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“मैं कौन हूँ?” जो स्वयं से इस सवाल को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं। उस द्वार को खोलने की चाबी यही है कि स्वयं से पूछों, “मैं कौन हूँ?” और जो तीव्रता से, समग्रता से अपने से यह सवाल पूछता है, वह स्वयं ही उत्तर भी पा जाता है।
महान् दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन् बूढ़े हो चले थे। उनकी देह जो कभी अति सुँदर और स्वस्थ थी, अब जर्जर और ढीली हो गई थी। जीवन संध्या के लक्षण प्रकट होने लगे थे। ऐसे बुढ़ापे की सुबह की घटना है। वह स्नानगृह में थे। स्नान के बाद वह जैसे ही अपने शरीर को पोंछने लगे, तभी अचानक उन्होंने गहरी नजर से देखा कि वह देह तो कब की जा चुकी है, जिसे वह अपनी माने बैठे थे। शरीर तो बिलकुल ही बदल गया है। वह काया अब कहाँ हैं? जिसे उन्होंने प्रेम किया था, जिस पर उन्होंने गौरव किया था, उसकी जगह यह खंडहर ही तो बाकी बचा रह गया है।
इस सोच के साथ उनके दार्शनिक मन में एक अत्यंत अभिनव बोध भी अंकुरित होने लगा, ‘शरीर तो वह नहीं है, लेकिन वह तो वही हैं। वह तो बिलकुल भी नहीं बदले हैं। अपने सारे कर्तृत्वों, उपलब्धियों के ढेर के बीच वह अपनी गहराई में जस−के−तस हैं। व्यक्तित्व के बनते−बदलते−विकसित होते विविध आयामों के बीच व्यक्ति के रूप में वह वही−के−वही हैं।’ तब उन्होंने स्वयं से ही पूछा,’ आह! तब फिर मैं कौन हूँ?’ अपनी गहराइयों में उन्हें उत्तर भी मिला और तत्त्ववेत्ता के रूप में वह संपूर्ण हुए।
यही सवाल प्रत्येक को अपने से पूछना होता है। यही असली सवाल है। जो इसे नहीं पूछते, वे एक प्रकार से व्यर्थ जीवन जीते हैं। जो पूछते ही नहीं, वे भला उत्तर भी कैसे पा सकेंगे? इसलिए स्वयं से अभी और तत्काल यह सवाल पूछो कि “मैं कौन हूँ?” अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूँजने दो, “मैं कौन हूँ?” जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो उसे अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है और उत्तर जीवन की सारी दिशा और अर्थ को परिवर्तित कर देता है।
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फरवरी−मार्च 2001 के पर्व−त्योहार
4 फरवरी, 2001 जया एकादशी
8 फरवरी, 2001 गुरु रविदास जयंती
17 फरवरी, 2001 स्वामी दयानंद जयंती
18 फरवरी, 2001 विजया एकादशी
21 फरवरी, 2001 महाशिव रात्रि
24 फरवरी, 2001 फुलेरा दूज/रामकृष्ण परमहंस जयंती
फरवरी−मार्च 2001 के पर्व−त्योहार 4 फरवरी, 2001 जया एकादशी 8 फरवरी, 2001 गुरु रविदास जयंती 17 फरवरी, 2001 स्वामी दयानंद जयंती 18 फरवरी, 2001 विजया एकादशी 21 फरवरी, 2001 महाशिव रात्रि 24 फरवरी, 2001 फुलेरा दूज/रामकृष्ण परमहंस जयंती 3 मार्च, 2001 होलाष्टक
6 मार्च, 2001 आमलकी एकादशी
9 मार्च, 2001 होलिका दहन
10 मार्च, 2001 धूलि वंदन
14 मार्च, 2001 रंगपंचमी
20 मार्च, 2001 पापमोचनी एकादशी
22 मार्च, 2001 प्रदोश
23 मार्च, 2001 संवत्सरारंभ/नवरात्र घटस्थापन
6 मार्च, 2001 आमलकी एकादशी 9 मार्च, 2001 होलिका दहन 10 मार्च, 2001 धूलि वंदन 14 मार्च, 2001 रंगपंचमी 20 मार्च, 2001 पापमोचनी एकादशी 22 मार्च, 2001 प्रदोश 23 मार्च, 2001 संवत्सरारंभ/नवरात्र घटस्थापन 28 मार्च, 2001 गणगौर
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नवीन वस्त्र धारण करने पर बालकों में जो उल्लास दिखलाई पड़ता है, कुछ वैसा ही उत्साह जनमानस में नूतन वर्ष के प्रति होता है। जीर्ण−शीर्ण पुरानी चीजें किसे भाती हैं? नई की कल्पना और आकर्षण ही कुछ और होता है। उनके आने और पाने में जो खुशियाँ उमंगती हैं, उनका कहना ही क्या!
पुराने साल की विदाई के बाद जब नूतन वर्ष का आगमन होता है, तो प्रत्येक मनुष्य में एक अभिनव स्फूर्ति और उमंग दिखाई पड़ती है। यह इस बात की सूचक होती है कि पुरातनता का आलस्य और अनुत्साह अपनी केंचुल त्याग चुके हैं और नई अँगड़ाई लेकर नूतनता का ऐसा आवरण ओढ़ा है, जिसमें सर्वत्र सक्रियता एवं गतिशीलता ही दृष्टिगोचर होती है। यों प्रगतिशीलता के अभाव का नाम भी प्राचीनता है। इसे भूतकाल या विगत काल भी कह सकते हैं। जब हम नए युग में, नए समय में, नए साल में प्रवेश करते हैं, तो सर्वप्रथम इस बात पर विचार करते हैं कि हमारा पिछड़ापन कैसे दूर हो? विगत वर्ष में हमसे जो भूलें हुई और जिसके कारण उन्नति के स्वर्ण अवसर हमने खोए, उनसे कैसे बचे और अपना भविष्य उज्ज्वल कैसे बनाएँ?
इन सभी बातों की समीक्षा का उपयुक्त अवसर नया वर्ष होता है। वह नवीन प्रेरणाएँ और नूतन विचार लेकर आता है। मनः संस्थान में यदि इनके प्रति उमंगे न जगें, तो उत्कर्ष का सिलसिला अवरुद्ध होकर रह जाएगा और उस आनंद और उल्लास से सदा वंचित ही बना रहेगा जो नववर्ष के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
योजनाकार क्रियान्वयन से पूर्व ही अपनी समस्त योजनाएँ भलीभाँति बना और मस्तिष्क में बैठा लेते हैं। भवन निर्माता निर्माण से पहले उसका नक्शा बनाते, तब निर्माण कार्य आरंभ करते हैं। ऐसे ही नए वर्ष के आते ही हर विवेकशील व्यक्ति पूरे सालभर का एक मोटा खाका तैयार करता है और यह सुनिश्चित का लेता है कि उस समूची अवधि में कौन−कौन से नए निर्धारण और कार्य कब−कब आरंभ होंगे। इसे नववर्ष की पुलकन का चमत्कार ही कहना चाहिए कि मन उक्त समय में समग्र सफलता के ताने−बाने बुनने में इतना संलग्न हो जाता है, जितना कि अन्य मौकों पर शायद ही होता हो।
वैसे तो काल एक सतत प्रवाह है, वह अनादि और अनंत भी है। इसलिए उसके नए−पुराने होने का अर्थ नहीं, किंतु फिर भी मनुष्य ने उसे दिन, सप्ताह, पक्ष, मास एवं वर्ष आदि के सुविधानुसार विभाजनों में बाँटकर एक विभेद तो उत्पन्न कर ही दिया है। तदनुसार तो बीत गया, उसे भूतकाल कहने की परंपरा है और आगत−अनागत को क्रमशः वर्तमान एवं भविष्यत् कह दिया जाता है। आदमी का यह सहज स्वभाव है कि वह विगत या वर्तमान के प्रति उतना उत्साहित नहीं रहता, जितना कि आने वाले अनागत के प्रति। परिवार के सभी सदस्य परस्पर हिल−मिलकर रहते हैं, यह सच है; पर जब कभी कोई चिर प्रतीक्षित मेहमान घर में आ विराजता है, तब जो प्रसन्नता की कहर पूरे वातावरण में दौड़ती दिखाई पड़ती है, वह अन्य अवसरों पर कहाँ देखी जाती है! कुछ ऐसे ही दृश्य अभिनव वर्ष के आगमन पर दृष्टिगोचर होता है। उससे मन में तरंग, शरीर में स्फूर्ति, क्रिया में गति, वाणी में उल्लास और बुद्धि में सक्रियता का जो नवीन उदय होता है, उसे वसंत में पतझड़ के बाद वनस्पतियों में निकलने वाले नूतन किसलय का संज्ञा दी जा सकती हैं।
इसे सृष्टिक्रम का एक आश्चर्य ही कहना चाहिए कि यहाँ किसी को भी पुरातनता का बोझ लंबे समय तक नहीं ढोना पड़ता। परमात्मा ने हर प्राणी का इस संदर्भ में ध्यान रखा है। मुर्गों में कलगी, हाथी में दाँत, साँप में केंचुल आदि इसी परिवर्तन के परिचायक हैं। अंत में शारीरिक अशक्तता के आ धमकने पर जीवात्मा को उससे भी मुक्त कर नवीन कलेवर प्रदान किया जाता है। यह उस एकरसता को दूर करने के लिए ही ईश्वर द्वारा निर्धारित व्यवस्था के अंतर्गत होता है, जो लंबे समय तक एक जैसी स्थिति और देह में रहने के कारण उत्पन्न होती हैं।
नवीनता ही जीवन है। उसमें गति, प्राण और प्रेरणा है। प्राचीनता तो दर−दर की ठोकरें खाती और स्थान−स्थान पर दुत्कारी जाती है। नए वर्ष को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए और उससे नई प्रेरणा लेकर हर एक को अपना जीवन सफल−समुन्नत बनाने में लग जाना चाहिए।
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वह संस्कृत के महान् विद्वान् थे। संस्कृत ही उनकी मातृ भाषा थी। उनका सारा परिवार संस्कृत में ही बात−चीत करता था। उनके यहाँ पीढ़ियों से इसी प्रकार संस्कृत में ही बातचीत करने की परंपरा चली आई थी। उनके पूर्वजों की प्रतिज्ञा थी कि हम न तो संस्कृत को छोड़कर दूसरी भाषा का कोई शब्द बोलेंगे और न ही सनातन धर्म को छोड़कर किसी भी मत−मताँतर के चक्कर में उलझेंगे। भले ही इसके लिए मुट्ठी−मुट्ठी भर आटा माँगकर पेट भरना पड़े, तो भी चिंता की कोई बात नहीं। भिखारी बनकर भी वेद−शास्त्रों की और सनातन धर्म की रक्षा करेंगे। इस प्रतिज्ञा का पालन करते हुए वह अपनी धर्मपत्नी तथा बाल−बच्चों को लेकर गंगा किनारे विचरण किया करते थे। पतित−पावनी गंगा जी के किनारे−किनारे चलते रहना ही उनका नियम था।
पाँच−सात मील चलकर सारा परिवार गाँव से बाहर किसी देवमंदिर में या वृक्ष के नीचे ठहर जाता था। वे गाँव में जाकर आटा माँग लेते और रूखा−सूखा जैसा भी होता, अपने हाथों से बनाकर भोजन पा लेते। अगले दिन फिर से श्री गंगाजी के किनारे आगे बढ़ जाते। संस्कृत एवं संस्कृति की उनकी यह प्रचार यात्रा इसी तरह गतिशील रहती।
एक बार वह देववाणी एवं देवसंस्कृति का प्रचार करते−करते एक राजा की रियासत में पहुँच गए और नियमानुसार गाँव से बाहर एक वृक्ष के नीचे ठहर गए। दोपहर को गाँव में गए और घरों से मुट्ठी−मुट्ठी भर आटा माँग लाए। उसी से भोजन बनने लगा। अकस्मात् उधर से राजपुरोहित आ निकले। उन्होंने देखा एक ब्राह्मण परिवार वृक्ष के नीचे ठहरा हुआ है। माथे पर तिलक गले में यज्ञोपवीत, सिर पर लंबी चोटी, ऋषि मंडली−सी प्रतीत हो रही है। पास आकर देखा तो रोटी बनाई जा रही थी। छोटे बच्चे तथा ब्राह्मणी संस्कृत में वार्त्तालाप कर रहे थे।
राजपुरोहित ने परिवार के मुखिया से संस्कृत भाषा में बातें कीं। उन्हें यह जानकर भारी आश्चर्य हुआ कि आ से ही नहीं, सैकड़ों वर्षों से इनके पूर्वज संस्कृत में ही बोलते चले आ रहे हैं और संस्कृत की, धर्म की, वेद−शास्त्रों की रक्षा के लिए ही भिखारी बने मारे−मारे डोल रहे हैं। राजपुरोहित ने सारा वृत्ताँत जब महाराज को सुनाया, तो वह भी चकित रह गए। उन्होंने पुरोहित से कहा कि ऐसे देव−परिवार को महलों में बुलाया जाए और मुझे परिवार सहित उनके दर्शन−पूजन का सौभाग्य प्राप्त कराया जाए।
महाराज एवं राजपुरोहित के अति आग्रहवश अगले दिन यह ऋषि परिवार राजभवन पहुँचा। वहाँ पहले से ही हजारों स्त्री−पुरुषों का जमघट लगा हुआ था। लोग पंडित श्रीराम जी महाराज की जय के नारे लगा रहे थे। अपने नाम के यह जयकारे सुनकर वह चकित भाव से मौन रहे। महाराज ने स्वयं अपनी महासनी सहित सुवर्ण पात्रों में ब्राह्मण देवता, ब्राह्मणी तथा बच्चों के चरण धोकर पूजन किया, आरती उतारी और चाँदी के थालों में सोने की अशर्फियाँ और हजारों रुपये के बढ़िया−बढ़िया दुशाले सामने लाकर रख दिए।
सबने देखा कि उस ब्राह्मण परिवार ने उन अशर्फियों और दुशालों की तरफ देखा तक नहीं। जब स्वयं महाराज एवं महारानी ने भेंट स्वीकार करने के लिए प्रार्थना की, तब पंडित जी ने धर्मपत्नी की ओर देखकर पूछा कि क्या आज के लिए आटा है? ब्राह्मणी ने कहा, नहीं। पंडित जी ने महाराज से कहा, बस आज के लिए आटा चाहिए। ये अशर्फियों के थाल और दुशाले मुझे नहीं चाहिए।
महाराज ने प्रार्थना की, ब्राह्मण देवता! मैं क्षत्रिय हूँ, भला दान की हुई चीज मैं वापस कैसे ले सकता हूँ। इस पर पंडित श्रीराम महाराज मुस्कराए और बोले, महाराज हम ब्राह्मणों का धन तो विद्या एवं तप है। हम इसी का अर्जन करते हैं और इसी का संग्रह करते हैं। इसी में हमारे संपत्ति की रक्षा कीजिए।
महाराज यह सुनकर बड़े श्रद्धाभाव से बोले, पर क्या यह उचित होगा कि एक क्षत्रिय अपना दिया हुआ दान वापस ले ले? क्या इसे सनातन धर्म को क्षति नहीं पहुँचेगी। इस पर पंडित जी ने कहा अच्छा इसे हमने ले लिया। अब इसे हमारी ओर से आप जनकल्याण के कार्यों में व्यय कर दीजिए। इस तरह हमारे और आपके दोनों के ही धर्म की रक्षा हो जाएगी।
और फिर सबने देखा कि ब्राह्मण देवता सपरिवार एक सेर आटा लेकर और सारे सोने की अशर्फियों से भरे चाँदी के थाल व दुशालों को ठुकराकर वेद पाठ करते हुए जंगल की ओर चले जा रहे हैं।
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आज हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं, 20वीं सदी कल की विषयवस्तु बन गई है। 20वीं सदी परिवर्तन की सदी रही। इसके तूफानी प्रवाह में वैज्ञानिकों से लेकर मनीषी एवं भविष्यविदों ने नए युग की झलक देखी, जिसका सूक्ष्म दर्शन विश्वपटल पर तीव्रतम गति से बदलते परिदृश्यों को देखकर किया जा सकता है। इसके अंतर्गत पुराने तौर−तरीके पिछड़ते जा रहे हैं, जो कल काम करते थे, वे आज काम नहीं कर रहे हैं। इस क्रम में सफल जीवन एवं नेतृत्व के तौर−तरीकों में भी नवीन निर्धारण अपेक्षित है और युग−मनीक्षा गहन विचार−मंथन करती हुई, इस विषय में अपने निष्कर्ष भी प्रस्तुत कर रही है।
उभर रहे सामाजिक परिदृश्य के संदर्भ में प्रख्यात विचारक एल्विन टॉफलर ने अपनी पुस्तक ‘पॉवर शिफ्ट’ में अपनी भविष्यवाणी व्यक्त करते हुए कहा था, “भावी समाज में प्रत्येक स्तर पर नवीन शक्ति ढाँचे का आधार भूत तत्त्व ‘ज्ञान’ होगा। आर्थिक उत्पादन का प्राथमिक स्रोत ज्ञान ही होगा और यह नया शक्ति संघर्ष हमारे मन और व्यक्ति के जीवन की गहराई में प्रवेश करने जा रहा है।”
अमेरिकी मनीषी डेविस ह्विटले अपनी पुस्तक ‘एम्पायरज ऑफ द माइंड’ में इसी आधार पर कहते हैं कि 21वीं सदी में एकमात्र साम्राज्य मन का होगा। इट−गारे, बुर्ज−कंगूरे, मेहराबों द्वारा बना साम्राज्य कल की वस्तु होगा। अर्थात् बाहरी सफलता एवं नेतृत्व का निर्धारक तत्त्व वैयक्तिक नेतृत्व होगा, हो सफलता ही नहीं, अस्तित्व रक्षा के लिए भी आवश्यक होगा और इसके लिए हमें जीवनपर्यंत विद्यार्थी एवं नेता बनना होगा, अन्यथा नए विश्व में अज्ञान एवं पिछड़ापन पूर्व से भी अधिक पीड़ादायक एवं घुटन भरा होगा। अतः प्रगति में बाधक दीर्घकालीन पूर्वाग्रहों एवं धारणाओं को बदलने व चुनौती देने का समय आ गया है। मन के साम्राज्य का मार्ग प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं कि यह बाहरी ज्ञान की बजाय अंदर के अपने ज्ञान द्वारा खुलेगा।
लेखक के अनुसार, प्रभावी स्व नेतृत्व के लिए सर्वप्रथम अपने गुणों, क्षमताओं, रुचियों, शक्तियों, दुर्बलताओं और योग्यताओं का ज्ञान होना आवश्यक है। तभी हम जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावी ढंग से ले सकते हैं, अन्यथा अपने सही−सही ज्ञान के अभाव में जीवन के अधिकाँश निर्णय अपनी अभिरुचि एवं प्रकृति के विपरीत बाहरी प्रभावों एवं दबावों द्वारा निर्धारित देखे जाते हैं, जो असंतोषजनक जीवन का निर्माण करते हैं। इन कारकों में सर्वप्रथम धन का लोभ होता है। धन के बाद दूसरा प्रभाव अनगढ़ सलाहें होती हैं, जो अच्छे भाव से कही होने के बावजूद भी अपने परिणाम में बेहूदी होती हैं। तीसरा प्रभाव पारिवारिक एवं सामाजिक दबाव होता है। चौथा व्यवसाय मार्केट का सर्वेक्षण होता है, जो प्रायः गहन तथ्यों की बजाय उथले तथ्यों पर आधारित होता है। पाँचवाँ कारक, सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ देना होता है, परिणामस्वरूप अधिकाँश व्यक्ति एक विचित्र जड़ता भरा रूखापन लिए अपने कार्य एवं व्यवसाय में पड़े रहते हैं और प्रायः भयंकर परिणामों के साथ जीते हैं। इनसे बचने के लिए अपना गहन अध्ययन, निरीक्षण एवं अन्वेषण आवश्यक है। आप क्या करना चाहते हैं? कहाँ जाना चाहते हैं? इन प्रश्नों का जवाब जहाँ मिलना शुरू हो जाए समझना चाहिए कि मन के साम्राज्य का आधा मार्ग तय हो गया।
आत्मज्ञान के अनुपात में ही व्यक्ति में सच्चे आत्म−सम्मान का भाव जाग्रत् होता है, जो कि रचनात्मक उत्प्रेरणाओं, व्यवहार एवं कार्यों को जन्म देता है। इसके समुचित अभाव में व्यक्ति अपने प्रति हीनता के भाव से ग्रस्त होता है या दंभ से भरा होता है, जो परिणाम में सृजन की बजाय ध्वंस को ही बुलावा देते हैं। स्वस्थ आत्मगौरव का भाव अपने मूल्य व महत्त्व की उचित समझ देता है और अपने व दूसरों के प्रति जिम्मेदारी भरे व्यवहार को प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है।
लेखक ने आत्मसम्मान के मूल्याँकन के लिए चार प्रश्न कसौटी रूप में दिए हैं, 1-क्या हम अपना सम्मान करते हैँ? 2-वर्तमान में जो हम हैं या जो बनना चाहते हैं, क्या उसे संतुष्ट हैं? 3-क्या हम वह कर रहे हैं, जो बनने चाहते हैं? क्या हम वहाँ जा रहे हैं, जहाँ हम जाना चाहते हैं? 4-क्या हम अपने जीवन के स्वामी आप अनुभव करते हैं अर्थात् जो कर सकते थे, उसे सफलतापूर्वक करने की क्षमता व रूप में अपना मूल्याँकन कर सकते हैं। यदि उत्तर न में हो तो इस संदर्भ में विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
आत्मज्ञान द्वारा आँतरिक उत्प्रेरणा पर आधारित प्रयास से ही चरम उत्पादकता एवं उपलब्धि सुनिश्चित होती है। अपने क्षेत्रों में सफल व्यक्तियों के उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि सफलता एवं स्वतंत्रता का आँतरिक उत्प्रेरक धन, सत्ता या नाम, यश की इच्छों के बाह्य उत्प्रेरक से अधिक सशक्त होता है। बाह्य प्रेरित व्यक्ति की क्षमता, बाह्य कारक के हटते ही तुरंत घटनी शुरू हो जाती है।
बाह्य प्रेरित लक्ष्य में प्रतिद्वंद्विता का खतरा सदैव बना रहता है। यह सत्ता और प्रभुत्व की इच्छा, दूसरों को नीचा दिखाने की इच्छा से प्रेरित होती है। ऐसे में ध्यान दूसरों में बँट जाता है। अतः हम अंतःप्रेरित की बजाय बाह्य प्रेरित इंसान बन जाते हैं। संबंध हार−जीत पर आधारित हो जाते हैं, जबकि जीत−जीत (विन−विन) संबंध अपेक्षित है। जिसके अंतर्गत लेखक के अनुसार हमें सहकर्मी, ग्राहक, पड़ोसी और प्रियजनों की जीतने में वह आगे बढ़ने में मदद करके शुभ इच्छा का संपादन करना चाहिए।
इसके लिए हमें बचपन एवं युवावस्था के एकाँगी एवं संकीर्ण भाव से ऊपर उठकर प्रौढ़ता एवं नेतृत्व के उदार भाव को ग्रहण करना चाहिए। बचपन में प्रधान प्रश्न रहता है, “आप मेरे लिए क्या कर सकते हैं? युवावस्था में, “मैं अकेले करना चाहता हूँ” यह भाव हावी रहता है। प्रौढ़ भाव “आओ साथ करें” का रहता है, जबकि नेता का प्रश्न होता है, “मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?”
लेखक के अनुसार उदारता की इस उच्च भूमि के लिए अपनी सत्ता व अर्जित उपलब्धि की स्थिति को देना व बाँटना बहुत कठिन होता है, क्योंकि यह हमारी प्रकृति का अभिन्न अंग प्रतीत होता है, किंतु अपने दीर्घकालीन हित एवं समाज की भलाई में यही स्वस्थ प्रक्रिया है व इसे आत्मानुशासन द्वारा स्वाभाविक बनाया जा सकता है। एम, स्काँट अपनी पुस्तक ‘द रोड लेस ट्रेवल्ड’ में इस संदर्भ में ठीक ही लिखते हैं, “मेरी यह पक्की धारणा है कि मनुष्य के रूप में, विशेष रूप से प्रौढ़ मनुष्य के रूप में जो हमारे अंतर एवं व्यक्तित्व को सबसे अधिक प्रकाशित कर सकता है, वह है अस्वाभाविक बनने की हमारी क्षमता अर्थात् अपनी प्रकृति का अतिक्रमण कर इसे रूपांतरित करने की क्षमता।” वस्तुतः यह आध्यात्मिक जीवन शैली को अपनाने का चुनौती भरा आह्वान है।
लेखक के अनुसार, वैयक्तिक नेतृत्व एवं सुप्रबंध का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व व्यक्ति की ‘इंटेग्रिटी’ है। ईमानदारी, सत्यनिष्ठा एवं चरित्रनिष्ठा इसी के पर्यायवाची हैं। इसका मर्म जीवन की हर परिस्थितियों में जीवन के उच्चतम मानदंडों के अनुरूप अपने को खरा उतारने की तत्परता एवं निष्ठा में निहित है। इसके लिए राजनायिका एवं उथले मन से किए गए निर्णय पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए प्रचलित ढर्रे एवं अनगढ़ आदतों को दरकिनार एवं दुरुस्त करते हुए वही करना होगा, जिसे कि अंतरात्मा सही मानती है। इसकी आवश्यकता केवल बड़े निर्णयों भर में अपेक्षित नहीं है, बल्कि छोटे−से−छोटा निर्णय एवं कार्य इससे प्रभावित होना चाहिए। यह कभी छोटी−बड़ी नहीं होती। जैसे स्त्री या तो गर्भवती होती है या नहीं होती। वैसे ही यह कभी आँशिक नहीं होती। नेतृत्व का जहाँ यह सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है वहीं यह आपसी संबंधों का भी कीमिया है। क्योंकि प्रामाणिकता एवं चरित्रनिष्ठा के आधार पर ही उस विश्वसनीय का जन्म होता है, जो कि संबंधों को मधुर एवं टिकाऊ बनाती है। बच्चों एवं नई पीढ़ी के लिए यह सबसे बड़ा तोहफा हो सकता है, जिससे कि प्रतिपादित आदर्श उनके लिए अनुकरण योग्य एक जीवंत उदाहरण बन जाए।
‘इंटेग्रिटी’ जहाँ आँतरिक प्राणतत्त्व द्वारा पोषित होती है, वहीं यह व्यक्तित्व को भी सुदृढ़ करती है। इसके आधार पर ही उस जिम्मेदार व्यक्तित्व का विकास होता है, जिसे परिभाषित करते हुए स्टीफन काँवे अपनी प्रख्यात पुस्तक ‘सेवेन हेविट्स ऑफ द हाइली इफेक्टिव पर्सन’ में लिखते हैं, “सफल व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं वह यह थोपी हुई नहीं होती, बल्कि अंतः स्फूर्त होती है। वे अपने व्यवहार के लिए परिस्थितियों, वातावरण या व्यक्तियों को दोष नहीं देते। उनका व्यवहार मूल्यों पर आधारित अपने स्वतंत्र एवं सचेतन निर्णयों द्वारा निर्धाथ्रत होता है।”
लेखक के अनुसार, सचाई यह है कि यदि हमारे अंदर मूल्य का कोई स्पष्ट एवं सुदृढ़ भाव नहीं है, तो हमारे पास बाँटने के लिए भी कुछ नहीं होता, ऐसे में हमें दूसरों की जरूरत हो सकती है, हम उन पर निर्भर हो सकते हैं, सुरक्षा की खोज कर सकते हैं, किंतु हम किसी को भाव दे या बाँट नहीं सकते, जब तक कि वे हमारे अंदर नहीं होते। वह हीरा हमारे अंदर हर व्यक्ति में विद्यमान रहता है, जो प्रतीक्षा में होता है कि उसे खोजा जाए व उसे तराशा जाए और यह हर व्यक्ति का परम कर्त्तव्य है।
यहाँ वैयक्तिक नेतृत्व के संदर्भ में असफलता एवं हताशा का अवरोध एक महत्त्वपूर्ण कारक है। लेखक के अनुसार परिवर्तन इस संसार में स्वाभाविक है और इससे निपटने के लिए दृष्टि की समग्रता अभीष्ट है। इसी के बल पर भूत के अनुभव रचनात्मक निवेश में बदलते हैं और इच्छित भविष्य रचनात्मक निवेश में बदलते हैं और इच्छित भविष्य के दर्शन होते हैं। ह्विटले समग्र दृष्टि के तीन तत्त्वों का उल्लेख इस तरह से करते हैं, 1- असफलता से सीखने का अनुभव, जिससे कि इसे दुबारा न दुहराया जाए, 2-भूतकालीन सफलताओं से नए खतरों के लिए विश्वास का अर्जन, 3-भावी सफलताओं के अज्ञात होने के बावजूद उनकी वास्तविकता पर सुदृढ़ विश्वास।
वैयक्तिक नेतृत्व को युग की महती आवश्यकता बताते हुए व इसके राजमार्ग पर प्रकाश डालते हुए डेविसह्विटले लिखते हैं कि भाव नेतृत्व वैयक्तिक दृष्टि से सफल व्यक्तियों द्वारा ही संभव होगा। लेखक के अनुसार, व्यवहार एवं क्रियाएँ व्यक्ति की वाणी की अपेक्षा अधिक जोर से बोलती हैं। बिना प्रतिबद्धता के शब्द अपना मूल्य खो बैठते हैं। बिना क्रिया के द्वारा पोषित शब्द अंततः निराशा और कटुता को जन्म देते हैं। जैसे−जैसे हम 21वीं सदी की ओर जा रहे हैं, यह चुनौती बढ़ती जा रही है। अब प्रवचन मात्र से पहले की तरह पेट भरने वाला नहीं है, क्योंकि लोगों के दिल−दिमाग कोरे उपदेश सुनते−सुनते वैसे ही रीते और प्यासे हैं। नए युग में अधिक−से−अधिक लोग अपना निर्णय वास्तविक वैयक्तिक आचरण एवं व्यवहार की कसौटी पर कसकर करेंगे और कम−से−कम लोग वाक् जाल में फँसेंगे।
हमारा जीवन प्रेरणादायी बने, अपनी सार्थकता के साथ फलीभूत हो, इसके लिए अपने अंदर की श्रेष्ठतम क्षमता एवं प्रतिभा उभरकर आनी ही चाहिए। दूसरों का सम्मान पाने के लिए हमें प्रथम इसके काबिल बनना होगा, हमें प्रामाणिक बनना होगा। अनुकरण योग्य एक आदर्श मॉडल बनने के लिए हमें प्रथम एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करना होगा, अर्थात् दूसरों का नेतृत्व करने से पूर्व हमें स्वयं का नेतृत्व करना होगा।
अपने मन के साम्राज्य के संचालन की सफलता ही अगले दिनों सभी के सफल जीवन एवं सक्षम नेतृत्व का एक मात्र ठोस आधार बनेगी।
अश्वघोष को वैराग्य हो गया। संसार से विरक्त होकर उन्होंने घर−परिवार त्याग दिया तथा ईश्वर दर्शन की अभिलाषा से वह जहाँ−तहाँ भटके, पर शाँति न मिली। कई दिन से अन्न के दर्शन न होने से क्षुधार्त और थके हुए अश्वघोष एक खलिहान के पास पहुँचे। एक किसान शाँति व प्रसन्नमुद्रा में अपने काम में लगा था। उसे देखकर अश्वघोष ने पूछा, “मित्र! आपकी प्रसन्नता का रहस्य क्या है?”
“ईश्वर दर्शन”−उसने संक्षिप्त उत्तर दिया। “मुझे भी उस परमात्मा के दर्शन कराइए।” विनीत भाव से अश्वघोष ने याचना की। “अच्छा” कहकर किसान ने थोड़े चावल निकाले। उन्हें पकाया। दो भाग किए, एक स्वयं अपने लिए, दूसरा अश्वघोष के लिए। दोनों ने चावल खाए, किसान खाकर अपने काम में लग गया। कई दिन का थका होने के कारण अश्वघोष सो गया। प्रचंड भूख में भोजन और कई दिन में श्रम के कारण गहरी नींद आ गई और जब वह सोकर उठा, तो उस दिन जैसी शाँति वह हल्का−फुल्का उसने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। किसान का दिया संदेश अब उन्हें अच्छी तरह समझ में आ गया। क्षणिक वैराग्य मिटा और उन्होंने अनुभव किया कि अनासक्त कर्म ही वह सीढ़ी है, जिस पर चढ़कर ईश्वर साक्षात्कार का पथ प्रशस्त हो सकता है, कर्म से पलायन नहीं।
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विलंब सूचना
अखण्ड ज्योति की बढ़ती प्रसार संख्या के अनुपात में डाक विभाग की प्रेषण व्यवस्थाएँ नहीं बढ़ सकी हैं− प्रायः विलंब हो जाता है। दिसंबर में डाकर हड़ताल के कारण अंतिम डिस्पेच 30 दिसंबर तक हुए। दिसंबर की प्रतियाँ पाठकों को जनवरी में मिली।
प्रतिवर्ष डाक विभाग से समाचार पत्र पंजीकरण का नवीनीकरण जनवरी में होता है। इस वर्ष नवीनीकरण अत्यधिक विलंब से मिलने के कारण जनवरी की प्रतियाँ भी अत्यधिक विलंब से भेजी जा सकी हैं।
आशा है, परिजन वस्तुस्थिति को समझकर संतुष्ट होंगे।
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संत शब्द सत् का एक रूप है। संत में सत्य का बोध होता है। संत सत्य के प्रति अनंत आस्था रखता है। एकनिष्ठ भाव से सत्य के सम्यक् दर्शन द्वारा अपने जीवन को ढालकर जीव और जगत् के प्रति आदर्श और व्यापक जीवन दृष्टि वाला व्यक्ति ही संत कहलाता है। संत का स्वरूप ईश्वर सदृश्य होता है। गुणों के आधार पर जिनमें भगवत्परायणता, निरपेक्षता, शाँति, समदृष्टि, मोह का अभाव, अहंकारशून्यता, द्वंद्वहीनता और अपरिग्रह आदि गुण रहते हैं, वे संत कहलाते हैं। यही भगवान् के वंदे समाज में भगवद्भक्ति का प्रचार करते हैं। यह प्रचार भिन्न−भिन्न रूपों में होता है। जिसे कई परंपराओं के रूप में देखा जा सकता है।
‘षण्’ धातु ‘तन’ प्रत्यय से संयुक्त होकर संत शब्द को बनाती है। जिसका अर्थ होता है, लोगों के प्रति अनुग्रहकारी होना। लोकानुग्रह तत्त्व तो सामान्यजनों में भी पाए जाते हैं। पाणिनी के अष्टाध्यायी सूत्र के अनुसार संतों में ब्रह्मानंदसंपन्न व्यक्ति होते हैं। यही विशिष्टता एवं विशेषता संत को सामान्यजन से पृथक् करती है। संत का प्रयोग विनयशीलसंपन्न साधु पुरुष के लिए किया जाता है। अपने विशिष्ट अर्थ में संत भगवत् अर्पित व्यक्ति होते हैं। संत वही है जिन्होंने सत्य की सम्यक् अनुभूति की है और उसी के प्रति सहजभाव से आस्थावान् होकर लोकरंजक जीवन दर्शन दिया है।
तैत्तिरीय संहिता के ब्रह्मावली खंड में उल्लेख मिलता है कि संत ब्रह्मा के अस्तित्व को साकार रूप प्रदान करता है। संतों के जीवन में आत्मा के आठ गुणों का विकास होता है। इन आठ गुणों का वर्णन गौतम स्मृति में इस तरह मिलता है, “दया सर्वभूतेषु वाँतिरनुसूया शोचम नायासे मंलमकार्पण्यमस्पृहा।”
बृहस्पति स्मृति के अनुसार, क्षमा, असूया, शौच, मंगल कार्य करना, अकार्पण्य आदि को नियमित रूप से पूर्ण करने वाला ही संत है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा उद्धव को समझाते हुए संतों के लक्षण की ओर संकेत किया है, “मैंने वेदों और शास्त्रों के रूप में मनुष्य के धर्म का उपदेश दिया है। उनके पालन से अंतःकरण की शुद्धि होती है, आत्मा पवित्र होता है और उल्लंघन से रोरव नरक जैसा दुःख−कष्ट मिलता है। परंतु मेरा जो भक्त उन्हें भी अपने ध्यान आदि में विक्षेप समझकर त्याग देता है और केवल मेरी भक्ति में लगा रहता है वही परम संत है।” श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने संतों की चर्चा करते हुए कहा है कि जो सुख और दुःख दोनों को समान भाव से देखता है एवं ग्रहण करता है, जिसे अपने मान−अपमान, स्तुति एवं निंदा की चिंता नहीं रहती और जो सदैव धैर्यपूर्वक निष्काम भाव से कम करता है, वही संत है।
कबीर, दादू, रज्जब आदि ने संत को सत्वस्य योगी कहा है। जड़ीभूत चिदात्मा जब परम सत्य का दिव्य दर्शन करता है, तो वह आनंद और उल्लास में निमग्न हो जाता है, इसी अवस्था में पहुँचा हुआ पुरुष सत्वस्य योगी होता है। ऐसे पुरुष सदा परमात्मा के परम भाव में निवास करते हैं। संसार उन्हें अपने सतरंगी आकर्षण में बाँध नहीं पाता। वे जगत् के जड़ तत्त्वों के मनोहारी एवं मधुमय आकर्षण में नहीं फँसते। वे सभी आकर्षण, आकाँक्षा, इच्छा आदि से परे होते हैं। उनकी चेतना इनसे परे परमात्म चेतना के संग एकीभूत रहती है। उनकी आवश्यकता अपनी आवश्यकता नहीं होती और न उनकी स्वयं की इच्छा होती है। परिणामतः संतों की आत्मा ऊर्ध्वमुखी होती हैं। संतों की व्यापक दृष्टि का मूल रहस्य उनकी आत्मा का ऊर्ध्वमुखी विकास ही है। संत कबीर आदि से ‘स्व’ के परित्याग द्वारा आत्मा के ऊर्ध्वमुखी विकास को संत का लक्षण माना है।
सगुण भक्तिधारा के संत तुलसीदास ने रामचरितमानस में संतों के दिव्य स्वरूप का वर्णन किया है। संतों की उनकी इस व्याख्या में एक ओर स्फटिक की सुँदरता है, तो दूसरी और मोती के आब की तरलता। तुलसी का संत स्वरूप उदात्त, निर्मल और पावन है। उनके अनुसार जिसके अंतःकरण में ‘स्व’ की भावना का विसर्जन हो गया वही संत में राग उस समय गलता है, जब वह स्वयं को परमार्थ के लिए उत्सर्ग कर देता है। उसके उत्सर्ग में प्रतिदान नहीं, बलिदान की भावना रहती है। प्रतिग्रह न होकर आत्मसमर्पण होता है, लेने का नहीं लुटा देने का भाव प्रधान होता है। संत औरों के लिए स्वयं को लुटा देता है। अपने को निःशेष भाव से लुटाकर ही मेघ जलधि कहलाता है। संत भी मेघ की भाँति अवघड़दानी होता है।
तुलसीदास कहते हैं संतों के अंदर काम, क्रोध, लोभ, मोह रूपी मनोविकार नहीं होता। उनका जीवन जप, तप, व्रत और संयम से संयमित होता है। श्रद्धा, मैत्री, मुदिता, दया आदि श्रेष्ठ गुण उनके हृदय में सदैव वास करते हैं। संतों का हृदय मोम के समान होता है। उनकी करुणा हिमालय सदृश्य होती है, जो पिघल−पिघलकर अगणित धाराओं के रूप में प्रवाहित होती है। यही धाराएँ आगे चलकर संत परंपरा बनी हैं। संतों के उपदेशों ने ही संत परंपरा की नींव डाली।
संत परंपरा का प्रारंभिक युग (सं. 1200 से 1550) का सूत्रपात संत जयदेव से लेकर संत धन्ना भगत तक चलता है। इस युग के संतों ने अपने उपदेशों का प्रचार स्वतंत्र रूप से किया। इस समय के प्रमुख संतों में नामदेव, कबीरदास, रैदास की गणना होती है। मध्ययुग में संत युग को दो भागों में बाँटा जा सकता है। पूर्वार्द्ध (सं. 1550-1700) तथा उत्तरार्द्ध (सं. 1700-1850) युग। मध्ययुग के पूर्वार्द्ध काल में प्रमुख संतों में संत गुरुनानक देव, दादू दयाल, संत मलूकदास एवं संत तुलसीदास हैं। इसके उत्तरार्द्ध के प्रधान संतों में संत रज्जब जी, सुँदरदास, बाबा की नाराम, संत दरिया साहब, (भाखड़ वाले), दरियादास (बिहार वाले), गरीबदास, चरणदास आदि का नाम आता है।
संत परंपरा के आधुनिक युग (सं. 1850 से आज) में भी अनेक प्रमुख संतों पलटू, साहब, संत शिवदयाल आदि का प्रादुर्भाव हुआ है। संत परंपरा के मध्ययुग के पूर्वार्द्ध में पंथों का संगठन होने लगा था। इसके उत्तरार्द्ध में आकर सामुदायिक प्रवृत्ति अपेक्षाकृत अधिक उग्र हो गई। आधुनिक काल में पुनरुद्धार की प्रवृत्ति और विश्वकल्याण की भावना को बहुत बल मिला।
विक्रम की सातवीं शताब्दी से प्रारंभ होने वाली संत परंपरा आगे के युगों में विभिन्न संप्रदायों के सिद्धाँतों एवं मतों से पुष्ट होकर पंद्रहवीं शताब्दी तक चली आई है। इसके पश्चात् इसे विशिष्ट नामों से जाना जाता है। पं. परशुराम चतुर्वेदी ने जयदेव से ही संत परंपरा का प्रारंभ माना है, परंतु आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसकी शुरुआत नामदेव से स्वीकारी है। संत साहित्य का श्रीगणेश गीत गोविंद के रचयिता जयदेव से हुआ है, परंतु प्रारंभ में उसकी रेखा क्षीण और धूमिल प्रतीत होती है। वस्तुतः संतधारा की यह क्षीण और अव्यवस्थित रेखा नामदेव के द्वारा व्यवस्थित, प्राँजल और प्रशस्त बनाई गई। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध भक्त नामदेव ने हिंदू−मुसलमान दोनों के लिए एक सामान्य भक्ति मार्ग का सुझाव सुझाया। यहीं से संत परंपरा का सुव्यवस्थित आविर्भाव माना जा सकता है।
सर्वप्रथम कबीरदास ने अपने कुछ विचारों को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त करना आरंभ किया। संत सेन, पीपा, धन्ना, रैदास आदि भी इन्हीं विचारों से अनुप्राणित थे। ये सभी संत रामानंद को अपना गुरु मानते थे। इन संतों ने स्वामी रामानंद के उपदेशों से प्रभावित होकर ही संत परंपरा का श्रीगणेश किया। कबीर एवं उनके समकालीन संतों का काल संत परंपरा का प्रारंभिक युग माना जाता है। इस युग में किसी संप्रदाय विशेष का संगठन नहीं हुआ था।
संत परंपरा के मध्य युग में प्रचलित नियमों का निर्वाह नहीं हो सका। गुरुनानक देव के समय से सामुदायिक संगठन शिष्यत्व पद्धति तथा उपदेश संग्रह की प्रथा प्रारंभ हुई। इसके पूर्वार्द्ध काल में नानकदेव ने नानक पंथ, दादू दयाल ने दादू पंथ, बाबरी साहिता ने बाबरी पंथ, हरिदास ने निरंजनी संप्रदाय तथा मलूकदास ने मलूक पंथ की स्थापना की। कबीर के नाम पर कबीर पंथ की स्थापना भी हुई। इसी तरह लालपंथ एवं साधु संप्रदाय का भी उदय हुआ। इन पंथों तथा संप्रदायों के भिन्न−भिन्न केंद्र स्थापित हो गए। इनके उपदेश संग्रहों को धर्मग्रंथ का महत्त्व मिलने लगा। इस युग के उत्तरार्द्ध में बाबा लाल ने बाबा लाली संप्रदाय, संत प्राणनाथ ने धामी संप्रदाय, बाबा धरनीदास का धरनीश्वरी संप्रदाय, दरियादास (बिहार वाले) ने दरियादासी ने शिवनारायणी संप्रदाय, संत चरणदास ने चरणदासी संप्रदाय, संत गरीबदास ने गरीबदासी पंथ, पानपदास ने पानपंथ और रामचरण दास ने रामसनेही संप्रदाय की स्थापना की। इस काल में दीन दरवेश, बुल्लेशाह और बाबा कीनाराम जैसे संतों ने केवल भगवान् के उपदेशों का प्रचार किया। इन्होंने किसी पंथों एवं संप्रदायों की स्थापना नहीं की।
इस काल के संत एक ऐसे समन्वित धर्म का प्रचार करना चाहते थे, जिसके अंतर्गत सभी प्रचलित धर्मों के मूल सिद्धाँतों का समावेश हो सके। इसके परिणामस्वरूप सभी धर्मग्रंथों के अध्ययन हेतु जिज्ञासा जागी। पौराणिक गाथाओं की सृष्टि, अलौकिकता की कल्पना, भक्तमालों की रचना तथा अपने−अपने धर्मों एवं संप्रदायों के श्रेष्ठ ग्रंथों की पूजा भी इस काल में की जाने लगी। इसी काल में विविध बाह्याचारों तथा कल्पित गाथाओं की रचना होने लगी। यहीं से विकृति का समावेश हुआ। इसे ही मध्ययुग का अंधकार काल कहा जाता है, क्योंकि संतों के सच्चे आदर्श एवं भक्ति के बदले स्वार्थपरता व अहंकार का नग्न नर्तन होने लगा था। कुछ संतों ने इस विकृति एवं विडंबना के विरुद्ध आवाज भी उठाई।
उन्नीसवीं सदी के प्रथम चरण से ही अँग्रेजों का प्रभाव बढ़ने लगा। पाश्चात्य शिक्षा पद्धति, कला तथा संस्कृति ने भारतीय ढंग से अपने आदर्शों एवं उद्देश्यों की व्याख्या की। इसलिए पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति तथा शास्त्रीय मानदंडों के आलोक में प्राचीन धारणाओं एवं मान्यताओं का पुनर्मूल्याँकन करने का प्रयास किया गया। इसी दौरान राधास्वामी संप्रदाय के तृतीय गुरु ब्रह्मशंकर मिश्र से संत परंपरा में बुद्धिवादी एवं वैज्ञानिकता का समावेश किया। इससे संत मत का औचित्य एवं महत्त्व की ओर प्रकाश पड़ा। कबीर पंथ के रामरहसदास तथा दादू पंथ के साधु निश्चलदास ने अपने−अपने पंथों के सिद्धाँतों को स्पष्ट करने का बीड़ा उठाया।
तत्कालीन सामाजिक−साँस्कृतिक पतन को रोकने एवं इसके पुनरोदय का शंखनाद राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे संतों ने समाज सुधार एवं सुधारवादी विचारधारा का प्रचार किया। इससे कुरीति उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन का पथ प्रशस्त हुआ। स्वामी रामतीर्थ ने भी कबीर, नानक तथा दादूदयाल द्वारा प्रयुक्त साधना पर बल दिया। इन आधुनिक संतों के कारण वैचारिक स्वतंत्रता, निर्भीकता, मानवता एवं विश्वकल्याण जैसे नैतिक गुणों को ग्रहण करने की प्रेरणा मिली।
संत परंपरा का वर्तमान पुनरोदय स्वामी विवेकानंद दयानंद, श्री अरविंद, रमण महर्षि एवं परमपूज्य गुरुदेव द्वारा किया गया। स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रखर आग्नेय विचारों से संत परंपरा का नव्योत्थान किया। उन्होंने अपनी गहन अंतर्दृष्टि से इसका नवोन्मेष देखा था। नवयुग के इस आधुनिक संत ने संत परंपरा का पुनर्जागरण किया। यही प्रयास आर्य परंपरा के रूप में विख्यात हुआ। आगे चलकर यह परंपरा श्री अरविंद की विकासोन्मुख प्रक्रिया द्वारा और भी विकसित हुई। परमपूज्य गुरुदेव ने संत परंपरा को समसामयिक ढंग से प्रस्तुत किया। विचार क्राँति की मशाल जलाने वाली युग निर्माण योजना संत परंपरा का ही सामयिक स्वरूप है। इसकी योजनाओं के माध्यम से ही भारतवर्ष में संतों के वास्तविक उद्देश्यों को फलीभूत होने का अवसर मिलेगा, जिससे उनके द्वारा देखा हुआ सपना ‘धरती में स्वर्ग का अवतरण एवं मनुष्य में देवत्व का विकास’ अवश्य पूर्ण होगा।
कुरुक्षेत्र की धर्मभूमि में तपस्यारत ऋषि मुद्गल के धर्माचरण, आराधना और उदार वृत्ति द्वारा जीवन निर्वाह करना आदर्श थे। मास के पहले पक्ष में वे खेतों से बीन−बीनकर चावल एकत्र करते, दूसरे पक्ष में उसे यज्ञ और अतिथि−सत्कार में व्यय कर देते। ऋषि श्रेष्ठ दुर्वासा छह हजार शिष्यों सहित मुद्गल की परीक्षा हेतु उनके आश्रम पर कई बार गए और निस्पृह मुद्गल ने उन्हें हर बार आतित्य द्वारा पूर्णतः संतुष्ट कर दिया।
दुर्वासा ऋषि मुद्गल पर कृपालु हुए। उन्होंने कुरुक्षेत्र के इस तपस्वी को स्वर्गप्राप्ति का वरदान दिया। स्वर्ग ले जाने के लिए आए देवदूत को नम्रतापूर्वक मजा करते हुए कहा, हे दूत! खेद है तुम्हें एकाकी ही स्वर्ग लौटना पड़ेगा। मैं तुम्हारा साथ नहीं दे सकूँगा। जिस लोक में कर्म को स्थान नहीं, वहाँ केवल सुख भोगने मैं नहीं जाना चाहता। कर्म करते हुए ही मैं सौ वर्षों तक जीने की इच्छा रखता हूँ। मुझे निर्माण प्राप्त कर सकता हूँ। तपस्वी मुद्गल मृत्युलोक में ही लोकमंगल के लिए करते हुए निर्वाण को प्राप्त हुए।
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आँखें मन और भाव का दर्पण हैं। भावनाओं एवं संवेदना की स्पष्ट छाप इसकी गहराई में अंकित होती है। आंखें वह द्वार हैं, जिसमें प्रवेश कर अंतरात्मा की झलक−झाँकी पाई जा सकती है। आँखों में व्यक्ति का व्यक्तित्व झलकता है। अतः भारतीय लक्षण शास्त्र में नेत्रों के आकार पर विशेष महत्त्व दिया गया है। इनके आकार−प्रकार से काफी कुछ व्यक्ति का स्वरूप निर्धाथ्रत किया जाता है। आँखों की अपनी भाषा होती है।
आँखों की इसी महत्ता एवं विशेषता के कारण विभिन्न विद्वानों ने इनके प्रति अपनी अभिव्यक्ति दी है। आचार्य गर्ग के अनुसार नेत्र लक्षणों का सर्वाधिक महत्त्व है। आँखें बहुत कुछ बोलती हैं। इसलिए वृंदावनलाल वर्मा ने कहा, ‘कृतज्ञ नेत्र! सुँदर मनोहर और हृदयहारी! किसने बनाए? क्यों बनाए? आत्मा के गवाक्ष। पवित्रता के आकाश! प्रकाश के पुँज।” गाँधी जी ने तो यहाँ तक कहा है, “आँखें सारे शरीर का दीपक हैं।” संत विनोबा जी के अनुसार, ‘नीलकाँत का दर्शन ही आँखों का उद्देश्य है।”
पाश्चात्य विद्वान् भी आँखों की विशेषता से अत्यंत प्रभावित हुए हैं। शेक्सपियर ने ‘लब्स, लेबर्स, लास्ट’ में कुछ इस तरह वर्णन किया है, “नेत्र ही वे शास्त्रकलाएँ और शिक्षापीठ हैं, जो समस्त संसार को प्रकट करते हैं, रखते और पोषित करते हैं।” शेक्सपियर ने नारी नेत्रों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। जॉर्ज हैबर्ट ने अपनी रचना जैजुला पुँडेशियम’ में स्पष्ट किया है कि सर्वत्र नेत्रों की भाषा एक ही होती है। इसी वजह से ‘दी जेंटलमेन अरार’ में जॉर्ज चेपमेन ने उल्लेख किया है, “नेत्र बोल सकते हैं औ नेत्र समझ सकते हैं।”
आँखें अनेक प्रकार की होती हैं और उन्हीं प्रकारों के आधार पर उनकी महत्ता आधारित होती है। आँखों को कमल, मछली, अनार के फूल, मेंढक, बैल के समान माना जाता है। पुरुषों की आँखें यदि ऊँट, बिल्ली, मुर्गी, हंस, हिरन के सदृश हों तो उसे अच्छा नहीं माना जाता। भारतीय लक्षण शास्त्र के अनुसार कमलनयन मनुष्य धनवान होता है। यदि आँखों में हल्की लाल डोरी दिखाई दे, तो भी इसी कोटि का माना जाता है। यानि कि उसे धन की प्राप्ति होती है। शहद के समान पूरी परंतु कालिमा लिए हुए आँखें हो तो मनुष्य बहुत धनवान होता है।
बिल्ली के समान बड़ी एवं नीली आँखों को शुभ संकेत नहीं माना जाता है। गोल−गोल आँखों वाला मनुष्य अत्यंत चतुर−चालाक होता है। हरापन लिए हुए नेत्र सौभाग्य सूचक हैं। आँखों में चमक एवं चिकनापन उत्तम लक्षण हैं। शहद के समान भूरी आँखों के किनारों में यदि लालिमा रहे, तो इसे भी भाग्यशाली माना जाता है। केवल मधुवन आँखें कुलनाशक होती हैं। दुर्योधन की आँखें इसी प्रकार मधुपिंगल थीं, जिसका परिणाम सर्वविदित है। जिन लोगों की आँखों में क्रीम रंगत हो, वे दीर्घजीवी होते हैं।
चीन में आँखों की पहचान की कला सुविख्यात है। इसके लिए पुरुषों की बायीं और महिलाओं की दायीं आँखों को आधार माना जाता है। बड़ी−बड़ी आँखें सुँदरता का प्रतीक हैं। यह दृढ़ इच्छाशक्ति, मेधा और प्रखर चरित्र की द्योतक हैं। ऐसी आँखों वाले व्यक्ति बहिर्मुखी प्रकृति के होते हैं। यह अन्य व्यक्तियों से ज्यादा प्रभावित नहीं होते। वे किसी भी क्षेत्र में प्रवेश करें, सफलता उनकी राह ताकती रहती है। मुख्यतः व्यापार, मीडिया एवं विज्ञापनों की दुनिया में ये सिद्धहस्त होते हैं। महिलाएँ पुरुषों की तुलना में और भी अधिक सफल रहती हैं। इनमें समर्पण का भाव रहता है।
छोटी और कंजी आँखें ईर्ष्या, द्वेष, अविश्वसनीयता आदि मनोवृत्ति की ओर ज्यादा झुकाव लिए होती हैं। यह खलनायकों का चरित्र है। ऐसे व्यक्ति कुँठा एवं निषेधात्मक मनोविकारों से ग्रस्त होते हैं। ये अपने स्वार्थ और व्यवसाय के प्रति सदैव सतर्क रहते हैं। इसके लिए ये शोषण की किसी सीमा को पार कर सकते हैं। कुटिलता इनकी परिचायक है। आँखें यदि छोटी−छोटी हैं, तो वह व्यक्ति बुद्धिमान होगा। अच्छाई के लिए इन्हें प्रयास−पुरुषार्थ करना पड़ता है, अन्यथा यह भी घातक हो सकता है।
चितवन तिरछी या बाँकापन दो तरह की होती है। एक ऊपर की ओर उठी होती है तथा दूसरी नीचे की ओर धँसी रहती है। ऊपर की ओर बाँकेपन सौंदर्य का आदर्श प्रतीक हैं। ऐसे व्यक्ति संवेदनशील परंतु कुशाग्र बुद्धि वाले होते हैं। प्रकृति द्वारा इन्हें आनंदपूर्ण जीवन का अनोक्षा अनुदान प्राप्त रहता है। रिश्तों में इन्हें विश्वसनीय नहीं माना जाता। जीवन व्यापार में ये लचीले होते हैं। कर्म के प्रति निष्ठा एवं मेहनत इनकी विशेषता है। जापान में नीचे की ओर धँसी आँखों को सौभाग्य एवं संपदा का सूचक माना जाता है। पश्चिमी देशों में ऐसी आँखों को विनम्रता, विश्वसनीयता एवं सेवाभाव के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। सहयोग के मामले में ये सर्वोपरि होते हैं। वे दूसरों के लिए कुर्बानी दे सकते हैं। इन्हें रिश्तों को बनाना एवं निर्वाह करना आता है। ऐसे व्यक्ति चरित्रवान् होते हैं।
ऐसी बाँकेपन वाली महिलाएँ विश्वसनीय एवं विनम्र होती हैं। जिन्हें भी ऐसी स्त्रियों का सान्निध्य मिलता है, वे धनवान होते हैं। ये स्वतंत्रताप्रिय एवं पुरुषों को अपने ऊपर हावी होने नहीं देतीं। प्रकृति से सेवाभावी होने के कारण ये कुशल माता की भूमिका अदा कर सकती हैं। नर्सिंग क्षेत्र में डॉक्टर या नर्स के रूप में ऐसी आँखों वाली महिलाएँ अत्यंत सफल होती हैं। पुरुष वर्ग वाणिज्य एवं व्यापार में प्रगति करता है।
बंट−बंट आँखें अंतर्मुखी व्यक्तित्व की परिचायक हैं। इन्हें संकीर्ण बुद्धि वाले के रूप में भी देखा जाता है। चीनी विद्वान् सियाँग मीन के अनुसार, बंद आँखों वाले मनुष्य सामाजिक होते हैं। प्रदर्शन करना उनकी चारित्रिक विशेषता है। कठिन−से−कठिन परिस्थितियों से सत्काल तालमेल बैठा लेना इनके बायें हाथ का खेल है। अतः ऐसे लोग राजनीतिक एवं व्यापारिक वर्ग के होते हैं। ऐसी महिलाओं का चरित्र अत्यंत जटिल होता है। उनकी महत्त्वाकांक्षा बढ़ी−चढ़ी होती है। पुरुषों की तुलना में महिलाएँ अधिक उन्नति करती हैं।
चौड़ी आँखों वाले साहसी, दृढ़ एवं खुले दिमाग वाले होते हैं। ये अति महत्त्वाकाँक्षी होते हैं, परंतु इसे प्राप्त करने में ज्यादा सफल नहीं होते। अपने लाभ के लिए दूसरों को कष्ट पहुँचाने में यह तनिक भी हिचकते नहीं हैं। इनमें भावनात्मक चोट को सहन करने की शक्ति कम होती है। ये अपने कार्यक्षेत्र में स्वयं को स्थापित करने में प्रायः असफल होते हैं। इस तरह की आँखों वाली महिला−पुरुषों की वैवाहिक संबंध आनंदपूर्ण होता है।
गंभीर झुकी हुई आँखें रोमाँटिक व्यक्तित्व की झलक हैं। ये अपनी भावनाओं को कभी भी प्रदर्शित नहीं करते। रोमाँटिक मूड में होने के कारण इनमें लेखक व कवि का गुण रहता है। परंतु इनकी लेखनी केवल प्रेम संबंधी क्षेत्रों तक सीमित रहती हैं। इनका जीवन भी प्रेम कहानियाँ से भरा होता है।
ऊपर उभरी हुई आँखें उद्धत अहंकारी व्यक्तित्व की झलक हैं। यद्यपि ऐसे व्यक्ति दृढ़ इच्छाशक्ति वाले होते हैं, परंतु ये अति कायर एवं अविश्वसनीय होते हैं। जीवन में सफलता के सूत्र हाथ लगने पर भी ये सुखी नहीं रहते। अहंकार की ज्वाला इन्हें अंदर से जलाती रहती है। इनके जीवन में प्रेम−प्यार जैसी सजल भावनाओं का स्थान नहीं होता। इनका चरित्र बड़ा ही संदिग्ध माना जाता है।
त्रिभुजाकार आँखों वाले व्यक्ति कुतर्की होते हैं। इनमें आत्मप्रदर्शन का भाव प्रबल रहता है। व्यक्तिगत जीवन में दूसरों के सामने सदैव सहज एवं असामान्य बने रहते हैं। इनका संबंध महज एक छलावा होता है। ऐसे व्यक्ति अक्सर राजनीतिक दाँव−पेंच वाले होते हैं। चतुर्भुजी आँखों का झुकाव प्रशासनिक सेवा की ओर अधिक होता है। ये अति बुद्धिमान
कवीन्द्र रवीन्द्र ने लिखा है, “मैंने द्वार−द्वार से माँगकर गेहूँ के दानों से अपनी झोली भर ली। अपनी उपलब्धि पर फूला हुआ घर की ओर चला। तभी एक निरीह दुर्बल वृद्ध आया और उसने मेरे आगे हाथ पसार दिए। मैंने सोचा, अपनी मेहनत से एकत्र अनाज इसे क्यों दूँ? फिर भी बेमन से एक दाना उसके हाथ पर पटक, मैं आगे बढ़ गया...। घर आकर झोली पलटा तो उसमें एक बड़ा दाना सोने का था....। मैंने अपना सिर धुना, कृपणता को कोसा..... हाय! दूसरों की उदारता से प्राप्त दानों को देने में मैं अनुदार क्यों बना? यदि उदार बन पाता तो मेरी झोली सोने से भरी होती।” देवदक्षिणा का अर्थ ही है कि व्यक्ति अपने अंदर की वृत्ति को मोड़ दे, देवत्व से जोड़ दे।
एवं व्यवहारकुशल होते हैं। चाँद सी आँखें अत्यंत चतुर−चालाक मानी जाती हैं। ये भी व्यवहारकुशल होते हैं। उथलेपन के कारण इनके रिश्तों में स्थायित्व नहीं रह पाता।
आँखों के आधार पर व्यक्तित्व की पहचान की जाती है। व्यक्तित्व का आकार प्रकार कैसा भी हो, उसकी आँखें चाहें कैसी भी हों, परंतु व्यक्ति निस्स्वार्थ जीवन जीता हैं, तो उसमें परिवर्तन संभव है। प्रभु को समर्पित जीवन के लिए शारीरिक आकार−प्रकार का मानदंड गौण है। भगवान् का दिव्य स्पर्श किसी के भी जीवन को दीप्त कर सकता है। अतः सदैव सत्कर्म करते हुए प्रभुमय जीवन जीना चाहिए।
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भौतिक जगत् में मत्स्य न्याय का सर्वत्र बोलबाला है। ऐसी घटनाएँ इन दिनों प्रायः घटती रहती हैं, जिसमें किसी कमजोर के मकान पर कोई बलवान हठात् कब्जा कर लें, उसकी संपत्ति पर अपनी दावेदारी दिखाने लगे। कई बार तो हद हो जाती है, जब हर प्रकार के विरोध−प्रतिरोध के बावजूद भी संपदा हड़प ली जाती हैं। इसे समर्थों का असमर्थों पर आधिपत्य ही कहना चाहिए।
चेतना जगत् में ऐसे प्रसंगों को आश्चर्यजनक और अद्भुत कहा जाएगा। वहाँ जब इस प्रकार के उदाहरण प्रस्तुत होते हैं और जब एक की देह पर दूसरी सत्ताएँ सवारी गाँठती हैं, तब वह विविध व्यक्तित्व के रूप में सामने आती हैं। ऐसे शरीरों में कुछ समय तक तो अपनी मूल चेतना का नियंत्रण रहता है, जबकि शेष समय में उस पर किन्हीं बाहरी सत्ताओं का अधिकार हो जाता है, तदनुसार कुछ समय व्यक्ति अपना सही नाम−पता बताता, जबकि दूसरे ही अवसर पर वह कोई अन्य बन जाता है। ऐसे घटनाक्रम अक्सर घटते ही रहते हैं।
इसी प्रकार एक प्रसंग की चर्चा काँलिन विल्सन अपने ग्रंथ ‘बियोण्ड दि आँकल्ट’ में करते हैं। वे लिखते हैं कि बोस्टन में एक बार एक डॉक्टर मोर्टन प्रिंस ने स्नायविक थकान से ग्रस्त एक लड़की का उपचार प्रारंभ किया। कई दिनों की चिकित्सा के बाद भी क्लारा फाउलर नामक उक्त लड़की को जब कोई लाभ नहीं हुआ, तो डॉ. मोर्टन ने उसे सम्मोहित करने की निश्चय किया। उस अवस्था में उसके अंदर से एक बिलकुल ही भिन्न व्यक्तित्व उभरकर सामने आया। यह एक चंचल और शैतान लड़की थी, जो अपना मान सैली बताया करती। मोर्टन यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गए। वह बार−बार इस बात को दुहराती थी कि वह क्लारा नहीं है, यद्यपि शरीर उसी का था। वह मजबूत तथा स्वस्थ थी, पर इस बात को समझ नहीं पाती थी कि आखिर क्लारा इतनी कमजोर क्यों हैं? एक अन्य अवसर पर जब उसे सम्मोहित किया गया, तो एक तीसरा ही व्यक्तित्व, उभरकर सामने आया। यह न तो क्लारा थी, न सैली। यह एक शिक्षिका थी, जिसे मोर्टन ने ‘बी−4’ नाम दिया।
क्लारा की काया पर इस नई आत्मा के अधिकार की कहानी भी बड़ी विचित्र है। उन दिनों वह एक नस्र थी। एक दिन उसके पिता के एक मित्र विलियम जीन्स उससे अस्पताल मिलने आए। बाहर एक सीढ़ी पड़ी हुई थी। उसने उसे सहारे प्रथम तल पर स्थित उसके कमरे के अंदर झाँककर देखा। पिता के मित्र को इस तरह खिड़की से झाँकते देखकर उसे गहरा आघात लगा और एक स्नायविक दौरा पड़ा। ठीक इसी समय ‘बी-4’ प्रकट हुई और उसके शरीर पर कब्जा जमा लिया।
तीनों में सैली अधिक शक्तिशाली थी, इसलिए वह क्आरा को शरीर से बाहर धकेल सकती थी, उस पर वाँछित समय तक अधिकार जमाए रह सकती थी अथवा उसके शरीर का इच्छानुवर्ती उपयोग कर सकती थी। अक्सर वह दब्बे क्आरा के साथ ओछी हरकतें किया करती। कई बार वह उस पर सवार होकर सुदूरवर्ती गाँवों तक पैदल आती। ऐसे मौकों पर बेचारी क्लारा को बड़ी मुश्किल से पैदल चलकर वापस लौटना पड़ता। एक अन्य अवसर पर सैली ने एक दूसरे शहर में नौकरी कर ली। वह एक होटल था और अनेक महीनों तक वह वहाँ बनी रही। इस बीच क्लारा संपूर्ण आत्मविस्मृति के दौर से गुजरती और जब स्मृति लौटती, तो वह परेशानी हो उठती, उसे कई प्रकार की मुसीबतों का सामना करना पड़ता।
डॉ. मोर्टन लंबे समय तक उसका उपचार करते रहे। अंततः सम्मोहन द्वारा ‘बी-4’ की आत्मा से तो उसे मुक्ति सफल न हो सके।
ऐसी ही एक बहुव्यक्तित्व से संबंधित घटना का उल्लेख थिगपेन एवं क्लेक्ली ने अपनी रचना ‘दि थ्री फेसेज ऑफ ईव’ में किया है। ईव ह्वाइट जिसका वास्तविक नाम क्रिस्टीन सिजमोर था, वह एक विवाहित युवती थी। उसे सिर दरद की शिकायत थ्ी और बीच−बीच में दौरे पड़ते थे। इस मध्य वह जो कुछ भी कार्य करती, उसका कुछ भी स्मरण नहीं रहता। वह अपने इस अजीबोगरीब रोग से परेशान थी और उससे छुटकारा पाना चाहती थी। इसी हेतु कुछ विशेषज्ञ चिकित्सकों से इलाज करवा रही थी। एक दिन वह उनके पास जाकर बतलाने लगी कि आज उसके पति ने उसे बुरी तरह फटकारा है, कारण कि वह बाजार से फिजूलखर्ची कर वासना भड़काने वाली पोशाकें क्रय कर लाई थी।
यद्यपि उसे इस बारे में तनिक भी स्मृति नहीं थी। एक अन्य दिन जब वह डॉ. थिगपेन से बातें कर रही थी, तब एक बिलकुल ही पृथक ‘ईव’ का स्वरूप सामने आया। वह एक सुसंस्कृत, आत्मविश्वासी उतावली पसंद महिला थी। जो धूम्रपान करती थी, शराब पीती थी तथा सभ्य व्यक्तियों का साहचर्य चाहती थी, जबकि वास्तविक ‘ईव’ संतोषी और उच्च विचारों वाली थी। शराब और सिगरेट के प्रति उसकी घृणा सुविदित थी। ‘ईव’ का व्यक्तित्व ‘ईव ब्लैक’ के रूप में तब सामने आया था, जब क्रिस्टीन मात्र छह वर्ष की थी। एक दिन उसे दौरा पड़ा। उस दौरे की स्थिति में ही उसने अपनी सोई हुई दो बहनों पर हमला कर दिया। बाद में वह सामान्य हो गई। उसे कुछ भी याद नहीं रहा, पर उस शैतानी का दंड उसे पिटाई के रूप में भुगतना पड़ा। यद्यपि वह बार−बार अपने उस कृत्य के प्रति अनभिज्ञता ही जताती रही। यह मूल ‘ईव’ से भिन्न सत्ता थी। ‘ईव’ का तीसरा व्यक्तित्व ‘जेन’ के रूप में प्रकट हुआ, जो शेष दोनों से अधिक समझदार थी।
ईव का उपचार चलता रहा। थिगपेन ने सोचा कि उसके इलाज से तीनों व्यक्तित्वों का एकीकरण हो गया है, पर वे भ्रम में थे। बाद में वह और अधिक उग्र रूप में प्रकट हुए।
थिगपेन के लिए यह अत्यंत अद्भुत मामला था। उन्होंने अलग−अलग सत्ताओं के प्रकटीकरण के अवसर पर ईव का सूक्ष्म अध्ययन करना शुरू किया, तो उन्हें हर सत्ता का पृथक् भौतिक चरित्र देखने को मिला। उदाहरण के लिए, ईव ब्लैक नायलोन वस्त्र के प्रति अधिक संवेदनशील थी। जब शरीर पर उसका अधिकार होता, तो नायलोन के कपड़े से ईव के शरीर पर चकत्ते उभर आते, किंतु ईव ह्वाइट के साथ यह बात नहीं थी।
दोनों के मध्य एक अन्य अंतर यह था कि ईव ह्वाइट कुछ मानसिक शक्तिसंपन्न थी, जबकि ईव ब्लैक साधारण थी। इस बात जब वह किशोरावस्था में थी, तो उसकी छोटी बहन बीमार हो गई। सबने निमोनिया का अनुमान लगाया। दूसरी रात क्रिस्टीन को स्वप्न में ईसामसीह के दर्शन हुए। उनने बताया कि तुम्हारी बहिन को निमोनिया नहीं, डिप्थीरिया है। बाद में उसी की दवा की गई और वह स्वस्थ हो गई। युवावस्था में क्रिस्टीन ने फिर एक स्वप्न देखा, जिसमें उसके पति की मौत बिजली के झटके लगने से हुई दरसाई गई थी। दूसरे रोज उसने पति को काम पर जाने से रोक दिया। जो व्यक्ति उसकी जगह काम करने गया, सचमुच उसकी मृत्यु बिजली का करेंट लगने से हो गई। एक बार वह अपने पति के साथ गाड़ी पर सैर के लिए निकली। कुछ दूर जाने के उपराँत उसने अपने पति से कार रोकने और पहियों का निरीक्षण करने का निवेदन किया। ऐसा करने पर पिछला पहिया काफी ढीला मिला। वह किसी भी क्षण खुलकर अलग हो सकता था।
इससे स्पष्ट है कि ईव के कलेवर पर अलग−अलग समय में अलग−अलग सत्ताओं का अधिकार होता। वे एक−दूसरे से सर्वथा स्वतंत्र और भिन्न थीं। उनकी अपनी निजी मौलिकताएँ थीं। उसी के हिसाब से स्थूल देह व्यवहार करतीं।
एक मिलते−जुलते प्रसंग का वर्णन करते हुए काँलिन विल्सन अपनी उक्त पुस्तक में लिखते हैं कि डोरिस फिसर वाशिंगटन, अमेरिका की रहने वाली थी। उसका पिता मद्यप था और माँ शालीन। एक बार जब वह छोटी थी, तो शराब के नशे में धुल पिता ने उसे उसकी माता की बाँहों से छीनकर फर्श पर फेंक दिया। वह उठ बैठी। अब वह डोरिस नहीं थी, बल्कि ‘एरियल’ नामधारी एक भिन्न चरित्र थी। उसके पश्चात् डोरिस के शरीर पर ‘मारग्रेट’ नामक सत्ता का कब्जा हो गया। उसने उसके जीवन को नरक तुल्य बना दिया। वह उसके साथ ऐसे मनोरंजन और खिलवाड़ करने लगी कि अब तक वह उनसे उबर नहीं सकी। उसकी मृत्यु एक पागलखाने में हुई।
डोरिस ने यह प्रण कर रखा था कि वह नदी में कभी भी तैरने नहीं जाएगी, किंतु जब उसे होश आया, तो वह यह देखकर हैरान रह गई कि वह नदी की ओर से ही लौट रही थी। उसके बाल गीले थे और साथ में भीगे वस्त्र भी थे। स्नान की उसे तनिक भी स्मृति नहीं थी। एक बार प्लेट में रखे एक केक के टुकड़े को खाने के लिए वह बढ़ी, तभी उसके शरीर पर मारग्रेट ने अधिकार कर लिया और उस टुकड़े को उठाकर नीचे फेंक दिया। वे दोनों परस्पर बातें भी करती थीं, यह आश्चर्यजनक होते हुए भी उतना ही सत्य है, जितना प्रतिदिन प्रातः सूर्य का निकलना। इस क्रम में दोनों एक ही मुँह का इस्तेमाल करतीं। मारग्रेट उसके मन की बात समझ जाती, पर डोरिस में यह क्षमता नहीं थी। इसके लिए उसे मुख से निस्सृत शब्दों पर निर्भर रहना पड़ता और तब तक इंतजार करना पड़ता, जब तक वे पूर्णतया बाहर न निकल जाएँ।
डोरिस में दूरदर्शन की भी सामर्थ्य थी। यदा−कदा उसे इसकी झलक मिल जाती। एक बार उसे अपनी माँ दिखाई पड़ी। वह बीमार प्रतीत हो रही थी। डोरिस जब माँ के पास पहुँची, तब वह निमोनियाग्रस्त थी। उपचार आरंभ हुआ, पर वह बच न सकी। डोरिस माँ के मृत शरीर के पार्श्व में बैठी हुई थी। इसी बीच कमरे में पिता का प्रवेश हुआ। उसने शराब पी रखी थी। लड़खड़ाते कदमों से वह अपने बिस्तर की ओर बढ़ा और पत्नी को देखे बिना ही सो गया। इसी क्षण डोरिस के शरीर में किसी नई आत्मा का आगमन हुआ। उसमें स्मृति और व्यक्तित्व का पूर्णतः अभाव था। शायद वह कोई नवजात बालिका थी। समय बीतने के साथ−साथ उस बालिका का विकास हुआ और वह एक सुस्त एवं निर्जीव युवती के रूप में उभरी। एक वर्ष पश्चात् असावधानीवश डोरिस सिर के बल गिर पड़ी। तब उसके भीतर से एक अन्य सत्ता का उद्भव हुआ। वह और भी अधिक सुस्त थी।
अब डोरिस की काया में विभिन्न स्तरों वाली सत्ताओं का एक परिवार ही बस गया था। रोचक बात यह थी कि सबने मिलकर एक श्रेणीबद्धता बना ली थी। एरियल नामक आत्मा इनमें सर्वोपरि थी। वह शेष चारों के मनों को पढ़ सकती थी और उनके बारे में सब कुछ जानती थी। इसके बाद मारग्रेट का स्थान था। वह अपने से नीचे की तीनों आत्माओं के बारे में भलीभाँति जानती थी, पर एरियल के बारे में नहीं, कारण कि वह उससे उच्च कोटि की थी। डोरिस को अपने से निम्न स्तर की दो आत्माओं का ज्ञान था, किंतु एरियल और मारग्रेट के बारे में नहीं। उनके संबंध में वह तभी समझ पाती थी, जब वे उनसे संपर्क करतीं।
डोरिस के प्रति मारग्रेट के व्यवहार पर एरियल अक्सर अप्रसन्न हो जाती। डोरिस को बाहर निकालकर उसके मन−मस्तिष्क पर कब्जा कर लेना, एरियल को तनिक भी नहीं सुहाता। इसलिए ऐसे अवसरों पर वह कई बार मारग्रेट को शरीर से बाहर धकेल देती। इन्हीं प्रसंगों के कारण मारग्रेट को यह विदित हो सका कि इस कलेवर में किसी अन्य सत्ता का भी अस्तित्व है, जिसकी जानकारी उसे नहीं है।
वह अभी इन आत्माओं के चंगुल में ही थी कि उसका परिचय पीट्सवर्ग के एक सहृदय चिकित्सक से हो गया वाल्टर फ्रेंकलिन प्रिंस नामक यह डॉक्टर डोरिस के साथ पुत्रीवत् व्यवहार करता, उसे भरपूर स्नेह−प्यार देता। इससे उसकी स्थिति में सुधार होने लगा। वह पहले की तुलना में अधिक स्वस्थ और प्रसन्न दीखने लगी। अब बाहर की सत्ताएँ अचानक विदा लेने लगीं। जो सत्ता सद्यः जात बालिका के रूप में प्रकट हुई थी, वह अकस्मात् यौवन से बचपन की ओर लौटने लगी और फिर एक दिन सदा के लिए समाप्त हो गई। ‘टेप रिकाँर्डर’ व्यक्तित्व भी समाप्त हो गया। इससे डोरिस का आत्मविश्वास जगा, वह अंदर से सबल अनुभव करने लगी। इसके साथ ही मारग्रेट का भी कैशोर्य की ओर पलायन हाने लगा और अंततः उस अस्तित्व का भी अंत हो गया। डोरिस के शरीर में अब सिर्फ ‘एरियल’ ही शेष बची। वह कभी भी डोरिस के जीवन में हस्तक्षेप नहीं करती, उसे परेशान नहीं करती। इसके विपरीत वह सदैव उसका ध्यान रखती। अंत में वह उसको न्यूयार्क ले गई। इस समय तक वाल्टर फ्रेंकलिन का निधन हो चुका था। इससे वह लगभग टूट−सी गई थी, कुछ समय उपराँत वहीं उसकी मौत हो गई।
चेतना जगत् में भी उल्लंघन−अतिक्रमण की पूरी−पूरी गुंजाइश है। निम्न स्तर का जंगल का कानून वहाँ भी चलता है। जिसकी लाठी, उसकी भैंस की कहावत सिर्फ भौतिक जगत् में ही चरितार्थ होते नहीं देखी जाती। उसका अस्तित्व सूक्ष्म संसार में भी विद्यमान है। सबल आत्माएँ निर्बलों को वहाँ भी उत्पीड़ित करते पाई जाती हैं। इससे बचने का एक ही उपाय है, हम अपनी निर्बलता से मुक्ति पाएँ। यहाँ निर्बलता का तात्पर्य शारीरिक दुर्बलता से नहीं लगाया जाना चाहिए। यहाँ इसका आशय चेतना की मलिनता से है। यही व्यक्ति को दीन−हीनों जैसी स्थिति में ला पटकती और अक्षमता का ऐसा उपहार दे जाती हैं, जो जन्म−जन्माँतरों तक पीछा नहीं छोड़ती। यदि उन विक्षेपों से किसी तरह छुटकारा पाया जा सके और चेतना का संपूर्ण परिमार्जन संभव हो सके, तो आत्मसत्ता इतनी समर्थ और विभूतिवान् बन सकती है, जिसकी उपमा ईश्वर से दी जा सके। मनुष्य परमात्मा का अंशधर है। वह उस स्तर को प्राप्त करके ही अपनी असमर्थता पर विजय पा सकता है, इसे काम ने नहीं।
मोती पहनने की महत्त्वाकांक्षा अनेक सीपियों का पेट चीरे बिना पूरी नहीं हो सकती।
***
मनुष्य व्यवसाय करता है पेट के लिए। और सृजन करता है आत्मा और परमात्मा की प्रसन्नता के लिए।
प्रिंस ऑफ वेल्स दिल्ली आ रहे थे। अँग्रेज सरकार की समूची व्यवस्था उनके स्वागत की भारी−भरकम तैयारियों में जुटी थी। वह 1920-21 का समय था। जब सामान्य अँग्रेज भी स्वयं को भारत देश का भाग्य विधाता समझ बैठता था। ऐसे में प्रिंस ऑफ वेल्स का दिल्ली आना बहुत मायने रखता था। हालाँकि राष्ट्रवासियों की कोशिशें यही थीं कि स्वागत समारंभ फीका रहे और भारत की अपनी विशिष्ट राष्ट्रीय एवं साँस्कृतिक छवि धूमिल न हो। पर अंग्रेज सरकार अपनी कुटिल चालें चलकर जैसे−तैसे अपने साम्राज्यवादी झंडे को ऊँचे से ऊँचा फहराना चाहती थी। उसकी कोशिश यह थी कि हिंदू समाज की आपसी फूट का लाभ उठाकर अछूतों की भीड़ इकट्ठी करके इस समारोह को जिस किसी तरह भी सफल बनाया जाए। यही नहीं हजारों−हजार संख्या में अछूत भाई−बहनों को इस अवसर पर ईसाई बनाने की योजना भी सरकार ने बनाई थी।
ऐसे समय में स्वामी परमानंद जी महाराज से चुप न बैठे रहा गया। वह संत होने के साथ सुधारक व विचारक भी थे। हिंदू समाज की रूढ़ियों, कुरीतियों को समाप्त करने के उद्देश्य से उन्होंने अपने आश्रम में हरिजन पाठशाला भी खोली थी। इन हरिजन बालकों को वे अपनी संतान से भी ज्यादा प्यार करते थे। उन्होंने अपने शिष्य श्री कृष्णानंद जी से कहा कि तुम आश्रम की हरिजन पाठशाला के बच्चों को लेकर दिल्ली जाओ और वहाँ के समारोह में बच्चों से भजन गवाओ। यह भजन था “धरम मत हारो रे।” इसे स्वामी परमानंद जी महाराज ने स्वयं ही इसी प्रयोजन के लिए बनाया था।
स्वामी परमानंद जी की हम बात को जानकर कई लोगों ने उन्हें काफी बुरा−भला कहा। कइयों की धमकियाँ भी मिलीं। पर कृष्णानंद जी अपने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करके सब कुछ सहते हुए चुपचाप दिल्ली के लिए चल पड़े। सरकार ने इस अवसर पर अछूतों को दिल्ली आने के लिए मुफ्त रेलगाड़ी की व्यवस्था की थी। ये लोग भी इसी का लाभ उठाकर आयोजन स्थल तक पहुँच गए।
प्रिंस ऑफ वेल्स के पधारने पर ज्यों ही समारोह शुरू हुआ, तभी आश्रम के बच्चों ने खंजरी बजाकर स्वामी परमानंद जी महाराज का भजन गाना प्रारंभ कर दिया, “धरम मत हारो रे, यह जीवन है कि दिन चार।”
सीधे−सादे शब्द। सीधी−सादी बात और सीधे−सादे सुनने वाले। एक−एक शब्द श्रोताओं के हृदय में बैठने लगा।
धरमराज को जाना होगा, सारा हाल सुनाना होगा। फिर पीछे पछताना होगा, कर लो सोच−विचार।
एक बूढ़े ने पूछा, ये कौन हैं? क्या गा रहे हैं। जब उसे बताया गया कि अछूतों के बच्चे हैं। भगवद् भक्ति आश्रम रेवाड़ी में पढ़ते हैं और गा रहे हैं, “धरम मत छोड़े रे, जगत में जीना है दिन चार।”
बूढ़े ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा, अछूतों के बालक और इतने साफ−सुथरे। इसका उपाय भी पहले से सोच रखा था। उन्होंने कुछ बच्चों के अभिभावकों को भी यात्रा में साथ ले लिया था, क्योंकि उनके गुरु महाराज को सारी स्थिति पूर्व से ही स्पष्ट थी। ये अभिभावक खड़े होकर कहने लगे, हाँ भाई, ये हमारे ही बच्चे हैं। आश्रम में स्वामी जी इन्हें पढ़ाते हैं।
इस पर बूढ़ा भंगी खड़ा होकर हाथ जोड़ता हुआ बोला, “भाइयों! एक बात मैं कहूँ। जब साधु−महात्मा हमारे बालकों को ऐसे प्रेम से पढ़ाते हैं, तो अब हमें धरम बदलने की जरूरत ही क्या रह गई है। अब हम अपना धरम नहीं छोड़ेंगे।”
उस वृद्ध की बात के समर्थन में पूरा आयोजन स्थल गूँज उठा। चारों ओर उसे इसी तरह की आवाजें सुनाई देने लगीं। अँग्रेजी सरकार का षडयंत्र विफल हो गया। स्वामी परमानंद जी महाराज को जब इस सफलता का पता चला, तो उन्होंने कहा, बाहरी शक्तियों की कुटिल चालें तभी सफल हो पाती हैं, हममें आपसी फूट होती है और आपसी फूट तभी पनपती है, जब हम परस्पर एक−दूसरे को प्यार और अपनापन देने में विफल रहते हैं। स्वामी जी का कथन आज भी तब जितना ही सत्य है।
देव संस्कृति का वासस्थान समर भूमि की लाल कीच नहीं, सहिष्णुता, का शीतल प्रदेश है, उदारता का उज्ज्वल क्षीर समुद्र है। −पं श्रीराम शर्मा आचार्य
मानवी बुद्धि जो कुछ भी देखती−समझती है, वह अत्यल्प है। उसे अर्द्ध सत्य कहना ही उचित होगा। यदि उसमें तथ्यों को सर्वांगपूर्ण रूप से जानने, समझने और उसके ज्ञात−अविज्ञात हर पहलू को परख पाने जितनी सामर्थ्य रही होती, तो विदित हो पाता कि यहाँ सीधा चलने पर जो उलटा क्रम दिखाई पड़ता है, उसे अपवाद कहकर नहीं टाला जा सकता। सहायता करने वालों को असहयोग−ही−असहयोग, प्रेम बाँटने वालों को घृणा−ही−घृणा का प्रतिदान मिलते भी कई बार देखा गया है। यह सब एक सुनिश्चित विधान के अंतर्गत होता है। इसमें उलटा नियम अथवा औंधा कानून जैसी कोई बात नहीं।
कई बार प्रगति प्रयासों के असफल होने के संबंध में भी ऐसे अपवाद सामने आते रहते हैं। उसी योग्यता के उसी मार्ग पर चलने वाले, उसी उपाय का अवलंबन करने वाले, दूसरे लोग बाजी−पर−बाजी जीतते, सफलता−पर−सफलता पाते चले जाते हैं, पर पूरी ईमानदारी और समझदारी के साथ किए गए अपने प्रयत्न बहुत ही स्वल्प परिणाम दे पाते हैं। अनेक बार तो बुरी तरह निराशा ही हाथ लगती है। यदि अपनी ही भूल से ऐसा हुआ, तो वह भूल क्या थी? यदि थी, तो क्या वह जानबूझकर की गई? इन प्रश्नों पर बहुत ढूँढ़−खोज करने पर भी कुछ ऐसे तथ्य हाथ नहीं लगते, जिन्हें असफलता का कारण ठहराया जाए, भूल माना जाए और भविष्य में उसे सुधारने का प्रयास किया जाए। अनेक बार मनुष्य स्वयं बिलकुल निर्दोष होता है। परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी विचित्र बन जाती हैं कि सब कुछ किया−कराया मिट्टी हो जाता है। अतिवृष्टि, पाला टिड्डे, कीड़ों आदि के कारण किसान का तत्परतापूर्वक किया गया श्रम जब निरर्थक चला जाता है, तो उसकी समझ में नहीं आता कि उससे कहाँ−क्या भूल हुई? वैसी भूल फिर न होने पाए, इसके लिए वह भविष्य में क्या सावधानी बरते? ऐसे ही अगणित प्रसंग सामने आते रहते हैं।
इन्हीं आकाँक्षाओं के मध्य भाग्यवाद का उदय होता है। जिन घटनाओं के लिए कार्य−कारण सिद्धाँत के अंतर्गत कोई बुद्धिसंगत व्याख्या नहीं सूझ पड़ती, वैसे प्रसंगों में मन को समझाने के लिए भाग्य का एकमात्र विकल्प ही शेष रह जाता है, अतः उन्हें सौभाग्य−दुर्भाग्य का खोल समझकर संतोष कर लेना पड़ता है। इसी प्रकार के और भी कथन तब कहे जाते हैं, जब प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं, अप्रत्याशित संकट सामने आ खड़े होते अथवा सफलता−मिलते−मिलते अपना रुख बदलती और बिजली की तरह आशा की चमक दिखाकर कहीं−से−कहीं चली जाती है। ऐसा ही तब भी कहा जाता है, जब अंधे के हाथ बटेर लगती और सर्वथा समर्थ, योग्य और श्रमशील को खाली हाथ रहना पड़ता है। कितनों को ही ऐसी सफलताएँ करतलगत हो जाती हैं, जिनके लिए उनके पुरुषार्थ को श्रेय किसी भी प्रकार नहीं दिया जा सकता। पूर्वजों की बड़ी संपत्ति उत्तराधिकार में मिल जाए, तो इसमें प्राप्तकर्त्ता का श्रेय क्या है? लॉटरी खुल जाने जैसी सफलताओं में किस कौशल या पौरुष को सराहा जाए? तेजी−मंदी के दौर में कई व्यापारी देखते−देखते दिवालिया होते और देखते−देखते लखपति बनते दृष्टिगत होते हैं। उसमें किसको मूर्ख, किसको बुद्धिमान कहा जाए? नदी में बाढ़ आती है। किसी का खेत काटकर उसकी आजीविका उदरस्थ कर जाती है। किसी के खेत में कहीं से लाकर ऐसी उपजाऊ मिट्टी पटक जाती है कि वह उसकी पैदावार से देखते−देखते अमीर बन जाता है। नदी द्वारा एक की भूमि को काट ले जाना और दूसरे को समृद्धि का वरदान बरसा जाना, इसे क्या कहा जाए? इसके लिए दोष या श्रेय किसको दिया जाए? आँधी−तूफान में जिसका छप्पर उजड़ गया और घर बिगड़ गया, इसमें उसकी क्या भूल बताई जाए और भविष्य में क्या सावधानी बरतने का परामर्श दिया जाए? सामान्य बुद्धि कुछ समझ नहीं पाती और उन्हें संयोग अथवा अपवाद कहकर टाल देती है। समय−समय पर ऐसे प्रसंग उपस्थित होते ही रहते हैं, जिसमें बुद्धि असमंजस में पड़ जाती है और कोई भी निर्णय–निष्कर्ष नहीं निकाल पाती।
एक ऐसे ही प्रसंग का वर्णन महात्मा आनंद स्वामी ने अपनी पुस्तक ‘एक ही रास्ता’ में किया है। घटना सन् 1946 की है। दोपहर का समय था। मुँगेर (बिहार) के लोग तब घरों में विश्राम कर रहे थे। कई दिनों से वहाँ भूकंप के हल्के झटके महसूस हो रहे थे। झटके अत्यंत मंद होने के कारण लोग उस ओर से असावधान बने रहे और किसी प्रकार की सुरक्षा के कोई कदम नहीं उठाए। प्रकृति की ओर से लगातार दी जा रही चेतावनी की उपेक्षा का सामूहिक दंड इसी दिन मिलने वाला है और यह जीवन का आखिरी दिन है, यह किसे पता था? विश्राम हेतु लोग अपने बिस्तर में गए ही थे कि तीव्र भूचाल आया और इसी के साथ मकान−दुकान देखते−देखते धराशायी हो गए। सब कुछ इतनी शीघ्रता से पलक झपकते हो गया कि लोगों को बाहर भागने का मौका ही नहीं मिला। पूरा नगर श्मशान में परिवर्तित हो गया। प्रथम और दूसरे दिन तक तो कुछ लोग जीवित चोट खाए निकलते रहे, पर तीसरे दिन से लाशों की ऐसी कतार लगी कि पंद्रह दिनों तक वह निकलती ही चली गई। मरघट का साकार दृश्य उपस्थित हो गया था।
अभी भी मलबे की सफाई चल रही थी और उसके नीचे दबे पड़े मृतकों की खोज की जा रही थी और उसके पर जब काम चल रहा था, सफाई करने वाले अचानक चौंक उठे। नीचे से बार−बार एक स्वर उभर रहा था, जिसमें धीरे और सावधानीपूर्वक खोदने का निवेदन था। पंद्रह दिनों तक जमीन में दबे रहने पर भी यह कौन जीवित बचा है। इस आश्चर्य से कुछ क्षण तक लोग विस्मय−विमूढ़ बने रहे, पर आपात स्थिति का ध्यान आते ही अधिक तत्परता और शीघ्रता दिखाई गई।
कुछ ही समय के परिश्रम के उपराँत भारी शहतीरों और ध्वस्त दीवारों के बीच विशाल ढेर के नीचे से एक अधेड़ आयु का व्यक्ति बाहर निकाला गया। आस−पास केले के बहुत सारे छिलके पड़े थे। उससे जब सुरक्षित बचे रहने के बारे में पूछा गया, तो बताया कि वह एक फल बेचने वाला है और इसी आय से अपना पेट पालता था। उक्त दिन केले की टोकरी सिर पर लिए इस मकान की दालान के नीचे खड़ा था कि अकस्मात् छत तीव्र कंपन के साथ गिर पड़ी और वह भी मलबे के नीचे दब गया। टोकरी इस प्रकार उलटी कि सारे केले उसके नीचे सुरक्षित पड़ रहे और वह भी कुछ इस प्रकार दबा कि किसी प्रकार की कोई हानि नहीं पहुँची। धरती एक बार फिर काँपी। इसी के साथ न जाने कैसे मलबे के मध्य एक छोटा सूराख हो गया। हवा और धूप−गरमी आने के लिए इतना पर्याप्त था। जीवन के लिए अब मात्र एक ही चीज की आवश्यकता रह गई थी, पानी की। दैवयोग से पृथ्वी तीसरी बार फिर काँपी और तब मकान का फर्श टूट गया एवं उसके साथ ही पानी की एक लहर इधर आई और इस गड्ढे को ऊपर तक भर गई। हवा−धूप यों छिद्र से उपलब्ध हो गई। केले पास थे ही। पानी भी परमात्मा ने भेज दिया।
इस आधार पर अब तक जीवित रहा। आज अंतिम दिन है, जबकि केले सब समाप्त हो गए हैं। पानी नहीं बचा है। प्रकाश का आना भी बंद हो गया, पर आप सब लोग जीवन−ज्योति बनकर आ गए, सो मैं आप सबको भगवान् की मदद की मानता हूँ। इतना कहकर उसकी आँखें भर आई। भगवान् को लाख−लाख धन्यवाद देकर वहां वहाँ से घर की ओर चला गया।
यह ठीक है कि ऐसे प्रसंग बार−बार नहीं घटते, यह अपवाद है। सामान्यक्रम इन्हें नहीं कहा जा सकता, फिर भी ये अपवाद भी सर्वथा उपेक्षणीय नहीं हैं। उनका भी कारण खोजना होगा। अत्युक्ति न समझी जाए और पौरुष समर्थकों को बुरा न लगे, तो नम्रतापूर्वक यहाँ तक कहा जा सकता है कि ‘भाग्य का खेल’ 30 प्रतिशत घटनाक्रमों में ही काम कर रहा होता है। यों महत्ता तो कर्मनिष्ठा की ही रहेगी और खुला समर्थन उसी को दिया जाएगा, पर इन अप्रत्याशित परिणामों के संबंध में विचार तो किया ही जाना चाहिए।
विज्ञान कहता है कि इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता, जो प्रकृति−नियम के विपरीत हो? भूकंप, बिजली गिरना, ज्वालामुखी फटना, तूफान जैसी घटनाएँ साधारण बुद्धि को आकस्मिक लगती हैं और उनके पीछे विपर्यय दीखता है, पर वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं हैं। उनके पीछे भी प्रकृति के सूक्ष्म नियम ही काम करते हैं। यह दूसरी बात है कि इन नियमों की जानकारी सर्वसाधारण को नहीं हो अथवा उस तरह के घटनाक्रम आए दिन घटित न होने के कारण वे आश्चर्यजनक लगते हों। चमत्कार उन्हीं को कहते हैं, जो दृश्य आमतौर पर देखने को नहीं मिलते। जब भी विज्ञान के आविष्कार प्रथम बार हुए, तो उन्हें भारी चमत्कारों के रूप में देखा गया था। रेल, टेलीफोन, बिजली, रेडियो, सिनेमा, टी. वी. आदि पूर्व काल में अप्रचलित आविष्कार जब सामने आए, तो सामान्य बुद्धि हतप्रभ रह गई और उसे जादू जैसी करामात समझा गया। पीछे अब जब विज्ञान और आविष्कारों का सिलसिला समझ में आ गया, तो अंतर्ग्रही यात्रा, अणु−आयुधों, रोबोटों, कंप्यूटरों जैसी आश्चर्यजनक उपलब्धियों तक को साधारण बात मान लिया गया है।
जादू नाम की कोई वस्तु दुनिया में नहीं है। लोगों की परख करने की क्षमता को चकमा दे सकने की सफलता का नाम ही जादूगरी है। अध्यात्म क्षेत्र में सिद्धि−चमत्कारों का वर्णन बहुत होता रहता है। उन्हें देखकर आश्चर्य तो किया जा सकता है, पर ऐसा नहीं माना जा सकता कि यह आकस्मिक है, इनके पीछे प्रकृति की सामान्य नियम−परंपरा का हाि नहीं है। इसमें अव्यवस्था के लिए रंचमात्र भी गुंजाइश नहीं है। यहाँ ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता, जिसे अप्रत्याशित, असंभव या चमत्कारी कहा जा सके। जिसे हम नहीं जानते, उस अविज्ञात को ही अपवाद कह सकते हैं। वस्तुतः उन अपवादों के पीछे भी प्रकृति का परिपूर्ण व्यवस्थाक्रम काम कर रहा होता है। आदि काम में सूर्य, बिजली, आग, वर्षा आदि तत्त्वों को देवता माना जाता था। उनकी मनौती मनाई और बलि चढ़ाई जाती थी। चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण किन्हीं राक्षसों का आकस्मिक आक्रमण समझा जाता था, पर अब वह बात नहीं रही। विज्ञान की शोधों और खोजों ने अब यह प्रमाणित कर दिया है कि इनके पीछे सुनिश्चित खगोलीय कारण हैं और यह बुद्धिसंगत भी हैं। यहाँ अप्रत्याशित कुछ भी नहीं हैं। अविज्ञात को ही अवचसउ कहते हैं। वस्तुतः इस सृष्टि में अंधेरगर्दी के लिए, व्यक्तिक्रम के लिए कहीं रत्तीभर भी गुंजाइश नहीं है।
अविज्ञात−अप्रत्याशित को ही अपवाद कहा जाता है। वस्तुतः यहाँ यथार्थवाद का ही अस्तित्व है। अपवाद का इतना ही अर्थ है कि जिस आधार पर वह असामान्य घटनाक्रम उपस्थित हुआ, उसकी जानकारी चलता ही रहेगा, क्योंकि सामान्य व्यवस्था की ही हमें जानकारी है और उसी को देखने−समझने की आदतें भी हैं। सृष्टि के अविज्ञात नियमों के आधार पर जब भी कुछ असामान्य घटित होगा, तभी उसे अपवाद कह दिया जाएगा। प्रकृति के रहस्य अनंत हैं और मनुष्य की बुद्धि अत्यंत स्वल्पं। ऐसी दशा में असाधारण तो घटित होता ही रहेगा। उचित यही है कि उस संबंध में हम अपना दृष्टिकोण साफ कर लें। अपनी ससीमता को स्वीकार करें और असमंजस में न पड़कर तथ्यों तक पहुँचने का यथासंभव प्रयत्न करते रहें।
पिछले दिनों एक ही तरीका अपनाया जाता रहा है कि हर अपवाद को देवमानवों के क्रिया−कृत्य मानकर समाधान कर लिया जाता रहा है। भाग्यवाद भी कुछ इसी प्रकार का दर्शन है, जिसमें देवताओं के द्वारा भाग्य निर्माण की बात कहकर एक विचित्र प्रकार की भ्राँति उत्पन्न कर दी गई हैं। विचारशील वर्ग में अपवादों को ‘चान्स,’ ‘काँइन्सीडेन्स’, ‘लक’ आदि कहा जाता रहा है। उसे अप्रत्याशित अवसर मात्र ठहराया गया है। उसके लिए किसी देवता को श्रेय या दोष नहीं दिया गया है। उसमें अविज्ञात को अपवाद की मान्यता भर दी गई है और उसका कारण विदित न होने पर उसे किसी देवता का कोप या अनुग्रह कहकर एक नया भ्रम गढ़ने की चेष्टा नहीं की गई है। यह समझदारी का चिह्न है। सर्वज्ञ होने का दावा करना मिथ्या गर्व है। जो ज्ञात नहीं है, उसे जानने के लिए मस्तिष्क खुला रखा जाए और धैर्यपूर्वक रहस्योद्घाटन के सूत्र खोज निकालने का प्रयत्न करते रहा जाए। इसी में बुद्धिमानी है।
राजा महेंद्रप्रताप के पास ज्योतिषी पहुँचे। कहा, “आपके भाग्य में पुत्र नहीं है, पर आप अमुक अनुष्ठान करेंगे तो अवश्य पुत्र होगा।” राजा साहब ने उन्हें तुरंत विदा करते हुए कहा, “आपको व्यर्थ मेरे जैसे व्यक्ति के पास आकर समय भी नष्ट करना पड़ा व तुरंत जाना भी पड़ रहा है। आप अपनी सलाह अपने पास रखें। मुझे अपना वंश चलाने के लिए जीवधारी रूपी बेटा नहीं चाहिए। जो राशि बेटे पर खरच होती, उसे मैं सत्प्रयोजनों में नियोजित करूंगा।
राजा साहब ने वृंदावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की। उसे ही अपना बेटा माना व लाखों की संपत्ति उसे दे गए। विरासत में उन्होंने लिखा कि मेरा वंश यह प्रेम महाविद्यालय ही आगे चलाएगा। समाज में ऐसे सत्प्रवृत्तियाँ चल पड़ें, तो मैं समझूँगा कि मेरा पुत्र सपूत निकला।
एक बार एक सेठ जी स्वयं महामना मालवीय जी के पास अपने यहाँ विवाह पर आयोजित विशाल भोज में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए पहुँचे। महामना जी ने उनके इस निमंत्रण को इन विनम्र किंतु मर्मस्पर्शी शब्दों में अस्वीकार कर दिया, “यह आपकी कृपा है, जो मुझ अकिंचन के पास आप स्वयं निमंत्रण देने पधारे, किंतु जब तक मेरे इस देश में, मेरे हजारों−लाखों भाई आधे पेट रहकर दिन काट रहे हों, तो मैं विविध व्यंजनों से परिपूर्ण बड़े−बड़े भोजों में कैसे सम्मिलित हो सकता हूँ। ये सुस्वादु पदार्थ मेरे गले कैसे उतर सकते हैं। क्या भोजन मात्र से ही यश मिलता है। यश अर्जन का आप कोई अच्छा तरीका नहीं सोच सकते?”
