मानव मौलिक रूप से स्वतंत्र है। प्रकृति ने तो उसे मात्र संभावनाएँ दी हैं। उसका स्वरूप निर्णित नहीं है। वह स्वयं का स्वयं ही सृजन करता है। उसकी श्रेष्ठता अथवा निकृष्टता स्वयं उसी के हाथों में है। मानव की यह मौलिक स्वतंत्रता गरिमामय एवं महिमापूर्ण है, किंतु वह चाहे तो इस दुर्भाग्य भी बना सकता है और दुःख की बात यही है कि ज्यादातर लोगों के लिए यह मौलिक स्वतंत्रता दुर्भाग्य ही सिद्ध होती है। क्योंकि सृजन की क्षमता में विनाश की क्षमता और स्वतंत्रता भी तो छिपी है। ज्यादातर लोग इसी दूसरे विकल्प का ही उपयोग कर बैठते हैं।
निर्मान से विनाश हमेशा ही आसान होता है। भला स्वयं को मिटाने से आसान और क्या हो सकता है? स्व-विनाश के लिए आत्मसृजन में न लगना ही काफी है। उसके लिए अलग से और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। जो जीवन में ऊपर की ओर नहीं उठ रहा है, वह अनजाने और अनचाहे ही पीछे और नीचे गिरता चला जाता है।
एक बार ऐसी ही चर्चा महर्षि रमण की सत्संग सभा में चली थी। इस सत्संग सभा में कुछ लोग कह रहे थे कि मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है, किंतु कुछ का विचार था कि मनुष्य तो पशुओं से भी गया-गुजरा है। क्योंकि पशुओं का भी संयम एवं बर्ताव कई बार मनुष्य से अनेकों गुना श्रेष्ठ होता है। सत्संग सभा में महर्षि स्वयं भी उपस्थित थे। दोनों पक्ष वालों ने उनसे अपना निर्णायक मत देने को कहा। महर्षि कहने लगे, “देखो, सच यही है कि मनुष्य मृण्मय और चिन्मय का जोड़ है। जो देह का और उसकी वासनाओं का अनुकरण करता है, वह नीचे-से-नीचे अँधेरों में उतरता जाता है और जो चिन्मय के अनुसंधान में रत होता है, वह अंततः सच्चिदानंद को पाता और स्वयं भी वही हो जाता है।” ठीक ही तो है। प्रज्ञा पुराण भी तो यही कहता है।
गीता में गायत्री का रोचक वर्णन मिलता है। गायत्री के भूः भुवः स्वः तीन स्वरूपों की अभिव्यक्ति बड़े ही सहज रूप में की गई है। गीता के प्रथम अध्याय में विषाद योग की विवेचना हुई है। इस विषाद का कारण मोह है। मानव स्वभाव में मोह का होना ही भूः स्थिति है, जो उसे पृथ्वी तत्त्व यानि कि पार्थिवता से कसे-जकड़े हैं। भगवान् कृष्ण ने इससे मुक्ति का मार्ग भुवः और स्वः में बताया है। इस परिप्रेक्ष्य में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को गायत्री का भुवः रूप धारण करने के लिए प्रेरित करते हैं। तत्पश्चात् उन्हें रूप में प्रवेश कराते हैं।
स्वः ब्राह्मी स्थिति है। स्वः का विस्तार समस्त प्राणियों एवं जीवों में ‘स्वः’ के रूप में है। आत्मा के अनंत विस्तार में परमात्मा का दिव्य सौंदर्य झलकता है। इस सृष्टि में वस्तु−तत्त्व अनात्म तत्त्व के रूप में जगत् के सभी पिंडों में व्याप्त हुआ है। जीव माँ के गर्भ में बंदी बनकर रहता है। जन्म के पश्चात् उसे स्वतंत्रता तो मिलती है, परंतु वह स्व के निर्बाध शासन में नहीं आ पता। वह अपने प्रारब्ध कर्मों के कारण सुख-दुःख का अनुभव करता है। मर्त्यलोक में जीव अपने कर्म बंधन को लेकर आता है और कठपुतली की तरह अपने दायरे में नाचता रहता है। इस दायरे को तोड़ना अर्थात् सुख-दुःख, पाप-पुण्य के संसार चक्र से बाहर निकलना ही मुक्ति या निर्वाण कहलाता है। प्रखर एवं कठोर साधना ही इस हेतु एकमात्र उपाय है। भोग वृत्तियों पर विजय प्राप्त कर एवं अंतःकरण को पवित्र एवं निर्मल बनाकर ही प्रकृति से विजय प्राप्त की जा सकती है।
गीता के प्रथम एवं द्वितीय अध्याय में भूः भुवः स्वः तीनों स्थितियों को समझाते हुए उन्हें प्राप्त करने का मार्ग सुझाया गया है। तीसरे अध्याय में इसकी साधना का उपाय कर्मयोग के रूप में वर्णित है। निष्काम कर्म ही स्व की सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। कर्मयोग का समस्त मर्म निष्काम कर्म पर ही निर्भर करता है। आसक्ति एवं फलरहित कर्म शरीर की तपस्या है। शरीर जब भगवत् आराधना करेगा, तो उसे निष्काम कर्म का पथ अनुसरण करना पड़ेगा। शरीर कर्म का आधार है। यही कर्म का साधन है। स्व की सिद्धि नैष्कर्म्य अवस्था लाने से प्राप्त होती है। कर्म त्याग इसका उपाय नहीं है वरन् कर्मफल की इच्छा के बिना कर्त्तव्य कर्म करने से वह प्राप्त होता है।
इंद्रिय सुख साँसारिक सुख है। इसे त्यागे बिना भूः से भुवः स्तर तक पहुँचना संभव नहीं है। यह कहा जा सकता है कि समस्त साँसारिक सुखोपभोग को त्याग कर भूः से भुवः स्तर तक पहुँचा जा सकता है। स्वः अवस्था की प्राप्ति हेतु भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, कर्मयोगी से कर्म स्वतः निसृत होता है। कर्मयोगी के लिए कर्म जीवन की सहज क्रिया के समान हो जाता है। जैसे पलकों का झपकना, श्वास का चलना आदि। कर्म के पीछे कर्त्तापन का होना अज्ञानता का द्योतक है। यही कर्त्तापन का अभाव ज्ञानातीत अवस्था की ओर संकेत करता है। कर्मयोगी दुःखी को देखकर द्रवित हो उठता है। द्वेषी के लिए उसमें स्वतः ही प्रेम उमड़ने लगता है। भूखे व्यक्ति को देखकर भोजन देने के लिए उसके हाथ अपने आप बढ़ ही जाते हैं। इस कार्य के लिए उसे कुछ सोचने की आवश्यकता नहीं होती ।
कर्मयोगी स्वः में लीन रहता है। लोक कल्याण हेतु वह नदी के समान सदा प्रवहमान् रहता है। वह अनासक्त रहकर कर्त्तव्य कर्म करता है। इसी कर्म में उसे आनंद मिलता है। दुनिया से वह कुछ भी इच्छा नहीं करता है। वह त्रिलोकी के समस्त वैभव को तिनके की तरह फेंक देता है। उसे नाम, यश, मान, प्रतिष्ठा आदि किसी भी चीज की इच्छा नहीं होती। वह भगवत् अर्पित कर्म करता है। न उसे पुण्य की इच्छा होती है और न पाप की । वह पाप और पुण्य दोनों से मुक्त रहता है। यही अवस्था सच्चे कर्मयोगी की द्योतक है। यही नैष्कर्म्य अवस्था कहलाती है। इस तरह स्व की साधना कर्मयोगी की साधना है।
गायत्री का द्वितीय चरण ‘तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि’ का है। इस चरण में गायत्री विराट् कल्पवृक्ष का रूप धारण करती है। इसकी छाया में समस्त लोक विराजमान है।
‘तत्’ शब्द का अर्थ ‘वह’ है। ‘वह’ उस अनंत-अखण्डरूपी परमात्मा की ओर इंगित करता है। वह परमात्मा समस्त लोकों से परे है। तत् शब्द से दूसरे अन्य लोकों की उड़ान आरंभ हो जाती है। भू-लोक से मृत्युरूपी रहस्य को भेदकर जन्म और मोक्ष को समझने वाला ही तत् शब्द से तादात्म्य कर सकता है। परम सत्य सभी लोकों से परे है। अतः सभी लोकों से उस पार ही सत्य का साक्षात्कार किया जा सकता है। कुरान में परमात्मा को सातवें आसमान पर स्थित माना गया है। वैदिक ज्ञान के अनुसार भी सात लोक हैं। ये हैं-भूः भुवः स्वः महः जनः तपः एवं सत्य लोक। परम सत्य का बोध इन सातों लोकों के ऊपर ही हो सकता है।
भूः लोक हमारी आवास स्थली है। यहाँ पर हम जीवनोपयोगी साधन पाते हैं। भुवः लोक भावनाओं का जगत् है। जहाँ पर मन अपनी अन्य कामनाएँ पूर्ण करना चाहता है। इस लोक में कला, विद्या, संगीत की प्राप्ति होती है। प्रत्येक कामना के पीछे सुखप्राप्ति का उद्देश्य निहित होता है। भुवः लोक ऊपर स्वः लोक आता है। जिसमें सुख का वास है। वहीं स्वर्ग लोक है। जो सुख की पराकाष्ठा है। तन भूलोक का, अचेतन मन भुवः का और सचेतन मन स्वः लोक की रचनाएँ हैं।
महः ज्ञान का लोक है। इस लोक में बुद्धि की उत्पत्ति होती है। वहाँ पर सुख की समस्त आकाँक्षाएँ एवं इच्छा को परित्याग करके प्रवेश किया जा सकता है। इस लोक में ज्ञान के आनंद का साम्राज्य है। उसे प्रज्ञा लोक भी कहते हैं। जनः सृजनात्मक लोक है। इस लोक में मनुष्य प्रकृति पर अधिकार कर लेता है। इससे समस्त प्रकार के चमत्कार आसान एवं सहज हो जाते हैं योगी प्रकृति से अपनी इच्छित वस्तु को प्राप्त कर सकता है।
तपस्वियों का लोक तपः लोक कहलाता है। तप करके मनुष्य विदेह हो जाता है। तप द्वारा देह के कष्टों एवं कठिनाइयों से मुक्ति पाई जा सकती है। तपस्वी शरीरगत कष्टों से ऊपर उठ जाता है। प्रभु ईसा ने इस लोक की साधना कर ली तो विदेह हो गए। क्रूसारोहण के समय में भी वे मुसकराते रहे। माँडव्य ऋषि भी शूली पर चढ़ाए गए, परंतु वे तनिक भी नहीं घबराए। तपस्या के बाद ही यह स्थिति प्राप्त होती है। तप द्वार अंतःकरण निर्मल एवं पवित्र हो जाता है। तपस्वी का मन एवं हृदय प्रखर होता है। पूर्ण तपस्वी सत्य लोक का आरोहण करता है। इस लोक में पहुँचकर उपासना करने पर परम सत्य का भान होता है। परम सत्य ही कुरान का खुदा है।
ये सातों लोक और उनके आकार सभी मनुष्य के अंदर समाहित हैं। उन्हें जाग्रत् कर ही बाह्य जगत् में इनका विस्तार किया जा सकता है। तत्त्वद्रष्टा की दृष्टि स्थूल से सूक्ष्म एवं सूक्ष्मतम होकर सत्य, परम सत्य तक पहुँचती है। प्रत्येक लोक दूसरे सूक्ष्म लोक में समाहित होता है। कारण कार्य से अधिक सूक्ष्म होता है और कार्य के हर अंश में विद्यमान रहता है। प्रत्येक ऊपर का कारण लोक अपने उच्च लोक में प्रविष्ट होकर व्याप्त है। अतः परम सत्य सर्वव्यापक सूक्ष्म शक्ति है। इसे ही परम ब्रह्म कहा गया है। जगद्गुरु शंकराचार्य ने ‘एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति’ कहा है। भगवान् बुद्ध ने इसे शून्य अवस्था के रूप में निरूपित किया है। इसी को प्रभु यीशु ने अपने शब्दों में इस तरह रूपायित किया है, “मैं अपने पिता की तरह हूँ।” महर्षि दयानंद ने उसे परमात्मा के रूप में स्वीकार किया और उसे संपूर्ण जगत् का कारण और आधार बताया है। गायत्री का सवितुः रूप यही है, जो समस्त लोकों को धारण करने वाली शक्ति है।
वरेण्यं, जो वरण करने योग्य अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है। परमात्मा गायत्री के भूः भुवः स्वः के रूप में और फिर तत्सवितुः रूप में जन्मदात्री, पालनकर्ती, सुख देने वाली, अलौकिक, सभी लोकों को धारण करने वाली शक्ति है। अतः वह अद्वितीय, अनुकरणीय, सर्वश्रेष्ठ और वरेण्य है।
अलौकिक, सभी लोकों को धारण करने वाली शक्ति है। अतः वह अद्वितीय, अनुकरणीय, सर्वश्रेष्ठ और वरेण्य है।
भर्ग अर्थात् शुद्ध स्वरूप और पवित्र करने वाला चैतन्य ब्रह्मस्वरूप। वह निष्काम है। कामना से वह अपवित्र नहीं हो सकता। कामना से क्रोध का जन्म होता है। निष्काम कर्म में कामना की अपवित्रता एवं क्रोध की कालिमा नहीं होती। वह अनंत शक्ति है। लोभ उसे स्पर्श नहीं कर सकता। समस्त प्राणियों के प्रति समान रूप से करुणामयी है। अतः वह मोहरहित है। सर्वव्यापक होने के कारण वह निरहंकारी है। उसका निराकार स्वरूप मत्सर को दूर करता है। इस प्रकार वह काम, क्रोध, मोह, मद, मत्सर से रहित है। अतः वह शुद्ध स्वरूप है।
देवस्य “यो दीव्यति दिव्यते वा स देवः” जो सभी सुखों को देने वाली स्वयं प्रकाशित आनंदस्वरूप तथा ज्ञानस्वरूप है वही देवस्य रूप है। “यो दीव्यति क्रीउति स देवः” जो अपने स्वरूप में ही आनंद मग्न रहे तथा अपने सहज स्वभाव से सभी जगत् की निर्मार्ती शक्ति है वह देव है। “विजिगीषते स देवः” जो सबको जीतने वाला है वह देव है। “व्यवहारयति स देवः” जो न्याय और अन्याय रूप व्यवहारों को जानने वाला उपदेष्टा है वह देव है। “यश्चराचरम् जगत् द्योतयति” जो समस्त चर-अचर जगत् का प्रकाशक है वह देव है।
“यः स्वापयति स देवः”
जो प्रलय में अभिव्यक्त सभी जीवों को एक साथ सुलाता है वह देव है। “यः कामयते काम्यने वा देव” जिसके सब सत्य काम और जिसकी प्राप्ति की कामना करते हैं वह देव है। “यो गच्छति गम्यते वा स देवः” जो सभी में व्याप्त और जानने के योग्य है, वह देव है।
धीमहि अर्थात् धारण करना। गायत्री महाशक्ति के स्वरूप को तत्त्वदृष्टि से जाना जा सकता है और वह तत्त्वदृष्टि की प्राप्ति उसके गुणों के सतत अभ्यास से ही संभव है। अतः गायत्री के गुणों को धारण किए बिना उसके जगत् जननी स्वरूप को जान पाना दुष्कर कार्य है।
गायत्री के तीसरे चरण में मंत्रद्रष्टा ऋषि उस प्रयोज्य को स्पष्ट करते हैं कि परमात्मा के उपर्युक्त प्रथम एवं द्वितीय चरण में वर्णित गुणों को धारण करें, ताकि वह परमात्मा हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रेरित करें। वह हमारी बुद्धि को अपनी ओर आकर्षित करे। यह एकमेव पथ है। अज्ञान, अभाव और अशक्ति से मुक्ति पाने का यही एक उपाय है।
गीता में गायत्री साधना का भी उल्लेख मिलता है। विषाद अथवा दुःख ही मानव मन को भुवः अवस्था में अर्थात् दुःख-निवारण के लिए गहरी भाव अवस्था में प्रवेश कराता है। वस्तुतः दुःख ही सच्चा सहायक एवं सहयोगी है। यही चिरस्थायी साथी हे। सुख तो बिजली की चमक के समान आता है और चला जाता है। दुःख ‘स्व’ आनंद की अवस्था में पहुँचा देता है।
परम पिता परमात्मा भूः स्वरूप में जन्मदाता है। इस तरह हम सदा व्यवहार में इस स्वरूप का अनुभव करते रहें। हमारा व्यवहार हर परिस्थिति में प्रेमपूर्ण रहे। प्रेम मुक्ति का कारण है, जबकि मोह बंधन का। भुवः स्वरूप की साधन है प्रेमपूर्ण व्यवहार। स्वः की साधना अपने आनंदस्वरूप में स्वयं स्थित होने की है। यही साधना समाधि तक पहुँचा देती है। इस प्रकार गायत्री के प्रथम चरण की साधना हमें अंतर्मुखी बना देती है। इसके प्रयोग से संसार में व्यवहार सहज एवं आनंदमय हो जाएगा।
‘स्वः’ जब समष्टि बनकर सबको अपने में देखता है, तो त्रिगुणात्मक प्रकृति के प्रीव से मुक्त हो जाता है। अपने अंदर में सवितारूपी उगते सूर्य का ध्यान करना चाहिए। योगी वही है जिसके अंतर में सूर्य सदैव प्रकाशमान् रहे और बाहर निष्काम कर्म का प्रवाह बहता रहे। अतः समस्त चराचर जगत् को जन्म देने वाले परमात्मा का उसके सविता रूप में ध्यान करते हुए सदा ही निष्काम कर्म में रित रहना चाहिए। इससे सभी कषाय-कल्मष भस्मीभूत हो जाते हैं। यही गायत्री एवं गीता का सार है। इसी साधना से बुद्धि निर्मल होती है एवं भगवान् की ओर प्रेरित होती है।
चट्टान रास्ते में बैठी थी। नदी का प्रवाह रोकर बोली, “बहन! थोड़ी देर सुस्ता लो, यह दुनिया कृतघ्नों से भरी है। तुम्हारी उदार तत्परता की कोई सराहना तक नहीं करेगा।”
नदी ने चट्टान की सद्भावना को सराहा तो, पर रुकी नहीं। बोली, “इस कार्य में जो आत्मसंतोष मिलता है, वही क्या कम है, जो लोगों की कृतज्ञता-कृतघ्नता को देखने का प्रयत्न करूं?”
ठीक ही है, प्रतिदान की अपेक्षा सामान्य जन करते हैं, तत्पुरुषों को केवल अपने लक्ष्य पर बढ़ना आता है। दुःख उठाकर भी सुख देने में उन्हें रस आता है।
टंकारा, गुजरात में जन्मे मूलशंकर अधिक विद्या प्राप्त करने की दृष्टि से घर छोड़कर मथुरा चल दिए। यहाँ स्वामी विरजानंद की पाठशाला में उन्होंने संस्कृत भाषा तथा वेदों का गहन अध्ययन किया।
अन्य विद्यार्थी तो पढ़-लिखकर अपना पेट पालने चल देते हैं, गुरु को एक प्रकार से भूल ही जाते हैं। मूलशंकर उनमें से न थे। उन्होंने विरजानंद से गुरुदक्षिणा के लिए निवेदन किया। गुरु ने उनसे वेद-धर्म का प्रसार करने में, प्रचलित पाखंड के उन्मूलन में जीवन लगा देने की याचना की। सच्चे शिष्य ने तत्काल संन्यास ले लिया और उनका नाम स्वामी दयानंद रखा गया। वे गुरु की इच्छा पूरी करने के लिए देशव्यापी भ्रमण पर निकल पड़े। कुछ समय उन्होंने हिमालय गंगा तट पर तप किया और नया आत्मबल संचित करके अपने काम में जुट गए।
उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नाम का प्रख्यात ग्रंथ लिखा। वेद भाष्य किया और अनवरत प्रव्रज्या में जुटे रहे। उनके प्रयास से एक बड़ा आँदोलन खड़ा हो गया, जिसने हिंदू धर्म के पुरातन स्वरूप से जन-जन को अवगत कराया। आर्य समाज की खदान में से बहुमूल्य मणि-माणिक्य निकले, जिनकी कृतियों को कभी भुलाया न जा सकेगा।
कर्म जब तक साधन बना रहता है तब तक वह बंधन का पर्याय ही है। पर जैसे ही कर्म साधना बन जाता है, उससे मुक्ति प्रवाहित होने लगती है। निष्काम कर्म, कर्म की साधना ही है। इसलिए इसे सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा गया है। इस कर्म से अंतःकरण शुद्ध एवं पवित्र होता है। इसमें प्रसिद्धि, यश, मान-सम्मान की कोई इच्छा नहीं होती । इसमें अपने मनोरथों, इच्छाओं, लालसाओं या अभिरुचियों का कोई आग्रह नहीं होता। यह कर्म अहंकार पुष्टि हेतु नहीं किया जाता। यह केवल भगवान् के लिए और भगवान् की आज्ञा से किया जाता है। अहंकार युक्त कर्म जगत् के लिए चाहे जितना ही अच्छा हो, कर्मयोग के लिए उपयुक्त नहीं है।
गीता के अनुसार, साधना करने के लिए किसी कर्म को उसका क्षेत्र बनाया जा सकता है। जिस भाव और चेतना से कोई कर्म किया जाता है वही उसे उसका स्वरूप प्रदान करता है। कर्म स्वयं में कुछ विशेष नहीं होता। उसमें निहित भाव ही उसे विशेषता प्रदान करता है। भाव विशेष से कामनारहित या मुक्त कर्म भी संभव है। हमारी सत्ता पुरुष प्रकृति गुणों के कर्म के अंदर भी अनासक्त हो सकती है। बाह्य सत्ता भी अनासक्त हो जाती है। संपूर्ण सत्ता कामना या आसक्तिरहित जो जाती है और फिर भी कर्म करना संभव होता है। कामना के बिना कर्म किया जा सकता है। आसक्तिरहित भी कर्म हो सकता है। अहंकार के बिना भी कर्म करना संभव है।
श्री अरविंद कहते हैं, मनुष्य कर्म कर सकता है और आँतरिक रूप से वह शाँत-स्थिर रह सकता है। स्थिरता का अर्थ यह नहीं है कि मन शून्य हो जाए या कोई कार्य ही न किया जाए। वे आगे कहते हैं कि मनुष्य को सदैव अंदर से कार्य करना सीखना चाहिए। अपनी आँतरिक सत्ता से कार्य करना सीखना चाहिए। क्योंकि यह सत्ता भगवद् संपर्क एवं सान्निध्य में रहती है। बाह्य सत्ता महज एक यंत्र होनी चाहिए और उसे बिलकुल भी अपनी वाणी, विचार या क्रिया को विवश या अभिप्रेरित नहीं करने देना चाहिए। कर्म यथार्थ चेतना के अंग के रूप में अंदर ही किया जाना चाहिए। सामान्य चेतना की अस्तव्यस्तता और चंचल मन के द्वारा किया कर्म संभावित परिणाम नहीं देता।
श्री अरविंद कहते हैं कि व्यक्ति एक ही समय में अभीप्सा और कर्म दोनों कर सकता है। ऐसा करने वाले जीवन मुक्त व्यक्ति कोई बंधन अनुभव नहीं करते। सभी काम्य-कर्मों में वह स्वयं को पूर्ण रूप से स्वतंत्र अनुभव करते हैं। क्योंकि कर्म वे स्वयं व्यक्तिगत रूप से नहीं करते। उनमें क्षुद्र अहंकार-बोध नहीं होता। बल्कि कर्म तो उनके द्वारा वैश्व शक्ति करती है। कर्म की सीमाएँ वे ही होती हैं, जिन्हें स्वयं वैश्व शक्ति अपने निजी कर्म में निर्धारित करती है।
जीवन मुक्त पुरुषों का अनुभव है ही कर्म करते हुए भी सचेतन रहा जा सकता है। हालाँकि ध्यानावस्था में सचेतन रहना अपेक्षाकृत सहज है, परंतु कर्म की अवधि में यह कठिन होता है। भगवद् स्मरण होते रहना और कर्म में सचेतन रहना धीमी प्रक्रिया है। श्री अरविंद के अनुसार यह दो रूपों में होती है, (1) यदि कोई व्यक्ति प्रतिक्षण कार्य करते समय भगवद् स्मरण करता रहे और उन्हें कर्म अर्पित करने का अभ्यास करता रहे। इस प्रकार सतत अभ्यास द्वारा यह प्रकृति के लिए स्वाभाविक हो जाता है। (2) ध्यान करने से एक आँतरिक चेतना विकसित होती है और क्रमशः स्थायी होने लगती है। मनुष्य इसे कार्य करने वाली बाहरी चेतना से पृथक एक चेतना अनुभव करता है। प्रारंभ में जब मनुष्य कर्म करता रहता है तब इस पृथक चेतना को अनुभव नहीं करता, परंतु जैसे ही वह कर्म करना बंद कर देता है, वह अनुभव करता है कि वह प्रतिपल वहाँ विद्यमान थी और पीछे से निरीक्षण कर रही थी। कुछ दिन बाद स्वयं कर्म के समय भी इस चेतना को अनुभव करने लगता है। इस अवधि में ऐसा लगता है मानो सत्ता के दो भाग हों, एक तो निरीक्षण करना और पीछे से सहारा देना। भगवद् स्मरण करना एवं उन्हें अर्पित करना। जब ऐसा होता है तब यथार्थ चेतना से कर्म करना अधिकाधिक आसान हो जाता है।
यह महान् साधकों का अनुभव है कि कर्म करते हुए भी भगवान् की उपस्थिति का बोध किया जा सकता है। कर्म तो उस चेतना से एकाकार एवं तदाकार होकर भी निःसृत होता रहता है। वह कर्म करते हुए भी ध्यान की तल्लीनता में डूबा रह सकता है। श्री अरविंद स्वयं भी टहलते हुए ध्यान करते थे।
योगियों का अनुभव है कि कर्म की ओर स्वयं को खोलना चैतन्य में खोलने जैसा है। जो शक्ति ध्यान की अवस्था में चेतना में कार्य करती है और उसकी ओर उद्घाटित होने पर सभी अस्त-व्यस्तता दूर हो जाती है, वही शक्ति कर्म को भी अपने नियंत्रण में ले सकती है। यह न केवल उस कर्म का दोषों से परिचय करा सकती है वरन् भविष्य के लिए मार्गदर्शन भी कर सकती है। यह मार्गदर्शन सदैव साथ रह सकता है। यदि कर्म को भगवद् चेतना की ओर उन्मुख कर दिया जाए, तो इस निर्देश को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया जा सकता है। यहाँ तक कि अपने सभी कर्मों के पीछे भगवद् शक्ति का भी सतत अनुभव किया जा सकता है।
साथ ही कर्मों की चेतना को प्राप्त करने के लिए सतत अभीप्सा बनाए रखने की आवश्यकता है। इसके और भी कई तरीके हैं, (1) अपनी गतिविधियों को इस रूप से देखने की आदत या क्षमता प्राप्त की जाए कि कर्म के प्रवेश के प्रवेग को आते हुए देखा जा सके और उसके स्वरूप को भी परखा जा सके। (2) एक ऐसी चेतना आ सकती है जिसमें कोई कुविचार या कर्म की प्रकृति का अनुभव होते ही बेचैनी हो। (3) जब अनुचित कर्म के लिए तत्पर हो तो अंदर की कोई चीज सावधान कर सकती है और रोक सकती है।
श्री अरविंद कहते हैं कर्म केवल तभी महत्त्वपूर्ण होते हैं जब वे प्रकृति के अंदर विद्यमान वस्तुओं को व्यक्त करते हैं। कर्म का एक महान् उपयोग यह है कि यह स्वभाव की परीक्षा करता है और साधक को उसकी बाहरी सत्ता के दोषों के सामने ला खड़ा करता है, जो उसकी दृष्टि से बच जाते हैं।
कर्म की प्रकृति के बारे में श्री अरविंद कहते हैं, प्रकृति वह शक्ति है, जो कर्म करती है। शक्ति क्रियाशील एवं निष्क्रिय दोनों रूपों में हो सकती है। परंतु जब वह निश्चल होती है, तब वह उतनी ही अधिक एक शक्ति होती है, जितनी कि वह कर्म करते समय होती है। त्रिगुण शक्ति का यह कार्य है। सात्विक कर्म प्रभावशाली होता है। रजस् कर्म के आधीन तब तक कर्म करता है, जब तक कि तमस् विश्राम एवं विराम नहीं ले लेता। तमस् निषेधात्मक स्थिति है। तमस् कर्म ही नहीं करना चाहता। वह जड़वत् बना रहता है। राजसिक कर्म में महत्त्वाकाँक्षा का ज्वार होता है। सात्विक कर्म अनासक्त भाव से अपने चरम बिंदु में होता रहता है। प्रकृति मुक्त होने पर वह स्वयं को दो भागों में विभक्त कर देती है, (1) आँतरिक शक्ति, जो अपने कर्म (रजस्, मतस् आदि) से मुक्त होती है। (2) बाह्य प्रकृति, जिसे वह व्यवहृत करती और बदलती रहती है।
महायोगी श्री अरविंद कर्म की त्रुटियों पर महत्त्व न देते हुए कहते हैं, काम में होने वाली त्रुटियों एवं भूलों के विषय में दुश्चिंतन नहीं करना चाहिए। भूलें करना मन का स्वभाव है। अतः इसका कोई ज्यादा महत्त्व नहीं है और न ही इससे व्यथित व परेशान होना चाहिए। एकमात्र उच्चतर चेतना ही इन सबको सुधार सकती है। सदैव अपने विशिष्ट प्रयासों एवं पुरुषार्थ पर ही विश्वास रखना चाहिए। जब काम हो रहा हो तब केवल अपने काम की बात ही सोचना बुद्धिमानी है। उससे पहले और उसके बाद नहीं। अपने मन को उस काम पर वापस मत ले जाओ, जो समाप्त हो चुका है। वह भूतकाल की चीज है और दुबारा उसमें संलग्न होना शक्ति का अपव्यय है। जो कार्य आगे करना है, उसकी आशा में अपने मन को मत लगने दो। जो शक्ति तुम्हारे अंदर कार्य कर रही है, वह अपने समय पर उसकी चिंता करेगी।
कर्म की कुशलता उस कर्म के प्रति तन और मन का नियोजन है। अपनी समस्त शक्ति और योग्यता भर काम करना चाहिए। अत्यधिक परिश्रम करते जाना समझदारी नहीं है, क्योंकि बाद में उसकी प्रतिक्रिया होती है। अत्यधिक परिश्रम जड़ता को ऊपर ले आता है। यदि बहुत अधिक कार्य किया जाता है, तो कर्मी की दिलचस्पी के बावजूद कर्म का स्तर गिर जाता है।
कर्म की इस साधना का आध्यात्मिक फल आँतरिक मनोभाव पर निर्भर करता है। इसके लिए महत्त्वपूर्ण तथ्य है कर्म में प्रयुक्त पूजा का भाव। यदि कोई कर्म के साथ-साथ भगवान् को स्मरण कर सके एवं कर्म को सहारा देने वाली व इसे संपादित करने वाली शक्ति को अनुभव कर सके, तो वह कर्म की साधना से मिलने वाले आध्यात्मिक परिणाम को द्विगुणित कर देती है। प्रेम एवं भक्ति कर्म की मूल प्रेरक शक्ति है। अतः कर्म की साधना को आनंदपूर्वक करते जाना चाहिए। हालांकि इस साधना में आनंद तब आता है, जब दिव्य शक्ति का सक्रिय भाव में अवतरण होता है। जिस कर्म को करने के लिए मनुष्य की आत्मा स्वीकृति प्रदान करे, वही उसके लिए सर्वोत्तम है। कर्म की यह साधना अपने विधि-विधान में संपूर्ण एवं समग्र है।
तथागत बोधिवृक्ष को साष्टाँग दंडवत् कर रहे थे। शिष्य ने साश्चर्य हो पूछा, “आप तो पूर्ण हैं, फिर इस तुच्छ वृक्ष को इतना सम्मान क्यों दे रहे हैं।” बुद्ध ने कहा, “आप सबको यह बोध कराने के लिए कि जो नमता है, सो बड़ा होता है। ऐसा न हो कि आप लोग अहंकारी बनकर नमन की परंपरा को भुला दें। ईश्वरीय मार्ग में इस प्रकार की बड़प्पन की महत्त्वाकाँक्षाएँ पहले छोड़नी पड़ती हैं। यह संस्कार बराबर जाग्रत् रखना चाहिए।”
बीसवीं सदी के महान् वैज्ञानिक आइन्स्टीन बेल्जियम की महारानी के निमंत्रण पर ब्रूसेल्स पहुँचे। महारानी ने अनेक उच्चाधिकारियों को उन्हें लेने के लिए स्टेशन भेजा, किंतु सामान्य वेश-भूषा और सीधे से आइन्स्टीन को वे पहचान ही नहीं पाए और निराश लौट आए।
आइन्स्टीन अपना बैग उठाए राजमहल पहुँचे और महारानी को अपने आने की सूचना भिजवाई। जब रानी ने अपने अधिकारियों की अज्ञता के कारण हुई असुविधा के लिए खेद प्रकट किया तो वे हँसते हुए बोले, “आप जरा-सी बात के लिए दुःख न करें, मुझे पैदल चलना बहुत अच्छा लगता है।”
जिस राजसी सम्मान को पाने के लिए लोग जीवनभर एड़ी-चोटी का पसीना एक करते रहते हैं, वह सम्मान महामानवों को सादगी की तुलना में इतना छोटा लगता है कि उसकी चर्चा भी चलना निरर्थक समझते हैं।
ईरानी शहंशाह अब्बास शिकार के लिए जंगल में भटक रहे थे। वहाँ उनकी भेंट एक चरवाहे बालक से हो गई। उसका नाम था, मुहम्मद अलीबेग। चरवाहा होते हुए भी उसकी हाजिर-जवाबी तथा व्यक्तित्व से शाह बड़े प्रभावित हुए और लौटते समय उसे भी अपने साथ ले आए।
मुहम्मद अलीबेग को राज्य का कोषाध्यक्ष बना दिया। यद्यपि वह एक निर्धन परिवार का था, फिर भी इतनी धन-दौलत को देखकर उसका मन तनिक भी विचलित न हुआ। वह अपने को कोषालय के समस्त धन का रक्षक मानता था। इतने बड़े पद पर रहते हुए भी उसके जीवन में सादगी थी। शाह अब्बास के बाद उनका अल्प वयस्क पौत्र शाह सफी राजसिंहासन पर आसीन हुआ। किसी ने शाह के कान भर दिए कि मुहम्मद अली राज्य के धन का दुरुपयोग करता है। शाह ने उस प्रकरण को जाँच के लिए अपने पास रखा और एक दिन बिना सूचना के उसकी हवेली का निरीक्षण करने जा पहुँचे।
शाह ने हवेली के सब कमरों का निरीक्षण किया। थोड़ी-सी वस्तुओं के अतिरिक्त वहाँ कुछ दिखाई ही न दे रहा था। शाह निराश लौटने लगा, तो खोजियों के संकेत पर शाह की दृष्टि एक बंद कमरे की ओर गई। उसमें तीन मजबूत ताले लटक रहे थे। अब शाह की शंका को कुछ आधार मिला। उन्होंने पूछा, इसमें क्या चीज है, जिसके लिए इतने मजबूत ताले लगाए हैं।
तुरंत ताले खोल दिए गए। शाह ने कक्ष के मध्य मेज पर एक लाठी, शीशे की सुराही आदि बर्तन तथा पोशाक और दो मोटे कंबल देखे। मुहम्मद ने कहा, “जब स्वर्गीय शाह मुझे यहाँ लाए थे, उस समय मेरे पास यही वस्तुएँ थीं और आज भी मेरे पास अपनी कहने को यही हैं। मैं इनसे प्रेरणा ग्रहण करता और उसी स्तर के जीवन का अभ्यास बनाए रखता हूँ।” युवा बादशाह इस आदर्शनिष्ठा को देखकर नत-मस्तक हो गया।
स्वप्न का विचित्र संसार प्राचीनकाल से ही मनुष्य के लिए जिज्ञासा एवं महान् कुतूहल का विषय रहा है। विश्व के विभिन्न दार्शनिकों ने अपने-अपने अनुभव के प्रकाश में इस पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। आधुनिक विज्ञान की शोध का भी यह एक रोचक विषय बना हुआ है। वह उसे प्रमुखतया अचेतन मन की भाषा मानता है और इसके अगम्य गूढ़ पक्षों को उभारने में प्रयासरत है, किंतु अभी तक वह कोई निश्चित मत नहीं निर्धारित कर पाया है। इस संदर्भ में भारतीय मनीषा का अपना मौलिक दृष्टिकोण रहा है। मानवीय चेतना के मर्मज्ञ ऋषियों ने इसके विविध स्वरूपों पर प्रकाश डालते हुए इसका समग्र विवेचन प्रस्तुत किया है।
प्राचीन यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक हिप्पेक्रेटस का मानना था कि निद्रा के समय आत्मा शरीर से अलग होकर भ्रमण करती है और ऐसे में जो देखती है या सुनती है, वही स्वप्न है। प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो अपनी पुस्तक ‘टाइमिमस’ में स्वप्नों की, दैहिक एवं मानसिक लक्षणों की महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में व्याख्या करते हैं। अरस्तू ने अपनी पुस्तक ‘पशुओं के इतिहास’ में लिखा है कि केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु भेड़, बकरियाँ, गाय, कुत्ते, घोड़े इत्यादि पशु भी स्वप्न देखते हैं।
भारतीय चिंतन में स्वप्न पर व्यापक प्रकाश डाला गया है। संहिता ग्रंथों का यह एक प्रमुख विषय रहा है। प्राचीन दार्शनिकों का यह मानना था कि आत्मा चौरासी लाख योनियों में जन्म लेने और भ्रमण करने के बाद मनुष्य योनि प्राप्त करती है। स्वप्न के माध्यम से वह विभिन्न योनियों में अर्जित अनुभवों का पुनः स्मरण करती है। इन्हीं के साथ ही स्वप्नों को भविष्य के संकेतों के साथ भी जोड़ा गया है। प्राचीनकाल से ही यह मान्यता रही है कि प्रकृति अपने ढंग से भावी शुभाशुभ संकेत देती है। वैदिक साहित्य में स्वप्न को भविष्य की शुभाशुभ घटनाओं का अमोघ लक्षण माना गया है। इस संदर्भ में रामायण, महाभारत, वायु पुराण, मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण, भविष्य पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणेश पुराण, ज्योतिष तत्त्व, भद्रबाहु संहिता, जैन कल्प सूत्र, अथर्वण परिशिष्ट आदि ग्रंथों में महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है।
प्रसिद्ध ग्रंथ भद्रबाहु संहिता में छह प्रकार के स्वप्नों का वर्णन मिलता है। (1) दृष्ट, जो जाग्रत् अवस्था में देखा गया हो उसे स्वप्न में देखना, (2) श्रुत, सोने से पूर्व सुनी बात को देखना, (3) अनुभूत, जो जागते हुए अनुभव किया हो उसे देखना, (4) प्रार्थित, जाग्रत् अवस्था में की गई प्रार्थना की इच्छा को देखना, (5) दोषजन्य, वात, पित्त आदि के दूषित होने से स्वप्न देखना। (6) भाविक, जो भविष्य में घटित होना हो उसे देखना। उपर्युक्त स्वप्नों में केवल भाविक स्वप्न का फल ही सही होता है।
इस क्रम में कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं का स्वरूप इस तरह के स्वप्नों द्वारा प्रकट हुआ है। रामचरितमानस में महात्मा तुलसी जी ने त्रिजटा के स्वप्न के माध्यम से रावण व राक्षस कुल के विनाश का संकेत किया था। त्रिजटा ने स्वप्न में देखा था कि रावण काले कपड़े पहने, गधे जुते रथ से दक्षिण दिशा में जा रहा है। कुछ दूर चलकर वह सिर के बल गिर पड़ता है। फिर उसने एक ऐसे तालाब में प्रवेश किया, जहाँ लाल वस्त्र पहने काले रंग की स्त्री खड़ी है। उसका पूरा शरीर कीचड़ से लथपथ है। उसके बाद त्रिजटा ने देखा कि रावण के सभी पुत्र सिर मुड़ाए तेल में नहाए हैं और रावण सुअर पर, कुँभकरण ऊँट पर तथा मेघनाथ सुअर पर सवार होकर दक्षिण दिशा की ओर गए हैं। समस्त राक्षस लाल कपड़े पहने गोबर के कुँड में घुस गए हैं।
अपने देश की सुप्रसिद्ध साहित्यकार अमृता प्रीतम ने भी ‘लाल बागों का रिश्ता,’ ‘अक्षर कुँडलिनी, ‘सितारों के अक्षर और किरणों की भाषा’ जैसे ग्रंथों में स्वप्न पर व्यापक प्रकाश डाला है। वह लिखती हैं कि इन्सान की सोई हुई आँखें स्वप्न में कुदरत की लिखी हुई इबारत को देखती हैं, पर वह पढ़ने में समर्थ नहीं होता। स्वप्नों की पृष्ठभूमि में भी कहीं यथार्थ की परछाई रहती है और ये कई बार बीते हुए कल तथा आने वाले कल की ओर संकेत करते हैं।
पश्चिमी मनोविज्ञानी कार्लजुग ने अपनी छात्रा का उदाहरण प्रस्तुत किया है। जिसे स्वप्न में अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो जाता है। वह स्वप्न में देखती है कि वह मर चुकी है और कक्षा चल रही है। उसके पास कई मृत सहेलियां अगली बैंच पर बैठी हैं। कक्षा का वातावरण बहुत शाँत एवं गंभीर है। वह शिक्षक को खोजी निगाहों से ढूँढ़ती है, किंतु यह नहीं दिखता। फिर उसे आभास होता है कि वह स्वयं ही शिक्षक है और मृत्यु के तुरंत बाद लोगों को अपने समूचे जीवन का विस्तृत वृत्ताँत सुना रही होती है। अन्य मृत लोग बड़े चाव से इन अनुभवों को सुन रहे थे, जैसे कि लौकिक जीवन के क्रियाकलाप और अनुभव बहुत निर्णायक एवं महत्त्वपूर्ण हैं। बाद में उसका यह स्वप्न आश्चर्यजनक ढंग से सत्य साबित हुआ।
