शाश्वत और सर्वस्व की प्राप्ति है धर्म

किसी ने कहा, स्वधर्म त्याग। यह सुनकर सुनने वाले घबराए। उनकी घबराहट स्वाभाविक थी। आखिर उनमें से हर एक ने अपने जीवन में पल-पल तिनका-तिनका जोड़ा था। छोटी-छोटी चीजों को पाने के लिए न जाने कितने झगड़े-झंझट खड़े किए थे, कितनी पुरजोर मेहनत की थी। उन सबका त्याग!

उनकी इस सकपकाहट को एक फकीर बैठा देख रहा था। वह हँस पड़ा। लोगों ने उसकी हँसी का कारण पूछा। तो उसने कहा, कुछ नहीं, बस यूँ ही बचपन की एक घटना याद आ गई। बचपन में मैं कुछ लोगों के साथ नदी तट पर वनभोज को गया था। नदी तो छोटी थी, पर रेत बहुत थी और रेत में चमकीले रंगों भरे पत्थर बहुत थे। मैंने तो जैसे खजाना पा लिया था। साँझ तक इतने पत्थर बीन लिए कि उन्हें साथ ले जाना असंभव था। चलते क्षण जब उन्हें छोड़ना पड़ा, तो आँखें भीग गईं। साथ के लोगों की उन पत्थरों की ओर विरक्ति देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उस दिन वे मुझे बड़े त्यागी लगे थे, पर आज जब सोचता हूँ, तो समझ आता है कि पत्थरों को पत्थर जान लेने पर त्याग का कोई प्रश्न ही नहीं है। अज्ञान भोग है। ज्ञान त्याग है। त्याग क्रिया नहीं है। वह करना नहीं होता है। वह हो जाता है। वह ज्ञान का सहज परिणाम है। भोग भी याँत्रिक है। वह भी कोई करता नहीं है। वह अज्ञान की सहज परिणति है।

फिर त्याग के कठिन और कठोर होने की बात व्यर्थ है। उसके लिए घबराने-परेशान होने का भी कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि वह कोई क्रिया नहीं है। क्रियाएँ ही कठिन और कठोर मालूम पड़ती हैं। वह तो परिणाम है, फिर उसमें जो छूटता मालूम होता है, वह निर्मूल्य होता है और जो पाया जाता है, वह अमूल्य होता है।

सच तो यह है कि हम केवल बंधनों को छोड़ते हैं और पाते हैं मुक्ति। छोड़ते हैं कौड़ियाँ और पाते हैं हीरे। छोड़ते हैं मृत्यु और पाते हैं अमृत। छोड़ते हैं अँधेरा और पा लेते हैं प्रकाश। छोड़ते हैं अपनी क्षुद्रता और पा लेते हैं शाश्वत और अनंत। छोड़ते हैं दुःखों को, पीड़ाओं को और पा लेते हैं असीम आनंद। इसलिए त्याग कहाँ है? न कुछ को छोड़कर सब कुछ को पा लेना त्याग नहीं है। शाश्वत और सर्वस्व की प्राप्ति है धर्म।


उज्ज्वल भविष्य का आधार अतिमानस का अवतरण

वैदिक ऋषि अधिमानस में अपनी चेतना को स्थिर कर सके थे। वहाँ पर आलोक का प्रवाह अविराम एवं सतत रहता है। वहाँ पर चेतना एक स्थिर प्रकाश पुँज बन जाती है। परिणामस्वरूप दृष्टि सार्वभौम बन जाती है और मनुष्य वैश्व आनंद का, विश्वव्यापी सौंदर्य का, सार्वभौम प्रेम का आस्वाद लेता है। यहीं पर विश्व प्रेम और आनंद का अनुभव होता है।

मन मनुष्य का दिव्य यंत्र है। मन के कारण मानव बना। विकासक्रम में मानव अतिमानस बनने की कल्पना सँजोने लगा है। इसके प्रणेता हैं श्री अरविंद। श्री अरविंद के अतिमानस योग को आध्यात्मिक जगत् का एक नूतन आविष्कार कहा जा सकता है। उन्होंने देवताओं के देश अधिमानस का अतिक्रमण करने का दुस्साहस किया। सामान्य मानस से अतिमानस के बीच मानस के कई स्तर आते हैं। साधक अपनी मानसिक चेतना का परिष्कार करके इस स्तर तक विकास कर सकता है।

मानस के ये चार स्तर हैं, ऊर्ध्वमानस, उद्भासित मानस, अंतर्बोधी मानस एवं अधिमानस। ये चार स्तर अलग-अलग हैं तथा अनुभवजन्य तथ्यों को प्रस्तुत करते हैं। सिद्धाँत रूप से देखा जाए, तो ये चारों मन अतिचेतना के अंतर्गत आते हैं। कुछ ऐसे भी योगी हैं, जिनके लिए ये स्तर उनकी जाग्रतावस्था की सामान्य चेतना के भाग हैं।

मानस विकास के अनुरूप ही उन दिव्य चेतना के स्वरूपों का दर्शन हो पाता है। यदि विकासक्रम में हमारा अतीत अवचेतन है तो भविष्य है अतिचेतन। रेंबो के शब्दों में कहें तो इसे अभिव्यक्ति देने के लिए ‘एक दूसरी भाषा’ की आवश्यकता पड़ती है।

मानस का विकास सामान्य मानस से प्रारंभ होता है। सामान्य मानस देश और काल में ही घिरा रहता है। वह उससे परे देखने में असमर्थ है। उसके देखने की अपनी विशेषता है, जो आगे के स्तर के लिए एक विवशता है। मन सदैव देश और काल को छोटे-छोटे भागों में बाँटता रहता है। सामान्य मानस एक ऐसी जाली है, जिसके बीच से एक ही तस्वीर दिखाई देती है। एक ही बार में कई वस्तुओं को देखने का वह आदी नहीं है। अगर देखे भी तो वे उसे परस्पर विरोधी प्रतीत होंगे। वह चीजों को एक-एक क्रम से पंक्ति के रूप में देखता है। वह इनसे छलाँग नहीं लगा सकता। चेतना जगत् की सारी बातें उसे तर्क विरुद्ध या धुँधली जान पड़ती हैं।

सामान्य मानस धूसर वर्ण का होता है। वह काफी धुँधली मक्खियों का एक दल-सा प्रतीत होता है, जो लोगों के सिर के चारों ओर चक्कर लगाता रहता है। विचारों का जमघट भी यहीं रहता है। यह प्रदेश अत्यंत स्थूल एवं लसलसा है। सभी उच्चस्तरीय विचार एवं भाव इसके अंदर समाकर दूषित हो जाते हैं। इसमें आनंद और दुःख को सहने की क्षमता अत्यल्प होती है। इस प्रदेश की ज्योति शिखा नन्हीं-सी होती है और यह रुक-रुककर जलती है तथा जल्दी ही बुझ जाती है।

सामान्य मानस देश और काल को तो खंडित करता ही है, इसके अलावा भी वह सभी कुछ को टुकड़ा-टुकड़ा कर देता है। श्री अरविंद इस बारे में ‘मानव चक्र’ में उल्लेख करते हैं, जब भागवत् चेतना इस स्तर में उतरती है, तो लोग उस पर ब्रह्म से लेकर परमाणुपर्यंत विखंडन का नियम लागू होता है। यहाँ पर आनंद खंड-खंड हो जाता है, प्रेम और शक्ति टुकड़ों में बंट जाते हैं और स्वभावतः ज्ञान तथा ज्ञानदृष्टि भी विभाजित हो जाती है। यहीं पर सब कुछ छिन्न-भिन्न होकर रह जाता है। ‘द आवर ऑफ गॉड’ में श्री अरविंद इसे ‘चूर-चूर हुई ऊँधती-ठेलती चेतना’ कहते हैं।

जब व्यक्ति चेतना के इस सामान्य स्तर से ऊपर बढ़ता है, तो आँखों पर चढ़ी जाली का आकार बढ़ता जाता है। अतः श्री अरविंद के चेतना के आरोहण का सारा इतिहास इस आँखों पर चढ़ी जाली को उतारने की कहानी है। चेतना का यह आरोहण केवल काल की विजय गाथा नहीं, अपितु आनंद, प्रेम और व्यापक सत्ता की भी विजय की कहानी है। ‘लेटर्स ऑन योग’ में वे कहते हैं, “ज्यों-ज्यों व्यक्ति इस स्तर से उठकर सर्वोत्तम स्तर की ओर आरोहण करता है, उसके अस्तित्व की तीव्रता, चेतना की तीव्रता, शक्ति की तीव्रता, वस्तुओं में रस की और जीवन के आनंद की तीव्रता बढ़ती जाती है।”

सामान्य मानस के विकासक्रम में ऊर्ध्वमानस प्रथम स्तर है। यह कुछ दार्शनिकों और चिंतकों में प्रायः देखा जाता है। यह कुछ अधिक स्पष्ट होता है। इसका रंग नीलाभ धूसर होता है। यहाँ पर आनंद अधिक टिकाऊ और प्रेम अधिक व्यापक होने लगता है। ऊर्ध्वमानस निम्न स्तरों के समान अनेक चीजों पर उतना निर्भर नहीं रहता।

ऊर्ध्वमानस का प्रकाश तेजहीन एवं कुछ कठोर-सा होता है। देखा जाए, तो यह एक बोझिल मानसिक तत्त्व ही होता है। ऊपर से आने वाली चेतना को अपने सार द्रव्य में मिला लेना इसका प्रमुख कार्य है। यह ऊर्ध्वचेतना को अपने ही ढंग से देखकर विचार करता है, परंतु उस चेतना के बारे में वह तभी समझ पाता है, जब उसे अपने में संपूर्ण रूप से न मिला ले। जो उसे समझ में नहीं आता है, बड़े मजे से उसे काट-छाँटकर अलग कर देता है। इस स्तर की सबसे बड़ी विशेषता है विकासोन्मुखी प्रवृत्ति।

ऊर्ध्वमानस जैसे-जैसे नीरवता को अपनाने लगता है, वह उद्भासित मानस के क्षेत्र में प्रवेश पाने लगता है। यहाँ पर प्रकाश की धाराएँ बहने लगती हैं। सच्ची आध्यात्मिक सुख-शाँति और प्रसन्नता इसी स्तर पर ही मिल पाती है। इसके प्रकाश का रंग सुनहला होता है। इस अवस्था में सदा उत्साह और उमंग बनी रहती है। चेतना सजग, सचेत एवं जाग्रत् होती है। इसकी दुनिया एकदम नवीन होती है, जिसके मापदंड नए, महत्त्व भी कुछ और ही होते हैं। यहाँ पर निरंतर एक आनंद की अखंड धारा बहती है। इस चैतन्य प्रदेश में जीवन अधिक विशाल, अधिक सत्य और प्राणवान् बनता है।

उद्भासित मानस में सदैव सत्यों की दीपावली होती है। छोटे सत्य दीपमाला सजाते हैं। यहाँ पर शब्दों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, मानो प्रत्येक वस्तु का अपना रहस्य हो, एक विशेष अर्थ और निजी जीवन हो। यह तो वर्णनातीत है, जो है केवल सजीव, जीवंत और अनुरागमय।

सामान्यतः इस नवीन चेतना में पहुँचने पर सृजनात्मक शक्तियाँ स्वतः खिल पड़ती हैं। विशेष रूप से यह काव्य क्षेत्र में कहीं अधिक परिलक्षित होती है। श्री अरविंद के शिष्यों में चीनी, भारतीय, अँग्रेज आदि भिन्न भाषाओं के कवियों की संख्या बहुत अधिक थी। यह तथ्य आश्चर्य-जनक है। यह इसी क्षेत्र के विकास की कहानी है। ‘श्री अरविंद केम टू मी’ में इस तथ्य का बड़ा सुँदर वर्णन हुआ है। “शब्द उन अंतर्लोकों में बना-बनाया तैयार रहता है जहाँ से सब कलाकृतियों की उत्पत्ति होती है।”

चेतना के उच्चतर लोकों का वर्णन करने के लिए कविता सबसे अच्छा साधन है। कविता के प्रवाहों में स्पंदनों को आसानी से पकड़ा जा सकता है। श्री अरविंद ने ‘फ्यूचर पोएट्री’ में इस लोक से निःसृत कविता के तमाम उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। शेली और शेक्सपियर की कविताओं की कुछ पंक्तियाँ इसी स्तर से आती प्रतीत होती हैं। श्री अरविंद की कविताओं में यह शुभ्र प्रवाह सतत बना हुआ है। इस प्रवाह को बनाए रखना आसान कार्य नहीं है। स्वामी विवेकानंद की कविताएँ भी उन लोकों का दर्शन कराती हैं।

उद्भासित मानस में सूक्ष्म दृष्टि खुल जाती है और साधक को अलौकिक श्रवण शक्ति भी प्राप्त हो जाती है। इस क्षेत्र की कमी है कि यहाँ पर उत्साह सहज ही उत्तेजना में बदलने लगता है। जब प्राण इस प्रकाश पुँज पर अधिकार कर लेता है, तो इसे कम और कठोर बना देता है। यह फिर एकदम विकृत हो जाता है। इसका प्रकाश फैला रहता है, इसी कारण इसमें सतत क्रमबद्धता नहीं रह पाती है। यह तो नवजन्म का उपक्रम मात्र है।

विमल पारदृश्यता अंतर्बोधी मानस की महत्ता है। इसकी गति तेज है। अपने समान किसी भी क्षेत्र में यह स्वतंत्र विचरण करता है। इसके कदम ऊर्ध्वमानस की तरह जकड़े हुए नहीं हैं। यह मानसिक विचारों का सहारा नहीं लेता। यही तो स्वतंत्रता है। इसी स्वतंत्रता का अभाव ही व्यक्ति को अतिचेतन में उड़ान भरने नहीं देता। इसी स्वतंत्रता एवं नीरवता में ही ज्ञान जन्म लेता है।

जब हम सब बिंदुओं में एक हो जाएँगे तभी खिलेगा दिव्य जीवन का सुवासित पुष्प। श्री अरविंद ने दिव्य जीवन में अंतर्बोध को परम सत्य की एक स्मृति कहा है। इसी दिव्य प्रकाश में ही ज्ञान की प्राप्ति होती है और पता चलता है कि ज्ञान अज्ञात की खोज नहीं है। मनुष्य की अपनी स्वयं की खोज ही है ज्ञान। उस अदृश्य रूप को जानना ही ज्ञान है। हर व्यक्ति के जीवन में यह एक क्षण के लिए ही सही, आता अवश्य है।

अंतःस्फुरित भाषा सूत्रबद्ध है, जबकि उद्भासित मन की भाषा काव्यमय होती है। श्री अरविंद ‘लेटर्स ऑन योगा’ में उल्लेख करते हैं कि अंतर्बोध में वस्तुएँ स्फुरणों द्वारा अंश-अंश करके दिखाई देती हैं, सारी एक साथ नहीं। ‘सिंथेसिस ऑफ योग’ में वे इसे इस तरह अभिव्यक्ति देते हैं, “एक कौंध में जो स्थल हमारे सामने खुलता है, वह सत्य का एक स्थल ही है, इसी तल पर पहुँचकर ही साधक नीरवता द्वारा उच्चतर चेतना की ओर उड़ान भरता है।”

अधिमानस वह उच्च श्रृंग है जो कि मानव चेतना के लिए अति दुर्लभ है। यह एक सार्वभौम चेतना है। अधिमानस देवताओं का लोक है। महान् धर्म प्रवर्तकों की प्रेरणा स्रोत भी यही है। सभी धर्मों की यह जन्मस्थली है। कलाकृतियाँ भी यहाँ जन्म लेती हैं। यहाँ पर व्यक्तित्व का लोप नहीं होता।

श्री अरविंद ने इसी अवस्था में आकर ही भारत को स्वतंत्रता प्रदान की थी। वे ‘लेटर्स ऑन योगा’ में इसकी व्याख्या करते हैं कि उस स्तर में साधक सत्य को आँशिक रूप से नहीं, बल्कि समग्रता से विशाल पुँजों में एक साथ देखता है। यहाँ पर प्रकाश समान एवं पूर्ण एकरूप रहता है। इस क्षेत्र में देश और काल का अत्यंत विस्तार होता है। अधिमानस देवताओं का देश है, जहाँ पर मनुष्य भगवत्कृपा से पहुँच पाता है।

वैदिक ऋषि अधिमानस में अपनी चेतना को स्थिर कर सके थे। वहाँ पर आलोक का प्रवाह अविराम एवं सतत रहता है। वहाँ पर चेतना एक स्थिर प्रकाश पुँज बन जाती है। परिणामस्वरूप दृष्टि सार्वभौम बन जाती है और मनुष्य वैश्व आनंद का, विश्वव्यापी सौंदर्य का, सार्वभौम प्रेम का आस्वाद लेता है। यहीं पर विश्व प्रेम और आनंद का अनुभव होता है।

अधिमानस चेतना में प्रवेश के अनेक मार्ग हैं, जैसे प्रगाढ़ धर्म निष्ठा द्वारा, प्रखर काव्य प्रेम के माध्यम से, चिंतन, कला, वीरता के उत्कर्ष द्वारा। मनुष्य को वर्तमान सीमाओं को पार करने के लिए जिस भी वस्तु से सहायता मिले, उसके माध्यम से वह वहाँ पहुँच सकता है। इस संदर्भ में श्री अरविंद ने कला को विशेष महत्त्व प्रदान किया है। उन्होंने कला को आध्यात्मिक प्रगति के प्रमुख साधनों में से एक माना है। यह धरती ही वह आधार है, जहाँ उस शिखर तक पहुँचा जा सकता है। इसलिए दिव्य लोक की देवसत्ताएँ मनुष्य शरीर धारण कर इस धरती में बारंबार जन्म लेती हैं।

अधिमानस के बाद जो स्तर आता है उसे अतिमानस कहते हैं। श्री अरविंद ने अतिमानस की खोज की। इस योग का मार्गदर्शन उन्होंने स्वामी विवेकानंद के सूक्ष्मशरीर द्वारा अलीपुर जेल में प्राप्त किया था। अतिमानस एक सर्वग्राही दृष्टि है। वह दृष्टि की एक गोलाई है, जिसके अंत में एक केन्द्रीय बिंदु नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों बिंदु होते हैं। अतिमानस मंडलाकार दृष्टि, अखण्ड दृष्टि, शाश्वत दृष्टि है। यह है त्रिकाल विजय। अधिमानस चेतना में देश और काल के महान् विस्तार की दृष्टि रहती है। अति मानसिक तीनों कालों पर छाई रहती है। भूत-वर्तमान और भविष्यत् के अविच्छिन्न संबंध अतिमानसिक चेतना में टूटकर अलग नहीं हो जाते, ज्ञान के एक एकाकी अविराम चित्र के अंदर वे तीनों एक साथ व्यक्त रहते हैं।

श्री अरविंद ने अतिमानस के धरती पर अवतरण की भविष्यवाणी की है। उन्होंने इस योग के माध्यम से मनुष्य मात्र का रूपांतरण चाहा है। उनके अनुसार धरती पर स्वर्ग का अवतरण एवं मनुष्य में देवत्व का उदय तभी संभव है, जब श्रेष्ठ आत्माएँ लोभ-मोह की जंजीरों को तोड़कर आगे आएँ। यही इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य का आधार है।


गृहस्थ में रहते हुए नारी बहुत कुछ कर सकती हैं (kahani)

अवंतिका बाई के पति मुँबई में मशीनों की दुकान मे काम करते थे। गुजारा ठीक चलता था, पर उनके हाथ की एक उँगली मशीन में कट गई थी। उनने प्रेरणा देकर पत्नी को नर्स की ट्रेनिंग कराई और स्वावलंबी तथा सुसंस्कारी बनाने में कोई कमी न रखी। नर्स की नौकरी करने के उपराँत भी अवंतिका बाई ने देश सेवा के कार्यों में भाग लेना शुरू किया और वे मुँबई में अनेकों महिला कार्यकर्त्री उत्पन्न करने में सफल रहीं।

वे गाँधी जी के स्वतंत्रता आँदोलन में सम्मिलित हुईं और नौ महीने की जेल काटी। गाँधी जी ने चंपारन सत्याग्रह में महिला संपर्क के लिए उन्हें विशेष रूप से बुलाया था।

मुँबई जाकर उन्होंने ‘भारतीय महिला समाज’ की स्थापना की और प्रौढ़ महिला शिक्षा तथा कुरीति उन्मूलन के लिए विशेष प्रयत्न किया एवं मुँबई कारपोरेशन की सदस्या चुनी गईं। उनकी सार्वजनिक सेवाओं से मुँबई का बच्चा-बच्चा परिचित और प्रभावित था।

यह सब काम उन्होंने गृहस्थ के उत्तरदायित्व निभाते हुए पूरे किए और उदाहरण प्रस्तुत किया कि गृहस्थ में रहते हुए भी नारी बहुत कुछ कर सकती हैं। यह उनके पति के सहयोग से ही संभव हुआ।


देवसंस्कृति की विरासत हैं, ऐसे अध्यात्मवेत्ता

साधारण वेश में वह असाधारण थे। यह असाधारणता उनकी कठोर तप-साधना से उपजी, पनपी एवं निखरी थी। महावीर हनुमान् उनके आदर्श एवं आराध्य थे। राम नाम उनका सर्वस्व था। वह कहीं भी, किसी भी स्थिति में हों, प्रत्येक श्वास के साथ उनका नाम-जप चलता रहता। वह कहा करते थे कि उपासना हो तो महावीर हनुमान् जैसी। साधना ऐसी हो, जैसी हनुमान् ने की। आराधना के मूर्तिमान् स्वरूप भला मेरे आराध्य हनुमान् के सिवा और कौन होगा। महावीर हनुमान् की यह उक्ति “राम काजु कीन्हें बिनु मोहिं कहाँ विश्राम” ही उनका आदर्श वाक्य था। सचमुच ही वह कभी विश्राम नहीं करते थे। सदा-सर्वदा अनथक भाव से आत्मकल्याण एवं लोककल्याण में रित रहते।

प्रातः दो-ढाई बजे जगकर स्नान आदि के उपराँत वह राम नाम के जप में तल्लीन हो जाते। उनकी यह ध्यान निमग्नता दोपहर बारह बजे तक अविराम चलती रहती। बारह बजे से तीन बजे तक सामान्य काम-काज निबटाते। कभी किसी दुःखी-पीड़ित प्राणी की सेवा-सहायता करते। उनकी इस सेवा-सहायता क्रम में जाति-पाँति, नर-नारी अथवा ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं था। ‘सिय राम मय सब जग जानी’ इस भाव में विभोर होकर उन्होंने जनसेवा को प्रभु सेवा मान लिया था। सेवा का अल्प समय भी उनके महत् भाव से जुड़कर महत् ही बन जाता।

तीन बजे अपराह्न फिर से राम नाम जप एवं ध्यान की निमग्नता प्रारंभ हो जाती, जो रात्रि बारह बजे तक अबाधित चलती रहती। रात्रि में थोड़ी देर की योग निद्रा में ही वे पर्याप्त विश्राँति पा लेते। सोलह वर्ष की किशोरवय से चालीस वर्ष की प्रौढ़ आयु तक यह क्रम चलता रहा। सप्ताह में केवल मंगलवार के दिन एक समय फलाहार ही उनके शरीर धारण का आधार था। तप के कठोर अनुबंधों से देह-मन-प्राणों को कसना-तपाना देखकर सामान्य जन चकित रह जाते। सभी की श्रद्धा स्वभावतः उनकी ओर उमड़ पड़ती। पर वह इस सब से बेखबर थे। उन्हें खबर थी तो बस अपने आराध्य की। पवन पुत्र हनुमान् को समर्पित हो रहा था उनके अस्तित्व का कण-प्रतिकण।

बजरंग बली भी अपने इस अनन्य भक्त की निष्ठा पर कृपालु हुए बिना न रह सके। वह भक्त के सम्मुख प्रत्यक्ष आ पधारे और उनसे वर माँगने को कहा। अपने आराध्य के इस कथन पर उन्होंने इतना ही माँगा, हे महावीर मारुति! आप तो साधु-संतों के रखवाले हो ही, मुझ पर भी जब कष्ट पड़े, तो बचा लेना। प्रभु! मैं भी आपके आदर्शों पर चल सकूँ, आत्मकल्याण एवं लोककल्याण में निरत रहूँ, इतनी सामर्थ्य देना। सिर पर हाथ रखकर पवन पुत्र हनुमान् ने इन्हें अपना अमोघ आशीष दिया, साथ ही अष्ट सिद्धि का वरदान भी दे डाला।

इस महासाधक ने जब अपने गुरुदेव अद्वैत भारती से इस पर चर्चा की तो समर्थ गुरुदेव ने इतना ही कहा, पुत्र! लोकेषणा एवं वित्तेषणा के लिए कभी भी इसका उपयोग न करना। उन्होंने उन्हें समझाते हुए कहा, बेटा आनंद भारती! जीवन की हर सामर्थ्य का सदुपयोग लोकसेवा में है। लोकसेवा ही प्रभु सेवा है। इस सत्य को प्रत्येक क्षण स्मरण रखना। आनंद भारती अपने गुरुदेव अद्वैत भारती के निष्ठावान् शिष्य थे। उन्होंने गुरुदेव को सिद्धि के सदुपयोग का वचन दिया और संतों की एक मंडली को साथ लेकर पदयात्रा द्वारा तीर्थभ्रमण करने हेतु निकल पड़े। उनकी मंडली काशी की यात्रा संपन्न करके पुनः वापस कलकत्ता आ गई।

उन्हीं दिनों 1857 ई. की क्राँति विफल हुई थी। हालाँकि इतना अंतर जरूर आया था कि अब सत्ता ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में न होकर सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन थी। 1857 ई. के इसी वर्ष में लार्ड वारेन हेस्ंिटग्स को ब्रिटिश भारत का सर्वप्रथम गवर्नर जनरल बनाया गया था। अँग्रेजों के लिए भारतवासी सदा से उपेक्षा एवं अवमानना के पात्र थे। इन दिनों यह उपेक्षा कुछ ज्यादा ही बढ़ी-चढ़ी थी। विदेशी अँग्रेज सामान्य नागरिकों के साथ साधु-संतों का भी अपमान करने से नहीं चूकते थे।

कलकत्ता वापस आकर रुकी साधु मंडली ने अपनी संध्या आरती शुरू की। शंख, नगाड़े, तुरही, नागफणी, झाँझ, ढोल आदि के नाद से समूचा वातावरण गूँज उठा। लगभग डेढ़ सौ संतों के अलख निरंजन की गूँज से अँग्रेजों की छावनी भी गूँज उठी। सच कहा जाए, तो गूँज ही नहीं काँप उठी। छावनी का अँग्रेज अफसर सिपाहियों की एक टुकड़ी साथ लेकर वहाँ पहुँचा और क्रोध से चिल्लाया, बंद करो यह शोरगुल और अपना डेरा-तंबू उठाकर चलते यहाँ ला रहे थे, कितने मन लकड़ियाँ हमारे लिए तुमने जलाईं? सबने कहा, बाबा कुल लकड़ियाँ नब्बे मन थीं।

संत ने कहा, तो जाओ तुम्हारी सल्तनत भी इन नब्बे मन लकड़ियों की तरह नब्बे साल में समाप्त हो जाएगी। तुम्हारे भाँति-भाँति के अन्यायों एवं अत्याचारों की ज्वालाओं के बीच भी भारत का कुछ नहीं बिगड़ेगा। वह प्रभु की कृपा से उसी तरह से सुरक्षित निकल आएगा, जैसे मैं निकल आया।

सावधानी से संत की भविष्यवाणी को लार्ड वारे हेस्ंिटग्स ने नोट किया। लंदन टाइम्स की लीथो कॉपी में यह हकीकत छपाई गई। लंदन टाइम्स ने लिखा, भारतीय संतों की सिद्धियों की अनेक बातें अब तक सुन रखी थीं, परंतु यह अद्भुत चमत्कार तो हजारों लोगों की आँखों के सामने हुआ कि नब्बे मन लकड़ियाँ जल गईं, पर पता नहीं चला कि उसमें वह साधु कैसे जीवित बच गया और उसने यह भी कह दिया कि नब्बे वर्षों बाद तुम्हें विदा होना पड़ेगा।

संतों की भविष्यवाणी की क्षमता तो भारतीय अध्यात्म शास्त्र में हर कहीं वर्णित है, पर विश्व इतिहास ने भी इस कालजयी सामर्थ्य को जान लिया। सचमुच ही 1857 से 1947 तक यानि नब्बे वर्षों तक ही अँग्रेजों का राज्य रहा। संत आनंद भारती भी इस घटना के बाद बाबा लक्कड़ भारती के रूप में प्रसिद्ध हो गए। लोग उन्हें इसी नाम से जानने व पुकारने लगे।

हजारों लोग इस घटना के बाद उनके दर्शनों के लिए आने लगे, तो संत रातों-रात अपनी साधुओं की मंडली के साथ गुजरात की तरफ तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े। जब वह तलेटी पर पहुँचे तो संतों ने गिरनार पर्वत की परिक्रमा सभक्ति पूरी की। यहाँ के सिद्ध क्षेत्र में उनकी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ और भी प्रखर हो गईं। बाबा लक्कड़ भारती ने सबसे कह दिया, अब मैं कहीं नहीं जाऊँगा और यहीं पर निवास करूंगा।

गिरनार की तलहटी में ही उन्होंने भवनाथ के समीप ही अपनी तपसाधना एवं लोकसेवा का उपक्रम प्रारंभ किया। यह क्रम काफी समय तक लगातार चलता रहा। एक दिन बाबा लक्कड़ भारती ने कहा, मैं कल सबेरे जीवित समाधि लूँगा और दूसरे दिन असंख्य जनों के बीच वह पद्मासन लगाकर बैठ गए। अपनी महासमाधि के कुछ पलों पूर्व वह सबको संबोधित कर कहने लगे, अपने देश से ये अँग्रेज तो जाएँगे ही। इन अंग्रेजों के जाने के बाद भी देश में भारी उथल-पुथल रहेगी, पर सारी उथल-पुथल और संकटों की आग में तपकर देश का उज्ज्वल भविष्य उभरेगा। भारतवर्ष विश्व का सिरमौर बनेगा। इसी के साथ उन्होंने प्राणों को ब्रह्मरंध्रों में चढ़ाकर समाधि ले ली। आज भी सच्चे अध्यात्मवेत्ता बाबा लक्कड़ भारती का समाधि स्थल अनेकों जिज्ञासु भक्तों को कृतार्थ है।


माँ की सेवा (kahani)

कलकत्ता में जन्मे के.सी.डे की आँखें डेढ़ वर्ष की उम्र में चली गईं। पाँच वर्ष के थे तब पिता मर गए। विधवा माता ने उन्हें थोड़ा-बहुत स्वयं ही पढ़ाया। वे मजूरी करने जातीं, तो डे को साथ ले जातीं। वे बच्चे के भविष्य के बारे में चिंतित तो रहतीं, पर धैर्य नहीं खोया। उन्हें स्कूली शिक्षा के स्थान पर सुसंस्कारिता, स्वावलंबन का पाठ पढ़ाया। संगीत में पुत्र की अभिरुचि को देखकर उन्होंने उसे वैसा ही शिक्षण देने की सुविधा जुटा दी। स्वयं मेहनत करके पुत्र के लिए साधन जुटातीं। अपने लिए वे सदैव ‘डे’ से कहा करतीं, “मेरे लिए चिंता न करो। अपने पैरों स्वयं ही खड़ा होने का प्रयास करो।” डे ने कई संगीतकारों से उनकी सेवा करते हुए शिक्षा पाई। युवा होने से पहले ही उन्होंने संगीत में प्रवीणता प्राप्त कर ली। टूटे-फूटे वाद्य यंत्रों के सहारे घर पर अभ्यास करते रहते।

कुछ दिनों में उनकी ख्याति सर्वत्र फैली। छोटे-छोटे संगीत सम्मेलनों के बाद उन्हें फिल्म कंपनियों ने बुलाया। अनवरत अभ्यास ने उनका कंठ भी निखार दिया था। एक-एक करके उनने प्रायः एक दर्जन गाने फिल्मों में पार्श्व गायक के रूप में गाए। कभी अभिनय करना पड़ा, तो अपनी सादी पोशाक में कैमरे के सामने आए थे। बनावट से उन्हें चिढ़ थी।

भारत के गायकों में फिल्म जगत् पर अपना आधिपत्य जमाने वाले एक ही थे, के.सी.डे। जिन फिल्मों के साथ उनका नाम जुड़ा होता, उसे देखने दर्शकों की भीड़ टूट पड़ती। वे सदैव इस यश का श्रेय अपनी माँ को देते रहे। अंतिम समय तक उनकी सेवा भी खूब की।


तीन शक्तिधाराएँ पथ प्रशस्त करेंगी इक्कीसवीं सदी का

यह एक सार्वभौम नियम है कि यदि मंजिल का, गंतव्य का स्थान निर्धारित हो, तो यात्रा किसी भी दिशा से आरंभ की जाए, देर-सबेर उस गंतव्य तक व्यक्ति पहुँचकर ही रहेगा। उदाहरण के लिए दिल्ली, कलकत्ता एवं मद्रास से मुँबई के लिए तीन व्यक्तियों द्वारा यात्रा की जाए, तो भले ही रास्ता तथा गाड़ियाँ अलग-अलग हों, किन्तु पहुँचेंगे वे सभी एक ही स्थान पर। यद्यपि यात्रा विभिन्न दिशाओं से आरंभ की गई है, किंतु अलग-अलग पथ पर चलते हुए निर्धारित केंद्र बिंदु पर अंततः वे तीनों पहुँच ही जाते हैं। प्रगति के हर क्षेत्र में यही नियम लागू होता है।

इन दिनों मानव समुदाय की सुख-शाँति, समृद्धि-वैभव हेतु समाज में कई प्रकार के प्रयास चल रहे हैं। स्थूल रूप से यदि इन्हें विभाजित किया जाए, तो ये तीन वर्गों में विभक्त होते हैं-(1) धर्म, (2) विज्ञान और (3) राजनीति। इस संबंध में प्रख्यात पत्रिका ‘नेचर’ के संपादक श्री रिचर्ड ग्रेगरी, जो वर्षों तक विज्ञान परिषद् ग्रेट ब्रिटेन के अध्यक्ष भी रहे हैं, ने अपनी पुस्तक ‘गाँड्स एंड मेन’ में लिखा है, “मेरे पितामह आजीवन धर्म का प्रचार करते रहे। मेरे पिता एक कट्टर समाजवादी नेता रहे और मुझे इन दोनों क्षेत्रों के अतिरिक्त तीसरे क्षेत्र विज्ञान क्षेत्र में काम करने का अवसर मिला। मैंने बिना किसी पूर्वाग्रह अथवा संबंधियों के प्रभाव के इन तीनों विषयों का गहरा अध्ययन किया है तथा उससे मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि धर्म, समाजवाद तथा विज्ञान तीनों द्वारा निर्दिष्ट जीवन-दर्शन आधारभूत रूप से एक ही है। तीनों का एक ही उद्देश्य है कि व्यक्ति एवं समाज का स्तर ऊँचा उठे। सत्यान्वेषण एवं आध्यात्मिक सिद्धाँतों को जीवन में किस प्रकार उतारा जाए, यही इनका मूलभूत प्रयोजन है।”

वस्तुतः इन तीनों के संबंध में जनमानस में बड़ी भ्राँतियाँ हैं। अपनी-अपनी चिंतन क्षमता के अनुरूप वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों एवं धर्मशास्त्रियों ने इन विषयों की परिभाषा को एक सीमा विशेष में बाँध दिया है, जबकि वास्तव में इनकी कोई विभाजन रेखा नहीं है। धर्म के संबंध में तो कहना ही होगा कि उसका समग्र स्वरूप सत्य की खोज को दृष्टिगत रखकर ही गढ़ा गया है। प्रथा-परंपराएँ तो समय के अनुरूप बदलते रहने वाली नियम-व्यवस्थाएँ भर हैं। इन्हें धर्म की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए। धर्म का मूल सिद्धाँत तो सभी मत-संप्रदायों में एक ही है, “सत्कर्मों द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करना तथा उसके अस्तित्व को मानना। वे यह भी मानते हैं कि ईश्वरीय व्यवस्था भले-बुरे कर्मों का पुरस्कार-दंड स्वयं निर्धारित करती है।”

धर्म का अर्थ है, वे आस्थाएँ, जो व्यक्ति को सत्प्रवृत्ति अपनाने और सत्कर्म करने के लिए प्रेरित करें, ताकि उसका अपना और सामाजिक जीवन अधिकाधिक सुखी व समुन्नत बने। धर्म व्यक्ति की भाव-संवेदनाओं को, अंतःकरण के मर्मस्थल को प्रभावित कर सुख-शाँति एवं सुव्यवस्था की स्थापना करना चाहता है। धर्म प्रचारक जहाँ भी गए हैं तथा उन्होंने सच्चे मन से प्रयास किए हैं, वहाँ उन्हें इस तरह की अभीष्ट सफलता भी मिली है।

राजनीति का भी यही उद्देश्य है, समाज में शाँति, सुरक्षा व सुव्यवस्था बनाए रखना। अब तक विश्व की राजनीति ने विकास के जितने भी चरण पूरे किए हैं, उस क्षेत्र में जितने भी प्रयोग हुए हैं, सबके सब इसी उद्देश्य से किए गए। लोगों में जब अव्यवस्था व छीना-झपटी चलने लगी, बलवान दुर्बलों को दबाने लगे, तो व्यवस्था बनाई गई कि कुछ शक्तिशाली व्यक्ति इस अनर्थ का निवारण करें। बलवानों को उद्दंडता बरतने से रोकें तथा दुर्बलों को सुरक्षा एवं संरक्षण उपलब्ध कराएँ। राजतंत्र, प्रजातंत्र से लेकर अधिनायकवाद और समाजवादी राजनीतिक दर्शनों का एकमात्र यही उद्देश्य रहा कि समाज में कमजोर-से-कमजोर व्यक्ति को भी जीने और सुखपूर्वक जीवनयापन करने की सुविधा व अवसर समान रूप से मिल सके।

यों तो गलत व्यक्ति कहाँ नहीं होते और वे जहाँ भी रहते हैं, अच्छे उद्देश्यों से आरंभ किए गए कार्यों को गलत, विकृत और गया-गुजरा बना देते हैं। धर्मक्षेत्र को ही लें तो इसमें इन्हीं कारणों से विकृतियाँ आईं कि वह क्षेत्र गलत व्यक्तियों के हाथ में चला गया, जिन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए जनश्रद्धा का दोहन आरंभ कर दिया। लोकमानस में आदर्शवादी आस्थाओं, उत्कृष्ट भावनाओं और उच्च विचारणाओं की स्थापना का कार्य ताक में रखकर रूढ़िवादी परंपराओं, अंध-विश्वासों, रीति-रिवाजों तथा स्वयं के द्वारा दी गई व्यवस्थाओं के प्रति अंध-श्रद्धा रखने के लिए तैयार किया जाने लगा ताकि निजी स्वार्थ पूरे होते रहें।

धर्म के पास लोकमानस पर, जन भावनाओं पर प्रभाव डालने की शक्ति थी, तो राजनीति के पास दंड और बल की ताकत थी। इस शक्ति का उद्देश्य भी दुष्ट-दुर्जनों को दंड देना और उन्हें सही रास्ते पर चलाना था लेकिन हुआ यह कि राज्य व्यवस्था के संचालन सूत्र ऐसे व्यक्तियों के हाथों में पहुँच गए, जिनके लिए सामाजिक हित गौण और व्यक्तिगत स्वार्थ अधिक मूल्यवान् थे। जहाँ-जहाँ भी ऐसा अनर्थ हुआ, वहीं-वहीं विकृतियाँ, कुप्रबंधन और दोहन-शोषण की दुःखद परिस्थितियाँ दिखाई देने लगीं।

वास्तव में मूर्द्धन्यों द्वारा निर्धारित राजनीति का भी वही उद्देश्य था, जो धर्म का रहा है। राजनीति के माध्यम से बाहरी व्यवस्था सुधारने, उसे ठीक रखने के प्रयास किए जाने चाहिए, तो धर्मतंत्र से लोगों की आस्थाओं और भावनाओं को परिष्कृत होना चाहिए। इन्हीं दिनों पिछली-तीन-चार शताब्दियों में विज्ञान के रूप में मनुष्य के पास एक नया शक्ति स्रोत हाथ में आया। सृष्टि की विभिन्न गतिविधियों की जिज्ञासा और शोध की दृष्टि से अध्ययन करने पर मनुष्य के हाथ में कुछ ऐसे नियम व सूत्र आए, जिनसे मनुष्य को थका देने वाले श्रम से मुक्ति और उपलब्धियों के कोष में अभिवृद्धि की संभावनाएँ दिखाई देने लगीं। उन संभावनाओं को यंत्रों के आविष्कार, नए-नए शक्ति स्रोतों की शोध के रूप में साकार भी किया गया।

अब से पांच सौ वर्ष पूर्व के मनुष्य का जीवन कितनी असुविधाओं से ग्रस्त था, इसकी अब कल्पना भी नहीं की जा सकती। अगर मान लिया जाए कि कुछ दिनों के लिए रेलगाड़ी, मोटर, यान आदि सब बंद हो जाएँ, बिजली का उपयोग वर्जित कर दिया जाए, तो लोगों को अपना जीवन ही भार लगने लगेगा। पहले ये सुविधाएँ नहीं थीं, इसलिए मनुष्य इनके अभाव की कल्पना ही नहीं करता था। अब ये उपलब्ध हैं, इसलिए इनके बिना जीना भी दूभर लगता है। वह इसलिए कि हम इन सुविधा-साधनों के अभ्यस्त हो गए हैं, जो भी हो, इन वैज्ञानिक साधनों के कारण अब संसार इतना छोटा हो गया है कि सारा विश्व एक परिवार के रूप में सिमट गया है। इससे पूर्व अपने परिवार के किसी सदस्य को इतनी दूर बसने भी नहीं दिया जाता था, क्योंकि तब उससे सरलतापूर्वक संपर्क नहीं किया जा सकता था, परंतु आज हजारों मील दूरी होने पर भी कुछ ही घंटों में पहुँचा जा सकता है।

विज्ञान ने भी मनुष्य को सुरक्षित और शाँतिपूर्ण जीवन यापन के कितने ही आधार खड़े किए, परंतु धर्म और राजनीति की तरह ही विज्ञान का भी गलत उपयोग हुआ, जिससे मानव समाज के लिए और भी भयंकर संकट उठ खड़े हुए हैं। विज्ञान की उपलब्धियों का जब तक साधन के रूप में उपयोग किया जाता रहेगा, तब तक वह मनुष्य समाज को ऊँचा उठाने में योगदान देता रहेगा, लेकिन यदि इसका उपयोग अनुचित ढंग से शस्त्र की तरह होने लगा तो उसके परिणाम धर्म और राजनीति के दुरुपयोग से भी अधिक भयंकर-विनाशकारी होंगे, जैसा कि पिछले दो विश्वयुद्धों में देखा गया। यही कारण है कि अब विश्वभर के मूर्द्धन्य मनीषियों, वैज्ञानिकों को इस तथ्य को एक मत से स्वीकार करना पड़ा है कि धर्म और राजनीति के दुरुपयोग से भी उतने दुष्परिणाम नहीं हुए जितने कि विज्ञान के दुरुपयोग से संभावित हो गए हैं। क्योंकि धर्म और राजनीति तो अब तक एक व्यवस्था, एक तंत्र के रूप में ही कार्य कर रहे थे। उन क्षेत्रों की विकृतियाँ अपने-अपने सीमा क्षेत्र में ही अनर्थ उत्पन्न करती थीं, परंतु विज्ञान के रूप में उपलब्ध हुई महाशक्ति ने सारी मनुष्य जाति के लिए सर्वग्राही संकट उत्पन्न कर दिया है।

चाकू से बंधन भी काटे जा सकते हैं और हाथ-पैर भी। अग्नि में मकान की ईंटें भी पकाई जा सकती हैं और मकान को आग भी लगाई जा सकती है। कुएं के पानी से प्यास बुझाकर जीवनरक्षा भी की जा सकती है और उसमें कूदकर प्राण भी दिए जा सकते हैं। धर्म अर्थात् भावनाओं, राजनीति अर्थात् व्यवस्था में गलत व्यक्तियों का प्रवेश और उनके द्वारा किया गया दुरुपयोग हाथ-पैर काटने, मकान जलाने और कुएं में गिरकर प्राण गँवाने जैसी दुःखद स्थितियाँ ही उत्पन्न करेंगे।

क्या इन अनर्थों को रोकने का कोई उपाय नहीं है? यह प्रश्न करते हुए सुप्रसिद्ध दार्शनिक और वैज्ञानिक रिचर्ड ग्रेगरी ने अपनी उपर्युक्त पुस्तक में कहा है, “तीन विभिन्न कोणों से चलने वाली ये तीन गाड़ियाँ यदि सही दिशा पर आ जाएँ, तो न केवल भविष्य के संकटों से सरलतापूर्वक बचा जा सकता है, वरन् उज्ज्वल भविष्य का सुँदर ताना-बाना भी बुना जा सकता है।”

क्या हैं भावी संकट? विज्ञान की विनाशकारी संभावनाएँ तो ऊपर बताई जा चुकी हैं। धर्म क्षेत्र में घुस पड़ी विकृतियाँ मनुष्य को अनास्थावान् बनाती जा रही हैं। राजनीति के क्षेत्र में आई विकृतियाँ उसे दिन-प्रतिदिन दुर्दम्य, स्वार्थी, उद्दंड और असामाजिक, अनैतिक बनाती जाएँगी। ऐसी स्थिति में आशा की किरण मात्र धर्मक्षेत्र में दिखाई पड़ती है, किंतु उसे भी अपने क्षेत्र में घुस पड़ी विकृतियों को हटाना पड़ेगा, साथ ही अवाँछनीय व्यक्तियों को निरुत्साहित करना होगा। इसके लिए कुछ ऐसे व्यक्तियों को आगे आना होगा, जो इस क्षेत्र में प्रकाश स्तंभ के रूप में चमक सकें। साधन और सामर्थ्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है, उन्हें उपयोग करने वाले व्यक्ति की सूझ-बूझ तथा दृष्टि। और यह धर्माचरण से ही विकसित होगी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भविष्य की राजनीति और कल का विज्ञान जब आध्यात्मिक मूल्यों से संचालित, प्रेरित होंगे, तभी वे अपनी समर्थता सिद्ध कर सकेंगे। तीनों का समन्वित स्वरूप ही समाज की भावी दिशाएँ और गतिविधियाँ निर्धारित करेगा।


कुँडलिनी महाशक्ति अंधविश्वास नहीं

जैन आचार्यों ने कुँडलिनी शक्ति का उल्लेख तेजोलेश्या के रूप में किया। आचार्यश्री महाप्राज्ञ के अनुसार यह शक्ति सूर्य के प्रतिनिधि की तरह मनुष्य के काय कलेवर में विद्यमान रहती है। ब्रह्माँड में सूर्य जितना प्रचंड, ऊर्जावान् और अग्नि से भरा हुआ है, अंतर्जगत् का सूर्य भी अपने स्वरूप और स्थिति के अनुसार उतना ही प्रदीप्त है।

उन्नीसवीं शताब्दी में हुए एक प्रसिद्ध समाज सुधारक संत ने कुँडलिनी की खोज अद्भुत तरह से की। स्वभाव से ही खंडनवादी और तर्क-विवाद में गहरी रुचि रखने वाले इन संत की दृष्टि में अध्यात्म और साधना का अर्थ कतिपय मानसिक-शारीरिक अभ्यास ही था। अध्यात्म क्षेत्र को इन अभ्यासों तक ही सीमित मान लें तो उसका विस्तार बीस प्रतिशत ही रह जाता है। बाकी अस्सी प्रतिशत स्वरूप नकारना पड़ता है। यह स्वरूप स्थूल साधनाओं के अभ्यासों के बाद अंतर्जगत् में उतरने के साथ शुरू होता है। अस्सी प्रतिशत इस भाग को रहस्य और गुह्य लोक भी कह सकते हैं। कुँडलिनी भी इसी लोक से संबंधित है। उन संत महापुरुष के अनुसार रहस्य या गुह्य विद्या जैसी कोई चीज होती ही नहीं है। अगर इस तरह का दावा किया जाता है, तो वह पाखंड और अविद्या के सिवा कुछ नहीं है।

योग, आध्यात्मिक तंत्र और रहस्यवाद के नाम पर निश्चित ही जालसाजियाँ हुई हैं, लोगों को बेवकूफ बनाया और अपना उल्लू सीधा किया गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि समूची गुह्य विद्याएँ ही झूठी और ठगी के लिए गढ़ी गई हैं। उन महात्मा की धारणा थी कि कुँडलिनी आदि का कोई अस्तित्व नहीं है। यह सिद्ध करने के लिए वे गंगा तट पर गए। एकाँत स्थान में अपने शिष्यों के साथ बैठे और इस विषय पर प्रवचन करने लगे। प्रवचन करते-करते उन्होंने गंगा की धारा में बहकर आता हुआ एक मुरदा देखा। अपने एक शिष्य से कहकर उसे खींचकर किनारे पर लगाया। कहने लगे कुँडलिनी के रूप में योग की कोई महान् शक्ति यदि शरीर के मूलाधार चक्र नामक स्थान पर विद्यमान है, तो उसका अस्तित्व दिखाई देना चाहिए। किसी-न-किसी रूप में तो वह मौजूद होगी। इतना कहकर स्वामी जी ने चाकू से मूलाधार चक्र वाला स्थान चीरा और शिष्यों को बताया, देखिए यहाँ कोई कुँडलिनी नहीं है।

बहुत लोगों की मान्यता है कि कुँडलिनी क्योंकि दिखाई नहीं देती, अतः उसका अस्तित्व नहीं है। इनमें आत्मिक दृष्टि से बड़ी ऊँचाई तक गए संत-महात्मा भी शामिल हैं। उनकी इस आध्यात्मिक स्थिति पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता, लेकिन उनकी अपनी प्रतीति नहीं है। वे इसे स्थूल रूप में देखना चाहते हैं, इसलिए कुँडलिनी के अस्तित्व से इनकार करते हैं, यह दृष्टिकोण गलत है।

परमात्मा की शक्ति का अनुभव विभिन्न लोगों को विभिन्न रूपों में होता है। जरूरी नहीं कि दो सिद्ध संतों को एक ही रूप में हो। यह अनुभूति इतनी भिन्न भी होती है कि दोनों के अनुयायी मिलें तो एक-दूसरे के इष्ट अभीष्ट को गलत ठहराने लगें। ईसा के अनुयायियों को नृत्य करते और मुरली बजाते श्रीकृष्ण गलत प्रतीक लग सकते हैं। बहुत से आलोचकों को श्रीकृष्ण का नटवर नागर रूप विलासी लोगों के मन की उपज ही लगता है, क्योंकि इस बहाने वे अपने मन की कुत्साओं पर आवरण डाल सकते हैं। मुहम्मद साहब के अनुयायियों को ईसा का उपदेश धर्म विरोधी ला सकता है कि अपने शत्रु को क्षमा कर दो। यह उपदेश तब धर्म विरुद्ध ही होगा कि कोई तुम्हारे बायें गाल पर थप्पड़ मारे, तो दायाँ भी उसके आगे कर दो। मुहम्मद साहब का धर्म तलवार का धर्म है और वह पापियों के प्रति .... को एक सीमा के बाद कमजोरी मानता है। कबीर के लिए तुलसी के राम ‘मन का भरम’ है, क्योंकि उनकी अनुभूति के अनुसार परमात्मा का सगुण साकार रूप है ही नहीं है। वह गुण और आकार से परे हैं, सीमा से भी परे। तुलसी के लिए धनुर्धारी राम परब्रह्म का ही स्वरूप हैं। आध्यात्मिक अनुभूतियों का स्वरूप व्यक्ति, स्वभाव और अंतस् की स्थिति के अनुसार अलग-अलग होता है। एक अनुभव के आधार पर दूसरे को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

कुँडलिनी शक्ति को भ्रम, भटकाव और ठगी का आधा बताने वालों के मन में इस विद्या के दुरुपयोग से जन्मा .... ही मुख्य रहा होगा। मध्यकाल से बीसवीं सदी तक गुह्य विद्याओं का जैसा दुरुपयोग हुआ, उसका एक शिकार कुँडलिनी शक्ति भी रही। अब भी लोग इसे आनन-फानन में जगा देने और देखते-ही-देखते महान् योगी बना देने का आश्वासन बाँटते घूमते हैं। इस तरह के दुरुपयोग या बाजारवाद से सावधान रहना चाहिए। यह मानकर चलना चाहिए कि कुँडलिनी ऊर्जा का विराट् सागर है, तो इसे घड़े में पानी भरने की तरह समेटा नहीं जा सकता, न ही अधिकार जताया जा सकता है।

कुँडलिनी के विषय में फैली दोनों तरह की भ्राँतियों का निराकरण होना चाहिए। वह न तो पाखंड, छलावा और कोरा रहस्यवाद है, न ही हाथ मिलाकर, सिर थपथपाकर किया जा सकने वाला शक्ति का विस्फोट। योग शास्त्रों और गुह्य विद्याओं के आधुनिक वैज्ञानिकों ने शरीर में जहाँ कुँडलिनी का वास बताया है, वह एक प्रतीक मात्र है। योग ग्रंथों और उपनिषदों में शरीर विज्ञान का जैसा चित्रण किया गया, वह सूक्ष्मशरीर का वर्णन है। स्थूलशरीर और उसके अंगों से तालमेल नहीं बिठाना चाहिए। उदाहरण के लिए, योग ग्रंथों में हृदय को सीने में उस स्थान पर बताया गया है, जहाँ छाती की अस्थियाँ मिलती हैं और उनके मिलन स्थल पर एक .... है, योगियों और रहस्यदर्शियों के अनुसार यह केंद्र समस्त भाव संवेदनाओं का केंद्र है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से इस मान्यता में कोई दम नहीं है। हृदय सीने के भाग में स्थित एक गुब्बारे जैसा माँस पिंड है। जो शरीर में रक्त संचार और शुद्धि का कार्य करता है, उसमें भाव संवेदना जैसी कोई गतिविधि ही नहीं है।

शरीर के जिस भाग में कुँडलिनी का वास बताया गया है, उसे भी इसी उदाहरण से समझना चाहिए। कुँडलिनी और हृदय आदि ही नहीं योग ग्रंथों में वर्णित सभी केंद्रों और मर्मस्थलों को भी इसी आधार पर देखना चाहिए। सूक्ष्मशरीर और उसके अंग-अवयवों को, स्थूलशरीर के अंग-अवयवों पर आधार स्थिति की तरह नहीं मानना चाहिए। वे आधार प्रतीक और संकेत मात्र हैं।

स्थूलशरीर और अस्तित्व की परवर्ती सत्ताओं के बारे में स्पष्ट हो जाने के बाद कुँडलिनी शक्ति का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। उपनिषदों में सबसे पहले इसका उल्लेख योगाग्नि के रूप में आया है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् में इसे योगाग्नि के रूप में निरूपित किया गया है। कठोपनिषद् में यमराज इस विद्या का उपदेश नचिकेता को देते हैं। वहाँ इसे अग्निविद्या और नाचिकेत अग्नि के रूप में बताया गया है। इसका संधान साधक के पाप-तापों को जलाकर राख कर देता है। वह अपने भीतर छाए आनंद को उद्घाटित कर लेता है। यमराज ने अग्नि विद्या का उपदेश देते हुए नचिकेता से कहा है कि यह तुम्हारे हृदय में ही निहित है। जिसके शरीर में यह अग्नि प्रज्वलित हो जाती है, उसके शरीर में न रोग होता है और न मन में क्षोभ। कहना न होगा कि अग्नि दिव्य स्तर की है। लौकिक जगत् में उपयोग की जाने वाली अग्नि से इसका संबंध प्रतीक और संकेत जैसा ही है। मनीषियों ने इसे ‘दिव्य अग्नि’ और ‘स्पिरिट फायर’ कहा है।

कुँडलिनी शक्ति को पश्चिम के तंत्रविदों ने सर्पेंट फायर और सर्पेंट पॉवर भी कहा है। यह कुँडलिनी शक्ति का ही अंग्रेजी अनुवाद है। ‘थियोसोफिकल सोसायटी’ की जननी मैडम ब्लैवटस्की कुँडलिनी को विश्वव्यापी विद्युतीय शक्ति या ‘कॉस्मिक इलेक्ट्रिसिटी’ कहा करती थी। उनके अनुसार यह ऊर्जा प्रकाश से भी तीव्र गति से बहती है। कुँडलिनी या दिव्य विद्युत की गति उन्होंने 5,55000 किलोमीटर प्रति सेकेंड बताई है, जबकि प्रकाश की गति 297000 किलोमीटर प्रति सेकेंड है। मैडम ब्लैवटस्की आज होतीं तो संभवतः कुँडलिनी शक्ति की गति को वैद्युतीय तरंगों में भी बतातीं।

जैन आचार्यों ने कुँडलिनी शक्ति का उल्लेख तेजोलेश्या के रूप में किया। आचार्यश्री महाप्राज्ञ के अनुसार यह शक्ति सूर्य के प्रतिनिधि की तरह मनुष्य के काय-कलेवर में विद्यमान रहती है। ब्रह्माँड में सूर्य जितना प्रचंड, ऊर्जावान् और अग्नि से भरा हुआ है, अंतर्जगत् का सूर्य भी अपने स्वरूप और स्थिति के अनुसार उतना ही प्रदीप्त है। तप, संयम और ध्यान-धारणा से तेजोलेश्या को प्रचंड-प्रदीप्त किया जा सकता है।

कुँडलिनी के पौराणिक और यौगिक रूपकों को साधना विज्ञान की आवश्यकता कहा जा सकता है। तथ्यों के निरूपण की यह अपनी शैली है। ऊर्जा का विराट् कुँड, सर्प, विद्युत, चक्र, नाड़ियाँ, सोई हुई सर्पिणी की फुफकार, अपनी पूँछ को मुँह में दबा और खुला रखकर मूलाधार चक्र पर लिपटी सर्पिणी, सुमेरु शिखर, अलग-अलग चक्रों की पंखुड़ियाँ, उनकी संख्या, विशिष्ट अक्षर, बीज शक्ति आदि पारिभाषिक पदों को उनके शब्दों से नहीं समझाया जा सकता। इन चक्रों के विवेचन में जाने से पहले कुँडलिनी महाशक्ति के सामान्य परिचय को ध्यान में रख लेना चाहिए।

संक्षेप में कुँडलिनी महाशक्ति विश्वव्यापी प्राण ऊर्जा या दिव्य शक्ति का वह अंग है, जो व्यक्ति की अपनी सत्ता में विद्यमान होता है। वह सक्रिय भी हो सकता है और प्रसुप्त या निष्क्रिय भी। यह ऊर्जा जिस अंश तक जाग्रत् अथवा सक्रिय रहती है, व्यक्ति उतना ही तेजस्वी, समर्थ और प्रतिभाशाली दिखाई देता है। थियोसोफिस्ट विद्वान् प्रो. हेनरी लिंडाल ने प्राण ऊर्जा को भौतिक जगत् में काम करने वाली विद्युत शक्ति के उदाहरण से समझाने की चेष्टा की है। उन्होंने लिखा है कि पृथ्वी के चारों ओर विद्युत चुँबकीय धाराओं का एक जाल-सा फैला हुआ है। तीन लाख वोल्ट से ज्यादा औसत सामर्थ्य वाले इस जाल या सागर का एक अंश प्रत्येक जीवधारी के हिस्से में आया है। यह अंश कुँडलिनी शक्ति के रूप में मेरुदंड में स्थित होता है।

मेरुदंड अर्थात् शरीर सत्ता का आधारभूत ढाँचा यदि यह नहीं हो तो शरीर लुँज-पुँज हो जाए। जीवन की सभी गतिविधियाँ ठप्प पड़ जाएँ। रेंगने वाले जीवों के अलावा सभी प्राणियों में मेरुदंड होता है। ध्यान रहे इस उल्लेख को स्थूल शरीर में पीठ के बीच रहने वाली रीढ़ की हड्डी से यथातथ्य जोड़कर न देखा जाए। वह संबंध एक अंश तक ही उपयुक्त है। प्रो. लिंडाल के अनुसार, जीवन के सामान्य क्रिया–कलापों में मानवीय विद्युत प्राण ऊर्जा अथवा दिव्य शक्ति का निरंतर व्यय होता रहता है। इस ऊर्जा का उद्गम स्रोत मस्तिष्क है। बिजलीघर की तरह इसी केन्द्र में प्राण ऊर्जा का उत्पादन, संचय और वितरण .... है, लेकिन यह केंद्र अपने आप में पूरा नहीं है। जब तक एक सूक्ष्म नाड़ी से शरीर सत्ता के निम्नतर भाग से जुड़ा होता है। यह नाड़ी सुषुम्ना कही जाती है। शरीर को काट-पीटकर इसे स्थूल आँखों से नहीं देखा जा सकता।

सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से प्राणशक्ति का संचित और सक्रिय कोष कामकेंद्र से जुड़ा होता है। मस्तिष्क में अथवा सहस्रार चक्र के इर्द-गिर्द लहराते सागर को कामकेंद्र में उठने वाले कंपन गतिशील करते रहते हैं। यों भी कह सकते हैं कि मस्तिष्क में उठने वाली तरंगें कामकेंद्र को चलित या शांत-संयमित करती रहती हैं। प्रो. लिंडाल लिखते हैं कि मस्तिष्क में स्थित केंद्र को उत्तरी ध्रुव मानें तो सुषुम्ना के आधार कामकेंद्र को उत्तरी ध्रुव कहा जा सकता है। नए जीवन की संरचना अथवा प्रजनन की .... इस केंद्र पर है। शरीर के अन्य अवयवों की .... हिस्सा ज्यादा संवेदनशील और सक्षम है। .... संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण होने के कारण शरीर में .... सुरक्षा पर भी सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है। .... वस्त्रों का आविष्कार किया और इन अंगों को .... और लज्जा ही .... इस क्षेत्र की सुरक्षा भी है।

थियोसोफी आँदोलन के प्रमुख विचारक और वैज्ञानिक सी.डब्लू. लेडबीटर ने लिखा है कि ब्रह्माँडव्यापी प्राण ऊर्जा या दिव्य विद्युत को मस्तिष्क में धारण करने के लिए जरूरी है कि उसे अधोगामी न होने दिया जाए। मस्तिष्क में संचित होने वाली ऊर्जा यदि काम-कौतुक में बहती रहे तो वह महाशक्ति जीवन में कभी कोई विशेषता नहीं ला सकेगी। वह शक्ति केवल कामकेंद्र से ही बरबाद नहीं होती, भोग और विलास के सभी क्षेत्रों से नष्ट होती है। जीवनचर्या में संयम और अनुशासन पर इसीलिए जोर दिया गया है।

जाग्रत स्थिति में कुँडलिनी व्यक्तित्व में ओजस् का प्राण प्रवाह उत्पन्न करती है। जाग्रत् और संचित प्राण ऊर्जा शरीर में सक्रियता और सामर्थ्य, मन में साहस, धैर्य और आत्मिक उत्कर्ष की संभावना साकार करती है। जिस व्यक्तित्व में ओजस् का प्राण प्रवाह उफनता रहता है,


बाह्य अभिव्यक्तियाँ (kahani)

जीवन भर कर्म में विश्वास रखने वाले बाल गंगाधर तिलक को जब अँग्रेजों द्वारा जेल में बंद कर दिया गया, तो उनने वहाँ भी ‘गीता रहस्य’ लिख डाला। परिस्थितियों के प्रतिकूल होते हुए भी ज्ञान व भक्ति की समन्वित धारा पर ऐसी विस्तृत समीक्षा युक्त विवेचना जेल में लिखी जाना उनकी आँतरिक परिपक्वता का ही चिह्न है।

अंतः से जब प्रभु के प्रति समर्पण का उल्लास फूटता है, तो वह यह स्वरूप भी ले लेता है और जब देशभक्ति के रूप में निकलता है, तो भगतसिंह आजाद जैसे फाँसी पर चढ़ जाने वाले वीर-बलिदानियों के त्याग-उत्सर्ग का स्वरूप ले लेता है। हैं ये सब विकास के क्रमिक सोपान व उनकी बाह्य अभिव्यक्तियाँ ही।


खोदी खाई को पाटना है-प्रायश्चित

कई बार ऐसा होता है जब मनुष्य जानबूझकर कुबुद्धिवश या फिर अनजाने में ही कुछ अनुचित कार्य कर बैठता है। ये बुरे कार्य न सिर्फ उसकी आत्मिक प्रगति एवं व्यक्तित्व के विकास में बाधक बनते हैं, अपितु उसकी भौतिक सफलताओं में भी अवरोध पैदा करते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है वह आत्मप्रताड़ना, जो अनैतिक और अवाँछनीय कार्य करने के कारण निरंतर अंतरंग में उठती रहती है। इस अंतर्व्यथा से मुक्त होने का एक ही मार्ग है प्रायश्चित।

दुष्कर्मों एवं कुविचारों के संस्कार एक प्रकार से विषैली परतों के रूप में चेतन मस्तिष्क एवं अचेतन मन पर जमते रहते हैं। कालाँतर में यही मन की चंचलता, उद्विग्नता, अस्थिरता, आवेश एवं विक्षोभ के रूप में प्रकट होते हैं और व्यक्ति को विक्षिप्त जैसा बना देते हैं। ऐसी दशा में किसी भी कार्य को एकाग्रचित्त होकर नहीं कर पाने के कारण उसे पग-पग पर असफल होना पड़ता है। उसके असंतुलित व्यवहार से संबंधित व्यक्ति असंतुष्ट होकर विरोधी बन जाते हैं। भटकता हुआ मन जीवन को कँटीली झाड़ियों में उलझा देता है, जहाँ केवल शोक एवं संताप ही दृष्टिगोचर होता है।

यही कारण है कि अपने अपराधों को स्वीकार कर उनके लिए प्रायश्चित करने की प्रथा सभी धर्मों में प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। पापों को प्रायश्चित के बिना मुक्ति तो दूर सामान्य सुखी-संतुष्ट जीवन भी संभव नहीं, इसीलिए प्रत्येक धर्म में’पाप के बोध’ को प्रमुख स्थान दिया गया है। यह बोध सिर्फ व्यक्ति की मनोवेदना या पश्चात्ताप तक सीमित नहीं है, अपितु किए गए अपराध का प्रायश्चित भी इसमें शामिल है। रास्ते में खाई खोदी गई है, तो उसके लिए सिर्फ पश्चात्ताप या वेदना प्रकट करने मात्र से कुछ नहीं होता वरन् उसे पाटने के लिए उतना ही प्रयत्न करना चाहिए, जितना खोदने के लिए किया गया था।

यहूदी तथा ईसाइयों में पापों का प्रायश्चित करने की .... इन धर्मों की स्थापना के साथ ही प्रारंभ हो गई थी। .... जगह-जगह पर इस भवन को जाग्रत् .... प्रयास किया गया है कि प्रत्येक यहूदी को अपने .... उन्हें स्वीकार करे और उसके लिए .... यहूदी अपने पापों को स्वीकार कर प्रायश्चित करने के लिए ‘याम किपूर’ की पूर्व संध्या से अगले दिन शाम तक प्रायश्चित संबंधी प्रार्थनाएँ तथा चिंतन-मनन करते हैं।

ईसाइयों में अपराध स्वीकार कर प्रायश्चित करने को ‘पाप स्वीकार संस्कार’ कहा जाता था। अब इस संस्कार को ‘पवित्रीकरण संस्कार’ कहा जाता है। ‘न्यू टेस्टामेंट’ में कई स्थानों पर पापों को स्वीकार करने की आवश्यकता व्यक्त की गई है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘कन्फेशन’ अर्थात् पाप स्वीकार कर प्रायश्चित के पश्चात् ही मुक्ति मिल सकती है।

मुसलमान भी अपने प्रतिदिन की नमाज में खुदा से अपने गुनाहों की माफी माँगते हैं। पारसी समुदाय के लोगों का मानना है कि पाप स्वीकार कर उसका प्रायश्चित कर लेने से मुक्ति मिल जाती है। बौद्ध भिक्षु भगवान् बुद्ध तथा धर्म-समुदाय के समक्ष माह में दो बार पापों को स्वीकार कर उनका प्रायश्चित करते थे।

हिन्दू धर्म में तो हर पाप का प्रायश्चित विधान निर्धारित है। उन्हें करके ही अवाँछनीय आचरणों की मलीनता से मुक्त हुआ जा सकता है। प्राचीनकाल में कहीं-कहीं अपराधियों को गाँव एवं जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था। उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता था। हत्या के अपराधियों को मुँह पर कपड़ा बाँधकर घर-घर जाकर भीख माँगनी पड़ती थी और उसी से अपना गुजारा करना पड़ता था। व्रत, तप, तीर्थयात्रा, दान-पुण्य, धर्मार्थ कार्य एवं दीन-दुखियों की सेवा-सहायता प्रायश्चित के ही अंग हैं।

अपने दोषों को स्वीकार करना, उसके लिए दुःखी होना, लज्जित होना और भविष्य में इस तरह की भूलों की पुनरावृत्ति न करना, यह मनोभूमि तो प्रायश्चितकर्त्ता की होनी ही चाहिए। एक तरफ प्रायश्चित की बात सोची जाए और दूसरी तरफ उन्हीं भूलों को दुहराते रहा जाए, तो प्रायश्चित का प्रयोजन ही नहीं रह जाता। सच्चे मन से किए गए प्रायश्चित से मन हलका हो जाता है और जीवन में सुख, शाँति एवं पवित्रता सहज ही परिवर्तन होने लगती है।


जैसे भी मिले, अनिवार्य है गुरु का आश्रय

गहन अर्थों में कोई भी मार्गदर्शक सत्ता दूसरे गुरु से भिन्न नहीं है। गुरु और शिष्य भी अलग-अलग नहीं है। उनका संबंध विद्युतधारा और बिजली के लैंप की तरह है। धारा प्रवाहित होती है, तो लैंप रोशनी देने लगता है। गुरु आध्यात्मिक शक्ति है और शिष्य उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम।

एक संन्यासी हुए हैं स्वामी निगमानंद। गृहस्थ जीवन से निवृत्त होने के बाद उन्होंने संन्यास लिया। आमतौर पर लोग घर-गृहस्थी छोड़कर संन्यास लेते हैं या पारिवारिक दायित्व सिर पर आने से पहले ही हरिद्वार, ऋषिकेश, काशी, प्रयाग, पैठण, काँची, रामेश्वरम् आदि तीर्थों में भाग जाते हैं। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की मृत्यु के बाद संन्यास लिया। पत्नी के रहते उनके मन में अध्यात्म की लवलेश झलक भी नहीं दिखाई देती। पत्नी भी औसत स्तर की गृहिणी थी। सामान्य स्त्रियों में पूजा-पाठ और व्रत-उपवास के प्रति जितनी रुचि हो सकती थी, उसमें थी। दोनों बहुत प्रेम और लगाव से रहते थे। पति कुछ ज्यादा ही आतुर अनुरागी थे। विवाह के बारह वर्ष बाद तक संतान नहीं हुई। परिवार में दोनों ही थे। तीस वर्ष की उम्र में पत्नी को किसी रोग ने आ घेरा और वह चल बसी।

पत्नी के निधन ने पति को बरी तरह आहत कर दिया। लगा कि संसार में कुछ रहा ही नहीं है। जीने का कोई उद्देश्य और अर्थ नहीं बचा। एक बार मन में आया कि पत्नी की चिता के साथ खुद भी जल मरें, लेकिन पत्नी का शव जलाने की भी हिम्मत नहीं हुई। आसक्ति इतनी प्रगाढ़ थी कि उसे सामने रखकर धूनी रमाए से बैठे रहे। स्वजन-संबंधियों ने समझा-बुझाकर और कुछ जोर-जबर्दस्ती दिखाकर अंत्येष्टि की। पति ने पत्नी का शरीर जलते देखा और अंतस् में जैसे क्राँति घटित हो गई। उठती हुई लपटों के साथ पत्नी की विभिन्न मुद्राएँ स्मृतिपटल पर आ गईं। उठना-बैठना, बात करना, प्रेम जताना, हँसना, गाना और कामकाज करना सभी याद आने लगा। इन घटनाओं के उभरने के साथ ही यह बोध जागा कि पत्नी मरी नहीं है। शरीर जला है, लेकिन यह शरीर पत्नी का नहीं था। अस्तित्व का कोई और तल था, जो पत्नी की तरह व्यवहार करता था।

वह कौन-सा-स्वरूप था? सोचने-समझने में देर लग सकती है, लेकिन स्मृति में चमक की तरह कौंध जाने में क्षणभर भी नहीं लगा। उस स्मृति के साथ ही बोध जागा और संकल्प उठा कि पत्नी के शाश्वत रूप की खोज करनी चाहिए। इस संकल्प ने उन्हें संन्यास की प्रेरणा दी। पत्नी का ध्यान किया, स्मरण किया, मंत्र जपा, चिंतन-मनन में उतरे। कोई भक्त अपने इष्ट-आराध्य को जिस आतुरता से पुकारता है, इसे ही व्यग्र भाव से उन्होंने ‘पत्नी’ की साधना की। माता-पिता-गुरु और संत की आराधना-उपासना कर हजारों साधक मुक्ति के लक्ष्य तक पहुँचे होंगे। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की आराधना की और सिद्ध स्तर पर पहुँचे। पश्चिम बंगाल के नदिया क्षेत्र में हुए इस संन्यासी को लोगों ने नहीं स्वीकारा, लेकिन स्वामी निगमानंद ने इसकी कभी चिंता नहीं की। वे कहते थे पत्नी के प्रेम ने उन्हें लौकिक दुःखों और अपेक्षाओं से मुक्त कर दिया। परमेश्वर का कोई और रूप दूसरों के लिए आराध्य होगा, मेरे लिए तो पत्नी ही ईश्वर रूप है। वही परमात्मा है। बाद में उन्होंने आश्रम भी बनाया और साधकों को योगभक्ति की शिक्षा दी।

किसी ने आशंका जताई कि पत्नी भी परमात्मा हो सकती है भला? पुत्र में परमात्मा के दर्शन किए जा सकते हैं। जैसे कौशल्या और यशोदा द्वारा, तो पत्नी के रूप में ईश्वर को क्यों नहीं देखा जा सकता? पति के माध्यम से परमात्मा को प्रकट किया जा सकता है, जैसे कि अनुसूया, सावित्री, राधा आदि ने स्वामी भाव से पति की आराधना की और जगन्नियता की झलक देखी, तो स्वामी निगमानंद ने ही कौन-सा अनर्थ किया।

किसी भी माध्यम से परमात्मसत्ता तक पहुँचने के मार्ग को मनीषियों ने गुरु-शिष्य संबंध के रूप में देखा है। गुरु एक माध्यम होता है। उसके व्यक्तित्व में विराट् ब्रह्म की झाँकी देखी जाती है, तभी दिव्यभाव प्रकट होता है। ज्यादातर मामलों में गुरु एक निमित्त कारण होता है। संभावनाएँ वस्तुतः अपने भीतर से ही प्रकट होती हैं। स्वामी निगमानंद के अनूठे प्रसंग में पत्नी एक साधारण स्त्री थी, लेकिन साधक संन्यासी के लिए वह एक निमित्त ही सिद्ध हुई। संभावनाएँ स्वयं स्वामी निगमानंद में थीं। एक अवलंबन पाकर वे प्रकट हो गईं।

बहुत बार गुरु साधारण स्थिति में होते हैं और शिष्य उनसे आगे बढ़ जाते हैं। यह मानें कि गुरु ही ऊर्जा और संभावना का स्रोत है, तो शिष्य को उनसे आगे नहीं निकलना चाहिए, लेकिन नियम यह है कि व्यक्ति स्वयं अपनी ही सीमाओं का अतिक्रमण करता है। मार्गदर्शक सत्ता रास्ता दिखाती है और कभी-कभार उत्प्रेरक का काम करती है। श्री अरविंद का उदाहरण प्रत्यक्ष है। उन्होंने महाराष्ट्र के योगी लेले से साधना सीखी थी। उसी का अभ्यास करते आँतरिक स्थिति के बारे में किसी को विशेष जानकारी नहीं है।

गुरु से तिरस्कार और प्रताड़ना भी मिलती है। बहुत बार वे द्वार पर शिष्य भाव से आए साधक को स्वीकार नहीं करते। जैसे द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाई। उसके माध्यम से अपनी अंतर्निहित संभावनाओं का आह्वान किया और गुरु के संकल्प का अतिक्रमण कर अर्जुन से भी बड़ी सिद्धि प्राप्त कर ली। उपनिषदों में आरुणि, श्वेतकेतु, सत्यकाम आदि शिष्यों का उल्लेख मिलता है। गुरु ने इन्हें कभी सामने बिठाकर विद्या नहीं सिखाई, न ही साधन-अभ्यास कराया था। व्यवहार में मार्गदर्शक सत्ता से उपेक्षा मिलने पर भी इन ऋषिकुमारों के मुखमंडल ब्रह्मतेज से चमकते रहते थे। कबीर प्रसंग तो इतिहास में भी शामिल है। स्वामी रामानंद ने उन्हें मंत्रदीक्षा देने से मना कर दिया। काशी के घाट पर वे योजना बनाकर गुरु के पाँवों तले आए। गुरु ने किसी व्यक्ति पर पैर पड़ते देखा, तो ‘राम’ ‘राम’ कह उठे। कबीर ने उसे ही गुरुमंत्र मान लिया। राम नाम जपकर निर्गुण ब्रह्म की अनुभूति के स्तर तक पहुँच गए।

गुरु अपने भीतर ही विद्यमान है। परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि इस सद्गुरु की शरण में जाएँ और सर्वतोभावेन समर्पण करें। समर्पण हो जाए तो भीतर सोया पड़ा बीज टूट जाता है और उसमें निहित आत्मतत्त्व प्रकट होने लगता है। बाहर दिखाई देने वाली मार्गदर्शक सत्ता अपने भीतर विद्यमान सद्गुरु का ही प्रतिबिंब है, लेकिन कई बार ऐसी विभूतियाँ भी संसार में आती हैं, जो समय से पहले ही संभावनाएँ प्रकट कर देती हैं। उनमें सामर्थ्य होती है। संकल्प और स्पर्श मात्र से वे साधक को परम लक्ष्य तक पहुँचा देती हैं। ज्ञात इतिहास में इस तरह की दीक्षा देने वाले गुरुओं में आदि शंकराचार्य का नाम आता है। उन्होंने पद्मपाद, गोरक्ष, सुरेश्वर और हस्तामलक नामक शिष्यों का संकल्प मात्र से उद्धार कर दिया था। अपने पुरुषार्थ से प्रयत्न करते तो इन शिष्यों को आठ से बारह जन्म और लेने पड़ते। लेकिन आदि शंकर ने अपनी अलौकिक क्षमता से समय के पूर्व ही उन्हें परम स्थिति में पहुँचा दिया। यह बात अलग है कि इन विभूतियों को धर्म-संस्कृति के पुनरुत्थान का दायित्व भी सौंपा। कहा कि मुक्ति अनायास ही नहीं मिली है। अनुग्रह का मूल्य चुकाना पड़ेगा। वह गुरु के अधूरे कार्य को पूरा करने के रूप में होगा।

पिछली शताब्दी में स्वामी रामकृष्ण परमहंस उस स्तर की समर्थ मार्गदर्शक सत्ता हुई, जिसने शिष्यों को समय से पहले ही समाधि के लक्ष्य तक पहुँचाया। नरेंद्रनाथ दत्त स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास जाया करते थे। अध्यात्म, ईश्वर, भक्ति, ज्ञान और विद्या की बातें सुन-सुनकर एक दिन उन्होंने यही पूछा था कि क्या आपने ईश्वर को देखा है। गुरु ने ‘हाँ’ या ‘न’ में उत्तर दिया। प्रतिप्रश्न किया कि “तुम देखना चाहते हो?” इसके बाद गुरु और शिष्य में संवाद या व्यवहार का जो क्रम चला, उसकी परिणति नरेंद्र का क्षुद्र अहं ब्रह्म के विराट् सागर में डूब जाने के रूप में ही हुई। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने पाँव के अँगूठे से नरेंद्र का स्पर्श किया और शिष्य की समाधि खुली। जब समाधि खुली तो गुरु ने कहा, तुम्हें इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करनी थी, लेकिन चालीस वर्ष की आयु पूरी होने पर। माँ का आदेश था, सो समय से पहले झलक दिखा दी। अब पुनरावृत्ति नहीं होगी। समाधि बंद और चाभी मेरे पास। अब यह उपयुक्त समय आने पर ही सौंपी जाएगी।

कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद इस प्रतिबंध को यकायक झेल नहीं पाए। वे चीख उठे! गुरु से बहुत अनुनय-विनय की, लेकिन मार्गदर्शक सत्ता ने जरा भी रियायत नहीं की। कहा, माँ का आदेश है कि उसका यंत्र बनो। उसके यंत्र बनोगे तभी मुक्ति मिलेगी। स्वामी विवेकानंद ने अपने आपको गुरु के कार्य के लिए समर्पित किया। समाधि की प्रथम झलक मिलने के बाद उनके चित्त में व्यग्र भाव निरंतर बना रहा। वे अंत तक बेचैन रहे। जैसे किसी नाग से मणि छीन ली गई हो और वह उसे पाने के लिए छटपटाता घूम रहा हो। वैसा ही आवेग स्वामी विवेकानंद के कार्यों में भी था। उनके प्रवचनों में भी कहीं-कहीं यह आवेग दिखाई देता है। लगता है कि एक भाव ठीक से व्यक्त नहीं होता और दूसरा उसके पीछे दौड़ा चला आता है। यह आवेग गुरु की दिखाई झलक को वापस पाने के लिए ही था। अपना मिशन पूरा हो जाने के बाद स्वामी विवेकानंद के चित्त में थोड़ी शाँति आई। रहस्यदर्शियों का कहना है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस अशरीरी रूप में उस समय शिष्य के पास आए थे और मृत्यु से कुछ पहले ही समाधि पर पड़ा परदा उठाया था।

इस शताब्दी में परमपूज्य गुरुदेव के कितने ही शिष्यों को उनके सान्निध्य में विलक्षण अनुभूतियाँ हुई हैं। परिजनों के लौकिक दायित्व पूरे होने और स्वयं को गुरुदेव के काम में नियोजित कर देने वाले अनुभवों का एक अंबार है। वैसा अनुग्रह सौभाग्यशाली साधकों को ही मिलता है। गुरुदेव कहा करते थे कि पात्रता विकसित करने के रूप में वह सौभाग्य साधक को स्वयं ही प्राप्त करना पड़ता है। पात्रता नहीं हो तो मेज, कुरसी, कलम, आसन और दैनंदिन उपयोग की वस्तुओं के अलावा आस-पास रहने वाले दृश्य-अदृश्य जीव-जंतुओं की तरह कोई लाभ नहीं उठाया जा सकता।

समर्थ मार्गदर्शक सत्ता का मिल जाना ईश्वर का अनुग्रह है, लेकिन इस तरह का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना उपयुक्त नहीं हैं गुरु नहीं मिले, तो उनका आविष्कार कर लेना चाहिए। दत्तात्रेय ने अपने लिए चौबीस गुरुओं का आविष्कार किया था। अपने आस-पास की वस्तुओं, व्यक्ति और विषयों का अवलोकन करें, तो उनसे पर्याप्त प्रकाश ग्रहण किया जा सकता है।

इन दिनों पाखंडी गुरुओं और धर्मध्वजी लोगों की बड़ी चर्चा होती है। यह भी कि उन्होंने शिष्यों को लूटा, उन्हें धोखा दिया और उनका अहित किया। यह एक सामाजिक समस्या है। धर्मक्षेत्र में घुसपैठ कर जाने वाले धूर्त गुरुओं से बचाव के प्रयत्न चलें। उन ढोंगी गुरुओं को बेनकाब किया जाए, लेकिन सामाजिक स्तर पर ही। जिन्हें अपने आत्मकल्याण की इच्छा है। इन्हें इस तरह की समीक्षा, आलोचना से बचने की सलाह दी गई है। स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने कहा है कि अध्यात्म पथ के पथिकों को किसी भी गुरु की निंदा-आलोचना से बचना चाहिए। उन्हें छोटा, बड़ा, महान् या अधम कहना व्यर्थ है। गुरु की शिक्षाओं के सार और मानदंड भिन्न हो सकते हैं। उनके व्यक्तित्व और जीवन में त्रुटियाँ भी हो सकती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि मैं अपने गुरु की देव पूजा करूं और दूसरों के गुरु की धज्जियाँ उड़ाऊँ। आपको केवल इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि साधक के जीवन में गुरु का विधायक योगदान क्या और कितना है।

सदा ही और सभी स्थानों पर किसी-न-किसी स्तर की मार्गदर्शक सत्ताएँ सतत निवास करती हैं। सूर्य नहीं होगा, तो चंद्रमा का प्रकाश रहेगा, वह भी नहीं होगा, तो तारे टिमटिमाकर अपनी रोशनी बिखेर रहे होंगे। उनकी सहायता के लिए जुगनू, दीपक, मोमबत्तियाँ और कम-ज्यादा रोशनी वाले लैंप लगे होंगे। आशय यह है कि प्रकाश सर्वत्र उपलब्ध है। इन सबमें से किसी का अस्तित्व ‘नहीं हो तो आँखें स्वयं अंधकार की अभ्यस्त हो जाती हैं। घटाटोप अँधेरे में कुछ देर तक ही सब कुछ स्याह होता है। धीरे-धीरे आँख के अलावा हाथ, पाँव और त्वचा सहित समस्त इंद्रियाँ अनुभव करने लगती हैं। प्रकाश की यह अनुभूति ही आवश्यकता और स्थिति के अनुसार गुरु का प्राप्त होना है।

