क्षण में शाश्वत छुपा है और अणु में विराट्। अणु को जो अणु मानकर छोड़ दे, वह विराट् को ही खो देता हैं इसी तरह जिसने क्षण का तिरस्कार किया, वह शाश्वत से अपना नाता तुड़ा लेता है। क्षुद्र को तुच्छ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही द्वार है परम का। इसी में गहरे -गहन अवगाहन करने से परम की उपलब्धि होती है।
जीवन का प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण है। किसी भी क्षण का मूल्य, किसी दूसरे क्षण से न तो ज्यादा है और न ही कम है। आनंद को पाने के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। जो जानते है, वे प्रत्येक क्षण को ही आनंद बना लेते है और जो विशेष समय की, किसी खास अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं, वे समूचे जीवन के समय और अवसर को ही गँवा देते हैं।
जीवन की कृतार्थता इकट्ठी और राशिभूत नहीं मिलती। उसे तो बिंदु-बिंदु और क्षण क्षण में ही पाना होता है। प्रत्येक बिन्दु सच्चिदानंद साँगर की ही अमृत अंश है और प्रत्येक क्षण अपरिमेय शाश्वत का सनातन अंश। इन्हें जो गहराइयों से अपना सका, वही अमरत्व का स्वाद चख पाता है।
एक फकीर के महानिर्वाण पर जब उनके शिष्यों से पूछा गया कि आपके सद्गुरु अपने जीवन में सबसे श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण बात कौन सी मानते थे? इसके उत्तर में उन्होंने कहा था, “ वही जिसमें किसी भी क्षण वे संलग्न होते थे।”
बूँद-बूँद से सागर बनता है और क्षण-क्षण से जीवन। बूँद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है और क्षण को जो पा ले, वह जीवन को पा लेता है। क्षण में शाश्वत की पहचान ही जीवन का आध्यात्मिक रहस्य है।
जीवन को किसी निर्दिष्ट ढाँचे में ढाल देने वाली सबसे प्रबल एवं उच्चस्तरीय शक्ति श्रद्धा है। यह अंतःकरण की दिव्य भूमि में उत्पन्न होकर समस्त जीवन को हरियाली से सजा देती है। श्रद्धा का अर्थ है। श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था। यह आस्था जब सिद्धाँत एवं व्यवहार में उतरती है, तो उसे निष्ठा कहते हैं। यही जब आत्मा के स्वरूप, जीवन एवं ईश्वर भक्ति के क्षेत्र में प्रवेश करती है, तो श्रद्धा कहलाती है।
आत्मकल्याण चाहने वाले के लिए और ईश्वर प्राप्ति के लिए इस शक्ति का उभार अवलंबन आवश्यक है इसके बिना उस महान लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। अपने अंतरात्मा में बैठे हुए परमात्म को देखने, उसे प्राप्त करने का उपाय बताते हुए मनीषियों ने इसी श्रद्धा की गरिमा को प्रस्तुत किया है। मनुष्य स्थूल कम, सूक्ष्म अधिक है। वह भावनाओं के सहारे पैदा होता, भावनाओं में ही जीवित रहता और भाव जगत् में ही विलीन होता है। भावनाओं के प्रति सम्मान ही श्रद्धा है।
यह संवेदना जहाँ भी होगी वही संतोष की निर्झरिणी प्रवाहित हो रही होगी। भगवान कृष्ण न कहा है, सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवित भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छूद्धः स एव सः॥ अर्थात् हे अर्जुन! यह सृष्टि श्रद्धा से विनिर्मित है। जिसकी जैसी श्रद्धा होती है वह पुरुष वैसा ही बन जाता है अर्थात् बुराइयों के प्रति श्रद्धा व्यक्ति को समस्याओं में कैद कर देती है, तो आदर्शों के प्रति श्रद्धा मनुष्य जीवन को सुख शाँति और प्रसन्नता से भर देती है। श्रद्धा में ही व्यक्तित्व के परिष्कार की वास्तविक सामर्थ्य है।
श्रद्धा के अभिसिंचन से पत्थर में देवता का उदय किया जा सकता हैं हिंदू संस्कृति में प्रतिमा प्रतिस्थापित करने तथा उनकी पूजा उपासना करने का दर्शन इसी श्रद्धा तत्व पर आधारित है। अपने इष्ट के प्रति अटूट श्रद्धा आरोपित करके ही उपासक उसके साथ अनन्य एकता स्थापित कर लेते हैं। ईश्वर, कर्मफल, जीवनोद्देश्य, कर्तव्यपालन, आत्मा की गरिमा जैसे सत्य तथ्यों पर सघन श्रद्धा रखने वाले लोग ही सामान्य जीवन से उठकर महामानवों देवदूतों की पंक्ति में बैठ सकते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र की उच्चस्तरीय साधनाओं में श्रद्धा की ही अपरिमेय शक्ति काम करती है।
श्रद्धा का आविर्भाव सरलता और पवित्रता के संयोग से होता है। पार्थिव वस्तुओं से ऊपर उठने के लिए सरलता व पवित्रता इन्हीं दो गुणों की अत्यंत आवश्यकता होती है। इच्छा से सरलता और प्रेम में पवित्रता का विकास जितना अधिक होगा, उतनी ही अधिक श्रद्धा बलवान होगी। सरलता द्वारा परमात्म की भावानुभूति होती है और पवित्र प्रेम के माध्यम से उसकी रसानुभूति। श्रद्धा दोरो का ही सम्मिलित स्वरूप है, उसमें भावना भी है और रस भी। जहाँ उसका उदय हो वहाँ लक्ष्य प्राप्ति की कठिनाई का अधिकाँश समाधान तुरंत हो जाता है। जब तक मनुष्य के अंतःकरण में श्रद्धा का जन्म नहीं होता, तब तक जप, तप, यम नियम, व्रत आदि जितने भी धर्माचरण हैं, उनमें मनुष्य की बुद्धि स्थिर नहीं रहती। यह श्रद्धा ही जीवन की कठिनाइयों में मनुष्य को पार लगाती है और आत्मगुणों का विकास करती हुई उसे विज्ञानयुक्त परमात्मा के प्रकाश तक जा पहुँचाती है।
मानव देह में एक चिरंतन आध्यात्मिक सत्य छुपा हुआ है। जब तक वह मिल नहीं जाता, इच्छाएँ उसे इधर से उधर भटकातीं, दुख के थपेड़े खिलाती रहती हैं। अपने आपको, अपनी चेतन सत्य को पहचानना आसान बात नहीं हैं विद्यमान परिस्थितियाँ ही धोखा देने के लिए पर्याप्त होती हैं, फिर जनम-जन्माँतरों के प्रारब्ध इतने भले नहीं होते, जो मनुष्य को साधारणतः ही क्षमा कर दें। हमारा असली व्यक्तित्व इतना स्पष्ट है कि उसकी भावानुभूति एक क्षण में हो जाती है। वह परदों में नहीं रहता, फिर भी वह इतना जटिल और कामनाओं के परदों में छुपा हुआ है कि असली स्वरूप को जानना टेढ़ा पड़ जाता है। साधना-उपासना करते हुए भी बार-बार पथ से विचलित होना पड़ता है।
श्रद्धा वह प्रकाश है जो आत्मा को सत्य प्राप्ति के लिए बनाए गए मार्ग को दिखाता रहता है। जब भी मनुष्य लौकिक चमक-दमक, कामिनी व कंचन के लिए मोहग्रस्त होता है, तो माता की तरह ठंडे जल से मुँह धोकर जगा देने वाली शक्ति यह श्रद्धा ही होती है। सत्य के सद्गुण ऐश्वर्य स्वरूप एवं ज्ञान की पूँजी अपनी बुद्धि से नहीं मिलती। उसके प्रति सविनय प्रेम भावना विकसित करनी पड़ती है, उसी को श्रद्धा कहते हैं। श्रद्धा सत्य की सीमा तक साधक को साधे रहती है और सँभाले रहती है।
श्रद्धा के बल पर ही मलिन चित्त अशुद्ध चिंतन का परित्याग करके बार-बार परमात्मा के चिंतन में लगा रहता हैं बुद्धि भी जड़ पदार्थों में सन्मय न रहकर परमात्मज्ञान में अधिक-से अधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य भाव में बदल जाती हैं । जब अपने कर्मों के औचित्य एवं अनौचित्य को परम प्रेरक शक्ति के हाथों सौंप देते हैं, तो एक प्रकार की निश्चिंतता मन में आ जाती है। मन का बोझ हलका हो जाता हैं। जिसकी जीवन पतवार परमात्मा के हाथ में हो उसे किसका भय?
सर्वशक्तिमान से संबंध स्थापित करके ही मनुष्य निर्भय हो सकता है। व्यक्तियों में सद्गुणों का प्रकाश और दिव्यता झरने लगती है। जीवन में आनंद झलकने लगता है। यह संबंध और स्पर्श जब तक पूर्णता तक नहीं पहुँचता, तब तक यह श्रद्धा के रूप में प्रकट व विकसित होता है। यह एक प्रकार से पाथेय है, इसलिए उसका मूल्य और महत्व उतना ही है, जितना कि अपने लक्ष्य का, गंतव्य का, अभीष्ट का, आत्मा, सत्य अथवा परमात्मा की प्राप्ति का। श्रद्धायुक्त जीवन की विशेषता से ही मनुष्य स्वभाव में ऐसी सुंदरता बढ़ती जाती है, जिसको देखकर श्रद्धावान् स्वयं संतुष्ट बना रहता है। श्रद्धा सरल हृदय की ऐसी प्रीतियुक्त भावना है, जो श्रेष्ठ पथ की सिद्धि कराती है। इसीलिए शास्त्रकार कहते है-
भवानीशडंकरै वंदे श्रद्धाविश्वासरुपिणौ। याभ्याँ विना न पश्यन्िसिद्धास्वाँतः स्थमीश्वरम्॥
हम सर्वप्रथम भवानी और भगवान्, प्रकृति और परमात्मा को श्रद्धा व विश्वास के रूप में वंदन करते है, जिसके बिना सिद्धि और ईश्वर-दर्शन की आकांक्षा पूर्ण नहीं होती।
उपर्युक्त विवेचना के सहारे हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि मानव जीवन में सबसे बड़ी, सबसे ऊँची, सबसे समर्थ शक्ति की ही है। मनःस्थिति को परिस्थितियों का सृजनकर्त्ता कहा गया है। शरीर का जन्म तो माता-पिता की उत्कृष्टता, श्रद्धा व विश्वासरूपी दिव्य जननी और जनक की अनुकंपा का फल माना जा सकता है। उल्लसित वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण पूर्णतया श्रद्धा के हाथ में है। उसी का महत्व, मर्म, उपार्जन, अभिवर्द्धन सिखाने के लिए भूतकाल की कथा-गाथाओं को पुरातन उपाख्यानों में पुराण के नाम से जाना जाता है।
भूत, भविष्य और वर्तमान की सुखद संभावनाओं का निर्माण अंतःकरण के जिस क्षेत्र में विनिर्मित होता है, उसका स्वरूप समझना हो तो एक श्रद्धा शब्द का उपयोग करने से वह प्रयोजन पूरा हो सकता है। गुरु कुछ भी न दे तो भी श्रद्धा में वह शक्ति है, जो अनंत आकाश से अपनी सफलता में तत्व और साधन को आश्चर्यजनक रूप से खींच लेती है। ध्रुव, एकलव्य, राजर्षि दिलीप की साधनाओं में सफलता का रहस्य उनके अंतःकरण की श्रद्धा ही रही है। उनके गुरुओं ने तो केवल उसकी परख की थी। यदि इस तरह की श्रद्धा आज भी लोगों में आ जाए व पूर्ण रूप से परमात्मा की इच्छाओं पर चलने को कटिबद्ध हो जाएँ, तो विश्व शाँति चिर संतोष और अनंत समृद्धि की परिस्थितियाँ बनते देर न लगे।
सुभद्रा कुमारी चौहान प्रयाग के एक राजपूत घराने में जन्मी। बचपन में वे पढ़ती भी रही, पर उस समय के प्रचलन के अनुसार उनका विवाह खंडवा के लक्ष्मण सिंह नामक लड़के से हो गया। सुभद्रा कुमारी आरंभ से ही विद्याप्रेमी थी। विवाह के बाद भी पति से आगे पढ़ने की प्रार्थना की, तो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर ली। उन्हें कॉलेज में भर्ती करा दिया गया। इस बीच पति ने भी वकालत पास कर ली।
आगे क्या करना है? दोनों ने निश्चय किया कि देश सेवा करेंगे। उन्हीं दिनों काँग्रेस आँदोलन चल पड़ा। पति-पत्नी दोनों झंडा सत्याग्रह में सम्मिलित हुए और जेल गए।
उनके पति ने खंडवा के ‘कर्मवीर’ साप्ताहिक में सहायक संपादक का काम कर लिया। माखनलाल चतुर्वेदी उसके संचालक थे। दोनों में से एक संपादक का कार्य करके घर चलाता और दूसरा जेल चला जाता। यह क्रम वर्षों तक चलता रहा। इस बीच सुभद्र कुमारी की प्रतिभा भी विकसित हुई। उन्होंने अनेकानेक उच्चकोटि की कविताएँ तथा कहानियाँ लिखी, जो देशभर में बहुत प्रख्यात हुई खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’ कविता सुभद्रा जी की ही है। दोनों ने मिलकर समाज-सेवा के भी अनेक कार्य किए। पारिवारिक धर्म निबाहते हुए भी राष्ट्रसेवा का यह एक अनुपम उदाहरण है।
भारतीय संस्कृति प्राचीन समय में विश्वव्यापी थी, इसके प्रमाण समय-समय पर मिलते रहे है और अब भी यत्र-यत्र उपलब्ध होते रहते है। वहाँ के रहन-सहन, भाषा, देवी-देवताओं, स्थानों, पदवियों आदि के नामों से भी यह स्पष्ट आभास मिलता है कि किस कदर एक समय भारतीय संस्कृति विश्व संस्कृति के रूप में प्रतिष्ठित थी।
मलेशिया यों तो अब एक मुस्लिम राष्ट्र है, पर वहाँ की भाषा एवं स्थानों के नामकरण में संस्कृत शब्दावली की बहुलता अब भी देखी जा सकती है। वहाँ की भाषा में ‘सिरापह’ एक ऐसा शब्द है, जो संस्कृत के ‘शाप’ और हिंदी अपभ्रंश ‘श्राप’ के समानार्थक है। किसी के अनिष्ट के संदर्भ में बोले गए वचन के लिए वहाँ इसी शब्द का प्रयोग होता है, जो संस्कृत और हिंदी के उपर्युक्त शब्दों का ही अर्थबोधक है। ‘सियार’ को संस्कृत में ‘शृंगाल’ कहते है। मलय भाषा में इसे ‘सरीगाल’ कहा जाता है। संस्कृत में ‘श्री’ सौंदर्य के अर्थ में प्रयुक्त होता है। मलय भाषा में इसके लिए ‘सेरी’ शब्द का प्रयोग होता है। इस तरह वहाँ का ‘सरीमुख’ संस्कृत के ‘श्रीमुख’ का ही पर्याय है। ‘संतोष’ जिसका अर्थ धैर्य है, मलय में इसे ‘संतेजा’ कहते है। ‘सरज’ दोनों में ही कमल को कहते है।
‘पुर’ प्रत्यय संस्कृत और हिंदी शब्दों के साथ मिलकर अक्सर स्थानवाचक हो जाता है, यथा-जमशेदपुर, खड़गपुर, नागपुर। इसी परिप्रेक्ष्य में ‘क्वालालंपुर’ को भी लिया जा सकता है, जो मलेशिया की राजधानी है। वहाँ का एक शहर ‘सीराम बन’ है, जो स्पष्टतः ‘श्रीराम वन’ का बिगड़ा रूप है। ‘सुँगई पट्टणी’ वहाँ का एक अन्य नगर है, जो संस्कृत शब्दावली के ‘श्रृंग‘ और ‘पट्टण’ शब्दों के मेल से बना लगता है। ‘श्रृंग पट्टण’ अर्थात् पर्वतीय नगर। मलेशिया के ‘पेतालिंग जय’ नगर में एक मस्जिद है, जो एक हिंदू मंदिर के ऊपर स्थित हैं पुरातात्त्विक अध्ययनों में इसे एक शिव मंदिर होने की संभावना प्रकट की गई है और कहा गया है कि कदाचित् इसमें कोई स्फटिक युक्त शिव मंदिर अत्यंत भव्य और पुरे नगर का गौरव होने के कारण ही शायद उस शहद का नाम ‘स्फटिक लिंग जय’ से विकृत होकर कालाँतर में ‘पेतालिंग जय’ हो गया हो, ऐसा विद्वानों का मत है।
जानने योग्य तथ्य यह है कि कुछ दशक पूर्व ‘सुँगई पट्टणी’ में खुदाई के दौरान एक अत्यंत प्राचीन शिव मंदिर का अवशेष प्राप्त हुआ था। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन हिंदू जाति विश्व में जहाँ-जहाँ गई, वहाँ-वहाँ उपासनास्थल के रूप में अन्य देवी-देवताओं के साथ-साथ शिवालय भी बनवाए। इसी क्रम में विश्व के अनेक मुस्लिम और ईसाई शासित राष्ट्रों में भी शिवलिंग पाए गए है, जो अब या तो संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे है या यत्र-तत्र उनकी विधिवत् पूजा होती है। वेटिकन सिटी के एटरुस्कन संग्रहालय में ऐसा ही एक अत्यंत पुराना शिवलिंग है, जो कहीं उत्खनन के दौरान पाया गया था। ऐसी मान्यता है कि पुराकाल में जब इटली में हिंदुओं का आधिपत्य था, तब वे इसकी पूजा किया करते थे। तुर्किस्तान के एक प्रमुख नगर बाँबीलन में एक हजार दो सौ फुट का एक विशाल शिवलिंग अब भी मौजूद है। इतना वृहत् लिंग समस्त विश्व में अन्यत्र कही नहीं है। मक्का में मक्केश्वरनाथ आज भी विराजमान है। ‘संगे असवद’ के नाम से इस्लाम धर्म में प्रसिद्ध यह हिंदू प्रतीक वास्तव में एक शिवलिंग है जिसका आलिंगन और चुँबन लिए बिना हजयात्रियों का हज पूरा नहीं होता। मक्का के जमजम कुएँ में भी एक शिवलिंग है, जिसकी पूजा खजूर की पत्तियों से की जाती है। मिस्र में ‘मेफिस’ और ‘अशीरिस’ नामक स्थानों में नन्दी पर आसीन त्रिशूलहस्त तथा व्याघ्रचर्मधारी शिव की कई मूर्तियाँ है, जो वहाँ के लोगों द्वारा पूजित है। ब्राजील में अगणित प्राचीन शिवलिंग इन दिनों भी देखे जा सकते है। वहाँ के काँरिथ नगर में एक पुराना पार्वती मंदिर है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में भी एक स्वर्णमंडित शिवलिंग है। फिजियन के एटिस नगर में ‘एबीर’ नामक शिवलिंग आज भी विद्यमान है। इजरायल में भी शिवलिंग काफी पाए गए है। हेड्रोपोलिस नगर के एक प्राचीन शिवालय में तीन सौ फुट जितना विशाल शिवलिंग है। इसके अतिरिक्त अफगानिस्तान के काबुल, बलख, बुखारा, चित्राल आदि स्थानों में कितने ही शिवलिंग देखे जा सकते है। इन्हें स्थानीय लोग ‘पंजशेर’ या ‘पंजबीर’ के नाम से पुकारते है।
शिवलिंग के उल्लेख से मलय और संस्कृत शब्दावलियों के तुलनात्मक अध्ययन में किंचित भटकाव आ उपस्थित हुआ। उसे दूर करते हुए अब पुनः उसी में प्रवेश करते है।
मलेशिया के रजवाड़े अब भी ‘महाराजा’ की उपाधि से विभूषित है, पर अब मुस्लिम संस्कृति के अनुरूप वे स्वयं की उपाधि ‘सुलतान’ रखने लगे है। यह परंपरा बहुत बाद में शुरू हुई। इसका प्रमाण सन् क्क्ब्फ्-ब्भ् में जोहोर के सुलतान द्वारा दिए गए एक भोज के अवसर पर तब देखने को मिला, जब उनके पटल वस्त्रों पर ‘जोहोर के महाराजा’ शब्द अंकित देखे गए।
जोहोर के सुलतान की अनेक पुत्रियाँ थी। उनमें से एक का नाम ‘विद्याधारी’ था। यह स्पष्ट संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ विदुषी, ज्ञानवान है। जब सिंगापुर जोहोर के अधीनस्थ था, तब वहाँ की एक बस्ती का नाम भी उसी के नाम पर रखा गया था।
मलेशिया में महाराजाओं के राजमहल अभी भी अपने संस्कृत नाम ‘आस्थान’ को सुशोभित कर रहे है। राजकुमार और राजकुमारियाँ आज भी वहाँ ‘पुत्र-पुत्री’ नाम से पुकारे जाते है। मलय कन्याओं का सम्मानसूचक संबोधक ‘महादेवी’ है। यदि किसी कन्या का नाम ‘रजिया’ है, तो रक्त परंपरा के अनुसार उसका संबोधन ‘पुत्री महादेवी रजिया’ होगा। इससे वहाँ की वर्तमान संस्कृति में भारतीय संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
मलय भाषा में उत्तराधिकारी राजकुमार को ‘टुँकू मुकुट’ कहकर पुकारा जाता है। संस्कृत में इसकी पर्यायवाची शब्दावली ‘टोक मुकुट’ है। ‘टोक’ अर्थात् शिशु और मुकुट अर्थात् ‘ताज’। संस्कृत-हिंदी के ‘भाषा’ शब्द के लिए मलय शब्द लगभग वही है। सिर्फ उच्चारण में मामूली अंतर के साथ उसे ‘भासा’ कहा-लिखा जाता है। यह ध्वन्यात्मक दृष्टि से हिंदी के ‘साँझ’ शब्द में अति समीप है।
शुद्ध और पवित्र के लिए संस्कृत में ‘शुचि’ शब्द का इस्तेमाल होता है। मलयवासी इसका उच्चारण ‘सुचि’ करते है। इस प्रकार मलय भाषा में ‘महासुचि’ ईश्वर-बोधक है, जिसका अर्थ संस्कृत की ही भाँति वहाँ भी ‘अति शुद्ध’ होता है। ‘स्वामी’ को वहाँ ‘सुआमी’ बोला जाता है। वहाँ की उच्चारण परंपरा में ‘स्वर’ (ध्वनि) ‘सवर’ है और ‘स्वर्ग’ के लिए ‘शुर्ग’ या ‘सोर्ग’ उच्चारण किया जाता है। शेर अथवा सिंह को वहाँ ‘सिंग‘ बोला जाता है। इस प्रकार इस संस्कृत उपसर्ग से व्युत्पन्न शब्द ‘सिंहासन’ है। मलयवासी इसे ‘सिंगासन’ कहते है। अर्थ दोनों का समान है। ‘सेतिया’ सत्य का अर्थबोधक है। इसी से ‘सेतियावान’ अर्थात् सत्वान बना है। ‘मृगसत्व’ संस्कृत शब्द है। मलेशिया में इसके लिए ‘मृगसेतुवा’ शब्द है, जिसका प्रयोग वहाँ सामान्य पशुओं के लिए किया जाता है। संस्कृत का ‘सर्व’ उपसर्ग वहाँ ‘सेरु’ बन गया, पर अर्थ यथावत् है। वहाँ का ‘सेरु सेमेस्ता’ संस्कृत का सर्वसमस्त अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘संकलियान’ संस्कृत का ‘साकल्य’ है।
मलेशिया के ग्रामीण अंचलों में ऋषि को आज भी ‘रेसि’ कहा जाता है। संस्कृत का ‘रथ” अब वहाँ ‘रत’ बन गया है, पर अर्थ की अभिन्नता ज्यों-का-त्यों सँजोए हुए है। ‘रस’ जिसका अर्थ संस्कृत में आनंद, स्वाद, अनुभूति है, वह आज भी अपने इस स्वरूप को मलय भाषा में यथावत् बनाए हुए है। ‘सेना’ शब्द वहाँ भी ‘फौज’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है। दंडबोधक संस्कृत का ‘शिक्षा’ शब्द अब ‘सिक्सा’ के रूप में परिवर्तित हो गया। इस ‘सिक्सा’ में प्रताड़ना और कठिनाई भी सम्मिलित है। ‘श्लोक’ को ‘सिलोक’, ‘सहोदर’ का ‘सौदर’ कहा जाता है, पर ‘रोम’ अर्थात् कोमल बाल अपने मूल रूप को अब भी अविकल बनाए हुए है। यही बात ‘रूप’ के साथ है। वह शब्द के साथ -साथ अर्थ की मौलिकता को भी अविच्छिन्न रूप से धारण किए हुए है। वर्ण, जिसका अर्थ ‘रंग‘ होता है, बिगड़कर वर्तमान में ‘रोण’ हो गया है। इस प्रकार ‘पंचवर्ण’ को वहाँ ‘अंचरोण’ कहते है।
हिंदुओं के देवी-देवता वहाँ अब भी पूज्य है और न्यूनाधिक अपने मूल उच्चारण को बनाए हुए है। यहाँ के ‘श्री राम’ संप्रति ‘सेरि राम’ हो गए है। ‘अर्जुन’ अपना प्रथम अक्षर खोकर ‘रंजुन’ बन गया है, पर ‘अप्सरा’ ‘शिव’, ‘विष्णु’ ‘मंत्री, ‘महाराजा’ जैसे शब्द, रूप और अर्थ दोनों ही दृष्टियों से अब तक अपरिवर्तित है। ‘प्रकृति’ अर्थात् स्वभाव ने अब ‘पेकर्ती’ का रूप धारण कर लिया है। मलय भाषा का ‘पूजी-पूजियान’ हिंदी के ‘परमपूज्य’ के अर्थ का द्योतक है। ‘पूजा’ वहाँ अपने आदि रूप में ही प्रतिष्ठित है। ‘पृथ्वी’ वहाँ ‘पर्तवी’ हो गई है, पर अपना देवी स्वरूप अक्षुण्ण रूप से बनाए हुए है। इस प्रकार श्रद्धा से उसे ‘देवी पर्तवी’ कहा जाता है। पूर्णिमा, परीक्षा, प्रधान जैसे संस्कृत शब्द कतिपय परिवर्तन के साथ ‘परणामा’ ‘पेटेक्सा’ ‘परदान’ बन गए है, पर संस्कृत का अपना स्वाभाविक अर्थ आज भी सँजोए हुए है।
मलेशिया के ‘इपोह’ शहर के निकट एक गरम जल की सरिता है। अति प्राचीन संस्कृत का ‘पुँडरीक स्तोत्र’ खुदाई में वही प्राप्त हुआ था। वहाँ एक स्तंभ भी खड़ा है, जिसमें इसी स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ संगमरमर फलक पर खुदी हुई है। यह भी इस बात का द्योतक है कि अभी मलेशिया में भारतीय संस्कृति की ही पताका लहराती थी।
ऐसा उल्लेख मिलता है कि ब्रुनेई के एक बंदरगाह का नाम वहाँ के स्वर्गीय शासक की पदवी की स्मृति में ‘सेरी भगवान्’ रख दिया गया था। इतिहासकारों का मत है कि कभी वहाँ हिंदू शासन था। बाद में जब अरब आक्राँताओं ने उस पर आक्रमण किए और वहाँ के मूल निवासियों का धर्म परिवर्तन बलपूर्वक किया जाने लगा, तो उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार तो लिया, पर अपनी हिंदू पदवियों को अक्षुण्ण बनाए रखा।
‘ईरान’ एक संस्कृत शब्द है। इसका अर्थ संस्कृत भाषा में ‘लवणयुक्त, निर्जल प्रदेश’ है। ईरान वस्तुतः यही तो है। यूगोस्लाविया और चैकोस्लोवाकिया में स्लाव लोग बसते है। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन स्लाव हिंदू परंपरा वाले थे। वे लोग भी इंद्र, वरुण, यम और सूर्य जैसे देवों की पूजा करते थे। चैकोस्लोवाकिया की राजधानी ‘प्राग‘ है। यह हिंदी संस्कृत का ही एक उपसर्ग है, जैसे- प्रागैतिहासिक। लातविया यूरोप का एक छोटा राष्ट्र है। उसकी राजधानी ‘ऋग्’ है। यह एक संस्कृत धातु है, यथा, ऋग्वेद। ऐसे कितने ही नामों का उल्लेख किया जा सकता है, जो हिंदी संस्कृत से व्युत्पन्न है, उदाहरण के लिए ‘राम सर’ अर्थात् भगवान् राम का तालाब तुर्की में, ‘निशापुर’ ईरान में, ‘नव बहार’ (नव विहार) इराक में, ‘मक्का’ (यज्ञाग्नि ‘मखा’ से) अरब में, ‘नगर हार’ अफगानिस्तान में और ‘रामथा’ (राम का स्थान), ‘रामल्ला’ जोर्डन में। यह सभी नाम प्राचीन समय में विश्वव्यापी भारतीय संस्कृति को ही सिद्ध करते है।
इसके अतिरिक्त खुदाई के दौरान प्राप्त वस्तुएँ भी इसी धारणा को सुदृढ़ करती है। लाओस के दक्षिणी प्राँत ‘सवन्नाखते’ में क्ब् अगस्त को एक भ्म् से. मी. व्यास का तीन हजार वर्ष पुराना काँसे का घंटा प्राप्त हुआ। यह तपोड्गन (तपाँगण) मंदिर के समीप उत्खनन में मिला। मंदिर के नाम से ही भासता है कि यह एक हिंदू धर्म पीठ रहा होगा, जहाँ तप और योग की शिक्षा दी जाती होगी।
ऐसे ही सन् क्क्त्त्क् में फिलीपीन्स के ‘लुबाड्’ नदी के मुहाने पर नदी तल से सन् क् का एक ताम्रपत्र प्राप्त हुआ। इस ताम्रपत्र ने फिलीपीन्स के इतिहास को त्त्ख्क् वर्ष पीछे धकेल दिया। उक्त अभिलेख ने ऐसे ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत किए है, जो इस द्वीप समूह को हिंदू प्रभुसत्ता का अंग सिद्ध करते है।
ताम्रपत्र में कविलिपि में खुदे अभिलेख में श्रीमती अंगकैटान नामक एक महिला की चर्चा है, जिसे पुलिराम नामक मंत्री की उपस्थिति में ऋण मुक्त करने की घोषणा संबंधी यह दस्तावेज है। यह आज भी फिलीपीन्स के राष्ट्रीय संग्रहालय में ‘डि लागुना काँपर प्लेट इन्स्क्रप्शन’ के नाम से सुरक्षित है।
उल्लेखनीय है कि फिलीपीन्स में अब भी वहाँ के मुसलमान रामायण कथा का मंचन करते है, जबकि वहाँ के ईसाइयों ने राष्ट्रीय संसद भवन के प्राँगण में वैदिक विधि निर्माता ‘मनु’ की प्रतिमा स्थापित कर रखी है। यह सब प्रमाणित करते है कि पुराकाल में वहाँ हिंदू संस्कृति थी। धर्मांतरण तो बाद में हुआ। इसके अतिरिक्त सुमात्रा में ‘श्रीविजय’ जावा में ‘मज्जपहित’, वियतनाम में ‘चंपा’, कंपूचिया में ‘अंगकोर’, यह सभी हिंदू वर्चस्व वाले राज्य थे, जो क्वीं शताब्दी के पूर्व तक अस्तित्व में बने रहे। इसके बाद धीरे-धीरे वे मुस्लिम या ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए, पर हिंदू प्रतीक, भवन, मंदिर, मूर्ति आज भी ध्वंसावशेष के रूप में विद्यमान है।
हिंदू परंपरा वाले अवशेष विश्वभर में सर्वत्र पाए गए है, कहीं स्थानवाचक नामों के रूप में तो कहीं देवी-देवताओं, पूजास्थलों, शिलालेखों के रूप में। यह सब इस बात को सिद्ध करते है कि कभी भारतीय संस्कृति का संपूर्ण विश्व में वर्चस्व था। आज वह जितनी सीमित और छोटी प्रतीत होती है, विगत में वह उतनी ही व्यापक थी, इस धारणा को आने वाले दिनों में बल मिलेगा, ऐसा विद्वानों का मत है।
राम और सीता वनवास जाने लगे तो लक्ष्मण की माता और पत्नी ने भी उनके साथ जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा-हम दोनों तुम्हें विदा देते है सुमित्रा कौशल्या की, उर्मिला सीता की और लक्ष्मण राम की तुलना में अपने इसी त्याग के कारण संसार में अधिक आदर्शवादी समझे और सराहे गए। ऐसे सौभाग्य का लाभ तीनों में किसी ने भी नहीं त्यागा। जिस किसी को भी लोकसेवा का अवसर मिले उसे कभी भी नहीं चूकना चाहिए।
जन्म चेतना की प्रत्यक्ष अवस्था है, तो मृत्यु इस प्रकटीकरण का अवसान। जन्म और मृत्यु आत्मा की यात्रा के पड़ाव है। किसी एक जीवन के प्रति व्यक्ति विशेष का लगाव रहने पर अगले जीवन में भी यह संस्मरण सजीव रहता है और पुनर्जन्म के रूप में अतीत के चलचित्र को उजागर करता है। क्या मौत और जिंदगी के बीच की स्थिति का वर्णन संभव है,? करीब पाँच साल पहले तक चिकित्सा शास्त्री मानते थे कि जीवन के उस पार का वर्णन करना असंभव है, कारण कि उनके अनुसार हृदय की गति रुकते ही मस्तिष्क को रक्त के जरिए ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाता है और उसके बाद से मौत के होने तक (जो करीब पाँच मिनट बाद मस्तिष्क तंतुओं में विकार पैदा हो ही जाती है) मनुष्य न कुछ देख सकता है, न कुछ अनुभव कर सकता है और न कुछ समझ सकता है। इसलिए वे मृत्यु के स्वरूप के सब वर्णनों और मृत्यु के बाद के सब संस्मरणों को काल्पनिक मानते है। उनका तर्क था कि ऐसे वर्णनों और संस्मरणों का कोई आधार नहीं है।
आधुनिक चिकित्साशास्त्रियों की इस मान्यता के बावजूद कुछ ऐसे विश्वसनीय और प्रामाणिक उदाहरण सामने आए हैं, जिनसे लगता है कि विद्युत तरंगों से शून्य स्तब्ध मस्तिष्क में भी मृत्यु पथ की यात्रा और अगले जनम की स्मृति रेखाएँ अंकित रह जाती हैं। इनमें सबसे उल्लेखनीय उदाहरण जीवंतता की सजीव मूर्ति सुविख्यात अभिनेत्री एलीजाबेथ टेलर का है, जो मौत के चंगुल से मुक्त होकर कुछ समय बाद जीवन में वापस लौट आई थी।
जीवन लाभ करने के बाद मौत के दरवाजे के उस पार का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि लंदन के उस ऑपरेटिंग थियेटर में मौत मेरे चारों ओर मँडराने लगी थी मृत्यु के मुख में होते हुए भी मैं जिंदा रहने की कोशिश कर रही थी। उनके अनुसार विजीविषा न हो तो शायद मौत एक सहज सुखदायक और स्वागत योग्य अनुभव बन जाए। धीरे-धीरे मेरा शरीर जीवन को निरंतर सोखता चला गया, साँसें बंद हो गई और जीवन शेष न रहा। अनजाने- अकेलेपन का एहसास हुआ। इस अवस्था में दो अनुभूतियाँ हुई, पहल छोटे-बड़े, कठोर मृदु हाथों से मैं ढक गई। दूसरी अनुभूति भूली बिसरी आवाजों की हुई। वे दोनों अनुभूतियाँ तब तक होती रही जब तक साँसों की हलचल पुनः शुरू न हो गई। ठीक इसी समय मेरे शरीर को डॉक्टर मृत घोषित कर चुके थे। इस तरह मृत्यु एक स्थिर अनुभव नहीं हैं, अनुक्रमिक अनुभूति है।
इतना ही नहीं, कतिपय घटनाओं से यह भी पता चलता है कि कृताता आत्मा का गुण है, जो मृत्यु के बाद की इस घटना से सिद्ध होता है। घटना क्−फ्म् की है। स्त्र वर्षीय श्रीमती बीज रूस एक कलाकृति के सृजन के लिए न्यूयार्क से पेरिस आई हुई थीं। अनजानी जगह पर वह चाहकर भी न सो सकी। यूँ सोचते-सोचते अचानक झपकी आ गई। इस दौरान एक अज्ञात शक्ति उन्हें बिस्तर से उठाकर उनके स्टूडियो में ले गई। अंधेरे में ही कागज पर उनके हाथ ने ब्रश चलाना शुरू कर दिया। उन्हें लग रहा था कि कोई अज्ञात शक्ति संभवतः उनके माध्यम से अपनी मनचाही कलाकृति का सृजन कर रही है। जो कुछ घट रहा था, उस पर उनका कोई वश नहीं है। सुबह उठकर अंधेरे में बने उस चित्र को देखकर दंग रह गई। यह असाधारण कलाकृति किसी अनजान सुँदरी की थी।
सौभाग्य से उन्हें एक ऐसी महिला का पता चला, जो किसी भी वस्तु को देखकर या छूकर उसका संबंध उसके अतीती से स्थापित कर सकती थी। सचमुच उस महिला ने स्पेन के महान चित्रकार गोया की प्रेतात्मा से संपर्क स्थापित करने के बाद उस रहस्य को सुलझा दिया। गोया की मृत्यु क्त्त्ख्त्त् में हुई थी। जीवन के अंतिम दिनों में स्पेन स्थित अपने शत्रुओं से मुक्ति पाने के लिए फ्राँस के दक्षिण भाग में स्थित बीज रूप के पूर्वजों के घर में शरण ली थी। इस अहसान का बदला था, जो वीज रूस को चित्रकारिता के रूप में गोया की प्रेतात्मा ने चुकाया। इस घटना का अमेरिकी परामनोवैज्ञानिक डॉ. स्टीवेंसन ने वैज्ञानिक ढंग से विश्लेषण किया है।
एक अन्य घटना में चार साल का अनिल कुमार जब अपनी माँ को भाभी कह कर पुकारने की जिद पर अड़ा रह, तो उससे घरवालों को बड़ा आश्चर्य हुआ। इस मामले का दिलचस्प पहलू तब सामने आया जब अनिल कुमार ने अपने पूर्व जन्म का सारा वृत्तांत कह सुनाया। अनिल की विचित्र परंतु सत्यकथा इस प्रकार है, पूर्व जन्म में जब वह सोलह साल का था, तो अपनी भाभी को लेने के लिए रिक्शा में बैठकर रवाना हुआ। कुछ दूर चलने के बाद रास्ते में ही दुर्घटना हो गई, जिसमें उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना की जाँच करने वाले एडवोकेट श्री एलपीमाथुर ने सहवासन में अनिल के साथ हुई दुर्घटना की पुष्टि की। उसने उस रिक्शा का नंबर फ्फ्स्त्र बताया, जिस पर आजकल जाप्ता फौजदारी के अंतर्गत उसके मालिक और चालक पर मुकदमा चल रहा है। अनिल ने सहवासन में अपने पूर्व जन्म के भाई भाभी को भी पहचान लिया। घर से बाहर स्कूल में भी उसे अपने तमाम पुराने अध्यापकों और सहपाठियों को पहचानने में कोई परेशानी नहीं हुई उसने उस जूते की दुकान की ओर भी संकेत किया, जिसमें अक्सर वह बैठा करता था। पिछले जन्म में वह सहवासन के मुख्तार क्षेत्रपाल के पुत्र और लालाजी के नाम से जाना जाता था। अब उसने उसी घर में अपनी भाभी के पुत्र अनिल कुमार नाम से जन्म लिया था।
अमेरिका के प्रख्यात पुनर्जन्म विशेषज्ञ फ्राँसिस स्टोरी पिछले बीस वर्षों से भी अधिक समय तक पुनर्जन्म की घटनाओं की जाँच करते रहे हैं। स्टोरी ने एशिया के भारत, वर्मा, थाइदेश और श्रीलंका आदि देशों में काफी खोजबीन की है। एक बार क्−म्ख् में पुनर्जन्म के अध्ययन के संबंध में वह खाम गए थे। इस दौरान मध्य थाइदेश, सूरिन में स्थित एक सैनिक शिविर के कंपनी कमाँडर कैप्टन नित वालसिरी ने उनके पास एक संदेश भेजा। उसने अनुरोध किया कि शिविर के सार्जेट थियाँग सान क्ला, जिसे अपने पुनर्जन्म की काफी घटनाएँ याद है, से मिले।
सार्जेट क्ला कद से छोटा और काफी चुस्त और पुष्ट था उसके बायें कान से लेकर खोपड़ी के निचले सिरे तक चोट का एक भद्दा सा निशान था। उससे पूछे जाने पर अपना विवरण इस प्रकार सुनाया, मेरे पूर्व जन्म का नाम होह था। मेरी मृत्यु क्−ख्ब् में हुई थी। इस जन्म के पिता मेरे पूर्व जन्म के बड़े भाई थे। मवेशी चुराने संबंधी घटना के कारण गाँव वालों ने मुझ पर तेज चाकू से हमला कर दिया। चाकू खोपड़ी में लगा और तत्काल मेरी मृत्यु हो गई। वही निशान मेरे इस जन्म में भी बना हुआ हैं इस घटना को और अधिक स्पष्ट करते हुए उसने बताया कि मेरी मृत्यु चाँग नाम के व्यक्ति के वार से हुई। मैं चाँग से बदला लेना चाहता था, परंतु कुछ समय बाद वह भी मर गया। मृत्यु के बाद मैं अपने मृत शरीर को स्पष्ट देख रहा था। खून से सना मेरा मृत शरीर पड़ा हुआ था। मैं सबको देख रहा था, परंतु मुझे कोई देख नहीं पा रहा था। बारी-बारी से सभी मित्रों, रिश्तेदारों के पास गया। बड़ी इच्छा हुई कि मैं भैया के घर में जन्म लूँ, जिससे उसी परिवार में मुझे प्यार मिल सके। भाभी का पेट फूला और मैं उसी के गर्भ में प्रवेश कर गया। क्ला ने अपने पूर्व जन्म की पत्नी मई (जिनकी मौत क्−ख्ब् में स्त्रम् वर्ष की आयु में हुई) निजीस को पहचान कर भी स्वयं को प्रमाणित किया। सूरिन नगरपालिका के एक अधिकारी स्त्रख् वर्षीय प्रमाने ने होह की हत्या के मामले की जाँच की थी। क्ला के बयान के सारे तथ्य को उसने सही बताया।
जुड़वाँ बच्चों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि उनकी उत्पत्ति और विकास विषयक परिस्थितियाँ समाजन होते हुए भी उनकी नियति अलग-अलग ही होती है। इस घटना में जुड़वाँ लड़कियों में से सिर्फ एक को अपने पूर्व जन्म की याद थी। क्−स्त्रम् में अमेरिका के मर्सर नाम के एक कस्बे के एक साधारण परिवार में जुड़वाँ लड़कियों ने जन्म लिया था। एक का नाम था गेल और दूसरी का सुसान। थोड़ी बड़ी होने पर गेल कुछ यहूदियों का नाम कहती कि वह उन लोगों को जानती है। उसने बताया मेरा जन्म जर्मनी में हुआ था और हिटलर के यातना शिविर में मेरी मृत्यु हुँई थी। गेल के पिता ने इस मामले को अमेरिका के पुनर्जन्म विशेषज्ञ को सौंपा। जिसने इसकी जाँच करने पर तथ्यों को सही पाया। ईसाई होते हुए भी क्त्त् साल की गेल गिरजाघर के बजाय अपने कस्बे से क्भ् मील दूर यहूदियों के उपासना गृह में उपासना के लिए जाती है।
“मैं जब कभी अपने कमरे में अकेला होता हूँ, तो कुछ होने लगता है। जिसके आधार पर मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि मेरे अंतःव्यक्तित्व का परिचालन मुख्यतः पूर्व जन्मों के संस्कार ही करते हैं। अवचेतन में निहित जन्म-जन्म के ये संस्कार हमें समय-समय पर चेतावनी भी देते हैं और हितकर परामर्श भी।”
यह वक्तव्य था महान कवि विलियम बटलर शीट्स का, उन्हें क्−ख्फ् में साहित्य का नोबुल पुरस्कार मिला था। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार कि वे पूर्व जन्म में लियो आफ्रीकंस नामक कवि थे। सोलहवीं सदी में जन्में लियो आफ्रीकंस यूरोप के नामी कवि और भूगोलशास्त्री थे। शीट्स कहते है। आफ्रीकन्स की आत्मा ने विचित्र स्वरों एवं अनेक महान क्षणों में मेरा मार्गदर्शन किया है। यही कारण है कि विचारों में डूबते ही उस काल के साहित्य से मेरा अनायास सामंजस्य स्थापित हो जाता है। अपने पूर्व जन्म का प्रभाव शीट्स के अंतर्मन पर अंत तक प्रबल और गहरा बना रहा। इस प्रभाव की विराट् रहस्यमयी छाया चित्र विचित्र प्रतीकों के माध्यम से उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देती है।
ये सभी घटनाएँ हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण सूत्रों की ओर संकेत करती है। इनसे यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान जीवन ही जीवन का अंत नहीं वरन् आत्मा की अनंत यात्रा का एक पड़ाव है। इसको परिष्कृत और पवित्र कर नए तथ्यों और समाधान की खोज करनी चाहिए। जिससे अनंत पथ की यात्री आत्मा उत्तरोत्तर विकासावस्था की ओर अग्रसर होती रह सके।
एक व्यक्ति के पास रेशम का थान था, धागे आपस में लड़ने लगे। अलग-अलग रहने की सबने ठानी। दर्जी ने उनके टुकड़े काट दिए।
एक जगह खजूर की पत्तियाँ थी। सूखी और बिखरी पड़ी थी। उन्होंने मिल जुल कर रहने का निश्चय किया। माली ने इकट्ठी करके उनकी चटाई बुन दी।
रेशम की धज्जियाँ दुकान दुकान पर मारी-मारी फिरीं, किसी ने नजर उठाकर भी उन्हें नहीं देखा, जबकि चटाई का गट्ठा हाथों हाथ बिक गया।
अलग होने और शामिल रहने का अंतर दोनों ने समझा और भविष्य के लिए सही रास्ता अपनाया।
राहगीर को काशी जाना था, सो रास्ता चलते समय उसकी दृष्टि मील के पत्थर पर पड़ी। काशी की दूरी और दिशा का संकेत उस पत्थर पर खुदा था। राहगीर रुककर वही बैठ गया, कहने लगा, “अंकन गलत नहीं हो सकता। प्रमाणिक लोगों ने लिखा है। काशी आ गई। अब आगे जाने की क्या जरूरत रही?” कोई समझदार उधर से निकला और पत्थर के पास आसन जमाकर बैठने का कारण जाना, तो कहा, “पत्थर पर संकेत भर है। काशी पहुँचना है, तो पैरों से चलकर दूरी पार करनी होगी।” भोले व्यक्ति ने अपनी भूल मानी और बिस्तर समेटकर चल पड़ा, पर समझदारों को समझाया जाना अत्यंत कठिन है। वे शास्त्र पढ़ते और सुनते रहते हैं और सोचते रहते हैं, इतने भर से धर्म-धारणा का, आत्मकल्याण का उद्देश्य पूरा हो जाएगा।
दार्शनिक हिक्री उन दिनों तुँबा में रहते थे कई लोग उनसे उलझी गुत्थियाँ सुलझाने संबंधी परामर्श करने आते। एक दिन एक व्यक्ति अपनी पत्नी समेत उनके पास पहुँचा और उसके आलस्य तथा कंजूसी की बुराई करने लगा। सचमुच यह दोनों बुराइयाँ उसमें थी भी। हिक्री ने उस औरत को अपने पास बुलाया। एक हाथ की मुट्ठी बाँधकर उसके सामने की और पूछा, “ यदि यह ऐसे ही सदा रहा करे, तो क्या परिणाम होगा, बताओ तो लड़की।” औरत सिटपिटाई तो, पर हिम्मत समेटकर बोली, “यदि सदा यह मुट्ठी ऐसी ही बंधी रही, तो हाथ अकड़कर निकम्मा हो जाएगा।”
हिक्री इस उत्तर को सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और दूसरे हाथ की हथेली बिल्कुल खुली रखकर फिर पूछा, “ यदि यह हाथ ऐसे ही खुला रहे, तो फिर इस हाथ का क्या हाल होगा, जरा बताओ तो।” औरत ने कहा, “ऐसी हालत में यह भी अकड़कर बेकार हो जाएगा। हिक्री ने उस औरत की भरपूर प्रशंसा की और कहा, “यह तो बुद्धिमान भी है और दूरदर्शी भी। मुट्ठी बँधी रहने और हाथ सीधा रहने के नुकसान को यह अच्छी तरह जानती है।” पति पत्नी नमस्कार करके चले गए। औरत रास्ते भर संत के प्रश्नों पर बराबर गौर करती रही और घर जाकर पति की सहायता करके अधिक कमाना और बचत को खुले हाथ से दान करना आरंभ कर दिया।
धर्म मानव जीवन का प्राण है, जो समस्त मानव जाति को एक सूत्र में बाँधता है, विभिन्न मनकों की माला के रूप में परिणत करता है, व्यक्ति को नए साँचे में ढालने का, उसको फिर से गढ़ने का काम आमतौर से धर्मानुशासन करता है और यह धर्मानुशासन सभी धर्मों में एक ही चर सत्य की ओर से ले जाता है। उसमें कही भी भेदभाव या टकराहट नहीं है। उस धर्मानुशासन की तकाजा है कि हम अपने को सभी बुरी प्रवृत्तियों, मानव प्रकृति की दुष्टताओं और दुर्बलताओं से स्वच्छ कर लें, अपने भीतर देखें, अपने आप का कायापलट कर डालें और अपने आपको उदात्त बनाएँ, महानता की ओर ले चलें, यह है सभी धर्मों की एकता वाला स्वरूप।
अमेरिकन बौद्धिक स्वतंत्रता के नेता वाल्ट ह्रिटमैन ने ‘साँग ऑफ माइसेल्ट’ में कहा है, “सभी धर्म सत्य हैं। जिस प्रकार विभिन्न वाद्य यंत्रों के स्वरों में भिन्नता के बावजूद उनका सम्मिलित स्वर सबको मोहित कर लेता है, उसी प्रकार संसार में विभिन्न धर्म एवं जातियों का अस्तित्व समाप्त किए बिना, उन्हें एकता के सूत्र में पिरोकर एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है। स्वतंत्रता आँदोलन में हिंदू मुस्लिम- सिक्ख-ईसाई सभी ने भाई-भाई की तरह कंधे से कंधा मिलाकर अपना योगदान दिया। उस समय सबकी एक भावना थी- हम भारतीय है।” यहाँ कहा भी जाता है-
उश्रंर यत् समुद्रस्य हिमादृश्चैव दक्षिणं। वर्षतं भारतः नामः भारतीय यत्र संतति॥
अर्थात् समुद्र के उत्तर में, हिमालय के दक्षिण में स्थित भूमि गत भारत है और उसमें रहने वाले भारतीय उसकी संतान है। इसका यही आशय हुआ कि सभी भारतीय भाई-भाई हैं और भारत उनकी माँ।
वस्तुतः अपनी सुरक्षा एवं प्रगति के लिए मनुष्य खानाबदोश जीवन छोड़कर समूह में एक स्थान पर रहने लगा। इससे समाज बना, फिर राज्य और राष्ट्र। आपस में एकता एवं अनुशासन रखने के लिए धर्म का सहारा लेकर नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जाती थी। उद्देश्य क्या था, पर स्वार्थ लिप्त तत्वों ने उसका क्या स्वरूप बना दिया?
