परिवर्तन सुनिश्चित है


परिधि से केन्द्र की ओर

देह परिधि है और आत्मा अपने अस्तित्व का केन्द्र। परिधि से केन्द्र की ओर यात्रा करने से ही आध्यात्मिक विकास सुनिश्चित होता है। जो इस सच से अनजान हैं, वे सारे जीवन परिधि पर ही टिके रहते हैं। ऐसे आत्म विमुख लोगों के लिए देह और उससे जुड़े वैभव-भोग ही जीवन का सब कुछ बन जाते हैं। साँसारिक पद-प्रतिष्ठ के भ्रम एवं झूठे मान-यश के अंधेरों की चाहत ही उनकी चेतना को हर पल घेरे रहती है।

लेकिन ज्यों ही आत्म चेतना परिधि से केन्द्र की ओर मुड़ती है आध्यात्मिक-अन्तर्यात्रा प्रारम्भ हो जाती है। आत्मजिज्ञासा की पहली प्रकाश किरण का उजियारा जीवन में प्रवेश कर जाता है। परन्तु परिधि से केन्द्र की ओर इस यात्रा की शुरुआत कैसे हो? गिरीशचन्द्र घोष ने अपने सद्गुरु श्री रामकृष्ण देव से एक समय यही सवाल पूछा था।

उत्तर में परमहंस देव ने मुस्कराते हुए गिरीश बाबू को बड़ी ही ममता से छू लिया। परमहंस देव के इस अलौकिक स्पर्श से गिरीश बाबू रोमाँचित हो उठे। वह कुछ बोल पाते, इससे पहले श्री रामकृष्ण देव ने उनसे कहा- ध्यान के समय, निद्रा की गोद में जाते समय मन ही मन मेरे इस स्पर्श को बड़ी ही प्रगाढ़ता से अनुभव करना। और सोचना तेरी चेतना, तेरा समूचा अस्तित्व मुझमें, मेरी चेतना में विलीन हो रहा है।

बात छोटी सी है, परन्तु अभ्यास करने वाले के लिए इसके परिणाम बहुत बड़े हैं। क्योंकि मन ही मन सद्गुरु के स्पर्श की प्रगाढ़ रूप से होने वाले अनुभूति में देह से प्राण, प्राण से मन और मन से आत्मा की ओर अन्तर्चेतना गतिशील हो जाती है। इस अनोखे अभ्यास से सम्पन्न होने वाली अन्तर्यात्रा ने ही श्रीयुत गिरीशचन्द्र घोष को महात्मा बना दिया।

बाद के दिनों में वह अपने अनुभवों को अपने गुरुभाइयों से बताते हुए कहा करते- सर्वोत्तम ध्यान है- सद्गुरु के कृपापूर्ण स्पर्श का ध्यान। उनके स्पर्श के समय हुए अनुभव का ध्यान। इससे सहज ही अन्तर्चेतना देह की परिधि से अपने अस्तित्व के केन्द्र आत्मा की ओर बढ़ चलती है। और इसकी तीव्रता के अनुपात में ही आत्म शक्तियों का अलौकिक जागरण स्वयमेव होने लगता है।


इस ज्ञान युग में अधिकाधिक परिजन भागीदारी करें

‘अपने उपासनास्थल की एक विशेषता है, वहाँ होते रहने वाला अखण्ड यज्ञ। गत 42 वर्षों से हमारा अखण्ड घृतदीप (1926 से) जलता है। साथ ही अगरबत्तियों एवं धूपबत्तियों के रूप में हवन सामग्री भी वहाँ यथाक्रम जलती रहती है। दीपक का घी और बत्तियों की सामग्री निरंतर जलने से दोनों का सम्मिश्रित धूम्र, वर्चस, तेज और प्रभाव उपासना कक्ष में यज्ञीय वातावरण उत्पन्न करता है। अतएव वह केवल अखण्ड दीप मात्र ही नहीं रहता वरन् अखण्ड यज्ञ बन जाता है, वहाँ अनायास ही हमें अपनी मनोभूमि उच्चस्तरीय रखने और उस स्थिति के महत्त्वपूर्ण लाभ लेने में सुविधा मिलती है।’ (अखण्ड ज्योति मई 1961, पृष्ठ 61) उपर्युक्त प्रसंग उस अखण्ड दीपक के विषय में हैं, जो आँवलखेड़ा, आगरा एवं मथुरा के बाद अब शाँतिकुँज हरिद्वार में सतत प्रज्वलित है एवं जिसकी साक्षी में हमारी गुरुसत्ता द्वारा उस प्राणचेतना का आह्वान किया गया, जिसके प्रत्यक्ष स्वरूप के रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका निकलती है। वस्तुतः अखण्ड दीपक से प्रेरणा लेकर ही 1937-38 में पूज्यवर ने यह विलक्षण नाम इस पत्रिका को दिया था।

इसी के विषय में वे जनवरी 1988 की पत्रिका में लिखते हैं, ‘अखण्ड ज्योति मानवी चेतना के अंतराल में दृश्यमान होने वाला वह तत्व है, जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘श्रद्धा’ कहते हैं। इसका जहाँ जितना उद्भव होता है, वहाँ उतना ही आदर्शों के प्रति निष्ठा का परिचय मिलता है। उसी के सहारे पुण्य-परमार्थ बन पड़ता है। यही है जो उत्कृष्टता के प्रति समर्पित होती है और अगणित विघ्न-बाधाओं के साथ जूझती-उलझती अपने गंतव्य तक पहुँचती है। श्रद्धा में आभा भी है और ऊर्जा भी। उच्चस्तरीय संकल्प इसी के कारण उभरते हैं और प्रबल प्रयत्न बनकर उस स्तर तक पहुँचते हैं, जहाँ मानव को महामानव, देवमानव का स्थान मिलता है। जिसके अंतराल में श्रद्धा उभरी, समझना चाहिए कि उसने महानता के उच्च शिखर पर पहुँचने की आधी मंजिल प्राप्त कर ली। शेष आधी को उस आधार पर उभरा पुरुषार्थ पूरी करा देता है। यही है ‘अखण्ड ज्योति’ का परिचय, स्वरूप और प्रभाव।’

इन शब्दों से ‘अखण्ड ज्योति’ की गंभीर गरिमा भरी महत्ता को समझा जा सकता है। विगत 64 वर्षों से सतत प्रवाहित यह ज्ञानगंगोत्री जन-जन को अभिशप्त मानसिकता से उबारती चली आ रही है। जिस-जिसने भी इसे पढ़ा है, वह इसके प्रतिपादनों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। आज के याँत्रिक युग में जहाँ अनास्था का दौर हैं, इसका टिमटिमाता दीपक सतत जाज्वल्यमान है, प्रकाशवान है एवं आदर्शवादी संकल्पों का प्रतीक है। विगत अंक में हम पाठकों को बता चुके हैं कि यह एक पत्रिका नहीं, एक आँदोलन है, मिशन है एवं हमारी गुरुसत्ता के सूक्ष्म व कारण शरीर की अभिव्यक्ति है ज्ञान के रूप में। यह ज्ञान गुरु की भूमिका निभाता है, संशयों को मिटाता है एवं गीताकार के शब्दों में अति पवित्र एवं पापनाशक है। पापी से भी पापी व्यक्ति को ज्ञान की नौका में बिठाकर पार कराया जा सकता है (4/36 एवं 4/38 श्रीमद्भगवद्गीता)। आज जिसका सबसे अधिक अभाव है एवं अभाव के कारण दुखों का जन्म होता है वह ज्ञान ही है। अखण्ड ज्योति इसी ज्ञान की लाल मशाल को लेकर सारे समाज व विश्व में अपना आलोक फैला रही है।

आज के इस युग का कोई सबसे बड़ा पुण्य-परमार्थ हो सकता है, तो वह है ज्ञानयज्ञ द्वारा विचारों को बदलने का कार्य- विचारक्राँति अभियान। संस्कृति की सबसे बड़ी सेवा यही है कि हर व्यक्ति को आशावादी चिंतन मिले, जीवन जीने का दिशाधारा का सच्चा मार्गदर्शन मिले। जानकारी देने वाला ज्ञान तो शिक्षा के रूप में, विज्ञान के रूप में, अन्य पत्र-पत्रिकाओं के रूप में ढेर सारा फैला पड़ा है, इंटरनेट से लेकर लाइब्रेरी में पाया जा सकता है, पर आत्मसत्ता को महानता की दिशा में अग्रसर करने वाले ज्ञान विस्तार का कहीं कोई तंत्र नहीं नजर आता। इस ज्ञान की विशेषता यह है कि यह तर्क, तथ्य, प्रमाणों की कसौटी पर प्रस्तुत किया गया है। आज के युग की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने वाले ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ का पोषक-समर्थक-प्रस्तोता है।

जो भी इस पत्रिका को अधिक-से-अधिक पाठकों तक पहुँचाएगा, वह सहज ही वह श्रेय प्राप्त कर लेगा जो गीताकार ने सातवें अध्याय के तीसरे श्लोक में ‘कश्चिन् माँ वेत्ति तत्त्वतः कहकर समझाया है। इस ज्ञान को जान लेना, समझ लेना परमात्मा को तत्त्वरूप से जान लेने के समान है। वार्षिक शुल्क विगत वर्ष जितना ही है। सन 2002 सामने है। प्रत्येक पाठक को न्यूनतम पाँच अतिरिक्त पाठक बढ़ाने हैं, ताकि इस ज्ञान यज्ञ में-युगधर्म में सबकी भागीदारी हो सके।


सफलता प्राप्ति के सात आध्यात्मिक नियम

मनुष्य अपने जीवन में सफलता के लिए तरह-तरह के प्रयास करता है। प्रायः मार्ग अथक श्रम एवं कड़े संघर्ष से होकर गुजरता है। शारीरिक टूटन, मानसिक चिंता, हताशा के बावजूद सफलता की झलक मिलती भी है, पर आँतरिक सुख-शाँति, स्वतंत्रता एवं बल न जाने पैरों तले कहाँ खिसक जाते हैं। भौतिक सफलता एवं समृद्धि कितनी ही बड़ी क्यों न हो, परन्तु जीवन में रिक्तता एवं अशाँति हृदय को सदैव कचोटती रहती है। अवश्य ही यह जीवन में किसी मौलिक चूक का परिणाम है और वह है- भौतिक सुख-समृद्धि के मूल स्रोत अपने वास्तविक स्वरूप की अज्ञानता अर्थात् अपने आध्यात्मिक स्वरूप के प्रति उदासीनता।

अपनी चर्चित पुस्तक ‘सद सेवेन स्प्रिचुअल लाँज ऑफ सक्सेस’ में दीपक चोपड़ा ने इस संदर्भ में गहरा प्रकाश डाला है व जीवन में सर्वांगीण सफलता के सात आध्यात्मिक सूत्रों की विशद विवेचना की है। यदि हम इन सिद्धाँतों को समझ सकें व जीवन में प्रयोग कर सकें, तो जीवन की सारी खुशियां एवं सफलताएं सहज एवं सरल ढंग से प्राप्त कर सकते हैं।

दीपक चोपड़ा के अनुसार सफलता का प्रथम सोपान विशुद्ध अंतःशक्ति का सिद्धाँत है। यह इस तथ्य पर आधारित है कि हम अपनी मूल अवस्था में विशुद्ध चैतन्य तत्व हैं। यही समस्त सृष्टि का स्रोत है। यही अनंत सृजन व समस्त संभावनाओं की उर्वर भूमि है। अंत एवं असीम होने के साथ यह पवित्र आनंददायक भी है। विशुद्ध-ज्ञान अनंत शाँति, पूर्ण संतुलन, अजेयता, सरलता सभी इसी के गुण हैं। यही हमारी मूल प्रकृति है। हम जितना अपने इस मूल स्वरूप का अनुभव करेंगे, उतना ही हम विशुद्ध अंतःशक्ति के क्षेत्र से जुड़ते जाएंगे।

यह अनुभव हमें अपने असली स्व (आत्मा) में प्रतिष्ठित करेगा वह बाह्य कारकों से मुक्त करेगा। बाह्य कारकों में व्यक्ति, परिस्थितियाँ, वातावरण एवं वस्तुएं आती हैं। सामान्यतः हम बाह्य कारकों के सहारे जीवन जीते हैं। वहाँ हमारा आँतरिक आधार अहंकार होता है, जो हमारा वास्तविक स्वरूप नहीं है। अहंकार हमारे स्व के प्रति भ्रामक धारणा है, यह एक सामाजिक मुखौटा है, नाटक की भूमिका का एक पात्र भर है। यह हमेशा अपने से बाहर तुष्टि की खोज करता है। इसमें बाह्य वस्तुओं के आधिपत्य का प्रबल भाव रहता है। बाह्य शक्ति की तीव्र भूख रहती है। यह तीनों भाव से जुड़े होते हैं, क्योंकि बाह्य कारकों के बदलते ही यह ध्वस्त होते ही यह भी ध्वस्त हो जाते हैं। मान लो कोई ऊंचे पद पर है या बहुत धन का स्वामी है। पद व धन के नष्ट होते ही इनसे जुड़ा वर्चस्व भी धूमिल हो जाता है, जबकि हमारा वास्तविक स्वरूप हमारी आत्मा, इन सभी बाहरी कारकों से मुक्त है।

विशुद्ध अंतःशक्ति के इस क्षेत्र का लाभ कैसे लें? विशुद्ध चेतना में निहित सृजनात्मक शक्तियों का उपयोग कैसे करें? इनसे संपर्क के तीन सूत्र वे बताते हैं, नीरव मौन, ध्यान व आत्मनिरपेक्षता।

नीरव मौन का अर्थ है- प्रतिदिन कुछ समय के लिए आत्मस्वरूप की गहराई में प्रतिष्ठित होना। इसके लिए बातचीत बंद करनी होगी। टीवी देखना, रेडियो सुनना, पुस्तक पढ़ना बंद करना होगा, क्योंकि तभी आँतरिक कोलाहल शाँत हो पाएगा। समयावधि क्रमशः कुछ मिनट से कुछ घंटे दिन व सप्ताह में बढ़ा सकते हैं। शुरुआत में आँतरिक चहलकदमी बढ़ जाएगी, लेकिन धीरे-धीरे यह शाँत होना शुरू होगी। क्योंकि मन को कुछ समय बाद यह अहसास हो जाएगा कि वह अपने असली स्व-आत्मा के निर्णय के विरुद्ध नहीं चल सकता। जैसे ही अंतर विवाद बंद होगा, विशुद्ध अंतःशक्ति क्षेत्र में नीरवता की अनुभूति शुरू होगी।

दूसरा पक्ष है ध्यान का। प्रत्येक दिन प्रातः व सायं न्यूनतम 30 मिनट बैठना होगा। इसमें विशुद्ध नीरवता व स्व-जागरुकता का अनुभव होता है। इस विशुद्ध ध्यान की स्थिति में सभी चीजें अखंड रूप से जुड़ी हुई अनुभव होंगी और तीसरा पक्ष है आत्मनिरपेक्षता का। निरंतर तुलना, विश्लेषण, आरोपण से अंतर्चेतना में बहुत हलचल होती है। यह विशुद्ध अंतःचेतना से आने वाले ऊर्जाप्रवाह को रोक देता है। आत्मनिरपेक्ष भाव मन में शाँति पैदा करता है व विशुद्ध चेतना से संपर्क बनाए रखता है। इसका अभ्यास भी कुछ मिनट से बढ़ाते-बढ़ाते धीरे-धीरे दिन भर कर सकते हैं।

मौन, ध्यान व आत्मनिरपेक्षता द्वारा प्रथम सिद्धाँत अर्थात् विशुद्ध अंतःशक्ति तक पहुँच हो जाएगी। फिर इसमें एक और चरण जोड़ सकते हैं, वह है प्रत्येक दिन कुछ समय प्रकृति से संवाद का। नदी, जंगल, पर्वत, झील, समुद्र किसी के भी सान्निध्य में बैठकर प्रकृति में विद्यमान बुद्धिमान व्यवस्था की समझ विशुद्ध अंतःशक्ति के क्षेत्र से संपर्क में सहायक होगी। इससे जीवन में सक्रिय शक्तियों की समस्वर प्रतिक्रियाओं के अनुभव के साथ समूचे जीवन से एकता का अनुभव होगा।

सफलता का दूसरा आध्यात्मिक सिद्धाँत है, देने का नियम। इसे आदान-प्रदान का सिद्धाँत भी कह सकते हैं। समूचा ब्रह्माँड इसी नियम पर आधारित है। मानवीय शरीर की मन व ऊर्जा, ब्रह्माँडीय शरीर की मन व ऊर्जा से सतत सक्रिय आदान-प्रदान की स्थिति में है। यही इनकी जीवंतता का प्रतीक है। इस आदान-प्रदान का रुकना वैसा ही घातक है जैसा कि शरीर में रक्तप्रवाह का रुक जाना।

प्रत्येक संबंध में लेन-देन से भरा है, लेना, देने को व देना, लेने को निर्धारित करता है और पाने का सबसे सरल तरीका है दूसरों को वह दें जो उन्हें जरूरत है। आपको जो भी चाहिए धन, प्रेम, खुशी, चीजों से उपकृत होना चाहते हैं, तो चुपचाप सभी को जीवन की अच्छी चीजों से उपकृत करो। यहाँ तक कि देने का विचार, आशीर्वाद का भाव व प्रार्थना भर में दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति है? आप बिना चाहिए किए भी चुपचाप खुशी, आनंद व हंसी के उपहार दूसरों को दे सकते हैं।

हम देने का जितना अभ्यास करें, इसके चमत्कारिक प्रभाव के प्रति उतना ही विश्वस्त होते जाएंगे। देने से हमें कुछ भी कमी नहीं पड़ने वाली, क्योंकि हमारी मूल प्रकृति अनंत संभावनाओं से भरी पड़ी हैं। अतः बाह्य रूप से हम कितने भी हीन व असमर्थ हों, परन्तु नैसर्गिक रूप से हम समृद्ध है। क्योंकि समस्त संपदा का स्रोत विशुद्ध चेतना है, जो खुशी प्रेम, शाँति, संतुलन, ज्ञान जैसी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करना जानती है।

सफलता का तीसरा आध्यात्मिक सिद्धाँत है, कर्म का सिद्धाँत। अर्थात् क्रिया की प्रतिक्रिया, कारण-कार्य का सिद्धाँत अर्थात् हम जो बोएंगे हमें वही काटना होगा। अतः हमें खुशी के बीज बोने कीक कला सीखनी होगी।

युगद्रष्टा स्वामी विवेकानंद ने कहा है, ‘कर्म मनुष्य की स्वतंत्रता की अनंत अभिव्यक्ति है। हमारे विचार, शब्द और क्रियाएं जाले के धागे हैं, जो हम अपने चारों ओर बुनते रहते हैं।’ अर्थात् हमारा जीवन अनंत विकल्पों से भरा है। अब हम किसका चुनाव करते हैं, इसके लिए हम स्वतंत्र है। लेकिन अधिकाँशतः हम पेवलाँव की ‘कंडीशंड रिफ्लेक्स’ की तरह वातावरण द्वारा अनुकूलित अपनी अचेतन वृत्तियों के अनुरूप याँत्रिक ढंग से निर्णय लेते हैं।

यदि हम थोड़ी देर के लिए पीछे हटकर अपने निर्णय को देखें, तब मात्र द्रष्टा बनने की इस प्रक्रिया में हम अचेतन को सचेतन निर्णय में बदल देते हैं। यह बहुत ही शक्तिदायिनी प्रक्रिया है। अतः किसी भी निर्णय लेने से पूर्व हम दो प्रश्न पूछ सकते हैं। पहला तो यह कि इस निर्णय के क्या परिणाम होंगे? दूसरा क्या इससे चारों ओर दूसरे लोग भी खुश होंगे? यदि हाँ तो इसे स्वीकार किया जाए, यदि नहीं तो इसे त्याग दिया जाए, बस इतना भर करना है।

सफलता का चौथा आध्यात्मिक सिद्धाँत है- न्यूनतम प्रयास का नियम। यह इस तथ्य पर आधारित है कि प्रकृति की बुद्धिमान व्यवस्था प्रयासरहित सहजता एवं सरलता से क्रियाशील रहती है। यह न्यूनतम क्रिया व प्रतिरोधहीनता का सिद्धाँत है। यह प्रेम व सामंजस्य का सिद्धाँत है। जब हम प्रकृति के इस पाठ को सीखते हैं, तो हमारी इच्छाएं सरलता से पूरी हो जाती है।

इसके विपरीत जब हम शक्ति के लोलुप होते हैं व दूसरों पर नियंत्रण करने लगते हैं, तो ऊर्जा का क्षरण करते हैं। स्वार्थ एवं अहं से प्रेरित प्रत्येक क्रिया द्वारा हम ऊर्जा-प्रवाह से वंचित हो जाते हैं। प्रेम द्वारा प्रेरित क्रिया से ऊर्जा की उत्तरोत्तर वृद्धि होती है और इस अतिरिक्त ऊर्जा व आनंद द्वारा हम कुछ भी सृजित कर सकते हैं।

इस सिद्धाँत को क्रियारूप में परिणत करने के लिए तीन घटकों पर ध्यान देना होगा। प्रथम है- स्वीकृति अर्थात् व्यक्ति, परिस्थिति व घटना को वैसे ही स्वीकार करना जैसे कि वे घटे। इसके लिए जब भी हम किसी व्यक्ति द्वारा व्यथित होते हैं या किसी परिस्थितिवश कुँठित हो जाते हैं, तो हमें स्मरण रखना होगा कि हम उस व्यक्ति या परिस्थिति से प्रतिक्रिया नहीं कर रहे हैं, बल्कि उस व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में अपनी भावनाओं से प्रतिक्रिया कर रहे हैं। ये विचार-भाव किसी दूसरे की त्रुटियाँ नहीं है। इस तथ्य के हृदयंगम होते ही हम यह जिम्मेदार लेंगे कि हम कैसा महसूस करते हैं व कैसे बदला जाए। चीजों की वैसी ही स्वीकृति से हम उन सभी घटनाओं व परिस्थितियों के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हैं, जिन्हें पहले हम दूसरों को जिम्मेदार ठहराते थे।

यहीं से इस सिद्धाँत का दूसरा पक्ष होता है, वह है जागरुकता का। अर्थात् किसी भी घटना, स्थिति के लिए किसी को भी जिम्मेदार न ठहराने से जागरुकता की स्थिति बनती है। इस सबका तात्पर्य है-स्थिति के प्रति रचनात्मक रुख। प्रत्येक समस्याओं में अवसर का बीज होता है तथा इसके प्रति जागरुकता हमें अच्छी स्थिति की ओर ले जाने में सहायक बनती है। इतना करते ही तथाकथित प्रतिकूलताएं कुछ नवीन व सुन्दर रचना के अवसर बन जाती है और प्रत्येक तथाकथित पीड़क, शिक्षक बन जाते हैं।

न्यूनतम प्रयास का तीसरा पक्ष है। प्रतिरक्षाहीनता अर्थात् आग्रहरहित होना, किसी को अपने दृष्टिकोण या विचार को मनवाने या थोपने की आवश्यकता महसूस न करना। सामान्यतः लोगों का 19 प्रतिशत समय अपने दृष्टिकोण की प्रतिरक्षा में व्यर्थ जाता है। जब हम प्रतिरक्षा करते हैं, दूसरों को दोष देते हैं व आग्रहग्रस्त होते हैं, तो जीवन में अनावश्यक विरोध खड़े हो जाते हैं। ऊंचे ताड़ के वृक्ष की तरह खड़े होने की आवश्यकता नहीं, जो तूफान के झोंकों में धराशायी हो जाता है। इसकी जगह सरकंडे की तरह लचकदार होना चाहिए, जो तूफान आने पर झुककर अपना अस्तित्व सुरक्षित रखता है। इस तरह जब जीवन में स्वीकृति, जिम्मेदारी व आग्रहहीनता की समग्रता आएगी तब जीवन प्रयासरहित सरलता से प्रवाहित होता प्रतीत होगा।

सफलता का पाँचवाँ आध्यात्मिक सिद्धाँत है, अभिप्राय व इच्छा। यह इस तथ्य पर आधारित है कि ऊर्जा व जानकारियों का अस्तित्व प्रकृति के प्रत्येक स्थल पर है। वास्तव में ‘क्वाँटम फील्ड’ के स्तर पर ऊर्जा व जानकारियों के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। ‘क्वाँटम फील्ड’ विशुद्ध चेतना का, विशुद्ध संभावनाओं का ही दूसरा नाम है और मानवीय अंतःचेतना एवं स्नायु तंत्र न केवल ‘क्वांटम फील्ड’ की ऊर्जा व जानकारियों के प्रति जागरुक होने में सक्षम है, बल्कि सचेतन रूप से इन्हें परिवर्तित भी कर सकते हैं। इस तरह मानव अपनी अंतर चेतना से समस्त परिस्थितियों एवं वातावरण को प्रभावित कर सकता है।

यह सचेतन परिवर्तन चेतना में निहित दो गुणोँ के द्वारा होता है। 1. एटेंशन अर्थात् ध्यान एवं मनोयोग तथा 2. इंटेंशन अर्थात् उद्देश्य। ध्यान उत्तेजित करता है व उद्देश्य रूपांतरित करता है। जब तक हम प्रकृति के दूसरे नियमों का उल्लंघन नहीं करते, अपने उद्देश्यों द्वारा हम प्रकृति के नियमों को वश में करके अपने स्वप्नों-इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं। उद्देश्य विशुद्ध संभावनाओं की अव्यक्त से व्यक्त में प्रयासरहित सहज व घर्षणरहित यह रखनी चाहिए कि यह मानव हित में हो। यह स्वतः ही होता है जब हम सफलता के अन्य आध्यात्मिक सिद्धाँतों के साथ होते हैं।

सफलता का छठा आध्यात्मिक सिद्धाँत है-अनासक्ति। इसके अनुसार जगत् में कुछ भी प्राप्त करने के लिए इसके प्रति आसक्ति का त्याग करना होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप इच्छा को ही छोड़ दें, बल्कि फल के प्रति अनासक्ति छोड़ दें। आसक्ति भय व असुरक्षा पर आधारित होती है, जो कि अपने वास्तविक स्वरूप पर अविश्वास की उपज है। बिना आसक्ति के हम दरिद्रता व दीनता के प्रतीक असहायपन, आशाहीनता एवं उद्विग्नता के दास बने रहते हैं। इसी तरह सुरक्षा की खोज एक भ्रम है। लोग इसे धन द्वारा पाने का प्रयास करते हैं, लेकिन यह जितना बढ़ता है, सुरक्षा से उतना ही दूर होते जाते हैं।

ऋषियों ने इसका समाधान आत्मविश्वास व भगवद्विश्वास के तत्वदर्शन में खोजा था। सुरक्षा या निश्चिंत का अर्थ है-ज्ञात से आसक्ति। ज्ञात क्या है? यह हमारा भूत है। अर्थात् ज्ञात भूतकालिक अनुकूलन के अतिरिक्त और क्या है? इसमें विकास व गति नहीं है, यहाँ जड़ता, अव्यवस्था और सड़न स्वाभाविक है।

आत्मविश्वास व भगवद्विश्वास दूसरी ओर विशुद्ध सृजन एवं स्वतंत्रता की उर्वर भूमि है। यह प्रत्येक क्षण आत्मा में प्रवेश करना है, जो कि समस्त संभावनाओं का क्षेत्र है। यहाँ प्रत्येक क्षण एडवेंचर, रोमाँच व रहस्य से भरा है। जीवन का आनंद यहीं पर है। अनासक्ति का नियम, उद्देश्य व इच्छा के सिद्धाँत का विरोधी भी नहीं है, क्योंकि अभी भी हमारे पास एक निश्चित दिशा में जाने की नीयत है। हमारा अभी एक लक्ष्य है, लेकिन सामने अनंत संभावनाएं हैं। आप कभी भी अपनी दिशा बदल सकते हैं। यहाँ समस्याओं पर समाधान थोपेंगे नहीं। अर्थात् आप अवसर के प्रति अधिक सतर्क होंगे।

यह नियम समग्र विकास की प्रक्रिया को त्वरित कर देता है। इसमें स्थिर होकर ही प्रत्येक समस्या को उच्चतर लाभ एवं विकास का साधन बना लेते हैं। बोलचाल की भाषा में इसे सौभाग्य कहा जाता है, जो कुछ नहीं तत्परता एवं अवसर का संयोग होता है और यही सफलता का विशुद्ध मसाला है।

जीवन में सफलता का सातवाँ व अंतिम सिद्धाँत है, धर्म का। धर्म अर्थात् जीवन का उद्देश्य। प्रत्येक व्यक्ति धरती पर एक विशेष उद्देश्य लेकर आता है। ईश्वरीय योजना में उसे अपना विशेष योगदान देना है, जिसे वह अपने विशेष ढंग से करेगा। बस यही उसका धर्म है। इस सिद्धाँत के भी तीन पक्ष है।

प्रथमतः हमें अपने वास्तविक स्वरूप को खोजना होगा जो आवश्यक रूप से इस शरीर में प्रसुप्त दिव्यता का भ्रूण है जिसे विकसित करना होगा। दूसरा यह कि हमें अपने विशेष गुण-प्रतिभा को व्यक्त करना होगा। दूसरा यह कि हमें अपने विशेष गुण-प्रतिभा को व्यक्त करना होगा, जिसे हमसे बेहतर दूसरा कोई इस ब्रह्माँड में नहीं कर सकता। जब हम इसे करते हैं तो समय की सीमाओं को लाँघ जाते हैं। तीसरा पक्ष है मानवता की सेवा। यह प्रश्न सतत पूछना होगा कि मैं जिसके भी संपर्क में आता हूँ, उसके लिए मैं क्या मदद कर सकता हूँ। अपनी विशेष गुण-प्रतिभा एवं मानवता की सेवा के साथ धर्म सिद्धाँत का पूर्ण उपयोग हो जाता है।

इसमें मेरे लिए क्या है? यह अहंकार का आँतरिक संवाद हमारे अपने आपसे है। मैं कैसे मदद कर सकता हूँ? यह हमें विशुद्ध संभावनाओं के क्षेत्र में ले जाता है व अपनी आध्यात्मिक संभावनाओं तक हमारी पहुँच हो जाती है। यह अंतर्संवाद हमें आत्मा के क्षेत्र में पहुँचा देता है। वैसे ध्यान इसका सबसे उपर्युक्त तरीका है।

हम स्वयं से एक प्रश्न पूछकर अपने धर्म की परीक्षा कर सकते हैं। यदि हमें संसार का सारा धन, ऐश्वर्य व समय मिलता तो हम क्या करते? यदि हम वही करते जो अभी कर रहे हैं तो हम धर्म में स्थित हैं, क्योंकि हम अपने विशेष गुण को व्यक्त करने में तल्लीन हैं। दूसरा प्रश्न यह है कि मैं मानवता की सेवा के लिए श्रेष्ठतम रूप से कैसे उपयुक्त हूँ? इसको जवाब देकर इसका अभ्यास करें।

इस तरह इन आध्यात्मिक सूत्रों का अनुगमन करते हुए जीवन में जो चाहे वह प्राप्त कर सकते हैं। इनका क्रम नैसर्गिक है, जिसे सरलता से समझा व जीवन में लागू किया ज सकता है।

उपर्युक्त सिद्धाँतों की समझ आते ही जीवन के असली मकसद पर ध्यान केन्द्रित होना प्रारंभ होता है, जो कि धर्म का सिद्धाँत है। इस नियम के प्रयोग से अपनी नैसर्गिक प्रतिभा की अभिव्यक्ति द्वारा मानवता की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए आप जो चाहें, जहाँ चाहें वहीं सृजन करना प्रारंभ करते हैं। तभी जीवन में असली आनंद व सफलता का अर्थ मालूम पड़ता है व जीवन प्रेम की अभिव्यक्ति बन जाता है। आत्मा की पूर्णता की अनुभूति जीवन की सफलता के चरम को छू लेती है।


मृत्यु चेतना के उच्चतम विकास का प्रवेश द्वार

आत्मा अमर है और शरीर नश्वर है। इस सच्चाई को कई बार सुनने के बावजूद मनुष्य मृत्यु का विचार करने से घबराते रहते हैं। दरअसल इसका कारण उनके मन में भ्राँत धारणाओं द्वारा पोषित आत्याँतिक भय का भाव है। लेकिन मृत्यु के बारे में यथार्थता कुछ और ही है। जिसे यदि वह समझ ले तो बात कुछ और ही बन जाए। मृत्यु अनुभव से गुजरे लोगों के अनुसार मृत्यु उनके लिए एक ऐसी पारसमणि सिद्ध हुई जिसके संस्पर्श ने उनके जीवन का कायाकल्प कर दिया व एक सामान्य सा अबुझ एवं अर्थहीन जीवन एक नवीन उद्देश्य एवं उल्लास से महक उठा।

एक अंग्रेज महिला मार्ग्रट ग्रे ने मृत्यु अनुभव से गुजरे कई लोगों पर व्यापक शोध अनुसंधान किया है, जिसका विस्तृत उल्लेख उन्होंने अपनी पुस्तक ‘रिटर्न फ्रॉम डेथ’ में किया है। लेखिका के अनुसार मृत्यु का स्पर्श किए इन लोगों के जीवन में मूलतः तीन तरह के परिवर्तन देखे गए। 1. दूसरों के प्रति आत्मीयता एवं प्रेम का विकसित भाव, 2. जीवन के रहस्य एवं ब्रह्मांडीय सिद्धान्तों को जानने की तीव्र इच्छा तथा 3. दूसरों के उपचारहित उपयुक्त की जाने योग्य नैसर्गिक शक्तियों व अनुदानों के विकास की इच्छा।

मृत्यु अनुभव से गुजरी एक हृदय रोग पीड़ित महिला का कहना है कि इस अनुभव के बाद उसने अपने अंदर प्रेम के भाव को धीरे-धीरे विकसित होते पाया। उसका कहना है कि छोटी-छोटी एवं नगण्य चीजों से भी अब उसे आनन्द आने लगा। दूसरे लोगों से वार्तालाप करने की क्षमता भी बहुत विकास हुआ। दूसरों के विषय में लगभग अतीन्द्रिय स्तर पर जागरुकता पैदा हुई। बीमार और मृत्यु का सामना कर रहे लोगों के प्रति उदात्त संवेदना पैदा हुई। उन्हें वह किसी भी तरह यह बताना चाहती थी कि मृत्यु की प्रक्रिया जीवन के विस्तार से अधिक और कुछ नहीं है।

मृत्यु का स्पर्श करने वाले न्यूमोनिया से पीड़ित व्यक्ति के उद्गार- ‘दूसरों के प्रति मेरे दृष्टिकोण में भारी परिवर्तन आया। मैं बहुत ही सिमटा एवं इक्कड़ व्यक्ति रहा हूँ। लेकिन इस अनुभव के बाद मैं काफी खुल गया हूँ। मैं दूसरों से अधिक आत्मीयता अनुभव करता हूँ व उनमें अधिक रुचि लेता हूँ।’

बहुत सारे व्यक्तियों ने आत्मीयता के भाव का विस्तार मनुष्य के साथ-साथ प्रकृति जगत् तक पाया। दिल के दौरे से गुजरे एक व्यक्ति का अनुभव- ‘तब से सब कुछ बदल गया है। मैं धूप में जाता हूँ व हवा का आनन्द लेता हूँ। आकाश कितना नीला है व वृक्ष भी कितने हरे दिखते हैं, सब कुछ पहले से अधिक सुन्दर लगता है। मेरी इन्द्रियाँ पहले से कितनी तीक्ष्ण हो गई हैं। मैं वृक्षों के आभामण्डल तक को देख सकता हूँ।’

मृत्यु अनुभव से गुजरे लोगों में जीवन, मृत्यु व सृष्टि के सत्य को जानने के तीव्र भाव को जाग्रत् होते देखा गया। ऐसी ही एक महिला का वक्तव्य है कि अब उसकी यह जानने की इच्छा तीव्र हो गई है कि वह कौन है? वह धरती पर क्यों आई? वह यह सब जानकर दूसरों को भी बताना चाहती है। प्रसूति के समय मृतप्राय महिला का कथन है कि इस अनुभव के बाद उसका जीवन पूरी तरह बदल गया है। अब वह जीवन मरण के रहस्य की खोज में जुटी है।

मृत्यु अनुभव से गुजरे लोगों में रोगों को ठीक करने की क्षमता के जागरण व दूसरे की सेवा के भाव को विकसित देखा गया। दोहरे हर्निया आप्रेशन से गुजरे व्यक्ति का कथन है कि इस घटना के बाद इसे लगा कि इसमें रोग ठीक करने की क्षमता है। आज वह विरघिंगम में एक चिकित्सा केन्द्र खोला है और आश्चर्यजनक उल्लास के साथ हजारों व्यक्तियों की सहायता कर रहा है। वह अपना नया जन्म हुआ अनुभव करता है। उसके चिंतन चरित्र में आमूल-चूल परिवर्तन आया है। उसके अनुसार यह अनुभव एक तरह से आत्मशोधन प्रक्रिया थी, जिसने पिछले पापों को धो डाला।

दो घण्टे तक मृत व्यक्ति का कहना है कि इस अनुभव ने मेरे जीवन को पूरी तरह बदल दिया है। मुझे एक उद्देश्य मिल गया है। मुझे ईश्वरीय कार्य करने के लिए भेजा गया है। मैंने दूसरों की सहायता करने का संकल्प लिया है। अब मैं जानता हूँ कि ब्रह्मांड का संचालन करने वाले सिद्धान्त हैं। भगवान् इन्हें नहीं तोड़ता, ये उसकी प्रकृति का अंग है। लेकिन जब हम इनका उल्लंघन करते हैं तो कष्ट और बीमारियाँ आती हैं। इनसे बचने का एकमात्र उपाय यह है कि हम अपनी राह बदलें व ईश्वरीय सिद्धान्तों के साथ जिएँ।

मृत्यु के अनुभव ने व्यक्तियों के दृष्टिकोण में अद्भुत परिवर्तन लाए हैं। जीवन के स्वरूप व उद्देश्य की नई समझ दी। जीवन के प्रति अधिक विधेयात्मक रुख का विकास किया। एक नवीन जीवन का बोध हुआ। अधिक आत्मबल के साथ आत्मगौरव का नवीन भाव जाग्रत् हुआ। भौतिक सम्पदाओं से लगाव कम हो गया। दूसरों से आशा-अपेक्षाएँ कम हो गई। विवेक सम्पन्नता, दया व करुणा के भाव का विकास हुआ।

जीवन मृत्यु के बाद भी चलता है इस विश्वास ने मृत्यु के भय को समाप्त या कम कर दिया। आग से बुरी तरह झुलसी महिला का कहना है कि अब मुझे मृत्यु का कोई भय नहीं है। मैं जानती हूँ कि मृत्यु के बाद भी एक आश्चर्यजनक जीवन होता है। ऐसे ही गुर्दा संक्रमण के कारण मृतप्रायः महिला का कहना है कि मृत्यु का सारा भय अब समाप्त हो गया है, अब तो मैं इसका स्वागत करती हूँ। लेकिन मृत्यु को जानबूझ कर प्रेरित करने के लिए कभी कुछ न करूंगी। मुझे लगता है कि हम यहाँ एक उद्देश्य से आए हैं, जिससे हम बच नहीं सकते।

ट्रक से कुचले गए व्यक्ति का कथन है कि इस अनुभव के बाद मुझे मृत्यु का कोई भय नहीं रहा। यदि जीवन को खतरे में डालने वाली स्थिति आती है तो मैं इससे बचने का पूर्ण प्रयास करूंगा। लेकिन मैं जानता हूँ कि जब मेरा समय आएगा, मैं चेतन रूप से विश्राम करना चाहूँगा, तो मृत्यु का स्वागत करूंगा, क्योंकि जैसा मैंने इसका अनुभव किया है यह सबसे आश्चर्यजनक चीज है।

‘इंटरनेशनल ऐसोसिएशन फॉर नीयर डेथ स्टडीज’ के संस्थापक प्रो. कैनेथ रिंग ने हृदय संघात से गुजरी एक महिला का उदाहरण दिया है, जो हमेशा मृत्यु से डरती थी। उसने अस्पताल में कई बार मृत्यु का साक्षात्कार किया, जिससे उसका मृत्यु का भय समाप्त हो गया था। डॉक्टर लोग सभी हैरान थे। वह जानती है कि वह कभी भी मर सकती है लेकिन उसे कोई भय नहीं है क्योंकि वह जानती है कि मृत्यु क्या है? यह जीवन का अन्त नहीं बल्कि शुरुआत है। जीवन ईश्वर का उपहार है जिसे वह कभी नहीं छोड़ेगी। लेकिन वह मृत्यु से भी नहीं डरती।

इस अनुभव के बाद लोगों ने ईश्वरीय अस्तित्व के संदर्भ में अधिक सुनिश्चितता व्यक्त की। आग से झुलसी महिला का कथन है कि अब उसका भगवान् के प्रति विश्वास अधिक दृढ़ है व उनके प्रति मान्यता में बदलाव आया है।

विषाणु संक्रमण में 1050 तापमान से गुजरी महिला का कहना है कि उस समय से वह भगवान् के अधिक समीपता अनुभव करती है और उसकी उपस्थिति जब चाहे अनुभव करती है। प्रार्थनाएँ चमत्कारिक ढंग से स्वीकार की जाती हैं व कई समस्याओं का समाधान सहज ही मिल जाता है।

इस तरह मृत्यु अनुभव ने लोगों में आध्यात्मिक जागरुकता उत्पन्न की जिसके अंतर्गत ईश्वर के निकट सान्निध्य व व्यक्तिगत स्तर पर ईश्वर से वार्तालाप की अनुभूति हुई और औपचारिक धर्म के प्रति लगाव में कमी आई।

गम्भीर कार दुर्घटना के बाद ऐसे अनुभव से गुजरी एक महिला का कथन है, इसके बाद वह अपनी आध्यात्मिक जागरुकता का विकास करना चाहती थी। ब्रह्मांड और भगवान् से क्या सम्बन्ध है इसका सच्चा अर्थ जानना चाहती थी। वह पादरी द्वारा बताई गई कर्मकाण्डीय क्रिया और अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहना चाहती थी। उसके अनुसार अब उसे भगवान् को खोजने के लिए किसी चर्च में जाने की आवश्यकता नहीं है। यह चाहे प्रोटेस्टेण्ट चर्च हो या यहूदी सभाघर, सभी उसके लिए एक समान हैं।

मृत्यु अनुभव से गुजरे लोगों पर गम्भीर अध्ययन अन्वेषण करने वालों में ऐमण्ड ए. मूडी का नाम भी उल्लेखनीय है। मृत्यु अनुभव के बाद व्यक्ति के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख उन्होंने अपनी चर्चित पुस्तक ‘लाइफ आफ्टर लाइफ’ में किया है। उनके अनुसार मृत्यु अनुभव ने लोगों के जीवन को नई परिभाषा व अर्थ दिया है। जीवन में अधिक उदारता व गम्भीरता का समावेश देखा गया। दूसरों के प्रति प्रेम का भाव व जीवन के गूढ़ रहस्यों को जानने की इच्छा का विकास हुआ।

अनुभव से गुजरी एक महिला का कहना है कि अब उसके जीवन का एक नया अध्याय खुल गया है जिसकी पूर्व में उसे संभावना तक न थी। अनुभव से पूर्व वह बहुत ही संकीर्ण व ज्ञान के प्रति विमूढ़ थी। अब वह सोचती रहती है कि जीवन में कितना अधिक जानना अभी शेष है।

एक अन्य व्यक्ति का अनुभव ‘पूर्व जीवन में मैं एक संतुष्ट व्यक्ति था। अपने तक ही सीमित था। लगता था कि दूसरों के प्रति जो कुछ करना है वह कर लिया है। मृत्यु अनुभव ने एक नई दृष्टि को जन्म दिया। अब देखता हूँ कि जिन चीजों को अच्छी मानकर करता था। वे मूलतः अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए करता था। पहले अपने आवेगों की प्रतिक्रिया के स्वरूप कार्य करता था। अब सोच समझकर बुद्धि विवेक से काम करता हूँ, जिसमें मन व आत्मा स्वस्थ रहें। अब दूसरों के दोषदर्शन व मूल्याँकन नहीं करता। अब चीजों को इसलिए करता हूँ कि वे वास्तव में अच्छी होती हैं। न कि अपने स्वार्थ व अहं की पूर्ति के लिए। जीवन की समझ काफी गहरी हो गई है।’

कुछ लोगों के अनुसार उनके शरीर को अधिक महत्त्व देने की धारणा में परिवर्तन हुआ है। ऐसी ही एक महिला का कहना है कि पहले वह शरीर के बारे में बहुत जागरुक थी। उसी को सजाने संवारने में अधिकाँश समय व शक्ति लगाती थी। मृत्यु अनुभव के बाद स्थिति एकदम विपरीत है। अब शरीर गौण हो गया है व आकर्षण का प्रमुख केन्द्र उसका मन है और इसी पर पूरा ध्यान केन्द्रित करती है।

इस तरह मृत्यु अनुभव ने लोगों को देहभाव से ऊपर उठाकर उच्चतर भाव में प्रतिष्ठित करवाया। जीवन के प्रति अधिक उद्देश्यपूर्ण व गम्भीर दृष्टि दी। धर्म के प्रति सच्ची रुचि जगाई और धर्मान्धता व रूढ़िवादिता को कम किया। साथ ही एक उच्चस्तरीय नियामक सत्ता का बोध हुआ व अपने अंदर उस सर्वोच्च सत्ता से संपर्क व वार्तालाप की क्षमता को भी विकसित किया। कुल मिलाकर एक नवीन दृष्टिकोण का जन्म हुआ जो निःस्वार्थ प्रेम और सच्चे आध्यात्मिक मूल्यों को उजागर करता है। इस तरह मृत्यु अनुभव ऐसी पारसमणि सिद्ध हुई, जो व्यक्ति के चिन्तन, चरित्र व दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन कर दे जो जीवन भर के सुधरने के प्रयास के बावजूद भी नहीं हो पाता। यह

ईश्वरीय चेतना की पक्षधर उच्चतर चेतना के दिव्य स्पर्श के कारण हैं। अर्थात् मृत्यु-जीवन का अन्त नहीं है बल्कि जीवन के माध्यम से विकसित हो रही चेतना के भावी उच्चतर विकास का एक प्रवेश द्वार है। यह जीवन के उस पार अदृश्य लोक में एक उच्चतर जीवन की ओर यात्रा का एक आवश्यक सोपान है। तभी तो बाबा कबीर कह गए हैं- कब भरिहौं, कब पाहिहों पूरन परमानन्द।


उत्तीर्ण होने के कारण (kahani)

श्वेतकेतु ब्रह्मविद्या जानने के लिए बहुत दिन से गुरुगृह में निवास कर रहे थे, पर अभीष्ट अनुदान उन्हें मिला नहीं।

गुरु की निष्ठुरता से खिन्न होकर एक दिन आश्रम की याग्नि ने कहा, तुम पर दया आती है। गुरु का पल्ला छोड़ो। वे जब तक लौटकर आएं, तब तक मैं ही तुम्हें ब्रह्मविद्या बता दूँगी।

श्वेतकेतु अग्निदेव के अनुग्रह का बड़ा उपकार माना, साथ ही अत्यंत विनम्रतापूर्वक बोले, सेवा किए बिना आपसे जो अनुदान मिलेगा, वह बिना मूल्य मिलने के कारण फलेगा कहाँ? पात्रता विकसित किए बिना, अपने अंदर सुसंस्कारिता उपजाए बिना जो उपहार हाथ लगेगा, वह टिकेगा कहाँ?