अपने गुरु की पूजा तो की जाए, दूसरे के गुरु का भी आदर-सम्मान किया जाए। कम-से-कम उनमें दोष तो नहीं ही देखे जाएँ। साधक के लिए यह आवश्यक है। साधना विज्ञान का मर्म समझाने वालों के लिए तो यहाँ तक कहा गया है कि वे रोगी और धूर्त गुरुओं की निंदा से भी बचें। उनके अनुसार कोई भी गुरु ढोंगी अथवा झूठा नहीं होता है, क्योंकि प्रत्येक गुरु का आध्यात्मिक उत्थान में योगदान होता है। वह योगदान कितना ही तुच्छ क्यों न हो। यह निर्देश आत्मिक विकास की उच्च कक्षा में पहुँच रह साधकों के लिए है।

गहन अर्थों में कोई भी मार्गदर्शक सत्ता दूसरे गुरु से भिन्न नहीं है। गुरु और शिष्य भी अलग-अलग नहीं हैं। उनका संबंध विद्युतधारा और बिजली के लैंप की तरह है। धारा प्रवाहित होती है, तो लैंप रोशनी देने लगता है। गुरु आध्यात्मिक शक्ति है और शिष्य उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम।

अनुग्रह के रूप में मिली हो या मार्गदर्शक सत्ता का आविष्कार किया गया हो, वह दो स्तर पर काम करती है। एक स्तर बाहर से काम करता दिखाई देता है और दूसरा रूप साधक को भीतर से साधता है। इसे कबीर ने कुम्हार द्वारा घड़े बनाने के रूपक से भी समझाया है। मिट्टी के लौंदे को फुलाते समय कुम्हार एक हाथ से घड़े को सँभालता है और दूसरे से थापियाँ मारता है। बाहर लगाई गई थापियाँ घड़े को मजबूत बनाती हैं, जबकि भीतर से सहलाता हुआ हाथ उसे विस्तार देता है। यह प्रक्रिया मिट्टी के एक मामूली से लौंदे को पात्र में बदल देती है। गुरु भी शिष्य को इसी तरह सहलाता और आकार देता है। दृष्टांत अधूरा है। थापकर और सहलाकर गुरु शिष्य को अपने समान ही बना लेता है।


दान का मर्म

महाराज धर्मध्वज जितने शूरवीर व नीतिकुशल थे, उतने ही धर्मपरायण एवं ईश्वरभक्त भी थे। वह नित्यप्रति नियम से देवमंदिर में भगवान् का पूजन-अर्चन किया करते थे। अपनी भगवत्पूजा के बाद ऋषि-मुनियों व ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणों को दान देना भी उनकी नियम-निष्ठा में शामिल था। उनकी सात्विक भावनाएँ, सुपात्रों एवं सत्पात्रों की सहायता करने की चाह ही इस नित्यप्रति दान का कारण थी। किसी भी फलाकाँक्षा का दोष उनके इस श्रेष्ठ कर्म में नहीं था। एक दिन हठात् उन्हें कोई आवश्यक कार्य आ गया। राजधानी से बाहर जाने की अनिवार्यता को समझकर उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र आर्यध्वज को बुलाकर कहा कि पुत्र! मैं आवश्यक कार्य से एक दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ। कल का समूचा काम तुम्हें करना है। आर्यध्वज ने इसे सहर्ष स्वीकार कर अपने पिताश्री को निश्चिंत कर दिया।

अगले दिन भोर होते ही राजकर्मचारियों ने आकर कहा कि युवराज दान देने का समय हो गया है। ऋषि-मुनि तथा ब्राह्मण लोग दरवाजे पर दान लेने के लिए खड़े हैं। युवराज ने बाहर आकर सभी का अभिवादन किया तथा कहा कि आप लोग मेरे पिताश्री से सदैव दान लेते आ रहे हैं। आज पिताश्री आवश्यक कार्यवश बाहर गए हैं। अतः यह काम मुझे करना है। मगर मेरे मन में एक जिज्ञासा है, कृपा करके उसका समाधान कर दें, तो मुझे दान देने में सुगमता रहेगी।

दान लेने आए सभी जनों ने युवराज से अपना प्रश्न प्रस्तुत करने के लिए कहा। इस पर आर्यध्वज बोला, आप सब मुझे यह बताएँ कि दान देने व नहीं देने का क्या फल होता है? युवराज का यह सवाल सुनकर सभी चुप साध गए। किसी के पास कोई सटीक उत्तर नहीं था। इस पर युवराज आर्यध्वज ने कहा कि बिना अपने प्रश्न का उत्तर पाए मैं किसी को कोई दान नहीं दूँगा। सभी याचक लोग निराश लौट गए।

दूसरे दिन जब महाराज धर्मध्वज लौटकर आए। तब यह सुनकर कि बेटे ने ब्राह्मणों को दान नहीं दिया, उनका मन क्षुब्ध हो गया। युवराज ने देखा कि पिताश्री को मेरे इस कार्य से दुःख हुआ है। तब उसने महाराज से बड़ी ही शालीनता से कहा, पिताजी! कोई भी काम का परिणाम जाने बिना उसे करना मैंने उचित नहीं समझा। मेरे इस विचार में यदि कोई खोट हो तो मुझे दंड दें।

धर्मध्वज ने कहा, बेटा! छान देने व नहीं देने से क्या फल होता है, यह तो मुझे भी मालूम नहीं है। मैं तो परंपरा से चली आ रही रीति का पालन करता आ रहा हूँ। युवराज ने कहा, तब तो यही अच्छा रहेगा कि मैं पीढ़ियों और परंपरा से निभाए जा रहे इस दान कर्म की सचाई का पता लगाऊँ। और जैसे-तैसे महाराज को राजी कर, उनका आशीष ले वह समाधान की खोज में चल पड़ा।

सबसे पहले वह पड़ोसी राजा के राज्य में गया। वे उसे कोई समाधान नहीं दे सके। उलटे उससे समाधान पाने हेतु अपना एक प्रश्न उसे और बता दिया। उन्होंने कहा, युवराज! तुम जिस तरह समाधान पाने के लिए व्यथित हो रहे हो, उसी तरह मेरे यहाँ भी संतान होते ही मर जाती है, इस कारण मैं भी बहुत दुःखी रहता हूँ। मेरी संतान कैसे जीवित रह सकती है? यदि इस प्रश्न का तुम समाधान बता सको, तो मैं तुम्हारा उम्रभर ऋणी रहूँगा।

युवराज आर्यध्वज उनको सहायता का वचन देकर आगे बढ़ चला। चलते-चलते शाम को वह एक खेत के पास पहुँचा। वहाँ एक बूढ़ा आदमी बैठा खेत की रखवाली कर रहा था। युवराज ने सोचा, आज रात यहीं विश्राम कर लिया जाए। यह सोचकर वह बूढ़े के पास आया और रात्रि विश्राम की याचना की।

बूढ़े ने देखा कि वेश-भूषा एवं बोल-चाल से यह लड़का कोई उच्च कुल का सा मालूम पड़ता है। उसने पूछा, बेटा तुम कौन हो, किस कारण अकेले घूम रहे हो? आर्यध्वज ने उसे समूची बात बता दी तथा उस बूढ़े से कहा, क्या आप हमारे इस कार्य में कुछ मदद कर सकते हैं? बूढ़े व्यक्ति ने कहा, बेटा! तुम उज्जैन चले जाओ। उज्जैन के राजा वीर विक्रमादित्य बहुत बुद्धिमान् तथा शिवभक्त हैं। उनपर भगवान् महाकालेश्वर की अपार कृपा है। वही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जो तुम्हारी समस्या का समाधान कर सकते हैं।

इतने में उस बूढ़े की स्त्री घर से भोजन लेकर आ गई। बूढ़े व्यक्ति ने युवराज से उसका परिचय कराया। बुढ़िया घर से चार रोटी बनाकर लाई थी। बूढ़े ने कहा, दो रोटी इस लड़के को दे दो, एक-एक रोटी हम दोनों खा लेंगे। बुढ़िया बहुत कलहकारिणी थी। वह सुनते ही उबल पड़ी, कहने लगी, तुम्हारा तो यह रोज का धंधा है। कोई-न-कोई रोज आता ही रहता है। कभी भी सुख की रोटी न तुम खाते हो और न मुझे खाने देते हो। इस पर चुपचाप बूढ़े ने अपने हिस्से की दो रोटियाँ आर्यध्वज को दे दीं। आर्यध्वज ने कहा, बाबा! यह कैसे हो सकता है। आप भूखे रहें और मैं भोजन करूं। बूढ़े ने कहा, बेटा! अतिथि भगवान् का रूप होता है। तुम निस्संकोच भोजन कर लो। मगर आर्यध्वज किसी भी हालत में राजी न हुआ। आखिरकार दोनों ने एक-एक रोटी खाई और तीनों आराम से सो गए।

आधी रात को बिल में से एक साँप ने निकलकर उस बूढ़े को डंस लिया तथा बूढ़े की मृत्यु हो गई। सुबह हुआ तो लड़के ने उठकर देखा कि बूढ़े के बगल में एक विषधर सर्प बैठा है और बूढ़े के मुँह से झाग निकल रहे हैं। लड़के को उठा देखकर सर्प भागा। लड़का भी साँप के पीछे-पीछे भागा। इतने में बुढ़िया भी जाग गई। बुढ़िया ने देखा कि बूढ़ा मरा पड़ा है तथा लड़का भाग रहा है। उसने सर्प को तो देखा नहीं था, उसने यही समझा कि मेरे पति को मारकर लड़का भाग रहा है। बुढ़िया भी उस लड़के के पीछे भागने लगी। रास्ते में एक पत्थर पड़ा था। उससे ठोकर लगी और बुढ़िया गिरी, तो उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

उस बूढ़े के द्वारा पहले बताए अनुसार आर्यध्वज उज्जैन नगरी में पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने वीर विक्रमादित्य को अपना परिचय दिया और समस्याएँ बताईं। साथ ही यह भी कहा, महाराज! मैंने यह भी सुना है कि आप बहुत बुद्धिमान् हैं तथा महाकाल भगवान् शिव के अनन्य भक्त हैं। आप ही हमारी इन समस्याओं का समाधान बता सकते हैं। विक्रमादित्य ने उसे उपयुक्त आश्वासन देकर अतिथिगृह में ठहरा दिया।

अगले दिन ब्रह्ममुहूर्त में महाराज विक्रमादित्य ने जब भगवान् महाकाल का पूजन करके ध्यान किया, तो उन्हें प्रेरणा मिली। उन्होंने युवराज को बुलाकर कहा, घर से निकलकर तुम जिस पड़ोसी राजा के पास गए थे। उन्हीं के पास वापस जाइए। पिछले जन्म में उनसे कुछ दुष्कर्म हुए हैं, उसके प्रायश्चित के लिए उन्होंने दान आदि ठीक ढंग से नहीं किए हैं। पर महाराज .... ! युवराज आर्यध्वज अभी कुछ कह पाते, इसके पहले उन्हें टोकते हुए विक्रमादित्य बोले, “द्रव्यदान ही सब कुछ नहीं है। उन्हें किसी पुण्य प्रयोजन के लिए श्रमदान करना पड़ेगा। शरीर से किए गए बुरे कामों का प्रायश्चित शरीर से अच्छे कर्म करने पर ही होता है। अपने पूर्वकृत पापों से मुक्त होने पर ही उन्हें पुत्र होगा। तुम्हारी समस्या का समाधान वह पुत्र ही करेगा।”

आर्यध्वज लौटकर उस राजा के पास आया। आकर उसने राजा को सारी बातें बताईं। राजा ने अपने राज्य के मनीषियों को बुलाकर सलाह की कि कौन-सा पुण्य कर्म श्रेष्ठ होगा। सभी ने विचारमंथन के पश्चात् कहा, “शिक्षा एवं चिकित्सा ही श्रेष्ठ कार्य हैं।” राजा ने उनकी बात मानकर चिकित्सालय एवं विद्यालय की उपयुक्त व्यवस्था की। इनके निर्माणकार्य में अपना भी पसीना बहाया। इन कार्यों के साथ ही राजा की भगवद् आराधना भी चलती रही।

और सचमुच इस अचूक दान के प्रभाव से अबकी बार रानी को जो शिशु हुआ, वह जीवित रहा, जबकि इसके पहले बच्चा पैदा होते ही मर जाता था, लेकिन यह बालक तो बीतते दिनों के साथ और भी स्वस्थ-सतेज होता गया। अब तो नगर निवासियों के साथ स्वयं राजा को भी यह विश्वास हो गया कि प्रभुकृपा से यह लड़का बच जाएगा। दिन बीते, मास बीते और इसी तरह दो वर्ष भी बीत गए। अब तो लड़का बोलने भी लगा। उसकी कुशाग्र प्रतिभा असाधारण थी, पर अभी भी सबको संदेह बना हुआ था कि भला यह नन्हा-सा बालक युवराज की समस्या का क्या समाधान करेगा।

लेकिन वीर विक्रमादित्य के कहे अनुसार युवराज को बुलाया गया। युवराज के सम्मुख आने पर उस नन्हें राजपुत्र ने परिचितों का सा व्यवहार किया। आप सब लोग स्नान करके आएँ, साथ ही दो मंचों की व्यवस्था की जाए। वहीं बैठकर ही मैं युवराज के प्रश्नों का समाधान करूंगा। उस छोटे-से दो वर्षीय शिशु के कहे अनुसार सारी व्यवस्था जुटाई गई। नगर निवासी भी अपनी आकुलता न रोक सके। मंचों के आस-पास भारी भीड़ जमा हो गई। सभी लोग उपयुक्त स्थान पर आसीन हुए। विशेष तौर पर बनाए गए दो मंच अभी भी खाली थे।

सबकी आकुलता समाप्त करते हुए एक मंच पर वह नन्हा राजपुत्र आसीन हुआ। दूसरे मंच पर बिठाने के लिए उसने जो कुछ भी कहा, वह तो और भी चकित करने वाला था। उसने कहा कि इसी नगर में चर्मकार चन्ना के घर में एक सुअरी के अभी-अभी एक संतान हुई है। उस नवजात शूकरी को आप लोग ले आएँ और उसे इस खाली मंच पर बिठाएँ। तभी प्रश्न का समाधान हो सकेगा।

राजा के कर्मचारी उस नवजात शूकरी को ले आए और उसे एक मंच पर बिठा दिया गया। राजपुत्र ने युवराज से कहा, अब आप अपनी समस्या कहें। इस पर युवराज आर्यध्वज ने अपना प्रश्न फिर से दुहरा दिया कि दान देने व ने देने से क्या होता है?

इस पर शिशु राजपुत्र ने कहना शुरू किया, युवराज! दान तीन तरह के होते हैं, अंशदान, समयदान व श्रमदान। अपनी धन-संपत्ति का एक अंश देना, उसे पुण्य-प्रयोजन में लगाना अंशदान है। अपनी प्रतिभा एवं समय का पुण्य कार्य में नियोजन समयदान कहा जाता है और अपनी सामर्थ्य एवं प्रतिभा के साथ दैहिक श्रम का नियोजन ही श्रमदान माना जाता है। इसमें श्रमदान का पुण्य तो आपने परख लिया। इसी के बल पर मेरे पिता महाराज को संतान की प्राप्ति हुई।

इसी के साथ अपना एक रहस्य मैं स्वयं ही आपको बताता हूँ। आप अपने प्रश्न के समाधान की तलाश करते हुए जिस बूढ़े एवं बुढ़िया से मिले थे। हम दोनों वही हैं। मैं पिछले जीवन में रोज ही कुछ-न-कुछ दान करता रहता था। श्रम, समय एवं सामर्थ्य के किसी-न-किसी हिस्से को पुण्य प्रयोजन में लगाना ही मेरा व्रत था, पर मेरी पत्नी मेरे इस कार्य की सख्त विरोधी थी। मेरे दान में हर समय बाधा उत्पन्न करती, कलह करने लगती। अपने इसी कार्य एवं प्रवृत्ति के कारण उसे शूकरी का जन्म लेना पड़ा है। मैं अपने दान के प्रभाव से ही इस राजकुल में उत्पन्न हुआ हूँ और अपनी मानसिक निर्मलता के कारण ही मुझे पूर्व जन्म का स्मरण भी है। सभी ने देखा उस नवजात शूकरी की आँखों से आँसू झर रहे थे, जबकि नन्हें राजपुत्र के मुख पर सत्य का तेज था। यह प्रकट प्रमाण देखकर सभी के साथ युवराज आर्यध्वज को दान का मर्म ज्ञात हो गया।


मोह बड़ा प्रबल है (kahani)

एक बार एक मित्र ने सर जान हर्शल नामक प्रख्यात पाश्चात्य विद्वान से प्रश्न किया, “आपको सृष्टि में सर्वोत्तम वस्तु कौन-सी लगी?” तो उन्होंने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “भाँति-भाँति के संयोग-वियोग आए, पर वह दृढ़तापूर्वक मेरे साथ जीवन के सुख और आनंद का झरना बना रहे। मेरे खिलाफ हवा चले, लोग मुझे बुरा कहें, धिक्कारें, रास्ता रोकें, उस समय मुझे बेपरवाह बना दें। जीवन में दुःखों से मेरी ढाल बन जाए। ईश्वर से प्रार्थना करने का अवसर मुझे मिले, तो मैं निवेदन करूंगा, हे प्रभु! मुझे विद्या पढ़ते रहने की रुचि दें। ज्ञान के धार्मिक महत्त्व को घटाए बिना यहाँ मैंने केवल उसके साँसारिक लाभ बताए हैं। विद्या की अभिरुचि कैसी आनंददायिनी है, संतोष का कैसा उन्मुक्त साधन है, इतना ही मैंने यहाँ स्पष्ट किया है।”

स्वर्गलोक में हलचल मच गई। स्वर्ग की शासन-व्यवस्था लड़खड़ा रही थी। विष्णु भगवान् हिरण्याक्ष वध के लिए वाराह रूप बनाकर धरती पर आए। प्रयोजन भी पूरा किया, किंतु यहीं रम गए, वापस लौटे नहीं। एक-एक करके देवता आए और वापस चलने का अनुरोध करने लगे, किंतु वाराह को कीचड़ में लोटना और परिवार के साथ रहना इतना सुहाया कि वे स्वर्ग लौटने को सहमत न हुए। बारी-बारी आए देवताओं को निराश होकर लौटना पड़ा। व्यवस्था बिगड़ते देखकर क्रुद्ध शिवजी ने वापस लाने का जिम्मा उठाया। वे आए और वाराह से लौटने और निर्धारित उत्तरदायित्व को निभाने की बात कहने लगे। इसका भी उन पर कोई प्रभाव न पड़ा। क्रुद्ध रुद्र ने त्रिशूल से वाराह का पेट फाड़ डाला और लाश को कंधे पर लादकर स्वर्ग सिंहासन पर पटक दिया।

विष्णु असली रूप में लौटे और देवताओं से बोले, “मोह बड़ा प्रबल है। वह भगवान् की भी दुर्गति करा सकता है। आप लोग उसके कुचक्र में न फँसना और अन्यान्यों को कड़ुए-मीठे उपायों से इसी प्रकार उबारना जैसे कि शिव ने मुझे छुड़ाया।”


यम-नियम-5 (अपरिग्रह) - अपरिमित के लिए परिमित का त्याग

प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करना।

दूसरों की प्रशंसा करना। उनके गुणों और सत्कार्यों को सराहना।

परिग्रह का सामान्य अर्थ है, ‘रोकना’। धन, विभूति, ज्ञान, वैभव, समय, साधन आदि की गति में अवरोध उत्पन्न किया जाता है, तो परिग्रह का पाप होने लगता है, बहते हुए जल को रोक ले तो वह सड़ने और सूखने लगता है, हवाओं को कैद करने की कोशिश में घर के द्वार और रोशनदान बंद कर लें तो जीवन देने वाली वायु दम घोंटने लगती है। समय को रोकने की कोशिश करें, काम को टालते जाने की नीति अपनाएँ, तो एक स्थिति ऐसी आती है जब कुछ करते नहीं बनता। इन उदाहरणों से मनीषियों ने एक यही तथ्य समझाया है कि प्रकृति ने जो अनुदान दिए हैं, उन्हें अपने प्रवाह के अनुसार चलते रहने दें। उन्हें रोकें नहीं।

परिग्रह के ठीक विपरीत है अपरिग्रह। रूढ़ अर्थ में इसकी परिभाषा धन-संपदा का संचय नहीं करने के रूप में की जाती है। इसी अर्थ में ग्रहण कर लें तो दुनिया में समृद्धि आ ही नहीं सकेगी। उद्योग, व्यापार और प्रतिष्ठान चलाने के लिए विपुल मात्रा में धन चाहिए। वह संचय करने से इकट्ठा होता है। अपरिग्रह का अर्थ संग्रह मात्र का त्याग मान लें, तो न संपदा संचित होगी और न ही वैभव-विकास का प्रयोजन सिद्ध होगा।

श्री अरविंद ने लिखा है कि अध्यात्म दर्शन में धन संपदा को गर्हित, त्याज्य और निंदित मानने की एक गलत प्रवृत्ति चल पड़ी। इससे हमने समृद्धि पर ध्यान देना बंद कर दिया। प्राचीन दर्शन में ऐसा नहीं था। धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की निंदा कर प्रसन्न और सुखी नहीं रहा जा सकता। सत्य प्रधान लोगों ने, साधकों और अध्यात्म रुचि रखने वाली प्रतिभाओं ने धन की निंदा कर लक्ष्मी का अपमान किया। परिणाम यह हुआ कि जगत् का पालन-पोषण करने वाली देवसत्ता विष्णु की शक्ति लक्ष्मी का कृपाप्रसाद असुरों के हाथ में चला गया। असुरों ने उसका उद्धत उपभोग किया और उनके कारण जगत् में त्रास ही फैला। आज यदि धन उद्धत प्रदर्शन और दूसरों के उत्पीड़न का कारण बना हुआ है, तो वह सत्पुरुषों के पाप का ही परिणाम है। उस पाप का जिसने संपदा को निंदित और त्याज्य बताया गया।

क्या किया जाए? श्री अरविंद का उत्तर है कि धन को आसुरी प्रभाव से मुक्त करो। सत्पुरुष और देववृत्ति के लोग उद्यमी बनें, संपदा कमाएँ और अपने उपार्जन को दैवी प्रयोजनों में लगाएँ। दैवी प्रयोजन अर्थात् समाज को सुखी-समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने वाले क्रिया-कलाप। नीति की कमाई दैवी कार्यों में लगेगी, तो सत्परिणाम आएँगे ही। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की संभावनाएँ भी उसी उपार्जन से साकार हो सकेंगी, अन्यथा महाभारत में अश्वमेध यज्ञ के बाद उस स्थान की धूलि में लौटने और निराश हो जाने वाले नेवले की तरह दैवी प्रवृत्तियों को भी निराश होना पड़ेगा।

संग्रह नहीं करने, धन-संपत्ति में ममत्व बुद्धि त्यागने, लोभ-लालच से बचने और सब कुछ भगवान् का समझने वाली आस्था लक्ष्य है। वह संपूर्ण त्याग और स्पृहा का निताँत अभाव बताते रहने से विकसित नहीं होती, पर नियमों को साधना के रूप में अपनाना है, तो एक प्रस्थान बिंदु नियत करना पड़ेगा। अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि व्रतों की तरह अपरिग्रह का अभ्यास भी एक छोटे-से नियम से शुरू किया जा सकता है। नियम यह है कि प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करते रहा जाए। विद्या-विभूति से सेवा करने, दूसरों के कष्ट दूर करने में अपनी प्रतिभा का अंश लगाने या कर्त्तव्य में उत्कृष्ट भाव का समावेश करने के अभ्यास आगे के हैं। अपरिग्रह का आदर्श धन-संपत्ति के मोह से मुक्त होने के लिए निश्चित किया गया है, तो दान का आरंभ भी धन से ही करना चाहिए।

भिक्षावृत्ति इन दिनों व्यवसाय का रूप ले चुकी है। फिर भी कुछ परिवारों या मनस्वियों ने नियम बना रखा है कि याचक जब भी आएगा, उसे मना नहीं करेंगे। इस व्रत का दूसरे लोग दुरुपयोग ही करते हैं, लेकिन जिसने व्रत धारण किया है, वह देते रहने के सुख को जानता है। धन संसार में सबसे प्रिय वस्तु है। लोग इसके लिए पद, प्रभाव और परिवार का भी त्याग कर देते हैं। जल्दी धनवान बनने के लिए पद-प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाकर अनुचित साधन अपनाए जाते हैं, तो वह एक किस्म का त्याग ही है। भगवद्गीता की परिभाषा में इसे तामसी त्याग कहा गया है, लेकिन है तो वह त्याग ही। धन के लिए अपने संबंध, स्वास्थ्य और परिवार को भी दाँव पर लगा देने की प्रवृत्ति खुलेआम देखी जाती है। इसका अर्थ है कि धन हमेशा से और अब भी सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

कंजूसी, छीन-झपट, बेईमानी, चोरी और भ्रष्टाचार जैसे मानसिक-सामाजिक अपराध भी धन की लालसा में ही किए जाते हैं। उस धन का एक अंश अहैतुक भाव से याचक को दिया जाता है, तो उसे अपरिग्रह की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम समझना चाहिए।

लोकमंगल के लिए अपनी आय का एक अंश लगाना दान का अगला चरण है, लेकिन जरूरतमंद लोगों को सीधे सहायता करना और इस नियम से पीछे नहीं हटने की निष्ठा फिर भी बनी रहनी चाहिए। उसमें कोई रुकावट नहीं आए। याचना करने वाले किसी भी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं जाने देने का नियम इस व्रत की पराकाष्ठा है। उस स्थिति तक क्रमशः ही पहुँचा जा सकता है। नहीं पहुँच पाए, तो भी कोई बात नहीं, प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करने का नियम भी पर्याप्त है। देते समय पाने वाले की पात्रता और आवश्यकता का विचार किया जा सकता है। कुपात्र को नहीं दिया जाए, क्योंकि उससे दिए गए अंश के दुरुपयोग और प्रकाराँतर से आसुरी शक्तियों को ही पुष्टि मिलती है।

जरूरी नहीं कि सत्पात्र और जरूरतमंद व्यक्ति हर दिन मिल ही जाएँ। जिस दिन नहीं मिलें, उस दिन का अंश सुरक्षित रखा जाए और अगले दिनों उसका उपयोग कर लिया जाए। पूछा जा सकता है कि इस एक साधारण नियम से अपरिग्रह का आदर्श कैसे प्राप्त किया जाए। योगदर्शन में इस नियम की सिद्धि-परिणति समस्त वैभव को प्रकट होने के रूप बताई गई है। महर्षि पतंजलि ने कहा कि परिपूर्ण अवस्था में साधक के सामने समस्त संपदाएँ प्रकट होने लगती हैं। प्रश्न किया जा सकता है कि एक साधारण नियम से यह चमत्कार कैसे संभव है। उसी का उत्तर पतंजलि ने यह कहते हुए दिया है कि सिद्धियों के प्रलोभन में व्रत-नियमों का पालन नहीं किया जाए, न ही उनके प्राप्त होने पर ठहर जाया जाए।

स्वामी शिवानंद ने लिखा है कि सिद्धियाँ साधक के विकास में बाधा पहुँचाती हैं। उनके प्रति ललक नहीं रखें। वे मिलें तो भी मुँह फेर लें। जहाँ तक छोटी-सी शुरुआत के बड़े परिणाम मिलने का प्रश्न है, उस संबंध में सचाई यही है कि वे निश्चित ही प्राप्त होते हैं। लक्ष्य कितना ही बड़ा और दूर तक हो, उस तक पहुँचने के लिए आरंभ दो छोटे-से कदम बढ़ाते हुए किया जाता है। अपरिग्रह यदि कोई बहुत बड़ा आदर्श है, तो उस दिशा में पहला कदम प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करना है।

दूसरा कदम? यह कदम अपने आसपास के लोगों की सराहना के रूप में है। नियम बना लिया जाए कि जहाँ तक होगा, दूसरों की प्रशंसा करेंगे। मनुष्य गुण-दोषों के मिश्रण से मिलकर बना है। अगर किसी पर ध्यान देने की जरूरत हो तो गुणों पर ही केंद्रित किया जाए। उन्हीं की सराहना करें। इसका अर्थ यह नहीं है कि दोषों का समर्थन करें, उन्हें भी गुण मानकर सराहें। अपितु व्यावहारिक पक्ष यही है कि दोषों को अनदेखा करें। ध्यान में रखें, सावधानी भी बरतें, उनके प्रभाव से अपना बचाव करें, सिर्फ व्यवहार में उन्हें रेखाँकित नहीं करें। उपेक्षा कर दें।

जिन गुणों की सराहना की जाती है, व्यक्ति उनके विकास के लिए प्रेरित होता है। जिसकी उपेक्षा की जाती है, व्यक्ति स्वयं भी उसे निरर्थक मानकर उनसे छूटने लगता है। कम-से-कम उनके प्रति आकृष्ट होना छोड़ देता है। प्रशंसा से दूसरों में सद्गुणों का विकास उत्कृष्टता के संवर्द्धन की, लोकमंगल साधना का ही हिस्सा है। दोहरा लाभ यह है कि प्रशंसा द्वारा हम अपने आप में भी इन गुणों का विकास करने लगते हैं। दूसरों के प्रति स्नेह-सद्भाव से भर उठते हैं। कम-से-कम परनिंदा और उसके कारण उत्पन्न होने वाले कलुष से तो बच ही जाते हैं। अपरिग्रह के शुद्ध अर्थों में यह नियम सद्गुणों का प्रवाह अविरल करने में सहायक है।

कहा गया है कि परिग्रह पाप नहीं है। आध्यात्मिक अपराध उसमें ममत्व बुद्धि धन-संपदा में ही नहीं, व्यक्तियों, वस्तुओं और विचारों में भी होती है। जिस वस्तु, व्यक्ति या विचार से मोह-ममता का संबंध जोड़ लिया जाता है, व्यक्ति धीरे-धीरे अपना आपा खोकर उसी के अनुरूप होने लगता है। कीट भृंगी, भौंरा पतंगा बनने लगता है और अपना स्वरूप खो बैठता है। मनुष्य का अपना स्वरूप जड़ या स्थावर नहीं है। वह चेतन है। जड़ पदार्थों से मोह-ममता जोड़ लेने के बाद आँतरिक स्थिति भी बदलने लगती है। धन-संपत्ति या अन्य वस्तुओं के प्रति मोहाविष्ट जनों में जीवन के दूसरे पक्ष गौण होने लगते हैं। उसके विकास की संभावनाएँ घटने-सिमटने लगती हैं। उदाहरण के लिए, पदलोलुप व्यक्तियों के मन में असुरक्षा, आशंका और आक्रामकता आ जाती है। उसमें विश्वास और सहिष्णुता का अभाव हो जाता है। धन के प्रति ममत्व बुद्धि रखने वालों का नैतिक, चारित्रिक विकास रुक जाता है। कृपण व्यक्तियों के लिए, मित्र-परिचितों और शुभचिंतकों की संख्या दिनोंदिन घटती जाती है। देखा तो यह भी गया है कि बेहद कंजूस लोगों के घर में संतानें नहीं होतीं। होती भी हैं तो उनकी योग्यता का विकास नहीं होता, क्योंकि उसकी आत्मा संचय और सुरक्षा की चिंता करते-करते कुँठित हो जाती है। दान, उदारता, सहिष्णुता और सराहना के भाव व्यक्ति की आत्मचेतना को विराट् बनाते हैं। फिर ईश्वर की यह समूची सृष्टि ही उसका आँगन और वैभव बन जाती है।


नारी शक्तिः एक भवितव्यता

नारी सृष्टि की सुँदर एवं सुकोमल कृति है। संवेदना उसकी सर्वोत्कृष्ट विशेषता है। प्राचीनकाल में इसी गुण के कारण उसे श्रेष्ठ एवं वरेण्य स्थान प्राप्त था, परंतु इस पक्ष को कमजोर मानकर वह सताई एवं शोषित भी की गई। पुरुष के तथाकथित पौरुषत्व एवं उद्धत अहंकार ने नारी का शोषण किया है। तमसाच्छन्नमय युग इसका ज्वलंत इतिहास है, जहाँ उसे केवल भोग एवं विलास की वस्तु माना गया। वर्तमान युग में स्थिति और भी विकृत है, किंतु यह नियति को स्वीकार्य नहीं था। नारी वर्ग सजग एवं जाग्रत् हुआ। जाग्रति की यह लहर समस्त विश्व में नारी जागरण के रूप में फैल गई। मनीषियों एवं भविष्यद्रष्टाओं के अनुसार, नवयुग का भविष्य इसी आँदोलन के गर्भ में पक रहा है।

नारी आँदोलन एक ऐसा आँदोलन है, जो किसी समाज या संस्कृति में नारी को पुरुष के समान सम्मान एवं अधिकार का मौलिक दावा करता है। पाश्चात्य जगत् में इसे ‘फेमीनिज्म’ कहा जाता है। इसका प्रारंभ अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुआ। उस समय इस आँदोलन की माँग थी महिलाओं को पुरुषों के समान सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में समान अधिकार प्राप्त हो। अधिकार रूपी इस माँग एवं आवश्यकता ने ही महिला आँदोलन की नींव रखी और इसका सूत्रपात हुआ। सदियों से पीड़ित, शोषित एवं प्रताड़ित नारी का स्वर इसी रूप में उभरकर सामने आया। इतिहास में यह प्रथम नारी आँदोलन था, जिसकी लहर धीरे-धीरे समूचे विश्व में फैलने लगी। इस आँदोलन को दो भागों में विभक्त किया जाता है, फर्स्ट वेव एवं सेकेंड वेव।

फर्स्ट वेव अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से प्रारंभ होकर सन् 1930 तक चला। इसका मुख्य उद्देश्य एवं लक्ष्य था, महिलाओं एवं पुरुषों का अधिकार समान हो। सेकेंड वेव की शुरुआत सन् 1960 के अंत में हुई। यह मत भी अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक परिस्थिति एवं परिवेश में उसकी समस्याओं की ओर ध्यानाकर्षित करता है तथा इसके समाधान एवं निराकरण की माँग दुहराता है।

पुरातात्त्विक प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि यूरोप और पूर्वी एशिया में पोलियोलिथिक सभ्यता थी। जिसमें मातृसत्तात्मक समाज का प्रचलन था एवं देवियों की पूजा-अर्चना की जाती थी। धीरे-धीरे इस परंपरा का ह्रास होता गया एवं मातृसत्तात्मक के स्थान पर पितृसत्तात्मक समाज का वर्चस्व बढ़ने लगा। इसके साथ ही राजनीतिक, धार्मिक, सैनिक आदि क्षेत्रों में पुरुषों के अधिकार में वृद्धि होने लगी। पुरुषों ने सभी पक्षों ने अपना एकाधिकार कायम कर लिया। अरस्तू ने अपने ग्रंथ ‘पोलिटिक्स’ में इस स्थिति का विशद वर्णन किया है। दूसरी सहस्राब्दी में पाश्चात्य जगत् में महिलाओं को आर्थिक, शैक्षिक तथा नैतिक स्तर से वंचित करने का कुचक्र रचा गया। इस तरह सर्वत्र नारी को शोषित एवं प्रताड़ित जीवन जीने को बाध्य कर दिया गया। इस अनीति एवं अत्याचार के विरुद्ध कुछ आवाजें उठने लगीं। जर्मनी में पुरुष एकाधिकार, चर्चों में महिलाओं के प्रवेश के लिए जनमत तैयार होने लगा। इटली के क्रिश्चियन दी विसान नामक विख्यात लेखक ने अपनी लेखनी के माध्यम से इसका घोर विरोध किया। सत्रहवीं शताब्दी तक यह स्थिति काफी मुखर हो चुकी थी। अनेकों महिला लेखिकाओं एवं विद्वानों का संगठन खड़ा हो गया। मेरी एस्टले ने नारी शिक्षा में वृद्धि हेतु आँदोलन की शुरुआत की।

‘फेमीनिज्म’ शब्द का उपयोग उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में प्रयोग हुआ, परंतु इसकी नींव अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही रखी जा चुकी थी। फर्स्ट वेव महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार की वकालत करता है। इस सिद्धाँत के अनुसार हर क्षेत्र में नारी को उचित स्थान एवं समुचित सम्मान मिलना चाहिए। यह विचारधारा फ्राँस की क्राँति एवं अमेरिकी स्वतंत्रता आँदोलन से प्रभावित मानी जाती है, क्योंकि ये दोनों ही क्राँतियाँ स्वतंत्रता एवं समानता की हिमायती हैं। फ्राँस के फेमीनिस्ट का तर्क है कि स्वतंत्रता, समानता एवं भाईचारा जैसी क्राँति का मूल्य सबके लिए समरूप होना चाहिए। अमेरिका में अमेरिकी महिला आँदोलनकारियों ने भी अमेरिका की स्वतंत्रता के साथ महिलाओं की नागरिकता एवं संपत्ति पर समान अधिकार के लिए आवाज बुलंद की थी।

इंग्लैंड में मेरी वोल स्टोन क्राफ्ट ने 1792 में महिला अधिकारों के संरक्षण पर एक क्राँतिकारी विचार .... किया। इसमें समानता एवं शिक्षा पर जोर दिया गया था। यह सर्वप्रथम ऐसा प्रयास था, जिसने महिलाओं को उनकी दुरवस्था से परिचित करवाया। उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में इंग्लैंड की मध्यमवर्गीय महिलाओं ने शिक्षा, रोजगार, नैतिक एवं मताधिकार प्राप्त करने हेतु आँदोलन का शंखनाद किया। जान स्टुअर्ट मिल ने समानता के इस अधिकार के लिए इनका सहयोग दिया। उसने अपनी पत्नी हेरियट टेलर से प्रेरित होकर ‘द सब्जेक्शन ऑफ वूमेन’ नामक ग्रंथ की रचना की।

सन् 1850 के पश्चात् इस आँदोलन में और भी तेजी व तीव्रता आई। यह प्रबल रूप धारण कर न्यूजीलैंड, पूर्व सोवियत संघ, जर्मनी, पोलैंड और आस्ट्रिया में आग की तरह फैल गया। समूचा पश्चिमी जगत् नारी आँदोलन की इस विचारधारा से परिचित हो गया। सामंतवादी पुरुषों के सामाजिक, साँस्कृतिक तथा शैक्षिक अवस्था में सुधार हेतु प्रयास चल पड़े। ‘न्यू वूमेन’ नामक विचारधारा ने समस्त जगत् में क्राँति की बिगुल बजा दी। उसने समानता के अलावा नारी की स्वतंत्र जीवन पद्धति एवं अभिव्यक्ति की ओर ध्यान आकर्षित किया। सन् 1920 में इस अभियान के स्वरूप में और विस्तार हुआ। समानता का व्यापक विचार महिलाओं के संवेदनशील उन समस्त बिंदुओं को स्पर्श करने लगा, जहाँ उसे शोषित एवं प्रताड़ित होना पड़ता था। माता एवं संतान के कल्याण के लिए अनेक योजनाएँ बनीं। यही मुद्दा सेकेंड वेव मुद्दे का मुख्य उद्देश्य बना।

सेकेंड वेव का प्रारंभ सन् 1960 में उत्तरी एवं मध्य अमेरिका तथा यूरोप व आस्ट्रेलिया के सामाजिक एवं मानवाधिकार आँदोलन से हुआ। अमेरिका से शुरू होने वाला नारी स्वतंत्रता आँदोलन-सामुदायिक स्वतंत्रता, महिला एवं पुरुषों की स्थिति के आधार पर समानता तथा स्वतंत्र अस्तित्व हेतु चलाया गया। सन् 1970 एवं 78 के बीच इसका स्वरूप और भी विस्तृत हुआ। इस आँदोलन की मुख्य विशेषता थी, समान वेतन, समान शिक्षा, व्यवसाय एवं नौकरी में समरूपता, स्वतंत्र पहचान, सेवा का समुचित अधिकार तथा अनीति, हिंसा व यौन शोषण से मुक्ति।

इस आँदोलन के मध्यकाल में सामाजिक एवं राजनीतिक तंत्र में हो रहे महिला शोषण को रोकने के लिए कई प्रकार की योजना बनी। अतः सामाजिक एवं राजनीतिक तंत्र में महिलाओं का प्रवेश द्वार खुल गया। भले ही यह संख्या न्यून थी, परंतु आगामी समय के लिए क्राँतिकारी परिवर्तन की आधारशिला बनी। यह विचारधारा साइमेन डी बीवेयर तथा केट मिलेट द्वारा प्रतिपादित हुई। उन्होंने पाश्चात्य जगत् में महिलाओं पर हो रहे शोषण एवं अत्याचार के खिलाफ ठोस कदम उठाया। जान डी बीवेयर के ‘सेकेंड सेक्स’ में उसका आभास होता है। सन् 1970 में केट मिलेट ने अपनी पुस्तक ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ में नारी की अवनति का वर्णन करते हुए उससे उत्थान का उपाय सुझाया। इस तरह नारी जाग्रति की एक नई चेतना का उदय हुआ और यह लहर सभी ओर फैल गई। नारी स्वयं अपनी दासताओं से मुक्ति के लिए छटपटाने लगी। परिणामतः नारी जागरण एक संगठित प्रयास एवं उपाय बन गया।

महिलाओं को शारीरिक शोषण के साथ ही मानसिक प्रताड़ना का दंश झेलना पड़ता था। अतः मानसिक रूप से सबल नारी की परिकल्पना की गई। सिगमंड फ्रायड के उस सिद्धाँत को पूरी तरह से नकार दिया गया, जिसमें नारी को भोग एवं विलास की वस्तु मात्र माना गया है। फ्राँस की महिला आँदोलनकारी हेलेन सिकस और लुसी इरीगरी ने महिला शरीर को देवत्व का वरदान घोषित किया। संवेदना एवं ममत्व को उसका सर्वश्रेष्ठ अलंकरण माना गया। इस तरह एक नई महिला संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ। पुरुष के एकाधिकार को समाप्त करने एवं नारी के यौन शोषण को रोकने के लिए आवाजें उठने लगीं। मेरी डेली ने ‘गाइन इकोलॉजी’ में उसे और भी विस्तार से वर्णन किया। विख्यात आँदोलनकर्त्री एंड्रिया डूवोरकीन ने भी क्राँतिकारी लेख लिखकर नारी जागरण में महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

नारी जागरण के दो मुख्य आँदोलन काल के पश्चात् आधुनिक विचारधारा का समावेश हुआ। आज उन सभी समस्याओं को रेखाँकित किया जाता है। जिसके तहत नारी को अबला एवं कमजोर मानकर शोषित किया जाता है। समस्याओं के निराकरण के साथ ही विकास के विभिन्न आयामों के प्रति नूतन दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। गायत्री चक्रवर्ती ऐसे समग्र आँदोलन की बात करती है, परंतु आँदोलन में उस देश की सामयिक समस्याएँ एवं परिस्थिति भी मुख्य कारक होती हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में एशियन, अफ्रोकेरीवियन तथा अफ्रीकी अमेरिकी आँदोलन को देखा जा सकता है। लेटिन अमेरिका का आँदोलन, जाति, लिंग, वर्ग-भेद की समानता की पुष्टि करता है। मुस्लिम देशों में सेकुलर, लिबरल आँदोलन महिलाओं की बुरका तथा तलाक से मुक्ति के इर्द-गिर्द घूमता है। भारतीय आँदोलन को समग्र आँदोलन कहा जा सकता है। फिर भी इसमें दहेज प्रथा, कुरीति, रूढ़िवादिता जैसी समस्याओं को प्राथमिकता दी गई है।

यूरोप में महिला जागरण मार्क्स आँदोलन के नाम से जाना जाता है। कार्ल मार्क्स एवं फ्रेडरिक एंजेल्स द्वारा प्रतिपादित सिद्धाँत के अनुसार नारी को भी आर्थिक तथा भौतिक उपलब्धियों में समान अधिकार होना चाहिए। उन्हें व्यवसाय एवं आय की उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। अमेरिका में ठीक इसी प्रकार का अभियान चला है। वह मटेरिएलिस्ट फेमीनिस्ट द्वारा संचालित एवं नियमित होता है। इसके अंतर्गत भी नारी को सामाजिक संबंधों एवं भौतिक अवस्था में समानता लाने पर बल दिया जाता है। आज इस विचारधारा का प्रभाव सभी क्षेत्रों में स्पष्टतः परिलक्षित होता है। समाजविज्ञानियों के अनुसार नारी जागरण अब सक्रिय एवं जीवंत हो उठा है। नारी मुक्ति आँदोलन पुरुषों के एकाधिकार रूपी दुर्ग को ध्वस्त करके ही रहेगा।

समस्त विश्व में नारी जागरण अभियान विभिन्न रूपों में सक्रिय है। यह प्रयास एवं पुरुषार्थ आगामी सदी-नारी सदी के भावी संकेत का द्योतक है। इक्कीसवीं सदी में नारी का ही वर्चस्व होगा। इसलिए कालचक्र पूर्ण वेग से गतिमान है। अतः नारी के उत्थान एवं विकास में हर समझदार नागरिक को लग जाना चाहिए। यही युगधर्म है।


कलंक को भी धो डाला (kahani)

पत्नी के सहयोग से ....

अमर लेखिका हैरियट एलिजाबेथ स्टो ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तक ‘टाम काका की कुटिया’ किन जटिल परिस्थितियों के बीच रहते हुए लिखी, यह बहुत कम लोग जानते हैं। आम जानकारी तो इतनी ही है कि इस क्राँतिकारी ग्रंथ ने अमेरिका से दासत्व की प्रथा उठा देने में अनुपम भूमिका का निर्वाह किया।

उन्होंने अपने भाभी के पत्र का उत्तर देते हुए लिखा था, “चूल्हा, चौका, कपड़े धोना, सिलाई, जूते गाँठना, बच्चों के लिए तैयारी आदि की व्यस्तता बनी ही रहती है। दिनभर सिपाही की तरह ड्यूटी देनी पड़ती है। छोटा बच्चा मेरे पास ही सोता है, वह जब तक सो नहीं जाता, कुछ भी लिख नहीं सकती। गरीबी और काम का दबाव बहुत है, फिर भी पुस्तक लिखने का समय निकालती हूँ, क्योंकि मुझे लगता है कि गुलाम प्रथा में सताए जाने वाले व्यक्ति भी अपने ही परिवार के अंग हैं। इस परिवार के लिए 10-12 घंटे लगाती हूँ, तो उस परिवार के लिए भी 1-2 घंटे तो निकालने ही चाहिए।”

हैरियट स्टो की यह पारिवारिक संवेदना ही उपन्यास के पृष्ठों पर छा गई। जिसने पढ़ा उसने ही अपने आपको एक बड़े परिवार का अंग अनुभव किया और इसी जाग्रत् परिवार भाव ने समाज से उस कलंक को भी धो डाला।


दाँपत्य सुख से ऊबी हुई आधुनिकता

कामकाजी दंपत्तियों का किया गया एक अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि कैरियर बनाने के लोभ में बच्चों से छुटकारा पा चुके दंपत्ति आपस में भी ज्यादा रुचि नहीं लेते। 30 से 45 वर्ष की आयु वाले कामकाजी दंपत्तियों में चालीस प्रतिशत लोगों का संबंध सिर्फ एक छत के नीचे रहने जैसा है।

आधुनिक सभ्यता अथवा कहें कि उपभोक्ता संस्कृति ने व्यक्ति और समाज को अपने ढंग से प्रभावित किया हो, उन्हें बरगलाया-फुसलाया हो, लेकिन परिवार संस्था को तो नष्ट-भ्रष्ट ही कर दिया है। किसी समय संयुक्त परिवार में माता-पिता या सास-ससुर और देवर-जेठ आदि दंपत्ति को सँभाले रहते थे। पति-पत्नी में अहं या ऐषणाओं की टकराहट होती, तो परिवार के दूसरे लोग उसे टूटने की ओर जाने से पहले ही दखल दे लेते थे। पारिवारिक जीवन में क्लेश-कलह आगे नहीं बढ़ पाता था। अब संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं। दखल देने वाला कोई रहा नहीं। विवाद हद से ज्यादा बढ़ता है, तो पास-पड़ोस के लोग, मित्र या दूर बसे नाते-रिश्तेदार (चाचा, ताऊ, सास-ससुर आदि) समझाने-बुझाने चले आते हैं। प्रभावशाली दखल वे भी नहीं दे पाते, क्योंकि वैसे संबंध ही नहीं रहे।

संयुक्त परिवार टूटने के बाद जो ढाँचा बना, उसमें पति-पत्नी और उनके बच्चे रह गए। अब इस इकाई को ही परिवार कहते हैं। मध्यम वर्ग में चलन यह है कि पति-पत्नी दोनों काम-धंधे पर निकल जाते हैं। घर में बच्चे अकेले रह गए। ज्यादा छोटे हुए, तो उन्हें केयर सेंटर, बालबाड़ी या प्री नर्सरी स्कूलों में छोड़ दिया। बच्चों को वह पोषण-संरक्षण नहीं मिलता, जो दादा-दादी या माँ के सान्निध्य में मिलता था। उन बच्चों की समस्या अपनी जगह है। समाजशास्त्री एक नया संकट इन दिनों अनुभव कर रहे हैं। संकट यह है कि अहं और एषणा के इर्द-गिर्द घूमने वाली मानसिकता दाँपत्य जीवन में भी दरार, टूटन और विघटन पैदा कर रही है। कामकाजी दंपत्तियों का किया गया एक अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि कैरियर बनाने के लोभ में बच्चों से छुटकारा पा चुके दंपत्ति आपस में भी ज्यादा रुचि नहीं लेते। 30 से 45 वर्ष की आयु वाले कामकाजी दंपत्तियों में चालीस प्रतिशत लोगों का संबंध सिर्फ एक छत के नीचे रहने जैसा है।

जीवन के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करती रहने वाली स्वयंसेवी संस्था ‘अनुभूति’ ने एक हजार दंपत्तियों से संपर्क किया। उन्हें एक प्रश्नावली दी और बातचीत भी की। प्रश्नावली में बीस सवाल थे। सभी सवाल पहली नजर में बहु मामूली थे। जैसे दफ्तर से पहले कौन लौटता है? पति-पत्नी में पहले से जो भी पहले घर पहुँच जाता है, वह दूसरे के आने पर किस तरह स्वागत करता है? घर आ जाने से रात सोने तक का समय कैसे बीतता है? घरेलू कामों के अलावा दोनों एक-दूसरे के निजी जीवन में कितनी दिलचस्पी लेते हैं, जैसे दफ्तर के अनुभव एक-दूसरे से बाँटते हैं या नहीं? एक-दूसरे के साथ होने के लिए कितने अधीर रहते हैं? जब भी कोई बीमार पड़ता है, तो दूसरा साथी क्या करता है? घर से बाहर कोई पुरुष या महिला मित्र है अथवा नहीं? पति-पत्नी अपने मित्रों के बारे में एक-दूसरे को बताते-समझाते हैं? एकाँत क्षणों को कैसे व्यतीत करते हैं? छुट्टी का दिन कैसे व्यतीत करते हैं?

अंतिम और महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह था कि पति-पत्नी की एक-दूसरे के बारे में क्या राय है? इस प्रश्न का उत्तर लिखकर देना जरूरी नहीं था। मौखिक भी दिया जा सकता था। जिस तरह के उत्तर आए, उनसे आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ज्यादातर लोगों ने अपने मन की बात लिखने की बजाय कहकर बताना ही ठीक समझा। पता नहीं, सर्वेक्षण करने वाले पति या पत्नी से चुगली ही कर बैठें। जिस आयु-वर्ग के लोगों से संपर्क किया गया, वे न तो नव विवाहित थे और न ही वृद्ध या अधेड़ उम्र के। तीस से पैंतालीस वर्ष की आयु वाले जोड़ों को परिपक्व और समझदार कहा जा सकता है। कम-से-कम उनमें नवविवाहितों की तरह आवेग या बेटे-बेटियों का जीवन सँवारने में लग जाने की चिंता नहीं होती। वे औसत स्तर का स्वस्थ दाँपत्य जी रहे हो सकते हैं।

आश्चर्य की बात यह कि जिस आयु-वर्ग में औसत स्वस्थ संबंधों की अपेक्षा की जाती है, वही सबसे ज्यादा ऊबा और एक-दूसरे से कतराने वाला साबित हुआ। जीवन-साथी के प्रति अपनी धारणा बताते हुए सत्तर प्रतिशत लोगों के स्वर शिकायत से भरे हुए थे। पंद्रह प्रतिशत लोगों ने साफ कहा कि वे पति अथवा पत्नी से तंग आ चुके हैं। छुटकारा पाने का कोई सौम्य रास्ता मिल जाए, तो उसे खुशी से अपनाएँगे। छुटकारा पाना ही है, तो सौम्य रास्ता ही क्यों? एक झटके में भी संबंध तोड़े जा सकते हैं। यह पूछने पर उत्तरदाता का कहना था कि आगे की जिंदगी में वे कोई उथल-पुथल नहीं लाना चाहते। सुख-शाँति के विकल्प बचे रहें और जिंदगी नए ढंग से शुरू कर पाए, इसकी आशा अभी बाकी है। यानी छुटकारा पाने के बाद पुनः एक जीवन साथी का चुनाव किया जा सकता है।

पैंतीस-चालीस वर्ष की उम्र में नए जीवन-साथी की तलाश का कारण यौनसुख की कामना नहीं हो सकती। इस संबंध में एक और अध्ययन है। उसकी चर्चा से पहले नए साथी की तलाश के कारण जान लें। पति अथवा पत्नी से छुटकारा पाने की साध पाले हुए लोगों को इससे अपने कैरियर में सहायता मिलती दिखाई दे रही थी। एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के मुँबई दफ्तर में मैनेजर एस. दिवाकर (नाम कल्पित) को अपनी पत्नी से सिर्फ इसलिए ऊब होने लगी कि वह एक प्रतिष्ठित दैनिक में साहित्य संपादक है। दिवाकर की राय में वह आगे नहीं जा सकती। उधर बहुराष्ट्रीय कंपनी में एक ऐसी सहकर्मी से उसकी अंतरंगता बढ़ गई है, जो संभावनापूर्ण है। दिवाकर का मानना था कि पत्रकार बीबी से छुटकारा मिले, तो सहकर्मी मित्र के साथ जोड़ी बनाकर कारोबारी जीवन में कुलाचें भरी जा सकती हैं। जिस महिला के साथ उसने सपने सँजोए, वह भी मैनेजर ही है और दिवाकर की राय में ज्यादा होशियार।

एक अन्य प्रसंग में पत्नी अपने परिवार से इसलिए छुटकारा पाना चाहती है कि पति व्यवसायी है। जब विवाह हुआ, तो सुनंदा इंटरमीडिएट पास थी और पति अपने पैतृक व्यवसाय को सँभालने की कोशिश कर रहे थे। सुनंदा घर में खाली रहती। समय बिताने के लिए योग्यता का विकास एक आसान रास्ता सूझा। पति ने सहयोग किया और सुनंदा ने उपाधि परीक्षा पास कर ली। बी.एड कर लिया और माध्यमिक विद्यालय में नौकरी लग गई। पति अपने पैतृक व्यवसाय में ही थे। अब जम गए हैं। बीस-पच्चीस हजार रुपये हर महीने कमा लेते हैं, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में पत्नी से थोड़े पिछड़े हैं। सुनंदा को लगता है कि पति उसके लायक नहीं हैं। अगर छुटकारा मिला जाए, तो अच्छा रहेगा। अच्छे ओहदे पर काम कर रहे वरिष्ठ अधिकारी के साथ जीवन बिता सके, तो ज्यादा सुखी रहेगी। उन्नति करने का अवसर मिलेगा।

प्रसंग बताते हैं कि दाँपत्य जीवन में निष्ठा और अनुराग का अभाव होता जा रहा है। इसी के चलते एक-दूसरे को तिलाँजलि देने की बात मन में आती है। आमतौर पर समझा जाता है कि यौनसुख की तलाश में लोग एक-दूसरे से विमुख होते हैं। पति अथवा पत्नी से यौन तृप्ति नहीं होती, इसलिए स्त्रियाँ परपुरुषगामी होती हैं और पुरुष दूसरी स्त्रियों को ताड़ते रहते हैं। समाज में व्यभिचारी लोगों की संख्या बहुत है। कामलिप्सा के कारण एक-दूसरे को धोखा देने और दूसरों से संबंध रखने की प्रवृत्ति भी खूब पनपी है। ‘अनुभूति’ ने पति-पत्नी के संबंधों को अलग कोण से देखने की कोशिश की और पाया कि तीस से पैंतालीस की उम्र वाले दंपत्तियों के लिए यौन तृप्ति तीसरी-चौथी प्राथमिकता है। अध्ययन के लिए चुने गए दंपत्तियों में चालीस प्रतिशत लोगों ने कहीं और संबंध बनाने के बारे में सोचा ही नहीं। कामकाजी जीवन में दूसरी स्त्रियों या पुरुषों के संपर्क में आना पड़ता है, यह अलग बात है। हँसी-मजाक, उठने-बैठने और जरूरत पड़ने पर मदद के लिए दौड़ जाने जैसी दोस्ती भी बन जाती है, लेकिन इन लोगों के मन में यौन संबंधों की इच्छा नहीं जगी।

कारण यह नहीं है कि उन्होंने पतिव्रत अथवा पत्नीव्रत धर्म के निष्ठापूर्वक पालन करने की सौगंध खा ली हो। दिनभर भागदौड़ करते और विभिन्न तरह के तनाव झेलते हुए इतनी थकान आ जाती है कि इस तरफ ध्यान नहीं नहीं जाता। परिस्थितियों के कारण संयम-अनुशासन में रहने वालों का सोचना यह भी है कि इस तरह की पहल कामकाजी जीवन और मित्रता पर बुरा असर भी डाल सकती है। जो लोग अपने वर्तमान साथी को छोड़कर किसी और के साथ रहना-बसना चाहते हैं, उनके लिए भी कैरियर ही मुख्य है। साथ काम करने के कारण, लगाव, निर्भरता और अनुराग के कारण यह हो सकता है, लेकिन ‘सैक्स’ कारण कतई नहीं है।

एक अन्य विश्लेषण में यह भी निष्कर्ष सामने आया है कि ‘सैक्स’ विवाहित जीवन से भी विदा हो रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के 21 मई 2000 अंक में छपे इस विश्लेषण के अनुसार अति के कारण अथवा दूसरी प्राथमिकताओं के कारण कामकाजी दंपत्ति यौनसुख से प्रायः विरत रहने लगे हैं। उठती उम्र में ही एक-दूसरे से परिचित होने के बाद प्रणय संबंध हो जाने और कुछ ही महीनों में विवाह कर लेने का बड़ा कारण ‘सैक्स’ तो हो सकता है, लेकिन एकाध बच्चे का जन्म होने के बाद वह जल्दी ही विदा हो जाता है। चार-पाँच साल बीतने के बाद यह आकर्षण कम होने लगता है, धीरे-धीरे लगभग विदा हो जाता है।

विवाहित जीवन शुरू करने के बाद यौनसुख में ही डूबे रहने को, विश्लेषण में जल्दी ही एक-दूसरे से ऊब जाने का मुख्य कारण बताया गया है। खाना-पीना, उठना-बैठना, आना-जाना और यात्राएँ करना सभी कुछ होता है, लेकिन अपने काम में ही डूबे रहने वालों के लिए अंतरंग बने रहना कठिन होता जा रहा है। विश्लेषण इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि भावात्मक, पारिवारिक और आर्थिक आकर्षण बहुत जल्दी फीके पड़ने लगते हैं। यौनसुख ही उन्हें एक-दूसरे से बाँधे रखता है। उसके अभाव में दाँपत्य जीवन कितना चलेगा? उत्तर गृहस्थ धर्म की प्रेरणाओं में है। समर्पण, त्याग और सेवा की भावना हो, तो संबंधों का चिरंतन निर्वाह किया जा सकता है, लेकिन यह इसलिए संभव नहीं दिखाई देता कि पति-पत्नी का अहं, स्वार्थ और आकाँक्षाओं में तालमेल नहीं बैठ रहा। उनकी अपनी निताँत वैयक्तिक अपेक्षाएँ और आवश्यकताएँ हैं, जिनके चलते मन से बहुत देर तक साथ नहीं निभता।

आधुनिक दांपत्य का अध्ययन इस निष्कर्ष को और ज्यादा पुष्ट करता है। पूछे गए सवालों में पैंतीस प्रतिशत लोगों ने कहा कि पति या पत्नी में से जो भी पहले आ जाता है, वह बाद में आने वाले के प्रति कोई उमंग नहीं जताता। पत्नी यदि पहले आ गई हो, तो पति जरूर अपेक्षा करता है कि उसके जूते उतारने, बेल्ट खोलने, कपड़े बदलने में सहायता की जाए। चाय-पानी हाजिर रखी जाए। जरूरी नहीं कि यह अपेक्षा पूरी हो। अठारह प्रतिशत गृहिणियों का कहना था कि आधा-पौन घंटे पहले वे भी तो थककर आई होती हैं। विश्राम का उनका अपना मूड़ भी होता है। फिर पति पहले आ जाते हैं, तो हमारे घर लौट आने पर वे ही कहाँ स्वागत करते दिखाई देते हैं।

कामकाज से लौटी पत्नी के बारे में बाईस प्रतिशत पुरुषों की धारणा पुरातनपंथी-रूढ़िवादी ही थी। उनके अनुसार घर-गृहस्थी सँभालना स्त्रियों का काम है। वे कमाने के लिए जाती हैं, यह अलग बात है। इससे उनका कर्त्तव्य नहीं बदल जाता। स्त्री का धर्म है कि पति घर आए, तो दरवाजे पर उसका इंतजार करती दिखाई दे। उसके आराम का ध्यान रखे। यह पूछा गया कि पुरुष या पति का ऐसा कोई कर्त्तव्य नहीं बनता? जो उत्तर दिए गए उनका सार यह है कि पत्नी की तरह दरवाजे पर खड़ा होना या घर में चाय-पानी पेश करना पति का दायित्व नहीं है। यह स्त्री का ही कर्त्तव्य है। पुरुष का धर्म स्त्री को संरक्षण देना है। यदि पति सहयोग नहीं करे, अनुमति नहीं दे तो स्त्री काम-धंधा ही नहीं कर पाएगी। इसके अलावा पुरुष के कारण स्त्री समाज में गर्व और अधिकार से सिर उठाकर चलती है। जिस स्त्री का पति नहीं होता उसे लोग समाज में जीने कहाँ देते हैं। चील-कौओं की तरह नोच डालेंगे। ऐसी-ऐसी बातें कही जाती हैं।

ये उत्तर पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता बताते हैं। आश्चर्य यह है कि अच्छे पदों पर बैठी महिलाएँ भी इस दृष्टिकोण का समर्थन करती पाई गईं। इस सोच का जवाब स्त्री-पुरुषों की समानता और गृहस्थी की जिम्मेदारी साझा होने की बात कहते हुए भी दिया गया है। लेकिन इस तरह का उत्तर देने वाली महिलाओं में भी आवश्यक खुलापन, आत्मविश्वास और पैने तर्कों का अभाव ही था।

दाँपत्य संबंध कामचलाऊ ढंग से चलने का एक प्रमाण यह भी है कि अपने दफ्तर या व्यवसाय के बारे में तीस प्रतिशत लोग ही एक-दूसरे को बताते हैं। यह जानकारी अपने आप और पूछने पर दोनों तरह से दी जाती है। सत्रह प्रतिशत लोग औपचारिक बातों के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कहते। कारण? अभिजित कोहली का उत्तर प्रतिनिधि अभिव्यक्ति है। सब कुछ या जरूरत से ज्यादा बताया जाए, तो ‘पार्टनर’ की माँग बढ़ने लगेगी। वह खुद भी तो कमाती है। खुद ही सारी बातें कहाँ बताती है? गृहिणियों की राय में दफ्तर की बातें बाँटने से पति महोदय की दखलंदाजी बढ़ने का खतरा रहता है। जरूरी भी नहीं है बताना। गृहस्थ जीवन में पति-पत्नी के बीच कोई परदा नहीं होने के आदर्श वाले भारतीय समाज में दोनों का ‘निजी’ जीवन भी होने लगा है। उसे एक-दूसरे के सामने नहीं खोलना चाहिए। बल्कि प्रयत्नपूर्वक अपनी निजता को गोपनीय रखना चाहिए। यह स्थिति दाँपत्य जीवन के सिर्फ ढकोसला रह जाने के अलावा क्या सिद्ध करती है? बाजार का तर्क है कि व्यक्ति अकेला हो तो उससे सौदा करना आसान रहता है। उपभोक्ता सामग्री आसानी से और ज्यादा खपाई जा सकती है। धर्म-अध्यात्म की प्रेरणा सामंजस्य, समर्पण और निष्ठा के लिए प्रेरित करती है। दोनों प्रवृत्तियों में किसकी जीत होती है, यह भविष्य बताएगा।


नींद की स्थिति में होता है परोक्ष से आदान-प्रदान

लंबी अनिद्रा के कारण जब विद्युत् की आपूर्ति में अवरोध उत्पन्न होता है, तो न सिर्फ शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाता है, अपितु उस शक्ति का ह्रास होने लगता है, जो अतींद्रिय अनुभूति का महत्त्वपूर्ण आधार है।

निद्रा मनुष्य के लिए आवश्यक और उपयोगी प्रक्रिया है। इसका न होना अथवा इससे वंचित कर देना व्यक्ति को विक्षुब्ध जैसी स्थिति में ला खड़ा करता है। सूक्ष्म सूचनाओं का महत्त्वपूर्ण आधार यही है। सामान्य मनुष्य के लिए सूक्ष्म जगत् से संपर्क इसी स्थिति में बन पड़ता है। यही शारीरिक-मानसिक थकान मिटाने का सर्वसुलभ साधन है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार निद्रा में सचेतन भाग अचेतन की स्थिति में सिर्फ इसलिए नहीं जाता कि उससे थके अंगों को आराम मिले, वरन् उस स्थिति में अंतरिक्ष में प्रवाहमान विद्युत्धाराओं में से उपयोगी अंश संगृहीत-संपादित करने का अवसर भी मिले, प्रयोजन यह भी होता है। एरियल और एंटीना विद्युत् चुँबकीय तरंगों को पकड़ते हैं। निद्रा अवस्था में हमारा अवचेतन मस्तिष्क वैसा ही बन जाता है और आकाश से इतनी विद्युत् खुराक प्राप्त कर लेता है, जिससे शारीरिक और मानसिक क्रिया–कलापों का संचालन ठीक प्रकार हो सके। निद्रा की पूर्ति न होने पर शारीरिक और मानसिक स्थिति में जो गड़बड़ी उत्पन्न होती है, उसे मनोविज्ञान की भाषा में ‘चेतनात्मक बुभुक्षा’ कहते हैं। आवश्यक विद्युतीय खुराक न मिल पाने के कारण ही यह दशा पैदा होती है। इसके बने रहने पर मनुष्य विक्षिप्तों या अर्द्ध विक्षिप्तों जैसा व्यवहार करने लगता है। पागलपन का एक कारण अनिद्रा भी है। अनिद्रा में इस विद्युत् आहार की ही कमी पड़ती है।

लंबी अनिद्रा के कारण जब उक्त विद्युत् की आपूर्ति में अवरोध उत्पन्न होता है, तो न सिर्फ शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाता है, अपितु उस शक्ति का भी ह्रास होने लगता है, जो अतींद्रिय अनुभूति का महत्त्वपूर्ण आधार है। स्वस्थ व्यक्ति में जैसे-जैसे यह ऊर्जा बढ़ती है, इंद्रियातीत सामर्थ्य की संभावना भी बलवती होने लगती है। योगी-यती इसी विद्युत् को बढ़ाकर ऐसी क्षमताएँ अर्जित कर लेते हैं, जिन्हें जन सामान्य ऋद्धि-सिद्धि के नाम से जानते हैं। निद्रा संवर्द्धन और क्षमता अभिवर्द्धन में इसका कितना बड़ा हाथ है, इसे प्राणायाम का कोई भी अभ्यासी सहज ही अनुभव कर सकता है। देखा गया है कि अभ्यास ज्यों-ज्यों बढ़ता है, बुद्धि तीक्ष्ण होती और गहरी निद्रा आती है। गहन निद्रा का एक गुण शारीरिक हलकापन भी है और दूसरा भविष्य संबंधी स्वप्न का दिग्दर्शन भी।

यों निद्रा संबंधी सामान्य सोच यह है कि रात्रि में हम जितना समय सोते हैं, उतना खोते हैं, पर यह अवधारणा अब गलत साबित होती जा रही है। वैज्ञानिक शोधें अब यह सिद्ध करने की स्थिति में आ गई हैं कि हमारा सोया हुआ समय भी उपयोगिता की दृष्टि से उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना जागरण का, बल्कि यह कहा जाए कि उससे भी अधिक, तो कदाचित् कोई अत्युक्ति न होगी। सीखने-सिखाने के कितने ही ऐसे कार्य इस दशा में भी संपन्न किए जा सकते हैं, जैसे जाग्रतावस्था में। मनोवैज्ञानिकों के इस कथन के पीछे सत्य अब सूर्य की तरह झाँकने और यह प्रमाणित करने लगा है कि नींद अब निरर्थक समयक्षेप जैसी प्रक्रिया न होकर ज्ञान-संपादन की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ऐसा ही एक समाचार पूर्व सोवियत संघ के ‘नोवोत्सी न्यूज एजेंसी’ ने अब से कुछ वर्ष पूर्व वहाँ के अखबारों में छापा, तो लोग आश्चर्यचकित रह गए। शरीर शास्त्रियों ने इसे शेखचिल्लियों जैसी कल्पना बताया, तो रूस के अनेक मनोविज्ञानियों ने उन मनःशास्त्रियों का उपहास उड़ाया, जिन्होंने इस प्रकार का दावा किया था, पर कई दिन पश्चात् जब वहाँ से परिणाम प्राप्त होने शुरू हुए, तो उनका संदेह जाता रहा। यहाँ तक कि उन्होंने स्वयं भी वहाँ जाकर परीक्षण कर सूक्ष्म निरीक्षण किया और किसी प्रकार के संशय की गुंजाइश न रहने पर संतोष व्यक्त किया।

इस अनुसंधान की शुरुआत की भी अत्यंत रोचक घटना है। हुआ यों कि कुछ वर्ष पूर्व मूर्द्धन्य मनःशास्त्री इगोर इवानोविच अपने साथी मनोवैज्ञानिकों के साथ नींद और स्वप्न प्रक्रिया पर विचार कर रहे थे कि अचानक उनके दिमाग में स्वप्न की वह प्रक्रिया कौंधी, जिसके माध्यम से यदा-कदा स्वप्नद्रष्टा को सही सूचना प्राप्त हो जाती है। बस, फिर क्या था, उनके मस्तिष्क में इस संदर्भ में उधेड़बुन आरंभ हो गई। वे और उनके सहयोगी इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार करने लगे कि जब स्वप्नावस्था में दिमाग सत्य संदेश प्राप्त कर सकने में सक्षम है, तो क्या निद्रावस्था में उसे सूक्ष्म शिक्षण संप्रेषित कर प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता?

इन्हीं संभावनाओं के बीच इस विलक्षण अन्वेषण कार्य का जन्म हुआ और मास्को के निकट दूबना नामक स्थान पर तत्संबंधी एक अनुसंधानशाला स्थापित की गई। परीक्षण आरंभ करने से पूर्व मनोवैज्ञानिकों ने कुछ प्रतिमान बनाए, जिनके आधार पर प्रयोगार्थियों का चयन किया जाना था, पर इसका सबसे महत्त्वपूर्ण आधार गहरी नींद में था। प्रयोग को उन्हीं व्यक्तियों को सम्मिलित किया गया, जिन्हें गहरी नींद आती थी। जो शेष प्रतिमानों को पूरे होने पर भी गहरी नींद का अनुबंध पूरे नहीं करते थे, उन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया। दूसरी ओर जिन्हें गहरी निद्रा तो आती थी, पर जो शेष शर्तों की पूर्ति नहीं कर पाए, उन्हें भी इसके अयोग्य घोषित किया गया। कुल मिलाकर परीक्षण के अनुकूल उन्हें ही ठहराया गया, जो निर्धारित सभी शर्तों की पूर्ति करते थे।

प्रयोग प्रारंभ किया गया। इसमें सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के माध्यम से प्रयोगार्थियों को नींद के दौरान अँग्रेजी एवं अन्य भाषाशास्त्र के रिकॉर्ड सुनाए गए और जागने पर तद्विषयक अनेक प्रश्न पूछे गए, जिसके कुछ ने सही, कुछ ने गलत जवाब दिए मनःशास्त्रियों का कहना था कि संभवतः इसका कारण मस्तिष्कीय अनुकूलनता का अभाव था। जिस मस्तिष्क ने जितनी जल्दी स्वयं को प्रशिक्षण योग्य ढाल लिया, उसने उतनी जल्दी सूचनाओं और संदेशों को ग्रहण करना आरंभ कर दिया, पर इसकी कमी सूक्ष्म संकेतों को ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करती है, ऐसा मनोवेत्ताओं का अभिमत था। दूसरा यह दृढ़ विश्वास भी था कि जैसे-जैसे मस्तिष्क की अनुकूलनता विकसित होती जाएगी, वैसे-वैसे उसकी ग्रहणशीलता में भी उत्तरोत्तर विकास होता चला जाएगा। मनोवैज्ञानिकों का मत है कि इस प्रक्रिया द्वारा लोग सोते में भी सारगर्भित जानकारी अर्जित कर उस समय का अतिरिक्त उपयोग कर सकेंगे, जिसे बोलचाल की भाषा में ‘सोना अर्थात् खोना’ जैसे संबोधनों से अभिहित किया जाता है। प्रयोग अभी जारी है।

इसका परिणाम चाहे जो हो, इस तथ्य से सर्वथा इनकार नहीं किया जा सकता है कि जब हम सोते रहते हैं, तब भी प्रकाराँतर से जागते रहते हैं। अंतर सिर्फ इतना होता है कि इसमें चेतना का स्वल्प अंश अचेतन स्थिति में चला जाता है, पर उसका अधिकाँश भाग अपना कार्य यथावत् करता रहता है। हृदय का धड़कना, साँस का चलना, रक्त का दौड़ना उस अवस्था में भी ज्यों-का-त्यों जारी रहता है। ऐसी दशा में बाहरी शिक्षण किसी प्रकार अंतःचेतना में उतर जाए, तो इसे आश्चर्यजनक तो कहा जा सकता है, पर असंभव नहीं। यह प्रक्रिया योगी स्तर के उन लोगों में स्पष्ट देखी जाती है, जिनकी चेतना तनिक परिष्कृत हो गई है। फिर वह सोते हों अथवा जागते, उनकी व्यष्टि चेतना समष्टि चेतना से इस प्रकार गुँथ जाती है कि अदृश्य के गर्भ में जो भी घटना पकती-पनपती रहती है, उसकी महत्त्वपूर्ण जानकारी जागते एवं सोते हुए में समान रूप से मूर्तिमान होने लगती है। महापुरुषों के स्वप्न प्रायः इसी स्तर के होते हैं। उनमें सामान्य जनों जैसे औंधे-सीधे दृश्यों का जाल-जंजाल नहीं होता, वरन् उसमें सोद्देश्य सूचनाओं का सारगर्भित समावेश होता है।

संक्षेप में, नींद एक साथ अनेक प्रयोजन पूरे करती है। वह शरीर और मस्तिष्क की क्लाँति मिटाकर उन्हें नई स्फूर्ति से ओत−प्रोत करती और उस ऊर्जा की भरपायी करती है, जिसका कि कार्य के क्षणों में क्षरण होता रहता है। इसके अतिरिक्त अदृश्य जगत् से संपर्क स्थापित करना, सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के माध्यम से ज्ञानार्जन करना जैसे कितने ही कार्य इसके द्वारा संपादित किए जा सकते हैं। इसलिए नींद स्वास्थ्य की दृष्टि से ही आवश्यक नहीं, वरन् सूक्ष्म आदान-प्रदान के दृष्टिकोण से भी उपयोगी है। इस दिशा में उपेक्षा नहीं बरती जानी चाहिए।


जन्म देने से पूर्व ही शिक्षा की व्यवस्था (kahani)

एक महिला ने शिकागो के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री फ्राँसिस वेलैंड पार्कर से यह पूछा, “वह अपने बच्चे की शिक्षा कब से प्रारंभ करे?” पार्कर ने पूछा, आपका बच्चा कब जन्म लिया है? महिला ने बताया, “वह तो पाँच वर्ष का हो गया।” पार्कर ने कहा, “क्षमा करें मादाम। अब पूछने से क्या फायदा। शिक्षा का सर्वोत्तम समय तो पाँच वर्ष तक ही होता है। सो आपने तो यों ही गँवा दिया। यदि आपने जन्म देने से पूर्व ही शिक्षा की व्यवस्था की होती, तो अब तक वह एक सुयोग्य नागरिक के लघु संस्करण के रूप में विकसित हो गया होता।”


अंतः चेतना से जुड़ा शरीर का रसायन शास्त्र

साधारणतया आहार-विहार का प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने वाले निरोग रहते हैं और असंयम बरतने वाले, अखाद्य खाने वाले बीमार पड़ते हैं। बीमारियों के कारण रोग-कीटाणुओं के रूप में, ऋतु-प्रभाव या धातुओं, तत्त्वों के हेर-फेर में ढूँढ़े जाते हैं और उसी आधार पर चिकित्सा की जाती है, पर कई बार इन सब मान्यताओं को झुठलाते हुए ऐसे कारण उपस्थित हो जाते हैं कि अप्रत्याशित रूप से शरीर के किन्हीं अवयवों का या प्रवृत्तियों का यकायक घटना-बढ़ना शुरू हो जाता है। कारण ढूँढ़ते हैं, तो समझ में नहीं आता। अँधेरे में ढेला फेंकने की तरह कुछ उपचार किया जाता है, तो उसका परिणाम कुछ नहीं निकलता।

ऐसी परिस्थितियाँ प्रायः हारमोन ग्रंथियों में गड़बड़ी आ जाने के कारण उत्पन्न होती है। शरीर के सामान्य अवयवों की संरचना और उनकी कायपद्धति का ज्ञान धीरे-धीरे बढ़ता आया है, इसलिए रोगों के कारण और निवारण के संबंध में काफी प्रगति भी हुई है, पर यह अंतःस्रावी ग्रंथियों की आश्चर्यचकित करने वाली हरकतें जब से सामने आई हैं, तब से चिकित्साविज्ञानी स्तब्ध रह गए हैं। प्रत्यक्षतः शरीरगत क्रिया−कलाप में इनका कोई सीधा उपयोग नहीं है। वे किसी महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति नहीं करतीं, चुपचाप एक कोने में पड़ी रहती हैं और वहीं से तनिक-सा स्राव बहा देती हैं। वह स्राव भी पाचक अंगों द्वारा नहीं, सीधा रक्त से जा मिलता है और अपना जादू जैसा प्रभाव छोड़ता है।

हारमोन शरीर और मन पर कितने ही प्रकार के प्रभाव डालते और परिवर्तन करते हैं। उनमें से एक परिवर्तन काम-वासना का मानसिक जागरण और यौन अंगों की प्रजनन क्षमता भी सम्मिलित है।

छोटी उम्र की लड़की और लड़के लगभग एक जैसे लगते हैं। कपड़ों से, बालों से उनकी भिन्नता पहचानी जा सकती है, अन्यथा वे साथ-साथ हँसते, खेलते, खाते हैं, कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता, पर जब बारह वर्ष से आयु ऊपर उठती है, तो दोनों में काफी अंतर अनायास ही उत्पन्न होने लगता है।

यह हारमोन स्रावों की करतूत है। वे समय-समय पर ऐसे उठते-जागते हैं, मानो किसी घड़ी में अलार्म लगाकर रख दिया हो अथवा टाइम बम को समय के काँटे के साथ फिट करके रखा हो। यौवन उभार के संबंध में इन्हीं के द्वारा सारा खेल रचा जाता है। अन्य सारे अवयव अपने ढंग से ठीक काम करते रहें, पर यदि इन हारमोन ग्रंथियों का स्राव न्यून हो, तो यौवन अंग विकसित न होंगे और यदि किसी प्रकार विकसित हो भी जाएँ, तो उनमें वासना का उभार नहीं होगा, न कामेच्छा जाग्रत् होगी, न उस क्रिया में रुचि होगी। संतानोत्पादन तो होगा ही कैसे?

