ईश्वर को खोजें नहीं, स्वयं में खोदे

ईश्वर को जो किसी वस्तु की भाँति खोजते हैं, वे नासमझ हैं। वह तो वस्तु है ही नहीं। वह तो आलोक, आनंद और अमृत के परम अनुभव का नाम है। ईश्वर न तो विषय है, न वस्तु और न ही व्यक्ति कि जिसे कहीं बाहर खोजा या पाया जा सके। वह तो अपनी ही चेतना का आत्यंतिक परिष्कार है।

सूफी फकीर जुन्नैद से किसी ने पूछा, ‘ईश्वर है तो दिखाई क्यों नहीं देता?’ जुन्नैद ने कहा, ‘ईश्वर कोई वस्तु तो है नहीं, वह तो अनुभूति है। उसे देखने का कोई उपाय नहीं । हाँ, अनुभव करने का अवश्य है।’ फकीर जुन्नैद की ये बातें प्रश्नकर्ता को संतुष्ट न कर सकीं। तब उन्होंने पास में ही पड़ा एक पत्थर उठाया और अपने पाँव पर पटक लिया उनके पाँव को गहरी चोट आई और उससे खून की धारा बहने लगी। प्रश्नकर्ता व्यक्ति इसे देखकर हैरान हो गया और बोला, ‘यह क्या किया आपने? इससे क्या आपको पीड़ा नहीं होगी? ‘फकीर जुन्नैद हँसते हुए बोले, ‘पीड़ा दिखती नहीं, फिर भी है। ऐसे ही ईश्वर भी है।’

जीवन में जो दिखाई पड़ता है, उसकी ही नहीं, उसकी भी सत्ता है, जो नहीं दिखाई पड़ता। दृश्य से उस अदृश्य की सत्ता बहुत गहरी है। क्योंकि उसे अनुभव करने के लिए स्वयं के अस्तित्व की गहराई में उतरना जरूरी होता है। तभी वह पात्रता उपलब्ध होती है, जो उसे छू सके, देख सके और जान सके। साधारण इंद्रियाँ नहीं, उसे पाने के लिए तो अनुभूति की गहरी संवेदनशीलता अर्जित करनी पड़ती है। तभी उसका साक्षात्कार होता है और तभी मालूम पड़ता है कि वह कहीं बाहर नहीं, जो उसे देखा जा सके, वह तो भीतर है, वह तो देखने वाले में ही छिपा है।

सच तो यह है कि ईश्वर को खोजना नहीं, खोदना होता है। जो स्वयं में ही उसे खोदते चले जाते हैं, अंत में वे अपने अस्तित्व के मूल स्रोत और चरम विकास के रूप में अनुभव करते हैं। तो बस सार यही है कि ईश्वर को बाहर नहीं खोजें, स्वयं में खोदें।


अगस्त-सितंबर 2002 के पर्व-त्योहार

4 अगस्त, 2001 रक्षाबंधन/श्रावणी उपाकर्म

7 अगस्त, 2001 बहुला चौथ व्रत

10 अगस्त, 2001 हल पष्ठी

12 अगस्त, 2001 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

15 अगस्त, 2001 स्वतंत्रता दिवस

21 अगस्त, 2011 हरितालिका तीज

22 अगस्त, 2001 श्री गणेश चतुर्थी

23 अगस्त, 2001 ऋषि पंचमी

30 अगस्त, 2001 वामन जयंती

1 सितंबर, 2001 श्री अनंत चतुर्दशी

2 सितंबर, 2001 भाद्रपद पूर्णिमा, महालयारंभ/महाप्रयाण वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा

3 सितंबर, 2001 पितृपक्ष प्रारंभ

5 सितंबर, 2001 शिक्षक दिवस

7 सितंबर, 2001 जयंती माता भगवती देवी

25 सितंबर, 2001 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जयंती

27 सितंबर, 2001 सोमवती अमावस्या / विश्वकर्मा पूजा

28 सितंबर, 2001 मलमास प्रारंभ


ब्रह्मांड की टोह हेतु चल रहे दुरसाहसी प्रयास

भूख चाहे पेट की हो या संपदा की, जब वह जाग्रत होती है, तो व्यक्ति को सहज-सामान्य नहीं रहने देती, इतना व्याकुल बनाती है, मानो कहीं से उसे अजस्र तृप्ति हाथ लग जाए और क्षुधा शाँत हो।

जठरानल शरीर का स्वाभाविक धर्म हैं। उसकी पूर्ति तो कहीं-न-कहीं से, किसी-न-किसी प्रकार होती ही रहती है, पर संपत्ति की भूख ऐसी है, जिसका कोई अंत नहीं, जब वह उद्बुद्ध होती है, तो ‘और-और’ की रट लगाए रहती है एवं जीवनपर्यंत चैन नहीं लेने देती।

व्यक्ति की तरह राष्ट्रों की भी वैभव की अभीप्सा अप्रतिम है। निर्धन देश तो अपनी गरीबी ही से लड़ाई लड़ने में लगे हुए हैं, किंतु अमीर देशों की भूख और पेट बढ़ता जा रहा है। उनके लिए उपलब्ध धन पर्याप्त नहीं, उन्हें विपुल वैभव चाहिए। यह कैसे और कहाँ से मिले?

इसके लिए उन्होंने प्रकृति के संसाधनों का बुरी तरह दोहन किया। धरती को निचोड़ा। जितना रस निकल सकता था, निकाल लिया। फिर समुद्र को मथा। वहाँ जो कुछ प्राप्त हो सकता था, उसे निर्ममतापूर्वक लूट लिया। अब उन्हें यह लगने लगा है कि समुद्र निःसत्व हो गए और धरती रत्नगर्भा नहीं रही, तो उन्होंने आकाश की ओर दृष्टि उठाई और पृथ्वी के समीपवर्ती खगोलीय पिंडों को अपना पहला निशाना बनाया। उन पर यान और उपग्रह भेजे जाने लगे और वहाँ के वातावरण और परिस्थिति के साथ-साथ उनकी मिट्टी का विश्लेषण-अध्ययन किया जाने लगा। इन अध्ययनों से वैज्ञानिक आश्चर्यचकित रह गए। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि इन पिंडों की धरती पर तो अरबों-खरबों डॉलर की लोहा, सोना, प्लैटिनम जैसी बहुमूल्य धातुएँ विद्यमान हैं, तो उन्हें पाने की योजनाएँ बनने लगीं। धनाढ्य देश इस दिशा में सबसे आगे हैं। वे अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को निरंतर विकसित करते जा रहे हैं, जिसका अंतिम लक्ष्य एक ही है कि अधिक-से-अधिक ग्रह-उपग्रहों पर वे अपना वर्चस्व स्थापित कर उस पर अधिकार कर सकें। इस अभियान को ‘गोल्ड रश टु स्पेस’ नाम दिया गया है। अमेरिका की एशफोर्ड कंपनी इस क्षेत्र में अग्रणी है। उसने इस काम के लिए ‘ब्रिस्टल’ नामक एक अंतरिक्ष यान तैयार कर रखा है, जिसे इस वर्ष किसी भी समय छोड़ा जा सकता है। योजनानुसार इसे पृथ्वी के किसी समीपस्थ पिंड पर भेजना जाएगा। वहाँ जाकर इसके उपकरण उसकी धरती की खुदाई करेंगे और उस मिट्टी को वापस पृथ्वी पर लाएँगे। यहाँ उससे खनिजों का दोहन किया जाएगा। अनुमान है कि यह स्पेस शटल सौ किग्रा. वजन ले जाने और उतना ही माल वापस लाने में सक्षम होगा। इसमें विशुद्ध एक करोड़ डॉलर लाभ की उम्मीद है। इस संपूर्ण परियोजना में 5 करोड़ लागत आने का आकलन किया गया है।

ऐसी ही एक परियोजना में संलग्न 50 वर्षीय कंप्यूटर विशेषज्ञ और परियोजना अध्यक्ष डॉ. जे.एफ. बेन्सन का कहना है कि उसकी परियोजना में खनिजों को लाने का काम हाथ में नहीं लिया गया है, वरन् उसके यान अलग-अलग ग्रह-उपग्रहों में जाकर खनिज संपदाओं का पता लगाएँगे और यह जानकारी एकत्रित करेंगे कि उक्त संपदा पूरे ग्रह पिंड में बिखरी पड़ी है या किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित है। यह सूचना दूसरे को बेचकर कंपनी धन कमाएगी।

करोड़ों डॉलर की कमाई इसी से हो जाएगी। इसके अतिरिक्त अंतरिक्ष भ्रमण को पर्यटन व्यवसाय के रूप में विकसित कर भी वैभव कमाने की उसकी योजना है। अगले दस वर्षों में यह व्यवसाय चल निकलेगा, ऐसा अनुमान है।

ग्रह-पिंडों को जानने-समझने की जिज्ञासा मनुष्य की कोई नई नहीं है। संपूर्ण अंतरिक्ष ही उसके लिए सदा से कुतूहल का विषय रहा है। पूर्व में जब विज्ञान का दखल अंतरिक्ष क्षेत्र में नहीं था, तो सब कुछ अनुमान-आकलन पर ही चल रहा था, किंतु पिछले दशकों में जब उसके यान-उपग्रह आकाश की दूरियाँ नापने लगे, तो ही ग्रहगोतकों की वास्तविक जानकारी उपलब्ध हो सकी। इस संदर्भ में विगत कुछ दशाब्दियों में कई यान चाँद और मंगल जैसे निकटस्थ पिंडों पर भेजे गए, लेकिन जो उपलब्धि अमेरिकी अपोलो अभियान से अर्जित हुई, वह कई अर्थों में महत्वपूर्ण थी। यह पहला अवसर था, जब किसी बाहरी ग्रह पर मनुष्य के पाँव पड़े थे। चंद्र धरातल की संरचना समझने में इसने काफी मदद पहुँचाई। पहली बार यह ज्ञात हुआ कि चंद्रमा की अंतःभित्ति (कोर) ‘लोहा’ और ‘निकेल’ जैसी धातुओं से निर्मित है। 140 कि.मी. मोटी बाह्य भित्ति ‘पेरिडोसाइस’ से बनी है, जबकि 60 कि.मी. मोटा भूपटल (क्रस्ट) ‘एनोथ्रोसाइट’ एवं ‘बाँसाल्ट’ युक्त है। यद्यपि वहाँ न कोई जलयोजित (हाइड्रेटेड) खनिज है, न कोई हाइड्रोक्सी समूह युक्त रवादार संरचना, जबकि पृथ्वी पर ऐसी पदार्थ प्रचुर परिमाण में है। इतने पर भी चंद्र तल पर जितना कुछ है, वह कम नहीं है। ऐसे में अमीर देशों के बीच वहाँ पहुँचने, बसने और वहाँ के संसाधनों का दोहन करने की प्रतिस्पर्द्धा स्वाभाविक ही है। इसमें एक ही अड़चन सामने आ रही है, जल की कमी। फिर भी इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं मान लिया जाना चाहिए, कारण कि शोध-अनुसंधान अब भी जारी हैं। इस क्रम में हाल ही में ‘नासा’ के वैज्ञानिकों ने वहाँ पानी होने की संभावना के बारे में एक सनसनीखेज घोषणा की है। पर कई ओर से इस घोषणा को चुनौती मिल रही है। इसमें अग्रणी हैं, राँची विश्वविद्यालय के भू-गर्भ विज्ञान के वैज्ञानिक एवं ‘जियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया’ के फेलो डॉ. नीतिश प्रियदर्शी। उनका कहना है कि चंद्रमा संबंधी कुछ तथ्यों पर यदि हम ध्यान दें, तो पाएँगे कि पृथ्वी एवं चाँद की सूर्य से औसत दूरी एक ही है, पर चंद्रमा के पास पृथ्वी की भाँति वायुमंडलीय ताप संरक्षण की प्रक्रिया नहीं है, इसलिए इसकी सतह का तापमान 125 डिग्री से.ग्रे0 (सूर्य प्रकाशित क्षेत्र में) से माइनस 160 डिग्री से.ग्रे. (अप्रकाशित रात्रि क्षेत्र ) के बीच ही रहता है। चंद्रमा के आँतरिक सतह से जो गैस निकलती है, वह बनने के तुरंत बाद अंतरिक्ष में लुप्त हो जाती है, क्योंकि चाँद की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पृथ्वी का 16.5 प्रतिशत) काफी क्षीण है। इसके कारण वायुमंडल को बनाए रखने में यह अक्षम है। ऐसे में जल संबंधी ‘नासा’ की वर्तमान अवधारण सही नहीं लगती, फिर भी किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले चंद्र-धरातल का भू-गर्भीय एवं भू-रासायनिक विश्लेषण आवश्यक है।

डॉ. प्रियदर्शी की इस आपत्ति से वहाँ बसने वालों को कुछ निराशा अवश्य हुई है, पर वहाँ की संपदा बटोर लाने में यह कोई बड़ी बाधा नहीं है। अत्याधुनिक उपकरणों से लैस मानवयुक्त चंद्रयान कुछ दिन रुककर वहाँ की ढेर सारी मिट्टी खोदकर पृथ्वी पर ला सकता है। इस अयस्कों से धातुएँ प्राप्त कर ली जाएँगी।

डॉ. प्रियदर्शी के मत को स्वीकार लेना अभी जल्दबाजी होगा, कारण कि अमेरिका का ‘प्रोस्पेक्टर’ यान अब भी वहाँ अपने खोजी यंत्रों और यंत्र मानवों द्वारा खुदाई और जाँच कार्य में लगा हुआ है। जल संबंधी संभावना का अनुमान अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इसी के द्वारा जुटाई गई सूचनाओं के आधार पर लगाया है। इसकी पुष्टि ‘अपोला’ अभियान द्वारा लाए गए 372 टन पत्थरों के अध्ययन भी करते हैं। न्यूट्रॉन स्पेक्ट्रोमीटर ने इनमें उपस्थित हाइड्रोजन अणुओं को आसानी से पहचान लिया है। इससे इस बात की संभावना प्रबल हो जाती है कि चंद्र-तल पर जल भले ही न हो, पर उसके गर्भ में, विशेषकर दक्षिण ध्रुव प्रदेश की गहरी खाइयों में बर्फ की चट्टान के रूप में पानी विद्यमान होना चाहिए। यदि यह सत्य साबित हुआ, तो चंद्रमा को स्टेशन के रूप में विकसित करने का संपन्न देशों का सपना साकार हो उठेगा। तब जल और ऑक्सीजन दोनों की पूर्ति बर्फ द्वारा आसानी से हो जाएगी। इससे दूसरे खगोलीय पिंडों में संपदा की खोज-यात्रा भी सरल साबित होगी। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल बहुत कम है, अतएव वहाँ से दूसरे ग्रहों के लिए यान प्रक्षेपण बहुत कम ऊर्जा में सफलतापूर्वक संभव हो जाएगा। बड़े देश इस चंद्र-अभियान में कितने सफल सिद्ध होते हैं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। अभी तो यह सब संभावना मात्र है।

मंगल ग्रह की परिस्थितियाँ पृथ्वी से काफी मिलती-जुलती हैं, इसलिए वैज्ञानिक शुरू से ही वहाँ किसी-न-किसी स्तर के जीवन की संभावना की बात करते रहे हैं। यह बात पृथक है कि अब तक इसकी पुष्टि नहीं हो सकी हैं, पर इस संभाव्यता को आज भी पूरी तरह निरस्त नहीं किया गया है और क्षीण ही सही, वैज्ञानिकों के एक वर्ग ने इन दिनों भी यह आशा लगा रखी है कि वहाँ जीवन के प्रमाण कभी-न-कभी जरूर मिलेंगे। पिछले वर्ष अमेरिका का सोजोर्न यान अपने ‘पाथफाइंडर’ रोबोट के साथ वहाँ उतरा और वहाँ की मिट्टी के बहुत सारे नमूने इकट्ठे किए। इसके अध्ययन से ज्ञात हुआ कि धरती की ही तरह वहाँ की मिट्टी में सिलिकॉन एल्युमिनियम और पोटैशियम बड़ी मात्रा में मौजूद है। वहाँ के वातावरण में ऑक्सीजन भी उपलब्ध है, पर अतीव न्यून परिमाण में। वहाँ के धरातल पर नदियों और समुद्रों के चिन्ह मिले है। वाइकिंग-1 एवं 2 अभियानों के भी यही निष्कर्ष थे।

इससे पूर्व रूसी यानों ने भी उस ग्रह की टोह ली थी। वे भी किसी प्रकार के जीवन की खोज तो न कर सके, पर वहाँ विद्यमान खनिज की प्रचुरता की जानकारी अवश्य दी थी। इस आधार पर उस अभियान के अगुआ रूसी वैज्ञानिक ब्लादिमिर जेरोकोविच ने कहा था कि कभी पृथ्वी के खनिज संपदा की कमी को पूरा करने में मंगल की धरती बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। शायद वह समय अब आ पहुँचा है, जब खगोलीय पिंडों पर इसकी तलाश की जाने लगी है।

इसके अतिरिक्त शनि के चंद्रमाओं के अध्ययन के लिए और यह पता लगाने के लिए कि वहाँ की धरती पर कौन-कौन से खनिज हैं, अमेरिका ने पिछले दिनों 350 करोड़ डॉलर से निर्मित ‘कासिनी’ नामक अंतरिक्ष यान शनि की ओर भेजा है। पृथ्वी से 2.2 खरब मील दूर स्थित शनि की कक्षा में वह सन् 2004 में पहुँचेगा और उसकी 84 बार परिक्रमा करेगा। इस मध्य वह शनि के गैसीय वलय एवं उसके उपग्रहों का अध्ययन करेगा। अंत में वह शनि के सबसे बड़े चंद्रमा ‘टाइटन’ के 85 चक्कर लगाकर उसकी धरती पर एक छोटा यान उतारेगा, जिसमें एक खोजी रोबोट और गाड़ी भी साथ होगी। रोबोट वहाँ के मिट्टी-पत्थरों के नमूने उठाकर गाड़ी में भरता जाएगा। बाद में सभी को ऊपर चक्कर काटते मुख्य यान में बुला लिया जाएगा, जहाँ से वे पुनः पृथ्वी की ओर प्रस्थान करेंगे। यहाँ उन नमूनों का विश्लेषण कर यह पता लगाया जाएगा कि वहाँ कौन-कौन सी धातुएँ विद्यमान हैं।

उल्लेखनीय है कि टाइटन की परिस्थितियाँ पृथ्वी जैसी ही पहचानी गई हैं। अब से लगभग साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी जिस प्रकार की थी, टाइटन को वैसा ही पाया गया है। इसके अतिरिक्त उसके चारों और पानी युक्त बादल भी देखे गए हैं। अतः वैज्ञानिक यह जानने को उत्सुक हैं कि पृथ्वी के खनिज और वहाँ के खनिजों में कैसी समानता होगी? यदि असमानता हुई, तो वह किस स्तर की होगी? क्या बिलकुल नई धातुएँ भी वहाँ पाई जा सकती हैं एवं वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न कर उन्हें पृथ्वी पर बनाया जा सकना संभव है क्या ? यह तो समय ही बताएगा कि इनमें से कौन-सी संभावना सत्य साबित होगी और पृथ्वीवासियों के लिए वहाँ की संपदा किस प्रकार उपयोगी बन सकेगी?

हैं। कदाचित् वह अपने मिशन में असफल हो पाए और किसी कारण से लक्ष्य-पूर्ति न कर सके, इस आशंका को ध्यान में रखकर वैज्ञानिकों ने इसका जुड़वाँ वोएजर-2 भी छोड़ा है, जो वोएजर-1 से पाँच साल पीछे चल रहा है। यह मिशन अपने प्रयोजन में कहाँ तक सफल होगा, बता पाना कठिन है।

वैभव हर एक को चाहिए, चाहे वह व्यक्ति हो, समाज या राष्ट्र हो। उस पर ही उसका भावी विकास निर्भर है, पर संपदा की इस खोज-यात्रा में हमें यह बात भी सुनिश्चित करनी पड़ेगी कि धन की खोज में हम कहीं अपना संपूर्ण धन ही न गँवा बैठें और कंगाल न हो जाएँ। इसे ध्यान में रखकर ही कोई राष्ट्र अंतर्ग्रहीय वैभव का खोज-अभियान सफल-सार्थक बना सकता है। इससे कम में नहीं।


Quotation

मनुष्य के सद्गुणों में सज्जनता और कृतज्ञता दो सबसे बड़े गुण हैं।

जीवन को परमशक्ति संपन्न बनाने के तीन आधार हैं-आत्मसंयम, आत्मविश्वास और आत्मज्ञान।


उसी के अनुरूप (kahani)

भीष्म पितामह ने राजकुमारों को शिक्षा-दीक्षा के लिए एक जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई थीं। पाँडवों ने उनमें से शालीनता-सहयोग का मार्ग चुना, कौरवों ने उद्दंडता और द्वेष का। दोनों ने मार्ग के अनुसार गति पाई। भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों को चुनाव का समान अधिकार दिया था। एक ने साधन-वैभव, सेना की चाह की, दूसरे ने मार्गदर्शन की। जो मार्ग चुना गया, उसी के अनुरूप गति मिली।


सँभालो जीवन की जागीर को

तर्कशास्त्र के महान् पंडित श्री रामनाथ जी नवद्वीप के समीप निर्जन वन में विद्यालय स्थापित कर अनवरत विद्या का दान करने लगे। यह अठारहवीं सदी का समय था। उस समय में कृष्णनगर में महाराज शिवचंद्र का शासन था। महाराज शिवचंद्र नीतिकुशल शासक होने के साथ ही विद्यानुरागी भी थे। उन्होंने भी पं. श्री रामनाथ की कीर्ति सुनी। पर साथ में उन्हें यह जानकर भारी दुःख हुआ कि ऐसा महान् एवं उदभट विद्वान गरीबी में फटेहाल दिन काट रहा है। महाराज ने स्वयं जाकर स्थिति का अवलोकन करने का विचार किया। पर वह जब पंडित जी की झोंपड़ी में पहुँचे तो वे यह देखकर हैरान रह गए कि पंडित जी बड़े ही शाँत भाव से विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं।

महाराज को देखकर पं. रामनाथ जी ने उनका उचित स्वागत किया। कुशल-क्षेम के उपरांत कृष्णनगर नरेश ने उनसे पूछा, ‘पंडित प्रवर । मैं आपकी क्या मदद करूं?’ पंडित रामनाथ जी ने कहा, ‘राजन्। भगवत्कृपा ने मेरे सारे अभाव मिटा दिए हैं, अब मैं पूर्ण हूँ। ‘राजा शिवचंद्र कहने लगे, ‘विद्वत्वर । मैं घर खरज के बारे में पूछ रहा हूँ। संभव है घर खरज में कोई कठिनाई आ रही हो?’

पंडित रामनाथ जी ने राजा शिवचंद्र की ओर एक ईषत् दृष्टि डाली और फिर किंचित् मुस्कराए। उनकी दृष्टि और मुस्कान का यह सम्मिलित प्रकाश ब्राह्मणत्व का वैभव बिखेर रहा था, पर कृष्णनगर नरेश इससे अनजान थे। उनका प्रश्न यथावत था। उनकी जिज्ञासा पर्ववत थी। वह पंडित जी को कुछ देने के लिए उत्सुक-उतावले थे।

महाराज शिवचंद्र की मनःस्थिति को भाँपकर रामनाथ जी कहने लगे, ‘राजन्। घर के बारे में, घर के खरचों के बारे में गृहस्वामिनी मुझसे अधिक जानती है। यदि आपको कुछ पूछना हो तो उन्हीं से पूछ लें।’

कृष्णनगर नरेश पंडित जी के घर गए और पं. रामनाथ जी की साध्वी गृहिणी से पूछा, ‘माताजी घर खरच के लिए कोई कमी तो नहीं है?’

अनुसूया, मदालसा की परंपरा में निष्णात् उन परम साध्वी ने कहा, ‘महाराज। भला सर्व समर्थ परमेश्वर के रहते उनके भक्तों को क्या कमी रह सकती है?’

‘फिर भी माताजी।’ लग रहा था कि राजा शिवचंद्र कुछ अधिक ही जानने को उत्सुक हैं।

‘महाराज। कोई कमी नहीं है। पहनने को कपड़े हैं, सोने के लिए बिछौना है। पानी रखने के लिए मिट्टी का घड़ा है। खाने के लिए विद्यार्थी सीधा ले आते है। झोपड़ी के बाहर खड़ी चौलाई का साग हो जाता है और भला इससे अधिक की जरूरत भी क्या है? यही कारण है कि हमें तंगी नहीं प्रतीत होती।’

उस वृद्ध नारी के ये वचन सुनकर महाराज मन-ही-मन श्रद्धानत हो गए। फिर भी प्रकट में उन्होंने आग्रह किया, ‘देवि। हम चाहते हैं कि आपको कुछ गाँवों की

जागीर प्रदान करें। इससे होने वाली आय से गुरुकुल भी ठीक तरह से चल सकेगा और आपके जीवन में भी कोई अभाव नहीं होगा।’

उत्तर में वह वृद्धा ब्राह्मणी मुस्कराई और कहने लगी, ‘राजन्। प्रत्येक मनुष्य को परमात्मा ने जीवनरूपी जागीर पहले से ही दे रखी है। जो जीवन की इस जागीर को भली प्रकार सँभालना सीख जाता है, उसे फिर किसी चीज का कोई अभाव नहीं रह जाता।’

इस संतुष्ट और श्रुत साधक दंपत्ति के चरणों में नरेश का मस्तक श्रद्धा से झुक गया।


ड्यूटी से न हटा (kahani)

इटली के पोम्पियायी नगर में अब से दो सौ वर्ष पूर्व एक भयंकर भूकंप आया, साथ ही ज्वालामुखी भी फटा। नगर के सभी नागरिक प्राण बचाने के लिए भागे, तो भी उस विनाशलीला की चपेट में असंख्यों आ गए।

जब उस नगर की पुरातत्व विभाग ने खुदाई कराई, तो मात्र किले के एक प्रहरी का कंकाल इस स्थिति में पाया गया कि वह मुस्तैदी से कंधे पर बंदूक रखे पहरा देता रहा और मलबे में दब गया।

उस कर्तव्यनिष्ठ प्रहरी का कंकाल बंदूक समेत अब उन खंडहरों के प्रवेश द्वारा पर शीशे की आलमारी में बंद करके लगाया गया है। नीचे लिखा है, ‘वह कर्तव्यनिष्ठ, जिसने मौत को स्वीकार किया, पर ड्यूटी से न हटा।’


तिलक का विज्ञान एवं दर्शन

हिंदू परंपरा में मस्तक पर तिलक या टीका लगाना धार्मिक कृत्यों के साथ जुड़ा हुआ है। प्रत्येक शुभ अवसर पर ऐसा करना प्रसन्नता का, सात्विकता का, सफलता का चिन्ह माना जाता है। किसी महत्वपूर्ण कार्य या विजय अभियान में निकलने पर रोली, हल्दी, चंदन या कुँकुम का तिलक लगाया जाता है। उपासना में षट्कर्म का यह एक अभिन्न अंग है। तीर्थों में देवदर्शन हेतु उपस्थित होने पर वहाँ माथे पर तिलक लगाकर शुभकामना दी जाती है। पर्व-त्यौहारों में, मेहमानों के आगमन पर उन्हें तिलक धारण कराकर उनका स्वागत किया जाता है और मंगलकामना व्यक्त की जाती है। यह सब एक सामान्य और औपचारिक कृत्य जैसा लगते हुए भी इसका महत्व असाधारण है। इसके दार्शनिक और विज्ञानिक पक्षों पर विचार करने से आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

भारतीय संस्कृति में कर्मकाँडों, परंपराओं, प्रथाओं को विनिर्मित करने वाले हमारे प्राचीन ऋषि एक साथ वैज्ञानिक भी थे और महान् दार्शनिक भी। इसलिए किसी भी शुभ प्रचलन की स्थापना में उन्होंने इन दोनों दृष्टियों को ध्यान में रखा, ताकि कोई एक पक्ष सर्वथा उपेक्षित और गौण न पड़ा रहे एवं दूसरे के दुरुपयोग की संभावना न बढ़ जाए। इसके पीछे संतुलन-समीकरण का प्रयोजन ही प्रमुख था, जिससे दोनों वर्ग के अनुयायी संतुष्ट हो सकें और स्थापना को समान महत्व दे सकें।

सर्वप्रथम इसके विज्ञान पक्ष को लें। ललाट में टीका या तिलक जिस स्थान पर लगाया जाता है, वह भ्रू-मध्य या आज्ञाचक्र है। शरीरशास्त्र की दृष्टि से यह स्थान पीनियल ग्रंथि का है। प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि प्रकाश से इसका गहरा संबंध है। प्रयोगों में जब किसी व्यक्ति की आँखों में पट्टी बाँधकर सिर को पूरी तरह ढक दिया गया और उसकी पीनियल ग्रंथि को उद्दीप्त किया गया, तो उसे मस्तक के अंदर प्रकाश की अनुभूति हुई। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि ध्यान-धारण के माध्यम से साधक में जो प्रकाश का अवतरण आज्ञाचक्र में होता है, उसका कोई-न-कोई संबंध इस स्थूल अवयव से अवश्य है। ऋषियों को यह तथ्य भलीभाँति विदित था, इसलिए उन्होंने टीका लगाने के प्रचलन को पूजा-उपासना के साथ-साथ हर शुभ कार्य से जोड़कर उसे धार्मिक कर्मकाँड का एक अविच्छिन्न अंग बना दिया, ताकि नियमित रूप से उस स्थान के स्पर्श से उसे उद्दीपन मिलता रहे और वहाँ से संबद्ध स्थूल-सूक्ष्म अवयव जागरण की प्रक्रिया से जुड़ सकें। यों तो अतींद्रिय शक्तियों के उन्नयन के लिए साधना विज्ञान में सुनिश्चित विधि-विधान और अभ्यास बताए गए हैं, पर ऐसे कठिन अभ्यास न तो सब के मनोनुकूल होते हैं, न हर एक का सहज रुझान इस ओर होता है। ऐसी स्थिति में क्या मनुष्य को लंबे समय तक पिछड़ी और अविकसित दशा में पड़ा रहने के लिए छोड़ दिया जाए?

नहीं। मानवता और समाज के प्रति जिसे तनिक भी लगाव होगा, वह औरों के विकास के बारे में जरूर सोचेगा। फिर ऋषि तो करुणा और संवेदना की प्रतिमूर्ति थे। यह भूल कैसे कर सकते थे। अस्तु, उन्होंने तिलक और टीके के माध्यम से जहाँ सर्वसाधारण की रुचि को धार्मिकता की ओर मोड़ना चाहा, वहीं उनकी आत्मिक प्रगति की दिशा में प्रथम चरण का द्वार भी खोल दिया। तिलक धारण वस्तुतः तृतीय नेत्र उन्मीलन की दिशा में एक आध्यात्मिक कदम है। किसी जन्म में इस रूप में इसकी मजबूत नींव पड़ जाने के उपराँत आगे के जन्मों में इस पर भव्य भवन की शुरुआत हो सकती है।

यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि दोनों भौंहों के बीच कुछ अतिरिक्त संवेदनशीलता होती है। इसे परीक्षा करके जाना जा सकता है। यदि हम आँखें बंद करके बैठ जाएँ और कोई व्यक्ति हमारे भ्रू-मध्य के एकदम निकट ललाट की और तर्जनी उँगली ले जाए, तो वहाँ हमें कुछ विचित्र अनुभव होगा। यही तृतीय नेत्र की प्रतीति है। इस संवेदना को हम अपनी उँगली भृकुटि-मध्य लाकर भी अनुभव कर सकते हैं। इसलिए इस केंद्र पर जब तिलक अथवा टीका लगाया जाता है, तो उससे आज्ञाचक्र को नियमित रूप से उत्तेजना मिलती रहती है। इससे सजग रूप में हम भले ही उसके जागरण के प्रति अनभिज्ञ रहें, पर अनावरण का वह क्रम अनवरत रूप से चलता रहता है।

तंत्रमार्ग में टीका सिर्फ परंपरावश नहीं लगाया जाता, वहाँ इसका प्रयोजन और गहन है। वह मार्थ पर इष्ट का प्रतीक है। इष्ट की स्मृति सदैव बनी रहनी चाहिए, भले ही संपूर्ण शरीर विस्मृत हो जाए। इस धारण के कारण मन बराबर उसी केंद्रबिंदु की ओर लगा रहता है। इसका परिणाम यह होगा कि शरीरव्यापी चेतना शनैः-शनैः आज्ञाचक्र पर एकत्र होने लगेगी। तिलक बिंदु पर उसका इकट्ठा होना ठीक वैसा ही है, जैसा आतिशी शीशे से सूर्य-किरणों को कागज के एक बिंदु पर केंद्रीभूत करना। इस एकत्रीकरण से कागज में आग लग जाती है। जो किरणों अब तक धूप के रूप में बिखरी हुई थीं, वे ही इकट्ठा होकर आग उत्पन्न कर देती हैं। यही बात यहाँ भी है। जब चेतना शरीर में फैली रहती है, तो शरीरचर्या के निमित्त प्रयुक्त होती रहती है, पर जब वही आज्ञाचक्र पर तिलक के माध्यम से एकत्र होती है, तो तीसरे नेत्र के जागरण का मार्ग प्रशस्त करती है। फिर हम स्थूल संसार से पृथक एक ऐसी दुनिया से जुड़ जाते हैं, जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘पारलौकिक जगत्’ और विज्ञान की भाषा में ‘परामानसिक जगत्’ कहते हैं।

योग विज्ञान के अनुसार पेड़ में कंद के स्थान से बहत्तर हजार नाड़ियाँ निकलकर शरीर के समस्त भागों में फैल जाती हैं। इनमें तीन प्रमुख हैं, इडा, पिंगला,सुषुम्ना। ये तीनों मेरुदंड मार्ग से ऊपर की ओर आती हुई मस्तिष्क के तीनों भागों का अलग-अलग स्पर्श करती हैं, तत्पश्चात् वहाँ से वह तीनों नाड़ियाँ रस्सी की तरह आपस में गुँथी हुई कपाल प्रदेश में ऊपर से नीचे की ओर जाती है। इसके बाद भ्रू-मध्य पर पृथक हो जाती हैं। सुषुम्ना आज्ञाचक्र या तीसरे नेत्र के स्थान पर अपनी यात्रा समाप्त कर देती है, जबकि इड़ा और पिंगला दोनों नेत्रों की कर्णिकाओं का स्पर्श कर उनकी रक्तवाहिनी तंतुओं के रूप में परिवर्तित हो जाती है। इन दोनों नाड़ियों का संबंध दोनों आँखों के माध्यम से जाग्रत और स्वप्नावस्था से है। इसके विपरीत सुषुम्ना का संबंध तीसरे नेत्र के माध्यम से सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत अवस्था से है। योगिजन भ्रू-मध्य में चित को एकाग्र कर सुषुम्ना मार्ग से इन्हीं अवस्थाओं के द्वारा अंतरजगत् में प्रवेश करते हैं। उस बिंदु पर तिलक धारण करने से एक प्रकार की मानसिक सजगता पैदा होती है, जिसे एकाग्रता की प्रारंभिक स्थिति कह सकते हैं अर्थात् जो कार्य साधक नियमित अभ्यास द्वारा संपन्न करते हैं, वह टीके के प्रयोग से कुछ अंशों में स्वयमेव संपादित हो जाता है। इस प्रकार तिलक आत्मोत्कर्ष का एक आधार बन जाता है। यह आधार आगे के जन्मों में और मजबूती ग्रहण करते हुए संस्कार का रूप धारण कर लेता है। फिर जो शुभारंभ तिलक के प्रतीक रूप में हुआ था, वह साधना-अभ्यास के रूप में परिपुष्ट होने लगता है। यह क्रम तब तक जारी रहता है, जब तक क्रिया पूरी न हो जाए अर्थात् आज्ञाचक्र के जागरण तक यह प्रयास-यात्रा चलती रहती है

साधना विज्ञान के आचार्यों ने पूर्व के इन अभ्यासों की पहचान मस्तक पर एक उथले-छोटे गड्ढे के रूप में बताई है। यदि कोई व्यक्ति अपने भ्रू-मध्य वाले भाग को उँगली से टटोलकर देखे, तो इसका स्पष्ट अनुभव होगा। गड्ढे के दोनों और दो उभार पड़ेंगे। यदि इसे दर्पण में देख जाए, तो वह एक अर्द्धचंद्राकार उभार के रूप में दृष्टिगोचर होगा।

यह विज्ञान पक्ष हुआ। तिलक का तत्वदर्शन अपने आप में अनेकों प्रेरणाएँ सँजोए हुए है। तिलक या त्रिपुँड प्रायः चंदन का होता है। चंदन की प्रकृति शीतल होती है। शीतल चंदन जब मस्तक पर लगाया जाता है, तो उसके पीछे भाव यह होता है कि चिंतन का जो केंद्रीय संस्थान मस्तिष्क के रूप में खोपड़ी के अंदर विराजमान है, वह हमेशा शीतल बना रहे, उसके विचार और भाव इतने श्रेष्ठ हों कि अपनी तरह औरों को भी वह शीतलता, शाँति और प्रसन्नता प्रदान करता रहे।

तिलक का महत्व जनजीवन में इतना अधिक है कि जब भी कोई महत्वपूर्ण, सम्मानसूचक, प्रसन्नतादायक घटना घटती है, तो माथे पर इसे लगा दिया जाता है। विवाह हो रह हो तो तिलक हो, कोई युद्ध पर जा रहा हो तो तिलक हो कोई युद्ध से विजयी होकर लौट रहा हो तो तिलक हो अर्थात् कोई भी सुखमय घटना हो, उसके साथ तिलक का अविच्छिन्न संबंध जोड़ दिया जाता है। ऐसा इसलिए कि वह आनंद चिरस्मरणीय बना रहे। मानवी चित का यह एक विचित्र स्वभाव है कि वह सुख को, प्रसन्नता को, आनंद को हमेशा याद रखना चाहता है, जबकि कटु प्रसंगों को, दुःख को भूल जाना चाहता है। इसलिए हमें अपने पिछले दिन सुखमय प्रतीत होते है। वृद्धजन अक्सर कहते सुने जाते है कि बचपन सुखद और सुँदर था। यह स्वाभाविक ही है, कारण कि मन दुःख को छोड़ देता है और सुख की शृंखला को बनाए रखता है। कोई बालक यह कभी नहीं कहता कि बचपन सुखद है। वह बड़ा होना चाहता है। बड़ों की तरह रहना, घूमना, पहनना, खाना, बातचीत करना चाहता है इसमें उन्हें आनंद आता है। इसलिए वे अक्सर उनकी नकल करते हैं। किसी को पूजा करते देखा, वह भी वैसा करने लगता है, किसी को हुक्का पीता देख, वह उसका अभिनय करता है, क्योंकि वह जानता है, यह बड़े होने के लक्षण हैं। इसमें वह प्रसन्नता अनुभव करता है। इसी प्रसन्नता के प्रतीक के रूप में तिलक माथे में विराजमान होता है।

तिलक के साथ सुख को जोड़ने का भारतीय संस्कृति का अपना प्रयोजन है, जब कल्पना में सुख बड़ा हो जाए, तो उसके साथ तिलक भी बड़ा हो जाए। सुख की याद आए तो साथ-साथ तिलक की भी स्मृति जाग्रत् हो। स्मरण का प्रभाव धीरे-धीरे आज्ञाचक्र से संबंधित हो जाता है। जब ऐसा हो जाता है, तो समझना चाहिए कि तीसरी आँख को जगाने के लिए सुख का उपयोग हुआ। हम सुख की धारा का उपयोग उसे चोट करने के लिए करते है। यह चोट जितने मार्गों से मिल सके उतनी उपयोगी है।

विवाहित स्त्रियाँ माँग में सिंदूर और माथे पर बिंदी लगाती हैं। बिंदी टीके का रूप है, वैसे ही माँग का सिंदूर तिलक का प्रतीक है। किंतु यहाँ इन्हें परिणीता के सुहाग के साथ जोड़ दिया गया है। यह अक्षत सुहाग के चिन्ह हैं। इनमें समर्पण और निष्ठा का भाव छुपा हुआ है। यह इस बात के प्रतीक हैं कि अब विवाहिता का अनुगत भाव पूर्णरूपेण पति की ओर है। वह उसकी समर्पिता है। अब उसके नारीत्व पर कोई बाधा नहीं पड़ेगी इसलिए पत्नी को पति के जीवित रहने तक इन्हें धारण करना पड़ता है। उसके मरते ही इन्हें हटा देने का विधान है। ऐसा इसलिए कि अब किसी के प्रति उसके अनुगत और समर्पण भाव का प्रश्न ही नहीं है। समझा जाता है कि वह विधवा हो गई, इस कारण से ऐसा किया गया है। नहीं, यह बात नहीं है। उसके पीछे गहरा प्रयोजन है। अब वह किसके अनुगत हो? अनुगत होने का प्रश्न ही नहीं है। सचाई तो यह है

कि अब उसे स्त्री की तरह नहीं, पुरुष की तरह जीना पड़ेगा। एक विधवा का जीवन पुरुष के जीवन के ही समान होता है, इसमें संदेह नहीं। अतएव वैधव्य में इन्हें मिटा दिया जाता है।

तिलक द्रव्य के रूप में भिन्न भिन्न प्रकार की वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। श्वेत और रक्तचंदन भक्ति के प्रतीक हैं। इनका इस्तेमाल भजनानंदी किस्म के लोग करते हैं। केशर एवं गोरोचन ज्ञान तथा वैराग्य के प्रतीक हैं ज्ञानी तत्वचिंतक और विरक्त हृदय वाले लोग इसका प्रयोग करते हैं। कस्तूरी ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, प्रेम, सौंदर्य, ऐश्वर्य सभी का प्रतीक है। परम अवस्था प्राप्त योगिगण इसका इस्तेमाल करते हैं।

तिलक धारण हेतु भिन्न-भिन्न उद्देश्यों के लिए अलग-अलग उँगलियों के प्रयोग का विधान है। ज्ञान की उपलब्धि के लिए तर्जनी, ऐश्वर्य के लिए मध्यमा, धन-वैभव, सुख-शाँति के लिए अनामिका उँगली विहित है। तर्जनी से लाल या श्वेत चंदन का टीका, मध्यमा से सिंदूर का, अनामिका से केशर, कस्तूरी, गोरोचन का टीका लगाना चाहिए। इनके लिए क्रमशः पर्व दिशा, उत्तर दिशा और पश्चिम दिशा निर्धारित हैं। इस ओर मुँह करके ही इनका तिलक धारण करना चाहिए। अँगूठे से भी चंदन तिलक करने की परंपरा है। ऐसा वे ही लोग करते हैं, जो सभी धर्म और संप्रदाय के प्रति समान दृष्टि रखते हैं। काले टीके का प्रयोग कापालिक लोग करते हैं।

इस प्रकार तिलक या टीका एक धार्मिक प्रतीक होते हुए भी उसमें विज्ञान और दर्शन का साथ-साथ समावेश है। इनको समझ सकें और उनकी शिक्षाओं को आत्मसप्त कर सकें तो ही उसकी सार्थकता हैं। इससे कम में नहीं


Quotation

मधुमक्खी का आदर इसलिए नहीं होता कि वह श्रम करती है वरन् इसलिए होता है कि वह दूसरों के लिए श्रम करती है।


रूप में ढला (kahani)

राजा दिलीप राज्यकार्य से समय निकालकर देश के विभिन्न आश्रमों-आरण्यकों में जाते थे। तेजस्वी राजकुमार रघु किशोर हो गए, तो उन्हें भी साथ ले जाने लगे।

एक बार रघु ने सहज जिज्ञासावश पूछा, ‘पिताजी, आप महत्वपूर्ण राज्य कार्यों की तरह ही आश्रमों में जाने का ध्यान रखते हैं। ऋषियों को उच्चतम अधिकारियों से भी अधिक सम्मान देते हैं, जबकि प्रत्यक्ष में उनकी उपयोगिता दिखती नहीं है।’

राजा बोले, ‘वत्स। ठीक प्रश्न किया। राज्य की आदर्श व्यवस्था हम चलाते हैं। उसका श्रेय भी हमें मिलता है। पर ऋषिगण ऐसे व्यक्तित्व गढ़ते हैं, जो आदर्श व्यवस्था की योजना बना सकें, उसे क्रियान्वित कर सकें। यदि ऐसे व्यक्ति न बनें, तो लाख प्रयास करने पर भी व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाए। जिनके कारण यह तंत्र व्यवस्थित चल रहा है, उनके निर्माताओं का जितना सम्मान किया जाए, उन पर जितना ध्यान दिया जाए, कम है। मेरा चिंतन और मेरी सामर्थ्य तथा तुम्हारा व्यक्तित्व भी ऋषिकृपा से ही इस रूप में ढला है।’


