विविध रोगों की यज्ञोपचार प्रक्रिया-2

अथर्ववेद के तीसरे काँड के ‘दीर्घायु प्राप्ति’ नामक 11वें सूक्त में ऐसे अनेक प्रयोगों का उल्लेख है, जिनमें यज्ञाग्नि में औषधीय सामग्री का हवन करके कठिन-से-कठिन रोगों का निवारण एवं जीवनी शक्ति का संवर्द्धन किया जा सकता है। इसी सूक्त में उल्लेख है-

यदि क्षितायुर्यदि व परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव। तमा हरामि निऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय॥

अर्थात् यदि व्यक्ति की आयु क्षीण हो गई हो, जीवनी शक्ति समाप्त हो गई हो और वह मरणासन्न हो, तो भी यज्ञ चिकित्सा के माध्यम से वह व्यक्ति रोग के चंगुल से छूट जाता है और सौ वर्ष तक जीवित रहने की शक्ति प्राप्त करता है।

सभी जानते हैं कि हृष्ट-पुष्ट शरीर न केवल रोगों से सुरक्षित रहता है, वरन् जीवन के सारे आनंद निरोग एवं पुष्ट शरीर वाला मनुष्य ही भोगता है। हवन में जो औषधीय एवं पुष्टिकारक पदार्थ डाले जाते हैं, उनके सूक्ष्म परमाणु शरीर में पहुँचकर उसे परिपुष्ट बनाते हैं। पुष्टिकारक एवं रोगनिवारक औषधियों-पदार्थों का खाना भी काया को बल प्रदान करता है, अतः इन्हें अवश्य खाया जाना चाहिए, परंतु उससे भी अधिक उपयोगी इनका हवन कर उससे उत्पन्न यज्ञीय ऊर्जा का लाभ उठाना है। हवन में दो गुण विशेष हैं- प्रथम यह कि खाने में संभव है कि एक साथ अधिक पौष्टिक पदार्थों का सेवन कर लेने पर लाभ के स्थान पर हानि उठानी पड़े, परंतु हवन के साथ यह समस्या नहीं रहती। उसके सूक्ष्म परमाणु सीधे रक्तप्रवाह में पहुँचते हैं और पाचन शक्ति पर कोई बोझ नहीं डालते। तभी तो पुत्रेष्टि यज्ञ में जब खाने के पदार्थों से वीर्य पुष्ट नहीं होता और अधिक खाने से पाचन शक्ति बिगड़ती है, उस समय हवन यज्ञ में डाले गए पौष्टिक पदार्थों के सूक्ष्म परमाणु सीधे रक्त में पहुँचकर आँतरिक शोधन करते हैं और मनवाँछित परिणाम प्रस्तुत करते हैं। दूसरे यज्ञीय ऊर्जा से परिमार्जित वस्तुओं की स्वच्छता एवं स्थिरता बढ़ जाती है। शारीरिक-मानसिक रुग्णता को हटाने-मिटाने में यज्ञ चिकित्सा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पिछले अंक में बताया जा चुका है कि किस रोगी के लिए किस स्तर की हवन सामग्री प्रयुक्त की जाए। सामान्य रोगों के लिए सर्वोपयोगी हवन सामग्री एवं सूर्य गायत्री मंत्र का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। इसे हर स्तर का व्यक्ति अपनाकर हर प्रकार की दुर्बलता एवं रुग्णता से छुटकारा पा सकता है। आगे की पंक्तियों में सर्वप्रथम पाचन तंत्र से संबंधित कुछ रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री का वर्णन किया जा रहा है, क्योंकि समस्त रोगों का उद्भव पाचन तंत्र की गड़बड़ी पर निर्भर करता है।

लीवर (यकृत) एवं तिल्ली तथा उससे संबंधित रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री का उल्लेख अखण्ड ज्योति के पिछले अंक में किया जा चुका है। यहाँ आम उदर रोगों जैसे अपच, वमन, डायरिया, हैजा, बवासीर आदि को दूर करने के लिए प्रयुक्त होने वाली विशेष हवन सामग्री का वर्णन किया जा रहा है। इसके साथ पूर्व वर्णित हवन सामग्री-’नंबर एक’ अर्थात् (1) अगर, (2) तगर (3) देवदार (4) चंदन (5) रक्त चंदन (6) गुग्गुल (7) लौंग (8) जायफल (9) चिरायता और (10) असगंध को भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन किया जाता है। यज्ञोपचार का पूर्ण लाभ तभी मिलता है।

(2) अपच अर्थात् भोजन न पचना एवं संबंधित रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री-

अपच के लिए निम्नाँकित औषधियों को बराबर मात्रा में लेकर तैयार किया जाता है-

(1) तालीसपत्र (2) तेजपत्र (3) पोदीना (4) हरड़ (5) अमलतास (6) नागकेसर (7) कालाजीरा (8) सफेद जीरा।

हवन करने के साथ ही उपर्युक्त आठों चीजों के कपड़छन चूर्ण को मिलाकर सुबह-शाम एक-एक चम्मच मट्ठा या जल के साथ रोगी को खिलाने से शीघ्र लाभ मिलता है।

(3) वमन अर्थात् कै, उल्टी तथा संबंधित रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री-

इसके लिए निम्नलिखित चीजों को मिलाकर हवन सामग्री तैयार की जाती है-

(1) वायविडंग (2) पीपल (3) छोटी पिप्पली (4) ढाक या पलाश के बीज या सूखे फल (5) गिलोय (6) निशोथ (7) नींबू की जड़ या सूखे फल (8) आम की गुठली (9) प्रियंगु (10) धाय के बीज

उक्त सभी दस चीजों के महीन छने हुए चूर्ण को सुबह-शाम एक-एक चम्मच शहद से खिलाना भी चाहिए।

(4) उदर रोग के लिए विशेष हवन सामग्री-

इसके लिए जिन औषधियों को हवन सामग्री बनाने में प्रयुक्त करते हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं-

(1) चव्य (2) चित्रक (3) तालीस पत्र (4) दालचीनी (5) आलूबुखारा (6) छोटी पिप्पली।

हवन करने के साथ-साथ इन छह चीजों को मिलाकर बनाए गए सूक्ष्म चूर्ण को एक-एक चम्मच जल के साथ सुबह-शाम रोगी को खिलाते रहना चाहिए।

(5) दस्त, डायरिया एवं संबंधित रोगों के लिए प्रयुक्त होने वाली विशेष हवन सामग्री-

(1) सफेद जीरा (2) दालचीनी (3) अजमोद (4) चित्रक (5) बेलगिरी (6) अतीस (7) सोंठ (8) तालमखाना (9) ईसबगोल (10) मौलश्री की छाल (11) तालमखाना (12) छुआरा।

उपर्युक्त सभी बारह चीजों को हवन के साथ ही सूक्ष्म चूर्ण बनाकर घोट-पीस एवं कपड़े से छानकर एक-एक चम्मच सुबह शाम दही या मट्ठे के साथ रोगी को पिलाते रहना चाहिए। जब दस्त लग रहे हों, तो परहेज का, पथ्यापथ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है। ऐसी स्थिति में दूध व दूध से बने मीठे पदार्थ, तली-भुनी चीजें एवं गरिष्ठ चीजें नहीं देनी चाहिए।

(6) हैजा की विशेष हवन सामग्री

(1) धनिया (2)कासनी (3) सौंफ (4) कपूर (5) चित्रक।

इन्हीं पाँचों हव्य पदार्थों के सूक्ष्म पाउडर को हवन के साथ-साथ एक-एक चम्मच सुबह-शाम खिलाते रहना चाहिए।

(7) आँव-पेचिश आदि के लिए विशेष हवन सामग्री

(1) मरोड़फली (2) अनारदाना (3) पोदीना (4) आम की गुठली (5) कतीरा।

हवन के साथ-साथ उक्त पाँचों के महीन चूर्ण को जल के साथ एक-एक चम्मच सुबह-सायं रोगी को खिलाते रहने से द्विगुणित लाभ मिलता है।

(8) पाइल्स अर्थात् बवासीर, अर्श एवं तत्संबंधित रोगों के लिए विशिष्ट हवन सामग्री-

खान-पान की गड़बड़ी से प्रायः कब्ज बने रहने एवं अमीबायोसिस आदि के कारण यह बीमारी अधिकाँश लोगों में पाई जाती है। शुष्क एवं रक्तार्श दोनों ही स्थितियों में निम्नलिखित औषधियों से बनी हवि सामग्री अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।

(1) नागकेशर (2) हाऊबेर (3) धमासा (4) दारुहल्दी (5) नीम की गुठली (निमोनी) (6) मूली के बीज (7) जावित्री (8) कमल केशर (9) गूलर के फूल।

इन सभी नौ चीजों को मिलाकर बारीक चूर्ण करके कपड़े से छान लेना चाहिए और हवन के साथ सुबह-शाम एक-एक चम्मच जल के साथ रोगी व्यक्ति को खिलाते रहना चाहिए।

असह्य पीड़ा की स्थिति में निम्नलिखित औषधियों की धूप भी दी जा सकती है। इस संबंध में वृहत् निघंटु-10, में उल्लेख है-

अश्वगंधोऽथ निर्गुण्डी वृहती पिप्पली फलम्। धूपोऽयं र्स्पशमात्रेण र्ह्यशसं शमने ह्यलम्॥

अर्थात् अश्वगंधा, निर्गण्डी, बड़ी कटेरी (कंटकारी), एवं पिप्पली, इन्हें अग्नि में जलाकर धूप देने से बवासीर-अर्श की पीड़ा शाँत होती है।

भावप्रकाश, निघंटु एवं अन्यान्य आयुर्वेद ग्रंथों में विभिन्न रोगों के लिए यज्ञोपचार में प्रयुक्त होने वाली कितनी ही वनौषधियों का वर्णन किया गया है। उनमें से हवन सामग्री में काम आने वाली कुछ प्रमुख वनौषधियों के नाम इस प्रकार हैं-ब्राह्मी, शतावरी, अश्वगंधा, विधारा, जटामाँसी, मंडूकपर्णी, शालपर्णी, इंद्रायण की जड़, मकोय, अड़ूसा, गुलाब के फूल, अगर, तगर, रास्ना, क्षीरकाकोली, पंडरी, प्रोक्षक, तालमखाना, बादाम, मुनक्का, जायफल, जावित्री, बड़ी इलायची, बड़ी हरड़, आँवला, बहेड़ा, छोटी पीपल, पुनर्नवा, नगेंद्र वामड़ी, चीड़ का बुरादा, गिलोय, चंदन, कपूर, केशर, गुग्गल, पानड़ी, मोथा, चिरायता, पितपापड़ा आदि। हवन सामग्री बनाने के लिए इन सभी औषधियों को बराबर मात्रा में लिया जाता है तथा इनका दसवाँ भाग शक्कर एवं आठवाँ भाग शहद डालकर गोघृत में लड्डू बनाकर सूर्य गायत्री मंत्र से हवन किया जाता है।

(9) विष निवारण की विशिष्ट हवन सामग्री-

(1) वन तुलसी के बीज (2) अपामाग्र (3) इंद्रायण की जड़ (4) करंज की गिरी (5) दारुहल्दी (6) चौलाई के पत्ते (7) विनौला गिरी (8) लाल चंदन।

हवन के साथ ही इन्हीं आठ चीजों को मिलाकर बारीक चूर्ण बनाकर सुबह-शाम एक-एक चम्मच जल के साथ देते रहने से तत्काल लाभ मिलता है।

यज्ञ-हवन से रोगोपचार की महिमा अनंत है। आवश्यकता मात्र औषधि चयन, नियमितता एवं भाव-श्रद्धा की गहनता की त्रिवेणी के समन्वय की है। औषधि चयन के संदर्भ में आयुर्वेद ग्रंथों में कहा भी गया है-

सुरभीणि सुपुष्टेश्च कारकाणि सितादिकम्। द्रव्यारामादाय जुहुयाच्चतुर्थं रोगनाशकम्॥

अर्थात् सुगंधित, पुष्टिकारक, मधुर एवं रोगनाशक चार प्रकार के पदार्थों का हवन करने से नानाप्रकार के रोगों का निवारण होता है। क्रमशः


स्वतंत्रता का अर्जन

परतंत्रता जन्मजात है। वह तो प्रकृतिप्रदत्त है। हममें से किसी को उसे अर्जित नहीं करना होता। होश सँभालते ही मनुष्य पाता है कि वह परतंत्र है। वासना की जंजीरों के साथ ही उसका इस जगत् में आना हुआ है। अगणित सूक्ष्म बंधन उसे बाँधे हुए हैं। इन बंधनों की पीड़ा हर पल उसे सताती है। परतंत्रता में भला कोई सुखी भी कैसे हो सकता है।

सुखी होने के लिए तो स्वतंत्रता चाहिए। यह स्वतंत्रता किसी को भी जन्म के साथ नहीं मिलती। इसे तो अर्जित करना होता है और यह उसे ही उपलब्ध होती है, जो उसके लिए श्रम एवं संघर्ष करता है। स्वतंत्रता के लिए मूल्य देना होता है। हो भी क्यों नहीं? जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, वह निर्मूल्य नहीं मिल सकता।

ध्यान रहे, प्रकृति से मिली परतंत्रता दुर्भाग्य नहीं है। दुर्भाग्य तो है स्वतंत्रता को अर्जित न कर पाना। दासता में जन्म लेना बुरा नहीं है, पर दासता ढोते हुए, दास स्थिति में ही मर जाना अवश्य बुरा है। अंतस् की स्वतंत्रता को पाए बिना जीवन में कुछ भी सार्थकता और कृतार्थता तक नहीं पहुँचता है।