विभिन्न सामाजिक परिवेश एवं भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के कारण विभिन्न धर्मों के सिद्धाँतों के प्रकटीकरण में थोड़ा अंतर है। विभिन्न धर्मों में ईश्वर के अलग-अलग नाम हैं, किंतु सबमें यही कहा गया है ईश्वर एक है तथा सबका पालनहार है।
वेदों में लिखा है, ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ अर्थात् एक ही ईश्वर को विज्ञजन विभिन्न नामों से पुकारते हैं। ‘एकोऽहम् बहुस्यामि’ का ईश्वरीय उद्घोष इस ओर इंगित करता है कि संसार उसी परमात्मा का प्रारूप है। कुरान शरीफ कहता है, ‘ फाएनमा तबल्लू फसमा बज हिल्ला’ अर्थात् जिस ओर भी तुम दृष्टि फेरो, अल्लाह का जलवा नजर आएगा। सूफी मत भी यही कहता है कि ईश्वर एक तथा अनल -हक (परम सत्य एक) है तथा संसार उसका जिल्ल (वास्तविकता की अभिव्यक्ति) है। बाइबिल में वर्णन है। “ परमेश्वर एक है, जो निरंजन, निराकार और ज्योतिस्वरूप है।” यहूदी मतानुसार “ईश्वर एक, निराकार तथा संपूर्ण ब्रह्मांड का सृजेता, सृष्टि का पिता है।” पारसी धर्म में भी ईश्वर को एक तथा अहूरमज्द (सर्वशक्तिमान) बताया है।
धर्म के आधार पर मतभेद का कोई आधार नहीं है। कुरान कहता हैं, “अल्लाह के अलावा जिन दूसरे इष्ट देवों को लोक पूजते हैं, उनका तुम तिरस्कार मत करो, अन्यथा अज्ञानता के कारण द्वेषवश वे लोग अल्लाह का तिरस्कार करने लगेंगे। यह पुण्य नहीं है कि अपने मुँह को पूरब या पश्चिम की ओर कर लो पुण्य तो मृत्यु दिन, परमेश्वर,पैगंबरों ग्रंथों पर श्रद्धा करने में हैं। साथ ही प्राणिमात्र के प्रति दया का भाव रखना तथा सदैव ईमानदार बने रहना परम धर्म है।” सच्चे सूफी का ध्येय है, “ अहं विनाश तथा उत्कट प्रेम का प्रकटीकरण।” रुमी ने लिखा है, “जहाँ इकाइयों (विभेदों) का अस्तित्व नष्ट हो जाता है, वही एकत्व स्थापित होता है। व्यक्तिगत अहंकार नष्ट होने पर सिर्फ ईश्वर रह जाता है और तब सर्वव्यापक प्रेम का उद्भव (भक्तियोग) होता है”
श्रीमद्भागवत में भी कहा है कि जैसे विभिन्न ज्ञानेंद्रियाँ एक ही वस्तु में अलग-अलग गुण अनुभव करती है, उसी प्रकार विभिन्न धर्मशास्त्र एक परमेश्वर के अनेक पक्षों की ओर इंगित करते हैं।
चीन में कन्फ्यूशियसवाद, ताओवाद और बौद्ध धर्म के अनुयायी जब परस्पर मिलकर अपने-अपने धर्म की प्रशंसा करते हैं, तब गोष्ठी के अंत में वे यह सहगान करते हैं-
धर्म अनेक हैं, पर तर्कना एक है, हम सभी भाई-भाई हैं। जेन्द-ए-अवेस्ता में कहा गया है “आर्य देशों, तूरानी देशों, मलय देशों, सीरियाई आदि सभी देशों के धर्म प्राण आस्तिक लोगों का हम समादर करते हैं।” महात्मा जरथुस्त्र कहते हैं, हम संसार के नीतिपरायण प्राचीन धर्मों की पूजा करते हैं।”
मुहम्मद साहब कहते हैं, “हर कौम के लिए हमने इबादत के तरीके मुकर्रर किए हैं।”
प्रोफेसर आर्नल्ड टायनबी लिखते है, “यह मेरा निजी विश्वास है कि जिस युग मैं जी रहा हूँ, उस युग में प्रचलित चार श्रेष्ठ धर्मों का मूल कथ्य एक है। वे एक ही बात को अलग -अलग ढंग से कहत हैं। यदि विश्व के इस स्वर्गिक संगीत का चार अवयवों को कोई एक ही साथ समान स्पष्टता से अपने दोनों कानों से सुन सके, तो उसे यह जानकर प्रसन्नता होगी कि वह कोई विसंवादी स्वर नहीं, प्रत्युत प्रसंवादी स्वर ही सुन रहा था।”
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि धर्म का प्रयोजन है इस विभक्त चेतना वाले जगत् से जिसमें विभेद है, द्वित्व है, समर समय, स्वातंत्र्य एवं प्रेममय जीवन में विकसित होने से हमारी मदद करना। सारे धर्म ग्रंथ भी ईश्वर प्रेरित हैं, अतः उपदेश करने, भर्त्सना करने, सुधार करने और ईमानदारी का प्रशिक्षण देने में लिए इनकी उपादेयता है। धर्म ग्रंथों का उद्देश्य यही है कि ईश्वरीय जनों की हर अच्छे कार्य में स्वयं को, समाज को सक्षम बनाने के लिए आवश्यक सहायताएँ ली जाएँ।
अपनी अपूर्णता का अहसास होने पर ही मानव ईश्वर से एकाकार होने के लिए आतुर हो उठता है। परम सत्ता से संपर्क होने के पश्चात वह पुनः मानव जाति की सेवा के लिए तत्पर हो जाता है। आध्यात्मिक व्यक्तित्व संपन्न ऐसे महामानस के श्रद्धापात्र बनते हैं। इन महात्माओं के अपने’-अपने धर्मों एवं पंथों के अधिकाँश अनुयायियों में परस्पर जितनी समानता नहीं पाई जाती, उससे कही अधिक समानता इन महात्माओं के बीच पाई जाती है।
अशोक ने अपने बारहवें शिलालेख में घोषणा की थी, जो मनुष्य अपने धार्मिक संप्रदाय के मोह में पड़कर उसकी गौरव वृद्धि की इच्छा से दूसरे धर्म संप्रदायों की निंदा करता है। और अपने धर्म संप्रदाय के प्रति समादर प्रकट करता है, वह वास्तव में अपने इस आचरण से अपने ही संप्रदाय को भारी क्षति पहुँचाता है। इसलिए विभिन्न संप्रदायों के बीच मेल मिलाप पैदा करना ही उचित है अर्थात् दूसरे लोगों द्वारा स्वीकृत, पावित्र्य एवं धर्मनिष्ठा के विधि नियम के प्रति स्वेच्छया सद्भाव रखना सराहनीय है। आज संसार हठधर्मिता, अतिबद्धता और असहिष्णुता के रोग से पीड़ित है और इतिहास साक्षी है कि इन्हीं कारणों से मानव जाति खून के आँसू बहा चुकी है। धर्मों और आधुनिक विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के सम्बन्ध में जो अनुभव सारी दुनिया में हुए हैं, उनके प्रभाव के कारण सारी मानव जाति एकजुट हो समाज में बदलती जा रही है। अब यह संभव नहीं कि विभिन्न सभ्यताएँ आपस में मतभेद रहते हुए टिक पाएँ।
भौतिक साधन, बौद्धिक क्षमता अथवा कुशलता का अभाव तो हमारे मध्य विभेद उत्पन्न नहीं कर रहे। इसका मुख्य कारण तो मानव स्वभाव का लोभ, पद, प्रतिष्ठा, हठवादिता, घमंड इत्यादि है। आज जब पूर्व और पश्चिम के महान विचारकों ने विज्ञान और आध्यात्मिक जीवन दोनों की आवश्यकता महसूस की है तब दुर्भाग्यवश दुनिया के धर्म स्वयं आलोचना के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में आवश्यकता है एक ऐसी धार्मिक आस्था की, जिसको मनुष्य समझ सके, जो तर्क एवं विवेक की कसौटी पर कसी जा सके।
रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा है, भारी मुश्किलों के बावजूद भारत ने सभी धर्मों व जातियों के सामंजस्य का प्रयत्न किया है। उनके बीच को वास्तविक भिन्नता को स्वीकार करते हुए एकता के कुछ आधार तलाशे हैं। वैज्ञानिक उपादानों के चलते सारा विश्व एक देश में तब्दील हो रहा है और वह समय आ गया है, जबकि आपको एकता का एक ऐसा आधार भी तलाशना होगा, जो गैर राजनीतिक हो। अगर भारत दुनिया को अपना समाधान दे सका, तो यह मानवता को एक मूल्यवान योगदान होगा।
जिन लोगों में उदात्त शक्ति की कमी है और जो परस्पर साहचर्य से नहीं रह पाते या तो नष्ट हो जाते है या अपकर्ष की स्थिति में जीवित रहते हैं। सिर्फ वे लोग जिनमें सहयोग की मजबूत भावना रहती है, स्वयं जीवित रहते हैं और सभ्यता की उन्नति करते हैं।
वर्तमान सदी में हममें से प्रत्येक को अपने अंदर छिपी असामान्यता को पहचानकर विश्व समाज के एक नागरिक भावनाओं को अपनाते हुए संकीर्णता से विशालता की ओर अग्रसर होना है। तभी हमारे अवतारों, महामानवों, पैगंबरों एवं नबियों का स्वप्न कि सारा राष्ट्र ही नहीं समूचा विश्व मिल जुलकर काम करे, चरितार्थ होगा।
हम सबके मस्तिष्क से चेतना की तरंगें सतत स्पंदित होती रहती हैं। अज्ञानता एवं निर्दिष्ट लक्ष्य के अभाव में मस्तिष्क पर नियंत्रण नहीं रह पाता और ये बहुमूल्य तरंगें बिखरती रहती है। ध्यान इन ऊर्जा तरंगों के बिखराव को रोककर एक सुनिश्चित केंद्रबिंदु पर केंद्रित करने की कला है। ध्यान द्वारा अपनी इन प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत एवं केंद्रित करके भौतिक और आध्यात्मिक सफलताओं को अर्जित किया जा सकता है।
आज आधुनिकता में रचे-बसे लोग अनिद्रा, तनाव आदि मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं। प्रचलित पद्धतियों से कारगर उपचार के अभाव में इन दिनों वैज्ञानिक ध्यान द्वारा उद्विग्नता, तनाव आदि के निदान हेतु गहन शोध -प्रयत्नों में जुटे हैं। ‘द फिजियोलॉजी ऑफ मेडिटेशन, ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ (टवस ख्ख्म्) में आरके वैलेस और हर्बर्ट बेन्सन ने बताया है कि ध्यान के दौरान शरीर में ऑक्सीजन की खपत और उपापचय दर बहुत ही न्यून हो जाती है। ऑक्सीजन की खपत पाँच मिनट में ही घटकर ब्भ् सेमी फ् (घन सेमी) मिनट हो जाती है, जो सामान्य से ख् प्रतिशत कम है। ध्यान के दौरान उपापचय दर अर्थात् शरीर में ऊर्जा की खपत में भी तीव्रता से कमी आने लगती है।
सर्वमान्य है कि तनाव एवं उद्विग्नता की स्थिति में त्वचा की प्रतिरोधकता कम हो जाती है। ध्यानावस्था में जीएसआर (गैल्वेनीक स्कीन रेसीस्टैन्स) ख्भ् से भ् प्रतिशत तक बढ़ जाता है, जबकि सामान्य निद्रावस्था में यह क् से ख् प्रतिशत तक ही बढ़ता है। अतः ध्यान प्रक्रिया से गहन विश्राम मिल सकता है। रोटर के लॉ ऑफ कन्ट्रोल स्केल और वेडिंग के एन्जाइमी स्केल द्वारा किए गए शोध द्वारा पता चला है कि ध्यान करने वाले व्यक्तियों का अंतःसंयम अपेक्षाकृत अधिक है, साथ ही वे ध्यान न करने वालों की तुलना में कम उद्विग्न होते हैं।
ब्रिटिश जनरल और साइकोलॉजी के संपादक जे सैण्डलर्स ने ख् व्यक्तियों पर प्रयोग किया। वह एक माह तक नइ सबसे सोऽहम् का जप ध्यान कराते रहें ये क्− से भ्त्त् वर्ष के आयु वर्ग के थे। अध्ययन द्वारा उन्हें यह मानक प्राप्त हुआ। श्वसन दर /मिनट क्भ्.त्त् से त्त्.फ् नाड़ी स्पंदन प्रति मिनट स्त्रभ्.म्-म्म्.ख्, रक्त चाप (सिस्टोलिक) क्फ्भ्.स्त्र- क्क्ब्.भ्, डायस्टोलिक त्त्भ्.त्त्-त्त्−.म्, जीएसआर (मिलीवोल्ट) त्त्.ब्-ख्म्.भ् और ईई जी क्ख्.म् तक। इस मानक के विश्लेषण से स्पष्ट पता चलता है कि ध्यान के बाद की स्थिति ध्यान से पूर्व की अपेक्षा अधिक शांत, तनावरहित, अंतर्मुखी एवं स्थिर हो गई।
डॉ. जीटी स्टालीन के एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार ध्यान करने वाले एक समूह के त्त्फ् प्रतिशत व्यक्तियों ने कुछ समय पश्चात ही नशीले पदार्थों का सेवन बंद कर दिया। इन व्यक्तियों के जीवन की विविध गतिविधियों में अधिक सुव्यवस्था देखी गई। डॉ. स्टालीन ने स्कूलों, कार्यालयों आदि अनेकों स्थानों पर इस प्रकार के ढेरों प्रयोग किए थे, जिनमें उन्हें पर्याप्त सफलता मिलीं। इसके अलावा ‘प्रास एंड कानस ऑफ मेडीटेशन’ नामक ग्रंथ में अमेरिका के विख्यात वैज्ञानिक गैरी ई स्वाईन ने अपनी एक शोध का उल्लेख करते हुए कहा कि ध्यान करने वाले व्यक्ति आसानी से शराब, सिगरेट काफी आदि नशीले पदार्थों के सेवन से छुटकारा पा जाते हैं। यही नहीं उनका जीवन सामान्य अमेरिकी वासियों की तुलना में अधिक व्यवस्थित एवं तनावमुक्त देखा गया। वैज्ञानिक डब्ल्यू सीमन और टी बंट पंद्रह विद्यार्थियों के समूह को दो माह तक ध्यान करवाया। दो माह पश्चात जब उनका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया तो पता चला कि सामान्य विद्यार्थियों की तुलना में ध्यान करने वाले विद्यार्थियों के अंतःनिर्देशन सहजता, आत्मसम्मान आदि मानवीय गुणों में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि हुई।
एक अन्य परीक्षण में हैदराबाद के एम.केसर रेड्डी ने एथलीटों पर ध्यान के प्रभाव का अध्ययन किया। इस प्रयोग ध्यान में संलग्न एथलीटों की वाइटल केपेसिटी और कार्डिसयों वास्कुलर एफीसियेंसी दोनों में सार्थक सुधार पाया गया। कार्डियों वास्कुलर एफीसियेंसी का अर्थ होता है, हृदय द्वारा कार्य कम व उपलब्धि अधिक। यह ऊतकों के पोषण का कार्य करता है व आपातकालीन परिस्थितियों के लिए आरक्षित क्षमता (क्रद्गह्यद्गह्क्द्गस्र ष्टड्डश्चड्डष्द्बह्लब्) रखता है।
ध्यान साधना से रक्त में लेक्टेट की मात्रा में स्पष्ट घटोत्तरी होती है। यह दर फ्फ् प्रतिशत तक कम हो जाती है। रक्त में लेक्टेट की सघनता उद्विग्नता, उच्च रक्त चाप को सूचित करती है। कमी होने से व्यक्ति के अंदर उत्साह उमंग और स्फूर्ति की, नवीन चेतना की लहरें हिलोरें मारने लगती है। इस अवस्था में श्वसन गति सामान्य विश्रामावस्था से लगभग आधी हो जाती है। कभी कभी तो यह चार श्वास प्रति मिनट कम देखा गया है। यहाँ तक कि ध्यान करने वाले अति संवेदनशील रोगियों के सिस्टोलिक एवं डायस्टोलिक रक्त चाप में भी पर्याप्त सुधार देखा गया है।
वैज्ञानिकों के लिए हृदय जो जीवन को स्पंदन देता हैं, अति महत्वपूर्ण एवं कोमल अंग है, मनुष्य विश्राम कर सकता है, पर उसका हृदय एक ही बार विश्राम करता है। और वह समय होता है मौत। निरंतर कार्य करने से हृदय की उत्पादकता में विशेष दबाव पड़ता है। उत्पादकता में कमी हृदय पर कार्य दबाव के घटने की सूचक है। ध्यानावस्था में हृदय उत्पादकता की कमी लगभग ख्भ् प्रतिशत होती है। इस क्रम में हृदय की धड़कन भी औसतन पाँच प्रति मिनट की दर से कम हो जाती है।
वैसे ध्यान योग का प्रमुख उद्देश्य मस्तिष्कीय तरंगों के बिखराव को रोकना और विशिष्ट चिंतन बिंदु पर केंद्रित करने की प्रवीणता प्राप्त करना है यूँ तो सामान्य विश्रामावस्था में ही अधिकाँश व्यक्तियों के मस्तिष्क से अल्फा तरंगें निकलती हैं। वे अल्फा तरंगें शरीर व मन की स्थिर व शाँत अवस्था की द्योतक है। ध्यान साधना से इन अल्फा तरंगों में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि देखी गई है। शोधकर्ता ब्राउन, स्टीवार्ट एवं ब्लोगेट ने ईईजी पर ग्यारह ध्यान करने वाले व ग्यारह ध्यान न करने वाले व्यक्तियों पर अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि ग्यारह में से क् साधकों की ध्यानावस्था में अधिकाँश समय अल्फा तरंगें निकल रही थी। जबकि ध्यान न करने वालों में से मात्र तीन में ही ये तरंगें हल्की सी दिख रही थी।
जर्मनी के मनोचिकित्सक डॉ. हंस बर्जर ने भी इलेक्ट्रोएन्सोफेलोग्राफ के माध्यम से ध्यान के कई प्रयोग किए। उन्होंने मानवीय मस्तिष्क से भिन्न-भिन्न प्रकृति की तरंगों को प्रस्फुटित होते देखा। त्त् से क्फ् क्रम प्रति सेकेंड की आवृत्तियों का नाम उन्होंने अल्फा तरंग रखा। ये विचार हीन अवस्था की द्योतक हैं। क्फ् से क्त्त् आवृत्ति प्रति सेकेंड का नाम उन्होंने बीटा तरंग बताया। यह पाँचों इंद्रियों की सक्रिय अवस्था की द्योतक है। भ् से त्त् की आवृत्ति का नाम उन्होंने थीटा तरंग दिया व भ् से कम को उन्होंने डेल्टा तरंग कहा।
बर्जर के शिष्यों ने शिशु एवं बच्चों पर प्रयोग करके देखा कि नवजात शिशु में डेल्टा तरंग व एकवर्षीय शिशु में शुरू हो जाती हैं। जो सतत सात-आठ वर्ष तक रहती है। त्त् वर्ष के बाद बीटा तरंगों का बाहुल्य हो जाता है। डब्ल्यू वाल्टर ने इस तथ्यों को अपने वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा पुष्ट किया। फ् से त्त् वर्षीय बालक की उच्च बौद्धिक जागरुक ग्रहण क्षमता अल्फा तरंगों के कारण ही मानी जा सकती है।
अध्यात्म साधनाओं में अल्फा स्थिति उत्पन्न करने के लिए साधकों को यम नियम से लेकर ध्यान धारणा के विविध यौगिक उपक्रमों का आश्रय लेना पड़ता है। कषाय- कल्मषों के परिशोधनों के पश्चात ही अल्फा तरंगों में अतिशय वृद्धि होती है। जिसे स्वभाव, आदतों व व्यवहार में उत्कृष्टता के समावेश के रूप में स्पष्ट देखा जाता है। ध्यान द्वारा प्रतिक्रिया समय (त्मंबजपवद ज्पउम) में जो तीव्रता देखी जाती है, वह बढ़ी हुई सतर्कता तथा मन व शरीर के सुधरे हुए सामंजस्य व घटी हुई जड़ता की सूचक है। श्रवण क्षमताओं में विकास की दर ध्यान के प्रभाव से आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है।
एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड एथीक्स (जेम्स हेस्टींग) के खंड फ्.स्त्र−ख् में एडवड्र कारपेंटर कृत ‘दइ आर्ट ऑफ क्रियेशन’ में ध्यान का उल्लेख कुछ इस प्रकार से है, ध्यानावस्था में हर्ष, प्रेम, उमंग, उत्साह और साहसरूपी चैतन्य तरंगें उठती हैं, जिससे जीवन के वास्तविक मूल्यों का बोध होता है। ध्यान के माध्यम से ही मौलिक विचारों का सृजन संभव हो सकता है।
एनसाइक्लोपीडिया के इसी खंड फ्.स्त्र−ख् में ही हेनरी वुड के शोधपत्र आइडीयल सजेशन में ध्यान को जीवन की दिव्यता बताया है।उनके अनुसार मात्र एक माह के ध्यान में ही व्यक्ति पूर्णतः शाँत, नीरव हो आत्मा के पावन मंदिर में प्रवेश प्राप्त कर उसके अव्यक्त महान संदेशों को श्रवण करना प्रारंभ कर लेता है। दिव्य जीवन के दिव्य पथ की ओर उसके कदम अनायास ही बढ़ने लगते हैं।
ध्यान के इन प्रभावों को देखते हुए अच्छा यही है कि व्यक्ति अपना ध्यान दुनिया के लुभावने मायाजाल से हटाकर आत्मतत्व की ओर उन्मुख हो। अंतर्मुखी एकाग्रता की यह यात्रा जीवन में प्रसन्नता, मानस में उत्कृष्ट चिंतन और हृदय में परिष्कृत भाव तरंगों को उमगाने वाली सिद्ध होगी और जीवनक्रम भी श्रेय पथ पर सदैव ही निरंतर निर्बाध गति से अग्रसर होता है।
अपने समय की प्रख्यात लेखिका, नारी स्वातंत्र्य की हिमायती मेरी स्टो किशोरावस्था में बहुत सुँदर लगती थी। इसकी चर्चा और प्रशंसा भी बहुत होती थी। इस पर लड़की को गर्व होने लगा और इतराकर चलने लगी। बात पिता को मालूम हुई, तो उन्होंने बेटी को बुलाकर प्यार कहा, “बच्ची, किशोरावस्था का सौंदर्य प्रकृति की देन है। इन अनुदान पर उसी की प्रशंसा होनी चाहिए।”
“तुम्हें गर्व करना हो तो साठ वर्ष की उम्र में शीशा देखकर करना कि तुम उस प्रकृति की देन को लंबे समय तक अक्षुण्ण रखकर अपनी समझदारी का परिचय दे सकी या नहीं।” इस शिक्षा का ही परिणाम था कि अपने अहंकार को गलाकर मेरी स्टो एक समाज सेविका के रूप में विकसित हो सकी।
प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉ. क्रोनिन बड़े गरीब थे। डॉक्टर बनकर वे धनवान हो गए। किंतु उनका मन पैसा संचय करने में पड़ गया। उनकी पत्नी ने कहा, “हम गरीब ही ठीक थे, कम से कम दिल में दया तो थी अब उसे खोकर कंगाल हो गए।” डॉ. क्रोनिन ने कहा, “सच है, धनी धन से नहीं होते, धनी तो मन से होते हैं। तुमने मुझे सही राह दिखाई, नहीं तो हम ऐसी स्थिति में पहुँच जाते, जहाँ परस्पर स्नेह के सूत्र भी कमजोर पड़ने लगते।”
एक बार एक स्त्री पहाड़ पर धान काट रही थी। इतने में एक दुष्ट मनुष्य उधर आया और उसके साथ दुष्टता करने पर उतारू हो गया पहले तो स्त्री ने आत्मरक्षा के लिए लड़ाई झगड़ा किया, पर शरीर से दुर्बल होने के कारण जब उसे विपत्ति आती दिखी, तो ईश्वर का नाम लेकर पहाड़ से नीचे कूद पड़ी ईश्वर ने उसकी रक्षा की। उसे जरा भी चोट न लगी और प्रसन्नतापूर्वक घर चली गई।
अब उसे अपने सतीत्व का अभिमान हो गया। हर किसी से शेखी मारती कि मैं ऐसी सतवंती हूँ कि पहाड़ से गिरने पर भी मुझे चोट नहीं लगती। पड़ोसी इस बात पर अविश्वास करने लगे और कहा ऐसा ही है, तो चल हमें आँखों के सामने पहाड़ पर से कूद कर दिखा। दूसरे दिन उस स्त्री ने सारे नगर में मुनादी कर दी कि आज मैं पहाड़ पर से कूदकर ससवंती होने का परिचय दूँगी। पूरा गाँव इकट्ठा हो गया और उसके साथ चल पड़ा। वह पहाड़ पर से कूदी तो उसकी एक टाँग टूट गई। मरते-मरते मुश्किल से बची। उस असफलता पर उसे बड़ा दुख हुआ और दिन रात खिन्न रहने लगीं उधर से एक ज्ञानी पुरुष निकले, तो सत्री ने अपनी इस असफलता का कारण पूछा। उन्होंने बताया कि पहली बार तू धर्म की रक्षा के लिए कूदी थी, इसलिए धर्म ने तेरी रक्षा की। दूसरी बात तू अपनी प्रशंसा दिखाने और अभिमान प्रकट करने के उद्देश्य से कूदी, तो यश, कामना और अभिमान ने तेरा पैर तोड़ दिया।”
स्त्री को अपनी भूल मालूम हुई और उसने अपना व्यर्थ का घमंड छोड़ दिया।
विश्व आज उस निर्णयात्मक दौर से गुजर रहा है जब साम्यवाद का अंत हो चला है और समाजवाद अपने अंतिम चरणों में हैं। दूरदर्शी विचारशीलों का कहना है कि पूँजीवादी का अंत भी अब ज्यादा दूर नहीं है। पूँजीवादी के अंत के बाद की सामाजिक रचना कैसी होगी? हाँलाकि यह प्रश्न अभी अनिर्णित है, लेकिन फिर भी संभावना पूर्ण है कि इस परिवर्तन के दौर में कुछ विकासशील देश आर्थिक शक्तियों के रूप में उभरकर आएँगे।
पाश्चात्य इतिहास में प्रत्येक कुछ सौ वर्षों के अंतराल में एक तीव्र परिवर्तन होता आया है। कुछ दशकों के अंदर समाज अपने दर्शन, सामाजिक व राजनैतिक ढाँचों, मूलभूत सिद्धाँत, कला तथा इसके अन्य मुख्य घटकों के साथ स्वयं को पुनर्व्यवस्थित कर लेता है इस समाज में पैदा व्यक्ति उस समाज की कल्पना भी नहीं कर सकता। जिसमें कि उसके पूर्वज जिए व उनके माता-पिता जन्में। हम आज ऐसे ही परिवर्तन के क्षणों में जी रहे हैं।
एक ऐसा परिवर्तन क्फ्वीं शताब्दी में हुआ था, जब अचानक ही लगभग रातोंरात पाश्चात्य दुनिया शहरों में आकर बस गई थी। नए ज्ञान का आधार धर्मग्रंथों की बजाय अरस्तू के विचारों की ओर खिसक गया था। संस्कृति केंद्र के रूप में शहरी विश्वविद्यालयों ने एकाँत गाँवों में अवस्थित मठों का स्थान ले लिया था।
अगला परिवर्तन ख् वर्षों के बाद हुआ। यह गुटनवर्ग के प्रिंटिंग आविष्कार के म् वर्षों के अंदर हुआ। जब क्ब्भ्भ् में पहली छपी पुस्तक सामने आई थी।
अगला परिवर्तन क्स्त्रस्त्रम् में अमेरिका की क्राँति व वाष्प इंजन के आविष्कार के साथ आरंभ हुआ। यह वाटरलू में ब् वर्ष बाद पूरा हो गया । इस दौरान सभी आधुनिक वादों ‘प्उ’ का जनम हुआ था। इसी समय पूँजीवादी, साम्यवाद, एवं औद्योगिक क्राँति का जन्म हुआ था परिणामतः इन ब् वर्षों ने एक नई यूरोपीय सभ्यता को जन्म दिया।
लगभग ख् वर्षों बाद आज का समय वैसे ही परिवर्तन का समय है। अंतर मात्र यह है आज यह पाश्चात्य समाज व इतिहास तक सीमित नहीं है। क्योँकि आज इसकी जगह पर विश्व इतिहास व विश्व सभ्यता आ गई है, जो वस्तुतः प्राचीनतम भारतीय इतिहास व सभ्यता से उत्पन्न हुई है। यह परिवर्तन जापान जैसे गैर पाश्चात्य देश के एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने से हुआ था। प्रथम कंप्यूटर के आविष्कार से यह विषय विवादास्पद है।
हम इस परिवर्तन के बीच में खड़े है। यदि हम इतिहास के प्रकाश में देखें तो परिवर्तन ख् से लेकर ख्ख् तक पूर्ण हो जाना चाहिए। हालाँकि इसके पहले ही विश्व के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और नैतिक नक्शे को बदलने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी हैं सन् ख् में पैदा हुई पीढ़ी यह सहज कल्पना नहीं कर सकेगी कि उनके दादा जिस दुनिया में जिए वह कैसी थी?