पर्व ब्रह्ममयं जगत्

प्रगति के पथ पर अग्रसर होते हुए जड़ तत्व चेतन बनने की दिशा में क्रमिक विकास कर रहे हैं। यह एक तथ्य है। सुविकसित प्राणी-चेतना जैसी प्रखर चेतना भले ही उनमें न हो, पर किसी मात्रा में वह स्फुल्लिंग विद्यमान अवश्य है, जो चेतना का सूक्ष्म-सा परिचय देते हैं और जड़ता से मुक्ति पाकर चेतना के चरम लक्ष्य की ओर रेंगते चलने का आभास दिलाते हैं।

जड़-चेतन में भगवान की सत्ता के विद्यमान होने का परिचय इसी दृष्टि से प्राप्त किया जा सकता है कि चेतन के स्तर की न सही, एक हलकी-सी झाँकी उनमें आगे बढ़ने की, ऊपर उठने की, विकसित होने की आकांक्षा के रूप में पाई जाती है। इस अंश को ईश्वरीय चेतन सत्ता की विद्यमानता के रूप में लिया जा सकता है।

हलचल धातु-पाषाण जैसे जड़ पदार्थों में भी पाई जाती है। कोई भी वस्तु पूर्णतया निष्क्रिय नहीं है। उसके परिवर्तन आँखों से भी देखे जा सकते हैं। बारीकी से देखने पर अणु-संरचना के भीतर चल रही अत्यंत द्रुतगामी हलचलें तो धूल के छोटे कण में भी पाई जा सकती हैं। इस सक्रियता को भी ईश्वरीय अंश माना जा सकता है।

साधारणतया जीवन को वनस्पति वर्ग और प्राणिवर्ग में बाँटा जा सकता है, पर सर्वथा निर्जीव कहे जाने वाले धातु-पाषाण जैसे पदार्थ में भी प्रसुप्त चेतना का एक अंश पाया जाता है। ऐसी दशा में असमंजस खड़ा हो गया है कि क्या जड़-पदार्थों को भी भला जीवन क्षमता संपन्न प्राणियों में ही गिना जाएगा। मनुष्य यों प्राणिवर्ग में ही आता है, पर असाधारण बुद्धिमता, मस्तिष्कीय संरचना, इंद्रिय चेतना और शरीर-गठन को देखते हुए एक अतिरिक्त चतुर्थ चेतना वर्ग की गणना करने की आवश्यकता प्रतीत होती है। भोजन को ऊर्जा में बदल सकने की क्षमता वाले को जीवधारी मानने वाली परिभाषा अब बहुत पुरानी हो गई हैं।

कोशिका में जीवनरस ‘प्रोटोप्लाज्म’ भरा होता है। उस रस में 12 तत्व मिले होते हैं, कार्बन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, सल्ल्र, कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नेशियम, लोहा, फास्फोरस क्लोरीन, सोडियम। इससे सिद्ध होता है कि जड़ पदार्थों का सम्मिश्रण जीवन तत्व की स्थिरता और प्रगति के लिए आवश्यक है। ऐसी दशा में इन रसायनों में भी जीवन की झाँकी की जाए, तो कुछ अनुचित न होगा।

एक जीवित प्राणी में अगणित जीवन तत्व विद्यमान रहते हैं। एक बूँद खून में हजारों सेल रहते हैं। रक्त में छोटी-छोटी लाला रक्त कणिकाएँ हैं,जिनमें हीमोग्लोबिन नामक लौह तत्व बहुलता से भरा होता है। इनसे कुछ कम संख्या में सफेद रक्त कोशिकाएँ हैं। ये रुग्णता के आक्रमण से लड़ती है। जिनमें आत्मरक्षा और प्रतिरोध से लड़ने का ज्ञान-विवेक मौजूद है, उन्हें अचेतन कैसे कहें? ऐसी दशा में जड़ माने जाने वाले शरीर की प्रत्येक कोशिका को एक स्वतंत्र जीवधारी और जड़ माने जाने वाले शरीर को चेतन घटकों का समूह-संगठन कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अणुविज्ञानी फ्रेड हायल और प्रो. जे.वी. नार्लिकर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि विश्व-रचना संबंधी अणुओं और मनुष्य शरीर के जीवाणुओं की संरचना में कोई मौलिक अंतर नहीं है, भले ही उनकी गतिविधियाँ भिन्न दिशाओं में चलती और भिन्न दिशाओं में काम करती दिखाई दें। इस दृष्टि से अणु भी चेतना के निकट ही जा पहुँचता है।

अणु क्या है? विज्ञान इसे पदार्थ का सूक्ष्म कण कहता है। यह जड़ है, पर अब जड़ की परिभाषा भी बदलने की आवश्यकता महसूस होने लगी है। केवल स्थिरता के आधार पर किसी को जड़ कहना उचित न होगा। जंतु जगत् में ‘स्पॉन्ज’ और ‘कोरल’ दो ऐसे प्राणी हैं, जो बाह्य दृष्टि से सर्वथा जड़ प्रतीत होते हैं, पर उनके अंदर जंतुओं की सारी क्रियाएँ पाई जाती हैं। जड़ और चेतन की मध्यवर्ती अवस्था वाला एक अन्य कण है, वाइरस। जब वह किसी शीशी में बंद पड़ा रहता है, तो एकदम निर्जीव कणिका के समान होता है, किंतु जैसे ही वह होस्ट शरीर में पहुँचता है, तेजी से वृद्धि करने लगता है और उसमें जीवन के लक्षण सुस्पष्ट हो जाते हैं।

मनुष्य शरीर में विद्यमान फेश और नाखून को क्या कहें? जड़ या चेतन? जब उन्हें हम काटते छाँटते हैं, तो किसी प्रकार की पीड़ा की अनुभूति नहीं होती, यह जड़ता का लक्षण है, किंतु उनमें वृद्धि होती रहती है, यह जीवन का चिन्ह है।

इस प्रकार अब जड़ और चेतन के बीच की विभाजन भित्ति लगभग समाप्त हो गई है और स्थावर में भी जंगम की सत्ता स्वीकार ली गई है। इससे ‘सर्व ब्रह्ममयं जगत्’ का अध्यात्मवादी तत्वदर्शन विज्ञानसम्मत भी सिद्ध हो जाता है।


श्री अरविंद का ‘अतिमानसिक रूपांतरण’

‘धरती पर दिव्य जीवन का अवतरण एवं मनुष्य में देवत्व का विकास’ श्री अरविंद के दर्शन का मुख्य लक्ष्य है। मानव शरीर में मन का उदय हुआ तो वह मानव कहलाया, परंतु शरीर इसके लिए उपयुक्त नहीं था। इसी तरह वर्तमान मानव-देह दिव्य मन की क्रिया के लिए एक उपयुक्त उपकरण नहीं है। इस प्रयोजन हेतु इस शरीर का दिव्य रूपांतरण आवश्यक है। यह प्रक्रिया अध्यात्म जगत् में एक नवीन क्राँति है। श्री अरविंद इसके सूत्रधार हैं। श्री अरविंद ने रूपांतरण की इस प्रक्रिया को त्रिविध रूपांतरण का नाम दिया है। यह आत्मिक (चैत्य), आध्यात्मिक और अति मानसिक रूपांतरण है।

मनुष्य के अंदर आत्मा होती है, इसे अंतरात्मा कहते हैं। श्री अरविंद इसे चैत्य तत्व कहते हैं। चैत्य पुरुष या अंतरात्मा परमात्मा का अंश है। शरीर , प्राण, मन आदि इसके उपकरण मात्र है। अंतरात्मा का मुख्य उद्देश्य है कि इन उपकरणों को इतना पवित्र एवं परिष्कृत कर दें, ताकि ये परमात्मा की दिव्य ज्योति एवं आनंद को ठीक-ठीक अभिव्यक्त कर सकें। चैत्य पुरुष केवल मनुष्य में क्रिया प्रारंभ करता है। पशु योनि तक तो प्रकृति की शक्ति ही उसके समस्त परिवर्तन में जिम्मेदार होती है, चैत्य पुरुष उसमें भाग नहीं लेता है।

चैत्य पुरुष सात्विकता में ही अधिक क्रियाशील होता है। तमोगुण एवं रजोगुण की प्रबलता में इसका प्रभाव अत्यंत क्षीण एवं न्यून होता है। यह अज्ञानपूर्ण क्षेत्र में प्रकाशपुँज के रूप में अवतरित होता है। जैसे-जैसे इसका प्रभाव प्रबल होता है, इसे मन, प्राण और शरीर से भिन्न रूप में अनुभव किया जा सकता है। इसका लक्षण है चरित्र, चिंतन एवं व्यवहार में उत्तरोत्तर उत्कृष्टता का समावेश। चैत्य पुरुष का यह प्रभाव सत्य, शुभ, सुँदर, परिष्कृत और श्रेष्ठ होता है। इस स्थिति में अवस्थित साधक अपने विचारों, भावनाओं, आचरण एवं चरित्र में गठित करने के लिए मन एवं प्राण पर एक दबाव अनुभव करता है।

चैत्य पुरुष आगे चलकर शरीर, प्राण और मन का नेतृत्व एवं नियंत्रण करने लगता है। इससे मानव की निम्न प्रकृति बदलने लगती है। मन में अंतर्दर्शन तथा प्राण में अंतर्वेग की अपनी स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाती है।

सभी क्रियाकलाप भगवान् की ओर उन्मुख हो जाते हैं। कण-कण में उसे एक परमात्मसत्ता की लीला दिखाई देने लगती है। अंतर में श्रद्धा और समर्पण का भाव विकसित होने लगता है। यही चैत्य-रूपांतरण है।

चैत्य-रूपांतरण में अंतर्दृष्टि प्राप्त हो जाने से अनंत और असीम का दर्शन होता है। मन अपने ऊपर के स्तर शुद्ध, शाँत और अंतहीन आत्मा के दिव्य प्रदेश में प्रवेश कर जाता है। वहाँ पर उसे दिव्य ज्योति और आनंद के साथ भगवत् सत्ता की उपस्थिति का बोध प्राप्त होता है। मन के ऊपर उठने की इस प्रक्रिया को आरोहण कहते हैं। मन के आरोहण करने पर उस प्रदेश में दिव्य प्रेम, सौंदर्य और ज्योतिर्मय ज्ञान का अनुभव होता है। इस प्रभाव से मन इतना आकर्षित एवं वशीभूत हो जाता है कि वह वहाँ पर अस्थाई रूप से अवस्थित हो जाता है । इसके परिणामस्वरूप उन स्तरों से मानव प्रकृति में उन अनुभूत तत्वों का अवतरण प्रारंभ होता है, इसे अवरोहण कहते हैं। सर्वप्रथम यह अवतरण मन में होता है और फिर प्राण में तथा शरीर को भी अपने प्रभाव क्षेत्र में कर लेता है। शारीरिक चेतना इसके प्रभाव में आकर विशाल, नमनशील और अनंत हो जाती हैं।

भगवत् चेतना के अवतरण से शारीरिक अंगों पर भगवान् की उपस्थिति का अनुभव होता है। यह अनुभव भागवत् उपस्थिति के रूप में होता है। यह अपनी सत्ता में शक्ति और आनंद के रूप में क्रिया करती है और सदैव बनी रहती है। समस्त दृश्यों और रूपों में भगवत् दर्शन होता है। समस्त शब्दों में उसका श्रवण होता है। समस्त स्पर्शों में एक उसी का स्पर्श होता है। सर्वत्र एक उसी प्रियतम के रूप, व्यक्तित्व और अभिव्यक्तियों की झलक मिलती है। हृदय में प्रेम और भक्ति जाग्रत् हो जाती है। समस्त प्राणियों में अपना ही रूप दिखाई देता है। इस प्रकार मानव चेतना पूर्णतया अध्यात्म सत्ता की चेतना में परिवर्तित हो जाती है। इसे ही आध्यात्मिक रूपांतरण कहते है। आध्यात्मिक रूपांतरण में मन, प्राण और शरीर में आध्यात्मिक परिवर्तन होता है। इस रूपांतरण में उच्चतर मन से लेकर अधिमन स्तर तक ज्योति और शक्ति का अवतरण होता है। परंतु इतने भर से दिव्य रूपांतरण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती।

इसका एकमात्र समाधान एवं विकल्प है अतिमन। यही दिव्य रूपांतरण के लिए सक्षम एवं समर्थ है।

दिव्य रूपांतरण हेतु मन प्रथम उपकरण है। मन ज्ञान को खोजता है। ज्ञान ही प्रकाश है। मन सर्वोच्च शक्ति के ज्ञानरूपी प्रकाश का अनुसंधान करता है। यही ज्ञान सबका आधार एवं आत्मा और पदार्थ का मूलभूत सत्य है। यह ज्ञान सृष्टि के संपूर्ण सत्य का एकमात्र सत्य है। विचार शक्ति के रूप में मन सृष्टि के रहस्य को अवतरित करता है एवं उसमें प्रवेश करता है। रूपांतरण के महाभियान हेतु केवल ज्ञान ही एक साधन है।

रूपांतरित जीवन के परिप्रेक्ष्य में श्री अरविंद ‘दिव्य जीवन’ में सुँदर वर्णन करते है, ‘विज्ञानमय प्राणी की आत्मा में मनोमय अहंकार नहीं होगा, अपितु वह आत्मा होगी जो सबमें एक है। वह प्राणी जगत् को आत्मा के विश्वात्मक रूप में देखेगा। यह ज्ञान सबके साथ तादात्म्यकरण के द्वारा विशाल और सुनिश्चित अंतर्भास को लाएगा। इसके अतिरिक्त उसे एक ऐसा साक्षात् अंतरंग ज्ञान होगा कि प्राण और शारीरिक इंद्रियों का उनकी क्रिया के और आत्मा की सेवा के निमित्त प्रत्येक पग पर पथ-प्रदर्शन करेगा। ‘ श्री अरविंद आगे कहते हैं, रूपांतरित मन अपने विषय को ज्ञात विषय के साथ बहिर्व्यापी और अंतर्व्यापी तादात्म्य करके तुरंत जान लेता है।

जिस प्रकार मन प्रकाश को, ज्ञान को खोजता है और ज्ञान के द्वारा प्रभुत्व प्राप्त करने का प्रयास करता है, उसी प्रकार प्राण अपनी निजी शक्ति का परिवर्द्धन करना और शक्ति के द्वारा अधिकार करना चाहता है। प्राण की खोज का विषय है, शक्ति, विजय का अधिकार, तृप्ति, रचना, हर्ष, प्रेम, सौंदर्य आदि। अस्तित्व संबंधी उसका हर्ष, कर्म, अनंत प्रकाश के सुखभाव में अपनी शक्ति की बलवती इच्छा में निहित है। विज्ञानमय परिवर्तन इन सबको पूर्णतम रूप में अभिव्यक्त कर सकेगा।

परिवर्तित प्राण मानसिक या प्राणिक अहंकार की शक्ति, तृप्ति या भोग के लिए क्रिया नहीं करेगा। इस प्राण का यह अर्थ होगा कि भागवत् उपस्थिति ज्योति, शक्ति, प्रेमा, आनंद और सौंदर्य व्यक्ति व जगत् पर अपने अधिकार को बढ़ाते जाएँगे। विज्ञानमय प्राण के लिए प्रेम का अर्थ होगा, आत्मा को आत्मा के साथ, ब्रह्म का ब्रह्म के साथ संपर्क, अंतरात्मा की अंतरात्मा के साथ अंतरंगता, समीपता, निकटता का असीम आनंद।

अतिमानस रूपांतरण में मन-प्राण के अलावा शरीर भी गंभीर भूमिका का निर्वहन करता है। शास्त्रों में शरीर को धर्म का स्थान माना गया है। परंतु साथ ही उसे ब्रह्म की प्राप्ति में बाधक भी माना गया है। श्री अरविंद की दृष्टि से शरीर का दिव्य रूपांतरण किया जा सकता है। अतिचेतन, अतिमन की क्रिया के लिए यह वर्तमान मानव देह उपयुक्त नहीं है। इस प्रयोजन हेतु इस देह का दिव्यीकरण या अतिमानस रूपांतरण आवश्यक है।

शरीर के दिव्य रूपांतरण में अनेकों कठिनाइयाँ हैं। इसमें पहली बाधा है, आहार। इस बाधा पर तभी विजय प्राप्त की जा सकती है, जब मनुष्य भोजन के बजाय अपने आसपास के वातावरण से ऊर्जा ग्रहण कर ले। शरीर को दिव्य बनाने में दूसरी बाधा है, काम-वासना। मानवजाति को अस्तित्व में बनाए रखने के लिए मानव शरीर में एक काम-केंद्र का निर्माण किया गया है। जिसका मुख्य स्थान है, ‘मूलाधार’।

अमैथुनी सृष्टि द्वारा ही इस कार्य से मुक्ति पाई जा सकती है। योग दर्शन ने यह माना है कि योगी अपने लिए अपने संकल्प से नवीन देहों का निर्माण कर सकता है। श्री अरविंद ने ‘सुप्रामेंटल मैनीफैश्ट्रेशन’ में इस तथ्य को इस तरह उल्लेख किया है, हमारे स्थूल भौतिक द्रव्य और प्राण के बीच में सूक्ष्म भौतिक तत्व रहता है। जिस मनुष्य के मन का अतिमानसिक रूपांतरण हुआ है, वह उस सूक्ष्म तत्व में किसी विशेष आकर का निर्माण कर सकेगा और वह आकार माता के गर्भ में आए बिना भी स्थूल आकार धारण कर लेगा।

रूपांतरण के इस क्रम में शरीर के भीतर सूक्ष्म इंद्रियाँ प्रायः सुप्तावस्था में रहती हैं, अतिमानस का रूपांतरण होने पर वे जीवंत और जाग्रत हो जाएँगी। चक्षु में समग्रता और सर्वग्राही सुस्पष्टता आ जाएगी। इससे वह दिव्य कवि और कलाकार की दृष्टि प्राप्त कर लेगा। उसमें एक ऐसी तीव्रता आ जाएगी कि वह एक साथ पदार्थ के गुण, रूप, रंग और भाव को देख लेगी। स्थूल चक्षु में पदार्थ के भौतिक पक्ष के साथ-साथ उसके भीतर के गुण की आत्मा और आध्यात्मिक द्रव्य को देखने की क्षमता आ जाएगी। इस प्रकार स्थूल पदार्थों के द्वारा पदार्थ के वास्तविक स्वरूप का दर्शन हो सकेगा। सभी पदार्थों में ब्रह्म का दर्शन होगा। दृष्टि में एक ऐसी आँतरिकता आ जाएगी कि वह पदार्थ के केवल स्थूल रूप को ही नहीं, अपितु उसे भी देखेगी, जो उसे अनुप्राणित करता है और सूक्ष्म रूप से उसके सभी ओर फला रहता है।

ऐसी समग्रता, एकता और आँतरिकता श्रवण-स्पर्श आदि इंद्रियों में भी जाएगी। समस्त शब्दों में ब्रह्म की ध्वनि सुनाई देगी। समस्त स्पर्शों में भगवान् का स्पर्श अनुभव होगा। शारीरिक अंगों में इस प्रकार अतिमानस रूपांतरण होने पर बहुत-सी शक्तियाँ प्रकट हो जाएँगी। गुरुत्वाकर्षण पर सफलता मिल जाने से शरीर हल्का होकर वायु में उड़ सकता है।

शरीर की प्रत्येक कोशिका और ऊतक में अतिमानस चेतना और आनंद व्याप्त हो जाएँगे। इससे बिना किसी इंद्रिय भोग के अत्यंत सहज आनंद की अनुभूति होगी। यह शरीर ज्योतिर्मय होगा और रोग, बुढ़ापा, मृत्यु से मुक्त होगा। आत्मा अपनी इच्छानुसार शरीर का परित्याग करेगी और मानव नवीन शरीर को निर्माण कर लेगा। रोग आदि के कारण शरीर को नहीं छोड़ना पड़ेगा।

यह त्रिविध रूपांतरण अतिमानसिक योग की चरम प्राप्ति है। महायोगी गोरखनाथ, अल्लामा महाप्रभु जैसे कतिपय योगियों ने इसे अपने जीवन में चरितार्थ भी किया है। इस चरम अवस्था को प्राप्त करना भले ही सर्वजन सुलभ न हो। फिर भी हर कोई इसका प्रारंभ अपने चरित्र, चिंतन एवं व्यवहार के सात्विक बदलाव से कर सकता है। यह बदलाव ही क्रमिक रूप से शनैः-शनैः अतिमानसिक रूपांतरण को सिद्ध करने वाला होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।


सर्वत्र पूजे जाते हैं (kahani)

जापान के एक बौद्ध भिक्षु ने अपने मत के धर्मग्रंथों को प्रकाशित करने के लिए धन एकत्रित किया। उस वर्ष पानी न बरसा। भिक्षु ने वह पैसा पीड़ितों की सेवा में लगा दिया। दूसरे वर्ष बाढ़ आई। इस बार का संग्रहित पैसा उसमें लगाया गया। तीसरी बार के संग्रह से ग्रंथ छपा। उस पर ‘तीसरा संस्करण’ लिखा हुआ था। पूछने पर बताया गया कि दो संस्करण उन्हीं को दीख सकते हैं, जिन्हें प्रेम और सेवा की आँखें मिली हों।

सुकरात बहुत कुरूप थे, फिर भी वे सदा दर्पण पास रखते थे और बार-बार मुँह देखते थे। एक मित्र ने इस पर आश्चर्य किया और पूछा, तो उन्होंने कहा, ‘सोचता यह रहता हूँ कि इस कुरूपता का प्रतिकार मुझे अधिक अच्छे कार्यों की सुँदरता बढ़ाकर करना चाहिए। इस तथ्य को याद रखने के लिए दर्पण देखने से सहायता मिलती है।’

इस संदर्भ में एक दूसरी बात सुकरात ने कही, ‘जो सुँदर हैं, उन्हें भी इसी प्रकार बार-बार दर्पण देखना चाहिए और सीखना चाहिए कि ईश्वरप्रदत्त सौंदर्य में कहीं दुष्कृत्यों के कारण दाग-धब्बा न लग जाए।’ उनका मत था, मनुष्य में चंदन जैसे गुण होने चाहिए, सुडौल हो या बेडौल, बिखेरे सुगंध ही।

‘क्या तुम मेरे समान शक्ति नहीं चाहतीं?’ कहकर ‘आँधी’ अपनी छोटी बहन मंदवायु की ओर देखने लगी।

कुछ उत्तर न पाकर वह फिर कहने लगी, ‘देखो, जिस समय में उठती हूँ, उस समय दूर-दूर तक लोग तूफान के चिन्हों से मेरे आने का संवाद चारों ओर फला देते हैं। समुद्र के जल के साथ ऐसा किलोल करती हूँ कि पानी की लहरों को पर्वत के समान ऊपर उछाल देती हूँ। मुझे देखकर मनुष्य अपने घरों में घुस जाते हैं। पशु-पक्षी अपनी जान बचाकर भागते फिरते हैं। कमजोर मकानों के छप्परों को भी उड़ा फेंक देती हूँ, मजबूत मकानों को पकड़कर हिला देती हूँ। मेरी साँस से राष्ट्र-के-राष्ट्र धूल में मिल जाते हैं। क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुममें भी मेरे समान शक्ति आ जाए।’

यह सुनकर वसंत की मंदवायु ने कुछ उत्तर न दिया और अपनी यात्रा पर चल पड़ी। उसको आते देखकर नदियाँ, ताल, जंगल, खेत सभी मुस्कराने लगे। बगीचों में तरह-तरह के फल खिल उठे। रंग-बिरंगे फूलों के गलीचे बिछ गए। सुगंधि से चारों ओर का वातावरण भर गया। पक्षीगण कुँजों में आकर बिहार करने लगे। सभी का जीवन सुखद हो गया। इस तरह से अपने कार्यों द्वारा वसंत वायु ने अपनी शक्ति का परिचय आँधी को करा दिया।

महामानवों का जीवनक्रम भी वसंत की मंदवायु के समान सुरभि-सौंदर्य-प्रसन्नता चारों ओर फैलाने वाला होता है। वे पराक्रम में नहीं, सौजन्य में महानता देखते हैं, इसी कारण वे सर्वत्र पूजे जाते हैं।


अविज्ञात का अद्भुत संसार

साधारण स्थिति में मानवी मन की ज्ञान-परिधि सीमित है। वह असीम को नहीं जान सकता। यदि उसमें जानने की ऐसी क्षमता रही होती, तो दुनिया में आज सब कुछ सुविज्ञात होता, पर विश्व में अब भी ऐसे कितने ही रहस्य मौजूद हैं, जो मानवी बुद्धि के लिए चुनौती बने हुए हैं।

ऐसा ही एक रहस्य कर्नाटक के शिमोला जिले के सपीगेहल्ली गाँव में पाया गया है। यहाँ सघन वन में प्राचीन मंदिर का खंडहर है। खंडहर के निकट ही एक कुआँ है। एक बार विल्फ्रेड नामक एक अँग्रेज शिकारी यहाँ शिकार हेतु आया। मंदिर को छिपने का उपयुक्त स्थान समझकर वह वहीं दुबककर बैठ गया और शेर का इंतजार करने लगा। आधी रात के करीब शेर अचानक कुएँ के नजदीक प्रकट हुआ। वह निशाना साध ही रहा था कि कुएँ के अंदर से सीटी की आवाज सुनाई पड़ी। वह सीटी बड़ी ही सुरीली थी। कुछ क्षण के लिए तो वह उसमें खो-सा गया, तभी पुनः उसे शेर का ध्यान आया। वह कुएँ की ओर मुँह किए निश्चल बैठा था। उसने फिर बंदूक का निशाना साधा। गोली छूटने ही वाली थी कि एक बार पुनः वही मोहक ध्वनि गूँजी। विल्फ्रेड अजीब बेचैनी अनुभव करने लगा। थोड़े अंतराल बाद तीसरी बार सीटी पुनः सुनाई पड़ी। इसी के साथ शेर कुएँ में कूद पड़ा। विल्फ्रेड को भी ऐसा लगने लगा, जैसे वह भी कूप में छलाँग लगा दे । उस ओर वह एक विचित्र खिंचाव महसूस कर रहा था। वह बड़ी मुश्किल से वहाँ से भागने में सफल हुआ। जब निकटवर्ती गाँव पहुँचा, तो लोगों ने बताया कि आज ही के दिन हर वर्ष यहाँ इस घटना की पुनरावृत्ति होती है। लगभग दर्जन भर शिकारियों ने इसी प्रकार अपनी जान गँवा दी। एकमात्र विल्फ्रेड ही ऐसा था, जो वहाँ से जीवित लौट सका।

इससे मिलता-जुलता प्रसंग नीलगिरि का है। यहाँ एक गाँव है, चमनथ। बताया जाता है कि टीपू सुल्तान के समय में यह गाँव एक बड़ा व्यापारिक केंद्र था और बहुत समृद्ध था। इसके अनेक चिन्ह अब भी वहाँ विद्यमान हैं। इन्हीं में से एक है, काले ग्रेनाइट पत्थरों से बना भव्य मंदिर का भग्नावशेष। समीप ही एक जलाशय है।

कहते हैं जिन दिनों इस ग्राम की यशगाथा गाई जाती थी, उन्हीं दिनों वहाँ एक रहस्यमय बीमारी फली, जिसमें वहाँ की पूरी-की-पूरी आबादी ही समाप्त हो गई। कई साल पश्चात कैप्टन नेड नामक एक अँग्रेज अफसर नीलगिरी में नियुक्त हुआ। बातचीत के दौरान उसे चमनथ में मंदिर की जानकारी मिली। वह एकाँत और प्रकृतिप्रेमी था। एक बार उसने मंदिर के दर्शन का कार्यक्रम बनाया। वहाँ गया और हर दृष्टि से उपयुक्त पाकर उसने वहीं रात बिताने का निश्चय किया।

आधी रात तक सब कुछ सामान्य रहा। मध्यरात्रि के उपराँत मंदिर में रखा पीतल का दीपक अचानक जल उठा और साथ-ही-साथ उसकी ज्वाला से कुछ अस्फुट-सी ध्वनि निकलने लगी।

कैप्टन नेड को हिंदी और संस्कृत से गहरा लगाव था। भारत रहते हुए उसने उन दोनों भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। ध्वनि पर ध्यान दिया, तो पता चला यह कोई स्तोत्र पाठ है। गौर करने पर विदित हुआ कि वह रावण-रचित शवि स्तोत्र है, जो अत्यंत मंद स्वर में उच्चरित हो रहा है। स्तोत्र पाठ से नेड ने अंदाज लगाया कि इसे कोई शिवालय होना चाहिए। वे ध्यानपूर्वक उसे सुनते रहे। पाठ समाप्त हुआ, तो दीपक बुझ गया। वह उसे अलादीन का कोई करामाती चिराग समझ बैठा और उठाकर घर ले आया। इसके साथ ही वह बुरी तरह बीमार पड़ गया। बहुतेरे उपचार कराए गए, पर स्थिति सुधरने के स्थान पर गंभीर बनती गई। अंततः एक रात कैप्टन नेड की पत्नी को एक साधु ने सपने में आदेश दिया कि दीपक जहाँ से लाया गया है, वहीं पहुँचा दिया जाए। जीवन-रक्षा का अब यही एकमात्र उपाय है। नेड ने ऐसा ही किया और धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा एवं जल्द ही एकदम ठीक हो गया।

मानवी मन स्थूल जगत् को समझने का एक उपकरण मात्र है। विज्ञान जैसी विधा में इसके इसी स्तर का उपयोग होता है। चूँकि इसमें वह हर कार्य के पीछे स्थूल कारण की तलाश करता है, इसलिए अक्सर रहस्यमय प्रसंगों को सुलझाने में असफल होता है। यह उसके ज्ञात जाग्रत भाग की चर्चा हुई। इस भूमिका से ऊँचा उठकर इसकी प्रसुप्त क्षमता को जगाया जा सके, तो फिर अज्ञात स्तर का रहस्य दुनिया में कुछ भी न रहे। ऐसा अध्यात्म उपचार के बिना संभव नहीं। इसी के माध्यम से योगी-यति सोई पड़ी शक्ति को जगाते और अपने लिए ऋद्धि-सिद्धियों के द्वार खोलते हैं। अविज्ञात को ज्ञात बनाने का यही एकमात्र उपचार है।


पाश्चात्य जगत् भी चमत्कृत रहा है आर्ष वाङ्मय से

मानवीय चेतना के विकास की निम्नता अथवा उच्चता ही वह कारण है जिसकी वजह से विचार निम्न अथवा उच्च होते हैं। इसी कारण पूर्व काल में अनेक तरह की आध्यात्मिक साधनाओं की खोज की गई, ताकि इनका अवलंबन लेकर मानवीय चेतना को विकसित करने हेतु विचारों के उच्चतम प्रवाह को धारण किया जा सके। विचारों की अपनी बहुमूल्य संपदा के कारण ही विश्व मानव की सर्वतोमुखी प्रगति में भारत ने सदा से अजस्र अनुदान दिए हैं।

विचारों की इसी अमूल्य संपदा की वजह से अरबों ने भारत से वेदाँत, दर्शन, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, रसायनशास्त्र और प्रशासन कला का ज्ञान प्राप्त किया। पश्चिमी दर्शन का जनक समझे जाने वाले यूनान में विचारों का विकास भारतीय विचारों और विचारकों के प्रभाव से ही हुआ। इस तथ्य की ओर संकेत करते हुए प्रोफेसर मैक्समूलर ने लिखा हैं, ‘यूनानियों को जितना अधिक भारत की दार्शनिक प्रकृति ने प्रभावित किया, उतना किसी अन्य ने नहीं।’ भारतवर्ष की प्राचीन दार्शनिक प्रवृत्ति की प्राण प्रतिष्ठा उपनिषदों में मिलती है। एडवर्ड टेलर ने स्पष्ट किया है कि यूनानी दर्शन उपनिषदों का ऋणी है। इस संबंध में थ्रेस भी एकमत हैं। भारतीय विचारधारा के प्रभाव से न केवल पश्चिमी क्षितिज पर विचारों का उदय हुआ, बल्कि बाद में भी पश्चिमी विचार और विचारक भारतीय विचारों के प्रभाव से प्रभावित होते रहे।

सबसे पहले भारतीय विचारों पर शोध-प्रबंध प्रस्तुत करने वाले यूरोपीय विद्वान् अलेक्जेन्डर ही थे। इन्होंने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में इस विषय पर विशद प्रकाश डाला। वारेन हेस्टिंग्स की प्रेरणा से भारतीय साहित्य का ज्ञान अर्जित करने वाले प्रथम अँग्रेज चार्ल्स विल्किन्स थे। इन्होंने बंगाल की एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की। यूरोप में संस्कृत पाँडित्य के जन्मदाता एच. टी. कोलब्रुक ने कहा है कि पाइथागोरस से लेकर उस समय तक कोई ऐसा विदेशी विद्वान नहीं हुआ, जिसको भारतीयता के विषय में विल्किन्स से अधिक ज्ञान हुआ। हेनरी टॉमस कोलब्रुक ने भारत के दार्शनिक साहित्य के अतिरिक्त यहाँ के वैज्ञानिक साहित्य पर भी शोध किया। मैक्समूलर का कथन है कि यदि कोलब्रुक जर्मनी में हुए होते तो बहुत पहले ही उनकी जन्मभूमि पर उनकी प्रतिभा प्रतिष्ठित हो गई होगी, अकादमियों की दीवारों पर उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा होता।

अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में फ्राँस भी भारतीय विचार प्रणाली में रुचि लेने लगा था। 1917 में फ्राँस के बादशाह के पुस्तकालयाध्यक्ष बिगनन ने अधीनस्थों से कहा था कि भारत में तथा ऐसे देशों में जहाँ भारतीय विचारधारा अपनाई गई हो, जितनी दर्शन, अध्यात्म व विज्ञान की पुस्तकें, ग्रंथ मिलें, उन्हें खरीद लाएँ। इस प्रयत्न में कालमेत नामक विद्वान् ने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद की प्रतिलिपियाँ तो प्राप्त कर लीं, परंतु चौथा अथर्ववेद उसे प्राप्त न हो सका। फ्राँस निवासियों को भारतीय विचारधारा और इतिहास की जानकारी अरबी, फारसी, चीनी, ग्रीक और लैटिन पुस्तकों से मिलती रहती थी। भारतीय सामग्री संग्रह करने का यह काम बाद में भी जारी रहा और जोसेफ दे गुहेन ने अभारतीय क्षेत्रों से यथासंभव सभी सामग्री जुटा ली। इस कार्य में उनको पाँडिचेरी के तमिल विद्वान् मारिदास पिल्लै का अमूल्य सहयोग मिला। पिल्लै लैटिन और फ्रेंच भाषा के अच्छे जानकार थे।

1917 के आसपास ही एन. क्वेति दयु पेरो (1931-1705) भारत आए और 1936 में मुगल शाहजादा दाराशिकोह के लिए फारसी में अनूदित उपनिषदों के आधार पर उन्होंने उनका यूरोपीय अनुवाद लैटिन भाषा में किया। विल्किन्स द्वारा भगवद्गीता और दयु पेरो के माध्यम से उपनिषदों के अनुवाद ‘आप निखेत’ से पाश्चात्य विचारकों को भारतीय दर्शन के मूल ग्रंथों के पाठ उपलब्ध हो गए।

लियोनार्ड द रोजी ने भी अन्य समसामयिक फ्राँसीसी विचारकों की भाँति यहाँ अनुभव किया कि यूरोप को भारतीय दर्शन की उपलब्धियों से परिचित होना चाहिए। तुलनात्मक भाषा विज्ञान के जन्मदाता फ्रैंज ब्राँय और आगस्ट श्लेगल तथा उनके फ्राँसीसी शिष्यों में ल्वायसेल्यु दे लाँग शैम्प हुए। इन्होंने मनुस्मृति और अमरकोष प्रकाशित किया। दूसरे शिष्य लैंगल्वा ने ऋग्वेद और हरिवंश पुराण के मूल पाठों से सीधा अनुवाद किया। परंतु सबसे प्रसिद्ध युगीन बरनाफ हुए। इनके बहुत से प्रसिद्ध शिष्यों में मैक्समूलर भी एक थे। इसी बीच 1922 में अपने ही देश की एक ‘सोशियन एशियाटिक’ संस्था की स्थापना पेरिस में हुई।

इसके माध्यम से बहुत से विद्वान भारतीय दर्शन में रुचि लेने लगे। इन्हीं में से एक बरनाफ से सहकर्मी बार्थेलेमि संत हेलारी भी थे। उन्होंने भारतीय दर्शन की न्याय और साँख्य शाखाओं में अपना महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित कराया।

1969 में इकोल दे हाँत एत्यूदे की स्थापना के बाद भारतीय विचारधारा के अध्ययन के लिए एक नया केंद्र खुल गया। यहाँ काम करने वाले मनीषियों में आगस्त बार्थ और एवेलस बरगाइन और एमिली सेनार्त मुख्य थे। बरगाइन ने एक युगाँतरकारी पुस्तक ‘द वैदिन रिलीजन एकार्डिग टु दू हिक्स ऑफ ऋग्वेद’ लिखी।

ब्रिटेन व फ्राँस के समान जर्मनी का भारत के साथ राजनैतिक संबंध बिलकुल नहीं रहा, फिर भी उन्होंने अत्यंत उत्साह के साथ संस्कृत को अपनाया और भारतीय दर्शन के प्रभाव को स्वीकार किया। सन् 1909 में फ्रेडरिक वान श्लेगेल ने अपनी पुस्तक ‘उबेर डाई स्प्रेशे एण्ड विशिष्ट दर इंदेर ‘ भारतीयों की भाषा और दर्शन पर लिखी और जर्मनी में भारतीय विचारधारा के संस्थापक बन गए। उन्होंने स्पष्ट घोषणा की कि विश्व चिंतन का सही इतिहास भारतीय चिंतन के बिना नहीं लिखा जा सकता । उनके भाई आगस्ट विल्हेण वान श्लेगेल ने भगवद्गीता का मूल पाठ लैटिन अनुवाद सहित संपादित किया।

यूरोप पर भारतीय दर्शन एवं चिंतन के प्रभाव के बारे में मैक्डेनल ने लिखा है कि नवजागरण के बाद विश्व के साँस्कृतिक मंच पर यदि कोई सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जा सकती है, तो वह है 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुई संस्कृत साहित्य की जानकारी। भारतीय दर्शन और साहित्य का यूरोप में सबसे अच्छा स्वागत जर्मनी में हुआ। यहाँ के विद्वान् जोहान गोट फ्रीड हर्डर ने 1996 में प्रकाशित अपनी मुख्य कृति आइडियाज ऑन ए फिलॉसफी ऑफ द हिस्ट्री ऑफ मेनकाइंड में भारतीयों का एक आदर्श चित्र प्रस्तुत किया। हर्डर के मित्र और प्रख्यात कवि जोहान वुल्फ गाँग वाल गेटे ने अपने चिंतन व जीवन में भारतीय साहित्य के प्रभाव को स्वीकारा है। उन्होंने अभिज्ञान शाकुँतलम् के बारे में उल्लेख किया है कि यह मेरे जीवन में एक युग का प्रतीक है। एलेक्स एराँन्सन के अनुसार ऐसे प्रतिभावान विद्वान् को जब तक प्राच्य विद्या दृढ़ आधार के रूप में प्राप्त न होती, तब तक वह उसका सहारा लेकर अपनी कल्पना को अपनी कृतियों में कैसे साकार करता।

श्लेगेल बंधु तो भारतीय दर्शन से इतना अधिक प्रभावित थे कि उन्होंने कहा कि वह प्रत्येक धर्मान्वेषी को यही परामर्श देंगे कि जिस प्रकार कला का अध्ययन करने के लिए इटली जाना आवश्यक है, उसी प्रकार धर्म-दर्शन के लिए भारत जाना चाहिए। वहाँ कुछ ऐसे धर्म के अंश अवश्य मिलेंगे, जिन्हें देखने के लिए यूरोप में भटकना व्यर्थ है। भारतीय चिंतन में रस लेने वाले विद्वानों में प्रतिभाशाली, भाषाशास्त्री एवं प्रशिया शिक्षामंत्री वान हलवोल्ट भी थे। उन्होंने परमात्मा को जीवन प्रदान करने के लिए धन्यवाद किया कि वह भारतीय दर्शन का अध्ययन कर सके।

इमैनुअल काँट (1912-1904) प्रथम प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक थे। जिन्होंने अपने चिंतन में भारतीय प्रभाव को स्वीकारा। काँट द्वारा प्रतिपादित दिक् और काल के मध्य प्राकृतिक जगत् और उससे परे अगम्यमूल वस्तु के भेद बहुत कुछ मायावाद के समान है। श्वेर बातस्की ने स्पष्ट किया है कि काँट द्वारा निरूपित शुद्धि-बुद्धि सिद्धांत का प्रतिरूप भारतीय दर्शन में है। इसके अतिरिक्त हरमन जैकोवी के मतानुसार काँट के ‘एस्थेटिक्स’ को भारतीय लेखक काव्य शास्त्र में बहुत पहले व्यक्त कर चुके हैं। इसी प्रकार काँट के उत्तराधिकारी जोहान गाँट लीव फिक्टे (1963-1924) ने अपनी ‘हिण्ट्स फॉर ब्लेसेड लाइफ’ ग्रंथ में अद्वैतवाद से मिलते-जुलते अनुच्छेद सम्मिलित किए हैं। काँट और फिक्टे तो मूल संस्कृत ग्रंथों से परिचित नहीं थे, परंतु आर्थर शोपनहावर को किसी सीमा तक इनका ज्ञान अवश्य था। उन्होंने ‘द वर्ल्ड एज विल एंड आइडिया’ में भारतीय दर्शन के आधार को स्पष्ट रूप से स्वीकारा है। शोपेनहावर ने औषनिषद् दर्शन से प्रभावित होकर इसको मानव बुद्धि की सर्वश्रेष्ठ उपज घोषित किया। उनका विचार था कि भारतीय चिंतन और दर्शन अवश्य ही यूरोपीय ज्ञान और दर्शन में गंभीर परिवर्तन ले आएगा। यही नहीं उन्होंने भारतीयों को यूरोपियनों की अपेक्षा अधिक गंभीर विचारक माना, क्योंकि वे जगत् को आँतरिक एवं सहजानुभूत कहकर उसकी व्याख्या करते हैं और यूरोपीय विचारकों की तरह उसको बाह्य एवं बुद्धिगम्य नहीं मानते। एक अन्य जर्मन दार्शनिक कार्ल क्रिश्चियन फ्रेडरिक ब्रासे (1971-1930) भी भारतीय दर्शन काफी अधिक प्रभावित थे। पाल डायसन (1943-1999) तो यूरोपीय दर्शन एवं भारतीय विद्या के महान् ज्ञाता थे। वे वेदाँत दर्शन के प्रति अत्यधिक आकृष्ट थे। उपनिषदों के मूल पाठ को जर्मन भाषा में अनुवाद और उनकी व्याख्या करके उन्होंने यूरोपीय विचारकों के लिए भारतीय दर्शन को समझना सुलभ कर दिया।

भारतीय चिंतन की प्रतिध्वनियाँ ऐसे देशों में भी सुनी गयीं, जिनका भारत से केवल औपचारिक संबंध था। रुमानिया के महाकवि मिहाई एसिनेस्क्यू (1950-1997) की कविताओं में वैदिक दर्शन की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी कविताओं के कितने ही अंश तो संस्कृत मूल के रूमानी रूपांतर जान पड़ते हैं। उन्होंने अपने साहित्य में भारतीय प्रतीकों को भी अपनाया है। यह भारत के प्राचीन साहित्य से उनके गहरे ज्ञान का द्योतक है। रूस के पूर्वी विस्तार से बहुत पहले ही रूसी चैदेव ने 2740 में कह दिया था कि हम पूर्व की लाड़ली संतान हैं। हम सब तरह से पूर्व से संबद्ध हैं। हमने अपने विश्वास, नियम और गुण वहीं से प्राप्त किए हैं।

लियों टॉलस्टाय (1929-1920) ने भारत का समर्थन अत्यंत संवेदनात्मक ढंग से किया है। 1909 में महात्मा गाँधी के नाम ‘लेटर टू ए हिंदू’ में टॉलस्टाय ने उपनिषदों, भगवद्गीता, तमिल ग्रंथ कुराल और विवेकानंद के लेखों सहित आधुनिक धार्मिक उपदेशों का भी उल्लेख किया था।

भारतीय चिंतन ने उन्नीसवीं शताब्दी में इंग्लैंड और जर्मनी को ही नहीं, सुदूर अमेरिका को भी प्रभावित किया था। रैल्फ वाल्डो एमर्सन (1903-1992) द्वारा प्रवर्तित शाँति आँदोलन इसका एक साफ प्रमाण है। भारतीय दर्शन के पुनर्जन्म सिद्धांत से विशेष आकर्षित हुए दूसरे अमेरिकन जिनका ध्यान भारत की ओर गया, हेनरी डविड थोरो (1918-1962) थे। वे भारतीयता के रंग में इतने रँग गए थे कि उन्होंने सनातन हिंदू जीवनचर्या भी अपना ली थी। वे कहते हैं, भारतीय दर्शन से मेरा इतना प्रेम है, तो मेरे लिए चावल का आहार ही उपयुक्त है। अमेरिका के बौद्धिक स्वतंत्रता का नेता वाल्ट व्हिटमैन (1919-1862) भी भारतीय चिंतन से प्रभावित होने वालों में थे। अपनी कुछ कविताओं में उन्होंने हिंदू रहस्यवाद में प्रत्यक्ष रुचि अभिव्यक्त की है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण उनकी ‘पैसेज टू इंडिया’ कविता है। जिसमें उन्होंने यह भाव व्यक्त किया है कि मनुष्य की आत्मा और विश्वात्मा एक ही है।