सामान्यतया कामोत्तेजना का प्रसंग 15-16 वर्ष की आयु से प्रारंभ होकर 60 वर्ष पर जाकर लगभग समाप्त हो जाता है। स्त्रियों का मासिक धर्म बंद हो जाने पर लगभग 50 वर्ष की आयु में उनकी वासनात्मक शारीरिक क्षमता और मानसिक आकाँक्षा दोनों ही समाप्त हो जाती हैं। इसी प्रकार 60 वर्ष पर पहुँचते-पहुँचते पुरुष की इंद्रियाँ एवं आकाँक्षाएँ भी शिथिल एवं समाप्त हो जाती हैं। यह सामान्य क्रम है, पर कई बार हारमोनों की प्रबलता इस संदर्भ में आश्चर्यजनक अपवाद प्रस्तुत करती है। बहुत छोटी आयु के बच्चे भी न केवल पूर्ण मैथुन में, वरन् सफल प्रजनन में भी समर्थ देखे गए हैं। उसी प्रकार शताधिक आयु हो जाने पर भी वृद्ध व्यक्तियों में इस प्रकार की युवावस्था जैसी परिपूर्ण क्षमता पाई गई है।

लिंग भेद से संबंधित हारमोनों में गड़बड़ी पड़ जाए, तो नारी के मूँछें निकल सकती हैं। पुरुष बिना मूँछ का हो सकता है तथा उसकी छाती बालरहित हो सकती है एवं दोनों की प्रवृत्तियाँ भिन्न लिंग जैसी हो सकती हैं। यौन आकाँक्षाएँ भी विपरीत वर्ग जैसी हो सकती हैं। इतना ही नहीं, कई बार तो इन हारमोनों का उत्पाद ऐसा हो सकता है कि प्रजनन अंगों की बनावट ही बदल जाए। ऐसे अनेक ऑपरेशनों के समाचार समय-समय पर सुनने को मिलते रहते हैं, जिनमें नर से नारी की और नारी से नर की जननेंद्रियों का विकास हुआ और फिर शल्य क्रिया द्वारा उसे तब तक के जीवन की अपेक्षा भिन्न लिंग का घोषित किया गया। इसी नई परिस्थिति के अनुसार उन्होंने साथी ढूँढ़े, विवाह किए और घर बसाए।

पुराने जमाने में मृत या स्वल्प कामेच्छा को जगाने के लिए रसायनों और भस्मों का प्रयोग किया जाता था। वह प्रयास भी नशे से उत्पन्न क्षणिक उत्तेजना जैसा ही सिद्ध हुआ। जब से हारमोन प्रक्रिया का ज्ञान हुआ है, तब से यौन ग्रंथियों के रसों को पहुँचाने से लेकर बंदर एवं कुत्ते की ग्रंथियों का आरोपण करने तक क्रम बराबर चल रहा है। आरंभ में उससे तत्काल लाभ दीखता है; पर वह बाहर का आरोपण देर तक नहीं ठहरता। भयंकर ऑपरेशनों के समय रोगी को अन्य व्यक्ति का रक्त दिया जाता है; वह शरीर में 3-4 दिन से अधिक नहीं ठहरता। शरीर यदि रक्त स्वयं बनाने लगे, तो ही फिर आगे की गाड़ी चलती है। इसी प्रकार आरोपित स्राव अथवा रस ग्रंथियां जाग्रत् होकर स्वतः काम करने लगें, अन्यथा वह बाहरी आरोपण की फुलझड़ी थोड़ी देर चमक दिखाकर बुझ जाएगी। अब तक के बाह्य आरोपण के सारे प्रयास निष्फल हो गए हैं। कुछ सप्ताह का चमत्कार देख लेने के अतिरिक्त उनसे कोई प्रयोजन सिद्ध न हुआ।

अस्सी के दशक में अमेरिका के एक वृद्ध डॉक्टर ब्राउन सेक्वार्ड ने घोषणा की कि उसने कुत्ते का वृषण-रस अपने शरीर में पहुँचाकर पुनः यौवन प्राप्त करने में सफलता पा ली है। 72 वर्षीय इस डॉक्टर की ओर अनेक चिकित्साशास्त्रियों का ध्यान आकर्षित हुआ और उन्होंने घोषणा को सच पाया, लेकिन यह सफलता स्थिर न रह सकी। वे कुछ ही दिन बाद पुनः पुरानी स्थिति में आ गए।

लिवरपुल यूनिवर्सिटी के शरीरशास्त्री डॉ. बर्नाडे मरे ने थायरोक्सिन का प्रयोग एक थायराइड विकारग्रस्त रोगिणी पर किया। दवा का असर बहुत थोड़े समय तक रहता था। कुछ वर्ष जीवित रखने के लिए एक-एक करके प्रायः आठ सौ भेड़ों की ग्रंथियां निचोड़कर उसे आए दिन लगानी पड़ती थीं। इस पर धक्का-मुक्की करके ही उसकी गाड़ी कुछ दिन और आगे धकेली जा सकी।

शरीरविज्ञानियों ने शरीर प्रणाली को समझने के लिए हारमोनों का गहराई से अध्ययन शुरू किया, तो कुछ ऐसे तथ्य हाथ लगे, जो विस्मयकारी थे। उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि आखिर इन थोड़े-से रसस्रावों में ऐसा क्या जादू है, जो शरीर की सामान्य व्यवस्था में वह इतनी भयानक उलट-पलट करके रख देते हैं। स्वास्थ्य के साधारण नियमोपनियम एक ओर और उनकी मनमानी एक ओर। इस रस्साकशी में सामान्य व्यवस्था लड़खड़ा जाती है और इन रसस्रावों की मनमानी जीतती है। इन रसों का रासायनिक विश्लेषण करने पर वे सामान्य स्तर के ही सिद्ध होते हैं। उनमें कुछ ऐसी अनहोनी मिश्रित नहीं दीखती, पर इसको झुठलाते हुए जब नतीजा सामने आता है, तो बुद्धि चकरा जाती है और इस विस्मय-विमूढ़ता की स्थिति में हाथ-पर-हाथ धरकर बैठना पड़ता है।

उदात्त भावनाएँ अंतरात्मा में जमीं हों और छोटा बनाने वालों पर बड़प्पन के संस्कार जम जाएँ, तो शरीर को ही नहीं, मस्तिष्क को भी बड़ा बनाने वाले हारमोन उत्पन्न होंगे। इंद्रिय भोगों में आसक्त अंतःभूमिका अपनी तृप्ति के लिए कामोत्तेजक अंतःस्रावों की मात्रा बढ़ाती है। विवेक जाग्रत् हो और विषय-भोगों की निरर्थकता एवं उनकी हानियों को गहराई से समझ लिया जाय, तो इन हारमोनों का प्रवाह सहज ही कुँठित हो जाता है। इसी प्रकार वियोग, विश्वासघात, अपमान जैसे आघात अंतःकरण की गहराई तक चोट पहुँचा दें, तो युवावस्था में भले-चंगे हारमोन स्रोत सूख सकते हैं। इसके विपरीत यदि रसिकता की लहरें लहराती रहें, तो वृद्धावस्था में भी वे यथावत गतिशील रह सकते हैं। जन्माँतरों की रसानुभूति बाल्यावस्था में भी प्रबल होकर उस स्तर की उत्तेजना समय से पूर्व ही उत्पन्न कर सकती है।

काम-क्रीड़ा शरीर द्वारा होती है, कामेच्छा मन से उत्पन्न होती है, पर इन हारमोनों की जटिल प्रक्रिया न शरीर से प्रभावित होती है और न मन से। उसका सीधा संबंध मनुष्य की अंतःचेतना से है। इसे आत्मिक स्तर कह सकते हैं। जीवात्मा में जमे काम बीज जिस स्तर के होते हैं, तद्नुरूप शरीर और मन का ढाँचा ढलता और बनता-बिगड़ता है। हारमोनों को भी प्रेरणा-उत्तेजना वहीं से मिलती है।

पीनियल ग्रंथि भ्रूमध्य भाग में है, जहाँ देवताओं का तीसरा नेत्र बताया जाता है। प्राचीनकाल में ऐसे प्राणी भी थे, जिनके मस्तिष्क में सचमुच एक अतिरिक्त तीसरी आँख और भी होती थी, जिससे वे बिना गरदन मोड़े पीछे के दृश्य भी देख सकते थे। अभी भी अफ्रीका में कुछ ऐसी छिपकलियाँ देखी गई हैं, जिनके सिर पर काँर्निया, रेटिना, लेंसयुक्त पूरी तीसरी आँख होती है।

गेहूँ की आकृति जैसी इस छोटी-सी ग्रंथि में आश्चर्य-ही आश्चर्य भरे पड़े हैं। जिन चूहों में दूसरे चूहों की पीनियल ग्रंथि का रस भरा गया, वे साधारण समय की अपेक्षा आधे दिनों में ही यौन रूप से विकसित हो गए और जल्दी बच्चे पैदा करने लगे। समय से पूर्व उनके अन्य अंग भी विकसित हो गए, पर इस विकास में जल्दी भर रही, मजबूती नहीं आई। शिवजी की कामदहन कथा की इस हारमोन से संगति अवश्य बैठती है, पर अंतःकरण का रुझान जिस स्तर का होगा, शरीर और मन को ढालने के लिए हारमोनों का प्रवाह उसी दिशा में बहने लगेगा।


भाव-संवेदनाएँ सिर्फ भगवान् के लिए

पूर्व आश्रम में गोस्वामी तुलसीदास की आसक्ति प्रसिद्ध है। उन्होंने स्वयं भी स्वीकार किया है और जीवनीकारों ने विस्तार से लिखा है कि तुलसीदास अपनी पत्नी के बिना एक दिन भी नहीं रह सकते थे। बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो गई, एक वैष्णव संन्यासी ने उन्हें पाला-पोसा और वीतराग गुरु से जितना स्नेह-दुलार मिल सकता है, उतना ही पाया। रामकथा कहने लगे, तो पंडितों-विद्वानों ने भी उनका तिरस्कार ही किया। जीवन में प्रेम कभी मिला ही नहीं। विवाह हुआ और संस्कारवान् स्त्री रत्नावली उनकी जीवनसंगिनी बनी, तो जैसे अब तक की सारी रिक्तता भर गई। पत्नी से मिला प्रेम और दुलार तुलसीदास को अवश्य निर्भर बना गया। यह स्थिति बन आई कि रत्नावली के बिना एक दिन भी रहना मुश्किल हो गया।

किंवदंती है या सत्य, लेकिन घटना महत्त्वपूर्ण है। एक दिन रत्नावली अपने मायके चली गई तुलसी उस समय आसपास ही कहीं रामकथा करने गए थे, लौटने में विलंब था। रत्नावली का कुशल-क्षेम पूछने भाई आया, तो सोचा एकाध दिन माता-पिता के पास ही हो आया जाए। कुछ ऐसी स्थिति बनी कि कथा निर्धारित समय से पहले ही पूरी हो गई और तुलसीदास घर लौट आए। देखा पत्नी घर पर नहीं है। उलटे पैर ससुराल दौड़े गए। बरसात के दिन थे, नदी में बाढ़ आ रही थी, तैरना ठीक से आता नहीं था। अँधेरे में कोई चीज तैरती दिखाई दी, उसी का सहारा लेकर उस पार पहुँचे। किनारे लगते वक्त सहारे को ठिकाने लगाया, बादल गरजे और बिजली चमकी तो उसकी रोशनी में देखा कि जिसे सहारा समझा था, वह वृक्ष का तना या लकड़ी का पाट नहीं, एक मुरदा था। कुछ देर के लिए सकपकाए और फिर सँभल गए। ससुर के घर की ओर सरपट दौड़े।

ससुराल में दरवाजा बंद था। चौकीदार रखने का रिवाज उन दिनों नहीं था। परकोटे के भीतर रहने की जगह बनी हुई थी। कुँडी खटखटाई, दरवाजा बजाया और आवाजें भी लगाईं। बरसात का मौसम था, आँधी-तूफान में किसी को सुनाई नहीं दिया। घर के चारों तरफ घूम गए। पीछे की तरफ देखा। छज्जे पर कुछ लटक रहा था। उसे पकड़कर ऊपर चढ़ गए। कहते हैं उसे रस्सी समझा था, असल में वह साँप था। तर्क कहता है कि साँप को पकड़कर कोई झूल नहीं सकता। वह डंस लेगा, हाथ फिसल जाएगा या सांप का शरीर भी टूट सकता है। लेकिन यहाँ तर्क की आवश्यकता नहीं है। तथ्य और संदेश महत्त्वपूर्ण हैं। तथ्य यह है कि तुलसीदास विरह-वेदना से दग्ध थे। साँप को रस्सी समझकर ऊपर चढ़ गए। रत्नावली तक पहुँचे। पत्नी अपने पति के अनुराग को समझती थी, लेकिन इतने दीवाने होंगे, यह सोचा नहीं था। देखकर प्रसन्न हुई और साथ ही उलाहना भी दिया कि मेरे प्रति इतना राग है। यही प्रीति कदाचित् भगवान् के प्रति होती, तो संसार का भी भला होता व उनका अपना भी। रत्नावली के ये भाव एक दोहे के रूप में प्रसिद्ध हैं-

अस्थि चर्ममय देह, तामैं ऐसी प्रीति। होति जो श्रीराम महँ, तो काहे की भव भीति॥

कहते हैं कि इन पंक्तियों ने तुलसीदास को जगा दिया। वे उलटे पाँव लौटे और फिर कभी गृहस्थ की ओर मुड़कर नहीं देखा। वाराणसी में जब वे कुटिया बनाकर रहने लगे थे, तो रत्नावली भी वहाँ आई थी। उनके द्वार पर ही शेष जीवन व्यतीत कर दिया। पति के सामने ही शरीर छोड़ा। जितने समय वहाँ रहीं, अपने आपको धन्य अनुभव करती रहीं कि संसार को भक्तिभाव में डूबने का संदेश देने वाला पति मिला। पति ने भले ही पीछे मुड़कर नहीं देखा हो, पर पत्नी भावनाएँ भगवान् में ही केंद्रित कर देने वाले पति को दूर से देखकर भी कृतकृत्य हो जाया करती थी।

भावनाओं का केंद्र हृदय माना गया है। वह हृदय नहीं जो सीने के मध्य भाग में धड़कता हुआ एक माँसपिंड है और पूरे शरीर में रक्त फेंकता है। जिस हृदय को भावनाओं का केंद्र बताया गया है। उसे योगशास्त्रों में ऊर्जा के एक भँवर की तरह निरूपित किया गया है। इस भँवर में उलझकर मनुष्य अपना व्यक्तित्व खो देता है। बुद्धि और विचार वहाँ मौन हो जाते हैं, युक्ति और तर्क का कोई महत्त्व नहीं रह जाता और दूसरों को दो कौड़ी की दिखाई देने वाली चीजें भी संसार में सब से ज्यादा मूल्यवान् दिखाई देने लगती हैं। देश, समाज, उद्देश्य, इष्ट, प्रियपात्र और अनुकूल विषयों में मन जब रमने लगता है, तो कितना ही विचार और तर्क करें, वह विमुख होता ही नहीं। विचार की दृष्टि से देखें, तो देश, समाज या किसी बड़े उद्देश्य के लिए मर मिटने में कोई समझदारी नहीं दीखती। फिर भी लोग अपने सुख विलास को छोड़कर आगे आते हैं, अपना उत्सर्ग कर देते हैं, खुशी-खुशी मर मिटते हैं।

स्वामी विवेकानंद ने एक जिज्ञासु का समाधान करते हुए साधकों की कक्षा में कहा था, “सावधान! भाव संपदा को लौकिक प्रयोजनों या प्रपंचों में बरबाद मत करना। यह संपदा सिर्फ भगवान् के लिए ही है।” लोग सिर्फ इसलिए दुःखी होते हैं कि भगवान् के प्रति समर्पण का भाव उठने पर विचार और तर्क करने लगते हैं, जबकि वहाँ भावना से काम लेना चाहिए। दूसरी तरफ लौकिक प्रपंचों में भावुक हो उठते हैं, जबकि वहाँ समझ और विवेक का उपयोग करना चाहिए। प्रश्न यह था कि निजी जीवन में भावशून्य दिखाई देने वाले भजन-कीर्तन में .... क्यों हो उठते हैं? भावुकता प्रायः दुःख का कारण बनती है। ईश्वर के प्रति वह जागती है, तो भी क्लेश ही होता है। क्या यह स्थिति से बचा नहीं जा सकता?

भावना है तो वे जागेंगी ही। उन्हें रोका नहीं जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में ऐसे क्षण अनिवार्य रूप से आते हैं, जब भावों का ज्वार उमड़ने लगता है। कुछ लोग उन्हें व्यक्त कर लेते हैं और कुछ भीतर-ही-भीतर पी जाते हैं। कुछ लोग एक सुँदर फूल देखते हैं, उसे समझते और बौद्धिक स्तर पर स्वीकार भी करते हैं, लेकिन मन में उससे कोई स्फुरणा नहीं आती। सुहानी सुबह, प्रकृति का रम्य वातावरण, मासूम बच्चे, कला-कौशल का प्रदर्शन, सुँदर और स्निग्ध व्यक्तित्व, अनुकरण करने योग्य सत्कार्य देखकर उनमें उल्लास नहीं जगता। कारण यह नहीं है कि वे भावशून्य होते हैं, बल्कि कारण यह है कि उनका हृदय द्वार बंद रहता है और जब मुस्कराने का अवसर आता है, तो वे उसके लाभ-हानि का हिसाब लगाने बैठ जाते हैं।

एक अन्य स्थिति में साधारण अप्रिय प्रसंगों पर भी लोगों के मन में रोष, विषाद, हताशा और उन्मत्त भाव प्रकट होने लगते हैं। कष्ट के समय वे इतने विचलित हो जाते हैं कि उसके निवारण का उपाय सोचने के बजाय विलाप करने लगते हैं। ऐसे लोगों को भावनात्मक दृष्टि से दुर्बल कहा गया है। भावशून्यता और भाव दौर्बल्य दोनों ही दोष हैं। उनके निवारण का एक ही उपाय है कि जहाँ बुद्धि का उपयोग किया जाना चाहिए, वहाँ भाव संपदा को नहीं लगाएँ, जहाँ भावनाएँ समर्पित करनी चाहिए, वहाँ बुद्धि का प्रयोग न करें।

बुद्धि का उपयोग कहाँ आवश्यक नहीं है? भगवान् के प्रति अपने आपको खोलते हुए विचार और तर्क में नहीं उलझना चाहिए। ध्यान, प्रार्थना, भजन, कीर्तन और सत्संग आदि साधनों में जिस किसी का भी अभ्यास हो, बुद्धि का उपयोग व्यर्थ मालूम देगा। ईश्वर के सामने स्वयं को किसी भी रूप में प्रस्तुत करते हुए श्रद्धाभाव की ही अपेक्षा की गई है। बौद्धिक स्तर पर ईश्वरीय सत्ता, उसकी प्रेरणा, संसार और सिद्धाँतों का विवेचन किया जा सकता है, लेकिन जब साधना क्षेत्र में उतरना हो तो बौद्धिक ऊहापोह को एक तरफ छोड़ दिया जाता है, भावनाएँ ही नियोजित की जाती हैं।

ध्यान और भजन के समय भावनाएँ आपने आप उमड़ने लगती हैं। देखा गया है कि इन प्रक्रियाओं को अपनाने पर साधकों की आँखें अपने आप सजल हो उठती हैं। कितनी ही दमित भावनाएँ उभर आती हैं। भावशून्य और तर्क या विचार के सहारे चलने वाले व्यक्ति सत्संग में अथवा गुरुसत्ता के सामने उपस्थित होने पर भावनाओं का विस्फोट होता अनुभव करते हैं। ध्यान आँदोलन के प्रचार में वर्षों से जुटी संस्था विवेक आश्रम के संयोजक स्वामी अनंतानंद ने अपने अनुभव लिखे हैं। उनके अनुसार ध्यान-सत्संग में आने वाले साधकों को वर्णनातीत आनंद की अनुभूति होती है। उनकी दमित भावनाएँ हिलोरें लेने लगती हैं। खासतौर पर कीर्तन में और ध्यान के सामूहिक अभ्यासों के समय लोग अपने आप को रोक नहीं पाते। वे सुबकते हैं, चीखते हैं, शरीर थरथराने लगता है और कई साधक गिर जाते हैं। सामान्य क्रम में यह स्थिति पीड़ा और भय का कारण बनती है, लेकिन साधना के क्षेत्र में यह तीव्र आवेग मात्र है। जब भावनाओं का ज्वार उठता है, तो मूलाधार चक्र सक्रिय हो जाता है अथवा किसी और नाड़ी में ऊर्जा प्रवाह दौड़ने लगता है।

कुछ समय के आवेग के बाद भावनाओं का विरेचन हो जाता है और वे संतुलित होने लगती हैं। भक्तों के जीवन में इनका आवेग प्रायः देखा गया है, लेकिन उनमें लय और संतुलन होता है। मीरा के अंतर्जगत् में भक्ति का आवेग होता था, तो वे नृत्य करने लगती थीं। उनके कंठ से गीत निकलने लगते थे। वे कोई बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन उनके रचे पद साहित्य में उच्च कोटि का स्थान रखते हैं। उनके लौकिक जीवन में, पारिवारिक या सामाजिक जीवन में भाव संवेदनाएँ शायद ही व्यक्त हुई हैं, लेकिन कृष्ण का नाम सुनते ही वे विभोर हो उठती थीं।

मीरा स्वभाव से ही कृष्ण के प्रति समर्पण भाव से भावित थीं। तुलसीदास के जीवन में भगवान् के प्रति समर्पित होने की घटना एक साधारण घटना से आई। वे भगवद्भाव से आविष्ट हो गए, तो जीवन के सब दुःख, कष्ट और अभाव जाते रहे। कठिन परिस्थितियों में भी उनके मन में दैन्य की भावना नहीं आई। सूरदास को कुछ लोग जन्माँध मानते हैं, लेकिन बहुत से समीक्षकों की मान्यता है कि उनके नेत्रों की ज्योति बाद में गई। अपनी रचनाओं में उन्होंने भावों और लौकिक क्रियाओं की जैसी सूक्ष्म अभिव्यक्ति की है, वह जन्म से अंधा व्यक्ति कर ही नहीं सकता। उदाहरण के लिए, मक्खी के गुड़ में लिपट जाने और किसी स्थान पर बैठ जाने के बाद पीछे के दो पाँव उठाकर रगड़ने की बारीकी बिना देखे समझी ही नहीं जा सकती। सूरदास जन्म से अंधे नहीं रहे होंगे। जीवनीकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि एक स्त्री के प्रति आकर्षित होने और उसकी तीव्र लताड़ सुनने के बाद वे क्षुब्ध हो गए थे। उस दुत्कार में भगवान् के प्रति उन्मुख होने का संकेत था। सूरदास ने क्षुब्ध होकर किया होगा, लेकिन वस्तुतः उनके जीवन में क्राँति आई। उन्होंने इस निश्चय के साथ अपनी आँखें फोड़ लीं कि अब दृष्टि सिर्फ अपने भीतर बैठे भगवान् की रूप-माधुरी का रसपान ही करेगी।

लौकिक जीवन में भावनाओं को लेकर प्रौढ़-परिपक्व रहना चाहिए। श्रीकृष्ण भावामृत संघ (इस्कान) के संस्थापक स्वामी भक्ति वेदाँत ने अपना अनुभव लिखा है, “प्रारंभ से ही मुझ पर भावनाओं की प्रतिक्रिया नहीं के बराबर होती है। अपने किसी घनिष्ठ संबंधी की मृत्यु होने पर दुःख नहीं होता। उसके संबंधियों को संवेदना का एक पत्र लिख देता हूँ, जिसमें दुःखी नहीं होने का अनुरोध रहता है। बहुत से साधक हैं, जो किसी भी विपत्ति या दुर्घटना से विचलित नहीं होते। परिस्थितियों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन वे लोग भगवत्कथा सुनते हुए कुछ प्रसंग आने पर फूट-फूटकर रोने लगते हैं। कथा-प्रसंगों में मैं स्वयं भी अपनी भावनाओं को हिलोरें लेने से रोक नहीं पाता। उस अवसर का रुदन और विलाप भी शाँति प्रदान करता है।”

स्वामी भक्ति वेदाँत के ही एक शिष्य स्वामी राधारमणदास ने लिख है कि साधन-भजन के अलावा सभी अवसरों पर केवल बुद्धि का प्रयोग करें, तो पाएँगे कि जीवन की हर परिस्थिति से निपट सकोगे। वहाँ भावनाओं का प्रयोग व्यर्थ और अपव्ययमूलक है। एक छोटी-सी स्थिति की कल्पना कीजिए कि रसोईघर में एक चूहा उपद्रव कर रहा है। उससे छुटकारा पाना चाहते हैं। क्या आप उसे मारने के लिए मशीनगन का प्रयोग करेंगे। नहीं .... एक मामूली-सा पिंजड़ा लाकर रख देंगे, उसमें रोटी का टुकड़ा लटका देंगे, युक्ति लगाएँगे और इस तरह चूहे से छुटकारा पा लेंगे। यही बात साँसारिक प्रपंचों पर भी लागू होगी। उनके लिए भावुक होना समझदारी नहीं है। साँसारिक संबंध अनित्य हैं। व्यवहार भी आते-जाते रहते हैं। उन्हें इतना घनिष्ठ या स्थायी मत बनाइए कि वे भावनाओं तक पहुँच जाएँ। यह दिव्य संपदा सिर्फ ईश्वर भक्ति और उच्च आध्यात्मिक अनुभवों के लिए ही सुरक्षित रखो। उस दशा में जब भी अवसर आएगा, तो भावनाएँ दिव्य अनुभवों के लिए वाहन और यंत्र का काम करेंगी। वे उच्च आध्यात्मिक शक्तियों को मार्ग देंगी।

कुछ साधकों को शिकायत रहती है कि वे बहुत परिश्रम करते हैं, फिर भी उन्हें अनुभूति नहीं होती। इसका एक ही कारण है। अनुभूति का क्षेत्र भावलोक है। वह क्षुद्र प्रयोजनों या लौकिक व्यवहार में ही व्यस्त है। जिस क्षेत्र में भागवत् भाव उतरना चाहिए, उसे लौकिक भीड़ से घेर रखा है और भगवान् के लिए दूसरा क्षेत्र छोड़ दिया है। जिस क्षेत्र में अवतरण होना है, वह खाली ही नहीं है। विमानतल पर मोटरगाड़ियाँ खड़ी कर दी जाएँ और हवाई जहाज बस अड्डों पर उतारने की कोशिश करें, तो यह कभी संभव नहीं होगा। एक अन्य उदाहरण से यों भी समझाया गया है कि गलत पता लिखा हुआ लिफाफा सही व्यक्ति तक नहीं पहुँच सकता। सही पता यह है कि भावनाएँ सिर्फ भगवान् के लिए और बुद्धि व्यवहार क्षेत्र के लिए। भाव जगत् में कूड़ा-कबाड़ इकट्ठा कर लिया है, तो साधना के क्षेत्र में हताशा, उदासी, खिन्न भाव और अंत में अरुचि ही हाथ लगेगी। बुद्धि का प्रयोग करने पर बहुत हुआ, तो ईश्वर के प्रति कुछ विचित्र और हास्यास्पद लगने वाली धारणाएँ बन जाएँगी, वे धारणाएँ बनती-बिगड़ती रहेंगी। आती-जाती रहने वाली छायाओं की तरह वे कोई प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकेंगी। एक दिन साधन-भजन छोड़कर आप भगवान् की खिल्ली उड़ाते देखे जाएँगे।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि साँसारिक घटनाओं के संबंध में प्रतिक्रियाओं से शून्य और शाँत रहा जाए। भजन-साधन में वह सारी क्षमता झोंक दी जाए। निर्दोष शिशु की तरह भागवत् कार्यों में हिस्सा लें। वहाँ से संसार में लौटें तो नेतृत्व बुद्धि के हाथों सौंप दें। भावनाओं को पीछे बैठा रहने दें। मंदिरों में लोग नंगे पाँव खुद चलकर जाते हैं। पूजा-पाठ, सेवा, समर्पण, दक्षिणा, प्रसाद आदि कृत्य अपने ही हाथों से संपन्न करते हैं। मंदिर से बाहर आते ही वे आवश्यक कार्य दूसरों के भरोसे या सेवकों के जिम्मे छोड़ देते हैं, अपने अस्तित्व को भावप्रधान बनाएँ तो भगवान् के कार्यों में उसे ही नेतृत्व करने दें। बुद्धि सेवक सहायक है। उसे दुनिया के लिए ही रहने दें।


काल के आयाम से जुड़ी अलौकिकताएँ

देह और चेतना एक-दूसरे से इस प्रकार गुँथी हुई हैं कि साधारण स्थिति में उन दोनों का पृथक्करण प्रायः असंभव बना रहता है, पर कई बार असाधारण परिस्थितियों में जब काया का बंधन ढीला होता है, तो आत्मचेतना वर्तमान कालखंड से किसी दूसरे में प्रवेश कर वहाँ की गतिविधियों, घटनाओं, व्यक्तियों को ठीक उसी प्रकार देखती है, मानो सब कुछ अपनी आँखों के आगे घटित हो रहा हो, जबकि सचाई यह है कि वह वर्षों पूर्व का प्रसंग होता है। विज्ञानवेत्ताओं ने इस प्रक्रिया को ‘टाइम स्लीप-काल सर्पण’ की संज्ञा दी है।

ऐसी ही एक घटना का उल्लेख काँलिन विल्सन ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘बियोण्ड दि अकल्ट’ में किया है। ‘डाउन दि रैबिट हाँल’ नामक अध्याय में इसकी चर्चा करते हुए वे लिखते हैं कि उक्त प्रकरण मूर्द्धन्य इतिहासकार आरनोल्ड टायनबी के साथ उस समय घटित हुआ, जब वे 10 जनवरी सन् 1912 को ग्रीस के एक किले की मुँडेर पर बैठे सामने के मैदान पर दृष्टिपात कर रहे थे और 197 वर्ष ईसा पूर्व हुए युद्ध के बारे में सोच रहे थे। अचानक उनकी आँखों के आगे का दृश्य बदलने लगा। वहाँ बिखरी धूप के बदले अब धुँध दिखाई पड़ने लगी। आमने-सामने दो सेनाएँ आक्रमण-प्रत्याक्रमण के घात-प्रतिघात में मुस्तैद थीं। एक ओर की पहाड़ी पर रोमन सेनाएँ मोरचा सँभाले हुए थीं, जबकि प्रतिपक्ष में मैसोडोनिया के फिलिप्स पंचम् की सेनाएँ थीं। दोनों में जबरदस्त भिड़ंत चल रही थी। वे एक-दूसरे को परास्त कर आगे बढ़ जाने के लिए उतावली थीं। इसी बीच कुहरा छँटा। रोमन सेनाएँ कमजोर पड़ने लगीं और अंत में आत्मसमर्पण कर दिया। मैसोडोनियन सेना का एक जत्था रोमन टुकड़ी को पहाड़ी के नीचे की ओर ले जाता दिखलाई पड़ा। ऐसा करते समय उन दोनों के बीच एक खतरनाक फासला पैदा हो गया, जिसका लाभ उठाकर रोमन अधिकारियों ने पीछे मुड़कर उन पर आक्रमण कर दिया। इस समय अधिकाँश रोमन सिपाही निहत्थे थे। वे अपने हथियार समर्पण के समय फेंक चुके थे, किंतु इस बार शत्रु सेनाओं ने उन्हें नहीं बख्शा और गाजर-मूली की तरह काट दिया। दृश्य इतना स्पष्ट था कि टायनबी विचलित हो उठे। वे उस कत्लेआम को और अधिक देखने का साहस नहीं जुटा सके और दृष्टि फेर ली। दूसरी ओर उन्हें कुछ अश्वारोही सिपाही दीख पड़े। वे सैकड़ों वर्ष पूर्व पहनी जाने वाली मैसोडोनियन पोशाक में थे। इस मध्य पुनः एक बार परिदृश्य बदला। अब वहाँ केवल सपाट मैदान था, जिसमें प्रखर धूप खिली हुई थी। वहाँ न कोई लाश थी, न युद्ध का कोई चिह्न। स्पष्ट है, टायनबी विगत के कालखंड में प्रवेश कर वहाँ हुई लड़ाई की झाँकी देख रहे थे।

महान् पर्वतारोही फ्रैंक एल. स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘दि माउंटेन विजन’ में ऐसी एक विवरण प्रस्तुत किया है। वे एक बार दिन के समय मोरविक से लोकडुइक तक स्कोटिश पहाड़ियों को पार कर रहे थे। धूप प्रखर थी। दूरस्थ सागर का नीला जल और पर्वतमालाओं की हरियाली दोनों मिलकर ऐसा लुभावना दृश्य उपस्थित कर रहे थे, जो मन को मोहने वाला था। वे चले जा रहे थे, तभी उन्हें कुछ असाधारण अनुभव हुआ। उन्हें लगा जैसे यहाँ का आभामंडल सामान्य नहीं, विकारयुक्त है। उसमें कुछ ऐसे अनिष्टकारी तत्त्व घुले हुए हैं, जो मनुष्य को, उसके चिंतन और व्यवहार को गहरे प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे वातावरण में रुकना उचित नहीं, यह सोचकर पहले तो वे वहाँ से तुरंत प्रस्थान करने का मन बनाने लगे। पीछे उनने इसकी सत्यता परखनी चाही और वहाँ के निषेधात्मक आभा की तीक्ष्णता का अनुमान लगाने के लिए रुक गए। उन्हें ऐसी क्षमता प्राप्त थी कि वे शीघ्र ही एकाग्रचित होकर अतींद्रिय स्थिति में पहुँच जाते थे। उनने मस्तिष्क को पूरी तरह विचार शून्य किया और सामने की ओर देखने लगे। वहाँ एक लोमहर्षक दृश्य फिल्म की तरह प्रकट हुआ। लगभग बीस स्त्री, पुरुष और बच्चे परस्पर संघर्ष कर रहे थे। उनके चेहरे से स्पष्ट झलक रहा था, जैसे वे बहुत थके हुए हों। लंबी यात्रा के उपराँत सब वहाँ पहुँचे तथा किसी कारण को लेकर भिड़ पड़े। देखते-ही-देखते सभी ने एक-दूसरे के विरुद्ध अस्त्र-शस्त्र उठा लिए। भाले, बरछे, बल्लमों के प्रहार से वहाँ की धरती रक्तरंजित हो उठी। इस संघर्ष में कोई भी जीवित न बचा और संपूर्ण युद्धस्थल शवों से पट गया। इस हृदय-विदारक दृश्य को देखकर उनका मन विचलित हो उठा। वे वहाँ से चल पड़े।

बाद में ‘स्काँट्समैन’ नामक पत्रिका में उनकी उक्त पुस्तक की समालोचना के साथ एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें उनने दो और ऐसी ही घटनाओं का वर्णन किया था। एक अलौकिक दर्शन सन् 1715 में ग्लीन ग्लोमेक के निकट सड़क पर हुआ तथा दूसरा सन् 1745 में। दोनों ही दृश्य संघर्ष के थे।

ऐसे ही एक अनुभव की चर्चा करते हुए आरनोल्ड टायनबी अपनी रचना ‘ए स्टडी ऑफ हिस्ट्री’ भाग दस में लिखते हैं कि जब वे एफीसस के एक नाट्यगृह के खंडहर में बैठे हुए थे, तो अचानक ही खाली नाट्यशाला में दर्शकों की भारी भीड़ दिखाई पड़ने लगी। लोग तेजी से इधर-से-उधर आ-जा रहे थे। उनमें आपस में बातें भी हो रही थीं। उनके पहनावे वर्तमानकालीन नहीं थे। उनने जो टोपियाँ पहन रखी थीं, वे लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व प्रचलन में थीं। उनकी बात-चीत उन्हें स्पष्ट कर्णगोचर हो रही थीं, पर वह शैली आज की नहीं थी। उसमें स्फुट परिवर्तन प्रतीत हो रहा था। सामने सुसज्जित मंच था। उसके एक किनारे कुछ वाद्य यंत्र रखे थे। कुछ व्यक्ति उनसे छेड़छाड़ करते दीख रहे थे। शायद वे उन्हें स्वरों से मिला रहे थे। तभी अचानक परदा गिर गया। कुछ क्षण पश्चात् जब वह दुबारा उठा, तो नाट्य मंच पर एक नृत्याँगना विराजमान थी। पहले उसने दर्शकों से कुछ कहा, जो टायनबी को सुनाई नहीं पड़ा। बाद में उसने आगे-पीछे, दायें-बायें घूमकर एक विशिष्ट मुद्रा में हाथ फैलाए। कदाचित् कार्यक्रम शुरू करने से पूर्व तब की यह कोई परंपरा थी। तत्पश्चात् नृत्य प्रारंभ हुआ। उसने जो लास्य प्रस्तुत किया, वह आकर्षक और मनमोहक था। उसके पाँवों की थिरकन और अंगों की लोच-लचक दर्शनीय थी। नृत्य और संगीत का वह संगम इतना अद्भुत था कि सभी मंत्रमुग्ध हो उसे देख रहे थे, तभी नेपथ्य में शोरगुल सुनाई पड़ा। वहाँ से आग की लपटें उठ रही थीं। लोग चीखते-चिल्लाते इधर-उधर दौड़ रहे थे। दर्शकों में भी भगदड़ मच गई। इसी समय टायनबी की तंद्रा टूटी। उनने इतस्ततः देखा। वहाँ न तो आग थी, न दर्शक। वे एफीसस के भग्नावशेष के मध पूर्ववत् बैठे हुए थे। बाद में वहाँ के प्राचीन इतिहास के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि उक्त नाट्यशाला की तबाही में कार्यक्रम के दौरान लगी आग की ही भूमिका थी। वे उस जीवंत दृश्य को सैकड़ों वर्ष बाद भी ज्यों-का-त्यों घटित होते देख रहे थे। ऐसा ‘टाइम स्लीप’ के कारण ही संभव हो सका।

उसी ग्रंथ में एक अन्य घटना का बखान करते हुए वे लिखते हैं कि तब वे ग्रीस भ्रमण पर थे, तब उनकी आयु मात्र तेईस वर्ष की थी। उन्हें इतिहास संबंधी जानकारियों में उन दिनों गहरी रुचि थी, इसलिए वे सनक स्तर पर यहाँ-वहाँ घूमा करते थे। इस क्रम में एक बार वे क्रीट स्थित एक पर्व शिखर पर जा पहुँचे। वहाँ ‘वारुकविला’ का भग्नावशेष मौजूद था। उसका निर्माण तीन शताब्दी पूर्व वेनिस के गवर्नर के लिए शायद किया गया था। उसे खड़े-खड़े अभी निहार ही रहे थे कि उन्हें रोमाँच होने लगा और वे अर्द्ध चेतना जैसी स्थिति में पहुँच गए। अब वहाँ एक भव्य महल दीख रहा था। भवन के दरबान पहरेदारी में मुस्तैद थे। अंदर चहल-पहल थी। कई अभिजात्य लोग परस्पर, बातचीत में संलग्न थे। ऐसा लग रहा था, मानो कोई समारोह हो। इसी बीच वहाँ एक दुर्घटना घट गई। प्रहरी के पेट में एक आगंतुक ने किसी शस्त्र से प्रहार कर दिया। वह गिर पड़ा। रक्त का फव्वारा फूट निकला। कुछ ही देर में उसकी मृत्यु हो गई। दृश्य इतना भयावह था कि टायनबी की अर्द्ध मूर्च्छा भंग हो गई। सामने वही भग्न भवन खड़ा था। इसके अतिरिक्त वहाँ कोई भी न था।

यह तो किन्हीं-किन्हीं के साथ यदा-कदा घटने वाली आकस्मिक घटनाएँ हैं। इन्हें साधारण नहीं कहा जा सकता। साधारण वह है, जो सर्वसुलभ हो, जिसे हर एक सफलतापूर्वक संपन्न कर सके। इस स्थिति को योग विज्ञान द्वारा ही उपलब्ध किया जा सकता है। इससे जब चेतना को परिमार्जित-परिष्कृत करके प्रखर बनाया जाता है, तब वह इससे भी अनेक गुना अधिक विस्मयकारी परिणाम प्रस्तुत करती है, इसलिए प्रत्येक को इस परिमार्जन की ओर ही ध्यान देना चाहिए। इतने से ही उस अलौकिकता को हस्तगत किया जा सकता है, जिसे साधारण स्थिति और अवस्था में चमत्कार कहकर पुकारते भर रहते हैं।


सुसंस्कारी पुत्र (kahani)

वंश परंपरा बनाए रखने के लिए व्यास जी ने गाँधारी तथा कुँती दोनों को वर माँगने के लिए कहा। गाँधारी ने 100 पराक्रमी पुत्र माँगे, किंतु कुँती ने 5 वीर और सुसंस्कारी पुत्र माँगे। इतिहास साक्षी है कि 100 पुत्रों का पालन करने में समर्थ गाँधारी उनकी सुसंस्कारिता का क्रम न बिठा सकीं। निर्वाह के लिए परेशान रहकर भी कुँती 5 पुत्रों को सुसंस्कार देने में सफल रहीं। गाँधारी के 100 पुत्र नष्ट हुए, किंतु कुँती के 5 पुत्रों का इतिहास स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया।


जाग्रत् युवा चेतना ही करेगी समग्र क्राँति

युवावस्था मानव जीवन का वसंत काल होता है। यह ऐसा समय होता है, जब विधाता की दी हुई सारी शक्तियाँ सहस्रधारा बनकर फूट पड़ती हैं। हर मन उमंग एवं उत्साह से परिपूर्ण होता है। कुछ कर दिखाने की चाहत होती है। आज भी राष्ट्र युवा चेतना के उन स्वरों को खोज रहा है, जिनसे समग्र क्राँति एवं नए इतिहास की रचना का गान प्रस्फुटित होगा।

समाज एवं राष्ट्र के नवनिर्माण में सदा से ही युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। प्राचीनकाल से लेकर आज तक युवाओं के योगदान से ही न सिर्फ समाज में समय-समय पर सकारात्मक बदलाव आते रहे हैं, अपितु राष्ट्र को भी नई दिशा मिलती रही है। वर्तमान समय में जब परिवार, समाज एवं राष्ट्र की धुरी लड़खड़ा रही है। संपूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन आवश्यक हो गया है। युवाओं का इस ओर से पूर्णतः उदासीन रहना निश्चित रूप से चिंताजनक है।

जिस युवा पीढ़ी के सामने देश का भविष्य सँवारने की महती जिम्मेदारी है। उसकी ऊर्जा रचनात्मक कार्यों में लगने के बजाय विध्वंसकारी गतिविधियों में खरच हो रही है। कुछ समय पहले तक देश की युवा पीढ़ी को ऊर्जावान्, विचारशील, कल्पनाशील एवं जुझारू माना जाता था। उसके इन्हीं गुणों के आधार पर उम्मीद की जाती थी कि वह समझदार निर्णय, सक्षम प्रतिस्पर्द्धा में टिकने वाली और सकारात्मक दृष्टिकोण वाली होगी। उम्मीदों के विपरीत आज युवा पीढ़ी निराश, कुँठाग्रस्त एवं आक्रोश की भावना से ग्रस्त अपने भविष्य के प्रति आशंकित एवं अनिश्चित नजर आती है। युवाओं के चेहरे पर ये मनोभाव कहीं भी आसानी से पढ़े जा सकते हैं।

एक समय था जब गाँधी, सुभाष, लेनिन, विवेकानंद एवं दयानंद जैसे उच्च चरित्र से पतरपूर्ण व्यक्तित्व युवाओं के आदर्श हुआ करते थे। समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए हर युवा तत्पर रहता था, परंतु आज समाज को बदलने के बजाय स्वयं बदल जाना उसे ज्यादा रुचिकर लगने लगा है। उच्च आदर्श एवं नैतिकता सिर्फ किताबी बातें बनकर रह गई हैं। भौतिक मूल्यों के सामने जीवन-मूल्यों को पूरी तरह से भुला दिया गया है। हर युवक एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में अपनी नैतिक जिम्मेदारियों तक से विमुख होता जा रहा है।

पिछले पचास वर्षों में कुशासन एवं भ्रष्टाचार, व्यवस्था और सामाजिक कुरीतियों से लोहा लेने वाली युवा शक्ति की हुँकार कहीं खो-सी गई लगती है। आज युवाओं के मन-मस्तिष्क में राष्ट्र की कोई परिकल्पना संभवतः है ही नहीं या है भी तो आधी-अधूरी। ऐसे में उसका एकमात्र स्वप्न होता है उच्च डिग्रियाँ प्राप्त कर विदेशों में जाकर पैसा कमाना। विभिन्न सर्वेक्षण रिपोर्टों के अनुसार ऐसे युवा ही देशी संस्थाओं एवं देश की सर्वाधिक आलोचना करते हैं, क्योंकि पश्चिम के बिना उन्हें अपना अस्तित्व ही अधूरा लगता है।

इसके कारण भी स्पष्ट हैं। अशिक्षा, बेरोजगारी एवं गरीबी में उलझा युवा अंतर्मन इन सबसे ऊब चुका है। इन समस्याओं का सामना करने की अपेक्षा इनसे पलायन उसे ज्यादा सहज लगता है। नई आर्थिक-औद्योगिक नीति एवं उपभोक्तावादी संस्कृति ने भी युवाओं के बीच व्यक्तिवादी चिंतन-पद्धति को प्रभावी रूप से विकसित किया है, युवाओं का एक वर्ग वह भी है, जो आधुनिकता के नाम पर पश्चिम की संस्कृति का शिकार बना है। इस संस्कृति ने भारतीय समाज में पैसे के महत्त्व को बढ़ाकर आदमी का महत्त्व घटा दिया है। यौन उच्छृंखलता, अपराध एवं ग्लैमर की मृग-मरीचिका में डूबा यह युवा वर्ग बुनियादी समस्याओं तक से अनभिज्ञ है। भोग-विलास की इस संस्कृति ने युवाओं को परिवार, समाज एवं राष्ट्र के प्रति गैर जिम्मेदार बना दिया है।

हाल में कराए गए विभिन्न सर्वेक्षण रिपोर्टों से युवाओं की समस्याओं और उनमें पनप रही आपराधिक और नकारात्मक प्रवृत्तियों का पता चलता है। भारत में 16 से 25 वर्ष के युवाओं की आबादी 21.5 करोड़ है। ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऐडवाँस स्टडीज’ ने इस आयु वर्ग के युवाओं का व्यापक अध्ययन किया। इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि देश भर के युवा कुँठा, आक्रोश एवं आपराधिक प्रवृत्तियों में बुरी तरह फँसे हुए हैं। युवाओं में तनाव एवं अवसाद भी पिछले 5 वर्षों में तेजी से बढ़े हैं। मनोचिकित्सकों के पास आने वाले मामलों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मामले युवाओं के होते हैं।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की नवीनतम रिपोर्ट भी युवाओं में बढ़ रही आपराधिक एवं नशे की प्रवृत्ति की पुष्टि करती है। मानसिक अशाँति एवं बेरोजगारी से त्रस्त युवा नशे में डूबकर जीवन के यथार्थ को भूल जाना चाहता है। प्रारंभ में तो नशा राहत प्रदान करता है, परंतु धीरे-धीरे इसका परिणाम गंभीर होता चला जाता है। नशे के साथ ही युवा अन्य दूसरी बुराइयाँ जैसे-चोरी, हिंसा आदि का शिकार हो जाता है और समाज की मुख्य धारा से कटता चला जाता है।

युवाओं के इस पतन के लिए देश की राजनीतिक व्यवस्था बहुत हद तक जिम्मेदार है। धर्म, जाति, भाषा एवं क्षेत्र के नाम पर युवाओं को पथ भ्रमित कर उनका गलत इस्तेमाल करना यहाँ की राजनीति का एक अभिन्न अंग बन चुका है। युवा शक्ति के सहारे सत्ता प्राप्त करने के बाद वे राजनीतिक दल ही बाद में विभिन्न मंचों से युवाओं को राजनीति से दूर रहने की सलाह देते हैं। इस दोहरे मापदंड का शिकार युवा अपने आपको लुटा-पिटा महसूस करता है। ऐसी स्थिति में या तो निराश-हताश होकर वह नशे का मार्ग अपना लेता है या फिर आक्रोश में भरकर विध्वंस के रास्ते चल पड़ता है।

कभी भारतीय शिक्षा से यहाँ के युवाओं का चरित्र निर्माण होता था। अपने-आपको समझने का ज्ञान प्राप्त होता था, परंतु आज शिक्षा का उद्देश्य मात्र येन-केन-प्रकारेण डिग्री हासिल करना ही रह गया है। वर्तमान शिक्षा पद्धति के स्वरूप में आमूल-चूल परिवर्तन की बात अवश्य की जाती है, किंतु शिक्षा से संबंधित जो कार्यक्रम तैयार किए जाते हैं, वे इसी शिक्षा-पद्धति को और ज्यादा मजबूत करते हैं। आजादी से पूर्व अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने शिक्षा को संस्कार का आधार मानकर शिक्षितों में आत्मविश्वास जाग्रत् करने का प्रयास किया था। आज उन प्रयासों को इस हद तक विस्मृत किया जा चुका है कि शिक्षा संस्थाओं में नैतिकता की शिक्षा का पाठ्यक्रम अनिवार्य आवश्यकता बन गई है।

आज युवा वर्ग अपने पाठ्यक्रम में बहुत से नए विषय पढ़ रहे हैं। नए वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। विभिन्न नए साँस्कृतिक एवं सामाजिक तौर-तरीकों का असर भी उन पर तेजी से हो रहा है। जो उनके लिए बेहद आकर्षक भी है। महापुरुषों के प्रेरक प्रसंगों को पाठ्य पुस्तकों से निकालकर कर्त्तव्य, बहादुरी, ईमानदारी एवं त्याग से शून्य पाठ्यक्रम युवा मन को आदर्शों से दूर ही ले जाएँगे। इन परिस्थितियों में युवा वर्ग का भ्रमित हो जाना स्वाभाविक है।

एक आदर्श की तलाश सबको होती है और यह स्वाभाविक है कि सबसे पहले इसकी खोज अपने घर-परिवार एवं आस-पास के माहौल से शुरू होती है। ऐसे में उनके सामने अभिभावकों एवं परिचितों द्वारा दोहरा मूल्य अपनाया जाना, कथनी एवं करनी में भिन्नता युवा संवेदनशील हृदय को बहुत गहरी चोट दे जाता है। ऐसा नहीं है कि आज का युवा जुझारू नहीं है या वह परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता और हिम्मत नहीं रखता। वस्तुतः वह पहले के युवाओं से अधिक प्रभावशाली ढंग से अपने कार्य को कर सकता है। आवश्यकता बस उसके सामने सच्चे आदर्श प्रस्तुत करने की है।

शासकीय स्तर पर भी इस समय एक ऐसी राष्ट्रीय युवा नीति और उस पर अमल की जरूरत है, जो दिग्भ्रमित हो गई युवा पीढ़ी को फिर से उसके सही लक्ष्य की ओर उन्मुख कर सके। एक ऐसी नीति जो युवाओं की ऊर्जा को नकारात्मक गतिविधियों में बरबाद होने से बचाए। उसे सकारात्मक-रचनात्मक कार्यों में खरच करने को प्रेरित करे। संवेदनाओं से लबालब भरे युवा मन की सिर्फ कमियों पर ध्यान देने की बजाय उसकी समस्याओं पर भी पूर्वाग्रह से मुक्त होकर विचार किया जाना चाहिए।

युवावस्था मानव जीवन का वसंत काल होता है। यह ऐसा समय होता है, जब विधाता की दी हुई सारी शक्तियाँ सहस्रधारा बनकर फूट पड़ती हैं। जब हर मन उमंग एवं उत्साह से परिपूर्ण होता है। कुछ कर दिखाने की चाहत होती है। आज भी राष्ट्र युवाचेतना के उन स्वरों को .... रहा है, जिनसे समग्र क्राँति एवं नए इतिहास की रचना का गान प्रस्फुटित होगा।


प्रकाशपूर्ण जीवन (kahani)

एक दिन, दो दिन और लगातार कई दिन तक भी रात-रात भर सितारों की गिनती करते देखकर आखिर एक दिन माँ ने अपने बच्चे से पूछ ही लिया, बेटे! तुम रात भर आकाश की ओर मुँह किए क्या गिना करते हो? आकाश के सितारे माँ! बहुत प्रयत्न करता हूँ, किंतु आकाश इतना विराट् और नक्षत्र इतने अधिक हैं कि वे गिनने में नहीं आते। माँ ने थपकी दी और बोली, बेटा! देर हो गई, तू सो जा, यह सितारे गिनने को नहीं वरन् इसलिए बनाए गए हैं कि लोग उन्हें देखकर स्वयं भी प्रकाशपूर्ण जीवन जीना सीखें।


परिपूर्ण समर्पण

वह हरी-भरी खेती से लहलहाते हुए पंजाब के एक इलाके का रहने वाला था। प्रकृति और वर्षा की उसके इलाके पर असीम कृपा थी। उसका कुल जितना उच्च था, परिवार उतना ही समृद्ध एवं वैभवशाली था। वह स्वयं भी स्वस्थ, सुँदर एवं शिष्ट था। इन बाहरी विभूतियों के साथ उसका आँतरिक जीवन भी उज्ज्वल था। गुरुनानक देव के सान्निध्य से इसमें नित्य-प्रति नया निखार आता जा रहा था।

गुरु ने साधना की जो विधियाँ बताई थीं, वह पूरी श्रद्धा से उन्हें नियमित किया करता था। वह तप कर रहा था, साधना के मार्ग पर बढ़ता जा रहा था। इसी प्रवाह में दिन बीते, महीने बीते और चार वर्षों की लंबी अवधि भी अतीत की गहन गुफा में विलीन हो गई। पता ही नहीं चला कि समय इतनी शीघ्रता से कैसे भागता चला गया।

एक रात अपने घर पर सोते हुए उसने स्वप्न में गुरुनानक देव को देखा। इस स्वप्नदर्शन ने उसमें गुरुदर्शन की अपूर्व व्याकुलता उत्पन्न कर दी। सुबह उठते ही उसने गुरु आश्रम चलने की तैयारियाँ शुरू कर दीं। उन दिनों नमक का बड़ा अभाव रहता था। वह जमाना ही ऐसा था, जब नमक के आवागमन पर बड़ा कड़ा नियंत्रण था। आश्रमवासी नमक के बिना बड़ा कष्ट भोगते थे। उसने सवा मन नमक का प्रबंध किया और उसे सिर पर लादकर गुरुधाम की ओर रवाना हो गया।

गुरुनानक देव का यह आश्रम उसके घर से पूरे सोलह कोस दूर था। भादों का महीना था। धूप निकलती तो सुई के समान चुभती। आकाश में बादल छा जाते, तो उमस बढ़ जाती। उसकी वेषभूषा भी देखने लायक थी। बगुले के पंख के समान उजली धोती, उस पर रेशम का नया कुर्ता, माथे पर रेशमी साफा, गौर वर्ण, उन्नत ललाट, विशाल आँखें, बलिष्ठ भुजाएँ, चौड़ी छाती, पर मुख पर नवनीत के समान कोमलता, आँखों में किसी सपने की परछाई और कदमों में मंजिल तलाशने की जल्दबाजी। इस अपरुप के साथ सिर पर नमक की बोरी का कोई ताल-मेल नहीं था, पर गुरुभक्ति में पगा पथिक मस्ती में चला जा रहा था।

न खाना खाने की परवाह, न पानी पीने की चिंता और न विश्राम करने की इच्छा। वह मंजिल पाकर ही रुकना चाहता था। अपने मन में कभी वह गुरुवाणी का पाठ करता, कभी उसे संगीत के स्वर में साधता और कभी गुरुनानक देव के ध्यान में इतना मग्न हो जाता कि मार्ग की बीहड़ता का उसे पता ही नहीं चल रहा था। उसके मन में मस्ती थी, भावों में अद्भुत ...., वह तो बस अपनी धुन में चला जा रहा था।

बीस वर्ष का रूपवान् यह युवक अपने घर से मुँह अँधेरे ही साढ़े चार बजे चला था और सूर्य पश्चिमी क्षितिज की ओट लेने लगा कि आश्रम पर पहुँच गया। पहुँचते ही उसने गुरुमाता को दंडवत् किया। उन्होंने मस्तक पर आशीर्वाद का हाथ फेरा। उसने व्याकुलता से गुरु के बारे में पूछा, तो पता चला कि वे खेत पर हैं। बस वह सीधे भागता हुआ खेत पर पहुँच गया।

खेत में गुरुनानक देव की उपस्थिति उसे कृतार्थ कर गई। भावाकुल नेत्रों से उसने अगले आदेश की याचना की। उसे खेत की घास-पात उखाड़ने का आदेश मिला। आदेशानुसार उसने कीचड़ सनी घास उखाड़ी और उसके ढेर को सिर पर लादकर चल पड़ा। कीचड़ युक्त पानी उसके शरीर और कपड़ों को गंदा व बदरंग बना रहे थे, पर उसके सामने तो एक ही मकसद था, गुरु की आज्ञा पालन करना।

वह आश्रम पहुँचा। गुरुदेव भी पहुँचे। उसकी यह दशा देखकर गुरुमाता से नहीं रहा गया। वह नानकदेव पर बरस पड़ीं, मुँह अँधेरे सुबह चला है यह घर से और अब रात घनी होने को आई है। न तो इसने एक बूँद पानी पिया है और न अन्न का एक दाना खाया है। क्या दुर्गति बनाई है आपने इसकी, बेचारा कीचड़ से सन गया है। दया नहीं आती आपको इस पर।

गुरु शाँत भाव से मुस्कराते हुए बोले, मैं तो इसका कीचड़ उतार रहा हूँ। अपने इस सारगर्भित वाक्य के साथ उन्होंने उस युवक को एक अन्य आदेश दे डाला, मेरे सारे कपड़े मैले हो रहे हैं, जाओ इन्हें नदी में धो लाओ।

विचित्र गुरु और विचित्र उनका आदेश। रात का समय, अंधकार का साम्राज्य, उस पर रुक-रुककर होती बारिश, पर गुरुभक्त वह युवक तुरंत चल पड़ा। उसने एक-एक कपड़े को अच्छी तरह से धोया और उन्हें सुखाने के लिए घास पर फैला दिया। न जाने कहाँ से सूर्य उदय हुआ और कुछ ही काल में सारे कपड़े सूख भी गए। वह कपड़े समेटकर फिर से गुरुधाम जा पहुँचा।

गुरुनानक देव ने पूछा, सूख गए कपड़े?

जी हाँ गुरुदेव! इसी के साथ उस युवक ने आश्चर्यजनक रीति से सूर्य उगने की सारी घटना कह सुनाई।

गुरु रहस्यमय मुस्कान बिखेरते हुए बोले, पागल तो नहीं हो गया तू। देख ले जाकर, बाहर अभी भी घना अँधेरा है और बारिश हो रही है। तब? उस युवक शिष्य के मन में प्रश्न कौंध गया।

वह तेरी गुरु निष्ठा का सूर्य था। युवक को सारी बात समझ में आ गई। उसने मन-ही-मन कृपालु गुरुदेव को प्रणाम किया।

परंतु उसकी परीक्षा अभी शेष थी। अगले ही दिन गुरुदेव को किसी जमींदार भक्त का निमंत्रण मिला। वह अपने दोनों पुत्रों एवं उस युवक के साथ चले। भक्त के घर पहुँचने पर गुरु का स्वागत-सत्कार हुआ। भोजन आदि के पश्चात् जमींदार भक्त ने गुरुदेव को सोने के दो कटोरे भेंट किए। गुरु ने इन कटोरों को पास रख लिया और वापस घर की ओर चल पड़े।

रास्ते में गुरुदेव ने तीनों को दिखाकर वे दोनों कटोरे एक मल-मूत्र से भरे एक गहरे गड्ढे में फेंक दिए। इसके पश्चात् गुरुदेव अपने पुत्रों की ओर मुखातिब होते हुए बोले, जा बेटे कटोरे निकाल ला, परंतु जवाब में उनके दोनों ही पुत्र अन्यमनस्क बने रहे, जैसे उन्होंने कुछ सुना ही नहीं।

इसके बाद उन्होंने उस युवक को संबोधित करते हुए कहा, लहना अब तेरी बारी है। गुरु का आदेश सुनते ही वह युवक लहना उस गड्ढे में कूद पड़ा और मल-मूत्र से सन गया, लेकिन उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी। वह कटोरे लेकर बाहर आया। स्वयं भी नहाया, कटोरों को रगड़-रगड़कर धोया और लाकर गुरुदेव के चरणों में रख दिए।

गुरुनानक देव की आँखें खुशी से चमक गईं, पर उन्होंने कहा कुछ नहीं। उनके कदम अपने घर के रास्ते पर बढ़ते रहे। रास्ते भर पूरी शाँति थी। सब चुपचाप थे। फिर भी यह गहरा मौन ऐसा कुछ कहे जा रहा था, जिसे वाणी कहने में असमर्थ थी।

उसी रात गुरुनानक देव ने झोंपड़ी में सोए लहना को जगाया और अपने कक्ष में बुलाया। उस पर अपना असीम वात्सल्य उड़ेलते हुए बोले, अब यह शरीर जर्जर हो गया लहना। इसे छोड़ने से पहले मैं तुम्हें अपना समस्त योग बल दे रहा हूँ। यह कहते हुए उन्होंने अपनी सारी आत्मिक शक्ति उस गुरुभक्त युवक लहना को दे दी। युवक लहना को उसकी सारी परीक्षाओं का सुफल देकर गुरुनानक देव समाधि लीन हो गए। यह लहना ही कालाँतर में गुरु अंगद देव के रूप में पूजित-प्रतिष्ठित हुए।


पुण्यात्माओं में मूर्द्धन्य (kahani)

विधाता ने जय-विजय को धरती पर यह तलाश करने के लिए भेजा कि उस वर्ष स्वर्ग में किसे सम्मानपूर्वक प्रवेश दिया जाए। दोनों दूत सर्वत्र घूमते फिरे और सज्जनों, भक्तजनों का लेखा-जोखा नोट करते रहे। इस बीच उन्होंने एक अंधा वृद्धजन देखा, जो रास्ते के किनारे दीपक जलाए बैठा था। देवदूतों ने पूछा, वृद्ध! घर से दूर, आँखें न होते हुए भी दीपक जलाना और रातभर जागना, कुछ समझ में नहीं आता। वृद्ध ने कहा, जो किया जाए, वह अपने हो, यह क्या जरूरी है? संसार के सब लोग भी तो अपने ही हैं। रात्रि को निकलने वालों को ठोकर लगने से बचाकर मुझे संतोष और आनंद मिलता है। स्वार्थरत रहने की तुलना में यह लाभ क्या कम है? देवदूत पर्यवेक्षण करके वापस लौटे और सारे विवरण सुनाए, तो सर्वश्रेष्ठ वह अंधा ही निकला। देवता अपने कंधों पर पालकी से उसे स्वर्ग लाए और पुण्यात्माओं में मूर्द्धन्य वरिष्ठों को दिए जाने वाले स्थान पर उसे रखा गया।


रोग-निवारण ही नहीं, आत्मिक प्रगति हेतु करें प्राणायाम

प्राणायाम एक ऐसी क्रिया है, जिससे न सिर्फ प्राणवायु की अधिकतम आपूर्ति हमारे अंगों को होती है, वरन् अंतरंगों का भलीभाँति व्यायाम भी हो जाता है। इस प्रकार स्वास्थ्य की दृष्टि से यह उपयोगी तो है ही, इससे आत्मोन्नति भी संभव है। योग का यह एक निर्विवाद सत्य है।

सामान्य शरीर विज्ञान में मानव शरीर के अंदर काम करने वाली भिन्न-भिन्न प्रणालियाँ हैं। इनमें प्रमुख हैं- तंत्रिका तंत्र, ग्रंथि तंत्र, श्वसन तंत्र, रक्त परिसंचरण तंत्र एवं पाचन तंत्र। इन सभी पर प्राणायाम का गहरा प्रभाव पड़ता है। मल विसर्जन वाले अंगों में प्रधान हैं, आँतें, गुरदे एवं फेफड़े। इनमें से आँतें तथा गुरदे तो पेट के भीतर हैं और फेफड़े छाती के अंदर। आमतौर पर साँस लेने में उदर की माँसपेशियाँ क्रमशः ऊपर नीचे जाती हैं, जिससे आँतों और गुरदे का व्यायाम और मालिश होती रहती है। प्राणायाम में पूरक, रेचक तथा कुँभक करते समय यह व्यायाम तथा मालिश और भी अधिक स्पष्ट रूप से और अच्छी तरह होने लगती है। इससे यदि कहीं रक्त जमा हो गया हो, तो इस हलचल के कारण उस पर जोर पड़ने से वह हट सकता है। यही नहीं, आँतों और गुरदे की क्रियाओं को नियंत्रित रखने वाले स्नायु और माँसपेशियाँ भी सुदृढ़ हो जाती हैं।

यही बात फेफड़ों के साथ भी है। श्वसन क्रिया ठीक तरह चलती रहे, इसके लिए श्वासोपयोगी माँसपेशियों के सुदृढ़ होने और फेफड़ों के लचकदार होने की आवश्यकता है। शारीरिक दृष्टि से प्राणायाम द्वारा इन माँसपेशियों और फेफड़ों का संस्कार होता है और कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का भलीभाँति निष्कासन हो जाता है।

आहार का परिपाक करने वाले और रस बनाने वाले अंगों पर भी प्राणायाम का अनुकूल असर पड़ता है। अन्न के परिपाक में आमाशय, उसके पृष्ठ भाग में स्थित पैंक्रियाज और यकृत मुख्य रूप कार्य करते हैं। प्राणायाम में इन सबकी कसरत होती है। इस योगाभ्यास में डायफ्राम और पेट की माँसपेशियाँ बारी-बारी से खूब सिकुड़ती और फैलती हैं, जिससे पाकोपयोगी अंगों का अच्छी तरह व्यायाम हो जाता है। जिन्हें अग्निमाँद्य और कोष्ठबद्धता की शिकायत रहती है, उनमें से अधिकाँश लोगों के यकृत में रक्त जमा रहता है, फलतः उसकी क्रिया दोषयुक्त होती है। इस रक्त संचय को हटाने के लिए प्राणायाम एक उत्तम साधन है।

किसी भी मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उसकी नाड़ियों में प्रवाहित होने वाले रक्त को ऑक्सीजन प्रचुर मात्रा में मिलती रहे। योगशास्त्र में बताई गई पद्धति के अनुसार प्राणायाम करने से रक्त को जितनी अधिक ऑक्सीजन मिल सकती है, उतनी अन्य किसी भी व्यायाम से नहीं मिलती। इसका कारण यह नहीं कि प्राणायाम करते समय व्यक्ति बहुत-सी ऑक्सीजन निगल लेता है, वरन् यह है कि उसके श्वासोपयोगी अंग समूह की अच्छी कसरत हो जाती है।

जो लोग अपनी श्वसन-क्रिया को ठीक करने के लिए किसी प्रकार का अभ्यास नहीं करते, वे अपने फेफड़ों के कुछ अंशों से ही साँस लेते हैं, शेष भाग निकम्मा पड़ा रहता है। इस प्रकार निष्क्रिय रहने वाले अंश बहुधा फेफड़ों के अग्रभाग होते हैं। इनमें वायु का संचार अच्छी तरह नहीं होता, फलतः टी.बी. के जीवाणु वहाँ आश्रय पाकर बढ़ने लगते हैं। यदि प्राणायाम के द्वारा फेफड़ों के हर भाग से काम लिया जाने लगे और उसका प्रत्येक कोष्ठक दिन में कई-कई बार शुद्ध हवा से धुल जाया करे, तो फिर इन जीवाणुओं का आक्रमण असंभव हो जाएगा और स्वास्थ्य संबंधी इन रोगों से बचा जा सकेगा।

प्राणायाम से पाक, श्वसन एवं मलोपयोगी अंगों की क्रिया ठीक होने से रक्त अच्छा बना रहता है। यही रक्त शरीर के समस्त अवयवों में पहुँचता है। यह कार्य रक्तवाहक अंगों का, विशेषकर हृदय का है। रक्त संचार से संबंध रखने वाला प्रधान अंग हृदय है और प्राणायाम द्वारा उसके अधिक स्वस्थ हो जाने से समस्त रक्तवाहक अंग अच्छी तरह काम करने लगते हैं।

परंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती। भस्त्रिका प्राणायाम में, विशेषकर उसका वह हिस्सा, जो कपालभाति से मिलता-जुलता है, वायवीय स्पंदन शरीर के प्रत्येक स्थूल-सूक्ष्म अवयव को, यहाँ तक कि अगोचर स्तर की नाड़ियों एवं शिराओं को झकझोरकर रख देता है। इस प्रकार प्राणायाम से सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अवयवों की क्रियाशीलता बढ़ जाने से वह ठीक प्रकार से काम करने के योग्य बन जाते हैं।

नाड़ी शोधन प्राणायाम में शरीर की सूक्ष्म नाड़ियाँ मल-विक्षेपों से मुक्त होने लगती हैं। यह इस प्राणायाम का अतिरिक्त लाभ है, कारण कि अंतरंगों का व्यायाम इससे भी उसी तरह होता है, जैसा अन्य प्राणायामों से, पर नाड़ियों की शुद्धि सिर्फ इसी से हो पाती है।

भ्रामरी प्राणायाम से शरीर के अंतरंगों की मालिश के अतिरिक्त भ्रमरनाद से जो कंपन उत्पन्न होता है, उससे पूरे मुखमंडल की माँसपेशियों का व्यायाम हो जाता है। इस स्थूल लाभ के अतिरिक्त उससे मानसिक एकाग्रता एवं प्राण की स्थिरता संबंधी सूक्ष्म लाभ भी मिलते हैं।

शीतली प्राणायाम से दूसरे लाभों के अलावा देह को शीतलता मिलती है। यह उष्ण प्रकृति वाले लोगों के लिए विशेष लाभकारी है। उज्जायी प्राणायाम में कंठ की मांसपेशियों की कसरत होती है। यह पेट के रोगों में उपयोगी है। लोम-विलोम सूर्यवेधन प्राणायाम से साँस के साथ खींचा हुआ प्राण नाभि में स्थित सूर्यचक्र को जाग्रत् करता है, उसके आलस्य और अंधकार को वेधता है। इससे सूर्यचक्र उद्दीप्त होकर अपनी परिधि का भेदन करते हुए सुषुम्ना मार्ग में उदर, छाती और कंठ तक अपना तेज फेंकता है। इसी कारण इसे सूर्यवेधन प्राणायाम कहते हैं।

प्राणाकर्षण प्राणायाम से सामान्य लाभों के अतिरिक्त शरीर में प्राण की मात्रा बढ़ने लगती है। इस बढ़ते प्राण से शरीर-स्वस्थता भी बढ़ने लगती है और व्यक्ति मनोबल संपन्न बन जाता है। मनोबल बढ़ने से, जिन कार्यों में इसकी कमी से दूसरे लोग असफल सिद्ध होते हैं, वही सफलता उसके चरण चूमने लगती है। इसके अलावा अभ्यासी चैतन्यता, उत्साह, साहस, धैर्य, पराक्रम जैसे तत्त्वों से भी ओत−प्रोत हो जाता है।

प्राणायाम से मस्तिष्क और मेरुदंड को भी बल मिलता है। शरीरविज्ञानी इस विषय में एकमत हैं कि साँस लेते समय मस्तिष्क में से दूषित रक्त प्रवाहित होता है और शुद्ध रक्त उसमें संचरित होता है। यदि साँस गहरी हो, तो दूषित रक्त एक साथ बह निकलता है और हृदय से जो शुद्ध खून वहाँ आता है, वह और भी परिशुद्ध होता है। प्राणायाम का यह विधान है कि उसमें साँस गहरी-से-गहरी ली जाए। इसका परिणाम यह होता है कि मस्तिष्क से सारा दूषित खून बह जाता है। योग उड्डियान बंध को हमारे सामने प्रस्तुत कर इस स्थिति को और भी स्पष्ट कर देने की चेष्टा करता है। इस बंध से हमें इतना अधिक शुद्ध रक्त मिलता है, जितना किसी श्वास संबंधी व्यायाम से नहीं। प्राणायाम से जो हमें स्फूर्ति और बल प्राप्त होता है, उसका यही वैज्ञानिक कारण है।

मेरुदंड एवं उससे संबंधित स्नायुओं के संबंध में हम देखते हैं कि इन अंगों के चारों ओर रक्त की गति साधारणतः मंद होती है। प्राणायाम से इन अंगों में रक्त की गति बढ़ जाती है। और इस प्रकार इन्हें स्वस्थ रखने में प्राणायाम सहायक होता है।

योग में कुँभक करते समय मूल, उड्डियान और जालंधर तीन प्रकार के बंध करने का निर्देश है। इन बंधों का अभ्यास करने से पृष्ठवंश की, जिसके अंतर्गत मेरुदंड आता है तथा तत्संबंधी स्नायुओं की उत्तम रीति से कसरत हो जाती है। इन बंधों के करने से पृष्ठवंश को यथास्थान रखने वाली माँसपेशियाँ और उनकी तंत्रिकाएँ फैलती और संकुचित होती है। इससे इनमें रक्तसंचार बढ़ जाता है। बंध यदि न भी किए जाएँ, तो भी प्राणायाम की सामान्य प्रक्रिया ही ऐसी है कि उससे पृष्ठवंश पर ऊपर की ओर हल्का-सा खिंचवा पड़ता है, जिससे मेरुदंड तथा संबंधित स्नायुओं को स्वस्थ रखने में सहायता मिलती है।

प्राणायाम से दे हके विभिन्न हिस्सों और अवयवों पर दबाव पड़ता है। इस दबाव से उस क्षेत्र का रक्तसंचार बढ़ जाता है। खून के दौरे सुव्यवस्थित हो जाने से उन अंगों की स्वस्थता भी प्रभावित होती है। इसी के साथ व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मविकास करते हुए अंततः चरम लक्ष्य तक जा पहुँचता है। प्राणायाम एक हानिरहित योगाभ्यास है। सभी को प्राणशक्ति की उपलब्धि के लिए इसे नियमित रूप से करना चाहिए।= =


प्रेरणा के स्रोत (kahani)

लोकमान्य इंग्लैंड से स्वदेश लौटे। उनके सम्मान में स्वागत समारोह किया गया। समारोह की समाप्ति पर वे अपनी बग्घी में बैठकर चलने लगे। उनको पहनाई गई मालाएँ भी बग्घी में रखी गईं। लोकमान्य ने मालाएँ कोचवान को देकर हँसते हुए कहा, “अपने घोड़ों को पहना दो। जैसे ये घोड़े इस बग्घी को खींचते हैं, वैसे ही हम देश की गाड़ी खींचते हैं। दोनों में अंतर कुछ नहीं है।

अपनी इसी निरहंकारिता, निस्पृहता के कारण वे लोकमान्य कहलाए, जन-जन के लिए प्रेरणा के स्रोत बने।


त्याग-बलिदान की संस्कृति देवसंस्कृति-3 -परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

(गताँक से आगे)

मित्रो! आदमी हो या कोई पक्षी हो, बुड्ढा हो, बिना पढ़ा हो या साधनहीन हो, तो भी कम-से-कम उसके भीतर इतनी हिम्मत अवश्य होनी चाहिए कि अनीति का विनाश करने के लिए, लड़ाई लड़ने के लिए सीना तानकर खड़ा हो जाए। बेटे! बड़े-बड़े बादशाहों को तो हम भुला सकते हैं, लेकिन उस पखेरू को हम सदैव याद रखेंगे। उसे हम भुला नहीं सकते। उस पखेरू को न भुलाने का मतलब है, देवपूजन अर्थात् देवत्व का पूजन। बेटे! भारतीय संस्कृति में देवत्व का पूजन करने की परंपरा है। यही परंपरा सतयुग को लाती है, धर्मयुग को लाती है। मानवजाति के उज्ज्वल भविष्य को लाती है। कौन-सी परंपराएँ? जिनको हम दैवीय परंपराएँ कहते हैं। दैवीय परंपराएँ क्या होती हैं? तिलक लगाना, माला जपना, गंगाजी नहाना, सत्यनारायण की कथा कहना आदि, क्या यही दैवी परंपराएँ हैं? नहीं, बेटे! ये तो खेल-खिलौने मात्र हैं। जो इसी खेल-खिलौने में उलझे रहते हैं, उन्हें हम ‘अफीमची’ कहते हैं, सनकी कहते हैं। काम होता नहीं है, त्याग की बात बनती नहीं, बैठे-बैठे कोने में झपकियाँ लेता रहता है, सरकता रहता है और कहता है कि प्रकाश दिखा दीजिए। घंटी बजा दीजिए, कान में नादब्रह्म सुना दीजिए। पेट में से पिल्ला निकाल दीजिए। उसमें से निकाल दें तेरा सिर।

मित्रो! क्या करना पड़ेगा? दैवीय सभ्यता यह नहीं है। दैवीय सभ्यता वह है, जिसमें त्याग और बलिदान की बात करनी पड़ती है। बेटे! हजारों वर्षों का इतिहास जब हम पढ़ते हैं, तो हमको दैवीय सभ्यता का यही स्वरूप दिखाई पड़ता है। रामचंद्रजी के बाद श्रीकृष्ण जी का नंबर आता है। श्रीकृष्ण जी का जीवन चरित्र जैसा कुछ भी आता है, उन्होंने जिन लोगों के साथ लेकर के काम शुरू किया था, उन लोगों के नाम थे, पाँडव। पाँडवों में क्या था? दैवीय सभ्यता थी। पाँडव देवताओं से पैदा हुए थे। मैंने सुना है कि कुँती ने देवताओं का जप-पूजन किया था और जप-पूजन करने के बाद में बच्चे पैदा किए थे। कैसे थे पाँच बच्चे? तो क्या उनमें एक था आई.ए.एस., एक था इन्कम टैक्स ऑफिसर, एक था सी.बी.आई. ऑफिसर आदि। इस तरह क्या उन्होंने लाखों रुपयों की आमदनी की थी? करोड़ों की जायदाद खरीदकर रख गए थे? तो फिर कुँती का बेटा, देवता का बेटा कौन होता है? क्या वह जिसके पास मोटरें हों, जिसके पास दौलत हो, जिसके पास मकान हो। नहीं, यह आपकी परिभाषा है। देवताओं की परिभाषा अलग थी।

मित्रो! देवताओं के बेटों को कैसा होना चाहिए? अगर कोई देवता का बेटा है, तो उसके व्यवहार में और जीवन में क्या गुण आना चाहिए? इसे हम पाँचों पाँडवों के जीवन में देख लेते हैं। अज्ञातवास के समय कुँती अपने बच्चों के साथ एक ब्राह्मणी के यहाँ छिपी हुई थी। उस इलाके में कोई एक राक्षस रहता था। जो वहाँ के हर घर से एक-एक आदमी प्रतिदिन मारने के लिए बुलाया करता था और उन्हें खा जाता था। नंबर के हिसाब से उस दिन ब्राह्मणी के बच्चे का नंबर आ गया। ब्राह्मणी रोने लगी। उसने कहा कि हमारे एक ही बालक था और वह भी आज राक्षस के हवाले होने जा रहा है। जब वह बैठी हुई रो रही थी, तो कुँती ने पूछा, बहिन क्या बात है? ब्राह्मणी बोली कि हमारे पास एक ही बच्चा है और उसको आज राक्षस के पास जाना पड़ेगा। उसे मरना ही होगा। अब हम क्या कर सकते हैं?