वासनाओं की अँधेरी काल-कोठरियों की कैद में जो बंद हैं, जिन्होंने विवेक का निरभ्र व मुक्त आकाश नहीं जाना है, समझना यही चाहिए कि उन्होंने जीवन तो पाया, पर वे जीवन को जानने से वंचित रह गए। उन्होंने न तो खुली हवा में साँस लेने का सुख पाया, न ही अनंत आकाश में चाँद-सितारों की जगमगाहट देखी। सुबह के सूरज की उजास का भी वे अनुभव नहीं कर पाए, क्योंकि ये सारे अनुभव स्वतंत्रता के हैं।

पिंजड़ों में कैद पक्षियों और वासनाओं की कैद में पड़ी आत्माओं के जीवन में कोई भेद नहीं, क्योंकि दोनों ही स्वतंत्रता एवं स्वामित्व का आनंद नहीं पा सकते।

प्रभु को जानना है, तो हर मनुष्य को चाहिए कि वह स्वतंत्रता का अर्जन करे। जो परतंत्र, पराजित और दास हैं, प्रभु का राज्य उनके लिए नहीं है।


भारतभूमि स्वर्गादपि गरीयसी

प्रचलित इतिहास में हमें बचपन से यह ज्ञान दिया जाता है कि हमारे पूर्वज आर्य जाति के यायावर जंगली (अर्द्ध सभ्य) लोग थे और वे मध्य एशिया के रहने वाले थे। उन्होंने उत्तर-पश्चिम भाग से भारत में प्रवेश किया। यहाँ उस समय एक सहस्र वर्ष से भी अधिक समय से सिंधु घाटी की सभ्यता फल-फूल रही थी, जिसके निवासी मूलतः द्रविड़ थे। आक्राँता आर्यों ने इस सभ्यता को रौंद दिया व द्रविड़ों को दक्षिण की ओर खदेड़ा। फिर कुछ सदियों में वेदों की रचना की, संस्कृत का प्रचार पूरे भारत में किया व महान् गंगा सभ्यता का निर्माण किया।

हमारे पूर्वजों का विदेश से आने वाला यह बर्बर, जंगली एवं असभ्य रूप एक भी ठोस तथ्य पर आधारित नहीं है, बल्कि भारत विद्वेषी यूरोपीय शासकों, मिशनरियों एवं इतिहासकारों द्वारा कल्पित षड्यंत्र का एक हिस्सा था। इस छद्म जाल से सावधान रहने की चेतावनी देते हुए, स्वतंत्रता का मंत्र देने वाले बंकिमचंद्र चटर्जी ने देशवासियों से कहा था, मुझे तुम लोगों को अपनी चेतावनी कड़े शब्दों में कह देनी है, क्योंकि तुम लोगों को प्रमाणित करने वाले यूरोपीय विद्वानों की सामान्य वृत्ति हमारे भूतकालीन इतिहास को लाँछित करने की है। उसकी गौरवमय स्मृतियों को तुम लोगों के मस्तिष्क से मिटाने की है और तुम लोगों को विपरीत दिशा में भटकाने की है। विदेशी बहकावे में अपने गौरवमयी अतीत को भुलाने की यह बात आज भी प्रासंगिक है।

सच तो यह है कि आर्यों का विदेशी आक्राँता होने का मत कभी भी किसी ठोस तथ्य पर आधारित नहीं रहा है। झूठ के आधार पर खड़ा इसका वैचारिक महल आज सत्यान्वेषियों के शोध-निष्कर्षों के प्रहारों से धराशायी हो गया है। आर्य विदेश से आए बर्बर आक्राँता थे, भारत के मूल निवासी नहीं, इस मत को सर्वप्रथम चुनौती स्वामी दयानंद सरस्वती ने दी, जिन्होंने स्पष्ट किया कि वेद में उल्लेखित आर्य शब्द कोई जाति न होकर नैतिक व आँतरिक गुण का परिचायक है।

इसके बाद स्वामी विवेकानंद ने अपनी दिव्य शक्ति से देशवासियों को अपने अतीत की गौरव-गरिमा से परिचित करवाया। उन्हें न केवल भारतीय ग्रंथों का अनुभूत बोध था, बल्कि पाश्चात्य इतिहास एवं धर्म का भी गहन ज्ञान था। उन्हें आर्यों के संदर्भ में पश्चिम की कुटिलता को समझने में देर न लगी। तभी तो अमेरिका के एक भाषण में उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा था, “तुम्हारे पाश्चात्य विद्वान् आर्यों को विदेशी भूमि से आकर आदिवासियों की भूमि छीनकर उन्हें भगा, वहाँ निवास करने की बात करते हैं। यह सब विशुद्ध बकवास है, मूर्खतापूर्ण-नादान बातें हैं। आश्चर्य कि हमारे भारतीय विद्वान् भी इन्हें आँख मूँदकर मानते हैं।” स्वामी जी ने दुःखी होकर कहा था कि ये सब भयंकर झूठ हमारे बच्चों को पढ़ाए जाते हैं।

आगे चलकर श्री अरविंद ने अपने ग्रंथ ‘सिक्रेट ऑफ दि वेदाज’ में देशवासियों को वेद के संदर्भ में यूरोपीय विद्वानों की दुर्भाग्यपूर्ण गलत धारणाओं से सावधान एवं सचेत किया है और उत्तर-पश्चिम से आर्य आक्राँताओं के सिद्धाँत को निराधार एवं अनिश्चित तथ्यों पर आधारित बताया है। उनके अनुसार इसका वेदों में कहीं उल्लेख नहीं है। इसी तरह आर्य एवं द्रविड़ों की भिन्नता भी भ्राँतिपूर्ण तथ्यों पर आधारित है। तमिल के गहन अध्ययन के उपराँत श्री अरविंद ने संस्कृत एवं तमिल के बीच गहन संबंध पाया व दोनों भाषाओं को एक विलुप्त आदि भाषा की दो शाखाओं के रूप में देखा।

श्री अरविंद के 10 वर्ष बाद गणितज्ञ एवं भाषाविद् आर. स्वामीनारायण अय्यर भी द्रविड़ भाषाओं के गहन शोध के आधार पर तमिल व संस्कृत के बीच गहन संबंध के निष्कर्ष पर पहुँचे। उनके अनुसार द्रविड़ क्रियाएँ (verbes) इंडो-आर्यन श्ज्ञबछज्ञै। क्ज्ञ था, जो समय के साथ बहुत विकृत हो गया व पहचानना बहुत कठिन हो गया है। दक्षिण भारत के ही भाषाविद् एवं गणितज्ञ एन. एस. राजाराम का भी अपने शोध-निष्कर्षों के आधार पर कहना है कि द्रविड़ भाषाएँ संस्कृत की तरह समरूपता पर प्रकाश डालती हैं। कुछ मायनों में द्रविड़ भाषाओं ने संस्कृत के प्राचीन स्वरूप को हिंदी जैसी उत्तर भारतीय भाषाओं की अपेक्षा बेहतर ढंग से संरक्षित रखा है।

भारतीय संविधान के निर्माता वी.आर. अंबेडकर भी अपने वेदों के अध्ययन-अनुशीलन के उपराँत इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि आर्यों के आक्राँता होने का मत एक ऐसा आविष्कार है, जो तथ्यों पर आधारित नहीं है। यह सिद्धाँत पूर्व कल्पनाओं पर आधारित है, जिसमें तथ्यों को तोड़-मरोड़कर इन्हें सिद्ध करने के लिए प्रयुक्त किया गया है। वेदों में आर्य नाम की जाति का कोई उल्लेख नहीं है। वेदों में आर्य जाति द्वारा भारत पर आक्रमण का भी कोई प्रमाण नहीं है। भारत के मूल निवासी दास-दस्युओं पर विजय, आर्य एवं दस-दस्युओं के बीच जातिभेद जैसी किसी चीज का प्रमाण नहीं है। न ही इसके बीच रंगभेद जैसी किसी बात का उल्लेख है। यदि मानवशास्त्र (Anthropology) एक विज्ञान है, जो जाति का निर्धारण करने में सहायक है, तो इसकी खोज यह सिद्ध करती है कि ब्राह्मण और अछूत एक ही जाति के हैं। यदि ब्राह्मण आर्य हैं, तो अछूत भी आर्य हैं। यदि ब्राह्मण द्रविड़ हैं, तो अछूत भी द्रविड़ हैं।

आर्यों के संबंध में न ही वेद और न ही अन्य संस्कृत ग्रंथों में भारत के बाहर किसी मूलभूत गृहभूमि का उल्लेख आया है। वास्तव में आर्यों की भूमि के संदर्भ में आए सभी स्थान जैसे सप्तसिंधु, आर्यावर्त, भारतवर्ष सभी भारतीय प्रायद्वीप में ही हैं। रामायण, महाभारत व पुराणों में भी उच्चस्तरीय विकसित सभ्यता की चर्चा भारत में ही है, जो कई सहस्राब्दियों तक चली।

बहुचर्चित लेखक भगवान् एस. गिडवाणी ने भी अपनी पुस्तक ‘रिटर्न ऑफ द आर्यन्स’ में इस ऐतिहासिक विश्वास का खंडन किया है कि यूरोपीय मूल के आर्यों ने उत्तर-पश्चिम से भारत में घुसकर हड़प्पा सभ्यता को तहस-नहस किया था। श्री गिडवाणी ने यह निष्कर्ष भारत, यूरोप एवं एशिया के लगभग 20 देशों के लोगों में युगों से प्रचलित आर्यों के गीतों, पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक प्रमाणों के मंथन से निकाला है। उनका दृढ़ विश्वास है कि आर्य मूल रूप से भारतवर्ष के निवासी थे।

1920-22 में भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में हुई खुदाई ने इस विषय पर गहन प्रकाश डाला है। इसके बाद के वर्षों में कई अन्य स्थानों पर भी ऐसे ही स्थल पाए गए, जो इस सभ्यता की व्यापकता ही नहीं, बल्कि इसके विकसित स्वरूप पर भी प्रकाश डालते हैं। इस सभ्यता को सिंधु घाटी की सभ्यता नाम दिया गया था, लेकिन बाद की खोजों के अनुसार यह सभ्यता मुख्यतः सरस्वती नदी के किनारे बसी थी। अतः इसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता कहना अधिक उचित होगा। यह 1500 से 1900 ई. पू. तक फली-फूली। अब तक खोजे गए लगभग 1500 स्थलों के आधार पर यह पूर्वानुमानित सीमा से कहीं अधिक व्यापक थी। इसका विस्तार पश्चिम में ईरान की सीमाओं तक, उत्तर में कश्मीर और हिंदुकुश पर्वत से आगे तुर्कमानिया, बैकट्रिया, तजाकिस्तान के पामीर पर्वतों के चरणों तक, दक्षिण में गोदावरी नदी तक तथा पूर्व में दिल्ली से भी आगे तक, लगभग 20 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में था। जो समकालीन मिश्र या मेसोपोटामिया की सभ्यता से बहुत बड़ी थी। यह निस्संदेह महानतम सभ्यताओं में एक थी।

सिंधु-सरस्वती क्षेत्र में हुए तमाम पुरातत्त्वीय खोजों से ऐसा कोई प्रमाण हाथ नहीं लगा है, जो आर्यों के बाहर से आने की बात को सिद्ध करे। यहाँ के बरतन, हथियार, लिपि, कला, मूर्तियाँ आदि इसकी पुष्टि नहीं करते। इसके विपरीत इस सभ्यता का वैदिक स्वरूप ही प्रमाणित होता है।

ऋग्वेद में न केवल जहाजरानी एवं समुद्री जहाजों का उल्लेख है, बल्कि नगरों से लेकर व्यापार एवं उद्योगों का भी उल्लेख है, जो सभी सिंधु-सरस्वती सभ्यता के साथ साम्य रखते हैं व इनका मध्य एशिया के यायावरों से कोई संबंध नहीं बैठता। इस सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता इसकी नगरीय विकास एवं व्यवस्था थी, जिसका स्तर यूरोप में 2000 वर्षों बाद देखने को मिलता है। इसके विदेशों में आँमन, बहरान, सुमेर जैसे देशों से व्यापार संबंध थे। इसके ‘लोथल’ को विश्व की सर्वप्रथम बंदरगाह (dockyard) एवं ज्वारीय अवरोधक (tidal lock) होने का गौरव प्राप्त है।

यहाँ पाई गई मुद्राओं से धार्मिक प्रचलनों का वैदिक स्वरूप उजागर होता है। देवताओं की मूर्तियाँ योगमुद्रा में बैठी या खड़ी पाई गई हैं। अग्नि पूजा, शक्ति उपासना, नंदी, पशुपति, शिव आदि रूपों में वैदिक सभ्यता के सशक्त प्रमाण मिले हैं। योग-आसन में ध्यान करते हुए योगी की मुद्रा, उस समय की योग-साधना पर प्रकाश डालते हैं। सैकड़ों मुद्राओं से उपलब्ध रहस्यमयी सिंधु लिपि का संस्कृत से संबंध पाया गया है।

अपने व्यापक रूप में सिंधु-सरस्वती सभ्यता वैदिक स्वरूप की थी अर्थात् जिसकी साँस्कृतिक पृष्ठभूमि वेद से जुड़ी थी। 6000 वर्ष पुरानी मिट्टी से ऐसा कुछ नहीं खोदा गया है, जो (आज हिंदू धर्म के रूप में) प्रचलित वैदिक सभ्यता से कुछ भिन्नता लिए हो। आर्य आक्राँता दर्शन के प्रबल समर्थक जॉन मार्शल भी ‘मोहनजोदड़ो एण्ड द इंदु सिविलाइजेशन’ में यह कहने के लिए बाधित हुए कि सिंधु घाटी के लोगों का धर्म इतना भारतीय है कि इसे वर्तमान हिंदू धर्म से किसी भी रूप में अलग नहीं ठहराया जा सकता। मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा दोनों जगह की सभ्यता एक आरंभिक सभ्यता नहीं है, बल्कि एक परिपक्व सभ्यता है, जिसके पीछे सहस्राब्दियों का मानवीय श्रम निहित है।