‘स्लीप एंड ड्रीम्स’ में श्री अरविंद एवं श्री माँ ने एक यात्री का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिसे स्वप्न में भावी दुर्घटना की चेतावनी मिलती है। यात्री एक होटल में ठहरता है। वहाँ स्वप्न में वह एक बहरे को उसकी अर्थी की ओर इशारा करता है और अंदर प्रवेश करने के लिए कहता है। प्रातः जब वह कमरे से बाहर आता है, तो बाहर उसे वही लड़का दिखता है। वैसे ही वस्त्र पहने हुए था और लिफ्ट की ओर संकेत कर रहा था। यह सब देख आश्चर्यचकित यात्री जब लिफ्ट की ओर प्रवेश करने ही वाला था कि वह अचानक ध्वस्त हो गई और इसमें वे सभी लोग मारे गए। इस घटना के बाद से यह व्यक्ति स्वप्नों को गंभीरता से लेने लगा।
सुविख्यात पाश्चात्य स्वप्न विश्लेषक जे. आर. ब्लैंड ने प्रसिद्ध शासक नौशेरखाँ के ऐसे ही एक स्वप्न का विवरण प्रस्तुत किया है। नौशेरखाँ स्वप्न विज्ञान को ‘ताबिर विज्ञान’ कहता था। एक दिन उसने स्वप्न में देखा कि वह सोने के पात्र में मदिरा का पान कर रहा है। उसी पात्र में एक काले कुत्ते ने भी मदिरा पान किया। उसने अपने मंत्री बुजुरमिहिर को अगले दिन बुलाकर स्वप्न सुनाया और विश्लेषण चाहा। मंत्री ने जो विश्लेषण बताया, उसके अनुसार उसकी प्रिय रानी के पास कोई काला दास है, वह उसका प्रेमी है। यह बात अंततः सही निकली। कहा जाता है कि यह विश्लेषक विश्वविख्यात ज्योतिषी वराहमिहिर थे।
गौतम बुद्ध के जन्म से पूर्व उनकी माता महामाया ने स्वप्न में देखा था कि छह दाँतों वाले हाथी ने उनके शरीर में प्रवेश किया है। स्वप्नशास्त्रियों ने स्वप्न की व्याख्या करते हुए बताया था कि जन्म लेने वाला शिशु या तो चक्रवर्ती सम्राट् होगा या महान् संत। भविष्य में यह बात सत्य सिद्ध हुई।
स्वप्नों के फलों की विवेचना के संदर्भ में भी भारतीय ग्रंथों में समय, तिथि एवं अवस्था के आधार पर इनके परिणामों का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। यहाँ तिथि एवं स्वप्न के परिणामों का घनिष्ठ संबंध है। इनके अनुसार शुक्ल पक्ष की षष्ठी, सप्तमी तथा चतुर्दशी तिथि को देखा गया स्वप्न शीघ्र फल देने वाला होता है। पूर्णिमा को देखे गए स्वप्न का फल अवश्य प्राप्त होता है। शुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी तथा नवमी को देखा गया स्वप्न विपरीत फल प्रदान करता है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, कृष्णपक्ष की द्वितीया के स्वप्न का फल देरी से प्राप्त होता है। इसी प्रकार शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तथा पंचमी को देखे स्वप्न का फल दो माह से दो वर्ष के अंदर प्राप्त होता है। रात्रि के प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ प्रहर का फल क्रमशः 1 वर्ष, 8 माह, 3 माह, एवं 6 दिन में प्राप्त होता है। उषाकाल में देखे स्वप्न का फल अति शीघ्र प्राप्त होता है। परंतु ये सभी बातें विषयसूचक स्वप्नों के बारे में हैं। इनका इन स्वप्नों से कोई संबंध नहीं, जो किसी शारीरिक क्रिया एवं सोच का परिणाम होते हैं।
भगवान् महावीर के जीवन में अस्थिग्राम के शूलपाणि मंदिर में रात्रि के अंतिम प्रहर में देखे गए ऐतिहासिक स्वप्न का उल्लेख प्राप्त होता है। महावीर ने स्वप्न में पिशाच की मौत, सफेद पंछी, कोयल, फूलों के दो हार, बैल, कमल के फूलों का सरोवर, समुद्र, रवि किरणें, बाँहों में लिपटा पर्वत तथा मेरुपर्वत की चढ़ाई देखी। उसी गाँव के ज्योतिषी ने नौ स्वप्नों का विश्लेषण श्री महावीर को बताया था। दो फूलों का हार, इस स्वप्न का विश्लेषण स्वयं भगवान् ने किया व बताया कि मैं गृहस्थ और संन्यास दोनों में जनमानस का विश्वास उत्पन्न करूंगा।
भगवान् महावीर की माता महारानी तृषला के चौदह स्वप्नों का भी उल्लेख इतिहास में मिलता है। ये चौदह स्वप्न थे, ऐरावत हाथी, सफेद बैल, शेर, लक्ष्मी, माला, चाँद, रवि, इंद्र, ध्वज, कमल, कलश, क्षीरसागर, देवरथ, तथा धुँआरहित अग्नि। जो वास्तव में 14 प्रतीक थे। मान्यता है कि जब कोई तीर्थंकर गर्भ में आता है, तो उसकी माता इन प्रतीकों को स्वप्न में देखती है।
भावी संकेत सूचना के अतिरिक्त स्वप्नों के माध्यम से जीवन की समस्याओं के समाधान भी उपलब्ध होते हैं। वैज्ञानिक आविष्कारों एवं साहित्यिक रचनाओं में स्वप्नों की इस अद्भुत भूमिका को देखा जा सकता है। नील वोहर की परमाणु संरचना और फ्रेडरिक केकुले द्वारा बेन्जाइन की रसायन रचना की खोज इसी के उदाहरण हैं। सुप्रसिद्ध विद्वान् हेनरी फेहर के अनुसार सृजनशील व्यक्ति स्वप्नों में अपनी समस्याओं के समाधान खोजते हैं। मनोविद् नाओपी एपल के अनुसार जब कुछ लेखक, वैज्ञानिक और कलाकार निद्रावस्था में जाते हैं, तो वे अवचेतन मन को अनसुलझे विषयों पर समाधान का संदेश देते हैं और वे आश्चर्यजनक ढंग से इनका समाधान पाते हैं। क्योंकि एपल के अनुसार अचेतन मन वह जानता है, जो चेतन नहीं जानता। पट कथा लेखक जेम्स केमराँन ने स्वप्न से प्राप्त संकेतों के आधार पर ही अर्नाल्ड श्वार्जनेगर की प्रसिद्ध एक्शन फिल्म ‘द टर्मीनेटर’ की स्क्रिप्ट लिखी थी।
इस तरह यह कहना तनिक भी अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं है कि स्वप्नों का अद्भुत एवं गूढ़ जगत् स्वयं में अस्तित्व के गहनतम आश्चर्य एवं समाधान सभी कुछ समेटे हुए है। आवश्यकता है इसकी रहस्यमयी भावना को सही ढंग से समझने व इसके रचनात्मक उपयोग की, जिससे कि यह मात्र कुतूहल एवं आश्चर्य भर न रहकर जीवन की गुत्थियों को हल कर लेने वाला एक सशक्त माध्यम बन सके।
उन दिनों पुरोहितों की चाँदी थी। कथा और कर्मकाँड के सहारे वे विपुल दक्षिणा बटोरते थे। पद्मनाभ ने नया मार्गदर्शन किया। वे उच्च कोटि के विद्वान् थे। उन्होंने लकड़ी काटकर पेट भरने का धंधा अपनाया। धर्मकृत्यों को मन लगाकर करते रहे। जो मिलता, उसे वहाँ के सत्कार्यों में लगा देते।
जनता ने उन्हें भरपूर मान दिया। लालची पुरोहितों को मुँह छिपाए फिरते और पद्मनाभ पर अनर्गल आक्षेप लगाते देखा गया। तो भी वे अपने समय के लोकप्रिय पुरोहित रहे और भरपूर मान मिला। उन्होंने यह तथ्य अपने जीवन से प्रतिपादित किया कि पौरोहित्य को परमार्थ भाव से किया जा सकता है। व्यवसायी भाव उसके लिए आवश्यक नहीं।
दुर्योधन को अहंकार दिखाए बिना चैन नहीं पड़ता था। पाँडव वनवास में थे। दुर्योधन को महलों में संतोष न हुआ, अपने वैभव का प्रदर्शन करने जंगल के उसी क्षेत्र में गया, जहाँ पाँडव रह रहे थे। वहाँ अपने को सर्वसमर्थ सिद्ध करने के लिए मनमाने ढंग से जश्न मनाने लगा। अहंकारी में शालीनता-सौजन्य नहीं रह जाता। वह अपने आगे किसी को कुछ भी नहीं समझता। उसी क्रम में कौरव गंधर्वों के सरोवर को गंदा करने लगे, रोकने पर भी न माने। क्रुद्ध होकर गंधर्वराज ने उन्हें बंदी बना लिया। पता पड़ने पर युधिष्ठिर ने अर्जुन को भेजकर अपने मित्र गंधर्वराज से उन्हें मुक्त कराया। दुर्योधन को शर्म से सिर झुकाना पड़ा।
अपने पिता बिंदुसार से सम्राट् अशोक को सुविस्तृत राज्य प्राप्त हुआ था। पर उसकी तृष्णा और अहमन्यता ने उसे चैन नहीं लेने दिया। आस-पास के छोटे-मोटे राज्य उसने अपनी विशाल सेना के बल पर जीते और अपने राज्य में मिला जिए।
उसके मन में कलिंग राज्य पर आक्रमण करने की उमंग आई। कलिंग धर्मात्मा भी था और साहसी भी। उसकी सेना तथा प्रजा ने अशोक के आक्रमण का पूरा मुकाबला किया। उसमें प्रायः सारी आबादी मृत्यु के मुँह में चली गई या घायल हो गई। अब उस देश की महिलाओं ने तलवार उठाई। अशोक इस सेना को देखकर चकित रह गया। वह उस देश में भ्रमण के लिए गया, तो सर्वत्र लाशें ही पटी देखीं और खून की धारा बह रही थी।
अशोक का मन पाप की आग से जलने लगा। उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और जो कुछ राज्य वैभव था, उस सारे धन से बौद्ध के प्रसार तथा उपयोगी धर्म संस्थान बनवाए। अपने पुत्र और पुत्री को धर्मप्रचार के लिए समर्पित कर दिया।
परिवर्तन इसी को हिते हैं। एक क्रूर और आतताई कहा जाने वाला अशोक बदला, तो प्रायश्चित की आग में तपकर वह एक संन्यासी जैसा हो गया।
मनुष्य जब तक स्वयं बदलना न चाहे, तब तक उसे कोई शक्ति बदलने में समर्थ नहीं हो सकती है। जीवन के अनूठे आरंभ में मन को जो महारोग उत्पन्न हुआ, उसी ने कर्मों को शुभ और अशुभ का विकृत रूप दिया है। सच तो यही है कि हमारा जीवन पीड़ा और पुकार के साथ जन्मा है और इस विकसित कहे जाने वाले जीव में सत्य और मुक्ति लुप्त हो गए हैं और इसका स्वाभाविक सुख समाप्त हो गया है। जीव यहाँ पर काल का कर और देव का दावा चुकाने आया है। विभिन्न प्रकार के शोक हमारे शरीर को घेरे हुए हैं। ये भीषण यातनाओं का अनुभव कराते हैं और अंत में हमें मृत्यु के हवाले कर देते हैं।
हम स्वयं ही अपने अंदर अपने शत्रुओं और बैरियों को आमंत्रण करते हैं। वे आकर हमारी जीवन वीणा के तार को तोड़ जाते हैं और एक करुण चीत्कार के साथ हमारे स्वर्गीय सुखरूपी संगीत का अंत हो जाता है। हम अपनी बहुमूल्य जीवन-संपदा का अपव्यय करते हैं एवं इसके चमत्कारों व आश्चर्यों को गँवा बैठते हैं। मनुष्य को दिए गए ईश्वरीय वरदानों को ऊपर यह एक महाशाप है। भूलें, झूठ और पाप इसको सताते ही रहते हैं। ये हमें दिव्य आनंद से वंचित कर देते हैं।
इन सबके मूल में अज्ञान है। अनंत काल से मानव अपने अंदर भूलों और अपराधों को संचित करता चला आ रहा है। वह अपने इस प्रारब्धरूपी कर्मों के दुर्विपाक की खेती काटता ही रहता है। वह स्वयं का सबसे बड़ा एवं बुरा दुश्मन है। शत्रु अंदर ही विद्यमान है, कहीं बाहर नहीं है। इसी के वशीभूत वह अपने समस्त वरदानों को शाप बनाता रहता है। सुख से दुःख को, हर्ष से पीड़ा को, अमृत से विष को खरीदना जैसे इसकी नियति बन गई है। वह अपने और पराये सुख का हनन करता है। इसने काल और इतिहास से कुछ नहीं सीखा है। इसने आदिम पशुता और दुष्टता को अभी भी जीवंत बनाए रखा है। युद्ध, खून-खराबी, लूटमार और अत्याचार उसके विनोद हैं। अनंत काल के सुँदर और वैभवपूर्ण सृजन को इसकी मूर्खता एक क्षण में विनष्ट कर डालती है। मानव की इच्छाशक्ति मृत्यु, काल और दुर्भाग्य के साथ षड्यंत्र करने में लगी है। कल्पों के कालचक्र में इसका जीवन कैदी बना हुआ है।
प्रश्न खड़ा होता है कि यदि हमें जीवन जीना है, तो अज्ञान और आँसुओं की क्या आवश्यकता पड़ी? दुःख-शोक कहाँ से आए? इसका जवाब यही है कि अंतरात्मा की गहन गुहा में तो सनातन पुरुष का गुप्त निवास है। पर बीच में अज्ञानरूपी अंधकार का पर्दा है। अतः इस अद्भुत अतिथि का स्वर एवं संवेदन सुनाई नहीं पड़ता और परमानंद का प्रभाकर दिखाई नहीं पड़ता। मानवीय मन का द्वंद्व ही अज्ञान है। इसका झिलमिल पर्दा प्रभु का दर्शन करने नहीं देता। मन शाश्वत के संकल्प को छुपाता है। हृदय की आशाएँ सनातन इच्छा को दबा देती हैं। पार्थिव सुख में अमृतोपम आनंद धुँधला हो जाता है। सुप्त को जगाने के लिए दुःख की आवश्यकता है। जहाँ अज्ञान है वहाँ दुःख है। सुख और दुःख में प्रथम दुःख का जन्म हुआ है। दुःख है देवों का धन। यह हृदय की पाषाणी जड़ता को तोड़ता है और आत्मा को जगाता है। दुःख जाग्रत् चैतन्यता को प्रभु की ओर आरोहित करता है।
पृथ्वी अभी प्रसव पीड़ा में है। इस पीड़ा और मानवीय पुरुषार्थ में ही सृजन की कोपलें फूटनी हैं। इसी में दिव्य जीवन की संभावना सन्निहित है। हालाँकि पाप का बल उसका विरोध कर रहा है। अज्ञान का प्रतिरोध भी अड़ा है। मन की मूर्खता और हृदय की अनिच्छा रोड़े अटकाती हैं, परंतु फिर भी प्रभु का कार्य अधूरा रहने वाला नहीं है।
महाकाल की सहचर आग्नेय आत्माएँ तो दुःख में से आनंद का अर्क खींचती हैं। यही आत्माएँ जगत् का उद्धार करती हैं। इन्हें ही संसार के दुःख-कष्ट का भार उठाना पड़ता है। इन्हें ही समस्त मानवजाति के भाग्य के भार को अपने सिर पर उठाना है। इनको अपने प्राणों के बदले ज्ञानदान देना होता है। परमात्मा की यह संतानें विष की प्याला पीती हैं। ये उद्धारक ही प्रभु का ऋण चुकाते हैं। भले ही इसके लिए इन्हें दुःख और मृत्यु को वरण करना पड़े, सतत दुःख के प्रहार को झेलना इनकी नियति है। इनका तप ही मनुष्य के लिए स्वर्ग का मार्ग रचता है। अज्ञान को मिटाने में ये अपने प्राण और प्रकाश की कीमत चुकाते हैं। जगत् के लिए जीवन का बलिदान करते हैं। इन्हें ही क्रास उठाना पड़ता है। अज्ञानी इन पर शाप बरसाते हैं और इनका अपमान व उपहास उड़ाते हैं। प्रभु के लिए जीने वाली आत्माएँ असीम ज्योति के बदले देह की मृत्यु का दान करती हैं। इनके बलिदान द्वारा ही अमर ज्योति की विजय होती है।
महाकाल के दूत इस संसार से जिस दुःख को मिटाने के लिए आए हैं, उसी दुःख को उन्हें स्वयं सहन करना पड़ता है। विदीर्ण एवं टूटे हुए हृदयों को वह शाँति देते हैं। जगत् का दुःख इनका अपना दुःख बन जाता है। पृथ्वी के पुराने भार को यह अपनी आत्मा में वहन कर लेता है। इन्हें भीषण दुःख-कष्ट-यातनाओं के बीच रहना पड़ता है। दुनिया की दुष्टता इन पर वार करती है। इनका हृदय छलनी हो उठता है। जगत् का जहर इनको नीलकंठ बना देता है। जगत् को नया जन्म देने के लिए इन्हें मौत को आलिंगन करना पड़ता है।
महाकाल के दूत जिसका उद्धार करते हैं, वही उन पर कुदृष्टि रखता है। जिसको यह बचाते हैं वही उनका दुश्मन बन जाता है। जिनके लिए यह मंगलकामना करते हैं वही इनको क्रास पर चढ़ा देते हैं। इनके द्वारा कुछ ही लोगों का उद्धार होता है। जिनकी अंतरात्मा पवित्र है, वही इस प्रकाश पथ के अनुगामी होते हैं। वह तो बस एक प्रज्वलित सूर्य की भाँति चमककर चला जाता है। उसके जाते ही पुनः पृथ्वी पर कालिमा पसर जाती है।
महाकाल की चेतना को धारण करने वाले ये पुरुष दिव्य कवच धारण कर अवतरित होते हैं। इनसे कोई नहीं जीत सकता। जगत् के प्रहार से ये झुकते नहीं। ये तो विनाश में सृजन का बीज बोते चलते हैं। अंधकार में होते हुए ये आगे बढ़ते हैं। उनके सहायक स्वयं प्रभु होते हैं और वह किसी से याचना नहीं करते। सत्पथ से वे तिल मात्र भी नहीं डिगते। मनुष्य में देवत्व का उदय एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण उनका लक्ष्य है। अखिल पृथ्वी के कण-कण में वह प्रभु को बसा देना चाहते हैं। उनका परिचय परमात्मा के सूर्य से है, किंतु वे परमात्मा की रात्रि का भी परिचय प्राप्त करना चाहते हैं। वे जगत् उद्धार के लिए नरक में भी प्रवेश करते हैं। वे दुःख को आनंद में, शोक को हर्ष में, अशुभ को शुभ में बदलने तथा कष्ट-पीड़ा का उन्मूलन करने आते हैं।
उनके इस कार्य के परिणामस्वरूप ही पृथ्वी प्रकाश का धाम बन सकेगी। मानव हृदय में परमात्मा के दर्शन होंगे। सत्य का प्रकाश पृथ्वी पर अवतरित होगा। जड़ तत्त्व चैतन्य हो उठेगा। मौत को अमर विचार मिलेगा। मूक हृदय जीवंत शब्द के प्रति जाग्रत् होगा। जीवन शाश्वत के सुख का सदन बन जाएगा। शरीर को अमृतत्त्व का स्वाद मिलेगा। यही उसकी पूर्णाहुति होगी।
महाकाल के इस अनोखे कार्य के लिए दुःख झेलना ही पड़ेगा। उनका अपनी संतानों से यही कहना है, “हे पुत्र! परमात्मा की महाशक्ति को अपनी आत्मा का आश्रय बना। परम सत्य की ओर अभिमुख हो। प्रेम के लिए प्रार्थना कर। शाँति का आह्वान कर, परंतु सावधान! शैतान के लिए कभी अपना द्वार मत खोलना। भूल से भी आसुरी मार्ग को मत अपनाना। क्योंकि ये सब धर्म विरोधी हैं। इसका अहम् समस्त संसार को निगल जाना चाहता है। अपने और दूसरे के दुःखों को यह अपना साधन बनाना चाहता है। यह सत्य और पीड़ा पर अपना सिंहासन स्थापित करना चाहता है। यह स्वयं को भगवान् घोषित करता है। हे पुत्र! प्रहार को निमंत्रण मत देना। अनंतता तेरी आत्मा का लक्ष्य है। तेरे अंदर दिव्य शक्ति का वास है। तू इससे अज्ञात है। यह अज्ञान ही तेरी पीड़ा है। दुःख अज्ञान का स्वहस्ताक्षर है। यह देवों का प्रमाण पत्र है।” जीवन में प्रभु के मिलन से ही दुःख का अंत होगा। शाँति प्रारब्ध के ऊपर मिली हुई आत्मा की विजय है। भाग्य की किताब में शेष रकम है प्रारब्ध। भाग्य का अर्थ है, अविद्या में संसिद्ध होने के लिए कार्यरत सत्य। प्रकृति और चैत्यात्मा के बीच व्यवहार ही भाग्य है। यहाँ पर भगवान् मध्यस्थ निर्णायक हैं। दुःख का कोई अंत नहीं। जीवन का सर्वनाश, देह की यंत्रणा और मरण से आत्मा बलवती होती है और तभी विजय का द्वार खुलता है।
जीवन का गुप्त सार है आनंद। यह दुःख की पुकार के पीछे छुपा रहता है। हे पुत्र। तू अपने क्षुद्र स्वरूप को त्याग दे। देहाभिमान ही दुःख का कारण है। तेरा लक्ष्य है प्रभुमय हो जाना। बाहर की ओर मत झाँक, अंदर की ओर मुड़। वहीं तेरे मिलन का मर्म छिपा है।
मेरे बच्चे! तू मृत्यु और देव के सामने याचना मत कर। तेरी आत्मा अनंत और शाश्वत है। परम सत्य में तेरा निवास है। तू इसे पहचान। अविद्या के झाँसे में तू गर्त में गिर गया है और अमृत से विमुख हो गया है। भावावेश में तेरा भीषण पतन हुआ है। इस प्रकार तेरे अंदर दुःख का धाम बन गया है और तू कामनाओं के तंबू में खड़ा हुआ है। एक विराट् छद्मवेश ने सनातन के आनंद को छिपा दिया है।
देवों के हाथ में मार्गदर्शक डोरी होती है। परम धाम का प्रेम मानव प्रार्थना को कभी नहीं नकारता है। ऐसा मानव कामना के दंभ से अंधा नहीं बनता। उसको भय और आशा का कोहरा आच्छादित नहीं कर सकता। आत्मा एक अलौकिक महिमा का मंदिर है। इसे पाने के लिए दुःख ही एक अनिवार्य शर्त है।
मनुष्य का मन शब्दों से परिचालित है। दृष्टि विचार के पर्दे के पीछे होती है और मनुष्य कुछ भी स्पष्ट नहीं देख पाता। अल्पाँश ही इसकी दृष्टि में आता है। परंतु इसी को वह पूर्ण मान लेता है। फिर इसको सर्वज्ञ शक्ति अर्थहीन लगती है। सत्य असत्य जैसा जान पड़ता है। यह उस जादूगर का जादुई नियम है। यह जादूगर चाहे तो सब कुछ बदल सकता है। मनुष्य अपनी इच्छा को प्रभु की इच्छा के साथ तदाकार कर सके, तो मनुष्य भी सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान बन सकता है। यदि इसका मन प्रभु के प्रकाश को धारण कर सके, तो मनुष्य भी उसके जैसा चमत्कार कर सकता है। वह प्रकृति का भी नियंता बन सकता है।
जीवन का सुख-दुःख भाग्य नहीं हैं। ये तो आते-जाते रहते हैं। मृत्यु आत्मा की यात्रा का अंत नहीं है। जीवन देवों का महायज्ञ है। प्रभु से एकाकार होने तक यह चलता रहता है। जीव का दैव अदृश्य विरोधी शक्तियों के साथ संघर्षरत रहता है। आत्मा अनेकानेक जन्मों में से होकर गिरती-पड़ती है और फिर उठती हुई आगे बढ़ती है। यह आरोहण करती हुई अंत में प्रभु के दैदीप्यमान शिखरों पर जाकर खड़ी हो जाती है। जो आत्मस्वरूप में ही निवास करता है, उसको प्रभु का दर्शन अवश्य होता है।
पारसी धर्म के पैगम्बर माने जाने वाले जरथुस्त्र शिक्षा प्राप्त करके विद्वान् बन गए थे। उनके गुरु उनसे न केवल प्रसन्न थे, बल्कि उन्हें शिष्य के रूप में पाकर अपने आपको गौरवान्वित अनुभव करते थे। उनकी सफलताओं से प्रसन्न होकर उनके पिता पौरुषस्प ने उनसे पूछा, “मेरी कौन-सी संपत्ति चाहते हो? माँग लो।”
जरथुस्त्र बोले, “पिता जी, अपना कमरबंद दे दें।”
पौरुषस्प आश्चर्य में पड़ गए, मूल्यवान् संपदाओं को छोड़कर सामान्य कमरबंद माँगा! पूछा, “ऐसा क्यों?”
जरथुस्त्र ने कहा, “आपने जीवन भर आदर्शों के लिए कमर कसकर पुरुषार्थ किया है। शैतान के विरुद्ध देवत्व की सुनिश्चित विजय के अभियान में मुझे लगना है। आपका कमरबंद मेरा आत्मविश्वास बढ़ाता है।”
पिता को विश्वास हो गया। साधनों की अपेक्षा आदर्शों को मूल्यवान समझने वाला यह होनहार बालक अवश्य महान् बनेगा।
राजा बालीक ने किसी बात पर रुष्ट होकर प्रधान अमात्य भद्रजित को पदच्युत कर दिया। सोचा इससे उन्हें प्रताड़ना मिलेगी और होश ठिकाने आएँगे। जनसम्मान के बिना कौन सुखी रह सकता है।
भद्रजित की आदर्शनिष्ठ बुद्धि अडिग रही। प्रेरणा हुई, लोकमंगल के लिए पद नहीं, श्रेष्ठ भावना चाहिए। उन्होंने जनसंपर्क साधा और लोक-सेवा के कार्यों में संलग्न हो गए। सहयोग पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ा। फलतः भद्रजित के सुख-संतोष में भी वृद्धि हो गई।
राजा की इच्छा हुई कि अमात्य को मिली प्रताड़ना का प्रतिफल आँखों से देखें। सो वे छद्म वेश बनाकर वहाँ जा पहुँचे, जहाँ भद्रजित उन दिनों निवास कर रहे थे।
राजा ने देखा, भद्रजित बिलकुल सहज स्थिति में हैं। अभाव का कोई चिह्न नहीं था। कुशल-क्षेम पूछी तथा राज्यपद न रहने की प्रतिक्रिया जाननी चाही। भद्रजित ने कहा, “मेरे ऊपर राजा ने बड़ा उपकार किया। मुझे यह समझने का अवसर मिला कि पद की अपेक्षा अपने कर्म और व्यवहार का प्रभाव कितना अधिक सार्थक होता है। आज मेरे और मेरी आराध्य जनता के बीच केवल स्नेह सूत्र है। पद, प्रतिष्ठा और औपचारिकता की खाई पट चुकी है। सुख-दुःख में एक होने का अवसर मिला। जो आत्मीयता अब अनुभव हुई वह पहले कहाँ थी?”
राजा समझ गए सत्पुरुष पद से नहीं, अपनी देवोपम प्रवृत्तियों से सम्मान पाते हैं।
काल शब्द की निष्पत्ति कल् धातु से हुई है। इसका अर्थ है गणना। समय का वह निश्चित भाग, जो गणना के लिए व्यवहृत होता है, काल कहलाता है। सभी भूतों को अपने में कवलित करने के कारण भी इसे काल कहते हैं। काल में कलाओं का संयोग होता है। पाणिनि के अनुसार, जिसमें मूर्तियों की वृद्धि एवं ह्रास प्रतीत हो उसे काल कहते हैं। सुश्रुत में काल की सटीक परिभाषा मिलती है। यहाँ इसे आदि, मध्य, अंत से रहित, मधुरसादि छह रसों की विस्मृति, संपत्ति का कारण, अपनी सूक्ष्म कला तक भी न ठहरने वाला कहा गया है। प्राणियों को सुख-दुःख के साथ संयोग-वियोग कराने अथवा प्राणियों के संहार के कारण भी इसे काल कहते हैं।
काल के पर्याय हैं दृष्ट, अनेहा और समय। ऋग्वेद में सर्वप्रथम इसका उल्लेख समय-बोध के लिए प्रयुक्त एक अभिधान के रूप में हुआ है। अथर्ववेद में इसके दार्शनिक रूप से संबंधित दो सूक्त हैं। शतपथ ब्राह्मण में समय सूचक अर्थ में काल का निरूपण मिलता है। वैदिक वाङ्मय में काल के दो स्वरूप हैं, प्रथम दैवी या दार्शनिक रूप, जिसे अमूर्त काल कहा गया है। दूसरा लोकगणना के लिए प्रयुक्त होता है। अथर्ववेद के काल सूक्त में अमूर्त काल का विस्तृत वर्णन हुआ है। इस सूक्त में इसे अश्व के रूप में प्रतिपादित करते हुए विश्व का नियामक कहा गया है।
अथर्ववेद के अनुसार काल का रूप है अश्व। यह सप्तरश्मियों से युक्त, सहस्राक्ष, अजर एवं प्रचुर रेतस् वाला है। इसी ने भुवन बनाया है। यही संपूर्ण विश्व के चारों ओर घूमता है। यही सबका पिता है एवं यही पुत्र बनाता है। इसी द्युलोक और पृथ्वी की उत्पत्ति हुई है। इसी में तीनों काल भूत, वर्तमान और भविष्यत् समाहित हैं। काल में सूर्य तपता है। यही दृग की दृष्टि है। इसी में मन, प्राण एवं नाम समाहित हैं। यही सबका ईश्वर और प्रजापति है। इस काल ने ही प्रजाओं का सृजन किया। प्रारंभ में इसने प्रजापति को बनाया। स्वयंभू कश्यप और तपस इससे उत्पन्न हुए। इसमें ही आपः तपस, दिशाएँ, सूर्य, वायु, पृथ्वी, ऋक् यजुष, यज्ञ, अप्सरा, गंधर्व एवं लोकादि प्रतिष्ठित हैं। काल में ही यम, अंगिरा, देव एवं अथर्वण सन्निहित हैं। लोक-परलोक, पुण्य लोक एवं सभी लोकों को जीतकर यह काल परम देवत्व को प्राप्त कर रहा है।
वैदिक युग में काल का समय-बोध के सामान्य पर्याय के रूप में प्रयोग मिलता है। इसके अतिरिक्त उस युग में काल का दार्शनिक रूप अधिक व्यापक हो गया था। उपनिषद् काल में इसका और भी विस्तार मिलता है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् में काल को जगत् का कारण बताया गया है। मैत्रायणी उपनिषद् की मान्यता है कि काल से ही भूतों का जन्म होता है। इसी से वृद्धि होती है एवं इसी में विलय हो जाता है। इसके अनुसार काल मूर्त एवं अमूर्त दोनों प्रकार का होता है।
महाभारत में काल के संहारक स्वरूप का संकेत मिलता है। मनुस्मृति के अनुसार काल एवं कालखंड परमात्मा द्वारा उत्पन्न होते हैं। गीता में भगवान् कृष्ण ने स्वयं को लोकों को क्षय करने वाला काल बताया है। पुराणों में काल के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन मिलता है। वायुपुराण में इसे चतुमूर्ति, चार मुख एवं चार द्रष्टा वाला कहा गया है। यह लोकों के संरक्षण के लिए सबका अतिक्रमण कर सकता है। इसके लिए कोई वस्तु असाध्य नहीं है। यही भूतों का जन्मदाता एवं संहारकर्त्ता है। सभी भूत काल के वशीभूत हैं। काल किसी के वश में नहीं है। कूर्म एवं विष्णु धर्मोत्तर पुराणों में कालरूपी परमात्मा को अनादि, अनंत, अजर एवं अमर बताया गया है। यही महेश्वर है। वैशेषिक सूत्र, योग सूत्र, न्याय सूत्र एवं न्याय मंजरी के पदार्थ निरूपण प्रसंग में भी काल की विवेचना हुई है। बौद्ध मत में काल की स्वतंत्र सत्ता नहीं है। यदि काल आदि-अंत से रहित है, तो उसमें निकट और दूर का भेद संभव नहीं है। अतः बौद्ध मान्यता के अनुसार काल कोई वस्तु नहीं, बल्कि एक विचार है। जैन दर्शन में काल छह पदार्थों में से एक है।
मैत्रायणी उपनिषद् में ब्रह्म के दो रूप मिलते हैं, अकाल और काल। जो सूर्य से परे है उसे अकाल एवं जो सूर्य से संबंधित है, उसे काल की मान्यता प्रदान की गई है। काल से लोक व्यवहार परिचालित होता है। इसे सूक्ष्म एवं स्थूल अथवा मूर्त एवं अमूर्त में विभाजित किया गया है। यही भेद तैत्तिरीयारण्यक में अणु एवं महत् नाम से जाना जाता है। श्रीमद्भागवत् में भी यही स्वरूप मिलता है। काल का व्यवहृत प्राणस्वरूप मूर्त है एवं त्रुटि आदि अव्यवहार्य रूप अमूर्त काल कहे गए हैं।
जैन ग्रंथ जंबूद्वीप पण्णति में व्यवहार एवं परमार्थ के रूप में काल के दो भेद बताए गए हैं। व्यवहार काल मनुष्य लोक में, परमार्थ काल सर्वलोक में प्रचलित है। दूसरा भेद संख्येय एवं असंख्येय है। गणना के योग्य काल को संख्येय एवं गणना से रहित असंख्येय काल होता है। ये दोनों मूर्त एवं अमूर्त के समान ही हैं। इनकी उत्पत्ति सूर्य से हुई है। संख्येय और असंख्येय काल कर्मभूमि में सूर्य की गति से देखा जाता है। सूर्य की गति विशेष से ही निमेष, काष्ठा, कला, युग आदि की जानकारी मिलती है।
वैदिक काल में काल के विभिन्न सूक्ष्म अवयवों का प्रचलन प्रारंभ हो चुका था। उन दिनों मुहूर्तों से लेकर युगों तक के काल-मान प्रचलित थे। व्यावहारिक काल की सूक्ष्मतम एवं वृहत्तम सीमाएँ अणु, परमाणु एवं निमेष से लेकर द्विपरार्द्ध तक पहुँच गई थीं। इसे परम और महान् काल भी कहा गया है। निमेष से वत्सरपर्यंत यह काल की एक इकाई थी। इसका वर्णन वैदिक काल से लेकर कौटिल्य काल तक मिलता है। युगों की इकाई भी इस काल तक विकसित हो चुकी थी। परंतु इसका सुनिश्चित मान तय नहीं हुआ था। वाजसनेयी संहिता में निमेष नामक काल-मान का उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण में मुहूर्त, क्षिप्त, एतर्हि, इदानीम, नदानीम, उच्छ्वास, प्रश्वास, निमेष आदि का संकेत है। वृहदारण्यक में निमेष, मुहूर्त, अहोरात्र, अर्द्धमास, मास, ऋतु एवं संवत्सर नामक काल-मान उल्लिखित हैं। महाभारत में क्षण, लव, मुहूर्त, दिवस, रात्रि, अर्द्धमास, मास, ऋतु संवत्सर और युग का जिक्र मिलता है। कौटिल्य ने कालखंडों को त्रुट, लव, निमेष, काष्ठा, कला, नाडिका, मुहूर्त, दिवस, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर एवं युग में विभाजित किया है।
पुराणों में ब्रह्मा द्वारा लव, काष्ठा, कला, मुहूर्त, रात-दिन, संधि, अर्द्धमास, अयन और युगों वाली युगावस्था का उल्लेख हुआ है। काल-गणना की दूसरी वृहत्तम इकाई पुराणों एवं ज्योतिष सिद्धाँतक ग्रंथों में और वृहत्संहिता के वैशेषिक सूत्र के प्रशस्तपाद भाष्य में युग, मन्वंतर, कल्प एवं प्रलय आदि रूपों में वर्णन वर्णित हुआ है। पुराणों एवं 222 ग्रंथों में युग का मान मिलता है। इसकी विशेषता है 222 और कल्प संबंधी व्यवस्था। इस व्यवस्था को 222 के सिद्धाँत ग्रंथों में भी अपनाया गया है।
पौराणिक युग में काल के दो भेद माने गए थे, सूक्ष्म और स्थूल। वायु और भागवत् पुराण में काल के दो अवयवों का चित्रण दो विशिष्ट परंपराओं में प्राप्त होता है। वायु पुराण के अनुसार निमेष काल की सबसे छोटी इकाई है, भागवत् पुराण में निमेष से भी सूक्ष्म काल के लव, वेद, त्रुटि, तसरेण, अणु और परमाणु आदि का उल्लेख है। 15 निमेष-1 काष्ठा, 30 काष्ठा-1 कला, 30 कला-1 मुहूर्त और 30 मुहूर्त का एक अहोरात्र होता है। सुश्रुत के अनुसार 15 अहोरात्र-एक पक्ष, दो पक्ष-एक मास, 12 मास-एक संवत्सर, छह मास-एक अयन, 2 अयन-एक संवत्सर, 5 संवत्सर-एक युग का होता है।
मानव काल-गणना का एक माह पितरों के एक अहोरात्र के बराबर होता है। तीस मानव मासों का एक पितृमास एवं 360 मानस मासों का एक पितृ संवत्सर होता है। मनुष्य के 100 वर्ष पितरों के लगभग साढ़े तीन वर्ष के बराबर होते हैं। मनुष्य का एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात कहा गया है। उत्तरायण देवों का दिन और दक्षिणायन उनकी रात्रि होती है। 360 मानव वर्षों का एक दिव्य संवत्सर (देव वर्ष) माना गया है। 3030 वर्षों का एक सप्तर्षिवत्सर कहा गया है। 9090 वर्षों का एक क्रौंचवत्सर होता है।
भारतीय संस्कृति में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग चार युगों की मान्यता है। 12 हजार दिव्य वर्षों या 4320000 का एक चतुर्युग बताया गया है। मार्कंडेय एवं विष्णु पुराण के अनुसार काल की एक इकाई होती है, जिसका मान 71 चतुर्युगों के बराबर होता है। मत्स्य पुराण में 14 मन्वंतरों कल्प का उल्लेख है। विष्णु पुराण में 14 मनुओं की विवेचना है, स्वायंभु, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णिक, दक्षसावर्णिक, ब्रह्मसावर्णिक, रुचि एवं भौम। प्रथम छह मनु व्यतीत हो चुके हैं। वर्तमान में वैवस्वत मनु चल रहा है। आठवें से 14वें तक भविष्य के मनु हैं। एक ब्रह्म कल्प में 14 मन्वंतर होते हैं। विभिन्न पुराणों में इसके वर्षों में अंतर मिलता है।
ऋग्वेद में कल्प शब्द का उल्लेख मिलता है। अभिलेखों में भी इसका जिक्र हुआ है। अशोक के चतुर्थ (गिरनार एवं काल सी) एवं पंचम (शाहबाज गढ़ी एवं मनसेरा) शिलालेखों में कल्प प्रतिसर्ग के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। ईसवी पूर्व तीसरी शताब्दी में कल्प का प्रचलन हो चुका था। बौद्धों में भी इसका संकेत मिलता है।
वायु पुराण के अनुसार एक कल्प में एक हजार चतुर्युग होता है। सूर्य के सिद्धाँत में कल्प को ब्रह्मा का दिन माना गया है। एक सहस्र कल्पों का ब्रह्मा का एक वर्ष होता है। वायु पुराण में ब्रह्मा के बीते हुए 28 कल्पों का वर्णन मिलता है। वर्तमान में श्वेतवाराहकल्प चल रहा है। ब्रह्मवैवर्त में 3, मत्स्य पुराण में 31 और ब्रह्माँड पुराण में 35 कल्पों का उल्लेख हुआ है।
ब्रह्मा की आयु दो परार्द्ध होती है। ब्रह्माँड पुराण परार्द्ध की संख्या का निरूपण करता है। एक, दश, शत्, सहस्र, अयुत (दश सहस्र), नियुत् (एक शत सहस्र), प्रयुत (दश शत सहस्र), कोटि (दश सहस्र अयुत), अर्बुद (दश कोटि), अब्ज (एक सौ कोटि), खर्ब (एक सहस्र कोटि), निखर्ब (दस कोटि सहस्र), 222 (एक सहस्र कोटि), पद्म (सहस्र सहस्र कोटि), समुद्र (सहस्र सहस्र दश कोटि), अन्त्य (कोटि सहस्र नियुत्), मध्य (कोटि सहस्र प्रयुत्), परार्द्ध (कोटि सहस्र कोटि)। परार्द्ध का दुगना ‘पर’ कहा गया है। परार्द्ध की यह संख्या यजुर्वेद में भी मिलती है।
ज्योतिष संहिताओं एवं सिद्धाँत ग्रंथों के अनुसार नौ प्रकार के काल-मान होते हैं। कहीं-कहीं चार और पाँच प्रकार के काल-मानों का उल्लेख मिलता है। ब्रह्मा से संबंधी काल-मान को ब्रह्म-मान कहा जाता है। बारह मासों का एक देव मान होता है। 30 तिथियों का एक चंद्र-मान होता है। यह पितरों के एक दिन के बराबर है। इसमें कृष्णपक्ष का दिन भाग एवं शुक्ल पक्ष का राशि भाग होता है। मन्वंतर व्यवस्था संबंधी काल-मान ही प्राजापत्यमान है। जो चारों युगों का 71 गुना कहा गया है। मध्यम गति से एक राशि में गुरु को जितना समय लगता है, उसे गौर वर्ष कहते हैं। सूर्य द्वारा एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश काल को एक सौर मास कहा जाता है। यह सामान्यतया 365 दिन का होता है।
भास्कराचार्य के अनुसार वर्ष, अयन, ऋतु, युग आदि का सौर से, मास एवं तिथियों का चंद्र-मान से, कृच्छ, सूतक, चिकित्सा, वासर आदि का विचार सावन-मान से और दिनों का घटिकादिक दिन मान नक्षत्र-मान से किया जाता है। इस प्रकार उक्त नौ प्रकार के मानों में मुख्यतः सौर, सावन, चंद्र और नक्षत्र आदि चार मानों का व्यवहार मिलता है। वेदाँग ज्योतिष एवं कौटिल्य ने भी इन मानों का उल्लेख किया है। इन्हीं से जीवन की गति-प्रगति होती रही है। ठीक भी है, यदि काल-गणना ही न हो तो भला जीवन को कौन गतिशील बनाए?