अग्निदेव लज्जित होकर अंतर्धान हो गए। श्वेतकेतु ने गुरु सेवा करके अपनी पात्रता परिपक्व की और नियत समय पर अभीष्ट अनुदान लेकर वापस लौटे।

गोपाल कृष्ण गोखले को सभी प्रश्नों के सही उत्तर देने के उपलक्ष्य में कक्षा का प्रथम पुरस्कार मिला। अध्यापक ने उनकी मेघा तथा लगाम को सराहा भी।

पुरस्कार उस समय तो उन्होंने रख लिया, पर रात बेचैनी को खिलाई और दूसरे दिन उठते ही अध्यापक के घर जा पहुँचे। पुरस्कार वापस लौटाते हुए उन्होंने कहा, ‘यह उत्तर तो मैंने चुपके से अमुक छात्र से पूछकर दिए थे। पुरस्कार का असली अधिकारी वही है।’

अध्यापक इस हिम्मत भरी ईमानदारी पर स्तब्ध रह गए। उन्होंने दुबारा वही इनाम लौटाया और कहा, ‘यह तुम्हारी ईमानदारी और बहादुरी के उपलक्ष्य में है। उत्तीर्ण होने के कारण नहीं।’


आधुनिकता का अभिशाप एक महारोग

‘न जाने क्यों हमें भय लग रहा है?’ इस प्रश्नचिह्न में मानव मन के मर्मज्ञ फोबिया की उपस्थिति का अहसास करते हैं। यह फोबिया दरअसल एक निराधार काल्पनिक भय है। यह एक ऐसा मनोरोग है, जिसे भय व मनःसंताप का मिला-जुला रूप कहा जा सकता है। मनोवैज्ञानिक बिना किसी तर्कसंगत कारण से किसी वस्तु या दशा से उत्पन्न असंगत भाव को फोबिया कहते हैं। उनके अनुसार यह आँतरिक और बाह्य दोनों कारणों से संभव हो सकता है। इसके कई रूप हैं। अक्सर यह मानसिक भय पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अधिक देखा जाता है। अति संवेदनशील व्यक्ति भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। फोबिया से ग्रस्त व्यक्ति अपने को असहाय एवं असमर्थ पाता है। मनोरोग विशेषज्ञों की दृष्टि में विधेयात्मक चिंतन ही इसका एकमात्र निदान हो सकता है।

‘फोबिया’ ग्रीक भाषा का एक शब्द है, जिसका तात्पर्य है-डरना, आशंकित या आतंकित होना। दिल्ली के डा. राममनोहर अस्पताल के वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डा. अरुण कुमार गुप्ता के अनुसार फोबिया एक ऐसी मानसिक बीमारी है, जिसमें व्यक्ति बेवजह भयग्रस्त हो जाता है। वह जिस किसी वस्तु, स्थान या व्यक्ति से डरता है, उससे वह हर स्थिति में दूर रहना चाहता है। इसके मूल में कोई वास्तविक लक्ष्य नहीं होता है। यह व्यक्ति का काल्पनिक जाल द्वारा बुना हुआ भय होता है, जिसमें वह बुरी तरह से उलझ जाता है। ऐसी परिस्थिति में रोगी अपने आपको अनियंत्रित एवं असहाय पाता है। यह भय उसके समूचे जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है।

प्रो. कैमरान के मतानुसार फोबिया एक ऐसा प्रयास है जो विस्थापन, आरोपण तथा बचने की प्रक्रियाओं के द्वारा आँतरिक रूप से उत्पन्न तनाव तथा चिंतन को बढ़ाता है। विस्थापन व आरोपण किसी बाह्य परिस्थिति के प्रति एक अतर्किक तथा असंगत भय का रूप धारण करता है और व्यवस्थित रूप से इस परिस्थिति से दूर भागने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। सामान्यतः किसी विशेष वस्तु या घटना से डरना उस वर्ग से संबंधित सभी वस्तुओं के प्रति भय पैदा करता है।

फोबिया के मुख्यतः तीन कारण बताए जाते हैं। ‘साधारण मूर्त फोबिया’, जिसमें व्यक्ति किसी मूर्त उत्तेजना से डरता है। थोड़े समय के बाद मूल उत्तेजना को भूल जाता है, परन्तु उसे तरह की समान उत्तेजना से बराबर भय रहता है। इसका दूसरा स्वरूप प्रतीकात्मक मूर्त फोबिया है, इसमें व्यक्ति कुछ मूर्त वस्तुओं से भय करता है, परन्तु वह उन्हें-ज्यों-का-त्यों नहीं बल्कि प्रतीक के रूप में अपनाता है, जबकि तीसरे ‘प्रतीकात्मक अमूर्त फोबिया’ में व्यक्ति किसी कल्पना या विचार से भयग्रस्त रहता है। इस फोबिया में उत्तेजना बाहर से न होकर व्यक्ति के अंदर होती है। मानव रोग विशेषज्ञ बैग्वी फोबिया के सामान्य लक्षण को कुछ इस तरह बताते हैं। शैशवावस्था में फोबिया किसी आघात पहुँचाने वाली घटना की स्थिति में प्रारंभ होता है। इसके मूल में अरुचिपूर्ण अनुभव एवं किसी तरह निषिद्ध या लज्जाजनक घटनाएं भी संबंधित हो सकती हैं, जिससे रोगी उस विषय में सोचते ही तनावयुक्त हो जाता है। यह अनुभव संरक्षणात्मक विस्मरण अथवा दमन के द्वारा मस्तिष्क से बाहर हो जाता है। फोबिया स्थायी भय भी हो सकता है, क्योंकि भय की मूल परिस्थिति से जुड़ी हुई अपराधी चेतना स्मृति में घटना के चेतन प्रत्यारोपण को रोक देती है। अगर सचेतन मस्तिष्क इस तथ्य को स्पष्ट कर सके तो भय का मूल भाव समाप्त हो सकता है, अन्यथा यह जड़ जमाकर बैठा रहता है।

आधुनिक मनोवैज्ञानिक फोबिया के लक्षण की व्याख्या इस तरह से करते हैं। इसमें पहले लर्निंग थ्योरी है। इसके अनुसार जब किसी व्यक्ति के दिल में किसी वस्तु विशेष अथवा स्थिति के प्रति भय होता है, तो वह फोबिया का शिकार हो जाता है। एक छोटा बालक किसी भी वस्तु से नहीं डरता है। वह बिना किसी भय के आग को पकड़ लेता है, परन्तु वह जब आग से जलन का अनुभव करता है तो फिर उसे छूता नहीं। यह स्थिति अगर गहरा प्रभाव डालती है, तो बच्चा जीवनभर आग से घबड़ाएगा। ऐसे भी कई व्यक्तियों को देखा जाता है, जो किसी स्कूटर या मोटरसाइकिल से दुर्घटना हो जाने के बाद भी उसे नहीं चला पाते। साइको एनालिसिस थ्योरी के अंतर्गत, मन में ऐसे विचार आते हैं, जो व्यक्ति को भयग्रस्त कर देते हैं। ये अशुभ विचार बार-बार उठते हैं और मन इनसे सदा आतंकित रहता है। कालाँतर में व्यक्ति मानसिक अंतर्द्वंद्व का शिकार हो जाता है। यह बुरा विचार व्यक्ति का पीछा नहीं छोड़ता और उसे फोबिया का रोगी बना देता है। एक अन्य थ्योरी के अनुसार एक वस्तु के या घटना के प्रति उत्पन्न भय किसी दूसरी वस्तु के प्रति भय में परिवर्तित हो जाता है। खेल में एक खिलाड़ी हार गया और संयोग से तेरह तारीख थी। वह खिलाड़ी 13 तारीख को अपशकुन मान बैठा। जब भी 13 तारीख आती है उस दिन कुछ भी नहीं करता। यह मानसिक भ्रम है, जो फोबिया का रूप धारण कर लेता है।

फोबिया एक मनोरोग है। यह कई प्रकार का होता है। जब कोई खुले स्थान पर जाने से घबड़ाता है, तो उस स्थिति को एग्रोफोबिया कहते हैं। कई बार इंजेक्शन लगवाने, चोट लगने या आपरेशन करवाने के दौरान होने वाले दर्द का डर सताने लगता है, इसे एल्गोफोबिया कहते हैं। तूफान और तेज हवा से डरने वाले व्यक्ति को एस्ट्राफोबिया का रोगी माना जाता है। ऐसे मनोरोगी स्नान के समय बाथरूम का दरवाजा अथवा खिड़की तक खुली रखते हैं। हीमैटोफोबिया का रोगी खून देखते ही काँपने लगता है। मैसोफोबिया का रोगी हर समय इस बात से आतंकित रहता है कि कहीं उसे कीटाणुओं द्वारा इंफेक्शन न हो जाए। जो अकेलेपन से डरता है वह मोनोफोबिया का रोगी होता है। ऐसे लोग कभी भी अकेले नहीं रह सकते। अंधेरे के भय से पीड़ित व्यक्ति बीमारी से घबड़ाते हैं। इन्हें डॉक्टर दवा या अस्पताल के नाम पर ही पसीना छूटने लगता है। इस तरह हाइड्रोफोबिया पानी से, इंसेक्टोफोबिया का रोगी कीड़े-मकोड़ों से परेशान रहता है। इस तरह के रोगी अक्सर चींटी, काकरोच, मेंढक, छिपकली, चूहे आदि से बेहद डरते हैं।

फोबिया पर सर्वेक्षण करना दुष्कर एवं कठिन कार्य हैं, फिर भी मनोविज्ञानियोँ के एक दल ने अपनी आधुनिकतम सर्वेक्षण रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि समाज में 60 प्रतिशत व्यक्तियों को एग्रोफोबिया अर्थात् सार्वजनिक स्थानों पर भय लगता है। महिलाओं की संख्या पुरुषों से दो गुनी होती है। यह समस्या पारिवारिक स्तर पर भी देखी जा सकती है। इसमें कुछ आनुवंशिक होते हैं। यह प्रायः 18 से 35 वर्ष के आयु वर्ग में देखा जाता है। इस तरह का मनोरोग बच्चों एवं 40 वर्ष के ऊपर के व्यक्तियों में नहीं होता। ऐसा बेबुनियाद डर खरीददारी, अधिक भीड़ में तथा सफर में होता है। इस परिस्थिति में व्यक्ति तनावग्रस्त एवं बच्चों जैसा असामान्य व्यवहार करने लगता है। भीड़ में वह अकेला एवं असहाय महसूस करता है। वह तमाम लोगों की क्रूर निगाहों को अपने में देखने लगता है एवं भयग्रस्त हो उठता है।

दूसरा मुख्य फोबिया है- सोशल फोबिया यानि सामाजिक भय। इसके लक्षण हैं-जनता के बीच न बोल पाना, दूसरों के सामने शर्माना, सार्वजनिक स्थानों पर न खा पाना एवं असहाय महसूस करना आदि। इस तरह का रोगी अत्यधिक चिंता का अनुभव करता है। यह प्रायः 15 से 20 वर्ष की आयु के किशोरों एवं महिलाओं में अधिक होता है। रोगी सार्वजनिक स्थल पर जाने से सदैव बचा रहना चाहता है। उसके अंदर हमेशा यही डर बना रहता है कि वहाँ वह अपने किसी विचित्र व्यवहार के कारण कहीं हंसी का पात्र न बन जाए। मनोवैज्ञानिक इसके पीछे अनियंत्रित यौन वेग एवं क्रोध का जिम्मेदार मानते हैं। व्यवहारशास्त्रियों के अनुसार यह फोबिया अचानक या धीरे-धीरे प्रारंभ होता है और मन-मस्तिष्क को अपने नियंत्रण में कर लेता है। इसके बेहद घबराहट, बेचैनी, हकलाना, मुँह सूखना, पसीना आना, शरीर काँपना, दिल की धड़कन बढ़ जाना आदि असामान्य क्रियाएं होने लगती हैं।

पैनिक डिस आर्डर्स भी सामाजिक भय से संबंधित होते हैं। इस स्थिति में हृदय की धड़कन एकाएक बढ़ जाती है और भयंकर घबराहट होने लगती है। इस दौरान दिल की धड़कन 100 से 150 प्रति मिनट या उससे सभी आगे निकल जाती है। यह असामान्य स्थिति एक से डेढ़ घंटे तक बनी रहती है। एग्रोफोबिया के आधे से अधिक मरीजों को पैनिक डिस आर्डर की शिकायत होती है। मनोविज्ञानियों की मान्यता है कि सामाजिक भय से एग्रोफोबिया अधिक होता है। कुत्ते, साँप, मच्छर, खून आदि से भय केवल तीन फीसदी लोगों में देखा गया है। यह भी महिलाओं में अधिक होता है। ईर्ष्या से भी फोबिया होता है। फोबिया में सिर दर्द, कमर दर्द, तनाव, उदासी, अपच आदि सामान्य लक्षण है। भय से तनाव की बारंबार तीव्रता की इस स्थिति के प्रति कुछ विशिष्ट लाक्षणिकताओं से युक्त प्रतिक्रिया उठने लगती है। अफ्रीका के अधिकाँश भागों के मूल निवासी वास्तविक तथा काल्पनिक दोनों ही प्रकार की भयंकर आशंकाओं से ग्रसित होते हैं। डेवनपोर्ट ने अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में साँप के फोबिया या उल्लेख किया है। उस क्षेत्र में साँप के काल्पनिक भय से सभी परेशान रहते हैं।

फोबिया पर अनेकों खोज एवं अनुसंधान जारी हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार डर से संबंधित वस्तु रोगी को काल्पनिक रूप से पूर्व के किसी खौफनाक अनुभव से जोड़ देती है। वैज्ञानिक भय से जुड़े हुए मस्तिष्क के इस विशेष प्रकार के सत्य को PTSD (पोस्ट ट्राँमैटिक स्ट्रेस डिस आर्डर) अर्थात् हादसे के बाद का सदमा कहते हैं। अमेरिका में मुख्यतः वियतनाम युद्ध से लौटे हुए भूतपूर्व सैनिकों में यह बीमारी अधिक संख्या में पाई गई थी। कभी असाध्य एवं कठिन समझे जाने वाले इस रोग का उपचार आज के अत्याधुनिक शोध-अनुसंधान के कारण सरल हो गया है।

वैज्ञानिकों के अनुसार सामान्यतः इंद्रियों से कोई सूचना कार्टेक्स से होते हुए एमीगडाला तक पहुँचती है। कार्टेक्स मस्तिष्क का सचेतन सोच से संबंधित केन्द्र है। इस केन्द्र से पता चलता है कि डर का वास्तविक कारण क्या है। अगर कार्टेक्स सचेतन स्थिति में हो तो फोबिया के मनोरोग से बचाव किया जा सकता है, परन्तु किन्हीं विशेष परिस्थितियों में सूचना सीधे एमीगडाला में पहुँच जाती है और मस्तिष्क को घटना की यथार्थता का ज्ञान नहीं मिल पाता है। सूचना के इस व्यतिक्रम से ही फोबिया का प्रादुर्भाव होता है। आधुनिक अनुसंधानों से स्पष्ट हो गया है कि मस्तिष्क को सूचना संप्रेषण का कार्य ग्लूकामेट नामक रसायन के द्वारा होता है। ग्लूकामेट को नियंत्रित और संतुलित कर लेने पर फोबिया से मुक्ति मिल सकती है। हालाँकि अभी तक किसी दवा के द्वारा इसका उपचार संभव नहीं हो सकता है।

सर्वप्रथम सन 1950 में दक्षिण अफ्रीका के मनोचिकित्सक जोसेफ बोल्प ने इसका उपचार सुझाया। इनके अनुसार फोबिया रोगी को भयग्रस्त वस्तु से सीधे संपर्क कराने पर भय में कमी आती है। सीधे संपर्क से वास्तविकता का बोध होता है और फोबिया से छुटकारा मिलने में सहायता मिलती है। एनसाइक्लोपीडिया ऑफ अमेरिकाना में फोबिया से उपचार की सर्वोत्तम विधि सहानुभूति को बताया है। फोबिया क्लीनिक नई दिल्ली के चिकित्सकगण भी सहानुभूति को फोबिया का मनोवैज्ञानिक उपचार बताते हैं। वे कहते हैं कि रोगी को भय की स्थिति में विधेयात्मक विचारधारा की ओर मोड़ देना चाहिए। आजकल बिहेवियर थेरेपी बिहेवियर मॉडिफिकेशन और फ्लाइंग विधियों से भी इसका उपचार किया जाने लगा है। हालाँकि इसके उपचार का सहज तरीका सहानुभूति एवं सद्चिंतन ही है। इसके द्वारा फोबिया से पूर्णतः मुक्ति पाई जा सकती है, क्योँकि फोबिया के मूल में वैचारिक विकृति ही सन्निहित होती है।

आज का तथाकथित आधुनिक समाज फोबिया जैसे कई अन्य मनोरोगों के शिकंजे में कस चुका है। अतः इसके निदान का एकमात्र विकल्प है- सद्चिंतन एवं सद्भाव। इसके अलावा शेष समस्त उपचार विधियाँ पेड़ की जड़ के स्थान पर पत्तों को सींचने एवं सद्चिंतन द्वारा तमाम मनोविकारों एवं मनोरोगों से बचाव करना चाहिए। यही स्थायी एवं समग्र समाधान है।


भूल समझ मौन रह गई (kahani)

आँधी ने मंद वायु से कहा, शक्तिवान बनने में ही गौरव है, मैं जब अपने वेग के साथ चलती हूँ, तो पेड़-पौधे उखाड़ जाते हैं, तालाबों का पानी उछलने लगता है, प्राणियों की मेरे सामने ठहरने की हिम्मत नहीं होती है।, सभी अपना बचाव करने के लिए छिपते फिरते हैं। जिंदगी ऐसी जीनी चाहिए कि लोग जिसका लोहा मानें और डरते रहें।

मंद वायु बोली, दीदी तुम सामर्थ्यवान हो, जो चाहो सो कर सकती हो, पर मुझे तो सेवा में आनंद आता है। धीमी चलती हूँ ताकि किसी को कष्ट न हो, निरंतर बहती हूँ ताकि सेवा के आनंद से क्षणभर के लिए भी वंचित न रहना पड़े। मुरझाए चेहरों पर शीतल सुगंधित पंखा झलते हुए जो संतोष प्राप्त होता है, मेरे लिए वही बस है। तुम्हें शक्ति का हर्ष प्रिय लगता है, पर मेरे लिए तो सेवायुक्त समर्पण ही सब कुछ है। आँधी अपनी भूल समझ मौन रह गई।


अपने भाग्य के निर्माता हम स्वयं

यह एक ऐसे व्यक्ति की जीवन कथा है, जो किसी के भी जीवन की गाथा हो सकती है। इसमें निहित भाव एवं तथ्य शाश्वत हैं। यह अंधकार में भटक रहे जीवन से प्रकाश की ओर गमन की कहानी है। यह आत्मघाती दुष्प्रवृत्तियों के शिकंजे से उबरने की संघर्ष गाथा है, जो इस आशा को जगाती है कि मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं है और वह अपने भाग्य का निर्माता एवं विधाता स्वयं आप है। फ्रेंक हेर्म्बग ने अपने जीवन में इसे ही चरितार्थ किया।

वह प्रतिकूल परिस्थितियों की मार से त्रस्त व्यक्ति था। इसे भाग्य का दोष कहें या नियति का क्रूर मजाक, जो उसे बचपन से ही माता-पिता का उचित संरक्षण एवं स्नेह नहीं मिल पाया और न ही विज्ञजनों का सत्संग एवं सही मार्गदर्शन। जीने का कोई स्पष्ट उद्देश्य न रहा तो, स्वाभाविक रूप से जीवन की ऊर्जा निम्नगामी मार्ग में प्रवाहित होती रही, और जीवन के दुःख एवं संघर्ष के बीच धूम्रपान और शराब जैसे दुर्व्यसन अभिन्न सहचर बन गए। इसी के साथ बिना कठोर श्रम किए सुख, सुविधापूर्ण जीवन जीने की भ्राँत धारणा भी मस्तिष्क में आ उभरी। इसी क्रम में किशोरावस्था में ही चोरी के दुष्कृत्य को अंजाम दे बैठा। और इसके परिणाम में मिली पुलिस की हिरासत, जेल की यात्रा, समाज से घृणा, जेल से मुक्ति और पुनः चोरी एवं बदले कल आग में विभत्स कुकृत्यों को अंजाम देने का दुष्चक्र चलता रहा।

दिशाहीन अपराधी जीवन के ये क्षण उन दिनों जेल की काल कोठरी में बीत रहे थे। कुछ ही महीनों में जेल के दुष्प्रभाव भी दिखने लगे। अनिद्रा, सरदर्द और कब्ज आदि जीवन चर्या के अभिन्न अंग बन गए थे। दवाइयों से कोई राहत नहीं मिल रही थी। बल्कि शारीरिक एवं मानसिक रोगों के और गम्भीर लक्षण प्रकट हो रहे थे। लगा कि ये सब जेल के आहार की गड़बड़ी के कारण हो रहा है। अतः आहार के चुनाव के संदर्भ में आहार विज्ञान पर एक पुस्तक की व्यवस्था की।

एक दिन फ्रेंक हेर्म्बग जेल के बूचड़खाने में पहुँचा, वहाँ मारे हुए पशु की लाश उल्टी लटक रही थी। इस दृश्य से उसे गहरा झटका लगा और इसी के साथ उसने माँसभक्षण को त्यागने का संकल्प किया। जेल के अंदर यह सब करना काफी कठिन था। जहाँ अन्य शराब और माँस पर जी रहे थे, वहाँ वह ताजा और सुपाच्य आहार लेने का प्रयास कर रहा था।

धीरे-धीरे इसके सत्परिणाम आने लगे। मन-मस्तिष्क का बोझ हलका होने लगा, जो सही दिशा में बढ़ रहे कदमों का संकेत था। संयोग से इसी दौरान योग की एक पुस्तक उसके हाथ लगी और इसे पढ़कर उसे जीवन की सही दिशा का और स्पष्ट आभास हुआ। अब तो विविध योगासनों एवं ध्यान के अभ्यास का क्रम चल पड़ा। उसे इस सबसे जीवन में एक गम्भीर आँतरिक परिवर्तन की अनुभूति होने लगी, और यह धारणा प्रबल होती गई कि अब तक जीवन त्रुटियों की एक लम्बी शृंखला रहा और अब इसे सुधारकर सार्थक दिशा की ओर नियोजित करना है।

किन्तु वह अभी शराब नहीं छोड़ पाया था और दिन में तीन पैकेट सिगरेट के पी रहा था। साथ ही उसे यह भी लग रहा था कि हृदय दुर्बल हो रहा है और वह फेफड़ों को बर्बाद कर रहा है। इसी दौरान उसने निश्चय किया कि वह चलते समय सिगरेट नहीं पीएगा, जो स्वयं में एक कठिन कार्य था। किन्तु निश्चय पक्का था अतः वह क्रमशः सिगरेट की संख्या कम करता गया। इस तरह यह संकल्प दृढ़ होता गया कि वह शीघ्र ही धूम्रपान की इस आदत से मुक्त हो जाएगा और साथ ही वह गहरे श्वास का अभ्यास सचेतन रूप से करता रहा। अन्ततः वह सिगरेट की जगह मीठी गोलियाँ लेने लगा। यह आवश्यकता भी क्रमशः क्षीण होती गयी और वह धूम्रपान से पूरी तरह से मुक्त था। इसी के साथ उसने शराब की लत को भी जीतने का निश्चय किया। यह उसकी दूसरी विजय थी। क्रमशः वह कई अन्य अस्वस्थ आदतों से भी मुक्त होता गया। और अब वह शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक एवं आत्मिक हर स्तर पर पहले से अधिक स्वस्थ एवं संतुलित अनुभव करने लगा।

किन्तु अभी भी वह नकारात्मक विचारों से मुक्त नहीं हो पाया था। अतः उसने सचेतन रूप से अपने विचार पद्धति को भी बदलने का निश्चय किया। उसे यह समझ आ गया था कि रूपांतरण का प्रथम चरण, अपने स्वास्थ्य और आदतों के लिए अपनी पूरी जिम्मेदारी लेने में है। इसी के साथ सुधार का सचेतन प्रयास अपनी दुर्भावनाओं में सबसे घातक भाव-घृणा से शुरू हुआ। लगा कि जहाँ घृणा है, वहाँ सद्भावना भी होनी चाहिए और जहाँ स्वार्थ है, वहाँ उदारता भी होनी चाहिए। अपने अन्दर उभरते हुए इन शिव भावों एवं विचारों को वह कहावतों की तरह लिखित रूप में साथ रखता गया और प्रतिदिन संकल्प की तरह इन्हें पढ़ता रहा।

उसने गहराई से अनुभव किया कि वह अपनी दुष्प्रवृत्तियों के लिए स्वयं जिम्मेदार था। अपने जीवन में अब तक दूसरे व्यक्तियों से जो भी अन्याय अनुभव कर रहा था वह सब गलत था। इस संदर्भ में उसने बदला लेने के विचारों को भुलाने का निश्चय किया। सबके साथ सद्भावपूर्ण जीवन जीने के संकल्प के साथ शान्ति की एक अद्भुत लहर उसकी अन्तर्चेतना में दौड़ गई। और अस्तित्व इसकी शीतलता से सराबोर हो उठा। अब जेल की संकरी और त्रासदायक कोठरी पहले से अधिक बड़ी और सुखद लग रही थी। जीवन का जैसे एक नया पुष्प खिल रहा था, जिसमें अपने प्रति, दूसरों के प्रति और समूचे विश्व के प्रति सद्भाव, शान्ति एवं प्रेम का भाव महक रहा था। सात्विक आहार-विहार, सतत् स्वाध्याय, आत्मचिंतन एवं योगाभ्यास द्वारा जैसे एक नया इन्सान जन्म ले रहा था। पहली बार उसे यह प्रतीत हो रहा था कि, बाह्य जगत् का परिवर्तन, आँतरिक जगत् के विकास के अनुरूप ही होता है।

जेल के पाँच वर्ष अब बीत चुके थे। एक दिन जेल का वार्डन कोठरी में आकर कैदी से बोला कि ‘अब तुम आजाद हो।’ यह सुनकर फ्रेंक हेर्म्बग मुस्कराया। क्योंकि वह तो उन आदतों, दुष्प्रवृत्तियों एवं विचारों से पहले ही आजाद हो चुका था, जिन्होंने उसे जेल व अन्य बाहरी यंत्रणाओं की अपेक्षा अधिक जटिल रूप से जकड़ रखा था। और गम्भीर कष्ट एवं त्रास पहुँचाया था। जीवन का अनुभव उससे कह रहा था कि बाहरी स्वतंत्रता की अपेक्षा आँतरिक स्वतंत्रता अधिक मूल्यवान है। और परिस्थितियाँ जो भी हों, इनकी प्रतिक्रियाएँ मनःस्थिति पर ही निर्भर करती हैं।

जेल में एक नष्ट-भ्रष्ट जीवन के रूपांतरण की यह गाथा थोड़े-बहुत बदले रूप में किसी भी व्यक्ति के जीवन का सत्य हो सकता है। बचपन के त्रुटिपूर्ण प्रशिक्षण एवं दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों के दंश की मार से पीड़ित व्यक्ति, किसी भी स्थिति में जीने के लिए बाध्य क्यों न हो, यदि व्यक्ति इस दुर्दशापूर्ण स्थिति के लिए बाहरी परिस्थितियों एवं दूसरे व्यक्तियों को दोष देने की बजाए, इसकी पूरी जिम्मेदारी स्वयं पर ले तो, इसे जीवन के रूपांतरण का श्रीगणेश हुआ मान सकते हैं। इसी के साथ आत्म-सुधार एवं निर्माण का अगला मार्ग स्वतः ही प्रशस्त होता जाएगा, जिसमें ‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।’ की उक्ति को पग-पग पर चरितार्थ होते देखा जा सकेगा।


श्रेष्ठ परिणाम (Kahani)

एक बहेलिया जैन धर्म की दीक्षा लेने गया। श्रावक मुनि ने कहा, अहिंसा व्रत पालन करने की शर्त पूरी करनी पड़ेगी। उसने कहा यह कैसे हो सकेगा? मेरी आजीविका तो यही है।

श्रावक मुनि ने कहा, अच्छा तो निराश मत लौटो। कम से कम एक प्राणी के प्रति अहिंसा व्रत निर्वाह का प्रण करो। बहुत सोच-विचार के बाद उसने ‘कौआ’ पकड़ने, न मारने का संकल्प लिया।

अहिंसा की बात मस्तिष्क में घूमनी शुरू हुई तो उसने एक-एक करके सभी प्राणियों का वध छोड़ दिया और वह स्वयं भी मुनि बन गया। छोटा शुभारंभ भी विकसित होते-होते उच्च स्थिति तक जा पहुँचता है। शुभ संकल्प आदर्शों के प्रति निष्ठा यदि दृढ़ है तो निश्चित ही कालाँतर में उसके श्रेष्ठ परिणाम होंगे।


पंचतत्त्वों के संतुलन हेतु उपयोगी मुद्राएं

शरीर पंचतत्वों का बना है। हाथ की पाँच अंगुलियाँ इनकी प्रतीक-प्रतिनिधि हैं। जब कभी इन तत्वों के असंतुलन से शरीर में कोई उपद्रव खड़ा होता है या कोई व्याधि आती है, तो पृथक-पृथक अंगुलियों के पारस्परिक स्पर्श से उन तत्वों को उत्तेजित कर संतुलन कायम किया जाता है। अंगुलियों के संपर्क का यह तरीका ‘मुद्रा’ कहलाता है। इन मुद्राओं को यदि व्यक्ति नियमित रूप से करता रहे, तो उसकी स्वस्थता अक्षुण्ण बनी रह सकती है, ऐसा विशेषज्ञों का मत है।

अंगूठा अग्नितत्व को निरूपित करता है। तर्जनी वायु तत्व प्रधान है। मध्यमा आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करती है। अनामिका में पृथ्वी तत्व का वास है, जबकि जल तत्व कनिष्ठा की विशेषता है। इन तत्वों के नियत आनुपातिक समन्वय से काया तंदुरुस्त बनी रहती है और मनुष्य प्रसन्न। इसे मानवी ज्ञान की विशिष्टता ही कहनी चाहिए कि उसने शारीरिक स्वस्थता के संदर्भ में अनेकों धाराएं ढूँढ़ निकाली हैं और हर एक के गहन अंतराल में उतरकर एवं व्यापक विस्तार में जाकर उसे ‘विज्ञान’ का स्वरूप प्रदान किया है। जड़ी-बूटी चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा, पंचकर्म, रस-भस्म, प्राण चिकित्सा, गंध चिकित्सा, चुँबक उपचार, यज्ञोपचार, एलोपैथी, होम्योपैथी, बायोकेमिक सब इसी शृंखला की कड़ियाँ हैं। सभी शरीर में व्याप्त पंचतत्वों के उस असंतुलन को ही न्यूनाधिक रूप में दूर करते हैं, जिसके कारण रोग उत्पन्न होते हैं। मुद्रा विज्ञान इन्हीं में से एक उपचारपद्धति है। यह हठयोग का एक अंग है। हठयोग की क्रियाएं प्राण-प्रवाह को सुचारु बनाती है। प्रवाह में किसी प्रकार के अवरोध की उपस्थिति ही अस्वस्थता का कारण है। यह अड़चन पंचतत्वों में से किसी के अति सक्रिय अथवा निष्क्रिय हो जाने के कारण उत्पन्न होती है। मुद्रा द्वारा इसी बाधा को दूर किया जाता है। इस दौरान जब दो या दो से अधिक अंगुलियों का स्पर्श करते हैं, तो उससे एक विद्युतीय तरंग पैदा होती है, जो तत्संबंधी तत्व की अनियमितता को दूर कर प्राण-प्रवाह को दुरुस्त करती है। यही आरोग्यता है।

मुद्राएं यों अनेकों हैं, पर यहाँ पर सबका उल्लेख न कर उनमें से केवल आठ का वर्णन किया जा रहा है। स्वास्थ्य-संरक्षण की दृष्टि से यह अतीव महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी हैं। इन्हें अपनाकर हर कोई नीरोग बना रह सकता है। ये निम्न हैं-

प्राण मुद्रा

सामान्य स्वास्थ्य हेतु यह अत्यंत ही उपयुक्त है। इससे हर प्रकार के प्राणघातक रोगों का शमन होता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट हैं, यह शरीरगत प्राण-प्रवाह को एकदम आदर्श स्थिति में बनाए रखती है। इस मुद्रा के करने से जो ऊर्जा को शक्ति और स्फूर्ति से भर देती है। इसके कारण प्रौढ़ जीवकोशों में भी यौवन की सक्रियता और गतिशीलता दिखलाई पड़ने लगती है, जिससे देहगत क्रियाएं संतुलित, नियमित और सामान्य बनी रहती है।

यह मुद्रा रोग प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाती है और शरीर को ऐसी सामर्थ्य प्रदान करती है कि वह जानलेवा रोगों का मुकाबला कर सके। कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में यह विशेष रूप से लाभकारी पाई गई है। देखा गया है कि रोगी जितना अधिक इसका अभ्यास करता है, परिणाम उतना ही उत्साहवर्द्धक सामने आता है। इसके अतिरिक्त थाइराइड संबंधी जटिलताओं एवं विभिन्न प्रकार के नेत्र रोगों में भी इसके नतीजे उल्लेखनीय पाए गए हैं।

अंगूठा, अनामिका और कनिष्ठा के मेल से यह मुद्रा बनती है। इन तीनों अंगुलियों के सिरों को मिलाकर इस प्रकार रखा जाता है कि उनका परस्पर हलका स्पर्श होता रहे, जबकि शेष दोनों अंगुलियाँ अर्थात् तर्जनी और मध्यमा सीधी बनी रहें। इससे आँखों के अंदर स्पष्ट हलचल तत्काल अनुभव की ज सकती है। यह मुद्रा जल, पृथ्वी और अग्नि तत्व का सम्मिलन है।

ज्ञान मुद्रा

इस मुद्रा से मस्तिष्कीय क्षमताओं का विकास होता है, स्मरण शक्ति बढ़ती और एकाग्रता गहरी होती है, चिंतन सामर्थ्य में पैनापन आता है और सीखने समझने की क्षमता प्रखर होती है। इसके अतिरिक्त मस्तिष्क संबंधी रोगों का निदान होता है। अनिद्रा के रोगियों को इससे विशेष लाभ होता देखा गया है। जो व्यक्ति चिड़चिड़े स्वभाव के और क्रोधी हैं, वे इसके नियमित अभ्यास से अपनी प्रकृति परिवर्तित कर सकते हैं।

ज्ञान का अर्थ होता है-ऋतंभरा प्रज्ञा। जो ज्ञान हमें सत्य-असत्य, सही-गलत, वास्तविक-अवास्तविक में अंतर करने का विवेक प्रदान करे, वही वास्तविक ज्ञान है। उसे उपलब्ध करने के लिए आध्यात्मिक अनुशासनों का सहारा लेना पड़ता है और जीवन को इतना तपपूर्ण बनाना पड़ता है कि केवल इस पथ के पथिक ही उसे कर गुजरने में सफल हो पाते हैं, दूसरे नहीं। इसी ज्ञान की प्रतीक यह ज्ञान मुद्रा है। इस मुद्रा को अक्सर भगवान बुद्ध को ध्यानस्थ प्रतिमाओं में देखा जा सकता है।

इस मुद्रा के अभ्यास से मस्तिष्क में रक्त संचार की गति बढ़ जाती है, जिससे न्यूरान्स नए ओज के साथ अपनी गतिविधियों में मुस्तैद हो जाते हैं। इससे दिमाग से संबंधित समस्याओं का निराकरण होने लगता है।

ज्ञानमुद्रा में केवल दो अंगुलियों का प्रयोग होता है- अंगूठा और अनामिका । दोनों के सिरों को आपस में स्पर्श किया जाता है और शेष तीनों अंगुलियाँ सीधी रहती हैं। इस स्पर्श के साथ ही मस्तिष्क में एक शमनकारी प्रभाव उत्पन्न होता है, जो बढ़ते-बढ़ते तंद्रा जैसी स्थिति में रूपांतरित हो जाता है। यदि बिस्तर पर लेटे-लेटे इसे किया जाए, तो यही बाद में नींद में बदल जाती है। इस मुद्रा में अग्नि और वायु तत्वों का संयोग होता है।

ध्यान मुद्रा

इसे करने से मन-मस्तिष्क में एक ऐसी शाँति का अवतरण होने लगता है, जो सुखकर होती है। सारे तनाव, सारी उलझनें, जो दिमाग को आलोड़ित करती हैं और उद्भिजों की तरह एक-एक करके मानसपटल पर उगती डूबती रहती है, उनका धीरे-धीरे शमन हो जाता है। मस्तिष्क के निश्चिंत हो जाने पर परेशान मनोदशा से व्यक्ति जब इस अवस्था में प्रवेश करता है, तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो वृक्ष की शीतल छाया में वह विश्राम कर रहा हो। ध्यान तभी लगता है, जब मन शाँत हो। उक्त मुद्रा इस प्रयोजन की पूर्ति करती है, इसलिए इसे अक्सर ध्यान-साधना के अभ्यासी करते पाए जाते हैं। इसका नाम इसी कारण ध्यान मुद्रा रखा गया है।

इस संपूर्ण शरीर में एक शिथिलीकरण प्रभाव पैदा हो जाता है, जिससे काया से समस्त अवयव नहीं स्फूर्ति और ताजगी से भरे उठते हैं। यही कारण है कि इस अवस्था से अभ्यासी जब बाहर आता है, तो वह अपने अंदर एक नई ऊर्जा और उत्साह का स्पंदन अनुभव करता है।

इस मुद्रा को प्रायः बैठकर करने का विधान हैं। इसके लिए दोनों हाथ गोदी में रखे जाते हैं- बायाँ हाथ नीचे दांया हाथ ऊपर। ऐसा करते ही मन-मस्तिष्क शाँत होने लगते हैं। यदि चित्त को तनिक नियंत्रित रखा जा सके, तो यह अवस्था शनैः शनैः बढ़ती हुई एक ऐसी स्थिति में जा पहुँचती है, जिसमें चिंतन का केन्द्रीय संस्थापन पूर्णतः निर्विचार दशा में आ जाता है, जो काफी आनंददायक होता है।

वरुण मुद्रा

यह वृक्क संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए अत्यंत उपयोगी मुद्रा है। इसके अतिरिक्त यह रक्त संबंधी विकारों को भी मिटाती है। वरुण अर्थात् जल। इसलिए इसके द्वारा शरीर में जल की कमी से उत्पन्न सभी प्रकार की जटिलताओं का निराकरण होता है। हमारे शरीर में लगभग 85 प्रतिशत जल है। जब कभी यह अनुपात घटता है, तो शरीर तंत्र असंतुलित हो जाता है। देह में जकड़न पैदा हो जाती है एवं खून अपनी संपूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाता। काया में अग्नि तत्व के हावी होने से यह स्थिति पैदा होती है, जिसको आसानी से यह मुद्रा दूर करती हैं।

यह मुद्रा काफी सरल है। इसमें अंगूठे के शीर्ष को कनिष्ठा के शीर्ष से मिलाना पड़ता है। शेष तीन अंगुलियाँ सीधी रहती है। यहाँ अग्नि तत्व का जल तत्व से संयोग होता है।

लिंग मुद्रा

इससे वक्षस्थल से संबंधित हर प्रकार की कमजोरी समाप्त हो जाती है। इसे करने से एक ऐसी शक्तिधारा उत्पन्न होती है, जो संपूर्ण शरीर में गर्मी पैदा करती है। अतः यह मुद्रा ठंड के दिनों में शीत से बचने के लिए एक उपयोगी उपाय है। इसके अतिरिक्त सर्दी, जुकाम और खाँसी के पुराने रोगियों के लिए यह काफी लाभकारी है। इसे नियमित रूप से करने वाले रोगी इससे आश्चर्यजनक फायदा उठाते देखे गए हैं।

शरीर में अग्नि तत्व पहले से ही मौजूद है, पर जल तत्व की सक्रियता के कारण जब कभी इसका संतुलन बिगड़ता है, तो व्यक्ति ‘कफ प्रधान’ बन जाता है। ऐसा आदमी सदा सर्दी, जुकाम, नजला, खाँसी से परेशान रहता है। इस पर काबू पाने का एकमात्र उपाय यही है कि देह में तत्वों का संतुलन स्थापित हो और कमजोर पड़ा अग्नि तत्व सक्रिय होकर जल तत्व की प्रधानता को निरस्त करे। लिंग मुद्रा इसी उद्देश्य को पूरा करती है।

लिंग मुद्रा को करने के लिए पहले दोनों हथेलियों को आपस में मिलाना पड़ता है, तत्पश्चात अंगुलियों को परस्पर गूँथते हुए ऐसा शिकंजा बनाना पड़ता है कि बायें हाथ के अंगूठे के ऊपर दायें हाथ का अंगूठा रहे। फिर दाएं हाथ का अंगूठा और तर्जनी उसे चारों ओर से इस प्रकार कसकर पकड़ें बायें हाथ का अंगूठा लगभग सीधी खड़ी स्थिति में आ जाए, तदुपराँत दोनोँ हाथों का शेष अंगुलियाँ भी एक-दूसरे से आबद्ध हो जाएं। यह लिंग मुद्रा है। अंगूठा अग्नितत्व का वाहक है। अस्तु, मुद्रा के दौरान उस पर जब चतुर्दिक् दबाव पड़ता है, तो उसका अग्नि तत्व उत्तेजित होकर संपूर्ण शरीर को ऊष्मा प्रदान करता है। इससे कफजनित बीमारियाँ शाँत होने लगती हैं।

सूर्य मुद्रा

यह मुद्रा व्यक्ति में सक्रियता और गतिशीलता पैदा करती एवं सुस्ती और आलस्य को दूर भगाती है। सूर्य प्रखरता का प्रतीक है। उसकी अनुपस्थिति में रात्रि के समय प्राणिमात्र को निद्रा, निष्क्रियता, अनुत्साह, आलस्य जैसे तत्व घेरे रहते हैं। प्रातः जब भगवान भास्कर अपनी अरुणिमा बिखरते हैं, तो कीट-पतंगों से लेकर मनुष्य तक में चैतन्यता दौड़ पड़ती है और सब अपनी-अपनी गतिविधियों में व्यस्त हो जाती हैं। यह अंशुमाली का प्रताप है। इसी के कारण संसार जागता और सोता है।