उत्तर पूँजीवादी विश्व कैसा होगा, यह ठीक-ठीक पता लगाना अभी बहुत कठिन है। संभावनाओं का अनुमान कुछ अंश तक लगा सकते हैं, लेकिन अधिकतर प्रश्नों का जवाब भविष्य के गर्भ में छुपा पड़ा है। नया समाज गैर समाजवादी व उत्तर -पूँजीवादी होगा, यह तो सुनिश्चित है और यह भी निश्चित है कि इसका प्रमुख स्त्रोत ज्ञान होगा। अतः यह एक संगठन व्यवस्था का समाज होगा।
उत्पादन में मुख्य एवं नियंत्रक पहलू आज न तो पूँजी है और न ही साधन तथा श्रमिक। यह है ज्ञान। पूँजीवादी तथा मजदूरों की जगह उत्तर पूँजीवाद समाज में प्रमुख भूमिका ज्ञदवूसमकहम वतामत तथा मतअपबम वतामत की है।
यह वही शक्ति है जिसने मार्क्सवाद को एक दर्शन के रूप में तथा साम्यवाद को एक समाज व्यवस्था के रूप में नष्ट कर दिया। वही आज तीव्रता से पूँजीवाद को समाज व्यवस्था के रूप में अनुपयुक्त सिद्ध कर रही है। क्त्त्वीं शताब्दी के मध्य से ख्भ् वर्षों तक पूँजीवादी प्रधान समाज दर्शन था। अब इसका अतिक्रमण उसी तीव्र गति के साथ समाज व विश्व के प्रति एक नए चिंतन द्वारा हो रहा है। पूँजीवादी नया समाज कैसा भी हो, लेकिन यह नहीं होगा।
सत्य यही है कि मूलभूत आर्थिक स्त्रोत ज्ञान है। अर्थ उपार्जन की गतिविधियों में न तो पूँजी के निर्धारक और न ही श्रमिक रहेंगे, जो कि क्−वीं और ख्वीं शताब्दी के अर्थ दर्शन के दो ध्रुव रहे हैं। भविष्य में सिर्फ ये उत्पादकता और नवाचार (पददवअंजपवद) के इर्द-गिर्द केंद्रित होंगे, जो कि काम करने के ज्ञान की दो विधियाँ है। कुशल समाज के सामाजिक प्रतिनिधि समूह न तो पूँजीवादी होंगे और न ही श्रमिक, जो कि ख्भ् वर्ष पूर्व की औद्योगिक क्राँति से अब तक चले आ रहे हैं। शासक समूह ज्ञानी कार्यकर्ताओं का होगा, जिनके पास पूँजी की उत्पादक क्षमता का उपयोग करने की दृष्टि एवं क्षमता होगी।
लेकिन इसमें दूसरा प्रतिनिधि समूह भी होगा, जिसे स्वयंसेवक कार्यकर्ता का नाम देना उचित होगा। जिनके पास ज्ञानवान कार्यकर्ता बनने के लिए ललक होगी। प्रत्येक देश में चाहे वह कितना ही विकसित क्यों न हो, बहुमत इन्हीं का होगा।
लेकिन यह समाज भी मूल्यों संबंधी शोध की एक नई विभाजन रेखा से विभाजित होगा। यह विभाजन स्पजमतंजम ज्ञानी एवं डंदंहमत प्रबंधक के बीच होगा। जिनमें ज्ञानी शब्द एक विचारों से संबंधित होगा व प्रबंधक लोगों एवं काम से। इस विभाजन को पाटना इस भविष्यत् समाज के लिए केंद्रीय दार्शनिक एवं शैक्षणिक चुनौती होगी।
मार्क्सवाद के विखंडन ने समाज के माध्यम से उद्धार के विश्वास को खंडित कर दिया है। आगे क्या होगा? इसके उत्तर में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है। शायद तितिक्षायुक्त त्याग के अतिरिक्त और कुछ नहीं? शायद एक परंपरागत धर्म का पुनरुज्जीवन। जो कुशल समाज की आवश्यकताओं एवं चुनौतियों को पूरा कर सके? जिसका आधार आध्यात्मिक ही भविष्य के जीवन मूल्यों का व्याख्याता बनेगा।
विकासशील देश विश्व की जनसंख्या का दो तिहाई हिस्सा बनाते हैं। जब तक परिवर्तन का यह दौर पूरा हो जाता है अर्थात् ख्क्भ् या ख्ख् के आस-पास, विकासशील देशों की जनसंख्या तीन-चौथाई हो जाएगी। इसकी पूरी संभावना है कि अगले एक दो दशकों में एक नया और जबरदस्त आर्थिक चमत्कार होगा, जिसमें गरीब एवं पिछड़े देश स्वयं को रातोरात विकसित एवं तीव्र विकसित आर्थिक शक्तियों में परिवर्तित कर लेंगे। इनमें भारत अपनी वृहत अप्रयुक्त क्षमताओं के साथ अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा।
मिथिला के पंडित गंगाधर शास्त्री एक विद्यालय में पढ़ाते थे। उनका लड़का गोविंद भी उसी में पढ़ता था। गोविंद भी पिता की तरह बड़ा शिष्ट और अनुशासनप्रिय था। सहपाठी उसे बहुत स्नेह और सम्मान देते थे एक दिन शास्त्री जी के साथ गोविंद विद्यालय नहीं पहुँचा। स्कूल बंद करके जब वे चलने लगे, तो विद्यार्थियों ने पूछा, गोविंद आज क्यों नहीं आया? शास्त्री जी ने भारी मन से कहा, गोविंद को अचानक दौरा पड़ा और वह वहाँ चला गया, जहाँ से फिर कोई नहीं लौटता। विद्यार्थी स्तब्ध रह गए। साथी के निधन का भारी दुख हुआ। साथ ही इस बात का आश्चर्य भी कि ऐसी दुर्घटना होने पर भी शास्त्री जी पढ़ाने कैसे आ सके और बिना माथे पर शिकन लाए किस प्रकार रोज जैसी कक्षा चलाते रहें अपना असमंजस लड़कों ने शास्त्री जी के सामने व्यक्त भी किया। पंडित जी ने उत्तर दिया, “बच्चों! पिता के हृदय से गुरु का कर्तव्य बड़ा होता है।”
पति-पत्नी में अनबन हो गई। एक दूसरे को कटु शब्द बोल गए। मनो को चोट पहुँची और बोलचाल बंद हो गई। उनका एक सात वर्षीय बालक था। वह कही से गीत के बोल सुन आया, “मुख से कड़वे बोल न बोल।” बालक को स्वर रुचा। वह उसे पिता के कमरे में बैठकर गुनगुनाने लगा। पिता का उस पर ध्यान गया, तो चौंके, मन में खीझे, क्या मैं ही कड़वा बोलता हूँ? बच्चे से बोले, “बेटा जा, अपनी मम्मी के कमरे में जाकर गा।” भोला बालक वही गीत माँ के कमरे में जाकर गाने लगा। माँ ने सुना, तो खीझ भी आई और हँसी भी। वह भी बोली, “ बेटा जा, अपने पिताजी के पास बैठकर गा।” बालक फिर पिता जी के कमरे में जाकर गाने लगा, तो डाँट पड़ गई। बेचारा क्या करता? दोनों कमरों के बीच बरामदे में बैठकर गाने लगा, ‘मुख से कड़वे बोल न बोल’। आवाज सुनकर माता-पिता दोनों अपने कमरे से निकले, बच्चे को रोकते, पर एक दूसरे को देखकर चुप रह गए। बालक ने दोनों को देखा, भाव पढ़े और बोला, “आप दोनों को यह गाना अच्छा नहीं लगता, तो अलग बैठकर गा रहा हूँ। अब क्या शिकायत है?” पति-पत्नी ने एक दूसरे को देखा एवं अपनी भूल समझी। दोनों बालक के पास गए, बोले, “अच्छा भाई हमें भी अच्छा लगता है। अब हमारे सामने गा लो। तुमने वस्तुतः हमें अपनी गलती का बोध करा दिया।” सद्विचार कही से भी उभरें, ग्राहय हैं।
सृष्टि के आदि काल में विविधता कुछ भी न थी, पृथ्वी, पहाड़, जल, नभ, तारे, विद्युत वृक्ष, फल, फूल, खेत, आदि कुछ भी न था, जो कुछ इन स्थूल आँखों से देखा जा सकता है। एक परमात्मा ही तत्त्वरूप में सर्वत्र व्याप्त था। उस विश्वव्यापी सत्ता ने सृष्टि सृजन की इच्छा से तप किया। तप से अंड की उत्पत्ति और उस अंड से ही शरीर के विभिन्न अवयवों का विकास हुआ, ऐसा ऐतरेय उपनिषद् में बताया गया है।
सृजन की इस मूल प्रक्रिया का वर्णन करते हुए उपनिषद्कार आगे बताते हैं। (ऐतरेय उपनिषद् द्वितीय तृतीय खंड) कि परमात्मा ने अपनी प्राण देह से देवताओं को उत्पन्न किया। वे सब देवता समुद्र में आ गिरे। फिर उनमें भूख उत्पन्न हुई। उन्होंने परमात्मा से कहा, “हमारे लिए ऐसे शरीर का निर्माण करें, जिसमें रहकर हम अन्न आदि खा सकें।” परमात्मा ने उन्हें गाय, घोड़ा आदि शरीर दिखाए, पर वे उन्हें पसंद न आए। अंत में उन्हें मनुष्य शरीर दिखाया, वह देवताओं को पसंद आ गया और उसमें प्रवेश कर गए। अग्नि वाणी सुनकर मुख में, वायु प्राण बनकर नासिका में और सूर्य चक्षु बनकर नेत्र गोलकों में प्रविष्ट हुआ। दिशाएँ स्रोत बनकर कानों में घुसीं। औषधियों ने रोम बनकर त्वचा में वास स्थान बनाया। चंद्रमा मन बनकर हृदय में स्थित हुआ। मृत्यु अपान बनकर नाभि में और जल रेत बनकर उपस्थ में स्थित हो गया। परमात्मा ने तब क्षुधा और प्यास को भी सब देवताओं के अंशों में बाँट दिया और वे ही हवि ग्रहण करने लगीं। तदनंतर परमेश्वर ने जल को तपाया और अन्न की उत्पत्ति की। अन्न को केवल अपान वायु ही ग्रहण कर सकी और उन्हीं के द्वारा प्रत्येक देवता को वाँछित हवि मिलने लगी।
अब परमात्मा ने विचार किया कि इंद्रियों में बैठे हुए देवताओं ने अपने-अपने विषय ग्रहण कर लिए, तो फिर इनके लिए मैं कौन हुआ? यदि मैं न हुआ, तो देवताओं की शक्ति का नियंत्रण कौन करेगा? तब परमेश्वर ने मनुष्य की मूर्द्धा को चीरकर देह में प्रवेश किया। यह द्वार ‘विहति’ कहलाता है और उसे प्राप्त करने वाला आनंद का स्वामी बनता है। उस परमात्मा के तीन आश्रय हैं, हृदय प्रथम, ब्रह्मधाम दूसरा और ब्रह्मांड तीसरा। देवताओं को जब भोग से भी तृप्ति हुई, तब उनके विचार में आया कि यहाँ कौन मूल है? तब उन्होंने परमेश्वर को पहचाना और उनके दर्शन किए।
इस प्रकार शरीर में स्थित इन देव-शक्तियों को गर्भ में रहकर ऋषियों ने जाना कि ज्ञान शक्ति, आदेश शक्ति, विज्ञान- प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि धैर्य, बुद्धि मनन शक्ति, स्मृति संकल्प, वेग, मनोरथ, कामना, भोग, प्राण शक्ति आदि सभी उस परमात्मा की सत्ता का ज्ञान कराने वाले हैं। जो परमात्मा को जान लेता है, वह इस लोक से उठकर स्वर्गलोक में ब्रह्म के साथ सभी दिव्य भोगों को पाता है। वह ज्ञानी अमृतत्व को प्राप्त होता है।
ऐतरेय उपनिषद् के इन मंत्रों में मनुष्य जीवन की उत्पत्ति, विकास और उसके विज्ञान के ऐसे गूढ़ रहस्य छिपे हुए है, जिन्हें जान लेने वाला सचमुच महान ऐश्वर्य का स्वामी बन सकता है। मनुष्य शरीर देवशक्तियों का आश्रय है। देवशक्तियाँ एक ही गुणों वाली ब्रह्मांड में सन्निहित शक्तियों का स्त्रोत कही जा सकती है। वह सब इस शरीर में विद्यमान होने से मनुष्य के अभावग्रस्त और असमर्थ होने का कोई कारण नहीं है। परमात्मा की उपस्थिति के कारण तो वह स्वयं ब्रह्मरूप ही है, किंतु अज्ञानतावश वह उन शक्तियों को पहचानता नहीं और ऐसे कर्म करता है, जिससे उन देवशक्तियों का वरदान मिलने की अपेक्षा दुख दारिद्रय ही हाथ लगता है। मनुष्य अनंत शक्तियों और साधनों से संपन्न होकर पग-पग रोग, पीड़ा, कष्ट बीमारी, दुर्बलता का शिकार होता रहता है। शरीर के प्रति आसक्ति के कारण वह दीन-हीन स्थिति में पड़ा रहता है।
भारतीय दर्शन के इन उच्चादर्शों को अब लोग अनर्गल और असंगत बातें कहकर टालते है। किंतु पृथ्वी पर जीवन विकास के वर्तमान सिद्धाँत जो विद्यालयों में पढ़ाए जाते हैं और जो विज्ञान के मुख्य सूत्र हैं, उन्हें यदि तथ्य की कसौटी पर देखें, तो यह पाएँगे कि वे न तो बुद्धिसंगत हैं और न ही जीवन के आदि स्रोत को प्रभावित कर पाते हैं। विश्व-व्यवस्था की तरह पूर्ण पुरुष का प्रादुर्भाव भी ईश्वर की रहस्यपूर्ण क्रिया है।
पहल मान्यता यह थी कि मनुष्य का विकास अमीबा से हुआ है। अमीबा एक कोशीय जीव है जो जल में रहती है और उसमें प्राणधारी के सभी गुण पाए जाते है। अमीबा को काँच की स्लाइड पर रखकर सूक्ष्मदर्शी की सहायता से ही अच्छी तरह देखा और उसके गुणों का पता लगाया जा सकता है। अमीबा की प्रजनन क्रिया बड़ी विचित्र है। उसकी कोशिका, जो प्रोटोप्लाज्म की थैली होती है और उँगलियों की तरह अनेक दिशाओं में निकलती रहती है, जब कोई उँगली काफी आगे निकल जाती है, तो वही प्रोटोप्लाज्म निकलकर एक नया अमीबा बन जाता है। इसकी ओर विद्युत हटकर अपनी रक्षा करता है। कोई खाद्य पदार्थ रखा जाए, तो वह दो उँगलियों की तरह चिमटी सी बनाकर उसे ग्रहण कर लेता है और उसे इस तरह रस में बदल देता है कि नया प्रोटोप्लाज्म तैयार कर ले। इस तरह उसे शक्ति मिलती है। अन्य जीवों की तरह वह उत्सर्जन भी करता है। पेट के मल को वह पानी में छोड़ता रहता है। अमीबा अपनी संतति को एक से दो, दो से चार और चार से आठ के क्रम में निरंतर बढ़ाता रहता है। जीवन विकास का सिद्धाँत बाद में इसी अमीबा से माना गया और यह कहा गया कि एक कोशीय जीव ने ही अंत में बहुकोशीय जीव के रूप में अपने आपको परिणत किया।
किंतु जब मनुष्य शरीर के कोशों का अध्ययन किया गया, तो जीवन विकास की अनेक नई बातें सामने आई और विज्ञान यह मानने लगा कि अमीबा मनुष्य की विकास शृंखला का मूल घटक नहीं हो सकता। यदि ऐसा होता, तो मनुष्य शरीर का सूक्ष्म कोश जो स्वयं भी प्रोटोप्लाज्म में बना होता है, निकालकर एक स्वतंत्र जीव बना दिया जाना संभव होता, जबकि नए बालक का जन्म गर्भाधान की विलक्षण प्रक्रिया से संपन्न होता है।
क्−वीं और ख्वीं शताब्दी में इस संबंध में व्यापक खोजें हुई, पर वे सब अपनी अपनी तरह से एकाँगी हल ही प्रस्तुत करती है। वैज्ञानिक चेतना के अत्यंत सूक्ष्म स्वरूप का अध्ययन तो कर सके हैं, किंतु उसका विश्वव्यापी शक्ति के साथ कोई सामंजस्य नहीं बिठा सके। यदि मनुष्य अमीबा, अमीबा से मछली, मछली से सुअर, सुअर से बंदर, बंदर से गोरिल्ला और गोरिल्ला से वर्तमान मनुष्य रूप में आया होता, तो विकास की इस गति को आगे बढ़ते जाना चाहिए था और हमें लाखों वर्ष में मनुष्य योनि से आगे बढ़कर किसी और प्रकार की शरीर स्थिति में बदल जाना चाहिए था। हम इतनी लंबी अवधि तक मनुष्य ही क्यों बने रहते? किंतु उलटा हो यह रहा है कि धरती में जितने भी जीवित प्राणी हैं, उनकी शक्तियाँ घटती ही जा रही हैं। मनुष्य की शारीरिक शक्तियाँ भी धीरे-धीरे चुकती जा रही हैं। विकास की अपेक्षा जीव विनाश की दिशा में चल रहे हैं। इसीलिए विकास की थ्योरी गले नहीं उतरती।
चेतना को रसायन की देन कहा जाता, तो उसे प्रयोगशाला में बना लिया गया होता और अब जो रोबोट तथा कंप्यूटर तैयार किए जाते हैं, उनके स्थान पर मनुष्य शरीर तैयार करने वाले कारखाने चल रहे होते। मनुष्य शरीर में जो भाव विज्ञान छुपा हुआ है, उससे स्पष्ट ही है कि मनुष्य की उत्पत्ति भी उतनी ही रहस्यपूर्ण है, जितनी कि उसकी आँतरिक शक्तियाँ। भौतिक शरीर तैयार हो भी जाए, तो उसमें भावनाएँ कैसे डाली जाएँ?
अब हम अपने प्राचीन दर्शन की ओर लौटते हैं जिसमें परमात्मा की इच्छा से अंड का निर्माण, अंड से अनेक अवयवों का विकास और उसमें देवताओं की, परमात्म की प्रतिष्ठा हुई। सूर्य और चंद्रमा आदि का वर्तमान स्वरूप कुछ भी हो, पर उनका निर्माण एकाएक हुआ है। विकास या विघटन स्थूल और सूक्ष्म दोनों में चलता है, किंतु उनका आदि आविर्भाव किसी पराशक्ति का ही महान चमत्कार हो सकता है, इस बात को अब शरीर विज्ञान के पंडित भी मानने लगे हैं। आकाल्ट एनाटॉमी के मूर्द्धन्य विद्वान एरिक एरिक्शन ने उपर्युक्त भारतीय दर्शन के संबंध में जो शब्द कहे हैं, वह प्रकाराँतर से पौर्वात्य मान्यताओं को ही पुष्ट करता है। वे कहते हैं, “यदि हम इतने बुद्धिमान होते कि विश्व व्यवस्था को अच्छी तरह समझ लेते, तो यह देखते कि सूर्य, चंद्रमा एवं अन्य ग्रहों का शरीर के समस्त अवयवों तथा उनके कार्यों पर कितना हस्तक्षेप है।”
‘दो मस्तिष्क प्रणाली एवं उनका आत्मिक उत्थान से संबंध’ नामक पुस्तक के रचनाकार डॉ. कोरिन हेलिन ने शरीर की जटिल प्रक्रियाओं का विस्तृत अध्ययन करने के बाद लिखा है, यह बड़े आश्चर्य ही बात है कि सारी-की सारी प्राकृतिक कला और ज्ञान नक्षत्रों द्वारा मनुष्य समाज को मिला हैं। इस दृष्टि से नक्षत्र गुरु और सारे बुद्धिजीवी प्राणी शिष्य हुए। आकाल्ट एनाटॉमी यह मानती है कि मनुष्य के दो शरीर हैं, एक पंच तत्वों से बना हुआ है स्थूल। दूसरा सूक्ष्म है, जो नक्षत्रों से (नक्षत्रों का अर्थ स्पष्टतः उन देवशक्तियों से ही है, जिनका वर्णन ऐतरेय उपनिषद् में किया है) बना है।
हमारे शरीर का स्थूल भाग, जो दृश्य और स्पृश्य है, पृथ्वी से बना है। यह कितने आश्चर्य की बात है कि अन्य लोकों में तथा चंद्रमा सूर्य बुध वृहस्पति आदि में जो ठोस तत्व है, वह पृथ्वी की देन है। पृथ्वी भी अपने अणुओं को उसी प्रकार बिखेरती है, जिस प्रकार सूर्य और चंद्रमा आदि बिखेरते रहते हैं। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार अपनी-अपनी शक्तिधाराओं द्वारा नक्षत्रों ने पृथ्वी को आच्छादित कर रखा है, पृथ्वी भी सभी नक्षत्रों पर छाई हुई है। सब अन्योन्याश्रित है।
इस जटिल प्रक्रिया को मनुष्य शरीर में दो मस्तिष्क प्रणाली को समझकर अनुभव किया जा सकता है। मस्तिष्क कोष दो पर्तों का बना होता है, सफेद (व्हाइट) एवं भूरा (ग्रे) श्वेत तत्व नसें बनाता है और भूरा नसों में ग्रंथियाँ (गैंग्लियन) गैंग्लियन में न्यूक्लियस वाली नसें पाई जाती हैं, जो प्रोटोप्लाज्म के भीतर तक धँसी होती है और फास्फोरस तत्व से युक्त होती हैं। फास्फोरस अग्नि तत्व है और वह जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। शरीर में अग्नि की मंदता ही अपच, अजीर्णता, काँतिहीनता, दुर्बलता और रोगों का कारण होती है। अग्नि न हो, तो मनुष्य निर्बल और कमजोर पड़ जाए। यह अग्नि तत्व सूर्य नक्षत्र का अदृश्य भाग ही है। फास्फोरस तत्व शरीर में आहार प्रक्रिया पर उतना आधारित नहीं है, जितना कि मस्तिष्क की उत्थान प्रक्रिया से। भौतिक विज्ञान अभी केवल स्थूल संरचना को देखती है, पर आने वाले समय में फिजिक्स और मेटाफिजिक्स के आपसी समन्वय से विज्ञजन यह समझ सकेंगे कि ब्रह्मांड व्यापी ऊर्जा शारीरिक तत्वों में कैसे बदलती हैं और उसे शक्ति के साथ ही बुद्धि, मेधा, प्रज्ञा किस प्रकार प्रदान करती हैं।
शरीर में हाथ, पाँव, रक्त, माँस, मज्जा को स्थूल पदार्थों की रासायनिक क्रिया कह सकते हैं। मन, बुद्धि, प्राण, इच्छा, ज्ञान इन सूक्ष्म गुणों को पदार्थ नहीं कह सकते, जबकि मनुष्य का जीवन इन्हीं से सधा हुआ है। जिस दिन आदमी मरता है, लाश पड़ी रहती है तो भी वह गति नहीं कर सकता। गति और क्रियाशीलता प्रकाश का गुण है, भले ही वह किसी भी आकृति प्रकृति का क्यों न हो। यदि अन्न से ही मन, प्राण, बुद्धि, चित्त, अहंकार का निर्माण होता है, तो यह उसके स्थूल दृश्य न होकर न्यूक्लियाई ही होगी और वह ‘न्यूक्लियाई’ आच्छादित आकाश के किसी नक्षत्र द्वारा आकर्षित शक्तिकण ही हो सकते हैं। वह शरीर में पहुँचकर अपना -अपना स्थान ग्रहण करते हैं। मन को चंद्रमा की तेजस् शक्ति कहते हैं। चंद्रमा किस प्रकार वनस्पति और वनस्पति ही मन का निर्माण करती है, इस संबंध में शास्त्रों में विशद चर्चा है। यहाँ इसका उल्लेख इसलिए अभीष्ट समझा गया, ताकि शरीरस्थ देवताओं पर प्रकाश पड़ सके। यह वह निष्कर्ष है, जिसे वैज्ञानिक जान चुके हैं। अन्य देवताओं की स्थिति काया में कहाँ और किस प्रकार है, यह तब पता चलेगा, जब विज्ञान का प्रवेश मस्तिष्क से फैलने वाले नाड़ी जाल और उसके भीतर की रहस्यमय प्रक्रिया में होगा। अभी तक जितना भी समझा जा सका है, यह अति गंभीर और भारतीय दर्शन की ही पुष्टि करने वाला है।
मस्तिष्क का अध्ययन करने वाले डॉ. और वैज्ञानिक यह मानते है कि शरीर में दो प्रकार की नसों का जाल बिछा हुआ है, (क्) सिम्पैथेटिक नसें, यह शरीरगत भाग की नसें है। उनसे पाचन क्रिया चलती है। खाद्य से शक्ति चूषण और रक्त परिभ्रमण का कार्य भी यही नसें करती हैं। ग्रंथियों से होने वाले स्राव को यह नसें ही नियंत्रित करती है। शरीर की टूट-फूट को जोड़ना और मल-मूत्र बाहर निकालने में इन नसों का ही योग रहता है। जब मस्तिष्क की सुषुम्ना प्रणाली की नसें विश्राम करती हैं, तब यह सिम्पैथेटिक प्रणाली टूट-फूट जोड़ती, माँस पेशी और अन्य शरीर कोशों में जो क्षति हुई होती है, उसे सुधारती रहती है। दूसरी प्रकार की नसों की पैरासिम्पैथेटिक कहते हैं। यह शरीर मन में स्थिरता, प्रसन्नता, शाँति पैदा करती है और ऐसे रस रसायनों को प्रोत्साहित करती है, जो शरीर मन को विश्राँति दे सकें। नसों की यह जटिलता मनुष्य शरीर में ही है, पशुओं के शरीर में नहीं।
इन नसों के मूल स्त्रोत और शक्ति का पता लगाते हुए शरीरशास्त्री जब मस्तिष्क में पहुँचे, तो उन्होंने पाया कि नसें मात्र इच्छा प्रवाह है और आगे चलकर वह जटिल और स्थूल रूप ले लेती हैं, इसलिए शरीरशास्त्रियों का एक वर्ग मनोविज्ञान का हिमायती हो गया और यह मानने एवं कहने लगा कि मनुष्य अपनी इच्छाओं को स्वस्थ, पवित्र एवं सृजनात्मक बनाकर अपने स्वास्थ्य को स्थिर रख सकता है। अधोगामी विचारों और कुप्रवृत्तियों से अपने आपको बचाकर स्वास्थ्य भी बचाए रख सकता है।
मनोविज्ञान का यह सिद्धाँत जितना विकसित हुआ, उतनी ही महत्वपूर्ण मन और मानवीय चेतना के गुणों संबंधी बातें सामने आई। शरीरविज्ञानी अब यह भी मानते हैं कि इच्छाशक्ति धाराओं और रंगों के रूप में मस्तिष्क प्रणाली के कोशों में बहती देखी जा सकती हैं।
पैरासिम्पैथेटिक मस्तिष्क प्रणाली स्त्री स्वभाव (निगेटिव) की है। नसों का एक बड़ा झुँड हृदय के निकट से फूटता है। भावनाओं का , मन का इसी स्थान से संबंध है, इसलिए मानवीय इच्छाओं, अनुभूतियों और शरीर विज्ञान सभी दृष्टि से इनका मूल्य महत्व बढ़ जाता है। इनके व्यापक और सूक्ष्म अध्ययन की आवश्यकता भी उतनी ही अधिक है।
शरीर, हृदय या मन के कष्ट मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं, इसलिए जब तक मस्तिष्क और भावनाएँ भी मनुष्य को सुख एवं आत्मिक शाँति प्रदान नहीं कर सकती। अब वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि मस्तिष्क आध्यात्मिक ब्रह्माँड से प्रभावित है। और जीवन सुधार के लिए उसकी जानकारी निताँत आवश्यक है।
मस्तिष्क के इस भाग को अवचेतन मन कहते हैं और वह जिन नसों से शेष शरीर के साथ संबंध स्थापित करता है, उन्हें रेशों का पुरकुँज कहा जा सकता है। वही शरीर की तन्मात्राएं ग्रहण करते हैं और सुषुम्ना प्रवाह से लेकर रीढ़ की हड्डी के सारे भाग में छाए रहते हैं। मन से यह संबंध स्थापित कर उसे शक्ति देते हैं। यदि मन को विकसित कर दिया जाए और सुषुम्ना प्रवाह में निवास करने वाली इन शक्तिधाराओं को ऊर्ध्वगामी बना लिया जाए, तो मनुष्य आकाश स्थित अदृश्य शक्तियों की महत्वपूर्ण और आश्चर्यजनक जानकारियाँ तथा रहस्य प्राप्त कर सकता है। देवताओं का संबंध भी नाड़ी तंत्र से है। इसे ही ‘विहति द्वार’ कह सकते हैं ।अभी उसकी विस्तृत जानकारी नहीं हो पाई है, पर यदि विज्ञान किसी तरह इसे नियंत्रित कर सका, तो अंतरिक्षीय ज्ञान अत्यंत सुलभ हो जाने की संभावनाएँ हैं।
युधिष्ठिर पाँडवों में सबसे बड़े थे। वे सदा अपने से बड़ों पर भरपूर सम्मान करते थे यहाँ तक कि महाभारत युद्ध प्रारंभ होने के पूर्व भी वे युद्ध स्थल में भीष्म पितामह और गुरु द्रोण को प्रणाम करने, आज्ञा लेने गए। उनके आचरण का प्रभाव पाँडवों पर यह पड़ा कि उन्होंने कभी स्वप्न में भी अपने अग्रज युधिष्ठिर की आज्ञा भंग नहीं की। इसी सामंजस्य के कारण वे एक रह सके और अजेय बने रहे।
महाभारत एक दूसरे को सम्मान न दे पाने की ही भीषण प्रतिक्रिया के रूप में उभरा था। बचपन में दुर्योधन राजमद में पांडवों को सम्मान न दे सका। भीम सहज प्रतिक्रिया के रूप में अपने बल का उपयोग करके उन्हें अपमानित तिरस्कृत करने लगे।
द्रौपदी सहज परिहास में भूल गई कि दुर्योधन को ‘अंधों के अंधे’ संबोधन से अपमान का अनुभव हो सकता है। दुर्योधन द्वेषवश नारी के शील का ही महत्व भूल गया तथा द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित करने पर उतारू हो गया।
यही सब कारण जुड़ते गए तथा छोटी-छोटी शिष्टाचार की त्रुटियों की चिनगारियाँ भीषण ज्वाला बन गई। यदि परस्पर सम्मान का ध्यान रखा जा सका होता, अशिष्टता पर अंकुश रखा जा सका होता, तो स्नेह बनाए रखने में कोई कठिनाई न होती। भीष्म पितामह और वासुदेव जैसे युग पुरुषों के प्रभाव का लाभ मिल जाता ।
कैकेयी मंथरा के बहकावे में आ गई। भरत को राज्य तथा राम को वनवास माँग बैठी। राम वनवास पर दशरथ जी ने शरीर त्याग दिया। भरत जी को वैराग्य हो गया। कौशल्या पर तो दुख का पहाड़ ही टूट पड़ा। परंतु ऐसी स्थिति में भी किसी ने किसी के सम्मान पर चोट नहीं की। कौशल्या राम को छोड़ना नहीं चाहती थी, परंतु अन्य माताओं के सम्मान का उन्हें पूरा ध्यान था। अतः उन्होंने राम को वन जाने की अनुमति दे दी।
जनक ने सुना, जानकी भी साथ गई हैं। उन्होंने दूतों द्वारा सही स्थिति का पता लगाया और तदनुसार भरत का समर्थन करने चित्रकूट पहुँच गए। भरत के कारण राम-सीता को वनवास हुआ। इस नाते उनको अपमानित करने का भूलकर भी प्रयास नहीं किया।
ऐसे एक-दूसरे के सम्मान के भाव ने विकट परिस्थितियों में भी अयोध्या का संतुलन बनाए रखा। भूल सिर्फ भूल रह गई, उससे परस्पर स्नेहों में कोई फर्क नहीं पड़ा। राम की अनुपस्थिति में भी और राम के आने पर भी पारिवारिक सद्भाव स्वर्गीय सुख देता रहा।
वह बसरा का सुलतान था। सुलतान होने के साथ ही वह खुद को जरूरत से ज्यादा समझदार एवं अक्लमंद भी समझता था। उसका एक काजी भी था, जो सदा ही प्रमुख काजी बनने की फिराक में रहता था। सो वह हमेशा ही तरह-तरह के दाव फेंकता रहता।
एक दिन सुलतान को अपनी बुद्धि पर कुछ ज्यादा ही गर्व हो गया। काजी ने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाना चाहा। उसने सुलतान को कहा, हुजूर सलामत! आप अपने बड़े काजी की परीक्षा क्यों न कर लें। यदि वह सफल न हुआ तो उसे फौरन बदल देना चाहिए। सुलतान को यह बात जँच गई। काजी ने उसे सुझाया कि आप उनसे पूछें, बड़े मियाँ! खुदा क्या है? वह कहाँ-कहाँ रहता है? उसका मुंह किस दिशा की ओर होता है? वह क्या करता है इत्यादि।
काजी तो आग लगाकर घर चला गया। सुलतान नपे प्रधान काजी से यही सवाल पूछा और उसे एक सप्ताह का समय दिया।
काजी ने मजबूरी में ‘हाँ’ कर दी। परंतु यह सुलतान की नासमझी एवं चंचल स्वभाव से परिचित था। अतः वह बड़ा परेशान एवं चिंतित हो उठा था कि क्या करे, क्या न करे। इधर वक्ता था कि तेजी से खिसकता चला जा रहा था। आखिर कार एक हफ्ते की मोहलत बीत गई। वह इस विषय में कुछ सोच विचार नहीं कर पाया। ऐसे में उसने अपनी समस्या अपने एक वफादार नौकर के सामने रखी। नौकर जरा ज्यादा ही चालाक था। वह बोला, आप भी बाबा बेकार ही हैरान हो रहे है। आप यदि अन्यथा न लें तो मैं कल ही सुलतान को आपको पूछे सवालों का जवाब देकर संतुष्ट कर दूँ।
नौकर ने जवाब दिया, बाबा आप तो मुझे अपना नुमाईदा घोषित करके सुलतान के पास भेज दें। आगे की सारी बातों को आप मुझ पर छोड़ दें। मैं खुद संभाल लूँगा। यदि नहीं संभाली गई, तो जो भी दण्ड मिलेगा मुझे मिलेगा, आप तो बच जाएंगे।
इसी बीच सुलतान ने नौकर से काजी को बुलवाने भेजा और काजी ने सुनियोजित रूप से अपने नौकर को प्रतिनिधि बनाकर दरबार में भेज दिया।
नौकर बेझिझक अपनी मस्ती में मस्त सुलतान के पास पहुँचा और अर्ज किया, जहाँपनाह, हुक्म दीजिए। बंदा हाजिर है। आप क्या पूछना चाहते हैं?
सुलतान ने नौकर को क्रूरतापूर्वक घूरकर देखा, फिर सख्त स्वर में पूछने लगा, क्या तुम काजी से पूछे गए सभी सवालों का जवाब देने में सक्षम हो?
नौकर शाँत, संयत और निर्भय होकर बोला, आपके सवालों का जवाब लेकर ही मैं खिदमत में हाजिर हूँ। किंतु....................।
यह किंतु-परंतु क्या है? सुलतान एकाएक बीच में उबल पड़ा।
हुजूर! आप ज्ञान के अगाध भंडार के रहस्य को जानना चाहते हैं। मैं सारे रहस्यों का भेद भी खोल दूँगा, परंतु आप एक सच्चे मुसलमान का फर्ज अदा करें और मुझको अपने से ऊँचा आसन बख्सें। एक अच्छे गृहस्थ की तरह आप खुद जमीन पर बैठें। क्योंकि मजहब के मुताबिक जो जिज्ञासु है वह शागिर्द है तथा जो समाधान देगा वह उस्ताद होता है। सो मैं उस्ताद और आप शागिर्द हुए।
सुलतान को यह बात जँची। उसने उसके लिए बेशकीमती पोशाक मँगाई और अपना आसन बैठने के लिए पेश किया और खुद नीचे फर्श पर बैठ गया।
उस्ताद ने शागिर्द से प्रश्न पूछने की इजाजत दे दी। सुलतान पूछने लगा, उस्ताद! खुदा कहाँ पर रहता है? उस्ताद ने एक लोटा दूध मँगवाया और कहा, सुलतान आप तो बड़े ज्ञानवान व्यक्ति हैं। जरा बतलाइए इस दूध में मक्खन कहाँ पर है।
सुलतान ने काफी सिर खपाया, उसे कोई स्पष्ट जवाब नहीं सूझा। अंत में सुलतान ने कहा, इसमें मक्खन है तो सही, परंतु दिखाई नहीं दे रहा है।
उस्ताद बोला, आप यह तो स्वीकार कर रहे है कि इसमें मक्खन है तो जरूर, परंतु बता नहीं पा रहे हैं। इसी तरह से खुदा भी जहान के जर्रे-जर्रे में मौजूद है। मक्खन पाने के लिए दूध मथना पड़ता है, इसी तरह खुदा को पाने के लिए भी इंसान के हृदय को मथना पड़ता है।
सुलतान ने अपना अगला जवाब माँगा कि खुदा किस दिशा में मुँह किए रहता है।
उस्ताद बने नौकर ने तुरंत एक शमाँ मँगवाई, जब शमाँ आ गई तो उस जलती हुई शमाँ की लौ की तरफ संकेत करके उसने कहा, सुलतान जरा गौर करें और बताएँ कि यह रोशनी किस दिशा की ओर मुँह किए हुए है।
सुलतान को इसका भी कोई हल नहीं मिला, तो उस्ताद ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, जहाँपनाह यह रोशनी किसी एक तरफ मुँह किए हुए नहीं है, बल्कि चारों ओर एक साथ मुँह किए हुए है, जो चारों दिशाओं में एक साथ रोशनी के करते फेंक रही है। ऐसे ही इसलिए खुदा भी एक नूर है, वह भी हर तरफ अपनी चमक-दमक फैलाता ही रहता है। जहाँ निहारते हैं, वही उसका ही प्रकाश नजर आएगा।
सुलतान उस्ताद की इस वाक्पटुता से बड़ा ही संतुष्ट हुआ और बड़े विनम्र स्वर में पूछा, कृपया अब यह भी बता दीजिए कि खुदा करता क्या है?