सिंधु-सरस्वती सभ्यता की प्रमुख नदी सरस्वती का आज भले ही कोई अस्तित्व न हो। लेकिन पुरातत्त्वीय खोजों से इसके पुरातन अस्तित्व का पता चलता है। उपग्रहीय चित्रों के द्वारा इसको प्रमाणित किया जा चुका है। यह हिमालय के चरणों में शिवालिक की पहाड़ियों से बहती थी। पंजाब में अंबाला के समीप मैदानों को छूती थी। सिंधु नदी के प्रायः समानाँतर चलती हुई राजस्थान के रेगिस्तानों से होती हुई अंततः गुजरात में कच्छ के रन में जाती थी और वहाँ अरब सागर में गिरती थी। यह तीन से दस कि.मी. चौड़ी एक विशाल नदी थी। एक समय सतलज एवं यमुना भी इसी की धाराएँ थीं। इनका प्रवाह 10,000 ई.पू. समाप्त हुए अंतिम हिमयुग में हिमालय के ग्लेशियर एवं बर्फशिलाओं के पिघलने के कारण अक्षुण्ण था। विस्तृत अन्वेषणों से यह तथ्य उजागर हुआ है कि सरस्वती नदी ने कई बार बाढ़ एवं भूकंपों के कारण अपनी राह बदली, जिससे सतलज नदी सिंधु नदी की ओर व यमुना पूर्व की ओर अपना रुख बदलती चली गई। प्रमाणों से यह भी स्पष्ट होता है कि बीच में सदियों लंबे सूखे पड़े, जिसके कारण सरस्वती कई खंडों में खंडित हो गई व अंततः 2000 ई. पूर्व तक पूर्णतः सूख गई।

वैदिक काल में ऋषि-मुनियों (आर्यों) के क्रिया–कलापों-तप-साधना की यह केंद्रीय स्थली रही है। ऋग्वेद काल में यह अपने पूरे वेग से प्रवाहित होती थी। आर्य लोग इसके किनारे रहते थे व इसके विविध अनुदान-वरदानों से अभिभूत होकर इसका स्तुतिगान करते थे। ऋग्वेद में इसकी स्तुति श्रेष्ठ माँ व श्रेष्ठ नदी के रूप में की गई है। (ऋग्. 2-41/16)।

ऋग्वेद, महाभारत एवं अन्य पुराणों से नदी की स्थिति का ज्ञान इसके किनारे बसे तीर्थस्थलों के रूप में हो जाता है। ऋग्वेद में लिखा है कि यह महान् नदी पर्वत से सागर तक बहती है। महाभारत में इसके रेगिस्तान में विलुप्त होने की बात कही गई है। आर्यों का विदेशी आक्राँता मत इन सभी ग्रंथों को 1000 ई.पू. के बाद के काल का बताता है अर्थात् सरस्वती नदी सूखने के 1000 वर्ष बाद की बात करता है, जो पूरी निराधार सिद्ध होता है।

सूखे में सरस्वती नदी का अंत हुआ। इससे कई अन्य क्षेत्र भी प्रभावित हुए थे। मेसोपोटामिया की सुमेरन सभ्यता भी इसी में क्षत-विक्षत हो गई थी। सिंधु-सरस्वती सभ्यता के पतन के साथ इसके वासी पहले यमुना के नए प्रवाह की ओर बढ़े और फिर गंगा की ओर आए। यहीं उन्होंने नई सभ्यता का निर्माण किया, जो हम सबको विरासत में मिली है, जिसके आधार पर हम गर्व के साथ यह कह सकते हैं कि हमारे आदि पूर्वज ‘आर्य’ भारतवासी ही थे। जिन्होंने अपनी इस भारतभूमि को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ बनाया।


Quotation

भलाई का पुरस्कार पाने और बुराई का दंड भुगतने में देर नहीं लगती। आत्मा के संतोष और पश्चाताप के रूप में वह हाथों-हाथ मिलता है।


सूर्य की भाँति देदीप्यमान (Kahani)

सुलोचना ने जीवनभर पतिव्रत की कठोर साधना द्वारा मेघनाद को वह बल प्रदान किया था कि उसके आगे देवता भी नहीं टिक सकते थे। ऐसे अपराजेय योद्धा को मारने वाले महारथी लक्ष्मण को भी यह सौभाग्य उनकी महान् पतिव्रता उर्मिला ने ही प्रदान किया था। उर्मिला भारतीय नारी के गौरवमय इतिहास का चंद्रमा, जिसने चौदह वर्ष तक अपने पति की अनुपस्थिति में पलक ऊपर उठाकर किसी पुरुष के दर्शन भी नहीं किए थे। उसने राज्य-भोग, आभूषण और स्वादयुक्त भोजनों का केवल इसलिए परित्याग कर दिया था, क्योंकि उसके पति वनवासी थे। ऐसी निष्ठाएँ भारतीय समाज को वह शक्ति प्रदान करती रही हैं, जिनकी यश-गाथाएँ आज भी विश्व-इतिहास के अंतरिक्ष में सूर्य की भाँति देदीप्यमान हैं।


सत्य की अभीप्सा

सत्य की खोज में सर्वाधिक अनिवार्य तत्त्व है ‘साहस’। स्वयं के यथार्थ को जानने का साहस। हम जो हैं, वैसे ही स्वयं को जानना सबसे अधिक जरूरी है। यह काम है तो बहुत कठिन, लेकिन इसके बिना सत्य में कोई गति भी संभव नहीं है। स्वयं के यथार्थ को जानने से ज्यादा बड़ा तप और क्या है? लेकिन सत्य की उपलब्धि के लिए वही मूल्य चुकाना होता है। उससे ही व्यक्ति की सत्य के प्रति अभीप्सा की घोषणा होती है। स्वयं के प्रति सच्चाई ही तो सत्य के प्रति प्यास की प्रगाढ़ता की अभिव्यक्ति है।

असत्य के तट से जो स्वयं को बाँधे हुए हैं, वह अपनी नौका सत्य के सागर में कैसे ले जा सकेगा? असत्य के तट को तो छोड़ना ही होगा। वह तट ही तो सत्य की यात्रा के लिए बाधा है। वह तट ही तो बंधन है। संभव है कि उस तट में सुरक्षा का आभास होता हो। यह सुरक्षा का मिथ्या आभास और उसकी चाहत ही तो असत्य का गढ़ है। सत्य की यात्रा में सुरक्षा का मोह नहीं, वरन् अज्ञात को जानने का अदम्य साहस चाहिए। असुरक्षित होने का जिसमें साहस नहीं है, वह अज्ञात का खोजी भी नहीं हो सकता।

तनिक सोचें तो सही, क्या इस झूठी सुरक्षा की चाहत ने हमारी सत्ता के सत्य को आवृत नहीं कर रखा है। क्या हमारी सारी वंचनाएँ सुरक्षा की ही आयोजनाएँ नहीं हैं? यह कैसी उलटबाँसी है कि आज लोभी त्यागी बना है। शोषक दान करता है। हिंसक ने अहिंसक के वस्त्र पहन रखे हैं और घृणा से भरे चित्त प्रेम की भाषा बोल रहे हैं। यह आत्मवंचना बहुत सुगम है। नाटकों में अभिनय कब कठिन रहे हैं। अभिनय के बाजार में सुँदर मुखौटे सदा से ही सस्ते दामों में मिलते रहे हैं। लेकिन याद रहे, जो सौदा ऊपर से सस्ता है, अंततः वही सबसे महँगा सिद्ध होता है, क्योंकि जो व्यक्ति मुखौटों में सत्य को छिपाता है, वह स्वयं से और सत्य से निरंतर दूर होता चला जाता है।

सत्य और उसके बीच एक अलंघ्य खाई बन जाती है। फिर तो उसकी आत्मा स्वयं के अनावरण के भय से सदा ही त्रस्त रहने लगती है। वह फिर स्वयं को छिपाता ही चला जाता है। वस्त्रों के ऊपर वस्त्र, मुखौटों के ऊपर मुखौटे। असत्य अकेला नहीं आता है। उसकी सुरक्षा के लिए उसकी फौजें भी आती हैं। असत्य और भय का फिर ऐसा जाल बन जाता है कि उसके ऊपर आँखें उठाना भी असंभव हो जाता है। व्यक्ति जब स्वयं के ही मुखौटों के उठ जाने के भय से पीड़ित हो, तो वह सत्य के पात्र को उघाड़ने की हिम्मत और सामर्थ्य कहाँ से जुटा सकता है?

यह शक्ति तो स्वयं को उघाड़ने के साहस से ही अर्जित होती है। सत्य का साक्षात्कार करने के लिए तो भयभीत चित्त शत्रु है। उस दिशा में तो बस अभय ही मित्र है। चित्त की अभयता उसे ही प्राप्त होती है, जो स्वयं के यथार्थ को स्वयं ही सब भाँति उघाड़कर भय से मुक्त हो जाता है। स्वयं को ढकने से भय बढ़ता जाता है और आत्मा शक्तिहीन होती जाती है, किंतु स्वयं को उघाड़ते ही ज्ञान के प्रकाश में सारे भय अपने आप ही भाग जाते हैं और शक्ति के अभिनव और अमित स्रोतों की उपलब्धि होती है। यही साहस है, स्वयं को उघाड़ने और जानने की क्षमता ही साहस है।

ब्रह्म विद्या पाने की दिशा में यही पहला और अनिवार्य चरण है। सत्यकाम ने यही साहस किया था। ऋषि हरिद्रुमत गौतम के आश्रम में पहुँचकर उसने ऋषि के चरणों में सिर रखकर कहा, आचार्य मैं सत्य की खोज में आया हूँ। ऋषि ने उससे पूछा, वत्स तेरा गोत्र क्या है? तेरे पिता कौन हैं? उनका नाम क्या है?

उस किशोरवय सत्यकाम की वाणी से निःसंकोच सत्य प्रस्फुटित हो उठा। उसने बिना किसी हिचक के कहा, “भगवन्! मुझे अपने गोत्र का ज्ञान नहीं है। न ही मैं अपने पिता को जानता हूँ। हाँ, मेरी माँ का नाम जाबाला है। इसलिए मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।”

हरिद्रुमत इस सरल सत्य से अभिभूत हो उठे। उन्होंने उस किशोर को हृदय से लगा लिया और बोले, “मेरे प्रिय! तू निश्चय ही ब्रह्मविद्या का अधिकारी है, क्योंकि जिसमें स्वयं के प्रति सच्चा होने का साहस है, सत्य स्वयं ही उसे खोजता हुआ उसके द्वार आ जाता है।”


पाप प्रकट करने में लज्जा (Kahani)

एक चोर संत नानक के पास पहुँचा और इस बुरी आदत से छुटकारा पाने का उपाय पूछा। नानक ने जो उपाय बताए, वे उससे निभते नही थे। किसी प्रकार भी वह आदत न छूटी, तो उन्होंने चोर को बताया कि तुम अपने पाप सबके सामने प्रकट करने लगो। चोर को पाप प्रकट करने में लज्जा लगती थी, सो उसने चोरी करना ही बंद कर दिया।


इक्कीसवीं सदी में सविता देवता के तेवर

सौरमंडल में सूर्य प्रधान है। वेदों के अनुसार सूर्य मनुष्य को जगाकर अभीष्ट कार्य करने में प्रवृत्त करते हैं। ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ कहकर सूर्य को सभी चराचर की आत्मा माना गया है। इस समस्त भूमंडल पर सर्वसाक्षी सूर्य सर्वत्र गूढ़ विचरण कर जीवों और मनुष्यों की गतिविधियों को देखते हैं। ग्रीक भाषा में सूर्य को ‘हेलियस’ कहा गया है। इस शब्द का अर्थ है तेजोमय।

सूर्य का यह तेज उसमें उत्पन्न अनंत ऊर्जा का परिणाम। इसी ऊर्जा के कारण पृथ्वी में प्राण का संचार होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी से आग के गोले के रूप में दिखने वाले सूर्य में भी हलचलें होती हैं। जो सौरज्वाला एवं काले धब्बों के रूप में देखी जा सकती हैं।

हालाँकि सूर्य सौरमंडल की मुख्य धुरी है, परंतु अपनी आकाशगंगा में यह भी एक छोटा-सा तारा है। सूर्य और पृथ्वी के मध्य 14 करोड़ 96 लाख किलोमीटर का फासला है। फिर भी सूर्य की किरणें यह लंबी दूरी मात्र आठ मिनट में तय कर लेती हैं। सूर्य का व्यास 13 लाख 92 हजार किलोमीटर है, जबकि पृथ्वी का लगभग 12 हजार 756 कि.मी. है। यह कल्पना करना आसान नहीं है कि पृथ्वी से कई गुना बड़ा एवं भारी सूर्य एक जलता हुआ पिंड है।

इसके समस्त भागों का तापमान एकसमान नहीं होता। इसका सतही तापमान लगभग 6000 डिग्री सेल्सियस है। सूर्य की रोशनी और गरमी के पीछे सौर ऊर्जा कार्य करती है। यही ऊर्जा पृथ्वी का प्राण है। इसी प्राण से पृथ्वी में जीवन का विकास संभव हो सका है। यह ऊर्जा सूर्य के केंद्र में न्यूक्लियर क्रिया से उत्पन्न होती है। इसके परिणाम-स्वरूप हाइड्रोजन गैस हीलियम में परिवर्तित होती रहती है। सूर्य के केंद्र में 5640 लाख टन हाइड्रोजन एक सेकेंड में 5400 लाख टन हीलियम में बदल जाती है। इससे 40 लाख टन हाइड्रोजन के बराबर की ऊर्जा किरणों के रूप में सूर्य से बाहर निकलती है। सूर्य प्रति सेकेंड 3.8 फ् 10-26 ‘जे’ ऊर्जा अंतरिक्ष में उत्सर्जित करता है।