उक्त मुद्रा अभ्यासकर्त्ता में ऐसी ही उमंग का संचार करती है। उससे तन-मन इतना हलका हो जाता है और ऐसी स्फूर्ति अनुभव होती है कि सुस्ती का पता तक नहीं चलता। साथ ही इसके नियमित और लंबे समय तक के अभ्यास के बाद कर्त्ता में कुछ अलौकिक शक्ति भी प्रकट हो सकती है, ऐसा मुद्रा विज्ञान के आचार्यों का मत है।

इस मुद्रा में अनामिका और अंगूठे का इस्तेमाल होता है। इसमें सर्वप्रथम अनामिका अंगुली द्वारा अंगूठे के आधार को छूना पड़ता है। उसके बाद अंगूठे को अनामिका के पोरुवे के ऊपर रखते हैं। यह सूर्य मुद्रा हुई। इसमें परस्पर अग्नि और पृथ्वी तत्व मिलते हैं।

वायु मुद्रा

आयुर्वेद में वायुजनित बीमारियों को वात प्रकोप कहा जाता है। वात जब कुपित होता है तो अस्थि-संधियों में दर्द शुरू हो जाता है, जिसे गठिया या संधिवात का रोग कहते हैं। मुद्रा वायु विकार को दूर कर देह में उसका संतुलन समीकरण बनाए रखती है। अस्तु जो संधिशोध या संधिवात से पीड़ित हैं, उनके लिए यह मुद्रा विशेष रूप से लाभकारी है। इसके अतिरिक्त पक्षाघात में भी इससे फायदा होता है। अच्छे परिणाम के लिए प्राणमुद्रा के साथ इस मुद्रा को बारी-बारी से किया जाता है। यह मुद्रा दाँत दर्द, सिर दर्द, पेट दर्द जैसे शूलों में निष्प्रभावी होती हैं, कारण कि ऐसे दर्द वायु प्रकोप के कारण नहीं होते।

यह मुद्रा सूर्य मुद्रा के ही समान है। अंतर सिर्फ इतना है कि यहाँ अनामिका अंगुली की जगह तर्जनी का प्रयोग होता है। तर्जनी द्वारा अंगूठे की जड़ को छूते और हलका सा दबाते हैं। फिर अंगूठे को उसके पोर के ऊपर झुकाते हुए इस प्रकार रखा जाता है कि तर्जनी अंगुली पर थोड़ा दबाव पड़े। यहाँ अग्नि और वायु तत्व का युग्म बनता है।

पृथ्वी मुद्रा

खनिज तत्वों एवं विटामिनों की कमी जब शरीर में होती है, तो आदमी कमजोरी महसूस करने गलता है। ऊपर से देह के हृष्ट-पुष्ट और मजबूत दिखाई पड़ने पर भी भीतर से वह दुर्बल और खोखला बनता जाता है। ऐसा व्यक्ति यदि थोड़ा-सा श्रम कर ले, तो बुरी तरह थक जाता एवं आगे और मेहनत करने की हिम्मत नहीं रह जाती। ऐसे लोगों के लिए पृथ्वी मुद्रा अत्यंत उपयोगी है।

इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में ऐसी प्रखर ऊर्जा का संचार होता है कि जो अंग अवयव अब तक इसके अभाव के कारण दीन-दुर्बल जैसी स्थिति में पड़े हुए थे, वे अचानक इतने सबल और सशक्त हो उठते हैं कि काया को पहले वाली विपन्नता का आभास तक नहीं मिलता। वह अंदर से बलिष्ठता अनुभव करने लगती है।

उत्पन्न शक्ति मन को भी प्रभावित करती है, जिससे व्यक्ति के मस्तिष्क में अधिक खुलापन आ जाता है। उसके विचार करने की शैली बदल जाती है। उसमें लचीलापन झलकने लगता है और पूर्व के उसके दुराग्रही स्वभाव में उल्लेखनीय कमी आ जाती है। अंगूठे और अनामिका अंगुली के सिरों को मिलाने से यह मुद्रा बनती है। इसमें अग्नि और पृथ्वी तत्व आपस में समन्वित होते हैं।

मुद्राएं एक बार में कम-से-कम 45 मिनट तक दोनों हाथों से करनी चाहिए। एक बार में इतना संभव न हो सके, तो उसे 30 एवं 15 मिनट के दो खंडों में बाँट लेना चाहिए।

पंचतत्वों के असंतुलन को दूर करना मुद्रा का कार्य है। इससे देह की स्वस्थता और क्षमता बढ़ती है तथा मन-मस्तिष्क अधिक अनुशासित और आध्यात्मिक बनते हैं। इससे हर एक को लाभ उठाना चाहिए।


नारी चेतना अब जाग्रत हो चली है

‘कल तक वे घर की दहलीज के भीतर थीं सहमी, सकुचाई, ठिठकी-ठिठकी, आज वे दहलीज के पार हैं अपनी जमीन तलाशती, कल तक उनके सपने आँखों की पलकों पर ही चिपके रहते थे, आज वे सपने साकार बन रहे हैं, धीरे-धीरे।’

नारी शक्ति का यह समवेत स्वर, आज युगपरिवर्तन के इन महान क्षणों में अपनी यथार्थता की गूँजी के साथ सर्वत्र प्रतिध्वनित हो रहा है। विश्व के हर कोने में ऐसी हवा चल पड़ी है महिलाओं के विकास के अनुरूप वातावरण बनता जा रहा है। नारी भी अपने घर की चहारदीवारी में सिमटे दोयम दर्जे से उबरकर अंतर्निहित क्षमता, सूझ-बूझ एवं साहस का परिचय देती हुई और दृढ़ एवं आत्मविश्वासपूर्ण कदमों के साथ आगे बढ़ रही है। पुरुष प्रधान समाज में वह अपने स्वतंत्र अस्तित्व का अहसास दिला रही है।

रूस में जनसंख्या की 53 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनमें 47 प्रतिशत महिलाएं रोजगार में लगी हैं। नौकरी में लगी उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाओं की संख्या 50.5 प्रतिशत है और 56.2 प्रतिशत विशिष्ट उच्चतर शिक्षा प्राप्त है। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई प्रयास चल रहे हैं। इसी उद्देश्य से अक्टूबर 1993 में ‘वीमेन ऑफ एशिया’ नामक राजनैतिक आँदोलन की नींव रखी गई थी। 19993 के संसदीय चुनाव में इस आँदोलन की 21 सदस्या विजयी होकर आई थी। इसी क्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति बोरसि येल्तिसन ने महिलाओं के हित में एक अध्यादेश जारी किया था, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि स्त्रियाँ समाज में जो भूमिका अदा कर रही हैं, उसी अनुपात में उन्हें राज्य प्रणाली के उच्च व मुख्य पदों पर भी प्रतिनिधित्व दिया जाए। प्रथम बार अध्यादेश के माध्यम से महिलाओं के लिए न्यूनतम कोटा रखने की बात की गई थी।

ईरान के उदारवादी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी ने एक महिला सम्मेलन में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार देने की वकालत की है और कहा है कि मजहब के आधार पर महिलाओं को उनके वाजिब अवसरों से वंचित नहीं करना चाहिए। अपने वादे को निभाते हुए उन्होंने महिलाओं को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त भी किया। जिनमें मैसीमेह उल्तेकार तो उपराष्ट्रपति पद पर हैं। इस समय ईरानी संसद में 13 महिला सदस्य और एक महिला उपाध्यक्ष हैं। महिलाओं को समान अधिकार देने संबंधी प्रयास के ही परिणामस्वरूप वर्ष 97 के अंत में ईरान ने पहली बार महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति की। ईरान में 1978 में हुई इस्लामी क्राँति के बाद से महिलाओं की पारिवारिक भूमिका पर ही बल दिया जाता था और अब तक उनके न्यायाधीश बनाए जाने पर रोक थी, पर अब स्थिति बदल रही है।

उगते सूर्य के देश जापान में भी नारियों की स्थिति में बहुत परिवर्तन आ गया है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद छह वर्ष के अमेरिकी कब्जे व पुनर्निर्माण के गत चार दशकों में आर्थिक सुधार व सबके लिए अनिवार्य शिक्षा को इस बदलाव का कारण माना जाता है। गत बीस वर्षों में जापान के श्रम बाजार में महिलाओं ने पुरुषों की अपेक्षा तेजी से प्रवेश किया है। 1996 में संपूर्ण श्रम शक्ति की 50 प्रतिशत पूर्ति महिलाएं कर रही थीं। वर्ष 1976 से 1996 के बीच प्रबंधकीय पदों पर महिलाओं की उपस्थिति में 60 प्रतिशत वृद्धि हुई। अभी तक अधिकाँश महिलाएं बैंक व डिपार्टमेंटल स्टोर तक सीमित थीं, जबकि आज भव्य व्यापारिक मंत्रणा कक्ष भी उनके लिए अछूते नहीं रह गए हैं। वर्षों से जापानी कंपनियों में प्रबंधकीय श्रेणी केवल पुरुषों के लिए आरक्षित मानी जाती थी व महिलाएं लिपिकीय कार्य तथा चाय परोसने तक सीमित थीं। अब पहली बार महिलाएं प्रबंधन की ओर अग्रसर हुई हैं और उनकी संख्या बढ़ती जा रही है।

सिडनी में हुए एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाएं अच्छी ‘बाँस’ सिद्ध हो सकती हैं, क्योंकि वे अपने काम के प्रति अतिरिक्त प्रयास के लिए तैयार रहती है और उनका सहयोगी व्यवहार आधुनिक कार्यस्थली के लिए उपयुक्त रहता है। महिला प्रबंधक अपने कर्मचारियों को ऊंचे-से-ऊंचा लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रेरित करती है और कर्मचारियों के अच्छे कार्यों के लिए उनको प्रतिफल भी प्रदान करती है। महिलाएं अपने स्टाफ को कार्यों के संबंध में नए विचार और तरीके अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं। सर्वेक्षण में आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अमेरिका और कनाडा के उत्पादन और सेवा संस्थानों के 1332 से अधिक कर्मचारियों के विचार लिए गए थे। इस सर्वेक्षण से यह भ्रम तो टूटा ही है कि नेतृत्व की भूमिका के लिए महिलाएं उपयुक्त नहीं होती, सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि पुरुष नेतृत्व क्षमता विकसित करने के लिए महिलाओं से सीख ले सकते हैं।

अपने देश की पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी एक क्राँतिकारी कदम है। 73वें संविधान संशोधन बिल के परिणामस्वरूप अधिक-से-अधिक महिलाओं को लोकतंत्र के आधारभूत स्तर पर राजनैतिक प्रक्रिया में भाग लेने के अवसर मिल रहे हैं। पंचायती राज के तीनों स्तरों-गाँव, ब्लॉक एवं जिला स्तर पर महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित किए गए हैं। अपनी भूमिका सक्षमता से निभाते हुए उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि महिलाएं किसी तरह कम नहीं है। अनुभव से ज्ञात हो रहा है कि वे बहुत अच्छा काम कर रही हैं। कहीं-कहीं तो पथभ्रष्ट पुरुष को सीधे रास्ते पर लाकर सभ्य समाज की परिकल्पना साकार कर रही हैं।

पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत मिले अधिकारों एवं कर्त्तव्यों का सदुपयोग करते हुए बस्तर जिले की ग्राम पंचायत कलगाँव की महिलाओं ने अपने पिछड़े गाँव को एक आदर्श गाँव के रूप में बदलकर एक मिसाल कायम कर दी है। 800 महिलाओं से बने महिला मंडल ने जब रचनात्मक कार्यों को हाथ में लिया तो सर्वप्रथम शराब के विरुद्ध आँदोलन छेड़ा। गाँव में शराब में डूबे पुरुषों द्वारा लड़ाई-झगड़ा एवं नारी शोषण आम बात हो गई थी। घर-परिवार की आर्थिक स्थिति की बिगड़ती जा रही थी। महिलाओं के शराब विरोधी आँदोलन से शराबियों की शामत आ गई। उन्हें दंडस्वरूप 157 रुपये जुर्माना देना पड़ा था। प्रति रविवार मद्यपान, निरक्षरता एवं अंधविश्वास के विरुद्ध अभियान रूप में रैली होती थी और दिनभर गलियों की सफाई। साथ ही ‘स्कूल चलो’ अभियान के अंतर्गत बच्चों को स्कूल भेजा जाने लगा।

पंचायती राज से मिले एक तिहाई आरक्षण का उत्तराखंड की पहाड़ी महिलाएं भी भरपूर उपयोग कर रही हैं। इसके परिणामस्वरूप कई महिलाएं ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत की सदस्य चुनी गई हैं। इनमें से कई स्वतंत्र रूप से अपने प्रभाव का उपयोग कर रही हैं। विशेषकर चेतना आँदोलन से जुड़ी महिलाएं पंचायती संस्थाओं के ऊपर अपनी छाप छोड़ती जा रही हैं। ये सभी पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की पहचान बनाने व उनकी सामाजिक सुरक्षा दृढ़ करने में संघर्षरत हैं। भ्रष्टाचार एवं शराबखोरी के विरुद्ध ये मुहिम छेड़े हुए हैं।

हरियाणा के पंचायती राज में महिलाओं की भूमिका पर सेंटर फॉर डेवलपमेंट एंड एक्शन ने दो वर्ष के अंतराल में एक अध्ययन किया है। इनके अनुसार एक मौन क्राँति का शुभारंभ हो चुका है। अधिकाँश चुनी गई महिलाएं दो वर्ष पूर्व अनपढ़ थीं, लेकिन दो वर्ष में सरकारी कागज-पत्र व दस्तावेजों को पढ़ने में अक्षम व शिक्षित पति-पुत्रों पर निर्भरता के कटु अनुभवों ने उन्हें शिक्षित होने की प्रबल प्रेरणा दी है और ये महिलाएं अपनी पुत्रियों को शिक्षित करने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। आरंभ में उन्हें पंचायत तंत्र का कोई ज्ञान नहीं था। आज वे इसमें सक्रियता से भाग ले रही हैं व अपनी शक्तियों का प्रयोग कर रही हैं।

दिल्ली स्थित लेडी इरविन कॉलेज के कम्यूनिटी रिसोर्स मैनेजमेंट तथा एक्सटेंशन विभाग की विदुषी शोधार्थियों ने सत्ता के विकेंद्रीकरण एवं स्थानीय की विदुषी शोधार्थियों ने सत्ता के विकेंद्रीकरण एवं स्थानीय प्रशासन में महिलाओं की भागीदारी से उनकी स्थिति में होने वाले परिवर्तन का पता लगाने के लिए एक सर्वेक्षण किया। अखिल भारतीय महिला संघ की सहायता से होने वाला यह सर्वेक्षण पाँच राज्यों में किया गया। 86 महिला कार्यकर्त्ताओं की संगोष्ठी में सर्वेक्षण की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। विभिन्न राज्यों में महिला समाज के अंदर होने वाली उथल-पुथल के रोचक प्रसंगों को उजागर करते हुए संगोष्ठी इस निष्कर्ष पर पहुँची कि ग्रामीण महिलाओं में राजनीति के प्रति जाग्रति बढ़ रही है। सत्ता में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका एवं अनुकरणीय सफलता की कहानियाँ तो इन्हें प्रोत्साहित करती ही हैं, महिला समाज में हो रहे सामाजिक एवं राजनैतिक परिवर्तन की ओर भी संकेत करती हैं।

विभिन्न क्षेत्रों के पंचायती राज में सक्रिय महिलाओं के विचार इस तरह से थे। लखनऊ में एक ब्लॉक पंचायत की सदस्य का कहना था, ‘हम आरक्षण को बैसाखी की तरह नहीं देखते, इसे प्रमुख धारा से जुड़ने तथा कुछ सार्थक कार्य करने की शुरुआत मान रहें हैं।’ फरीदाबाद जिला पंचायत की एक सदस्या का कहना था, ‘वे महिलाएं जो पहले घर से बाहर निकलने में झिझकती थीं, आज प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। यही एक क्राँतिकारी कदम है।’ हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की एक ग्रामप्रधान का कथन था, ‘पंचायत चलाने में क्या कठिनाई है? एक महिला यदि एक परिवार को चला सकती है, तो वह पंचायत भी चला सकती है। संभवतः पुरुषों की अपेक्षा अधिक दक्षता से।’

महिलाओं में शिक्षा के प्रसार के उद्देश्य से नेशनल पॉलिसी ऑफ एजुकेशन 96 का सूत्रपात हुआ था। इसके द्वारा शिक्षित महिलाओं की संख्या में सुधार हुआ है। प्राथमिक स्कूलों में लड़कियों के प्रवेश की वृद्धि दर 1981 की 66.2 प्रतिशत से 1991 तक 88.6 प्रतिशत तक रही। साक्षरता कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने से भी महिलाओं में एक जाग्रति पैदा हुई है। पश्चिमी बंगाल व आंध्रप्रदेश में शराबबंदी इसी जागरुकता का परिणाम रही। तमिलनाडु में पुडुडुकोट्टाई में साक्षरता व कराटे के अभ्यास ने महिलाओं को साहसी बना दिया है। इस क्रम में दिल्ली में साक्षरता अभियान के अंतर्गत 30 हजार कक्षाएं चलीं। प्रत्येक कक्षा में 10 छात्र थे, इनमें महिलाओं की संख्या 90 प्रतिशत थी। यहाँ कई क्षेत्रों में 50 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हो चुकी हैं।

उपयुक्त सहायता, समर्थन और प्रशिक्षण मिलने से अशिक्षित, अप्रशिक्षित महिलाएं भी परिवार से लेकर राष्ट्र के आर्थिक विकास में अपना योगदान किस कुशलता से दे सकती हैं और आर्थिक परावलंबन को भी पछाड़ सकती है- राजस्थान सहकारिता आँदोलन से जुड़ी सैकड़ों महिलाएं इसका उदाहरण है। विविध सहकारी संगठनों के द्वारा अभिसिंचित आदिवासी महिलाओं का रेशम उत्पादन व्यवसाय आज लंबे संघर्ष एवं कठोर श्रम के परिणामस्वरूप फल-फूल रहा है। जिससे सैकड़ों आदिवासी महिलाएं न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सामाजिक शक्ति के रूप में उभर रही हैं। यही नहीं अपने बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता आदि पर भी उचित ध्यान दे रही हैं।

इस तरह नारी चेतना अब जाग्रत हो उठी है। जागी ही नहीं, बल्कि उठकर आगे भी बढ़ चली है। उसके बढ़ते चरणों को अब कोई रोक नहीं सकता और शीघ्र ही वह अपने गौरवमयी पद पर प्रतिष्ठित होकर रहेगी। नारी की जाग्रत चेतना ही इक्कीसवीं सदी में सतयुगी संभावनाओं का आधार बनेगी।


यही था मेरा पाप (Kahani)

विदर्भ देश में एक अपरिग्रही परिव्राजक रहता था, नाम था श्रुतिकीर्ति। भजन भाव तो नित्यकर्म जितना ही बन पड़ता, पर प्रवास में यही खोजता रहा कि पीड़ा और पतन से ग्रसितों के पास पहुँचे और उनकी श्रम एवं ज्ञान के द्वारा सेवा-सहायता करे। यही थी उसकी जीवनचर्या जिसे किशोरवय से लेकर वृद्धावस्था तक अविचल श्रद्धा के साथ चलता रहा।

समय आया और मरण का दिन आ पहुँचा। स्वर्ग लोक से विमान आया, देवता उसे नला रहे थे। श्रुतिकीर्ति स्वर्ग पहुँच गए, पर शीघ्र ही वहाँ के वैभव विलास से दुःखी होकर उन्होंने अपना स्थान पृथ्वीलोक में बदलने का निश्चय किया।

ब्राह्मण ने देवताओं से प्रार्थना की- यदि सचमुच उन्होंने पुण्य कमाया है, तो इच्छित वरदान मिले। उन्हें पृथ्वीलोक तक पहुँचा दिया जाए, जहाँ पीड़ितों और पतितों की सेवा-सहायता करते हुए आत्मसंतोष का अर्जन हो सके। स्वर्ग सुख से मुझे सेवा संतोष अधिक प्रिय है।

देवताओं ने तथास्तु कहकर उसे पृथ्वीलोक पहुँचा दिया। पृथ्वीलोक में रह रहे श्रुतिकीर्ति की भेंट एक दिन उनके ही गुरु से हो गई। गुरु ने पूछा, ‘भला आप तो स्वर्ग में थे, फिर वापस कैसे आए?’

संत ने कहा, ‘पुण्य का फल नहीं पाप का दंड भुगतने वहाँ गया। सेवा में प्रगाढ़ निष्ठा होती तो पहले दिन ही स्वर्ग को अस्वीकार कर देता। यही था मेरा पाप, जिसका दंड विलास-व्यसन में घुटने सहन कर लौटा हूँ।’


आत्मैव आत्मनो बंधु आत्मैव रिपु आत्मनः

श्रेष्ठी सुयश के पास सुविधा-साधनों की कमी न थी। अभाव था तो बस मन की शान्ति का। जिसकी खोज उन्हें अनवरत थी। पर शान्ति भी भला कहीं आसानी से मिलती है। वस्तुस्थिति तो यही है- शान्ति की खोज जितनी, उतनी ही अशान्ति। मन पर जितना नियंत्रण रखने की कोशिश, उतना ही वह काबू के बाहर। यह एक बड़ी ही अजीब सी विचित्रता है, जिसका समाधान ढूंढ़ते तो अनेक हैं, पर पाता कोई बिरला एक है।

अनेक सत्संग करते रहो, साधनाओं में भटकते रहो, तपस्या करके सूखते रहो, पाठ, भजन, कीर्तन करके घर-संसार में शोर मचाते रहो। पर जब तक यह गुत्थी नहीं सुलझती कि आत्मा और परमात्मा एक है, तब तक सब कुछ सारहीन, बेकार बना रहता है। श्रेष्ठी सुयश की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। वह शान्ति की खोज में, आत्मा का परमात्मा से सम्बन्ध ढूंढ़ने में हैरान परेशान थे। पर जैसा कि उन्होंने एक दिन पढ़ा था-

फूल वही, चमन वही फर्क नजर-नजर का है, अहदे-बहार में था क्या दौरे खिजाँ में क्या नहीं।

लेकिन नजर का यह फर्क भला कहीं आसानी से मिटता है। श्रेष्ठी सुयश भी ढूंढ़ते गए, बढ़ते गए, करते रहे खोज, सुनते रहे उपदेश। मन में एक संकल्प था कि मेरे हृदय की जिज्ञासा कहीं न कहीं अवश्य शान्त होगी। आत्मा को कहीं न कहीं तो सत्य का स्पर्श होगा ही। मन की दौड़ कहीं तो थमेगी ही।

अपनी साधना के पलों में श्रेष्ठी सुयश सोचते कि आत्मा को निर्बन्ध कहा गया है। आत्मा को परमात्मा कहा गया है। शास्त्रकारों ने ‘अयमात्मा ब्रह्म’ की घोषणा की है। यह सब सच है तो फिर जीव संसार में भला क्यूँ अटका रहता है। आखिर यह सब क्यों, कैसे व किस अनुराग से है। परन्तु उनके ये प्रश्न समय के साथ गहराते तो थे, पर मिटते न थे। हाँ समाधान के लिए उनकी कोशिशें बरकरार थीं।

अपनी इस ढूंढ़-खोज में एक बार वे एक आश्रम में जा पहुँचे। यह आश्रम न तो जन-जीवन से एकदम दूर था और न ही एकदम घुला-मिला। इसे देखकर वैदिक ऋषियों के आरण्यक की कल्पना साकार हो उठती थी। इसका संचालन एक गृहस्थ सन्त करते थे। उनका नाम था आचार्य श्रीकृष्ण। सद्विचारों के प्रसार को वह अपने जीवन का लक्ष्य मानते थे। आए जिज्ञासुओं को अपना आत्म स्वरूप मानकर उसे अपने सद्ज्ञान का प्रसाद देते थे।

श्रेष्ठी सुयश भी अपने प्रश्नों की पोटली सिर पर लादे वहाँ पहुँचे। आश्रम के श्रद्धालु अन्तेवासियों ने उन्हें आचार्य श्री से मिलवाया। कुशल-क्षेम के सवालों का उन्होंने अनमने भाव से उत्तर दिया। उनके मन में उफान था कि आचार्य श्री से सब कुछ एक ही साँस में कह दिया जाय। पर आचार्य श्री उनसे बातें करते हुए भी अपना कुछ काम निबटाने में लगे थे। थोड़ी ही देर में उन्होंने अपना काम निबटा लिया। और श्रेष्ठी सुयश को देखकर हल्के से मुस्कराए। उनकी इस मुस्कान में एक गहरी रहस्यमयता थी। सच पूछों तो यह रहस्यमयता उनके समूचे व्यक्तित्व को अपने में लपेटे हुए थी। हाँ इस रहस्यमयता के पर्दे से उनकी अलौकिक साधना एवं आश्चर्यजनक सिद्धियाँ यदा-कदा यथार्थ परिचय दे जाती थी। पर अभी इन पलों में वह श्रेष्ठी सुयश को सम्बोधित करते हुए कहने लगे- सेठ जी! एक बार एक ऊंटवाला अपने सौ ऊंटों का काफिला लेकर घूम रहा था। जगह-जगह ठहरता जाता और चलता जाता। ऊंटों का पेट भी इस प्रकार जंगल में भर जाता था।

एक दिन ऊंटों का यह कारवाँ एक धर्मशाला के पास आकर ठहरा। ऊंटवाला एक-एक खूँटा गाड़ता जाता और उसके साथ हर ऊंट को बाँधता जा रहा था। निन्यानवे खूँटे गाड़ चुका और उतने ही ऊंट बाँध चुका था, पर उसके पास खूँटा कम पड़ गया। वह धर्मशाला के व्यवस्थापक के पास गया और उसे अपनी समस्या कह सुनायी। व्यवस्थापक भी खूँटा ढूंढ़ने में असफल रहा। इस पर ऊंटवाला परेशान हो गया कि इस ऊंट का क्या किया जाए?

इस बीच व्यवस्थापक को कुछ सूझा और उसने ऊंटवाले को एक तरकीब सुझायी। तरकीब के अनुसार उसने ऊंट के पास जाकर झूठमूठ का एक अभिनय किया, जैसे कि वह सचमुच ही खूँटा गाड़ रहा हो। फिर उसने अभिनय किया मानो वह रस्सी से उसे खूँटे के साथ बाँध रहा हो।

प्रातः उसे आगे जाना था। उसने सभी ऊंटों को खोला तो वे खड़े हो गए और चलने को तैयार हो गए। लेकिन सौवाँ ऊंट टस से मस नहीं हुआ। आखिर हार कर वह पुनः व्यवस्थापक के पास पहुँचा और उसे अपनी विपदा कह सुनायी। व्यवस्थापक ने उससे कहा- जैसे तुमने बाँधने का अभिनय किया था, अब ठीक वैसे ही खोलने का अभिनय करो। तभी यह ऊंट उठेगा।

ठीक यही हुआ। ऊंटवाले ने व्यवस्थापक के बताए अनुसार ठीक वैसा ही किया। अब न केवल ऊंट उठकर खड़ा हो गया, बल्कि चलने को भी तैयार हो गया। यह कथा सुनाते हुए आचार्य श्रीकृष्ण बोले- कहिए सेठ जी- अब आप बताइए इस प्रसंग से आप क्या समझे। सेठ जी अपना मौन तोड़ते हुए बोले- आचार्य जी! मेरे तो कुछ भी समझ में नहीं आया। आप ही कृपा करके इसे स्पष्ट करें।

आचार्य श्री सेठ की इस नादानी पर हंस पड़े और बोले- इस सौवें ऊंट जैसी ही हमारी गति है। हमारी आत्मा निर्बन्ध है- मुक्त है, निर्लेप है, पर हम हैं पूरे अज्ञानी। हम अज्ञानवश इसे जकड़े हुए हैं और स्वयं को विवश समझ रहे हैं। जबकि असलियत यह है कि सौवें ऊंट की ही तरह हम कहीं भी बंधे हुए नहीं हैं, पर भ्रमवश अपने को बंध हुआ मान रहे हैं। सर्वमान्य सच्चाई यही है कि अपने कष्टों एवं समस्याओं के स्वयं हम ही जिम्मेदार हैं।

आचार्य श्री यह कहकर चुप हो गए। श्रेष्ठी सुयश को अब समझ में आने लगा कि दोषी तो हम स्वयं ही हैं। यह सब हमारे मानने का ही चक्कर है। आत्मा निर्बन्ध है, पर हम इसे बंधा हुआ मान कर दुःखी होते रहते हैं। और जब बन्धन ही नहीं है, तब फिर अशान्ति कैसी? क्योंकि सारी अशान्ति तो बन्धन में है।

श्रेष्ठी सुयश भाव विह्वल होकर आचार्य श्री के चरणों में दण्डवत प्रणाम करने लगे। आचार्य श्री स्नेह उड़ेलते हुए बोले- ‘सेठ जी! यह तथ्य जानते तो सब हैं, पर मानता कोई नहीं। आप लगातार इतने दिनों से स्वाध्याय और सत्संग करके अपने मन को माँजते रहे हैं- इसीलिए यह बात आपको समझ में आ सकी।’

श्रेष्ठी सुयश कुछ कह पाते- इससे पहले ज्ञानमूर्ति, तपोनिष्ठ आचार्य श्री के अधरों पर एक दोहा उभर आया-

हानि तनिक न कर सकै, दुश्मन बैरी कोय। अधिक हानि निज मन करै, जो मन मैला होय।

श्रेष्ठी सुयश भी इस दोहे के भाव को गुनते हुए अपनी भावी साधना में प्रवृत्त होने की तैयारी करने लगे।


मानवता को बचाया जा सकेगा (Kahani)

बुद्धिजीवियों संभलो

सभी बुद्धिजीवियों को मिल-बैठकर अब यह विचार करना ही होगा कि मानव जाति का अंतिम लक्ष्य क्या है, विकास अथवा विनाश। एकाकी रूप में महाद्वीप या राष्ट्रीय स्तर पर समृद्ध होने और शेष सारे संसार को नष्ट कर देने की कल्पना शेखचिल्ली के समान ही कही जाएगी। यह मानकर चलना ही होगा कि हम इस सुविधा पर अकेला नहीं, सब एक साथ हैं, न मरेंगे तो सब एक साथ, जिएंगे तो भी एक ही साथ। आवागमन की द्रुत सुविधाओं ने आज विश्व को ‘जेट एज’ में पहुँचा दिया है। यहाँ की व्याधि कुछ ही पलों में हजारों मील दूर समुद्र पार भी पहुँच सकती है। ऐसे में कैसे थोड़ा परिष्कृत किया जाए एवं आदिम मानव के स्तर पर नहीं विकसित मानव के स्तर पर विश्व सभ्यता के अभ्युदय की चर्चा ही नहीं क्रियान्वयन भी हो, तभी महाप्रलय की आसन्न विभीषिका से मानवता को बचाया जा सकेगा।


परोक्ष जगत् है अनंत संभावनाओं का भाँडागार

मैडम हेलेना पेट्रोवना ब्लावतास्की एक आध्यात्मिक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी थी। उनकी आध्यात्मिक शक्तियों तथा प्रतिकूलताओं व कठिनाइयों में भी साहसपूर्वक संघर्षरत रहने के गुणों को आज भी स्मरण किया जाता है। 1831 में एकाटेरिन्स्लाव, रूस में उनका जन्म हुआ। बाल्यकाल से ही उनकी रुचि आत्मा, मृत्यु जैसे विषयों व गुह्य-विज्ञान में थी। उम्र के साथ यह रुचि बढ़ती गयी। पेरिस के प्रख्यात् अध्यात्मवेत्ता डेनियल डगलस होम से उन्होंने अध्यात्म की शिक्षा ली। युवावस्था में एक दो बार उन्हें एक लम्बे, ओजस्वी भारतीय की छवि दिखी, जो उन्हें तिब्बत के संत प्रतीत हुये। अतः तिब्बत के सूक्ष्म शरीरधारी संतों से संपर्क स्थापित करके वास्तविक ज्ञान प्राप्ति की अभिलाषा उन्हें भारत खींच लायी। दस वर्षों के भारत भ्रमण के बाद वे अध्यात्म का ज्ञान प्राप्त कर रूस लौटी। लोगों के अनकहे मानसिक प्रश्नों के उत्तर, रोगों के उपचार, समस्याओं का समाधान आदि लिखित रूप में देना उनके लिए सामान्य बात थी।

एक बार मादाम ब्लावतास्की ने जड़-चेतन वस्तुओं के भार परिवर्तन का प्रदर्शन किया। एकाग्र दृष्टि लगाकर उनके देखने मात्र से कई लोग मिलकर एक छोटी सी मेज को अनेक प्रयासों के पश्चात् भी उठा नहीं सके। उनके दृष्टि हटाते ही भार सामान्य हो गया।

उनके पिता इन चमत्कारों को बकवास मानते थे। अतः दो मित्रों ने उन्हें कागज के टुकड़े पर ऐसा शब्द लिखकर दूसरे कमरे में रखवाया जो किसी को भी ज्ञात नहीं था। पिता ने कहा कि हेलेना सूक्ष्म जगत् से संपर्क करके उस शब्द को बता दे तो उन्हें उसकी आध्यात्मिक शक्तियों पर विश्वास हो जाएगा। उस कागज का बिना स्पर्श किये हेलेना का उत्तर पिता तक पहुँचा तो उनकी हैरानी का कोई ठिकाना न रहा, क्योंकि वह उनके एक अत्यन्त पुराने प्रिय घोड़े का नाम था, जिसका अनुमान लगाना असम्भव था। तब से वे अपनी पुत्री पर विश्वास व गर्व करने लगे।

1875 में मादाम ब्लावतास्की की किसी सूक्ष्म सत्ता का मार्गदर्शन प्राप्त करने की तीव्र इच्छा हुई। इसके पीछे उद्देश्य था- ब्रह्मांड का संचालन करने वाले नियमों-सिद्धान्तों का ज्ञान प्राप्त करना एवं सूक्ष्म शरीरधारी संतों की सहायता से प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण करना। ये सूक्ष्म शरीरधारी संत अपनी इच्छानुसार कहीं भी, कभी भी स्थूल शरीर धारण करने की क्षमता रखते हैं, कोई भी वस्तु, कहीं भी, किसी भी समय प्रकट करना, भूत-भविष्य देखना तथा इच्छानुसार अपनी आयु बढ़ाने में ये पूर्णतया समर्थ होते हैं। मादाम ब्लावतास्की ने अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कर्नल ओलकाँट एवं समर्पित गुह्य विज्ञानी डब्ल्यू.क्यू.जड्ज की सहायता से थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना की। भारत आने के कुछ माह पश्चात् उन्होंने थियोसोफिकल पत्रिका की प्रथम प्रति प्रकाशित करवायी। पाश्चात्य रहस्यवाद, पूर्वी दर्शन, भारतीय वेदों व अन्य ऐसे ही विषयों पर विषद चर्चा का इसमें समावेश किया। इस समय तक ‘बंदर खेल’ अर्थात् कौतुक के लिए चमत्कार दिखाना उन्होंने लगभग समाप्त कर दिया था। उनके अनुसार मार्गदर्शन सूक्ष्म सत्ता ने गुह्य ज्ञान के अकारण प्रदर्शन की मनाही की थी। सिद्ध सूक्ष्म शरीरधारी संत ‘कुथ हूमी’ उनके मार्गदर्शक हैं, ऐसा उनका दावा था। इसे प्रामाणित करना भी उनके लिए कठिन न था। वे प्रसन्नतापूर्वक सूक्ष्म सत्ता की शुभकामनाएँ, विचार व उपहार सुपात्र व्यक्तियों तक पहुँचा देती थीं।

किसी रात्रि भोज अथवा सभा में सूक्ष्म जगत् के संदेशों का वितरण होने के साथ अलौकिक संगीत सुनायी देता था, वस्तुएँ किसी अलौकिक शक्ति द्वारा हिलायी जाती थीं। एक बार दिन के उजाले में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटीं। श्रीमती सीनेट नामक महिला ने पैदल भ्रमण के दौरान मादाम ब्लावतास्की से कहा कि कोई स्थूल व्यक्तिगत संदेश सूक्ष्म सत्ता के द्वारा अभी प्राप्त हो जाये तो वे उनके अस्तित्व के प्रति विश्वस्त हो जायेंगी। मादाम ब्लावतास्की ने कागज के टुकड़े पर लिखा और मोड़कर हाथों में रख लिया। अपने स्थान से हटे बिना एक वृक्ष को इंगित किया। एक टहनी पर खुदा मिला- ‘मुझे विश्वास है कि मुझसे यहाँ एक संदेश छोड़ने का आग्रह किया गया। आप मुझसे क्या चाहती हैं।’ इसके नीचे तिब्बती लिपि में हस्ताक्षर थे। श्रीमती सीनेट को विश्वास हो गया कि ऐसा कृत्य किसी अलौकिक शक्ति द्वारा ही सम्पन्न किया जा सकता है।

एक अन्य घटना कुछ निष्पक्ष अतिथियों के समक्ष घटी, जिसने और अधिक प्रभावित किया। मादाम ब्लावतास्की, कर्नल ओलकाँट तथा श्रीमती सीनेट ने एक अन्य महिला एवं मेजर हेन्डरसन के साथ पिकनिक का आयोजन किया। सामान तैयार करके वे निकल पड़े। मार्ग में एक अंग्रेज न्यायाधीश भी सपत्नीक सम्मिलित हो गये। पिकनिक स्थल पर पहुँचकर ज्ञात हुआ कि सात व्यक्तियों के लिए कप-तश्तरी छह ही थे। मादाम ब्लावतास्की से कोई व्यवस्था करने का आग्रह किया गया। कुछ मिनट मौन रहने के पश्चात् उन्होंने मेजर हेन्डरसन से एक स्थान विशेष खोदने के लिए कहा। थोड़ा सा खोदने पर ही वहाँ एक कप-तश्तरी मिले, जिनकी बनावट घर से लाये कप-तश्तरियों के समान ही थी।

ऐसी अभूतपूर्व घटनाओं के पश्चात् ह्यम, सिनेट तथा अन्यों ने मादाम ब्लावतास्की से ऐसा चमत्कार दिखाने को कहा जिससे सम्पूर्ण विश्व आकर्षित हो जाये, जैसे लंदन टाइम्स समाचार पत्र की एक प्रति शिमला में उसी

दिन प्रकट हो जाये, जिस दिन इंग्लैण्ड में प्रकाशित हो। कुछ दिनों उपरान्त सिनेट को अपने कार्यालय में मार्गदर्शक सत्ता का संदेश मिला। इसमें समझाया गया था कि ऐसा चमत्कार दिखाना कोई कठिन कार्य नहीं, किन्तु जन सामान्य की दृष्टि में आने पर सम्पूर्ण विश्व में अव्यवस्था व्याप्त हो जायेगी, लोगों की भीड़ लगने लगेगी। जबकि मानव समुदाय को परम सत्य पर विश्वास दिलाने का एकमात्र उपाय है- क्रमिक रूप से ज्ञान की प्राप्ति। मनुष्य अपने जीवन काल में व्यक्तिगत पात्रता के अनुसार क्रमिक रूप से ज्ञान प्राप्त करता जाता है। चमत्कारों से कौतुक तो उत्पन्न होगा पर इससे जन-सामान्य के विवेक-चक्षु खोलना सम्भव नहीं। उनके इस कथन से सिनेट को और अधिक प्रभावित किया कि एक प्रत्यक्षदर्शी की कही बात दस अपरिचितों के कथन से अधिक विश्वसनीय होती है, अतः जिस सत्कार्य में निरत हो उसे ही आगे बढ़ाओ, भविष्य में दैवीय सहायता मिलते रहेगी। सिनेट तथा मिस्टर ह्यम का इसी प्रकार कुथ हूमी से विचारों का आदान-प्रदान निरन्तर चलते रहने के बावजूद ऐसा वे मादाम ब्लावतास्की के माध्यम से ही कर सकते थे। वे सीधे कुथ हूमी से संपर्क नहीं कर सकते थे।

मादाम ब्लावतास्की ने सम्पूर्ण भारत की यात्रा भी की, क्योंकि उनका विश्वास था कि भारत भूमि का प्रत्येक क्षेत्र तीर्थ है। इस दौरान वे ब्राइट रोग से गम्भीर रूप में ग्रसित हो गयीं। इसी अवस्था में अकेले दार्जलिंग तक गयीं। वहाँ से सिक्किम गयीं जहाँ उनकी अपने गुरु से भेंट हुई और पुनः स्वस्थ हो गयीं। इसके बाद कुथ हमी थियोसोफिकल सोसायटी के कुछ लोगों को स्थूल रूप में भी दिखे। कई बार एक सफेद वेशभूषाधारी पगड़ी बाँधे ओजस्वी भारतीय कुछ मिनटों तक हवा में इधर-उधर घूमने के बाद अंतर्ध्यान हो जाते थे। इस दृश्य को अनेक लोगों ने प्रत्यक्ष रूप से देखा।

अड्यार के सोसायटी मुख्यालय में मादाम ब्लावतास्की ने एक आलमारी में अपने गुरु की तस्वीरें रखीं। यह स्थान इस बात के लिए प्रसिद्ध था कि यहाँ उनकी अनुपस्थिति में भी गुरु के द्वारा संदेश छोड़े जाते थे। एक बार उनके सरल स्वभावी मित्र जनरल मोरगन को अलमारी देखने के लिए बुलाया गया। अलमारी खोलते ही उनमें रखी तश्तरी गिर कर टूट गयी। मादाम ब्लावतास्की की मित्र श्रीमती कोलुम्ब इस बात से अत्यन्त रुष्ट हुयीं। उन्होंने बड़बड़ाते हुए टूटी तश्तरी के टुकड़े कागज में लपेटकर अलमारी में रखे। जनरल मोरगन को यह सब बुरा लगा और बोले कि यह तश्तरी इतनी अधिक महत्त्वपूर्ण है तो सूक्ष्म शक्ति इसे पुनः जोड़ ले। इसके पश्चात् आलमारी खोले जाने पर वहाँ कुथ हूमी के संदेश के साथ तश्तरी भी जुड़ी हुई मिली। इस घटना ने भारतीयों तथा यूरोपियनों दोनों को बहुत प्रभावित किया।

सूक्ष्म जगत् में विचरण करने वाली महान् आत्माओं से संपर्क करके जगत् का कल्याण करने वाले आध्यात्मिक व्यक्तियों के अनेकों उदाहरण हैं। सूक्ष्म शरीरधारी संत स्वयं भी ऐसे मनुष्यों को ढूंढ़ते रहते हैं, जिनके माध्यम से वे अपना लोकहित का उद्देश्य पूर्ण कर सकें। भविष्य में प्रत्येक व्यक्ति अध्यात्म को जीवन में अपनाकर सूक्ष्म जगत् से सहज रूप में संपर्क करने की क्षमता प्राप्त कर ले तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।


मूलभूमि से बिछुड़े

ऐसी मान्यता है कि अब से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व भारत के घुमंतू बंजरों से कुछ समूह यहाँ से बाहर निकलकर विश्व के कई देशों में फैल गए। अपनी यायावर प्रकृति के कारण वे कहीं स्थायी रूप से न बस सके और तब से लेकर अब तक लगातार घूमते रहने के कारण विश्व के करीब हर हिस्से में व्याप्त हो चुके हैं। विदेशों में इन्हें ‘जिप्सी’ कहकर पुकारा जाता है। लंबे अंतराल के गुजर जाने और मातृभूमि से दूर रहने के बावजूद कुछ विकृति के साथ उनमें भारतीय संस्कृति के अंश-अवशेष अब भी देखे जा सकते हैं। उनकी आस्थाओं, मान्यताओं, और बोलियों पर ध्यान देने से यह स्पष्ट प्रतीत होगा कि वे हिन्दू परंपरा के ही लोग हैं।

जिप्सी संस्कृति का गहराई से अध्ययन करने वाले मनीषी और शोधकर्ता भिक्षु चमनलाल अपने ग्रंथ, ‘जिप्सी-भारत की विस्मृत संतति’ में लिखते हैं, ‘जिप्सी कहे जाने वाले लोग, जो मध्य तथा दक्षिण यूरोप और अमेरिका के कई भागों में पाए जाते हैं, वास्तव में भारतीय मूल के हैं, वे या तो स्वयं उन स्थलों में गए अथवा विदेशी आक्राँतों द्वारा बंदी बनाकर ले जाए गए।’