कुँती ने कहा कि आपने अपनी जान जोखिम में डालकर हमको छिपा रखा है, तो हमारा भी तो कुछ कर्त्तव्य हो जाता है। हम भी तो कुछ करेंगे आपके लिए। उन्होंने कहा, बच्चो! तुम पाँच हो। एक काम करो, यह जो ब्राह्मणी है, इसके एक ही बालक है। इसने अपनी जान जोखिम में डालकर हमको छिपाकर रखा है। इसलिए क्या करना चाहिए बच्चो? तुममें से एक बच्चे को अपना बलिदान कर देना चाहिए। बच्चों ने कहा, माता जी! इससे बड़ा सौभाग्य हमारा क्या हो सकता है? भीम चले गए और उसे बचा लिया।

मित्रो! यह क्या है? यह है देवता का मन। देवता का मन वह होता है कि जब उसके जीवन में कोई त्याग करने, बलिदान करने का मौका आता है, तो बल्लियों उछलने लगता है। यह होता है, देवताओं का दिल। और राक्षसों का दिल कैसा होता है? राक्षसों का, चोरों का, घटिया आदमी का दिल यह है कि जब त्याग का वक्त आता है, तो वह थर-थर काँपने लगता है। हर समय जिसकी यही नीयत रहती है कि यह मंत्र जपूँगा, यह तंत्र जपूँगा, यह पूजा करूंगा और इससे यह पैसा कमाऊँगा, यह औलाद पाऊँगा, धन कमाऊँगा। कामना-ही-कामना, कामना-ही-कामना जिसके अंदर भरी हुई है, बेटे यह कोई अध्यात्म नहीं है।

ठीक है मित्रो! यह बच्चों का अध्यात्म रहा होगा। मैं यह तो नहीं कहता कि बच्चों को यह जरूरत नहीं है। हम मिठाई बाँट करके और कोई लोभ देकर के बच्चों को अपने पास बुला लेते हैं। यह भी अध्यात्म का कोई हिस्सा होगा, पर मैं इसको ठूंस कहता हूँ, भूसी कहता हूँ। किसकी? अध्यात्म की। भूसी कौर-सी? जिसमें यह पाया जाता है कि अध्यात्म क्या है। बेटे, यह अध्यात्म का खिलवाड़ है, छिलका है, जूठन का पत्ता है। पत्ते पर मिठाई खाकर के लोग उसे फेंक देते हैं और कुत्ते उसे चाटने के लिए टूट पड़ते हैं, चट कर जाते हैं। यह भी हो सकता है प्राप्त करने की दृष्टि से। अध्यात्म को हम भौतिक चीजों को पाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, इसलिए बेटे, मैं इसको जूठन का पत्ता कहता हूँ। किसी आदमी का खाया हुआ पत्ता फेंक दिया गया, दूसरा कहता है कि हमको भी दे दीजिए। हाँ बेटे, तुझे भी दे देंगे।

बेटे, हमने तप किया है और तप करके पाया है और तू हिस्सा माँगता है। चल तुझे भी दे देंगे। यह क्या है? छोटी चीज है, रत्तीभर चीज है। न इसमें किसी को घमंड करने की जरूरत है और न सफलता प्राप्त करने की जरूरत है। हमने अध्यात्म से यह पा लिया, वह पा लिया। बेटे, पाने से अध्यात्म का कोई संबंध नहीं है। अध्यात्म का संबंध है, देने से। आपने क्या दिया, बताइए? बस, यही एक सवाल है। अगर आप यह कहते हैं कि हम भगवान् की भक्ति से कोई ताल्लुक रखते हैं, तो आप यह जवाब दीजिए कि दैवीय सभ्यता के लिए, श्रेष्ठ आचरणों के लिए, लोगों के सामने अच्छी परंपरा स्थापित करने के लिए आपने क्या दिया? यही एक जवाब दीजिए और दूसरा हम कुछ नहीं सुनना चाहते। हमने इतना भजन किया। तो ठीक है अपने भजन को डिब्बी में रखिए। भजन का या और किसी का हवाला देना हम नहीं सुनना चाहते। गायत्री मंत्र की ग्यारह कॉपी हमने लिखीं। तो आप अपनी ग्यारह कॉपी ताले में बंद कर दीजिए। हमें मत बताइए। हमको तो यह बताइए कि आपने दैवीय सभ्यता के लिए कितना त्याग किया है? कितना बलिदान किया है? कितनी सेवा की है? नहीं साहब! हमने तो ग्यारह कापियाँ लिखी हैं। अच्छा, ग्यारह कापियाँ मुबारक हों, उसे अपने घर रखिए। हम नहीं सुनना चाहते।

मित्रो! अध्यात्म की प्राचीन परंपराएँ, शालीन परंपराएँ, महान् परंपराएँ भगवान् को अपनी ओर खींचती हैं और खींचने के अलावा दूसरों की सहायता करने में समर्थ होती हैं। ऐसा कोई अध्यात्म नहीं है, जो मनोकामना को प्राप्त कराता है। अध्यात्म वह है, जिससे आदमी अपना कल्याण करते हैं और दूसरों का कल्याण करने में समर्थ होते हैं। ऐसी शक्ति, जो दूसरों का कल्याण करती है, वह केवल असली अध्यात्म में रहती है। वह त्याग किए बिना, बलिदान किए बिना, सेवा धर्म किए बिना, दैवीय सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप जीवन ढाले बिना किसी में नहीं आ सकती। न आई है और न आएगी। कौन-सी? जिसमें त्याग जुड़ा हुआ न हो, सेवा जुड़ी हुई न हो, लोकहित जुड़ा हुआ न हो, कष्ट सहने की बात जुड़ी हुई न हो, उसमें अध्यात्म कैसे हो सकता है? नहीं बेटे! इससे कम में कभी अध्यात्म न था और न कभी होगा।

मित्रो! भगवान् श्रीकृष्ण ने उस जमाने में, दुर्योधन के जमाने में जब चारों ओर असभ्यता और अनीति फैली पड़ी थी, तब यही नमूना पेश किया था। उनके पाँच हितैषी और हिमायती थे। पाँचों हिमायतियों का मैं एक नमूना बता रहा था। पाँचों पाँडवों से कुँती ने कहा, बच्चो! तुममें से एक को वहाँ जाना चाहिए। बच्चे उछलने लगे और कहने लगे कि यह सौभाग्य तो हमको मिलना चाहिए। प्रतिस्पर्द्धा-काँम्पिटीशन शुरू हो गई कि बलिदान में हम आगे जाएँगे। पाँचों बच्चों में प्रतिस्पर्द्धा शुरू हो गई। कुँती के लिए जद्दोजहद खड़ी हो गई। युधिष्ठिर कहते कि हम सबसे बड़े हैं। हम दुनिया में सबसे पहले आए थे, इसलिए हमारा नंबर पहला है। सबसे छोटे वाले नकुल कहने लगे कि हम सबसे छोटे हैं, इसलिए हमको जाना चाहिए। अर्जुन कहने लगे कि इसके लिए हमको जाना चाहिए। सबमें झगड़ा होने लगा। कुँती ने कहा, अच्छा तुममें से कौन सबसे भाग्यवान है, इसके लिए मैं गोली बनाकर निकालती हूँ। पाँचों पाँडवों के नाम से गोली बनाकर डाल दी गई और कहा गया कि अच्छा, एक गोली उठा लो। जिसका नाम आ जाएगा, उसी को जाना चाहिए।

गोली उठाई गई। भीम का नाम आ गया। भीम उछलने लगे, ओ हो! यह मेरा सौभाग्य है। मित्रो! सौभाग्य किसे कहते हैं? नौकरी में तरक्की हो जाने को? लॉटरी में रुपया निकल आने को? तीन बेटियों के बाद दो बेटा हो जाने को? आपकी दृष्टि में इसके अतिरिक्त और कोई सौभाग्य होता है क्या? नहीं होता। बेटे! यह सौभाग्य नहीं होता। सौभाग्य वह होता है, जिसमें आदमी अजर-अमर हो जाता है। बेटे! सौभाग्य वह होता है, जिसमें हजारों-लाखों आदमी श्रद्धा के सुमन चढ़ाते रहते हैं और उसके चरणों पर आँसू बहाते रहते हैं और जिसके मरने के बाद भी आदमी उससे प्रकाश-प्रेरणा ग्रहण करते रहते हैं, रोशनी ग्रहण करते रहते हैं। देवता उन्हें ही कहते हैं, सौभाग्य उसे कहते हैं। सौभाग्यशाली वे हैं, वंदनीय वे हैं, जिन्होंने अपना आचरण इस तरीके से पेश किया कि जिससे प्रेरित होकर हजारों आदमी नमूने पेश करते रहें और दिशा प्राप्त करते रहें।

मित्रो! ऐसा ही हुआ। भीम का नंबर आ गया। भीम बच्चा था और राक्षस नौजवान। राक्षस कितना बड़ा था? समझ लीजिए छत के बराबर रहा होगा। और भीम? छोटा-सा ही था। भीम लड़ने के लिए चला गया। महाभारत की कथा के अनुसार मैंने सुना है कि भीम ने कहा, अच्छा, आप हमको खाएँगे तो हो ही, तो क्यों न पहले दो-दो हाथ कर देख लें। राक्षस ने कहा, चल, इसमें कोई एतराज नहीं है हमको। आ, हो जाए, दो-दो हाथ। भीम लड़ने के लिए तैयार हो गया और उसने राक्षस को पटककर मार दिया।

क्यों साहब! ऐसा हो सकता है? हाँ बेटे, ऐसा हो सकता है। सत्य हजार हाथी के बराबर बलवान होता है। बच्चों ने भी सत्य का आश्रय लेकर बड़ी-बड़ी सफलताएँ पाई हैं। कौन-कौन ने पाई हैं? चंद बच्चों के नाम बता सकता हूँ। प्रह्लाद बच्चा था, लेकिन उसका बाप हिरण्यकश्यप कितना समर्थ था। वह इतने बड़े दैत्य से लड़ने के लिए खड़ा हो गया और उसका कचूमर निकाल दिया। यह बच्चों की बात कह रहा हूँ। कंस से लड़ने के लिए श्रीकृष्ण भगवान् गए थे। तब वे कितने छोटे थे। बच्चा जब लड़ने के लिए गया तो कंस को, चाणूर को और बकासुर को मार डाला और किस-किस को मारा? हाथियों को, कालिया को मार डाला, कैसे मार डाला बच्चे ने? बेटे, बच्चे ने नहीं, सत्य ने मार डाला। सत्य के पास हजार हाथियों के बराबर बल होता है। इसीलिए मुष्टिकासुर कौन था? एक हाथी था। भगवान् श्रीकृष्ण चाहते तो और भी निन्यानवे हाथियों को मार सकते थे, क्योंकि उनके पास सत्य था। बच्चा हो तो क्या, बड़ा हो तो क्या, जिसके पास सत्य है, विजय उसकी ही होती है।

मित्रो! महाभारत की कथाएँ भी इसी तरह की मालूम पड़ती हैं, जिसमें लोगों ने देवत्व पैदा किया। देवत्व का छोटा-सा फार्म बनाया, सीढ़ी बनाई, आदर्श उपस्थित किया, जिससे लोगों के सामने देवत्व घिसटता हुआ चला गया, और वे दिन भी आए, जबकि दुर्योधन की आसुरी सभ्यता का निवारण हो गया, समाधान हो गया। कभी और भी ऐसे ही हुआ था। सारे इतिहास में तो यही पढ़ता रहता हूँ। अठारह पुराणों का अनुवाद मैंने किया है और इतिहास भी पढ़ा है। दो वर्ष पहले मैंने इतिहास को ज्यादा गहराई और ध्यान से पढ़ा है। ‘भारतीय संस्कृति का समस्त विश्व को अजस्र अनुदान’ नामक बड़ा ग्रंथ मैंने लिखा है। आपने पढ़ा होगा, उसमें मैंने हिंदुस्तान की सारी-की-सारी हिस्ट्री लिखी है। सारी दुनिया को निहाल कर देने की हिस्ट्री। किससे निहाल कर दिया था? बेटे, सारी दुनिया को धन दिया था, विद्या दी थी, ज्ञान दिया था। सारी दुनिया में भारतीयों का वर्चस्व छा गया था और उनको जगद्गुरु माना गया था, देवता माना गया था।

महाराज जी! यह सब कैसे हुआ था? बता दीजिए हम भी करना चाहते हैं। ऐसी विधि हमको भी बता दीजिए। हाँ बेटे, ला तुझे भी बता देते हैं कि क्या विधि है? बस एक तो तू माला ले ले और एक मंत्र। मंत्र लेकर क्या करूं? जप किया कर ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय। नमः शिवाय से क्या हो जाएगा? सारे विश्व में तेरा यश हो जाएगा और तू अजर-अमर हो जाएगा। सारी दुनिया का कल्याण हो जाएगा। ऐसा हो जाएगा? नहीं बेटे, ऐसा नहीं हो सकता।

मित्रो! मैंने जो पुस्तक लिखी है ‘भारतीय संस्कृति का समस्त विश्व को अजस्र अनुदान’। उसमें मैंने यह लिखा है कि भारतीय लोगों ने किस कदर त्याग और बलिदान किए हैं और एक से बढ़कर एक कैसे-कैसे नमूने खड़े किए हैं। बलिदानों का जखीरा लगा दिया है। भारतीय सभ्यता को अपने अनुदान देने वाले लोगों का जब मैं इतिहास पढ़ता हूँ, तो आँखों में से आँसू टपक पड़ते हैं। उनमें से एक थे, कुमारजीव, जो हिंदुस्तान से रवाना हुए और चीन पहुँच गए। जहाँ की न वे भाषा जानते थे और न कुछ जानते थे। “चीन नाम का देश है, जिसमें जाकर बौद्ध धर्म का प्रसार करेंगे।” यह सोचकर वे अकेले ही रेगिस्तानों को पार करते हुए चले गए। उन भयंकर रेगिस्तानों को जहाँ तीस-तीस दिनों तक पानी की एक बूँद भी नहीं मिलती थी। पेड़ की एक छाया तक नहीं है, केवल रेगिस्तान-ही-रेगिस्तान भरा पड़ा है। अपनी थैली में थोड़ा-सा पानी लेकर वे रवाना हो गए। कौन? कुमारजीव। वे चाइना में रह गए। चाइना में कौन था उनका? न कोई बेटा था, न मित्र था, न कोई शिष्य था उनका। वहाँ जाकर के उन्होंने चायनीज भाषा सीखी और सीखने के बाद में बौद्ध धर्मग्रंथों का अनुवाद करके वहाँ रखा। सारे-के-सारे चाइना को बौद्ध बनाने का श्रेय कुमारजीव जैसे बुद्ध के अनुयायियों को था।

गुरुजी! यह कैसे हो गया? बेटे, जादू से। जादू से कैसे हो गया? हमको भी सिखा दीजिए। बेटे, जिस जादू से दुनिया में बड़े-बड़े काम हुए हैं और अध्यात्म का प्रणयन हुआ है, उसका नाम है, त्याग और बलिदान। नहीं महाराज जी। त्याग-बलिदान का नहीं, हमको तो बता दीजिए मंत्र। मंत्र कैसा होता है? अहा! इसी मंत्र के चक्कर में फिर रहा है धूर्त। अच्छा महाराज जी! बता दीजिए जादू। जादू बता दें तोरा सिर। मित्रो! क्या हुआ? सारी-की-सारी पुस्तकों में मैंने लिखा है कि भारत के गौरव को ऊँचा उठाने के लिए, सारे विश्व का कायाकल्प कर डालने के लिए, जो आधारभूत मंत्र था, वह था त्याग और बलिदान। त्याग और बलिदान की आवश्यकता महात्मा बुद्ध को पड़ी कि जिससे न केवल हिंदुस्तान, वरन् सारे के सारे विश्व को सुसंस्कृत बनाया जाए, फिर से सुसंस्कृत बनाया जाए। इसके लिए उन्हें अपील करनी पड़ी कि जो हमारे सबसे प्यारे हों, जो हमारे हितैषी हों, जो हमारी आज्ञा का पालन करने वाले हों, जो हमसे यह कहते हों कि बुद्ध हमारा है, तो वह त्याग करके दिखाएँ। यही सीधा-सरल मार्ग है।

महाराज जी! हम तो आपके चरणों में फूल चढ़ा देंगे। आपके ऊपर फूल चढ़ाएँगे और तीन बार नमस्कार करेंगे। ओ हो। बड़ा भारी शिष्य है हमारा। और क्या करेगा? महाराज जी! पच्चीस पैसे का आपका एक रंगीन फोटो खिंचवाऊँगा। फिर क्या करेगा उसका? टाँगूँगा। कैसे टाँगेगा, उलटा या सीधा? महाराज जी! टाँगूँगा तो सीधा। बेटे, हमारा कहना मान तो उलटा टाँग दे फोटो को। उलटा टाँग देगा, तो ज्यादा फायदा हो जाएगा। क्यों? क्योंकि तब गुरु जी की नाक में दम आएगी तो जल्दी आशीर्वाद देंगे। तो यह मामला है? हाँ बेटे, घटिया लोगों का, छोटे लोगों का, हलके लोगों का यही मामला है। इनके लिए जितनी गाली दी जाए, कम है। यह हमारे आपके सबके ऊपर लागू होती है। इसमें आदमी सिवाय चालाकी के, सिवाय माँगने के, सिवाय बड़ा आदमी बनने के, सिवाय ऐय्यासी के, सिवाय विलासिता के कुछ बाकी नहीं है।

मित्रो! क्या करना पड़ेगा? भारतीय सभ्यता और संस्कृति को जिंदा रखने के लिए बुद्ध ने जो कदम उठाए, उसने अपने-अपने मित्रों और शिष्यों से कहा कि आप आएँ और हमारे पीछे-पीछे चलें। किस तरह चलें? आप हमारी बात मानते हैं, तो हमारे रास्ते पर चलें और हमारा अनुकरण करें। क्या रास्ता है आपका? हमारा रास्ता है, त्याग और बलिदान का। किसने त्याग और बलिदान के रास्ते पर कदम बढ़ाए? एक लाख शिष्य और सवा लाख शिष्याओं ने। उन सारे-के-सारे लोगों ने कहा कि हम आपके रास्ते पर चलेंगे। आपने जिस काम के लिए अवतार लिया है, उस काम में हम आपका सहयोग करेंगे और सहायता करेंगे। दो लाख आदमियों को लेकर बुद्ध ने न केवल हिंदुस्तान, वरन् समूचे एशिया, न केवल एशिया, वरन् सारे-के-सारे महाद्वीपों में दैवीय सभ्यता का प्रसार किया। उस जमाने में सात महाद्वीप माने जाते थे। अब तो हमने पाँच कर लिए हैं। सारे महाद्वीपों में उन लोगों ने न जाने क्या-से-क्या काम करने शुरू कर दिए, जिससे वे जगद्गुरु कहलाने के अधिकारी हुए।

यह क्या किया बुद्ध ने? बेटे, बुद्ध ने यही किया। दैवीय सभ्यता का प्रसार इसी से हुआ है। तो क्या बुद्ध ने बड़े व्याख्यान दिए थे? हाँ बेटे, बुद्ध ने बड़े व्याख्यान दिए थे, लेकिन व्याख्यान देने के साथ-साथ में उसके नमूने भी पेश किए गए थे। क्या नमूना पेश किया? उनका बेटा राहुल आया और बोला, पिताजी! हम आपके अंश-वंश से पैदा हुए हैं। हाँ बेटे, तुम हमारे अंश-वंश से पैदा हुए हो तो तुम्हें हमारी वंश-परंपरा की रक्षा करनी चाहिए। वंश-परंपरा की रक्षा कैसे होती है? पंडित जी से पूछा, तो वे बोले, बस जौ का पिंड बना लो और उस पर धूप-दीप, फूल लगा दो और ‘तर्पयामि’ करके पिंड को गंगा जी में चढ़ा दो। बस, वंश का उद्धार हो जाएगा। तो क्या पिताजी। ऐसे उद्धार होगा? नहीं बेटे, ऐसे उद्धार नहीं होगा। कैसे होगा? जिस रास्ते पर हम चले हैं, उस रास्ते पर तू भी चल।

राहुल ने कहा, अच्छा पिताजी! कोई और रास्ता बताइए? बुद्ध ने कहा, नहीं बेटे, हम जिस रास्ते पर चले हैं, उससे अच्छा कोई रास्ता नहीं हो सकता है। अगर रहा होता, तो हम भी उस पर चल दिए होते। यही सबसे अच्छा रास्ता है। तुझे यही करना पड़ेगा। अगर तू हमारा बेटा है और यह कहता है कि हम आपका वंश चलाएँगे, तो हमारे रास्ते पर चल। राहुल तैयार हो गया। वह सारी जिंदगी भर अपने पिता के कदमों पर चलता रहा और न जाने कहाँ-से-कहाँ चला गया। वह वर्मा गया। सारे-के-सारे विश्व में एक सिरे से दूसरे सिरे तक भटकता फिरा और अपने पिता के कामों का और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के लिए त्याग-बलिदान की झड़ी लगाता रहा।

(क्रमशः)


युगगीता-19 - मैं जानता हूँ कि तुम कौन हो और किसलिए आए हो

(गीता के चतुर्थ अध्याय-ज्ञानकर्मसंन्यासयोग की युगानुकूल व्याख्या)

इस अंक से हम चौथा अध्याय आरंभ कर रहे हैं। इसके पूर्व के तीन अध्यायों में 18 लेखों द्वारा योगेश्वर श्रीकृष्ण एवं युगद्रष्टा परमपूज्य गुरुदेव के चिंतन के परिप्रेक्ष्य में बड़ा ही महत्त्वपूर्ण जन-जन के लिए उपयोगी चिंतन प्रस्तुत किया जा चुका है। इन सभी लेखों का एक संकलित रूप ‘युगगीता’ ग्रंथ के प्रथम भाग के रूप में पाठकगणों के समक्ष शीघ्र ही आ रहा है। चौथे अध्याय का शीर्षक है- ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग नामक इस चतुर्थ अध्याय में न केवल ज्ञान, कर्म, संन्यास के समुच्चय रूपी योग की व्याख्या है, इसमें मूल रूप से चार प्रकरणों की विशद विवेचना भी है। पहला प्रकरण है अवतार चेतना के प्रकटीकरण का, उसके हेतु का। दूसरा प्रकरण है कर्म, अकर्म और विकर्म की व्याख्या का। तीसरा प्रकरण है यज्ञ का, यज्ञ क्या है, कितने प्रकार का है, उसे हम दर्शन की दृष्टि से कैसे समझें? चौथा प्रकरण है ज्ञान का, ज्ञान के महत्त्व का एवं संशयों से मुक्त हो ज्ञान की प्राप्ति द्वारा कर्म में तत्पर होने का। चारों ही एक-दूसरे से जुड़े हैं। व्याख्या के माध्यम से इनकी परस्पर संगति क्रमशः समझ में आती जाएगी। यह ध्यान में रखने योग्य बात है कि योगेश्वर श्रीकृष्ण प्रथम छह अध्यायों में मूलतः कर्मयोग की चर्चा कर रहे हैं। कर्मयोग के साथ-ही-साथ वे ज्ञानयोग व भक्तियोग के मर्मस्पर्शी बिंदु भी साथ ले आते हैं। फिर इस अध्याय का नाम भी है, ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग। कई लोग यह समझते हैं कि गीता मात्र संन्यासियों के लिए है अथवा इसे पढ़ने से अच्छा-खास गृहस्थ संन्यासी बन जाता है। ऐसी बात नहीं है। यह गीता एक गृहस्थ श्रीकृष्ण द्वारा दूसरे गृहस्थ अर्जुन के माध्यम से हम सभी गृहस्थ धर्म या अन्य धर्म का पालन करने वालों के लिए कही गई है। जहाँ तक संन्यास से मतलब है, वह है कर्मणा न्यासः इति कर्म संन्यासः अर्थात् कर्म का न्यास कर दो, ट्रस्ट बना दो। कर्म का फल ईश्वर को समर्पित कर दो। यह विस्तृत थ्योरी इस चौथे अध्याय में आई है एवं इसी की ओर विशद व्याख्या पाँचवे-छठे अध्याय में हुई है।

इस अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग की शुरुआत श्री भगवान् की स्वीकारोक्ति से होती है कि यह गीता रूपी योग का गुह्य ज्ञान उन्हीं के माध्यम से-ईश्वरीय सत्ता के माध्यम से धरती पर आया है। तमाम कर्मों के एकमात्र कारण, उनके एकमात्र सृजनकर्त्ता और परम नियंता कौन हैं, यही स्पष्ट किया गया है। वही समग्र समष्टि में क्रीड़ा कर रहा है। उसी की कार्यप्रणाली समझ लेने के बाद मानव में दिव्यता का समावेश हो जाता है। समष्टि के साथ व्यष्टि के तादात्म्य का अर्थ है इस भूमंडल पर ईश्वर जैसी पूर्णता, ऐश्वर्य से जुड़ी सामर्थ्य, सौंदर्य एवं परमशक्ति से युक्त होकर कर्म करना। बड़ी ही सुँदर काव्य की अभिव्यक्ति के साथ निरंतर ज्ञान एवं कर्मयोग का ज्ञान, कर्त्ताभाव के त्याग का वर्णन निस्स्वार्थ भाव से प्रवाहित हुआ है। यही इस अध्याय की विशेषता है।

भगवान् कहते हैं कि यह कर्मयोग जिसकी उन्होंने पिछले अध्यायों में व्याख्या की है, उनका कोई निजी सिद्धाँत नहीं है। यह श्रद्धाभाव से शताब्दियों से परंपरा रूप में चलता आया है तथा यही भारतीय संस्कृति का सनातन-अविनाशी आधार है। यद्यपि यह योग रहस्यमय है, गहन भाव से युक्त ( रहस्यं ह्येतदुत्तमम् )। प्रारंभ में किसी को जमे, न जमे, लेकिन पात्रता और ईश्वरीय अनुकंपा से जो भी इसे समझ लेता है, वह संसार रूपी महासागर की इस हिचकोलों से भरी यात्रा को पार कर जाता है। यही प्रारंभिक तीन श्लोकों की भूमिका है व यह वे अर्जुन को क्यों कह रहे हैं, यह भी इसमें समझा रहे हैं।

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥ 4/1

“मैंने इस अविनाशी योग को सर्वप्रथम भगवान् सूर्य को सुनाया। सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मुनि को दिया और मनु ने अपने पुत्र (सूर्यवंशी राजाओं के प्रसिद्ध पूर्वज) इक्ष्वाकु के प्रति कहा।”

“हे परंतप अर्जुन! इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना। तथापि अनंत शताब्दियाँ बीत जाने पर यह महान् ज्ञान संसार से लुप्तप्राय हो गया।”

से एवायं मय तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि में सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥ 4/3

“मैं उसी पुरातन योग का उपदेश तुझे दे रहा हूँ, क्योंकि तू मेरा भक्त व मित्र है। चूँकि यह बड़ा ही गुह्य रहस्य से भरा ज्ञान है, तू इसे जानने का उचित पात्र भी है।”

इन तीन श्लोकों से इस अति महत्त्वपूर्ण चौथे अध्याय की भूमिका बनती है। अर्जुन स्वभाव से तुरंत जिज्ञासु हो उठता है, भ्रमित भी हो जाता है, यह सुनकर “इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्”-मैंने यह अविनाशी योग सूर्य भगवान् को दिया। वह सोचता है कि या तो यह कथन मिथ्या है या फिर भगवान् के इन शब्दों में कोई गुह्य रहस्य छिपा हुआ है। वह सीधा प्रश्न करता है-

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयाँ त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥ 4/4

“आपका जन्म तो बाद का है और भगवान् सूर्य का पहले का, अर्थात् कल्प के आदि का। तब मैं इस बात को कैसे मानूँ, समझूँ कि आप ही ने कल्प के आदि में इस ज्ञान को सूर्य को दिया था।”

यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण के समक्ष लौकिक दृष्टि से एक जिज्ञासा आई है, जो उन्हीं के कथन के प्रत्युत्तर में जन्मी है।

सूर्य का जन्म अर्जुन भी आदिकाल से हुआ मान रहा है एवं अवतारवाद को न समझ पाने के कारण वह यह समझ पाने में असमर्थ है कि श्रीकृष्ण ने कब इसे सूर्य को कहा व कब कालक्रम में वह अब उस स्थान पर एक श्रोता बनकर आ खड़ा हुआ है। सूर्य वस्तुतः आदर्श के रूप में इस अविनाशी योग के प्रथम श्रोता के रूप में भगवान् द्वारा यहाँ उद्धृत हैं। सुवति प्रेरयति लोकः इति सूर्यः जो अपने कर्म से सारे जग को कर्मरत रहने की प्रेरणा दे, वह सूर्य। कर्म में कोई शिथिलता नहीं, निरंतर कर्त्तव्यपरायणता का पाठ पढ़ाए वह सूर्य। सूर्य-मनु-राजर्षिगण एवं फिर लुप्त हो जाने के कारण अब अर्जुन को निमित्त बनाकर भगवान् इस विराट् ज्ञान को जन-जन के सम्मुख रख रहे हैं। गायत्री का देवता सविता देवता-सूर्य से आरंभ हुआ यह गीता का ज्ञान गुरु के माध्यम से जन-जन तक आ रहा है। गीता, गायत्री व गुरु तीनों का परस्पर समन्वय है यह विलक्षण ज्ञान। इसीलिए गीता हम सबके लिए एक अनिवार्य पाठ्यपुस्तक बन जाती है।

भगवान् जब कहते हैं कि “सबसे पहले मैंने इसे सूर्य को कहा”-तो उनके इस ‘मैं’ को, उसके मर्म को जानना चाहिए। यह भगवान् का मैं अहंजनित नहीं है। यह ‘मैं’ समष्टिगत है। उनके इस मैं में परब्रह्म की व्याख्या हो रही है। परमात्मा का ‘मैं’ अर्थात् समष्टिगत मैं। सारे ईकोसिस्टम का प्रतीक है यह विराट् इगो, मैं। भगवान् ऐश्वर्य से भरी सत्ता का नाम है, इसीलिए ईश्वर है। वही ईश्वर कह रहा है, देवकीनंदन बाल-ग्वालों, गोपियों के साथ खेलने वाले, दुर्योधन के शब्दों में ग्वाले कृष्ण नहीं। यह समझना बड़ा जरूरी है। क्या कहते हैं भगवान्!

बहून में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥ 4/5

“हे परंतप! तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सब को तू नहीं जानता, किंतु मैं जानता हूँ।”

भगवान् एक आश्चर्यजनक रहस्योद्घाटन कर रहे हैं। हम सभी अनेक जन्म धारण कर चुके हैं, हमने इस तरह असंख्यों अनुभव एकत्र किए हैं और आज हम जो कुछ भी हैं, वह भी हमारे अब तक के अनुभवों और प्रतिक्रियाओं के परिणाम ही हैं। पूर्व जन्मों में संचित ज्ञान-संपदा का परिपाक ही है, जो हम इस जन्म में कुछ संस्कारों के ज्ञान से मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन जीने हेतु कर्मरत हैं, किंतु वर्तमान शारीरिक उपाधियों में हम इतना घुल-मिल गए हैं, अपने तात्कालिक सुख-दुःख, कामोद्वेग, पीड़ा, राग-द्वेषादि में इतने तल्लीन रहते हैं कि हम जीवन की घटनाओं से अलग खड़े होकर उनके द्रष्टा नहीं बन पाते। इसी कारण हम वास्तव में कौन हैं, यह अनुभूति नहीं कर पाते। भगवान् कह रहे हैं, यही बात कि तुम तो नहीं जानते, किंतु मैं सब जानता हूँ कि मैं कौन था व कौन हूँ? बात बड़ी गुह्य है।

अवतार-लीला वस्तुतः अति गहन विषय है। भगवान् सशरीर आते हैं, लीला करते हैं, यह ज्ञान प्रभु की कृपा के बिना संभव भी नहीं है। बड़ा आसान है यह कहना, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ मैं ही सच्चिदानंद परब्रह्म हूँ। किंतु छह प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त भगवान् स्वयं रक्त-माँस का शरीर धारण कर मनुष्य बन संसार में आते हैं, प्राणियों का उद्धार करते हैं, ऐसा ज्ञान पाने के लिए प्रभु कृपा-गुरु का दिव्य अनुदान जरूरी है। ऋषि-मुनि उग्र तपस्या करके भी ‘अवतार तत्त्व’ का ज्ञान नहीं प्राप्त कर सके। पुराणों में उल्लेख आता है कि नैमिषारण्य में सहस्रोंसहस्र ऋषि-मुनि थे। उन सभी ने भगवान् श्रीराम को देखा था, किंतु उन्हें अवतार रूप से ग्रहण किया था केवल भारद्वाज आदि कुछ गिने-चुने ऋषियों ने। अन्य सभी कहते थे, “हम जानते हैं कि तुम दशरथ पुत्र हो।” बस इतना ही। मात्र भारद्वाज ने ही उनकी अवतार रूप में पूजा की थी। श्रीकृष्ण के साथ रहते हुए भी अर्जुन उन्हें भगवान् के रूप में नहीं जान सके, जब उनकी कृपा हुई, दिव्य चक्षु मिले तभी पता चला कि श्रीकृष्ण का असली स्वरूप क्या है।

हममें से कितने लोग जान पाए, यह तत्त्व आत्मसात कर पाए कि हमारे गुरु स्वयं ईश्वर रूप हैं। कहते तो हम रहे, गीत भी हम लिखते एवं गाते रहे, फिर हमारे अंदर अवतारी सत्ता के सहचर होने के गुण क्यों नहीं आ सके, संभवतः इसलिए कि हम ही संशय से भरे थे। न अपने को जान पाए न अपने गुरु को। जो जान पाए, वे तर गए, तर रहे हैं व तर जाएँगे। हमारा स्वयं का अहं बार-बार बाधक बन जाता है एवं कर्तृत्व का श्रेय लेने हेतु आतुर हो जाता है। सम्मान थोड़ा-सा भी हमें नहीं पच पाता एवं वह अजीर्ण हमारे व्यवहार-वाणी में निकलता रहता है। अवतारवाद के मर्म को समझकर हम अपनी गुरुनिष्ठा को ही नहीं मजबूत करते, वस्तुतः अपनी मुक्ति का, लोभ-मोह-अहं के बंधनों से मुक्ति पाने का, त्याग में प्रतिष्ठित हो इसी जीवन में जीवन्मुक्त बनने का पथ ही तो प्रशस्त करते हैं। इसीलिए बड़ा जरूरी है चौथे अध्याय का अवतारवाद का यह ककहरा।

श्रीरामकृष्ण देव ने कहा है, “जब अवतार आते हैं, तो सैकड़ों व्यक्तियों को अपने आश्रय से तारने के लिए आते हैं। रेल का इंजन खुद चलता है और भारी-भारी माल से लदी गाड़ियों को भी खींच लेता है। अवतार भी इसी प्रकार हजारों मनुष्यों को ईश्वर के पास ले जाते हैं। अवतार को सब लोग नहीं पहचान पाते। देह धारण करने से रोग, क्लेश, क्षुधा और तृष्णा लगी रहती है। लगता है, वे भी हमारे ही समान हैं। राम सीता के शोक में रोए थे। वे तो नर-लीला करते हैं। मनुष्य रूप में स्वयं अवतीर्ण होते हैं, किंतु उन्हें जानने के लिए उनसे प्रेम करना जरूरी है। उन्हें पहचानने के लिए साधना करना जरूरी है। उनकी कृपा मिल गई, तो फिर कुछ भी नहीं चाहिए।”

साधारणतया प्रारब्धवश ही मनुष्य का जन्म होता है। क्या श्री भगवान् का ऐसा कोई प्रारब्ध था, जिस कारण उन्हें अपनी महिमा से च्युत होकर साधारण मानव के रूप में जन्म लेना पड़ रहा है। इस शंका के समाधान हेतु ही भगवान् ने अर्जुन व इसके माध्यम से हम सबको अपना स्वरूप दिखाने हेतु यह संदेश कहा है। थोड़ा-सा इस संबंध में भगवान् ने अर्जुन को भूमिका रूप में तब कहा था, जब उन्होंने कर्म करते हुए भी कर्मों से न बँधने के प्रसंग में अपना दिव्य दृष्टांत तीसरे अध्याय में सामने रखा था।

न में पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥ 3/22

“मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्त्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म करने में ही विश्वास करता हूँ।”

वहाँ मात्र एक झलक रखी थी अपने दिव्य अवतारी स्वरूप की। पर अब वे अपने आपको स्पष्ट शब्दों में अवतार घोषित करते हैं।

पुनर्जन्म की बात भी अनायास ही भगवान् कह जाते हैं। पुनर्जन्म की प्रारंभिक सभी खोजें भारतवर्ष में हुईं। बाद में पश्चिम में भी जिज्ञासा जगी एवं ढेरों प्रमाण उन्हें मिलने लगे, उस मुस्लिम व ईसाई धर्म में भी, जहाँ पुनर्जन्म की मान्यता ही नहीं है। जातक कथाओं में ऐसे उदाहरण काफी मिलते हैं। इनके अनुसार अंतिम अवतार भगवान् का महात्मा बुद्ध के रूप में हुआ था। अवतारी चेतना किस तरह से बारंबार आती है, उसका नमूना हैं ये कथाएँ। एक कथा परमपूज्य गुरुदेव अक्सर सुनाया करते थे। यह घटना भगवान् बुद्ध के सिद्धार्थ से बुद्ध बनने की प्रक्रिया के दौरान घटी व संबंधित है एक अनाम ऐसी लड़की से, जिसे भगवान् ने उसके उत्तर जन्म में अहसास कराया कि वह कौन है एवं वे कौन हैं।

यह एक तथ्य है कि भगवत्सत्ता के अंशरूप में जन्मे महापुरुष भी मुमुक्षत्व प्राप्त करने के लिए कई जन्मों तक तप करते हैं, तब कहीं भगवान् की सत्ता उनमें अवतरित होती है। सिद्धार्थ के रूप में जन्म लेने से पूर्व सत्य की खोज, निर्वाण-प्राप्ति के उपाय की दिशा में महात्मा बुद्ध का तप चल रहा था। उस तपश्चर्या के दौरान जंगल में एक लड़की उन्हें भोजन दे जाती थी। पूछती कि आप क्यों कठोर तप कर रहे हैं? भगवान् कहते, निर्वाण की प्राप्ति के उपाय खोजने एवं जन-जन को बताने के लिए। लड़की कहती, आपको भूख नहीं लगती? यह तो हम आपको कंद-मूल दे जाते हैं, तो आप खा लेते हैं। यह निर्वाण है क्या, जिसके लिए आप तप कर रहे हैं। भगवान् बोले, “जिस दिन मिल जाएगा, सबसे पहले तुझे ही बताएँगे। तूने हमारी बड़ी सेवा की है।” लड़की हँसकर चली जाती। सिद्धार्थ पुनः जन्मे, तप किया एवं आत्मबोध प्राप्त किया, निर्वाण प्राप्ति का उपाय उन्हें दिखाई देने लगा। उधर वह लड़की भी फिर जन्मी, पर न उसे विगत जन्म की स्मृति थी, न यह मालूम कि यह बुद्ध कौन हैं?

भगवान् बुद्ध का प्रथम उपदेश होना था। पाँच ब्राह्मण पहले उनके शिष्य बने थे। उनमें पहले थे काश्यप। प्रसेनजित, बिंबसार भी उनसे जुड़ चुके थे। काश्यप से वे बोले, “मैं पहला अपना प्रवचन करूंगा।” सभी के मन में जिज्ञासा थी कि कहाँ पहला उपदेश देंगे प्रभु। बिंबसार के यहाँ प्रसेनजित के यहाँ या कहीं और। भगवान् बोले “कहीं नहीं! मैं पंचशाला गाँव में रहने वाली एक कुम्हार की लड़की को पहला प्रवचन दूँगा। मुझे मेरे पिछले जन्मों की स्मृति है। मेरा वायदा है उस लड़की से। पहला प्रवचन उसी को सुनाया जाएगा। फिर और लोग सुनेंगे।” जिज्ञासु शिष्यगण देखने गए कि कौन-सी लड़की है वह? पंचशाला गाँव में एक लड़की बारह वर्ष की कुम्हार के घर दिए बना रही थी, मिट्टी कूट रही थी। उसे कहा गया कि स्वामी जी प्रवचन हेतु बुला रहे हैं। वह बोली, ‘मैं’ नहीं जानती उन्हें। मुझे मिट्टी कूटनी है, ढेरों काम करने हैं। भगवान् बोले, हम इंतजार कर लेंगे। वह आएगी जरूर। तीन दिन तक प्रतीक्षा चलती रही। जब लोगों ने कहा कि वह नहीं आ रही, तो भगवान् बोले कि फिर मैं ही पहुँच जाता हूँ। भगवान् पहुँचे तो लड़की बोली, पहले आप हमारा काम करा दें, फिर हम आप जो भी कहेंगे, वह सुन लेंगे। पहले हमारे साथ मिट्टी कूट दें। दिनभर बुद्ध ने उस लड़की के साथ मिट्टी कूटी। लड़की ने कहा, आपने हमारा इतना काम किया तो हम भी आपके प्रवचन में बैठ जाएँगे। हमें कुछ आता-जाता नहीं है, पर हम सुन लेंगे। प्रवचन में भगवान बुद्ध ने वह रहस्य खोला कि इसी लड़की ने हमारी सेवा की थी पूर्व जन्म में। हमने निर्वाण का पहला उपदेश इसे सुनाने का वायदा किया था, इसलिए हम इसे ही सुना रहे हैं। आप सभी उसके साथ हैं, अतः लाभ आपको भी मिल रहा है। लड़की वह सब सुनने के बाद देवत्व को प्राप्त हो गई। उसके जीवन की दिशा बदल गई व शीघ्र ही उसने भी आत्मबोध को प्राप्त किया।

यहाँ जो मर्म की बात है, वह है भगवान् का कथन कि “मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, उनको तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। ( तानि अहं वेद सर्वाणि )।” यह हमें समझ में आ जाए, तो हमें अहसास होगा कि कैसे हमें खोजते-खोजते हमारे सद्गुरु-हमारे ईश्वर हम तक पहुँच गए। परमपूज्य गुरुदेव का एक प्रवचन है, जिसमें उन्होंने कहा, “मुझे मालूम है, मुझसे जुड़ी श्रेष्ठ आत्माएँ कहाँ-कहाँ हैं? मैं उन्हें चुन-चुनकर एकत्र कर रहा हूँ, ताकि एक लड़ियों का हार बना सकूँ।” गायत्री परिवार उसी का नाम है। पूज्यवर ने कहा है, “यदि सन् 2000 के अंत तक तुमने मेरा साथ दिया, तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ, तुम्हें पार कर दूँगा। भवबंधनों से भरे महासागर में से तुम्हारी नौका सकुशल खींचकर निकाल ले जाऊँगा। शर्त एक ही है कि बिना किसी माँग, अपेक्षा, यश की कामना के तुम मेरा काम करो। मेरे विचारों का विस्तार करो।”

परमपूज्य गुरुदेव के जीवन से जुड़ा एक संस्मरण बड़ा मर्मस्पर्शी है। गायत्री तपोभूमि की स्थापना के समय 2400 तीर्थों की जल-रज की स्थापना वहाँ होनी थी। पूज्यवर के एक प्रियभक्त जो मरण तक यहीं शाँतिकुँज में रहे, श्री बद्रीप्रसाद पहाड़िया थे। उनके पास पूज्यवर की लिखी 1945-46 के जमाने की चिट्ठियाँ हैं। इससे ज्ञात होता है कि वे कितने पुराने समय से जुड़े थे। पूज्यवर ने उन्हें लिखा कि तुम्हारा बाँदा जिले के अमुक गाँव में 11 वर्ष की एक लड़की है। वह पूर्व जन्म की एक देवी है, सिद्ध है। बिना उसे इसके माता-पिता को बताए तुम उसके गाँव का जल ले आओ। पहाड़िया जी किसी तरह ले आए। उस जल को भी अन्यान्य रहस्यमय स्रोतों से आए पावन प्रतीकों के साथ वहाँ रखा गया। जो महात्मा बुद्ध के जीवन में घटा, लगभग वैसा ही पूज्यवर के साथ। यही महापुरुषों की लीला है।

भगवान् पाँचवे के साथ ही अगले श्लोक में कहते हैं,

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया॥ 4/6

“मैं जन्मरहित, अविनाशी, सभी प्राणियों का नियामक ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर अपनी योग माया से प्रकट होता हूँ।”

भगवान् के इस योगमाला वाले रूप से आवरण हटने के बाद उन्हें पहचानना बड़ा जरूरी है। जैसा कि हम पूर्व में कह चुके हैं कि भगवान् राम के समय ही ऋषिगण नहीं जानते थे कि वे भगवान् हैं। रामकृष्ण परमहंस कहते हैं, ऋषियों ने रामचंद्रजी से कहा, हम जानते हैं कि तुम दशरथ के लड़के हो। भारद्वाज ऋषि भले ही तुम्हारी अवतार रूप से पूजा करें, पर हम लोग तो अखंड सच्चिदानंद को चाहते हैं। इस बात को सुनकर रामचंद्रजी हँसकर चले गए। ठाकुर कहते हैं, “ऋषि लोग ज्ञानी थे, इस कारण वे अखंड सच्चिदानंद को चाहते थे। भक्त लोग तो भक्ति का स्वाद लेने के लिए अवतार को ही चाहते हैं।” श्रीरामकृष्ण के वचनों से अवतार तत्त्व बड़ी सुगमता से समझ में आ जाता है।

भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि जो कुछ भी उत्पन्न होता है, उसका कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है, किंतु वे तो अजन्मे हैं, साथ ही अव्ययात्मा (अविनश्वर स्वरूप) भी हैं। शुद्ध चैतन्य भाव से भरे-पूरे हैं। चैतन्य में न कभी विकार आता है, न परिवर्तन आता है। तो फिर वे प्रकट कैसे होते हैं? भगवान् कहते हैं, अपनी अंतर्निहित माया द्वारा। भगवान् अपनी इस माया के स्वामी हैं, अतः वे अवतरित हो जाते हैं। हम जीव अपनी उस माया-वासना समुच्चय के अधीन जीवन जीते हैं, यही हममें व उनमें अंतर है। भगवान् के अवतरण का हेतु, अवतार का प्रयोजन तथा उनके दिव्य जन्म-कर्म के बारे में चर्चा अगले अंक में करेंगे।

(क्रमशः)


गुरु कथामृत-18 - जीवन-साधना का प्रखर मार्गदर्शन देते ये पत्र

इतना विराट् गायत्री परिवार, ऐसे विराट् आयोजन एवं अपरिमित संभावनाओं से भरे इस मिशन के इतिहास को जब कभी भी सुव्यवस्थित ढंग से लिखा जाएगा, तो लोग जानेंगे कि किस पौधशाला से निकलकर यह वटवृक्ष विकसित हुआ है। वस्तुतः तप-साधना ही वह पूँजी है, जिससे जन-जन को जोड़कर परमपूज्य गुरुदेव ने इतनी बड़ी संस्था खड़ी कर दी। जिस मिशन की जड़ें तप की पूँजी से सिंचित होती रही हों, उसके तो और भी विस्तृत होने, सारे विश्व में छा जाने के विषय में किसी को कोई शंका भी नहीं होना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव के पन्नों से ज्ञात होता है कि कैसे छोटी-छोटी आशंकाओं का समाधान कर, सतत प्रेरणा देते रहे एवं छोटी-छोटी भ्राँतियों का निवारण कर उन्होंने जीवन-साधना के पथ पर लाखों व्यक्तियों को अग्रगामी बना दिया। पत्रों के महासागर में से कुछ पत्र पाठक-परिजनों के लिए यहाँ हम बानगी रूप में दे रहे हैं।

मन नहीं लगना हर साधक की एक सामान्य शिकायत रहती है। ऐसे में उनका मार्गदर्शन मिल जाए, तो फिर क्या है। 7-6-51 को श्री रामस्वरूप चाचौदिया (राठ, जिला हमीरपुर) को लिखे एक पत्र में पूज्यवर निर्देश देते हैं-

“आपका मन अस्थिर रहता है। इसके लिए सुविधानुसार कुछ उपवास और मौन का अभ्यास किया करें, उससे चित्त स्थिर रहने लगेगा। 14 जून को गायत्री जयंती के दिन भी व्रत-उपवास कर लें। निरंतर श्रद्धापूर्वक जप करते रहने से सभी आध्यात्मिक कठिनाइयों का हल हो जाता है।”

श्री चाचौदिया जी को मार्गदर्शन मिला। प्रगति के उच्च सोपानों पर चढ़े। वे परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आरंभ किए गए एक विराट् साधना अभियान में जुट गए। मार्गदर्शन की फिर भी आवश्यकता थी। उन्हें दूसरा पत्र 8-12-1951 को लिखा गया।

“हमारे आत्मस्वरूप,

आपका पत्र मिला। यह जानकर प्रसन्नता हुई कि आप सहस्राँशु यज्ञ में शामिल हो गए हैं। यह इस युग का अभूतपूर्व यज्ञ है। इसमें सम्मिलित होने से आपकी आत्मा को परम शाँति प्राप्त होगी।

गायत्री मंदिर के लिए हर व्यक्ति अपना-अपना कर्त्तव्य पालन करे। अपना दान ही दूसरों पर प्रभाव डालने का सबसे अच्छा तरीका है।

आप मंगल को ही उपवास करते रहें। सप्ताह में एक दिन उपवास होना चाहिए। जब बाहर जाया करें तब मानसिक ध्यान द्वारा माता का पूजन कर लिया करें। जप के समय अगरबत्ती या दीपक कोई भी एक वस्तु जलाई जा सकती है।”

देखने में सामान्य पत्र ही लगता है। किसी भी दिन उपवास करें, क्या फर्क पड़ता है, पर पूज्यवर ने देखा होगा कि आग्रह मंगलवार का ही है। बाहर जाते हैं, तो माला नहीं हो पाती, मन दुःखी रहता है। अतः उपचार दे दिया कि मानसिक जप कर लिया करो। जप के साथ दीपक जले या अगरबत्ती, कुछ भी फर्क नहीं पड़ता, पर साधक को निर्देश दिए, ताकि वे व्रतशील हो साधक बन सकें।

यही छोटे-छोटे टोटके लोगों की जीवन-साधन के अंग बन गए एवं क्रमशः उन्हें स्तरीय साधक बनाते चले गए। हम गायत्री साधना करते हैं, तो विवाह के बंधन में क्यों बँधें, हमारा क्या होगा, ऐसी कई आशंकाएँ किसी के भी मन में आ सकती हैं। श्री देवव्रत प्रसाद श्रीवास्तव जी (मुजफ्फरपुर), जो उन दिनों जी.जी.बी. कॉलेज में पढ़ रहे थे, के मन में भी कुछ ऐसी ही बातें थीं। उन्हें उत्तर मिला-

“आप माता का आँचल श्रद्धापूर्वक पकड़े रहें। आपकी सब कठिनाइयों को माता हल करती चलेंगी। विवाह हो जाने में कुछ हर्ज नहीं। वह तो होना ही है। आप प्रसन्नतापूर्वक कर लें। जीविका के बारे में भी चिंता की कोई बात नहीं। भगवान् सबकी व्यवस्था करते हैं, वे आपकी भी करते हैं।”

“व्यावहारिक क्षेत्र में आप निराशा एवं आशंका के साथ नहीं, प्रसन्नता के साथ प्रवेश करें। माता की सहायता आपको आड़े वक्त पर सदा काम आती रहेगी। अखण्ड ज्योति आप पढ़ते ही रहते होंगे। उसे अपने अन्य मित्रों को भी पढ़ाया करें।”

इसी उपर्युक्त निर्देश की तरह एक और पत्र का अवलोकन करें, जो 17-10-52 को श्री बिहारीलाल दुबे (बिलासपुर) को लिखा गया था।

“हमारे आत्मस्वरूप,

आपका पत्र मिला। आप गायत्री प्रचार के लिए जो प्रयत्न करते हैं, वह एक उच्च कोटि के यज्ञ से किसी भी प्रकार कम नहीं है। आपकी नवरात्रि साधना सानंद संपन्न हुई, यह बड़े आनंद की बात है। तप ही मनुष्य जीवन की सच्ची संपत्ति है। उस मार्ग पर चलते रहने से आपको आशाजनक शाँति मिलेगी।”

कई व्यक्ति भावुकतावश गुरु की काया को, स्थूल शरीर को ही सब कुछ मान बैठते हैं। गुरु ब्रह्मा है, विष्णु है, महेश है, पर पूज्यनीय उसके विचार हैं। कई के मन में आता है, हमें गुरुदेव के दर्शन होते, हम भी उनके पैर दबा पाते, हम भी उनकी कुछ सेवा कर पाते। ऐसी परिस्थितियों में साधक का मार्गदर्शन हमारी गुरुसत्ता करती है, जब वे श्री बैजनाथ जी सौनकिया (दिगौड़ा, टीकमगढ़ म.प्र.) को 2-3-63 को लिखते हैं।

“हमारा शरीर नहीं, अंतःकरण ही श्रद्धा के योग्य हे। आप हमारी भावनाओं को सुविस्तृत करके हमारी सच्ची सहायता और प्रसन्नता का माध्यम बनते हैं।

आपके ब्राह्मण शरीर से जीवनभर ऋषिकर्म ही होते रहेंगे और आप पूर्णता का लक्ष्य इसी जन्म में प्राप्त करेंगे, ऐसा विश्वास है। उस क्षेत्र में आप अपने संकल्प द्वारा प्रकाशवान् सूर्य की तरह चमकेंगे और बहुत जनकल्याण करेंगे, ऐसा विश्वास है।”

कितना स्पष्ट निर्देश है एक युगद्रष्टा गुरु द्वारा एवं किसी भी शिष्य के लिए करने योग्य कर्त्तव्य है। कभी-कभी कुछ विशिष्ट मार्गदर्शन भी साधकों को मिला करता था। जैसी-जैसी पात्रता होती, वैसा ही उपचार उसे बताया जाता। साधना में महत् सत्ता के साथ साझेदारी पात्रता का विकास किए बिना संभव है भी नहीं। आगर (मालवा, म.प्र.) के श्री नंदकिशोर शर्मा को 17-4-63 को लिखे एक पत्र पर दृष्टि डालें। “हमारे आत्मस्वरूप,

पत्र मिला। आप पिछले पत्र में बताई गई विधि से रविवार की उपासना आरंभ कर दें। दृश्य क्या दीखेंगे, ऐसा न सोचें।

आप हमारी आत्मा से अपनी आत्मा को सटाकर हमारी गरमी और रोशनी अपनी आत्मा में प्रवेश करती हुई ध्यान किया करें। अपने शरीर को हमारे शरीर से सटा हुआ उसी प्रकार ध्यान करें जैसे राम-भरत परस्पर मिले थे। भरत मिलाप का दृश्य ध्यान में रख सकते हैं।”

कितनी सुँदर उपमा के साथ समझाया गया है। तादात्म्य, तद्रूपता, विसर्जन, विलय की इससे अच्छी और क्या व्याख्या हो सकती है। किसी भी साधक के लिए उपासना संबंधी मार्गदर्शन है, ध्यान कैसे किया जाए, यह बताया गया है।

थोड़ा उच्चस्तरीय साधना संबंधी मार्गदर्शन की बात सोचें, तो मन में कुँडलिनी योग, हठयोग आदि के विषय में जिज्ञासा आने लगती है। हर कोई चाहता है कि उसकी कुँडली वैसी ही जग जाए, जैसी कि कभी नरेंद्रनाथ की रामकृष्ण परमहंस ने जगाई थी। परंतु पूज्यवर का बड़ा स्पष्ट चिंतन इस विषय में है। वे 21-2-54 को श्री रामदास (कानपुर) को लिखते हैं।

“हठयोग एवं विरक्ति प्रधान योग साधनाओं में कुँडलिनी, चक्रवेधन आदि का विधान है। गृहस्थ योग एवं कर्मयोग के पथिकों को उस मार्ग पर नहीं चलना पड़ता और वे राजा जनक की तरह आवश्यक कार्य करते हुए भी उच्च आध्यात्मिक मनोभूमि में पहुँचकर लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं। जिन साधनाओं की आप चर्चा किया करते हैं, वह आपकी शारीरिक एवं साँसारिक स्थिति के लिए अनुकूल नहीं है। आप अन्य सरल साधनाओं के द्वारा ही लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे। शबरी, निषाद, रैदास आदि अनेक साधारण स्थिति के साधक बिना विशिष्ट योग साधनाओं के उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके थे। आप भी वैसा ही कर सकेंगे। गृहस्थ त्यागने की, नौकरी छोड़ने की आपको आवश्यकता न पड़ेगी। कोई चमत्कारिक अनुभव आपको भले ही न हों, पर आप गृहस्थ योग की भूमिका को ठीक प्रकार पालन करते हुए योगी और यतियों की गति को प्राप्त कर लेंगे। आप इस संबंध में पूर्ण निश्चिंत रहें और सब सोचना-विचारना हमारे ऊपर छोड़ दें।”

पाठकों के लिए इस अंक में साधना संबंधी प्रारंभिक से उच्चतम स्थिति का मार्गदर्शन है। तरह-तरह के चोंचले खड़े करने के बजाय मन तल्लीन-तन्मय हो जीवन-साधना में निखार आता रहे, वही ध्यान सर्वाधिक सफल है, यह निष्कर्ष पूज्यवर के लिखे पत्रों से मिलता है। हमने अपने अध्यात्म को हौआ बना लिया है अथवा उसका बड़ा ही जटिल विकृत स्वरूप हमारे मन में है। अध्यात्म जीवन जीने की कला सिखाता है। अगर मर्म समझ में आ जाए तो व्यक्तित्व का परिष्कार, गुणों में अभिवृद्धि एवं दृष्टिकोण पर छाए कुहासे मिटने की प्रक्रिया संपन्न होने लगती है। यही वह कुँजी है, जो हमें अपनी गुरुसत्ता के चिंतन से जोड़कर हमारी आध्यात्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यदि इन पत्रों से कुछ प्रतिशत परिजन भी सच्चा मार्गदर्शन पा सकें, तो यह परिश्रम हम सफल मानेंगे।


अपनों से अपनी बात-1 - विराट् महाकुँभ छोड़ गया अमिट स्मृतियाँ

विगत अंक में परिजन-पाठक उन पूर्व तैयारियों के विषय में पढ़ चुके हैं, जिनकी परिणतिस्वरूप एक विराट् महापूर्णाहुति आयोजन सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के रूप में भारत की आध्यात्मिक राजधानी कुँभनगरी हरिद्वार में संपन्न हुआ। 6 से 11 नवंबर तक संपन्न हुए इस महापुरुषार्थ का पूरा विवरण तो परिजन प्रज्ञा अभियान पाक्षिक में भी पढ़ सकते हैं, पर ‘अखण्ड ज्योति’ के पाठकों के लिए चार रंगीन पृष्ठों सहित शेष सारा विवरण इस अंक में दिया जा रहा है।

पूर्व तैयारी संबंधी कुछ झलकियाँ

सुरुचि एवं सौंदर्य अध्यात्म की परिधि में आता है। इसके जुड़ जाने से जड़ प्रकृति में भी एक अनुपम शोभा दृष्टिगोचर होने लगती है। महापूर्णाहुति नगर की सबसे महत्त्वपूर्ण विलक्षणता थी, चाहे वे आवास हों अथवा कार्यालय, प्रदर्शनी अथवा चिकित्सालय, सभी को परिजन भाई-बहिनों ने गोबर से लीपकर रंगोलियों से, क्यारियों से, पौधों से सजाया था। मात्र सात दिन के लिए बने, प्रयोग में आने वाले इस नगर का सौंदर्य दर्शनीय था। ऐसा लगता था मानो देवशिल्पी विश्वकर्मा स्वयं कार्य करने धरती पर आ खड़े हुए हों।

कुल 30 नगर एवं पंद्रह भोजनालयों का निर्माण किया गया था। प्रभारी अभियंताओं ने बनाते समय ध्यान रखा था कि मुख्य पहुँच मार्ग कम-से-कम सत्तर फीट चौड़ा हो एवं सभी रास्ते सीधे हों। ऐसी व्यवस्था रखी गई थी कि फायर बिग्रेड की गाड़ी हर टेंट तक पहुँच सके। ठेकेदारों के लगाए टेंटों में सुविधा, सुव्यवस्था स्वयंसेवकों के कौशल से जुड़ गई।

रेलगाड़ी के टैंकरों के आकार के कैप्सूलनुमा पीपे (पौण्टून्स) जल के ऊपर (गंगा नदी की मुख्य जलधारा) तैराकर स्टीलतार के अठारह मोटे रस्सों से बाँधे गए थे। लगभग डेढ़ सौ मीटर के इस पुल को बनाने के लिए पच्चीस पौण्टून्स क्रेन के मानवी सहयोग से उतारे गए थे। 31 अक्टूबर को जिलाधिकारी श्री हरीशचंद्र जोशी द्वारा उसका उद्घाटन किया गया। इस पुल के बनने से लालजीवाला एवं गौरीशंकर द्वीप के बीच की दूरी बहुत कम हो गई। प्रातः 3 बजे से रात्रि 11 तक उस पुल पर सतत खचाखच लोग चलते रहे।

समूचे महापूर्णाहुति नगर में इस बार फ्लश वाले शौचालयों की व्यवस्था की गई थी। मोरबी के किरीट भाई ने इसके लिए निःशुल्क हजारों सीटें उपलब्ध कराईं। इसी आधार पर गंगानदी व पूरी तीर्थनगरी की पवित्रता संभव बनी।

पूरे महापूर्णाहुति नगर में एक बार में सभी स्थानों पर नियुक्त स्वयंसेवकों की संख्या प्रायः एक लाख थी। जब भी कोई कार्यक्रम में जाता, उसका स्थान लेने की प्रतिस्पर्द्धा-सी मच जाती। आवास, कार्यालयों, प्रदर्शनी, मल्टीमीडिया, लोककलामंच, चिकित्सालय, यज्ञशाला, संस्कारशाला, सभी नगरों, सभी भोजनालयों, पी.सी.ओ तथा प्रशासकीय कार्यालयों में मुस्तैदी से स्वयंसेवक ड्यूटी देते रहे।

सभी की एक ही अपेक्षा थी, चाहे वे तीर्थयात्रियों के जत्थे हों अथवा नगरवासी कि यह पवित्रता का वातावरण जो बना है, क्या किसी तरह स्थायी बना रह सकता है। यदि ऐसा हो सका, तो नवगठित राज्य उत्तराँचल जहाँ देवात्मा हिमालय स्थित है, एक नमूना सारे भारत के समक्ष बन सकेगा। चुनौती गायत्री परिजनों ने स्वीकार की है व इसका परीक्षण 2004 के अर्द्ध कुँभ में करने का निर्णय लिया है।

प्रसारण तंत्र की महती भूमिका

इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंटमीडिया दोनों ने ही इस महायज्ञ में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाचार पत्र तो विराट् विभूति ज्ञानयज्ञ (नई दिल्ली) से ही सारे भारतवर्ष में पूर्व तैयारियों का विवरण भेज रहे थे, साथ ही शाँतिकुँज की न्यूज फीचर सेवा ने भी ‘सृजन संदेश’ समाचार सेवा आरंभ कर दी थी, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी पीछे नहीं रहा। ‘आस्था चैनेल’ ने न केवल पूरे कार्यक्रम का लाइव कह्वरेज बैंकाक से किया, विराट् विभूति महायज्ञ की झलकियाँ तीन दिन पूर्व से ही दिखाना आरंभ कर दीं। आस्था चैनेल के द्वारा प्रसारण को कैबल टी.वी. ने हाथों-हाथ लिया एवं जहाँ-जहाँ जिन नगरों में यह उपलब्ध था, वहाँ सभी को जानने को मिला कि इतना विराट् आयोजन एक महान् उद्देश्य को लेकर हो रहा है। दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनेल डी.डी. 1, लखनऊ, बरेली व दिल्ली की प्रादेशिक सेवाओं, सी.बी.सी तथा जर्मन टी.वी. ने भी प्रसारण सेवा से जन-जन तक संदेश पहुँचाया। दिल्ली की ‘थर्ड आई कम्यूनिकेशन’ संस्था ने कार्यक्रम के पूर्व से ही आकर आठ बीटाकैम कैमरे सारे महायज्ञ नगर में कैबल्स की सेटिंग तथा मल्टीमीडिया सेंटर की स्थापना कर दी। प्रभाकर तिवारी एवं अतुल गुप्ता के नेतृत्व में आई टीम का मार्गदर्शन गजाधर भारद्वाज जी, सुभाष रंथ (‘मंथन’ के निर्देशक), संदीप श्रीवास्तव तथा दिव्येश व्यास, अभय श्रीवास्तव ने किया। शाँतिकुँज के कार्यकर्त्ताओं के युवा बालकों के दल ने अलग-अलग जोन्स का कार्य सँभालकर असंभव को भी संभव बना दिया। प्रतिदिन के कार्यक्रम की छह घंटे की एडीटिंग की हुई कैसेट दिल्ली होकर बैंकॉक जाती व दो दिन बाद उसे दो खंडों में डेढ़ सौ देशों में आस्था चैनेल द्वारा प्रसारित किया जाता। यह कार्य समर्पण भाव से जिस तरह संपन्न होता रहा, सभी ने उसे देखकर भूरि-भूरि सराहना की। इस परिश्रम का ही परिणाम है कि छह कैसेटों का एक महापूर्णाहुति वीडियो सेट उन सभी के लिए आज उपलब्ध है, जो किसी कारणवश कार्यक्रम देख नहीं पाए।

विराट् कलश यात्रा में भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति की झलक

कार्यक्रम का शुभारंभ 6 नवंबर को विराट् कलश यात्रा के लिए रखे ग्यारह हजार कलशों के संस्कारशाला (शाँतिकुँज के सामने सप्तर्षि क्षेत्र में) में पूजन से संपन्न हुआ। छह नवंबर की प्रातः से ही सारे नगरों के परिजनों का रुख शाँतिकुँज की ओर ही था। पीत वस्त्रधारी बहनों ने हजारों की संख्या में कलशों में जल भरा एवं निर्धारित समय से पूर्व ही यज्ञशाला (लालजीवाला) की ओर की अपनी पैदल यात्रा (प्रायः पंद्रह किलोमीटर लंबी) आरंभ कर दी। कलशधारी महिलाओं एवं प्रायः सत्तर झाँकियों के साथ चल रहे कार्यकर्त्ताओं का आठ किलोमीटर लंबा जुलूस अद्भुत था। चारों ओर से नारे गूँज रहे थे। बैंड भक्तिगीतों की वंदना गा रहे थे। सारा नगर इस दृश्य से अभिभूत था। शाँतिकुँज की ब्रह्मवादिनी कन्याओं द्वारा प्रस्तुत गीत के साथ ही प्रातः 8 बजे यात्रा आरंभ हो गई एवं हाथी, घोड़े, ऊँट, बैंड मिशन के विभिन्न कार्यक्रमों एवं भारत की विविधता में एकता एवं विराट्ता की झलक दिखाने वाली झांकियों, भजन मंडलियों, नृत्य करती विभिन्न क्षेत्रों की टोलियों के जत्थे चल पड़े।

दो भागों में बँटी इस विशाल कलश यात्रा में एक ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान भारत माता मंदिर की ओर से व दूसरा नीतिपास-बद्रीनाथ-दिल्ली राजमार्ग से चले जत्थे दूधाधारी मंदिर पर एक हो गए। यहाँ से खड़खड़ी, भीमगोड़, हर की पौड़ी, अपर मार्केट, देवपुरा, डैम कोठी, बाईपास मार्ग से लौटकर गंगा के किनारे-किनारे चलकर चार पटा पुलों द्वारा इस यात्रा ने ठीक ढाई बजे अपराह्न यज्ञशाला में प्रवेश किया। लगभग पाँच सौ वाहन इसमें थे तथा पूरी यात्रा के सुसंचालन हेतु लगभग डेढ़ हजार स्वयंसेवक जुटे थे। पचास मोबाइल फोनों की सेवाओं ने यात्रा को सुव्यवस्थित बनाए रखा। श्री श्याम बिहारी दुबे के मार्गदर्शन में सारे स्वयंसेवकों ने अद्भुत अनुशासन का प्रदर्शन किया। कलश यात्रा के दोनों ओर साथ चल रही बहनों-भाइयों-झाँकियों पर रास्ते भर पुष्पवर्षा गायत्री परिजनों तथा नगरवासियों द्वारा होती रही।

इस कलश यात्रा में पहली बार पूज्यवर द्वारा प्रज्वलित, परमवंदनीया माताजी द्वारा संरक्षित अखण्ड दीपक भी यात्रा की अगवानी करता साथ चला। लोककला मंच के कलाकार भी कलश यात्रा में अपने क्षेत्र की संस्कृति का दिग्दर्शन कराते साथ चल रहे थे। स्थान-स्थान पर नगरवासी जल-शरबत, मूँगफली, मिश्री, फलों के थाल लिए खड़े थे एवं देवसत्ताओं के प्रतीक रूपी कलशयात्रियों को देते चले जा रहे थे। प्रवासी भारतीयों का जत्था भी अपने बैनर्स लिए साथ चल रहा था। लगभग तीन बजे यज्ञशाला में पहुँचने पर भावभरे गीतों एवं ऋषिसत्ता के संदेशवाहकों द्वारा दिए गए पावन संदेशों ने शीतलता व प्रेरणा दी तथा फिर कलशों की आरती उतारकर प्रसाद वितरण कर इस यात्रा का विसर्जन कर दिया गया।

नवयुगदर्शन प्रदर्शनी, चिकित्सा नगर एवं लोककला मंच

छह नवंबर संध्या को ही लगभग 36000 वर्ग फीट क्षेत्र में फैली चार भागों में बँटी प्रदर्शनी, सत्तर बिस्तरों व आधुनिक उपकरणों सहित पचास चिकित्सकों से युक्त चिकित्सा नगर एवं टूरिस्ट बैंगलो के पास बने विराट् लोककला मंच का उद्घाटन संस्था प्रमुख शैलबाला पण्ड्या द्वारा दीप-प्रज्वलन कर किया गया। इसके साथ ही यह सेवाएँ सबके लिए खोल दी गईं।

नवयुगदर्शन प्रदर्शनी का निर्माण मात्र एक महीने की अल्प अवधि में गंगाधर के समानाँतर हर की पौड़ी के सामने रोड़ी बेलवाला में पैंसठ शिल्पियों, मूर्तिकारों, चित्रकारों सहित उनके तीन सौ सहयोगियों द्वारा किया गया था। इस कार्य में श्री गंगाधर चौधरी एवं सुधीर भारद्वाज के मार्गदर्शन में सभी भाई-बहन जुटे हुए थे। चौबीस पंखुड़ी वाले कमल से युक्त देवसंस्कृति फव्वारा, विराट् मशाल, महाकाल की घूमती प्रतिमा, चरक ऋषि के आश्रम के साथ नवग्रह वाटिका, विभिन्न मूर्तियों के माध्यम से गुरुसत्ता का जीवनदर्शन, अवतारों की परंपरा, ऋषि परंपरा सभी कुछ इतना मनमोहक था कि उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। सप्तक्राँतियों के जीवन स्वरूप को प्रदर्शनी में लोगों ने देखा व प्रेरणा ली। सारे परिसर में विशाल होर्डिंग्स जगह-जगह लगे थे। इन्हें श्री बाबू भाई सतवारा (मुँबई) एवं संजय पटेल के समर्पित साथियों तथा राजस्थान के श्री महेन्द्र सिंह आदि ने तैयार किया था। इसके साथ ही आयुर्वेद का दिग्दर्शन कराती एक भव्य प्रदर्शनी भी उसी दिन आरंभ हुई। साथ ही ग्रामोत्थान-ग्रामतीर्थ निर्माण, गौ संवर्द्धन आँदोलन पर आधारित प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया गया। शाँतिकुँज के रचनात्मक प्रकोष्ठ की बहनों ने श्री अगमवीर सिंह जी एवं के सी त्यागी के मार्गदर्शन में इसे तैयार किया था। आयुर्वेद प्रदर्शनी डॉ. रामप्रकाश पाण्डेय के मार्गदर्शन में ऋषिकुल-गुरुकुल के समर्पित छात्र-छात्राओं द्वारा बनाई गई थी। एक आदर्श ग्राम का मॉडल भी बनाया गया था।

लोककला मंच का शुभारंभ कलश यात्रा वाले दि नहीं अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाकार पं. श्याम दास मित्र के द्वारा सरस्वती वंदना एवं मैहर के संगीतज्ञ समूहों द्वारा वादन से हुआ। इसके बाद 10 नवंबर संध्या तक 2 से 4 अपराह्न एवं 8 से 11 सायं यह मंच सतत चलता रहा। सभी नगरों के परिजनों ने अपनी-अपनी सुविधानुसार भारत के सभी कोनों से आए कलाकारों की प्रतिभा को देखा-सराहा। लोकरंजन से लोकमंगल के अद्भुत इस प्रेरक प्रयोग की सभी ने प्रशंसा की। महेंद्र शर्मा जी के नेतृत्व में उमाकाँत व शशिकाँत सिंह तथा डॉ. रमन ने यहाँ की व्यवस्था सँभाली।

देवपूजन का विशिष्ट दिन-विशिष्ट प्रयोग

1501 कुँडी यज्ञशाला में 7 नवंबर को प्रातः 7 से सायं 4 तक देवपूजन का क्रम चला। इसका प्रसारण पूरे यज्ञनगर में एवं सिटी कैबल द्वारा पूरे हरिद्वार नगर में हुआ। साथ ही संस्कारशाला में भी यह क्रम चलता रहा। सौत्रामणी प्रयोग के साथ यह पूजन क्रम संपन्न हुआ। सौत्रामणी स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन, सभ्य समाज के निर्माण के संकल्प का दिग्दर्शन कराने वाली एक वैदिक प्रक्रिया है। इसमें स्वस्थ शरीर हेतु अश्विनीकुमार, स्वच्छ मन हेतु कला की देवी सरस्वती तथा सभ्य समाज हेतु देवराज इंद्र को विशिष्ट आहुतियाँ दी जाती हैं। साथ ही पुरुषमेध के अधिष्ठाता देवता सविता देवता का विशेष पूजन भी संपन्न होता है।

ये सारे क्रम देवपूजन के क्रम में संपन्न किए गए। संस्था प्रमुख एवं गुरुसत्ता की प्रतिनिधि के रूप में श्रीमती शैलबाला पण्ड्या ने बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति के विधिवत् आरंभ होने की घोषणा की। विश्वकुँडलिनी जागरण द्वारा मानवी चेतना के विकास को समर्पित यह संकल्प सभी ने सुना। डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं वीरेश्वर जी उपाध्याय ने इस महायज्ञ की महती भूमिका पर प्रकाश डाला। अग्नि आह्वान जब सूर्यकाँत मणि के माध्यम से सविता-देवता की किरणों से मनीषी पं. श्री वीरेश्वर जी उपाध्याय द्वारा किया गया, सारा वातावरण दिव्यता से भर गया। सौत्रामणी प्रयोग में गोदावरी नामक गाय एवं उसकी बछिया को मुख्य देवमार्ग से डॉ. प्रणव पण्ड्या, शैलजीजी देवपथ पर चलाकर लाए एवं ठीक मंच के सामने गौदुग्ध का दोहन किया, तो सारा वातावरण भाव-तरंगों से भर गया। यही दुग्ध फिर तीन देवसत्ताओं को समर्पित किया गया। इसी गौ माता को बाद में शुक्रताल के वीतराग स्वामी कल्याणदेव जी की गौशाला में गौ-वत्स दक्षिणाक्रम के अंतर्गत दान दे दिया गया।


VigyapanSuchana

सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ का पूरा विस्तृत विवरण प्रज्ञा अभियान पाक्षिक के बीस पृष्ठ के विशेषाँक (1-12-2000) तथा ‘महापूर्णाहुति’ नामक स्मारिका में प्रकाशित हुआ है। इस एवं विगत अंक में तो मात्र कुछ झलकियाँ ही दी गई हैं। जिन्हें विस्तार से पढ़ना हो, वे स्मारिका (विमोचन 29-1-2001 वसंत पंचमी के दिन) सुरक्षित करा लें। बिना पोस्टेज के मूल्य है पच्चीस रुपया।

पूरा पूजनक्रम आश्वमेधिक ढंग से चला। देवमंच पर प्रथम दिन का पूरा यज्ञ विशिष्ट आहुतियों के साथ डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं शैलजीजी द्वारा किया गया। बाद में इसी अग्नि को 1501 कुँडों में विधिवत् विस्तार दे दिया गया, जिनमें अगले चार दिनों तक यज्ञ संपन्न हुआ।

ज्ञानमंच, दीपयज्ञ, विचारमंच

देवपूजन वाले दिन से ही ज्ञानमंच से उद्बोधन एवं प्रतिदिन दीपयज्ञ का क्रम आरंभ हो गया, साथ ही रोड़ी बेलवाला में बने विचारमंच का भी उद्घाटन देवपूजन के तुरंत बाद परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के मुनि श्री चिदानंद सरस्वती द्वारा दीप प्रज्वलन एवं श्रीमती अनीता स्नातिका द्वारा वेदवाणी-सरस्वती वंदना द्वारा किया गया। विचार मंच का विशाल पंडाल एक ओर हर की पौड़ी तथा दूसरी ओर गंगा की पावन धारा के बीच बनाया। उद्घाटन उद्बोधन में मनीषी श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं कई चिंतक-विचारक उपस्थित थे। मुनि जी ने परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लगाए गए ज्ञानबीज का विस्तार देख अपनी हर्षाभिव्यक्ति प्रस्तुत की। कहा कि एक संत कैसे हजारों चलते-फिरते तीर्थ बना देता है, उसका नमूना है यह गायत्री परिवार। अगले दिन 8 नवंबर से 10 नवंबर सायं तक प्रातः 10 से 12 एवं अपराह्न 2 से 4 व कभी-कभी दिनभर यह विचारमंच सक्रिय रहा एवं विशिष्ट विभूतियाँ उसमें आती रहीं, अपने विचारों से खचाखच भरे विशाल सभागार को लाभान्वित करती रहीं।

विचारमंच पर वर्तमान संदर्भ में सामाजिक क्राँति के सशक्त आधार, आपदारहित विकास के आदर्श प्रारूप, शिक्षा एवं स्वावलंबन आँदोलन, नारी जागरण आँदोलन एवं सप्तसूत्री कार्यक्रम एवं समाज का पुनर्निर्माण जैसे विषयों पर विभिन्न वक्ताओं के उद्बोधन हुए। विशिष्ट वक्ताओं में डॉ. धर्मपाल (कुलपति गुरुकुल काँगड़ी), श्री जगदीशचंद्र पंत (पूर्व कृषि एवं स्वास्थ्य सचिव, ऋचा प्रमुख) श्री राजनाथ सिंह (मुख्यमंत्री उ.प्र.),श्री मुरली मनोहर जोशी (मानव संसाधन विकास मंत्री भारत सरकार), उ.प्र. के मंत्रीगण श्री धनराज यादव, वीरेंद्र सिंह आदि, भारत सरकार के मंत्रीगण रमेश बैस, डा. कंथेरिया, समन्वय परिवार के प्रमुख स्वामी श्री सत्यमित्रानंद जी महाराज, श्री देवेंद्र स्वरूप (चिंतक-विचारक-स्तंभकार), श्री भरत झुनझुनवाला, श्री चंद्रशेखर प्राण, डॉ. वी. कुमार आदि थे। इ समंच के संचालन में श्री वीरेश्वर जी उपाध्याय के साथ श्री कर्मयोगी जी, डॉ. एस.पी. मिश्र, श्री ए.एस. अवस्थी (रजिस्ट्रार, इंद्रप्रस्थ वि.वि.) आदि की विशिष्ट भूमिका रही। समय-समय पर विशिष्ट अतिथियों के साथ डॉ. प्रणव पण्ड्या भी पहुँचे व अपने विचार व्यक्त किए।

ज्ञानमंच पर प्रतिदिन सायं 5.30 से 8.30 तक 7,8,9,10 तारीखों में उद्बोधक मार्गदर्शन दिए गए एवं दीपयज्ञ का क्रम चलता रहा। यहाँ से डॉ. प्रणव पण्ड्या, श्रीमती शैलबाला पण्ड्या, गायत्री तपोभूमि के प्रमुख पंडित श्री लीलापत जी शर्मा एवं श्री वीरेश्वर उपाध्याय के ओजस्वी उद्बोधन प्रसारित हुए। सभी के उद्बोधनों की धुरी एक ही थी, घर-घर में गायत्री यज्ञ पहुँचे, महाकाल के विराट् रूप को सभी पहचानें, युग-परिवर्तन की पदचाप सुनें तथा सप्त आँदोलनों हेतु अपने संकल्प सक्रियता में बदलें। ज्ञानमंच की विशेषता जहाँ नौ नवंबर की संध्या पंडित लीलापत जी का ओजस्वी प्रायः डेढ़ घंटे चला उद्बोधन रहा, वहाँ आठ नवंबर की संध्या महामहिम पं. विष्णुकाँत शास्त्री (राज्यपाल उ.प्र.) का सारगर्भित प्रेरक व्याख्यान रहा। प्रतिदिन दीपयज्ञ भाइयों व ब्रह्मवादिनी बहनों की समन्वित टोलियों ने कराया। गंगा किनारे बने ज्ञानमंच पर प्रकाशित दीपकों, सुँदर क्यारियों में सजाए प्रज्वलित दीपों ने प्रतिदिन दीपोत्सव का सा दृश्य प्रस्तुत किया। प्रेरक युगगायन ने वातावरण को दिव्य बना दिया।

सृजन संकल्प सहित आहुतियाँ यज्ञशाला में

यज्ञाहुतियों का क्रम नियमित चला। हर पारी में पूर्णाहुति कराई गई। एक बार में प्रायः पच्चीस हजार से अधिक याजक यज्ञ संपन्न करते रहे। पुरुषमेध प्रयोग के अंतर्गत सविता देवता के निमित्त विशेष आहुतियाँ व्यष्टि पुरुष, राष्ट्र पुरुष तथा विराट् पुरुष हेतु भी दी गईं। सौत्रामणी के अंतर्गत त्रिदेवों के लिए आहुतियाँ तथा मौन ताँत्रिक आहुतियों के समय वातावरण ही विलक्षण होता था। एक पारी यज्ञ संसद के भाइयों द्वारा तथा दूसरी पारी ब्रह्मवादिनी बहनों द्वारा कराई जाती रही। यह क्रम चारों दिन चला। प्रायः तीस लाख से अधिक परिजन आहुतियाँ देकर जाते रहे। यूप बंधन में बँधे पुरुषमेध प्रव्रज्या संकल्प वाले परिजनों का दृश्य देख सभी गदगद थे। यज्ञमंच के साथ ही संस्कार मंच पर भी विभिन्न संस्कार संपन्न होते रहे। प्रतिदिन मंत्रदीक्षा भी दोनों स्थान पर दी गई।

समापन पर कुछ विशिष्ट

इतना बड़ा आयोजन जिस दैवी चेतना ने सँभाल रखा था, उसकी कण-कण में उपस्थिति सभी ने अनुभव की।

देव विसर्जन (11 नवंबर कार्तिक पूर्णिमा) वाले दिन वातावरण भाव संवेदना से ओत−प्रोत था। सभी देवताओं को विदाई दी गई।

दूर-दूर से आए प्रवासी भारतीय एवं कोने-कोने से आए परिजनों ने कुछ विशिष्ट एकात्मा का भाव अनुभव किया। सभी के शारीरिक कष्ट मानो इन दिनों मिट गए।

समापन के तुरंत बाद पंद्रह दिन तक पूरे क्षेत्र की सफाई का क्रम श्री गौरीशंकर जी के मार्गदर्शन में चला। सामूहिक श्रमदान का विलक्षण दृश्य था यह।

8 दिसंबर को आभार ज्ञापन समारोह में आए सभी अधिकारीगण, पत्रकार बंधु, होटल-धर्मशाला संघों के प्रमुख व स्थानीय गणमान्य नागरिकगण हमारा आभार स्वीकार करने के स्थान पर उलटे शाँतिकुँज को इस महायज्ञ हेतु भावभरा धन्यवाद देकर गए।


अपनों से अपनी बात-2 - अंतिम चरण सामने है, अब क्या करना है?

इस युग वसंत को गरिमामय ढंग से संपन्न करें

एक विराट् धर्मानुष्ठान की महापूर्णाहुति के चौथे चरण में सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ संपन्न हुआ। इस दौरान 7 से 11 नवंबर 2000 की अवधि में चले इस प्रयोग में प्रतिदिन आहुतियाँ उन सृजन संकल्पों के साथ दी गईं, जिनके लिए पूरे वर्षभर वातावरण बनाया गया था। असंख्यों व्यक्तियों ने यूप में बँधकर युग-प्रव्रज्या हेतु स्वयं को संकल्पित किया। न्यूनतम समयदान से लेकर संपूर्ण जीवनदान तक के संकल्प, सातों आँदोलनों को गति देने एवं देवसंस्कृति के विश्वविद्यालय स्तर की अनुपम स्थापना के निमित्त लिए गए हैं। साधनदान के संकल्प में अंशदान की बढ़ोत्तरी से लेकर इस भागीरथी प्रयास में, ज्ञानयज्ञ की प्रक्रिया को विस्तार देने तथा विश्वविद्यालय निर्माण हेतु साधन एकत्र करने के भी ढेरों संकल्प आए हैं। साधना में भागीदारी के संकल्प में ढेरों व्यक्तियों ने अपनी जीवन-साधना को और अधिक प्रखर करने, स्वयं को युगनायक के स्तर पर निखारने, अपनी साधना में उच्चस्तरीय सोपानों से जुड़ने के संकल्प लिए हैं। सब मिलाकर महापूर्णाहुति वर्ष उपलब्धियों से भरा रहा है।

यह युग वसंत है

अब 29 जनवरी 2001 के रूप में अंतिम चरण सामने है। यह युग वसंत युग है, जिसे इक्कीसवीं सदी रूपी अरुणोदय की अगवानी करने वाला कह सकते हैं। वसंत पंचमी परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस है। गायत्री परिवार, युग निर्माण मिशन इसी दिन अपना वार्षिकोत्सव मनाता है। शीत की ठिठुरन-कंपन में वासंती उल्लास एक नूतन प्रेरणा का संचार करता है, किंतु यह युग वसंत तो और भी विशिष्ट है। यह युगचेतना के अभ्युदय की हीरक जयंती (पिचहत्तरवें वर्ष) की वेला में आया है। पाठकों-परिजनों को ज्ञात होगा कि आज से 75 वर्ष पूर्व 1926 में वह ऐतिहासिक वसंत आया था, जब परमपूज्य गुरुदेव ने अपने दीपक की ज्योति में अपने गुरुदेव (सूक्ष्मशरीरधारी दादागुरु) के प्रथम दर्शन किए थे। उनका शक्तिपात पाया था। वही दीपक जो 18 जनवरी वसंत पर्व के दिन जला था, उसी अखण्ड अग्नि के रूप में अपनी पिचहत्तर वर्ष की यात्रा पूरी कर ढेरों उपलब्धियों के साथ अब 29 जनवरी 2001 की वसंत वेला में आ पहुँचा है। यही हमारे मिशन के जन्म से अब तक का गौरवमय इतिहास है, जो इक्कीसवीं सदी की सुदृढ़ नींव बनाने जा रहा है।

युगचेतना के अभ्युदय की हीरक जयंती

दो विशिष्ट सुयोग और इस 2001 वें वर्ष के साथ जुड़े हैं। एक अखण्ड दीपक के साथ-साथ शक्तिस्वरूपा स्नेहसलिला परमवंदनीया माताजी की जीवनयात्रा के 75 वर्ष भी पूरे होना। 1926 में ही आश्विन कृष्ण चतुर्थी की पावन वेला में आगरा नगर में श्री जसवंत बोहरे जी के परिवार में माता भगवती देवी ने जन्म लिया था। दूसरा सुयोग है श्री अरविंद (पाँडिचेरी) ने इसी वर्ष भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित किया था, आज से 75 वर्ष पूर्व। अवतारों के लीला-संदोह को न समझ पाने वाले इन सुयोगों को मात्र संयोग कह देते हैं, पर यह एक विलक्षण एवं स्थापित तथ्य है कि यह युगचेतना के धरती पर अभ्युदय का हीरक जयंती वर्ष है एवं अब सतयुगी उल्लास के धरती पर प्रकट होने की प्रक्रिया को कोई भी न रोक सकेगा। गायत्री परिवार की ज्ञान मशाल इसी दिव्य ज्योति की प्रतीक है।

संगठनात्मक अनोखा एवं न्यूनतम कार्यक्रम

इस वर्ष जनवरी माह के प्रथम सप्ताह से ही एक विशिष्ट संपर्क-परामर्श शिक्षण की प्रक्रिया भारत के चुने हुए शक्तिपीठों में शाँतिकुँज के प्राणवान् कार्यकर्त्ताओं द्वारा आरंभ कर दी गई है। यह अंक पहुँचने तक विभिन्न शक्तिपीठों में टोलियाँ पहुँच चुकी होंगी एवं छह चक्रों में वे एक से डेढ़ दिवस के कार्यक्रमों में गहन संपर्क एवं सातों आँदोलनों की कार्य-योजना पर विचार-विमर्श कर रही होंगी। इनका वसंत पूर्व समापन होने तक फरवरी माह से आरंभ होने वाले प्रतिभा-परिष्कार सत्रों के लिए क्षेत्र की विभूतियों का सुनियोजन भी हो चुका होगा। किन-किन ने किन आँदोलनों को हाथ में लिया है एवं कैसे वे उस केंद्रीय शक्तिपीठ को संगठन की धुरी बनाकर अपने-अपने क्षेत्र में क्रियान्वित करेंगे, यह सब प्रशिक्षण पूरे जनवरी माह क्षेत्रों में चलेगा। न्यूनतम तीन कार्यक्रम तो हर परिजन, समयदानी, संगठन स्तर के युगनायक, प्रज्ञामंडलों, प्रज्ञापीठों से जुड़े परिजनों, अखण्ड ज्योति पाठकों-परिजनों के लिए दिए जा रहे हैं। ये हैं (1) जीवन-साधना को और अधिक प्रखर बनाना (2) नारी जाग्रति आँदोलन द्वारा परिवार निर्माण की प्रक्रिया को गतिशील बनाना (3) ग्रामतीर्थ योजना द्वारा समाज निर्माण में भागीदारी करना। सभी जानते हैं कि ग्रामतीर्थ से अर्थ है व्यसन मुक्त, स्वच्छ, संस्कारी, स्वस्थ, शिक्षित, सहकारी, स्वावलंबी ग्राम। सातों आँदोलनों में से जो-जो परिजन जो भी कुछ अतिरिक्त कर रहे हैं, वे करते रहें, पर साथ ही ये तीनों अनिवार्य क्रम में जोड़ लें। ध्यान रखें कि बिना साधनात्मक-आध्यात्मिक आधार के कोई भी सामाजिक, बौद्धिक आँदोलन सफल नहीं होता। आस्तिकता विस्तार एवं जीवन-साधना का दैनंदिन प्रखरतम अभ्यास ही वह धुरी है, जिस पर संगठन, क्राँति या आँदोलन की सफलता निर्भर है।

शाँतिकुँज से आ रही टोलियों के साथ परिजन, यदि अभी तक अपने क्षेत्र के संगठन की रूपरेखा, आँदोलनों को चलाने की रणनीति आदि विस्तृत विवरण न भेज पाए हों तो भेज दें। सभी आँकड़े यहाँ कंप्यूटर में डालकर पूरे राष्ट्र व विश्व के संगठन का एक समग्र ढाँचा खड़ा किया जा रहा है। अपने-अपने क्षेत्र की विभूतियों के नियोजन हेतु क्या योजना बनी, नहीं बनी, तो क्या व कैसे बनाने जा रहे हैं, यह भी विस्तार से सभी लिखकर भेज दें।

वसंत पर्व इस तरह मने

इस वर्ष की वसंत पंचमी इक्कीसवीं सदी की अगवानी ने निमित्त ठीक वैसे ही संपन्न होगी जैसी कि विगत वर्ष 10 फरवरी 2000 को सबके लिए निर्मल मन-सभ्य समाज के विकास की सद्भाव भरी प्रार्थना के रूप में संपन्न हुई थी। साथ ही विद्यावरण के संकल्प भी इसी के साथ विभिन्न प्रज्ञा संस्थानों, अन्याय संगठनों द्वारा इसी दिन लिए गए थे। प्रस्तुत वसंत जो 29 फरवरी 2001 सोमवार के दिन आ रहा है, राष्ट्र और विश्व की सभी इकाइयों द्वारा उसी भाव के साथ सभी संप्रदाय-वर्गों के लोगों के साथ मिलकर एक साथ संपन्न होगा। इक्कीसवीं सदी जो उज्ज्वल भविष्य लेकर आ रही है, की आरती इस तरह मात्र जलते दीपों द्वारा नहीं, अपने क्षेत्र के ज्योतित संकल्पों के साथ संपन्न होगी।

वसंत की पूर्व संध्या पर प्रत्येक इकाई अपनी सुविधानुसार अखण्ड जप का 12 या 14 घंटे का कार्यक्रम चलाएगी। न्यूनतम आधा घंटा तो सभी इस प्रक्रिया में बैठें ही। पर्व दिन प्रातः 6 से 8 तक सामूहिक जप के साथ ध्यान-धारणा का साधना प्रयोग चलेगा। यह विगत वर्ष भेजे गए ऑडियो कैसेट्स द्वारा संपन्न होगा। पूर्वाह्न 8 से 11.30 तक पर्वपूजन, पूज्य गुरुदेव का जन्म दिवस-गुरु पूजन, सरस्वती पूजन, यज्ञ आदि का क्रम, साथ ही विद्यालयों में सरस्वती पूजन के साथ विद्यावरण के संकल्प संपन्न हों। शाम 7 8.30 तक सायंकालीन कार्यक्रम सामूहिक प्रार्थना प्रयोग के रूप में सभी स्थानों पर मनाए जाएँ, किंतु इससे पूर्व शाम 5 से 6.30 की अवधि में एक प्रचार आमंत्रण यात्रा सभी स्थानों पर निकाली जाए। यह आयोजन भव्य-खर्चीला भले न हो, प्रभावी अवश्य हो। इस क्षेत्र के आम लोगों को कार्यक्रम की जानकारी देना, प्रेरणा देकर आमंत्रण देना इसका मुख्य उद्देश्य होगा। बैनर्स, प्रचार पट्टियों, प्रेरक नारों, कीर्तन व झाँकियों के साथ प्रेरणा का प्रसार हो। आगे मंगल कलश लेकर कुछ देवियाँ चलें। इस यात्रा के पहुँचते ही युग संगीत एवं शाम के कार्यक्रम की व्यवस्था का क्रम चल पड़े।

सायंकालीन कार्यक्रम

इसमें सभी संगठनों को आमंत्रित किया जाए। यदि वे अपने स्तर पर करना चाहें, तो सभी से प्रार्थना की जाए कि इस पावन दिन एक साथ एक समय पर न्यूनतम 7.30 से 8 की अवधि में सभी ‘सबके लिए सद्बुद्धि सबके लिए उज्ज्वल भविष्य’ की प्रार्थना करें। विभिन्न संगठन, संप्रदाय अपनी-अपनी उपासना पद्धति से यह क्रम संपन्न कर सकते हैं। जो पारिवारिक-व्यक्तिगत स्तर पर करना चाहते हैं, वे भी न्यूनतम इस आधे घंटे की अवधि को दीप प्रज्वलित कर जप-प्रार्थना द्वारा संपन्न करें, यह प्रेरणा दी जाए। इक्कीसवीं सदी की अगवानी की यह आरती हर दरवाजे पर, हर उपासना गृह में न्यूनतम पाँच दीपों द्वारा अवश्य उतारी जाए।

जहाँ सामूहिक कार्यक्रम गायत्री परिवार की संगठित इकाई, प्रज्ञा संस्थानों, शक्तिपीठों द्वारा संपन्न हो रहे हैं, वहाँ क्रम कुछ इस तरह रहे- शाम 7 से 7.30 आयोजन के महत्त्व, महापूर्णाहुति की अब तक की उपलब्धियों व गुरुसत्ता के जीवन-दर्शन पर उद्बोधन। 7.30 से 8 देव आह्वान, दीप प्रज्वलन, सामूहिक सस्वर मंत्रोच्चारण, मौन प्रार्थना (जप-ध्यान)। 8 से 8.30 महापूर्णाहुति के इस पाँचवे चरण का अनुयाज-युगचेतना के अभ्युदय की हीरक जयंती की रूपरेखा, सातों आँदोलनों का स्वरूप, क्रिया-योजना पर उद्बोधन। 7.30 से 8 जब जप-ध्यान-मौन प्रार्थना का स्वरूप चले, तब सभी के मन में भाव कुछ इस प्रकार रहें, “हे प्रभु! हमारे मन निर्मल बनें। मन की निर्मलता हमें सद्भाव भरे सहकार की ओर ले जाए, जिससे हमारे संगठन में युगशक्ति का प्रखर प्राणवान् स्वरूप उभरकर आए। हम नवसृजन के इस महायज्ञ में भागीदारी कर सकें।”

विद्यालयों में विद्यावरण संकल्प

माँ सरस्वती के अवतरण के इस पावन दिन गायत्री मिशन से जुड़े-प्रभावित सभी विद्यालयों में विद्यावरण संकल्प का क्रम चले। भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के क्रम में विगत दिनों लाखों भाई-बहन, छात्र-छात्राएँ सक्रिय हुए हैं। संक्षिप्त गीत, संक्षिप्त पूजन, शिक्षा-विद्या के अंतर को समझाते हुए इस दिन की महत्ता संबंधी उद्बोधन एवं अंत में विद्यावरण संकल्प यह क्रम चले। संकल्प के पुष्प बच्चों से एकत्र कराके माँ सरस्वती की प्रतिमा पर समर्पित हों। संकल्प का भाव इस प्रकार हो, “महाविद्या के अवतरण के इस पावन पर्व पर विद्या के विनम्र साधक के रूप में हम संकल्प लेते हैं कि लौकिक जीवन को सँवारने वाली शिक्षा के साथ, जीवन को पूर्णता तक पहुँचाने वाली विद्या को हम जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग मानकर अपनाएँगे। इसका स्वयं नियमित अभ्यास करेंगे।” इसी के साथ संस्कृति मंडलों की स्थापना संबंधी संकल्प भी लिए जा सकते हैं। इस तरह प्रस्तुत वसंत पंचमी का पावन पर्व पूरे भारतवर्ष में नई सहस्राब्दी के स्वागत आरती उतारने के क्रम में परिपूर्ण उल्लास के साथ मनाया जाए।


शाश्वत और सर्वस्व की प्राप्ति है धर्म

किसी ने कहा, स्वधर्म त्याग। यह सुनकर सुनने वाले घबराए। उनकी घबराहट स्वाभाविक थी। आखिर उनमें से हर एक ने अपने जीवन में पल-पल तिनका-तिनका जोड़ा था। छोटी-छोटी चीजों को पाने के लिए न जाने कितने झगड़े-झंझट खड़े किए थे, कितनी पुरजोर मेहनत की थी। उन सबका त्याग!