अमेरिका में ईसाइयों ने जो विज्ञान आँदोलन चलाया, उसमें भी भारतीय प्रभाव स्पष्टतः आलोकित है। इस आँदोलन की जन्मदात्री मेरी बेकर एंडी वेदाँतियों की तरह यह मानती थी कि जगत् दुःख और असत्मय है। इन दुःखों से छुटकारा पाने के लिए सत्य की अनुभूति आवश्यक है।

पाश्चात्य विद्वानों में रोमाँ रोलाँ के अलावा विलियम बटलर यीट्स, सी.एस. इलियट, एडवर्ड कारपेंटर, हैलाँक, एलिस, आल्डुअस हक्सले और डी. एच. लारेन्स आदि साहित्यकारों के विचारों में भारतीय विचारों का स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है।

भारतीय विचारधारा का यह प्रभाव पश्चिमी दर्शन और साहित्य तक ही सीमित नहीं है। वहाँ के वैज्ञानिकों ने भी इसके प्रभाव को स्वीकारा है। इस क्रम में ऋषियों की चिंतन संपदा के वेदांत दर्शन ने क्वाँटम भौतिकी के वैज्ञानिक वारनर हाइज़ेनबर्ग की सोच में व्यापक उलटफेर कर दी। उनके अनिश्चितता के सिद्धांत में वेदाँत तत्व की ही व्याख्या है कि पदार्थ का स्वरूप प्रतिक्षण अनिश्चित है। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘फिजिक्स एंड फिलॉसफी’ में यहाँ के चिंतन से स्वयं को प्रभावित होने का मार्मिक वर्णन किया है। नील्स बोर और इरविन श्रोडिंगर के स्वरों में भी यही गूँज सुनाई देती है। श्रोडिंगर के वेव्स मेकेनिक्स में वेदाँत वर्णित प्रकृति के अनिश्चित स्वरूप का संकेत मिलता है।

विज्ञान के क्षेत्र में आइन्स्टीन और हाइज़ेनबर्ग के प्रतिमानों को पार करने वाले जियोफेश च्यू ने बूअ स्ट्रैप का अनोखा सिद्धांत दिया है। इनके अनुसार प्रकृति के मौलिक तत्व को विघटित नहीं किया जा सकता। अंत में उन्होंने इसकी स्वीकारोक्ति भी की कि उनके प्रयोग भारत के साँस्कृतिक ज्ञान का सत्यापन भर हैं। च्यू की भाँति डेविड बोम के प्रयोगों का निष्कर्ष अखंडित पूर्णता वेदाँत का ही एक रूप है। उनका ‘अनब्रोकेन होलनेस’ का अभिनव सिद्धांत इसी प्रभाव से प्रेरित है। ग्रेगरी बैटसन के शब्दों में, ‘माइंड विद आउट नर्वस सिस्टम’ बिना स्नायु संस्थान के मन की धारण भी पूर्वी चिंतन से प्राप्त हुई। वैज्ञानिक आर.डी.लैंग के अनुसार पूर्वी चिंतन पूर्णतया वैज्ञानिक है। इसके अलावा स्टेनग्राफ के ‘रील्स ऑफ ह्यूमन कान्शसनेस’ एवं कार्ल गुस्ताव जुँग के प्रयोगों एवं राबर्टो असगोली की’ साइको सिंथेसिस’ में भारतीय चिंतन के प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। वे इस तयि को साफ तौर पर सत्यापित करते हैं कि भारत के अजस्र अनुदानों से ही समूचा विश्व आलोकित-प्रकाशित हुआ है।


VigyapanSuchana

ज्ञातव्य

जून 2001 की अखण्ड-ज्योति में विस्तार से ‘पूज्यवर के ज्ञान शरीर को जन-जन तक पहुँचाएँ’ एवं जुलाई 2001 की अखण्ड ज्योति में हो रहा है ज्ञानयज्ञ का शुभारंभ-मंगलाचरण (ज्ञान केंद्रों की स्थापना करें एवं वाङ्मय को जन-जन तक पहुँचाएँ) शीर्ष से लेख प्रकाशित हुए थे, उसके साथ पंजीयन पत्रक भी थे। जो भी ज्ञान केंद्र की स्थापना करना चाहते हों, वे तुरंत उन्हें भरकर धरोहर राशि एवं क्रयादेश के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी मथुरा भेज दें। ज्ञान केंद्र संबंधी सारा पत्राचार इसी पते पर करें।


श्रम-उपार्जन के सहारे (kahani)

गुलाब का पौधा कुछ सीखने के उद्देश्य से एक व्यक्ति के पास पहुँचा। उस व्यक्ति ने सिखाया, जो जैसा व्यवहार करता है, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। दुष्ट के साथ दुष्टता करना ही नीति है। यदि ऐसा न किया गया, तो संसार तुम्हारे अस्तित्व को मिटाने में लग जाएगा।

गुलाब ने उसकी बात गाँठ बाँध ली। घर लौटकर आया और अपनी सुरक्षा के लिए काँटे उत्पन्न करने लगा। जो कोई उसकी ओर हाथ बढ़ाता, वह काँटे छेद देता था।

कुछ दिनों बाद उस पौधे को एक साधु से सत्संग करने का अवसर मिला। साधु ने उसे बताया, ‘परोपकार में अपनी जीवन को खपाने वाले से बढ़कर सम्माननीय कोई दूसरा नहीं होता ।’

परिणामस्वरूप गुलाब ने उसी दिन अपने प्रथम पुष्प को जन्म दिया। उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैलने लगी। जो भी पास से गुजरता, कुछ क्षण के लिए उसके सौंदर्य तथा सुरभि से मुग्ध हुए बिना न रहता।

राजा जनक महल की छत पर सोए हुए थे। हंस-हंसिनी अटारी की मुँडेर पर बैठे वार्तालाप करने लगे। हंसिनी बोली, ‘इन दिनों सबसे बड़े ब्रह्मज्ञानी राजा जनक हैं।’ हंस ने बात काटकर कहा, ‘तुम रैक्स को नहीं जानतीं। अपने समय के वे ही सबसे बड़े ब्रह्म-ज्ञानवेत्ता हैं।’ हंसिनी ने पूछा, ‘भला कौन है रैक्स?’ हंस ने उत्तर दिया, ‘अरे वह गाड़ी वाला रैक्स, जो गाड़ी खींचकर बोझ ढोता और अयाचित वृति से निर्वाह करता है।’

जनक अधजगे थे। वे पक्षियों की भाषा जानते थे। हंस-हंसिनी की वार्ता ध्यानपूर्वक सुनने के निमित्त करवट बदलने लगे। आहट पाकर हंस-युग्म चौकन्ना हुआ और उड़ गया। बात अधूरी रह गई।

राजा को नींद नहीं आई। रैक्स कौन हैं? कहाँ रहते हैं? उनसे संपर्क कैसे सधे? यह विचार उन्हें बेचैन किए हुए था। सवेरा होते ही दरबार लगा। राजा ने सभासदों से गाड़ी वाले रैक्स को ढूँढ़ निकालने का आदेश दिया।

बहुत दौड़-धूप के बाद रैक्स का पता चला। राजदूतों ने उनसे जनकपुर चलने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। मुझे राजा से क्या लेना-देना । अपना प्रस्तुत कर्तव्य पूरा करूं या इधर-उधर भागता फिरुँ।

दूतों ने सारा विवरण जा सुनाया। जनक स्वयं ही चल पड़े और वहाँ पहुँचे, जहाँ रैक्स गाड़ी खींच-धकेलकर निर्वाह चलाते और साधना-सेवा का समन्वित कार्य करते है।

राजा ने इतने बड़े ब्रह्मज्ञानी को ऐसा कष्टसाध्य जीवनयापन करते देखा, तो द्रवित हो उठे। सुविधा-साधनों के लिए उन्होंने धनराशि प्रस्तुत की।

अस्वीकार करते हुए रैक्स ने कहा, ‘राजन्। यह दरिद्रता नहीं अपरिग्रह है, जिसे गँवा बैठने पर तो मेरे हाथ से ब्रह्म तेज भी चला जाएगा।’

तत्वज्ञान के अनेक मर्म-रहस्यों को सत्संग में जानने के उपराँत जनक यह विचार लेकर वापस लौटे कि विलासी नहीं, अपरिग्रही ही सच्चा ब्रह्मज्ञानी हो सकता है, उन्हें नई दिशा मिली। उस दिन से उन्होंने अपने हाथों कृषि करने, हल चलाने की नई योजना बनाई और श्रम-उपार्जन के सहारे निर्वाह करते हुए राजकाज चलाने लगे।


स्वप्नों की रोमाँचकारी-रहस्यमयी दुनिया

सपनों की दुनिया में जीवन के हर पहलू के अनोखे एवं अद्भुत दृश्य दिखाई देते हैं। अपनी मनोवृत्ति के अनुसार रेखाचित्र में रंग भरते सपनों की दुनिया बड़ी अजीब है। विद्वानों ने इसे अपने-अपने ढंग से शब्दों में पिरोया है। मनोवैज्ञानिक इसे अपने अव्यवस्थित अचेतन की मनोलीला मानते हैं। कोई इसे मनोवैज्ञानिक समस्या मानता है, तो कोई मन के दमित विचारों का परिणाम। अध्यात्मविदों के अनुसार ईश्वरीय संदेश के रूप में भी वह प्रतिबिंबित होता है, जबकि वैज्ञानिकों ने सपनों को जैविक क्रिया से संबंधित दर्शाया है।

सामान्य क्रम में स्वप्न को जाग्रत् अवस्था की स्मृति माना जा सकता है। इस अवस्था में बाह्य जगत् से इंद्रियों का संबंध समाप्त हो जाता है। पातंजलि योग के अनुसार स्वप्न एक वृति का नाम है। इसमें चेतन मन जाग्रत अवस्था के अभाव में सुषुप्त हो जाता है और अचेतन मन क्रियाशील हो उठता है। इस तरह से देखा जाए, तो स्वप्न भी मन की एक रचना है। यह भावित स्मृर्तव्य स्मृति है। जाग्रत अवस्था में अनुभव किए गए विषयों की ही स्मृति होती है। परंतु स्वप्न में यह कल्पित होती है। अतः इनकी स्मृति कल्पित विषयों की स्मृति होती है। इसे ही स्मृति की स्मृति कहते हैं। स्मरण करने के ज्ञान का इसमें अभाव होता है। इसी कारण स्वप्न को भावित स्मृर्तव्य स्मृति कहते हैं।

वृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार स्वप्नों में ज्ञानेंद्रियों का व्यापार बंद हो जाता है, फिर भी सूक्ष्म इंद्रियों के द्वारा सूक्ष्म विषयों का अनुभव होता है और इस सुख-दुःख अनुभव से सुख व दुःख का बोध भी प्राप्त होता है। यह आत्मा की अवस्था नहीं है। इसे सूक्ष्मशरीर का क्रिया-व्यापार कहा जाता है। आत्मा तो द्रष्टा के रूप में इसे देखती है। मनुष्य जब थककर सो जाता है, तो वह दृश्य दुनिया से अपना संबंध विच्छेद कर लेता है। इसके पश्चात् वह स्वप्नों की अनोखी एवं आश्चर्यमयी दुनिया में प्रवेश करता है। इसमें स्थूलशरीर भाग नहीं लेता। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार स्वप्न प्रतीकों और प्रत्ययों का संसार है। इस अवस्था में देश और काल की गति जाग्रत् अवस्था से भिन्न होती है। ये अवस्थाएँ स्वप्नावस्था में अति शीघ्र परिवर्तित होती रहती है। स्वल्प समय में भी बड़े-बड़े घटनाचक्र पूर्ण हो जाते हैं। स्वप्नावस्था में व्यक्ति, विषय तथा संबंध ये सभी तीव्र गति से परिवर्तनशील होते हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि स्वप्न में सूक्ष्मशरीर की गतिविधियाँ भाग लेती हैं।

वृहदारण्यक उपनिषद् में स्वप्न को मिथ्या माना गया है। जो चीज नहीं है, उसको भी मन अपने ढंग से गढ़ लेता है। ब्रह्मसूत्र में स्वप्न को कोरी माया बताया गया है। साँख्य और अद्वैत वेदाँती कहते हैं कि संस्कार मात्र से बुद्धि का विभिन्न विषयों का आकार धारण करने वाला परिणाम ही स्वप्न है। अधिकाँश वेदाँती स्वप्न के विषय को सर्वथा मिथ्या मानते हैं। परंतु सभी वेदाँती स्वप्न को भ्रम एवं असत्य नहीं मानते। आद्य गुरु शंकराचार्य ने भी सपनों में हाथी पर चढ़ना तथा गधे पर चढ़ना अशुभ माना है। छाँदोग्य उपनिषद् ने स्वप्न के शुभ तथा अशुभ प्रतीकों का समर्थन किया है।

योगवासिष्ठ में स्वप्नों का सुँदर विवरण प्राप्त होता है। इसके अनुसार जब जीव सुषुप्त अवस्था में प्राणों के द्वारा क्षुब्ध होकर चित का आकार धारण कर लेता है, तो स्वप्न दिखाई देते हैं। जैसे बीज के भीतर विशालकाय वृक्ष का आकार छिपा रहता है, वैसे ही जीव भी अपने अंदर ही सारे जगत् को विराट् एवं विस्तृत रूप से अनुभव करता है। इस अवस्था में जीव को उसकी वासनाओं के अनुकूल स्वप्न दिखते हैं, वायुप्रधान व्यक्ति आकाश में उड़ने का, जलतत्व प्रधानता होने पर जल संबंधी तथा पिन से प्रधान व्यक्ति उष्णताविषयक स्वप्नों का अनुभव करता है। जो ज्ञान बाह्य इंद्रियों के बिना अंदर की प्रतिक्रियास्वरूप प्राप्त होता है, उसे स्वप्न कहते हैं।

पुराणों में स्वप्न की जो व्याख्या मिलती है, उसके अनुसार परमेश्वर की इच्छा से जीव को अपने मनोगत संस्कार दिखाई पड़ने लगते है, उसे स्वप्न माना जाता है। तंत्रालोक में स्वप्न के बारे में इस तरह वर्णन मिलता है कि सुषुप्त अवस्था में यानि सोने के समय शरीर के तत्व विलीन हो जाते हैं और उन्हीं नष्ट हुए तत्वों से संबंधित सपने का अनुभव होता है। आयुर्वेद ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि स्वप्न गहरी नींद की दशा में नहीं होता। ऐसी दशा में स्मृति नहीं रहती ।

विद्वानों का मत है कि स्वप्न विषय कल्पनाओं पर आधारित होते हैं। इन कल्पनाओं के ज्ञान को स्मृति सामान्यता

ग्रहण नहीं कर सकती। स्वप्न का संबंध चित से माना गया है। चित के तीन गुण होते है। इसी वजह से स्वप्न भी तीन प्रकार के होते हैं, सात्विक, राजसिक तथा तामसिक स्वप्न। सात्विक स्वप्न को सर्वोत्कृष्ट स्वप्न माना जाता है। इस अवस्था में सत्व प्रधान होता है। जिस व्यक्ति में इस गुण की अधिकता होती है, उसी को ये स्वप्न दिखाई देते हैं। स्वप्न की ऐसी अवस्था में पूर्वाभास आदि ईश्वरीय संदेश प्राप्त होते है। राजसिक स्वप्न में रजोगुण प्रधान होता है। तामसिक स्वप्न में विषय में क्षणिक होता है। इसलिए जागने पर स्वप्न का विषय याद नहीं रहता। स्वप्न के विषय वास्तविक और अवास्तविक दोनों हो सकते हैं।

पाश्चात्य मनोविज्ञान ने अपने ढंग से स्वप्न को स्थापित किया है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने स्वप्न के बारे में कहा है, जाग्रत् तथा सचेत अवस्था में हम अपने मन की जिन इच्छाओं और कामनाओं को प्रकट करने या कार्य रूप में परिणत करने में संकोच करते हैं या डरते हैं, वे ही रात की एकांत अवस्था में स्वप्न के रूप में दृष्टिगोचर होती है। ज्यों ही हम जागते हैं, सपना भी भूल जाते हैं। इसका भी यही कारण है कि जाग्रत अवस्था का डर फिर उन्हें पीछे धकेल देता है। फ्रायड स्वयं भी स्वीकार करते हैं कि स्वप्न एक मनोविश्लेषक वस्तु है। इसका मनोवैज्ञानिक इतिहास है। डॉ0 जुँग ने अपने शोधग्रंथ ‘साइकोलॉजी ऑफ द अनकान्शस’ में फ्रायड के विचारों का काफी तर्कपूर्ण ढंग से खंडन किया है। फ्रायड के अनुसार मनुष्य के मन की समूची इच्छाएँ कामवासना से संबंध रखती हैं। परंतु डॉ. जुँग ने इसको नकारते हुए सिद्ध किया है कि मनुष्य की कामप्रेरणा के अतिरिक्त उसकी वास्तविक इच्छा कहीं अधिक व्यापक है। उसमें सामाजिक, धार्मिक तथा रचनात्मक प्रवृत्तियां भी शामिल हैं। इसलिए अज्ञात मानस, अचेतन अवस्था के विचार सचेत मानस या सचेतन अवस्था के विचार हो सकते हैं। मानव स्वभाव की इस सत्यता को पुटनम नामक विद्वान् ने भी स्वीकार किया है।

फ्रायड तथा डॉ. जुँग की विचारधारा में अंतर केवल इतना ही था कि फ्रायड के अनुसार स्वप्न में अतृप्त वासना या कामना की अभिव्यक्ति होती है और जुँग के अनुसार स्वप्न वर्तमान परिस्थितियों का व्यंग्य चित्र (कार्टून) है और वह किसी उदाहरण द्वारा किसी निश्चित तथ्य को बतला रहा है। फ्रायड स्वप्न को अतृप्त वासना के सीमित व संकुचित दायरे में सीमाबद्ध कर देते हैं। परंतु जुँग उसे वर्तमान परिस्थिति के साथ जोड़कर इसकी शंका को व्यापक व विस्तृत कर देते है। जुँग के अनुसार स्वप्न के माध्यम से महान् दार्शनिक सत्य, संकल्प, भावी परिस्थिति, महत्वाकाँक्षाएँ, दूसरे के मन की बात आदि भी जानी जा सकती हैं। इस तरह देखा जाए, तो जुँग के विचार भारतीय विचारों के अधिक निकट हैं।

गहन तथा अचेतन अवस्था में मन की प्रतीकात्मक क्रियाओं का नाम स्वप्न है। जुँग की मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा तथा भावना को अपने में समेटे हुए है। वह कभी नहीं चाहता कि कोई उसके मन की बात को जाने। अतः उसके स्वप्न भी प्रतीकात्मक होते हैं, ताकि कोई अन्य उसे समझ न सकें। हर एक की अपनी कल्पना,अपनी इच्छा, अपना विचार पृथक् और भिन्न होता है। इसी वजह से सभी के स्वप्न भी भिन्न-भिन्न होंगे।

गहन मानस की कलात्मक भावना स्वप्न में जाग उठती है। इसी कारण दार्शनिक काँट की अभिव्यक्ति है कि स्वप्न गहन मानस की स्वतः बनी हुई कविता है। प्रसिद्ध कवि दाँते जो कुछ स्वप्न में देखते थे, उसे कविता का रूप देते थे। साल्ट थैरेपी के जनक किट्ज पर्ल्स के मतानुसार सपने हमें स्पष्ट संकेत देते हैं कि हम क्या कर पा रहे हैं, हमारी सामर्थ्य कितनी है। न्यू एंड मुरु तथा कार्ल्स केंस्टनेग कहते हैं कि स्वप्न मस्तिष्क में निहित तथ्यों के सचेतन केंद्र का स्थान परिवर्तन करता है। कई विद्वान् इसे प्रामाणिक मानते हैं, क्योंकि जाग्रत् अवस्था में मस्तिष्क का संकलन

केंद्र स्थिर होता है। सपने में इस केंद्र का स्थान बदल जाता हैं। बदलाव या परिवर्तन जितने अधिक होंगे, सपने भी उतने प्रकार के दिखाई देंगे।

दूसरी शताब्दी में रोम के आर्तिनिकोरस ने आना इआरोटिका में तीस हजार सपनों का विश्लेषण किया है। उसे सपनों को दो भागों में विभाजित किया है, सामान्य और प्रतीकात्मक सपने। आर्तिनिकोरस के अनुसार सपनों का अर्थ उल्टा होता है। जो भी हो, इसकी भाषा बड़ी प्रतीकात्मक एवं रहस्यात्मक होती है।

सपने देखना मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। इस संदर्भ में आधुनिक स्वप्न विश्लेषक डॉ. अंजलि हजारिका कहती हैं कि मनुष्य यदि स्वप्न न देखे तो तनाव में पागल हो सकता है। सपने मार्गदर्शक की भूमिका भी अदा कर सकते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में स्वप्न विश्लेषक मधु टंडन की मान्यता है कि सपने सलाहकार, निर्देशक और आलोचक सभी प्रकार के हो सकते हैं। मनोचिकित्सक डॉ. जितेंद्र नागपाल ने सपने को समस्याओं का दर्शन माना है।

इस तरह देखा जाए तो सपनों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या फ्रायड से आरंभ होती है। वह एक अद्भुत देन थी, भले ही वह अपने आप में संपूर्ण न हो। क्योंकि यहीं से अचेतन की अवधारण प्रारंभ हुई और जिसे जाने बिना सपनों की समुचित वैज्ञानिक व्याख्या संभव नहीं है। यह ठीक है कि पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक मन की सूक्ष्म गइराई से अनभिज्ञ रहे, जिसे उनका प्रयोग पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सका, परंतु उन्होंने जितना खोजा, उसके माध्यम से सपनों की खोजबीन अवश्य ही की जा सकती है। अपने ऋषियों ने अंतर्दृष्टि से मन को भेदा था और सपनों की समुचित व्याख्या की थी, परंतु अब आवश्यकता है वैदिक ऋषियों के अनुभूत सिद्धांतों को पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों के प्रयोग द्वारा और अधिक अन्वेषण-अनुसंधान करने की।


धर्म का पर्यायवाची (kahani)

जगत् में रामकृष्ण परमहंस सूर्य की तरह उदित हुए। उन्होंने एक नया आदर्श रखा, लोकसेवा को भगवद्गीता कहा। उन्हें एक शिष्य मिला विवेकानंद। उसे उन्होंने तत्वज्ञान कूट-कूटकर पिलाया। शिष्य ने व्यक्तिगत सुविधा, ऋद्धि-सिद्धि या मोक्ष की बात कभी सोची ही नहीं, निरंतर मनुष्य जाति का हित ध्यान में रखा। संसारभर में घूमे और देश-विदेश में भारतीय संस्कृति का यथार्थवादी स्वरूप प्रस्तुत करने में प्राणपण से प्रयत्न किया। श्रेय से सदा दूर रहे। अपने गुरु के नाम से रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इस निस्पृहता से उनके प्रति जनश्रद्धा घटी नहीं वरन् बढ़ी ही। सही व्यक्ति द्वारा सही मार्ग अपनाए जाने का सत्परिणाम सभी ने प्रत्यक्ष देखा। विवेकानंद मात्र 39 वर्ष जीवित रहे । पर इतने स्वल्पकाल में भी वे महत्वपूर्ण स्थापनाएँ करने में समर्थ हुए।

मगध के राजा सर्वदमन को राजगुरु की नियुक्ति अपेक्षित थी। यह स्थान बहुत समय से रिक्त पड़ा था। एक दिन महापंडित दीर्घलोम उधर से निकले। राजा से भेंट-अभिवादन के उपराँत महापंडित ने कहा, ‘राजगुरु का स्थान आपने रिक्त छोड़ा हुआ है। उचित समझें तो उस स्थान पर मुझे नियुक्त कर दें।’

राजा बहुत प्रसन्न हुए। साथ ही एक निवेदन भी किया, ‘आपने जो ग्रंथ पढ़े हैं, कृपया एक बार सबको फिर पढ़ लें। इतना कष्ट करने के उपराँत आपकी नियुक्ति होगी। जब तक आप आवेंगे नहीं, यह स्थान रिक्त ही पड़ा रहेगा।’

विद्वान् अपनी कुटी में वापस चले गए और सब ग्रंथ ध्यानपूर्वक पढ़ने लगे। जब पढ़ लिए, तो फिर नियुक्ति का आवेदन लेकर राजदरबार में उपस्थित हुए। राजा ने अबकी बार फिर और भी अधिक नम्रतापूर्वक एक बार फिर उन ग्रंथों को पढ़ लेने के लिए कहा। दीर्घलोम असमंजसपूर्वक फिर पढ़ने के लिए चल दिए।

नियत अवधि बीत गई, पर पंडित वापस न लौटे। तब राजा स्वयं पहुँचे और न आने का कारण जानना चाहा। पंडित ने कहा, ‘ गुरु अंतरात्मा में रहता है। बाहर के गुरु कामचलाऊ भर होते हैं। आप अपने अंदर के गुरु से परामर्श लिया करें।’

राजा ने नम्रतापूर्वक पंडित जी को साथ ले लिया और उन्हें राजगुरु के स्थान पर नियुक्त कर दिया। बोले, ‘अब आपने शास्त्रों का सार जान लिया, इसलिए आप उस स्थान को सुशोभित करें।’ धर्म का अर्थ मात्र कथावाचन-कर्मकाँड भर समझ लेना नहीं, अपितु उसे अनुरूप आचरण करना भी है। दिव्यदर्शी ऋषियों ने इसी कारण आदर्शवादी चरित्रनिष्ठा को धर्म का पर्यायवाची माना है।


भारतीय ही थे विश्व के प्रथम उपदेष्टा

आज विश्व के अलग-अलग देशों की अपनी संस्कृतियाँ हैं और उनकी एक पृथक पहचान है, पर यदि उनका सूक्ष्म अध्ययन किया जाए, तो किसी-न-किसी स्तर पर, कहीं-न-कहीं उन पर भारतीयता की छाप अवश्य दिखलाई पड़ेगी। यह बात अलग है कि इस प्रकार के चिह्न संपूर्ण विश्व में अब सीमित ही रह गए हैं, पर जो हैं, वह भी यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि पुराकाल में भारतीय संस्कृति विश्वव्यापी थी और उसके ध्वजावाहक ‘आर्य’ ही थे।

इस संबंध में प्रसिद्ध इतिहासकार पोकाँक का कथन उल्लेखनीय है । वे अपने ग्रंथ ‘इंडिया इन ग्रीस’में लिखते है, ‘मैंने सावधान रहकर परिश्रम और सूक्ष्मतापूर्वक जो अध्ययन-विश्लेषण किया है, उससे मैं आश्चर्यचकित हूँ। मैंने शब्दों की एकरूपता और आश्चर्यजनक समानता भी देखी है, उससे अचरज में हूँ और इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि यूरोपवासियों के विश्व-भ्रमण से भी पूर्व भारतीय ऋषियों या आर्यों की विश्व-यात्रा संपन्न हो चुकी थी। इसके प्रमाण आज भी विद्यमान हैं।’

अपनी उपर्युक्त पुस्तक में पोकाँक जिन साक्ष्यों की चर्चा करते हैं, वह वास्तुशिल्प, रीति-रिवाज, रहन-सहन, धारणाओं, नामों, भाषायी समानता एवं प्राचीन ग्रंथों तथा दस्तावेजों के उल्लेखों के रूप में विश्वभर में बिखरे पड़े हैं। उन्हें देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि अति प्राचीन समय में किसी-न-किसी रूप में वे भारतीय संस्कृति से संबद्ध रहे हों अथवा भारतवंशी ही वहाँ जाकर बस गए हों, जो कालाँतर में एक नई संस्कृति की पहचान लेकर उभरे और उन-उन स्थानों में छा गए। इस संदर्भ में सर्वप्रथम मक्का का उल्लेख करना अनुचित न होगा।

‘हरिहरेश्वर महाहात्म्य’ अध्याय-9 में इस्लाम पूर्व के मक्का का वर्णन करते हुए कहा गया है-

एंक पंद गयायाँ तु मकायाँ तु द्वितीयकम। तृतीयं स्थापितं दिव्यं मुक्तयै शुमलस्य सन्निधौ॥

अर्थात् विष्णु का एक पद गया में, दूसरा मक्का में तथा तीसरा शुक्ल तीर्थ के समीप स्थापित है। इनके दर्शनों से पितृगण मुक्ति पाते हैं। जानने योग्य तथ्य यह है कि प्राचीन ग्रंथों में मक्का की चर्चा हरिहर क्षेत्र के रूप में हुई है। तब यह हिंदुओं का एक बहुत बड़ा तीर्थ था। इस्लाम आधिपत्य के बाद वहाँ की मूल संरचना में काफी कुछ फेर-बदल कर दिया गया।

‘शक्ति संगम तंत्र’ (3,9,4,-56) में लिखा हुआ है कि प्राचीन समय में पाँच ‘प्रस्थ’ विख्यात थे, इंद्रप्रस्थ, यमप्रस्थ, वरुणप्रस्थ, वरुणप्रस्थ, कूर्मप्रस्थ तथा देवप्रस्थ। इनमें कुल 56 देश समाविष्ट थे। उल्लेखों से ज्ञात होता है कि वरुणप्रस्थ का विस्तार तब पूर्व में राजावर्त (राजस्थान), उत्तर में हिंगुला नदी तथा पश्चिम में मक्का तक सुदीर्घ था।

राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के निदेशक डॉ. फतेह सिंह ने अपने शोध-प्रबंध ‘सिंधु घाटी में उपनिषदों के प्रतीक’ में इस बात को सप्रमाण सिद्ध किया है कि प्राचीन ‘आर्यावर्त’ मक्का से लंका तक फैले ‘सैंधव’ नामक सागरतटीय प्रदेश तथा बंगाल की खाड़ी से ब्रह्मपुत्र के उद्गमस्थल तक विस्तृत था। इतने पर भी आर्य संस्कृति सिर्फ इसी भूभाग तक सीमित नहीं थी। उसका व्यापक विस्तार लगभग संपूर्ण पश्चिम एशिया अर्थात् आज के खाड़ी देशों एवं उससे परे तक था। ईरान, अफगानिस्तान एवं अरब में तब आर्य लोग रहते थे। धृतराष्ट्र की पत्नी गाँधारी अफगानिस्तान की थी। उस समय यह ‘गंधार देश’ के नाम से प्रसिद्ध था। पाणिनी व्याकरण के रचयिता महर्षि पाणिनी भी इसी देश के निवासी थे। वहाँ का कंधार प्राँत ‘गंधार’ का ही विकृत रूप है। जैम्पलमेर के भाटी राजाओं के पूर्व गजसिंह का बसाया हुआ शहर ‘गजनी’ अब भी अस्तित्व में है। इसकी चर्या तवारिख जैसलमेर’ (पृ.1-10), पुस्तक में स्पष्ट रूप से की गई है। उसका उल्लेख करते हुए कहा गया है कि गजबाहु (गजसिंह) ने स्वाँगिया जी की आज्ञा से युधिष्ठिर संवत् 307 में गजनी बसाई थी। इसे निरूपित करने वाला उक्त दोहा उल्लेखनीय है-

तीन सत अतसक धरम, वैशाखे सित तीन। रवि रोहिणि गजबाहु नै गजनी रची नवीन॥

अपनी रचना ‘महाभारत मीमाँगसा’ में राम बहादुर चिंतामणि लिखते हैं कि इन दिनों काबुल में जो पठान जाति रहती है, वह उत्तरप्रदेश के चंद्रवंशी क्षत्रियों की राजधानी ‘प्रतिष्ठान’ की रहने वाली थी। इसी का अपभ्रंश बाद में पठान हो गया। ये प्रजातंत्र के पोषक थे। इनकी राज्य-व्यवस्था गणों पर आधारित थी। पाँडवों ने इन्हीं गणों में से सात को जीता था-’गणान् उत्सवसंकेतान् दस्यून पर्वत वासिनः। अजयन् सप्त पाँडवाः।’ हर ‘गण’ के कई उपगण थे। यही ‘उपगण’ बाद में बिगड़कर अफगानिस्तान बन गया।

अफगानिस्तान के आगे ईरान है। वहाँ भी हिंदू संस्कृति के वाहक आर्यों की ही बस्ती थी। इस संबंध में मैक्समूलर अपनी कृति ‘साइंस ऑफ लैंग्वेजेज’ में कहते हैं कि यह बात भौगोलिक प्रमाणों से भी सिद्ध है कि पारसी लोग फ रस (ईरान) में आबाद होने से पूर्व भारत में आबाद थे। उत्तर भारत का यह समुदाय बाद में ईरान जा बसा।

ईरान के पश्चिमी खाड़ी के उस पार अरब है। संस्कृति शोधकों ने अरब शब्द की जो व्युत्पत्ति बताई है, वह ध्यान देने योग्य है। वैदिक संस्कृति में घोड़े को ‘अर्वन’ कहा जाता है और जहाँ बहुत अधिक घोड़े रहते हैं, उसे ‘अर्व’ कहते हैं। जिस तरह गायों के चारागाह को ‘व्रज’ भेड़-बकरी वाले देश को ‘गाँधार’ कहते हैं, उसी तर्ज पर उत्तम घोड़ों की प्रचुरता होने के कारण उस देश का नाम ‘अर्व’ या ‘अरब’ पड़ गया। अरब देश में आर्यों से प्रादुर्भूत ‘शेख’ नामक एक जाति, जो मूलतः ब्राह्मणों की अंशधर थी, उसका उल्लेख मनुस्मृति में भी हुआ है-

ब्रात्यातु जायते विप्रात्पापात्मा भृज्जकंटकः। आवन्त्यवाटधानौ च पुष्पधः शैख एव च॥

‘एशियाटिक रिसर्चेज’ नामक ग्रंथ के 10वें खंड में लिखा हुआ है कि इस्लाम धर्म के प्रचार से पहले अरब में हिंदू धर्म का बोलबाला था। रामानुज संप्रदाय के मूल प्रचारक यवनाचार्य यहीं से 1 वीं शताब्दी में भारत आए। उनका जन्म अरब के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था और अलेक्जेंड्रिया के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में उन्होंने शिक्षा पाई थी।

राहुल साँकृत्यायन ने अपनी रचना ‘दर्शन दिग्दर्शन’ में इस बात की चर्चा की है कि काबा के मंदिरों के 326 विग्रह इस्लाम काल में तोड़ डाले गए थे, किंतु वहाँ जाने वाले बताते हैं कि अब भी वहाँ कितने चिह्न मौजूद हैं।

राजाओं के हिंदू नाम भी इस बात के द्योतक हैं कि उन क्षेत्रों में पूर्व आर्य जाति ही रहती थी। इस संबंध में असीरिया के सम्राटों के नाम द्रष्टव्य हैं, सुवरदत, जशदत, सुबंधि। यह नाम एकदम भारतीय हैं। इसके अतिरिक्त असुर नासिरपाल, असुरवाणी पाल भी विचारणीय हैं। मिश्र और अरब के सम्राट् वाणासुर (बनिपाल) की पुत्री ऊषा का विवाह भगवान् कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से हुआ था। जो 1300-1400 ई.पू. के मध्य राज्य करता था। ऐसे ही मेसोपोटामिया के एक शासक का नाम दशरथ था, वहाँ का एक अन्य राजा हरि था। मेसोपोटामिया में उत्खनन के दौरान जो पुरातात्त्विक सामग्रियाँ मिली हैं, वह भारतीय शैली की हैं। इससे स्पष्ट हैं, वहाँ के निवासी भारतीय आर्य ही थे।

जूड़िया यहूदियों का नगर हैं। यहीं पर ईसा और मूसा हुए। दोनों का उत्तरार्द्ध जीवन भारत में बीता और दोनों दिवंगत भी यहीं हुए। दोनों की पहलगाव, कश्मीर में आस-पास ही कब्रें हैं। ईसा की कब्र पर हिब्रू भाषा में ‘योशूवा’ लिखा हुआ है। यहूदी लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते थे। ‘जेसस’ तो इसका ग्रीक रूपांतरण है। इससे भी यही संकेत मिलता है कि दोनों आर्य परंपरा के लोग थे और आर्यावर्त से उनका गहरा लगाव था। बाइबिल (जेनिसिस, अध्याय-11) में भी यह लिखा हुआ है कि यहाँ के लोग एक ही भाषा-भाषी थे। वे सब पूर्व से आए।

पोकाँक समेत कई विद्वानों का मत है कि जूड़िया में बसने वाले लोग और कोई नहीं यदुवंशी ही थे। ऐसा माना जाता है कि महाभारत युद्ध के कुछ ही समय बाद कृष्ण की नगरी द्वारिका समुद्र में डूब गई। तब वहाँ के निवासी (यदुवंशी) बारह समूहों में बँटकर विश्व के विभिन्न भागों में जा बसे। वर्तमान यहूदी वंश वास्तव में यदुवंश ही है, ऐसा वे मानते हैं। वे (यहूदी) अपनी काल गणना ई.पू. 3960 से प्रारंभ करते हैं। शायद यह उनका द्वारिका छोड़ने का संभावित वर्ष हो।

पिछले दिनों इजरायल में एक सुरंग निर्माण के दौरान हुई खुदाई में 903 ग्राम वजन का एक बाट मिला है। सीसे से निर्मित इस बाट के दोनों ओर हिब्रू भाषा में ‘बार कोछबा’ नाम छपा है, जिसे रोमनों के विरुद्ध हुई यहूदी क्राँति का नेता माना जाता है। बैट गोवरिन के उत्तर में यहूदी पहाड़ियों के तल में जिस स्थान से यह बाट मिला है, वहाँ के बारे में विश्वास किया जाता है कि यहूदी क्राँति के दौरान यहूदी परिवारों ने यहीं शरण ली थी।

इस बाट की विशेषता यह है कि इस पर षड्दल कमल की आकृति बनी हुई हैं, जो भारतीय संस्कृति को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। यह समाचार ‘इजरायल टुडे’ के सितंबर-अक्टूबर 1999 के अंक में छपा था।

अपनी पुस्तक ‘मानवेर जन्मभूमि’ में बाबू उमेश चंद्र विद्यारत्न लिखते हैं कि राजा सगर की आज्ञा से यवनों (क्षत्रियों) ने जिस ‘पल्ली’ नामक स्थान में अपना निवास बनाया, वहीं ‘पेलिस्टाइन’ हो गया। कई विद्वानों का मत है कि वैदिक ऋषि ‘पुलस्तिन’ का वहाँ आश्रम होने के कारण ही उसका यह नाम पड़ा ।

कश्यप सागर (कैस्पियन सी) के पश्चिमी तट पर अजर बैजान की राजधानी ‘बाकू’ है। वहाँ ज्वालामुखी देवी का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर है। वहाँ पर संस्कृत का एक शिलालेख भी है। उल्लेखों से ऐसा ज्ञात होता है कि 1924 तक उसमें भारतीय पुजारी रहता था, जो मुलतान का निवासी था।

ऐसा ही वर्णन बोंगाई लेविन एवं विगासिन की पुस्तक ‘भारत की छवि’ जो प्रगति प्रकाशन, मास्को से प्रकाशित हुई है, में मिलता है। उसमें कहा गया है कि बाकू में एक हिंदू मंदिर बनाया गया था, जिसमें यहाँ आने-जाने वाले भारतीय पूजा करते थे। उसमें इस बात की भी चर्चा है कि काकेशिया में बसने वाली ‘ओसेतिन’ जाति का वेदों के स्न्नजेता आर्यों से निकट का रिश्ता है।

‘थियाँगनी’ ऑफ हिंदूज’ ग्रंथ में काउंट जार्नस्टजर्ना ने कहा है कि खाल्डियन तथा वेबिलोनियन मूलतया मूर्तिपूजक राजपूत हिंदू थे। वहाँ के सूर्य मंदिर के अवशेषों के अध्ययन के आधार पर उन्होंने यह प्रतिपादित किया है कि 4000 वर्ष ई.पू. वहाँ सूर्य की उपासना होती थी। जार्नस्टजर्ना एक स्कैडिनेवियाई हैं। वे अपनी उक्त रचना में लिखते हैं कि सात वारों के स्कैंडिनेवियन नाम उनके भारतीय नामों से बहुत मिलते हैं। इस आधार पर परोक्ष रूप से उन्होंने यही कहना चाहा है कि भारतीयता की स्पष्ट छाप वहाँ अब भी देखी जा सकती है।

आस्ट्रेलिया में आज जो लोग रह रहे हैं, वे अँग्रेज हैं। उनके वहाँ पहुँचने से पूर्व जो जाति रहती थी, वह माओरी जनजाति के लोग हैं। उनकी संख्या अब बहुत कम रह गई है। उनकी भाषा तथा रीति-रिवाज भारतीय तमिलों से काफी मिलते हैं। इतिहासकारों का मत है कि हजारों वर्ष पूर्व तमिलनाडु से नौकाचालकों का कोई दल वहाँ जा बसा होगा और फिर स्थाई रूप से वहीं रह गया। ऐसा मानने का एक कारण यह भी है कि उनका चेहरा भारतीय तमिलों से काफी साम्य रखता है तथा उनमें भी शैव अथवा वैष्णवों की तरह माथे पर तिलक लगाने की प्रथा है। ऐसा ही एक चित्र लाँग मिसिंग लिंक्स (पृ. 195) पुस्तक में देखा जा सकता है।

भारतीयों की तरह वे भी पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं और ऐसा मानते हैं कि मर जाने के बाद व्यक्ति का पुनर्जन्म मनुष्य, पशु या वनस्पति के रूप में फिर से होता है। यह धारण उनके आर्य होने की ही पुष्टि करता है।

संत रैदास चमड़े का कार्य करते थे। उन्होंने जन-स्तर पर सत्प्रवृत्तियों की स्थापना को ही अपनी साधना मान रखा था। प्रभु का कार्य मानकर उसे करते थे। उसी के प्रभाव से उनके चमड़ा भिगोने की कठोती में गंगा फट पड़ी थीं।

अपनी अफ्रीका यात्रा का वर्णन करते हुए माँगों पार्क ने वहाँ के संस्कृत या संस्कृतोदभव नामों वाले स्थानों, पर्वतों की सूची दी है, जिसे देखकर स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारत का साँस्कृतिक अनुदान उसे भी मिला है। अफ्रीकी पर्वत शिखर माउंट मेरु, माउंट शंभु ऐसे ही कुछ नाम हैं।

इस प्रकार यह स्वीकारने में अब किसी को भी संकोच नहीं होना चाहिए कि भारतीय संस्कृति के अलमबरदार आर्यों ने संपूर्ण विश्व में फलकर उसे आर्य संस्कृति प्रदान की थी। ‘कृण्वन्तु विश्वं आर्यम’ जैसे वेद वाक्य से भी आर्यों के उस संकल्प का ही संकेत मिलता है, जिसमें उन्होंने संपूर्ण विश्व को आर्य (श्रेष्ठ) बनाने का प्रण किया था। ऐसा उन्होंने किया भी, पर तब से लेकर अब तक सहस्न्नों वर्ष बीत जाने से अब उसके प्रमाण बहुत स्वल्प ही शेष रह गए हैं। कर्नल टाड, हम्बोल्ट एवं ई.जी. स्कूइयर प्रभृति विद्वानों ने भी इस मत को माना है और इस बात को अंगीकार किया है कि भारतीय ही प्राचीनकाल में विश्व के प्रथम उपदेष्टा थे।


Quotation

प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ो मत। अपनी महानता का परिचय देकर उसे क्षुद्र बनने दो।


न प्यार पाने की शिकायत (kahani)

एक व्यक्ति किसी विद्वान के पास पहुँचा, बोला-मैं ईमानदारी से जीवनयापन करता हूँ, पर कोई न मेरी प्रशंसा करता है और न प्यार। विद्वान ने कहा-ईमानदारी अच्छी बात है, पर उसके साथ मधुर व्यवहार और सेवाभावी सहकार भी जुड़ा रहना चाहिए। इतना कर सको तो फिर प्रशंसा की कमी न रहेगी, न प्यार पाने की शिकायत करनी पड़ेगी।