लगभग ऐसा ही मत अन्य अनेक विद्वानों का है। सभी इस बात पर सहमत हैं कि वे आर्य रक्त के हैं और उनकी मूल भूमि भारत ही है। जिप्सियों को ‘रोम’ या ‘रोमा’ भी कहते हैं। इस शब्द की व्युत्पत्ति बताकर प्रख्यात विद्वान और जिप्सी समुदाय के अध्येता ए.जीर. पशुपति ने भी यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि वे भारतीय परंपरा के ही लोग हैं, कोई और नहीं। लंबे काल तक अपनी जन्मभूतम से दूर रहने के कारण उनमें अन्य संस्कृतियों का भी स्पष्ट असर है, इतने पर भी वे अपनी मूल संस्कृति के चिह्न स्वयं में आज भी संजोए हुए हैं। उनकी पूजा−पद्धति हिन्दुओं के समान है। वे देवता को ‘देवला’ कहकर पुकारते हैं। यह शब्द मालवी के ‘दवल’ शब्द से व्युत्पन्न प्रतीत होता है। वे हिन्दू देवताओं की अब भी पूजा करते हैं। ईसाई बनकर भी उनमें हिन्दुत्व का भाव विद्यमान है। वे ‘क्रास’ को क्रास न कहकर ‘त्रुशुल’ कहते हैं। यह स्पष्ट रूप से भारतीय आस्था का द्योतक है। त्रिशूल भगवान शंकर का आयुध है। जहाँ यह आयुध होगा, वहाँ भगवान शिव की छवि मानस-पटल पर अनायास उभर आती है। ऐसा मालूम पड़ता है, मानो वे कभी शैव मत के अनुयायी थे, अस्तु ईसाई मत का चिह्न धारण करने के बावजूद अपनी शैव आस्था को अक्षुण्ण रखने के लिए क्रास में त्रिशूल की भावना करने लगे। यह अपनी मूल परंपरा को जीवित रखने का एक अनूठा उदाहरण है।

उनकी नाक-नक्श, कद-काठी, रहन-सहन सब कुछ भारतीयों जैसा है। हिन्दुओं की भाँति वे अपने पूर्वजों का सम्मान करते हैं और किसी परिजन की मृत्यु पर भारतीय श्राद्ध प्रथा की तरह मृतक भोज कराते हैं। कई जिप्पसी समुदायों में विवाह की प्राचीन भारतीय परिपाटी-स्वयंवर प्रथा अब भी प्रचलित हैं, जिसमें कन्या अपने पति का चुनाव स्वयं करती है। भगवान राम और कृष्ण कुछ समूहों में आज भी पूजित हैं।

हर वर्ष संपूर्ण यूरोप के जिप्सियों का एक सम्मेलन होता है, जिसमें जिप्सी समाज के मुखिया का चयन होता है। मुखिया के लिए ‘बड़ो सिरो’ शब्द का प्रयोग होता है। इसके अतिरिक्त पुरुष मुखिया के लिए ‘राजा’ और स्त्री मुखिया के लिए ‘रानी’ शब्द भी प्रयुक्त होते हैं।

उनकी अंकपद्धति पूर्णतः भारतीय है। सिर्फ एक और दो पर कुछ ग्रीक प्रभाव झलकता है। सप्ताह के दिनों के नाम संस्कृत उद्गम के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। सोमवार को जिप्सी लोग प्रथम दिवेस कहते हैं, मंगलवार को द्वितीय दिवेस तथा बुधवार को तृतीय दिवेस। यह शोध और अनुसंधान का विषय है कि सात दिनों को इस प्रकार पुकारने की परंपरा भारत में किस काल में थी? इतिहासकारों को इसका पता लगाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त उनकी रोमानी बोली पर अब भी उसमें हिन्दी, संस्कृत, पंजाबी, गुजराती, राजपूताना और मालवा की बोलियों के हजारों शब्द देखे जा सकते हैं, कुछ ज्यों-के-त्यों, कुछ विकृत स्थिति में। उदाहरण के लिए रोमानी के कुछ शब्द द्रष्टव्य हैं, ‘वेर्श’ यह रोमानी में वर्ष के लिए प्रयुक्त होता है। ‘दिवेस’ हिन्दी में इसके लिए दिवस शब्द का इस्तेमाल करते हैं। ‘ब्रिशित’- वृष्टि, ‘तल्ली’-तलैया (तालाब), ‘बालू’-बालू, ‘बिक्री’-बकरी, ‘नाक’ ‘दाँत’-दाँत, ‘दादे’-दादा, ‘दुक’-दुःख, ‘बूढ़ा ‘तुद’-दूध, ‘किर्मों’-कृमि, ‘तू पानी’-पानी, ‘श्चाँद’-चाँद, ‘याग‘-आग, ‘कुनारा’-किनारा, ‘राखली’-रखैल आदि कितने ही ऐसे शब्द हैं, जिन्हें देखकर उनके आर्य होने का सहज ही अनुमान लगता है। यह ठीक है कि उनकी भाषा में भारतीय शब्दों की बहुलता है, इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि संप्रति उनकी भाषा विशुद्ध रूप से भारतीय है। उसमें देशाँतरीय भाषाओं का सहज समावेश हो गया है। इससे उनके निष्क्रमण पथ का पता चलता है। जिप्सी भाषा में फारसी, तुर्की, ग्रीक और स्लाव का पर्याप्त प्रभाव दृष्टिगोचर होता है, किंतु ‘अरबी’ का स्पर्श तक नहीं मिलता। इससे यह अंदाज लगाया जा सकता है कि उनके प्रवास पथ में अरब देश सम्मिलित नहीं था।

जिप्पिसयों के अनेक उपसमूहों के नाम भारतीय हैं, जैसे जट्टस (जाट), जोराची (सौराष्ट्री), सिंडीज (सिंधी) आदि। यह भी इस बात का संकेत है कि उनकी मूलभूमि भारत है। ‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी’ में उन्हें भारतीय नस्ल की एक यायावर प्रजाति बतलाया गया है। दुनिया के विभिन्न भागों में फैले जिप्सी न्यूनाधिक परिवर्तन के साथ अब भी लगभग वही धंधे अपनाए हुए हैं, जो उनके भारतीय पूर्वजों के पैत्रिक धंधे थे। पर आश्रित हैं। इससे भी यही जनजातीय समूह संप्रति उन्हीं धंधों पर आश्रित हैं। इससे भी यही प्रमाणित होता है कि वे हिन्दू हैं। टोकरी बुनना, जादूगरी करना, पशुपालन, सर्पमाँत्रिक, गाना-बजाना, नृत्य करना, अश्व चिकित्सा, घोड़ों में नाल लगाना, नट विद्या, लौहकर्म, घोड़ों और खच्चरों का व्यापार तथा भविष्यवक्ता के रूप में भाग्य और भविष्य बतलाना-यह उनके प्रधान कार्य है। इनके द्वारा ही वे अपना जीविकोपार्जन इन दिनों भी करते देखे जा सकते हैं।

यों तो जिप्सी विश्वव्यापी प्रजाति हैं, पर इस समय उसकी प्रचुरता पश्चिमी गोलार्द्ध में ही अधिक है। यह सत्य है कि जिप्सियों का कोई निश्चित स्थान नहीं है, परिभ्रमण उनकी सहज प्रवृत्ति है। इतने पर भी अनेक देशों में उन्होंने अपना स्थायी आवास बना लिया है। इनमें हंगरी, रुमानिया, सर्विया, आस्ट्रिया, ग्रीस, तुर्की, इटली, जर्मनी, रूस, फ्राँस, स्वीडन, डेनमार्क, नार्वे, पोलैंड, इंग्लैंड तथा ईरान प्रमुख हैं। इन देशों में इनकी संख्या 12 लाख के करीब है।

भिन्न-भिन्न देशों में उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। जर्मनी में 16वीं शताब्दी में इन्हें ‘इजिप्टेट, स्पेनिश, गिलर्नो’ नाम से संबोधित किया जाता था। बाद में वहाँ उन्हें ‘जिगूनेर’ भी कहा जाने लगा। इसके अतिरिक्त रूस में ‘जगारी,’ फारस में ‘जेंगी, तुर्की में ‘चिनेगी’, बुल्गारिया में ‘गुप्ती’, स्पेन में ‘गिटानज’ अथवा ‘गिप्टानोज’ तथा फ्राँस में ‘बोहेमियन’ नाम से प्रसिद्ध हैं।

उनके यूरोप प्रवास काल के संबंध में विद्वानों में कोई निश्चित मत नहीं है। कई विद्वान उनके प्रवास काल को छठवीं शताब्दी के आस-पास मानते हैं, जबकि अनेक लोग दसवीं शताब्दी को उनका निष्क्रमण काल मानते हैं। इस संबंध में मार्टिन ब्लौक अपने ग्रंथ ‘जिप्सीज देयर लाइफ एंड कस्टम्स’ में लिखते हैं कि सर्वप्रथम जार्जिया के पादरी माँउट ऐथोस ने यूरोप में इनके अस्तित्व की जानकारी सन 1100 में दी। तत्पश्चात सन 1322 में क्रीट में इनकी उपस्थिति दर्ज की गई। सन 1346 में ये कोरफू में देखे गए। तदुपराँत सन 1340 में इन्हें सर्विया में पाया गया। सन 1417 तक इनकी व्यापकता मालदेविया, हंगरी, जर्मनी और स्विट्जरलैंड आदि देशों तक फैली गई। 1442 में इनका पदार्पण वासले में हुआ और 1457 में पेरिस पहुँच गए। पंद्रहवीं सदी के मध्य तक ये संपूर्ण यूरोप में छा गए। इसके बाद ये पिरेनीज पर्वत के उस पार स्पेन में अपने उन साथियों से जा मिले,जिनके पूर्वज कुछ दशाब्दी पूर्व उत्तरी अफ्रीका होकर यहाँ आए थे।

विश्व के विभिन्न देशों में आश्रय और आजीविका की तलाश में भटक रहे जिप्सियों का जीवन सरल नहीं है। भारत के बंजारा ओर लंबानी जातियों की तरह इन्हें भी अगणित मुसीबतों का सामना करना पड़ा। जहाँ-जहाँ गए, वहाँ इन्हें संदेह की दृष्टि से देखा गया, इन्हें चोर-उचक्के समझा गया और बढ़-चढ़कर कहर ढाए गए। इंग्लैंड, फ्राँस, आस्ट्रिया, जर्मनी, स्पेन आदि देशों में इनका एक जैसा इतिहास है। इन राष्ट्रों में इनका इतना उत्पीड़न किया गया कि इतिहासकारों के लिए यह निर्णय करना कठिन है कि यहूदी और जिप्सी इन दो प्रजातियों में से किसे सर्वाधिक शोषण सहना पड़ा।

जिप्सी हमसे बिछुड़े हुए हैं, वे अपनी मूल भूमि से विलग हैं, इतने पर भी उनकी सोच और संस्कार, आस्थाएं और मान्यताएं भारतीयों जैसी अब भी बनी हुई हैं, यह गर्व की बात है। अच्छा होता, हम उनसे आत्मीयता प्रदर्शित कर पाते और उनमें सोई पड़ी भारतीयता की भावना को जाग्रत करते तो भारत का एक अंग, जो विभिन्न देशों में उक्त समुदाय के रूप में बिखरा पड़ा है और उपेक्षा भाव झेल रहा है, वह अधिक समर्थ-सशक्त बन पाता। इससे आर्य संस्कृति को विश्वव्यापी बनाने में हम अधिक सफल होते। ‘कृण्वंतो विश्वं आर्यम्’ के आर्ष उद्घोष को क्रियान्वित करने का एक आसान तरीका कदाचित यह भी हो सकता है कि मध्यकाल में निर्गत हुए इन भारतीयों को हम आत्मसात कर लें। देह का कोई अंग सड़-गल रहा हो, तो उससे पूरे शरीर को पीड़ा होती है। जिप्सियों की दुर्दशा पर भारतीयता की आत्मा कचोटती है। उन्हें उबारकर ही हम इस आत्मप्रताड़ना से मुक्त हो सकते हैं।


सबको न्याय मिले, ऐसा समाज बने

लोकताँत्रिक व्यवस्था में न्याय को मनुष्य का मूलभूत अधिकार माना गया है, क्योंकि इसी सशक्त आधार पर मनुष्य का जीवन सम्मानित और सुरक्षित रहता है। किन्तु वर्तमान में मनुष्य का यही प्राथमिक अधिकार सर्वाधिक तिरस्कृत हो रहा है। अपराधियों और समाज विरोधी तत्त्वों के लगातार बढ़ते दबदबे से देश का विशाल जनसमुदाय किंकर्त्तव्यविमूढ़ है। उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि वह क्या करे? कहाँ जाये? इतनी भयानक स्थिति निर्मित हो चुकी है कि हमारी संवैधानिक व्यवस्था ही कटघरे में आ गई है। आज यह प्रश्न हमारे सामने आ खड़ा हुआ है कि अपराध नियंत्रित न्याय की अवधारणा आखिर कैसे पुष्पित एवं पल्लवित हो?

सृष्टि की मानव सभ्यता के जन्म के साथ ही समुदाय और समाज अस्तित्त्व में आते गये। कालाँतर में सामाजिक व्यवस्थाओं और सभ्यताओं का विकास क्रम आरम्भ हुआ और इसी विकास-क्रम में मनुष्य द्वारा मनुष्य के उत्पीड़न और शोषण का दौर भी शुरू हुआ। हमेशा से ही समाज के कुछ लोगों में द्वन्द्व, टकराहट एवं संघर्ष होता रहा है। ऐसे समाज का अस्तित्त्व कभी भी नहीं रहा, जिसमें कोई दोष न रहा हो। समाज के इसी दोष को दूर करने के निमित्त न्याय की अवधारणा का उद्भव हुआ।

न्याय का अर्थ है वह प्रणाली, नियम या योजना जिसके द्वारा सम्यक् निर्णय तक पहुँचा जा सके। प्रमाणों द्वारा अर्थ का परीक्षण, वस्तु-तत्त्व की परीक्षा न्याय है। मनुस्मृति, किरातार्जुनीय, न्याय-सूत्र, न्यायभाष्य आदि में न्याय शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में हुआ है। सामाजिक संदर्भ में सम्यक् निर्णय सामाजिक न्याय के क्षेत्र में ही करना होता है। वहीं इसकी आवश्यकता पड़ती है। यही कारण है कि भारतीय परम्परा में समाज में न्याय के लिए व्यवहार शब्द का प्रयोग हुआ है। जिसे इन दिनों ‘जस्टिस’ कहा जाता है। उसे सामान्यतः भारत में व्यवहार कहा जाता है।

व्यवहार की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि विविध संदेहों को हरण करते हुए निश्चित निर्गम की प्रतिष्ठ करना ही व्यवहार है। गृह्यसूत्रों, महाभारत, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, शुक्रनीतिसार, भविष्य पुराण आदि ग्रंथों में भी यही बात कही गई है। इन भारतीय शास्त्रों में व्यवहार-अंगों यानि न्यायाँगों का भी विशद् वर्णन मिलता है। इनमें न्याय-सभा को धर्माधिकरण, धर्मस्थान या धर्मासन कहा गया है। न्याय-करना कैसा हो, वहाँ देवमूर्तियाँ, फूल, सुगंध, जल आदि कहाँ किस प्रकार रखे जायें, न्यायाधीश कैसे हो, इन सबकी विस्तृत विवेचना है। सर्वोच्च न्यायाधीश किस प्रकार प्रसन्न, प्रशाँत, विनय सम्पन्न होकर न्याय-कक्ष में आये, इसका भी विस्तृत वर्णन मिलता है। वाद, प्रतिवाद, प्रतिरोध, पक्ष, प्रतिज्ञा, प्रत्युत्तर, साक्ष्य और प्रमाण वर्तमान न्याय व्यवस्था के भी अंग हैं और पहले भी थे।

आधुनिक राजतंत्र ने न्याय की अपनी अवधारणा प्रस्तुत की है। भारतीय संविधान की न्याय दृष्टि यह है कि भारतीय राज्य संप्रभु है, सर्वोच्च है। वह अपने समस्त नागरिकों के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक अधिकारों की रक्षा करता है। विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, श्रद्धा एवं पूजा-पद्धति की स्वतंत्रता की रक्षा भी उसका दायित्व है। इसके बाद भी आज जो घटनाएँ घट रही हैं, वे हमें बर्बर आदिम-युग की याद दिला देती हैं। बुद्ध और महावीर के काल से आज तक के लम्बे अन्तराल में अगर हम एक कदम आगे बढ़े हैं तो दस कदम पीछे हुए हैं। सभ्यता एवं विकास के तमाम दावों के बावजूद हमारी न्याय-व्यवस्था की नींव बेहद जर्जर एवं खोखली है।

न्याय व्यवस्था की पूरी परिकल्पना ही इस तथ्य पर आधारित है कि ताकतवर द्वारा कमजोर के साथ हो रहे अन्याय को रोका जा सके और अपराधी को दण्डित किया जा सके। चाहे राज्य की ताकत के खिलाफ आम आदमी के हक का सवाल हो या बलशाली व्यक्ति द्वारा किसी निर्बल, बेसहारा आदमी पर हो रहे अन्याय का प्रश्न हो। पर सच्चाई यह है कि आज की स्थिति में 23246 मुकदमे सर्वोच्च न्यायालय में, 30 लाख मुकदमे देश के विभिन्न उच्च न्यायालय में एवं 2 करोड़ 80 लाख मुकदमे देश के विभिन्न अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित है। विभिन्न मामलों में लोग 20-25 साल से अपने मुकदमों के फैसलों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बहुत से मामलों में यह प्रतीक्षा कई पीढ़ियों तक करनी पड़ती है।

अपराधियों के मनोबल में लगातार हो रही वृद्धि और न्याय का उस बढ़ते मनोबल को तोड़ पाने में असफल रहना, दैनिक जीवन की अत्यंत कटु सच्चाइयाँ है। इससे एक यह बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि हमारे संविधान निर्माताओं से एवं विशेषज्ञों से कुछ भूल अवश्य हुई है। पहली तो यही कि हमारा संविधान जिन विदेशी संविधानों के अध्ययन के आधार पर निर्मित किया गया है वहाँ की परिस्थितियाँ अलग हैं। उन देशों में 50 प्रतिशत अपराधी सजा अवश्य पाते हैं। दूसरी भूल यह हुई है कि सिद्धान्त और व्यवहार से समन्वय स्थापित नहीं किया जा सका। यह हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि हम अभी भी दो सौ वर्षों की गुलामी मानसिकता से ऊपर उठकर अपनी न्याय व्यवस्था नहीं बना पाये।

आज जबकि सम्पूर्ण समाज आदर्श-विहीन हो चुका है। प्रत्येक व्यक्ति का लक्ष्य मात्र यही रह गया है कि येन-केन प्रकारेण कैसे धन अर्जित किया जाये, तब ऐसे में हम समाज के किसी भी विशिष्ट अंग से यह अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि यह भ्रष्टाचार से मुक्त हो, चाहे वह न्यायपालिका ही क्यों न हो? परन्तु यह भी सच है कि देश में चारों ओर जितना भ्रष्टाचार व्याप्त है उस अनुपात में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार कम है। चाहे अधीनस्थ न्यायालय के न्यायधीश हों या उच्च न्यायालय के अब भी वे अपने दायित्व का निर्वाह भय, लोभ व मोह से मुक्त होकर करते हैं। इसके बाद भी वर्तमान न्याय-व्यवस्था ने देश के आम आदमी को निराश ही किया है। वह न्याय के लिए अदालतों के चक्कर लगाने की अपेक्षा यह प्रयास करता रहता है कि मुकदमा न करना पड़े। देश के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने न्यायाधीशों की गोष्ठी में इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए कहा था कि ‘लोग नरक में जाना अदालत जाने से बेहतर समझते हैं।’

ऐसा नहीं है कि न्याय व्यवस्था को सुधारने का प्रयास ही नहीं किया गया। न्याय-व्यवस्था सुधारने के लिए देश के आजाद होने के बाद विभिन्न विधि-आयोगों का गठन किया गया। ये विधि आयोग सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीशों की अध्यक्षता में गठित हुये। उन्होंने देश के विभिन्न वर्गों से विस्तृत संपर्क करके विभिन्न विधि-क्षेत्रों की व्यवस्था की अनुशंसाएँ की, किन्तु अधिकतर विधि आयोग की रिपोर्ट एवं अनुशंसाएँ विधि-मंत्रालय के पुस्तकालय की शोभा बढ़ाने तक ही सीमित रही।

आज आवश्यकता इस बात की है कि वर्तमान न्याय-प्रक्रिया को सरल और द्रुतगामी बनाया जाये। जिससे दो बातें सुनिश्चित हो सके। पहला यह कि मुकदमों का निस्तारण एक निर्धारित समय सीमा में किया जा सके। दूसरा न्याय व्यवस्था उन लोगों तक पहुँचे जो न्यायालय तक पहुँचने में असमर्थ हैं। इस सम्बन्ध में बहुत से विशेषज्ञों एवं विधि आयोगों ने महत्त्वपूर्ण एवं सुविचारित सुझाव दिये हैं।

निःसन्देह न्याय के बिना सजीव समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। परन्तु पूर्ण न्याय तभी सम्भव है जब समाज में नैतिक एवं मानवीय शक्तियों का विकास हो। इसके लिए आज समाज में सामूहिक सोच वाले आध्यात्मिक-व्यावहारिक लोगों को विराट् बहुमत में आगे आना होगा; क्योंकि प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष या समाज विशेष का नहीं अपितु राष्ट्र का है। इसके बिना समाज में न्याय व्यवस्था की स्थिति नगण्य ही रहेगी।


अनोखा उदाहरण (Kahani)

कालीदास सर्वथा निरक्षर थे। पंडितों की चालाकी से उनका विवाह एक विदुषी से उसको शास्त्रार्थ में हराकर करा दिया। विवाह होने के बाद भेद खुला, तो विद्योत्तमा ने कालिदास से कहा- आप मेरे पति बने रहना चाहते हैं, तो मुझसे अधिक विद्या प्राप्त करें।

कालीदास को बात चुभ गई। उन्होंने पूरी लगन और मेहनत से पढ़ना आरंभ कर दिया। लगने जीती और मूर्खता हारी। कालीदास उच्चकोटि के विद्वान बने। घर लौटे तो पत्नी ने संस्कृत में तीन प्रश्न पूछे। इनके उत्तर में उन्होंने तीन ग्रंथ लिखकर दिए, रघुवंश, मेघदूत और कुमार संभव। पत्नी के उलाहने से लगनशील बनकर उच्चकोटि की विद्वत्ता प्राप्त करने का संसार में यह अनोखा उदाहरण है।


वातव्याधि निवारण की यज्ञोपचार प्रक्रिया-10

पिछले अंक में यज्ञ चिकित्सा द्वारा प्रमेह एवं डायबिटीज अर्थात् मधुमेह जैसे कष्टसाध्य रोगों से पूर्णरूपेण छुटकारा पाने के लिए विशिष्ट प्रकार की हवन-सामग्री आदि का वर्णन किया जा चुका है। बताया गया कि किस तरह आहार-विहार को संयमित करके नित्य-नियमित रूप से संबंधित रोगों में विशेष प्रकार की वनौषधियों से तैयार की गई हवन सामग्री से सूर्य गायत्री मंत्र द्वारा हवन करने व उसी हवि सामग्री से सूर्य गायत्री मंत्र द्वारा हवन करने व उसी हवि सामग्री के सूक्ष्म पाउडर को सुबह-शाम खाते रहने से इन बीमारियों से मुक्ति मिल जाती है और रोगी व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ हो जाता है। यहाँ वातव्याधि की विशिष्ट हवन सामग्री का वर्णन किया जा रहा है।

चरक संहिता के अनुसार-’अशीतिर्वात विकारः’ अर्थात् वात विकार अस्सी प्रकार के होते हैं। यह सभी वातव्याधियाँ शरीरस्थ पाँच प्राणों अर्थात् प्राण, उदान, समान, व्यान तथा अपान के कुपित होने, अपने मार्ग से हटकर विपरीत मार्ग में गमन करने क्षीण या वृद्ध होकर विकृत रूप धारण करने आदि कारणों से उत्पन्न होती हैं। प्राणों में अर्थात् वायु में विकृति पैदा करने के मूल कारणों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ‘अत्यंत रूखे और शीतल पदार्थ खाने से, हलके अन्न, कड़वे, कसैले और चटपटे पदार्थ अत्यधिक खाने से,कम खाने से, अत्यधिक उपवास करने से, रात्रि में अधिक जागने से, अत्याधिक वमन-विरेचन करने से विषम उपचार करने से, अत्यधिक रक्तस्राव होने से, अधिक कूदने-तैरने से, अधिक पैदल चलने से, शरीरगत रस, रक्त आदि धातुओं के क्षीण होने से अधिक चिंता या शोक करने से, किसी रोग के अधिक दिनों तक बने रहने के कारण कृशकाय होने से मर्म स्थान में चोट लगने से, कष्टदायक शय्या पर सोने से या कष्टप्रद कुर्सी, चौकी, चारपाई पर बैठने से, दिन में सोने से, अत्यधिक क्रोध करने से, भयभीत होने से, आमदोष उत्पन्न होने से, मल-मूत्र आदि वेगों को रोकने से वायु प्रकुपित होकर शरीर के खाली स्रोतों या छिद्रों पर भर जाती हैं और सर्वांगव्यापी अथवा एकाँगव्यापी अनेक प्रकार के वात विकार उत्पन्न करती हैं।’

आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार सर्वांगवात उसे कहते हैं जब प्रकुपित वात सारे शरीर की शिराओं एवं स्नायुओं को सुखाकर पूरे शरीर को चेष्टारहित अर्थात् शून्य बना देता है और सभी अंग-प्रत्यंगों में पीड़ा होती है। इसके विपरीत जब प्रकुपित वायु शरीर के दायें या बायें किसी एक भाग पर आक्रमण करके उस भाग की शिराओं तथा स्नायुओं को सुखाकर एक हाथ या पैर को संकुचित कर देती है और पीड़ित अंग में सुई चुभाने जैसा दर्द और शूल होता है, तो उसे एकाँग वात, पक्षाघात या अर्द्धांग कहते हैं। इसमें एक तरफ का आधा शरीर शून्य हो जाता है। इसे फालिज भी कहते हैं। ‘अर्दितवात’ या लकवा इससे भिन्न होता है।

मूर्द्धन्य आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार वातव्याधि का आक्रमण प्रायः वर्षा ऋतु में, दिन और रात्रि के तीसरे प्रहर में तथा अन्न पचने पर एवं शिशिर ऋतु में, ठंडी के दिनों में अधिक होता है।

यहाँ पर उन वातव्याधियों की यज्ञोपचार प्रक्रिया का वर्णन किया जा रहा है, जिन्हें प्रायः हर कोई जानता है और सर्वाधिक संख्या में लोग इनसे प्रभावित एवं पीड़ित रहते हैं। ये हैं- 1. कटि स्नायुशूल्य या गृध्रसी, जिसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में ‘साइटिका’ के नाम से जाना जाता है। 2. आमवात या संधिशोध ‘रियूमेटाइड आर्थ्राइटिस’ 3. संधिवात या जोड़ों का दर्द ‘ओस्टिओ आर्थ्राइटिस’ 4. घुटने का शोध एवं दर्द सनोवाइटिस आफनी’ आयुर्वेद में इसे क्रोष्टुशीर्ष कहते हैं। 5. गठियावात या वातरक्त ‘गाउट’ 6. चेहरे का लकवा या अर्दित वात ‘फेशियल पैरालिसिस’ 7. पक्षापघात, अर्द्धांग या फालिज ‘हेमिप्लेजिआ’ 8. अधराँग घात ‘पैराप्लेजिआ’ जिसमें दोनोँ पैर लकवाग्रस्त हो जाते हैं।

आयुर्वेद में वर्णित ‘गृध्रसी’ रोग को ही एलोपैथी में ‘साइटिका’ कहते हैं। बोलचाल की भाषा में यह कमर, कूल्हे, जाँघ व पंजे का वात रोग, लंगड़ी का दर्द वायुपीड़ा, कुलंग का दर्द आदि नामों से जाना जाता है।

साइटिका अर्थात् गृध्रसी रोग का प्रमुख कारण रीढ़ की हड्डियों के बीच की कशेरुकाओं के मध्य की डिस्क का खिसक जाना माना जाता है, जिसे ‘स्लिप डिस्क’ कहते हैं। इसके कारण स्पाइनल कॉर्ड मेरुरज्जु से निकलकर पैर तक जाने वाली ‘सियाटिका नर्व’ पर आस-पास की अस्थियों का अधिक दबाव पड़ता है जिससे कमर कूल्हे व पैर का दर्द होता है। रीढ़ की हड्डी में संक्रमण, हड्डियों की अभिवृद्ध, शोध आदि कारणों से भी साइटिका रोग हो जाता है।

यह व्याधि कमर से लेकर जाँघ, घुटने तथा पैर के टखने तक फैली होती है। इसमें कूल्हे की संधि, कमर, पीठ, उरु, जंघा एवं पैर में अर्थात् कमर से लेकर एड़ी तक अंगों में जकड़न तथा सुई चुभाने जैसी पीड़ा होती है। दर्द कभी हलका तो कभी तेज होता है, जिससे रोगी को खड़ा होना तक मुश्किल हो जाता है। दर्द किसी समय पैर में और घुटने के पिछली तरफ से होता हुआ टखने तक जाता है, जिसके कारण चलने में लंगड़ापन होता है और जानुसंधि के पीछे जाँघ की पेशियों को छूने तक में असाध्य दर्द अनुभव होता है। झुकने, छींकने, खाँसने आदि के समय दर्द बढ़कर और तीव्र हो जाता है। इस रोग में दर्द के साथ-साथ अंगों में बार-बार स्पंदन होता रहता है। साइटिक रोग प्रायः चालीस-पचास वर्ष की आयु वालों को होता है और प्रायः एक ही ओर होता है, दोनों ओर कभी-कभी ही देखा जाता है।

साइटिका वातव्याधि के उपचार के लिए जो हवन सामग्री तैयार की जाती है, उसमें निम्नलिखित जड़ी-बूटियाँ मिलाई जाती हैं-1. ग्वारपाठे की जड़ 2. सलई की गोंद 3. सलई की छाल 4. निर्गुंडी 5. पुनर्नवा 6. अश्वगंधा 7. डवत्रक 8. नागरमोथा 9. मुलहठी 10. हरसिंगार के पत्ते 11. दशमूल अर्थात् सारेवन पिठवन, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, गोक्षरु, बेल, सोनापाठा, गनियार (अग्निमंथ), गंभारी और पाढल की छाल 12. रास्ना 13. बालछड़ (जटामाँसी( 14. सहजन (मुनगा) की छाल 15. मेथी के बीज 16. तेज पत्रक 17. धमासा 18. गुग्गल 19. विदारीकंद 20. केवाकंद 21. अखरोट की छाल, फल (मींगी) 22. पोंठ 23. देवदार 24. एरंड की जड़ 25. सुरंजना मीठी 263. विधारा 27. काली हल्दी 28. गिलोय 29. खिरेटी 30. अमलतास फल का गूदा 31. बकायन की आँतरिक छाल 32. मेढ़ासिंगी 33. ऊंटकटारा की जड़ 34. पोहकरमूल 35. पीपरामूल 36. तगर 37. कायफल।

उपर्युक्त सभी चीजों को बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीस कर जौकुट पाउडर बना लिया जाता है। हवन करते समय इसी सामग्री में पहले से तैयार की गई काँमन-हवन सामग्री नंबर-1 को भी समान मात्रा मिला लेते हैं। इस नंबर-1 सामग्री को अगर, तगर, देवदार, रक्त चंदन, सफेद चंदन, गुग्गल, लौंग, जायफल और असंगध की बराबर मात्रा लेकर बनाया जाता है। वातव्याधि में हवन करते समय आहुतियाँ प्रदान करने का मंत्र सूर्य गायत्री मंत्र प्रयुक्त होगा। सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार हैं- ‘ऊं भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।

यहाँ एक बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि शीघ्र लाभ के हवन के साथ-साथ उपर्युक्त 37 चीजों से बने पाउडर को खाना भी अनिवार्य है। इसके लिए इन 37 चीजों से बने जौकुट पाउडर की कुछ मात्रा को अधिक बारीक पीसकर कपड़छन कर लेना चाहिए और एक काँच के बर्तन या प्लास्टिक के डिब्बे में अलग रख लेना चाहिए। हवन के पश्चात इस पाउडर को सुबह-शाम एक-एक चम्मच शहद के साथ रोगी व्यक्ति को नित्य नियमित रूप से खिलाना चाहिए। ‘काँमन हवन सामग्री नंबर 1’ को खाने में प्रयुक्त नहीं करते, वरन् मात्र हवन में ही प्रयुक्त करते हैं। कुछ लोगों को पाउडर खाने में प्रायः अरुचिकर लगता है, अतः ऐसी स्थिति में उक्त पाउडर का क्वाथ बनाकर पीना चाहिए।

क्वाथ बनाने का सही तरीका यह है कि उक्त 37 चीजों से बने जौकुट पाउडर या सूक्ष्मीकृत चूर्ण की 30 ग्राम से 50 ग्राम तक की मात्रा में भिगो लेकर शाम को स्टील के एक वर्तन में लगभग एक लीटर पानी में भिगो देना चाहिए और सुबह उसे गैस चूल्हे, स्टोव या सामान्य चूल्हे पर मंद आँच में उबलने देना चाहिए। जब एक चौथाई पानी रह जाए, तो काढ़े को उतारकर ठंडा होने तक छोड़ देना चाहिए। इसके बाद महीन कपड़े से अच्छी तरह दबाकर छान लेना चाहिए। इसकी आधी मात्रा सुबह एवं आधी मात्रा शाम को एक चुटकी भर पिप्पली चूर्ण मिलाकर पी लेना चाहिए।

साइटिका रोग प्रायः कब्ज बने रहने, अमीवाइसिस होने अर्थात् पेट में आँव बनते रहने के कारण अधिक कष्टप्रद होता है। अतः अच्छा होगा कि हवन करने और चूर्ण या क्वाथ लेने से पूर्व सबसे पहले पेट की सफाई कर ली जाए। इसके लिए रात्रि में सोते समय कैस्टर ऑयल अर्थात् एरंड तेल-10 मिली. (2 छोटे चम्मच) एक गिलास गुनगुने जल में अच्छी तरह मिलाकर रोगग्रस्त व्यक्ति को पी लेना चाहिए। पेट साफ हो जाने पर दवा का प्रभाव शीघ्र होता है। भोजनोपराँत कोई पाचक द्रव्य जैसे महाशंखवटी आदि ली जा सकती है।

सरसों तेल-1 कि. 2. मेथी बीज-8. ग्राम 3. धतूरा बीज-80 ग्राम 4. कनेर जड़-80 ग्राम 5. कुचला-80 ग्राम 6. आक की जड़-80 ग्राम 7. भाँग की पत्ती (निजमा)-80 ग्राम 8. लहसुन-40 ग्राम 9. अतीस-15 ग्राम 10. कायफल-100 ग्राम 11. मिर्च बीज-12 ग्राम 12. अजवायन-15 ग्राम 13. कलिहारी-5 ग्राम 14. भिलावा-10 ग्राम 15. कंटकारी-10 ग्राम 16. प्रियंगुबीज-5 ग्राम 17. तंबाकू-2 ग्राम 18. शंखिया-2 ग्राम 19. अफीम-2 ग्राम।

उक्त 19 चीजों को कूट-पीसकर बारीक कर लें। तदुपराँत सभी को एकसार करके तेल में डालकर मंद आँच में पकने दें। जब ये सभी औषधियाँ तेल में अच्छी तरह से जल जाएं, तब कड़ाही उतारकर ठंडा होने दें। इसके बाद छानकर अलग बर्तन में रख लें और उस तेल में 1. पिपरमिंट-40 ग्राम 2. कपूर-80 ग्राम 3. अजवायन सत-40 ग्राम और 4. मेथाइल सेलिसिक एसिड-30 ग्राम डालकर अच्छी तरह मिला दें। तेल प्रयोग हेतु तैयार है। कड़ाही में नीचे जो अवशेष या कीट (जला हुआ पदार्थ) बचता है, उसे भी सुरक्षित रख लेना चाहिए।

मालिश करते समय हाथ को बार-बार अंगीठी में गर्म करते रहना चाहिए। इससे तुरंत लाभ मिलता है। मालिश करने के बाद सुरक्षित अवशेष को हलका कुनकुना करके पीड़ित अंग पर फैलाकर ऊपर से कपड़ा बाँध देना चाहिए। यह क्रम साइटिका के दर्द मिटने तक रोज करते रहना चाहिए। यह तेल सभी प्रकार की वातव्याधियों में लाभकारी है। खट्टी एवं ठंडी चीजें दही, अचार, छाछ, उड़द की दाल, कार्बाइड से पके हुए फल आदि का सेवन नहीं करना वातव्याधि से छुटकारा पाने का सर्वोत्तम उपाय है।


प्रकृति के प्रकोपों से कैसे बचें

मनुष्य ने विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ की है, हिमालय क्षेत्र भी उससे अछूता नहीं रहा है। देश का यह अत्यधिक संवेदनशील भूभाग पर्यावरणीय विनाश के दौर से गुजर रहा है। हिमालय की कोमल हरियाली को रौंदते विलासी पर्यटक एवं पर्वतारोही तथा इसके वनों की अंधाधुँध कटाई करते लालची मानव ने इसके हरे कवच को बेतहाशा नुकसान पहुँचाया है। ज्ञातव्य हो कि पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से इस क्षेत्र में 60 प्रतिशत वन संपदा का आच्छादन अनिवार्य था, लेकिन वनों के अंधाधुँध विनाश ने इस सीमा को कबका लाँघ दिया है। उपग्रहों से प्राप्त चित्रों के अनुसार आज इसमें 20 प्रतिशत से भी कम वन क्षेत्र शेष बचा है। इस स्थिति से उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन, हिमालय क्षेत्र में बादल फटने से लेकर प्रलयंकारी बाढ़ व ग्लेशियर पिघलने से लेकर नदियों में जल संकट की विपन्नताओं के रूप में अपना कहर बरपा रहा है।

उत्तराँचल व हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाएं भयंकर तबाही का दृश्य प्रस्तुत कर रही है। पिछले वर्ष अगस्त माह में उत्तराखंड के धर्मगंगा जल ग्रहण क्षेत्र में बादल फटने की घटना के परिणामस्वरूप आई बाढ़ ने धर्मगंगा जल ग्रहण क्षेत्र में अब तक यह सबसे भयंकर बाढ़ थी, लेकिन जल स्तर इतना नहीं था। इसी तरह 19 जून की रात को रणखंडी खड्ड में बादल फटने के रूप में प्रकृति का प्रकोप बरसा था। जिसके परिणामस्वरूप आई बाढ़ से बड़े पैमाने पर खेत-खलिहान, पुल, स्कूल भवन, चक्कियों व विद्युत, पेयजल योजनाओं को भारी क्षति हुई थी तथा दो किमी. लंबी झील बन गई थी।

इसी तरह गतवर्ष अगस्त माह में हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले की उच्च पर्वत श्रृंखलाओं में बादल फटने की घटना घटी। इससे यहाँ की आँध्रा नदी में अचानक आई बाढ़ ने विनाश को जो ताँडव किया, उसमें 139 आदमी बह गए, दर्जनों लोग घायल हुए। पूरा रोहडू उपमंडल समूचे देश से बिलकुल कटा रहा। इस दुर्घटना में 70 करोड़ रुपये के नुकसान होने का अनुमान है। इसके अतिरिक्त प्राँत के विभिन्न भागों में व्यापक वर्षा, बाढ़, भूस्खलन एवं आकाशीय बिजली गिरने से भारी तबाही हुई। इसी तरह पिछले वर्षों बादल फटने के कारण आई बाढ़ से पर्वतीय घाटी में स्थित शाट गाँव का नामोनिशान ही मिट गया था। पूरा-का-पूरा गाँव, खेत एवं मकानों के साथ पार्वती नदी में बह गया था।

बादल फटने के रूप में बरसने वाले प्रकृति के प्रकोपों का कारण खोजने वाले पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इसका वृक्षों के कटने से गहरा संबंध है। वनस्पति विशेषज्ञों का कहना है कि आए दिन बादल फटने व उससे होने वाली तबाही को कम करने के लिए समुद्र तल से 4000 से 8000 फुट की ऊंचाई पर अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाए जाने चाहिए। उनके अनुसार रूस व आल्पस के पर्वतीय क्षेत्रों में भी एक समय बादल फटने की घटनाएं जब-तब होती रहती थीं। खोजने पर पाया गया कि ये घटनाएं एक निश्चित ऊंचाई वाले क्षेत्र में वृक्षारोपण किया गया। अब आधी शताब्दी से वहाँ इस तरह की प्राकृतिक दुर्घटनाएं नहीं सुनाई देती।

हिमालय क्षेत्र में वनों के कटाव के कारण बरसात में वर्षा का 70 से 75 प्रतिशत जल नदियों में बह जाता है, जो मैदानों में बाढ़ का कारण बनता है। असम, बिहार की तरह पंजाब, हरियाणा व उत्तरप्रदेश भी हिमालय से निकलने वाली नदियों की उपत्यिका में बसे हुए हैं।

तिब्बत पर चीन का आधिपत्य होने के बाद ब्रह्मपुत्र के जलग्रहण क्षेत्र में जिसका बड़ा भू-भाग तिब्बत में है, जंगलों की बेरहमी से कटाई हुई है। अरुणाचल में पेड़ों की कटाई पिछले कुछ ही वर्षों में तीव्र हुई है। नेपाल में वन विनाश चरम सीमा पर पहुँचा है। भूटान में इसकी शुरुआत हुई है। जम्मू, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तराँचल के पर्वतीय क्षेत्र पहले ही वनों की कटाई के लिए कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं।

देश में बाढ़ की प्रथम दस्तक पूर्वोत्तर के असम राज्य में होती है। असम के जीवन की पर्याय ब्रह्मपुत्र नदी तथा उसकी सहायक नदियाँ जून के प्रथम सप्ताह में ही विनाश करने लगती है। हर वर्ष लाखों बाढ़ पीड़ित शरणार्थी इधर-उधर भागते हैं। असम में ब्रह्मपुत्र की बाढ़ इतनी तबाही लाती है कि वहाँ औसतन चार व्यक्तियों में एक बाढ़ की त्रासदी झेलता है।

बिहार देश का सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त क्षेत्र है। राष्ट्रीय सिंचाई आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के 400 लाख हेक्टेयर बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में 70 लाख हेक्टेयर भू-क्षेत्र बिहार में है। जो देश का 17.5 प्रतिशत है। 1954 में बिहार का बाढ़ग्रस्त क्षेत्र 25 लाख हेक्टेयर था। इसमें क्रमशः वृद्धि हुई है। 1971 में यह 45 लाख हेक्टेयर व 1987 में बढ़कर 64.61 में लाख हेक्टेयर हो गया। आज 70 लाख हेक्टेयर तक अर्थात् प्राँत का 41.27 प्रतिशत भाग बाढ़ प्रभावित हो गया है। बूढ़ी गंडक को छोड़कर उत्तर बिहार में बहने वाली किसी भी नदी का उद्गम बिहार नहीं है। कोसी (गंडक), बागमती, कमला, बलान, महानंदा, अधवारा समूह की नदियाँ उत्तर-बिहार के मैदानी भागों में नेपाल से हिमालय की तराई से आती है। कुछ नदियाँ तिब्बत से आती हैं। ये सभी नदियाँ उत्तर-बिहार से होते हुए गंगा में गिरती है। इनका 61 प्रतिशत विनाश के साथ ही क्रमशः नदियों में बाढ़ की स्थिति भी बिगड़ती जा रही है।

हिमालयी क्षेत्र में वन विनाश एवं पर्यावरण असंतुलन के कारण उत्पन्न बाढ़ का एक उदाहरण है-20 जुलाई 1972 की अलकनंदा में आई प्रलयंकारी बाढ़। बाढ़ का प्रभाव हनुमान चट्टी के पास अलकनंदा में तथा रेणी में धोलीगंगा के संगम से लेकर 230 किमी. दूर हरिद्वार और पथरी तक पड़ा था। बाढ़ में अलकनंदा के अमरी जलग्रण्हा क्षेत्र में व्यापक स्तर पर जन-धन की हानि हुई थी। इसी मौसम में मूसलाधार वर्षा तो अलकनंदा के दायीं ओर भी हुई थी, लेकिन वन विनाश से अछूता होने के कारण यहाँ इस तरह के किसी प्रकृति प्रकोप की नौबत नहीं आई।

इसी तरह देवताओं की घाटी कुल्लू-मनाली में सितंबर 95 में अपने इतिहास की सबसे विध्वंसक बाढ़ आई थी। जिसमें हजारों वृक्ष, सैकड़ों एकड़ फल वृक्ष व कृषि भूमि, मकान एवं सड़कें बह गए थे। इस क्षेत्र में जंगलों का विनाश बड़ी तेजी से हुआ है। इस कारण पिछले वर्ष भी बाढ़ की विपत्ति का सामना करना पड़ा है।