छोटे-से घर में जन्म लेकर संपन्नता की पराकाष्ठा तक पहुँचने पर भी महापुरुष कभी बदलते नहीं। हेनरी फोर्ड अमेरिका के एक छोटे-से ग्राम ग्रीनफील्ड में जन्मे। घर की आर्थिक स्थिति खराब होने से उन्हें बारह वर्ष की आयु से ही नौकरी करनी पडीं, रात में पढ़ाई और दिन में मशीनों काे बनाना, सुधारना, इस प्रकार उनकी पूरी दिनचर्या उद्देश्यपूर्ण कार्यों में लग गई।
लगन की प्रचंड शक्ति ने हेनरी को स्वावलंबी, इंजीनियर एवं मैकेनिक बना दिया। उसने कई तरह की मशीनों को बनाया और सुधारा। उसकी लगन उसे इस दिशा में निपूण बनाती रही। फोर्ड ने मोटर बनाने का नया कार्य हाथ में लिया और वह बिगड़ते-सुधरते सफलता के स्तर तक पहुँच गया। उसने जलयान भी बनाए।
अमेरिका में हेनरी फोर्ड का कारखाना प्रथम श्रेणी का है। उसमें हजारों व्यक्ति काम करते हैं। श्रमिकों की सुविधा का उसमें पूरा ध्यान रखा जाता है। फोर्ड ने जो कमाया, उसका अधिकाँश भाग जनकल्याण के कार्यों के लिए दान किया। उसके दान में किसी देश-जाति का कोई भेदभाव नहीं रखा गया। फोर्ड फाउंडेशन द्वारा अनेकों परमार्थ कार्य चलते हैं, जो अब तक अरबों-खरबों का दान कर चुका है।
मनुष्य भगवान् नहीं बन सकता, यह सत्य है, पर उसकी शक्ति को स्वयं में ग्रहण-धारण कर अपनी समर्थता का आभास अवश्य दिला देता है। जब अंशधर सत्ता इतनी शक्तिशाली हो सकती है, तो स्वयं भगवान् कितने सामर्थ्यवान् होंगे, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि मनुष्य निर्बल नहीं, बलवान है।
मूर्द्धन्य नृतत्ववेत्ता स्टील्स ने अपने संस्मरणों में इस बात का उल्लेख किया है कि मनुष्य साधारण सत्ता और महत्ता वाला प्राणी भर प्रतीत होता है, पर यदि किसी को उसके अंदर तक झाँक सकने की दृष्टि मिल सकी होती, तो वह देख सकता कि मनुष्य वस्तुतः कितना दिव्य और विभूतिवान् है। वे सन् 1950 के अंतिम दशकों में पूर्वी कनाडा में कोण्टाग्नेज इंडियन्स के अध्ययन के दौरान बिताए गए क्षणों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार वे जंगलों में छोटी-छोटी कुटिया बनाकर दूरश्रवण की क्षमता विकसित करने के प्रति प्रयत्नशील दिखाई पड़े, वह वास्तव में लक्ष्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और निष्ठा ही दर्शाता है। वे तब तक एकाँतवास का जीवन व्यतीत करते, जब तक उस सामर्थ्य को पूर्णतः प्राप्त न कर लेते। इसकी प्राप्ति के उपराँत वे कठिनाई में पड़े अपने दूरस्थ मित्रों और कुटुँबियों से संपर्क साधने और उन्हें आवश्यक संदेश देने में इस शक्ति का उपयोग करते। अनेक बार वे इसी शक्ति के माध्यम से उन्हें संकटों से उबारते और उनकी रक्षा करते। उस दौरान उनके झोंपड़ों का काँपना इस बात का स्पष्ट प्रमाण होता कि वे किसी दूरवर्ती के सघन संपर्क हैं और दोनों के बीच कोई महत्त्वपूर्ण आदान-प्रदान चल रहा है।
स्टीफन स्वाट्ज ने भी अपनी रचना ‘दि सीक्रेट वॉल्ट्स ऑफ टाइम, साइकिक आरकियोलॉजी एण्ड दि क्वेस्ट फोर मैन्स बिगनिंग्स’ में मोण्टाग्नेज इंडियन्स के अतींद्रिय क्षमताओं का बखान करते हुए लिखा है कि वे दूरश्रवण में पारंगत थे। इसके अतिरिक्त भी उनमें विविध प्रकार की सामर्थ्य थी। वे बादलों का आवाहन कर तत्काल वर्षा कराने में समर्थ थे। किसी व्यक्ति में अतिशय गरमी और अतिशय शीत की अनुभूति को क्षण मात्र में परिवर्तित करने की शक्ति उनमें विद्यमान थी। वे जड़ में भी गति पैदा करने की विभूति से संपन्न थे। उनका मत है कि पंचभौतिक प्रकृति पर नियंत्रण के लिए पंच तत्त्वों पर नियंत्रण आवश्यक है। वे इस विचारधारा से भी सहमत थे कि मानवी शक्ति वास्तव में अंतस् की परिष्कृति की ही पर्याय है।
पं. गोपीनाथ कविराज अपनी पुस्तक ‘सनातन साधना की गुप्त धारा’ में लिखते हैं कि इस जगत् में अज्ञान के आवरण में आच्छन्न होकर मोहनिद्रा में निद्रित हैं। इससे जागना ही वास्तविक जाग्रति है, शक्ति का अनावरण है, विभूतियों का उद्भव और ऐश्वर्य का प्रकटीकरण है। हम लोग व्यवहार भूमि में जिसे जाग्रत् अवस्था समझते हैं, वह भी वास्तव में जाग्रत् नहीं है। चेतना की तीन स्थितियाँ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति भी प्रकाराँतर से नींद के ही भेद मात्र हैं। इनको त्यागना ही ईश्वरप्राप्ति है। पूर्णत्व लाभ इसी को कहते हैं। इसके पश्चात् शक्ति का ऐसा प्राकट्य होता है कि ‘जीव’ ‘शिव’ और ‘नर’ ‘नारायण’ बन जाता है।
आदि शंकराचार्य ने अपनी ‘दक्षिणा मूर्ति स्तोत्र’ में इस बात का स्पष्ट संकेत किया है कि मोहनिद्रा से जीव को जो जगा देता है, वही वास्तविक गुरु है। जीव की संपूर्ण जाग्रति की स्थिति में उसे इस बात का स्फुट अनुभव होता है कि यह जगत् उससे बाहर नहीं है, वरन् नगर प्रतिबिंबित होता है और वह प्रतिबिंबित नगर जिस प्रकार दर्पण के अंतर्गत है, उससे बाहर नहीं, ठीक उसी प्रकार समग्र विश्व ही आत्मरूपी स्वच्छ दर्पण में प्रतिबिंबित होता है। इसलिए यह कहना गलत नहीं है कि यह विश्व, आत्मा के अपने ही भीतर है, बाहर नहीं। माया के कारण जो अंतर की वस्तु है, उसे बाहर देखा जाता है। सद्गुरु ही जीव सत्ता को इस निम्न भूमिका से ऊपर उठाते और आगे बढ़ाते हैं। साधना का समग्र उद्देश्य और गुरुकृपा का संपूर्ण लक्ष्य साक्षात्कार कहते हैं। साधारण से असाधारण एवं क्षुद्र से महान् बनने की यही प्रक्रिया है।
अपनी प्रसिद्ध कृति ‘योगी गुरु’ में बंगाल के सिद्ध योगी निगमानंद कहते हैं कि योग की प्रारंभिक प्रक्रियाओं से गुजरते हुए साधक जब सफलतापूर्वक समाधि-सोपान तक पहुँचता है, तब उसे पहली बार यह ज्ञात होता है कि उसकी शक्ति कितनी असीम है। ससीमता के बंधन को तोड़ते हुए जब वह असीमता के द्वार पर पहुँचता है, तो सोचता है कि मनुष्य भी कितना मूढ़ है कि सब कुछ होते हुए भी वह दीन-दयनीय स्थिति में पड़ा-पड़ा विपन्नता के आँसू बहाता रहता है! जिस क्षण मानवजाति की यह मूर्च्छना टूटेगी, उसी क्षण वह मनुष्य से शक्तिसंपन्न देवता बन जाएगा।
मनुष्य की शक्ति कितनी चमत्कारिक हो सकती है, इसकी चर्चा करते हुए प्रख्यात नृतत्वविज्ञानी डाउग बॉयड ने अपने ग्रंथ ‘रॉलिंग थण्डर’ में एक ऐसे अमेरिकी व्यक्ति का वर्णन किया है, जिसे लोग रॉलिंग थण्डर बनाम ‘शक्ति का स्वामी’ कहकर पुकारते थे। एक बार उसने एक बड़े से कीड़े को सींक के सहारे छेड़ दिया। उसमें तीव्र हलचल हुई। वह बेचैन होकर इधर-उधर भागने लगा। उसी के साथ वहाँ भयंकर तूफान आ गया। कीटक के शाँत होने के साथ-साथ वह भी शाँत हो गया। लोग इसे संयोग न समझ बैठें, इस भ्रम को दूर करने के लिए रॉलिंग थण्डर ने उसे दुबारा छेड़ा। कीड़ा फिर व्याकुल हो उठा। उसके साथ ही एक तीव्र चक्रवात पुनः आ उपस्थित हुआ, जो पहले की तरह कीटक के शाँत होने के साथ-साथ धीरे-धीरे थम गया। अगली बार रॉलिंग थण्डर ने कीड़े को उछाल दिया। वह पीठ के बल आ गिरा। दूसरे ही पल एक प्रचंड आवाज के साथ बिजली कौंधी। कई बार इस क्रिया की पुनरावृत्ति की गई। हर बार तीक्ष्ण ध्वनि के साथ बिजली कड़की। दोनों क्रियाएँ इतने आश्चर्यजनक ढंग से साथ-साथ होतीं, मानो कीड़े के गिरने का सीधा संबंध वज्रपात से हो। भौतिक क्रियाओं में जिस तरह का कार्य-कारण संबंध दिखलाई पड़ता है, वैसा ही कुछ यहाँ देखा गया। थोड़ी देर पश्चात् घनघोर वर्षा आरंभ हो गई, जो घंटों जारी रही।
एक अन्य प्रसंग में रॉलिंग थण्डर ने अपनी अतींद्रिय शक्ति के माध्यम से जेल काट रहे एक कैदी को कारागार से मुक्त कराया था। उस व्यक्ति ने वियतनाम युद्ध में लड़ाई लड़ने से मना कर दिया था। इसे सरकारी अवज्ञा समझकर उसे बंदी बना लिया और कारावास में डाल दिया गया।
तब रॉलिंग थण्डर के साथ एक अन्य नृतत्वशास्त्री जॉन वेल्श भी थे। दोनों लीवेनवर्थ जेल पहुँचे और दरबान से अपने आने का अभिप्राय बताया, कहा कि वे उस कैदी से मिलना चाहते हैं और उसे साथ ले जाने की भी इच्छा है। थोड़ी देर पश्चात् एक जेल अधिकारी आया और कहा कि उससे मिलना संभव नहीं है। रॉलिंग थण्डर अपनी बात पर अड़ा रहा और मिलाने का बार-बार आग्रह करता रहा। इसी बीच एक अन्य अधिकारी वहाँ पहुँचा। उसने बताया कि उस कैदी को दूसरी जेल में स्थानाँतरित कर दिया गया है।
शाम हो चुकी थी, इसलिए दोनों नजदीक के एक होटल में चले गए। अर्द्धरात्रि को रॉलिंग थण्डर अचानक क्रोधित हो उठा। उसने वेल्स को बताया कि अधिकारियों ने झूठ बोला है। कैदी यहीं है। अभी-अभी उसने जेल के अंदर जाकर इसकी जानकारी की है। यदि वे असत्य का सहारा लेंगे, तो वह ‘भय’ को हथियार बनाएगा।
दूसरी सुबह उसने वेल्श से आग्रह किया कि वह उसके साथ सिगार पिए और नदी तट पर चलकर मंत्र जपे। थोड़ी ही देर में सिगार से अत्यंत काला धुआँ निकलकर हवा में तिरोहित हो गया। उसी समय गड़गड़ाहट की तुमुल ध्वनि हुई और ऊपर आकाश में बादल इकट्ठे होने लगे। उसका एक बड़ा टुकड़ा उनके साथ-साथ जेलखाने की ओर बढ़ चला। वहाँ पहुँचकर रॉलिंग थण्डर इस बुरी तरह चिल्लाया कि द्वारपाल डरकर भीतर चला गया और अधिकारियों को बुला लाया। उन लोगों ने उसे वहाँ से चले जाने को कहा, किंतु उसने बादल की ओर इशारा किया और उसे देखते रहने को कहा। जैसे ही उन लोगों ने वैसा करना शुरू किया, बादल उनकी ओर बढ़ने लगा। इसके साथ ही धूल और पत्थर हवा में उड़ने लगे और वहाँ एक चक्रवात उत्पन्न हो गया। जेल की इमारत उसमें बुरी तरह फँस गई। उसका द्वार उखड़कर हवा में उड़ने लगा। जेल अधिकारी भयभीत हो गए। वे कैदी को उसके साथ जाने देने के लिए सहमत हो गए।
लीवेनवर्थ के ही कारावास से संबंधित पच्चीस वर्ष पूर्व की एक घटना की चर्चा करते हुए मूर्द्धन्य मनोविज्ञानी डोनाल्ड पॉवेल विल्सन ने अपनी पुस्तक ‘माई सिक्स कन्विक्ट्स’ में हैडाड नामक एक ऐसे हत्यारे का वर्णन किया है, जो अद्भुत शक्तिसंपन्न था। विल्सन को हैडाड की विलक्षणता के बारे में पहली बार तब जानकारी मिली, जब वे कारागृह में हैडाड की कोठरी में गए। वहाँ उसका निर्जीव-सा शरीर लोहे की छड़ों के सहारे एक बेल्ट के माध्यम से लटक रहा था। यह बेल्ट किसी वार्डर का था, जो उसकी कमर से रहस्यमय ढंग से गायब हो गया था। बाद में उसका शव परीक्षण के लिए शव-परीक्षण कक्ष में ले जाया गया। वहाँ जैसे ही डॉक्टरों ने चीर-फाड़ के औजार उठाने प्रारंभ किए, वह धीरे से उठ बैठा। उसने बताया कि वह वास्तव में मरा नहीं था, अपितु समाधि में चला गया था, इस कारण से शरीर प्रणाली की सभी क्रियाएँ एकदम ठप्प हो गई थीं।
अगले दिन उसने अपनी शक्ति का एक बार फिर प्रदर्शन किया। इस बार कुछ दूसरे ढंग से उसके साथ बहुत सारे मिर्गी के रोगी थे, जिन्हें नियमित रूप से दौरे पड़ते थे। सबको अस्पताल के मनोरोग वार्ड में एक साथ रखा गया था। हैडाड ने उनके दौरे शक्ति प्रयोग के द्वारा तीन दिन तक रोके रखने की घोषणा की। सचमुच इस मध्य किसी को भी दौरे नहीं पड़े। अवधि समाप्त होते ही उनका आना पुनः शुरू हो गया।
एक अन्य प्रदर्शन में उसने शरीर के कपड़े उतारे और डेस्क के ऊपर निश्चेष्ट लेट गया। उसके बाद घोषणानुसार उसके शरीर पर बारह राशियाँ उभर आईं। इस समय जब उसकी नस को बींधा गया, तो उसमें रक्त नहीं के बराबर था। इससे ऐसा प्रतीत होता है, उसने शरीर की समस्त अनैच्छिक क्रियाओं पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था। वह इच्छानुसार जेल से गायब हो जाता था और पुनः वापस लौट आता। विल्सन लिखते हैं कि एक बार जब उसे पुलिस की गाड़ी पर बिठाकर जेल लाया जा रहा था, तो बंद गाड़ी से अचानक अदृश्य हो गया। बाद में उसने जेल के फाटक से अंदर प्रवेश किया। बताया कि वह रास्ते में खो गया था। एक अन्य अवसर पर उसे एक संगीत कार्यक्रम में देखा गया। पूछने पर बताया कि कार्यक्रम समीप ही हो रहा था और देखे हुए काफी समय हो गया था, अतः उसमें सम्मिलित हो गया। कार्यक्रम के उपराँत वह उसी अलौकिक तरीके से जेल के अंदर चला गया, जिस तरह बाहर निकला था। हैडाड विलक्षण व्यक्ति था। वह जो चाहता, उसे संभव कर दिखाता। उसके लिए असंभव कुछ भी नहीं था। वह अक्सर कहा करता कि साधारण इन्सान के लिए जो कठिन और असाध्य प्रतीत होता है, वह उसके लिए अत्यंत सामान्य-सी बात है। हैडाड साधारण दीखता भर था, पर उसकी शक्ति असाधारण थी। इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बार वह दुश्मनों के चुंगुल में फँस गया। उन्होंने उसकी कार को गोलियों से छलनी कर दिया, फिर भी उसे कुछ नहीं हुआ। उसका कहना था कि गोलियाँ उसके शरीर से टकराकर बिखर गईं, जैसे वह हाड़-माँस का न होकर इस्पात का बना हो। अंततः दुश्मनों ने हार मान ली। वे उसे मार नहीं सके और उसको कोसते हुए लौट गए।
मनुष्य साधारण नहीं, दिव्य क्षमतावान् है। उसकी शक्तियाँ प्रदर्शन और बड़प्पन सिद्ध करने के लिए नहीं, कल्याण-कामना हेतु नियोजित होनी चाहिए। बाजीगरी यदि महानता की निशानी रही होती, तो हर चौक-चौराहे पर करतब दिखाने वाले लोग महान् कहलाते और पूजे जाते, पर ऐसा कहाँ है! शक्ति का वास्तविक उपयोग दूसरों की सहायता में है, अपनी शान में नहीं। जो इस मूल मंत्र को अपनाते हैं, वे यश और सम्मान के भागी बनते और जन्म-जन्माँतरों तक याद किए जाते हैं।
पाँडवों ने राजसूय यज्ञ किया। उसमें सर्वोत्तम पद चुन लेने के लिए कृष्ण को कहा गया। उन्होंने आगंतुकों के पैर धोकर सत्कार करने का काम अपने जिम्मे लिया। यह उनकी निरहंकारिता और विनम्रता की पराकाष्ठा ही थी।
राविया बसरी संतों के संग बैठी बातें कर रही थी। तभी हसन बसरी वहाँ आ पहुँचे और बोले, “चलिए, झील के पानी पर बैठकर हम दोनों अध्यात्म की चर्चा करें।” हसन के बारे में प्रसिद्ध था कि उन्हें पानी पर चलने की सिद्धि प्राप्त है।
राविया ताड़ गई कि हसन उसी का प्रदर्शन करना चाहते हैं। बोलीं, “भैया, यदि दोनों आसमान में उड़ते-उड़ते बातें करें, तो कैसा रहे?” (राविया के बारे में भी प्रसिद्ध था कि वे हवा में उड़ सकती हैं।) फिर गंभीर होकर बोलीं, “भैया जो तुम कर सकते हो, वह हर एक मछली करती है और जो मैं कर सकती हूँ वह हर मक्खी करती है। सत्य करिश्मेबाजी से बहुत ऊपर है। उसे विनम्र होकर खोजना पड़ता है।कि अध्यात्मवादी को दबा करके अपनी गुणवत्ता गँवानी नहीं चाहिए।” हसन ने अध्यात्म का मर्म समझा और राविया को अपना गुरु मानकर आत्मपरिशोधन में जुट गए।
माता प्रकृति अनेकानेक रहस्यों एवं आश्चर्यों की जन्मदात्री है। अगणित रहस्य एवं आश्चर्य इसके गर्भ से उपजते, बढ़ते एवं हमें चमत्कृत करते रहते हैं। अरोरा एवं व्हीशलर की बात भी कुछ ऐसी ही है। इन दोनों का ही संबंध मैग्नेटोस्फीयरिक प्लाज्मा से है। जो सूर्य के सहारे जन्मता और उफनता है।
सूर्य ऊर्जा का स्रोत है। सूर्य की सक्रियावस्था में चुँबकीय तूफान उमड़ते हैं। इसमें अरबों किलोवाट ऊर्जा होती हैं इस ऊर्जा के कण आपसी प्रतिक्रिया करके अंतरिक्ष के वातावरण को गतिशील एवं सक्रिय बनाए रखते हैं। इसमें विद्युत् चुँबकीय क्षेत्र का योगदान भी बड़ा महत्वपूर्ण होता है। हमारी धरती एक विराट् प्लाज्मा की प्रयोगशाला है और यही विघातक एवं विषैले विकिरणों से हमारी रक्षा करती है। इसे सुरक्षा कवच माना जा सकता है।
चुँबकीय प्लाज्मा धरती के समस्त चुँबकीय क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। वैज्ञानिक इसका संबंध अरोरा एवं व्हीशलर से जोड़कर देखते हैं। इस क्षेत्र में सर्वप्रथम 1745 में स्वीडन के सेल्सियस ने कार्य किया था। उन्होंने अरोरा को चुँबकीय व्यतिवम से संबंधित बताया।
अरोरा आसमान में घूमते हुए प्रकाश की भाँति है। प्राचीन कथाओं में इसे देवताओं के उदय एवं अवतरण के रूप में भी चित्रित किया गया है। संस्कृत में इसे उषा या प्रभात से संबोधित किया गया है। अरोरा ऐसा निकलता है जैसे कोई साड़ी वाला अपने अंदर से रंग-बिरंगी साड़ियों को आसमान में उछाल रहा हो। यह आर्कटिक अंतरिक्ष में किरणों की अद्भुत जादूगरी दिखाता है। पृथ्वी के दोनों ध्रुवीय चुँबकीय क्षेत्र में अरोरा को देखा गया है। उत्तरी अरोरा को अरोरा बोरेलिस (उत्तरी उषा) कहते हैं। सर्वप्रथम फ्राँसीसी अंतरिक्षविद् गैसेण्डी ने 12 सितंबर 1621 को दक्षिणी प्राँत में इस मनोरम दृश्य को देखा और इसका नामकरण किया। कैपटन कुक ने 19 फरवरी 1773 में भारतीय समुद्र के 5706’ह्य दक्षिणी अरोरा को देखा एवं इसका नाम अरोरा आस्ट्रेलीस रखा।
अरोरा अंतरिक्ष के अंदर 650 से 800 अक्षाँश में स्थित होता है। इसी वजह से संभवतः यह मैदानी क्षेत्र जैसे भारत में दृष्टिगोचर नहीं होता, परंतु इसका अपवाद भी है। 4 फरवरी 1872 में इसे मुँबई एवं अपने देश के कई स्थानों पर देखा गया। कभी-कभी अरोरा इलीप्ट एवं विश्व के अन्य देशों में भी अभूतपूर्व चुँबकीय तूफानों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता है।
इस पर अनेकों किंवदंतियां भी प्रचलित हैं। अरस्तु ने इसे चैज्म (ष्टद्धड्डह्यद्व-ष्टद्धड्डह्यद्वड्डह्लड्ड) कहा है। इसका तात्पर्य है “आकाश फटने से उत्पन्न प्रकाश।” अरोरा को किसी बड़ी घटनाओं का जन्मदाता भी माना जाता है। इसके लाल रंग के कारण इसे तलवारबाजी से जोड़ा जाता है। सन् 1938 में तो यह उत्तर दिशा में भीषण दावानल के रूप में दिखा। इसी वजह से इंग्लैंड के फायर ब्रिगेड वाले इसकी खोज में निकल पड़े, ताकि इस अग्निकाँड को बुझा सकें। अरोरा कवियों के काव्यमय अलंकारों में भी झलका है। 1743 में एक रूसी विज्ञानी लोम्नोसोव इसे देख इतने भावुक हो गए थे कि इस पर उन्होंने कविता रच डाली थी। वे एक कवि भी थे। ग्रीक में टूटते तारों, भूकंप आदि से भी इसका संबंध जोड़ा गया है।
वैज्ञानिक मान्यतानुसार आयनमंडल के अणु-परमाणुओं के सूर्य से प्रभावित इलेक्ट्रॉनों से टकराने से अरोरारूपी रंग-बिरंगा प्रकाश उत्पन्न होता है। यह विचार 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में नार्वे के वैज्ञानिक बर्कलैंड एवं स्ट्रोमर ने दिया। आधुनिक शोध-निष्कर्ष इसे वायुमंडल के विक्षोभ से उत्पन्न नहीं मानता। आज इसके विद्युत् चुँबकीय दशा का परिणाम माना जा रहा है।
यह अरोरा अंतरिक्ष में भँवर के समान उठता है। आधुनिक अन्वेषण के अनुसार जब सौर वायु के चुँबकीय क्षेत्र और चुँबकीय मंडल के बीच प्रतिक्रिया होती है, तो अरोरा का जन्म होता है। सौर वायु में दस लाख मेगावाट विद्युत् शक्ति होती है। 1859 में जब टेलीकम्युनीकेशन का प्रचलन प्रारंभ ही हुआ था, तभी यह घटना घटित हुई थी। उस समय हुआ यूँ कि अरोरा की शक्ति से टेलीकॉम बिना बैट्री के चलने लगा। इससे एक प्रश्न खड़ा होता है कि क्या अरोरारूपी प्राकृतिक विद्युत् भंडार का उपयोग किया जा सकता है। अभी तक तो यह परिकल्पना मात्र है। परंतु बर्कलैण्ड के टेरेला सिद्धाँत से इस परिकल्पना को बल मिलता है।
उत्तर एवं दक्षिण ध्रुवीय अरोरा एक समान होते हैं और एक ही समय में क्रियाशील व गतिशील होते हैं। वैज्ञानिक दोनों अरोरा को एक ही स्रोत से उत्पन्न मानते हैं। दोनों क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन एक समान व्यवहार करता है। इन दोनों को ‘मिरर इमेज’ माना जा सकता है।
अरोरा का रंग आखिर इतना चमकीला एवं इतना आकर्षक क्यों होता है? इस परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिक मान्यता है कि आइनोस्फीयर में शून्य से इलेक्ट्रॉनों की भारी बौछार होती है। इससे आयन मंडल के अणु-परमाणु तेजी से गर्म होकर प्रकाश का विकिरण करते हैं। चूँकि इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के अणु-परमाणु में विभिन्न प्रकार की टकराहटें होती हैं। अतः भिन्न प्रकार के रंगों के प्रकाश उत्सर्जित होते हैं। यहाँ पर मुख्यतः ऑक्सीजन और नाइट्रोजन परमाणुओं की अधिकता होती है। जब यह परमाणु आयनीकृत होते हैं, तो विभिन्न प्रकार की प्रकाश तरंगों को उत्पन्न करते हैं।
रंग प्रकाश तरंग के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। ऑक्सीजन परमाणु से हरा दूधिया रंग निकलता है। इसका प्रभाव 110 से 250 किमी. अक्षाँश तक होता है। 300 से 400 किमी. अक्षाँश में जब कम ऊर्जा वाले कण ऑक्सीजन परमाणु से टकराते हैं, तो लालिमायुक्त प्रकाश निकलता है। नाइट्रोजन परमाणु से हरे रंग का प्रकाश निकलता है। उत्सर्जित करता है। आयनीकृत परमाणु से नीला रंग एवं उदासीन नाइट्रोजन से नील लोहित रंग निकलता है। इलेक्ट्रॉनों की इस बरसात से ही रंगों का समाँ बँधता है।
सौर वायु की तीव्रता से अरोरा प्रकाश भी प्रदीप्त हो उठते हैं। ये प्रकाश सामान्यतः पश्चिम से पूर्व की ओर गतिशील होते हैं। प्रातःकालीन वेला में ये विभिन्न रंगों से युक्त एवं बिखरे होते हैं। इस दौरान दो से तीन घंटों तक प्रकाश की ये चमत्कारिक अठखेलियाँ दृश्यमान होती हैं। अरोरा में 0.1 मिलियन मेगावाट ऊर्जा होती है। परंतु इसमें सौर वायु की तीव्रता के मिलते ही यह ऊर्जा 10 लाख मेगावाट तक पहुँच जाती है।
सौर क्रम की सक्रियावस्था में अरोरा की रंगीन छटा बड़ी मनोरम होती है। इस अवधि में रंगों का अद्भुत मिश्रण होता है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं तूलिका लिए आसमान के आसमानी परदे पर रंग उकेर रही हो। शाम सात से दस बजे तक यह प्रकाश गोलाई लिए हुए रहता है। इसकी गति एक क्षितिज से दूसरे क्षितिज तक बढ़ती है। देर शाम तक यह चार प्रकार की रेखाकृत संरचनाओं में परिवर्तित हो जाता है। इसे रेपीड आर्क कहते हैं। इनका विस्तार सैकड़ों किमी. के दायरे में विस्तृत होता है। मध्य रात्रि के आने तक सारे रंग विलुप्त हो जाते हैं। केवल दूधिया या हलका हरा रंग शेष बचा रह जाता है। फिर इनमें धुओं के बुलबुले उठते प्रतीत होते हैं। इन बुलबुलों का अस्तित्व एक सेकेंड से आधे मिनट तक होता है। इन्हें पल्सेटिंग अरोरा कहते हैं। रात के गुजरने के साथ ही अरोरा का प्रकाश कम होने लगता है। दिन के उजाले में ये दृष्टिगोचर नहीं होते तथा उत्तर की ओर जाते हुए प्रतीत होते हैं।
अरोरा के निर्माण में तीन तत्त्वों का होना आवश्यक है, सौर वायु, चुँबकीय क्षेत्र एवं ग्रह या उपग्रह का वायुमंडल। बुध ग्रह में पृथ्वी के समान चुँबकीय क्षेत्र होता है, परंतु वायुमंडल क्षेत्र के अभाव में वहाँ ध्रुवीय प्रकाश नहीं होता है। शुक्र एवं मंगल में चुँबकीय क्षेत्र का पता नहीं लगाया जा सका है। अतः वहाँ भी यह रंगीन प्रकाश नहीं है। चंद्रमा में चुँबकीय क्षेत्र एवं वायुमंडल की उपस्थिति में अरोरा नहीं दिखता। बृहस्पति में चुँबकीय क्षेत्र विद्यमान होता है और उसके वायुमंडल में हाइड्रोजन गैस होती है। अतः उसके ध्रुवीय प्रकाश को नोवियन अरोरा कहते हैं। हाइड्रोजन के कारण अरोरा का रंग गुलाबी होता है। शनि ग्रह में अरोरा दिखाई नहीं देता। यूरेनस और नेपच्यून में भी अरोरा का अस्तित्व नहीं होता।
मैग्नेटिक प्लाज्मा की एक और अद्भुत सुपर नेचुरल क्रिया है, व्हीशलर। श्रव्य रेडियो संकेत की आवृत्ति को व्हीशलर कहा जाता है। इसे कढ्ढद्ध (कद्गह्ब् द्यशख् स्नह्द्गह्नह्वद्गठ्ठष्ब्) कहते हैं। बिजली के तेज चमकने से इसकी आवृत्ति 300-30000 हर्ट्ज होती है। यह आवाज सुपर नेचुरल जैसी है, जो बिजली के तड़कने से आँधी एवं बरसात से आती है। सबसे पहले इस संकेत को 1859 में जार्ज बी. प्रेस्कोट ने रिकॉर्ड किया। प्रेस्कोट बोस्टन के टेलीग्राफ आपरेटर थे। यह आवाज बड़ी विचित्र थी एवं सबसे जुदा थी। वह किसी मशीन की आवाज नहीं थी। इस पर सूक्ष्म विवेचन एवं अनुसंधान सन् 1919 में प्रथम विश्वयुद्ध के दोरान हैनरिक बार्क हेसन ने किया। ये भी इस आवाज की विशिष्टता एवं विचित्रता से हैरान थे। अंततः अमेरिका के लॉस ऐन्जिल्स टाइम्स नामक पत्रिका में प्रथम बार किसी सुपर नेचुरल ध्वनि के बारे में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी।
इस आवाज की फ्रीक्वेन्सी काफी कम होती है, परंतु इसे रेडियो सैट में सुना जा सकता है। इस आवाज को कमजोर विद्युत् धारा की तरंगों में परिवर्तित किया जा सकता है। इसका अध्ययन करने के लिए अंटार्कटिका पेनीनसुल में 100 किलोवाट का एक शक्तिशाली ट्राँसमीटर स्थापित किया गया है। यह ट्राँसमीटर प्लाज्मा पाँज (स्थिति) पर स्थापित है, जो कि मैग्नेटोस्फीयर का महत्त्वपूर्ण गोलार्द्ध है। इसके लिए एक स्टेशन का भी निर्माण किया गया है। इसका संबंध गिराडेवीले, ला टेक लेक मिस्टासिनी, क्यूबेक, कनाडा, पिट्सवर्ग, डरहम, न्यूहैम्पशायर तथा अमेरिका से है।
धरती के उस स्थान पर जहाँ तीव्र विद्युत् आँधी आती है एवं तेज बिजली तड़कती है, वहाँ पर यह संकेत अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट जल्दी-जल्दी आता है। रात्रि में आयनोस्फियर की सक्रियता बढ़ जाने पर भी इसे साफ सुना जा सकता है। दिन में यह कम सुनाई देती है। इसकी सर्वाधिक तीव्रता 50 भू-चुँबकीय अक्षाँश में होती है। ध्रुवीय प्रदेश में इसका संकेत नहीं उतरता है। अपने देश में गुलमर्ग एवं नैनीताल में इस सुपर नेचुरल आवाज को रिकॉर्ड किया गया है। इसे जानने के लिए बैंगुआई-द्बद्बद्ब उपग्रह (1962) द्वारा आयनमंडल में परिष्कृत किया गया। उपग्रह वायोजन द्ब एवं द्बद्ब के रिकॉर्ड से पता चलता है कि यह सुपर नेचुरल तरंग बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून के मैग्नेसेस्फीयर में भी विद्यमान है।
इस प्रकार अरोरा की प्रकाशमय छटा तथा व्हीशलर रूपी विचित्र आवाज प्रकृति की अद्भुत रचना है। ऐसे ही न जाने कितने रहस्य इसकी पिटारी में छुपे पड़े हैं। प्रकृति को माता मानकर ही इसके आँचल में समाए अगणित रहस्यों एवं आश्चर्यों को निहारा जा सकता है।
रूस के जन-नेता लेनिन पर एक बार उनके शत्रुओं ने घातक आक्रमण किया और वे घायल होकर रोग शय्या पर गिर पड़े। अभी ठीक तरह से अच्छे भी नहीं हो पाए थे कि एक महत्त्वपूर्ण रेलवे लाइन टूट गई। उसकी तुरंत मरम्मत किया जाना आवश्यक था। काम बड़ा था, फिर भी जल्दी पूरा हो गया।
काम पूरा होने पर जब हर्षोत्सव हुआ तो देखा कि लेनिन मामूली कुली-मजदूरों की पंक्ति में बैठे हैं। रुग्णता के कारण दुर्बल रहते हुए भी लट्ठे ढोने का काम बराबर करते रहे और अपने साथियों में उत्साह की भावना पैदा करते रहे।
आश्चर्यचकित लोगों ने पूछा, “आप जैसे जन-नेता को अपने स्वास्थ्य की चिंता करते हुए इतना कठिन काम नहीं करना चाहिए था।” लेनिन ने हँसते हुए कहा, “जो इतना भी नहीं कर सके, उसे जन-नेता कौन कहेगा।”
बिहार प्राँत के एक छोटे-से गाँव में एक किसान रहता था। नाम था उसका हजारी। उसने अपने खेतों की मेड़ों पर आम के पेड़ लगाए। जब वे बड़े हुए, तो उन पर पक्षियों ने घोंसले बना लिए। मधुर स्वर में चह-चहाते। जब बौर आता तो कोयल कूकती। छोटे-छोटे फल आते तो सारे गाँव के लोग बारी-बारी से चटनी के लिए आम माँगकर ले जाते। वह स्वयं भी उस पेड़ के नीचे सघन छाया में चारपाई बिछाकर बैठता, तो अच्छा लगता।
हजारी के बच्चे बड़े हो गए थे। उसने सोचा कि खेती-बाड़ी का काम इन्हें सौंप देना चाहिए और स्वयं उस क्षेत्र में आम के पौधे लगवाने के लिए निकल पड़ना चाहिए। ढलती उम्र में परमार्थ-परायण होने को ही वानप्रस्थ कहते हैं।
उसने अपने खेत पर आमों की नर्सरी उगाई। गाँव-गाँव घूमा। आम लगाने का महत्त्व समझाया। जो लोग सहमत होते, उनके यहाँ स्वयं ही पौधे लगा आता। खाद, रखवाली आदि में भी दिलचस्पी लेता। इस प्रकार मरते समय तक उसने एक हजार आम्र उद्यान लगवा दिए। उस क्षेत्र का नाम उस किसान की स्मृति में ‘हजारी बाग’ पड़ा।
तक्षशिला विश्वविद्यालय के प्रांगण में उस दिन उत्सव का-सा माहौल था। सभी छात्र हर्षातिरेक में उन्मत्त हो रहे थे। कई वर्षों की उनकी तपस्या पूरी हो गई। आज वे शिष्य से आचार्य बनने की योग्यता पा लेंगे।
प्राँगण में जगह-जगह शिष्य मंडलियाँ अपने-अपने आचार्यों के साथ हास-परिहास में निमग्न थीं। आज उनकी विदाई होने वाली है। कुछ में निस्तब्धता छाई हुई थी। शायद वर्षों का स्नेह-संग बिछुड़न की पीड़ा से आहत हो। लंबे सान्निध्य को जब उर्वर मृत्तिका मिल जाती है, तो वहाँ पारिवारिक संबंधों का हरा-भरा वृक्ष खड़ा हो जाता है, इतना मजबूत, इतना गहन, इतना विस्तृत कि उसे आसानी से मिटाया न जा सके।
आचार्य ‘कुल’ और उनके शिष्य परिकर का कुछ ऐसा ही हाल था। वे प्राँगण के एक कोने में सबसे अलग बैठे थे, लगभग मौन। देखने से ऐसा प्रतीत होता था, मानो वियोग की वेदना उनसे सही न जा रही हो, पर एक को छोड़कर शेष नौ के बारे में यह बात ठीक-ठीक कह पाना मुश्किल था कि वे सचमुच ही विछोह की स्मृति से व्याकुल थे अथवा वह कोई अभिनय था। हाँ, अहिंसक की विह्वलता सुस्पष्ट थी। आँखों के कोरों तक छलक पड़ने वाली बूँदों को बार-बार रोकने की असफल चेष्टा उसकी मनोदशा को स्वयमेव उजागर कर रही थी। उसकी यह बेचैनी समझी जा सकती थी।
अहिंसक, आचार्य से पितृतुल्य स्नेह करता था। वह उनमें अपने पिता की छवि निहारता। उधर आचार्य भी उस पर पुत्रवत् वात्सल्य लुटाते। उसका सौम्य, तेजोद्दीप्त चेहरा, गौर वर्ण, सुँदर कद-काठी, प्रखर मेधा, विनीत व्यवहार, आज्ञापालन, नियमित दिनचर्या उन्हें मोह लेती, पर कभी-कभी वे उदास हो जाते, जैसे अंदर कुछ कचोट रहा हो। यह स्थिति उनकी अक्सर हो जाया करती, पर किसी से कुछ कहते नहीं थे।
आज जब विदाई की वेला उपस्थित हुई, तो उनके चेहरे पर असमंजस की स्पष्ट रेखाएँ बनती-बिगड़ती परिलक्षित हो रही थीं। ऐसा प्रतीत होता था, माने वे कुछ निश्चय न कर पा रहे हों, जबकि अहिंसक भावप्रवण हो रहा था। रुँधे गले से बोला, “देव! आपने जो ज्ञान अपने भंडार में से लुटाया है, उसकी कीमत तो हम कई जन्मों में भी नहीं चुका सकते, पर हम चाहते हैं कि आप उसका कुछ-न-कुछ मोल लेकर हमें उससे उऋण करेंगे।”
“हाँ, अवश्य।” आचार्य के स्वर में तनिक व्यंग्य था। “माणवक अहिंसक! मैं आज तुमसे गुरु-दक्षिणा जरूर लूँगा, दे सकोगे?”
“आपकी इच्छा पूरी करने में मुझे सर्वस्व भी खोना पड़ा, तो हिचकूँगा नहीं। तात् आप आज्ञा करें।” अहिंसक उत्साहित होकर बोला।
“तो सुनो, मुझे एक सहस्र नरबलियाँ चाहिए।”
टहिंसक अवाक् रह गया। उसे जैसे अपने कानों पर विश्वास न हुआ। उसकी आश्चर्यमिश्रित दृष्टि को भाँपते हुए आचार्य कुल ने पुनः दोहराया, “हाँ, एक सहस्र नरबलियाँ।”
टहिंसक को पैरों के नीचे की जमीन खिसकती प्रतीत हुई। ऐसा लगा, जैसे पृथ्वी तेजी से नाच रही हो और उसका अपना आपा उसमें विलीन हो गया हो। स्थूल सत्ता कहीं खो गई और सूक्ष्म का अनंत विस्तार धरती-आकाश तक हो गया हो। उस विस्तार में ही आचार्य ‘कुल’ दीख रहे हैं। मुखमंडल में प्रतिकार और पश्चात्ताप के दोहरे भाव हैं। हृदय क्षेत्र में एक काली प्रतिच्छाया विद्यमान है, जो थोड़ी देर पूर्व दिए गए आदेश के प्रति मन की शुचिता पर प्रश्न-चिह्न की तरह विराजमान है।
क्षणार्द्ध में ही अहिंसक का व्यापक विस्तार वाला अस्तित्व स्थूल देह में सिमट गया। वह सामान्य बना, तो देखा, सभी उसकी ओर निहार रहे हैं। उसने सकुचाते हुए हाथ जोड़कर आचार्य से निवेदन किया, “तात्! यह कैसी दक्षिणा है? दक्षिणा है या दंड? इससे तो हमारा संपूर्ण जीवन ही अंधकारमय हो जाएगा। आपने ज्ञानदान कर एक बार उसे आलोकित किया है। अब पुनः उसे गहन तमिस्रा में धकेल देना चाहते हैं? नहीं, देव! नहीं, बर्बरता का खेल आचार्य नहीं, असभ्य और अज्ञ सिखलाते हैं। वह विश्वविद्यालयों की विषयवस्तु नहीं, वन-प्राँतरों का अभ्यास है और फिर मेरा नाम माणवक अहिंसक है। हिंसा वृत्ति और मेरे इस नाम में कितना बड़ा विरोधाभास है, जरा सोचें आचार्य। क्या यह उचित होगा, कोई निर्धन व्यक्ति अमीरी का स्वाँग रचे? क्या यह आदर्श होगा कि अरण्य के एकाँत कुटीर में रहने वाला संन्यासी माया की छलना में पड़े? फिर मेरा यह नाम अकारण भी नहीं है। कोसल राजपुरोहित मेरे पिता भार्गव गार्ग्य ने इसे मेरी अहिंसाप्रिय अंतःवृत्ति को देखकर ही रखा था। इस घटना से उन्हें कैसा आघात लगेगा, सोचें। कोसल नरेश प्रसेनजित कितने, मर्माहत होंगे, तनिक कल्पना करें। कल्पना करें उस दृश्य की जहाँ लाशें-ही-लाशें पड़ी हों और मेरी खड्ग लहू की धार बहा रही हो। बर्दाश्त कर सकेंगे प्रत्यक्ष में इसे आप? नहीं, मूर्च्छित हो जाएँगे आचार्य। फिर मेरा अंतर तो बहुत ही कोमल है। मुझसे यह नृशंसता कैसे हो सकेगी? अस्तु अपनी आज्ञा पर पुनर्विचार करें देव। मुझे आपका कठोर-से-कठोर आदेश शिरोधार्य है, पर यह हिंसा........ओफ्फ! यह मुझसे न हो सकेगी।”
मस्तक पर उभर आए स्वेद बिंदुओं को पोंछते हुए उसने फिर कहना शुरू किया, “हत्याओं से स्वार्थ सधते हैं आर्य, आदर्श नहीं। आपकी उक्त आज्ञा से मेरा अंतःकरण काँप उठा है, मेरी आस्था डगमगा गई है और निष्ठा कमजोर पड़ रही है। तनिक विचार करें देव! क्या यह मानवता के प्रति गंभीर अपराध नहीं होगा? क्या इससे गुरु-शिष्य की पावन परंपरा कलंकित नहीं होगी? क्या इतिहास के पृष्ठों पर यह एक काले अध्याय के रूप में अंकित नहीं हो जाएगा? सोचें आर्य। एक सहस्र नरबलियों से जो चीत्कारें उठेंगी, वे जन्म-जन्माँतरों तक हमारा पीछा न करेंगी? आत्मा पर लदे उस बोझ को हम कैसे ढो सकेंगे?”
यह कहकर चेहरा हाथ से ढ़ककर वह फूट-फूटकर रोने लगा। थोड़ी देर पश्चात् भावुकता पर काबू पाया, तो आँखों को पोंछ आचार्य कुल की ओर देखा। उनका चेहरा निर्विकार था। समझा लिया, आदेश यथावत् है। वह धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ा, निकट पहुँचा, हाथ जोड़े और भर्राए गले से क्षीण स्वर में कहा, “जा रहा हूँ आर्य, पर स्मरण रखें, क्रूरता की माटी में कोमल किसलय नहीं खिलते। वहाँ रक्त बहाने वाले नागफनी ही सिर उठाते हैं।”
इतना कहकर वह झुका और आचार्य के चरण छुए। आँसुओं की दो बूँदें लुढ़क पड़ीं। इसके बाद वह मंथर गति से चलता हुआ आँखों से ओझल हो गया।
काफी समय बीत गया। आज माणवक बहुत बेचैन था। अपने गुफा-द्वार के एक शिलाखंड से सिर टिकाए अधलेटे वह सोच रहा था, महीनों बीत गए, पर इस सघन प्राँतर में कोई मनुष्य नहीं दिखा। आस-पास के इलाके भी वीरान हैं, फिर मेरे व्रत की पूर्णाहुति कैसे होगी? तत्पश्चात् वह अपने गले से उँगलियों की माला निकालकर गिनने लगा, एक, दो, तीन........दस............पचास..........दो सौ, पाँच सौ........नौ सौ निन्यानवे। सिर्फ एक बलि और चाहिए। नौ सौ निन्यानवे वध की हवि तो गुरु दक्षिणा के इस यज्ञ में अर्पित हो चुकी है। अब शेष एक के लिए मुझे और कितना इंतजार करना पड़ेगा? ओफ्फ! कोसल का जालिनी व क्या अब नरविहीन हो गया? क्या वनवासी भी जंगल छोड़कर भाग गए या सबकी हमने हत्या कर दी? फिर उस एक हव्य की व्यवस्था कैसे होगी?
अभी माणवक यह सब सोच ही रहा था कि किसी आहट से उसकी विचार-शृंखला टूटी। वह सतर्क हुआ। नियमित अंतराल पर होने वाली यह क्षीण ध्वनि कोई पदचाप तो नहीं? उसने कर्णेंद्रियों पर जोर डाला। हाँ, यह पदचाप ही है, किसी मनुष्य की। कदाचित् कोई इधर ही आ रहा है। वह उठ बैठा। कान ध्वनि पर ही लगे रहे। वह धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट और तीव्र होती जा रही थी। उसने खड्ग सँभाली। उसकी धार देखी। किंचित् भोंथरी हो गई थी। पास पड़े चिकने पत्थर पर रगड़कर उसे दुरुस्त किया, तदुपराँत पार्श्व के वृक्ष की ओट में खड़ा होकर प्रतीक्षा करने लगा।
थोड़ी ही देर में सामने की वृक्षावलियों के मध्य, पगडंडी पर एक मानवाकृति उभरी। वह कोई चीवरधारी भिक्षु प्रतीत हो रहा था। हाथ में मधुकरी पात्र लिए निर्भयतापूर्वक इसी ओर बढ़ा चला आ रहा था। और नजदीक आया, तो उसके संपूर्ण शरीर से निर्गत होती काँति को देख माणवक समझ गया, यह कोई साधारण मनुष्य नहीं। वह मन-ही-मन प्रसन्न था कि उसकी गुरु दक्षिणा एक असाधारण मानव की बलि से पूरी होगी। कुछ और समीप आया, तो वह उस पर झपट पड़ा। उसका रौबदार स्वर गूँजा, “सावधान, भिक्षु! ठहरो....., सावधान!”