महत्व विद्वता का नहीं, पवित्र भावनाओं का

महाराज विवेकनिधि राजा होते हुए भी अतिशय धर्मपरायण एवं ईश्वरभक्त थे। उनकी पुत्री का नाम सुप्रज्ञा था। राजकुमारी भी अपने पिता की भाँति बड़ी धर्मपरायण थी। राजा भी अपनी इस पुत्री के प्रति अति स्नेह रखते थे। एक बार उन्होंने राजकुमारी के जन्मदिवस के अवसर पर एक बड़े प्रीतिभोज का आयोजन किया। इस आयोजन में उन्होंने राज्य के बड़े-बड़े लोगों को आमंत्रित किया। प्रीतिभोज आरंभ करने के पूर्व राजकुमारी सुप्रज्ञा ने धार्मिक परंपरा के अनुसार विशिष्ट अतिथियों के आदर-सत्कार का मन बनाया। वह पूजा की थाली लिए खड़ी हो गई और चारों ओर बैठे अतिथियों को ध्यान में निहारने लगी। एक ओर नगर के प्रमुख विद्वान् एवं धनाढ्य लोग कीमती वस्त्रों से अलंकृत थे, तो दूसरी ओर एक कोने में कुछ साधु-महात्मा आँखें बंद किए अपनी मस्ती में बैठे थे। राजकुमारी विद्वानों एवं धनी लोगों की कतार को छोड़कर साधु-महात्माओं की ओर अग्रसर हुई और उन्हें बड़े आदर-सम्मानपूर्वक पुष्पहार भेंट किए। तत्पश्चात् राजकुमारी महात्माओं की पूजा करने लगीं। फूलों के हार पहनने के बाद महात्मा देवताओं जैसे प्रतीत हो रहे थे।

राजा को यह देखकर खिन्नता हुई कि राजकुमारी ने नगर के प्रतिष्ठित विद्वानों का समुचित आदर नहीं किया और उन्हें पुष्पहार नहीं पहनाए। उनकी पूजा नहीं की। राजकुमारी द्वारा केवल साधु-महात्माओं का स्वागत और पूजन राजा की धारण के अनुसार विद्वान् पंडितों तथा श्रीमंतों का अपमान था। परंतु राजा मौन रहे। जब राजकुमारी द्वारा महात्माओं की पूजा संपन्न हो गई, उन्होंने आदरपूर्वक सभी आमंत्रित अतिथियों से भोजन करने की प्रार्थना की। सभी ने भोजन-प्रसाद ग्रहण किया।

इसी बीच राजा ने राजकुमारी सुप्रज्ञा को एक ओर बुलाकर अपने मन की बात कही। ‘पुत्री। तुमने राज्य के गणमान्य विद्वानों एवं पंडितों का आदर-सत्कार नहीं किया, उनकी पूजा नहीं की, उन्हें पुष्पहार भेंट में नहीं दिए, केवल साधु-महात्माओं की पूजा की। यह बात मेरी समझ में नहीं आई। बेटी इसका खुलासा करके मेरे उद्विग्न मन को शाँत करो।’

सुप्रज्ञा बड़ी विदुषी थी। वह बोली, ‘पिताजी। आप कल राजदरबार बुलवाइए। मैं राजदरबार में ही आपके प्रश्नों का समुचित एवं उपयुक्त उत्तर देने का प्रयास करूंगी।’

राजा जानते थे कि उनकी पुत्री बड़ी धर्मपरायण, विवेकशील एवं व्यवहारकुशल है। उन्होंने बिना किसी संकल्प-विकल्प के उसकी बात मानते हुए राजदरबार का आयोजन किया।

अगले दिन राजदरबार में सभी आमंत्रित व्यक्तियों को उनके पद एवं अधिकार के अनुसार पूर्ण आदर-सम्मान के साथ बिठाया गया। साधु-महात्मा लोग भी दरबार में पधारे। राजकुमारी ने स्वयं सभी लोगों का समुचित सम्मान किया। उसने साधु-महात्माओं को उच्च आसनों पर बिठाया। राजकुमारी ने दो कागज दिए और दोनों पर ईश्वर का नाम लिख दिया। तत्पश्चात् राजकुमारी ने एक कागज विद्वानों को दिखाया और दूसरा साधु-महात्माओं को। उसने उनसे पूछा कि ईश्वर का नाम ठीक लिखा गया है अथवा नहीं? इस बारे में जिसे जो भी कहना हो वह कागज पर लिखकर दें।

जब विद्वानों ने कागज को देखा तो आपस में वाद-विवाद करने लगे कि ईश्वर है या नहीं। ईश्वर है, तो उसका क्या स्वरूप है और उसके कितने नाम हैं, उनमें से कौन-सा नाम सर्वश्रेष्ठ है? सभी ने अपना-अपना मत शास्त्रों के प्रमाण सहित कागज पर लिख दिया।

दूसरी ओर का दृश्य विचित्र था। जब साधु-महात्माओं ने कागज पर ईश्वर का नाम लिखा हुआ देखा तो वे उसे प्रणाम करने लगे। वे ईश्वर का नाम उच्चारण करते-करते आनंदमग्न हो गए। एक अलौकिक मुस्कान उनके चेहरे पर तैरने लगी। उनकी आँखों में दिव्य चमक आ गई। मस्ती में झूम उठे। राजा और राजकुमारी यह सब देख रहे थे। राजा उनके हृदय के पवित्र भावों को समझ गए। कुछ देर बाद राजा ने नौकर के द्वारा कागज वापस मँगा लिए। राजा ने देखा कि विद्वानों ने ईश्वर के नाम पर तरह-तरह की टिप्पणियाँ लिखकर दोनों तरफ से पूरा कागज भर दिया था। जबकि महात्माओं ने तो कागज को देखकर केवल प्रणाम भर किया था। उन्होंने उस पर कुछ भी नहीं लिखा था। उनके कागज से उनके पवित्र हृदय की भावनाओं के अनुसार ‘हे ईश्वर । हे ईश। हे परमात्मा। हे राम।’ की आवाज प्रतिध्वनित हो रही थी। राजा को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया। वे समझ गए कि वास्तव में महात्मा लोग ही ईश्वर के सच्चे भक्त हैं। वे राजकुमारी की सूझ-बूझ पर बड़े प्रसन्न हुए।

लेकिन राजा की जिज्ञासु वृति अभी शाँत नहीं हुई थी। उन्होंने राजकुमारी से पूछा-बेटी बताओ, इन महात्माओं में सर्वश्रेष्ठ कौन है? राजकुमारी ने राजा से ही उसकी परीक्षा लेकर अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं ही ढूँढ़ने की प्रार्थना की।

राजा ने महात्माओं की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। वे राजसिंहासन से उतरकर पहले महात्मा के पास गए और बोले, ‘हे पूज्यवर। आप ही ईश्वर के सर्वश्रेष्ठ भक्त हैं। मैं आपको अपने सिंहासन पर बिठाना चाहता हूँ।’ राजा के इन वचनों को सुनकर महात्मा हँसने लगे। उन्होंने उत्तर दिया, राजन् क्षमा करें। आपके निर्णय में थोड़ी कमी है। सर्वश्रेष्ठ महात्मा मैं नहीं हूँ, बल्कि मेरे पास बैठे महात्मा सर्वश्रेष्ठ हैं। वे ही इस सम्मान के योग्य हैं। यह कहकर वह महात्मा चुपचाप उठकर राजदरबार से बाहर चला गया। इसी प्रकार दूसरे, तीसरे तथा सभी महात्माओं ने अपने से आगे वाले महात्मा को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए राजदरबार से उठकर बाहर की ओर प्रस्थान कर दिया। अंत में एक महात्मा बचे। उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा कि हे राजन्। जो सर्वश्रेष्ठ महात्मा थे वे तो सभी चले गए। मैं तो सामान्य व्यक्ति हूँ। मैं इस राजगद्दी का हकदार नहीं। यह कहकर वे महात्मा भी राजदरबार से बाहर चले गए।

महात्माओं के ऐसे निस्पृह भाव को देख राजा अलौकिक आनंद से परिपूर्ण होकर भाव-विभोर हो गया। अब यह तथ्य उनकी समझ में आ गया था कि सर्वाधिक महत्व धन, पद एवं विद्वता का नहीं, पवित्र भावनाओं से ओतप्रोत हृदय का है। जिसका सम्मान किया जाना चाहिए, वह पवित्र एवं निष्कपट अंतःकरण है। यही वह योग्यता है, जो सामान्य मनुष्य को ईश्वर का प्रीतिभाजन बना देती है। इस तथ्य को समझकर ही राजा विवेकनिधि उस दिन से भगवान् के भक्तों के भक्त बन गए।


दैवी वातावरण का विस्तार (kahani)

आइंस्टीन से किसी ने पूछा कि संसार में इतना दुःख और कलह क्यों है, जबकि विज्ञान ने एक-से-एक बढ़कर सुख-साधन उत्पन्न कर दिए।

उत्तर देते हुए उन्होंने कहा-कमी बस एक ही रह गई कि अच्छे मनुष्य बनाने की कोई योजना नहीं बनी। देश, संप्रदाय के पक्षधर सभी दीखते हैं, पर ऐसे लोग दीख नहीं पड़ते, जो अच्छे इन्सान बनने की योजना बनाएँ।

जरथुस्त्र को बोध हो चुका था। अहुरमज्द (परमात्मा) का सत्य, न्याय और प्रेम (दान-सेवा) का संदेश जन-जन तक पहुँचाने का अभियान चालू कर चुके थे। उसे तीव्र गति देने के लिए संस्कारवान् समर्थ व्यक्तियों की आवश्यकता अनुभव की। ईरान में ‘बल्ख’ साम्राज्य का शासक गुश्तास्प सत्पुरुष था। वे उसके सामने स्वप्न में तीन प्रतीक लेकर प्रकट हुए।

एक हरा पौधा देते हुए कहा, ‘यह सद्भाव का प्रतीक है। परमात्मा एक है, उसके अनुशासन पर चलने और चलाने की आस्था, सबके हृदयों में आरोपित करना अपना पवित्र कर्तव्य मानो।’

एक पुस्तक दी और कहा, ‘यह सद्ज्ञान है, इसे समझने, समझाने का क्रम बढ़ाओ।’

एक अग्नि पिंड दिया और कहा, ‘यह दिव्य अग्नि (यज्ञाग्नि) सत्कर्म का प्रतीक है। यह जलती-बुझती नहीं, अनित्य है। इसका विस्तार करो। तुम्हें पवित्र यश मिलेगा, तुम्हारा राज्य सुखी-समुन्नत बनेगा।’ सद्भाव, सद्ज्ञान और सत्कर्म का संयोग चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करता है।

शासक गुश्तास्प प्रभावित हुआ। उसका जीवन सही दिशा में घूमा और उसके साधनों और प्रभाव-सदुपयोग से सारे क्षेत्र में दैवी वातावरण का विस्तार हो गया।


मन एवं मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः

मन सर्वशक्तिमान, सर्वगत और परमात्मा का एक कल्पनात्मक स्वरूप है। मन का परमात्मा के साथ घनिष्ठ संबंध है। मन और ब्रह्म दो भिन्न वस्तुएँ नहीं है। ब्रह्म ही मन का आकर धारण करता है। अतः मन अनंत और अपार शक्तियों का स्वामी है। मन स्वयं पुरुष है एवं जगत् का रचयिता है। मन के अंदर का संकल्प ही बाह्य जगत् में नवीन आकार ग्रहण करता है, जो कल्पना चित्र अंदर उदय होता है, वही बाहर स्थूल रूप में प्रकट होता है।

मन का स्वभाव संकल्प है। मन के संकल्प के अनुरूप ही जगत् का निर्माण होता है। वह जैसा सोचता है, वैसा ही होता है। मन जगत् का सुप्त बीज है। संकल्प द्वारा उसे जाग्रत किया जाता है। यही बीज पहाड़, समुद्र, पृथ्वी और नदियों से युक्त संसाररूपी वृक्ष को उत्पन्न करता है। मन ही जगत् का उत्पादक है। सत्, असत एवं सदसत् आदि मन के संकल्प हैं। जाग्रत्, स्वप्न और भ्रम आदि सभी अवस्थाएँ मन के रूपांतर हैं। देश और काल का विस्तार व क्रम भी मन के नियंत्रण में है। मन ही लघु को विभु और विभु को लघु में परिवर्तित करता रहता है।

मन में सृजन की अपार संभावनाएँ सन्निहित हैं। मन स्वयं ही स्वतंत्रतापूर्वक शरीर की रचना करता है। देहभाव को धारण करके वह जगतरूपी इंद्रजाल बुनता है। प्रत्येक मन का संसार भिन्न एवं अद्भुत होता है। मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। इस निर्माण प्रक्रिया में मन का महत्वपूर्ण योगदान है। मन का चिंतन ही उसका परिणाम है। यह जैसा सोचता है और प्रयत्न करता है वैसा ही उसका फल मिलता है।

मन के चिंतन पर ही संसार के सभी पदार्थों का स्वरूप निर्भर करता है। जिस वस्तु का जिस भाव से चिंतन किया जाता है, वह वस्तु उसी प्रकार से अनुभव में आने लगती है। सतत चिंतन से असत्य पदार्थ भी सत्य प्रतीत होने लगता है एवं विष भी अमृत बन जाता है। शत्रु एवं मित्र बन जाता है एवं शत्रु-बुद्धि से मित्र शत्रु हो जाता है। दुःख -सुख और खट्टा-मीठा सभी मन की कल्पनाएँ हैं। जैसा हमारा विचार होता है वैसा ही हमारा जगत्।

मन दृढ़ भावना के साथ जैसी कल्पना करता है, उसकी उसी रूप में उतने ही समय तक और उसी प्रकार का फल अनुभव होता है। अतः इस जगत् की वस्तु न सत्य है और न असत्य। जिसने जिसको जैसा समझा, उसे वह वैसा ही दिखाई पड़ता है। मन में उपजे विचार ही वासनाओं और क्रियाओं के रूप में दृष्टिगोचर होते है। इस तरह व्यक्ति अपने विचारों के संसार में निमग्न हो जाता है, क्योंकि उसी के अनुरूप उसको आस्वादन मिलता है। प्रत्येक वस्तु को वह अपने मन के अनुसार देखता है।

दृढ़ निश्चयी मन का संकल्प बड़ा बलवान होता है। वह जिस विचार में स्थिर हो जाता है, परिस्थितियाँ वैसी ही विनिर्मित होने लगती हैं। स्वयं में न तो नीम कटुआ है और न गुड़ मीठा, न अग्नि गरम और न चंद्रमा शीतल। मन जिसमें रमा वही उसका गुण प्रतीत होता है। बुरी-से-बुरी चीज एवं परिस्थितियों में भी वह आनंद उठा सकता है और अच्छी-से-अच्छी परिस्थिति में भी कष्ट एवं बेचैनी का अनुभव कर सकता है। शुद्ध एवं पवित्र मन की परिणति तत्काल एवं तत्क्षण होती है।

शुद्ध मन का आकार एवं स्वरूप प्रखर एवं प्रभावपूर्ण होता है। सतत अभ्यास द्वारा मन को शक्तिशाली बनाना संभव है। उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। अपने संकल्प बल द्वारा असंभव को संभव कर दिखाता है। ऐसा मन शरीर के नष्ट होने पर भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है। इसका निश्चय हिमालय के समान अटल एवं समुद्र

जैसा गंभीर होता है। सफलता इसकी दासी के समान है। निश्चित रूप से समस्त जड़ और चेतन मन के अधीन हैं। मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है।

मन के होने के कारण ही हम मनुष्य कहलाते हैं। यही सुख और दुःख की रचना करता है। यही सुख एवं ऐश्वर्य के साधन जुटाता है और यही भीषण दुःखों को आमंत्रण देता है। मन के अनुरूप ही मनुष्य होता है। शुभ अशुभ कर्मों के कारण भी यही है। मन को साधन लेने पर सभी सध जाता है। साधना का मूल यह मन ही है।

दृश्य जगत् इसकी इच्छाओं का मात्र छायाचित्र है। इच्छाओं के अवसान होते ही यह तिरोहित हो जाता है। मन द्वारा रचा हुआ यह एक महान् स्वप्न है। यह विभिन्न प्रकार के अगणित पदार्थों वाला, तत्वरहित संसार संकल्पनात्मक मन के कर्म द्वारा सृजित सृजन है। रेशम के कीड़े के समान मन अपनी वासना पूर्ति हेतु देह का निर्माण करता है। कुम्हार के घड़े के समान इसे गढ़ता है। हाड़-माँस की यह देह कुछ नहीं है, बल्कि मन की कल्पना द्वारा खड़ी की गई एक संरचना है। देह क्या है? यह पूर्वकाल की, अभ्यास द्वारा विनिर्मित वासनाओं की एक आवृत्ति है। देहभाव से मन को देहत्व का बोध होता है। इससे परे हो जाने पर मन देहभाव से मुक्त हो जाता है। फिर न तो कष्ट-कठिनाइयों का अनुभव होता है और न इसकी समस्या ही होती है। योगी अपने संकल्प बल द्वारा मन को परिपक्व कर लेते हैं। उनका सूक्ष्मशरीर विकसित हो जाता है। वे असाधारण शक्तियों एवं चमत्कारों के स्वामी बन जाते हैं।

शारीरिक रोगों का कारण भी मन ही है। मन को शुद्ध एवं पवित्र कर शरीर का नीरोग एवं स्वस्थ किया जा सकता है। मन की पवित्रता से वासना भी उच्चकोटि की बन जाती है। दुःख के दो कारण हैं आधि और व्याधि। शारीरिक दुःखों का नाम व्याधि है और मानसिक दुःखों को आधि कहते हैं। अज्ञानजनित मन अपने वश में नहीं होता। इससे मन में वासनाएँ उठती हैं। इसकी पूर्ति हेतु मानव बुरे कर्म में लिप्त हो जाता है। वह अनुचित कर्म करता है, अखाद्य भक्षण करता है, कुसंग में पड़ जाता है और अपने मन में कुविचारों को पोषण देने लगता है। इस प्रकार शारीरिक नस नाड़ियाँ ठीक-ठीक काम करना बंद कर देती हैं। इनमें व्यतिक्रम आने लगता है। प्राण का संचार अस्त व्यस्त हो जाता है और मनुष्य कमजोर एवं अशक्त पड़ने लगता है। पाचन, श्वसन, परिसंचरण आदि तंत्र बुरी तरह से प्रभावित होने लगते हैं। परिणामस्वरूप मनुष्य आधि व्याधि से जर्जर हो जाता है।

मनःसंस्थान को स्वस्थ एवं पुष्ट करके ही इसका निराकरण संभव है। श्रेष्ठ चिंतन से मन निर्मल होने लगता है। इसके लिए मन को सदा स्वाध्याय एवं सद्चिंतन में लगाए रहना चाहिए। मन को साध लेने पर वह वरदान बन जाता है। मन एक देहरी पर खड़ा नीचे दृश्य जगत् की ओर झाँक सकता है और ऊपर चेतना के उच्चस्तरीय आयामों में भी गति कर सकता है। अच्छा यही है कि सतत साधना से हम इसे उच्चस्तरीय आयामों की ओर प्रेरित करें।


सच्चे धर्मावलंबी (kahani)

एक शिष्य को धर्मनिष्ठ होने का अभिमान हो गया है। गुरुजी ताड़ गए। धर्म का सही मर्म समझाने के लिए वे एक दिन एक सद्गृहस्थ के घर ठहरे। कृषक एक आम लाया था, उसे उसने अपनी धर्मपत्नी को दे दिया। बेचारी धर्मपत्नी ने भी उसे खाया नहीं, छोटे बच्चे को दे दिया। बच्चे ने आम गुरु-चरणों में समर्पित किया, तो गुरु ने शिष्य को बताया, ‘वत्स। धर्म का यह है सही अर्थ’।

एक ब्राह्मण पूजा-उपासना करके सिद्धियां प्राप्त करने के निमित्त गंगातट पर चला गया, घर का काम छोड़ दिया और भिक्षा से दिन काटने लगा।

उधर से एक दूरदर्शी ऋषि गुजरे। ब्राह्मण की मान्यता और क्रिया देखकर दुःखी हुए, उसे समझाने का उपाय सोचने लगे।

ऋषि नदी में मुट्ठी-मुट्ठी बालू डालने लगे। वह ब्राह्मण यह कौतुक देखता रहा और निकट आकर बोला, ‘यह क्या कर रहे हैं?’

ऋषि ने कहा, ‘नदी पार जाने के लिए पुल बना रहा हूँ।’

ब्राह्मण हँसा और बोला, ‘इस प्रकार थोड़े ही बनेगा। इसके लिए साधन, श्रम, धन और कौशल चाहिए। यह सब जुटाएँ तभी बात बनेगी।’

अब संत की बन आई। उन्होंने कहा, ‘आप भी मात्र भजन के सहारे सिद्धियां पाने के लिए पूजा तक अवलंबित न रहें, आत्मशोधन और लोकसेवा की बात भी सोचें। इससे कम में आपको मनोरथ भी पूरा होने वाला नहीं है।’

ऋषि साँकेतिक शिक्षा देकर चले गए। ब्राह्मण ने नई कार्य-पद्धति अपनाई और उपासना के साथ साधना-आराधना के तत्व भी जोड़कर सच्चे धर्मावलंबी बने।


विनाश से सबक लें, - प्रकृति को माता मानें

मनुष्य ने हमेशा प्रकृति से लिया ही है। प्रकृति भी उदारतापूर्वक मनुष्य की हर आवश्यकता की पूर्ति करती रही हैं, परंतु जबसे मनुष्य ने अपने भोग-विलास के लिए प्राकृतिक संपदाओं के निर्बाध उपयोग के साथ-साथ उसे नष्ट करने का भी सिलसिला शुरू किया, तभी से अपने विनाश को भी आमंत्रित कर लिया। आज समूचा विश्व जिस तरह किसी-न-किसी प्राकृतिक आपदा की चपेट में आकर जन-धर की अपार क्षति उठा रहा है, उसने मनुष्य को प्रकृति के साथ अपने संबंधों पर पुनः विचार करने हेतु बाध्य कर दिया है।

ब्राजील व ब्रोनियों के जंगलों में भयंकर सूखे व ताप के कारण लगी आग भी पूर्णतः ठंडी नहीं हुई है। पिछले वर्ष उड़ीसा में आए समुद्री तूफान का विनाशकारी परिणाम न जाने कब तक कितने लोगों को भोगना है। गुजरात में हुई भूकंप की विनाशकारी लीला अभी भी समूचे देश का दिल दहला रही है। पिछले दिनों उसी के बाद एक समुद्री तूफान और आ धमका। चीन में आई भयंकर बाढ़ ने तो चीन की अर्थव्यवस्था को ही झकझोर कर रख दिया है। दो करोड़ हेक्टेयर से अधिक भूमि जलमग्न हो गई है। डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए। हजारों मकान एवं रेल लाइनें तहस-नहस हो गई। दक्षिण फ्लोरिडा में आए तूफान से पचास मील क्षेत्र में रहने वाले लगभग दो लाख लोग बेघर हो गए । 13 लाख लोगों को लंबे समय तक बिना बिजली के रहना पड़ा। बाँग्लादेश के तटीय क्षेत्रों में आया भयानक समुद्री तूफान, इन्हीं क्षेत्रों में अतिवर्षण व बाढ़ से हुआ विनाश, कनाडा के कुछ भागों में बरफीले तूफानों का आगमन, अमेरिका में कुछ स्थानों पर आया जानलेवा अप्रत्याशित अंधड़, आस्ट्रेलिया, फिलीपींस व इंडोनेशिया के भयंकर सूखे से हजारों लोग असमय काल-कवलित हो गए।

पर्वतीय क्षेत्र भी इन आपदाओं से अछूते नहीं रहे। वहाँ प्रकृति का प्रकोप बादल फटने एवं भू-स्खलन के रूप में दिखाई पड़ता है। बादल फटने से आई अचानक बाढ़ से जहाँ गाँव के-गाँव बह जाते हैं, वहीं भू-स्खलन के कारण मार्ग अवरुद्ध हो जाने से यात्रियों को अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं, अनेकों इसमें दबकर मर जाते हैं। पर्वतों में भू-स्खलन के कारण अब तक इतना ज्यादा विनाश हो चुका है कि उसका ठीक-ठीक अनुमान लगा पाना मुश्किल है। भू-स्खलन के तात्कालिक परिणामों से पर्वतवासी बच भी जाएँ, तब भी उनके जीवन को सुरक्षित नहीं कहा जा सकता । भू-स्खलन के कारण अक्सर पर्वत खिसक कर नदी में जा गिरता है, जिससे नदी में एक अस्थाई बाँध बन जाता है। इस बाँध के निर्माण के पश्चात् इसका टूटना प्रायः निश्चित होता है, क्योंकि पहाड़ का मलबा बहुत देर तक पानी का दबाव बर्दाश्त नहीं कर पाता अतः बाँध टूट जाता है। उसके बाद हुई कुछ क्षणों की तबाही में ही बहुत नुकसान हो जाता है। कुछ समय पहले गढ़वाल में बिरही नदी में इसी प्रकार से बनी झील टूटने से आई बाढ़ में 32 मोटरगाड़ियाँ कुछ क्षणों में ही गायब हो गई, इससे नुकसान का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

इस सबका कारण यही है कि वस्तुतः आज हम वैज्ञानिक उपलब्धियों की चकाचौंध में अपने मूल तत्व एवं संस्कृति को भूल चुके हैं। अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए हम धरती की जीवनदायी व्यवस्था में व्यवधान उपस्थित करने पर भी उतारू हो गए है। अपने भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए उन्हीं प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं, जो प्रकृति ने स्वचालित संतुलन व्यवस्था के रूप में हमें दिए हैं। अनेकानेक वैज्ञानिक चमत्कार, अंतरिक्ष की खोज, ध्वनि की गति के यंत्रों का निर्माण, अणु-विस्फोट, रासायनिक खाद व कीटनाशक रसायनों के प्रयोग में उत्पादन वृद्धि, ये सब हमारे विकास के विभिन्न चरण हैं।

विकास करते हुए हमने प्राकृतिक संतुलन की महत्ता को एकदम विस्मृत कर दिया। इससे होने वाले दूरगामी परिणाम के रूप में हम अपने ही विनाश को अनदेखा करते गए। आज कार्बन डाइ ऑक्साइड व अन्य ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन में हो रही वृद्धि के कारण धरती का औसत तापमान काफी बढ़ चुका है। इस प्रकार पिछला दशक पिछली समूची सदी का सर्वाधिक गर्म दशक रहा है। परिवर्तन की यह दर पिछले 10,000 वर्षों में तीव्रतम हैं। मौसम के नियंता माने जाने वाले वनों पर किस खतरनाक हद तक दबाव बढ़ चुका है, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि विश्व-बाजार में लकड़ी व उसके उत्पादों का प्रतिवर्ष 114 अरब डॉलर का कारोबार होता है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक संतुलन का छिन्न-भिन्न होना स्वाभाविक है।

प्राचीनकाल में सुखद जीवन का सार यही था कि मानव प्रकृति के साथ आत्मिक संबंध स्थापित कर बहुत सीधा-सादा जीवन व्यतीत करता था। वह सिर्फ अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए प्रकृति का उपयोग करता था और इसके लिए वह प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होता था। उसकी इस भावना के फलस्वरूप उसके और प्रकृति के बीच आँतरिक संबंध कायम था। उसका जीवन सुख-शाँति से परिपूरित था। प्रकृति की गोद में उन्मुक्त विचरण करते हुए मनुष्य का मन स्वर्गीय सौंदर्य एवं आनंदानुभूति से भर उठता था।

यह बात सही भी है, वास्तव में मानव का जीवन प्रकृति से इतना घुला-मिला है कि प्रकृति की परिधि के बाहर कुछ सोचा ही नहीं जा सकता। हमारा संपूर्ण जीवन, हमारी खुशियाँ, हमारा सुख, हमारे आविष्कार, हमारा स्वास्थ्य सब कुछ प्रकृति में ही निहित है। इसके बाद भी मनुष्य यदि प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की बात सोचता है, तो इसे उसके मिथ्या दंभ के सिवाय और क्या कहा जा सकता है। प्रकृति पर विजय की इस भावना ने ही प्रकृति को विनाश-लीला फैलाने पर विवश कर दिया है। प्रकृति के विभिन्न रूपों में विभिन्नता होते हुए भी उनमें नियमबद्धता है। उसके सभी रूपों के भीतर कोई शृंखला अनुस्यूत है, कोई नियम चल रहा है। जिसके परिणामस्वरूप समस्त सृष्टि सुव्यवस्थित रूप से चलती रहती है। सभी जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों एवं पशु-पक्षियों पर प्रकृति का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव पड़ता ही है। ये सब भी हजारों वर्षों से प्रकृति के नियमों का पालन कर रहे हैं। एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जिसने प्राकृतिक नियमों की अवहेलना करते हुए प्रकृति का विध्वंस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

अभी भी समय है सँभलने का, अब तक हुए विनाश से सबक लेकर सादगी एवं संयम का जीवन अपनाकर, प्रकृति से मातृवत् व्यवहार करके ही मानवजाति इस स्वनिर्मित विनाश से बच सकती है और इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की संभावना साकार हो सकती है।


धर्म को हराने की चेष्टा (kahani)

बात सन् 1936 की है। गाँधी जी अस्पृश्यता निवारण के लिए देशभर में दौर कर रहे थे। उड़ीसा के एक कस्बे में गाँधीजी ठहरे हुए थे कि पंडितों का एक दल उनसे शास्त्रार्थ करने आ गया। कह रहा था, शास्त्र में अस्पृश्यता का समर्थन है।

गाँधी जी ने मंडली को सम्मानपूर्वक बैठाया और कहा, मैं शास्त्र तो पढ़ा नहीं हूँ, इसलिए आप से हार मान लेता हूँ। पर यह विश्वास करता हूँ कि संसार के सब शास्त्र मिलकर भी मानवी एकता के सिद्धांत को झुठला नहीं सकते। मेरा धर्म तो यही है एवं मैं इस पर अडिग हूँ और जीवनभर रहूँगा।

दिल्ली में एक संत थे, हजरत निजामुद्दीन। उनके यहाँ ईश्वर की वंदना वाला संगीत चलता ही रहता था।

उन दिनों दिल्ली के बादशाह थे गयासुद्दीन तुगलक। उन्होंने संत को गाना-बजाना बंद करने का हुक्म भेजा। संत ने फरमान मानने से इनकार कर दिया।

तुगलक ने सीधा दंड तो न दिया, पर उन्हें हैरान करने की ठानी।

निजामुद्दीन एक बावड़ी बनवा रहे थे। उसमें लगे मजदूरों को उन्होंने किले में काम करने के लिए बुला लिया, ताकि बावड़ी का काम रुक जाए।

मजदूर दिन में किले का काम करते और रात को चुपके से बावड़ी बनाने जा जाते।

रात को दिए की जरूरत पड़ती। तेल के ढेरों दिए जलते और बावड़ी बनती।

तुगलक ने हुक्म दिया, हजरत के हाथों कोई तेल न बेचे।

हजरत ने पानी भरकर दिए जलाना शुरू कर दिया और बावड़ी बनती रही।

इस चमत्कार से तुगलक का सिर नीचा हो गया । बावड़ी पूरी होने तक पानी के चिराग जलते ही रहे। तब से उस बावड़ी का और दरगाह का नाम चिराग निजामुद्दीन पड़ गया।

धर्म के मार्ग पर चलने वालों को कोई बाधा रोक नहीं सकती। स्वयं परमसत्ता उसके साथ-साथ चलती है। धर्म को हराने की चेष्टा करने वाले की अंततः हार होकर ही रहती है।


भगवान की लाठी

बस विधून से चल पड़ी थी और खराब रास्ते पर लड़खड़ाती हुई आगे बढ़ रही थी। गाँव के लोग उसमें भेड़-बकरियों की तरह ठुँसे हुए थे। ग्रामीण महिलाएँ लंबे-लंबे घूँघट काढ़े बड़ी-बड़ी चादरों में लिपटी-सिपटी बैठी थीं। अधनंगे बच्चे रोते-पिनपिनाते चले जा रहे थे।

अक्टूबर का महीना था। इसलिए मौसम काफी खुशगवार था। वह भी अपने गाँव से वापस आ रहा था। कुछ दूर चलकर कंडक्टर ने उसे आवाज दी, बाबूजी। यह सीट खाली है। आप इधर आ जाएँ। वह भीड़ में से रास्ता बनाता हुआ वहाँ जा पहुँचा। इस बीच बस चलती रही और यात्रियों के अनुरोध पर माधोबाग बाजार के पास रुक गई। वहाँ से एक बूढ़े बाबा और उसके साथ दो जवान लड़के बस पर चढ़े । बाबा की उम्र पचास-पचपन के करीब होगी। सफेद धोती, सफेद कुरता, सिर पर बड़ा-सा पग्गड़ और सफेद दाढ़ी ने उन्हें काफी रौबदार बना दिया था। उनके साथ बस पर सवार हुए दोनों लड़के माहौल से बेखबर बातों में मग्न थे। वे ऊँची आवाज में कोई घटना एक-दूसरे को सुना रहे थे और हँस रहे थे।

जब भी उसकी नजरें सामने की ओर उठतीं, उसने बाबा की खिड़की के धुँधले शीशे से बाहर ही झाँकते पाया।

अचानक बस एक अगले स्टॉप पर रुकी। वे दोनों शरारती और बातूनी लड़के उतर गए। कुछ दूसरे लोग जो खड़े थे, वे आकर उस सीट पर विराजमान हो गए। बस कंडक्टर टिकट देते हुए आगे बढ़ रहा था। उसने बाबा से भी गंतव्य स्थान पूछते हुए कहा, बाबा। आप तो माधोबाग से बैठे हैं न। हाँ बेटा। कहते हुए बाबा ने भी टिकट लिया और उसी वक्त बाबा के साथ बैठे व्यक्ति ने अपनी जेबों पर हाथ मारकर कहा, हाय... मेरे पैसे..... हाय, मैं तो लुट गया... बस रोको, अरे भाई बस रोको... मेरी तो जेब कट गई है। किसी ने मेरी जेब से पाँच सौ रुपये निकाल लिए हैं।

अरे भाई। जरा अपने पास ही एक बार देखो। कहीं तुमसे कोई गलतफहमी तो नहीं हो गई।

वह रुआँसी आवाज में बोला ... मेरे से गलती, आप लोग मेरी तकलीफ क्यों नहीं समझ रहे। जिसका पैसा निकल जाता है, वह गलती नहीं कर सकता। मैं अच्छी तरह होशो-हवाश में हूँ। अभी-अभी थोड़ी देर पहले मेरी जेब में रकम थी। अब टिकट लेने लगा हूँ, तो जेब बिलकुल खाली है। वह काफी तेज आवाज में बोल रहा था।

किसी थाने के आगे बस रोको जी। पुलिस वाले खुद ही सबकी तलाशी ले लेंगे। कोई न उतरे बस से, चलो ड्राइवर साहब।

मैं तो यहीं पास में उतरुँगा। बस में कोई मिमियाया। हरगिज नहीं। अब तो सबको नौबस्ता पुलिस चौकी तक चलना पड़ेगा। कंडक्टर ने किसी बड़े जज की तरह अपना फैसला सुना दिया।

पूरे पाँच सौ थे। सौ-सौ के पाँच नोट। वह व्यक्ति जोर-जोर से बोल रहा था।

बस में हंगामा मचा हुआ था। कंडक्टर ने सब खिड़कियाँ बंद करवा दी थीं। लोग अपनी-अपनी जेबें टटोल रहे थे कि कहीं वह भी किसी जेबकतरे का शिकार न हो गए हों। अज्ञात चोर को सभी बुरा-भला कह रहे थे। हर व्यक्ति दूसरे को संदिग्ध नजरों से देख रहा था।

अभी पता चल जाएगा जी। किसने मेरे नोट निकाले हैं। मेरे नोटों के कोनों पर नीली स्याही का निशान है। अभी पता चला जाएगा... चोर बचकर आखिर जाएगा किधर।

मिल जाए तो सौ जूते लगाओ चोर को।

हो सकता हैं, जिसने जेब काटी हो, वह पिछले स्टॉप पर ही उतर गया हो।

नहीं, क्या कहते हैं आप लोग। अभी थे मेरे पास... जब स्टॉप से बस चली है, तो मैंने टिकट के लिए खुद यह दो रुपये ऊपर वाली जेब में रखे थे।

भाई साहब। आप फिक्र न करें... चोर बचकर नहीं जा सकता। कंडक्टर ने उसे आश्वासन दिया। वह व्यक्ति जिसके रुपये चोरी हुए थे, अपने हुलिये से किसी दफ्तर का क्लर्क लगता था। कॉटन की बुशर्ट और मामूली कपड़े की पतलून, उसकी उम्र यही कोई तीस-पैंतीस साल के आसपास की होगी। ऐसे परिश्रमी और सफेदपोश के पाँच सौ रुपये गुम हो जाने का मतलब तो एक महीने की तनख्वाह का सफाया होना है... शायद यह उसकी तनख्वाह ही हो, बेचारा। उसके बड़े अफसोस के अंदाज में सोचा।

वह तो विधून से बस पर चढ़ा था और उसे कुछ अपने काम की जल्दी भी थी।

जरा देर बाद बस नौबस्ता पुलिस चौकी के पास रुक गई। ड्राइवर उतरकर पुलिस चौकी में चला गया। सब लोग एक अजीब-सी कशमकश में बस की खिड़कियों के शीशे से झाँक रहे थे।

ड्राइवर पुलिस चौकी से जब बाहर आया, तो उसके साथ दो सिपाही और दरोगा साहब थे। कंडक्टर दरवाजे की सिटकनी लगाए बड़े सावधान तरीके से खड़ा था। जब पुलिस वाले आ गए, तो सवारियों को एक-एक करके उतारा गया। हर व्यक्ति की अच्छी तरह तलाशी ली गई। दो सिपाही बस के दरवाजे के सामने खड़े थे और वह व्यक्ति जिसके पैसे चोरी हुए थे, सिपाहियों के साथ खड़ा उन्हें इस हादसे का ब्यौरा सुना रहा था।

औरतों ने अपनी तलाशी लेने पर प्रतिरोध किया था। इसलिए दरोगा जी ने निश्चय किया, पहले मरदों की तलाशी ले लीजिए और फिर एक औरत सब औरतों की तलाशी ले ले। सामान भी चैक होगा और पूरी बस भी। कहीं किसी ने रुपये बस में इधर-उधर फेंक दिए हों।

एक-एक करके तलाशी ली जाने लगी। तलाशी के इस क्रम में कई लोगों के बाद वह बाबाजी भी उतरे और उसकी तलाशी शुरू होते ही शोर उठा... यह .... रहे मेरे पैसे।

सिपाही ने बाबा को गरेबान से पकड़कर उनके मुख पर थप्पड़ जमाते हुए कहा, ओ बुड्ढ़े। तुझे शर्म नहीं आई जेब काटते हुए। शकल फरिश्तों की और करतूत शैतानों की।

हाय, तनिक देखो तो इस बुड्ढे की करतूत। एक महिला ने खेद प्रकट करते हुए कहा।

खुदा की कसम, यह रुपये मेरे हैं। मैंने आज ही माधोबाग की बाजार में बकरियाँ बेची हैं। यह रुपये उसी के हैं।

बकवास कर रहा है। मक्कार। ओ बुड्ढे। अपनी इस लंबी दाढ़ी की तो लाज रखनी थी। सिपाही ने उस बूढ़े बाबा को झिंझोड़ते हुए डाँटा। उसकी पगड़ी खुलकर पैरों में आ रही थी।

इधर-उधर से भी काफी लोग इकट्ठे हो गए थे और वे सबके सब अपनी-अपनी बोली और अपने-अपने लहले में उसे धिक्कार रहे थे। देखो जी, भरोसा नहीं होता कि यह बूढ़ा भी जेबकतरा हो सकता है। अरे भाई। आजकल फरिश्तों जैसी शक्लों वाले ही धोखा देते हैं। तोबा। तोबा। पैर कब्र में और यह हरकतें।

किसी ने कहा, अरे भई कलजुग है कलजुग। ऐसी ही और भी अगणित बातें, व्यंग्य भरे जुमले हवा में तैर रहे थे। कुछ लोग कह रहे थे कि बाबा ने अगर बुढ़ापे में इतनी सफाई से जेब काटी है, तो जवानी में इसका क्या हाल रहा होगा। हर व्यक्ति को बाबा के चोर होने का पूरी तरह से यकीन हो गया था, लेकिन उसका अब भी आग्रह था कि ये रुपये उसी के हैं। उसके जर्द चेहरे पर बेबसी छा रही थी। वह अपमान और रुसवाई से पीड़ित होकर सुबक रहा था।

दारोगा जी ने बटुआ खोलकर उसके असल मालिक को रकम लौटा दी। उस आदमी ने दारोगाजी, सिपाहियों और उस कंडक्टर का धन्यवाद किया और पाँच-पाँच के दो नोट सिपाही की तरफ बढ़ा दिए, हवलदार जी। चाय-पानी के लिए।

दूसरा सिपाही बाबा को बेदर्दी से ढकेलता हुआ पुलिस चौकी की तरफ ले चला। उसने अपनी शहादत की

उँगली उठाकर आसमान की तरफ देखा और बेचारगी से पुकारा, ‘या अल्लाह.. तू इन्साफ कर .. ‘चल, चल, ज्यादा ड्रामा न कर बुड्ढे। अंदर चल। तेरा पिछला रिकॉर्ड भी देखेंगे।

वह व्यक्ति जिसके रुपये चोरी हुए थे, पास खड़े एक ताँगे पर जा बैठा और ताँगा चल पड़ा। सब आश्वस्त थे कि चलो हकदार को उसका हक मिल गया। लेकिन ताँगा अभी थोड़ी ही दूर चला था कि सामने से आते हुए एक तेज रफ्तार ताँगे से इस जोर से टकराया कि सवारियाँ उछलकर इधर-उधर बिखर गई। चीख-पुकार का शोर उठा, सभी की नजरें उसकी ओर उठ गई। दुर्घटना अचानक और अप्रत्याशित थी, सभी मुँह फाड़े खड़े थे।

सबसे अधिक विचित्र बात तो यह थी कि गिरने-लुढ़कने के बाद ताँगे की अन्य किसी भी सवारी को कोई खास चोट नहीं आई थी, सिवा उस आदमी को जो अभी-अभी रुपये लेकर हँसी-खुशी ताँगे में सवार हुआ था। दूसरे ताँगे का बाँस उसके सीने में घुस गया था। खून उसके सीने से उबल-उबलकर उसके कपड़ों पर फल रहा था। लोग दौड़कर उसके पास पहुँचे, तो उसने डूबती-लड़खड़ाती आवाज में कहा, बाबाजी को बुलाओ।

लोग बाबा को लेने पुलिस चौकी की ओर दौड़ पड़े और थोड़ी ही देर में उन्हें ले भी आए। बाबा की ओर देखते हुए उसने खून थूककर जैसे-तैसे कहा, ‘बाबाजी। सबके सामने मैं आपसे माफी माँगता हूँ। मुझे माफ कर दो। ये पैसे आपके ही हैं। मैंने बड़ा गुनाह किया कि आप पर इल्जाम लगाया। जब आपने टिकट लेने के लिए बटुआ खोला, तो मैंने नोट गिन लिए थे और उन पर निशान भी देख लिए थे।’

बाबा की आँखों से आँसुओं के दो मोती टूटे... और उस व्यक्ति की गरदन एक ओर लुढ़क गई।

भगवान् की बेआवाज लाठी इतनी असरकारक है, यह सभी देख रहे थे, लेकिन चंद पलों में जो घटना घटित हुई थी उसकी सचाई से इन्कार संभव न था। इस घटना के बारे में सोचकर आज भी दिल इत्मीनान से भर जाता है कि कमजोर व्यक्ति भी बेसहारा नहीं है। भगवान् सबके साथ है और भगवान् की बेआवाज लाठी में बड़ा दम है।


संस्कारों की प्रबला (kahani)

महर्षि जावालि ने पर्वत पर ब्रह्मकमल खिला देखा। शोभा और सुगंध पर मुग्ध होकर ऋषि सोचने लगे उसे देवता के चरणों में चढ़ने का सौभाग्य प्रदान किया जाए।

ऋषि को समीप आया देख पुष्प प्रसन्न तो हुआ, पर साथ ही आश्चर्य व्यक्त करते हुए आगमन का कारण भी पूछा।

जावालि बोले, ‘तुम्हें देव-सामीप्य का श्रेय देने की इच्छा हुई, तो अनुग्रह के लिए तोड़ने आ पहुँचा।’

पुष्प की प्रसन्नता खिन्नता में बदल गई। उदासी का कारण महर्षि ने पूछा तो फल ने कहा, ‘देव-सामीप्य का लोभ संवरण न कर सकने वाले कम नहीं। फिर देवता को पुष्प जैसी तुच्छ वस्तु की न तो कमी है और न इच्छा। ऐसी दशा में यदि मैं तितलियों-मधुमक्खियों जैसे क्षुद्र कृमि-कीटकों की कुछ सेवा-सहायता करता रहता, तो क्या बुरा था। आखिर इस क्षेत्र को खाद की भी तो आवश्यकता होती, जहाँ मैं उगा और बढ़ा।’

ऋषि ने पुष्प की भाव-गरिमा को समझा और वे भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उसे यथास्थान छोड़कर वापस लौट आए।

संत इब्राहीम ने ईश्वरभक्ति के लिए घर छोड़ दिया और वे भिक्षाटन पर निर्वाह करके साधनारत रहने लगे।

किसी किसान के यहाँ वे भिक्षा माँग रहे थे, तो उसके रोककर कहा, ‘आप जवान हैं, परिश्रमपूर्वक निर्वाह करें, बचे समय में साधना करें। समर्थ का भिक्षा माँगना उचित नहीँ।’

इब्राहीम को बात जँच गई। उनने इस सदुपदेशकर्ता का एहसान माना और पूछा, ‘तो फिर इतनी कृपा और करें कि मुझे काम दिला दें, ताकि गुजारे के संबंध में निश्चिंत रहकर भजन करता रह सकूँ।’

किसान का एक आम का बगीचा था। उसकी रखवाली का काम सौंप दिया। साथ ही निर्वाह का प्रबंध कर दिया। दोनों को सुविधा रही।

बहुत दिन बाद आम की फसल के दिनों में किसान बगीचे में पहुँचा और मीठे आम तोड़कर लाने के लिए कहा। इब्राहीम ने बड़े और पके फल लाकर सामने रख दिए। वे सभी खट्टे थे। नाराजी का भाव दिखाते हुए किसान ने पूछा, ‘इतने दिन यहाँ रहते हो गए, इस पर भी ये नहीं देखा कि कौन पेड़ खट्टे और कौन मीठे फलों का है?’