महामना जी की यह मर्मयुक्त बात सुन सेठ जी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भोज में व्यय होने वाला सारा धन गरीबों के कल्याणार्थ दान दे दिया।
निश्चित ही यह प्रिय लगता है कि परमात्मा का अनुग्रह बरसे, स्वयं को कुछ न करना पड़े और अनायास ही अध्यात्म की ऊँची कक्षा तक पहुँच जाएँ। निजी जीवन में जब इस तरह का अनुग्रह बरसता है, तो उसे ईश्वर की सहायता, चमत्कार, अहैतुकी कृपा और भगवतदर्शन जैसी उपलब्धियों के नाम से पुकारते हैं। सामूहिक रूप से या बहुत बड़े समुदाय, देश या विश्व में उनका अनुग्रह बरसता है, तो उसे अवतार कहते हैं। परमात्मचेतना अपने आपको लौकिक रूप में ढालती है और अपनी सामर्थ्य से चमत्कार करके वापस चली जाती है। अवतार पूरे समूह, समाज या देश की आकाँक्षा और आवश्यकता के अनुसार आते हैं।
एक अन्य पक्ष है, जो निजी जीवन और सामाजिक, राष्ट्रीय जीवन में भी दिखाई देता है। वह परिदृश्य भी ईश्वर की सामर्थ्य से ही प्रकट होता है, लेकिन उसमें मानवी पराक्रम भी उतना ही भागीदार बनता है। गोवर्द्धन पर्वत निश्चित ही श्रीकृष्ण ने कनिष्ठा अँगुली के इशारे से उठाया था, लेकिन ग्वाल−बालों ने भी अपनी लाठियों का सहारा देकर पुरुषार्थ प्रकट किया था। लंका विजय और रावण के पराभव में श्रीराम का ही दिव्य चमत्कार दिखाई देता है, लेकिन रीछ−वानर इकट्ठे न होते, आसुरी आतंक से पीड़ित लोगों ने गुहार न मचाई होती, तो राम अकेले रावण का संहार करने शायद नहीं जाते।
दूसरे प्रकार के प्रयत्नों में मनुष्य जाति ही अपने भीतर ईश्वरीय सामर्थ्य प्रकट करती है और आसुरी आतंक से जूझ पड़ती है। वह संगठित आततायी शक्तियों से टकराती है। उन्हें पराभूत कर मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करती है। निजी जीवन में आत्मिक क्राँति के लिए इस तरह के प्रयत्नों को साधना कहते हैं। जिन उपायों से परमात्मा का अनुग्रह बरसता है, दरअसल वह उपाय कम और मौन पुकार ज्यादा है। इसे प्रार्थना कहते हैं। प्रार्थना सुनकर भगवान् दौड़े आते हैं। उनकी कृपा बरसने लगती है। साधना में प्रयत्नों की तीव्रता के अनुसार अपने भीतर बैठी परमात्म चेतना स्वयं को व्यक्त करती है। वह साधक को उसकी स्थिति के अनुसार लाभ पहुँचाती और लौकिक जीवन को कम−से−कम छेड़ती हैं।
प्रार्थना का मार्ग भक्ति का मार्ग है। भक्तों के जीवन में परमात्मा का अनुग्रह बरसता है, तो देखा गया है कि उनका साँसारिक जीवन अस्त−व्यस्त होने लगता है। उन्हें अपनी आँतरिक स्थिति के अनुसार किसी भी समय हँसी आ सकती है, वे रोने लग सकते हैं, नाचने−गाने लगते हैं और भावनाओं के वेग में आस−पास के जगत् को भी अव्यवस्थित करने लगते हैं। ज्यादातर भावुक भक्त प्रायः दुनियादारी के लायक नहीं होते।
साधना के संबंध में कहा गया है कि वह पहले पात्रता विकसित करती है, फिर परमात्मा को प्रकट करती है। योग की भाषा में इसे ऊर्जा का आरोहण कहते हैं। भक्ति या प्रार्थना में भगवान् का अनुग्रह बरसता है, तो उसे ‘अवतरण’ कहा गया है। तत्त्व रूप में आरोहण या अवतरण में कोई अंतर नहीं हैं। दोनों स्थितियों में भगवान् की चेतना ही प्रकट होती है, लेकिन आरोहण को अवतरण की तुलना में ज्यादा सहज, स्वाभाविक और काम्य बताया गया है। प्रत्येक व्यक्ति की आँतरिक स्थिति एक समान नहीं होती। किसी को आरोहण अनुकूल पड़ता है और किसी को अवतरण, लेकिन चुनना हो तो ऊर्जा को अपने भीतर से उठने देने का मार्ग अपनाना चाहिए।
आरोहण और अवतरण के अंतर को कई तरह से समझा जा सकता है। वर्षा चौबीसों घंटे नहीं होती। कुछ घंटों तक होती रहे, तो भी जीवन अस्त−व्यस्त हो जाता है, लेकिन झील, झरने कुएं और सोतों में जमीन के भीतर से पानी निरंतर बहता रहता है। वह स्थान के अनुरूप एकत्रित होता और फिर ठहर जाता है। इससे किसी तरह की गड़बड़ी नहीं होती। तेज और अनवरत वर्षा को बादलों से पानी का अवतरण कह सकते हैं और जमीन के भीतरी स्रोतों से निकलने की प्रक्रिया को आरोहण के रूप में देखा जा सकता है।
परमात्म चेतना से अचानक बिना कुछ किए साक्षात्कार भी हो जाता है। बहुत से लोगों को एक साथ भी हो सकता है। ऐसे कई साधकों की तैयारी पिछले कई जन्मों से चल रही होती है। वे उस साक्षात्कार से लाभ उठा लेते हैं। जिन्हें बिना प्रयास के ही परमतत्त्व मिल जाता है, वे या तो चूक जाते हैं अथवा उस प्रतीति को झेल नहीं पाने के कारण असहज−असामान्य हो जाते है। श्री अरविंद ने लिखा है कि पिछले जन्म की तैयारी हो तो भी अवतरण अकस्मात् नहीं होना चाहिए। थोड़ी−बहुत तैयारी इस जन्म में भी आवश्यक है। पार्थिव शरीर तो इसी जन्म में मिला है। मन−बुद्धि−चित्त−अहंकार भी नए घटकों का, पंच तन्मात्राओं का आश्रय लेकर स्थिर हैं। उन्हें भी तैयार करना चाहिए।
दूसरों के प्रयत्न भी व्यक्ति का उद्धार करते हैं। उसे सौभाग्य कहा गया है। महर्षि पतंजलि के योगसूत्र की व्याख्या करते हुए व्यास मुनि ने लिखा है कि उस सौभाग्य से बचें तो ही अच्छा। अनुग्रह ईश्वर का भी नहीं लेना चाहिए। वह स्वयं प्रकट हो तो वापस भेज देना चाहिए। हम स्वयं ही साधना का पुरुषार्थ करते हुए इस तक पहुँचे हैं। तब उससे ज्यादा घनिष्ठ हो सकेंगे। प्रह्लाद और ध्रुव की साधना भक्तों की आदर्श है। उन्होंने अनायास आए अवतारी रूप या दृश्य को पहचानने से मना कर दिया। कहा कि जब तक वह हृदय में नहीं प्रकट होंगे, अतिथि ईश्वर को स्वीकार नहीं करेंगे। कौन जाने, कोई आसुरी माया हो।
श्री अरविंद ने अतिमानस के अवतरण को जो सिद्धाँत प्रतिपादित किया, वह अनुग्रह या कृपा स्तर का नहीं है। उनकी दृष्टि यह थी कि सौ लोग भी इस साधना के लिए तैयार हो सके, अपने आपको भागवत् चेतना के अतिमानसी रूप का वाहन बना सकें तो पृथ्वी पर चमत्कार घटित होगा। तब हजारों−लाखों लोग पूर्णता को प्राप्त कर सकेंगे। गिने−चुने साधकों में होने वाला अवतरण, उन्हें बिजलीघर की तरह बना देगा, जहाँ से लोगों तक विद्युत् धारा पहुँचती रहे। गिने−चुने साधकों में भागवत् चेतना का अवतरण उन्हें प्रकाश स्तंभ की तरह खड़ा कर देने जैसा है। मुक्त आत्माओं के उस आलोक को देख हजारों लोगों को प्रेरणा मिल सकती है और वे भी पूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं।
थियोसोफी आँदोलन ने वासना−तृष्णा के बंधनों में बँधे लोगों के लिए अनुग्रह सहायता वाले अवतरण का मार्ग अपनाया। थियोसोफी दर्शन की मान्यता है कि हजारों मुक्त आत्माएँ बंधन में जकड़े लोगों का उद्धार करने के लिए संसार में विचरण करती हैं। लोग कामना भर करें, वे उनकी सहायता के लिए पहुँच जाती हैं। इस मान्यता ने जितने लोगों की सहायता की, उससे ज्यादा का अहित किया है। अदृश्य सहायकों की प्रतीक्षा करते हुए साधक पुरुषार्थ करने से चूक गए। वे आत्मिक विकास नहीं कर पाए और उसके स्थान पर बेहोश कर देने वाले दंभ में चूर होकर रह गए।
साधना में प्रचंड वेग से प्रवृत्त करने वाली परंपराओं में सामूहिक तप का निषेध किया गया है। जप, भजन, सत्संग, पाठ आदि मृदु और पुकारपरक साधनाओं में सामूहिकता को थोड़ा महत्त्व दिया गया है, क्योंकि उससे अतिरिक्त बल मिलता है, लेकिन कुँडलिनी जागरण, चक्रवेधन, भावगती दीक्षा और तंत्र की सकाम−निष्काम हर तरह की साधनाएँ अकेले ही करने की व्यवस्था है। ये साधनाएँ समूह में की जातीं तो विलक्षण परिणाम निकलते।
अध्यात्मविदों के अनुसार परिणाम लाभ के स्थान पर हानि पहुँचाने वाले ज्यादा होते हैं। ऊर्जा का तीव्र जागरण और समूह में उसका संचार कमजोर लोगों को तहस−नहस कर सकते हैं। बिजली का प्रचंड प्रवाह अचानक दौड़ जाए, तो कमजोर तार जल जाते हैं। मशीनें फुँक जाती हैं और ज्यादा वोल्टेज नहीं सह सकने वाले बल्ब फ्यूज हो जाते हैं।
कुँडलिनी जागरण के लिए वैसे भी निजी पुरुषार्थ को महत्त्व दिया गया है। दक्षिणमार्गी सौम्य साधनाओं में गुरु की भूमिका मार्गदर्शक और सहायक की रहती है। वह जरूरी और उचित समझें तो शिष्य पर शक्तिपात कर सकता है लेकिन आमतौर पर इसकी मनाही है। साधक को निजी प्रयत्नों से ही आगे बढ़ने देने का निर्देश है।
ऊर्जा का प्रचंड प्रवाह जगा सकने वाली साधनाओं में सामूहिकता का निषेध एक−दूसरे से प्रभावित नहीं होने देने की सावधानी के तौर पर भी है। जहाँ सामूहिक साधना की जाती है, वहाँ कुछ अतिरिक्त ऊर्जा भी बहने लगती है, यह सभी साधकों के सम्मिलित प्रयत्नों के कारण है। सब को जोड़−मिलाकर कूती गई मात्रा से ज्यादा ही हो जाता है। उदाहरण के लिए, किसी खाली पात्र में सौ लोग आधा−आधा लीटर दूध डालें, तो वह संचय पचास लीटर से ज्यादा ही होगा। कारण कि सभी लोग ठीक आधा लीटर तो नहीं डालते, दो−चार चम्मच ज्यादा भी हो सकता है। पचास लोगों का वह अतिरिक्त योगदान वास्तविक जोड़ से ज्यादा ही बैठता है। अपवादस्वरूप वह कभी कम भी हो सकता है। कुँडलिनी विद्या के प्रसिद्ध विद्वान् पंडित गोपीकृष्ण के अनुसार, यह अतिरिक्त ऊर्जा रिक्त रह गए साधक की तरफ दौड़ती है। प्रवाह थोड़ा आगे बढ़ता है, तो दूसरे साधकों की ऊर्जा भी बहने लगती है। खतरा यह है कि तैयार नहीं हो सकता साधक उस वेग को सहन नहीं कर पाए और उसका अनिष्ट हो जाए।
शून्य स्थान की ओर दौड़ पड़ने वाले प्रवाहों से बवंडर खड़े हो जाते हैं। गरमी के दिनों में रेगिस्तानी या सूखी जगहों पर उठने वाले चक्रवातों से सभी परिचित हैं। यह भी जानते होंगे कि गरमी के कारण जिस जगह हवा का दबाव बेहद कम हो जाता है, वहाँ सभी दिशाओं से वायु का खिंचाव होने लगता है। खिंचाव के कारण आने वाली हवाओं का दबाव चपेट में आने वाली वस्तुओं को जकड़ लेता है। जीवित प्राणी उस चपेट में आ जाएँ, तो उनका दम घुटने लगता है।
सातवें दशक में अमेरिका के सभी शहरों में आठ−दस घंटे के लिए बिजली गुल हो जाने की घटना घटी। उस घटना का कारण बिजली का तंत्र था, जिसमें एक जगह फालतू रह गई बिजली दूसरी जगह भेज दी जाती थी। कोई विशेष उपाय किए बिना इस स्वचालित व्यवस्था के कारण किसी भी इलाके में क्षणभर के लिए भी बिजली गुल नहीं होने का इंतजाम हो सका था। हुआ यह कि अटलाँटा राज्य के एक गाँव की बिजली किसी दुर्घटना के कारण चली गई। अपने आप बिजली का हस्ताँतरण करने वाली व्यवस्था के कारण दूसरे गाँवों की अतिरिक्त बिजली का प्रवाह वैक्यूम क्षेत्र की आरे बहने लगा। कई जगह से यह प्रवाह दौड़ा। परिणाम यह हुआ कि गाँव का तंत्र उस प्रवाह को झेल नहीं पाया। व्यवस्था ध्वस्त हो गई। सभी फ्यूज उड़ गए, ट्राँसफार्मर फुँक गए। इस महाशून्य को भरने के लिए जो अफरा−तफरी मची, उसने तमाम शहरों की व्यवस्था गड़बड़ा दी और हर जगह घंटों के लिए ब्लैक आउट हो गया। प्रचंड वेग से ऊर्जा जगाने वाली तीव्र साधनाओं में भी इसी तरह की अराजकता का खतरा रहता है। इसलिए वह पुरुषार्थ स्वयं और अकेले करने को श्रेयस्कर बताया गया है।
आरोहण और अवतरण में सात्विक दृष्टि से कोई अंतर नहीं है। परमात्मा सब जगह व्याप्त है। वह जहाँ भी प्रकट होता है, विशेष अंतर नहीं पड़ता। आरोहण और अवतरण के तथ्य को व्यापक व्यवहार बुद्धि से देखें, तो भी पाएँगे कि एक दिशा से जो आरोहण है, दूसरी दिशा से वही अवतरण भी है। पृथ्वी गोल है। मंगल ग्रह पर बैठकर देखना संभव हो तो यहाँ के लोग एक दिशा से पैरों के बल खड़े दिखाई देंगे, दूसरे छोर पर चल रहे पैरों से लटके दिखाई देंगे। धरती में एक तरफ से छेदकर पार निकल जाने वाले उदाहरण से भी यह तथ्य समझा जा सकता है। भारत में खड़ा व्यक्ति उस छेद से दूसरे छोर पर बनी इमारत को देखे, तो वह जमीन पर खड़ी होने के बजाय लटकती दिखाई देगी। इधर के फव्वारे आकाश में फुहारा छोड़ते प्रतीत होते हैं, तो दूसरे तल पर बने फव्वारे पानी बरसाते लगेंगे। आरोहण और अवतरण के क्रम को सीधे खड़े होकर और शीर्षासन लगाते हुए देखने के रूप में भी समझा जा सकता है।
लेकिन यह अभेद स्थिति तात्विक दृष्टि से है। साधक की दृष्टि से आरोहण और अवतरण को एक ही नहीं कह सकते। अध्यात्मविदों ने इस आधार पर विभिन्न धर्मों के स्वभाव और प्रभाव का भी विश्लेषण किया है। उनके अनुसार प्रार्थना पर जोर देने वाले धर्मों की दृष्टि अपेक्षाकृत संकीर्ण होती है। वे परमात्मा से पूर्ण तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाते। जो कृपा करता है, वह हमेशा बड़ा होता है। दूसरे प्रार्थना पर जोर देने वाले धर्मों में असहिष्णुता या कट्टरता भी बढ़ जाती है। उन्हें अपनी मान्यता और अनुभव ही प्रामाणिक लगता है। दूसरों के अनुभव खंडित, आँशिक या मिथ्या प्रतीत होते हैं। उन पर चर्चा चलती है या मतभेद सामने आते हैं, तो उन्हें क्रोध आता है। वे जोर−जबर्दस्ती भी अपना सकते हैं और दूसरों को अपना मत मनवा लेने में पुण्य समझते हैं।
विश्व−समाज में जैसे−जैसे समझ और विचारशीलता का विकास हुआ है, वैसे−वैसे अपने मत के प्रति पूर्वाग्रह कम हुआ है। यह भी स्वीकार किया जाने लगा है कि अपना ही अनुभव सत्य नहीं है, दूसरे की अनुभूति भी सत्य हो सकती है। सत्य विराट् है और देखने वाली आँख या अनुभव करने वाली चेतना की अपनी सीमाएँ हैं। उन सीमाओं में सत्य का पूर्ण समावेश नहीं हो सकता। ध्यान या साधना पर जोर देने वाले धर्मों में उदारता, सहिष्णुता और युक्तिसंगतता के लिए पर्याप्त स्थान मिला है। क्योंकि उन धर्म परंपराओं में अपनी साधना और स्थिति के अनुसार ही अर्जन किया होता है। अपने पुरुषार्थ से प्राप्त उपलब्धि पर गर्व और संतोष होता है। उसे सहेजने की चिंता की जाती है।
इन दिनों विश्व−समाज में ध्यान और साधना के प्रति गहरी रुचि जाग रही है। पिछले बीस वर्षों में विभिन्न संगठनों ने कुँडलिनी, ध्यान, चक्रवेधन और योग आदि आरोहणपरक साधना−विधियों के लिए प्रयास किए। प्रयास आँदोलन स्तर के भी थे। उन्हें पर्याप्त सफलता मिली है। लाखों लोग ध्यान और साधना में प्रवृत्त हुए हैं। भजन−पूजन−प्रार्थना और भक्ति का प्रचार करने वाले आँदोलन भी छिड़े, लेकिन उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। भारतीय धर्म−परंपरा में इन दोनों मार्गों का समावेश है। ‘प्रार्थना’ और ‘साधना’ दोनों विधियों पर पर्याप्त अनुभव और विज्ञान यहाँ की परंपरा के पास है। इसलिए विश्व−समाज उसकी ओर आशाभरी दृष्टि से देख भी रहा है।
शरीर, वस्त्र और दैनिक उपयोग की वस्तुओं को स्वच्छ रखना।
सुबह उठते ही पृथ्वी माता को प्रणाम और भगवान का स्मरण करना। रात को सोने से पहले भी ईश्वर का स्मरण और दिनभर के कार्यों की समीक्षा करना।
जो भी काम करें, उसे भगवान् की आराधना समझना।
आत्मविकास या परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पतंजलि ने जिन गुणों को आधार बताया है, उनमें शौच का स्थान छठा है। आठ अंगों के हिसाब से देखें, तो नियमों के क्रम में यह प्रथम आता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि पाँच व्रत यम की श्रेणी में आते हैं। यम अर्थात् विधान और नियम अर्थात् अनुशासन। विधान अंतरंग पक्ष का द्योतक है। वह आस्था से शुरू होता है और आचार्य विनोबा भावे के अनुसार आचरण को सँभालता है। नियम का आरंभ आचरण से शुरू है और अंतरंग तक जाता है। घड़ा बनाते समय चाक पर रखी गीली मिट्टी को बाहर से थपकी देते हैं और भीतर से विस्तार के लिए दबाव बनाते हैं। बाहर और भीतर दोनों तरफ से सहेजने पर कुँभ आकार लेता है। यम और नियम के अभ्यास से साधक की पात्रता भी उसी तरह आकार लेने लगती है।
शौच का सामान्य अर्थ शुद्धि किया जाता है। टीकाकारों ने बाहर और भीतर की अर्थात् शरीर और मन की शुद्धि के रूप में अर्थ को विस्तार दिया है। शरीर की शुद्धि स्नान, प्रक्षालन और साफ−सुथरे वस्त्र पहनने से समझी जाती है। मन की शुद्धि का अर्थ है, राग−द्वेष आदि विकारों का नहीं होना। इन अर्थों से शौच की परिभाषा तो हो जाती है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि उनका पालन किस तरह किया जाए। शुचिता का अर्थ शरीर और मन के मैल की सफाई तो है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि यह कैसे किया जाए।
स्नान करने, समय−समय पर हाथ−पाँव−मुँह धोते रहने, पंचाँग शुद्धि का निर्वाह करने से शौच व्रत सधने लगता है। किंतु इतना ही काफी नहीं हैं। स्नान आदि से स्वच्छता की आवश्यकता पूरी होती है, लेकिन शौच व्रत का अर्थ स्वच्छता ही नहीं है। वह शुचिता का एक छोटा−सा हिस्सा है। बहुत संभव है कि नहा−धो लेने और सज−सँवर जाने के बावजूद व्यक्ति शुचिता की कसौटी पर खरा नहीं उतरे। श्रृंगार प्रसाधनों का कलात्मक उपयोग कर लेने पर भी व्यक्तित्व से कुटिलता के भाव टपकते रहें। रहन−सहन में सुरुचि−संपन्नता दिखाई देने पर भी चित्त में अशाँति, आवेग, लिप्सा, विषाद आदि विकार छाए रहते हैं। उनके कारण आत्मिक प्रगति की दिशा में निरंतर अवरोध उत्पन्न होते रहते हैं।
शौच व्रत स्वच्छता की तुलना में पवित्रता के अर्थ में ज्यादा ध्वनित होता है। पवित्रता एक भाव है, जो सध जाए, तो मन को प्रसाद से भर देता है। स्वच्छता इसके काय−कलेवर की तरह है। पवित्रता एक भाव है, जो सध जाए, तो मन को प्रसाद से भर देता है। स्वच्छता इसके काय−कलेवर की तरह है। पवित्रता का बोध न होता स्वच्छता एक भावहीन स्थिति है। यह अपने आप को कोई आत्मिक पात्रता विकसित नहीं करती। वह बोध होने पर लोग कुँभ, ग्रहण, अमावस, पूर्णिमा और दूसरे स्नान पर्वों पर हजारों लोगों के साथ गंगा में नहाने पर भी अहोभाव से भर देता है। हजारों लोगों के एक साथ स्नान करने पर वह जल स्थूल दृष्टि से दूषित हो जाता है, लेकिन श्रद्धा से स्नान करने गए लोगों के मन में शुचिता का भाव भर देता है।
आशय यह नहीं है कि स्वच्छता का कोई महत्त्व नहीं है। स्वस्थ रहने के लिए उन उपायों की निताँत आवश्यकता है। कहा इतना भर जा रहा है कि स्वच्छता की दृष्टि से किए गए उपचार भाव के साथ संपन्न किए जाएँ, तो शुचिता को सिद्ध करते हैं। जिन दिनों कीटाणुनाशक और त्वचा को कोमल−स्वस्थ−निरोग रखने वाले औषधीय साबुन नहीं बनते थे, उन दिनों लोग जल और मृत्तिका आदि से ही स्नान कर लेते थे। पाँच−सात दिन में एकाध−बार साबुन लगाने वाले लोग आज भी लाखों की संख्या में होंगे। वे किसी अभाव या अज्ञान के चलते ऐसा नहीं करते, बल्कि अपने विवेक से पानी और मिट्टी आदि उपयोग में लाते हैं। सिर्फ इसलिए कि इनका उपयोग उनके पवित्रता−बोध को गहन बनाता है। अभ्यास या संस्कार के कारण उन्हें ऐसा लगता है कि साबुन आदि साधनों का उपयोग किया गया, तो शुचिता का बोध आहत होगा, क्योंकि इन वस्तुओं में रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है।
कृत्रिम साधनों को तिलाँजलि देने के आदर्श को पूरी तरह नहीं अपनाया जा सकता। कम−से−कम आज की भाग−दौड़ वाली शहरी जिंदगी में यह सुझाव नहीं दिया जा सकता। जिन दिनों प्रकृति पूरी तरह स्वच्छ और निर्दोष थी, उन दिनों मिट्टी−राख आदि के उपयोग से आरोग्य और स्फूर्ति देने वाली स्वच्छता आ सकती थी। आज चारों ओर प्रदूषण फैल हुआ है, इसलिए सहज उपलब्ध साधनों पर ही निर्भर रहने में समझदारी है। पवित्रता किसी कृत्य से नहीं, भाव से संबंध रखती है। शरीर, वस्त्र और दैनिक उपयोग की वस्तुओं को स्वच्छ रखने के साथ प्रत्येक काम को भगवान् की आराधना समझते हुए करने का अभ्यास इस आवश्यकता को पूरी करता है।
पवित्रता का अभ्यास प्रतीक के तौर पर सुबह उठते ही पृथ्वी माता को प्रणाम से आरंभ किया जाता है। पृथ्वी को प्रणाम के लिए एक विशिष्ट श्लोक का पाठ भी किया जाता है। उसमें पृथ्वी को माँ मानकर संबोधित किया गया है। माँ को पाँव से स्पर्श करना अपराध है। साधक कहता है कि माँ आप पर पाँव रखना अपराध है, लेकिन मुझे क्षमा करो, क्योंकि ऐसा नहीं किया गया तो जीवन नहीं चल पाएगा।
स्थूल दृष्टि से यह क्षमा−प्रार्थना निरर्थक है। नहीं करें तो कुछ बिगड़ नहीं जाता। पाँव से छूने पर पृथ्वी आहत नहीं हो रही और क्षमा नहीं माँगें, तो वह कोई दंड नहीं दे रही। लेकिन चित्त में आह्लाद भरने के लिए भावपूर्वक की गई इस प्रार्थना का बहुत महत्त्व है। पृथ्वी को जीवंत प्रतिमा मानने और क्षमा माँगते हुए जिस संवेदना से दिनचर्या शुरू होती है, वह पूरे दिन को धन्य बनाती है। संवेदना को लगा लिया जाए, तो प्रत्येक कृत्य के साथ संवेदना का अभ्यास दिनोंदिन बढ़ाया जाना चाहिए। वह पृथ्वी के प्रति ही नहीं, जिस किसी भी क्षण, जिन किन्हीं भी लोगों और वस्तुओं के संपर्क में आते हैं, उन सबके लिए एक पुनीत रखना चाहिए। सजग रहें कि चित्त में संवेदना जागी रहे। किसी के प्रति द्वेष का भाव नहीं आए।
शुचिता की सिद्धि के लिए सुबह पृथ्वी माता को प्रणाम भाव ईश्वर के स्मरण से जो प्रयोजन पूरा होता है, वही उद्देश्य रात को सोने से पहले के स्मरण से पूरा होता है। उस समय दिनभर के कार्यों की समीक्षा की जानी चाहिए। स्मरण साधक की चेतना को एक स्तर पर पहुँचाता है। समीक्षा में इस तथ्य का ध्यान रखा जाता है कि दूसरों को क्षुब्ध करने वाला कोई कृत्य तो नहीं हो गया। पृथ्वी को प्रणाम के साथ दिनचर्या शुरू करने वाले चित्त से किसी के प्रति अनजाने में कोई अपराध हो गया हो, तो उसके लिए क्षमा माँगना, ग्लानि अनुभव करना और दोबारा वैसी गलती नहीं हो, इस तरह की सावधानी बरतने का संकल्प उभरे, तो समझना चाहिए कि शुचिता की दिशा में प्रगति हो रही है। समीक्षा के समय सजगता बनी रहे, इतना ही काफी है।
यह सजगता अपने काम को भगवान की आराधना समझने के नियम से प्रखर होती है। किसी काम को बोझ समझकर नहीं किया जाए। आराधना समझकर किए गए कार्य दूसरों के प्रति द्वेष, विषाद या स्पर्द्धा के भाव को तिरोहित करते हैं। इन भावों या दुर्भावना से किए गए कार्य ही मन में मलीनता लाते हैं। उन्हीं के कारण कषाय−कल्मष उत्पन्न होते हैं। आराधना को व्यवहार और कर्म की कसौटी मान लें, तो किसी भी आचरण से दूसरे का अहित नहीं होगा। किसी के प्रति द्वेष−दुर्भाव ही नहीं होगा तो ईर्ष्या, क्रोध, विषाद आदि विकारों का अपने आप शमन हो जाएगा।
योगशास्त्र ने शौच का परिणाम बताया है कि वह पूरी तरह सिद्ध हो गया, तो जो भी निरर्थक है, उससे छुटकारा मिल जाता है। चित्त में न भ्रम रहता है और न ही संशय, क्योंकि सभी विकार तब नष्ट हो जाते हैं। शास्त्र की भाषा में इस स्थिति को जुगुप्सा और असंसर्ग कहा गया है। जुगुप्सा का शाब्दिक अथ मलिन स्थिति से घृणा है, लेकिन घृणा स्वयं विकार है और शुचिता पूरी तरह सिद्ध हो जाए, तो विकार के लिए कोई स्थान कहाँ बच रहता है। वस्तुतः शुचिता जीवन और जगत् के प्रति यथार्थ दृष्टि जगाती है। वही चाहिए भी।
युवक नरेंद्र से जब भी रामकृष्ण परमहंस समाज सेवा, दलितों का उद्धार एवं विश्व निर्माण हेतु आगे आने की बात कहते, नरेंद्र एक ही बात कहता, “मुझे अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व सँभालने हैं।” व्यामोह से मुक्ति दिलाने हेतु भगवत् स्वरूप रामकृष्ण को काली को माध्यम बनाना पड़ा। इससे जो शक्ति मिली, अंतः में प्रकाश पहुँचा, तो नरेंद्र का गुण−कर्म−स्वभाव आमूल−चूल बदल गया और वह विवेकानंद बनकर विश्ववंद्य महापुरुष कहलाए।
प्रेत वह होते हैं, जिनके पास मन होता है, परंतु इंद्रियों का अभाव होता है। इस तरह इनकी दो श्रेणियाँ होती हैं, वासना शरीरधारी एवं सूक्ष्म शरीरधारी। ये क्रमशः वासना लोक एवं सूक्ष्म लोक में निवास करते हैं। वे दोनों प्रकार के प्रेत अपने−अपने लोक में रहते हुए भी भौतिक जगत् से सतत संपर्क बनाए रहते हैं। मन की तीन अवस्थाएँ होती हैं, चेतन, अचेतन ओर अतिचेतन। जीवित मनुष्य चेतन मन की अवस्था में काम करता है। मरणोपराँत चेतन मन का स्थान अचेतन ले लेता है। सूक्ष्म शरीरधारी एवं वासना शरीर धारी अचेतन मन के दो स्वरूप हैं। अचेतन चेतन से अति शक्तिशाली होता है। वासनाजन्य इच्छाओं के कारण प्रेतों का जीवन अशाँत, व्यथित और विवेकशून्य होता है। परंतु सूक्ष्मशरीर शाँत, स्थिर और सहयोग मनोवृत्ति का होता है। इन्हीं कारणों से प्रेम दूसरों को कष्ट देते एवं परेशान करते हैं, जबकि सूक्ष्म शरीरी आत्मा सहयोग एवं सहायता पहुँचाती हैं।
ये प्रेत देहातीत व्यक्तित्व होते हैं। वासना शरीर या प्रेत शरीर का निर्माण अन्न तत्त्व से होता है। सूक्ष्मशरीर प्राण तत्त्वों से विनिर्मित माना जाता है। सामान्यतया व्यक्ति मरने के बाद वासना शरीर को प्राप्त करता है एवं उसका वेग शाँत होने पर सूक्ष्मशरीर में प्रवेश करता है। कुछ काल पश्चात् सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीर के रूप में नवीन देह धारण करता है। इसी चक्र को संसार का भवचक्र कहते हैं। पार्थिव शरीर में इच्छा, वासना, कामना का भाव आँदोलित करता रहता है, जबकि सूक्ष्मशरीर में विचारों की प्रबलता रहती है। विचार शक्ति होने के कारण इसमें अंतः चेतना प्रगाढ़ होती है। स्थूलशरीर में सक्रिय चेतना का दबाव अधिक होता है। अंतः चेतना की प्रबलता की वजह से ही सूक्ष्म शरीर जीव अपनी प्रबल वासना− कामना की पूर्ति हेतु पार्थिव काया को धारण करने के लिए बाध्य होते हैं। श्रेष्ठ एवं निष्काम कर्मयोग ही इस बंधन से मुक्ति का कारण बनता है। परंतु वासना का अनंत दबाव जीव को इन सबसे वंचित करता है और इसकी परिणति भटकती प्रेतात्माओं के रूप में होती है, जो स्वयं विक्षुब्ध होती हैं और दूसरों को परेशान करती हैं।
अपने देश में प्रेतों के किस्से−कहानियों का जखीरा अंतहीन एवं व्यापक है। अनेकों रूपों में इनकी चर्चाएँ होती रहती हैं। ऐसी ही एक घटना आज से पच्चीस साल पूर्व अँग्रेजी साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ में प्रकाशित हुई थी। इस विवरण के अनुसार उत्तरप्रदेश के खुफिया पुलिस इंस्पेक्टर श्री गुरुशरण लाल श्रीवास्तव की पैंतीस तत्नी श्रीमती शाँति देवी की रहस्यमय ढंग से मृत्यु हो गई थी। इसी घटना का विस्तृत विवरण उस समय के प्रायः सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था। श्रीवास्तव जी अपने लिए एक मकान बनवाना चाहते थे। अतः उन्होंने इसके लिए जमीन खरीदी और अपनी योजना को कार्यरूप में अंजाम दिया। मकान का निर्माण कार्य समाप्त होते ही भूत−प्रेतों का उत्पात प्रारंभ हो गया। वस्तुतः जिस प्लाँट पर मकान बना था, वहाँ कुछ साल पूर्व एक हरिजन व्यक्ति की हत्या हुई थी और तभी से वह प्लाँट भूत−प्रेतों का बसेरा बन गया था। श्रीवास्तव जी इसे कपोल कल्पना मानते थे।
भूत−प्रेतों का उत्पात अक्टूबर 1969 से आरंभ हुआ। अचानक ही उनके घर में ईंट−पत्थरों के साथ धूल की बारिश होने लगती। खिड़की−दरवाजे अपने आप खुलने और बंद होने लगते। यह तमाम उपद्रव तभी होता, जब श्रीवास्तव घर में अनुपस्थित होते। लाख कोशिशें के बावजूद उपद्रवियों का कहीं कोई सुराग नहीं मिल पाया। जून 1970 तक यह अपने उग्र रूप में पहुँच गया। तब फर्श पर रखी कुर्सियां हवा में उछलकर तैरने लगतीं। रसोईघर के बरतन शून्य में ही टकराने लगे। एक दिन श्रीवास्तव जी की तलवार म्यान से निकलकर काफी देर तक अधर में लटकी रही, बात में यह बिस्तर के नीचे दबी मिली। इसके पश्चात् किसी अज्ञात हाथों ने तलवार को खून से लथपथ स्थिति में बाहर आँगन में फेंक दिया। अचानक उनकी डेढ़ साल की कन्या गायब हो गई। बहुत खोजबीन करने पर एक बहुत बड़े बक्से के पीछे बेहोश पड़ी मिली। एक अन्य अवसर पर उस लड़की को एक सूटकेस में बंद पाया गया। परिवार में सदा दहशत और तनाव का वातावरण बना रहा। एक जुलाई 1970 को तो भूतों ने श्रीवास्तव की पत्नी को ही जला डाला बाद में अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया।
उपर्युक्त घटना से मिलती−जुलती एक घटना ब्राजील के साओ पाउलों राज्य के इटपिया नगर में रहने वाले काँटों के घर में घटी थी। इसका विवरण ब्राजील के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय दैनिक पत्र ‘ओ कुजारों’ ने प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार अप्रैल 1959 की सुबह काँओ साहब अपने घर में बैठे थे। अचानक उनके घर में पत्थरों की वर्षा होने लगी। यह क्रम दो−तीन दिन तक कुछ अंतराल में बराबर होता रहा। इसके बाद पत्थरों की जगह बरतन, आलू, प्याज, शलजम आदि की बारिश होने लगी। इसका कहीं कोई समाधान नजर नहीं आ रहा था। आखिरकार इसे प्रेतबाधा मानकर उपचार हेतु एक पादरी को बुलाया गया। भूतों ने उन पर भी हमला बोल दिया। इस रहस्यमयी घटना से सभी त्रस्त और हैरान थे। काफी खोजबीन के पश्चात् पता चला कि यह उपद्रव काँटो की नौकरानी फ्रांसिस्को को लक्ष्य करके होती थी। संभवतः भूत फ्रांसिस्को की आड़ में यह ताँडव−लीला कर रहे थे। इस घटना के संदर्भ में ‘ओ कुजारो’ अपने संपादकीय में लिखते हैं, “इन विचित्र घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी काफी समझदार और उच्च प्रतिष्ठित लोग हैं, पर उनके लिए भी यह रहस्य के घेरे में घिरा रहा।”
इंग्लैंड के सी. ई. एम. जोड विश्व के अग्रणी चिंतकों, मनोवैज्ञानिकों, दार्शनिकों और प्रख्यात लेखकों की गणना में आते थे। सन् 1944 में बी. बी. पी. पर आयोजित एक परिसंवाद में भाग लेते हुए उन्होंने कहा था, मैं पहले भूत−प्रेतों में विश्वास नहीं रखता था, परंतु उस दिन से करने लगा, जिस दिन प्रयोगशाला में अज्ञात ढंग से मुझ पर साबुन की टिकिया बरसने लगीं। इंग्लैंड के एक और विश्वविख्यात लेखक, नाटककार तथा अभिनेता तोराल कोवार्ड का भी कहना है कि भूतों को मात्र जादुई कल्पना कहकर टाला नहीं जा सकता। उन्होंने इनके अस्तित्व को स्वीकारा है।
इसी तरह की एक और प्रेतलीला 5 जुलाई 1973 को होशंगाबाद में हुई। होशंगाबाद के वलर्क सुभाषचंद्र जैन का परिवार भी ऐसे ही एक विचित्र हादसे का शिकार हुआ। एक दिन श्री जैन की चारपाई में आग चलने लगी, परंतु, सबसे बड़ी हैरानी की बात थी कि उस आग की लपटों का उनकी माँ के शरीर पर कोई प्रभाव न था। उनके शरीर पर आँच आने या झुलसने का कोई चिह्न नहीं था। श्री जैन के परिवार में आग लगने की यह घटना बराबर चलती रही। उन्होंने इससे परेशान होकर एक नहीं कई−कई मकान बदल डाले, लेकिन हर मकान पर यही दृश्य उपस्थित होता। जिस किसी मकान में गए वहीं कमरे की विभिन्न वस्तुओं में आग लग जाती। इस विचित्र प्रकोप से सुभाष को किराये का मकान मिलना मुश्किल हो गया। अंततः उन्होंने एक जैन मंदिर में शरण ली। वहाँ भी उनका पीछा न छूटा। कई प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार एकाएक अग्नि की लपटें उठतीं और बुझाने पर बुझ भी जाती। अंत में तो गीले कपड़ों, दीवारों, अचार, दाल, चावल के डिब्बों, अटैची आदि इन रहस्यमयी आग से राख बन गए। इसके निराकरण के लिए एक पंडित को आमंत्रित किया गया। पंडित जी ने जैसे ही भागवत् का एक पन्ना पढ़ा कि दूसरे पन्ने में आग लग गई। प्रेतों की यह करतूत अपने में रहस्य ही बनी रही।
प्रेतों का स्वरूप भिन्न−भिन्न होता है। कभी−कभी वे अपने विगत जन्मों के परिचितों पर भी अपना रुख दिखाते हैं। इसके पीछे उनकी अतृप्त इच्छाएँ समाई रहती हैं। पुष्पा सुँदर एवं आकर्षक युवती थी। उसका अपने पड़ोस के एक युवक अरुण से प्यार हो गया। प्रेम विवाह में परिणत होने से पहले ही असफल हो गया। समय के बढ़ते प्रवाह ने उसकी स्मृति पर विस्मृति की मोटी परत जमा दी। बात आई गई हो गई। बीस वर्ष के लंबे अंतराल के बाद अरुण दार्जिलिंग से पुष्पा का हस्तलिखित पत्र प्राप्त कर हर्ष मिश्रित आनंदित हुआ। कुछ दिन बाद पुनः एक पत्र मिला, जिसमें अरुण को दार्जिलिंग आने का प्रेमपूर्ण अनुरोध किया गया था। अरुण इस निवेदन को टाल न सका और उसने बनारस से दार्जिलिंग की ओर प्रस्थान किया। दार्जिलिंग के स्टेशन पर ही एक खाकी वरदीधारी ने उसकी अगवानी की और कहा, मैं पुष्पा जी का ही ड्राइवर हूँ, मेरा नाम बहादुर सिंह है। पुष्पा जी ने आपको लाने के लिए अपनी कार भेजी है। बहादुर उसे एक आलीशान बंगले में पहुँचाकर कहीं गायब हो गया। बंगले की मल्लिका पुष्पा पूरे श्रृंगार के साथ उसके सामने आई और अभिवादन किया।
अजमेर की रहने वाली पुष्पा आज ऐश्वर्य एवं वैभव की स्वामिनी बन बैठी थी। पता नहीं कब उसके भाग्य ने करवट बदली। यह सब देखते ही अरुण हतप्रभ रह गया। विगत स्मृति चलचित्र की भाँति चलने लगी। इसी बीच पुष्पा चाँदी के गिलास में दूध और सोने की तश्तरी में स्वल्पाहार लेकर उपस्थित हुई। उसने बड़े विस्तार के साथ अपनी आपबीती सुनाई। इतने में ही एक भयानक दृश्य दिखाई दिया। कंधे पर बंदूक रखे और कमर में तलवार लटकाए एक आदमी ने उस कमरे में प्रवेश किया तथा आव देखा न ताव, पुष्पा पर गोली चला दी। बचाने को आए बहादुर सिंह को भी उसने गोली मार दी। कमरे में दो मर्मभेदी चीत्कार गूँजने के बार तनावयुक्त उदासी छा गई। आलीशान बंगले का वह कमरा खून से लथपथ दो लाशों से भरा बड़ा ही वीभत्स दिख रहा था। अरुण ने उसे अपने शब्दों में व्यक्त किया, “इस घटना से परेशान मैं भागता हुआ पुलिस स्टेशन पहुँचा और इंस्पेक्टर को बीती रात की सारी घटनाएँ एक साँस में कह सुनाई। इसके विपरीत इंस्पेक्टर ने प्रतिक्रिया हीन मेरी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने मुझे बताया कि यह कुछ नहीं प्रेतलीला है। इसके एक माह पूर्व भी किसी व्यक्ति ने इसी तरह की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इंस्पेक्टर जब मेरे साथ अटैची लेने साथ गया, तो वहाँ का परिवेश देखकर बड़ी हैरानी हुई। वह एक भुतहा खंडहर था, जहाँ लाल रेशमी कपड़े में लिपटा एक पैकेट मिला। इसे खेलने पर सिंदूर की डिबिया और काँच की लाल चूड़ियाँ मिलीं। बीती रात इसी पैकेट को पुष्पा मेरी ओर बढ़ा रही थी कि हत्या की वारदात घट गई।” आज वह भुतहा मकान कलकत्ता के किसी सेठ का आलीशान होटल है।
अरुण शर्मा ने अपने परलोक विज्ञान में अपनी आप−बीती प्रेतलीला का इस तरह वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है, जब मैं कमरे में बैठा था, उस रात एक अजनबी लड़की आई। उसने अपना परिचय जवा नाम से दिया। मुझे याद आया, जवा हरिमोहन चतुर्वेदी की भाँजी थी और ये लोग बनारस में मेरे पड़ोसी थे। जब मैंने अपने अतीत के भूले−बिसरे पन्नों को पलटा, तो याद आया जवा पढ़ने−लिखने में बहुत कमजोर थी। किसी तरह बी.ए. पास कर वह अपने घर चली गई। तीन−चार साल बाद चतुर्वेदी जी रिटायर हुए और वे इंदौर चले गए। बाद में पता चला कि जवा की शादी हो गई, परंतु इतने लंबे समय के अंतराल में जवा यहाँ कैसे आ पहुँची? मैंने सोचा हो सकता है कि यहीं किसी रिश्तेदार के पास आई होगी। इतने वर्षों के बाद अप्रत्याशित भेंट से स्वाभाविक है उसके प्रति जानने की जिज्ञासा जागना।
जवा कश्मीरी थी। अगली मुलाकात में उसने बताया कि वह उसकी सहेली रूपा के यहाँ ठहरी है। बोली कि आज व्यस्तता कुछ ज्यादा होने के कारण अगली रात आएगी। दूसरी रात को वह आई। वह अत्यंत स्वाभाविक स्थिति में तथा प्रसन्नचित्त थी। मेरे पड़ोस में रहने के कारण मैं उसके स्वभाव से परिचित था। वह वहाँ बैठ गई तथा ढेर सारी बातें करने लगी। उसने अपनी फोटो खींचने का आग्रह किया। इसके पूर्व भी मैँने उसके कई फोटो खींचे थे। बातों−बातों में उसने प्रेत विद्या का जिक्र किया। उसने इससे संबंधित सूक्ष्म से सूक्ष्मतम तथ्यों तक को स्पष्ट करके रख दिया। मैं जवा की इन गंभीर बातों पर हैरान था। बल्कि मेरा ज्ञान भी जवा के समान सूक्ष्म और गंभीर नहीं था। अंतिम रात जवा की बातों से मैं सिहर उठा। वह बोल उठी, परिमल क्राँति घोष की प्रेत विद्या के कारण मैं तुम्हारे पास आकर्षित होकर चली आई हूँ। यह सुनते ही लगा, मानो में किसी भयंकर इंद्रजाल में फँस गया हूँ। किसी अज्ञात भय से मेरा सारा शरीर काँप उठा। फिर न जाने कब तक अचेत पड़ा रहा। जब उठा तो सुबह हो गई थी। दूसरे दिन परिमल घोष को विगत घटना की जानकारी दी, तो उन्होंने बताया कि जवा ने शादी के पश्चात् आत्महत्या कर ली थी और वह तुम्हें प्रेम करती थी। इसलिए भटकती हुई वह तुम्हारे पास खिंचती चली आई। जब मैंने जवा की खिंची तस्वीर देखी, तो और भी हैरानी हुई। फोटो में कमरे का सारा दृश्य यथावत् था, परंतु उस फोटो में जवा नहीं थी।
हसन नियाज अलीगढ़ विश्वविद्यालय में अरबी भाषा और साहित्य के प्राध्यापक थे। नियाज साहब के पिता अपने जमाने के मशहूर लेखक और अरबी व फारसी के उच्चकोटि के विद्वान् थे। उनकी स्वयं की लाइब्रेरी थी, जिसमें हजारों की संख्या में विभिन्न विषयों की पुस्तकें व्यवस्थित थीं। जिस मकान में लाइब्रेरी थी, वह अलीगढ़ शहर के बाहर बड़े ही सुनसान जगह पर था। नियाज साहब की मौत के बाद लाइब्रेरी अक्सर खाली पड़ती रहती थी। एक रिसर्च स्कॉलर नियाज साहब से अनुमति लेकर वहीं पढ़ने आया। युवक वहीं पास के एक मकान में रहने लगा। मकान के बगल में ही संगमरमर की कब्र थी। वहाँ हमेशा एक चिराग जलता रहता था, लेकिन जलाने वाले का कोई पता−ठिकाना नहीं मिल पाया।
उस स्कॉलर ने बताया, मैं एक दिन खिड़की के पास बैठकर पुस्तक पढ़ रहा था। अचानक एक लड़की आई और जलते हुए चिराग को रख गई। मैंने समय नोट कर लिया और देखा कि वह ठीक नियत समय में चिराग रखकर चली जाती है। नित्यप्रति की इस घटना को सामान्य समझकर मैंने टाल दिया। कुछ दिन से कड़ाके की सरदी पड़ रही थी। उसी दौरान बारिश भी जमकर हो रही थी। संयोगवश मैं वहीं खिड़की के सामने अपनी रिसर्च के नोट्स तैयार कर रहा था। विषय की गंभीरता एवं भारीपन से मन भी बोझिल−सा हो रहा था। एकाएक मुझे याद आई चिराग वाली बात। सोच वह लड़की आज चिराग जलाने कैसे आएगी? परंतु वह भीगती हुई आई और चिराग रखकर खड़की हो गई। तब तक मेरा मन शाँत हो चुका था एवं मैं पुनः अपने कार्य में व्यस्त हो गया। एक आवाज ने मुझे चौंका दिया। वही चिराग वाली युवती मेरे सामने खड़ी थी। वह नाजिमा थी और वह बोली कि मैदान के उस पार लाल कोठी में उसका घर है। उस दिन के बाद नाजिमा नित्य मेरे कमरे में आती और घंटों अपने बारे में बताती रहती थी।
नाजिमा को भी पढ़ने का शौक था। वह गंभीर से गंभीरता विषयों को बड़े सरल एवं सहज ढंग से प्रतिपादित कर देती। उसकी भाषा परिष्कृत एवं प्रतिपादन शैली बड़ी सुँदर थी। बरबस मैं नाजिमा की ओर आकर्षित होने लगा। इसके पीछे एक और कारण भी था। वह मुझे कठिन वक्त पर आर्थिक सहयोग भी करती थी। उसने कई बार मुझे सौ−सौ के नए नोट निकालकर दिए। भला कैसे उसके एहसान को भूला जा सकता है। एक दिन वह आई और चली गई। कई दिन हो गए, वह नहीं आई, तो मैं उसके बताए पते पर लाल कोठी की ओर चल पड़ा। लाल बंगले पर एक बुढ़िया बैठी हुई थीञ नाजिमा का पता पूछने पर उसने एक कब्र की ओर इशारा कर दिया। कब्र के ऊपर लाल पत्थर पर उर्दू में साफ−साफ लिखा था, “नाजिमा, मेरी प्यारी नाजिमा, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा।” मैं सन्न रह गया। इसका मतलब नाजिमा की आत्मा ही मेरे पास आई एवं सहयोग देकर अदृश्य हो गई।
प्रेतयोनि इच्छाओं एवं वासनाओं की अतृप्त योनि है। इस तरह हर भटकती आत्मा का वह विचित्र संसार है। जहाँ दमित, दूषित और अतृप्त भोगों की कल्पना करने वाला हर प्राणी पहुंचता है। इसके विपरीत श्रेष्ठ, कर्म, सद्चिंतन एवं निष्काम सेवापरायण मनुष्य स्वर्ग एवं उच्चतर लोकों को प्राप्त करता है, भगवत्प्राप्ति की लक्ष्य−सिद्धि तक पहुँचता है। अतः हर मनुष्य को इस दुर्लभ मानव शरीर से सतत श्रेष्ठ कर्म में लगे रहना चाहिए।
एक बालक मिठाई बहुत खाता था, उसकी यह आदत उसके स्वास्थ्य को बिगाड़ रही थी। बालक मानता नहीं था। निदान के लिए उसकी माता उसे रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा का अधिक प्रभाव पड़ने की आशा से उनके पास ले गई और प्रार्थना की कि आप इसे उपदेश देकर मिठाई खाना छुड़ा दें। परमहंस ने उसे एक सप्ताह बाद आने को कहा। महिला चली गई। एक सप्ताह बाद आई, तब उन्होंने बालक को उपदेश दिया और उसने मिठाई छोड़ भी दी।
महिला ने एक सप्ताह विलंब लगाने का कारण पूछा, तो परमहंस ने कहा, तब तो मैं मिठाई स्वयं खाता था। जब बालक को उपदेश देना आवश्यक प्रतीत हुआ, तो पहले मैंने स्वयं मिठाई छोड़ी, तब बालक को कहा। जो करता है, उसी की शिक्षा का प्रभाव भी पड़ता है।
यह प्राथमिक आवश्यकता है कि व्यक्ति पहले अपने चिंतन को देखे। लोकसेवी व सत्साहस संघर्ष करने के लिए आगे आने वाले के लिए तो यह एक अनिवार्य प्रक्रिया हैं।
धर्म का अर्थ है−अपने साँसारिक और आध्यात्मिक दायित्वों का भलीभाँति निर्वाह, ताकि लौकिक जीवन में समृद्धि, सामूहिक विकास और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त हो।
एक व्यापारी एक घोड़े पर नमक और एक गधे पर रुई की गाँठ लादे जा रहा था। रास्ते में एक नदी मिली। पानी में घुसते ही घोड़े ने पानी में डुबकी लगाई तो काफी नमक पानी में घुल गया। गधे ने घोड़े से पूछा, यह क्या कर रहे हो? घोड़े ने कहा, वजन हलका कर रहा हूँ। यह सुनकर गधे ने भी दो डुबकी लगाई, पर उससे गाँठ भीगकर इतनी भारी हो गई कि उसे ढोने में गधे की जान आफत में पड़ गई। कुरीतियों, कुप्रचलनों की बिना समझे−बूझे की गई नकल कठिनाइयाँ बढ़ाती हैं, सुविधा नहीं।
अकाल भयावह था। समूचा सिरोही राज्य इसकी व्यथा से आक्राँत था। सिरोही नरेश अपने समूचे प्रयासों−प्रयत्नों के बावजूद अपनी प्रजा की रक्षा करने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहे थे। उन्होंने अपना सारा संचित धन अकाल राहत कार्य में लगा दिया, फिर भी अकाल राहत कार्य पूर्ण नहीं हो पा रहा था। अल्प समय में ही राज्य के खजाने खाली होने लगे। भयंकर अकाल था, अभी काफी समय बाकी था। सोच में डूबे नरेश निराश होने लगे।
उन्होंने अंतिम उपाय के तौर पर अपने राज्य के बुद्धिजीवी, विचारशील नागरिकों की सभा बुलाई। सथा में अकाल राहत कार्य के बारे में चर्चा होने लगी। लोग तरह−तरह के सुझाव−समाधान प्रस्तुत कर रहे थे, पर प्रस्तुत किए जा रहे सारे समाधान धन के अभाव में स्वयं में महाप्रश्न बन रहे थे। धन कहाँ से लाया जाए? धन प्राप्ति का उचित उपाय क्या हो? एक अनुभवी वयोवृद्ध, विचारशील नागरिक ने संकोचपूर्वक कहा, “अन्नदाता इस सवाल का उत्तर हमारे पास है। यदि अनुमति हो, तो प्रस्तुत करने का साहस करूं।”
सिरोही नरेश को तो जैसे प्राण मिले, उन्होंने कहा कि नेकी और पूछ−पूछ, आप अवश्य कहें। नरेश के प्रोत्साहन पर उस वृद्ध ने कहना प्रारंभ किया, नंदीवर्धनपुर के जगतशाह झाँझड़ वाले काफी धनवान एवं धर्मात्मा हैं। इस कार्य में अवश्य साथ दे सकते हैं, किंतु इसके लिए राज्य को स्वयं उनसे याचना करनी होगी। वृद्ध का यह सुझाव कतिपय सभासदों को नहीं भाया। वे सोचने लगे, क्या राजा का अपने ही किसी प्रजाजन के सामने याचक बनना उचित होगा? सभा में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
परंतु सिरोही नरेश प्रजावत्सल थे। उन्होंने सभी का संकोच तोड़ते हुए कहा, इसमें मेरे अपमान की कोई बात नहीं। शाह धर्मप्राण व्यक्ति हैं, उनके सामने किसी लोकहित के कार्य हेतु माँगने में शर्म कैसी? यदि शाह के आगे हाथ फैलाने से राहत कार्य पूर्ण हो जाता है, तो इससे अच्छी बात और क्या होगी? यदि मेरे निवेदन पर शाह जी ने प्रजा की भलाई के लिए कार्य किया और प्रजा की रक्षा हो जाए, तो इससे बढ़कर मेरा सौभाग्य और क्या होगा? अपने इस कथन को क्रिया रूप में परिणत करते हुए सिरोही नरेश ने महामंत्री की ओर देखते हुए कहा, मंत्री महोदय! आप अभी नंदीवर्धनपुर गाँव को जाएँ और जगतशाह झाँझड़ वाले को दरबार में मान सहित उपस्थित होने का संदेश पहुँचाएँ। राजाज्ञा को शिरोधार्य करके मंत्री महोदय तुरंत अपने राज्यकर्मचारियों के साथ नंदीवर्धनपुर को रवाना हो गए।
अपनी यात्रा पूरी करके राज्य कर्मचारी एवं मंत्री महोदय नंदीवर्धनपुर ग्राम के चौराहे पर आकर रुके और आगंतुकों से शाह के निवास का पता पूछा। गाँव वालों ने बताया, सामने जो हवेली दिख रही है, वहीं झाँझड़ वाले शाह का मकान है। मंत्री महोदय एवं राज्य कर्मचारियों ने शाह की हवेली के आगे आकर देखा कि एक हृष्ट−पुष्ट व्यक्ति वहाँ पशुशाला की सफाई कर रहा है। वह आधी बाजू की खादी की बनियान तथा खादी की ही ऊँची धोती पहने है। मंत्री ने मन−ही−मन सोचा, जरूर यह शाह का ग्वाला होगा। जो इस समय पशुशाला की सफाई कर रहा है। मंत्री ने उसे अपने समीप बुलाया और रोबीले स्वर में कहा, ए मजदूर! जाकर शाह साहब को कहो कि सिरोही राज्य के मंत्री व राज्य कर्मचारी आपसे मिलने आए हैं और उन्हें दरबार ने याद किया है। शाह ने मंत्री महोदय को पहचान लिया, लेकिन इस पहचान को अपने मन में रखते हुए उन्होंने कहा, अन्नदाता, मैं अभी शाह को आपके पधारने का समाचार देता हूँ। आप सब लोग हवेली के बैठक खाने में विराजें। राज्य कर्मचारी तथा मंत्री महोदय एक नौकर के सद्व्यवहार से खुश हो गए। उनको लगने लगा, वास्तव में शाह के नौकरों का व्यवहार काफी अच्छा है।
इन सबको उचित स्थान पर बैठने के लिए कहकर वह स्वयं अंदर गए और साफ−सुथरी पोशाक पहनकर मंत्री महोदय के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। बड़े ही विनम्र भाव से कहने लगे, “मालिक फरमाओ! दास हाजिर है। आपको यहाँ तक, इस दास की कुटिया तक पधारने का कष्ट क्यों करना पड़ा। आप संदेश भिजवा देते, तो मैं स्वयं आपकी सेवा में हाजिर हो जाता। नरेश कुशल से तो हैं। आप तो मेरे लिए उनका हुक्म बतलाओ। सेवक के लिए उनका क्या संदेश लेकर आए हैं?” शाह साहब की विनम्र वाणी को सुनकर और उनके चेहरे की ओर देखकर मंत्री महोदय को भारी अचरज हुआ कि अरे, यह तो वही मजदूर है, जो शाह की पशुशाला में सफाई कर रहा था। उन्हें लगा कहीं मुझे भ्रम तो नहीं हो रहा है। जिज्ञासा की पूर्ति के लिए मंत्री महोदय ने धीरे से शाह से पूछा, मजदूर के रूप में पशुशाला में....।
वह मैं ही था। शाह मुस्कराते हुए कहने लगे, मंत्री जी! हम काम न करें और आराम को बड़ा मानें, यह तो हमारा भ्रम हैं। काम तो पूजा है। फिर कोई काम छोटा नहीं होता।
मंत्री महोदय कुछ देर तक शाह को बड़े विस्मय से देखते रहे। वे कुछ भी बोल न पाए। फिर रुकते−रुकते बोले, राज्य में अकाल पड़ा हुआ है। नरेश ने अपना पूरा खजाना प्रजाजनों की सेवा में लगा दिया है और...। बीच में ही शाह मंत्री जी से बोले सिरोही नरेश ने आपको मेरे पास कुछ सहयोग के लिए भेजा है। मंत्री महोदय ने सिर हिलाकर समर्थन किया। शाह ने मंत्री महोदय से कहा, महाराज ने इतनी छोटी−सी बात के लिए आपको यहाँ भेजा, इसके लिए मैं आपसे एवं महाराज से क्षमा चाहता हूँ। आप वहाँ दरबार में बैठे हुए ही हुक्म फरमा देते, तो भी आपका यह सेवक तैयार था।
शाह विनम्र स्वर में अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोले, मेरे पास जितना जो कुछ भी है, वह सब राज्य का ही तो है। राज्य की जनता का उस पर पूरा−पूरा अधिकार हैं। मैं इस अकाल के राहत कार्य में काम नहीं आ सका, तो मेरा जीवन ही बेकार है। मैं धन−स्वर्ण मुद्राओं की गाड़ियाँ अभी दरबार में भेजने का प्रबंध करता हूँ और जब तक महाराज की ओर से मना का संदेश नहीं मिलेगा, तब तक स्वर्णमुद्राओं से भरी एक से जुड़ी एक बैलगाड़ियाँ यहाँ से प्रस्थान करती रहेंगी।
शाह ने एक क्षण रुककर फिर कहा, यह अपार वैभव मेरा नहीं हैं। वास्तव में धन−संपदा किसी की नहीं होती है। वह तो प्रत्येक जरूरतमंद की है। जिसके पास जो संपत्ति है, वह उसका मालिक नहीं संरक्षक भर है। उसका काम तो उसे जरूरतमंदों तक पहुँचाना है।
शाह ने उसी समय अपने कर्मचारियों को आदेश दिया कि बैलगाड़ियों का प्रबंध करो और स्वर्णमुद्राओं को गाड़ियों में भरकर शीघ्र राजदरबार में पहुंचाओ और जब तक मेरा आदेश न हो, तब तक गाड़ियाँ भेजना बराबर चालू रहना चाहिए। शाह की बातें सुनकर मंत्री महोदय के पाँवों के नीचे की धरती दोलायमान होने लगी। वह निर्णय नहीं कर सके कि यह क्या कह रहे हैं और मैं क्या सुन रहा हूँ। कहीं यह सब स्वप्न तो नहीं है। यह तो शाह नहीं शहंशाह हैं।
मंत्री महोदय ने शाह के आगे अपना मस्तक झुका दिया और उनकी आज्ञा लेकर दरबार की ओर चल दिए। सिरोही नरेश के दरबार में जब उन्होंने अपनी यात्रा का यह अनुभव वृत्ताँत सुनाया, तो सिरोही नरेश सहित सभी एक स्वर से कह उठे, “शाह ने ही सही अर्थों में अर्थ को अर्थवान् बनाया है। उनका धन भी धर्म की साधना ही है।”
साधु आत्मानंद की कुटिया गाँव के पास ही थी। प्रायः प्रतिदिन सायंकाल ग्रामीण लोग उनके पास जाते और धर्म−चर्चा का लाभ प्राप्त करते। जब संध्या भजन का समय आता, गाँव के दो नटखट लड़के जा धमकते और कहते, महात्मन्! आपसे ज्ञान प्राप्त करने आए हैं, फिर शुरू करते गप्पें। बीच−बीच में साधु को चिढ़ाने, गुस्सा दिलाने वाली बातें भी करते जाते। उनका तो मनोरंजन होता, पर आत्मानंद का भजन−पूजन का समय निकल जाता। वह क्रम महीनों चलता रहा, पर साधु एक दिन भी गुस्सा नहीं हुए। बालकों के साथ बात करते हुए आप भी हँसते रहते।
बहुत दिन बाद भी जब वे नटखट लड़के उन्हें क्रुद्ध न कर सके, तो उन्हें अपने आप पर हुआ, उन्होंने क्षमा माँगते हुए पूछा, “महात्मन्। हमने जान−बूझकर आपको चिढ़ाये किया, फिर भी आप न कभी खीझे, न क्रुद्ध हुए।” आत्मानंद ने हँसते हुए कहा, मैं ही कुद्ध हो जाता, तो आप सबको सिखा क्या पाता?