उनकी इस सकपकाहट को एक फकीर बैठा देख रहा था। वह हँस पड़ा। लोगों ने उसकी हँसी का कारण पूछा। तो उसने कहा, कुछ नहीं, बस यूँ ही बचपन की एक घटना याद आ गई। बचपन में मैं कुछ लोगों के साथ नदी तट पर वनभोज को गया था। नदी तो छोटी थी, पर रेत बहुत थी और रेत में चमकीले रंगों भरे पत्थर बहुत थे। मैंने तो जैसे खजाना पा लिया था। साँझ तक इतने पत्थर बीन लिए कि उन्हें साथ ले जाना असंभव था। चलते क्षण जब उन्हें छोड़ना पड़ा, तो आँखें भीग गईं। साथ के लोगों की उन पत्थरों की ओर विरक्ति देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उस दिन वे मुझे बड़े त्यागी लगे थे, पर आज जब सोचता हूँ, तो समझ आता है कि पत्थरों को पत्थर जान लेने पर त्याग का कोई प्रश्न ही नहीं है। अज्ञान भोग है। ज्ञान त्याग है। त्याग क्रिया नहीं है। वह करना नहीं होता है। वह हो जाता है। वह ज्ञान का सहज परिणाम है। भोग भी याँत्रिक है। वह भी कोई करता नहीं है। वह अज्ञान की सहज परिणति है।

फिर त्याग के कठिन और कठोर होने की बात व्यर्थ है। उसके लिए घबराने-परेशान होने का भी कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि वह कोई क्रिया नहीं है। क्रियाएँ ही कठिन और कठोर मालूम पड़ती हैं। वह तो परिणाम है, फिर उसमें जो छूटता मालूम होता है, वह निर्मूल्य होता है और जो पाया जाता है, वह अमूल्य होता है।

सच तो यह है कि हम केवल बंधनों को छोड़ते हैं और पाते हैं मुक्ति। छोड़ते हैं कौड़ियाँ और पाते हैं हीरे। छोड़ते हैं मृत्यु और पाते हैं अमृत। छोड़ते हैं अँधेरा और पा लेते हैं प्रकाश। छोड़ते हैं अपनी क्षुद्रता और पा लेते हैं शाश्वत और अनंत। छोड़ते हैं दुःखों को, पीड़ाओं को और पा लेते हैं असीम आनंद। इसलिए त्याग कहाँ है? न कुछ को छोड़कर सब कुछ को पा लेना त्याग नहीं है। शाश्वत और सर्वस्व की प्राप्ति है धर्म।


उज्ज्वल भविष्य का आधार अतिमानस का अवतरण

वैदिक ऋषि अधिमानस में अपनी चेतना को स्थिर कर सके थे। वहाँ पर आलोक का प्रवाह अविराम एवं सतत रहता है। वहाँ पर चेतना एक स्थिर प्रकाश पुँज बन जाती है। परिणामस्वरूप दृष्टि सार्वभौम बन जाती है और मनुष्य वैश्व आनंद का, विश्वव्यापी सौंदर्य का, सार्वभौम प्रेम का आस्वाद लेता है। यहीं पर विश्व प्रेम और आनंद का अनुभव होता है।

मन मनुष्य का दिव्य यंत्र है। मन के कारण मानव बना। विकासक्रम में मानव अतिमानस बनने की कल्पना सँजोने लगा है। इसके प्रणेता हैं श्री अरविंद। श्री अरविंद के अतिमानस योग को आध्यात्मिक जगत् का एक नूतन आविष्कार कहा जा सकता है। उन्होंने देवताओं के देश अधिमानस का अतिक्रमण करने का दुस्साहस किया। सामान्य मानस से अतिमानस के बीच मानस के कई स्तर आते हैं। साधक अपनी मानसिक चेतना का परिष्कार करके इस स्तर तक विकास कर सकता है।

मानस के ये चार स्तर हैं, ऊर्ध्वमानस, उद्भासित मानस, अंतर्बोधी मानस एवं अधिमानस। ये चार स्तर अलग-अलग हैं तथा अनुभवजन्य तथ्यों को प्रस्तुत करते हैं। सिद्धाँत रूप से देखा जाए, तो ये चारों मन अतिचेतना के अंतर्गत आते हैं। कुछ ऐसे भी योगी हैं, जिनके लिए ये स्तर उनकी जाग्रतावस्था की सामान्य चेतना के भाग हैं।

मानस विकास के अनुरूप ही उन दिव्य चेतना के स्वरूपों का दर्शन हो पाता है। यदि विकासक्रम में हमारा अतीत अवचेतन है तो भविष्य है अतिचेतन। रेंबो के शब्दों में कहें तो इसे अभिव्यक्ति देने के लिए ‘एक दूसरी भाषा’ की आवश्यकता पड़ती है।

मानस का विकास सामान्य मानस से प्रारंभ होता है। सामान्य मानस देश और काल में ही घिरा रहता है। वह उससे परे देखने में असमर्थ है। उसके देखने की अपनी विशेषता है, जो आगे के स्तर के लिए एक विवशता है। मन सदैव देश और काल को छोटे-छोटे भागों में बाँटता रहता है। सामान्य मानस एक ऐसी जाली है, जिसके बीच से एक ही तस्वीर दिखाई देती है। एक ही बार में कई वस्तुओं को देखने का वह आदी नहीं है। अगर देखे भी तो वे उसे परस्पर विरोधी प्रतीत होंगे। वह चीजों को एक-एक क्रम से पंक्ति के रूप में देखता है। वह इनसे छलाँग नहीं लगा सकता। चेतना जगत् की सारी बातें उसे तर्क विरुद्ध या धुँधली जान पड़ती हैं।

सामान्य मानस धूसर वर्ण का होता है। वह काफी धुँधली मक्खियों का एक दल-सा प्रतीत होता है, जो लोगों के सिर के चारों ओर चक्कर लगाता रहता है। विचारों का जमघट भी यहीं रहता है। यह प्रदेश अत्यंत स्थूल एवं लसलसा है। सभी उच्चस्तरीय विचार एवं भाव इसके अंदर समाकर दूषित हो जाते हैं। इसमें आनंद और दुःख को सहने की क्षमता अत्यल्प होती है। इस प्रदेश की ज्योति शिखा नन्हीं-सी होती है और यह रुक-रुककर जलती है तथा जल्दी ही बुझ जाती है।

सामान्य मानस देश और काल को तो खंडित करता ही है, इसके अलावा भी वह सभी कुछ को टुकड़ा-टुकड़ा कर देता है। श्री अरविंद इस बारे में ‘मानव चक्र’ में उल्लेख करते हैं, जब भागवत् चेतना इस स्तर में उतरती है, तो लोग उस पर ब्रह्म से लेकर परमाणुपर्यंत विखंडन का नियम लागू होता है। यहाँ पर आनंद खंड-खंड हो जाता है, प्रेम और शक्ति टुकड़ों में बंट जाते हैं और स्वभावतः ज्ञान तथा ज्ञानदृष्टि भी विभाजित हो जाती है। यहीं पर सब कुछ छिन्न-भिन्न होकर रह जाता है। ‘द आवर ऑफ गॉड’ में श्री अरविंद इसे ‘चूर-चूर हुई ऊँधती-ठेलती चेतना’ कहते हैं।

जब व्यक्ति चेतना के इस सामान्य स्तर से ऊपर बढ़ता है, तो आँखों पर चढ़ी जाली का आकार बढ़ता जाता है। अतः श्री अरविंद के चेतना के आरोहण का सारा इतिहास इस आँखों पर चढ़ी जाली को उतारने की कहानी है। चेतना का यह आरोहण केवल काल की विजय गाथा नहीं, अपितु आनंद, प्रेम और व्यापक सत्ता की भी विजय की कहानी है। ‘लेटर्स ऑन योग’ में वे कहते हैं, “ज्यों-ज्यों व्यक्ति इस स्तर से उठकर सर्वोत्तम स्तर की ओर आरोहण करता है, उसके अस्तित्व की तीव्रता, चेतना की तीव्रता, शक्ति की तीव्रता, वस्तुओं में रस की और जीवन के आनंद की तीव्रता बढ़ती जाती है।”

सामान्य मानस के विकासक्रम में ऊर्ध्वमानस प्रथम स्तर है। यह कुछ दार्शनिकों और चिंतकों में प्रायः देखा जाता है। यह कुछ अधिक स्पष्ट होता है। इसका रंग नीलाभ धूसर होता है। यहाँ पर आनंद अधिक टिकाऊ और प्रेम अधिक व्यापक होने लगता है। ऊर्ध्वमानस निम्न स्तरों के समान अनेक चीजों पर उतना निर्भर नहीं रहता।

ऊर्ध्वमानस का प्रकाश तेजहीन एवं कुछ कठोर-सा होता है। देखा जाए, तो यह एक बोझिल मानसिक तत्त्व ही होता है। ऊपर से आने वाली चेतना को अपने सार द्रव्य में मिला लेना इसका प्रमुख कार्य है। यह ऊर्ध्वचेतना को अपने ही ढंग से देखकर विचार करता है, परंतु उस चेतना के बारे में वह तभी समझ पाता है, जब उसे अपने में संपूर्ण रूप से न मिला ले। जो उसे समझ में नहीं आता है, बड़े मजे से उसे काट-छाँटकर अलग कर देता है। इस स्तर की सबसे बड़ी विशेषता है विकासोन्मुखी प्रवृत्ति।

ऊर्ध्वमानस जैसे-जैसे नीरवता को अपनाने लगता है, वह उद्भासित मानस के क्षेत्र में प्रवेश पाने लगता है। यहाँ पर प्रकाश की धाराएँ बहने लगती हैं। सच्ची आध्यात्मिक सुख-शाँति और प्रसन्नता इसी स्तर पर ही मिल पाती है। इसके प्रकाश का रंग सुनहला होता है। इस अवस्था में सदा उत्साह और उमंग बनी रहती है। चेतना सजग, सचेत एवं जाग्रत् होती है। इसकी दुनिया एकदम नवीन होती है, जिसके मापदंड नए, महत्त्व भी कुछ और ही होते हैं। यहाँ पर निरंतर एक आनंद की अखंड धारा बहती है। इस चैतन्य प्रदेश में जीवन अधिक विशाल, अधिक सत्य और प्राणवान् बनता है।

उद्भासित मानस में सदैव सत्यों की दीपावली होती है। छोटे सत्य दीपमाला सजाते हैं। यहाँ पर शब्दों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, मानो प्रत्येक वस्तु का अपना रहस्य हो, एक विशेष अर्थ और निजी जीवन हो। यह तो वर्णनातीत है, जो है केवल सजीव, जीवंत और अनुरागमय।

सामान्यतः इस नवीन चेतना में पहुँचने पर सृजनात्मक शक्तियाँ स्वतः खिल पड़ती हैं। विशेष रूप से यह काव्य क्षेत्र में कहीं अधिक परिलक्षित होती है। श्री अरविंद के शिष्यों में चीनी, भारतीय, अँग्रेज आदि भिन्न भाषाओं के कवियों की संख्या बहुत अधिक थी। यह तथ्य आश्चर्य-जनक है। यह इसी क्षेत्र के विकास की कहानी है। ‘श्री अरविंद केम टू मी’ में इस तथ्य का बड़ा सुँदर वर्णन हुआ है। “शब्द उन अंतर्लोकों में बना-बनाया तैयार रहता है जहाँ से सब कलाकृतियों की उत्पत्ति होती है।”

चेतना के उच्चतर लोकों का वर्णन करने के लिए कविता सबसे अच्छा साधन है। कविता के प्रवाहों में स्पंदनों को आसानी से पकड़ा जा सकता है। श्री अरविंद ने ‘फ्यूचर पोएट्री’ में इस लोक से निःसृत कविता के तमाम उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। शेली और शेक्सपियर की कविताओं की कुछ पंक्तियाँ इसी स्तर से आती प्रतीत होती हैं। श्री अरविंद की कविताओं में यह शुभ्र प्रवाह सतत बना हुआ है। इस प्रवाह को बनाए रखना आसान कार्य नहीं है। स्वामी विवेकानंद की कविताएँ भी उन लोकों का दर्शन कराती हैं।

उद्भासित मानस में सूक्ष्म दृष्टि खुल जाती है और साधक को अलौकिक श्रवण शक्ति भी प्राप्त हो जाती है। इस क्षेत्र की कमी है कि यहाँ पर उत्साह सहज ही उत्तेजना में बदलने लगता है। जब प्राण इस प्रकाश पुँज पर अधिकार कर लेता है, तो इसे कम और कठोर बना देता है। यह फिर एकदम विकृत हो जाता है। इसका प्रकाश फैला रहता है, इसी कारण इसमें सतत क्रमबद्धता नहीं रह पाती है। यह तो नवजन्म का उपक्रम मात्र है।

विमल पारदृश्यता अंतर्बोधी मानस की महत्ता है। इसकी गति तेज है। अपने समान किसी भी क्षेत्र में यह स्वतंत्र विचरण करता है। इसके कदम ऊर्ध्वमानस की तरह जकड़े हुए नहीं हैं। यह मानसिक विचारों का सहारा नहीं लेता। यही तो स्वतंत्रता है। इसी स्वतंत्रता का अभाव ही व्यक्ति को अतिचेतन में उड़ान भरने नहीं देता। इसी स्वतंत्रता एवं नीरवता में ही ज्ञान जन्म लेता है।

जब हम सब बिंदुओं में एक हो जाएँगे तभी खिलेगा दिव्य जीवन का सुवासित पुष्प। श्री अरविंद ने दिव्य जीवन में अंतर्बोध को परम सत्य की एक स्मृति कहा है। इसी दिव्य प्रकाश में ही ज्ञान की प्राप्ति होती है और पता चलता है कि ज्ञान अज्ञात की खोज नहीं है। मनुष्य की अपनी स्वयं की खोज ही है ज्ञान। उस अदृश्य रूप को जानना ही ज्ञान है। हर व्यक्ति के जीवन में यह एक क्षण के लिए ही सही, आता अवश्य है।

अंतःस्फुरित भाषा सूत्रबद्ध है, जबकि उद्भासित मन की भाषा काव्यमय होती है। श्री अरविंद ‘लेटर्स ऑन योगा’ में उल्लेख करते हैं कि अंतर्बोध में वस्तुएँ स्फुरणों द्वारा अंश-अंश करके दिखाई देती हैं, सारी एक साथ नहीं। ‘सिंथेसिस ऑफ योग’ में वे इसे इस तरह अभिव्यक्ति देते हैं, “एक कौंध में जो स्थल हमारे सामने खुलता है, वह सत्य का एक स्थल ही है, इसी तल पर पहुँचकर ही साधक नीरवता द्वारा उच्चतर चेतना की ओर उड़ान भरता है।”

अधिमानस वह उच्च श्रृंग है जो कि मानव चेतना के लिए अति दुर्लभ है। यह एक सार्वभौम चेतना है। अधिमानस देवताओं का लोक है। महान् धर्म प्रवर्तकों की प्रेरणा स्रोत भी यही है। सभी धर्मों की यह जन्मस्थली है। कलाकृतियाँ भी यहाँ जन्म लेती हैं। यहाँ पर व्यक्तित्व का लोप नहीं होता।

श्री अरविंद ने इसी अवस्था में आकर ही भारत को स्वतंत्रता प्रदान की थी। वे ‘लेटर्स ऑन योगा’ में इसकी व्याख्या करते हैं कि उस स्तर में साधक सत्य को आँशिक रूप से नहीं, बल्कि समग्रता से विशाल पुँजों में एक साथ देखता है। यहाँ पर प्रकाश समान एवं पूर्ण एकरूप रहता है। इस क्षेत्र में देश और काल का अत्यंत विस्तार होता है। अधिमानस देवताओं का देश है, जहाँ पर मनुष्य भगवत्कृपा से पहुँच पाता है।

वैदिक ऋषि अधिमानस में अपनी चेतना को स्थिर कर सके थे। वहाँ पर आलोक का प्रवाह अविराम एवं सतत रहता है। वहाँ पर चेतना एक स्थिर प्रकाश पुँज बन जाती है। परिणामस्वरूप दृष्टि सार्वभौम बन जाती है और मनुष्य वैश्व आनंद का, विश्वव्यापी सौंदर्य का, सार्वभौम प्रेम का आस्वाद लेता है। यहीं पर विश्व प्रेम और आनंद का अनुभव होता है।

अधिमानस चेतना में प्रवेश के अनेक मार्ग हैं, जैसे प्रगाढ़ धर्म निष्ठा द्वारा, प्रखर काव्य प्रेम के माध्यम से, चिंतन, कला, वीरता के उत्कर्ष द्वारा। मनुष्य को वर्तमान सीमाओं को पार करने के लिए जिस भी वस्तु से सहायता मिले, उसके माध्यम से वह वहाँ पहुँच सकता है। इस संदर्भ में श्री अरविंद ने कला को विशेष महत्त्व प्रदान किया है। उन्होंने कला को आध्यात्मिक प्रगति के प्रमुख साधनों में से एक माना है। यह धरती ही वह आधार है, जहाँ उस शिखर तक पहुँचा जा सकता है। इसलिए दिव्य लोक की देवसत्ताएँ मनुष्य शरीर धारण कर इस धरती में बारंबार जन्म लेती हैं।

अधिमानस के बाद जो स्तर आता है उसे अतिमानस कहते हैं। श्री अरविंद ने अतिमानस की खोज की। इस योग का मार्गदर्शन उन्होंने स्वामी विवेकानंद के सूक्ष्मशरीर द्वारा अलीपुर जेल में प्राप्त किया था। अतिमानस एक सर्वग्राही दृष्टि है। वह दृष्टि की एक गोलाई है, जिसके अंत में एक केन्द्रीय बिंदु नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों बिंदु होते हैं। अतिमानस मंडलाकार दृष्टि, अखण्ड दृष्टि, शाश्वत दृष्टि है। यह है त्रिकाल विजय। अधिमानस चेतना में देश और काल के महान् विस्तार की दृष्टि रहती है। अति मानसिक तीनों कालों पर छाई रहती है। भूत-वर्तमान और भविष्यत् के अविच्छिन्न संबंध अतिमानसिक चेतना में टूटकर अलग नहीं हो जाते, ज्ञान के एक एकाकी अविराम चित्र के अंदर वे तीनों एक साथ व्यक्त रहते हैं।

श्री अरविंद ने अतिमानस के धरती पर अवतरण की भविष्यवाणी की है। उन्होंने इस योग के माध्यम से मनुष्य मात्र का रूपांतरण चाहा है। उनके अनुसार धरती पर स्वर्ग का अवतरण एवं मनुष्य में देवत्व का उदय तभी संभव है, जब श्रेष्ठ आत्माएँ लोभ-मोह की जंजीरों को तोड़कर आगे आएँ। यही इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य का आधार है।


गृहस्थ में रहते हुए नारी बहुत कुछ कर सकती हैं (kahani)

अवंतिका बाई के पति मुँबई में मशीनों की दुकान मे काम करते थे। गुजारा ठीक चलता था, पर उनके हाथ की एक उँगली मशीन में कट गई थी। उनने प्रेरणा देकर पत्नी को नर्स की ट्रेनिंग कराई और स्वावलंबी तथा सुसंस्कारी बनाने में कोई कमी न रखी। नर्स की नौकरी करने के उपराँत भी अवंतिका बाई ने देश सेवा के कार्यों में भाग लेना शुरू किया और वे मुँबई में अनेकों महिला कार्यकर्त्री उत्पन्न करने में सफल रहीं।

वे गाँधी जी के स्वतंत्रता आँदोलन में सम्मिलित हुईं और नौ महीने की जेल काटी। गाँधी जी ने चंपारन सत्याग्रह में महिला संपर्क के लिए उन्हें विशेष रूप से बुलाया था।

मुँबई जाकर उन्होंने ‘भारतीय महिला समाज’ की स्थापना की और प्रौढ़ महिला शिक्षा तथा कुरीति उन्मूलन के लिए विशेष प्रयत्न किया एवं मुँबई कारपोरेशन की सदस्या चुनी गईं। उनकी सार्वजनिक सेवाओं से मुँबई का बच्चा-बच्चा परिचित और प्रभावित था।

यह सब काम उन्होंने गृहस्थ के उत्तरदायित्व निभाते हुए पूरे किए और उदाहरण प्रस्तुत किया कि गृहस्थ में रहते हुए भी नारी बहुत कुछ कर सकती हैं। यह उनके पति के सहयोग से ही संभव हुआ।


देवसंस्कृति की विरासत हैं, ऐसे अध्यात्मवेत्ता

साधारण वेश में वह असाधारण थे। यह असाधारणता उनकी कठोर तप-साधना से उपजी, पनपी एवं निखरी थी। महावीर हनुमान् उनके आदर्श एवं आराध्य थे। राम नाम उनका सर्वस्व था। वह कहीं भी, किसी भी स्थिति में हों, प्रत्येक श्वास के साथ उनका नाम-जप चलता रहता। वह कहा करते थे कि उपासना हो तो महावीर हनुमान् जैसी। साधना ऐसी हो, जैसी हनुमान् ने की। आराधना के मूर्तिमान् स्वरूप भला मेरे आराध्य हनुमान् के सिवा और कौन होगा। महावीर हनुमान् की यह उक्ति “राम काजु कीन्हें बिनु मोहिं कहाँ विश्राम” ही उनका आदर्श वाक्य था। सचमुच ही वह कभी विश्राम नहीं करते थे। सदा-सर्वदा अनथक भाव से आत्मकल्याण एवं लोककल्याण में रित रहते।

प्रातः दो-ढाई बजे जगकर स्नान आदि के उपराँत वह राम नाम के जप में तल्लीन हो जाते। उनकी यह ध्यान निमग्नता दोपहर बारह बजे तक अविराम चलती रहती। बारह बजे से तीन बजे तक सामान्य काम-काज निबटाते। कभी किसी दुःखी-पीड़ित प्राणी की सेवा-सहायता करते। उनकी इस सेवा-सहायता क्रम में जाति-पाँति, नर-नारी अथवा ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं था। ‘सिय राम मय सब जग जानी’ इस भाव में विभोर होकर उन्होंने जनसेवा को प्रभु सेवा मान लिया था। सेवा का अल्प समय भी उनके महत् भाव से जुड़कर महत् ही बन जाता।

तीन बजे अपराह्न फिर से राम नाम जप एवं ध्यान की निमग्नता प्रारंभ हो जाती, जो रात्रि बारह बजे तक अबाधित चलती रहती। रात्रि में थोड़ी देर की योग निद्रा में ही वे पर्याप्त विश्राँति पा लेते। सोलह वर्ष की किशोरवय से चालीस वर्ष की प्रौढ़ आयु तक यह क्रम चलता रहा। सप्ताह में केवल मंगलवार के दिन एक समय फलाहार ही उनके शरीर धारण का आधार था। तप के कठोर अनुबंधों से देह-मन-प्राणों को कसना-तपाना देखकर सामान्य जन चकित रह जाते। सभी की श्रद्धा स्वभावतः उनकी ओर उमड़ पड़ती। पर वह इस सब से बेखबर थे। उन्हें खबर थी तो बस अपने आराध्य की। पवन पुत्र हनुमान् को समर्पित हो रहा था उनके अस्तित्व का कण-प्रतिकण।

बजरंग बली भी अपने इस अनन्य भक्त की निष्ठा पर कृपालु हुए बिना न रह सके। वह भक्त के सम्मुख प्रत्यक्ष आ पधारे और उनसे वर माँगने को कहा। अपने आराध्य के इस कथन पर उन्होंने इतना ही माँगा, हे महावीर मारुति! आप तो साधु-संतों के रखवाले हो ही, मुझ पर भी जब कष्ट पड़े, तो बचा लेना। प्रभु! मैं भी आपके आदर्शों पर चल सकूँ, आत्मकल्याण एवं लोककल्याण में निरत रहूँ, इतनी सामर्थ्य देना। सिर पर हाथ रखकर पवन पुत्र हनुमान् ने इन्हें अपना अमोघ आशीष दिया, साथ ही अष्ट सिद्धि का वरदान भी दे डाला।

इस महासाधक ने जब अपने गुरुदेव अद्वैत भारती से इस पर चर्चा की तो समर्थ गुरुदेव ने इतना ही कहा, पुत्र! लोकेषणा एवं वित्तेषणा के लिए कभी भी इसका उपयोग न करना। उन्होंने उन्हें समझाते हुए कहा, बेटा आनंद भारती! जीवन की हर सामर्थ्य का सदुपयोग लोकसेवा में है। लोकसेवा ही प्रभु सेवा है। इस सत्य को प्रत्येक क्षण स्मरण रखना। आनंद भारती अपने गुरुदेव अद्वैत भारती के निष्ठावान् शिष्य थे। उन्होंने गुरुदेव को सिद्धि के सदुपयोग का वचन दिया और संतों की एक मंडली को साथ लेकर पदयात्रा द्वारा तीर्थभ्रमण करने हेतु निकल पड़े। उनकी मंडली काशी की यात्रा संपन्न करके पुनः वापस कलकत्ता आ गई।

उन्हीं दिनों 1857 ई. की क्राँति विफल हुई थी। हालाँकि इतना अंतर जरूर आया था कि अब सत्ता ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में न होकर सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन थी। 1857 ई. के इसी वर्ष में लार्ड वारेन हेस्ंिटग्स को ब्रिटिश भारत का सर्वप्रथम गवर्नर जनरल बनाया गया था। अँग्रेजों के लिए भारतवासी सदा से उपेक्षा एवं अवमानना के पात्र थे। इन दिनों यह उपेक्षा कुछ ज्यादा ही बढ़ी-चढ़ी थी। विदेशी अँग्रेज सामान्य नागरिकों के साथ साधु-संतों का भी अपमान करने से नहीं चूकते थे।

कलकत्ता वापस आकर रुकी साधु मंडली ने अपनी संध्या आरती शुरू की। शंख, नगाड़े, तुरही, नागफणी, झाँझ, ढोल आदि के नाद से समूचा वातावरण गूँज उठा। लगभग डेढ़ सौ संतों के अलख निरंजन की गूँज से अँग्रेजों की छावनी भी गूँज उठी। सच कहा जाए, तो गूँज ही नहीं काँप उठी। छावनी का अँग्रेज अफसर सिपाहियों की एक टुकड़ी साथ लेकर वहाँ पहुँचा और क्रोध से चिल्लाया, बंद करो यह शोरगुल और अपना डेरा-तंबू उठाकर चलते यहाँ ला रहे थे, कितने मन लकड़ियाँ हमारे लिए तुमने जलाईं? सबने कहा, बाबा कुल लकड़ियाँ नब्बे मन थीं।

संत ने कहा, तो जाओ तुम्हारी सल्तनत भी इन नब्बे मन लकड़ियों की तरह नब्बे साल में समाप्त हो जाएगी। तुम्हारे भाँति-भाँति के अन्यायों एवं अत्याचारों की ज्वालाओं के बीच भी भारत का कुछ नहीं बिगड़ेगा। वह प्रभु की कृपा से उसी तरह से सुरक्षित निकल आएगा, जैसे मैं निकल आया।

सावधानी से संत की भविष्यवाणी को लार्ड वारे हेस्ंिटग्स ने नोट किया। लंदन टाइम्स की लीथो कॉपी में यह हकीकत छपाई गई। लंदन टाइम्स ने लिखा, भारतीय संतों की सिद्धियों की अनेक बातें अब तक सुन रखी थीं, परंतु यह अद्भुत चमत्कार तो हजारों लोगों की आँखों के सामने हुआ कि नब्बे मन लकड़ियाँ जल गईं, पर पता नहीं चला कि उसमें वह साधु कैसे जीवित बच गया और उसने यह भी कह दिया कि नब्बे वर्षों बाद तुम्हें विदा होना पड़ेगा।

संतों की भविष्यवाणी की क्षमता तो भारतीय अध्यात्म शास्त्र में हर कहीं वर्णित है, पर विश्व इतिहास ने भी इस कालजयी सामर्थ्य को जान लिया। सचमुच ही 1857 से 1947 तक यानि नब्बे वर्षों तक ही अँग्रेजों का राज्य रहा। संत आनंद भारती भी इस घटना के बाद बाबा लक्कड़ भारती के रूप में प्रसिद्ध हो गए। लोग उन्हें इसी नाम से जानने व पुकारने लगे।

हजारों लोग इस घटना के बाद उनके दर्शनों के लिए आने लगे, तो संत रातों-रात अपनी साधुओं की मंडली के साथ गुजरात की तरफ तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े। जब वह तलेटी पर पहुँचे तो संतों ने गिरनार पर्वत की परिक्रमा सभक्ति पूरी की। यहाँ के सिद्ध क्षेत्र में उनकी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ और भी प्रखर हो गईं। बाबा लक्कड़ भारती ने सबसे कह दिया, अब मैं कहीं नहीं जाऊँगा और यहीं पर निवास करूंगा।

गिरनार की तलहटी में ही उन्होंने भवनाथ के समीप ही अपनी तपसाधना एवं लोकसेवा का उपक्रम प्रारंभ किया। यह क्रम काफी समय तक लगातार चलता रहा। एक दिन बाबा लक्कड़ भारती ने कहा, मैं कल सबेरे जीवित समाधि लूँगा और दूसरे दिन असंख्य जनों के बीच वह पद्मासन लगाकर बैठ गए। अपनी महासमाधि के कुछ पलों पूर्व वह सबको संबोधित कर कहने लगे, अपने देश से ये अँग्रेज तो जाएँगे ही। इन अंग्रेजों के जाने के बाद भी देश में भारी उथल-पुथल रहेगी, पर सारी उथल-पुथल और संकटों की आग में तपकर देश का उज्ज्वल भविष्य उभरेगा। भारतवर्ष विश्व का सिरमौर बनेगा। इसी के साथ उन्होंने प्राणों को ब्रह्मरंध्रों में चढ़ाकर समाधि ले ली। आज भी सच्चे अध्यात्मवेत्ता बाबा लक्कड़ भारती का समाधि स्थल अनेकों जिज्ञासु भक्तों को कृतार्थ है।


माँ की सेवा (kahani)

कलकत्ता में जन्मे के.सी.डे की आँखें डेढ़ वर्ष की उम्र में चली गईं। पाँच वर्ष के थे तब पिता मर गए। विधवा माता ने उन्हें थोड़ा-बहुत स्वयं ही पढ़ाया। वे मजूरी करने जातीं, तो डे को साथ ले जातीं। वे बच्चे के भविष्य के बारे में चिंतित तो रहतीं, पर धैर्य नहीं खोया। उन्हें स्कूली शिक्षा के स्थान पर सुसंस्कारिता, स्वावलंबन का पाठ पढ़ाया। संगीत में पुत्र की अभिरुचि को देखकर उन्होंने उसे वैसा ही शिक्षण देने की सुविधा जुटा दी। स्वयं मेहनत करके पुत्र के लिए साधन जुटातीं। अपने लिए वे सदैव ‘डे’ से कहा करतीं, “मेरे लिए चिंता न करो। अपने पैरों स्वयं ही खड़ा होने का प्रयास करो।” डे ने कई संगीतकारों से उनकी सेवा करते हुए शिक्षा पाई। युवा होने से पहले ही उन्होंने संगीत में प्रवीणता प्राप्त कर ली। टूटे-फूटे वाद्य यंत्रों के सहारे घर पर अभ्यास करते रहते।

कुछ दिनों में उनकी ख्याति सर्वत्र फैली। छोटे-छोटे संगीत सम्मेलनों के बाद उन्हें फिल्म कंपनियों ने बुलाया। अनवरत अभ्यास ने उनका कंठ भी निखार दिया था। एक-एक करके उनने प्रायः एक दर्जन गाने फिल्मों में पार्श्व गायक के रूप में गाए। कभी अभिनय करना पड़ा, तो अपनी सादी पोशाक में कैमरे के सामने आए थे। बनावट से उन्हें चिढ़ थी।

भारत के गायकों में फिल्म जगत् पर अपना आधिपत्य जमाने वाले एक ही थे, के.सी.डे। जिन फिल्मों के साथ उनका नाम जुड़ा होता, उसे देखने दर्शकों की भीड़ टूट पड़ती। वे सदैव इस यश का श्रेय अपनी माँ को देते रहे। अंतिम समय तक उनकी सेवा भी खूब की।


तीन शक्तिधाराएँ पथ प्रशस्त करेंगी इक्कीसवीं सदी का

यह एक सार्वभौम नियम है कि यदि मंजिल का, गंतव्य का स्थान निर्धारित हो, तो यात्रा किसी भी दिशा से आरंभ की जाए, देर-सबेर उस गंतव्य तक व्यक्ति पहुँचकर ही रहेगा। उदाहरण के लिए दिल्ली, कलकत्ता एवं मद्रास से मुँबई के लिए तीन व्यक्तियों द्वारा यात्रा की जाए, तो भले ही रास्ता तथा गाड़ियाँ अलग-अलग हों, किन्तु पहुँचेंगे वे सभी एक ही स्थान पर। यद्यपि यात्रा विभिन्न दिशाओं से आरंभ की गई है, किंतु अलग-अलग पथ पर चलते हुए निर्धारित केंद्र बिंदु पर अंततः वे तीनों पहुँच ही जाते हैं। प्रगति के हर क्षेत्र में यही नियम लागू होता है।

इन दिनों मानव समुदाय की सुख-शाँति, समृद्धि-वैभव हेतु समाज में कई प्रकार के प्रयास चल रहे हैं। स्थूल रूप से यदि इन्हें विभाजित किया जाए, तो ये तीन वर्गों में विभक्त होते हैं-(1) धर्म, (2) विज्ञान और (3) राजनीति। इस संबंध में प्रख्यात पत्रिका ‘नेचर’ के संपादक श्री रिचर्ड ग्रेगरी, जो वर्षों तक विज्ञान परिषद् ग्रेट ब्रिटेन के अध्यक्ष भी रहे हैं, ने अपनी पुस्तक ‘गाँड्स एंड मेन’ में लिखा है, “मेरे पितामह आजीवन धर्म का प्रचार करते रहे। मेरे पिता एक कट्टर समाजवादी नेता रहे और मुझे इन दोनों क्षेत्रों के अतिरिक्त तीसरे क्षेत्र विज्ञान क्षेत्र में काम करने का अवसर मिला। मैंने बिना किसी पूर्वाग्रह अथवा संबंधियों के प्रभाव के इन तीनों विषयों का गहरा अध्ययन किया है तथा उससे मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि धर्म, समाजवाद तथा विज्ञान तीनों द्वारा निर्दिष्ट जीवन-दर्शन आधारभूत रूप से एक ही है। तीनों का एक ही उद्देश्य है कि व्यक्ति एवं समाज का स्तर ऊँचा उठे। सत्यान्वेषण एवं आध्यात्मिक सिद्धाँतों को जीवन में किस प्रकार उतारा जाए, यही इनका मूलभूत प्रयोजन है।”

वस्तुतः इन तीनों के संबंध में जनमानस में बड़ी भ्राँतियाँ हैं। अपनी-अपनी चिंतन क्षमता के अनुरूप वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों एवं धर्मशास्त्रियों ने इन विषयों की परिभाषा को एक सीमा विशेष में बाँध दिया है, जबकि वास्तव में इनकी कोई विभाजन रेखा नहीं है। धर्म के संबंध में तो कहना ही होगा कि उसका समग्र स्वरूप सत्य की खोज को दृष्टिगत रखकर ही गढ़ा गया है। प्रथा-परंपराएँ तो समय के अनुरूप बदलते रहने वाली नियम-व्यवस्थाएँ भर हैं। इन्हें धर्म की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए। धर्म का मूल सिद्धाँत तो सभी मत-संप्रदायों में एक ही है, “सत्कर्मों द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करना तथा उसके अस्तित्व को मानना। वे यह भी मानते हैं कि ईश्वरीय व्यवस्था भले-बुरे कर्मों का पुरस्कार-दंड स्वयं निर्धारित करती है।”

धर्म का अर्थ है, वे आस्थाएँ, जो व्यक्ति को सत्प्रवृत्ति अपनाने और सत्कर्म करने के लिए प्रेरित करें, ताकि उसका अपना और सामाजिक जीवन अधिकाधिक सुखी व समुन्नत बने। धर्म व्यक्ति की भाव-संवेदनाओं को, अंतःकरण के मर्मस्थल को प्रभावित कर सुख-शाँति एवं सुव्यवस्था की स्थापना करना चाहता है। धर्म प्रचारक जहाँ भी गए हैं तथा उन्होंने सच्चे मन से प्रयास किए हैं, वहाँ उन्हें इस तरह की अभीष्ट सफलता भी मिली है।

राजनीति का भी यही उद्देश्य है, समाज में शाँति, सुरक्षा व सुव्यवस्था बनाए रखना। अब तक विश्व की राजनीति ने विकास के जितने भी चरण पूरे किए हैं, उस क्षेत्र में जितने भी प्रयोग हुए हैं, सबके सब इसी उद्देश्य से किए गए। लोगों में जब अव्यवस्था व छीना-झपटी चलने लगी, बलवान दुर्बलों को दबाने लगे, तो व्यवस्था बनाई गई कि कुछ शक्तिशाली व्यक्ति इस अनर्थ का निवारण करें। बलवानों को उद्दंडता बरतने से रोकें तथा दुर्बलों को सुरक्षा एवं संरक्षण उपलब्ध कराएँ। राजतंत्र, प्रजातंत्र से लेकर अधिनायकवाद और समाजवादी राजनीतिक दर्शनों का एकमात्र यही उद्देश्य रहा कि समाज में कमजोर-से-कमजोर व्यक्ति को भी जीने और सुखपूर्वक जीवनयापन करने की सुविधा व अवसर समान रूप से मिल सके।

यों तो गलत व्यक्ति कहाँ नहीं होते और वे जहाँ भी रहते हैं, अच्छे उद्देश्यों से आरंभ किए गए कार्यों को गलत, विकृत और गया-गुजरा बना देते हैं। धर्मक्षेत्र को ही लें तो इसमें इन्हीं कारणों से विकृतियाँ आईं कि वह क्षेत्र गलत व्यक्तियों के हाथ में चला गया, जिन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए जनश्रद्धा का दोहन आरंभ कर दिया। लोकमानस में आदर्शवादी आस्थाओं, उत्कृष्ट भावनाओं और उच्च विचारणाओं की स्थापना का कार्य ताक में रखकर रूढ़िवादी परंपराओं, अंध-विश्वासों, रीति-रिवाजों तथा स्वयं के द्वारा दी गई व्यवस्थाओं के प्रति अंध-श्रद्धा रखने के लिए तैयार किया जाने लगा ताकि निजी स्वार्थ पूरे होते रहें।

धर्म के पास लोकमानस पर, जन भावनाओं पर प्रभाव डालने की शक्ति थी, तो राजनीति के पास दंड और बल की ताकत थी। इस शक्ति का उद्देश्य भी दुष्ट-दुर्जनों को दंड देना और उन्हें सही रास्ते पर चलाना था लेकिन हुआ यह कि राज्य व्यवस्था के संचालन सूत्र ऐसे व्यक्तियों के हाथों में पहुँच गए, जिनके लिए सामाजिक हित गौण और व्यक्तिगत स्वार्थ अधिक मूल्यवान् थे। जहाँ-जहाँ भी ऐसा अनर्थ हुआ, वहीं-वहीं विकृतियाँ, कुप्रबंधन और दोहन-शोषण की दुःखद परिस्थितियाँ दिखाई देने लगीं।

वास्तव में मूर्द्धन्यों द्वारा निर्धारित राजनीति का भी वही उद्देश्य था, जो धर्म का रहा है। राजनीति के माध्यम से बाहरी व्यवस्था सुधारने, उसे ठीक रखने के प्रयास किए जाने चाहिए, तो धर्मतंत्र से लोगों की आस्थाओं और भावनाओं को परिष्कृत होना चाहिए। इन्हीं दिनों पिछली-तीन-चार शताब्दियों में विज्ञान के रूप में मनुष्य के पास एक नया शक्ति स्रोत हाथ में आया। सृष्टि की विभिन्न गतिविधियों की जिज्ञासा और शोध की दृष्टि से अध्ययन करने पर मनुष्य के हाथ में कुछ ऐसे नियम व सूत्र आए, जिनसे मनुष्य को थका देने वाले श्रम से मुक्ति और उपलब्धियों के कोष में अभिवृद्धि की संभावनाएँ दिखाई देने लगीं। उन संभावनाओं को यंत्रों के आविष्कार, नए-नए शक्ति स्रोतों की शोध के रूप में साकार भी किया गया।

अब से पांच सौ वर्ष पूर्व के मनुष्य का जीवन कितनी असुविधाओं से ग्रस्त था, इसकी अब कल्पना भी नहीं की जा सकती। अगर मान लिया जाए कि कुछ दिनों के लिए रेलगाड़ी, मोटर, यान आदि सब बंद हो जाएँ, बिजली का उपयोग वर्जित कर दिया जाए, तो लोगों को अपना जीवन ही भार लगने लगेगा। पहले ये सुविधाएँ नहीं थीं, इसलिए मनुष्य इनके अभाव की कल्पना ही नहीं करता था। अब ये उपलब्ध हैं, इसलिए इनके बिना जीना भी दूभर लगता है। वह इसलिए कि हम इन सुविधा-साधनों के अभ्यस्त हो गए हैं, जो भी हो, इन वैज्ञानिक साधनों के कारण अब संसार इतना छोटा हो गया है कि सारा विश्व एक परिवार के रूप में सिमट गया है। इससे पूर्व अपने परिवार के किसी सदस्य को इतनी दूर बसने भी नहीं दिया जाता था, क्योंकि तब उससे सरलतापूर्वक संपर्क नहीं किया जा सकता था, परंतु आज हजारों मील दूरी होने पर भी कुछ ही घंटों में पहुँचा जा सकता है।

विज्ञान ने भी मनुष्य को सुरक्षित और शाँतिपूर्ण जीवन यापन के कितने ही आधार खड़े किए, परंतु धर्म और राजनीति की तरह ही विज्ञान का भी गलत उपयोग हुआ, जिससे मानव समाज के लिए और भी भयंकर संकट उठ खड़े हुए हैं। विज्ञान की उपलब्धियों का जब तक साधन के रूप में उपयोग किया जाता रहेगा, तब तक वह मनुष्य समाज को ऊँचा उठाने में योगदान देता रहेगा, लेकिन यदि इसका उपयोग अनुचित ढंग से शस्त्र की तरह होने लगा तो उसके परिणाम धर्म और राजनीति के दुरुपयोग से भी अधिक भयंकर-विनाशकारी होंगे, जैसा कि पिछले दो विश्वयुद्धों में देखा गया। यही कारण है कि अब विश्वभर के मूर्द्धन्य मनीषियों, वैज्ञानिकों को इस तथ्य को एक मत से स्वीकार करना पड़ा है कि धर्म और राजनीति के दुरुपयोग से भी उतने दुष्परिणाम नहीं हुए जितने कि विज्ञान के दुरुपयोग से संभावित हो गए हैं। क्योंकि धर्म और राजनीति तो अब तक एक व्यवस्था, एक तंत्र के रूप में ही कार्य कर रहे थे। उन क्षेत्रों की विकृतियाँ अपने-अपने सीमा क्षेत्र में ही अनर्थ उत्पन्न करती थीं, परंतु विज्ञान के रूप में उपलब्ध हुई महाशक्ति ने सारी मनुष्य जाति के लिए सर्वग्राही संकट उत्पन्न कर दिया है।

चाकू से बंधन भी काटे जा सकते हैं और हाथ-पैर भी। अग्नि में मकान की ईंटें भी पकाई जा सकती हैं और मकान को आग भी लगाई जा सकती है। कुएं के पानी से प्यास बुझाकर जीवनरक्षा भी की जा सकती है और उसमें कूदकर प्राण भी दिए जा सकते हैं। धर्म अर्थात् भावनाओं, राजनीति अर्थात् व्यवस्था में गलत व्यक्तियों का प्रवेश और उनके द्वारा किया गया दुरुपयोग हाथ-पैर काटने, मकान जलाने और कुएं में गिरकर प्राण गँवाने जैसी दुःखद स्थितियाँ ही उत्पन्न करेंगे।

क्या इन अनर्थों को रोकने का कोई उपाय नहीं है? यह प्रश्न करते हुए सुप्रसिद्ध दार्शनिक और वैज्ञानिक रिचर्ड ग्रेगरी ने अपनी उपर्युक्त पुस्तक में कहा है, “तीन विभिन्न कोणों से चलने वाली ये तीन गाड़ियाँ यदि सही दिशा पर आ जाएँ, तो न केवल भविष्य के संकटों से सरलतापूर्वक बचा जा सकता है, वरन् उज्ज्वल भविष्य का सुँदर ताना-बाना भी बुना जा सकता है।”

क्या हैं भावी संकट? विज्ञान की विनाशकारी संभावनाएँ तो ऊपर बताई जा चुकी हैं। धर्म क्षेत्र में घुस पड़ी विकृतियाँ मनुष्य को अनास्थावान् बनाती जा रही हैं। राजनीति के क्षेत्र में आई विकृतियाँ उसे दिन-प्रतिदिन दुर्दम्य, स्वार्थी, उद्दंड और असामाजिक, अनैतिक बनाती जाएँगी। ऐसी स्थिति में आशा की किरण मात्र धर्मक्षेत्र में दिखाई पड़ती है, किंतु उसे भी अपने क्षेत्र में घुस पड़ी विकृतियों को हटाना पड़ेगा, साथ ही अवाँछनीय व्यक्तियों को निरुत्साहित करना होगा। इसके लिए कुछ ऐसे व्यक्तियों को आगे आना होगा, जो इस क्षेत्र में प्रकाश स्तंभ के रूप में चमक सकें। साधन और सामर्थ्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है, उन्हें उपयोग करने वाले व्यक्ति की सूझ-बूझ तथा दृष्टि। और यह धर्माचरण से ही विकसित होगी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भविष्य की राजनीति और कल का विज्ञान जब आध्यात्मिक मूल्यों से संचालित, प्रेरित होंगे, तभी वे अपनी समर्थता सिद्ध कर सकेंगे। तीनों का समन्वित स्वरूप ही समाज की भावी दिशाएँ और गतिविधियाँ निर्धारित करेगा।


कुँडलिनी महाशक्ति अंधविश्वास नहीं

जैन आचार्यों ने कुँडलिनी शक्ति का उल्लेख तेजोलेश्या के रूप में किया। आचार्यश्री महाप्राज्ञ के अनुसार यह शक्ति सूर्य के प्रतिनिधि की तरह मनुष्य के काय कलेवर में विद्यमान रहती है। ब्रह्माँड में सूर्य जितना प्रचंड, ऊर्जावान् और अग्नि से भरा हुआ है, अंतर्जगत् का सूर्य भी अपने स्वरूप और स्थिति के अनुसार उतना ही प्रदीप्त है।

उन्नीसवीं शताब्दी में हुए एक प्रसिद्ध समाज सुधारक संत ने कुँडलिनी की खोज अद्भुत तरह से की। स्वभाव से ही खंडनवादी और तर्क-विवाद में गहरी रुचि रखने वाले इन संत की दृष्टि में अध्यात्म और साधना का अर्थ कतिपय मानसिक-शारीरिक अभ्यास ही था। अध्यात्म क्षेत्र को इन अभ्यासों तक ही सीमित मान लें तो उसका विस्तार बीस प्रतिशत ही रह जाता है। बाकी अस्सी प्रतिशत स्वरूप नकारना पड़ता है। यह स्वरूप स्थूल साधनाओं के अभ्यासों के बाद अंतर्जगत् में उतरने के साथ शुरू होता है। अस्सी प्रतिशत इस भाग को रहस्य और गुह्य लोक भी कह सकते हैं। कुँडलिनी भी इसी लोक से संबंधित है। उन संत महापुरुष के अनुसार रहस्य या गुह्य विद्या जैसी कोई चीज होती ही नहीं है। अगर इस तरह का दावा किया जाता है, तो वह पाखंड और अविद्या के सिवा कुछ नहीं है।

योग, आध्यात्मिक तंत्र और रहस्यवाद के नाम पर निश्चित ही जालसाजियाँ हुई हैं, लोगों को बेवकूफ बनाया और अपना उल्लू सीधा किया गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि समूची गुह्य विद्याएँ ही झूठी और ठगी के लिए गढ़ी गई हैं। उन महात्मा की धारणा थी कि कुँडलिनी आदि का कोई अस्तित्व नहीं है। यह सिद्ध करने के लिए वे गंगा तट पर गए। एकाँत स्थान में अपने शिष्यों के साथ बैठे और इस विषय पर प्रवचन करने लगे। प्रवचन करते-करते उन्होंने गंगा की धारा में बहकर आता हुआ एक मुरदा देखा। अपने एक शिष्य से कहकर उसे खींचकर किनारे पर लगाया। कहने लगे कुँडलिनी के रूप में योग की कोई महान् शक्ति यदि शरीर के मूलाधार चक्र नामक स्थान पर विद्यमान है, तो उसका अस्तित्व दिखाई देना चाहिए। किसी-न-किसी रूप में तो वह मौजूद होगी। इतना कहकर स्वामी जी ने चाकू से मूलाधार चक्र वाला स्थान चीरा और शिष्यों को बताया, देखिए यहाँ कोई कुँडलिनी नहीं है।

बहुत लोगों की मान्यता है कि कुँडलिनी क्योंकि दिखाई नहीं देती, अतः उसका अस्तित्व नहीं है। इनमें आत्मिक दृष्टि से बड़ी ऊँचाई तक गए संत-महात्मा भी शामिल हैं। उनकी इस आध्यात्मिक स्थिति पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता, लेकिन उनकी अपनी प्रतीति नहीं है। वे इसे स्थूल रूप में देखना चाहते हैं, इसलिए कुँडलिनी के अस्तित्व से इनकार करते हैं, यह दृष्टिकोण गलत है।

परमात्मा की शक्ति का अनुभव विभिन्न लोगों को विभिन्न रूपों में होता है। जरूरी नहीं कि दो सिद्ध संतों को एक ही रूप में हो। यह अनुभूति इतनी भिन्न भी होती है कि दोनों के अनुयायी मिलें तो एक-दूसरे के इष्ट अभीष्ट को गलत ठहराने लगें। ईसा के अनुयायियों को नृत्य करते और मुरली बजाते श्रीकृष्ण गलत प्रतीक लग सकते हैं। बहुत से आलोचकों को श्रीकृष्ण का नटवर नागर रूप विलासी लोगों के मन की उपज ही लगता है, क्योंकि इस बहाने वे अपने मन की कुत्साओं पर आवरण डाल सकते हैं। मुहम्मद साहब के अनुयायियों को ईसा का उपदेश धर्म विरोधी ला सकता है कि अपने शत्रु को क्षमा कर दो। यह उपदेश तब धर्म विरुद्ध ही होगा कि कोई तुम्हारे बायें गाल पर थप्पड़ मारे, तो दायाँ भी उसके आगे कर दो। मुहम्मद साहब का धर्म तलवार का धर्म है और वह पापियों के प्रति .... को एक सीमा के बाद कमजोरी मानता है। कबीर के लिए तुलसी के राम ‘मन का भरम’ है, क्योंकि उनकी अनुभूति के अनुसार परमात्मा का सगुण साकार रूप है ही नहीं है। वह गुण और आकार से परे हैं, सीमा से भी परे। तुलसी के लिए धनुर्धारी राम परब्रह्म का ही स्वरूप हैं। आध्यात्मिक अनुभूतियों का स्वरूप व्यक्ति, स्वभाव और अंतस् की स्थिति के अनुसार अलग-अलग होता है। एक अनुभव के आधार पर दूसरे को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

कुँडलिनी शक्ति को भ्रम, भटकाव और ठगी का आधा बताने वालों के मन में इस विद्या के दुरुपयोग से जन्मा .... ही मुख्य रहा होगा। मध्यकाल से बीसवीं सदी तक गुह्य विद्याओं का जैसा दुरुपयोग हुआ, उसका एक शिकार कुँडलिनी शक्ति भी रही। अब भी लोग इसे आनन-फानन में जगा देने और देखते-ही-देखते महान् योगी बना देने का आश्वासन बाँटते घूमते हैं। इस तरह के दुरुपयोग या बाजारवाद से सावधान रहना चाहिए। यह मानकर चलना चाहिए कि कुँडलिनी ऊर्जा का विराट् सागर है, तो इसे घड़े में पानी भरने की तरह समेटा नहीं जा सकता, न ही अधिकार जताया जा सकता है।

कुँडलिनी के विषय में फैली दोनों तरह की भ्राँतियों का निराकरण होना चाहिए। वह न तो पाखंड, छलावा और कोरा रहस्यवाद है, न ही हाथ मिलाकर, सिर थपथपाकर किया जा सकने वाला शक्ति का विस्फोट। योग शास्त्रों और गुह्य विद्याओं के आधुनिक वैज्ञानिकों ने शरीर में जहाँ कुँडलिनी का वास बताया है, वह एक प्रतीक मात्र है। योग ग्रंथों और उपनिषदों में शरीर विज्ञान का जैसा चित्रण किया गया, वह सूक्ष्मशरीर का वर्णन है। स्थूलशरीर और उसके अंगों से तालमेल नहीं बिठाना चाहिए। उदाहरण के लिए, योग ग्रंथों में हृदय को सीने में उस स्थान पर बताया गया है, जहाँ छाती की अस्थियाँ मिलती हैं और उनके मिलन स्थल पर एक .... है, योगियों और रहस्यदर्शियों के अनुसार यह केंद्र समस्त भाव संवेदनाओं का केंद्र है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से इस मान्यता में कोई दम नहीं है। हृदय सीने के भाग में स्थित एक गुब्बारे जैसा माँस पिंड है। जो शरीर में रक्त संचार और शुद्धि का कार्य करता है, उसमें भाव संवेदना जैसी कोई गतिविधि ही नहीं है।

शरीर के जिस भाग में कुँडलिनी का वास बताया गया है, उसे भी इसी उदाहरण से समझना चाहिए। कुँडलिनी और हृदय आदि ही नहीं योग ग्रंथों में वर्णित सभी केंद्रों और मर्मस्थलों को भी इसी आधार पर देखना चाहिए। सूक्ष्मशरीर और उसके अंग-अवयवों को, स्थूलशरीर के अंग-अवयवों पर आधार स्थिति की तरह नहीं मानना चाहिए। वे आधार प्रतीक और संकेत मात्र हैं।

स्थूलशरीर और अस्तित्व की परवर्ती सत्ताओं के बारे में स्पष्ट हो जाने के बाद कुँडलिनी शक्ति का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। उपनिषदों में सबसे पहले इसका उल्लेख योगाग्नि के रूप में आया है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् में इसे योगाग्नि के रूप में निरूपित किया गया है। कठोपनिषद् में यमराज इस विद्या का उपदेश नचिकेता को देते हैं। वहाँ इसे अग्निविद्या और नाचिकेत अग्नि के रूप में बताया गया है। इसका संधान साधक के पाप-तापों को जलाकर राख कर देता है। वह अपने भीतर छाए आनंद को उद्घाटित कर लेता है। यमराज ने अग्नि विद्या का उपदेश देते हुए नचिकेता से कहा है कि यह तुम्हारे हृदय में ही निहित है। जिसके शरीर में यह अग्नि प्रज्वलित हो जाती है, उसके शरीर में न रोग होता है और न मन में क्षोभ। कहना न होगा कि अग्नि दिव्य स्तर की है। लौकिक जगत् में उपयोग की जाने वाली अग्नि से इसका संबंध प्रतीक और संकेत जैसा ही है। मनीषियों ने इसे ‘दिव्य अग्नि’ और ‘स्पिरिट फायर’ कहा है।

कुँडलिनी शक्ति को पश्चिम के तंत्रविदों ने सर्पेंट फायर और सर्पेंट पॉवर भी कहा है। यह कुँडलिनी शक्ति का ही अंग्रेजी अनुवाद है। ‘थियोसोफिकल सोसायटी’ की जननी मैडम ब्लैवटस्की कुँडलिनी को विश्वव्यापी विद्युतीय शक्ति या ‘कॉस्मिक इलेक्ट्रिसिटी’ कहा करती थी। उनके अनुसार यह ऊर्जा प्रकाश से भी तीव्र गति से बहती है। कुँडलिनी या दिव्य विद्युत की गति उन्होंने 5,55000 किलोमीटर प्रति सेकेंड बताई है, जबकि प्रकाश की गति 297000 किलोमीटर प्रति सेकेंड है। मैडम ब्लैवटस्की आज होतीं तो संभवतः कुँडलिनी शक्ति की गति को वैद्युतीय तरंगों में भी बतातीं।

जैन आचार्यों ने कुँडलिनी शक्ति का उल्लेख तेजोलेश्या के रूप में किया। आचार्यश्री महाप्राज्ञ के अनुसार यह शक्ति सूर्य के प्रतिनिधि की तरह मनुष्य के काय-कलेवर में विद्यमान रहती है। ब्रह्माँड में सूर्य जितना प्रचंड, ऊर्जावान् और अग्नि से भरा हुआ है, अंतर्जगत् का सूर्य भी अपने स्वरूप और स्थिति के अनुसार उतना ही प्रदीप्त है। तप, संयम और ध्यान-धारणा से तेजोलेश्या को प्रचंड-प्रदीप्त किया जा सकता है।

कुँडलिनी के पौराणिक और यौगिक रूपकों को साधना विज्ञान की आवश्यकता कहा जा सकता है। तथ्यों के निरूपण की यह अपनी शैली है। ऊर्जा का विराट् कुँड, सर्प, विद्युत, चक्र, नाड़ियाँ, सोई हुई सर्पिणी की फुफकार, अपनी पूँछ को मुँह में दबा और खुला रखकर मूलाधार चक्र पर लिपटी सर्पिणी, सुमेरु शिखर, अलग-अलग चक्रों की पंखुड़ियाँ, उनकी संख्या, विशिष्ट अक्षर, बीज शक्ति आदि पारिभाषिक पदों को उनके शब्दों से नहीं समझाया जा सकता। इन चक्रों के विवेचन में जाने से पहले कुँडलिनी महाशक्ति के सामान्य परिचय को ध्यान में रख लेना चाहिए।

संक्षेप में कुँडलिनी महाशक्ति विश्वव्यापी प्राण ऊर्जा या दिव्य शक्ति का वह अंग है, जो व्यक्ति की अपनी सत्ता में विद्यमान होता है। वह सक्रिय भी हो सकता है और प्रसुप्त या निष्क्रिय भी। यह ऊर्जा जिस अंश तक जाग्रत् अथवा सक्रिय रहती है, व्यक्ति उतना ही तेजस्वी, समर्थ और प्रतिभाशाली दिखाई देता है। थियोसोफिस्ट विद्वान् प्रो. हेनरी लिंडाल ने प्राण ऊर्जा को भौतिक जगत् में काम करने वाली विद्युत शक्ति के उदाहरण से समझाने की चेष्टा की है। उन्होंने लिखा है कि पृथ्वी के चारों ओर विद्युत चुँबकीय धाराओं का एक जाल-सा फैला हुआ है। तीन लाख वोल्ट से ज्यादा औसत सामर्थ्य वाले इस जाल या सागर का एक अंश प्रत्येक जीवधारी के हिस्से में आया है। यह अंश कुँडलिनी शक्ति के रूप में मेरुदंड में स्थित होता है।

मेरुदंड अर्थात् शरीर सत्ता का आधारभूत ढाँचा यदि यह नहीं हो तो शरीर लुँज-पुँज हो जाए। जीवन की सभी गतिविधियाँ ठप्प पड़ जाएँ। रेंगने वाले जीवों के अलावा सभी प्राणियों में मेरुदंड होता है। ध्यान रहे इस उल्लेख को स्थूल शरीर में पीठ के बीच रहने वाली रीढ़ की हड्डी से यथातथ्य जोड़कर न देखा जाए। वह संबंध एक अंश तक ही उपयुक्त है। प्रो. लिंडाल के अनुसार, जीवन के सामान्य क्रिया–कलापों में मानवीय विद्युत प्राण ऊर्जा अथवा दिव्य शक्ति का निरंतर व्यय होता रहता है। इस ऊर्जा का उद्गम स्रोत मस्तिष्क है। बिजलीघर की तरह इसी केन्द्र में प्राण ऊर्जा का उत्पादन, संचय और वितरण .... है, लेकिन यह केंद्र अपने आप में पूरा नहीं है। जब तक एक सूक्ष्म नाड़ी से शरीर सत्ता के निम्नतर भाग से जुड़ा होता है। यह नाड़ी सुषुम्ना कही जाती है। शरीर को काट-पीटकर इसे स्थूल आँखों से नहीं देखा जा सकता।

सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से प्राणशक्ति का संचित और सक्रिय कोष कामकेंद्र से जुड़ा होता है। मस्तिष्क में अथवा सहस्रार चक्र के इर्द-गिर्द लहराते सागर को कामकेंद्र में उठने वाले कंपन गतिशील करते रहते हैं। यों भी कह सकते हैं कि मस्तिष्क में उठने वाली तरंगें कामकेंद्र को चलित या शांत-संयमित करती रहती हैं। प्रो. लिंडाल लिखते हैं कि मस्तिष्क में स्थित केंद्र को उत्तरी ध्रुव मानें तो सुषुम्ना के आधार कामकेंद्र को उत्तरी ध्रुव कहा जा सकता है। नए जीवन की संरचना अथवा प्रजनन की .... इस केंद्र पर है। शरीर के अन्य अवयवों की .... हिस्सा ज्यादा संवेदनशील और सक्षम है। .... संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण होने के कारण शरीर में .... सुरक्षा पर भी सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है। .... वस्त्रों का आविष्कार किया और इन अंगों को .... और लज्जा ही .... इस क्षेत्र की सुरक्षा भी है।

थियोसोफी आँदोलन के प्रमुख विचारक और वैज्ञानिक सी.डब्लू. लेडबीटर ने लिखा है कि ब्रह्माँडव्यापी प्राण ऊर्जा या दिव्य विद्युत को मस्तिष्क में धारण करने के लिए जरूरी है कि उसे अधोगामी न होने दिया जाए। मस्तिष्क में संचित होने वाली ऊर्जा यदि काम-कौतुक में बहती रहे तो वह महाशक्ति जीवन में कभी कोई विशेषता नहीं ला सकेगी। वह शक्ति केवल कामकेंद्र से ही बरबाद नहीं होती, भोग और विलास के सभी क्षेत्रों से नष्ट होती है। जीवनचर्या में संयम और अनुशासन पर इसीलिए जोर दिया गया है।

जाग्रत स्थिति में कुँडलिनी व्यक्तित्व में ओजस् का प्राण प्रवाह उत्पन्न करती है। जाग्रत् और संचित प्राण ऊर्जा शरीर में सक्रियता और सामर्थ्य, मन में साहस, धैर्य और आत्मिक उत्कर्ष की संभावना साकार करती है। जिस व्यक्तित्व में ओजस् का प्राण प्रवाह उफनता रहता है,


बाह्य अभिव्यक्तियाँ (kahani)

जीवन भर कर्म में विश्वास रखने वाले बाल गंगाधर तिलक को जब अँग्रेजों द्वारा जेल में बंद कर दिया गया, तो उनने वहाँ भी ‘गीता रहस्य’ लिख डाला। परिस्थितियों के प्रतिकूल होते हुए भी ज्ञान व भक्ति की समन्वित धारा पर ऐसी विस्तृत समीक्षा युक्त विवेचना जेल में लिखी जाना उनकी आँतरिक परिपक्वता का ही चिह्न है।

अंतः से जब प्रभु के प्रति समर्पण का उल्लास फूटता है, तो वह यह स्वरूप भी ले लेता है और जब देशभक्ति के रूप में निकलता है, तो भगतसिंह आजाद जैसे फाँसी पर चढ़ जाने वाले वीर-बलिदानियों के त्याग-उत्सर्ग का स्वरूप ले लेता है। हैं ये सब विकास के क्रमिक सोपान व उनकी बाह्य अभिव्यक्तियाँ ही।


खोदी खाई को पाटना है-प्रायश्चित

कई बार ऐसा होता है जब मनुष्य जानबूझकर कुबुद्धिवश या फिर अनजाने में ही कुछ अनुचित कार्य कर बैठता है। ये बुरे कार्य न सिर्फ उसकी आत्मिक प्रगति एवं व्यक्तित्व के विकास में बाधक बनते हैं, अपितु उसकी भौतिक सफलताओं में भी अवरोध पैदा करते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है वह आत्मप्रताड़ना, जो अनैतिक और अवाँछनीय कार्य करने के कारण निरंतर अंतरंग में उठती रहती है। इस अंतर्व्यथा से मुक्त होने का एक ही मार्ग है प्रायश्चित।

दुष्कर्मों एवं कुविचारों के संस्कार एक प्रकार से विषैली परतों के रूप में चेतन मस्तिष्क एवं अचेतन मन पर जमते रहते हैं। कालाँतर में यही मन की चंचलता, उद्विग्नता, अस्थिरता, आवेश एवं विक्षोभ के रूप में प्रकट होते हैं और व्यक्ति को विक्षिप्त जैसा बना देते हैं। ऐसी दशा में किसी भी कार्य को एकाग्रचित्त होकर नहीं कर पाने के कारण उसे पग-पग पर असफल होना पड़ता है। उसके असंतुलित व्यवहार से संबंधित व्यक्ति असंतुष्ट होकर विरोधी बन जाते हैं। भटकता हुआ मन जीवन को कँटीली झाड़ियों में उलझा देता है, जहाँ केवल शोक एवं संताप ही दृष्टिगोचर होता है।

यही कारण है कि अपने अपराधों को स्वीकार कर उनके लिए प्रायश्चित करने की प्रथा सभी धर्मों में प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। पापों को प्रायश्चित के बिना मुक्ति तो दूर सामान्य सुखी-संतुष्ट जीवन भी संभव नहीं, इसीलिए प्रत्येक धर्म में’पाप के बोध’ को प्रमुख स्थान दिया गया है। यह बोध सिर्फ व्यक्ति की मनोवेदना या पश्चात्ताप तक सीमित नहीं है, अपितु किए गए अपराध का प्रायश्चित भी इसमें शामिल है। रास्ते में खाई खोदी गई है, तो उसके लिए सिर्फ पश्चात्ताप या वेदना प्रकट करने मात्र से कुछ नहीं होता वरन् उसे पाटने के लिए उतना ही प्रयत्न करना चाहिए, जितना खोदने के लिए किया गया था।

यहूदी तथा ईसाइयों में पापों का प्रायश्चित करने की .... इन धर्मों की स्थापना के साथ ही प्रारंभ हो गई थी। .... जगह-जगह पर इस भवन को जाग्रत् .... प्रयास किया गया है कि प्रत्येक यहूदी को अपने .... उन्हें स्वीकार करे और उसके लिए .... यहूदी अपने पापों को स्वीकार कर प्रायश्चित करने के लिए ‘याम किपूर’ की पूर्व संध्या से अगले दिन शाम तक प्रायश्चित संबंधी प्रार्थनाएँ तथा चिंतन-मनन करते हैं।

ईसाइयों में अपराध स्वीकार कर प्रायश्चित करने को ‘पाप स्वीकार संस्कार’ कहा जाता था। अब इस संस्कार को ‘पवित्रीकरण संस्कार’ कहा जाता है। ‘न्यू टेस्टामेंट’ में कई स्थानों पर पापों को स्वीकार करने की आवश्यकता व्यक्त की गई है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘कन्फेशन’ अर्थात् पाप स्वीकार कर प्रायश्चित के पश्चात् ही मुक्ति मिल सकती है।

मुसलमान भी अपने प्रतिदिन की नमाज में खुदा से अपने गुनाहों की माफी माँगते हैं। पारसी समुदाय के लोगों का मानना है कि पाप स्वीकार कर उसका प्रायश्चित कर लेने से मुक्ति मिल जाती है। बौद्ध भिक्षु भगवान् बुद्ध तथा धर्म-समुदाय के समक्ष माह में दो बार पापों को स्वीकार कर उनका प्रायश्चित करते थे।

हिन्दू धर्म में तो हर पाप का प्रायश्चित विधान निर्धारित है। उन्हें करके ही अवाँछनीय आचरणों की मलीनता से मुक्त हुआ जा सकता है। प्राचीनकाल में कहीं-कहीं अपराधियों को गाँव एवं जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था। उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता था। हत्या के अपराधियों को मुँह पर कपड़ा बाँधकर घर-घर जाकर भीख माँगनी पड़ती थी और उसी से अपना गुजारा करना पड़ता था। व्रत, तप, तीर्थयात्रा, दान-पुण्य, धर्मार्थ कार्य एवं दीन-दुखियों की सेवा-सहायता प्रायश्चित के ही अंग हैं।

अपने दोषों को स्वीकार करना, उसके लिए दुःखी होना, लज्जित होना और भविष्य में इस तरह की भूलों की पुनरावृत्ति न करना, यह मनोभूमि तो प्रायश्चितकर्त्ता की होनी ही चाहिए। एक तरफ प्रायश्चित की बात सोची जाए और दूसरी तरफ उन्हीं भूलों को दुहराते रहा जाए, तो प्रायश्चित का प्रयोजन ही नहीं रह जाता। सच्चे मन से किए गए प्रायश्चित से मन हलका हो जाता है और जीवन में सुख, शाँति एवं पवित्रता सहज ही परिवर्तन होने लगती है।


जैसे भी मिले, अनिवार्य है गुरु का आश्रय

गहन अर्थों में कोई भी मार्गदर्शक सत्ता दूसरे गुरु से भिन्न नहीं है। गुरु और शिष्य भी अलग-अलग नहीं है। उनका संबंध विद्युतधारा और बिजली के लैंप की तरह है। धारा प्रवाहित होती है, तो लैंप रोशनी देने लगता है। गुरु आध्यात्मिक शक्ति है और शिष्य उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम।

एक संन्यासी हुए हैं स्वामी निगमानंद। गृहस्थ जीवन से निवृत्त होने के बाद उन्होंने संन्यास लिया। आमतौर पर लोग घर-गृहस्थी छोड़कर संन्यास लेते हैं या पारिवारिक दायित्व सिर पर आने से पहले ही हरिद्वार, ऋषिकेश, काशी, प्रयाग, पैठण, काँची, रामेश्वरम् आदि तीर्थों में भाग जाते हैं। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की मृत्यु के बाद संन्यास लिया। पत्नी के रहते उनके मन में अध्यात्म की लवलेश झलक भी नहीं दिखाई देती। पत्नी भी औसत स्तर की गृहिणी थी। सामान्य स्त्रियों में पूजा-पाठ और व्रत-उपवास के प्रति जितनी रुचि हो सकती थी, उसमें थी। दोनों बहुत प्रेम और लगाव से रहते थे। पति कुछ ज्यादा ही आतुर अनुरागी थे। विवाह के बारह वर्ष बाद तक संतान नहीं हुई। परिवार में दोनों ही थे। तीस वर्ष की उम्र में पत्नी को किसी रोग ने आ घेरा और वह चल बसी।

पत्नी के निधन ने पति को बरी तरह आहत कर दिया। लगा कि संसार में कुछ रहा ही नहीं है। जीने का कोई उद्देश्य और अर्थ नहीं बचा। एक बार मन में आया कि पत्नी की चिता के साथ खुद भी जल मरें, लेकिन पत्नी का शव जलाने की भी हिम्मत नहीं हुई। आसक्ति इतनी प्रगाढ़ थी कि उसे सामने रखकर धूनी रमाए से बैठे रहे। स्वजन-संबंधियों ने समझा-बुझाकर और कुछ जोर-जबर्दस्ती दिखाकर अंत्येष्टि की। पति ने पत्नी का शरीर जलते देखा और अंतस् में जैसे क्राँति घटित हो गई। उठती हुई लपटों के साथ पत्नी की विभिन्न मुद्राएँ स्मृतिपटल पर आ गईं। उठना-बैठना, बात करना, प्रेम जताना, हँसना, गाना और कामकाज करना सभी याद आने लगा। इन घटनाओं के उभरने के साथ ही यह बोध जागा कि पत्नी मरी नहीं है। शरीर जला है, लेकिन यह शरीर पत्नी का नहीं था। अस्तित्व का कोई और तल था, जो पत्नी की तरह व्यवहार करता था।

वह कौन-सा-स्वरूप था? सोचने-समझने में देर लग सकती है, लेकिन स्मृति में चमक की तरह कौंध जाने में क्षणभर भी नहीं लगा। उस स्मृति के साथ ही बोध जागा और संकल्प उठा कि पत्नी के शाश्वत रूप की खोज करनी चाहिए। इस संकल्प ने उन्हें संन्यास की प्रेरणा दी। पत्नी का ध्यान किया, स्मरण किया, मंत्र जपा, चिंतन-मनन में उतरे। कोई भक्त अपने इष्ट-आराध्य को जिस आतुरता से पुकारता है, इसे ही व्यग्र भाव से उन्होंने ‘पत्नी’ की साधना की। माता-पिता-गुरु और संत की आराधना-उपासना कर हजारों साधक मुक्ति के लक्ष्य तक पहुँचे होंगे। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की आराधना की और सिद्ध स्तर पर पहुँचे। पश्चिम बंगाल के नदिया क्षेत्र में हुए इस संन्यासी को लोगों ने नहीं स्वीकारा, लेकिन स्वामी निगमानंद ने इसकी कभी चिंता नहीं की। वे कहते थे पत्नी के प्रेम ने उन्हें लौकिक दुःखों और अपेक्षाओं से मुक्त कर दिया। परमेश्वर का कोई और रूप दूसरों के लिए आराध्य होगा, मेरे लिए तो पत्नी ही ईश्वर रूप है। वही परमात्मा है। बाद में उन्होंने आश्रम भी बनाया और साधकों को योगभक्ति की शिक्षा दी।

किसी ने आशंका जताई कि पत्नी भी परमात्मा हो सकती है भला? पुत्र में परमात्मा के दर्शन किए जा सकते हैं। जैसे कौशल्या और यशोदा द्वारा, तो पत्नी के रूप में ईश्वर को क्यों नहीं देखा जा सकता? पति के माध्यम से परमात्मा को प्रकट किया जा सकता है, जैसे कि अनुसूया, सावित्री, राधा आदि ने स्वामी भाव से पति की आराधना की और जगन्नियता की झलक देखी, तो स्वामी निगमानंद ने ही कौन-सा अनर्थ किया।

किसी भी माध्यम से परमात्मसत्ता तक पहुँचने के मार्ग को मनीषियों ने गुरु-शिष्य संबंध के रूप में देखा है। गुरु एक माध्यम होता है। उसके व्यक्तित्व में विराट् ब्रह्म की झाँकी देखी जाती है, तभी दिव्यभाव प्रकट होता है। ज्यादातर मामलों में गुरु एक निमित्त कारण होता है। संभावनाएँ वस्तुतः अपने भीतर से ही प्रकट होती हैं। स्वामी निगमानंद के अनूठे प्रसंग में पत्नी एक साधारण स्त्री थी, लेकिन साधक संन्यासी के लिए वह एक निमित्त ही सिद्ध हुई। संभावनाएँ स्वयं स्वामी निगमानंद में थीं। एक अवलंबन पाकर वे प्रकट हो गईं।

बहुत बार गुरु साधारण स्थिति में होते हैं और शिष्य उनसे आगे बढ़ जाते हैं। यह मानें कि गुरु ही ऊर्जा और संभावना का स्रोत है, तो शिष्य को उनसे आगे नहीं निकलना चाहिए, लेकिन नियम यह है कि व्यक्ति स्वयं अपनी ही सीमाओं का अतिक्रमण करता है। मार्गदर्शक सत्ता रास्ता दिखाती है और कभी-कभार उत्प्रेरक का काम करती है। श्री अरविंद का उदाहरण प्रत्यक्ष है। उन्होंने महाराष्ट्र के योगी लेले से साधना सीखी थी। उसी का अभ्यास करते आँतरिक स्थिति के बारे में किसी को विशेष जानकारी नहीं है।

गुरु से तिरस्कार और प्रताड़ना भी मिलती है। बहुत बार वे द्वार पर शिष्य भाव से आए साधक को स्वीकार नहीं करते। जैसे द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाई। उसके माध्यम से अपनी अंतर्निहित संभावनाओं का आह्वान किया और गुरु के संकल्प का अतिक्रमण कर अर्जुन से भी बड़ी सिद्धि प्राप्त कर ली। उपनिषदों में आरुणि, श्वेतकेतु, सत्यकाम आदि शिष्यों का उल्लेख मिलता है। गुरु ने इन्हें कभी सामने बिठाकर विद्या नहीं सिखाई, न ही साधन-अभ्यास कराया था। व्यवहार में मार्गदर्शक सत्ता से उपेक्षा मिलने पर भी इन ऋषिकुमारों के मुखमंडल ब्रह्मतेज से चमकते रहते थे। कबीर प्रसंग तो इतिहास में भी शामिल है। स्वामी रामानंद ने उन्हें मंत्रदीक्षा देने से मना कर दिया। काशी के घाट पर वे योजना बनाकर गुरु के पाँवों तले आए। गुरु ने किसी व्यक्ति पर पैर पड़ते देखा, तो ‘राम’ ‘राम’ कह उठे। कबीर ने उसे ही गुरुमंत्र मान लिया। राम नाम जपकर निर्गुण ब्रह्म की अनुभूति के स्तर तक पहुँच गए।

गुरु अपने भीतर ही विद्यमान है। परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि इस सद्गुरु की शरण में जाएँ और सर्वतोभावेन समर्पण करें। समर्पण हो जाए तो भीतर सोया पड़ा बीज टूट जाता है और उसमें निहित आत्मतत्त्व प्रकट होने लगता है। बाहर दिखाई देने वाली मार्गदर्शक सत्ता अपने भीतर विद्यमान सद्गुरु का ही प्रतिबिंब है, लेकिन कई बार ऐसी विभूतियाँ भी संसार में आती हैं, जो समय से पहले ही संभावनाएँ प्रकट कर देती हैं। उनमें सामर्थ्य होती है। संकल्प और स्पर्श मात्र से वे साधक को परम लक्ष्य तक पहुँचा देती हैं। ज्ञात इतिहास में इस तरह की दीक्षा देने वाले गुरुओं में आदि शंकराचार्य का नाम आता है। उन्होंने पद्मपाद, गोरक्ष, सुरेश्वर और हस्तामलक नामक शिष्यों का संकल्प मात्र से उद्धार कर दिया था। अपने पुरुषार्थ से प्रयत्न करते तो इन शिष्यों को आठ से बारह जन्म और लेने पड़ते। लेकिन आदि शंकर ने अपनी अलौकिक क्षमता से समय के पूर्व ही उन्हें परम स्थिति में पहुँचा दिया। यह बात अलग है कि इन विभूतियों को धर्म-संस्कृति के पुनरुत्थान का दायित्व भी सौंपा। कहा कि मुक्ति अनायास ही नहीं मिली है। अनुग्रह का मूल्य चुकाना पड़ेगा। वह गुरु के अधूरे कार्य को पूरा करने के रूप में होगा।

पिछली शताब्दी में स्वामी रामकृष्ण परमहंस उस स्तर की समर्थ मार्गदर्शक सत्ता हुई, जिसने शिष्यों को समय से पहले ही समाधि के लक्ष्य तक पहुँचाया। नरेंद्रनाथ दत्त स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास जाया करते थे। अध्यात्म, ईश्वर, भक्ति, ज्ञान और विद्या की बातें सुन-सुनकर एक दिन उन्होंने यही पूछा था कि क्या आपने ईश्वर को देखा है। गुरु ने ‘हाँ’ या ‘न’ में उत्तर दिया। प्रतिप्रश्न किया कि “तुम देखना चाहते हो?” इसके बाद गुरु और शिष्य में संवाद या व्यवहार का जो क्रम चला, उसकी परिणति नरेंद्र का क्षुद्र अहं ब्रह्म के विराट् सागर में डूब जाने के रूप में ही हुई। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने पाँव के अँगूठे से नरेंद्र का स्पर्श किया और शिष्य की समाधि खुली। जब समाधि खुली तो गुरु ने कहा, तुम्हें इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करनी थी, लेकिन चालीस वर्ष की आयु पूरी होने पर। माँ का आदेश था, सो समय से पहले झलक दिखा दी। अब पुनरावृत्ति नहीं होगी। समाधि बंद और चाभी मेरे पास। अब यह उपयुक्त समय आने पर ही सौंपी जाएगी।

कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद इस प्रतिबंध को यकायक झेल नहीं पाए। वे चीख उठे! गुरु से बहुत अनुनय-विनय की, लेकिन मार्गदर्शक सत्ता ने जरा भी रियायत नहीं की। कहा, माँ का आदेश है कि उसका यंत्र बनो। उसके यंत्र बनोगे तभी मुक्ति मिलेगी। स्वामी विवेकानंद ने अपने आपको गुरु के कार्य के लिए समर्पित किया। समाधि की प्रथम झलक मिलने के बाद उनके चित्त में व्यग्र भाव निरंतर बना रहा। वे अंत तक बेचैन रहे। जैसे किसी नाग से मणि छीन ली गई हो और वह उसे पाने के लिए छटपटाता घूम रहा हो। वैसा ही आवेग स्वामी विवेकानंद के कार्यों में भी था। उनके प्रवचनों में भी कहीं-कहीं यह आवेग दिखाई देता है। लगता है कि एक भाव ठीक से व्यक्त नहीं होता और दूसरा उसके पीछे दौड़ा चला आता है। यह आवेग गुरु की दिखाई झलक को वापस पाने के लिए ही था। अपना मिशन पूरा हो जाने के बाद स्वामी विवेकानंद के चित्त में थोड़ी शाँति आई। रहस्यदर्शियों का कहना है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस अशरीरी रूप में उस समय शिष्य के पास आए थे और मृत्यु से कुछ पहले ही समाधि पर पड़ा परदा उठाया था।

इस शताब्दी में परमपूज्य गुरुदेव के कितने ही शिष्यों को उनके सान्निध्य में विलक्षण अनुभूतियाँ हुई हैं। परिजनों के लौकिक दायित्व पूरे होने और स्वयं को गुरुदेव के काम में नियोजित कर देने वाले अनुभवों का एक अंबार है। वैसा अनुग्रह सौभाग्यशाली साधकों को ही मिलता है। गुरुदेव कहा करते थे कि पात्रता विकसित करने के रूप में वह सौभाग्य साधक को स्वयं ही प्राप्त करना पड़ता है। पात्रता नहीं हो तो मेज, कुरसी, कलम, आसन और दैनंदिन उपयोग की वस्तुओं के अलावा आस-पास रहने वाले दृश्य-अदृश्य जीव-जंतुओं की तरह कोई लाभ नहीं उठाया जा सकता।

समर्थ मार्गदर्शक सत्ता का मिल जाना ईश्वर का अनुग्रह है, लेकिन इस तरह का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना उपयुक्त नहीं हैं गुरु नहीं मिले, तो उनका आविष्कार कर लेना चाहिए। दत्तात्रेय ने अपने लिए चौबीस गुरुओं का आविष्कार किया था। अपने आस-पास की वस्तुओं, व्यक्ति और विषयों का अवलोकन करें, तो उनसे पर्याप्त प्रकाश ग्रहण किया जा सकता है।

इन दिनों पाखंडी गुरुओं और धर्मध्वजी लोगों की बड़ी चर्चा होती है। यह भी कि उन्होंने शिष्यों को लूटा, उन्हें धोखा दिया और उनका अहित किया। यह एक सामाजिक समस्या है। धर्मक्षेत्र में घुसपैठ कर जाने वाले धूर्त गुरुओं से बचाव के प्रयत्न चलें। उन ढोंगी गुरुओं को बेनकाब किया जाए, लेकिन सामाजिक स्तर पर ही। जिन्हें अपने आत्मकल्याण की इच्छा है। इन्हें इस तरह की समीक्षा, आलोचना से बचने की सलाह दी गई है। स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने कहा है कि अध्यात्म पथ के पथिकों को किसी भी गुरु की निंदा-आलोचना से बचना चाहिए। उन्हें छोटा, बड़ा, महान् या अधम कहना व्यर्थ है। गुरु की शिक्षाओं के सार और मानदंड भिन्न हो सकते हैं। उनके व्यक्तित्व और जीवन में त्रुटियाँ भी हो सकती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि मैं अपने गुरु की देव पूजा करूं और दूसरों के गुरु की धज्जियाँ उड़ाऊँ। आपको केवल इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि साधक के जीवन में गुरु का विधायक योगदान क्या और कितना है।

सदा ही और सभी स्थानों पर किसी-न-किसी स्तर की मार्गदर्शक सत्ताएँ सतत निवास करती हैं। सूर्य नहीं होगा, तो चंद्रमा का प्रकाश रहेगा, वह भी नहीं होगा, तो तारे टिमटिमाकर अपनी रोशनी बिखेर रहे होंगे। उनकी सहायता के लिए जुगनू, दीपक, मोमबत्तियाँ और कम-ज्यादा रोशनी वाले लैंप लगे होंगे। आशय यह है कि प्रकाश सर्वत्र उपलब्ध है। इन सबमें से किसी का अस्तित्व ‘नहीं हो तो आँखें स्वयं अंधकार की अभ्यस्त हो जाती हैं। घटाटोप अँधेरे में कुछ देर तक ही सब कुछ स्याह होता है। धीरे-धीरे आँख के अलावा हाथ, पाँव और त्वचा सहित समस्त इंद्रियाँ अनुभव करने लगती हैं। प्रकाश की यह अनुभूति ही आवश्यकता और स्थिति के अनुसार गुरु का प्राप्त होना है।