इब्राहीम ने नम्रतापूर्वक कहा, ‘मैंने कभी किसी पेड़ का फल नहीं चखा। बिना आपकी आज्ञा के चोरी करके मैं क्यों चखता?’

किसान इस रखवाले की ईमानदारी, वफादारी पर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कहा, ‘आप पूरे समय भजन करें। निर्वाह मिलता रहेगा। रखवाला दूसरा रख लेंगे।’

इब्राहीम दूसरे दिन बड़े सबेरे ही उठकर अन्यत्र चले गए। चिट्ठी रख गए। ‘आपने आरंभ में कहा था, बिना परिश्रम के नहीं खाना चाहिए। आपकी उस अनुशासन भरी शिक्षा से ही मेरी श्रद्धा बढ़ी थी। अब तो आप ठीक उल्टा उपदेश करने लगे। मुफ्त का खाने लगूँ, यह कैसे होगा? आपकी बदली हुई शिक्षा को देखकर मैंने चला जाना ही उचित समझा।’

संस्कारों की प्रबला सही मार्ग पर चलने वाले को कभी दिग्भ्राँत नहीं कर सकती।


सनकों और बेवकूफियों के कीर्तिमान

यदा-कदा इन्सान अपनी धुन में ऐसा कुछ कर बैठता है, जिसके पीछे न कोई तर्क होता है और न ही विचार। ऐसी विचारशून्यता और तर्कहीनता से प्रेरित ये कार्य ही मानव मन की सनक कहलाते हैं। ऐसी सनकें कौतुक एवं कुतूहल बढ़ाने के साथ यह सोचने के लिए भी विवश करती हैं कि मनुष्य की इस क्रिया-शक्ति के साथ उसकी चिंतन-शक्ति भी जुड़ सकी होती, तो किए गए कार्य का स्वरूप कितना उत्कृष्ट एवं लाभकारी होता। परंतु ऐसा न हो पाने के कारण ही अजीबो-गरीब सनकें सामने आती रहती हैं।

अदालत में व्यक्तियों पर मुकदमा चलता हैं,पर जानवरों पर मुकदमा चले, यह बड़े ही आश्चर्य की बात है। सन् 1459 में फ्राँस के शहर लावागू की अदालत में खाँसी भीड़ थी। लोगों के चेहरों पर आश्चर्यमिश्रित उत्सुकता थी। इस दिन अदालत में एक मादा सुअर और उसके छह नन्हें बच्चों पर मानव शिशु की हत्या का मुकदमा चलाना था। निश्चित समय पर जज साहब पधारे। मादा सुअर और उसके शिशुओं को कटघरे में खड़ा किया गया। पूरी सुनवाई के पश्चात् जज ने सुअर परिवार को हत्या का दोषी पाया और मादा सुअर को मौत की सजा सुनाई, परंतु बच्चों की कम उम्र को देखते हुए उनकी सजा माफ कर दी गई। बच्चों को छोड़ने का एक कारण यह भी था कि उनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिल पाए थे।

कोई माने या न माने, आज से करीब एक हजार साल पहले 29 वीं शताब्दी के अंत तक यूरोप में जानवरों पर भी मुजरिमों की तरह मुकदमे चलाए जाते थे और सख्त सजा भी मिलती थी। इन मुकदमों की खास बात यह थी कि पालतू जानवरों को अदालत दंडित करती थी, पर जंगली जानवरों को चर्च सजा देता था। जानवरों को मृत्युदंड दिए जाने का तरीका भी अनोखा था। मृत्युदंड के दोषी जानवर को अदालत के सामने पेश होने के लिए तीन बार कहा जाता था। जब जानवर तीन बार कहे जाने के पश्चात् भी अदालत में अपनी सूरत नहीं दिखाता था, तो जज महोदय उसे निर्वासित कर देते थे। इसका उल्लंघन मृत्युदंड होता था।

ऐसे ही क्रम में सन् 1521 में चूहों पर चले मुकदमे ने तो भारी प्रसिद्धि प्राप्त की थी। फ्राँस में चले इस मुकदमे में चूहों की पैरवी की थी विख्यात वकील बरथीलोमियू चासानी ने। चूहों पर आरोप था कि वे नागरिकों के अनाज एवं कपड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं। चूहों के खिलाफ अदालत में हाजिर होने के लिए सम्मन जारी किया गया, पर चूहों को न आना था और न वे आए। जज ने चूहों के वकील चासानी से जब इस बावत पूछा, तो चासानी ने कहा कि सम्मन गलत था। सही मायने में सम्मन में स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए कि किस मुहल्ले के चूहों को कोर्ट में हाजिर होने का आदेश है। दुबारा आदेश हुआ। इस बार भी चूहे नहीं आए। जज ने पूछा, पर चासानी ने उत्तर देकर कहा कि उसके तमाम मुवक्किल चूहे बूढ़े व चलने में लाचार हैं। अतः उन्हें कोर्ट में लाने के लिए विशेष प्रबंध करने होंगे। जज ने बात मान ली, पर जब चूहे फिर भी नहीं उपस्थिति हुए, तो चासानी का जवाब था। मेरे मुवक्किल आने को तैयार थे, पर दूसरे पक्ष के लोगों ने अपनी बिल्लियों को बाँधकर नहीं रखा था, इसीलिए चूहे डर गए। यह अदालत की जिम्मेदारी है कि वह हर अपराधी तथा बचाव पक्ष की सहायता करे। जज को यह बात माननी पड़ी और उन्होंने शिकायत पक्ष के लोगों को इस ओर सावधान किया। किंतु फिर भी सारी बिल्लियों को न बाँधा जा सका एवं मुकदमा खारिज हो गया।

उन दिनों किसी जंतु पर जादू-टोना करने का आरोप लग जाए, तो उसका मरना निश्चित था। इंग्लैंड में 1495 में एक मुर्गी ने अंडा दिया। विज्ञान की दृष्टि से यह अनहोनी घटना नहीं है। परंतु लोगों को लगा कि मुर्गी अवश्य ही जादू-टोना जानती है। जज और वकील ने तो मुर्गी को शैतान का रूप कह डाला और अंत में सजा के तौर पर मुर्गी और उसके अंडे को भरे बाजार में जला दिया गया।

पति के सिर पर बाल न होना पत्नी के लिए कोई असामान्य घटना नहीं है। परंतु मन में सनक हो तब तो बात ही कुछ और है। तेहरान की एक सुँदरी ने पति के गंजे सिर को देखते ही मुकदमा दायर कर दिया। हुआ यह था कि विवाह के समय पति महाशय ने लुभावनी विग लगा रखी थी, जिससे नवेली दुल्हन अनजान थी। शादी के बाद एक रात एक भोज में कुछ शरारती बच्चों ने पति के बाल पकड़कर खींचे तो विग गिर पड़ी और रोशनी में गंजा सिर दिख गया। लोगों की खिलखिलाहट से पत्नी इतनी आहत हुई कि उसने पैंतालीस हजार डॉलर के गुजारे-भत्ते के साथ तलाक की माँग कर दी।

सबके तौर-तरीके बड़े अनूठे होते हैं। यहाँ कुछ भी संभव है। आमतौर पर विवाह के उपराँत महिलाओं को गृहस्वामिनी कहा जाता है। बीस वर्षीया एलिस कार्निन सल्मी तो सचमुच में गृहस्वामिनी बन गई। हुआ यह कि उसने उस मकान से ही शादी कर ली, जिसमें वह 20 साल से रहती आ रही थी। एलिस के अनुसार, लड़कियाँ बड़ी उत्सुकता से शादी करती हैं, परंतु पुरुष के अत्याचारों से तंग आकर कुछ समय बाद ही तलाक ले लेती हैं। लड़कियों को विवाह तो करना ही होता है, तो फिर अपने घर से ही शादी क्यों न कर ली जाए। सोच के इस विचित्र क्रम में एलिस को मकान से शादी करने की प्रेरणा मिली। यह विवाह संस्कार पूरी परंपरा एवं विधिपूर्वक उसी मकान से संपन्न हुआ। दूल्हे के पिता की भूमिका जेरी पोट से अदा की, जो व्यवसाय से बिल्डर हैं और जिन्होंने उस मकान का निर्माण किया था।

सुनकर हैरानी होती है कि 26 बच्चों के पिता को अभी भी एक अदद दुल्हन की खोज है। ये साहब हैं नेपाल के अब्दुल रहमान। इनकी दो शादियाँ हुई है और उनसे 26 बच्चे हैं। इनके अभी भी 20 बच्चे जीवित हैं। संतान प्राप्त करने की ललक में 55 साल के अब्दुल रहमान अब भी एक ऐसी नई-नवेली तीसरी बीबी की तलाश में है, जो ढेर सारे बच्चों को जन्म दे सके। इसी तरह संयुक्त अरब अमीरात के सलीमन जुमा मुबारक के जीवन की सबसे बड़ी तमन्ना है कि वह अपने मुल्क में सबसे अधिक बच्चे पैदा करें। सलीम की उम्र 50 वर्ष से कम है और वह 45 औलादों का पिता बन चुके हैं। उनकी तीन बीवियां है तथा इसके पूर्व चार पत्नियों को तलाक दे चुके हैं। अगर उन्होंने तलाक नहीं दिए होते, तो संभवतः बच्चों की संख्या और भी अधिक होती।

धनवान होते हुए भी और भी धन कमाने की सनक देखी जाती है, परंतु पैसों को थैली में रखकर भीख माँगने की बात बड़ी अजीबोगरीब है। ऐसी घटना में उस भिखारी को अंततः जेल की हवा खानी पड़ी, जो अपनी जेब में पूरी चार लोख रेयाल (भारतीय मुद्रा में पैंतीस लाख के बराबर) भरकर एक मस्जिद के नीचे भीख माँग रहा था। हुआ कुछ यों कि भीख माँगते समय उसकी एक अन्य व्यक्ति से झड़प हो गई। उस व्यक्ति ने भिखारी को दौड़ाया।

भागते समय भिखारी की जेब से चार लाख रेयाल का बंडल गिर पड़ा। लोगों ने उसे पकड़ा और पुलिस के हवाले कर दिया।

सनक का यह क्रम-जीते-ज्ी ही नहीं, मरने के बाद भी बना रहता है। अक्सर देखने में आता है कि शवयात्रा में शामिल होने वाला कोई भी व्यक्ति शराब पीकर नहीं आता है। लेकिन यदि मरने वाले की अंतिम इच्छा यही हो कि उसकी शवयात्रा में शामिल वही व्यक्ति हो जो शराब पिया हो। मोगा पंजाब के रामगढ़िया परिवार के गुरुदयाल सिंह की शवयात्रा में शरीक सारे व्यक्ति शराब के नशे में धुत थे। इसलिए कि यह गुरुदयाल की आखिरी ख्वाहिश जो थी। उसके बेटों ने उसकी मौत के बाद उसके घर पहुँचे लोगों को जमकर शराब पिलाई। उसके बाद ही पृतक की शवयात्रा चली।

सनक जन्मजात भी होती है और परिस्थितिजन्य भी। कहा जाता है कि सनकी व्यक्ति अपने माता-पिता की एकमात्र संतान अथवा बड़ी संतान होता है। सनकी बड़े जिज्ञासु होते है। ये अपने प्रिय विषय में लीन रहते हैं। इन्हें इस बात की कतई परवाह नहीं होती कि लोग क्या कहेंगे? नार्टिघम में एक सज्जन हैं, जो बैंकों में सुरक्षा उपकरण लगाने का काम करते हैं। उन्होंने विधिवत् अपना नाम राबिनहुड रखा हुआ है। राबिनहुड की तरह ही वे हरी पोशाक पहनते हैं तथा हाथ में धनुष-बाण लिए रहते हैं।

मनोविज्ञानी डॉ. डेविड विक्स ने सनकीपन से ग्रस्त एक महिला का वर्णन किया है। वह लिखते हैं कि उसे शानदार किस्म के पियानो रखने का शोक था तथा इसके पास ऐसे चार पियानो थे। इसे यह भी सनक थी कि मकान की सबसे ऊपरी अथवा कम-से-कम तीसरी मंजिल में रहना चाहिए। एक बार इसे ऐसा घर तो मिल गया, पर इस घर की सीढ़ियाँ घुमावदार थीं। अतः पियानो दीवारों से अड़ गए, पर पियानो को तो ऊपर जाना ही था। अतः दीवारें तोड़कर उन्हें ऊपर ले जाया गया, परंतु एक सप्ताह बाद ही इस महिला को यह जगह खराब लगने लगी और वह किसी दूसरे मकान में चली गई।

इसी प्रकार सेब्राइल के शासक अवादेल मोता दिल को खोपड़ियों के गुलदस्ते बनाकर उसमें आकर्षक फूल सजाकर रखने का बड़ा शौक था। खोपड़ियाँ वह अपने शत्रुओं का वध करके प्राप्त किया करता था। इंग्लैंड का विख्यात कवि बायरन भी खोपड़ियों का शौकीन था। वह उन्हें शराब पीने-पिलाने के लिए इस्तेमाल करता था। चीन की टाइलो नाम की एक लड़की खोपड़ियाँ इकट्ठा करने की इतनी शौकीन थी कि उसने अपने पिता की मृत्यु के बाद उसकी खोपड़ी भी अपने पास रख ली थी। रोजर पादरी को यह सनक थी कि वह हर दूसरे-तीसरे दिन हैट खरीदकर कब्रिस्तान में रख आता था, ताकि मुरदे इसे पहन सकें। रोमन सम्राट् नीरो की महारानी गधी के दूध से स्नान करती थी। विश्वसुंदरी क्लियोपेट्रा को भी गधी के दूध से नहाने की सनक थी।

जहाँ तक शेखों और उनकी परिवारों के लोगों की फिजूलखरची की बात है, उसके बारे में एक नहीं अनेक मनोरंजक तथ्य उपलब्ध हैं। संयुक्त अरब अमीरात की फिजूलखरची बेगमों में से वहाँ के एक शेख सैयद बिन सुलतान अल नहायन की बेगम शेखा हैं, जिन्होंने केवल 30 दिनों के अंदर 20 लाख डॉलर का समान खरीद कर घरेलू सामान की खरीददारी का विश्व रिकॉर्ड ही कायम कर दिया। इस खरीदे हुए सामान को हवाई अड्डे तक ले जाने के लिए 29 ट्रकों की जरूरत पड़ी और जब वे ट्रक सामान लेकर हवाई अड्डे की तरफ जा रहे थे, तो ऐसा लगता था कि जैसे ट्रकों का एक काफिला चल रहा हो। इतना ही नहीं एक और दिलचस्प बात इस मामले में यह भी है कि यह सामान जो केवल एक घर के लिए खरीदा गया था, वह 100 घरों की आवश्यकता से भी अधिक था। कहा जाता है कि संयुक्त अरब अमीरात के शेख सैयद बिन सुलतान अल नहायन इस समय 19000 करोड़ रुपये की संपत्ति के मालिक हैं और स्वयं भी फिजूलखरची के लिए देश विदेश में चर्चित हैं।

अपने विचित्र शौक के इसी क्रम में चीन में एक महिला ऐसी है, जिसके बाल दो मीटर 30 से.मी. से लंबे है। शेनयाँग में रहने वाली वाँग लीगवान वस्तुतः सबसे लंबे बालों वाली महिला हैं। वाँग लीजवान अपने इतने लंबे बालों को धोने के लिए किसी आधुनिक शैंपू का इस्तेमाल नहीं करती हैं। मजे की बात यह है कि वाँग की 19 वर्षीया लड़की के बाल भी काफी लंबे हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि वह अपनी माँ के लंबे बालों का रिकॉर्ड तोड़ने में सफल हो। बालों की वह कहानी पचास साल से उज्जैन नगर में बसी 94 वर्षीय संन्यासिनी जगदंबा के साथ भी है। इनके 19 फुट लंबे केश है। जगदंबा भी प्राकृतिक साधनों के अलावा किसी बाहरी प्रसाधन का उपयोग नहीं करती हैं। इन बालों को धोने में ही इनका दो घंटे या इससे ज्यादा समय लग जाता है। ऐसी ही कथाएँ और भी है, जो यह बताती हैं कि मनुष्य जिस अमूल्य जीवन ऊर्जा की बरबादी अपनी बेतुकी सनक भरे कारनामों में बरबाद करता है, वही बहुमूल्य ऊर्जा यदि सृजनात्मक कार्यों में खप सके, तो सृजन और सफलता के नए-नए कीर्तिमान खड़े किए जा सकते हैं।


बड़ा प्रयोजन (kahani)

युधिष्ठिर ने महल के नीचे रस्सी के सहारे एक घंटा बाँध रखा था। प्रजाजनों में से किसी को न्याय चाहिए तो वह घंटा बजाता। युधिष्ठिर उसे तुरंत बुलाते ओर उसका फैसला करते।

पाँडवों ने इस पर आपत्ति की तो युधिष्ठिर ने कहा, ‘राजा का धर्म है कि उसे अपनी सुविधा को प्राथमिकता न देकर उन प्रजाजनों की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, जिनके लिए वह सिंहासन की न्यायपीठ पर बैठा है।’

भगवान् बुद्ध का जब मरणकाल निकट आया, तब उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाकर कुछ उपदेश दिए। उन्होंने कहा, ‘तुम साम्यवादी संकीर्णता से दूर रहकर सच्चे धर्म का पालन करना, धर्म मनुष्य को मर्यादाओं में रखता है और शालीन बनाता है। बिना तट की सरिता उच्छृंखल होकर अपना और सबका विनाश करती है। धर्म के सीमा-बंधन तोड़ना मत।’

‘परस्पर एक होकर रहना। कारण कुछ भी हो, पृथकतावाद मत अपनाना। जो तुम में फूट डालो, उनसे सतर्क रहना और उन्हें कभी क्षमा मत करना।’

‘जहाँ रहते हों उसे पथ-विश्राम मात्र मानना । तुम्हारा घर तो वहाँ है, जहाँ जीवन लक्ष्य पूर्ण होता है। रास्ते के साथियों से मिलना जरूर, पड़ावों पर ठहराना भी, पर उनके साथ इतने मत उलझ जाना, कि मंजिल ही भूल जाएँ।’

‘भिक्षुओं। बोलना कम, करना ज्यादा। जितना ज्यादा बोलोगे उतना ही तुम्हारा सम्मान गिरेगा। उथले लोग ही बहुत बकवास करते हैं। तुम जो बोलो ठोस, मर्यादित, थोड़ा, अनुभूत और विश्वासपूर्वक बोलना, उस थोड़े से भी बड़ा प्रयोजन सधेगा।’


सत्य का बोध कराए, ऐसी शिक्षा प्रचलित हो

शिक्षा और दर्शन अन्योन्याश्रित है। जीवन को विकसित एवं पल्लवित बनाने के लिए दोनों की आवश्यकता है। शिक्षा और दर्शन एक-दूसरे से संबंधित हैं। दार्शनिकों के मतानुसार शिक्षा दर्शन का क्रियात्मक एवं व्यावहारिक पक्ष है। जान एडम्स की मान्यता है कि शिक्षा, दर्शन का क्रियाशील एवं गत्यात्मक पहलू है। जान डीवी ने दर्शन को शिक्षा का सामान्य सिद्धांत कहा है। इन्होंने इन दोनों के बीच संबंधों की घनिष्ठता को स्वीकारा है। वे कहते है शिक्षा की सहायता से ही मनुष्य को दर्शन संबंधी आवश्यक ज्ञान प्राप्त होता है।

दर्शन का उद्देश्य है, जीवन को समुन्नत बनाना। इस हेतु कुछ निश्चित सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जाता है। शिक्षा द्वारा इन सिद्धांतों को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया जाता है। अतः शिक्षा दर्शन के उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप देने तथा उसके उद्देश्यों के अनुसार व्यक्ति के जीवन संबंधी दृष्टिकोण को प्रभावित करने में सहायता प्रदान करती है। शिक्षा को दर्शन के उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन कहा गया है। इसकी सहायता से ही दार्शनिक ज्ञान मिलता है। शिक्षा की उर्वर भूमि में दर्शन की उत्पत्ति मानी जा सकती है। शैक्षिक प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति के मन में विचारों का प्रादुर्भाव होता है और अंत में विचार ही दर्शन को जन्म देते हैं।

शिक्षा और दर्शन दोनों को एक-दूसरे के पूरक कहा जा सकता है। दार्शनिकों ने शिक्षा के संबंध में भी गहन विचार-मंथन किया है। सुकरात, प्लेटो तथा रूसो से लेकर जान डीवी और अन्य आधुनिक दार्शनिक इस बारे में एक मत हैं। पूर्वी दार्शनिकों का मत बड़ा ही समग्र एवं संपूर्ण है। प्राचीनकाल के याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ, विश्वामित्र से लेकर महर्षि व्यास तक अधिकाँश प्रसिद्ध दार्शनिक, मूर्द्धन्य आचार्य एवं शिक्षाशास्त्री रहे हैं। रवींद्रनाथ टैगोर की विश्वभारती, श्री अरविंद का पाँडिचेरी आश्रम दार्शनिक विचारों की व्यावहारिक प्रतिमूर्ति हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा संचालित शाँतिकुँज के तत्वावधान में देवसंस्कृति महाविद्यालय प्रारंभ हो रहा है। यहाँ पर भी वैदिक दर्शन एवं संस्कृति के व्यावहारिक एवं क्रियात्मक स्वरूप का पठन-पाठन प्रस्तावित है।

महात्मा गाँधी की नई शिक्षा पद्धति बुनियादी शिक्षा इसी से संबंधित है। इस प्रकार प्रायः सभी शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के साथ-साथ दर्शन पर भी विचार किया है। इसकी वजह है कि दार्शनिक विचारधाराओं का व्यावहारिक रूप शिक्षा के माध्यम से ही मिल सकता है। शिक्षाशास्त्री भी यह अनुभव करने लगे हैं कि सामाजिक मूल्यों और आदर्शों की खोज तथा परिवर्तनशील जीवन के लिए परिभाषाओं और सिद्धांतों की रचना आवश्यक है। यह कार्य दर्शन की सहायता से ही संभव है।

शिक्षा दर्शन का जन्म प्रचलित शिक्षा पद्धति के असंतोष के कारण हुआ। भारत में भी नवीन दर्शन का जन्म इसी असंतोष का परिणाम है। अँग्रेजी शिक्षा पद्धति के विरुद्ध आक्रोश एवं असंतोष ने ही काशी विद्यापीठ, विश्वभारती, अरविंद आश्रम, वनस्थली विद्यापीठ, गुरुकुल काँगड़ी, गुरात विद्यापीठ, जामिया मिलिया इस्लामिया आदि विशेष शिक्षण संस्थाओं को जन्म दिया। पुरातन परंपरा में सामयिकता लाने हेतु नवीन पद्धति की खोज की जाती है। भारतीय शिक्षा के विकास के लिए शिक्षा-दर्शन को संस्कृति के मूलभूत तत्वों की उपयोगिता और उसके व्यावहारिक पक्ष पर विचार करना चाहिए।

शिक्षा-दर्शन, शिक्षा और दर्शन के बीच की एक शाखा और दोनों को संबद्ध करने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है। सभी शिक्षाशास्त्री इनके बीच के स्थायित्व को स्वीकारते हैं। परंतु इसके वास्तविक स्वरूप में मताँतर है। जान डीवी और उसके समर्थकों के मतानुसार संपूर्ण दर्शन ही शिक्षा-दर्शन है। दर्शन का उद्देश्य है- शिक्षा के लिए सामान्य सिद्धांतों की खोज करना। उनके अनुसार दर्शन का प्रमुख कार्य है- जीवन की कठिनाइयों को दूर करना एवं इस हेतु नई दशा एवं दिशा प्रस्तुत करना। वे दर्शन का संबंध जीवन, मृत्यु, पृथ्वी, ब्रह्मांड आदि अनसुलझी समस्याओं से नहीं जोड़ते। जान डीवी के अनुसार दर्शन को सामाजिक समस्याओं के अध्ययन तक ही सीमित करना चाहिए। इन व्यावहारिकतावादी दार्शनिकों ने संपूर्ण दर्शन को ही शिक्षा-दर्शन माना है। शिक्षा और दर्शन में शिक्षा ही प्रमुख है और दर्शन उसका सिद्धांतीकरण रूप है।

एक अन्य वर्ग दर्शन को केवल शिक्षा-दर्शन तक ही सीमित नहीं मानता। वह इसे दर्शन का एक अंग मानता है। इनके मतानुसार दर्शन में जीवन और ब्रह्माँड संबंधी विषयों का समावेश उचित एवं आवश्यक है। इस परिप्रेक्ष्य में बट्रेंड रसेल कहते हैं, दर्शन को विश्व की गतिविधि एवं क्रियाकलापों के अध्ययन में संलग्न रहना चाहिए। इससे मनुष्य की वैचारिक एवं बौद्धिक शक्ति विकसित होती है, कल्पनाशक्ति समृद्ध होती है एवं अंधविश्वासों-मान्यताओं में परिवर्तन होता है। ब्रह्मांडीय चिंतन करके मन भी महान् होने लगता है और इससे तादात्म्य स्थापित कर लेता है। यही इसकी सार्थकता एवं सफलता है। इस तरह दर्शन में शिक्षा के लिए एक नवीन शाखा व विषय का उदय होता है।

वस्तुतः दर्शन के एक गर्भ से समस्त विषयों का जन्म हुआ है। ज्ञान-विज्ञान की समस्त शाखाएँ दर्शन से उद्भूत हुई हैं। यहाँ तक कि गणित भी एक विषय है, जो दर्शन के बीज से बाहर निकला। इसके पश्चात् क्रमशः भौतिक, रसायन, जीव विज्ञान आदि विज्ञानों ने इसी पथ का अनुसरण किया। गणित में प्रश्न और उत्तर संबंधी निश्चितता होती है। अन्य सभी विज्ञान गणित का आश्रय लेते हैं, परंतु विज्ञान में पदार्थों का अध्ययन किया जाता है, जबकि गणित संबंधों का अध्ययन-अन्वेषण करता है। अतः सभी विज्ञान इसका सहारा लेकर विभिन्न पदार्थों के संबंधों का अध्ययन करते हैं।

इस तरह ये सभी विषय प्रकाराँतर से दर्शन से ही उद्भूत हुए है। अतः इनका इससे संबंध भी बरकरार है। गणित और दर्शन की पद्धतियों में पर्याप्त समानता पाई जाती है। गणित के जन्मदाता अरस्तू स्वयं एक ऊँचे स्तर के दार्शनिक रहे है। इसी प्रकार विज्ञान के संबंध में भी कहा गया है। पाश्चात्य दर्शन को वर्तमान रूप देने वाले दार्शनिक थेल्स एक उच्चकोटि के वैज्ञानिक थे।

सभी विज्ञान जिस गणित का आश्रय लेते हैं, उसी तरह सभी कलाएँ दर्शन का सहारा लेती हैं। इस क्रम में शिक्षा-दर्शन की महत्ता असंदिग्ध है। शिक्षण विधि के अतिरिक्त सभी शैक्षिक कार्यक्रमों, जैसे शैक्षिक उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शैक्षिक व्यवस्था, शैक्षिक साधन आदि का निर्धारण शिक्षा-दर्शन की सहायता से किया जाता है। वह दर्शन शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण से संबंधित परिस्थितियों और समस्याओं का समाधान देता है। इससे लक्ष्य निर्धारण में सहायता मिलती है। छात्रों में बौद्धिक विकास के साथ-साथ भावनात्मक अभिवृद्धि भी आवश्यक है अन्यथा शिक्षा एकाँगी हो जाएगी। आज की इस एकाँगी शिक्षा के दुष्परिणाम से भला कौन परिचित नहीं? शिक्षा-दर्शन ही इस अभाव को भर सकने में समर्थ है।

वैसे शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य है-ज्ञान की प्राप्ति एवं दर्शन का उद्देश्य है- ज्ञान की खोज। प्लेटो के अनुसार दर्शन वह नशा है, जो सभी प्रकार के ज्ञान से आनंद प्राप्त करता है। ज्ञान कसी बिंदु में ठहरकर संतुष्ट नहीं हो जाता। इसकी खोज की यात्रा अनंत है। जान डीवी ने शिक्षा के दर्शन के संबंध में कहा है कि दर्शन शिक्षा के लक्ष्य और विज्ञान उसकी प्राप्ति के साधन पर विचार करता है।

शिक्षा-दर्शन शैक्षिक उद्देश्यों के संबंध में मौलिक विचार देता है। परंतु इन विचारों में विभिन्नता पाई जाती

गाँधी जी ने वकालत प्रारंभ की। उन्होंने केवल सही अधिकारों के लिए ही पैरवी करने का फैसला किया। उनके एक मुवक्किल ने उन्हें अपना गलत पक्ष नहीं बतलाया और उन्होंने केस ले लिया। बाद में जब पता लगा, तो कोर्ट में उन्होंने बहस नहीं की, तारीख बढ़ गई। कोर्ट से लौटकर उन्होंने उस मुवक्किल को उसकी दी हुई फीस वापस कर दी।

लोगों ने कहा-आप फीस ले चुके हैं, अब केस वापस मत कीजिए। वकीलों को थोड़ा-बहुत तो इधर-उधर करना ही पड़ता है। गाँधी जी ने कहा, ‘लोग क्या करते हैं, वह मेरा आदर्श नहीं, मुझे क्या करना चाहिए, वह मुझे अच्छी तरह याद है। मैं परंपरा या धन के लोभ में सिद्धांतों को बट्टा नहीं लगाऊँगा।’ उच्च आदर्शों के प्रति इस निष्ठा ने ही उन्हें महात्मा और ‘राष्ट्रपिता’ का पद दिलाया।

है। यह जीवन-दर्शन की भिन्नता का परिचायक है, जो शिक्षा और समाज के लिए लाभदायक सिद्ध होता है। यह भिन्नता स्थान, काल, परिस्थिति एवं परंपराओं के कारण भी हो सकती है। यही एकता के सूत्र में आबद्ध करती है। शिक्षा-दर्शन की आवश्यकता है, जीवन संबंधी इन भिन्नताओं में उचित व उपयुक्त साध्यों और साधनों का चुनाव एवं उचित परामर्श देना। इसी माध्यम से ही शैक्षिक कार्यक्रमों, साँस्कृतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय परंपराओं को सुरक्षित रखा जा सकता है।

शिक्षा क्षेत्र में प्राचीन और नवीन के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न एक अन्य प्रमुख कार्य है। प्रत्येक काल में प्राचीन और नवीन के बीच एक स्वाभाविक-सा विरोध पाया जाता है। जिस कारण नवीन परंपराएँ पुरातन का स्थान नहीं ले पातीं। जबकि प्राचीन के बाद नवीन का क्रम आता है। बल्कि प्राचीन नवीन को जन्म देता है। यदि प्राचीन न हो तो नवीन कहाँ से आएगा। नवीन के विचार से प्राचीन को त्याग देना उचित नहीं है। दोनों के बीच समन्वय एवं सामंजस्य की आवश्यकता है। यह कार्य शिक्षा-दर्शन द्वारा ही किया जा सकता है। डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार प्राचीन से उचित संबंध के अभाव में आज व्यक्ति अकेला, अशाँत है और उसका परम यथार्थ प्रकृति और व्यक्ति तक से संपर्क नहीं रह गया है। उसका यही एकाकीपन बहुधा उत्तेजनापूर्ण हठधर्मिता के रूप में प्रकट होता रहता है।

विद्यार्थियों को सामाजिक, साँस्कृतिक और बौद्धिक उलझनों के बीच कथित मार्गदर्शन करना आवश्यक है। हमारे देश में इसी तरह उलझावपूर्ण वातावरण व्याप्त हो गया है। एक ओर विदेशी संस्कृति का तीव्र जोर तो दूसरी ओर अपने अंदर-रसी-बसी अपनी संस्कृति। परिणामस्वरूप दो समानाँतर संस्कृतियों का जन्म हो गया है। भारतीय संस्कृति उपभोग को त्योग के आधार पर उचित ठहराती है, परंतु विदेशी संस्कृति केवल सर्वनाशी उपयोग पर ही आधारित है। किसे अपनाएं और किसे छोड़े? इस बौद्धिक ऊहापोह में विद्यार्थी भी उलझकर रह गए हैं। अतः सत्य का बोध हो, ऐसी शिक्षा एवं ज्ञान की व्यवस्था होनी चाहिए। अध्ययन-अध्यापन में ऐसी शैक्षणिक व्यवस्था एवं विषय का प्रचलन आरंभ करना चाहिए, जिससे कि विद्यार्थी भटक न जाए और उसका समग्र विकास हो। शिक्षा-दर्शन का मुख्य कार्य है- इन विरोधी और विपरीत परिस्थितियों में शिक्षा का मार्गदर्शन करना।

आधुनिक शिक्षा का सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख ध्येय छात्रों के सर्वांगीण विकास का होना चाहिए। शिक्षा दर्शन इस दिशा में ठोस कदम उठा सकता है। इसे निश्चित करना चाहिए कि छात्रों के व्यक्तित्व के विकास में कौन-कौन से तत्व विशेष महत्वपूर्ण है और व्यक्तित्व के किन अंगों को अधिक महत्व देना चाहिए? प्रत्येक शिक्षक को यह ज्ञान आवश्यक है, ताकि वह छात्रों के व्यक्तित्व विकास में सहायक हो। शिक्षकों को सफलता तभी प्राप्त हो सकती है, जब शिक्षक को शिक्षा के समस्त स्वरूप का ज्ञान हो। शिक्षक का शिक्षकत्व भी इसी में है कि वह शिक्षण से संबंधित सभी बातों से भलीप्रकार परिचित हो और अपने विषय की शिक्षा संपूर्ण ज्ञानराशि के अंश के रूप में और वास्तविक जीवन के संदर्भ में दे।

शाँतिकुँज ने इसी को व्यावहारिक रूप से चरितार्थ करने के लिए एक व्यापक विराट् परियोजना तैयार की है, जो कि विश्वविद्यालय के रूप में अगले दिनों चरितार्थ होने जा रही है।


रक्ष पर सवार होकर जाना (kahani)

सूरज आकाश में होकर गुजर रहा था, तो उसने सुना कि कुछ लोग इकट्ठा होकर उसे देवता न कहकर आग का गोला मात्र बता रहे हैं। इस पर सूरज को बड़ा बुरा लगा और उसने दूसरे दिन अपने रथ पर चढ़कर जाने से इनकार कर दिया।

संसार में हलचल मच गई। प्रभात होने में देर होते देखकर सभी चिंता में डूब गए। कारण जानने और बाधा को हटाने के लिए प्राची से कहा गया। प्राची ने सूरज की बहुत कुछ प्रशंसा और अभ्यर्थना की और उसे सदा की भाँति रथ पर चढ़कर जाने के लिए मनाया।

सूरज बोला, ‘जिन लोगों का अनादिकाल से मैं इतना उपकार कर रहा हूँ, वे मुझे आग का गोला कहें, तो ऐसे कृतध्यों का अब मैं मुँह भी न देखूँगा। अब मैं यात्रा पर जाना ही नहीं चाहता।’

प्राची ने उसे समझाया, ‘लोक दृष्टि तो बालकों द्वारा फेंके गए पत्थरों के समान है। विचारशील समुद्र की तरह गंभीर होते हैं, फेंके हुए पत्थर उसके गर्भ में विलीन हो जाते हैं। पर अहंकारी कच्चे घड़े के समान होता है, जो छोटे-से आघात को भी सहन नहीं कर सकता और जरा-सी चोट से टूटकर छितरा जाता है। आपको क्षुद्र कच्चे घड़े की तरह नहीं वरन् गंभीर समुद्र की तरह ही व्यवहार करना चाहिए।

सूरज विचारों में डूब गया। उसे यात्रा के लिए रक्ष पर सवार होकर जाना ही उचित जान पड़ा।


हिंदी पत्रकारिता आदर्शोन्मुखी बने

पत्रकारिता को लोकताँत्रिक शासन व्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका के कारण ही चतुर्थ स्तंभ की संज्ञा दी गई है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की भाँति यह लोकतंत्र का न केवल प्रमुख आधार स्तंभ है, बल्कि इन तीनों को नियंत्रित एवं सचेत करने वाला तथा लोकतंत्र की रक्षा करने वाला अभिन्न अंग भी है। अपने लगभग 193 वर्ष के इतिहास में हिंदी पत्रकारिता इस संदर्भ में अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभाती हुई कई पड़ावों को पार कर चुकी है। स्वतंत्रता से पूर्व जहाँ उसने राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्षों में अविस्मरणीय योगदान दिया, वहीं स्वतंत्रता के बाद इसके विस्तार में कई आयाम जुड़ते गए, किंतु कालप्रवाह के साथ इसे पतन एवं अवसान के दौर से भी गुजरना पड़ा है, जिसके कारण आज इसका प्रगतिशील प्रवाह कुछ अवरुद्ध-सा पड़ गया है। सामयिक चुनौतियों से जूझने एवं युगधर्म के सम्यक् निर्वाह के लिए इसका निराकरण एवं पुनर्निर्धारण करना अभीष्ट हो गया

हिंदी पत्रकारिता का शुभारंभ 30 मई, 1929 को पं. जुगल किशोर शुक्ल द्वारा प्रतिपादित ‘उदन्त मार्तंड’ नामक पत्रिका से माना जाता है। 1958 के विद्रोह काल तक हिंदी पत्रों की संख्या न के बराबर रही। हिंदी पत्रकारिता के विकास का मार्ग भारतेंद्र हरिश्चंद्र के पश्चात् प्रशस्त हुआ। भारतेंद्र जी ने ‘कवि वचन सुधा, ‘हरिश्चंद्र मेग्जीन,’ ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ आदि पत्रिकाओं के माध्यम से राष्ट्रीय पत्रकारिता की शुरुआत की। स्वतंत्रता आँदोलन की पृष्ठभूमि के रूप में इस युग की पत्रकारिता ने मुख्य भूमिका निभाई। उस समय देश का नेतृत्व एक प्रकार से नेताओं की अपेक्षा पत्रकारों के हाथों में था। उनके प्रयासों के फलस्वरूप देश हर दृष्टि से जाग्रत हो रहा था। स्वदेशी के प्रति आग्रह बढ़ रहा था और स्वराष्ट्र का अर्थ स्पष्ट हो रहा था। वस्तुतः इसी पृष्ठभूमि पर 20वीं सदी के पत्रकारों एवं राजनेताओं ने स्वतंत्रता संघर्ष को और गति दी।

20 वीं सदी का प्रारंभिक काल जहाँ भारत में ब्रिटिश अत्याचारों से भरा हुआ युग था,वहीं हिंदी पत्रकारिता का यह द्विवेदी युग था, जो अपनी प्रखर राष्ट्रीयता के लिए प्रसिद्ध थे। उनके द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ इस युग की प्रमुख पत्रिका थी। यह अपनी साहित्य एवं संस्कृति की सौम्य सेवा-साधना के साथ राष्ट्रीय जागरण का अलख भी जगा रही थी। इस युग की भारतीय पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य था-देशवासियों को सचेत करना, उनके स्वदेशी संस्कार को जाग्रत् करना, स्वराज्य का महत्व उद्घाटित करना और देशवासियों को कूपमंडूकता से उबारकर ज्ञान की निजी संपदा तथा युगचेतना से जोड़ना। ‘वंदे मातरम’ के संपादक तथा स्वदेशी आँदोलन काल के भारतीय नायक श्री अरविंद की धारण थी कि भारत की दुर्बलता का प्रधान कारण चिंतन शक्ति का ह्रास है, ज्ञान की भूमि में अज्ञान का विस्तार है। इस अनेकमुखी अज्ञान को दूर करने की जातीय प्रेरणा से उस काल की पत्रकारिता अनुप्राणित थी।

गाँधी जी के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आँदोलन में प्रवेश करने के साथ पत्रकारिता में नया मोड़ आया। 1120 से 1948 पर्यंत समय को पत्रकारिता का गाँधी युग माना जाता है। गाँधी युग की पत्रकारिता ने स्वतंत्रता संग्राम को अपने चरम तक पहुँचा दिया था। ब्रिटिश साम्राज्य का दमनचक्र जितना बढ़ा, पत्रकारों की लड़ाई भी उतनी ही प्रखर होती गई। अभ्युदय, प्रताप, विशाल भारत, देश-विदेश, नृसिंह आदि पत्रों ने असहयोग आँदोलन, चौरा-चौरी काँड, साइमन कमीशन, नेहरू रिपोर्ट, सविनय अवज्ञा आँदोलन, भारत छोड़ो आँदोलन जैसी राजनीतिक गतिविधियों को उद्दीप्त किया। भूमिगत क्राँतिकारियों की तरह रणभेरी, शंखनाद, बोल दे धावा जैसे भूमिगत पत्रों का भी प्रकाशन हुआ। यहाँ तक कि सरस्वती, हिमालय, माधुरी, सुधा, चाँद जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं ने भी राष्ट्र-जागरण की अनेक क्राँतिकारी रचनाएँ प्रकाशित कीं और आँदोलन में अपना योगदान दिया।

इस तरह स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ में पत्रकारिता की उल्लेखनीय भूमिका रही। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय, मदनमोहन मालवीय, महात्मा गाँधी आदि सभी राजनेताओं ने इसे अपने विचारों को जनता तक पहुँचाने का माध्यम चुना। बाबू बालमुकुँद गुप्त, पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र, पं. अंबिकाप्रसाद वाजपेयी पं. बालकृष्ण भट्ट गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबूराव विष्णु पराड़कर , शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनपुरी, पं. बनारसी दास चतुर्वेदी जैसे पत्रकारों ने राष्ट्रीय चेतना को जगाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हिंदी पत्रकारिता के पितामह माने जाने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर लिखते हैं कि मैं कलकत्ता पत्रकार बनने नहीं, बल्कि देश को शीघ्र स्वतंत्र देखने और क्राँतिकारियों के साथ काम करने के उद्देश्य से गया था। सभी पत्रकार देशभक्ति एवं राष्ट्रप्रेम के इसी भाव से आप्लावित थे। इस तरह स्वतंत्रता से पूर्व की हिंदी पत्रकारिता राष्ट्र-भक्त राजनीतिज्ञों, साहित्य साधकों एवं पत्रकारों की त्रिवेणी रही, इसने राष्ट्रीय चेतना जगाने व देश को स्वतंत्र करने में अपनी अविस्मरणीय भूमिका निभाई।

स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद हिंदी पत्रकारिता का विस्तार होता गया व इसकी व्यापकता में नए-नए आयाम जुड़ते गए। स्वतंत्रता से अनेकों प्रश्न उपजे, जैसे देश की एकता, अखंडता, देशी राज्यों का भारत में विलय, नए भारत की आर्थिक एवं राजनीतिक समस्याओं के समाधान आदि, जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को फलने-फूलने का अवसर दिया। पहले केवल राजनीतिक अथवा सामाजिक समाचारों को प्रमुखता दी जाती थी। अब खेल, वाणिज्य संगीत, कला, विज्ञान, स्वास्थ्य, फिल्म आदि भी प्रमुख अंग बनते गए। इस तरह पत्रकारिता का चहुंमुखी विकास हुआ।

विविधता के साथ इसकी प्रसारण संख्या एवं पाठकों की संख्या में वृद्धि हुई। 1956 में जहाँ हिंदी पत्रों की संख्या 1000 थी, 1993 तक यह संख्या पाँच गुना बढ़ गई थी। इसमें भी हिंदी दैनिकों की संख्या सर्वोच्च थी। हिंदी पत्र ही नहीं, पत्रिकाओं की प्रसारण संख्या भी सर्वाधिक थी।