नौकर ने उचित अवसर जान काजी को फौरन बुलवा लिया और फिर उसने सुलतान को अपने आसन पर बैठाया और कहा, जहाँपनाह! खुदा यही करता है। वह राजा को रंक और रंक को राजा करता रहता है। किसी को ताज देता है, किसी का ताज गिराता है। कालचक्र की इसी तरह की गति को पकड़कर चलाने वाला खुदा ही है। वह परिवर्तनशीलता बनाए रखता है।
सुलतान ने उसे अपना उस्ताद बना लिया। काजी के साथ उसे भी भरपूर उपहार देकर विदा किया।
अमीचंद नामक एक प्रसिद्ध व्यक्ति महर्षि दयानंद के पास गाना गाने जाया करता था। दयानंद को उस व्यक्ति से अत्यंत आत्मीयता हो चुकी थी। एक दिन समाज के सभ्य लोगों ने उसके आचरण के विषय में महर्षि से शिकायत की। महर्षि ने विस्तार से पता लगाया तो सच पाया। दूसरे दिन जब अमीचंद गाना गाकर उठने ही वाला था कि महर्षि ने कहा, प्यारे दोस्त! तुम्हारा गला तो कोयल का है, परंतु आचरण कौए के समान है। अमीचंद को इतनी सी बात हृदय को चुभने के समान लगी। उसने संकल्प लिया कि महर्षि देव से मिलूँगा तो अच्छा बनकर। दूसरे दिन से ही उसने कार्यालय में रिश्वत लेना बंद कर दिया। बहुत समय से त्यागी हुई पत्नी को पुनः बुला लिया। नशा आदि का भी सेवन करना बंद कर दिया। तब ऋषि चरणों में जाकर मस्तक झुकाया। अमीचंद की पत्नी तो ऋषि के अद्भुत कर्तृत्व पर मुग्ध थी तथा अपना नया जन्म अनुभव कर रही थी।
लगन क्या से क्या न बना दे
प्रतिभा के संपादन में, अभिवर्द्धन में जिसकी भी अभिरुचि बढ़ती रही है, जिसने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुविकसित बनाने के लिए प्रयत्नरत रहने में अपनी विशिष्टता की सार्थकता समझी है, समझना चाहिए उसी को अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने का अवसर मिला है। उसी को जनसाधारण का स्नेह-सहयोग मिला है। पुस्तकों का बक्सा सिर पर रखकर फेरी लगाने वाले भगवती प्रसाद वाजपेयी, भिक्षान्न से पले बालकृष्ण शर्मा नवीन, भैंस चराने वाले रामवृक्ष बेनीपुरी आदि घोर विपन्नताओं से ऊँचे उठकर मूर्द्धन्य साहित्यकार बने थे। शहर के कूड़ों में से चिथड़े बटोरकर गुजारा करने वाले गोक्री विश्वविख्यात साहित्यकार हो चुके हैं। ध्यानध्यक्षों में हेनरी फोर्ड, राँक फेलर, अल्फ्रेड नोबुल, टाटा, बिड़ला में से अधिकाँश आरंभिक दिनों में साधनरहित स्थिति में ही रहे हैं। पीछे उनके उठने में सूझ बूझ ही प्रधान रूप में सहायक रही है। कठोर श्रमशीलता, एकाग्रता एवं लक्ष्य के प्रति सघन तत्परता ही सच्चे अर्थों में सहायक सिद्ध हुई। इन्हीं सब सद्गुणों का समुच्चय मिलकर ऐसा प्रभावशाली व्यक्तित्व विनिर्मित करता है, जिसे प्रतिभा कहते हैं।
क्. प्रातः−सायं दोनों समय संध्यावंदन और गायत्री का मंत्र जप करना।
ख्. कम से कम आधा घंटा प्रतिदिन जप के साथ अपने इष्ट का ध्यान करना। उन्हें हर घड़ी याद रखने की कोशिश करना।
प्रसिद्ध विचारक टेल हार्ड द कारडियन ने मनुष्य के अस्तित्व और अनुभूति के संबंध में लिखा है, “हम कोई मनुष्य नहीं हैं, जिसे आध्यात्मिक अनुभव हो रहे हों, बल्कि हमारा स्वरूप ही अध्यात्म है, अध्यात्म चेतना जो मनुष्य होने के अनुभव से गुजर रही है।” यह उक्त अध्यात्म मार्ग पर चल रहे साधकों के लिए है बहुत उपयोगी। चिंतन किया जाए, तो इसकी प्रेरणा साधक की दिशाधारा ही बदल देती हैं। शास्त्रों और तत्वदर्शियों ने भी अपने ढंग से यही बात कही है। उनका सार मनुष्य को महत्व नहीं देता। वह दूसरे प्राणियों की तरह ही है। सृष्टि परिवार की करोड़ों अरबों प्रजातियों में से एक है। उसमें विशेषता सिर्फ यह है कि वह आत्मसत्ता का अनुभव कर सकता है। इस तथ्य को ज्यादा स्पष्ट शब्दों में इस प्रकार कहा गया है कि आत्मसत्ता या आत्मचेतना मनुष्य होने की लीला कर रही है। अगर वह अनुभव करती है तो मानवीय करने पर जोर है कि हम अपने आपको मनुष्य रूप में नहीं चेतन सत्ता के रूप में अनुभव करें। सिर्फ सिद्धाँत रूप में ही नहीं, वस्तुस्थिति या तात्विक दृष्टि से भी अनुभव करें कि हमारा स्वरूप मूलतः चेतना है। हाड़ माँस का यह काय-कलेवर नहीं। मनुष्य यदि अपने आपको चेतना की अभिव्यक्ति के स्थान पर उसको अनुभव करने वाला समझने लगे, तो इस विपर्यय से यहाँ दुर्घटना ही होगी। उस दुर्घटना के परिणाम रोग, शोक, विक्षेप, कलह और द्वंद्व के रूप में देखे जाएंगे। साधना से दूर और जीवन के प्रति विधायक दृष्टिकोण नहीं रखने वालों के जीवन में यह स्थितियाँ देखी ही जाती है।
विधायक दृष्टि क्या है? आत्मचेतना या ईश्वर की सत्ता ही मूल स्वरूप है। मनुष्य उसकी एक तरंग मात्र है। किरण सूर्य की ऊर्जा का एक प्रक्षेप है, किरणें मुख्य नहीं है, जो मिलकर सूर्य का निर्माण करते हैं। ईश्वर प्रणिधान कलेवर में ज्यादातर स्वतंत्र और व्यक्त हो पा रही है। श्री अरविंद ने चेतना के एक और स्वरूप की कल्पना की है, जो भविष्य में साकार होनी है। उनके अनुसार चेतना का वह स्वरूप अतिमानस होगा। इस स्तर पर पहुँची चेतन सत्ता मनुष्य से हजार गुना समर्थ, मुख और प्राँजल होगी।
ऋषियों ने चेतनसत्ता की इन लीलाओं को ईश्वर कहकर व्यक्त किया है। ईश्वर सिर्फ मनुष्य में ही नहीं जीवन के विविध रूपों में प्रकट हुआ है। वह जड़ के रूप में व्यक्त भी है और अव्यक्त भी। मुक्त हुई आत्माओं और मनीषियों की चिंता रही है कि मनुष्य इस सत्य को जीवन में अधिक से अधिक धारण कर सकें और अपने लक्ष्य तक पहुँचे, उसकी दिशाधारा अपने मूलस्वरूप की ओर हो। यम नियम और योग साधना के अगले लक्षण ऋषिसत्ताओं की उसी चिंता और अनुग्रह के प्रसाद हैं। अंतिम नियम ईश्वर प्रणिधान में इस तथ्य को गहराई से अपने भीतर धारण में इस तथ्य को गहराई से अनुभव करने का आधार बनता है। भारतीय धर्म परंपरा के अनुयायियों के लिए दो अभ्यास सुगम कराए गए हैं। एक प्रातः -साँय दोनों समय संध्यावंदन और गायत्री मंत्र का जप करना। दूसरे कम से कम आधार घंटा ध्यान रखना। आरंभ से ही और भारतीय मनीषा के अनुसार, अनादिकाल से संध्या गायत्री को अनिवार्य साधन के रूप में अपनाया गया है। अनादिकाल से इसलिए कि काल का कोई अंत नहीं दिखाई देता। अंत का पता नहीं है, इसलिए आरंभ की कल्पना भी नहीं बनती। अर्थ में संध्या गायत्री को सनातन साधना के रूप में भी समझाया गया है।
संध्या गायत्री के अर्थ, उद्देश्य और स्वरूप को समझाने के लिए विपुल शास्त्र, प्रवचन- विवेचन उपलब्ध है। संक्षेप में यह कि संध्यावंदन गायत्री मंत्र के जप का पूर्व और उत्तर पक्ष है। जप के लिए जिस मानसिक या प्राणिक स्थिति की आवश्यकता होती है, उसकी तैयारी संध्या उपचारों में की जाती है। संध्या का आशय दिन और रात के संधिकाल से तो हैं, उसका सूक्ष्म अर्थ मनुष्य का अपनी मूल चेतना से सम्मिलन भी है। जिस भावभूमि में यह मिलन होता है, वहाँ किरण अपने स्त्रोत से जुड़ने की स्थिति में आती है। इस संधि संयोग के कारण भी गायत्री जप से पूर्व उत्तर में होने वाले उपचारों को संध्यावंदन कहते हैं। संध्यावंदन के मंत्रों में पवित्रता से आरंभ कर प्राणऊर्जा जगाने, जाने अनजाने हुए दुष्कृत्यों से मुक्त होने, दृश्य जगत् में ईश्वरीय सत्ता के सबसे बड़े प्रतीक सूर्य के सामने खड़े होकर पानी की तरह तरल होकर, अपने क्षुद्र अहं को विसर्जित करने और अपनी लौकिक सत्ता को बार-बार परिमार्जित करने की प्रक्रियाएँ संपन्न होती है।
अपने मूल स्वरूप से जुड़ने के लिए प्रार्थना और ध्यान धारणा का अगला चरण गायत्री जप के रूप में पूरा किया जाता है। मूल साधना यही है। आँतरिक स्तर पाकर एक स्थिति में पहुँच जाने के बाद कई साधकों के लिए संध्यावंदन के उपचार आवश्यक नहीं रह जाते। लेकिन उस स्थिति में भी उन्हें करते रहने के निर्देशन दिए गए है। सिद्ध हो जाने पर भी साधनाक्रम चलता रहे। साधकों को समझाया जाता है कि उनका लक्ष्य मिल जाए, तो भी संध्या गायत्री का त्याग नहीं करें। अनुग्रह मानने और धन्यवाद देने के भाव से ही सही, यह क्रम चलता रहे। यह निर्देश किसी भी स्थिति में व्यतिरेक नहीं आने देने के लिए है।
गायत्री मंत्र मानवीय चेतना को, उसके मल विक्षेपों में सन गई सत्ता को धो पोंछकर और जला तपाकर मूल रूप में निखारने वाला अनुष्ठान है। सामान्य जप से गहरे जाकर मंत्र जब अपना प्रभाव दिखाने लगता है, तो ये भ्राँतियाँ जल भुनकर राख होने लगती है कि अपना कोई स्वतंत्र स्वच्छंद अस्तित्व है। कोई विलक्षण सत्ता है। व्यक्ति की यह आस्था निरस्त होने लगती है कि यह सारा संसार वैभव, सत्ता और सुख उसी के लिए हैं। अपनी गतिविधियों, आदतों और भावनाओं की समीक्षा करके देखें तो सही, कि साधक का चिंतन इस तरह का नहीं है? ईमानदारी से पूछें तो लगभग सभी लोग अपने आपको केंद्र में रखकर देखते हैं। गायत्री मंत्र का जप आत्मिक जगत् में जो भी विलक्षण प्रभाव उत्पन्न करता है, उसका पहला संस्कार व्यक्ति की इन अनास्था या विकृत चिंतन को तोड़ता है कि वह संसार का केंद्र है। आसपास के जगत् में जो कुछ भी होता है, उसके अनुरूप और अनुकूल ही होना चाहिए। तीनों लोक विराट् ब्रह्मांड, अस्तित्व का तेजस्वी प्रचंड और महासूर्य जैसा स्वरूप, उस स्वरूप में अपनी अकिंचन स्थिति और महाऊर्जा की एक सूक्ष्म किरण से चलती हुई अपनी सत्ता। इन अनुभूतियों से गुजरने के बाद किस साधक को यह भ्रम रह जाएगा कि वह महान है और यह समूचा वैभव उसी के लिए पसरा हुआ है।
संध्यावंदन के साथ आधा घंटा प्रतिदिन ध्यान करने का निर्देश भी पतंजलि के व्याख्याकारों ने दिए हैं। यह जप-ध्यान से अलग है। संध्यावंदन के बाद भी ध्यान किया जा सकता है और आगे पीछे भी। सुबह उठने के बाद और रात को सोने से पहले किया जाए, तो भी ध्यान उत्तम। कोई भी समय चुन लें, लेकिन नियमितता अवश्य रखें। यह नहीं कि आज आठ बजे कर लिया और कल दस-ग्यारह बजे अथवा कभी सुबह किया, तो कभी शाम या दोपहर को। परिस्थितिगत विवशता के कारण कभी कभार चूक हो जाए, तो अलग बात है, अन्यथा समय ओर नियमितता का निर्वाह सभी स्थितियों में किया जाना चाहिए। साधना की नियमितता में चूक आध्यात्मिक अपराध है। अगर प्रमाद से वह हो जाए, तो प्रायश्चित भी किया जाना चाहिए। महात्मा गाँधी का यह प्रसंग बहुतों ने सुना होगा कि साबरमती आश्रम में किसी बैठक में बहुत व्यस्त होने के कारण वे संध्या समय की प्रार्थना नहीं कर पाए थे। प्रार्थना के संबंध में वे इतने नियमित और दृढ़ थे कि उसका समय हो जाता, कोई काम कितना ही महत्वपूर्ण हो, उसे छोड़कर भजन साधन में लगते। उस दिन चूक हो गई और गाँधी जी को ध्यान आया कि नियमित प्रार्थना नहीं हो सकी हैं, तो उन्होंने ग्लानि अनुभव की। सार्वजनिक रूप से अपनी भूल को स्वीकार किया और प्रायश्चित के रूप में उपवास भी किया। साधना उपासना के क्षेत्र में इसी तरह की तत्परता और निष्ठा होनी चाहिए।
हम मनुष्य हैं, मनुष्य हैं इसलिए ईश्वर को प्राप्त करना हमारा लक्ष्य हैं, उसे प्राप्त कर लिया जाए, ता हम संसार के सबसे भाग्यशाली व्यक्ति हो जाएँगे। साधना उपासना इस आध्यात्मिक दर्प से छुटकारा दिलाती है। वह इस विनम्र बोध में ले जाती है कि ईश्वर हैं, उसकी सत्ता कण-कण में व्याप्त है। इस कार्य कलेवर में उसी की एक चिंगारी व्यक्त हुई है। वह अब भी उसी महाज्वाला का अंश है और बुझ जाएगी तब भी उसी ज्योति में लीन हो जाएंगी अपना क्षुद्र अहं मात्र एक भ्राँति है। ईश्वर ही नियंता, व्यापक और अस्तित्वज्ञान है। उसका प्रणिधान साधक को निरंतर प्रवहमान रखता है।
प्राचीन भारत केवल आध्यात्मिक एवं साँस्कृतिक दृष्टि से ही उन्नत नहीं था, वरन् राजनीतिक क्षेत्र में भी उसने बहुत उन्नति कर ली थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के प्रकाशन के बाद विदेशी विद्वान भी मानने लगे कि भारत की राजनीतिक प्रौढ़ता बहुत प्राचीन है। यहाँ के दंड विधान केवल जनता के लिए ही नहीं, वरन् राजा के लिए भी थे। सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता श्री युत काशीप्रसाद जायसवाल ने अपने ग्रंथ ‘हिंदू पोलिटी’ में यह सिद्ध किया है कि चाणक्य के अर्थशास्त्र के पहले भी ऋग्वेद काल में राजनीतिक शासन प्रचलित था। राजा चुने जाते थे। राज्य व्यवस्था पर जनता का पूरा अधिकार था, निष्पक्ष कार्य न करने पर वह राजा को हटा सकती थी, इसके अतिरिक्त कितने ही जनतंत्र थे, जिसका शासन गाँव वाले सभा और समितियों के माध्यम से चलाते थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र, सुप्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ-मण्ज्ञिम निकाय एवं पाणिनी के अष्टाध्यायी ग्रंथ में इस पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।
श्री अविनाश चंद्र दास ने अपने खोजपूर्ण ग्रंथ ‘ऋग्वैदिक कल्चर’ में उस समय की सभा-समितियों का वर्णन करते हुए लिखा है कि वैदिक कार्यों में जनतंत्रीय प्रवृत्तियाँ थी। सार्वजनिक तथा निजी कार्यों को सभा में रखा जाता था। नेता का चुनाव भी सभा में ही होता था। प्रत्येक वयस्क ग्रामवासी बिना किसी वर्ग-भेद के इसमें भाग ले सकता था। कृष्ण-यजुर्वेद में उल्लेख है कि बड़े पैमाने पर इस सभा में स्त्रियाँ भी भाग लेती थी। किसी को भी अपना मत प्रकट करने से रोका नहीं जा सकता था। ऋग्वेद में अनेकों ऐसे मंत्र है, जिनसे स्पष्ट है कि समितियों की बैठकें नगरों में होती थीं और इसमें राजा का चुनाव योग्यता के आधार पर होता था और वह जनता की भलाई के कार्य करने तक ही पद बना रह सकता था। अथर्ववेद में राजा चुने जाने का स्पष्ट उल्लेख है-
इन्द्रेन्द्र मनुष्याफः परेहि सं ह्वज्ञास्थ वरुणै संविदानः। स त्वायमह्नत् स्वे सधस्थे स देवान् यक्षत् स उ कल्पवाद् विशः।
अर्थात् हे राजन्! आप आम जनता के सामने आइए और आप अपने निर्वाचन करने वालों के अनुकूल हो। इस पुरोहित ने आपके योग्य स्थान पर यह कहकर बुलाया है कि आप इस देश में स्तुत्य हों और जाति को भी अपने सन्मार्ग पर चलने दें। एक अन्य मंत्र है-
त्वाँ विशों वृणताँ राज्याय त्वामिमाः प्रदिशः पंच देवीः। वर्ष्मन् राष्ट्रस्य ककुदि श्रयज्ञव ततो न उग्रो विभजा वसूनि।
अच्छ त्वा यन्तु हविनः सजाता अग्निदूतो अजिरः सं चरातै। जायाः पुत्राः सुमनसो भवन्तु बहु बलिं प्रति पश्यासा उग्रः।
अर्थात् हे राजन्! राजकाज कराने के लिए प्रजा तुझे निर्वाचित करे। राजा के श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठकर तू हम लोगों में उग्र होते हुए भी धन बाँट दिया कर। तेरे अपने देशवासी तुझे बुलाते हुए तेरे पास आवें। तेरे साथ एक चतुर तेजयुक्त दूत हो। राष्ट्र में जितनी स्त्रियाँ और उनके पुत्र हों, वे तरी ओर मित्रभाव से देखें और तू तभी उग्र होकर बाहुबली बनेगा।
इसी तरह के अनेक मंत्र अथर्ववेद में भी है, जिनमें राजा के निर्वाचन का उल्लेख है। राज्याधिकारी प्राप्त करते समय राजा को पुरोहित के सामने निम्न प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी-
“मैं नियमानुसार शासन करूंगा। यदि नहीं करूं तो आप मुझे सभी प्रकार के दंड दे सकते है। मेरी निंदा-प्रशंसा, पुत्र, कलत्र एवं जीवन तक आपके हाथ में है। राज्य को हानि पहुँचाऊँ या उसके प्रति द्रोह करूं, तो मुझे परिजनों से अलग कर बंदीगृह में डाल सकते है।”
प्रतिज्ञा याद रहे, इसके लिए राजपुरोहित राजा की पीठ पर सात डंडे लगाता था।
कोई राजा यदि निर्वाचन के बाद अपनी प्रतिज्ञा भूल जाता व अन्याय पर उतर आता, तो इसके लिए अनेक प्रकार की दंड व्यवस्था थी। इसका विस्तृत वर्ण मनुस्मृति, शुक्रनीति, चाणक्य नीति और विदुर नीति में किया गया है। शुक्राचार्य के अनुसार-
गुणनीतिबलद्वेषी कुलभूतोऽयधार्मिकः। प्रकृत्यनुमतिं कृत्वा स्थापयेद्राज्यगुप्यते।
अर्थात् जो राजा मूर्खता एवं मोहवश होकर अपनी प्रजा को सताता हो, वह शीघ्र ही राज्य से हटा दिया जाना चाहिए। वह निश्चित ही बंधु-बाँधवों समेत मृत्युलोक को प्राप्त होगा।
इसी प्रकार राजा को अपने अपराधों के प्रायश्चित के लिए अनेक विधि-विधान भी बने हुए थे। उस समय राजा व राजपुरुष इतने संवेदनशील होते थे कि स्वयं अपना अपराध स्वीकार कर अपने आपके लिए दंड निर्धारण करते थे। शुक्रनीति के अनुसार साधारण व्यक्ति से राजा को अधिक दंड देने का प्रावधान था।
कार्षापणं भवेद्दण्डयो यत्रान्यः प्राकृतो जनः। तत्र राजा भवेद्दण्डयः सहस्त्रमिति धारणा।
अर्थात् जिस अपराध में साधारण मनुष्य पर एक पैसा दंड होता था, उसी अपराध पर राजा को सहस्र पैसा दंड देना पड़ता था।
हिंदू धर्मशास्त्र में अत्याचारी शासकों को अपने पद से हटाने के अनेक उदाहरण मिलते है। अधिक उद्दंड होने पर उसका वध तक कर दिया जाता था। महाभारत में राजा वैन का वध कर उसके स्थान पर पृथु को राजा बनाने का स्पष्ट उल्लेख है।
प्राचीन समय में जब राजतंत्र तक में भी शासक का कार्य जनानुकूल होता था, तब यह कितना हास्यास्पद है कि आज लोकताँत्रिक शासक अपराधीकरण की ओर बढ़ रहे हैं? ऐसा सिर्फ इसलिए है, क्योंकि वे अपने गौरवपूर्ण प्राचीन परंपरा एवं उत्कृष्ट मूल्यों को भुला बैठे है। नष्ट हुई संवेदनशीलता के कारण ही आज उनकी यह दशा है।
आज के दौर में उपयुक्त यही है कि राजतंत्र के लिए एक निश्चित आचार-संहिता हो और जिसका आधार भारतीय शास्त्रों पर आधारित हों। उसका पालन सभी लोग मन, वचन, कर्म की पवित्रता के साथ करे। उसका अनुगमन अन्य सभी करेंगे, तो पुनः हम अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त करेंगे।
उत्तरकाल पर परमार्थपरायण जीवन जीने वालों की मनःस्थिति सदैव उपवन के गुलाब की तरह होती है। प्रातःकाल की पवन लहरी आई और गुलाब को स्पर्श कर चली गई। पत्ते ने हँसते गुलाब को देखा, तो आग-बबूला हो गया। बोला, यह भी कोई जीवन है, माली आता है और असमय में ही तुम्हारी जीवन-लीला समाप्त कर देता है, इतने अल्प जीवन में भी क्या आनंद? मैं रोज देखता हूँ, कितने फूल खिलते हैं और मुरझा जाते है। गुलाब ने बड़े शाँत स्वर में उत्तर दिया, भाई! जीवन का अर्थ है-सच्ची सुगंध। इस प्रकार चारों ओर सुगंध को फैलाते हुए आमंत्रित मृत्यु ही जीवन और अमरता है।
रामकृष्ण परमहंस की पत्नी शारदामणि जब युवा हो गई, तब अपने पति के पास दक्षिणेश्वर मंदिर आई। परमहंस जी ने उन्हें पूरे स्नेह और सम्मान के साथ रखा। साथ ही अपना लक्ष्य भी उनके सामने रखा कि वे ब्रह्मचर्यपूर्वक आध्यात्मिक क्रिया-कलापों में संलग्न रहना चाहते है। यदि वे आज्ञा दें, तो इस व्रत को न तोड़े।
शारदामणि ने सहर्ष सहमति दे दी और वे पति के साथ रहते हुए भी, आजीवन ब्रह्मचारिणी रही। जितने पति के शिष्य-भक्त आते थे, उन्हें वे अपनी संतान की तरह स्नेह देती थी।
उन दिनों बंगाल में सती प्रथा का प्रचलन था। वे भी सती होना चाहती थी। पर मरते समय परमहंस जी ने आदेश दिया, “आत्महत्या से कोई लाभ नहीं। तुम मेरा छोड़ा काम पूरा करो।” उन्होंने आदेश पाला और जब तक जीवित रही, भक्तजनों को ज्ञान तथा वरदान का अभाव नहीं खटकने दिया।
पदार्थ विज्ञान आज की स्थिति तक एक लंबे संघर्ष के बाद पहुँचा है। पाश्चात्य भूमि में उपजे इस विज्ञान को अपनी वर्तमान गौरवमयी स्थिति तक पहुँचने में धर्मक्षेत्र के अंधविश्वासों एवं मूढ मान्यताओं के विरुद्ध घोर संघर्ष करना पड़ा है। अपने सर्वस्व की बाजी लगाते हुए इसने पग-पग भूमि पर अपना अधिकार जमाया है। कापर्निकस, गैलीलियो जैसे इसके सत्यान्वेषक सपूतों को इसके निमित्त अपने प्राणों की आहुति तक देनी पड़ी है।
अपनी पूर्वाग्रहरहित सत्यान्वेषक पद्धति को देकर विज्ञान में मानव जाति की एक बहुत बड़ी सेवा की है। धर्मक्षेत्र के पाखंडों, मूढ़ताओं एवं अंधविश्वास की जड़ों पर कुठाराघात कर इसने जो महत् कार्य किया है, वह सराहनीय है। इस तरह भौतिक एवं दार्शनिक स्तर पर विज्ञान की उपलब्धियों के प्रति मनुष्य जाति कृतज्ञता व्यक्त किए बिना नहीं रह सकती।
लेकिन बात यहाँ समाप्त नहीं हो जाती। इसका दूसरा पक्ष भी विचारणीय है। जहाँ एक ओर विज्ञान ने पूर्वाग्रहरहित सत्यान्वेषण की वैज्ञानिक पद्धति देकर दर्शन की सेवा की है, वही वह अपनी सीमाओं का भी अतिक्रमण कर बैठा है। इससे उपजे प्रत्यक्षवाद ने शुरुआत में ही जोर-शोर से यह कहना शुरू कर दिया था कि जो प्रत्यक्ष है वही सत्य है, जो प्रत्यक्ष नहीं उसका कोई अस्तित्व नहीं। चूँकि चेतना का (आत्मा का) प्रत्यक्ष प्रमाण उसे अपनी प्रयोगशाला में नहीं मिला, अतः इसके अस्तित्व को ही नकार दिया गया। इस तरह मनुष्य एक चलता-फिरता पेड़-पौधा भर बनकर रह गया। यह प्रकाराँतर से भोगवाद एवं संकीर्ण स्वार्थ वृत्ति ही का प्रतिपादन हुआ। साथ ही इससे प्रेम, त्याग, सेवा, संयम, परोपकार, नीति, मर्यादा जैसी मानवीय गरिमा की पोषक धार्मिक मान्यताएँ सर्वथा खंडित होती चली गई।
इसके अलावा इस विज्ञान से उपजे भोगवादी दर्शन ने साधनों के सदुपयोग करने की जगह दुरुपयोग ही सिखलाया। संकीर्ण स्वार्थों की अंधी दौड़ में प्रकृति का दोहन इस कदर हुआ कि प्रकृति भी भूकंप, बाढ़, दुर्भिक्ष, अकाल आदि के रूप में अपना विनाश-ताँडव करने के लिए मजबूर हो गई। यही वजह है कि आज प्राकृतिक संतुलन पूर्णतः डगमगा गया है। वायुमंडल में कार्बन डाइ ऑक्साइड का बढ़ना, तापमान के बढ़ने से हिमखंडों का पिघलना, प्रदूषण, तेजाबी वर्षा, परमाणु विकिरण जैसे सर्वनाशी संकट मानवीय अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाए हुए है।
इस तरह विज्ञान ने एक ओर जहाँ मनुष्य को साधन संपन्न बनाकर भौतिक सुखों के अंबार लगा दिए है, वही दूसरी ओर इससे उपजे भोगवादी दर्शन से पनपी संकीर्ण स्वार्थवृत्ति ने उसे उचित-अनुचित के निर्णय की क्षमता से च्युत कर दिया है। भोगों के आनंद में आज का इंसान अपने क्षणिक सुख में इतना लिप्त है कि विनोद-ही-विनोद में फुलझड़ी की तरह अपनी बहुमूल्य प्राण संपदा को नष्ट कर रहा है। आँतरिक रूप से वह खोखला हो गया है, बाहरी खोज में भटकते-भटकते वह स्वयं को ही भूल बैठा है। अपने अस्तित्व के केंद्र में विद्यमान शक्ति, ज्ञान एवं आनंद की दैवीय संपदा को उभारने वाले धर्म-अध्यात्म को सर्वथा भूल गया है। विज्ञान द्वारा पनपाए गए आज के विविध संकटों के मूल कारण आस्था संकट में ही है और इसका एकमात्र समाधान अध्यात्म द्वारा ही संभव है। जितना विज्ञान बाह्य प्रगति के लिए आवश्यक है उससे कही अधिक आवश्यकता आँतरिक परिष्कार एवं सुव्यवस्था के लिए धर्म की है। क्योंकि पदार्थों के नियंत्रण एवं सुसंचालन का केंद्र अंतःस्थिति चेतन तत्व ही है।
लेकिन आज धर्म के क्षेत्र में चारों ओर ऐसा कुहासा छाया हुआ है कि इसके यथार्थ स्वरूप का परिचय कहीं नहीं मिलता। धर्म आज भ्राँतियों का ऐसा जंजाल बन गया है, जिसमें एक विचारशील व्यक्ति को कुछ सूझ ही नहीं पड़ता। आज की दशा में धर्म या तो अंधविश्वास, मूढ मान्यताओं से जकड़ा हुआ है या फिर ऋद्धि-सिद्धि, चमत्कारों का प्रतिपादन कर दिग्भ्राँत मानव को और भटका रहा है अथवा सामान्य मानव को अनंत जीवन, परलोक एवं स्वर्ग के सुखद स्वप्न दिखलाकर पलायनवादी बना रहा है। जिस धर्म का जीवन की यथार्थता से कोई संबंध नहीं, जिसकी न तो उपयोगिता समझ आए और न ही प्रामाणिकता दिखाई दे, उसे कोई भी विवेकशील व्यक्ति कैसे स्वीकार कर सकता है? शायद धर्म का यही स्वरूप रहा है। इसी को देखकर विचारशील प्रबुद्ध स्वयं को नास्तिक कहलाना अधिक बेहतर मानता है। इसी धर्म को लेनिन ने अफीम की गोली कहकर लताड़ा हो, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं।
परंतु धर्म की यह बाह्य विकृति कैसी भी क्यों न हों, इसके परिष्कृत स्वरूप की आवश्यकता अपरिहार्य है। इसी संदर्भ में विज्ञान जगत् के शिरोमणि सर आइन्स्टाइन ने कहा था कि विज्ञान मनुष्य को वस्तुपरक ज्ञान की पराकाष्ठा तक ले जाकर अपनी सीमाओं का बोध करवाता है व आगे के चेतनात्मक ज्ञान का संकेत देता है, जहाँ इसकी पहुँच नहीं, यह कार्य धर्मक्षेत्र का है। उनका कहना था कि धर्म और विज्ञान के परस्पर सहयोग एवं समन्वय से ही मनुष्य जाति आगे बढ़ सकेगी। उनकी यह उक्ति चिर-परिचित है कि धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है व विज्ञान के बिना धर्म अंधा।
वैज्ञानिक प्रगति से उपजे इस आस्था संकट की विषम वेला में धर्म को अपनी उपयोगिता एवं प्रामाणिकता सिद्ध करनी होगी। समाधान इससे कम में नहीं हो सकता। विज्ञान की सफलता के मूल कारण ये ही दो तत्व रहे है। इसने अपनी उपयोगिता व प्रामाणिकता जनसामान्य के सामने प्रस्तुत की है। विज्ञान का कार्यक्षेत्र भौतिक जगत् रहा है। इसने भौतिक जगत् के संबंध में जो सिद्धाँत दिए है, वे विश्व के हर कोने में लागू होते है। अपनी उपयोगिता उपलब्ध भौतिक सुख-साधनों के रूप में सामने प्रत्यक्ष की है।
धर्म-अध्यात्म का क्षेत्र जो अब तक शास्त्र प्रमाण या महापुरुष वचन के रूप में मात्र श्रद्धा का विषय रहा है, क्या इसमें भी विज्ञान की अन्वेषण विधि लागू की जा सकती है? क्या आध्यात्मिक सिद्धाँतों को तर्क, तथ्य एवं प्रमाण के आधार पर प्रस्तुत किया जा सकता है? इस संदर्भ में स्वामी विवेकानंद ने लगभग सौ वर्ष पूर्व कहा था, “मेरे विचार में विज्ञान की विधि अध्यात्म पर भी लागू होनी चाहिए। यह जितनी जल्दी किया जाए उतना ही अच्छा रहेगा। इस प्रक्रिया में यदि कोई धर्म नष्ट भी हो जाए, तो उसे नष्ट होने दें। क्योंकि जो नष्ट होता है, वह इसका अनावश्यक अंश होगा व जो बचेगा वह धर्म का उज्ज्वल स्वरूप होगा।”
इक्कीसवीं सदी की दुनिया के लिए यह आवश्यक है कि अध्यात्म अपने दर्शन का विज्ञान की आधुनिक शाखाओं के प्रकाश में उपयोगी प्रतिपादन करें। लेकिन काम इतने भर से चलने वाला नहीं। एकाकी विज्ञान की बैसाखियों के सहारे चलकर धर्म अपना वर्चस्व सिद्ध न कर पाएगा। विज्ञान ने स्वयं को प्रमाणित करने के लिए अध्यात्म या विज्ञान की किसी अन्य शाखा का सहारा नहीं लिया है। इसने स्वयं को अपने अंदर से सिद्ध किया है। धर्म को भी उसी कसौटी में स्वयं को खरा सिद्ध करना होगा।
आज के आस्था संकट के दौर में समाधान मात्र अध्यात्म सिद्धाँतों को विज्ञान द्वारा सिद्ध करने से नहीं होगा, न ही इनकी दार्शनिक व्याख्या करने भय से होगा। न ही इसकी उपयोगिता आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि साधना-उपचारों के उपकरणों द्वारा सिद्ध होगी।
अध्यात्म क्षेत्र के सिद्धाँतों की उपयोगिता एवं वैज्ञानिकता तभी प्रमाणित मानी जाएगी जब यह अपने कार्यक्षेत्र अर्थात् अंतर्जगत् से इनको सिद्ध करे। अर्थात् धर्म के सिद्धाँतों को अपने जीवनरूपी प्रयोगशाला में प्रयुक्त करना होगा व आत्मचेतना के अस्तित्व की अभिव्यक्ति जीवन के हर अंग में करनी होगी। इसका यथार्थ प्रमाण व्यक्तित्व में उत्कृष्ट चिंतन, उदात्त भावना एवं आदर्श चरित्र के रूप में परिलक्षित करना होगा। जितने अंश में यह अध्यात्म व्यक्तित्व के अंदर घटित होता जाएगा, उतना ही उसमें देवत्व बढ़ता जाएगा। ऐसे ब्रह्मवर्चस संपन्न महामानवों का बाहुल्य ही भोगवादी दर्शन से उपजी भ्राँतियों का सर्वसमर्थ निराकरण करेगा और तभी समाज में वे परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, जिन्हें स्वर्गोपम कहा जा सकेगा।
गाँधीजी के सामने डाक का ढेर लगा था। वह आए हुए प्रत्येक पत्र को ध्यान से पढ़ते जाते और जो हिस्सा कोरा होता, उसे कैंची से काटकर अलग रख लेते। एक सज्जन वही पास में बैठे थे और बहुत देर से गाँधीजी की कतरनें देख रहे थे। उन्होंने बहुत आश्चर्य से पूछा-मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप इन कतरनों को एकत्रित कर क्यों रखते जा रहे है? इनका क्या उपयोग है?
गाँधीजी ने कहा, मुझे जब पत्रों के उत्तर देने होते है, तब मैं इन्हीं कतरनों का उपयोग करता हूँ। यदि ऐसा न करुँ तो यह कागज बेकार हो जाएँगे और इससे दो प्रकार की हानियाँ होगी, एक तो अनावश्यक खरच में वृद्धि हो जाएगी और दूसरे राष्ट्रीय संपत्ति नष्ट होगी। किसी देश में जितनी वस्तुएँ है, वह सब उस देश की संपत्ति मानी जानी चाहिए। हमारा देश निर्धन है। ऐसी स्थिति में हमें धन का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।
यह सच है कि इंसान सृष्टि का सबसे बुद्धिमान जीव है। पर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि प्रकृति के छोटे-नन्हें जीवों में बौद्धिक क्षमता भी है। भले ही यह सीमित दायरे में हो। वैसे कभी-कभी इन छोटे कहे जाने वाले जीवों की बुद्धि कुशलता देखकर मनुष्य की बुद्धि भी चकरा जाती है। प्रकृति ने अपने आँचल की छाया में सबको पनाह दी है। इंसान अपने अहंकार को त्याग सके, तो इन छोटे जीवों की अनोखी क्षमताओं से काफी कुछ सीख सकता है। यह तथ्य है कि प्रकृति माता की हर संतान अपने आप में अद्भुत एवं आश्चर्यजनक क्षमताएँ सँजोए है।
माता प्रकृति की इन संतानों के बारे में सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘टाइम’ ने अपने ख्क् मार्च क्क्क्फ् के अंक में एक विशेष लेखमाला प्रकाशित की थी। इसके एक लेख के अनुसार ऐरीजोना विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में भूरे रंग का एक तोता है। सभी जानते है कि तोतों में बोलने की कुछ विशेष क्षमता होती है। इस बारे में कुछ खास जानकारी पाने के लिए पक्षीविज्ञानी फारेन पेयरवर्ग ने इस भूरे रंग के तोते पर कुछ प्रयोग किए। इन प्रयोगों के निष्कर्ष में उन्होंने पाया कि भूरे रंग का एलेक्स नाम का तोता न सिर्फ बोलियों की नकल करता है, बल्कि वस्तुओं के रंग, प्रकार, बनावट, आदि के बारे में भी बड़ी आसानी से ब्यौरेवार जानकारी दे डालता है। पेयरवर्ग ने इसके साँकेतिक स्वरों को भाषा में परिवर्तित किया है। उनके अनुसार जब वह परेशान होता है, तो अलग तरह के स्वर निकालता है, जबकि खुशी और प्रसन्नता की अवस्था में वह काफी शाँत होकर बोलता है।
नृतत्वविज्ञानी के अनुसार मानव की कई बौद्धिक विशेषताएँ है। इन्हीं विशेषताओं में सर्वप्रमुख है विस्तृत बातों को संकेतों एवं सूत्रों के रूप में प्रयोग करने की कुशलता। इसी वजह से उसने अन्य जीवों से अपना अस्तित्व अलग बना रखा है। फ्रेंचविज्ञानी ज्याँ मितराँ का मानना है कि इस विशेषता को मनुष्य का एकाधिकार मानना ठीक नहीं। सृष्टि के अन्य प्राणी भी बीज रूप में यह विशेषता रखते है। उनके अनुसार शायद इस बात को परखकर ही चार्ल्स डार्विन ने कहा था, अपनी विकास प्रक्रिया में मनुष्य को इन्हीं छोटे और कमतर कहे व माने जाने वाले प्राणियों के संसार से गुजरना पड़ता है। यह बात विवादास्पद भले ही हो, पर इतना तो सच है कि अन्य जीव-जंतुओं में किसी-न-किसी रूप में बौद्धिक क्षमता रहती ही है।
यूरोप में क्लेवर हेन्स नाम का एक घोड़ा है। उस घोड़े के बारे में डच साइकोलॉजिस्ट आस्कर पगंस्ट का कहना है कि इसने गणित के कई सवालों को हल कर तहलका मचा दिया है। क्लेवर हेन्स अंकों का जोड़-घटाना कर ही लेता है, साथ ही उसे गुणा-भाग करने में कोई ज्यादा परेशानी नहीं होती है। मनोविज्ञानी उसकी इस क्षमता से हैरान है। उनका मानना है कि व्याकलन, गुणन व विश्लेषण की क्षमता का घोड़े में इस कदर पाए जाना प्रकृति का एक अनोखा आश्चर्य ही है। सही अर्थों में वह ‘क्लेरवाँयन्स’ संपन्न है।
वैज्ञानिकों ने बंदर की एक प्रजातियों पर भाषा संबंधी अनुसंधान की शुरुआत क्क्स्त्र में की। उनका अध्ययन विहैव्यिरल साइन्स के अंतर्गत किया गया। अपने प्रायोगिक निष्कर्षों में वैज्ञानिकों ने बताया कि चिंपाँजी तथा कोको गोरिल्ला साँकेतिक भाषा के माध्यम से बहुत अग्रणी साबित हुए। इस शोध प्रक्रिया में कई वैज्ञानिकों ने अपनी जान को जोखिम में डालकर यह गहन अध्ययन संपन्न किया और अंत में उन्हें स्वीकारना पड़ा कि बंदरों की अनेकों प्रजातियाँ अपने आप में कुछ विशेष बौद्धिक कुशलता को समेटे हुए है।
शोध-प्रयोग के इस क्रम में काँजी नामक एक चिंपाँजी को अटलाँटा की एक जार्जिया स्टेट यूनिवर्सिटी के लैंग्यून रिसर्च सेंटर में रखा गया है। इस पर प्रख्यात मनोविज्ञानी सू सेवेज रैंबाग ने अनेकों प्रयोग संपन्न किए है। उनके अनुसार चिंपाँजी यद्यपि अधिक स्पष्ट तौर पर बोल नहीं सकते, परंतु इनकी समझदारी काफी बढ़ी-चढ़ी रहती है। मनोवैज्ञानिक सू सेवेज के अनुसार चिंपाँजी में शब्दों के नियंत्रण के लिए स्वर यंत्र का उचित विकास नहीं होता, पर इनकी समझदारी पर कोई प्रश्न चिह्न नहीं है।
अपने अध्ययनक्रम में उन्होंने यह पाया कि काँजी नाम का चिंपाँजी लेक्सीग्राम के द्वारा अपनी अभिव्यक्ति को संपूर्ण तौर पर व्यक्त करता है। इस लेक्सीग्राम में एक इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड होता है। जिसमें कई तरह के स्विच होते है। उसके बटन को दबाने से इसके कंप्यूटर के परदे पर उसी प्रकार की आकृति उभरती है, जिसका उसमें संकेत होता है। काँजी इतना समझदार है कि वह अपनी आवश्यकतानुसार ही बटन दबाता है। इसके द्वारा यह खेलना, बातचीत करना तथा अन्य तरह के काम करता है। वह अन्य बच्चों के साथ खेलता है और उनके जैसा और उसी तरह का कुछ खास करने की कोशिश भी करता है। सबसे मजे की बात तो यह है कि उसे सिनेमा देखना काफी अच्छा लगता है।
इस काँजी नाम के चिंपाँजी ने एलिया नाम की दो साल की लड़की की पढ़ाई भी करनी शुरू की और वह ढाई सालों तक अनवरत पढ़ता भी रहा। अपनी इस पढ़ाई के क्रम में सामान्य अँग्रेजी व्याकरण को सीख लिया। इस संबंध में प्राणि विज्ञानी रोजन का मानना है कि सभी जीवों में अपने जीवनक्रम को चलाने के लिए एक मौलिक वृत्ति होती है। यदि इसे उपयुक्त और उचित रीति से विकसित किया जा सके, तो सभी जीव काँजी की ही भाँति बुद्धिमान साबित हो सकते है।
इस बारे में यदि यह कहा जाए कि जैव विकास के क्रम में बंदर इंसान का काफी नजदीकी है, तो बात ऐसी नहीं है। समझदारी खाली बंदरों तक सीमित नहीं है। अन्य प्राणियों में भी यह अनोखापन देखने को मिलता है। यहाँ बात डाल्फिन मछली की, की जा रही है। जिसकी बढ़ी-चढ़ी बौद्धिक कुशलता को देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। डाल्फिन को प्राणी वर्गीकरण के क्रम में स्तनधारी वर्ग में रखा गया है। विज्ञानवेत्ताओं ने इसे साढ़े चार करोड़ साल पुराना स्तनधारी माना है।
इसकी बौद्धिकता परीक्षा के एक क्रम में अमेरिका के एक विद्यालय में स्कूली बच्चों के साथ डाल्फिन का भी इम्तहान लिया गया। यह इम्तहान कागज, कलम, स्याही के द्वारा न होकर मौखिक और प्रायोगिक था। परीक्षाफल में मजेदार बात यह रही कि डाल्फिन ने कुछ स्कूली बच्चों के साथ अधिक अंक प्राप्त कर लिए। इस नतीजे ने सबको मानने के लिए विवश कर दिया कि योग्यता सिर्फ मानव की अकेली संपत्ति नहीं है। प्रकृति ने अन्य प्राणियों को भी इसका अनुदान-वरदान दिया है, पर जहाँ अन्य प्राणी कुछ और अधिक सीखने-जानने के लिए सहज तत्पर हो जाते है, वही मानव अपने भावी विकास के प्रति प्रायः उपेक्षा बरतता है, जबकि उसे इस बात के लिए हमेशा सचेष्ट रहना चाहिए कि उसे अभी और आगे बढ़ना है। मानव से देवमानव बनना है।
पादरी लार्ड बेकन भारत आए तो धर्म परिवर्तन कराने का उद्देश्य लेकर थे। पर जहाँ की स्थिति को देखकर वे पिछड़े लोगों का जीवन स्तर ऊँचा उठाने में लग गए। धोती-कुर्ता पहनना शुरू किया। चर्च ने सहायता देनी बंद कर दी, तो उन्होंने खेती करके गुजारे का इंतजाम कर लिया। मुफ्त दवा बाँटने के स्थान पर लागत मूल्य पर वे दवा देते। जो पैसे नहीं दे सकता था, उससे उतने मूल्य की मजूरी करा लेते। ऐसा आदर्श पादरी देखकर एक भारतीय लड़की ने उनसे विवाह कर लिया। दोनों मिलकर देना काम करने लगे। दोनों एक-एक मिलकर ग्यारह हो गए। पिछड़ों और गिरों को ऊँचा उठाने में दोनों आजीवन लगे रहे। उनकी कार्यपद्धति अनेकों को प्रेरणादायक बनी।
श्रीनगर कश्मीर में जन्मी उर्मिला एक धनी ठेकेदार की बेटी थी। वे पढ़ती और पढ़ाती रही। किशोरावस्था में भी उन्होंने महिला समाज की बड़ी सेवा की।
बड़ी होने पर उनका विवाह मेरठ के धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री से हुआ। उर्मिला भी शास्त्री थी। वे एक स्कूल में अध्यापिका हो गई। गृह कार्यों के अतिरिक्त वे पति समेत सार्वजनिक सेवा में विशेषकर महिला उत्थान में लगी रहती।
सत्याग्रह आँदोलन आरंभ हुआ। उसे आगे बढ़ाने में उर्मिला जी प्राणपण से लग गई। उनकी संगठन और आँदोलन की क्षमता अद्भुत थी। मेरठ शहर को ही नहीं, पूरे जिले से उन्होंने जगा दिया। सत्याग्रह आँदोलन में वह क्षेत्र अग्रणी हो गया। महिला संगठन उन्होंने अलग ही खड़ा किया, जिसकी पाँच हजार सदस्या थी।
उर्मिला जी को दो बार जेल जाना पड़ा। फिर भी वे पूरे उत्साह के साथ आजादी की लड़ाई लक्ष्मीबाई रानी की तरह लड़ती रही। उनके द्वारा स्थापित ‘शिशु विद्यालय’ अभी भी सफलतापूर्वक चल रहा है। वे अब नहीं रही, किंतु दाँपत्य द्वारा स्थापित आदर्श अभी भी जिंदा है।
अपने दिमाग के दो टुकड़ों की बात सोचकर ही जी घबरा जाता है। पर इसका असली दर्द तो वही जानते है, जो चसपज ब्रेन यानि कि मस्तिष्कीय विखंडन के शिकार है। वैज्ञानिकों के अनुसार हमारा मस्तिष्क दो भागों से बना होता है। बायाँ हेमीस्फीयर और दायाँ हेमीस्फीयर। ये दोनों भाग कार्पस केलोसम से जुड़े होते है। दोनों हेमीस्फीयर के बीच सेरीब्रल कामीसर का न्यूरल पथ होता है, जिससे ये आपस में एक-दूसरे से सूचना प्राप्त करते है एवं संतुलन बनाए रहते है। शरीर का संपूर्ण दायाँ भाग मस्तिष्क के बायें हेमीस्फीयर से एवं बायाँ भाग दायें हेमीस्फीयर से संबंधित रहता है। शरीर के सुसंचालन हेतु दोनों हेमीस्फीयर्स में सामंजस्य आवश्यक है। कमीसर जो दोनों भागों को जोड़ता है, के खराब हो जाने से दोनों हेमीस्फीयर के बीच तारतम्य बिगड़ जाता है, जिसके फलस्वरूप दोहरे व्यक्तित्व (डनजपचसम च्मतेवदंसपजल) का निर्माण होता है। यह एक रोग है, जिसे सीजोफ्रेनिया कहते है। ग्रीक शब्द से बना सीजोफ्रेनिया का तात्पर्य है मस्तिष्क का विभाजन।