युवा शक्ति किसी राष्ट्र की उज्ज्वल आशा का प्रतीक है। देश एवं समाज का भविष्य इसी पीढ़ी के हाथों में होता है। यह एक सार्वभौम एवं शाश्वत सत्य है, लेकिन आज यह एक मुहावरा बनकर रह गया है, जिसे हर नेता और उपदेशक अपने मुँह से सुनाया करता है। जबकि इस समय देश का भविष्य तय करने में जवान अपनी कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। युवा पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में दिग्भ्रमित है। उसके सामने न कोई आदर्श है, न उच्च उद्देश्य। ऐसे में उपभोक्तावादी संस्कृति के निरंकुश भोगवाद का दंश उसे विक्षिप्तता एवं पतन की राह पर धकेल रहा है। परिणामस्वरूप टूटे स्वप्नों, बिखरे अरमानों एवं अतृप्त आकाँक्षाओं की मारी युवा पीढ़ी का जीवन पुष्प खिलने से पूर्व ही मुरझाकर दम तोड़ रहा है। कालचक्र के विषम प्रवाह में युवा शक्ति को रचनात्मक दिशा में मोड़ने एवं उसे अपने जीवन का राष्ट्र−समाज के सृजन में प्रेरित एवं नियोजित करने की आवश्यकता पहले से अधिक गंभीर हो गई है।
युवा शक्ति की वर्तमान दुर्दशा का कारण बहुत कुछ अपनी स्वतंत्रता काल की दोषपूर्ण नीतियों में खोजा था सकता है। आजादी के बाद विकसित देशों के साथ अंधी दौड़ में हमने युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण की आवश्यकता की पूरी तरह अनदेखी की और उपभोक्तावाद के हामी व आधुनिकता के प्रहरी बनने के लालच में उन्हें मानसिक स्तर पर अपसंस्कृति के दुष्प्रभावों एवं इसकी सुलगती हिंसा के सहारे छोड़ दिया। इससे उपजी हताशा ही युवाओं में कभी तोड़−फोड़, हिंसा, बलात्कार, अपहरण और अतिवाद के रूप में, तो कभी भ्रष्टाचार और घोटालों के रूप में हमारे सामने खुला ताँडव करती दिखाई देती है।
उपभोक्तावादी संस्कृति में पली युवा पीढ़ी तात्कालिकता में जीने में विश्वास करती है और भविष्य के प्रति बेखबर है। वह इंतजार करना नहीं चाहती, इसी क्षण सब कुछ पाना चाहती है। इंस्टेंट काँफी और इंस्टेंट फूड की तरह सुख−समृद्धि, धन−दौलत, प्यार−मोहब्बत सब इंस्टेंट पाना चाहती है। परिणामस्वरूप पतन की खाई में गिरने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। कम−से−कम नगरीय युवक जो समाजशास्त्रियों के विचार एवं चिंता की परिधि में आते हैं, उनमें तो यह प्रवृत्ति साफ−साफ दिख रही है। महानगरीय युवकों में बड़ी तेजी से हिंसा, मूल्यहीनता, आत्मकेंद्रिकता, कुँठा और कल्पनाहीनता बढ़ रही है और उनकी जीवन की समझ बहुत उथली एवं विकृत होती चली गई है।
भगत सिंह ने कभी कहा था, “युवाओं में इतना प्यार होता है कि वह तो पेड़−पौधों, नदी−पहाड़ों, झरनों और जंगल तक के इश्क में डूबे रहते हैं।” किंतु आज के दौर में सचाई दूसरी ही है। आज उनके प्रेम की यह उदात्त परिभाषा दैहिक सुख एवं वासना की परिधि में सिमटकर कलुषित हो चुकी है। वह ‘वर्चुअल रिएल्टी’ पर यकीन रखता है। सब कुछ हकीकत में पाना चाहता है। आधुनिक विज्ञान विशेषज्ञों ने उनके मत को पुष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जहाँ पूर्व में फ्रायड के आधे−अधूरे सिद्धाँत यौन उन्मुक्तता को पुष्ट करते थे, वहीं अमेरिकी रसायनज्ञ एवं एवं मनोशास्त्रीगणों ने कुछ वर्ष पूर्व ही अपनी पुस्तक ‘द केमेस्ट्री ऑफ लव’ में अपने आधे−अधूरे निष्कर्षों से प्रेम की उदात्त भाव की जड़ों पर कुठाराघात किया है। उनके अनुसार प्रेम कोई अहसास जैसी चीज नहीं हैं, जैसा कि सदियों से कवियों एवं दार्शनिकों ने उसे प्रतिपादित किया है। लेबोनिट्ज ने साफ−साफ कहा है कि शरीर में विद्यमान एस्ट्रोजन और एंड्रोजन की कुछ निश्चित रासायनिक संक्रियाओं का परिणाम ही प्रेम या रुमानी अहसास जैसी चीज है। वस्तुतः इस विचारधारा में पल−बढ़ रही युवा पीढ़ी के लिए प्रेम जैसा पवित्र भाव दैहिक खिलवाड़, यौन उन्मुक्तता एवं स्वच्छंदता का पर्याय बन गया है।
उपभोक्ता संस्कृति के इन हमलों ने युवा पीढ़ी को आदर्शों एवं उच्च उद्देश्य के प्रति पंगु बना दिया है। यह मोहपाश इस कदर कसा जा रहा है कि उसे धन एवं भोग के अतिरिक्त ओर कुछ सूझ नहीं रहा है। संयम, सदाचार, त्याग, सेवा, नीति, मर्यादा आदि की बातें दकियानूसी मानी जाती है। तथाकथित विकास के अंतर्गत एक स्वप्नहीन−अराजक पीढ़ी बहुत तेजी से बढ़ रही है। जब हर्षद−मेहता को करोड़ों की धोखाधड़ी के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था और पूरा मीडिया हर्षदमय हो गया था, उस दौरान भारत के चार महानगरों में युवाओं के बीच सर्वेक्षण हुआ था कि उनके पंसदीदा नायक कौन है और स्वयं क्या बनना चाहते हैं। इस सर्वेक्षण के नतीजों ने संवेदनशील समाजशास्त्रियों को झकझोर कर रख दिया। 60 प्रतिशत से अधिक युवकों की संख्या ऐसी थी, जो हर्षद मेहता जैसा बनना चाहते थे। इन युवकों का पसंदीदा नायक हर्षद मेहता था 72 प्रतिशत युवक इससे बेपरवाह थे कि हर्षद ने आखिर क्या किया और उसने जो किया वह देश के अहित में है। इन सर्वेक्षण परिणामों का स्पष्ट निष्कर्ष था कि पैसा और कामयाबी हासिल करने के लिए कुछ भी काय जा सके, बिना किसी हिचक और अपराधबोध के करना चाहिए।
एक समय था जब हाई स्कूल और कॉलेज में प्रवेश करने वाली युवा पीढ़ी सोचती थी कि हम गोखले बनेंगे, तिलक बनेंगे, स्वामी विवेकानंद, गाँधी, जवाहरलाल, सरदार पटेल, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद बनेंगे, लड़कियाँ सोचती थीं कि हम भगिनी निवेदिता, सरोजनी नायडू, कमला देवी चट्टोपाध्याय, अरुणा आसफ अली, हंसा मेहता बनेंगी। आय ये आदर्श एवं सपने धूमिल पड़ गए हैं। आज युवा पीढ़ी के पास सिर्फ फिल्म स्टार या टी.वी. स्टार बनने का सपना है। फिल्मों और टी. वी. की मायावी दुनिया ने उनके सामने एक छद्म स्वर्ग में सभी समस्याओं के इंस्टेंट समाधान मौजूद हैं। बात ही बात में सभी समस्याएँ हल हो जाती हैं। फिल्मी हीरो माफिया गिरोह का अकेले ही सफाया कर सकता है। अदना−सी नौकरी के लिए भटकने वाला युवक अचानक किसी जादुई चमत्कार से करोड़ पति हो जाता हैं। एक ईमानदार दिखने वाला फिल्मी अभिनेता भ्रष्ट व्यवस्था को बदल देता है। सचाई से कोसों दूर ये चित्र और बिंब चूँकि हमें इंस्टेंट तृप्ति देते हैं, युवा इन्हीं में खो जाते हैं और भविष्य के प्रति अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसे धारावाहिक आज की यूवा पीढ़ी को अधिक आकर्षित करते दिखाई देते हैं।
अपनी गहनतम इच्छा, प्रकृति एवं आत्मा के स्वभाव के विपरीत कठपुतली की तरह का यह व्यवहार युवाओं की दिशाधारा पर गंभीर प्रश्न लगा देता है। अपनी इच्छा, अपना संकल्प और अपना ज्ञान, जो मनुष्य जीवन के लक्षण हैं, आज युवा पीढ़ी ही नहीं, प्रौढ़ों और बूढ़ों की पीढ़ी में भी गायब होते जा रहे हैं। साँस्कृतिक और आर्थिक गुलामी में जकड़े देश की यही नियति हो सकती है। लेकिन प्रौढ़ों और बूढ़ों में इनका गायब होना इतना कष्टदायक नहीं है, जितना युवा पीढ़ी में इनका गायब होना। जिनके सामने भविष्य खुला पड़ा है, उनका भविष्य के प्रति उदासीन हो जाना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, यह वैसे ही है, जैसे कि हँसते−खेलते, उछलते, कूदते बच्चे को अचानक लकवा मार जाए। नौजवान जो अपने स्वभाव से, प्रकृति से स्वतंत्र इच्छा, अदम्य संकल्प और अनंत जिज्ञासा लिए होता है, यदि अपनी इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति को किसी केस सामने गिरवी रख दे, जो आने वाला है, उसके संबंध में जिज्ञासा करना बंद कर दे और जो उस पर थोपा जा रहा है, उसका विरोध भी न करे, तो यही कहा जाएगा कि जवानी को लकवा मार गया है।
युवा शक्ति उस उद्दाम ऊर्जा का नाम है, जिसने हर युग में व्यवस्था की जड़ता के इन क्षणों में अपनी आवाज के बुलंद किया है। इतिहास के हर मोड़ पर इस वर्ग ने, परिवर्तन के हर चौराहे−चौराहे पर कफ़न बाँधकर दमन और दुर्व्यवस्था का मुकाबला किया है। 1779 की फ्राँस की राज्यक्राँति को भले ही मध्यम वर्ग अथवा बुर्जुआ क्राँति के नाम से जाना जाता है, किंतु उसका असली वाहक वहाँ का नवयुवक ही था। रूस की बोल्शेविक क्राँति के वाहकों में 80 प्रतिशत लोग 18 से 34 वर्ष की आयु के थे। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गहन तमस के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम के आँदोलन की संपूर्ण ज्योति युवा शक्ति की अदम्य ऊर्जा की आभा से उद्दीप्त थी। 1905 के बंग−भंग से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आँदोलन व 1947 की आजादी तक, सभी महत्त्वपूर्ण दौर में युवा शक्ति अग्रिम पंक्ति पर रही। तिलक युग से लेकर गाँधी युग तक इस समुदाय ने सदैव ही बलिदानी एवं क्राँतिकारी परंपरा में अग्रणी भूमिका निभाई। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु सभी युवा थे। ऐतिहासिक समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए, तो 20वीं सदी के आरंभिक 50 वर्षों में छात्र आँदोलनों ने भारतीय जनमानस की वैचारिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में निर्णायक योगदान दिया और 1947 में देश के आजाद होने तक इनकी अपनी युगाँतरकारी भूमिका रही।
स्वतंत्रता के पश्चात् युवा शक्ति में बिखराव आया और राष्ट्रीय स्तर पर उसकी रचनात्मक भूमिका धूमिलप्राय रही। 80 के दशक के प्रारंभिक काल में लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में इसकी एक आशाजनक झलक मिली थी, किंतु कालक्रम में राजनीति के घातक दंश ने इसे भी पंगु बना दिया। आज राजनीति युवा शक्ति को अपने कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त कर रही है। विभिन्न छात्र संघ, राजनीतिक दलों के विस्तार−विभाग बनकर रह गए है। राजनीति के चक्रव्यूह में उलझी छात्र शक्ति से सृजन की उन्मुक्त भूमिका की आशा नहीं की जा सकती।
साँस्कृतिक पुनर्जागरण के आधार पर समाज निर्माण एवं राष्ट्र उत्थान के पुनीत कार्य में शाँतिकुँज हरिद्वार का युग निर्माण अभियान सक्रिय है। अपने कार्यक्रमों में युवा शक्ति के प्रभावी एवं सार्थक नियोजन के लिए यह कटिबद्ध हैं। इसमें जहाँ संजीवनी साधना सत्र द्वारा युवा शक्ति के चरित्र निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार की जाती है, वहीं युग शिल्पी सत्रों के अंतर्गत लोकसेवा के कार्य में अपनी प्रतिभा एवं शक्ति के नियोजन का प्रशिक्षण दिया जाता है। युग के इस अभूतपूर्व सृजन आँदोलन में सुशिक्षित युवा वर्ग बुद्ध के युवा भिक्षु−भिक्षुणियों, रामकृष्ण मिशन के युवा संन्यासी परिव्राजकों, गाँधी के युवा सत्याग्रहियों एवं सुभाष−भगत सिंह की परंपरा में त्याग−बलिदान के उच्चस्तरीय आदर्श प्रस्तुत कर रहा है। जाति−वर्ग, धर्म−संप्रदाय, भाषा−प्राँत आदि भेद−भावों से परे यह आँदोलन सुसंस्कृत मानव एवं सभ्य समाज के नव निर्माण के लिए संकल्पित है। इसकी रचनात्मक गतिविधियों के अंतर्गत सप्तक्राँतियों का बिगुल बज चुका है, जिसके अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण, नशा निवारण, कुरीति उन्मूलन एवं नारी जागरण जैसे कार्य हाथ में लिए गए हैं। भोगवादी संस्कृति के नागपाश में जक्रही युवा शक्ति व राजनीति के चक्रव्यूह में उलझी छात्र शक्ति इस अभियान में अपनी ऊर्जा का नियोजन कर समाज निर्माण एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के कार्य में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा सकती है।
आशा, उत्साह व गति का समन्वय ही जीवन है। जिसमें जीवन का अभाव हैं, वह इन तीन गुणों से रहित होता है। ऐसे का पुरुष जीवित अवस्था में भी मृतक के समान होते हैं।
रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे, कुकर्म करने तथा बुराई को प्रश्रय देने वाला मनुष्य जीवित दीखता हुआ भी मृत ही है, क्योंकि कुकर्म और कुविचार मृत्यु के प्रतिनिधि है। इनको आश्रय देने वाला मृतक के सिवाय और कौन हो सकता है।
एक बार एक विवाह के समय जब वहाँ बहुत मिष्ठान्न−पकवान बन रहे थे, तब घर की पालतू बिल्ली ने ऊधम मचाया। हर चीज में मुँह डाल देती औ जूठा कर देती। घर की मालकिन ने उसे पकड़कर नाँद के नीचे बंद कर दिया। फिर वह काम में लग गई। कई रोज काम में व्यस्त रहने के कारण उसे बिल्ली को निकालने की बात याद न रही और वह उसी में दबकर मर गई।
बारात जब लौटकर आई और बहू ने घर में प्रवेश किया, उस समय घर मालकिन को बिल्ली की याद आई। उसे निकाला गया, तो मरी मिली। उसे फिकवाया गया। नई बहू यह सब देख रही थी। उसने समझ लिया कि इस घर की यही परंपरा है। बाद में जब उसका बच्चा हुआ और उसके बड़े होने पर बारात गई और नई बहू, आई, तो उसने भी एक बिल्ली पकड़कर नाँद के नीचे बंद की और जब वह मर गई, तो ठीक उसी समय जब नई बहू ने घर में प्रवेश किया, उस बिल्ली को फिकवाया। जो उसने देखा था, उसे कुल परंपरा समझा और उसी का पालन करने में अपना धर्म या कल्याण समझा।
आजकल ऐसी ही कई अंध परंपराएँ फैली हैं, जिनका कारण मालूम ही नहीं है और पता लगाया जाए, तो उनका कारण बिना समझे−बूझे− किया गया अनुकरण ही सिद्ध होगा। क्या उपयोगी है क्या अनुपयोगी, इस पर विचार किए बिना क्रम चलता रहता है व भेड़ों की तरह सब उसका अंधानुकरण करते चले जाते हैं।
भारतीय स्वतंत्रता आँदोलन की महत्ता एक महायज्ञ से कम न थी। इस महायज्ञ में अनेकों वीरों एवं वीराँगनाओं ने अपने जीवन को आहूत किया। शहीदों की शहादत की तो अंतहीन गाथा है, परंतु वीराँगनाओं की वीरोचित स्मृतियों को भी नहीं भुलाया जा सकता। जिन्होंने अपना सर्वस्व इस बलिवेदी पर चढ़ा दिया, उन वीराँगनाओं में कई लेखिका एवं कवयित्री भी थीं, जिन्होंने अपनी लेखनी में प्राण भरकर देशभक्ति और देशप्रेम का ओजस्वी मंत्री फूँका।
इस क्रम एनी बेसेंट का नाम प्रमुख है। वह भारत आई तो थीं सत्य की खोज के लिए, परंतु यहाँ आकर उनका सारा जीवन सेवा के प्रति समर्पित हो गया। एनी बेसेंट ने सन् 1913 में ‘कामन विल’ नामक साप्ताहिक पत्र निकालकर स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद किया। इसके कुछ महीने बाद उन्होंने ‘मद्रास स्टेंडर्ड’ खरीदकर उसका नाम ‘न्यू इंडिया’ रखा। वे इन पत्रों में स्वाधीनता के उग्र एवं जोशीले लेख लिखती रहीं। इसी कारण जून 1917 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसी वर्ष एनी बेसेंट ने काँग्रेस का अध्यक्ष पद स्वीकार किया। सन् 1929 में उन्होंने नेशनल कन्वेंशन नामक एक नया आँदोलन भी चलाया था।
भारत आने से पूर्व एनी बेसेंट स्वामी विवेकानंद से मिल चुकी थीं। वे सत्य की खोज में निकली थीं और कहा करती थीं, सत्य के अनुसंधान में चाहे मेरे समस्त लौकिक बंधन टूट जाएँ, मित्रता और सामाजिक बंधन छिन्न−भिन्न हो जाएँ, चाहे मैं प्रेम से वंचित हो जाऊँ। चाहे उसके लिए मुझे निर्जन पथों में क्यों न भटकना पड़े और सत्य प्रकट होकर चाहे मुझे क्यों न मिटा डाले, मैं उसका अनुसरण करने से पीछे नहीं हटूँगी। यही प्रखरता और आत्मविश्वास ही उनकी सेवा का मंत्र रहा।
स्वर्णकुमारी देवी मूलतः साहित्यकार थीं। वह कवींद्र रवींद्रनाथ ठाकुर की बड़ी बहन थीं। उन्हें भारत की प्रथम महिला उपन्यासकार, पत्रकार एवं संपादक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने ‘भारती’ जैसी प्रसिद्ध पत्रिका का सात साल तक सफल संपादन किया। अपनी पत्रिका के माध्यम से उन्होंने तत्कालीन समाज में संव्याप्त अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, कुरीतियों आदि पर जमकर प्रहार किया। उनकी लेखनी में देशीभक्ति का जज्बा भी रहता था। 1876 में प्रकाशित उनके प्रथम उपन्यास ‘दीप निर्वाह’ को राष्ट्रीय चेतना की सर्वोत्कृष्ट कृति माना जाता है। स्वर्णकुमारी देवी ने स्वतंत्रता संग्राम के अपने अपूर्ण कार्य को अपनी बेटी सरला देवी चौधरी के माध्यम से पूरा किया।
सरला देवी चौधरी अपनी माँ की पत्रिका ‘भारती’ के लिए लेख लिखती थीं। इसके पश्चात् उन्होंने भारती के संपादन द्वारा राष्ट्र−चेतना के जागरण का कार्य किया। सरला देवी अपने लेखनी के माध्यम से जनता में विदेशी गुलामी के प्रति प्रतिकार की ज्वाला जलाती थीं। उनके क्राँतिकारी लेख को पढ़कर युवा और युवतियाँ आक्रोश से उलबने लगते थे। इसी के परिणामस्वरूप सरला देवी ने राष्ट्रीय आँदोलन हेतु एक विराट् संगठन खड़ा किया। उनकी लिखी ‘बंगेर वीर’ नामक पुस्तक जनजागरण के लिए प्रेरणा बनी
भगिनी निवेदिता स्वाधीनता, सेवा और साधना की त्रिवेणी थीं। निवेदिता का मंत्र था, सर्वधर्म समानता, गरीबी−गुलामी से मुक्ति और मानव एवं देशसेवा के लिए सर्वस्व समर्पण। यह मंत्र उन्हें उनके गुरु युगद्रष्टा स्वामी विवेकानंद से मिला था। चिर संन्यासिनी निवेदिता का नाम था मार्गरेट नोबुल। वह आयरलैंड निवासी थीं और भारत को अपना कर्मभूमि मानती थीं। निवेदिता अपनी लेखनी से जनता में नारी शिक्षा, जाग्रति, देशप्रेम की भावना भरती थीं। स्वतंत्रता आँदोलन के समय उनके द्वारा रचित राष्ट्रीयगान और कविताएँ अत्यंत प्रेरणाप्रद एवं उत्कृष्ट थीं। युगाँतर जैसी क्राँतिकारी पत्रिका के पीछे रहकर क्राँतिकारियों को अपना सहयोग देती थीं। भारत के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने के कारण ही स्वामी विवेकानंद ने उन्हें अपनी मानस कन्या मान लिया था। श्री अरविंद ने उन्हें भगिनी निवेदिता कहा और रवींद्रनाथ ठाकुर लोकमाता कहकर पुकारते थे।
डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी भारत की प्रथम महिला विधायिका थीं। वे लेखिका और स्वतंत्रता सेनानी थीं। सन् 1930 के नमक सत्याग्रह आँदोलन में उन्होंने गाँधी जी के साथ गिरफ्तारी दी थीं। ब्रिटिश सरका एवं पुलिस द्वारा महिलाओं पर अत्याचार के विरोध में उन्होंने न केवल जमकर संघर्ष किया, बल्कि उसके लिए कठोर जेल यातनाएँ भी सहीं। राष्ट्रसेवा की सक्रिय भागीदारी के क्रम में डॉ. रेड्डी अनेक लेखों द्वारा भारतीय जनमानस में विदेशी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का स्वर भरती थीं। इसके अलावा भी उन्होंने विभिन्न विषयों पर कई पुस्तकें लिखी हैं। डॉ. मुथुलक्ष्मी 1713 में भारत की प्रथम महिला डॉक्टर बनीं। इसके माध्यम से भी वह मानवता की सेवा करती थीं। सचमुच में वह भारत का गौरव थीं।
भारत कोकिला सरोजनी नायडू जन्मजात कवयित्री थीं। अँग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार एडमंड गाँसे उनके साहित्यिक गुरु थे। वे भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पाश्चात्य जगत् में प्रसारित करने में सफल हुई। इसके लिए उनका अँग्रेजी भाषा का ज्ञान महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। उनकी कविताओं में भारत की आत्मा बसती थी। मानो देशसेवा के लिए ही उनका जन्म हुआ था। साहित्य, देशभक्ति और राजनीति जैसे भिन्न−भिन्न क्षेत्रों में उनकी भूमिका सफल और सराहनीय है।
कमला देवी चट्टोपाध्याय केवल लेखिका ही नहीं स्वतंत्रता संग्राम की जुझारू नेता, सामाजिक क्राँति की अग्रदूत और एक महान् कलाकार थीं। उन्होंने इंडियन वूमैन, बैटल फाँर फ्रीडम, एट द क्राँस रोड, अवेकनिंग ऑफ इंडियन वूमैन, वूमैन मूवमेंट ऑफ इंडिया, द ग्लोरी ऑफ इंडियन हैंडीक्राफ्ट जैसी कई पुस्तकें लिखी हैं। 1927 में कमला देवी ने अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई। बाद में वे इस संगठन की अध्यक्ष भी बनीं। स्वतंत्रता आँदोलन में कूद पड़ने के कारण सन् 1930-44 के बीच कई बार जेलयात्रा की। स्वतंत्रताप्राप्ति के पश्चात् भी उन्होंने देश के विकास में अपना योगदान दिया। राष्ट्र को यह उनकी महत्त्वपूर्ण देन है।
दुर्गाबाई देशमुख स्वतंत्रता और सेवा की प्रतिमूर्ति थीं। एक प्रबुद्ध समाजसेवी और चिंतक होने के कारण उनके विचार कई हिंदी और अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उन्होंने कई क्राँतिकारी लेख लिखे थे।
सुभद्राकुमारी चौहान अपने राष्ट्र की गौरव−रत्न थीं। उन्होंने न केवल वीरोचित गीत रचकर क्राँतिकारियों को प्रेरणा दी, बल्कि स्वयं आगे बढ़कर इस पुनीत महायज्ञ में अपनी आहुति समर्पित की। ‘राखी की लॉज’ और ‘जलियावाला बाग में वसंत’ जैसी अमर और ओजस्वी कविताएँ असहयोग आँदोलन के दौरान पवित्र मंत्र साबित हुई। ‘झाँसी की रानी’ ने भारतीय जनमानस में क्राँति की मशाल जलाई, जिसे पढ़कर गुलामी का अँधेरा काटने के लिए देश के युवा सिर पर कफ़न बाँध लड़ने−मरने को तैयार हो जाते थे। सुभद्राकुमारी चौहान की कविताएँ क्राँति महायज्ञ में आहुत का कार्य करती थीं। उन्होंने ‘कर्मवीर’ जैसी पत्रिका के लिए भी कार्य किया, जिसका संपादन भारत की आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी कर रहे थे।
शहीदों को शहादत में सक्रिय सहयोग देने वाली सुशीला देवी मूलतः कवयित्री थीं। कविता के अलावा नका गद्य भी अत्यंत सशक्त है। कविता हो चाहे लेख, सभी में क्राँति का पुट रहता था। क्राँतिगीत लिखना उनका शौक था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी के बाद, उनकी कुर्बानियों की याद में लिखा दरद भरा गीत तो पंजाब की जनता की जबान पर चढ़कर बोला। सुशीला देवी ने स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह, भगवती चरण बोहरा आदि क्राँतिकारियों के साथ खुलकर काम किया था।
प्रसिद्ध क्राँतिकारी यशपात की धर्मपत्नी प्रकाशवती क्राँतिकारी लेख लिखकर जनमानस में राष्ट्रभक्ति का जज्बा भरती थीं। इसीलिए 1938 में ‘विप्लव’ पत्रिका के प्रकाशन का कार्य उनने सँभाला। इसी पत्रिका के माध्यम से राष्ट्रीय आँदोलन को गति देने वाला लेख वे लिखती थीं।
राष्ट्रीय भावनाओं की काव्यधारा बहाने वाली तोरणदेवी शुक्ला ‘लला’ स्वतंत्रता विभूति थीं। तत्कालीन पत्र पत्रिकाओं में उनकी उग्र रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। उनकी कविताओं के भावों से चिंगारियाँ फूटती थीं। ‘जाग्रति’ उनकी इन्हीं कविताओं का संग्रह है। बाद में उन्हें इस कृति के लिए ‘केसरिया’ जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रदान किया गया।
विद्यावती कोकिला किशोरावस्था से ही गाँधी जी के प्रभाव से राष्ट्रीय कविताएँ लिखने लगी थीं। स्वतंत्रता आँदोलन में उन्होंने बढ़−चढ़कर भाग लिया और जेल गई। ‘अमर ज्योति’ उनका महाकात्य है। माँ, सुहागगीत, सुहागिन और पुनर्मिलन उनके काव्यसंग्रह हैं। इसके पश्चात् उनका झुकाव पूर्णतया श्री अरविंद दर्शन की ओर हो गया। विद्यावती कोकिला ने ‘सावित्री’ के अनुवाद का दुस्साध्य कार्य किया। उन्होंने स्वतंत्रता आँदोलन से प्रारंभ कर अंत में आत्मिक स्वतंत्रता के लक्ष्य पथ पर आरुढ़ होकर अपना जीवन त्याग।
उर्मिला देवी शास्त्री दैनिक ‘जन्मभूमि’ की संपादिका थीं। एक संवेदनशील लेखिका, जुझारू संपादक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी और मातृत्व से भरा उनका जीवन बड़ा ही निराला था। उनकी छोटी बहन पुरुषार्थवती भी राष्ट्रीय कविताएँ लिखतीं, परंतु अल्पवय में ही उनकी मृत्यु हो गई। दोनों बहनों ने भारतीय आजादी में अनोखा कार्य किया।
भारत−रत्न अरुणा आसफ अली ने स्वतंत्रतारूपी महायज्ञ में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। एक पत्रकार के नाते उन्हें प्राप्त समस्त पुरस्कार राशियों को वह अपने पत्रों ‘लिंक’ और ‘पेट्रियाट’ को जीवंत रखने के लिए समर्पित करती रहीं। उनके लेख राष्ट्रीय चेतना को जीवंत और जाग्रत् करने हेतु कटिबद्ध रहते थे। उन्हें अनेकों पुरस्कारों से अलंकृत किया गया और मरणोपराँत ‘भारत−रत्न’ दिया गया। ‘मेमोरीज ऑफ 1942, बिहाइंड लिंक हाउस, द न्यू चैलेंज, एटीन इयर्स आफ्टर गाँधी, थर्टी इयर्स आफ्टर फ्रीडम, विल द काँग्रेस सरवाइव’ आदि ग्रंथों में उनकी प्रखर चेतना झलकती है। बालमणि अम्मा केरल की राष्ट्रवादी साहित्यकार थीं। उन्होंने राष्ट्रीय उद्बोधन वाली कविताओं की रचना की। वह मुख्यतः वात्सल्य, ममता, मानवता के कोमल भाव की कवयित्री के रूप में विख्यात हैं। फिर भी स्वतंत्रतारूपी दीपक की उष्ण लौ से भी वे अछूती नहीं रहीं। सन् 1929-39 के बीच लिखी उनकी कविताओं में देशभक्ति, गाँधी का प्रभाव, स्वतंत्रता की चाह स्पष्ट परिलक्षित होती है। इसके बाद भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहीं। उन्हें पद्म विभूषण आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
हंसा मेहता ने भी स्वतंत्रता संग्राम पर अनेक आलेख प्रकाशित किए। वह एक निर्भीक लेखिका थीं। नयनतारा सहगल जीवन और लेखन दोनों क्षेत्र में साहस की उत्कृष्ट मिशाल थीं। वह ‘प्रिजन एंड चाकलेट केक’ एवं ‘फ्रॉम फीवर सेट फ्री’ जैसे क्राँतिकारी पुस्तकों की लेखिका थीं। वह स्वतंत्रता सेनानी स्वतंत्रचेता मन की बेबाक प्रतिध्वनि थीं।
इसके अलावा भी अनेकों वीराँगनाएँ हुई, जिन्होंने अपनी लेखनी उठाकर भारतीय जनमानस में स्वतंत्रतारूपी आशा का दीपक जलाया। इनके बलिदान और कुर्बानियों पर सच्ची श्रद्धाँजलि तभी संभव है, जब आज बहनें युग की माँग स्वीकारें और उसकी पुकार सुनें। नारी अभ्युदय का नवयुग तभी आ सकता है।
आत्मविश्वास और ईश्वर−अनुग्रह उपलब्ध कर लेने वाला व्यक्ति इतना सामर्थ्य−संपन्न होता है, मानों उसे इंद्र−कुबेर का सहयोग मिल गया। इन्हें प्राप्त करने का एक मात्र उपाय है− अपनी पात्रता−प्रामाणिकता विकसित करना।
राजा द्रुमिल, राजकुमार स्थावर सर्ग की दिनों−दिन बढ़ रही उच्छृंखल−वृत्ति से जितने पीड़ित थे, प्रजा उससे अधिक परेशान थी। महाराज द्रुमिल ने एक−से−एक विद्वान बुलाए, अच्छे−अच्छे नैतिक उपदेशों की व्यवस्था की गई, किंतु जिस तरह चिकने घड़े पर पानी का प्रभाव नहीं पड़ता, उसी प्रकार राजकुमार स्थावर सर्ग पर कोई प्रभाव न पड़ा।
अंत में महाराज द्रुमिल ने पूज्यपाद अश्वत्थ की शरण ली। प्रजा के हित की दृष्टि से महर्षि अश्वत्थ ने राजकुमार को ठीक करने का आश्वासन तो दे दिया, पर उन्होंने महाराज से स्पष्ट कह दिया कि उनकी किसी भी योजना में बाधा उत्पन्न नहीं की जाएगी। महाराज द्रुमिल ने उस शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
महर्षि अश्वत्थ की आज्ञा से सर्वप्रथम स्थावर सर्ग की राज्यवृत्ति रोक दी। उनके पास की सारी संपत्ति छीन ली और सम्राट की ओर से उन्हें बंदी बनाकर अप−द्वीप निष्कासित कर दिया। यह वह स्थान था, जहाँ न तो पर्याप्त भोजन ही उपलब्ध था और न ही जल। अतिवृष्टि के कारण रात में सो सकना कठिन था, वहाँ दिन में हिंसक जंतुओं का भय था। कुछ ही दिन में स्थावर सर्ग सूखकर काँटा हो गए अब तक उनके मन में जो अहंकार और दर्प था, प्रकृति की कठोर यातनाओं के आघात से टूटकर चकनाचूर हो गया। महाराज को इस बीच कई बार पुत्र के मोह ने सताया भी, पर अश्वत्थ को वचन दे चुके थे, अतएव कुछ बोल भी नहीं सकते थे।
समय पूरा होने को आया। प्रकृति के संसर्ग में रहकर स्थावर सर्ग बदले और जब वे लौटकर आए, तो सबने देखा, उनका मुख−मंडल दर्प से नहीं, करुणा व सौम्यता से दीप्तिमान था। जो कम मनुष्य नहीं कर सके, वह प्रकृति की दंड व्यवस्था ने पूरा कर दिखाया।
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बार बछड़ों को अलग ले जाकर अविश्वसनीय अमानुषिक तरीके अपनाकर भूखा मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। जानवरों की दूध देने वाली अवस्था समाप्त होने पर उनको फिर पैदल ही देहातीं इलाकों में पुनः गर्भधारण हेतु भेज दिया जाता है। वापस आने पर बछड़ों के लिए वही प्रक्रिया दुहराई जाती है। इस तरह के दमघोंटू वातावरण में प्रत्येक जानवर 5 या 6 ऋतु दूध दे पाते हैं, फिर उन्हें भी कसाई खाने भेज दिया जाता है। सर्वेक्षण के अनुसार प्रतिवर्ष 80,000 बछड़े एवं 40,000 गाय−भैंस इस तरह मौत के घाट उतार दिए जाते हैं।
गाय−भैंस के बच्चों को बिना लगाए ही शीघ्र व ज्यादा मात्रा में दूध उतारने के लिए उन्हें हारमोन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इन हारमोन इंजेक्शनों में ‘ऑक्सीटोसिन’ या ‘पिट्यूटरी’ प्रमुख हैं। इनके इस्तेमाल से पशुओं के हारमोन्स तुरंत क्रियाशील हो जाते हैं तथा थनों में दूध जल्दी आता है। इंजेक्शन लगते रहने के कारण दूध में पशुओं के रक्त व हड्डियों के तत्त्व आने शुरू हो जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इन इंजेक्शनों के प्रयोग से जो दूध प्राप्त होता है, उनके उपयोग से बच्चे विशेष रूप से बालिकाओं में हारमोन संबंधी असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। कम उम्र के बालक−बालिकाएँ असमय ही परिपक्व हो जाती है। यह दूध मनुष्य की प्रजनन क्षमता को भी प्रभावित करता है तथा इसके अधिक दिनों के प्रयोग से नपुँसक होने का खतरा रहता है।
इस इंजेक्शन के इस्तेमाल से पशुओं की गर्भधारण क्षमता कम हो जाती है तथा मृत बच्चे पैदा होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। थनों में सूजन और संक्रमण की शिकायतें बढ़ जाती हैं। पाचनतंत्र से संबंधित रोग उत्पन्न हो जाते हैं तथा पशुओं के पैरों के जोड़ों और हड्डियों में विकृति आ जाती है। ‘ऑक्सीटोसिन’ कृत्रिम रूप से संश्लेषण द्वारा निर्मित किए जाने वाला एक ऐसे हारमोन का रासायनिक रूप है, जो प्राकृतिक रूप से मस्तिष्क स्थित पियूष ग्रंथियों द्वारा उत्सर्जित किया जाता है। इस इंजेक्शन का प्रयोग प्रसवोपराँत महिलाओं में दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह इंजेक्शन पशुओं की मांसपेशियों में दिया जाता है। शरीर द्वारा उत्सर्जित न हो पाने के कारण यह पशुओं की माँसपेशियों में जमा होता रहता है। इस तरह पशु−वध के बाद ऐसे पशुओं का माँस खाने वाले मनुष्यों में भी यह हामोर्निनिक तत्त्व प्रवेश कर जाता है।
ब्रिटेन में जब ‘मैडकाउ’ बीमारी का पता चला, तो पूरे यूरोप में तत्काल गौमांस प्रतिबंधित कर दिया गया। उपभोक्ता संगठन, मीडिया सभी एकजुट होकर उसके खिलाफ खड़े हो गए। यहाँ तक कि सरकार पर भी संकट के बादल घिर आए परंतु भारत में जहरीले दूध को लेकर अभी तक कोई विशेष कारगर कदम नहीं उठाए गए। मिलावटखोरी के चलते ही आज भारतीय डेयरी उत्पाद विश्व बाजार में आधी कीमतों पर बिक रहे हैं। जहाँ से प्रतिवर्ष कम−से−कम तीन सौ करोड़ रुपये का निर्यात किया जा सकता था, वहाँ से सिर्फ डेढ़ सौ करोड़ रुपये का ही निर्यात हो पा रहा है।
वस्तुतः इस स्थिति से उबरने के लिए सशक्त जनक्राँति की आवश्यकता है। प्रत्येक उपभोक्ता का जागरूक होना जरूरी है। गो−पालन की बहुआयामी महत्ता से जन−जन को परिचित कराया जाए। घरेलू गो−पालन को बढ़ावा देने के लिए सरका द्वारा और ज्यादा साधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। ऐसे कानून बनाए जाने चाहिए, जो जन−स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को कड़ी−से−कड़ी सजा दें। नकली दूध का विष सामूहिक प्रयास से ही समाप्त हो सकता है।
सरकारी उच्च नौकरी पर बने रहते हुए भी बंकिम बाबू नेउन दिनों की परिस्थितियों को दृष्टिगत रख ‘आनंदमठ’ की रचना की। ‘वंदेमातरम्’ का जयघोष पहली बार इसी में किया गया। यह उपन्यास एक ऐसे देशभक्त संन्यासी दल की कथा, जिसने देश को गुलामी से मुक्त कराने हेतु गुप्त रूप से सैनिक तैयारी की व लड़ते−लड़ते अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। इस गाथा व वंदेमातरम् के नारे ने क्राँति की जो लहर देशभर में फैलाई, उसने अन्यायी−अनाचारी प्रशासन को झकझोरकर रख दिया। ऐसा साहस प्रखर प्रतिभाशाली ही कर सकते हैं।
सिनेमा को दर्शन, चिंतन, विधि, मान्यता, परंपरा तथा नैतिकता जैसे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष मूल्यों का सम्मान करना आना चाहिए।
सिनेमा सामाजिक जीवन को नई दिशा प्रदान कर सकता है। यह सामाजिक विचार को परिष्कृत एवं भावना हो सुकोमल बनाने का कार्य कर सकता है। इससे समाज और भी अधिक उन्नत हो सकता है। फिल्मों द्वारा अकल्पनीय सफलता प्राप्त हो सकती है। ऐसा रूस ने किया है। फ्राँस कर रहा है, इंग्लैंड ने आरंभ कर दिया, अमेरिका भी इस दिशा में प्रयासरत है। हम भी अपने देश में प्रगतिशील एवं उत्कृष्ट कलात्मक सिनेमा द्वारा लोगों एवं समाज को उन्नत दिशा प्रदान कर सकते हैं।
सिनेमा एक मनोरंजन का साधन भी है। मनोरंजन को चरित्रवान् होना चाहिए। यही उसका वास्तविक स्वरूप सी है। जिस मनोरंजन का उत्कृष्ट चरित्र नहीं होता, उसका प्रभाव विनाशक हो सकता है। अतः सिनेमा को, मन को स्वस्थ बनाए रखकर उसकी रुचि को उच्चस्तरीय बनाना चाहिए। सिनेमा का कार्य है कि लोगों की पसंद को बदले, परिष्कृत बनाए और क्रियात्मक व सृजनशील रखे सिनेमा समाज के पथ−प्रदर्शक की भूमिका निभा सकता है। उसे सदैव समाज के प्रति ईमानदार व जिम्मेदार होना चाहिए। सामाजिक परिवर्तन में सिनेमा की भूमिका नजर−अंदाज नहीं की जा सकती, हालाँकि उसकी एक सीमा है।
भारतीय समाज की संरचना अनोखी एवं विचित्र है। अब तक फिल्म निर्माता इस संरचना को समझ नहीं लेता, उसकी सफलता संदिग्ध बनी रहेगी। जब तक सिनेमा में समाजरूपी जमीन में बिखरे पड़े बीजों का अंकुरण नहीं होगा, वह सिनेमा इस समाज में स्वीकृत नहीं होगा। अंतःचेतना से लगातार संपर्क एवं संबंध बनाए रखना उसकी अनिवार्य आवश्यकता है। फिल्में समाज से कटकर जीव नहीं बनी रह सकतीं। सिनेमा जो कुछ भी चुता उसके मूल बीज समाज में विद्यमान होते हैं। अतः नाव का आधार भी इसी को लेकर होना चाहिए।
सिनेमा निर्माण से जुड़ी एक विशेषता उसकी व्यापकता जो उसे करोड़ों लोगों के पास ले जाती है और वह भी बहुत आसानी से। आज सिनेमा के इस व्यापक प्रभाव को कोई अनुभव कर रहा है। सामान्यतया सिनेमा देखने के दर्शकों की चेतना सुप्त रहती है और भावना प्रबल वह जाग्रत्। भावनाओं का यह दुबार सिनेमा देखने तक ही अमित नहीं रहता, वरन् इसके बाद तक बना रहता है। भावनाओं को सही पोषण नहीं मिल पाता, तो परिणाम भयावह होता है। दुर्भाग्य से आज की व्यावसायिक फिल्मों ने मानवी मानसिकता को ऊँचा उठाने के बजाय उसे विकृति की गहरी खाई में धकेल दिया है। आर्थिक लाभ हेतु यह व्यवसाय समाज एवं खासकर युवा वर्ग के लिए आत्मघाती सिद्ध हो रहा है।
आज सिनेमा ने विचारों को निकृष्ट एवं भावनाओं को कलुषित कर दिया है। इसके अनुसार रिश्तों एवं संबंध का आधार त्याग व प्रेम नहीं बल्कि स्वार्थ है। पावन एवं पवित्र प्रेम को व्यावसायिक व दैहिक वासना तक सीमित कर दिया है। नारी ममत्व एवं स्नेह की मूरत नहीं, उसे शोषण व मनोरंजन का साधन बना दिया गया है। सिनेमा के बोला, अंगद जिस राम ने तेरे पिता को मारा, तू उन्हीं की सहायता कर रहा है। मेरे मित्र का पुत्र होकर भी तू मुझसे बैर कर रहा है। अंगद हँसा और बोला, रावण! अन्यायी से लड़ना और उसे मारना ही सच्चा धर्म है, चाहे वह मेरे पिता हों अथवा आप ही क्यों न हों? अंगद के यह तेजस्वी शब्द सुनकर रावण को उत्तर देते न बना।
वैभव एवं ऐश्वर्य की चकाचौंध में कमजोर मानसिकता में गहरा भटकाव आ गया है। यह जीवन−शैली को तहस−नहस कर रहा है। अश्लीलता, हिंसा, हत्यारूपी ये दृश्य जीवन−मूल्यों का क्षरण कर रहे हैं।
उलटे को उलटकर ही सीधा किया जा सकता है। यह उक्ति सिनेमा के लिए सही सिद्ध हो सकती है। सिनेमा जितना जहर उगल चुका है, उसे बंद कर पुनः नैसर्गिक मूल्यों की प्राप्ति हेतु उन्मुख होना होगा। उसे अपने अति व्यावसायिक मोह को परित्याग कर व्यक्ति, समाज व राष्ट्र को ऊँचा उठाने हेतु प्रयास करना चाहिए। कला की पहुँच भावनाओं व संवेदना क्षेत्र तक होती है। अतः सिनेमारूपी कला के इस माध्यम द्वारा समाज का भावनात्मक परिष्कार किया जा सकता है, किया जाना चाहिए।
जागरूकता और प्रखरता का एक अद्भुत समन्वय अंगद के चरित्र में देखने को मिलता है। वे रावण के दरबार में जा पहुँचे और उससे साहसपूर्वक वार्त्तालाप किया। रावण के मित्र बालि के पुत्र होने के नाते प्रभु ने उन्हें दूत के रूप में भेजा था। परस्पर उत्तेजक संवाद के बाद जब रावण अंगद के पैरों को भी हिला न पाया, तो उसने एक कूटनीतिक चाल चली।
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यज्ञ को भारतीय संस्कृति का मूल माना गया है। प्राचीनकाल से ही आत्मसाक्षात्कार से लेकर स्वर्ग−सुख, बंधन−मुक्ति, मन शुद्धि, पाप−प्रायश्चित, आत्मबल, ऋद्धि−सिद्धियों आदि के केंद्र यज्ञ ही थे। यज्ञों द्वारा मनुष्य को अनेक आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं। गायत्री महामंत्री के साथ−साथ शास्त्रोक्त हवियों के द्वारा भावप्रवणता के साथ जो विधिवत् हवन किया जाता है, उससे एक दिव्य वातावरण विनिर्मित होता है। उस दिव्य यज्ञीय वातावरण में बैठने मात्र से रोगी मनुष्य निरोग हो सकते हैं। चरम ऋषि ने अपने अनुपम ग्रंथ चरक संहिता में लिखा है, “आरोग्य प्राप्त करने की इच्छा करने वालों को विधिवत् हवन करना चाहिए।” बुद्धि को शुद्ध करने की यज्ञ में अपूर्व क्षमता है। जिन व्यक्तियों के मस्तिष्क दुर्बल हैं बुद्धि, मलीन है अथवा मानसिक विकृतियों से घिरे हुए हैं, यदि वे यज्ञ करें, तो उससे उनकी मानसिक दुर्बलताएँ शीघ्र दूर हो सकती हैं। यज्ञ से प्रसन्न हुए देवता मनुष्य को धन, वैभव, सौभाग्य तथा सुख−साधन प्रदान करते हैं। यज्ञ करने वाला कभी दरिद्री नहीं रह सकता। यज्ञ करने वाले स्त्री−पुरुषों की संतान बलवान, बुद्धिमान, सुँदर और दीर्घजीवी होती हैं। राजा दशरथ को यज्ञ द्वारा ही चार पुत्र प्राप्त हुए थे। गीता आदि शास्त्रों में इसीलिए यज्ञ को आवश्यकता धर्मकृत्य बताया गया है और कहा गया है कि यज्ञ न करने वालों को लोग और परलोक कुछ भी प्राप्त नहीं होता। यजुर्वेद में भी कहा गया है कि जो यज्ञ को त्यागता है, उसे परमात्मा त्याग देता है। यज्ञ के द्वारा ही मनुष्य को देवयोनि प्राप्त होती है और वह स्वर्ग का अधिकारी बनता है।
प्राचीनकाल में ऋषि−मनीषियों ने यज्ञ के सर्वतोमुखी इन लाभों को भलीप्रकार समझा था, इसलिए वे उसे लोककल्याण का अति आवश्यक कार्य समझकर अपने जीवन का एक तिहाई समय यज्ञों के आयोजन में ही लगाते थे। स्वयं यज्ञ करना और दूसरों से यज्ञ कराना उनका प्रधान कार्य था। जब तक भारत में यज्ञ की प्रतिष्ठा थी, तब तक यह भूमि स्वर्ण−संपदाओं की स्वामिनी थी। लोग स्वस्थ, सुदृढ़, प्रतिभावान् एवं दीर्घजीवी होते थे। यज्ञीय गरिमा को भुला देने से आज जो दुर्गति हो रही है, वह सर्वविदित है। यज्ञ की उसी प्राचीन गरिमा को पुनर्स्थापित करने में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान, शाँतिकुँज के मूर्द्धन्य वैज्ञानिकों ने ऋषिसत्ता के निर्देशन में गत बीस वर्षों जो शोध−निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं, वे बहुमूल्य हैं।
यज्ञ चिकित्सा−यज्ञोपैथी को ही लें, तो यह एलोपैथी, होम्योपैथी आदि उपचारपद्धतियों से अत्यंत श्रेष्ठ व सफल सिद्ध हुई है। भिन्न−भिन्न रोगों के लिए विशेष प्रकार की हवन सामग्री प्रयुक्त करने पर उनके जो परिणाम सामने आए हैं, वे बहुत ही उत्साहजनक रहे। यज्ञोपैथी में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि आयुर्वेद शास्त्रों में जिस रोग की जो औषधियों बताई गई हैं, उसे खाने के साथ ही उन वनौषधियों को आम, पीपल आदि की समिधाओं के साथ नियमित रूप से हवन भी किया जाता रहे, तो कम समय में अधिक लाभ मिलता है। यज्ञोपैथी का मूल सिद्धाँत ही यह है कि जो वस्तु जितनी सूक्ष्म होती जाती है, वह उतनी ही अधिक शक्तिशाली एवं उपयोगी बनती जाती है। विशिष्ट मंत्रों के साथ जब औषधि युक्त हवि सामग्री का हवन किया जाता है, तो यज्ञीय ऊर्जा से पूरित धूम्र रोगी के शरीर में रोम छिद्रों एवं नासिका द्वारा अंदर प्रविष्ट करता है और रोग की जड़ें कटने लगती हैं। इससे रोगी शीघ्र ही रोगमुक्त होने लगता है। अथर्ववेद 3/99/2 में कहा गया है−
यदि क्षितायुर्यदि वापरेतों यदि, मृत्योरन्तिकं नीत एव। तमा हरामि निऋंतेरुपस्थाद स्यार्ष मेन शतशारदाय।
अर्थात् अग्निहोत्र के माध्यम से आयु क्षीण हुए, जीवनी−शक्तियों नष्ट हुए तथा मृत्यु के समीप पहुँचे हुए व्यक्ति रोग के चंगुल से छूट जाते हैं। रोगी मृत्यु के मुख से पुनः वापस आ जाते हैं और सौ वर्ष जीवित रहने की शक्ति प्राप्त करते हैं।
आरोग्य वृद्धि एवं रोग−निवारण के लिए इस तरह के जो यज्ञ किए जाते हैं, उन्हें ‘भैषा यज्ञ’ कहते हैं। प्राचीनकाल में आरोग्य शास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् यज्ञ के ब्रह्मा होते थे, जो सूक्ष्म वैज्ञानिक परीक्षण द्वारा यह जान लेते थे कि इस समय वायुमंडल में क्या विकार या प्रदूषण बढ़ जाने से कौन−सा रोग फैला हुआ है और उसके निवारण के लिए किन वनौषधियों का हवन का आयोजन किया जाता था। रोगी के शरीर में कौन−सी व्याधि बढ़ी हुई है, कौन से तत्त्व घट−बढ़ गए हैं? उनकी पूर्ति करके एवं शरीरगत धातुओं का संतुलन ठीक करने के लिए किन औषधियों की आवश्यकता है, वह ऐसा निर्णय करते थे और वनौषधियों की हवन सामग्री बनाकर, उसी प्रकृति के वेदमंत्रों से आहुतियाँ दिलाकर हवन कराया जाता था। वैसा ही पुरोडस एवं यावशिष्ट रोगी के लिए तैयार किया जाता था। रोगी यज्ञधूम्र के वातावरण में रहता था और उसी वायु से सुवासित जलवायु एवं आहार ग्रहण करता था तदनुसार वह आधि−व्याधियों से, रोगों से छुटकारा पा लेता था। इस तरह के भैषज यज्ञों का वर्णन अनेक ग्रंथों में मिलता है।
भावप्रकाश, निघंटु एवं अन्य आयुर्वेद ग्रंथों में यज्ञ−चिकित्सा में प्रयुक्त होने वाली जिन औषधियों को प्रमुखता दी गई है, उनमें अगर, तगर, गूगल, ब्राह्मी, शतावरी, असंगध, विधारा, रास्ना, गिलोय, जटामंसी, शालपर्णी मंडकपर्णी इंद्रायण की जड़, अड़ूसा, मकोय, गुलाब के फूल, गोखरू, तालमखाना, क्षीरकाकोली, बादाम, मुनक्का, जायफल, बड़ी, हरड़, आँवला, छोटी पिप्पली, बड़ी इलायची, जीवंती, पुनर्नवा, नागकेशर, चंदन, कपूर, चीड़ का बुरादा, देवदार, चीता, पित्तपापड़ा, मोथा आदि मुख्य हैं। यह सभी औषधियाँ समान मात्रा में ली जाती हैं। इन्हें जौकुट करके उसमें दसवाँ भाग गुड़ की शर्करा एवं घी मिलाकर हवन करने से निकटस्थ लोगों को शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन का लाभ मिलता है।
यों तो विशेष रोगों के लिए विशेष प्रकार की रोगानुसार हवन सामग्री तैयार की जाती है, परंतु जो औषधियाँ सभी रोगों में समान रूप से एक समान हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं, (1) अगर (2) तगर (3) देवदार (4) चंदन (5) लाल चंदन (6) जायफल (7) लौंग (8) गूगल (9)चिरायता (10) गिलोय एवं (11) असगंध।
इन औषधियों को बराबर मात्रा में लेकर कूट−पीसकर दरदरा चूर्ण बना लिया जाता है। इस प्रकार तैयार हवन सामग्री को एक डिब्बे में रखकर नंबर(1)का लेबल लगा देना चाहिए।
अब, जैसा कि आगे वर्णन किया जा रहा है, उन औषधियों को रोगानुसार लेकर उनका भी जौकुट पाउडर बनाकर दूसरे डिब्बे में रखकर नंबर (2) का लेबल चिपका देना चाहिए। यज्ञोपचार करते समय नंबर (1)एवं नंबर (2)के डिब्बों में से समान मात्रा में औषधीय हवन सामग्री अलग पात्र में निकालकर मिश्रित कर लेना चाहिए और उसी से गायत्री महामंत्र या सूर्य गायत्री मंत्र द्वारा कम−से−कम चौबीस बार हवन करना चाहिए अर्थात् 24 आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिए औषधियों जितनी ताजी और अच्छी होंगी, उतना ही अधिक वे लाभकारी होंगी। सूर्योदय के समय किया गया हवन सर्वाधिक लाभकारी होता है। वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा भी अब यह सिद्ध हो चुका है। आवश्यकतानुसार पीछे भी दिन में तीन बार और रात को एक−दो बार किसी पात्र में अग्नि रखकर थोड़ी−सी औषधीय हवन सामग्री थोड़ी देर के लिए रोगी के निकट धूप की भाँति जलाई जा सकती है। हवन करते समय तैयार औषधियों का दसवाँ भाग शर्करा एवं दसवाँ भाग घृत मिला लेना चाहिए। कोई औषधि या वस्तु अधिक महँगी हो अथवा अनुपलब्ध हो तो उसकी पूर्ति अन्य दूसरी औषधियों की मात्रा बढ़ाकर की जा सकती है।
विधिः − यज्ञोपचार की प्रक्रिया इस प्रकार है−
शास्त्रों में सूर्य को स्वास्थ्य का केंद्र माना गया है। सूर्य में रोग−निवारण की प्रचंड शक्ति विद्यमान है। इसका प्रयोग करने से कई प्रकार के रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है और पूर्ण दीर्घायुष्य प्राप्त किया जा सकता है। नीरोगता, बलिष्ठता एवं दीर्घायु के लिए सूर्य गायत्री मंत्र का उपयोग किया जाता है। सूर्य−गायत्री का मंत्र इस प्रकार है−
ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि, तन्नः सूर्यों प्रचोदयात्।
गहन वैज्ञानिक अध्ययन−अनुसंधानों के आधार पर पाया गया है कि जो वनौषधियाँ आयुर्वेद ग्रंथों में जिन रोगों के लिए गुणकारी मानी गई हैं, उन्हें हवन सामग्री के रूप में घृत और शक्कर मिलाकर सूर्य−गायत्री मंत्र के साथ रोगी के निकट हवन करने से साधारण औषधि−चिकित्सा की अपेक्षा रोगी को अधिक लाभ मिलता है। यज्ञोपचार प्रक्रिया में रोगानुसार गायत्री महामंत्र तथा उससे संबंधित चौबीस गायत्री मंत्र द्वारा हवन किया जाता है। यज्ञ चिकित्सा करते समय उन्हीं विशिष्ट औषधियों को सूक्ष्म चूर्ण रूप में सुबह−शाम एक−एक चम्मच लेते रहने से दूना लाभ मिलता है।
हवन के पश्चात् समीप रखे हुए जल पात्र में दूर्वा, कुश अथवा पुष्प डुबोकर गायत्री मंत्र पढ़ते हुए रोगी पर अभिसिंचन करना चाहिए। साथ ही यज्ञ की भस्म मस्तक, हृदय, कंठ, पेट नाभि एवं दोनों भुजाओं पर लगानी चाहिए। इसी प्रकार घृतपात्र में जो घृत बचा रहता है, उसमें से कुछ बूँदें लेकर रोगी के मस्तक एवं हृदय पर लगाना चाहिए। देखा गया है कि इन प्रयोगों से सामान्य औषधि चिकित्सा की अपेक्षा रोगी को अधिक लाभ मिलता है। इसका प्रभाव रोगी के शारीरिक एवं मानसिक दोनों ही क्षेत्रों में पड़ता है, परिणामस्वरूप वह जल्दी स्वस्थ हो जाता है। जीवनी−शक्ति बढ़ जाने से वह दुबारा उस बीमारी से आक्राँत नहीं होने पाता।
यज्ञोपैथी द्वारा कुछ सामान्य रोगों को दूर करने में प्रयुक्त होने वाली विशेष औषधियों के रोगानुसार नाम एवं उनकी प्रयोग−विधि अगली पंक्तियों में दी जा रही है। यहाँ इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि इन विशिष्ट औषधियों से बनी हवन सामग्री के साथ ही उपर्युक्त नंबर (1) कॉमन हवन सामग्री भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब रोगी के समीप हवन किया जाता है।
(1)यकृत (लीवर) एवं तिल्ली तथा उससे संबंधित रोग−इन अंगों से संबंधित रोगों की विशेष हवन सामग्री इस प्रकार है−
(1)शरपुँखा (2)कालमेध (3)पिप्पलीमूल (4)पुनर्नवा (5)मकोय (6)सेमर (शालमली) (7)जामुन छाल (8) अपामार्ग (9)भृंगराज (10)भुइ आँवाला (11) कुटकी (12) राई।
इन सभी 12 औषधियों को जौकूट कर हवन सामग्री बनाने के साथ ही कुछ मात्रा महीन पीसकर इसको कपड़े से छानकर पाउडर रूप में अलग रख लेना चाहिए और रोगी को सुबह−शाम एक−एक चम्मच जल के साथ खिलाना चाहिए। इस प्रकार यह यज्ञोपचार प्रक्रिया बड़ी प्रभावी मानी गई है। आगे भी यह क्रम हम जारी रखेंगे।
मरने के कुछ समय पश्चात् मनुष्य को नवजीवन मिलता है। इस संबंध में अब उपलब्ध तथ्यों का इतना बाहुल्य है कि संदेह और अविश्वास की कोई गुँजाइश ही नहीं रह जाती। इसी तरह चेतना के किसी कारणवश अचेतन अवस्था में चले जाने के बाद पुनः चेतन में आ लौटने के लगभग वैसे ही उपलब्ध अनुभवों की खोज भी अब वैज्ञानिकों ने कर दिखाई हैं।
फ्राँस के मूर्द्धन्य वैज्ञानिक डॉ. डेलाकौर ने इस संदर्भ में गहन अध्ययन−अनुसंधान किया है। उनने मृत्यु के प्रथम चरण से लौटने वाले व्यक्तियों की मनः स्थिति एवं अनुभूतियों को बड़ी गहराई से न केवल निरखा−परखा है, वरन् वैज्ञानिक अनुसंधान की कसौटी पर भी कसा है। उन्होंने अपने ही देश के प्रख्यात अभिनेता डेनियल जीनल पर किए गए परीक्षणों से मरणोत्तर जीवन की वास्तविकता को उजागर किया है।
घटनाक्रम के अनुसार, डेनियल जीनल को अचानक दिल का दौरा पड़ा। उन्हें चिकित्सालय पहुँचाने और आवश्यक चिकित्सा सुविधा तुरंत उपलब्ध कराने में देरी हो गई। ऑपरेशन थियेटर में चिकित्सकों ने देखा कि उसके हृदय की गति पूरी तरह अवरुद्ध हो चुकी हैं। दिल की धड़कन रिकॉर्ड करने वाली मशीन ई. सी. जी. की सुई ने घूमना बंद कर दिया है। अतः उसे मृत मान लिया गया। कुछ देर बाद डॉक्टरों ने देखा कि मशीन की सुई अचानक ही फिर से हिलने−डुलने लगी है, तो उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा।
डेनियल की आँख खुली तो उससे बातचीत करने का सिलसिला भी चला। दिल का दौरा पड़ने के बाद से लेकर नेत्र खुलने तक की समयावधि में क्या हुआ? इस रहस्य को उजागर करते हुए उसने बताया, “पहले तो मैंने एक कमरे में तैरना आरंभ किया, जहाँ भय−सा लग रहा था। मुँह से आवाज भी नहीं निकल पा रही थी। इसके बाद देखा कि सामने अपने दिवंगत माता−पिता खड़े हैं। उन्होंने साँत्वना बँधाते हुए थपथपाया और अपने साथ रंग−बिरंगे फूलों से महकते हुए बगीचे में ले गए। डेनियल के माता−पिता और छोटे बच्चे पास्कल का देहाँत पहले ही हो चुका था, जो उस बगीचे में खेल−कूद रहा था। कुछ ही क्षणों बाद माँ ने धीरज बँधाते हुए कहा, अब तुम यथावत् लौटा जाओ, जिंदगी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं।” तभी ई. सी. जी. मशीन पर दिल की धड़कनों का रेखाँकन शुरू हो गया।
अमेरिका के सुप्रसिद्ध चिकित्साविज्ञानी डॉ. बने राबट्स ने भी इस संबंध में महत्त्वपूर्ण अनुसंधान किया है। उनके अनुसार मरणासन्न व्यक्तियों के पास बैठने से यह पता चलता है कि जीवन की आखिरी साँस लेने से पूर्व वे अपने निकटवर्ती पारिवारिक सदस्यों, समुदाय के व्यक्तियों के साथ अधिक−से−अधिक वार्त्तालाप करना चाहते हैं। कभी−कभी तो वे ऐसी अलौकिक एवं आश्चर्यजनक घटनाओं का उल्लेख करते हैं, जिन्हें सुनकर हतप्रभ रह जाना पड़ता है। उनने ग्रीस के किंगपाँल नामक व्यक्ति की एक ऐसी ही रोचक घटना का वर्णन अपनी कृति में किया है। उसके अनुसार, एक बार अचानक ही किंगपाँल अचेतन अवस्था में चला गया। कुछ देर बार होश में आया तो उतनी अवधि के अनुभवों को अपनी पत्नी के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए बताया, मैं ऐसा महसूस कर रहा था कि मानो किसी नदी के किनारे पर खड़ा हूँ और सामने काले रंग की सड़क है। उसके आखिर में प्रकाश किरणें स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही हैं।
एक दस वर्षीय हैंस नामक बालक के अनुभव तो और भी चौंका देने वाले हैं। हैंस के माता−पिता उसे प्यार से हैरा कहकर पुकारते थे। एक बार हैरा किसी दीवार के नीचे दुर्घटनावश दबकर बुरी तरह घायल हो गया। चिकित्सकों ने बच्चे को चेतनाशून्य अर्थात् मृत घोषित कर दिया। माता−पिता की ममता को यह कतई विश्वास नहीं हो रहा था कि उनका बैटा हैंस मर चुका है। वे उसको जीवित ही मानते रहे। दैवी विधान की विचित्रता को भला कौन समझ सकता हैं? ठीक चौबीस घंटे बाद हैंस की चेतना पुनः लौट आई। साँसें चलने लगीं, दिल धड़कने लगा। परिवार के अन्यान्य सदस्यों एवं पास−पड़ोस के लोगों को इस विचित्र एवं विलक्षण घटना के बारे में जब पता चला, तो उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा ओर बच्चे को देखने के लिए समूचा निकटवर्ती समुदाय आ पहुँचा।
चौबीस घंटे अचेतन अवस्था की अनुभूतियों के बारे में पूछे जाने पर हैंस ने इस अवधि में एकत्रित अनुभवों को
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उपस्थित आत्मीयजनों के सम्मुख कह सुनाया। उसने बताया कि मैं एक ऐसी दुनिया में चला गया, जहाँ अत्यधिक आनंद की अनुभूति होने लगी थी। वहाँ के बच्चों को खेलते−खेलते देखकर मेरा भी मन उनके क्रिया−कलापों में भाग लेने का हुआ, तो मैंने उनसे अनुमति माँगी, लेकिन मेरे प्रस्ताव को उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अस्वीकृत करते हुए कहा, “तुम्हारा अभी यहाँ आने का समय नहीं हुआ है। साँसारिक कर्त्तव्यों के निर्वाह हेतु तुम पुनः वापस चले जाओ।” इस प्रकार मैं फिर से अपनी चेतना में वापस लौट आया। हैंस स्वस्थ होने पर पूर्व की भाँति अपनी दिनचर्या बिताने लगा।
यह एक तथ्य, किंतु आश्चर्यजनक सत्य है कि मरणोपराँत भी जीवात्मा फिर से उसी पुराने कलेवर को धारण करने के लिए सहमत हो जाती है। प्रायः देखने में आता है कि मृत्यु के उपराँत का यह अल्पकालीन समय लोगों के लिए बड़ा ही शाँति एवं सुखमय व्यतीत होता है, लेकिन कभी−कभी स्थिति इसके विपरीत भी दिखने लगती है। दृश्य इतने भयावह−डरावने लगते हैं कि उन्हें देखकर दर्शकों के ही नहीं, श्रोताओं के भी रोंगटे खड़े होने लगते हैं।
‘लाइफ बिफोर लाइफ’ नामक अपनी कृति में विख्यात परामनोविज्ञानी एवं सम्मोहन विद्या के विशेषज्ञ हेलेन वेम्बेक ने अचेतन अवस्था की अनुभूतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। उन्होंने मरणोत्तर जीवन एवं अचेतन के स्मृति भंडार का पता लगाने के लिए कई व्यक्तियों को सम्मोहन विद्या के द्वारा वशीभूत किया। मृत्यु के पश्चात् और चेतन अवस्था में आने तक के अनुभवों के बारे में जब उनसे पूछा गया, तो प्रत्युत्तर में यही सुनने को मिला कि उस अदृश्य दुनिया के अशरीरी लोग अर्थात् जीवात्माएँ छाया की भाँति मार्गदर्शक और सहायक का काम करती हैं और अपने स्थान पर पुनः लौटने का सत्परामर्श देती हैं।
इंग्लैंड में सर्वाधिक लोकप्रिय समाचार पत्र ‘दी टाइम्स’ में पिछले दिनों मनुष्य के पुनर्जम्म से संबंधित अनेकों घटनाएँ छप चुकी हैं। जिन लोगों ने अपनी रिपोर्ट कमेटी के सामने प्रस्तुत की, उनमें से अधिकाँश ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक एवं अपने क्षेत्र के जाने−माने विशेषज्ञ थे। इनमें से एक थे, फ्राँस के सुविख्यात खगोलविज्ञानी कैमिले फ्लेमेरियन, जिन्होंने उन्नीस वर्ष की आयु में सन् 1861 ई. में ‘साइकिक’ शब्द की खोज की, जिसे अध्यात्म विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी समझा जाता है। उन्हें यह प्रेरणा अपने समय के मूर्द्धन्य दार्शनिक मनीषी अलान कार्डेक की पुस्तक ‘दी बुक ऑफ स्पिरिट’ से मिली। कार्डेक के मतानुसार, अध्यात्म ज्ञान की उपलब्धि का एकमात्र कारण पुनर्जन्म की सत्यता है। उन्होंने अपने सिद्धाँतों की पुष्टि करते हुए बताया है कि मृत और जीवित व्यक्ति के मध्य आदान−प्रदान का जो क्रम चलता है, इसमें आत्मा की ही मुख्य भूमिका है। इस खोज के लिए शरीरगत नहीं, मनोवैज्ञानिक कारण अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। अपने विचारों से अवगत कराने हेतु उन्होंने पेरिस में ‘सोसाइटी ऑफ साइकोलॉजिकल स्टडीज’ की स्थापना की। फ्लेमेरियन ने इसी सोसाइटी में प्रवेश पाया और उन तथ्यों को ढूँढ़ निकाला, जिनसे आत्मा की अखंडता ओर नित्यता सिद्ध होती है। सन् 1923 में फ्लैमेरियन को उक्त सोसाइटी के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अपने साठ वर्ष के गहन अनुसंधानों का ब्यौरा प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि मनुष्य में कोई अदृश्य शक्ति ऐसी हैं, जो मरने के बाद भी अपना अस्त्वि बनाए रखती है। सोसाइटी की पूरी रिपोर्ट को चार सौ पृष्ठों में प्रकाशित किया गया। इसके बाद तो वैज्ञानिकों के लिए मरणोत्तर जीवन पर अनुसंधानों का रास्ता खुल गया। अनेक भौतिकविज्ञानियों ने भी अपनी अभिरुचि को इस ओर केंद्रित किया। थैलियम तत्त्व के अन्वेषक विलियम क्रूक्स का नाम अध्यात्मविज्ञानियों की इस श्रृंखला में अग्रणी माना जाता है। उन्होंने श्रीमती क्रुक की चमत्कारी क्षमताओं का बड़ी गहनता के साथ अध्ययन किया है। वे स्वयं भी आत्मबल के धनी समझे जाते थे।
दिसंबर 1870 की ‘साइंटिस्ट डायरी’ में ‘क्रूक्स एण्ड दी स्पिरिट वर्ल्ड’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें विलियम क्रूक्स की अतींद्रिय क्षमताओं पर प्रकाश डाला गया है। क्रूक्स ने ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा, “हे ईश्वर! मुझे अपने भाई की दिवंगत आत्मा के साथ बातचीत करने का सुअवसर प्रदान करें, जिसकी मृत्यु तीन वर्ष पूर्व जलयान में डूबकर हो गई थी।”
ईश्वर की सृष्टि में चेतना का प्रमुख आकर्षण प्रेम और स्नेह−सद्भाव है। उसे भरपूर स्नेह−सद्भाव, प्यार मिलता रहे, तो वह एक शरीर छोड़ने और कुछ समय विश्राम करने के बाद पुनः उसी रूप में नए परिधान में आ जाती है। घर−परिवार में सुसंस्कारिता का वातावरण विनिर्मित किया जा सके, तो जीवंत एवं जाग्रत् जीवात्मा को तो सुख मिलेगा ही, साथ ही शरीर छूटने पर भी वह उसी परिवेश में जन्म लेना या आना अधिक पसंद करेगी।
महापुरुषों के उच्चतम अनुभवपूर्ण भावों में अपने हृदय को मिला देना एवं उस भाव से स्वयं भावित हो जाना ही असली संग है। यदि ऐसे महापुरुषों का स्थूल सान्निध्य न मिल सके, तो उनके द्वारा रचित सत्साहित्यों का मनोयोगपूर्वक स्वाध्याय भी बहुत लाभदायक होता है। भगवत् प्राप्त महापुरुषों के अनुभवयुक्त वचनों में बड़ा प्रभाव होता है और आत्मा को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है ।
जीवन शाश्वत केंद्र एवं अनादि चैतन्य तत्त्व ‘आत्मा’ ही मनुष्य के सुखों का मूल स्रोत है। जो सुख−शाँति एवं स्थिरता से भरा−पूरा जीवन जीने के अभिलाषी हों, उन्हें अपनी आत्मा को जानने का प्रयास करना चाहिए। आत्मा में ही संपूर्ण विश्व व्यवस्थित है। तेजबिंदूपनिषद् में आत्मा की महत्ता प्रतिपादन करते हुए कहा गया है−
आत्मनोऽन्या गतिर्नास्ति सर्वमात्ममय जगत्। आत्मनोऽन्यन्न हि क्वापि आत्मनोऽन्यत्तृणं नहि॥
अर्थात् आत्मा से भिन्न गति नहीं है। सब जगत् आत्ममय है। आत्मा से विलग कुछ भी नहीं है, आत्मा से भिन्न एक तिनका भी नहीं हैं।
आत्मा में शौर्य, प्रेम एवं पौरुष की अनंत शक्ति समाहित है। आत्मशक्ति से संपन्न व्यक्ति के सारे अभाव, दुःख−दारिद्र्य, साँसारिक आधि−व्याधि समाप्त हो जाती है। आज शरीर के संपूर्ण अंग−प्रत्यंगों की स्थूल जानकारी, पदार्थ और उसके गुण−भेद की जानकारी, ग्रह−नक्षत्रों से संबंधित गणित और वैज्ञानिक तथ्य जानने के मनुष्य की भौतिक सुविधाएँ भले ही बढ़ गई हों, पर अपने आपको जानने का प्रयास नहीं करने के कारण मनुष्य का दुःख बढ़ा ही है। हमारे पूर्वज ज्ञान−विज्ञान में आज के वैज्ञानिकों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रवीण थे, किंतु वे इस सत्य से अवगत थे कि विज्ञान अंततोगत्वा मनुष्य की वृत्तियों को भोगवादी ही बनाता है। अतः उन्होंने धर्म और अध्यात्म पर आधारित जीवन की रचना की थी। इस जीवन में प्राण था, शक्ति थी, समुन्नति थी और वह सब कुछ था, जिससे मनुष्य का जीवन सुखी और संतुष्ट कहा जा सके।
सूक्ष्मतापूर्वक विश्लेषण करने पर पता चलता है कि मनुष्य न शरीर है, न मन और न बुद्धि, क्योंकि यह सभी पंचभूतों के सत्−रज अंश से निर्मित है और इसी कारण नश्वर है। आत्मा अनश्वर है। वह स्वयं शक्ति का उत्पादक, अजर−अमर सर्वव्यापी तत्त्व है। आत्मा सद्यः अनुभूमि है। आत्मा में ज्ञान का सहज प्रकाश है, जो सत्य को झूठ से अलग करके प्रकाशित करता है। उपनिषद् में कहा गया है,
नहि द्रुष्टुदृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते। य एव हि निराकर्त्ता तदेव तस्य स्वरुपम्।
अर्थात् “जिस प्रकार द्रष्टा से दृष्टि का बोध स्वतः हो जाता है, उसी प्रकार निराकरणकर्त्ता के रूप में आत्मा स्वयं सिद्ध है।” यदि मैं कह रहा हूँ कि मैं नहीं हूँ। सूर्य के प्रकाश की तरह आत्मा स्वयं प्रकाशित एवं स्वतः ज्ञात है। जैसे बादलों के आवरण से सूर्य की सत्ता बाधित नहीं, वैसे ही शरीर आदि आवरणों से आत्मा खंडित नहीं होती। उपनिषद् आगे कहता है−
जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्यनात्मनः। फलानासिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिन॥
आत्मा नित्योऽव्ययः शुद्धः एकः क्षेत्रज्ञ आश्रयः। अविक्रियः स्वदृग् हेतुर्व्यापकोऽसंगयनावृतः॥
“जन्म, अस्तित्व की प्रतीति, वृद्धि, परिमाण, क्षय और विनाश ये छह विकार देह के हैं, देह में दिखते हैं। ये आत्मा में नहीं हैं। आत्मा से हमारे मूल स्वरूप से इनका कोई संबंध नहीं है। जैसे काल भगवान् की प्रेरणा से वृक्षों में प्रतिवर्ष फूल लगते हैं, फलों के अस्तित्व का अनुभव होता है, वे बढ़ते हैं, पकते हैं, क्षीण होते हैं और नष्ट हो जाते हैं, वे वृक्ष ज्यों−का−त्यों सदा बना रहता है, वैसे ही जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत छहों विकार देह के ही होते हैं। आत्मा के नहीं। आत्मा तो सदा एकरस बना रहता है।”
मनुष्य जीवन के साथ जन्म−मरण, सुख−दुःख और भोग−रोग आदि की जो विलक्षणताएँ अविच्छिन्न रूप से विद्यमान हैं, वे मनुष्य को सोचने के लिए विवश कर देती हैं कि इंद्रियों के भोग, भोगकर जीवन के दिन पूरे कर लेना मात्र मनुष्य जीवन का उद्देश्य नहीं है। यह अमूल्य मानवजीवन पाकर भी यदि आत्मकल्याण न किया जा सके, तो न जाने कब तक फिर अनेकों कष्टसाध्य योनियों में भटकना पड़ेगा। जिसके अंदर आत्मज्ञान प्राप्त करने की इच्छा जाग्रत् हो जाए, उसे अपने आपको परमात्मा का कृपापात्र ही समझना चाहिए।
सबसे पहले, हमें इस सत्य को आँतरिक गहराई तक हृदयंगम करना होगा कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं। परमात्मा के सनातन अंश है। उनसे मिलने का हमारा नित्य सिद्ध आधार है। इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति में आत्मा का सुधा बीज विद्यमान है। अपने मूल स्वरूप को पहचानना, अपने अंदर के सुधा बीचों को अंकुरित होने देने से रोकना ही हमारे दुःखों का कारण है। जब मनुष्य अपने को आत्मा के रूप में नहीं स्वीकारता, अपने जीवन को आत्मसंस्पर्श से वंचित रखता है तभी तक वह दुःखी रहता है।
दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमें अपनी चेतना को बहिर्गमन अर्थात् साँसारिकता की ओर से हटाकर अंतर्मन की ओर मोड़ना होगा। आज मनुष्य का जीवन सिर्फ शरीर एवं संसार तक ही सीमित होकर रह गया है। आत्मिक जीवन की ओर से वह पूरी तरह उदासीन हो गया है। अर्थ व अधिकार ये दो ही मानवजीवन के लक्ष्य रह गए है। इन दोनों की प्राप्ति के लिए व्यक्ति उचित−अनुचित, न्याय−अन्याय का कुछ भी ध्यान न रख प्रमत्त की भाँति जुटा रहता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि मनुष्य कर्म करना बंद कर दे। इसका मतलब यह है कि वह उनकी दिशा बदल दे। उसका हर कार्य आत्मिक उन्नति की भावना लिए हुए हो। भगवान् को समर्पित हो। जब हर कार्य भगवान् को समर्पित किया जाएगा, तो स्वतः ही अनुचित कार्य नहीं बन पड़ेंगे।
तीसरी आवश्यकता है, शुद्ध−सात्विक आहार−विहार की। सात्विक वृत्तियों वाला व्यक्ति ही आत्मोद्धार करने में सफल हो सकता है। आहार−विहार, शयन−जागरण एवं चेष्टा के संबंध में गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, “यह योग न तो बहुत खाने वाले का सिद्ध होता है और न ही बिल्कुल न खाने वाले का ही सिद्ध होता है। यह दुःखों का नाश करने वाला तो यथायोग्य आहार करने वाले का और कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का ही सिद्ध होता है।” शिष्ट, ऋत, सत्य, प्रिय एवं हितकारी वाक्−प्रयोग तथा समय−समय पर एकाँत सेवन भी करते रहना चाहिए।
आत्मिक प्रगति की चाह रखने वाले व्यक्तियों को महात्माओं संग भी करना चाहिए। ऐसे महापुरुषों के उच्चतम अनुभवपूर्ण भावों में अपने हृदय को मिला देना एवं उस भाव से स्वयं भावित हो जाना ही असली संग है यदि ऐसे महापुरुषों का स्थूल सान्निध्य न मिल सके, तो उनके द्वारा रचित सत्साहित्यों का मनोयोगपूर्वक स्वाध्याय भी बहुत लाभदायक होता हैं। भगवत् प्राप्त महापुरुषों के अनुभवयुक्त वचनों में बड़ा प्रभाव होता है और आत्मा को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है।
आत्मिक उन्नति के मार्ग में प्रमाद एक महाशत्रु है। यह हमारे अंदर शुभ की ओर उठने वाली चेतना का शत्रु है। जो चेतना के दिव्य आयामों को स्पर्श करने से रोके, जो आत्मिक उच्चताओं में आस्था न बनने दे, वह हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। उससे संग्राम कर उसे पराजित करना हमारा परम धर्म हो जाता है। विवेक चूड़ामणि में कहा है−
इतः को न्वस्ति मूढात्मा यस्तु स्वार्थें प्रमाद्यति। दुर्लभं मानुषं देहं प्राप्य तत्रापि पौरुषम्॥
जीवन परमात्मा का दिया एक अमूल्य वरदान है। चाहे इससे विभूतियां अर्जित कर लो चाहे दुर्गति।
अर्थात् दुर्लभ मनुष्य देह और उसमें भी पुरुषत्व को पाकर जो आत्मसाक्षात्कार में प्रमाद करता है, उससे अधिक मूढ़ और कौन होगा।
हमने अपने जीवन को आत्मिक दिव्यता में ढालने का संकल्प ले लिया है, तो हमें संकीर्णता भी त्यागनी होगी। अपने अहं पर आघात करने होंगे। सबमें परमात्मा का ही एक अंश आत्मा की ज्योति प्रज्वलित है, इस सत्य को पहचानना होगा। हम अपनी सत्ता को अहंपोषित इंद्रियों के छोटे और टूटे−फूटे सुख देने के बजाय शाश्वत सुख का आनंद दें। सर्वत्र एक ही आत्मा का दर्शन करने वाला मनुष्य न तो मोहग्रस्त होता है और न ही शोकाकुल। तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वं अनुपश्यतः। जैसे−जैसे आत्मभाव में दृढ़ता आती है, आनंद बढ़ने लगता है।
अगर हम वास्तव में सुख−शाँति से भरा−पूरा जीवन जीना चाहते हैं, तो हमें अपनी आत्मिक उत्कृष्टताओं को उभारना होगा और अपनी सारी बुराइयों से संघर्ष करना होगा। आत्मज्ञान की संपदा प्राप्त किए बिना सुख−शाँति की चाह एक कल्पना मात्र है।
(गताँक से आगे)
मित्रो! बेटा कैसा होना चाहिए? राहुल की तरह से होना चाहिए। बेटा ऐसा नहीं होना चाहिए कि बाप मरेगा तो उसकी जायदाद हमको मिलनी चाहिए और जो खेत है, वह हमको मिलना चाहिए। बाप का पैसा हमको मिलना चाहिए। बाप जिंदा है, तो हिस्सा मिलना चाहिए। नहीं, ऐसे बेटे नहीं हो सकते। नहीं, महाराज जी! बेटे ऐसे ही होते हैं। बाप के पास इक्कीस बीघे जमीन है। बाप को मरने में अभी देर है। बेटा कहता है कि हमारा हिस्सा अभी दे दो। हम मरेंगे तब देंगे। नहीं, मरने का इंतजार हम नहीं करेंगे, अभी दे दो। यह कौन है? क्या बेटे ऐसे ही होते हैं? नहीं ऐसे नहीं होते बेटे। श्रवणकुमार के तरीके से बेटे होते हैं और राहुल के तरीके से बेटे होते हैं और बेटियाँ कैसी होती हैं? बेटियाँ संघमित्रा के तरीके से होती हैं। संघमित्रा सम्राट्, अशोक की बेटी थी। उसने कहा, पिता जी आपने संन्यास ले लिया? हाँ। तो फिर हमारे लिए हुक्म दीजिए कि हमको क्या करना चाहिए।
मित्रो! संघमित्रा जो थी, उसने कहा पिता जी क्या करना पड़ेगा? बेटी, हमारे रास्ते पर चलना पड़ेगा। सम्राट् अशोक की बेटी संघमित्रा निकल पड़ी ओर उसने जितने बुद्ध ने विहार बनाए थे, उससे ज्यादा विहार बनाकर दिखा दिए। महिलाओं के क्रिया−कलाप, महिलाओं के संगठन, महिलाओं के विहार संघमित्रा ने ढेर सारे बना दिए। यह सब हमारी किताब में वर्णन किया गया है; उसका मैं हवाला दे रहा था। कितने ज्यादा बुद्ध के विहार थे और कितने महिलाओं के लिए? यह कैसे हो गया? बेटे, इस तरीके की परंपराओं से हो गया। कहाँ−से−कहाँ तक हुआ? बेटे, जहाँ कहीं भी अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने की जरूरत पड़ी होगी अथवा धर्म की स्थापना करने की जरूरत पड़ी होगी और जब ठोस कदम उठाने की जरूरत पड़ी होगी, तब कैसे कि आज है। पोला कदम जब तक उठाना है, तब तक तो मीटिंग करेंगे, वार्षिकोत्सव करेंगे, रामायण सम्मेलन करेंगे। ठीक है बेटे, ये पोला कदम हो सकता है, पर यह ठोस कदम नहीं हो सकता। ठोस कदम यह हो सकता है कि हमें लोगों के, जनसाधारण के सामने त्याग और बलिदान की परंपराएँ प्रस्तुत करनी चाहिए, ताकि लोगों का मुँह यह कहने के लिए बंद हो जाए कि ये कहने−सुनने की बातें हैं। ये दूसरों को उपदेश देने की बातें हैं। ये बातें काम नहीं आ सकतीं और कोई आदमी इन्हें जीवन में करके नहीं दिखा सकता। दूसरों को कह सकता है कि आपको त्यागी होना चाहिए, ब्रह्मचारी रहना चाहिए, परोपकारी होना चाहिए। आप और हम कह सकते हैं, लेकिन जब स्वयं करने का मौका आएगा तक हम नहीं कर सकते। यही कारण है कि वक्ताओं का, उपदेशकों का कहीं कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिखाई देता।
मित्रों! चिंता करने की कोई बात नहीं है। आप अपने से ही शुरुआत कीजिए, नमूना बनिए, साँचा बनिए। हमारी परंपरा स्वयं से शुरुआत करने की रही है। जहाँ कहीं भी हम देखते हैं, अपने से ही शुरुआत देखते हैं। विश्वामित्र और हरिश्चंद्र दोनों आपस में घनिष्ठ थे। इतने घनिष्ठ थे कि गुरु−शिष्य का प्रेम जो राजा विश्वामित्र में था और किसी में नहीं देखा गया। विश्वामित्र एक बड़ा काम करने वाले थे, नई दुनिया बनाने वाले थे। जब हम पढ़ते हैं, तो उसमें नई सृष्टि लिखा हुआ है। वे नई सृष्टि बना रहे थे। मैं समझता हूँ नई सृष्टि तो क्या बना रहे होंगे, लेकिन नया जमाना ला रहे होंगे। विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से कहा, तू हमारा मित्र है, दोस्त है? उनने कहा, हाँ। तो फिर हमारे साथ−साथ चल, हमारे काम आ। राजा हरिश्चंद्र ने कहा, हम आपके साथ−साथ चलेंगे और आपके काम आएँगे। तो फिर काम आ चल हमारे साथ।
मित्रो! विश्वामित्र को पैसे की जरूरत पड़ी होगी, तो उन्होंने हरिश्चंद्र का राज्य माँगा होगा, दूसरी चीजें माँगी होंगी और आखिरी में जहाँ मौका आ गया होगा, तो भौतिक साधनों के लिए राजा हरिश्चंद्र ने अपने आपको नीलाम कर दिया होगा। अपनी बीबी−बच्चे को नीलाम कर दिया होगा। यह क्या चीज है? त्याग और बलिदान है। इसको हम भूल नहीं सकते। क्यों विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र को ही दोस्त क्यों बनाया। इससे कम में काम नहीं चल सकता था? अभी भी हजारों गाँधियों को पैदा करने की ताकत हरिश्चंद्र में है। गाँधी जी ने बचपन में हरिश्चंद्र का ड्रामा देखा और ड्रामा देखकर उन्होंने कहा, मैं हरिश्चंद्र होकर जिऊँगा। वे वास्तव में हरिश्चंद्र होकर के लिए। हरिश्चंद्र ने एक हरिश्चंद्र जोने कितने पैदा कर गए। कैसे हो गए? बेटे और कोई तरीका नहीं है अपने आपको त्याग की बलिवेदी पर समर्पित करने के अलावा। अगर हमारे व्यक्तिगत जीवन में लोकहित के लिए, परमार्थ के लिए कहीं त्याग की परंपरा नहीं है, तो फिर कहने भर की बातें हैं, बरगलाने भर की बातें हैं और आपको छलने एवं जनता को बरगलाने की बातें हैं। नया युग लाने के लिए तो हमें फिर वहीं से आरंभ करना होगा, जहाँ हमारे ऊपर यह बात लागू होती है कि त्याग और बलिदान का प्रश्न आए, तो हम कहाँ होते हैं? बगलें झाँकते हैं या आगे बढ़−चढ़कर लग जाते हैं।
मित्रों! हमारी संस्कृति में त्याग−बलिदान की परंपराएँ आदि काल से रही हैं, चाहे बुद्ध हो या हरिश्चंद्र कोई भी रहा हो। त्याग−बलिदान की परंपराएँ गाँधी जी के आश्रम में भी थीं। गाँधी जी के आश्रम में जब ‘नमक−सत्याग्रह’ शुरू हुआ तो लोगों ने कहा कि आप चुपचाप बैठे रहिए और लोगों को हुक्म दीजिए। सब लोग जेल जा सकते हैं, नमक बना सकते हैं, आप शाँति से बैठे रहिए, बाकी लोग ये सब काम करेंगे। गाँधी जी ने कहा, ऐसा नहीं हो सकता। जो लोग साबरमती आश्रम में रहते हैं, उन आश्रमवासियों का सबसे पहले नंबर है, बाकी लोगों का पीछे नंबर है। उन्होंने सबसे पहले अपना नाम लिखाया। गाँधी जी के आश्रम में जो उन्नीस आदमी थे उनको लेकर और आश्रम में ताला डालकर गाँधी जी अपने साथियों को लेकर नमक बनाने के लिए रवाना हो गए और वहाँ से जेल चले गए। उनके जेल जाने के बाद जो आग फैली, तो गाँधी जी के बच्चे, जनसेवक सभी ने कहा कि हमें भी जेल जाना चाहिए। यह प्रभाव व्याख्यानों का था? नहीं, त्याग के लिए गाँधी जी का स्वयं को प्रस्तुत करने का था। बिना कोई व्याख्यान दिए, बिना कोई कथा कहे, बिना कोई प्रवचन दिए, बिना कोई सम्मेलन बुलाए कितने सारे आदमी जेल चले गए। गाँधी जी के उस साहस, को त्याग को देखकर लोगों ने समझ लिया कि इस आदमी की कथनी और करनी के बारे में दो राय नहीं है। इसकी कथनी और करनी एक है।
सिख धर्म भी इसी का साक्षी
मित्रों! यही परंपरा बनी रही है और बनी रहेगी। सारे का सारा इतिहास, पुराणों का इतिहास, धर्म−शास्त्रों का इतिहास, अमुक का इतिहास जब हम देखते हैं, तो दूसरा कोई तरीका दिखाई नहीं पड़ता। यवनों के विरुद्ध जब सिख धर्म बनाया गया और इस बात की जरूरत पड़ी कि लोगों को हिंदू धर्म की रक्षा के लिए सिपाहियों के तरीके से, सैनिकों के तरीके से तनकर खड़ा हो जाना चाहिए और अपनी जान को जोखिम में डालना चाहिए। यह बहादुरी अब गुरुगोविंद सिंह पैदा करने वाले थे, तब उन्होंने लोगों से पूछा कि इसका कौन−सा तरीका हो सकता है? लोगों में बहादुरी कैसे भरी जा सकती है? अगर यह उपदेश से हो जाए कि उससे सब लोग सूली पर चढ़ जाएँ, सब मारे जाएँ और हम सुरक्षित बैठे रहेंगे, ऐसा नहीं हो सकता। गुरुगोविंद सिंह ने कहाँ, “पहला नंबर हमारा है।” उन्होंने जान−बूझकर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कीं, ताकि लोगों में जोश और जीवन पैदा हो सके।
मित्रो! गुरुगोविंद सिंह के दो बच्चे दीवार में चिनवा दिए गए। दो बच्चे युद्ध में थे। एक बच्चा लड़ाई के मैदान में जब मारा गया दो दूसरा बच्चा, जो उसके साथ−साथ लड़ रहा था, भागकर आया और अपने पिता जी को खबर सुनाई कि हमारे भाईसाहब तो लड़ाई में मारे गए। गुरुगोविंद सिंह ने कहा, मारे गए, तो बेटा फिर तू कैसे आ गया? उस वक्त बच्चे से जवाब नहीं बन पड़ा। वह बेचारा समझ नहीं सका कि पिता जी का क्या इशारा है? पिताजी का यह इशारा था कि एक भाई लड़ाई के मैदान में मारा गया, तुझे भी मरना चाहिए। वह इशारा समझ गया, लेकिन उनके आगे जवाब क्या दे सकता था। उसने कहा, पिताजी! मुझे प्यास लगी थी। पानी पीने के लिए और आपको खबर सुनाने एवं सुस्ताने के लिए मैं आया था। ठीक है बेटा! जितनी देर सुस्ताना था सुस्ता लिया। हाँ और देख प्यासा है, तो बेटे बैरी के खून से अपनी प्यास बुझाना। चल यहाँ से और उसे भगा दिया।
मित्रो! वह चलता हुआ चला गया। मैं यह क्या कह रहा हूँ। ये अध्यात्म की बातें कह रहा हूँ, देव−परंपराओं की बातें कह रहा हूँ और ये बात कह रहा हूँ कि अगर दुनिया में कोई बड़े काम हुए हैं या बड़े काम हो सकते हैं, तो इससे कम में नहीं हो सकते और न इससे अधिक में हो सकते हैं।
तमाशों से उबरें, सच्चा अध्यात्म जानें
भाइयों! अपना ये कुटुँब हमने बहुत दिनों पहले बनाया था। उस समय हमारे पास बच्चे−ही−बच्चे थे। बच्चों के बारे में जो नीति अख्तियार करनी चाहिए, वो ही नीति हमारी थी। बच्चों के लिए, उन्हें देने के लिए क्या हो सकता है? पिताजी गुब्बारा देना, टॉफी देना, लेमनचूस देना। पिताजी चाबी की रेलगाड़ी लाना। हम बरफ की कुल्फी खाएँगे, आदि सारी−की−सारी माँगें, फरमाइशें− डिमाँड बच्चे करते रहते हैं। ये कौन हैं? बच्चे। अध्यात्म क्षेत्र में फरमाइश करने वाले ये कौन है? बिलकुल बच्चे हैं, बालक है। इनको इसी बात की फिक्र पड़ी रहती है कि हमको दीजिए, हमको दीजिए। इसलिए ये बालक हैं। बेटे, आज से तीस साल पहले हमने बिलकुल बालकों का समूह जमा किया था और लोगों से कहा था कि हमारे पास जो कुछ है, आप ले जाइए। तब लोगों ने कहा था, पिता जी! आपके पास क्या है? गुब्बारे हैं। तो हमको दे दीजिए। बस एक गुब्बारा पेटी से निकाला, फूँक मारकर हवा भर दी और कहा ये रहा तुम्हारा गुब्बारा। एक ने कहा, पिताजी! आपको सबको बेटा देते हैं? हाँ बेटे, हमारी पेटी में बहुत−सी चीजें हैं। ये देख टॉफी है, ये लेमनचूस है। ये नौकरी में तरक्की है। ये दमे की बीमारी का इलाज है।
ये क्या है? ये बेटे सब तमाशे हैं, खेल−खिलौने हैं। ये सब बहुत दिनों पहले थे। अब हमारी दुकान बड़ी हो गई है और अब मैं आपसे दूसरे तरीके से उम्मीद करता हूँ। अब आप गुब्बारे माँगते हैं, तो मैं नाराज होता हूँ और आप से कहता हूँ कि अब आप तीस साल के हो गए है। आपको शर्म नहीं करना चाहिए? बेटे अब हम बुड्ढे हो गए हैं और हमको कम दिखाई पड़ता है। डॉक्टर ने कहा है कि आँखों को टेस्ट कराना और चश्मा खरीद देना। डॉक्टर ने बताया था कि अट्ठाईस रुपये का चश्मा आएगा। बेटे, निकाल अट्ठाईस रुपये का चश्मा। बेटे, निकाल अट्ठाईस और हमारी आँखों का टेस्ट कराकर ला। चश्मा खरीदकर ला। अरे! पिताजी, आपने तो ‘टर्न’ ही बदल दिया। हाँ बेटे, बदल दिया। पहले हम गुब्बारे दिया करते थे, अब हम चश्मे के लिए पैसे माँगते हैं। ये क्या बात हो गई? ये तो बिलकुल उलटा हो गया। हाँ बेटे हमारा ही क्या उलटा हो गया, तेरा भी उलटा हो गया। जब तू गोदी में था तब नंगा फिरता था और अब तो तू कच्छा भी पहनता है, पैंट भी पहनता है। तूने बदल दिया कि नहीं? हाँ महाराज जी! मैंने तो बदल दिया। बेटे तू बदल गया, तो हम भी बदल गए।
मित्रो! अब हमारा कुटुँब जवान हो गया है। हम जवान आदमियों से अपेक्षा करते हैं देने की। अब हम माँगने की अपेक्षा करते हैं और हमारा हक है कि हम आपसे माँगें। अब आप से माँगा गया है और माँगना चाहिए। बेटे, जहाँ कहीं भी वास्तविकता का उदय हुआ है, जहाँ कहीं भी विवेकशीलता आई है, वहीं परंपरा पलट जाती है। अब हम आपसे लेने की परंपरा आरंभ करते हैं, क्योंकि आप अब जवान हो गए हैं। खासतौर से इस जमाने में, जिसमें हम और आप जिंदा है। यह जीवनभर का सवाल है। आज मनुष्य जाति जहाँ चली जा रही है, आदमी का चिंतन जिस गहराई के गड्ढे में धँसता हुआ चला जा रहा है, ये ठीक वही परंपराएँ हैं, जो कि रावण के जमाने में आई थीं। इसमें वह मनुष्यों को मारक हड्डियों के ढेर लगा देता था। आज हड्डियों के ढेर तो नहीं लगाए जाते, पर हम हड्डियों के ढेर को चलते−फिरते आदमियों का रूप में देख सकते हैं। हड्डियाँ जो जिंदा तो हैं, पर जिनको चूस लिया गया है। मैं समझता हूँ कि प्राचीनकाल में ज्यादा भले आदमी थे और शरीफ आदमी थे। कौन से आदमी? वे जो मारकर डाल देते थे, उनको मैं ज्यादा पसंद करता हूँ, क्योंकि तब आदमी को मारकर खत्म कर देते थे, लेकिन आज का तरीका बहुत गंदा है। आज तो आप रुला−रुलाकर मारते हैं, कोंच–कोंचकर मारते हैं, तरसा−तरसाकर मारते हैं। ये गंदा तरीका है। रावण के जमाने में तब भी अच्छा तरीका था, सीधे खत्म कर देने का।
आज की विडंबना
मित्रो! आज हम क्या करते हैं? आज हम अपनी स्वार्थपरता के कारण हर एक को चूसते हैं। किसको चूसते हैं? जो कोई भी हमारे पास आता है, हम उसको चूस जाते हैं, उसे जिंदा नहीं छोड़ना चाहते, केवल उसकी हड्डियाँ रह जाती हैं। उदाहरण के लिए जैसे हमारी बीबी। हमने अपनी बीबी को चूस लिया है। अब वह सिर्फ हड्डी का ढाँचा मात्र है। कैसे हुआ? बेटे, जब वह अपने आप के घर से यहाँ आई थी, तो वह उम्मीद लेकर आई थी कि हमारा स्वास्थ्य अच्छा बनाया जाएगा। हमको पढ़ाया जाएगा, शिक्षित किया जाएगा और यह उम्मीद लेकर आई थी कि बाप हमको जितना स्नेह देता है, जितनी हमें सुविधा देगा। लेकिन हमने उसको चूस लिया। हर साल बच्चे पैदा किए। कामवासना−पूर्ति की वजह से हमने उसके पेट में से पाँच बच्चे निकाल दिए। पाँच बेटियाँ हो गई, अभी एक बेटा और होना चाहिए। अब वह बेचारी लाश रह गई है। बार−बार हमारे पास आती रहती है और कहती रहती है कि हमारे पेट में दरद होता है, कमर में दरद होता है और हमारे सिर में दरद होता है। मैं कहता हूँ कि बेटी तू जिंदा है, भगवान् को बहुत धन्यवाद दे कि ये पिशाच तुझे अभी तक जिंदा छोड़े हुए है। इसका बस चले तो तुझे खाकर तेरी जिंदगी खत्म कर दे, चाँडाल कहीं का। इसे तो अभी और बच्चे चाहिए।
मित्रों! उस बेचारी के पास न माँस है, न रक्त है शरीर में और न उसके पास जान है। उसके पास कुछ भी नहीं है। न जाने किस तरीके से साँस ले रही है और कैसे दिन बिता रही है। नहीं साहब! मेरा तो वंश चलना चाहिए। इस राक्षस का, दुष्ट का वंश चलना चाहिए? ये क्या है? ये बेटे, कसाईपन है। आज हर आदमी कसाई होता हुआ चला जा रहा है। आज हम देखते हैं कि न हमको अपनी बीबी के प्रति दया है, न अपने माँ−बाप के प्रति दया है, न अपने बच्चों के प्रति दया है। रोज बच्चे पैदा कर लेते हैं। इस बात की लिहाज−शर्म नहीं हैं कि आखिर इनको पढ़ाएगा कौन? शिक्षा के लिए पैसा कहाँ से आएगा? इनको खेलने के लिए रेल कहाँ से आएगी? हमको तो बस काम−वासना से प्यार है। हम तो चौरासी बच्चे पैदा करेंगे। आज आदमी चाँडाल होता हुआ चला जा रहा है।
मित्रो! आज हमें किसी के ऊपर दया नहीं है। हमारे पास कहीं भी धर्म नहीं है। हमारे पास कहीं भी ईसान नहीं है। आज आदमी इतना खुदगर्ज होता हुआ चला जा रहा है कि मुझको ये मालूम पड़ता है कि हमारी खुदगर्जी का पेट इतना बढ़ता हुआ चला जा रहा है कि इंसानों से हमारा गुजारा नहीं हो सकता। अब जो कोई भी सामने आएगा, हम उसको अपनी खुदगर्जी का शिकार बनाएँगे। किसको बनाएँगे? देवी−देवताओं में से जो भी हमारे चक्कर में फँसेगा, हम उसको खत्म करके रहेंगे। देवताओं के ईसान को खत्म करके उन्हें बेईमान बनाकर रहेंगे। संतोषी माता हमारे चक्कर में आ जाएँगी, तो उनको बदनाम करके रहेंगे। हम उन्हें दो बकरे, खिलाएँगे और ये कहेंगे कि हमको डकैती में फायदा करा हो। हम उसको बदनाम कराकर रहेंगे। हर एक को हम बदनाम कराएँगे। जो कोई भी हमारा गुरु होगा, हम उसको बदनाम कराकर रहेंगे। हम कहेंगे कि हमारा गुरु ऐसा है, जिसको न इंसाफ की जरूरत है, न उचित−अनुचित की जरूरत है। जो कोई भी हाथ जोड़ता है, जो कोई भी सवा रुपये देता है, उसी की मनोकामना पूरी कर देता है।
दुर्मतिजन्य दुर्गति से हुआ आदमी का अवमूल्यन
बेटे, हम कहाँ जा रहे हैं और न जाने क्या हो रहा है? हम जिस जमाने में रह रहे हैं, उसमें आदमी न जाने क्या होने जा रहा है? अगर आदमी इसी तरीके से बना रहा, तो उसका परिणाम क्या होगा? अभी जितनी ज्यादा मुसीबतें आई हैं, आगे उसे भी ज्यादा आएँगे। इससे तो अच्छा होता अगर युद्ध हो जाता और दुनिया खत्म हो जाती, लेकिन हमारी स्वार्थपरता जिंदा रही और आज हम पर हावी होती चली जा रही है। आदमी, जैसा निष्ठुर, जैसा नीच, जैसा स्वार्थी होता हुआ चला जा रहा है, अगर यही क्रम जारी रहा तो मैं आपसे कहे देता हूँ कि आदमी−आदमी को मार करके खाएगा। पकाकर खाएगा कि नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन आदमी−आदमी ने डरने लगेगा। अभी तक हमको भूत का डर लगता था, साँप का डर लगता था, चोरों का डर लगता था, लेकिन अब हमको मनुष्यों का डर लगेगा। इतना तो अभी ही हो गया है कि आदमी की कीमत उसके बिस्तर से कम हो गई है। आज आप बिस्तर लेकर धर्मशाला में आते हैं, तो धर्मशाला वाला कहता है, आइए साहब! कमरा खाली है, लेकिन अगर आपके पास बिस्तर नहीं है, अटैची नहीं है और आप एक थैला लेकर जाते हैं और कहते हैं कि साहब! धर्मशाला में ठहरने की जगह है कि नहीं? धर्मशाला वाला कहता है कि आपके साथ और कौन−कौन हैं। आपका सामान कहाँ है?