बुद्ध वहीं रुक गए। उसने तलवार से आक्रमण कर दिया और अंधाधुँध वार करता रहा, पर यह क्या। तथागत की धूमिल छायाकृति वहाँ खड़ी थी और वे स्वयं दूर खड़े मुस्करा रहे थे। वह दौड़कर उस ओर लपका। इस बार सीधे गरदन पर प्रहार किया। खड्ग आर-पार निकल गई। एक बार फिर धोखा हुआ। बुद्ध कुछ पीछे खड़े थे। उनके चेहरे पर करुणा और हास्य का पुट था। माणवक की भृकुटियाँ तन गईं। उसकी आँखें अंगारे बरसा रही थीं। वह तुमुल गर्जना करते हुए दहाड़ा, “मायावी! छली!! तुम कोई भी हो, पर आज हमारी कटार तुम्हारा रक्त पीकर रहेगी। चाहे जो भी इंद्रजाल रचो, लेकिन अब बच न सकोगे।”
इतना कहकर उसने चीते की-सी फुर्ती से तथागत पर छलाँग लगा दी। वह धड़ाम से भूमि पर जा गिरा। ओष्ठ कट गए और खून की एक पतली धार बह निकली। पुनः विफलता हाथ लगी। बार-बार की असफलता से वह खूँखार हो उठा और रौद्र रूप धरकर बुद्ध के पीछे यहाँ-वहाँ भागता रहा, किंतु हर बार उसे उनकी सूक्ष्माकृति ही हाथ लगी। पंचभौतिक शरीर दूर बना रहा।
घंटों यह खेल चलता रहा। माणवक इस भागदौड़ में बुरी तरह थक गया और मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। अर्हत उसके निकट आए और करुणा विगलित आवाज लगाई, “वत्स अंगुलिमाल! उठो, देखो, मैं पास ही खड़ा हूँ। आँखें खोलो, वत्स!”
अंगुलिमाल की मूर्च्छा तंद्रा की-सी स्थिति में परिवर्तित हो गई। उसे लगा जैसे कोई अत्यंत मधुर बाँसुरी की ध्वनि उसके कर्णकुहरों से टकरा रही है और एक संदेश दे रही है। उस संदेश में एक परिचय है। कोई कह रहा है, “मैं दिव्य प्रकाश हूँ, मुक्त हूँ, शास्ता हूँ और तुम्हें शास्ता बनाने आया हूँ।”
तदुपराँत ध्वनि समाप्त हो गई। उसके कानों में देर तक ‘शास्ता’ शब्द गूँजता रहा। थोड़ी देर पश्चात् तंद्रा टूटी, आँखें खुलीं। वह फटे-फटे नेत्रों से तथागत को देखने लगा।
बोधिसत्व कहने लगे, “अंगुलिमाल। तुम जिस संकल्प को पूरा करने में लगे हो, उसकी भयंकरता के बारे में भी कभी सोचा है? गुरु दक्षिणा लोगों की कराहों से पूरी नहीं होती वत्स। उसका लक्ष्य ऊँचा होना चाहिए, पतन की राह पर ले जाना नहीं। तुम्हारे साथ धोखा हुआ है, आचार्य ने पाखंड किया है, देखो.....।”
इतना कहकर भगवान् ने उसके सिर का स्पर्श किया। एक बार फिर उसे तंद्रा ने आ घेरा। वह देखता है, आचार्य ‘कुल’ चिंतामग्न बैठे हैं, सोच रहे हैं, “नहीं.......नहीं.... ऐसा नहीं हो सकता। माणवक इतना हेय नहीं है। क्या वह अपवित्र है। गुरु पत्नी के प्रति ऐसा भाव.... यह कैसे संभव है? पर छात्र तो यही कहते हैं। हो सकता है यह सत्य हो। आखिर वे मिथ्या भाषण क्यों करेंगे? अवश्य ही वह दोषी है। अब मैं उसे छोड़ूंगा नहीं। आने दो समय, ऐसी गुरु दक्षिणा माँगूँगा कि जन्मांतरों तक वह उसके पातक को भोगेगा।”
बुद्ध के स्पर्श के साथ ही उसका सम्मोहन भंग हो गया, स्थिति पूर्ववत् हुई। एक पल के लिए वह स्तब्ध हो गया, फिर तथागत के चरणों में गिरकर बिलख-बिलखकर रोने लगा। बोधिसत्व उसे साँत्वना देने लगे। बड़ी मुश्किल से थोड़े समय बाद वह कुछ सहज हुआ, तो भरे गले से भगवान् बुद्ध से कहने लगा, “भंते! बहुत देर कर दी। अब तो इस जीवन में कुछ बचा नहीं। आगे एक ही इच्छा है कि उस संकल्प यज्ञ में अपना जीवन भी होम दें और गुरु दक्षिणा पूरी करें।”
यह कहकर उसने खड्ग उठाई और अपनी गरदन पर प्रहार करना चाहा, लेकिन हाथ स्तंभित हो गया। वह बुद्ध की ओर देखने लगा। भगवान् उसे करुणार्द्र दृष्टि से देख रहे थे, बोले, “तुम अंतिम आहुति अपने जीवन की देना चाहते हो? ठीक है, पर तुम्हारी मौत तो हो चुकी। रक्त निकले और प्राण छूटे, तभी मृत्यु होती है, ऐसा तो नहीं? तुम तो पहले ही मर चुके हो। जिस दिन तुमने पहली हत्या की, उसी रोज तुम्हारी मौत हो गई। यह तुम्हारा नवीन जन्म है। अब तुम शास्ता हो, बुद्ध हो। हममें तुममें कोई फर्क नहीं। दोनों एक हैं। आओ, दोनों मिलकर दूसरों को ऊँचा उठाएँ। उठो, वत्स! चले।”
दोनों श्रावस्ती की ओर चल पड़े, तथागत आगे-आगे और अंगुलिमाल पीछे-पीछे, पर अब वह दुर्दांत दस्यु नहीं था। उँगलियों की माला भी उसकी ग्रीवा में नहीं थी। अब वह एक शाँत-सौम्य चीवरधारी भिक्षु था, बुद्ध का शिष्य।
कुछ दिन विनोबा भावे प्रतिदिन अपने पवनार आश्रम से लगभग तीन मील दूर स्थित सुरगाँव जाते थे, एक फावड़ा कंधे पर रखकर।
एक बार कमलनयन बजाज ने उनसे पूछा कि आप फावड़ा रोज इतनी दूर अपने साथ क्यों ले जाते हैं। उस गाँव में ही किसी के यहाँ फावड़ा क्यों नहीं छोड़ आते?
विनाेबा जी बोले, “जिस काम के लिए मैं जाता हूँ, उसका औजार भी मेरे साथ ही होना चाहिए। फौज का सिपाही अपनी बंदूक या अन्य हथियार लेकर चलता है, उसी प्रकार एक ‘सफैया’ को भी अपने औजार सदा अपने साथ लेकर ही चलने चाहिए। सिपाही को अपने हथियार से मोह हो जाता है, उसी तरह हमें भी अपने औजारों को अपने साथ ले जाने में आनंद और गौरव का अनुभव होना चाहिए।
सामान्यतः मनुष्य सामाजिक नीति-नियमों के आधार पर ही अपना मानदंड बनाता है। इन्हीं नियमों के अनुरूप अपने क्रियाकलापों एवं गतिविधियों को संचालित एवं नियंत्रित करता है, पर कभी-कभी व्यक्ति इन नियम, कानूनों से परे कुछ अजीब सोचने एवं करने लग जाता है। मन का आवेग किसी विशेष पहलू पर वेगवान हो जाता है। यह विधेयात्मक भी हो सकता है एवं निषेधात्मक भी। प्रायः निषेधात्मक स्वरूप को सनक के रूप में जाना जाता है और ऐसे व्यक्तियों को सनकी कहते हैं। समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है। इस दायरे में विशिष्ट एवं प्रसिद्ध लोग भी आते हैं।
पहले जमाने में बादशाहों की सनकें भी बड़ी विचित्र प्रकार की थीं। संसार का सर्वाधिक पेटू बादशाह रोम का बिटेलियस माना जाता है। जिसकी एक दिन की खुराक का खरच तीन लाख पचहत्तर हजार डालर था। वह बुलबुलों की जीभ और मोरों का दिमाग बड़े चाव से खाता था। इतना खाने वाले बादशाह ने अपनी माँ को इसलिए भूखों मार डाला, क्योंकि उसे किसी ज्योतिषी ने बताया था कि यदि उसकी माँ का शीघ्र स्वर्गवास हो जाए, तो वह अधिक दिन सुख से शासन करेगा।
जरा-सा प्रसन्न हुए तो बड़े-बड़े इनाम दे दिए और नाराज हुए तो देश निकाला कर दिया। बादशाहों के लिए यह साधारण बात थी। भारत पर सत्रह बार हमला करने वाले और सोमनाथ के प्रसिद्ध मंदिर को तोड़कर सोना-चाँदी एवं हीरे-जवाहरात अपने देश ले जाने वाले मुहम्मद गजनवी को बहुत प्रिय थी। वह अंसारी को सदैव अपने साथ रखता था। एक बार गजनवी अपनी बेगमों के बीच बैठा हँसी-मजाक कर रहा था। अंसारी ने समयानुकूल एक शानदार नज्म सुना दी। गजनवी बड़ा प्रसन्न हुआ एवं उसे इनाम देने के लिए शाही खजाने ले गया। वहाँ हीरे-जवाहरात की चकाचौंध करने वाले ढेरों को देखकर अंसारी का मुँह खुला-का-खुला रह गया। गजनवी ने अंसारी को हुक्म दिया कि वह अपना मुँह इसी प्रकार खुला रखे। मुहम्मद गजनवी ने उसका मुँह अमूल्य रत्नों से भर दिया। उसने ऐसा तीन बार किया। इसकी कीमत उस समय एक करोड़ से अधिक थी।
जिसके सिर पर मौत का साया पड़ा हो, वह भी बादशाह की सनक के परिणामस्वरूप समृद्ध हो सकता है। ऐसा सौभाग्य गरीब बनौदी को बादशाह नादिरशाह के द्वारा प्राप्त हुआ। ईरान का शहंशाह नादिरशाह अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात था। उसने जब भारत पर आक्रमण किया, तो चारों ओर हाहाकार मच गया। उसकी सेनाओं ने तबाही मचा दी थी। ऐसे समय भागते समय बनौदी को कुछ न सूझा एवं वह एक पेड़ पर चढ़ गया। संयोग की बात थी कि नादिरशाह की सेना ने रात्रि विश्राम हेतु उसी स्थान पर पड़ाव डाला और उस पेड़ के नीचे बादशाह का हरम यानि अंतःपुर की बेगमों का खेमा लगा। ऊपर बनौदी प्राणों की खैर मनाता पेड़ से चिपका बैठा था और नीचे बादशाह की बेगमें।
बनौदी इसी प्रकार रात गुजारना चाहता था, परंतु भाग्य को कुछ और मंजूर था। आधी रात को एक सैनिक की नजर उस पर गई और उसने तत्काल खतरे का बिगुल बजा दिया। बनौदी घबराहट में पेड़ से नीचे गिर पड़ा। नादिरशाह के पास उसे पेश करने पर पहले तो बादशाह ने तलवार खींचनी चाही, लेकिन तत्काल अपना निर्णय बदलकर हुक्म दिया कि पूरा हरम ही बनौदी को सौंप दिया जाए। बादशाह की इस सनक ने दरिद्र बनौदी को हीरे-जवाहरात से लदी तैंतीस बेगमों तथा गुलामों का मालिक बना दिया।
रूस के बादशाह के सनक की एक और कहानी दाढ़ी के बारे में है। रूस के सम्राट् पीटर महान् को दाढ़ी से चिढ़ हो गई थी। वह अपनी जेब में उस्तरा रखता था और जो भी दढ़ियल आदमी राजमहल में प्रवेश करे, उसकी दाढ़ी अपने हाथों से मूँड़ देता था।
दाढ़ी की भाँति संसार में मूँछों का भी अपना अलग इतिहास है। मूँछें मर्दानगी की शान मानी जाती हैं और इससे व्यक्तित्व की अपनी पहचान बनती है। हिटलर, चर्चिल, चार्ली चैपलिन की मूँछें जहाँ सूक्ष्मता के कारण प्रसिद्ध हैं, वहीं हमारे देश के खूँखार डाकू सरदार माधोसिंह, मोहरसिंह, तहसीलदार सिंह एवं मलखानसिंह आदि की बड़ी मूँछें उनकी क्रूरता एवं दबंगता को दर्शाती हैं। राजेंद्रकुमार उर्फ दुकार की मूँछ का कारनामा कुछ निराला है। राजेंद्र कुमार तिवारी अपनी मूँछ में मोमबत्ती फँसाकर उन्हें जलाते हैं। इनकी मूँछें तबले की थाप के इशारे पर नृत्य करती हैं। 33 वर्षीय इन महाशय का कहना है कि बारह साल की कठिन साधना के उपराँत ही वे विद्या में पारंगत हो सके। वह अपनी मूँछ में प्लास्टिक की क्लिपों के द्वारा जलती मोमबत्ती रखकर तबले की थाप पर शास्त्रीय नृत्य कराते हैं। जापान, चीन, कोरिया आदि देशों के दूरदर्शन केंद्र इन पर वृत्तचित्र भी बना चुके हैं। इस मूँछ नृत्य के लिए उन्होंने अपने सारे दाँत भी उखड़वा दिए हैं।
मूँछों का रिकार्ड प्रौढ़ तथा वृद्ध व्यक्तियों के नाम ज्यादातर दर्ज है। परंतु लंबी मूँछ की दास्तान भी बड़ी अजीबोगरीब है। उनतालीस वर्षीय एक महाशय ने तो 8 फीट 10 से.मी. की लंबी मूँछ बढ़ाकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। वर्तमान में टेलीफोन मैकेनिक पद पर कार्यरत रामचंद्र को मूँछ बढ़ाने का बड़ा शौक है। इसी सनक के कारण वह 16 वर्ष की उम्र से उसे बढ़ाते चले जा रहे हैं। उन्होंने अपनी मूँछ को सन् 1980 के अंत में बढ़ाने का निश्चय किया था। प्रतिदिन की परवरिश से बढ़ी अपनी इस मूँछ को वह कानों में लपेटकर रखते हैं।
सामान्यतः व्यक्ति रोटी, दाल, चावल आदि खाता है। लेकिन कोई साइकिल खा जाए या पूरी टोकरी कच्ची सब्जी खा जाए, तो इसे आश्चर्य ही कहा जाएगा। भारत के प्रसिद्ध तीर्थस्थान जगन्नाथपुरी में एक ऐसा आदमी दिखाई दिया, जो शक्ल-सूरत में आदमी जैसा है, पर उसका आचरण विचित्र है। 43 साल का यह व्यक्ति पश्चिम बंगाल के हुगली जिले से पुरी आया था। वह हजारों लोगों के सामने चार ईंटें, कुछ पत्थर, पत्ते, पंद्रह गोभी, केले का पेड़, कागज, कपड़े, पचास किलो कच्ची सब्जी, सेलून के कटे हुए बालों का ढेर आसानी से खा गया। इस खबर के प्रसारित होते ही पुरी के पुलिस अधीक्षक के निर्देश से उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस जीप में जब उस ले जाया जा रहा था, तो लक्ष्मी बाजार के निकट भूख के मारे चिल्लाने लगा। पुलिस की निगरानी में उसे सब्जी बाजार में छोड़ दिया गया। वहाँ उसने तुरंत पंद्रह गोभी, दस लौकी, तीन बड़े कद्दू, ढेर सारे सेव व अंगूर खा गया। इसे देखकर सब्जी मंडी डर के मारे खाली हो गई। यह दावा करता है कि दस हजार रुपये देने पर वह एक आदमी का शव भी आराम से खा लेगा।
इस विचित्रता की दौड़ में सर्वभक्षक फ्राँसवासी लोटिटो उर्फ मैगेटाउट बहुत आगे हैं। ये धातु, प्लास्टिक तथा कांच को निगल जाते हैं। इनकी आँत की एक्सरे रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है। ग्रेनब्रेन स्थित मेडीकल हिस्ट्री में इसके बारे में विस्तृत वर्णन मिलता है। एक बार तो मैगेटाउट पूरी साइकिल को ही खा गए। हालाँकि इसे खाने में उन्हें छह दिन लगे। उनका कहना है कि मैंने साइकिल को फ्रेम से खाना शुरू किया। बाद में हथौड़ी से तोड़-तोड़कर सारी साइकिल खा गया। केवल टायर एवं ट्यूब को खाने में थोड़ी दिक्कतें हुईं। इसको खाते समय बेहिसाब पानी पीना पड़ा। सुलगती हुई सिगरेट, रेजर, ब्लेड आदि को खाने में उन्हें कुछ लगता ही नहीं। इसी क्रम में वह एक पूरा का पूरा जहाज भी खा गए।
सनक की ये कहानियाँ विचित्र, रोचक, आश्चर्यजनक होने के साथ ही हैरत-अंगेज भी लगती है। इसके निषेधात्मक पहलुओं के साथ इससे जुड़ा एक सत्य भी है और वह सत्य यह है कि मनुष्य अपनी प्रबल इच्छाशक्ति के साथ कुछ भी कर सकता है। बस बात है अपनी सोच को सही और उचित दिशा में मोड़ने की।
ब्रह्मज्ञानी रामानुज उन दिनों धर्मप्रचार की पदयात्रा पर थे। रात्रि में जहाँ रुके वहाँ एक व्यक्ति प्रेत बाधा से पीड़ित मिला। वह स्वयं आवेशग्रस्त रहता और उन्माद कृत्य से सभी व्यक्तियों को भी दुःख देता।
लोग उसे रामानुज के पास लाए। उन्होंने प्रेत से पूछा, वह पूर्व जन्म में कौन था और क्यों इन दिनों कष्ट सहता और कष्ट देता है।
प्रेत ने कहा, “वह विद्वान् था, पर विद्या का लाभ केवल स्वार्थपूर्ति में ही करता रहा। इस कारण ब्रह्मराक्षस बना और इस उद्विग्नता में जलने लगा।”
रामानुज ने प्रेत का मार्गदर्शन किया, समाधान कराया और विद्यादान का केंद्र स्थापित कराने के उपचार से सभी को उस विपत्ति से छुड़ाया।
मानवीय विकास के मोटे तौर पर दो आयाम रहे हैं, बाह्य एवं आँतरिक। बाह्य विकास जहाँ भौतिक प्रगति, सुख-समृद्धि एवं साँसारिक अभ्युदय से जुड़ा रहा है, वहीं आँतरिक विकास चरित्र-चिंतन की उत्कृष्टता एवं आत्मिक परिष्कार से संबंधित रहा है। मनुष्य की प्रगति यात्रा इन्हीं दो चरणों से होकर आगे बढ़ी है। पश्चिम में यह प्रमुखतया मानवीय अस्तित्व के शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक आयामों को छूती हुई भौतिकता प्रधान रही, जिसके कारण उसके विकास की अवधारणा को एकाँगी एवं अधूरा ही कहा जा सकता है, जबकि भारत में इसने उपयुक्त आयामों के साथ आत्मिक विकास के भी चरमोत्कर्ष को पाया। इसी तथ्य में इसकी मौलिक समग्रता निहित है। वैदिक युग का स्वर्णिम अतीत इसका गौरवमयी अध्याय रहा है।
वैदिक संस्कृति के साथ हम मानवीय सभ्यता के इतिहास का शुभारंभ मान सकते हैं। इसका ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ माना गया है। इसमें जो उदात्त चिंतन धारा प्रवाहित होती है, वह सर्वथा आध्यात्मिक होते हुए भी जीवन के व्यावहारिक पक्षों से अछूती नहीं है। क्योंकि यह तपःपूत एवं सूक्ष्मदर्शी ऋषियों द्वारा मानव के समग्र विकास के लिए प्रकट की गई थी। यह ‘ऋत’ एवं ‘सत्य’ के ठोस आध्यात्मिक आधार पर प्रतिष्ठित थी। ‘ऋत’ जहाँ प्राकृतिक जगत् के अंदर कार्य करने वाले अटल व्यापक नियम हैं, वहीं ‘सत्य’ आध्यात्मिक जगत् के अंदर काम करने वाले नियम हैं। स्पष्ट रूप में वैदिक आदर्श ऋत और सत्य को एक ही मौलिक तथ्य के दो रूप मानता है। इसके अनुसार मनुष्य का कल्याण प्राकृतिक नियमों और आध्यात्मिक नियमों की परस्पर अभिन्नता को समझते हुए उसके साथ अपनी एकरूपता के अनुभव में ही है। वैदिक ऋषियों ने जीवन के इस मूलभूत रहस्य को अनुभूत कर मनुष्य के सर्वांगीण अभ्युदय का समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। इसके मर्म को स्पष्ट करते हुए सत्यव्रत सिद्धाँतालंकार लिखते हैं, “प्रकृति है, परंतु प्रकृति ही सब कुछ नहीं है, प्रकृति के पीछे आत्मतत्त्व है, वही तत्त्व जिसे कुछ लोग परमात्मा कहते हैं। शरीर है, परंतु शरीर ही सब कुछ नहीं, शरीर के पीछे आत्मतत्त्व है, वही तत्त्व जिसे कुछ लोग जीवात्मा कहते हैं।” इसी के अंतर्गत ऋषियों ने “तेन त्यक्तेन भुँजीथा” का सारगर्भित संदेश दिया अर्थात् संसार को भोगो, परंतु त्यागपूर्वक। संसार में रहो, परंतु निस्संग होकर, निर्लिप्त होकर। भोग और त्याग का यह आदर्श ही वैदिक संस्कृति की विलक्षणता है, जो अन्य संस्कृतियों में दुर्लभ है। अन्य संस्कृतियाँ इन दोनों में सिर्फ एक सत्य को मानती हैं। कोई त्यागवाद को ले बैठी हैं, कोई भोगवाद को, किसी ने प्रकृतिवाद को, किसी ने भौतिकवाद को जन्म दिया है, तो किसी ने कोरे अध्यात्मवाद को। भोग और त्याग का समन्वय, भौतिकवाद और आत्मवाद का मेल सिर्फ वैदिक संस्कृति में पाया जाता है।
वैदिक संस्कृति का यही मौलिक तत्त्व मानवीय विकास को समग्रता प्रदान करता है। इसमें आध्यात्मिक उत्कर्ष के साथ भौतिक विकास भी उचित स्थान पाता है। इसी के तहत वैदिक ऋषि इंद्रियों के उपभोग को रखते हुए पूरे सौ वर्ष व इससे भी अधिक ही जीना चाहते थे। भौतिक सुख-समृद्धि के साधनों के साथ जीवनोपयोगी सब विद्याएँ इसमें विद्यमान हैं। गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद, नौतिमानादिविद्या, सृष्टि विद्या, विविध प्रकार की कलाएँ, उद्योग धंधे, व्यापार, देशाटन, काव्य शैलियाँ, काव्यालंकार आदि तमाम विषय इसमें भरे हुए हैं। महर्षि दयानंद के अनुसार वेद में चार विषय हैं, क्योंकि परमेश्वर से लेकर तृणपर्यंत सभी पदार्थों का साक्षात् ज्ञान है।
मनुष्य एवं समाज के समग्र विकास को सुनिश्चित करने वाली वर्णाश्रम व्यवस्था वैदिक महर्षियों की एक अमूल्य देन है। आश्रम व्यवस्था वस्तुतः व्यक्ति के पूर्ण विकास का विधान है। इसके ब्रह्मचर्य एवं गृहस्थाश्रम व्यक्ति के साँसारिक अभ्युदय को इंगित करते हैं तथा वानप्रस्थ एवं संन्यास आत्मिक उत्कर्ष के साधन हैं। इसी तरह वैदिक वर्ण व्यवस्था मानव के सामूहिक विकास को सुनिश्चित करती है। अथर्ववेद का भूमि सूक्त राष्ट्र भक्ति, वीरता के भाव एवं मातृभूमि के यशोगान से ओतप्रोत है। मानव साहित्य में पहली बार पृथ्वी को माता कहकर अपने आपको इसका पुत्र कहा गया है। वैदिक मंत्र अपने ही कल्याण तक सीमित नहीं हैं। वे विश्वकल्याण के भाव से ओतप्रोत हैं। जगह-जगह पर इनमें सबके हित की भद्र कामना तथा विश्व में शाँति की प्रार्थना की गई है। इसमें लौकिक प्रगति को संक्षिप्त एवं सुव्यवस्थित करने वाली शासन व्यवस्था का मौलिक प्रतिपादन हुआ है। पुरुष सूक्त में इस विषय पर विशेष प्रकाश डाला गया है। कालाँतर में व्यास, मनु एवं याज्ञवल्क्य आदि द्वारा प्रस्तुत सशक्त शासन व्यवस्था भी इसी को अपना उद्गम स्रोत मानती है।
इसी तरह मनुष्य के शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक सर्वविध विकास की योजना वैदिक संस्कृति में है। यह भौतिक एवं आध्यात्मिक संतुलन और सामंजस्य बिठाती हुई व्यक्ति के साथ समष्टि के कल्याण को सुनिश्चित करती है। यही वैदिक महर्षियों द्वारा प्रतिपादन विकास की मूल भारतीय अवधारणा है।
यह अवधारणा संस्कृति की प्रगति यात्रा के साथ बढ़ती है और साथ ही मनुष्य को ईश्वर की दिव्य प्रतिकृति मानते हुए उसके पूर्ण विकास एवं अभिव्यक्ति पर बल देती है। वृहदारण्यकोपनिषद् में ऋषियों की इसी उपलब्धि के वर्णन में कहा गया है, उन्होंने जब गहराई में प्रवेश किया, तो समय की परिधि में आबद्ध ससीम सत्ता के पीछे उन्हें एक असीम शाश्वत वास्तविकता की उपलब्धि हुई। इस प्रकार उन्होंने विशुद्ध चेतना के स्वरूप एवं जीवात्मा के विकास की चरम परिणति को जाना। यही तथ्य श्रीकृष्ण गीता के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन को बताते हैं। बुद्ध ने इसी चरम उद्देश्य की प्राप्ति को आत्मबोध-ज्ञानोदय कहा है। वेदाँत के अनुसार ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होने पर मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है।
कालप्रवाह के साथ वेदों से निस्सृत विकास की समग्र धारा क्रमशः क्षीण होती गई। बुद्ध एवं शंकर के समय तक यह अलग-अलग पड़ने लगी। साँसारिक और आध्यात्मिक जीवन अस्तित्व की प्रवहमान धारा के दो किनारे बन गए हैं। जगत् मिथ्या, संसार माया का भाव प्रबल हो उठा। आत्मिक विकास के लिए गृहत्याग, संन्यास एवं संसार विमुखता अनिवार्य माने जाने लगे। श्री अरविंद, लाइफ डिवाइन में इसे ‘असेटिक डिनाइल’ एवं ‘मेटेरिऐलिस्टिक रिफ्यूजल’ की संबा देकर संबोधित करते हैं। दूसरी ओर अध्यात्म से विहीन जीवन की धारा भोग-विलास एवं संकीर्ण स्वार्थपरता की नारकीय दलदल बन गई है। आज विकास की ये धाराएँ अपने विकृत रूप में जो दृश्य प्रस्तुत कर रही हैं, उसके अंतर्गत श्री-समृद्धि से हीन अध्यात्म दरिद्रता, पलायन या अंधविश्वास एवं मूढ़-मान्यताओं का प्रतीक बन गया है और बिना आध्यात्मिक आधार के भौतिक-समृद्धि अशाँति, आतंक एवं असंतोष की त्रासदी बन गई है।
पश्चिम में 1000 ई. तक यूरोपीय सभ्यता बहुत कुछ अर्द्ध सभ्य स्थिति में पड़ी हुई थी। यहाँ विकास का दौर अधिक स्फुट रूप से पुनर्जागरण के बाद ही उभरा। उसी के बाद मनुष्य के कल्याण हित, आशावादी चिंतनधारा, मानववाद (॥रु्नहृढ्ढस्रु) के रूप में प्रस्फुटित हुई, जो 14वीं एवं 15वीं शताब्दी में ग्रीक एवं रोमन संस्कृति व दर्शन की पुनर्जाग्रति के रूप में हुई। इसका मूल विचार सार्वभौमिक एक्य का प्रचार करने वाला नैतिक तत्त्व था। ई.पू. पूर्वी सदी में एफ्क्यूरस ने इसी दर्शन को विकसित किया था और एक नैतिक मानववादी आधार दिया था। 9वीं सदी के मध्य में काँट ने इसी के अंतर्गत ईश्वर के ध्यान के स्थान पर मनुष्य की पूजा का विधान किया। इंग्लैंड में जॉन स्टुअर्ट मिल ने उपयोगितावाद से मानववाद को पोषित किया। हर्बर्ट स्पेंसर, हक्सले, बट्रेंड रसेल इसके प्रबल समर्थक रहे। 20वीं सदी में प्रो. शिलर ने मानव अनुभव के आधार पर इसे नूतन परिभाषा दी। इस तरह आज यह साम्यवाद, समाजवाद, प्रगतिवाद तथा अन्य अनेकों रूप में मानवीय कल्याण एवं विकास को निर्धारित कर रहा है।
अपने उदात्त भावों एवं मानव कल्याणकारी उद्देश्यों के बावजूद यह विचारधारा, मानवीय अस्तित्व के समग्र आकलन में असमर्थ है। इसका भौतिक दृष्टिकोण अस्तित्व के आध्यात्मिक सत्य की गहराई में कैसे झाँक सकता है। फिर उसके विकास एवं अभिव्यक्ति की बात तो और दुर्गम बनी रहती है। इसी कारण डार्विन विशुद्ध जैविकीय आधार पर ही विकास प्रक्रिया को परिभाषित करते रहे वह उनके शिष्य जैविकीय हेर-फेर भर से नए मानव की रचना के हवाई किले बना रहे हैं। मार्क्स मनुष्य को आर्थिक प्रगति पर्याय मानकर समाज की आर्थिक नवरचना का प्रतिपादन करते रह गए। इसी तरह फ्रायड ने काम को ही अस्तित्व का मूल तत्त्व मानने की भूल की। वस्तुतः पश्चिम का भौतिकवादी दृष्टिकोण मनुष्य के आध्यात्मिक स्वरूप को समझने में असमर्थ रहा है। इस तरह पश्चिम की विकास धारा भौतिक प्रगति की ही सीमा में गतिशील है। आध्यात्मिक धारा की शिथिलता के कारण इसी का वर्चस्व समूचे विश्व में दृष्टिगोचर हो रहा है।
इस तरह वर्तमान परिदृश्य में दो विकास धाराएँ विद्यमान हैं, एक है विज्ञान द्वारा पुष्ट भौतिक विकास अथवा विकास का पश्चिमी दृष्टिकोण और दूसरी है अध्यात्म की गुह्य धारा, जिसमें विकास की भारतीय अवधारणा का सार निहित है। बाहरी दृष्टि से दोनों का स्वरूप एक-दूसरे का विरोधी प्रतीत होता है और दोनों के आदर्श भी सर्वथा भिन्न-भिन्न हैं। भौतिक अथवा पश्चिमी दृष्टिकोण में विकास का आदर्श है-विस्तार और आध्यात्मिक अथवा भारतीय दृष्टिकोण में विकास का आदर्श है-परिष्कार। विस्तार के नाम पर भौतिकवाद आक्राँता की भूमिका में रहा है। रोम, यूनान, अरब एवं अंग्रेजों के विजय अभियान इसकी गवाही हैं। इन्होंने हाथ में तलवार लेकर और खून की नदियाँ बहाकर अपनी विस्तारवादी आकाँक्षाओं को पूरा किया है। अपनी कुटिल एवं निंकुश नीतियों द्वारा ये ताकतें कैसी विषमताएँ पैदा कर रही हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।
भौतिकवादी अथवा पश्चिमी मानसिकता वाला व्यक्ति विकास का मूल्याँकन, व्हाट यू हेव? (खद्धड्डह्ल ब्शह्व द्धड्डक्द्ग) के प्रश्न से करता है अर्थात् यदि कोई धन्य-धान्य से संपन्न, रौब-दौब वाला सफल व्यक्ति है, तो उसे सफल माना जाएगा, चाहे वह चरित्र, चिंतन की दृष्टि से चोर, लुटेरा, व्यभिचारी ही क्यों न हो? इसके विपरीत आध्यात्मिक अथवा भारतीय अवधारणा में विकास की कसौटी है, व्हाट यू आर? (खद्धड्डह्ल ब्शह्व ड्डह्द्ग) अर्थात् आप क्या हैं? यदि व्यक्ति फटेहाल ही क्यों न हो, यदि वह संयम, त्याग, करुणा भाव से संपन्न है, तो उसे विकसित माना जाएगा। युगनायक स्वामी विवेकानंद भारत के इसी महान् चरित्र का उद्घोष करते हुए कहते हैं कि वैदिक संस्कृति ने अपने साँस्कृतिक विस्तार के लिए कभी खून की नदियाँ नहीं बहाईं। उसने सदैव आशीर्वाद और शाँति के वचन कहे, सबको प्रेम और सहानुभूति की कथा सुनाई। यहाँ का साम्राज्य विस्तार विचारों के बल पर हुआ। भारतीय विचार का सबसे बड़ा लक्षण है, इसका शाँत स्वभाव और नीरवता। अशोक महान् की विजय गाथा में यही विचार जीवंत हुआ था।
आज भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास की दोनों धाराएँ विपरीत ध्रुवों पर खड़ी है। यही मनुष्य की वर्तमान दुर्दशा की त्रासदी है। भौतिक विकास के एकाकी महत्त्व ने भौतिक समृद्धि-संपन्नता तो बढ़ाई है, परंतु धर्म के अभाव में आध्यात्मिक दृष्टि से दरिद्र बनते गए। पर करें क्या? अध्यात्म के पास दिशा तो है, किंतु गति नहीं, जबकि विज्ञान के पास गति है, किंतु दिशा नहीं, हालाँकि मनुष्य के विकास के लिए दोनों का सहयोग-समन्वय अनिवार्य है। इस आवश्यकता पर बल देते हुए कहा गया है, “धर्म के बिना विज्ञान अंधा है और विज्ञान के बिना धर्म लँगड़ा है।” दोनों के मिलन से ही अंधे-लंगड़े की जोड़ी बनकर संकट से उबरने का सुयोग बन सकता है।
इस संदर्भ में अध्यात्म को ही अपनी प्रमुख भूमिका निभानी होगी, क्योंकि इसकी स्थिति नियंत्रक एवं नियोजन की है। विज्ञान एवं भौतिक विकास पदार्थ जगत् का प्रतिनिधित्व करता है और अध्यात्म चेतन जगत् का। भौतिक जगत् के मूल में सक्रिय चेतन तत्त्व के अस्तित्व एवं उसकी वरिष्ठता रसेल वैलेस अपनी कृति ‘सोशल इन्वायरमेंट एण्ड मॉरल प्रोगेस’ में लिखते हैं, यह विश्वास कर लेने के पर्याप्त आधार मिल गए हैं कि चेतना द्वारा ही इस जगत् का संचालन किया जा रहा है। इसी तथ्य पर इंग्लैंड की रॉयल सोसायटी के प्रमुख एवं वैज्ञानिक-दार्शनिक जेम्स जीनस ने अपनी सुप्रसिद्ध रचनाओं में इसी तथ्य पर व्यापक प्रकाश डाला है। विश्वभर के 14 वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा मिल-जुलकर लिखी गई पुस्तक ‘द ग्रेट डिजाइन’ में इसी सत्य को स्पष्ट किया गया है। आइन्स्टाइन ने इसी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि भगवान् पासे नहीं फेंकता अर्थात् यहाँ सब चेतन सत्ता द्वारा संचालित एवं नियंत्रित है।
विकास की विरोधी धाराओं को जोड़ने से पूर्व मनुष्य को विकास के आध्यात्मिक पक्ष को समझना होगा। इसका मार्गदर्शन वैदिक संस्कृति के उपनिषदीय चिंतन में मिलता है। इसके सूत्रों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि विकास का यथार्थ तात्पर्य दिव्यता, आत्मज्योति व अतिमानस में प्रतिष्ठित होना है। श्री अरविंद ने ‘द सिंथेसिस ऑफ योग’ में इसका समुचित विश्लेषण प्रस्तुत किया है। उन्होंने मनुष्य को वर्तमान मनःस्थिति से ऊपर उठने को प्रेरित करते हुए आगामी आधारों की भी चर्चा की है। इन स्तरों को उन्होंने उच्च मन, प्रकाशित मन, अधिमानस तथा अतिमानस कहा है। मन से ऊपर उठकर अमिन में प्रतिष्ठित होना ही वास्तविक अर्थों में विकास है तथा जो इसके लिए प्रयत्नशील है, वही विकासशील।
वस्तुतः यह वेदों में प्रतिपादित ‘ऋत एवं सत्य’ के शाश्वत आधार पर प्रतिष्ठित होकर किए गए विकास का ही नूतन प्रतिपादन है। इसी तरह वैदिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाले स्वामी दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद एवं परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जैसी युग की महानतम विभूतियों ने इसी सत्य को अपने-अपने ढंग से प्रतिपादित किया है।
आज की विषम स्थिति में विकास के इस सत्य को समझा जाना चाहिए। इसे समझकर ही वह संभव हो सकेगा, जिससे कि विनाश पर उतारु अनियंत्रित भौतिक विकास की उच्छृंखल धारा को सही दिशा में नियोजित कर, समग्र विकास की राह प्रशस्त की जा सके।
देवताओं और दनुजों में घमासान युद्ध हुआ। विलासी देवताओं को हारकर भागना पड़ा। पराक्रम में निरत दनुज जीत गए। देवता प्रजापति के पास पहुँचे। उन्होंने संयम के अभाव को पराजय का कारण बताया और कहा, “मनुष्यों में एक तप, तेज का धनी मुचकुँद है। अपना सेनापति उसे बनाओ और विजय पाओ।” ऐसा ही किया गया। देवताओं की सेना जीत गई और विजयी मुचकुँद को स्वर्ग ले गई।
देव समुदाय के बीच वह अपने पराक्रम की डींग हाँकने लगा और पग-पग पर अपने अहंकार का परिचय देने लगा।
दनुजों का दूसरा आक्रमण हुआ। मुचकुँद दर्प और अहंकार के वशीभूत होकर अपनी वरिष्ठता गँवा चुका था। अब उससे पहले जैसा पराक्रम नहीं बन पड़ रहा था, तब कार्तिकेय को बुलाया गया। उसने विजय पाई। इंद्र ने मुचकुँद को वापस धरती पर भेज दिया और कहा, “अहंकार दोष से मुक्ति पाने का तप करो। उसके बिना समस्त वैभव अधूरे हैं।”
शिवजी ने संस्कारित व्यक्तियों की ही भस्म खोजकर लाने के लिए एक स्नेह पात्र गण को नियुक्त किया। वह निष्ठापूर्वक अपना कार्य समय पर पूरा करने लगा।
एक बार उसने कहा, “प्रभु आपके भक्त अधिकाँश आप जैसे अलमस्त फक्कड़ होते हैं। कई बार उनके दाह की भी व्यवस्था नहीं जुट पाती। उनका दाह करने के लिए ईंधन जुटाने, भस्म प्राप्त करने में बड़ी कठिनाई होती है।” शिवजी ने उसकी निष्ठा से प्रसन्न होकर वरदान दिया। कहा, “परेशान मत हुआ करो। अबसे उसके ऊपर अपना दाहिना हाथ कर दिया करो, वह भस्म हो जाया करेगा।”
वरदान ने काम को सुगम बना दिया। एक बार आत्मरक्षार्थ उस शक्ति का प्रयोग किया, तो वह क्रम चल पड़ा। शक्ति का घमंड उभरा और वासनापूर्ति के लिए भी उसका प्रयोग होने लगा। निर्धारित कर्त्तव्य के लिए दी गई शक्ति अकर्त्तव्य में लगाने से वह असुर कहलाया और स्वयं अपने सिर पर हाथ रखने के कारण भस्मीभूत हो गया। यदि कर्त्तव्य की मर्यादा में ही वह वरदान का उपयोग करता, तो शिव के स्नेह और संस्कार के यश का भागीदार बनता।
बंधुवर पुष्प! लो सवेरा हुआ, माली इधर ही आ रहा है, अपनी सज्जनता, सौम्यता तथा उपकार की सजा भुगतने के लिए तैयार हो जाओ। तात् ! यदि मेरी सीख मानते और कठोरता व कुटिलता का आश्रय ग्रहण किए रहते, तो आज यह नौबत नहीं आती।
फूल कुछ बोला नहीं, उसकी स्मित और भी मोहक हो उठी। माली आया, उसने फूल को तोड़ा और डलिया में रखा। काँटा दर्प से हँसा, माली की वृद्ध उँगलियों में चुभा और अहंकार में ऐंठ गया। माली उसे गालियाँ बकता हुआ वापस लौट गया।
समय बीता। एक दिन देवमंदिर में चढ़ाए उस फूल की सूखी काया को उठाकर कोई उसी वृक्ष की जड़ों के पास डाल गया। काँटे ने म्लान मुख सुमन को देखा, तो हँसा और बोला, “कहो तात् ! अब तो समझ गए कि परोपकारी होना अपनी ही दुर्गति कराना है।”
फूल की आत्मा बोली, “बंधु यह तुम्हारा अपना विश्वास है। शरीरों में चुभकर दूसरों की आत्मा को कष्ट पहुँचाने के पाप के अतिरिक्त तुम अपयश के भी भागी बने। अंत तो सभी का सुनिश्चित है, किंतु अपने प्राणों को देवत्व में परिणत करने और संसार को प्रसन्नता प्रदान करने का जो श्रेय मुझे मिला, तुम उससे सदैव के लिए वंचित रह गए। मैं हर दृष्टि से फायदे में हूँ और तुम घाटे में।”
उन दिनों पूरे भारत में सुधारवादी आँदोलन और महिला जागरण का मंत्र फूँका जा रहा था। गाँधी जी का कहना था कि यदि हमें एक-दूसरे को समझना है, संगठित होना है, तो इस बात की परम आवश्यकता है कि सारे देश की भाषा एक हो। क्योंकि देश के अधिकतर लोग हिंदी भाषा को समझते हैं, अतः मैं चाहूँगा कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी व्यक्ति हिंदी पढ़ें और बोलें। उनका भाषण सुनने वालों में वह लड़की भी थी, जिसकी उम्र अभी सिर्फ 10 साल थी। वह आँध्र के काकीनाड़ा नामक स्थान पर रहती थी। उसने निश्चय कर लिया कि वह महिलाओं और लड़कियों के लिए हिंदी स्कूल खोलेगी और उसने अपने माता-पिता के सहयोग से काकीनाड़ा में हिंदी पाठशाला खोल दी। वह एक ऐसा युग था, जबकि महिलाएँ शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़ी हुई थीं। देखते-देखते विद्यार्थियों की संख्या 500 हो गई। उसे और भी कई शिक्षिकाएँ रखनी पड़ीं। आँध्र में खुलने वाली यह पहली हिंदी पाठशाला थी। गाँधी जी को इसकी सूचना भेजी गई। उन्होंने जमनालाल बजाज को इसका निरीक्षण करने के लिए भेजा।
न लाखों की संपत्ति, न विशाल भवन, न आधुनिक सुविधाएँ। गुरुकुल की भाँति पूर्ण भारतीय वातावरण में प्रगति करते हुए इस विद्यालय को देखकर वे दंग रह गए।
इस स्कूल का संस्थापक कौन है? उन्होंने प्रश्न किया। प्रधानाध्यापिका ने फ्राक पहने हुए 10 वर्षीय बालिका की ओर इशारा किया। जमनालाल बजाज कुछ समझ नहीं पाए, किंतु जब उन्हें पूरी बात बताई गई, तो वे चकित और हैरान रह गए।
श्री जमनालाल बजाज के द्वारा यह अविश्वसनीय बात गाँधी जी के कानों तक पहुँची। उस समय आँध्र और दक्षिण के अन्य राज्य बहुत ही पिछड़े हुए समझे जाते थे। काकीनाड़ा जैसे स्थान पर महिलाओं की पाठशाला, वह भी निजी स्तर पर, उसमें 500 विद्यार्थी, यह सब कुछ आश्चर्यचकित करने वाला था। उन्होंने 1921 में अपनी पत्नी श्रीमती कस्तूरबा गाँधी, संत सी.एफ. एंड्रयूज और जमनालाल बजाज के साथ पाठशाला का निरीक्षण किया। वहाँ आकर पता चला कि वह केवल पाठशाला मात्र नहीं थी, अपितु वह तो एक राष्ट्रीय कार्यशाला भी थी। दुर्गा देवी ने अपने आभूषण उतारकर गाँधी जी को भेंट कर दिए। उनकी देखा-देखी अनेक अन्य महिलाओं ने भी ऐसा किया और जली विदेशी वस्त्रों की होली, जिसमें उस छोटी बालिका ने अपने सभी विदेशी फ्राक अग्नि को समर्पित कर दिए।
यही नहीं उसने यह भी घोषणा कर दी कि वह पूर्णतया गाँधी जी को समर्पित है। स्कूल का पूरा काम अपने साथियों को सौंप कर वह गाँधी जी के आश्रम में जाकर रहने लगी। यौवन की दहलीज पर पाँव रखते-रखते न जाने कितनी बार जेल यात्रा की। सन् 1933 में जेल से छूटने के पश्चात् उन्होंने अनुभव किया कि बिना पढ़ाई के राष्ट्रीय कार्य भी सुचारु रूप से नहीं किया जा सकता। उनका जन्म 1909 में हुआ था और इस प्रकार 1933 में जबकि वे जेल से बाहर आईं, उनकी आयु माप 24 वर्ष थी।
इसके बाद वह पढ़ाई हेतु जुट पड़ीं। मैट्रिक, इंटर, बी.ए. तथा लॉ की परीक्षाएँ पास कीं। हिंदी, इंग्लिस, तेलमू तथा अन्य दक्षिणी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने आँध्र महिला सभा का गठन किया और पूरे आँध्र प्रदेश में स्त्री शिक्षा के कार्य को आगे बढ़ाया। इतना ही नहीं वे वकील के रूप में स्त्री अधिकारों के लिए भी लड़ने लगीं। पहले वह फेडरल कोर्ट में एडवोकेट बनीं और बाद में मद्रास लैजिस्लेटिव कौंसिल की सदस्या बनीं। स्वतंत्र भारत में उन्हें राज्यसभा की सदस्या मनोनीत किया गया। सन् 1953 में जब उनकी आयु 44 वर्ष थी, तब वे योजना आयोग की सदस्या थीं, उनका विवाह उस समय केंद्रीय वित्त मंत्री चिंतामणि देशमुख के साथ हुआ। यह दो प्रतिभाओं का अनूठा संगम था। स्वतंत्रता सेनानी और महिला नेता के रूप में तो वे पहले ही बहुत अधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी थीं। उनके दिए हुए इस नारे, “एक लड़के की शिक्षा एक व्यक्ति की शिक्षा है, जबकि एक लड़की की शिक्षा एक पूरे परिवार की शिक्षा है” ने सारे संसार में लोकप्रियता प्राप्त की थी। इस नारी का नाम कितनी संस्थाओं से जुड़ा था, कहना कठिन है। 1956 से 1962 तक वे केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्षा रहीं। 1958 से 1961 तक राष्ट्रीय स्त्री शिक्षा समिति की अध्यक्षा। कौंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट, नारी संरक्षण गृह, आँध्र महिला सभा आदि से भी उनका नाम जुड़ा हुआ था।
सरकारी ढुल-मुल नीतियों और लालफीताशाही प्रशासन से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। बाल्यकाल से ही वे सिद्धाँतों के लिए लड़ती रहीं और जब भी उनकी सैद्धाँतिक निष्ठा पर प्रहार हुआ, उन्होंने बड़ी-से-बड़ी कुर्सी पर लात मार दी। दूसरी पंचवर्षीय योजना में समाज कल्याण के लिए शासन द्वारा पर्याप्त धन न दिए जाने पर उन्होंने बोर्ड के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। नारी शिक्षा के लिए बनी राष्ट्रीय कमेटी की चेयरमेनशिप पर लात मार दी। वह कार्य करने में विश्वास रखती थीं, शासन की जी-हजूरी में नहीं। शासन से अलग होकर वे आँध्र के ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्री व बच्चों के कल्याण कार्यों में जुटी रहीं। सन् 1973 में उन्हें नेहरू पुरस्कार प्रदान किया गया और 1974 में पद्म भूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया। अनथक सेवा करने के परिणामस्वरूप वृद्ध और जर्जर शरीर इतना भार न सँभाल सका और 9 मई 1981 को 72 वर्ष की आयु में उनका देहाँत हो गया।
उनके जीवन ने यह प्रमाणित कर दिया कि नारी यदि अपनी शक्तियों का समुचित सुनियोजन करे, तो वह क्या नहीं कर सकती?