पिछले पाँच अरब वर्षों से सूर्य अपनी गैस को ऊर्जा में परिवर्तित करता चला आ रहा है। ऊर्जा की खपत भी उसी अनुरूप होती है। इसकी सतह का जो तापमान है, वह पूरी सतह पर एकसमान नहीं है। सूर्य के फोटोस्फीयर में 6000 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान होता है। इसमें अनियंत्रित गैसों की एक परत क्रोमोस्फियर होती है। इन दोनों के बीच एक और परत होती है, जिसका तापमान 4500 डिग्री सेंटीग्रेड होता है। यह सूर्य का सबसे ठंडा प्रदेश होता है। इसे सूर्यग्रहण के प्रारंभ एवं अंत में मैग्नेटा फ्रीज के रूप में देखा जा सकता है।

सूर्य के जिस सतही स्थान पर तापमान कम होता है एवं अँधेरा व ठंडा मात्र होता है, उसे ‘मन स्पॉट’ कहा जाता है। सन स्पॉट का तापमान अपनी निकटवर्ती गैस के तापमान से 2000 सेंटीग्रेड कम होता है। यह फोटोस्फीयर में काले धब्बे के रूप में होता है। इनकी संख्या एक हजार से चालीस हजार के बीच होती है। ये धब्बे जोड़ी या समूह में भ्रमण करते हैं तथा इनका जीवनकाल कुछ दिनों से लेकर कुछ महीनों तक होता है। इन धब्बों को खोजने का सर्वप्रथम श्रेय महान् वैज्ञानिक गैलीलियो का जाता है।

सूर्य कभी शाँत नहीं रहता। उसके अंदर हलचलें उठती रहती हैं। ये हलचलें कभी-कभी इतनी तीव्र होती हैं कि सूर्य की सतह पर ऊँची-ऊँची ज्वालाएँ फूट पड़ती हैं। अमेरिकी भौतिकविज्ञानी यूनीन नॉरमन पार्लर के अनुसार हाइड्रोजन और हीलियम की आयनीत गैस से बनी एक धारा लगातार और अनवरत रूप से सूर्य से प्रवाहित होती रहती है। इस प्रवाह में प्रोटानों और इलेक्ट्रानों की संख्या बराबर होती है। इसे ही सौर वायु के नाम से जाना जाता है। सौर वायु की गति 1.26 से 2.88 मिलियन किलोमीटर प्रति घंटा होती है।

सौर्य ज्वाला ‘सन स्पॉट’ से ऊर्जा के रूप में फूट पड़ती है। ये भारी मात्रा में सौर वायु में कणों को बिखेर देती हैं, जो ऊर्जा के कण धरती में जबर्दस्त चुँबकीय क्षेत्र का निर्माण करते हैं। इससे धरती में संचार माध्यम पूरी तरह ध्वस्त हो सकते हैं। सौर ज्वाला अंतरिक्ष में सैकड़ों मील के दायरे में फैल जाती हैं। अब तक सौर ज्वालाएँ अत्यधिक उग्र रूप में 28 फरवरी 1942, 19 नवंबर 1949, 13 सितंबर 1971 तथा अप्रैल 1990 को देखी गई थीं।

बीसवीं शताब्दी के आखिरी पड़ाव सन् 2000 में सूर्य की हलचलें फिर से अपने प्रचंड रूप में देखी गईं। अभी पिछले वर्ष मार्च 2000 की 3 और 4 तारीख को सूर्य की बाहरी सतह पर सौ-सौ मेगाटन क्षमता के करोड़ों हाइड्रोजन बमों के बराबर शक्ति के विस्फोट हुए। इससे पृथ्वी के अंदर घातक पराबैगनी किरणों का भीषण तूफान प्रवेश कर गया। प्रसिद्ध अंतरिक्ष भौतिकविद् आर.एस. श्रीवास्तव के अनुसार, इस घटना से पृथ्वी पर एक्स किरणों तथा पराबैगनी विकिरण की वर्षा के कारण दिन में 11 से डेढ़ बजे का समय अत्यंत खतरनाक था।

अमेरिका के जे.एम. फ्रीज एवं डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, सूर्य के कोरोना क्षेत्र में दो बिंदु हैं। इन्हें 8882 तथा 8881 नाम से जाना जाता है। वर्तमान कालावधि में ये दोनों बिंदु अचानक अत्यधिक सक्रिय हो गए हैं। इन दोनों स्थानों से 20 करोड़ टन कोरोना द्रव्य का आवेशित किरण पुँज बाहर निकल रहा है। इसकी गति 3000 किलोमीटर प्रति सेकेंड है। इसकी दिशा पृथ्वी की ओर कभी भी मुड़ सकती है। सामान्य रूप से इसकी यह प्रक्षेपण गति दस गुना अधिक है। इन किरणों में बीटा और गामा किरणें भी सम्मिलित हैं। इस खगोलीय घटना के संदर्भ में दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक प्रोफेसर विष्णु भाटिया ने स्पष्ट किया है कि कभी-कभी पृथ्वी का चुँबकीय क्षेत्र सूर्य से निकलने वाले उच्च ऊर्जा कणों को विचलित कर देता है। इस बार भी कुछ इसी तरह की घटना घटी और पृथ्वी एक बड़े खतरे से बच गई।

धरती पर तूफानों का विध्वंसक रूप तो कभी-कभी देखने में आता है, परंतु सूर्य पर इससे भी विकराल, भयंकर एवं तेज तूफान सदैव चक्कर काटते रहते हैं। इस तूफान की वजह से सूर्य पर विद्यमान् सौरकलंक की सक्रियता प्रत्येक बारहवें वर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है। इससे सूर्य के आभामंडल के आकार और आकृति में समय-समय पर परिवर्तन होता रहता है। इन सौरकलंक के तीव्र चुँबकीय 222 के निकट का तापमान शेष क्षेत्र की तुलना में कम होता है। दूसरी ओर के चुँबकीय क्षेत्र में अत्यधिक तापमान पर इलेक्ट्रॉन, प्रोटान एवं परमाणविक आयनों सदृश्य विद्युत्करण अत्यंत जटिल पथों पर भ्रमण करते हैं। सूर्य की सक्रियता ग्यारह वर्षीय चक्र चलने का यही कारण है। प्रत्येक बारहवें वर्ष में यह सक्रियता अपनी चरम सीमा पर होती है। 24 अप्रैल 1990 को इसी सौर हलचल के दौरान सूर्य उत्तर-पश्चिम भाग से सूर्य का कुछ पदार्थ अत्यंत वेग के 222 अलग होकर जाते देखा गया था। यह सूर्य से 10 लाख किलोमीटर दूर तक छिटककर पहुँच गया था।

सौरकलंक की अधिकतम सक्रियता के कारण प्रायः 222 पर बहुतरंगीय ध्रुवीय ज्योति प्रकट होती है। इस ज्योति को उत्तरी ध्रुव में ‘अरोरा बोरियालिस’ तथा दक्षिण ध्रुव में ‘अरोरा आस्ट्रियालिस’ कहते हैं। सौर कलंकों से उठने वाले चुँबकीय तूफानों के विद्युत्कृत कणों को पृथ्वी का चुँबकीय क्षेत्र अवशोषित कर लेता है। इसी के परिणाम-स्वरूप पृथ्वी के उत्तर और दक्षिण ध्रुव पर प्रकाश के मनोहारी एवं सुँदर दृश्य दृष्टिगोचर होते हैं।

सौरकलंक में होने वाली अभिक्रियाओं से निकलने वाली किरणें पृथ्वी के आयनमंडल तक पहुँच जाती हैं। इससे पृथ्वी का भू-चुँबकीय क्षेत्र भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। सौर-हलचलों की अधिकतम तीव्रता हुए बिना नहीं रहता। सौर-हलचलों की अधिकतम तीव्रता पृथ्वी के आयनोस्फियर में उथल-पुथल मचा देती है। इस वजह से धरती में चुँबकीय तूफान आने की संभावना बढ़ जाती है। इससे रेडियो संचार में बाधा पड़ती है और विद्युत् आपूर्ति के अस्त-व्यस्त होने की आशंका रहती है। हमारी पृथ्वी कई बार इन घटनाओं का कटु अनुभव झेल चुकी है। इन खगोलीय घटनाओं से अनेक देशों में विद्युत् व्यवस्था ध्वस्त हो गई थी। इसी वजह से कनाडा का हाइड्रोक्यूबिक विद्युत् संयंत्र भी नष्ट हो गया था और कनाडा एवं अमेरिका के कई शहर घंटों अँधेरे के साये में डूबे रहे।

वर्तमान सौरकलंकों के बढ़ने की शुरुआत 1996 से हुई और मार्च 2000 में अपनी चरम सीमा पर रही। सूर्य पर जब चुँबकीय सक्रियता अधिक होती है, तो उसके आभामंडल में समरूपता रहती है, परंतु जब उस पर चुँबकीय सक्रियता कम होती है, तो उसके आभामंडल में अनेक ज्योति रेखाएँ नजर आती हैं, जो अंतर्ग्रहीय अंतरिक्ष में दूर तक प्रवेश कर जाती हैं। अमेरिका के नेशनल ओशनिक एण्ड एटमाँस्फेरिक एडमिनिस्ट्रशन के मौसम विज्ञानी गैरी हैकमेन का कहना है कि इस बार सौरचक्र में होने वाले विस्फोट और इसके कारण आने वाली किरणों का घातक तूफान पृथ्वी से एक लाख पचास हजार किलोमीटर दूर से गुजर गया, इसे एक दैवी कृपा ही कहा जा सकता है। अन्यथा अंतरिक्ष में स्थापित प्रायः सभी कृत्रिम उपग्रह और उन पर आश्रित आधुनिक उद्योग एक बड़ी दुर्घटना के शिकार हो जाते।

सूर्य में होने वाली ये सभी हलचलें व्यापक परिवर्तन की परिचायक हैं। वैज्ञानिकों का यह मानना है कि इन हलचलों के परिणामस्वरूप आने वाले समय में धरती पर बड़ी मात्रा में परिवर्तन होंगे। उनका कहना है कि धरती की आकृति तो वही रहेगी, पर प्रकृति पूरी तरह बदल जाएगी। इसे इक्कीसवीं सदी में होने वाले युगपरिवर्तन के रूप में भी देखा जा सकता है। “


विभूतिसंपन्न हिमालय

सिद्धि सामान्यतः किसी भी मनचाहे मनोरथ को पूरा करने की क्षमता को व्यक्त करती है, किंतु आध्यात्मिक एवं परामनोवैज्ञानिक क्षेत्र में इसका अर्थ और व्यापक एवं गूढ़ हो जाता है। यहाँ यह असाधारण एवं अद्भुत कार्यों को अंजाम देने की क्षमता की पर्याय है। जनसाधारण के अनुभव इनके सामने बौने सिद्ध होते हैं और बुद्धिजीवियों के तर्क-वितर्क भी असहाय महसूस करते हैं। उदाहरण के लिए, बिना ज्योतिष या अन्य सहारा लिए किसी व्यक्ति का भविष्य बता देना, बिना किसी साधन के मनचाही वस्तु उपस्थित कर देना, बिना औषधि के असाधारण रोग से मुक्त कर देना आदि सामान्यजन के लिए असंभव हैं और इन्हें सिद्धि की श्रेणी में रखा जाता है और इन्हें संपन्न करने वाला व्यक्ति सिद्धपुरुष कहलाता है।

पूर्वकाल में हमारे ऋषि विशिष्ट सिद्धिसंपन्न होते थे। किंतु कालक्रम के साथ इनका सर्वथा अभाव-सा होता गया। वर्तमान युग में भी ऐसे क्षमतायुक्त सिद्धपुरुष हुए हैं, जिन्होंने समय-समय पर अलौकिक क्षमताओं के अस्तित्व को प्रमाणित कर आधुनिक विज्ञान को सोचने व करने के लिए नूतन आधार दिया है और जगत् में इस संदर्भ में व्याप्त अनास्था के बादलों को भी छाँटा है। हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में आज भी ऐसे दिव्य आश्रम एवं तपस्थली हैं, जहाँ ऐसे सिद्धपुरुष तपस्या में लीन हैं व इनके लिए सिद्धियाँ तो मानो बायें हाथ का खेल हैं।

पुराणों में वर्णित हिमालय अवस्थित कालापग्राम ऐसा ही एक दिव्य आश्रम है, जहाँ हजारों सिद्ध-योगी सूक्ष्मशरीर में विचरण करते हैं और साधना में लीन हैं। यह आश्रम मानसरोवर और कैलाश से भी आगे स्थित है, जिसे स्थूल दृष्टि से देखा जाना संभव नहीं है। मात्र दिव्यदृष्टिसंपन्न कृपापात्र व्यक्ति ही इसका दर्शन कर सकते हैं। मीलों लंबा यह दिव्य क्षेत्र स्वयं में अद्वितीय है। यह ऋतु काल एवं वायुमंडल जैसे भौतिक कारकों से सर्वथा मुक्त है। यहाँ गरमी सरदी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कालप्रवाह के साथ विश्व में सृष्टि निर्माण एवं प्रलय कितनी बार हुआ, किंतु यह आश्रम अविचल रूप से स्थित है व इसके निवासी कालजयी हैं।

अनुभवी जनों के अनुसार वैदिक काल के वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कणाद, पुलस्त्य ऋषि आज भी इस स्थान पर सशरीर विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं। इस सिद्ध भू-भाग में महायोगी गोरखनाथ, जगद्गुरु शंकराचार्य आदि योगीजन भी विचरण करते हुए स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके अतिरिक्त कई अज्ञातनामा योगी भी यहाँ साधनारत हैं। कुछ योगी तो सैकड़ों वर्षों से यहाँ ध्यानस्थ हैं। केवल योगी, साधु और संन्यासी ही नहीं, अपितु संन्यासिनियों और योगिनियाँ भी इस कालापग्राम में विचरण करती हुई दिखाई देती हैं। यहाँ पर किसी प्रकार का छल, कपट, द्वेष, व्यभिचार आदि नहीं है, बल्कि साधना के क्षेत्र में उन्नत, प्रकृति के अज्ञात रहस्यों की खोज में सभी अपने आप में निमग्न हैं।