समूचे देश में बाढ़ के कारण उत्पन्न प्रलयंकारी स्थिति का खतरा हर वर्ष बढ़ता जा रहा है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 1951 में देश का एक करोड़ हेक्टेयर भू-क्षेत्र बाढ़ ग्रस्त था। 1960 में यह ढाई करोड़ हेक्टेयर, 1978 में 3.4 हेक्टेयर तथा 1980 में बढ़कर 4 करोड़ हेक्टेयर हो गया। पिछले वर्ष आई बाढ़ में साढ़े नौ सौ से अधिक लोगों के मरने, 3 लाख मकान ढहने, चार लाख हेक्टेयर भू-क्षेत्र में खड़ी फसल नष्ट होने की घटनाएं हुई व लगभग सात करोड़ हेक्टेयर भू-क्षेत्र बाढ़ग्रस्त हुआ।

वर्षा द्वारा बाढ़ के नियमन हेतु वृक्षों का हरियाली भरा भू-आवरण बहुत ही सहायक है। भारत में वर्षा की प्रकृति के कारण इसकी महत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है। मौसम विज्ञानी पी.आर. पिशारेटी भारत व यूरोप में वर्षा के लक्षणों के बारे में महत्त्वपूर्ण अंतर बताते हुए कहते हैं कि यूरोप में पूरे वर्षभर वर्षा धीरे-धीरे होती रहती है। इसके विपरीत भारत के अधिकतर क्षेत्रों में वर्षा वर्ष के 8760 घंटों में से मात्र 100 घंटे में ही होती है। इसमें से कुछ समय मूसलाधार वर्षा होती है। इसमें से कुछ समय मूसलाधार वर्षा होती है। इस कारण आधी वर्षा केवल 20 घंटों में ही हो जाती हैं, जबकि यूरोप की वर्षा की सामान्य बूँद काफी छोटी होती है। इस कारण भूमि को काटने की क्षमता यहाँ की वर्षा में कम होती है। दूसरा यूरोप में बहुत-सी वर्षा बर्फ के रूप में गिरती है, जो धीरे-धीरे मिट्टी में समाहित होती है। भारत में तेजी से गिरने वाली बहुत सी वर्षा में मिट्टी को काटने व बहाने की बहुत अधिक क्षमता होती है। इसका परिणाम यह होता है कि वृक्षाच्छादन के अभाव में अधिकाँश जल मिट्टी के साथ नालों में बह जाता है, जो उफनकर आगे बाढ़ का रूप लेता है। वनभूमि जल का अधिकतम अवशोषण करती है, जो भू-क्षरण के साथ अनावश्यक बहाव को रोकती है। वन, वृक्ष व हरियाली वर्षा के वेग को पहले अपने ऊपर लेकर धीरे से उतारते हैं। मिट्टी को कटने नहीं देते। दूसरा जल को ग्रहण कर पृथ्वी के नीचे के जल भंडार में वृद्धि करते हैं।

बरसात में हिमनदियों ने जहाँ बाढ़ का संकट पैदा किया वहीं हिमालय में बर्फ कम पिघलने के कारण जल संकट पैदा हुआ है। जल की कमी से सर्वाधिक प्रभावित नदियों में गंगा, यमुना, घाघरा व शारदा नदी है। पानी की कमी का इतना संकट पहली बार पड़ा है। पिछले वर्ष नरोरा में गंगा नदी की जल उपलब्धता का आकलन चौंकाने वाला रहा। यहाँ अप्रैल के द्वितीय पक्ष में पिछले वर्ष की अपेक्षा 57 प्रतिशत जल था। मई के प्रथम पक्ष में इसकी मात्रा 45 प्रतिशत रही। मई के द्वितीय पक्ष में गत वर्ष की अपेक्षा मात्र 43 प्रतिशत जल उपलब्ध था। जून के प्रथम पक्ष में स्थिति और बिगड़ गई। गतवर्ष की अपेक्षा गंगा में जल की मात्रा 49 प्रतिशत ही रही।

ऐसे ही घाघरा नदी में गतवर्ष की अपेक्षा मात्र 54 प्रतिशत जल उपलब्ध रहा। शारदा नदी में अप्रैल के प्रथम पक्ष में जहाँ 26 प्रतिशत कमी थी, अप्रैल के द्वितीय पक्ष में 28 प्रतिशत कमी रही। इसी तरह यमुना नदी में भी जल की मात्रा में 15 प्रतिशत कमी आई। जल की मात्रा में इस कमी का एक कारण जहाँ हिमालय क्षेत्र में बादलों के छाए रहने के कारण तापमान का न बढ़ना रहा, वहीं दूसरा कारण वनों के विनाश के कारण हिमालय क्षेत्र के हरित आवरण का उजड़ना भी है। ऐसी भूमि की जल अवशोषण क्षमता बहुत घट जाती है, जिसके कारण पृथ्वी के अंदर भंडारित जल की कमी के कारण नदियों को अप्रत्यक्ष रूप से मिलने वाले जल की मात्रा भी घट जाती हैं।

वृक्षों के घटते आवरण के कारण वायुमंडल का तापमान भी बढ़ रहा है। गंगा नदी का प्रमुख स्रोत गंगोत्री-ग्लेशियर गत चार वर्षों में 800 मीटर पीछे हट गया है। 1935 में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के ब्रिटिश भू-विज्ञानी बी. आडेन के प्रथम सर्वेक्षण के अनुसार 19वीं सदी में यह मात्र 7.31 मीटर पीछे हटा। 1990 के बाद हर वर्ष यह 18 मीटर पीछे हट रहा है। इस गति से यदि इसका पिघलना जारी रहा तो 100 वर्षों में गंगा नदी, सरस्वती नदी की तरह विलुप्त न हो जाए। गंगोत्री के आगे भोजवासा क्षेत्र का नाम भोज वृक्ष के आधार पर पड़ा है। कभी यहाँ भोज के घने जंगल थे। आज यहाँ भोज वृक्ष का एक ठूँठ तक दिखाई नहीं देता। इन भोज वृक्षों का जहाँ पर्यावरणीय एवं आयुर्वेदिक दृष्टि से महत्व है, वहीं ये हमारी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में महत्वपूर्ण रहे हैं। हमारे ऋषियों ने इसी के पन्नों में अपने ज्ञान को सुरक्षित रखा था।

इसी तरह काठमाँडू के उत्तर में 50 किमी. दूर जीराल्या ग्लेशियर धीरे-धीरे पिघल रहा है। इसके उत्तर-पश्चिमी हिस्से में पिघलने की प्रक्रिया तेज हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके पिघलने से भयंकर विस्फोट हो सकता है। एक अनुमान के अनुसार इसमें आठ करोड़ घन मीटर जल विद्यमान है। इसके फटने से चार करोड़ घन मीटर जल बाहर निकलेगा। जिसकी बाढ़ का पानी बिहार में भी घुसकर तबाही कर सकता है।

विश्व का सर्वोच्च पर्वत हिमालय प्राचीनकाल से मानव सभ्यता संस्कृतियों का जनक, पोषक एवं संरक्षक रहा है, वहीं यह भी स्मरण रहे कि भौगोलिक दृष्टि से सबसे कम उम्र का पर्वत है। इसके विकास की प्रक्रिया सतत जारी है। इसका अधिकाँश भाग कठोर चट्टान न होकर कोमल मिट्टी है, जो वर्षा की तेज धार में आसानी से बह जाती है। इसके प्रति श्रद्धा भाव रखते हुए वृक्षारोपण द्वारा इसके हरीतिमा कवच को अधिकाधिक पुष्ट करते हुए इसके पर्यावरण की रक्षा करनी होगी, तभी हम प्रकृति के विविध प्रकोपों से बच पाएंगे व समस्त मानव जाति के गौरव मुकुट को सुरक्षित रख सकेंगे।


घर में रहकर भी संन्यास (Kahani)

एक राजा ने संन्यासी से कहा, राजकाज में बड़े झंझट हैं तथा संन्यास में निश्चिंतता। आप मुझे संन्यास की दीक्षा दे दीजिए। संन्यासी ने प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा दे दी। पर पूछा, राजकाज कौन करेगा? उत्तर मिला, किसी को दान कर दूँगा और अपने निर्वाह के लिए कुछ मेहनत मजूरी कर लूँगा।

संन्यासी ने कहा, राज मुझे दान कर दो। मेरे नौकर की तरह शासन की व्यवस्था चलाओ, कर्म से पलायन मत करो। वह तो अध्यात्म दर्शन का मूल है। तुम्हारे ऐसा करते रहने पर संन्यास भी सध जाएगा और गुरु का सौंपा हुआ काम करते हुए शांतिपूर्वक निर्वाह भी होता रहेगा। स्वामित्व को त्यागना और कर्त्तव्य को धर्म मानकर करते रहने से घर में रहकर भी संन्यास सध सकता है।


पीड़ा निवारण पहले शेष सेवा बाद में

भिक्षु कलम्भन ने धर्म प्रचार के लिए जाते समय प्रस्थान की घड़ी में भगवान् तथागत को प्रणाम किया। भगवान् तथागत ने अपने इस प्रिय शिष्य को दोनों हाथों से उठाया और हृदय से लगाते हुए कहा- वत्स! संसार बड़ा दुःखी है। लोग अज्ञानवश कुरीतियों से जकड़े हुए हैं। तुम उन्हें जागृति का संदेश दो। ध्यान रहे विचार क्रान्ति ही धर्म चक्र प्रवर्तन की धुरी है और आत्मकल्याण के साथ लोक कल्याण का महामंत्र भी।

अपने शास्ता की चरण धूलि को माथे पर लगाकर कलम्भन चल पड़े। दिन छिपने से कुछ पूर्व ही वह एक गाँव में जा पहुँचे। इस गाँव में महामारी का प्रकोप था। वहाँ के प्रायः सभी पुरुष बीमार पड़े थे। स्त्रियाँ उनकी सेवा-शुश्रूषा में व्यस्त थीं। बच्चों की त्वचा हड्डियों से चिपक गयी थी। ऐसा लग रहा था कि इस पूरे गाँव में किसी को भी न तो भर-पेट अन्न मिलता था और न ही उन्हें बीमारियों से लड़ने के लिए जीवन रक्षक औषधियाँ। शिक्षा की दृष्टि से भी उनमें से किसी को कोई चेतना न थी। सभी एक से बढ़कर एक म्लान-मलिन और दुःखी थे।

कलम्भन के गाँव में प्रवेश करते ही गाँव में जैसे आशा की एक किरण दिखाई दी। जिसने भी सुना भगवान तथागत के शिष्य कलम्भन अपने गाँव में आए हैं, वही उल्लसित हो उठा। विद्युत् गति से यह उल्लास भरा समाचार पूरे गाँव में फैल गया। सभी एक दूसरे से कहने बतियाने लगे- भगवान् तथागत के शिष्य भिक्षु कलम्भन हम सभी के दुःख दूर करने के लिए हैं। भगवान् शाक्य मुनि ने उन्हें स्वयं भेजा है। हम लोगों के दुःख निश्चय ही दूर होंगे।

श्रद्धालु ग्रामवासियों ने उनके लिए विश्राम की सुखद व्यवस्था कर दी। सभी ने रात्रि बड़ी प्रसन्नता एवं शान्ति से काटी। हर एक का मन आशान्वित था। प्रातःकाल बौद्धभिक्षु जब तक अपना ध्यान समाप्त करें, तब तक द्वार ग्रामवासियों की भीड़ से भर गया। भिक्षु कलम्भन जब बाहर निकले तब जरा-जीर्ण व्याधिग्रस्त ग्राम निवासियों को देखकर एक पल के लिए उनका मन क्षुब्ध हुआ, लेकिन दूसरे ही पल उन्होंने सभी को बैठने के लिए कहा।

सबको सामने बिठाकर उन्होंने उपदेश प्रारम्भ किया। तप का उपदेश, ज्ञानी बनने का उपदेश और सब से बढ़कर बुद्ध धर्म एवं संघ की शरण में जाने का उपदेश। पर आपत्ति के मारे ग्रामीणों को न बुद्धं शरणं गच्छामि समझ में आया और न ही धम्मं शरणं गच्छामि एवं संघं शरणं गच्छामि के महामंत्र।

हताश भिक्षु कलम्भन उल्टे पाँव चल पड़े। और अपने शास्ता के पास लौट कर बोले- भगवन्! पता नहीं मेरे में कुछ त्रुटि है अथवा फिर मेरे ज्ञानोपदेश में। यह भी हो सकता है प्रभु! कि ग्रामीणों में ग्रहणशील चेतना न हो। कारण जो भी हो, पर मेरा प्रयास पूर्णतया निष्फल रहा। भगवान् तथागत ने बड़ी धैर्य एवं सहिष्णुता से अपने प्रिय शिष्य की कथा सुनी। सब कुछ सुनकर वह एक पल के लिए चुप रहे, फिर उन्होंने आचार्य महाकाश्यप एवं जीवक भी बुलाकर कहा- देखो वत्स! तुम लोग उस गाँव में पहुँचकर ग्राम निवासियों के लिए औषधि एवं शिक्षा का प्रबन्ध करो।

तथागत की आज्ञा मानकर महाकाश्यप और जीवक वहाँ से चल पड़े। तब भिक्षु कलम्भन ने उनसे प्रश्न किया। भगवन्! आपने इन दोनों महानुभावों को तत्त्वोपदेश के लिए तो कहा ही नहीं। तथागत यत्किंचित् गम्भीर हुए और बोले- वत्स! समाज की प्राथमिक आवश्यकताओं और सुधार की मूल आवश्यकता को पूरा किए बगैर तत्त्वोपदेश सम्भव नहीं। वत्स आज की आवश्यकता स्वास्थ्य है, शिक्षा है। इसके बाद कुरीतियों एवं रूढ़ियों के संजाल से उन्हें मुक्त करना है। अभी उन्हें जीवन की आशा चाहिए। आज जिएँगे तो कल ये ही सम्यक् सम्बुद्ध बनेंगे। कलम्भन को सत्य समझ में आ गया। उसने भी सोचा कि कोरे धर्मोपदेश की अपेक्षा समाज सेवा कहीं अधिक श्रेयस्कर है।


हम बदलें तो दुनिया बदलें

आखिर मनुष्य बदलता क्यों नहीं? उसके चरित्र, चिंतन, और व्यवहार में वह श्रेष्ठता क्यों नहीं आ पाती, जिसके लिए कहा जाता है कि वह ईश्वर का अंशधर है? उसमें ईश्वरीय चेतना विद्यमान है, यह सत्य है, तो उसकी झलक-झाँकी मिलनी चाहिए, वैसी पवित्रता भी दीखनी चाहिए, लेकिन यथार्थ में यह सब दृष्टिगोचर होते नहीं, क्यों? यह प्रश्न सभ्यता और समाज के विकासकाल से दार्शनिकों के मन में उभरते और उन्हें आँदोलित करते रहे हैं।

यदि गहराई में उतरकर इस विचार करें, तो हम पाएंगे कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनशील है। स्थिर कुछ भी नहीं। ब्रह्माँड बदल रह है। दुनिया एक जैसी कभी नहीं रहती। समाज गतिशील है। वृक्ष वनस्पतियाँ भी समय के साथ-साथ पनपते बढ़ते, फलते-फूलते और आयु पूरी करके सूख जाते हैं। जीवधारियों की भी ऐसी ही गति है। स्वयं मनुष्य शरीर भी बदला रहता है। बचपन, यौवन, वार्द्धक्य और मरण यह अवस्थाएं वहाँ भी देखी जाती हैं। एक व्यक्तित्व की मूलसत्ता ही अपरिवर्तनशील क्यों है? जीवन से मृत्यु तक आखिर मनुष्य का स्वभाव बदलता क्यों बने रहते हैं। उसमें उदात्तता का समावेश क्यों नहीं हो पाता? प्रकृति के साथ यह विरोधाभास कैसा है?

मूर्द्धन्य मनीषी हेमिंग्वे से एक बार किसी ने पूछा कि मार्क्स ने जो साम्यवाद का दर्शन दिया है, उसकी सफलता के बारे में आप क्या सोचते है? उनका कहना था कि यह उत्तर जानने की तुलना में यह अच्छा होगा कि उन-उन देशों में जाकर देखा जाए कि किस तरह के कठोर नियंत्रण पर वहाँ की व्यवस्था टिकी हुई है। जहाँ पर छोटी-सी गलती के लिए प्राणहरण जैसे दंड का विधान है, वहाँ भी घोटाले और भ्रष्टाचार हो रहे हैं। भुखमरी और चोरी की समस्या वहाँ भी आम देशों की तरह है। जिस एकरूपता और समता को लेकर यह व्यवस्था बनाई गई थी और सोचा गया था कि रोटी, कपड़ा तथा मकान की दृष्टि से सब समान होंगे, वह आकाँक्षा पूरी कहाँ हो पाई? आदमी वहाँ भी बदल नहीं सका। जो कुछ बदलाव जैसा समाजवादी देशों में दीखता है। वह नियमन हटा नहीं कि अव्यवस्था फैली। इसलिए समाज को बदलने का वह प्रयास भी असफल रहा, ऐसा कहना गलत नहीं होगा। सचाई तो यह है कि मनुष्य जब तक नहीं बदलता, तब तक समाज के बदलने की कल्पना करना अर्थहीन है।

आज से पूर्व इस निमित्त कई क्राँतियाँ हुई। भगवान महावीर ने इसके लिए अहिंसा का दर्शन दिया। भगवान बुद्ध ने धर्मचक्र प्रवर्तन जैसी महाक्रांति की, पर दोनों ही क्राँतियाँ समाज और संसार के कुछ हिस्से को ही प्रभावित कर सकीं और सामयिक बनी रहीं। उस समय विशेष के गुजर जाने के बाद स्थिति पूर्ववत हो गई। मनुष्य और समाज में जो कुछ परिवर्तन दिखलाई पड़ रहा था, वह अस्थाई बना रहा। यह परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबना है। बौद्ध और जैन दर्शन अब भी हैं, पर वे अज मत-मताँतर से अधिक कुछ भी नहीं है। उसमें बदलाव करने की शक्ति नहीं रही। ऐसा क्यों हुआ?

इस पर विचार करने से ज्ञात होगा कि भगवान बुद्ध और महावीर के जमाने में जो कुछ कायाकल्प जैसा दीख पड़ा, वह आरोपित था, वह उनकी तेजस्विता का प्रभाव था। उसके कारण उनके अनुयायियों को कायाँतर का एक छद्म आवरण अपने ऊपर डालना पड़ा। वे न रहे, प्रत्यक्ष रूप से उनकी छत्रछाया न रही, तो वह कृत्रिम परिवर्तन भी समाप्त हो गया और सब कुछ पहले जैसा हो गया। इसलिए जब तक आदमी की मूलसत्ता में आमूलचूल परिवर्तन नहीं होता, तब तक बदलाव स्थाई नहीं हो सकता। मनुष्य के समग्र परिवर्तन के लिए मानवी अंतराल का संपूर्ण बदलाव जरूरी है। चाहे जिस भी काल में यह पूर्ण बदलाव आए, वहाँ मानवी अंतःकरण में क्राँति अवश्य घटित होगी। इससे कम में बदलाव एक खिलवाड़ बनकर रह जाएगा।

अब प्रश्न है कि यह बदलाव आए कैसे? क्या यह स्वयमेव घटित होगा? कोई पराशक्ति इसे कर गुजरेगी या परमेश्वर की अनुकंपा से संपन्न हो जाएगा? नहीं, ऐसी बात नहीं है। परिवर्तन जहाँ वहीं, जिस स्तर पर भी होता है, वहाँ उसके पीछे कोई-न-कोई निमित्त कारण अवश्य होता है। धरती पर दिन-रात नियमित रूप से होते रहते है। उसका कारण पृथ्वी अपनी धुरी पर हर 24 घंटे में एक बार घूम जाना है। रेडियो का बजना, पंखे का घूमना, रेफ्रिजरेटर में बर्फ का जमना, इन सबके मूल में उनमें प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा है। स्विच के दबते ही जब बिजली दौड़ती है, तो सारे यंत्र अपने-अपने कार्य करने लगते हैं और उसका प्रवाह बंद होते ही सभी निष्क्रिय दशा में आ जाते हैं। इसी प्रकार चक्रवात, भूकंप, ज्वालामुखी-विस्फोट जैसे विनाशकारी परिवर्तनों के पीछे भी सुनिश्चित भौतिक कारण है। तात्पर्य यह कि बिना कारण के कोई कार्य या परिवर्तन यहाँ संभव नहीं। इसलिए जब मानवी अंतराल के परिवर्तन की बात आती है और उत्कर्ष की दिशा में कदम बढ़ाने का सवाल सामने आता है, तो यहाँ भी प्रयास और पुरुषार्थ को सदैव स्मरण रखना होगा। निजी पराक्रम के बिना यह शक्य न हो सकेगा। जो इसके लिए प्रकृति प्रवाह पर आश्रित रहना चाहते और अपने पूर्णत्व की कल्पना करते हैं, उनकी बात और है। वे कितने जन्मों में और कितने लंबे काल में उक्त लक्ष्य को प्राप्त करेंगे, प्राप्त कर सकेंगे भी या नहीं, कहीं उनकी उन्नति, अवनति की दिशा में न मुड़ जाए और वे जन्मों पीछे किन्हीं निकृष्ट योनियों में न चले जाएं, इस संबंध में सही-सही कुछ भी कह पाना मुश्किल है। अतएव परिवर्तन संबंधी सहज प्रवाह वाली अवधारणा बहुत ही अनिश्चित और अविवेकपूर्ण है। विवेकवान लोग इतने लंबे काल तक इंतजार नहीं कर सकते और न यह खतरा मोल ले सकते हैं।

अब एक ही विकल्प शेष रहता है कि अपने को बदलने के लिए हम स्वयं से संघर्ष करें। आत्मपरिष्कार की साधना किसी महाभारत से कम नहीं है। उसमें क्षण-क्षण में मनोभूमि में आने वाली बुराइयों और दुष्प्रवृत्तियों से लोहा लेना और उन्हें परास्त करना पड़ता है। इसके लिए स्वयं को एक सतर्क सैनिक की भूमिका निभानी पड़ती है और कुविचारों के, दुर्भावनाओं के आते ही उन्हें धर दबोचना पड़ता है, ताकि उनकी मलिनता पटल पर हावी न होने पाए।

रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि लोटे की चमक को बनाए रखने के लिए उसे बार-बार माँजना पड़ता है, नित्य प्रति उसकी रगड़ाई करनी पड़ती है। इससे कम में चमक बनी नहीं रह सकती है। हाँ, यदि वह सोने का हो, तो बात दूसरी है। मनुष्यों के साथ विडंबना यह है कि स्वर्ण मनोभूमि वाले देवपुरुष करोड़ों में इक्के-दुक्के ही होते हैं, शेष सभी को जागरुक रहकर अंतःकरण की धुलाई-सफाई करनी पड़ती है, तभी ईश्वरीय आलोक की वास्तविक झाँकी आदमी में प्रकट होती है। इससे पूर्व उसकी आभा कषाय-कल्मषों के कारण दृश्यमान नहीं हो पाती। मनुष्य के जन्म-जन्माँतरों के संस्कार उस पर छाए रहते हैं। इन्हें घटाए-मिटाए बिना हम ईश्वर का राजकुमार कहलाने के अधिकारी नहीं बनते। ईश्वर के पुत्र को ईश्वर जैसा होना चाहिए। मानवी गरिमा उस दिव्यता को धारण करने में ही है, उससे पृथक रहने या उसकी जगह मलिनता आरोपित करने में नहीं। यह कृत्रिमता है, स्वाभाविक नहीं।

मानवी चेतना का सहज स्वभाव अपनी मूल सत्ता से एकाकार हो जाना है। यह कैसे हो? इसके लिए प्रबल पराक्रम करना पड़ेगा और वह सारे उपाय-उपचार पड़ेंगे, जिससे चेतना की गति ऊर्ध्वमुखी हो। यदि यह ऊर्ध्वमुखता निरंतर बनाए रखी गई, उसमें किसी प्रकार का अवरोध-अड़चन न आने दी गई, तो परमेश्वर की प्राप्ति सुनिश्चित है। यह मनुष्य का चरम विकास है। इस अवस्था को प्राप्त किए बिना आदमी में किसी भी स्तर का बदलाव आधा-अधूरा और अधकचरा ही कहा जाएगा। व्यक्ति का वास्तविक कायाकल्प और यथार्थ परिवर्तन भगवत्प्राप्ति के बाद ही पूरा होता है। यह समग्र परिवर्तन और संपूर्ण विकास है, पर इसके लिए यह शर्त सदा याद रखनी होगी कि परमात्मा को पाने के लिए परमात्मा जैसी पवित्रता चाहिए। इससे कम में न तो कभी कोई समाज बदला है, न आगे बदलने की उम्मीद है। धरती पर सतयुगी वातावरण की संभावना को साकार करने का एकमात्र आधार यही है कि मनुष्य अपनी क्षुद्रता को त्यागे, काम-क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष को तिलाँजलि दे और उच्च आदर्शवादिता अपनाए। साधारण से असाधारण एवं मानव से महामानव बनने का यही मूलमंत्र है।

आदमी के लिए असंभव कुछ भी नहीं। वह जिस भी किसी कार्य के लिए ठान लें, वहाँ सफलता अवश्यंभावी है। उसके संकल्प में इतना बल है कि पर्वत को भी समतल बना दे, फिर अपने आपे को बदलना क्योंकर कठिन होना चाहिए? वह सरल से सरलतम है और कठिन से कठिनतम भी। यह तो अपनी-अपनी दृष्टि है। जो उसे दुरूह मानकर भगवान भरोसे बैठे रहते हैं, उनके लिए तो क्या कहा जा सकता है लेकिन जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर हैं, ईश्वर केवल उन्हीं की सहायता करता है। इसलिए उत्कृष्टता की दिशा में हम एक कदम आगे बढ़ाएं, परमात्मा हमें अनेक कदम आगे बढ़ने में मदद करेंगे, यह सुनिश्चित है।


भविष्य कथन से आकार लेते आज के घटनाक्रम

‘दर्शं नु विश्व दर्शतं दर्श रथमपि क्षमि, एता जुषत में गिरः’ ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के पच्चीसवें सूक्त के इस अठारहवें मंत्र में दिव्य द्रष्ट ऋषि इस सत्य को घोषित करता है, ‘कि मैंने उस अदृश्य को देखा है। पृथ्वी पर अवतरित उसके सुवर्ण रथ को देखा है। उसने मेरी कविता स्वीकार कर ली है।’ निश्चित रूप से अदृश्य दर्शन की दिव्य दृष्टि भविष्यत् के दृश्य को देखने और उसे अपनी कविता का रूप देने में सक्षम है। 16वीं सदी में फ्राँस में जन्मे माइकल डी नास्त्रेदमस ऐसे ही दिव्य द्रष्ट थे। उन्होंने अपनी अतीन्द्रिय चेतना से भविष्य की झलक पायी और उसे अपनी कविताओं में पिरोया। ऐसी ही एक कविता में उन्होंने कहा था-

11 सितम्बर 2001 को अमेरिका के न्यूयार्क शहर में हुए आतंकवादी हमले में नास्त्रेदमस की कविता में निहित पीड़ादायक सच साकार हो गया। इस हमले में वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर की गगनचुम्बी इमारतें ही धराशायी नहीं हुई, इन्सान के भीतर भी बहुत कुछ टूटा, बिखरा और बहा। समूचे विश्व मानस में यह सवाल भी गहराया और घहराया कि आखिर पृथ्वी का, मानव जाति का भविष्य क्या है? इस सवाल के जवाब के लिए आज ज्यों-त्यों बातें बनाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए सार्थक-प्रामाणिक प्रतिपादन चाहिए।

युग निर्माण आन्दोलन एवं विचार क्रान्ति अभियान के प्रवर्तक परम पूज्य गुरुदेव का जीवन एवं उनके कथन इस कसौटी पर सबसे अधिक खरे उतरते हैं। उन्होंने वर्षों पहले ही आज की परिस्थितियों की विस्तृत व्याख्या एवं विवेचना प्रस्तुत कर दी थी। साथ ही मानवता के उज्ज्वल भविष्य का सुखद चित्राँकन भी किया था। विचारशीलों की जिज्ञासा हो सकती है, कि आखिर उनके इन कथनोँ का आधार क्या है? तो उत्तर उन्हीं के शब्दों में- ‘इस कथन प्रतिपादन के पीछे उच्चस्तरीय अध्यात्म की अनुभूतियाँ हैं, जिनमें घटित होने वाले घटनाक्रम का उल्लेख नहीं है, वरन् विश्व की भवितव्यता का निरूपण है। और बताया गया है कि प्रचण्ड प्रवाह किस दिशा में चल पड़ा है और वह भविष्य में जाकर कब, किस लक्ष्य तक पहुँच कर रुकेगा।’

तथ्य को और अधिक स्पष्ट करते हुए वह कहते हैं- ‘प्रस्तुत भविष्यवाणियों का पहला आधार है- अदृश्य जगत् का वह सूक्ष्म प्रवाह जो कुछ नयी उथल-पुथल करने के लिए अपने उद्गम से चल पड़ा है और अपना उद्देश्य पूरा करके ही रहेगा।’ वह आगे बताते हैं- ‘दूसरा आधार है- हमारा निज का संकल्प जो किसी उच्चस्तरीय सत्ता की प्रेरणा से महाकाल की चुनौती की तरह अवधारित किया गया है।’ (अ.ज्यो. फरवरी 1987, पृ. 63-64)

आज जिस विश्व व्यापी आतंकवाद से समूचा विश्व जूझ रहा है। परम पूज्य गुरुदेव ने उसे अपने जीवन काल में ही उपजते, पनपते, विस्तार करते और मिटते देख लिया था। उनके अनुसार यह सब तृतीय विश्वयुद्ध एवं खण्ड प्रलय जैसी विकट परिस्थितियों के बदले होने वाली चिह्न पूजा है। इस सम्बन्ध में उनके शब्द है- ‘(तृतीय विश्व युद्ध की) यह सम्भावना सार्थक नहीं होने दी जाएगी। अधिक से अधिक इतना हो सकता है कि प्रलय जैसा कुहराम मचाने वाली घटाएँ कहीं हल्की-भारी चिह्न पूजा करके वापस लौट जाएंगी।’

वह आगे कहते हैं- ‘महायुद्ध के स्थान पर उसका छुट-पुट स्वरूप आतंकवादी लुक-दुप आक्रमणों के रूप में दृष्टिगोचर होता रहेगा। यह नयी पद्धति इस युग की नयी देन होगी। आमने-सामने की लड़ाई शूरवीरों को शोभा देती थी, पर जब नीति मर्यादा का कोई प्रश्न ही नहीं रहा तो ‘मारो और भाग जाओ’ की छापामार नीति ही काम देगी। .........किन्तु यह भय मन में से निकाल ही देना चाहिए कि सर्वनाशी तृतीय महायुद्ध मानवी अस्तित्व को मिटाकर रहेगा। ....इस सम्बन्ध में हमें इतना ही समझ लेना चाहिए कि घटाएँ उठेंगी, घुमड़ेंगी और गरजेंगी तो बहुत, पर इतनी वर्षा होने के आसार नहीं हैं, जिसमें सर्वत्र प्रलय के भयानक दृश्य दिखने लगें।’ (अ. ज्यो. फरवरी 1987, पृ. 38)

फिर भी परम पूज्य गुरुदेव की दृष्टि में इस क्रम में सर्वाधिक उथल-पुथल वाला समय होगा- बीसवीं सदी के अन्त और इक्कीसवीं सदी के आगमन का समय। उनके अनुसार- यह जब अपनी परिपूर्ण स्थिति में होंगे, तब उनके बदलने में काफी देर लगेगी। यह समय क्रमिक गति से बदलेगा। परिवर्तन की धीमी गति से चलती हुई प्रक्रिया दिखाई देगी। इन्हें देखकर यह तो अनुमान लगाया जा सकता है कि समय की गति किस दिशा में चल पड़ी है। इस समय की गति को नयी दिशा में मोड़ने वाला समय क्या होगा? परिजनों के इस सवाल के उत्तर में यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त है कि जो अखण्ड ज्योति के नियमित पाठक हैं, उन्होंने अखण्ड ज्योति वर्ष 1989 के जून अंक के पृ. 57 का ध्यान होगा। इस पृष्ठ में प्रकाशित समाचार डायरी में एक शीर्षक प्रकाशित हुआ था निन्यानवे का फेर- क्या आखिरी फेर? इस शीर्षक के अंतर्गत चार्ल्स बर्लिट्ज की पुस्तक डूम्जडे; 1999 का उल्लेख है। इस पुस्तक के लेखक ने बाइबिल की भविष्यवाणियों एवं चिरपुरातन बेबीलोन की सभ्यता के अध्ययन द्वारा प्राप्त ज्योतिर्विज्ञान की गणना पर आधारित कैलेण्डर के निष्कर्षों का हवाला देते हुए लिखा है कि हमारे तारामण्डल का (वर्तमान) एक चक्र सितम्बर 2001 में पूरा होता है। और यही वह घड़ी है जब एक नए युग के जन्म की सम्भावनाएँ बनती हैं।

हालाँकि परम पूज्य गुरुदेव के अनुसार- ‘युग परिवर्तन की प्रक्रिया भी विश्व व्यवस्था को देखते हुए आश्चर्यजनक गति से बदलेगी। पर उस परिवर्तन की तीव्रता को यथा समय समझ सकना हर किसी के लिए कठिन पड़ेगा। इस सच्चाई को हृदयंगम करने में बहुत जोर लगाना पड़ेगा। 31 दिसम्बर सन् 2000 में रात्रि को सोते समय जो नजारे देखकर सोएँगे- वे 1 जनवरी सन् 2001 में सर्वथा बदले हुए दीखें, यह नहीं हो सकेगा। गति की तीव्रता को पहचानना सरल नहीं होता। धीमापन तो और भी अधिक समझने में जटिल होता है।’ (अ. ज्यो. फरवरी 1987, पृ.59)

इतने पर भी एक सत्य तो सर्व प्रत्यक्ष होकर उज्ज्वल भविष्य का अहसास दिलाएगा ही। वह सत्य यह होगा कि बुराई के पक्षधरों को, आतंकवादियों को ढूंढ़ने से भी शरण खोजे न मिलेगी। उनके मित्र भी उनसे किनारा काटेंगे। हितैषी उनसे दूर हटने में ही अपना कल्याण समझेंगे। समूचा विश्व उनके खिलाफ एक जुट होगा। आतंकवाद के खिलाफ एक कारगर जंग छिड़ेगी। इस सत्य को बताते हुए वह आगे कहते हैं- ‘एक-एक करके सभी संकट टल जाएँगे।’ (अ. ज्यो. जून 1984, पृ. 18)

इन सब परिस्थितियों की परिणति बताते हुए पूज्य गुरुदेव के शब्द हैं- ‘सघन तमिस्रा का अन्त होगा। ऊषाकाल के साथ उभरता हुआ अरुणोदय अपनी प्रखरता का परिचय देगा। जिन्हें तमिस्रा चिरस्थायी लगती हो, वे अपने ढंग से सोचे, पर हमारा दिव्य दर्शन उज्ज्वल भविष्य की झाँकी करता है। इस पुण्य प्रयास में सृजन की पक्षधर देवशक्तियाँ प्राण-पण से जुट गयी हैं। इस सृजन प्रयास के एक अकिंचन घटक के रूप में हमें भी कुछ कारगर अनुदान प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है।’ (अ. ज्यो. जून 1984, पृ. 18)। परम पूज्य गुरुदेव का यह दिव्य दर्शन इन्हीं दिनों साकार होने को है। इन दिनों होने वाले विश्व घटना क्रम इसी भविष्य कथा की भूमिका लिखने में लगे हैं।


विद्वानों की कमी न रहे (Kahani)

मुँबई के चौपाटी मैदान में लोकमान्य तिलक का स्वतंत्रता के समर्थन में बड़ा विद्वत्तपूर्ण भाषण हुआ।

उपस्थित लोगों में से कइयों ने कहा, ‘आप जैसे विद्वान किसी अन्य विषय पर खोजपूर्ण लेख लिखें या भाषण दें तो उसका प्रतिफल कितना शानदार हो।’

तिलक ने कहा, ‘स्वतंत्रता मिल गई तो मेरे जैसे कितने ही विद्वान लिखने और बोलने के लिए पैदा हो जाएंगे। अभी तो मुझे स्वतंत्रता के लिए काम करना चाहिए, जिससे विद्वानों की कमी न रहे।


निसिचर हीन महि का समय है यह

‘निसिचर हीन करौं महि’- यह प्रण काल के भी काल भगवान् महाकाल का है। जो विश्वमानवता का समवेत स्वर बनकर इन दिनों चहुँ ओर गूँज रहा है। 11 सितम्बर 2001 के दिन आतंकवादी असुरता ने अमेरिका में जो कुछ किया, उससे लाखों-आंखें ही नहीं छलकी-करोड़ों का आक्रोश भी उभरा। निःसन्देह ये आतंकवादी हमले बर्बरता और क्रूरता की पराकाष्ठा हैं। कुछ मिनटों में लगभग बीस-तीस हजार लोगों की मृत्यु और 200 अरब डालर की सम्पत्ति का नाश ऐसी घटना है, जिसने अमेरिकावासियों को ही नहीं सारी दुनिया को स्तब्ध कर दिया।

हालाँकि आतंकवादी असुरता के कहर की यह पहली घटना नहीं है। 1988 से सन् 2000 तक समूची दुनिया में आतंकवाद की 45 हजार से भी अधिक घटनाएँ घट चुकी हैं। इनमें से करीब 15 हजार लोगों के प्राण भी जा चुके हैं। इसमें 11 सितम्बर वाली घटना भी शामिल कर लें तो यह आँकड़ा 30 से 35 हजार तक जा पहुँचेगा। इस अवधि में 4 हजार लोगों का अपहरण हुआ, करीब 11 हजार घर तबाह किए गए और सैकड़ों पुल उड़ाए गए। अनेकों गगनचुम्बी इमारतों को नेस्तनाबूद कर दिया गया।

23 जून 1985 को जब इस आसुरी प्रकोप का शुरुआती दौर था, एयर इण्डिया का विमान गायब किया गया। 328 विमान यात्री मारे गए। भारत के दो शिखर नेताओं- इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की हत्या की गयी। श्रीलंका के कई शिखर नेताओं को आत्मघाती दस्तों ने उड़ा दिया। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की दृष्टि से पिछले दशक में प्रतिवर्ष तकरीबन 300 से 400 आतंकवादी घटनाएँ हुई। पर पिछले दिनों अमेरिका में हुआ आतंकवादी हमला तो जैसे आतंकवादी कहर की पराकाष्ठा थी।

यद्यपि पिछले दशक में इज़राइल के प्रधानमंत्री की हत्या कुछ कम दर्दनाक नहीं थी। मिश्र के राष्ट्रपति हुसनी मुबारक पर जानलेवा हमला किया गया। संयुक्त राष्ट्र के भवन को उड़ाने की कोशिश की गयी। टोक्यो की भूमिगत ट्रेन में आतंकवादियों ने जहरीली गैस छोड़कर 5 हजार से अधिक यात्रियों को मौत के कगार पर पहुँचा दिया। संक्षेप में शीतयुद्ध के दौरान और समाप्ति के पश्चात् भी अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय आतंकवाद की घटनाओं में कोई कमी नहीं आयी, बल्कि उल्टे इसकी नयी-नयी खौफनाक शक्लें उभरकर सामने आती गयी।

पिछले दो दशकों की हमारी राष्ट्रीय-सामाजिक एवं साँस्कृतिक जीवन यात्रा इन्हीं खौफनाक शक्लों की दहशत की मार झेलती आयी है। पहले पंजाब, फिर पूर्वोत्तर क्षेत्र और जम्मू-काश्मीर, कहीं कुछ भी तो ऐसा नहीं बचा जहाँ से चीत्कारें न उठ रही हों, जहाँ से आग की लपटें और बारूद का धुआँ न उठ रहा हो। यह सब कुछ इतना विकट और वीभत्स है कि देश का अस्तित्व और अस्मिता दोनों ही दाँव पर लगे हैं। इसमें दोष किसका, कितना और क्यूँ? इसकी व्याख्या बहुतों ने की और बहुतेरे कर रहे हैं। हम तो यहाँ महाकाल द्वारा उजागर किए जा रहे उस प्रकृति सत्य की बात कर रहे हैं, जो इन दिनों अपेक्षाकृत अधिक मुखर और प्रखर बनकर प्रकट हो रहा है।

और यह काल सत्य यही है कि जब परिस्थितियों पर इन्सान का बस नहीं रहता तो भगवान् महाकाल स्वयं ही युग प्रत्यावर्तन की बागडोर सम्भालते हैं। आज जिनके पास देखने वाली आँखें हैं, सोच-समझ सकने वाली बुद्धि है वे देख सकते हैं, सोच और समझ सकते हैं कि आतंकवादी असुरता को जन्म देने वाले को अपने वैभव और समृद्धि का अनुदान देकर उसका पालन-पोषण करने वालों को किस तरह मजबूरी और बेबसी में उनका विरोध करना पड़ रहा है। इन दिनों जो कुछ भी और जिस तरह भी हो रहा है, उसे उज्ज्वल भविष्य की प्रथम किरण और नवयुग के निर्माण का प्रथम चरण समझा जाना चाहिए।

घटनाओं का बाह्य स्वरूप अवश्य पीड़ादायक है। परन्तु यह सब मनुष्यता के विष को निचोड़ने का उपक्रम भर है। इस क्रम में दर्द की कराहटें अवश्य हैं, पर यही आगे चलकर स्वस्थ मानवीय जीवन का रूप ले लेंगी। आसुरी तत्त्वों और शक्तियों से संघर्ष की इस बेला में दैवी शक्तियों का एक पूरा समूह कार्यक्षेत्र में उतर पड़ा है। सूक्ष्मद्रष्टा इसे देख भी रहे हैं और अपनी भागीदारी भी निभा रहे हैं। इनमें से किसका, कितना परिचय किसे मिल सका इसका कोई महत्त्व नहीं है। महत्त्व इसका है कि आतंकवादी असुरता को कैसे-किस विधि से पराजित, परास्त और नेस्तनाबूद किया जाय।

विनाश का सरंजाम जुटाने वाले असुर निश्चित ही बलिष्ठ होते हैं, पर देवों की बलिष्ठता उसे कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी होती है। जो समय रहते मैदान में उतरते हैं और बिगड़ी को बनाकर ही दम लेते हैं। यह समय-समय पर भूतकाल में भी होता रहा है। और यही अब भी हो रहा है। महान् परिवर्तन के लिए देवशक्तियों की एक विशाल सेना युद्धक्षेत्र में उतर पड़ी है। इसकी गतिविधियों के परिणाम हम सब अगले ही दिनों अपनी आँखों से देखेंगे।

वर्तमान स्थिति जो कुछ भी है अपने भारत देश की महान् भूमिका में जाने से पूर्व की स्थिति है। भारत ने असुरता का पर्याप्त दंश झेला है और अभी भी वह इसके प्रभाव से गहरी पीड़ा में है। इन दिनों और आगामी कुछ वर्षों में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ जन्म लेंगी, जिससे उसकी पीड़ा दूर होगी। यही नहीं पीड़ा मुक्त भारत में कुछ ऐसी सृजन सामर्थ्य का विकास होगा, जिससे कि वह भावी नेतृत्व की नवीन भूमिका का सार्थक ढंग से निर्वाह कर सके। पर इन दिनों उसे पर्याप्त सावधानी स्वयं की शक्तियों को नष्ट होने से बचाना है। और उन्हें विकसित एवं समृद्ध करना है।

क्योंकि आज जो कुछ भी विश्व परिदृश्य में घटित हो रहा है। वह सिर्फ उतने तक ही सीमित नहीं रहेगा। आसुरी तत्त्व मरते-मरते भी काफी कुछ उत्पात मचाने से किसी भी तरह से न चूकेंगे। फिर भी सब कुछ के बाद ‘निसिचर हीन करौं महि’- इस धरती को राक्षसी तत्त्वों से रहित करने की युग प्रत्यावर्तन की योजना अवश्य पूरी होगी। क्योंकि यह स्वयं भगवान् महाकाल का प्रण है। इसके लिए जो और जैसा उचित होगा, प्रकृति वैसी व्यवस्था जुटाएगी। मानवीय योजनाएँ धरी रह जाएगी। सत्ता और शासन के नए गठजोड़ उभरेंगे। और थोड़ी बहुत ना नुकुर के बावजूद प्रायः सभी को आसुरी तत्त्वों एवं शक्तियों से लोहा लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। प्रकृति एवं परिस्थितियों का दबाव उनसे सहज ही वैसा करा लेगा।