अरे भाई! गरमी के दिन हैं, सामान की क्या जरूरत है? अरे साहब! आजकल बड़ी भीड़ है। सारी जगह भरी हुई है। कहीं जगह नहीं है। आप ऐसा कीजिए, चौथे नंबर की धर्मशाला है, वहाँ चले जाइए। वहाँ जाते हैं, तो वह कहता है कि अरे साहब! आप अब आए हैं? आपसे पहले पच्चीस आदमियों को मना कर दिया है कि यहाँ जगह नहीं है। ऐसा क्यों होता है? क्यों मना करते हैं? यह आदमी का मूल्य, आदमी की प्रामाणिकता, आदमी की इज्जत को बताता है कि आदमी की कीमत से धर्मशाला के बिस्तर की कीमत ज्यादा है। आज आदमी का मूल्य इतना गिर गया है। कल आदमी और भी भयंकर होने वाला है।
मित्रो! आदमी जब कल और भयंकर हो जाएगा, तब वह भूत बन जाएगा, पिशाच बन जाएगा। तब आदमी को देखकर आदमी भागेगा और कहेगा, “आदमी आ गया’ चलो भागो यहाँ से। वह देखो आदमी खड़ा है।” कल यही परिस्थितियाँ पैदा होने वाली हैं। यह हमारे मन का घिनौनापन है। अभी हमारे ऊपर स्वार्थ छाया हुआ है। हम समाज के किसी काम में भाग लेना नहीं चाहते। हम समाज के लिए कोई सेवा करना चाहते हैं, तो पहले यह देखते हैं कि सेवा के बहाने हमारा उल्लू सीधा होगा कि नहीं होगा। हमारा उल्लू सीधा होता है, तो बेटे हम संस्था में जाते हैं, कमेटी में जाते हैं, प्रेसीडेंट बनते हैं, मीटिंग में जाते हैं, अगर उल्लू सीधा नहीं होता है, तो कहते हैं कि समाज के जीवन से हमारा कोई लगाव नहीं है, कोई संबंध नहीं है।
मित्रो! लोकहित के लिए हमारे मन खाली होते चल गए। उदारता हमारे मन में से निकलती चली जा रही है और निष्ठुरता हमारे मन में से निकलती चली जा रही है और निष्ठुरता हमारे रोम−रोम में घुसती चली जा रही है। परिणाम क्या होगा? आप देख लेना, इसका परिणाम बहुत भयंकर होगा। कलियुग के बारे में पुस्तकों में जो बताया गया है, उसको मैं सही मानता हूँ। आदमी का चिंतन जैसा और जितना घटिया होगा, मुसीबतें उसी हिसाब से आएँगी। आज भगवान की दी हुई मुसीबतें हमारे पास आती हुई चली जा रही हैं। बीमारियों हमारे पास बराबर बढ़ रही हैं। डॉक्टर बढ़ रहे हैं, अस्पताल बढ़ रहे हैं, लेकिन बीमारियों का दौर अभी और बढ़ेगा। डॉक्टर कितने बढ़ गए हैं, भगवान् करे डॉक्टर दोगुने−चौगुने हो जाएँ। लेकिन बीमारियों का क्या हो जाएगा? बीमारियाँ अच्छी नहीं हो सकतीं। बीमारियाँ सौ गुनी ज्यादा होंगी, हजार गुना ज्यादा होंगी। वे तब तक अच्छी नहीं हो सकतीं, जब तक आदमी आध्यात्मिकता के रास्ते पर लौटकर नहीं आएगा, तब तक आदमी का पिंड बीमारियों से नहीं छेटेगा और घर का नरक? बेटे घर का नरक भी दूर नहीं हो सकता।
(शेष अगले अंक में)
( के चतुर्थ अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग की युगानुकूल व्याख्या)
विगत अंक में चतुर्थ अध्याय के प्रारंभिक छह श्लोकों की व्याख्या द्वारा इस विषय में प्रवेश किया गया था। समन्वित योग सही अर्थों में क्या होता है, इसे श्रीमद्भगवद गीता पढ़े बिना जाना नहीं जा सकता। इस अध्याय में विशेष रूप से चार प्रकरणों की चर्चा है, जिनके बारे में पिछले अंक में लिखा गया था। पहला अवतार के प्रकटी करण का, दूसरा कर्म−अकर्म और विकर्म की व्याख्या का, तीसरा यज्ञ का ज्ञान−विज्ञान और चौथा ज्ञान की प्राप्ति द्वारा कर्म में कैसे तत्पर हुआ जाए। इस अध्याय के प्रारंभिक तीन श्लोकों में भगवान् द्वारा स्वीकारोक्ति है कि यह योग उनने−वासुदेव श्रीकृष्ण ने ही परमात्मा के शक्ति समुच्चय के रूप में सर्वप्रथम सूर्य से कहा था। यह योगरूपी ज्ञान अति रहस्यमय है एवं चूँकि यह कालाँतर में लुप्त होता चला गया, इसलिए वे द्वापर में इसे अर्जुन को एवं उसके माध्यम से उस व उस युग के बाद आने वाले सभी युगों के अभीप्सा रखने वाले जिज्ञासुओं के लिए कह रहे हैं। अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में वे एक बड़ी रहस्यभरी बात कहते हैं। “तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, उन्हें तू नहीं जानता, किंतु मैं जानता हूँ।” अवतारवाद की व्याख्या पुनर्जन्म की पुष्टि देने वाले इस कथन से आरंभ होती है। तनिक अहं वेद सर्वाणि के द्वारा वे कहते हैं, मुझे नियंता होने के नाते यह मालूम है कि कौन−सी आत्मा क्या है, कौन सुपात्र है एवं कौन विगत जन्मों के कितने संस्कार लेकर आई है। हमने बताया था कि परमपूज्य गुरुदेव ने भी इसी तरह जाग्रतात्माओं के एक संगठन के रूप में गायत्री परिवार विनिर्मित किया है, बार−बार हमें भी इसी तरह से स्मरण दिलाते रहे, परंतु परमात्मसत्ता−अवतारी चेतना के प्रतिनिधि अपना लीलासंदोह एक सामान्य पुरुष के रूप में ही दिखाते हैं। इसी बात को छठे श्लोक में भगवान ने कहा है, “मैं नियामक ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर योगमाया से प्रकट होता हूँ।” भगवान अपनी इस माया के स्वामी हैं, हम उस माया के अधीन जीते हैं। यही नर और नारायण में अंतर है। अब इसके बाद की व्याख्या इस लेख में पढ़ें।
अवतार प्रकट कैसे होता है
जब हम सभी प्राणियों का ईश्वर अजन्मा ओर अपरिवर्तनशील है, तब फिर जब वह अवतार लेता है, तो स्वयं को प्रकट कैसे करता है, यह प्रश्न सामने आ खड़ा होता है। इसी का उत्तर भगवान छठे श्लोक में “संभवामि आत्ममायया” कथन द्वारा देते हैं कि मैं अपनी अंतर्निहित माया द्वारा अपने आपको प्रकट करता हूँ। हमारा अपना जन्म अपनी वासनाओं के कारण होता है। प्रकृति में अधिष्ठित होकर अपनी माया से जन्म लेने वाला कौन हुआ परब्रह्म−परमात्मा−परमेश्वर अपनी वासना के वशीभूत जन्म लेने वाला एक सामान्य नर। इसी व्याख्या को आद्य श्री शंकराचार्य सही मानते हैं। विशिष्ट द्वैतवादी रामानुजाचार्य, द्वैतवादी माधवाचार्य तथा भक्ति मार्गी श्री बल्लभाचार्य के मत यहाँ अलग−अलग हैं। अर्थ तीनों ने वहीं किए हैं, जो अंत में निष्कर्ष निकला है कि अपने संकल्प से अवतार जन्म लेते हैं। परंतु माया के स्वामी ‘समष्टि कारण शरीरों’ के स्वामी को भी अवतार लेना पड़ता है, धरती पर आना पड़ता है, यह सुनिश्चित है।
वस्तुतः भगवान् के पार्षद, विभूतियाँ, सिद्धपुरुष, स्वयं भगवान् अवतार लेते हैं। चेतना के अति उच्च शिखर से नीचे आकर मानव रूप में आते हैं। हर अवतार के पीछे महाकरुणा का भाव होता है। महा करुणा नहीं होती तो इतने ऊँचे शिखर पर बैठा आदमी नीच क्यों उतरता और हम सबके जीवन में वैसा ही जीवन जीते हुए क्यों जाता, जो कि सामान्य मनुष्य सारा भोग भोगते हुए जीता है। लोकशिक्षण के लिए करुणा के अवतार के रूप में धरती पर स्वयं भगवान् आते हैं और उन्हें अपनी संतानों के बीच आना, उनका दुःख बाँटना बहुत अच्छा लगता है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे, “मैं तो माँ का चपरासी हूँ। माँ की जमींदारी देखने आया हूँ।” ईश्वर का अवतार माँ के चपरासी के रूप में, माँ की जमींदारी अर्थात् उनकी सारी संतानों की देखभाल करने के लिए होने की बात श्री रामकृष्ण ने कही है। हमें कभी−कभी ये बातें समझ में नहीं आतीं। हम उन्हें सामान्य पुरुष मान बैठते हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने भी बार−बार कहा है कि हम सभी पिछले जन्मों के साथी हैं। तुम हमारे गिद्ध−गिलहरी हो, तुम हमारे रीछ−वानर हो। ये सब बातें प्रज्ञापुरुष−युगद्रष्टा के अंग−अवयव के रूप में हम सभी को अपनी गरिमा का बोध कराती हैं और उस विशिष्ट लोक में ले जाती हैं, जहाँ हम स्वयं को सौभाग्यशाली ही नहीं मानें, अपने स्वरूप को जानें भी और तदनुसार अपने क्रिया–कलापों को ढालें।
श्री अरविंद ने स्वामी विवेकानंद के बारे में कहा है, “वे शिव के तृतीय नेत्र की कृपा के कटाक्ष थे।” तीसरा नेत्र एक बार कृपा की दृष्टि से थोड़ा−सा झुक जाए, उसे कहते हैं कृपा कटाक्ष। विवेकानंद के बारे में यह कहा जाता है कि सप्तर्षियों में से एक सत्ता उनके रूप में अवतरित हुई थी। चाहे जो शक्तियाँ आएँ, उनके पीछे होती है ईश्वर की महा करुणा, ईश्वर की अपने संतानों के बीच जाने की अदम्य इच्छा। परमपूज्य गुरुदेव ने स्थान−स्थान पर लिखा है, “मैं आना नहीं चाहता था, पर मुझे धकेला गया है। सृष्टि की संचालक सत्ताओं ने मुझे इस धरती पर विशेष काम करने के लिए भेजा है।”
जुलाई 1969 (पृष्ठ 65) की अखण्ड ज्योति के संपादकीय में पूज्यवर लिखते हैं, “युग की परिवर्तन अवश्यंभावी है। हमारा छोटा−सा जीवन इसी की घोषणा करने, पूर्व सूचना देने के लिए है। हमने अपना सारा जीवन महाकाल के इस महान् प्रयोजन में सम्मिलित होने के लिए, प्रबुद्ध आत्माओं को निमंत्रण देने में लगा दिया। जिस काम के लिए हम आए थे, पूरा होने को है। अगला काम स्वयं महाकाल करेंगे।” अवतार का प्रयोजन क्या है, रहस्य क्या है, इसे पूज्यवर ने जून 1967 (पृष्ठ 17) की अखण्ड ज्योति में इस तरह दिया है, “भगवान् की अनेक शक्तियाँ हैं। उनके प्रयोजन, विधान, स्वरूप एवं प्रकरण भी अनेक हैं। जड़−चेतन जगत् के विविध क्रिया–कलापों को चलाने एवं बनाने−बिगाड़ने के संदर्भ में अनेक तथ्य जब सामने आते हैं, तो उनको सुव्यवस्थित कैसे रखा जाए, इस समस्या को हल करने के लिए भगवान् अपनी शक्ति को अनेक भागों में विभक्त करके अंशावतार के रूप में अनेक आत्माओं को जन्म देता है। यही अवतारों का रहस्य है। समय−समय पर भगवान् की अनेकानेक शक्तियाँ अनेक प्रकार की आवश्यकताओं एवं अव्यवस्थाओं को हल करने के लिए अवतरित होती रहती हैं।”
अवतार एक जहाज, एक जादूगर
श्रीरामकृष्ण परमहंस कहा करते थे, “सामान्यजन जिनने बैरागी का चोला तो पहन लिया है, साधु−महात्मा भी कहलाते हैं, सड़ी लकड़ी की तरह हैं, जो किसी भी नाली में फँस जाती है। सड़ी लकड़ी पानी में बहते−बहते फूल जाती है और अटक जाती है, पार ही नहीं हो पाती। अवतार एक बड़ जहाज की तरह है, जो सारी नदी−समुद्र का चक्कर लगाकर कइयों को पार उतारकर आता है।” जरा−सी सिद्धि आते ही अपने मद में फूलने वालों की तुलना ठाकुर श्री रामकृष्ण ने सड़ी लकड़ी से की है। अवतार कितनी बड़ी शक्ति है, इस उदाहरण के इसलिए समझना जरूरी है कि आज के इस कलियुग में ढेरों अवतार भगवान् दिखाई देते हैं। एक और उदाहरण रामकृष्ण दिया करते थे, “अवतार की प्रक्रिया एक जादूगर के खेल की तरह है। वह आता है गाँव में जादू दिखाने, कई गाँठें लगी रस्सी को लेकर। कहता है सभी से खोलो। लोग खोल नहीं पाते, और उलझ जाते हैं। जादूगर तब हवा में रस्सी फेंकता है एवं सभी गाँठें खुल जाती हैं।” वे कहते थे कि अवतार भी ऐसे ही हमारी जन्म−जन्माँतरों की गाँठों की रस्सियों को लेकर आता है एवं एक क्षण में खोल देता है। इसीलिए सद्गुरु को, अवतार को प्रारब्धों को बदलने की, भूतकाल को बदलने की क्षमता से संपन्न बताया जाता है। गुरु और अवतार एक साथ हों तो कार्य और आसान हो जाता है। जो कार्य हम अपने पुरुषार्थ से नहीं कर सकते, वह कार्य अवतार− सद्गुरु कुछ ही क्षणों में कर दिखाता है। हमारा प्रारब्ध बदल देता है।
भगवान् अवतार क्यों लेते हैं, यह सातवें−आठवें श्लोक में स्पष्ट करते हैं−
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मनं सृजाम्यहम्॥ 4/7 परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥ 4/8
“हे अर्जुन! जब−जब संसार में धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब−तब मैं साकार रूप से अपने आपको प्रकट करता हूँ। साधु पुरुषों की रक्षा और दुष्कर्मियों (पाप कर्म करने वालों) के विनाश तथा धर्म की अच्छी तरह संस्थापना करने के लिए मैं अपने आपको युग−युग में प्रकट करता हूँ।”
संभवामि युगे−युगे
चीनी का धर्म जिसके कारण से वह चीनी है और जिसके बिना वह चीनी नहीं रहती, उसकी मिठास ही है। उष्णता अग्नि का धर्म है और प्रकाश सूर्य का धर्म है। इसी प्रकार मनुष्य का धर्म है उसके अंदर निहित दिव्यता, आत्मा की उत्कृष्टता। यही बाहर विभिन्न गुणों के रूप में अभिव्यक्त होती है। प्रेम, ईमानदारी, क्षमा, प्रसन्नता, सज्जनता के रूप में अभिव्यक्त मूलभूत दिव्यता का जब ह्रास होने लगे तथा अत्याचार, झूठ, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, छल−कपट, घृणा जैसी पाशविक प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगें, तो पुनः धर्म की परिचायक सत्प्रवृत्तियों की स्थापना करने हेतु भगवान स्वयं को प्रकट करते हैं, यह यहाँ बताया है (तदाऽऽत्मनं सृजाम्यहम्)।
इसी बात को तुलसीदास जी ने “जब−जब होहि धरम की हानी, बाढ़हि असुर अधर्म अभिमानी” के रूप में निरूपित किया है। सर्वशक्तिमान भगवान् का जीव−जगत् के कल्याण के लिए मनुष्य देह धारण कर आना, प्रकट होना संसार के आध्यात्मिक इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना है। प्रत्येक अवतार में धर्म−संस्थापन की पद्धति भिन्न−भिन्न प्रकार की होती है। देश, काल और प्रयोजन के अनुसार कार्य की प्रणाली बदल जाती है। अवतार का अर्थ ही होता है, नीचे उतरना। अवतार में दिव्य चैतन्य की अभिव्यक्ति के हमें निरंतर दर्शन होते रहते हैं। अवतार में तो दिव्यसत्ता का भान होता है, पर उनका प्रसंग अवतार के साथ आगे कहीं लेंगे। अवतार की चर्चा तो यहाँ जिस संदर्भ में चल रही है, उसे समझ लेना जरूरी है।
अवतार आखिर क्यों?
जब ईश्वरीय सत्ता के कृपा−कटाक्ष से ही सारी व्यवस्था संभव हो पा रही है, उनकी इच्छा मात्र से ही सृष्टि का कार्य चल रहा है, तो उनकी आवश्यकता क्यों? यह बात भगवान् ने आठवें श्लोक में स्पष्ट की है, यथासमय दुष्कर्मियों को दंड देने और सद्पुरुषों की सहायता करने की लक्ष्यपूर्ति हेतु ही अवतार का आविर्भाव होता है। इसीलिए वे कहते हैं कि मैं “परित्राणाय साधूनाँ” तथा “विनाशाय च दुष्कृताम्” स्वयं को युग−युग में प्रकट करता हूँ “संभवामि युगे युगे।” क्यों? क्योंकि यही वह प्रक्रिया हैं, जिससे कि किसी समाज के साँस्कृतिक विकासक्रम को आगे बढ़ाया जा सकता है। धर्म की संस्थापना अवतार के संभव होने पर ही क्रिया रूप लेती है।
अवतारवाद का प्रस्तुत प्रसंग बड़ा ही रहस्यमय है। मात्र इन दो श्लोकों में एक बहुत बड़ा सिद्धाँत अनायास ही भगवान् के श्रीमुख से निकल गया है, निकला नहीं, जान−बूझकर अर्जुन के माध्यम से हम सबको बताया गया है, ताकि हम अवतार की संभावना व उसके उद्देश्य को भलीभाँति समझ सकें। एक पाश्चात्य विचारक हुए हैं अर्नाल्ड टायनबी। उनका कहना है, “संसार का इतिहास, सभ्यता तथा संस्कृति का जन्म ‘चुनौती एवं प्रत्युत्तर’ (चैलेंज एण्ड रिस्पाँस) का ही इतिहास है। मानव को सृष्टि के आरंभ से ही चुनौती मिलती रही है एवं वह उसका प्रत्युत्तर देता रहा है। तभी तो वह आज तक जीवित है। चुनौती भौतिक भी हो सकती है, सामाजिक भी, आध्यात्मिक भी। जब यह चुनौती उग्र रूप ले लेती है, तो एक संकट का जन्म होता है, तब कहीं कोई दैवीय शक्ति, निस्सहायों की पुकार सुन उनके अंदर से आत्मबल के प्रवाह के रूप में फूट पड़ती है। हम ललकार का उत्तर देते हैं। कोई करुणामय सत्ता आकर हमें संकट से बचा लेती है। यही विश्व का नियम है एवं इसी को गीता ने अवतारवाद व शेष धर्म−संप्रदायों ने पैगंबर कह दिया हैं।”
अवतरण एवं आरोहण
प्रस्तुत मत हमने अपने पश्चिम के एक विचारक का रखा। अब जरा देखे हमारे पूर्व के महान् योगी महर्षि श्री अरविंद क्या कहते हैं? ‘गीता प्रबंध’ (ऐसेज आँन गीता) में वे लिखते हैं, “अवतार का आना जो मानवजाति के अंदर भगवान् का परम लक्ष्य है, केवल धर्म का संस्थापन करने के लिए नहीं होता। क्योंकि धर्म की स्थापना को इतना बड़ा और पर्याप्त हेतु नहीं है, कोई ऐसा महान् लक्ष्य नहीं है, जिसके लिए ईसा या कृष्ण या बुद्ध को उतरकर आना पड़े। यह कार्य तो भागवत् संकल्प सिद्धि की एक सामान्य अवस्था मात्र है। इस दिव्य अवतरण के दो पहलू हैं, एक है अवतरण, मानवजाति में भगवान् का जन्म लेना, मानव आकृति और प्रकृति में भगवान् का प्रकट होना। दूसरा है आरोहण, भगवान् के भाव में मनुष्य का जन्म ग्रहण, भागवत् चेतना में उसका उत्थान। यह जीव का नवजन्म हैं, द्वितीय जन्म है। भगवान् का अवतार लेना और धर्म की स्थापना करना इसी नवजन्म के लिए होता है। यह जो दूसरा पहलू हैं, यही सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो इन दो श्लोकों की सतही व्याख्या करने वालों से अक्सर छूट जाता है। गीता की शिक्षा एक गंभीर दार्शनिक और धार्मिक सत्य है और यह कहती है कि ऐतिहासिक या पौराणिक अतिमानवों की कल्पना के जोर से या रहस्यमय तरीके से किसी को भी भगवान् घोषित कर दिया जाए। जब तक यह उच्चस्तरीय उद्देश्य न हो, तब तक न तो भगवान् का दिव्य जन्म होता है, न अवतरण होता है
सन् 1978 में एक प्रवचन में पूज्यवर ने कहा था, “मैं कौन हूँ, यह बता दूँ तो यहाँ से हर की पौड़ी नहीं, दिल्ली तक लाइन लग जाएगी। मैंने अपने ऊपर एक साधारण गृहस्थ ब्राह्मण का परदा डाल रखा है। मेरे मार्गदर्शक ने जो मुझे निर्देश दिया, मैंने वही किया है।”
अवतार का आगमन मानव प्रकृति में भागवत् प्रकृति को प्रकटाने के लिए होता है। ईसा, कृष्ण और बुद्ध की भगवत्ता को प्रकटाने के लिए होता है, ताकि मानव प्रकृति अपने सिद्धाँत, विचार अनुभव, कर्म और सत्ता को ईसा, कृष्ण और बुद्ध के साँचे में ढालकर स्वयं भागवत् प्रकृति में रूपांतरित हो जाए। अवतारों के द्वारा धर्म की संस्थापना एक प्रकार से तोरण द्वार बनाना है, जिसके माध्यम से वे स्वयं प्रवेश करते हैं और मनुष्यों को उसका अनुपालन करने को कहते हैं। प्रत्येक अवतार मनुष्यों के सामने अपना ही दृष्टांत रखते हैं, अपने आप को ही एक मात्र मार्ग बताते हैं।
‘अवतार’ की व्याख्या पूरी तरह समझ में तब तक नहीं आ सकती, जब तक कि गीता के अन्य अध्यायों के अन्य श्लोकों के साथ उसका संबंध न समझ लिया जाए। पहले तो तीसरे से चौथे अध्याय में, जो एकदम विषय परिवर्तन आया है, उस पर चलें। तीसरे अध्याय के अंतिम श्लोक में भगवान् ने कहा है, “हे अर्जुन! तू कामरूपी दुर्जय शत्रु की जो हम चर्चा कर चुके (विगत किश्तों में) उनसे बचाकर ऊँचा उठाने का कार्य अवतार ही करता है। इसीलिए चौथे अध्याय में मानव की सबसे बड़ी त्रासदी एवं समाज की सबसे बड़ी दुर्घटना अनाचार का बढ़ना, सज्जनों का घटना बताया गया है व इन सबका उपचार है, अवतार का प्रकटीकरण। एकदम से विषय बदला है, पर समझ में आ जाए, तो अच्छा है कि क्यों बदला है। इसी प्रकार नवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में भगवान् कहते हैं, “मूढ़ लोग मानुषीतन में निवास कर रहे मुझको, समग्र भूतों के महान ईश्वर को तुच्छ समझकर तिरस्कृत करते हैं, क्योंकि वे मेरे सर्वलोक महेश्वर परमभाव को नहीं जानते (अवजानन्ति माँ मूढा मानुषी तनुमाश्रितम्.....)।” इन विचारों को सामने रखकर यदि हम भगवान् के दिव्य जन्म और दिव्य कर्म के मर्म को समझ सकें, तो ठीक रहेगा।
एक जगह गीता कहती है, “ईश्वर सब प्राणियों के हृदय क्षेत्र में निवास करते हैं और सबको माया से यंत्रारुढ़वत् चलाते रहते हैं।” (18/61)। यदि यदि ऐसी बात है, तो हम यह कैसे मानें कि ईश्वरीय चेतना किसी और रूप में, प्रत्यक्ष रूप में अपने विरुद्ध कार्य करने आती है। इसका उत्तर श्री अरविंद देते हुए कहते हैं, “भगवान् का अवतरण इसलिए होता है कि मनुष्य और उनके बीच के परदे को फाड़कर दिखाया जीवनभर उठा तक नहीं सकता।”
भागवत् नेता होते हैं अवतार−अवतार शब्द का अर्थ है उतरना। यह भगवान् का उस रेखा के नीचे उतर आना है, जो भगवान् को मानव जगत् या मानव अवस्था से अलग करती हैं। “संभवामि युगे−युगे” के माध्यम से भगवान् ने अर्जुन को, जो मानवजाति का एक श्रेष्ठतम नमूना है, विभूति है, बताया है कि तुम्हारे अंदर मैं वह दिव्य भाव प्रकट कर रहा हूँ, जिसमें प्रवेश कर तुम ऊपर उठ सकते हो। यह तभी संभव है, जब अपनी सामान्य मानवता के अज्ञान और सीमाबंधन को पारकर तुम मुझे अच्छी तरह समझ लो।
श्री अरविंद ने और एक स्थान पर खा है, “अवतार ऐंद्रजालिक जादूगर बनकर नहीं आते, प्रत्युत मानवजाति के भागवत् नेता और भागवत् मनुष्य के एक दृष्टांत बनकर आते हैं।” कितनी स्पष्ट व्याख्या हैं, अवतार की। कुछ जटिल शब्दावजी में हमने अब तक अवतारवाद की, इस शब्द की व्याख्या की है। अब बड़े सरल शब्दों में ‘अवतार’ की अवधारणा पर पूज्यवर गुरुदेव का चिंतन देखें। अखण्ड ज्योति का अगस्त 1979 का अंक प्रज्ञावतार विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ था। उसमें पूज्यवर लिखते हैं, “यदा−कदा ऐसी परिस्थितियाँ हर युग में आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने पराक्रम को भारी देखते हैं और विपन्नता से लड़ते−लड़ते भी सत्य परिणाम की संभावना को धूमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता है और पासा पलटने जैसी असंभाव्य को संभव बनाने वाली परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है। सदा से विषम वेलाओं में ऐसा ही चलता रहा है। भविष्य में भी यही क्रम चलेगा।”
अवतार का प्रयोजन−प्रकटीकरण−आगे परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं, “मनुष्य का पौरुष जहाँ लड़खड़ाता है, वहाँ गिरने से पूर्व ही सृजेता के लंबे हाथ असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए अपना चमत्कार प्रस्तुत करते दिखाई पड़ते हैं। यही है स्रष्टा का लीला अवतरण प्रकटीकरण।” (पृष्ठ 5)। इसी प्रकार पृष्ठ 7 पर वे लिखते हैं, “व्यापक शक्तियाँ सूक्ष्म और निराकार होती हैं। उनका कार्यक्षेत्र अदृश्य जगत् है। परब्रह्म की अवतार सत्ता युग संतुलन को सँभालने−सुधारने के लिए आती हैं। यह कार्य वह उनसे कराती है, जिनमें दैवतत्त्वों का चिरसंचि बाहुल्य पाया जाता है।”
परमपूज्य गुरुदेव ने मनुष्य जिसकी चेतना विकसित है, को तीन श्रेणियों में बाँटा है। संत, सुधारक और शहीद। उनने लिख है कि जब समाज में इन तीनों का अनुपात−वर्चस्व बढ़ने लगे, तो समझना चाहिए कि सूत्र−संचालक अवतारी सत्ता प्रकट होने जा रही है। ‘संतों’ को उनने सज्जनता−ब्राह्मणत्व के पर्याय तथा चरित्र एवं आचरण से उपदेश देने वाला बताया है। ‘सुधारक’ इससे ऊँची स्थिति है, जिसमें पात्र आत्मनिर्माण की तपश्चर्या ही नहीं पर्याप्त होती वरन् वे दुष्टाचरण−कुरीतियों से जूझते भी हैं। वे ब्राह्म−क्षात्र अपनाते हैं। ‘शहीद’ वे जो ‘स्व’ का ‘पर’ के लिए समग्र समर्पण कर दें। समर्पण−शरणागति−अहं का विसर्जन कर वे आत्मदानी बन जाते हैं। इन तीनों वर्णों के अनुपात में वृद्धि को पूज्यवर ने अवतारी चेतना के प्रकटीकरण का प्रमाण माना है।
इस प्रसंग को अगले अंक में “जन्म कर्म च में दिव्यम्” की व्याख्या के साथ आगे बढ़ाएँगे। बड़ा ही रोचक तत्त्वदर्शन है। समझ में आ जाए तो व्यक्तित्व में भूचाल लाकर दिखा देगा ।
रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि यदि तुम गाँव में जाओ, यात्रा में जाकर देखो, तो तुम्हें वहाँ एक कलाकार मिलेगा, जो सभी का अभिनय कर लेता है। मोनोएक्ट प्ले में वह माहिर होता है। मैं इस पति की स्त्री हूँ, मुझे ही समझ लो, कहकर माथे पर घूँघट डाल लेता है। ठाकुर इतना कहकर खुद अभिनय करके दिखाते थे वह कहते थे कि यही अवतार है। परदा जो डाल लिया, यह माया है। परदा हटा दिया, तो पहचान लिया कि मैं कौन हूँ। जो राम था, कृष्ण था यही रामकृष्ण होकर आया है।
चाहे आधुनिक साइबर क्राँति हमें कहीं−से−कहीं पहुँचा दे, ई−मेल व ई−चैट आदि के माध्यम से संचार क्राँति की बात कही जा रही हो, अपनी भाषा में हाथ से लिखी चिट्ठी जो डाकिया लेकर आता है, की बात कुछ और ही है। ई−मेल में चाहे आप कितनी भाव−संवेदना उड़ेल दें, उसमें याँत्रिकता की गंध तो रहेगी ही। परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी ढेरों चिट्ठियों से अगणित परिजनों को इतना आत्मीय बना डाला कि वे उनके लिए सब कुछ करने को तैयार हुए। पत्रलेखन एक कला भी है एवं लेखन विधा में इस बड़ा ऊँचा स्थान प्राप्त है। जिस परमभाव में प्रवेश कर हमारी गुरुसत्ता पत्र लिखा करती थी एवं वह जब शिष्य के पास पहुँचता था, तो उसका आनंद वही जानता था। लोग चिट्ठी लिखकर प्रतीक्षा करते रहते, कभी देरी नहीं होती, समय पर व कभी−कभी भौगोलिक दृष्टि से असंभव प्रतीत होने वाले समय में भी चिट्ठियाँ आ जातीं। अपने प्रिय−आत्मीय परिजन की हर वैयक्तिक, पारिवारिक, साधनात्मक, सामाजिक उलझन−ऊहापोह में गुरुसत्ता की भागीदारी रहती थी। क्या पत्र लेखन की विधा भी एक संगठन खड़ा कर सकती है? यह प्रश्न जब भावी शोधकर्त्ताओं−अन्वेषकों के समक्ष आएगा, तो निश्चित ही वे पूज्यवर के पत्रों को उस कसौटी पर खरा पाएँगे।
हम इस स्तंभ में कई तरह के वैविध्यपूर्ण ढंग से परामर्शपरक अथवा दिव्य परोक्ष मार्गदर्शन देने वाले अथवा लौकिक मार्गदर्शन वाले पत्र देते रहे हैं। उद्देश्य यही है कि इन पत्रों द्वारा हम उस परामर्श को अपने लिए भी मानकर जीवन में उतारने का प्रयास करें। गुरुकथामृत पढ़कर ढेरों पाठकों ने हमें भी पत्र लिखे हैं व अपने जीवन में आमूल−चूल परिवर्तन की बात लिखी है। होगा क्यों नहीं? उस युगऋषि के एक−एक शब्द में प्राण जो छलकता है।
पत्रों के क्रम में हम सबसे पहले एक पत्र 23/2/43 का श्री मोहनराज भंडारी के नाम लिखा हुआ ले रहे हैं। ये सज्जन ब्यावर अजमेर के निवासी हैं एवं बड़े आत्मीय भाव से पूज्यवर को 41-42 से ही पत्र लिखते रहे हैं। कभी−कभी उलाहना होता कि आप हमें भूल तो नहीं गए। पत्र का जवाब, प्रत्येक का जल्दी न मिलने पर हैरान होना स्वाभाविक था। पत्र का जवाब दिया गया−
“देखो मोहन! यह वक्त किफायत का है। हर चीज महँगी हो जाने के कारण समय की माँग है कि हर बात में खरच कम किया जाए। मंगलचंद के पास अखबार जाता ही है, उसी को पढ़ लिया करो। जो पैसा बचे, उससे एक और अखबार मँगा लो, इस तरह तुम दोनों दो अखबार पढ़ लिया करोगे। इसी तरह जब मंगीचंद पत्र भेजा करें, उसी के साथ तुम भी अपना पत्र भेज दिया करो। इसी प्रकार एक ही लिफाफे में हम भी दोनों को उत्तर दे दिया करेंगे। क्यों ठीक है न! इसमें खरच भी कम पड़ेगा और काम भी निकल जाया करेगा।”
मित्रवत् परामर्श है। द्वितीय विश्वयुद्ध की महँगाई में किस तरह जीवनयापन करना चाहिए, यह व्यावहारिक मार्गदर्शन है। इसी पत्र के आरंभ में पूज्यवर ने लिखा था, “ऐसा कभी मत सोचा करो कि हम तुम्हें भूल गए हैं या किसी प्रकार स्नेह कम हो गया है। तुम हमें अपने छोटे भाई के बराबर प्रिय हो और आगे रहोगे।”
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यह पत्र एक सिखावन है, एक लोकशिक्षण है। तब पूज्यवर की आयु रही होगी, यही लगभग 32 वर्ष की। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका निकलते हुए तीन−चार वर्ष ही हुए थे। पत्रिका ने जितने सदस्य गायत्री परिवार के या उनके आत्मीयों के नहीं बनाए, उनसे अधिक प्रेमभाव से लिखे इन पत्रों ने बनाए हैं।
सारे राष्ट्र में 2001 को ‘नारी शक्ति जागरण वर्ष ‘घोषित किया गया है। परमपूज्य गुरुदेव के इस अभियान को सात आँदोलन में इस वर्ष हम और तीव्र गति दे रहे हैं,परंतु निम्न उद्धृत पत्र तो देखिए, जो पूज्यवर ने धामपुर (बिजनौर) की काँती देवी त्यागी को 22-12-56 को लिखा था। पत्र की भाषा पढ़कर आपको लगेगा कि कौन−सा क्राँतिकारी उनके अंदर से जन्म ले रहा था। वे लिखते हैं−
“शाखा बनाने में तुम्हारा प्रभाव अवश्य ही सफल होगा। सड़े−गले विचार के कूपमंडूक दंडी मुँडी ईश्वरीय संदेश तथा सनातन तत्त्वज्ञान को रोक नहीं सकते। ऐसे लोगों का मुँह बंद करने में तुम्हारी जैसी एक ही प्रतिभाशाली महिला काफी है। सैद्धाँतिक धर्मचर्चा में तो ऐसे लोग सदा मुँह की खाते हैं। इनके प्रभाव में पड़कर अपने महिला समाज को विचलित नहीं होने देना चाहिए।”
पत्र की भाषा देखने योग्य है। 1956 का समय कैसा था, सभी जानते है। गायत्री मंत्र नारी नहीं जप सकती, न अग्निहोत्र कर सकती हैं, ऐसा वातावरण चारों ओर छाया था। ऐसे में पूज्यवर अपनी शिष्या को शक्ति देते हैं, बल देते हैं व कहते हैं कि तुम अकेली ही आगे बढ़कर ‘महिला समाज’ को गति दो।
आध्यात्मिक दृष्टि से वे समय−समय पर मार्गदर्शन देते रहते थे, उच्च विकसित कक्षा में पहुँच गई शिष्याओं को। उनमें से एक थीं अंजार (कच्छ) की केशर बहन। इनके कतिपय पत्र हम पहले भी इस स्तंभ में दे चुके हैं। यह पत्र 27-3-1967 का है। वे लिखते हैं−
“तुम्हारी आत्मा दिन−दिन ऊँची उठ रही है, इसका हमें बड़ा संतोष तथा हर्ष है। गृहस्थ में रहकर तुम संत−महात्माओं की सी तपश्चर्या कर रही हो। ऐसा साहस कोई विरले ही कर पाते हैं। तुम्हारे पुण्य से तुम्हारा सारा परिवार फलेगा−फूलेगा। तुम्हारा कल्याण होना तो निश्चित है।”
निश्चित ही इस साधिका ने बहुत प्रगति की। कइयों की प्रेरणा स्रोत बनीं व अंत में उनकी ज्योति अपनी गुरुसत्ता के साथ ही एकाकार हो गई। इस प्रकार अनेक साधिकाओं, जाग्रत् नारियों को लिखे उनके पत्रों ने न केवल उनका सतत मार्गदर्शन किया, उनके समग्र विकास में भी उनका योगदान बड़ा भारी रहा। कभी−कभी अलौकिक रूप लेकर भी पाती पहुँच जाती थी। बरेली निवासी सुश्री कमल भटनागर को एक ऐसा ही पत्र 19/8/5/ का लिखा प्राप्त हुआ।
“चि. अतुल की माताजी को साँत्वना तथा शिक्षा देने के लिए हमारी ही आत्मा गई थी। वह स्वप्न नहीं, योग निद्रा थी। ऐसी स्थिति में हम अपने आत्मीय जनों को शिक्षा एवं साँत्वना देने जाया करते हैं।”
पत्र का संकेत समझने का प्रयास करें। चि. अतुल की माताजी को स्वप्न में पूज्यवर दिखे होंगे। वे आशंकित रही होंगी, गुरुसत्ता के दर्शनों से उन्हें साँत्वना मिली, पर पत्र भी दिख दिया तो जवाब आ गया कि उनका ही सूक्ष्मशरीर उन्हें योग निद्रा के माध्यम से शक्ति देने गया था। ऐसे परोक्ष संकेत देने वाले ढेरों पत्र हमारे संकलन में हैं।
किसी भी संगठन को सींचते हैं उसके संस्थापक के प्रति श्रद्धाभरे समर्पण के पत्र−पुष्प−जल। पूज्यवर ने एक निराली परंपरा डाली कि हमें बड़े धन्ना सेठों की नहीं भावनाशीलों के अंशदान की जरूरत है। ढेरों व्यक्तियों ने अपना अंशदान समर्पित कर भाव−श्रद्धाँजलियों से गायत्री परिवार का विराट् परिकर, पाँचों केंद्रीय संस्थान तथा साढ़े पाँच हजार छोटे−बड़े शक्तिपीठ खड़े किए हैं। ऐसे भी व्यक्ति अपवाद रूप में होते थे, जिनकी सामर्थ्य अधिक थी। कुछ अधिक करने की ताकत भी थी तथा इच्छा भी रखते थे। उनके समर्पण को भी पूज्यवर ने स्वीकार किया। गायत्री परिवार के एक आधारस्तंभ पूज्यवर के अनन्य शिष्य जबलपुर वासी री दानाभाई उन्हीं में से एक हैं। उन्हीं को लिखा एक पत्र यहाँ उद्धृत है।
“हमारे आत्मस्वरूप, 1-5-67
आपका पत्र और चैक मिला। आपकी श्रद्धा अनुपम है। राणाप्रताप के मिशन को भामाशाह ने और गाँधी जी के मिशन को जमनालाल बजाज ने सींचा था। यदि यह सहयोग न मिलता, तो दोनों उतना काम न कर पाते, जो उन्होंने किया। युग निर्माण मिशन का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें आपकी श्रद्धा और अनुपम त्याग की पग−पग पर चर्चा होगी।”
श्री दानाभाई ने युग निर्माण विद्यालय गायत्री तपोभूमि मथुरा के छात्रावास का निर्माण भी कराया था व सारा खरच भी वहन किया था। इस सारे प्रयास की प्रशस्ति की बात लिखते हुए पूज्यवर अपने भाव इस प्रकार व्यक्त करते हैं−
“आपकी श्रद्धा ही गायत्री तपोभूमि की सुगंधित वाटिका बनकर संसार में शाँति और धर्म−ज्ञान का, कल्याण का अनुदान बिखेरेगी।”
जिस गुरुसत्ता ने जीवनभर औरों को बाँआ−ही−बाँटा, किसी का कुछ उधार अपने पर न रखा, उसके मन में एक ही वेदान थी कि उनके द्वारा आरंभ किया हुआ कार्य आगे हजारों वर्ष तक चलता रहे। ऐसे प्राणवानों में उनने प्राण फूँके एवं उन्हीं के भावभरे समर्पण का चमत्कार है कि मोती की लड़ियों के बने हार की तरह एक गायत्री परिवार आज सक्रिय−जीवंत एवं दिन−प्रतिदिन और बढ़ता दिखाई देता है। श्री दानाभाई अपनी पत्नी लक्ष्मी बेन के देहावसान के बाद डेढ़ वर्ष पूर्व ब्रह्मकालीन हो गए, पर उनका नाम युग निर्माण के इतिहास में अमर हो गया। यही तो वह निधि है,
जिसके बलबूते हम उनके नन्हें−नन्हें अनगढ़ से अनुचर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय जैसे विराट् निर्माण की बात उनकी ही सूक्ष्म−कारण शक्ति के बल पर कह देते हैं। लगभग डेढ़ सौ करोड़ की लागत का निर्माण कैसे होगा, यह लौकिक स्तर पर नहीं, परोक्ष के स्तर पर सक्रिय सत्ता पर आरोपित कर सोचा जाए, तो कुछ भी असंभव नहीं। पत्रों की यह पुष्पमाला गुरुसत्ता के लीला−संदोह का वर्णन इसी तरह करती रहेगी। जन−जन को उनके उस स्वरूप का बोध कराती रहेगी, जिसने वर्तमान वट−वृक्ष का बीज बोया, सींचा व इतना बड़ा करके दिखाया।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवतारी सत्ताओं की माया के विषय में लिखा है, “माया हास बाहु दिक्पाला।” वे दिग्पाल की तरह विराट् होते हैं। उनकी हँसी भी माया का जाल है, माया का परदा है। अवतार इसी तरह अपने बारे में की गई चर्चा को हँसी के ठहाकों में उड़ा देते हैं। तुलसीदास जी ने यह भी लिखा है, “सो जानहिं जेहि देहु जनाई, जानत तुमहि तुमहि होई जाई।” अगर तुम को जान लिया, फिर तुम्हारा होने में कोई कठिनाई नहीं, पर तकलीफ यही है कि हु जीवनभर नहीं जान पाते कि अवतारों के संग हम चले, फिर भी हम जाननहीं पाए। इस उद्धरण में द्वितीय पंक्ति गायत्री चालीसा में भी आई है। हम भी थोड़ा आत्मचिंतन करें, अपनी आराध्यसत्ता के सत्ता के विषय में।
आज की सबसे बड़ी चुनौती है पर्यावरण का प्रदूषण। अतिशय सुविधा पाने की अदम्य लालसा का ही प्रतिफल है कि आज चारों ओर प्रदूषण से भरा पर्यावरण दिखाई देता है। औद्योगीकरण, शहरीकरण तथा सीमेंट कंग्रीटीकरण ने वनों के कवच को क्रमशः समाप्त किया एवं बढ़ती हुई आबादी ने उसमें घी की आहुतियाँ दीं। पिछले दिनों का ऋतु विपर्यय हम सभी को एक चेतावनी देता हुआ आया है कि यदि अभी भी हम न संभलें, तो महाविनाश सुनिश्चित है।
इस समय सबसे बड़ा संकट जो राष्ट्र के सामने आ खड़ा हुआ है, वह है सूखे का, दुर्भिक्ष का जो पूर्वी तट बंगाल की खाड़ी से लगे उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश राजस्थान से लेकर गुजरात के अधिसंख्य भाग सौराष्ट्र−कच्छ में बड़ भीषण रूप में प्रस्तुत होते जा रहा है। मानसून की वर्षा पर निर्भर भारतवर्ष से इन दिनों मौसम देवता बहुत नाराज चल रहे हैं। रौद्र प्रकृति यों तो सारे विश्व में कुहराम मचाए हुए है, हमारे इस विकासशील कृषिप्रधान देश में इसका प्रकोप कुछ ज्यादा ही है। आँध्रप्रदेश से लेकर पंजाब तक किसानों के द्वारा आत्महत्या करने का क्रम जारी है। यह एक चेतावनी है, खतरे की लाल झंडी है। हर वर्ष सूखा आता है, समुद्री तूफान आते हैं एवं आसाम, पूर्वी उत्तरप्रदेश एवं बिहार में बाढ़ का कहर बरपता है। जितना हम आगे बढ़ते हैं, उतने ही पीछे हटते जाते हैं। और देश न जाने कहाँ−से−कहाँ पहुँच गए, हम वहीं हैं, अब तो ऐसा लगने लगा है कि वैश्वीकरण की होड़ में कहीं हमारा मूल स्रोत कृषि संपदा ही दाँव पर न लग जाए। ‘लाँग टर्म’ उपचार सोचे जाने चाहिए, सोचे जा रहे हैं, पर उनके पीछे मिशनरी उत्साह वाला प्रेरक बल नहीं है। करोड़ों−अरबों रुपयों की राशि बती चली जा रही हैं।
आइए। निगाह वर्तमान संकट पर दौड़ाएँ। गायत्री परिवार एक अशासकीय स्तर पर बिना शासन की वित्तीय सहायता के कार्य करने वाला सबसे बड़ा समाज निर्माण को, आध्यात्मिक चेतना के विस्तार को समर्पित संगठन है। इससे सभी को आशाएँ हैं। हमारे बहुत से परिजन इस क्षेत्र में निवास भी करते हैं। हमें क्या करना चाहिए, यह अधिकांश परिजन विभिन्न प्राँतों से अक्सर पूछते रहते हैं। इस युगधर्म सोचे हैं, जो सूखे की इस दावग्नि में कुछ तो बूँदें बरसाएँगे, कुछ तो राहत देंगे।
श्रूमप्रधान राहत कार्य
इसमें गाँवों के तालाबों को गहरा करना, सामूहिक श्रमदान की प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर राहत कार्यों में सही व्यक्ति तक उसका मूल्य पहुँचाना तथा जल व मिट्टी के संरक्षण, जल की भूमि पर खेती (जलागम विकास) जैसे प्रयास आते हैं। यह कार्य 2700 जलागम क्षेत्रों के लिए गायत्री परिवार ने 1991 में हाथ में लिया था। पर शासकीय स्तर पर असहयोग व जलागम दीपयज्ञ का झुनझुना हाथ में थमाकर शासन ने पल्ला झाड़ लिया। यदि यह उस गति से चलता, जैसा कि तत्कालीन केंद्रीय सचिव महोदय ने परिकल्पना की थी, तो आज जो संकट दिखाई देता है व सभी के मुख पर ‘वाटर हारवेस्टिंग‘ की बात चल रही है, यह लगभग पूरी हो गई होती। जब इसे नए सिरे से अपने ही प्रज्ञा संस्थानों, परिजनों को मिशनरी स्तर पर हाथ में लेना होगा। कैसे करें, उसके लिए शाँतिकुँज के रचनात्मक प्रकोष्ठ से संपर्क करें।
(2) साधनप्रधान योगदान
हम मध्यवर्ग, निम्न मध्यमवर्ग के सभी परिजन हैं। यदि मात्र अखण्ड ज्योति के पाठक प्रति सप्ताह एक समय का भोजन न लें, व्रत रखें व उसकी राशि संकलित करें, तो कितना बड़ा कोष खड़ा हो जाएगा, इसकी कल्पना करें, एक माह में 4 बार के भोजन की बचत। यदि पाँच रुपया न्यूनतम भी एक समय का भोजन मानें, तो बीस रुपये प्रतिमाह। दो सौ चालीस रुपया प्रतिवर्ष। यदि उसका साढ़े छह लाख पाठकों की संख्या से गुणा कर दिया जाए, तो यह राशि दो करोड़ पैंसठ लाख रुपये बैठती है। एक वर्ष में मात्र अखण्ड ज्योति के परिजन इतनी राशि संग्रह कर सकते हैं। यदि प्राणवान्−निष्ठावान्, दीक्षित, शुभेच्छु, सहयोग प्रायः पाँच करोड़ रुपये बैठती है। क्या इतना हम नहीं कर सकते कि एक प्रामाणिक तंत्र जिला स्तर पर खड़ा करें एवं परिजनों के संग्रह की राशि जमा करते चले एवं जहाँ दैवी आपदाओं में राहत राशि−अन्नदान−जल व्यवस्था−बीज आदि की व्यवस्था की जरूरत हो, केंद्र के मार्गदर्शन में उसका नियोजन करते चलें। जिलास्तरीय संगठन केंद्र द्वारा ही नामित होंगे व यहाँ का दैवी आपदा प्रबंधन तंत्र सारा क्रम हाथ में लेगा, पर सूचनाएँ एकत्र करना व वितरण करने का कार्य तो परिजनों को ही करना है। पारदर्शी तंत्र बने, इसका ध्यान सभी को रखना है, नहीं तो चंदा एकत्र करने वालों की आडंबरी भीड़ से पल्ला छुड़ाना मुश्किल हो जाएगा।
(3) साधनाप्रधान प्रयोग
उपचार−अध्यात्म तंत्र के अंग होने के नाते हम अपनी साधना में दैवी विभीषिकाओं के निवारण हेतु अतिरिक्त जप तो करें ही, सबके, उज्ज्वल भविष्य की सद्भावपूर्वक प्रार्थना भी साथ जोड़े। वरुण गायत्री मंत्र से यदि दैनिक या साप्ताहिक अग्निहोत्र, बलिवैश्व आदि आहुतियाँ समर्पित की जा सकें, तो इसके सकारात्मक परिणाम
निश्चित ही निकलेंगे। मंत्र इस प्रकार है−
ॐ जलबिम्बाय विद्महे, नीलपुरुषाय धीमहि। तन्नो वरुणः प्रचोदयात् स्वाहा। इदं वरुणाय इदं न मम।
ध्यान रखे कि इसके लिए कहीं भी किसी को बड़े यज्ञ करने की जरूरत नहीं है। जो नियमित यज्ञ−अग्निहोत्र चलता है, उसी में इन आहुतियों को भी जोड़ लें। परमसत्ता से प्रार्थना है कि वह इस दैवी आपदा को ठीक करने में मानवी पुरुषार्थ की सुनवाई अवश्य करेगा।
विशिष्ट क्रम, विशिष्ट प्रशिक्षण केंद्र में भी, क्षेत्र में भी
“ब्रह्ममुहूर्त में साधक और तपस्वी जाग जाते है और उस पुण्य वेला में साधनारत होते हैं, जबकि विषयी लोग इसी समय अधिक गहरी नींद का मजा ले रहे होते हैं। इन दिनों ब्रह्ममुहूर्त है। असुरताभरी तमसाच्छन्न निशा का अब अंत होने जा रहा है और उसके स्थान पर ज्योतिर्मय प्रभात के उदय की संभावनाएँ उग जाती हैं। यह संधिकाल प्रभात की ऊषा लेकर आया है। मंदिरों में शंख−निनाद हो रहा है कि सजग आत्माएँ जगें और अपने पुनीत धर्म−कर्त्तव्यों में संलग्न हों। युग निर्माण योजना एक शंख−निनाद है, जो संस्कारी व्यक्तियों को जगाने और उन्हें प्रभातकालीन कर्त्तव्यों में जुटने का उद्बोधन कर रहा है। “ परमपूज्य गुरुदेव ने ये पंक्तियाँ अखण्ड ज्योति के अगस्त 1969 (विचार क्राँति विशेषाँक) के प्रारंभिक लेख में लिखी थीं। इन्हें बार−बार पढ़ना और अपने आपको सुनाना चाहिए, ताकि हम उस विशिष्ट भागवत् मुहूर्त को पहचान सकें, जो हमारे समक्ष आकर खड़ा हुआ है।
उज्ज्वल भविष्य की वेला आ पहुँची− युग चेतना के अभ्युदय की हीरक जयंती का वर्ष आ पहुँचा। बारहवर्षीय
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की तरह चल रहा एक विराट् साधनात्मक महापुरुषार्थ संपन्न हो गया और हम सबके लिए एक वातावरण बनाया गया। 1989 से लेकर वसंत पर्व 2001 तक चले इस विशिष्ट अभियान के फलितार्थ क्या होंगे, इसे परमपूज्य की लेखनी से जानने का प्रयास करें, तो अच्छा रहेगा। यह उपर्युक्त चिंतन अगस्त 1969 विशेषाँक के पृष्ठ 17 से उद्धृत हैं। “हम सुषुप्ति की स्थिति में पड़ी हुई राष्ट्र चेतना को कुँभकरणी निद्रा से जगाने का प्रयास करेंगे। विश्वास है कि अगले दिनों राष्ट्र जगेगा और अँगड़ाई लेता हुआ उठ खड़ा होगा। जिस दिन यह महादैत्य जगेगा, उस दिन दसों दिशाएँ काँप उठेंगी। उसके पास अध्यात्म, तत्त्वज्ञान, शौर्य, साहस, विज्ञान एवं संपन्नता की इतनी अधिक परंपरागत पूँजी विद्यमान है, जिसके बल पर विश्व की अद्भुत−अनुपम शक्ति बनकर रहेगा। सर्वश्रेष्ठता से परिपूर्ण हमारा प्राचीन इतिहास है। अब उज्ज्वल भविष्य भी ऐसा होने जा रहा है, जिसमें कि हम प्रत्येक क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व, मार्गदर्शन एवं सहयोग कर सकने में समर्थ हो सकें।”
ईश्वर ही है इस घड़ी का नियंता
पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि एक ऋषि−योगी की भी लेखनी बीसवीं सदी के प्रारंभ में इसी तरह की आग उगलने लगी थी। श्री अरविंद जो आय. सी. एस. परीक्षा में जान−बूझकर अनुत्तीर्ण हो भारत आए एवं ‘वंदेमातरम्’ पत्र से क्राँतिकारियों को दिशादर्शन देने लगे। उनके तत्कालीन लेखों का संकलन ‘पश्चिम के खण्डहरों में से भारत का पुनर्जन्म’ मीरा अदिति सेण्टर मैसूर द्वारा हिंदी में 1994 में प्रकाशित हुआ है। उनके विचार परमपूज्य गुरुदेव के चिंतन के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने योग्य हैं। जुलाई 1979 को अपने लेख में वे लिखते हैं, “विशेष युगों में कुछ विशेष आँदोलन होते हैं, जब ईश्वरीय शक्ति अपने आपको प्रकट करती है और अपनी चरम शक्ति से मानवजाति के सारे आकलनों को तहस−नहस कर देती है। सावधान राजनेता और योजनाएँ रचने वाले कूटनीतिज्ञों की बुद्धिमानी का मजाक बना देती है। वैज्ञानिक विश्लेषण करने वालों के पूर्वानुमानों को वह झूठा बना देती है और जितनी प्रचंडता और तीव्र गति से वह आगे बढ़ती है, उससे उसका मानवातीत−अलौकिक शक्ति होना स्पष्ट रूप से प्रकट होता
चला जाता है। बौद्धिक व्यक्ति बाद में उस आँदोलन के कारण ढूँढ़ निकालने का और उन तत्त्वों को उजागर करने का प्रयास करता है, जिन्होंने उसे संभव बनाया, किंतु उस समय वह सरासर गलत होता है, प्रत्येक पग पर अच्छी बुद्धि भूल कर बैठती है और उसका विज्ञान काम नहीं करता। यही वह समय है जब हम कहते है कि इस आँदोलन में ईश्वर का हाथ है। वही उसका नेता है और उस अपना उद्देश्य पूरा करना ही है, चाहे मनुष्य के लिए उन साधनों को समझना कितना ही असंभव क्यों न हो, जिनसे उसे सफलता मिलेगी।” (पृष्ठ 57)
दो युगों की मध्याँतर वेला
कलकत्ता में रह रहे श्री अरविंद के प्रसिद्ध उत्तरपाड़ा भाषण के बाद यह लेख ‘कर्मयोगिन’ (अँग्रेजी दैनिक) में प्रकाशित हुआ था। उसने उनके द्वारा की गई उस भविष्यवाणी को और मजबूती प्रदान की, जिसमें उनने कहा था कि 1836 में ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस के जनम के साथ ही उस युग का सतयुगी समय आरंभ हो गया है। भारत को सारे विश्व का नेतृत्व करना है। मात्र थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी, क्योंकि दो युगों की मध्याँतर संधि वेला 175 वर्षों की होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस अवधि के, जो नानाप्रकार के उतार−चढ़ाव, क्राँतिकारियों की कीर्तिगाथाओं, भारत की आजादी के लिए किए गए अनवरत प्रयासों, योद्धा स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, रमण महर्षि, परमपूज्य गुरुदेव के आविर्भाव तथा विश्व−वसुधा को रक्तरंजित कर देने वाले दो विश्व युद्धों, छोटे−बड़े प्रायः दो हजार युद्धों एवं वैज्ञानिक क्राँति की उपलब्धियों भरे क्षणों से युक्त रही है, अब मात्र अंतिम दस वर्ष बाकी हैं। 165वाँ वर्ष चल रहा है एवं यही अंतिम दस वर्ष नवयुग के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाएँगे।
ऐतिहासिक हीरक जयंती वर्ष
बात उज्ज्वल भविष्य की उस ऐतिहासिक हीरक जयंती वर्ष के संदर्भ में चल रही है, जो विगत वसंत पर्व 21 जनवरी 2001 से आरंभ होकर 17 फरवरी 2002 वसंत पंचमी तक संपन्न होने जा रहा है। महापूर्णाहुति शानदार ढंग से संपन्न हुई, अब इस वसंत से इसका अनुयाज भी आरंभ होना है। लाखों− करोड़ों साधकों− गृहस्थों ने जीवन−साधना के सूत्र विगत वर्षों में अपने जीवन में अंगीकार किए एवं एक नए अध्याय में सप्त आँदोलनों की सक्रियता के माध्यम से प्रवेश किया है। जैसा कि पिछले अंक में भी बताया गया एवं प्रज्ञा अभियान ‘पक्षिक’ के पृष्ठों पर स्पष्ट किया जाता रहा है कि जीवन−साधना की धुरी पर ही ये सारे आँदोलन गतिशील हो रहे हैं। वसंत पर्व से आरंभ हुआ यह हीरक जयंती वर्ष कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है। यह परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 में प्रज्वलित अखण्ड दीपक, जो अब शाँतिकुँज में स्थित है, के 75वें, वर्ष में प्रवेश वाला वर्ष है। इसी की साक्षी में परमपूज्य गुरुदेव व शक्तिस्वरूपा माताजी के सभी महत्त्वपूर्ण निर्धारण हुए, जिनने इस मिशनरूपी वटवृक्ष को इस समुन्नत स्थिति में पहुँचाया है। परमपूज्य गुरुदेव ने उसे एक अखण्ड अग्रि−अखण्ड यज्ञ की संज्ञा दी थी। परमवंदनीया माताजी के संरक्षण में 1971 में इसे यहाँ लाए जाने के बाद से लगातार 30 वर्षों से इसके समक्ष निरंतर अखण्ड जप चलता रहा है। कितना बड़ा शक्ति का स्रोत है, इसकी कल्पना सामान्यजन नहीं कर सकते। इसे अखण्ड ज्योति पाठकों−परिजनों को गुरुसत्ता की परोक्ष उपस्थिति का द्योतक एक प्रतीक मानकर स्वयं को सौभाग्यशाली मानना चाहिए। यह वर्ष परमवंदनीया माताजी के 1926 में आश्विन कृष्ण चतुर्थी को धरती पर अवतरण के संदर्भ में उनका भी हीरक जयंती वर्ष है। परमवंदनीया शक्तिस्वरूपा माताजी ने सजलता दी, स्नेह−ममत्व के अभिसिंचन से परमपूज्य गुरुदेव के पुरुषार्थ को पूर्णता दी। नारी जागरण के एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में स्नेहसलिला माताजी उभरीं एवं 1959-60 का समय हो अथवा 1971-72 का, सूक्ष्मीकरण की वेला (1984-86) हो अथवा पूज्यवर के महाप्रयाण के बाद के चार वर्ष, उनने सतत आगे चलकर मार्गदर्शन किया है। यह वर्ष इसीलिए ‘महिला जागरण वर्ष’ के रूप में भी मिशन द्वारा मनाया जा रहा है।
तीसरा एक संयोग यह कि श्री अरविंद ने भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण के रूप में वर्ष 1923 को ऐतिहासिक माना था। उसके भी 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। सह संयोग मात्र नहीं है, युग नियंता की भागवत् योजना का ही एक अंग है, जिसमें नए सिरे से सारी धरती का भाग्य लिखा जा रहा है। दो सहस्राब्दियों के कूड़े−कचरे को साफ होने में अभी न्यूनतम बीस वर्ष लगना है, किंतु
नवसृजन आरंभ हो चुका है, इसे हर कोई देख सकता है। हर दृष्टि से यह युग वसंत है, नई सहस्राब्दी के प्रथम वर्ष में नूतन उल्लास लेकर आया है एवं वर्षभर जन−जन में नूतन प्रेरणा, शक्ति चेतना का संचार करता रहेगा।
मात्र औपचारिकता न रह जाए
और वर्षों की तरह यह वर्ष एक औपचारिकता मात्र न बनकर रह जाए, हर व्यक्ति मं नूतन प्राण फूँके एवं उच्चस्तरी आत्मिक प्रगति के सोपानों पर चढ़ने की आकाँक्षा जगा दे, यह चुनौती यह हम सबके लिए लेकर आया है। वही इसे स्वीकार कर सकेंगे, जो निज की जीवन−साधना और सृजनधर्मी पुरुषार्थ को और अधिक प्रखर बनाने की समझदारी, तत्परता एवं कौशल दिखा पाएँगे। 75 वर्ष किसी भी मिशन−संगठन के लिए प्रौढ़ता की चरमावस्था
के प्रतीक हैं। शासन की किसी भी तरह की सहायता पर आधारित न रहकर मात्र समयदान−अंशदान की पूँजी से जाग्रतात्माओं का यह संगठन जो खड़ा हुआ है, इसे अब विभूतिवानों−प्रतिभाशीलों को सृजननिष्ठ आँदोलन में नियोजित करना है। उदार अनुदान भी ऊपर से बरसेंगे, पर उन्हीं पर जो जीवन−साधना की कसौटी पर खरे उतरेंगे। जीवन−साधना चौबीस घंटे की होती है। हर क्षण भगवत्चेतनामय, हर क्षण विधेयात्मक चिंतन से ओत−प्रोत तथा सतयुगी उल्लास भरे आनंद में सराबोर रहे, ऐसी अपेक्षा हमारी गुरुसत्ता की प्रत्येक परिजन से इस वर्ष विशेष में है। हम मात्र उत्साह में औपचारिकता न बरतकर रह जाएँ, गहरे उतरें व गुरुसत्ता के चिंतन−प्रवाह में निरंतर गोते लगाते रहने का अभ्यास करें, यह अपेक्षा स्वाध्यायक्रम में हम से की जा रही हैं।
परिजनों के लिए गायत्री तीर्थ में विशिष्ट सत्रों का क्रम
(1) इसी उद्देश्य से परिजनों के लिए इस वर्ष विशिष्ट साधना सत्रों की श्रृंखला का निर्धारण किया गया है। हमारे 75 वर्ष के परिपक्व वयोवृद्ध इस संगठन के प्राणवान् वरिष्ठ कहे जाने वाले प्रज्ञापुत्रों से यह अनुरोध किया जा रहा है कि अब इस वर्ष वे अखण्ड दीपक के सान्निध्य में एक अनुष्ठान से युक्त विशिष्ट सत्र प्रतिवर्ष करते रहने का क्रम बना लें। ये प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के एकान्त साधना सत्र होंगे। इनमें साधक को एक ही कोठरी में 24 घंटे रहना होगा, मौत सहित तप के सारे उपक्रम पूरे करने होंगे, मात्र गुरुदेव को ही सुनना व पढ़ना होगा। प्रारंभिक दौर में अभी 36 कमरों में 36 साधकों के लिए 1 मार्च से 5 मार्च, 7 मार्च से 11 मार्च, 13 मार्च से 17 मार्च इस प्रकार तीन ही सत्र रखे गए हैं। इसके बाद 23 मार्च से नवरात्रि सत्र होने के कारण अलग से इन्हें चला पाना संभव नहीं होगा। बाद में ये आश्विन नवरात्रि से चैत्र नवरात्रि की छह माह की अवधि में 2001-2002 में अनवरत चलते रहेंगे। इन सत्रों के बारे में विस्तार से 1 फरवरी का प्रज्ञा अभियान पाक्षिक पढ़ें।
(2) 9 दिवसीय जीवन−साधना सत्र एवं एक माह के युगशिल्पी सत्र यथावत् चलते रहेंगे।
(3) शाँतिकुँज की बहनों का विशिष्ट प्रशिक्षण श्रद्धेया जीजी के मार्गदर्शन में आरंभ हो गया है। यही ब्रह्मवादिनी बहनें ग्रीष्मकाल के बाद शाँतिकुँज में क्षेत्र के नारी जागरण सत्रों का विधिवत् संचालन करेंगी। इनकी घोषणा समय− समय पर की जाती रहेगी। इस वर्ष मात्र केंद्र ही नहीं, क्षेत्रों में भी महिला जागरण सत्रों की श्रृंखला चले, ऐसा गुरुसत्ता का संकेत है। इसी कार्य के लिए प्राणवान् प्रशिक्षिकाओं को उच्चस्तरीय शिक्षण इस वसंत के बाद दिया जा रहा है। बाद में क्षेत्र की ओजस्वी−लोकनायक स्तर की बहनों को भी प्रशिक्षण में शामिल किया जाएगा।
(4) ग्रीष्मकाल में 16 मई से 30 जून की अवधि में 5-5 दिन के तीर्थसेवन सत्र यथावत् चलते रहेंगे।
(5) आँदोलन प्रधान एक प्रशिक्षण सत्र प्रतिमाह शाँतिकुँज में निर्धारित तिथियों में चलेंगे। ये सत्र अप्रैल, मई, जुलाई, अगस्त, सितंबर एवं अक्टूबर में छह आँदोलनों पर पृथक−पृथक आयोजित किए जाएँगे। ये भी पाँच−पाँच दिन के होंगे। चूँकि जीवन−साधना सभी आँदोलनों की धुरी में है, उसे सभी के साथ गूँथ दिया गया है। इनकी तिथियों के लिए परिजन पत्राचार कर लें।
गायत्री शक्तिपीठों−प्रज्ञासंस्थानों पर भी सत्र चलेंगे
इस वर्ष जनवरी माह में संपर्क प्रशिक्षण के लिए प्रायः साठ शक्तिपीठों का दौरा करने वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं की टोलियाँ पहुँची हैं। वे संभावनाओं को तलाशकर वसंत तक आ चुकी होंगी। अब निर्धारण यह है कि हर शक्तिपीठ, प्रज्ञा संस्थान पर, जहाँ स्थान भी है व जिनके पास संसाधन हैं, वहाँ तीन माह में एक बार दो सत्र अवश्य चलें। ये सत्र पाँच−पाँच दिन के कुछ दिनों का अंतर भी रखा जा सकता है। हमारे सभी शक्तिपीठ भागवत् चेतना के केंद्र है। क्षेत्र के कार्यकर्त्ताओं, जिले की शाखाओं प्रज्ञा, मंडलों, स्वाध्याय मंडलों एवं महिला मंडलों का उनसे संपर्क अब प्रशिक्षण स्तर पर जुड़ जाना चाहिए। यही सोचकर उस वर्ष माँग के अनुपात में कितने दल हम निकाल सकते हैं, यह देखकर मार्च 2002 से प्रति तीन माह न्यूनतम दो−दो सब दो सौ शक्तिपीठों पर आरंभ करने का मन है। प्रत्येक पीठ पर यह प्रति तीन माह के अंतर से पाँच दिन के लिए चलेंगे। 1 से 5 साधनाप्रधान चल सकता है एवं 21 से 25 आँदोलनप्रधान। यह तो मात्र नमूने के लिए लिखा गया है। तिथियाँ संगठन प्रकोष्ठ से चचौ कर तय की जा सकती हैं।
शक्तिपीठ साधना सत्र का प्रारूप
ये शिविर शाँतिकुँज के प्रशिक्षण कार्यकर्त्ताओं के मार्गदर्शन में चलेंगे। पूर्व संध्या को सभी को संकल्प दिलाया जाएगा, अतः सभी संध्या 5 बजे से पूर्व आकर अपनी पाँच दिन की रहने की व्यवस्था बना लेंगे। प्रातः चार बजे जागरण से क्रम आरंभ होगा। आरती, सामूहिक ध्यान, प्रज्ञायोग, पादुका नमन एवं सामूहिक यज्ञ तक सभी दिनों में यह एक−सा क्रम रहेगा। प्रातः 8 बजे शाँतिकुँज प्रतिनिधि द्वारा उद्बोधन होगा, 9.30 पर भोजन−प्रसाद, अपराह्न दो बजे विशिष्ट क्रियापरक गोष्ठी तथा सायं 6 से 6.14 की नादयोग साधना के बाद समाधान गोष्ठी, वीडियो संदेश, प्रज्ञा पुराण आदि का क्रम चलेगा। अपराह्न की गोष्ठी के बाद प्रतिदिन 3.30 पर सामूहिक श्रमदान तथा 5 बजे आरती होगी, जिसमें सभी भाग लेंगे। पाँचवे दिन प्रातःकाल के विदाई संदेश के बाद सभी अपने−अपने स्थानों के लिए रवाना हो सकेंगे। इस प्रकार प्रायः पाँच दिन में वे परिजन जो दूरी के कारण, छुट्टी न मिल पाने के कारण अथवा कई अन्य झंझटों में उलझे रहने के कारण शाँतिकुँज नहीं आ पाते, उसी प्राणप्रवाह से अभिपूरित हो सकेंगे, जो सुयोग गायत्री तीर्थ में आने पर मिलता। यदि उत्साह उभरा, तो प्रत्येक शक्तिपीठ एक जाग्रत् प्राणवान् केंद्र बनकर एक−डेढ़ वर्ष में प्रशिक्षण की प्रक्रिया संपन्न कर रहे होंगे। इसी तरह का एक पाँच दिवसीय सत्र आँदोलनों को गति देने की दृष्टि से प्रत्येक पीठ पर कम−से−कम तीन माह में एक बार चले, ऐसी अपेक्षा रखी गई है।
अब सब कुछ नूतन−उल्लासमय हो
वसंत नूतन उल्लास, नई प्रेरणा, पुलकन भरे प्राणप्रवाह के संचार का प्रतीक है। इस वसंत से प्रत्येक परिजन से कहा जा रहा है कि वे सूर्योदय पर सूर्यार्घ्यदान के साथ शंखनाद का क्रम अपनाएँ। सूर्योदय होते ही सभी घर के, शक्तिपीठ के मंडल के सदस्य एक साथ सूर्य को अर्घ्य दें एवं शंख ध्वनि करें। यह सभी को बताने के लिए है कि “सभी सावधान हों, नया युग आ रहा है।” हो सके तो इसके बाद प्रभातफेरी का क्रम बनाएँ। रोज नहीं संभव हो तो कम−से−कम प्रत्येक पूर्णिमा एवं अमावस्या तथा माह में पड़ने वाले पर्व पर सभी जगह उत्साहपूर्वक सूर्यार्घ्य, शंखनाद तथा प्रभातफेरी का क्रम सभी जगह चले। साधनाप्रधान एवं सातों आँदोलनों पर नए नारे, नए गीत बनाए जा रहे हैं। इस वर्ष यही नूतन उल्लास भरा क्रम सब ओर एक जैसा चले। सभी प्राणवान् परिजनों से अपेक्षा रहेगी कि हीरक जयंती वर्ष उसी उत्साह के साथ साल भर संपन्न होगा, जैसा कि ऊपर बताया गया है। बहुविधि कार्यक्रम हैं, ढेरों कार्य होना है। हमें तो बस अपने अंदर के उत्साह को जिंदा बनाए रख लगे रहना है। परिणाम निश्चित ही सुखद उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं से भरे होंगे।
कृपया ध्यान दें
‘गायत्री’ नाम से एक धारावाहिक दूरदर्शन−1 पर प्रति शनिवार 7.30 से 8.00 बजे सायंकाल अवधि में 24 फरवरी 2001 से प्रसारित होने जा रहे है। यह धारावाहिक गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार के मार्गदर्शन में परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी के परोक्ष संरक्षण में बना है। गायत्री महाशक्ति की उत्पत्ति से लेकर विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम आदि ऋषिगणों के कथानकों से गुँथ 104 श्रृंखलाओं तक चलने वाला यह धारावाहिक महापूर्णाहुति के अनुयाज की हीरक जयंती की वेला में गुरुसत्ता को ही समर्पित है।
स्मारिका अब उपलब्ध
बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण के समापन पर प्रकाशित ‘महापूर्णाहुति’ नामक स्मारिका अब गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज में उपलब्ध है। इसका विमोचन वसंत पर्व 29-1-2001 को प्रस्तावित था। इसमें गुरुसत्ता से जुड़े दुर्लभ संस्मरण एवं बारहवर्षीय साधना अभियान का सचित्र विवरण प्रस्तुत किए गए हैं। नए−पुराने हर परिजन के लिए प्रायः 224 पृष्ठों का यह ग्रंथ संग्रहणीय है। पच्चीस रुपये में यह उपलब्ध है। डाक खरच अतिरिक्त है।
आजीवन सदस्यता
अखण्ड ज्योति का वार्षिक चंदा प्रतिवर्ष भेजने में पाठकों को असुविधा होती है, डाक व्यय लगता है और चंदा विलंब से मिलने पर पिछले अंक भी उपलब्ध नहीं हो पाते। जो परिजन निरंतर अखण्ड ज्योति पढ़ना चाहते हैं, वे आजीवन सदस्यता शुल्क 900/- अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर भिजवा दें। जब तक अखण्ड ज्योति प्रकाशित होगी, उन्हें मिलती रहेगी। जो भी पिछले आजीवन सदस्य अब पत्रिका बंद करना चाहें, अपना रुपया वापस ले सकते हैं।
आशा है अधिक−से−अधिक परिजन इस योजना से लाभान्वित होंगे।
आ रही ‘हीरक जयंती’ हम पुकारे जा रहे हैं। मातृसत्ता के सपूतों को इशारे आ रहे हैं॥
मातृसत्ता के तराशा है हमें कुछ आश लेकर, अखण्ड ज्योति ने तपाया है हमें विश्वास देकर। अगर हीरा बन गए हैं, तो समय अब आ गया है, मातृसत्ता के लिए हीरे सँवारे जा रहे हैं॥
हमारा व्यक्तित्व, हीरों सा चमकना चाहिए ही, औ अनगढ़ भीड़ में, हमको दमकना चाहिए ही। मातृसत्ता को समर्पित हार हीरों का करें हम, इन दिनों हीरे दमकते ही निखारे जा रहे हैं।
इन दिनों व्यक्तित्व ही नेतृत्व युग का कर सकेंगे, आचरण वाले मनुज ही, प्रेरणाएँ भर सकेंगे। सृजन सैनिक ही टिकेंगे क्राँतियों के मोरचों पर, जो खरे, युग की कसौटी पर उतारे जा रहे हैं॥
नहीं नकली हो प्रमाणित, कोई हीरक जयंती पर, हो बुझा दीपक न कोई, अखण्ड ज्योति आरती पर। मातृसत्ता की निराशा के नहीं कारण बनेंगे, बस यही संकल्प अब मन में उभारे जा रहे हैं॥
मानवी संवेदना विकसाएँगे, मृदु−सीप बनकर, अखण्ड ज्योति की विभा विखराएँगे हम दीप बनकर। अब न भटकेगी मनुजता, भावना से शून्य तम में, नेह भीगे प्राण के दीपक उजारे जा रहे हैं॥
-मंगल विजय ‘विजयवर्गीय’
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“मैं कौन हूँ?” जो स्वयं से इस सवाल को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं। उस द्वार को खोलने की चाबी यही है कि स्वयं से पूछों, “मैं कौन हूँ?” और जो तीव्रता से, समग्रता से अपने से यह सवाल पूछता है, वह स्वयं ही उत्तर भी पा जाता है।
महान् दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन् बूढ़े हो चले थे। उनकी देह जो कभी अति सुँदर और स्वस्थ थी, अब जर्जर और ढीली हो गई थी। जीवन संध्या के लक्षण प्रकट होने लगे थे। ऐसे बुढ़ापे की सुबह की घटना है। वह स्नानगृह में थे। स्नान के बाद वह जैसे ही अपने शरीर को पोंछने लगे, तभी अचानक उन्होंने गहरी नजर से देखा कि वह देह तो कब की जा चुकी है, जिसे वह अपनी माने बैठे थे। शरीर तो बिलकुल ही बदल गया है। वह काया अब कहाँ हैं? जिसे उन्होंने प्रेम किया था, जिस पर उन्होंने गौरव किया था, उसकी जगह यह खंडहर ही तो बाकी बचा रह गया है।
इस सोच के साथ उनके दार्शनिक मन में एक अत्यंत अभिनव बोध भी अंकुरित होने लगा, ‘शरीर तो वह नहीं है, लेकिन वह तो वही हैं। वह तो बिलकुल भी नहीं बदले हैं। अपने सारे कर्तृत्वों, उपलब्धियों के ढेर के बीच वह अपनी गहराई में जस−के−तस हैं। व्यक्तित्व के बनते−बदलते−विकसित होते विविध आयामों के बीच व्यक्ति के रूप में वह वही−के−वही हैं।’ तब उन्होंने स्वयं से ही पूछा,’ आह! तब फिर मैं कौन हूँ?’ अपनी गहराइयों में उन्हें उत्तर भी मिला और तत्त्ववेत्ता के रूप में वह संपूर्ण हुए।
यही सवाल प्रत्येक को अपने से पूछना होता है। यही असली सवाल है। जो इसे नहीं पूछते, वे एक प्रकार से व्यर्थ जीवन जीते हैं। जो पूछते ही नहीं, वे भला उत्तर भी कैसे पा सकेंगे? इसलिए स्वयं से अभी और तत्काल यह सवाल पूछो कि “मैं कौन हूँ?” अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूँजने दो, “मैं कौन हूँ?” जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो उसे अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है और उत्तर जीवन की सारी दिशा और अर्थ को परिवर्तित कर देता है।
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फरवरी−मार्च 2001 के पर्व−त्योहार
4 फरवरी, 2001 जया एकादशी
8 फरवरी, 2001 गुरु रविदास जयंती
17 फरवरी, 2001 स्वामी दयानंद जयंती
18 फरवरी, 2001 विजया एकादशी
21 फरवरी, 2001 महाशिव रात्रि
24 फरवरी, 2001 फुलेरा दूज/रामकृष्ण परमहंस जयंती
फरवरी−मार्च 2001 के पर्व−त्योहार 4 फरवरी, 2001 जया एकादशी 8 फरवरी, 2001 गुरु रविदास जयंती 17 फरवरी, 2001 स्वामी दयानंद जयंती 18 फरवरी, 2001 विजया एकादशी 21 फरवरी, 2001 महाशिव रात्रि 24 फरवरी, 2001 फुलेरा दूज/रामकृष्ण परमहंस जयंती 3 मार्च, 2001 होलाष्टक
6 मार्च, 2001 आमलकी एकादशी
9 मार्च, 2001 होलिका दहन
10 मार्च, 2001 धूलि वंदन
14 मार्च, 2001 रंगपंचमी
20 मार्च, 2001 पापमोचनी एकादशी
22 मार्च, 2001 प्रदोश
23 मार्च, 2001 संवत्सरारंभ/नवरात्र घटस्थापन
6 मार्च, 2001 आमलकी एकादशी 9 मार्च, 2001 होलिका दहन 10 मार्च, 2001 धूलि वंदन 14 मार्च, 2001 रंगपंचमी 20 मार्च, 2001 पापमोचनी एकादशी 22 मार्च, 2001 प्रदोश 23 मार्च, 2001 संवत्सरारंभ/नवरात्र घटस्थापन 28 मार्च, 2001 गणगौर
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नवीन वस्त्र धारण करने पर बालकों में जो उल्लास दिखलाई पड़ता है, कुछ वैसा ही उत्साह जनमानस में नूतन वर्ष के प्रति होता है। जीर्ण−शीर्ण पुरानी चीजें किसे भाती हैं? नई की कल्पना और आकर्षण ही कुछ और होता है। उनके आने और पाने में जो खुशियाँ उमंगती हैं, उनका कहना ही क्या!