अनुभवी साधकों के अनुसार यहीं पर सिद्ध योग झील अपने आप में दिव्य, मनोहर और अद्वितीय है। मीलों लंबी प्रकृति निर्मित इस झील का पानी निरंतर बहता हुआ निर्मल, स्वच्छ और स्फटिक के समान है। शीतलता और पवित्रता की दृष्टि से यह जल अद्वितीय है। इस जल को स्पर्श करने से ही सारा शरीर दिव्य, पवित्र और अलौकिक हो जाता है। इस जल की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि इसमें स्नान करने से वृद्धता और रोग स्वतः समाप्त हो जाते हैं। सिद्ध योग झील के किनारे-किनारे स्फटिक से निर्मित नावें पड़ी हैं, जिन्हें खोलकर कोई भी योगी या साधक झील में विचरण कर सकता है। सारा प्रदेश सुगंधित पुष्पों से आच्छादित है। सारी धरती मखमली हरी दूब और द्रुमों से भरी है। असंख्य प्रकार के पुष्प खिले रहते हैं। जो हमेशा स्वस्थ, तरोताजा और सुगंधित बने रहते हैं। इस दिव्य क्षेत्र में यहाँ के कल्पवृक्षों के नीचे बैठकर साधक जो भी इच्छा करता है, वह उसी समय पूर्ण हो जाती है।

देश के कई उत्कृष्ट संन्यासी-योगी सिद्धाश्रम जा चुके हैं। स्वामी अखिलेश्वरानंद जी ऐसे ही एक सिद्ध संत थे, जिन्हें इस दिव्यभूमि का अनुभव रहा है। सिद्धियाँ उनके लिए महज खेल के समान थीं। ‘हिमालय के महायोगियों की गुप्त सिद्धियाँ’ नामक पुस्तक में इनके योग-चमत्कारों व सिद्धियों का विस्तार से वर्णन है। इनमें से बारह उल्लेखनीय सिद्धियाँ इस प्रकार से हैं-(1) परकाया प्रवेश सिद्धि, (2) आकाशगमन सिद्धि, (3) जलगमन प्रक्रिया, (4) हादि विद्या, जिसके माध्यम से बिना आहार ग्रहण किए वर्षों जीवित रहा जा सकता है। (5) कादि विद्या, इसके माध्यम से साधक या योगी कैसी भी परिस्थिति में अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है, उस पर गरमी-सरदी, बरसात, आग, हिमपात आदि का कोई प्रभाव नहीं होता। (6) काल सिद्धि, जिसके माध्यम से हजारों वर्ष पूर्व के क्षण को या घटना को देख सकता है, साथ ही आने वाले हजार वर्षों के कालखंड को जाना जा सकता है कि उसमें कहाँ-क्या घटित होने वाला है और वह किस प्रकार घटित होगा। (7) संजीवनी विद्या, जो शुक्राचार्य या कुछ अन्य ऋषियों को ही ज्ञात थी, इसके माध्यम से मृत व्यक्ति को भी जीवनदान दिया जा सकता है। (8) इच्छामृत्यु, इसके माध्यम से काल पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त होता है और साधक चाहे तो सैकड़ों-हजारों वर्षों तक जीवित रह सकता है। (9) कायाकल्प सिद्धि, जिसके माध्यम से व्यक्ति शरीर में पूर्ण परिवर्तन लाया जा सकता है, ऐसा परिवर्तन कि वृद्ध एवं रोगी व्यक्ति भी सुँदर, युवा, रोगरहित व स्वस्थ रूप ले सकता है। (10) लोकगमन सिद्धि, इसके माध्यम से पृथ्वी लोक में ही नहीं, अपितु अन्य लोकों में उसी प्रकार विचरण किया जा सकता है, जैसे कि हम वाहन द्वारा एक शहर से दूसरे शहर में जाते हैं। इसके माध्यम से व्यक्ति भू-लोक, भुवः लोक, स्वः लोक, महः लोक, जनः लोक, तपः लोक, सत्य लोक, चंद्र लोक, सूर्य लोक, पाताल और वायु लोक में भी जाकर वहाँ के निवासियों से मिल सकता है, वहाँ की श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त कर सकता है। (11) शून्य साधना, इसमें प्रकृति से कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। खाद्य सामग्री, वस्तु, बहुमूल्य हीरे, जवाहरात आदि शून्य से प्राप्त कर मनोवाँछित सफलता एवं संपन्नता पाई जा सकती है। (12) सूर्य विज्ञान, इसके माध्यम से एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ में रूपांतरित किया जा सकता है।

सूर्य सिद्धाँत महर्षि पतंजलि का महत्त्वपूर्ण सिद्धाँत है। जिसे उन्होंने सबसे पहले स्पष्ट किया था। इसके बाद उनके शिष्य सुधन्वा, प्रियुकु देदेत्त्व आदि ने उसे आगे बढ़ाया। वर्तमान समय में भी निमिष, चैतन्य, लाहिड़ी, वरोचन, स्वामी विशुद्धानंद आदि इसमें निष्णात हुए हैं।

पतंजलि ने अपने सूत्रों में स्पष्ट किया है कि सूर्य की किरणों में विभिन्न रंगों से युक्त रश्मियाँ होती हैं, जिसका समन्वित रूप श्वेत है, जिसे विशुद्धात्मक तत्त्व कहा जाता है। इस श्वेत रश्मि को 24 कोणीय स्फटिक के माध्यम से ही पकड़ा जा सकता है। इस स्फटिक के प्रत्येक कोण एक-दूसरे से वर्तुलावस्था में होते हैं। जब सूर्य किरण इस स्फटिक लैंस पर पड़ती है, तो घनीभूत होती हुई एक वर्तुल से दूसरे वर्तुल में प्रवाहमान होती है और जब 24वें 222 में प्रवेश करती है, तो सर्वथा शुभ्र-स्वेत रंग की होकर रह जाती है और यह रश्मि निकलकर जिस पदार्थ पर पड़ती है, तो मनोवाँछित पदार्थ परिवर्तन हो जाता है। पत्थर को हीरे में बदला जा सकता है। सूर्य सिद्धाँत के ज्ञाता को यह ज्ञान होता है कि प्रकृति का कौन-सा पदार्थ कितने वर्तुलों से युक्त है। स्वामी अखिलेश्वरानंद जी इस सिद्धाँत का प्रयोग करते हुए अपने शिष्यों को दो मिनट में पत्थर से हीरा बनाकर दिखा देते थे।

अपनी पुस्तक ‘ए सर्च इन सिक्रेट इंडिया’ में पाश्चात्य खोजी मनीषी पाल ब्रंटन ने महायोगी स्वामी विशुद्धानंद जी का उल्लेख किया है, जो सूर्य सिद्धाँत के मर्मज्ञ थे। उनके पास सूर्य सिद्धाँत से हजारों प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त थीं। पतंजलि के ‘जायंतर परिणाम’ अर्थात् एक वस्तु को दूसरे में परिवर्तित कर देने की व्याख्या करते हुए उन्होंने इसका वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत किया है।

उनके अनुसार विश्व में हर जगह सत्ता मात्र रूप या शाश्वत रूप में सभी चीजें विद्यमान् हैं, पर सब व्यक्त नहीं हैं। जिस पदार्थ की मात्रा अधिक विकसित व अधिक प्रस्फुटित होती है वही व्यक्त होता है, वही दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए, लोहे का टुकड़ा मात्र लोहे का टुकड़ा नहीं होता, उसमें सब पदार्थ अव्यक्त रूप में उपस्थित रहते हैं। इसमें स्वर्ण तत्त्व भी विद्यमान् होता है, किंतु सूक्ष्म रूप में। किंतु यदि इसके विलीन भाव को प्रबुद्ध किया जाए और उसकी मात्रा बढ़ा दी जाए, तो लौह भाव दब जाएगा और स्वर्ण का विलीन भाव प्रबुद्ध होने से लोहे का टुकड़ा सोने का हो जाएगा।

वास्तव में न लोहा नष्ट हुआ और न सोने की नवीन सृष्टि हुई। दोनों पहले भी विद्यमान् थे और अब भी हैं। अंतर मात्र इनके अनुपात एवं घनत्व का है। इस अव्यक्त एवं व्यक्त के अंतर के ठीक-ठीक रहस्य व क्रिया-कौशल को जानकर किसी भी स्थान पर, किसी भी वस्तु का आविर्भाव किया जा सकता है। यही योग शक्ति के माध्यम से पदार्थ की सत्ता के रूपांतरण का रहस्य है और यही सूर्य विज्ञान की सहायता से भी किया जा सकता है।

एक पदार्थ को दूसरे रूप में रूपांतरण करना जहाँ सूर्य सिद्धाँत द्वारा संभव है, वहीं योगबल से भी इस कार्य को बिना किसी स्फटिक यंत्र का सहारा लिए किया जा सकता है। योगबल की व्याख्या करते हुए स्वामी अखिलेश्वरानंद ‘हिमालय के महायोगियों की गुप्त सिद्धियाँ’ पुस्तक में लिखते हैं, बाहर विश्व में सूर्य देदीप्यमान है, उससे करोड़ों गुना तेज और ताप लेकर एक सूर्य हमारे अंदर निहित है, किंतु उसका तेजस् एवं ताप बिखरा हुआ है। योग साधनाओं के माध्यम से इसकी रश्मियों को घनीभूत करके व नेत्रों के माध्यम से पदार्थ पर उनका प्रभाव डालकर मनोवाँछित पदार्थ में इसे रूपांतरित किया जा सकता है।

इसी प्रकार इस पुस्तक में परकाया प्रवेश, रोग निवारण, मृत्यु निवारण आदि के प्रयोगों का उल्लेख है। ऐसी ही एक विशिष्ट क्रिया है शून्य मार्ग से यात्रा की, जिसमें कुछ ही क्षणों में जितना चाहे उतना सामान लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा की जा सकती है। इस प्रक्रिया का गूढ़ रहस्य बताते हुए वे कहते हैं कि इसमें पूरे शरीर को नियंत्रित कर इड़ा व पिंगला को समन्वित करना होता है। ऐसा होते ही पूरा शरीर वायु से भी अत्यंत हल्का और वेगवान बन जाता है।

इस तरह हिमालय के योगियों की सिद्धियों का संसार अद्भुत एवं विलक्षण है, जो सहज ही विश्वसनीय नहीं लगता और पर्याप्त कौतुक एवं आश्चर्य का विषय बन जाता है। किंतु समय-समय पर प्रकट होने वाले प्रामाणिक संदर्भ इसके अस्तित्व पर मोहर लगाते रहते हैं। हालाँकि सिद्धियों की चकाचौंध में सामान्यतः जो पक्ष उपेक्षित-सा रह जाता है, वह है इससे अभिन्न रूप से जुड़ा साधना का पक्ष। साधना के साथ क्रमशः सिद्धियों का प्रस्फुटन भी शुरू हो जाता है, किंतु जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति में इनकी चकाचौंध को बाधस्वरूप मानकर हमेशा इनसे बचने का ही निर्देश रहता है। साधना की परिपक्व अवस्था में सिद्धपुरुषों और योगियों के लिए सिद्धियाँ कौतुक का विषय नहीं रहतीं, बल्कि अनुचर बनकर रह जाती हैं, जिनका उपयोग मात्र लोककल्याण के हित ही किया जाता है, जो भी हो, सिद्धियों का अस्तित्व अध्यात्म विज्ञान की असीम समर्थता को स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है।


राजपुरोहित के मतानुसार (Kahani)

राजस्थान के हीरालाल शास्त्री साधारण अध्यापक थे। उनने नौकरी से पेट पालते रहने की अपेक्षा नारी शिक्षा को जीवन का लक्ष्य बनाया और एक छोटे देहात में अपने बल-बूते छोटा कन्या विद्यालय चलाने लगे। लगन और उपेक्षा के आधार पर किए गए कामों में जमीन-आसमान जितना अंतर होता है। लगनपूर्वक चलाए गए कन्या विद्यालय की सार्थकता और लोकप्रियता आकाश चूमने लगी। समर्थन की कमी न रही। छप्पर के नीचे आरंभ किया गया वनस्थली बालिका विद्यापीठ देश की मानी हुई शिक्षण संस्थाओं में से एक है। शास्त्री जी के प्रति जनता की अपार श्रद्धा थी। लोकसेवा ने उन्हें राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित किया। उनकी स्मृति में डाक टिकटें तक छपीं। इस महान् उपलब्धि के पीछे लोकसेवा की प्रेरणा ही छिपी हुई थी।

काशिराज युवराज संदीप के विकास से संतुष्ट थे। वे प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाते, व्यायाम, घुड़सवारी आदि में प्रवृत्त रहते। समय पर अध्ययन और राजदरबार के कार्यों में रुचि लेना आदि सभी प्रवृत्तियाँ ठीक थीं। एक क्षण भी न गँवाते और न किसी दुर्व्यसन में उलझते, किंतु राजपुरोहित बार-बार आग्रह करते कि उन्हें कुछ वर्षों के लिए किसी संत के सान्निध्य में, आश्रम में रखने की व्यवस्था बनाई जाए। काशिराज सोचते थे कि राजकुमार को इसी क्रम में राजकार्य का अनुभव बढ़ाने का अवसर दिया जाए।

तभी एक घटना घटी। राजकुमार नगर भ्रमण के लिए घोड़े पर निकले। जहाँ वे रुकते, स्नेह भाव से नागरिक उन्हें घेर लेते। एक बालक कुतूहलवश घोड़े के पास जाकर पूँछ सहलाने लगा। घोड़े ने लात फटकारी और बालक दूर जा गिरा। उसके पैर की हड्डी टूट गई। राजकुमार ने देखा, हँसकर बोले, असावधानी बरतने वालों का यही हाल होता है, और आगे बढ़ गए। सिद्धाँततः बात सही थी, पर लोगों को व्यवहार खटक गया। काशिराज को सारा विवरण मिला, तो वे भी दुःखी हुए। राजपुरोहित ने कहा, महाराज! स्पष्ट हुआ है कि युवराज में संवेदनाओं का अभाव है। मात्र सतर्कता-सक्रियता के बल पर वे जनश्रद्धा का अर्जन और पोषण न कर सकेंगे। हो सकता है कभी क्रूरकर्मी भी बन जाएँ। अस्तु समय रहते युवराज की इस कमी को पूरा कर लिया जाना चाहिए। राजा का समाधान हो गया तथा उन्होंने राजपुरोहित के मतानुसार व्यवस्था कर दी।


गुरु के कोप ने दिखाई आत्मज्ञान की दिशा

वह जेठ की दुपहरी थी। तपिश और धूल के बवंडर के बीच किसी ने उसका द्वार खटखटाया। द्वार खोलने पर उसने देखा कि धूल से सना लिपटा एक साधु उससे कह रहा है, बेटा, मुझे प्यास लगी है, मुझे थोड़ा पानी पिला दें। साधु की बात सुनकर उसने अपनी विवशता बताते हुए कहा, “महाराज! मैं तो एक मुसलमान हूँ, मेरा नाम अफजल है। आप हिंदू साधु हैं। मेरे घर का पानी आप कैसे पी सकेंगे?”