किसान और उसकी पत्नी साथ-साथ खेत पर जा रहे थे। पत्नी राजमहल की शोभा देखती पीछे रह गई।
किसान ने पुकार, “व्यर्थ क्यों समय खराब करती हो? इस महल से तो हमारा महल सौ गुना अच्छा है।” राजा ऊपर बैठा यह वार्त्तालाप सुन रहा था। उसने बुलाकर पूछा, “भला तुम्हारा महल कहाँ है?”
किसान ने कहा, “हरे-भरे खेतों का फला-फूला क्षेत्र ही हमारा महल है, जिससे असंख्यों का पेट भरता है, आपके महल में वह विशेषता कहाँ है?” राजा नतमस्तक हो गया।
तथागत उन दिनों श्रावस्ती विहार में थे। जैतवन की व्यवस्था अनाथ पिंडक सँभालते थे। दक्षिण क्षेत्र की प्रव्रज्या से दास चीरित्र वापस लौटे और बड़े विहार जैतवन में जा पहुँचे।
दास चीरित्र की भाव-भंगिमा और विधि-व्यवस्था वैसी नहीं रह गई थी, जैसी कि जाते समय उन्हें अभ्यास कराया गया था। वे जहाँ भी गए बुद्ध की गरिमा और उनकी प्रतिभा का सम्मिश्रण चमत्कार दिखाता रहा। सम्मान बरसा, धन बरसा, प्रशंसा हुई, आतिथ्य की कमी न रही।
अनाथ पिंडक ने पहले दिन तो आतिथ्य किया और दूसरे दिन हाथ में कुल्हाड़ी थमा दी, जंगल से ईंधन काट लाने के लिए। सभी आश्रमवासियों के दैनिक जीवन को कठोर श्रम से सँजोना पड़ता था। अपवाद मात्र रोगी या असमर्थ ही हो सकते थे।
दास चीरित्र इतना सम्मान पाकर लौटे थे कि वे अपने को दूसरे अर्हत के रूप में प्रसिद्ध करते थे। कुल्हाड़ी उन्होंने एक कोने में रख दी। मुँह लटकाकर बैठ गए। श्रमिकों जैसा काम करना अब उन्हें भारी पड़ रहा था। यों आरंभ के साधनाकाल में यह अनुशासन उन्हें कूट-कूटकर सिखाया गया था।
अनाथ पिंडक उस दिन तो चुप रहे। दूसरे दिन कहा, “अर्हत को तथागत के पास रहना चाहिए। यहाँ तो हम सभी श्रावक मात्र हैं।”
दास चीरित्र चल पड़े और श्रावस्ती पहुँचे। विहार में तथागत उपस्थित न थे। वे भिक्षाटन के लिए स्वयं गए हुए थे। तीसरे प्रहर लौटने की बात सुनकर उनको अधीरता भी हुई और आश्चर्य भी। इतने बड़े संघ के अधिपति द्वार-द्वार पर भटकें और भिक्षाटन से मान घटाएँ, यह उचित कैसे समझा जाए?
बेचैनी ने उन्हें प्रतीक्षा न करने दी और वहाँ पहुँचे जहाँ तथागत भिक्षाटन कर रहे थे, साथ ही मार्ग में पड़े उपले भी दूसरी झोली में रख रहे थे, ताकि आश्रम के चूल्हे में उनका उपयोग हो सके।
अभिवादन उपचार पूरा भी न हो पाया था कि मन को जानने वाले बुद्ध ने दास चीरित्र से कहा, “अर्हत ही बनना हो तो अहंता गलानी और छोटे श्रम को भी गरिमा प्रदान करनी चाहिए। इसके बिना 222 बढ़ेगा और सत्य पाने का मध्याँतर बढ़ेगा।” समाधान हो गया। अहंता गली और श्रावक-व्रत फिर से निखर आया।
यह विज्ञान के अनेकों पक्ष हैं। इसमें मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य की अभिवृद्धि के साथ-साथ शारीरिक रोगों के निवारण में भी असाधारण सफलता मिलती है। स्वास्थ्य संवर्द्धन की यह यज्ञोपचार प्रक्रिया इतनी सरल और उपयोगी है कि इसके आधार पर मारक और पोषक दोनों ही तत्त्वों को शरीर के विभिन्न अंग-अवयवों में आसानी से पहुँचाया जा सकता है। विभिन्न औषधीय वनस्पतियों, पोषक द्रव्यों की हवि से हर कोई व्यक्ति बल, पोषण एवं रोगनिरोधक शक्ति प्राप्त कर सकता है तथा आगत व अनागत विभिन्न रोगों से बचकर दीर्घायुष्य ऊर्जा के साथ सूक्ष्मीभूत हुए औषधीय एवं पोषक तत्त्व साँस के साथ सीधे रस-रक्त में शीघ्रता से मिल जाते हैं और जीवकोशाओं को प्रभावित कर शरीर के रोग प्रतिरोधी क्षमता की अभिवृद्धि एवं जीवनी शक्ति का विकास असाधारण रूप से करते हैं। मन-मस्तिष्क से संबंधित सिर दर्द, आधासीसी, अनिद्रा, सनक, पागलपन, उन्माद आदि एवं नासिका, गला, फेफड़े आदि से संबंधित सरदी, जुकाम, खाँसी, दमा, ब्रौंकाइटिस, क्षय आदि रोगों में देखते-देखते लाभ पहुँचता है। गहन अध्ययन-अनुसंधानों के पश्चात् देखा गया है कि जिन स्थानों पर नित्य निरंतर यज्ञ होता रहता है, वहाँ क्षय, प्लेग जैसी महामारियों के जीवाणु-विषाणु पनपते तक नहीं हैं।
अखण्ड ज्योति के गत अंक में बताया गया है कि किस प्रकार से यज्ञोपचार प्रक्रिया द्वारा विविध प्रकार के ज्वरों से छुटकारा पाया जा सकता है। यहाँ पर सरदी, जुकाम, खाँसी, दमा-ब्रौंकाइटिस, क्षय आदि से लेकर त्वचा रोग, प्रदर प्रमेह आदि रोगों की यज्ञ चिकित्सा के संबंध में वर्णन किया जा रहा है।
(1) सरदी, जुकाम, बुखार की विशेष हवन सामग्री-
सरदी-जुकाम के साथ ही यदि बुखार आता हो तो निम्नलिखित औषधियों को समान मात्रा में लेकर हवन सामग्री बनाकर सूर्य गायत्री मंत्र के साथ कम-से-कम चौबीस बार नित्य हवन करना चाहिए। गत अंकों में वर्णित ‘काँमन हवन सामग्री’ नंबर-1 को भी रोगानुसार तैयार की गई सभी प्रकार की विशिष्ट हवन सामग्री में बराबर मात्रा में मिश्रित कर तब हवन किया जाता है, इस बात को भी सदैव ध्यान में रखना चाहिए। इस काँमन हवन सामग्री में अगर, तगर, देवदार, चंदन, लाल चंदन, जायफल, लौंग, गूगल, चिरायता, गिलाय एवं अश्वगंधा आदि वनौषधियाँ मिली होती हैं। घी, जौ, शक्कर हवन करते समय अलग से मिलाए जाते हैं।
सरदी-जुकाम, बुखार की विशेष हवन सामग्री इस प्रकार है-
(1) दूब (2) पोस्त (3) कासनी (4) चिरायता (5) कालममेध (6) शरपुँखा (7) सप्तपर्णी (8) भुईं आँवला (9) पटोल पत्र (10) नीमछाल (11) कटु (12) कुटकी (13) आर्टीमीसिया (14) तुलसी पत्र (15) वासा (16) भारंगी (17) कंटकारी (18) मुलहठी।
हवन करने के साथ ही उक्त सभी अठारह औषधियों के बारीक पिसे एवं कपड़छन पाउडर को सुबह-शाम एक-एक चम्मच गुनगुने जल के साथ रोगी को खिलाते रहना चाहिए। इससे सरदी-जुकाम में तत्काल लाभ मिलता है।
(2)जुकाम की विशेष हवन सामग्री- (खाँसी, ठंड लगना, हाथ-पैर में टूटन आदि में)
(1) दूर्वा घास (दूब) (2) कासनी (3) सौंफ (4) उन्नाव (5) बहेड़ा (6) धनिया (7) तुलसी पत्र (8) अंजीर (9) गुलाब के फूल (10) गुल बनफ्शा (11) तुलसी की मंजरी (12) चिरायता।
इन सभी बारह चीजों के सूक्ष्मीकृत पाउडर को सुबह-शाम एक-एक चम्मच गुनगुने जल के साथ जुकाम पीड़ित व्यक्ति को हवन के पश्चात् देते रहने से शीघ्रता से आराम मिलता है।
(3)खाँसी की विशेष हवन सामग्री- (सरदी, जुकाम एवं संबंधित ज्वरों पर)
इसके लिए निम्नलिखित औषधियों को बराबर मात्रा में मिलाकर हवन सामग्री तैयार की जाती है।
(1) मुलहठी (2) पान की जड़(कुरदान) (3) हल्दी (4) अनार (5) कंटकारी (6) वासा (7) बहेड़ा (8) उन्नाव (9) अंजीर की छाल (10) काकड़ासिंगी (11) बड़ी इलायची (12) कुलंजन (13) तुलसी की मंजरी (14) गिलोय (15) दालचीनी (16) लौंग (17) मुनक्का (18) पिप्पली।
हवन के साथ-साथ उक्त अठारह चीजों को समान मात्रा में मिलाकर बनाए गए कपड़छन चूर्ण को सुबह एवं शाम को एक-एक चम्मच शहद को साथ रुग्ण व्यक्ति को खिलाते रहना चाहिए।
(4)खाँसी-अस्थमा-दमा-क्रॉनिक ब्रौंकाइटिस आदि रोगों की विशिष्ट हवन सामग्री-
अस्थमा की आरंभिक अवस्था से लेकर ‘क्रॉनिक’ अवस्था तक के लिए निम्नाँकित वनौषधियों को बराबर मात्रा में लेकर जौकुट हवन सामग्री बनाकर नित्य प्रातः हवन करने एवं शाम को इसी हवन सामग्री से अग्निधूप देने से शीघ्र लाभ मिलता है। सामग्री के घटक तत्त्व इस प्रकार हैं- (1) धाय के फूल (2) पोस्त के डोड़े (3) बबूल की छाल (4) मालकाँगनी (5) बड़ी इलायची (6) तुलसी पंचाँग (7) वासा-अडूसा के पत्ते (8) आक के पीले पत्ते (9) नागरमोथा (10) कंटकारी (11) काकड़ासिंगी (12) लौंग (13) भाँग (14) बहेड़े का छिलका (15) चिरायता (16) अपामाग्र के बीज (17) धनिया (18) अजवायन (19) चंदन (20) हल्दी (21) इंद्र जौ (22) सोंठ (23) छोटी पीपल (24) अतीस।
हवन के साथ ही इन सभी चौबीस चीजों को मिलाकर बनाए गए कपड़छन चूर्ण को सुबह चीजों को मिलाकर बनाए गए कपड़छन चूर्ण को सुबह एवं शाम को एक-एक चम्मच शहद के साथ खिलाते रहने से दूना लाभ मिलता है और अस्थमा रोग धीरे-धीरे सदा के लिए समूल नष्ट हो जाता है।
(5)उष्णता की विशिष्ट हवन सामग्री- (शरीर में गरमी की अधिकता एवं संबंधित रोगों पर)
शरीर में उष्णता अधिक बढ़ जाने पर निम्नाँकित औषधियों को बराबर मात्रा में लेकर हवन सामग्री बनाई जाती है और नित्य प्रातः सूर्य गायत्री मंत्र के साथ हवन किया जाता है।
(1) धनिया (2) कासनी (3) बन गुलाब के फूल (4) आँवला (5) खस (6) खसखस (पोस्तबीज) (7) सौंफ (8) बनफ्शा।
हवन के बाद इन सभी आठ चीजों को मिलाकर बनाए गए सूक्ष्म पाउडर को सुबह-शाम एक-एक चम्मच जल से खिलाने से तत्काल लाभ मिलता है।
(6) रक्त विकार की विशेष हवन सामग्री-
इसमें निम्नलिखित औषधियाँ मिलाकर हवन सामग्री तैयार करते हैं-
(1) धमासा (2) सारिवा (3) कुटज छाल (कुड़ा) (4) अडूसा (वासा) (5) शरपुँखा (6) मजीठ (7) कुटकी (8) रास्ना (9) खदिर (खैर) (10) शीतल चीनी (11) चोपचीनी (12) नीम के फूल या पत्ते (13) दारु हल्दी (14) कपूर (15) चकोड़ा के बीज (चक्रमर्द बीज) (16) चमेली के पत्ते (17) बाकुची (18) जवासा (19) कालमेध।
हवन के पश्चात् सभी बाईस चीजों को मिलाकर कपड़छन किया हुआ पाउडर सुबह शाम एक-एक चम्मच जल के साथ रोगी को खिलाते रहने से तत्काल लाभ मिलता है। रक्त विकार में परहेज का विशेष ध्यान रखना चाहिए और प्रभावित व्यक्ति को खटाई एवं तली-भुनी चीजें नहीं खानी चाहिए।
(7)चर्म रोग-दाद, खाज, खुजली, एलर्जी आदि की विशिष्ट हवन सामग्री-
इसके लिए निम्नलिखित औषधियों को समान मात्रा में लेकर हवन सामग्री बनाई जाती है-
(1) शीतल चीनी (2) चोपचीनी (3) नीम के फूल या पत्ते (4) चमेली के पत्ते (5) दारु हल्दी (6) कपूर (7) मेथी के बीज (8) पद्माख (9) मेंहदी के पत्ते (10) चक्रमर्द (चकोड़ा) के बींज
उक्त सभी दस चीजों को नित्य हवन करने के पश्चात् समान मात्रा में मिलाकर बनाए गए बारीक कपड़छन पाउडर को सुबह एवं शाम एक-एक चम्मच जल के साथ खाते या खिलाते रहना चाहिए। रक्त विकार की तरह ही त्वचा रोग में भी परहेज करना आवश्यक है। इसमें भी खटाई, तली-भुनी चीजें एवं गरिष्ठ पदार्थ नहीं खाने चाहिए।
अभियान साधना वाले परिजनों के लिए ज्ञातव्य
जुलाई-अगस्त की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ
17 जुलाई कामिका एकादशी
30 जुलाईपवित्रा एकादशी
4 अगस्तश्रावणी
15 अगस्तअजा एकादशी
29 अगस्तजलझूलनी एकादशी
2 सितंबर भाद्रपद एकादशी पूर्णिमा
अहिंसा एक मनोभाव है। यह मन का धर्म है। यह वह वृत्ति है, जो पीड़ित व्यक्ति के पीड़ाजनित अनुभव से व्यक्त होती है। इसका भाव कल्पनीय है। यह बाहर प्रकट नहीं होता है, परंतु अत्यंत प्रभावशाली होता है। मन में अहिंसा का भाव सुदृढ़ हो जाने से व्यक्ति अजातशत्रु हो जाता है। कोई भी प्राणी उससे द्वेष नहीं करता। क्रूर भी उसके सामने विनम्र हो जाता है। इसी के साथ वह एक जीवन-मूल्य भी है।
मनोभाव होने के कारण यह मनोविज्ञान का भी विषय है। हिंसा और अहिंसा का स्थान मानव मस्तिष्क है। हिंसा के मूल में भय रहता है और वह उस भय की ही अभिव्यक्ति है और इसी के वशीभूत मनुष्य इसमें प्रवृत्त होता है। इसका एक अन्य कारण लोभ है। धन की वजह से भी लोग हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। डाकू धन के लोभ में पथिक को मार डालता है। इसी कारण एक भाई दूसरे भाई पर तलवार खींच लेता है।
निर्भय और सबल व्यक्ति हिंसा नहीं करता। वह अहिंसा पर विश्वास करता है, क्योंकि इसके मूल में प्रेम की भावना कार्य करती है। प्रेम में हिंसा का स्थान कहाँ? अतः अहिंसक सदा निर्भय एवं निडर होता है। अहिंसा वीरों का भूषण है। यह कायरों का आचरण नहीं है। कायर कभी क्षमा नहीं करता और न उसकी क्षमा का कोई मूल्य होता है। रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं, “उसका क्या जो दंतहीन विषरहित विनीत सरल हो।”
मनुष्य की जन्मजात प्रकृति हिंसा है या अहिंसा? इस विषय में मनोविज्ञानियों मताँतर है। हिंसा को सहज वृत्ति मानने वालों के अनुसार मनुष्य स्वभाव से दुष्ट है। अतः बुराई उसकी जन्मजात वृत्ति है। पर आगे वे यह भी कहते हैं कि यह प्रवृत्ति स्वाभाविक तो है, परंतु कल्याणकारी नहीं है। इससे मुक्ति पाई जा सकती है। स्वाभाविक हिंसावादियों की मान्यतानुसार हिंसा स्वाभाविक वृत्ति है। क्योंकि ऐसा न होता तो उसे रोकने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता। इसके पक्षधर मानते हैं कि यदि मनुष्य को स्वच्छंद छोड़ दिया जाए, तो वह उच्छृंखल हो जाएगा। वह अहिंसा की अपेक्षा हिंसा का ही रास्ता वरण करेगा। साधुता की अपेक्षा दुष्टता की ओर मुड़ेगा।
मानव-स्वभाव को हिंसा मानने वालों में पाश्चात्य विद्वान् मैकडूगल, एडलर, फ्रायड, डार्विन आदि हैं। परंतु पूर्वी दृष्टिकोण अति उदात्त है एवं इससे भिन्न है। भारतीय विचार के अनुसार मानव स्वभाव से पवित्र एवं दोषमुक्त है, क्योंकि जीवात्मा से अभिन्न है। वह परमात्मा का एक दिव्य अंश है। जीवात्मा में परमात्मा के समस्त दिव्य गुण समाहित हैं, फिर जीवात्मा अपवित्र कैसे हो सकती है। उपनिषद् में जीव को स्वभाव से नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त माना गया है। छाँदोग्योपनिषद् में स्पष्ट संकेत है, जीव सत्यकाम, सत्य-संकल्प, अजर, अमर एवं शोकरहित है।
षड्दर्शनों में भी जीव को श्रेष्ठ एवं दोषरहित घोषित किया गया है। न्याय दर्शन के अनुसार बुद्धि, सुख-दुःख, इच्छा, द्वेष आदि आत्मा के स्वाभाविक धर्म हैं। जीवात्मा स्वभाव से ज्ञानवान् है। इसलिए इसका प्रत्येक कार्य विचारपूर्ण होना चाहिए। विवेकपूर्ण कर्म के द्वारा वह अवश्य ही साधुता का पथ अख़्तियार करेगा। अज्ञान, अधर्म, मोह, दुष्टता आदि जीव के आरोपित धर्म हैं।
साँख्य दर्शन में स्पष्ट किया गया है कि समस्त जीव सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त हैं। बंधन का भाव स्वाभाविक नहीं है। यह तो जीव पर आरोपित किया गया है। बंधन और मुक्ति प्रकृति के धर्म हैं। जीवात्मा प्रकृति के संयोग में आकर बद्ध हो जाता है। वस्तुतः दोष संसार में आकर ही पनपता है। संसार के दोष से भला वह मुक्त कैसे हो सकता है। परंतु जीवात्मा नित्य, शुद्ध एवं बुद्ध है।
साँख्यदर्शन सत्कार्यवादी है। गीता की मान्यता है, ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’। मानव की सहज वृत्ति हिंसक नहीं है। यदि ऐसा हो तो उसकी परिष्कार की संपूर्ण प्रक्रिया और समस्त प्रयास का कोई मूल्य नहीं होगा। मनुष्य की वृत्ति मूलतः दिव्यता से ओतप्रोत है। अगर ऐसा नहीं होता, तो वह सन्मार्गगामी नहीं हो सकता और इसी वजह से ही वह पाप और पुण्य दोनों से मुक्त हो जाता है। मुक्ति इसका स्वरूप है। वह स्वभाव से मुक्त है। विषय-वासनाओं को कुचक्रों में फँसकर वह हिंसाग्रस्त हो गया है। जीव के ऊपर कर्म-प्रारब्ध का मैल जम गया है। जैसे लैंप के काँच में धुआँ की परत चढ़ी हुई रहती है और इसमें लौ दिखाई नहीं देती। काँच को साफ करते ही लौ फिर से चमकने लगती है। जीवात्मा लैंप की लौ के सदृश है।
स्वभाव तो वह है जो नित्य और अपवादरहित है, इसका निराकरण संभव नहीं होता। यदि मानव स्वभाव मूलतः हिंसक, कलहप्रिय, दुश्चरित्र आदि होता, तो जन्म-जन्माँतरों तक यम-नियमों का पालन करने पर भी अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि गुणों का समावेश नहीं हो सकता। मानवीय वृत्ति यदि बुराइयों का गढ़ रही होती, तो फिर निराकरण का प्रयास क्यों किया जाता? प्रयास और पुरुषार्थ करने का तात्पर्य है, अपने भूले हुए स्वरूप की ओर लौट आना चाहते हैं। अपने अंदर में सारी छटपटाहट, अकुलाहट एवं आतुरता इसलिए है, क्योंकि हमारी दिव्य संपदा खो गई है। यदि श्रेष्ठता एवं दिव्यता हमारा स्वभाव न होता, तो अहिंसा जैसे कठोर तप की आवश्यकता क्यों?
दिव्य आत्मा परमात्मा का अंश है। दिव्यता इसका स्वरूप है। हिंसक कर्मों से यह अपना पीछा छुड़ाना चाहती है। जब हम हिंसक कार्य करने जाते हैं, तो हमारा अंतःकरण कांप उठता है। यह उस कार्य के विरुद्ध विद्रोह करता है। मन अस्वाभाविक हो जाता है। समस्त शरीर काँपने-थर्राने लगता है, क्योंकि आत्मा ऐसे कार्य के लिए प्रश्रय नहीं देती। परंतु अंतःकरण की इस आवाज को क्रमशः अनसुनी करते-करते मानव अत्यंत क्रूर एवं निष्ठुर हो जाता है। आत्मा की संवेदना एवं करुणारूपी अहिंसा निष्ठुरता के पद तले कुचल ही जाती है और वह पाषाणी जड़ता के नीचे दबी-कुचली पड़ी रहती है। अंत में अहिंसा की उर्वर भूमि में हिंसा का नग्न नर्तन होता है। परंतु यह स्वाभाविक नहीं है। व्यक्ति चाहे तो आत्मा की उस मधुर अनुगूँज को भी प्राप्त कर सकता है, जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। अतः मानव मूलतः अहिंसा का पुजारी है। वह उसी का पक्षधर है।
इस संदर्भ में प्रख्यात चिंतक डॉ. राम जी सिंह का मत बड़ा सारगर्भित लगता है। इनके अनुसार हिंसा, दुर्भाव आदि मानव स्वभाव के अंग नहीं हैं, वह आरोपित हैं। वास्तविक अर्थ में यह उसका जन्मजात स्वभाव नहीं है, अपितु वातावरण से अर्जित विभाव मात्र है। ऋषि एवं संत मानवी स्वभाव के बड़े गंभीर द्रष्टा हैं। इसलिए वे हिंसक अपराध को भी क्षमादान कर देते हैं। परिवर्तन, विमुख स्थिति-स्थापन जैसे विधि-शास्त्रों में भी दोषी के प्रति उदारता का परिचय दिया गया है। यह मानव स्वभाव की साधुता में आस्था की अभिव्यक्ति है। मनुष्य के अंतर्निहित सद् में विश्वास ही मानवीय संस्कृति के विकास की इतिहास की कहानी है।
मुनि नथमल का मत है कि अहिंसा में मैत्री, सद्भावना, एकता और सुख-शाँति का समावेश है। अहिंसा का स्वरूप है-उपशम, मृदुता, सरलता, संतोष, अनासक्ति और अद्वेष। हमारे मन, वाणी और समस्त कार्य को अहिंसारूपी स्नेहिल स्पर्श प्राप्त है। ऐसा व्यक्ति न तो औरों को कष्ट देता है और न स्वयं को। अहिंसा में परम संतोष है। हिंसा स्वभाव के प्रतिकूल है।
अहिंसा का भाव जब मन में दृढ़तापूर्वक स्थित हो जाता है, तो उसके संपर्क में आने वाले हिंसक एवं कुटिल स्वभाव वालों का भी बैर-भाव शाँत हो जाता है। अहिंसा में प्रतिष्ठित योगी के अंतःकरण का सान्निध्य हिंसक प्राणियों का मनोविकार शाँत कर सकता है। अहिंसक योगी का व्यवहार मधुर, सौम्य एवं सात्विक होता है। उसके शत्रु भी उसका सम्मान करते हैं। उसका कोई बैरी होता ही नहीं है। वह अजातशत्रु हो जाता है। सभी उस पर विश्वास कर लेते हैं। केवल पशु-पक्षी ही नहीं वरन् साँप, बिच्छू आदि जहरीले प्राणी भी उसको हानि नहीं पहुँचाते।
अहिंसा दिव्य गुण है। यह मनुष्य के व्यक्तित्व को सुँदर एवं समुन्नत बनाता है। अहिंसक व्यक्तित्व का वातावरण शुद्ध एवं प्रभावपूर्ण होता है। संपर्क में आने वालों पर इसका प्रभाव परिलक्षित होता है। ऋषियों के सम्मुख हिंसक प्राणी भी बैर-भाव को छोड़कर साधु वृत्ति वाले जो जाते हैं। यह अहिंसा की विशिष्टता ही है। अहिंसा प्रिय व्यक्ति के मुख-मंडल पर समुद्र के समान गंभीरता एवं महानता होती है। इनके अंदर दुष्ट मनोभाव प्रवेश नहीं कर पाता है। उनके चेहरे पर हित श्वेत-सौम्यता होती है। आँखों में पवित्रता की गहराई होती है। उनकी चेष्टाएँ निताँत सौम्य स्नेहिल और करुणामयी होती हैं। द्वेष एवं विकार का वहाँ द्वंद्व तक नहीं होता। क्रूरता एवं आक्रामकता भी उनके समक्ष नतमस्तक हो जाती हैं। उनके पास कुटिलता एवं दुष्टता हावी नहीं हो पाती वरन् अपना समर्पण कर बैठती हैं। इनका निवास सर्वसुलभ होता है। जिस समाज में ऐसे अहिंसा के पुजारी रहते हैं वहाँ सुख, शाँति, समृद्धि की सनातन वर्षा होती है।
अहिंसा मनोभाव के साथ एक जीवन-मूल्य भी है। जीवन-मूल्यों का तात्पर्य उन व्यवहारों, कर्त्तव्यों और मानदंडों से है, जिन पर किसी व्यक्ति के महत्त्व का आकलन एवं मूल्याँकन किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन-मूल्य कुछ व्यक्तिगत एवं कुछ सामाजिक होता है। उसके जीने का ढंग एवं स्वरूप होता है। यह उसके व्यक्तिगत विचारों से संबंधित है। इस परिप्रेक्ष्य में अहिंसा एक ऐसा जीवन मूल्य है, जिसको धनवान और निर्धन, राजा और रंक, प्रजा और शासक, बालक और वृद्ध, दुर्बल व बलवान तथा स्त्री और पुरुष सभी समान रूप से अर्जित कर सकते हैं। मूल्यों के अर्जन से ही व्यक्ति मूल्यवान् बनता है। इस मूल्य की अलौकिकता एवं दिव्यता व्यक्ति को अनमोल बना देती है। इस तरह निश्चित रूप से अहिंसा भी अनमोल वस्तु है। किसी भी ऐश्वर्य से अहिंसा का ऐश्वर्य कम नहीं है। यह दुर्लभ संपदा है।
इतना ही नहीं अहिंसा मोक्ष का सोपान भी है और जगत् में व्यवहृत दिव्य रसायन भी। यह प्रतिक्षण जीवन को पुष्ट, उन्नत, उत्कृष्ट एवं पावन बनाती है। यह अपनी उत्कृष्टता से सर्वातिशायी और सद्यः प्रभावकारी है। अहिंसा में प्रतिष्ठित व्यक्ति देवों के लिए भी स्पृहणीय एवं वंदनीय होता है। अहिंसा का व्रत पालन कर स्वयं में सुख-शाँति का अनुभव किया जा सकता है एवं समाज को भी समुन्नत बनाया जा सकता है।
ऋषि पुलस्त्य से उनके आश्रमवासियों ने पूछा, “रावण आपका नाती है, स्वयं भी शिव भक्त तथा विद्वान् है, फिर भी दुष्टता क्यों बरतता है?”
ऋषि बोले, “उसे सोने की लंका बनाने का शौक जो लगा है। बिना शोषण के इतना धन जुटाता कैसे? यह लिप्सा ही दुष्टता की जननी है।”
देवसंस्कृति महाविद्यालय की दिशा में एक और सार्थक कदम
शाँतिकुँज 8 मई। देवसंस्कृति महाविद्यालय की प्रगति की दिशा में एक और सार्थक कदम उस समय रखा गया, जब 8 मई मंगलवार को हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पी. एस. सकलानी की अध्यक्षता में 8 सदस्यीय निरीक्षण समिति शाँतिकुँज आई इस समिति का उद्देश्य गढ़वाल विश्वविद्यालय से देवसंस्कृति महाविद्यालय की संबद्धता को सुनिश्चित करना था। इस निरीक्षण समिति के सदस्यों में माननीय कुलपति महोदय के अतिरिक्त गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. एम.एस. रावत और वहीं के प्राचीन भारतीय इतिहास के विभागाध्यक्ष प्रो. बी.एम. खंडूरी और कला संकाय के डीन प्रो. आर.एन. सिंह और कार्य परिषद के सदस्य प्रो. पेन्यली, क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी श्री पंत जी और गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. जयदेव वेदालंकार एवं गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय के ही ख्यातिप्राप्त मनोवैज्ञानिक प्रो. ओ.पी. मिश्रा थे। विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में गढ़वाल विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्षा डॉ. लता गैरोला भी थीं।
निरीक्षण समिति के सभी सदस्य शाँतिकुँज की गतिविधियों को देखकर ही अभिभूत हो गए। शैल जीजी एवं डॉ. पण्ड्या ने उन सबको जब परमपूज्य गुरुदेव की विद्या विस्तार योजना की व्याख्या करते हुए देवसंस्कृति महाविद्यालय के उद्देश्यों व कार्य योजना की रूपरेखा को स्पष्ट किया तो सभी के मुख पर यही बात थी कि सचमुच ही आप लोग युग की माँग को पूरा कर रहे हैं।
अपनी सारी भावी औपचारिकताओं को पूरा करते हुए देवसंस्कृति महाविद्यालय के जुलाई मास में प्रारंभ हो जाने की संभावना है। इस महाविद्यालय में अभी एम.ए. (प्राचीन भारतीय इतिहास-संस्कृति व पुरातत्त्व, दर्शनशास्त्र एवं मनोविज्ञान) की कक्षाओं के साथ योग में पी.जी. डिप्लोमा की कक्षा को शुरू किया जाएगा। प्रत्येक कक्षा के लिए विद्यार्थियों की अधिकतम संख्या 20 सुनिश्चित की गई है। सभी छात्र-छात्राओं का प्रवेश साक्षात्कार द्वारा लिया जाएगा। जो भी परिजन इस विषय में अधिक जानकारी के इच्छुक हों, वे देवसंस्कृति महाविद्यालय प्रकोष्ठ, शाँतिकुँज हरिद्वार से पत्र व्यवहार कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति व भारतीय विद्याओं का पुनरुज्जीवन एवं विकास-विस्तार ही इस महाविद्यालय का उद्देश्य है, जिसे देवसंस्कृति महाविद्यालय के साथ-साथ यहाँ अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राएँ मिलकर पूरा करेंगे।
पिछले कुछ वर्षों में सूचना एवं संचार के क्षेत्र में हुई क्राँति ने आधुनिकीकरण एवं विकास के नए आयाम स्थापित किए हैं। इस क्राँति से दुनिया सिमट सी गई लगती है। अपने टी.वी. सेट पर विभिन्न सेटेलाइट्स चैनलों के माध्यम से दुनिया के तमाम देशों के बारे में सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। इंटरनेट पर भी अपनी मनचाही जानकारी प्राप्त की जा सकती है, परंतु इस क्राँति के साथ कई अहम् राष्ट्रीय सवाल उठ खड़े हुए हैं। इनमें पहला यह है कि देश में कितने प्रतिशत लोगों को ये सुविधाएँ उपलब्ध हैं?
भारत में सरकारी आँकड़ों के अनुसार ही 40 प्रतिशत लोग गरीबी के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। गरीबी रेखा से नीचे का मतलब है कि वे लोग बुनियादी आवश्यकताओं से भी वंचित हैं। उन्हें यह भी पता नहीं कि सरकार उनके विकास के लिए कौन-सी योजनाएँ चला रही है। जिनके लिए ये योजनाएँ बनाई जा रही हैं। वे ही इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। लाभ उठा रहे हैं वे लोग, जिन तक तथाकथित सूचना एवं संचार क्राँति पहुँची हैं ऐसे समाज में जहाँ सिर्फ भरपेट खाना या पानी प्राप्त करने के लिए स्वतंत्रता गिरवी रख दी जाती हो, इस क्राँति का क्या महत्त्व रह जाता है।
यूरोपीय देशों में इस क्राँति से आर्थिक और साँस्कृतिक ही नहीं, राजनीतिक निकटता भी बढ़ रही है, परंतु हमारे दश में विभिन्न जातीय समूहों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान का प्रबल आग्रह नए नए तनावों एवं संघर्षों को जन्म दे रहा है। इसका कारण न सिर्फ बहुतांश बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा इसे संचालित किया जाना है, अपितु संचारकर्त्ताओं की कल्पनाशून्यता और संचार-प्रक्रिया के प्रति अज्ञानशून्यता भी कम दोषी नहीं है।
तीसरे, विकसित देशों के लिए सूचना एवं संचार क्राँति कोई आकस्मिक घटना नहीं है। वहाँ इसके लिए पहले से ही वातावरण बना हुआ था। वहाँ का समाज भौतिक एवं मानसिक रूप से इसकी संभावनाओं का अपने पक्ष में उपभोग करने और चुनौतियों का मुकाबला कर सकने में सक्षम था, परंतु भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह एक आयातित 222 है, जिसके लिए यहाँ का समाज भौतिक एवं मानसिक 222 से तैयार नहीं है। इसकी कारण इसके विपरीत परिणाम सामने आ रहे हैं। यह सही है कि हम अपने आधुनिकीकरण एवं विकास को तेज करने के लिए सूचना एवं संचार क्राँति का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन यह काम उसके विवेकसम्मत नियमन के बिना संभव नहीं।
चौथा, सूचना एवं संचार के सभी साधन समाज में नैतिकता एवं ईमानदारी के सार्वजनिक रूप से मान्य प्रतीकों को तोड़कर अपने सामाजिक अपरिचय और रुचि को स्थापित करने की बचकानी उत्कंठा में निमग्न हैं। सामान्य मानवीय रिश्ते-नातों ही नहीं, संतों एवं राष्ट्र निर्माताओं पर चुहल भरे प्रहार या उनकी निंदा किसी स्व-अर्जित गहरे दार्शनिक अनुभव और चिंतन की कसौटी पर नहीं, अपितु सिर्फ फुरसती विलास के लिए किया जाने लगा है। आज हम संचार माध्यमों द्वारा ढाकर लाए जाने वाले साँस्कृतिक कचरे के कूड़ेदान बन जाने के लिए अभिशप्त हैं।
विश्वभर के शेयर बाजारों की जानकारी, उद्योगों की जानकारी, अश्लीलता का प्रदर्शन, तथ्यहीन राजनीतिक, सामाजिक, पारिवारिक उथल-पुथल की जानकारी दिखाने मात्र से सूचना एवं संचार क्राँति नहीं हो सकती, न ही सर्वेक्षण करके गलत आँकड़े प्रस्तुत करने से गलत बात सच हो जाती है।
भारत जैसे वैविध्यपूर्ण संस्कृति वाले विशाल देश में जहाँ हर क्षेत्र की परंपराएँ, समस्याएँ एवं प्राथमिकताएँ हैं, असली सूचना एवं संचार क्राँति तभी होगी, जब हम उसके परिमार्जित, सकारात्मक स्वरूप के साथ जन जन के लाभ पहुँचाने में समर्थ हो सकेंगे।
गुरु ने शिष्य को साथ-साथ दो ध्यान करने का निर्देश दिया, एक गणेश का, दूसरा कुबेर का।
शिष्य ने बहुत प्रयत्न किया, पर दोनों एक साथ न बन पड़ते। जब एक की छवि में तन्मयता आती, तो दूसरा विस्मृत हो जाता। असफलता की स्थिति उसने गुरु को कह सुनाई।
गुरु मुस्कराए और बोले, “स्वार्थ और परमार्थ दोनों एक साथ सधते नहीं हैं। संसार और भगवान् में से एक ही हाथ लगता है।”
अक्सर हमें अपने बुजुर्गों से कदम-कदम पर वर्जनाएँ मिलती रहती हैं, यह न करो, वह न करो, ऐसा करने से अशुभ होगा, ऐसा करोगे तो शुभ होगा, सफलता मिलेगी आदि-आदि। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इन पारंपरिक बातों एवं रीति-रिवाजों से शायद ही किसी का दैनिक जीवन अछूता हो। कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि हमारे जीवन के एक बड़े हिस्से पर इनका अंकुश लगा हुआ है।
यदि हम गहराई से विचार करें, तो यह पता चलता है कि ये परंपराएँ या रीति-रिवाज यों ही नहीं बना दिए गए हैं। इनके पीछे स्पष्ट कारण होते हैं। इनसे जुड़े कुछ मूल्य होते हैं। कुछ बातें अवश्य होती हैं, जिनकी मनाही के पीछे कोई समुचित कारण समझ में नहीं आता। परंतु कई बातें ऐसी हैं, जो तर्क की कसौटी पर पूर्णतः खरे उतरती हैं।
हमारे यहाँ की सामाजिक परंपराओं में ब्राह्मणों और ब्रह्मचारियों को संयमित जीवन जीने को कहा गया है। इसका मूल कारण यही है कि वे उत्तेजना से बचें। यहाँ ब्राह्मण का तात्पर्य जाति विशेष से नहीं, ज्ञान के उपासकों से है। समुचित आचार-विचार के अभाव में भव्य ज्ञान-साधना कैसे संभव हो सकती है?
इसी प्रकार सूर्य अथवा चंद्र ग्रहण के समय घर में रखे भोजन को फेंक देने की परंपरा है। अब वैज्ञानिक शोधों से यह बात साबित हो चुकी है कि ग्रहण के दौरान निकलने वाली किरणें हानिकारक होती हैं एवं खाद्य पदार्थों को नुकसान पहुँचाती हैं।
इसी तरह आज हमारे चारों ओर हिंसा का जो वातावरण बना हुआ है, उसका एक प्रमुख कारण सात्विक भोजन का अभाव है। भारतीय परंपरा के अंतर्गत सदा से शुद्ध-सात्विक भोजन की रीति-नीति रही है। भोजन हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। यह बात वैज्ञानिकता की कसौटी पर भी खरी उतर चुकी है। इतना ही नहीं इससे न सिर्फ हमारा तन अपितु मन भी प्रभावित होता है, यह भी प्रमाणित हो चुका हैं ऐसे में जो हिंसा से भरे तामसिक भोजन का त्याग नहीं कर सकते, वे तामसिक प्रवृत्तियों से कैसे बचे रह सकते हैं।
भारतीय संस्कृति में मंदिर में अथवा पूजा-उपासना में घंटा-नाद की प्रथा है। घंटा-नाद की प्रथा है। घंटा मंगल ध्वनि का प्रतीक है। घंटे के स्वर वातावरण में पवित्रता का भाव भरते हैं। मन में आध्यात्मिकता के भाव जगाते हैं। घंटा-ध्वनि अन्य ध्वनियों एवं विचारों को भूलकर मन को एकाग्र करने के लिए प्रेरित करती है। पूजा-उपासना, देवदर्शन यह सब शाँति एवं आनंद प्राप्त करने के लिए ही तो किया जाता है, किंतु जब तक मन में अन्यान्य भाव एवं ध्वनियाँ भरी होंगी, तब तक शाँति एवं आनंद प्राप्त करना कैसे संभव हो सकेगा?