पुराने साल की विदाई के बाद जब नूतन वर्ष का आगमन होता है, तो प्रत्येक मनुष्य में एक अभिनव स्फूर्ति और उमंग दिखाई पड़ती है। यह इस बात की सूचक होती है कि पुरातनता का आलस्य और अनुत्साह अपनी केंचुल त्याग चुके हैं और नई अँगड़ाई लेकर नूतनता का ऐसा आवरण ओढ़ा है, जिसमें सर्वत्र सक्रियता एवं गतिशीलता ही दृष्टिगोचर होती है। यों प्रगतिशीलता के अभाव का नाम भी प्राचीनता है। इसे भूतकाल या विगत काल भी कह सकते हैं। जब हम नए युग में, नए समय में, नए साल में प्रवेश करते हैं, तो सर्वप्रथम इस बात पर विचार करते हैं कि हमारा पिछड़ापन कैसे दूर हो? विगत वर्ष में हमसे जो भूलें हुई और जिसके कारण उन्नति के स्वर्ण अवसर हमने खोए, उनसे कैसे बचे और अपना भविष्य उज्ज्वल कैसे बनाएँ?
इन सभी बातों की समीक्षा का उपयुक्त अवसर नया वर्ष होता है। वह नवीन प्रेरणाएँ और नूतन विचार लेकर आता है। मनः संस्थान में यदि इनके प्रति उमंगे न जगें, तो उत्कर्ष का सिलसिला अवरुद्ध होकर रह जाएगा और उस आनंद और उल्लास से सदा वंचित ही बना रहेगा जो नववर्ष के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
योजनाकार क्रियान्वयन से पूर्व ही अपनी समस्त योजनाएँ भलीभाँति बना और मस्तिष्क में बैठा लेते हैं। भवन निर्माता निर्माण से पहले उसका नक्शा बनाते, तब निर्माण कार्य आरंभ करते हैं। ऐसे ही नए वर्ष के आते ही हर विवेकशील व्यक्ति पूरे सालभर का एक मोटा खाका तैयार करता है और यह सुनिश्चित का लेता है कि उस समूची अवधि में कौन−कौन से नए निर्धारण और कार्य कब−कब आरंभ होंगे। इसे नववर्ष की पुलकन का चमत्कार ही कहना चाहिए कि मन उक्त समय में समग्र सफलता के ताने−बाने बुनने में इतना संलग्न हो जाता है, जितना कि अन्य मौकों पर शायद ही होता हो।
वैसे तो काल एक सतत प्रवाह है, वह अनादि और अनंत भी है। इसलिए उसके नए−पुराने होने का अर्थ नहीं, किंतु फिर भी मनुष्य ने उसे दिन, सप्ताह, पक्ष, मास एवं वर्ष आदि के सुविधानुसार विभाजनों में बाँटकर एक विभेद तो उत्पन्न कर ही दिया है। तदनुसार तो बीत गया, उसे भूतकाल कहने की परंपरा है और आगत−अनागत को क्रमशः वर्तमान एवं भविष्यत् कह दिया जाता है। आदमी का यह सहज स्वभाव है कि वह विगत या वर्तमान के प्रति उतना उत्साहित नहीं रहता, जितना कि आने वाले अनागत के प्रति। परिवार के सभी सदस्य परस्पर हिल−मिलकर रहते हैं, यह सच है; पर जब कभी कोई चिर प्रतीक्षित मेहमान घर में आ विराजता है, तब जो प्रसन्नता की कहर पूरे वातावरण में दौड़ती दिखाई पड़ती है, वह अन्य अवसरों पर कहाँ देखी जाती है! कुछ ऐसे ही दृश्य अभिनव वर्ष के आगमन पर दृष्टिगोचर होता है। उससे मन में तरंग, शरीर में स्फूर्ति, क्रिया में गति, वाणी में उल्लास और बुद्धि में सक्रियता का जो नवीन उदय होता है, उसे वसंत में पतझड़ के बाद वनस्पतियों में निकलने वाले नूतन किसलय का संज्ञा दी जा सकती हैं।
इसे सृष्टिक्रम का एक आश्चर्य ही कहना चाहिए कि यहाँ किसी को भी पुरातनता का बोझ लंबे समय तक नहीं ढोना पड़ता। परमात्मा ने हर प्राणी का इस संदर्भ में ध्यान रखा है। मुर्गों में कलगी, हाथी में दाँत, साँप में केंचुल आदि इसी परिवर्तन के परिचायक हैं। अंत में शारीरिक अशक्तता के आ धमकने पर जीवात्मा को उससे भी मुक्त कर नवीन कलेवर प्रदान किया जाता है। यह उस एकरसता को दूर करने के लिए ही ईश्वर द्वारा निर्धारित व्यवस्था के अंतर्गत होता है, जो लंबे समय तक एक जैसी स्थिति और देह में रहने के कारण उत्पन्न होती हैं।
नवीनता ही जीवन है। उसमें गति, प्राण और प्रेरणा है। प्राचीनता तो दर−दर की ठोकरें खाती और स्थान−स्थान पर दुत्कारी जाती है। नए वर्ष को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए और उससे नई प्रेरणा लेकर हर एक को अपना जीवन सफल−समुन्नत बनाने में लग जाना चाहिए।
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वह संस्कृत के महान् विद्वान् थे। संस्कृत ही उनकी मातृ भाषा थी। उनका सारा परिवार संस्कृत में ही बात−चीत करता था। उनके यहाँ पीढ़ियों से इसी प्रकार संस्कृत में ही बातचीत करने की परंपरा चली आई थी। उनके पूर्वजों की प्रतिज्ञा थी कि हम न तो संस्कृत को छोड़कर दूसरी भाषा का कोई शब्द बोलेंगे और न ही सनातन धर्म को छोड़कर किसी भी मत−मताँतर के चक्कर में उलझेंगे। भले ही इसके लिए मुट्ठी−मुट्ठी भर आटा माँगकर पेट भरना पड़े, तो भी चिंता की कोई बात नहीं। भिखारी बनकर भी वेद−शास्त्रों की और सनातन धर्म की रक्षा करेंगे। इस प्रतिज्ञा का पालन करते हुए वह अपनी धर्मपत्नी तथा बाल−बच्चों को लेकर गंगा किनारे विचरण किया करते थे। पतित−पावनी गंगा जी के किनारे−किनारे चलते रहना ही उनका नियम था।
पाँच−सात मील चलकर सारा परिवार गाँव से बाहर किसी देवमंदिर में या वृक्ष के नीचे ठहर जाता था। वे गाँव में जाकर आटा माँग लेते और रूखा−सूखा जैसा भी होता, अपने हाथों से बनाकर भोजन पा लेते। अगले दिन फिर से श्री गंगाजी के किनारे आगे बढ़ जाते। संस्कृत एवं संस्कृति की उनकी यह प्रचार यात्रा इसी तरह गतिशील रहती।
एक बार वह देववाणी एवं देवसंस्कृति का प्रचार करते−करते एक राजा की रियासत में पहुँच गए और नियमानुसार गाँव से बाहर एक वृक्ष के नीचे ठहर गए। दोपहर को गाँव में गए और घरों से मुट्ठी−मुट्ठी भर आटा माँग लाए। उसी से भोजन बनने लगा। अकस्मात् उधर से राजपुरोहित आ निकले। उन्होंने देखा एक ब्राह्मण परिवार वृक्ष के नीचे ठहरा हुआ है। माथे पर तिलक गले में यज्ञोपवीत, सिर पर लंबी चोटी, ऋषि मंडली−सी प्रतीत हो रही है। पास आकर देखा तो रोटी बनाई जा रही थी। छोटे बच्चे तथा ब्राह्मणी संस्कृत में वार्त्तालाप कर रहे थे।
राजपुरोहित ने परिवार के मुखिया से संस्कृत भाषा में बातें कीं। उन्हें यह जानकर भारी आश्चर्य हुआ कि आ से ही नहीं, सैकड़ों वर्षों से इनके पूर्वज संस्कृत में ही बोलते चले आ रहे हैं और संस्कृत की, धर्म की, वेद−शास्त्रों की रक्षा के लिए ही भिखारी बने मारे−मारे डोल रहे हैं। राजपुरोहित ने सारा वृत्ताँत जब महाराज को सुनाया, तो वह भी चकित रह गए। उन्होंने पुरोहित से कहा कि ऐसे देव−परिवार को महलों में बुलाया जाए और मुझे परिवार सहित उनके दर्शन−पूजन का सौभाग्य प्राप्त कराया जाए।
महाराज एवं राजपुरोहित के अति आग्रहवश अगले दिन यह ऋषि परिवार राजभवन पहुँचा। वहाँ पहले से ही हजारों स्त्री−पुरुषों का जमघट लगा हुआ था। लोग पंडित श्रीराम जी महाराज की जय के नारे लगा रहे थे। अपने नाम के यह जयकारे सुनकर वह चकित भाव से मौन रहे। महाराज ने स्वयं अपनी महासनी सहित सुवर्ण पात्रों में ब्राह्मण देवता, ब्राह्मणी तथा बच्चों के चरण धोकर पूजन किया, आरती उतारी और चाँदी के थालों में सोने की अशर्फियाँ और हजारों रुपये के बढ़िया−बढ़िया दुशाले सामने लाकर रख दिए।
सबने देखा कि उस ब्राह्मण परिवार ने उन अशर्फियों और दुशालों की तरफ देखा तक नहीं। जब स्वयं महाराज एवं महारानी ने भेंट स्वीकार करने के लिए प्रार्थना की, तब पंडित जी ने धर्मपत्नी की ओर देखकर पूछा कि क्या आज के लिए आटा है? ब्राह्मणी ने कहा, नहीं। पंडित जी ने महाराज से कहा, बस आज के लिए आटा चाहिए। ये अशर्फियों के थाल और दुशाले मुझे नहीं चाहिए।
महाराज ने प्रार्थना की, ब्राह्मण देवता! मैं क्षत्रिय हूँ, भला दान की हुई चीज मैं वापस कैसे ले सकता हूँ। इस पर पंडित श्रीराम महाराज मुस्कराए और बोले, महाराज हम ब्राह्मणों का धन तो विद्या एवं तप है। हम इसी का अर्जन करते हैं और इसी का संग्रह करते हैं। इसी में हमारे संपत्ति की रक्षा कीजिए।
महाराज यह सुनकर बड़े श्रद्धाभाव से बोले, पर क्या यह उचित होगा कि एक क्षत्रिय अपना दिया हुआ दान वापस ले ले? क्या इसे सनातन धर्म को क्षति नहीं पहुँचेगी। इस पर पंडित जी ने कहा अच्छा इसे हमने ले लिया। अब इसे हमारी ओर से आप जनकल्याण के कार्यों में व्यय कर दीजिए। इस तरह हमारे और आपके दोनों के ही धर्म की रक्षा हो जाएगी।
और फिर सबने देखा कि ब्राह्मण देवता सपरिवार एक सेर आटा लेकर और सारे सोने की अशर्फियों से भरे चाँदी के थाल व दुशालों को ठुकराकर वेद पाठ करते हुए जंगल की ओर चले जा रहे हैं।
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आज हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं, 20वीं सदी कल की विषयवस्तु बन गई है। 20वीं सदी परिवर्तन की सदी रही। इसके तूफानी प्रवाह में वैज्ञानिकों से लेकर मनीषी एवं भविष्यविदों ने नए युग की झलक देखी, जिसका सूक्ष्म दर्शन विश्वपटल पर तीव्रतम गति से बदलते परिदृश्यों को देखकर किया जा सकता है। इसके अंतर्गत पुराने तौर−तरीके पिछड़ते जा रहे हैं, जो कल काम करते थे, वे आज काम नहीं कर रहे हैं। इस क्रम में सफल जीवन एवं नेतृत्व के तौर−तरीकों में भी नवीन निर्धारण अपेक्षित है और युग−मनीक्षा गहन विचार−मंथन करती हुई, इस विषय में अपने निष्कर्ष भी प्रस्तुत कर रही है।
उभर रहे सामाजिक परिदृश्य के संदर्भ में प्रख्यात विचारक एल्विन टॉफलर ने अपनी पुस्तक ‘पॉवर शिफ्ट’ में अपनी भविष्यवाणी व्यक्त करते हुए कहा था, “भावी समाज में प्रत्येक स्तर पर नवीन शक्ति ढाँचे का आधार भूत तत्त्व ‘ज्ञान’ होगा। आर्थिक उत्पादन का प्राथमिक स्रोत ज्ञान ही होगा और यह नया शक्ति संघर्ष हमारे मन और व्यक्ति के जीवन की गहराई में प्रवेश करने जा रहा है।”
अमेरिकी मनीषी डेविस ह्विटले अपनी पुस्तक ‘एम्पायरज ऑफ द माइंड’ में इसी आधार पर कहते हैं कि 21वीं सदी में एकमात्र साम्राज्य मन का होगा। इट−गारे, बुर्ज−कंगूरे, मेहराबों द्वारा बना साम्राज्य कल की वस्तु होगा। अर्थात् बाहरी सफलता एवं नेतृत्व का निर्धारक तत्त्व वैयक्तिक नेतृत्व होगा, हो सफलता ही नहीं, अस्तित्व रक्षा के लिए भी आवश्यक होगा और इसके लिए हमें जीवनपर्यंत विद्यार्थी एवं नेता बनना होगा, अन्यथा नए विश्व में अज्ञान एवं पिछड़ापन पूर्व से भी अधिक पीड़ादायक एवं घुटन भरा होगा। अतः प्रगति में बाधक दीर्घकालीन पूर्वाग्रहों एवं धारणाओं को बदलने व चुनौती देने का समय आ गया है। मन के साम्राज्य का मार्ग प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं कि यह बाहरी ज्ञान की बजाय अंदर के अपने ज्ञान द्वारा खुलेगा।
लेखक के अनुसार, प्रभावी स्व नेतृत्व के लिए सर्वप्रथम अपने गुणों, क्षमताओं, रुचियों, शक्तियों, दुर्बलताओं और योग्यताओं का ज्ञान होना आवश्यक है। तभी हम जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावी ढंग से ले सकते हैं, अन्यथा अपने सही−सही ज्ञान के अभाव में जीवन के अधिकाँश निर्णय अपनी अभिरुचि एवं प्रकृति के विपरीत बाहरी प्रभावों एवं दबावों द्वारा निर्धारित देखे जाते हैं, जो असंतोषजनक जीवन का निर्माण करते हैं। इन कारकों में सर्वप्रथम धन का लोभ होता है। धन के बाद दूसरा प्रभाव अनगढ़ सलाहें होती हैं, जो अच्छे भाव से कही होने के बावजूद भी अपने परिणाम में बेहूदी होती हैं। तीसरा प्रभाव पारिवारिक एवं सामाजिक दबाव होता है। चौथा व्यवसाय मार्केट का सर्वेक्षण होता है, जो प्रायः गहन तथ्यों की बजाय उथले तथ्यों पर आधारित होता है। पाँचवाँ कारक, सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ देना होता है, परिणामस्वरूप अधिकाँश व्यक्ति एक विचित्र जड़ता भरा रूखापन लिए अपने कार्य एवं व्यवसाय में पड़े रहते हैं और प्रायः भयंकर परिणामों के साथ जीते हैं। इनसे बचने के लिए अपना गहन अध्ययन, निरीक्षण एवं अन्वेषण आवश्यक है। आप क्या करना चाहते हैं? कहाँ जाना चाहते हैं? इन प्रश्नों का जवाब जहाँ मिलना शुरू हो जाए समझना चाहिए कि मन के साम्राज्य का आधा मार्ग तय हो गया।
आत्मज्ञान के अनुपात में ही व्यक्ति में सच्चे आत्म−सम्मान का भाव जाग्रत् होता है, जो कि रचनात्मक उत्प्रेरणाओं, व्यवहार एवं कार्यों को जन्म देता है। इसके समुचित अभाव में व्यक्ति अपने प्रति हीनता के भाव से ग्रस्त होता है या दंभ से भरा होता है, जो परिणाम में सृजन की बजाय ध्वंस को ही बुलावा देते हैं। स्वस्थ आत्मगौरव का भाव अपने मूल्य व महत्त्व की उचित समझ देता है और अपने व दूसरों के प्रति जिम्मेदारी भरे व्यवहार को प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है।
लेखक ने आत्मसम्मान के मूल्याँकन के लिए चार प्रश्न कसौटी रूप में दिए हैं, 1-क्या हम अपना सम्मान करते हैँ? 2-वर्तमान में जो हम हैं या जो बनना चाहते हैं, क्या उसे संतुष्ट हैं? 3-क्या हम वह कर रहे हैं, जो बनने चाहते हैं? क्या हम वहाँ जा रहे हैं, जहाँ हम जाना चाहते हैं? 4-क्या हम अपने जीवन के स्वामी आप अनुभव करते हैं अर्थात् जो कर सकते थे, उसे सफलतापूर्वक करने की क्षमता व रूप में अपना मूल्याँकन कर सकते हैं। यदि उत्तर न में हो तो इस संदर्भ में विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
आत्मज्ञान द्वारा आँतरिक उत्प्रेरणा पर आधारित प्रयास से ही चरम उत्पादकता एवं उपलब्धि सुनिश्चित होती है। अपने क्षेत्रों में सफल व्यक्तियों के उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि सफलता एवं स्वतंत्रता का आँतरिक उत्प्रेरक धन, सत्ता या नाम, यश की इच्छों के बाह्य उत्प्रेरक से अधिक सशक्त होता है। बाह्य प्रेरित व्यक्ति की क्षमता, बाह्य कारक के हटते ही तुरंत घटनी शुरू हो जाती है।
बाह्य प्रेरित लक्ष्य में प्रतिद्वंद्विता का खतरा सदैव बना रहता है। यह सत्ता और प्रभुत्व की इच्छा, दूसरों को नीचा दिखाने की इच्छा से प्रेरित होती है। ऐसे में ध्यान दूसरों में बँट जाता है। अतः हम अंतःप्रेरित की बजाय बाह्य प्रेरित इंसान बन जाते हैं। संबंध हार−जीत पर आधारित हो जाते हैं, जबकि जीत−जीत (विन−विन) संबंध अपेक्षित है। जिसके अंतर्गत लेखक के अनुसार हमें सहकर्मी, ग्राहक, पड़ोसी और प्रियजनों की जीतने में वह आगे बढ़ने में मदद करके शुभ इच्छा का संपादन करना चाहिए।
इसके लिए हमें बचपन एवं युवावस्था के एकाँगी एवं संकीर्ण भाव से ऊपर उठकर प्रौढ़ता एवं नेतृत्व के उदार भाव को ग्रहण करना चाहिए। बचपन में प्रधान प्रश्न रहता है, “आप मेरे लिए क्या कर सकते हैं? युवावस्था में, “मैं अकेले करना चाहता हूँ” यह भाव हावी रहता है। प्रौढ़ भाव “आओ साथ करें” का रहता है, जबकि नेता का प्रश्न होता है, “मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?”
लेखक के अनुसार उदारता की इस उच्च भूमि के लिए अपनी सत्ता व अर्जित उपलब्धि की स्थिति को देना व बाँटना बहुत कठिन होता है, क्योंकि यह हमारी प्रकृति का अभिन्न अंग प्रतीत होता है, किंतु अपने दीर्घकालीन हित एवं समाज की भलाई में यही स्वस्थ प्रक्रिया है व इसे आत्मानुशासन द्वारा स्वाभाविक बनाया जा सकता है। एम, स्काँट अपनी पुस्तक ‘द रोड लेस ट्रेवल्ड’ में इस संदर्भ में ठीक ही लिखते हैं, “मेरी यह पक्की धारणा है कि मनुष्य के रूप में, विशेष रूप से प्रौढ़ मनुष्य के रूप में जो हमारे अंतर एवं व्यक्तित्व को सबसे अधिक प्रकाशित कर सकता है, वह है अस्वाभाविक बनने की हमारी क्षमता अर्थात् अपनी प्रकृति का अतिक्रमण कर इसे रूपांतरित करने की क्षमता।” वस्तुतः यह आध्यात्मिक जीवन शैली को अपनाने का चुनौती भरा आह्वान है।
लेखक के अनुसार, वैयक्तिक नेतृत्व एवं सुप्रबंध का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व व्यक्ति की ‘इंटेग्रिटी’ है। ईमानदारी, सत्यनिष्ठा एवं चरित्रनिष्ठा इसी के पर्यायवाची हैं। इसका मर्म जीवन की हर परिस्थितियों में जीवन के उच्चतम मानदंडों के अनुरूप अपने को खरा उतारने की तत्परता एवं निष्ठा में निहित है। इसके लिए राजनायिका एवं उथले मन से किए गए निर्णय पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए प्रचलित ढर्रे एवं अनगढ़ आदतों को दरकिनार एवं दुरुस्त करते हुए वही करना होगा, जिसे कि अंतरात्मा सही मानती है। इसकी आवश्यकता केवल बड़े निर्णयों भर में अपेक्षित नहीं है, बल्कि छोटे−से−छोटा निर्णय एवं कार्य इससे प्रभावित होना चाहिए। यह कभी छोटी−बड़ी नहीं होती। जैसे स्त्री या तो गर्भवती होती है या नहीं होती। वैसे ही यह कभी आँशिक नहीं होती। नेतृत्व का जहाँ यह सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है वहीं यह आपसी संबंधों का भी कीमिया है। क्योंकि प्रामाणिकता एवं चरित्रनिष्ठा के आधार पर ही उस विश्वसनीय का जन्म होता है, जो कि संबंधों को मधुर एवं टिकाऊ बनाती है। बच्चों एवं नई पीढ़ी के लिए यह सबसे बड़ा तोहफा हो सकता है, जिससे कि प्रतिपादित आदर्श उनके लिए अनुकरण योग्य एक जीवंत उदाहरण बन जाए।
‘इंटेग्रिटी’ जहाँ आँतरिक प्राणतत्त्व द्वारा पोषित होती है, वहीं यह व्यक्तित्व को भी सुदृढ़ करती है। इसके आधार पर ही उस जिम्मेदार व्यक्तित्व का विकास होता है, जिसे परिभाषित करते हुए स्टीफन काँवे अपनी प्रख्यात पुस्तक ‘सेवेन हेविट्स ऑफ द हाइली इफेक्टिव पर्सन’ में लिखते हैं, “सफल व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं वह यह थोपी हुई नहीं होती, बल्कि अंतः स्फूर्त होती है। वे अपने व्यवहार के लिए परिस्थितियों, वातावरण या व्यक्तियों को दोष नहीं देते। उनका व्यवहार मूल्यों पर आधारित अपने स्वतंत्र एवं सचेतन निर्णयों द्वारा निर्धाथ्रत होता है।”
लेखक के अनुसार, सचाई यह है कि यदि हमारे अंदर मूल्य का कोई स्पष्ट एवं सुदृढ़ भाव नहीं है, तो हमारे पास बाँटने के लिए भी कुछ नहीं होता, ऐसे में हमें दूसरों की जरूरत हो सकती है, हम उन पर निर्भर हो सकते हैं, सुरक्षा की खोज कर सकते हैं, किंतु हम किसी को भाव दे या बाँट नहीं सकते, जब तक कि वे हमारे अंदर नहीं होते। वह हीरा हमारे अंदर हर व्यक्ति में विद्यमान रहता है, जो प्रतीक्षा में होता है कि उसे खोजा जाए व उसे तराशा जाए और यह हर व्यक्ति का परम कर्त्तव्य है।
यहाँ वैयक्तिक नेतृत्व के संदर्भ में असफलता एवं हताशा का अवरोध एक महत्त्वपूर्ण कारक है। लेखक के अनुसार परिवर्तन इस संसार में स्वाभाविक है और इससे निपटने के लिए दृष्टि की समग्रता अभीष्ट है। इसी के बल पर भूत के अनुभव रचनात्मक निवेश में बदलते हैं और इच्छित भविष्य रचनात्मक निवेश में बदलते हैं और इच्छित भविष्य के दर्शन होते हैं। ह्विटले समग्र दृष्टि के तीन तत्त्वों का उल्लेख इस तरह से करते हैं, 1- असफलता से सीखने का अनुभव, जिससे कि इसे दुबारा न दुहराया जाए, 2-भूतकालीन सफलताओं से नए खतरों के लिए विश्वास का अर्जन, 3-भावी सफलताओं के अज्ञात होने के बावजूद उनकी वास्तविकता पर सुदृढ़ विश्वास।
वैयक्तिक नेतृत्व को युग की महती आवश्यकता बताते हुए व इसके राजमार्ग पर प्रकाश डालते हुए डेविसह्विटले लिखते हैं कि भाव नेतृत्व वैयक्तिक दृष्टि से सफल व्यक्तियों द्वारा ही संभव होगा। लेखक के अनुसार, व्यवहार एवं क्रियाएँ व्यक्ति की वाणी की अपेक्षा अधिक जोर से बोलती हैं। बिना प्रतिबद्धता के शब्द अपना मूल्य खो बैठते हैं। बिना क्रिया के द्वारा पोषित शब्द अंततः निराशा और कटुता को जन्म देते हैं। जैसे−जैसे हम 21वीं सदी की ओर जा रहे हैं, यह चुनौती बढ़ती जा रही है। अब प्रवचन मात्र से पहले की तरह पेट भरने वाला नहीं है, क्योंकि लोगों के दिल−दिमाग कोरे उपदेश सुनते−सुनते वैसे ही रीते और प्यासे हैं। नए युग में अधिक−से−अधिक लोग अपना निर्णय वास्तविक वैयक्तिक आचरण एवं व्यवहार की कसौटी पर कसकर करेंगे और कम−से−कम लोग वाक् जाल में फँसेंगे।
हमारा जीवन प्रेरणादायी बने, अपनी सार्थकता के साथ फलीभूत हो, इसके लिए अपने अंदर की श्रेष्ठतम क्षमता एवं प्रतिभा उभरकर आनी ही चाहिए। दूसरों का सम्मान पाने के लिए हमें प्रथम इसके काबिल बनना होगा, हमें प्रामाणिक बनना होगा। अनुकरण योग्य एक आदर्श मॉडल बनने के लिए हमें प्रथम एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करना होगा, अर्थात् दूसरों का नेतृत्व करने से पूर्व हमें स्वयं का नेतृत्व करना होगा।
अपने मन के साम्राज्य के संचालन की सफलता ही अगले दिनों सभी के सफल जीवन एवं सक्षम नेतृत्व का एक मात्र ठोस आधार बनेगी।
अश्वघोष को वैराग्य हो गया। संसार से विरक्त होकर उन्होंने घर−परिवार त्याग दिया तथा ईश्वर दर्शन की अभिलाषा से वह जहाँ−तहाँ भटके, पर शाँति न मिली। कई दिन से अन्न के दर्शन न होने से क्षुधार्त और थके हुए अश्वघोष एक खलिहान के पास पहुँचे। एक किसान शाँति व प्रसन्नमुद्रा में अपने काम में लगा था। उसे देखकर अश्वघोष ने पूछा, “मित्र! आपकी प्रसन्नता का रहस्य क्या है?”
“ईश्वर दर्शन”−उसने संक्षिप्त उत्तर दिया। “मुझे भी उस परमात्मा के दर्शन कराइए।” विनीत भाव से अश्वघोष ने याचना की। “अच्छा” कहकर किसान ने थोड़े चावल निकाले। उन्हें पकाया। दो भाग किए, एक स्वयं अपने लिए, दूसरा अश्वघोष के लिए। दोनों ने चावल खाए, किसान खाकर अपने काम में लग गया। कई दिन का थका होने के कारण अश्वघोष सो गया। प्रचंड भूख में भोजन और कई दिन में श्रम के कारण गहरी नींद आ गई और जब वह सोकर उठा, तो उस दिन जैसी शाँति वह हल्का−फुल्का उसने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। किसान का दिया संदेश अब उन्हें अच्छी तरह समझ में आ गया। क्षणिक वैराग्य मिटा और उन्होंने अनुभव किया कि अनासक्त कर्म ही वह सीढ़ी है, जिस पर चढ़कर ईश्वर साक्षात्कार का पथ प्रशस्त हो सकता है, कर्म से पलायन नहीं।
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विलंब सूचना
अखण्ड ज्योति की बढ़ती प्रसार संख्या के अनुपात में डाक विभाग की प्रेषण व्यवस्थाएँ नहीं बढ़ सकी हैं− प्रायः विलंब हो जाता है। दिसंबर में डाकर हड़ताल के कारण अंतिम डिस्पेच 30 दिसंबर तक हुए। दिसंबर की प्रतियाँ पाठकों को जनवरी में मिली।
प्रतिवर्ष डाक विभाग से समाचार पत्र पंजीकरण का नवीनीकरण जनवरी में होता है। इस वर्ष नवीनीकरण अत्यधिक विलंब से मिलने के कारण जनवरी की प्रतियाँ भी अत्यधिक विलंब से भेजी जा सकी हैं।
आशा है, परिजन वस्तुस्थिति को समझकर संतुष्ट होंगे।
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संत शब्द सत् का एक रूप है। संत में सत्य का बोध होता है। संत सत्य के प्रति अनंत आस्था रखता है। एकनिष्ठ भाव से सत्य के सम्यक् दर्शन द्वारा अपने जीवन को ढालकर जीव और जगत् के प्रति आदर्श और व्यापक जीवन दृष्टि वाला व्यक्ति ही संत कहलाता है। संत का स्वरूप ईश्वर सदृश्य होता है। गुणों के आधार पर जिनमें भगवत्परायणता, निरपेक्षता, शाँति, समदृष्टि, मोह का अभाव, अहंकारशून्यता, द्वंद्वहीनता और अपरिग्रह आदि गुण रहते हैं, वे संत कहलाते हैं। यही भगवान् के वंदे समाज में भगवद्भक्ति का प्रचार करते हैं। यह प्रचार भिन्न−भिन्न रूपों में होता है। जिसे कई परंपराओं के रूप में देखा जा सकता है।
‘षण्’ धातु ‘तन’ प्रत्यय से संयुक्त होकर संत शब्द को बनाती है। जिसका अर्थ होता है, लोगों के प्रति अनुग्रहकारी होना। लोकानुग्रह तत्त्व तो सामान्यजनों में भी पाए जाते हैं। पाणिनी के अष्टाध्यायी सूत्र के अनुसार संतों में ब्रह्मानंदसंपन्न व्यक्ति होते हैं। यही विशिष्टता एवं विशेषता संत को सामान्यजन से पृथक् करती है। संत का प्रयोग विनयशीलसंपन्न साधु पुरुष के लिए किया जाता है। अपने विशिष्ट अर्थ में संत भगवत् अर्पित व्यक्ति होते हैं। संत वही है जिन्होंने सत्य की सम्यक् अनुभूति की है और उसी के प्रति सहजभाव से आस्थावान् होकर लोकरंजक जीवन दर्शन दिया है।
तैत्तिरीय संहिता के ब्रह्मावली खंड में उल्लेख मिलता है कि संत ब्रह्मा के अस्तित्व को साकार रूप प्रदान करता है। संतों के जीवन में आत्मा के आठ गुणों का विकास होता है। इन आठ गुणों का वर्णन गौतम स्मृति में इस तरह मिलता है, “दया सर्वभूतेषु वाँतिरनुसूया शोचम नायासे मंलमकार्पण्यमस्पृहा।”
बृहस्पति स्मृति के अनुसार, क्षमा, असूया, शौच, मंगल कार्य करना, अकार्पण्य आदि को नियमित रूप से पूर्ण करने वाला ही संत है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा उद्धव को समझाते हुए संतों के लक्षण की ओर संकेत किया है, “मैंने वेदों और शास्त्रों के रूप में मनुष्य के धर्म का उपदेश दिया है। उनके पालन से अंतःकरण की शुद्धि होती है, आत्मा पवित्र होता है और उल्लंघन से रोरव नरक जैसा दुःख−कष्ट मिलता है। परंतु मेरा जो भक्त उन्हें भी अपने ध्यान आदि में विक्षेप समझकर त्याग देता है और केवल मेरी भक्ति में लगा रहता है वही परम संत है।” श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने संतों की चर्चा करते हुए कहा है कि जो सुख और दुःख दोनों को समान भाव से देखता है एवं ग्रहण करता है, जिसे अपने मान−अपमान, स्तुति एवं निंदा की चिंता नहीं रहती और जो सदैव धैर्यपूर्वक निष्काम भाव से कम करता है, वही संत है।
कबीर, दादू, रज्जब आदि ने संत को सत्वस्य योगी कहा है। जड़ीभूत चिदात्मा जब परम सत्य का दिव्य दर्शन करता है, तो वह आनंद और उल्लास में निमग्न हो जाता है, इसी अवस्था में पहुँचा हुआ पुरुष सत्वस्य योगी होता है। ऐसे पुरुष सदा परमात्मा के परम भाव में निवास करते हैं। संसार उन्हें अपने सतरंगी आकर्षण में बाँध नहीं पाता। वे जगत् के जड़ तत्त्वों के मनोहारी एवं मधुमय आकर्षण में नहीं फँसते। वे सभी आकर्षण, आकाँक्षा, इच्छा आदि से परे होते हैं। उनकी चेतना इनसे परे परमात्म चेतना के संग एकीभूत रहती है। उनकी आवश्यकता अपनी आवश्यकता नहीं होती और न उनकी स्वयं की इच्छा होती है। परिणामतः संतों की आत्मा ऊर्ध्वमुखी होती हैं। संतों की व्यापक दृष्टि का मूल रहस्य उनकी आत्मा का ऊर्ध्वमुखी विकास ही है। संत कबीर आदि से ‘स्व’ के परित्याग द्वारा आत्मा के ऊर्ध्वमुखी विकास को संत का लक्षण माना है।
सगुण भक्तिधारा के संत तुलसीदास ने रामचरितमानस में संतों के दिव्य स्वरूप का वर्णन किया है। संतों की उनकी इस व्याख्या में एक ओर स्फटिक की सुँदरता है, तो दूसरी और मोती के आब की तरलता। तुलसी का संत स्वरूप उदात्त, निर्मल और पावन है। उनके अनुसार जिसके अंतःकरण में ‘स्व’ की भावना का विसर्जन हो गया वही संत में राग उस समय गलता है, जब वह स्वयं को परमार्थ के लिए उत्सर्ग कर देता है। उसके उत्सर्ग में प्रतिदान नहीं, बलिदान की भावना रहती है। प्रतिग्रह न होकर आत्मसमर्पण होता है, लेने का नहीं लुटा देने का भाव प्रधान होता है। संत औरों के लिए स्वयं को लुटा देता है। अपने को निःशेष भाव से लुटाकर ही मेघ जलधि कहलाता है। संत भी मेघ की भाँति अवघड़दानी होता है।
तुलसीदास कहते हैं संतों के अंदर काम, क्रोध, लोभ, मोह रूपी मनोविकार नहीं होता। उनका जीवन जप, तप, व्रत और संयम से संयमित होता है। श्रद्धा, मैत्री, मुदिता, दया आदि श्रेष्ठ गुण उनके हृदय में सदैव वास करते हैं। संतों का हृदय मोम के समान होता है। उनकी करुणा हिमालय सदृश्य होती है, जो पिघल−पिघलकर अगणित धाराओं के रूप में प्रवाहित होती है। यही धाराएँ आगे चलकर संत परंपरा बनी हैं। संतों के उपदेशों ने ही संत परंपरा की नींव डाली।
संत परंपरा का प्रारंभिक युग (सं. 1200 से 1550) का सूत्रपात संत जयदेव से लेकर संत धन्ना भगत तक चलता है। इस युग के संतों ने अपने उपदेशों का प्रचार स्वतंत्र रूप से किया। इस समय के प्रमुख संतों में नामदेव, कबीरदास, रैदास की गणना होती है। मध्ययुग में संत युग को दो भागों में बाँटा जा सकता है। पूर्वार्द्ध (सं. 1550-1700) तथा उत्तरार्द्ध (सं. 1700-1850) युग। मध्ययुग के पूर्वार्द्ध काल में प्रमुख संतों में संत गुरुनानक देव, दादू दयाल, संत मलूकदास एवं संत तुलसीदास हैं। इसके उत्तरार्द्ध के प्रधान संतों में संत रज्जब जी, सुँदरदास, बाबा की नाराम, संत दरिया साहब, (भाखड़ वाले), दरियादास (बिहार वाले), गरीबदास, चरणदास आदि का नाम आता है।
संत परंपरा के आधुनिक युग (सं. 1850 से आज) में भी अनेक प्रमुख संतों पलटू, साहब, संत शिवदयाल आदि का प्रादुर्भाव हुआ है। संत परंपरा के मध्ययुग के पूर्वार्द्ध में पंथों का संगठन होने लगा था। इसके उत्तरार्द्ध में आकर सामुदायिक प्रवृत्ति अपेक्षाकृत अधिक उग्र हो गई। आधुनिक काल में पुनरुद्धार की प्रवृत्ति और विश्वकल्याण की भावना को बहुत बल मिला।
विक्रम की सातवीं शताब्दी से प्रारंभ होने वाली संत परंपरा आगे के युगों में विभिन्न संप्रदायों के सिद्धाँतों एवं मतों से पुष्ट होकर पंद्रहवीं शताब्दी तक चली आई है। इसके पश्चात् इसे विशिष्ट नामों से जाना जाता है। पं. परशुराम चतुर्वेदी ने जयदेव से ही संत परंपरा का प्रारंभ माना है, परंतु आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसकी शुरुआत नामदेव से स्वीकारी है। संत साहित्य का श्रीगणेश गीत गोविंद के रचयिता जयदेव से हुआ है, परंतु प्रारंभ में उसकी रेखा क्षीण और धूमिल प्रतीत होती है। वस्तुतः संतधारा की यह क्षीण और अव्यवस्थित रेखा नामदेव के द्वारा व्यवस्थित, प्राँजल और प्रशस्त बनाई गई। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध भक्त नामदेव ने हिंदू−मुसलमान दोनों के लिए एक सामान्य भक्ति मार्ग का सुझाव सुझाया। यहीं से संत परंपरा का सुव्यवस्थित आविर्भाव माना जा सकता है।
सर्वप्रथम कबीरदास ने अपने कुछ विचारों को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त करना आरंभ किया। संत सेन, पीपा, धन्ना, रैदास आदि भी इन्हीं विचारों से अनुप्राणित थे। ये सभी संत रामानंद को अपना गुरु मानते थे। इन संतों ने स्वामी रामानंद के उपदेशों से प्रभावित होकर ही संत परंपरा का श्रीगणेश किया। कबीर एवं उनके समकालीन संतों का काल संत परंपरा का प्रारंभिक युग माना जाता है। इस युग में किसी संप्रदाय विशेष का संगठन नहीं हुआ था।
संत परंपरा के मध्य युग में प्रचलित नियमों का निर्वाह नहीं हो सका। गुरुनानक देव के समय से सामुदायिक संगठन शिष्यत्व पद्धति तथा उपदेश संग्रह की प्रथा प्रारंभ हुई। इसके पूर्वार्द्ध काल में नानकदेव ने नानक पंथ, दादू दयाल ने दादू पंथ, बाबरी साहिता ने बाबरी पंथ, हरिदास ने निरंजनी संप्रदाय तथा मलूकदास ने मलूक पंथ की स्थापना की। कबीर के नाम पर कबीर पंथ की स्थापना भी हुई। इसी तरह लालपंथ एवं साधु संप्रदाय का भी उदय हुआ। इन पंथों तथा संप्रदायों के भिन्न−भिन्न केंद्र स्थापित हो गए। इनके उपदेश संग्रहों को धर्मग्रंथ का महत्त्व मिलने लगा। इस युग के उत्तरार्द्ध में बाबा लाल ने बाबा लाली संप्रदाय, संत प्राणनाथ ने धामी संप्रदाय, बाबा धरनीदास का धरनीश्वरी संप्रदाय, दरियादास (बिहार वाले) ने दरियादासी ने शिवनारायणी संप्रदाय, संत चरणदास ने चरणदासी संप्रदाय, संत गरीबदास ने गरीबदासी पंथ, पानपदास ने पानपंथ और रामचरण दास ने रामसनेही संप्रदाय की स्थापना की। इस काल में दीन दरवेश, बुल्लेशाह और बाबा कीनाराम जैसे संतों ने केवल भगवान् के उपदेशों का प्रचार किया। इन्होंने किसी पंथों एवं संप्रदायों की स्थापना नहीं की।
इस काल के संत एक ऐसे समन्वित धर्म का प्रचार करना चाहते थे, जिसके अंतर्गत सभी प्रचलित धर्मों के मूल सिद्धाँतों का समावेश हो सके। इसके परिणामस्वरूप सभी धर्मग्रंथों के अध्ययन हेतु जिज्ञासा जागी। पौराणिक गाथाओं की सृष्टि, अलौकिकता की कल्पना, भक्तमालों की रचना तथा अपने−अपने धर्मों एवं संप्रदायों के श्रेष्ठ ग्रंथों की पूजा भी इस काल में की जाने लगी। इसी काल में विविध बाह्याचारों तथा कल्पित गाथाओं की रचना होने लगी। यहीं से विकृति का समावेश हुआ। इसे ही मध्ययुग का अंधकार काल कहा जाता है, क्योंकि संतों के सच्चे आदर्श एवं भक्ति के बदले स्वार्थपरता व अहंकार का नग्न नर्तन होने लगा था। कुछ संतों ने इस विकृति एवं विडंबना के विरुद्ध आवाज भी उठाई।
उन्नीसवीं सदी के प्रथम चरण से ही अँग्रेजों का प्रभाव बढ़ने लगा। पाश्चात्य शिक्षा पद्धति, कला तथा संस्कृति ने भारतीय ढंग से अपने आदर्शों एवं उद्देश्यों की व्याख्या की। इसलिए पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति तथा शास्त्रीय मानदंडों के आलोक में प्राचीन धारणाओं एवं मान्यताओं का पुनर्मूल्याँकन करने का प्रयास किया गया। इसी दौरान राधास्वामी संप्रदाय के तृतीय गुरु ब्रह्मशंकर मिश्र से संत परंपरा में बुद्धिवादी एवं वैज्ञानिकता का समावेश किया। इससे संत मत का औचित्य एवं महत्त्व की ओर प्रकाश पड़ा। कबीर पंथ के रामरहसदास तथा दादू पंथ के साधु निश्चलदास ने अपने−अपने पंथों के सिद्धाँतों को स्पष्ट करने का बीड़ा उठाया।
तत्कालीन सामाजिक−साँस्कृतिक पतन को रोकने एवं इसके पुनरोदय का शंखनाद राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे संतों ने समाज सुधार एवं सुधारवादी विचारधारा का प्रचार किया। इससे कुरीति उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन का पथ प्रशस्त हुआ। स्वामी रामतीर्थ ने भी कबीर, नानक तथा दादूदयाल द्वारा प्रयुक्त साधना पर बल दिया। इन आधुनिक संतों के कारण वैचारिक स्वतंत्रता, निर्भीकता, मानवता एवं विश्वकल्याण जैसे नैतिक गुणों को ग्रहण करने की प्रेरणा मिली।
संत परंपरा का वर्तमान पुनरोदय स्वामी विवेकानंद दयानंद, श्री अरविंद, रमण महर्षि एवं परमपूज्य गुरुदेव द्वारा किया गया। स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रखर आग्नेय विचारों से संत परंपरा का नव्योत्थान किया। उन्होंने अपनी गहन अंतर्दृष्टि से इसका नवोन्मेष देखा था। नवयुग के इस आधुनिक संत ने संत परंपरा का पुनर्जागरण किया। यही प्रयास आर्य परंपरा के रूप में विख्यात हुआ। आगे चलकर यह परंपरा श्री अरविंद की विकासोन्मुख प्रक्रिया द्वारा और भी विकसित हुई। परमपूज्य गुरुदेव ने संत परंपरा को समसामयिक ढंग से प्रस्तुत किया। विचार क्राँति की मशाल जलाने वाली युग निर्माण योजना संत परंपरा का ही सामयिक स्वरूप है। इसकी योजनाओं के माध्यम से ही भारतवर्ष में संतों के वास्तविक उद्देश्यों को फलीभूत होने का अवसर मिलेगा, जिससे उनके द्वारा देखा हुआ सपना ‘धरती में स्वर्ग का अवतरण एवं मनुष्य में देवत्व का विकास’ अवश्य पूर्ण होगा।
कुरुक्षेत्र की धर्मभूमि में तपस्यारत ऋषि मुद्गल के धर्माचरण, आराधना और उदार वृत्ति द्वारा जीवन निर्वाह करना आदर्श थे। मास के पहले पक्ष में वे खेतों से बीन−बीनकर चावल एकत्र करते, दूसरे पक्ष में उसे यज्ञ और अतिथि−सत्कार में व्यय कर देते। ऋषि श्रेष्ठ दुर्वासा छह हजार शिष्यों सहित मुद्गल की परीक्षा हेतु उनके आश्रम पर कई बार गए और निस्पृह मुद्गल ने उन्हें हर बार आतित्य द्वारा पूर्णतः संतुष्ट कर दिया।
दुर्वासा ऋषि मुद्गल पर कृपालु हुए। उन्होंने कुरुक्षेत्र के इस तपस्वी को स्वर्गप्राप्ति का वरदान दिया। स्वर्ग ले जाने के लिए आए देवदूत को नम्रतापूर्वक मजा करते हुए कहा, हे दूत! खेद है तुम्हें एकाकी ही स्वर्ग लौटना पड़ेगा। मैं तुम्हारा साथ नहीं दे सकूँगा। जिस लोक में कर्म को स्थान नहीं, वहाँ केवल सुख भोगने मैं नहीं जाना चाहता। कर्म करते हुए ही मैं सौ वर्षों तक जीने की इच्छा रखता हूँ। मुझे निर्माण प्राप्त कर सकता हूँ। तपस्वी मुद्गल मृत्युलोक में ही लोकमंगल के लिए करते हुए निर्वाण को प्राप्त हुए।
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आँखें मन और भाव का दर्पण हैं। भावनाओं एवं संवेदना की स्पष्ट छाप इसकी गहराई में अंकित होती है। आंखें वह द्वार हैं, जिसमें प्रवेश कर अंतरात्मा की झलक−झाँकी पाई जा सकती है। आँखों में व्यक्ति का व्यक्तित्व झलकता है। अतः भारतीय लक्षण शास्त्र में नेत्रों के आकार पर विशेष महत्त्व दिया गया है। इनके आकार−प्रकार से काफी कुछ व्यक्ति का स्वरूप निर्धाथ्रत किया जाता है। आँखों की अपनी भाषा होती है।
आँखों की इसी महत्ता एवं विशेषता के कारण विभिन्न विद्वानों ने इनके प्रति अपनी अभिव्यक्ति दी है। आचार्य गर्ग के अनुसार नेत्र लक्षणों का सर्वाधिक महत्त्व है। आँखें बहुत कुछ बोलती हैं। इसलिए वृंदावनलाल वर्मा ने कहा, ‘कृतज्ञ नेत्र! सुँदर मनोहर और हृदयहारी! किसने बनाए? क्यों बनाए? आत्मा के गवाक्ष। पवित्रता के आकाश! प्रकाश के पुँज।” गाँधी जी ने तो यहाँ तक कहा है, “आँखें सारे शरीर का दीपक हैं।” संत विनोबा जी के अनुसार, ‘नीलकाँत का दर्शन ही आँखों का उद्देश्य है।”
पाश्चात्य विद्वान् भी आँखों की विशेषता से अत्यंत प्रभावित हुए हैं। शेक्सपियर ने ‘लब्स, लेबर्स, लास्ट’ में कुछ इस तरह वर्णन किया है, “नेत्र ही वे शास्त्रकलाएँ और शिक्षापीठ हैं, जो समस्त संसार को प्रकट करते हैं, रखते और पोषित करते हैं।” शेक्सपियर ने नारी नेत्रों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। जॉर्ज हैबर्ट ने अपनी रचना जैजुला पुँडेशियम’ में स्पष्ट किया है कि सर्वत्र नेत्रों की भाषा एक ही होती है। इसी वजह से ‘दी जेंटलमेन अरार’ में जॉर्ज चेपमेन ने उल्लेख किया है, “नेत्र बोल सकते हैं औ नेत्र समझ सकते हैं।”
आँखें अनेक प्रकार की होती हैं और उन्हीं प्रकारों के आधार पर उनकी महत्ता आधारित होती है। आँखों को कमल, मछली, अनार के फूल, मेंढक, बैल के समान माना जाता है। पुरुषों की आँखें यदि ऊँट, बिल्ली, मुर्गी, हंस, हिरन के सदृश हों तो उसे अच्छा नहीं माना जाता। भारतीय लक्षण शास्त्र के अनुसार कमलनयन मनुष्य धनवान होता है। यदि आँखों में हल्की लाल डोरी दिखाई दे, तो भी इसी कोटि का माना जाता है। यानि कि उसे धन की प्राप्ति होती है। शहद के समान पूरी परंतु कालिमा लिए हुए आँखें हो तो मनुष्य बहुत धनवान होता है।
बिल्ली के समान बड़ी एवं नीली आँखों को शुभ संकेत नहीं माना जाता है। गोल−गोल आँखों वाला मनुष्य अत्यंत चतुर−चालाक होता है। हरापन लिए हुए नेत्र सौभाग्य सूचक हैं। आँखों में चमक एवं चिकनापन उत्तम लक्षण हैं। शहद के समान भूरी आँखों के किनारों में यदि लालिमा रहे, तो इसे भी भाग्यशाली माना जाता है। केवल मधुवन आँखें कुलनाशक होती हैं। दुर्योधन की आँखें इसी प्रकार मधुपिंगल थीं, जिसका परिणाम सर्वविदित है। जिन लोगों की आँखों में क्रीम रंगत हो, वे दीर्घजीवी होते हैं।
चीन में आँखों की पहचान की कला सुविख्यात है। इसके लिए पुरुषों की बायीं और महिलाओं की दायीं आँखों को आधार माना जाता है। बड़ी−बड़ी आँखें सुँदरता का प्रतीक हैं। यह दृढ़ इच्छाशक्ति, मेधा और प्रखर चरित्र की द्योतक हैं। ऐसी आँखों वाले व्यक्ति बहिर्मुखी प्रकृति के होते हैं। यह अन्य व्यक्तियों से ज्यादा प्रभावित नहीं होते। वे किसी भी क्षेत्र में प्रवेश करें, सफलता उनकी राह ताकती रहती है। मुख्यतः व्यापार, मीडिया एवं विज्ञापनों की दुनिया में ये सिद्धहस्त होते हैं। महिलाएँ पुरुषों की तुलना में और भी अधिक सफल रहती हैं। इनमें समर्पण का भाव रहता है।
छोटी और कंजी आँखें ईर्ष्या, द्वेष, अविश्वसनीयता आदि मनोवृत्ति की ओर ज्यादा झुकाव लिए होती हैं। यह खलनायकों का चरित्र है। ऐसे व्यक्ति कुँठा एवं निषेधात्मक मनोविकारों से ग्रस्त होते हैं। ये अपने स्वार्थ और व्यवसाय के प्रति सदैव सतर्क रहते हैं। इसके लिए ये शोषण की किसी सीमा को पार कर सकते हैं। कुटिलता इनकी परिचायक है। आँखें यदि छोटी−छोटी हैं, तो वह व्यक्ति बुद्धिमान होगा। अच्छाई के लिए इन्हें प्रयास−पुरुषार्थ करना पड़ता है, अन्यथा यह भी घातक हो सकता है।
चितवन तिरछी या बाँकापन दो तरह की होती है। एक ऊपर की ओर उठी होती है तथा दूसरी नीचे की ओर धँसी रहती है। ऊपर की ओर बाँकेपन सौंदर्य का आदर्श प्रतीक हैं। ऐसे व्यक्ति संवेदनशील परंतु कुशाग्र बुद्धि वाले होते हैं। प्रकृति द्वारा इन्हें आनंदपूर्ण जीवन का अनोक्षा अनुदान प्राप्त रहता है। रिश्तों में इन्हें विश्वसनीय नहीं माना जाता। जीवन व्यापार में ये लचीले होते हैं। कर्म के प्रति निष्ठा एवं मेहनत इनकी विशेषता है। जापान में नीचे की ओर धँसी आँखों को सौभाग्य एवं संपदा का सूचक माना जाता है। पश्चिमी देशों में ऐसी आँखों को विनम्रता, विश्वसनीयता एवं सेवाभाव के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। सहयोग के मामले में ये सर्वोपरि होते हैं। वे दूसरों के लिए कुर्बानी दे सकते हैं। इन्हें रिश्तों को बनाना एवं निर्वाह करना आता है। ऐसे व्यक्ति चरित्रवान् होते हैं।
ऐसी बाँकेपन वाली महिलाएँ विश्वसनीय एवं विनम्र होती हैं। जिन्हें भी ऐसी स्त्रियों का सान्निध्य मिलता है, वे धनवान होते हैं। ये स्वतंत्रताप्रिय एवं पुरुषों को अपने ऊपर हावी होने नहीं देतीं। प्रकृति से सेवाभावी होने के कारण ये कुशल माता की भूमिका अदा कर सकती हैं। नर्सिंग क्षेत्र में डॉक्टर या नर्स के रूप में ऐसी आँखों वाली महिलाएँ अत्यंत सफल होती हैं। पुरुष वर्ग वाणिज्य एवं व्यापार में प्रगति करता है।
बंट−बंट आँखें अंतर्मुखी व्यक्तित्व की परिचायक हैं। इन्हें संकीर्ण बुद्धि वाले के रूप में भी देखा जाता है। चीनी विद्वान् सियाँग मीन के अनुसार, बंद आँखों वाले मनुष्य सामाजिक होते हैं। प्रदर्शन करना उनकी चारित्रिक विशेषता है। कठिन−से−कठिन परिस्थितियों से सत्काल तालमेल बैठा लेना इनके बायें हाथ का खेल है। अतः ऐसे लोग राजनीतिक एवं व्यापारिक वर्ग के होते हैं। ऐसी महिलाओं का चरित्र अत्यंत जटिल होता है। उनकी महत्त्वाकांक्षा बढ़ी−चढ़ी होती है। पुरुषों की तुलना में महिलाएँ अधिक उन्नति करती हैं।
चौड़ी आँखों वाले साहसी, दृढ़ एवं खुले दिमाग वाले होते हैं। ये अति महत्त्वाकाँक्षी होते हैं, परंतु इसे प्राप्त करने में ज्यादा सफल नहीं होते। अपने लाभ के लिए दूसरों को कष्ट पहुँचाने में यह तनिक भी हिचकते नहीं हैं। इनमें भावनात्मक चोट को सहन करने की शक्ति कम होती है। ये अपने कार्यक्षेत्र में स्वयं को स्थापित करने में प्रायः असफल होते हैं। इस तरह की आँखों वाली महिला−पुरुषों की वैवाहिक संबंध आनंदपूर्ण होता है।
गंभीर झुकी हुई आँखें रोमाँटिक व्यक्तित्व की झलक हैं। ये अपनी भावनाओं को कभी भी प्रदर्शित नहीं करते। रोमाँटिक मूड में होने के कारण इनमें लेखक व कवि का गुण रहता है। परंतु इनकी लेखनी केवल प्रेम संबंधी क्षेत्रों तक सीमित रहती हैं। इनका जीवन भी प्रेम कहानियाँ से भरा होता है।
ऊपर उभरी हुई आँखें उद्धत अहंकारी व्यक्तित्व की झलक हैं। यद्यपि ऐसे व्यक्ति दृढ़ इच्छाशक्ति वाले होते हैं, परंतु ये अति कायर एवं अविश्वसनीय होते हैं। जीवन में सफलता के सूत्र हाथ लगने पर भी ये सुखी नहीं रहते। अहंकार की ज्वाला इन्हें अंदर से जलाती रहती है। इनके जीवन में प्रेम−प्यार जैसी सजल भावनाओं का स्थान नहीं होता। इनका चरित्र बड़ा ही संदिग्ध माना जाता है।
त्रिभुजाकार आँखों वाले व्यक्ति कुतर्की होते हैं। इनमें आत्मप्रदर्शन का भाव प्रबल रहता है। व्यक्तिगत जीवन में दूसरों के सामने सदैव सहज एवं असामान्य बने रहते हैं। इनका संबंध महज एक छलावा होता है। ऐसे व्यक्ति अक्सर राजनीतिक दाँव−पेंच वाले होते हैं। चतुर्भुजी आँखों का झुकाव प्रशासनिक सेवा की ओर अधिक होता है। ये अति बुद्धिमान
कवीन्द्र रवीन्द्र ने लिखा है, “मैंने द्वार−द्वार से माँगकर गेहूँ के दानों से अपनी झोली भर ली। अपनी उपलब्धि पर फूला हुआ घर की ओर चला। तभी एक निरीह दुर्बल वृद्ध आया और उसने मेरे आगे हाथ पसार दिए। मैंने सोचा, अपनी मेहनत से एकत्र अनाज इसे क्यों दूँ? फिर भी बेमन से एक दाना उसके हाथ पर पटक, मैं आगे बढ़ गया...। घर आकर झोली पलटा तो उसमें एक बड़ा दाना सोने का था....। मैंने अपना सिर धुना, कृपणता को कोसा..... हाय! दूसरों की उदारता से प्राप्त दानों को देने में मैं अनुदार क्यों बना? यदि उदार बन पाता तो मेरी झोली सोने से भरी होती।” देवदक्षिणा का अर्थ ही है कि व्यक्ति अपने अंदर की वृत्ति को मोड़ दे, देवत्व से जोड़ दे।
एवं व्यवहारकुशल होते हैं। चाँद सी आँखें अत्यंत चतुर−चालाक मानी जाती हैं। ये भी व्यवहारकुशल होते हैं। उथलेपन के कारण इनके रिश्तों में स्थायित्व नहीं रह पाता।
आँखों के आधार पर व्यक्तित्व की पहचान की जाती है। व्यक्तित्व का आकार प्रकार कैसा भी हो, उसकी आँखें चाहें कैसी भी हों, परंतु व्यक्ति निस्स्वार्थ जीवन जीता हैं, तो उसमें परिवर्तन संभव है। प्रभु को समर्पित जीवन के लिए शारीरिक आकार−प्रकार का मानदंड गौण है। भगवान् का दिव्य स्पर्श किसी के भी जीवन को दीप्त कर सकता है। अतः सदैव सत्कर्म करते हुए प्रभुमय जीवन जीना चाहिए।
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भौतिक जगत् में मत्स्य न्याय का सर्वत्र बोलबाला है। ऐसी घटनाएँ इन दिनों प्रायः घटती रहती हैं, जिसमें किसी कमजोर के मकान पर कोई बलवान हठात् कब्जा कर लें, उसकी संपत्ति पर अपनी दावेदारी दिखाने लगे। कई बार तो हद हो जाती है, जब हर प्रकार के विरोध−प्रतिरोध के बावजूद भी संपदा हड़प ली जाती हैं। इसे समर्थों का असमर्थों पर आधिपत्य ही कहना चाहिए।
चेतना जगत् में ऐसे प्रसंगों को आश्चर्यजनक और अद्भुत कहा जाएगा। वहाँ जब इस प्रकार के उदाहरण प्रस्तुत होते हैं और जब एक की देह पर दूसरी सत्ताएँ सवारी गाँठती हैं, तब वह विविध व्यक्तित्व के रूप में सामने आती हैं। ऐसे शरीरों में कुछ समय तक तो अपनी मूल चेतना का नियंत्रण रहता है, जबकि शेष समय में उस पर किन्हीं बाहरी सत्ताओं का अधिकार हो जाता है, तदनुसार कुछ समय व्यक्ति अपना सही नाम−पता बताता, जबकि दूसरे ही अवसर पर वह कोई अन्य बन जाता है। ऐसे घटनाक्रम अक्सर घटते ही रहते हैं।
इसी प्रकार एक प्रसंग की चर्चा काँलिन विल्सन अपने ग्रंथ ‘बियोण्ड दि आँकल्ट’ में करते हैं। वे लिखते हैं कि बोस्टन में एक बार एक डॉक्टर मोर्टन प्रिंस ने स्नायविक थकान से ग्रस्त एक लड़की का उपचार प्रारंभ किया। कई दिनों की चिकित्सा के बाद भी क्लारा फाउलर नामक उक्त लड़की को जब कोई लाभ नहीं हुआ, तो डॉ. मोर्टन ने उसे सम्मोहित करने की निश्चय किया। उस अवस्था में उसके अंदर से एक बिलकुल ही भिन्न व्यक्तित्व उभरकर सामने आया। यह एक चंचल और शैतान लड़की थी, जो अपना मान सैली बताया करती। मोर्टन यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गए। वह बार−बार इस बात को दुहराती थी कि वह क्लारा नहीं है, यद्यपि शरीर उसी का था। वह मजबूत तथा स्वस्थ थी, पर इस बात को समझ नहीं पाती थी कि आखिर क्लारा इतनी कमजोर क्यों हैं? एक अन्य अवसर पर जब उसे सम्मोहित किया गया, तो एक तीसरा ही व्यक्तित्व, उभरकर सामने आया। यह न तो क्लारा थी, न सैली। यह एक शिक्षिका थी, जिसे मोर्टन ने ‘बी−4’ नाम दिया।
क्लारा की काया पर इस नई आत्मा के अधिकार की कहानी भी बड़ी विचित्र है। उन दिनों वह एक नस्र थी। एक दिन उसके पिता के एक मित्र विलियम जीन्स उससे अस्पताल मिलने आए। बाहर एक सीढ़ी पड़ी हुई थी। उसने उसे सहारे प्रथम तल पर स्थित उसके कमरे के अंदर झाँककर देखा। पिता के मित्र को इस तरह खिड़की से झाँकते देखकर उसे गहरा आघात लगा और एक स्नायविक दौरा पड़ा। ठीक इसी समय ‘बी-4’ प्रकट हुई और उसके शरीर पर कब्जा जमा लिया।
तीनों में सैली अधिक शक्तिशाली थी, इसलिए वह क्आरा को शरीर से बाहर धकेल सकती थी, उस पर वाँछित समय तक अधिकार जमाए रह सकती थी अथवा उसके शरीर का इच्छानुवर्ती उपयोग कर सकती थी। अक्सर वह दब्बे क्आरा के साथ ओछी हरकतें किया करती। कई बार वह उस पर सवार होकर सुदूरवर्ती गाँवों तक पैदल आती। ऐसे मौकों पर बेचारी क्लारा को बड़ी मुश्किल से पैदल चलकर वापस लौटना पड़ता। एक अन्य अवसर पर सैली ने एक दूसरे शहर में नौकरी कर ली। वह एक होटल था और अनेक महीनों तक वह वहाँ बनी रही। इस बीच क्लारा संपूर्ण आत्मविस्मृति के दौर से गुजरती और जब स्मृति लौटती, तो वह परेशानी हो उठती, उसे कई प्रकार की मुसीबतों का सामना करना पड़ता।
डॉ. मोर्टन लंबे समय तक उसका उपचार करते रहे। अंततः सम्मोहन द्वारा ‘बी-4’ की आत्मा से तो उसे मुक्ति सफल न हो सके।
ऐसी ही एक बहुव्यक्तित्व से संबंधित घटना का उल्लेख थिगपेन एवं क्लेक्ली ने अपनी रचना ‘दि थ्री फेसेज ऑफ ईव’ में किया है। ईव ह्वाइट जिसका वास्तविक नाम क्रिस्टीन सिजमोर था, वह एक विवाहित युवती थी। उसे सिर दरद की शिकायत थ्ी और बीच−बीच में दौरे पड़ते थे। इस मध्य वह जो कुछ भी कार्य करती, उसका कुछ भी स्मरण नहीं रहता। वह अपने इस अजीबोगरीब रोग से परेशान थी और उससे छुटकारा पाना चाहती थी। इसी हेतु कुछ विशेषज्ञ चिकित्सकों से इलाज करवा रही थी। एक दिन वह उनके पास जाकर बतलाने लगी कि आज उसके पति ने उसे बुरी तरह फटकारा है, कारण कि वह बाजार से फिजूलखर्ची कर वासना भड़काने वाली पोशाकें क्रय कर लाई थी।
यद्यपि उसे इस बारे में तनिक भी स्मृति नहीं थी। एक अन्य दिन जब वह डॉ. थिगपेन से बातें कर रही थी, तब एक बिलकुल ही पृथक ‘ईव’ का स्वरूप सामने आया। वह एक सुसंस्कृत, आत्मविश्वासी उतावली पसंद महिला थी। जो धूम्रपान करती थी, शराब पीती थी तथा सभ्य व्यक्तियों का साहचर्य चाहती थी, जबकि वास्तविक ‘ईव’ संतोषी और उच्च विचारों वाली थी। शराब और सिगरेट के प्रति उसकी घृणा सुविदित थी। ‘ईव’ का व्यक्तित्व ‘ईव ब्लैक’ के रूप में तब सामने आया था, जब क्रिस्टीन मात्र छह वर्ष की थी। एक दिन उसे दौरा पड़ा। उस दौरे की स्थिति में ही उसने अपनी सोई हुई दो बहनों पर हमला कर दिया। बाद में वह सामान्य हो गई। उसे कुछ भी याद नहीं रहा, पर उस शैतानी का दंड उसे पिटाई के रूप में भुगतना पड़ा। यद्यपि वह बार−बार अपने उस कृत्य के प्रति अनभिज्ञता ही जताती रही। यह मूल ‘ईव’ से भिन्न सत्ता थी। ‘ईव’ का तीसरा व्यक्तित्व ‘जेन’ के रूप में प्रकट हुआ, जो शेष दोनों से अधिक समझदार थी।
ईव का उपचार चलता रहा। थिगपेन ने सोचा कि उसके इलाज से तीनों व्यक्तित्वों का एकीकरण हो गया है, पर वे भ्रम में थे। बाद में वह और अधिक उग्र रूप में प्रकट हुए।
थिगपेन के लिए यह अत्यंत अद्भुत मामला था। उन्होंने अलग−अलग सत्ताओं के प्रकटीकरण के अवसर पर ईव का सूक्ष्म अध्ययन करना शुरू किया, तो उन्हें हर सत्ता का पृथक् भौतिक चरित्र देखने को मिला। उदाहरण के लिए, ईव ब्लैक नायलोन वस्त्र के प्रति अधिक संवेदनशील थी। जब शरीर पर उसका अधिकार होता, तो नायलोन के कपड़े से ईव के शरीर पर चकत्ते उभर आते, किंतु ईव ह्वाइट के साथ यह बात नहीं थी।
दोनों के मध्य एक अन्य अंतर यह था कि ईव ह्वाइट कुछ मानसिक शक्तिसंपन्न थी, जबकि ईव ब्लैक साधारण थी। इस बात जब वह किशोरावस्था में थी, तो उसकी छोटी बहन बीमार हो गई। सबने निमोनिया का अनुमान लगाया। दूसरी रात क्रिस्टीन को स्वप्न में ईसामसीह के दर्शन हुए। उनने बताया कि तुम्हारी बहिन को निमोनिया नहीं, डिप्थीरिया है। बाद में उसी की दवा की गई और वह स्वस्थ हो गई। युवावस्था में क्रिस्टीन ने फिर एक स्वप्न देखा, जिसमें उसके पति की मौत बिजली के झटके लगने से हुई दरसाई गई थी। दूसरे रोज उसने पति को काम पर जाने से रोक दिया। जो व्यक्ति उसकी जगह काम करने गया, सचमुच उसकी मृत्यु बिजली का करेंट लगने से हो गई। एक बार वह अपने पति के साथ गाड़ी पर सैर के लिए निकली। कुछ दूर जाने के उपराँत उसने अपने पति से कार रोकने और पहियों का निरीक्षण करने का निवेदन किया। ऐसा करने पर पिछला पहिया काफी ढीला मिला। वह किसी भी क्षण खुलकर अलग हो सकता था।
इससे स्पष्ट है कि ईव के कलेवर पर अलग−अलग समय में अलग−अलग सत्ताओं का अधिकार होता। वे एक−दूसरे से सर्वथा स्वतंत्र और भिन्न थीं। उनकी अपनी निजी मौलिकताएँ थीं। उसी के हिसाब से स्थूल देह व्यवहार करतीं।
एक मिलते−जुलते प्रसंग का वर्णन करते हुए काँलिन विल्सन अपनी उक्त पुस्तक में लिखते हैं कि डोरिस फिसर वाशिंगटन, अमेरिका की रहने वाली थी। उसका पिता मद्यप था और माँ शालीन। एक बार जब वह छोटी थी, तो शराब के नशे में धुल पिता ने उसे उसकी माता की बाँहों से छीनकर फर्श पर फेंक दिया। वह उठ बैठी। अब वह डोरिस नहीं थी, बल्कि ‘एरियल’ नामधारी एक भिन्न चरित्र थी। उसके पश्चात् डोरिस के शरीर पर ‘मारग्रेट’ नामक सत्ता का कब्जा हो गया। उसने उसके जीवन को नरक तुल्य बना दिया। वह उसके साथ ऐसे मनोरंजन और खिलवाड़ करने लगी कि अब तक वह उनसे उबर नहीं सकी। उसकी मृत्यु एक पागलखाने में हुई।
डोरिस ने यह प्रण कर रखा था कि वह नदी में कभी भी तैरने नहीं जाएगी, किंतु जब उसे होश आया, तो वह यह देखकर हैरान रह गई कि वह नदी की ओर से ही लौट रही थी। उसके बाल गीले थे और साथ में भीगे वस्त्र भी थे। स्नान की उसे तनिक भी स्मृति नहीं थी। एक बार प्लेट में रखे एक केक के टुकड़े को खाने के लिए वह बढ़ी, तभी उसके शरीर पर मारग्रेट ने अधिकार कर लिया और उस टुकड़े को उठाकर नीचे फेंक दिया। वे दोनों परस्पर बातें भी करती थीं, यह आश्चर्यजनक होते हुए भी उतना ही सत्य है, जितना प्रतिदिन प्रातः सूर्य का निकलना। इस क्रम में दोनों एक ही मुँह का इस्तेमाल करतीं। मारग्रेट उसके मन की बात समझ जाती, पर डोरिस में यह क्षमता नहीं थी। इसके लिए उसे मुख से निस्सृत शब्दों पर निर्भर रहना पड़ता और तब तक इंतजार करना पड़ता, जब तक वे पूर्णतया बाहर न निकल जाएँ।
डोरिस में दूरदर्शन की भी सामर्थ्य थी। यदा−कदा उसे इसकी झलक मिल जाती। एक बार उसे अपनी माँ दिखाई पड़ी। वह बीमार प्रतीत हो रही थी। डोरिस जब माँ के पास पहुँची, तब वह निमोनियाग्रस्त थी। उपचार आरंभ हुआ, पर वह बच न सकी। डोरिस माँ के मृत शरीर के पार्श्व में बैठी हुई थी। इसी बीच कमरे में पिता का प्रवेश हुआ। उसने शराब पी रखी थी। लड़खड़ाते कदमों से वह अपने बिस्तर की ओर बढ़ा और पत्नी को देखे बिना ही सो गया। इसी क्षण डोरिस के शरीर में किसी नई आत्मा का आगमन हुआ। उसमें स्मृति और व्यक्तित्व का पूर्णतः अभाव था। शायद वह कोई नवजात बालिका थी। समय बीतने के साथ−साथ उस बालिका का विकास हुआ और वह एक सुस्त एवं निर्जीव युवती के रूप में उभरी। एक वर्ष पश्चात् असावधानीवश डोरिस सिर के बल गिर पड़ी। तब उसके भीतर से एक अन्य सत्ता का उद्भव हुआ। वह और भी अधिक सुस्त थी।
अब डोरिस की काया में विभिन्न स्तरों वाली सत्ताओं का एक परिवार ही बस गया था। रोचक बात यह थी कि सबने मिलकर एक श्रेणीबद्धता बना ली थी। एरियल नामक आत्मा इनमें सर्वोपरि थी। वह शेष चारों के मनों को पढ़ सकती थी और उनके बारे में सब कुछ जानती थी। इसके बाद मारग्रेट का स्थान था। वह अपने से नीचे की तीनों आत्माओं के बारे में भलीभाँति जानती थी, पर एरियल के बारे में नहीं, कारण कि वह उससे उच्च कोटि की थी। डोरिस को अपने से निम्न स्तर की दो आत्माओं का ज्ञान था, किंतु एरियल और मारग्रेट के बारे में नहीं। उनके संबंध में वह तभी समझ पाती थी, जब वे उनसे संपर्क करतीं।
डोरिस के प्रति मारग्रेट के व्यवहार पर एरियल अक्सर अप्रसन्न हो जाती। डोरिस को बाहर निकालकर उसके मन−मस्तिष्क पर कब्जा कर लेना, एरियल को तनिक भी नहीं सुहाता। इसलिए ऐसे अवसरों पर वह कई बार मारग्रेट को शरीर से बाहर धकेल देती। इन्हीं प्रसंगों के कारण मारग्रेट को यह विदित हो सका कि इस कलेवर में किसी अन्य सत्ता का भी अस्तित्व है, जिसकी जानकारी उसे नहीं है।
वह अभी इन आत्माओं के चंगुल में ही थी कि उसका परिचय पीट्सवर्ग के एक सहृदय चिकित्सक से हो गया वाल्टर फ्रेंकलिन प्रिंस नामक यह डॉक्टर डोरिस के साथ पुत्रीवत् व्यवहार करता, उसे भरपूर स्नेह−प्यार देता। इससे उसकी स्थिति में सुधार होने लगा। वह पहले की तुलना में अधिक स्वस्थ और प्रसन्न दीखने लगी। अब बाहर की सत्ताएँ अचानक विदा लेने लगीं। जो सत्ता सद्यः जात बालिका के रूप में प्रकट हुई थी, वह अकस्मात् यौवन से बचपन की ओर लौटने लगी और फिर एक दिन सदा के लिए समाप्त हो गई। ‘टेप रिकाँर्डर’ व्यक्तित्व भी समाप्त हो गया। इससे डोरिस का आत्मविश्वास जगा, वह अंदर से सबल अनुभव करने लगी। इसके साथ ही मारग्रेट का भी कैशोर्य की ओर पलायन हाने लगा और अंततः उस अस्तित्व का भी अंत हो गया। डोरिस के शरीर में अब सिर्फ ‘एरियल’ ही शेष बची। वह कभी भी डोरिस के जीवन में हस्तक्षेप नहीं करती, उसे परेशान नहीं करती। इसके विपरीत वह सदैव उसका ध्यान रखती। अंत में वह उसको न्यूयार्क ले गई। इस समय तक वाल्टर फ्रेंकलिन का निधन हो चुका था। इससे वह लगभग टूट−सी गई थी, कुछ समय उपराँत वहीं उसकी मौत हो गई।
चेतना जगत् में भी उल्लंघन−अतिक्रमण की पूरी−पूरी गुंजाइश है। निम्न स्तर का जंगल का कानून वहाँ भी चलता है। जिसकी लाठी, उसकी भैंस की कहावत सिर्फ भौतिक जगत् में ही चरितार्थ होते नहीं देखी जाती। उसका अस्तित्व सूक्ष्म संसार में भी विद्यमान है। सबल आत्माएँ निर्बलों को वहाँ भी उत्पीड़ित करते पाई जाती हैं। इससे बचने का एक ही उपाय है, हम अपनी निर्बलता से मुक्ति पाएँ। यहाँ निर्बलता का तात्पर्य शारीरिक दुर्बलता से नहीं लगाया जाना चाहिए। यहाँ इसका आशय चेतना की मलिनता से है। यही व्यक्ति को दीन−हीनों जैसी स्थिति में ला पटकती और अक्षमता का ऐसा उपहार दे जाती हैं, जो जन्म−जन्माँतरों तक पीछा नहीं छोड़ती। यदि उन विक्षेपों से किसी तरह छुटकारा पाया जा सके और चेतना का संपूर्ण परिमार्जन संभव हो सके, तो आत्मसत्ता इतनी समर्थ और विभूतिवान् बन सकती है, जिसकी उपमा ईश्वर से दी जा सके। मनुष्य परमात्मा का अंशधर है। वह उस स्तर को प्राप्त करके ही अपनी असमर्थता पर विजय पा सकता है, इसे काम ने नहीं।
मोती पहनने की महत्त्वाकांक्षा अनेक सीपियों का पेट चीरे बिना पूरी नहीं हो सकती।
***
मनुष्य व्यवसाय करता है पेट के लिए। और सृजन करता है आत्मा और परमात्मा की प्रसन्नता के लिए।
प्रिंस ऑफ वेल्स दिल्ली आ रहे थे। अँग्रेज सरकार की समूची व्यवस्था उनके स्वागत की भारी−भरकम तैयारियों में जुटी थी। वह 1920-21 का समय था। जब सामान्य अँग्रेज भी स्वयं को भारत देश का भाग्य विधाता समझ बैठता था। ऐसे में प्रिंस ऑफ वेल्स का दिल्ली आना बहुत मायने रखता था। हालाँकि राष्ट्रवासियों की कोशिशें यही थीं कि स्वागत समारंभ फीका रहे और भारत की अपनी विशिष्ट राष्ट्रीय एवं साँस्कृतिक छवि धूमिल न हो। पर अंग्रेज सरकार अपनी कुटिल चालें चलकर जैसे−तैसे अपने साम्राज्यवादी झंडे को ऊँचे से ऊँचा फहराना चाहती थी। उसकी कोशिश यह थी कि हिंदू समाज की आपसी फूट का लाभ उठाकर अछूतों की भीड़ इकट्ठी करके इस समारोह को जिस किसी तरह भी सफल बनाया जाए। यही नहीं हजारों−हजार संख्या में अछूत भाई−बहनों को इस अवसर पर ईसाई बनाने की योजना भी सरकार ने बनाई थी।
ऐसे समय में स्वामी परमानंद जी महाराज से चुप न बैठे रहा गया। वह संत होने के साथ सुधारक व विचारक भी थे। हिंदू समाज की रूढ़ियों, कुरीतियों को समाप्त करने के उद्देश्य से उन्होंने अपने आश्रम में हरिजन पाठशाला भी खोली थी। इन हरिजन बालकों को वे अपनी संतान से भी ज्यादा प्यार करते थे। उन्होंने अपने शिष्य श्री कृष्णानंद जी से कहा कि तुम आश्रम की हरिजन पाठशाला के बच्चों को लेकर दिल्ली जाओ और वहाँ के समारोह में बच्चों से भजन गवाओ। यह भजन था “धरम मत हारो रे।” इसे स्वामी परमानंद जी महाराज ने स्वयं ही इसी प्रयोजन के लिए बनाया था।
स्वामी परमानंद जी की हम बात को जानकर कई लोगों ने उन्हें काफी बुरा−भला कहा। कइयों की धमकियाँ भी मिलीं। पर कृष्णानंद जी अपने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करके सब कुछ सहते हुए चुपचाप दिल्ली के लिए चल पड़े। सरकार ने इस अवसर पर अछूतों को दिल्ली आने के लिए मुफ्त रेलगाड़ी की व्यवस्था की थी। ये लोग भी इसी का लाभ उठाकर आयोजन स्थल तक पहुँच गए।
प्रिंस ऑफ वेल्स के पधारने पर ज्यों ही समारोह शुरू हुआ, तभी आश्रम के बच्चों ने खंजरी बजाकर स्वामी परमानंद जी महाराज का भजन गाना प्रारंभ कर दिया, “धरम मत हारो रे, यह जीवन है कि दिन चार।”
सीधे−सादे शब्द। सीधी−सादी बात और सीधे−सादे सुनने वाले। एक−एक शब्द श्रोताओं के हृदय में बैठने लगा।
धरमराज को जाना होगा, सारा हाल सुनाना होगा। फिर पीछे पछताना होगा, कर लो सोच−विचार।
एक बूढ़े ने पूछा, ये कौन हैं? क्या गा रहे हैं। जब उसे बताया गया कि अछूतों के बच्चे हैं। भगवद् भक्ति आश्रम रेवाड़ी में पढ़ते हैं और गा रहे हैं, “धरम मत छोड़े रे, जगत में जीना है दिन चार।”
बूढ़े ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा, अछूतों के बालक और इतने साफ−सुथरे। इसका उपाय भी पहले से सोच रखा था। उन्होंने कुछ बच्चों के अभिभावकों को भी यात्रा में साथ ले लिया था, क्योंकि उनके गुरु महाराज को सारी स्थिति पूर्व से ही स्पष्ट थी। ये अभिभावक खड़े होकर कहने लगे, हाँ भाई, ये हमारे ही बच्चे हैं। आश्रम में स्वामी जी इन्हें पढ़ाते हैं।
इस पर बूढ़ा भंगी खड़ा होकर हाथ जोड़ता हुआ बोला, “भाइयों! एक बात मैं कहूँ। जब साधु−महात्मा हमारे बालकों को ऐसे प्रेम से पढ़ाते हैं, तो अब हमें धरम बदलने की जरूरत ही क्या रह गई है। अब हम अपना धरम नहीं छोड़ेंगे।”
उस वृद्ध की बात के समर्थन में पूरा आयोजन स्थल गूँज उठा। चारों ओर उसे इसी तरह की आवाजें सुनाई देने लगीं। अँग्रेजी सरकार का षडयंत्र विफल हो गया। स्वामी परमानंद जी महाराज को जब इस सफलता का पता चला, तो उन्होंने कहा, बाहरी शक्तियों की कुटिल चालें तभी सफल हो पाती हैं, हममें आपसी फूट होती है और आपसी फूट तभी पनपती है, जब हम परस्पर एक−दूसरे को प्यार और अपनापन देने में विफल रहते हैं। स्वामी जी का कथन आज भी तब जितना ही सत्य है।
देव संस्कृति का वासस्थान समर भूमि की लाल कीच नहीं, सहिष्णुता, का शीतल प्रदेश है, उदारता का उज्ज्वल क्षीर समुद्र है। −पं श्रीराम शर्मा आचार्य
मानवी बुद्धि जो कुछ भी देखती−समझती है, वह अत्यल्प है। उसे अर्द्ध सत्य कहना ही उचित होगा। यदि उसमें तथ्यों को सर्वांगपूर्ण रूप से जानने, समझने और उसके ज्ञात−अविज्ञात हर पहलू को परख पाने जितनी सामर्थ्य रही होती, तो विदित हो पाता कि यहाँ सीधा चलने पर जो उलटा क्रम दिखाई पड़ता है, उसे अपवाद कहकर नहीं टाला जा सकता। सहायता करने वालों को असहयोग−ही−असहयोग, प्रेम बाँटने वालों को घृणा−ही−घृणा का प्रतिदान मिलते भी कई बार देखा गया है। यह सब एक सुनिश्चित विधान के अंतर्गत होता है। इसमें उलटा नियम अथवा औंधा कानून जैसी कोई बात नहीं।
कई बार प्रगति प्रयासों के असफल होने के संबंध में भी ऐसे अपवाद सामने आते रहते हैं। उसी योग्यता के उसी मार्ग पर चलने वाले, उसी उपाय का अवलंबन करने वाले, दूसरे लोग बाजी−पर−बाजी जीतते, सफलता−पर−सफलता पाते चले जाते हैं, पर पूरी ईमानदारी और समझदारी के साथ किए गए अपने प्रयत्न बहुत ही स्वल्प परिणाम दे पाते हैं। अनेक बार तो बुरी तरह निराशा ही हाथ लगती है। यदि अपनी ही भूल से ऐसा हुआ, तो वह भूल क्या थी? यदि थी, तो क्या वह जानबूझकर की गई? इन प्रश्नों पर बहुत ढूँढ़−खोज करने पर भी कुछ ऐसे तथ्य हाथ नहीं लगते, जिन्हें असफलता का कारण ठहराया जाए, भूल माना जाए और भविष्य में उसे सुधारने का प्रयास किया जाए। अनेक बार मनुष्य स्वयं बिलकुल निर्दोष होता है। परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी विचित्र बन जाती हैं कि सब कुछ किया−कराया मिट्टी हो जाता है। अतिवृष्टि, पाला टिड्डे, कीड़ों आदि के कारण किसान का तत्परतापूर्वक किया गया श्रम जब निरर्थक चला जाता है, तो उसकी समझ में नहीं आता कि उससे कहाँ−क्या भूल हुई? वैसी भूल फिर न होने पाए, इसके लिए वह भविष्य में क्या सावधानी बरते? ऐसे ही अगणित प्रसंग सामने आते रहते हैं।
इन्हीं आकाँक्षाओं के मध्य भाग्यवाद का उदय होता है। जिन घटनाओं के लिए कार्य−कारण सिद्धाँत के अंतर्गत कोई बुद्धिसंगत व्याख्या नहीं सूझ पड़ती, वैसे प्रसंगों में मन को समझाने के लिए भाग्य का एकमात्र विकल्प ही शेष रह जाता है, अतः उन्हें सौभाग्य−दुर्भाग्य का खोल समझकर संतोष कर लेना पड़ता है। इसी प्रकार के और भी कथन तब कहे जाते हैं, जब प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं, अप्रत्याशित संकट सामने आ खड़े होते अथवा सफलता−मिलते−मिलते अपना रुख बदलती और बिजली की तरह आशा की चमक दिखाकर कहीं−से−कहीं चली जाती है। ऐसा ही तब भी कहा जाता है, जब अंधे के हाथ बटेर लगती और सर्वथा समर्थ, योग्य और श्रमशील को खाली हाथ रहना पड़ता है। कितनों को ही ऐसी सफलताएँ करतलगत हो जाती हैं, जिनके लिए उनके पुरुषार्थ को श्रेय किसी भी प्रकार नहीं दिया जा सकता। पूर्वजों की बड़ी संपत्ति उत्तराधिकार में मिल जाए, तो इसमें प्राप्तकर्त्ता का श्रेय क्या है? लॉटरी खुल जाने जैसी सफलताओं में किस कौशल या पौरुष को सराहा जाए? तेजी−मंदी के दौर में कई व्यापारी देखते−देखते दिवालिया होते और देखते−देखते लखपति बनते दृष्टिगत होते हैं। उसमें किसको मूर्ख, किसको बुद्धिमान कहा जाए? नदी में बाढ़ आती है। किसी का खेत काटकर उसकी आजीविका उदरस्थ कर जाती है। किसी के खेत में कहीं से लाकर ऐसी उपजाऊ मिट्टी पटक जाती है कि वह उसकी पैदावार से देखते−देखते अमीर बन जाता है। नदी द्वारा एक की भूमि को काट ले जाना और दूसरे को समृद्धि का वरदान बरसा जाना, इसे क्या कहा जाए? इसके लिए दोष या श्रेय किसको दिया जाए? आँधी−तूफान में जिसका छप्पर उजड़ गया और घर बिगड़ गया, इसमें उसकी क्या भूल बताई जाए और भविष्य में क्या सावधानी बरतने का परामर्श दिया जाए? सामान्य बुद्धि कुछ समझ नहीं पाती और उन्हें संयोग अथवा अपवाद कहकर टाल देती है। समय−समय पर ऐसे प्रसंग उपस्थित होते ही रहते हैं, जिसमें बुद्धि असमंजस में पड़ जाती है और कोई भी निर्णय–निष्कर्ष नहीं निकाल पाती।
एक ऐसे ही प्रसंग का वर्णन महात्मा आनंद स्वामी ने अपनी पुस्तक ‘एक ही रास्ता’ में किया है। घटना सन् 1946 की है। दोपहर का समय था। मुँगेर (बिहार) के लोग तब घरों में विश्राम कर रहे थे। कई दिनों से वहाँ भूकंप के हल्के झटके महसूस हो रहे थे। झटके अत्यंत मंद होने के कारण लोग उस ओर से असावधान बने रहे और किसी प्रकार की सुरक्षा के कोई कदम नहीं उठाए। प्रकृति की ओर से लगातार दी जा रही चेतावनी की उपेक्षा का सामूहिक दंड इसी दिन मिलने वाला है और यह जीवन का आखिरी दिन है, यह किसे पता था? विश्राम हेतु लोग अपने बिस्तर में गए ही थे कि तीव्र भूचाल आया और इसी के साथ मकान−दुकान देखते−देखते धराशायी हो गए। सब कुछ इतनी शीघ्रता से पलक झपकते हो गया कि लोगों को बाहर भागने का मौका ही नहीं मिला। पूरा नगर श्मशान में परिवर्तित हो गया। प्रथम और दूसरे दिन तक तो कुछ लोग जीवित चोट खाए निकलते रहे, पर तीसरे दिन से लाशों की ऐसी कतार लगी कि पंद्रह दिनों तक वह निकलती ही चली गई। मरघट का साकार दृश्य उपस्थित हो गया था।
अभी भी मलबे की सफाई चल रही थी और उसके नीचे दबे पड़े मृतकों की खोज की जा रही थी और उसके पर जब काम चल रहा था, सफाई करने वाले अचानक चौंक उठे। नीचे से बार−बार एक स्वर उभर रहा था, जिसमें धीरे और सावधानीपूर्वक खोदने का निवेदन था। पंद्रह दिनों तक जमीन में दबे रहने पर भी यह कौन जीवित बचा है। इस आश्चर्य से कुछ क्षण तक लोग विस्मय−विमूढ़ बने रहे, पर आपात स्थिति का ध्यान आते ही अधिक तत्परता और शीघ्रता दिखाई गई।
कुछ ही समय के परिश्रम के उपराँत भारी शहतीरों और ध्वस्त दीवारों के बीच विशाल ढेर के नीचे से एक अधेड़ आयु का व्यक्ति बाहर निकाला गया। आस−पास केले के बहुत सारे छिलके पड़े थे। उससे जब सुरक्षित बचे रहने के बारे में पूछा गया, तो बताया कि वह एक फल बेचने वाला है और इसी आय से अपना पेट पालता था। उक्त दिन केले की टोकरी सिर पर लिए इस मकान की दालान के नीचे खड़ा था कि अकस्मात् छत तीव्र कंपन के साथ गिर पड़ी और वह भी मलबे के नीचे दब गया। टोकरी इस प्रकार उलटी कि सारे केले उसके नीचे सुरक्षित पड़ रहे और वह भी कुछ इस प्रकार दबा कि किसी प्रकार की कोई हानि नहीं पहुँची। धरती एक बार फिर काँपी। इसी के साथ न जाने कैसे मलबे के मध्य एक छोटा सूराख हो गया। हवा और धूप−गरमी आने के लिए इतना पर्याप्त था। जीवन के लिए अब मात्र एक ही चीज की आवश्यकता रह गई थी, पानी की। दैवयोग से पृथ्वी तीसरी बार फिर काँपी और तब मकान का फर्श टूट गया एवं उसके साथ ही पानी की एक लहर इधर आई और इस गड्ढे को ऊपर तक भर गई। हवा−धूप यों छिद्र से उपलब्ध हो गई। केले पास थे ही। पानी भी परमात्मा ने भेज दिया।
इस आधार पर अब तक जीवित रहा। आज अंतिम दिन है, जबकि केले सब समाप्त हो गए हैं। पानी नहीं बचा है। प्रकाश का आना भी बंद हो गया, पर आप सब लोग जीवन−ज्योति बनकर आ गए, सो मैं आप सबको भगवान् की मदद की मानता हूँ। इतना कहकर उसकी आँखें भर आई। भगवान् को लाख−लाख धन्यवाद देकर वहां वहाँ से घर की ओर चला गया।
यह ठीक है कि ऐसे प्रसंग बार−बार नहीं घटते, यह अपवाद है। सामान्यक्रम इन्हें नहीं कहा जा सकता, फिर भी ये अपवाद भी सर्वथा उपेक्षणीय नहीं हैं। उनका भी कारण खोजना होगा। अत्युक्ति न समझी जाए और पौरुष समर्थकों को बुरा न लगे, तो नम्रतापूर्वक यहाँ तक कहा जा सकता है कि ‘भाग्य का खेल’ 30 प्रतिशत घटनाक्रमों में ही काम कर रहा होता है। यों महत्ता तो कर्मनिष्ठा की ही रहेगी और खुला समर्थन उसी को दिया जाएगा, पर इन अप्रत्याशित परिणामों के संबंध में विचार तो किया ही जाना चाहिए।
विज्ञान कहता है कि इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता, जो प्रकृति−नियम के विपरीत हो? भूकंप, बिजली गिरना, ज्वालामुखी फटना, तूफान जैसी घटनाएँ साधारण बुद्धि को आकस्मिक लगती हैं और उनके पीछे विपर्यय दीखता है, पर वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं हैं। उनके पीछे भी प्रकृति के सूक्ष्म नियम ही काम करते हैं। यह दूसरी बात है कि इन नियमों की जानकारी सर्वसाधारण को नहीं हो अथवा उस तरह के घटनाक्रम आए दिन घटित न होने के कारण वे आश्चर्यजनक लगते हों। चमत्कार उन्हीं को कहते हैं, जो दृश्य आमतौर पर देखने को नहीं मिलते। जब भी विज्ञान के आविष्कार प्रथम बार हुए, तो उन्हें भारी चमत्कारों के रूप में देखा गया था। रेल, टेलीफोन, बिजली, रेडियो, सिनेमा, टी. वी. आदि पूर्व काल में अप्रचलित आविष्कार जब सामने आए, तो सामान्य बुद्धि हतप्रभ रह गई और उसे जादू जैसी करामात समझा गया। पीछे अब जब विज्ञान और आविष्कारों का सिलसिला समझ में आ गया, तो अंतर्ग्रही यात्रा, अणु−आयुधों, रोबोटों, कंप्यूटरों जैसी आश्चर्यजनक उपलब्धियों तक को साधारण बात मान लिया गया है।
जादू नाम की कोई वस्तु दुनिया में नहीं है। लोगों की परख करने की क्षमता को चकमा दे सकने की सफलता का नाम ही जादूगरी है। अध्यात्म क्षेत्र में सिद्धि−चमत्कारों का वर्णन बहुत होता रहता है। उन्हें देखकर आश्चर्य तो किया जा सकता है, पर ऐसा नहीं माना जा सकता कि यह आकस्मिक है, इनके पीछे प्रकृति की सामान्य नियम−परंपरा का हाि नहीं है। इसमें अव्यवस्था के लिए रंचमात्र भी गुंजाइश नहीं है। यहाँ ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता, जिसे अप्रत्याशित, असंभव या चमत्कारी कहा जा सके। जिसे हम नहीं जानते, उस अविज्ञात को ही अपवाद कह सकते हैं। वस्तुतः उन अपवादों के पीछे भी प्रकृति का परिपूर्ण व्यवस्थाक्रम काम कर रहा होता है। आदि काम में सूर्य, बिजली, आग, वर्षा आदि तत्त्वों को देवता माना जाता था। उनकी मनौती मनाई और बलि चढ़ाई जाती थी। चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण किन्हीं राक्षसों का आकस्मिक आक्रमण समझा जाता था, पर अब वह बात नहीं रही। विज्ञान की शोधों और खोजों ने अब यह प्रमाणित कर दिया है कि इनके पीछे सुनिश्चित खगोलीय कारण हैं और यह बुद्धिसंगत भी हैं। यहाँ अप्रत्याशित कुछ भी नहीं हैं। अविज्ञात को ही अवचसउ कहते हैं। वस्तुतः इस सृष्टि में अंधेरगर्दी के लिए, व्यक्तिक्रम के लिए कहीं रत्तीभर भी गुंजाइश नहीं है।
अविज्ञात−अप्रत्याशित को ही अपवाद कहा जाता है। वस्तुतः यहाँ यथार्थवाद का ही अस्तित्व है। अपवाद का इतना ही अर्थ है कि जिस आधार पर वह असामान्य घटनाक्रम उपस्थित हुआ, उसकी जानकारी चलता ही रहेगा, क्योंकि सामान्य व्यवस्था की ही हमें जानकारी है और उसी को देखने−समझने की आदतें भी हैं। सृष्टि के अविज्ञात नियमों के आधार पर जब भी कुछ असामान्य घटित होगा, तभी उसे अपवाद कह दिया जाएगा। प्रकृति के रहस्य अनंत हैं और मनुष्य की बुद्धि अत्यंत स्वल्पं। ऐसी दशा में असाधारण तो घटित होता ही रहेगा। उचित यही है कि उस संबंध में हम अपना दृष्टिकोण साफ कर लें। अपनी ससीमता को स्वीकार करें और असमंजस में न पड़कर तथ्यों तक पहुँचने का यथासंभव प्रयत्न करते रहें।
पिछले दिनों एक ही तरीका अपनाया जाता रहा है कि हर अपवाद को देवमानवों के क्रिया−कृत्य मानकर समाधान कर लिया जाता रहा है। भाग्यवाद भी कुछ इसी प्रकार का दर्शन है, जिसमें देवताओं के द्वारा भाग्य निर्माण की बात कहकर एक विचित्र प्रकार की भ्राँति उत्पन्न कर दी गई हैं। विचारशील वर्ग में अपवादों को ‘चान्स,’ ‘काँइन्सीडेन्स’, ‘लक’ आदि कहा जाता रहा है। उसे अप्रत्याशित अवसर मात्र ठहराया गया है। उसके लिए किसी देवता को श्रेय या दोष नहीं दिया गया है। उसमें अविज्ञात को अपवाद की मान्यता भर दी गई है और उसका कारण विदित न होने पर उसे किसी देवता का कोप या अनुग्रह कहकर एक नया भ्रम गढ़ने की चेष्टा नहीं की गई है। यह समझदारी का चिह्न है। सर्वज्ञ होने का दावा करना मिथ्या गर्व है। जो ज्ञात नहीं है, उसे जानने के लिए मस्तिष्क खुला रखा जाए और धैर्यपूर्वक रहस्योद्घाटन के सूत्र खोज निकालने का प्रयत्न करते रहा जाए। इसी में बुद्धिमानी है।
राजा महेंद्रप्रताप के पास ज्योतिषी पहुँचे। कहा, “आपके भाग्य में पुत्र नहीं है, पर आप अमुक अनुष्ठान करेंगे तो अवश्य पुत्र होगा।” राजा साहब ने उन्हें तुरंत विदा करते हुए कहा, “आपको व्यर्थ मेरे जैसे व्यक्ति के पास आकर समय भी नष्ट करना पड़ा व तुरंत जाना भी पड़ रहा है। आप अपनी सलाह अपने पास रखें। मुझे अपना वंश चलाने के लिए जीवधारी रूपी बेटा नहीं चाहिए। जो राशि बेटे पर खरच होती, उसे मैं सत्प्रयोजनों में नियोजित करूंगा।
राजा साहब ने वृंदावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की। उसे ही अपना बेटा माना व लाखों की संपत्ति उसे दे गए। विरासत में उन्होंने लिखा कि मेरा वंश यह प्रेम महाविद्यालय ही आगे चलाएगा। समाज में ऐसे सत्प्रवृत्तियाँ चल पड़ें, तो मैं समझूँगा कि मेरा पुत्र सपूत निकला।
एक बार एक सेठ जी स्वयं महामना मालवीय जी के पास अपने यहाँ विवाह पर आयोजित विशाल भोज में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए पहुँचे। महामना जी ने उनके इस निमंत्रण को इन विनम्र किंतु मर्मस्पर्शी शब्दों में अस्वीकार कर दिया, “यह आपकी कृपा है, जो मुझ अकिंचन के पास आप स्वयं निमंत्रण देने पधारे, किंतु जब तक मेरे इस देश में, मेरे हजारों−लाखों भाई आधे पेट रहकर दिन काट रहे हों, तो मैं विविध व्यंजनों से परिपूर्ण बड़े−बड़े भोजों में कैसे सम्मिलित हो सकता हूँ। ये सुस्वादु पदार्थ मेरे गले कैसे उतर सकते हैं। क्या भोजन मात्र से ही यश मिलता है। यश अर्जन का आप कोई अच्छा तरीका नहीं सोच सकते?”