जनमानस को प्रबुद्ध करने में इस दौर की पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण कार्य किया। इसी के बल पर आज जनसमुदाय देश व समाज की स्थिति, राजनीतिक घटनाचक्र, प्रशासन वर्ग की गतिविधियों आदि से भलीभाँति परिचित हो रहा है। इस तरह सामान्यजन को जगाकर सामाजिक परिवर्तन को दिशा देने में स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता ने बहुत बड़ा कार्य किया है। इसके द्वारा राष्ट्रीय नवजाग्रति के साथ प्रादेशिक समस्याओं पर प्रकाश पड़ा है और क्षेत्रीय स्थिति भी इससे मुखरित हुई है।

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में जहाँ अभूतपूर्व उन्नति हुई, वहीं इसके साथ भटकाव एवं विकृति का काला साया भी बढ़ता गया है। जिसके कारण आज यह स्वार्थ के दलदल में धँस गई है और दिशाहीनता की स्थिति में भटक गई है। 20वीं सदी के प्रारंभ से लेकर आठवें दशक तक का समय अगर हिंदी पत्रिकाओं के लिए स्वर्णिम काल था, तो इसके अंतिम दो दशक इसके अवसान काल भी सिद्ध हुए हैं। इसी दौर में आजादी की लड़ाई में क्राँतिकारी नेतृत्व देने वाला गणेश शंकर विद्यार्थी का अखबार ‘प्रताप’ बंद हो गया। श्रीकृष्णदत पालीवाला का ‘सैनिक’ बंद हो गया। इलाहाबाद का ‘भारत’ बनारस का ‘बनारस’ नवभारत टाइम्स के जयपुर संस्करण बंद हो गए। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका, रविवार, चौथी दुनिया, संडे मेल, संडे ऑर्ब्जवर (हिंदी), हिंदी एक्सप्रेस, दिनमान, पराग एवं माधुरी जैसी श्रेष्ठ पत्रिकाएँ इसी दौर में निकलीं और बंद भी हो गई। इसी तरह हिंदी के लगभग सभी प्रतिष्ठित व्यावसायिक दैनिक अखबार से लेकर पत्र-पत्रिकाएँ अपने अस्तित्व की अंतहीन लड़ाई लड़ रही हैं।

हिंदी पत्रकारिता की आदर्शोन्मुखी दिशा जीवन-मूल्यों से विमुख होकर व्यावसायिकता में उलझकर रह गई हैं। पहले जो मिशन था, वह अब उद्योग या व्यवसाय बन गया है। पत्र-पत्रिकाओं की विषयवस्तु विविधता के बावजूद अपनी गुणवत्ता एवं मूल्य के संदर्भ में सिमटकर रह गई है और जो सामग्री उसके पृष्ठों पर सबसे अधिक स्थान घेरती है, वह है मनोरंजन की विषयवस्तु। मनोरंजन भी ऐसा नहीं है कि जिसे सात्विक, सुरुचिपूर्ण एवं स्वस्थ कहा जाए, बल्कि यह अश्लील, कुत्सित एवं भौंड़ी प्रकृति का होता है। इनकी चर्चा का विषय फिल्मी दुनिया का ग्लैमर, हीरो-हीरोइन के संवाद, साक्षात्कार व उनके निजी जीवन की मनगढ़ंत खबरें ही रहती हैं।

फिल्मी मनोरंजन के बाद राजनीतिक घटनाचक्र इनकी चर्चा का प्रिय विषय रहता है। इसके बाद व्यवसाय को ले सकते है। इसकी भी पृष्ठ संख्या क्रमशः बढ़ती जा रही है। उदारीकरण के बाद विदेशी कंपनियों की चकाचौंध ने इसे बढ़ावा दिया है। बिजनेस के बाद फैशन और फिटनेस को ले सकते हैं। फैशन की दुनिया में क्या हो रहा है? मॉडलों के ग्लैमर, शरीर सौष्ठव को आकर्षक करने के तौर-तरीके, सौंदर्य को निखारने के नुस्खे जैसे विषयवस्तु को विशेष प्रमुखता दी जाती है। इस सबके बाद ही कहीं साहित्य संस्कृति पोषक, मूल्य संवर्द्धक एवं समाज-राष्ट्र को दिशा देने वाली सामग्री की बारी आती है और इसे पत्र-पत्रिकाओं के किसी कोने में खोजबीन कर ही ढूँढ़ा जा सकता है।

हिंदी पत्रकारिता का यह प्राथमिकता क्रम इसकी आदर्श-विमुखता एवं दिशाहीनता का परिचायक है। यह स्थिति किसी भी रूप में वाँछनीय नहीं है। युग की विषम परिस्थितियों के पीछे सक्रिय अनास्था संकट से जूझने के लिए हिंदी पत्रकारिता को पुनः स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की आदर्शोन्मुखी भूमिका में जीवंत एवं जाग्रत् होना होगा, क्योंकि राजनैतिक स्वतंत्रता एवं कुछ वैज्ञानिक तथा आर्थिक प्रगति के बावजूद अभी एक संग्राम शेष है, जिसे लड़ा जाना चाहिए । अभी भी साँस्कृतिक पराधीनता के संस्कार गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। इसी कारण हम अपसंस्कृति के आक्रामक तेवरों के सामने या तो भाग खड़े हो रहे हैं या इसे हवा देते हुए इसे पुष्ट कर रहे हैं। उसके लिए जबकि आवश्यकता जूझने की है। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रवर्तित एवं संस्थापित ‘अखंड ज्योति’ ने अपने प्रकाशन के प्रारंभ से ही इस दायित्व को निभाया है। आज 64 वर्षों के उपराँत भी इसकी ज्योति मंद नहीं पड़ी है, उलटे इसकी प्रदीप्ति और भी प्रखर हुई है। युग की पुकार, हिंदी पत्रकारिता को आत्मविस्मृत एवं संकीर्ण व्यावसायिक स्वार्थों के दलदल से उबारकर गौरवमयी अतीत के मिशनरी भाव को ग्रहण एवं धारण करने के लिए उद्बोधित कर रही है। ‘अखण्ड ज्योति’ के इस संदेश को सुना जा सके, तभी आज की हिंदी पत्रकारिता सजग प्रहरी की भूमिका निभाती हुई जन-जन के बीच साँस्कृतिक क्राँति का अलख जगा सकेगी, जिसके आधार पर 21 वीं सदी-उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष युगऋषि कर चुके हैं।


VigyapanSuchana

अभियान साधना के साधकों के लिए

(अगस्त-सितंबर 2009 की तिथियाँ)

4 अगस्त श्रावणी

15 अगस्तअजा एकादशी

29 अगस्तजलझूलनी एकादशी

2 सितंबर भाद्रपद पूर्णिमा

14 सितंबरइंदिरा एकादशी

29 सितंबरकामिका एकादशी

2 अक्टूबर प्र0 आश्विन शुक्ल पूर्णिमा

हिंदी से अँग्रेजी अनुवादक चाहिए-

परमपूज्य गुरुदेव के विराट् साहित्य को जो हिंदी से अँग्रेजी में अनूदित कर सकें, ऐसे विद्वानों का आह्वान है। अँग्रेजी का अनुवाद तभी प्रभाव बनता है, जब भावनानुवाद करने में प्रवीणता हो। संस्कृतनिष्ठ-प्राँजल भाषा जैसी हिंदी में ही उसे समझकर जो भावनानुवाद कर सकें, ऐसे अनुवादक कहीं भी हों, पाठकों के संपर्क में हो, प्रोफेशनल स्तर पर कार्य करते हों, कृपया उनकी सूचना शाँतिकुँज हरिद्वार के अनुवाद प्रकोष्ठ को दें। पत्राचार ही करें।


सबके लिए बहुमूल्य (kahani)

राजा अग्निमित्र और श्रेष्ठि सोमपाल मित्र थे। उनमें बहस हो गई। सोमपाल ने कहा, राज्य का संरक्षण उपयोगी तो है, पर अनिवार्य नहीं, ईश्वरप्रदत्त विभूतियों और साधनों से मनुष्य बहुत मजे में रह सकता है। राजा ने उग्र होकर चुनौती दी, ‘अच्छा एक वर्ष नगर में मत घुसना, जंगल की सीमा में रहना। अंदर आए तो जेल में डाल दूँगा। हार मान लो तो प्रतिबंध हटा दूँगा और यदि एक वर्ष में कुछ उल्लेखनीय करके दिखा दोगे, तो मैं हार मान लूँगा।

सोमपाल सीमित साधन लेकर जंगल में प्रवेश कर गए। वहाँ एक निराश लकड़हारा मिला। श्रम बहुत करने पर भी परिवार का पोषण ठीक से नहीं कर पाने से दुखी था। सोमपाल ने उसे उत्साहित किया। कहा, मित्र तुम मुझे श्रम से सहायता देना, मैं तुम्हें विचार से सहायता दूँगा। दोनों मिलकर बड़ा काम कर लेंगे। लकड़हारा राजी हो गया।

सोमपाल ने उससे कुल्हाड़ी ले ली। स्वयं लकड़ी काटने लगे और उसे नगर के समाचार लेने भेज दिया। प्राप्त सूचनाओं के आधार पर वे उसे जलाऊ और इमारती लकड़ी बेचने भेजने लगे। धीरे-धीरे काम बढ़ निकला, अधिक मजदूर बुलाकर अधिक काम होने लगा। नगरवासी उस व्यवस्था का लाभ उठाने लगे।

तभी पता लगा कि विशाल यज्ञ होने वाला है। सोमपाल ने यज्ञीय समिधाओं तथा सुगंधित वनौषधियों का संग्रह कर लिया। यज्ञ संयोजकों को सूचना मिली, तो अच्छे मूल्य पर तैयार वस्तुएँ खरीद ली गई। इसी प्रकार नगर की ढेरों आवश्यकताएँ सोमपाल के तंत्र से पूरी होने लगीं।

राजा को सूचना मिली तो उस तंत्र के पीछे कौन है, यह खोजा गया। राजा अपने मित्र से मिलने स्वयं गए। प्रेम से मिले, पूछा ‘तुम तो शहर में घुसे नहीं, यह सब कैसे विकसित किया?’ सोमपाल बोले, ‘मित्र यह मेरी विचारशक्ति और लकड़हारे की शरीर शक्ति का संयोग है। इसी के संयोग से वन-संपदा नगरवासियों के काम आई और एक वर्ष का समय हम सबके लिए बहुमूल्य बन गया।’


श्रावणी पर्व पर कार्यकर्ताओं की रीति-नीति - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

(26-9-95 को दिया गया वीडियो संदेश)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो, भाइयो। ढाई वर्ष होने को आया, हमारा एवं आपका मिलन संभव न हो सका। एकाध आदमी की बात अलग है, परंतु अधिकांश व्यक्तियों से हम न मिल पाए। इतने दिनों तक हम एवं आप अलग-अलग रहे, अतः हम अपने मन की बातें आपको बतलाना चाहते हैं। यह कोई व्याख्यान नहीं है, अतः श्रावणी के इस शुभ अवसर पर आपसे कुछ बातें करना चाहते हैं।

आपको वह दिन याद है जिस दिन आप अपना काम-धंधे छोड़कर, घर को छोड़कर यहाँ के लिए चले थे। हमें तो यह बात बिलकुल याद है, आपको याद हो या न हो, पर हमें याद है कि आपने कितना त्याग भरा कदम उठाया था। कितनी आमदनी का घाटा उठाया, यह बात तो मैं नहीं कहता हूँ। अपने जमे हुए अपने घोंसले को छोड़कर आने का प्रयास किया। अपने घरवालों से, अपने पड़ोसी से आपका संपर्क था। वह भी अपने आप में एक महत्व रखता है। धन का सवाल नहीं है कि आपके पास कितना था और आपने कितना त्याग किया। आपके पास सौ मन मिठाई थी, उसमें से नब्बे मन आपने दान कर दिया। यह उतना ही महत्व रखता है, जितना कि चार रोटी में से तीन रोटी दान कर दे। आपने कितनी शिक्षा प्राप्त की, यह भी नहीं कह सकता, परंतु हम आपके त्याग के प्रति आभारी हैं। हम आपके रहने तक की भी व्यवस्था नहीं कर पाए। एक कोठरी में आपके पूरे परिवार को ठहरा दिया। हम समझते हैं कि इस समय आपको मुर्गी की तरह से, कबूतर की तरह से रहना पड़ रहा है। यह आपको मालूम था, यहाँ की व्यवस्था आप देखकर गए थे। जब आप यहाँ आए थे, तो यह भी देखकर गए थे कि धन की भी यहाँ कोई विशेष व्यवस्था नहीं है। यहाँ ब्राह्मणोचित जीवन जीने की बात थी।

ब्राह्मणोचित जीवन

मित्रो। पैसा जब बढ़ता है, तो इन्सान की आदत खराब हो जाती है। वह अपनी सुविधा बढ़ा लेता है। परंतु आप जब यह अनुभव करें कि कि जो पैसा आपको दिया जा रहा है, वह हमारे बच्चों ने अपना पेट काटकर, अपने बच्चों के दूध का खरच कम करके हमारे पास भेजा था, उस समय अवश्य आप अपने खरच को कम करने का प्रयत्न करेंगे। कितनी श्रद्धा, भावना से लोगों ने दिया है, उसे हमें किस ढंग से खरच करना चाहिए, यह बात समझ में आनी चाहिए।

मित्रो। आपको यह मालूम था कि हम यहाँ बाहर के व्यक्ति की तरह नहीं, वरन् एक साधारण ब्राह्मण का जीवन जी सकते हैं। यह जानते हुए उस समय आपने हिम्मत के साथ कदम बढ़ाया, हमारे लिए यह बहुत प्रसन्नता की बात है। गाँधी जी को जब आवश्यकता पड़ी, तो अनेक सत्याग्रही खोली खाने, मरने, कटने के लिए तैयार होकर आ गए। हमें वह जमाना याद है, जब बुद्ध के लिए हजारों नर-नारी अपना सब कुछ छोड़कर उनके कामों को पूरा करने के लिए आगे आ गए थे।

मित्रो। उसी परंपरा का निर्वाह आपने किया, यह देखकर हमें प्रसन्नता है, काफी खुशी है। आपके लिए हमारा मन कृतज्ञता से भरा पड़ा है। आपके मन में एक हूक उठी और आपने सारे व्यवधानों को, सारे रास्तों को काटकर यहाँ आने का प्रयास किया, आपकी यह भावना हमें याद है। शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास को अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया था और उनके नौकर बन गए थे। आप लोगों ने भी भावना की दृष्टि से उनकी तरह ही साहस भरा कदम उठाया। आपकी भावना, श्रद्धा डगमगाने लगेगी, तो यह आपके लिए भी बुरा होगा और हमारे लिए भी बुरा हो जाएगा। अतः ऐसा मत होने देना।

मित्रो। अगर किसी स्त्री का पति मर जाए तथा वह पति के साथ सती होने को तैयार हो जाए। सारा गाँव उसे देखने को आए तथा उसकी जय-जयकार करे और फल बरसाने लगे। उसके बाद जब चिता में आग लग जाए और वह औरत ऐन मौके पर भाग जाए, तो बहुत बुरा होता है। आदमी श्रद्धा-भावना लेकर आए और फिर कहे कि हमारा जीवन बर्बाद हो गया । मित्रो। आप यह मत होने देना। आपको हमेशा अपनी इज्जत बचाकर रखनी है। आपको यह देखना होगा कि जब आप घर छोड़कर आए थे, तब आपकी भावना क्या थी? जब आप घर से चले थे और जो स्तर आपका था, वह स्तर कम होने पर या समाप्त हो जाने पर आपकी हालत उसी स्त्री की तरह हो जाएगी, जैसा कि अभी हमने बताया है कि उसे लोग धिक्कारने लगे थे।

स्तर कम न होने पाए

साथियो। आपका स्तर कम न होने पाए, इस कार्य हेतु हम आपको एक शीशा देना चाहते हैं, जिसमें आप अपनी शकल देखें कि आपकी नाक, दाँत, मुँह ठीक है या नहीं। इसे आप स्वयं समझ सकते हैं, इसके बारे में हम क्या कहें। यह हुई शीशे की कसौटी नंबर एक। दूसरे-सोने को कसौटी से परखकर हम देखना चाहते हैं कि आप वही हैं, जो आए थे या बदल गए हैं। आप उसी बिरादरी में हैं या दूसरी बिरादरी में तो नहीं चले गए। इस संसार में अच्छे काम भी होते हैं और बुरे-से-बुरे काम भी होते हैं। आप शूरवीर भी बन सकते हैं तथा गलत काम करके पुलिस के हवाले भी हो सकते हैं। आदमी अगर टिकाऊ हो तो क्या कहना। आप अपना वेष बदलें नहीं, टिकाऊ बनें। वेष बदलने में शोभा नहीं है। इसकी इज्जत नहीं है। संत ज्ञानेश्वर के पिता ने अपना वेष बदल दिया था। कैसे बदला, यह मैं नहीं कहता हूँ, परंतु बाद में वे परेशान हो गए। संत ज्ञानेश्वर को उनका प्रायश्चित करना पड़ा।

मित्रो। सिद्धांतों का रास्ता चलना यह भी बड़ी बात है। कहाँ जा रहे हैं? ऊँचे आदर्श का जीवन जीने जा रहे हैं। अगर पीछे हट गए, तो वह दो कौड़ी का बन जाता है। गृहस्थ जीवन में बच्चा पैदा हो जाए, तो कोई बात नहीं, परंतु कोई बाबा जी हो जाए और फिर बच्चा पैदा कर ले, तो बेकार का हो जाएगा। उस लड़के या लड़की के लिए समाज के मुश्किलें पैदा हो जाएँगी तथा संत समाज के लिए भी उसे अपनाना मुश्किल हो जाएगा। इसी तरह जब आप आए थे, तो आपको वहाँ के लोगों ने विदाई दी थी और जब आप यहाँ आए थे, तो हमने भी प्रसन्नता की थी, क्योंकि आपने बड़े ऊँचे काम के लिए कदम उठाया था।

जीवन कितने दिन का होता है? विवेकानंद की मृत्यु उनतालीस वर्ष की उम्र में हो गई थी। शंकराचार्य की भी 32 वर्ष की आयु में मृत्यु हुई थी। रामकृष्ण परमहंस भी बहुत दिन नहीं जिए थे। बाकी जितने महापुरुष थे, उनको भी जवानी नहीं आई और वे इस दुनिया से चले गए थे। भगवान् करे आप हजार वर्ष जिएँ, परंतु कल के लिए भी तैयार रहें। आप देखते नहीं कि रास्ता चलते किसी का हार्ट फल हो जाता है। इन्सान की खाल पानी से भरा हुआ कच्चा घड़ा है। वह कब फूट जाएगा, यह किसको पता है? इन्सान का यह शरीर एक गुब्बारा है। इसमें से हवा कब निकल जाएगी, इसको कौन जानता है? यह कोई आश्चर्य नहीं है। इसलिए आप अपने त्याग को, अपनी भावना को, केवल भावना को ही नहीं, वरन् उस काम को हमेशा याद रखें, जिसके लिए आपने साहस भरा कदम उठाया था। जिंदगी बड़ी शानदार है, इस तथ्य को आपको समझना चाहिए।

मित्रो। आपको यह समझना चाहिए कि भगवान् ने आपको यह जिंदगी बहुत ही शानदार दी है तथा आप जो काम कर रहे हैं, वह बड़ा ही शानदार है। इसमें करोड़ों लोगों का भाग्य छिपा है। आप यह नहीं समझते हैं, किंतु हम स्पष्ट रूप से देख रहे हैं। एक इतिहास बनने वाला है। आगामी दिनों गाँधी जी के आँदोलन के बाद कोई कार्यक्रम अगर इस दुनिया में है और अगर कोई उसकी चर्चा होगी, तो वह शाँतिकुँज, युगनिर्माण योजना का कार्यक्रम होगा। इतना बड़ा तथा महत्वपूर्ण कार्य कभी बना नहीं तथा कोई ऐसा कार्यक्रम बना भी नहीं सकता है। यह सफल होगा और बिलकुल सफल होगा, हमें पूरा विश्वास है, आपको विश्वास हो या न हो। हम जब भगवान् के पास बैठते हैं, हमें इस बात का पूरा-पूरा विश्वास दिलाया जाता है।

मित्रो। आप में से किसी के मन में यह बात नहीं आनी चाहिए कि यह योजना सफल नहीं होगी। सफल न होने पर हम मारे-मारे फिरेंगे, यह बात भी आपको अपने मन में कभी सोचनी नहीं चाहिए। इस मिशन में आप ऐसे सफल होंगे, जो इतिहास के पन्नों में कभी नहीं आए। परंतु वह स्थिति आने में कभी-कभी रुकावट भी आ जाती है। आपने सूर्य और चंद्रमा में ग्रहण पड़ते देखा होगा। आदमी कभी-कभी गुस्से में आकर माँ-बाप को गाली-गलौज भी कर देता है और घटिया बन जाता है। हम आपको सभी तरह के घटियापन से सावधान करना चाहते हैं, ताकि आपके बारे में कोई न तो उँगली उठाए और न कहीं आपका रास्ता घूम जाए। रेलगाड़ियाँ पटरियों पर घूम जाती हैं और अपनी दिशा बदल देती हैं और हमें एवं आपको पता भी नहीं चलता।

कसौटी पर होगी परीक्षा

साथियो। हम आपको कसौटी पर कसना चाहते हैं। हम यह देखना चाहते हैं कि आप जब यहाँ आए थे और उस समय आपकी जो भावना थी, उसमें कहीं कच्चापन तो नहीं आ रहा है? आप कहीं उसी स्थिति में लौट जाने का मन तो नहीं बना रहे हैं? कहीं आपके अंदर यह विचार तो नहीं उठ रहे हैं कि हम चले जाएँगे तथा मजे से रहेंगे और अधिक खरच करेंगे। अधिक सुख-सुविधा में रहेंगे। आपके पास जो दान-दक्षिण का पैसा आ रहा है, उसमें से अनावश्यक रूप से खरच करने का कोई अधिकार आपको नहीं है। गाँधी जी को किसी ने मुट्ठी भर पैसा दे दिया था, तो उसमें से एक चवन्नी नीचे गिर गई। गाँधी जी वहीं पर बैठ गए थे। लोगों ने उनसे कहा कि आप हट जाइए, यहाँ भीड़ आ रही है। आप दब जाएँगे। गाँधी जी ने कहा कि हमें दबना मंजूर है, परंतु जिस श्रद्धा के साथ उस आदमी ने दान दिया है, उसका दुरुपयोग करना गुंजार नहीं हैं।

उसी प्रकार जिस आदमी ने यहाँ संस्था को दान दिया है, वह श्रेष्ठ भावनाओं के साथ दिया है। अगर आपको दान के पैसे को ज्यादा खरच करने की बात मन में आ गई हो, तो यह आपका दुर्भाग्य और हमारा दुर्भाग्य है। अगर आप एक बार भी इस पर छत पर चढ़े, तो हम मानेंगे कि आप औंधे मुँह जमीन पर गिर गए। इससे अच्छा होता कि आप छत पर ऊपर ही नहीं चढ़ते। आप धन के संबंध में अपनी महत्वाकाँक्षा को रोकिए। आप विलासी न बनें और न परिवार बढ़ाएँ। अगर परिवार बढ़ेगा तो खरच बढ़ेगा, कपड़ा, पढ़ाई आदि का खरच बढ़ेगा। अतः आप में से जो स्थाई कार्यकर्ता हैं, उनसे मेरी प्रार्थना है कि आप फैमिली प्लानिंग करा लें, क्योंकि हम जानते हैं कि आप ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकते हैं। आपका लोभ, मोह बढ़ेगा, तो आप ब्राह्मण नहीं रह सकते हैं, जब आप बनिया बन जाएँगे। आपको बनिया बनने के लिए हमने नहीं बुलाया है। अगर आपकी खरचीली आदत पड़ गई है, तो उसे कसें और कम खरच में काम चलाएँ। आपकी कमजोरी आप ही दूर कर सकते है। आप इनका पालन करें।

स्वयंसेवक बनकर रहें

मित्रो। आपकी एक कमजोरी और है, जो मनुष्य को सामूहिक जीवन में प्रवेश करने पर होती है और वह है- लोकेषणा, पुत्रेषणा और वित्तेषणा। इनमें भी सबसे बढ़कर एक हूक उठती है, वह है नेता बनने की महत्वाकाँक्षा । यह मनुष्य को नीचे गिराने की प्रवृत्ति है। संत के लिए यह तीनों चीजें नहीं होनी चाहिए। नेता वह होते हैं, जो अपना फोटो छपाना, नाम, यश प्राप्त करना चाहते हैं। यह नेता नहीं अभिनेता हैं। अगर बड़प्पन प्राप्त करना है, तो सबसे छोटा बनकर रहना चाहिए। सिर नीचा करके रहना चाहिए। स्वयंसेवक बनकर रहना चाहिए। गाँधी जी किसी संस्था के पदाधिकारी भी नहीं थे, परंतु लोगों ने उन्हें ऊँचा उठा कर रख दिया। वे ही राष्ट्रपिता बापू बने। उनका ही करोड़ों का स्मारक बना।

विनोबा को आप जानते हैं। वह ट्रस्टी नहीं थे, सभापति नहीं थे। ईसा, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस को ही देख लें। समाज में लोग नम्रता की, शालीनता की, व्यावहारिकता की कद्र करते हैं। आज लीडर कौन होता है। जो तस्कर होता है, शातिर दिमाग होता है। मित्रो। दूसरों के द्वारा दिया हुआ सम्मान तो आपकी इज्जत बढ़ाता है, परंतु जब आप स्वयं अपना बड़प्पन दिखाकर सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं, तो प्रगति नहीं हो सकती है। आज जिन लोगों ने अनेक संस्थाओं को नष्ट किया है, वे सब नेता बनना चाहते थे। नेता बनने में अगर किसी को कष्ट हुआ या अवरोध आया, तो उन्होंने अन्य साथियों का गला घोंटना शुरू कर दिया और उसे बरबाद करके चैन लिया। परंतु वे नहीं जानते कि भगवान् का डंडा बहुत प्रबल है। उससे वे नहीं बच सकते हैं।

मित्रो। नेतागीरी एक प्रकार का नशा है। यह नशा शराब, भाँग, हेरोइन से भी बड़ा है। अगर किसी के मन में वह आ गया हो कि हमें मशक्कत नहीं करनी चाहिए, हमें स्वयंसेवक नहीं रहना चाहिए। हमें अपनी मनमर्जी चलानी चाहिए। हमें किसी की बात न मानकर यह दिखलाना चाहिए कि देखो हम कितने समर्थ हैं, जो लोगों को इस तरह कर डालते हैं। अगर आप ऐसा करते हैं, तो आपको धिक्कार है। अगर आप अपनी मरजी चलाना चाहते हैं तथा मिशन को बर्बाद करना चाहते हैं, तो हम आपको शाप देते हैं कि आप कभी सफल नहीं होंगे। नेतागीरी थोड़ी देर के लिए आपके हाथ में आ भी जाए, परंतु बाद में आपकी मिट्टी पलीद हो जाएगी, आपको लोग थू-थू करेंगे। अगर ऐसा न हो तो आप हमें जो मन हो कह देना।

मित्रो। आपको यह देखना होगा कि स्वयं के आपके जीवन में कहीं अपव्यय, नेतागीरी तथा हरामखोरी तो नहीं आ गई। हरामखोरी से कोई महान् नहीं बनता है। काम के द्वार ही व्यक्ति महान् बनता है। हरामखोरी माने जो हाथ से काम नहीं करता है, उसके दिमाग में गलत बातें आती रहती हैं। ऐसा व्यक्ति जगह-जगह बैठता रहता है और यह बतलाता रहता है कि हम गिरे हैं और तुम्हें भी गिरना चाहिए। ऐसा व्यक्ति मिशन की बातें इधर-उधर करता है। बेटे हमारे पास कोई नौकरी नहीं है, जो तीन महीने का वेतन देकर आपको घर भेज दें। इस कार्य में हमें भी शर्म आती है, आपको आती है या नहीं, पता नहीं। यह भी हमें करना पड़ सकता है कि आपके विस्तर को हम फेंक दें, परंतु यह काम करने में हमें बहुत शर्म आएगी। अगर आप किसी काम को करते हैं, तो बेशक करें, परंतु आपने आने के लिए जो तीन प्रतिज्ञाएँ की थीं, उन्हें निभाने का प्रयास करें।

याद करें वे प्रतिज्ञाएँ

कौन-सी तीन प्रतिज्ञाएँ की थीं? पहली प्रतिज्ञा थी कि हम वित्तेषणा से बचेंगे। कम-से-कम में गुजारा करेंगे। आप रिश्तेदारों के लिए, घूमने के लिए खरच नहीं कर सकते हैं। अगर करते हैं, तो आप वह काम करते हैं जिसके लिए आपकी आत्मा आपको कभी-न-कभी धिक्कारेगी अवश्य। दूसरा अगर आप संतान बढ़ा रहे हैं, तो वह गलत होगा। परंतु अगर यह मान्यता हो कि हमारा बेटा भी स्वयंसेवक होगा, तो ठीक है। परंतु यह ख्वाब कि हमारा बेटा आदमी बनेगा, विलायत जाएगा, तो गलत होगा।

महात्मा गाँधी के पास एक आदमी आया और उसने अपनी शिक्षा के बारे में बतलाया तथा अपनी योग्यता के अनुसार कार्य देने का अनुरोध किया। गाँधी जी ने कहा कि हम योग्यता के अनुसार तो काम नहीं दे सकते हैं। आपको जो भी हम काम देंगे, उसे करना पड़ेगा। उन्होंने उसे गेहूँ साफ करने का काम सौंपा और उसने किया। यह घटना मैं आपको इसलिए सुनाता हूँ कि यह आपके ऊपर भी लागू होती है। आपको भी हम शिक्षा, योग्यता के अनुसार काम नहीं दे सकते हैं। हम जो भी काम सौंपे, उसे आपको करना है। इस तरह को जो आदमी होता है, वह अपने ऊपर अंकुश बर्दाश्त नहीं कर सकता है। वह स्वच्छंद रहना पसंद करता है। आपको अनुशासन में रहना पड़ेगा, ताकि आप ज्यादा महत्वपूर्ण काम कर सकें। आप ज्यादा व्यस्त रह सकें तथा आपके क्रियाकलापों का प्रभाव लोगों पर पड़ सकें।

आपने देखा नहीं जनता पार्टी का क्या हुआ? सभी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। आपने देखा नहीं, इन लोगों ने देश को तबाह कर दिया। यह महत्वाकाँक्षा वाले व्यक्तियों का काम है। हरिद्वार में मालवीय जी ने एक ब्रह्मचर्य आश्रम बनाया था, जो किसी जमाने में गुरुकुल आश्रम के बराबर का था। हिंदू विश्वविद्यालय के समान उसे भी बनाने का उनका सपना था। इसमें काफी इमारतें बनी थीं। आर्थिक व्यवस्था राजाओं के द्वारा बना दी गई थी। मालवीय जी के मरने के बाद वहाँ के कार्यकर्ताओं ने इस कदर लूटमार मचा दी कि उसका क्या कहना? अपना स्वार्थ सीध करने के लिए उन्होंने उस संस्था का न जाने क्या-क्या कर डाला। अगर वह आश्रम जिंदा होता, तो हिंदू विश्वविद्यालय के स्तर का होता, परंतु उसका सर्वनाश हो गया।

मित्रो। हमें सबसे बड़ा दुःख उस समय होता है, जब वे व्यक्ति, जिनको हमने अपने हाथ, पैर, होंठ समझा था, उनके ऊपर गंदगी की परतें जमती जा रही हैं। वे आज नहीं तो कल इस संस्था की जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाएँगे तथा इसे काट डालेंगे और इसका सर्वनाश कर देंगे। परंतु आप भी स्थिति में प्रशंसा के भागीदार नहीं हो सकते हैं। हमने वह सब चालीस वर्षों के अंदर देखा है कि वे अपने आप में तो बर्बाद हो ही गए, उस संस्था का भी सर्वनाश कर दिया। हम ऐसा नहीं होने देंगे। मित्रो। आपका श्रम से जी चुराना एवं आपकी अनुशासनहीनता हमें बिलकुल पसंद नहीं है। आपमें से किसी के भी अंदर यदि नेतागीरी का बीज पल रहा तो इसे कुचल दें। इससे हमें दुःख है। ये आदतें हमें बिलकुल पसंद नहीं है। आप हमारा जी दुखाने का कष्ट न करें। इससे आप भी सुखी नहीं रह सकते हैं। आप इस प्रकार त्रास देंगे, तो आप सुखी नहीं रह सकते।

हमारा लक्ष्य उज्ज्वल भविष्य

किसान दो महीने पहले अपने खेतों में लगी हुई फसल को देखकर नित्य नयी-नयी योजनाएँ बनाता है तथा मन में प्रसन्नता रहती है। कोयल जब वसंत के महीने में आम के बौर को देखकर प्रसन्न होती है, तो कूकती रहती है। हमारे अंदर भी उज्ज्वल भविष्य को लेकर प्रसन्नता है। औरत के पेट में जब बच्चा होता है, तो उसकी माँ पहले से कपड़ा सिलकर तैयार रखती है। हमारा भी लक्ष्य है कि इस दुनिया को सँवारने का हम जितना प्रयत्न कर रहे हैं, उतना अधिक-से-अधिक करें। यह कार्य होते हुए देखकर हमें प्रसन्नता होती है। अपने कार्यकर्ताओं को देखकर हमें काफी प्रसन्नता होती है। आप में से कुछ पके हुए आम हैं, तो कुछ कच्चे हैं। दोनों में कुछ फर्क है क्या? नहीं, कोई फर्क नहीं है। गायत्री तपोभूमि, शाँतिकुँज, ब्रह्मवर्चस तथा शक्तिपीठों पर लगे कार्यकर्ता एवं समयदानी भी हमारे प्यारे बच्चे हैं, जिन्होंने साथ-साथ चलने का संकल्प लिया है।

मित्रो। आज श्रावणी के दिन जो मेरा संदेश सुन रहे हैं, वे सब समयदानी हैं। कैसे समयदानी है? आप एक महीने के बाद जन्म लेने वाले हैं तथा उसके बाद गोद में खेलेंगे। बाद में तैयार हो जाएँगे तथा हमारा सहयोग करेंगे। यहाँ जो भी हैं, वह विचार करके आगे-पीछे आए हैं। हमारी एक वंश परंपरा है। यह ऋषियों की परंपरा है।

आप उसके सदस्य हैं। आगे-पीछे यह बढ़ने वाला है। जो बूढ़े हो जाएँगे। वे मरेंगे तथा नौजवान आते जाएँगे तथा परंपरा चालू रहेगी। हमने निश्चय किया था कि हम इतना साहित्य लिखेंगे, वह हमने पूरा किया। यह हमारा कोई लक्ष्य था? नहीं, यह नहीं था। हमारा इससे बड़ा लक्ष्य था। हमने नया जमाना लाने का, कुरीतियों को समाप्त करने का तथा इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने का संकल्प लिया है। इस काम के लिए काफी लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है। हमें प्रसन्नता है कि हमारे साथ ढेरों-के-ढेरों व्यक्ति चल रहे हैं। अनुशासित सिपाही की तरह बंदूक चलाना चाहते हैं।

हमारा दूसरा लक्ष्य नया युग लाने, नया वातावरण बनाने, नई परंपरा तथा नया मनुष्य बनाने और न जाने कितनी हमारी योजनाएँ है। देश, समाज, परिवार, जनमानस को बनाने के लिए न जाने हमें कितने काम करने हैं। इस काम को हम अकेले पूरा नहीं कर सकते हैं। यह काम हमारी जीवात्मा करेगी। इसका मतलब हमारे सहयोगी इस कार्य को पूरा कर सकते हैं। मित्रो। अकेले न हम शाँतिकुँज बना सकते थे,न प्रज्ञा-संगठन बना सकते थे और न इतना बड़ा प्रचार तंत्र खड़ा कर सकते थे, परंतु हमारे बहुत सारे सहयोगियों के द्वारा यह काम पूरा हो गया। यह हमारे हाथ-पैर हैं। हमारा साधन, संप्रदाय, संगठन का मतलब हम हम हैं। हम अकेले नहीं करते हैं। संगठन न होता तो हम अकेले क्या कर सकते थे। हमारे साथ माता जी है, जो हमारा सारा काम सँभालती है। हमारे सहयोगी जो जारी-बीमारी में, दुःख-कष्ट में हमें सलाह देते हैं। लेखन-संपादन भी करते हैं। अकेला आदमी कुछ नहीं कर सकता है। शाखा-संगठन के बिना कुछ नहीं हो सकता है। आप हमारी बिरादरी के हैं, तो आप हमारे विचार का ख्याल रखें, हमारी इज्जत का ख्याल रखें, क्योंकि अब आप हमारे कुटुँब, परिवार में सम्मिलित हो गए है। हमारी दस सूत्री योजना, बीस सूत्री योजना और न जाने कितनी योजनाएँ है। जो आदमी जिस योग्यता-क्षमता का है, वृक्षारोपण से लेकर अनेक काम कर सकता है।

तीन चीजें कम कर लें

मित्रो। हमको यह कहना है कि आप तीन चीजें कम कर लें तो आप सेवा कर सकते हैं। तब आप हमारे पक्के, ईमानदार तथा महान् कुटुँबी सदस्य हैं। ये तीन चीजें हैं, लोभ, मोह और अहंकार।

पहला-आप अपने लोभ को कम करें। कम-से-कम में ही जीवन चलाने का प्रयास करें। अगले दिनों कोई भी व्यक्ति संपत्तिवान नहीं रह सकता है। आने वाले युग में जो अधिक जमा करेंगे, अधिक ठाट-बाट में रहना चाहेंगे आने वाले समय में लोग उन्हें जिंदा नहीं रहने देंगे। आपकी योग्यता है, तो ज्यादा देंगे। आपको कलम, चश्मा आदि की आवश्यकता है, तो हम देंगे। लेकिन आप आवश्यकता से अधिक नहीं रख सकें। औसत भारतीय नागरिक का जीवन आपको जीना होगा। आप ज्यादा खाना नहीं खा सकते हैं। आप इक्कीस रोटी खाकर तो हमें दिखाइए। आप बहुत से कपड़े पहनकर तो दिखाइए। इस संसार में हर आदमी का कोटा है। उसी सीमा में रहना चाहिए। जिस आदमी ने लोभ को जितना कम कर लिया वह आध्यात्मिकता की दृष्टि से, लोकसेवी की दृष्टि से उतना ही महान् बनता हुआ चला जाएगा।

दूसरा-कुटुंब है तो उसे सीमित बनाने का प्रयास करना। आप संतान की संख्या जितनी बढ़ाएँगे, उतनी ही आप समाज की सेवा नहीं कर पाएँगे। आप हमारे हाथ-पैर, कुटुँबी, परिवार का अंग होकर तब काम नहीं कर सकेंगे, जब आपका परिवार बढ़ा चढ़ा होगा। आज के जमाने में बच्चा पैदा करना एक जुल्म है।

तीसरी बात है-’अहं की। ‘अहं’ यानी-अहंकार। यह एक इतना बड़ा चाँडाल है, जल्लाद, इतना बड़ा कसाई है कि उसके बाद सार्वजनिक सेवा कार्य में और कोई जालिम हो ही नहीं सकता। लोकसेवा के क्षेत्र में जो अहंकारी है, वह मरेगा। वह बड़ा बनने के चक्कर में सबको मारेगा तथा मिशन को मारेगा और स्वयं भी कुछ दिन में मरेगा। अतः आप अपने आरे में यह तैयार करें कि छोटे-से-छोटा कार्यकर्ता रहकर काम कर सकें। आप ज्यादा-से-ज्यादा मशक्कत करने का प्रयास करें। आप हमारी हड्डी को खोलकर देख लें, हमने अपना तेल निकाल दिया है। दधीचि की तरह से दान तो नहीं दिया, परंतु हमने मेहनत की है। मेहनत, मशक्कत, श्रम एवं मनोयोग की समस्त सफलताओं की कुँजी है। अगली महत्वपूर्ण बात है, सबको अपने से बड़ा मानना, स्वयं सबसे छोटा बनकर रहना। ‘एटम’ सबसे छोटा है, परंतु न जाने कैसा तूफान पैदा कर देता है। अपने व्यक्तित्व को छोटा बनाकर ऊँचा उठने का प्रयास करना। गाँधी जी ने हमें छोटा काम जो भंगी का था, उसे सौंपा। उन्होंने कहा कि अगर तू इसे कर लेगा तो हमारे आश्रम तथा गाँधी जी को समझ लेगा। छोटे काम में भी बड़प्पन सीखना चाहिए। जो आदमी छोटा काम करेगा, वह उतना ही बड़ा आदमी है तथा जो वक्ता होकर, मैनेजर होकर, गायक होकर रहेगा, ऐसा सोचता है वह घटिया आदमी होगा। गाँधीजी, विनोबा, विवेकानंद आदि छोटे होकर जिए और बड़े बन गए।

मित्रो। भारत जब आजाद हो गया तो गाँधी जी को राष्ट्रपति बनने की बात कही गई थी, तो उन्होंने कहा कि खबरदार, जो ऐसा कहा। जनता पार्टी की सरकार आई तो उस समय जयप्रकाश नारायण से भी राष्ट्रपति बनने की बात कही गई थी, तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया था। अगर नेता बनने की, कुरसी की, मंच की, यह दोष कभी भी तुममें आ गया, तो बेकार हो जाओगे। अपनी आत्मा के विकास के बारे में सोचिए, नहीं तो दो कौड़ी के हो जाएँगे। इस प्रकार के हो जाएँगे। तो हमें दुःख होगा। हम चाहते हैं कि अपना प्यार-तप आपके ऊपर बिखेर दें, लेकिन पुण्य, ज्ञान यह नहीं हो सकेगा। इसे स्वयं अर्जित करना पड़ता है। अगर बच्चे के अंग में गंदगी लगी है, तो उसे हम कैसे गोद ले सकते हैं? जो बड़े काम करना चाहते हैं और छोटे काम से जी चुराते हैं, उनकी सफलता संदिग्ध ही बनी रहती है। नहीं साहब। बैठे रहते हैं, सेठ बैठे रहते हैं, काम तो मजदूर करते हैं। हमें काम से क्या लेना-देना? तब बेटे हमारी तुम्हारी कुट्टी हो जाएगी, निभेगी नहीं।

सफलता के सूत्र

मित्रो। आपको लोभ-लालच होगा तो आप प्रगति नहीं कर सकते। जिसने जितना कमाया है और उतना ही खरच कर डाला है, तो खाली हाथ रहा है। आप मोह को भी घटा देना, बच्चे कम पैदा करना तथा यह मत सोचना कि आपका बच्चा विदेश जाएगा, वकील बन जाएगा। आप अपनी नम्रता तथा मशक्कत के बारे में पूरा-पूरा प्रयास करना। जब कभी हम चैके की तरफ झाँकते हैं, तो हमारा एक स्वयंसेवक बड़ी ही मुस्तैदी से काम करता दिखाई देता है। वह असली नेता मालूम पड़ता है। जब कभी देखा, धोती कसा हुआ मालूम पड़ता है। हमें उसे देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। हम आपके बारे में ऐसी ही मान्यता रखते हैं। आपके साथ भी हमारी तीन कसौटी हैं, (1) क्या आप हमारा प्यार चाहते हैं? (2) क्या आप भगवान् पर विश्वास करते हैं? (3) क्या आप समय की माँग को पूरा करने हेतु अपने अंदर उत्साह से भरे हैं?

अगर यह आपको प्राप्त हो जाएगा तो आपके दुश्मन भाग खड़े होंगे तथा आपका अहंकार समाप्त हो जाएगा और आप वजनदार, इज्जतदार आदमी हो जाएँगे तथा आपको हर जगह सम्मान मिलेगा। अगर ये तीन चीजें हो जाएँगी, तो आप हमारे पास खिंचते चले आएँगे। लोहे को चुँबक खींच लेता है। आप लोहा बन जाना, हम खींच लेंगे। हमारे पास जो भी जीवन का सार है, उसे आपके जिम्मे सुपुर्द कर देंगे। इसके अलावा और क्या कहें आपको?