परंपराओं के इस क्रम में कोई भी धार्मिक अनुष्ठान करते समय कलश स्थापना की परंपरा है। यह संपूर्णता एवं समृद्धि का प्रतीक है। कलश के मुख पर विष्णु, कंठ में रुद्र एवं मूल में ब्राह्मा का वास मानकर इसकी तुलना सृष्टिकर्त्ता विराट् पुरुष से की गई है। अतः पूर्णघट ब्रह्मांड के सृजन का प्रतीक है। आम्र पल्लवों से युक्त कलश ही परिपूर्ण होता है। आम एक सदाबहार वृक्ष है। यह सृजन के पश्चात् जीवन की निरंतरता का बोधक है। इसलिए धार्मिक अनुष्ठानों में सर्वप्रथम कलश की स्थापना होती है और मृत्यु हो जाने पर जीवन की समाप्ति के प्रतीकात्मक घट को फोड़ दिया जाता है। इसका वैज्ञानिक पक्ष यह भी है कि मंगल कलश ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अपने में केंद्रित कर आसपास विकरित कर वातावरण को दिव्य बनाता है।
इस तरह यह बात स्वीकार करने योग्य है कि परंपराओं में भी विवेक छुपा हुआ है। हाँ, इसका मतलब यह नहीं है कि हम सभी परंपराएँ मानने ही लगें। परंतु इतना तो सच है ही कि अपने बड़े-बूढ़ों द्वारा कही हुई बातों को एकदम नकारें नहीं, बल्कि उन्हें ज्ञान-विज्ञान एवं तर्क की कसौटी पर कसें और यदि उसमें सार हो तो अपनाने में कतई न हिचकें।
सत्य अकेला नहीं, प्रेम और न्याय को भी साथ लेकर चलता है। इसी प्रकार असत्य के साथ पतन और संकट के सहचरों की जोड़ी चलती है।
(16-4-74 का शाँतिकुँज में दिया गया उद्बोधन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! इन दिनों मनुष्य जाति एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जिसके एक ओर सर्वनाश है, एक ओर उत्थान। हम सभी सामूहिक आत्महत्या करने के लिए खड़े हुए हैं। मनुष्य जाति चाहेगी, तो थोड़े दिनों पीछे सामूहिक रूप से आत्महत्या भी करनी पड़ेगी, क्योंकि तब हमारे ऊपर एटम बम बरसने लगेंगे और सारे-का-सारा वातावरण जहरीला हो जाएगा। मौत और जिंदगी में से एक का निर्धारण करने का सही वक्त यही है। ये चौराहा है। ये युग की संध्या है। इस युग की संध्या में हमको और आपको, उन लोगों को जिनके पास क्षमताएँ हैं, उनको थोड़े समय के लिए कम-से-कम जिंदगी के लिए इस बात का विचार करना चाहिए कि हम इस जन्म में मालदार नहीं बनेंगे, तो हमारा पुण्य अगले जन्म में हमें मालदार बना सकता है। इस जन्म में हम औलाद वाले और संतान वाले नहीं बनेंगे, तो अगले जन्म में हम संतान वाले और औलाद वाले बन सकते हैं। इस जन्म में अगर हमने वासना और तृष्णा मो पूरा नहीं भी किया, तो अगले जन्म में हम पूरा कर सकते हैं, अगर अगला जन्म इन्सान का मिल गया तब।
भौतिक इच्छा में पुत्रेषणा आती है, लोकेषणा आती है, वित्तेषणा आती है, वासनाएँ आती हैं, तृष्णाएँ आती हैं, लोभ-मोह को पूरा करना आता है। इन्हीं चार-पाँच चीजों के चंगुल में इन्सान की जिंदगी बँधी हुई सड़ रही है। लोगों से हमें कहना है कि इन बंधनों में से अपनी जिंदगी को निकालिए और जहाँ समय ने, युग ने, मनुष्यता ने और भगवान् ने आपको पुकारा है, वहाँ जाकर के खड़े हो जाइए। आप यहाँ से ये प्रेरणा लेकर जाएँ, संदेश ले करके जाएँ, उद्बोधन लेकर के जाएँ और वहाँ जहाँ फूल खिला हुआ हो। बगीचा तो सारा है। वहाँ कहीं कलियाँ होती हैं, कहीं पत्ते होते हैं, लेकिन भौंरों और शहद की मक्खियों को खासतौर से वहीं चक्कर काटना पड़ता है, जहाँ खिलावट ज्यादा होती है। हमको और आपको सर्वसाधारण के पास भी जाना पड़ेगा, जन-जन के पास जाना पड़ेगा, हर आदमी को संबोधित करना पड़ेगा, लेकिन जहाँ कहीं भी आपको ज्यादा चमक दिखाई पड़ती हो, प्रभाव ज्यादा दिखाई पड़ता हो, वहाँ आपको अपनी आँखों को बहुत तीखी रखना पड़ेगा।
आप जादूगर होकर जाएँ
मित्रो! गाँधी जी में यह विशेषता थी कि वे मनुष्य को जानने-परखने में बहुत होशियार थे। उनकी समझ में और पकड़ में ज्यादा देर नहीं लगती थी कि इसका नाम जवाहर लाल नेहरू है। इस तरह लोगों की आँखों में आँखें डालकर, चेहरे पर निगाहें डालकर आदमियों को पहचानने में उन्हें जरा भी गलत-फहमी नहीं होती थी कि ये काम का आदमी है और मजेदार आदमी है। उन्होंने इस तरह के काम के और मजेदार आदमी जहाँ कहीं भी पाए, उनकी खुशामद की तो क्या, प्यार किया तो क्या, कहीं-न-कहीं से गढ़कर हिंदुस्तान की आजादी की सेना में एक-से-एक बढ़िया आदमी लाकर के खड़े कर दिए। आदमी को पहचानने वाले जादूगर थे और बाजीगर थे वे। आपको भी मैं चाहूँगा कि आप जादूगर होकर के जाएँ, बाजीगर हो करके जाएँ और आदमी को पहचानने वाला होकर के जाएँ। आपको जहाँ कहीं भी ये दिखाई पड़ता हो कि ये काम का आदमी है, तो आप उसके पास सौ बार जाना, सौ बार खुशामद करना। हमारे लिए तो यह संभव नहीं हो पाता। हम तो चिट्ठी भी नहीं लिख पाते। हमारे पास तो चार सौ-पाँच सौ चिट्ठियाँ आती हैं। हमारे लिए तो उस डाक को पूरा करना और जवाब देना ही मुश्किल हो जाता है। हम तो उन लाखों लोगों में से जिनमें चमक देखी, प्रभाव देखा, उनके पास जा भी नहीं सकते और बुला भी नहीं सकते। आपको हम उसी तरीके से ‘डेलिगेट’ नियुक्त करते हैं, जैसे हमारे गुरु ने हमको प्रतिनिधि नियुक्त किया हुआ है। मेरे गुरुजी ने कहा कि मुझे वहाँ जाना चाहिए जहाँ कहीं भी दुनिया में चमकदार आदमी दिखाई पड़ें, जबर्दस्त आदमी दिखाई पड़ें। उनकी खुशामद करनी चाहिए, जो आदमी आत्मविश्वास से भरे हुए हों, विद्या से भरे हुए हों, जीवट और जान से भरे हुए हों, प्रभाव से भरे हुए हों और प्रतिभा से भरे हुए हों।
जहाँ भी चमक है, वहाँ विभूति है
मित्रो! हम आपको अपना प्रतिनिधि, अपना डेलीगेट, अपना संदेशवाहक नियुक्त करके भेजते हैं। इस तरह की चमक जहाँ कहीं भी आपको दिखाई पड़े, वहाँ आपको खासतौर से ध्यान देना चाहिए। क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता की विभूतियों में ये कहा है कि जहाँ कहीं भी चमक दिखाई पड़ती है, वहाँ-वहाँ मैं हूँ। पेड़ों में पीपल का पेड़, कामचोर, हरामखोर, व्यभिचारी, घटिया लोग यही चाहते हैं कि ये चीजें जन्नत में मिलेंगी। इसी ख्वाब में लोग डूबे रहते हैं। आज के संतों पर हमें गुस्सा आता है। उनको यहाँ भी एकादशी के दिन उपवास और वहाँ स्वर्ग में जाने पर भी एकादशी का व्रत रहेगा और कहेंगे कि कहाँ है कल्पवृक्ष-मेवा और फल चाहिए। मक्कार कहीं का, केवल स्वर्ग की कामना करता है।
मित्रो! हम आपको वास्तविकता से परिचय कराना चाहते हैं। अगर आपको साँसारिकता से लगाव है तथा शरीर को नीरोग और खुशहाल बनाना चाहते हैं, तो मशक्कत करें। श्रम करें। अक्ल की भी पूजा कर लेंगे तो सब चीजें पूरी हो जाएँगी। आपकी कामना पूरी हो जाएगी। आपकी तृष्णा पूरी हो जाएगी। तृष्णा क्या है? बेटे! आपने बेटे की शादी में पचास हजार रुपये खरच कर दिया। ऐसा क्यों किया, जबकि आपको इसका सूद मिलता था। अब तो घाटा गया है। हाँ साहब! हो तो गया, पर दूसरों को दिखाने के लिए, रौब झाड़ने के लिए, अपना सिक्का बजाने हेतु ऐसा किया। इसे ही तृष्णा कहते हैं। एक और भूत हमारे ऊपर सवार रहता है, उसका नाम ‘अहं’ है। जिसका हम प्रदर्शन करते हैं। मोटर पर बैठकर बादशाह की तरह से चलते हैं। यह है अहं, जो समाज को दिखाया जाता है। यह अहं ही पिशाच है, राक्षस है। यह हमारा हर तरह से नुकसान पहुँचाते हैं। इसे पूरा करने के लिए हम न जाने कितना आडंबर बनाते हैं। अहं, वासना और तृष्णा ये ही मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं।
हमारी जीभ में स्वाद है, परंतु उसके लिए खुराक चाहिए। पेट भरने के लिए रोटी, सब्जी चाहिए, हमको अमुक चीज चाहिए। यह सारी चीजें पूरी करने के लिए मनुष्य को श्रम करना पड़ता है। श्रम तथा बुद्धि के आधार पर हम साधन इकट्ठा करते हैं। अगर आपको भौतिक चीजों की ही लालसा है, तो आपको आध्यात्मिकता की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। उसके लिए श्रम कीजिए।
मित्रो! किंतु क्या किया जाए! ये देवी-देवता हत्यारे हैं, चुड़ैल हैं, जो बकरा खाते हैं और मनोकामना पूर्ण करते हैं। आपकी समस्याएँ बिलकुल भौतिकवादी हैं। अध्यात्मवाद से आपका कोई संबंध नहीं है। आपकी तो मिट्टी पलीद हो ही चुकी है, अब हमारी होने वाली है। अध्यात्म की मिट्टी पलीद होने वाली है। अरे, हम एक नाव में जो बैठे हैं। आप मरेंगे तो हम भी मरेंगे। लोभी गुरु-लालची चेला दोनों मरेंगे।
मित्रो! एक मौलवी साहब थे। उनका एक चेला था। चेले को समझाकर मौलवी साहब मक्का-मदीना हज करने चले गए। इधर चेले ने अपनी करामात दिखाना शुरू कर दिया। उसको जो भी चढ़ावा आता, वह उसे खाता तथा अपने पास रख लेता। इस बीच में वह चेला खूब खा-पीकर मोटा हो गया था।
चेले ने सोचा कि जब मौलवी साहब आ जाएँगे, तो हमारी क्या चलेगी तथा हमें कौन पूछेगा? उसने एक चाल चली और गाँव के हर मुसलमान के घर गया और औरत, बच्चे, बूढ़े प्रत्येक नर-नारी से एक ही बात कहता रहा कि मौलवी साहब मक्का-मदीना से आने वाले हैं। वे बहुत बड़े सिद्ध पुरुष होकर के आ रहे हैं, जिसे जो कह देंगे, कर देंगे, उसको लाभ मिलेगा। वे बजुत चमत्कारी बनकर आ रहे हैं। उनतीस तारीख को मौलवी साहब आ गए। भीड़ लगने लगी। चेले ने कहा कि आप जानते नहीं हैं, मौलवी साहब की दाढ़ी में चमत्कार है। पहले बाल में पूरा चमत्कार है। दूसरे-तीसरे में क्रमशः बीस प्रतिशत, पंद्रह प्रतिशत लाभ मिलेगा। अब तो हल्ला मच गया। पहले बाल के लिए भीड़ लग गई।
29 तारीख को सबने अपना कारोबार बंद कर दिया और पहुँच गए मौलवी साहब के पास। सभी ने उन्हें मालाएँ पहनाईं। मौलवी साहब प्रसन्न थे। वे बैठे भी नहीं थे कि अरे भाई! जरा रुको। यह क्या कर रहे हो? कोई माना नहीं और उनकी दाढ़ी तथा सिर के सभी बाल उखाड़ लिए। अब मौलवी साहब ने सोचा कि मेरे सारे बाल उखड़ गए। चेले की पौ बारह हो गई।
असली अध्यात्म समझें
मित्रो! मैं क्या कह रहा था? मनोकामना की बात, सिद्धियों की बात कह रहा था। अगर इसका नाम अध्यात्म है, गायत्री है, अनुष्ठान है, तो मैं आपसे बहुत ही नम्र शब्दों में कहना चाहूँगा कि इससे आपको कोई फायदा नहीं होने वाला है। आपको महात्मा के पास जाने से, चक्कर काटने से कोई लाभ मिलने वाला नहीं है। आप दो ही देवताओं श्रम और शिक्षा की, ज्ञान की पूजा करें और अपने जीवन को महान् बनाएँ। यह एक अध्याय आज समाप्त हुआ। इसके आधार पर भी भौतिक जीवन में आप सुख और आनंद पा सकते हैं।
मित्रो! एक दूसरा रास्ता और है, जिसे हम अध्यात्म कहते हैं। बेटे! अध्यात्म वह चीज है जो भौतिक शरीर के भीतर निवास करता है, जिसके द्वारा मनुष्य को सिद्धि 222 खा-पीकर लाल पड़ गया और यहाँ-वहाँ डोला-डोला फिरने लगा। कभी-कभी हमारे यहाँ भी आ जाता था।
एक साल क्या हुआ? एक साल दुकानदार को पड़ गया नुकसान। बस दुकानदार को आ गया गुस्सा। उसने कहा कि मैंने तीन साल के अंदर तुमको बीस हजार रुपये दिए। मेरा बीस हजार रुपया निकाल या मेरा मुनाफा करा, नहीं तो मैं तेरी दाढ़ी उखाड़ लूँगा। उसने कहा, अब क्या करूं, कैसे मुनाफा हो और कैसे घाटा पूरा हो? उसने कहा, चल अपने गुरुजी के पास चलता हूँ। उसे लेकर मेरे पास आ गया। मैंने कहा, बेटे क्या बीमारी लेकर आ गया। दुकानदार ने कहा, गुरुजी इसने कहा कि मैंने चौबीस लक्ष का अनुष्ठान किया है, तो तुम्हें ये फायदा हो जाएगा, लेकिन मुझे इस वर्ष नुकसान पड़ गया। मैंने उसे ठीक करके उसका घाटा पूरा करा दिया और दोनों से कहा कि बेटा तू अपने घर रह और तू अपने घर। दाढ़ी वाले लड़के से कहा कि बेटा तू भिक्षा माँग के खा। गायत्री का जप करता है और दुकानदारी के पैसे में शेयर होल्डर बनता है? तुझसे ये किसने कहा?
मित्रो! अगर मैं ये करना चाहूँ तो सोने-चाँदी के जखीरे खड़ा कर सकता हूँ। जो आशीर्वाद मैं फोकट में देता रहता हूँ, अगर उसकी कीमत बना दूँ, तो फिर जाने मैं क्या-क्या कर लूँ। लेकिन उस ओर मैं कभी गया नहीं। क्यों नहीं गया? क्योंकि वह धन, जिसके पीछे श्रद्धा जुड़ी हुई नहीं है, जिसके पीछे प्रेम जुड़ा हुआ नहीं है। जिस पैसे के पीछे आदमी की भावना जुड़ी हुई नहीं है, इस तरह का पैसा अगर मैंने लेना शुरू कर दिया, तो मित्रो! मेरा तेज, मेरा ब्रह्मवर्चस, मेरा मिशन और मेरे वो क्रियाकलाप सब नष्ट हो जाएँगे। ये जो इमारत है, इसमें जो कोई बैठेगा और जब तक व्याख्यान खत्म नहीं होता, तब तक तो उसके ऊपर इन इमारतों का चूना और इन इमारतों की ईंटें निकल-निकलकर उसके ऊपर गिरेंगी। जो कोई इसमें सोएगा, उसको रात में ऐसे सपने दिखाई पड़ेंगे और रात को वेश्याएँ दिखाई पड़ेंगी और भूत दिखाई पड़ेंगे और गुरुजी का प्रवचन जाने कहाँ छू हो जाएगा, इस तरह दबाव का पैसा हमारे मिशन में लगा होगा, तो वह सारे ईमान को भ्रष्ट कर देगा।
हमारा मूल है श्रद्धा
इसलिए मित्रो! मैंने जिंदगी भर यही रखा कि जहाँ श्रद्धा से भरा हुआ पैसा, ईमानदारी से भरा हुआ पैसा, भावनाओं से भरा हुआ पैसा आता होगा, उसे ही इस मिशन के लिए स्वीकार करेंगे। यह ठीक है कि हमारे मिशन को पैसे की बहुत जरूरत है, लेकिन हम जानते हैं कि हमारे बंधन कितने बँधे हुए हैं। अभी हम आप वानप्रस्थों को साठ-साठ और सत्तर-सत्तर की संख्या में हर महीने बुलाते हैं। अगर हमारे पास व्यवस्था हो, साधन हो, हमारे पास ठहरने का प्रबंध हो, खाने का प्रबंध हो, व्याख्यानों का प्रबंध हो तो हम बजाय साठ-सत्तर के छह सौ वानप्रस्थ हर महीने बुला सकते हैं और तीन सौ पेयर सारे हिंदुस्तान में और सारे विदेश में भेज सकते हैं और हम एक क्राँति ला सकते हैं। पर हम रुके हुए बैठे रहते हैं। हमारे यहाँ शिविर चलते रहते हैं। हम एक बार में पच्चीस महिलाओं को बुलाते हैं और उन्हें प्रशिक्षित करके पच्चीस शाखाओं में भेजते हैं। अगर हमारे पास उनके ठहरने, खाने, व्याख्यान आदि का प्रबंध हो तो हम क्यों बुलाएँगे पच्चीस महिलाएँ? फिर हम एक महीने के शिविर में एक हजार महिलाएँ बुला सकते हैं और एक हजार गाँवों में महिलाओं के विद्यालय चालू कर सकते हैं। पर हमारे पास साधनों का अभाव है।
मित्रो! अगर हमने चंदा माँगा होता, हर आदमी से कहा होता, हर आदमी को दबाव दिया होता और मजबूर किया होता। हर आदमी को लोभ और आश्वासन दिए होते, तो हमारे पास हीरे-जवाहरातों की खानें खड़ी होतीं, हमारे पास सोना खड़ा होता। हमको यह विद्या याद है और हमारा तप उस कीमत का है कि अगर हम उसकी कीमत पर पैसा इकट्ठे कर लें। अगर हम अपीलें करने लगें कि आपको देना चाहिए, तो अपील के नाम पर इकट्ठा कर लें। लेकिन हमने आज तक कभी माँगा नहीं और न माँगेंगे। हम जो काम करने चले हैं, उसमें हम ये चाहते हैं कि भावना से जुड़ा हुआ, श्रद्धा से जुड़ा हुआ, प्रेम से जुड़ा हुआ, मोहब्बत से जुड़ा हुआ, निष्ठा से जुड़ा हुआ और अपनी अंतःप्रेरणा से जुड़ा हुआ पैसा आए, चाहे वह कानी कौड़ी ही क्यों न हो? चाहे हम पच्चीस आदमी ही क्यों न बुलाएँ, पचास आदमी ही क्यों न बुलाएँ? चाहे हम जिंदगी भर में थोड़ा ही काम करें, छोटी ही बात रखें, लेकिन हम उतना ही करेंगे, जितना कि श्रद्धा से भरा हुआ पैसा हमारे पास आएगा।
आप जाइए ज्ञानयज्ञ के लिए धन एकत्र करिए
लेकिन हम आपको भेजते हैं और इसलिए भेजते हैं कि आप खुली जबान से और खुले हुए मुँह से कह सकें उन लोगों से भी, जिनके पास पैसा है। अगर वे लोग आपको इस तरीके से दिखाई पड़ते हैं कि वे किसी अच्छे काम के लिए और इस मिशन जैसे क्रियाकलापों के लिए खरच करने की स्थिति में और दान देने की स्थिति में हैं, तो आप इस तरीके से कहना। अगर इस तरीके के कामों में वे खरच करते हुए आपको दिखाई न पड़ें, तो उनसे कहना कि आपके पास जो दबा हुआ पैसा पड़ा है, रुका हुआ पैसा पड़ा है, उस पैसे को ऐसे क्रिया-कृत्यों में लगा दीजिए जिससे हमारे विचार क्राँति के लिए बहुत बड़ा साहित्य तैयार किया जा सकता है। मनुष्य की जीवात्मा की भूख मिटाने के लिए अभी एक ऐसा साहित्य नहीं लिखा गया है। किसी ने इस पर कलम छुई नहीं है, किसी ने पट्टी-पूजन किया नहीं है कि जो आदमी के दिलों को हिला दे। दिमागों को बदल दे। केवल गंदे उपन्यास और गंदी कहानियाँ, जादू की किताबें लिखी गई हैं, जिनमें वाहियात भरा हुआ पड़ा है। अभी तक इन्सान को हिलाने और जगाने वाला साहित्य किसी ने पढ़ या लिखा नहीं है।
मित्रो! जो लोग तंबाकू की फैक्ट्रियाँ चलाते हैं, बीड़ियों की फैक्ट्रियाँ, शराब की फैक्ट्रियाँ चलाते हैं, कसाई खाने चलाते हैं, चमड़े का उद्योग करते हैं और केवल इसलिए करते हैं कि किसी भी कीमत पर, किसी भी तरीके से उनके पास पैसा आना चाहिए। आपकी अगर हिम्मत हो और कोई आपकी बात मान ले, तो आप ये कहना कि उसमें आपको रुपये में चार आने मिलते हैं, लेकिन इसमें रुपये में एक आना मिलेगा। अगर आप चाहें तो इस तरह के व्यापार और उद्योग-धंधे शुरू कर सकते हैं, जिससे कि हमारे समाज के खोए हुए मनोबल को पुनः जाग्रत किया जा सके। दान मत दीजिए, अपने पास ही रखिए! बाबा! हम दान नहीं माँगते हैं, लेकिन आप अपने उद्योग को बदल दीजिए। बीड़ी के उद्योग में आपने बीस करोड़ रुपये को आप साहित्य के प्रकाशन में डाल दीजिए। फिर देखिए हम क्या व्यवस्था करते हैं?
नारी का जागरण करने के लिए एक भी किताब अभी तक नहीं लिखी जा सकी है, जो महिलाओं में जीवट उत्पन्न कर सके। इसी तरह बच्चों में जीवट उत्पन्न करने के लिए किसी ने कलम नहीं छुई है। मेढक की कहानी लिखी है, बंदर की कहानी लिखी है, कुत्ते की कहानी लिखी है, भूत की कहानी लिखी है, लेकिन बच्चों के अंदर जीवट पैदा करने की एक किताब नहीं लिखी गई। इस तरह का साहित्य जो हमारे समाज की कुरीतियों से लोहा लेने में समर्थ हो सके, इस तरह का साहित्य जो मनुष्य के भीतर दबे हुए भगवान् को जगा सके। हमारा अखण्ड ज्योति का जरा-सा साहित्य, मुट्ठी भर पैसों से प्रकाशित होने वाला साहित्य अपनी भूमिका को बखूबी प्रस्तुत कर रहा है। अगर यही साहित्य और यही प्रकाशन असंख्य धाराओं में लिखा जा सके और उसके प्रकाशन की व्यवस्था की जा सके तथा उसके लिए बुकसेलर तैयार किए जा सकें। उसका सारी-की-सारी हिंदुस्तान की चौदह भाषाओं में प्रकाशन किया जा सके, तो क्या आप समझते हैं कि हम हिंदुस्तान में नई फिजा पैदा नहीं कर सकते? नई दिशाएँ पैदा नहीं कर सकते? मुट्ठी भर निकलने वाली अखण्ड ज्योति क्या गजब ढा रही है, आप देख नहीं रहे हैं? इस तरह की अखण्ड ज्योतियाँ अगर सब भाषाओं में निकलने लगें और जगह-जगह निकलने लगें, तो गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान के रूप में छोटे-से केंद्र, जिनमें थोड़ा सा प्रकाशन होता है, इस तरह का प्रकाशन अगर जगह-जगह चालू हो सके, तो क्या हम कुछ भी काम नहीं कर सकते हैं। हाँ हम बहुत कुछ काम कर सकते हैं।
मित्रो! आप लोगों से यह कहना कि अगर आप में दान देने की या खरच करने की हिम्मत नहीं है, तो आप इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने व्यवसाय को बदल दें। मनुष्य के दिमाग को बदलने के लिए और जीवात्मा की भूख मिटाने के लिए आज जिस साहित्य की जरूरत है, उसके लिए आप पैसा दीजिए और इस काम को अपने हाथ में लीजिए। हम आपका एग्रीमेंट कर देंगे और आपकी व्यवस्था बना देंगे। हम आपके लिए साहित्य लिखकर दे देंगे, आपकी सहायता कर देंगे और आपको नुकसान नहीं पड़ने देंगे। ये गारंटी हम दे सकते हैं। लेकिन हम क्या कर सकते हैं? मित्रो! हमारे पास धन नहीं है और हम कोई काम शुरू नहीं कर सकते। ऐसा उद्योग चालू करने के लायक हमारे पास कोई सामर्थ्य नहीं है, साधन नहीं है।
साहित्य के बाद सुरुचिपूर्ण कला
मित्रो! यह तो हुआ साहित्य का काम नंबर एक, दूसरा काम है चित्रों का। चित्र, आपने देखा नहीं कितने काम करते हैं? गंदे चित्र बिकते हुए आपने देखे नहीं? दीपावली के दिनों आपने गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले और चौराहे-चौराहे पर तसवीर वालों की दुकानों को देखा नहीं है कि इन तसवीरों में क्या है? आपको इनमें अस्सी फीसदी तसवीरें व मालूम पड़ेंगी, जो मनुष्य की वासना को उद्दीप्त करती हैं, जो आदमी के अंदर के शैतान को भड़काती हैं। जो हमारी माँ को, बहन को और बेटी को वेश्या के रूप में प्रस्तुत करती हैं, उस तसवीर के माध्यम से। नारी, जिसको हमने सम्मान दिया, जिसको हमने माँ कहा, बेटी कहा, बहन कहा, उसकी शक्ल इन तसवीर वालों ने इस तरीके से हमारे सामने प्रस्तुत की है, जिससे कि हमारी आँखें खराब हो जाएँ और जो औरत हमें दिखाई पड़े, वो वेश्या के रूप में दिखाई पड़े और अपनी कामना की पूर्ति के लिए दिखाई पड़े। इस तरह तसवीर वालों ने हमारी आँखें बदल दी हैं।
साथियो! तो क्या इस बात की जरूरत नहीं है कि हम फिर से इस तरीके से लोगों में तसवीरों के प्रति अभिरुचि पैदा करें, जिसमें शिवाजी की जद्दोजहद और त्याग-बलिदान का स्वरूप परिलक्षित हो? क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि महर्षि दधीचि जिन्होंने अपनी हड्डियों तक का दान कर दिया था, उनकी तसवीरें लोगों को दें? ऐसी तसवीरें क्या कहीं दिखाई पड़ती हैं? मैंने तो आज तक नहीं देखीं। उनके जैसा हिंदुस्तान में त्याग करने वाला अनोखा उदाहरण एकमात्र वही थे। आज हम ऐसा अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करने वाले की एक भी तसवीर नहीं खरीद सकते। जिन लोगों ने स्वराज्य के लिए और उसके पूर्व स्वराज्य के लिए त्याग-बलिदान और कुरबानियाँ दी हैं, क्या आपके पास उनकी तसवीरें हैं? गणेश जी की तसवीर तो आप कहीं से खरीद सकते हैं, लेकिन ऋषि दधीचि की कोई तसवीर आपके नहीं मिल सकती।
मित्रो! क्या करना पड़ेगा? यह भी एक ऐसा काम है, जो मनुष्य के जीवन को और मनुष्य की दिशाओं को हिलाकर रख सकता है। अगर कहीं ऐसा उद्योग खड़ा करने में हम समर्थ हो जाएँ, कहीं हम स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को और अमुक समस्याओं को हल करने के लिए प्रकाशन का बड़ा संस्थान खड़ा कर सके, तो फिर मजा आ जाए। आप पैसे वालों के पास जाना और उनसे कहना कि हमारे पास बहुत सारे कीमती काम करने के लिए पड़े हैं। साहित्य के अलावा कला के मंच अभी जिंदा हैं। सरस्वती का प्रतीक कला के मंच क्या गजब ढा रहे हैं, आपको दिखाई नहीं पड़ता? हिंदुस्तान में जितनी संख्या में सारे अखबार प्रकाशित होते हैं, हिंदी से लेकर अँगरेजी तक सब भाषाओं के, उससे तीन गुने पाठक वे हैं जो सिनेमा को रोज देखने जाते हैं। सिनेमा अगर हमारे हाथ में रहा होता, सिनेमा तंत्र को चलाने के लिए अगर हमको धन मिल गया होता, तो मित्रो! हमने ऐसी सैकड़ों, हजारों फिल्में नई बनाकर समाज में फेंक दी होतीं, जिसमें कि ऋषियों का जीवन, देवताओं का जीवन, संतों का जीवन, महापुरुषों का जीवन, उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए होते। वे सारी-की-सारी घटनाएँ, जो लोगों को अपने जीवन में क्राँति और हलचल पैदा करने वाली दिखाई दे सकती थीं, उनको बनाने के लिए हम समर्थ हो सकते थे, लेकिन करोड़ों रुपया फिल्म उद्योग में लगा हुआ है।
मित्रो! अगर आप चाहें कि थोड़ा-सा भी पैसा ऐसे कामों के लिए मिल जाए, तो लोग तैयार नहीं हो सकते। क्योंकि वे देखते हैं कि ज्यादा मुनाफा इसमें नहीं है। वे यह देखते हैं कि लोगों की माँग क्या है? जमाने की माँग क्या है? जमाना जो चीज माँगता है, हम वह बराबर देते हुए चले जाते हैं। जमाना बीड़ी माँगता है, इसलिए हम बीड़ी देते हुए चले जाते हैं। जमाना शराब माँगता है और हम शराब की फैक्ट्रियाँ खोलते हुए चले जाते हैं। जमाना जुआ माँगता है, हराम का पैसा माँगता है और हम देते हुए चले जाते हैं। जमाना जो माँगता है, उसको हम देते हुए चले जाएँगे, तो मित्रो! जमाने को फिर उठाएगा कौन? जमाने को दिशाएँ देगा कौन? जमाने में हेर-फेर करेगा कौन? जमाने में हेर-फेर करने और दिशाएँ देने के लिए जरूरत उन लोगों की है, जो लोगों के दिमागों को मोड़ने में समर्थ हो सकें और लोगों की समझ को चैलेंज कर सकें, लोगों की समझ को ढालने के लिए नया प्रयास कर सकें।
धर्मतंत्र से चलें ढेरों प्रयास
मित्रो! इस तरह के प्रयास असंख्य दिशाओं में किए जाने आवश्यक हैं। हम और आप अपने संत के रूप में, ब्राह्मण के रूप में, पंडित के रूप में, कथावाचक के रूप में, और ज्ञानी के रूप में जाएँगे और धर्ममंच का सहारा लेकर धर्म के माध्यम से जहाँ कहीं भी हमको धार्मिक भावनाओं की जगह दिखाई पड़ेगी, वहाँ हम बदलने की कोशिश करेंगे, पलटने की कोशिश करेंगे। मित्रो! समाज को ऊँचा उठाने के लिए, राष्ट्र को ऊँचा उठाने के लिए, मानवता को ऊँचा उठाने के लिए आपकी जरूरत है। आपको धर्मवीर होना चाहिए और जहाँ कहीं भी धर्म की किरणें दिखाई पड़ती हों, धर्म के बीजाँकुर दिखाई पड़ते हों, वहाँ जाकर के आपको खाद के तरीके से, पानी के तरीके से बरसना चाहिए, ताकि जहाँ कहीं धर्म के बीजाँकुर जिंदा हों, वहाँ उनको उगाया जा सके, जगाया जा सके। ये आपका वैयक्तिक काम है और निजी काम है। इसे आप कर सकते हैं और आपको करना चाहिए। उसके अतिरिक्त ढेरों-के-ढेरों काम पड़े हैं। उनके लिए दूसरे आदमियों के सहायता की भी जरुरत है। इसके लिए आप वहाँ जाना, जहाँ कहीं भी आपको बुद्धि दिखाई पड़ती हों, चमक दिखाई पड़ती हो, प्रतिभाएँ दिखाई पड़ती हों, विभूतियाँ दिखाई पड़ती हों, प्रभाव दिखाई पड़ता हो, ज्ञान दिखाई पड़ता हो, धन दिखाई पड़ता हो।
आप उन सब लोगों के पास जाना और खुशामदें करना। आप उनको लेकर के चले आना और इस मोरचे पर खड़े करना, जहाँ कि आगे वाली लाइन में आप खड़े हैं। आपके दायीं ओर, बायीं ओर, आपके आगे और पीछे वे लोग सहायकों के रूप में साथ-साथ चलें। जिस राह पर चलते हुए हमको इन्सान के अंदर भगवान् की स्थापना करनी है और पृथ्वी पर स्वर्ग का अवतरण करना है, उस राह के लिए आपको अकेले चलना ही काफी नहीं है। प्रतिभावन विभूति को भी साथ-साथ लेकर चलना है। आप से ऐसा है मेरा निवेदन और ऐसा है अनुरोध। आज की बात समाप्त। ॥ ॐ शाँति॥
आदिकाल से ही भारत में गुरु-शिष्य परंपरा चली आ रही है। इसका वर्णन किए बिना आध्यात्मिक साधना प्रसंग एवं संस्कृति का प्रकरण अधूरा रह जाता है। गुरु-शिष्य परंपरा ही आदिकाल से ज्ञान-संपदा का संरक्षण कर उसे श्रुति के रूप में क्रमबद्ध करती आई है। भारत को जगद्गुरु की उपमा इस कारण ही दी जाती रही है कि उसने विश्व-मानवता का न केवल मार्गदर्शन किया, अपितु ब्राह्मणत्व के आदर्शों को जीवन में उतार कर औरों के लिए वह प्रेरणा स्रोत बना। गुरु व शिष्य के परस्पर महान् संबंधों एवं समर्पण भाव द्वारा अपने अहंकार को गलाकर ज्ञान-प्राप्ति की महत्ता का विवरण शास्त्रों में स्थान-स्थान पर मिलता है।
गुरु को मानवी चेतना का मर्मज्ञ माना गया है। वह शिष्य की चेतना में उलट-फेर करने में समर्थ होता है। गुरु का हर आघात शिष्य के अहंकार पर होता है तथा वह यह प्रयास करता है कि किसी भी प्रकार से डाँट से, पुचकार से, विभिन्न शिक्षणों द्वारा वह अपने समर्पित शिष्य के अहंकार को धोकर, साफ कर उसे निर्मल बना दे।
प्राचीनकाल में गुरु के सान्निध्य में रहकर शिष्य साधना का तेजस्वी जीवन बिताते थे। तपोवेष्ठित होने से उनका शरीर स्वर्ण जैसा दैदीप्यमान् होता था। संसार की कठिनाइयों से संघर्ष करने की उनमें शक्ति होती थी। वार्त्तालाप, विवेचन, विश्लेषण और विचार-विनिमय के द्वारा उनमें गंभीर चिंतन की प्रवृत्ति जागती थी। साधना-स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्मज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुण-पुँज या ज्ञान-पुँज ही नहीं, शक्ति-पुँज होकर भी निकलते थे। फलस्वरूप उन्हें भौतिक सुखों की कोई आकाँक्षा नहीं होती थी। जब वे अधिकार नहीं कर्त्तव्य माँगते थे। सेवा को वे व्रत समझते थे। साहस और कर्मठता उनमें कूट-कूटकर भरी होती थी। मनुष्य शरीर के रूप में उनमें स्वयं देवत्व निवास करता था। ऐसे मेधावी पुरुषों से यह भारतभूमि भरी-पूरी थी। तभी यहाँ सुख और समृद्धि की वर्षा हुआ करती थी।
वस्तुतः गुरु-शिष्य संबंधों का आध्यात्मिक स्तर उच्चस्तरीय आदान-प्रदान का होता है। शिष्य अपनी सत्ता के अहं को गुरु चरणों में समर्पित करता है। गुरु शक्तिपात द्वारा अपनी अनुकंपा द्वारा उसे ज्ञानप्राप्ति का अधिकारी बनाता व जीवन मुक्त कर देता है। इन संबंधों को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आत्मिक चार प्रकार का बताया गया है। लोकाचार में प्रथम तीन प्रकार के संबंध तो कहीं भी, किसी से भी स्थापित हो सकते हैं, किंतु सिर्फ गुरु से ही आत्मिक स्तर के संबंधों की संभावना है।
हमारी आध्यात्मिक परंपरा गुरु प्रधान ही रही है। इसी परंपरा के कारण साधना-पद्धतियों का सफल प्रयोग भी हुआ है। सदा से गुरुजनों ने इन्हें अपने जीवन में प्रयोग किया है तथा सफलता पाने पर सुपात्र साधकों के ऊपर रिसर्च लेबोरेट्री की तरह परीक्षण किया है। उन्हें श्रेष्ठ देवमानव बनाने का प्रयास किया है। गुरु-शिष्य परंपरा ने ही इतने नररत्न इस देश को दिए हैं, जिससे हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
जनार्दन पंत के शिष्य एकनाथ, गहिनीनाथ के शिष्य निवृत्तिनाथ, निवृत्तिनाथ के शिष्य ज्ञानेश्वर, स्वामी निगमानंद के शिष्य योगी अनिर्वाण, गोविंदपाद के शिष्य शंकराचार्य, शंकरानंद के शिष्य विद्यारण्य, कालूराम के शिष्य कीनाराम, भगीरथ स्वामी के शिष्य तैलंग स्वामी, ईश्वरपुरी के शिष्य महाप्रभु चैतन्य, पूर्णानंद के शिष्य विरजानंद, विरजानंद के शिष्य दयानंद, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य विवेकानंद व उनकी शिष्या निवेदिता, प्राणनाथ महाप्रभु के शिष्य छत्रसाल, समर्थ रामदास के शिष्य शिवाजी, चाणक्य के शिष्य चंद्रगुप्त, कबीर के शिष्य रैदास, दादू के शिष्य रज्जब, विशुद्धानंद के शिष्य गोपीनाथ कविराज, पतंजलि के शिष्य पुष्यमित्र तथा बंधुदत्त के शिष्य कुमारजीव ऐसे कुछ नाम हैं, जो इस परंपरा में देवसंस्कृति के पन्नों में पढ़े जा सकते हैं व जिनका जीवन उनके समर्पण भाव से लेकर गुरु के आत्मभाव के प्रसंग अपने आप में अद्भुत हैं। युगों-युगों तक ये प्रसंग आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधकों को प्रेरणा देते रहेंगे।
ज्ञानवान् तथा बुद्धिमान् आचार्यों के मार्गदर्शन में रहकर जीवन की सर्वांगपूर्ण शिक्षा इस देश के नागरिकों ने पाई थी, इसी से वे अपने ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता को प्रकाशित रख सके। गुरुकुलों के रूप में न सही, उतने व्यापक क्षेत्र में भी भले ही न हो, किंतु यह परंपरा अभी पूर्ण रूप से मृत नहीं हुई है। आज भी ब्रह्मविद्या के जानकार आचार्य और ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ के जिज्ञासु शिष्य यहाँ विद्यमान हैं, किंतु उनकी संख्या इतनी कम है कि वे किसी तरह लोक-जीवन में प्रकाश उत्पन्न नहीं कर पा रहे। फिर भी संतोष यह है कि ‘गुरु गौरव’ अभी भी यहाँ सुरक्षित है और उसका पूर्ण विकास भी संभव है।
शिष्य के संबंध में उपनिषद्कार कहता है “समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठ” हाथ में समिधा लेकर शिष्य विनम्र भाव से श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाए। समिधा क्यों? समिधा अग्नि पकड़ती है। गुरु ज्ञान की ज्योति के रूप में जीती-जागती व स्वयं को उस अग्नि का स्पर्श कर देगा, तो ज्ञान की अग्नि में तपकर वह भी ज्ञान का प्रकाश-विस्तार करने वाले तंत्र के रूप में विकसित होगा।
भारतीय संस्कृति में श्रद्धा, जो शिष्य में गुरु के प्रति होनी चाहिए, की बड़ी तर्कसम्मत वैज्ञानिक व्याख्या स्थान-स्थान पर की गई है। जब श्रेष्ठ गुरु के प्रति समर्पण होता है तो व्यक्ति तत्सम हो जाता है। इस समर्पण से उसे गुरु व भगवान् दोनों एक साथ मिल जाते हैं। श्री रामकृष्ण कहते थे, सामान्य गुरु कान फूँकते हैं, अवतारी महापुरुष-सद्गुरु प्राण फूँकते हैं, ऐसे सद्गुरु का स्पर्श व कृपादृष्टि ही पर्याप्त है।
वास्तविकता यही है कि समर्पण भाव से गुरु के निर्देशों का परिपालन करने वालों को जी भरकर गुरु के अनुदान मिले हैं। श्रद्धा की परिपक्वता, समर्पण की पूर्णता शिष्य में अनंत संभावनाओं के द्वार खोल देती है। उसके सामने देहधारी गुरु की चेतना की रहस्यमयी परतें खुलने लगती हैं। इनका ठीक-ठीक खुलना शास्त्रीय भाषा में गुरु के दक्षिणा मूर्ति रूप का प्राकट्य है। जो यह रूप समझ सका, परावाणी को सुन सका, उसे स्थूल का अभाव भी अभाव नहीं प्रतीत होगा। गुरु का यह रूप जान लेने पर मौन व्याख्या शुरू हो जाती है। हृदय में निःशब्द शक्ति का प्रस्फुटन होने लगता है। प्रश्न जन्म लेने से पूर्व ही उत्तरित हो जाते हैं। महाशून्य से उत्सर्जित चित्तशक्ति का निर्झर खुल जाता है।
आज राष्ट्र को ज्ञानवान्, प्रकाशवान् तथा शक्तिवान् बनाने के लिए चिर प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा की पुनरावृत्ति की निताँत आवश्यकता है। इसके बिना शाश्वत आनंद की अनुभूति तो दूर, शाँतिमय जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसमें कुछ देर भले ही लगे, किंतु आत्मा की ज्ञान-पिपासा को अधिक दिन तक भुलाया नहीं जा सकता। गुरु पर्व ही उसे जगाने का शुभ मुहूर्त है।
गुरु-शिष्य की इस परंपरा में परमपूज्य गुरुदेव एक ऐसी ही दिव्य सत्ता के रूप में हम सबके बीच आए। अनेकों व्यक्तियों ने उनका स्नेह पाया, सामीप्य पाया, पाय बैठकर मार्गदर्शन पाया, अनेक प्रकार से उनकी सेवा करने का अवसर मिला, पर जो उनके विचारों को उनका स्वरूप समझकर उनके निर्देशों के अनुरूप चलता रहा, उसे यह सब न भी मिला हो, तो भी आत्मिक प्रगति के पथ पर चल पड़ने का मार्गदर्शन मिला। ऐसे व्यक्ति साधना क्षेत्र में ऊँचाइयों को प्राप्त होंगे। गुरु जो कहे बिना कोई विकल्प प्रस्तुत किए, बिना कोई तर्क किए उसे करना ही साधना है। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं, सपनेहुँ सुलभ न तेहिं।
प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री की पत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री ने अपने जीवन के रोचक प्रसंग सुनाते हुए बताया-
“जब मैं पहली बार अपने पति के साथ रूस यात्रा के लिए तैयार हुई, तो मुझे बड़ा डर लग रहा था। मैं सोच रही थी कि मैं सीधी-सादी भारतीय गृहणी हूँ। राजनीति का मुझे ज्ञान नहीं, विदेशी तौर-तरीकों का पता नहीं। कहीं मुझसे कोई ऐसे प्रश्न न किए जाएँ, जिसका उत्तर मैं ठीक से न दे पाऊँ और तब मेरे पति अथवा देश का गौरव कुछ घटे अथवा उनकी हँसी हो। किंतु फिर मैंने यह निश्चय करके अपना डर दूर कर लिया कि मैं एक महान् देश के प्रधानमंत्री की पत्नी के रूप में अपने प्रस्तुत नहीं करूंगी। मैं तो सबके सामने अपने को एक साधारण भारतीय गृहणी के रूप में रखूँगी। मैंने जाकर अपने को एक गृहणी के रूप में ही पेश किया। वहाँ के अच्छे लोगों ने मुझसे घर-गृहस्थी के विषय में ही बातचीत की, जिसका उत्तर देकर मैंने सबको संतुष्ट कर दिया। इस प्रकार मैंने एक बहुमूल्य अनुभव यह पाया कि मनुष्य वास्तव में जो कुछ है, यदि उसी रूप में दूसरों के सामने पेश करे, तो उसे कोई असुविधा नहीं होती और उसकी सच्ची सरलता उपहास का विषय न बनकर स्नेह एवं श्रद्धा का विषय बनती है।”
गुरुपूर्णिमा सद्गुरु के प्रति अपने ‘स्व’ के अर्पण और समर्पण का महापर्व है। बड़े ही बड़भागी होते हैं वे लोग, जिन्हें सद्गुरु के दर्शन मिलते हैं। उनमें भी धन्यभागी वे हैं, जिन्होंने अपने समूचे अस्तित्व को उनके लिए दे डाला। स्वयं को समूचे तौर पर उनके चरणों में निछावर कर दिया। सभी शास्त्रकार इस बारे में एक मत हैं कि मनुष्य घटना है।
परंतु यह दुर्लभ सुयोग व्यर्थ चला जाता है, यदि सद्गुरु न मिलें। सद्गुरु का मिल नहीं मनुष्य देह में मनुष्यत्व को अंकुरित करता है। यह अंकुरण उनके दर्शन मात्र से हो जाता है और यदि दर्शन करने के साथ उनकी पहचान भी हो गई, तब तो समझो कि मुमुक्षा जग पड़ी। मनुष्य में देवत्वप्राप्ति के कपाट खुल गए और यदि उन्होंने अपना लिया, अपने आश्रय में रख लिया, तब तो परम तत्त्व की प्राप्ति निश्चित ही हो गई।
ऊपर कही ये तीनों बातें मात्र कुछ शब्दों का हेर-फेर नहीं हैं। इनमें बड़े गहरे मायने-मतलब छुपे हैं। यदि ऐसा न होता तो महान् तपस्वी ऋषिगण यह न कहते, “दुर्लभ त्रयमेतत् दैवानुग्रह हेतुकम। मनुष्यत्वं मुमुक्षत्वं सद्गुरुणाँ संश्रयः।” अर्थात् तीन चीजें इस जीवन में अति दुर्लभ हैं और इनको प्राप्ति का कारण हमारा पुरुषार्थ नहीं, बल्कि देवकृपा है और ये तीनों चीजें हैं, (1) मनुष्यत्व, (2) मुमुक्षत्व एवं (3) सद्गुरु का आश्रय।
इस ऋषिवचन की गहराई समझने के लिए आवश्यक है कि दैवानुग्रह के निहितार्थ को जाना जाए। उसके तत्त्व को हृदयंगम किया जाए। दैवानुग्रह का अर्थ है, ईश्वर कृपा या फिर उसके प्रतीक-प्रतिनिधि-सद्गुरु की कृपा। सामान्य क्रम में जीवन में हम जो कुछ पाते हैं, उसके मूल में हमारा अपना पुरुषार्थ होता है। पुरुषार्थ के बल पर, दम पर ही हम इस संसार में बहुत कुछ पाने का स्वप्न देखते हैं और फिर उस स्वप्न को साकार करते हैं।
पुरुषार्थ की महानता और गरिमा असंदिग्ध है। किंतु इसकी सीमा लोक और लौकिकता तक ही है। सारे पुरुषार्थ अहं के दायरे में ही घूमते-मँडराते रहते हैं। इस अहं के विसर्जन के बाद ही अलौकिकता का द्वार खुलता है और ईश्वर कृपा जीवन में सक्रिय होती है। यह कृपा ही अध्यात्म का मूल तत्त्व है। आध्यात्मिक जीवन की निधि है। यही वह प्रारंभ है जहाँ से ‘तमसे मा ज्योतिर्गमय’ का महामंत्र सक्रिय एवं साकार रूप लेता है। मनुष्यत्व की अमूल्य निधि इसी बिंदु पर प्राप्त होती है।
सही मायने में यह सद्गुरु के दर्शन का सुफल है। सद्गुरु मनुष्य देह में रहते हुए भी ईश्वर ही होते हैं। इस तत्त्व को बताते हुए ही महात्मा कबीर ने कहा है कि उन्हें तो अंधा ही समझो, जो सद्गुरु को केवल मनुष्य समझते हैं। जब तक हम सद्गुरु को निरा और अपने जैसा इन्सान समझते रहे, तब तक समझो कि उनका दर्शन हमें हुआ ही नहीं।
उनके ईश्वरीय भाव का दर्शन ही यथार्थ में सद्गुरु का दर्शन है। यदि हम यह अनुभव कर सकें कि इस हाड़-माँस की देह में स्वयं सर्वेश्वर विराजमान हैं, तो समझो कि हमें सद्गुरु का दर्शन मिल सका। इस तरह दर्शन पाने के बाद फिर मानव देह में मनुष्यत्व का उदय हुए बिना नहीं रहता।
मनुष्यत्व का उदय हुआ, इसका मतलब यह है कि हमने मनुष्य में निहित सारी संभावनाएँ जान लीं। जब तक हमको यह पता नहीं कि मनुष्य का निहितार्थ क्या है? मनुष्य क्या कर सकता है और क्या पा सकता है? मनुष्य का सर्वोच्च प्राप्य एवं उसकी परमोच्च ऊँचाई क्या है? तब तक हम मानव देह में रहते हुए भी मनुष्यत्व से वंचित हैं। सद्गुरु के दर्शनों से ही मनुष्य में निहित संभावनाओं का सही-सही पता चलता है और तभी शास्त्रकारों ने कहा है कि मनुष्यत्व की प्राप्ति सद्गुरु के दर्शन का सुफल है।
इन संभावनाओं को जानने के बाद जो अगला तत्त्व अंकुरित होता है, वह है मुमुक्षा। मुमुक्षा का अर्थ है-स्वयं में निहित दैवी संभावनाओं को साकार करने की दिव्य इच्छा। मुमुक्षु दिव्य इच्छा इसलिए है, क्योंकि इसके उदय होते ही अन्य सभी लौकिक इच्छाएँ स्वयं ही तिरोहित हो जाती हैं। जिस तरह सूर्य एवं अंधकार दोनों एक स्थान पर एक साथ नहीं रह सकते। उसी प्रकार मुमुक्षा एवं लौकिक कामनाएँ एक साथ नहीं रह सकते। उसी प्रकार मुमुक्षा एवं लौकिक कामनाएँ एक साथ नहीं रह सकतीं। मुमुक्षा के उदय होते ही मन-प्राण एक साथ दिव्यत्व एवं देवत्व के लिए मचल उठते हैं। ऐसे में भला क्षुद्र कामनाएँ व गर्हित वासनाएँ कहाँ टिकी रह सकती हैं।
मुमुक्षा के प्रबल होते ही परम कृपालु सद्गुरु स्वयं ही अपने आश्रय में ले लेते हैं। लोकभाषा में जिन्हें हम सद्गुरु द्वारा ली जाने वाली परीक्षाएँ कहते हैं, वह भी प्रकाराँतर से सद्गुरु की कृपा के क्रमिक सोपान ही हैं। ये न हों तो, न तो हमारे मनुष्यत्व का निखार होगा और न ही मुमुक्षा अपने प्रबलतम रूप में प्रदीप्त होगी।
मुमुक्षा के जगते ही स्वयं की क्षुद्रताएँ अपने आप ही सद्गुरु के विराट् में विलीन होने लगती हैं। अपनी अहंता हर पल-हर क्षण नष्ट होती है और सद्गुरु की महानता प्रतिपल-प्रतिक्षण प्रकट होती है। क्षुद्रता के महानता में परिवर्तन की धन्य घड़ी यही है। यही वह पल है, जिसके लिए गोस्वामी जी महाराज ने कहा है-
सन्मुख होहि जीव मोहिं जबहीं। कोटि जन्म अघ नासहिं तबहीं॥
माँ की गोद में भला उसके प्राणों से प्यारे शिशु को क्या भय? ठीक इसी तरह अपने प्यारे सद्गुरु के परम पावन आश्रय में उसकी शिष्य-संतान को क्या भय? सद्गुरु का आश्रित शिष्य स्वयं अपने गुरु का ही प्रतिरूप होता है। क्योंकि सद्गुरुणाँ आश्रय का मतलब ही है कि वह समर्पण, विसर्जन एवं विलय की सारी प्रक्रियाएँ पूर्ण कर चुका। अब तो बस उसका जीवन ‘सोऽहं’ की अखंड वृत्ति ही है।
सद्गुरु के आश्रय में शिष्य का जीवन एक ऐसी पवित्र ज्योति बन जाता है, जिसको कभी बुझना ही नहीं है। सच्चे शिष्य में सद्गुरु स्वयं ही प्रकाशित-ज्योतित होते हैं। शिष्य तो बस यंत्र रह जाता है, यथार्थ कर्त्ता तो बस सद्गुरु ही होते हैं। गुरु पूर्णिमा पर (5 जुलाई, 2001) प्रतिवर्ष हमें ऐसे ही सच्चे शिष्यत्व का बोध कराने आता है। हमें हमारी उन कमियों-कमजोरियों के प्रति आगाह करने आता है, जिसकी वजह से अभी हमारा अर्पण एवं समर्पण अधूरा है। यदि इस तत्त्वबोध को हम अनुभव कर सकें, तो निश्चित रूप से यह गुरुपूर्णिमा हमारे लिए ‘सद्गुरुणाँ आश्रय’ का दुर्लभ सुयोग सिद्ध हो सकेगी।
बगदाद के खलीफा उन दिनों दैनिक तीन दिरम वेतन लेते थे और प्रजा का धन प्रजाहित में ही खरच कर देते थे।
एक दिन उनकी बेगम ने कहा, “तीन दिन का वेतन पेशगी मिल जाए, तो वे बच्चों के कपड़े बनवा लें।”
खलीफा ने कहा, “क्या पता, कौन तीन दिन जिए न जिए। मैं कर्जदार बनकर नहीं मरना चाहता।” उन्होंने उधार पैसा लिया ही नहीं। आवश्यकताएँ सीमित रखने और परिवार की सुविधा से, सुसंस्कारों को अधिक महत्त्व देने की इस प्रवृत्ति से ही वे आदर्श लोकसेवी के रूप में उभरे और पूजे गए।
विदुर जी ने जब देखा कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन अनीति करना नहीं छोड़ते, तो सोचा कि इनका सान्निध्य और इनका अन्न मेरी वृत्तियों को भी प्रभावित करेगा, इसलिए वे नगर के बाहर वन में कुटी बनाकर पत्नी सुलभा सहित रहने लगे। जंगल से भाजी तोड़ लेते, उबालकर खा लेते तथा सत्कार्यों में, प्रभु-स्मरण में समय लगाते।
श्रीकृष्ण जब संधि दूत बनकर गए और वार्त्ता असफल हो गई, तो वे धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य आदि सबका आमंत्रण अस्वीकार करके विदुर जी के यहाँ जा पहुँचे। वहाँ भोजन करने की इच्छा प्रकट की।
विदुर जी को यह संकोच हुआ कि शाक प्रभु को परोसने पड़ेंगे? पूछा, “आप भूखे भी थे, भोजन का समय भी था और उनका आग्रह भी, फिर आपने वहाँ भोजन क्यों नहीं किया?”