महामना जी की यह मर्मयुक्त बात सुन सेठ जी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भोज में व्यय होने वाला सारा धन गरीबों के कल्याणार्थ दान दे दिया।
निश्चित ही यह प्रिय लगता है कि परमात्मा का अनुग्रह बरसे, स्वयं को कुछ न करना पड़े और अनायास ही अध्यात्म की ऊँची कक्षा तक पहुँच जाएँ। निजी जीवन में जब इस तरह का अनुग्रह बरसता है, तो उसे ईश्वर की सहायता, चमत्कार, अहैतुकी कृपा और भगवतदर्शन जैसी उपलब्धियों के नाम से पुकारते हैं। सामूहिक रूप से या बहुत बड़े समुदाय, देश या विश्व में उनका अनुग्रह बरसता है, तो उसे अवतार कहते हैं। परमात्मचेतना अपने आपको लौकिक रूप में ढालती है और अपनी सामर्थ्य से चमत्कार करके वापस चली जाती है। अवतार पूरे समूह, समाज या देश की आकाँक्षा और आवश्यकता के अनुसार आते हैं।
एक अन्य पक्ष है, जो निजी जीवन और सामाजिक, राष्ट्रीय जीवन में भी दिखाई देता है। वह परिदृश्य भी ईश्वर की सामर्थ्य से ही प्रकट होता है, लेकिन उसमें मानवी पराक्रम भी उतना ही भागीदार बनता है। गोवर्द्धन पर्वत निश्चित ही श्रीकृष्ण ने कनिष्ठा अँगुली के इशारे से उठाया था, लेकिन ग्वाल−बालों ने भी अपनी लाठियों का सहारा देकर पुरुषार्थ प्रकट किया था। लंका विजय और रावण के पराभव में श्रीराम का ही दिव्य चमत्कार दिखाई देता है, लेकिन रीछ−वानर इकट्ठे न होते, आसुरी आतंक से पीड़ित लोगों ने गुहार न मचाई होती, तो राम अकेले रावण का संहार करने शायद नहीं जाते।
दूसरे प्रकार के प्रयत्नों में मनुष्य जाति ही अपने भीतर ईश्वरीय सामर्थ्य प्रकट करती है और आसुरी आतंक से जूझ पड़ती है। वह संगठित आततायी शक्तियों से टकराती है। उन्हें पराभूत कर मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करती है। निजी जीवन में आत्मिक क्राँति के लिए इस तरह के प्रयत्नों को साधना कहते हैं। जिन उपायों से परमात्मा का अनुग्रह बरसता है, दरअसल वह उपाय कम और मौन पुकार ज्यादा है। इसे प्रार्थना कहते हैं। प्रार्थना सुनकर भगवान् दौड़े आते हैं। उनकी कृपा बरसने लगती है। साधना में प्रयत्नों की तीव्रता के अनुसार अपने भीतर बैठी परमात्म चेतना स्वयं को व्यक्त करती है। वह साधक को उसकी स्थिति के अनुसार लाभ पहुँचाती और लौकिक जीवन को कम−से−कम छेड़ती हैं।
प्रार्थना का मार्ग भक्ति का मार्ग है। भक्तों के जीवन में परमात्मा का अनुग्रह बरसता है, तो देखा गया है कि उनका साँसारिक जीवन अस्त−व्यस्त होने लगता है। उन्हें अपनी आँतरिक स्थिति के अनुसार किसी भी समय हँसी आ सकती है, वे रोने लग सकते हैं, नाचने−गाने लगते हैं और भावनाओं के वेग में आस−पास के जगत् को भी अव्यवस्थित करने लगते हैं। ज्यादातर भावुक भक्त प्रायः दुनियादारी के लायक नहीं होते।
साधना के संबंध में कहा गया है कि वह पहले पात्रता विकसित करती है, फिर परमात्मा को प्रकट करती है। योग की भाषा में इसे ऊर्जा का आरोहण कहते हैं। भक्ति या प्रार्थना में भगवान् का अनुग्रह बरसता है, तो उसे ‘अवतरण’ कहा गया है। तत्त्व रूप में आरोहण या अवतरण में कोई अंतर नहीं हैं। दोनों स्थितियों में भगवान् की चेतना ही प्रकट होती है, लेकिन आरोहण को अवतरण की तुलना में ज्यादा सहज, स्वाभाविक और काम्य बताया गया है। प्रत्येक व्यक्ति की आँतरिक स्थिति एक समान नहीं होती। किसी को आरोहण अनुकूल पड़ता है और किसी को अवतरण, लेकिन चुनना हो तो ऊर्जा को अपने भीतर से उठने देने का मार्ग अपनाना चाहिए।
आरोहण और अवतरण के अंतर को कई तरह से समझा जा सकता है। वर्षा चौबीसों घंटे नहीं होती। कुछ घंटों तक होती रहे, तो भी जीवन अस्त−व्यस्त हो जाता है, लेकिन झील, झरने कुएं और सोतों में जमीन के भीतर से पानी निरंतर बहता रहता है। वह स्थान के अनुरूप एकत्रित होता और फिर ठहर जाता है। इससे किसी तरह की गड़बड़ी नहीं होती। तेज और अनवरत वर्षा को बादलों से पानी का अवतरण कह सकते हैं और जमीन के भीतरी स्रोतों से निकलने की प्रक्रिया को आरोहण के रूप में देखा जा सकता है।
परमात्म चेतना से अचानक बिना कुछ किए साक्षात्कार भी हो जाता है। बहुत से लोगों को एक साथ भी हो सकता है। ऐसे कई साधकों की तैयारी पिछले कई जन्मों से चल रही होती है। वे उस साक्षात्कार से लाभ उठा लेते हैं। जिन्हें बिना प्रयास के ही परमतत्त्व मिल जाता है, वे या तो चूक जाते हैं अथवा उस प्रतीति को झेल नहीं पाने के कारण असहज−असामान्य हो जाते है। श्री अरविंद ने लिखा है कि पिछले जन्म की तैयारी हो तो भी अवतरण अकस्मात् नहीं होना चाहिए। थोड़ी−बहुत तैयारी इस जन्म में भी आवश्यक है। पार्थिव शरीर तो इसी जन्म में मिला है। मन−बुद्धि−चित्त−अहंकार भी नए घटकों का, पंच तन्मात्राओं का आश्रय लेकर स्थिर हैं। उन्हें भी तैयार करना चाहिए।
दूसरों के प्रयत्न भी व्यक्ति का उद्धार करते हैं। उसे सौभाग्य कहा गया है। महर्षि पतंजलि के योगसूत्र की व्याख्या करते हुए व्यास मुनि ने लिखा है कि उस सौभाग्य से बचें तो ही अच्छा। अनुग्रह ईश्वर का भी नहीं लेना चाहिए। वह स्वयं प्रकट हो तो वापस भेज देना चाहिए। हम स्वयं ही साधना का पुरुषार्थ करते हुए इस तक पहुँचे हैं। तब उससे ज्यादा घनिष्ठ हो सकेंगे। प्रह्लाद और ध्रुव की साधना भक्तों की आदर्श है। उन्होंने अनायास आए अवतारी रूप या दृश्य को पहचानने से मना कर दिया। कहा कि जब तक वह हृदय में नहीं प्रकट होंगे, अतिथि ईश्वर को स्वीकार नहीं करेंगे। कौन जाने, कोई आसुरी माया हो।
श्री अरविंद ने अतिमानस के अवतरण को जो सिद्धाँत प्रतिपादित किया, वह अनुग्रह या कृपा स्तर का नहीं है। उनकी दृष्टि यह थी कि सौ लोग भी इस साधना के लिए तैयार हो सके, अपने आपको भागवत् चेतना के अतिमानसी रूप का वाहन बना सकें तो पृथ्वी पर चमत्कार घटित होगा। तब हजारों−लाखों लोग पूर्णता को प्राप्त कर सकेंगे। गिने−चुने साधकों में होने वाला अवतरण, उन्हें बिजलीघर की तरह बना देगा, जहाँ से लोगों तक विद्युत् धारा पहुँचती रहे। गिने−चुने साधकों में भागवत् चेतना का अवतरण उन्हें प्रकाश स्तंभ की तरह खड़ा कर देने जैसा है। मुक्त आत्माओं के उस आलोक को देख हजारों लोगों को प्रेरणा मिल सकती है और वे भी पूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं।
थियोसोफी आँदोलन ने वासना−तृष्णा के बंधनों में बँधे लोगों के लिए अनुग्रह सहायता वाले अवतरण का मार्ग अपनाया। थियोसोफी दर्शन की मान्यता है कि हजारों मुक्त आत्माएँ बंधन में जकड़े लोगों का उद्धार करने के लिए संसार में विचरण करती हैं। लोग कामना भर करें, वे उनकी सहायता के लिए पहुँच जाती हैं। इस मान्यता ने जितने लोगों की सहायता की, उससे ज्यादा का अहित किया है। अदृश्य सहायकों की प्रतीक्षा करते हुए साधक पुरुषार्थ करने से चूक गए। वे आत्मिक विकास नहीं कर पाए और उसके स्थान पर बेहोश कर देने वाले दंभ में चूर होकर रह गए।
साधना में प्रचंड वेग से प्रवृत्त करने वाली परंपराओं में सामूहिक तप का निषेध किया गया है। जप, भजन, सत्संग, पाठ आदि मृदु और पुकारपरक साधनाओं में सामूहिकता को थोड़ा महत्त्व दिया गया है, क्योंकि उससे अतिरिक्त बल मिलता है, लेकिन कुँडलिनी जागरण, चक्रवेधन, भावगती दीक्षा और तंत्र की सकाम−निष्काम हर तरह की साधनाएँ अकेले ही करने की व्यवस्था है। ये साधनाएँ समूह में की जातीं तो विलक्षण परिणाम निकलते।
अध्यात्मविदों के अनुसार परिणाम लाभ के स्थान पर हानि पहुँचाने वाले ज्यादा होते हैं। ऊर्जा का तीव्र जागरण और समूह में उसका संचार कमजोर लोगों को तहस−नहस कर सकते हैं। बिजली का प्रचंड प्रवाह अचानक दौड़ जाए, तो कमजोर तार जल जाते हैं। मशीनें फुँक जाती हैं और ज्यादा वोल्टेज नहीं सह सकने वाले बल्ब फ्यूज हो जाते हैं।
कुँडलिनी जागरण के लिए वैसे भी निजी पुरुषार्थ को महत्त्व दिया गया है। दक्षिणमार्गी सौम्य साधनाओं में गुरु की भूमिका मार्गदर्शक और सहायक की रहती है। वह जरूरी और उचित समझें तो शिष्य पर शक्तिपात कर सकता है लेकिन आमतौर पर इसकी मनाही है। साधक को निजी प्रयत्नों से ही आगे बढ़ने देने का निर्देश है।
ऊर्जा का प्रचंड प्रवाह जगा सकने वाली साधनाओं में सामूहिकता का निषेध एक−दूसरे से प्रभावित नहीं होने देने की सावधानी के तौर पर भी है। जहाँ सामूहिक साधना की जाती है, वहाँ कुछ अतिरिक्त ऊर्जा भी बहने लगती है, यह सभी साधकों के सम्मिलित प्रयत्नों के कारण है। सब को जोड़−मिलाकर कूती गई मात्रा से ज्यादा ही हो जाता है। उदाहरण के लिए, किसी खाली पात्र में सौ लोग आधा−आधा लीटर दूध डालें, तो वह संचय पचास लीटर से ज्यादा ही होगा। कारण कि सभी लोग ठीक आधा लीटर तो नहीं डालते, दो−चार चम्मच ज्यादा भी हो सकता है। पचास लोगों का वह अतिरिक्त योगदान वास्तविक जोड़ से ज्यादा ही बैठता है। अपवादस्वरूप वह कभी कम भी हो सकता है। कुँडलिनी विद्या के प्रसिद्ध विद्वान् पंडित गोपीकृष्ण के अनुसार, यह अतिरिक्त ऊर्जा रिक्त रह गए साधक की तरफ दौड़ती है। प्रवाह थोड़ा आगे बढ़ता है, तो दूसरे साधकों की ऊर्जा भी बहने लगती है। खतरा यह है कि तैयार नहीं हो सकता साधक उस वेग को सहन नहीं कर पाए और उसका अनिष्ट हो जाए।
शून्य स्थान की ओर दौड़ पड़ने वाले प्रवाहों से बवंडर खड़े हो जाते हैं। गरमी के दिनों में रेगिस्तानी या सूखी जगहों पर उठने वाले चक्रवातों से सभी परिचित हैं। यह भी जानते होंगे कि गरमी के कारण जिस जगह हवा का दबाव बेहद कम हो जाता है, वहाँ सभी दिशाओं से वायु का खिंचाव होने लगता है। खिंचाव के कारण आने वाली हवाओं का दबाव चपेट में आने वाली वस्तुओं को जकड़ लेता है। जीवित प्राणी उस चपेट में आ जाएँ, तो उनका दम घुटने लगता है।
सातवें दशक में अमेरिका के सभी शहरों में आठ−दस घंटे के लिए बिजली गुल हो जाने की घटना घटी। उस घटना का कारण बिजली का तंत्र था, जिसमें एक जगह फालतू रह गई बिजली दूसरी जगह भेज दी जाती थी। कोई विशेष उपाय किए बिना इस स्वचालित व्यवस्था के कारण किसी भी इलाके में क्षणभर के लिए भी बिजली गुल नहीं होने का इंतजाम हो सका था। हुआ यह कि अटलाँटा राज्य के एक गाँव की बिजली किसी दुर्घटना के कारण चली गई। अपने आप बिजली का हस्ताँतरण करने वाली व्यवस्था के कारण दूसरे गाँवों की अतिरिक्त बिजली का प्रवाह वैक्यूम क्षेत्र की आरे बहने लगा। कई जगह से यह प्रवाह दौड़ा। परिणाम यह हुआ कि गाँव का तंत्र उस प्रवाह को झेल नहीं पाया। व्यवस्था ध्वस्त हो गई। सभी फ्यूज उड़ गए, ट्राँसफार्मर फुँक गए। इस महाशून्य को भरने के लिए जो अफरा−तफरी मची, उसने तमाम शहरों की व्यवस्था गड़बड़ा दी और हर जगह घंटों के लिए ब्लैक आउट हो गया। प्रचंड वेग से ऊर्जा जगाने वाली तीव्र साधनाओं में भी इसी तरह की अराजकता का खतरा रहता है। इसलिए वह पुरुषार्थ स्वयं और अकेले करने को श्रेयस्कर बताया गया है।
आरोहण और अवतरण में सात्विक दृष्टि से कोई अंतर नहीं है। परमात्मा सब जगह व्याप्त है। वह जहाँ भी प्रकट होता है, विशेष अंतर नहीं पड़ता। आरोहण और अवतरण के तथ्य को व्यापक व्यवहार बुद्धि से देखें, तो भी पाएँगे कि एक दिशा से जो आरोहण है, दूसरी दिशा से वही अवतरण भी है। पृथ्वी गोल है। मंगल ग्रह पर बैठकर देखना संभव हो तो यहाँ के लोग एक दिशा से पैरों के बल खड़े दिखाई देंगे, दूसरे छोर पर चल रहे पैरों से लटके दिखाई देंगे। धरती में एक तरफ से छेदकर पार निकल जाने वाले उदाहरण से भी यह तथ्य समझा जा सकता है। भारत में खड़ा व्यक्ति उस छेद से दूसरे छोर पर बनी इमारत को देखे, तो वह जमीन पर खड़ी होने के बजाय लटकती दिखाई देगी। इधर के फव्वारे आकाश में फुहारा छोड़ते प्रतीत होते हैं, तो दूसरे तल पर बने फव्वारे पानी बरसाते लगेंगे। आरोहण और अवतरण के क्रम को सीधे खड़े होकर और शीर्षासन लगाते हुए देखने के रूप में भी समझा जा सकता है।
लेकिन यह अभेद स्थिति तात्विक दृष्टि से है। साधक की दृष्टि से आरोहण और अवतरण को एक ही नहीं कह सकते। अध्यात्मविदों ने इस आधार पर विभिन्न धर्मों के स्वभाव और प्रभाव का भी विश्लेषण किया है। उनके अनुसार प्रार्थना पर जोर देने वाले धर्मों की दृष्टि अपेक्षाकृत संकीर्ण होती है। वे परमात्मा से पूर्ण तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाते। जो कृपा करता है, वह हमेशा बड़ा होता है। दूसरे प्रार्थना पर जोर देने वाले धर्मों में असहिष्णुता या कट्टरता भी बढ़ जाती है। उन्हें अपनी मान्यता और अनुभव ही प्रामाणिक लगता है। दूसरों के अनुभव खंडित, आँशिक या मिथ्या प्रतीत होते हैं। उन पर चर्चा चलती है या मतभेद सामने आते हैं, तो उन्हें क्रोध आता है। वे जोर−जबर्दस्ती भी अपना सकते हैं और दूसरों को अपना मत मनवा लेने में पुण्य समझते हैं।
विश्व−समाज में जैसे−जैसे समझ और विचारशीलता का विकास हुआ है, वैसे−वैसे अपने मत के प्रति पूर्वाग्रह कम हुआ है। यह भी स्वीकार किया जाने लगा है कि अपना ही अनुभव सत्य नहीं है, दूसरे की अनुभूति भी सत्य हो सकती है। सत्य विराट् है और देखने वाली आँख या अनुभव करने वाली चेतना की अपनी सीमाएँ हैं। उन सीमाओं में सत्य का पूर्ण समावेश नहीं हो सकता। ध्यान या साधना पर जोर देने वाले धर्मों में उदारता, सहिष्णुता और युक्तिसंगतता के लिए पर्याप्त स्थान मिला है। क्योंकि उन धर्म परंपराओं में अपनी साधना और स्थिति के अनुसार ही अर्जन किया होता है। अपने पुरुषार्थ से प्राप्त उपलब्धि पर गर्व और संतोष होता है। उसे सहेजने की चिंता की जाती है।
इन दिनों विश्व−समाज में ध्यान और साधना के प्रति गहरी रुचि जाग रही है। पिछले बीस वर्षों में विभिन्न संगठनों ने कुँडलिनी, ध्यान, चक्रवेधन और योग आदि आरोहणपरक साधना−विधियों के लिए प्रयास किए। प्रयास आँदोलन स्तर के भी थे। उन्हें पर्याप्त सफलता मिली है। लाखों लोग ध्यान और साधना में प्रवृत्त हुए हैं। भजन−पूजन−प्रार्थना और भक्ति का प्रचार करने वाले आँदोलन भी छिड़े, लेकिन उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। भारतीय धर्म−परंपरा में इन दोनों मार्गों का समावेश है। ‘प्रार्थना’ और ‘साधना’ दोनों विधियों पर पर्याप्त अनुभव और विज्ञान यहाँ की परंपरा के पास है। इसलिए विश्व−समाज उसकी ओर आशाभरी दृष्टि से देख भी रहा है।
शरीर, वस्त्र और दैनिक उपयोग की वस्तुओं को स्वच्छ रखना।
सुबह उठते ही पृथ्वी माता को प्रणाम और भगवान का स्मरण करना। रात को सोने से पहले भी ईश्वर का स्मरण और दिनभर के कार्यों की समीक्षा करना।
जो भी काम करें, उसे भगवान् की आराधना समझना।
आत्मविकास या परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पतंजलि ने जिन गुणों को आधार बताया है, उनमें शौच का स्थान छठा है। आठ अंगों के हिसाब से देखें, तो नियमों के क्रम में यह प्रथम आता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि पाँच व्रत यम की श्रेणी में आते हैं। यम अर्थात् विधान और नियम अर्थात् अनुशासन। विधान अंतरंग पक्ष का द्योतक है। वह आस्था से शुरू होता है और आचार्य विनोबा भावे के अनुसार आचरण को सँभालता है। नियम का आरंभ आचरण से शुरू है और अंतरंग तक जाता है। घड़ा बनाते समय चाक पर रखी गीली मिट्टी को बाहर से थपकी देते हैं और भीतर से विस्तार के लिए दबाव बनाते हैं। बाहर और भीतर दोनों तरफ से सहेजने पर कुँभ आकार लेता है। यम और नियम के अभ्यास से साधक की पात्रता भी उसी तरह आकार लेने लगती है।
शौच का सामान्य अर्थ शुद्धि किया जाता है। टीकाकारों ने बाहर और भीतर की अर्थात् शरीर और मन की शुद्धि के रूप में अर्थ को विस्तार दिया है। शरीर की शुद्धि स्नान, प्रक्षालन और साफ−सुथरे वस्त्र पहनने से समझी जाती है। मन की शुद्धि का अर्थ है, राग−द्वेष आदि विकारों का नहीं होना। इन अर्थों से शौच की परिभाषा तो हो जाती है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि उनका पालन किस तरह किया जाए। शुचिता का अर्थ शरीर और मन के मैल की सफाई तो है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि यह कैसे किया जाए।
स्नान करने, समय−समय पर हाथ−पाँव−मुँह धोते रहने, पंचाँग शुद्धि का निर्वाह करने से शौच व्रत सधने लगता है। किंतु इतना ही काफी नहीं हैं। स्नान आदि से स्वच्छता की आवश्यकता पूरी होती है, लेकिन शौच व्रत का अर्थ स्वच्छता ही नहीं है। वह शुचिता का एक छोटा−सा हिस्सा है। बहुत संभव है कि नहा−धो लेने और सज−सँवर जाने के बावजूद व्यक्ति शुचिता की कसौटी पर खरा नहीं उतरे। श्रृंगार प्रसाधनों का कलात्मक उपयोग कर लेने पर भी व्यक्तित्व से कुटिलता के भाव टपकते रहें। रहन−सहन में सुरुचि−संपन्नता दिखाई देने पर भी चित्त में अशाँति, आवेग, लिप्सा, विषाद आदि विकार छाए रहते हैं। उनके कारण आत्मिक प्रगति की दिशा में निरंतर अवरोध उत्पन्न होते रहते हैं।
शौच व्रत स्वच्छता की तुलना में पवित्रता के अर्थ में ज्यादा ध्वनित होता है। पवित्रता एक भाव है, जो सध जाए, तो मन को प्रसाद से भर देता है। स्वच्छता इसके काय−कलेवर की तरह है। पवित्रता एक भाव है, जो सध जाए, तो मन को प्रसाद से भर देता है। स्वच्छता इसके काय−कलेवर की तरह है। पवित्रता का बोध न होता स्वच्छता एक भावहीन स्थिति है। यह अपने आप को कोई आत्मिक पात्रता विकसित नहीं करती। वह बोध होने पर लोग कुँभ, ग्रहण, अमावस, पूर्णिमा और दूसरे स्नान पर्वों पर हजारों लोगों के साथ गंगा में नहाने पर भी अहोभाव से भर देता है। हजारों लोगों के एक साथ स्नान करने पर वह जल स्थूल दृष्टि से दूषित हो जाता है, लेकिन श्रद्धा से स्नान करने गए लोगों के मन में शुचिता का भाव भर देता है।
आशय यह नहीं है कि स्वच्छता का कोई महत्त्व नहीं है। स्वस्थ रहने के लिए उन उपायों की निताँत आवश्यकता है। कहा इतना भर जा रहा है कि स्वच्छता की दृष्टि से किए गए उपचार भाव के साथ संपन्न किए जाएँ, तो शुचिता को सिद्ध करते हैं। जिन दिनों कीटाणुनाशक और त्वचा को कोमल−स्वस्थ−निरोग रखने वाले औषधीय साबुन नहीं बनते थे, उन दिनों लोग जल और मृत्तिका आदि से ही स्नान कर लेते थे। पाँच−सात दिन में एकाध−बार साबुन लगाने वाले लोग आज भी लाखों की संख्या में होंगे। वे किसी अभाव या अज्ञान के चलते ऐसा नहीं करते, बल्कि अपने विवेक से पानी और मिट्टी आदि उपयोग में लाते हैं। सिर्फ इसलिए कि इनका उपयोग उनके पवित्रता−बोध को गहन बनाता है। अभ्यास या संस्कार के कारण उन्हें ऐसा लगता है कि साबुन आदि साधनों का उपयोग किया गया, तो शुचिता का बोध आहत होगा, क्योंकि इन वस्तुओं में रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है।
कृत्रिम साधनों को तिलाँजलि देने के आदर्श को पूरी तरह नहीं अपनाया जा सकता। कम−से−कम आज की भाग−दौड़ वाली शहरी जिंदगी में यह सुझाव नहीं दिया जा सकता। जिन दिनों प्रकृति पूरी तरह स्वच्छ और निर्दोष थी, उन दिनों मिट्टी−राख आदि के उपयोग से आरोग्य और स्फूर्ति देने वाली स्वच्छता आ सकती थी। आज चारों ओर प्रदूषण फैल हुआ है, इसलिए सहज उपलब्ध साधनों पर ही निर्भर रहने में समझदारी है। पवित्रता किसी कृत्य से नहीं, भाव से संबंध रखती है। शरीर, वस्त्र और दैनिक उपयोग की वस्तुओं को स्वच्छ रखने के साथ प्रत्येक काम को भगवान् की आराधना समझते हुए करने का अभ्यास इस आवश्यकता को पूरी करता है।
पवित्रता का अभ्यास प्रतीक के तौर पर सुबह उठते ही पृथ्वी माता को प्रणाम से आरंभ किया जाता है। पृथ्वी को प्रणाम के लिए एक विशिष्ट श्लोक का पाठ भी किया जाता है। उसमें पृथ्वी को माँ मानकर संबोधित किया गया है। माँ को पाँव से स्पर्श करना अपराध है। साधक कहता है कि माँ आप पर पाँव रखना अपराध है, लेकिन मुझे क्षमा करो, क्योंकि ऐसा नहीं किया गया तो जीवन नहीं चल पाएगा।
स्थूल दृष्टि से यह क्षमा−प्रार्थना निरर्थक है। नहीं करें तो कुछ बिगड़ नहीं जाता। पाँव से छूने पर पृथ्वी आहत नहीं हो रही और क्षमा नहीं माँगें, तो वह कोई दंड नहीं दे रही। लेकिन चित्त में आह्लाद भरने के लिए भावपूर्वक की गई इस प्रार्थना का बहुत महत्त्व है। पृथ्वी को जीवंत प्रतिमा मानने और क्षमा माँगते हुए जिस संवेदना से दिनचर्या शुरू होती है, वह पूरे दिन को धन्य बनाती है। संवेदना को लगा लिया जाए, तो प्रत्येक कृत्य के साथ संवेदना का अभ्यास दिनोंदिन बढ़ाया जाना चाहिए। वह पृथ्वी के प्रति ही नहीं, जिस किसी भी क्षण, जिन किन्हीं भी लोगों और वस्तुओं के संपर्क में आते हैं, उन सबके लिए एक पुनीत रखना चाहिए। सजग रहें कि चित्त में संवेदना जागी रहे। किसी के प्रति द्वेष का भाव नहीं आए।
शुचिता की सिद्धि के लिए सुबह पृथ्वी माता को प्रणाम भाव ईश्वर के स्मरण से जो प्रयोजन पूरा होता है, वही उद्देश्य रात को सोने से पहले के स्मरण से पूरा होता है। उस समय दिनभर के कार्यों की समीक्षा की जानी चाहिए। स्मरण साधक की चेतना को एक स्तर पर पहुँचाता है। समीक्षा में इस तथ्य का ध्यान रखा जाता है कि दूसरों को क्षुब्ध करने वाला कोई कृत्य तो नहीं हो गया। पृथ्वी को प्रणाम के साथ दिनचर्या शुरू करने वाले चित्त से किसी के प्रति अनजाने में कोई अपराध हो गया हो, तो उसके लिए क्षमा माँगना, ग्लानि अनुभव करना और दोबारा वैसी गलती नहीं हो, इस तरह की सावधानी बरतने का संकल्प उभरे, तो समझना चाहिए कि शुचिता की दिशा में प्रगति हो रही है। समीक्षा के समय सजगता बनी रहे, इतना ही काफी है।
यह सजगता अपने काम को भगवान की आराधना समझने के नियम से प्रखर होती है। किसी काम को बोझ समझकर नहीं किया जाए। आराधना समझकर किए गए कार्य दूसरों के प्रति द्वेष, विषाद या स्पर्द्धा के भाव को तिरोहित करते हैं। इन भावों या दुर्भावना से किए गए कार्य ही मन में मलीनता लाते हैं। उन्हीं के कारण कषाय−कल्मष उत्पन्न होते हैं। आराधना को व्यवहार और कर्म की कसौटी मान लें, तो किसी भी आचरण से दूसरे का अहित नहीं होगा। किसी के प्रति द्वेष−दुर्भाव ही नहीं होगा तो ईर्ष्या, क्रोध, विषाद आदि विकारों का अपने आप शमन हो जाएगा।
योगशास्त्र ने शौच का परिणाम बताया है कि वह पूरी तरह सिद्ध हो गया, तो जो भी निरर्थक है, उससे छुटकारा मिल जाता है। चित्त में न भ्रम रहता है और न ही संशय, क्योंकि सभी विकार तब नष्ट हो जाते हैं। शास्त्र की भाषा में इस स्थिति को जुगुप्सा और असंसर्ग कहा गया है। जुगुप्सा का शाब्दिक अथ मलिन स्थिति से घृणा है, लेकिन घृणा स्वयं विकार है और शुचिता पूरी तरह सिद्ध हो जाए, तो विकार के लिए कोई स्थान कहाँ बच रहता है। वस्तुतः शुचिता जीवन और जगत् के प्रति यथार्थ दृष्टि जगाती है। वही चाहिए भी।
युवक नरेंद्र से जब भी रामकृष्ण परमहंस समाज सेवा, दलितों का उद्धार एवं विश्व निर्माण हेतु आगे आने की बात कहते, नरेंद्र एक ही बात कहता, “मुझे अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व सँभालने हैं।” व्यामोह से मुक्ति दिलाने हेतु भगवत् स्वरूप रामकृष्ण को काली को माध्यम बनाना पड़ा। इससे जो शक्ति मिली, अंतः में प्रकाश पहुँचा, तो नरेंद्र का गुण−कर्म−स्वभाव आमूल−चूल बदल गया और वह विवेकानंद बनकर विश्ववंद्य महापुरुष कहलाए।
प्रेत वह होते हैं, जिनके पास मन होता है, परंतु इंद्रियों का अभाव होता है। इस तरह इनकी दो श्रेणियाँ होती हैं, वासना शरीरधारी एवं सूक्ष्म शरीरधारी। ये क्रमशः वासना लोक एवं सूक्ष्म लोक में निवास करते हैं। वे दोनों प्रकार के प्रेत अपने−अपने लोक में रहते हुए भी भौतिक जगत् से सतत संपर्क बनाए रहते हैं। मन की तीन अवस्थाएँ होती हैं, चेतन, अचेतन ओर अतिचेतन। जीवित मनुष्य चेतन मन की अवस्था में काम करता है। मरणोपराँत चेतन मन का स्थान अचेतन ले लेता है। सूक्ष्म शरीरधारी एवं वासना शरीर धारी अचेतन मन के दो स्वरूप हैं। अचेतन चेतन से अति शक्तिशाली होता है। वासनाजन्य इच्छाओं के कारण प्रेतों का जीवन अशाँत, व्यथित और विवेकशून्य होता है। परंतु सूक्ष्मशरीर शाँत, स्थिर और सहयोग मनोवृत्ति का होता है। इन्हीं कारणों से प्रेम दूसरों को कष्ट देते एवं परेशान करते हैं, जबकि सूक्ष्म शरीरी आत्मा सहयोग एवं सहायता पहुँचाती हैं।
ये प्रेत देहातीत व्यक्तित्व होते हैं। वासना शरीर या प्रेत शरीर का निर्माण अन्न तत्त्व से होता है। सूक्ष्मशरीर प्राण तत्त्वों से विनिर्मित माना जाता है। सामान्यतया व्यक्ति मरने के बाद वासना शरीर को प्राप्त करता है एवं उसका वेग शाँत होने पर सूक्ष्मशरीर में प्रवेश करता है। कुछ काल पश्चात् सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीर के रूप में नवीन देह धारण करता है। इसी चक्र को संसार का भवचक्र कहते हैं। पार्थिव शरीर में इच्छा, वासना, कामना का भाव आँदोलित करता रहता है, जबकि सूक्ष्मशरीर में विचारों की प्रबलता रहती है। विचार शक्ति होने के कारण इसमें अंतः चेतना प्रगाढ़ होती है। स्थूलशरीर में सक्रिय चेतना का दबाव अधिक होता है। अंतः चेतना की प्रबलता की वजह से ही सूक्ष्म शरीर जीव अपनी प्रबल वासना− कामना की पूर्ति हेतु पार्थिव काया को धारण करने के लिए बाध्य होते हैं। श्रेष्ठ एवं निष्काम कर्मयोग ही इस बंधन से मुक्ति का कारण बनता है। परंतु वासना का अनंत दबाव जीव को इन सबसे वंचित करता है और इसकी परिणति भटकती प्रेतात्माओं के रूप में होती है, जो स्वयं विक्षुब्ध होती हैं और दूसरों को परेशान करती हैं।
अपने देश में प्रेतों के किस्से−कहानियों का जखीरा अंतहीन एवं व्यापक है। अनेकों रूपों में इनकी चर्चाएँ होती रहती हैं। ऐसी ही एक घटना आज से पच्चीस साल पूर्व अँग्रेजी साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ में प्रकाशित हुई थी। इस विवरण के अनुसार उत्तरप्रदेश के खुफिया पुलिस इंस्पेक्टर श्री गुरुशरण लाल श्रीवास्तव की पैंतीस तत्नी श्रीमती शाँति देवी की रहस्यमय ढंग से मृत्यु हो गई थी। इसी घटना का विस्तृत विवरण उस समय के प्रायः सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था। श्रीवास्तव जी अपने लिए एक मकान बनवाना चाहते थे। अतः उन्होंने इसके लिए जमीन खरीदी और अपनी योजना को कार्यरूप में अंजाम दिया। मकान का निर्माण कार्य समाप्त होते ही भूत−प्रेतों का उत्पात प्रारंभ हो गया। वस्तुतः जिस प्लाँट पर मकान बना था, वहाँ कुछ साल पूर्व एक हरिजन व्यक्ति की हत्या हुई थी और तभी से वह प्लाँट भूत−प्रेतों का बसेरा बन गया था। श्रीवास्तव जी इसे कपोल कल्पना मानते थे।
भूत−प्रेतों का उत्पात अक्टूबर 1969 से आरंभ हुआ। अचानक ही उनके घर में ईंट−पत्थरों के साथ धूल की बारिश होने लगती। खिड़की−दरवाजे अपने आप खुलने और बंद होने लगते। यह तमाम उपद्रव तभी होता, जब श्रीवास्तव घर में अनुपस्थित होते। लाख कोशिशें के बावजूद उपद्रवियों का कहीं कोई सुराग नहीं मिल पाया। जून 1970 तक यह अपने उग्र रूप में पहुँच गया। तब फर्श पर रखी कुर्सियां हवा में उछलकर तैरने लगतीं। रसोईघर के बरतन शून्य में ही टकराने लगे। एक दिन श्रीवास्तव जी की तलवार म्यान से निकलकर काफी देर तक अधर में लटकी रही, बात में यह बिस्तर के नीचे दबी मिली। इसके पश्चात् किसी अज्ञात हाथों ने तलवार को खून से लथपथ स्थिति में बाहर आँगन में फेंक दिया। अचानक उनकी डेढ़ साल की कन्या गायब हो गई। बहुत खोजबीन करने पर एक बहुत बड़े बक्से के पीछे बेहोश पड़ी मिली। एक अन्य अवसर पर उस लड़की को एक सूटकेस में बंद पाया गया। परिवार में सदा दहशत और तनाव का वातावरण बना रहा। एक जुलाई 1970 को तो भूतों ने श्रीवास्तव की पत्नी को ही जला डाला बाद में अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया।
उपर्युक्त घटना से मिलती−जुलती एक घटना ब्राजील के साओ पाउलों राज्य के इटपिया नगर में रहने वाले काँटों के घर में घटी थी। इसका विवरण ब्राजील के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय दैनिक पत्र ‘ओ कुजारों’ ने प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार अप्रैल 1959 की सुबह काँओ साहब अपने घर में बैठे थे। अचानक उनके घर में पत्थरों की वर्षा होने लगी। यह क्रम दो−तीन दिन तक कुछ अंतराल में बराबर होता रहा। इसके बाद पत्थरों की जगह बरतन, आलू, प्याज, शलजम आदि की बारिश होने लगी। इसका कहीं कोई समाधान नजर नहीं आ रहा था। आखिरकार इसे प्रेतबाधा मानकर उपचार हेतु एक पादरी को बुलाया गया। भूतों ने उन पर भी हमला बोल दिया। इस रहस्यमयी घटना से सभी त्रस्त और हैरान थे। काफी खोजबीन के पश्चात् पता चला कि यह उपद्रव काँटो की नौकरानी फ्रांसिस्को को लक्ष्य करके होती थी। संभवतः भूत फ्रांसिस्को की आड़ में यह ताँडव−लीला कर रहे थे। इस घटना के संदर्भ में ‘ओ कुजारो’ अपने संपादकीय में लिखते हैं, “इन विचित्र घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी काफी समझदार और उच्च प्रतिष्ठित लोग हैं, पर उनके लिए भी यह रहस्य के घेरे में घिरा रहा।”
इंग्लैंड के सी. ई. एम. जोड विश्व के अग्रणी चिंतकों, मनोवैज्ञानिकों, दार्शनिकों और प्रख्यात लेखकों की गणना में आते थे। सन् 1944 में बी. बी. पी. पर आयोजित एक परिसंवाद में भाग लेते हुए उन्होंने कहा था, मैं पहले भूत−प्रेतों में विश्वास नहीं रखता था, परंतु उस दिन से करने लगा, जिस दिन प्रयोगशाला में अज्ञात ढंग से मुझ पर साबुन की टिकिया बरसने लगीं। इंग्लैंड के एक और विश्वविख्यात लेखक, नाटककार तथा अभिनेता तोराल कोवार्ड का भी कहना है कि भूतों को मात्र जादुई कल्पना कहकर टाला नहीं जा सकता। उन्होंने इनके अस्तित्व को स्वीकारा है।
इसी तरह की एक और प्रेतलीला 5 जुलाई 1973 को होशंगाबाद में हुई। होशंगाबाद के वलर्क सुभाषचंद्र जैन का परिवार भी ऐसे ही एक विचित्र हादसे का शिकार हुआ। एक दिन श्री जैन की चारपाई में आग चलने लगी, परंतु, सबसे बड़ी हैरानी की बात थी कि उस आग की लपटों का उनकी माँ के शरीर पर कोई प्रभाव न था। उनके शरीर पर आँच आने या झुलसने का कोई चिह्न नहीं था। श्री जैन के परिवार में आग लगने की यह घटना बराबर चलती रही। उन्होंने इससे परेशान होकर एक नहीं कई−कई मकान बदल डाले, लेकिन हर मकान पर यही दृश्य उपस्थित होता। जिस किसी मकान में गए वहीं कमरे की विभिन्न वस्तुओं में आग लग जाती। इस विचित्र प्रकोप से सुभाष को किराये का मकान मिलना मुश्किल हो गया। अंततः उन्होंने एक जैन मंदिर में शरण ली। वहाँ भी उनका पीछा न छूटा। कई प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार एकाएक अग्नि की लपटें उठतीं और बुझाने पर बुझ भी जाती। अंत में तो गीले कपड़ों, दीवारों, अचार, दाल, चावल के डिब्बों, अटैची आदि इन रहस्यमयी आग से राख बन गए। इसके निराकरण के लिए एक पंडित को आमंत्रित किया गया। पंडित जी ने जैसे ही भागवत् का एक पन्ना पढ़ा कि दूसरे पन्ने में आग लग गई। प्रेतों की यह करतूत अपने में रहस्य ही बनी रही।
प्रेतों का स्वरूप भिन्न−भिन्न होता है। कभी−कभी वे अपने विगत जन्मों के परिचितों पर भी अपना रुख दिखाते हैं। इसके पीछे उनकी अतृप्त इच्छाएँ समाई रहती हैं। पुष्पा सुँदर एवं आकर्षक युवती थी। उसका अपने पड़ोस के एक युवक अरुण से प्यार हो गया। प्रेम विवाह में परिणत होने से पहले ही असफल हो गया। समय के बढ़ते प्रवाह ने उसकी स्मृति पर विस्मृति की मोटी परत जमा दी। बात आई गई हो गई। बीस वर्ष के लंबे अंतराल के बाद अरुण दार्जिलिंग से पुष्पा का हस्तलिखित पत्र प्राप्त कर हर्ष मिश्रित आनंदित हुआ। कुछ दिन बाद पुनः एक पत्र मिला, जिसमें अरुण को दार्जिलिंग आने का प्रेमपूर्ण अनुरोध किया गया था। अरुण इस निवेदन को टाल न सका और उसने बनारस से दार्जिलिंग की ओर प्रस्थान किया। दार्जिलिंग के स्टेशन पर ही एक खाकी वरदीधारी ने उसकी अगवानी की और कहा, मैं पुष्पा जी का ही ड्राइवर हूँ, मेरा नाम बहादुर सिंह है। पुष्पा जी ने आपको लाने के लिए अपनी कार भेजी है। बहादुर उसे एक आलीशान बंगले में पहुँचाकर कहीं गायब हो गया। बंगले की मल्लिका पुष्पा पूरे श्रृंगार के साथ उसके सामने आई और अभिवादन किया।
अजमेर की रहने वाली पुष्पा आज ऐश्वर्य एवं वैभव की स्वामिनी बन बैठी थी। पता नहीं कब उसके भाग्य ने करवट बदली। यह सब देखते ही अरुण हतप्रभ रह गया। विगत स्मृति चलचित्र की भाँति चलने लगी। इसी बीच पुष्पा चाँदी के गिलास में दूध और सोने की तश्तरी में स्वल्पाहार लेकर उपस्थित हुई। उसने बड़े विस्तार के साथ अपनी आपबीती सुनाई। इतने में ही एक भयानक दृश्य दिखाई दिया। कंधे पर बंदूक रखे और कमर में तलवार लटकाए एक आदमी ने उस कमरे में प्रवेश किया तथा आव देखा न ताव, पुष्पा पर गोली चला दी। बचाने को आए बहादुर सिंह को भी उसने गोली मार दी। कमरे में दो मर्मभेदी चीत्कार गूँजने के बार तनावयुक्त उदासी छा गई। आलीशान बंगले का वह कमरा खून से लथपथ दो लाशों से भरा बड़ा ही वीभत्स दिख रहा था। अरुण ने उसे अपने शब्दों में व्यक्त किया, “इस घटना से परेशान मैं भागता हुआ पुलिस स्टेशन पहुँचा और इंस्पेक्टर को बीती रात की सारी घटनाएँ एक साँस में कह सुनाई। इसके विपरीत इंस्पेक्टर ने प्रतिक्रिया हीन मेरी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने मुझे बताया कि यह कुछ नहीं प्रेतलीला है। इसके एक माह पूर्व भी किसी व्यक्ति ने इसी तरह की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इंस्पेक्टर जब मेरे साथ अटैची लेने साथ गया, तो वहाँ का परिवेश देखकर बड़ी हैरानी हुई। वह एक भुतहा खंडहर था, जहाँ लाल रेशमी कपड़े में लिपटा एक पैकेट मिला। इसे खेलने पर सिंदूर की डिबिया और काँच की लाल चूड़ियाँ मिलीं। बीती रात इसी पैकेट को पुष्पा मेरी ओर बढ़ा रही थी कि हत्या की वारदात घट गई।” आज वह भुतहा मकान कलकत्ता के किसी सेठ का आलीशान होटल है।
अरुण शर्मा ने अपने परलोक विज्ञान में अपनी आप−बीती प्रेतलीला का इस तरह वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है, जब मैं कमरे में बैठा था, उस रात एक अजनबी लड़की आई। उसने अपना परिचय जवा नाम से दिया। मुझे याद आया, जवा हरिमोहन चतुर्वेदी की भाँजी थी और ये लोग बनारस में मेरे पड़ोसी थे। जब मैंने अपने अतीत के भूले−बिसरे पन्नों को पलटा, तो याद आया जवा पढ़ने−लिखने में बहुत कमजोर थी। किसी तरह बी.ए. पास कर वह अपने घर चली गई। तीन−चार साल बाद चतुर्वेदी जी रिटायर हुए और वे इंदौर चले गए। बाद में पता चला कि जवा की शादी हो गई, परंतु इतने लंबे समय के अंतराल में जवा यहाँ कैसे आ पहुँची? मैंने सोचा हो सकता है कि यहीं किसी रिश्तेदार के पास आई होगी। इतने वर्षों के बाद अप्रत्याशित भेंट से स्वाभाविक है उसके प्रति जानने की जिज्ञासा जागना।
जवा कश्मीरी थी। अगली मुलाकात में उसने बताया कि वह उसकी सहेली रूपा के यहाँ ठहरी है। बोली कि आज व्यस्तता कुछ ज्यादा होने के कारण अगली रात आएगी। दूसरी रात को वह आई। वह अत्यंत स्वाभाविक स्थिति में तथा प्रसन्नचित्त थी। मेरे पड़ोस में रहने के कारण मैं उसके स्वभाव से परिचित था। वह वहाँ बैठ गई तथा ढेर सारी बातें करने लगी। उसने अपनी फोटो खींचने का आग्रह किया। इसके पूर्व भी मैँने उसके कई फोटो खींचे थे। बातों−बातों में उसने प्रेत विद्या का जिक्र किया। उसने इससे संबंधित सूक्ष्म से सूक्ष्मतम तथ्यों तक को स्पष्ट करके रख दिया। मैं जवा की इन गंभीर बातों पर हैरान था। बल्कि मेरा ज्ञान भी जवा के समान सूक्ष्म और गंभीर नहीं था। अंतिम रात जवा की बातों से मैं सिहर उठा। वह बोल उठी, परिमल क्राँति घोष की प्रेत विद्या के कारण मैं तुम्हारे पास आकर्षित होकर चली आई हूँ। यह सुनते ही लगा, मानो में किसी भयंकर इंद्रजाल में फँस गया हूँ। किसी अज्ञात भय से मेरा सारा शरीर काँप उठा। फिर न जाने कब तक अचेत पड़ा रहा। जब उठा तो सुबह हो गई थी। दूसरे दिन परिमल घोष को विगत घटना की जानकारी दी, तो उन्होंने बताया कि जवा ने शादी के पश्चात् आत्महत्या कर ली थी और वह तुम्हें प्रेम करती थी। इसलिए भटकती हुई वह तुम्हारे पास खिंचती चली आई। जब मैंने जवा की खिंची तस्वीर देखी, तो और भी हैरानी हुई। फोटो में कमरे का सारा दृश्य यथावत् था, परंतु उस फोटो में जवा नहीं थी।
हसन नियाज अलीगढ़ विश्वविद्यालय में अरबी भाषा और साहित्य के प्राध्यापक थे। नियाज साहब के पिता अपने जमाने के मशहूर लेखक और अरबी व फारसी के उच्चकोटि के विद्वान् थे। उनकी स्वयं की लाइब्रेरी थी, जिसमें हजारों की संख्या में विभिन्न विषयों की पुस्तकें व्यवस्थित थीं। जिस मकान में लाइब्रेरी थी, वह अलीगढ़ शहर के बाहर बड़े ही सुनसान जगह पर था। नियाज साहब की मौत के बाद लाइब्रेरी अक्सर खाली पड़ती रहती थी। एक रिसर्च स्कॉलर नियाज साहब से अनुमति लेकर वहीं पढ़ने आया। युवक वहीं पास के एक मकान में रहने लगा। मकान के बगल में ही संगमरमर की कब्र थी। वहाँ हमेशा एक चिराग जलता रहता था, लेकिन जलाने वाले का कोई पता−ठिकाना नहीं मिल पाया।
उस स्कॉलर ने बताया, मैं एक दिन खिड़की के पास बैठकर पुस्तक पढ़ रहा था। अचानक एक लड़की आई और जलते हुए चिराग को रख गई। मैंने समय नोट कर लिया और देखा कि वह ठीक नियत समय में चिराग रखकर चली जाती है। नित्यप्रति की इस घटना को सामान्य समझकर मैंने टाल दिया। कुछ दिन से कड़ाके की सरदी पड़ रही थी। उसी दौरान बारिश भी जमकर हो रही थी। संयोगवश मैं वहीं खिड़की के सामने अपनी रिसर्च के नोट्स तैयार कर रहा था। विषय की गंभीरता एवं भारीपन से मन भी बोझिल−सा हो रहा था। एकाएक मुझे याद आई चिराग वाली बात। सोच वह लड़की आज चिराग जलाने कैसे आएगी? परंतु वह भीगती हुई आई और चिराग रखकर खड़की हो गई। तब तक मेरा मन शाँत हो चुका था एवं मैं पुनः अपने कार्य में व्यस्त हो गया। एक आवाज ने मुझे चौंका दिया। वही चिराग वाली युवती मेरे सामने खड़ी थी। वह नाजिमा थी और वह बोली कि मैदान के उस पार लाल कोठी में उसका घर है। उस दिन के बाद नाजिमा नित्य मेरे कमरे में आती और घंटों अपने बारे में बताती रहती थी।
नाजिमा को भी पढ़ने का शौक था। वह गंभीर से गंभीरता विषयों को बड़े सरल एवं सहज ढंग से प्रतिपादित कर देती। उसकी भाषा परिष्कृत एवं प्रतिपादन शैली बड़ी सुँदर थी। बरबस मैं नाजिमा की ओर आकर्षित होने लगा। इसके पीछे एक और कारण भी था। वह मुझे कठिन वक्त पर आर्थिक सहयोग भी करती थी। उसने कई बार मुझे सौ−सौ के नए नोट निकालकर दिए। भला कैसे उसके एहसान को भूला जा सकता है। एक दिन वह आई और चली गई। कई दिन हो गए, वह नहीं आई, तो मैं उसके बताए पते पर लाल कोठी की ओर चल पड़ा। लाल बंगले पर एक बुढ़िया बैठी हुई थीञ नाजिमा का पता पूछने पर उसने एक कब्र की ओर इशारा कर दिया। कब्र के ऊपर लाल पत्थर पर उर्दू में साफ−साफ लिखा था, “नाजिमा, मेरी प्यारी नाजिमा, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा।” मैं सन्न रह गया। इसका मतलब नाजिमा की आत्मा ही मेरे पास आई एवं सहयोग देकर अदृश्य हो गई।
प्रेतयोनि इच्छाओं एवं वासनाओं की अतृप्त योनि है। इस तरह हर भटकती आत्मा का वह विचित्र संसार है। जहाँ दमित, दूषित और अतृप्त भोगों की कल्पना करने वाला हर प्राणी पहुंचता है। इसके विपरीत श्रेष्ठ, कर्म, सद्चिंतन एवं निष्काम सेवापरायण मनुष्य स्वर्ग एवं उच्चतर लोकों को प्राप्त करता है, भगवत्प्राप्ति की लक्ष्य−सिद्धि तक पहुँचता है। अतः हर मनुष्य को इस दुर्लभ मानव शरीर से सतत श्रेष्ठ कर्म में लगे रहना चाहिए।
एक बालक मिठाई बहुत खाता था, उसकी यह आदत उसके स्वास्थ्य को बिगाड़ रही थी। बालक मानता नहीं था। निदान के लिए उसकी माता उसे रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा का अधिक प्रभाव पड़ने की आशा से उनके पास ले गई और प्रार्थना की कि आप इसे उपदेश देकर मिठाई खाना छुड़ा दें। परमहंस ने उसे एक सप्ताह बाद आने को कहा। महिला चली गई। एक सप्ताह बाद आई, तब उन्होंने बालक को उपदेश दिया और उसने मिठाई छोड़ भी दी।
महिला ने एक सप्ताह विलंब लगाने का कारण पूछा, तो परमहंस ने कहा, तब तो मैं मिठाई स्वयं खाता था। जब बालक को उपदेश देना आवश्यक प्रतीत हुआ, तो पहले मैंने स्वयं मिठाई छोड़ी, तब बालक को कहा। जो करता है, उसी की शिक्षा का प्रभाव भी पड़ता है।
यह प्राथमिक आवश्यकता है कि व्यक्ति पहले अपने चिंतन को देखे। लोकसेवी व सत्साहस संघर्ष करने के लिए आगे आने वाले के लिए तो यह एक अनिवार्य प्रक्रिया हैं।
धर्म का अर्थ है−अपने साँसारिक और आध्यात्मिक दायित्वों का भलीभाँति निर्वाह, ताकि लौकिक जीवन में समृद्धि, सामूहिक विकास और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त हो।
एक व्यापारी एक घोड़े पर नमक और एक गधे पर रुई की गाँठ लादे जा रहा था। रास्ते में एक नदी मिली। पानी में घुसते ही घोड़े ने पानी में डुबकी लगाई तो काफी नमक पानी में घुल गया। गधे ने घोड़े से पूछा, यह क्या कर रहे हो? घोड़े ने कहा, वजन हलका कर रहा हूँ। यह सुनकर गधे ने भी दो डुबकी लगाई, पर उससे गाँठ भीगकर इतनी भारी हो गई कि उसे ढोने में गधे की जान आफत में पड़ गई। कुरीतियों, कुप्रचलनों की बिना समझे−बूझे की गई नकल कठिनाइयाँ बढ़ाती हैं, सुविधा नहीं।
अकाल भयावह था। समूचा सिरोही राज्य इसकी व्यथा से आक्राँत था। सिरोही नरेश अपने समूचे प्रयासों−प्रयत्नों के बावजूद अपनी प्रजा की रक्षा करने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहे थे। उन्होंने अपना सारा संचित धन अकाल राहत कार्य में लगा दिया, फिर भी अकाल राहत कार्य पूर्ण नहीं हो पा रहा था। अल्प समय में ही राज्य के खजाने खाली होने लगे। भयंकर अकाल था, अभी काफी समय बाकी था। सोच में डूबे नरेश निराश होने लगे।
उन्होंने अंतिम उपाय के तौर पर अपने राज्य के बुद्धिजीवी, विचारशील नागरिकों की सभा बुलाई। सथा में अकाल राहत कार्य के बारे में चर्चा होने लगी। लोग तरह−तरह के सुझाव−समाधान प्रस्तुत कर रहे थे, पर प्रस्तुत किए जा रहे सारे समाधान धन के अभाव में स्वयं में महाप्रश्न बन रहे थे। धन कहाँ से लाया जाए? धन प्राप्ति का उचित उपाय क्या हो? एक अनुभवी वयोवृद्ध, विचारशील नागरिक ने संकोचपूर्वक कहा, “अन्नदाता इस सवाल का उत्तर हमारे पास है। यदि अनुमति हो, तो प्रस्तुत करने का साहस करूं।”
सिरोही नरेश को तो जैसे प्राण मिले, उन्होंने कहा कि नेकी और पूछ−पूछ, आप अवश्य कहें। नरेश के प्रोत्साहन पर उस वृद्ध ने कहना प्रारंभ किया, नंदीवर्धनपुर के जगतशाह झाँझड़ वाले काफी धनवान एवं धर्मात्मा हैं। इस कार्य में अवश्य साथ दे सकते हैं, किंतु इसके लिए राज्य को स्वयं उनसे याचना करनी होगी। वृद्ध का यह सुझाव कतिपय सभासदों को नहीं भाया। वे सोचने लगे, क्या राजा का अपने ही किसी प्रजाजन के सामने याचक बनना उचित होगा? सभा में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
परंतु सिरोही नरेश प्रजावत्सल थे। उन्होंने सभी का संकोच तोड़ते हुए कहा, इसमें मेरे अपमान की कोई बात नहीं। शाह धर्मप्राण व्यक्ति हैं, उनके सामने किसी लोकहित के कार्य हेतु माँगने में शर्म कैसी? यदि शाह के आगे हाथ फैलाने से राहत कार्य पूर्ण हो जाता है, तो इससे अच्छी बात और क्या होगी? यदि मेरे निवेदन पर शाह जी ने प्रजा की भलाई के लिए कार्य किया और प्रजा की रक्षा हो जाए, तो इससे बढ़कर मेरा सौभाग्य और क्या होगा? अपने इस कथन को क्रिया रूप में परिणत करते हुए सिरोही नरेश ने महामंत्री की ओर देखते हुए कहा, मंत्री महोदय! आप अभी नंदीवर्धनपुर गाँव को जाएँ और जगतशाह झाँझड़ वाले को दरबार में मान सहित उपस्थित होने का संदेश पहुँचाएँ। राजाज्ञा को शिरोधार्य करके मंत्री महोदय तुरंत अपने राज्यकर्मचारियों के साथ नंदीवर्धनपुर को रवाना हो गए।
अपनी यात्रा पूरी करके राज्य कर्मचारी एवं मंत्री महोदय नंदीवर्धनपुर ग्राम के चौराहे पर आकर रुके और आगंतुकों से शाह के निवास का पता पूछा। गाँव वालों ने बताया, सामने जो हवेली दिख रही है, वहीं झाँझड़ वाले शाह का मकान है। मंत्री महोदय एवं राज्य कर्मचारियों ने शाह की हवेली के आगे आकर देखा कि एक हृष्ट−पुष्ट व्यक्ति वहाँ पशुशाला की सफाई कर रहा है। वह आधी बाजू की खादी की बनियान तथा खादी की ही ऊँची धोती पहने है। मंत्री ने मन−ही−मन सोचा, जरूर यह शाह का ग्वाला होगा। जो इस समय पशुशाला की सफाई कर रहा है। मंत्री ने उसे अपने समीप बुलाया और रोबीले स्वर में कहा, ए मजदूर! जाकर शाह साहब को कहो कि सिरोही राज्य के मंत्री व राज्य कर्मचारी आपसे मिलने आए हैं और उन्हें दरबार ने याद किया है। शाह ने मंत्री महोदय को पहचान लिया, लेकिन इस पहचान को अपने मन में रखते हुए उन्होंने कहा, अन्नदाता, मैं अभी शाह को आपके पधारने का समाचार देता हूँ। आप सब लोग हवेली के बैठक खाने में विराजें। राज्य कर्मचारी तथा मंत्री महोदय एक नौकर के सद्व्यवहार से खुश हो गए। उनको लगने लगा, वास्तव में शाह के नौकरों का व्यवहार काफी अच्छा है।
इन सबको उचित स्थान पर बैठने के लिए कहकर वह स्वयं अंदर गए और साफ−सुथरी पोशाक पहनकर मंत्री महोदय के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। बड़े ही विनम्र भाव से कहने लगे, “मालिक फरमाओ! दास हाजिर है। आपको यहाँ तक, इस दास की कुटिया तक पधारने का कष्ट क्यों करना पड़ा। आप संदेश भिजवा देते, तो मैं स्वयं आपकी सेवा में हाजिर हो जाता। नरेश कुशल से तो हैं। आप तो मेरे लिए उनका हुक्म बतलाओ। सेवक के लिए उनका क्या संदेश लेकर आए हैं?” शाह साहब की विनम्र वाणी को सुनकर और उनके चेहरे की ओर देखकर मंत्री महोदय को भारी अचरज हुआ कि अरे, यह तो वही मजदूर है, जो शाह की पशुशाला में सफाई कर रहा था। उन्हें लगा कहीं मुझे भ्रम तो नहीं हो रहा है। जिज्ञासा की पूर्ति के लिए मंत्री महोदय ने धीरे से शाह से पूछा, मजदूर के रूप में पशुशाला में....।
वह मैं ही था। शाह मुस्कराते हुए कहने लगे, मंत्री जी! हम काम न करें और आराम को बड़ा मानें, यह तो हमारा भ्रम हैं। काम तो पूजा है। फिर कोई काम छोटा नहीं होता।
मंत्री महोदय कुछ देर तक शाह को बड़े विस्मय से देखते रहे। वे कुछ भी बोल न पाए। फिर रुकते−रुकते बोले, राज्य में अकाल पड़ा हुआ है। नरेश ने अपना पूरा खजाना प्रजाजनों की सेवा में लगा दिया है और...। बीच में ही शाह मंत्री जी से बोले सिरोही नरेश ने आपको मेरे पास कुछ सहयोग के लिए भेजा है। मंत्री महोदय ने सिर हिलाकर समर्थन किया। शाह ने मंत्री महोदय से कहा, महाराज ने इतनी छोटी−सी बात के लिए आपको यहाँ भेजा, इसके लिए मैं आपसे एवं महाराज से क्षमा चाहता हूँ। आप वहाँ दरबार में बैठे हुए ही हुक्म फरमा देते, तो भी आपका यह सेवक तैयार था।
शाह विनम्र स्वर में अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोले, मेरे पास जितना जो कुछ भी है, वह सब राज्य का ही तो है। राज्य की जनता का उस पर पूरा−पूरा अधिकार हैं। मैं इस अकाल के राहत कार्य में काम नहीं आ सका, तो मेरा जीवन ही बेकार है। मैं धन−स्वर्ण मुद्राओं की गाड़ियाँ अभी दरबार में भेजने का प्रबंध करता हूँ और जब तक महाराज की ओर से मना का संदेश नहीं मिलेगा, तब तक स्वर्णमुद्राओं से भरी एक से जुड़ी एक बैलगाड़ियाँ यहाँ से प्रस्थान करती रहेंगी।
शाह ने एक क्षण रुककर फिर कहा, यह अपार वैभव मेरा नहीं हैं। वास्तव में धन−संपदा किसी की नहीं होती है। वह तो प्रत्येक जरूरतमंद की है। जिसके पास जो संपत्ति है, वह उसका मालिक नहीं संरक्षक भर है। उसका काम तो उसे जरूरतमंदों तक पहुँचाना है।
शाह ने उसी समय अपने कर्मचारियों को आदेश दिया कि बैलगाड़ियों का प्रबंध करो और स्वर्णमुद्राओं को गाड़ियों में भरकर शीघ्र राजदरबार में पहुंचाओ और जब तक मेरा आदेश न हो, तब तक गाड़ियाँ भेजना बराबर चालू रहना चाहिए। शाह की बातें सुनकर मंत्री महोदय के पाँवों के नीचे की धरती दोलायमान होने लगी। वह निर्णय नहीं कर सके कि यह क्या कह रहे हैं और मैं क्या सुन रहा हूँ। कहीं यह सब स्वप्न तो नहीं है। यह तो शाह नहीं शहंशाह हैं।
मंत्री महोदय ने शाह के आगे अपना मस्तक झुका दिया और उनकी आज्ञा लेकर दरबार की ओर चल दिए। सिरोही नरेश के दरबार में जब उन्होंने अपनी यात्रा का यह अनुभव वृत्ताँत सुनाया, तो सिरोही नरेश सहित सभी एक स्वर से कह उठे, “शाह ने ही सही अर्थों में अर्थ को अर्थवान् बनाया है। उनका धन भी धर्म की साधना ही है।”
साधु आत्मानंद की कुटिया गाँव के पास ही थी। प्रायः प्रतिदिन सायंकाल ग्रामीण लोग उनके पास जाते और धर्म−चर्चा का लाभ प्राप्त करते। जब संध्या भजन का समय आता, गाँव के दो नटखट लड़के जा धमकते और कहते, महात्मन्! आपसे ज्ञान प्राप्त करने आए हैं, फिर शुरू करते गप्पें। बीच−बीच में साधु को चिढ़ाने, गुस्सा दिलाने वाली बातें भी करते जाते। उनका तो मनोरंजन होता, पर आत्मानंद का भजन−पूजन का समय निकल जाता। वह क्रम महीनों चलता रहा, पर साधु एक दिन भी गुस्सा नहीं हुए। बालकों के साथ बात करते हुए आप भी हँसते रहते।
बहुत दिन बाद भी जब वे नटखट लड़के उन्हें क्रुद्ध न कर सके, तो उन्हें अपने आप पर हुआ, उन्होंने क्षमा माँगते हुए पूछा, “महात्मन्। हमने जान−बूझकर आपको चिढ़ाये किया, फिर भी आप न कभी खीझे, न क्रुद्ध हुए।” आत्मानंद ने हँसते हुए कहा, मैं ही कुद्ध हो जाता, तो आप सबको सिखा क्या पाता?