यह रोग भ्रम, संदेह, शंका, मानसिक अवसाद, तनाव, उत्तेजना, क्षोभ एवं कुविचारों से पैदा होता है। मेडीटेशन ऑफ फर्स्ट फिलोसॉफी में रेने देकार्ते ने अभिव्यक्ति दी है, “शरीर और मन में बहुत बड़ा भेद होता है। शरीर दृश्यमान है, जबकि मन शक्तिशाली एवं अदृश्य है। इस शक्तिशाली एवं अदृश्य मन को यदि शंका-कुशंकाओं के दायरे में घिरा रहने दिया जाए और बेलगाम घोड़े की तरह स्वतंत्र छोड़ दिया जाए, तो मानसिक भ्रम का यह छूत-रोग पनपने लगता है। ये मानसिक भ्रम दो तरह के होते है। पहला तथ्यहीन संदेह एवं दूसरा अवचेतन प्रेरित संदेह। किसी रोग के बारे में पढ़कर या सुनकर स्वयं अपने में रोग की भयावहता की मिथ्या कल्पना प्रथम कोटि के संदेह में आती है। आज कुशंका के इस स्वरचित मकड़जाल से सर्वाधिक मनुष्य ग्रसित पाए जाते है। अस्पष्ट तथ्य के बावजूद किसी संदेह या कारण पर लापरवाह बने रहना अचेतन प्रेरित संदेह कहलाता है। जैसे कंपनी के किसी कर्मचारी को अचानक नौकरी से बाहर निकाल देना। मैनेजर की उपेक्षा-उदासीनता ही वह तथ्य था, जिसे कर्मचारी ने जानने का प्रयत्न नहीं किया।”
संदेह की ये दोनों क्रियाएँ दुहरे मस्तिष्कीय विखंडन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। बच्चों को शारीरिक या मानसिक रूप से अधिक प्रताड़ित किए जाने पर भी बीमारी लग जाती है। फ्रैंक डब्ल्यू. पुटनेम के ई. ई. जी. द्वारा लिए ग्राफ से पता चलता है कि दुहरे व्यक्तित्व वाले लोगों के मस्तिष्क का विद्युतप्रवाह सामान्य मस्तिष्क की तुलना में ज्यादा होता है।
मानव मन के विशेषज्ञों का कहना है कि हर व्यक्ति के अंदर एक स्वतंत्र रूप से नियंत्रण करने का एक केंद्र होता है, जिसे ‘सब सिस्टमत्त् कहते है। भूली हुई बातों का अचानक याद आ जाना, किसी समस्या का समाधान तुरंत प्राप्त होना और स्वप्न के द्वारा अगणित तथ्यों का पता चलना इसी अचेतन ‘सब सिस्टम’ की सक्रियता के कारण बन पड़ता है। परंतु चिंता और अवसाद के कारण यह ‘सब सिस्टम’ शक्कीपन जैसे अन्य अनेक मस्तिष्कगत रोगों को जन्म देता है। ऐसे में यह ‘सब सिस्टम’ अक्रिय हो जाता है और जो होना चाहिए उसका ठीक उलटा होता है। जैसे अचानक किसी बात को भूल जाना आदि।
दिमाग के इस बँटेपन या अधूरेपन के बारे में देकार्ते का कथन है, हम आधे दिमाग के बारे में कल्पना नहीं कर सकते। मैं का विचार मनुष्य से अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इसी विचारों में ही पूर्णता है। अतः मस्तिष्करूपी इस तंत्र को सुव्यवस्थित रखने के लिए तनाव एवं संदेह से मुक्ति अनिवार्य है। एक अन्य विज्ञानी श्रोडिंजर के मतानुसार सबके मन की संरचना एक जैसी है। संपूर्ण ब्रह्माँड एक विराट् पुरुष के मस्तिष्क से संचालित है। अच्छा हो मनुष्य स्वयं को उस विराट् सत्ता का एक घटक समझकर स्वयं को उस सत्ता से जोड़े और व्यावहारिक जीवन में सुखी बने रहने के लिए विचारों की विकृति से हर तरह से बचे। ऐसा न होने पर ही अनेकों रोग जन्म लेते है।
न्यूयार्क से प्रकाशित विश्वप्रसिद्ध पत्रिका ‘न्यूज वीक’ के ख् नवंबर क्भ् के अंक में ‘भ्रम एक रोग है’ शीर्षक से एक लेख निकला था। जिसमें न्यूरोविशेषज्ञ डेवीड सील्वर स्वींग, मौर्ट बुशम के प्रयोगों का निष्कर्ष छपा था। लंदन हैंपसरस्मिथ हास्पिटल के न्यूरो विशेषज्ञ डेबीड सील्वर स्वींग के अनुसार भ्रम के कारण मस्तिष्क में उच्च संवेगात्मक स्थिति होती है और सीजोफ्रेनिया जन्म लेता है। इससे मस्तिष्क का थैलेमस, हिप्पोकेंपस और स्ट्रेटम प्रभावित होता है। सील्वर स्वींग ने पी. ई. टी. (पोजीट्राँन इमीशन टोमोग्राफी) द्वारा ख्फ् वर्ष के छह लड़कों का परीक्षण किया। पी. ई. टी. मस्तिष्क में एक परिसंचरण का अध्ययन करता है। प्रयोग के दौरान सामान्य एवं संदेहजन्य विचार दिया गया, बाद में पी. ई. टी. के ग्राफ से स्पष्ट पता चला कि संदेहजन्य विचार के समय मस्तिष्क में रक्त प्रवाह तेज हो जाता है। माउंट सीनाई स्कूल ऑफ मेडिसिन के न्यूरोलॉजिस्ट मौर्ट बुशम के अनुसार भ्रम के कारण प्री फ्रंटल लोब में खराबी होने की स्पष्ट संभावना रहती है, जिससे स्मरण शक्ति में ह्रास होता है।
वाशिंगटन की एक प्रसिद्ध पत्रिका नेशनल जियोग्राफी के जून क्भ् के अंक में डी. सी. वीनवर्ग का एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ था। डी. सी. वीनवर्ग वाशिंगटन के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मैंटल हेल्थ के विख्यात न्यूरोलॉजिस्ट है। उनका निष्कर्ष है कि संदेह और भ्रम के कारण ही सीजोफ्रेनिया होता है। हिप्पोकेंपस जो स्मृति केंद्र है, हताशा और निराशा के समय अपनी स्मृति खो देता है। इस पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में ब् प्रतिशत सीजोफ्रेनिया के रोगी उपेक्षित पड़े है। मस्तिष्क में ‘मोनोऐमिनो आक्सीडेस ए’ नामक एन्जाइम का स्रवण होता है, जिससे दोनों हेमीस्फीयर के बीच तारतम्य तथा क्रियाशीलता बनी रहती है। तनाव, उत्तेजना के समय इस एन्जाइम का स्रवण बंद हो जाता है और इसकी चरम दशा में ब्रेन कैंसर तक की स्थिति बनना शुरू हो जाती है।
इस क्रम में नोबुल पुरस्कार विजेता फ्राँसिस किक का प्रायोगिक अंकन कुछ इस प्रकार है, सुख-दुःख, स्मृति-आशा, अनुभूति और स्वतंत्र इच्छा तंत्रिका कोशिकाओं के व्यवहार पर निर्भर करता है। इन कोशिकाओं को स्वस्थ रखने का एक उपाय है आशा, उत्साह एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार के समय ज्यादा होता है। यह एन्जाइम शरीर में प्रतिरोधी क्षमता और मस्तिष्क को शाँत-शीतल बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है।
प्रेम की सजल भावनाओं और श्रेष्ठ विचारों से ही मस्तिष्क को स्वस्थ रखते हुए सरल-सुखी जिंदगी की कल्पना को साकार किया जा सकता है। ओल्ड टेस्टामेंट के अनुसार प्रेम से सराबोर हृदय हमेशा मस्तिष्क को शाँत-समुन्नत बनाए रखता है। उसी तथ्य को चार हजार पुरानी चीनी चिकित्सा भी स्वीकारती है। देकार्ते ने पहली बार वैज्ञानिक ढंग से इस बात का बोध कराया कि गलत मत सोचो, अन्यथा गलत हो जाओगे। स्वयं को ईश्वर के समान शक्तिशाली मानों और श्रेष्ठ विचारों से मस्तिष्क को अलंकृत करो। अतः चिंतन और व्यवहार आपस में अन्योन्याश्रित है। विचार उत्कृष्ट होंगे तो शंका-संदेहों का मायाजाल अपने आप ही तिरोहित हो जाएगा। ‘ए ट्रीटीज ऑफ ह्यूमन नेचर’ में डेवीड ह्यूम ने मन के बारे में कुछ इस तरह से अभिव्यक्ति दी है। विचाररुपी मन मानसिक साम्राज्य का चक्रवर्ती सम्राट् है। इसी मन द्वारा ही शरीर परिचालित होता है। मन के संगठन (ब्वदेबपवने व्िन्दपजल) द्वारा मस्तिष्क विभाजन (चसपज इतंपद) से छुटकारा पाना संभव है।
यदि कोई यह पूछे कि क्या मनुष्य स्वयं को ब्रह्माँडीय चेतना के साथ विलय कर सकता है? इस विषय में सिगमंड फ्रायड को रोम्या रोलाँ ने एक पत्र लिखा था। जिसका जवाब फ्रायड के ‘सिविलाइजेशन एंड इट्स डिस्कंटेंटमेंट’ में सामुद्रिक अनुभूति के रूप में प्राप्त होता है। उल्लेख है, यह अनुभूति शैशव अवस्था की हो सकती है, जो मनुष्य और शेष विश्व के मध्य रहस्य के परदे को अनावृत करती है। अगर मस्तिष्क के हेमीस्फीयर के बीच रेडियो लिंक संभव हो सके, तो एक चेतना के द्वारा समस्त विश्व को नियंत्रित किया जा सकता है। इस ओर खोज जारी है। रेडियो लिंक का यह सिद्धाँत अदृश्य जगत् में अपनी फ्रीक्वेन्सी के विचारों को आकर्षित कर चेतना के संगठन को शक्तिशाली बनाता है। यह शक्तिशाली संगठन सृजन और विध्वंस दोनों रूप में संभव हो सकता है। रावण, कंस, दुर्योधन, हिटलर, नेपोलियन आदि इतिहास के रक्तरंजित पन्नों पर अंकित विनाशलीला की यह कहानी इस फ्रीक्वेन्सी के कारण ही घटित हुई होगी। आज के अनीति, आतंक, विप्लव, भ्रष्टाचार, उच्छृंखल भोगवाद के पीछे यही सिद्धाँत नजर आता है। इसी वजह से हमारे मन को टुकड़ों में बँटना भी पड़ता है।
इसका उपयुक्त समाधान एवं निदान यही है कि हम विधेयात्मक सोचे और उस परमसत्ता पर, उसके मंगलमय विधान पर अटल विश्वास रखे, जहाँ अमंगल संभव ही नहीं। सदा ही इस तथ्य पर भरोसा बनाए रखा जाए कि हम स्वयं में उस प्रभु के अभिन्न अंश ही है। इस सत्य को अपने जीवन के प्रति कण से अभिव्यक्त करना ही अपना जीवन धर्म है। इस अटल विश्वास के होते हुए भला कैसी चिंता, कैसा डर। फिर तो सहज रूप में एक प्रबल आत्म-विश्वास ही प्रकट होता है और ऐसा जीवनक्रम बनता है, जहाँ किसी मनोरोग का कोई स्थान नहीं।
अपने सुख एवं स्वार्थ लिप्सा की अंधी दौड़ में मनुष्य अपनी मनुष्यता खो बैठा है। माँसाहार का बढ़ता प्रचलन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। स्वभाव से मनुष्य एक शाकाहारी प्राणी है। उसके दाँत, लंबी आँत, पसीने वाली त्वचा, नाखून आदि सभी शारीरिक लक्षण उसकी शाकाहारी नैसर्गिकता को प्रकट करते है। जहाँ एक ओर मनुष्येत्तर शाकाहारी जीव भोजन न मिलने पर प्राण त्याग देते है, वही मनुष्य अपने शौक, व्यवसाय एवं स्वाद के लिए पशु-पक्षियों के प्रति की गई नृशंस हत्या करने से नहीं चूकता। दूसरे प्राणियों के प्रति की गई नृशंस क्रूरता उसके अपने जीवन में एक अभिशाप बनकर आती है और उसके शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शाँति (पारिवारिक सौहार्द्र) एवं सामाजिक संतुलन व्यवस्था की जड़ों को हिला देती है।
पौष्टिकता की दृष्टि से माँसाहार किसी भी तरह समग्र आहार नहीं है। संतुलित भोजन के लिए मनुष्य के आहार में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन व खनिज लवण का उचित मात्रा में होना अनिवार्य है। माँस- प्रोटीन एवं वसा प्रधान आहार है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, रेशे, विटामिन-सी एवं विटामिन-के का सर्वथा अभाव पाया जाता है।
माँस में कोलेस्ट्रॉल व हानिकारक सेचूरेटिड फेटी एसिड के अतिरिक्त अन्य विषाक्त तत्व भी पाए जाते है। माँस उत्पादन को बढ़ाने के लिए उपयुक्त हार्मोन व कीटनाशक दवाइयों के कारण भी माँस अभक्ष्य हो जाता है। ऐसे हार्मोस में डी. इ. एस. (क्ण् म्ण् ण्) व एम. जी. ए. (डण् ळण् ।ण्) और कीटनाशक दवाइयों में डी. डी. टी, पी. सी. वी, पी. वी. वी. आदि प्रमुख है। अमेरिका की जनरल एकाउंटिंग आफिस रिपोर्ट के अनुसार माँस में क्ब्फ् रसायन तत्व निर्धारित मात्रा से अधिक पाए गए, जिनमें ब्स्त्र कैंसर कारक थे व ख्म् जन्म संबंधी विकृति से जुडे थे।
दूसरा माँसाहार के संदर्भ में यह धारणा प्रचलित है कि यह बलवर्द्धक होता है। उक्त धारणा आधे-अधूरे तथ्यों पर आधारित है। माँस में विद्यमान चर्बी हृदय रोग, रक्तचाप, मधुमेह जैसे रोग पैदा करती है। ऊर्जा का आदर्श स्त्रोत है कार्बोहाइड्रेट, जो माँस में होता ही नहीं। प्रोटीन का प्रधान कार्य माँसपेशियों के ऊतकों का निर्माण है। दूसरा माँसीय प्रोटीन में विद्यमान युरिक एसिड, लकोमीन, क्रेरियन जैसे विषाक्त पदार्थ माँसाहारी के शरीर के इकट्ठे हो जाते है, जिससे कई तरह के विकार पैदा होते है। माँसाहार शक्तिवर्द्धक की बजाय रोग व शक्ति क्षय का कारण बनता है। माँस में विद्यमान विषाक्त तत्व जो उत्तेजना पैदा करते है, वह शक्ति का भ्रम हो सकता है, वस्तुतः माँस शक्तिवर्द्धक नहीं है।
वनस्पति से उपलब्ध कार्बोहाइड्रेट, चिकनाई व चीनी, माँस प्रोटीन की अपेक्षा अधिक बलदायक है। शक्ति का असली स्त्रोत है शाकाहार। खिलाड़ियों की शक्ति पर आहार के प्रभाव की हुई शोध से यह तथ्य प्रमाणित हुआ है। एक डेनिश शोधकर्त्ता के अनुसार तीन दिन में मिश्रित आहार से- माँस, अंडे प्रधान आहार लेने पर खिलाड़ियों की शक्ति में आधी कमी देखी गई व पूर्णतः शाकाहारी भोजन लेने पर इसमें भ् प्रतिशत वृद्धि पाई गई। विश्व के श्रेष्ठतम तैराक मूर्रे रोज व जोनी वेसमतर पूर्णतः शाकाहारी थे। इसके अतिरिक्त फुटबाल, भारोत्तोलन जैसे शक्ति प्रधान खेल में भी शाकाहारी खिलाड़ी अपना वर्चस्व जमाते देखे गए है।
मनुष्येत्तर प्राणियों में घोड़ा शाकाहार की शक्ति का आदर्श उदाहरण है। उसकी शक्ति को देखते हुए ही शक्ति की मापन इकाई हार्सपावर रखा गया है। उसकी शक्ति, स्फूर्ति व सूझ-बूझ शाकाहार का परिणाम है। इस ग्रह का प्रथम जीवधारी डायनोसौर भी शाकाहारी जीव था। हाथी-शेर की लड़ाई में हाथी ही अंत तक डटा रहता है। शेर जैसा माँसाहारी जीव चाहे अधिक हिंसक एवं खूँखार हो सकता है, लेकिन शक्ति व क्षमता में शाकाहारी हाथी से पीछे रह जाता है। गाय, ऊँट, भेड़, बकरी, खरगोश, हिरन जैसे शाकाहारी जीव अपने अजस्र अनुदानों द्वारा हमें अनुग्रहीत कर रहे हैं।
माँस उत्पादन व्यवसाय विश्व की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। इसके कारण विश्व का खाद्य संकट गहराता जा रहा है व कई तरह की पर्यावरण संबंधी समस्याएँ भी पैदा हो गई है। एक अध्ययन के अनुसार ख्ब् लाख टन प्रोटीन माँस उत्पादन के लिए ख् करोड़ टन वानस्पतिक प्रोटीन पशुओं को दिया जाता है अर्थात् क् प्रतिशत प्रोटीन संसाधन प्रक्रिया में ही नष्ट हो जाता है। ख्क् पौंड वनस्पति प्रोटीन से मात्र क् पौंड माँसीय प्रोटीन तैयार हो पाता है। अमेरिका के अन्न उत्पादन का स्त्र प्रतिशत पशुओं को खिलाया जाता है। अमेरिका में यदि माँस भक्षण बंद हो जाता है, तो विश्व की क् प्रतिशत प्रोटीन की कमी पूरी हो जाए। कुछ अन्य देश भी यदि माँस छोड़ दे, तो सारे विश्व में भूखे पेटो को भरपेट भोजन मिल जाए। ज्ञातव्य हो कि आज विश्व के एक अरब लोग भूख व अधूरे पोषण से पीड़ित है। इनमें से चार करोड़, जिनमें अधिकाँशतः बच्चे है, भूख एवं कुपोषण के कारण प्रतिवर्ष मौत से मुंह में चले जाते है।
माँस उत्पादन के व्यवसाय से वर्षा वन उजड़ रहे है। एक अमेरिकी अर्थशास्त्री के अनुसार ब् ओंस वजनी हेमवर्गर के पोषण में भ्भ् वर्ग फुट वर्षा वन नष्ट हो जाते है। एक अन्य अध्ययन के अनुसार जितना शाकाहारी भोजन एक हेक्टेयर भूमि में उत्पन्न होता है, उतना ही माँस उत्पादन में स्त्र हेक्टेयर भूमि लगती है अर्थात् माँस उत्पादन में भूमि का सात गुना अधिक उपयोग होता है।
माँस उत्पादन में पानी की खपत बहुत ज्यादा होती है, जिसके कारण जलाभाव की समस्या खड़ी हो रही है। कैलिफोर्निया में एक अध्ययन के अनुसार एक पौंड के उत्पादन में होने वाले जल की गौलन लागत इस तरह से है, साग-सब्जी ख् गैलन, गेहूँ ख्ब् गैलन, सेब ब्क् गैलन, संतरा म्भ् गैलन, अंगूर स्त्र गैलन, दूध क्फ् गैलन, अंडा भ् गैलन, सुअर क्फ् गैलन, गौमाँस भ्ख्क्क् गैलन। एक पौंड माँस उत्पादन में खरच होने वाले जल से एक सामान्य परिवार के एक महीने की जल आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है।
वर्ल्ड वॉच इन्स्टीट्यूट की क्क्क्क् की रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरण संतुलन के लिए अमीरों को माँस खपत कम करनी होगी व पशु-कृषि के कारण उत्पन्न आर्थिक एवं पर्यावरणजन्य समस्याओं पर पुनर्विचार करना होगा।
माँसोत्पादन के साथ एक गंभीर समस्या पर्यावरण प्रदूषण की जुड़ी हुई है। भारत में इस समय फ्त्त्ख्क् कत्लखाने है। यहाँ से निकलने वाली गंदगी रोगाणुओं का प्रसूतिगृह है। कत्लखानों से प्रतिवर्ष क्क् लाख म् हजार टन गंदगी निकलती है, जो पर्यावरण को प्रदूषित कर रही है। दिल्ली के एक वैज्ञानिक समूह के अनुसार प्लेग आदि महामारियाँ फैलने का प्रमुख कारण कत्लखाने है।
माँसाहार का आत्महत्या जैसी आत्महनन की हेय कृति से सीधा संबंध है। जिस समाज में जितना अधिक माँसाहार होता है, वहाँ उतनी ही अधिक आत्महत्याएँ होती है। केरल प्राँत इसका ज्वलंत उदाहरण है। यहाँ इस समय स्त्रक्भ् कत्लखाने है, जो देश में सर्वाधिक है। यहाँ आत्महत्या का औसत भी प्रति लाख व्यक्ति सर्वाधिक ख्स्त्र.फ् है, जबकि राष्ट्रीय औसत क्.ख् है। यह स्पष्ट करता है कि माँसाहार प्रधान समाज में व्यक्ति अधिक तनाव में रहता है।
माँसाहार का युद्ध से भी सीधा संबंध है। जार्ज बर्नार्ड शाँ जो माँसभक्षण की अपेक्षा मरना पसंद करते थे, कहा करते थे, “माँसाहार क्रूरता को जन्म देता है। क्रूरता युद्ध की जननी है।” ‘मेनज फूड’ के लेखक एल. जोनसन के अनुसार, पुरातत्ववेत्ताओं ने खोज की है कि प्रागैतिहासिक यूरोप में युद्ध का दौर तब बढ़ा जब मनुष्य ने माँस के लिए पशुओं के झुँड को रखना शुरू किया। इस आधार पर कह सकते है कि माँसभक्षण से शाँत एवं अनाक्रमण मानव हिंसा, शत्रुता व लड़ाई की ओर झुक गया।
इस तरह माँसभक्षण किसी भी स्तर पर मनुष्य व उसके समाज के हित में नहीं है। ‘ट्रांजीशन टू वेजीटेरिएनिज्म’ पुस्तक के लेखक डॉ. रुडोल्फ वेलेन्टाइन के अनुसार माँस के दुष्परिणामों को देखते हुए आज अमेरिका जैसे विकसित देश शाकाहार की ओर मुड़ रहे है। अमेरिका में पिछले पाँच वर्ष की तुलना में आज क्क् प्रतिशत अधिक शाकाहारी है। अमेरिका कृषि के विभाग के अनुसार दो-तिहाई अमेरिकावासी स्वास्थ्य या पौष्टिकता की दृष्टि से शाकाहार प्रधान भोजन का चुनाव कर रहे है, लेकिन अपने भारत देश में स्थिति इसके विपरीत है। यहाँ माँसाहार का प्रचलन बढ़ता जा रहा है, जबकि देश, समाज एवं संस्कृति का भविष्य शाकाहार जीवनशैली से जुड़ा हुआ है। यह नैतिकता की सर्वसमर्थक शैली है। यह दया, प्रेम, सहिष्णुता, क्षमा, सहृदयता जैसे सद्भावों पर आधारित है। यह सृजनात्मक तत्वों से ओतप्रोत है।
पौष्टिकता की दृष्टि से भी शाकाहार अधिक श्रेष्ठ एवं सहज है। सभी दालें, सोयाबीन, मेवे, मूँगफली, प्रोटीन के समृद्ध भंडार है। शाकाहार में प्रोटीन सहजता से उपलब्ध है व अधिक सुपाच्य एवं बलवर्द्धक है। आवश्यकता के अनुरूप उपर्युक्त चिकनाई दूध व मेवों में सहजता से उपलब्ध रहती है। शाक सब्जियों में विटामिन एवं खनिक तत्वों का विपुल भंडारण रहता है। कार्बोहाइड्रेट सभी अन्न, आलूकंद में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहता है। लेकिन अब स्पष्ट हो गया है कि मनुष्य शरीर स्वयं ही इसे संश्लिष्ट एवं संपादित करने में समर्थ हैं।
अब शोध द्वारा यह प्रमाणित हो चुका है कि हृदय रोग, रक्त चाप, मधुमेह जैसे रोगों में शाकाहार आश्चर्यजनक सुधार कर देता है।
शाकाहार का सर्वोपरि महत्व इसके आध्यात्मिक मूल्य में हैं। मनः चेतना पर इसका सात्विक प्रभाव पड़ता है। छाँदोग्य उपनिषद् में कहा गया है, ‘आहार शुद्धौ सत्व शुद्धि’ अर्थात् सात्विक आहार से शरीर, मन एवं बुद्धि हलके एवं पवित्र बनते हैं।
विश्व के सभी अवतारों, धर्मप्रवर्तकों एवं महापुरुषों ने इसे स्वीकारा एवं सराहा है। पाइथागोरस, न्यूटन से लेकर आइसस्टाइन तक के महान वैज्ञानिकों नियोनादों द विंसी, जार्ज बर्नार्ड शाँ जैसे कलाकार एवं महान विभूतियाँ जीवनपर्यंत शाकाहारी बने रहे। गाँधी जी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, शास्त्री जी, पटेल जैसे देशभक्त एवं सुभाष, भगतसिंह एवं चंद्रशेखर जैसे क्राँतिकारी सभी शाकाहार के पक्षधर थे।
शाकाहार हर दृष्टि से श्रेष्ठ एवं वरेण्य है। मनुष्य के सर्वांगीण विकास की संभावनाएँ इसमें विद्यमान हैं। यह मनुष्यता के विकास की सर्वोच्च कक्षा है। इसके पीछे मनुष्य का अन्य जीव प्रकृति से प्रेम और विश्व बंधुत्व का दर्शन छिपा है, समझदारी का तकाजा यही है कि हम समय रहते आसुरी संस्कृति के प्रतीक माँस भक्षण को त्यागें व शाकाहार को अपनाएँ।
शाकाहार हर दृष्टि से श्रेष्ठ एवं वरेण्य है। मनुष्य के सर्वांगीण विकास की संभावनाएँ इसमें विद्यमान हैं। यह मनुष्यता के विकास की सर्वोच्च कक्षा है। इसके पीछे मनुष्य का अन्य जीव प्रकृति से प्रेम और विश्व बंधुत्व का दर्शन छिपा है, समझदारी का तकाजा यही है कि हम समय रहते आसुरी संस्कृति के प्रतीक माँस भक्षण को त्यागें व शाकाहार को अपनाएँ।
बड़ौदा में दीवान पद पर काम करते हुए अरविंद घोष को सत्रह रुपये वेतन के मिलते थे। कलकत्ता में राष्ट्रीय विद्यालय खुला और उसके लिए वस्तुएँ सदैव परिश्रम से मिला करती हैं। सत्रह रुपये मासिक का प्रिंसिपल योग्यता का व्यक्ति चाहिए था। घोष बाबू ने सत्रह रुपयों की सीमित परिकर वाली नौकरी छोड़ दी और सत्रह रुपयों के प्रिंसिपल पद पर चले गए, क्योंकि वे एक बड़े परिवार को ज्ञान लाभ दे सकते थे। नेशनल कॉलेज ने कितने ही कर्मठ राष्ट्रीय कार्यकर्त्ता निकाले। यही घोषबाबू योगिराज अरविंद बनकर बाद में पाँडिचेरी जाकर बस गए एवं विराट् विश्व की सेवा करते रहे।
एक घना जंगल था। उसमें कई शूकर परिवार थे। आक्रमणकारी सिंह एक ही था। वह जब चाहता, हमला करता और किसी भी मोटे या दुर्बल शूकर को चट कर जाता । झुँड के अन्य सदस्य घबराकर, सिर पर पैर रखकर इधर-उधर भागते। एक दिन बूढ़े शूकर ने स्वजातियों - सभी परिवारों को एकत्रित किया और कहा, “मरना है, तो बहादुरी से क्यों न मरें? रहना है तो मिल जुलकर क्यों न रहे?” बात सभी को अच्छी लगी और वे उसके कहने पर चलने को तैयार हो गए। दूसरे दिन तगड़े शूकरों का एक दल गठित किया गया और योजना बनी कि आक्रमण की प्रतीक्षा न करके, शेर की माँद पर चलें और वहाँ उस पर हल्ला बोल दिया जाए। नई योजना, नई हिम्मत और नई आशा से तगड़ें शूकरों के हौसले बढ़ गए। सो वे बहादुरी के साथ चले और माँद में सोए शेर पर बिजली की तरह टूट पड़े।
शेर को ऐसी मुसीबत का सामना इससे पहले कभी भी नहीं करना पड़ा था। वह घबरा गया और जान बचाकर इतनी तेजी से भागा कि यह देख तक न सका कि हमला करने वाले कौन और कितने हैं? भयाक्राँत शेर ने उस जंगल में भूतों का निवास सोचा और फिर कभी उधर न लौटने का निश्चय करते हुए दूरस्थ वन में अपना डेरा डाल दिया। शूकरों के परिवार निश्चिततापूर्वक रहने और वन विहार का आनंद लेने लगे। उस क्षेत्र में रहने वाले शृगाल ने रात को अपने बच्चों को मनोरंजन करते हुए, शूकरों द्वारा सिंह पर किए गए आक्रमण की कथा सुनाई और कहा, “बड़ी ताकत नहीं, सूझबूझ है, जिसे अपनाकर शूकरों को श्रेय मिला। जिसके अभाव में सिंह को अपना राज्य अकारण ही छोड़ना पड़ा।”
शिक्षा की आवश्यकता बच्चों के लिए ही नहीं बड़ों के लिए भी है। प्रौढ़ शिक्षा इसी अनिवार्य आवश्यकता का एक रूप है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने प्रौढ़ शिखा के बारे में कहा है, प्रौढ़ शिक्षा न तो साक्षरता से आरंभ होती है, न साक्षरता पर उसकी समाप्ति ही होती है। अपने जीवन एवं अस्तित्व के लिए अनवरत जूझते, संघर्षरत जनसमुदाय पर साक्षरता बरबस थोपी तो नहीं जा सकती। थके टूटे जन को साक्षरता में वास्तविक रुचि हो भी नहीं सकती। साक्षरता की माँग तो वस्तुतः ऐसे लोगों के अंतःकरण से अपने आप उभरनी चाहिए, जिनके पेट में दिन को दो रोटी गई हों और जिनमें साक्षरता के लायक कुछ आँतरिक ऊर्जा हो। जीवन संघर्ष में लगे लोगों में यदि साक्षरता का प्रसार करना है, तो ऐसा कार्यक्रम तैयार करना होगा, जो जीवन केंद्रित हो।
सामान्य शैक्षिक व्यवस्था बालकों की शिक्षा को ही आधार मानकर चलती है। बाल जीवन में ही रचनात्मक मूल्यों का समावेश किए जाने पर भावी जीवन सुदृढ़ एवं संगठित हो जाता है। परंतु बाल्यावस्था में शिक्षा की पावनधारा नहीं बह सकी, तो प्रौढ़ जीवन में भी उसकी क्षतिपूर्ति की जा सकती है। प्रौढ़ शिक्षा प्रौढ़ों को शिक्षित करने के उद्देश्य से चलाई जाती है। इसकी परंपरा अत्यंत प्राचीन है। वैदिक भारत की आरण्यक प्रथा इसी का एक रूप थी। शिक्षा की ये परंपराएँ एवं व्यवस्थाएं ब्रिटिश काल में शिथिल कर दी गई, उनके स्थान पर शिक्षा की नई विधियों का प्रचलन किया गया। हालाँकि ब्रिटिश काल में भी औपचारिक शिक्षा के साथ ही प्रौढ़ शिक्षा को प्रारंभ किया गया। कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों की स्थापना के पश्चात प्रौढ़ों के लिए योजनाएं बनीं। उनके लिए रात्रि स्कूल की व्यवस्था की गई। सन क्त्त्त्त्ख् -त्त्फ् में स्थापित ‘इंडियन एजुकेशन कमीशन’ के प्रतिवेदनानुसार मुँबई में क्फ्म्, चेन्नई में ख्ख्फ् तथा बंगाल में क् रात्रि स्कूलों के संचालन हुए। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में कर्नाटक में श्री एमएसविश्वेश्वरैय्या ने स्त्र साक्षरता केंद्रों को चलाया एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना की। सन क्−फ्स्त्र में विभिन्न राज्यों में लोकप्रिय अंतरिम सरकारों की स्थापना के पश्चात प्रौढ़ शिक्षा पर विशेष अभियान छेडात्र गया। इस दिशा में बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री डॉ. सैय्यद महमूद ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। चैन्नई में सी राजगोपालाचारी ने प्रौढ़ शिक्षा के कार्य की गतिशीलता बनाया। प्रौढ़ शिक्षा का संगठित एवं सुनियोजित प्रयास पहली पंचवर्षीय योजना (क्−भ्क्-भ्म्) के साथ आरंभ हुआ। चौथी पंचवर्षीय योजना (क्−म्−-स्त्रब्) में शिक्षा आयोग के सदस्यों ने अनुभव किया कि प्रौढ़ शिक्षा को उत्पादन का साधन बनाने के लिए उसे ऐसा रूप दिया जाए, जिससे आर्थिक एवं सामाजिक स्तर में सुधार लाया जा सके। यह चिंतन उपयोगी एवं व्यावहारिक सिद्ध हुआ। छठी पंचवर्षीय योजना में प्रौढ़ शिक्षा को व्यापक आधार एवं सुव्यवस्थित रूप दिया गया था। इस महत्वाकाँक्षी कार्यक्रम के अंतर्गत क्भ् से ख्भ् आयु वर्ग के लगभग दस करोड़ व्यक्तियों को पाँच वर्ष की अवधि में शिक्षा की सुविधाएं सुलभ कराने का प्रस्ताव था। यह कार्यक्रम क् अप्रैल क्−स्त्र− से प्रारंभ हुआ। सातवीं पंचवर्षीय योजना में भी प्रौढ़ शिक्षा के माध्यम से इसी वर्ग विशेष के जीवन स्तर को विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था। अब प्रौढ़ शिक्षा के अंतर्निहित महत्व को स्वीकार करते हुए उसे और अधिक ठोक एवं व्यापक आधार देने का प्रयास किया गया था।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात प्रथम बार सन् क्−स्त्रस्त्र में शैक्षिक नियोजन में प्रौढ़ शिक्षा को उच्च प्राथमिकता देने का प्रावधान किया गया। क्−स्त्रस्त्र-स्त्र− में ‘प्रौढ़ शिक्षा के नीति वाक्य’ का प्रारूप बना। तदनंतर ख् अक्टूबर क्−स्त्रत्त् को राष्ट्रीय स्तर पर प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। साक्षरता मिशन का श्रीगणेश भ् मई क्−त्त्त्त् में हुआ॥ संपूर्ण साक्षरता अभियान’। द्वारा निरक्षरता उन्मूलन का प्रयास जबर्दस्त ढंग से चला। इसके तहत देश में केरल पहला राज्य था, जहाँ कि शिक्षा −.म् प्रतिशत पहुँच गई। सन क्−त्त्म् के राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संबंध में आचार्य राममूर्ति समिति ने स्पष्ट किया कि सबके लिए शिक्षा हो। इसके अंतर्गत नई दिशा में राष्ट्रीय एकता, निर्धनता, उन्मूलन, पर्यावरण संरक्षण, महिला शिक्षा व समानता आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों को उच्च प्राथमिकता देने की बात कही गई।
विदेशों में प्रौढ़ शिक्षा ब्रिटेन में प्रचलित थी, जहाँ निरक्षरता कोई गंभीर समस्या नहीं थी। ब्रिटेन में ‘वर्कर्स एजूकेशलन एसोसिएशन’ तथा विश्वविद्यालय के ‘एक्स्ट्रा म्यूरल डिपार्टमेन्ट’ द्वारा प्रौढ़ शिक्षा का प्रचलन था। वहाँ इसका उद्देश्य उस समय की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों एवं विषयों के व्यक्तियों को शिक्षित एवं प्रशिक्षित करना था। प्रौढ़ शिक्षा का नामकरण करने का श्रेय स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को जाता है। उन्होंने बतलाया कि प्रौढ़ शिक्षा एक विस्तृत कार्यक्रम है। इसके पाँच उद्देश्य है, आर्थिक सुधार हेतु शिक्षा, नागरिक शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा, निरक्षरता उन्मूलन तथा मनोरंजन एवं सौंदर्य बोध शिक्षा। विश्व के सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश चीन में वर्तमान सदी के प्रारंभिक दशकों में चलाए गए शिक्षण आँदोलन को ‘जनशिक्षा’ का नाम दिया गया है। इसे निरक्षरता के त्वरित उन्मूलन हेतु संचालित किया गया। इस आँदोलन के प्रणेता डॉ. जेम्स वेन थे। डॉ. वेन ने विद्यार्थियों के अवकाश एवं शिक्षित व्यक्तियों के खाली समय को दृष्टि में रखकर इस योजना को गति दी थी। इसकी उपलब्धि उत्साह-वर्द्धक थी।
विशेषज्ञों के अनुसार किसी व्यक्ति को व्यावहारिक साक्षर उस समय कहा जा सकता है, जब वह इतना ज्ञान और कौशल प्राप्त कर ले जो उसे उसके समाज में समस्त ऐसे कार्य संपन्न करने योग्य बना दे, जिनमें साक्षरता आवश्यक होती है। इस प्रकार व्यावहारिक साक्षर वह व्यक्ति है, जिसने पढ़ने-लिखने की इतनी व्यावहारिक कुशलता प्राप्त कर ली हो कि इन दक्षताओं से स्वतः अपने एवं समाज के कल्याण का सतत काम ले सके। इसके बाद प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत ‘कार्यात्मक साक्षरता का जन कार्यक्रम’ क् मई क्क्त्त्म् को प्रारंभ किया गया। इसमें छात्र राष्ट्रीय सेवा योजना के तहत अपने अवकाशों में स्वयं सेवा के आधार पर साक्षर बनाने के प्रयास में अपना योगदान देते हैं इनका नारा है, ‘ईच वन टीच वन’। सन् क्क्म्-म्क् में श्रमिक शिक्षा हेतु सर्वप्रथम इंदौर में ‘वर्कर्स स्पेशज एजुकेशन इंस्टीट्यूट’ स्थापित हुई। इसकी सफलता को देखते हुए क्क्म्त्त् में नागपुर में भी ठीक इसी तरह की संस्था की स्थापना हुई। इस तरह प्रौढ़ों को साक्षर करने के लिए अनेकों योजनाओं एवं कार्यक्रमों का संचालन किया गया।
यूँ तो औपचारिक-अनौपचारिक विधियों से व्यक्तियों को शिक्षित किया जाता है, परंतु विभिन्न परिस्थितियों, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक आदि के कारण व्यक्ति की शिक्षा का क्रम बहुधा टूट भी जाता है। वह अपने व्यवसाय, उत्तरदायित्व और विभिन्न अन्य सीमाओं में रहते हुए भी शिक्षा का क्रम जारी रख सके, यही सतत शिक्षा का उद्देश्य है। इसके लिए दो बातों की आवश्यकता है, व्यक्ति जहाँ है वही उसके जीवन एवं शैक्षिक स्तर के साथ शिक्षा को जोड़ा जाए तथा शिक्षा का विषय एवं पद्धति दोनों ही ऐसे हो कि व्यक्ति की तात्कालिक आवश्यकताओं एवं अभिरुचियों से मेल खा सकें तथा उसके जीवन में उपयोगी हो सके। कामकाजी शिक्षालयों में यही होता है।
आज के जमाने में प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के चार प्रमुख तत्व है, जागरुकता, व्यावहारिकता, साक्षरता तथा राष्ट्रीय मूल्य। सामान्य जागरुकता से अभिप्राय है। शिक्षार्थियों में उनके व्यक्तिगत, पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, नागरिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय संदर्भों में स्वविवेक उत्पन्न करना। जो समाज एवं राष्ट्र की समृद्धि में सहायक तथा सर्वहितकारी हो। शिक्षार्थियों में सामाजिक भेदभाव जैसे छुआछूत, जातिवाद, कुरीतियाँ, नशा, दहेज आदि अंधविश्वास, जनसंख्या नियंत्रण तथा शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता उत्पन्न करना है। प्रौढ़ शिक्षा का दूसरा मुख्य तत्व व्यावहारिकता है। व्यक्ति जिस व्यवसाय, कार्य अथवा उत्पादक गतिविधियों में संलग्न है, वह उसे पूर्ण मनोयोगपूर्वक, दक्षता व कुशलता से संपन्न करे। व्यावहारिकता में व्यक्ति की संपूर्ण क्रियाशीलता सम्मिलित है। इसमें सामाजिक संपर्क के साथ-साथ मौलिक गतिविधियों का भी समावेश होता है। हालाँकि प्रौढ़ शिक्षा के संदर्भ में व्यावहारिकता का तत्व मुख्यतः उसके व्यावसायिक या आर्थिक पक्ष से संबंधित है। परंतु सही मायने में व्यावहारिकता का मूल उद्देश्य है कि प्रत्येक कार्य में कुशलता, तत्परता एवं नवीनता का समावेश हो।
साक्षरता प्रौढ़ शिक्षा का तीसरा प्रमुख तत्व है, पाठ्यक्रम तथा इसे पढ़ने-लिखने की विधाएँ। परंतु इसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक एवं विस्तृत है। प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम का चौथा एवं महत्वपूर्ण तत्व राष्ट्रीय मूल्य भी है। इसका उद्देश्य प्रतिभागियों को राष्ट्रीय मूल्यों का सम्यक् ज्ञान कराना है, ताकि वे राष्ट्र व मानव के विकास व उत्थान में अपना योगदान दे सके। इसमें राष्ट्रीय एकता, देशभक्ति की भावना, सेवा तथा भाषा, धर्म आदि की विराट् विस्तृत विचारधारा का समावेश होता है।
इस संबंध में डेनमार्क ने प्रौढ़ शिक्षा का राष्ट्रीय एवं सामाजिक जीवन में घनिष्ठ संबंध स्थापित किया है। इसके क्षेत्र में ‘डेनिश फाँक हाईस्कूल’ का उल्लेखनीय योगदान है। इसे विशप एन. एफ. एस. गुल्विंग ने प्रारंभ किया था। पहला फाँक हाईस्कूल सन् क्क्ब्ब् में स्थापित हुआ था। क्क्म्फ् तक इनकी संख्या म्स्त्र की चुकी थी। वियतनाम में सन् क्क्ब्भ् की क्राँति के पूर्व साक्षरता एवं शिक्षा की स्थिति असंतोषजनक थी। अगस्त क्क्ब्भ् में होची मिन्ह के नेतृत्व में सफल क्राँति हुई। इसी वर्ष लोकशिक्षा विभाग ने एक वर्ष की अवधि में ख्भ् लाख एवं नौ वर्ष में लगभग क् लाख लोगों को साक्षर बनाया। प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में यूगोस्लाविया विभिन्न पद्धतियों एवं माध्यमों से अपने नागरिकों को प्रशिक्षित कर रहा है। वहाँ पर कार्यकर्त्ताओं के विश्वविद्यालयों की संख्या लगभग फ्भ् है। सन् क्क्भ्त्त् के शैक्षिक सुधार के उपराँत वहाँ विश्वविद्यालय प्रौढ़ शिक्षा ने महत्वपूर्ण कार्य किया है। फिलीपीन्स में यह कदम क्क्ब्भ् में उठाया गया। इसी दौरान ‘ब्यूरो ऑफ पब्लिक स्कूल’ के अंतर्गत प्रौढ़ शिक्षा प्रभाग की स्थापना हुई। वहाँ सन् क्क्म्म् से स्त्रख् की अवधि में छह वर्षीय सघन साक्षरता आँदोलन चलाया गया। अब तो वहाँ सबके लिए शिक्षा कार्य योजना प्रशंसनीय कार्य कर रहा है।
अपने देश में इसकी आवश्यकता कहीं अधिक है। इस प्रौढ़ शिक्षा के अभियान में प्रत्येक प्रबुद्ध नागरिक को भाग लेना चाहिए। शिक्षा में ही राष्ट्र का समुचित विकास सन्निहित है। अतः हर जन का महान् दायित्व एवं कर्त्तव्य होना चाहिए कि वह पाँच लोगों को ज्ञानदान प्रदान करे। ज्ञानदान के इस महायज्ञ में हम सबको में हम सबको अवश्य ही अपनी भागीदारी का निर्वहन करना चाहिए। इसी में हमारा भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।
वाजिश्रवा ने अपने पुत्र नचिकेता को उसकी इच्छानुसार यमाचार्य के लिए दान कर दिया। वह ब्रह्मविद्या प्राप्त करना चाहता था। अतः वे उसके मार्ग में बाधक नहीं बने। मोह ने उन्हें विचलित नहीं किया। यम ने बार-बार समझाया। पराक्रम से वैभव पाया जा सकता है। तुम साधना करो और सिद्धियाँ लेकर प्रसन्नता भरे दिन बिताओ। ब्रह्मविद्या तो छुरे की धार है, उसे पाने के लिए अपने मनोरथों से लड़ना पड़ता है और सोने की तरह अपने को तपाना पड़ता है, वह तुम कैसे कर सकोगे? नचिकेता का आग्रह नहीं, संकल्प था। उसे हर कीमत पर उपलब्ध करने का प्रण दुहराया। यमाचार्य उसे पाँच अग्नियों में तपाते गए और एक-एक करके ब्रह्मविद्या का एक-एक सोपान पार कराते गए। इन तपस्याओं में उसे इंद्रियजयी, मनोजयी, कालजयी बनना पड़ा। उसने पाँच इंद्रियों और पाँचों मनोरथों का निरस्त कर लिया था, अस्तु वह सच्चे अर्थों में ब्रह्मवेत्ता बना।
सरिता के सुरम्य तट पर सुशोभित शिव मंदिर, उसके पास ही घाट पर धोबियों के पत्थर पड़े थे। मंदिर में प्रतिष्ठित शिवलिंग और धोबी का एक पत्थर दोनों कभी पर्वत उपत्यिका के साथ-साथ चले थे। काल गति ने एक को शिव प्रतिमा बना दिया, तो दूसरे को धोबी का पत्थर। धोबी का पत्थर आत्महीनता अनुभव कर दुःखी होता। उससे एक दिन रहा नहीं गया, शिवलिंग को संबोधित कर कहा, “तात! आप धन्य है। देव मंदिर में प्रतिष्ठित है। भव-बंधनों में जकड़े प्राणी आपके पास आकर कितनी शांति, कितना संतोष अनुभव करते हैं। काश, यह पुण्य सुयोग हमें भी मिलता।” शिवलिंग आत्मप्रशंसा सुनकर गंभीर हो उठे। बोले, “तात! आपका दुख करना निरर्थक है, आप नहीं जानते, हम तो मात्र यहाँ आने वाले लोगों को क्षणिक शाँति और शीतलता प्रदान करते हैं। आप तो निर्विकार भाव से हर किसी का मैल धोते रहते हैं। आपकी साधना धन्य है। मेरे पास अपने की प्रथम कसौटी तो आप ही हैं। इसलिए जब लोग मेरी उपासना करते हैं, तब मैं आपकी किया करता हूँ। घाट का पत्थर गद्दा हो उठा और दुगने उत्साह से लोगों का मैल धोने लगा।
(शाँतिकुँज परिसर में फ्/म्/स्त्रख् को परमपूज्य गुरुदेव द्वारा दिया गया प्रवचन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! मनुष्य को इस साँसारिक जीवन की सफलता के लिए दो चीजों की आवश्यकता है, पहला है, श्रम और दूसरा ज्ञान। श्रम के द्वारा हम मेहनत करते हैं, मजदूरी करते है तथा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करके संतोष महसूस करते है। दूसरी चीज है, ज्ञान। ज्ञान का विकास मनुष्य के श्रम द्वारा होता है तथा उसके बाद मनुष्य की उन्नति होती है। साँसारिक जीवन में श्रम और ज्ञान दोनों की आवश्यकता है। श्रम हमारे पास हो और ज्ञान न हो तो हमारी भौतिक प्रगति, भौतिक संपदा नगण्य होती है, परंतु जब ज्ञान मनुष्य के पास होता है, तो वह इंजीनियर होता है, डॉक्टर होता है, कलाकार होता है। ज्ञान के द्वारा ही हमारा विकास होता है तथा हमारे विचार में परिवर्तन होता है। अतः हमको साँसारिक प्रगति के लिए श्रम को विकसित करना चाहिए। आप किसान की तरह से, श्रमिक की तरह से श्रम करके दौलत कमा सकते हैं। जापान में सब लोग श्रम का महत्व समझते हैं, श्रम की ही पूजा करते हैं।
श्रम की महिमा
एक बार स्वामी रामतीर्थ जापान गए। उन्होंने सोचा कि यह जापान थोड़े ही समय में इतना संपत्तिवान- लक्ष्मीवान कैसे हो गया? भारत के लोगों ने हजारों वर्षों से लक्ष्मी जी का पूजन किया, लक्ष्मी स्त्रोत का पाठ किया, परंतु संपत्तिवान न हो सके। इसका क्या कारण है। यह जानने के लिए स्वामी रामतीर्थ जापान गए। जापान एशिया में सबसे बड़ा दौलतमंद देश था। अमेरिका तो ‘फर्स्ट वर्ल्डवार’ तथा सेकेंड वर्ल्डवार अर्थात् प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संपत्तिवान हुआ, परंतु प्रथम विश्वयुद्ध से पहले जापान ही एक देश था, जो दौलतमंद था। जापान कैसे मालदार हुआ, यह देखने वे गए। वहाँ वे एक कारखाने का निरीक्षण करने लगे। उन्होंने देखा कि एक ओर मशीनों से तेल टपक रहा है तथा दूसरी ओर श्रमिकों के शरीर से पसीना टपक रहा है। यह देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए और समझ गए कि यही कारण है, जिससे जापान के लोग संपत्तिवान हो गए।