बात कठिन है, लेकिन होना ऐसा ही है। ईश्वरीय कृतियों को हमेशा ही चमत्कार कहा जाता है। वह घोर अंधकार के बीच न जाने कहाँ से सूर्य का गरमागरम गोला निकाल देते हैं। चिर अभ्यास में आ जाने के कारण हालाँकि यह सब अजनबी नहीं प्रतीत होता। पर वस्तुतः है तो सही। आकाश में न जाने कहाँ से बादल आ जाते हैं और न जाने किस प्रकार बरस कर सारा जल-जंगल एक कर देते हैं। यह अचम्भा ही अचम्भा है। ऐसा कुछ अचम्भा इन दिनों भी होने जा रहा है। जिसकी अगली कड़ी विश्व चिन्तन में भारी उथल-पुथल के रूप में प्रकट होगी। विचार क्रान्ति ही इसकी दिशा निर्धारित करेगी और युग परिवर्तन को साकार रूप देगी।


प्रलोभन के बदले (Kahani)

बहुत समय पूर्व जापान में एक जिले के जिलाधीश थे, चाईसेन। उनके हाथ में सरकार ने बहुत सत्ता दे रखी थी।

एक व्यापारी अपना कुछ काम सरकार से निकालना चाहता था। इसके लिए जिलाधीश का सहयोग अपेक्षित था। व्यापारी अशर्फियों की थैली लेकर पहुँचा और बोला, ‘यह भेंट स्वीकार करें, मेरा काम कर दें। इस भेंट की बात कोई भी नहीं जान पाएगा।’

चाईसेन ने कहा, ‘यह कैसे हो सकता है कि कोई न जाने। आसमान, पृथ्वी मेरी आत्मा, तुम्हारी आत्मा और परमात्मा पाँच की जानकारी में जो बात आ गई, उस पाप का भेद तो खुल ही गया। कृपाकर अपनी अशर्फियाँ वापस ले जाइए, अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व को झुठलाना मेरे लिए किसी भी प्रलोभन के बदले संभव न हो सकेगा।


नवयुग आगमन की वेला में हो रहा विश्वमंथन

विश्व मन्थन की जिस घड़ी में आज हम सब जी रहे हैं, वह असाधारण है। इसकी प्रक्रिया भले ही अभी ऊहापोह भरी लगे, पर इसकी परिणति आश्चर्यजनक होनी है। इस समय को विधाता ने धरती और मनुष्य की भाग्य लिपि लिखने के लिए युगों के बाद चुना है। जिनकी अंतःसंवेदना जाग्रत् है, जो अन्तरिक्ष में उमड़ रही सूक्ष्म हलचलों को समझ सकते हैं, वे इन दिनों कुछ आश्चर्यजनक और अलौकिक होता हुआ देख रहे हैं। इन्हीं दिनों भगवान् महाकाल की रुद्र चेतना प्रचण्ड सौर शक्ति के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हो रही है। इस अवतरण के परिणाम स्वरूप धरती के इतिहास में ही नहीं भूगोल में भी बदलाव आया है। हालाँकि यह प्रक्रिया लम्बी है इसे लम्बे समय तक चलना है, फिर भी इन पलों का महत्त्व कुछ अलग ही है। क्योंकि इक्कीसवीं सदी में अभिनीत होने वाली सृजन कथा की भूमिका इन्हीं दिनों लिखी जाती रही है।

हमेशा ही असाधारण समय के कर्त्तव्य भी असाधारण होते आये हैं। राजनीति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था सभी कुछ विश्वमन्थन की महाहलचलों से प्रभावित हैं। जिसे संवारना-दिशा देना उस क्षेत्र विशेष के विशिष्टों, वरिष्ठों एवं विशेषज्ञों का दायित्व है। उनमें से जो अपने दायित्व को सच्चाई, ईमानदारी एवं विश्वमानवता के प्रति समर्पित भाव से निभाएँगे, उन्हें भगवान महाकाल अपनी आगामी सृजन योजना के लिए चुनेंगे एवं विशेष दायित्व सौंपेंगे। परन्तु जिनकी बुद्धि मोह एवं भ्रष्टाचार के पंक से अभी भी नहीं निकल पा रही है, उन्हें सृजन शक्तियाँ सर्वथा अप्रासंगिक बनाकर एक ओर कूड़े के ढेर में डाल देंगी।

लेकिन इन सभी से कहीं अधिक विशेष दायित्व उनका है, जो ईश्वर विश्वासी और अध्यात्म परायण हैं। इनमें से भी उनका दायित्व तो और भी अधिक बढ़ जाता है, जिन्हें प्रज्ञावतार ने अपना अंग-अवयव कहा और माना है। विश्वमन्थन की इस घड़ी में उन्हें प्रज्ञावतार की कारण सत्ता के प्रखर तप में अपने भी तप-प्राण घोलने हैं। इस महामन्थन में उन्हें भी देव शक्तियों के पक्षधर बनकर अपनी भागीदारी निभानी हैं। जब पल चुनौती भरे हों तो शूरवीर कहीं कोने में दुबककर सिमटे-सिकुड़े नहीं बैठे रहते। पलायन तो कायरों और डरपोकों को ही शोभा देता है। तपस्वी तो हमेशा ही प्रचण्ड पौरुष का मूर्तिमान रूप होते आए हैं। उन्हें भला ऐसे में असुरता से दो-दो हाथ किए बिना चैन कहाँ? और फिर तब तो उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, जब देव सेना के महानायक बने श्रद्धेय गुरुवर ने अपनी शिष्य-सन्तानों और देवत्व के पक्षधरों को अपने प्रचण्ड तप में भागीदार बनने के लिए संकेत दिए हों।

‘तप’ दो अक्षरों का शब्द भर नहीं है, यह वह महाशक्ति है, जो हमेशा ही असुरता के उद्दाम एवं प्रचण्ड वेग को घुटने टेकने के लिए मजबूर करती आयी है। इतिहास और पुराणों में इसके आश्चर्यजनक प्रभावों के उदाहरण भरे पड़े हैं। अगस्त्य एवं विश्वामित्र के महातप ने रावण और उसके संगी साथियों के दिल दहला दिए थे। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के माध्यम से इन्हीं महर्षियों की तपशक्ति क्रियाशील थी, जिसने देखते-देखते समूचे युग को आसुरी प्रभावों से मुक्त कर दिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर के प्रचण्ड आसुरी वेग को जब महर्षि अरविन्द ने अपने तपशक्ति से टक्कर दी, तो उसे मिटते ही बना। स्वयं परम पूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन काल में राष्ट्रीय एवं मानवीय संकट के समय अपने तप के प्रचण्ड प्रभाव से संकटों के महापर्वतों को रौंद-मसलकर धूल में मिला दिया।

उनकी सक्रियता अभी थमी नहीं है। वह अभी भी तप-निरत हैं। बस हमें भी ग्वाल बालों की भाँति गोवर्धन के नीचे आकर खड़ा होना है। इससे हमें सुरक्षा एवं श्रेय दोनों ही मिलेगा। साथ ही देवशक्तियों के ऐसे अगणित अनुदान हम पर बरसेंगे, जिससे हमारा जीवन धन्य और कृतकृत्य बन सके। प्रज्ञावतार की पराचेतना से प्रेरित तप के इस विशिष्ट अनुष्ठान का स्वरूप जटिल होते हुए भी अपने प्रभाव में प्रचण्ड ऊर्जा उत्पादक एवं असुरता के लिए भयकारक एवं संहारक है। इसको शामिल होने के लिए जाति-वर्ग, आयु एवं स्थान का कोई बन्धन नहीं है। हर कोई अपने स्थान पर रहते हुए अपनी नियमित दिनचर्या का निर्वाह करते हुए इसे कर सकता है।

इसके लिए भागीदार स्त्री-पुरुष सभी अपनी नियमित साधना के साथ रुद्र गायत्री मंत्र की एक माला असुरता के संहार के लिए करें। इस विशेष जप में रुद्र गायत्री महामंत्र के साथ क्लीं बीज का संपुट लगाएँ। यह संपुटित रुद्र गायत्री मंत्र है- “ॐ क्लीं क्लीं क्लीं पंचवक्त्राय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं क्लीं ॐ।” इस संपुटित महामंत्र के जप के साथ यह गहन भावना रखें कि हम प्रज्ञावतार परम पूज्य गुरुदेव की तप साधना में विशिष्ट भागीदार हैं। और हमारी तप ऊर्जा उनकी तपश्चेतना के साथ एक होकर आतंकवादी असुरता का संहार और विश्व कल्याण कर रही है। इस महाप्रयोग को करते समय हमारी गहन आस्था यह भी रहे कि हम और हमारे सभी परिजन परम पूज्य गुरुदेव के तप-तेज से सुरक्षित हैं। भगवान् सूर्य की रश्मियाँ शक्ति किरणें बनकर हमें अजस्र ऊर्जा अनुदान दे रही हैं।

इस साधना अनुष्ठान का दूसरा चरण रुद्र गायत्री महामंत्र से दी आहुतियों के रूप में है। इन आहुतियों की संख्या अपने समय एवं सामर्थ्य के अनुसार पाँच या ग्यारह हो सकती है। रुद्र गायत्री के साथ पाँच या ग्यारह की संख्याएँ विशेष शुभ योग देती हैं। क्योंकि शास्त्रानुसार भगवान् रुद्र पंचमुखी हैं और उनके रूप ग्यारह हैं। तभी शास्त्रकारों ने एकादश रुद्रों की चर्चा की है।

इस अनुष्ठान साधना को करने वाले ध्यान रखें कि जिस-तिस तरह जप संख्या पूरी कर लेने का नाम साधना नहीं है। जप संख्या तो ज्यों-त्यों करके कोई भी खाली समय में पूरा कर सकता है। पर विलासी एवं अस्त-व्यस्त दिनचर्या अपनाने वाला व्यक्ति उतनी भर चिह्न पूजा से कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। साथ में तपश्चर्या के कठोर विधान भी जुड़ने चाहिए, जो स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण तीनों ही शरीरों को तपाते एवं हर दृष्टि में समर्थ बनाते हैं। संचित कषाय-कल्मष भी तप साधना में बहुत बड़े व्यवधान होते हैं। उनका निवारण एवं निराकरण भी इसी भट्टी में प्रवेश करने से बन पड़ता है। ऋषि-मुनियों की जिस प्रखरता की चर्चा शास्त्रों में होती है, वह उनकी विद्वता के कारण नहीं, गहन तप साधना का परिणाम है।

इसलिए इस अनुष्ठान साधना के भागीदारों को अपनी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति के अनुसार कुछ व्रतबन्ध अवश्य अपनाने चाहिए। उदाहरण के लिए स्थूल शरीर का शोधन- उपवास अथवा अस्वाद व्रत से आसानी से होता है। इसे अपनी स्थिति के अनुसार सप्ताह में एक दिन हो सके तो रविवार या गुरुवार को अपनाया जा सकता है। इसी तरह सूक्ष्म शरीर के परिशोधन के लिए नियमित रूप से स्वाध्याय का सहारा लिया जाना चाहिए। कारण शरीर की साधना तो अपनी गुरु सत्ता को भाव भरा समर्पण करने से ही पूर्ण होती है समर्पण की गहनता हमें श्रद्धेय गुरुवर की तपचेतना एवं उनके द्वारा सम्पन्न किए जा रहे युग प्रत्यावर्तन का परिचय अपने आप ही दे देगी।

इस विशेष तप साधना में भाव और उद्देश्य मुख्य है- क्रिया विधि नहीं। सो अन्य धर्मों को मानने वाले, अन्य साधना पथो-पन्थों के अनुयायी अपनी साधना में इन भावों को समावेशित कर युग चेतना के भागीदार एवं सहचर बन सकते हैं। देवत्व के पक्षधर, विश्व मानवता का कल्याण चाहने वालों को इसमें बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभानी चाहिए। विचारशीलों एवं जाग्रत् आत्माओं का कर्त्तव्य है कि वे इसके लिए स्वयं तो आगे आएँ ही, अपने साथी-सहचरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। जिन्हें युग देवता भगवान् महाकाल की चमत्कारी सामर्थ्य पर भरोसा है- उन्हें इस विशेष साधना-अनुष्ठान की परिणति एवं परिणाम के बारे में भी आश्वस्त रहना चाहिए। आज हो रहे विश्व मन्थन के परिणाम स्वरूप नवयुग आएगा और निश्चित ही आएगा। इक्कीसवीं सदी- उज्ज्वल भविष्य का अभिप्राय एवं पर्याय बनकर रहेगी।


सबसे बड़ी (Kahani)

ग्रीस के दार्शनिक प्लेटो से दूर-दूर के लोग कुछ सीखने आते थे, पर वे बताने के साथ-साथ वह बात उनसे भी पूछते थे जो उन्हें आती नहीं थी।

लोगों ने कहा, ‘जो आपसे पूछने आते हैं आप उनसे भी जानने का प्रयत्न करते हैं। इसमें आपकी इज्जत घटती है।’

प्लेटो ने कहा, ‘मैं जीवनभर विद्यार्थी बना रहना चाहता हूँ। यह पदवी मुझे सबसे बड़ी लगती है।’


सच्चा कीर्तिस्तंभ

उस दिन राजमहल के द्वार पर नगर श्रेष्ठी के साथ अन्य गणमान्य जनों की एक साथ उपस्थिति अप्रत्याशित थी। महाराज विक्रम इन सबको राजप्रासाद की ड्योढ़ी पर देखकर थोड़ा चौंके, ठिठके और हतप्रभ हुए। उज्जयिनी की सतत प्रवाहमान् शिप्रा की धवलधारा की ही भाँति उज्जयिनी नरेश वीर विक्रमादित्य भी जनकल्याण के कार्यों में सतत और अविराम निरत रहा करते थे। उनके सुशासन में भूख, भय एवं भ्रष्टाचार का नामोनिशान न था। प्रजाजनों को अपने शासक पर विश्वास था, तब फिर आज...?

यह प्रश्न विक्रमादित्य के नेत्रों में तीव्रता से चमक उठा। उन्होंने उपस्थित जनों की ओर निहारते हुए नगर श्रेष्ठी से पूछा- श्रेष्ठिवर! किस समस्या ने आप सबको एक साथ यहाँ आने के लिए विवश किया है? आप सब सकुशल तो हैं? प्रत्युत्तर में नगर श्रेष्ठी ने महाराज को प्रणाम करते हुए कहा-हम सबकी कुशलता के लिए चिन्तित न हों आर्य! आपके सुशासन में सभी प्रजाजन शान्तिपूर्ण, सुखमय जीवनयापन कर रहे हैं। हम सब तो आपसे एक आवश्यक कार्य हेतु अनुमति पाने के लिए पधारे हैं।

महाराज विक्रम उन सभी को महल के एक विशाल कक्ष में लेकर आए। वहाँ सभी ने यथायोग्य आसन ग्रहण किए। तत्पश्चात् विक्रमादित्य ने नगर श्रेष्ठी से पूछा-कहिए, किस आवश्यक कार्यवश आप लोगों का यहाँ आगमन हुआ है?

नगर श्रेष्ठी ने निवेदन किया-महाराज! आपकी पराक्रम कथा, आपकी दानशीलता, आपकी न्यायपरायणता, दीन-दुःखियों का अभाव दूर करने वाली आपकी तत्परता, प्रजा के दुःख में दुःखी एवं सुख में सुखी होने वाली मनोभावना की प्रशंसा करने में शब्दों की सामर्थ्य बौनी है। आप सच्चे अर्थों में इस जगत् रूपी नभ मण्डल में तेजोमय सूर्य के समान है।

महाराज विक्रमादित्य नगर श्रेष्ठी के इस कथन को सुनकर पहले तो कुछ पलों के लिए चुप रहे, फिर हल्के से मुस्कराते हुए बोले-तो आप सब यहाँ मेरी प्रशंसा के लिए पधारे हैं, किन्तु आप सब इतना तो समझते ही हैं कि प्रशंसा मनुष्य की प्रगति में बाधक ही बनती है।

‘ऐसा नहीं है वीरवर!’ नगर के एक गणमान्य सज्जन ने सभी उपस्थित जनों की भावनाओं को अपना स्वर देना प्रारम्भ किया। ‘हम लोग आपकी इस प्रकार के केवल प्रशंसा करने के लिए नहीं आए हैं, हम लोग तो एक निवेदन लेकर आए हैं।’

अपना आशय स्पष्ट करें आर्य! महाराज विक्रम उपस्थित नागरिकों के विचारों को स्पष्ट तौर पर जानना चाहते थे।

‘हम सबकी इच्छा है कि मध्यवर्ती विशाल चौक में संगमरमर पत्थर का आपका एक गगनचुम्बी कीर्ति स्तम्भ निर्माण कराया जाए।’ नगर श्रेष्ठी ने सबकी बात आखिर अपने शब्दों में पिरो ही दी।

‘कीर्ति स्तम्भ’ शब्द सुनते ही विक्रमादित्य ने नगर श्रेष्ठी से पूछा-इस कीर्ति स्तम्भ से आपका तात्पर्य और उसका लाभ?

श्रेष्ठी ने अपने कथन का निहितार्थ समझाते हुए कहा-’महाराज! आपका यह भव्य कीर्ति स्तम्भ आगामी पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बना रहेगा। भावी पीढ़ियाँ भी आपके प्रजाहित के कार्यों को सुनकर वैसे ही कार्य करने के लिए प्रेरित होती रहेंगी। राज्य का क्या आदर्श होना चाहिए उसकी व्याख्या से कीर्ति स्तम्भ द्वारा उन्हें मार्गदर्शन मिलेगा। आपकी कीर्ति के गुणगान के लिए नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी के लिए कुछ प्रेरणा की प्राप्ति हो सके, इसी शुभाशय से हम लोग आपके नाम का कीर्ति स्तम्भ स्थापित करना चाहते हैं। आपकी खुशामद करने का हमारा कोई इरादा नहीं है।

उज्जयिनी नरेश को भी लगा कि यदि आगामी पीढ़ियों को योग्य मार्ग पर चलने के लिए ऐसे कीर्ति स्तम्भ द्वारा शिक्षा दी जा सकती है, तो ऐसा निवेदन मेरे द्वारा क्यों अस्वीकार किया जाए। इसके अतिरिक्त और भी कुछ विचार राजा के मन में आए। अन्त में उन्होंने उपस्थित जनों से कहा-इस प्रकार की बात मेरे लिए सर्वथा नयी और असाधारण है। अतः मैं तुरन्त कोई उत्तर नहीं दे सकता। आज की रात्रि में इस पर विचार करूंगा। अतः आज का समय मुझे आप लोग दें। उपस्थित जन समुदाय उज्जयिनी नरेश के इस कथन को सुनकर आशान्वित होकर अपने-अपने स्थानों की ओर चले गए।

वह पूरा दिन राज दरबार के कार्यों में व्यतीत हो गया। रात्रि में थोड़ी विश्राम के पश्चात् वीरवर विक्रम रात्रि के समय नगर भ्रमण के लिए चल पड़े। यह उनकी जीवनचर्या का नियमित कार्यक्रम था। अभी वह थोड़ी दूर चले थे कि दो अलमस्त साँड एक दूसरे से लड़ते-लड़ते सामने आते देख राजा विक्रम रास्ते से एक ओर सरककर एक ब्राह्मण की गोशाला में बने एक मोटे खम्भे पर चढ़ गए।

गोशाला का मालिक वह ब्राह्मण अभी तक जाग रहा था। वह बड़ा ही विद्वान ज्योतिषी था। भूत, भविष्य और वर्तमान की बातें वह बड़ी ही आसानी से बयान कर देता था। आज की रात्रि के आकाश में मंगल और शुक्र ग्रह को देखकर उसने पास ही खाट पर सोई अपनी पत्नी को जगाकर कहा-अरी सुन! इस समय इन दोनों ग्रहों का योग लाभकारी नहीं है।

उसकी पत्नी इस तरह अचानक जग पड़ने से थोड़ा खीज गयी थी। इस खीज में ही उसने कहा-लाभकारी नहीं है, तो क्या होगा? क्यों बेकार अपनी और हमारी नींद खराब करते हो। फिर थोड़ा ऊँघते स्वर में बोली-अपनी तो इससे कुछ हानि नहीं होगी।

नहीं, अपने लिए तो इनका कोई बुरा प्रभाव नहीं है, लेकिन दुःखभंजक महाराज विक्रम के लिए आज इन ग्रहों का योग बड़ा ही भयकारक एवं घातक है।

फिर वह ब्राह्मण अपने आप से कहने लगा-यह तो बड़ी खराब बात होगी। प्रजापालक महाराज विक्रमादित्य के जीवन में भय और दुःख आए यह हम कैसे सह सकते हैं?

इतनी बातें कहकर ब्राह्मण किसी विचार में मग्न हो गया। वह मौन बना रहा। पति के इस मौन से पत्नी उकता गयी। उसने पति का हाथ झकझोरते हुए कहा-चुप क्यों हो, तुम ही कोई उपाय निकालो। राजा के इस संकट के निवारण का उपाय तुम्हारे शास्त्रों में कुछ तो होगा? अरे भाग्यवान्! मैं इस संकट के निवारण का उपाय ही सोचने में लगा हूँ। मुझे लग रहा है कि संकट के निवारण के लिए अनुष्ठान की आवश्यकता है।

‘कैसा अनुष्ठान?’

‘राजा पर आए सम्भावित संकट के निवारण के लिए सेतु महात्म्य खण्ड का पाठ करना होगा।’

‘तब तुम कल प्रातः जाकर राजा से सारी बातें बतलाओ और कहो कि वह पाठ का आयोजन करें।’

‘नहीं, राजा को यह सब बतलाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। हमीं स्वयं महाराज के जीवन के लिए सेतु महात्म्य खण्ड के पाठ कर अनुष्ठान करेंगे।’

ब्राह्मण की पत्नी को अपने पति की यह बात ठीक नहीं लगी। उसे पता था कि इस अनुष्ठान में पर्याप्त खर्च आता है। इस खर्च की बात सोचकर वह थोड़ा भड़क गयी और कहने लगी-’राजा ने अब तक हमारे लिए क्या किया है, जो हम उनके लिए यह बेमतलब का खर्च उठाएँ। हम तो पहले से ही अपनी चिन्ताओं की वजह से परेशान हैं।’

पत्नी की ये बातें सुनकर ब्राह्मण ने थोड़ा क्रोधपूर्वक कहा-’ऐसी बातें कहना ठीक नहीं है। महाराज वीर विक्रमादित्य के लिए इस तरह की बातें करना किसी भी तरह से उचित नहीं है।’

परन्तु ब्राह्मण की पत्नी के मन में गुबार कुछ ज्यादा ही था। उसने अपना रोष व्यक्त करते हुए कहा-’अब रहने भी दो। यह भी कभी सोचा है, अपनी तीन कुँआरी कन्याएँ हैं। इनके विवाह के लिए हम लोग कितने हैरत, परेशान रहते हैं। किन्तु पास में पैसा न होने के कारण हम उनका विवाह नहीं कर पा रहें।’

‘हाँ यह बात तो सच है, फिर...’

‘फिर क्या? क्या राजा का यह फर्ज नहीं बनता कि कन्याओं का विवाह की वह व्यवस्था जुटाए। बाद में हम उसके लिए अनुष्ठान की व्यवस्था करें।’

पत्नी की बातों ने ब्राह्मण को चिन्ता में डाल दिया। वह कुछ बोल नहीं सका। खम्भे पर बैठे राजा ने अपने कानों से ब्राह्मण दंपत्ति की सारी बातें सुन ली थी। इतनी देर में लड़ते हुए दोनों साँड़ भी कहीं दूर चले गये थे। रात्रि भी समाप्त हो चली थी। वह खम्भे से उतरकर अपने महल की ओर चल पड़े।

रात्रि बीती, प्रभात हुआ। महाराज विक्रम ने अपने निजी सेवक से ब्राह्मण को दरबार में बुला भेजा। साथ ही नगर श्रेष्ठी के साथ उन गणमान्य जनों को भी बुलाया गया जो कल कीर्ति स्तम्भ के निर्माण की प्रार्थना लेकर आए थे।

आज का दरबार अपनी सज-धज में कुछ विशेष था। कुछ ही देर में सभी लोग उपस्थित हो गए। राजा ने संकेत कर ब्राह्मण से कहा-विप्रवर आप आसन ग्रहण करें। राजा के सिंहासन के बगल में रखे एक ऊँचे आसन पर बैठने का संकेत प्राप्त होते ही ब्राह्मण के मन की सारी शंका-कुशंकाएँ समाप्त हो गयी। वह आश्वस्त होकर बैठ गया।

दरबार की कार्यवाही प्रारम्भ करते हुए कहा-विप्रवर! आपकी कन्याओं के विवाह का सारा खर्च राजकोष से होगा। आप घर जाकर वर ढूंढ़े और उनके विवाह का मुहूर्त्त निश्चित कर लें। खर्च की कोई चिन्ता नहीं करेंगे। निश्चिन्त होकर पुत्रियों का विवाह करें।

राजा की बातें सुनकर ब्राह्मण निश्चिन्त हो गया। दरबार में नगर श्रेष्ठी और उनके साथ आए हुए गणमान्य जन भी उपस्थित थे। उनकी ओर देखते हुए राजा वीर विक्रम ने कहा-श्रेष्ठिवर! आपका निवेदन मैं स्वीकार नहीं कर सकता। मुझे अपने कीर्ति स्तम्भ की जरा भी आवश्यकता नहीं है। जनता की सेवा करना, दुखियों का दुःख मिटाना यही मेरा सच्चा कीर्ति स्तम्भ है। स्तम्भ की स्थापना मेरे अभिमान का कारण बनकर रह जाएगा, ऐसा मेरा मन कह रहा है।

दरबार में उपस्थित लोग एक दूसरे की ओर देखने लगे। पर अभी वे कुछ बातें इससे पूर्व राजा विक्रम ने कहा-मेरी आपसे एक विशेष प्रार्थना है।

‘आज्ञा करें राजन्!’ नगर श्रेष्ठी ने कहा।

आप लोगों ने मेरे कीर्ति स्तम्भ के निर्माण के लिए जो भारी धन व्यय करने की योजना बनायी है। उस सम्पूर्ण धन को आप जनहित के कार्यों में खर्च कर दें। यही मेरा सच्चा कीर्ति स्तम्भ होगा। भावी पीढ़ियाँ भी इसी से प्रेरणा प्राप्त कर सकेंगी।

नगर श्रेष्ठी समेत सारे जन राजा विक्रमादित्य के भावोद्गारों पर मुग्ध हो गए। सभी ने समवेत स्वरों में महाराज विक्रम के आदेश को शिरोधार्य करने की घोषणा की। इस स्वीकारोक्ति के अनुसार कार्य भी हुआ। और इस कार्य की परिणति सभी जानते हैं कि आज 2058 वर्ष बीत जाने पर भी महाराज वीर विक्रमादित्य की कीर्ति उतनी प्रखर, तेजस्वी एवं प्रेरणादायी है।


इसी का नाम अवतरण (Kahani)

दिव्य आत्मा कौन?

परमार्थ प्रयोजनों के लिए बहुत कुछ कर गुजरने की अभिलाषा एक ऐसा तत्व है जिसे ईश्वरीय प्रकाश एवं पूर्व जन्मों के संचित उत्कृष्ट संस्कारों का प्रवाह कह सकते हैं। जिसके भीतर जितनी ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोगी बनने की तड़पन है वह उतना ही दिव्य आत्मा है। तइपन पानी के स्रोतों की तरह है जो पहाड़ जैसी कठोरता को चीरकर बाहर निकल आती है। साधारण परिस्थिति के लोग भी उपयुक्त अवसर पर अपनी तड़पन क्रियान्वित करने का साहस कर बैठते हैं तब वह साहस ही ईश्वरीय अवतरण के रूप में उन्हें सूर्य चन्द्रमा की तरह चमका देता है। इड़पन का फूट पड़ना, इसी का नाम अवतरण है।


VigyapanSuchana

‘अखण्ड ज्योति’ के आजीवन सहचर बनें

परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आरंभ की गई अखण्ड ज्योति पत्रिका ‘आजीवन’ योजना से अब अधिकाधिक व्यक्ति लाभ उठाने लगे एक बार रु. नौ सो (सुरक्षा निधि) देकर जीवनभर अपने लिए तथा परिवार के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ जैसा आध्यात्मिक संरक्षक नियुक्त करने में ही लोग समझदारी मान रहें हैं।

हर वर्ष बैंक ड्राफ्ट बनवाने की बजाय एक बार हिम्मत जुटाकर रु. नौ सौ भेजने में ज्यादा समझदारी अनुभव की जा रही है। आशा है, आप भी इस योजना से लाभान्वित होना चाहेंगे और पूज्यवर के विचारों से अपने को तथा परिवार को अनुप्राणित करेंगे।

व्यवस्थापक

अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा

परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी


देवपूजन का मर्म

समापन किश्त - गतांक से आगे

मित्रो! देवता कौन हो सकता है? देवता वह होता है, जो देता है, दूसरों को श्रेष्ठ बनाता है। देवता वह नहीं है, जो आप रंग-बिरंगे खिलौने बनाकर लाते हैं। ये किसकी मूर्ति बनाकर लाए? भैरव जी की बनाकर लाए। भैरव जी का मुँह ऐसा क्यों है? अरे साहब! इनका मुँह तो ऐसा ही है। अच्छा ये देवी जी जीभ क्यों निकालती हैं? ये तो काट खाएंगी। अरे साहब! ये तो बकरा खाएंगी। धत् तेरे की! अगर ये बकरा काटने वाली हैं, तो जो हमारे पड़ोस में कसाई रहता है, उसमें और इसमें क्या फर्क है? नहीं साहब! ये तो देवी जी हैं। माँस तो ये भी खाती हैं और वो कसाई भी खाता है, तभी तो मैं इसे कसाई कह रहा हूँ। नहीं साहब! ये कसाई नहीं देवी हैं। नहीं बेटे, ऐसी देवी नहीं हो सकती, जो बकरा खाती हो।

सच्चा अध्यात्म क्या कहता है; इसलिए मित्रो! जो आपने रंग-बिरंगे, चित्र-विचित्र खिलौने बनाकर रखें हैं और उन रंग-बिरंगे खिलौनों से अगर आप ये ख्याल करते हैं कि ये देवी हमारा यह भला करेगी, हमारी अमुक मनोकामना पूरी करेगी, तो हम देवी को ये मिठाई खिलाएंगे, मालपुए खिलाएंगे, तो यह आपकी खामख्याली है। अगर आप ऐसे काम नहीं करना चाहते, तो वहाँ आइए, जहाँ सच्चा अध्यात्म आपकी प्रकृति का उद्धार करता है, आपको आत्मदर्शन कराता है। वहाँ आइए जहाँ अध्यात्म आपके दिमाग की सफाई करता है और यह कहता है कि देववृत्तियाँ, श्रेष्ठ वृत्तियाँ जो संयम के ऊपर टिकी हुई हैं और लोकमंगल के ऊपर टिकी हुई हैं, उनको दो हिस्सों में बाँट सकते हैं। सारी-की-सारी देवियों और सारे-के-सारे देवताओं को दो भागों में बाँट सकते हैं। एक वर्ग देवी-देवताओं का वह है, जो हमारे व्यक्तिगत जीवन पर छाए रहते हैं, जो हमको संयमशील बनाते हैं, भावनाशील बनाते हैं, संस्कारवान बनाते हैं, साहसी बनाते हैं इत्यादि। वे हमारे व्यक्तिगत जीवन में सद्गुणों का समावेश करते हैं।

दूसरा वर्ग देवताओं का वह है, जो हमारे व्यवहार को समाज के प्रति उदार बनाता है, उदात्त बनाता है। दूसरों की सेवा करने के लिए पीड़ा-पतन निवारण करने के लिए, दूसरों को ज्ञान देने और ऊंचा उठाने के लिए, दूसरों को परामर्श देने के लिए हमें प्रेरित करता है। इस तरह हम देवी-देवताओं को दो वर्गों में बाँट सकते हैं। इनमें से एक वे हैं जो हमारे व्यक्तित्व परिष्कार के लिए खड़े हुए हैं और दूसरे वे हैं जो उदारता के ऊपर खड़े हुए हैं। ऊपरी तौर से देखने पर वे दो वर्गों में विभक्त दिखते भर हैं, पर वास्तव में वे दोनों हैं एक ही भाग। क्योंकि जब हम अपने आपको श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं तो हमको बाहर की मदद लेनी पड़ती है। जब हम तैरने की इच्छा करते हैं, तो हमको तालाब में प्रवेश करना पड़ता है। तालाब में प्रवेश किए बिना आपको तैरना नहीं आ सकता। आपको अपना श्रेष्ठ व्यक्तित्व बनाने के लिए लोकव्यवहार को विनम्र, सुशील और सेवाभावी बनाना आवश्यक है। लोकमंगल के लिए, अपना व्यक्तित्व श्रेष्ठ बनाने के लिए, सेवा के लिए दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करने के लिए अगर हम तैयार न हो, तो हम अपना व्यक्तिगत जीवन अच्छा बना ही नहीं सकते। वास्तव में यह वर्गीकरण मैंने आपकी सुविधा के लिए और जानकारी के लिए इसलिए किया है, ताकि आप दोनों को आसानी से समझ सकें, अन्यथा वो दोनों एक ही हैं।

मित्रो! देवता के लिए अनुदान देना, देवता के लिए अनुदान प्रस्तुत करना-यही देवोपचार का उद्देश्य है। आप कहीं भी मंदिर में जाते हैं, तो कुछ-न-कुछ वहाँ चढ़ाते हैं। कुछ भी नहीं है तो भी ‘पत्रम् पुष्पम् फलम् तोयम्’ तो चढ़ाते ही हैं। इसलिए आप यह बात ध्यान रखना कि जब किसी भी देवता के यहाँ जाएं तो कुछ भी न मिले तो तुलसी का एक पत्ता जरूर ले जाना। फूल या पत्ता भी न हो तो ताँबे का एक नया पैसा, एल्युमिनियम गिलेट का एक पाँच पैसे का सिक्का ही डाल देना। महाराज जी! अगर नहीं डालें तो? तो बेटे देवता नाराज हो जाएंगे और शाप दे देंगे। पंडित जी के यहाँ पत्रा दिखाने जाते हैं, अगर खाली हाथ जाएंगे, तो आपको शाप पड़ेगा। राहु भी नाराज हो जाएगा, चंद्रमा भी नाराज हो जाएगा। पंडित जी! पत्रा देखकर बताइए कि हमारे ग्रह कैसे हैं? ला, पहले पत्रा का पूजन तो कर। अरे पंडित जी! हम तो खाली हाथ आ गए। बेटा खाली हाथ नहीं आते। देवता के सामने खाली हाथ नहीं जाते। देवता के सामने, गुरुजी के पास आते हैं, तो कुछ-न-कुछ लेकर आते हैं। फूल लाते हैं, केला लाते हैं। नहीं, महाराज जी! हम तो ऐसे ही चले आए। नहीं बेटे ऐसे नहीं आना चाहिए। कुछ भी लाया कर। फल-फूल कुछ भी लाया कर। हाँ गुरुजी! फूल लाया था। बस, तो ठीक है, काम बन जाएगा। काम बन गया।

देने वाले ही देवता

मित्रो! देने वाले को देवता कहते हैं और देवपूजन के लिए आदमी को देने वाला व्यक्ति बनना पड़ता है, लेने वाला नहीं। देवता किसी से लिया नहीं करते, हर एक की मदद करते हैं। आपको भी देवता की मदद करनी चाहिए। देवता का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए ही देवपूजन किया जाता है। देवपूजन की शिक्षाएं हैं कि हम अपने जीवन में देवत्व का समावेश करें। हम पशु जीवन से ऊंचे उठें, मनुष्य जीवन से ऊंचे उठें और दैवी जीवन में प्रवेश करें। दैवी वृत्तियों का आह्वान करें और पशु प्रवृत्तियों का विसर्जन करें। हमारे जीवन में चारों ओर से पशु छाया हुआ है, इंद्रियों पर पशु छाया हुआ है। हर जगह पशु-प्रवृत्तियाँ छाई हुई हैं। पशु कौन है, जो अपने आप तक सीमित है। पशु में एक ही खराबी है कि वह केवल अपने आप तक सीमित रहता है। वह न समाज की सोचता है, न अपने वर्ग की सोचता है, न देश की सोचता है, न वृत्तियों की सोचता है। केवल अपने पेट की सोचता रहता है और अपनों की सोचता रहता है। इसीलिए तो हम पशु की निंदा करते हैं।

मित्रो! अभी आप वास्तव में नरक के पशु जैसा जीवन जी रहे हैं। अगर कोई आपकी जिंदगी का विश्लेषण करे कि आप क्या है, तो जो निष्कर्ष आएगा उसे देखकर आप हैरान रह जाएंगे। चलिए, हम आपको लैबोरेटरी में ले चलते हैं। हम लैब में विश्लेषण करने के पश्चात जो आपकी पैथालॉजीकल रिपोर्ट तैयार करेंगे, उसमें हम आपको यह ‘डिक्लेयर’ अर्थात् घोषित कर सकते हैं। बताइए साहब! यह किसकी हड्डी है? ये तो साहब कुत्ते की हड्डी है। नहीं साहब! ये मनुष्य की हड्डी है। मनुष्य की हड्डी कैसे हो सकती है? यह कौन बताएगा? यह बात डॉक्टर अपनी प्रयोगशाला में बताएगा। इसी तरह हम अपनी प्रयोगशाला में ले जाकर कह सकते हैं कि अभी आप इनसान नहीं बन पाए, न देवता बनने की हिम्मत ही जुट रही। अभी आप पशु का जीवन जी रहे हैं। पशु का जीवन स्वार्थी जीवन, चालाक जीवन, कामनाओं से भरा हुआ जीवन, वासनाओं से भरा हुआ जीवन, तृष्णाओं से भरा हुआ जीवन जी रहे हैं।

मित्रो! अब क्या होना चाहिए? अब हमारा जीवन एक ही दिशा में बढ़ना चाहिए, देवत्व की दिशा में। देवत्व की दिशा में बढ़ें, तो क्या हो सकता है? तब बेटे! हमारा देवपूजन का उद्देश्य पूरा हो सकता है। हम आपको देवपूजन की सारी प्रक्रियाएं केवल इस मकसद से सिखाते हैं कि आपके भीतर देने की वृत्ति हो जाए, उदारता की वृत्ति पैदा हो जाए, श्रेष्ठता की वृत्ति पैदा हो जाए और आप देवता बनने की कोशिश करें।

देवता व मनुष्य में अंतर

देवता में क्या विशेषता होती हैं? देवता और मनुष्य में क्या फर्क होता है? देवता खाते तो रहते हैं, पर पखाना नहीं करते। अनुमान जी को चाहे जितना खाना खिला दो- रोटी खिला दो और दूसरे दिन देखो, कहीं मल विसर्जित किया हुआ नहीं मिलेगा। देवता की एक पहचान तो यही है। देवता अगर मल विसर्जन कर दे तो समझना चाहिए कि वह देवता नहीं है। दूसरी पहचान देवता की यह है कि वे कभी बूढ़े नहीं होते। देवता सदैव जवान रहते हैं। अच्छा बताइए कि भगवान रामचंद्र जी का ऐसा फोटो क्या किसी ने देखा है, जिसमें उनके दाँत उखड़ गए हों और बाल सफेद हो गए हों? आपने देखा है? नहीं साहब! हमने तो नहीं देखा। अच्छा तो कृष्ण भगवान का देखा होगा? कृष्ण भगवान की जब मृत्यु हुई थी तब वे एक सौ पच्चीस वर्ष की उम्र के थे। मैं आप से पूछता हूँ कि एक सौ पच्चीस वर्ष की उम्र के व्यक्ति के चेहरे पर झुर्री आ होंगी कि नहीं? हाँ, महाराज जी! जरूर आई होंगी। बाल सफेद हुए होंगे या काले? सफेद हुए होंगे। अच्छा, एकाध दाँत उखड़ा होगा या नहीं? हाँ साहब! जरूर उखड़ा होगा। अच्छा,कृष्ण भगवान का एक फोटो हमको दिखाए। बताइए यह फोटो बुढ़ापे का है या जवानी का। नहीं साहब! यह बुढ़ापे का नहीं है, जवानी का है। जवानी किसमें रहती है? देवता में रहती है। देवता जवान होता है। देवता अगर बूढ़े होने लग जाएं, तो समझना चाहिए कि ये सब बेकार हैं। देवताओं के चेहरे भरे हुए होते हैं। देवता वह होते हैं जिनके चेहरे पर जवानी छाई रहती हैं, उमंगे छाई रहती हैं, उत्साह छाया रहता है, जीवट छाया रहता है। देवता की पूजा करने के लिए आपकी मनःस्थिति उसी तरह की होनी चाहिए।

ईमानदारी की बात यह है कि देवी-देवताओं की जितनी भी छवियाँ हैं, वास्तव में ये सब मॉडल हैं। हमको क्या बनना है, इस लक्ष्य को पाने के लिए हम उसी के अनुरूप देवता अर्थात् मॉडल बना दिया गया था कि मीनार कितनी बड़ी बनेगी, गेट कैसे बनेगा, अमुक चीज कैसी बनेगी आदि। कागज पर बने नक्शे से उतना साफ नहीं हो पाता, इसलिए हमेशा बहुत बढ़िया इमारतों के लिए ‘मॉडल’ बनाकर रखते हैं। इसी तरह यदि हम राम की खूबियाँ धारण करना चाहते हैं, तो राम की मूर्ति सामने रखते हैं। हम कृष्ण की उपासना इसलिए करना चाहते हैं कि हम कृष्ण जैसे बनना चाहते हैं। कृष्ण भगवान की खुशामद और चापलूसी करने से क्या हो सकता है? बेटे तू बता तो सही कि कृष्ण जी अपनी खुशामद करने वाले को, चापलूसी करने वाले को या किसी चमचे को अपना चमचा बनाना चाहते हैं क्या? असली यही बात है ना? हाँ गुरुजी! हम तो भगवान का चमचा बनना चाहते हैं। बेटे! चमचे तो उनके होते हैं, किनके? वेश्याओं के, नेताओं के और राजाओं के, जो कहते हैं कि अरे साहब! आपकी सात पीढ़ियों ने बड़े-बड़े शेर मारे हैं। पाँच साल बाद आया हूँ, एक शाल तो लूँगा ही। अच्छा ले ज चारण।

मित्रो! आप क्या बनना चाहते हैं? चारण बनना चाहते हैं या चमचे बनना चाहते हैं? क्या आप वेश्याओं के पीछे चमचे बनकर फिरना चाहते हैं? अरे साहब! इनके क्या कहने? इन्होंने तो वहाँ गाया था, नाचा था, बड़े गजब का था। ये श्रीकृष्ण भगवान हैं। देखिए, इनके मुकुट और इनके ये रेशमी कपड़े और बाजूबंद और देखिए इनकी गायें। देखिए इनकी बाँसुरी। क्या बनना चाहते हैं आप श्रीकृष्ण भगवान के चमचे। बेटे! चमचा बनने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। आपको देवता बनने के लिए उन वृत्तियों को ‘मॉडल’ के रूप में ग्रहण करना पड़ेगा और अपने आपको ढालने की तैयारी करनी पड़ेगी। आप रामचंद्र जी के उपासक हैं, तो रामचंद्र जी बनने की तैयारी कीजिए। कृष्णचंद्र जी बनना चाहते हैं तो आप कृष्णचंद्र जी बनने की तैयारी कीजिए। मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

आप हनुमान जी बनना चाहते हैं न ? हाँ गुरुजी हमारे इष्ट तो हनुमान जी हैं, आप हनुमान जी बनिए, हमें क्या शिकायत है। वहीं साहब! हनुमान जी तो हम नहीं बनना चाहते। रहेंगे तो हम वही, जैसे पहले थे और पूजा करेंगे हनुमान जी की। चलेंगे पश्चिम को और देखेंगे पूरब को। वाह बेटे! खोज कर रहा है पूरब की और चलेगा पश्चिम की ओर। हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है? आखिर हम क्या बनेंगे? अगर हम यह तय कर लें, तो मित्रो! हमारे भीतर देवता की हस्ती पैदा हो सकती है। देवताओं की संज्ञा में तब आप खड़े होंगे जब आपके शरीर में से गंदगी पैदा न होती हो। देवता पखाना नहीं करते। उनको पसीना भी नहीं आता। इसको कहते हैं देवता। वे पेशाब भी नहीं करते। अच्छा पानी तो पीते होंगे। हाँ बेटे! शंकर जी को तू पानी चढ़ा सकता है। कितना पानी चढ़ा दूँ? सामर्थ्य भर खूब पानी चढ़ा दे। महाराज जी! शंकर जी इतना पानी पिएंगे तो फिर पेशाब तो करेंगे ही। नहीं बेटे! शंकर जी पानी पीते रहते हैं, खाना खाते रहते हैं हमारी भावनाओं के रूप में, श्रद्धा के रूप में हमारे जीवन की दुष्टा प्रवृत्तियों, पाप आदि का निष्कासन करते रहते हैं, ताकि दुष्कर बलाएं न आएं।