“बच्चे! त्री सत्यवादिता से मैं प्रसन्न हुआ। पर मैं भेद-भाव को नहीं मानता। तू मुझे पानी पिला।” साधु ने उसकी ओर कृपापूर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा।

अफजल तुरंत कोठरी में जाकर जल लाया, साधु ने जल पीकर अपनी प्यास बुझाई और उसकी भक्ति एवं सत्यवादिता से प्रसन्न होकर उससे कहा, “बेटा! तू ने पूर्व जन्म में उत्तम कर्म किए हैं, जिसके फलस्वरूप ही मुझसे तेरी मुलाकात हुई है। मैं तुझे योग की दुर्लभ सिद्धियाँ देता हूँ, पर तू इनका उपयोग केवल परमार्थ कार्यों के लिए करना। अपने स्वार्थ के लिए इनका उपयोग कभी भूलकर भी न करना।”

मंत्रमुग्ध बने उस किशोर अफजल को सिद्धियों की प्रक्रिया समझाकर वह साधु वहाँ से अदृश्य हो गए। अफजल ने उस योग प्रक्रिया का बीस वर्षों तक निष्ठापूर्वक अभ्यास किया। उसके चमत्कारिक कार्यों ने दूर-दूर तक के लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उसकी सहायता के लिए एक अशरीरी आत्मा भी हर समय उसके साथ रहती थी, जिसे वह ‘हजरत’ के नाम से पुकारता था। यह अदृश्य आत्मा उसकी सभी इच्छाओं को पूरा कर देती थी।

समय बदला। अफजल के हृदय में अपनी सिद्धियों का अभिमान उत्पन्न हो गया। अभिमान के भयानक अँधेरे में फंसकर वह विपरीत मार्ग पर चलने लगा। अपने गुरु की अवज्ञा करके उसने अपनी सिद्धियों का दुरुपयोग करना प्रारंभ कर दिया। जिन-जिन पदार्थों को उठाकर वह पुनः रख देता, वे तुरंत अदृश्य हो जाते और उनका पता तक नहीं लगता। वह समय-समय पर वाहक के रूप में कलकत्ता के बड़े-बड़े जौहरियों की दुकानों पर जाता। वहाँ वह जिस वस्तु को स्पर्श कर लेता, वह वस्तु उसके दुकान से चले जाने के बाद अदृश्य हो जाती। ऐसे कौतुकों के कारण चारों ओर हाहाकार मच गया। उसके कारनामों से पीड़ित होकर जनता ने पुकार की, उसे पकड़ने की गुहार की। पर उसे बंदी बनाने में पुलिस असफल रही, क्योंकि उसके केवल यह कहने से कि ‘हजरत यह उठा लो’ समस्त प्रमाण गायब हो जाते, नष्ट हो जाते।

एक धनी व्यक्ति का उसके साथ परिचय हुआ और उसने उसे अपने यहाँ बुलवाया। उस समय अन्य लगभग बीस पड़ोसी भी वहाँ उपस्थित थे। उनके साथ महान् योगी लाहिड़ी महाशय के एक प्रमुख शिष्य भी वहाँ उपस्थित थे। अुजल ने उनकी ओर देखकर कहा, तेरे हाथ अत्यंत सुदृढ़ हैं। नीचे जाकर एक चिकना पत्थर लेकर उस पर अपना नाम लिखकर कहीं दूर फेंक दे।

उन्होंने वैसा ही किया। तत्पश्चात् अफजल ने उन्हें कहा, एक घड़ा लेकर सामने से गंगाजल भर ला। अफजल के कथनानुसार जब वे साधु गंगाजल से घड़ा भरकर ला रहे थे, तभी अफजल ने आवाज दी, “हजरत पत्थर को घड़े में डाल दो।” यह कहते ही पत्थर घड़े में आ गया। उसने देखा कि उनका नाम लिखा हुआ यह वही पत्थर है। अफजल के इस चमत्कार ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया।

उस समय एक बाबूजी भी इस आश्चर्य को देख रहे थे। उनकी घड़ी भी अफजल के स्पर्श करने के बाद अदृश्य हो गई थी। जब बाबूजी ने उससे बहुत निवेदन किया कि मेरी घड़ी बहुत कीमती है, मुझे लौटा दो, तब अफजल ने कहा, “तुम्हारी तिजोरी में पाँच सौ रुपये हैं, पहले तुम वे रुपये मुझे दो।” घबराया हुआ वह बेचारा अपने घर जाकर बताई गई रकम ले आया। तत्पश्चात् अफजल ने कहा, “तुम्हारे घर के पास जो पुल है, वहाँ जाकर हजरत को पुकारो कि मेरी घड़ी लौटाए।” उस व्यक्ति ने वैसा ही किया, तब घड़ी हवा में से उतरती हुई उसके दाहिने हाथ में आ गई।

इस घटना के पश्चात् अफजल ने उन सबको कहा कि आप लोग जो पेय पदार्थ पीना चाहें, बताएँ। हजरत वही पेय ला देंगे और सचमुच ही थोड़ी देर बाद प्रत्येक की अपनी इच्छानुसार दूध, विभिन्न फलों के रस आदि उन लोगों के पास उपस्थित हो गए।

इसके बाद भोजन की बारी आई। उनमें से कई लोगों का प्रस्ताव था, भोजन बहुत ही बढ़िया होना चाहिए और प्रत्येक खाद्यपदार्थ सोने की थालियों एवं सोने की प्लेटों व कटोरियों में परोसा जाना चाहिए। इसी के साथ प्रत्येक व्यक्ति ने अपनी-अपनी पसंद के खाद्य पदार्थ मँगवाने की इच्छा व्यक्त की।

अफजल ने अदृश्य हजरत को संबोधित किया और वहाँ अत्यंत कोलाहल हुआ और स्वादिष्ट सब्जी, पूड़ियाँ एवं अनेक प्रकार के फल तथा मेवों से भरी स्वर्ण की जगमगाती थालियाँ अतिथियों के समक्ष आ उतरीं। प्रत्येक पदार्थ असाधारण रूप से स्वादिष्ट था। घंटेभर से भी अधिक समय तक सबका भोजन चलता रहा और जब यह भोजनकार्य समाप्त हो गया तथा लोग जाने लगे, तब एक ध्वनि हुई। क्षणभर में वहाँ खाद्य सामग्री एवं सोने के बरतनों का नामों-निशान तक न रहा।

इस तरह अफजल अपने चमत्कारों से सबको मंत्र-मुग्ध कर देता था। उसे आत्मज्ञान तो न था, परंतु कतिपय यौगिक प्रक्रियाओं पर उसका प्रभुत्व था। जिससे सूक्ष्म लोक में प्रविष्ट हो सकने से उसकी प्रत्येक इच्छा तुरंत पूर्ण हो जाती थी। वह हजरत के माध्यम से किसी भी पदार्थ के अणुओं को खींच सकता था।

परंतु उस चमत्कारी अफजल के जीवन में एक दिन ईश्वरीय न्याय का दिन भी आ गया। उसे राह चलते एक लँगड़ा वृद्ध मिला। उस समय उसके हाथों में स्वर्ण का एक गोला था। अफजल ने ज्यों ही उस स्वर्ण के गोले का स्पर्श किया, वह गोला गायब हो गया। इस पर उस वृद्ध ने उसे पुकारा और कहा, “क्या तू मुझे नहीं जानता? तनिक देख मेरी ओर और पहचान मुझे।”

अफजल अवाक् रह गया, क्योंकि यह तो वही महात्मा थे, जिनने उसे बहुत समय पहले योग-दीक्षा दी थी। अफजल के द्वारा पहचानते ही वह वृद्ध व्यक्ति अपने मूल रूप में आ गया। वह उसे फटकारते हुए कहने लगा, “मैं देख रहा हूँ कि तूने अपनी शक्तियों का दुःखी मनुष्यों की सहायता के लिए उपयोग नहीं किया। बल्कि तू लोगों को लूटने में अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर रहा है। मैं अपनी समस्त सूक्ष्म शक्तियाँ अब तुझसे वापस ले रहा हूँ। अब हजरत भी तुझसे अलग हो गया है।”

यह सुनकर अफजल उस योगी के चरणों में गिर पड़ा और बोला, “हे मेरे गुरुदेव! आपने मेरा भ्रम दूर कर दिया। मैं आपका अत्यंत उपकार मानता हूँ। मैं अपनी समस्त अभिलाषाओं को त्याग करने का वचन देता हूँ और अपने दुष्ट कृत्यों का प्रायश्चित करने के लिए मैं पहाड़ों की कंदराओं में चला जाऊँगा।”

अफजल के सच्चे पश्चात्ताप से द्रवित होकर योगी ने कहा, “तेरे द्वारा आज्ञापालन एवं प्रायश्चित करने की प्रतिबद्धता से प्रसन्न होकर मैं तुझे वरदान देता हूँ कि तेरी अन्य सिद्धियाँ तो लुप्त हो गई हैं, परंतु अपने भोजन एवं वस्त्रों की आवश्यकता के लिए तू हजरत को आज्ञा प्रदान कर सकेगा और तेरी आज्ञा पूर्ण होगी। तू आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए हिमालय की कंदराओं में चला जा, भगवान् तुझे अवश्य सफलता प्रदान करेंगे।”

इसी के साथ वह योगी अदृश्य हो गया। अफजल के पाँव भी अपनी नई यात्रा की ओर बढ़ चले। उस अब ज्ञात हो चुका था कि सच्ची सिद्धि तो बस आत्मज्ञान ही है। जिसका दुरुपयोग कभी भी संभव नहीं है। वह यह भी अनुभव कर रहा था कि गुरु के कोप में भी कृपा ही है।


Quotation

मनुष्य का पौरुष जहाँ लड़खड़ाता है, वहाँ गिरने से पूर्व ही सृजेता के लंबे हाथ असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए अपना चमत्कार प्रस्तुत करते दिखाई पड़ते हैं। यही है स्रष्टा का लीला-अवतरण, प्रकटीकरण।”

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


सच्ची सफलता हेतु कुछ अनिवार्य शर्तें

सफलता मात्र संयोग का नाम नहीं है। यह दृष्टिकोण का परिणाम है। नीतिपूर्वक चलकर ही सच्ची सफलता अर्जित की जा सकती है। इस राह पर प्राप्त असफलता भी उतनी ही श्रेष्ठ एवं वरेण्य है। सफलता एक अनुभव है। सफलता कोई रहस्य नहीं, वरन् कुछ बुनियादी नियमों का सतत पालन करने का सुखद परिणाम है। इसके विपरीत असफलता कुछ गलतियों को लगातार दुहराने का नतीजा है।

अर्ल नाइटिंगेल के अनुसार, “मूल्यवान् लक्ष्य की लगातार प्राप्ति का नाम ही सफलता है।” सफलता सतत प्रयास का नाम है। सफलता एक सफर है, मंजिल नहीं। मंजिल या लक्ष्यप्राप्ति के पश्चात् ठहर जाना सफलता का अंत है। लक्ष्य मिलने पर एक सुखद अनुभव होता है। सफलता इसी अनुभूति का विषय है। इसे अंदर अहसास किया जा सकता है। सफलता का सफर लक्ष्य की मूल्यता के महत्त्व पर निर्भर करता है। यदि लक्ष्य उत्कृष्ट एवं ऊँचा है, तो सफलता भी उतनी ही महान् एवं पावन होगी। यही सफलता की कहानी है, परंतु यह कहानी पूर्णता और संतोष के बिना अधूरी है।

श्रेष्ठता का प्रयास ही सफलता है। संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे सुधारा या सुगढ़ नहीं बनाया जा सकता। पूर्णता की प्राप्ति एक असंभव तो नहीं, हाँ, दुष्कर लक्ष्य हो सकता है। परंतु श्रेष्ठता पाई जा सकती है। श्रेष्ठता में सफलता समाहित है। इस प्रयास हेतु संघर्ष की आवश्यकता पड़ती है। सफलता संघर्ष के बिना नहीं मिल सकती। बिना संघर्ष कठिनाइयों से जूझने की कला सिखाता है। आत्मविश्वास तभी जग सकता है, जब मुसीबतों व कठिनाइयों का सामना किया जाता है, उनको जीता जाता है। कष्ट-कठिनाइयाँ जीवन का अपरिहार्य अंग हैं। इनसे जूझना ही संघर्ष है। विजेता कभी मायूस एवं निराश नहीं होता। वह संघर्षरत रहता है। संघर्ष ही सफलता है। हर चीज आसान होने से पहले कठिन होती है। कठिनाइयों से नहीं भागना चाहिए। इसलिए कहा गया है, “शाँत समुद्र में नाविक कभी कुशल नहीं बन पाता।”