सन क्−ख्− से पहले की बात है। वहाँ के लोग श्रम के कारण सारी दुनिया की संपत्ति अपने यहाँ इकट्ठा कर लेना चाहते थे। हमें याद है कि उस जमाने में जापान की साइकिल भारत में ख्ख् रुपये में मिलती थी, जिसमें भारत के जापान से लाने में क् रुपये खरच होते थे। वह सारी दुनिया में इतनी बिकती थी कि इसके कारण जापान एशिया में मालदार हो गया। उसने उन दिनों अमेरिका पर भी हमला किया था। वह छोटा सा देश दुनिया में सबसे मालदार यानि भौतिक दृष्टि से महान बनना चाहता था।
भौतिक उन्नति कैसे हो सकती है, यह देवी की पूजा, संतोषी माता की पूजा पाठ से नहीं हो सकती है। यह आध्यात्मिक विषय है। देवता का काम दौलत बाँटना नहीं है। श्रम के देवता का काम धन देना है। आप रेलवे स्टेशन पर जाएँ और यह कहें कि बाबू जी हमें चिपकाने वाला टिकट दे दीजिए। अरे! आपको यह भी नहीं मालूम कि कौन सी चीज कहाँ मिलती है। आपको चिपकाने वाली टिकट डाकघर में मिलेगी। रेल से सफर करने का टिकट रेलवे स्टेशन पर मिलेगा।
स्वामी रामतीर्थ ने देखा तो यह पाया कि वहाँ के श्रमिक प्रातः − बजे से शाम के चार बजे तक श्रम करते है। बच्चे, पत्नी एवं घर के सभी लोग वहाँ छह घंटे अवश्य श्रम करते है, जिसके कारण वह देश दौलतमंद है। आप श्रम करेंगे, तो आपकी भौतिक उन्नति होगी।
शिक्षा नहीं ज्ञान
मित्रो! दूसरी चीज ज्ञान है। यह शिक्षा से संबंध नहीं रखता है। ज्ञान का मतलब विद्या से है, जिसके द्वारा मनुष्य का विकास होता है, प्रगति होती है। ज्ञान, जिसे आप शिक्षा कहते है, इसे हम जानकारी कहते है। मित्रो! आप रास्ता बदल दें, तो आप भी मालदार बन सकते हैं। अभी आपको श्रम करने का अभ्यास नहीं है, श्रम का तिरस्कार करते हैं। हमारे इस अभागे समाज ने श्रम के प्रति अवज्ञा की है। जो आदमी श्रम करता है, उसे हम चमार, धोबी, डोम, मोची आदि कहते हैं तथा उसका हम तिरस्कार करते हैं। श्रम के प्रति इस देश में जब तक अवज्ञा होती रहेगी, इसका भविष्य उज्ज्वल नहीं हो सकता। मित्रो! हम श्रमिक हैं तथा ख्भ् घंटे श्रम करते हैं। हम श्रम का सम्मान करते हैं। हमारे विचार में ‘कामचोर’ ‘हरामखोर’ एक गाली है। अतः यदि आप उन्नति करना और इससे बचना चाहते हैं, तो आपको श्रम करना चाहिए तथा श्रम के प्रति सम्मान जाग्रत् करना चाहिए तथा श्रम के प्रति सम्मान जगत् करना चाहिए। हमारा विचार यही है कि भारत के लोग श्रम करें एवं सुखी रहें। आज आप अपनी औलाद को देखें, वह श्रम के अभाव में शराबी, माँसाहारी तथा व्यभिचारी हो गई है। चूँकि आपने ढेर सारी संपत्ति को उसके लिए रख छोड़ा है। वह मौज-मस्ती का जीवन जीती है। इस प्रकार आपका तो सत्यानाश हो जाएगा। आपने देखा नहीं कि राजमहलों का क्या हुआ ? आप श्रम का सम्मान करेंगे, तो आपका विकास होगा। आज सम्मान उन्हें मिल रहा है, जो हाथ से काम नहीं करते हैं, जैसे कि पंडित जी, पुरोहित जी। आपकी निगाह में काम न करने वालों को पंडित जो, पुरोहित जो, जोगीदार जो, बाबू जी आदि कहा जाता है। यह गलत है। इसमें सुधार की आवश्यकता है।
मित्रो ! अगर आपको दौलत प्राप्त करनी है, धनवान बनना है, तो हम आपको सही तरीका बतला सकते हैं। आप श्रम की शक्ति को बढ़ाइए। इसे आप तब बढ़ा सकेंगे जब आप श्रम का सम्मान हमारी तरह कर रहे होंगे। हाथ-पाँव से मशक्कत करके आपने पैसा कमाया है, तो आप उसका उपयोग सही ढंग से कर सकते हैं। बाप की कमाई अगर बेटा खा रहा है, तो यह अनैतिक कार्य है। यह माँस खाने के बराबर है।
प्राचीनकाल में श्राद्ध की परंपरा थी। आज भी वह किसी-न-किसी रूप में जीवित है। पहले जमाने में जब किसी की मृत्यू हो जाती थी, पंचायत बैठती थी तथा यह निर्णय लेती थी कि इनके बच्चों का काम मेहनत करने से, मशक्कत करने से चल सकता है या नहीं? अगर ये वयस्क होते थे, हाथ से कमाते थे, तो उनके पिता का सारा पैसा समाज के कल्याण के लिए लगा दिया जाता था। उसका नाम श्राद्ध था। अगर उनके पास कुछ नहीं होता तो पंचायत उन बच्चों को दे देती थी। वास्तव में वही व्यक्ति सही रूप से खरच कर सकता है, जो श्रम से कमाता है।
मित्रो ! शारीरिक श्रम से ही आत्मविश्वास एवं भौतिक प्रगति संभव है। प्रायः लोगों को शिकायत रहती है कि शारीरिक श्रम से हम थक जाते है। बेटे ! वही व्यक्ति थकता है, जो श्रम को बेकार समझकर करता है। खिलाड़ी को कभी थकावट नहीं आती हैं, क्योंकि काम करते समय उसमें उत्साह होता है। इसलिए उसे थकावट नहीं आती। कैदी थकता है, परंतु किसान नहीं थकता है। थकता वह है जो काम को पराया समझता है। हमने शारीरिक तथा मानसिक श्रम किया है। आज जो आप देख रहे है, वह श्रम का फल है। श्रम करने से हमारे भीतर दो गुना उत्साह पैदा हो गया है। हमारे नस-नाड़ी, मस्तिष्क, शरीर पूर्ण स्वस्थ हैं। पेंशन पाने वाले आज जल्दी थक जाते हैं, अस्वस्थ हो जाते हैं। उनकी सेहत खराब हो जाती है।
आदमी को जन्म से लेकर मृत्यु तक श्रमिक होना चाहिए। रामप्रसाद विस्मिल को फाँसी लगने वाली थी। वह बीस मिनट पहले व्यायाम कर रहे थे। लोगों ने पूछा कि आपको तो अब फाँसी लगने वाली हैं, यह क्या कर रहे हैं ? उन्होंने कहा कि हमने जीवनभर मेहनत एवं मशक्कत की है। वह अभ्यास हमें हर दिन करना है। अजगर पड़ा रहता है। आप तो खरगोश बनें तथा दौड़ते रहें। मशक्कत करने से ही लाभ होगा। उनने चटाई उठाकर एक जगह पर रख दी तथा कहा गंदा कैदी था। सब काम पूरा करने के बाद उसने गीता को उठाया और सीने से बाँधकर यह गीत गाता हुआ चल दिया, ‘मेरा रंग दे वसंती चोला’....।’मैं आत्मा हूँ, आत्मा रहूँगा। बदल डालूँगा यह पुराना चोला’।
दैनंदिन जीवन की सिद्धि
मित्रो ! अगर आपको भौतिक जीवन में तथा आध्यात्मिक जीवन में सिद्धांतों का पालन करना हो तो श्रम और ज्ञान के प्रति सम्मान होना चाहिए। अगर श्रम के प्रति आपके अंदर सम्मान है, तो फिर आप देखना कि क्या चमत्कार होता है। आप श्रम करेंगे तो दीर्घजीवी होंगे। इसके लिए खुराक की जरूरत हैं, अमुक चीज की जरूरत है, इसके साथ ही सबसे आवश्यक हैं, मनुष्य का मशक्कत यानी-श्रम ! इसके बिना मनुष्य को दीर्घजीवन प्राप्त करना संभव नहीं है। एशिया के अंतर्गत एक रेगिस्तान हैं। वहाँ के लोग सौ वर्ष से कम जीते ही नहीं है। एक आदमी अभी एक सौ आठ वर्ष की उम्र में मरा हैं। उसने सौ वर्ष की उम्र में भी शादी की थी। उसके साठ से ऊपर बच्चे थे। यह दीर्घजीवन कैसे मिला ? यह खान-पान से हुआ था, यह भी ठीक है। यह संयम से संभव हुआ था, यह भी ठीक है, परंतु एक चीज इससे भी आगे की है और उसका नाम है श्रम। इसके बिना अर्थात् मशक्कत किए बिना आप दीर्घजीवन नहीं प्राप्त कर सकते हैं। खुराक खाना ही ज्यादा नहीं है, अगर आप मशक्कत नहीं करेंगे तो आपका पेट बढ़ता हुआ चला जाएगा, चर्बी बढ़ती हुई चली जाएगी और आप मरेंगे। बेटे यह भौतिकता की नहीं है। यह आध्यात्मिकता का प्रशिक्षण है जिसके बिना आपको भौतिक लाभ मिल ही नहीं सकता। मित्रो ! एक दूसरी चीज है जिसका नाम शिक्षा है। इसके बिना मानवीय विकास संभव नहीं है। हम योरोप गए थे और वहाँ देखकर आए थे। बेचारे गरीब लोग, जो किसी तरह अपना पेट भरते हैं, वह भी यह सोचते हैं कि हमारी शिक्षा का विकास होना चाहिए। केवल शरीर के विकास से ही सब कुछ संभव नहीं हैं। उनका यह विचार है कि मनुष्य के शारीरिक विकास के बिना साँसारिक जीवन में हम प्रगति नहीं कर सकते हैं। वे सात घंटे परिश्रम करते हैं, परंतु दो घंटे नियमित रूप से रात्रि पाठशाला में भाग लेते हैं। आप तो पत्ते खेलने में बर्बाद कर देते हैं। जो मेकेनिक होता है, वह अपने विभाग के लोगों से जानकारी लेता हुआ आगे चलकर बी. ई. एम. ई. बन जाता है। छोटा-सा मजदूर उसी क्षेत्र का इंजीनियर बन जाता है। उसे क्षेत्र में नाम एवं ख्याति प्राप्त करता है।
स्वामी विवेकानंद जब अमेरिका गए थे, उस समय वहाँ की जनता को वे वेदाँत की शिक्षा देने लगे, तो उन्होंने एक प्रश्न किया कि क्या आपने भारतवर्ष में इस शिक्षा को पूरा कर लिया ? थोड़ी देर वे मौन रहे, फिर उन्होंने कहा कि आप लोगों ने मैट्रिक पास कर लिया है। आप लोगों ने पहली चीज अर्थात् शरीर बल प्राप्त कर लिया है। आपने श्रम करके संपत्ति भी प्राप्त कर ली है, जो आध्यात्मिकता का प्रथम चरण है। आगे अब आपको वेदाँत की आवश्यकता है। इस कारण से हम यहाँ आए हैं। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान में वह स्थिति नहीं आई है। वहाँ के लोगों को हम कर्मयोग सिखाते हैं। उन्हें हम बतलाते हैं कि आप मशक्कत करें तथा रोटी कमाना सीखें। आपने तमोगुण का पूरा कर लिया अर्थात् आप अब जड़ प्रकृति के नहीं है।
आपने परिश्रम करना सीख लिया है। भारतवर्ष के अंतर्गत यह होता है कि बाप पचास वर्ष के हो गए तथा बेटा बाईस वर्ष का हो गाय और नौकरी करने लगा, तो वह स्वयं काम करना ठीक नहीं समझते। यह है कामचोरी, हरामखोरी, जो आपके यहाँ नहीं है। अतः आपको वेदाँत का शिक्षण दिया जा सकता है।
हमारा जीवन एक मिसाल
मित्रो ! आप भजन नहीं काम करें। भजन तो एक घंटे होता है। बेटे ! हमारा सिनेमा रात के एक बजे से प्रारंभ हो जाता है। हम भजन भी करते हैं तथा सोलह घंटे मशक्कत भी करते हैं। आप श्रम नहीं करेंगे, तो आपको मैं बेहूदा, हरामखोर कहूँगा और इससे ऊपर की भी गाली दूँगा। जो मशक्कत नहीं करते हैं, उन्हें मैं घृणा की दृष्टि से देखता हूँ। बेटे ! हमारा रात्रि एक बजे से सुबह सात बजे तक सिनेमा चलता है। सात बजे से नौ बजे तक ‘इंटरवल’ होता है। इसके बाद जब तक हम आपको ध्यान नहीं करा देते हैं, विश्राम नहीं करते हैं। हम एक श्रमिक हैं। श्रमिक की दृष्टि से हमारी उम्र सत्रह वर्ष है, वैसे इस समय हमारी उम्र सत्तर वर्ष की है। ‘सेवन्टीन’ तथा ‘सेवन्टी’ में कोई अंतर नहीं है। साधारणतया दाँत न हों तो जबान से इस तरह की भूल हो जाती हैं, लेकिन शरीर और मन से हम ‘सेवन्टीन के हैं। परिश्रम हमारे लिए एक योगाभ्यास है, प्रगति चाहते वाले हर मनुष्य के लिए यह आवश्यक है।
मित्रो ! शारीरिक श्रम के साथ ही मानसिक श्रम भी आवश्यक है। अमेरिका में बहुत से स्कूल हैं, परंतु वैसे विद्यार्थी अधिक हैं स्कूलों में, जो शनिवार और रविवार को क्लास करते है और अपनी आत्मविकास करते हैं। इस कारण उनका प्रगति का रास्ता खुल जाता हैं। पाँच दिन मेहनत-मजदूरी करके पेट भरते हैं तथा दो दिन छुट्टी होता है, तो उसी के आधार पर उनका विकास होता चला जाता है। जब तक उनके आँखों की रोशनी खत्म नहीं होती है, वह अपनी पढ़ाई तथा आत्मविश्वास का कार्य रोकते नहीं है।
मित्रो ! मैं यह बतला रहा था कि आपके देवता तो अनेक हैं, परंतु उनमें से दो देवता-श्रम और ज्ञान प्रधान हैं। अगर आप इनकी पूजा-उपासना कर सकेंगे, तो आपको भौतिकता की सारी उपलब्धियाँ प्राप्त हो जाएँगी। आप शेखचिल्ली की उड़ान न भरें, वरन् आध्यात्मिकता के सही स्वरूप को समझने का प्रयास करें, तभी वास्तविक श्रम का लाभ व सत्परिणाम आपको प्राप्त होगा। आप दौलत चाहते हैं, तो आप इस प्राप्त कर सकते हैं। हमको स्वर्ग की कोई इच्छा नहीं है। हमने पंडितों से सुना है कि एक स्वर्ग है, जो बहुत ही वाहियात किस्म का है। वहाँ बड़े-बड़े पेड़ हैं, इंद्र की अप्सराएँ नाच करती रहती हैं। आदमी के विचार वास्तव में जानवरों के समान है।
भ्राँतियों से निकलें, वास्तविकता जानें
अगर आप हिंदू हैं या मुसलमान हैं, तो आपके स्वर्ग एवं जन्नत में दो ही चीजें रखी हैं, शराब और अप्सराएँ जन्नत में शराब एवं शहद रखा है, हूर और गुलमा है। अरे ! आपको पानी पीने से क्या काम, आप तो शराब पिएँ वहाँ सत्तर हूर रहती है। हूर किसे कहते हैं, खूबसूरत औरतों को। सत्तर गुलाम हैं, जो आपकी सेवा करेंगे। स्वर्ग की कामना करने वाले को कामचोर, हरामखोर, व्यभिचारी, घटिया लोग यही चाहते हैं कि ये चीजें जन्नत में मिलेंगी। इसी ख्वाब में लोग डूबे रहते हैं। आज के संतों पर हमें गुस्सा आता है। उनको यहाँ भी एकादशी का व्रत रहेगा और कहेंगे कि कहाँ है कल्पवृक्ष-मेवा और फल चाहिए। मक्कार कहीं का, केवल स्वर्ग की कामना करता है।
मित्रो ! हम आपको वास्तविकता से परिचय कराना चाहते हैं। अगर आपको साँसारिकता से लगाव है तथा शरीर को नीरोग और खुशहाल बनाना चाहते हैं, तो मशक्कत करें। श्रम करें। अक्ल की भी पूजा कर लेंगे तो सब चीजें पूरी हो जाएंगी। आपकी कामना पूरी हो जाएगी। आपकी तृष्णा पूरी हो जाएगी। तृष्णा क्या हैं ? बेटे ! आपने बेटे की शादी में पचास हजार रुपये खरच कर दिया। ऐसा क्यों किया, जबकि आपको इसका सूद मिलता था। अब तो घाटा गया है। हाँ साहब ! हो तो गया, पर दूसरों को दिखाने के लिए, रौब झाड़ने के लिए, अपना सिक्का बजाने हेतु ऐसा किया। इसे ही तृष्णा कहते हैं। एक और भूत हमारे ऊपर सवार रहता है, उसका नाम ‘अहं’ है। जिसका हम प्रदर्शन करते हैं। मोटर पर बैठकर बादशाह की तरह से चलते हैं। यह है अहं, जो समाज को दिखाया जाता है। यह अहं ही पिशाच है, राक्षस है। यह हमारा हर तरह से नुकसान पहुँचाते हैं। इसे पूरा करने के लिए हम न जाने कितना आडंबर बनाते हैं। अहं, वासना और तृष्णा ये ही मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं।
हमारी जीभ में स्वाद है, परंतु उसके लिए खुराक चाहिए। पेट भरने के लिए रोटी, सब्जी चाहिए, हमको अमुक चीज चाहिए। यह सारी चीजें पूरी करने के लिए मनुष्य को श्रम करना पड़ता है। श्रम तथा बुद्धि के आधार पर हम साधन इकट्ठा करते हैं। अगर आपको भौतिक चीजों की ही लालसा है, तो आपको आध्यात्मिकता की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। उसके लिए श्रम कीजिए।
मित्रो ! किंतु क्या किया जाए ! ये देवी-देवता हत्यारे हैं, चुड़ैल हैं, जो बकरा खाते हैं और मनोकामना पूर्ण करते हैं। आपकी समस्याएँ बिलकुल भौतिकवादी है। अध्यात्मवाद से आपका कोई संबंध नहीं है। आपकी तो मिट्टी पलीद हो ही चुकी है, अब हमारी होने वाली है। अध्यात्म की मिट्टी पलीद होने वाली है। अरे, हम एक नाव में जो बैठे हैं। आप मरेंगे तो हम भी मरेंगे। लोभी गुरु-लालची चेला दोनों मरेंगे।
मित्रो ! एक मौलवी साहब थे। उनका एक चेला था। चेले को समझाकर मौलवी साहब मक्का-मदीना हज करने चले गए। इधर चेले ने अपनी करामात दिखाना शुरू कर दिया। उसको जो भी चढ़ावा आता, वह उसे खाता था अपने पास रख लेता। इस बीच में वह चेला खूब खा-पीकर मोटा हो गया था।
चेले ने सोचा कि जब मौलवी साहब आ जाएंगे, तो हमारी क्या चलेगी तथा हमें कौन पूछेगा ? उसने एक चाल चली और गाँव के हर मुसलमान के घर गया और औरत, बच्चे, बूढ़े प्रत्येक नर-नारी से एक ही बात कहता रहा कि मौलवी साहब मक्का-मदीना से आने वाले हैं। वे बहुत बड़े सिद्ध पुरुष होकर के आ रहे हैं, जिसे जो कह देंगे, कर देंगे, उसको लाभ मिलेगा। वे बहुत चमत्कारी बनकर आ रहे हैं। उनतीस तारीख को मौलवी साहब आ गए। भीड़ लगने लगी। चेले ने कहा कि आप जानते नहीं हैं, मौलवी साहब की दाढ़ी में चमत्कार है। पहले बाल में पूरा चमत्कार है। दूसरे-तीसरे में क्रमशः बीस प्रतिशत, पंद्रह प्रतिशत लाभ मिलेगा। अब तो हल्ला मच गया। पहले बाल के लिए भीड़ लग गई।
ख्क् तारीख को सबने अपना कारोबार बंद कर दिया और पहुँच गए मौलवी साहब के पास। सभी ने उन्हें मालाएं पहनाई। मौलवी साहब प्रसन्न थे। वे बैठे भी नहीं थे कि अरे भाई ! जरा रुको। यह क्या कर रहे हो ? कोई माना नहीं और उनकी दाढ़ी तथा सिर के सभी बाल उखाड़ लिए। अब मौलवी साहब ने सोचा कि मेरे सारे बाल उखड़ गए। अब हम घर पर जाएँगे, तो घरवाली रहने नहीं देगी। अतः यहाँ से भागना ही अच्छा है। मौलवी साहब चले गए। चेले की पौ बारह हो गई।
असली अध्यात्म समझें
मित्रों ! मैं काया कह रहा था ? मनोकामना की बात, सिद्धियों की बात कह रहा था। अगर इसका नाम अध्यात्म है, गायत्री है, अनुष्ठान है, तो मैं आपसे बहुत ही नम्र शब्दों में कहना चाहूँगा कि इससे आपको कोई फायदा नहीं होने वाला हैं, आपको महात्मा के पास जाने से, चक्कर काटने से कोई लाभ मिलने वाला नहीं है। आप दो ही देवताओं श्रम और शिक्षा की, ज्ञान की पूजा करें और अपने जीवन को महान् बनाएँ। यह एक अध्याय आज समाप्त हुआ। इसके आधार पर भी भौतिक जीवन में आप सुख और आनंद पा सकते हैं।
मित्रो ! एक दूसरा रास्ता और है, जिस हम अध्यात्म कहते हैं। बेटे ! अध्यात्म वह चीज है जो भौतिक शरीर के भीतर निवास करता हैं, जिसके द्वारा मनुष्य को सिद्धियों मिलती हैं। भौतिक शक्ति एवं आध्यात्मिक शक्ति को जब हम मिलाते हैं, तो एक नए किस्म की चीजें मिलती हैं, जिसे हम ‘विभूतियाँ’ कहते हैं। विभूतियाँ वह चीज हैं जो दिखलाई नहीं पड़ती हैं। मित्रो ! हमारी नसों में-नाड़ियों में जो शक्ति हैं, उसे हम दिखा नहीं सकते हैं। हम नसों को दिखा सकते हैं, किंतु उसकी शक्ति का नहीं। नहीं साहब ! हम तो उस शक्ति को देखना चाहते हैं, जिससे जब आप किसी को घूँसा मारते हैं और गिरा देते हैं। बेटे ! हम अपनी चेतना को भी नहीं दिखा सकते है। वह भी उसी प्रकार की चीज हैं। बेटो ! ब्रह्मांड में जो चीजें विद्यमान हैं वह सारी-की-सारी चीजें हमारे शरीर में भी विद्यमान हैं। इतना ही नहीं, हमारे अंदर दिव्य शक्ति विद्यमान है।
दिव्य शक्ति किसे कहते हैं ? मित्रो ! यह देवताओं की शक्ति हैं, जो हमारे अंग-अंग में विद्यमान है। इसके अलावा हमारे भीतर ‘सुप्रीम पावर’ अर्थात् परमात्मा विद्यमान है। परमात्मा क्या हैं ? यह संवेदना के साथ जोड़ लें, तो हम सारी खुशी प्राप्त कर सकते हैं। हमारे अंदर ‘शिवोंडहं’ की भावना आ सकती है। अगर चेतना को सुप्रीम पावर के साथ जोड़ लें, तो मनुष्य बहुत ज्यादा सुख तथा आनंद का अनुभव कर सकता है।
मित्रो ! इसके साथ ही हमारे शरीर के हर चीज के दो रूप हैं। एक हैं भौतिक रूप आँखों का आध्यात्मिक रूप जिसे हम आज्ञाचक्र कहते हैं, दिव्य दृष्टि कहते है। जिसके द्वारा दूर की चीजें, भूत, वर्तमान, भविष्य की चीजें देख सकते हैं। इसे हम माइक्रोस्कोप से भी नहीं देख सकते हैं। यह वस्तु का सूक्ष्म रूप है। यह टेलीविजन तथा टेलीफोन की तरह है। संजय ने अपनी दिव्य दृष्टि से महाभारत के सारे दृश्य देखे थे तथा धृतराष्ट्र को पूरा-का-पूरा विवरण सुनाया था। यह दिव्य दृष्टि क्या थी ? मित्रो ! हमारे भीतर बहुत सारी चीजें फिट है। इतनी ज्यादा फिट हैं कि हम उनका वर्णन नहीं कर सकते हैं। अगर हमारी अक्ल तथा श्रम ठीक से काम करें, तो उस टेलीविजन से हम सारी चीजें प्राप्त कर सकते हैं। हमारे भीतर अतींद्रिय क्षमताएँ भरी पड़ी हैं। अगर हम उसे जगा लें, तो सारी-की-सारी भौतिक उपलब्धियां प्राप्त कर सकते हैं।
जीवो ब्रह्यैव नापरः
मित्रो ! उसी चेतना को, जिसमें आध्यात्मिक शक्ति भरी पड़ी है उसे अक्ल के माध्यम से शिक्षा के माध्यम से, ज्ञान के माध्यम से हम जगा सकते हैं तथा लाभ प्राप्त कर सकते हैं। उस समय हम महात्मा, सिद्धपुरुष, देवात्मा बन जाते हैं। हमें परमात्मा भी बन सकते हैं। परमात्मा भी मनुष्य हैं। वह मनुष्य का साफ-सुथरा स्वरूप है। ब्रह्म अलग हैं, जिसका हमने स्वरूप नहीं देखा हैं, परंतु जो चौबीस अवतार हुए हैं, उसमें से अधिकांश का मनुष्य का ही स्वरूप रहा है। परशुराम जी तीन कला के, रामचंद्र जी बारह कला के और श्रीकृष्ण जी सोलह कला के अवतार थे। ये सब कला के मनुष्य थे। तीन कला का मतलब क्या हुआ ? मनुष्य से तीन गुना अधिक शक्ति रखने वाले व्यक्ति। हम सब एक कला के भगवान् हैं, अवतार हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश हेतु हमें अपनी चेतना को परिष्कृत करना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि एक दुनिया वह है, जो आपके लिए बाहर खड़ी है। एक दुनिया यह है, जो हमारे भीतर अर्थात् ‘एटम’ के भीतर है। इसे अध्यात्म द्वारा ही माना जा सकता है।
मित्रो ! हमें अब यह बतलाना है कि अंतः में जो ताकत है, उसे कैसे जगाया जा सकता है। अंतरंग जीवन में एक अनोखी और शक्तिशाली दुनिया है। इसमें अपनी अंतः चेतना का प्रवेश कैसे करा सकते हैं, यह हमें बतलाना है। उसे विकसित कैसे कर सकते हैं, यह बतलाना है। अध्यात्म से भौतिक लाभ मिल सकते हैं ? हाँ बेटे ! भौतिक लाभ इससे मिल सकते हैं। इससे हम सिद्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं। सोने से कपड़ा खरीद सकते हैं, मकान खरीद सकते हैं। विभूतियों के द्वारा ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है।
हम अपनी अंतःसामर्थ्य को कैसे विकसित कर सकते हैं, विभूतियाँ एवं सिद्धियों कैसे प्राप्त कर सकते हैं, यह कल से हम आपको बतलाने का प्रयास करेंगे। आज हमने आपको भौतिक जीवन का स्वरूप समझाने में अपना समय लगा दिया। अगर जब समय मिलेगा आपस अध्यात्म की विशद् चर्चा करेंगे तथा बताएँगे कि ब्रह्मवर्चस का उपासना-साधना का, आध्यात्मिक का जो प्रशिक्षण दिया जा रहा है, उसका उद्देश्य क्या हैं ? उसका प्रयोग क्या हैं ? उसके सिद्धाँत बताने के साथ यह भी बतलाने का प्रयास करेंगे कि यहाँ पर जो क्रियाएँ हमने सिखाई हैं, उसमें आप कैसे सफल और पारंगत हो सकते हैं, ? इसमें आपको क्या-क्या करना होगा ? यह विषम समझाना आज से हमारा उद्देश्य है। आज से हम अपनी व्याख्यान माला शुरू कर रहे हैं। आध्यात्मिकता का पूरा-का-पूरा स्वरूप आपकी समझ में जब तक नहीं आ जाए, तब तक हमारा यह कार्यक्रम चालू रहेगा, ताकि आप आध्यात्मिकता का सही स्वरूप समझ सकें तथा इस रास्ते पर चलने का प्रयास कर सकें। आज की बात समाप्त। ॥ ॐ शाँतिः ॥
“हमारे लिखे विचारों में कितनी आभा हैं, कितनी रोशनी हैं, कितनी मौलिकता है और कितनी शक्ति हैं, यह कहने की नहीं, अनुभव करने की बात है। जिन्होंने इन्हें पढ़ा, तड़पकर रह गए। रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय ने इन्हें लिखा हैं, सो इनका प्रभाव होना ही चाहिए, हो रहा है और होकर रहेगा।” (अखण्ड ज्योति अगस्त क्−म्−, पृष्ठ ब्क्) यह अभिव्यक्ति है परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी की, अपने विचारों के संबंध में, जो उन्होंने अपनी कलम से जीवनभर लिखे। उनकी लेखनी बहुत कम उम्र से प्रायः क्ख्-क्फ् वर्ष की आयु से ही सक्रिय हो उठी थी, किंतु विधिवत लेखन उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने एवं श्री अरविंद, रवींद्रनाथ टैगोर एवं महात्मा गाँधी से मिलने के बाद प्रायः सत्ताईस वर्ष की उम्र में क्−फ्स्त्र-फ्त्त् में आरंभ किया, जब उन्होंने ‘अखण्ड ज्योति’ प्रकाशित करने का प्रयास किया। इस प्रक्रिया में कुछ अवरोध आए, परंतु क्−ब् के वसंत पर्व से अनवरत यह प्रकाशित होने लगी एवं उसी वर्ष एक ग्रंथ लेकर भी आई, “मैं क्या हूँ’। व्यक्ति को अपने अंदर की चेतना तक ले जाकर बोध कराने वाली यह पुस्तक आज भी परिजनों-पाठकों की प्रिय पुस्तक बनी हुई हैं।
पुरुषार्थ सक्रिय रहा
क्−ब् से प्रारंभ हुआ पुरुषार्थ कागज काले करने के लिए नहीं वरन् जन-जन के मन को मथने एवं अंतः में छिपे देवत्व को उभारने के लिए सक्रिय हुआ था। यह क्रमशः और तीव्र गति लेता चला गया एवं प्रायः प्रतिवर्ष एक या दो विशेषांक एवं त्त्-क् पुस्तिकाओं का ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा से प्रकाशन होने लगा। व्यक्ति के मन की समस्याओं का समाधान, शारीरिक स्वास्थ्य, समाज की विभिन्न समस्याओं का विधेयात्मक सुधारात्मक हल किए ‘अखण्ड ज्योति’ लोकप्रिय होने लगी। इसने राष्ट्र की आजादी वाला वर्ष पार किया, लोगों की राजनीतिक चेतना को जगाया। एक आजाद राष्ट्र में किए जाने वाले कर्तव्यों का स्मरण कराया, साथ ही अध्यात्म दर्शन, गायत्री महामंत्र की विशद् व्याख्या यज्ञ के तत्वज्ञान से जन-जन को परिचित कराते हुए अपनी एक अलग पहचान बना ली। क्−भ्त्त् के सहस्रकुंडी महायज्ञ मथुरा के बाद इसने एक विराट गायत्री परिवार के संगठनात्मक नवसृजन की भूमिका संभाल ली एवं देखते-देखते यह प्रत्येक परिजन की एक अनिवार्य पाठ्य पुस्तिका बन गई। व्यक्ति, परिवार, समाज निर्माण की धुरी पर केंद्रित ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका ने युग के नवनिर्माण की योजना क्−म्ख् में प्रस्तुत की। इसके बाद साधनात्मक मार्गदर्शन हेतु लगातार ‘पंचकोशीय जागरण’ साधना का पत्राचार-मार्गदर्शन इससे चलने लगा। ढेरों व्यक्ति साधना के क्रम में इससे जुड़ें।
क्रांतिकारी स्वर
क्−म्भ्-म्म् से परमपूज्य गुरुदेव के स्वर क्राँतिकारी एवं तीखे होते चले गए एवं उन्होंने महाकाल की युग-प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के आरंभ होने का उद्घोष कर दिया। साथ ही एक पत्रिका और प्रकाशित होने लगी ‘युग निर्माण योजना’। व्यक्ति निर्माण यदि अखण्ड ज्योति की विषयवस्तु था, तो परिवार एवं समाज निर्माण ‘युग निर्माण योजना’ पत्रिका की। दोनों का ही इष्ट एवं लक्ष्य एक था, देवमानवों द्वारा युग का नवनिर्माण।
विज्ञान ओर अध्यात्म के समन्वयात्मक दार्शनिक प्रतिपादनों ने क्−म्म्-म्स्त्र के बाद एक बहुत बड़े बुद्धिजीवी, तर्क-तथ्य प्रमाण की भाषा समझने वाले वर्ग को गायत्री परिवार, अखण्ड ज्योति परिवार से जोड़ा। बड़ी संख्या में छात्र-अध्यापक, वैज्ञानिक, चिकित्सक आदि इस चिंतन से जुड़ते चले गए। जीवन जीने की कला की विधा के रूप में अध्यात्म का प्रतिपादन कर जीवन साधना को एक अनिवार्यता बताने वाले आचार्य श्री ने जन-जन के हृदय स्थल को स्पर्श ही नहीं किया वरन् अपने विचारों से गजब का एक क्राँतिकारी आँदोलन खड़ा कर दिया। यह अपने समय का विचार क्राँति अभियान बना, जो साधना की पृष्ठभूमि पर टिका था।
अंतिम पुरुषार्थ
क्−स्त्र-स्त्रक् से लेकर क्−− तक की आयुष्य के अंतिम बीस वर्ष का समय परमपूज्य गुरुदेव की जीवन साधना के प्रखरतम पुरुषार्थ का समय है। इस अवधि में उन्होंने युगतीर्थ शांतिकुंज की स्थापना की। इसकी बागडोर परमवंदनीया माताजी के हाथ में सौंपी। स्वयं उच्चस्तरीय व्यक्तियों के निर्माण में लग गए। उनसे प्राण प्रत्यावर्तन साधनाएँ संपन्न कराई, वानप्रस्थ का पुनरुज्जीवन किया एवं हरिद्वार में ब्रह्मवर्चस् षोध्पा संस्थान सहित प्रायः ढाई हजार गायत्री तीर्थों, शक्तिपीठों की स्थापना की। अस्सी वर्ष की आयु तक खिले ब्रह्मकमल की एक-एक पंखुड़ी एक महत्वपूर्ण स्थापना का इतिहास लिए, क्राँतिधर्मी साहित्य के निर्माण एवं इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के उद्घोष के साथ क्−− तक सुवासित रह गायत्री जयंती ख् जून के दिन स्थूल रूप में दृष्टि के वर्ष के लिए लिखे गए विचारों का सशक्त जखीरा उनकी पत्रिका अखण्ड ज्योति एवं वाङ्मय के रूप में जीवंत है, सूक्ष्म व कारण सत्ता से सक्रिय है एवं आज लाखों नहीं, करोड़ों के मर्म को स्पर्श करता दिखाई देता है।
महापुरुष कभी मरते नहीं, वे सतत विचारों से सक्रिय रह हजारों-लाखों-करोड़ों को प्रेरणा देते रहते हैं। स्वामी विवेकानंद एक छोटी आयुष्य का जीवन जीकर क्−ख् में शरीर छोड़कर गए, परंतु उनके जाने के बाद उनके प्रचंड वैचारिक ऊर्जा प्रवाह ने जो क्राँति का तूफान पैदा किया, वह दिन-प्रतिदिन गति पकड़ता जा रहा है। श्री अरविंद ने स्वयं को प्रकाराँतर से जीवन के अंतिम चालीस वर्षों में कुछ गिने-चुने व्यक्तियों तक सीमित रह साधना में खपा दिया था, पर क्−भ् में उनके महाप्रयाण के बाद उनके विचारों ने जो तीव्र गति पकड़ी, वह आग भी उनके साहित्य के विस्तार में देखी जा सकती हैं।
प्राण संजीवनी वाड्मय एवं अखण्ड ज्योति पत्रिका
परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर न केवल मासिक पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ के रूप में प्राण संजीवनी जन-जन तक पहुँचाने वाली पाती पहुँचाई, पुस्तकों के रूप में वह मार्गदर्शक साहित्य लिखा, जिसकी कि भारतवर्ष को ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व को अत्यधिक आवश्यकता थी। उन्होंने बेड़ियों में जकड़े धर्मतंत्र को न केवल मुक्त कर उसका स्वरूप सबके समक्ष स्पष्ट किया, उसका व्यावहारिक अध्यात्मपरक प्रतिपादन प्रायः फ्ख् से अधिक लिखी, बड़ी-छोटी पुस्तिकाओं के रूप में प्रकाशित किया। कोई एक व्यक्ति इतना अधिक कार्य अपने जीवित रहते रह सकता है, यह अकल्पनीय है। बिना किसी स्टेनो या सहायक के एकाकी अपने पुरुषार्थ के बलबूते उन्होंने सारगर्भित विचारों-प्रतिपादनों से भरे इस साहित्य का जीवनभर सृजन किया एवं जन-जन को इस सुधा को पिलाकर उनके जीवन की राह को एक नई प्रगति की दिशा की ओर मोड़ दिया। इसी साहित्य का संकलन है-स्त्र खंडों में प्रकाशित वाङ्मय।
परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखे गए साहित्य के इस वाङ्मय के एक-एक खंड में जिन विषयों के अंतर्गत उनके द्वारा विगत साठ वर्षों में लिखे विचारों को संकलित किया गया है, वे स्वयं में निराले हैं। किसी ‘एनसाइक्लोपीडिया’ की तरह ये सत्तर ग्रंथ एक प्रकार से सौगुना शोधग्रंथों की सिनाप्सिस की तरह हैं। इनका विमोचन भारत सरकार के प्रधानमंत्री के हाथों आंवलखेड़ा (आगरा) की प्रथम महापूर्णाहुति की वेला में क् नवंबर क्−−भ् को हुआ। तब से अब तक ये ग्रंथ भारत के कोने-कोने में पहुँच पाने में सफल हुए हैं।
हीरक जयंती वर्ष में ‘ज्ञान शरीर’ की स्थापना
परमपूज्य गुरुदेव के विचारों को हम जितना अधिक, जितनी तेजी से जन-जन तक पहुँचा पाएंगे, उतना ही युग के नवनिर्माण का प्रयोजन पूरा होता दीख पड़ने लगेगा। वाङ्मय का पुस्तकालयों में स्थापित कराना, विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों में एक अनिवार्य अंग के रूप में पहुँचाना अब हमारे सभी परिजनों का परम ध्येय बन जाना चाहिए। इसके लिए ‘अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्र’ की स्थापना स्थान-स्थान पर हो एवं जिसके न्यूनतम फ् सदस्य हों। इसकी स्थापना में अपने निज की या अन्य समान विचारधारा के व्यक्तियों की पूँजी मिल-जुलकर लगाई जा सकती है। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका जो अब म्भ्वें वर्ष में चल रही है, को अधिकाधिक पहुँचाना, वाङ्मय को सरकारी-सामाजिक संगठनों के माध्यम से एक अभियान के रूप में स्थापित किए जाने का महायज्ञ अब किया जाना चाहिए। इस हीरक जयंती वर्ष का यह अतिरिक्त पुरुषार्थ हमारा हो कि हम अपने प्रभाव का पूरा उपयोग कर स्थान-स्थान पर वाङ्मय स्थापित कर सकें। हर पोस्ट ग्रेजुएट, डिग्री एवं इंटर कालेजों में अपने प्रयासों से यह स्थापित हो जाए। यदि परमपूज्य गुरुदेव के विचार इन स्थानों पर पहुँच गए, तो शिक्षा और विद्या का सार्थक समन्वय होने लगेगा।
ऐसे केंद्री अधिकाधिक स्थापित हों एवं वे मात्र विचार क्रांति के जाग्रत तीर्थ बनें, ऐसा मन हैं। वहाँ से मिशन की पत्रिकाओं तथा अभी सत्तर खंडों में फैले विचार समुच्चय के रूप में विद्यमान परमपूज्य गुरुदेव के ‘ज्ञान शरीर’ के रूप में वाङ्मय के विस्तार की, घर-घर स्थापना का अभियान चले, तो देखते-देखते परिवर्तन गति पकड़ने लगेगा। परिजन ऐसे केंद्रों की स्थापना, उनके संचालन की योजना, वित्तीय तंत्र आदि के विषय में संलग्न फार्म भरकर अखण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी मथुरा भेज दें एवं इस गायत्री जयंती गुरुपूर्णिमा से इस योजना के सक्रिय अंग बनकर कार्य करें, ऐसा सभी से भावभरा आह्वान है।
हम अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्र की स्थापना करना चाहते हैं। अपना तथा अपने सदस्यों का विवरण नीचे दे रहे हैं। इस संबंध में विस्तृत जानकारी हमें भेजें।
अखण्ड ज्योति ज्ञान केंद्र स्थान-पता...................................................................................
समीपस्थ गायत्री शक्तिपीठ...............................................फोन नं. .....................................
संयोजक का नाम.......................................................................................................
आवास का पता.......................................................................................................
पिन कोड...............................................फोन नं ........................................
व्यवसाय पदनाम..................................................................................................
कार्यालय का पता.....................................................................................................
पिन कोड........................................फोन नं ..........................
शिक्षा...................................................जन्म दिनाँक...................................................
अखण्ड ज्योति सदस्य नं............................................कितनी पत्रिका मँगाते हैं............................
मिशन से कब जुड़े..................................................................................................
मिशन संबंधी गतिविधियों का वितरण.............................................................................
.............................................................................................................
हस्ताक्षर संयोजन .............................
(क्) सहयोगी का नाम.................................................................................................
आवास का पता.........................................................................................................
पिन कोड.......................................फोन नं ....................
व्यवसाय पदनाम........................................................................................................
कार्यालय का पता........................................................................................................
पिन कोड........................................फोन नं ..........................
शिक्षा.......................................................जन्म दिनाँक...................................................
अखण्ड ज्योति सदस्य नं..........................................कितनी पत्रिका मँगाते हैं............................
मिशन से कब जुड़े.....................................................................................................
मिशन संबंधी गतिविधियों का वितरण............................................................................
.................................................................................................................................
हस्ताक्षर सहयोगी ...............................
(ख्) सहयोगी का नाम.............................................................................................
आवास का पता....................................................................................................
...........................पिन कोड.......................................फोन नं ...................................
व्यवसाय पदनाम......................................................................................................
कार्यालय का पता....................................................................................................
पिन कोड........................................फोन नं ......................
शिक्षा...........................................जन्म दिनाँक...................................................
अखण्ड ज्योति सदस्य नं.....................................कितनी पत्रिका मँगाते हैं...........................
मिशन से कब जुड़े....................................................................................
मिशन संबंधी गतिविधियों का वितरण.......................................................................
...........................................................................................................................
हस्ताक्षर सहयोगी .............................
(फ्) सहयोगी का नाम..............................................................................................
आवास का पता.............................................................................................................
....................................................................................................................
पिन कोड.......................................फोन नं ...................................
व्यवसाय पदनाम.........................................................................................................
कार्यालय का पता.....................................................................................................
पिन कोड........................................फोन नं ..........................
शिक्षा...............................................जन्म दिनाँक...................................................
अखण्ड ज्योति सदस्य नं...............................कितनी पत्रिका मँगाते हैं............................
मिशन से कब जुड़े......................................................................................
मिशन संबंधी गतिविधियों का वितरण............................................................................