भगवान् बोले, “चाचाजी! जैसे भोजन को करना आपने उचित नहीं समझा, जो आपके गले न उतरा, वह मुझे भी कैसे रुचता? जिसमें आपने स्वाद पाया, उसमें मुझे स्वाद न मिलेगा, ऐसा आप कैसे सोचते हैं?”
विदुरजी भाव-विह्वल हो गए, प्रभु के स्मरण मात्र से हमें जब पदार्थ नहीं संस्कार प्रिय लगने लगे हैं, तो स्वयं प्रभु की भूख पदार्थों से कैसे बुझ सकती है? उन्हें तो भावना चाहिए। उसकी विदुर दंपत्ति के पास कहाँ कमी थी। भाजी के माध्यम से वही दिव्य आदान-प्रदान चला। दोनों धन्य हो गए।”
“गुरुदेव को तीन अभिभावकों के तीन अनुदान उपलब्ध होते रहे हैं। हिमालय पिता से प्रखर व्यक्तित्व, मार्गदर्शक गुरु से लोकमंगल के लिए अभीष्ट सामर्थ्य। गायत्री माता से देवत्व युक्त ब्रह्मवर्चस्। यह तीनों ही उनकी उधार ली हुई अनुदान में प्राप्त विभूतियाँ हैं। वे इस शर्त पर मिली हैं कि उनका एक-एक कण भी अपने लोभ-मोह के लिए स्वार्थ-साधन के लिए खरच न किया जाए एवं उन्होंने इस प्रतिबंध का सदा पूरा-पूरा ध्यान रखा है।” ये पंक्तियाँ हैं फरवरी 1972 की अखण्ड ज्योति की ‘अपनों से अपनी बात’ की। लेखिका हैं परमवंदनीया माताजी। एक सच्ची शिष्या, आराधिका के रूप में उन्होंने अपनी गुरुसत्ता के सौंपे हर दायित्व को सँभाला। यहाँ वे गुरुदेव के तीन संरक्षक-अभिभावक के बारे में लिख रही हैं कि जो भी कुछ वे कर पाए, इसी समर्पण के बल पर। मिले अनुदान का एक कण भी निज पर नहीं, परहितार्थाय खरच करना। यह कार्य उन्होंने जीवनभर किया, यह उनके जीवन वृत्त से जाना जा सकता है।
स्वयं परमपूज्य गुरुदेव अपनी उपलब्धियों का सारा श्रेय अपनी गुरुसत्ता को ही देते थे। अपने हाथ से अपनी आत्मकथा उन्होंने अप्रैल 1985 में लिखी थी व इसे उस माह के जीवन वृत्ताँत विशेषाँक के रूप में प्रकाशित किया। इसके कई उद्धरण पढ़ने-समझने योग्य हैं। किसी भी आदर्श शिष्य के अंदर गुरु के प्रति क्या भाव होना चाहिए, इसका संकेत इनसे मिलता है। बाद में ये सभी अंश थोड़े संपादित होकर ‘हमारी वसीयत और विरासत’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए। यह पुस्तक जन-जन तक लोकप्रिय हुई है। इसमें वे लिखते हैं, “उस दिन (वसंत पर्व 1926) हमने सच्चे मन से उन्हें समर्पण किया। वाणी ने नहीं, आत्मा ने कहा, जो कुछ पास में है, आपके निमित्त ही अर्पण। भगवान् को हमने देखा नहीं, पर वह जो कल्याण कर सकता था, वही आप भी कर रहे हैं। इसलिए आप हमारे भगवान् हैं। जो आज सारे जीवन का ढाँचा आपने बताया है, उसमें राई-रत्ती प्रमाद न होगा।” (पृष्ठ 5, अप्रैल 1985 अखण्ड ज्योति) आगे वे लिखते हैं, “नंदन वन पहुँचते ही गुरुदेव का सूक्ष्मशरीर प्रत्यक्षतः सामने विद्यमान था। उनके प्रकट होते ही हमारी भावनाएँ उमड़ पड़ीं। आँखें बरस पड़ीं। होंठ काँपते रहे। नाक गीली होती रही। ऐसा लगता था मानो अपने ही शरीर का कोई खोया अंग फिर मिल गया हो और उसके अभाव में जो अपूर्णता रहती हो सो पूर्ण हो गई हो। उनका सिर पर हाथ रख देना हमारे प्रति अगाध प्रेम के प्रकटीकरण का प्रतीक था।” (पृष्ठ 34, अप्रैल 1985 अखण्ड ज्योति)
एक शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण क्या व कैसा होता है, इसकी बानगी देते हैं ये शब्द। जीवनभर परमपूज्य गुरुदेव अपनी इस परोक्ष सूक्ष्मशरीरधारी सत्ता से मिले अनुदानों की ही चर्चा करते रहे। चाहे साठ के दशक की अखण्ड ज्योति हो या सत्तर के दशक की। दो या तीन अंक छोड़कर स्थान-स्थान पर उनके समर्पण भाव की अभिव्यक्ति पाठक को दृष्टिगोचर होती है।
अप्रैल 1969 में मथुरा से अपनी विदाई की पूर्व वेला में परमपूज्य गुरुदेव संपादकीय द्वारा अपने शिष्यों-पाठकों की मनोभूमि तैयार कर रहे थे। ‘हमारी प्रेम साधना और उसकी परिणति’ शीर्षक से एक लेख में वे लिखते हैं, “अपने मार्गदर्शक के प्रति हमारी प्रेम साधना को यदि साँसारिक रिश्तों से तोला जाए, तो उसकी उपमा पतिव्रता स्त्री के अनन्य पतिप्रेम से दी जा सकती है। उनकी प्रसन्नता अपनी प्रसन्नता है। उनकी इच्छा अपनी इच्छा।” (पृष्ठ 62, अप्रैल 1969) “परमात्मा का प्रेम अपने विकसित रूप में एक कदम आगे बढ़ते हुए गुरुभक्ति के रूप में फलित हो सका। हमने अपने मार्गदर्शक पर उतनी ही निष्ठा आरोपित की, जितनी परमेश्वर पर की जा सकती है।” (पृष्ठ 61, अप्रैल 1969) “ ईश्वरभक्ति का अभ्यास हमने गुरुभक्ति की प्रयोगशाला में-व्यायामशाला में आरंभ किया और क्रमिक विकास करते हुए प्रभुप्रेम के दंगल में जा पहुँचे।” (पृष्ठ 64, मई 1969)
ये उद्धरण मात्र इसलिए दिए जा रहे हैं कि हम एक सच्चे शिष्य की तरह स्वयं को कसौटी पर कस सकें। समर्पण हो तो किस स्तर का, किस ऊँचाई का। संबंध हो तो कैसा। अति पावन आत्मा से आत्मा का रिश्ता है यह एवं सब कुछ खो देने की भावना से प्यार किया जाता है। बदले में मिलता ही चला जाता है-
कबीरदास जी कहते हैं-
गुरु गोविंद तो एक हैं, दूजा यहु आकार। आपा मेट जीवत मरै, तो पावै करतार॥
यहाँ ‘आपा’ अर्थात् अहंकार, ‘जीवत मरै’ अर्थात् अपने सामने ही समाप्त कर देना एवं ‘करतार’ अर्थात् परमात्मा है। अर्थात् “गुरु साक्षात् भगवान् ही हैं। गुरु और परमात्मा दोनों मूलतः एक ही सत्ता के दो नाम हैं। केवल आकार या रूप की भिन्नता है। गुरुकृपा से जो जीवित मरता है अर्थात् अपने अहंकार-ममता को समाप्त कर देता है, वह परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।”
संत कबीर गुरु-शिष्य संबंधों पर अपनी व्याख्या बड़ी स्पष्ट व निराली देते हैं। वे लिखते हैं-
बूड़े थे परि उबरे, गुरु की लहरि चमंकि। भेरा देख्या जरजरा, उतरि पड़ै फरंकि॥
भेरा यानी एक प्रकार की नाव, जरजरा यानी जर्जर, फरंकि यानी फड़ककर-उछलकर।
अर्थात् “मैं पुरानी और जर्जर नाव अर्थात् परंपरागत रूढ़िवादी आचार-विचारों वाली संसार सागर की यात्रा में करीब-करीब डूब चुका था। किंतु सद्गुरु के अनुग्रह भरे वचनों की लहर ने चमक कर मुझे बचा लिया। बस, मैं उछलकर परंपराओं की, रूढ़ियों की नाव से अलग हो गया।”
कितनी सुँदर उलटबाँसी है एवं गुरु से जुड़ने की फलश्रुति है, जो बताती है कि समग्र कायाकल्प कर देती है गुरु से जुड़ने की प्रक्रिया। समर्पण पर ही कबीर की एक और बड़ी प्यारी साखी है।
सद्गुरु के सद्कै करूं, दिल अपणी का साछ। कलियुग हम स्यूँ लड़ि पड्या, मुहकम मेरा बाछ॥
सदकै यानी निछावर, साछ यानी साक्ष्य, मुहकम यानी दृढ़, बाछ यानी आकाँक्षा-वाँछा।
अब अर्थ हुआ, “शिष्य कहता है कि मैं हृदय को साक्षी बनाकर (सच्चे हृदय से) सद्गुरु के प्रति अपने को निछावर करता हूँ। सद्गुरु की कृपा और उनके प्रति मेरा समर्पण देखकर कलियुग (साँसारिक विषय-वासनाएँ) मुझ से लड़ने लगा। वह मुझे गुरु के प्रति समर्पण से विचलित करना चाहता है। किंतु मैं दृढ़ इच्छा वाला हूँ। कलियुग मुझे विचलित नहीं कर सकता।”
आज के इस युग में, कलियुग की पराकाष्ठा के इस जमाने में कितना अद्भुत शिक्षण है। इच्छा दृढ़ हो तो विषय-वासनाओं से लड़ा जा सकता है, समर्पण सच्चा हो तो फिर तारणहार के रूप में गुरु इस घोर कलियुग में भी हमें जरा भी विचलित न होने देकर तार देता है।”
वस्तुतः गुरु कितना भी योग्य हो, समर्थ हो, यदि साधक के, व्यक्ति के अंतराल में शिष्यत्व नहीं है, तो गुरु की योग्यता कारगर न हो सकेगी। गुरु बीज बोता है, खाद-पानी की व्यवस्था करता है, लेकिन भूमि भी तो उर्वर होनी चाहिए, अन्यथा बीजों का ढेर ऊसर बंजर जमीन में यों ही व्यर्थ चला जाता है। हम सभी को बार-बार अपनी पात्रता को परखना चाहिए। परमवंदनीया माताजी ने गुरुसत्ता के प्रति पूर्ण समर्पण किया। परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी सूक्ष्मशरीरधारी सत्ता को सब कुछ समर्पित कर दिया। बदले में दोनों ने जो पाया, वह हम सबके सामने है। हमें तो पहचानने के लिए, खोजने के लिए पुरुषार्थ करने की भी जरूरत नहीं। सहज ही हमें इस कलियुग में तारणहार के रूप में गुरुसत्ता मिल गई है। संकल्प, धैर्य और श्रद्धा का त्रिविध सुयोग यदि अपनाया जाए, तो मनोभूमि ऐसी बनती है कि अध्यात्म के दिव्य अवतरण को धारण किया जा सके। यह पात्रता ही शिष्यत्व है। समय पात्रता विकसित करने में लगता है, गुरु प्राप्ति में नहीं। जितने भी अनुदानों-लौकिक, पारलौकिक लाभों की चर्चा ग्रंथों में आती है, वह मिथ्या नहीं सत्य है। सही श्रद्धा हो, अपना उद्देश्य पावन हो तो लोकमंगल के लिए ये अनुदान मिलते भी हैं और सदुपयोग किए जाने पर इनको बहुगुणित होते भी देखा जा सकता है। गुरु तो पत्थरों में से हीरे तराशता है, जैसे स्वामी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने खोज निकाला था। समस्त सिद्धियाँ मिलने का प्रस्ताव सामने होते हुए भी नरेंद्रनाथ (स्वामी विवेकानंद) ने ईश्वरीय प्रेम की ही माँग की थी और वही उन्हें मिली।
कभी-कभी लगता है गुरु बड़े कठोर होते हैं। जिस किसी ने महर्षि दयानंद के गुरु विरजानंद जी के, सद्गुरु श्री विजयकृष्ण गोस्वामी जी के एवं गुरजिएफ के बारे में पढ़ा होगा, वह अवश्य जानता होगा कि वे अपने शिष्यों के प्रति कितने कठोर थे। परंतु वास्तविकता इससे विपरीत थी। इनसे बड़ा प्रेमी तीनों लोकों में भी नहीं मिलेगा। गुरु तो सर्जन है, शल्य-चिकित्सक है। इसे जन्म-जन्माँतरों के कषाय-कल्मष निकाल देने हैं, अपने शिष्य को धो देना है। सद्गुरुदेव के शब्दों में, “मेरे गुरु ने मुझे धोबी की तरह पीट-पीटकर धुला है, धुनिये की तरह धुनाई की है।” कठोरता व इस धुनाई के पीछे भी अनन्य प्रेमभाव है। आज भी सूक्ष्म व कारणशरीर से दानों ही सत्ताएँ शिव और शक्ति के रूप में हमारे बीच मौजूद हैं। हम अपना प्रेम-समर्पण उनके प्रति और अधिक बढ़ाएँ, उनके बताए मार्ग पर चलकर लोकमंगल में स्वयं को नियोजित कर दें, गुरुपर्व पर यही हमारी सच्ची गुरुदक्षिणा होगी।
कबीर साहब की साखियों में गुरु की गरिमा का स्थान-स्थान पर प्रतिपादन है। एक स्थान पर वे लिखते हैं-
कबीर सतगुरु नाँ मिल्या रही अधूरी सीख। स्वाँग जती का पहरि करि, घरि घरि माँगे भीख॥
अर्थात् “अगर सच्चा गुरु नहीं मिला और आध्यात्मिक शिक्षा अधूरी रही तो ऐसे में जती (संन्यासी) का वेश भीख माँगने का बनावटी आवरण मात्र है।” कितने ही व्यक्ति गुरु से जुड़ तो जाते हैं, पर अपना समुचित आध्यात्मिक शिक्षण पाने में असफल रह जाते हैं एवं ऐसी स्थिति में व्यक्ति यदि कहीं लौकिक जगत् भी छोड़ दे, तो न घर का रहता है, न घाट का। फिर तो वह भीख माँगते रहने वाला एक बाबाजी मात्र बन जाता है, जिसे वेश का सम्मान होने के नाते कुछ मिल जाता है, किंतु लक्ष्यप्राप्ति की मात्रा कभी पूरी नहीं हो पाती। आज यह विडंबना हमें चारों ओर दिखाई देती है। धर्म का व्यापारीकरण-सा हो गया है। लगभग एक करोड़ बाबाजी वाला यह देश इक्कीसवीं सदी में हमें एक भी विवेकानंद-दयानंद नहीं देता, तो इसका कारण संभवतः दोनों ही स्तर पर पात्रता की कमी है।
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने जीवन भर गुरुभक्ति-सच्चे गुरु की पहचान एवं सच्चे समर्पण की परिणति पर लिखा। जो भी कुछ उनकी जीवनभर की उपलब्धियाँ रहीं, जो कि किसी भी स्थिति में आश्चर्य से कम नहीं, वे अपनी गुरुसत्ता को ही उसका पूरा श्रेय देते हैं। वे अपने तीन अभिभावक मानते रहे हैं, हिमालय, गुरुसत्ता (स्वा. श्री सर्वेश्वरानंदजी महाराज) तथा गायत्री माता। ‘कृत्य किसी का श्रेय किसी को’ पुस्तिका में वे लिखते हैं, “जो भी कुछ हमसे बन पड़ा वह हमारे मास्टर-संरक्षक ने हमारे लिए किया, हम तो बस निमित्त मात्र बने रहे, श्रेय लूटते रहे।”
आज उसी गुरुसत्ता के लाखों-करोड़ों शिष्य हैं। उन्हीं के बल पर ‘गायत्री परिवार’ रूपी यह विशाल वृक्ष, एक अनूठा संगठन सभी के लिए आशा का केंद्र बना खड़ा है। कैसे पैदा किए उन्होंने वे शिष्य? कौन-सी घूटी पिलाई उन्हें, यह जानना हो तो हमें उनके स्नेहसिक्त पत्रों का अवलोकन करना चाहिए, जो एक निधि के रूप में हमारे पास सुरक्षित हैं। ये पत्र जीते-जागते अध्यात्म साधना के समर्पण का मर्म अपने में समाए लोकशिक्षण करने में समर्थ ग्रंथ हैं। इनकी एक-एक पंक्ति देखने योग्य है। 8/4/54 को श्री रामचरण सिंह बिजनौर को लिखे एक पत्र में वे कहते हैं,
“गायत्री माता का आँचल यदि आप श्रद्धापूर्वक पकड़ेंगे, तो इसका परिणाम बहुत ही कल्याणकारक होगा। इतना निश्चित है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती।
आप हमें गुरु मानते हैं। हम भी आपको पुत्र एवं शिष्य मानकर आपके कल्याण के लिए प्रयत्न करते रहेंगे। हमारा स्नेह, सहयोग, पथ-प्रदर्शन तथा आशीर्वाद आपको प्राप्त होता रहेगा।”
इस पत्र में गुरुदेव श्री सिंह को अपना पुत्र एवं शिष्य संबोधित कर रहे हैं। पुत्रवत् स्नेह ही शिष्य को वह अनुदान देने की पात्रता देता है, जिसके लिए गुरु की गरिमा जानी जाती हैं अपनी प्राणशक्ति का आरोपण कर वह अपने सगे बेटे से भी अधिक प्यार अपनी मानस संतति से करता है एवं उसका सच्चा मार्गदर्शन भी करता है। इसीलिए तो वे 4 अक्टूबर 1952 को श्री बैजनाथ शोनकिया जी को लिखे एक पत्र में लिख देते हैं-
“तुम्हारा जीवन-लक्ष्य निश्चित है। (1) निश्चित प्रारब्ध एवं कर्म-बंधनों को इस जीवन में भुगत कर आगे का हिसाब पूरा करना (2) नित्य की साधारण साधना द्वारा अपनी आँतरिक भूमि शुद्ध करते रहना। यह दो कार्य आपको पूरे करने हैं। तीसरा कार्य आपको पूर्णता प्राप्त कराना हमारे जिम्मे है। आप अपना काम करते रहें। समय पर हम अपना काम कर देंगे। हमें हमारी जिम्मेदारी का पूरा-पूरा ध्यान है।”
कबीरदास जी कह गए हैं, कभी संशय नहीं रखना चाहिए।
संसै खाया सकल जगु, संसा किनहुँ न खद्ध। जो बेधे गुरु अष्षिराँ तिनि संसा चुणि चुणि खद्ध॥
यहाँ पहले शब्दों का अर्थ समझ लें। संसै अर्थात् संशय। खद्ध यानी खाया-नष्ट किया। अष्षियाँ अक्षरों से। बेधे याने बिद्ध-बिंधे हुए प्रविष्ट। अब अर्थ हुआ “संशय (गुरु वचनों के प्रति श्रद्धा का अभाव) ने सारे संसार को नष्ट कर दिया। किंतु संशय को कोई समाप्त नहीं कर सका। संशय को केवल वही भक्त समाप्त कर पाता है, जिसका हृदय सद्गुरु के अविनाशी एवं साधनाप्रसूत उपदेशों से विद्ध है। उपदेश उसने हृदयंगम कर लिए हैं।”
यहाँ यह बात लिखी इसलिए कि हम सद्गुरु के वचनों का मोल समझ सकें। उनकी एक-एक सीख हृदयंगम करने योग्य है। मित्रवत् भाव से अपने एक अनन्य श्री बद्रीप्रसाद जी पहाड़िया को एक बहुत पुराने (4/8/1942) लिखे पत्र में लिखते हैं-
“आप ऐसा ख्याल कदापि न करें कि नाराजी की कोई बात है। हमारे निकट नाराजी जैसी किसी वस्तु की पहुँच नहीं है। तुम तो बहुत ऊँचे उठने वाले व्यक्ति हो। जो व्यक्ति सचमुच अपराधी होते हैं, उन पर भी हमें दया ही आती है। क्योंकि वे नहीं जानते कि हम क्या कर रहे हैं। तुम कभी भी ऐसी बात मत सोचा करो। कार्य बहुत अधिक रहने के कारण पत्रों के उत्तर ही दे पाते हैं। अपनी ओर से पत्र भेजने में विलंब हो गया। तुम तो अपने ही हो। आत्मीयता के साथ द्वैत भाव नहीं रहता।
तुम्हें काम बहुत करना पड़ता है, पर खाने को कम मिलता है, यह जानकर चिंता हुई। ऐसे अवसरों पर मनुष्य भटक जाता है और अनुचित पैसे को भी ग्रहण करने लगता है। तुम ऐसा मत करना। हरिश्चंद्र की तरह कष्ट सहना, पर अपने पथ से विचलित मत होना। दुःखों को अपनाते हुए भी धर्म पर स्थिर रहना वीरों का काम है। हमारा विश्वास है कि तुम बहादुर ही प्रमाणित होगे।”
जरा पत्र की सिखावन देखिए। एक तो पत्र न मिलने की वजह से यदि नाराजी हो तो आप से आरंभ कर ‘तुम’ पर आकर आत्मीयता की, अद्वैत भाव की स्थापना। दूसरे जीवन व्यवहार में कहीं कोई भटकाव आता हो तो बालक की तरह समझाना कि खाने में रूखी-सूखी मिले, तो भी चलेगा, पर अनुचित पैसे को मत ग्रहण करना। तुम वीर पुरुष हो एवं तुम्हें दुखों में भी धर्म पर स्थिर बने रहना चाहिए। कितनी बड़ी शिक्षा है, कितना प्रेम है गुरु को अपने शिष्य से। कहाँ मिलती है आज ऐसी सिखावन देखने को। तरस जाते हैं हम ऐसे नरपुँगवों को देखने को, जो सामने आए प्रलोभनों को ठुकरा दें। उन्हें भटकाव से रोकने वाला कोई गुरुतत्त्व नहीं है न।
जब गुरु शिष्य को समझाते हैं, तो एक-एक शब्द में प्राण छिपे होते हैं। पत्र के माध्यम से भी मानो वे शक्तिपात करते हैं। एक पत्र श्री रामस्वरूप चायौदिया जी को 7 अगस्त 1950 को लिखा। देखें-
“आपका पत्र मिला। पढ़कर मिलने के समान प्रसन्नता हुई। चित्त का पूर्णतया वश में होना ‘समाधि’ कहलाता है। वह पूर्णावस्था तो अभी देर में प्राप्त होगी, पर जैसे-जैसे आपकी श्रद्धा और साधना आगे बढ़ती चलेगी, वैसे-ही-वैसे मन अपने आप स्थिर होता चलेगा। जप के समय मस्तिष्क के मध्य भाग में अँगूठे के बराबर दीपक की लौ के समान पीतवर्ण गायत्री तेज का ध्यान किया करें। इससे आपका चित्त शाँति और एकाग्रता की ओर अग्रसर होगा।
आपका हमारे प्रति गुरुभाव है। यह अच्छा ही है। पत्थर की मूर्ति को आधार बनाकर भगवान् को प्राप्त करने योग्य श्रद्धा उत्पन्न करने का अभ्यास किया जाता है। किसी गुरु को आधार मानकर अपने अंतःकरण में निवास करने वाले ‘सद्गुरु’ को प्राप्त करने का अभ्यास करना पड़ता है। कालाँतर में जब सद्गुरु जाग्रत हो जाता है, तब वह शिष्य को (अंतःकरण चतुष्टय कोद्ध आपने साथ ले चलता है। आपको वह वास्तविक दीक्षा प्राप्त होने में यह नकली गुरुदीक्षा भी सहायता करेगी। जैसे पहलवानों को लकड़ी के मुदगर उनकी बलवृद्धि में सहायक होते हैं हम मुद्गर मात्र हैं। साधारण मनुष्य। आप जैसे ब्राह्मण बंधुओं के अनन्य सेवक-चरण रज।”
जरा इस पत्र की भाषा तो देखिए। स्वयं की विनम्रता किस सीमा तक? अपने आपको अपने भक्त का अनन्य सेवक, यरण रज कह रहे हैं। यह भी लिख रहे हैं कि अभी अस्थायी रूप से यह भाव जो आपने पैदा किया है, बनाए रखें। सबसे ज्यादा जरूरी है अंदर के सद्गुरु को जगाना। अंदर के गुरु को जगाकर शिष्य की उपमा अंतःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहं) से देकर कितना बड़ा अध्यात्म का पाठ पढ़ाया है, यह वही जान सकते हैं, जिनने गुरुभक्ति के दंगल में थोड़ा-सा व्यायाम किया हो।
अंत में हिंगोली के माधव कौतिक ढाके को लिखा एक पत्र प्रस्तुत है। इससे ज्ञात होता है कि गुरु-शिष्य के अंतर्संबंध किस स्तर के होते हैं। यह पत्र 28-12-1955 को लिखा गया।
“तुम्हें स्वप्न में हम लोग दीखते हैं। हम लोग तुम्हें सदा अपने आस-पास घूमता देखते हैं। यह अपने पिछले जन्मों के संबंधों के कारण ही है।”
गायत्री परिवार की नींव कितनी गहरी है, यह इन पत्रों से समझा जा सकता है। इन्हीं पातियों ने, संबंध-सूत्रों की घोषणा करने वाले ऋषितंत्र ने स्वयं अवतरित हो यह संगठन खड़ा किया है। इस स्नेह-संवेदना की नींव पर खड़े तंत्र को कोई हिचकोला हिला भी नहीं सकता, यह विश्वास इस गुरुपूर्णिमा पर हम सभी सँजोकर उस गुरुतत्त्व के सच्चे अंग-अवयव बनने का प्रयास करें, यही उनके प्रति सच्ची पुष्पाँजलि होगी।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के ज्ञान से प्रभावित श्री माथुर बाबू एक बार पूछ बैठे, “महाराज जी, आपके विचारों का स्पर्श पाकर जन-जीवन धन्य हो जाएगा। आप प्रचार के निमित्त निकलते क्यों नहीं?”