हम आप में से जो पुराने कार्यकर्ता हैं और जो नए आ रहे हैं, उन्हें बहुत प्यार करते हैं और हमेशा करते रहेंगे। हमें पूर्ण आशा है कि आप सब के सहयोग से ही सारे विश्व का जो नया भविष्य बनने वाला है, वह आप लोगों के सहयोग से ही होगा। इसके लिए आपको अपना व्यक्तित्व लेकर हमारे पास खड़ा होना होगा। आपका फूहड़, निकम्मा, अनगढ़ व्यक्तित्व लेकर हम क्या करेंगे? आपका वजन और लादना होगा।

आप रोज विचार करना कि हमारा लोभ, मोह, अहंकार घटा कि नहीं, हमारी श्रमशीलता, कार्यक्षमता बढ़ी या नहीं। अगर इस प्रकार नित्य चिंतन कर सकेंगे, तो आपकी जीवात्मा ही आपको इतना ऊँचा उठा देगी कि आप देखते रह जाएँगे। उस समय आप हमारे प्राणप्रिय बन जाएँगे तथा मिशन के लिए बड़े ही उपयोगी हो जाएँगे। इसी बात को हम हमेशा आपको समझाते रहते हैं। इसके लिए आपको सदा प्रयास करते रहना चाहिए तथा हमारे प्राणप्रिय बनकर रहना चाहिए। हम चाहते हैं कि हम और आप इस काम को एक साथ पूरा करें तथा नये युग को ला सकें। ॥ॐ शाँति॥


VigyapanSuchana

ज्ञातव्य

‘केंद्रीय हलचलें’ स्तंभ के अंतर्गत विगत अंक में देवसंस्कृति महाविद्यालय के शुभारंभ की सूचना दी गई थी। पाठ्यक्रम निर्माण के संबंध में जिनकी रुचि एवं गति हो, उन्हें भी संबोधित किया गया था। अब इस माह के अंत तक यह सारा कार्य सुनियोजित रूप ले लेगा। जल्दी ही पत्राचार करें। इस महाविद्यालय को ही विश्वविद्यालय बनना है। लाखों परिजनों की आशा का केंद्र यह विश्वविद्यालय जल्दी ही बनकर खड़ा हो, ऐसी अभिलाषा है। विभिन्न विभूतियों से इस संबंध में देवसंस्कृति महाविद्यालय प्रकोष्ठ’ से पत्राचार करने हेतु कहा जा रहा है।


श्रयरोग-उन्मूलन की विशिष्ट यज्ञोपचार प्रक्रिया-(7)

पिछले अंक में सरदी, जुकाम, खाँसी, श्वास या दमा आदि रोगों को दूर करने की अनुसंधानपूर्ण यज्ञ-चिकित्सा का वर्णन किया जा चुका है। इस अंक में श्रय, राजयक्ष्मा या टी.बी. चेचक, खरा जैसी कुछ प्राणघातक बीमारियों के संबंध में विस्तारपूर्वक बताया जा रहा है कि कि तरह से यज्ञोपचार प्रक्रिया द्वारा इन्हें दूर किया और स्वस्थ रहा जा सकता है। इस संबंध में प्राचीनकाल से ही वेद, पुराण एवं आयुर्वेद ग्रंथों में विस्तृत उल्लेख मिलता है। प्रख्यात आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता के चिकित्सा स्थान के ‘राजयक्ष्मचिकित्सत्’ नामक आठवें अध्याय के 193वें श्लोक में कहा गया है-

प्रयुक्तया यया चेष्ट्या राजयक्ष्मा पुरा जितः। ताँ वेद विहितामिष्टिमारोग्गाथीं प्रयोजयेत्॥

अर्थात् जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीनकाल में राजयक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था, आरोग्यता चाहने वाले मनुष्य को उसी वेदविहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए। तात्पर्य यह कि क्षय रोग के लिए यज्ञ चिकित्सा एक ऐसा महत्वपूर्ण एवं सर्वांगपूर्ण उपाय-उपचार हैं कि इसके पश्चात् किसी अन्य उपाय की आवश्यकता नहीं रहती।

वैज्ञानिक विश्लेषणों के अनुसार क्षयरोग कई तरह का होता है। उदाहरणस्वरूप फेफड़ों का क्षय, ग्रंथियों का क्षय, हड्डियों का क्षय (बोन टी.बी), मस्तिष्क के आवरण का क्षय, उदर या आँतों का क्षय, त्वचा का क्षय, रीढ़ की हड्डी का क्षय, उत्पादक एवं मूत्रवाहक अंग संबंधी क्षय आदि कई प्रकार के क्षय रोगियों का निर्धारण रोगवाहक जीवाणुओं-विषाणुओं की गहन जाँच-पड़ताल के बाद किया जाता है और उसी के अनुरूप चिकित्सा की जाती है। प्रायः देखा जाता है कि रोगी व्यक्ति की असावधानी, बदपरहेजी एवं द्रव दवा की पूर्ण निर्धारित खुराक न लेने पर फिर से दुबारा वही रोग उभर आता है और जानलेवा साबित होता है। यज्ञ चिकित्सा में उक्त सभी प्रकार के क्षय रोगों को समूल नष्ट करने की क्षमता विद्यमान है। इस संबंध में वेद भगवान् आशापूर्ण शब्दों में आदेश देते हैं कि हे रोगिन। हवियों के क्षरा क्षय रोग से मैं तुमको छुड़ाता हूँ। अथर्ववेद काँड 3, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 11, मंत्र प्रथम कहता है-

मुन्नवामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्। ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इंद्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम।

अर्थात् हे व्याधिग्रस्त। तुमको सुख के साथ चिरकाल तक जीने के लिए गुप्त यक्ष्मारोग और संपूर्ण प्रकट राजयक्ष्मा रोग से हवन के द्वारा छुड़ाता हूँ। हे इंद्रदेव और अग्निदेव। इस व्यक्ति को इस समय जिस पीड़ा या पुराने रोग ने जकड़ रखा है, उससे इसको अवश्य छुड़ाएँ। इससे अगला मंत्र जो कहता है, उसका भाव है, ‘यदि रोगग्रस्त मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होने वाला हो या उसकी आयु क्षीण हो गई हो, तो भी मैं विनाश समीप से उसे वापस लाता हूँ और सौ वर्ष की पूर्ण आयु तक के लिए सुरक्षित करता हूँ।’

इसी तरह अथर्ववेद के काँड-2, सूक्त 33 के ‘यक्ष्माविबर्हण सूक्त’ के सात मंत्रों में कहा गया है कि हे रोगिन्। आपके प्रत्येक अंग, प्रत्येक लोम और शरीर के प्रत्येक संधि भाग में जहाँ कहीं भी यक्ष्मा रोग का निवास है, यहाँ से हम उसे दूर करते हैं। इससे आगे काँड 9, सूक्त-95 एवं 128 यक्ष्मनाशन सूक्त में, गंडमाला चिकित्सा सूक्त 86 में हवन द्वारा क्षयरोग दूर करने का उल्लेख है।

क्षयरोग किन कारणों से उत्पन्न होता है? इसका स्पष्ट उल्लेख अथर्ववेद में काँड 9, सूक्त 96 में किया गया है। भावार्थ, ‘जो क्षयरोग पसलियों को तोड़ डालता है, फेफड़ों में जाकर बैठ जाता है, पृष्ठभाग के ऊपरी हिस्से में स्थित हो जाता है, अति स्त्री प्रसंग से उत्पन्न होने वाले उस क्षयरोग को हे यज्ञीय हवि। तू शरीर से बाहर निकाल दे। इस क्षयरोग को उत्पन्न करने वाले विषाणु पक्षी की भाँति हवा में उड़ते हुए एक से दूसरे व्यक्ति में प्रविष्ट हो उसे संक्रमित कर देते हैं। चाहे रोग ने जड़ जमा ली हो, चाहे जड़ न जमाई हो, हवि चिकित्सा दोनों की ही उत्तम चिकित्सा है। असंयमित जीवन जीने से उत्पन्न हे क्षय रोग। हम तेरी उत्पत्ति को जानते हैं, किंतु जिस घर में नाना प्रकार की औषधियों से या रोगनाशक हवि, चरु या अन्न आदि द्वारा हवन होता है, उस घर में तू कैसे पहुँच सकता है।’

प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए जो व्यक्ति नित्यप्रति नियमपूर्वक वनौषधि युक्त हवन सामग्री से गायत्री महामंत्र या सूर्य गायत्री मंत्र के साथ हवन करता है, वह कदापि रोगी नहीं हो सकता। यह वेदवर्णित मत है, जिसकी पुष्टि अब वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी हो चुकी है कि क्षयरोग तो ऐसे व्यक्ति के निकट फटकता तक नहीं। अथर्ववेद काँड-19, सूक्त-36, मंत्र 1-2 का इस संबंध में स्पष्ट आदेश है-

न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते। यं भेषजस्य गुल्गुलोः सुरभिगंधो अश्नुते॥

विष्वत्रतस्माद यक्ष्मा मृगा अश्वा इवेरते। यद गुल्गुल सैंधवं यद वाप्यासि समुद्रियम॥

अर्थात् ‘जिसके शरीर को औषधि रूप रोगनाशक गुग्गल का उत्तम गंध व्यापता है, उसको राजयक्ष्मा का रोग एवं दूसरों के द्वारा दिए गए अभिशाप स्पर्श तक नहीं करते। इस गुग्गुल की सुँगधि से यक्ष्मा आदि रोग उसी प्रकार सभी दिशाओं में पलायन कर जाते हैं, जिस प्रकार शीघ्रगामी अश्व और हिरन दौड़ जाते हैं।’

यज्ञोपचार द्वारा यक्ष्मा रोग को दूर करने का वर्णन पुराणों में भी मिलता है। लिंग पुराण 49, श्लोक 9 से 13 तक विभिन्न प्रकार के रोगों के शमनार्थ यज्ञोपचार का वर्णन है। यथा-

षण्मास तु घृतं हुत्वा सर्वव्याधिविनाशनम॥ राजयक्ष्मा तिनैर्होमान्नश्यते वत्सरेणु तु। यवहोमेन चायुष्यं घृतेन च जयस्तदा।

अर्थात् छह महीने तक घी का हवन करने से सब प्रकार की व्याधियों का नाश होता है। एक वर्ष तक तिल का हवन करने से राजयक्ष्मा अर्थात् टी. बी. का नाश होता है। जौ का हवन करने से आयुवृद्धि एवं घी के हवन से जय प्राप्त होती है।

इसी तरह देवीभागवत् 11/24/-26 में स्पष्ट उल्लेख है-

वचाभिः पयशक्ताभिः क्षयं हुत्वा विनाशयेत्। मधुत्रितयहोमेन राजयक्ष्मा विनश्यति॥

लताः पर्वसु विच्छिद्य सोमस्य जुहुयादद्विजः। पोमे सूर्येण संयुक्ते प्रयोक्ताः क्षयशाँतये॥

अर्थात् दूध में बच को अभिषिक्त करके हवन करने से क्षयरोग दूर होता है। दूध, दही और घी इन तीनों को होमने से भी राजयक्ष्मा नष्ट होता है। अमावस्या के दिन सोमलता की डाली को गाँठों पर से अलग करके हवन करने पर क्षयरोग दूर हो जाता है।

इन मंत्रों से स्पष्ट है कि क्षयरोग चाहे प्रारंभिक अवस्था में हो अथवा बहुत बढ़ गया हो-चतुर्थ अवस्था में पहुँच गया हो, यहाँ तक कि उसके कारण रोगी बिलकुल मरणासन्न हो गया हो, तो भी यज्ञोपचार के द्वारा वह ठीक हो सकता है और सौ वर्ष तक जीवित रह सकता है। अथर्ववेद काँड-3, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त-11, मंत्र-4 की स्पष्टोक्ति है-

शंत जीव शरदो वर्धमानः शंत हेमंताच्छतमु वसंतान्। शतं इंद्रो अग्निः सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषाहार्षमेनम।

अर्थात् हे हवि चिकित्सा द्वारा क्षयरोग से आरोग्य लाभ किए हुए मनुष्य। तू दिनोदिन बढ़ता हुआ सौ शरदों तक, सौ हेमंतों तक और सौ वसंतों तक जीवित रह। वायु, अग्नि, सूर्य और बृहस्पति पूर्जन्य ने सौ वर्ष की आयु देने वाली हवि की सहायता से पुनः तुझे सौ वर्ष की आयु प्राप्त करा दी है।

यज्ञोपचार प्रक्रिया द्वारा क्षयरोग-निवारण के उपरोक्त वैदिक प्रमाणों को ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने अपने गहन अनुसंधानों एवं प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर प्रमाणित सिद्ध कर दिखाया है। पाया गया है कि सुदृढ़ भावना के साथ सूर्य गायत्री मंत्र से विशिष्ट प्रकार से बनी हवन सामग्री के साथ किया गया हवन आरंभिक अवस्था से लेकर असाध्य स्थिति तक पहुँचे यक्ष्मा, टी. बी. रोग को समूल नष्ट करने में समर्थ है। सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार है-

ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यो प्रचोदयात्।

क्षय रोग की विशेष हवन सामग्री-

इसके लिए जिन औषधियों को बराबर मात्रा में लिया जाता है, वे इस प्रकार हैं (1) रुदंती (2) रुद्रवंती (3) शरपुँखा (4) जावित्री (5) विल्व की छाल (6) छोटी कंटकारी (7) बड़ी कंटकारी (8) तेजपत्र (9) पाढल (10) वासा (11) गंभारी (13) श्योनाक (14) प्रश्निपर्णी (15) शालिपर्णी (16) शतावर (17) अश्वगंधा (18) जायफल (19)

नागकेशर (20) शंखाहुली (21) नीलकमल (22) लौंग (23) जीवंती (24) कमलगट्टा की गिरी (25) मुनक्का (26) केशर-यथाशक्ति।

इन सभी 26 चीजों का जौकुट पाउडर बनाकर हवन करने के लिए अलग डिब्बे में रख लेना चाहिए, साथ ही इन्हीं को मिलाकर बनाए गए सूक्ष्म एवं कपड़छन पाउडर को सुबह-शाम खाने के लिए एक अन्य डिब्बे में अलग कर लेना चाहिए। खाने वाले बारीक पाउडर को हवन करने के पश्चात् सुबह एवं शाम को एक-एक चम्मच घी एवं शक्कर के साथ नियमित रूप से लेते रहने से शीघ्र लाभ मिलता है। क्षय रोगी को ठंडी एवं खट्टी चीजों का परहेज अवश्य करना या कराना चाहिए।

हवन करते समय इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि अखंड ज्योति के पिछले अंकों में वर्णित हवन सामग्री नंबर (1) को, जिसमें अगर, तगर, देवदार, चंदन, रक्त चंदन, गुग्गुल, लौंग, जायफल, गिलोय, चिरायता और धी, जौ, तिल, शक्कर अश्वगंधा मिले होते है, उसे भी क्षय रोग के लिए बनाई गई विशेष हवन सामग्री में बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन करना चाहिए। जहाँ तक हो सके, हवन के लिए क्षीर वृक्षों की समिधा का चयन करना चाहिए जैसे-पीपल, गूलर, पाकर, पलाश, शमी, देवदार, सेमल या आम की छालयुक्त सूखी समिधा। इस प्रकार की समिधाओं एवं हवन सामग्री के निरंतर प्रयोग से क्षय रोग को समूल नष्ट किया और दीर्घायु प्राप्त की जा सकती है। क्रमशः।


श्रावणी उपाकर्म के मूल में छिपा दर्शन

भारतीय संस्कृति पर्वों एवं त्यौहारों की संस्कृति है। इनका उद्देश्य मानवीय संबंधों का विकास एवं उदात्त भावनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति है। इन पर्वों में श्रावणी या रक्षाबंधन का महत्वपूर्ण स्थान है। वैदिक युग से प्रचलित यह पर्व शिक्षा, स्वास्थ्य, सौंदर्य तथा साँस्कृतिक मूल्यों की स्थापना एवं पुनर्स्मरण कराता है। इसे प्रायश्चित एवं जीवन-मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्प पर्व के रूप में मनाया जाता है। यही जीवन की सुख एवं समृद्धि का आधार है।

श्रावणी पूर्णिमा के दिन दो प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं। श्रावणी अथवा उपाकर्म और रक्षाबंधन। रक्षाबंधन का अर्थ है-रक्षा करने के लिए बँध जाना। सूत्र प्रतीक है-पवित्र प्रेम की पहचान का, भाई और बहिन के अटूट विश्वास का। राखी के इस पर्व को रखड़ी, सलोनी, श्रावणी व अन्य कई नामों से भी जाना जाता है। परंतु प्रत्येक नाम का वास्तविक अर्थ स्नेह ही है। राखी कच्चे धागों का एक ऐसा अटूट बंधन है, जिसने भारतीय संस्कृति को एक अलग पहचान दी है।

इस पर्व के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि देवासुर संग्राम में जब देवता निरंतर पराजित होने लगे, तब इंद्र ने अपने गुरु बृहस्पति से विजय प्रापित की इच्छा प्रकट की एवं इसके लिए उपाय सुझाने के लिए प्रार्थना की। देवगुरु बृहस्पति ने श्रावण पूर्णिमा के दिन आक के रेशों की राखी बनाकर इंद्र की कलाई पर बाँध दी। यह रक्षा कवच वरदान साबित हुआ। इस प्रकार मानव संस्कृति में प्रथम रक्षा−सूत्र बाँधने वाले बृहस्पति देवगुरु के पद पर प्रतिष्ठित हुए। तभी से रक्षा सूत्र बाँधने का प्रचलन प्रारंभ हुआ।

इसी दिन इंद्र को देवासुर संग्राम के लिए विदा करते समय उनकी पत्नी शची ने उनकी भुजा पर रक्षा−सूत्र बाँधा था। यह सूत्र एक विश्वास और आस्था का प्रतीक था। विश्वास फलित हुआ और इंद्र विजयी होकर लौटे। प्राचीनकाल में योद्धाओं की पत्नियाँ रक्षा−सूत्र बाँधकर उन्हें युद्ध भूमि में भेजती थीं, ताकि वे विजयी होकर लौटें। एक अन्य कथानक के अनुसार भगवान् वामन ने राजा बलि को इसी दिन ही रक्षा हेतु सूत्र बाँधकर दक्षिणा प्राप्त की थी। वस्तुतः राखी के इसी कच्चे धागे के बदले भगवान् श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की साड़ी को अक्षय एवं असीमित कर लाज बचाई थी। इसे भाई-बहिन के पवित्र एवं पावन संबंधों का सूत्रपात कहा जा सकता है और यहीं से रक्षाबंधन की पुण्य परंपरा प्रचलित हुई।

पौराणिक युग, मध्यकाल और वर्तमान समय में रक्षाबंधन विभिन्न रूपों में दिखाई देता है, परंतु इसकी सनातनता, निरंतरता एवं भावना में कहीं व्यतिक्रम नहीं हुआ है। हाँ, कुछ विसंगतियाँ जरूर आई हैं। समाज के बदलते प्रतिमान व परिवेश के बावजूद आज भी प्रेम की मिठास से सराबोर यह पर्व जीवन की पवित्रता और रक्षा का प्रतीक बना हुआ है।

प्राचीनकाल का महत्व ही वर्तमान समय में रक्षाबंधन के पर्व के रूप में एक नवीन आशा एवं उत्साह का संचार करता है। रक्षाबंधन भाई-बहनों के स्नेह का प्रतीक पर्व है। राखी के स्नेहिल धागों में बहनों हृदय की समस्त कोमल भावनाएँ साकार हो उठती हैं। बहन भाई के हाथ में राखी बाँधकर उनके मन में कर्तव्यपालन, बलिदान एवं निष्ठा की भावना जगाती है और बदले में किसी भी संकट के समय अपनी सुरक्षा व संरक्षण का उनसे आश्वासन पाती है। प्राचीनकाल में राखी बाँधने वाला स्वयं करने में सक्षम होता था, इसलिए वह रक्षा के लिए अभयदान देता था।

रक्षाबंधन भारत देश का साँस्कृतिक प्रतिमान है। इसका स्वरूप पूर्णतया साँस्कृतिक है। रक्षा की भावना पर आधारित होने के कारण यह पर्व शक्ति और साहस का संदेशवाहक है। इस पर्व ने भारतीय जनमानस को आँदोलित किया है। इसने इतिहास के प्रवाह तक को बदल डालने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। इस पर्व ने धर्म, रक्त, भाषा और जातीयता की सीमाओं को लाँघकर लोगों को भावनात्मक बंधन में बाँधा है। भावना के सूत्र बड़े सूक्ष्म एवं चिरस्थाई होते हैं। राखी के कच्चे धागों में लौह बंधन से अधिक सामर्थ्य एवं शक्ति विद्यमान है। वर्तमान की विपरीत परिस्थितियों में इस पर्व की प्रासंगिकता अक्षुण्ण है। इसमें समता, एकता, संरक्षण एवं स्नेह के साथ-साथ भाई-बहन का पवित्रतम सनातन संबंध जुड़ा हुआ है।

श्रावण पूर्णिमा का एक और पक्ष है- श्रावणी अर्थात् उपाकर्म। उपाकर्म विशुद्ध रूप से वैदिक कर्म है। इसके बिना रक्षाबंधन अधूरा एवं अपूर्ण है। किसी पवित्र नदी, जलाशय या समुद्र तट पर सामूहिक रूप से विधिपूर्वक स्नान, पूजन, हवन करके यह पर्व संपन्न किया जाता है। इसी दिन यज्ञोपवीत बदलने का भी विधान है। शास्त्र वचन है कि-

संप्राते श्रावणास्यान्त पौणिंमास्या दिनोदये। स्नानं कुवींत मतिमान् श्रुति स्मृति विधानतः॥

अर्थात् बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि श्रावण की पूर्णिमा को प्रातः ही श्रुति-स्मृति विधानानुसार स्नानादि कृत्य करे। यह आत्मशोधन का पुण्य पर्व है। सावधानी के साथ रहने वाले व्यक्तियों से भी प्रमादवश कुछ भूल हो जाती है। इन दोषों को करने एवं पाप से निवृत्ति हेतु श्रावणी का विशेष योगदान है। आचार्य हेमादि कृत् श्रावणी संकल्प का कर्मकाँड का सबसे बड़ा संकल्प है। यह प्रायश्चित संकल्प है। इसके तहत ज्ञात-अज्ञात अनेक पापों का नामोल्लेख कर उससे मुक्ति पाने की कामना की गई है। इसमें मिट्टी, गोबर, भस्म, पंचगव्य, अपामार्ग, कुशयुक्त जल आदि के द्वारा स्नान किया जाता है। इससे शारीरिक शुद्धि होती है और ऋषिपूजन, देवपूजन , द्वारा आध्यात्मिक शाँति उपलब्ध होती है। हवन के पश्चात् सूर्य को अर्घ्य चढ़ाया जाता है। आत्मशुद्धि के बाद वेदाध्ययन का भी नियम है।

श्रावणी पर्व पर स्नान संबंधी विधियाँ बहुत ही वैज्ञानिक आधार पर स्थिर की गई है। मृतिका, भस्म, गोमय, कुशा, दूर्वा आदि सभी स्वास्थ्यवर्द्धक एवं रोगनाशक होती हैं। इस प्रकार श्रावणी की सारी प्रक्रिया सर्वविध शुद्धि के लिए अत्यंत लाभप्रद है। पंचगव्य के पदार्थ की उपयोगिता को आयुर्वेद भी स्वीकारता है।

वैदिक युग से मनाए जा रहे इस पर्व का उद्देश्य प्रमाद या अज्ञानवश किए गए दुष्कर्मों को प्रायश्चित द्वारा दूर करना है। साथ ही जीवन-मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्पित होना है। यह भविष्य में शुभ कर्मों की प्रेरणा प्रदान करता है। इस पर्व के मूल में पवित्र भावना एवं उच्च आदर्श सन्निहित है। जिन्हें अपनाकर जीवन एवं समाज को उत्कृष्ट एवं उन्नत बनाया जा सकता है।


VigyapanSuchana

अभियान साधना के साधक ध्यान दें

अपना साधनाक्रम कब से आरंभ किया है, कब तक चलाएँगे, किन-किन को साथ लेकर चल रहे हैं, व्यक्तिगत या सामूहिक किस स्तर पर कर रहे हैं, यह पत्राचार शाँतिकुँज हरिद्वार के पते पर कर लें। अपना साधना पंजीयन भी करा लें। साथ में जिस किसी के भी सदस्य हैं, पत्रिका मंडल, ‘स’ समूह, शक्तिपीठ अवश्य लिख भेजें। पते के ऊपर ‘संगठन प्रकोष्ठ साधना आँदोलन’ लिखें।

सभी पाठकों से- सुधीजनों से

‘अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्र’ योजना ने तीव्र गति पकड़ी है एवं ढेर सारे पत्र ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ पहुँच रहे हैं। विगत अंक जुलाई 2002 की ‘अपनों से अपनी बात’ में उसके संबंध में विस्तार से पढ़ा जा सकता है। इसी के साथ-साथ शाँतिकुँज ‘साहित्य विस्तार पटल’ योजना भी गतिशील हुई है। दोनों ही एक-दूसरे की पूरक योजनाएँ हैं एवं एक ही उद्देश्य-गुरुसत्ता के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए आरंभ की गई हैं। जितने अधिक व्यक्तियों की भागीदारी होगी, उतना ही उज्ज्वल भविष्य नजदीक आता स्पष्ट दिखाई देगा। इस वर्ष नई किताबों का भी प्रकाशन किया जा रहा है, जिनमें से एक गुरुसत्ता के जीवनवृत्त पर महत्वपूर्ण घटनाओं सहित लिखी गई औपन्यासिक शैली की पुस्तक भी है। सभी दोनों ही योजनाओं में भागीदारी का ज्ञानयज्ञ में बढ़-चढ़कर भागीदारी करें। सितंबर का अखण्ड ज्योति अंक ‘याग साधना विशेषाँक ‘ होगा। अधिक-से-अधिक पाठकों तक इसे पहुँचाने का प्रयास करें।


गहना कर्मणोगति

(गीता के चतुर्थ अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग की युगानुकूल व्याख्या-आठवीं कड़ी)

कर्म, अकर्म और विकर्म तथा कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म की व्याख्या हमने विगत अंक में पढ़ी है। भगवान् कहते हैं कि वह मनुष्य बुद्धिमान है, जो अकर्म में कर्म को व कर्म में अकर्म को देखकर उसका मर्म समझ लेता है। ऐसा व्यक्ति ही सभी कर्मों को वास्तविक योग में स्थित होकर संपादित करता है तथा सही अर्थों में समझदार है। चूँकि ज्ञानीजन भी कर्म करते-करते क्या करना, न करना इस विषय में भ्रम में पड़ जाते हैं, यह जानना जरूरी है कि संकल्पित होकर कर्म कैसे किए जाएँ, विकर्मों से बच जाए एवं अकर्म को समझकर कर्म किए जाएँ। जो भी कर्म अंतरात्मा को भगवान् के साथ युक्त करके किए जाएँगे, भगवान् के अनुसार से ही सच्चे कर्म हैं। तुलसीदास जी ने भी यही कहा है कि सब तरह भगवान् पर विश्वास रखकर गुणों को, श्रेष्ठ उपलब्धियों को उनके द्वारा प्रदत्त तथा दोषों को अपने द्वारा किया मानना चाहिए, तो व्यक्तित्व का विकास ठीक होता है एवं मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। जो कर्म करते हुए अभिमान को त्याग, भगवान् को श्रेय दे, वह सही अर्थों में कर्म में अकर्म को देखता है। अकर्म की स्थिति में ही इतिहास को बदल देने वाली ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं, जो युगाँतरकारी होती है। यह सारा मर्म इसलिए समझना जरूरी है कि कर्म की गति बड़ी गहन होती है एवं भगवान् उसी की व्याख्या कर रहे हैं। अब आगे।

महापुरुष इस विष पर क्या कहते हैं?

अभी तक विगत दो माह से तीन श्लोकों की ही विशद व्याख्या का क्रम चल रहा है। यह विषय जटिल है, भलीभाँति समझ लेने पर गीता के मर्म तक हमें ले जाता है, इसलिए इतना विस्तार जरूरी भी है। तीनों श्लोकों के भाव को उपर्युक्त सार-संक्षेप में दिया गया। इन्हीं श्लोकों की व्याख्या करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि जो कर्म करके भी उसमें अपने चित को शाँति की स्थिति में रख सकता है और बाहरी कोई कर्म न करके भी अंतर में जिसके आत्मचिंतन का प्रवाह चलता रहता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है, योगी है और सबके सब कर्म उसके संपन्न हो गए हैं। कभी एक चर्चा में उन्होंने अपने शिष्य से कहा था, ‘जानते हो भगवान् कृष्ण कैसे थे? समस्त गीता मूर्तिमान (पर्सोनीफ इड) है। जब अर्जुन का मन अज्ञान और कायरता से भर गया था, तब उन्होंने गीता सुनाई। उस समय उनका मुख्य भाव कर्म का मर्म उनके शरीर के कण-कण से फट कर निकल रहा था। कर्म, कर्म, अनंत कर्म एवं उसके फल की ओर ध्यान न देकर ‘ममबुद्धि’ को उन्हीं के चरण कमलों में संलग्न रख कर्म करना ही कर्मयोग है। चारों योगों का सामंजस्य आवश्यक है, नहीं तो मन-बुद्धि को तू उन्हीं में कैसे लगाए रखेगा। इस प्रकार वैदिक धर्मानुष्ठान-साधन-भजन-ध्यान आदि भी जो दिन-रात किए जाता हैं, हर साँस में,प्रत्येक चेष्टा में किए जाते हैं, सभी कर्म हैं।’

कितनी सुँदर व सरल, सटीक व स्पष्ट व्याख्या है तीनों श्लोकों की। इसी प्रकार विनोबा ने भी बड़ी निराली व सुँदर व्याख्या की है, कर्म व अकर्म की। वे कहते हैं, ‘सूर्य उदय होता है, पर उसके मन में क्या यह कभी भाव आता है कि मैं अँधेरा मिटाऊँगा, पंछियों को उड़ने की प्रेरणाएँ दूँगा। वह तो उदय होता है बस। उसका अस्तित्व मात्र विश्व को गति देता है। उसका कर्म सहज स्वभाव का होने के कारण अकर्म हो जाता है, उसमें उसे कष्ट या त्रास नहीं होता। तभी गीता में कहा है भगवान् कृष्ण ने-मैंने कर्मयोग का यह रहस्य पहले-पहल विवस्वान् को सिखाया। विवस्वान् का अर्थ है- ‘सूर्य’। सूर्य कर्म करता है, जो अकर्म हो जाता है। सूर्य ने मनु को सिखाया अर्थात् सूर्य से यह ‘करके न करने का’ गुर मनुष्य ने सीखा, क्योंकि मनु मानव का प्रतीक है। मनु ने इक्ष्वाकु-सूर्यवंशी राजा को और फिर सारे जगत् को दिया। कोई भी ज्ञानी यदि कहता है कि मैं उपकार नहीं करूंगा, तो उसके लिए यह असंभव है। वह कर्म करते-करते अकर्म की दिशा में पहुँच गया है,

यह उसके स्वभाव का एक अंग बन गया है। वह उपकार किए बिना रह नहीं सकता। संत पुरुष कर्म उसी तरह करते हैं, जैसे सूर्य का प्रकाश देना। कर्म-कर्म तो तब लगे जब उसमें भार हो। जब मालूम ही न हो कि मैंने कर्म किया एवं यह स्वभाव का अंग बन जाए तो कर्म अकर्म हो जाता है।’ बड़ी सुँदर उक्तियों के साथ विनोबा जो गीता को गीताई गीता माता कहते थे, ने जटिल विषय की व्याख्या की है। अकर्म में कर्म को भी उन्होंने दृष्टाँत से समझाया है। वे कहते हैं , ‘ मान लीजिए हमें गुस्सा आ गया। जिसकी भूल से गुस्सा आया है, उसके पास आने पर हम बोलते ही नहीं। इस अबोल का कर्म, त्याग का कितना प्रचंड परिणाम होता है, यह समझा जा सकता है। बच्चे की गलती पर माँ-बाप बोलना बंद कर दें, तो जबर्दस्त फलश्रुति देखी जाती है। यह है अकर्म में छिपा हुआ कर्म।’

अष्टावक्र गीता (29,62) कहती है-

निवृतिरपि मूढ़स्य प्रवृतिरुपजायते। प्रवृतिरपि धीरस्य निवृतिफलदायिनी।

अर्थात् मूर्खों की निवृत्ति एक प्रकार की प्रवृत्ति है और धीरवृत्ति के व्यक्ति की प्रवृत्ति का फल भी निवृत्ति जैसा होता है। संभवतः यही कारण है कि श्रीकृष्ण ने सत्रहवें-अठारहवें श्लोक में कहा है कि कर्म, अकर्म-विकर्म में बड़ी पेचीदा बातें हैं। कर्म में अकर्म तथा विकर्म एवं अकर्म में कर्म तथा विकर्म आ मिलते हैं। सामान्य मनुष्य को कर्म करते रहना है, निष्काम कर्म सतत करते रहना है, अकर्म व विकर्म से बचना है। अकर्म कब विकृत रूप ले ले, मालूम नहीं। जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को समझ लेता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमानी होते हुए परमात्मचेतना में स्थित हो, स्वयं को महापुरुषों की गिनती में बिठा लेता है।

कर्म की गति बड़ी गहन

उपर्युक्त विवेचनाओं को आत्मसात् कर लेने के पश्चात् ‘गहना कर्मणो गतिः’ को समझने का प्रयास करेंगे। इस विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी की एक चौपाई से इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। वे लिखते हैं-

औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु। अति विचित्र भगवंत गति को जग जाने जोगु॥

परमपिता परमात्मा की गति को कौन समझ सकता है? कर्म की गति इतनी गहन है कि अपराध कोई और करता है और फल किसी को भोगना पड़ता है। यह भगवान् की न्याय व्यवस्था भी बड़ी निराली है। अर्जुन जैसा मनीषी विद्वान् महारथी भी एक अति आवश्यक कर्म का घोर युद्ध मान बैठा है एवं भगवान् को उलाहना दे रहा है कि क्यों आप मुझे इस घोर कर्म में प्रवृत्ति कर रहे हैं। कर्म की गति अति गहन होने के कारण वह इस महाभारत के मर्म को नहीं समझा पा रहा है।

भगवान् कहते हैं कि दीप से जलते धुएँ के आवरण में कर्म के जाल फँसे रहते है। उन्हें सामान्य मनुष्य समझ नहीं सकता। भारतीय पौराणिक इतिहास में एक महाराजा नृग हुए हैं। वे बड़े दानी व यशस्वी राजा थे। गोदान में एक ब्राह्मण को उन्होंने सैकड़ों गायें दे दीं। इन गायों में एक ऐसी गाय भी थी, जो किसी ने राजा को दान में दी थी। अब राजा द्वारा जब भी दान किया जाता था, वह विशुद्ध रूप से उनके द्वारा खरीदी हुई गायों का ही किया जाता था। त्रुटिवश यह गाय उसमें मिल गई। जिस व्यक्ति ने महाराज को दान में गाय दी थी, वह राजा के पास पहुँचा और उसके शिकायत की कि आपने मेरे द्वारा दिए गए दान को किसी और को कैसे दे दिया। राजा बोले-भाई। कर्मचारियों से गलती हो गई। हम तो जानते भी नहीं थे। उसने कहा कि निश्चित ही आपको दंड भुगतना पड़ेगा। कर्मचारियों की गलती आपकी गलती है। आप सर्वोच्च पद पर है, दान जैसे कार्य में आपको सावधानी रखनी चाहिए थी।

खैर। मृत्यु के पश्चात् धर्मराज के यहाँ न्याय हुआ। धर्मराज बोले-राजा नृग आपके पास बड़े पुण्य है। आपका जीवन धर्मप्रधान रहा है, पर आपके साथ एक छोटा पाप भी जुड़ा है। आप दान वाले प्रकरण में दोनों ब्राह्मणों का समाधान भी नहीं कर पाए व अनजाने ही गलती आपसे हो गई। पहले पाप का फल भोगना चाहते हैं या पुण्य का। राजा नृग की आत्मा बोली, ‘पहले पाप का फल भोग करवा दीजिए।’ उन्हें गिरगिट की योनि में जन्म लेना पड़ा । द्वारिका में जन्मे। एक बड़े गिरगिट के रूप में कुएँ में रहते थे। भगवान् कृष्ण क्रीड़ा हेतु सहयोगियों के साथ उधर आए। देखा कि कुछ यादवपुत्र उसे कुएँ से बाहर निकालने का प्रयास कर रहे हैं। बाहर निकलते ही उसने भगवान् के ज्योतिरूप में दर्शन कर लिए एवं उन्हीं की ज्योति में शरीर छोड़कर समा गया। पाप का फल भी भोगा एवं पुण्यों के स्वरूप थोड़ी ही जीवनावधि में भोग पूरा कर परमसत्ता के साथ पुण्यों के कारण एकाकार हो गए।

करम गति टारे नाहिं टरै

कथा तो पौराणिक है,पर कर्म की गति कितनी गहन, टारे नहीं टरती, इस तथ्य को स्पष्ट करती है। हम कभी-कभी ऊहापोह में फँस जाते है। कौन-से हमारे पुण्य थे जिनके कारण इस जन्म में भौतिकता के जंजाल से निकलकर हम भगवद् कर्म में जुड़ गए। गायत्री परिवार से जुड़कर जिस सत्कर्म में, ज्ञानयज्ञ में निरत हो गए, जहाँ हमें चारों ओर भगवान्-ही-भगवान् दिखाई देता है, यह सारा हमारा विगत जन्मों के पुण्यों का फल है। कुछ व्यक्ति जुड़ने के बाद भी स्वरूप को समझ नहीं पाते, फिर भौतिकवाद में, लौकिक दुनिया की चकल्लस में उलझ जाते हैं, उनके पुण्य क्षीण होते चले जाते हैं, इस जन्म की साधना के अभाव में वे कुछ अर्जित नहीं कर पाते, अतः दुर्बुद्धि हावी हो जाती है, वह कर्म कराने लगती है, जो कभी सोचा भी नहीं था। कर्म की गति बड़ी गहन है। कर्म फल विधाता का बड़ा अकाट्य सिद्धांत है।

परमपूज्य गुरुदेव एक स्थान पर लिखते हैं कि हम ने जो जीवनभर लोगों को अनुदान बाँटे हैं, उनके बदले में यदि हमें और माताजी को बीमार होकर शरीर छोड़ना पड़े, तो कोई आश्चर्य नहीं। गुरुदेव-माताजी ने सचेत स्थिति में सभी भोगकर शरीर छोड़ा, महासमाधि ली। रामकृष्ण परमहंस ने गले के कैंसर से पीड़ित होकर शरीर छोड़ा । जब महापुरुष अपवाद नहीं हुए, तो हम कैसे बच सकते हैं। हाँ, परमात्मचेतना में स्थित होकर आज से ही श्रेष्ठ कर्म करते हुए अपने पुण्यों के ‘अकाउंट’ में वृद्धि करने हेतु संकल्पित हो जाना चाहिए। निषिद्ध कर्मों से बचना चाहिए। एवं निष्काम कर्म में लिप्त हो जाना चाहिए।

परमपूज्य गुरुदेव की लिखी एक पुस्तक-’गहना कर्मणो गति।’ इसकी भूमिका में वे लिखते हैं, ‘निस्संदेह कर्म की गति बड़ी गहन है। धर्मात्माओं को दुःख, पापियों को सुख, आलसियों को सफलता, उद्योगशीलों को असफलता, विवेकवानों पर विपत्ति, मूर्खों के यहाँ संपत्ति, दंभियों को प्रतिष्ठा, सत्यनिष्ठों को तिरस्कार प्राप्त होने के अनेक उदाहरण इस दुनिया में देखे जाते है। कोई जन्म से ही वैभव लेकर पैदा होता हैं, किन्हीं को जीवनभर दुःख-ही-दुःख भोगने पड़ते हैं। सुख और सफलता के जो नियम निर्धारित हैं, वे सर्वांश पूरे नहीं उतरते। इन सब बातों को देखकर भाग्य-ईश्वर की मर्जी, कर्म की गति संबंधी प्रश्न व संदेह उठ खड़े होते है। वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टि से ही कर्म की गहन गति पर विचार किया जाए, तो यह प्रतिपादित हो सकता है कि जो कुछ भी फल प्राप्त होता है, वह अपने कर्मों के कारण ही है।’

सही दृष्टि विकसित करें

इस पुस्तक में उन्होंने पंचाध्यायी के माध्यम से पाठकों को चित्रगुप्त का परिचय कराया है, दैहिक-दैविक-भौतिक तापों का वर्णन किया है, ये किस कारण आते हैं, यह बताया है। कर्मों की संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण तीनों स्वरूपों की व्याख्या की है एवं यह लिखा है कि आप सत्कर्मों द्वारा अपनी दुनिया स्वयं बना सकते हैं। इस पुस्तक के समापन पृष्ठों में वे लिखते हैं, ‘हर मौज मारने वाले को पूर्व जन्म का धर्मात्मा और हर कठिनाई में पड़े हुए व्यक्ति को पूर्व जन्म का पापी कह देना उचित नहीं। सत्पुरुषों को पग-पग पर कष्ट झेलने पड़ते हैं। यह पुण्य संचय के, तपश्चर्या के, अपनी सत्यता की परीक्षा स्वर्ण समान चमकाने वाले दुख है। जब भी कोई विपत्ति आए, यह नहीं सोचना चाहिए कि हम पापी हैं, अभागे हैं, ईश्वर के कोपभाजन है। संभव है वह कष्ट हमारे हित के लिए आया हो। कर्म की गति गहन है, उसे हम ठीक प्रकार नहीं जानते,केवल परमात्मा ही जानता है।’

श्रीकबीरदास जी ने इसी बात को इस तरह लिखा है-

करता था सो क्यँ किया, अब करि क्यूँ पछिताइ। बोवै पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाइ॥

‘जब बुरे कर्म करता था, तो क्यों किया? करने के बाद अफसोस क्यों करता है? जब बबूल का पेड़ बोया है, तो आम कहाँ से खाएगा? साधन साध्य के अनुरूप होना चाहिए।’

बहुल सरल भाषा में कबीर ने कर्मों की गति हम सबको समझा दी है। भगवान् कहते हैं कि जो उनके साथ योगयुक्त होकर कर्म करता है, उसके कर्मों के स्वामी भगवान् होते है। वह उन कर्मों का निमित्त मात्र होता है, जो उसकी प्रकृति अपने स्वामी को जानते हुए, उन्हीं के वश में रहते हुए करती है। उसके कर्म अग्नि में ईमान की तरह जलकर भस्म हो जाते है। इसका उसके मन पर कोई लेप या दाग नहीं लगता । वह स्थिर, शाँत, अचल निर्मल शुभ और पवित्र बना रहता है। ऐसे दिव्यकर्मी का, महामानव का यही प्रथम लक्षण है कि वह कर्तृत्व अभिमान से शून्य मोक्षदायक ज्ञान में स्थित होकर समस्त कर्म करता है। यह उपर्युक्त भाषा उन्नीसवें, बीसवें एवं इक्कीसवें श्लोक का भावार्थ है, जिन्हें यहाँ उद्धृत किया जा रहा है।

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः। ज्ञानग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥

त्यक्त्वा कर्मफलासडं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृतोपि नैव किन्निचत्करोति सः॥

निराशीयंतचितात्मा व्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विवम॥

‘जिसके सभी कार्य (शास्त्रसम्मत) बिना कामना और मानसिक उद्वेगों के होते हैं और जिसके समस्त कर्म ज्ञान रूप अग्नि के द्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ऋषिगणों, ज्ञानीजन द्वारा बुद्धिमान (पंडित) कहा जाता हैं।’

‘ऐसा व्यक्ति सब प्रकार की कर्मफल-आसक्ति छोड़कर सदैव प्रभु में तृप्त रहता है,प्रभु के अतिरिक्त किसी अन्य पर आश्रित न होकर वह सब प्रकार के कर्मों को करते हुए भी वस्तुतः कुछ भी नहीं करता।’

‘जिसका अंतःकरण और इंद्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, जिसने समस्त भोगों की सामग्री का-संग्रह वृति का परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित (उद्विग्नता से मुक्त) व्यक्ति केवल शारीरिक कर्म करता हुआ भी किसी प्रकार के पापों को प्राप्त नहीं होता।’

दिव्यकर्मी के लक्षण

उपर्युक्त तीनों श्लोकों दिव्यकर्मी महामानवों के लक्षण बता रहे हैं। जहाँ कामना से मुक्ति मिल गई, वहाँ मानसिक उद्विग्नता का क्या काम । जहाँ कर्ता का व्यक्तिगत अहंकार नहीं होता, वहाँ कामना का रहना असंभव हो जाता है। ऐसी स्थिति में कामना निराहार हो जाती है, क्षीण होकर नष्ट हो जाती है। बाह्मतः मुक्त पुरुष भी दूसरे लोगों की तरह समस्त कर्म करता दिखाई पड़ता है एवं संभवतः वह इन्हें बड़े पैमाने पर और अधिक शक्तिशाली संकल्प एवं वेगवती शक्ति के साथ करता है, क्योंकि उसके साथ भगवत्संकल्प का बल जुड़ा होता है। परंतु इन सभी उपक्रमों में, पुरुषार्थों में कामना से जुड़ी निम्नकोटि की इच्छाओं का अभाव होता है, ‘सर्वे समारंभाः कामसंकल्पवर्जिताः।’ उसको कर्मों के फल के प्रति आसक्ति नहीं होती । फल के लिए कर्म नहीं किया जाता, बल्कि सब कर्मों के स्वामी परमात्मा का एक यंत्र बनकर सारा कर्म किया जाता है। वहाँ कामना-वासना-अहंता के लिए कोई स्थान नहीं होता। चूँकि यथार्थ में कर्मी तो स्वयं भगवान् हैं, मुक्त पुरुष का अंतःकरण और अंतरात्मा कुछ भी नहीं करता (नैव किंचित् करोति)। कर्म करती है वह प्रकृति, वह चिन्मय भगवती जो अंतर्यामी भगवान् के द्वारा नियंत्रित होती है।