...................................................................................................................................
हस्ताक्षर सहयोगी .............................
निकटवर्ती रेलवे स्टेशन...................................................................................
ट्राँसपोर्ट कं. ........................................................................................
बैंक का नाम ........................................................................................................
दिनाँक..............................................
हस्ताक्षर
संयोजक.................................................................
(यदि सहयोगी अधिक हों तो सादा कागज पर वितरण लिखकर संलग्न करें)
अखण्ड ज्योति के गत दो अंकों में विविध प्रकार के मानसिक रोगों के निवारण एवं मस्तिष्कीय क्षमताओं की अभिवृद्धि हेतु शोधपूर्ण यज्ञोपचार प्रक्रिया का उल्लेख किया गया था। इन पृष्ठों में विशिष्ट प्रकार की औषधियों से विनिर्मित हवन सामग्री के प्रयोग द्वारा नानाप्रकार के ज्वरों, ‘फीवर’ से कैसे छुटकारा पाया और स्वस्थ हुआ जा सकता है, इसका वर्णन किया जा रहा है। ज्वर चिकित्सा में हवन करते समय आहुतियाँ प्रदान करने का मंत्र का सूर्य गायत्री मंत्र ही प्रयुक्त होगा, इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। इसके साथ ही सभी प्रकार के ज्वरों में प्रयुक्त होने वाली अलग-अलग हवन सामग्री में पहले से बनीं, कीमेन हवन सामग्री नंबर (क्) को संभाग में मिलाकर तब हवन करना चाहिए। कामन हवन सामग्री को अगर, तगर, देवदार, रक्त चंदन, श्वेत चंदन, गुगल, लौंग, जायफल, चिरायता और असगंध की बराबर मात्रा लेकर बनाया जाता है।
ज्वर की विविध श्रेणियाँ हैं। उदाहरण के लिए, मलेरिया को ही लें तो इसके एकतरा, तिजारी, चौथिया, डेंगू फीवर आदि कितने ही रूप हैं इनमें ठंड देकर बुखार आता है और पसीना देकर उत्तर जाता हैं। इसी तरह वात, पित्त, कफ के कुपित होने, बैक्टीरिया, वायरस जैसे जीवाणुओं-विषाणुओं के कारण शरीर के विविध अंग-अवयवों में संक्रमण होने से तरह-तरह के बुखार उत्पन्न हो जाते हैं। समयानुसार इनकी तीव्रता घटती-बढ़ती रहती है और तदनुसार रोगी के शरीर का तापमान भी परिवर्तित होता रहता है। ऐसी अवस्था में जिन रोगियों को सामान्य बुखार होते हैं और उन्हें चलने फिरने, उठने-बैठने, स्नान करने आदि में कठिनाई नहीं होती, वे स्वयं हवन कर सकते हैं। किंतु जिन्हें उन सब बातों में कठिनाई अनुभव होती हैं, वे स्वयं आहुति न डालकर केवल हवन के समीप आराम से बैठ सकते हैं। चलने-फिरने एवं उठने-बैठने में असमर्थ रोगियों की शैया के पास ही ताँबे से बने हवन कुँड में हवन करना चाहिए। रेडीमेड हवन कुँड न होने पर जमीन पर ही मिट्टी या ईंट से छोटा-सा हवन कुँड बनाकर हवन किया जा सकता है। रोगी को पूर्वाभिमुख होकर हवन करना तथा ईशानकोण की ओर मुख करके इष्टदेवता को नमन करते हुए औषधि सेवन करना चाहिए।
यहाँ पर रोगानुसार जिस विशिष्ट प्रकार की हवन सामग्री से हवन करने का विधि-विधान बताया जा रहा है, उन्हीं औषधियों का सूक्ष्मीकृत कपड़छन पाउडर भी नियमित रूप से सुबह-शाम एक-एक चम्मच रोगी को खिलाते रहना चाहिए। इससे रोग-शमन में तीव्रता आती है और व्यक्ति जल्दी स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता है।
(क्) साधारण बुखार (सिंपिल फीवर) की विशेष हवन सामग्री :--
इसके लिए निम्नाँकित औषधियां बराबर मात्रा में ली जाती हैं।
(क्) चिरायता (ख्) तुलसी की लकड़ी (फ्) तुलसी के बीज (ब्) करंज गिरी (भ्) लाल कनेर के पुष्प (म्) नीम छाल (स्त्र) सहदेवी (त्त्) गिलोय (−) नीम छाल (क्) पटोल पत्र (क्ख्) मुलहठी।
हवन करने के साथ ही इन्हीं बारह द्रव्यों के कपड़छन चूर्ण को सुबह-शाम एक-एक चम्मच कुनकुने जल के साथ रोगी व्यक्ति को सेवन भी कराते रहना चाहिए।
(ख्) शीत ज्वर ‘कामन कोल्ड’ (मलेरिया) की विशेष हवन सामग्री :--
क्) चिरायता (ख्) तुलसी की लकड़ी (फ्) तुलसी के बीज (ब्) करंज गिरी (भ्) लाल कनेर के पुष्प (म्) नीम छाल (स्त्र) सहदेवी (त्त्) गिलोय (−) नीम छाल (क्) पटोल पत्र (क्ख्) लाल चंदन (क्फ्) चित्रक।
उक्त क्फ् औषधियों के महीन चूर्ण को सुबह-शाम एक-एक चम्मच गरम जल के साथ मलेरिया ग्रस्त व्यक्ति को देते रहना चाहिए। हवन करते समय उक्त सामग्री में ही ‘कामन हवन सामग्री नंबर (क्)’ बराबर मात्रा में तथा इनमा दसवाँ भाग शर्करा एवं दसवां भाग ही घी मिलाकर तब हवन करना चाहिए
(फ्) जाड़े का बुखार तिजारी व चौथिया मलेरिया ज्वर की विशेष हवन सामग्री :--
यह मलेरिया बुखार एक दिन बाद एवं दो दिन बाद अंतर देकर ठंडक के साथ आता है।
इसमें प्रयुक्त होने वाली हवन सामग्री में निम्नांकित औषधियां मिलाई जाती है-
(क्) अडूसा (ख्) पटोल पत्र (फ्) तेजपत्र (ब्) अमलतास (भ्) दारु हल्दी (म्) चिरायता (स्त्र) काला (त्त्) बच (−) गिलोय (क्) लाल चंदन (क्क्) शलिपणीं (क्ख्) पृष्टिपणीं (क्फ्) देवदार (क्भ्) खस (क्ब्) करंज गिरी (क्म्) तुलसी पत्र।
हवन के साथ ही इन सभी सोलह औषधियों का कपड़छन पाउडर सुबह-शाम एक-एक चम्मच कुनकुने जल के साथ खिलाते रहने पर तत्काल लाभ मिलता है।
मलेरिया की तरह ही गरमी के दिनों विशेष रूप से डेंगू फीवर एवं वायरल फीवर का प्रकोप ज्यादा पाया जाता है। एलोपैथी दवाओं का सेवन करने की अपेक्षा आयुर्वेदिक औषधियों से निर्मित विशिष्ट प्रकार की हवन सामग्री से हवन करने, उसी को चूर्ण रूप में या क्वाथ रूप में सेवन करने से यह दोनों प्रकार की व्याधियों समूल रूप से नष्ट हो जाती है। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान ने इस संदर्भ में गहन अध्ययन व अनुसन्धान करके जो फार्मूला प्रस्तुत किया है, वह इस प्रकार है-
(ब्) डेंगू फीवर, वायरल फीवर एवं संबंधित रोगों की विशेष हवन सामग्री :--
इसके घटक तत्व इस तरह से हैं-
(क्) चिरायता (ख्) कालमेघ (फ्) आर्टीमीसिया एनुआ (ब्) कपूर तुलसी (भ्) शरपुँखा (म्) सप्तपर्णी (स्त्र) मुलहठी (त्त्) गिलोय (−) सारिवा (क्) विजया (क्क्) कुटकी (क्ख्) करंजगिरी (क्फ्) पटोल पत्र (क्ब्) नीमगिरी (निबौली)।
हवन करने के साथ ही उक्त सभी क्ब् चीजों के संभाग बारीक कपड़छन पाउडर को हल्के कुनकुने जल के साथ सुबह-शाम एक-एक चम्मच रोगी व्यक्ति को खिलाते रहने से शीघ्र लाभ मिलता है।
(भ्) दंडक ज्वर की विशेष हवन सामग्री :-- (सभी संक्रामक रोगों पर)
दंडक ज्वर की हवन सामग्री बनाने के लिए जो औषधियां बराबर मात्रा में प्रयुक्त होती है, वे इस प्रकार है-
(क्) पटोल पत्र (ख्) कालमेघ (फ्) चिरायता (ब्) आर्टीमीसिया एनुआ (भ्) कुटकी (म्) नीम गिरी (स्त्र) गिलोय (त्त्) करंज गिरी (−) कपूर तुलसी।
हवन के साथ ही उक्त सभी − चीजों को मिलाकर कपड़छन करके प्राप्त पाउडर को एक-एक चम्मच सुबह व शाम को जल के साथ खिलाना चाहिए।
(म्) विषम ज्वर :--
जो ज्वर कभी सरदी से, कभी गरमी से, कभी कम, कभी ज्यादा तथा समय-कुसमय अनियमित रूप से आते हैं, उन्हें विषम ज्वर कहते हैं।
विषम ज्वर की विशेष हवन सामग्री :--
विषम ज्वर की विशिष्ट हवन सामग्री बनाने में जो औषधियां संभाग में प्रयुक्त की जाती है, वे इस प्रकार हैं-
(क्) चिरायता (ख्) कालमेघ (फ्) आर्टीमीसिया एनुआ (ब्) करंज गिरी (भ्) नीम गिरी (म्) नीम छाल (स्त्र) सहदेवी (त्त्) गिलोय (−) पाढ़ की जड़ (क्) नागरमोथा (क्ख्) तुलसी पत्र (क्फ्) कपूर तुलसी (क्ब्) कुटकी (क्भ्) पटोल पत्र।
हवन के साथ ही इन सभी क्भ् चीजों को मिलाकर बनाए गए कपड़छन पाउडर को एक चम्मच सुबह एवं एक चम्मच सुबह एवं एक चम्मच शाम को जल के साथ रोगी को अवश्य खिलाते रहना चाहिए। हर तरह के विषम ज्वर की शमन करने में यह योग अतीव उपयोगी सिद्ध हुआ है।
(स्त्र) उष्ण ज्वर की विशिष्ट हवन सामग्री :-- (टाइफ़ाइड, पैराटाइफ़ाइड एवं संबंधित रोगों पर)
इसके लिए जिन औषधियों को विशेष रूप से हवन करने एवं खाने में प्रयुक्त किया जाता है, उनके नाम इस प्रकार हैं-
(क्) इंद्र जौ (ख्) पटोल पत्र (फ्) नाम का गुठला (निबौली) (ब्) नेत्रवाला (भ्) त्रयमाण (म्) काला जीरा (स्त्र) चौलाई की जड़ (त्त्) बड़ी इलायची (−) मुलहठी (क्) वासा (क्क्) गिलोय (क्ख्) नागरमोथा।
इन सभी क्ख् चीजों को मिलाकर बारीक पिसा हुआ कपड़छन पाउडर एक-एक चम्मच सुबह-शाम जल के साथ रोगी को खिलाना चाहिए। टाइफ़ाइड एवं पैराटाइफ़ाइड इससे शीघ्र लाभ मिलता है।,
(त्त्) जीर्ण ज्वर का विशिष्ट हवन सामग्री :--
(क्) चिरायता (ख्) कालमेघ (फ्) आर्टीमीसिया (ब्) करंज गिरी (भ्) नीम गिरी (म्) नीम छाल (स्त्र) सहदेवी (त्त्) गिलोय (−) पाढ़ की जड़ (क्) नागरमोथा (क्ख्) तुलसी पत्र (क्फ्) कपूर तुलसी (क्ब्) कुटकी (क्भ्) पटोल पत्र (क्म्) जवासा (क्स्त्र) इंद्र जौ।
हवन करने के साथ ही उक्त सभी क्त्त् चीजों को मिलाकर बनाए गए कपड़छन चूर्ण को जल के साथ सुबह एवं शाम को एक-एक चम्मच लेते रहना चाहिए। चूँकि यह ज्वर ज्वरों के आरंभ में, समुचित चिकित्सा के अभाव और रोगवृद्धि ज्वराँत में अपथ्य, अज्ञानतावश, कब्ज एवं अधिक ताप के कारण होता है। अतः समुचित आहार-विहार एवं पथ्य-परहेज का इसमें विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए।
(गीता के चतुर्थ अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग की युगानुकूल व्याख्या की छठी कड़ी)
विगत अंक में बताया गया था कि चाहे कोई भी उपासना-पद्धति हो। सभी साधनाएँ एक ही लक्ष्य-आनंद स्वरूप तत्त्वरूप परमात्मा की ओर ही ले जाती हैं। प्रत्येक को अपने आह्वान की तीव्रता के अनुपात में अपने कार्य-क्षेत्र में सफलता मिलती है। यह तभी हो पाता है, जब मनुष्य आसक्ति, भय और क्रोध को त्यागकर स्थिर मन से परमात्मा के अनंत सौंदर्य की उपासना करे। "ये यथा माँ प्रपद्यन्ते" श्लोक की विस्तृत व्याख्या विगत अंक में की गई। इसकी पुष्टि हेतु ठाकुर श्रीरामकृष्ण देव एवं परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के माध्यम से व्याख्या की गई। यह भी बताया गया कि साँसारिकता के लौकिक लाभ फल की आकाँक्षा से पूजने वाले लोगों को मिल जाते हैं, किंतु ये अल्पकालिक एवं अस्थाई होने के कारण तुच्छ होते है। निष्काम कर्म की अपनी महत्ता है। "कर्मंणाँ सिद्धिं यजन्त" की व्याख्या करते हुए भगवान कहते हैं कि आकाँक्षारहित होकर जीवनयापन किया जाना चाहिए।
प्रस्तुत अंक में आगे जो व्याख्या की जा रही हैं, उसका पूर्वार्द्ध तेरहवें श्लोक के माध्यम से विगत अंक में दिया गया था। जिसमें भगवान चार वर्णों की व्याख्या करते हैं एवं कहते हैं कि इनका स्पष्ट होते हुए भी मुझे अविकारी-अकर्ता ही मानना। इसी व्याख्या को आगे प्रभु समझाते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता का चौदहवाँ श्लोक है-
न माँ कर्माणि लिम्पन्ति न में कर्मफले स्पृहा। ठति माँ योअभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥
"न मुझे कर्म लिप्त करते हैं, न ही मुझे कर्मफल की लालसा है। जो मुझे इस प्रकार तत्व से जान लेता है, वह कर्मों के बंधन को प्राप्त नहीं होता।"
भगवान् यहाँ कह रहे हैं, कर्म तभी उचित सिद्ध हो पाते हैं जब भावना शुद्ध होती है। यदि अंदर की भावना इंद्रिय तुष्टि की है, तो उससे अधिकाधिक मानसिक बंधन ही उत्पन्न होंगे। निस्वार्थ समर्पित कर्म वासनाओं के क्षय का कारण होते हैं। ऐसे कर्म करने वाले व्यक्तित्व मुक्त होकर अनंत आत्मा की स्वतंत्रता और विस्तार को प्राप्त होते हैं। कर्मों में यज्ञीय भाव कैसे बनाया जाए, इस पर भगवान् समझाते हुए कहते हैं, "कर्मफल की लालसा मत रखो एवं उनमें लिप्त मत होओ।" भगवान स्वयं अपने बारे में कहते हैं कि मुझे कभी भी प्रकार की कर्मफल की लालसा नहीं है। (न में कर्मफले स्पृहा)।
सूर्य प्रकाशित होता है तो दोनों को ही प्रकाश देता है, गंदे जल वाले तालाब को और निर्मल पावन गंगा के शुद्ध जल को। प्रकाशक सूर्य न तो तालाब की गंदगी से और न ही नदी की दैदीप्यमान पवित्रता से ही प्रभावित होता है। प्रकाशिक सूर्य प्रकाशन में हमेशा पृथक और अलिप्त बना रहता है। इसी प्रकार शुद्ध-अनंत चैतनरूप भौतिक उपाधियों कमरे से लिप्त नहीं होता। सड़क पर दौड़ रही गाड़ियाँ लैंप पोस्ट से प्रकाशित प्रकाश से मार्गदर्शन पा दौड़ती रहती है, गंतव्य तक पहुँचती हैं। वाहनों में बैठे हम ही है, जो गंतव्य स्थानों तक पहुँचते हैं, बिना किसी उत्सुकता के लैंप पोस्ट हमारी भागदौड़ को प्रकाशित करते रहते हैं।
यदि यह ज्ञान हमें हो सके कि हमारी आत्मसत्ता सभी क्रियाओं का केंद्र अवष्सय है, पर उसके परिणामों से अलिप्त है, तो संसार की सभी गतिविधियों का संचालन करते हुए भी हम आत्मा में ही स्थित रहते हैं एवं भगवत् कार्य करते हुए जीवन को सार्थक ढंग से जीते हैं। भगवान कहते हैं "जो मुझे इस तरह से जानता है (कर्मभिः न स बध्यते)।" कितना सुंदर स्पष्टीकरण है। जीवन जीने की कला का अनुपम शिक्षण है। भगवान् को जानना है, तो हमें इस तरह तत्व रूप में जानना चाहिए। फिर हमारे सभी कर्म यज्ञीय भाव में होते रहेंगे।
परमपूज्य गुरुदेव जीवनभर यही कहते रहे कि हम हर व्यक्ति को निष्काम कर्म में लिप्त कर ब्राह्मण बनाना चाहते हैं। जीवनभर उनकी साधना इसी निमित्त नियोजित होती रही। ब्राह्मण वह जिसका चिंतन ऐसा हो जो ऊपर बताया गया। ब्राह्मण वह जो ब्रह्म में विचरण करे, जो कर्मों के बंधन से ऊपर चले।
कम वास्तव में हमारे व्यक्तित्व को अपने पीछे छोड़ी हुई वासनाओं की हथकड़ियों से बाँधते हैं। नए कर्म नई वासनाएँ उत्पन्न करते हैं, हमारे विचार करने को और कर्म करने की स्वतंत्रता जकड़ जाती है। फिर हम अपने ही द्वारा विगतकाल में किए गए कर्मों का एक मकड़जाल मात्र बनकर रह जाते हैं। इसमें हमारे लिए स्वतंत्र रूप से कर्म करने का कोई अवसर नहीं बच रहता। कई लोग आदतों के गुलाम होते हैं एवं बार-बार कहते हैं कि मैं असहाय हूँ, इनसे मुक्त होना चाहता हूँ, पर हो नहीं पा रहा हूँ। आदत चाहे वह झूठ बोलने की हो, कडुआ बोलने की हो या शराब पीने की हो, पड़ तो सहज भाव से जाती हैं, पर उनकी दासता से छुटकारा पाना अत्यंत कठिन है।
यह ज्ञान की उपलब्धि कि मनुष्य आत्मा में स्थित है, वह अपने शरीर के कर्मों से लिपायमान नहीं होता, वह मात्र एक साक्षी के रूप में जीवन जी रहा है, मनुष्य के अहंकार को परिष्कृत कर देता है। तब कर्म बिना कर्त्ता भाव से किए जाते हैं। कर्त्ताभाव अर्थात् अहंकार। इस भाव के किए गए कर्म फिर वासनाओं को जन्म नहीं देते, हमारे अहंभाव को नहीं बढ़ाते। ऐसे दिव्य कर्मों से मनुष्य बंधनों को नहीं प्राप्त होता। दिव्य कर्म आत्मा से उद्भूत होते हैं और केवल आत्मा के प्रकाश में ही पहचाने जाते हैं।
अगले श्लोक में भगवान् इसी बात को स्वीकार करते हुए कहते हैं-
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूवैरंपि मुमुक्षुभिः। कुरु कमैव तस्मात्वं पूवैः पूर्वतंर कृतम्॥
"पूर्वकाल में भी इसी तत्वदर्शन को जानकर प्राचीन मुमुक्षुओं ने कर्म किए हैं। तुम भी जैसे पूर्वकाल में पूर्वजों ने किया, ऐसे ही कर्मों का संपादन करो।"
भगवान् ने यही नमूना सामने रख दिया है। वे स्पष्ट कह रहे हैं कि किस तरह कर्म करना, इसमें कहीं किसी प्रकार के भ्रम में-असमंजस में पड़ने की जरूरत नहीं है। पूर्वकाल के मुमुक्ष तथा जनक आदि एवं पूर्वजों-ऋषिगणों की जीवनचर्या से शिक्षण लो।"एवं ज्ञात्वा" जहाँ प्रभु ने कहा है, वहाँ वे कह रहे हैं कि यह जानकर कि वास्तविक आत्मा ही हमारे भीतर चैतन्य रूप से विद्यमान है, उसे न किसी भी प्रकार के कर्मफल की लालसा है एवं वह न ही किसी से लिप्त है, प्राचीन मुमुक्षुओं ने कर्मों का संपादन किया एवं समाजोपयोगी जीवन जिया है। कृतं कर्म पूवैंरपि मुमुक्षुभिः। ऐसे में अर्जुन को कोई बनावटी जिंदगी नहीं जीनी है। वे तो एक शास्त्रविहित मार्ग बता रहे हैं, जिसका पूर्व मुमुक्षुओं ने श्रद्धापूर्वक अनुसरण किया है। यह एक जाना माना पथ है, परीक्षित मार्ग है एक ऐसा राजमार्ग पर चलकर बदुतो न अपनी मानसिक आसक्तियों से भवबंधनों से छुटकारा पाया है। ऐसे अनुकरणीय जीवन को चाहे वह भगीरथ का हो, विश्वामित्र का हो अथवा श्रीराम का, लक्ष्मण जी का अथवा हनुमान जी का, जनक का अथवा अष्टावक्र का जीवन जीकर वह अपने कर्मों का संपादन कर सकता है। ऐसे क्षणों को जब हम जीते हैं, तो हम अहंभाव से ऊपर उठकर कृष्ण चैतन्य में निवास करने लगते हैं, साथ ही ऐसे कर्म ही वास्तव में कर्मरहित कर्म की उपाधि पाते हैं, जिनसे व्यक्ति शुद्ध आध्यात्मिक जीवन की सहज स्थिति में पहुँच जाता है। विस्तार से इसकी व्याख्या अगले दो श्लोकों में है, जिन्हें कर्मयोग की धुरी कहा जाता है। इससे पूर्व हम परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का इस संबंध में मत देखना चाहेंगे। वे अखण्ड ज्योति के वर्ष ब्ख्, अंक स्त्र के पृष्ठ क् पर लिखते हैं, "मनुष्य का जीवन एक खेत हैं, जिसमें कर्म बोए जाते हैं और उन्हीं के अच्छे-बुरे फल पाता है। बुरे कर्म करने वाला बुराई समेटता है। कहावत है, आम बोएगा वह आम खाएगा, बबूल बोएगा वह काँटे पाएगा। बबूल बोकर आम प्राप्त करना जिस प्रकार प्रकृति का सत्य नहीं उसी प्रकार बुराई के बीज बोकर भलाई पा लेने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।" कैसे कर्म करें, इस संबंध में बाद सही मार्गदर्शन है।
स्वयं अपने जीवन में गुरुदेव ने बड़े विलक्षण प्रयोग किए। ‘हमने जीवन भर बोया एवं काटा’ शीर्षक से उनका एक प्रवचन हैं, जो ‘गुरुवर की धरोहर’ पुस्तक के भाग एक के ब्स्त्रवें से भ्ब्वें पृष्ठ में प्रकाशित है। वे लिखते हैं कि “हमारे गुरु ने हमें गायत्री के चौबीस महापुरश्चरणों की विधि बताने के बाद कहा, तुम्हारे पास जो कुछ हैं, उसे भगवान् के खेत में बोना शुरू करो, वह सौ गुना होकर फिर मिल जाएगा। उन्होंने कहा, श्रम और समय भगवान् के खेत में, जो चारों ओर समाज के रूप में तुम्हारे आसपास विद्यमान हैं, बो डालो। दूसरा बुद्धि की सारी सामर्थ्य भगवान् के निमित्त लगा दो। तीसरी चीज है भावनाएँ। भगवान् के खेत में इन्हें बो दो, तुम्हें प्रत्युत्तर में सौ गुना मिलेंगी। धन जो भी तुम्हारे पास हैं, भगवान् के खेत में बो दो, यह सौगुना होकर तुम्हें मिलेगा।” इसके पश्चात् पूज्यवर लिखते हैं, “मैंने यही किया एवं तब से बराबर ऋद्धि-सिद्धियों के लाभ पा रहा हूँ।” यही उस कर्म का सिद्धाँत है, जिसे योगेश्वर कृष्ण ने पंद्रहवें श्लोक में बताया है। अब अति महत्वपूर्ण अगले दो श्लोकों पर चलते हैं, जहाँ से दिव्य कर्म को भगवान् परिभाषित करते हैं एवं कर्म की गति को अति गहन बताते हुए कर्म रहस्य का वह मर्म प्रकाशित कर देते हैं, जो गीता के तत्वदर्शन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽषुभात्॥
कर्मणो हृापि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणष्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ -ष्लोक क्म्-क्स्त्र चतुर्थ अध्याय
“यह निर्णय करने में बड़े-बड़े बुद्धिमान लोग भी भ्रमित हैं कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इसीलिए वह कर्मतत्व मैं तुम्हें भलीभाँति समझाकर बताऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ से अर्थात् कर्मबंधन से मुक्त हो जाओ।”
“हे अर्जुन! तुम्हें भलीभाँति जानना चाहिए कि कर्म का स्वरूप क्या है? निषिद्ध कर्म क्या है तथा अकर्म क्या है? यह जानना इसलिए जरूरी है कि कर्म की गति बड़ी गहन हैं।”
गीता एक प्रकार से मानव जीवन के प्रति सूक्ष्म दृष्टि के विवेचन की दृष्टि से लिखा गया ग्रंथ है। गीताकार ने चिरपुरातन शोध के वैज्ञानिक साधनों की सूक्ष्म अवलोकन-अध्ययन विधि का प्रयोग किया है। यहाँ भगवान् कह रहे हैं कि यह जान पाना आसान नहीं एवं बड़े-बड़े बुद्धिमान ज्ञानी लोग भी इस विषय में बड़े भ्रम में हैं कि कर्म क्या हैं, और अकर्म क्या है? इसी कारण वे अर्जुन को इनकी व्याख्या समझाना चाह रहे हैं।
कर्मों का वर्गीकरण-भगवान् स्वीकार कर रहे हैं कि हमारे शास्त्रों के गहन विचारक-चिंतक-महर्षि भी इस समस्या के विषय में बड़े भ्रमित से प्रतीत होते हैं कि कर्म क्या है, अकर्म क्या है, विकर्म क्या हैं? (किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽपि अत्रमोहिताः)। यहाँ कवि से तात्पर्य ऋषि-मुनिगणों से है। इसलिए वह कहते हैं कि तुम्हें पहले बताऊँगा कि कर्म क्या है। वास्तविक कर्म समझ में आ जाने पर हम अशुभ के-अशिव के मार्ग पर पर जाने से स्वयं को बचा सकेंगे।
योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार जीवन दो भागों में बाँटा जा सकता हैं, क्रिया यानि कर्म, अक्रिया यानि अकर्म। क्रिया या कर्म को भगवान् पुनः दो भागों में बाँटते हैं, कर्म जीवन की वह क्रिया हैं, जो हमें करनी चाहिए, जिसे श्रीकृष्ण ने स्वधर्म कहा है या निष्काम कर्म नाम दिया है। विकर्म जीवन की वह क्रिया हैं, जो हमें नहीं करनी चाहिए। जो निषिद्ध हैं, जो नैतिक शास्त्र के सिद्धाँतों के अनुरूप नहीं है। जिन्हें करने से मनुष्य पाप को प्राप्त होता है। मानवी गरिमा को लाँछन लगाने वाले सभी कर्म निषिद्ध कर्म या विकर्म बताए गए हैं। पहले विकर्म को समझ लें तो कर्म एवं अकर्म को समझाना आसान हो जाएगा, अशुभ से भी मुक्ति मिलेगी।
विकर्म वे हैं जिनके बारे में समाज और शास्त्रों ने निषिद्ध किया है। इसकी व्याख्या हेतु हमें नीतिशास्त्र का सहारा लेना पड़ता हैं। नीतिशास्त्र चार बातों पर आधारित हैं, भौगोलिक परिस्थिति पर, आपकी आयु पर, आपकी योग्यता पर तथा चौथा सामाजिक परिस्थिति विशेष पर। कुछ नियम हैं तथा नहा-धोकर दोनों समय संध्या करनी चाहिए। यह नियम मध्य और दक्षिणी भारत में लागू हो सकता हैं, परंतु यही बात हिमाचल, उत्तराँचल और ठंडे क्षेत्रों पर लागू की जाए, तो संभव है कि सही न बैठे। हो सकता है कि नहा-धोकर न कर पाएं। मन की पवित्रता धारण कर ली, संध्या कर ली तो बहुत बड़ी बात है। रोज नहीं नहा पाए, तीन दिन में एक बार नहा लिया। जैसी भौगोलिक परिस्थितियाँ हैं, वैसा कार्य कर लिया। गंगोत्री-गोमुख में बैठकर वह नियम नहीं सध सकते, जो मैदानी क्षेत्र में सध सकते हैं। कुछ नैतिक नियम हैं कि महिलाओं से दूर से बात करनी चाहिए। तो यह आपकी आयु पर निर्भर करता है। छोटा बच्चा जाकर माँ को पकड़ भी लेता है व उससे चिपक भी जाता है। किंतु यही काम कोई बड़ा व्यक्ति सार्वजनिक रूप से करें, तो इसे निषिद्ध कर्म माना जाएगा।
तीसरी बात है योग्यता। आप कहाँ तक पढ़े-लिखे हैं। कहाँ तक आपकी सामाजिक उपलब्धि है। एक डॉक्टर के लिए इमरजेंसी आने पर कार से भी जाना पड़ सकता है या किसी तेज वाहन से भी। एक प्रचारक के लिए, उद्बोधन कर्ता के लिए जरूरी है कि कहीं साइकिल से भी जाना पड़े, कहीं रेल से भी व कहीं प्लेन से भी। अनिवार्य कर्म के नाते वह सब करना पड़ सकता है, जिससे समय बचे अधिक काम हो सकें। परंतु एक विद्यार्थी के लिए जिसके पास पर्याप्त समय हैं, कोई बहुत जरूरी काम नहीं है, कार का उपयोग करना, विमान का उपयोग करना विलासिता है। चौथा है सामाजिक परिस्थिति विशेष। जैन मुनियों के लिए रात्रि को करवट बदलना भी निषिद्ध है। वे करवट इसलिए नहीं बदलते कि करवट के नीचे कहीं कोई चींटी-जीव-जंतु न आ जाए। अहिंसा का अतिवाद है। जैन धर्म के अनुयायी पैदल चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं। तीर्थंकर महावीर इस सिद्धि को प्राप्त कर चुके थे, इसलिए उन्होंने वे नियम बना दिए। पर यह जरूरी नहीं कि हर सामाजिक वर्ग पर ये नियम लागू हों।
कौन-सा कर्म निषिद्ध हैं, कौन-सा करने योग्य, यह निर्धारण नीति शास्त्र पर ही हो सकता हैं एवं ऊपर बताई गई चार बातों के आधार पर ही। विकर्म वह है जिन्हें करने से नैतिकता का उल्लंघन होता है। सारे विपरीत कर्म विकर्म कहे गए हैं।
दूसरा शब्द हैं कर्म। हर क्रिया कर्म नहीं है। भोजन करना, अंगों का संचालन होना, पशुओं द्वारा सहज कार्य किया जाना कर्म नहीं हैं। तब तो चट्टानों के फिसलने पर भी यह कहा जा सकता है कि जड़ पदार्थ भी कर्म करते हैं। जब हमारा संकल्प और इच्छा क्रिया के साथ जुड़ जाते हैं, साथ ही उद्देश्य भी निर्धारित हो जाते हैं, तो वह कर्म बनता है। बिना संकल्प के कर्म में प्राण नहीं आता। कर्म में मूल तत्व हैं, उसका प्राण हैं संकल्प। संकल्पित कर्म ही हमारे प्रारब्ध का निर्माण करते हैं। यदि हमने संकल्पित कर्म नहीं किए हैं, तो हमने फिर कर्मयोग का संपादन नहीं किया है।
इसी कारण भगवान् कहते हैं कि तुम्हें जानना चाहिए कि कर्म क्या हैं? नहीं जानने से डर है कि कहीं कोई निषिद्ध कर्म को, सहज-स्वाभाविक कर्म को ही कर्म समझ बैठो। कुछ ऐसे श्रेष्ठ कर्म होते हैं, जो शास्त्रविहित हैं, जिनका परिपालन गौरवपूर्ण ढंग से उच्च कर्तव्यों के रूप में किया जाना चाहिए। कुछ ऐसे कर्म हैं जिनकी शास्त्रों द्वारा निंदा की गई हैं, उनकी उत्पत्ति हमारी निम्न प्रवृत्तियों से होती हैं, वे हमारे अहंभाव तथा दुर्वासनाओं से प्रेरित होते हैं, ऐसे कर्म विकर्म कहलाते हैं। उनसे बचना चाहिए।
अकर्म क्या हैं? अकर्म आलस्य की अवस्था को नहीं कहते। संकल्परहित कर्म ही अकर्म हैं। ईश्वर की इच्छा ही जब हमारी इच्छा बन जाती हैं, तो यह अकर्म बन जाता है, जो स्वचालित ढंग से संचालित होता रहता है। जो ईश्वर चाहते हैं, जैसा चाहते हैं, वे ही संकल्प हमारे द्वारा मूर्त होने लगें, हमारे व्यक्तित्व के माध्यम से झरने लगें, तो ऐसी उच्चस्तरीय स्थिति को अकर्म कहते हैं। अकर्म में व्यक्ति ब्राह्मी स्थिति में पहुँच सकता हैं, अतः इसे समझना बहुत जरूरी है।
अभी तो इन दोनों श्लोकों के कुछ शब्दों के अर्थों को कुछ अंश तक समझा पाने में ही सफलता मिली है। परंतु वास्तव में इनके शाब्दिक अर्थों के साथ-साथ जुड़ी अभिव्यंजनाएँ ही समझा पाएंगी कि हम कितना इस अर्थ को समझ पाए। श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म, अकर्म तथा विकर्म बड़ी पेचीदा बातें हैं। कर्म से अकर्म तथा विकर्म एवं अकर्म में कर्म तथा विकर्म आ मिलते हैं। मनुष्य को इसमें कैसे निष्काम कर्म में प्रवृत्त होना हैं, इसकी व्याख्या और विस्तार के साथ अगले अंक में।
संसार के माने हुए वैज्ञानिक आइन्स्टीन, बचपन में बड़े फिसड्डी थे। साथी लड़के उनका हमेशा मजाक उड़ाते थे। एक दिन अत्यंत गंभीरतापूर्ण उन्होंने अध्यापक से पूछा,"क्या मैं किसी प्रकार सुयोग्य बन सकता हूँ ?" अध्यापक ने उन्हें संक्षेप में एक ही उत्तर दिया,"दिलचस्पी और एकाग्रतापूर्वक अभ्यास, यही एक गुरुमंत्र है, विद्वान् बनने का।" आइन्स्टीन ने वह बात गिरह बाँध ली और विषयों के अध्ययन में तन्मय हो गए। परिणाम स्पष्ट है, वे संसार में अणु विज्ञान के पारंगत और सापेक्षवाद के जनक माने गए। उनकी वह पुरानी बुद्ध कहलाने वाली बुद्धि हजार गुनी होकर विकसित हुई।
साबरमती आश्रम में भोजन बंद के उपराँत कई अतिथि आए, उनमें पं. मोतीलाल नेहरू भी थे। कुछ भोजन बनाने की आवश्यकता पड़ी। बा उसी समय थककर लेटी थीं। उनकी आँख लग गई। आश्रम में एक ट्रावनकोर का लड़का काम करता था। एक लड़की कुसुम भी भोजन में सहायता करती थी। गाँधी जी ने इन दोनों बच्चों से कहा, “कुछ भोजन बना डालो।” वे जुट गए और प्रबंध हो गया। बा जगीं, तो उन्हें दुख हुआ। बोलीं, ‘मुझे क्यों नहीं जगाया? इन बच्चों को भी तो आराम की आवश्यकता थी।” पति-पत्नि की इसी परदुःख कातरता ने, सेवा के प्रति निष्ठा ने उन्हें विश्ववंद्य बना दिया।
महामानवों के अवतरण का एक सर्वाधिक प्रमुख लक्ष्य होता हैं लोकशिक्षण। यह कार्य वे लेखनी से भी करते हैं, वाणी से भी तथा अपने आचरण से भी। जैसा भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा हैं, मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः (ब्/क्क्) “सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।” वही बात गुरुजनों पर भी लागू होती हैं। गुरुसत्ता का अवतरण ही इसीलिए होता है कि अध्यात्म पथ के पथिकों को दैनंदिन जीवन साधना, आत्मिक प्रगति संबंधी मार्गदर्शन समय-समय पर मिल सके। हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि ऐसी गुरुसत्ता हम सभी के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती चली गई। गुरुदेव द्वारा अपने शिष्यों को लिखे पत्र इसी कारण हम प्रतिमाह परिजनों-पाठकों को पढ़वाते हैं, ताकि वे गुरुसत्ता के सूक्ष्म व कारण रूप से आज भी वही शिक्षण ले सके, जो सभी कतिपय साधकों ने स्थूल शरीर द्वारा अपनी उंगलियों से लिखी गई उनकी पाती से लिया था।
क्−ब्ख् (माह व तारीख स्पष्ट नहीं हैं) में एक साधक को लिखे पत्र में पूज्यवर लिखते हैं-
“तमोगुण की उच्च कक्षा वीरता, साहस एवं अन्याय निवारण हैं। रजोगुण की उच्च कक्षा लोक संग्रह, परमार्थ एवं पवित्रता है। सतोगुण की उच्च कक्षा प्रेम, दया एवं त्याग है। आप लोग प्रेम की भूमिका में आगे बढ़ रहे हैं, यह अतीव संतोष की बात हैं।”
पत्र को सभी पाठक दो बार पढ़े एवं इस भाषा पर ध्यान दें। गूढ़ तत्वदर्शन मानो इन तीन पंक्तियों में पिरो दिया गया है। तमोगुण, रजोगुण सतोगुण की इससे सुँदर व्याख्या और क्या हो सकती है। अपने अंदर सबके प्रति प्रेम का विस्तार ‘वसुधैव कुटुँबकम्‘ की भावना, औरों के लिए और भी अधिक त्याग करने की वृत्ति जिसमें विकसित होती चले, मानना चाहिए कि सतोगुण न केवल बढ़ रहा हैं, जिसकी उच्चतर कक्षा में हम प्रविष्ट होते जा रहे हैं। यही तीन गुण तो हैं जो किसी के व्यक्तित्व के निर्माण एवं विकास की प्रक्रिया को निर्धारित करते हैं।
क् जनवरी क्−म् का लिखा एक और पत्र यहाँ उद्धृत कर रहे हैं। जिसमें वे लिखते हैं-
“अध्यात्मिक साधनाएँ बरगद के वृक्ष की तरह धीरे-धीरे बढ़ती हैं, पर वे होती टिकाऊ हैं। आपका साधन वृक्ष सुचारु रूप से बढ़ रहा है। उस पर मनोलय आदि की सफलता के फल भी यथासमय अवश्य लगेंगे। इन कार्यों से प्रगति धीरे-धीरे होती हैं और कुछ विलंब भी लगता है। आपकी साधना कुछ ही समय में फलरूप में परिणत होने लगती।”
साधना को बरगद के वृक्ष की तरह बढ़ने की उपमा देकर मानो गागर में सागर समाहित कर दिया गया है। गीता के पुरुषोत्तम योग में योगेश्वर श्रीकृष्ण को समझाने में बीस श्लोकों का प्रयोग करना पड़ा, किंतु यहाँ यदि देखें तो इन चार-पाँच पंक्तियों में सारा-का-सारा मर्म अध्यात्म साधना का, पुरुष से पुरुषोत्तम बनने का छिपा पड़ा है। धैर्य साधना-क्षेत्र में अति अनिवार्य है। जल्दबाजी, आतुरता से असमंजस पैदा होता है एवं फिर यही आशंका क्रमशः अश्रद्धा में या चिह्न−पूजा में बदल जाती है। हर व्यक्ति सफलता देखना भी चाहता है। यह आश्वासन पूज्यवर की पाती में साकार उतरता है।
सहज भाव से लिखी एक छोटी-सी बात एक अन्य पत्र के माध्यम से जो बाँदा के श्री बद्रीप्रसाद पहाड़िया जी को ख्त्त्-ख्-भ्फ् को लिखा गया था, किस तरह संप्रेषित कर दी गई, यह देखने योग्य है। वे लिखते हैं-
“बच्चे की फीस माफ हो गई, सो ठीक है। आपके ऊपर चढ़ी हुई जन्म-जन्माँतरों की मलीनतारूपी फीस भी प्रिंसीपल परमात्मा माफ करेंगे। अब आपको गृह निवासा साधु के रूप में जीवन व्यतीत करना है।”
पत्र की भाषा देखें। बच्चे की फीस माफ होना एक लौकिक कार्य है। वह शरीरधारी एक प्रिंसीपल के बस की व बच्चे के पुरुषार्थ के वश की बात थी। पर उसी बात को परलौकिक शब्दावली के साथ जोड़ते हुए जो पूज्यवर लिख गए हैं, वह शोधकर्ताओं के लिए आगे कई वर्षों तक एक चुनौती बना रहेगा। वे लिखते हैं उपमा देकर कि इसी तरह आपकी आत्मा पर चढ़े कषाय-कल्मष, मलिनताएँ परमात्मा द्वारा साफ कर दी जाएं, ऐसी हम प्रार्थना करते हैं। यहाँ परमात्मा को प्रिंसिपल की उपमा दी गई हैं एवं फीस से आशय हैं-जन्म-जन्माँतरों से चले आ रहे मलीन आवरण। भाषा का सौष्ठव-सुगठन इससे अधिक सुँदर और क्या हो सकता है। बारंबार कलम चूमने का मन करता है। इच्छा होती है कि सतत इसी चिंतन को पढ़-पढ़कर अपनी मुक्ति का पथ भी प्रशस्त कर लिया जाए। इससे बड़ी प्रार्थना और हो भी क्या सकती है कि हम चाहेंगे कि ऐसा हो एवं आप गृह निवासी साधु के रूप में, एक सद्गृहस्थ होते हुए भी निर्लिप्त कर्म करने वाले साधक के रूप में प्रतिष्ठित हों।
मनुष्य कभी-कभी बड़ा डाँवाडोल हो जाता हैं, जीवन समर में चलते-चलते। कभी प्रगति के अवसर प्रशस्त होते दीखते हैं, तो कभी लगता है कि अब सब कुछ चुक गया, कोई भी शक्ति अब बचा नहीं सकती। अवसाद-उत्साह के हिचकोले सहज ही जीवन में आते रहते हैं। ऐसी स्थिति में पत्र लिखने पर गुरुसत्ता का प्रत्युत्तर क्या होता था, यह जान लेना ठीक रहेगा, सभी को शिक्षण भी इससे मिलेगा।
“हमारे आत्मस्वरूप ख्क्/क्क्/भ्ख्
आपका पत्र मिला। कुशल समाचार पढ़कर प्रसन्नता हुई। धूप-छाँह की भाँति मनुष्य के जीवन में तीनों गुणों के उभार आते रहते हैं। समुद्र में ज्वार-भाटे की तरह मन भी कई बार चढ़ाव-उतार के झोंके लेता रहता है। महाभारत के बाद पाँडवों ने श्रीकृष्ण जी से युद्ध के समय कही हुई गीता पुनः सुनाने की प्रार्थना की, तो श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि “उस समय मेरी जो आत्मिक स्थिति थी, वह अब नहीं है। इसलिए वह गीता तो नहीं सुना सकता, पर दूसरा अनुगीता के नाम से सुनाता हूँ।” इस प्रसंग से यह आदर होता है कि बड़े-बड़े की मनोदशा में उभार आते रहते हैं। आपको भी वैसा ही हुआ हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। साँसारिकता के जो विशेष अनुभव पिछले दिनों आए, वे भी स्थाई नहीं है। बदली हटते ही फिर सूर्य का प्रकाश प्रकट हो जाएगा। आपका आधार बहुत मजबूत है। उसे पकड़े रहने वाले व्यक्ति की कभी दुर्गति नहीं होती।”
जीवन का व्यावहारिक पक्ष कुछ ऐसा हैं, जिसमें सभी सफल नहीं हो पाते। बड़ों के, भगवान् स्तर की सत्ता के उदाहरण देकर यहाँ हमारे पूज्यवर गुरुदेव बड़ा ही स्पष्ट चिंतन सामने रखते हैं कि कोई भी अपवाद नहीं है मनःस्थिति किसी की भी कभी भी गड़बड़ा सकती है। आशावाद ही जीवन है। अंधकार कितना भी घना क्यों न हो, सूर्य कदापि आशा नहीं छोड़ता कि दिनमान नहीं होगा। वह तो भवितव्यता है। ऐसी बदलियाँ आए दिन हम सबके जीवन सूर्य पर भी आती रहती है। हमें बिना घबराए उनका सामना करते रहना चाहिए। यह जीवन जीने की कला है। यही वस्तुतः सही मायने में अध्यात्म है।
साधक के लिए एक बड़ा रोमाँचकारी विषय हैं कुँडलिनी जागरण। कब जगेगी गुरुकृपा से कुँडलिनी? कब वे विलक्षण अनुभव होंगे, यह जिज्ञासा सहज ही मन में बनी रहती है। ऐसी स्थिति में जिन्हें मार्गदर्शन नहीं मिल पाता, वे गड़बड़ा जाते हैं, जो उंगली पकड़कर गुरुसत्ता आश्रय में चलते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। वे प्रगति की ऊँची कक्षाओं को पार कर जाते हैं। कानपुर के श्री रामदास वर्मा को क्स्त्र-ख्-भ्क् का लिखा एक पत्र साक्षी रूप में प्रस्तुत हैं-
“कुँडलिनी जगाने के लिए हठयोग की क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। जब वह जागती हैं, तो सर्प की तरह फुसकारती हुई ऊपर चलती हैं और हाड़-माँस सबको चाट जाती है। अस्थि-पिंजर मात्र मनुष्य रह जाता है और उस पर फिर नया रक्त-माँस आता है। वह साधनाएँ काफी क्लिष्ट हैं। तुम्हारे लिए ब्रह्म कुँडलिनी का मार्ग उचित है। हम ऐसे सीधे मार्ग पर आपको लिए चल रहे हैं, जो तनिक भी कठिनाई या झंझट का सामना किए बिना परम लक्ष्य तक पहुँचा दें। आपकी यात्रा अत्यंत संतोषजनक रीति से आगे बढ़ रही है। आपको अपनी यात्रा ढीली मालूम पड़ती है और अधिक कष्टसाध्य तथा तीव्र उपासना करने की इच्छा होती हैं, यह आपकी प्रगति का प्रधान लक्षण है। यदि आपकी गति रुक जाएगी, तो आपका उत्साह ठंडा हो जाएगा और श्रद्धा शिथिल पड़ जाएगी। आपकी श्रद्धा और तीव्र उत्कंठा को देखकर हम यह जान लेते हैं कि आपकी प्रगति किस प्रकार हो रही है।”
पत्र बड़ा स्पष्ट हैं एवं सभी साधकों के लिए गायत्री जयंती की बेला में मार्गदर्शक है। हमारी साधना कैसी हो, किस तरह हम उसे गति दें, इस संबंध में परिपूर्ण मार्गदर्शन है। ब्रह्म कुँडलिनी का मार्ग क्या हैं, कैसे आगे बढ़ा जाए? यह पूज्यवर की लेखनी से ही विस्तृत मार्गदर्शन हम आगे प्रस्तुत करते रहेंगे। अभी तक हम गुरुदेव के लिखे पत्रों की ही बात करते रहे हैं, किंतु गुरुदेव स्वयं इसी उपर्युक्त पत्र के आरंभ में अपने भक्तों के पत्रों के बारे में क्या कहते हैं, यह पढ़कर इस लेख को विराम देंगे।
“आपका पत्र जब आता हैं, तब आँतरिक स्नेह उमड़ पड़ता हैं। पत्र को बार-बार पढ़ लेने पर भी उसे हाथ से अलग करने की इच्छा नहीं होती। पत्र के बातें तो साधारण होती हैं, पर उसके चारों ओर जो मधु चिपका होता हैं, उसका रसास्वादन करते-करते तृप्ति नहीं होती।”
माँ! बबूल का पौधा लगा देने के बाद ज्यादा देख-रेख नहीं करनी पड़ती, वह अपने आप ही इतना बड़ा क्यों हो जाता हैं? बच्चे के इस प्रश्न का माँ ने “हाँ बेटा” कहकर संक्षिप्त उत्तर दे दिया। और क्योँ माँ, गुलाब छोटे-छोटे होते हैं, एक वर्ष में ही तैयार हो जाते हैं, तो भी उनके लिए पिताजी को दिन-रात परिश्रम करना पड़ता है। वह क्यों? बच्चे ने फिर प्रश्न किया। इस बार माँ ने बच्चे की जिज्ञासा का भरपूर समाधान करते हुए कहा-”बेटे! श्रेष्ठ वस्तुएँ सदैव परिश्रम से मिला करती हैं। ऐसा न होता तो अच्छे व बुरे में अंतर ही क्या रह जाता?”