सच्ची सफलता का मापदंड है उचित कार्य को उचित ढंग से पूर्ण करना और अपने लक्ष्य को प्राप्त करना। जीवन में सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि दूसरों की तुलना में हम क्या कर रहे हैं। हमारी सफलता तो इस तथ्य पर आधारित है कि हम अपनी क्षमताओं की तुलना में क्या कर रहे हैं। सफल व्यक्ति स्वयं से लड़ा करते हैं। वे अपने ही कार्यों में सदैव सुधार लाते हैं और प्रगति करते हैं। सफलता का मानदंड प्राप्त ऊँचाई नहीं हो सकती, वरन् यह इस बात से तय होता है कि हम गिरकर कितनी बार उठते हैं। गिरकर बार-बार उठने की शक्ति ही सफलता का पथ प्रशस्त करती है।

सफलता का पथ दुष्कर नहीं तो सरल भी नहीं है। इस पथ पर अनेक मुसीबतें आती हैं। ये मुसीबतें हैं, अहंकार, सफलता-असफलता का डर, योजना की कमी, लक्ष्य का अभाव, जिंदगी का बदलाव, विश्वास की कमी, आर्थिक असुरक्षा, असह्य पारिवारिक दायित्व, दिशाहीनता, अकेलेपन का अहसास, सारा बोझ स्वयं उठाना, क्षमता से अधिक स्वयं को बाँधना, प्रशिक्षण, दृढ़ता व प्राथमिकता की कमी। इन कठिनाइयों को पार करके ही सफलता का सेहरा सिर पर बँधता है।

सफलता के लिए आवश्यक है दृढ़ मनःस्थिति की। किसी स्थिति में हम अपने आपको कैसे सँभालते और ढालते हैं, उसी से हमारी सफलता तय होती है। असफल दो प्रकार के होते हैं, वे जो करते तो हैं, परंतु सोचते नहीं। दूसरे वे जो सोचते तो हैं, परंतु कुछ करते नहीं। सोचने-विचारने की क्षमता का प्रयोग किए बिना जीवन जीना ठीक उसी तरह है जैसे बिना निशाने के तीर चलाना।

सफल नहीं हो पाने के कई कारण हैं। चुनौती स्वीकारने में झिझक भी एक वजह है। जीवन में खतरे भी आते हैं, उनसे डरना सफलता के लिए घातक है। खतरा उठाने वाले सदैव सतर्क व सजग होते हैं और असफलता उनके पास नहीं फटकती। सतत प्रयास-पुरुषार्थ के अभाव से असफलता हाथ लगती है। जब कठिनाइयाँ भारी पड़ती हैं, तो पलायन सबसे आसान तरीका नजर आता है। विजेता बारंबार असफलता के बावजूद हार नहीं मानता। अधिकतर लोग ज्ञान और प्रतिभा की कमी से नहीं हारते, बल्कि वे इसलिए हार जाते हैं कि क्योंकि वे भाग खड़े होते हैं। सफलता का रहस्य है सतत कोशिश और विरोध। राल्फवाल्डो इमर्सन के शब्दों में कहें तो कोई व्यक्ति इसलिए नायक नहीं होता कि वह किसी और से ज्यादा बहादुर है, वरन् दूसरों की तुलना में दस मिनट ज्यादा दिखाता है।

असफलता के कारणों में आते हैं, तुरंत इच्छापूर्ति, प्राथमिकताओं की कमी, कामचोरी, स्वार्थ और लालच। लालच का अंत नहीं है। स्वाभिमान की कमी से लालच पैदा होता है। लालच झूठा अहंकार, आडंबर, दिखावा, प्रदर्शन या बराबरी की आदत के रूप में दिखाई देता है। स्वार्थी और लालची व्यक्तियों के जीवन में सच्ची सफलता कभी नहीं आ सकती। विश्वास का अभाव भी असफलता का एक कारण है। यह साहस और आत्मविश्वास की कमी द्योतक है। ऐसे लोग दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए दूसरों के साथ चलते हैं। वे दूसरों की नजर में अच्छा रहने के लिए जान-बूझकर गलत काम करते रहने को मजबूर होते हैं। दृढ़ विश्वास आस्था से उपजता है। आस्था के बिना सभी कार्य दिवास्वप्न के समान होते हैं। आस्था चमत्कार का इंतजार नहीं करती। परंतु उसे साकार बनाती है। इसी वजह से हेनरी फोर्ड ने कहा है अगर आप सोचते हैं कि आप कर सकते हैं या आप यह सोचते हैं कि आप नहीं कर सकते, तो आप दोनों ही तरह ठीक हैं।

प्रकृति या ईश्वर के नियमों को समझने का अभाव भी असफलता का कारण बन सकता है। परिवर्तन एवं बदलाव प्रकृतिप्रदत्त नियम हैं। हर प्रगति एक बदलाव है, परंतु हर बदलाव एक प्रगति नहीं है। अतः परिवर्तन या बदलाव को जाँच-परखकर स्वीकारना चाहिए। असफलता के कारणों में योजना बनाने और तैयारी करने की अनिच्छा भी आती है। इस परिप्रेक्ष्य में विंस लिंबार्डी का कथन बड़ा ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है। उनके अनुसार जीतने की इच्छा सभी में होती है, परंतु जीतने के लिए तैयारी करने की इच्छा बहुत कम लोगों में होती है। सफलता और असफलता के बीच वही अंतर है, जो बिलकुल सही और लगभग सही में है।

किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए पूरी तैयारी करना आवश्यक है। इसके लिए जरूरी है, उद्देश्य, सिद्धाँत, योजना, अभ्यास, सतत प्रयास, धैर्य और गर्व। इसी से पूरी तैयारी होती है। तैयारी का तात्पर्य है अपनी गलतियों से सीख लेना। किसी त्रुटि एवं भूल को सुधारने का सबसे अच्छा तरीका है, जल्दी ही गलती स्वीकारना, उस पर अड़े न रहना, उससे सीखना, उसे दुहराना नहीं और न बढ़ाना और न दूसरों पर दोषारोपण करना। बहानेबाजी, अवसरों को पहचानने में अयोग्यता, डर, अनुशासन की कमी, कमजोर स्वाभिमान, ज्ञान का अभाव, भाग्यवादी दृष्टिकोण, उद्देश्य की कमी, साहस का अभाव भी असफलता के कारणों में आते हैं। इन कारणों को दूर करके ही सफलता का सौभाग्य प्राप्त किया जा सकता है।

असफलता के गर्भ से ही सफलता रूपी शिशु का जन्म होता है। इसी वजह से टाम वैटरसन कहते हैं, “जब भी असफलता की दर दुगुनी या इससे अधिक होने लगती है, तो समझना चाहिए कि सफलता मिलने वाली है।” बस इससे जूझने हेतु साहस सँजोने की आवश्यकता भर है। सफलता की कहानियाँ बड़ी असफलता की कहानियाँ भी होती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने असफलता के तप्त रेगिस्तान में सफलता रूपी भव्य महल खड़ा किया था। लिंकन हजार बार असफल हुए, परंतु उन्होंने हार नहीं मानी।

1913 में जी.डी. फारेस्ट ने ट्रायोड ट्यूब का आविष्कार किया। इस आविष्कार के पूर्व उन्हें बारंबार असफलता मिली और धोखाधड़ी जैसा कठोर आरोप भी लगाया गया। 10 दिसंबर 1903 के न्यूयार्क टाइम्स के संपादकीय में ‘राइट ब्रदर्स’ की समझ पर सवालिया निशान लगाया गया था। परंतु वे इस उलाहने एवं असफलता से निराश नहीं हुए थे और वायुयान की खोज की थी। 65 साल की उम्र में कर्नल सैंडर्स के पास एक पुरानी कार और सोशल सिक्यूरिटी से प्राप्त मात्र 100 डॉलर थे। उन्होंने इनसे कुछ करने की इच्छा की । हजारों दरवाजे खटखटाए, तब उन्हें पहला खरीददार मिला। असफलता के इस दौर में वे कभी निराश व हताश नहीं हुए। इसी के परिणामस्वरूप आज केंटुकी, फ्रायड चिकन के नाम से विख्यात है।

युवा कार्टूनिस्ट वाल्ड डिस्नी के कार्टूनों को अत्यंत निम्नस्तरीय माना जाता था। वे हिम्मत नहीं हारे और उन्होंने अंततः मिनी हाउस की परिकल्पना की। महान् वैज्ञानिक थामस एडीसन के जीवन में भी हजारों बार असफलता का अंतहीन दौर आया था, परंतु इसके आगे उनने घुटने नहीं टेके। संसार को रोशनी देने वाली बिजली का बल्ब उन्हीं के आविष्कार का नतीजा है।

सफल व्यक्ति छोटे-छोटे कार्यों को ही कुशलता एवं धैर्यपूर्वक करते हैं। वे किसी महान् कार्य के इंतजार में नहीं बैठे रहते। हेनरी फोर्ड ने जो पहली कार बनाई थी, उसमें ‘रिवर्स गेयर’ डालना ही भूल गए थे। फिर वे चालीस साल की उम्र में दीवालिया हो गए थे। उन्होंने सफलता पाने के लिए अथक् परिश्रम एवं धैर्य को बनाए रखा और उसे पाया। युवा बीथोवन से कहा गया था कि उसमें संगीत की प्रतिभा नहीं है। उन्हीं बीथोवन ने संगीत की सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ करके संसार को आश्चर्यचकित कर दिया।

जीवन में असफलताएँ तो सच्ची सहचरी हैं। इनका स्वागत करना चाहिए। ये विनम्रता, संयम और धैर्य की शिक्षा देती हैं। कष्ट-कठिनाइयों में प्राप्त साहस और विश्वास असफलता से जूझने और उबरने में सहायता प्रदान करता है। व्यक्ति को सदैव कठिन परिस्थितियों से ऊपर उठकर जीना व जीतना सीखना चाहिए।

सफल होने के लिए कई गुणों की आवश्यकता पड़ती है। दृढ़ इच्छा शक्ति से सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है। नैपोलियन हिल का कहना है कि इंसान जो सोच सकता है और जिसमें विश्वास करता, वह उसे प्राप्त भी कर सकता है। प्रतिबद्धता सफलता का आवश्यक गुण है। निष्ठा और बुद्धिमता प्रतिबद्धता बनाने के दो दृढ़ आधार हैं। यहाँ पर निष्ठा का अर्थ है, नुकसान वह क्षति होने पर भी अपना कार्य पूरा करना। बुद्धिमत्ता का तात्पर्य है कि ऐसे गलत कार्य ही न करना।

सफलता के लिए जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। सच्चरित्र व्यक्ति जिम्मेदारियों को स्वीकारते हैं। वे अपना फैसला स्वयं करते हैं और अपने जीवन को दिशा भी स्वयं ही देते हैं। सफलता इतनी सहज एवं सरल नहीं है कि यूँ ही अनायास संयोग से मिल जाए। इसके लिए कड़ी मेहनत की जरूरत है। मेहनत अपने आप में प्रारंभ भी है और अंत भी। कठोर मेहनत ही सफलता की कुँजी है। पैराडाइज लास्ट लिखने के लिए मिल्टन प्रतिदिन प्रातः चार बजे उठ जाते थे। उन्होंने वर्षों तक यह परिश्रम किया। नोहा वैबस्टर को वैबस्टर डिक्शनरी का संकलन करने में छत्तीस वर्ष लगे। चार्ल्स डार्विन ने अपनी प्रख्यात कृति ‘ओरिजीन ऑफ स्पिशीज’ बीस वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद पूर्ण की थी।

चरित्र सफलता का अपरिहार्य गुण है। चरित्र व्यक्ति के नैतिक मूल्यों, विश्वासों और शख्सियत से मिलकर बनता है। जॉर्ज वाशिंगटन कहते हैं, मैं उम्मीद करता हूँ कि मुझमें सदैव इतनी दृढ़ता और चारित्रिक गुण हों कि मैं एक ईमानदार व्यक्ति के रूप में जाना जा सकूँ। यह मेरे संसार के किसी भी महत्त्वपूर्ण पद-प्रतिष्ठा से बढ़कर है। चिंतन की उत्कृष्टता सफलता का एक अंग है। सही सोच क्षमताओं का भरपूर उपयोग करने में सहायक होती है। सच्चा विश्वास इसी सोच से कई गुना बढ़कर है। सच्चा विश्वास आत्मविश्वासी होने का दृष्टिकोण है। यह व्यापक तैयारियों से ही उपलब्ध होता है।

सच्ची सफलता के लिए शर्त है कि जितना पाएँ उससे अधिक प्रदान करें। देने वाले का कोई प्रतियोगी नहीं होता। वह स्वयं ही प्रतियोगी बन जाता है। इससे ईर्ष्या-द्वेष का भाव नहीं पनपता और न ही उसके बढ़ते कदमों का कोई प्रतिकार करता है। यह गुण किसी भी डिग्री से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। इसके अलावा साहस का संबल, प्रभु समर्पित कर्म, सतत जिज्ञासु प्रवृत्ति सफलता के सूत्र हैं। इन सूत्रों द्वारा व्यक्ति सफलता का दरवाजा खटखटा सकता है एवं सफलता के भव्य भवन में प्रवेश कर सकता है।