युवा शक्ति किसी राष्ट्र की उज्ज्वल आशा का प्रतीक है। देश एवं समाज का भविष्य इसी पीढ़ी के हाथों में होता है। यह एक सार्वभौम एवं शाश्वत सत्य है, लेकिन आज यह एक मुहावरा बनकर रह गया है, जिसे हर नेता और उपदेशक अपने मुँह से सुनाया करता है। जबकि इस समय देश का भविष्य तय करने में जवान अपनी कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। युवा पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में दिग्भ्रमित है। उसके सामने न कोई आदर्श है, न उच्च उद्देश्य। ऐसे में उपभोक्तावादी संस्कृति के निरंकुश भोगवाद का दंश उसे विक्षिप्तता एवं पतन की राह पर धकेल रहा है। परिणामस्वरूप टूटे स्वप्नों, बिखरे अरमानों एवं अतृप्त आकाँक्षाओं की मारी युवा पीढ़ी का जीवन पुष्प खिलने से पूर्व ही मुरझाकर दम तोड़ रहा है। कालचक्र के विषम प्रवाह में युवा शक्ति को रचनात्मक दिशा में मोड़ने एवं उसे अपने जीवन का राष्ट्र−समाज के सृजन में प्रेरित एवं नियोजित करने की आवश्यकता पहले से अधिक गंभीर हो गई है।
युवा शक्ति की वर्तमान दुर्दशा का कारण बहुत कुछ अपनी स्वतंत्रता काल की दोषपूर्ण नीतियों में खोजा था सकता है। आजादी के बाद विकसित देशों के साथ अंधी दौड़ में हमने युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण की आवश्यकता की पूरी तरह अनदेखी की और उपभोक्तावाद के हामी व आधुनिकता के प्रहरी बनने के लालच में उन्हें मानसिक स्तर पर अपसंस्कृति के दुष्प्रभावों एवं इसकी सुलगती हिंसा के सहारे छोड़ दिया। इससे उपजी हताशा ही युवाओं में कभी तोड़−फोड़, हिंसा, बलात्कार, अपहरण और अतिवाद के रूप में, तो कभी भ्रष्टाचार और घोटालों के रूप में हमारे सामने खुला ताँडव करती दिखाई देती है।
उपभोक्तावादी संस्कृति में पली युवा पीढ़ी तात्कालिकता में जीने में विश्वास करती है और भविष्य के प्रति बेखबर है। वह इंतजार करना नहीं चाहती, इसी क्षण सब कुछ पाना चाहती है। इंस्टेंट काँफी और इंस्टेंट फूड की तरह सुख−समृद्धि, धन−दौलत, प्यार−मोहब्बत सब इंस्टेंट पाना चाहती है। परिणामस्वरूप पतन की खाई में गिरने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। कम−से−कम नगरीय युवक जो समाजशास्त्रियों के विचार एवं चिंता की परिधि में आते हैं, उनमें तो यह प्रवृत्ति साफ−साफ दिख रही है। महानगरीय युवकों में बड़ी तेजी से हिंसा, मूल्यहीनता, आत्मकेंद्रिकता, कुँठा और कल्पनाहीनता बढ़ रही है और उनकी जीवन की समझ बहुत उथली एवं विकृत होती चली गई है।
भगत सिंह ने कभी कहा था, “युवाओं में इतना प्यार होता है कि वह तो पेड़−पौधों, नदी−पहाड़ों, झरनों और जंगल तक के इश्क में डूबे रहते हैं।” किंतु आज के दौर में सचाई दूसरी ही है। आज उनके प्रेम की यह उदात्त परिभाषा दैहिक सुख एवं वासना की परिधि में सिमटकर कलुषित हो चुकी है। वह ‘वर्चुअल रिएल्टी’ पर यकीन रखता है। सब कुछ हकीकत में पाना चाहता है। आधुनिक विज्ञान विशेषज्ञों ने उनके मत को पुष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जहाँ पूर्व में फ्रायड के आधे−अधूरे सिद्धाँत यौन उन्मुक्तता को पुष्ट करते थे, वहीं अमेरिकी रसायनज्ञ एवं एवं मनोशास्त्रीगणों ने कुछ वर्ष पूर्व ही अपनी पुस्तक ‘द केमेस्ट्री ऑफ लव’ में अपने आधे−अधूरे निष्कर्षों से प्रेम की उदात्त भाव की जड़ों पर कुठाराघात किया है। उनके अनुसार प्रेम कोई अहसास जैसी चीज नहीं हैं, जैसा कि सदियों से कवियों एवं दार्शनिकों ने उसे प्रतिपादित किया है। लेबोनिट्ज ने साफ−साफ कहा है कि शरीर में विद्यमान एस्ट्रोजन और एंड्रोजन की कुछ निश्चित रासायनिक संक्रियाओं का परिणाम ही प्रेम या रुमानी अहसास जैसी चीज है। वस्तुतः इस विचारधारा में पल−बढ़ रही युवा पीढ़ी के लिए प्रेम जैसा पवित्र भाव दैहिक खिलवाड़, यौन उन्मुक्तता एवं स्वच्छंदता का पर्याय बन गया है।
उपभोक्ता संस्कृति के इन हमलों ने युवा पीढ़ी को आदर्शों एवं उच्च उद्देश्य के प्रति पंगु बना दिया है। यह मोहपाश इस कदर कसा जा रहा है कि उसे धन एवं भोग के अतिरिक्त ओर कुछ सूझ नहीं रहा है। संयम, सदाचार, त्याग, सेवा, नीति, मर्यादा आदि की बातें दकियानूसी मानी जाती है। तथाकथित विकास के अंतर्गत एक स्वप्नहीन−अराजक पीढ़ी बहुत तेजी से बढ़ रही है। जब हर्षद−मेहता को करोड़ों की धोखाधड़ी के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था और पूरा मीडिया हर्षदमय हो गया था, उस दौरान भारत के चार महानगरों में युवाओं के बीच सर्वेक्षण हुआ था कि उनके पंसदीदा नायक कौन है और स्वयं क्या बनना चाहते हैं। इस सर्वेक्षण के नतीजों ने संवेदनशील समाजशास्त्रियों को झकझोर कर रख दिया। 60 प्रतिशत से अधिक युवकों की संख्या ऐसी थी, जो हर्षद मेहता जैसा बनना चाहते थे। इन युवकों का पसंदीदा नायक हर्षद मेहता था 72 प्रतिशत युवक इससे बेपरवाह थे कि हर्षद ने आखिर क्या किया और उसने जो किया वह देश के अहित में है। इन सर्वेक्षण परिणामों का स्पष्ट निष्कर्ष था कि पैसा और कामयाबी हासिल करने के लिए कुछ भी काय जा सके, बिना किसी हिचक और अपराधबोध के करना चाहिए।
एक समय था जब हाई स्कूल और कॉलेज में प्रवेश करने वाली युवा पीढ़ी सोचती थी कि हम गोखले बनेंगे, तिलक बनेंगे, स्वामी विवेकानंद, गाँधी, जवाहरलाल, सरदार पटेल, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद बनेंगे, लड़कियाँ सोचती थीं कि हम भगिनी निवेदिता, सरोजनी नायडू, कमला देवी चट्टोपाध्याय, अरुणा आसफ अली, हंसा मेहता बनेंगी। आय ये आदर्श एवं सपने धूमिल पड़ गए हैं। आज युवा पीढ़ी के पास सिर्फ फिल्म स्टार या टी.वी. स्टार बनने का सपना है। फिल्मों और टी. वी. की मायावी दुनिया ने उनके सामने एक छद्म स्वर्ग में सभी समस्याओं के इंस्टेंट समाधान मौजूद हैं। बात ही बात में सभी समस्याएँ हल हो जाती हैं। फिल्मी हीरो माफिया गिरोह का अकेले ही सफाया कर सकता है। अदना−सी नौकरी के लिए भटकने वाला युवक अचानक किसी जादुई चमत्कार से करोड़ पति हो जाता हैं। एक ईमानदार दिखने वाला फिल्मी अभिनेता भ्रष्ट व्यवस्था को बदल देता है। सचाई से कोसों दूर ये चित्र और बिंब चूँकि हमें इंस्टेंट तृप्ति देते हैं, युवा इन्हीं में खो जाते हैं और भविष्य के प्रति अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसे धारावाहिक आज की यूवा पीढ़ी को अधिक आकर्षित करते दिखाई देते हैं।
अपनी गहनतम इच्छा, प्रकृति एवं आत्मा के स्वभाव के विपरीत कठपुतली की तरह का यह व्यवहार युवाओं की दिशाधारा पर गंभीर प्रश्न लगा देता है। अपनी इच्छा, अपना संकल्प और अपना ज्ञान, जो मनुष्य जीवन के लक्षण हैं, आज युवा पीढ़ी ही नहीं, प्रौढ़ों और बूढ़ों की पीढ़ी में भी गायब होते जा रहे हैं। साँस्कृतिक और आर्थिक गुलामी में जकड़े देश की यही नियति हो सकती है। लेकिन प्रौढ़ों और बूढ़ों में इनका गायब होना इतना कष्टदायक नहीं है, जितना युवा पीढ़ी में इनका गायब होना। जिनके सामने भविष्य खुला पड़ा है, उनका भविष्य के प्रति उदासीन हो जाना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, यह वैसे ही है, जैसे कि हँसते−खेलते, उछलते, कूदते बच्चे को अचानक लकवा मार जाए। नौजवान जो अपने स्वभाव से, प्रकृति से स्वतंत्र इच्छा, अदम्य संकल्प और अनंत जिज्ञासा लिए होता है, यदि अपनी इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति को किसी केस सामने गिरवी रख दे, जो आने वाला है, उसके संबंध में जिज्ञासा करना बंद कर दे और जो उस पर थोपा जा रहा है, उसका विरोध भी न करे, तो यही कहा जाएगा कि जवानी को लकवा मार गया है।
युवा शक्ति उस उद्दाम ऊर्जा का नाम है, जिसने हर युग में व्यवस्था की जड़ता के इन क्षणों में अपनी आवाज के बुलंद किया है। इतिहास के हर मोड़ पर इस वर्ग ने, परिवर्तन के हर चौराहे−चौराहे पर कफ़न बाँधकर दमन और दुर्व्यवस्था का मुकाबला किया है। 1779 की फ्राँस की राज्यक्राँति को भले ही मध्यम वर्ग अथवा बुर्जुआ क्राँति के नाम से जाना जाता है, किंतु उसका असली वाहक वहाँ का नवयुवक ही था। रूस की बोल्शेविक क्राँति के वाहकों में 80 प्रतिशत लोग 18 से 34 वर्ष की आयु के थे। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गहन तमस के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम के आँदोलन की संपूर्ण ज्योति युवा शक्ति की अदम्य ऊर्जा की आभा से उद्दीप्त थी। 1905 के बंग−भंग से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आँदोलन व 1947 की आजादी तक, सभी महत्त्वपूर्ण दौर में युवा शक्ति अग्रिम पंक्ति पर रही। तिलक युग से लेकर गाँधी युग तक इस समुदाय ने सदैव ही बलिदानी एवं क्राँतिकारी परंपरा में अग्रणी भूमिका निभाई। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु सभी युवा थे। ऐतिहासिक समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए, तो 20वीं सदी के आरंभिक 50 वर्षों में छात्र आँदोलनों ने भारतीय जनमानस की वैचारिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में निर्णायक योगदान दिया और 1947 में देश के आजाद होने तक इनकी अपनी युगाँतरकारी भूमिका रही।
स्वतंत्रता के पश्चात् युवा शक्ति में बिखराव आया और राष्ट्रीय स्तर पर उसकी रचनात्मक भूमिका धूमिलप्राय रही। 80 के दशक के प्रारंभिक काल में लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में इसकी एक आशाजनक झलक मिली थी, किंतु कालक्रम में राजनीति के घातक दंश ने इसे भी पंगु बना दिया। आज राजनीति युवा शक्ति को अपने कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त कर रही है। विभिन्न छात्र संघ, राजनीतिक दलों के विस्तार−विभाग बनकर रह गए है। राजनीति के चक्रव्यूह में उलझी छात्र शक्ति से सृजन की उन्मुक्त भूमिका की आशा नहीं की जा सकती।
साँस्कृतिक पुनर्जागरण के आधार पर समाज निर्माण एवं राष्ट्र उत्थान के पुनीत कार्य में शाँतिकुँज हरिद्वार का युग निर्माण अभियान सक्रिय है। अपने कार्यक्रमों में युवा शक्ति के प्रभावी एवं सार्थक नियोजन के लिए यह कटिबद्ध हैं। इसमें जहाँ संजीवनी साधना सत्र द्वारा युवा शक्ति के चरित्र निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार की जाती है, वहीं युग शिल्पी सत्रों के अंतर्गत लोकसेवा के कार्य में अपनी प्रतिभा एवं शक्ति के नियोजन का प्रशिक्षण दिया जाता है। युग के इस अभूतपूर्व सृजन आँदोलन में सुशिक्षित युवा वर्ग बुद्ध के युवा भिक्षु−भिक्षुणियों, रामकृष्ण मिशन के युवा संन्यासी परिव्राजकों, गाँधी के युवा सत्याग्रहियों एवं सुभाष−भगत सिंह की परंपरा में त्याग−बलिदान के उच्चस्तरीय आदर्श प्रस्तुत कर रहा है। जाति−वर्ग, धर्म−संप्रदाय, भाषा−प्राँत आदि भेद−भावों से परे यह आँदोलन सुसंस्कृत मानव एवं सभ्य समाज के नव निर्माण के लिए संकल्पित है। इसकी रचनात्मक गतिविधियों के अंतर्गत सप्तक्राँतियों का बिगुल बज चुका है, जिसके अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण, नशा निवारण, कुरीति उन्मूलन एवं नारी जागरण जैसे कार्य हाथ में लिए गए हैं। भोगवादी संस्कृति के नागपाश में जक्रही युवा शक्ति व राजनीति के चक्रव्यूह में उलझी छात्र शक्ति इस अभियान में अपनी ऊर्जा का नियोजन कर समाज निर्माण एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के कार्य में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा सकती है।
आशा, उत्साह व गति का समन्वय ही जीवन है। जिसमें जीवन का अभाव हैं, वह इन तीन गुणों से रहित होता है। ऐसे का पुरुष जीवित अवस्था में भी मृतक के समान होते हैं।
रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे, कुकर्म करने तथा बुराई को प्रश्रय देने वाला मनुष्य जीवित दीखता हुआ भी मृत ही है, क्योंकि कुकर्म और कुविचार मृत्यु के प्रतिनिधि है। इनको आश्रय देने वाला मृतक के सिवाय और कौन हो सकता है।
एक बार एक विवाह के समय जब वहाँ बहुत मिष्ठान्न−पकवान बन रहे थे, तब घर की पालतू बिल्ली ने ऊधम मचाया। हर चीज में मुँह डाल देती औ जूठा कर देती। घर की मालकिन ने उसे पकड़कर नाँद के नीचे बंद कर दिया। फिर वह काम में लग गई। कई रोज काम में व्यस्त रहने के कारण उसे बिल्ली को निकालने की बात याद न रही और वह उसी में दबकर मर गई।
बारात जब लौटकर आई और बहू ने घर में प्रवेश किया, उस समय घर मालकिन को बिल्ली की याद आई। उसे निकाला गया, तो मरी मिली। उसे फिकवाया गया। नई बहू यह सब देख रही थी। उसने समझ लिया कि इस घर की यही परंपरा है। बाद में जब उसका बच्चा हुआ और उसके बड़े होने पर बारात गई और नई बहू, आई, तो उसने भी एक बिल्ली पकड़कर नाँद के नीचे बंद की और जब वह मर गई, तो ठीक उसी समय जब नई बहू ने घर में प्रवेश किया, उस बिल्ली को फिकवाया। जो उसने देखा था, उसे कुल परंपरा समझा और उसी का पालन करने में अपना धर्म या कल्याण समझा।
आजकल ऐसी ही कई अंध परंपराएँ फैली हैं, जिनका कारण मालूम ही नहीं है और पता लगाया जाए, तो उनका कारण बिना समझे−बूझे− किया गया अनुकरण ही सिद्ध होगा। क्या उपयोगी है क्या अनुपयोगी, इस पर विचार किए बिना क्रम चलता रहता है व भेड़ों की तरह सब उसका अंधानुकरण करते चले जाते हैं।
भारतीय स्वतंत्रता आँदोलन की महत्ता एक महायज्ञ से कम न थी। इस महायज्ञ में अनेकों वीरों एवं वीराँगनाओं ने अपने जीवन को आहूत किया। शहीदों की शहादत की तो अंतहीन गाथा है, परंतु वीराँगनाओं की वीरोचित स्मृतियों को भी नहीं भुलाया जा सकता। जिन्होंने अपना सर्वस्व इस बलिवेदी पर चढ़ा दिया, उन वीराँगनाओं में कई लेखिका एवं कवयित्री भी थीं, जिन्होंने अपनी लेखनी में प्राण भरकर देशभक्ति और देशप्रेम का ओजस्वी मंत्री फूँका।
इस क्रम एनी बेसेंट का नाम प्रमुख है। वह भारत आई तो थीं सत्य की खोज के लिए, परंतु यहाँ आकर उनका सारा जीवन सेवा के प्रति समर्पित हो गया। एनी बेसेंट ने सन् 1913 में ‘कामन विल’ नामक साप्ताहिक पत्र निकालकर स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद किया। इसके कुछ महीने बाद उन्होंने ‘मद्रास स्टेंडर्ड’ खरीदकर उसका नाम ‘न्यू इंडिया’ रखा। वे इन पत्रों में स्वाधीनता के उग्र एवं जोशीले लेख लिखती रहीं। इसी कारण जून 1917 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसी वर्ष एनी बेसेंट ने काँग्रेस का अध्यक्ष पद स्वीकार किया। सन् 1929 में उन्होंने नेशनल कन्वेंशन नामक एक नया आँदोलन भी चलाया था।
भारत आने से पूर्व एनी बेसेंट स्वामी विवेकानंद से मिल चुकी थीं। वे सत्य की खोज में निकली थीं और कहा करती थीं, सत्य के अनुसंधान में चाहे मेरे समस्त लौकिक बंधन टूट जाएँ, मित्रता और सामाजिक बंधन छिन्न−भिन्न हो जाएँ, चाहे मैं प्रेम से वंचित हो जाऊँ। चाहे उसके लिए मुझे निर्जन पथों में क्यों न भटकना पड़े और सत्य प्रकट होकर चाहे मुझे क्यों न मिटा डाले, मैं उसका अनुसरण करने से पीछे नहीं हटूँगी। यही प्रखरता और आत्मविश्वास ही उनकी सेवा का मंत्र रहा।
स्वर्णकुमारी देवी मूलतः साहित्यकार थीं। वह कवींद्र रवींद्रनाथ ठाकुर की बड़ी बहन थीं। उन्हें भारत की प्रथम महिला उपन्यासकार, पत्रकार एवं संपादक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने ‘भारती’ जैसी प्रसिद्ध पत्रिका का सात साल तक सफल संपादन किया। अपनी पत्रिका के माध्यम से उन्होंने तत्कालीन समाज में संव्याप्त अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, कुरीतियों आदि पर जमकर प्रहार किया। उनकी लेखनी में देशीभक्ति का जज्बा भी रहता था। 1876 में प्रकाशित उनके प्रथम उपन्यास ‘दीप निर्वाह’ को राष्ट्रीय चेतना की सर्वोत्कृष्ट कृति माना जाता है। स्वर्णकुमारी देवी ने स्वतंत्रता संग्राम के अपने अपूर्ण कार्य को अपनी बेटी सरला देवी चौधरी के माध्यम से पूरा किया।
सरला देवी चौधरी अपनी माँ की पत्रिका ‘भारती’ के लिए लेख लिखती थीं। इसके पश्चात् उन्होंने भारती के संपादन द्वारा राष्ट्र−चेतना के जागरण का कार्य किया। सरला देवी अपने लेखनी के माध्यम से जनता में विदेशी गुलामी के प्रति प्रतिकार की ज्वाला जलाती थीं। उनके क्राँतिकारी लेख को पढ़कर युवा और युवतियाँ आक्रोश से उलबने लगते थे। इसी के परिणामस्वरूप सरला देवी ने राष्ट्रीय आँदोलन हेतु एक विराट् संगठन खड़ा किया। उनकी लिखी ‘बंगेर वीर’ नामक पुस्तक जनजागरण के लिए प्रेरणा बनी
भगिनी निवेदिता स्वाधीनता, सेवा और साधना की त्रिवेणी थीं। निवेदिता का मंत्र था, सर्वधर्म समानता, गरीबी−गुलामी से मुक्ति और मानव एवं देशसेवा के लिए सर्वस्व समर्पण। यह मंत्र उन्हें उनके गुरु युगद्रष्टा स्वामी विवेकानंद से मिला था। चिर संन्यासिनी निवेदिता का नाम था मार्गरेट नोबुल। वह आयरलैंड निवासी थीं और भारत को अपना कर्मभूमि मानती थीं। निवेदिता अपनी लेखनी से जनता में नारी शिक्षा, जाग्रति, देशप्रेम की भावना भरती थीं। स्वतंत्रता आँदोलन के समय उनके द्वारा रचित राष्ट्रीयगान और कविताएँ अत्यंत प्रेरणाप्रद एवं उत्कृष्ट थीं। युगाँतर जैसी क्राँतिकारी पत्रिका के पीछे रहकर क्राँतिकारियों को अपना सहयोग देती थीं। भारत के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने के कारण ही स्वामी विवेकानंद ने उन्हें अपनी मानस कन्या मान लिया था। श्री अरविंद ने उन्हें भगिनी निवेदिता कहा और रवींद्रनाथ ठाकुर लोकमाता कहकर पुकारते थे।
डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी भारत की प्रथम महिला विधायिका थीं। वे लेखिका और स्वतंत्रता सेनानी थीं। सन् 1930 के नमक सत्याग्रह आँदोलन में उन्होंने गाँधी जी के साथ गिरफ्तारी दी थीं। ब्रिटिश सरका एवं पुलिस द्वारा महिलाओं पर अत्याचार के विरोध में उन्होंने न केवल जमकर संघर्ष किया, बल्कि उसके लिए कठोर जेल यातनाएँ भी सहीं। राष्ट्रसेवा की सक्रिय भागीदारी के क्रम में डॉ. रेड्डी अनेक लेखों द्वारा भारतीय जनमानस में विदेशी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का स्वर भरती थीं। इसके अलावा भी उन्होंने विभिन्न विषयों पर कई पुस्तकें लिखी हैं। डॉ. मुथुलक्ष्मी 1713 में भारत की प्रथम महिला डॉक्टर बनीं। इसके माध्यम से भी वह मानवता की सेवा करती थीं। सचमुच में वह भारत का गौरव थीं।
भारत कोकिला सरोजनी नायडू जन्मजात कवयित्री थीं। अँग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार एडमंड गाँसे उनके साहित्यिक गुरु थे। वे भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पाश्चात्य जगत् में प्रसारित करने में सफल हुई। इसके लिए उनका अँग्रेजी भाषा का ज्ञान महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। उनकी कविताओं में भारत की आत्मा बसती थी। मानो देशसेवा के लिए ही उनका जन्म हुआ था। साहित्य, देशभक्ति और राजनीति जैसे भिन्न−भिन्न क्षेत्रों में उनकी भूमिका सफल और सराहनीय है।
कमला देवी चट्टोपाध्याय केवल लेखिका ही नहीं स्वतंत्रता संग्राम की जुझारू नेता, सामाजिक क्राँति की अग्रदूत और एक महान् कलाकार थीं। उन्होंने इंडियन वूमैन, बैटल फाँर फ्रीडम, एट द क्राँस रोड, अवेकनिंग ऑफ इंडियन वूमैन, वूमैन मूवमेंट ऑफ इंडिया, द ग्लोरी ऑफ इंडियन हैंडीक्राफ्ट जैसी कई पुस्तकें लिखी हैं। 1927 में कमला देवी ने अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई। बाद में वे इस संगठन की अध्यक्ष भी बनीं। स्वतंत्रता आँदोलन में कूद पड़ने के कारण सन् 1930-44 के बीच कई बार जेलयात्रा की। स्वतंत्रताप्राप्ति के पश्चात् भी उन्होंने देश के विकास में अपना योगदान दिया। राष्ट्र को यह उनकी महत्त्वपूर्ण देन है।
दुर्गाबाई देशमुख स्वतंत्रता और सेवा की प्रतिमूर्ति थीं। एक प्रबुद्ध समाजसेवी और चिंतक होने के कारण उनके विचार कई हिंदी और अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उन्होंने कई क्राँतिकारी लेख लिखे थे।
सुभद्राकुमारी चौहान अपने राष्ट्र की गौरव−रत्न थीं। उन्होंने न केवल वीरोचित गीत रचकर क्राँतिकारियों को प्रेरणा दी, बल्कि स्वयं आगे बढ़कर इस पुनीत महायज्ञ में अपनी आहुति समर्पित की। ‘राखी की लॉज’ और ‘जलियावाला बाग में वसंत’ जैसी अमर और ओजस्वी कविताएँ असहयोग आँदोलन के दौरान पवित्र मंत्र साबित हुई। ‘झाँसी की रानी’ ने भारतीय जनमानस में क्राँति की मशाल जलाई, जिसे पढ़कर गुलामी का अँधेरा काटने के लिए देश के युवा सिर पर कफ़न बाँध लड़ने−मरने को तैयार हो जाते थे। सुभद्राकुमारी चौहान की कविताएँ क्राँति महायज्ञ में आहुत का कार्य करती थीं। उन्होंने ‘कर्मवीर’ जैसी पत्रिका के लिए भी कार्य किया, जिसका संपादन भारत की आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी कर रहे थे।
शहीदों को शहादत में सक्रिय सहयोग देने वाली सुशीला देवी मूलतः कवयित्री थीं। कविता के अलावा नका गद्य भी अत्यंत सशक्त है। कविता हो चाहे लेख, सभी में क्राँति का पुट रहता था। क्राँतिगीत लिखना उनका शौक था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी के बाद, उनकी कुर्बानियों की याद में लिखा दरद भरा गीत तो पंजाब की जनता की जबान पर चढ़कर बोला। सुशीला देवी ने स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह, भगवती चरण बोहरा आदि क्राँतिकारियों के साथ खुलकर काम किया था।
प्रसिद्ध क्राँतिकारी यशपात की धर्मपत्नी प्रकाशवती क्राँतिकारी लेख लिखकर जनमानस में राष्ट्रभक्ति का जज्बा भरती थीं। इसीलिए 1938 में ‘विप्लव’ पत्रिका के प्रकाशन का कार्य उनने सँभाला। इसी पत्रिका के माध्यम से राष्ट्रीय आँदोलन को गति देने वाला लेख वे लिखती थीं।
राष्ट्रीय भावनाओं की काव्यधारा बहाने वाली तोरणदेवी शुक्ला ‘लला’ स्वतंत्रता विभूति थीं। तत्कालीन पत्र पत्रिकाओं में उनकी उग्र रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। उनकी कविताओं के भावों से चिंगारियाँ फूटती थीं। ‘जाग्रति’ उनकी इन्हीं कविताओं का संग्रह है। बाद में उन्हें इस कृति के लिए ‘केसरिया’ जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रदान किया गया।
विद्यावती कोकिला किशोरावस्था से ही गाँधी जी के प्रभाव से राष्ट्रीय कविताएँ लिखने लगी थीं। स्वतंत्रता आँदोलन में उन्होंने बढ़−चढ़कर भाग लिया और जेल गई। ‘अमर ज्योति’ उनका महाकात्य है। माँ, सुहागगीत, सुहागिन और पुनर्मिलन उनके काव्यसंग्रह हैं। इसके पश्चात् उनका झुकाव पूर्णतया श्री अरविंद दर्शन की ओर हो गया। विद्यावती कोकिला ने ‘सावित्री’ के अनुवाद का दुस्साध्य कार्य किया। उन्होंने स्वतंत्रता आँदोलन से प्रारंभ कर अंत में आत्मिक स्वतंत्रता के लक्ष्य पथ पर आरुढ़ होकर अपना जीवन त्याग।
उर्मिला देवी शास्त्री दैनिक ‘जन्मभूमि’ की संपादिका थीं। एक संवेदनशील लेखिका, जुझारू संपादक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी और मातृत्व से भरा उनका जीवन बड़ा ही निराला था। उनकी छोटी बहन पुरुषार्थवती भी राष्ट्रीय कविताएँ लिखतीं, परंतु अल्पवय में ही उनकी मृत्यु हो गई। दोनों बहनों ने भारतीय आजादी में अनोखा कार्य किया।
भारत−रत्न अरुणा आसफ अली ने स्वतंत्रतारूपी महायज्ञ में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। एक पत्रकार के नाते उन्हें प्राप्त समस्त पुरस्कार राशियों को वह अपने पत्रों ‘लिंक’ और ‘पेट्रियाट’ को जीवंत रखने के लिए समर्पित करती रहीं। उनके लेख राष्ट्रीय चेतना को जीवंत और जाग्रत् करने हेतु कटिबद्ध रहते थे। उन्हें अनेकों पुरस्कारों से अलंकृत किया गया और मरणोपराँत ‘भारत−रत्न’ दिया गया। ‘मेमोरीज ऑफ 1942, बिहाइंड लिंक हाउस, द न्यू चैलेंज, एटीन इयर्स आफ्टर गाँधी, थर्टी इयर्स आफ्टर फ्रीडम, विल द काँग्रेस सरवाइव’ आदि ग्रंथों में उनकी प्रखर चेतना झलकती है। बालमणि अम्मा केरल की राष्ट्रवादी साहित्यकार थीं। उन्होंने राष्ट्रीय उद्बोधन वाली कविताओं की रचना की। वह मुख्यतः वात्सल्य, ममता, मानवता के कोमल भाव की कवयित्री के रूप में विख्यात हैं। फिर भी स्वतंत्रतारूपी दीपक की उष्ण लौ से भी वे अछूती नहीं रहीं। सन् 1929-39 के बीच लिखी उनकी कविताओं में देशभक्ति, गाँधी का प्रभाव, स्वतंत्रता की चाह स्पष्ट परिलक्षित होती है। इसके बाद भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहीं। उन्हें पद्म विभूषण आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
हंसा मेहता ने भी स्वतंत्रता संग्राम पर अनेक आलेख प्रकाशित किए। वह एक निर्भीक लेखिका थीं। नयनतारा सहगल जीवन और लेखन दोनों क्षेत्र में साहस की उत्कृष्ट मिशाल थीं। वह ‘प्रिजन एंड चाकलेट केक’ एवं ‘फ्रॉम फीवर सेट फ्री’ जैसे क्राँतिकारी पुस्तकों की लेखिका थीं। वह स्वतंत्रता सेनानी स्वतंत्रचेता मन की बेबाक प्रतिध्वनि थीं।
इसके अलावा भी अनेकों वीराँगनाएँ हुई, जिन्होंने अपनी लेखनी उठाकर भारतीय जनमानस में स्वतंत्रतारूपी आशा का दीपक जलाया। इनके बलिदान और कुर्बानियों पर सच्ची श्रद्धाँजलि तभी संभव है, जब आज बहनें युग की माँग स्वीकारें और उसकी पुकार सुनें। नारी अभ्युदय का नवयुग तभी आ सकता है।
आत्मविश्वास और ईश्वर−अनुग्रह उपलब्ध कर लेने वाला व्यक्ति इतना सामर्थ्य−संपन्न होता है, मानों उसे इंद्र−कुबेर का सहयोग मिल गया। इन्हें प्राप्त करने का एक मात्र उपाय है− अपनी पात्रता−प्रामाणिकता विकसित करना।
राजा द्रुमिल, राजकुमार स्थावर सर्ग की दिनों−दिन बढ़ रही उच्छृंखल−वृत्ति से जितने पीड़ित थे, प्रजा उससे अधिक परेशान थी। महाराज द्रुमिल ने एक−से−एक विद्वान बुलाए, अच्छे−अच्छे नैतिक उपदेशों की व्यवस्था की गई, किंतु जिस तरह चिकने घड़े पर पानी का प्रभाव नहीं पड़ता, उसी प्रकार राजकुमार स्थावर सर्ग पर कोई प्रभाव न पड़ा।
अंत में महाराज द्रुमिल ने पूज्यपाद अश्वत्थ की शरण ली। प्रजा के हित की दृष्टि से महर्षि अश्वत्थ ने राजकुमार को ठीक करने का आश्वासन तो दे दिया, पर उन्होंने महाराज से स्पष्ट कह दिया कि उनकी किसी भी योजना में बाधा उत्पन्न नहीं की जाएगी। महाराज द्रुमिल ने उस शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
महर्षि अश्वत्थ की आज्ञा से सर्वप्रथम स्थावर सर्ग की राज्यवृत्ति रोक दी। उनके पास की सारी संपत्ति छीन ली और सम्राट की ओर से उन्हें बंदी बनाकर अप−द्वीप निष्कासित कर दिया। यह वह स्थान था, जहाँ न तो पर्याप्त भोजन ही उपलब्ध था और न ही जल। अतिवृष्टि के कारण रात में सो सकना कठिन था, वहाँ दिन में हिंसक जंतुओं का भय था। कुछ ही दिन में स्थावर सर्ग सूखकर काँटा हो गए अब तक उनके मन में जो अहंकार और दर्प था, प्रकृति की कठोर यातनाओं के आघात से टूटकर चकनाचूर हो गया। महाराज को इस बीच कई बार पुत्र के मोह ने सताया भी, पर अश्वत्थ को वचन दे चुके थे, अतएव कुछ बोल भी नहीं सकते थे।
समय पूरा होने को आया। प्रकृति के संसर्ग में रहकर स्थावर सर्ग बदले और जब वे लौटकर आए, तो सबने देखा, उनका मुख−मंडल दर्प से नहीं, करुणा व सौम्यता से दीप्तिमान था। जो कम मनुष्य नहीं कर सके, वह प्रकृति की दंड व्यवस्था ने पूरा कर दिखाया।
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बार बछड़ों को अलग ले जाकर अविश्वसनीय अमानुषिक तरीके अपनाकर भूखा मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। जानवरों की दूध देने वाली अवस्था समाप्त होने पर उनको फिर पैदल ही देहातीं इलाकों में पुनः गर्भधारण हेतु भेज दिया जाता है। वापस आने पर बछड़ों के लिए वही प्रक्रिया दुहराई जाती है। इस तरह के दमघोंटू वातावरण में प्रत्येक जानवर 5 या 6 ऋतु दूध दे पाते हैं, फिर उन्हें भी कसाई खाने भेज दिया जाता है। सर्वेक्षण के अनुसार प्रतिवर्ष 80,000 बछड़े एवं 40,000 गाय−भैंस इस तरह मौत के घाट उतार दिए जाते हैं।
गाय−भैंस के बच्चों को बिना लगाए ही शीघ्र व ज्यादा मात्रा में दूध उतारने के लिए उन्हें हारमोन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इन हारमोन इंजेक्शनों में ‘ऑक्सीटोसिन’ या ‘पिट्यूटरी’ प्रमुख हैं। इनके इस्तेमाल से पशुओं के हारमोन्स तुरंत क्रियाशील हो जाते हैं तथा थनों में दूध जल्दी आता है। इंजेक्शन लगते रहने के कारण दूध में पशुओं के रक्त व हड्डियों के तत्त्व आने शुरू हो जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इन इंजेक्शनों के प्रयोग से जो दूध प्राप्त होता है, उनके उपयोग से बच्चे विशेष रूप से बालिकाओं में हारमोन संबंधी असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। कम उम्र के बालक−बालिकाएँ असमय ही परिपक्व हो जाती है। यह दूध मनुष्य की प्रजनन क्षमता को भी प्रभावित करता है तथा इसके अधिक दिनों के प्रयोग से नपुँसक होने का खतरा रहता है।
इस इंजेक्शन के इस्तेमाल से पशुओं की गर्भधारण क्षमता कम हो जाती है तथा मृत बच्चे पैदा होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। थनों में सूजन और संक्रमण की शिकायतें बढ़ जाती हैं। पाचनतंत्र से संबंधित रोग उत्पन्न हो जाते हैं तथा पशुओं के पैरों के जोड़ों और हड्डियों में विकृति आ जाती है। ‘ऑक्सीटोसिन’ कृत्रिम रूप से संश्लेषण द्वारा निर्मित किए जाने वाला एक ऐसे हारमोन का रासायनिक रूप है, जो प्राकृतिक रूप से मस्तिष्क स्थित पियूष ग्रंथियों द्वारा उत्सर्जित किया जाता है। इस इंजेक्शन का प्रयोग प्रसवोपराँत महिलाओं में दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह इंजेक्शन पशुओं की मांसपेशियों में दिया जाता है। शरीर द्वारा उत्सर्जित न हो पाने के कारण यह पशुओं की माँसपेशियों में जमा होता रहता है। इस तरह पशु−वध के बाद ऐसे पशुओं का माँस खाने वाले मनुष्यों में भी यह हामोर्निनिक तत्त्व प्रवेश कर जाता है।
ब्रिटेन में जब ‘मैडकाउ’ बीमारी का पता चला, तो पूरे यूरोप में तत्काल गौमांस प्रतिबंधित कर दिया गया। उपभोक्ता संगठन, मीडिया सभी एकजुट होकर उसके खिलाफ खड़े हो गए। यहाँ तक कि सरकार पर भी संकट के बादल घिर आए परंतु भारत में जहरीले दूध को लेकर अभी तक कोई विशेष कारगर कदम नहीं उठाए गए। मिलावटखोरी के चलते ही आज भारतीय डेयरी उत्पाद विश्व बाजार में आधी कीमतों पर बिक रहे हैं। जहाँ से प्रतिवर्ष कम−से−कम तीन सौ करोड़ रुपये का निर्यात किया जा सकता था, वहाँ से सिर्फ डेढ़ सौ करोड़ रुपये का ही निर्यात हो पा रहा है।
वस्तुतः इस स्थिति से उबरने के लिए सशक्त जनक्राँति की आवश्यकता है। प्रत्येक उपभोक्ता का जागरूक होना जरूरी है। गो−पालन की बहुआयामी महत्ता से जन−जन को परिचित कराया जाए। घरेलू गो−पालन को बढ़ावा देने के लिए सरका द्वारा और ज्यादा साधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। ऐसे कानून बनाए जाने चाहिए, जो जन−स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को कड़ी−से−कड़ी सजा दें। नकली दूध का विष सामूहिक प्रयास से ही समाप्त हो सकता है।
सरकारी उच्च नौकरी पर बने रहते हुए भी बंकिम बाबू नेउन दिनों की परिस्थितियों को दृष्टिगत रख ‘आनंदमठ’ की रचना की। ‘वंदेमातरम्’ का जयघोष पहली बार इसी में किया गया। यह उपन्यास एक ऐसे देशभक्त संन्यासी दल की कथा, जिसने देश को गुलामी से मुक्त कराने हेतु गुप्त रूप से सैनिक तैयारी की व लड़ते−लड़ते अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। इस गाथा व वंदेमातरम् के नारे ने क्राँति की जो लहर देशभर में फैलाई, उसने अन्यायी−अनाचारी प्रशासन को झकझोरकर रख दिया। ऐसा साहस प्रखर प्रतिभाशाली ही कर सकते हैं।
सिनेमा को दर्शन, चिंतन, विधि, मान्यता, परंपरा तथा नैतिकता जैसे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष मूल्यों का सम्मान करना आना चाहिए।
सिनेमा सामाजिक जीवन को नई दिशा प्रदान कर सकता है। यह सामाजिक विचार को परिष्कृत एवं भावना हो सुकोमल बनाने का कार्य कर सकता है। इससे समाज और भी अधिक उन्नत हो सकता है। फिल्मों द्वारा अकल्पनीय सफलता प्राप्त हो सकती है। ऐसा रूस ने किया है। फ्राँस कर रहा है, इंग्लैंड ने आरंभ कर दिया, अमेरिका भी इस दिशा में प्रयासरत है। हम भी अपने देश में प्रगतिशील एवं उत्कृष्ट कलात्मक सिनेमा द्वारा लोगों एवं समाज को उन्नत दिशा प्रदान कर सकते हैं।
सिनेमा एक मनोरंजन का साधन भी है। मनोरंजन को चरित्रवान् होना चाहिए। यही उसका वास्तविक स्वरूप सी है। जिस मनोरंजन का उत्कृष्ट चरित्र नहीं होता, उसका प्रभाव विनाशक हो सकता है। अतः सिनेमा को, मन को स्वस्थ बनाए रखकर उसकी रुचि को उच्चस्तरीय बनाना चाहिए। सिनेमा का कार्य है कि लोगों की पसंद को बदले, परिष्कृत बनाए और क्रियात्मक व सृजनशील रखे सिनेमा समाज के पथ−प्रदर्शक की भूमिका निभा सकता है। उसे सदैव समाज के प्रति ईमानदार व जिम्मेदार होना चाहिए। सामाजिक परिवर्तन में सिनेमा की भूमिका नजर−अंदाज नहीं की जा सकती, हालाँकि उसकी एक सीमा है।
भारतीय समाज की संरचना अनोखी एवं विचित्र है। अब तक फिल्म निर्माता इस संरचना को समझ नहीं लेता, उसकी सफलता संदिग्ध बनी रहेगी। जब तक सिनेमा में समाजरूपी जमीन में बिखरे पड़े बीजों का अंकुरण नहीं होगा, वह सिनेमा इस समाज में स्वीकृत नहीं होगा। अंतःचेतना से लगातार संपर्क एवं संबंध बनाए रखना उसकी अनिवार्य आवश्यकता है। फिल्में समाज से कटकर जीव नहीं बनी रह सकतीं। सिनेमा जो कुछ भी चुता उसके मूल बीज समाज में विद्यमान होते हैं। अतः नाव का आधार भी इसी को लेकर होना चाहिए।
सिनेमा निर्माण से जुड़ी एक विशेषता उसकी व्यापकता जो उसे करोड़ों लोगों के पास ले जाती है और वह भी बहुत आसानी से। आज सिनेमा के इस व्यापक प्रभाव को कोई अनुभव कर रहा है। सामान्यतया सिनेमा देखने के दर्शकों की चेतना सुप्त रहती है और भावना प्रबल वह जाग्रत्। भावनाओं का यह दुबार सिनेमा देखने तक ही अमित नहीं रहता, वरन् इसके बाद तक बना रहता है। भावनाओं को सही पोषण नहीं मिल पाता, तो परिणाम भयावह होता है। दुर्भाग्य से आज की व्यावसायिक फिल्मों ने मानवी मानसिकता को ऊँचा उठाने के बजाय उसे विकृति की गहरी खाई में धकेल दिया है। आर्थिक लाभ हेतु यह व्यवसाय समाज एवं खासकर युवा वर्ग के लिए आत्मघाती सिद्ध हो रहा है।
आज सिनेमा ने विचारों को निकृष्ट एवं भावनाओं को कलुषित कर दिया है। इसके अनुसार रिश्तों एवं संबंध का आधार त्याग व प्रेम नहीं बल्कि स्वार्थ है। पावन एवं पवित्र प्रेम को व्यावसायिक व दैहिक वासना तक सीमित कर दिया है। नारी ममत्व एवं स्नेह की मूरत नहीं, उसे शोषण व मनोरंजन का साधन बना दिया गया है। सिनेमा के बोला, अंगद जिस राम ने तेरे पिता को मारा, तू उन्हीं की सहायता कर रहा है। मेरे मित्र का पुत्र होकर भी तू मुझसे बैर कर रहा है। अंगद हँसा और बोला, रावण! अन्यायी से लड़ना और उसे मारना ही सच्चा धर्म है, चाहे वह मेरे पिता हों अथवा आप ही क्यों न हों? अंगद के यह तेजस्वी शब्द सुनकर रावण को उत्तर देते न बना।
वैभव एवं ऐश्वर्य की चकाचौंध में कमजोर मानसिकता में गहरा भटकाव आ गया है। यह जीवन−शैली को तहस−नहस कर रहा है। अश्लीलता, हिंसा, हत्यारूपी ये दृश्य जीवन−मूल्यों का क्षरण कर रहे हैं।
उलटे को उलटकर ही सीधा किया जा सकता है। यह उक्ति सिनेमा के लिए सही सिद्ध हो सकती है। सिनेमा जितना जहर उगल चुका है, उसे बंद कर पुनः नैसर्गिक मूल्यों की प्राप्ति हेतु उन्मुख होना होगा। उसे अपने अति व्यावसायिक मोह को परित्याग कर व्यक्ति, समाज व राष्ट्र को ऊँचा उठाने हेतु प्रयास करना चाहिए। कला की पहुँच भावनाओं व संवेदना क्षेत्र तक होती है। अतः सिनेमारूपी कला के इस माध्यम द्वारा समाज का भावनात्मक परिष्कार किया जा सकता है, किया जाना चाहिए।
जागरूकता और प्रखरता का एक अद्भुत समन्वय अंगद के चरित्र में देखने को मिलता है। वे रावण के दरबार में जा पहुँचे और उससे साहसपूर्वक वार्त्तालाप किया। रावण के मित्र बालि के पुत्र होने के नाते प्रभु ने उन्हें दूत के रूप में भेजा था। परस्पर उत्तेजक संवाद के बाद जब रावण अंगद के पैरों को भी हिला न पाया, तो उसने एक कूटनीतिक चाल चली।
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यज्ञ को भारतीय संस्कृति का मूल माना गया है। प्राचीनकाल से ही आत्मसाक्षात्कार से लेकर स्वर्ग−सुख, बंधन−मुक्ति, मन शुद्धि, पाप−प्रायश्चित, आत्मबल, ऋद्धि−सिद्धियों आदि के केंद्र यज्ञ ही थे। यज्ञों द्वारा मनुष्य को अनेक आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं। गायत्री महामंत्री के साथ−साथ शास्त्रोक्त हवियों के द्वारा भावप्रवणता के साथ जो विधिवत् हवन किया जाता है, उससे एक दिव्य वातावरण विनिर्मित होता है। उस दिव्य यज्ञीय वातावरण में बैठने मात्र से रोगी मनुष्य निरोग हो सकते हैं। चरम ऋषि ने अपने अनुपम ग्रंथ चरक संहिता में लिखा है, “आरोग्य प्राप्त करने की इच्छा करने वालों को विधिवत् हवन करना चाहिए।” बुद्धि को शुद्ध करने की यज्ञ में अपूर्व क्षमता है। जिन व्यक्तियों के मस्तिष्क दुर्बल हैं बुद्धि, मलीन है अथवा मानसिक विकृतियों से घिरे हुए हैं, यदि वे यज्ञ करें, तो उससे उनकी मानसिक दुर्बलताएँ शीघ्र दूर हो सकती हैं। यज्ञ से प्रसन्न हुए देवता मनुष्य को धन, वैभव, सौभाग्य तथा सुख−साधन प्रदान करते हैं। यज्ञ करने वाला कभी दरिद्री नहीं रह सकता। यज्ञ करने वाले स्त्री−पुरुषों की संतान बलवान, बुद्धिमान, सुँदर और दीर्घजीवी होती हैं। राजा दशरथ को यज्ञ द्वारा ही चार पुत्र प्राप्त हुए थे। गीता आदि शास्त्रों में इसीलिए यज्ञ को आवश्यकता धर्मकृत्य बताया गया है और कहा गया है कि यज्ञ न करने वालों को लोग और परलोक कुछ भी प्राप्त नहीं होता। यजुर्वेद में भी कहा गया है कि जो यज्ञ को त्यागता है, उसे परमात्मा त्याग देता है। यज्ञ के द्वारा ही मनुष्य को देवयोनि प्राप्त होती है और वह स्वर्ग का अधिकारी बनता है।
प्राचीनकाल में ऋषि−मनीषियों ने यज्ञ के सर्वतोमुखी इन लाभों को भलीप्रकार समझा था, इसलिए वे उसे लोककल्याण का अति आवश्यक कार्य समझकर अपने जीवन का एक तिहाई समय यज्ञों के आयोजन में ही लगाते थे। स्वयं यज्ञ करना और दूसरों से यज्ञ कराना उनका प्रधान कार्य था। जब तक भारत में यज्ञ की प्रतिष्ठा थी, तब तक यह भूमि स्वर्ण−संपदाओं की स्वामिनी थी। लोग स्वस्थ, सुदृढ़, प्रतिभावान् एवं दीर्घजीवी होते थे। यज्ञीय गरिमा को भुला देने से आज जो दुर्गति हो रही है, वह सर्वविदित है। यज्ञ की उसी प्राचीन गरिमा को पुनर्स्थापित करने में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान, शाँतिकुँज के मूर्द्धन्य वैज्ञानिकों ने ऋषिसत्ता के निर्देशन में गत बीस वर्षों जो शोध−निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं, वे बहुमूल्य हैं।
यज्ञ चिकित्सा−यज्ञोपैथी को ही लें, तो यह एलोपैथी, होम्योपैथी आदि उपचारपद्धतियों से अत्यंत श्रेष्ठ व सफल सिद्ध हुई है। भिन्न−भिन्न रोगों के लिए विशेष प्रकार की हवन सामग्री प्रयुक्त करने पर उनके जो परिणाम सामने आए हैं, वे बहुत ही उत्साहजनक रहे। यज्ञोपैथी में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि आयुर्वेद शास्त्रों में जिस रोग की जो औषधियों बताई गई हैं, उसे खाने के साथ ही उन वनौषधियों को आम, पीपल आदि की समिधाओं के साथ नियमित रूप से हवन भी किया जाता रहे, तो कम समय में अधिक लाभ मिलता है। यज्ञोपैथी का मूल सिद्धाँत ही यह है कि जो वस्तु जितनी सूक्ष्म होती जाती है, वह उतनी ही अधिक शक्तिशाली एवं उपयोगी बनती जाती है। विशिष्ट मंत्रों के साथ जब औषधि युक्त हवि सामग्री का हवन किया जाता है, तो यज्ञीय ऊर्जा से पूरित धूम्र रोगी के शरीर में रोम छिद्रों एवं नासिका द्वारा अंदर प्रविष्ट करता है और रोग की जड़ें कटने लगती हैं। इससे रोगी शीघ्र ही रोगमुक्त होने लगता है। अथर्ववेद 3/99/2 में कहा गया है−
यदि क्षितायुर्यदि वापरेतों यदि, मृत्योरन्तिकं नीत एव। तमा हरामि निऋंतेरुपस्थाद स्यार्ष मेन शतशारदाय।
अर्थात् अग्निहोत्र के माध्यम से आयु क्षीण हुए, जीवनी−शक्तियों नष्ट हुए तथा मृत्यु के समीप पहुँचे हुए व्यक्ति रोग के चंगुल से छूट जाते हैं। रोगी मृत्यु के मुख से पुनः वापस आ जाते हैं और सौ वर्ष जीवित रहने की शक्ति प्राप्त करते हैं।
आरोग्य वृद्धि एवं रोग−निवारण के लिए इस तरह के जो यज्ञ किए जाते हैं, उन्हें ‘भैषा यज्ञ’ कहते हैं। प्राचीनकाल में आरोग्य शास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् यज्ञ के ब्रह्मा होते थे, जो सूक्ष्म वैज्ञानिक परीक्षण द्वारा यह जान लेते थे कि इस समय वायुमंडल में क्या विकार या प्रदूषण बढ़ जाने से कौन−सा रोग फैला हुआ है और उसके निवारण के लिए किन वनौषधियों का हवन का आयोजन किया जाता था। रोगी के शरीर में कौन−सी व्याधि बढ़ी हुई है, कौन से तत्त्व घट−बढ़ गए हैं? उनकी पूर्ति करके एवं शरीरगत धातुओं का संतुलन ठीक करने के लिए किन औषधियों की आवश्यकता है, वह ऐसा निर्णय करते थे और वनौषधियों की हवन सामग्री बनाकर, उसी प्रकृति के वेदमंत्रों से आहुतियाँ दिलाकर हवन कराया जाता था। वैसा ही पुरोडस एवं यावशिष्ट रोगी के लिए तैयार किया जाता था। रोगी यज्ञधूम्र के वातावरण में रहता था और उसी वायु से सुवासित जलवायु एवं आहार ग्रहण करता था तदनुसार वह आधि−व्याधियों से, रोगों से छुटकारा पा लेता था। इस तरह के भैषज यज्ञों का वर्णन अनेक ग्रंथों में मिलता है।
भावप्रकाश, निघंटु एवं अन्य आयुर्वेद ग्रंथों में यज्ञ−चिकित्सा में प्रयुक्त होने वाली जिन औषधियों को प्रमुखता दी गई है, उनमें अगर, तगर, गूगल, ब्राह्मी, शतावरी, असंगध, विधारा, रास्ना, गिलोय, जटामंसी, शालपर्णी मंडकपर्णी इंद्रायण की जड़, अड़ूसा, मकोय, गुलाब के फूल, गोखरू, तालमखाना, क्षीरकाकोली, बादाम, मुनक्का, जायफल, बड़ी, हरड़, आँवला, छोटी पिप्पली, बड़ी इलायची, जीवंती, पुनर्नवा, नागकेशर, चंदन, कपूर, चीड़ का बुरादा, देवदार, चीता, पित्तपापड़ा, मोथा आदि मुख्य हैं। यह सभी औषधियाँ समान मात्रा में ली जाती हैं। इन्हें जौकुट करके उसमें दसवाँ भाग गुड़ की शर्करा एवं घी मिलाकर हवन करने से निकटस्थ लोगों को शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन का लाभ मिलता है।
यों तो विशेष रोगों के लिए विशेष प्रकार की रोगानुसार हवन सामग्री तैयार की जाती है, परंतु जो औषधियाँ सभी रोगों में समान रूप से एक समान हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं, (1) अगर (2) तगर (3) देवदार (4) चंदन (5) लाल चंदन (6) जायफल (7) लौंग (8) गूगल (9)चिरायता (10) गिलोय एवं (11) असगंध।
इन औषधियों को बराबर मात्रा में लेकर कूट−पीसकर दरदरा चूर्ण बना लिया जाता है। इस प्रकार तैयार हवन सामग्री को एक डिब्बे में रखकर नंबर(1)का लेबल लगा देना चाहिए।
अब, जैसा कि आगे वर्णन किया जा रहा है, उन औषधियों को रोगानुसार लेकर उनका भी जौकुट पाउडर बनाकर दूसरे डिब्बे में रखकर नंबर (2) का लेबल चिपका देना चाहिए। यज्ञोपचार करते समय नंबर (1)एवं नंबर (2)के डिब्बों में से समान मात्रा में औषधीय हवन सामग्री अलग पात्र में निकालकर मिश्रित कर लेना चाहिए और उसी से गायत्री महामंत्र या सूर्य गायत्री मंत्र द्वारा कम−से−कम चौबीस बार हवन करना चाहिए अर्थात् 24 आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिए औषधियों जितनी ताजी और अच्छी होंगी, उतना ही अधिक वे लाभकारी होंगी। सूर्योदय के समय किया गया हवन सर्वाधिक लाभकारी होता है। वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा भी अब यह सिद्ध हो चुका है। आवश्यकतानुसार पीछे भी दिन में तीन बार और रात को एक−दो बार किसी पात्र में अग्नि रखकर थोड़ी−सी औषधीय हवन सामग्री थोड़ी देर के लिए रोगी के निकट धूप की भाँति जलाई जा सकती है। हवन करते समय तैयार औषधियों का दसवाँ भाग शर्करा एवं दसवाँ भाग घृत मिला लेना चाहिए। कोई औषधि या वस्तु अधिक महँगी हो अथवा अनुपलब्ध हो तो उसकी पूर्ति अन्य दूसरी औषधियों की मात्रा बढ़ाकर की जा सकती है।
विधिः − यज्ञोपचार की प्रक्रिया इस प्रकार है−
शास्त्रों में सूर्य को स्वास्थ्य का केंद्र माना गया है। सूर्य में रोग−निवारण की प्रचंड शक्ति विद्यमान है। इसका प्रयोग करने से कई प्रकार के रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है और पूर्ण दीर्घायुष्य प्राप्त किया जा सकता है। नीरोगता, बलिष्ठता एवं दीर्घायु के लिए सूर्य गायत्री मंत्र का उपयोग किया जाता है। सूर्य−गायत्री का मंत्र इस प्रकार है−
ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि, तन्नः सूर्यों प्रचोदयात्।
गहन वैज्ञानिक अध्ययन−अनुसंधानों के आधार पर पाया गया है कि जो वनौषधियाँ आयुर्वेद ग्रंथों में जिन रोगों के लिए गुणकारी मानी गई हैं, उन्हें हवन सामग्री के रूप में घृत और शक्कर मिलाकर सूर्य−गायत्री मंत्र के साथ रोगी के निकट हवन करने से साधारण औषधि−चिकित्सा की अपेक्षा रोगी को अधिक लाभ मिलता है। यज्ञोपचार प्रक्रिया में रोगानुसार गायत्री महामंत्र तथा उससे संबंधित चौबीस गायत्री मंत्र द्वारा हवन किया जाता है। यज्ञ चिकित्सा करते समय उन्हीं विशिष्ट औषधियों को सूक्ष्म चूर्ण रूप में सुबह−शाम एक−एक चम्मच लेते रहने से दूना लाभ मिलता है।
हवन के पश्चात् समीप रखे हुए जल पात्र में दूर्वा, कुश अथवा पुष्प डुबोकर गायत्री मंत्र पढ़ते हुए रोगी पर अभिसिंचन करना चाहिए। साथ ही यज्ञ की भस्म मस्तक, हृदय, कंठ, पेट नाभि एवं दोनों भुजाओं पर लगानी चाहिए। इसी प्रकार घृतपात्र में जो घृत बचा रहता है, उसमें से कुछ बूँदें लेकर रोगी के मस्तक एवं हृदय पर लगाना चाहिए। देखा गया है कि इन प्रयोगों से सामान्य औषधि चिकित्सा की अपेक्षा रोगी को अधिक लाभ मिलता है। इसका प्रभाव रोगी के शारीरिक एवं मानसिक दोनों ही क्षेत्रों में पड़ता है, परिणामस्वरूप वह जल्दी स्वस्थ हो जाता है। जीवनी−शक्ति बढ़ जाने से वह दुबारा उस बीमारी से आक्राँत नहीं होने पाता।
यज्ञोपैथी द्वारा कुछ सामान्य रोगों को दूर करने में प्रयुक्त होने वाली विशेष औषधियों के रोगानुसार नाम एवं उनकी प्रयोग−विधि अगली पंक्तियों में दी जा रही है। यहाँ इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि इन विशिष्ट औषधियों से बनी हवन सामग्री के साथ ही उपर्युक्त नंबर (1) कॉमन हवन सामग्री भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब रोगी के समीप हवन किया जाता है।
(1)यकृत (लीवर) एवं तिल्ली तथा उससे संबंधित रोग−इन अंगों से संबंधित रोगों की विशेष हवन सामग्री इस प्रकार है−
(1)शरपुँखा (2)कालमेध (3)पिप्पलीमूल (4)पुनर्नवा (5)मकोय (6)सेमर (शालमली) (7)जामुन छाल (8) अपामार्ग (9)भृंगराज (10)भुइ आँवाला (11) कुटकी (12) राई।
इन सभी 12 औषधियों को जौकूट कर हवन सामग्री बनाने के साथ ही कुछ मात्रा महीन पीसकर इसको कपड़े से छानकर पाउडर रूप में अलग रख लेना चाहिए और रोगी को सुबह−शाम एक−एक चम्मच जल के साथ खिलाना चाहिए। इस प्रकार यह यज्ञोपचार प्रक्रिया बड़ी प्रभावी मानी गई है। आगे भी यह क्रम हम जारी रखेंगे।
मरने के कुछ समय पश्चात् मनुष्य को नवजीवन मिलता है। इस संबंध में अब उपलब्ध तथ्यों का इतना बाहुल्य है कि संदेह और अविश्वास की कोई गुँजाइश ही नहीं रह जाती। इसी तरह चेतना के किसी कारणवश अचेतन अवस्था में चले जाने के बाद पुनः चेतन में आ लौटने के लगभग वैसे ही उपलब्ध अनुभवों की खोज भी अब वैज्ञानिकों ने कर दिखाई हैं।
फ्राँस के मूर्द्धन्य वैज्ञानिक डॉ. डेलाकौर ने इस संदर्भ में गहन अध्ययन−अनुसंधान किया है। उनने मृत्यु के प्रथम चरण से लौटने वाले व्यक्तियों की मनः स्थिति एवं अनुभूतियों को बड़ी गहराई से न केवल निरखा−परखा है, वरन् वैज्ञानिक अनुसंधान की कसौटी पर भी कसा है। उन्होंने अपने ही देश के प्रख्यात अभिनेता डेनियल जीनल पर किए गए परीक्षणों से मरणोत्तर जीवन की वास्तविकता को उजागर किया है।
घटनाक्रम के अनुसार, डेनियल जीनल को अचानक दिल का दौरा पड़ा। उन्हें चिकित्सालय पहुँचाने और आवश्यक चिकित्सा सुविधा तुरंत उपलब्ध कराने में देरी हो गई। ऑपरेशन थियेटर में चिकित्सकों ने देखा कि उसके हृदय की गति पूरी तरह अवरुद्ध हो चुकी हैं। दिल की धड़कन रिकॉर्ड करने वाली मशीन ई. सी. जी. की सुई ने घूमना बंद कर दिया है। अतः उसे मृत मान लिया गया। कुछ देर बाद डॉक्टरों ने देखा कि मशीन की सुई अचानक ही फिर से हिलने−डुलने लगी है, तो उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा।
डेनियल की आँख खुली तो उससे बातचीत करने का सिलसिला भी चला। दिल का दौरा पड़ने के बाद से लेकर नेत्र खुलने तक की समयावधि में क्या हुआ? इस रहस्य को उजागर करते हुए उसने बताया, “पहले तो मैंने एक कमरे में तैरना आरंभ किया, जहाँ भय−सा लग रहा था। मुँह से आवाज भी नहीं निकल पा रही थी। इसके बाद देखा कि सामने अपने दिवंगत माता−पिता खड़े हैं। उन्होंने साँत्वना बँधाते हुए थपथपाया और अपने साथ रंग−बिरंगे फूलों से महकते हुए बगीचे में ले गए। डेनियल के माता−पिता और छोटे बच्चे पास्कल का देहाँत पहले ही हो चुका था, जो उस बगीचे में खेल−कूद रहा था। कुछ ही क्षणों बाद माँ ने धीरज बँधाते हुए कहा, अब तुम यथावत् लौटा जाओ, जिंदगी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं।” तभी ई. सी. जी. मशीन पर दिल की धड़कनों का रेखाँकन शुरू हो गया।
अमेरिका के सुप्रसिद्ध चिकित्साविज्ञानी डॉ. बने राबट्स ने भी इस संबंध में महत्त्वपूर्ण अनुसंधान किया है। उनके अनुसार मरणासन्न व्यक्तियों के पास बैठने से यह पता चलता है कि जीवन की आखिरी साँस लेने से पूर्व वे अपने निकटवर्ती पारिवारिक सदस्यों, समुदाय के व्यक्तियों के साथ अधिक−से−अधिक वार्त्तालाप करना चाहते हैं। कभी−कभी तो वे ऐसी अलौकिक एवं आश्चर्यजनक घटनाओं का उल्लेख करते हैं, जिन्हें सुनकर हतप्रभ रह जाना पड़ता है। उनने ग्रीस के किंगपाँल नामक व्यक्ति की एक ऐसी ही रोचक घटना का वर्णन अपनी कृति में किया है। उसके अनुसार, एक बार अचानक ही किंगपाँल अचेतन अवस्था में चला गया। कुछ देर बार होश में आया तो उतनी अवधि के अनुभवों को अपनी पत्नी के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए बताया, मैं ऐसा महसूस कर रहा था कि मानो किसी नदी के किनारे पर खड़ा हूँ और सामने काले रंग की सड़क है। उसके आखिर में प्रकाश किरणें स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही हैं।
एक दस वर्षीय हैंस नामक बालक के अनुभव तो और भी चौंका देने वाले हैं। हैंस के माता−पिता उसे प्यार से हैरा कहकर पुकारते थे। एक बार हैरा किसी दीवार के नीचे दुर्घटनावश दबकर बुरी तरह घायल हो गया। चिकित्सकों ने बच्चे को चेतनाशून्य अर्थात् मृत घोषित कर दिया। माता−पिता की ममता को यह कतई विश्वास नहीं हो रहा था कि उनका बैटा हैंस मर चुका है। वे उसको जीवित ही मानते रहे। दैवी विधान की विचित्रता को भला कौन समझ सकता हैं? ठीक चौबीस घंटे बाद हैंस की चेतना पुनः लौट आई। साँसें चलने लगीं, दिल धड़कने लगा। परिवार के अन्यान्य सदस्यों एवं पास−पड़ोस के लोगों को इस विचित्र एवं विलक्षण घटना के बारे में जब पता चला, तो उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा ओर बच्चे को देखने के लिए समूचा निकटवर्ती समुदाय आ पहुँचा।
चौबीस घंटे अचेतन अवस्था की अनुभूतियों के बारे में पूछे जाने पर हैंस ने इस अवधि में एकत्रित अनुभवों को
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उपस्थित आत्मीयजनों के सम्मुख कह सुनाया। उसने बताया कि मैं एक ऐसी दुनिया में चला गया, जहाँ अत्यधिक आनंद की अनुभूति होने लगी थी। वहाँ के बच्चों को खेलते−खेलते देखकर मेरा भी मन उनके क्रिया−कलापों में भाग लेने का हुआ, तो मैंने उनसे अनुमति माँगी, लेकिन मेरे प्रस्ताव को उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अस्वीकृत करते हुए कहा, “तुम्हारा अभी यहाँ आने का समय नहीं हुआ है। साँसारिक कर्त्तव्यों के निर्वाह हेतु तुम पुनः वापस चले जाओ।” इस प्रकार मैं फिर से अपनी चेतना में वापस लौट आया। हैंस स्वस्थ होने पर पूर्व की भाँति अपनी दिनचर्या बिताने लगा।
यह एक तथ्य, किंतु आश्चर्यजनक सत्य है कि मरणोपराँत भी जीवात्मा फिर से उसी पुराने कलेवर को धारण करने के लिए सहमत हो जाती है। प्रायः देखने में आता है कि मृत्यु के उपराँत का यह अल्पकालीन समय लोगों के लिए बड़ा ही शाँति एवं सुखमय व्यतीत होता है, लेकिन कभी−कभी स्थिति इसके विपरीत भी दिखने लगती है। दृश्य इतने भयावह−डरावने लगते हैं कि उन्हें देखकर दर्शकों के ही नहीं, श्रोताओं के भी रोंगटे खड़े होने लगते हैं।
‘लाइफ बिफोर लाइफ’ नामक अपनी कृति में विख्यात परामनोविज्ञानी एवं सम्मोहन विद्या के विशेषज्ञ हेलेन वेम्बेक ने अचेतन अवस्था की अनुभूतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। उन्होंने मरणोत्तर जीवन एवं अचेतन के स्मृति भंडार का पता लगाने के लिए कई व्यक्तियों को सम्मोहन विद्या के द्वारा वशीभूत किया। मृत्यु के पश्चात् और चेतन अवस्था में आने तक के अनुभवों के बारे में जब उनसे पूछा गया, तो प्रत्युत्तर में यही सुनने को मिला कि उस अदृश्य दुनिया के अशरीरी लोग अर्थात् जीवात्माएँ छाया की भाँति मार्गदर्शक और सहायक का काम करती हैं और अपने स्थान पर पुनः लौटने का सत्परामर्श देती हैं।
इंग्लैंड में सर्वाधिक लोकप्रिय समाचार पत्र ‘दी टाइम्स’ में पिछले दिनों मनुष्य के पुनर्जम्म से संबंधित अनेकों घटनाएँ छप चुकी हैं। जिन लोगों ने अपनी रिपोर्ट कमेटी के सामने प्रस्तुत की, उनमें से अधिकाँश ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक एवं अपने क्षेत्र के जाने−माने विशेषज्ञ थे। इनमें से एक थे, फ्राँस के सुविख्यात खगोलविज्ञानी कैमिले फ्लेमेरियन, जिन्होंने उन्नीस वर्ष की आयु में सन् 1861 ई. में ‘साइकिक’ शब्द की खोज की, जिसे अध्यात्म विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी समझा जाता है। उन्हें यह प्रेरणा अपने समय के मूर्द्धन्य दार्शनिक मनीषी अलान कार्डेक की पुस्तक ‘दी बुक ऑफ स्पिरिट’ से मिली। कार्डेक के मतानुसार, अध्यात्म ज्ञान की उपलब्धि का एकमात्र कारण पुनर्जन्म की सत्यता है। उन्होंने अपने सिद्धाँतों की पुष्टि करते हुए बताया है कि मृत और जीवित व्यक्ति के मध्य आदान−प्रदान का जो क्रम चलता है, इसमें आत्मा की ही मुख्य भूमिका है। इस खोज के लिए शरीरगत नहीं, मनोवैज्ञानिक कारण अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। अपने विचारों से अवगत कराने हेतु उन्होंने पेरिस में ‘सोसाइटी ऑफ साइकोलॉजिकल स्टडीज’ की स्थापना की। फ्लेमेरियन ने इसी सोसाइटी में प्रवेश पाया और उन तथ्यों को ढूँढ़ निकाला, जिनसे आत्मा की अखंडता ओर नित्यता सिद्ध होती है। सन् 1923 में फ्लैमेरियन को उक्त सोसाइटी के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अपने साठ वर्ष के गहन अनुसंधानों का ब्यौरा प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि मनुष्य में कोई अदृश्य शक्ति ऐसी हैं, जो मरने के बाद भी अपना अस्त्वि बनाए रखती है। सोसाइटी की पूरी रिपोर्ट को चार सौ पृष्ठों में प्रकाशित किया गया। इसके बाद तो वैज्ञानिकों के लिए मरणोत्तर जीवन पर अनुसंधानों का रास्ता खुल गया। अनेक भौतिकविज्ञानियों ने भी अपनी अभिरुचि को इस ओर केंद्रित किया। थैलियम तत्त्व के अन्वेषक विलियम क्रूक्स का नाम अध्यात्मविज्ञानियों की इस श्रृंखला में अग्रणी माना जाता है। उन्होंने श्रीमती क्रुक की चमत्कारी क्षमताओं का बड़ी गहनता के साथ अध्ययन किया है। वे स्वयं भी आत्मबल के धनी समझे जाते थे।
दिसंबर 1870 की ‘साइंटिस्ट डायरी’ में ‘क्रूक्स एण्ड दी स्पिरिट वर्ल्ड’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें विलियम क्रूक्स की अतींद्रिय क्षमताओं पर प्रकाश डाला गया है। क्रूक्स ने ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा, “हे ईश्वर! मुझे अपने भाई की दिवंगत आत्मा के साथ बातचीत करने का सुअवसर प्रदान करें, जिसकी मृत्यु तीन वर्ष पूर्व जलयान में डूबकर हो गई थी।”
ईश्वर की सृष्टि में चेतना का प्रमुख आकर्षण प्रेम और स्नेह−सद्भाव है। उसे भरपूर स्नेह−सद्भाव, प्यार मिलता रहे, तो वह एक शरीर छोड़ने और कुछ समय विश्राम करने के बाद पुनः उसी रूप में नए परिधान में आ जाती है। घर−परिवार में सुसंस्कारिता का वातावरण विनिर्मित किया जा सके, तो जीवंत एवं जाग्रत् जीवात्मा को तो सुख मिलेगा ही, साथ ही शरीर छूटने पर भी वह उसी परिवेश में जन्म लेना या आना अधिक पसंद करेगी।
महापुरुषों के उच्चतम अनुभवपूर्ण भावों में अपने हृदय को मिला देना एवं उस भाव से स्वयं भावित हो जाना ही असली संग है। यदि ऐसे महापुरुषों का स्थूल सान्निध्य न मिल सके, तो उनके द्वारा रचित सत्साहित्यों का मनोयोगपूर्वक स्वाध्याय भी बहुत लाभदायक होता है। भगवत् प्राप्त महापुरुषों के अनुभवयुक्त वचनों में बड़ा प्रभाव होता है और आत्मा को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है ।
जीवन शाश्वत केंद्र एवं अनादि चैतन्य तत्त्व ‘आत्मा’ ही मनुष्य के सुखों का मूल स्रोत है। जो सुख−शाँति एवं स्थिरता से भरा−पूरा जीवन जीने के अभिलाषी हों, उन्हें अपनी आत्मा को जानने का प्रयास करना चाहिए। आत्मा में ही संपूर्ण विश्व व्यवस्थित है। तेजबिंदूपनिषद् में आत्मा की महत्ता प्रतिपादन करते हुए कहा गया है−
आत्मनोऽन्या गतिर्नास्ति सर्वमात्ममय जगत्। आत्मनोऽन्यन्न हि क्वापि आत्मनोऽन्यत्तृणं नहि॥
अर्थात् आत्मा से भिन्न गति नहीं है। सब जगत् आत्ममय है। आत्मा से विलग कुछ भी नहीं है, आत्मा से भिन्न एक तिनका भी नहीं हैं।
आत्मा में शौर्य, प्रेम एवं पौरुष की अनंत शक्ति समाहित है। आत्मशक्ति से संपन्न व्यक्ति के सारे अभाव, दुःख−दारिद्र्य, साँसारिक आधि−व्याधि समाप्त हो जाती है। आज शरीर के संपूर्ण अंग−प्रत्यंगों की स्थूल जानकारी, पदार्थ और उसके गुण−भेद की जानकारी, ग्रह−नक्षत्रों से संबंधित गणित और वैज्ञानिक तथ्य जानने के मनुष्य की भौतिक सुविधाएँ भले ही बढ़ गई हों, पर अपने आपको जानने का प्रयास नहीं करने के कारण मनुष्य का दुःख बढ़ा ही है। हमारे पूर्वज ज्ञान−विज्ञान में आज के वैज्ञानिकों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रवीण थे, किंतु वे इस सत्य से अवगत थे कि विज्ञान अंततोगत्वा मनुष्य की वृत्तियों को भोगवादी ही बनाता है। अतः उन्होंने धर्म और अध्यात्म पर आधारित जीवन की रचना की थी। इस जीवन में प्राण था, शक्ति थी, समुन्नति थी और वह सब कुछ था, जिससे मनुष्य का जीवन सुखी और संतुष्ट कहा जा सके।
सूक्ष्मतापूर्वक विश्लेषण करने पर पता चलता है कि मनुष्य न शरीर है, न मन और न बुद्धि, क्योंकि यह सभी पंचभूतों के सत्−रज अंश से निर्मित है और इसी कारण नश्वर है। आत्मा अनश्वर है। वह स्वयं शक्ति का उत्पादक, अजर−अमर सर्वव्यापी तत्त्व है। आत्मा सद्यः अनुभूमि है। आत्मा में ज्ञान का सहज प्रकाश है, जो सत्य को झूठ से अलग करके प्रकाशित करता है। उपनिषद् में कहा गया है,
नहि द्रुष्टुदृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते। य एव हि निराकर्त्ता तदेव तस्य स्वरुपम्।
अर्थात् “जिस प्रकार द्रष्टा से दृष्टि का बोध स्वतः हो जाता है, उसी प्रकार निराकरणकर्त्ता के रूप में आत्मा स्वयं सिद्ध है।” यदि मैं कह रहा हूँ कि मैं नहीं हूँ। सूर्य के प्रकाश की तरह आत्मा स्वयं प्रकाशित एवं स्वतः ज्ञात है। जैसे बादलों के आवरण से सूर्य की सत्ता बाधित नहीं, वैसे ही शरीर आदि आवरणों से आत्मा खंडित नहीं होती। उपनिषद् आगे कहता है−
जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्यनात्मनः। फलानासिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिन॥
आत्मा नित्योऽव्ययः शुद्धः एकः क्षेत्रज्ञ आश्रयः। अविक्रियः स्वदृग् हेतुर्व्यापकोऽसंगयनावृतः॥
“जन्म, अस्तित्व की प्रतीति, वृद्धि, परिमाण, क्षय और विनाश ये छह विकार देह के हैं, देह में दिखते हैं। ये आत्मा में नहीं हैं। आत्मा से हमारे मूल स्वरूप से इनका कोई संबंध नहीं है। जैसे काल भगवान् की प्रेरणा से वृक्षों में प्रतिवर्ष फूल लगते हैं, फलों के अस्तित्व का अनुभव होता है, वे बढ़ते हैं, पकते हैं, क्षीण होते हैं और नष्ट हो जाते हैं, वे वृक्ष ज्यों−का−त्यों सदा बना रहता है, वैसे ही जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत छहों विकार देह के ही होते हैं। आत्मा के नहीं। आत्मा तो सदा एकरस बना रहता है।”
मनुष्य जीवन के साथ जन्म−मरण, सुख−दुःख और भोग−रोग आदि की जो विलक्षणताएँ अविच्छिन्न रूप से विद्यमान हैं, वे मनुष्य को सोचने के लिए विवश कर देती हैं कि इंद्रियों के भोग, भोगकर जीवन के दिन पूरे कर लेना मात्र मनुष्य जीवन का उद्देश्य नहीं है। यह अमूल्य मानवजीवन पाकर भी यदि आत्मकल्याण न किया जा सके, तो न जाने कब तक फिर अनेकों कष्टसाध्य योनियों में भटकना पड़ेगा। जिसके अंदर आत्मज्ञान प्राप्त करने की इच्छा जाग्रत् हो जाए, उसे अपने आपको परमात्मा का कृपापात्र ही समझना चाहिए।
सबसे पहले, हमें इस सत्य को आँतरिक गहराई तक हृदयंगम करना होगा कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं। परमात्मा के सनातन अंश है। उनसे मिलने का हमारा नित्य सिद्ध आधार है। इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति में आत्मा का सुधा बीज विद्यमान है। अपने मूल स्वरूप को पहचानना, अपने अंदर के सुधा बीचों को अंकुरित होने देने से रोकना ही हमारे दुःखों का कारण है। जब मनुष्य अपने को आत्मा के रूप में नहीं स्वीकारता, अपने जीवन को आत्मसंस्पर्श से वंचित रखता है तभी तक वह दुःखी रहता है।
दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमें अपनी चेतना को बहिर्गमन अर्थात् साँसारिकता की ओर से हटाकर अंतर्मन की ओर मोड़ना होगा। आज मनुष्य का जीवन सिर्फ शरीर एवं संसार तक ही सीमित होकर रह गया है। आत्मिक जीवन की ओर से वह पूरी तरह उदासीन हो गया है। अर्थ व अधिकार ये दो ही मानवजीवन के लक्ष्य रह गए है। इन दोनों की प्राप्ति के लिए व्यक्ति उचित−अनुचित, न्याय−अन्याय का कुछ भी ध्यान न रख प्रमत्त की भाँति जुटा रहता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि मनुष्य कर्म करना बंद कर दे। इसका मतलब यह है कि वह उनकी दिशा बदल दे। उसका हर कार्य आत्मिक उन्नति की भावना लिए हुए हो। भगवान् को समर्पित हो। जब हर कार्य भगवान् को समर्पित किया जाएगा, तो स्वतः ही अनुचित कार्य नहीं बन पड़ेंगे।
तीसरी आवश्यकता है, शुद्ध−सात्विक आहार−विहार की। सात्विक वृत्तियों वाला व्यक्ति ही आत्मोद्धार करने में सफल हो सकता है। आहार−विहार, शयन−जागरण एवं चेष्टा के संबंध में गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, “यह योग न तो बहुत खाने वाले का सिद्ध होता है और न ही बिल्कुल न खाने वाले का ही सिद्ध होता है। यह दुःखों का नाश करने वाला तो यथायोग्य आहार करने वाले का और कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का ही सिद्ध होता है।” शिष्ट, ऋत, सत्य, प्रिय एवं हितकारी वाक्−प्रयोग तथा समय−समय पर एकाँत सेवन भी करते रहना चाहिए।
आत्मिक प्रगति की चाह रखने वाले व्यक्तियों को महात्माओं संग भी करना चाहिए। ऐसे महापुरुषों के उच्चतम अनुभवपूर्ण भावों में अपने हृदय को मिला देना एवं उस भाव से स्वयं भावित हो जाना ही असली संग है यदि ऐसे महापुरुषों का स्थूल सान्निध्य न मिल सके, तो उनके द्वारा रचित सत्साहित्यों का मनोयोगपूर्वक स्वाध्याय भी बहुत लाभदायक होता हैं। भगवत् प्राप्त महापुरुषों के अनुभवयुक्त वचनों में बड़ा प्रभाव होता है और आत्मा को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है।
आत्मिक उन्नति के मार्ग में प्रमाद एक महाशत्रु है। यह हमारे अंदर शुभ की ओर उठने वाली चेतना का शत्रु है। जो चेतना के दिव्य आयामों को स्पर्श करने से रोके, जो आत्मिक उच्चताओं में आस्था न बनने दे, वह हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। उससे संग्राम कर उसे पराजित करना हमारा परम धर्म हो जाता है। विवेक चूड़ामणि में कहा है−
इतः को न्वस्ति मूढात्मा यस्तु स्वार्थें प्रमाद्यति। दुर्लभं मानुषं देहं प्राप्य तत्रापि पौरुषम्॥
जीवन परमात्मा का दिया एक अमूल्य वरदान है। चाहे इससे विभूतियां अर्जित कर लो चाहे दुर्गति।
अर्थात् दुर्लभ मनुष्य देह और उसमें भी पुरुषत्व को पाकर जो आत्मसाक्षात्कार में प्रमाद करता है, उससे अधिक मूढ़ और कौन होगा।
हमने अपने जीवन को आत्मिक दिव्यता में ढालने का संकल्प ले लिया है, तो हमें संकीर्णता भी त्यागनी होगी। अपने अहं पर आघात करने होंगे। सबमें परमात्मा का ही एक अंश आत्मा की ज्योति प्रज्वलित है, इस सत्य को पहचानना होगा। हम अपनी सत्ता को अहंपोषित इंद्रियों के छोटे और टूटे−फूटे सुख देने के बजाय शाश्वत सुख का आनंद दें। सर्वत्र एक ही आत्मा का दर्शन करने वाला मनुष्य न तो मोहग्रस्त होता है और न ही शोकाकुल। तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वं अनुपश्यतः। जैसे−जैसे आत्मभाव में दृढ़ता आती है, आनंद बढ़ने लगता है।
अगर हम वास्तव में सुख−शाँति से भरा−पूरा जीवन जीना चाहते हैं, तो हमें अपनी आत्मिक उत्कृष्टताओं को उभारना होगा और अपनी सारी बुराइयों से संघर्ष करना होगा। आत्मज्ञान की संपदा प्राप्त किए बिना सुख−शाँति की चाह एक कल्पना मात्र है।
(गताँक से आगे)
मित्रो! बेटा कैसा होना चाहिए? राहुल की तरह से होना चाहिए। बेटा ऐसा नहीं होना चाहिए कि बाप मरेगा तो उसकी जायदाद हमको मिलनी चाहिए और जो खेत है, वह हमको मिलना चाहिए। बाप का पैसा हमको मिलना चाहिए। बाप जिंदा है, तो हिस्सा मिलना चाहिए। नहीं, ऐसे बेटे नहीं हो सकते। नहीं, महाराज जी! बेटे ऐसे ही होते हैं। बाप के पास इक्कीस बीघे जमीन है। बाप को मरने में अभी देर है। बेटा कहता है कि हमारा हिस्सा अभी दे दो। हम मरेंगे तब देंगे। नहीं, मरने का इंतजार हम नहीं करेंगे, अभी दे दो। यह कौन है? क्या बेटे ऐसे ही होते हैं? नहीं ऐसे नहीं होते बेटे। श्रवणकुमार के तरीके से बेटे होते हैं और राहुल के तरीके से बेटे होते हैं और बेटियाँ कैसी होती हैं? बेटियाँ संघमित्रा के तरीके से होती हैं। संघमित्रा सम्राट्, अशोक की बेटी थी। उसने कहा, पिता जी आपने संन्यास ले लिया? हाँ। तो फिर हमारे लिए हुक्म दीजिए कि हमको क्या करना चाहिए।
मित्रो! संघमित्रा जो थी, उसने कहा पिता जी क्या करना पड़ेगा? बेटी, हमारे रास्ते पर चलना पड़ेगा। सम्राट् अशोक की बेटी संघमित्रा निकल पड़ी ओर उसने जितने बुद्ध ने विहार बनाए थे, उससे ज्यादा विहार बनाकर दिखा दिए। महिलाओं के क्रिया−कलाप, महिलाओं के संगठन, महिलाओं के विहार संघमित्रा ने ढेर सारे बना दिए। यह सब हमारी किताब में वर्णन किया गया है; उसका मैं हवाला दे रहा था। कितने ज्यादा बुद्ध के विहार थे और कितने महिलाओं के लिए? यह कैसे हो गया? बेटे, इस तरीके की परंपराओं से हो गया। कहाँ−से−कहाँ तक हुआ? बेटे, जहाँ कहीं भी अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने की जरूरत पड़ी होगी अथवा धर्म की स्थापना करने की जरूरत पड़ी होगी और जब ठोस कदम उठाने की जरूरत पड़ी होगी, तब कैसे कि आज है। पोला कदम जब तक उठाना है, तब तक तो मीटिंग करेंगे, वार्षिकोत्सव करेंगे, रामायण सम्मेलन करेंगे। ठीक है बेटे, ये पोला कदम हो सकता है, पर यह ठोस कदम नहीं हो सकता। ठोस कदम यह हो सकता है कि हमें लोगों के, जनसाधारण के सामने त्याग और बलिदान की परंपराएँ प्रस्तुत करनी चाहिए, ताकि लोगों का मुँह यह कहने के लिए बंद हो जाए कि ये कहने−सुनने की बातें हैं। ये दूसरों को उपदेश देने की बातें हैं। ये बातें काम नहीं आ सकतीं और कोई आदमी इन्हें जीवन में करके नहीं दिखा सकता। दूसरों को कह सकता है कि आपको त्यागी होना चाहिए, ब्रह्मचारी रहना चाहिए, परोपकारी होना चाहिए। आप और हम कह सकते हैं, लेकिन जब स्वयं करने का मौका आएगा तक हम नहीं कर सकते। यही कारण है कि वक्ताओं का, उपदेशकों का कहीं कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिखाई देता।
मित्रों! चिंता करने की कोई बात नहीं है। आप अपने से ही शुरुआत कीजिए, नमूना बनिए, साँचा बनिए। हमारी परंपरा स्वयं से शुरुआत करने की रही है। जहाँ कहीं भी हम देखते हैं, अपने से ही शुरुआत देखते हैं। विश्वामित्र और हरिश्चंद्र दोनों आपस में घनिष्ठ थे। इतने घनिष्ठ थे कि गुरु−शिष्य का प्रेम जो राजा विश्वामित्र में था और किसी में नहीं देखा गया। विश्वामित्र एक बड़ा काम करने वाले थे, नई दुनिया बनाने वाले थे। जब हम पढ़ते हैं, तो उसमें नई सृष्टि लिखा हुआ है। वे नई सृष्टि बना रहे थे। मैं समझता हूँ नई सृष्टि तो क्या बना रहे होंगे, लेकिन नया जमाना ला रहे होंगे। विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से कहा, तू हमारा मित्र है, दोस्त है? उनने कहा, हाँ। तो फिर हमारे साथ−साथ चल, हमारे काम आ। राजा हरिश्चंद्र ने कहा, हम आपके साथ−साथ चलेंगे और आपके काम आएँगे। तो फिर काम आ चल हमारे साथ।
मित्रो! विश्वामित्र को पैसे की जरूरत पड़ी होगी, तो उन्होंने हरिश्चंद्र का राज्य माँगा होगा, दूसरी चीजें माँगी होंगी और आखिरी में जहाँ मौका आ गया होगा, तो भौतिक साधनों के लिए राजा हरिश्चंद्र ने अपने आपको नीलाम कर दिया होगा। अपनी बीबी−बच्चे को नीलाम कर दिया होगा। यह क्या चीज है? त्याग और बलिदान है। इसको हम भूल नहीं सकते। क्यों विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र को ही दोस्त क्यों बनाया। इससे कम में काम नहीं चल सकता था? अभी भी हजारों गाँधियों को पैदा करने की ताकत हरिश्चंद्र में है। गाँधी जी ने बचपन में हरिश्चंद्र का ड्रामा देखा और ड्रामा देखकर उन्होंने कहा, मैं हरिश्चंद्र होकर जिऊँगा। वे वास्तव में हरिश्चंद्र होकर के लिए। हरिश्चंद्र ने एक हरिश्चंद्र जोने कितने पैदा कर गए। कैसे हो गए? बेटे और कोई तरीका नहीं है अपने आपको त्याग की बलिवेदी पर समर्पित करने के अलावा। अगर हमारे व्यक्तिगत जीवन में लोकहित के लिए, परमार्थ के लिए कहीं त्याग की परंपरा नहीं है, तो फिर कहने भर की बातें हैं, बरगलाने भर की बातें हैं और आपको छलने एवं जनता को बरगलाने की बातें हैं। नया युग लाने के लिए तो हमें फिर वहीं से आरंभ करना होगा, जहाँ हमारे ऊपर यह बात लागू होती है कि त्याग और बलिदान का प्रश्न आए, तो हम कहाँ होते हैं? बगलें झाँकते हैं या आगे बढ़−चढ़कर लग जाते हैं।
मित्रों! हमारी संस्कृति में त्याग−बलिदान की परंपराएँ आदि काल से रही हैं, चाहे बुद्ध हो या हरिश्चंद्र कोई भी रहा हो। त्याग−बलिदान की परंपराएँ गाँधी जी के आश्रम में भी थीं। गाँधी जी के आश्रम में जब ‘नमक−सत्याग्रह’ शुरू हुआ तो लोगों ने कहा कि आप चुपचाप बैठे रहिए और लोगों को हुक्म दीजिए। सब लोग जेल जा सकते हैं, नमक बना सकते हैं, आप शाँति से बैठे रहिए, बाकी लोग ये सब काम करेंगे। गाँधी जी ने कहा, ऐसा नहीं हो सकता। जो लोग साबरमती आश्रम में रहते हैं, उन आश्रमवासियों का सबसे पहले नंबर है, बाकी लोगों का पीछे नंबर है। उन्होंने सबसे पहले अपना नाम लिखाया। गाँधी जी के आश्रम में जो उन्नीस आदमी थे उनको लेकर और आश्रम में ताला डालकर गाँधी जी अपने साथियों को लेकर नमक बनाने के लिए रवाना हो गए और वहाँ से जेल चले गए। उनके जेल जाने के बाद जो आग फैली, तो गाँधी जी के बच्चे, जनसेवक सभी ने कहा कि हमें भी जेल जाना चाहिए। यह प्रभाव व्याख्यानों का था? नहीं, त्याग के लिए गाँधी जी का स्वयं को प्रस्तुत करने का था। बिना कोई व्याख्यान दिए, बिना कोई कथा कहे, बिना कोई प्रवचन दिए, बिना कोई सम्मेलन बुलाए कितने सारे आदमी जेल चले गए। गाँधी जी के उस साहस, को त्याग को देखकर लोगों ने समझ लिया कि इस आदमी की कथनी और करनी के बारे में दो राय नहीं है। इसकी कथनी और करनी एक है।
सिख धर्म भी इसी का साक्षी
मित्रों! यही परंपरा बनी रही है और बनी रहेगी। सारे का सारा इतिहास, पुराणों का इतिहास, धर्म−शास्त्रों का इतिहास, अमुक का इतिहास जब हम देखते हैं, तो दूसरा कोई तरीका दिखाई नहीं पड़ता। यवनों के विरुद्ध जब सिख धर्म बनाया गया और इस बात की जरूरत पड़ी कि लोगों को हिंदू धर्म की रक्षा के लिए सिपाहियों के तरीके से, सैनिकों के तरीके से तनकर खड़ा हो जाना चाहिए और अपनी जान को जोखिम में डालना चाहिए। यह बहादुरी अब गुरुगोविंद सिंह पैदा करने वाले थे, तब उन्होंने लोगों से पूछा कि इसका कौन−सा तरीका हो सकता है? लोगों में बहादुरी कैसे भरी जा सकती है? अगर यह उपदेश से हो जाए कि उससे सब लोग सूली पर चढ़ जाएँ, सब मारे जाएँ और हम सुरक्षित बैठे रहेंगे, ऐसा नहीं हो सकता। गुरुगोविंद सिंह ने कहाँ, “पहला नंबर हमारा है।” उन्होंने जान−बूझकर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कीं, ताकि लोगों में जोश और जीवन पैदा हो सके।
मित्रो! गुरुगोविंद सिंह के दो बच्चे दीवार में चिनवा दिए गए। दो बच्चे युद्ध में थे। एक बच्चा लड़ाई के मैदान में जब मारा गया दो दूसरा बच्चा, जो उसके साथ−साथ लड़ रहा था, भागकर आया और अपने पिता जी को खबर सुनाई कि हमारे भाईसाहब तो लड़ाई में मारे गए। गुरुगोविंद सिंह ने कहा, मारे गए, तो बेटा फिर तू कैसे आ गया? उस वक्त बच्चे से जवाब नहीं बन पड़ा। वह बेचारा समझ नहीं सका कि पिता जी का क्या इशारा है? पिताजी का यह इशारा था कि एक भाई लड़ाई के मैदान में मारा गया, तुझे भी मरना चाहिए। वह इशारा समझ गया, लेकिन उनके आगे जवाब क्या दे सकता था। उसने कहा, पिताजी! मुझे प्यास लगी थी। पानी पीने के लिए और आपको खबर सुनाने एवं सुस्ताने के लिए मैं आया था। ठीक है बेटा! जितनी देर सुस्ताना था सुस्ता लिया। हाँ और देख प्यासा है, तो बेटे बैरी के खून से अपनी प्यास बुझाना। चल यहाँ से और उसे भगा दिया।
मित्रो! वह चलता हुआ चला गया। मैं यह क्या कह रहा हूँ। ये अध्यात्म की बातें कह रहा हूँ, देव−परंपराओं की बातें कह रहा हूँ और ये बात कह रहा हूँ कि अगर दुनिया में कोई बड़े काम हुए हैं या बड़े काम हो सकते हैं, तो इससे कम में नहीं हो सकते और न इससे अधिक में हो सकते हैं।
तमाशों से उबरें, सच्चा अध्यात्म जानें
भाइयों! अपना ये कुटुँब हमने बहुत दिनों पहले बनाया था। उस समय हमारे पास बच्चे−ही−बच्चे थे। बच्चों के बारे में जो नीति अख्तियार करनी चाहिए, वो ही नीति हमारी थी। बच्चों के लिए, उन्हें देने के लिए क्या हो सकता है? पिताजी गुब्बारा देना, टॉफी देना, लेमनचूस देना। पिताजी चाबी की रेलगाड़ी लाना। हम बरफ की कुल्फी खाएँगे, आदि सारी−की−सारी माँगें, फरमाइशें− डिमाँड बच्चे करते रहते हैं। ये कौन हैं? बच्चे। अध्यात्म क्षेत्र में फरमाइश करने वाले ये कौन है? बिलकुल बच्चे हैं, बालक है। इनको इसी बात की फिक्र पड़ी रहती है कि हमको दीजिए, हमको दीजिए। इसलिए ये बालक हैं। बेटे, आज से तीस साल पहले हमने बिलकुल बालकों का समूह जमा किया था और लोगों से कहा था कि हमारे पास जो कुछ है, आप ले जाइए। तब लोगों ने कहा था, पिता जी! आपके पास क्या है? गुब्बारे हैं। तो हमको दे दीजिए। बस एक गुब्बारा पेटी से निकाला, फूँक मारकर हवा भर दी और कहा ये रहा तुम्हारा गुब्बारा। एक ने कहा, पिताजी! आपको सबको बेटा देते हैं? हाँ बेटे, हमारी पेटी में बहुत−सी चीजें हैं। ये देख टॉफी है, ये लेमनचूस है। ये नौकरी में तरक्की है। ये दमे की बीमारी का इलाज है।
ये क्या है? ये बेटे सब तमाशे हैं, खेल−खिलौने हैं। ये सब बहुत दिनों पहले थे। अब हमारी दुकान बड़ी हो गई है और अब मैं आपसे दूसरे तरीके से उम्मीद करता हूँ। अब आप गुब्बारे माँगते हैं, तो मैं नाराज होता हूँ और आप से कहता हूँ कि अब आप तीस साल के हो गए है। आपको शर्म नहीं करना चाहिए? बेटे अब हम बुड्ढे हो गए हैं और हमको कम दिखाई पड़ता है। डॉक्टर ने कहा है कि आँखों को टेस्ट कराना और चश्मा खरीद देना। डॉक्टर ने बताया था कि अट्ठाईस रुपये का चश्मा आएगा। बेटे, निकाल अट्ठाईस रुपये का चश्मा। बेटे, निकाल अट्ठाईस और हमारी आँखों का टेस्ट कराकर ला। चश्मा खरीदकर ला। अरे! पिताजी, आपने तो ‘टर्न’ ही बदल दिया। हाँ बेटे, बदल दिया। पहले हम गुब्बारे दिया करते थे, अब हम चश्मे के लिए पैसे माँगते हैं। ये क्या बात हो गई? ये तो बिलकुल उलटा हो गया। हाँ बेटे हमारा ही क्या उलटा हो गया, तेरा भी उलटा हो गया। जब तू गोदी में था तब नंगा फिरता था और अब तो तू कच्छा भी पहनता है, पैंट भी पहनता है। तूने बदल दिया कि नहीं? हाँ महाराज जी! मैंने तो बदल दिया। बेटे तू बदल गया, तो हम भी बदल गए।
मित्रो! अब हमारा कुटुँब जवान हो गया है। हम जवान आदमियों से अपेक्षा करते हैं देने की। अब हम माँगने की अपेक्षा करते हैं और हमारा हक है कि हम आपसे माँगें। अब आप से माँगा गया है और माँगना चाहिए। बेटे, जहाँ कहीं भी वास्तविकता का उदय हुआ है, जहाँ कहीं भी विवेकशीलता आई है, वहीं परंपरा पलट जाती है। अब हम आपसे लेने की परंपरा आरंभ करते हैं, क्योंकि आप अब जवान हो गए हैं। खासतौर से इस जमाने में, जिसमें हम और आप जिंदा है। यह जीवनभर का सवाल है। आज मनुष्य जाति जहाँ चली जा रही है, आदमी का चिंतन जिस गहराई के गड्ढे में धँसता हुआ चला जा रहा है, ये ठीक वही परंपराएँ हैं, जो कि रावण के जमाने में आई थीं। इसमें वह मनुष्यों को मारक हड्डियों के ढेर लगा देता था। आज हड्डियों के ढेर तो नहीं लगाए जाते, पर हम हड्डियों के ढेर को चलते−फिरते आदमियों का रूप में देख सकते हैं। हड्डियाँ जो जिंदा तो हैं, पर जिनको चूस लिया गया है। मैं समझता हूँ कि प्राचीनकाल में ज्यादा भले आदमी थे और शरीफ आदमी थे। कौन से आदमी? वे जो मारकर डाल देते थे, उनको मैं ज्यादा पसंद करता हूँ, क्योंकि तब आदमी को मारकर खत्म कर देते थे, लेकिन आज का तरीका बहुत गंदा है। आज तो आप रुला−रुलाकर मारते हैं, कोंच–कोंचकर मारते हैं, तरसा−तरसाकर मारते हैं। ये गंदा तरीका है। रावण के जमाने में तब भी अच्छा तरीका था, सीधे खत्म कर देने का।
आज की विडंबना
मित्रो! आज हम क्या करते हैं? आज हम अपनी स्वार्थपरता के कारण हर एक को चूसते हैं। किसको चूसते हैं? जो कोई भी हमारे पास आता है, हम उसको चूस जाते हैं, उसे जिंदा नहीं छोड़ना चाहते, केवल उसकी हड्डियाँ रह जाती हैं। उदाहरण के लिए जैसे हमारी बीबी। हमने अपनी बीबी को चूस लिया है। अब वह सिर्फ हड्डी का ढाँचा मात्र है। कैसे हुआ? बेटे, जब वह अपने आप के घर से यहाँ आई थी, तो वह उम्मीद लेकर आई थी कि हमारा स्वास्थ्य अच्छा बनाया जाएगा। हमको पढ़ाया जाएगा, शिक्षित किया जाएगा और यह उम्मीद लेकर आई थी कि बाप हमको जितना स्नेह देता है, जितनी हमें सुविधा देगा। लेकिन हमने उसको चूस लिया। हर साल बच्चे पैदा किए। कामवासना−पूर्ति की वजह से हमने उसके पेट में से पाँच बच्चे निकाल दिए। पाँच बेटियाँ हो गई, अभी एक बेटा और होना चाहिए। अब वह बेचारी लाश रह गई है। बार−बार हमारे पास आती रहती है और कहती रहती है कि हमारे पेट में दरद होता है, कमर में दरद होता है और हमारे सिर में दरद होता है। मैं कहता हूँ कि बेटी तू जिंदा है, भगवान् को बहुत धन्यवाद दे कि ये पिशाच तुझे अभी तक जिंदा छोड़े हुए है। इसका बस चले तो तुझे खाकर तेरी जिंदगी खत्म कर दे, चाँडाल कहीं का। इसे तो अभी और बच्चे चाहिए।
मित्रों! उस बेचारी के पास न माँस है, न रक्त है शरीर में और न उसके पास जान है। उसके पास कुछ भी नहीं है। न जाने किस तरीके से साँस ले रही है और कैसे दिन बिता रही है। नहीं साहब! मेरा तो वंश चलना चाहिए। इस राक्षस का, दुष्ट का वंश चलना चाहिए? ये क्या है? ये बेटे, कसाईपन है। आज हर आदमी कसाई होता हुआ चला जा रहा है। आज हम देखते हैं कि न हमको अपनी बीबी के प्रति दया है, न अपने माँ−बाप के प्रति दया है, न अपने बच्चों के प्रति दया है। रोज बच्चे पैदा कर लेते हैं। इस बात की लिहाज−शर्म नहीं हैं कि आखिर इनको पढ़ाएगा कौन? शिक्षा के लिए पैसा कहाँ से आएगा? इनको खेलने के लिए रेल कहाँ से आएगी? हमको तो बस काम−वासना से प्यार है। हम तो चौरासी बच्चे पैदा करेंगे। आज आदमी चाँडाल होता हुआ चला जा रहा है।
मित्रो! आज हमें किसी के ऊपर दया नहीं है। हमारे पास कहीं भी धर्म नहीं है। हमारे पास कहीं भी ईसान नहीं है। आज आदमी इतना खुदगर्ज होता हुआ चला जा रहा है कि मुझको ये मालूम पड़ता है कि हमारी खुदगर्जी का पेट इतना बढ़ता हुआ चला जा रहा है कि इंसानों से हमारा गुजारा नहीं हो सकता। अब जो कोई भी सामने आएगा, हम उसको अपनी खुदगर्जी का शिकार बनाएँगे। किसको बनाएँगे? देवी−देवताओं में से जो भी हमारे चक्कर में फँसेगा, हम उसको खत्म करके रहेंगे। देवताओं के ईसान को खत्म करके उन्हें बेईमान बनाकर रहेंगे। संतोषी माता हमारे चक्कर में आ जाएँगी, तो उनको बदनाम करके रहेंगे। हम उन्हें दो बकरे, खिलाएँगे और ये कहेंगे कि हमको डकैती में फायदा करा हो। हम उसको बदनाम कराकर रहेंगे। हर एक को हम बदनाम कराएँगे। जो कोई भी हमारा गुरु होगा, हम उसको बदनाम कराकर रहेंगे। हम कहेंगे कि हमारा गुरु ऐसा है, जिसको न इंसाफ की जरूरत है, न उचित−अनुचित की जरूरत है। जो कोई भी हाथ जोड़ता है, जो कोई भी सवा रुपये देता है, उसी की मनोकामना पूरी कर देता है।
दुर्मतिजन्य दुर्गति से हुआ आदमी का अवमूल्यन
बेटे, हम कहाँ जा रहे हैं और न जाने क्या हो रहा है? हम जिस जमाने में रह रहे हैं, उसमें आदमी न जाने क्या होने जा रहा है? अगर आदमी इसी तरीके से बना रहा, तो उसका परिणाम क्या होगा? अभी जितनी ज्यादा मुसीबतें आई हैं, आगे उसे भी ज्यादा आएँगे। इससे तो अच्छा होता अगर युद्ध हो जाता और दुनिया खत्म हो जाती, लेकिन हमारी स्वार्थपरता जिंदा रही और आज हम पर हावी होती चली जा रही है। आदमी, जैसा निष्ठुर, जैसा नीच, जैसा स्वार्थी होता हुआ चला जा रहा है, अगर यही क्रम जारी रहा तो मैं आपसे कहे देता हूँ कि आदमी−आदमी को मार करके खाएगा। पकाकर खाएगा कि नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन आदमी−आदमी ने डरने लगेगा। अभी तक हमको भूत का डर लगता था, साँप का डर लगता था, चोरों का डर लगता था, लेकिन अब हमको मनुष्यों का डर लगेगा। इतना तो अभी ही हो गया है कि आदमी की कीमत उसके बिस्तर से कम हो गई है। आज आप बिस्तर लेकर धर्मशाला में आते हैं, तो धर्मशाला वाला कहता है, आइए साहब! कमरा खाली है, लेकिन अगर आपके पास बिस्तर नहीं है, अटैची नहीं है और आप एक थैला लेकर जाते हैं और कहते हैं कि साहब! धर्मशाला में ठहरने की जगह है कि नहीं? धर्मशाला वाला कहता है कि आपके साथ और कौन−कौन हैं। आपका सामान कहाँ है?