देव पूजन किस लिए

देवता को इसलिए इष्ट मानते हैं, देवता का पूजन इसलिए करते हैं, देवता की आराधना इसलिए करते हैं कि हमारी देववृत्तियाँ विकसित होती हुई चली जाएं। देवता की आराधना हम इसलिए करते हैं कि हमारा देवत्व निराशा न लाए। देवत्व कभी निराशा नहीं ला सकता। देवत्व की ओर चलने वाला व्यक्ति निराश हो सकता। सफलता नहीं मिली, न सही, अगले जन्म में मिलेगी। देवत्व की ओर बढ़ने वाले में क्या ताकत आ गई कि वह कहता है कि अभी नहीं तो अगले जन्म में मिल जाएगी। देवता कभी अपने सत्प्रयत्नों की ओर से निराशा नहीं पाया जा सकता। निराशा माने बुढ़ापा। बुढ़ापा किसे कहते हैं, निराशा को। बुढ़ापा क्या होता है, निराशा। बेटे! शरीर का तो यह धर्म ही है कि वह बूढ़ा होने वाला है। वह बूढ़ा होगा ही, लेकिन शरीर के बूढ़े होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

जिन दिनों जर्मनी ने इंग्लैंड के ऊपर हमले किए थे और इंग्लैंड के जीवन-मरण का प्रश्न था, उन दिनों वहाँ का प्रधानमंत्री चर्चिल इतना बूढ़ा हो गया था कि वह पार्लियामेंट की मेज पर वहाँ बैठकर काम नहीं कर सकता था। उसके लिए एक चारपाई बिछा दी गई थी और पार्लियामेंट के मेम्बर और दूसरे मिनिस्टर उसके दायें-बायें बैठते थे और वह करवट लेकर बात करता था, चलता था तो छड़ी लेकर चलता था, बूढ़ा इतना हो गया था कि काम नहीं कर सकता था लेकिन उसने सारे इंग्लैंड को आश्वासन दिलाया, ‘हमारे पास खून है और हमारे पास पसीना है। इसलिए इस बड़ी-से-बड़ी मुसीबत को बर्दाश्त करेंगे। इंग्लैंड को कोई गुलाम नहीं बना सकता। आप लोग खून-पसीना बहाने के लिए तैयार हो जाइए। मैं आपकी आजादी की सुरक्षा करने की गारंटी देता हूँ।’ उसने ये वचन तब कहे जब सारे इंग्लैंड के ऊपर जर्मनी का हमला हो रहा था। वह खड़ा हो गया। उसने कहा, ‘हम जिंदा हैं, इसलिए आप में से हर एक को जिंदा रखेंगे, इंग्लैंड को जिंदा रखेंगे। इंग्लैंड के किसी नागरिक को डरने की आवश्यकता नहीं है।’

मित्रो! ये कौन लोग थे? इनको जवान आदमी कहते है। आज जब कम उम्र के व्यक्ति जरा-जरा सी बात पर निराशा की बात करते हैं, निराशा की बात कहते हैं और ये कहते हैं कि साहब! हम तो इम्तिहान में फेल हो गए, हमारा भविष्य अंधकारमय हो गया। अब तो हम कुतुबमीनार से कूदकर मरेंगे। रेलगाड़ी से कटकर मरेंगे। उस तरह की जब कोई खबर हमारे पास आती है कि अरे साहब! कोई लड़का था, मर गया, बड़े दुःख की बात है। मैं कहता हूँ कि बेटे! तू एक गलती सुधार। तो यह मत कह कि एक लड़का मर गया। तो क्या कहूँ? यों कह कि एक बुड्ढा व्यक्ति मर गया। बुड्ढा कैसे? वह तो लड़का था। नहीं बेटे, वह बुड्ढा था। बुड्ढा आदमी वह है जिसकी उम्मीदें खत्म हो गई, जीवन खत्म हो गया, जोश खत्म हो गया, उमंगें खत्म हो गई, आशाएं खत्म हो गई, वह आदमी बूढ़ा है। ऐसा आदमी थक जाता है। जो आदमी हार जाता है, जिस आदमी ने हिम्मत गंवा दी, जिस आदमी ने अपने उज्ज्वल भविष्य के सपने गंवा दिए, वह आदमी बूढ़ा हो गया।

साथियो! देवता बूढ़े नहीं हो सकते। देवपूजन के माध्यम से हम देवताओं की आराधना करते हैं, देववृत्तियों की आराधना करते हैं। जब हम शंकर जी की आराधना करते हैं, संघशक्ति की देवी दुर्गा की आराधना करते हैं, पूर्ण पुरुष कृष्ण भगवान की आराधना करते हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की आराधना करते हैं, भक्त शिरोमणि हनुमान की आराधना करते हैं, तो इस माध्यम से उनकी जो श्रेष्ठ वृत्तियाँ हैं, उनको अपने अंदर धारण करते हैं। नहीं साहब! हनुमान जी हमें रुपया-पैसा दे जाएं, हमारा ब्याह करा दें। हनुमान जी बेटा दे जाएं। बेटे! ऐसे कैसे हो सकता है? जिसके यहाँ जो होगा वही तो होगा। जो चीज है ही नहीं, तो वह कैसे दे देगा? जब हनुमान जी का ब्याह हुआ नहीं, तो वह कैसे दे देगा? जब हनुमान जी का ब्याह हुआ नहीं, उसके बच्चा हुआ ही नहीं, तो बेटा कैसे दे जाएंगे आपको? गुरुजी हम बीमार हैं, इंजेक्शन लगा दीजिए। बेटे! हम कैसे लगा देंगे। नहीं गुरुजी! आप तो महात्मा हैं, एक इंजेक्शन तो हमारे लगा ही दें। अच्छा आप इंजेक्शन नहीं लगा सकते, तो हमारा दाँत हिलता है, उसे ही उखाड़ दें। बेटे, हमसे तेरा दाँत भी नहीं उखड़ेगा। फिर आप किस बात के गुरु हैं? गुरु हैं तो बेटा हम ज्ञान देंगे, रामायण पढ़ा देंगे, गीता पढ़ा देंगे और दूसरे पाठ पढ़ा देंगे। नहीं साहब! आप तो हमारा दाँत उखाड़ ही दीजिए। बेटे हम कैसे उखाड़ सकते हैं? हमको स्वयं ही नहीं आता। यह क्या है? पागलपन है, अज्ञानता है।

देवताओं के वरदान-सत्प्रवृत्तियाँ

मित्रो! देवता दैवी शक्तियों से भरे हुए, दिव्यतत्वों से भरे हुए, दिव्य विचारणाओं से भरे हुए, दिव्य भावनाओं से भरे हुए होते हैं। देवता अगर किसी को वरदान देंगे तो वे मानवता का वरदान देंगे, सद्गुणों का वरदान देंगे तो वे मानवता का वरदान देंगे, सद्गुणों का वरदान देंगे, श्रेष्ठता का वरदान देंगे, सत्प्रवृत्तियों का वरदान देंगे। ये सद्गुण और सत्प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं, जिनको हम ‘ट्रेवलर्स चेक’ कह सकते हैं। इस हुँडी को आप कहीं भी भुना लीजिए। सत्प्रवृत्तियों को लेकर के आप बाजार में जाइए और यह कहिए कि हम महात्मा गाँधी हैं और हम महात्मा हैं और हमारे महात्मा की कीमत लाइए। जनता आपके ऊपर नोट बरसाना शुरू कर देगी और जब आप मरेंगे तो सौ करोड़ रुपये का आपका स्मारक बना देगी। ये हुँडी है महानता की। आप नहीं खाते तो कोई हर्ज की बात नहीं, आप खिला सकते है। ठीक है, हम अपने इस्तेमाल में खर्च नहीं कर सकते, लेकिन हम चाहें तो किसी को भी फायदा पहुँचा सकते हैं। चाणक्य ने असंख्यों को फायदा पहुँचाया। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को धनी बना दिया। महात्माओं के वरदान और आशीर्वाद से न जाने क्या-क्या हुए। वे स्वयं लंगोटी पहनते थे, तो कोई हर्ज की बात नहीं थी। देवत्व जब मनुष्य के भीतर आता है, तो महानता के रूप में आता है और महात्मा वह हुँडी है, जो नरसी मेहता की तरह से हर एक के ऊपर बरस सकती है।

मित्रो! आध्यात्मिकता वो हुँडी है, देवत्व वह हुँडी है और मानवता वह हुँडी है, जिसकी भुनाने के लिए सुदामा की तरह से आप कभी भी भगवान के बैंक में जा सकते हैं और अपना पैसा वसूल कर सकते हैं। अगर आपको भौतिक चीजों की जरूरत पड़ जाए, तो भी इससे आप खरीद सकते हैं, लेकिन मैं समझता हूँ कि उसको अपने आपकी संपदा इतनी महान मालूम पड़ती है कि भौतिक वस्तुओं को इकट्ठा करने में कोई आनंद नहीं आता। इसलिए जिसको देवत्व का रस मालूम पड़ जाता है, वह उन चीजों को जो नाशवान हैं, जो कल नहीं रहने वाली हैं, जो केवल चमकदार मालूम पड़ती हैं, वास्तव में चमकदार नहीं है, बाहर से मृगतृष्णा की तरह मालूम पड़ती हैं और आनंद का कारण नहीं बन सकती। ऐसा व्यक्ति जानता है कि भौतिकता हमारे आनंद का कारण नहीं बन सकती, औलाद हमारे आनंद का कारण नहीं बन सकती, वैभव, आर्थिक उन्नति हमारे आनंद का कारण नहीं बन सकती। बेटे! यह सब मालूम पड़ता है, महसूस होता है, पर असलियत में है नहीं। यदि होता, तो संपन्न आदमी, बेटे वाले आदमी, पैसे वाले आदमी, ताकतवर आदमी- सबके सब ये कहते कि हम तो अपने जीवन में धन्य हुए। हम इस जीवन में सुखयापन करते हैं।

महानता सबसे बड़ा वरदान

मित्रो! देवत्व यह संपत्ति है जो हमारे जीवन के साथ जुड़ी रहती है और जन्म-जन्माँतरों तक साथ जा सकती है। भौतिक संपत्ति को तो कोई चोर भी ले जा सकता है, अमुक भी ले जा सकता है, इनकम टैक्स वाला भी ले जाता है और मरने के बाद हमारा बेटा, पोता ले जाता है, लेकिन जो हमारे जीवन को हर क्षण आनंद से सराबोर रखती है, और लोक-परलोक तक हमारे साथ चली जाती हैं, उस दैवी शक्ति, दैवी विभूति, दैवी संपदा का नाम है, ‘महानता’। महानता देना देवता काम है। कोई देवता अगर प्रसन्न होगा तो क्या पैसे देगा? नहीं। तो पैसे के स्थान पर ‘चेक’ देगा, बैंक ड्राफ्ट भेज देगा? मित्रो! ध्यान रखना देवता आपको पैसा नहीं देगा। उसका चेक, ड्राफ्ट महानता है। देवता महानता दिया करते हैं। महानता की कीमत पर आदमी संपदाएं कमा सकता है, यश कमा सकता है, वैभव कमा सकता है।

इसलिए देवपूजन में हम अपनी उन वृत्तियों का विकास करते हैं, जो जीवन का लक्ष्य निर्धारित करते हैं। देवपूजन के माध्यम से हम आत्मशोधन का प्रयास करते हैं। ये हमारे प्रत्येक क्रियाकलाप के माध्यम हैं। आत्मशोधन स्वर्णजयंती वर्ष का भी माध्यम है। अगर आप स्वर्णजयंती वर्ष और दूसरी किसी अन्य उपासना में संलग्न होना चाहते हैं, तो आपको किसी-न-किसी रूप में देवपूजन करना पड़ेगा। हिन्दू हैं तो भी करना पड़ेगा, निराकारवादी हैं, तो भी करना पड़ेगा। मुसलमान हैं, तो धूपबत्ती जलानी पड़ेगी। ईसाई हैं तो भी आपको मोमबत्ती जलानी पड़ेगी, फूल चढ़ाना पड़ेगा। देवता के सामने श्रद्धाँजलि अर्पित करनी पड़ेगी, मस्तक झुकाना पड़ेगा, सिर झुकाना पड़ेगा, श्रद्धा व्यक्त करनी पड़ेगी। देवता के सामने श्रद्धा की अभिव्यक्ति का नाम देवपूजन है।

आत्मशोधन का अर्थ है, अपने आपकी सफाई, अपनी शारीरिक सफाई, मानसिक सफाई, आर्थिक सफाई, व्यवहार की सफाई, पैसे की सफाई, शारीरिक क्रियाओं की सफाई, मानसिक विचारों की सफाई, अगर आप ये सब सफाइयाँ कर सकते हों तो मैं यकीन दिलाता हूँ कि अध्यात्म के जो पुण्य बताए गए हैं, सिद्धियाँ बताई गई है, चमत्कार बताए गए हैं, देवता की कृपा बताई गई हैं, भगवान का साक्षात्कार बताया गया है। जो कुछ भी आपने उसके माहात्म्य सुने हैं, वे सौ फीसदी सही हैं और जरूर मिल सकते हैं। मैं फिर कहता हूँ कि नकद धर्म के रूप में वे इसी जन्म में मिल सकते हैं। गवाही के रूप में मैं हमेशा अपने आपको पेश करता रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप सही अध्यात्म ग्रहण करें, देवपूजन का उद्देश्य समझें, आत्मशोधन का उद्देश्य समझें और नींव भर लें, जिसके ऊपर एक विशालकाय महल बनाया जा सकता है। आज मैंने नींव भरने की प्रक्रिया आपको बताई कि आप किस तरीके से आत्मशोधन और देवपूजन इन दो प्रक्रियाओं के माध्यम से अपने व्यक्तित्व के निर्माण की, अध्यात्म और योगाभ्यास की नींव भर सकते हैं। मैं आपको महल बनाने की विधि आगे कभी बताऊंगा कि आप खिड़की कैसे लगा सकते हैं, किवाड़ कैसे लगा सकते हैं, छत कैसे डाल सकते हैं और शीशे कैसे लगा सकते हैं इस महल में, जिसको आप बनाना चाहते हैं, आत्म उन्नति का मकान। आज की बात समाप्त।

ॐ शाँतिः॥


युगगीता-28 - कर्म में ब्रह्मदर्शन से ब्रह्म की ही प्राप्ति

(गीता के चतुर्थ अध्याय की युगानुकूल व्याख्या - दसवीं कड़ी)

विगत अंक (नवंबर 2001 की युगगीता) में विस्तार से दिव्यकर्मियों के लक्षण व बंधनमुक्ति प्रकरण पर चर्चा की गई। 18वें श्लोक से 21वें श्लोक तक की गई चर्चा के अनुसार भगवान दिव्यकर्मियों के लक्षण बताते हैं-1. कर्त्तव्य अभिमान से मुक्त होकर ज्ञान में स्थित होकर कर्म करना 2. कामना से मुक्त होकर भगवान के संकल्प बल से युक्त होकर कर्म करना 3. वैयक्तिक संकल्प से परे होकर आध्यात्मिक जीवन जीना 4. पमत्व में स्थित होकर द्वंद्वातीत जीवन जीना।

भगवान अशुभ से मुक्त होने के लिए अर्जुन को कर्मयोग का तत्वदर्शन समझा रहे हैं व बता रहे है कि यह वह कर्म है जिससे वे कर्मबंधन से, अशुभ से उसे मुक्त करना चाहते हैं। ये मानव जाति का उसे महानायक बनाना चाह रहे हैं एवं इसके लिए उसे एक आदर्श लोकसेवी कैसे बनना हैं, यह समझा रहें हैं। बिना माँगे जो मिले उसी में संतुष्ट रह सेवाभाव में पूर्णता प्राप्त कर यदि द्वंद्वों से परे हो जाए तो उसकी मन शक्तियों के नाश बंद हो जाएगा। वह ईर्ष्यामुक्त हो श्रेष्ठ प्रयोजनों में अपनी वृत्तियाँ नियोजित करेगा। वह कभी कर्मबंधनों में नहीं बंधेगा, क्योंकि उसके दिव्यकर्मों से नई वासनाएं नहीं जन्मेंगी। यहाँ तक बाइसवें श्लोक की व्याख्या के बाद इस अंक में तेईसवें श्लोक के द्वारा इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हैं।

यज्ञायाचरतः कर्म

चतुर्थ अध्याय का तेइसवाँ श्लोक दिव्यकर्मी की व्याख्या को आगे बढ़ाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं-

गतसड्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥

अर्थात् ‘जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममता से मुक्त है तथा जिसका चित्त सदैव परमात्मा के ज्ञान में स्थित है, ऐसे यज्ञ भाव से आचरण करने वाले व्यक्ति के संपूर्ण कर्मों का क्षय हो जाता है।’

यहाँ इस श्लोक में भगवान यह समझाने का प्रयास सूक्ष्म रूप में कर रहे हैं कि कैसे प्रत्येक व्यक्ति का प्रत्येक कर्म उस अनंत सत्ता के प्रति समर्पण भावपूर्ण यज्ञ भाव से किया जा सकता है। भगवान ने पहले कहा कि कर्म करते हुए अकर्म तक पहुँचो, कर्म करते हुए साधना की उच्चतम स्थिति तक पहुँचो। ऐसे व्यक्ति के अंतस् में सतत ज्ञानाग्नि जलती रहती है (ज्ञज्ञ्क्नाग्निदग्धकर्माणं 4/19)। ज्ञान किस बात का, इस बात का कि मैं व भगवान एक हैं। वह ज्ञान जिसमें हम भगवत् चेतना के स्फुल्लिंग हैं। ऐसी स्थिति में मनुष्य ब्राह्मी स्थिति में पहुँच जाता है। ईसा जब क्रूस पर चढ़ाए जाते हैं तो यह नहीं कहते कि मेरी रक्षा करो। वे तो कहते हैं, ‘मैं व मेरे पिता एक हैं, इनकी रक्षा करो जिन्हें यह मालूम नहीं है।’ ऐसे में तुलसीदास जी की उक्ति याद आ जाती है, ‘नाते एक राम केमनियत सुहृदय सुसेव्य जहाँ लौं।’ हम राम के हैं राम हमारे हैं। ऐसी स्थिति में सारे काम भगवान के निमित्त होने लगते हैं। ऐसे कार्य प्रारब्ध का निर्माण नहीं करते।

दिव्यकर्मी की यही खूबियाँ हैं। पूर्ण आँतरिक आनंद एवं शाँति उसे ऐसे कर्म से प्राप्त होती है। सामान्य मनुष्य अपने सुख के लिए बाह्य पदार्थों पर निर्भर रहते हैं, इसी से उनकी कामनाएं-वासनाएं होती हैं, इसी कारण उन्हें क्रोध, दुख, शोक, उद्वेग, मानसिक संताप, हर्ष आदि होते हैं। इसीलिए वे सभी वस्तुओं को शुभ-अशुभ के काँटे से तौलते हैं, किन्तु दिव्य आत्मा पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे किसी प्रकार की निर्भरता के बिना सदा तृप्त रहते हैं (नित्यतृप्तो निराश्रयः 4/20)। उनके रोम-रोम में परमात्मसत्ता की ज्योति विद्यमान रहती है। वे बहिरंग सुखों में यदि सुख लेते भी हैं, तो इस कारण नहीं कि उनकी रुचि है या वे उसमें डूबकर पथभ्रष्ट होना चाहते हैं, अपितु इसलिए कि इनमें स्थित आत्मा के लिए, उनके द्वारा भगवान की अभिव्यक्ति के लिए, उनमें स्थित शाश्वत सत्य के लिए यह सुख है। इन पदार्थों के बाह्य स्पर्श में उनकी आसक्ति नहीं होती, बल्कि अपने अंदर मिलने वाला आनंद ही सर्वत्र उन्हें दिखाई-अनुभूत होने लगता है। प्रिय के स्पर्श से उन्हें हर्ष नहीं होता, अप्रिय से शोक नहीं होता। वे सभी पदार्थों में अक्षय आनंद का भोग करते हैं।

आसक्ति व देह भावना से मुक्ति

दिव्यकर्मी की कर्मों के प्रति आसक्ति सर्वथा नष्ट हो जाती है एवं वह देह के अभिमान व ममत्व भाव से मुक्त हो जाता है, यह भगवान यहाँ बता रहे हैं। जब व्यक्ति अपने अंधकारमय जीवन का परित्याग कर देता है, कामोद्वेगों के बंधनों से मुक्त हो जाता है (गतसंगस्य मुक्तस्य 4/23) तो फिर वह ज्ञान में स्थित हो जाता है। ऐसा आध्यात्मिक पुरुष फिर अपने सभी कर्मों का संपादन जगत् के ईश्वर, परमपिता परमात्मा के प्रति भक्तिमय समर्पण भाव द्वारा यज्ञ भावनापूर्वक संपादित करता है। उसके कर्म प्रभु की कृपा और प्रेम के आह्वान के निमित्त ही होते हैं। कर्म ही उसकी पूजा होते हैं।

जब कर्म के प्रति ऐसी दृष्टि होती है तो रैदास की तरह हर कर्म पूजा बन जाता है। भाव की प्रगाढ़ता में किए गए कर्म यज्ञीय कर्म होते हैं। ‘जो मन चंगा तो कठौती में गंगा’ की तरह से अलौकिक शक्तियों का प्रत्यक्षीकरण भी कराते हैं। ऐसे कर्मों को करने से व्यक्ति का दिव्यकर्मी का श्रद्धा से युक्त ज्ञान भी प्रकट होने लगता है। ‘श्रद्धा’ अर्थात् पतझड़ में भी वसंत को देखना। ‘वसंत’ के प्रति आस्था। जो नहीं है उसका अंतर्ज्योति द्वारा दर्शन। अनंतता के प्रति गहन श्रद्धा। अंधकार में भी उजाले का दर्शन। जो हमें हमारे गुरुदेव इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के रूप में करा गए हैं।

जब इस श्रद्धा और ज्ञान के साथ दिव्यकर्मी अपने कर्म करता है तो परमात्मा के लिए यज्ञीय भाव से कर्म करता है। कर्म कितना छोटा या बड़ा है, यह नहीं देख जाता। भगवान के प्रेम में डूबकर कर्म किए जाते हैं।

आचार्य शंकर का यज्ञ-कर्म

आचार्य शंकर ने यही भाव लेकर कर्म किए। संन्यासी को सामान्यतः कर्मत्यागी कहा जाता है, परन्तु उन दिनों आचार्य शंकर ने संन्यास की अवधारणा इस प्रकार दी की जो लोग अपने दायरे से बाहर नहीं निकल पा रहे थे, उन्हें राष्ट्र के लिए सर्वस्व निछावर करने हेतु अपने प्रभाव से उसने सक्रिय कर दिया। अरबों का राष्ट्र पर आक्रमण था- दुर अवस्था देखी नहीं जा रही थी देश की आचार्य शंकर द्वारा। आचार्य ने कर्म से संन्यास की बात नहीं की। विश्वात्मा के लिए समर्पित कर्म, यज्ञीय भाव से किए गए कर्म की बात उसने कही। अपने संन्यास की व्यवस्था द्वारा उसने लोगों को विलासभोग से मुक्त हो समर्पित भाव से जीने की व्यवस्था बनाई, ‘कर्मणा न्यासः इति कर्म संन्यासः’ की बात कही। परन्तु वह व्यवस्था कालाँतर में समय के साथ घुन लगने के कारण गड़बड़ा गई। उनकी धारणा ‘संगत्यक्त्वा’ एक तरफ रह गई एवं आसक्ति, मठ की संपत्ति आदि ही प्रतीक बनकर रह गए। परमपूज्य गुरुदेव ने ऐसी परिस्थितियों में वानप्रस्थ को, परिव्राजक धर्म को जिंदा किया एवं इसे ‘नवसंन्यास’ नाम दिया, जिसकी महत्ता का गान 100 वर्ष पूर्व स्वामी विवेकानंद ने किया था। यज्ञीय भाव से कर्म ही सच्चा संन्यास है एवं ऐसे व्यक्ति के संपूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते (4/23) यह बात उन्होंने भी पूरी गरिमा के साथ स्थापित की।

फिर कर्म यज्ञमय कैसे बनें? इसकी व्याख्या ब्रह्मार्पण ब्रह्मकर्म की बात कहकर अगले श्लोक पर हम आते हैं-

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्ग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥

अर्थात् ‘ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्मरूपी कर्ता के द्वारा आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म ही है, क्योंकि उसमें अर्पण अर्थात् स्रुवा आदि भी ब्रह्म हैं और हवन किए जाने वाले द्रव्य भी ब्रह्म हैं। इस तरह कर्म में ब्रह्मदर्शन करने से ब्रह्म की ही प्राप्ति होती हैं।’

गीता जी के इस अति प्रसिद्ध श्लोक जिसके द्वारा भारतीय घरों में प्रतिदिन भोजन के पूर्व प्रभु-स्मरण किया जाता है, कितनी गहरी बात भगवान श्रीकृष्ण ने कह दी है। सारे श्लोक का मर्म कितना विलक्षण है। ब्रह्मार्पण का अर्थ है, कुछ उसके अलावा रहे ही नहीं। सब कुछ इस चरम बिन्दु परमात्मा के लिए हो। जो किया जा रहा है, जिस उद्देश्य के लिए है, जिसमें आहुति दी जा रही है, देने वाला भी वही है ब्रह्म का ही अंश है, यह स्थिति दिव्य कर्मी की होनी चाहिए। ऐसी स्थिति में द्वैत का भाव ही नहीं है।

जो कुछ है सो तोर

‘यद् द्वैत तद् भयम’ जहाँ दूसरा आया, वहाँ भय आया। कर्मयोग का ऐसा स्वरूप हो कि जिसमें दूसरा कोई रहे ही नहीं। एक ही स्वर्ण धातु होती हैं, उसी से अंगूठी, उसी से कंगन, उसी से बाजूबंद बनते हैं। तत्वदृष्टि ऐसी विकसित की जाए कि यह सब कुछ ब्रह्म कर्म है। तब ही हमें कर्मयोग की समाधि प्राप्त होती है।

स्वामी विवेकानंद के महाप्रयाण के बाद सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह शेष गुरु भाइयों पर आई कि अब आगे कार्य कैसे चलेगा। श्रीमती ओलीबुल के दान से भूमि तो क्रय कर ली गई, मठ का नक्शा भी बन गया। निर्माण को परिपूर्णता के चरम तक पहुँचाना था। पहले जनरल सेक्रेटरी महासचिव रामकृष्ण मिशन के बने शारदानंद जी। उन्होंने ‘रामकृष्ण लीला प्रसंग‘ लिखना आरंभ किया। धीरे-धीरे प्रकाशित होने लगे, लोगों को जानकारी मिली, धनराशि भी आने लगी। दिन भर लिखते। लिखते-लिखते घुटनों में भयंकर दर्द होता, पर उन्हें लगता कि मानों वे समाधि की स्थिति में लिख रहे हों। घुटनों में गठिया हो गया पर वे कभी रुके नहीं। उसी स्थिति में लेखन उनका जारी रहा। वे लिखते हैं, ‘इस समय मैं उन क्षणों में जीने लगता हूँ, जिनमें समाधि लग जाती है।’ कर्म में एकाग्रता-मनोयोग व भक्ति तीनों मिल जाएं तो समाधि का आनंद आने लगता है। चौबीसवें श्लोक का यही भाव है। हम सभी जाते हैं कि स्वामी शारदानंद जी के इस लेखन रूपी यज्ञकर्म ने रामकृष्ण मिशन का आधारभूत ढाँचा खड़ा कर दिया एवं आज रामकृष्ण लीलामृत, वचनामृत, कथामृत के कारण भी हम वह सब कुछ जानते हैं, जो आज से 110-120 वर्ष पूर्व घटा एवं एक नया इतिहास रच गया।

ऐसा ही एक प्रसंग स्वामी विज्ञानानंद जी (श्री हरि प्रसन्न चटर्जी) का भी मिलता है। रामकृष्ण मिशन के इस कर्णधार ने बाल्मीकि रामायण का इंग्लिश भावाँतरण किया है। उस समय की स्थिति लिखते हुए वे कहते हैं कि मुझे ऐसा लगता कि मानो राम-सीता मेरे सामने बैठें हों। भाव में, ईश्वरीय प्रेम में डूबकर कर्म करना सबसे बड़ा कार्य है- यज्ञीय कार्य है। प्रेमपूर्वक किया गया, श्रद्धा में डूबकर किया गया हर कर्म यज्ञ स्वरूप बन जाता है।

तीन प्रकार की समाधियाँ

इस श्लोक में ‘ब्रह्मकर्मसमाधिना’ की चर्चा आई है। समाधि तीन प्रकार की बताई जाती है। योगसमाधि, ज्ञानसमाधि, कर्मसमाधि। योगसमाधि पातंजल योगशास्त्र के अनुसार योग की सर्वोच्च स्थिति का नाम है। ज्ञान की उच्चतम स्थिति में पहुँच जाना ज्ञानसमाधि है। कर्म करते-करते अकर्म को प्राप्त हो जाना, ब्रह्म को प्राप्त हो जाना, ब्राह्मीस्थिति में पहुँच जाना कर्मसमाधि है। सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर देना हवि, अग्नि, आहुति, यज्ञ सब कुछ परमात्मामय हो। यज्ञीय भाव से हो, यही कर्मसमाधि है।

यज्ञ का बाह्य अनुष्ठान तो जीवन के अंतरतम में घटने वाले क्षणों का बहिरंग में चित्रण मात्र हैं। ‘जब हमारे भीतर चैतन्यता की अग्नि अपनी देदीप्यमान महिमा में प्रज्वलित हो उठती है, तो हमारी ज्ञानेंद्रियाँ आसपास के साँसारिक विषयों का ज्ञान प्राप्त कर मनरूपी कुँड में उनकी आहुति देती हैं।’ यह व्याख्या स्वामी चिन्मयानंदजी की प्रस्तुति श्लोक के विषय में है। वे कहते हैं, ‘हमारे भीतर स्थित महान आत्मा के प्रति अपने समस्त कार्यों का समर्पण ही यज्ञभाव में संपादित कर्मों का सम्यक् सुनियोजन है।’

सभी कर्मों में ब्रह्म का, जगदीश्वर का, उसके क्रीड़ा-कल्लोल का दर्शन करना एक विलक्षण अनुभूति है। भगवान श्रीकृष्ण इस सुप्रसिद्ध श्लोक के माध्यम से हम सभी से अपेक्षा करते हैं कि हम अपनी सभी भीतर और बाहर की घटनाओं में प्रभु का निरंतर आह्वान करें, उसकी अनुभूति करें तथा अपने सभी दैनंदिन क्रियाकलापों को दिव्यता प्रदान करें। कोई भी क्षण हमारे लिए विश्राम का नहीं है, हर क्षण भक्तिमय है, परमात्मामय है। प्रतिक्षण का यह समर्पण भाव हमारी देवसंस्कृति को बड़ा विलक्षण बनाता है। जब व्यक्ति दिव्य जागरुकता के ऐसे ग्राह्य वातावरण में रहता है, तो उसके सभी कर्म यहाँ तक कि अत्यंत महत्वहीन से दिखाई देने वाले साँसारिक कर्म भी अनजाने में ही अहं के परिपूर्ण समर्पण का रूप ले लेते हैं। ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ सदा ब्रह्म का चिंतन करते रहने से ब्रह्मदर्शन होता है, यह सत्य है। स्वामी अपूर्वानंद जी (रामकृष्ण शिवाश्रम) लिखते हैं, ‘परमहंसदेव भी श्रीकृष्ण की साधना करते समय छह मास तक सर्वत्र कृष्ण का दर्शन करते थे। काली मंदिर में पूजा करते समय सब कुछ चैतन्यमय देखते थे, चिन्मय अर्घा, चिन्मय मंदिर, चिन्मयी देवी।’

ब्रह्म में कर्मों का आधान

कर्मों का यह समर्पण यज्ञ की अधीश्वर सत्ता को है। कर्म का सच्चा संन्यास ब्रह्म में कर्मों का आधान करना ही है। इसी बात को आगे भगवान ने पाँचवें अध्याय के दसवें श्लोक में भी कहा है कि जो पुरुष आसक्ति को त्यागकर ब्रह्म में कर्मों का आधान करके कर्म करता है (ब्रह्मण्याधाय कर्माणि), वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल के पत्ते पर पानी नहीं ठहरता। चारों ओर दृष्टि दौड़ाने पर हम भगवान के संदेश को समझने का प्रयास करते हैं, तो एक ही बात मुखरित होती है कि बंधनमुक्ति ब्रह्म से युक्त होकर ही मिलेगी, श्रद्धा में, बिना किसी आसक्ति के प्रेम में डूबकर किए गए समर्पण भाव से संपादित कर्मों से ही मिलेगी, क्योंकि इससे हर कर्म यज्ञमय बन जाता है।

परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर यही किया और यही जीवन जिया। उनकी लेखनी की साधना भी यज्ञकर्म समाधि ही थी। अपना सब कुछ श्रद्धापूर्वक उस परब्रह्म में उड़ेल कर उन्होंने जो साधना की, वह ब्रह्मकर्म था, ब्रह्मकर्म-समाधि थी। उसी ब्रह्म को अर्पित थी। ‘अखण्ड ज्योति’ में वे एक स्थान पर लिखते हैं, ‘मनुष्य जिसे प्यार करता है, उसके उत्कर्ष एवं सुख के लिए बड़े-से-बड़ा त्याग और बलिदान करने को तैयार रहता है। अपने शरीर, मन, अंतःकरण एवं भौतिक साधनों का अधिकाधिक भाग समाज और संस्कृति की सेवा में लगाने से रुका ही नहीं जाता। जितना भी कुछ पास दीखता है, उसे अपने प्रिय आदर्शों के लिए लुटा डालने की ऐसी हूक उठती है कि कोई भी साँसारिक प्रलोभन उसे रोक सकने में समर्थ नहीं होता। दूसरे लोग अपनी छोटी-छोटी सेवाओं और उदारताओं की बार-बार चर्चा करते रहते हैं और उन्हें उसका प्रतिफल नहीं मिला, ऐसी शिकायतें करते रहते हैं। अपने लिए इस तरह सोच सकना संभव नहीं, क्योंकि लोकमंगल, स्वाँत सुखाय आत्मतृप्ति के लिए ही बन पड़ता है। किसी पर अहसान जताने या अपनी विशेषता प्रदर्शित करने के लिए नहीं। लोकसेवा का प्रतिफल जब आत्मसंतोष के रूप में तुरंत मिल गया तो और कुछ चाहने की आवश्यकता ही क्या रहे?’ (‘प्रेम साधना और उसकी परिणति’ मई 1961 अखण्ड ज्योति)।

उपासना से आराधना की ओर

परमपूज्य गुरुदेव ने ब्रह्म को अर्पित कर्म को, उपासना के लिए कर्म को सेवा साधना-लोक आराधना का रूप देकर एक विराट संगठन गायत्री परिवार खड़ा कर दिया एवं उनकी जिनकी उपासना को एक विराट रूप दे दिया।

कहा कि परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ है। हर कार्य जो समष्टिगत ब्रह्म को अर्पित करके किया जाएगा, ब्रह्मार्पणं-ब्रह्मकर्म समाधि की स्थिति में ले जाएगा। एक क्राँतिकारी तेवर अपनाते हुए वे आज की स्थिति को देखते हुए लिखते हैं, ‘गिरता-उठता तो जमाना है, पर इसके लिए वास्तविक पाप-पुण्य का बोझ उस समय की अग्रगामी प्रतिभाओं के सिर पर लदता है। उनका अग्रगमन असंख्यों में प्राण फूँकता है। वे गिरते हैं तो ओलोँ की तरह समूची फसल को सफाचट करके रख देते हैं। जो चुप बैठे रहते हैं वे न तो शाँतिप्रिय कहलाते हैं, न निरपेक्ष, न अनासक्त। आड़े वक्त में मुँह छिपाने के लिए शाँति का, भजन का, ब्रह्मज्ञान का लबादा ओढ़ने वाले अपना मन भले ही समझा लें, आपत्तिकाल की यातनाएं उन्हें कभी क्षमा नहीं करेंगी। दुर्घटना, महामारी, अग्निकाँड, आक्रमण-उत्पीड़न से संत्रस्त हाहाकारी वातावरण में जो एकाँत साधना की बात सोचे, उसे ब्रह्मज्ञानी कौन कहेगा? निष्ठुर पाषाण से कम उन्हें दूसरी उपमा क्या दी जाए, यह सोचने के बाद कदाचित ही कोई दूसरा शब्द मिल सकें।’ (अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1982, क्या काफिला बिछुड़ ही जाएगा)।

यदि वास्तव में किसी को चौबीसवें इस श्लोक का मर्म समझना हो तो उसे कर्म में ब्रह्मदर्शन करने वाले योगी के रूप में परमपूज्य गुरुदेव की जीवन गाथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ पढ़नी चाहिए। जिनका सारा जीवन यज्ञमय एवं हर श्वास में जिन्होंने संस्कृति को समर्पित जीवन जिया, लाखों नहीं, करोड़ों व्यक्तियों को समष्टि के लिए किए जाने वाले कर्म में नियोजित कर गए, उनके जीवन-दर्शन में इस श्लोक के स्वर मुखरित होते हैं एवं साक्षात् श्रीकृष्ण उन झलकियों में दृष्टिगोचर होने लगते है। भगवान की शक्ति ही प्रकृति में आकर दिव्य कर्मों का संपादन करती हैं। केवल ऐसे कर्म ही मुक्त पुरुष के कर्म बन जाते हैं, सिद्ध कर्मयोगी के कर्म बन जाते हैं। इन कर्मों को उदय आत्मा से होता है और आत्मा में कोई विकार उत्पन्न किए बिना ही इनका लय हो जाता है। इस श्लोक की सूक्ष्मतम व्याख्या के बाद आगे की विवेचना अगले अंक में।


कभी नहीं भूलता (Kahani)

परिवार का वातावरण और अभिभावकों का स्तर यह मिलकर ऐसा विद्यालय विनिर्मित करते हैं, जिसमें आरंभिक जीवन में ही वह सिखाया जाता है, जो फिर कभी नहीं भूलता।


गुरुकथामृत-28 - सद्गुरु सवाँ नं कों संगाँ

सतगुरु सवाँ न को सगा, सोधी सई न दाति। हरि जी सवाँ न को हितू, हरिजन सइ न जाति॥

कबीरदास जी इस साखी में कहते हैं, ‘सदगुरु के समान कोई अपना सगा नहीं है। विद्वान के समान कोई देने वाला नहीं है, भगवान के समान कोई हितैषी नहीं है और भक्त के समान कोई जाति नहीं हैं।’

उपर्युक्त साखी से संत कबीर के ज्ञान-विज्ञान की गहराई का हमें भान होता है। उन्होंने कहा है कि सदगुरु जैसा कोई सगा नहीं है, वह हमारा अपना है। उससे दिल खोलकर सब कुछ कहा जा सकता है। अपना अंतःकरण उसके समक्ष खोलकर उड़ेल दो, वह पग-पग पर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। उंगली पकड़कर तुम्हें चलना सिखाएगा। उससे कभी छल-कपट मत करो। अपना सगों से भी सगा मानकर उससे अपनी सारी मन की बात कह डालो। परमपूज्य गुरुदेव भी तो ऐसे ही सदगुरु थे, जिनसे हजारों लाखों व्यक्ति जुड़े व उनको अपना सगा मानकर उनके समक्ष खुलते चले गए। अपना सब कुछ उन्हें कहकर वे हलके हो लेते थे एवं फिर उनके योगक्षेम का निर्वाह पूज्यवर ही करते थे। चाहे वह निष्कासन तप के रूप में साधकों द्वारा प्रायश्चित विधान में अपने सभी पाप उनके समक्ष उजागर कर देना हो अथवा पाती जो नित्य समय पर पहुँच जाती थी, उससे अपने दाँपत्य जीवन की भी बात करना हो, वे विश्वास रखकर लिखते थे या कह देते थे। ऐसा ही एक पत्र हम एक बहन के हाथों लिखे पत्र के जवाब में पूज्यवर की ओर से प्रस्तुत कर रहे हैं। देखें इसकी भाषा। 14/9/1954 को लिखे इस पत्र में लिखते हैं-

प्रिय पुत्री चुन्नु आशीर्वाद,

पत्र मिला। पढ़कर अपने बच्चों के साथ खेलने जैसी प्रसन्नता हुई। तुम हमें हमारी पुत्री के समान प्रिय हो। तुम्हारे लिए कोई चिंता की बात हमारे लिए भी वैसी ही दुखदायी होगी।

तुम चिंता न करो। चि. देवव्रत की पिछली बातों पर आशंका न करें। अब वह तुम्हारे अलावा और किसी को न चाह सकेंगे। तुम हमारे ऊपर निश्चिंत रह सकती हो। बच्चे को स्नेह।

श्रीराम शर्मा आचार्य

पत्र की भाषा पर ध्यान दें। चुन्नू (सही नाम हमें भी विदित नहीं, मात्र पत्र उपलब्ध है) बहन ने जो भी अपनी आशंकाएं थीं, लिख भेजीं, अपना जी खोलकर रख दिया। पूज्यवर ने उस वेदना को समझा एवं पूरी तरह आश्वस्त कर दिया कि उनके पति व उनके संबंधों को वे अपनी प्रार्थना द्वारा घनिष्ठतम बनाने का प्रयास करेंगे। अपने आध्यात्मिक पिता-अभिभावक-संरक्षक-गुरु का अपने दाँपत्य जीवन के विषय में यह संकेत पाकर वे निश्चिंत हो गई। यह पत्र एक शिष्या का अपने गुरु के प्रति विश्वास का प्रतीक है एवं इस बात का भी कि गुरु से बड़ा सगा और कोई नहीं हो सकता।

संभवतः यही बात थी कि एक बहन संतानप्राप्ति संबंधी अपनी मनोकामना लिख भेजती है। एक बार नहीं, कई बार। तब वे 29/6/1954 को लिखे इस पत्र में आश्वासन देते हैं एवं सही मार्गदर्शन करते हैं, मुन्नी नाम से इन बहन का।

‘तुम अपना मन आत्मकल्याण की दिशा में लगाओ। निरंतर भक्तिपूर्वक गायत्री माता की उपासना करती रहो। वृद्धावस्था की संतान स्वयं दुःख पाती है और माता-पिता को भी चिंता में डालती है। आजकल मनुष्यों की आयु अधिक नहीं होती। कौन जाने आप लोगों की आयु कितनी है। यदि थोड़ी आयु रही तब तो बेचारे बच्चों की कैसी दुर्दशा होगी, इसकी कल्पना करके तुम सब समझ सकती हो। यह भगवान की दया ही है कि जीवन के अंतिम वर्षों में कोई चिंता तुम्हें नहीं हैं और आत्मकल्याण का पर्याप्त अवसर है। दूसरी ओर पूर्वकृत प्रारब्ध को भुगतते जाने का भी अच्छा मार्ग है।

तुम अकारण ही चिंता मोल लेकर व्यर्थ परेशान मत हो। शाँतिपूर्वक भगवान में मन लगाकर शाँति प्राप्त करो, घर में सबको आशीर्वाद।’

श्रीराम शर्मा आचार्य

समझाने का तरीका भी निराला है। निस्संतान मुन्नी बहन (सही नाम अज्ञात) को जो संदेश पूज्यवर ने दिया है, आज के आशीर्वाद देने वाले ढेरों संत-धर्मोपदेशक-महामंडलेश्वर समझ लें एवं साथ-ही-साथ आशीर्वाद माँगने वाले भी, तो हमारे देश से बहुप्रजनन की समस्या ही मिट जाए। औरों से बिल्कुल अलग एक सुधारक मार्गदर्शक व अपने सगे की तरह वे समझाते हैं कि यह एक भगवान सत्ता का अनुदान ही है कि उनके पास कोई संतान नहीं है। यदि बच्चा इस बढ़ती उम्र में हो भी गया, तो वह दुःख ही पाएगा। हम जानते हैं कि ढेरों सुपात्रों को पूज्यवर ने सुसंततियाँ भी दी हैं, पर प्रारब्ध की जानकारी तो सदगुरु को ही हो सकती है। वही उसे बदल भी सकता है एवं जहाँ चाहे वहाँ विधि के विधान को बदल भी सकता है। पर यहाँ इस मामले में उन्होंने अपनी मानस पुत्री-शिष्यता के हित की बात सोची है एवं यही समझाया है कि यह समय भजन, भगवद् चिंतन का है, सारे समाज को अपनी संतान मानकर उसकी सेवा करने का है। कितना सही व सशक्त मार्गदर्शन है। यही अपनत्व, सगे-संबंधी वाली आत्मीयता, खरी बातें हमारी गुरुसत्ता की विशेषता को स्थापित करती हैं।

22/12/1967 को ऐसा ही एक पत्र उनके द्वारा बहन निर्मला को लिखा गया। उसकी भी भाषा को पाठकगण पढ़ें व तत्वदर्शन को आत्मसात करें।

‘प्रिय पुत्री निर्मला आशीर्वाद, पत्र मिला। तुम्हारी निराशा और चिंता से दुःख हुआ। संतानोत्पादन का मनुष्य जीवन में केवल राई-रत्ती स्थान है। संतान होना न कोई सौभाग्य है और न होना दुर्भाग्य। बात बहुत छोटी हैं, उसे इतना अधिक महत्त्व देना व्यर्थ है।