शब्दावली कठिन अवश्य है, पर बहुत कठिन नहीं है इन तीन श्लोकों के भाव को समझना। अभी तक चर्चा हुई कर्मों के विषय में । उनके वर्गीकरण व उनके स्वरूप के विषय में। अब यहाँ भगवान् जिस विषय पर चर्चा आरंभ कर रहे हैं, वह है कि ‘कर्मों में पूर्ण पारंगत’ कर्मषुः कौशलम’ वाले दिव्यकर्मी महामानवों को कैसे पहचाना जाए? कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो अंदर से ही अव्यवस्थित होते हैं, अपने कर्मों को विषाक्त बना देते हैं। उनके द्वारा पूरा परिश्रम करते हुए भी अपूर्ण कर्मों का ही संपादन हो पाता है, जबकि अन्य लोग अपनी सुव्यवस्थित आत्मसत्ता एवं इच्छाशक्ति के द्वारा कर्मों में वरदान का स्वरूप दे देते हैं। किसी भी कर्म की महिमा उस कर्म में नहीं, लेकिन कर्ता के हृदय की श्रेष्ठता एवं पवित्रता में ही निहित होती है।

तमाहुः पंडितं बुधाः

ऐसे व्यक्तियों को गीताकार ने पंडित (बुद्धिमान) कहा है, जो बिना व्यक्तिगत कामना के, किसी प्रकार की मानसिक उथल-पुथल के कर्मों को करते रहते हैं। इसका एकमेव कारण यही है कि उनकी सभी वासनाएँ स्वाध्यायजनित समझ और ध्यानजनित अनुभव में अर्थात् ज्ञानाग्नि में दग्ध हो गई हैं, जलकर भस्म हो गई हैं (ज्ञानग्निदग्ध कर्माणं) जो जिस कार्य को हाथ में ले, उसे दिव्यता प्रदान करे, वही सही अर्थों में ज्ञानी है, पंडित है। परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर यही किया। उन्होंने कहा, ‘यह कार्य महाकाल का है। युग के नवनिर्माण की योजना परमसत्ता की है। हमारा संकल्प इनके साथ मिला हुआ है। हम निमित्त मात्र हैं। तुम भी हमारे साथ इस कार्य में जुड़ जाओ।’ यही हुआ । जो जुड़ता चला गया, उसके कर्म दिव्य हो गए। ज्ञान की अग्नि में उसकी वासनाएँ दग्ध होती चली गई।

किसी का संकल्प व्यक्तिगत तब होता है, जब उसके साथ कामना जुड़ी हो। कामना यानि अंधी दौड़-अतृप्ति। अंतर्जगत् में तीव्र हलचल। यह नहीं मिला तो कैसे काम चलेगा? कामना का अर्थ है, अपनी इंद्रियों को तृप्ति मिले, ऐसा प्रयास करना। अपने अंदर से शाँति खोज पाने में असमर्थता। साधक वृति का अभाव। तृप्ति-तुष्टि अपने अंदर खोज पाने में असमर्थता। दूसरों को देख-देखकर पागल हो जाना, अंतहीन कामनाएँ अपने अंदर पाल लेना कामना से जुड़कर कर्म करने वालों की निशानी हैं। किंतु जिनके संकल्प समष्टिगत हैं, जो औरों के दुःख में भागीदार बनते हैं, वे ज्ञानी, दिव्यकर्मी कहलाते हैं, सदैव प्रभु में लीन रहते हैं तथा कभी पापों को प्राप्त नहीं होते। यही व्याख्या दृष्टाँतों के माध्यम से और विस्तार से अगले अंक में।


Quotation

दैवी कृपा के अवतरण के लिए शर्त है-

साधक की पात्रता, पवित्रता और प्रामाणिकता।


गुरुकथामृत-25 - व्यावहारिक जीवन का शिक्षण देती मार्गदर्शक पाती

महापुरुषों की रीति-नीति भी निराली है। वे कभी परोक्षजगत से अपने भक्तों को आश्वासन दे देते हैं, कभी प्रत्यक्ष वचनों द्वारा अभयदान, कभी लेखनी से लेखों वे पत्रों द्वारा संरक्षण-प्रत्यक्ष के समान ही मार्गदर्शन। जीवन में कई प्रकार की समस्याएँ आती है। कई ऐसी होती हैं, जिन्हें हम ओढ़ लेते है। जबर्दस्ती उनके विषय में बार-बार चिंतन कर स्वयं को उद्विग्न बना लेते हैं। सकाम चिंतन करने वाले अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं। ऐसे कई पत्र पूज्यवर के लिखे हमारे पास हैं, जिनमें उनने उदारतापूर्वक अनुदान बाँट है। कई ऐसे हैं जिनमें समझाया है, तर्क की कसौटी पर विवेक का प्रयोग करने को कहा है। किसी को लड़के की चाह थी, किसी को चुनाव में जीतने की तथा किसी को पैसा कमाने की। अनुत्तरित कोई न रहा। सभी को यथासमय मार्गदर्शन भी मिला और समाधान भी।

25/12/53 को मुजफ्फरपुर की मुन्नी देवी को लिखा पत्र यहाँ उनकी एक ऐसी अभिलाषा को संकेत करके लिखा गया है, जो किसी भी नारी की हो सकती है। पूज्यवर लिखते हैं-

‘तुम्हारी इच्छा और अभिलाषा का हमें ध्यान है। जो कुछ प्रयत्न हम से हो सकेगा, सो करने का प्रयत्न करेंगे। पूर्व संचित प्रारब्ध भोगों के कारण इस जन्म में तो क्या आगे के कई जन्मों में भी तुम्हारे लिए संतान का योग नहीं है। बहुत विचार करने पर भी अंधकार ही दिखाई पड़ता है।

तुम कुछ समय श्रद्धा एवं भक्ति-भावना के साथ गायत्री उपासना में संलग्न रहा, ताकि अशुभ-अदृष्ट का निवारण हो सके। धैर्य और श्रद्धापूर्वक साधना मार्ग पर कुछ दिनों तुम्हें लगा रहना पड़ेगा। तभी कुछ सत्य परिणाम होने की आशा है।

गायत्री चालीसा का पाठ तुमने आरंभ कर दिया होगा। एक माला प्रतिदिन ‘यं’ बीज समेत गायत्री की जपा करो।

‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।’ इस प्रकार तुम मंत्र का जप किया करो।

निराश होने की, चिंता करने की कोई बात नहीं है। तुम्हारी मनोव्यवस्था को दूर करने के लिए हम प्रयत्न करेंगे और माता की कृपा हुई तो परिणाम कुछ अच्छा ही होगा। पुनश्चसंभव हो तो दिसंबर (1953) की अखण्ड ज्योति में छपी हुई अनुज्ञान योजना में भाग लेने का प्रयत्न करना गायत्री साहित्य का दान वितरण गौदान की बराबर फलदायक है।’

पूरे पत्र का अवलोकन करें तो दो बातें स्पष्ट होती हैं। अपनी शिष्या के लिए कुछ करने की मन में टीस एवं दूसरी स्पष्ट प्रारब्ध बताते हुए कठोरतापूर्वक विधि का विधान बता देना। परंतु फिर अपनी शिष्या को एक मार्ग सुझाते हैं, साथ ही सेवाधर्म से जुड़ा। ज्ञानयज्ञ का कार्य भी बताते हैं। सत प्रयासों के बाद पात्रता विकसित हुई, मुन्नी देवी इस योग बनीं कि उनके गर्भ में संतान आए एवं विधि का विधान समर्पण भाव ने उलट दिया। गुरु के पत्र की भाषा से वे टूट भी सकती थीं और हो सकता कोई और गुरु कर लेतीं। किंतु बताई गई साधना-आराधना का सुखद परिणाम निकला।

एक पत्र राजनीति से संबंधित है। ये सज्जन चुनाव हार गए थे, निराशा में गुरुवर को पत्र लिखा। परमपूज्य गुरुदेव ने इन सज्जन श्री बद्रीप्रसाद पहाड़िया जी को 3/11/43 को लिखा, ‘आपका पत्र मिला। हार जाने का समाचार ला। बीस-पच्चीस वोट आपको अधिक मिल सकते थे, शायद मिले भी थे। पर चूँकि आपके लिए वह कार्य उपयुक्त न था। आपका जीवन लक्ष्य दूसरा है। एक ही दिशा में मनुष्य की प्रगति ठीक प्रकार हो सकती है, इसलिए कई तरफ पैर फस जाने पर उन्नति रुक जाने का भय रहता है। आपको शेष जीवन में बहुत भारी काम करने हैं। बच्चों को काम से लगाकर आपको गृहस्थ छोड़ना है और जीवन का शेष भाग धर्म-प्रचार में लगाना है। राजनैतिक उलझन आपको इस मार्ग में बढ़ने में कोई सहायता न पहुँचाती। इसलिए आपके जीते हुए वोट शुमार में कम बैठे। माता की ऐसी ही इच्छा थी। आशा है, आप इसे अपनी असफलता नहीं सफलता मानेंगे।’

कितना बढ़िया स्पष्टीकरण है हारने का। यदि ये हारते नहीं तो इन्हें बोध नहीं होता कि गुरुसत्ता ने कितना बड़ा कार्य उनके लिए उनके संस्कारों-पात्रता के अनुरूप सँजोकर रखा है। दोनों की जोड़ी ठीक बनी। यह संबंध 1993 तक चला। जब पहाड़िया जी ने निरंतर चौबीस वर्ष शाँतिकुँज के निर्माण से आगे तक साथ रह यहीं शरीर छोड़ा। आखिरी समय तक फिर वे भगवान् के ही काम में लगे रहे।

इसी तरह का एक पत्र श्री बी एल. गुप्ता जी को लिखा यहाँ उद्धृत है। वे सरकारी मशीनरी के कार्य करने की शैली से क्षुब्ध थे। ध्यान रहे जब यह पत्र लिखा गया, आजादी को मात्र दस वर्ष हुए थे। पर परमपूज्य गुरुदेव ने अपने शिष्य को कितना मार्मिक मार्गदर्शन दिया है, यह देखें। 2/5/56 को श्री गुप्ता जी को लिखे पत्र में वे लिखते हैं।

सरकारी मशीन आपके ही क्षेत्र में नहीं, संपूर्ण देश में बुरी तरह भ्रष्ट हो रही है। चेचक की एक फुंसी पर पट्टी बाँधने से कुछ समस्या हल होने वाली नहीं है, काँग्रेस में यह साहस दीखता नहीं कि इस कोढ़ी मशीनरी को शुद्ध करे या संक्रामक रोगियों की तरह इन्हें हटा दे। उसके तो आधार यही लोग बने हुए हैं। ऐसी दशा में जनक्राँति ही एकमात्र तरीका दीखता है, जो उस तंत्र का नए सिरे से निर्माण करे। संभव है कम्यूनिस्ट इस कार्य को पूरा करें। आज जो कुछ हो रहा है, उसकी 3-4 घटनाएँ आपने लिखी, पर यह तो एक व्यापक गतिविधि का छोटा-सा दृश्य मात्र है।

आप बहुत भावुकता में न बहें। आप कुछ सुधार न कर सकेंगे। हाथ-पैर पीटेंगे, तो खुद ही जोखिम उठाएँगे। इसलिए समय की प्रतीक्षा करें। जितना आसान हो उतना ही करें।

काम करने का समय कुछ दिन बाद आएगा। अभी अपनी स्थिति बचाए रहना ही पर्याप्त है। आप वकालत भी चालू रखें। बेवक्त के लिए दो पैसे पीछे पड़े रहें, ऐसा प्रयत्न करें। जनता की सच्ची सेवा करने में अभी तो सरकारी तंत्र सहायक नहीं, बाधक ही है। आप किसी प्रकार काम चलाते रहने की नीति ही अभी रखें। समयानुसार ही ठोस कार्य संभव होगा।

गुप्ताजी ने जो स्थिति लिखी, मनोव्यथा बयान की, वह किसी भी आदर्श देशभक्त व्यक्ति की हो सकती है। सरकारी कार्य में भ्रष्टाचार, मात्र दस वर्षों में ही स्वप्नों का टूट जाना, बड़े व्यापक स्तर पर अराजकता उन्हें चुभ रही थी तो उन्होंने लिख भेजा। जवाब जो मिला, वह आपके समक्ष है। गुरुदेव प्रत्यक्ष लिख रहे हैं मई 1958 में कि जनक्राँति ही एकमात्र तरीका है। इस तंत्र का नए से से निर्माण करना होगा। भावुकता में बहने से काम न चलेगा। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। समय की प्रतीक्षा करना। अवसर आने पर (कुछ दिन बाद समय आएगा। चुस्ती से जुटना ही इस समय का युगधर्म है, यह योगेश्वर श्रीकृष्ण के रूप में वे अपने शिष्य को समझा रहे हैं। बड़ी व्यावहारिक सलाह भी दी है कि अभी तो बेवक्त के लिए कुछ पैसे एकत्र कर लें, सरकारी तंत्र से लड़ने की न सोचें। यह मार्गदर्शन सच्चे मित्र से अधिक और कौन दे सकता है। गुरु से बड़ा कोई सच्चा मित्र हो भी नहीं सकता।

एक और पत्र श्री सुमंत कुमार मिश्र को लिखा गया है, जिसे पूज्यवर ने सूत्र रूप में लिखा है। देखें, इस 16-22-1949 के लिखे पत्र को बावन वर्ष बाद की समयावधि में। हमारे आत्मस्वरूप,

इन दिनों कन्या के विवाह (गुरुदेव की बड़ी पुत्री दयावती) में अत्यधिक व्यस्त होने से आपके पत्र का संक्षिप्त उत्तर दे रहा हूँ।

आप उत्तेजना एवं भावुकता के सहारे जीवन के प्रश्नों को हल करने का प्रयत्न न करें। जीवन एक बड़ी नीरस एवं कठोर सचाई है। आप बुद्धिमानी, व्यवहारकुशलता एवं दूरदर्शिता के आधार पर भावी जीवन का सुव्यवस्थित क्रम बनाएँ।

पुस्तकालय साधारण रीति से चलने दें। वह वटवृक्ष की भाँति आयु के अनुसार बढ़ेगा और फलेगा-फूलेगा।

पैसा कमाना कोई गुनाह नहीं है । वह दैनिक जीवन की कठोर आवश्यकता है। आप शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक सभी उन्नतियों की बात सोचा करें।

शिक्षा को बीच में लटकता छोड़ बैठना उचित न होगा। जब इतना पढ़े ही हैं, तो बोर्ड का सरकारी प्रमाण-पत्र प्राप्त करने तक उसे पूरा ही कर लीजिए। बाद में जो शिक्षा या कार्यप्रणाली उपयोगी हो, उसे अपना लें।

घरवालों से जितना कम विरोध लेकर आप चलेंगे, उतनी ही आपको सुगमता रहेगी।

मथुरा आपका घर है, कभी भी आ सकते हैं, पर अधिक लोगों को साथ लाने की अपेक्षा अकेले या एकाध साथी सहित आना आपके हित में रहेगा।

दार्शनिक, विवेचनात्मक प्रश्नों का हल पत्र-व्यवहार में नहीं हो सकता। इसके लिए हमारा साहित्य पढ़ना या प्रत्यक्ष वार्तालाप करना ही मार्ग है।

आशा है कि आप सकुशल होंगे।

श्रीराम शर्मा आचार्य

पूरे पत्र को सभी पाठक पढ़ें व देखें कि इसमें उनके कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर हैं कि नहीं। जीवन क्या है, कैसे जीना चाहिए, शिक्षा क्यों जरूरी है? व्यावहारिक जगत् में घरवालों के साथ कैसे दिल मिलकर रहें, यह सारी जिज्ञासाएँ सूत्र रूप में एक लंबे पत्र के छोटे उत्तर के रूप में लिख दी गई हैं। यही पत्राचार की शैली तो है, जिसने लाखों को गुरुवर के स्नेह-सूत्रों में आबद्ध, उनसे जुड़े रहने को विवश कर दिया। काश। हम भी कुछ प्रेरणा लेते इन पत्रों से।


अपनों से अपनी बात - हीरक जयंती वर्ष की हमारी साधना और सेवा-आराधना

साधना धुरी बने रचनात्मक आँदोलनों की

परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 में आरंभ किए गए साधनाक्रम को चलते हुए 85 वर्ष पूरे हो गए। वर्ष 51-52 में रजत जयंती वर्ष 86-88 में स्वर्ण जयंती वर्ष मनाए गए एवं इस वर्ष हीरक जयंती (2001-2002) मनाई जा रही है। सभी जानते है। सभी जानते हैं कि अखण्ड दीपक के प्रज्वलन तथा अपनी गुरुसत्ता से वसंत पर्व 1926 की पावन वेला में हुए साक्षात्कार से साधना प्रधान इस गायत्री पर्व का शुभारंभ माना जाता है। यह एक महान् पुरुषार्थ है, जो करोड़ों साधकों ने अपनी आराध्य सत्ता के पदचिह्नों पर चलकर पूरा किया है। जनवरी 1986 में जब परमपूज्य गुरुदेव ने स्वर्ण जयंती वर्ष की विशेष साधना आरंभ कराई, तो इसमें सम्मिलित होने के लिए सभी ‘अखण्ड ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड ज्योति’ की ‘अपनों से अपनी बात’ में पूज्यवर लिखते हैं, ‘हीरक जयंती का समय आने तक हम नए शरीर से कहीं और भी अधिक महत्वपूर्ण नई भूमिका संपादित कर रहे होंगे। अस्तु उसकी प्रतीक्षा व्यर्थ है। सोचा गया कि क्यों न अगले वर्ष को साधना स्वर्ण जयंती वर्ष मना लिया जाए। (पृष्ठ 82) आगे वे लिखते हैं, ‘समय आने पर हमारे उत्तराधिकारी हीरक जयंती एवं शताब्दी भी मनाएँगे, पर तब हम दोनों की सूक्ष्म व कारण सत्ता ही सक्रिय होगी।’

प्रस्तुत वर्ष विशेष

हम सभी इस वर्ष प्रखर प्रज्ञारूपी सतत प्रज्वलित अखण्ड अग्नि के रूप में पहले अखण्ड ज्योति संस्थान एवं फिर शाँतिकुँज हरिद्वार में स्थापित’ अखण्ड दीपक के 85 वर्ष पूरे होने पर हीरक जयंती की विशिष्ट साधना का क्रम बना रहे हैं। साधना आँदोलन को गति दे रहे हैं एवं प्रत्येक को इस अभियान से जुड़कर परिष्कृत व्यक्तित्वसंपन्न इक्कीसवीं सदी की जिम्मेदारी सँभालने योग्य महामानव बनने का आमंत्रण दे रहे हैं। सभी क्रियाप्रधान कार्यक्रम इसी साधना की धुरी पर चलते रहे हैं, इस वर्ष से गति पकड़कर 2011-2012 तक परमपूज्य गुरुदेव की जन्म शताब्दी के वर्ष तक और तीव्रता से चलते रहेंगे।

हीरक जयंती की इस साधनावर्ष की एक और विशेषता है, युगचेतना के अभ्युदय की हीरक जयंती भी इस वर्ष होना। श्री अरविंद ने जिसे भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष कहा था, वह भी 1926 ही था। अब वह भागवत् चेतना पूर्णतः सक्रिय हो भागवत मुहूर्त में प्रवेश कर चुकी है एवं अवतरण की, प्रज्ञावतरण के प्रकटीकरण की वेला आ चुकी है। इस उपलक्ष्य में युगचेतना की प्रतीत लाल मशाल के चित्र की घर-घर स्थापना का आँदोलन चलाया जा रहा है। तीसरी विशेषता इस हीरक जयंती के विशिष्ट साधना वर्ष की और है, वह है इस मिशन की सहसंस्थापिका, सहसंरक्षिका माता भगवती देवी के जन्म की भी हीरक जयंती होना। उन्होंने भी 1926 की आश्विर कृष्ण चतुर्थी (बीस सितंबर) को जन्म लिया था एवं 28 वर्ष बाद ही उनकी सत्ता अपनी आराध्य सत्ता से एकाकार हो सजल श्रद्धा रूप से जुड़कर युग्म का निर्माण कर चुकी थी। प्रखर प्रज्ञा के प्रतीक पूज्य गुरुवर एवं सजल श्रद्धा की प्रतीक शक्तिस्वरूपा माता जी को ही वह विराट् संगठन खड़ा करना था, जो आज एक वटवृक्ष के रूप में पुष्पित-पल्लवित होता लाखों-करोड़ों की आशाओं के केंद्रबिंदु के रूप में देखा जा रहा है।

स्वर्ण जयंती साधना वर्ष की झलकियाँ

स्वर्ण जयंती साधना वर्ष जो 5 फरवरी 1986 से आरंभ होकर 24 जनवरी 1988 तक चला, कई विशेषताएँ अपने में लिए था। इसमें एक लाख नैष्ठिक साधकों को उपयुक्त मार्गदर्शन द्वारा एक अभियान के रूप में शक्तिधाराओं के प्रवाह से जोड़ा गया। साधना तो प्रतिदिन 85 मिनट की ही थी, साथ ही प्रातः 25 मिनट आत्मबोध चिंतन की व रात्रि सोते समय 15 मिनट तत्व-बोध-मनन की साधना भी सम्मिलित थी। इस साधना में प्रत्येक साधक द्वारा प्रतिदिन 600 गायत्री मंत्र जपने का प्रावधान रखा गया था। उपासना क्रम को छह भागों में विभाजित किया गया था, आत्मशोधन के लिए षट्कर्म, प्रतीक पूजा उपचार, सोऽहम्, प्राणयोग, गायत्री जप और ध्यान, खेचरी मुद्रा तथा सूर्यार्घ्य दान। प्रत्येक का महत्व विस्तार से सात पृष्ठ के संपादकीय द्वारा समझाया गया था। एक लाख साधकों द्वारा पूज्यवर ने प्रतिदिन छह करोड़ प्रतिदिन की साधना संपन्न कराई। इनके साथ-साथ सभी से दोनों नवरात्रियाँ संपन्न करने हेतु आग्रह किया। उन्होंने अनुमान लगाया कि यदि न्यूनतम एक हजार भी व्यक्ति निकल आते हैं, तो इस साधना स्वर्ण जयंती वर्ष में चौबीस सौ करोड़ का जप संपन्न होगा। यह हुआ और बड़ी सफलता के साथ पूरा हुआ।

इस वर्ष में एक और विशेषता थी-वह यह कि साधना प्रशिक्षण हेतु मंडलियों का गठन एवं उनके चार-चार दिवसीय साधना सत्र सारे भारत में स्थान-स्थान पर आयोजित किया जाना। ऐसे प्रशिक्षण लेने वाले साधकों को अनुसाधक कहा गया । शाँतिकुँज में जो प्रतिबंध थे, वे क्षीण कर दिए गए एवं सभी को मौका दिया गया, ताकि इस महत्वपूर्ण आँदोलनों में केंद्रीय प्रतिनिधियों द्वारा संचालित शिक्षण सत्रों में सभी भाग ले सकें। ऐसा हुआ, वर्षभर चला और ढेरों व्यक्ति नए जुड़े, जो आज मिशन की कमान सँभाले अपने क्षेत्र में दिखाई देते हैं। इस साधना वर्ष में इस प्रशिक्षण शृंखला से प्रतिदिन चौबीस करोड़ गायत्री जप संपन्न करने की प्रक्रिया चल पड़ी। यह क्रम सितंबर तक चला। सितंबर 1986 में पूज्यवर ने लिखा, ‘भौतिक संपत्ति द्वारा मिलने वाले सुविधा-साधनों से सभी परिचित हैं। अस्तु, उसके उपार्जन में सहज ही सबकी रुचि रहती है। कदाचित् ऐसा ही परिचय आत्मिक विभूतियों से भी रहा होता और उनके द्वारा मिलने वाले सत्परिणामों को समझा गया होता, तो प्रतीत होता कि इस प्रयोजन के लिए किया गया श्रम कितना अधिक उपयोगी है। इस प्रयास से व्यक्तित्व के सर्वतोमुखी विकास की जो पृष्ठभूमि बनती है, उसे भूतकालीन सच्चे अध्यात्मवादियों की उपलब्धियों का पर्यवेक्षण करने वाला सहज ही समझ सकता है। अनादिकाल से चले आ रहे प्रकृति के मौलिक सिद्धांत अनंत काल तक चलते रहते हैं। साधना और सिद्धि का समन्वय भी ऐसा ही एक अकाट्य सिद्धांत है। उसकी सचाई समझने का मौका इस स्वर्ण जयंती साधना के सदस्यों को अवश्य मिला है, मिलेगा, ऐसी आशा करने में कोई अतिवाद नहीं है।’ (पृष्ठ 62)

साधना शृंखला चली और ढेरों साधक जुड़े। यह श्रम किस निमित्त किया गया, यह उपर्युक्त पंक्तियों में गुरुसत्ता ने समझाया। इसी वर्ष उन्होंने साधकों के सामूहिक सम्मेलन भी रखे एवं दो दिवसीय आयोजनों द्वारा पूरा भारत साधनामय बना दिया गया। साथ ही अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर 1986 में दस-दस दिवसीय साधना सत्रों में विशिष्ट साधकों को आमंत्रित किया गया। स्थान की कमी को गुरुवर ने अनुभव किया। वे लिखते हैं, ‘अब एक नया शाँतिकुँज बनाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। वर्तमान इमारत को नारी प्रशिक्षण के लिए सुरक्षित करना पड़ेगा और पुरुष शिविरार्थियों के लिए दूसरे आश्रम का निर्माण होगा। इस निर्माण को साधना स्वर्ण जयंती वर्ष का चिरस्थाई स्मारक कहा जा सकेगा। ‘(पृष्ठ 65) आज जो भी कुछ विस्तार गायत्री नगर का परिजन देख रहे हैं, वह उसी नए शाँतिकुँज के संकल्प की ही परिणति है।

हीरक जयंती में अभियान साधना गति पकड़े

साधना स्वर्ण जयंती वर्ष के बारे में विस्तार से इसलिए पाठकों को बताया गया, ताकि वे पच्चीस वर्ष पूर्व की मिशन की स्थिति को, आँदोलन की तीव्रता को और गुरुसत्ता की टीस को समझ सकें। अब यह हीरक जयंती वर्ष इस वर्ष की अभियान साधना से तीव्र वेग लेकर आरंभ हुआ है। सभी आँदोलनों-रचनात्मक कार्यक्रमों की धुरी परमपूज्य गुरुदेव वे साधना को ही बताया है । व्यक्तित्व का परिष्कार करने, मनःस्थिति को उदात्त बनाने एवं इक्कीसवीं सदी की महती जिम्मेदारियाँ सँभालने के लिए हर कार्यकर्ता को एक श्रेष्ठ साधक बनना होगा। अभियान साधना के विषय में विस्तार से विगत दो अंकों में विवेचन किया गया है। यह एक वर्ष में पाँच लाख गायत्री जप की साधना है, जिसका विवरण गायत्री महाविज्ञान भाग दो में आया है। इसमें कोई विशिष्ट नियम-उपनियम नहीं है। इसे गायत्री जयंती या गुरुपूर्णिमा से आरंभ कर दिया गया है। अब तक न किया गया हो तो अब कभी भी, किसी भी पूर्णिमा या एकादशी से आरंभ कर सकते हैं। इसमें माह की दोनों एकादशियों में चौबीस माला अतिरिक्त करनी है। साधारण दिनों में प्रतिदिन 10 मालाएँ करनी है, जिनमें एक घंटा लगता है। वर्ष में तीन नवरात्रियाँ मनानी हैं। तीसरी नवरात्रि ज्येष्ठ शुक्ल 1 से 9 वाली नवरात्रि से समापन किया जा सकता है या जहाँ से आरंभ किया है, वहाँ से वर्षभर चलाई जा सकती है। प्रति रवार 15 माला करनी है। अंतिम दिन 24 मालाओं द्वारा पूर्णाहुति करनी है। दोनों एकादशियों, तीनों नवरात्रियों एवं प्रत्येक बृहस्पतिवारों में विशिष्ट तप−तितिक्षा, हलका उपवास रखना है। यह सरल साधना हर कोई कर सकता है व नियमपूर्वक निभा सकता है।

हीरक जयंती वर्ष में साधना आँदोलन ने सारे भारत व विश्व में गति पकड़ी है। अभियान साधना उस गति को और नए आयाम देगी। साथ ही पाँच दिवसीय साधना प्रशिक्षण सत्र भी विभिन्न शक्तिपीठों पर आयोजित किए जा रहे हैं। ये वर्षभर चलते रहेंगे। जहाँ साधना प्रशिक्षण हो चुके, ऐसे शक्तिपीठ वर्षभर अपने यहाँ जीवन-साधना का विधिवत् प्रशिक्षण देते रहेंगे। उस तरह यदि 2000 शक्तिपीठों में यह क्रम चल पड़ा, तो यह वर्ष एक कीर्तिमान स्थापित करेगा। इसके साथ ही शाँतिकुँज में भी आश्विन नवरात्रि 2002 से चैन नवरात्रि 2002 तक (26 अक्टूबर से 13 अप्रैल) की अवधि में विशेष पाँच दिवसीय प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के सत्र चलाए जाएँगे। प्रयास किया जा रहा है कि सीमित साधकों को एकाँत, चिंतन,विशिष्ट साधना एवं पूज्यवर के साहित्य तथा कैसेट्स द्वारा उनके अमृत वचनों का सान्निध्य मिले, ऐसी कुछ व्यवस्था बने। विशिष्ट कक्ष बन चुके हैं, पर सामान्य आने-जाने वाले ही इतने हैं कि अभी अक्टूबर तक इनकी संख्या कम होने का प्रश्न नहीं उठता । इसीलिए यह क्रम इन कक्षों में 82 साधकों से व यदि कक्ष को दो में विभाजित करना संभव हो सका, तो 244 साधकों से शुरुआत संभवतः हो सकेगी।

साधना एक आँदोलन बने

इसके साथ-साथ साधना, जीवन-साधना का रूप लेकर विभिन्न रूपों में, विभिन्न समूहों में साप्ताहिक, पाक्षिक जिस भी रूप में अन्याय संगठनों, पंथों-संप्रदायों में संपन्न हो सके, इसका प्रयास किया जाना चाहिए। हमने 3 सितंबर 1999 को पीड़ा निवारण दिवस के रूप में एक सामूहिक प्रयोग किया, वह सफल रहा । फिर वह 20 फरवरी 2000 को दुहराया गा तथा पुनः 3 सितंबर को भी संपन्न किया गया। हर वर्ष तो यह क्रम चलता रहेगा, पर सबके लिए सद्बुद्धि, सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना यदि प्रति सप्ताह में बीस-तीस के समूह में होती रहे व उसके क्रियापक्ष पर भी विचार-विनिमय का क्रम चलता रहे, तो पारस्परिक सौहार्द्र बढ़ेगा। गायत्री अभियान सारे भारत व विश्व में फैल जाएगा।

समग्र विकास हेतु सेवाप्रधान छह कार्यक्रम

अब बारी आती है सेवाप्रधान उन आँदोलनों की, जिन्हें इस वर्ष गति दी गई है। सभी जानते हैं कि साधना आँदोलन के अतिरिक्त ये हैं- (1) शिक्षा आँदोलन (2) स्वास्थ्य आँदोलन (3) स्वावलंबन (4) पर्यावरण जागरण-हरीतिमा संवर्द्धन (5) नारी जागरण (6) कुरीति उन्मूलन, व्यसन मुक्ति आँदोलन। साधना तभी कारगर होती है, जब व्यावहारिक सेवापक्ष उससे जुड़ा हो। साधना जब तक समष्टि पर, कार्यक्षेत्र में आरोपित नहीं होती वह साधक को मात्र अंतः के परिष्कार -उत्थान से आगे जीवन-मुक्ति, उदार परमार्थ वृति का अभ्यास नहीं सिखा पाती। इसीलिए सातों आँदोलनों में से एक साधना एवं एक कोई भी सेवा प्रधान आँदोलन स्वाध्याय के साथ हाथ में लेने को कहा गया है, ताकि कार्यकर्ताओं का समग्र विकास हो सके।

एक साथ सातों आँदोलन लेंगे, तो एक भी नहीं सधेगा। जैसी परिस्थितियाँ हों, जैसा अपने आसपास का परिकर हो, वैसी ही मन में धारण रख समूह बनाकर आँदोलन हाथ में लेकर स्वयं को गतिशील करना चाहिए। कोई जल्दी नहीं है कि हमें 19 फरवरी वसंत पर्व तक सातों आरंभ कर देने हैं। थोड़ी-थोड़ी सबकी अधूरी शुरुआत करने के स्थान पर केंद्र से परामर्श कर कुछ को पूर्णता तक पहुँचाना ज्यादा समझदारी का काम है। इसलिए 2002 के अंत तक का ‘टारगेट’ लेकर आँदोलनों को गति दी जानी चाहिए।

(1) शिक्षा आँदोलन के अंतर्गत अशिक्षा का कलंक मिटाने हेतु हम सभी को तत्पर होना चाहिए। हर पढ़े-लिखे को कम-से-कम दस साक्षर बनाकर विद्याऋण चुकाना है। सरकारी योजनाएँ, साक्षरता मिशन तो असफल हो गए। राष्ट्र को पूर्णतः शिक्षित, जागरुक मात्र स्वैच्छिक-पारमार्थिक वृति के संगठन ही बना सकते हैं। इसके अतिरिक्त कई प्रारंभिक शिक्षा लेकर बीच में छोड़ देते हैं। उनकी अनवरत अनौपचारिक शिक्षा का क्रम कैसे चले, यह भी हमारे सभी कार्यकर्ताओं को सोचना चाहिए। एक-डेढ़ घंटे के टय़ूरोरियल्स यदि सभी केंद्रों, प्रज्ञा मंडलों, 3-4 समूहों, शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों पर चल पड़ें, तो ऐसी अनेक प्रतिभाएँ उभर सकेंगी, जो साधनों के अभाव में पढ़ नहीं पाते। हमें अनौपचारिक स्वावलंबन प्रधान शिक्षण ही देना है, साक्षर डिग्रीधारी ब्रह्मराक्षसों की फौज नहीं खड़ी करनी। इनके साथ-साथ कामकाजी विद्यालयों (रोजमर्रा की जानकारी वाले) का संचालन, संस्कृति मंडलों की स्थापनाएँ एवं बाल-संस्कारशालाओं का क्रम आरंभ किया जा सकता है।

(2) स्वास्थ्य आँदोलन के अंतर्गत अहार-विहार, रहन-सहन, सफाई, व्यायाम-योग आदि के प्रशिक्षण का क्रम चलना चाहिए, रोग होने ही नहीं पाए, ऐसा शिक्षण देने वाले स्वास्थ्य संरक्षकों के निर्माण का क्रम चले। आधुनिकता के विकास के साथ शारीरिक रोग भी बढ़े हैं, मनोशारीरिक भी। इनका निदान कैसे हो एवं सामान्य वनौषधियों से कैसे हम नीरोग रह सकते हैं, यह शिक्षण जन-जन को दिया जाना चाहिए। आयुर्वेद की विज्ञानसम्मत ‘शोध एवं विकास’ स्तर पर प्रतिष्ठा करने का शाँतिकुँज का अभिनव प्रयास इस वर्ष विश्वविद्यालय के माध्यम से गतिशील हो रहा है। इसे पूरा होते-होते 2003 की शुरुआत हो जाएगी। फिर भी हमें अपने इस आँदोलन को निरंतर गतिशील बनाए रखना है। गाँवों में सफाई, स्वास्थ्य शिविर एवं जागरुकता पैदा करने का अभियान चल सकता है, साथ ही घरेलू मसाला-वाटिका एवं कुछ वनौषधियों के रोपण का क्रम हर व्यक्ति कर सकता है। गमलों में स्वास्थ्य कैसे संभव है, इसका प्रशिक्षण भी लिया जा सकता है। आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि से मनोविकारों व जटिल रोगों की चिकित्सा कराई जा सकती है। संतुलित आहार, व्यायाम, प्रज्ञायोग की चित्रप्रधान प्रदर्शनी से लोकशिक्षण भी किया जा सकता है।

(3) स्वावलंबन आँदोलन के अंतर्गत ‘गाँव की ओर वापस लौटो’ अभियान को मूल केंद्र में रखकर कार्य किया जा रहा है। गाँव स्वावलंबी व आकर्षक बनें, इसके लिए गौलापन को धुरी बनाया जाए। गौ आधारित प्रदूषणरहित सस्ता खाद, गोमूत्र के रूप में कीटनाशक, पौष्टिक दुग्ध, गोबर-गोमूत्र से बनने वाली दवाओं सहित कितने ही प्रकार से कुटीर उत्पाद बनाए जा सकते हैं। इसी प्रकार लघु उद्योगों के प्रशिक्षण का क्रम शाँतिकुँज में बनाया गया है, जो हर व्यक्ति को काम दे सकता है। सहकारी आधार पर ऐसे कितने ही पारमार्थिक प्रकल्प खड़े किए जा सकते हैं, जो स्वावलंबन को मजबूती दे सकते हैं। जड़ी-बूटियों की खेती, मिल-जुलकर किए गए कृषि उत्पादन से भी बेरोजगारी उन्मूलन में मदद मिल सकती है। ग्राम तीर्थ योजना को गति दी जाए।

(4) पर्यावरण आंदोलन में हरीतिमा संवर्द्धन, डिस्पोजिबल कल्चर से परहेज, प्रदूषणकारी उद्योगों को हटाकर कुटीर उद्योगों को लगाना, डीजल-पेट्रोल का सीमित उपयोग, पशु ऊर्जा का अधिकाधिक उपयोग, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का दोहन, ऊर्जा संरक्षण के प्रयोग तथा कचरे की सुव्यवस्था को ठोस कार्यक्रम का रूप देकर गति दी जा सकती है। पूर्वजों-प्रियजनों की स्मृति में, श्रावणी व जन्म दिवस आदि पर वृक्षारोपण के संकल्प हों व निभाए जाएँ। प्रत्येक ग्राम तीर्थ में अपना वन हो, जिसकी रक्षा सभी मिलकर करें। पर्यावरण वाहिनियाँ बनें, युवाशक्ति की भागीदारी बढ़े। सूक्ष्म प्रकृति के परिशोधन हेतु आध्यात्मिक प्रयोग चलते रहें।

(5) नारी जागरण आँदोलन में नारी स्वच्छंदता नहीं, नारी शक्ति जागरण गायत्री परिवार की अवधारण है। उसकी प्रसुप्त क्षमता को जगाया जाए व हर क्षेत्र में उसे नेतृत्व दिया जाए। नारी स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वावलंबन, संस्कार एवं सम्मान के पाँचों पक्षों पर समुचित ध्यान दिया जाए। प्रजनन के अनावश्यक भार से मुक्ति, नियमित दिनचर्या आहार-विहार पर ध्यान देने से नारी का स्वास्थ्य ठीक रह सकेगा। सभी को शिक्षा के समान अवसर मिलें। उनके लिए पुस्तकालय हों। व्यक्तित्व के विकास की शिक्षण प्रक्रिया गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले पाठशालाएँ चलें। कुटीर उद्योग सिखाकर नारी को स्वावलंबी बनाया जा सकता है। अर्थोपार्जन की क्षमता होगी तो नारी किसी से दबेगी नहीं । नारीशक्ति के स्वयंसेवी वचन समूह बनें व सहकारी आधार पर उनकी व्यवस्था बने। माता ही बच्चों को संस्कार देती है। जीवन-विद्या की कला में पारंगत नारी सुसंस्कारी धर्मप्रधान माता परिवार को भी श्रेष्ठ बनाती है। धर्मतंत्र से लोकशिक्षण के क्रम में भी नारी को अग्रणी भूमिका निभाने दी जाए। सम्मान नारी को भी मिले एवं नारी संगठनों को भी, ताकि समाज की अधूरी प्रगति पूर्णता का रूप ले। गायत्री परिवार इस दिशा में महती भूमिका निभा सकता है।

(6) व्यसन मुक्ति-कुरीति उन्मूलन आँदोलन में सूत्र है- साधनों को व्यसन से बचाएँ, सृजन में लगाएँ। सभी जानते है कि तंबाकू, गुटका, पानमसाला, शराब, उत्तेजक सॉफ्ट ड्रिंक्स एवं नशीली दवाओं से स्वास्थ्य का, अर्थ-संपदा का कितना नुकसान होता है। शराब सबसे अधिक हानि पहुँचाती है जब उसके कारण नारी उत्पीड़न भी होता है व सामाजिक हिंसा भी बढ़ती है। इन सब के विरुद्ध एक वातावरण बने, प्रभात फ रियाँ निकले, प्रदर्शनियोँ का आयोजन हो, विद्यार्थी वर्ग व शिक्षक वर्ग को साथ लेकर जागरुकता अभियान छेड़ा जाए, तो वातावरण बन सकता है। सामाजिक कुरीतियाँ आज भी नेग, देहे, अपव्यय भरी शादियों, मृतक भोज, फैशन, फिजूलखरची के रूप में पनप रही हैं, इनसे तथा राजतंत्र के स्तर पर भ्रष्टाचार से जन-जन को अवगत करा जागरुकता पैदा करना हर नागरिक का कर्तव्य है। दीवाल लेखन सभाएँ, नाटक, वीडियो, धार्मिक आयोजनों में संकल्प द्वारा इन सभी संघर्षात्मक आँदोलनों को गति दी जा सकती है। इसमें युवाशक्ति एवं नारीशक्ति की बड़ी जिम्मेदारी भरी भूमिका हो सकती है।

(7) साधना और आराधना, व्यक्तित्व परिष्कार और सेवाधर्म के प्रयोगों से भरी है हमारी यह हीरक जयंती एवं उसकी आगामी डेढ़ वर्ष की हमारी क्रियापद्धति। यह अवधि हम सबके लिए कठोर आत्मनिरीक्षण की है। अपने क्रियाकलाप को कठोर समीक्षापूर्वक हम सभी परखें और जहाँ जो छिद्र दिखाई पड़ें, उन्हें साहसपूर्वक रोकने के लिए जुट जाएँ। लोकसेवा हमारा व्रत बने, जनकल्याण के लिए किए गए प्रयत्नों में जीवन की सार्थकता अनुभव करें। बड़ा आदम नहीं, महामानव बनने में हमारी आकाँक्षा-अभिलाषा केंद्रित हो सके, तो श्रावणी महापर्व की वेला में हीरक जयंती वर्ष के इस मोड़ पर हम अपनी गुरुसत्ता को सही मायने में आश्वासन दे पाएँगे कि उनके बताए मार्ग पर ‘मानव में देवत्व लाने धरती पर स्वर्ग उतारने’ हेतु सक्षम युगसैनिक अब पूरी तरह तैयार हैं।


संगठन की याचना


संगठन की याचना (kavita)

हे तपोनिष्ठ । हे वेद की मूर्ति। अब शक्ति दो, संगठन यह सघन हो सके, आपने बीज बोए यहाँ जो, प्रभो। उनका, अब अंकुरण-पल्लवन हो सके।

व्यक्ति हो तुम नहीं, चेतना-शक्ति हो, आदमी में परिष्कार की वृति हो, अब सभी को समझ आ रहा सत्य यह, अब इसी भाव का जागरण हो सके।

सत्य है यह, कि हर ओर विध्वंस है, लग रहा, ज्यों निरंकुश असुर-वंश है, प्रेरणा दो, महानाश के इन सभी खंडहरों पर सतत नव सृजन हो सके।

पूज्यवर। आपसे जो इशारा मिला, सप्त आँदोलनों का सहारा मिला, व्यक्ति में हो सके दिव्यता का उदय, भूमि पर स्वर्ग का अवतरण हो सके।

विश्वविद्यालयी ज्ञान की धार से, मिट सके मूढ़ता, रूढ़ि संसार से, देव संस्कृति बने विश्व संस्कृति यहाँ, शुद्ध संपूर्ण वातावरण हो सके।

विश्व भर के मनीषी यहाँ आएँगे, ज्ञान से, श्रेष्ठ जीवन-दिशा पाएँगे, हो सके देव संस्कृति धरा पर मुखर, आसुरी शक्ति का यूँ क्षरण हो सके।

हे प्रभो। आपका प्राण-बल पा सकें, कार्य में आपके तीव्र गति ला सकें, ताकि अंशज हरेक, आपके सूर्य की काँति से जगमगाती किरण हो सके। शक्ति दो, संगठन यह सघन हो सके।

− शचीन्द्र भटनागर

*समाप्त*