परिवर्तन की इस वेला में हमारी भूमिका अति महत्वपूर्ण
“भूकंपों, ज्वालामुखियों, दुर्भिक्षों, बाढ़ों, महामारियों का अपना इतिहास है। उनके द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला महाविनाश सुनने वालों तक के रोमाँच कर देता है। फिर भी भूमि की समस्वरता समाप्त नहीं हुई है। विनाश की चुनौतियों को स्वीकार करने में विकास पूरी तरह समर्थ हैं। निराशाजन्य परिस्थितियों की विकरालता से सभी परिचित है। तमिस्रा की व्यापकता देने वाली ऊषा अपने समय पर उदित होती रही है एवं परिवर्तन लाती रही है।” प्रस्तुत उद्धरण परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से नवंबर क्−त्त्त्त् की ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से लिया गया है। उन्होंने तब क्ख् वर्षीय युग संधि महापुरश्चरण की घोषणा की ही थी। यह भी कहा था, “इस कुसमय का अंत होते-होते कहर बरसेगा” तथा “सड़े फोड़े का गहरा मवाद यदि एक साथ ही निकलेगा, तो अधिक घिनौने दृश्य उपस्थित करेगा”, “इसीलिये इस अवधि को बारह से पंद्रह वर्षों की सृजन व ध्वंस से भरी संधि लीला में बदल दिया गया हैं, ऐसा समय आएगा, जिसमें पिछले समस्त घाटे की पूर्ति हो जाएगी, ताकि गहरी खाई पाटकर समतल ही नहीं वरन् पुष्पोद्यान के रूप में छटा भी दीखने लगे।”
यह सारा कथोपकथन एक ही लेख से हैं-’युगसंधि की द्विधा नियति-परिणति,’ जो भी कुछ ऊपर लिखा हैं, उसे घटित होते आपने-हमने-सभी ने देखा है। भयावह-से-भयावह विभीषिकाओं से विश्व-वसुधा इन दिनों गुजर रही है। कष्ट की इन प्रलयंकारी घड़ियों में भी भगवद्सत्ता के दर्शन तब होते हैं, तब मानवता के नाम पर ढेरों सद्प्रयास इस दिशा में चल पड़ते हैं। ऐसा हुआ हैं व हम सबने देखा है। समाचार पत्रों में पढ़ा भी है।
परमपूज्य गुरुदेव यह भी इसी लेख में लिखते हैं, “भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण के कारण जो अनर्थ उपजे हैं, उन्हें कोई दावानल भस्मसात् करके रख दें, यह संभव है। ऐसा समय असाधारण रूप से कष्टकारी भी हो सकता है। विपत्तियाँ और बढ़ सकती हैं। संकट और भी अधिक गहरा सकते हैं, किंतु साथ ही यह भी निश्चित है कि उज्ज्वल भविष्य का सृजन भी इन्हीं दिनों होगा। प्रतिभाएँ इन्हीं दिनों उभरेंगी और उनके द्वारा बहुमुखी सृजन की ऐसी योजनाएं भी बनेंगी, जो चरितार्थ होने पर ऐसा वासंती वातावरण बना दें, जिसकी इक्कीसवीं सदी के रूप में आशा-अपेक्षा चिरकाल से की जाती रही हैं।” (पृष्ठ भ्-भ्क् नवंबर त्त्त्त् अखण्ड ज्योति)।
ऊपर यह सब इसलिए पुनः लिखा एवं परिजनों को याद कराया, ताकि हम सब अपने चिंतन को वर्तमान त्रासदी भरे समय में भी विधेयात्मक बनाए रख सकें, मनोबल गिरने न दें और पतन की दुरभिसंधि का शिकार न हो जाएं। पिछले दिनों इतना कुछ कहा गया, लिखा गया, कभी-कभी पाठकों-परिजनों को लगता है कि अब तो इक्कीसवीं सदी आ गई। अब तो कष्टों का समापन होना चाहिए। सतयुग के चिह्न स्थान-स्थान पर दिखाई देने चाहिए। किंतु दैवी आपदा ही नहीं, दुर्बुद्धि का भस्मासुर अभी चारों ओर महाविनाश मचाता दीख रहा है। लोगों का लालच किस सीमा तक बढ़ गया है, देखा जा सकता है। तहलका से लेकर सीमाशुल्क के सभी वरिष्ठ अधिकारियों की भ्रष्टाचार में गिरफ्तारी इसकी साक्षी देते हैं। लगता है कि सारे कुँए में ही भाँग मिला दी गई हैं, जिसे पीकर सभी उन्मत्त होते दिखाई देते हैं। युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहे हैं ढेरों युद्ध आज भी विश्व में कहीं-न-कहीं लड़े जा रहे हैं। गृह युद्ध की सी स्थिति विश्वभर में चारों ओर है। आत्महत्याओं का दौर चल पड़ा है। मनोचिकित्सकों को विचित्र प्रकार की व्याधियाँ चुनौती दे रही हैं और सारे प्रयासों के बावजूद मानवी स्वास्थ्य कहीं भी नियंत्रण में आता नहीं दीखता। क्या होगा, कब होगा, कैसे होगा यह प्रश्न चिह्न सभी के समक्ष खड़ा दिखाई देता है। आखिर धैर्य की भी तो एक सीमा हैं, वह चुकती-सी नजर आती है।
हम कभी-कभी भूल जाते हैं कि पुनर्निर्माण भी अपना समय लेता है। अभी हाल ही में गुजरात में आए भूकंप का दृष्य हमारे सामने है। चारों ओर मलबा, टूटे मकान, खंडहर से दीखते महानगर, किंतु उनके बीच की आशा की किरणों की तरह मानवी पुरुषार्थ से हो रहा पुनर्निर्माण एक विरोधाभास ही सही, किंतु एक सुखद अहसास भी दिला देता है। गाड़ी पटरी से उतर जाए, तो उसे वापस पटरी पर लाने में समय लगता है। मानवी प्रयास जितने तीव्रतम स्तर पर हो सकते हैं, हो रहे हैं एवं लगता है कि आगामी एक या डेढ़ वर्षों में सारा सौराष्ट्र एवं कच्छ हमें पुनर्निमित दिखाई देगा, साथ ही नर्मदा का नीर वहाँ पहुँचकर उन्हें दुर्भिक्ष से भी राहत पहुँचा रहा होगा। हर सघन अंधकार के बाद उजाले की लालिमा लिए सूर्य की किरण आती हैं, यह याद रखा जाना चाहिए।
जहाँ चर्चा युगसंधि की चल रही हो, वहाँ इस दृश्य को व्यापक स्तर पर देखने-समझने का प्रयास करें। हजारों वर्षों की गंदगी को बुहार कर एक क्षण में नहीं हटाया जा सकता। विगत दो सहस्राब्दियों में मानव बड़ी तेजी से बौद्धिक प्रगति के चरमतम आयामों पर पहुँचा है। पिछली सहस्राब्दी की अंतिम दो सदियों तो वैज्ञानिक-औद्योगिक आर्थिक क्राँति के चरमतम सोपानों तक पहुँचाने वाली मानी जाती है। अब इक्कीसवीं सदी, जिसे आरंभ हुए मात्र कुल जमा डेढ़ सौ दिन भी नहीं हुए हैं, अपने साथ साँस्कृतिक क्राँति का उद्घोष लेकर आई है। विज्ञान और अध्यात्म के समन्वयात्मक सोपानों पर चढ़कर इक्कीसवीं सदी की मानवजाति ऐसे उपाय खोज निकालेगी कि अब ध्वंस नहीं, मात्र सृजन-ही-सृजन हो। ख्क् से लेकर ख्क्भ् तक की सारी अवधि सृजन की प्रसूति वेदना भरी घड़ियों से भरा है। नवसृजन जहाँ कहीं भी होता है, अत्यधिक कष्टदायी स्थिति में से ही होता है। यह सृजन हो रहा है, नई जगती का, नए राष्ट्र का, जिसे महानायक बनना है, सारे विश्व का एवं साँस्कृतिक नवोन्मेष की धुरी पर विकसित होने वाली मानवता का। यदि वह सब हम युगऋषि के महर्षि अरविंद के शब्दों में समझे सके तो यह अवधि जिसे हम भोगकर कष्ट के रूप में बिता रहे हैं, तप बन जाएगी एवं हम सभी योगी उस महायोगी के संरक्षण में एक महत्वपूर्ण किरदार नवनिर्माण के साक्षी होने का, युगनिर्माण में भागीदार होने का निभा जाएँगे।’अखण्ड ज्योति’ इसीलिए सभी को सदैव आशावाद का संकेत देती है एवं अपने कर्त्तव्य की जानकारी कराती रहती है।
श्री अरंविद ने क्−ब्त्त् में अपने एक पत्र में लिखा है, "इस समय में बड़ी-से-बड़ी बुरी घटनाएँ घट रही हैं और मैं कहना चाह रहा हूँ कि अभी इससे भी कहीं अधिक बुरी परिस्थितियाँ आना निष्चित है, पर इसमें घबराने की कोई बात नहीं वरन् मनुष्यों को यह समझना चाहिए कि इस प्रकार की घटनाओं का होना अनिवार्य है। इसी से एक नवीन और श्रेष्ठ संसार की रचना हो सकनी संभव है।" परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं,"यह दो महायुगों की मिलन वेला है। ऐसे में मिलन मुहूर्त का गौरव असंख्य गुँना बढ़ जाना स्वभाविक है और सचमुच यह समय ‘परिवर्तन का महापर्व’ भी बन चुका है। दृष्य जगत् के स्पंदन किसी अदृष्य महाषक्ति के सकेंतों के अनुसार तीव्रतर और तीव्रतम होते चले आ रहे हैं। श्री अरविंद ने इसी समय को भागवत् मुहूर्त के आने पर सोया रहे और उसके उपयोग के लिए तैयार न हो, जो उसके स्वागत के लिए दिया सँजोकर न रखे और उसकी पुकार से कान बंद कर ले।" (मातृवाणी)
वस्तुतः महापुरश्चरण की साधना जो बारह वर्ष तक चली है एवं जिसके अनुयाज रूप में यह बारह वर्षीय वेला ख्क् से ख्क्ख् तक की हम सब के लिए आई हैं, अपने सभी परिणाम इसी अवधि में दिखाएगी। अदृश्य वातावरण में भरे भौतिक एवं चेतनात्मक प्रदूषणों से निपटने के बाद अब उसे नवसृजन का कार्य भी करना हैं। निमित्त हम सभी को बनना है। प्रतिभाओं का अभ्युदय होना है एवं देवसंस्कृति का विस्तार विश्वभर में इन्हीं दिनों होता हैं। अवतरण की वेला में भगवान् एक नहीं, अनेकों प्रबुद्ध आत्माओं के रूप में एक साथ अवतरित होता है। यही आत्माएँ के रूप में एक साथ अवतरित होता है। यही आत्माएँ के रूप में एक साथ अवतरित होता है। यही आत्माएँ मिल-जुलकर दैवी प्रयोजनों की पूर्ति संभव कर दिखाती हैं।
‘परिवर्तन की अदृश्य किंतु अद्भुत प्रक्रिया’ शीर्षक से फरवरी क्−त्त्स्त्र के इक्कीसवीं सदी विशेषांक (अखण्ड ज्योति) में छपे गुरुसत्ता के कुछ उद्गारों को पढ़ने से आज की असमंजस की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी, हम भलीभाँति युग बदलने की प्रक्रिया को समझ भी सकेंगे। वे पृष्ठ भ्क् पर लिखते हैं "बीसवीं सदी का अंत और इक्कीसवीं सदी का आगमन, जब अपना परिपूर्ण स्थिति में होंगे, तब उनके बदलने में काफी देर लगेगी। यह समय क्रमिक गति से बदलेगा। परिवर्तन की धीमी गति से चलती हुई प्रक्रिया दिखाई देगी। इन्हें देखकर यह तो अनुमान लगाया जा सकता है कि समय गति किस दिशा में चल रही हैं, पर जो होने जा रहा हैं, वह एक क्षण में उलट जाए ऐसा नहीं हो सकता। नाटकों में परदा उलटते ही दूसरी तरह के दृश्य सामने आ खड़े होते हैं, पर युगपरिवर्तन तो बहुत बड़ी बात है। उसकी प्रक्रिया द्रुतगति से चलती हुई भी मानवी बुद्धि को धीमी ही प्रतीत होगी।"
"युग परिवर्तन की प्रक्रिया को यथावत्, यथासमय समझ सकना हर किसी के लिए कठिन पड़ेगा" "फ्क् दिसंबर सन् ख् की रात्रि को सोते समय जो नजारे देखकर सोए थे, वे क् जनवरी सन् ख्क् में सर्वथा बदले हुए दीखें, यह नहीं हो सकता। गति की तीव्रता को पहचानना सरल नहीं होता। धीमापन तो और भी अधिक समझने में जटिल होता है। छोटी बालक तो निरंतर बढ़ता रहता है, पर वह दिखाई नहीं पड़ता कि हर रोज, हर घंटे किस क्रम से कितना बढ़ रहा है।"
उदाहरणों के माध्यम से कितने सुँदर ढंग से उस तथ्य को समझाने का प्रयत्न किया गया है, जिसे हम सामान्य बुद्धि से जोर लगाने पर भी समझ नहीं पाते। हमें तो उनका महामानवों का संदेश सुन "करिष्ये वचंन तव" की भाषा बोलनी चाहिए। इसी इक्कीसवीं सदी अंक में पृष्ठ म्ब् पर वे लिखते हैं,"जो घटित होने वाला है, उस सफलता के लिए श्रेयाधिकारी-भागीदार बनने से दूरदर्शी विज्ञजनों में से किसी को भी चूकना नहीं चाहिए। यह लोभ-मोह के लिए खपने और अहंकार प्रदर्शन के लिए ठाठ-बाट बनाने की बात सोचने और उसी स्तर की धारणा, रीति-नीति अपनाए रहने का समय नहीं है श्रेय संभावना की भागीदारी में सम्मिलित होने का सुयोग्य-सौभाग्य जिन्हें अर्जित करना हैं, उन्हें हमारी ही तरह भौतिक जगत् में संयमी-सेवाधर्मी बनना पड़ेगा।"
गायत्री जयंती की वेला में सब हम याद करते हैं तो पाते हैं कि परमपूज्य गुरुदेव हमारे लिए मार्गदर्शक संजीवनी, अपने विचार छोड़ गए हैं, जो हमारा समय-समय पर मार्गदर्शन करते रहते हैं, साथ ही शाँतिकुँज व देवसंस्कृति विश्वविद्यालय परिसर के रूप में एक विराट् छावनी भी। इक्कीसवीं सदी के आगमन की वेला में इस गायत्री जयंती पर हम सबका अतिरिक्त पुरुषार्थ होना चाहिए कि हम शांतिकुंज रूपी गुरुसत्ता के स्थूलशरीर-दृश्यमान-प्रतिमा-शांतिकुंज से जुड़े रहें, कम-से-कम इन संधिकाल के बारह वर्षों में प्रतिवर्ष एक सत्र अवध्य कर लें। वह सुखद-सौभाग्य भी इस वर्ष बड़े अनुपम रूप में विशिष्ट एकाँत में किए जा सकने वाले प्राण-प्रत्यावर्तन स्तर के पाँच दिवसीय साधना सत्र के रूप में आ रहा है। अभी त्त्ख् कमरों की ही व्यवस्था हो पाई है, जिनमें चौबीस घंटे एकाँत में गुरुचेतना के सान्निध्य में रहा जा सकेगा। त्रिपदा ख् नाम से बने इन कमरों में टेपरिकॉर्डर द्वारा ध्यान-साधना, त्रिकाल संध्या से लेकर अमृतवाणी-मातृवाणी का आनंद भी लिया जा सकेगा। परमवंदनीया माताजी के भोजनालय में बने सात्विक आहार से अपना परिशोधन-पुनर्निर्माण हो सकेगा। आश्विन नवरात्रि से यह शृंखला आरंभ होनी है, जो चैत्र नवरात्रि ख्ख् तक अनवरत चलती रहेगी। हमें परमपूज्य गुरुदेव की अप्रैल क्−− में लिखी महाप्रयाण से कुछ पूर्व की वेला की पंक्तियाँ याद आ जाती है "नवसृजन के आधार, उपकरण, औजार या साधन यहाँ वह समुदाय है, जिस शांतिकुंज के महागरुड़ ने अंडे बच्चों की तरह अपने डैनों के नीचे छिपा कर रखा हैं। उनको समर्थ एवं परिपुष्ट बनाने की प्रक्रिया इसी तंत्र के अंतर्गत चलती रहेगी।"
भारी उज्ज्वल है। हमारी जीवन-साधना प्रखर हो तो ही हम श्रेयाधिकारी बन सकेंगे, वह तथ्य निश्चित मानना चाहिए। हम श्रेष्ठ गायत्री साधक बनें, अपने इष्ट (जो भी हमारा हो) उससे यही प्रार्थना करें कि बुद्धि के अकाल का प्रकोप, दैवी प्रकोपों की इस वेला में कहीं हम पर न आ सवार हो, हम सद्बुद्धि को धारण किए उस महायात्रा पर अनवरत चलते रहें, जिस राह पर वह अनोखा बाजीगर हमें अनायास ही खड़ा कर गया है।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का निर्माणाधीन महाविद्यालय का भवन अब गायत्री कुँज में बनकर तैयार है। इसमें सातों आँदोलन के प्रशिक्षण का तंत्र गुरुपूर्णिमा से आरंभ हो सकेगा। इस विश्वविद्यालय को स्वतंत्र अपने पैरों पर खड़े करने की प्रारंभिक प्रक्रिया भी आरंभ हो चुकी है। अभी यहाँ चार फैकल्टीज आरंभ कर हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय श्रीनगर से संबद्धता ली जा रही है। क्रमशः एक-दो वर्ष यह स्वतंत्र विश्वविद्यालय के रूप में कार्य कर सकेगा। इसके लिए फैकल्टी के सदस्यों के आवासों का निर्माण भी आरंभ हो चुका है। इसी के साथ-साथ ॐ आकार का ‘स्वास्थ्य फैकल्टी’ का विराट अनुसंधान केंद्र भी खड़ा होना आरंभ हो चुका है। परिजनों में से वरिष्ठ प्रतिभाशाली स्तर के ऐसे विभूतिवानों को इसमें भागीदारी हेतु आह्वान किया जा रहा है, जो साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य स्वावलंबन चारों विधाओं के पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया में सहयोग दे सकें। चूँकि विभिन्न भाषाओं का भी शिक्षण चलेगा, सभी भारतीय व विदुषी भाषाओं के विद्वानों-अनुवादकों का योगदान भी अपेक्षित है।
गायत्री परिवार की पृष्ठभूमि साधना है। गुरुवर की चौबीस लक्ष की महापुरश्चरण साधना ने वह आधार खड़ा किया कि आज चारों और गायत्री महाविद्या के विस्तार की बात गूँजती सुनाई देती है। हमारा बारह वर्षीय महापुरश्चरण पुरुषार्थ सन् ख् में ‘सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ’ के साथ संपन्न हुआ। कइयों के मन में असमंजस है कि अब इसके बाद क्या। क्या साधना मात्र इतनी ही अवधि के लिए थी ? क्या इस वर्ष कुछ और इस संदर्भ में नहीं किया जाना हैं ? अब आगामी वर्षों की रीति-नीति क्या सामाजिक आँदोलनों की सुधारात्मक-रचनात्मक कार्यक्रमों की धुरी पर बनेगी ? तो क्या साधना का इसमें कोई स्थान नहीं ?
परिजनों को-पाठकों को यही स्पष्ट करना है कि इस वर्ष वसंत पंचमी (ख्क्.क्.ख्क्) से आरंभ हुए हीरक जयंती वर्ष का मुख्य केंद्र बिंदु है- जीवन साधना एक आंदोलन बन जाए। हमारे व्यक्तित्व को भी वह आँदोलित कर दे एवं इसी की धुरी पर सारे समाज में नवनिर्माण की गतिविधियाँ संचालित हो पड़े। यह सब तभी हो पाएगा जब हमारे परिजन, विराट् गायत्री परिवार के घटक, पूज्यवर के-गुरुसत्ता के अंग-अवयव अपनी साधना से कदापि पीछे न हटकर और भी सक्रिय हों। श्रेष्ठ साधक ही युगनिर्माण का भागीरथी लक्ष्य पूरा करने में सहायक सिद्ध होंगे।
इसी उद्देश्य से जीवन साधना आँदोलन जो जन-जन द्वारा विभिन्न संप्रदायों-मतों के लोगों में क्रियान्वित होना है, के साथ-साथ गायत्री अभियान साधना को भी इस वर्ष गति देने का मन है। गायत्री महाविज्ञान भाग-ख् के अंतिम पृष्ठों में इसका विस्तार से वर्णन है। यहाँ संक्षेप में इसकी क्रियापद्धति दी जा रही है, जो गायत्री जयंती क् जून ख्क् से आरंभ की जा सकती है। यह साधनाक्रम छिटपुट रूप में पूज्यवर द्वारा मथुरा से एवं हरिद्वार से पहले भी आरंभ किया गया था। आज सूर्य पर बढ़ते कलंकों-विक्षोभों एवं धरती पर संभावित ध्वंस की घुमड़ती घटाओं को देखकर इस एक वर्ष की साधना को यदि गायत्री परिवार के पच्चीस प्रतिशत कार्यकर्त्ता भी मन लगाकर कर सकें, तो इससे महाविनाश से जूझने की सामर्थ्य भी मिलेगी एवं सूक्ष्मजगत् में कार्य कर रही ऋषि सत्ताओं के शक्ति संवाहक-दूत श्रेष्ठ साधकों के रूप में मिल सकेंगे।
गायत्री अभियान साधना पंचमुखी गायत्री माता का एक नैष्ठिक अनुष्ठान है, जो पाँच लाख गायत्री मंत्र ज पके माध्यम से एक वर्ष में पूरा होता है। एक वर्ष की तपश्चर्या साधक के व्यक्तित्व को निखार देती है। साधक को प्राणशक्ति से भर देती है। इससे उसका आत्मबल बढ़ता है एवं साधक अपने अंदर-बाहर चारों ओर एक दैवी शक्ति की उपस्थिति की अनुभूति करता है।,
पंचमुखी गायत्री का वर्णन आलंकारिक रूप में आता है। वास्तव में यह गायत्री महाशक्ति के पाँच विभाग हैं, ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। यह पांचों चरण पाँच देवताओं के भी प्रतीक है। ॐ गणेश, व्याह्नति-भवानी, तीन चरण, ब्रह्मा, विष्णु और महेश। यह पांचों गायत्री के पाँच प्रमुख शक्तिपुंज कहे जा सकते हैं। पंचतत्वों से समस्त प्रकृति का, मानवी काया का संचालन हो रहा है। जीव को चारों ओर से पाँच कोषों ने आच्छादित कर रखा है, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय कोष। पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पंचप्राण, चैतन्य पंचक (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आत्मा)। ये सभी पंचमुखी गायत्री की प्रस्फुटित प्रेरणाएं हैं। इस अभियान साधना के फलस्वरूप साधक की मनोवृत्ति में शोधन होता है तथा पंचकोशों के जागरण की पृष्ठभूमि तैयार हो जाती है।
इस साधना को, जिसमें एक वर्ष में पाँच लाख गायत्री मंत्र का जप विधिवत पूरा किया जाता हैं, किसी भी शुक्लपक्ष की एकादशी से आरंभ किया जा सकता है। परंतु इसके लिए शुभारंभ कर श्रेष्ठतम समय गायत्री महाशक्ति के अवतरण की शुक्लपक्ष की दशमी के अगले दिन से माना गया है। यही मुहूर्त सबसे उत्तम है। जिस एकादशी से यह अनुष्ठान क्रम आरंभ हो, उसी एकादशी को अगले वर्ष पूर्ण हो, इसका ध्यान रखा जाए। इस वर्ष यह मुहूर्त ख् जून ख्क् (गायत्री जयंती के अगले दिन) से आरंभ होकर आगामी वर्ष की गायत्री जयंती के अगले दिन तक के लिए है। इस साधना के कुछ नियम है। ये बड़े कड़े भी नहीं हैं और वर्षभर अपनी दैनंदिन क्रियाओं के साथ भी निभाए जा सकते हैं। ये नियम इस प्रकार है-(क्) माह की दोनों एकादशियों को चौबीस माला जपनी चाहिए। साधारण दिनों में प्रतिदिन क् मालाएँ जपनी चाहिए। बिना गिनती की चिंता किए क् मालाएँ एक घंटे में तथा चौबीस मालाएँ ढाई घंटों में पूरी करने की, पूर्णतः भावविह्वल होकर जप करने की बात सोचनी चाहिए।
(ख्) वर्ष में तीन ऋतु संध्याएँ (नवरात्रि-नवदुर्गा) आती हैं। वर्षा के अंत व शीत के आरंभ में आश्विन शुक्ल क् से − तक, शीत के अंत व ग्रीष्म के आरंभ के चैत्र शुक्ल क् से − तक तथा ग्रीष्म के अंत और वर्षा के आरंभ में ज्येष्ठ शुक्ल क् से − तक। चूँकि दशमी का भी समान महत्व है एवं गायत्री जयंती का दिन तीसरी नवदुर्गा में पूर्णाहुति का हैं, इसलिए तीनों ऋतु संध्याएँ दस दिन की मानी जाती है। इनमें प्रत्येक में चौबीस माला प्रतिदिन के हिसाब से तीन चौबीस हजार के अनुष्ठान पूरे हो जाते हैं।
(फ्) अंतिम दिन (ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी ख्ख्) को चौबीस मालाओं के रूप में विशेष जप एवं हवन करके पूर्णाहुति की जाए।
यदि संख्या का हिसाब सही ढंग से बिठा लें, तो यह पूरा उपक्रम वर्षभर में पाँच लाख का पूरा कर देता हैं। लक्ष्य के साथ नियमों को निभाकर की गई इस साधना के प्रतिफल भी विशेष ही मिलेंगे। संख्या का हिसाब इस प्रकार हैं-
(अ) बारह माह की चौबीस एकादशियों को प्रतिदिन चौबीस मालाओं के हिसाब से ख्ब्’ख्ब्=भ्स्त्रम् मालाएँ।
(ब) दस-दस तीन की कुल तीन नवदुर्गाओं में प्रतिदिन की ख्ब् मालाओं के हिसाब से फ्’ख्ब्=म्ख् मालाएं।
(स) वर्ष के फ्म् दिनों में से शेष फ्म् दिनों में दस माला प्रतिदिन के हिसाब से फ्म् मालाएं।
(द) प्रति सप्ताह रविवार को पाँच माला अतिरिक्त जपी जाएं। इस प्रकार भ्ख् भ्=ख्म् मालाएं।
(इ) अंतिम दिन चौबीस मालाओं द्वारा पूर्णाहुति।
इस प्रकार सब मिलाकर कुल पाँच लाख का जप पूरा हो जाता है। इस दौरान माह की दोनों एकादशियों का उपवास करना चाहिए। उपवास में दूध, दही, छाछ, शाक जैसे तरल द्रव्य, सात्विक पदार्थ लिए जाएं। यदि एक समय भोजन कर काम चला सकें, तो थोड़ा तप सध सकेगा। उपवास की अवधि में पानी कई बार पिया जाए। बालक, वृद्ध, गर्भिणी या कमजोर प्रकृति के व्यक्ति चाहें तो दो बार सात्विक आहार ले सकते हैं।
तीनों नवरात्रियों में कामसेवन, पलंग पर सोना, दूसरे व्यक्ति से हजामत बनवाना, चमड़े के जूते पहनना, मद्यमाँस का सेवन आदि विशेष रूप से वर्जित हैं। शेष दिनों में सामान्य क्रम रखा जा सकता है। यदि सध सके, तो बावन रविवार तथा चौबीस एकादशियों में भी ये नियम न्यूनाधिक करें, तो अच्छा है। हर माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को क्त्त् मंत्रों से गायत्री हवन कर लें या पूर्णिमा के दिन दीपयज्ञ के माध्यम से उस मास की पूर्णाहुति कर लें।
अभियान साधना एक प्रकार से लक्ष्यवेधन की साधना है। विशिष्ट किसी प्रकार के और मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है। मात्र शांतिकुंज संरक्षण हेतु पत्र भेजकर अपना साधनाक्रम आरंभ किया जा सकता है। गायत्री जयंती से यदि आरंभ न हो सके, तो इसे आगामी मास में आरंभ कर इसी माह में एक वर्ष बाद समाप्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए। बीच-बीच में जो भी साधना संबंध अनुभूतियाँ हों, उन्हें लिखते चलें, एक डायरी लेखन का क्रम बनाते चलें। नित्य दैनंदिन कार्य करते हुए भी इस सुनिश्चित लक्ष्य वाली साधना को निश्चित ही पूरा किया जा सकता हैं, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।
प्रातः-साँय दोनों समय जप किया जा सकता हैं। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में अधिक समय भी मिल जाता हैं, मन भी लगता है। अतः तीन-चौथाई अंश सबेरे पूरा कर लेना चाहिए। ज पके समय मस्तक के मध्य भाग अथवा हृदय क्षेत्र में प्रकाश पुँज गायत्री का ध्यान करते रहना चाहिए। सूतक, यात्रा, बीमारी आदि के दिनों में भी बिना माला के मानसिक जप चालू रखना चाहिएं। किसी दिन साधना छूट जाए, तो प्रायश्चित की एक अतिरिक्त मास के साथ अगले दिन उसे कर लिया जाए।
गायत्री जयंती पर सभी साधकों से यही भावभरा आह्वान है कि स्वयं की साधना को और प्रखर बनाएँ। जितना बन सके, इस अभियान साधना में भागीदारी करें इस वर्ष शांतिकुंज में आश्विन नवरात्रि ख्क् से चैत्र नवरात्रि ख्ख् तक की अवधि में विशिष्ट प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के पाँच-पाँच दिवसीय साधना सत्र लगाए जा रहे हैं। प्रयास करें कि अभियान साधना में भाग लेने वाले परिजन यहाँ अथवा अपने पास के शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों पर वर्ष में न्यूनतम एक सत्र तो संपन्न कर लें। यहाँ तो स्थान सीमित हैं, पर सभी से पत्राचार किया जा सके, तो कुछ की व्यवस्था तो जाँच-पड़ताल कर बनाई जा सकती है। गायत्री जयंती पर्व से आरंभ की जाने वाली यह अभियान साधना सभी के लिए मंगलमय पथ प्रशस्त करें, ऐसी माँ से प्रार्थना है
हमारा यह अखिल विश्व गायत्री परिवार जिस एक धुरी पर खड़ा है, जो उसके संसाधनों का स्त्रोत हैं, वह है प्रत्येक भावनाशील का स्वेच्छा से दिया गया नियमित अंशदान-समयदान। इसी ने इतना बड़ा तंत्र खड़ा कर दिया कि उसकी क्षमता की कल्पना भी नहीं जा सकती। मुट्ठीफंड से काँग्रेस चले, यह मंत्र महामना श्री मालवीय जी स्वतंत्रता-प्राप्ति के पूर्व उस जन आँदोलन को देना चाहते थे। उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की तरह उनके साथ आसनसोल जेल में बंद हमारी गुरुसत्ता ने इस मंत्र को गाँठ बाँध लिया एवं अपने इस तंत्र को जनशक्ति के बल पर खड़ा कर दिया। भावनाशीलों के श्रम-सीकरों में कितनी शक्ति होती है, यह कारगिल युद्ध की वेला में हमारे परिजनों ने दिखाया। जब थोड़े ही समय में सवा करोड़ रुपये की राशि उन्होंने एकत्र कर दिखाई। अब गुजरात त्रासदी की वेला भी कुछ ऐसी ही है।
हमने परिजनों से फरवरी-मार्च की अखण्ड ज्योति में अनुरोध किया था कि यदि हम समय-समय पर आने वाली आपदाओं के लिए समय रहते एक निधि खड़ी करने की व्यवस्था कर लें, तो ठीक रहेगा। सरकार से कभी भी एक कौड़ी की सहायता न लेने वाला गायत्री परिवार अभी तक गुजरात भूकंप त्रासदी में जो कुछ भी कर पाया हैं, वह सभी परिजनों के अंशदान से ही संभव हो पाया है। इसके अतिरिक्त तप के माध्यम से सप्ताह में एक दिन के एक समय के व्रत की बात कही गई थी एवं यह बताया था कि यह बचत सीधे शांतिकुंज भेजी जानी चाहिए, जहाँ कि इसकी राहत कार्य हेतु सदैव त्वरित व्यवस्था हेतु उपयोगिता रहेगी। हमने परिजनों को बताया था कि यदि मात्र साढ़े छह लाख पाठक जो ‘अखण्ड ज्योति’ से जुड़े हैं, अपनी स्वयं की एक समय की भोजन की राशि बचा सकें, तो इससे एक माह में बीस रुपये प्राप्त होगी। वर्षभर में यह राशि बासठ करोड़ रुपये हो जाती है। यदि गायत्री परिवार के नैष्ठिक-प्राणवान् भावनाशील समर्थक-शुभेच्छुओं की संख्या पाँच करोड़ सारे भारत व विश्व में मान ली जाए, तो प्रति व्यक्ति एक हजार रुपया प्रतिवर्ष की बचत के साथ यह राशि पाँच हजार करोड़ हो जाती है। इससे कितने बड़े काम हो सकते हैं, कल्पना की जा सकती है।
सरकार के पास सीमित साधन है। वह भी तो जनता से लेकर हमें सुविधाएं देती है। अब शासकीय खरच बढ़ जाने ये प्रायः सभी राज्य सरकारें दिवालिया हैं। केंद्रीय शासन तंत्र कर्जे में कार्य कर रहा है। हम अपने स्तर पर ही इतना बड़ा तंत्र खड़ा कर सकते हैं कि आने वाले समय में अखिल विश्व गायत्री परिवार अपने बलबूते ही कई रचनात्मक आँदोलन चलाया सके, राष्ट्र सृजनात्मक गतिविधियों को अंजाम दे सके। प्रत्येक परिजन से यह प्रार्थना है कि वे अपने सभी पाठक मित्र परिजन-हितैषी शुभेच्छुओं से, नवयुग लाने को इच्छुक परिजनों से कर बद्ध याचना करें कि इस वर्ष में वे सभी इसी निधि का घट भर दें। बूँद-बूँद से घड़ा भरता है एवं बूँदों के संग्रह से ही सरोवर विनिर्मित होता है। एक बूँद पानी का कितना महत्व होता हैं, यह अभी ‘वाटर हारवेस्टिंग‘ (पानी की खेती) से दुर्भिक्ष निवारण के युद्धस्तरीय उपायों से नजर आता है।
यदि सभी भावनाशील एकजुट होकर इस एक वर्ष ख्क्-ख्ख् में गायत्री जयंती तक एक हजार रुपया प्रति व्यक्ति बचत एकत्र कर शांतिकुंज भेज सके, तो सात सौ जिलों का आपदा प्रबंधन तंत्र भी खड़ा किया जा सकेगा। किंतु यह बचत तप पर आधारित होनी चाहिए। तप अर्थात् फिर अतिरिक्त न खाना, फलाहार न लेना, मात्र एक समय बिना भोजन-दूध अतिरिक्त किसी वस्तु के भूखे रह लेना। इससे सप्ताह में एक बार अवकाश मिल जाने से शरीर भी स्वस्थ रहेगा एवं एक समय की भोजन की राशि बच जाएगी। यह राशि प्रतिमाह ‘आपदा राहत अंशदान’ श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट शांतिकुंज हरिद्वार-ख्ब्−ब्क्क् के पते पर एम. ओ., चेक या डीडी द्वारा भेज दी जानी चाहिए। यह नियमित अंशदान के अतिरिक्त हो, यह ध्यान रखें।
एक दूसरी महत्वपूर्ण बात है आपदा प्रबंधन वाहिनी की इसके लिए चुस्त स्वस्थ स्काउटिंग की मानसिकता वाले ऐसे स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण का तंत्र खड़ा किया जाना हैं, जो अपने वार्ड, मुहल्ले या ग्राम से लेकर क्षेत्र में आने वाली किसी भी विपत्ति में तुरंत एकजुट होकर पहुँच सके एवं बचाव (रिक्स्यू), राहत (रिलीफ) तथा पुनर्वास (रिहैबिलिटेषन) का कार्य संभाल सके। इनके विधिवत प्रशिक्षण की व्यवस्था बनाई जा रही हैं संभवतः यह प्रशिक्षण जुलाई माह से आरंभ हो सकेगा। अपनी तैयारी अभी से रखें एवं प्रशिक्षक बनने है अपना पत्राचार केंद्र से कर लें। इसमें चिकित्सा, भोजन, आपूर्ति निर्माण से जुड़े कारीगर, इंजीनियर्स तथा मजबूत काठी वाले श्रम करने वाले स्वयंसेवकों को वरीयता दी जाएगी। दोनों ही कार्य आपाद् धर्म की तरह इस गायत्री जयंती से सभी को आरंभ कर देना चाहिए।
गंगा बंदी थी सुरपुर में, भगीरथ ने मुक्त कराया। भगीरथ का ही प्रचंड तप, मृत्युलोक में सुरसरि लाया॥
गंगा बंधन मुक्त हो गई, राजा, रंक सभी को तारा। पतित और पावन दोनों के लिए खुल गया उसका द्वारा॥
इतना ही क्यों, निज प्रवाह को कोटि-कोटि जन तक पहुँचाया॥ पतित पावनी गायत्री भी, कीलित ही मानी जाती थी।
कुछ विशिष्ट लोगों द्वारा ही बना ली गई निज थाती थी। पर गुरुवर के प्रचंड तप ने, जन-जन को उपलब्ध कराया॥
अब ‘गायत्री’ विश्वव्यापनी, आदि शक्ति होती जाती है। ऊँच-नीच का भेद भुला सबके पातक धोती जाती।
गुरुवर श्रीराम शर्मा ने युग भगीरथ का यश पाया॥ आओ! नमन करें गंगा के, गायत्री के भगीरथ को।
श्रद्धा सुमन चढ़ाएं आओ! कोटि-कोटि जन उद्धारक को। उन्हें गायत्री जयंती पर, गायत्री ने गले लगाया॥
-मंगलविजय ‘विजय’
*समाप्त*