लोगों की समझ उलटी हैं। तुम किसी के तानों की रत्तीभर भी परवाह न करो। विद्या पढ़ने का क्रम जारी रखो। स्वावलंबन लक्ष्य रखो। मानव जीवन का मूल्य और महत्व समझो और उसको प्राप्त करने के लिए आशा एवं उत्साह के साथ परिपूर्ण परिश्रम और पुरुषार्थ करो।

यही तुम्हारे लिए उचित एवं श्रेयस्कर है। संतान वाली बात का हमारी दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं। फिर भी जो बन पड़ेगा, तुम्हारी प्रसन्नता के लिए प्रयत्न करेंगे।’

कितनों में साहस है इतना स्पष्ट लिखने का। पूज्यवर ने न केवल उन्हें हिम्मत बंधाई, शिक्षा अर्जन, विद्या ग्रहण कर स्वावलंबी बनने की बात समझाई है और कहा है कि यह कोई दुर्भाग्य नहीं कि संतान नहीं है। हजारों लोग तो इसी वेदना में कलपते, दुःख पाते, अपना पैसा गंवाते, लुटते-लुटाते देखे जाते हैं। हाँ, कहीं भी कोई योग हो तो देने वाला उदार है, देता है, पर स्पष्ट इस प्रकार लिखकर तो कोई अपना सगा ही देता है, जो किसमें हित है, किसमें नहीं, यह जानता है।

परमपूज्य गुरुदेव को कई लोग लेखक, संगठक, विद्वान मानते हैं, पर उनका एक बड़ा सबल समाज सुधारक, कुरीति उन्मूलक स्वरूप अभी भी बहुतों को अविज्ञात है। उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया एवं अपनत्व के नाते सच्चा मार्गदर्शन देकर शिष्यों को सही रास्ते पर चलाया है। चाहे वह माता-पिता की बात मानना हो, चाहे अपनी निज की विवाह की बात हर विषय पर एक खरा चिंतन वे पत्र द्वारा देते थे। ये पत्र भी एक अनाम अपने आत्मीय साधक को 29/5/52 को लिखा गया, ऐसी ही कुछ कहानी कहता है।

हमारे आत्मस्वरूप,

आपका पत्र मिला, दो बार पढ़ा और आपकी परिस्थितियों को समझा। आपके सभी निश्चय बहुत ही सही, उपयुक्त, बुद्धिमत्तापूर्ण और सतोगुणी वृत्ति में परिपूर्ण हैं। हम उन सभी से सहमत हैं और सभी में सफलता चाहते हैं।

पिता, प्रत्यक्ष देवता है। आप पिताजी को प्रत्यक्ष देव मानकर उनकी सुविधा और सेवा के लिए सभी प्रयत्न करना। यह आपके लिए बहुत ही ऊंचा धर्म-कर्त्तव्य है।

विवाह में दहेज प्रथा को ठुकराकर आपने एक बड़े ही साहस का आदर्श कार्य किया है। आप जैसे कुछ युवक आगे बढ़ें, तभी इस हत्यारी प्रथा का अंत हो सकता है। सौ. चंद्रलेखा के साथ तुम्हारा जीवन बहुत ही सुखी रहेगा। हमें यहाँ से ही उसकी सद्बुद्धि, सेवाभावना, सतीत्व एवं अनेक सद्गुणों की प्रवृत्ति दिखाई दे रही हैं। ऐसी अच्छी सहधर्मिणी प्राप्त करने के आपके सौभाग्य को बधाई। सौ. चंद्रलेखा तक हमारा आशीर्वाद पहुँचा दें।’

पत्र को पूरा पढ़ें, एक बार नहीं दो बार पढ़ें। आप सभी को इसमें हर पंक्ति में छिपा अपनत्व-ममत्व एवं वह मार्गदर्शन मिलेगा, जो हमें कोई अपना देता है। आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व लिखे उस पत्र में क्राँतिकारी तेवर हैं एवं एक उच्चस्तरीय मार्गदर्शन है। पिता को प्रत्यक्ष देव मानकर उनकी सेवा करने की जहाँ प्रेरणा इसमें हैं, वहीं उनके शिष्य के साहस की प्रशंसा भी है, जिसने दहेज प्रथा को ठुकराया। यह बात उस जमाने की दृष्टि से कितनी विवेकसम्मत, तार्किक एवं क्राँति के स्वर लिए थी, इसे समझा जा सकता है। यही स्वर तीखे होते चले गए एवं युगनिर्माण योजना के आधारभूत सिद्धाँत बन गए। यह कार्य मात्र एक ऐसी ही सत्ता ही कर सकती थी, जिसे संवेदना को, अपनेपन को अपने पत्रों की भाषा में, लेखनी जो ‘अखण्ड ज्योति’ लिखती थी, उसके शब्दों में तथा अपनी वाणी में गूँथना आता था, जो हम सबका, सभी शिष्यों का अपना था, सगा था।


केन्द्र के समाचार-क्षेत्र की हलचलें

आतंकवादी हिंसा के बाद मानवतावादी प्रयास

11 सितंबर 2001 को घाटी सारे विश्व को हिला देने वाली घटना के बाद तुरंत अपने सभी परिजनों की स्मृति आई, जो उसी क्षेत्र में या समीप रहते हैं। चौबीस घंटे में ही सभी के कुशलक्षेम पता लग गए। कई तो दैवी अनुकंपा से बचे। जिनके कार्यालय ‘वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ में थे, वे उस दिन केन्द्र के परामर्श से न्यूजर्सी गायत्री चेतना केन्द्र फ्रैंकलिन सिटी के उस पावन स्थान पर थे, जहाँ निर्माण होना है। अपने सौभाग्य को धन्यवाद दे सभी ने अमेरिका व कनाडा भर में परिजनों से संपर्क किया, शाँतिकुँज से आए कुशलक्षेम समाचार की जानकारी एक−दूसरे को दी तथा एक समय सामूहिक शाँतिपाठ कर ‘अभियान साधना’ से अपने को जोड़ लिया। इसके साथ-साथ सभी परिजनों ने स्वयंसेवी स्तर पर ‘रक्तदान’ में भाग लिया। न्यूयार्क, न्यूजर्सी, मेरीलैंड तथा शिकागो के कार्यकर्ताओं ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया। सभी के स्थान-स्थान पर शाँति दीपयज्ञों का संचालन भी किया।

ब्रह्मवादिनी बहनों के भव्य सम्मेलन स्थान-स्थान पर

29 सितंबर को विदाई लेकर 30 सितंबर की प्रातः निकले ब्रह्मवादिनी बहनों के तीनों दलों के बड़े उत्साहवर्द्धक समाचार सारे देश से मिल रहे हैं। इन पंक्तियों को लिखे जाने तक बाराबंकी, देवरिया, अयोध्या, बसखारी, अलवर, श्रीमाधोपुर, बीकानेर, जयपुर तथा आगरा, गुना, भोपाल, इंदौर के कार्यक्रमों के विस्तृत विवरण मिल चुके थे। सभी स्थानों पर भव्य कलश यात्रा, ओजस्वी उद्बोधनों, मार्गदर्शक प्रदर्शनी में हजारों की भीड़ तथा संस्कारों से युक्त चौबीस कुँडी, महायज्ञों में विराट उपस्थिति के समाचर मिल रहे हैं। नारी शक्ति की भागीदारी सभी स्थानों पर अत्यधिक रही है। हीरक जयंती वर्ष का यह प्रयास निश्चित ही मिशन के लिए अति महत्त्वपूर्ण मोड़ लेकर आया है।

अंतः ऊर्जा जागरण सत्रों का केन्द्र में शुभारंभ हो गया

विगत 26 अक्टूबर से आश्विन नवरात्रि के अति व्यस्त एवं भावपरक वातावरण में संपन्न आयोजन के बाद शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ में नए मौन एकाकी अंतःऊर्जा जागरण सत्रों का शुभारंभ हुआ है। ये सत्र पाँच दिवसीय हैं एवं इनमें साधक को अकेले अपने कक्ष में चौबीस घंटे मौन रहकर साधना करनी होती है। आहार की व्यवस्था भी सभी की इन्हीं कक्षों में है। नवनिर्मित त्रिपदा-2 (पातंजलि भवन) में स्थान प्रायः साठ शिविरार्थियों के लिए सुरक्षित रखे गए हैं। चौबीस घंटे में मात्र एक बार साधकगण एक साथ कल्क सेवन कर अखण्ड दीपक को प्रणाम करने तथा उनके लिए सुरक्षित यज्ञशाला में यज्ञ संपन्न करने हेतु निकलते हैं। सभी इन साधना सत्रों का पूरा लाभ उठा रहे हैं एवं सत्र पूरा होने पर हो रहे समीक्षा गोष्ठियों में अपने सुखद अनुभवों अनुभूतियों की चर्चा भी कर रहें हैं। यह क्रम 10 अप्रैल नवरात्रि तक चलता रहेगा। फरवरी माह में वसंत पर्व 17/2/2002 को होने के कारण एक शिविर स्थगित करना पड़ा है। 15 फरवरी प्रातः समापन के बाद अब 16, 17, 18, 19 का अवकाश रहेगा। अगले सत्र 20, 21, 22, 23, 24 तथा 25, 26, 27, 28 मार्च की तारीखों में होंगे। मार्च की तिथियाँ बदल गई हैं। परिजन नोट कर लें। अब 2 से 6, 7 से 11, 12 से 16, 17 से 21, 22 से 26 तथा 27 से 31 मार्च की तारीखों में सत्र संपन्न होंगे। अप्रैल की तारीखें यथावत रहेंगी। 20 फरवरी के सत्र के लिए साधक 19 की शाम तक पहुँच जाएंगी।

झारखंड में समृद्धि महायज्ञ फरवरी में

झारखंड नवगठित प्राँत है। अभी पिछले दिनों राँची में सितंबर के अंतिम सप्ताह में एक विराट प्राँतीय सम्मेलन में संकल्प लिया गया कि झारखंड प्राँत की समृद्धि शाँति हेतु एक महायज्ञ फरवरी में संपन्न किया जाए। केन्द्र से परामर्श कर फरवरी 2002 का तृतीय सप्ताह फिलहाल तय किया गया है। इसमें सभी जिलों के जनजाति वर्ग के कार्यकर्त्ता परिजन एवं राज्य सरकार के प्रतिनिधियों सहित श्रीमंतों की भागीदारी रहेगी। इससे इस नए राज्य की सर्वांगपूर्ण समृद्धि का पथ प्रशस्त होगा।

चुरु में राजस्थान तथा हरियाणा सम्मेलन

23, 24 सितंबर की तारीखों में उत्तरी राजस्थान के शहर चुरु में गायत्री शक्तिपीठ पर एक विराट कार्यकर्त्ता सम्मेलन पूरे राजस्थान तथा हरियाणा प्राँत का आयोजित किया गया। राजस्थान के प्रायः सभी जिलों के कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्र के आँदोलन समूहों की रिपोर्ट लेकर उसमें आए। हरियाणा के समीपवर्ती प्रायः आठ जिले भी इसमें शामिल हुए। डा. प्रणव पण्ड्या के नेतृत्व में गए इस दल ने गायत्री परिजनों का वर्तमान परिस्थितियों को दृष्टिगत रख कर्त्तव्य बताया। इससे पूर्व दिल्ली से पिलानी आने पर सीरी (ceeri) केन्द्रीय इलेक्ट्रॉनिक शोध संस्थान में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर निदेशक डा. शमीम अहमद की अध्यक्षता में उद्बोधन भी हुआ, जिसमें झुँझनू जिले के सभी कार्यकर्ता व वरिष्ठ वैज्ञानिक मौजूद थे।

तिरूपति अश्वमेध की तैयारियाँ चरम स्तर पर

तिरूपति अश्वमेध महायज्ञ 23 से 26 दिसंबर में प्रस्तावित है। सभी धर्मशालाएं रहने के स्थान आरक्षित कर लिए गए हैं। इसके अलावा अस्थाई आवास बनाए जाने हेतु तैयारियाँ चल रही हैं। करीब 20 प्रयाज टोलियाँ पूरे आँध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, मलयाली भाषी क्षेत्रों में सक्रिय हैं। उत्साह एवं जोश प्रतिदिन दूना होता चला जाता है। लगता है यह गंगा व कृष्णा का, जमुना व कावेरी का संगम राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य का राजमार्ग बनाएगा।


युगद्रष्टा दो महापुरुष एवं आज का युगधर्म

‘जबकि और लोग अपने देश एक जड़ पदार्थ का टुकड़ा समझते हैं, थोड़े से चरागाह और खेत, वन और पहाड़ियाँ, नदियाँ मैं अपने देश को अपनी माता मानता हूँ। मैं उसकी आराधना करता हैं, माता के रूप में उसकी पूजा करता हूँ। यदि एक राक्षस एक पुत्र की माता की छाती पर चढ़कर खून चूसने लगे, तो वह क्या करेगा? मैं यह जानता हूँ कि मुझमें इस गिरी हुई कौम को उबारने की ताकत है। शारीरिक शक्ति की बात नहीं, मैं कोर्ठ तलवार या बंदूक उठाकर लड़ने नहीं जा रहा, पर ज्ञान की शक्ति तो असीम है।’

श्री अरविंद अगस्त 30, 1905 (बंदेमातरम्)

‘हमारा देश गरीब है, फिर भी उसकी श्रद्धा बलवती है, जिसके बलबूते वे साधन जुटाए जा सके हैं, जो विश्व के कायाकल्प में महती भूमिका निभा सकें। संसार के प्रमुख तीर्थों में से तीन चौथाई भारत में ही हैं। उठे हुए दूसरों को कंधे पर बिठाकर उठाने वाले लोग इसी देश में हुए हैं। यह यहाँ की मिट्टी की विशेषता है। पूर्व दिशा से ही सदा सूर्य निकलता है और उसका प्रकाश सारे संसार में फैलता है। उषाकाल, ब्रह्ममुहूर्त और अरुणोदय का वह देश भारत ही है, जहाँ से दिनकर उदय होता और संसार में अपना प्रकाश फैलता है। कल परिस्थितियाँ बदलेंगी और तब तक बदलने की यह प्रक्रिया चलती रहेगी, जब तक कि सारा विश्व स्वाभाविक और संतोषजनक स्थिति में नहीं जा पहुँचता।’

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ‘अखण्ड ज्योति’ फरवरी 1987, पृष्ठ 57

‘जब एक महान समुदाय धूल में से उठ खड़ा होता है तो कौन-सा मंत्र संजीवनी मंत्र है अथवा उसे पुनर्जीवित करने वाली कौन-सी शक्ति है। भारत में दो महामंत्र हैं, एक तो ‘बंदेमातरम्’ का मंत्र है, जो मातृभूमि के प्रति जनता के जाग्रत प्रेम की सार्वभौम पुकार है और दूसरा और अधिक गुप्त और रहस्यपूर्ण है, जो अभी उद्घाटित नहीं हुआ है।’

श्री अरविंद फरवरी 19, 1908 (वंदेमातरम्)

‘अन्य धर्मावलंबियों के अन्य मंत्र हो सकते हैं, पर जब कभी सार्वभौम एवं सर्वजनीन मंत्र की खोज पूर्वाग्रहों को दूर रखकर निष्पक्ष भाव से उसकी निजी महत्ता के आधार पर की जाएगी, तो उसका निष्कर्ष गायत्री मंत्र ही निकलेगा। इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर स्वयं में बीज जैसी शक्ति का स्रोत है। इस कारण इसकी सामर्थ्य का विस्तार अनंत है।’

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड ज्योति मई 1967, पृष्ठ 60

‘सृष्टि के आदि से लेकर अद्यावधि गायत्री मंत्र की जितनी आवृत्तियाँ हुई है उतनी और किसी उपासना प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाले शब्द गुच्छक की नहीं। सृष्टि में अनेकों विभूतियाँ हैं। उनमें से एक गायत्री भी है। इस मंत्र का शब्द गुँथन इस प्रकार हुआ है जो भावार्थ और सामर्थ्य की दृष्टि से विलक्षण है। इसमें व्यक्ति और समाज को सुसंपन्न, सुसंस्कृत एवं समृद्ध बनाने वाले अनेकानेक रहस्यमय तत्वों का समावेश है। त्रिपदा के तीन चरणों में समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी के सिद्धाँत की साँगोपाँग विवेचना भरी पड़ी है। विश्व का यह सबसे छोटा, किन्तु सबसे सारगर्भित धर्मशास्त्र, तत्वदर्शन एवं अध्यात्म विज्ञान है। सतयुगी विश्व-व्यवस्था के समस्त सूत्र संकेत इसमें बीज रूप में कूट-कूटकर भरे हुए हैं। इसे नवयुग का संविधान कहें तो भी अत्युक्ति न होगी।’

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ‘अखण्ड ज्योति’ अगस्त 1983, पृष्ठ 33

‘केवल वही कौम, जो अपने जीवन के ग्रामीण मूल की पुष्टता को शहरी तड़क भड़करूपी पत्तों और फूलों के लिए बलिदान नहीं कर देती, स्वस्थ दशा में मानी जाएगी और उसका स्थायित्व सुनिश्चित होगा, भूमि की ओर वापस लौटना हमारी मुक्ति के लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना स्वदेशी का विकास अथवा अकाल के विरुद्ध संघर्ष। यदि हम अपने नवयुवकों को खेतों पर वापस जाने का प्रशिक्षण दें तो वे ग्रामीण जनता के लिए सलाहकार, नेता और उदाहरण बन सकेंगे।’

श्री अरविंद मार्च 6, 1908 (वंदेमातरम्)

‘इक्कीसवीं शताब्दी में बड़े शहरों का विकेंद्रीकरण होगा। गाँव का स्थान कस्बे लेंगे। कल-कारखाने छोटे-छोटे इस स्तर के लगेंगे, जो प्रदूषण उत्पन्न न करें, जिनके लिए बड़ी मात्रा में कोयला न जलाना पड़े। इतनी बिजली तो हवा-पानी से ही निकल आया करेगी, जिससे कुटीर उद्योगों के लिए छुटपुट शक्ति मिलती रहे। मनुष्य जिस शारीरिक श्रम का अनभ्यस्त हो गया है, उसे फिर से अपनाने लगेगा। साथ ही लघु उद्योगों के लिए छोटे संयंत्रों द्वारा उत्पन्न की गई बिजली भी मिलती रहेगी। देहाती जीवन स्वास्थ्यकर भी होता है, सुविधाजनक भी ओर सस्ता भी।’

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड ज्योति फरवरी 1987, पृष्ठ 41

‘विशेष युगों में कुछ विशेष आन्दोलन होते हैं जब ईश्वरीय शक्ति अपने आपको प्रकट करती है और अपनी चरम शक्ति से मानव के सारे आकलनों को तहस-नहस कर देती है, सावधान राजनेता और योजनाएं रचने वाले राजनीतिज्ञों की बुद्धिमानी का मजाक बना देती है, वैज्ञानिक विश्लेषण करने वालों के पूर्वानुमानों को झूठा बना देती है और जितनी प्रचंडता और तीव्रगति से वह आगे बढ़ती है, उससे उसका मानवातीत शक्ति होना स्पष्ट रूप से प्रकट हो जाता है। बौद्धिक व्यक्ति बाद में उस आँदोलन के कारणों को ढूंढ़ निकालने का और उन तत्वों को उजागर करने का प्रयास करता है, जिन्होंने उसे संभव बनाया। किन्तु उस समय वह सरासर गलत होता है, प्रत्येक पग पर उसकी बुद्धि भूल कर बैठती है और उसका विज्ञान काम नहीं करता। यही वह समय है जब हम कहते हैं कि इस आँदोलन में ईश्वर का हाथ है। वही उसका नेता है और उसे अपना उद्देश्य पूरा करना ही है। चाहे मनुष्य के लिए उन साधनों को समझना कितना ही असंभव क्यों न हो जिनसे उसे सफलता मिलेगी।’

श्री अरविंद जुलाई 17, 1909 (वंदेमातरम्)

‘पिछले दिनों दो खंड अवतारों ने युगपरिवर्तन की दिशा में अत्यंत रहस्यपूर्ण भूमिका संपादित की है। रामकृष्ण परमहंस और योगी अरविंद की आध्यात्मिक तपश्चर्या ने अवतरण भूमिका ने क्या कुछ किया, इसका रहस्योद्घाटन आज नहीं कुछ समय उपराँत होगा। तीसरा अवतरण युगनिर्माण आँदोलन के रूप में आजकल चल रहा है। इसमें महाकाल भी काम कर रहा है और महाकाली भी। पूर्णावतार लगभग तीस वर्ष की कठिन अवधि के उपराँत प्रकट होगा। महान व्यक्तियों के रूप में भी और महान परिवर्तन के रूप में भी।’

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड ज्योति जून 1967 पृष्ठ 24

‘अवतार ऐसे ही समय में प्रकट होते हैं। मनुष्य का बाहुबल थक जाता है और विनाश की आशंका बलवती हो जाती है, तो प्रवाह को उलटने का पुरुषार्थ महाकाल ही करता है। स्रष्टा को अपनी इस सुरम्य विश्ववाटिका का दर्द भरा अवसान सहन नहीं हो सकता। वे धर्म की ग्लानि और अधर्म की अभिवृद्धि को एक सीमा तक ही सहन कर सकते हैं। मानवी पुरुषार्थ जब संतुलन बनाए रहने में असफल रहता है, तो व्यवस्था को भगवान स्वयं संभालते हैं इन दिनों कुछ ऐसा ही होने जा रहा है। महाकाल की चेतना सूक्ष्मजगत में ऐसी महान हलचलें विनिर्मित कर रही हैं, जिसके प्रभाव-परिणाम को देखते हुए उसे अप्रत्याशित चमत्कारी ही मना जाएगा।’

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड ज्योति अगस्त 1971 पृष्ठ 13

‘आदर्शवादी दुस्साहस ही अवतार है। वह एक भावनात्मक प्रवाह के रूप में उत्पन्न होता है और असंख्यों को अनुप्राणित करता है। अवतार का दार्शनिक विश्लेषण उस ऋतंभरा प्रज्ञा की उमंगभरी हलचलों के रूप में किया जाता है, जो मानवी अंतःकरणोँ में अनायास ही उभरती है और अपनी प्रखरता के कारण मनुष्यों को आदर्शों के लिए मर मिटने को विवश कर देती हैं।’

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड ज्योति अगस्त 1979, पृष्ठ 25, 26

‘आध्यात्मिकता ही भारत की एकमात्र राजनीति है और सनातन धर्म की उपलब्धि ही उसका एकमात्र स्वराज। जब उदारतावाद, राष्ट्रवाद, आतंकवाद जैसी मूर्खताएं समाप्त हो जाएंगी, तभी सत्य को अवसर मिलेगा भारत में सात्विक मस्तिष्क उभरेगा और भारत के पुनर्जीवन के पूर्वार्द्ध के रूप में एक सच्चा-सशक्त आध्यात्मिक आँदोलन आरंभ होगा। निस्संदेह अभी विपत्तियों का सामना करना पड़ रहा है, परंतु हमें सही बातों में विश्वास है कि ईश्वर हमारा मार्गदर्शन कर रहा है, आवश्यक अनुभव प्रदान कर रहा है और उचित परिस्थितियाँ तैयार कर रहा है।’

श्री अरविंद जुलाई 13, 1911 (एक मित्र को लिखें गए पत्र से)

‘ईसाई धर्म में सेविन टाइम्स, इस्लाम धर्म में चौदहवीं सदी में कयामत तथा भविष्य पुराण में खंडप्रलय की चर्चा है। अन्य पूर्वार्त्त और पाश्चात्य दिव्यदर्शियों ने भी इसी स्तर की भविष्यवाणियाँ की हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि कुसमय का अंत आते-आते कहर बरपेगा। किन्तु इसके बाद ऐसा समय आएगा, जिसमें पिछले सभी घाटे की पूर्ति हो जाएगी, ताकि गहरी खाई पाटकर समतल ही नहीं वरन् पुष्पोद्यान के रूप में भी छटा दिखाई देने लगे−−−प्रतिभाएं इन्हीं दिनों उभरेंगी और उनके द्वारा बहुमुखी सृजन की ऐसी योजनाएं बनेगी, जो चरितार्थ होने पर ऐसा वासंती वातावरण बना दें, जिसकी इक्कीसवीं सदी के रूप में आशा-अपेक्षा चिरकाल से की जाती रही है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड ज्योति नवंबर 1988, पृ. 31


अपनों से अपनी बात- - युग परिवर्तन की इस महान प्रक्रिया में अपना तप भी जोड़ें

‘अगले दिनों संसार का समग्र परिवर्तन करके रख देने वाला एक भयंकर तूफान विद्युत गति से बढ़ता चला आ रहा है, जो इस सड़ी-गली दुनिया को समर्थ, प्रबुद्ध, स्वस्थ एवं समुन्नत बनाकर ही शाँत होगा।’ (अखण्ड ज्योति पृष्ठ 65 सितंबर 1981)

‘यदि पूरा भगवान एक जगह जन्में तो फिर शेष सारे संसार की व्यवस्था कौन संभालेगा। सदा अंशावतार ही होते हैं। अवरण की वेला में एक नहीं, प्रबुद्ध आत्माएं एक साथ अवतरित होती है और वे मिलजुलकर दैवी प्रयोजनों की पूर्ति करती है।’ (अखण्ड ज्योति पृष्ठ 16 अक्टूबर 1967)

‘यदि पूरा भगवान एक जगह जन्मे तो फिर शेष सारे संसार की व्यवस्था कौन संभालेगा। सदा अंशावतार ही होते हैं। अवतरण की वेला में एक नहीं, प्रबुद्ध आत्माएं एक साथ अवतरित होती हैं और वे मिलजुलकर दैवी प्रयोजनों की पूर्ति करती हैं।’ (अखण्ड ज्योति पृष्ठ 16, अक्टूबर 1967)

यहाँ दो संदर्भ युगद्रष्टा पूज्यवर की लेखनी से दिए गए हैं। इन्हें भी पढ़ें तथा पृष्ठ 61-62 पर दिए गए लेख ‘युगद्रष्टा दो महापुरुष और आज का युगधर्म’ विषय पर अभिव्यक्तियों का भी मनन करें। हीरक जयंती साधना वर्ष के एक बड़े महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं हम सभी। सारे विश्व में महायुद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। विश्व एक महात्रासदी से गुजर रहा है। जो भी परिस्थितियाँ पैदा हुई हैं, अप्रत्याशित नहीं है, पर निश्चित ही यह संकट टलेगा, नवसृजन की संभावनाएं , साकार होंगी एवं वर्तमान विभीषिका का समापन होगा। समय कुछ अधिक लग सकता है, परिस्थितियाँ आगामी कुछ माह में और जटिल हो सकती हैं, पर यह जो अवधि 2002 के मध्य तक के कुछ दिनों तक की हैं, बड़ा विशेष स्थान रखती है युगपरिवर्तन की प्रक्रिया में। संकटों का सामना अधिक जागरुकता एवं साहसिकता के साथ करने के लिए सभी को अपेक्षाकृत अधिक तत्परतापूर्वक कटिबद्ध होना चाहिए। निराशा को जरा भी पास नहीं फटकने देना चाहिए। सतयुग की वापसी जैसी महान उपलब्धि के स्वप्न संजोए ही रखने चाहिए।

प्रतिकूलताएं हटेंगी, नवसृजन का लक्ष्य पूरा होगा

जो भी कोई दंगल में लड़ने की इच्छा रखता है, उस पहलवान को चोटें भी खानी पड़ती हैं, वर्जिश भी पूरी करनी होती है, पर दंगल जीतने का गौरव मन में उमंगें भरता रहता है। विद्यार्थी जो डॉक्टर या इंजीनियर बनना चाहते हैं, फीस देने, पुस्तकें खरीदने के अलावा और भी कुछ यत्न करते रहते हैं, विशेष कोचिंग लेते हैं एवं कॉलेज की नियमित प्रायः 9-10 वर्ष की पढ़ाई में भी अनवरत लगे रहते हैं। कोई यह सोचे कि बिना स्कूल या कॉलेज जाए काम चल जाए व ऐसे ही पुरस्कार रूप में डिग्री मिल जाए, तो यह शेखचिल्ली का ख्वाब कहा जाएगा। न छात्र ऐसा सोचते हैं न अभिभावक उन्हें बढ़ावा देते हैं। अध्यापक भी ऐसी उपेक्षा दिखाने वालों पर अप्रसन्न ही होते हैं। युगसंधि के इन विशिष्ट दिनों में प्रतिभावानों का अन्यमनस्क रहना, असमंजस में या अकर्मण्यता में पड़े रहना ऐसा ही अपनाया गया अवरोध कहा जाएगा, जिससे किसी को यह भले ही लगता हो की तत्काल तो राहत मिल गई, सुविधा में समय कट गया, पर भविष्य तो निश्चित ही अंधकारमय एवं विपन्न ही कहलाएगा।

अग्निपरीक्षा में जब धातु खंड को गुजारा जाता है तो उस पर जो भी बीतता हो, जब कसौटी पर कसे जाने और तपाने में अधिक चमकने की प्रामाणिकता सिद्ध हो जाती है, तो फिर किसी को क्वालिटी-गुणवत्ता पर कोई संदेह नहीं रह जाता। खरे सोने को महत्त्व दिया जाता है, उच्च स्तर पर उसका मूल्याँकन होता है। यह उदाहरण आज की परिस्थितियों पर पूरी तरह लागू होता है। वरिष्ठों, विशिष्ठों, विशेषज्ञों ही नहीं सामान्यजनों की भी खरी परीक्षा का समय है यह। आगामी इस समय में जो पूर्णतः श्रेष्ठतम स्थिति में पहुँचने में भी दस-ग्यारह वर्षों का समय और लेगा, सभी को विकट परीक्षाओं की घड़ी से गुजरना है, यह किसी प्रकार की तप−साधना से कम नहीं है।

सप्तर्षियों की तप−साधना सुप्रसिद्ध है। ऋषिश्रेष्ठ विश्वामित्र जिनने नवयुग की कल्पना की, नूतन सृष्टि की रचना की एवं गायत्री मंत्र के ऋषि कहलाए, कठोर तप से ही ब्रह्मर्षि बन पाए। सप्तर्षियों की तपःस्थली शाँतिकुँज भी मूल रूप में उन्हीं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि है।

सप्तर्षियों ने तप किया तो वे अजर-अमर बनकर आकाश में जाकर स्थापित हुए, चमकने-दमकने लगे। ध्रुव को ब्रह्माँड का ध्रुवकेन्द्र बनने का अवसर तप-साधना से ही मिला था। च्यवनऋषि जब तप में निरत हुए तो वे सुकन्या जैसी पत्नी एवं अश्विनीकुमार जैसे चिकित्सक पा सके और जराजीर्ण शरीर का कायाकल्प करके खोए यौवन को पुनः प्राप्त कर सकने में सफल हुए।

पार्वती ने भी सती का जन्म पाने के बाद अपने आराध्य को खोने पर लंबा तप करके शिव को पति के रूप में वरण कर सकने का सुयोग पाया। अनुसूया की तपस्या भी भगीरथ गंगा की तरह मंदाकिनी धरती पर लाने में सफल हुई। कुँती, अंजनी, शकुँतला, गार्गी, मैत्रेयी, कात्यायनी ने भी अपने-अपने स्तर के तप करके उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ अर्जित कीं। स्वयं मनु और शतरूपा की तपस्या ही उन्हें अवतारों की जन्मदात्री बना सकी।

जमीन से सभी धातुएं मिट्टी मिली हुई अयस्क (और ओ.आर.ई.) के रूप में उपलब्ध होती है। उन्हें भट्टी में तपाने के उपराँत ही महत्वपूर्ण कामों में आ सकने योग्य बनाया जाता है। अग्नि संस्कार के बाद गलाई-ढलाई करने पर ही उपकरण-औजारों का निर्माण संभव हो पाता है। सूर्य का तपता तेज न हो तो समुद्र का खारा पानी भाप बनकर न बादल बने और न हम सबको पेयजल मिले। पारद जैसी विष समान धातु भी अग्नि संस्कार-तप के माध्यम से संजीवनी औषधि बन जाती है। आयुर्वेद की सभी गुणकारी भस्में लौह, ताँबा, पारद, हीरा तथा मकरध्वज तपाए जाने पर ही गुणकारी बनती है। ईंटें आँवे में पककर ही मजबूत होती है। यह तप-संस्कार जहाँ भी संपन्न होता है, परिणाम फलदायी ही होते हैं।

गंगा की गोद, हिमालय की छाया में स्थित शाँतिकुँज तप-साधना के संस्कारों से अनुप्राणित है। नित्य इस सीमित साठ एकड़ के परिकर में जितना गायत्री जप संपन्न होता है, उसकी संख्या करोड़ों में जाती है। पाषाण परिकर हिमालय देवात्मा है, क्योंकि उसकी कंदराओं में रहकर अगणित तपस्वी ऋषियों ने अपनी प्रचंड तपऊर्जा का समावेश किया एवं अभी भी कर रहे हैं। उसी की छाया में, वादियों में प्रवेश द्वार पर स्थित हरिद्वार की इस पावन तपोभूमि में निरंतर कुछ साधक मौन एकाकी तप−साधना भी कर रहे हैं,जो 26 अक्टूबर से निरंतर चल रही है एवं आगामी नवरात्रि तक चलती रहेगी। इसके अतिरिक्त दो हजार से अधिक साधक नौ-नौ दिन के अपने अनुष्ठान यहाँ आकर करते हैं। एक वर्ष के लिए आरंभ हुई अभियान साधना विगत गायत्री जयंती से आरंभ हुई थी। इसे करने वालों की बड़ी संख्या शाँतिकुँज में भी है एवं क्षेत्र में तो यह संख्या लाखों में चली जाती है। अब इसे 2002 की समाप्ति गीताजयंती 15 दिसंबर तक आगे बढ़ा दिया गया है। नियमित गायत्री साधना इसके अतिरिक्त सभी परिजन कर रहे हैं।

युगचेतना का उद्भव ऋषिकल्प सामूहिक तपश्चर्या पर भी ही बहुत कुछ निर्भर है। रचनात्मक दृष्टि से हर प्रयास किया जाना चाहिए। भौतिक स्तर पर प्रत्यक्ष प्रयासों का अपना महत्व है, पर तप से ही आरंभ हुए इस मिशन गायत्री परिवार का साधना आँदोलन एक विशेष उद्देश्य के साथ आरंभ किया गया है। यह मात्र उपासना तक सीमित न रह जीवन साधना बन जाए, हर श्वास में योगसाधना, संयम तपश्चर्या का समावेश हो जाए, तो वातावरण निश्चित ही बदलेगा।

परमपूज्य गुरुदेव द्वारा संपन्न 24-24 लक्ष की 24 महापुरश्चरणों की साधना युगपरिवर्तन-सतयुग की वापसी हेतु सुरक्षित रखी हुई है। उस ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’ के ब्याज से ही मिशन की इतनी बड़ी-बड़ी योजनाएं पूरी हुई हैं। साथ में देव कन्याओं द्वारा 1971-72 में संपन्न इतना बड़ा तप का कोष परमवंदनीया माताजी की पचास वर्ष की तप−साधना भी है। विशिष्ट अमडडडड तो इस युगपरिवर्तन की महान प्रक्रिया में अपना विशिष्ट तप नियोजित करेंगी ही, पर सर्वसाधारण भी जुड़ जाए, तो न केवल युगधर्म का निर्वाह होगा, वे अनुदानों के लाभार्थी भी बनेंगे। संयुक्त देवशक्ति द्वारा दैवी दुर्गा के अवतरण का एक अभिनव प्रयोग चल रहा है और हम सबको उसमें भागीदारी करनी चाहिए।


आत्मकल्याण की समन्वित (Kahani)

जिज्ञासु कात्यायन ने देवर्षि नारद से पूछा, ‘भगवन्! आत्मकल्याण के लिए विभिन्न शास्त्रों में विभिन्न उपाय बताए हैं। जप, तप, त्याग, वैराग्य, योग, ज्ञान, स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत, ध्यान, धारणा, समाधि आदि अनेक उपायों में से सभी को कर सकना हर एक के लिए संभव नहीं। फिर सामान्य जन यह भी निर्णय नहीं कर सकते कि इनमें से किसे चुना जाए। कृपया आप ही मेरा समाधान करें कि सर्वसुलभ और सुनिश्चित मार्ग क्या है? अनेक मार्गों के भटकाव से निकालकर मुझे सरल अवलंबन का निर्देश कीजिए।’

नारद ने कात्यायन से कहा, ‘हे मुनि श्रेष्ठ सद्ज्ञान और भक्ति का एक ही लक्ष्य है कि मनुष्य सत्कर्मों में प्रवृत्ति हो। स्वयं संयमी रहे और अपनी सामर्थ्यों को गिरों को उठाने और उठों को उछालने में नियोजित करे। सत्प्रवृत्तियाँ ही सच्ची देवियाँ हैं। जिन्हें जो जितनी श्रद्धा के साथ सींचता है, वह उतनी ही विभूतियाँ अर्जित करता है। आत्मकल्याण की समन्वित साधना के लिए परोपकाररत रहना ही श्रेष्ठ है।’


विश्व संकट के समाधान हेतु विशेष साधना क्रम

अपने देव परिवार की यह विशेषता रही है कि उसने कार्य सिद्धि के लिए लौकिक पुरुषार्थ के साथ उसी के अनुरूप आध्यात्मिक पुरुषार्थ भी किया है है। जब-जब राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आपात स्थिति अनुभव की गई है, तब-तब ऋषि-निर्देशन के अनुसार परिस्थितियों के अनुरूप सामूहिक साधनात्मक पुरुषार्थ किए जाते रहे हैं। इन दिनों जो भीषण संघर्ष की स्थिति उभरी है, उसके पीछे अविवेकी, संवेदनहीनों, महत्वाकांक्षियों का बढ़ता दुस्साहस तथा विवेकवानों, सद्भावना संपन्नों में उनके प्रतिरोध के लिए संकल्प और सत्साहस का अभाव ही मूल कारण रहे हैं। इसलिए वर्तमान विभीषिकाओं के समाधान के लिए निम्नानुसार साधनात्मक निर्धारण किए गए हैं।

प्रतिदिन कम-से-कम एक माला शिव गायत्री का जप। जप के साथ भावना रहे, ‘हे त्रिपुरारी! भटके हुओं के मनों से वासना, तृष्णा एवं अहंतारूपी असुरों का सफाया करके उनमें शिव, लोकहितकारी कामनाओं, विचारणाओं और प्रवृत्तियों का संचार करें।’

ॐ पञ्चवक्त्राय विद्महे, महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।

एक माला गायत्री महामंत्र का जप ‘क्लीं’ बीज मंत्र का संपुट लगाते हुए। भावना रहे, ‘हे महाशक्ति! सत्पुरुषों सद्भावना संपन्नों में अनीति-अवाँछनीयता के प्रतिरोध एवं दमन के उपयुक्त संकल्प, सत्साहस एवं संघबद्धता जाग्रत करें।’

ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं ऊँ।

जप के समय ध्यान करें, ‘हमारी कल्याणकारी भावना से उभरी जप की तरंगें ऋषि तंत्र के किए गए दिव्य संचार के साथ संयुक्त होकर सविता देव तक पहुँच रही हैं, वहाँ से समाधानपरक स्पंदन एवं ऊर्जा परावर्तित होकर फैल रही है। उस दिव्य प्रवाह ने सारे भू-मंडल को अपनी लपेट में ले लिया है। अभीष्ट की सिद्धि के लिए उसका प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है।’ जहाँ कहीं किसी भी प्रसंग में हवन-यज्ञ हों, उनमें निम्न आहुतियाँ उक्त भावना के साथ डाली जाएं-

अनिष्ट निवारणार्थ विशेष आहुति-

ॐ पञ्चवक्त्राय विद्महे, महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् स्वाहा॥ इदं रुद्राय, इदं न मम॥

दिवंगतों की आत्मा की शाँति के लिए आहुति-ऊँ शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नो भवत्वर्य्यमा। शन्नऽइन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः स्वाहा॥ इदं जन कल्याणार्थाय इदं न मम।

यह विशुद्ध साधनात्मक प्रयोग करते हुए, इसके अनुरूप सामाजिक वातावरण बनाने के लिए भी प्रयास किए जाएं। जगह-जगह अनिष्ट निवारक के लिए सामूहिक प्रार्थना सभाएं भी की जा सकती है। पूर्व निर्धारित तिथि एवं समय पर प्रारंभ में एक घंटे या अधिक समय का सामूहिक जप रखा जाए, जो लोग गायत्री मंत्र का निर्धारित अन्य मंत्र न जानते हों या उन्हें करने में कोई झिझक हो, वे जनकल्याण के भाव से मौन बैठकर अपने विश्वास के अनुसार भावभरी प्रार्थना भर करते रहें। बाद में जन सद्भाव एवं अनीति-अत्याचार के विरुद्ध संकल्प जगाने वाले युगगायन किए जाएं। वर्तमान संकट के निवारण के लिए दुर्बुद्धि त्याग, अनीति के प्रतिरोध सद्बुद्धि के जागरण और सद्भावना के विस्तार की आवश्यकता समझाई जाए। इस दिशा में अपने परिवार द्वारा चलाए जा रहे साधना-पुरुषार्थ की जानकारी देते हुए अधिक-से-अधिक भाई-बहनों को इसमें भागीदार बनने के लिए भावभरा आमंत्रण दिया जाए। अपने परिवार के कुशल वक्ताओं के साथ विभिन्न विचारधाराओं के प्रगतिशील प्रतिपादकों से से संक्षेप में समर्थनपरक अपीलें कराई जाएं। अंत में कुछ मिनट मौन प्रार्थना के साथ शाँतिपाठ और शाँति अभिसिंचन करके समापन किया जाए।

विश्वास है कि जिस प्रकार पहले के प्रकरणों में परिजनों ने तत्परता का परिचय दिया है वैसी ही बल्कि उससे भी अधिक तत्परता इस संदर्भ में बरतेंगे। यह समस्या जल्दी सुलझने वाली नहीं दिखती तथा इसका क्षेत्र भी अपेक्षाकृत अधिक व्यापक है। अस्तु, उसी अनुपात में साधना अभियान की तत्परता और व्यापकता भी होनी चाहिए।


परिवर्तन सुनिश्चित है (Kavita)

जिस तरह सघन-तिमिर के बीच सूर्य का दर्शन निश्चित है उस तरह ही विभीषिका बीच कि युग परिवर्तन निश्चित है।

हुआ है जब भागीरथ तप, हिमालय तो पिघलेगा ही चीरकर हिमनग की छाती, स्रोत-सुरसरि निकलेगा ही धरा के सूखे अधरों पर, सजल-अभिसिंचन निश्ति है।

ठीक है मानव मूल्यों का, निरंतर ही पतझर हो रहा रही हैं सद्प्रवृत्तियां सूख, हृदय नीरस जरजर हो रहा किन्तु पतझर के बाद, वसंत, स्नेह, संवेदन निश्चित है।

हो रहा है समुद्रमंथन और विषघट भी निकला है असुर हावी होते जाते, सुरों का साहस उथला है किन्तु विषपायी का विषपान, सुधा संवर्धन निश्चित है।

आज भी कोई कारण नहीं, न हो परिस्थितियों का बदलाव। हो रही है वैचारिक क्राँति, न रुक पाए मानव-भटकाव। हुई हैं युग प्रज्ञा गतिमान, मनुज परिवर्तन निश्चित है।

खोलकर रखें खिड़कियाँ द्वार, प्रकाशित हो चिंतन का कक्ष। परोसा जाए श्रेष्ठ चिंतन, अरे! जनमानस के भी समक्ष श्रेष्ठ चिंतन चरित्र दोनों, स्वर्ग का सर्जन निश्चित है॥

मंगल विजय विजयवर्गीय


तपोवनों में प्रकाश उतरा


तपोवनों में प्रकाश उतरा (Kavita)

लगा रहा है, पुकार काई नया सबेरा पुकारता है।

अखण्ड दीपक की, ज्योति जागी, बना दिया है, प्रभात बागी, न काम देगा त्रुमार कोई नया उजेला, पुकारता है।

जगी तपस्या, अनीति भागी, मिटी रूढ़ियां, कुरीति भागी, नये सृजन का शृंगार कोई नया चितेरा, संवारता है।

नयी नहीं है, कथा पुरानी, सुनो समय की भविष्य वाणी, किया न जिसने सुधार अपना उसे न कोई, उबारता है।

दिगन्त को दे दिया बुलाया, वसन्त को दे दिया बुलावा, लगा गगन तक किरण नसेनी, स्वर्ग, धरनि पर उतारता है।

दुःखी जनों में, सुहास उतरा। तपोवनों में, प्रकाश उतरा, मनुष्यता का विकास सपना, भरे नयन से निहारता है।

लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’

*समाप्त*