अपने गुरु की पूजा तो की जाए, दूसरे के गुरु का भी आदर-सम्मान किया जाए। कम-से-कम उनमें दोष तो नहीं ही देखे जाएँ। साधक के लिए यह आवश्यक है। साधना विज्ञान का मर्म समझाने वालों के लिए तो यहाँ तक कहा गया है कि वे रोगी और धूर्त गुरुओं की निंदा से भी बचें। उनके अनुसार कोई भी गुरु ढोंगी अथवा झूठा नहीं होता है, क्योंकि प्रत्येक गुरु का आध्यात्मिक उत्थान में योगदान होता है। वह योगदान कितना ही तुच्छ क्यों न हो। यह निर्देश आत्मिक विकास की उच्च कक्षा में पहुँच रह साधकों के लिए है।

गहन अर्थों में कोई भी मार्गदर्शक सत्ता दूसरे गुरु से भिन्न नहीं है। गुरु और शिष्य भी अलग-अलग नहीं हैं। उनका संबंध विद्युतधारा और बिजली के लैंप की तरह है। धारा प्रवाहित होती है, तो लैंप रोशनी देने लगता है। गुरु आध्यात्मिक शक्ति है और शिष्य उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम।

अनुग्रह के रूप में मिली हो या मार्गदर्शक सत्ता का आविष्कार किया गया हो, वह दो स्तर पर काम करती है। एक स्तर बाहर से काम करता दिखाई देता है और दूसरा रूप साधक को भीतर से साधता है। इसे कबीर ने कुम्हार द्वारा घड़े बनाने के रूपक से भी समझाया है। मिट्टी के लौंदे को फुलाते समय कुम्हार एक हाथ से घड़े को सँभालता है और दूसरे से थापियाँ मारता है। बाहर लगाई गई थापियाँ घड़े को मजबूत बनाती हैं, जबकि भीतर से सहलाता हुआ हाथ उसे विस्तार देता है। यह प्रक्रिया मिट्टी के एक मामूली से लौंदे को पात्र में बदल देती है। गुरु भी शिष्य को इसी तरह सहलाता और आकार देता है। दृष्टांत अधूरा है। थापकर और सहलाकर गुरु शिष्य को अपने समान ही बना लेता है।


दान का मर्म

महाराज धर्मध्वज जितने शूरवीर व नीतिकुशल थे, उतने ही धर्मपरायण एवं ईश्वरभक्त भी थे। वह नित्यप्रति नियम से देवमंदिर में भगवान् का पूजन-अर्चन किया करते थे। अपनी भगवत्पूजा के बाद ऋषि-मुनियों व ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणों को दान देना भी उनकी नियम-निष्ठा में शामिल था। उनकी सात्विक भावनाएँ, सुपात्रों एवं सत्पात्रों की सहायता करने की चाह ही इस नित्यप्रति दान का कारण थी। किसी भी फलाकाँक्षा का दोष उनके इस श्रेष्ठ कर्म में नहीं था। एक दिन हठात् उन्हें कोई आवश्यक कार्य आ गया। राजधानी से बाहर जाने की अनिवार्यता को समझकर उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र आर्यध्वज को बुलाकर कहा कि पुत्र! मैं आवश्यक कार्य से एक दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ। कल का समूचा काम तुम्हें करना है। आर्यध्वज ने इसे सहर्ष स्वीकार कर अपने पिताश्री को निश्चिंत कर दिया।

अगले दिन भोर होते ही राजकर्मचारियों ने आकर कहा कि युवराज दान देने का समय हो गया है। ऋषि-मुनि तथा ब्राह्मण लोग दरवाजे पर दान लेने के लिए खड़े हैं। युवराज ने बाहर आकर सभी का अभिवादन किया तथा कहा कि आप लोग मेरे पिताश्री से सदैव दान लेते आ रहे हैं। आज पिताश्री आवश्यक कार्यवश बाहर गए हैं। अतः यह काम मुझे करना है। मगर मेरे मन में एक जिज्ञासा है, कृपा करके उसका समाधान कर दें, तो मुझे दान देने में सुगमता रहेगी।

दान लेने आए सभी जनों ने युवराज से अपना प्रश्न प्रस्तुत करने के लिए कहा। इस पर आर्यध्वज बोला, आप सब मुझे यह बताएँ कि दान देने व नहीं देने का क्या फल होता है? युवराज का यह सवाल सुनकर सभी चुप साध गए। किसी के पास कोई सटीक उत्तर नहीं था। इस पर युवराज आर्यध्वज ने कहा कि बिना अपने प्रश्न का उत्तर पाए मैं किसी को कोई दान नहीं दूँगा। सभी याचक लोग निराश लौट गए।

दूसरे दिन जब महाराज धर्मध्वज लौटकर आए। तब यह सुनकर कि बेटे ने ब्राह्मणों को दान नहीं दिया, उनका मन क्षुब्ध हो गया। युवराज ने देखा कि पिताश्री को मेरे इस कार्य से दुःख हुआ है। तब उसने महाराज से बड़ी ही शालीनता से कहा, पिताजी! कोई भी काम का परिणाम जाने बिना उसे करना मैंने उचित नहीं समझा। मेरे इस विचार में यदि कोई खोट हो तो मुझे दंड दें।

धर्मध्वज ने कहा, बेटा! छान देने व नहीं देने से क्या फल होता है, यह तो मुझे भी मालूम नहीं है। मैं तो परंपरा से चली आ रही रीति का पालन करता आ रहा हूँ। युवराज ने कहा, तब तो यही अच्छा रहेगा कि मैं पीढ़ियों और परंपरा से निभाए जा रहे इस दान कर्म की सचाई का पता लगाऊँ। और जैसे-तैसे महाराज को राजी कर, उनका आशीष ले वह समाधान की खोज में चल पड़ा।

सबसे पहले वह पड़ोसी राजा के राज्य में गया। वे उसे कोई समाधान नहीं दे सके। उलटे उससे समाधान पाने हेतु अपना एक प्रश्न उसे और बता दिया। उन्होंने कहा, युवराज! तुम जिस तरह समाधान पाने के लिए व्यथित हो रहे हो, उसी तरह मेरे यहाँ भी संतान होते ही मर जाती है, इस कारण मैं भी बहुत दुःखी रहता हूँ। मेरी संतान कैसे जीवित रह सकती है? यदि इस प्रश्न का तुम समाधान बता सको, तो मैं तुम्हारा उम्रभर ऋणी रहूँगा।

युवराज आर्यध्वज उनको सहायता का वचन देकर आगे बढ़ चला। चलते-चलते शाम को वह एक खेत के पास पहुँचा। वहाँ एक बूढ़ा आदमी बैठा खेत की रखवाली कर रहा था। युवराज ने सोचा, आज रात यहीं विश्राम कर लिया जाए। यह सोचकर वह बूढ़े के पास आया और रात्रि विश्राम की याचना की।

बूढ़े ने देखा कि वेश-भूषा एवं बोल-चाल से यह लड़का कोई उच्च कुल का सा मालूम पड़ता है। उसने पूछा, बेटा तुम कौन हो, किस कारण अकेले घूम रहे हो? आर्यध्वज ने उसे समूची बात बता दी तथा उस बूढ़े से कहा, क्या आप हमारे इस कार्य में कुछ मदद कर सकते हैं? बूढ़े व्यक्ति ने कहा, बेटा! तुम उज्जैन चले जाओ। उज्जैन के राजा वीर विक्रमादित्य बहुत बुद्धिमान् तथा शिवभक्त हैं। उनपर भगवान् महाकालेश्वर की अपार कृपा है। वही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जो तुम्हारी समस्या का समाधान कर सकते हैं।

इतने में उस बूढ़े की स्त्री घर से भोजन लेकर आ गई। बूढ़े व्यक्ति ने युवराज से उसका परिचय कराया। बुढ़िया घर से चार रोटी बनाकर लाई थी। बूढ़े ने कहा, दो रोटी इस लड़के को दे दो, एक-एक रोटी हम दोनों खा लेंगे। बुढ़िया बहुत कलहकारिणी थी। वह सुनते ही उबल पड़ी, कहने लगी, तुम्हारा तो यह रोज का धंधा है। कोई-न-कोई रोज आता ही रहता है। कभी भी सुख की रोटी न तुम खाते हो और न मुझे खाने देते हो। इस पर चुपचाप बूढ़े ने अपने हिस्से की दो रोटियाँ आर्यध्वज को दे दीं। आर्यध्वज ने कहा, बाबा! यह कैसे हो सकता है। आप भूखे रहें और मैं भोजन करूं। बूढ़े ने कहा, बेटा! अतिथि भगवान् का रूप होता है। तुम निस्संकोच भोजन कर लो। मगर आर्यध्वज किसी भी हालत में राजी न हुआ। आखिरकार दोनों ने एक-एक रोटी खाई और तीनों आराम से सो गए।

आधी रात को बिल में से एक साँप ने निकलकर उस बूढ़े को डंस लिया तथा बूढ़े की मृत्यु हो गई। सुबह हुआ तो लड़के ने उठकर देखा कि बूढ़े के बगल में एक विषधर सर्प बैठा है और बूढ़े के मुँह से झाग निकल रहे हैं। लड़के को उठा देखकर सर्प भागा। लड़का भी साँप के पीछे-पीछे भागा। इतने में बुढ़िया भी जाग गई। बुढ़िया ने देखा कि बूढ़ा मरा पड़ा है तथा लड़का भाग रहा है। उसने सर्प को तो देखा नहीं था, उसने यही समझा कि मेरे पति को मारकर लड़का भाग रहा है। बुढ़िया भी उस लड़के के पीछे भागने लगी। रास्ते में एक पत्थर पड़ा था। उससे ठोकर लगी और बुढ़िया गिरी, तो उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

उस बूढ़े के द्वारा पहले बताए अनुसार आर्यध्वज उज्जैन नगरी में पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने वीर विक्रमादित्य को अपना परिचय दिया और समस्याएँ बताईं। साथ ही यह भी कहा, महाराज! मैंने यह भी सुना है कि आप बहुत बुद्धिमान् हैं तथा महाकाल भगवान् शिव के अनन्य भक्त हैं। आप ही हमारी इन समस्याओं का समाधान बता सकते हैं। विक्रमादित्य ने उसे उपयुक्त आश्वासन देकर अतिथिगृह में ठहरा दिया।

अगले दिन ब्रह्ममुहूर्त में महाराज विक्रमादित्य ने जब भगवान् महाकाल का पूजन करके ध्यान किया, तो उन्हें प्रेरणा मिली। उन्होंने युवराज को बुलाकर कहा, घर से निकलकर तुम जिस पड़ोसी राजा के पास गए थे। उन्हीं के पास वापस जाइए। पिछले जन्म में उनसे कुछ दुष्कर्म हुए हैं, उसके प्रायश्चित के लिए उन्होंने दान आदि ठीक ढंग से नहीं किए हैं। पर महाराज .... ! युवराज आर्यध्वज अभी कुछ कह पाते, इसके पहले उन्हें टोकते हुए विक्रमादित्य बोले, “द्रव्यदान ही सब कुछ नहीं है। उन्हें किसी पुण्य प्रयोजन के लिए श्रमदान करना पड़ेगा। शरीर से किए गए बुरे कामों का प्रायश्चित शरीर से अच्छे कर्म करने पर ही होता है। अपने पूर्वकृत पापों से मुक्त होने पर ही उन्हें पुत्र होगा। तुम्हारी समस्या का समाधान वह पुत्र ही करेगा।”

आर्यध्वज लौटकर उस राजा के पास आया। आकर उसने राजा को सारी बातें बताईं। राजा ने अपने राज्य के मनीषियों को बुलाकर सलाह की कि कौन-सा पुण्य कर्म श्रेष्ठ होगा। सभी ने विचारमंथन के पश्चात् कहा, “शिक्षा एवं चिकित्सा ही श्रेष्ठ कार्य हैं।” राजा ने उनकी बात मानकर चिकित्सालय एवं विद्यालय की उपयुक्त व्यवस्था की। इनके निर्माणकार्य में अपना भी पसीना बहाया। इन कार्यों के साथ ही राजा की भगवद् आराधना भी चलती रही।

और सचमुच इस अचूक दान के प्रभाव से अबकी बार रानी को जो शिशु हुआ, वह जीवित रहा, जबकि इसके पहले बच्चा पैदा होते ही मर जाता था, लेकिन यह बालक तो बीतते दिनों के साथ और भी स्वस्थ-सतेज होता गया। अब तो नगर निवासियों के साथ स्वयं राजा को भी यह विश्वास हो गया कि प्रभुकृपा से यह लड़का बच जाएगा। दिन बीते, मास बीते और इसी तरह दो वर्ष भी बीत गए। अब तो लड़का बोलने भी लगा। उसकी कुशाग्र प्रतिभा असाधारण थी, पर अभी भी सबको संदेह बना हुआ था कि भला यह नन्हा-सा बालक युवराज की समस्या का क्या समाधान करेगा।

लेकिन वीर विक्रमादित्य के कहे अनुसार युवराज को बुलाया गया। युवराज के सम्मुख आने पर उस नन्हें राजपुत्र ने परिचितों का सा व्यवहार किया। आप सब लोग स्नान करके आएँ, साथ ही दो मंचों की व्यवस्था की जाए। वहीं बैठकर ही मैं युवराज के प्रश्नों का समाधान करूंगा। उस छोटे-से दो वर्षीय शिशु के कहे अनुसार सारी व्यवस्था जुटाई गई। नगर निवासी भी अपनी आकुलता न रोक सके। मंचों के आस-पास भारी भीड़ जमा हो गई। सभी लोग उपयुक्त स्थान पर आसीन हुए। विशेष तौर पर बनाए गए दो मंच अभी भी खाली थे।

सबकी आकुलता समाप्त करते हुए एक मंच पर वह नन्हा राजपुत्र आसीन हुआ। दूसरे मंच पर बिठाने के लिए उसने जो कुछ भी कहा, वह तो और भी चकित करने वाला था। उसने कहा कि इसी नगर में चर्मकार चन्ना के घर में एक सुअरी के अभी-अभी एक संतान हुई है। उस नवजात शूकरी को आप लोग ले आएँ और उसे इस खाली मंच पर बिठाएँ। तभी प्रश्न का समाधान हो सकेगा।

राजा के कर्मचारी उस नवजात शूकरी को ले आए और उसे एक मंच पर बिठा दिया गया। राजपुत्र ने युवराज से कहा, अब आप अपनी समस्या कहें। इस पर युवराज आर्यध्वज ने अपना प्रश्न फिर से दुहरा दिया कि दान देने व ने देने से क्या होता है?

इस पर शिशु राजपुत्र ने कहना शुरू किया, युवराज! दान तीन तरह के होते हैं, अंशदान, समयदान व श्रमदान। अपनी धन-संपत्ति का एक अंश देना, उसे पुण्य-प्रयोजन में लगाना अंशदान है। अपनी प्रतिभा एवं समय का पुण्य कार्य में नियोजन समयदान कहा जाता है और अपनी सामर्थ्य एवं प्रतिभा के साथ दैहिक श्रम का नियोजन ही श्रमदान माना जाता है। इसमें श्रमदान का पुण्य तो आपने परख लिया। इसी के बल पर मेरे पिता महाराज को संतान की प्राप्ति हुई।

इसी के साथ अपना एक रहस्य मैं स्वयं ही आपको बताता हूँ। आप अपने प्रश्न के समाधान की तलाश करते हुए जिस बूढ़े एवं बुढ़िया से मिले थे। हम दोनों वही हैं। मैं पिछले जीवन में रोज ही कुछ-न-कुछ दान करता रहता था। श्रम, समय एवं सामर्थ्य के किसी-न-किसी हिस्से को पुण्य प्रयोजन में लगाना ही मेरा व्रत था, पर मेरी पत्नी मेरे इस कार्य की सख्त विरोधी थी। मेरे दान में हर समय बाधा उत्पन्न करती, कलह करने लगती। अपने इसी कार्य एवं प्रवृत्ति के कारण उसे शूकरी का जन्म लेना पड़ा है। मैं अपने दान के प्रभाव से ही इस राजकुल में उत्पन्न हुआ हूँ और अपनी मानसिक निर्मलता के कारण ही मुझे पूर्व जन्म का स्मरण भी है। सभी ने देखा उस नवजात शूकरी की आँखों से आँसू झर रहे थे, जबकि नन्हें राजपुत्र के मुख पर सत्य का तेज था। यह प्रकट प्रमाण देखकर सभी के साथ युवराज आर्यध्वज को दान का मर्म ज्ञात हो गया।


मोह बड़ा प्रबल है (kahani)

एक बार एक मित्र ने सर जान हर्शल नामक प्रख्यात पाश्चात्य विद्वान से प्रश्न किया, “आपको सृष्टि में सर्वोत्तम वस्तु कौन-सी लगी?” तो उन्होंने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “भाँति-भाँति के संयोग-वियोग आए, पर वह दृढ़तापूर्वक मेरे साथ जीवन के सुख और आनंद का झरना बना रहे। मेरे खिलाफ हवा चले, लोग मुझे बुरा कहें, धिक्कारें, रास्ता रोकें, उस समय मुझे बेपरवाह बना दें। जीवन में दुःखों से मेरी ढाल बन जाए। ईश्वर से प्रार्थना करने का अवसर मुझे मिले, तो मैं निवेदन करूंगा, हे प्रभु! मुझे विद्या पढ़ते रहने की रुचि दें। ज्ञान के धार्मिक महत्त्व को घटाए बिना यहाँ मैंने केवल उसके साँसारिक लाभ बताए हैं। विद्या की अभिरुचि कैसी आनंददायिनी है, संतोष का कैसा उन्मुक्त साधन है, इतना ही मैंने यहाँ स्पष्ट किया है।”

स्वर्गलोक में हलचल मच गई। स्वर्ग की शासन-व्यवस्था लड़खड़ा रही थी। विष्णु भगवान् हिरण्याक्ष वध के लिए वाराह रूप बनाकर धरती पर आए। प्रयोजन भी पूरा किया, किंतु यहीं रम गए, वापस लौटे नहीं। एक-एक करके देवता आए और वापस चलने का अनुरोध करने लगे, किंतु वाराह को कीचड़ में लोटना और परिवार के साथ रहना इतना सुहाया कि वे स्वर्ग लौटने को सहमत न हुए। बारी-बारी आए देवताओं को निराश होकर लौटना पड़ा। व्यवस्था बिगड़ते देखकर क्रुद्ध शिवजी ने वापस लाने का जिम्मा उठाया। वे आए और वाराह से लौटने और निर्धारित उत्तरदायित्व को निभाने की बात कहने लगे। इसका भी उन पर कोई प्रभाव न पड़ा। क्रुद्ध रुद्र ने त्रिशूल से वाराह का पेट फाड़ डाला और लाश को कंधे पर लादकर स्वर्ग सिंहासन पर पटक दिया।

विष्णु असली रूप में लौटे और देवताओं से बोले, “मोह बड़ा प्रबल है। वह भगवान् की भी दुर्गति करा सकता है। आप लोग उसके कुचक्र में न फँसना और अन्यान्यों को कड़ुए-मीठे उपायों से इसी प्रकार उबारना जैसे कि शिव ने मुझे छुड़ाया।”


यम-नियम-5 (अपरिग्रह) - अपरिमित के लिए परिमित का त्याग

प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करना।

दूसरों की प्रशंसा करना। उनके गुणों और सत्कार्यों को सराहना।

परिग्रह का सामान्य अर्थ है, ‘रोकना’। धन, विभूति, ज्ञान, वैभव, समय, साधन आदि की गति में अवरोध उत्पन्न किया जाता है, तो परिग्रह का पाप होने लगता है, बहते हुए जल को रोक ले तो वह सड़ने और सूखने लगता है, हवाओं को कैद करने की कोशिश में घर के द्वार और रोशनदान बंद कर लें तो जीवन देने वाली वायु दम घोंटने लगती है। समय को रोकने की कोशिश करें, काम को टालते जाने की नीति अपनाएँ, तो एक स्थिति ऐसी आती है जब कुछ करते नहीं बनता। इन उदाहरणों से मनीषियों ने एक यही तथ्य समझाया है कि प्रकृति ने जो अनुदान दिए हैं, उन्हें अपने प्रवाह के अनुसार चलते रहने दें। उन्हें रोकें नहीं।

परिग्रह के ठीक विपरीत है अपरिग्रह। रूढ़ अर्थ में इसकी परिभाषा धन-संपदा का संचय नहीं करने के रूप में की जाती है। इसी अर्थ में ग्रहण कर लें तो दुनिया में समृद्धि आ ही नहीं सकेगी। उद्योग, व्यापार और प्रतिष्ठान चलाने के लिए विपुल मात्रा में धन चाहिए। वह संचय करने से इकट्ठा होता है। अपरिग्रह का अर्थ संग्रह मात्र का त्याग मान लें, तो न संपदा संचित होगी और न ही वैभव-विकास का प्रयोजन सिद्ध होगा।

श्री अरविंद ने लिखा है कि अध्यात्म दर्शन में धन संपदा को गर्हित, त्याज्य और निंदित मानने की एक गलत प्रवृत्ति चल पड़ी। इससे हमने समृद्धि पर ध्यान देना बंद कर दिया। प्राचीन दर्शन में ऐसा नहीं था। धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की निंदा कर प्रसन्न और सुखी नहीं रहा जा सकता। सत्य प्रधान लोगों ने, साधकों और अध्यात्म रुचि रखने वाली प्रतिभाओं ने धन की निंदा कर लक्ष्मी का अपमान किया। परिणाम यह हुआ कि जगत् का पालन-पोषण करने वाली देवसत्ता विष्णु की शक्ति लक्ष्मी का कृपाप्रसाद असुरों के हाथ में चला गया। असुरों ने उसका उद्धत उपभोग किया और उनके कारण जगत् में त्रास ही फैला। आज यदि धन उद्धत प्रदर्शन और दूसरों के उत्पीड़न का कारण बना हुआ है, तो वह सत्पुरुषों के पाप का ही परिणाम है। उस पाप का जिसने संपदा को निंदित और त्याज्य बताया गया।

क्या किया जाए? श्री अरविंद का उत्तर है कि धन को आसुरी प्रभाव से मुक्त करो। सत्पुरुष और देववृत्ति के लोग उद्यमी बनें, संपदा कमाएँ और अपने उपार्जन को दैवी प्रयोजनों में लगाएँ। दैवी प्रयोजन अर्थात् समाज को सुखी-समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने वाले क्रिया-कलाप। नीति की कमाई दैवी कार्यों में लगेगी, तो सत्परिणाम आएँगे ही। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की संभावनाएँ भी उसी उपार्जन से साकार हो सकेंगी, अन्यथा महाभारत में अश्वमेध यज्ञ के बाद उस स्थान की धूलि में लौटने और निराश हो जाने वाले नेवले की तरह दैवी प्रवृत्तियों को भी निराश होना पड़ेगा।

संग्रह नहीं करने, धन-संपत्ति में ममत्व बुद्धि त्यागने, लोभ-लालच से बचने और सब कुछ भगवान् का समझने वाली आस्था लक्ष्य है। वह संपूर्ण त्याग और स्पृहा का निताँत अभाव बताते रहने से विकसित नहीं होती, पर नियमों को साधना के रूप में अपनाना है, तो एक प्रस्थान बिंदु नियत करना पड़ेगा। अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि व्रतों की तरह अपरिग्रह का अभ्यास भी एक छोटे-से नियम से शुरू किया जा सकता है। नियम यह है कि प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करते रहा जाए। विद्या-विभूति से सेवा करने, दूसरों के कष्ट दूर करने में अपनी प्रतिभा का अंश लगाने या कर्त्तव्य में उत्कृष्ट भाव का समावेश करने के अभ्यास आगे के हैं। अपरिग्रह का आदर्श धन-संपत्ति के मोह से मुक्त होने के लिए निश्चित किया गया है, तो दान का आरंभ भी धन से ही करना चाहिए।

भिक्षावृत्ति इन दिनों व्यवसाय का रूप ले चुकी है। फिर भी कुछ परिवारों या मनस्वियों ने नियम बना रखा है कि याचक जब भी आएगा, उसे मना नहीं करेंगे। इस व्रत का दूसरे लोग दुरुपयोग ही करते हैं, लेकिन जिसने व्रत धारण किया है, वह देते रहने के सुख को जानता है। धन संसार में सबसे प्रिय वस्तु है। लोग इसके लिए पद, प्रभाव और परिवार का भी त्याग कर देते हैं। जल्दी धनवान बनने के लिए पद-प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाकर अनुचित साधन अपनाए जाते हैं, तो वह एक किस्म का त्याग ही है। भगवद्गीता की परिभाषा में इसे तामसी त्याग कहा गया है, लेकिन है तो वह त्याग ही। धन के लिए अपने संबंध, स्वास्थ्य और परिवार को भी दाँव पर लगा देने की प्रवृत्ति खुलेआम देखी जाती है। इसका अर्थ है कि धन हमेशा से और अब भी सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

कंजूसी, छीन-झपट, बेईमानी, चोरी और भ्रष्टाचार जैसे मानसिक-सामाजिक अपराध भी धन की लालसा में ही किए जाते हैं। उस धन का एक अंश अहैतुक भाव से याचक को दिया जाता है, तो उसे अपरिग्रह की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम समझना चाहिए।

लोकमंगल के लिए अपनी आय का एक अंश लगाना दान का अगला चरण है, लेकिन जरूरतमंद लोगों को सीधे सहायता करना और इस नियम से पीछे नहीं हटने की निष्ठा फिर भी बनी रहनी चाहिए। उसमें कोई रुकावट नहीं आए। याचना करने वाले किसी भी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं जाने देने का नियम इस व्रत की पराकाष्ठा है। उस स्थिति तक क्रमशः ही पहुँचा जा सकता है। नहीं पहुँच पाए, तो भी कोई बात नहीं, प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करने का नियम भी पर्याप्त है। देते समय पाने वाले की पात्रता और आवश्यकता का विचार किया जा सकता है। कुपात्र को नहीं दिया जाए, क्योंकि उससे दिए गए अंश के दुरुपयोग और प्रकाराँतर से आसुरी शक्तियों को ही पुष्टि मिलती है।

जरूरी नहीं कि सत्पात्र और जरूरतमंद व्यक्ति हर दिन मिल ही जाएँ। जिस दिन नहीं मिलें, उस दिन का अंश सुरक्षित रखा जाए और अगले दिनों उसका उपयोग कर लिया जाए। पूछा जा सकता है कि इस एक साधारण नियम से अपरिग्रह का आदर्श कैसे प्राप्त किया जाए। योगदर्शन में इस नियम की सिद्धि-परिणति समस्त वैभव को प्रकट होने के रूप बताई गई है। महर्षि पतंजलि ने कहा कि परिपूर्ण अवस्था में साधक के सामने समस्त संपदाएँ प्रकट होने लगती हैं। प्रश्न किया जा सकता है कि एक साधारण नियम से यह चमत्कार कैसे संभव है। उसी का उत्तर पतंजलि ने यह कहते हुए दिया है कि सिद्धियों के प्रलोभन में व्रत-नियमों का पालन नहीं किया जाए, न ही उनके प्राप्त होने पर ठहर जाया जाए।

स्वामी शिवानंद ने लिखा है कि सिद्धियाँ साधक के विकास में बाधा पहुँचाती हैं। उनके प्रति ललक नहीं रखें। वे मिलें तो भी मुँह फेर लें। जहाँ तक छोटी-सी शुरुआत के बड़े परिणाम मिलने का प्रश्न है, उस संबंध में सचाई यही है कि वे निश्चित ही प्राप्त होते हैं। लक्ष्य कितना ही बड़ा और दूर तक हो, उस तक पहुँचने के लिए आरंभ दो छोटे-से कदम बढ़ाते हुए किया जाता है। अपरिग्रह यदि कोई बहुत बड़ा आदर्श है, तो उस दिशा में पहला कदम प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करना है।

दूसरा कदम? यह कदम अपने आसपास के लोगों की सराहना के रूप में है। नियम बना लिया जाए कि जहाँ तक होगा, दूसरों की प्रशंसा करेंगे। मनुष्य गुण-दोषों के मिश्रण से मिलकर बना है। अगर किसी पर ध्यान देने की जरूरत हो तो गुणों पर ही केंद्रित किया जाए। उन्हीं की सराहना करें। इसका अर्थ यह नहीं है कि दोषों का समर्थन करें, उन्हें भी गुण मानकर सराहें। अपितु व्यावहारिक पक्ष यही है कि दोषों को अनदेखा करें। ध्यान में रखें, सावधानी भी बरतें, उनके प्रभाव से अपना बचाव करें, सिर्फ व्यवहार में उन्हें रेखाँकित नहीं करें। उपेक्षा कर दें।

जिन गुणों की सराहना की जाती है, व्यक्ति उनके विकास के लिए प्रेरित होता है। जिसकी उपेक्षा की जाती है, व्यक्ति स्वयं भी उसे निरर्थक मानकर उनसे छूटने लगता है। कम-से-कम उनके प्रति आकृष्ट होना छोड़ देता है। प्रशंसा से दूसरों में सद्गुणों का विकास उत्कृष्टता के संवर्द्धन की, लोकमंगल साधना का ही हिस्सा है। दोहरा लाभ यह है कि प्रशंसा द्वारा हम अपने आप में भी इन गुणों का विकास करने लगते हैं। दूसरों के प्रति स्नेह-सद्भाव से भर उठते हैं। कम-से-कम परनिंदा और उसके कारण उत्पन्न होने वाले कलुष से तो बच ही जाते हैं। अपरिग्रह के शुद्ध अर्थों में यह नियम सद्गुणों का प्रवाह अविरल करने में सहायक है।

कहा गया है कि परिग्रह पाप नहीं है। आध्यात्मिक अपराध उसमें ममत्व बुद्धि धन-संपदा में ही नहीं, व्यक्तियों, वस्तुओं और विचारों में भी होती है। जिस वस्तु, व्यक्ति या विचार से मोह-ममता का संबंध जोड़ लिया जाता है, व्यक्ति धीरे-धीरे अपना आपा खोकर उसी के अनुरूप होने लगता है। कीट भृंगी, भौंरा पतंगा बनने लगता है और अपना स्वरूप खो बैठता है। मनुष्य का अपना स्वरूप जड़ या स्थावर नहीं है। वह चेतन है। जड़ पदार्थों से मोह-ममता जोड़ लेने के बाद आँतरिक स्थिति भी बदलने लगती है। धन-संपत्ति या अन्य वस्तुओं के प्रति मोहाविष्ट जनों में जीवन के दूसरे पक्ष गौण होने लगते हैं। उसके विकास की संभावनाएँ घटने-सिमटने लगती हैं। उदाहरण के लिए, पदलोलुप व्यक्तियों के मन में असुरक्षा, आशंका और आक्रामकता आ जाती है। उसमें विश्वास और सहिष्णुता का अभाव हो जाता है। धन के प्रति ममत्व बुद्धि रखने वालों का नैतिक, चारित्रिक विकास रुक जाता है। कृपण व्यक्तियों के लिए, मित्र-परिचितों और शुभचिंतकों की संख्या दिनोंदिन घटती जाती है। देखा तो यह भी गया है कि बेहद कंजूस लोगों के घर में संतानें नहीं होतीं। होती भी हैं तो उनकी योग्यता का विकास नहीं होता, क्योंकि उसकी आत्मा संचय और सुरक्षा की चिंता करते-करते कुँठित हो जाती है। दान, उदारता, सहिष्णुता और सराहना के भाव व्यक्ति की आत्मचेतना को विराट् बनाते हैं। फिर ईश्वर की यह समूची सृष्टि ही उसका आँगन और वैभव बन जाती है।


नारी शक्तिः एक भवितव्यता

नारी सृष्टि की सुँदर एवं सुकोमल कृति है। संवेदना उसकी सर्वोत्कृष्ट विशेषता है। प्राचीनकाल में इसी गुण के कारण उसे श्रेष्ठ एवं वरेण्य स्थान प्राप्त था, परंतु इस पक्ष को कमजोर मानकर वह सताई एवं शोषित भी की गई। पुरुष के तथाकथित पौरुषत्व एवं उद्धत अहंकार ने नारी का शोषण किया है। तमसाच्छन्नमय युग इसका ज्वलंत इतिहास है, जहाँ उसे केवल भोग एवं विलास की वस्तु माना गया। वर्तमान युग में स्थिति और भी विकृत है, किंतु यह नियति को स्वीकार्य नहीं था। नारी वर्ग सजग एवं जाग्रत् हुआ। जाग्रति की यह लहर समस्त विश्व में नारी जागरण के रूप में फैल गई। मनीषियों एवं भविष्यद्रष्टाओं के अनुसार, नवयुग का भविष्य इसी आँदोलन के गर्भ में पक रहा है।

नारी आँदोलन एक ऐसा आँदोलन है, जो किसी समाज या संस्कृति में नारी को पुरुष के समान सम्मान एवं अधिकार का मौलिक दावा करता है। पाश्चात्य जगत् में इसे ‘फेमीनिज्म’ कहा जाता है। इसका प्रारंभ अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुआ। उस समय इस आँदोलन की माँग थी महिलाओं को पुरुषों के समान सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में समान अधिकार प्राप्त हो। अधिकार रूपी इस माँग एवं आवश्यकता ने ही महिला आँदोलन की नींव रखी और इसका सूत्रपात हुआ। सदियों से पीड़ित, शोषित एवं प्रताड़ित नारी का स्वर इसी रूप में उभरकर सामने आया। इतिहास में यह प्रथम नारी आँदोलन था, जिसकी लहर धीरे-धीरे समूचे विश्व में फैलने लगी। इस आँदोलन को दो भागों में विभक्त किया जाता है, फर्स्ट वेव एवं सेकेंड वेव।

फर्स्ट वेव अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से प्रारंभ होकर सन् 1930 तक चला। इसका मुख्य उद्देश्य एवं लक्ष्य था, महिलाओं एवं पुरुषों का अधिकार समान हो। सेकेंड वेव की शुरुआत सन् 1960 के अंत में हुई। यह मत भी अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक परिस्थिति एवं परिवेश में उसकी समस्याओं की ओर ध्यानाकर्षित करता है तथा इसके समाधान एवं निराकरण की माँग दुहराता है।

पुरातात्त्विक प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि यूरोप और पूर्वी एशिया में पोलियोलिथिक सभ्यता थी। जिसमें मातृसत्तात्मक समाज का प्रचलन था एवं देवियों की पूजा-अर्चना की जाती थी। धीरे-धीरे इस परंपरा का ह्रास होता गया एवं मातृसत्तात्मक के स्थान पर पितृसत्तात्मक समाज का वर्चस्व बढ़ने लगा। इसके साथ ही राजनीतिक, धार्मिक, सैनिक आदि क्षेत्रों में पुरुषों के अधिकार में वृद्धि होने लगी। पुरुषों ने सभी पक्षों ने अपना एकाधिकार कायम कर लिया। अरस्तू ने अपने ग्रंथ ‘पोलिटिक्स’ में इस स्थिति का विशद वर्णन किया है। दूसरी सहस्राब्दी में पाश्चात्य जगत् में महिलाओं को आर्थिक, शैक्षिक तथा नैतिक स्तर से वंचित करने का कुचक्र रचा गया। इस तरह सर्वत्र नारी को शोषित एवं प्रताड़ित जीवन जीने को बाध्य कर दिया गया। इस अनीति एवं अत्याचार के विरुद्ध कुछ आवाजें उठने लगीं। जर्मनी में पुरुष एकाधिकार, चर्चों में महिलाओं के प्रवेश के लिए जनमत तैयार होने लगा। इटली के क्रिश्चियन दी विसान नामक विख्यात लेखक ने अपनी लेखनी के माध्यम से इसका घोर विरोध किया। सत्रहवीं शताब्दी तक यह स्थिति काफी मुखर हो चुकी थी। अनेकों महिला लेखिकाओं एवं विद्वानों का संगठन खड़ा हो गया। मेरी एस्टले ने नारी शिक्षा में वृद्धि हेतु आँदोलन की शुरुआत की।

‘फेमीनिज्म’ शब्द का उपयोग उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में प्रयोग हुआ, परंतु इसकी नींव अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही रखी जा चुकी थी। फर्स्ट वेव महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार की वकालत करता है। इस सिद्धाँत के अनुसार हर क्षेत्र में नारी को उचित स्थान एवं समुचित सम्मान मिलना चाहिए। यह विचारधारा फ्राँस की क्राँति एवं अमेरिकी स्वतंत्रता आँदोलन से प्रभावित मानी जाती है, क्योंकि ये दोनों ही क्राँतियाँ स्वतंत्रता एवं समानता की हिमायती हैं। फ्राँस के फेमीनिस्ट का तर्क है कि स्वतंत्रता, समानता एवं भाईचारा जैसी क्राँति का मूल्य सबके लिए समरूप होना चाहिए। अमेरिका में अमेरिकी महिला आँदोलनकारियों ने भी अमेरिका की स्वतंत्रता के साथ महिलाओं की नागरिकता एवं संपत्ति पर समान अधिकार के लिए आवाज बुलंद की थी।

इंग्लैंड में मेरी वोल स्टोन क्राफ्ट ने 1792 में महिला अधिकारों के संरक्षण पर एक क्राँतिकारी विचार .... किया। इसमें समानता एवं शिक्षा पर जोर दिया गया था। यह सर्वप्रथम ऐसा प्रयास था, जिसने महिलाओं को उनकी दुरवस्था से परिचित करवाया। उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में इंग्लैंड की मध्यमवर्गीय महिलाओं ने शिक्षा, रोजगार, नैतिक एवं मताधिकार प्राप्त करने हेतु आँदोलन का शंखनाद किया। जान स्टुअर्ट मिल ने समानता के इस अधिकार के लिए इनका सहयोग दिया। उसने अपनी पत्नी हेरियट टेलर से प्रेरित होकर ‘द सब्जेक्शन ऑफ वूमेन’ नामक ग्रंथ की रचना की।

सन् 1850 के पश्चात् इस आँदोलन में और भी तेजी व तीव्रता आई। यह प्रबल रूप धारण कर न्यूजीलैंड, पूर्व सोवियत संघ, जर्मनी, पोलैंड और आस्ट्रिया में आग की तरह फैल गया। समूचा पश्चिमी जगत् नारी आँदोलन की इस विचारधारा से परिचित हो गया। सामंतवादी पुरुषों के सामाजिक, साँस्कृतिक तथा शैक्षिक अवस्था में सुधार हेतु प्रयास चल पड़े। ‘न्यू वूमेन’ नामक विचारधारा ने समस्त जगत् में क्राँति की बिगुल बजा दी। उसने समानता के अलावा नारी की स्वतंत्र जीवन पद्धति एवं अभिव्यक्ति की ओर ध्यान आकर्षित किया। सन् 1920 में इस अभियान के स्वरूप में और विस्तार हुआ। समानता का व्यापक विचार महिलाओं के संवेदनशील उन समस्त बिंदुओं को स्पर्श करने लगा, जहाँ उसे शोषित एवं प्रताड़ित होना पड़ता था। माता एवं संतान के कल्याण के लिए अनेक योजनाएँ बनीं। यही मुद्दा सेकेंड वेव मुद्दे का मुख्य उद्देश्य बना।

सेकेंड वेव का प्रारंभ सन् 1960 में उत्तरी एवं मध्य अमेरिका तथा यूरोप व आस्ट्रेलिया के सामाजिक एवं मानवाधिकार आँदोलन से हुआ। अमेरिका से शुरू होने वाला नारी स्वतंत्रता आँदोलन-सामुदायिक स्वतंत्रता, महिला एवं पुरुषों की स्थिति के आधार पर समानता तथा स्वतंत्र अस्तित्व हेतु चलाया गया। सन् 1970 एवं 78 के बीच इसका स्वरूप और भी विस्तृत हुआ। इस आँदोलन की मुख्य विशेषता थी, समान वेतन, समान शिक्षा, व्यवसाय एवं नौकरी में समरूपता, स्वतंत्र पहचान, सेवा का समुचित अधिकार तथा अनीति, हिंसा व यौन शोषण से मुक्ति।

इस आँदोलन के मध्यकाल में सामाजिक एवं राजनीतिक तंत्र में हो रहे महिला शोषण को रोकने के लिए कई प्रकार की योजना बनी। अतः सामाजिक एवं राजनीतिक तंत्र में महिलाओं का प्रवेश द्वार खुल गया। भले ही यह संख्या न्यून थी, परंतु आगामी समय के लिए क्राँतिकारी परिवर्तन की आधारशिला बनी। यह विचारधारा साइमेन डी बीवेयर तथा केट मिलेट द्वारा प्रतिपादित हुई। उन्होंने पाश्चात्य जगत् में महिलाओं पर हो रहे शोषण एवं अत्याचार के खिलाफ ठोस कदम उठाया। जान डी बीवेयर के ‘सेकेंड सेक्स’ में उसका आभास होता है। सन् 1970 में केट मिलेट ने अपनी पुस्तक ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ में नारी की अवनति का वर्णन करते हुए उससे उत्थान का उपाय सुझाया। इस तरह नारी जाग्रति की एक नई चेतना का उदय हुआ और यह लहर सभी ओर फैल गई। नारी स्वयं अपनी दासताओं से मुक्ति के लिए छटपटाने लगी। परिणामतः नारी जागरण एक संगठित प्रयास एवं उपाय बन गया।

महिलाओं को शारीरिक शोषण के साथ ही मानसिक प्रताड़ना का दंश झेलना पड़ता था। अतः मानसिक रूप से सबल नारी की परिकल्पना की गई। सिगमंड फ्रायड के उस सिद्धाँत को पूरी तरह से नकार दिया गया, जिसमें नारी को भोग एवं विलास की वस्तु मात्र माना गया है। फ्राँस की महिला आँदोलनकारी हेलेन सिकस और लुसी इरीगरी ने महिला शरीर को देवत्व का वरदान घोषित किया। संवेदना एवं ममत्व को उसका सर्वश्रेष्ठ अलंकरण माना गया। इस तरह एक नई महिला संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ। पुरुष के एकाधिकार को समाप्त करने एवं नारी के यौन शोषण को रोकने के लिए आवाजें उठने लगीं। मेरी डेली ने ‘गाइन इकोलॉजी’ में उसे और भी विस्तार से वर्णन किया। विख्यात आँदोलनकर्त्री एंड्रिया डूवोरकीन ने भी क्राँतिकारी लेख लिखकर नारी जागरण में महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

नारी जागरण के दो मुख्य आँदोलन काल के पश्चात् आधुनिक विचारधारा का समावेश हुआ। आज उन सभी समस्याओं को रेखाँकित किया जाता है। जिसके तहत नारी को अबला एवं कमजोर मानकर शोषित किया जाता है। समस्याओं के निराकरण के साथ ही विकास के विभिन्न आयामों के प्रति नूतन दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। गायत्री चक्रवर्ती ऐसे समग्र आँदोलन की बात करती है, परंतु आँदोलन में उस देश की सामयिक समस्याएँ एवं परिस्थिति भी मुख्य कारक होती हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में एशियन, अफ्रोकेरीवियन तथा अफ्रीकी अमेरिकी आँदोलन को देखा जा सकता है। लेटिन अमेरिका का आँदोलन, जाति, लिंग, वर्ग-भेद की समानता की पुष्टि करता है। मुस्लिम देशों में सेकुलर, लिबरल आँदोलन महिलाओं की बुरका तथा तलाक से मुक्ति के इर्द-गिर्द घूमता है। भारतीय आँदोलन को समग्र आँदोलन कहा जा सकता है। फिर भी इसमें दहेज प्रथा, कुरीति, रूढ़िवादिता जैसी समस्याओं को प्राथमिकता दी गई है।

यूरोप में महिला जागरण मार्क्स आँदोलन के नाम से जाना जाता है। कार्ल मार्क्स एवं फ्रेडरिक एंजेल्स द्वारा प्रतिपादित सिद्धाँत के अनुसार नारी को भी आर्थिक तथा भौतिक उपलब्धियों में समान अधिकार होना चाहिए। उन्हें व्यवसाय एवं आय की उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। अमेरिका में ठीक इसी प्रकार का अभियान चला है। वह मटेरिएलिस्ट फेमीनिस्ट द्वारा संचालित एवं नियमित होता है। इसके अंतर्गत भी नारी को सामाजिक संबंधों एवं भौतिक अवस्था में समानता लाने पर बल दिया जाता है। आज इस विचारधारा का प्रभाव सभी क्षेत्रों में स्पष्टतः परिलक्षित होता है। समाजविज्ञानियों के अनुसार नारी जागरण अब सक्रिय एवं जीवंत हो उठा है। नारी मुक्ति आँदोलन पुरुषों के एकाधिकार रूपी दुर्ग को ध्वस्त करके ही रहेगा।

समस्त विश्व में नारी जागरण अभियान विभिन्न रूपों में सक्रिय है। यह प्रयास एवं पुरुषार्थ आगामी सदी-नारी सदी के भावी संकेत का द्योतक है। इक्कीसवीं सदी में नारी का ही वर्चस्व होगा। इसलिए कालचक्र पूर्ण वेग से गतिमान है। अतः नारी के उत्थान एवं विकास में हर समझदार नागरिक को लग जाना चाहिए। यही युगधर्म है।


कलंक को भी धो डाला (kahani)

पत्नी के सहयोग से ....

अमर लेखिका हैरियट एलिजाबेथ स्टो ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तक ‘टाम काका की कुटिया’ किन जटिल परिस्थितियों के बीच रहते हुए लिखी, यह बहुत कम लोग जानते हैं। आम जानकारी तो इतनी ही है कि इस क्राँतिकारी ग्रंथ ने अमेरिका से दासत्व की प्रथा उठा देने में अनुपम भूमिका का निर्वाह किया।

उन्होंने अपने भाभी के पत्र का उत्तर देते हुए लिखा था, “चूल्हा, चौका, कपड़े धोना, सिलाई, जूते गाँठना, बच्चों के लिए तैयारी आदि की व्यस्तता बनी ही रहती है। दिनभर सिपाही की तरह ड्यूटी देनी पड़ती है। छोटा बच्चा मेरे पास ही सोता है, वह जब तक सो नहीं जाता, कुछ भी लिख नहीं सकती। गरीबी और काम का दबाव बहुत है, फिर भी पुस्तक लिखने का समय निकालती हूँ, क्योंकि मुझे लगता है कि गुलाम प्रथा में सताए जाने वाले व्यक्ति भी अपने ही परिवार के अंग हैं। इस परिवार के लिए 10-12 घंटे लगाती हूँ, तो उस परिवार के लिए भी 1-2 घंटे तो निकालने ही चाहिए।”

हैरियट स्टो की यह पारिवारिक संवेदना ही उपन्यास के पृष्ठों पर छा गई। जिसने पढ़ा उसने ही अपने आपको एक बड़े परिवार का अंग अनुभव किया और इसी जाग्रत् परिवार भाव ने समाज से उस कलंक को भी धो डाला।


दाँपत्य सुख से ऊबी हुई आधुनिकता

कामकाजी दंपत्तियों का किया गया एक अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि कैरियर बनाने के लोभ में बच्चों से छुटकारा पा चुके दंपत्ति आपस में भी ज्यादा रुचि नहीं लेते। 30 से 45 वर्ष की आयु वाले कामकाजी दंपत्तियों में चालीस प्रतिशत लोगों का संबंध सिर्फ एक छत के नीचे रहने जैसा है।

आधुनिक सभ्यता अथवा कहें कि उपभोक्ता संस्कृति ने व्यक्ति और समाज को अपने ढंग से प्रभावित किया हो, उन्हें बरगलाया-फुसलाया हो, लेकिन परिवार संस्था को तो नष्ट-भ्रष्ट ही कर दिया है। किसी समय संयुक्त परिवार में माता-पिता या सास-ससुर और देवर-जेठ आदि दंपत्ति को सँभाले रहते थे। पति-पत्नी में अहं या ऐषणाओं की टकराहट होती, तो परिवार के दूसरे लोग उसे टूटने की ओर जाने से पहले ही दखल दे लेते थे। पारिवारिक जीवन में क्लेश-कलह आगे नहीं बढ़ पाता था। अब संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं। दखल देने वाला कोई रहा नहीं। विवाद हद से ज्यादा बढ़ता है, तो पास-पड़ोस के लोग, मित्र या दूर बसे नाते-रिश्तेदार (चाचा, ताऊ, सास-ससुर आदि) समझाने-बुझाने चले आते हैं। प्रभावशाली दखल वे भी नहीं दे पाते, क्योंकि वैसे संबंध ही नहीं रहे।

संयुक्त परिवार टूटने के बाद जो ढाँचा बना, उसमें पति-पत्नी और उनके बच्चे रह गए। अब इस इकाई को ही परिवार कहते हैं। मध्यम वर्ग में चलन यह है कि पति-पत्नी दोनों काम-धंधे पर निकल जाते हैं। घर में बच्चे अकेले रह गए। ज्यादा छोटे हुए, तो उन्हें केयर सेंटर, बालबाड़ी या प्री नर्सरी स्कूलों में छोड़ दिया। बच्चों को वह पोषण-संरक्षण नहीं मिलता, जो दादा-दादी या माँ के सान्निध्य में मिलता था। उन बच्चों की समस्या अपनी जगह है। समाजशास्त्री एक नया संकट इन दिनों अनुभव कर रहे हैं। संकट यह है कि अहं और एषणा के इर्द-गिर्द घूमने वाली मानसिकता दाँपत्य जीवन में भी दरार, टूटन और विघटन पैदा कर रही है। कामकाजी दंपत्तियों का किया गया एक अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि कैरियर बनाने के लोभ में बच्चों से छुटकारा पा चुके दंपत्ति आपस में भी ज्यादा रुचि नहीं लेते। 30 से 45 वर्ष की आयु वाले कामकाजी दंपत्तियों में चालीस प्रतिशत लोगों का संबंध सिर्फ एक छत के नीचे रहने जैसा है।

जीवन के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करती रहने वाली स्वयंसेवी संस्था ‘अनुभूति’ ने एक हजार दंपत्तियों से संपर्क किया। उन्हें एक प्रश्नावली दी और बातचीत भी की। प्रश्नावली में बीस सवाल थे। सभी सवाल पहली नजर में बहु मामूली थे। जैसे दफ्तर से पहले कौन लौटता है? पति-पत्नी में पहले से जो भी पहले घर पहुँच जाता है, वह दूसरे के आने पर किस तरह स्वागत करता है? घर आ जाने से रात सोने तक का समय कैसे बीतता है? घरेलू कामों के अलावा दोनों एक-दूसरे के निजी जीवन में कितनी दिलचस्पी लेते हैं, जैसे दफ्तर के अनुभव एक-दूसरे से बाँटते हैं या नहीं? एक-दूसरे के साथ होने के लिए कितने अधीर रहते हैं? जब भी कोई बीमार पड़ता है, तो दूसरा साथी क्या करता है? घर से बाहर कोई पुरुष या महिला मित्र है अथवा नहीं? पति-पत्नी अपने मित्रों के बारे में एक-दूसरे को बताते-समझाते हैं? एकाँत क्षणों को कैसे व्यतीत करते हैं? छुट्टी का दिन कैसे व्यतीत करते हैं?

अंतिम और महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह था कि पति-पत्नी की एक-दूसरे के बारे में क्या राय है? इस प्रश्न का उत्तर लिखकर देना जरूरी नहीं था। मौखिक भी दिया जा सकता था। जिस तरह के उत्तर आए, उनसे आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ज्यादातर लोगों ने अपने मन की बात लिखने की बजाय कहकर बताना ही ठीक समझा। पता नहीं, सर्वेक्षण करने वाले पति या पत्नी से चुगली ही कर बैठें। जिस आयु-वर्ग के लोगों से संपर्क किया गया, वे न तो नव विवाहित थे और न ही वृद्ध या अधेड़ उम्र के। तीस से पैंतालीस वर्ष की आयु वाले जोड़ों को परिपक्व और समझदार कहा जा सकता है। कम-से-कम उनमें नवविवाहितों की तरह आवेग या बेटे-बेटियों का जीवन सँवारने में लग जाने की चिंता नहीं होती। वे औसत स्तर का स्वस्थ दाँपत्य जी रहे हो सकते हैं।

आश्चर्य की बात यह कि जिस आयु-वर्ग में औसत स्वस्थ संबंधों की अपेक्षा की जाती है, वही सबसे ज्यादा ऊबा और एक-दूसरे से कतराने वाला साबित हुआ। जीवन-साथी के प्रति अपनी धारणा बताते हुए सत्तर प्रतिशत लोगों के स्वर शिकायत से भरे हुए थे। पंद्रह प्रतिशत लोगों ने साफ कहा कि वे पति अथवा पत्नी से तंग आ चुके हैं। छुटकारा पाने का कोई सौम्य रास्ता मिल जाए, तो उसे खुशी से अपनाएँगे। छुटकारा पाना ही है, तो सौम्य रास्ता ही क्यों? एक झटके में भी संबंध तोड़े जा सकते हैं। यह पूछने पर उत्तरदाता का कहना था कि आगे की जिंदगी में वे कोई उथल-पुथल नहीं लाना चाहते। सुख-शाँति के विकल्प बचे रहें और जिंदगी नए ढंग से शुरू कर पाए, इसकी आशा अभी बाकी है। यानी छुटकारा पाने के बाद पुनः एक जीवन साथी का चुनाव किया जा सकता है।

पैंतीस-चालीस वर्ष की उम्र में नए जीवन-साथी की तलाश का कारण यौनसुख की कामना नहीं हो सकती। इस संबंध में एक और अध्ययन है। उसकी चर्चा से पहले नए साथी की तलाश के कारण जान लें। पति अथवा पत्नी से छुटकारा पाने की साध पाले हुए लोगों को इससे अपने कैरियर में सहायता मिलती दिखाई दे रही थी। एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के मुँबई दफ्तर में मैनेजर एस. दिवाकर (नाम कल्पित) को अपनी पत्नी से सिर्फ इसलिए ऊब होने लगी कि वह एक प्रतिष्ठित दैनिक में साहित्य संपादक है। दिवाकर की राय में वह आगे नहीं जा सकती। उधर बहुराष्ट्रीय कंपनी में एक ऐसी सहकर्मी से उसकी अंतरंगता बढ़ गई है, जो संभावनापूर्ण है। दिवाकर का मानना था कि पत्रकार बीबी से छुटकारा मिले, तो सहकर्मी मित्र के साथ जोड़ी बनाकर कारोबारी जीवन में कुलाचें भरी जा सकती हैं। जिस महिला के साथ उसने सपने सँजोए, वह भी मैनेजर ही है और दिवाकर की राय में ज्यादा होशियार।

एक अन्य प्रसंग में पत्नी अपने परिवार से इसलिए छुटकारा पाना चाहती है कि पति व्यवसायी है। जब विवाह हुआ, तो सुनंदा इंटरमीडिएट पास थी और पति अपने पैतृक व्यवसाय को सँभालने की कोशिश कर रहे थे। सुनंदा घर में खाली रहती। समय बिताने के लिए योग्यता का विकास एक आसान रास्ता सूझा। पति ने सहयोग किया और सुनंदा ने उपाधि परीक्षा पास कर ली। बी.एड कर लिया और माध्यमिक विद्यालय में नौकरी लग गई। पति अपने पैतृक व्यवसाय में ही थे। अब जम गए हैं। बीस-पच्चीस हजार रुपये हर महीने कमा लेते हैं, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में पत्नी से थोड़े पिछड़े हैं। सुनंदा को लगता है कि पति उसके लायक नहीं हैं। अगर छुटकारा मिला जाए, तो अच्छा रहेगा। अच्छे ओहदे पर काम कर रहे वरिष्ठ अधिकारी के साथ जीवन बिता सके, तो ज्यादा सुखी रहेगी। उन्नति करने का अवसर मिलेगा।

प्रसंग बताते हैं कि दाँपत्य जीवन में निष्ठा और अनुराग का अभाव होता जा रहा है। इसी के चलते एक-दूसरे को तिलाँजलि देने की बात मन में आती है। आमतौर पर समझा जाता है कि यौनसुख की तलाश में लोग एक-दूसरे से विमुख होते हैं। पति अथवा पत्नी से यौन तृप्ति नहीं होती, इसलिए स्त्रियाँ परपुरुषगामी होती हैं और पुरुष दूसरी स्त्रियों को ताड़ते रहते हैं। समाज में व्यभिचारी लोगों की संख्या बहुत है। कामलिप्सा के कारण एक-दूसरे को धोखा देने और दूसरों से संबंध रखने की प्रवृत्ति भी खूब पनपी है। ‘अनुभूति’ ने पति-पत्नी के संबंधों को अलग कोण से देखने की कोशिश की और पाया कि तीस से पैंतालीस की उम्र वाले दंपत्तियों के लिए यौन तृप्ति तीसरी-चौथी प्राथमिकता है। अध्ययन के लिए चुने गए दंपत्तियों में चालीस प्रतिशत लोगों ने कहीं और संबंध बनाने के बारे में सोचा ही नहीं। कामकाजी जीवन में दूसरी स्त्रियों या पुरुषों के संपर्क में आना पड़ता है, यह अलग बात है। हँसी-मजाक, उठने-बैठने और जरूरत पड़ने पर मदद के लिए दौड़ जाने जैसी दोस्ती भी बन जाती है, लेकिन इन लोगों के मन में यौन संबंधों की इच्छा नहीं जगी।

कारण यह नहीं है कि उन्होंने पतिव्रत अथवा पत्नीव्रत धर्म के निष्ठापूर्वक पालन करने की सौगंध खा ली हो। दिनभर भागदौड़ करते और विभिन्न तरह के तनाव झेलते हुए इतनी थकान आ जाती है कि इस तरफ ध्यान नहीं नहीं जाता। परिस्थितियों के कारण संयम-अनुशासन में रहने वालों का सोचना यह भी है कि इस तरह की पहल कामकाजी जीवन और मित्रता पर बुरा असर भी डाल सकती है। जो लोग अपने वर्तमान साथी को छोड़कर किसी और के साथ रहना-बसना चाहते हैं, उनके लिए भी कैरियर ही मुख्य है। साथ काम करने के कारण, लगाव, निर्भरता और अनुराग के कारण यह हो सकता है, लेकिन ‘सैक्स’ कारण कतई नहीं है।

एक अन्य विश्लेषण में यह भी निष्कर्ष सामने आया है कि ‘सैक्स’ विवाहित जीवन से भी विदा हो रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के 21 मई 2000 अंक में छपे इस विश्लेषण के अनुसार अति के कारण अथवा दूसरी प्राथमिकताओं के कारण कामकाजी दंपत्ति यौनसुख से प्रायः विरत रहने लगे हैं। उठती उम्र में ही एक-दूसरे से परिचित होने के बाद प्रणय संबंध हो जाने और कुछ ही महीनों में विवाह कर लेने का बड़ा कारण ‘सैक्स’ तो हो सकता है, लेकिन एकाध बच्चे का जन्म होने के बाद वह जल्दी ही विदा हो जाता है। चार-पाँच साल बीतने के बाद यह आकर्षण कम होने लगता है, धीरे-धीरे लगभग विदा हो जाता है।

विवाहित जीवन शुरू करने के बाद यौनसुख में ही डूबे रहने को, विश्लेषण में जल्दी ही एक-दूसरे से ऊब जाने का मुख्य कारण बताया गया है। खाना-पीना, उठना-बैठना, आना-जाना और यात्राएँ करना सभी कुछ होता है, लेकिन अपने काम में ही डूबे रहने वालों के लिए अंतरंग बने रहना कठिन होता जा रहा है। विश्लेषण इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि भावात्मक, पारिवारिक और आर्थिक आकर्षण बहुत जल्दी फीके पड़ने लगते हैं। यौनसुख ही उन्हें एक-दूसरे से बाँधे रखता है। उसके अभाव में दाँपत्य जीवन कितना चलेगा? उत्तर गृहस्थ धर्म की प्रेरणाओं में है। समर्पण, त्याग और सेवा की भावना हो, तो संबंधों का चिरंतन निर्वाह किया जा सकता है, लेकिन यह इसलिए संभव नहीं दिखाई देता कि पति-पत्नी का अहं, स्वार्थ और आकाँक्षाओं में तालमेल नहीं बैठ रहा। उनकी अपनी निताँत वैयक्तिक अपेक्षाएँ और आवश्यकताएँ हैं, जिनके चलते मन से बहुत देर तक साथ नहीं निभता।

आधुनिक दांपत्य का अध्ययन इस निष्कर्ष को और ज्यादा पुष्ट करता है। पूछे गए सवालों में पैंतीस प्रतिशत लोगों ने कहा कि पति या पत्नी में से जो भी पहले आ जाता है, वह बाद में आने वाले के प्रति कोई उमंग नहीं जताता। पत्नी यदि पहले आ गई हो, तो पति जरूर अपेक्षा करता है कि उसके जूते उतारने, बेल्ट खोलने, कपड़े बदलने में सहायता की जाए। चाय-पानी हाजिर रखी जाए। जरूरी नहीं कि यह अपेक्षा पूरी हो। अठारह प्रतिशत गृहिणियों का कहना था कि आधा-पौन घंटे पहले वे भी तो थककर आई होती हैं। विश्राम का उनका अपना मूड़ भी होता है। फिर पति पहले आ जाते हैं, तो हमारे घर लौट आने पर वे ही कहाँ स्वागत करते दिखाई देते हैं।

कामकाज से लौटी पत्नी के बारे में बाईस प्रतिशत पुरुषों की धारणा पुरातनपंथी-रूढ़िवादी ही थी। उनके अनुसार घर-गृहस्थी सँभालना स्त्रियों का काम है। वे कमाने के लिए जाती हैं, यह अलग बात है। इससे उनका कर्त्तव्य नहीं बदल जाता। स्त्री का धर्म है कि पति घर आए, तो दरवाजे पर उसका इंतजार करती दिखाई दे। उसके आराम का ध्यान रखे। यह पूछा गया कि पुरुष या पति का ऐसा कोई कर्त्तव्य नहीं बनता? जो उत्तर दिए गए उनका सार यह है कि पत्नी की तरह दरवाजे पर खड़ा होना या घर में चाय-पानी पेश करना पति का दायित्व नहीं है। यह स्त्री का ही कर्त्तव्य है। पुरुष का धर्म स्त्री को संरक्षण देना है। यदि पति सहयोग नहीं करे, अनुमति नहीं दे तो स्त्री काम-धंधा ही नहीं कर पाएगी। इसके अलावा पुरुष के कारण स्त्री समाज में गर्व और अधिकार से सिर उठाकर चलती है। जिस स्त्री का पति नहीं होता उसे लोग समाज में जीने कहाँ देते हैं। चील-कौओं की तरह नोच डालेंगे। ऐसी-ऐसी बातें कही जाती हैं।

ये उत्तर पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता बताते हैं। आश्चर्य यह है कि अच्छे पदों पर बैठी महिलाएँ भी इस दृष्टिकोण का समर्थन करती पाई गईं। इस सोच का जवाब स्त्री-पुरुषों की समानता और गृहस्थी की जिम्मेदारी साझा होने की बात कहते हुए भी दिया गया है। लेकिन इस तरह का उत्तर देने वाली महिलाओं में भी आवश्यक खुलापन, आत्मविश्वास और पैने तर्कों का अभाव ही था।

दाँपत्य संबंध कामचलाऊ ढंग से चलने का एक प्रमाण यह भी है कि अपने दफ्तर या व्यवसाय के बारे में तीस प्रतिशत लोग ही एक-दूसरे को बताते हैं। यह जानकारी अपने आप और पूछने पर दोनों तरह से दी जाती है। सत्रह प्रतिशत लोग औपचारिक बातों के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कहते। कारण? अभिजित कोहली का उत्तर प्रतिनिधि अभिव्यक्ति है। सब कुछ या जरूरत से ज्यादा बताया जाए, तो ‘पार्टनर’ की माँग बढ़ने लगेगी। वह खुद भी तो कमाती है। खुद ही सारी बातें कहाँ बताती है? गृहिणियों की राय में दफ्तर की बातें बाँटने से पति महोदय की दखलंदाजी बढ़ने का खतरा रहता है। जरूरी भी नहीं है बताना। गृहस्थ जीवन में पति-पत्नी के बीच कोई परदा नहीं होने के आदर्श वाले भारतीय समाज में दोनों का ‘निजी’ जीवन भी होने लगा है। उसे एक-दूसरे के सामने नहीं खोलना चाहिए। बल्कि प्रयत्नपूर्वक अपनी निजता को गोपनीय रखना चाहिए। यह स्थिति दाँपत्य जीवन के सिर्फ ढकोसला रह जाने के अलावा क्या सिद्ध करती है? बाजार का तर्क है कि व्यक्ति अकेला हो तो उससे सौदा करना आसान रहता है। उपभोक्ता सामग्री आसानी से और ज्यादा खपाई जा सकती है। धर्म-अध्यात्म की प्रेरणा सामंजस्य, समर्पण और निष्ठा के लिए प्रेरित करती है। दोनों प्रवृत्तियों में किसकी जीत होती है, यह भविष्य बताएगा।


नींद की स्थिति में होता है परोक्ष से आदान-प्रदान

लंबी अनिद्रा के कारण जब विद्युत् की आपूर्ति में अवरोध उत्पन्न होता है, तो न सिर्फ शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाता है, अपितु उस शक्ति का ह्रास होने लगता है, जो अतींद्रिय अनुभूति का महत्त्वपूर्ण आधार है।

निद्रा मनुष्य के लिए आवश्यक और उपयोगी प्रक्रिया है। इसका न होना अथवा इससे वंचित कर देना व्यक्ति को विक्षुब्ध जैसी स्थिति में ला खड़ा करता है। सूक्ष्म सूचनाओं का महत्त्वपूर्ण आधार यही है। सामान्य मनुष्य के लिए सूक्ष्म जगत् से संपर्क इसी स्थिति में बन पड़ता है। यही शारीरिक-मानसिक थकान मिटाने का सर्वसुलभ साधन है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार निद्रा में सचेतन भाग अचेतन की स्थिति में सिर्फ इसलिए नहीं जाता कि उससे थके अंगों को आराम मिले, वरन् उस स्थिति में अंतरिक्ष में प्रवाहमान विद्युत्धाराओं में से उपयोगी अंश संगृहीत-संपादित करने का अवसर भी मिले, प्रयोजन यह भी होता है। एरियल और एंटीना विद्युत् चुँबकीय तरंगों को पकड़ते हैं। निद्रा अवस्था में हमारा अवचेतन मस्तिष्क वैसा ही बन जाता है और आकाश से इतनी विद्युत् खुराक प्राप्त कर लेता है, जिससे शारीरिक और मानसिक क्रिया–कलापों का संचालन ठीक प्रकार हो सके। निद्रा की पूर्ति न होने पर शारीरिक और मानसिक स्थिति में जो गड़बड़ी उत्पन्न होती है, उसे मनोविज्ञान की भाषा में ‘चेतनात्मक बुभुक्षा’ कहते हैं। आवश्यक विद्युतीय खुराक न मिल पाने के कारण ही यह दशा पैदा होती है। इसके बने रहने पर मनुष्य विक्षिप्तों या अर्द्ध विक्षिप्तों जैसा व्यवहार करने लगता है। पागलपन का एक कारण अनिद्रा भी है। अनिद्रा में इस विद्युत् आहार की ही कमी पड़ती है।

लंबी अनिद्रा के कारण जब उक्त विद्युत् की आपूर्ति में अवरोध उत्पन्न होता है, तो न सिर्फ शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाता है, अपितु उस शक्ति का भी ह्रास होने लगता है, जो अतींद्रिय अनुभूति का महत्त्वपूर्ण आधार है। स्वस्थ व्यक्ति में जैसे-जैसे यह ऊर्जा बढ़ती है, इंद्रियातीत सामर्थ्य की संभावना भी बलवती होने लगती है। योगी-यती इसी विद्युत् को बढ़ाकर ऐसी क्षमताएँ अर्जित कर लेते हैं, जिन्हें जन सामान्य ऋद्धि-सिद्धि के नाम से जानते हैं। निद्रा संवर्द्धन और क्षमता अभिवर्द्धन में इसका कितना बड़ा हाथ है, इसे प्राणायाम का कोई भी अभ्यासी सहज ही अनुभव कर सकता है। देखा गया है कि अभ्यास ज्यों-ज्यों बढ़ता है, बुद्धि तीक्ष्ण होती और गहरी निद्रा आती है। गहन निद्रा का एक गुण शारीरिक हलकापन भी है और दूसरा भविष्य संबंधी स्वप्न का दिग्दर्शन भी।

यों निद्रा संबंधी सामान्य सोच यह है कि रात्रि में हम जितना समय सोते हैं, उतना खोते हैं, पर यह अवधारणा अब गलत साबित होती जा रही है। वैज्ञानिक शोधें अब यह सिद्ध करने की स्थिति में आ गई हैं कि हमारा सोया हुआ समय भी उपयोगिता की दृष्टि से उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना जागरण का, बल्कि यह कहा जाए कि उससे भी अधिक, तो कदाचित् कोई अत्युक्ति न होगी। सीखने-सिखाने के कितने ही ऐसे कार्य इस दशा में भी संपन्न किए जा सकते हैं, जैसे जाग्रतावस्था में। मनोवैज्ञानिकों के इस कथन के पीछे सत्य अब सूर्य की तरह झाँकने और यह प्रमाणित करने लगा है कि नींद अब निरर्थक समयक्षेप जैसी प्रक्रिया न होकर ज्ञान-संपादन की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ऐसा ही एक समाचार पूर्व सोवियत संघ के ‘नोवोत्सी न्यूज एजेंसी’ ने अब से कुछ वर्ष पूर्व वहाँ के अखबारों में छापा, तो लोग आश्चर्यचकित रह गए। शरीर शास्त्रियों ने इसे शेखचिल्लियों जैसी कल्पना बताया, तो रूस के अनेक मनोविज्ञानियों ने उन मनःशास्त्रियों का उपहास उड़ाया, जिन्होंने इस प्रकार का दावा किया था, पर कई दिन पश्चात् जब वहाँ से परिणाम प्राप्त होने शुरू हुए, तो उनका संदेह जाता रहा। यहाँ तक कि उन्होंने स्वयं भी वहाँ जाकर परीक्षण कर सूक्ष्म निरीक्षण किया और किसी प्रकार के संशय की गुंजाइश न रहने पर संतोष व्यक्त किया।

इस अनुसंधान की शुरुआत की भी अत्यंत रोचक घटना है। हुआ यों कि कुछ वर्ष पूर्व मूर्द्धन्य मनःशास्त्री इगोर इवानोविच अपने साथी मनोवैज्ञानिकों के साथ नींद और स्वप्न प्रक्रिया पर विचार कर रहे थे कि अचानक उनके दिमाग में स्वप्न की वह प्रक्रिया कौंधी, जिसके माध्यम से यदा-कदा स्वप्नद्रष्टा को सही सूचना प्राप्त हो जाती है। बस, फिर क्या था, उनके मस्तिष्क में इस संदर्भ में उधेड़बुन आरंभ हो गई। वे और उनके सहयोगी इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार करने लगे कि जब स्वप्नावस्था में दिमाग सत्य संदेश प्राप्त कर सकने में सक्षम है, तो क्या निद्रावस्था में उसे सूक्ष्म शिक्षण संप्रेषित कर प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता?

इन्हीं संभावनाओं के बीच इस विलक्षण अन्वेषण कार्य का जन्म हुआ और मास्को के निकट दूबना नामक स्थान पर तत्संबंधी एक अनुसंधानशाला स्थापित की गई। परीक्षण आरंभ करने से पूर्व मनोवैज्ञानिकों ने कुछ प्रतिमान बनाए, जिनके आधार पर प्रयोगार्थियों का चयन किया जाना था, पर इसका सबसे महत्त्वपूर्ण आधार गहरी नींद में था। प्रयोग को उन्हीं व्यक्तियों को सम्मिलित किया गया, जिन्हें गहरी नींद आती थी। जो शेष प्रतिमानों को पूरे होने पर भी गहरी नींद का अनुबंध पूरे नहीं करते थे, उन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया। दूसरी ओर जिन्हें गहरी निद्रा तो आती थी, पर जो शेष शर्तों की पूर्ति नहीं कर पाए, उन्हें भी इसके अयोग्य घोषित किया गया। कुल मिलाकर परीक्षण के अनुकूल उन्हें ही ठहराया गया, जो निर्धारित सभी शर्तों की पूर्ति करते थे।

प्रयोग प्रारंभ किया गया। इसमें सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के माध्यम से प्रयोगार्थियों को नींद के दौरान अँग्रेजी एवं अन्य भाषाशास्त्र के रिकॉर्ड सुनाए गए और जागने पर तद्विषयक अनेक प्रश्न पूछे गए, जिसके कुछ ने सही, कुछ ने गलत जवाब दिए मनःशास्त्रियों का कहना था कि संभवतः इसका कारण मस्तिष्कीय अनुकूलनता का अभाव था। जिस मस्तिष्क ने जितनी जल्दी स्वयं को प्रशिक्षण योग्य ढाल लिया, उसने उतनी जल्दी सूचनाओं और संदेशों को ग्रहण करना आरंभ कर दिया, पर इसकी कमी सूक्ष्म संकेतों को ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करती है, ऐसा मनोवेत्ताओं का अभिमत था। दूसरा यह दृढ़ विश्वास भी था कि जैसे-जैसे मस्तिष्क की अनुकूलनता विकसित होती जाएगी, वैसे-वैसे उसकी ग्रहणशीलता में भी उत्तरोत्तर विकास होता चला जाएगा। मनोवैज्ञानिकों का मत है कि इस प्रक्रिया द्वारा लोग सोते में भी सारगर्भित जानकारी अर्जित कर उस समय का अतिरिक्त उपयोग कर सकेंगे, जिसे बोलचाल की भाषा में ‘सोना अर्थात् खोना’ जैसे संबोधनों से अभिहित किया जाता है। प्रयोग अभी जारी है।

इसका परिणाम चाहे जो हो, इस तथ्य से सर्वथा इनकार नहीं किया जा सकता है कि जब हम सोते रहते हैं, तब भी प्रकाराँतर से जागते रहते हैं। अंतर सिर्फ इतना होता है कि इसमें चेतना का स्वल्प अंश अचेतन स्थिति में चला जाता है, पर उसका अधिकाँश भाग अपना कार्य यथावत् करता रहता है। हृदय का धड़कना, साँस का चलना, रक्त का दौड़ना उस अवस्था में भी ज्यों-का-त्यों जारी रहता है। ऐसी दशा में बाहरी शिक्षण किसी प्रकार अंतःचेतना में उतर जाए, तो इसे आश्चर्यजनक तो कहा जा सकता है, पर असंभव नहीं। यह प्रक्रिया योगी स्तर के उन लोगों में स्पष्ट देखी जाती है, जिनकी चेतना तनिक परिष्कृत हो गई है। फिर वह सोते हों अथवा जागते, उनकी व्यष्टि चेतना समष्टि चेतना से इस प्रकार गुँथ जाती है कि अदृश्य के गर्भ में जो भी घटना पकती-पनपती रहती है, उसकी महत्त्वपूर्ण जानकारी जागते एवं सोते हुए में समान रूप से मूर्तिमान होने लगती है। महापुरुषों के स्वप्न प्रायः इसी स्तर के होते हैं। उनमें सामान्य जनों जैसे औंधे-सीधे दृश्यों का जाल-जंजाल नहीं होता, वरन् उसमें सोद्देश्य सूचनाओं का सारगर्भित समावेश होता है।

संक्षेप में, नींद एक साथ अनेक प्रयोजन पूरे करती है। वह शरीर और मस्तिष्क की क्लाँति मिटाकर उन्हें नई स्फूर्ति से ओत−प्रोत करती और उस ऊर्जा की भरपायी करती है, जिसका कि कार्य के क्षणों में क्षरण होता रहता है। इसके अतिरिक्त अदृश्य जगत् से संपर्क स्थापित करना, सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के माध्यम से ज्ञानार्जन करना जैसे कितने ही कार्य इसके द्वारा संपादित किए जा सकते हैं। इसलिए नींद स्वास्थ्य की दृष्टि से ही आवश्यक नहीं, वरन् सूक्ष्म आदान-प्रदान के दृष्टिकोण से भी उपयोगी है। इस दिशा में उपेक्षा नहीं बरती जानी चाहिए।


जन्म देने से पूर्व ही शिक्षा की व्यवस्था (kahani)

एक महिला ने शिकागो के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री फ्राँसिस वेलैंड पार्कर से यह पूछा, “वह अपने बच्चे की शिक्षा कब से प्रारंभ करे?” पार्कर ने पूछा, आपका बच्चा कब जन्म लिया है? महिला ने बताया, “वह तो पाँच वर्ष का हो गया।” पार्कर ने कहा, “क्षमा करें मादाम। अब पूछने से क्या फायदा। शिक्षा का सर्वोत्तम समय तो पाँच वर्ष तक ही होता है। सो आपने तो यों ही गँवा दिया। यदि आपने जन्म देने से पूर्व ही शिक्षा की व्यवस्था की होती, तो अब तक वह एक सुयोग्य नागरिक के लघु संस्करण के रूप में विकसित हो गया होता।”


अंतः चेतना से जुड़ा शरीर का रसायन शास्त्र

साधारणतया आहार-विहार का प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने वाले निरोग रहते हैं और असंयम बरतने वाले, अखाद्य खाने वाले बीमार पड़ते हैं। बीमारियों के कारण रोग-कीटाणुओं के रूप में, ऋतु-प्रभाव या धातुओं, तत्त्वों के हेर-फेर में ढूँढ़े जाते हैं और उसी आधार पर चिकित्सा की जाती है, पर कई बार इन सब मान्यताओं को झुठलाते हुए ऐसे कारण उपस्थित हो जाते हैं कि अप्रत्याशित रूप से शरीर के किन्हीं अवयवों का या प्रवृत्तियों का यकायक घटना-बढ़ना शुरू हो जाता है। कारण ढूँढ़ते हैं, तो समझ में नहीं आता। अँधेरे में ढेला फेंकने की तरह कुछ उपचार किया जाता है, तो उसका परिणाम कुछ नहीं निकलता।

ऐसी परिस्थितियाँ प्रायः हारमोन ग्रंथियों में गड़बड़ी आ जाने के कारण उत्पन्न होती है। शरीर के सामान्य अवयवों की संरचना और उनकी कायपद्धति का ज्ञान धीरे-धीरे बढ़ता आया है, इसलिए रोगों के कारण और निवारण के संबंध में काफी प्रगति भी हुई है, पर यह अंतःस्रावी ग्रंथियों की आश्चर्यचकित करने वाली हरकतें जब से सामने आई हैं, तब से चिकित्साविज्ञानी स्तब्ध रह गए हैं। प्रत्यक्षतः शरीरगत क्रिया−कलाप में इनका कोई सीधा उपयोग नहीं है। वे किसी महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति नहीं करतीं, चुपचाप एक कोने में पड़ी रहती हैं और वहीं से तनिक-सा स्राव बहा देती हैं। वह स्राव भी पाचक अंगों द्वारा नहीं, सीधा रक्त से जा मिलता है और अपना जादू जैसा प्रभाव छोड़ता है।

हारमोन शरीर और मन पर कितने ही प्रकार के प्रभाव डालते और परिवर्तन करते हैं। उनमें से एक परिवर्तन काम-वासना का मानसिक जागरण और यौन अंगों की प्रजनन क्षमता भी सम्मिलित है।

छोटी उम्र की लड़की और लड़के लगभग एक जैसे लगते हैं। कपड़ों से, बालों से उनकी भिन्नता पहचानी जा सकती है, अन्यथा वे साथ-साथ हँसते, खेलते, खाते हैं, कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता, पर जब बारह वर्ष से आयु ऊपर उठती है, तो दोनों में काफी अंतर अनायास ही उत्पन्न होने लगता है।

यह हारमोन स्रावों की करतूत है। वे समय-समय पर ऐसे उठते-जागते हैं, मानो किसी घड़ी में अलार्म लगाकर रख दिया हो अथवा टाइम बम को समय के काँटे के साथ फिट करके रखा हो। यौवन उभार के संबंध में इन्हीं के द्वारा सारा खेल रचा जाता है। अन्य सारे अवयव अपने ढंग से ठीक काम करते रहें, पर यदि इन हारमोन ग्रंथियों का स्राव न्यून हो, तो यौवन अंग विकसित न होंगे और यदि किसी प्रकार विकसित हो भी जाएँ, तो उनमें वासना का उभार नहीं होगा, न कामेच्छा जाग्रत् होगी, न उस क्रिया में रुचि होगी। संतानोत्पादन तो होगा ही कैसे?