प्रमहंस बोले, “बेटे मैंने कुछ पौधे लगा रखे हैं, उनकी देखभाल करने के लिए यहाँ रहता हूँ।” माथुर बाबू बोले, “प्रभु वह काम तो माली........................।”
परमहंस बीच में ही हँस पड़े। पास बैठे नरेन्द्र, राखाल आदि की ओर इशारा करके बोले, “माली साधारण पौधे सँभाल सकता है, इन कल्पवृक्षों को तो मुझे ही सँभालना है। जो काम तू चाहता है, वह यही कर लेंगे।”
सारे विश्व को, जनमानस को जीवन विद्या के आलोक केंद्र के रूप में शाँतिकुँज से प्रकाश मिले, इसकी ढेरों शाखा-प्रशाखाएँ बनें एवं पुनः भारत इस जागती एक महानायक बने, यह परमपूज्य गुरुदेव की सदा की इच्छा रही। इसी उद्देश्य से उन्होंने शाँतिकुँज को गायत्री-तीर्थ का स्वरूप दिया, ऋषि-परंपराओं की, जो लुप्तप्राय-सी हो गई थीं, यहाँ स्थापना की। यही नहीं, एक बोधिवृक्ष-कल्पवृक्ष के रूप में इस पावन तीर्थ की कई शाखाएँ गायत्री शक्तिपीठों, प्रज्ञा, संस्थानों, प्रज्ञापीठों के रूप में स्थापित की गईं। प्रारंभ चौबीस से किया गया था, किंतु उनकी संख्या देखते-देखते चौबीस सौ तक जा पहुँची एवं अब यह आँकड़ा पाँच हजार को पार करता दिखाई दे रहा है।
शाँतिकुँज एक अकाडमी का, विश्वविद्यालय का स्वरूप ले एवं इसके द्वारा पढ़ाई जाने वाली जीवन जीने की कला के पर्याय अध्यात्म विद्या की विभिन्न विधाएँ, महाविद्यालयों की तरह प्रज्ञा संस्थानों द्वारा पढ़ाई जाएँ, यह भी पूज्यवर का मन था। परिजन विगत एक-दो वर्षों से सुन रहे हैं व जब भी शाँतिकुँज आते हैं, देखते रहे हैं कि शाँतिकुँज परिसर के बिलकुल समीप आम्रकुँजों से घिर ऋषिकेश मार्ग पर एक भूखंड है, जिसमें संतों-महापुरुषों के द्वारा मई 1999 में भूमिपूजन समारोह संपन्न हुआ था। अब वह परिसर बनकर तैयार हो चुका है।
विश्वविद्यालय देश में ही नहीं, विश्वभर में ढेरों हैं। अपना मन उस परंपरागत शिक्षा पढ़ाने वाले तंत्र की स्थापना का न कभी था, न अब है। हमारी गुरुसत्ता ने शिक्षा के समानाँतर विद्या विस्तार की बात कही है। विद्या विस्तार होगा, अध्यात्म-चेतना का आलोक देश-विदेश में फैलेगा, तो पुनः नालंदा, तक्षशिला परंपरा जीवित होगी, जिसने ढेरों महामानवों को, ऋषियों को जन्म दिया। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की परमपूज्य गुरुदेव की परिकल्पना के पीछे वही चिंतन काम कर रहा है। साधना, शिक्षा, स्वावलंबन तथा स्वास्थ्य जैसी विधाओं पर कोई ठोस कार्य हो, इनके शिक्षण-प्रशिक्षण का तंत्र बने व यहाँ से प्रशिक्षित लोकसेवी विश्वभर में फैल जाएँ, तो पुनः इस देश को विश्व का अग्रणी बनने में देर नहीं लगेगी।
परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से अक्टूबर 89 की ‘अखण्ड ज्योति’ में लिखे एक लेख के एक उद्धरण को पाठकों को पढ़ाने को यहाँ मन है। “युग परिवर्तन की महाक्राँति के असंख्यों विभाग-उपभाग हैं। उन सभी में नवजीवन का संचार होता हुआ देखा जा सकता है। लगता है कोई महान् जादूगर अपने चमत्कारों की पिटारी खोलकर सर्वसाधारण को यह अवगत कराने जा रहा है कि दैत्य की दानवी दमनकारी शक्ति कितनी ही क्यों न हो, विश्वकर्मा की सृजन-सामर्थ्य उससे कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। परिस्थितियों का कायाकल्प करने के लिए सामर्थ्य पुँजों, महामनीषियों और सृजन के कलाकारों ने अपने-अपने पुरुषार्थ तेज कर दिए हैं। लगता है कि समाज के कायाकल्प को कोई भी भवितव्यता टाल नहीं सकेगी। इसके लिए चार संकल्प इस मिशन द्वारा लिए गए हैं-
(1) परिकर के प्रायः चौथाई करोड़ (पच्चीस लाख) लोगों को सृजन के लिए प्रशिक्षित करने का, बैटरी चार्ज करने के स्तर का कार्यक्रम (2) एक लाख सृजनशिल्पी कार्य क्षेत्र में उतारना। साधु, ब्राह्मण का पुनरुज्जीवन। (3) नालंदा, तक्षशिला, श्रावस्ती परंपरा का अनुकरण। श्रावकों-परिव्राजकों-पुरोहितों को प्रशिक्षित कर सारे विश्व में भेजना। (4) नारी जागरण।” (पृष्ठ 56)।
जो परिजन उपर्युक्त संदेश की भाषा समझते हों, वे जान सकते हैं कि इस हीरक जयंती वर्ष में अब क्या कुछ होने जा रहा है। शाँतिकुँज करोड़ों गायत्री साधकों की श्रद्धा का केंद्र यथावत् बना रहेगा। इसके साथ जुड़ा परिसर एक विश्वविद्यालय स्तर के परिसर के रूप में विकसित होगा। इसकी औपचारिक शुरुआत विगत दिनों हो गई जब 8 मई को हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल (उत्तराँचल) के उपकुलपति, कुलसचिव एवं विशेषज्ञों की एक टीम ने आकर प्रारंभिक सर्वेक्षण कर मनोविज्ञान, दर्शन, प्राच्य इतिहास, संस्कृति, पुरातत्त्व एवं योग इन चार विषयों में परास्नातक स्तर का प्रशिक्षण देने के लिए देवसंस्कृति महाविद्यालय आरंभ किए जाने हेतु अपनी संस्तुति दे दी है। इस महाविद्यालय की जुलाई के मध्य से अस्सी छात्र-छात्राओं से शुरुआत हो रही है। इसी को आगे चलकर पहले डीम्ड एवं फिर एक पूरी यूनिवर्सिटी का रूप दिया जाएगा, जिसमें पहले बताई चारों विधाएँ अपने पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई जा सकेंगी। इसमें शासन की औपचारिकताएँ मात्र पूरी की जा रही हैं। यह महाविद्यालय पूर्णतः स्वशासित एवं बिना किसी सरकारी अनुदान के जन-जन के लिए कार्य करेगा। इसी को आगामी एक-डेढ़ वर्षों में विश्वविद्यालय स्तर मिलने पर यह बिना किसी अनुदान के जन-जन के सहयोग से ही कार्य करेगा। परिजन इसका स्वागत करें एवं इसे हीरक जयंती वर्ष में गुरुसत्ता के चरणों में चढ़ाया एक पुष्पहार मानें।
विगत अंक में बताया गया कि इस विशिष्ट अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण कर्मों के बंधन से मुक्त हो मनुष्य को, साधक को तत्त्वतः भगवान् को जान लेने, उन तक पहुँचने का मार्ग सुझाते हैं। यह एक प्रकार से जीवन जीने की कला का शिक्षण है। कर्म को मनुष्य यदि यज्ञीय भाव से संचालित करता रहे, तो फिर कभी कष्टों में, अज्ञानरूपी दुःखों के घटाटोप में घिरने का तो प्रश्न ही नहीं है। भगवान् कहते हैं कि मनुष्य आत्मा में स्थित है, वह अपने शरीर के कर्मों से लिपायमान नहीं होता, वह मात्र एक साक्षी के रूप में जीवन जी रहा है। ऐसा विचार कर कर्म करने से ‘कर्त्ताभाव’ से मुक्त होकर कर्म किए जाते हैं। इसके लिए भगवान् यहाँ नमूना सामने रखते हैं। पंद्रहवें श्लोक में उन्होंने कहा कि प्राचीनकाल में भी कई मुमुक्षुओं ने इसी तरह कर्म किए हैं, तुम भी उनकी ही तरह कर्मों का संपादन करो। यह एक शास्त्रविहित मार्ग है। कर्म की गति को अति गहन बताते हुए शिक्षक-गुरु श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्म-अकर्म-विकर्म का भेद न समझ पाने के कारण ही ढेरों व्यक्ति दुर्गति को प्राप्त होते हैं। निषिद्ध कर्म, विकर्म, संकल्पित कर्म, कर्म तथा संकल्परहित कर्म ईश्वर की इच्छानुसार किए गए कर्म-अकर्म हैं, यह परिभाषा उदाहरणों के साथ विगत अंक में समझाई गई। अब इस सूत्रभरी अभिव्यंजनाओं से भीर व्याख्या को और अच्छी तरह इस अंक में समझने का प्रयास करेंगे।
बुद्धिमान मनुष्य कौन
भगवान् कहते हैं, “कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इसका फैसला बुद्धिमान पुरुष भी नहीं कर पाते। जो यह रहस्य जान लेता है, वह कर्म बंधनों से मुक्त हो जाता है।” (श्लोक 16) आगे फिर वे कहते हैं, “कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए। विकर्म को भी भलीभाँति समझ लिया जाना चाहिए, क्योंकि कर्म की गति बड़ी गहन है-गहना कर्मणो गतिः।” (श्लोक क्रमाँक 17) अब इन दो श्लोकों को और भी अधिक गंभीरता से समझना हो तो अठारहवें श्लोक की व्याख्या समझ लेनी चाहिए। भगवान् इसमें कहते हैं-
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥
“जो मनुष्य कर्म में अकर्म को देखता है और जो अकर्म में कर्म को देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है अर्थात् वह बुद्धिमान पुरुष ही सर्वत्र सभी कर्मों का वास्तविक कर्त्ता होता है।”
इन तीनों श्लोकों की गूढ़ अभिव्यंजनाओं को अब हम यहाँ समझाने का प्रयास करेंगे। अकर्म, कर्म और विकर्म की परिभाषाएँ उदाहरण सहित पहले हम दे चुके हैं। भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि यह संसार, जिसमें हम रह रहे हैं, इसमें कर्म एक जंगल के समान है, जिसमें मनुष्य अपने काल की विचारधारा, अपने व्यक्तित्व के मानदंडों और अपनी परिस्थिति के अनुसार किसी तरह लुढ़कता हुआ अपनी यात्रा संपन्न कर रहा है। श्री अरविंद कहते हैं, “ मनुष्य के ये विचार और मान उसके एक ही काल या एक ही व्यक्तित्व को नहीं, बल्कि अनेक कालों व व्यक्तित्वों को लिए हुए होते हैं। अनेक सामाजिक अवस्थाओं के विचार और नीतिधर्म तह-पर-तह जमकर आपस में गुत्थमगुत्था हुए होते हैं, इन सबके बीच मूल सत्य को ढूँढ़ता हुआ एक ज्ञानी अंत में ऐसी जगह जा पहुँचता है, जहाँ यही अंतिम प्रश्न उसके समक्ष आता है कि यह सारा कर्म और जीवन एक भ्रमजाल तो नहीं है, कर्म को सर्वथा त्याग कर अकर्म का प्राप्त होना ही क्या इस थके हुए भ्राँतियुक्त मानव जीव के लिए अंतिम आश्रय नहीं है? परंतु ऐसी स्थिति में श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस बारे में तो ज्ञानी भी भ्रम में पड़ जाते हैं और मोहित हो जाते हैं (कवयोऽप्यत्र मोहिताः? 4-17)। क्योंकि ज्ञान और मोख कर्म से मिलते हैं, अकर्म से नहीं।” इसीलिए कर्म की गति अति गहन है।
हम बता चुके हैं कि क्रिया कर्म है, अक्रिया अकर्म है। कर्म जीवन की वह क्रिया है, जो हमें करनी चाहिए, जिसे स्वधर्म या निष्काम कर्म भी भगवान् कहते हैं। विकर्म वह क्रिया है जीवन की, जो निषिद्ध है, नैतिकता के सिद्धाँतों के अनुरूप नहीं है। अकर्म वह स्थिति नहीं है, जिसमें व्यक्ति आलस्य या अकर्मण्यता को प्राप्त हो। संकल्परहित कर्म ही अकर्म है। ईश्वर की इच्छा ही हमारी इच्छा बन जाए, तो वह अकर्म के रूप में स्वचालित ढंग से संचालित होती रहती है। ऐसे उच्चस्तरीय स्थिति के कर्मों को अकर्म कहते हैं। संकल्पों से जुड़ी क्रियाएँ कर्म कहलाती हैं।
गहना कर्मणो गतिः
अब कर्म में अकर्म तथा अकर्म में कर्म यह क्या चक्कर है, इस जंजाल को थोड़ा समझने का प्रयास करेंगे। कितना समझ या समझा पाएँगे मालूम नहीं, क्योंकि भगवान् स्वयं कह रहे हैं कि कर्म की गति बड़ी गहन है। यहाँ योगेश्वर अठारहवें श्लोक में जो बात कह रहे हैं, वह बड़े पते की है। वे कह रहे हैं कि कोई जरूरत नहीं कि आवश्यक साँसारिक कर्मों से बचा जाए। जो अनिवार्य हैं, उन्हें अवश्य किया जाए, किंतु अंतरात्मा को भगवान् के साथ योग में स्थित करके (युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्)। यदि इस भाव से नहीं किया गया, तो वे कर्म नहीं हैं। अकर्म मुक्ति का मार्ग नहीं है। जिसकी प्रज्ञा विकसित है, जो अंतर्दृष्टि संपन्न है, वह देख सकता है कि ऐसा अकर्म स्वयं ही सतत होते रहने वाला एक कर्म है, एक ऐसी अवस्था है, जो प्रकृति और उसके गुणों की क्रियाओं के अंतर्गत ही संपन्न हो रही है। जो इस बात को समझ लेता है कि आकर्षण्यता क्या है, संकल्पित कर्म क्या है तथा कर्म करते हुए भी अकर्म की स्थिति में कैसे रहा जा सकता है, भगवान् उसे बुद्धिमान मनुष्य (स बुद्धिमान मनुष्येषु) कहते हैं। यह एक उच्चतम ज्ञान है, जो बुद्धि के उच्च आयामों पर पहुँचने पर ही मिलता है। ऐसा ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति भ्राँत-मोहित बुद्धि वाला नहीं है। वह मुक्त पुरुष है। वह ब्राह्मी स्थिति को पहुँचा पुरुष है।
श्री अरविंद की पुस्तक है ‘विचार व सूत्र’। ‘मातृ वाणी’ के दसवें खंड में विचारपक्ष में संकलित करके यह किताब बनी है। इसमें एक वाक्य है, जो उद्धृत करने का मन है। “जो जीवन के संघर्षों से जूझ रहा है, सतत कर्मरत है, उसे ही सक्रिय मत मानो। जो गुफा में बैठा आत्मसत्ता को सक्रिय कर समष्टि की साधना कर रहा है, वह जो कर्म कर रहा है, वह अकर्म है और इस अकर्म में बड़ी शक्ति छिपी पड़ी है।” यदि हम इतिहास के पृष्ठ पलटें तो पाते हैं कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों भूमिका निभाने वाले दो ही संत हैं, महापुरुष हैं, श्री अरविंद एवं पं. श्रीराम शर्मा आचार्य। दोनों ने ही प्रारंभिक जीवन में युवावस्था में एक क्राँतिकारी के रूप में सक्रिय भूमिका निभाकर इस महासंग्रामरूपी महायज्ञ में आहुतियाँ दीं एवं दोनों ने ही जीवन का उत्तरकाल आध्यात्मिक तप-वातावरण को प्रचंड ऊर्जा से ओतप्रोत करने की प्रक्रिया संपन्न करने में लगाया। जीवन के अंतिम वर्षों में श्री अरविंद भी काफी समय एकाकी-अंतर्मुखी साधना में लीन रहते थे। परमपूज्य गुरुदेव का जीवन भी गवाह है कि अंतिम बीस वर्ष के सूक्ष्मीकरण के 1984 से आरंभ होकर 1990 में समाप्त हुए छह वर्ष एकाँत साधना हेतु ही नियोजित थे। इसके अतिरिक्त भी वे एक-एक वर्ष के लिए तीन बार प्रत्यक्ष एवं एक बार परोक्ष हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में एकाकी तप में रत रहे।
कर्म में अकर्म
भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि सच्चा योगी वही है, जो कर्म में अकर्म एवं अकर्म में कर्म के कर्म को पहचान लेता है। तत्त्व से जान लेता है एवं कर्म की गति इसीलिए गहन होती है। मनुष्य अकर्म में कर्म को देख नहीं पाता और कर्म में अकर्म को समझ नहीं पाता। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि कर्म का अहंकार छोड़कर जिसे अकर्म दिखाई पड़े और यह समझे कि जो भी कर्म हो रहे हैं, भगवान् की इच्छानुसार हो रहे हैं, वही मनुष्य समझदार है-
गुण तुम्हार समझउ निज दोषा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥
‘तुम्हार भरोसा’ अर्थात् भगवान् के नाम पर परमसत्ता के नाम पर किया गया हर कार्य अकर्म है। भले ही वह प्रत्यक्ष दिखाई न दे। हम सभी अपने कर्मों का श्रेय लेने की कोशिश करते हैं। अच्छे सभी कर्म परमात्मा की इच्छा से हो रहे हैं, यदि यह हम सोचने लगें, तो हमारी वासनाएँ क्षीण हो जाएँ, कर्म-अकर्म बन जाए। कर्मों को संपन्न करते वक्त यदि कोई दोष रह जाए, जो कि स्वाभाविक है, तो हमें अंतःकरण की मलीनता को निमित्त मानना चाहिए। भगवान् को दोष नहीं देना चाहिए। कई लोग कहते हैं कि अच्छा काम किया तो हमने गलत किया तो भगवान् की प्रेरणा से स्वतः हो गया। यह सामान्य दृष्टि हर किसी के मन में सहज होती है। एक कथा से, जो कि पौराणिक है, बड़ा स्पष्ट हो जाएगा।
एक ब्राह्मण ने अपनी झोंपड़ी के आसपास बगीचे को खूब सुँदर बनाया। बगीचे में चारों तरफ बाड़ लगा दी। एक दिन ऐसा हुआ कि उस बाड़ में से एक गाय अंदर घुस आई। उसने सारे बगीचे को उजाड़ दिया। जो भी कुछ बड़े परिश्रम से लगाया गया था, वह गौ माता चर गई। जैसे ही ब्राह्मण ने बाहर आकर देखा, तो क्रुद्ध होकर उसने एक लाठी उस गाय को लगा दी। सोचा तो यह था कि इससे वह बाहर भग जाएगी, पर गाय थी कृशकाय। एक लाठी पड़ी एवं वह वहीं मृत्यु को प्राप्त हो गई। अब ब्राह्मण देवता बड़े परेशान कि यह क्या हो गया। गौ हत्या का पाप लगा गया। इतने में गौ हत्या स्वयं आकर सामने खड़ी हो गई कि चलिए! टब अपने किए का दंड भुगतिए। ब्राह्मण महाराज को एक युक्ति सूझी। उन्होंने कहा, मैंने कुछ नहीं किया। मेरे हाथों ने किया। हाथों के देवता को इंद्र हैं, इसे जाकर पूछो कि यह कैसे हो गया। गौ हत्या सीधी इंद्रदेवता के पास जा पहुँची। बोली कि वह ब्राह्मण कहता है कि गौ हत्या तो आपके द्वारा हुई है। हाथों के देवता होने के कारण उसने यह इल्जाम आप पर थोप दिया है। इंद्र सोचने लगे कि अच्छी आफत है। बुरा काम कोई करे व दोष किसी और का माना जाए।
इंद्र ने ब्राह्मण वेश धारण किया और पंडित जी की झोंपड़ी में अवतरित हुए। पंडित जी से इंद्र ने कहा कि महाराज बगीचा बड़ा सुँदर है। किसने लगाया? पंडित जी बोले, हमने लगाया है। बड़ी मेहनत की है। इंद्र बोले, ऐसा लगता है कि कोई जीव आकर इसका एक हिस्सा चर गया। ब्राह्मण देवता बोले, हाँ एक दुष्ट गाय आई थी। हमने उसे मार दिया। इंद्र बोले, तो क्या आपके हाथों गौ हत्या हो गई। पंडित जी ने पुनः दाँव पलटा, नहीं हमारे क्यों, वह तो इंद्र का अधिकार क्षेत्र है। उन्हीं के द्वारा हुई। इंद्र बोले, पर बगीचा तो आपका ही लगाया हुआ है। आपने ही मेहनत की व आप ही उसका श्रेय ले रहे हैं। जब अच्छे काम की तारीफ की तो आपने मान लिया कि आपने लगाया है, आपने किया है एवं जब हत्या की बात की तो आप कहते हैं कि इंद्र ने की। इतना कहकर इंद्र देवता ने स्वयं को प्रकट कर दिया व ले गए उन्हें मृत्युलोक, ताकि दंड मिल सके।
हर मनुष्य में एक सहज दोष होता है कि हर अच्छे कर्म का वह स्वयं श्रेय लेने की कोशिश करता है। यदि इसके स्थान पर ईश्वरीय सत्ता की प्रेरणा को यदि हम श्रेय दे तो हमारे अंदर अभिमान पैदा नहीं होगा, कर्म के प्रति आसक्ति नहीं होगी। जो कर्म में अभिमान त्याग दे, भगवान् को श्रेय दे, वह कर्म में अकर्म को देखता है। परमपूज्य गुरुदेव हमेशा यही कहा करते थे कि महाकाल हमसे करा रहा है। जो कुछ भी हमारी उपलब्धियाँ हैं, वह हमारी गुरुसत्ता की ही देन हैं। हम गोस्वामी जी की चौपाई के भाव को समझने का प्रयास करें, जो भी कुछ गुण है, जो भी कुछ अच्छा है, हे प्रभु! वह तुम्हारा ही है, तुम्हारे ही कारण है। जो भी दोष हैं। उन्हें मैं अपना मानूँगा। जिनको भगवान् पर विश्वास है, वह इसी भाव को मन में रख सतत कर्म करते रहते हैं।
अकर्म में कर्म
श्री अरविंद के अकर्म को गाँधी जी भी नहीं समझ पाए थे। एक स्थान पर वह कह गए थे, “आजादी के इस संग्राम की वेला में वे भगोड़े बनकर पाँडिचेरी जाकर बैठ गए, जबकि उन्होंने जहाँ से शुरुआत की थी (क्राँतिकारी के रूप में) उसे आगे बढ़ाना चाहिए था।” उनके इस कथन की बड़ी प्रतिक्रिया हुई थी उन दिनों। लोगों ने इसे बड़ी गंभीरता से लिया था। श्री अरविंद और श्री रमण के अकर्म को, मौन तप को, परोक्ष जगत् को प्रचंड आँदोलन से भर देने वाली ऊर्जा को प्रवाहित करने की प्रक्रिया को परमपूज्य गुरुदेव ने समझा था। वे स्वयं पाँडिचेरी जाकर उनसे मिले भी। (1937) एवं 1940 से सतत प्रकाशित अपनी पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ में निरंतर वे लिखते रहे कि सूक्ष्मजगत् में तपकर रही इन दो सत्ताओं के द्वारा ही स्वतंत्रता संग्राम अपनी अंतिम परिणति को पहुँचेगा। भगतसिंह का बलिदान, गाँधी जी का सत्याग्रह आँदोलन अपनी जगह, पर परोक्ष जगत् से सक्रिय ऊर्जाप्रवाह को नकारा नहीं जा सकेगा, जिसने यह वातावरण बनाया। प्रत्यक्षतः यह अकर्म ही दिखाई देता है। किंतु इस अकर्म में ही सच्चा कर्म छिपा है।
भगिनी निवेदिता ने अपने गुरु (स्वामी विवेकानंद) के महाप्रयाण (1902) के बाद अपना कार्य जारी रखा। वे न केवल नारी जागरण के लिए संघर्ष कर रही थीं, राष्ट्र निर्माण हेतु भारतवर्ष की आजादी के समर्थन में भी वे सतत लिखती रहती थीं। कई क्राँतिकारी उनसे मिलने आते रहते थे। लॉर्ड कर्जन जो बंगभंग के लिए जिम्मेदार थे, तक शिकायत पहुँची कि बेलूरमठ के रामकृष्ण मिशन का क्राँतिकारियों से संबंध है। तब मठ की जमीन व कुछ भवन ही वहाँ पर थे। तत्कालीन संचालक मंडल ने निवेदिता से कहा कि हमारे पास बराबर लाटसाहब का संदेश आ रहा है। वे कह रहे हैं कि इस मठ को समाप्त कर देना है, ताकि क्राँतिकारियों का गढ़ ही समाप्त हो जाए। कई संन्यासियों पर भी उन्हें संदेह है कि ये कहीं क्राँतिकारी तो नहीं। तब निवेदिता ने कहा कि ऐसी बात है, तो हम अपने गुरु के सच्चे शिष्य हैं। हम जाकर उनसे मिलेंगे व समझाएँगे। लाटसाहब की पत्नी भगिनी निवेदिता की इंग्लैंड के समय से ही अच्छी मित्र थीं। उन्होंने जाकर उन्हें समझाया कि यह हमारे गुरु का एवं उनके गुरु का मंदिर है। यहाँ क्राँतिकारी कहाँ हैं? आप यह क्या कर रहे है।? यहाँ तो आदमी बनाने का तंत्र है। इसे नष्ट मत करिए। बात आई गई हो गई।
‘मठ की डायरी’ के उन दिनों के पृष्ठों को जिनने पढ़ा है, वे बताते हैं कि ऐसी स्थिति आ गई थी कि भगिनी निवेदिता को मठ से निकालने की तैयारी हो गई थी, ताकि उनसे मिलने वाले क्राँतिकारियों के कारण मठ की बदनामी न हो। पर गुरु-निष्ठा तो देखिए, मिशन के खातिर समर्पण तो देखिए कि उन्हीं ने रामकृष्ण मिशन की, अपने गुरु के मंदिर की रक्षा की। इनके इस प्रत्यक्ष अकर्म में जो महान् कर्म दिखाई देता है, क्या उसने आजादी की दिशा में भारत को नहीं बढ़ाया? 19022 से 1911 तक प्रत्यक्षतः एक संन्यासिनी, परंतु परोक्ष रूप से एक योद्धा, भारतप्रेमी एवं भारत की स्वतंत्रता के लिए सतत संघर्ष करने वाली महिला थीं वे। 1911 में उन्होंने मात्र चौवालीस वर्ष की उम्र में शरीर अवश्य छोड़ दिया, पर वे इतिहास में गुरु-शिष्य परंपरा में अमर हो गईं, एक कीर्तिमान समर्पण का बना गईं।
प्रत्यक्ष के पीछे परोक्ष को समझें
हम अक्सर महापुरुषों को पलायनवादी मान लेते हैं। हमारी वामपंथी विचारधारा हमें धार्मिक-आध्यात्मिक कार्यों में समय नष्ट करना, राष्ट्रीय संपदा से खिलवाड़ करना बताती है। परंतु क्या वे कभी समझ पाएँगे कि इस अकर्म को कर्म का कितना बड़ा मर्म छिपा पड़ा है। प्रत्यक्षतः परमपूज्य गुरुदेव 1930 के दशक के बाद लेखन करते रहे, साधना करते व कराते रहे, संगठन खड़ा करते रहे। परंतु उनके इस कर्म में छिपे अकर्म एवं अकर्म दिखाई देने वाले पुरुषार्थ में निहित कर्म में वह सत्य छिपा पड़ा है, जिसने ‘युगनिर्माण योजना’ को मूर्त रूप दिया, एक विराट् तंत्र खड़ा कर दिया।
परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे, “हमारा सूक्ष्मशरीरी दिन रात काम करता रहता है। जब तुम लोग सोते रहते हो, तो तुम्हारे अंतःकरण में जाकर उनकी धुलाई-सफाई करता है। प्रत्यक्ष में लोगों को हमारा प्यार, हमारी लेखनी व हमारा संगठन दिखाई देता है, पर इससे भी बड़ा और अधिक महत्त्वपूर्ण है हमारा परोक्ष।” गायत्री परिवार की अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना सहित आठ भाषाओं में प्रकाशित पत्रिकाएँ, साढ़े पाँच हजार प्रज्ञा संस्थान-गुरुसत्ता के प्रत्यक्ष कर्म की परिणतियाँ हैं, तो उनका अकर्म उनकी सूक्ष्मीकरण साधना, महाप्रयाण के बाद सूक्ष्म व कारण सत्ता से सक्रिय उनका अस्तित्व, उनके द्वारा ब्राह्मीचेतना से एकाकार होकर किया गया अकर्म है, जिसका महत्त्व सर्वाधिक है। जिसे हम नहीं जानते, जिसे हमने नहीं देखा, अकर्म की स्थिति में किए गए उस कर्म के एक पल में किए गए कार्यों से इतिहास बदल जाता है।
इसीलिए भगवान् कहते हैं कि जो कर्म में अकर्म को और अकर्म में कर्म को देखता है, मनुष्यों में वह सर्वाधिक बुद्धिमान है, प्रज्ञासंपन्न मनीषी है। इस अकर्म को पहचानना व उसको अकर्मण्यता से पृथक समझना बहुत जरूरी है। श्री शिवप्रसाद सिंह ने एक पुस्तक लिखी है, ‘ अनुत्तर योगी’। श्री अरविंद के ऊपर लिखी इस पुस्तक में वे कहते हैं, “ इतिहास को मोड़ने-मरोड़ने वाली घटनाएँ हमेशा आत्मा की नीरवता में घटित होती हैं।” अर्थात् अकर्म की स्थिति में ऐसा कुछ घट जाता है, जो क्राँतिकारी बन जाता है। परमपूज्य गुरुदेव भी कहते थे, “मैंने कुछ नहीं किया। गुरु रूप में मेरे भगवान् ने किया है। मैं तो निमित्त मात्र रहा हूँ।” यथार्थ दृष्टि उसी के पास होती है, जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखता है। अब ‘गहना कर्मणो गतिः’ एवं उपर्युक्त प्रतिपादन की और भी व्याख्या अगले अंक में।
शाँतिकुँज में गायत्री विद्यापीठ (माध्यमिक विद्यालय) के लिए प्रशिक्षित स्तर के (न्यूनतम बी.एड.) शिक्षकों-शिक्षिकाओं के समयदान की आवश्यकता है। जो एक वर्ष का समय दे सकते हों, वे शाँतिकुँज से संपर्क करें। अपना पता, टेलीफोन नंबर, विस्तृत शैक्षणिक योग्यताएँ, कार्यानुभव लिख भेजें। यहाँ से पत्र मिलने पर ही वे आएँ। व्यवस्थातंत्र, शाँतिकुँज हरिद्वार
परमपूज्य गुरुदेव ने सितंबर 1969 का अखण्ड ज्योति अंक ‘ज्ञानयज्ञ अंक’ के रूप में लिखा। इसके संपादकीय में उन्होंने शीर्षक दिया, ‘अपना ज्ञानयज्ञ भी सफल और संपूर्ण होना चाहिए,। इसमें उन्होंने लिखा, “ अपने 1953 के शतकुँडी नरमेध तथा 1958 के सहस्रकुँडी महायज्ञ होमात्मक आयोजनों की परंपरा में बड़ी शान के साथ संपन्न हो गए। होमात्मक के साथ जपात्मक यज्ञ भी जुड़ा है। आहुतियों से भी कई गुनी संख्या जप की भी संपन्न होती रही है। यहाँ तक कि अपने परिवार द्वारा हर दिन एक चौबीस लक्ष का गायत्री पुरश्चरण संपादित किया जा रहा है। इन दोनों ही स्तर के यज्ञ के साथ हम दूसरा धर्मानुष्ठान ‘ज्ञानयज्ञ’ चलाते रहे हैं। हमारा जीवनक्रम होमात्मक-जपात्मक एवं ज्ञानयज्ञ के इन दोनों पहियों पर ही लुढ़कता आ रहा है। ज्ञान ही है, जो पशु को मनुष्य, मनुष्य को देवता और देवता को भगवान् बनाने में समर्थ होता है। ज्ञान से ही प्रसुप्त मनुष्यता जागती है और वही आत्मा को अज्ञान के अंधकार में भटकने से उबारकर कल्याणकारी प्रकाश की ओर उन्मुख करता है।........ जीवनभर हमने उपासना के समय के अतिरिक्त प्रतिदिन बारह घंटे इस ज्ञानयज्ञ में ही लगाए हैं। विगत 43 वर्षों से हो रही हमारी ज्ञान साधना, जिसमें हमारी दूनी रुचि रही है और दूना श्रम करते रहे हैं, कम ही लोगों की जानकारी में हैं।” (पृष्ठ 57,58)
क्राँतिकारी चिंतन
इसी लेख में पूज्यवर लिखते हैं, “क्राँतिकारी विचार ही मनोभूमियाँ बदलते हैं और बदली हुई मनोभूमि में ही महान् जीवन एवं समर्थ समाज की संभावनाएँ समाविष्ट रहती हैं।” (पृष्ठ 60)। जीवनभर गुरुदेव ने लिख एवं जो भी लिखा उसने लाखों व्यक्तियों के जीवन को बदल दिया। अखण्ड ज्योति पत्रिका (1937 से अभी तक), युगनिर्माण योजना पत्रिका एवं इनके सभी भाषाओं में अनुवादों ने जीवन की हर समस्या को स्पर्श किया एवं सभी के सरल समाधान दिए हैं। मनःस्थिति कैसे बदली जाए, कैसे अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाया जाए, इस पत्रिका के प्रतिपादनों ने इस संबंध में जन-जन का उंगली पकड़ाकर, मार्गदर्शन किया है। यदि गुरुदेव ने लिखा है कि “रोते हुए आँसुओं की स्याही से, जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो उनका प्रभाव होना ही चाहिए, हो रहा है और होकर रहेगा” (अखण्ड ज्योति अगस्त 1969) तो निश्चित रूप से यह सत्य है।
विगत 64 वर्षों की ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिकाएँ अब उन्हें तो पढ़ने को नहीं मिल सकतीं, जो अभी जुड़े हैं, विगत एक या दो दशक में जुड़े हैं अथवा समय-समय पर संदर्भों को पत्रिका में पढ़ते रहे हैं। इसके अतिरिक्त वे ग्रंथ भी आज पढ़ने को नहीं मिल सकते, जो पूज्यवर ने 1940 में ‘मैं क्या हूँ’ से आरंभ कर क्राँतिधर्मी साहित्य तक अनवरत जीवनभर लिखे। इनकी संख्या भी प्रायः तीन हजार के आसपास है, जिनमें छोटी पुस्तिकाएँ, ट्रैक्ट्स एवं गायत्री महाविज्ञान, प्रज्ञापुराण जैसे ग्रंथ भी शामिल हैं। कितना ही अच्छा हो कि यही सब एक स्थान पर पढ़ने को मिल जाए। मर्मस्पर्शी ‘अपनों से अपनी बात’ जो आज से पचास वर्ष पूर्व लिखी गई व आज पूर्णतः सत्य सिद्ध हो रही है, यदि आज पढ़ने को मिल जाए, तो कितना अच्छा रहे। यही सभी की इच्छा जानकर परमवंदनीया माताजी की आज्ञानुसार श्रद्धाँजलि समारोह 1990 में एक भागीरथी पुरुषार्थ की शुरुआत की गई, ‘पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय’ के रूप में। 1995 की आँवलखेड़ा (आगरा) की प्रथम महापूर्णाहुति में इसका विमोचन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जी द्वारा किया गया। जिसने भी इन्हें पढ़ा है, आत्मसात किया है, उसने एक नहीं कई विश्वकोशों को पढ़ने जैसी अनुभूति की है। जहाँ-जहाँ ये पहुँचे हैं, शोधकर्त्ताओं के लिए अमूल्य बन गए हैं। इनके अंश उद्धृत कर सैकड़ों पत्रकारों ने आज के निषेधात्मक उपभोक्तावादी समाज में विधेयात्मक चिंतन को बढ़ावा दिया है।
जीवनभर का मर्म-वाङ्मय
प्राण संजीवनी के रूप में उपलब्ध यह वाङ्मय अब कुछ ही वर्षों में 38 खंड और जुड़कर एक सौ आठ खंडों का अपने समय की एक ऐतिहासिक स्थापना बनकर कीर्तिमान बन जाएगा। इसमें उनके जीवनभर के लिखे, बोले, पत्रों में अभिव्यक्त विचारों का भी संकलन है। एक आलमारी में सजा यह ज्ञानसागर सही अर्थों में परमपूज्य गुरुदेव के साकार विग्रह की, उनके ज्ञानशरीर की घर में स्थापना है। जहाँ यह स्थापित होगा, वहाँ गुरुदेव के अनुदान सहज ही बरसेंगे। लौकिक-परलौकिक दोनों ही दृष्टि से विद्या का यह भाँडागार घर-घर, हर विद्यालय, महाविद्यालय में स्थापित होना ही चाहिए।
ज्ञान केंद्र स्थापित हों
हीरक जयंती के इस वर्ष में इसे अब एक आँदोलन का रूप देकर ‘अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्रों’ की स्थान-स्थान पर स्थापना की बात सबसे कही जा रही है। चूँकि पूज्यवर के विचारों की धुरी ‘अखण्ड ज्योति’ ही रही है, इसीलिए इसे यह नाम दिया है। युग के नवनिर्माण की प्रक्रिया में इन ज्ञान केंद्रों की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। परमपूज्य गुरुदेव ने शक्तिपीठों, प्रज्ञा-संस्थानों के निर्माण से भी अधिक महत्त्व इन ज्ञान मंदिरों को दिया है। अपने निज के या समान विचारधारा वाले परिजनों के समूहों की बचत के संग्रह द्वारा इन्हें स्थापित किया जा सकता है। इनकी विधिवत् बिक्री अपने केंद्र से की जा सकती है। इन्हें अस्पतालों, धार्मिक स्थलों, न्यायालयों, कारागारों, संग्रहालयों, विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, कार्यालयों, उच्चाधिकारियों, बुद्धिजीवियों के यहाँ एवं श्रीमंतों के प्रतिष्ठानों में स्थापित किया जा सकता है। सामाजिक संगठनों, पंचायतों, प्रशिक्षण संस्थान, लायन्स, रोटरी क्लबों तथा अन्य क्लबों, भारत विकास परिषद्, अन्य स्वैच्छिक संगठनों के ब्लॉक, जिला एवं प्राँतीय कार्यालयों तथा नगरपालिका के पुस्तकालयों में इसे रखा जा सकता है। आवश्यकतानुसार साँसद निधि/विधायक निधि का भी उपयोग किया जा सकता है। सभी से कहा जा सकता है कि किसी को भेंट, पुरस्कार, शील्ड के रूप में यदि वे इन प्राणवान् ग्रंथों को दें, तो वह ज्यादा लोकोपयोगी होगा। विवाहों में भेंट के रूप में वाङ्मय पूरा न सही, एक गंथ तो दिया जा सकता है। आज न जाने कितने दिन प्रचलित हैं, उन दिनों के नामों पर कार्ड्स बाजार में बिकते हैं, जिनका अरबों डालर का बाजार भारत है। यदि नववर्ष, दीपावली, रक्षाबंधन, विजयादशमी, गायत्री जयंती, गुरुपूर्णिमा, वसंत पंचमी जैसे पावन पर्वों पर कार्ड्स के स्थान पर अपने हितैषी, शुभेच्छुओं, उच्चाधिकारियों को ये भेंट में दिए जाएँ, तो वे दुआ भी देंगे एवं सतत आपको याद करते रहेंगे।
इस हीरक जयंती वर्ष में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका अपने पाठकों को एक उपहार देने जा रही है। यदि वे ‘ज्ञान केंद्र’ स्थापित करेंगे, तो उन्हें पुण्य-परमार्थ का लाभ तो प्राप्त होगा ही, इस विद्या-विस्तार योजना के द्वारा सातों आँदोलनों को गति देने हेतु पर्याप्त व्यवस्था भी जुटा सकेंगे। इसके लिए निम्न नियम व व्यवस्थाएँ बनाई गई हैं।
ज्ञान केंद्रों के नियम-व्यवस्थाएँ
(1) ज्ञान केंद्र संचालन में दैनंदिन व्यय, पूर्णकालिक / आँशिकालिक कार्यकर्त्ताओं के ब्राह्मणोचित जीवन निर्वाह, स्थान का किराया, बिजली, परिवहन, प्रचार−कार्य में जाने के मार्ग व्यय आदि में धन व्यय होगा। विशिष्ट प्रतिभाओं को साहित्य भेंट करने होंगे, आयोजनों में पुरस्कार वितरण भी होंगे। ज्ञानरथ, होर्डिंग, दीवाल लेखन आदि की भी आवश्यकता पड़ेगी। किसी भी प्रकार घाटा उठाते हुए संस्थान इन व्ययों को वहन करने के लिए विशेष प्रावधान कर रहा है, जिससे इन ज्ञान केंद्रों का संचालन सफलतापूर्वक हो सके, इसके अंतर्गत वाङ्मय के प्रत्येक 10,000 (100 खंड) रुपये के ऑर्डर पर बीस वाङ्मय के खंड अतिरिक्त अथवा 2500 रुपये के बराबर (मुद्रित) मूल्य का अखण्ड ज्योति संस्थान द्वारा प्रकाशित/प्रचारित साहित्य या सामग्री दी जाएगी। यह सुविधा तभी संभव होगी, जब ऑर्डर के साथ पूरी राशि अग्रिम ड्राफ्ट द्वारा भेजी जाए।
(2) प्रत्येक केंद्र को पंजीकरण कराना आवश्यक होगा। इसका शुल्क (धरोहर राशि) 1000 रुपये है, जो कभी भी वापस लिया जा सकता है। इसका नवीनीकरण प्रति दो वर्षों में कराना होगा।
(3) ऑर्डर्स 10,000 रुपये से कम के न हों।
(4) ट्राँसपोर्ट/रेलवे भाड़ा अखण्ड ज्योति संस्थान वहन करेगा।
(5) पूरे 70 खंड के वाङ्मय का एक सेट सभी ज्ञान केंद्र 7000/ मूल्य में बेचेंगे। अलग-अलग खंडों की बिक्री करनी हो तो उन्हें 125 रुपये प्रति खंड बेचा जा सकता है। समय-समय पर विक्रयनीति घोषित की जाती रहेगी। सरकारी एवं अन्य संस्थानों के लिए निर्धारित रीति-नीति का पालन सभी को करना होगा।
(6) केंद्र की स्थापना, संचालन या पूँजी जुटाने हेतु किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष दान नहीं लेंगे, न ही ज्ञान केंद्र के नाम पर दान/सहयोग की रसीद छपाएँगे। ज्ञान केंद्र के सदस्य ही पूँजी मिल-जुलकर इकट्ठी करेंगे।
(7) यह योजना ‘अखण्ड ज्योति’ एवं ‘वाङ्मय’ के घर-घर प्रचार-प्रसार की दृष्टि से आरंभ की गई है एवं घाटा उठाकर इसे हाथ में लिया गया है। इसे मिशनरी भाव से ही संपन्न किया जाना है।
(8) ‘ज्ञान केंद्र’ केवल अखण्ड ज्योति संस्थान, युग निर्माण योजना, मथुरा एवं शाँतिकुँज, हरिद्वार से प्रकाशित सामग्री के अतिरिक्त अन्य कोई सामग्री नहीं रखेंगे।
(9) अनियमितता होने पर पंजीकरण समाप्त कर दिया जाएगा, तब अखण्ड ज्योति से उनका कोई संबंध न रहेगा।
(10) मिशन की मान्यताओं, आदर्शों के विपरीत आचरण करने वाले व्यक्तियों या संस्थाओं से कोई संपर्क नहीं रखेंगे। ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे, न ही ऐसी गतिविधियों में संलग्न होंगे, जिससे अखण्ड ज्योति संस्थान, युगनिर्माण योजना, शाँतिकुँज हरिद्वार की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचे।
जो परिजन अखण्ड ज्योति पत्रिका बड़ी तादाद में मँगा रहे हैं, वे निश्चित ही ज्ञान केंद्रों के रूप में अपना पंजीयन करा सकते हैं एवं इस वाङ्मय-गुरुचेतना के विचारों के विस्तार की योजना में भागीदारी कर सकते हैं।
पतन निवारण सर्वश्रेष्ठ सेवा
गुरुसत्ता के विचारों को घर-घर पहुँचाने से बड़ा कोई पुण्य कार्य नहीं है। आज की सबसे बड़ी समस्या है, बुद्धि का दुर्भिज्ञ। सद्बुद्धि के अभाव में, सद्ज्ञान का सान्निध्य न मिल पाने के कारण न जाने कितने सगरपुत्र शापित स्थिति में, विक्षुब्धता की स्थिति में जीवन जी रहे हैं। युग-भगीरथ के रूप में परिजनों को ही उन्हें उस अवस्था से त्राण दिलाने हेतु ज्ञान गंगा धरती पर अवतरित करनी होगी। तभी वे शाप से उबर सकेंगे। सेवाओं में सबसे बड़ी सेवा है, ‘पतन निवारण’। वैचारिक पतन से यदि उबारा जा सके, तो मानव मात्र को ऊँचा उठाया जा सकता है। पीड़ा निवारण की सेवा सामयिक होती है। सुविधा-संवर्द्धन की सेवा से अकर्मण्यता और परावलंबन बढ़ता है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा कार्य है, लोगों के गिरते विचारों को उठाकर ऊर्ध्वगामी चिंतन विकसित करना, साँस्कृतिक प्रदूषण से भरे इस समाज में श्रेष्ठता के विस्तार की साधना संपन्न करना।
परमपूज्य गुरुदेव ने अपने ज्ञानयज्ञ विशेषाँक (अखण्ड ज्योति सितंबर 1969) में लिखा है, “अगले दिनों संसार का समग्र परिवर्तन कर देने वाला एक भयंकर तूफान विद्युत् गति से आगे बढ़ता चला आ रहा है, जो इस सड़ी दुनिया को समर्थ, प्रबुद्ध, स्वस्थ और समुन्नत बनाकर ही शाँत होगा।” आगे वे लिखते हैं, “अगले क्षणों जिस स्वर्णिम उषा का उदय होने वाला है, उसके स्वागत की तैयारी में हमें जुट जाना चाहिए। अपना ज्ञानयज्ञ इसी प्रकार का शुभारंभ-मंगलाचरण है। असुरता का पददलन और मानवता की पुण्य प्रतिष्ठापना का अपना व्रत-संकल्प इसी ईश्वरीय प्रेरणा का प्रति है।”
जून 2001 की अखण्ड ज्योति में विस्तार से ‘पूज्यवर के ज्ञानशरीर को जन-जन तक पहुँचाएँ, शीर्षक से एक लेख दिया गया था। उसके साथ पंजीयन पत्रक भी थे। जो भी ज्ञान केंद्र की स्थापना करना चाहते हों, वे तुरंत उन्हें भरकर धरोहर राशि एवं क्रयादेश के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी मथुरा’ भेज दें। ज्ञान केंद्र संबंधी सारा पत्राचार इसी पते पर करें।
परमपूज्य गुरुदेव के अदम्य आकाँक्षा एवं मिशनरी भावना से कार्य करने की ललक पैदा करने वाले इन शब्दों के प्रभाव को समझा जा सकता है। ‘अखण्ड ज्योति’ की प्राणचेतना-जीवनमूरि ने ही गायत्री परिवार जैसा विराट् संगठन खड़ा किया है। वे इसी अंक में, इसी लेख में आगे लिखते हैं, “हम भाग्यशाली हैं, जो सस्ते में निपट रहे हैं। असली काम और बढ़े-चढ़े त्याग-बलिदान अगले लोगों को करने पड़ेंगे। अपने जिम्मे ज्ञानयज्ञ का समिधादान और आज्याहुति होम मात्र प्रथम चरण आया है। आकाश छूने वाली लपटों में आहुतियाँ अगले लोग देंगे।” आज बत्तीस वर्ष बाद इस विराट् ज्ञानयज्ञ को भारत व विश्वभर में संपन्न होना है। आइए हम सभी इस हीरक जयंती को ऐतिहासिक बना दें एवं इस ज्ञानयज्ञ में बढ़-चढ़कर आहुतियाँ दें।
साध्य मेरे! सधना करते रहो तुम। सिद्धि की मैं कामना करती रहूँगी॥
जानती हूँ तुम कहाँ कितने विवश हो। किसलिए यह शूल्य पथ तुमने गहा है॥ है बड़ा परमार्थ-सीमित स्वार्थों से। विज्ञ, प्रज्ञों ने सदा ऐसा कहा है॥
अग्रगामी बन तुम्हारे ध्येय पथ की। मार्गव्यापी शूल, मैं हरती रहूँगी॥ सिद्धि की..........
लोकमंगल का सुखद नरमेध है यह। प्राण सूखेंगे, मगर समिधा बनेगी॥ माँग लूँगी मैं सहस्रों जन्म प्रभु से। हर जीम में आत्मा आहुति बनेगी॥
यज्ञ के ऋत्विज! सदा निःशंक रहना। मैं सरित हूँ, सिंधु को भरती रहूँगी॥ सिद्धि की.........
मानना मत तुम, कि एकाकी कहीं हो। प्राण में यह प्राण मेरा ही घुला है॥ घ्राण में जो गंध-सी आती कभी है। नाथ! श्रद्धा-सुमन मेरा ही खिला है॥
छल लिया पतझर ने भी यदि कभी तो। पात बन-बन डाल से झरती रहूँगी॥ सिद्धि की..........
पीर की क्या बात है होती रहेगी। नीर का क्या सोचना बहता रहेगा॥ प्राण ये करना प्रतीक्षा जानते हैं। दुःख दूरी का हृदय सहता रहेगा॥
भव्य मेरे! भावना करते रहो तुम। ‘मानता का दीप’ मैं धरती रहूँगी॥
सिद्धि की मैं कामना करती रहूँगी॥
-माया वर्मा
गौ, गंगा, गीता, गायत्री, सुर संस्कृति के धाम हैं। तो ‘सद्गुरु’ संस्कृति-सदन के शोभित शिखर ललाम हैं॥
सुर संस्कृति चोटी की संस्कृति गुरुता की ऊँचाई है। ‘जगत् गुरु’ की गुरु गरिमा के चिंतन की गहराई है।
इसीलिए हर महापुरुष संग जुड़े गुरु के नाम हैं। ‘सद्गुरु’ ही संस्कृति-सदन के शोभित शिखर ललाम हैं॥
ज्ञान और विज्ञान सभी के मूल गुरु के सूत्र हैं। सुर संस्कृति के उपासकों के चलते गुरु से गौत्र हैं।
ऋषि स्तर की गरिमा वाले ही सद्गुरु के काम हैं। ‘सद्गुरु’ ही संस्कृति-सदन के शोभित शिखर ललाम हैं॥
हृदय गुफा के अंधकार को गुरु का ज्ञान मिटाता है। सद्गुरु ज्ञानस्वरूप प्रकाशित हो सद्पथ दिखलाता है।
गुरु ‘सविता’ हैं ‘सावित्री’ हैं, गुरु ही चारों धाम हैं। ‘सदगुरु’ ही संस्कृति-सदन के शोभित शिखर ललाम हैं॥
गुरु ‘ब्रह्मा’ हैं, शिष्य उन्हीं के मानस पुत्र कहाते हैं। वे ‘विष्णु’ हैं उनके द्वारा पोषण सद्गुण पाते हैं।
वे ‘महेश’ हैं, शिष्यजनों के संरक्षक अविराम हैं। ‘सदगुरु’ ही संस्कृति-सदन के शोभित शिखर ललाम हैं॥
-मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’
*समाप्त*