अरे भाई! गरमी के दिन हैं, सामान की क्या जरूरत है? अरे साहब! आजकल बड़ी भीड़ है। सारी जगह भरी हुई है। कहीं जगह नहीं है। आप ऐसा कीजिए, चौथे नंबर की धर्मशाला है, वहाँ चले जाइए। वहाँ जाते हैं, तो वह कहता है कि अरे साहब! आप अब आए हैं? आपसे पहले पच्चीस आदमियों को मना कर दिया है कि यहाँ जगह नहीं है। ऐसा क्यों होता है? क्यों मना करते हैं? यह आदमी का मूल्य, आदमी की प्रामाणिकता, आदमी की इज्जत को बताता है कि आदमी की कीमत से धर्मशाला के बिस्तर की कीमत ज्यादा है। आज आदमी का मूल्य इतना गिर गया है। कल आदमी और भी भयंकर होने वाला है।
मित्रो! आदमी जब कल और भयंकर हो जाएगा, तब वह भूत बन जाएगा, पिशाच बन जाएगा। तब आदमी को देखकर आदमी भागेगा और कहेगा, “आदमी आ गया’ चलो भागो यहाँ से। वह देखो आदमी खड़ा है।” कल यही परिस्थितियाँ पैदा होने वाली हैं। यह हमारे मन का घिनौनापन है। अभी हमारे ऊपर स्वार्थ छाया हुआ है। हम समाज के किसी काम में भाग लेना नहीं चाहते। हम समाज के लिए कोई सेवा करना चाहते हैं, तो पहले यह देखते हैं कि सेवा के बहाने हमारा उल्लू सीधा होगा कि नहीं होगा। हमारा उल्लू सीधा होता है, तो बेटे हम संस्था में जाते हैं, कमेटी में जाते हैं, प्रेसीडेंट बनते हैं, मीटिंग में जाते हैं, अगर उल्लू सीधा नहीं होता है, तो कहते हैं कि समाज के जीवन से हमारा कोई लगाव नहीं है, कोई संबंध नहीं है।
मित्रो! लोकहित के लिए हमारे मन खाली होते चल गए। उदारता हमारे मन में से निकलती चली जा रही है और निष्ठुरता हमारे मन में से निकलती चली जा रही है और निष्ठुरता हमारे रोम−रोम में घुसती चली जा रही है। परिणाम क्या होगा? आप देख लेना, इसका परिणाम बहुत भयंकर होगा। कलियुग के बारे में पुस्तकों में जो बताया गया है, उसको मैं सही मानता हूँ। आदमी का चिंतन जैसा और जितना घटिया होगा, मुसीबतें उसी हिसाब से आएँगी। आज भगवान की दी हुई मुसीबतें हमारे पास आती हुई चली जा रही हैं। बीमारियों हमारे पास बराबर बढ़ रही हैं। डॉक्टर बढ़ रहे हैं, अस्पताल बढ़ रहे हैं, लेकिन बीमारियों का दौर अभी और बढ़ेगा। डॉक्टर कितने बढ़ गए हैं, भगवान् करे डॉक्टर दोगुने−चौगुने हो जाएँ। लेकिन बीमारियों का क्या हो जाएगा? बीमारियाँ अच्छी नहीं हो सकतीं। बीमारियाँ सौ गुनी ज्यादा होंगी, हजार गुना ज्यादा होंगी। वे तब तक अच्छी नहीं हो सकतीं, जब तक आदमी आध्यात्मिकता के रास्ते पर लौटकर नहीं आएगा, तब तक आदमी का पिंड बीमारियों से नहीं छेटेगा और घर का नरक? बेटे घर का नरक भी दूर नहीं हो सकता।
(शेष अगले अंक में)
( के चतुर्थ अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग की युगानुकूल व्याख्या)
विगत अंक में चतुर्थ अध्याय के प्रारंभिक छह श्लोकों की व्याख्या द्वारा इस विषय में प्रवेश किया गया था। समन्वित योग सही अर्थों में क्या होता है, इसे श्रीमद्भगवद गीता पढ़े बिना जाना नहीं जा सकता। इस अध्याय में विशेष रूप से चार प्रकरणों की चर्चा है, जिनके बारे में पिछले अंक में लिखा गया था। पहला अवतार के प्रकटी करण का, दूसरा कर्म−अकर्म और विकर्म की व्याख्या का, तीसरा यज्ञ का ज्ञान−विज्ञान और चौथा ज्ञान की प्राप्ति द्वारा कर्म में कैसे तत्पर हुआ जाए। इस अध्याय के प्रारंभिक तीन श्लोकों में भगवान् द्वारा स्वीकारोक्ति है कि यह योग उनने−वासुदेव श्रीकृष्ण ने ही परमात्मा के शक्ति समुच्चय के रूप में सर्वप्रथम सूर्य से कहा था। यह योगरूपी ज्ञान अति रहस्यमय है एवं चूँकि यह कालाँतर में लुप्त होता चला गया, इसलिए वे द्वापर में इसे अर्जुन को एवं उसके माध्यम से उस व उस युग के बाद आने वाले सभी युगों के अभीप्सा रखने वाले जिज्ञासुओं के लिए कह रहे हैं। अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में वे एक बड़ी रहस्यभरी बात कहते हैं। “तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, उन्हें तू नहीं जानता, किंतु मैं जानता हूँ।” अवतारवाद की व्याख्या पुनर्जन्म की पुष्टि देने वाले इस कथन से आरंभ होती है। तनिक अहं वेद सर्वाणि के द्वारा वे कहते हैं, मुझे नियंता होने के नाते यह मालूम है कि कौन−सी आत्मा क्या है, कौन सुपात्र है एवं कौन विगत जन्मों के कितने संस्कार लेकर आई है। हमने बताया था कि परमपूज्य गुरुदेव ने भी इसी तरह जाग्रतात्माओं के एक संगठन के रूप में गायत्री परिवार विनिर्मित किया है, बार−बार हमें भी इसी तरह से स्मरण दिलाते रहे, परंतु परमात्मसत्ता−अवतारी चेतना के प्रतिनिधि अपना लीलासंदोह एक सामान्य पुरुष के रूप में ही दिखाते हैं। इसी बात को छठे श्लोक में भगवान ने कहा है, “मैं नियामक ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर योगमाया से प्रकट होता हूँ।” भगवान अपनी इस माया के स्वामी हैं, हम उस माया के अधीन जीते हैं। यही नर और नारायण में अंतर है। अब इसके बाद की व्याख्या इस लेख में पढ़ें।
अवतार प्रकट कैसे होता है
जब हम सभी प्राणियों का ईश्वर अजन्मा ओर अपरिवर्तनशील है, तब फिर जब वह अवतार लेता है, तो स्वयं को प्रकट कैसे करता है, यह प्रश्न सामने आ खड़ा होता है। इसी का उत्तर भगवान छठे श्लोक में “संभवामि आत्ममायया” कथन द्वारा देते हैं कि मैं अपनी अंतर्निहित माया द्वारा अपने आपको प्रकट करता हूँ। हमारा अपना जन्म अपनी वासनाओं के कारण होता है। प्रकृति में अधिष्ठित होकर अपनी माया से जन्म लेने वाला कौन हुआ परब्रह्म−परमात्मा−परमेश्वर अपनी वासना के वशीभूत जन्म लेने वाला एक सामान्य नर। इसी व्याख्या को आद्य श्री शंकराचार्य सही मानते हैं। विशिष्ट द्वैतवादी रामानुजाचार्य, द्वैतवादी माधवाचार्य तथा भक्ति मार्गी श्री बल्लभाचार्य के मत यहाँ अलग−अलग हैं। अर्थ तीनों ने वहीं किए हैं, जो अंत में निष्कर्ष निकला है कि अपने संकल्प से अवतार जन्म लेते हैं। परंतु माया के स्वामी ‘समष्टि कारण शरीरों’ के स्वामी को भी अवतार लेना पड़ता है, धरती पर आना पड़ता है, यह सुनिश्चित है।
वस्तुतः भगवान् के पार्षद, विभूतियाँ, सिद्धपुरुष, स्वयं भगवान् अवतार लेते हैं। चेतना के अति उच्च शिखर से नीचे आकर मानव रूप में आते हैं। हर अवतार के पीछे महाकरुणा का भाव होता है। महा करुणा नहीं होती तो इतने ऊँचे शिखर पर बैठा आदमी नीच क्यों उतरता और हम सबके जीवन में वैसा ही जीवन जीते हुए क्यों जाता, जो कि सामान्य मनुष्य सारा भोग भोगते हुए जीता है। लोकशिक्षण के लिए करुणा के अवतार के रूप में धरती पर स्वयं भगवान् आते हैं और उन्हें अपनी संतानों के बीच आना, उनका दुःख बाँटना बहुत अच्छा लगता है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे, “मैं तो माँ का चपरासी हूँ। माँ की जमींदारी देखने आया हूँ।” ईश्वर का अवतार माँ के चपरासी के रूप में, माँ की जमींदारी अर्थात् उनकी सारी संतानों की देखभाल करने के लिए होने की बात श्री रामकृष्ण ने कही है। हमें कभी−कभी ये बातें समझ में नहीं आतीं। हम उन्हें सामान्य पुरुष मान बैठते हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने भी बार−बार कहा है कि हम सभी पिछले जन्मों के साथी हैं। तुम हमारे गिद्ध−गिलहरी हो, तुम हमारे रीछ−वानर हो। ये सब बातें प्रज्ञापुरुष−युगद्रष्टा के अंग−अवयव के रूप में हम सभी को अपनी गरिमा का बोध कराती हैं और उस विशिष्ट लोक में ले जाती हैं, जहाँ हम स्वयं को सौभाग्यशाली ही नहीं मानें, अपने स्वरूप को जानें भी और तदनुसार अपने क्रिया–कलापों को ढालें।
श्री अरविंद ने स्वामी विवेकानंद के बारे में कहा है, “वे शिव के तृतीय नेत्र की कृपा के कटाक्ष थे।” तीसरा नेत्र एक बार कृपा की दृष्टि से थोड़ा−सा झुक जाए, उसे कहते हैं कृपा कटाक्ष। विवेकानंद के बारे में यह कहा जाता है कि सप्तर्षियों में से एक सत्ता उनके रूप में अवतरित हुई थी। चाहे जो शक्तियाँ आएँ, उनके पीछे होती है ईश्वर की महा करुणा, ईश्वर की अपने संतानों के बीच जाने की अदम्य इच्छा। परमपूज्य गुरुदेव ने स्थान−स्थान पर लिखा है, “मैं आना नहीं चाहता था, पर मुझे धकेला गया है। सृष्टि की संचालक सत्ताओं ने मुझे इस धरती पर विशेष काम करने के लिए भेजा है।”
जुलाई 1969 (पृष्ठ 65) की अखण्ड ज्योति के संपादकीय में पूज्यवर लिखते हैं, “युग की परिवर्तन अवश्यंभावी है। हमारा छोटा−सा जीवन इसी की घोषणा करने, पूर्व सूचना देने के लिए है। हमने अपना सारा जीवन महाकाल के इस महान् प्रयोजन में सम्मिलित होने के लिए, प्रबुद्ध आत्माओं को निमंत्रण देने में लगा दिया। जिस काम के लिए हम आए थे, पूरा होने को है। अगला काम स्वयं महाकाल करेंगे।” अवतार का प्रयोजन क्या है, रहस्य क्या है, इसे पूज्यवर ने जून 1967 (पृष्ठ 17) की अखण्ड ज्योति में इस तरह दिया है, “भगवान् की अनेक शक्तियाँ हैं। उनके प्रयोजन, विधान, स्वरूप एवं प्रकरण भी अनेक हैं। जड़−चेतन जगत् के विविध क्रिया–कलापों को चलाने एवं बनाने−बिगाड़ने के संदर्भ में अनेक तथ्य जब सामने आते हैं, तो उनको सुव्यवस्थित कैसे रखा जाए, इस समस्या को हल करने के लिए भगवान् अपनी शक्ति को अनेक भागों में विभक्त करके अंशावतार के रूप में अनेक आत्माओं को जन्म देता है। यही अवतारों का रहस्य है। समय−समय पर भगवान् की अनेकानेक शक्तियाँ अनेक प्रकार की आवश्यकताओं एवं अव्यवस्थाओं को हल करने के लिए अवतरित होती रहती हैं।”
अवतार एक जहाज, एक जादूगर
श्रीरामकृष्ण परमहंस कहा करते थे, “सामान्यजन जिनने बैरागी का चोला तो पहन लिया है, साधु−महात्मा भी कहलाते हैं, सड़ी लकड़ी की तरह हैं, जो किसी भी नाली में फँस जाती है। सड़ी लकड़ी पानी में बहते−बहते फूल जाती है और अटक जाती है, पार ही नहीं हो पाती। अवतार एक बड़ जहाज की तरह है, जो सारी नदी−समुद्र का चक्कर लगाकर कइयों को पार उतारकर आता है।” जरा−सी सिद्धि आते ही अपने मद में फूलने वालों की तुलना ठाकुर श्री रामकृष्ण ने सड़ी लकड़ी से की है। अवतार कितनी बड़ी शक्ति है, इस उदाहरण के इसलिए समझना जरूरी है कि आज के इस कलियुग में ढेरों अवतार भगवान् दिखाई देते हैं। एक और उदाहरण रामकृष्ण दिया करते थे, “अवतार की प्रक्रिया एक जादूगर के खेल की तरह है। वह आता है गाँव में जादू दिखाने, कई गाँठें लगी रस्सी को लेकर। कहता है सभी से खोलो। लोग खोल नहीं पाते, और उलझ जाते हैं। जादूगर तब हवा में रस्सी फेंकता है एवं सभी गाँठें खुल जाती हैं।” वे कहते थे कि अवतार भी ऐसे ही हमारी जन्म−जन्माँतरों की गाँठों की रस्सियों को लेकर आता है एवं एक क्षण में खोल देता है। इसीलिए सद्गुरु को, अवतार को प्रारब्धों को बदलने की, भूतकाल को बदलने की क्षमता से संपन्न बताया जाता है। गुरु और अवतार एक साथ हों तो कार्य और आसान हो जाता है। जो कार्य हम अपने पुरुषार्थ से नहीं कर सकते, वह कार्य अवतार− सद्गुरु कुछ ही क्षणों में कर दिखाता है। हमारा प्रारब्ध बदल देता है।
भगवान् अवतार क्यों लेते हैं, यह सातवें−आठवें श्लोक में स्पष्ट करते हैं−
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मनं सृजाम्यहम्॥ 4/7 परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥ 4/8
“हे अर्जुन! जब−जब संसार में धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब−तब मैं साकार रूप से अपने आपको प्रकट करता हूँ। साधु पुरुषों की रक्षा और दुष्कर्मियों (पाप कर्म करने वालों) के विनाश तथा धर्म की अच्छी तरह संस्थापना करने के लिए मैं अपने आपको युग−युग में प्रकट करता हूँ।”
संभवामि युगे−युगे
चीनी का धर्म जिसके कारण से वह चीनी है और जिसके बिना वह चीनी नहीं रहती, उसकी मिठास ही है। उष्णता अग्नि का धर्म है और प्रकाश सूर्य का धर्म है। इसी प्रकार मनुष्य का धर्म है उसके अंदर निहित दिव्यता, आत्मा की उत्कृष्टता। यही बाहर विभिन्न गुणों के रूप में अभिव्यक्त होती है। प्रेम, ईमानदारी, क्षमा, प्रसन्नता, सज्जनता के रूप में अभिव्यक्त मूलभूत दिव्यता का जब ह्रास होने लगे तथा अत्याचार, झूठ, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, छल−कपट, घृणा जैसी पाशविक प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगें, तो पुनः धर्म की परिचायक सत्प्रवृत्तियों की स्थापना करने हेतु भगवान स्वयं को प्रकट करते हैं, यह यहाँ बताया है (तदाऽऽत्मनं सृजाम्यहम्)।
इसी बात को तुलसीदास जी ने “जब−जब होहि धरम की हानी, बाढ़हि असुर अधर्म अभिमानी” के रूप में निरूपित किया है। सर्वशक्तिमान भगवान् का जीव−जगत् के कल्याण के लिए मनुष्य देह धारण कर आना, प्रकट होना संसार के आध्यात्मिक इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना है। प्रत्येक अवतार में धर्म−संस्थापन की पद्धति भिन्न−भिन्न प्रकार की होती है। देश, काल और प्रयोजन के अनुसार कार्य की प्रणाली बदल जाती है। अवतार का अर्थ ही होता है, नीचे उतरना। अवतार में दिव्य चैतन्य की अभिव्यक्ति के हमें निरंतर दर्शन होते रहते हैं। अवतार में तो दिव्यसत्ता का भान होता है, पर उनका प्रसंग अवतार के साथ आगे कहीं लेंगे। अवतार की चर्चा तो यहाँ जिस संदर्भ में चल रही है, उसे समझ लेना जरूरी है।
अवतार आखिर क्यों?
जब ईश्वरीय सत्ता के कृपा−कटाक्ष से ही सारी व्यवस्था संभव हो पा रही है, उनकी इच्छा मात्र से ही सृष्टि का कार्य चल रहा है, तो उनकी आवश्यकता क्यों? यह बात भगवान् ने आठवें श्लोक में स्पष्ट की है, यथासमय दुष्कर्मियों को दंड देने और सद्पुरुषों की सहायता करने की लक्ष्यपूर्ति हेतु ही अवतार का आविर्भाव होता है। इसीलिए वे कहते हैं कि मैं “परित्राणाय साधूनाँ” तथा “विनाशाय च दुष्कृताम्” स्वयं को युग−युग में प्रकट करता हूँ “संभवामि युगे युगे।” क्यों? क्योंकि यही वह प्रक्रिया हैं, जिससे कि किसी समाज के साँस्कृतिक विकासक्रम को आगे बढ़ाया जा सकता है। धर्म की संस्थापना अवतार के संभव होने पर ही क्रिया रूप लेती है।
अवतारवाद का प्रस्तुत प्रसंग बड़ा ही रहस्यमय है। मात्र इन दो श्लोकों में एक बहुत बड़ा सिद्धाँत अनायास ही भगवान् के श्रीमुख से निकल गया है, निकला नहीं, जान−बूझकर अर्जुन के माध्यम से हम सबको बताया गया है, ताकि हम अवतार की संभावना व उसके उद्देश्य को भलीभाँति समझ सकें। एक पाश्चात्य विचारक हुए हैं अर्नाल्ड टायनबी। उनका कहना है, “संसार का इतिहास, सभ्यता तथा संस्कृति का जन्म ‘चुनौती एवं प्रत्युत्तर’ (चैलेंज एण्ड रिस्पाँस) का ही इतिहास है। मानव को सृष्टि के आरंभ से ही चुनौती मिलती रही है एवं वह उसका प्रत्युत्तर देता रहा है। तभी तो वह आज तक जीवित है। चुनौती भौतिक भी हो सकती है, सामाजिक भी, आध्यात्मिक भी। जब यह चुनौती उग्र रूप ले लेती है, तो एक संकट का जन्म होता है, तब कहीं कोई दैवीय शक्ति, निस्सहायों की पुकार सुन उनके अंदर से आत्मबल के प्रवाह के रूप में फूट पड़ती है। हम ललकार का उत्तर देते हैं। कोई करुणामय सत्ता आकर हमें संकट से बचा लेती है। यही विश्व का नियम है एवं इसी को गीता ने अवतारवाद व शेष धर्म−संप्रदायों ने पैगंबर कह दिया हैं।”
अवतरण एवं आरोहण
प्रस्तुत मत हमने अपने पश्चिम के एक विचारक का रखा। अब जरा देखे हमारे पूर्व के महान् योगी महर्षि श्री अरविंद क्या कहते हैं? ‘गीता प्रबंध’ (ऐसेज आँन गीता) में वे लिखते हैं, “अवतार का आना जो मानवजाति के अंदर भगवान् का परम लक्ष्य है, केवल धर्म का संस्थापन करने के लिए नहीं होता। क्योंकि धर्म की स्थापना को इतना बड़ा और पर्याप्त हेतु नहीं है, कोई ऐसा महान् लक्ष्य नहीं है, जिसके लिए ईसा या कृष्ण या बुद्ध को उतरकर आना पड़े। यह कार्य तो भागवत् संकल्प सिद्धि की एक सामान्य अवस्था मात्र है। इस दिव्य अवतरण के दो पहलू हैं, एक है अवतरण, मानवजाति में भगवान् का जन्म लेना, मानव आकृति और प्रकृति में भगवान् का प्रकट होना। दूसरा है आरोहण, भगवान् के भाव में मनुष्य का जन्म ग्रहण, भागवत् चेतना में उसका उत्थान। यह जीव का नवजन्म हैं, द्वितीय जन्म है। भगवान् का अवतार लेना और धर्म की स्थापना करना इसी नवजन्म के लिए होता है। यह जो दूसरा पहलू हैं, यही सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो इन दो श्लोकों की सतही व्याख्या करने वालों से अक्सर छूट जाता है। गीता की शिक्षा एक गंभीर दार्शनिक और धार्मिक सत्य है और यह कहती है कि ऐतिहासिक या पौराणिक अतिमानवों की कल्पना के जोर से या रहस्यमय तरीके से किसी को भी भगवान् घोषित कर दिया जाए। जब तक यह उच्चस्तरीय उद्देश्य न हो, तब तक न तो भगवान् का दिव्य जन्म होता है, न अवतरण होता है
सन् 1978 में एक प्रवचन में पूज्यवर ने कहा था, “मैं कौन हूँ, यह बता दूँ तो यहाँ से हर की पौड़ी नहीं, दिल्ली तक लाइन लग जाएगी। मैंने अपने ऊपर एक साधारण गृहस्थ ब्राह्मण का परदा डाल रखा है। मेरे मार्गदर्शक ने जो मुझे निर्देश दिया, मैंने वही किया है।”
अवतार का आगमन मानव प्रकृति में भागवत् प्रकृति को प्रकटाने के लिए होता है। ईसा, कृष्ण और बुद्ध की भगवत्ता को प्रकटाने के लिए होता है, ताकि मानव प्रकृति अपने सिद्धाँत, विचार अनुभव, कर्म और सत्ता को ईसा, कृष्ण और बुद्ध के साँचे में ढालकर स्वयं भागवत् प्रकृति में रूपांतरित हो जाए। अवतारों के द्वारा धर्म की संस्थापना एक प्रकार से तोरण द्वार बनाना है, जिसके माध्यम से वे स्वयं प्रवेश करते हैं और मनुष्यों को उसका अनुपालन करने को कहते हैं। प्रत्येक अवतार मनुष्यों के सामने अपना ही दृष्टांत रखते हैं, अपने आप को ही एक मात्र मार्ग बताते हैं।
‘अवतार’ की व्याख्या पूरी तरह समझ में तब तक नहीं आ सकती, जब तक कि गीता के अन्य अध्यायों के अन्य श्लोकों के साथ उसका संबंध न समझ लिया जाए। पहले तो तीसरे से चौथे अध्याय में, जो एकदम विषय परिवर्तन आया है, उस पर चलें। तीसरे अध्याय के अंतिम श्लोक में भगवान् ने कहा है, “हे अर्जुन! तू कामरूपी दुर्जय शत्रु की जो हम चर्चा कर चुके (विगत किश्तों में) उनसे बचाकर ऊँचा उठाने का कार्य अवतार ही करता है। इसीलिए चौथे अध्याय में मानव की सबसे बड़ी त्रासदी एवं समाज की सबसे बड़ी दुर्घटना अनाचार का बढ़ना, सज्जनों का घटना बताया गया है व इन सबका उपचार है, अवतार का प्रकटीकरण। एकदम से विषय बदला है, पर समझ में आ जाए, तो अच्छा है कि क्यों बदला है। इसी प्रकार नवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में भगवान् कहते हैं, “मूढ़ लोग मानुषीतन में निवास कर रहे मुझको, समग्र भूतों के महान ईश्वर को तुच्छ समझकर तिरस्कृत करते हैं, क्योंकि वे मेरे सर्वलोक महेश्वर परमभाव को नहीं जानते (अवजानन्ति माँ मूढा मानुषी तनुमाश्रितम्.....)।” इन विचारों को सामने रखकर यदि हम भगवान् के दिव्य जन्म और दिव्य कर्म के मर्म को समझ सकें, तो ठीक रहेगा।
एक जगह गीता कहती है, “ईश्वर सब प्राणियों के हृदय क्षेत्र में निवास करते हैं और सबको माया से यंत्रारुढ़वत् चलाते रहते हैं।” (18/61)। यदि यदि ऐसी बात है, तो हम यह कैसे मानें कि ईश्वरीय चेतना किसी और रूप में, प्रत्यक्ष रूप में अपने विरुद्ध कार्य करने आती है। इसका उत्तर श्री अरविंद देते हुए कहते हैं, “भगवान् का अवतरण इसलिए होता है कि मनुष्य और उनके बीच के परदे को फाड़कर दिखाया जीवनभर उठा तक नहीं सकता।”
भागवत् नेता होते हैं अवतार−अवतार शब्द का अर्थ है उतरना। यह भगवान् का उस रेखा के नीचे उतर आना है, जो भगवान् को मानव जगत् या मानव अवस्था से अलग करती हैं। “संभवामि युगे−युगे” के माध्यम से भगवान् ने अर्जुन को, जो मानवजाति का एक श्रेष्ठतम नमूना है, विभूति है, बताया है कि तुम्हारे अंदर मैं वह दिव्य भाव प्रकट कर रहा हूँ, जिसमें प्रवेश कर तुम ऊपर उठ सकते हो। यह तभी संभव है, जब अपनी सामान्य मानवता के अज्ञान और सीमाबंधन को पारकर तुम मुझे अच्छी तरह समझ लो।
श्री अरविंद ने और एक स्थान पर खा है, “अवतार ऐंद्रजालिक जादूगर बनकर नहीं आते, प्रत्युत मानवजाति के भागवत् नेता और भागवत् मनुष्य के एक दृष्टांत बनकर आते हैं।” कितनी स्पष्ट व्याख्या हैं, अवतार की। कुछ जटिल शब्दावजी में हमने अब तक अवतारवाद की, इस शब्द की व्याख्या की है। अब बड़े सरल शब्दों में ‘अवतार’ की अवधारणा पर पूज्यवर गुरुदेव का चिंतन देखें। अखण्ड ज्योति का अगस्त 1979 का अंक प्रज्ञावतार विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ था। उसमें पूज्यवर लिखते हैं, “यदा−कदा ऐसी परिस्थितियाँ हर युग में आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने पराक्रम को भारी देखते हैं और विपन्नता से लड़ते−लड़ते भी सत्य परिणाम की संभावना को धूमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता है और पासा पलटने जैसी असंभाव्य को संभव बनाने वाली परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है। सदा से विषम वेलाओं में ऐसा ही चलता रहा है। भविष्य में भी यही क्रम चलेगा।”
अवतार का प्रयोजन−प्रकटीकरण−आगे परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं, “मनुष्य का पौरुष जहाँ लड़खड़ाता है, वहाँ गिरने से पूर्व ही सृजेता के लंबे हाथ असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए अपना चमत्कार प्रस्तुत करते दिखाई पड़ते हैं। यही है स्रष्टा का लीला अवतरण प्रकटीकरण।” (पृष्ठ 5)। इसी प्रकार पृष्ठ 7 पर वे लिखते हैं, “व्यापक शक्तियाँ सूक्ष्म और निराकार होती हैं। उनका कार्यक्षेत्र अदृश्य जगत् है। परब्रह्म की अवतार सत्ता युग संतुलन को सँभालने−सुधारने के लिए आती हैं। यह कार्य वह उनसे कराती है, जिनमें दैवतत्त्वों का चिरसंचि बाहुल्य पाया जाता है।”
परमपूज्य गुरुदेव ने मनुष्य जिसकी चेतना विकसित है, को तीन श्रेणियों में बाँटा है। संत, सुधारक और शहीद। उनने लिख है कि जब समाज में इन तीनों का अनुपात−वर्चस्व बढ़ने लगे, तो समझना चाहिए कि सूत्र−संचालक अवतारी सत्ता प्रकट होने जा रही है। ‘संतों’ को उनने सज्जनता−ब्राह्मणत्व के पर्याय तथा चरित्र एवं आचरण से उपदेश देने वाला बताया है। ‘सुधारक’ इससे ऊँची स्थिति है, जिसमें पात्र आत्मनिर्माण की तपश्चर्या ही नहीं पर्याप्त होती वरन् वे दुष्टाचरण−कुरीतियों से जूझते भी हैं। वे ब्राह्म−क्षात्र अपनाते हैं। ‘शहीद’ वे जो ‘स्व’ का ‘पर’ के लिए समग्र समर्पण कर दें। समर्पण−शरणागति−अहं का विसर्जन कर वे आत्मदानी बन जाते हैं। इन तीनों वर्णों के अनुपात में वृद्धि को पूज्यवर ने अवतारी चेतना के प्रकटीकरण का प्रमाण माना है।
इस प्रसंग को अगले अंक में “जन्म कर्म च में दिव्यम्” की व्याख्या के साथ आगे बढ़ाएँगे। बड़ा ही रोचक तत्त्वदर्शन है। समझ में आ जाए तो व्यक्तित्व में भूचाल लाकर दिखा देगा ।
रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि यदि तुम गाँव में जाओ, यात्रा में जाकर देखो, तो तुम्हें वहाँ एक कलाकार मिलेगा, जो सभी का अभिनय कर लेता है। मोनोएक्ट प्ले में वह माहिर होता है। मैं इस पति की स्त्री हूँ, मुझे ही समझ लो, कहकर माथे पर घूँघट डाल लेता है। ठाकुर इतना कहकर खुद अभिनय करके दिखाते थे वह कहते थे कि यही अवतार है। परदा जो डाल लिया, यह माया है। परदा हटा दिया, तो पहचान लिया कि मैं कौन हूँ। जो राम था, कृष्ण था यही रामकृष्ण होकर आया है।
चाहे आधुनिक साइबर क्राँति हमें कहीं−से−कहीं पहुँचा दे, ई−मेल व ई−चैट आदि के माध्यम से संचार क्राँति की बात कही जा रही हो, अपनी भाषा में हाथ से लिखी चिट्ठी जो डाकिया लेकर आता है, की बात कुछ और ही है। ई−मेल में चाहे आप कितनी भाव−संवेदना उड़ेल दें, उसमें याँत्रिकता की गंध तो रहेगी ही। परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी ढेरों चिट्ठियों से अगणित परिजनों को इतना आत्मीय बना डाला कि वे उनके लिए सब कुछ करने को तैयार हुए। पत्रलेखन एक कला भी है एवं लेखन विधा में इस बड़ा ऊँचा स्थान प्राप्त है। जिस परमभाव में प्रवेश कर हमारी गुरुसत्ता पत्र लिखा करती थी एवं वह जब शिष्य के पास पहुँचता था, तो उसका आनंद वही जानता था। लोग चिट्ठी लिखकर प्रतीक्षा करते रहते, कभी देरी नहीं होती, समय पर व कभी−कभी भौगोलिक दृष्टि से असंभव प्रतीत होने वाले समय में भी चिट्ठियाँ आ जातीं। अपने प्रिय−आत्मीय परिजन की हर वैयक्तिक, पारिवारिक, साधनात्मक, सामाजिक उलझन−ऊहापोह में गुरुसत्ता की भागीदारी रहती थी। क्या पत्र लेखन की विधा भी एक संगठन खड़ा कर सकती है? यह प्रश्न जब भावी शोधकर्त्ताओं−अन्वेषकों के समक्ष आएगा, तो निश्चित ही वे पूज्यवर के पत्रों को उस कसौटी पर खरा पाएँगे।
हम इस स्तंभ में कई तरह के वैविध्यपूर्ण ढंग से परामर्शपरक अथवा दिव्य परोक्ष मार्गदर्शन देने वाले अथवा लौकिक मार्गदर्शन वाले पत्र देते रहे हैं। उद्देश्य यही है कि इन पत्रों द्वारा हम उस परामर्श को अपने लिए भी मानकर जीवन में उतारने का प्रयास करें। गुरुकथामृत पढ़कर ढेरों पाठकों ने हमें भी पत्र लिखे हैं व अपने जीवन में आमूल−चूल परिवर्तन की बात लिखी है। होगा क्यों नहीं? उस युगऋषि के एक−एक शब्द में प्राण जो छलकता है।
पत्रों के क्रम में हम सबसे पहले एक पत्र 23/2/43 का श्री मोहनराज भंडारी के नाम लिखा हुआ ले रहे हैं। ये सज्जन ब्यावर अजमेर के निवासी हैं एवं बड़े आत्मीय भाव से पूज्यवर को 41-42 से ही पत्र लिखते रहे हैं। कभी−कभी उलाहना होता कि आप हमें भूल तो नहीं गए। पत्र का जवाब, प्रत्येक का जल्दी न मिलने पर हैरान होना स्वाभाविक था। पत्र का जवाब दिया गया−
“देखो मोहन! यह वक्त किफायत का है। हर चीज महँगी हो जाने के कारण समय की माँग है कि हर बात में खरच कम किया जाए। मंगलचंद के पास अखबार जाता ही है, उसी को पढ़ लिया करो। जो पैसा बचे, उससे एक और अखबार मँगा लो, इस तरह तुम दोनों दो अखबार पढ़ लिया करोगे। इसी तरह जब मंगीचंद पत्र भेजा करें, उसी के साथ तुम भी अपना पत्र भेज दिया करो। इसी प्रकार एक ही लिफाफे में हम भी दोनों को उत्तर दे दिया करेंगे। क्यों ठीक है न! इसमें खरच भी कम पड़ेगा और काम भी निकल जाया करेगा।”
मित्रवत् परामर्श है। द्वितीय विश्वयुद्ध की महँगाई में किस तरह जीवनयापन करना चाहिए, यह व्यावहारिक मार्गदर्शन है। इसी पत्र के आरंभ में पूज्यवर ने लिखा था, “ऐसा कभी मत सोचा करो कि हम तुम्हें भूल गए हैं या किसी प्रकार स्नेह कम हो गया है। तुम हमें अपने छोटे भाई के बराबर प्रिय हो और आगे रहोगे।”
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यह पत्र एक सिखावन है, एक लोकशिक्षण है। तब पूज्यवर की आयु रही होगी, यही लगभग 32 वर्ष की। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका निकलते हुए तीन−चार वर्ष ही हुए थे। पत्रिका ने जितने सदस्य गायत्री परिवार के या उनके आत्मीयों के नहीं बनाए, उनसे अधिक प्रेमभाव से लिखे इन पत्रों ने बनाए हैं।
सारे राष्ट्र में 2001 को ‘नारी शक्ति जागरण वर्ष ‘घोषित किया गया है। परमपूज्य गुरुदेव के इस अभियान को सात आँदोलन में इस वर्ष हम और तीव्र गति दे रहे हैं,परंतु निम्न उद्धृत पत्र तो देखिए, जो पूज्यवर ने धामपुर (बिजनौर) की काँती देवी त्यागी को 22-12-56 को लिखा था। पत्र की भाषा पढ़कर आपको लगेगा कि कौन−सा क्राँतिकारी उनके अंदर से जन्म ले रहा था। वे लिखते हैं−
“शाखा बनाने में तुम्हारा प्रभाव अवश्य ही सफल होगा। सड़े−गले विचार के कूपमंडूक दंडी मुँडी ईश्वरीय संदेश तथा सनातन तत्त्वज्ञान को रोक नहीं सकते। ऐसे लोगों का मुँह बंद करने में तुम्हारी जैसी एक ही प्रतिभाशाली महिला काफी है। सैद्धाँतिक धर्मचर्चा में तो ऐसे लोग सदा मुँह की खाते हैं। इनके प्रभाव में पड़कर अपने महिला समाज को विचलित नहीं होने देना चाहिए।”
पत्र की भाषा देखने योग्य है। 1956 का समय कैसा था, सभी जानते है। गायत्री मंत्र नारी नहीं जप सकती, न अग्निहोत्र कर सकती हैं, ऐसा वातावरण चारों ओर छाया था। ऐसे में पूज्यवर अपनी शिष्या को शक्ति देते हैं, बल देते हैं व कहते हैं कि तुम अकेली ही आगे बढ़कर ‘महिला समाज’ को गति दो।
आध्यात्मिक दृष्टि से वे समय−समय पर मार्गदर्शन देते रहते थे, उच्च विकसित कक्षा में पहुँच गई शिष्याओं को। उनमें से एक थीं अंजार (कच्छ) की केशर बहन। इनके कतिपय पत्र हम पहले भी इस स्तंभ में दे चुके हैं। यह पत्र 27-3-1967 का है। वे लिखते हैं−
“तुम्हारी आत्मा दिन−दिन ऊँची उठ रही है, इसका हमें बड़ा संतोष तथा हर्ष है। गृहस्थ में रहकर तुम संत−महात्माओं की सी तपश्चर्या कर रही हो। ऐसा साहस कोई विरले ही कर पाते हैं। तुम्हारे पुण्य से तुम्हारा सारा परिवार फलेगा−फूलेगा। तुम्हारा कल्याण होना तो निश्चित है।”
निश्चित ही इस साधिका ने बहुत प्रगति की। कइयों की प्रेरणा स्रोत बनीं व अंत में उनकी ज्योति अपनी गुरुसत्ता के साथ ही एकाकार हो गई। इस प्रकार अनेक साधिकाओं, जाग्रत् नारियों को लिखे उनके पत्रों ने न केवल उनका सतत मार्गदर्शन किया, उनके समग्र विकास में भी उनका योगदान बड़ा भारी रहा। कभी−कभी अलौकिक रूप लेकर भी पाती पहुँच जाती थी। बरेली निवासी सुश्री कमल भटनागर को एक ऐसा ही पत्र 19/8/5/ का लिखा प्राप्त हुआ।
“चि. अतुल की माताजी को साँत्वना तथा शिक्षा देने के लिए हमारी ही आत्मा गई थी। वह स्वप्न नहीं, योग निद्रा थी। ऐसी स्थिति में हम अपने आत्मीय जनों को शिक्षा एवं साँत्वना देने जाया करते हैं।”
पत्र का संकेत समझने का प्रयास करें। चि. अतुल की माताजी को स्वप्न में पूज्यवर दिखे होंगे। वे आशंकित रही होंगी, गुरुसत्ता के दर्शनों से उन्हें साँत्वना मिली, पर पत्र भी दिख दिया तो जवाब आ गया कि उनका ही सूक्ष्मशरीर उन्हें योग निद्रा के माध्यम से शक्ति देने गया था। ऐसे परोक्ष संकेत देने वाले ढेरों पत्र हमारे संकलन में हैं।
किसी भी संगठन को सींचते हैं उसके संस्थापक के प्रति श्रद्धाभरे समर्पण के पत्र−पुष्प−जल। पूज्यवर ने एक निराली परंपरा डाली कि हमें बड़े धन्ना सेठों की नहीं भावनाशीलों के अंशदान की जरूरत है। ढेरों व्यक्तियों ने अपना अंशदान समर्पित कर भाव−श्रद्धाँजलियों से गायत्री परिवार का विराट् परिकर, पाँचों केंद्रीय संस्थान तथा साढ़े पाँच हजार छोटे−बड़े शक्तिपीठ खड़े किए हैं। ऐसे भी व्यक्ति अपवाद रूप में होते थे, जिनकी सामर्थ्य अधिक थी। कुछ अधिक करने की ताकत भी थी तथा इच्छा भी रखते थे। उनके समर्पण को भी पूज्यवर ने स्वीकार किया। गायत्री परिवार के एक आधारस्तंभ पूज्यवर के अनन्य शिष्य जबलपुर वासी री दानाभाई उन्हीं में से एक हैं। उन्हीं को लिखा एक पत्र यहाँ उद्धृत है।
“हमारे आत्मस्वरूप, 1-5-67
आपका पत्र और चैक मिला। आपकी श्रद्धा अनुपम है। राणाप्रताप के मिशन को भामाशाह ने और गाँधी जी के मिशन को जमनालाल बजाज ने सींचा था। यदि यह सहयोग न मिलता, तो दोनों उतना काम न कर पाते, जो उन्होंने किया। युग निर्माण मिशन का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें आपकी श्रद्धा और अनुपम त्याग की पग−पग पर चर्चा होगी।”
श्री दानाभाई ने युग निर्माण विद्यालय गायत्री तपोभूमि मथुरा के छात्रावास का निर्माण भी कराया था व सारा खरच भी वहन किया था। इस सारे प्रयास की प्रशस्ति की बात लिखते हुए पूज्यवर अपने भाव इस प्रकार व्यक्त करते हैं−
“आपकी श्रद्धा ही गायत्री तपोभूमि की सुगंधित वाटिका बनकर संसार में शाँति और धर्म−ज्ञान का, कल्याण का अनुदान बिखेरेगी।”
जिस गुरुसत्ता ने जीवनभर औरों को बाँआ−ही−बाँटा, किसी का कुछ उधार अपने पर न रखा, उसके मन में एक ही वेदान थी कि उनके द्वारा आरंभ किया हुआ कार्य आगे हजारों वर्ष तक चलता रहे। ऐसे प्राणवानों में उनने प्राण फूँके एवं उन्हीं के भावभरे समर्पण का चमत्कार है कि मोती की लड़ियों के बने हार की तरह एक गायत्री परिवार आज सक्रिय−जीवंत एवं दिन−प्रतिदिन और बढ़ता दिखाई देता है। श्री दानाभाई अपनी पत्नी लक्ष्मी बेन के देहावसान के बाद डेढ़ वर्ष पूर्व ब्रह्मकालीन हो गए, पर उनका नाम युग निर्माण के इतिहास में अमर हो गया। यही तो वह निधि है,
जिसके बलबूते हम उनके नन्हें−नन्हें अनगढ़ से अनुचर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय जैसे विराट् निर्माण की बात उनकी ही सूक्ष्म−कारण शक्ति के बल पर कह देते हैं। लगभग डेढ़ सौ करोड़ की लागत का निर्माण कैसे होगा, यह लौकिक स्तर पर नहीं, परोक्ष के स्तर पर सक्रिय सत्ता पर आरोपित कर सोचा जाए, तो कुछ भी असंभव नहीं। पत्रों की यह पुष्पमाला गुरुसत्ता के लीला−संदोह का वर्णन इसी तरह करती रहेगी। जन−जन को उनके उस स्वरूप का बोध कराती रहेगी, जिसने वर्तमान वट−वृक्ष का बीज बोया, सींचा व इतना बड़ा करके दिखाया।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवतारी सत्ताओं की माया के विषय में लिखा है, “माया हास बाहु दिक्पाला।” वे दिग्पाल की तरह विराट् होते हैं। उनकी हँसी भी माया का जाल है, माया का परदा है। अवतार इसी तरह अपने बारे में की गई चर्चा को हँसी के ठहाकों में उड़ा देते हैं। तुलसीदास जी ने यह भी लिखा है, “सो जानहिं जेहि देहु जनाई, जानत तुमहि तुमहि होई जाई।” अगर तुम को जान लिया, फिर तुम्हारा होने में कोई कठिनाई नहीं, पर तकलीफ यही है कि हु जीवनभर नहीं जान पाते कि अवतारों के संग हम चले, फिर भी हम जाननहीं पाए। इस उद्धरण में द्वितीय पंक्ति गायत्री चालीसा में भी आई है। हम भी थोड़ा आत्मचिंतन करें, अपनी आराध्यसत्ता के सत्ता के विषय में।
आज की सबसे बड़ी चुनौती है पर्यावरण का प्रदूषण। अतिशय सुविधा पाने की अदम्य लालसा का ही प्रतिफल है कि आज चारों ओर प्रदूषण से भरा पर्यावरण दिखाई देता है। औद्योगीकरण, शहरीकरण तथा सीमेंट कंग्रीटीकरण ने वनों के कवच को क्रमशः समाप्त किया एवं बढ़ती हुई आबादी ने उसमें घी की आहुतियाँ दीं। पिछले दिनों का ऋतु विपर्यय हम सभी को एक चेतावनी देता हुआ आया है कि यदि अभी भी हम न संभलें, तो महाविनाश सुनिश्चित है।
इस समय सबसे बड़ा संकट जो राष्ट्र के सामने आ खड़ा हुआ है, वह है सूखे का, दुर्भिक्ष का जो पूर्वी तट बंगाल की खाड़ी से लगे उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश राजस्थान से लेकर गुजरात के अधिसंख्य भाग सौराष्ट्र−कच्छ में बड़ भीषण रूप में प्रस्तुत होते जा रहा है। मानसून की वर्षा पर निर्भर भारतवर्ष से इन दिनों मौसम देवता बहुत नाराज चल रहे हैं। रौद्र प्रकृति यों तो सारे विश्व में कुहराम मचाए हुए है, हमारे इस विकासशील कृषिप्रधान देश में इसका प्रकोप कुछ ज्यादा ही है। आँध्रप्रदेश से लेकर पंजाब तक किसानों के द्वारा आत्महत्या करने का क्रम जारी है। यह एक चेतावनी है, खतरे की लाल झंडी है। हर वर्ष सूखा आता है, समुद्री तूफान आते हैं एवं आसाम, पूर्वी उत्तरप्रदेश एवं बिहार में बाढ़ का कहर बरपता है। जितना हम आगे बढ़ते हैं, उतने ही पीछे हटते जाते हैं। और देश न जाने कहाँ−से−कहाँ पहुँच गए, हम वहीं हैं, अब तो ऐसा लगने लगा है कि वैश्वीकरण की होड़ में कहीं हमारा मूल स्रोत कृषि संपदा ही दाँव पर न लग जाए। ‘लाँग टर्म’ उपचार सोचे जाने चाहिए, सोचे जा रहे हैं, पर उनके पीछे मिशनरी उत्साह वाला प्रेरक बल नहीं है। करोड़ों−अरबों रुपयों की राशि बती चली जा रही हैं।
आइए। निगाह वर्तमान संकट पर दौड़ाएँ। गायत्री परिवार एक अशासकीय स्तर पर बिना शासन की वित्तीय सहायता के कार्य करने वाला सबसे बड़ा समाज निर्माण को, आध्यात्मिक चेतना के विस्तार को समर्पित संगठन है। इससे सभी को आशाएँ हैं। हमारे बहुत से परिजन इस क्षेत्र में निवास भी करते हैं। हमें क्या करना चाहिए, यह अधिकांश परिजन विभिन्न प्राँतों से अक्सर पूछते रहते हैं। इस युगधर्म सोचे हैं, जो सूखे की इस दावग्नि में कुछ तो बूँदें बरसाएँगे, कुछ तो राहत देंगे।
श्रूमप्रधान राहत कार्य
इसमें गाँवों के तालाबों को गहरा करना, सामूहिक श्रमदान की प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर राहत कार्यों में सही व्यक्ति तक उसका मूल्य पहुँचाना तथा जल व मिट्टी के संरक्षण, जल की भूमि पर खेती (जलागम विकास) जैसे प्रयास आते हैं। यह कार्य 2700 जलागम क्षेत्रों के लिए गायत्री परिवार ने 1991 में हाथ में लिया था। पर शासकीय स्तर पर असहयोग व जलागम दीपयज्ञ का झुनझुना हाथ में थमाकर शासन ने पल्ला झाड़ लिया। यदि यह उस गति से चलता, जैसा कि तत्कालीन केंद्रीय सचिव महोदय ने परिकल्पना की थी, तो आज जो संकट दिखाई देता है व सभी के मुख पर ‘वाटर हारवेस्टिंग‘ की बात चल रही है, यह लगभग पूरी हो गई होती। जब इसे नए सिरे से अपने ही प्रज्ञा संस्थानों, परिजनों को मिशनरी स्तर पर हाथ में लेना होगा। कैसे करें, उसके लिए शाँतिकुँज के रचनात्मक प्रकोष्ठ से संपर्क करें।
(2) साधनप्रधान योगदान
हम मध्यवर्ग, निम्न मध्यमवर्ग के सभी परिजन हैं। यदि मात्र अखण्ड ज्योति के पाठक प्रति सप्ताह एक समय का भोजन न लें, व्रत रखें व उसकी राशि संकलित करें, तो कितना बड़ा कोष खड़ा हो जाएगा, इसकी कल्पना करें, एक माह में 4 बार के भोजन की बचत। यदि पाँच रुपया न्यूनतम भी एक समय का भोजन मानें, तो बीस रुपये प्रतिमाह। दो सौ चालीस रुपया प्रतिवर्ष। यदि उसका साढ़े छह लाख पाठकों की संख्या से गुणा कर दिया जाए, तो यह राशि दो करोड़ पैंसठ लाख रुपये बैठती है। एक वर्ष में मात्र अखण्ड ज्योति के परिजन इतनी राशि संग्रह कर सकते हैं। यदि प्राणवान्−निष्ठावान्, दीक्षित, शुभेच्छु, सहयोग प्रायः पाँच करोड़ रुपये बैठती है। क्या इतना हम नहीं कर सकते कि एक प्रामाणिक तंत्र जिला स्तर पर खड़ा करें एवं परिजनों के संग्रह की राशि जमा करते चले एवं जहाँ दैवी आपदाओं में राहत राशि−अन्नदान−जल व्यवस्था−बीज आदि की व्यवस्था की जरूरत हो, केंद्र के मार्गदर्शन में उसका नियोजन करते चलें। जिलास्तरीय संगठन केंद्र द्वारा ही नामित होंगे व यहाँ का दैवी आपदा प्रबंधन तंत्र सारा क्रम हाथ में लेगा, पर सूचनाएँ एकत्र करना व वितरण करने का कार्य तो परिजनों को ही करना है। पारदर्शी तंत्र बने, इसका ध्यान सभी को रखना है, नहीं तो चंदा एकत्र करने वालों की आडंबरी भीड़ से पल्ला छुड़ाना मुश्किल हो जाएगा।
(3) साधनाप्रधान प्रयोग
उपचार−अध्यात्म तंत्र के अंग होने के नाते हम अपनी साधना में दैवी विभीषिकाओं के निवारण हेतु अतिरिक्त जप तो करें ही, सबके, उज्ज्वल भविष्य की सद्भावपूर्वक प्रार्थना भी साथ जोड़े। वरुण गायत्री मंत्र से यदि दैनिक या साप्ताहिक अग्निहोत्र, बलिवैश्व आदि आहुतियाँ समर्पित की जा सकें, तो इसके सकारात्मक परिणाम
निश्चित ही निकलेंगे। मंत्र इस प्रकार है−
ॐ जलबिम्बाय विद्महे, नीलपुरुषाय धीमहि। तन्नो वरुणः प्रचोदयात् स्वाहा। इदं वरुणाय इदं न मम।
ध्यान रखे कि इसके लिए कहीं भी किसी को बड़े यज्ञ करने की जरूरत नहीं है। जो नियमित यज्ञ−अग्निहोत्र चलता है, उसी में इन आहुतियों को भी जोड़ लें। परमसत्ता से प्रार्थना है कि वह इस दैवी आपदा को ठीक करने में मानवी पुरुषार्थ की सुनवाई अवश्य करेगा।
विशिष्ट क्रम, विशिष्ट प्रशिक्षण केंद्र में भी, क्षेत्र में भी
“ब्रह्ममुहूर्त में साधक और तपस्वी जाग जाते है और उस पुण्य वेला में साधनारत होते हैं, जबकि विषयी लोग इसी समय अधिक गहरी नींद का मजा ले रहे होते हैं। इन दिनों ब्रह्ममुहूर्त है। असुरताभरी तमसाच्छन्न निशा का अब अंत होने जा रहा है और उसके स्थान पर ज्योतिर्मय प्रभात के उदय की संभावनाएँ उग जाती हैं। यह संधिकाल प्रभात की ऊषा लेकर आया है। मंदिरों में शंख−निनाद हो रहा है कि सजग आत्माएँ जगें और अपने पुनीत धर्म−कर्त्तव्यों में संलग्न हों। युग निर्माण योजना एक शंख−निनाद है, जो संस्कारी व्यक्तियों को जगाने और उन्हें प्रभातकालीन कर्त्तव्यों में जुटने का उद्बोधन कर रहा है। “ परमपूज्य गुरुदेव ने ये पंक्तियाँ अखण्ड ज्योति के अगस्त 1969 (विचार क्राँति विशेषाँक) के प्रारंभिक लेख में लिखी थीं। इन्हें बार−बार पढ़ना और अपने आपको सुनाना चाहिए, ताकि हम उस विशिष्ट भागवत् मुहूर्त को पहचान सकें, जो हमारे समक्ष आकर खड़ा हुआ है।
उज्ज्वल भविष्य की वेला आ पहुँची− युग चेतना के अभ्युदय की हीरक जयंती का वर्ष आ पहुँचा। बारहवर्षीय
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की तरह चल रहा एक विराट् साधनात्मक महापुरुषार्थ संपन्न हो गया और हम सबके लिए एक वातावरण बनाया गया। 1989 से लेकर वसंत पर्व 2001 तक चले इस विशिष्ट अभियान के फलितार्थ क्या होंगे, इसे परमपूज्य की लेखनी से जानने का प्रयास करें, तो अच्छा रहेगा। यह उपर्युक्त चिंतन अगस्त 1969 विशेषाँक के पृष्ठ 17 से उद्धृत हैं। “हम सुषुप्ति की स्थिति में पड़ी हुई राष्ट्र चेतना को कुँभकरणी निद्रा से जगाने का प्रयास करेंगे। विश्वास है कि अगले दिनों राष्ट्र जगेगा और अँगड़ाई लेता हुआ उठ खड़ा होगा। जिस दिन यह महादैत्य जगेगा, उस दिन दसों दिशाएँ काँप उठेंगी। उसके पास अध्यात्म, तत्त्वज्ञान, शौर्य, साहस, विज्ञान एवं संपन्नता की इतनी अधिक परंपरागत पूँजी विद्यमान है, जिसके बल पर विश्व की अद्भुत−अनुपम शक्ति बनकर रहेगा। सर्वश्रेष्ठता से परिपूर्ण हमारा प्राचीन इतिहास है। अब उज्ज्वल भविष्य भी ऐसा होने जा रहा है, जिसमें कि हम प्रत्येक क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व, मार्गदर्शन एवं सहयोग कर सकने में समर्थ हो सकें।”
ईश्वर ही है इस घड़ी का नियंता
पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि एक ऋषि−योगी की भी लेखनी बीसवीं सदी के प्रारंभ में इसी तरह की आग उगलने लगी थी। श्री अरविंद जो आय. सी. एस. परीक्षा में जान−बूझकर अनुत्तीर्ण हो भारत आए एवं ‘वंदेमातरम्’ पत्र से क्राँतिकारियों को दिशादर्शन देने लगे। उनके तत्कालीन लेखों का संकलन ‘पश्चिम के खण्डहरों में से भारत का पुनर्जन्म’ मीरा अदिति सेण्टर मैसूर द्वारा हिंदी में 1994 में प्रकाशित हुआ है। उनके विचार परमपूज्य गुरुदेव के चिंतन के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने योग्य हैं। जुलाई 1979 को अपने लेख में वे लिखते हैं, “विशेष युगों में कुछ विशेष आँदोलन होते हैं, जब ईश्वरीय शक्ति अपने आपको प्रकट करती है और अपनी चरम शक्ति से मानवजाति के सारे आकलनों को तहस−नहस कर देती है। सावधान राजनेता और योजनाएँ रचने वाले कूटनीतिज्ञों की बुद्धिमानी का मजाक बना देती है। वैज्ञानिक विश्लेषण करने वालों के पूर्वानुमानों को वह झूठा बना देती है और जितनी प्रचंडता और तीव्र गति से वह आगे बढ़ती है, उससे उसका मानवातीत−अलौकिक शक्ति होना स्पष्ट रूप से प्रकट होता
चला जाता है। बौद्धिक व्यक्ति बाद में उस आँदोलन के कारण ढूँढ़ निकालने का और उन तत्त्वों को उजागर करने का प्रयास करता है, जिन्होंने उसे संभव बनाया, किंतु उस समय वह सरासर गलत होता है, प्रत्येक पग पर अच्छी बुद्धि भूल कर बैठती है और उसका विज्ञान काम नहीं करता। यही वह समय है जब हम कहते है कि इस आँदोलन में ईश्वर का हाथ है। वही उसका नेता है और उस अपना उद्देश्य पूरा करना ही है, चाहे मनुष्य के लिए उन साधनों को समझना कितना ही असंभव क्यों न हो, जिनसे उसे सफलता मिलेगी।” (पृष्ठ 57)
दो युगों की मध्याँतर वेला
कलकत्ता में रह रहे श्री अरविंद के प्रसिद्ध उत्तरपाड़ा भाषण के बाद यह लेख ‘कर्मयोगिन’ (अँग्रेजी दैनिक) में प्रकाशित हुआ था। उसने उनके द्वारा की गई उस भविष्यवाणी को और मजबूती प्रदान की, जिसमें उनने कहा था कि 1836 में ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस के जनम के साथ ही उस युग का सतयुगी समय आरंभ हो गया है। भारत को सारे विश्व का नेतृत्व करना है। मात्र थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी, क्योंकि दो युगों की मध्याँतर संधि वेला 175 वर्षों की होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस अवधि के, जो नानाप्रकार के उतार−चढ़ाव, क्राँतिकारियों की कीर्तिगाथाओं, भारत की आजादी के लिए किए गए अनवरत प्रयासों, योद्धा स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, रमण महर्षि, परमपूज्य गुरुदेव के आविर्भाव तथा विश्व−वसुधा को रक्तरंजित कर देने वाले दो विश्व युद्धों, छोटे−बड़े प्रायः दो हजार युद्धों एवं वैज्ञानिक क्राँति की उपलब्धियों भरे क्षणों से युक्त रही है, अब मात्र अंतिम दस वर्ष बाकी हैं। 165वाँ वर्ष चल रहा है एवं यही अंतिम दस वर्ष नवयुग के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाएँगे।
ऐतिहासिक हीरक जयंती वर्ष
बात उज्ज्वल भविष्य की उस ऐतिहासिक हीरक जयंती वर्ष के संदर्भ में चल रही है, जो विगत वसंत पर्व 21 जनवरी 2001 से आरंभ होकर 17 फरवरी 2002 वसंत पंचमी तक संपन्न होने जा रहा है। महापूर्णाहुति शानदार ढंग से संपन्न हुई, अब इस वसंत से इसका अनुयाज भी आरंभ होना है। लाखों− करोड़ों साधकों− गृहस्थों ने जीवन−साधना के सूत्र विगत वर्षों में अपने जीवन में अंगीकार किए एवं एक नए अध्याय में सप्त आँदोलनों की सक्रियता के माध्यम से प्रवेश किया है। जैसा कि पिछले अंक में भी बताया गया एवं प्रज्ञा अभियान ‘पक्षिक’ के पृष्ठों पर स्पष्ट किया जाता रहा है कि जीवन−साधना की धुरी पर ही ये सारे आँदोलन गतिशील हो रहे हैं। वसंत पर्व से आरंभ हुआ यह हीरक जयंती वर्ष कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है। यह परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 में प्रज्वलित अखण्ड दीपक, जो अब शाँतिकुँज में स्थित है, के 75वें, वर्ष में प्रवेश वाला वर्ष है। इसी की साक्षी में परमपूज्य गुरुदेव व शक्तिस्वरूपा माताजी के सभी महत्त्वपूर्ण निर्धारण हुए, जिनने इस मिशनरूपी वटवृक्ष को इस समुन्नत स्थिति में पहुँचाया है। परमपूज्य गुरुदेव ने उसे एक अखण्ड अग्रि−अखण्ड यज्ञ की संज्ञा दी थी। परमवंदनीया माताजी के संरक्षण में 1971 में इसे यहाँ लाए जाने के बाद से लगातार 30 वर्षों से इसके समक्ष निरंतर अखण्ड जप चलता रहा है। कितना बड़ा शक्ति का स्रोत है, इसकी कल्पना सामान्यजन नहीं कर सकते। इसे अखण्ड ज्योति पाठकों−परिजनों को गुरुसत्ता की परोक्ष उपस्थिति का द्योतक एक प्रतीक मानकर स्वयं को सौभाग्यशाली मानना चाहिए। यह वर्ष परमवंदनीया माताजी के 1926 में आश्विन कृष्ण चतुर्थी को धरती पर अवतरण के संदर्भ में उनका भी हीरक जयंती वर्ष है। परमवंदनीया शक्तिस्वरूपा माताजी ने सजलता दी, स्नेह−ममत्व के अभिसिंचन से परमपूज्य गुरुदेव के पुरुषार्थ को पूर्णता दी। नारी जागरण के एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में स्नेहसलिला माताजी उभरीं एवं 1959-60 का समय हो अथवा 1971-72 का, सूक्ष्मीकरण की वेला (1984-86) हो अथवा पूज्यवर के महाप्रयाण के बाद के चार वर्ष, उनने सतत आगे चलकर मार्गदर्शन किया है। यह वर्ष इसीलिए ‘महिला जागरण वर्ष’ के रूप में भी मिशन द्वारा मनाया जा रहा है।
तीसरा एक संयोग यह कि श्री अरविंद ने भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण के रूप में वर्ष 1923 को ऐतिहासिक माना था। उसके भी 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। सह संयोग मात्र नहीं है, युग नियंता की भागवत् योजना का ही एक अंग है, जिसमें नए सिरे से सारी धरती का भाग्य लिखा जा रहा है। दो सहस्राब्दियों के कूड़े−कचरे को साफ होने में अभी न्यूनतम बीस वर्ष लगना है, किंतु
नवसृजन आरंभ हो चुका है, इसे हर कोई देख सकता है। हर दृष्टि से यह युग वसंत है, नई सहस्राब्दी के प्रथम वर्ष में नूतन उल्लास लेकर आया है एवं वर्षभर जन−जन में नूतन प्रेरणा, शक्ति चेतना का संचार करता रहेगा।
मात्र औपचारिकता न रह जाए
और वर्षों की तरह यह वर्ष एक औपचारिकता मात्र न बनकर रह जाए, हर व्यक्ति मं नूतन प्राण फूँके एवं उच्चस्तरी आत्मिक प्रगति के सोपानों पर चढ़ने की आकाँक्षा जगा दे, यह चुनौती यह हम सबके लिए लेकर आया है। वही इसे स्वीकार कर सकेंगे, जो निज की जीवन−साधना और सृजनधर्मी पुरुषार्थ को और अधिक प्रखर बनाने की समझदारी, तत्परता एवं कौशल दिखा पाएँगे। 75 वर्ष किसी भी मिशन−संगठन के लिए प्रौढ़ता की चरमावस्था
के प्रतीक हैं। शासन की किसी भी तरह की सहायता पर आधारित न रहकर मात्र समयदान−अंशदान की पूँजी से जाग्रतात्माओं का यह संगठन जो खड़ा हुआ है, इसे अब विभूतिवानों−प्रतिभाशीलों को सृजननिष्ठ आँदोलन में नियोजित करना है। उदार अनुदान भी ऊपर से बरसेंगे, पर उन्हीं पर जो जीवन−साधना की कसौटी पर खरे उतरेंगे। जीवन−साधना चौबीस घंटे की होती है। हर क्षण भगवत्चेतनामय, हर क्षण विधेयात्मक चिंतन से ओत−प्रोत तथा सतयुगी उल्लास भरे आनंद में सराबोर रहे, ऐसी अपेक्षा हमारी गुरुसत्ता की प्रत्येक परिजन से इस वर्ष विशेष में है। हम मात्र उत्साह में औपचारिकता न बरतकर रह जाएँ, गहरे उतरें व गुरुसत्ता के चिंतन−प्रवाह में निरंतर गोते लगाते रहने का अभ्यास करें, यह अपेक्षा स्वाध्यायक्रम में हम से की जा रही हैं।
परिजनों के लिए गायत्री तीर्थ में विशिष्ट सत्रों का क्रम
(1) इसी उद्देश्य से परिजनों के लिए इस वर्ष विशिष्ट साधना सत्रों की श्रृंखला का निर्धारण किया गया है। हमारे 75 वर्ष के परिपक्व वयोवृद्ध इस संगठन के प्राणवान् वरिष्ठ कहे जाने वाले प्रज्ञापुत्रों से यह अनुरोध किया जा रहा है कि अब इस वर्ष वे अखण्ड दीपक के सान्निध्य में एक अनुष्ठान से युक्त विशिष्ट सत्र प्रतिवर्ष करते रहने का क्रम बना लें। ये प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के एकान्त साधना सत्र होंगे। इनमें साधक को एक ही कोठरी में 24 घंटे रहना होगा, मौत सहित तप के सारे उपक्रम पूरे करने होंगे, मात्र गुरुदेव को ही सुनना व पढ़ना होगा। प्रारंभिक दौर में अभी 36 कमरों में 36 साधकों के लिए 1 मार्च से 5 मार्च, 7 मार्च से 11 मार्च, 13 मार्च से 17 मार्च इस प्रकार तीन ही सत्र रखे गए हैं। इसके बाद 23 मार्च से नवरात्रि सत्र होने के कारण अलग से इन्हें चला पाना संभव नहीं होगा। बाद में ये आश्विन नवरात्रि से चैत्र नवरात्रि की छह माह की अवधि में 2001-2002 में अनवरत चलते रहेंगे। इन सत्रों के बारे में विस्तार से 1 फरवरी का प्रज्ञा अभियान पाक्षिक पढ़ें।
(2) 9 दिवसीय जीवन−साधना सत्र एवं एक माह के युगशिल्पी सत्र यथावत् चलते रहेंगे।
(3) शाँतिकुँज की बहनों का विशिष्ट प्रशिक्षण श्रद्धेया जीजी के मार्गदर्शन में आरंभ हो गया है। यही ब्रह्मवादिनी बहनें ग्रीष्मकाल के बाद शाँतिकुँज में क्षेत्र के नारी जागरण सत्रों का विधिवत् संचालन करेंगी। इनकी घोषणा समय− समय पर की जाती रहेगी। इस वर्ष मात्र केंद्र ही नहीं, क्षेत्रों में भी महिला जागरण सत्रों की श्रृंखला चले, ऐसा गुरुसत्ता का संकेत है। इसी कार्य के लिए प्राणवान् प्रशिक्षिकाओं को उच्चस्तरीय शिक्षण इस वसंत के बाद दिया जा रहा है। बाद में क्षेत्र की ओजस्वी−लोकनायक स्तर की बहनों को भी प्रशिक्षण में शामिल किया जाएगा।
(4) ग्रीष्मकाल में 16 मई से 30 जून की अवधि में 5-5 दिन के तीर्थसेवन सत्र यथावत् चलते रहेंगे।
(5) आँदोलन प्रधान एक प्रशिक्षण सत्र प्रतिमाह शाँतिकुँज में निर्धारित तिथियों में चलेंगे। ये सत्र अप्रैल, मई, जुलाई, अगस्त, सितंबर एवं अक्टूबर में छह आँदोलनों पर पृथक−पृथक आयोजित किए जाएँगे। ये भी पाँच−पाँच दिन के होंगे। चूँकि जीवन−साधना सभी आँदोलनों की धुरी में है, उसे सभी के साथ गूँथ दिया गया है। इनकी तिथियों के लिए परिजन पत्राचार कर लें।
गायत्री शक्तिपीठों−प्रज्ञासंस्थानों पर भी सत्र चलेंगे
इस वर्ष जनवरी माह में संपर्क प्रशिक्षण के लिए प्रायः साठ शक्तिपीठों का दौरा करने वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं की टोलियाँ पहुँची हैं। वे संभावनाओं को तलाशकर वसंत तक आ चुकी होंगी। अब निर्धारण यह है कि हर शक्तिपीठ, प्रज्ञा संस्थान पर, जहाँ स्थान भी है व जिनके पास संसाधन हैं, वहाँ तीन माह में एक बार दो सत्र अवश्य चलें। ये सत्र पाँच−पाँच दिन के कुछ दिनों का अंतर भी रखा जा सकता है। हमारे सभी शक्तिपीठ भागवत् चेतना के केंद्र है। क्षेत्र के कार्यकर्त्ताओं, जिले की शाखाओं प्रज्ञा, मंडलों, स्वाध्याय मंडलों एवं महिला मंडलों का उनसे संपर्क अब प्रशिक्षण स्तर पर जुड़ जाना चाहिए। यही सोचकर उस वर्ष माँग के अनुपात में कितने दल हम निकाल सकते हैं, यह देखकर मार्च 2002 से प्रति तीन माह न्यूनतम दो−दो सब दो सौ शक्तिपीठों पर आरंभ करने का मन है। प्रत्येक पीठ पर यह प्रति तीन माह के अंतर से पाँच दिन के लिए चलेंगे। 1 से 5 साधनाप्रधान चल सकता है एवं 21 से 25 आँदोलनप्रधान। यह तो मात्र नमूने के लिए लिखा गया है। तिथियाँ संगठन प्रकोष्ठ से चचौ कर तय की जा सकती हैं।
शक्तिपीठ साधना सत्र का प्रारूप
ये शिविर शाँतिकुँज के प्रशिक्षण कार्यकर्त्ताओं के मार्गदर्शन में चलेंगे। पूर्व संध्या को सभी को संकल्प दिलाया जाएगा, अतः सभी संध्या 5 बजे से पूर्व आकर अपनी पाँच दिन की रहने की व्यवस्था बना लेंगे। प्रातः चार बजे जागरण से क्रम आरंभ होगा। आरती, सामूहिक ध्यान, प्रज्ञायोग, पादुका नमन एवं सामूहिक यज्ञ तक सभी दिनों में यह एक−सा क्रम रहेगा। प्रातः 8 बजे शाँतिकुँज प्रतिनिधि द्वारा उद्बोधन होगा, 9.30 पर भोजन−प्रसाद, अपराह्न दो बजे विशिष्ट क्रियापरक गोष्ठी तथा सायं 6 से 6.14 की नादयोग साधना के बाद समाधान गोष्ठी, वीडियो संदेश, प्रज्ञा पुराण आदि का क्रम चलेगा। अपराह्न की गोष्ठी के बाद प्रतिदिन 3.30 पर सामूहिक श्रमदान तथा 5 बजे आरती होगी, जिसमें सभी भाग लेंगे। पाँचवे दिन प्रातःकाल के विदाई संदेश के बाद सभी अपने−अपने स्थानों के लिए रवाना हो सकेंगे। इस प्रकार प्रायः पाँच दिन में वे परिजन जो दूरी के कारण, छुट्टी न मिल पाने के कारण अथवा कई अन्य झंझटों में उलझे रहने के कारण शाँतिकुँज नहीं आ पाते, उसी प्राणप्रवाह से अभिपूरित हो सकेंगे, जो सुयोग गायत्री तीर्थ में आने पर मिलता। यदि उत्साह उभरा, तो प्रत्येक शक्तिपीठ एक जाग्रत् प्राणवान् केंद्र बनकर एक−डेढ़ वर्ष में प्रशिक्षण की प्रक्रिया संपन्न कर रहे होंगे। इसी तरह का एक पाँच दिवसीय सत्र आँदोलनों को गति देने की दृष्टि से प्रत्येक पीठ पर कम−से−कम तीन माह में एक बार चले, ऐसी अपेक्षा रखी गई है।
अब सब कुछ नूतन−उल्लासमय हो
वसंत नूतन उल्लास, नई प्रेरणा, पुलकन भरे प्राणप्रवाह के संचार का प्रतीक है। इस वसंत से प्रत्येक परिजन से कहा जा रहा है कि वे सूर्योदय पर सूर्यार्घ्यदान के साथ शंखनाद का क्रम अपनाएँ। सूर्योदय होते ही सभी घर के, शक्तिपीठ के मंडल के सदस्य एक साथ सूर्य को अर्घ्य दें एवं शंख ध्वनि करें। यह सभी को बताने के लिए है कि “सभी सावधान हों, नया युग आ रहा है।” हो सके तो इसके बाद प्रभातफेरी का क्रम बनाएँ। रोज नहीं संभव हो तो कम−से−कम प्रत्येक पूर्णिमा एवं अमावस्या तथा माह में पड़ने वाले पर्व पर सभी जगह उत्साहपूर्वक सूर्यार्घ्य, शंखनाद तथा प्रभातफेरी का क्रम सभी जगह चले। साधनाप्रधान एवं सातों आँदोलनों पर नए नारे, नए गीत बनाए जा रहे हैं। इस वर्ष यही नूतन उल्लास भरा क्रम सब ओर एक जैसा चले। सभी प्राणवान् परिजनों से अपेक्षा रहेगी कि हीरक जयंती वर्ष उसी उत्साह के साथ साल भर संपन्न होगा, जैसा कि ऊपर बताया गया है। बहुविधि कार्यक्रम हैं, ढेरों कार्य होना है। हमें तो बस अपने अंदर के उत्साह को जिंदा बनाए रख लगे रहना है। परिणाम निश्चित ही सुखद उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं से भरे होंगे।
कृपया ध्यान दें
‘गायत्री’ नाम से एक धारावाहिक दूरदर्शन−1 पर प्रति शनिवार 7.30 से 8.00 बजे सायंकाल अवधि में 24 फरवरी 2001 से प्रसारित होने जा रहे है। यह धारावाहिक गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार के मार्गदर्शन में परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी के परोक्ष संरक्षण में बना है। गायत्री महाशक्ति की उत्पत्ति से लेकर विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम आदि ऋषिगणों के कथानकों से गुँथ 104 श्रृंखलाओं तक चलने वाला यह धारावाहिक महापूर्णाहुति के अनुयाज की हीरक जयंती की वेला में गुरुसत्ता को ही समर्पित है।
स्मारिका अब उपलब्ध
बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण के समापन पर प्रकाशित ‘महापूर्णाहुति’ नामक स्मारिका अब गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज में उपलब्ध है। इसका विमोचन वसंत पर्व 29-1-2001 को प्रस्तावित था। इसमें गुरुसत्ता से जुड़े दुर्लभ संस्मरण एवं बारहवर्षीय साधना अभियान का सचित्र विवरण प्रस्तुत किए गए हैं। नए−पुराने हर परिजन के लिए प्रायः 224 पृष्ठों का यह ग्रंथ संग्रहणीय है। पच्चीस रुपये में यह उपलब्ध है। डाक खरच अतिरिक्त है।
आजीवन सदस्यता
अखण्ड ज्योति का वार्षिक चंदा प्रतिवर्ष भेजने में पाठकों को असुविधा होती है, डाक व्यय लगता है और चंदा विलंब से मिलने पर पिछले अंक भी उपलब्ध नहीं हो पाते। जो परिजन निरंतर अखण्ड ज्योति पढ़ना चाहते हैं, वे आजीवन सदस्यता शुल्क 900/- अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर भिजवा दें। जब तक अखण्ड ज्योति प्रकाशित होगी, उन्हें मिलती रहेगी। जो भी पिछले आजीवन सदस्य अब पत्रिका बंद करना चाहें, अपना रुपया वापस ले सकते हैं।
आशा है अधिक−से−अधिक परिजन इस योजना से लाभान्वित होंगे।
आ रही ‘हीरक जयंती’ हम पुकारे जा रहे हैं। मातृसत्ता के सपूतों को इशारे आ रहे हैं॥
मातृसत्ता के तराशा है हमें कुछ आश लेकर, अखण्ड ज्योति ने तपाया है हमें विश्वास देकर। अगर हीरा बन गए हैं, तो समय अब आ गया है, मातृसत्ता के लिए हीरे सँवारे जा रहे हैं॥
हमारा व्यक्तित्व, हीरों सा चमकना चाहिए ही, औ अनगढ़ भीड़ में, हमको दमकना चाहिए ही। मातृसत्ता को समर्पित हार हीरों का करें हम, इन दिनों हीरे दमकते ही निखारे जा रहे हैं।
इन दिनों व्यक्तित्व ही नेतृत्व युग का कर सकेंगे, आचरण वाले मनुज ही, प्रेरणाएँ भर सकेंगे। सृजन सैनिक ही टिकेंगे क्राँतियों के मोरचों पर, जो खरे, युग की कसौटी पर उतारे जा रहे हैं॥
नहीं नकली हो प्रमाणित, कोई हीरक जयंती पर, हो बुझा दीपक न कोई, अखण्ड ज्योति आरती पर। मातृसत्ता की निराशा के नहीं कारण बनेंगे, बस यही संकल्प अब मन में उभारे जा रहे हैं॥
मानवी संवेदना विकसाएँगे, मृदु−सीप बनकर, अखण्ड ज्योति की विभा विखराएँगे हम दीप बनकर। अब न भटकेगी मनुजता, भावना से शून्य तम में, नेह भीगे प्राण के दीपक उजारे जा रहे हैं॥
-मंगल विजय ‘विजयवर्गीय’