सामान्यतया कामोत्तेजना का प्रसंग 15-16 वर्ष की आयु से प्रारंभ होकर 60 वर्ष पर जाकर लगभग समाप्त हो जाता है। स्त्रियों का मासिक धर्म बंद हो जाने पर लगभग 50 वर्ष की आयु में उनकी वासनात्मक शारीरिक क्षमता और मानसिक आकाँक्षा दोनों ही समाप्त हो जाती हैं। इसी प्रकार 60 वर्ष पर पहुँचते-पहुँचते पुरुष की इंद्रियाँ एवं आकाँक्षाएँ भी शिथिल एवं समाप्त हो जाती हैं। यह सामान्य क्रम है, पर कई बार हारमोनों की प्रबलता इस संदर्भ में आश्चर्यजनक अपवाद प्रस्तुत करती है। बहुत छोटी आयु के बच्चे भी न केवल पूर्ण मैथुन में, वरन् सफल प्रजनन में भी समर्थ देखे गए हैं। उसी प्रकार शताधिक आयु हो जाने पर भी वृद्ध व्यक्तियों में इस प्रकार की युवावस्था जैसी परिपूर्ण क्षमता पाई गई है।

लिंग भेद से संबंधित हारमोनों में गड़बड़ी पड़ जाए, तो नारी के मूँछें निकल सकती हैं। पुरुष बिना मूँछ का हो सकता है तथा उसकी छाती बालरहित हो सकती है एवं दोनों की प्रवृत्तियाँ भिन्न लिंग जैसी हो सकती हैं। यौन आकाँक्षाएँ भी विपरीत वर्ग जैसी हो सकती हैं। इतना ही नहीं, कई बार तो इन हारमोनों का उत्पाद ऐसा हो सकता है कि प्रजनन अंगों की बनावट ही बदल जाए। ऐसे अनेक ऑपरेशनों के समाचार समय-समय पर सुनने को मिलते रहते हैं, जिनमें नर से नारी की और नारी से नर की जननेंद्रियों का विकास हुआ और फिर शल्य क्रिया द्वारा उसे तब तक के जीवन की अपेक्षा भिन्न लिंग का घोषित किया गया। इसी नई परिस्थिति के अनुसार उन्होंने साथी ढूँढ़े, विवाह किए और घर बसाए।

पुराने जमाने में मृत या स्वल्प कामेच्छा को जगाने के लिए रसायनों और भस्मों का प्रयोग किया जाता था। वह प्रयास भी नशे से उत्पन्न क्षणिक उत्तेजना जैसा ही सिद्ध हुआ। जब से हारमोन प्रक्रिया का ज्ञान हुआ है, तब से यौन ग्रंथियों के रसों को पहुँचाने से लेकर बंदर एवं कुत्ते की ग्रंथियों का आरोपण करने तक क्रम बराबर चल रहा है। आरंभ में उससे तत्काल लाभ दीखता है; पर वह बाहर का आरोपण देर तक नहीं ठहरता। भयंकर ऑपरेशनों के समय रोगी को अन्य व्यक्ति का रक्त दिया जाता है; वह शरीर में 3-4 दिन से अधिक नहीं ठहरता। शरीर यदि रक्त स्वयं बनाने लगे, तो ही फिर आगे की गाड़ी चलती है। इसी प्रकार आरोपित स्राव अथवा रस ग्रंथियां जाग्रत् होकर स्वतः काम करने लगें, अन्यथा वह बाहरी आरोपण की फुलझड़ी थोड़ी देर चमक दिखाकर बुझ जाएगी। अब तक के बाह्य आरोपण के सारे प्रयास निष्फल हो गए हैं। कुछ सप्ताह का चमत्कार देख लेने के अतिरिक्त उनसे कोई प्रयोजन सिद्ध न हुआ।

अस्सी के दशक में अमेरिका के एक वृद्ध डॉक्टर ब्राउन सेक्वार्ड ने घोषणा की कि उसने कुत्ते का वृषण-रस अपने शरीर में पहुँचाकर पुनः यौवन प्राप्त करने में सफलता पा ली है। 72 वर्षीय इस डॉक्टर की ओर अनेक चिकित्साशास्त्रियों का ध्यान आकर्षित हुआ और उन्होंने घोषणा को सच पाया, लेकिन यह सफलता स्थिर न रह सकी। वे कुछ ही दिन बाद पुनः पुरानी स्थिति में आ गए।

लिवरपुल यूनिवर्सिटी के शरीरशास्त्री डॉ. बर्नाडे मरे ने थायरोक्सिन का प्रयोग एक थायराइड विकारग्रस्त रोगिणी पर किया। दवा का असर बहुत थोड़े समय तक रहता था। कुछ वर्ष जीवित रखने के लिए एक-एक करके प्रायः आठ सौ भेड़ों की ग्रंथियां निचोड़कर उसे आए दिन लगानी पड़ती थीं। इस पर धक्का-मुक्की करके ही उसकी गाड़ी कुछ दिन और आगे धकेली जा सकी।

शरीरविज्ञानियों ने शरीर प्रणाली को समझने के लिए हारमोनों का गहराई से अध्ययन शुरू किया, तो कुछ ऐसे तथ्य हाथ लगे, जो विस्मयकारी थे। उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि आखिर इन थोड़े-से रसस्रावों में ऐसा क्या जादू है, जो शरीर की सामान्य व्यवस्था में वह इतनी भयानक उलट-पलट करके रख देते हैं। स्वास्थ्य के साधारण नियमोपनियम एक ओर और उनकी मनमानी एक ओर। इस रस्साकशी में सामान्य व्यवस्था लड़खड़ा जाती है और इन रसस्रावों की मनमानी जीतती है। इन रसों का रासायनिक विश्लेषण करने पर वे सामान्य स्तर के ही सिद्ध होते हैं। उनमें कुछ ऐसी अनहोनी मिश्रित नहीं दीखती, पर इसको झुठलाते हुए जब नतीजा सामने आता है, तो बुद्धि चकरा जाती है और इस विस्मय-विमूढ़ता की स्थिति में हाथ-पर-हाथ धरकर बैठना पड़ता है।

उदात्त भावनाएँ अंतरात्मा में जमीं हों और छोटा बनाने वालों पर बड़प्पन के संस्कार जम जाएँ, तो शरीर को ही नहीं, मस्तिष्क को भी बड़ा बनाने वाले हारमोन उत्पन्न होंगे। इंद्रिय भोगों में आसक्त अंतःभूमिका अपनी तृप्ति के लिए कामोत्तेजक अंतःस्रावों की मात्रा बढ़ाती है। विवेक जाग्रत् हो और विषय-भोगों की निरर्थकता एवं उनकी हानियों को गहराई से समझ लिया जाय, तो इन हारमोनों का प्रवाह सहज ही कुँठित हो जाता है। इसी प्रकार वियोग, विश्वासघात, अपमान जैसे आघात अंतःकरण की गहराई तक चोट पहुँचा दें, तो युवावस्था में भले-चंगे हारमोन स्रोत सूख सकते हैं। इसके विपरीत यदि रसिकता की लहरें लहराती रहें, तो वृद्धावस्था में भी वे यथावत गतिशील रह सकते हैं। जन्माँतरों की रसानुभूति बाल्यावस्था में भी प्रबल होकर उस स्तर की उत्तेजना समय से पूर्व ही उत्पन्न कर सकती है।

काम-क्रीड़ा शरीर द्वारा होती है, कामेच्छा मन से उत्पन्न होती है, पर इन हारमोनों की जटिल प्रक्रिया न शरीर से प्रभावित होती है और न मन से। उसका सीधा संबंध मनुष्य की अंतःचेतना से है। इसे आत्मिक स्तर कह सकते हैं। जीवात्मा में जमे काम बीज जिस स्तर के होते हैं, तद्नुरूप शरीर और मन का ढाँचा ढलता और बनता-बिगड़ता है। हारमोनों को भी प्रेरणा-उत्तेजना वहीं से मिलती है।

पीनियल ग्रंथि भ्रूमध्य भाग में है, जहाँ देवताओं का तीसरा नेत्र बताया जाता है। प्राचीनकाल में ऐसे प्राणी भी थे, जिनके मस्तिष्क में सचमुच एक अतिरिक्त तीसरी आँख और भी होती थी, जिससे वे बिना गरदन मोड़े पीछे के दृश्य भी देख सकते थे। अभी भी अफ्रीका में कुछ ऐसी छिपकलियाँ देखी गई हैं, जिनके सिर पर काँर्निया, रेटिना, लेंसयुक्त पूरी तीसरी आँख होती है।

गेहूँ की आकृति जैसी इस छोटी-सी ग्रंथि में आश्चर्य-ही आश्चर्य भरे पड़े हैं। जिन चूहों में दूसरे चूहों की पीनियल ग्रंथि का रस भरा गया, वे साधारण समय की अपेक्षा आधे दिनों में ही यौन रूप से विकसित हो गए और जल्दी बच्चे पैदा करने लगे। समय से पूर्व उनके अन्य अंग भी विकसित हो गए, पर इस विकास में जल्दी भर रही, मजबूती नहीं आई। शिवजी की कामदहन कथा की इस हारमोन से संगति अवश्य बैठती है, पर अंतःकरण का रुझान जिस स्तर का होगा, शरीर और मन को ढालने के लिए हारमोनों का प्रवाह उसी दिशा में बहने लगेगा।


भाव-संवेदनाएँ सिर्फ भगवान् के लिए

पूर्व आश्रम में गोस्वामी तुलसीदास की आसक्ति प्रसिद्ध है। उन्होंने स्वयं भी स्वीकार किया है और जीवनीकारों ने विस्तार से लिखा है कि तुलसीदास अपनी पत्नी के बिना एक दिन भी नहीं रह सकते थे। बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो गई, एक वैष्णव संन्यासी ने उन्हें पाला-पोसा और वीतराग गुरु से जितना स्नेह-दुलार मिल सकता है, उतना ही पाया। रामकथा कहने लगे, तो पंडितों-विद्वानों ने भी उनका तिरस्कार ही किया। जीवन में प्रेम कभी मिला ही नहीं। विवाह हुआ और संस्कारवान् स्त्री रत्नावली उनकी जीवनसंगिनी बनी, तो जैसे अब तक की सारी रिक्तता भर गई। पत्नी से मिला प्रेम और दुलार तुलसीदास को अवश्य निर्भर बना गया। यह स्थिति बन आई कि रत्नावली के बिना एक दिन भी रहना मुश्किल हो गया।

किंवदंती है या सत्य, लेकिन घटना महत्त्वपूर्ण है। एक दिन रत्नावली अपने मायके चली गई तुलसी उस समय आसपास ही कहीं रामकथा करने गए थे, लौटने में विलंब था। रत्नावली का कुशल-क्षेम पूछने भाई आया, तो सोचा एकाध दिन माता-पिता के पास ही हो आया जाए। कुछ ऐसी स्थिति बनी कि कथा निर्धारित समय से पहले ही पूरी हो गई और तुलसीदास घर लौट आए। देखा पत्नी घर पर नहीं है। उलटे पैर ससुराल दौड़े गए। बरसात के दिन थे, नदी में बाढ़ आ रही थी, तैरना ठीक से आता नहीं था। अँधेरे में कोई चीज तैरती दिखाई दी, उसी का सहारा लेकर उस पार पहुँचे। किनारे लगते वक्त सहारे को ठिकाने लगाया, बादल गरजे और बिजली चमकी तो उसकी रोशनी में देखा कि जिसे सहारा समझा था, वह वृक्ष का तना या लकड़ी का पाट नहीं, एक मुरदा था। कुछ देर के लिए सकपकाए और फिर सँभल गए। ससुर के घर की ओर सरपट दौड़े।

ससुराल में दरवाजा बंद था। चौकीदार रखने का रिवाज उन दिनों नहीं था। परकोटे के भीतर रहने की जगह बनी हुई थी। कुँडी खटखटाई, दरवाजा बजाया और आवाजें भी लगाईं। बरसात का मौसम था, आँधी-तूफान में किसी को सुनाई नहीं दिया। घर के चारों तरफ घूम गए। पीछे की तरफ देखा। छज्जे पर कुछ लटक रहा था। उसे पकड़कर ऊपर चढ़ गए। कहते हैं उसे रस्सी समझा था, असल में वह साँप था। तर्क कहता है कि साँप को पकड़कर कोई झूल नहीं सकता। वह डंस लेगा, हाथ फिसल जाएगा या सांप का शरीर भी टूट सकता है। लेकिन यहाँ तर्क की आवश्यकता नहीं है। तथ्य और संदेश महत्त्वपूर्ण हैं। तथ्य यह है कि तुलसीदास विरह-वेदना से दग्ध थे। साँप को रस्सी समझकर ऊपर चढ़ गए। रत्नावली तक पहुँचे। पत्नी अपने पति के अनुराग को समझती थी, लेकिन इतने दीवाने होंगे, यह सोचा नहीं था। देखकर प्रसन्न हुई और साथ ही उलाहना भी दिया कि मेरे प्रति इतना राग है। यही प्रीति कदाचित् भगवान् के प्रति होती, तो संसार का भी भला होता व उनका अपना भी। रत्नावली के ये भाव एक दोहे के रूप में प्रसिद्ध हैं-

अस्थि चर्ममय देह, तामैं ऐसी प्रीति। होति जो श्रीराम महँ, तो काहे की भव भीति॥

कहते हैं कि इन पंक्तियों ने तुलसीदास को जगा दिया। वे उलटे पाँव लौटे और फिर कभी गृहस्थ की ओर मुड़कर नहीं देखा। वाराणसी में जब वे कुटिया बनाकर रहने लगे थे, तो रत्नावली भी वहाँ आई थी। उनके द्वार पर ही शेष जीवन व्यतीत कर दिया। पति के सामने ही शरीर छोड़ा। जितने समय वहाँ रहीं, अपने आपको धन्य अनुभव करती रहीं कि संसार को भक्तिभाव में डूबने का संदेश देने वाला पति मिला। पति ने भले ही पीछे मुड़कर नहीं देखा हो, पर पत्नी भावनाएँ भगवान् में ही केंद्रित कर देने वाले पति को दूर से देखकर भी कृतकृत्य हो जाया करती थी।

भावनाओं का केंद्र हृदय माना गया है। वह हृदय नहीं जो सीने के मध्य भाग में धड़कता हुआ एक माँसपिंड है और पूरे शरीर में रक्त फेंकता है। जिस हृदय को भावनाओं का केंद्र बताया गया है। उसे योगशास्त्रों में ऊर्जा के एक भँवर की तरह निरूपित किया गया है। इस भँवर में उलझकर मनुष्य अपना व्यक्तित्व खो देता है। बुद्धि और विचार वहाँ मौन हो जाते हैं, युक्ति और तर्क का कोई महत्त्व नहीं रह जाता और दूसरों को दो कौड़ी की दिखाई देने वाली चीजें भी संसार में सब से ज्यादा मूल्यवान् दिखाई देने लगती हैं। देश, समाज, उद्देश्य, इष्ट, प्रियपात्र और अनुकूल विषयों में मन जब रमने लगता है, तो कितना ही विचार और तर्क करें, वह विमुख होता ही नहीं। विचार की दृष्टि से देखें, तो देश, समाज या किसी बड़े उद्देश्य के लिए मर मिटने में कोई समझदारी नहीं दीखती। फिर भी लोग अपने सुख विलास को छोड़कर आगे आते हैं, अपना उत्सर्ग कर देते हैं, खुशी-खुशी मर मिटते हैं।

स्वामी विवेकानंद ने एक जिज्ञासु का समाधान करते हुए साधकों की कक्षा में कहा था, “सावधान! भाव संपदा को लौकिक प्रयोजनों या प्रपंचों में बरबाद मत करना। यह संपदा सिर्फ भगवान् के लिए ही है।” लोग सिर्फ इसलिए दुःखी होते हैं कि भगवान् के प्रति समर्पण का भाव उठने पर विचार और तर्क करने लगते हैं, जबकि वहाँ भावना से काम लेना चाहिए। दूसरी तरफ लौकिक प्रपंचों में भावुक हो उठते हैं, जबकि वहाँ समझ और विवेक का उपयोग करना चाहिए। प्रश्न यह था कि निजी जीवन में भावशून्य दिखाई देने वाले भजन-कीर्तन में .... क्यों हो उठते हैं? भावुकता प्रायः दुःख का कारण बनती है। ईश्वर के प्रति वह जागती है, तो भी क्लेश ही होता है। क्या यह स्थिति से बचा नहीं जा सकता?

भावना है तो वे जागेंगी ही। उन्हें रोका नहीं जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में ऐसे क्षण अनिवार्य रूप से आते हैं, जब भावों का ज्वार उमड़ने लगता है। कुछ लोग उन्हें व्यक्त कर लेते हैं और कुछ भीतर-ही-भीतर पी जाते हैं। कुछ लोग एक सुँदर फूल देखते हैं, उसे समझते और बौद्धिक स्तर पर स्वीकार भी करते हैं, लेकिन मन में उससे कोई स्फुरणा नहीं आती। सुहानी सुबह, प्रकृति का रम्य वातावरण, मासूम बच्चे, कला-कौशल का प्रदर्शन, सुँदर और स्निग्ध व्यक्तित्व, अनुकरण करने योग्य सत्कार्य देखकर उनमें उल्लास नहीं जगता। कारण यह नहीं है कि वे भावशून्य होते हैं, बल्कि कारण यह है कि उनका हृदय द्वार बंद रहता है और जब मुस्कराने का अवसर आता है, तो वे उसके लाभ-हानि का हिसाब लगाने बैठ जाते हैं।

एक अन्य स्थिति में साधारण अप्रिय प्रसंगों पर भी लोगों के मन में रोष, विषाद, हताशा और उन्मत्त भाव प्रकट होने लगते हैं। कष्ट के समय वे इतने विचलित हो जाते हैं कि उसके निवारण का उपाय सोचने के बजाय विलाप करने लगते हैं। ऐसे लोगों को भावनात्मक दृष्टि से दुर्बल कहा गया है। भावशून्यता और भाव दौर्बल्य दोनों ही दोष हैं। उनके निवारण का एक ही उपाय है कि जहाँ बुद्धि का उपयोग किया जाना चाहिए, वहाँ भाव संपदा को नहीं लगाएँ, जहाँ भावनाएँ समर्पित करनी चाहिए, वहाँ बुद्धि का प्रयोग न करें।

बुद्धि का उपयोग कहाँ आवश्यक नहीं है? भगवान् के प्रति अपने आपको खोलते हुए विचार और तर्क में नहीं उलझना चाहिए। ध्यान, प्रार्थना, भजन, कीर्तन और सत्संग आदि साधनों में जिस किसी का भी अभ्यास हो, बुद्धि का उपयोग व्यर्थ मालूम देगा। ईश्वर के सामने स्वयं को किसी भी रूप में प्रस्तुत करते हुए श्रद्धाभाव की ही अपेक्षा की गई है। बौद्धिक स्तर पर ईश्वरीय सत्ता, उसकी प्रेरणा, संसार और सिद्धाँतों का विवेचन किया जा सकता है, लेकिन जब साधना क्षेत्र में उतरना हो तो बौद्धिक ऊहापोह को एक तरफ छोड़ दिया जाता है, भावनाएँ ही नियोजित की जाती हैं।

ध्यान और भजन के समय भावनाएँ आपने आप उमड़ने लगती हैं। देखा गया है कि इन प्रक्रियाओं को अपनाने पर साधकों की आँखें अपने आप सजल हो उठती हैं। कितनी ही दमित भावनाएँ उभर आती हैं। भावशून्य और तर्क या विचार के सहारे चलने वाले व्यक्ति सत्संग में अथवा गुरुसत्ता के सामने उपस्थित होने पर भावनाओं का विस्फोट होता अनुभव करते हैं। ध्यान आँदोलन के प्रचार में वर्षों से जुटी संस्था विवेक आश्रम के संयोजक स्वामी अनंतानंद ने अपने अनुभव लिखे हैं। उनके अनुसार ध्यान-सत्संग में आने वाले साधकों को वर्णनातीत आनंद की अनुभूति होती है। उनकी दमित भावनाएँ हिलोरें लेने लगती हैं। खासतौर पर कीर्तन में और ध्यान के सामूहिक अभ्यासों के समय लोग अपने आप को रोक नहीं पाते। वे सुबकते हैं, चीखते हैं, शरीर थरथराने लगता है और कई साधक गिर जाते हैं। सामान्य क्रम में यह स्थिति पीड़ा और भय का कारण बनती है, लेकिन साधना के क्षेत्र में यह तीव्र आवेग मात्र है। जब भावनाओं का ज्वार उठता है, तो मूलाधार चक्र सक्रिय हो जाता है अथवा किसी और नाड़ी में ऊर्जा प्रवाह दौड़ने लगता है।

कुछ समय के आवेग के बाद भावनाओं का विरेचन हो जाता है और वे संतुलित होने लगती हैं। भक्तों के जीवन में इनका आवेग प्रायः देखा गया है, लेकिन उनमें लय और संतुलन होता है। मीरा के अंतर्जगत् में भक्ति का आवेग होता था, तो वे नृत्य करने लगती थीं। उनके कंठ से गीत निकलने लगते थे। वे कोई बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन उनके रचे पद साहित्य में उच्च कोटि का स्थान रखते हैं। उनके लौकिक जीवन में, पारिवारिक या सामाजिक जीवन में भाव संवेदनाएँ शायद ही व्यक्त हुई हैं, लेकिन कृष्ण का नाम सुनते ही वे विभोर हो उठती थीं।

मीरा स्वभाव से ही कृष्ण के प्रति समर्पण भाव से भावित थीं। तुलसीदास के जीवन में भगवान् के प्रति समर्पित होने की घटना एक साधारण घटना से आई। वे भगवद्भाव से आविष्ट हो गए, तो जीवन के सब दुःख, कष्ट और अभाव जाते रहे। कठिन परिस्थितियों में भी उनके मन में दैन्य की भावना नहीं आई। सूरदास को कुछ लोग जन्माँध मानते हैं, लेकिन बहुत से समीक्षकों की मान्यता है कि उनके नेत्रों की ज्योति बाद में गई। अपनी रचनाओं में उन्होंने भावों और लौकिक क्रियाओं की जैसी सूक्ष्म अभिव्यक्ति की है, वह जन्म से अंधा व्यक्ति कर ही नहीं सकता। उदाहरण के लिए, मक्खी के गुड़ में लिपट जाने और किसी स्थान पर बैठ जाने के बाद पीछे के दो पाँव उठाकर रगड़ने की बारीकी बिना देखे समझी ही नहीं जा सकती। सूरदास जन्म से अंधे नहीं रहे होंगे। जीवनीकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि एक स्त्री के प्रति आकर्षित होने और उसकी तीव्र लताड़ सुनने के बाद वे क्षुब्ध हो गए थे। उस दुत्कार में भगवान् के प्रति उन्मुख होने का संकेत था। सूरदास ने क्षुब्ध होकर किया होगा, लेकिन वस्तुतः उनके जीवन में क्राँति आई। उन्होंने इस निश्चय के साथ अपनी आँखें फोड़ लीं कि अब दृष्टि सिर्फ अपने भीतर बैठे भगवान् की रूप-माधुरी का रसपान ही करेगी।

लौकिक जीवन में भावनाओं को लेकर प्रौढ़-परिपक्व रहना चाहिए। श्रीकृष्ण भावामृत संघ (इस्कान) के संस्थापक स्वामी भक्ति वेदाँत ने अपना अनुभव लिखा है, “प्रारंभ से ही मुझ पर भावनाओं की प्रतिक्रिया नहीं के बराबर होती है। अपने किसी घनिष्ठ संबंधी की मृत्यु होने पर दुःख नहीं होता। उसके संबंधियों को संवेदना का एक पत्र लिख देता हूँ, जिसमें दुःखी नहीं होने का अनुरोध रहता है। बहुत से साधक हैं, जो किसी भी विपत्ति या दुर्घटना से विचलित नहीं होते। परिस्थितियों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन वे लोग भगवत्कथा सुनते हुए कुछ प्रसंग आने पर फूट-फूटकर रोने लगते हैं। कथा-प्रसंगों में मैं स्वयं भी अपनी भावनाओं को हिलोरें लेने से रोक नहीं पाता। उस अवसर का रुदन और विलाप भी शाँति प्रदान करता है।”

स्वामी भक्ति वेदाँत के ही एक शिष्य स्वामी राधारमणदास ने लिख है कि साधन-भजन के अलावा सभी अवसरों पर केवल बुद्धि का प्रयोग करें, तो पाएँगे कि जीवन की हर परिस्थिति से निपट सकोगे। वहाँ भावनाओं का प्रयोग व्यर्थ और अपव्ययमूलक है। एक छोटी-सी स्थिति की कल्पना कीजिए कि रसोईघर में एक चूहा उपद्रव कर रहा है। उससे छुटकारा पाना चाहते हैं। क्या आप उसे मारने के लिए मशीनगन का प्रयोग करेंगे। नहीं .... एक मामूली-सा पिंजड़ा लाकर रख देंगे, उसमें रोटी का टुकड़ा लटका देंगे, युक्ति लगाएँगे और इस तरह चूहे से छुटकारा पा लेंगे। यही बात साँसारिक प्रपंचों पर भी लागू होगी। उनके लिए भावुक होना समझदारी नहीं है। साँसारिक संबंध अनित्य हैं। व्यवहार भी आते-जाते रहते हैं। उन्हें इतना घनिष्ठ या स्थायी मत बनाइए कि वे भावनाओं तक पहुँच जाएँ। यह दिव्य संपदा सिर्फ ईश्वर भक्ति और उच्च आध्यात्मिक अनुभवों के लिए ही सुरक्षित रखो। उस दशा में जब भी अवसर आएगा, तो भावनाएँ दिव्य अनुभवों के लिए वाहन और यंत्र का काम करेंगी। वे उच्च आध्यात्मिक शक्तियों को मार्ग देंगी।

कुछ साधकों को शिकायत रहती है कि वे बहुत परिश्रम करते हैं, फिर भी उन्हें अनुभूति नहीं होती। इसका एक ही कारण है। अनुभूति का क्षेत्र भावलोक है। वह क्षुद्र प्रयोजनों या लौकिक व्यवहार में ही व्यस्त है। जिस क्षेत्र में भागवत् भाव उतरना चाहिए, उसे लौकिक भीड़ से घेर रखा है और भगवान् के लिए दूसरा क्षेत्र छोड़ दिया है। जिस क्षेत्र में अवतरण होना है, वह खाली ही नहीं है। विमानतल पर मोटरगाड़ियाँ खड़ी कर दी जाएँ और हवाई जहाज बस अड्डों पर उतारने की कोशिश करें, तो यह कभी संभव नहीं होगा। एक अन्य उदाहरण से यों भी समझाया गया है कि गलत पता लिखा हुआ लिफाफा सही व्यक्ति तक नहीं पहुँच सकता। सही पता यह है कि भावनाएँ सिर्फ भगवान् के लिए और बुद्धि व्यवहार क्षेत्र के लिए। भाव जगत् में कूड़ा-कबाड़ इकट्ठा कर लिया है, तो साधना के क्षेत्र में हताशा, उदासी, खिन्न भाव और अंत में अरुचि ही हाथ लगेगी। बुद्धि का प्रयोग करने पर बहुत हुआ, तो ईश्वर के प्रति कुछ विचित्र और हास्यास्पद लगने वाली धारणाएँ बन जाएँगी, वे धारणाएँ बनती-बिगड़ती रहेंगी। आती-जाती रहने वाली छायाओं की तरह वे कोई प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकेंगी। एक दिन साधन-भजन छोड़कर आप भगवान् की खिल्ली उड़ाते देखे जाएँगे।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि साँसारिक घटनाओं के संबंध में प्रतिक्रियाओं से शून्य और शाँत रहा जाए। भजन-साधन में वह सारी क्षमता झोंक दी जाए। निर्दोष शिशु की तरह भागवत् कार्यों में हिस्सा लें। वहाँ से संसार में लौटें तो नेतृत्व बुद्धि के हाथों सौंप दें। भावनाओं को पीछे बैठा रहने दें। मंदिरों में लोग नंगे पाँव खुद चलकर जाते हैं। पूजा-पाठ, सेवा, समर्पण, दक्षिणा, प्रसाद आदि कृत्य अपने ही हाथों से संपन्न करते हैं। मंदिर से बाहर आते ही वे आवश्यक कार्य दूसरों के भरोसे या सेवकों के जिम्मे छोड़ देते हैं, अपने अस्तित्व को भावप्रधान बनाएँ तो भगवान् के कार्यों में उसे ही नेतृत्व करने दें। बुद्धि सेवक सहायक है। उसे दुनिया के लिए ही रहने दें।


काल के आयाम से जुड़ी अलौकिकताएँ

देह और चेतना एक-दूसरे से इस प्रकार गुँथी हुई हैं कि साधारण स्थिति में उन दोनों का पृथक्करण प्रायः असंभव बना रहता है, पर कई बार असाधारण परिस्थितियों में जब काया का बंधन ढीला होता है, तो आत्मचेतना वर्तमान कालखंड से किसी दूसरे में प्रवेश कर वहाँ की गतिविधियों, घटनाओं, व्यक्तियों को ठीक उसी प्रकार देखती है, मानो सब कुछ अपनी आँखों के आगे घटित हो रहा हो, जबकि सचाई यह है कि वह वर्षों पूर्व का प्रसंग होता है। विज्ञानवेत्ताओं ने इस प्रक्रिया को ‘टाइम स्लीप-काल सर्पण’ की संज्ञा दी है।

ऐसी ही एक घटना का उल्लेख काँलिन विल्सन ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘बियोण्ड दि अकल्ट’ में किया है। ‘डाउन दि रैबिट हाँल’ नामक अध्याय में इसकी चर्चा करते हुए वे लिखते हैं कि उक्त प्रकरण मूर्द्धन्य इतिहासकार आरनोल्ड टायनबी के साथ उस समय घटित हुआ, जब वे 10 जनवरी सन् 1912 को ग्रीस के एक किले की मुँडेर पर बैठे सामने के मैदान पर दृष्टिपात कर रहे थे और 197 वर्ष ईसा पूर्व हुए युद्ध के बारे में सोच रहे थे। अचानक उनकी आँखों के आगे का दृश्य बदलने लगा। वहाँ बिखरी धूप के बदले अब धुँध दिखाई पड़ने लगी। आमने-सामने दो सेनाएँ आक्रमण-प्रत्याक्रमण के घात-प्रतिघात में मुस्तैद थीं। एक ओर की पहाड़ी पर रोमन सेनाएँ मोरचा सँभाले हुए थीं, जबकि प्रतिपक्ष में मैसोडोनिया के फिलिप्स पंचम् की सेनाएँ थीं। दोनों में जबरदस्त भिड़ंत चल रही थी। वे एक-दूसरे को परास्त कर आगे बढ़ जाने के लिए उतावली थीं। इसी बीच कुहरा छँटा। रोमन सेनाएँ कमजोर पड़ने लगीं और अंत में आत्मसमर्पण कर दिया। मैसोडोनियन सेना का एक जत्था रोमन टुकड़ी को पहाड़ी के नीचे की ओर ले जाता दिखलाई पड़ा। ऐसा करते समय उन दोनों के बीच एक खतरनाक फासला पैदा हो गया, जिसका लाभ उठाकर रोमन अधिकारियों ने पीछे मुड़कर उन पर आक्रमण कर दिया। इस समय अधिकाँश रोमन सिपाही निहत्थे थे। वे अपने हथियार समर्पण के समय फेंक चुके थे, किंतु इस बार शत्रु सेनाओं ने उन्हें नहीं बख्शा और गाजर-मूली की तरह काट दिया। दृश्य इतना स्पष्ट था कि टायनबी विचलित हो उठे। वे उस कत्लेआम को और अधिक देखने का साहस नहीं जुटा सके और दृष्टि फेर ली। दूसरी ओर उन्हें कुछ अश्वारोही सिपाही दीख पड़े। वे सैकड़ों वर्ष पूर्व पहनी जाने वाली मैसोडोनियन पोशाक में थे। इस मध्य पुनः एक बार परिदृश्य बदला। अब वहाँ केवल सपाट मैदान था, जिसमें प्रखर धूप खिली हुई थी। वहाँ न कोई लाश थी, न युद्ध का कोई चिह्न। स्पष्ट है, टायनबी विगत के कालखंड में प्रवेश कर वहाँ हुई लड़ाई की झाँकी देख रहे थे।

महान् पर्वतारोही फ्रैंक एल. स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘दि माउंटेन विजन’ में ऐसी एक विवरण प्रस्तुत किया है। वे एक बार दिन के समय मोरविक से लोकडुइक तक स्कोटिश पहाड़ियों को पार कर रहे थे। धूप प्रखर थी। दूरस्थ सागर का नीला जल और पर्वतमालाओं की हरियाली दोनों मिलकर ऐसा लुभावना दृश्य उपस्थित कर रहे थे, जो मन को मोहने वाला था। वे चले जा रहे थे, तभी उन्हें कुछ असाधारण अनुभव हुआ। उन्हें लगा जैसे यहाँ का आभामंडल सामान्य नहीं, विकारयुक्त है। उसमें कुछ ऐसे अनिष्टकारी तत्त्व घुले हुए हैं, जो मनुष्य को, उसके चिंतन और व्यवहार को गहरे प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे वातावरण में रुकना उचित नहीं, यह सोचकर पहले तो वे वहाँ से तुरंत प्रस्थान करने का मन बनाने लगे। पीछे उनने इसकी सत्यता परखनी चाही और वहाँ के निषेधात्मक आभा की तीक्ष्णता का अनुमान लगाने के लिए रुक गए। उन्हें ऐसी क्षमता प्राप्त थी कि वे शीघ्र ही एकाग्रचित होकर अतींद्रिय स्थिति में पहुँच जाते थे। उनने मस्तिष्क को पूरी तरह विचार शून्य किया और सामने की ओर देखने लगे। वहाँ एक लोमहर्षक दृश्य फिल्म की तरह प्रकट हुआ। लगभग बीस स्त्री, पुरुष और बच्चे परस्पर संघर्ष कर रहे थे। उनके चेहरे से स्पष्ट झलक रहा था, जैसे वे बहुत थके हुए हों। लंबी यात्रा के उपराँत सब वहाँ पहुँचे तथा किसी कारण को लेकर भिड़ पड़े। देखते-ही-देखते सभी ने एक-दूसरे के विरुद्ध अस्त्र-शस्त्र उठा लिए। भाले, बरछे, बल्लमों के प्रहार से वहाँ की धरती रक्तरंजित हो उठी। इस संघर्ष में कोई भी जीवित न बचा और संपूर्ण युद्धस्थल शवों से पट गया। इस हृदय-विदारक दृश्य को देखकर उनका मन विचलित हो उठा। वे वहाँ से चल पड़े।

बाद में ‘स्काँट्समैन’ नामक पत्रिका में उनकी उक्त पुस्तक की समालोचना के साथ एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें उनने दो और ऐसी ही घटनाओं का वर्णन किया था। एक अलौकिक दर्शन सन् 1715 में ग्लीन ग्लोमेक के निकट सड़क पर हुआ तथा दूसरा सन् 1745 में। दोनों ही दृश्य संघर्ष के थे।

ऐसे ही एक अनुभव की चर्चा करते हुए आरनोल्ड टायनबी अपनी रचना ‘ए स्टडी ऑफ हिस्ट्री’ भाग दस में लिखते हैं कि जब वे एफीसस के एक नाट्यगृह के खंडहर में बैठे हुए थे, तो अचानक ही खाली नाट्यशाला में दर्शकों की भारी भीड़ दिखाई पड़ने लगी। लोग तेजी से इधर-से-उधर आ-जा रहे थे। उनमें आपस में बातें भी हो रही थीं। उनके पहनावे वर्तमानकालीन नहीं थे। उनने जो टोपियाँ पहन रखी थीं, वे लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व प्रचलन में थीं। उनकी बात-चीत उन्हें स्पष्ट कर्णगोचर हो रही थीं, पर वह शैली आज की नहीं थी। उसमें स्फुट परिवर्तन प्रतीत हो रहा था। सामने सुसज्जित मंच था। उसके एक किनारे कुछ वाद्य यंत्र रखे थे। कुछ व्यक्ति उनसे छेड़छाड़ करते दीख रहे थे। शायद वे उन्हें स्वरों से मिला रहे थे। तभी अचानक परदा गिर गया। कुछ क्षण पश्चात् जब वह दुबारा उठा, तो नाट्य मंच पर एक नृत्याँगना विराजमान थी। पहले उसने दर्शकों से कुछ कहा, जो टायनबी को सुनाई नहीं पड़ा। बाद में उसने आगे-पीछे, दायें-बायें घूमकर एक विशिष्ट मुद्रा में हाथ फैलाए। कदाचित् कार्यक्रम शुरू करने से पूर्व तब की यह कोई परंपरा थी। तत्पश्चात् नृत्य प्रारंभ हुआ। उसने जो लास्य प्रस्तुत किया, वह आकर्षक और मनमोहक था। उसके पाँवों की थिरकन और अंगों की लोच-लचक दर्शनीय थी। नृत्य और संगीत का वह संगम इतना अद्भुत था कि सभी मंत्रमुग्ध हो उसे देख रहे थे, तभी नेपथ्य में शोरगुल सुनाई पड़ा। वहाँ से आग की लपटें उठ रही थीं। लोग चीखते-चिल्लाते इधर-उधर दौड़ रहे थे। दर्शकों में भी भगदड़ मच गई। इसी समय टायनबी की तंद्रा टूटी। उनने इतस्ततः देखा। वहाँ न तो आग थी, न दर्शक। वे एफीसस के भग्नावशेष के मध पूर्ववत् बैठे हुए थे। बाद में वहाँ के प्राचीन इतिहास के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि उक्त नाट्यशाला की तबाही में कार्यक्रम के दौरान लगी आग की ही भूमिका थी। वे उस जीवंत दृश्य को सैकड़ों वर्ष बाद भी ज्यों-का-त्यों घटित होते देख रहे थे। ऐसा ‘टाइम स्लीप’ के कारण ही संभव हो सका।

उसी ग्रंथ में एक अन्य घटना का बखान करते हुए वे लिखते हैं कि तब वे ग्रीस भ्रमण पर थे, तब उनकी आयु मात्र तेईस वर्ष की थी। उन्हें इतिहास संबंधी जानकारियों में उन दिनों गहरी रुचि थी, इसलिए वे सनक स्तर पर यहाँ-वहाँ घूमा करते थे। इस क्रम में एक बार वे क्रीट स्थित एक पर्व शिखर पर जा पहुँचे। वहाँ ‘वारुकविला’ का भग्नावशेष मौजूद था। उसका निर्माण तीन शताब्दी पूर्व वेनिस के गवर्नर के लिए शायद किया गया था। उसे खड़े-खड़े अभी निहार ही रहे थे कि उन्हें रोमाँच होने लगा और वे अर्द्ध चेतना जैसी स्थिति में पहुँच गए। अब वहाँ एक भव्य महल दीख रहा था। भवन के दरबान पहरेदारी में मुस्तैद थे। अंदर चहल-पहल थी। कई अभिजात्य लोग परस्पर, बातचीत में संलग्न थे। ऐसा लग रहा था, मानो कोई समारोह हो। इसी बीच वहाँ एक दुर्घटना घट गई। प्रहरी के पेट में एक आगंतुक ने किसी शस्त्र से प्रहार कर दिया। वह गिर पड़ा। रक्त का फव्वारा फूट निकला। कुछ ही देर में उसकी मृत्यु हो गई। दृश्य इतना भयावह था कि टायनबी की अर्द्ध मूर्च्छा भंग हो गई। सामने वही भग्न भवन खड़ा था। इसके अतिरिक्त वहाँ कोई भी न था।

यह तो किन्हीं-किन्हीं के साथ यदा-कदा घटने वाली आकस्मिक घटनाएँ हैं। इन्हें साधारण नहीं कहा जा सकता। साधारण वह है, जो सर्वसुलभ हो, जिसे हर एक सफलतापूर्वक संपन्न कर सके। इस स्थिति को योग विज्ञान द्वारा ही उपलब्ध किया जा सकता है। इससे जब चेतना को परिमार्जित-परिष्कृत करके प्रखर बनाया जाता है, तब वह इससे भी अनेक गुना अधिक विस्मयकारी परिणाम प्रस्तुत करती है, इसलिए प्रत्येक को इस परिमार्जन की ओर ही ध्यान देना चाहिए। इतने से ही उस अलौकिकता को हस्तगत किया जा सकता है, जिसे साधारण स्थिति और अवस्था में चमत्कार कहकर पुकारते भर रहते हैं।


सुसंस्कारी पुत्र (kahani)

वंश परंपरा बनाए रखने के लिए व्यास जी ने गाँधारी तथा कुँती दोनों को वर माँगने के लिए कहा। गाँधारी ने 100 पराक्रमी पुत्र माँगे, किंतु कुँती ने 5 वीर और सुसंस्कारी पुत्र माँगे। इतिहास साक्षी है कि 100 पुत्रों का पालन करने में समर्थ गाँधारी उनकी सुसंस्कारिता का क्रम न बिठा सकीं। निर्वाह के लिए परेशान रहकर भी कुँती 5 पुत्रों को सुसंस्कार देने में सफल रहीं। गाँधारी के 100 पुत्र नष्ट हुए, किंतु कुँती के 5 पुत्रों का इतिहास स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया।


जाग्रत् युवा चेतना ही करेगी समग्र क्राँति

युवावस्था मानव जीवन का वसंत काल होता है। यह ऐसा समय होता है, जब विधाता की दी हुई सारी शक्तियाँ सहस्रधारा बनकर फूट पड़ती हैं। हर मन उमंग एवं उत्साह से परिपूर्ण होता है। कुछ कर दिखाने की चाहत होती है। आज भी राष्ट्र युवा चेतना के उन स्वरों को खोज रहा है, जिनसे समग्र क्राँति एवं नए इतिहास की रचना का गान प्रस्फुटित होगा।

समाज एवं राष्ट्र के नवनिर्माण में सदा से ही युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। प्राचीनकाल से लेकर आज तक युवाओं के योगदान से ही न सिर्फ समाज में समय-समय पर सकारात्मक बदलाव आते रहे हैं, अपितु राष्ट्र को भी नई दिशा मिलती रही है। वर्तमान समय में जब परिवार, समाज एवं राष्ट्र की धुरी लड़खड़ा रही है। संपूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन आवश्यक हो गया है। युवाओं का इस ओर से पूर्णतः उदासीन रहना निश्चित रूप से चिंताजनक है।

जिस युवा पीढ़ी के सामने देश का भविष्य सँवारने की महती जिम्मेदारी है। उसकी ऊर्जा रचनात्मक कार्यों में लगने के बजाय विध्वंसकारी गतिविधियों में खरच हो रही है। कुछ समय पहले तक देश की युवा पीढ़ी को ऊर्जावान्, विचारशील, कल्पनाशील एवं जुझारू माना जाता था। उसके इन्हीं गुणों के आधार पर उम्मीद की जाती थी कि वह समझदार निर्णय, सक्षम प्रतिस्पर्द्धा में टिकने वाली और सकारात्मक दृष्टिकोण वाली होगी। उम्मीदों के विपरीत आज युवा पीढ़ी निराश, कुँठाग्रस्त एवं आक्रोश की भावना से ग्रस्त अपने भविष्य के प्रति आशंकित एवं अनिश्चित नजर आती है। युवाओं के चेहरे पर ये मनोभाव कहीं भी आसानी से पढ़े जा सकते हैं।

एक समय था जब गाँधी, सुभाष, लेनिन, विवेकानंद एवं दयानंद जैसे उच्च चरित्र से पतरपूर्ण व्यक्तित्व युवाओं के आदर्श हुआ करते थे। समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए हर युवा तत्पर रहता था, परंतु आज समाज को बदलने के बजाय स्वयं बदल जाना उसे ज्यादा रुचिकर लगने लगा है। उच्च आदर्श एवं नैतिकता सिर्फ किताबी बातें बनकर रह गई हैं। भौतिक मूल्यों के सामने जीवन-मूल्यों को पूरी तरह से भुला दिया गया है। हर युवक एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में अपनी नैतिक जिम्मेदारियों तक से विमुख होता जा रहा है।

पिछले पचास वर्षों में कुशासन एवं भ्रष्टाचार, व्यवस्था और सामाजिक कुरीतियों से लोहा लेने वाली युवा शक्ति की हुँकार कहीं खो-सी गई लगती है। आज युवाओं के मन-मस्तिष्क में राष्ट्र की कोई परिकल्पना संभवतः है ही नहीं या है भी तो आधी-अधूरी। ऐसे में उसका एकमात्र स्वप्न होता है उच्च डिग्रियाँ प्राप्त कर विदेशों में जाकर पैसा कमाना। विभिन्न सर्वेक्षण रिपोर्टों के अनुसार ऐसे युवा ही देशी संस्थाओं एवं देश की सर्वाधिक आलोचना करते हैं, क्योंकि पश्चिम के बिना उन्हें अपना अस्तित्व ही अधूरा लगता है।

इसके कारण भी स्पष्ट हैं। अशिक्षा, बेरोजगारी एवं गरीबी में उलझा युवा अंतर्मन इन सबसे ऊब चुका है। इन समस्याओं का सामना करने की अपेक्षा इनसे पलायन उसे ज्यादा सहज लगता है। नई आर्थिक-औद्योगिक नीति एवं उपभोक्तावादी संस्कृति ने भी युवाओं के बीच व्यक्तिवादी चिंतन-पद्धति को प्रभावी रूप से विकसित किया है, युवाओं का एक वर्ग वह भी है, जो आधुनिकता के नाम पर पश्चिम की संस्कृति का शिकार बना है। इस संस्कृति ने भारतीय समाज में पैसे के महत्त्व को बढ़ाकर आदमी का महत्त्व घटा दिया है। यौन उच्छृंखलता, अपराध एवं ग्लैमर की मृग-मरीचिका में डूबा यह युवा वर्ग बुनियादी समस्याओं तक से अनभिज्ञ है। भोग-विलास की इस संस्कृति ने युवाओं को परिवार, समाज एवं राष्ट्र के प्रति गैर जिम्मेदार बना दिया है।

हाल में कराए गए विभिन्न सर्वेक्षण रिपोर्टों से युवाओं की समस्याओं और उनमें पनप रही आपराधिक और नकारात्मक प्रवृत्तियों का पता चलता है। भारत में 16 से 25 वर्ष के युवाओं की आबादी 21.5 करोड़ है। ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऐडवाँस स्टडीज’ ने इस आयु वर्ग के युवाओं का व्यापक अध्ययन किया। इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि देश भर के युवा कुँठा, आक्रोश एवं आपराधिक प्रवृत्तियों में बुरी तरह फँसे हुए हैं। युवाओं में तनाव एवं अवसाद भी पिछले 5 वर्षों में तेजी से बढ़े हैं। मनोचिकित्सकों के पास आने वाले मामलों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मामले युवाओं के होते हैं।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की नवीनतम रिपोर्ट भी युवाओं में बढ़ रही आपराधिक एवं नशे की प्रवृत्ति की पुष्टि करती है। मानसिक अशाँति एवं बेरोजगारी से त्रस्त युवा नशे में डूबकर जीवन के यथार्थ को भूल जाना चाहता है। प्रारंभ में तो नशा राहत प्रदान करता है, परंतु धीरे-धीरे इसका परिणाम गंभीर होता चला जाता है। नशे के साथ ही युवा अन्य दूसरी बुराइयाँ जैसे-चोरी, हिंसा आदि का शिकार हो जाता है और समाज की मुख्य धारा से कटता चला जाता है।

युवाओं के इस पतन के लिए देश की राजनीतिक व्यवस्था बहुत हद तक जिम्मेदार है। धर्म, जाति, भाषा एवं क्षेत्र के नाम पर युवाओं को पथ भ्रमित कर उनका गलत इस्तेमाल करना यहाँ की राजनीति का एक अभिन्न अंग बन चुका है। युवा शक्ति के सहारे सत्ता प्राप्त करने के बाद वे राजनीतिक दल ही बाद में विभिन्न मंचों से युवाओं को राजनीति से दूर रहने की सलाह देते हैं। इस दोहरे मापदंड का शिकार युवा अपने आपको लुटा-पिटा महसूस करता है। ऐसी स्थिति में या तो निराश-हताश होकर वह नशे का मार्ग अपना लेता है या फिर आक्रोश में भरकर विध्वंस के रास्ते चल पड़ता है।

कभी भारतीय शिक्षा से यहाँ के युवाओं का चरित्र निर्माण होता था। अपने-आपको समझने का ज्ञान प्राप्त होता था, परंतु आज शिक्षा का उद्देश्य मात्र येन-केन-प्रकारेण डिग्री हासिल करना ही रह गया है। वर्तमान शिक्षा पद्धति के स्वरूप में आमूल-चूल परिवर्तन की बात अवश्य की जाती है, किंतु शिक्षा से संबंधित जो कार्यक्रम तैयार किए जाते हैं, वे इसी शिक्षा-पद्धति को और ज्यादा मजबूत करते हैं। आजादी से पूर्व अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने शिक्षा को संस्कार का आधार मानकर शिक्षितों में आत्मविश्वास जाग्रत् करने का प्रयास किया था। आज उन प्रयासों को इस हद तक विस्मृत किया जा चुका है कि शिक्षा संस्थाओं में नैतिकता की शिक्षा का पाठ्यक्रम अनिवार्य आवश्यकता बन गई है।

आज युवा वर्ग अपने पाठ्यक्रम में बहुत से नए विषय पढ़ रहे हैं। नए वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। विभिन्न नए साँस्कृतिक एवं सामाजिक तौर-तरीकों का असर भी उन पर तेजी से हो रहा है। जो उनके लिए बेहद आकर्षक भी है। महापुरुषों के प्रेरक प्रसंगों को पाठ्य पुस्तकों से निकालकर कर्त्तव्य, बहादुरी, ईमानदारी एवं त्याग से शून्य पाठ्यक्रम युवा मन को आदर्शों से दूर ही ले जाएँगे। इन परिस्थितियों में युवा वर्ग का भ्रमित हो जाना स्वाभाविक है।

एक आदर्श की तलाश सबको होती है और यह स्वाभाविक है कि सबसे पहले इसकी खोज अपने घर-परिवार एवं आस-पास के माहौल से शुरू होती है। ऐसे में उनके सामने अभिभावकों एवं परिचितों द्वारा दोहरा मूल्य अपनाया जाना, कथनी एवं करनी में भिन्नता युवा संवेदनशील हृदय को बहुत गहरी चोट दे जाता है। ऐसा नहीं है कि आज का युवा जुझारू नहीं है या वह परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता और हिम्मत नहीं रखता। वस्तुतः वह पहले के युवाओं से अधिक प्रभावशाली ढंग से अपने कार्य को कर सकता है। आवश्यकता बस उसके सामने सच्चे आदर्श प्रस्तुत करने की है।

शासकीय स्तर पर भी इस समय एक ऐसी राष्ट्रीय युवा नीति और उस पर अमल की जरूरत है, जो दिग्भ्रमित हो गई युवा पीढ़ी को फिर से उसके सही लक्ष्य की ओर उन्मुख कर सके। एक ऐसी नीति जो युवाओं की ऊर्जा को नकारात्मक गतिविधियों में बरबाद होने से बचाए। उसे सकारात्मक-रचनात्मक कार्यों में खरच करने को प्रेरित करे। संवेदनाओं से लबालब भरे युवा मन की सिर्फ कमियों पर ध्यान देने की बजाय उसकी समस्याओं पर भी पूर्वाग्रह से मुक्त होकर विचार किया जाना चाहिए।

युवावस्था मानव जीवन का वसंत काल होता है। यह ऐसा समय होता है, जब विधाता की दी हुई सारी शक्तियाँ सहस्रधारा बनकर फूट पड़ती हैं। जब हर मन उमंग एवं उत्साह से परिपूर्ण होता है। कुछ कर दिखाने की चाहत होती है। आज भी राष्ट्र युवाचेतना के उन स्वरों को .... रहा है, जिनसे समग्र क्राँति एवं नए इतिहास की रचना का गान प्रस्फुटित होगा।


प्रकाशपूर्ण जीवन (kahani)

एक दिन, दो दिन और लगातार कई दिन तक भी रात-रात भर सितारों की गिनती करते देखकर आखिर एक दिन माँ ने अपने बच्चे से पूछ ही लिया, बेटे! तुम रात भर आकाश की ओर मुँह किए क्या गिना करते हो? आकाश के सितारे माँ! बहुत प्रयत्न करता हूँ, किंतु आकाश इतना विराट् और नक्षत्र इतने अधिक हैं कि वे गिनने में नहीं आते। माँ ने थपकी दी और बोली, बेटा! देर हो गई, तू सो जा, यह सितारे गिनने को नहीं वरन् इसलिए बनाए गए हैं कि लोग उन्हें देखकर स्वयं भी प्रकाशपूर्ण जीवन जीना सीखें।


परिपूर्ण समर्पण

वह हरी-भरी खेती से लहलहाते हुए पंजाब के एक इलाके का रहने वाला था। प्रकृति और वर्षा की उसके इलाके पर असीम कृपा थी। उसका कुल जितना उच्च था, परिवार उतना ही समृद्ध एवं वैभवशाली था। वह स्वयं भी स्वस्थ, सुँदर एवं शिष्ट था। इन बाहरी विभूतियों के साथ उसका आँतरिक जीवन भी उज्ज्वल था। गुरुनानक देव के सान्निध्य से इसमें नित्य-प्रति नया निखार आता जा रहा था।

गुरु ने साधना की जो विधियाँ बताई थीं, वह पूरी श्रद्धा से उन्हें नियमित किया करता था। वह तप कर रहा था, साधना के मार्ग पर बढ़ता जा रहा था। इसी प्रवाह में दिन बीते, महीने बीते और चार वर्षों की लंबी अवधि भी अतीत की गहन गुफा में विलीन हो गई। पता ही नहीं चला कि समय इतनी शीघ्रता से कैसे भागता चला गया।

एक रात अपने घर पर सोते हुए उसने स्वप्न में गुरुनानक देव को देखा। इस स्वप्नदर्शन ने उसमें गुरुदर्शन की अपूर्व व्याकुलता उत्पन्न कर दी। सुबह उठते ही उसने गुरु आश्रम चलने की तैयारियाँ शुरू कर दीं। उन दिनों नमक का बड़ा अभाव रहता था। वह जमाना ही ऐसा था, जब नमक के आवागमन पर बड़ा कड़ा नियंत्रण था। आश्रमवासी नमक के बिना बड़ा कष्ट भोगते थे। उसने सवा मन नमक का प्रबंध किया और उसे सिर पर लादकर गुरुधाम की ओर रवाना हो गया।

गुरुनानक देव का यह आश्रम उसके घर से पूरे सोलह कोस दूर था। भादों का महीना था। धूप निकलती तो सुई के समान चुभती। आकाश में बादल छा जाते, तो उमस बढ़ जाती। उसकी वेषभूषा भी देखने लायक थी। बगुले के पंख के समान उजली धोती, उस पर रेशम का नया कुर्ता, माथे पर रेशमी साफा, गौर वर्ण, उन्नत ललाट, विशाल आँखें, बलिष्ठ भुजाएँ, चौड़ी छाती, पर मुख पर नवनीत के समान कोमलता, आँखों में किसी सपने की परछाई और कदमों में मंजिल तलाशने की जल्दबाजी। इस अपरुप के साथ सिर पर नमक की बोरी का कोई ताल-मेल नहीं था, पर गुरुभक्ति में पगा पथिक मस्ती में चला जा रहा था।

न खाना खाने की परवाह, न पानी पीने की चिंता और न विश्राम करने की इच्छा। वह मंजिल पाकर ही रुकना चाहता था। अपने मन में कभी वह गुरुवाणी का पाठ करता, कभी उसे संगीत के स्वर में साधता और कभी गुरुनानक देव के ध्यान में इतना मग्न हो जाता कि मार्ग की बीहड़ता का उसे पता ही नहीं चल रहा था। उसके मन में मस्ती थी, भावों में अद्भुत ...., वह तो बस अपनी धुन में चला जा रहा था।

बीस वर्ष का रूपवान् यह युवक अपने घर से मुँह अँधेरे ही साढ़े चार बजे चला था और सूर्य पश्चिमी क्षितिज की ओट लेने लगा कि आश्रम पर पहुँच गया। पहुँचते ही उसने गुरुमाता को दंडवत् किया। उन्होंने मस्तक पर आशीर्वाद का हाथ फेरा। उसने व्याकुलता से गुरु के बारे में पूछा, तो पता चला कि वे खेत पर हैं। बस वह सीधे भागता हुआ खेत पर पहुँच गया।

खेत में गुरुनानक देव की उपस्थिति उसे कृतार्थ कर गई। भावाकुल नेत्रों से उसने अगले आदेश की याचना की। उसे खेत की घास-पात उखाड़ने का आदेश मिला। आदेशानुसार उसने कीचड़ सनी घास उखाड़ी और उसके ढेर को सिर पर लादकर चल पड़ा। कीचड़ युक्त पानी उसके शरीर और कपड़ों को गंदा व बदरंग बना रहे थे, पर उसके सामने तो एक ही मकसद था, गुरु की आज्ञा पालन करना।

वह आश्रम पहुँचा। गुरुदेव भी पहुँचे। उसकी यह दशा देखकर गुरुमाता से नहीं रहा गया। वह नानकदेव पर बरस पड़ीं, मुँह अँधेरे सुबह चला है यह घर से और अब रात घनी होने को आई है। न तो इसने एक बूँद पानी पिया है और न अन्न का एक दाना खाया है। क्या दुर्गति बनाई है आपने इसकी, बेचारा कीचड़ से सन गया है। दया नहीं आती आपको इस पर।

गुरु शाँत भाव से मुस्कराते हुए बोले, मैं तो इसका कीचड़ उतार रहा हूँ। अपने इस सारगर्भित वाक्य के साथ उन्होंने उस युवक को एक अन्य आदेश दे डाला, मेरे सारे कपड़े मैले हो रहे हैं, जाओ इन्हें नदी में धो लाओ।

विचित्र गुरु और विचित्र उनका आदेश। रात का समय, अंधकार का साम्राज्य, उस पर रुक-रुककर होती बारिश, पर गुरुभक्त वह युवक तुरंत चल पड़ा। उसने एक-एक कपड़े को अच्छी तरह से धोया और उन्हें सुखाने के लिए घास पर फैला दिया। न जाने कहाँ से सूर्य उदय हुआ और कुछ ही काल में सारे कपड़े सूख भी गए। वह कपड़े समेटकर फिर से गुरुधाम जा पहुँचा।

गुरुनानक देव ने पूछा, सूख गए कपड़े?

जी हाँ गुरुदेव! इसी के साथ उस युवक ने आश्चर्यजनक रीति से सूर्य उगने की सारी घटना कह सुनाई।

गुरु रहस्यमय मुस्कान बिखेरते हुए बोले, पागल तो नहीं हो गया तू। देख ले जाकर, बाहर अभी भी घना अँधेरा है और बारिश हो रही है। तब? उस युवक शिष्य के मन में प्रश्न कौंध गया।

वह तेरी गुरु निष्ठा का सूर्य था। युवक को सारी बात समझ में आ गई। उसने मन-ही-मन कृपालु गुरुदेव को प्रणाम किया।

परंतु उसकी परीक्षा अभी शेष थी। अगले ही दिन गुरुदेव को किसी जमींदार भक्त का निमंत्रण मिला। वह अपने दोनों पुत्रों एवं उस युवक के साथ चले। भक्त के घर पहुँचने पर गुरु का स्वागत-सत्कार हुआ। भोजन आदि के पश्चात् जमींदार भक्त ने गुरुदेव को सोने के दो कटोरे भेंट किए। गुरु ने इन कटोरों को पास रख लिया और वापस घर की ओर चल पड़े।

रास्ते में गुरुदेव ने तीनों को दिखाकर वे दोनों कटोरे एक मल-मूत्र से भरे एक गहरे गड्ढे में फेंक दिए। इसके पश्चात् गुरुदेव अपने पुत्रों की ओर मुखातिब होते हुए बोले, जा बेटे कटोरे निकाल ला, परंतु जवाब में उनके दोनों ही पुत्र अन्यमनस्क बने रहे, जैसे उन्होंने कुछ सुना ही नहीं।

इसके बाद उन्होंने उस युवक को संबोधित करते हुए कहा, लहना अब तेरी बारी है। गुरु का आदेश सुनते ही वह युवक लहना उस गड्ढे में कूद पड़ा और मल-मूत्र से सन गया, लेकिन उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी। वह कटोरे लेकर बाहर आया। स्वयं भी नहाया, कटोरों को रगड़-रगड़कर धोया और लाकर गुरुदेव के चरणों में रख दिए।

गुरुनानक देव की आँखें खुशी से चमक गईं, पर उन्होंने कहा कुछ नहीं। उनके कदम अपने घर के रास्ते पर बढ़ते रहे। रास्ते भर पूरी शाँति थी। सब चुपचाप थे। फिर भी यह गहरा मौन ऐसा कुछ कहे जा रहा था, जिसे वाणी कहने में असमर्थ थी।

उसी रात गुरुनानक देव ने झोंपड़ी में सोए लहना को जगाया और अपने कक्ष में बुलाया। उस पर अपना असीम वात्सल्य उड़ेलते हुए बोले, अब यह शरीर जर्जर हो गया लहना। इसे छोड़ने से पहले मैं तुम्हें अपना समस्त योग बल दे रहा हूँ। यह कहते हुए उन्होंने अपनी सारी आत्मिक शक्ति उस गुरुभक्त युवक लहना को दे दी। युवक लहना को उसकी सारी परीक्षाओं का सुफल देकर गुरुनानक देव समाधि लीन हो गए। यह लहना ही कालाँतर में गुरु अंगद देव के रूप में पूजित-प्रतिष्ठित हुए।


पुण्यात्माओं में मूर्द्धन्य (kahani)

विधाता ने जय-विजय को धरती पर यह तलाश करने के लिए भेजा कि उस वर्ष स्वर्ग में किसे सम्मानपूर्वक प्रवेश दिया जाए। दोनों दूत सर्वत्र घूमते फिरे और सज्जनों, भक्तजनों का लेखा-जोखा नोट करते रहे। इस बीच उन्होंने एक अंधा वृद्धजन देखा, जो रास्ते के किनारे दीपक जलाए बैठा था। देवदूतों ने पूछा, वृद्ध! घर से दूर, आँखें न होते हुए भी दीपक जलाना और रातभर जागना, कुछ समझ में नहीं आता। वृद्ध ने कहा, जो किया जाए, वह अपने हो, यह क्या जरूरी है? संसार के सब लोग भी तो अपने ही हैं। रात्रि को निकलने वालों को ठोकर लगने से बचाकर मुझे संतोष और आनंद मिलता है। स्वार्थरत रहने की तुलना में यह लाभ क्या कम है? देवदूत पर्यवेक्षण करके वापस लौटे और सारे विवरण सुनाए, तो सर्वश्रेष्ठ वह अंधा ही निकला। देवता अपने कंधों पर पालकी से उसे स्वर्ग लाए और पुण्यात्माओं में मूर्द्धन्य वरिष्ठों को दिए जाने वाले स्थान पर उसे रखा गया।


रोग-निवारण ही नहीं, आत्मिक प्रगति हेतु करें प्राणायाम

प्राणायाम एक ऐसी क्रिया है, जिससे न सिर्फ प्राणवायु की अधिकतम आपूर्ति हमारे अंगों को होती है, वरन् अंतरंगों का भलीभाँति व्यायाम भी हो जाता है। इस प्रकार स्वास्थ्य की दृष्टि से यह उपयोगी तो है ही, इससे आत्मोन्नति भी संभव है। योग का यह एक निर्विवाद सत्य है।

सामान्य शरीर विज्ञान में मानव शरीर के अंदर काम करने वाली भिन्न-भिन्न प्रणालियाँ हैं। इनमें प्रमुख हैं- तंत्रिका तंत्र, ग्रंथि तंत्र, श्वसन तंत्र, रक्त परिसंचरण तंत्र एवं पाचन तंत्र। इन सभी पर प्राणायाम का गहरा प्रभाव पड़ता है। मल विसर्जन वाले अंगों में प्रधान हैं, आँतें, गुरदे एवं फेफड़े। इनमें से आँतें तथा गुरदे तो पेट के भीतर हैं और फेफड़े छाती के अंदर। आमतौर पर साँस लेने में उदर की माँसपेशियाँ क्रमशः ऊपर नीचे जाती हैं, जिससे आँतों और गुरदे का व्यायाम और मालिश होती रहती है। प्राणायाम में पूरक, रेचक तथा कुँभक करते समय यह व्यायाम तथा मालिश और भी अधिक स्पष्ट रूप से और अच्छी तरह होने लगती है। इससे यदि कहीं रक्त जमा हो गया हो, तो इस हलचल के कारण उस पर जोर पड़ने से वह हट सकता है। यही नहीं, आँतों और गुरदे की क्रियाओं को नियंत्रित रखने वाले स्नायु और माँसपेशियाँ भी सुदृढ़ हो जाती हैं।

यही बात फेफड़ों के साथ भी है। श्वसन क्रिया ठीक तरह चलती रहे, इसके लिए श्वासोपयोगी माँसपेशियों के सुदृढ़ होने और फेफड़ों के लचकदार होने की आवश्यकता है। शारीरिक दृष्टि से प्राणायाम द्वारा इन माँसपेशियों और फेफड़ों का संस्कार होता है और कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का भलीभाँति निष्कासन हो जाता है।

आहार का परिपाक करने वाले और रस बनाने वाले अंगों पर भी प्राणायाम का अनुकूल असर पड़ता है। अन्न के परिपाक में आमाशय, उसके पृष्ठ भाग में स्थित पैंक्रियाज और यकृत मुख्य रूप कार्य करते हैं। प्राणायाम में इन सबकी कसरत होती है। इस योगाभ्यास में डायफ्राम और पेट की माँसपेशियाँ बारी-बारी से खूब सिकुड़ती और फैलती हैं, जिससे पाकोपयोगी अंगों का अच्छी तरह व्यायाम हो जाता है। जिन्हें अग्निमाँद्य और कोष्ठबद्धता की शिकायत रहती है, उनमें से अधिकाँश लोगों के यकृत में रक्त जमा रहता है, फलतः उसकी क्रिया दोषयुक्त होती है। इस रक्त संचय को हटाने के लिए प्राणायाम एक उत्तम साधन है।

किसी भी मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उसकी नाड़ियों में प्रवाहित होने वाले रक्त को ऑक्सीजन प्रचुर मात्रा में मिलती रहे। योगशास्त्र में बताई गई पद्धति के अनुसार प्राणायाम करने से रक्त को जितनी अधिक ऑक्सीजन मिल सकती है, उतनी अन्य किसी भी व्यायाम से नहीं मिलती। इसका कारण यह नहीं कि प्राणायाम करते समय व्यक्ति बहुत-सी ऑक्सीजन निगल लेता है, वरन् यह है कि उसके श्वासोपयोगी अंग समूह की अच्छी कसरत हो जाती है।

जो लोग अपनी श्वसन-क्रिया को ठीक करने के लिए किसी प्रकार का अभ्यास नहीं करते, वे अपने फेफड़ों के कुछ अंशों से ही साँस लेते हैं, शेष भाग निकम्मा पड़ा रहता है। इस प्रकार निष्क्रिय रहने वाले अंश बहुधा फेफड़ों के अग्रभाग होते हैं। इनमें वायु का संचार अच्छी तरह नहीं होता, फलतः टी.बी. के जीवाणु वहाँ आश्रय पाकर बढ़ने लगते हैं। यदि प्राणायाम के द्वारा फेफड़ों के हर भाग से काम लिया जाने लगे और उसका प्रत्येक कोष्ठक दिन में कई-कई बार शुद्ध हवा से धुल जाया करे, तो फिर इन जीवाणुओं का आक्रमण असंभव हो जाएगा और स्वास्थ्य संबंधी इन रोगों से बचा जा सकेगा।

प्राणायाम से पाक, श्वसन एवं मलोपयोगी अंगों की क्रिया ठीक होने से रक्त अच्छा बना रहता है। यही रक्त शरीर के समस्त अवयवों में पहुँचता है। यह कार्य रक्तवाहक अंगों का, विशेषकर हृदय का है। रक्त संचार से संबंध रखने वाला प्रधान अंग हृदय है और प्राणायाम द्वारा उसके अधिक स्वस्थ हो जाने से समस्त रक्तवाहक अंग अच्छी तरह काम करने लगते हैं।

परंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती। भस्त्रिका प्राणायाम में, विशेषकर उसका वह हिस्सा, जो कपालभाति से मिलता-जुलता है, वायवीय स्पंदन शरीर के प्रत्येक स्थूल-सूक्ष्म अवयव को, यहाँ तक कि अगोचर स्तर की नाड़ियों एवं शिराओं को झकझोरकर रख देता है। इस प्रकार प्राणायाम से सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अवयवों की क्रियाशीलता बढ़ जाने से वह ठीक प्रकार से काम करने के योग्य बन जाते हैं।

नाड़ी शोधन प्राणायाम में शरीर की सूक्ष्म नाड़ियाँ मल-विक्षेपों से मुक्त होने लगती हैं। यह इस प्राणायाम का अतिरिक्त लाभ है, कारण कि अंतरंगों का व्यायाम इससे भी उसी तरह होता है, जैसा अन्य प्राणायामों से, पर नाड़ियों की शुद्धि सिर्फ इसी से हो पाती है।

भ्रामरी प्राणायाम से शरीर के अंतरंगों की मालिश के अतिरिक्त भ्रमरनाद से जो कंपन उत्पन्न होता है, उससे पूरे मुखमंडल की माँसपेशियों का व्यायाम हो जाता है। इस स्थूल लाभ के अतिरिक्त उससे मानसिक एकाग्रता एवं प्राण की स्थिरता संबंधी सूक्ष्म लाभ भी मिलते हैं।

शीतली प्राणायाम से दूसरे लाभों के अलावा देह को शीतलता मिलती है। यह उष्ण प्रकृति वाले लोगों के लिए विशेष लाभकारी है। उज्जायी प्राणायाम में कंठ की मांसपेशियों की कसरत होती है। यह पेट के रोगों में उपयोगी है। लोम-विलोम सूर्यवेधन प्राणायाम से साँस के साथ खींचा हुआ प्राण नाभि में स्थित सूर्यचक्र को जाग्रत् करता है, उसके आलस्य और अंधकार को वेधता है। इससे सूर्यचक्र उद्दीप्त होकर अपनी परिधि का भेदन करते हुए सुषुम्ना मार्ग में उदर, छाती और कंठ तक अपना तेज फेंकता है। इसी कारण इसे सूर्यवेधन प्राणायाम कहते हैं।

प्राणाकर्षण प्राणायाम से सामान्य लाभों के अतिरिक्त शरीर में प्राण की मात्रा बढ़ने लगती है। इस बढ़ते प्राण से शरीर-स्वस्थता भी बढ़ने लगती है और व्यक्ति मनोबल संपन्न बन जाता है। मनोबल बढ़ने से, जिन कार्यों में इसकी कमी से दूसरे लोग असफल सिद्ध होते हैं, वही सफलता उसके चरण चूमने लगती है। इसके अलावा अभ्यासी चैतन्यता, उत्साह, साहस, धैर्य, पराक्रम जैसे तत्त्वों से भी ओत−प्रोत हो जाता है।

प्राणायाम से मस्तिष्क और मेरुदंड को भी बल मिलता है। शरीरविज्ञानी इस विषय में एकमत हैं कि साँस लेते समय मस्तिष्क में से दूषित रक्त प्रवाहित होता है और शुद्ध रक्त उसमें संचरित होता है। यदि साँस गहरी हो, तो दूषित रक्त एक साथ बह निकलता है और हृदय से जो शुद्ध खून वहाँ आता है, वह और भी परिशुद्ध होता है। प्राणायाम का यह विधान है कि उसमें साँस गहरी-से-गहरी ली जाए। इसका परिणाम यह होता है कि मस्तिष्क से सारा दूषित खून बह जाता है। योग उड्डियान बंध को हमारे सामने प्रस्तुत कर इस स्थिति को और भी स्पष्ट कर देने की चेष्टा करता है। इस बंध से हमें इतना अधिक शुद्ध रक्त मिलता है, जितना किसी श्वास संबंधी व्यायाम से नहीं। प्राणायाम से जो हमें स्फूर्ति और बल प्राप्त होता है, उसका यही वैज्ञानिक कारण है।

मेरुदंड एवं उससे संबंधित स्नायुओं के संबंध में हम देखते हैं कि इन अंगों के चारों ओर रक्त की गति साधारणतः मंद होती है। प्राणायाम से इन अंगों में रक्त की गति बढ़ जाती है। और इस प्रकार इन्हें स्वस्थ रखने में प्राणायाम सहायक होता है।

योग में कुँभक करते समय मूल, उड्डियान और जालंधर तीन प्रकार के बंध करने का निर्देश है। इन बंधों का अभ्यास करने से पृष्ठवंश की, जिसके अंतर्गत मेरुदंड आता है तथा तत्संबंधी स्नायुओं की उत्तम रीति से कसरत हो जाती है। इन बंधों के करने से पृष्ठवंश को यथास्थान रखने वाली माँसपेशियाँ और उनकी तंत्रिकाएँ फैलती और संकुचित होती है। इससे इनमें रक्तसंचार बढ़ जाता है। बंध यदि न भी किए जाएँ, तो भी प्राणायाम की सामान्य प्रक्रिया ही ऐसी है कि उससे पृष्ठवंश पर ऊपर की ओर हल्का-सा खिंचवा पड़ता है, जिससे मेरुदंड तथा संबंधित स्नायुओं को स्वस्थ रखने में सहायता मिलती है।

प्राणायाम से दे हके विभिन्न हिस्सों और अवयवों पर दबाव पड़ता है। इस दबाव से उस क्षेत्र का रक्तसंचार बढ़ जाता है। खून के दौरे सुव्यवस्थित हो जाने से उन अंगों की स्वस्थता भी प्रभावित होती है। इसी के साथ व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मविकास करते हुए अंततः चरम लक्ष्य तक जा पहुँचता है। प्राणायाम एक हानिरहित योगाभ्यास है। सभी को प्राणशक्ति की उपलब्धि के लिए इसे नियमित रूप से करना चाहिए।= =


प्रेरणा के स्रोत (kahani)

लोकमान्य इंग्लैंड से स्वदेश लौटे। उनके सम्मान में स्वागत समारोह किया गया। समारोह की समाप्ति पर वे अपनी बग्घी में बैठकर चलने लगे। उनको पहनाई गई मालाएँ भी बग्घी में रखी गईं। लोकमान्य ने मालाएँ कोचवान को देकर हँसते हुए कहा, “अपने घोड़ों को पहना दो। जैसे ये घोड़े इस बग्घी को खींचते हैं, वैसे ही हम देश की गाड़ी खींचते हैं। दोनों में अंतर कुछ नहीं है।

अपनी इसी निरहंकारिता, निस्पृहता के कारण वे लोकमान्य कहलाए, जन-जन के लिए प्रेरणा के स्रोत बने।


त्याग-बलिदान की संस्कृति देवसंस्कृति-3 -परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

(गताँक से आगे)

मित्रो! आदमी हो या कोई पक्षी हो, बुड्ढा हो, बिना पढ़ा हो या साधनहीन हो, तो भी कम-से-कम उसके भीतर इतनी हिम्मत अवश्य होनी चाहिए कि अनीति का विनाश करने के लिए, लड़ाई लड़ने के लिए सीना तानकर खड़ा हो जाए। बेटे! बड़े-बड़े बादशाहों को तो हम भुला सकते हैं, लेकिन उस पखेरू को हम सदैव याद रखेंगे। उसे हम भुला नहीं सकते। उस पखेरू को न भुलाने का मतलब है, देवपूजन अर्थात् देवत्व का पूजन। बेटे! भारतीय संस्कृति में देवत्व का पूजन करने की परंपरा है। यही परंपरा सतयुग को लाती है, धर्मयुग को लाती है। मानवजाति के उज्ज्वल भविष्य को लाती है। कौन-सी परंपराएँ? जिनको हम दैवीय परंपराएँ कहते हैं। दैवीय परंपराएँ क्या होती हैं? तिलक लगाना, माला जपना, गंगाजी नहाना, सत्यनारायण की कथा कहना आदि, क्या यही दैवी परंपराएँ हैं? नहीं, बेटे! ये तो खेल-खिलौने मात्र हैं। जो इसी खेल-खिलौने में उलझे रहते हैं, उन्हें हम ‘अफीमची’ कहते हैं, सनकी कहते हैं। काम होता नहीं है, त्याग की बात बनती नहीं, बैठे-बैठे कोने में झपकियाँ लेता रहता है, सरकता रहता है और कहता है कि प्रकाश दिखा दीजिए। घंटी बजा दीजिए, कान में नादब्रह्म सुना दीजिए। पेट में से पिल्ला निकाल दीजिए। उसमें से निकाल दें तेरा सिर।

मित्रो! क्या करना पड़ेगा? दैवीय सभ्यता यह नहीं है। दैवीय सभ्यता वह है, जिसमें त्याग और बलिदान की बात करनी पड़ती है। बेटे! हजारों वर्षों का इतिहास जब हम पढ़ते हैं, तो हमको दैवीय सभ्यता का यही स्वरूप दिखाई पड़ता है। रामचंद्रजी के बाद श्रीकृष्ण जी का नंबर आता है। श्रीकृष्ण जी का जीवन चरित्र जैसा कुछ भी आता है, उन्होंने जिन लोगों के साथ लेकर के काम शुरू किया था, उन लोगों के नाम थे, पाँडव। पाँडवों में क्या था? दैवीय सभ्यता थी। पाँडव देवताओं से पैदा हुए थे। मैंने सुना है कि कुँती ने देवताओं का जप-पूजन किया था और जप-पूजन करने के बाद में बच्चे पैदा किए थे। कैसे थे पाँच बच्चे? तो क्या उनमें एक था आई.ए.एस., एक था इन्कम टैक्स ऑफिसर, एक था सी.बी.आई. ऑफिसर आदि। इस तरह क्या उन्होंने लाखों रुपयों की आमदनी की थी? करोड़ों की जायदाद खरीदकर रख गए थे? तो फिर कुँती का बेटा, देवता का बेटा कौन होता है? क्या वह जिसके पास मोटरें हों, जिसके पास दौलत हो, जिसके पास मकान हो। नहीं, यह आपकी परिभाषा है। देवताओं की परिभाषा अलग थी।

मित्रो! देवताओं के बेटों को कैसा होना चाहिए? अगर कोई देवता का बेटा है, तो उसके व्यवहार में और जीवन में क्या गुण आना चाहिए? इसे हम पाँचों पाँडवों के जीवन में देख लेते हैं। अज्ञातवास के समय कुँती अपने बच्चों के साथ एक ब्राह्मणी के यहाँ छिपी हुई थी। उस इलाके में कोई एक राक्षस रहता था। जो वहाँ के हर घर से एक-एक आदमी प्रतिदिन मारने के लिए बुलाया करता था और उन्हें खा जाता था। नंबर के हिसाब से उस दिन ब्राह्मणी के बच्चे का नंबर आ गया। ब्राह्मणी रोने लगी। उसने कहा कि हमारे एक ही बालक था और वह भी आज राक्षस के हवाले होने जा रहा है। जब वह बैठी हुई रो रही थी, तो कुँती ने पूछा, बहिन क्या बात है? ब्राह्मणी बोली कि हमारे पास एक ही बच्चा है और उसको आज राक्षस के पास जाना पड़ेगा। उसे मरना ही होगा। अब हम क्या कर सकते हैं?

कुँती ने कहा कि आपने अपनी जान जोखिम में डालकर हमको छिपा रखा है, तो हमारा भी तो कुछ कर्त्तव्य हो जाता है। हम भी तो कुछ करेंगे आपके लिए। उन्होंने कहा, बच्चो! तुम पाँच हो। एक काम करो, यह जो ब्राह्मणी है, इसके एक ही बालक है। इसने अपनी जान जोखिम में डालकर हमको छिपाकर रखा है। इसलिए क्या करना चाहिए बच्चो? तुममें से एक बच्चे को अपना बलिदान कर देना चाहिए। बच्चों ने कहा, माता जी! इससे बड़ा सौभाग्य हमारा क्या हो सकता है? भीम चले गए और उसे बचा लिया।

मित्रो! यह क्या है? यह है देवता का मन। देवता का मन वह होता है कि जब उसके जीवन में कोई त्याग करने, बलिदान करने का मौका आता है, तो बल्लियों उछलने लगता है। यह होता है, देवताओं का दिल। और राक्षसों का दिल कैसा होता है? राक्षसों का, चोरों का, घटिया आदमी का दिल यह है कि जब त्याग का वक्त आता है, तो वह थर-थर काँपने लगता है। हर समय जिसकी यही नीयत रहती है कि यह मंत्र जपूँगा, यह तंत्र जपूँगा, यह पूजा करूंगा और इससे यह पैसा कमाऊँगा, यह औलाद पाऊँगा, धन कमाऊँगा। कामना-ही-कामना, कामना-ही-कामना जिसके अंदर भरी हुई है, बेटे यह कोई अध्यात्म नहीं है।

ठीक है मित्रो! यह बच्चों का अध्यात्म रहा होगा। मैं यह तो नहीं कहता कि बच्चों को यह जरूरत नहीं है। हम मिठाई बाँट करके और कोई लोभ देकर के बच्चों को अपने पास बुला लेते हैं। यह भी अध्यात्म का कोई हिस्सा होगा, पर मैं इसको ठूंस कहता हूँ, भूसी कहता हूँ। किसकी? अध्यात्म की। भूसी कौर-सी? जिसमें यह पाया जाता है कि अध्यात्म क्या है। बेटे, यह अध्यात्म का खिलवाड़ है, छिलका है, जूठन का पत्ता है। पत्ते पर मिठाई खाकर के लोग उसे फेंक देते हैं और कुत्ते उसे चाटने के लिए टूट पड़ते हैं, चट कर जाते हैं। यह भी हो सकता है प्राप्त करने की दृष्टि से। अध्यात्म को हम भौतिक चीजों को पाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, इसलिए बेटे, मैं इसको जूठन का पत्ता कहता हूँ। किसी आदमी का खाया हुआ पत्ता फेंक दिया गया, दूसरा कहता है कि हमको भी दे दीजिए। हाँ बेटे, तुझे भी दे देंगे।

बेटे, हमने तप किया है और तप करके पाया है और तू हिस्सा माँगता है। चल तुझे भी दे देंगे। यह क्या है? छोटी चीज है, रत्तीभर चीज है। न इसमें किसी को घमंड करने की जरूरत है और न सफलता प्राप्त करने की जरूरत है। हमने अध्यात्म से यह पा लिया, वह पा लिया। बेटे, पाने से अध्यात्म का कोई संबंध नहीं है। अध्यात्म का संबंध है, देने से। आपने क्या दिया, बताइए? बस, यही एक सवाल है। अगर आप यह कहते हैं कि हम भगवान् की भक्ति से कोई ताल्लुक रखते हैं, तो आप यह जवाब दीजिए कि दैवीय सभ्यता के लिए, श्रेष्ठ आचरणों के लिए, लोगों के सामने अच्छी परंपरा स्थापित करने के लिए आपने क्या दिया? यही एक जवाब दीजिए और दूसरा हम कुछ नहीं सुनना चाहते। हमने इतना भजन किया। तो ठीक है अपने भजन को डिब्बी में रखिए। भजन का या और किसी का हवाला देना हम नहीं सुनना चाहते। गायत्री मंत्र की ग्यारह कॉपी हमने लिखीं। तो आप अपनी ग्यारह कॉपी ताले में बंद कर दीजिए। हमें मत बताइए। हमको तो यह बताइए कि आपने दैवीय सभ्यता के लिए कितना त्याग किया है? कितना बलिदान किया है? कितनी सेवा की है? नहीं साहब! हमने तो ग्यारह कापियाँ लिखी हैं। अच्छा, ग्यारह कापियाँ मुबारक हों, उसे अपने घर रखिए। हम नहीं सुनना चाहते।

मित्रो! अध्यात्म की प्राचीन परंपराएँ, शालीन परंपराएँ, महान् परंपराएँ भगवान् को अपनी ओर खींचती हैं और खींचने के अलावा दूसरों की सहायता करने में समर्थ होती हैं। ऐसा कोई अध्यात्म नहीं है, जो मनोकामना को प्राप्त कराता है। अध्यात्म वह है, जिससे आदमी अपना कल्याण करते हैं और दूसरों का कल्याण करने में समर्थ होते हैं। ऐसी शक्ति, जो दूसरों का कल्याण करती है, वह केवल असली अध्यात्म में रहती है। वह त्याग किए बिना, बलिदान किए बिना, सेवा धर्म किए बिना, दैवीय सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप जीवन ढाले बिना किसी में नहीं आ सकती। न आई है और न आएगी। कौन-सी? जिसमें त्याग जुड़ा हुआ न हो, सेवा जुड़ी हुई न हो, लोकहित जुड़ा हुआ न हो, कष्ट सहने की बात जुड़ी हुई न हो, उसमें अध्यात्म कैसे हो सकता है? नहीं बेटे! इससे कम में कभी अध्यात्म न था और न कभी होगा।

मित्रो! भगवान् श्रीकृष्ण ने उस जमाने में, दुर्योधन के जमाने में जब चारों ओर असभ्यता और अनीति फैली पड़ी थी, तब यही नमूना पेश किया था। उनके पाँच हितैषी और हिमायती थे। पाँचों हिमायतियों का मैं एक नमूना बता रहा था। पाँचों पाँडवों से कुँती ने कहा, बच्चो! तुममें से एक को वहाँ जाना चाहिए। बच्चे उछलने लगे और कहने लगे कि यह सौभाग्य तो हमको मिलना चाहिए। प्रतिस्पर्द्धा-काँम्पिटीशन शुरू हो गई कि बलिदान में हम आगे जाएँगे। पाँचों बच्चों में प्रतिस्पर्द्धा शुरू हो गई। कुँती के लिए जद्दोजहद खड़ी हो गई। युधिष्ठिर कहते कि हम सबसे बड़े हैं। हम दुनिया में सबसे पहले आए थे, इसलिए हमारा नंबर पहला है। सबसे छोटे वाले नकुल कहने लगे कि हम सबसे छोटे हैं, इसलिए हमको जाना चाहिए। अर्जुन कहने लगे कि इसके लिए हमको जाना चाहिए। सबमें झगड़ा होने लगा। कुँती ने कहा, अच्छा तुममें से कौन सबसे भाग्यवान है, इसके लिए मैं गोली बनाकर निकालती हूँ। पाँचों पाँडवों के नाम से गोली बनाकर डाल दी गई और कहा गया कि अच्छा, एक गोली उठा लो। जिसका नाम आ जाएगा, उसी को जाना चाहिए।

गोली उठाई गई। भीम का नाम आ गया। भीम उछलने लगे, ओ हो! यह मेरा सौभाग्य है। मित्रो! सौभाग्य किसे कहते हैं? नौकरी में तरक्की हो जाने को? लॉटरी में रुपया निकल आने को? तीन बेटियों के बाद दो बेटा हो जाने को? आपकी दृष्टि में इसके अतिरिक्त और कोई सौभाग्य होता है क्या? नहीं होता। बेटे! यह सौभाग्य नहीं होता। सौभाग्य वह होता है, जिसमें आदमी अजर-अमर हो जाता है। बेटे! सौभाग्य वह होता है, जिसमें हजारों-लाखों आदमी श्रद्धा के सुमन चढ़ाते रहते हैं और उसके चरणों पर आँसू बहाते रहते हैं और जिसके मरने के बाद भी आदमी उससे प्रकाश-प्रेरणा ग्रहण करते रहते हैं, रोशनी ग्रहण करते रहते हैं। देवता उन्हें ही कहते हैं, सौभाग्य उसे कहते हैं। सौभाग्यशाली वे हैं, वंदनीय वे हैं, जिन्होंने अपना आचरण इस तरीके से पेश किया कि जिससे प्रेरित होकर हजारों आदमी नमूने पेश करते रहें और दिशा प्राप्त करते रहें।

मित्रो! ऐसा ही हुआ। भीम का नंबर आ गया। भीम बच्चा था और राक्षस नौजवान। राक्षस कितना बड़ा था? समझ लीजिए छत के बराबर रहा होगा। और भीम? छोटा-सा ही था। भीम लड़ने के लिए चला गया। महाभारत की कथा के अनुसार मैंने सुना है कि भीम ने कहा, अच्छा, आप हमको खाएँगे तो हो ही, तो क्यों न पहले दो-दो हाथ कर देख लें। राक्षस ने कहा, चल, इसमें कोई एतराज नहीं है हमको। आ, हो जाए, दो-दो हाथ। भीम लड़ने के लिए तैयार हो गया और उसने राक्षस को पटककर मार दिया।

क्यों साहब! ऐसा हो सकता है? हाँ बेटे, ऐसा हो सकता है। सत्य हजार हाथी के बराबर बलवान होता है। बच्चों ने भी सत्य का आश्रय लेकर बड़ी-बड़ी सफलताएँ पाई हैं। कौन-कौन ने पाई हैं? चंद बच्चों के नाम बता सकता हूँ। प्रह्लाद बच्चा था, लेकिन उसका बाप हिरण्यकश्यप कितना समर्थ था। वह इतने बड़े दैत्य से लड़ने के लिए खड़ा हो गया और उसका कचूमर निकाल दिया। यह बच्चों की बात कह रहा हूँ। कंस से लड़ने के लिए श्रीकृष्ण भगवान् गए थे। तब वे कितने छोटे थे। बच्चा जब लड़ने के लिए गया तो कंस को, चाणूर को और बकासुर को मार डाला और किस-किस को मारा? हाथियों को, कालिया को मार डाला, कैसे मार डाला बच्चे ने? बेटे, बच्चे ने नहीं, सत्य ने मार डाला। सत्य के पास हजार हाथियों के बराबर बल होता है। इसीलिए मुष्टिकासुर कौन था? एक हाथी था। भगवान् श्रीकृष्ण चाहते तो और भी निन्यानवे हाथियों को मार सकते थे, क्योंकि उनके पास सत्य था। बच्चा हो तो क्या, बड़ा हो तो क्या, जिसके पास सत्य है, विजय उसकी ही होती है।

मित्रो! महाभारत की कथाएँ भी इसी तरह की मालूम पड़ती हैं, जिसमें लोगों ने देवत्व पैदा किया। देवत्व का छोटा-सा फार्म बनाया, सीढ़ी बनाई, आदर्श उपस्थित किया, जिससे लोगों के सामने देवत्व घिसटता हुआ चला गया, और वे दिन भी आए, जबकि दुर्योधन की आसुरी सभ्यता का निवारण हो गया, समाधान हो गया। कभी और भी ऐसे ही हुआ था। सारे इतिहास में तो यही पढ़ता रहता हूँ। अठारह पुराणों का अनुवाद मैंने किया है और इतिहास भी पढ़ा है। दो वर्ष पहले मैंने इतिहास को ज्यादा गहराई और ध्यान से पढ़ा है। ‘भारतीय संस्कृति का समस्त विश्व को अजस्र अनुदान’ नामक बड़ा ग्रंथ मैंने लिखा है। आपने पढ़ा होगा, उसमें मैंने हिंदुस्तान की सारी-की-सारी हिस्ट्री लिखी है। सारी दुनिया को निहाल कर देने की हिस्ट्री। किससे निहाल कर दिया था? बेटे, सारी दुनिया को धन दिया था, विद्या दी थी, ज्ञान दिया था। सारी दुनिया में भारतीयों का वर्चस्व छा गया था और उनको जगद्गुरु माना गया था, देवता माना गया था।

महाराज जी! यह सब कैसे हुआ था? बता दीजिए हम भी करना चाहते हैं। ऐसी विधि हमको भी बता दीजिए। हाँ बेटे, ला तुझे भी बता देते हैं कि क्या विधि है? बस एक तो तू माला ले ले और एक मंत्र। मंत्र लेकर क्या करूं? जप किया कर ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय। नमः शिवाय से क्या हो जाएगा? सारे विश्व में तेरा यश हो जाएगा और तू अजर-अमर हो जाएगा। सारी दुनिया का कल्याण हो जाएगा। ऐसा हो जाएगा? नहीं बेटे, ऐसा नहीं हो सकता।

मित्रो! मैंने जो पुस्तक लिखी है ‘भारतीय संस्कृति का समस्त विश्व को अजस्र अनुदान’। उसमें मैंने यह लिखा है कि भारतीय लोगों ने किस कदर त्याग और बलिदान किए हैं और एक से बढ़कर एक कैसे-कैसे नमूने खड़े किए हैं। बलिदानों का जखीरा लगा दिया है। भारतीय सभ्यता को अपने अनुदान देने वाले लोगों का जब मैं इतिहास पढ़ता हूँ, तो आँखों में से आँसू टपक पड़ते हैं। उनमें से एक थे, कुमारजीव, जो हिंदुस्तान से रवाना हुए और चीन पहुँच गए। जहाँ की न वे भाषा जानते थे और न कुछ जानते थे। “चीन नाम का देश है, जिसमें जाकर बौद्ध धर्म का प्रसार करेंगे।” यह सोचकर वे अकेले ही रेगिस्तानों को पार करते हुए चले गए। उन भयंकर रेगिस्तानों को जहाँ तीस-तीस दिनों तक पानी की एक बूँद भी नहीं मिलती थी। पेड़ की एक छाया तक नहीं है, केवल रेगिस्तान-ही-रेगिस्तान भरा पड़ा है। अपनी थैली में थोड़ा-सा पानी लेकर वे रवाना हो गए। कौन? कुमारजीव। वे चाइना में रह गए। चाइना में कौन था उनका? न कोई बेटा था, न मित्र था, न कोई शिष्य था उनका। वहाँ जाकर के उन्होंने चायनीज भाषा सीखी और सीखने के बाद में बौद्ध धर्मग्रंथों का अनुवाद करके वहाँ रखा। सारे-के-सारे चाइना को बौद्ध बनाने का श्रेय कुमारजीव जैसे बुद्ध के अनुयायियों को था।

गुरुजी! यह कैसे हो गया? बेटे, जादू से। जादू से कैसे हो गया? हमको भी सिखा दीजिए। बेटे, जिस जादू से दुनिया में बड़े-बड़े काम हुए हैं और अध्यात्म का प्रणयन हुआ है, उसका नाम है, त्याग और बलिदान। नहीं महाराज जी। त्याग-बलिदान का नहीं, हमको तो बता दीजिए मंत्र। मंत्र कैसा होता है? अहा! इसी मंत्र के चक्कर में फिर रहा है धूर्त। अच्छा महाराज जी! बता दीजिए जादू। जादू बता दें तोरा सिर। मित्रो! क्या हुआ? सारी-की-सारी पुस्तकों में मैंने लिखा है कि भारत के गौरव को ऊँचा उठाने के लिए, सारे विश्व का कायाकल्प कर डालने के लिए, जो आधारभूत मंत्र था, वह था त्याग और बलिदान। त्याग और बलिदान की आवश्यकता महात्मा बुद्ध को पड़ी कि जिससे न केवल हिंदुस्तान, वरन् सारे के सारे विश्व को सुसंस्कृत बनाया जाए, फिर से सुसंस्कृत बनाया जाए। इसके लिए उन्हें अपील करनी पड़ी कि जो हमारे सबसे प्यारे हों, जो हमारे हितैषी हों, जो हमारी आज्ञा का पालन करने वाले हों, जो हमसे यह कहते हों कि बुद्ध हमारा है, तो वह त्याग करके दिखाएँ। यही सीधा-सरल मार्ग है।

महाराज जी! हम तो आपके चरणों में फूल चढ़ा देंगे। आपके ऊपर फूल चढ़ाएँगे और तीन बार नमस्कार करेंगे। ओ हो। बड़ा भारी शिष्य है हमारा। और क्या करेगा? महाराज जी! पच्चीस पैसे का आपका एक रंगीन फोटो खिंचवाऊँगा। फिर क्या करेगा उसका? टाँगूँगा। कैसे टाँगेगा, उलटा या सीधा? महाराज जी! टाँगूँगा तो सीधा। बेटे, हमारा कहना मान तो उलटा टाँग दे फोटो को। उलटा टाँग देगा, तो ज्यादा फायदा हो जाएगा। क्यों? क्योंकि तब गुरु जी की नाक में दम आएगी तो जल्दी आशीर्वाद देंगे। तो यह मामला है? हाँ बेटे, घटिया लोगों का, छोटे लोगों का, हलके लोगों का यही मामला है। इनके लिए जितनी गाली दी जाए, कम है। यह हमारे आपके सबके ऊपर लागू होती है। इसमें आदमी सिवाय चालाकी के, सिवाय माँगने के, सिवाय बड़ा आदमी बनने के, सिवाय ऐय्यासी के, सिवाय विलासिता के कुछ बाकी नहीं है।

मित्रो! क्या करना पड़ेगा? भारतीय सभ्यता और संस्कृति को जिंदा रखने के लिए बुद्ध ने जो कदम उठाए, उसने अपने-अपने मित्रों और शिष्यों से कहा कि आप आएँ और हमारे पीछे-पीछे चलें। किस तरह चलें? आप हमारी बात मानते हैं, तो हमारे रास्ते पर चलें और हमारा अनुकरण करें। क्या रास्ता है आपका? हमारा रास्ता है, त्याग और बलिदान का। किसने त्याग और बलिदान के रास्ते पर कदम बढ़ाए? एक लाख शिष्य और सवा लाख शिष्याओं ने। उन सारे-के-सारे लोगों ने कहा कि हम आपके रास्ते पर चलेंगे। आपने जिस काम के लिए अवतार लिया है, उस काम में हम आपका सहयोग करेंगे और सहायता करेंगे। दो लाख आदमियों को लेकर बुद्ध ने न केवल हिंदुस्तान, वरन् समूचे एशिया, न केवल एशिया, वरन् सारे-के-सारे महाद्वीपों में दैवीय सभ्यता का प्रसार किया। उस जमाने में सात महाद्वीप माने जाते थे। अब तो हमने पाँच कर लिए हैं। सारे महाद्वीपों में उन लोगों ने न जाने क्या-से-क्या काम करने शुरू कर दिए, जिससे वे जगद्गुरु कहलाने के अधिकारी हुए।

यह क्या किया बुद्ध ने? बेटे, बुद्ध ने यही किया। दैवीय सभ्यता का प्रसार इसी से हुआ है। तो क्या बुद्ध ने बड़े व्याख्यान दिए थे? हाँ बेटे, बुद्ध ने बड़े व्याख्यान दिए थे, लेकिन व्याख्यान देने के साथ-साथ में उसके नमूने भी पेश किए गए थे। क्या नमूना पेश किया? उनका बेटा राहुल आया और बोला, पिताजी! हम आपके अंश-वंश से पैदा हुए हैं। हाँ बेटे, तुम हमारे अंश-वंश से पैदा हुए हो तो तुम्हें हमारी वंश-परंपरा की रक्षा करनी चाहिए। वंश-परंपरा की रक्षा कैसे होती है? पंडित जी से पूछा, तो वे बोले, बस जौ का पिंड बना लो और उस पर धूप-दीप, फूल लगा दो और ‘तर्पयामि’ करके पिंड को गंगा जी में चढ़ा दो। बस, वंश का उद्धार हो जाएगा। तो क्या पिताजी। ऐसे उद्धार होगा? नहीं बेटे, ऐसे उद्धार नहीं होगा। कैसे होगा? जिस रास्ते पर हम चले हैं, उस रास्ते पर तू भी चल।

राहुल ने कहा, अच्छा पिताजी! कोई और रास्ता बताइए? बुद्ध ने कहा, नहीं बेटे, हम जिस रास्ते पर चले हैं, उससे अच्छा कोई रास्ता नहीं हो सकता है। अगर रहा होता, तो हम भी उस पर चल दिए होते। यही सबसे अच्छा रास्ता है। तुझे यही करना पड़ेगा। अगर तू हमारा बेटा है और यह कहता है कि हम आपका वंश चलाएँगे, तो हमारे रास्ते पर चल। राहुल तैयार हो गया। वह सारी जिंदगी भर अपने पिता के कदमों पर चलता रहा और न जाने कहाँ-से-कहाँ चला गया। वह वर्मा गया। सारे-के-सारे विश्व में एक सिरे से दूसरे सिरे तक भटकता फिरा और अपने पिता के कामों का और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के लिए त्याग-बलिदान की झड़ी लगाता रहा।

(क्रमशः)


युगगीता-19 - मैं जानता हूँ कि तुम कौन हो और किसलिए आए हो

(गीता के चतुर्थ अध्याय-ज्ञानकर्मसंन्यासयोग की युगानुकूल व्याख्या)

इस अंक से हम चौथा अध्याय आरंभ कर रहे हैं। इसके पूर्व के तीन अध्यायों में 18 लेखों द्वारा योगेश्वर श्रीकृष्ण एवं युगद्रष्टा परमपूज्य गुरुदेव के चिंतन के परिप्रेक्ष्य में बड़ा ही महत्त्वपूर्ण जन-जन के लिए उपयोगी चिंतन प्रस्तुत किया जा चुका है। इन सभी लेखों का एक संकलित रूप ‘युगगीता’ ग्रंथ के प्रथम भाग के रूप में पाठकगणों के समक्ष शीघ्र ही आ रहा है। चौथे अध्याय का शीर्षक है- ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग नामक इस चतुर्थ अध्याय में न केवल ज्ञान, कर्म, संन्यास के समुच्चय रूपी योग की व्याख्या है, इसमें मूल रूप से चार प्रकरणों की विशद विवेचना भी है। पहला प्रकरण है अवतार चेतना के प्रकटीकरण का, उसके हेतु का। दूसरा प्रकरण है कर्म, अकर्म और विकर्म की व्याख्या का। तीसरा प्रकरण है यज्ञ का, यज्ञ क्या है, कितने प्रकार का है, उसे हम दर्शन की दृष्टि से कैसे समझें? चौथा प्रकरण है ज्ञान का, ज्ञान के महत्त्व का एवं संशयों से मुक्त हो ज्ञान की प्राप्ति द्वारा कर्म में तत्पर होने का। चारों ही एक-दूसरे से जुड़े हैं। व्याख्या के माध्यम से इनकी परस्पर संगति क्रमशः समझ में आती जाएगी। यह ध्यान में रखने योग्य बात है कि योगेश्वर श्रीकृष्ण प्रथम छह अध्यायों में मूलतः कर्मयोग की चर्चा कर रहे हैं। कर्मयोग के साथ-ही-साथ वे ज्ञानयोग व भक्तियोग के मर्मस्पर्शी बिंदु भी साथ ले आते हैं। फिर इस अध्याय का नाम भी है, ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग। कई लोग यह समझते हैं कि गीता मात्र संन्यासियों के लिए है अथवा इसे पढ़ने से अच्छा-खास गृहस्थ संन्यासी बन जाता है। ऐसी बात नहीं है। यह गीता एक गृहस्थ श्रीकृष्ण द्वारा दूसरे गृहस्थ अर्जुन के माध्यम से हम सभी गृहस्थ धर्म या अन्य धर्म का पालन करने वालों के लिए कही गई है। जहाँ तक संन्यास से मतलब है, वह है कर्मणा न्यासः इति कर्म संन्यासः अर्थात् कर्म का न्यास कर दो, ट्रस्ट बना दो। कर्म का फल ईश्वर को समर्पित कर दो। यह विस्तृत थ्योरी इस चौथे अध्याय में आई है एवं इसी की ओर विशद व्याख्या पाँचवे-छठे अध्याय में हुई है।

इस अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग की शुरुआत श्री भगवान् की स्वीकारोक्ति से होती है कि यह गीता रूपी योग का गुह्य ज्ञान उन्हीं के माध्यम से-ईश्वरीय सत्ता के माध्यम से धरती पर आया है। तमाम कर्मों के एकमात्र कारण, उनके एकमात्र सृजनकर्त्ता और परम नियंता कौन हैं, यही स्पष्ट किया गया है। वही समग्र समष्टि में क्रीड़ा कर रहा है। उसी की कार्यप्रणाली समझ लेने के बाद मानव में दिव्यता का समावेश हो जाता है। समष्टि के साथ व्यष्टि के तादात्म्य का अर्थ है इस भूमंडल पर ईश्वर जैसी पूर्णता, ऐश्वर्य से जुड़ी सामर्थ्य, सौंदर्य एवं परमशक्ति से युक्त होकर कर्म करना। बड़ी ही सुँदर काव्य की अभिव्यक्ति के साथ निरंतर ज्ञान एवं कर्मयोग का ज्ञान, कर्त्ताभाव के त्याग का वर्णन निस्स्वार्थ भाव से प्रवाहित हुआ है। यही इस अध्याय की विशेषता है।

भगवान् कहते हैं कि यह कर्मयोग जिसकी उन्होंने पिछले अध्यायों में व्याख्या की है, उनका कोई निजी सिद्धाँत नहीं है। यह श्रद्धाभाव से शताब्दियों से परंपरा रूप में चलता आया है तथा यही भारतीय संस्कृति का सनातन-अविनाशी आधार है। यद्यपि यह योग रहस्यमय है, गहन भाव से युक्त ( रहस्यं ह्येतदुत्तमम् )। प्रारंभ में किसी को जमे, न जमे, लेकिन पात्रता और ईश्वरीय अनुकंपा से जो भी इसे समझ लेता है, वह संसार रूपी महासागर की इस हिचकोलों से भरी यात्रा को पार कर जाता है। यही प्रारंभिक तीन श्लोकों की भूमिका है व यह वे अर्जुन को क्यों कह रहे हैं, यह भी इसमें समझा रहे हैं।

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥ 4/1

“मैंने इस अविनाशी योग को सर्वप्रथम भगवान् सूर्य को सुनाया। सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मुनि को दिया और मनु ने अपने पुत्र (सूर्यवंशी राजाओं के प्रसिद्ध पूर्वज) इक्ष्वाकु के प्रति कहा।”

“हे परंतप अर्जुन! इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना। तथापि अनंत शताब्दियाँ बीत जाने पर यह महान् ज्ञान संसार से लुप्तप्राय हो गया।”

से एवायं मय तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि में सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥ 4/3

“मैं उसी पुरातन योग का उपदेश तुझे दे रहा हूँ, क्योंकि तू मेरा भक्त व मित्र है। चूँकि यह बड़ा ही गुह्य रहस्य से भरा ज्ञान है, तू इसे जानने का उचित पात्र भी है।”

इन तीन श्लोकों से इस अति महत्त्वपूर्ण चौथे अध्याय की भूमिका बनती है। अर्जुन स्वभाव से तुरंत जिज्ञासु हो उठता है, भ्रमित भी हो जाता है, यह सुनकर “इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्”-मैंने यह अविनाशी योग सूर्य भगवान् को दिया। वह सोचता है कि या तो यह कथन मिथ्या है या फिर भगवान् के इन शब्दों में कोई गुह्य रहस्य छिपा हुआ है। वह सीधा प्रश्न करता है-

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयाँ त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥ 4/4

“आपका जन्म तो बाद का है और भगवान् सूर्य का पहले का, अर्थात् कल्प के आदि का। तब मैं इस बात को कैसे मानूँ, समझूँ कि आप ही ने कल्प के आदि में इस ज्ञान को सूर्य को दिया था।”

यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण के समक्ष लौकिक दृष्टि से एक जिज्ञासा आई है, जो उन्हीं के कथन के प्रत्युत्तर में जन्मी है।

सूर्य का जन्म अर्जुन भी आदिकाल से हुआ मान रहा है एवं अवतारवाद को न समझ पाने के कारण वह यह समझ पाने में असमर्थ है कि श्रीकृष्ण ने कब इसे सूर्य को कहा व कब कालक्रम में वह अब उस स्थान पर एक श्रोता बनकर आ खड़ा हुआ है। सूर्य वस्तुतः आदर्श के रूप में इस अविनाशी योग के प्रथम श्रोता के रूप में भगवान् द्वारा यहाँ उद्धृत हैं। सुवति प्रेरयति लोकः इति सूर्यः जो अपने कर्म से सारे जग को कर्मरत रहने की प्रेरणा दे, वह सूर्य। कर्म में कोई शिथिलता नहीं, निरंतर कर्त्तव्यपरायणता का पाठ पढ़ाए वह सूर्य। सूर्य-मनु-राजर्षिगण एवं फिर लुप्त हो जाने के कारण अब अर्जुन को निमित्त बनाकर भगवान् इस विराट् ज्ञान को जन-जन के सम्मुख रख रहे हैं। गायत्री का देवता सविता देवता-सूर्य से आरंभ हुआ यह गीता का ज्ञान गुरु के माध्यम से जन-जन तक आ रहा है। गीता, गायत्री व गुरु तीनों का परस्पर समन्वय है यह विलक्षण ज्ञान। इसीलिए गीता हम सबके लिए एक अनिवार्य पाठ्यपुस्तक बन जाती है।

भगवान् जब कहते हैं कि “सबसे पहले मैंने इसे सूर्य को कहा”-तो उनके इस ‘मैं’ को, उसके मर्म को जानना चाहिए। यह भगवान् का मैं अहंजनित नहीं है। यह ‘मैं’ समष्टिगत है। उनके इस मैं में परब्रह्म की व्याख्या हो रही है। परमात्मा का ‘मैं’ अर्थात् समष्टिगत मैं। सारे ईकोसिस्टम का प्रतीक है यह विराट् इगो, मैं। भगवान् ऐश्वर्य से भरी सत्ता का नाम है, इसीलिए ईश्वर है। वही ईश्वर कह रहा है, देवकीनंदन बाल-ग्वालों, गोपियों के साथ खेलने वाले, दुर्योधन के शब्दों में ग्वाले कृष्ण नहीं। यह समझना बड़ा जरूरी है। क्या कहते हैं भगवान्!

बहून में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥ 4/5

“हे परंतप! तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सब को तू नहीं जानता, किंतु मैं जानता हूँ।”

भगवान् एक आश्चर्यजनक रहस्योद्घाटन कर रहे हैं। हम सभी अनेक जन्म धारण कर चुके हैं, हमने इस तरह असंख्यों अनुभव एकत्र किए हैं और आज हम जो कुछ भी हैं, वह भी हमारे अब तक के अनुभवों और प्रतिक्रियाओं के परिणाम ही हैं। पूर्व जन्मों में संचित ज्ञान-संपदा का परिपाक ही है, जो हम इस जन्म में कुछ संस्कारों के ज्ञान से मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन जीने हेतु कर्मरत हैं, किंतु वर्तमान शारीरिक उपाधियों में हम इतना घुल-मिल गए हैं, अपने तात्कालिक सुख-दुःख, कामोद्वेग, पीड़ा, राग-द्वेषादि में इतने तल्लीन रहते हैं कि हम जीवन की घटनाओं से अलग खड़े होकर उनके द्रष्टा नहीं बन पाते। इसी कारण हम वास्तव में कौन हैं, यह अनुभूति नहीं कर पाते। भगवान् कह रहे हैं, यही बात कि तुम तो नहीं जानते, किंतु मैं सब जानता हूँ कि मैं कौन था व कौन हूँ? बात बड़ी गुह्य है।

अवतार-लीला वस्तुतः अति गहन विषय है। भगवान् सशरीर आते हैं, लीला करते हैं, यह ज्ञान प्रभु की कृपा के बिना संभव भी नहीं है। बड़ा आसान है यह कहना, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ मैं ही सच्चिदानंद परब्रह्म हूँ। किंतु छह प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त भगवान् स्वयं रक्त-माँस का शरीर धारण कर मनुष्य बन संसार में आते हैं, प्राणियों का उद्धार करते हैं, ऐसा ज्ञान पाने के लिए प्रभु कृपा-गुरु का दिव्य अनुदान जरूरी है। ऋषि-मुनि उग्र तपस्या करके भी ‘अवतार तत्त्व’ का ज्ञान नहीं प्राप्त कर सके। पुराणों में उल्लेख आता है कि नैमिषारण्य में सहस्रोंसहस्र ऋषि-मुनि थे। उन सभी ने भगवान् श्रीराम को देखा था, किंतु उन्हें अवतार रूप से ग्रहण किया था केवल भारद्वाज आदि कुछ गिने-चुने ऋषियों ने। अन्य सभी कहते थे, “हम जानते हैं कि तुम दशरथ पुत्र हो।” बस इतना ही। मात्र भारद्वाज ने ही उनकी अवतार रूप में पूजा की थी। श्रीकृष्ण के साथ रहते हुए भी अर्जुन उन्हें भगवान् के रूप में नहीं जान सके, जब उनकी कृपा हुई, दिव्य चक्षु मिले तभी पता चला कि श्रीकृष्ण का असली स्वरूप क्या है।

हममें से कितने लोग जान पाए, यह तत्त्व आत्मसात कर पाए कि हमारे गुरु स्वयं ईश्वर रूप हैं। कहते तो हम रहे, गीत भी हम लिखते एवं गाते रहे, फिर हमारे अंदर अवतारी सत्ता के सहचर होने के गुण क्यों नहीं आ सके, संभवतः इसलिए कि हम ही संशय से भरे थे। न अपने को जान पाए न अपने गुरु को। जो जान पाए, वे तर गए, तर रहे हैं व तर जाएँगे। हमारा स्वयं का अहं बार-बार बाधक बन जाता है एवं कर्तृत्व का श्रेय लेने हेतु आतुर हो जाता है। सम्मान थोड़ा-सा भी हमें नहीं पच पाता एवं वह अजीर्ण हमारे व्यवहार-वाणी में निकलता रहता है। अवतारवाद के मर्म को समझकर हम अपनी गुरुनिष्ठा को ही नहीं मजबूत करते, वस्तुतः अपनी मुक्ति का, लोभ-मोह-अहं के बंधनों से मुक्ति पाने का, त्याग में प्रतिष्ठित हो इसी जीवन में जीवन्मुक्त बनने का पथ ही तो प्रशस्त करते हैं। इसीलिए बड़ा जरूरी है चौथे अध्याय का अवतारवाद का यह ककहरा।

श्रीरामकृष्ण देव ने कहा है, “जब अवतार आते हैं, तो सैकड़ों व्यक्तियों को अपने आश्रय से तारने के लिए आते हैं। रेल का इंजन खुद चलता है और भारी-भारी माल से लदी गाड़ियों को भी खींच लेता है। अवतार भी इसी प्रकार हजारों मनुष्यों को ईश्वर के पास ले जाते हैं। अवतार को सब लोग नहीं पहचान पाते। देह धारण करने से रोग, क्लेश, क्षुधा और तृष्णा लगी रहती है। लगता है, वे भी हमारे ही समान हैं। राम सीता के शोक में रोए थे। वे तो नर-लीला करते हैं। मनुष्य रूप में स्वयं अवतीर्ण होते हैं, किंतु उन्हें जानने के लिए उनसे प्रेम करना जरूरी है। उन्हें पहचानने के लिए साधना करना जरूरी है। उनकी कृपा मिल गई, तो फिर कुछ भी नहीं चाहिए।”

साधारणतया प्रारब्धवश ही मनुष्य का जन्म होता है। क्या श्री भगवान् का ऐसा कोई प्रारब्ध था, जिस कारण उन्हें अपनी महिमा से च्युत होकर साधारण मानव के रूप में जन्म लेना पड़ रहा है। इस शंका के समाधान हेतु ही भगवान् ने अर्जुन व इसके माध्यम से हम सबको अपना स्वरूप दिखाने हेतु यह संदेश कहा है। थोड़ा-सा इस संबंध में भगवान् ने अर्जुन को भूमिका रूप में तब कहा था, जब उन्होंने कर्म करते हुए भी कर्मों से न बँधने के प्रसंग में अपना दिव्य दृष्टांत तीसरे अध्याय में सामने रखा था।

न में पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥ 3/22

“मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्त्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म करने में ही विश्वास करता हूँ।”

वहाँ मात्र एक झलक रखी थी अपने दिव्य अवतारी स्वरूप की। पर अब वे अपने आपको स्पष्ट शब्दों में अवतार घोषित करते हैं।

पुनर्जन्म की बात भी अनायास ही भगवान् कह जाते हैं। पुनर्जन्म की प्रारंभिक सभी खोजें भारतवर्ष में हुईं। बाद में पश्चिम में भी जिज्ञासा जगी एवं ढेरों प्रमाण उन्हें मिलने लगे, उस मुस्लिम व ईसाई धर्म में भी, जहाँ पुनर्जन्म की मान्यता ही नहीं है। जातक कथाओं में ऐसे उदाहरण काफी मिलते हैं। इनके अनुसार अंतिम अवतार भगवान् का महात्मा बुद्ध के रूप में हुआ था। अवतारी चेतना किस तरह से बारंबार आती है, उसका नमूना हैं ये कथाएँ। एक कथा परमपूज्य गुरुदेव अक्सर सुनाया करते थे। यह घटना भगवान् बुद्ध के सिद्धार्थ से बुद्ध बनने की प्रक्रिया के दौरान घटी व संबंधित है एक अनाम ऐसी लड़की से, जिसे भगवान् ने उसके उत्तर जन्म में अहसास कराया कि वह कौन है एवं वे कौन हैं।

यह एक तथ्य है कि भगवत्सत्ता के अंशरूप में जन्मे महापुरुष भी मुमुक्षत्व प्राप्त करने के लिए कई जन्मों तक तप करते हैं, तब कहीं भगवान् की सत्ता उनमें अवतरित होती है। सिद्धार्थ के रूप में जन्म लेने से पूर्व सत्य की खोज, निर्वाण-प्राप्ति के उपाय की दिशा में महात्मा बुद्ध का तप चल रहा था। उस तपश्चर्या के दौरान जंगल में एक लड़की उन्हें भोजन दे जाती थी। पूछती कि आप क्यों कठोर तप कर रहे हैं? भगवान् कहते, निर्वाण की प्राप्ति के उपाय खोजने एवं जन-जन को बताने के लिए। लड़की कहती, आपको भूख नहीं लगती? यह तो हम आपको कंद-मूल दे जाते हैं, तो आप खा लेते हैं। यह निर्वाण है क्या, जिसके लिए आप तप कर रहे हैं। भगवान् बोले, “जिस दिन मिल जाएगा, सबसे पहले तुझे ही बताएँगे। तूने हमारी बड़ी सेवा की है।” लड़की हँसकर चली जाती। सिद्धार्थ पुनः जन्मे, तप किया एवं आत्मबोध प्राप्त किया, निर्वाण प्राप्ति का उपाय उन्हें दिखाई देने लगा। उधर वह लड़की भी फिर जन्मी, पर न उसे विगत जन्म की स्मृति थी, न यह मालूम कि यह बुद्ध कौन हैं?

भगवान् बुद्ध का प्रथम उपदेश होना था। पाँच ब्राह्मण पहले उनके शिष्य बने थे। उनमें पहले थे काश्यप। प्रसेनजित, बिंबसार भी उनसे जुड़ चुके थे। काश्यप से वे बोले, “मैं पहला अपना प्रवचन करूंगा।” सभी के मन में जिज्ञासा थी कि कहाँ पहला उपदेश देंगे प्रभु। बिंबसार के यहाँ प्रसेनजित के यहाँ या कहीं और। भगवान् बोले “कहीं नहीं! मैं पंचशाला गाँव में रहने वाली एक कुम्हार की लड़की को पहला प्रवचन दूँगा। मुझे मेरे पिछले जन्मों की स्मृति है। मेरा वायदा है उस लड़की से। पहला प्रवचन उसी को सुनाया जाएगा। फिर और लोग सुनेंगे।” जिज्ञासु शिष्यगण देखने गए कि कौन-सी लड़की है वह? पंचशाला गाँव में एक लड़की बारह वर्ष की कुम्हार के घर दिए बना रही थी, मिट्टी कूट रही थी। उसे कहा गया कि स्वामी जी प्रवचन हेतु बुला रहे हैं। वह बोली, ‘मैं’ नहीं जानती उन्हें। मुझे मिट्टी कूटनी है, ढेरों काम करने हैं। भगवान् बोले, हम इंतजार कर लेंगे। वह आएगी जरूर। तीन दिन तक प्रतीक्षा चलती रही। जब लोगों ने कहा कि वह नहीं आ रही, तो भगवान् बोले कि फिर मैं ही पहुँच जाता हूँ। भगवान् पहुँचे तो लड़की बोली, पहले आप हमारा काम करा दें, फिर हम आप जो भी कहेंगे, वह सुन लेंगे। पहले हमारे साथ मिट्टी कूट दें। दिनभर बुद्ध ने उस लड़की के साथ मिट्टी कूटी। लड़की ने कहा, आपने हमारा इतना काम किया तो हम भी आपके प्रवचन में बैठ जाएँगे। हमें कुछ आता-जाता नहीं है, पर हम सुन लेंगे। प्रवचन में भगवान बुद्ध ने वह रहस्य खोला कि इसी लड़की ने हमारी सेवा की थी पूर्व जन्म में। हमने निर्वाण का पहला उपदेश इसे सुनाने का वायदा किया था, इसलिए हम इसे ही सुना रहे हैं। आप सभी उसके साथ हैं, अतः लाभ आपको भी मिल रहा है। लड़की वह सब सुनने के बाद देवत्व को प्राप्त हो गई। उसके जीवन की दिशा बदल गई व शीघ्र ही उसने भी आत्मबोध को प्राप्त किया।

यहाँ जो मर्म की बात है, वह है भगवान् का कथन कि “मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, उनको तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। ( तानि अहं वेद सर्वाणि )।” यह हमें समझ में आ जाए, तो हमें अहसास होगा कि कैसे हमें खोजते-खोजते हमारे सद्गुरु-हमारे ईश्वर हम तक पहुँच गए। परमपूज्य गुरुदेव का एक प्रवचन है, जिसमें उन्होंने कहा, “मुझे मालूम है, मुझसे जुड़ी श्रेष्ठ आत्माएँ कहाँ-कहाँ हैं? मैं उन्हें चुन-चुनकर एकत्र कर रहा हूँ, ताकि एक लड़ियों का हार बना सकूँ।” गायत्री परिवार उसी का नाम है। पूज्यवर ने कहा है, “यदि सन् 2000 के अंत तक तुमने मेरा साथ दिया, तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ, तुम्हें पार कर दूँगा। भवबंधनों से भरे महासागर में से तुम्हारी नौका सकुशल खींचकर निकाल ले जाऊँगा। शर्त एक ही है कि बिना किसी माँग, अपेक्षा, यश की कामना के तुम मेरा काम करो। मेरे विचारों का विस्तार करो।”

परमपूज्य गुरुदेव के जीवन से जुड़ा एक संस्मरण बड़ा मर्मस्पर्शी है। गायत्री तपोभूमि की स्थापना के समय 2400 तीर्थों की जल-रज की स्थापना वहाँ होनी थी। पूज्यवर के एक प्रियभक्त जो मरण तक यहीं शाँतिकुँज में रहे, श्री बद्रीप्रसाद पहाड़िया थे। उनके पास पूज्यवर की लिखी 1945-46 के जमाने की चिट्ठियाँ हैं। इससे ज्ञात होता है कि वे कितने पुराने समय से जुड़े थे। पूज्यवर ने उन्हें लिखा कि तुम्हारा बाँदा जिले के अमुक गाँव में 11 वर्ष की एक लड़की है। वह पूर्व जन्म की एक देवी है, सिद्ध है। बिना उसे इसके माता-पिता को बताए तुम उसके गाँव का जल ले आओ। पहाड़िया जी किसी तरह ले आए। उस जल को भी अन्यान्य रहस्यमय स्रोतों से आए पावन प्रतीकों के साथ वहाँ रखा गया। जो महात्मा बुद्ध के जीवन में घटा, लगभग वैसा ही पूज्यवर के साथ। यही महापुरुषों की लीला है।

भगवान् पाँचवे के साथ ही अगले श्लोक में कहते हैं,

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया॥ 4/6

“मैं जन्मरहित, अविनाशी, सभी प्राणियों का नियामक ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर अपनी योग माया से प्रकट होता हूँ।”

भगवान् के इस योगमाला वाले रूप से आवरण हटने के बाद उन्हें पहचानना बड़ा जरूरी है। जैसा कि हम पूर्व में कह चुके हैं कि भगवान् राम के समय ही ऋषिगण नहीं जानते थे कि वे भगवान् हैं। रामकृष्ण परमहंस कहते हैं, ऋषियों ने रामचंद्रजी से कहा, हम जानते हैं कि तुम दशरथ के लड़के हो। भारद्वाज ऋषि भले ही तुम्हारी अवतार रूप से पूजा करें, पर हम लोग तो अखंड सच्चिदानंद को चाहते हैं। इस बात को सुनकर रामचंद्रजी हँसकर चले गए। ठाकुर कहते हैं, “ऋषि लोग ज्ञानी थे, इस कारण वे अखंड सच्चिदानंद को चाहते थे। भक्त लोग तो भक्ति का स्वाद लेने के लिए अवतार को ही चाहते हैं।” श्रीरामकृष्ण के वचनों से अवतार तत्त्व बड़ी सुगमता से समझ में आ जाता है।

भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि जो कुछ भी उत्पन्न होता है, उसका कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है, किंतु वे तो अजन्मे हैं, साथ ही अव्ययात्मा (अविनश्वर स्वरूप) भी हैं। शुद्ध चैतन्य भाव से भरे-पूरे हैं। चैतन्य में न कभी विकार आता है, न परिवर्तन आता है। तो फिर वे प्रकट कैसे होते हैं? भगवान् कहते हैं, अपनी अंतर्निहित माया द्वारा। भगवान् अपनी इस माया के स्वामी हैं, अतः वे अवतरित हो जाते हैं। हम जीव अपनी उस माया-वासना समुच्चय के अधीन जीवन जीते हैं, यही हममें व उनमें अंतर है। भगवान् के अवतरण का हेतु, अवतार का प्रयोजन तथा उनके दिव्य जन्म-कर्म के बारे में चर्चा अगले अंक में करेंगे।

(क्रमशः)


गुरु कथामृत-18 - जीवन-साधना का प्रखर मार्गदर्शन देते ये पत्र

इतना विराट् गायत्री परिवार, ऐसे विराट् आयोजन एवं अपरिमित संभावनाओं से भरे इस मिशन के इतिहास को जब कभी भी सुव्यवस्थित ढंग से लिखा जाएगा, तो लोग जानेंगे कि किस पौधशाला से निकलकर यह वटवृक्ष विकसित हुआ है। वस्तुतः तप-साधना ही वह पूँजी है, जिससे जन-जन को जोड़कर परमपूज्य गुरुदेव ने इतनी बड़ी संस्था खड़ी कर दी। जिस मिशन की जड़ें तप की पूँजी से सिंचित होती रही हों, उसके तो और भी विस्तृत होने, सारे विश्व में छा जाने के विषय में किसी को कोई शंका भी नहीं होना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव के पन्नों से ज्ञात होता है कि कैसे छोटी-छोटी आशंकाओं का समाधान कर, सतत प्रेरणा देते रहे एवं छोटी-छोटी भ्राँतियों का निवारण कर उन्होंने जीवन-साधना के पथ पर लाखों व्यक्तियों को अग्रगामी बना दिया। पत्रों के महासागर में से कुछ पत्र पाठक-परिजनों के लिए यहाँ हम बानगी रूप में दे रहे हैं।

मन नहीं लगना हर साधक की एक सामान्य शिकायत रहती है। ऐसे में उनका मार्गदर्शन मिल जाए, तो फिर क्या है। 7-6-51 को श्री रामस्वरूप चाचौदिया (राठ, जिला हमीरपुर) को लिखे एक पत्र में पूज्यवर निर्देश देते हैं-

“आपका मन अस्थिर रहता है। इसके लिए सुविधानुसार कुछ उपवास और मौन का अभ्यास किया करें, उससे चित्त स्थिर रहने लगेगा। 14 जून को गायत्री जयंती के दिन भी व्रत-उपवास कर लें। निरंतर श्रद्धापूर्वक जप करते रहने से सभी आध्यात्मिक कठिनाइयों का हल हो जाता है।”

श्री चाचौदिया जी को मार्गदर्शन मिला। प्रगति के उच्च सोपानों पर चढ़े। वे परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आरंभ किए गए एक विराट् साधना अभियान में जुट गए। मार्गदर्शन की फिर भी आवश्यकता थी। उन्हें दूसरा पत्र 8-12-1951 को लिखा गया।

“हमारे आत्मस्वरूप,

आपका पत्र मिला। यह जानकर प्रसन्नता हुई कि आप सहस्राँशु यज्ञ में शामिल हो गए हैं। यह इस युग का अभूतपूर्व यज्ञ है। इसमें सम्मिलित होने से आपकी आत्मा को परम शाँति प्राप्त होगी।

गायत्री मंदिर के लिए हर व्यक्ति अपना-अपना कर्त्तव्य पालन करे। अपना दान ही दूसरों पर प्रभाव डालने का सबसे अच्छा तरीका है।

आप मंगल को ही उपवास करते रहें। सप्ताह में एक दिन उपवास होना चाहिए। जब बाहर जाया करें तब मानसिक ध्यान द्वारा माता का पूजन कर लिया करें। जप के समय अगरबत्ती या दीपक कोई भी एक वस्तु जलाई जा सकती है।”

देखने में सामान्य पत्र ही लगता है। किसी भी दिन उपवास करें, क्या फर्क पड़ता है, पर पूज्यवर ने देखा होगा कि आग्रह मंगलवार का ही है। बाहर जाते हैं, तो माला नहीं हो पाती, मन दुःखी रहता है। अतः उपचार दे दिया कि मानसिक जप कर लिया करो। जप के साथ दीपक जले या अगरबत्ती, कुछ भी फर्क नहीं पड़ता, पर साधक को निर्देश दिए, ताकि वे व्रतशील हो साधक बन सकें।

यही छोटे-छोटे टोटके लोगों की जीवन-साधन के अंग बन गए एवं क्रमशः उन्हें स्तरीय साधक बनाते चले गए। हम गायत्री साधना करते हैं, तो विवाह के बंधन में क्यों बँधें, हमारा क्या होगा, ऐसी कई आशंकाएँ किसी के भी मन में आ सकती हैं। श्री देवव्रत प्रसाद श्रीवास्तव जी (मुजफ्फरपुर), जो उन दिनों जी.जी.बी. कॉलेज में पढ़ रहे थे, के मन में भी कुछ ऐसी ही बातें थीं। उन्हें उत्तर मिला-

“आप माता का आँचल श्रद्धापूर्वक पकड़े रहें। आपकी सब कठिनाइयों को माता हल करती चलेंगी। विवाह हो जाने में कुछ हर्ज नहीं। वह तो होना ही है। आप प्रसन्नतापूर्वक कर लें। जीविका के बारे में भी चिंता की कोई बात नहीं। भगवान् सबकी व्यवस्था करते हैं, वे आपकी भी करते हैं।”

“व्यावहारिक क्षेत्र में आप निराशा एवं आशंका के साथ नहीं, प्रसन्नता के साथ प्रवेश करें। माता की सहायता आपको आड़े वक्त पर सदा काम आती रहेगी। अखण्ड ज्योति आप पढ़ते ही रहते होंगे। उसे अपने अन्य मित्रों को भी पढ़ाया करें।”

इसी उपर्युक्त निर्देश की तरह एक और पत्र का अवलोकन करें, जो 17-10-52 को श्री बिहारीलाल दुबे (बिलासपुर) को लिखा गया था।

“हमारे आत्मस्वरूप,

आपका पत्र मिला। आप गायत्री प्रचार के लिए जो प्रयत्न करते हैं, वह एक उच्च कोटि के यज्ञ से किसी भी प्रकार कम नहीं है। आपकी नवरात्रि साधना सानंद संपन्न हुई, यह बड़े आनंद की बात है। तप ही मनुष्य जीवन की सच्ची संपत्ति है। उस मार्ग पर चलते रहने से आपको आशाजनक शाँति मिलेगी।”

कई व्यक्ति भावुकतावश गुरु की काया को, स्थूल शरीर को ही सब कुछ मान बैठते हैं। गुरु ब्रह्मा है, विष्णु है, महेश है, पर पूज्यनीय उसके विचार हैं। कई के मन में आता है, हमें गुरुदेव के दर्शन होते, हम भी उनके पैर दबा पाते, हम भी उनकी कुछ सेवा कर पाते। ऐसी परिस्थितियों में साधक का मार्गदर्शन हमारी गुरुसत्ता करती है, जब वे श्री बैजनाथ जी सौनकिया (दिगौड़ा, टीकमगढ़ म.प्र.) को 2-3-63 को लिखते हैं।

“हमारा शरीर नहीं, अंतःकरण ही श्रद्धा के योग्य हे। आप हमारी भावनाओं को सुविस्तृत करके हमारी सच्ची सहायता और प्रसन्नता का माध्यम बनते हैं।

आपके ब्राह्मण शरीर से जीवनभर ऋषिकर्म ही होते रहेंगे और आप पूर्णता का लक्ष्य इसी जन्म में प्राप्त करेंगे, ऐसा विश्वास है। उस क्षेत्र में आप अपने संकल्प द्वारा प्रकाशवान् सूर्य की तरह चमकेंगे और बहुत जनकल्याण करेंगे, ऐसा विश्वास है।”

कितना स्पष्ट निर्देश है एक युगद्रष्टा गुरु द्वारा एवं किसी भी शिष्य के लिए करने योग्य कर्त्तव्य है। कभी-कभी कुछ विशिष्ट मार्गदर्शन भी साधकों को मिला करता था। जैसी-जैसी पात्रता होती, वैसा ही उपचार उसे बताया जाता। साधना में महत् सत्ता के साथ साझेदारी पात्रता का विकास किए बिना संभव है भी नहीं। आगर (मालवा, म.प्र.) के श्री नंदकिशोर शर्मा को 17-4-63 को लिखे एक पत्र पर दृष्टि डालें। “हमारे आत्मस्वरूप,

पत्र मिला। आप पिछले पत्र में बताई गई विधि से रविवार की उपासना आरंभ कर दें। दृश्य क्या दीखेंगे, ऐसा न सोचें।

आप हमारी आत्मा से अपनी आत्मा को सटाकर हमारी गरमी और रोशनी अपनी आत्मा में प्रवेश करती हुई ध्यान किया करें। अपने शरीर को हमारे शरीर से सटा हुआ उसी प्रकार ध्यान करें जैसे राम-भरत परस्पर मिले थे। भरत मिलाप का दृश्य ध्यान में रख सकते हैं।”

कितनी सुँदर उपमा के साथ समझाया गया है। तादात्म्य, तद्रूपता, विसर्जन, विलय की इससे अच्छी और क्या व्याख्या हो सकती है। किसी भी साधक के लिए उपासना संबंधी मार्गदर्शन है, ध्यान कैसे किया जाए, यह बताया गया है।

थोड़ा उच्चस्तरीय साधना संबंधी मार्गदर्शन की बात सोचें, तो मन में कुँडलिनी योग, हठयोग आदि के विषय में जिज्ञासा आने लगती है। हर कोई चाहता है कि उसकी कुँडली वैसी ही जग जाए, जैसी कि कभी नरेंद्रनाथ की रामकृष्ण परमहंस ने जगाई थी। परंतु पूज्यवर का बड़ा स्पष्ट चिंतन इस विषय में है। वे 21-2-54 को श्री रामदास (कानपुर) को लिखते हैं।

“हठयोग एवं विरक्ति प्रधान योग साधनाओं में कुँडलिनी, चक्रवेधन आदि का विधान है। गृहस्थ योग एवं कर्मयोग के पथिकों को उस मार्ग पर नहीं चलना पड़ता और वे राजा जनक की तरह आवश्यक कार्य करते हुए भी उच्च आध्यात्मिक मनोभूमि में पहुँचकर लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं। जिन साधनाओं की आप चर्चा किया करते हैं, वह आपकी शारीरिक एवं साँसारिक स्थिति के लिए अनुकूल नहीं है। आप अन्य सरल साधनाओं के द्वारा ही लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे। शबरी, निषाद, रैदास आदि अनेक साधारण स्थिति के साधक बिना विशिष्ट योग साधनाओं के उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके थे। आप भी वैसा ही कर सकेंगे। गृहस्थ त्यागने की, नौकरी छोड़ने की आपको आवश्यकता न पड़ेगी। कोई चमत्कारिक अनुभव आपको भले ही न हों, पर आप गृहस्थ योग की भूमिका को ठीक प्रकार पालन करते हुए योगी और यतियों की गति को प्राप्त कर लेंगे। आप इस संबंध में पूर्ण निश्चिंत रहें और सब सोचना-विचारना हमारे ऊपर छोड़ दें।”

पाठकों के लिए इस अंक में साधना संबंधी प्रारंभिक से उच्चतम स्थिति का मार्गदर्शन है। तरह-तरह के चोंचले खड़े करने के बजाय मन तल्लीन-तन्मय हो जीवन-साधना में निखार आता रहे, वही ध्यान सर्वाधिक सफल है, यह निष्कर्ष पूज्यवर के लिखे पत्रों से मिलता है। हमने अपने अध्यात्म को हौआ बना लिया है अथवा उसका बड़ा ही जटिल विकृत स्वरूप हमारे मन में है। अध्यात्म जीवन जीने की कला सिखाता है। अगर मर्म समझ में आ जाए तो व्यक्तित्व का परिष्कार, गुणों में अभिवृद्धि एवं दृष्टिकोण पर छाए कुहासे मिटने की प्रक्रिया संपन्न होने लगती है। यही वह कुँजी है, जो हमें अपनी गुरुसत्ता के चिंतन से जोड़कर हमारी आध्यात्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यदि इन पत्रों से कुछ प्रतिशत परिजन भी सच्चा मार्गदर्शन पा सकें, तो यह परिश्रम हम सफल मानेंगे।


अपनों से अपनी बात-1 - विराट् महाकुँभ छोड़ गया अमिट स्मृतियाँ

विगत अंक में परिजन-पाठक उन पूर्व तैयारियों के विषय में पढ़ चुके हैं, जिनकी परिणतिस्वरूप एक विराट् महापूर्णाहुति आयोजन सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के रूप में भारत की आध्यात्मिक राजधानी कुँभनगरी हरिद्वार में संपन्न हुआ। 6 से 11 नवंबर तक संपन्न हुए इस महापुरुषार्थ का पूरा विवरण तो परिजन प्रज्ञा अभियान पाक्षिक में भी पढ़ सकते हैं, पर ‘अखण्ड ज्योति’ के पाठकों के लिए चार रंगीन पृष्ठों सहित शेष सारा विवरण इस अंक में दिया जा रहा है।

पूर्व तैयारी संबंधी कुछ झलकियाँ

सुरुचि एवं सौंदर्य अध्यात्म की परिधि में आता है। इसके जुड़ जाने से जड़ प्रकृति में भी एक अनुपम शोभा दृष्टिगोचर होने लगती है। महापूर्णाहुति नगर की सबसे महत्त्वपूर्ण विलक्षणता थी, चाहे वे आवास हों अथवा कार्यालय, प्रदर्शनी अथवा चिकित्सालय, सभी को परिजन भाई-बहिनों ने गोबर से लीपकर रंगोलियों से, क्यारियों से, पौधों से सजाया था। मात्र सात दिन के लिए बने, प्रयोग में आने वाले इस नगर का सौंदर्य दर्शनीय था। ऐसा लगता था मानो देवशिल्पी विश्वकर्मा स्वयं कार्य करने धरती पर आ खड़े हुए हों।

कुल 30 नगर एवं पंद्रह भोजनालयों का निर्माण किया गया था। प्रभारी अभियंताओं ने बनाते समय ध्यान रखा था कि मुख्य पहुँच मार्ग कम-से-कम सत्तर फीट चौड़ा हो एवं सभी रास्ते सीधे हों। ऐसी व्यवस्था रखी गई थी कि फायर बिग्रेड की गाड़ी हर टेंट तक पहुँच सके। ठेकेदारों के लगाए टेंटों में सुविधा, सुव्यवस्था स्वयंसेवकों के कौशल से जुड़ गई।

रेलगाड़ी के टैंकरों के आकार के कैप्सूलनुमा पीपे (पौण्टून्स) जल के ऊपर (गंगा नदी की मुख्य जलधारा) तैराकर स्टीलतार के अठारह मोटे रस्सों से बाँधे गए थे। लगभग डेढ़ सौ मीटर के इस पुल को बनाने के लिए पच्चीस पौण्टून्स क्रेन के मानवी सहयोग से उतारे गए थे। 31 अक्टूबर को जिलाधिकारी श्री हरीशचंद्र जोशी द्वारा उसका उद्घाटन किया गया। इस पुल के बनने से लालजीवाला एवं गौरीशंकर द्वीप के बीच की दूरी बहुत कम हो गई। प्रातः 3 बजे से रात्रि 11 तक उस पुल पर सतत खचाखच लोग चलते रहे।

समूचे महापूर्णाहुति नगर में इस बार फ्लश वाले शौचालयों की व्यवस्था की गई थी। मोरबी के किरीट भाई ने इसके लिए निःशुल्क हजारों सीटें उपलब्ध कराईं। इसी आधार पर गंगानदी व पूरी तीर्थनगरी की पवित्रता संभव बनी।

पूरे महापूर्णाहुति नगर में एक बार में सभी स्थानों पर नियुक्त स्वयंसेवकों की संख्या प्रायः एक लाख थी। जब भी कोई कार्यक्रम में जाता, उसका स्थान लेने की प्रतिस्पर्द्धा-सी मच जाती। आवास, कार्यालयों, प्रदर्शनी, मल्टीमीडिया, लोककलामंच, चिकित्सालय, यज्ञशाला, संस्कारशाला, सभी नगरों, सभी भोजनालयों, पी.सी.ओ तथा प्रशासकीय कार्यालयों में मुस्तैदी से स्वयंसेवक ड्यूटी देते रहे।

सभी की एक ही अपेक्षा थी, चाहे वे तीर्थयात्रियों के जत्थे हों अथवा नगरवासी कि यह पवित्रता का वातावरण जो बना है, क्या किसी तरह स्थायी बना रह सकता है। यदि ऐसा हो सका, तो नवगठित राज्य उत्तराँचल जहाँ देवात्मा हिमालय स्थित है, एक नमूना सारे भारत के समक्ष बन सकेगा। चुनौती गायत्री परिजनों ने स्वीकार की है व इसका परीक्षण 2004 के अर्द्ध कुँभ में करने का निर्णय लिया है।

प्रसारण तंत्र की महती भूमिका

इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंटमीडिया दोनों ने ही इस महायज्ञ में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाचार पत्र तो विराट् विभूति ज्ञानयज्ञ (नई दिल्ली) से ही सारे भारतवर्ष में पूर्व तैयारियों का विवरण भेज रहे थे, साथ ही शाँतिकुँज की न्यूज फीचर सेवा ने भी ‘सृजन संदेश’ समाचार सेवा आरंभ कर दी थी, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी पीछे नहीं रहा। ‘आस्था चैनेल’ ने न केवल पूरे कार्यक्रम का लाइव कह्वरेज बैंकाक से किया, विराट् विभूति महायज्ञ की झलकियाँ तीन दिन पूर्व से ही दिखाना आरंभ कर दीं। आस्था चैनेल के द्वारा प्रसारण को कैबल टी.वी. ने हाथों-हाथ लिया एवं जहाँ-जहाँ जिन नगरों में यह उपलब्ध था, वहाँ सभी को जानने को मिला कि इतना विराट् आयोजन एक महान् उद्देश्य को लेकर हो रहा है। दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनेल डी.डी. 1, लखनऊ, बरेली व दिल्ली की प्रादेशिक सेवाओं, सी.बी.सी तथा जर्मन टी.वी. ने भी प्रसारण सेवा से जन-जन तक संदेश पहुँचाया। दिल्ली की ‘थर्ड आई कम्यूनिकेशन’ संस्था ने कार्यक्रम के पूर्व से ही आकर आठ बीटाकैम कैमरे सारे महायज्ञ नगर में कैबल्स की सेटिंग तथा मल्टीमीडिया सेंटर की स्थापना कर दी। प्रभाकर तिवारी एवं अतुल गुप्ता के नेतृत्व में आई टीम का मार्गदर्शन गजाधर भारद्वाज जी, सुभाष रंथ (‘मंथन’ के निर्देशक), संदीप श्रीवास्तव तथा दिव्येश व्यास, अभय श्रीवास्तव ने किया। शाँतिकुँज के कार्यकर्त्ताओं के युवा बालकों के दल ने अलग-अलग जोन्स का कार्य सँभालकर असंभव को भी संभव बना दिया। प्रतिदिन के कार्यक्रम की छह घंटे की एडीटिंग की हुई कैसेट दिल्ली होकर बैंकॉक जाती व दो दिन बाद उसे दो खंडों में डेढ़ सौ देशों में आस्था चैनेल द्वारा प्रसारित किया जाता। यह कार्य समर्पण भाव से जिस तरह संपन्न होता रहा, सभी ने उसे देखकर भूरि-भूरि सराहना की। इस परिश्रम का ही परिणाम है कि छह कैसेटों का एक महापूर्णाहुति वीडियो सेट उन सभी के लिए आज उपलब्ध है, जो किसी कारणवश कार्यक्रम देख नहीं पाए।

विराट् कलश यात्रा में भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति की झलक

कार्यक्रम का शुभारंभ 6 नवंबर को विराट् कलश यात्रा के लिए रखे ग्यारह हजार कलशों के संस्कारशाला (शाँतिकुँज के सामने सप्तर्षि क्षेत्र में) में पूजन से संपन्न हुआ। छह नवंबर की प्रातः से ही सारे नगरों के परिजनों का रुख शाँतिकुँज की ओर ही था। पीत वस्त्रधारी बहनों ने हजारों की संख्या में कलशों में जल भरा एवं निर्धारित समय से पूर्व ही यज्ञशाला (लालजीवाला) की ओर की अपनी पैदल यात्रा (प्रायः पंद्रह किलोमीटर लंबी) आरंभ कर दी। कलशधारी महिलाओं एवं प्रायः सत्तर झाँकियों के साथ चल रहे कार्यकर्त्ताओं का आठ किलोमीटर लंबा जुलूस अद्भुत था। चारों ओर से नारे गूँज रहे थे। बैंड भक्तिगीतों की वंदना गा रहे थे। सारा नगर इस दृश्य से अभिभूत था। शाँतिकुँज की ब्रह्मवादिनी कन्याओं द्वारा प्रस्तुत गीत के साथ ही प्रातः 8 बजे यात्रा आरंभ हो गई एवं हाथी, घोड़े, ऊँट, बैंड मिशन के विभिन्न कार्यक्रमों एवं भारत की विविधता में एकता एवं विराट्ता की झलक दिखाने वाली झांकियों, भजन मंडलियों, नृत्य करती विभिन्न क्षेत्रों की टोलियों के जत्थे चल पड़े।

दो भागों में बँटी इस विशाल कलश यात्रा में एक ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान भारत माता मंदिर की ओर से व दूसरा नीतिपास-बद्रीनाथ-दिल्ली राजमार्ग से चले जत्थे दूधाधारी मंदिर पर एक हो गए। यहाँ से खड़खड़ी, भीमगोड़, हर की पौड़ी, अपर मार्केट, देवपुरा, डैम कोठी, बाईपास मार्ग से लौटकर गंगा के किनारे-किनारे चलकर चार पटा पुलों द्वारा इस यात्रा ने ठीक ढाई बजे अपराह्न यज्ञशाला में प्रवेश किया। लगभग पाँच सौ वाहन इसमें थे तथा पूरी यात्रा के सुसंचालन हेतु लगभग डेढ़ हजार स्वयंसेवक जुटे थे। पचास मोबाइल फोनों की सेवाओं ने यात्रा को सुव्यवस्थित बनाए रखा। श्री श्याम बिहारी दुबे के मार्गदर्शन में सारे स्वयंसेवकों ने अद्भुत अनुशासन का प्रदर्शन किया। कलश यात्रा के दोनों ओर साथ चल रही बहनों-भाइयों-झाँकियों पर रास्ते भर पुष्पवर्षा गायत्री परिजनों तथा नगरवासियों द्वारा होती रही।

इस कलश यात्रा में पहली बार पूज्यवर द्वारा प्रज्वलित, परमवंदनीया माताजी द्वारा संरक्षित अखण्ड दीपक भी यात्रा की अगवानी करता साथ चला। लोककला मंच के कलाकार भी कलश यात्रा में अपने क्षेत्र की संस्कृति का दिग्दर्शन कराते साथ चल रहे थे। स्थान-स्थान पर नगरवासी जल-शरबत, मूँगफली, मिश्री, फलों के थाल लिए खड़े थे एवं देवसत्ताओं के प्रतीक रूपी कलशयात्रियों को देते चले जा रहे थे। प्रवासी भारतीयों का जत्था भी अपने बैनर्स लिए साथ चल रहा था। लगभग तीन बजे यज्ञशाला में पहुँचने पर भावभरे गीतों एवं ऋषिसत्ता के संदेशवाहकों द्वारा दिए गए पावन संदेशों ने शीतलता व प्रेरणा दी तथा फिर कलशों की आरती उतारकर प्रसाद वितरण कर इस यात्रा का विसर्जन कर दिया गया।

नवयुगदर्शन प्रदर्शनी, चिकित्सा नगर एवं लोककला मंच

छह नवंबर संध्या को ही लगभग 36000 वर्ग फीट क्षेत्र में फैली चार भागों में बँटी प्रदर्शनी, सत्तर बिस्तरों व आधुनिक उपकरणों सहित पचास चिकित्सकों से युक्त चिकित्सा नगर एवं टूरिस्ट बैंगलो के पास बने विराट् लोककला मंच का उद्घाटन संस्था प्रमुख शैलबाला पण्ड्या द्वारा दीप-प्रज्वलन कर किया गया। इसके साथ ही यह सेवाएँ सबके लिए खोल दी गईं।

नवयुगदर्शन प्रदर्शनी का निर्माण मात्र एक महीने की अल्प अवधि में गंगाधर के समानाँतर हर की पौड़ी के सामने रोड़ी बेलवाला में पैंसठ शिल्पियों, मूर्तिकारों, चित्रकारों सहित उनके तीन सौ सहयोगियों द्वारा किया गया था। इस कार्य में श्री गंगाधर चौधरी एवं सुधीर भारद्वाज के मार्गदर्शन में सभी भाई-बहन जुटे हुए थे। चौबीस पंखुड़ी वाले कमल से युक्त देवसंस्कृति फव्वारा, विराट् मशाल, महाकाल की घूमती प्रतिमा, चरक ऋषि के आश्रम के साथ नवग्रह वाटिका, विभिन्न मूर्तियों के माध्यम से गुरुसत्ता का जीवनदर्शन, अवतारों की परंपरा, ऋषि परंपरा सभी कुछ इतना मनमोहक था कि उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। सप्तक्राँतियों के जीवन स्वरूप को प्रदर्शनी में लोगों ने देखा व प्रेरणा ली। सारे परिसर में विशाल होर्डिंग्स जगह-जगह लगे थे। इन्हें श्री बाबू भाई सतवारा (मुँबई) एवं संजय पटेल के समर्पित साथियों तथा राजस्थान के श्री महेन्द्र सिंह आदि ने तैयार किया था। इसके साथ ही आयुर्वेद का दिग्दर्शन कराती एक भव्य प्रदर्शनी भी उसी दिन आरंभ हुई। साथ ही ग्रामोत्थान-ग्रामतीर्थ निर्माण, गौ संवर्द्धन आँदोलन पर आधारित प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया गया। शाँतिकुँज के रचनात्मक प्रकोष्ठ की बहनों ने श्री अगमवीर सिंह जी एवं के सी त्यागी के मार्गदर्शन में इसे तैयार किया था। आयुर्वेद प्रदर्शनी डॉ. रामप्रकाश पाण्डेय के मार्गदर्शन में ऋषिकुल-गुरुकुल के समर्पित छात्र-छात्राओं द्वारा बनाई गई थी। एक आदर्श ग्राम का मॉडल भी बनाया गया था।

लोककला मंच का शुभारंभ कलश यात्रा वाले दि नहीं अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाकार पं. श्याम दास मित्र के द्वारा सरस्वती वंदना एवं मैहर के संगीतज्ञ समूहों द्वारा वादन से हुआ। इसके बाद 10 नवंबर संध्या तक 2 से 4 अपराह्न एवं 8 से 11 सायं यह मंच सतत चलता रहा। सभी नगरों के परिजनों ने अपनी-अपनी सुविधानुसार भारत के सभी कोनों से आए कलाकारों की प्रतिभा को देखा-सराहा। लोकरंजन से लोकमंगल के अद्भुत इस प्रेरक प्रयोग की सभी ने प्रशंसा की। महेंद्र शर्मा जी के नेतृत्व में उमाकाँत व शशिकाँत सिंह तथा डॉ. रमन ने यहाँ की व्यवस्था सँभाली।

देवपूजन का विशिष्ट दिन-विशिष्ट प्रयोग

1501 कुँडी यज्ञशाला में 7 नवंबर को प्रातः 7 से सायं 4 तक देवपूजन का क्रम चला। इसका प्रसारण पूरे यज्ञनगर में एवं सिटी कैबल द्वारा पूरे हरिद्वार नगर में हुआ। साथ ही संस्कारशाला में भी यह क्रम चलता रहा। सौत्रामणी प्रयोग के साथ यह पूजन क्रम संपन्न हुआ। सौत्रामणी स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन, सभ्य समाज के निर्माण के संकल्प का दिग्दर्शन कराने वाली एक वैदिक प्रक्रिया है। इसमें स्वस्थ शरीर हेतु अश्विनीकुमार, स्वच्छ मन हेतु कला की देवी सरस्वती तथा सभ्य समाज हेतु देवराज इंद्र को विशिष्ट आहुतियाँ दी जाती हैं। साथ ही पुरुषमेध के अधिष्ठाता देवता सविता देवता का विशेष पूजन भी संपन्न होता है।

ये सारे क्रम देवपूजन के क्रम में संपन्न किए गए। संस्था प्रमुख एवं गुरुसत्ता की प्रतिनिधि के रूप में श्रीमती शैलबाला पण्ड्या ने बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति के विधिवत् आरंभ होने की घोषणा की। विश्वकुँडलिनी जागरण द्वारा मानवी चेतना के विकास को समर्पित यह संकल्प सभी ने सुना। डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं वीरेश्वर जी उपाध्याय ने इस महायज्ञ की महती भूमिका पर प्रकाश डाला। अग्नि आह्वान जब सूर्यकाँत मणि के माध्यम से सविता-देवता की किरणों से मनीषी पं. श्री वीरेश्वर जी उपाध्याय द्वारा किया गया, सारा वातावरण दिव्यता से भर गया। सौत्रामणी प्रयोग में गोदावरी नामक गाय एवं उसकी बछिया को मुख्य देवमार्ग से डॉ. प्रणव पण्ड्या, शैलजीजी देवपथ पर चलाकर लाए एवं ठीक मंच के सामने गौदुग्ध का दोहन किया, तो सारा वातावरण भाव-तरंगों से भर गया। यही दुग्ध फिर तीन देवसत्ताओं को समर्पित किया गया। इसी गौ माता को बाद में शुक्रताल के वीतराग स्वामी कल्याणदेव जी की गौशाला में गौ-वत्स दक्षिणाक्रम के अंतर्गत दान दे दिया गया।


VigyapanSuchana

सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ का पूरा विस्तृत विवरण प्रज्ञा अभियान पाक्षिक के बीस पृष्ठ के विशेषाँक (1-12-2000) तथा ‘महापूर्णाहुति’ नामक स्मारिका में प्रकाशित हुआ है। इस एवं विगत अंक में तो मात्र कुछ झलकियाँ ही दी गई हैं। जिन्हें विस्तार से पढ़ना हो, वे स्मारिका (विमोचन 29-1-2001 वसंत पंचमी के दिन) सुरक्षित करा लें। बिना पोस्टेज के मूल्य है पच्चीस रुपया।

पूरा पूजनक्रम आश्वमेधिक ढंग से चला। देवमंच पर प्रथम दिन का पूरा यज्ञ विशिष्ट आहुतियों के साथ डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं शैलजीजी द्वारा किया गया। बाद में इसी अग्नि को 1501 कुँडों में विधिवत् विस्तार दे दिया गया, जिनमें अगले चार दिनों तक यज्ञ संपन्न हुआ।

ज्ञानमंच, दीपयज्ञ, विचारमंच

देवपूजन वाले दिन से ही ज्ञानमंच से उद्बोधन एवं प्रतिदिन दीपयज्ञ का क्रम आरंभ हो गया, साथ ही रोड़ी बेलवाला में बने विचारमंच का भी उद्घाटन देवपूजन के तुरंत बाद परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के मुनि श्री चिदानंद सरस्वती द्वारा दीप प्रज्वलन एवं श्रीमती अनीता स्नातिका द्वारा वेदवाणी-सरस्वती वंदना द्वारा किया गया। विचार मंच का विशाल पंडाल एक ओर हर की पौड़ी तथा दूसरी ओर गंगा की पावन धारा के बीच बनाया। उद्घाटन उद्बोधन में मनीषी श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं कई चिंतक-विचारक उपस्थित थे। मुनि जी ने परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लगाए गए ज्ञानबीज का विस्तार देख अपनी हर्षाभिव्यक्ति प्रस्तुत की। कहा कि एक संत कैसे हजारों चलते-फिरते तीर्थ बना देता है, उसका नमूना है यह गायत्री परिवार। अगले दिन 8 नवंबर से 10 नवंबर सायं तक प्रातः 10 से 12 एवं अपराह्न 2 से 4 व कभी-कभी दिनभर यह विचारमंच सक्रिय रहा एवं विशिष्ट विभूतियाँ उसमें आती रहीं, अपने विचारों से खचाखच भरे विशाल सभागार को लाभान्वित करती रहीं।

विचारमंच पर वर्तमान संदर्भ में सामाजिक क्राँति के सशक्त आधार, आपदारहित विकास के आदर्श प्रारूप, शिक्षा एवं स्वावलंबन आँदोलन, नारी जागरण आँदोलन एवं सप्तसूत्री कार्यक्रम एवं समाज का पुनर्निर्माण जैसे विषयों पर विभिन्न वक्ताओं के उद्बोधन हुए। विशिष्ट वक्ताओं में डॉ. धर्मपाल (कुलपति गुरुकुल काँगड़ी), श्री जगदीशचंद्र पंत (पूर्व कृषि एवं स्वास्थ्य सचिव, ऋचा प्रमुख) श्री राजनाथ सिंह (मुख्यमंत्री उ.प्र.),श्री मुरली मनोहर जोशी (मानव संसाधन विकास मंत्री भारत सरकार), उ.प्र. के मंत्रीगण श्री धनराज यादव, वीरेंद्र सिंह आदि, भारत सरकार के मंत्रीगण रमेश बैस, डा. कंथेरिया, समन्वय परिवार के प्रमुख स्वामी श्री सत्यमित्रानंद जी महाराज, श्री देवेंद्र स्वरूप (चिंतक-विचारक-स्तंभकार), श्री भरत झुनझुनवाला, श्री चंद्रशेखर प्राण, डॉ. वी. कुमार आदि थे। इ समंच के संचालन में श्री वीरेश्वर जी उपाध्याय के साथ श्री कर्मयोगी जी, डॉ. एस.पी. मिश्र, श्री ए.एस. अवस्थी (रजिस्ट्रार, इंद्रप्रस्थ वि.वि.) आदि की विशिष्ट भूमिका रही। समय-समय पर विशिष्ट अतिथियों के साथ डॉ. प्रणव पण्ड्या भी पहुँचे व अपने विचार व्यक्त किए।

ज्ञानमंच पर प्रतिदिन सायं 5.30 से 8.30 तक 7,8,9,10 तारीखों में उद्बोधक मार्गदर्शन दिए गए एवं दीपयज्ञ का क्रम चलता रहा। यहाँ से डॉ. प्रणव पण्ड्या, श्रीमती शैलबाला पण्ड्या, गायत्री तपोभूमि के प्रमुख पंडित श्री लीलापत जी शर्मा एवं श्री वीरेश्वर उपाध्याय के ओजस्वी उद्बोधन प्रसारित हुए। सभी के उद्बोधनों की धुरी एक ही थी, घर-घर में गायत्री यज्ञ पहुँचे, महाकाल के विराट् रूप को सभी पहचानें, युग-परिवर्तन की पदचाप सुनें तथा सप्त आँदोलनों हेतु अपने संकल्प सक्रियता में बदलें। ज्ञानमंच की विशेषता जहाँ नौ नवंबर की संध्या पंडित लीलापत जी का ओजस्वी प्रायः डेढ़ घंटे चला उद्बोधन रहा, वहाँ आठ नवंबर की संध्या महामहिम पं. विष्णुकाँत शास्त्री (राज्यपाल उ.प्र.) का सारगर्भित प्रेरक व्याख्यान रहा। प्रतिदिन दीपयज्ञ भाइयों व ब्रह्मवादिनी बहनों की समन्वित टोलियों ने कराया। गंगा किनारे बने ज्ञानमंच पर प्रकाशित दीपकों, सुँदर क्यारियों में सजाए प्रज्वलित दीपों ने प्रतिदिन दीपोत्सव का सा दृश्य प्रस्तुत किया। प्रेरक युगगायन ने वातावरण को दिव्य बना दिया।

सृजन संकल्प सहित आहुतियाँ यज्ञशाला में

यज्ञाहुतियों का क्रम नियमित चला। हर पारी में पूर्णाहुति कराई गई। एक बार में प्रायः पच्चीस हजार से अधिक याजक यज्ञ संपन्न करते रहे। पुरुषमेध प्रयोग के अंतर्गत सविता देवता के निमित्त विशेष आहुतियाँ व्यष्टि पुरुष, राष्ट्र पुरुष तथा विराट् पुरुष हेतु भी दी गईं। सौत्रामणी के अंतर्गत त्रिदेवों के लिए आहुतियाँ तथा मौन ताँत्रिक आहुतियों के समय वातावरण ही विलक्षण होता था। एक पारी यज्ञ संसद के भाइयों द्वारा तथा दूसरी पारी ब्रह्मवादिनी बहनों द्वारा कराई जाती रही। यह क्रम चारों दिन चला। प्रायः तीस लाख से अधिक परिजन आहुतियाँ देकर जाते रहे। यूप बंधन में बँधे पुरुषमेध प्रव्रज्या संकल्प वाले परिजनों का दृश्य देख सभी गदगद थे। यज्ञमंच के साथ ही संस्कार मंच पर भी विभिन्न संस्कार संपन्न होते रहे। प्रतिदिन मंत्रदीक्षा भी दोनों स्थान पर दी गई।

समापन पर कुछ विशिष्ट

इतना बड़ा आयोजन जिस दैवी चेतना ने सँभाल रखा था, उसकी कण-कण में उपस्थिति सभी ने अनुभव की।

देव विसर्जन (11 नवंबर कार्तिक पूर्णिमा) वाले दिन वातावरण भाव संवेदना से ओत−प्रोत था। सभी देवताओं को विदाई दी गई।

दूर-दूर से आए प्रवासी भारतीय एवं कोने-कोने से आए परिजनों ने कुछ विशिष्ट एकात्मा का भाव अनुभव किया। सभी के शारीरिक कष्ट मानो इन दिनों मिट गए।

समापन के तुरंत बाद पंद्रह दिन तक पूरे क्षेत्र की सफाई का क्रम श्री गौरीशंकर जी के मार्गदर्शन में चला। सामूहिक श्रमदान का विलक्षण दृश्य था यह।

8 दिसंबर को आभार ज्ञापन समारोह में आए सभी अधिकारीगण, पत्रकार बंधु, होटल-धर्मशाला संघों के प्रमुख व स्थानीय गणमान्य नागरिकगण हमारा आभार स्वीकार करने के स्थान पर उलटे शाँतिकुँज को इस महायज्ञ हेतु भावभरा धन्यवाद देकर गए।


अपनों से अपनी बात-2 - अंतिम चरण सामने है, अब क्या करना है?

इस युग वसंत को गरिमामय ढंग से संपन्न करें

एक विराट् धर्मानुष्ठान की महापूर्णाहुति के चौथे चरण में सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ संपन्न हुआ। इस दौरान 7 से 11 नवंबर 2000 की अवधि में चले इस प्रयोग में प्रतिदिन आहुतियाँ उन सृजन संकल्पों के साथ दी गईं, जिनके लिए पूरे वर्षभर वातावरण बनाया गया था। असंख्यों व्यक्तियों ने यूप में बँधकर युग-प्रव्रज्या हेतु स्वयं को संकल्पित किया। न्यूनतम समयदान से लेकर संपूर्ण जीवनदान तक के संकल्प, सातों आँदोलनों को गति देने एवं देवसंस्कृति के विश्वविद्यालय स्तर की अनुपम स्थापना के निमित्त लिए गए हैं। साधनदान के संकल्प में अंशदान की बढ़ोत्तरी से लेकर इस भागीरथी प्रयास में, ज्ञानयज्ञ की प्रक्रिया को विस्तार देने तथा विश्वविद्यालय निर्माण हेतु साधन एकत्र करने के भी ढेरों संकल्प आए हैं। साधना में भागीदारी के संकल्प में ढेरों व्यक्तियों ने अपनी जीवन-साधना को और अधिक प्रखर करने, स्वयं को युगनायक के स्तर पर निखारने, अपनी साधना में उच्चस्तरीय सोपानों से जुड़ने के संकल्प लिए हैं। सब मिलाकर महापूर्णाहुति वर्ष उपलब्धियों से भरा रहा है।

यह युग वसंत है

अब 29 जनवरी 2001 के रूप में अंतिम चरण सामने है। यह युग वसंत युग है, जिसे इक्कीसवीं सदी रूपी अरुणोदय की अगवानी करने वाला कह सकते हैं। वसंत पंचमी परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस है। गायत्री परिवार, युग निर्माण मिशन इसी दिन अपना वार्षिकोत्सव मनाता है। शीत की ठिठुरन-कंपन में वासंती उल्लास एक नूतन प्रेरणा का संचार करता है, किंतु यह युग वसंत तो और भी विशिष्ट है। यह युगचेतना के अभ्युदय की हीरक जयंती (पिचहत्तरवें वर्ष) की वेला में आया है। पाठकों-परिजनों को ज्ञात होगा कि आज से 75 वर्ष पूर्व 1926 में वह ऐतिहासिक वसंत आया था, जब परमपूज्य गुरुदेव ने अपने दीपक की ज्योति में अपने गुरुदेव (सूक्ष्मशरीरधारी दादागुरु) के प्रथम दर्शन किए थे। उनका शक्तिपात पाया था। वही दीपक जो 18 जनवरी वसंत पर्व के दिन जला था, उसी अखण्ड अग्नि के रूप में अपनी पिचहत्तर वर्ष की यात्रा पूरी कर ढेरों उपलब्धियों के साथ अब 29 जनवरी 2001 की वसंत वेला में आ पहुँचा है। यही हमारे मिशन के जन्म से अब तक का गौरवमय इतिहास है, जो इक्कीसवीं सदी की सुदृढ़ नींव बनाने जा रहा है।

युगचेतना के अभ्युदय की हीरक जयंती

दो विशिष्ट सुयोग और इस 2001 वें वर्ष के साथ जुड़े हैं। एक अखण्ड दीपक के साथ-साथ शक्तिस्वरूपा स्नेहसलिला परमवंदनीया माताजी की जीवनयात्रा के 75 वर्ष भी पूरे होना। 1926 में ही आश्विन कृष्ण चतुर्थी की पावन वेला में आगरा नगर में श्री जसवंत बोहरे जी के परिवार में माता भगवती देवी ने जन्म लिया था। दूसरा सुयोग है श्री अरविंद (पाँडिचेरी) ने इसी वर्ष भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित किया था, आज से 75 वर्ष पूर्व। अवतारों के लीला-संदोह को न समझ पाने वाले इन सुयोगों को मात्र संयोग कह देते हैं, पर यह एक विलक्षण एवं स्थापित तथ्य है कि यह युगचेतना के धरती पर अभ्युदय का हीरक जयंती वर्ष है एवं अब सतयुगी उल्लास के धरती पर प्रकट होने की प्रक्रिया को कोई भी न रोक सकेगा। गायत्री परिवार की ज्ञान मशाल इसी दिव्य ज्योति की प्रतीक है।

संगठनात्मक अनोखा एवं न्यूनतम कार्यक्रम

इस वर्ष जनवरी माह के प्रथम सप्ताह से ही एक विशिष्ट संपर्क-परामर्श शिक्षण की प्रक्रिया भारत के चुने हुए शक्तिपीठों में शाँतिकुँज के प्राणवान् कार्यकर्त्ताओं द्वारा आरंभ कर दी गई है। यह अंक पहुँचने तक विभिन्न शक्तिपीठों में टोलियाँ पहुँच चुकी होंगी एवं छह चक्रों में वे एक से डेढ़ दिवस के कार्यक्रमों में गहन संपर्क एवं सातों आँदोलनों की कार्य-योजना पर विचार-विमर्श कर रही होंगी। इनका वसंत पूर्व समापन होने तक फरवरी माह से आरंभ होने वाले प्रतिभा-परिष्कार सत्रों के लिए क्षेत्र की विभूतियों का सुनियोजन भी हो चुका होगा। किन-किन ने किन आँदोलनों को हाथ में लिया है एवं कैसे वे उस केंद्रीय शक्तिपीठ को संगठन की धुरी बनाकर अपने-अपने क्षेत्र में क्रियान्वित करेंगे, यह सब प्रशिक्षण पूरे जनवरी माह क्षेत्रों में चलेगा। न्यूनतम तीन कार्यक्रम तो हर परिजन, समयदानी, संगठन स्तर के युगनायक, प्रज्ञामंडलों, प्रज्ञापीठों से जुड़े परिजनों, अखण्ड ज्योति पाठकों-परिजनों के लिए दिए जा रहे हैं। ये हैं (1) जीवन-साधना को और अधिक प्रखर बनाना (2) नारी जाग्रति आँदोलन द्वारा परिवार निर्माण की प्रक्रिया को गतिशील बनाना (3) ग्रामतीर्थ योजना द्वारा समाज निर्माण में भागीदारी करना। सभी जानते हैं कि ग्रामतीर्थ से अर्थ है व्यसन मुक्त, स्वच्छ, संस्कारी, स्वस्थ, शिक्षित, सहकारी, स्वावलंबी ग्राम। सातों आँदोलनों में से जो-जो परिजन जो भी कुछ अतिरिक्त कर रहे हैं, वे करते रहें, पर साथ ही ये तीनों अनिवार्य क्रम में जोड़ लें। ध्यान रखें कि बिना साधनात्मक-आध्यात्मिक आधार के कोई भी सामाजिक, बौद्धिक आँदोलन सफल नहीं होता। आस्तिकता विस्तार एवं जीवन-साधना का दैनंदिन प्रखरतम अभ्यास ही वह धुरी है, जिस पर संगठन, क्राँति या आँदोलन की सफलता निर्भर है।

शाँतिकुँज से आ रही टोलियों के साथ परिजन, यदि अभी तक अपने क्षेत्र के संगठन की रूपरेखा, आँदोलनों को चलाने की रणनीति आदि विस्तृत विवरण न भेज पाए हों तो भेज दें। सभी आँकड़े यहाँ कंप्यूटर में डालकर पूरे राष्ट्र व विश्व के संगठन का एक समग्र ढाँचा खड़ा किया जा रहा है। अपने-अपने क्षेत्र की विभूतियों के नियोजन हेतु क्या योजना बनी, नहीं बनी, तो क्या व कैसे बनाने जा रहे हैं, यह भी विस्तार से सभी लिखकर भेज दें।

वसंत पर्व इस तरह मने

इस वर्ष की वसंत पंचमी इक्कीसवीं सदी की अगवानी ने निमित्त ठीक वैसे ही संपन्न होगी जैसी कि विगत वर्ष 10 फरवरी 2000 को सबके लिए निर्मल मन-सभ्य समाज के विकास की सद्भाव भरी प्रार्थना के रूप में संपन्न हुई थी। साथ ही विद्यावरण के संकल्प भी इसी के साथ विभिन्न प्रज्ञा संस्थानों, अन्याय संगठनों द्वारा इसी दिन लिए गए थे। प्रस्तुत वसंत जो 29 फरवरी 2001 सोमवार के दिन आ रहा है, राष्ट्र और विश्व की सभी इकाइयों द्वारा उसी भाव के साथ सभी संप्रदाय-वर्गों के लोगों के साथ मिलकर एक साथ संपन्न होगा। इक्कीसवीं सदी जो उज्ज्वल भविष्य लेकर आ रही है, की आरती इस तरह मात्र जलते दीपों द्वारा नहीं, अपने क्षेत्र के ज्योतित संकल्पों के साथ संपन्न होगी।

वसंत की पूर्व संध्या पर प्रत्येक इकाई अपनी सुविधानुसार अखण्ड जप का 12 या 14 घंटे का कार्यक्रम चलाएगी। न्यूनतम आधा घंटा तो सभी इस प्रक्रिया में बैठें ही। पर्व दिन प्रातः 6 से 8 तक सामूहिक जप के साथ ध्यान-धारणा का साधना प्रयोग चलेगा। यह विगत वर्ष भेजे गए ऑडियो कैसेट्स द्वारा संपन्न होगा। पूर्वाह्न 8 से 11.30 तक पर्वपूजन, पूज्य गुरुदेव का जन्म दिवस-गुरु पूजन, सरस्वती पूजन, यज्ञ आदि का क्रम, साथ ही विद्यालयों में सरस्वती पूजन के साथ विद्यावरण के संकल्प संपन्न हों। शाम 7 8.30 तक सायंकालीन कार्यक्रम सामूहिक प्रार्थना प्रयोग के रूप में सभी स्थानों पर मनाए जाएँ, किंतु इससे पूर्व शाम 5 से 6.30 की अवधि में एक प्रचार आमंत्रण यात्रा सभी स्थानों पर निकाली जाए। यह आयोजन भव्य-खर्चीला भले न हो, प्रभावी अवश्य हो। इस क्षेत्र के आम लोगों को कार्यक्रम की जानकारी देना, प्रेरणा देकर आमंत्रण देना इसका मुख्य उद्देश्य होगा। बैनर्स, प्रचार पट्टियों, प्रेरक नारों, कीर्तन व झाँकियों के साथ प्रेरणा का प्रसार हो। आगे मंगल कलश लेकर कुछ देवियाँ चलें। इस यात्रा के पहुँचते ही युग संगीत एवं शाम के कार्यक्रम की व्यवस्था का क्रम चल पड़े।

सायंकालीन कार्यक्रम

इसमें सभी संगठनों को आमंत्रित किया जाए। यदि वे अपने स्तर पर करना चाहें, तो सभी से प्रार्थना की जाए कि इस पावन दिन एक साथ एक समय पर न्यूनतम 7.30 से 8 की अवधि में सभी ‘सबके लिए सद्बुद्धि सबके लिए उज्ज्वल भविष्य’ की प्रार्थना करें। विभिन्न संगठन, संप्रदाय अपनी-अपनी उपासना पद्धति से यह क्रम संपन्न कर सकते हैं। जो पारिवारिक-व्यक्तिगत स्तर पर करना चाहते हैं, वे भी न्यूनतम इस आधे घंटे की अवधि को दीप प्रज्वलित कर जप-प्रार्थना द्वारा संपन्न करें, यह प्रेरणा दी जाए। इक्कीसवीं सदी की अगवानी की यह आरती हर दरवाजे पर, हर उपासना गृह में न्यूनतम पाँच दीपों द्वारा अवश्य उतारी जाए।

जहाँ सामूहिक कार्यक्रम गायत्री परिवार की संगठित इकाई, प्रज्ञा संस्थानों, शक्तिपीठों द्वारा संपन्न हो रहे हैं, वहाँ क्रम कुछ इस तरह रहे- शाम 7 से 7.30 आयोजन के महत्त्व, महापूर्णाहुति की अब तक की उपलब्धियों व गुरुसत्ता के जीवन-दर्शन पर उद्बोधन। 7.30 से 8 देव आह्वान, दीप प्रज्वलन, सामूहिक सस्वर मंत्रोच्चारण, मौन प्रार्थना (जप-ध्यान)। 8 से 8.30 महापूर्णाहुति के इस पाँचवे चरण का अनुयाज-युगचेतना के अभ्युदय की हीरक जयंती की रूपरेखा, सातों आँदोलनों का स्वरूप, क्रिया-योजना पर उद्बोधन। 7.30 से 8 जब जप-ध्यान-मौन प्रार्थना का स्वरूप चले, तब सभी के मन में भाव कुछ इस प्रकार रहें, “हे प्रभु! हमारे मन निर्मल बनें। मन की निर्मलता हमें सद्भाव भरे सहकार की ओर ले जाए, जिससे हमारे संगठन में युगशक्ति का प्रखर प्राणवान् स्वरूप उभरकर आए। हम नवसृजन के इस महायज्ञ में भागीदारी कर सकें।”

विद्यालयों में विद्यावरण संकल्प

माँ सरस्वती के अवतरण के इस पावन दिन गायत्री मिशन से जुड़े-प्रभावित सभी विद्यालयों में विद्यावरण संकल्प का क्रम चले। भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के क्रम में विगत दिनों लाखों भाई-बहन, छात्र-छात्राएँ सक्रिय हुए हैं। संक्षिप्त गीत, संक्षिप्त पूजन, शिक्षा-विद्या के अंतर को समझाते हुए इस दिन की महत्ता संबंधी उद्बोधन एवं अंत में विद्यावरण संकल्प यह क्रम चले। संकल्प के पुष्प बच्चों से एकत्र कराके माँ सरस्वती की प्रतिमा पर समर्पित हों। संकल्प का भाव इस प्रकार हो, “महाविद्या के अवतरण के इस पावन पर्व पर विद्या के विनम्र साधक के रूप में हम संकल्प लेते हैं कि लौकिक जीवन को सँवारने वाली शिक्षा के साथ, जीवन को पूर्णता तक पहुँचाने वाली विद्या को हम जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग मानकर अपनाएँगे। इसका स्वयं नियमित अभ्यास करेंगे।” इसी के साथ संस्कृति मंडलों की स्थापना संबंधी संकल्प भी लिए जा सकते हैं। इस तरह प्रस्तुत वसंत पंचमी का पावन पर्व पूरे भारतवर्ष में नई सहस्राब्दी के स्वागत आरती उतारने के क्रम में परिपूर्ण उल्लास के साथ मनाया जाए।