सफलता के कुछ मुख्य उपाय हैं, जिंदगी जीने के लिए है हार के लिए नहीं, सदैव दूसरों की गलतियों से सीखना, चरित्रवान् व्यक्तियों के साथ संबंध बनाना, पाने की अपेक्षा देने की सोचना, बिना कुछ दिए कभी पाने का प्रयास नहीं करना। दूरगामी सोच, विवेक एवं साहस के साथ कदम बढ़ाना और बढ़ाकर कभी वापस न लेना - सफलता का सूत्र है। सफलता प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को अपनी ईमानदारी के साथ कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए।


इसके पास शब्द नहीं (Kahani)

एक यहूदी अनपढ़ था और ग्रामीण भी। प्रायश्चित पर्व पर सबको प्रार्थना करते देखकर वह भी बैठ गया और वर्णमाला के अक्षरों का ही पाठ करता हुआ भावना करने लगा, “हे प्रभु! मुझे तो कोई मंत्र याद नहीं, इन अक्षरों को जोड़कर तुम्हीं मंत्र बना लेना। मैं तो तुम्हारा दास हूँ, पूजा के लिए नए भाव कहाँ से लाऊँ?” जब तक दूसरे लोग प्रार्थना करते रहे, वह ऐसे ही भगवान् का ध्यान करता रहा।

सायंकाल जब सब सामूहिक प्रार्थना में सम्मिलित हुए, तो धर्मगुरु रबी ने उस ग्रामीण को भक्तों की अग्रपंक्ति में रखा। यह देखकर साथी ने आपत्ति की, “श्रीमान जी! इसे तो मंत्र भी अच्छी तरह याद नहीं।” “तो क्या हुआ” रबी ने आर्द्र कंठ से कहा, “इसके पास शब्द नहीं, भाव तो हैं।”


मानवी काया पर कब्जा

अबाबीलों और चमगादड़ों की ऐसी प्रकृति है कि वह जहाँ कहीं भी खाली-परित्यक्त मकान देखते, वहीं अपना अड्डा जमा लेते हैं, जैसे वह उन्हीं के लिए निर्मित हुए हों। इस प्रकार की प्रवृत्ति मृतात्माओं में भी देखी जाती है। वे हीन मनोबल वालों या मृत देहों में ऐसे प्रवेश कर जाती हैं, मानो वे उनके ही घोंसले हों।

इस तरह की घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं। एक प्रसंग मेलबोर्न का है। ‘दि माइंड्स ऑफ बिली मिलिगन’ नामक कृति में इसका वर्णन करते हुए डेनियल की लिखते हैं कि एक बार बिली मिलिगन नामक एक युवक बलात्कार केस में गिरफ्तार हुआ। पुलिस पूछताछ में ऐसा लगा, जैसे वह मानसिक रोगी हो। अस्तु, उसकी मनःचिकित्सकों से जाँच करवाई गई। वहाँ मामला कुछ और निकला। पड़ताल में उसे बहुव्यक्तित्व वाला आदमी घोषित किया गया। उसकी देह में तेईस आत्माओं का कब्जा था। उनमें से एक आत्मा यूगोस्लाव थी, जो सर्बो क्रोट भाषा बोलती थी। मिलिगन ने जीवन में कभी यह भाषा नहीं सीखी थी, परंतु जब वह उक्त आत्मा के अधीन होता, तो वह यह भाषा धाराप्रवाह बोलता। सब इसे सुनकर अचरज करते। उसके शरीर में एक अन्य लेस्बियन आत्मा का निवास था। मिलिगन ने बलात्कार का जो अपराध किया था, वह इसी के वश में आकर किया था। यों मिलिगन की मूल सत्ता एकदम सरल प्रकृति की और सदाचार पसंद थी।

विविध व्यक्तित्व संबंधी एक अन्य घटना का बखान करते हुए फ्लोरा रीटा स्क्रीबर अपनी पुस्तक ‘दि डिवाइडेड सेल्फ’ में लिखती हैं कि कई बार इस तरह के अनेकानेक व्यक्तित्व किसी आदमी के अंदर से तब उभरकर सामने आते हैं, जब बचपन या यौवन में उसके साथ कोई अप्रिय प्रसंग घटित हुआ हो। वे लिखती हैं कि ऐसे अनेक पुरुषों और महिलाओं के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि इन घटनाक्रमों से वे हीन भावना का शिकार हो जाते हैं, उनका मनोबल बुरी तरह टूट जाता है, वे आत्मविश्वास की कमी अनुभव करने लगते हैं। यही बाहरी सत्ताओं के प्रवेश की अनुकूल अवस्था है। उनका मत है कि ऐसे ही अधिकाँश शरीरों में बाहरी आत्माओं का निवास होता है। अपने उक्त ग्रंथ में उनने एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख किया है, जिसके चौदह व्यक्तित्व थे। उसमें एक साथ चौदह सत्ताओं का आधिपत्य था। सब बारी-बारी से उस पर अधिकार जमाती और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के उपराँत निष्क्रिय हो जातीं। वह बताती हैं कि इन चौदह आत्माओं में से एक आत्मा किसी साहित्यकार की थी। इसके अतिरिक्त चित्रकार, संगीतकार, भवन निर्माता, कृषक, इंजीनियर एवं प्राध्यापक जैसी सत्ताएँ उनमें सम्मिलित थीं। रोचक बात यह थी कि जब कोई आत्मा उसमें अभिव्यक्त होती, तो वह अपना काम पूर्ण करके ही विराम लेती थी। एक बार कृषक आत्मा ने उस पर लंबे समय तक अधिकार जमाए रखा। इस दौरान उसे खेती विषयक बात के अतिरिक्त और कुछ नहीं सूझता। वह खेती के तरीकों और बारीकियों पर ही बातें किया करता। जब तक यह सत्ता उस पर हावी रही, कृषि करता रहा। संबंधियों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता कि जिस व्यक्ति को खेती संबंधी तनिक भी ज्ञान नहीं और जिसे इसमें थोड़ी भी रुचि नहीं, वह अचानक इसमें कैसे रस लेने लगा और उसे इतनी सूक्ष्म जानकारी अकस्मात् कहाँ से आ गई? चित्रकार आत्मा जब उस देह में सक्रिय हुई, तो वह उच्चकोटि के चित्र और पेंटिंग बनाने लगा। कभी वह भवन निर्माण का विशेषज्ञों जैसा कार्य करने लगता, तो यदा-कदा ऐसे विद्वत्तपूर्ण निबंध लिख डालता, जिसकी उस जैसे साधारण ज्ञान वाले व्यक्ति से कल्पना नहीं की जा सकती। कुल मिलाकर उसका जीवन बड़ा ही कठिनाई पूर्ण रहा। वह जब तक जीवित रहा, इनसे मुक्ति नहीं पा सका। उसकी सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि वह अपने हिसाब से उनका कभी भी उपयोग नहीं कर सका। इसके विपरीत वह उनके वशवर्ती बना रहा और उन्हीं की इच्छानुवर्ती कार्य करता रहा। उल्लेखनीय बात यह थी कि वह समस्त सत्ताएँ एक परिवार की तरह उस शरीर में रहती थीं। जब ई.ई.जी. लिया गया, तो आश्चर्यजनक ढंग से उसकी तरंगीय गतिविधियाँ भिन्न-भिन्न थीं। एक मस्तिष्क में अनेक ‘ब्रेन पैटर्न्स’ सह चिकित्सा जगत् के लिए एक अजूबा था, कारण कि मस्तिष्कीय शैली भी ‘फिंगर प्रिंट’ की तरह बिलकुल व्यक्तिगत होती है और एक का मस्तिष्कीय नमूना दूसरे से सर्वथा पृथक् होता है। वैज्ञानिक इस गुत्थी को अंत तक नहीं सुलझा सके और यही कहते रहे कि चिकित्सा विज्ञान के लिए यह मामला एक गूढ़ रहस्य है।

भारतीय दर्शन इस तथ्य को स्वीकारता है कि देहरहित सत्ताएँ दूसरे के शरीरों को अपना माध्यम बनाकर ऐसे-ऐसे क्रिया कृत्य कर सकती हैं, जो सामने वाले को अचंभे में डाल दे। प्रेत, पिशाच, जिन्न जैसी निकृष्ट स्तर की आत्माएँ तो बदले की भावना से प्रेरित रहती हैं। वे न तो स्वयं चैन से रहती हैं, न औरों को शाँतिपूर्वक रहने देती हैं। जिस शरीर को आधार बनाती हैं, उसके जीवन को नारकीय बनाकर रख देती हैं। उनका मुख्य प्रयोजन ही सताना होता है। इसके विपरीत यदि उच्चस्तरीय आत्माओं को कभी ऐसी भूमिकाओं में संलग्न होने की जरूरत पड़ी, तो उनका रुख पूरी तरह सहयोगात्मक ही होता है। दूसरों को ऊँचा उठाना, आगे बढ़ाना और मार्गदर्शन करना ही इसके पीछे का प्रधान लक्ष्य होता है। शरीर में रहते हुए भी वे परोपकारवृत्ति में निरत रहती हैं और शरीर छूटने के उपराँत भी उसकी मनःस्थिति वैसी ही पवित्र बनी रहती है, जबकि विक्षुब्ध आत्माएँ जीते-जी अशाँत बनी रहती हैं और मरकर भी उस मनोदशा से उबर नहीं पातीं। इस संसार में इस स्तर की कितनी ही सूक्ष्म सत्ताएँ मौजूद हैं। डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी, राकिनी, ब्रह्मराक्षस, बेताल आदि इसी श्रेणी में आते हैं। तंत्र शास्त्र की संपूर्ण नींव इन्हीं पर टिकी है। अभिचार, कृत्या, घात, मूठ, चौकी जैसी ताँत्रिक क्रियाओं के माध्यम से जब इन शक्तियों को किन्हीं लक्ष्यों पर प्रक्षेपित किया जाता है, तो वह आज्ञाकारी सेवक की तरह अपने कार्य संपादन में लग जाती हैं। इसे कोरा बकवास नहीं, सुस्थापित तथ्य कहना चाहिए। समय-समय पर इसके उदाहरण सामने आते ही रहते हैं।

ऐसे ही एक प्रकरण की चर्चा करते हुए मार्क्स फ्रीडम लाँडग अपनी पुस्तक ‘दि सीक्रेट साइंस बिहाइंड मिरैकल्स’ में लिखते हैं कि सन् 1917 में वे जब पहली बार एक अध्यापक के रूप में हवाई द्वीप गए, तो वहाँ के मूल ‘हुना’ धर्म की उन्हें जानकारी मिली। इसमें मृत्युदायक प्रार्थना की एक बहुचर्चित प्रथा है, जो तब आम थी। जब किसी पर इस प्राणघातक प्रार्थना का प्रयोग किया जाता है, तो सर्वप्रथम उसके पैरों में एक चुभन का अनुभव होता, जो बाद में सुन्न में परिवर्तित होकर पाँवों को चेतनाशून्य बना देती है। पीछे यह सुन्नता पैरों से ऊपर की ओर बढ़ते हुए संपूर्ण काया को अपना शिकार बना लेती है। इसके उपराँत उस व्यक्ति की मौत हो जाती है। सुनने में यह बात बेतुकी प्रतीत हो सकती है, पर जब मैक्स ने होनेलूलू के क्वीनस अस्पताल में इसकी पड़ताल की, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि वहाँ इस प्रकार के मरीज प्रतिवर्ष एक, दो या कभी-कभी अधिक की संख्या में आ जाते हैं। उन्हें अच्छी-से-अच्छी चिकित्सकीय सेवाएँ देने के बावजूद भी डॉक्टर किसी को भी बचा पाने में अब तक सफल नहीं हो सके हैं। जानकार लोग इसका कारण उस शैतान सत्ता को बताते हैं, जिसे ऐसा करने के लिए ही प्रेरित प्रक्षेपित किया जाता है। एक बार वहाँ का एक मंत्री इस विद्या के विशेषज्ञ ‘काहुना’ के कुचक्र में पड़ गया। उसने अपनी काहुना विद्या का प्रयोग कर उसके साथी मंत्रियों को एक-एक कर मारना शुरू किया। इससे परेशान होकर उस मंत्री ने स्वयं इसे सीखा और उस काहुना पर इसका प्रयोग कर उसे मार डाला। यह सारा प्रसंग मंत्री की डायरी से मैक्स को विदित हुआ।

विलियम टफ्ट्स ब्रायघम नामक एक डॉक्टर उक्त विद्या पर काफी खोज-अध्ययन किया है। इसमें उस घटना का भी उल्लेख है कि किस प्रकार उनके साथ रहने वाला एक स्थानीय बालक इसकी चपेट में आया और कैसे डॉ. ब्रायघम ने उसे मौत के मुँह से बाहर निकाला। घटनाक्रम का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि एक बार वे उस लड़के के साथ एक पर्वत पर कुछ खोजबीन के लिए जा रहे थे, तभी उसने पाँवों में सुन्नता की शिकायत की। स्पष्ट था, वह मृत्युदायी प्रार्थना का शिकार हो चुका था। पूछताछ से ज्ञात हुआ कि वहाँ के स्थानीय काहुना ने उसे किसी गोरे के साथ काम न करने की चेतावनी दी थी और इसकी उपेक्षा करने पर मृत्यु की सुनिश्चित संभावना भी प्रकट की थी। बाद में बालक इस बात को भूल गया। आज उसी का परिणाम उसे भुगतना पड़ रहा था।

बालक की इस आकस्मिक विपत्ति का दोषी ब्रायघम स्वयं को मान रहे थे, अतएव उसे बचाने का उपाय करना भी उसका कर्त्तव्य है, यह सोचकर वह उस बालक पर झुक गए और उक्त आत्मा को संबोधित कर कहने लगे कि यह लड़का निर्दोष है। इसकी कोई गलती नहीं। आप दयावान् और कृपालु हैं। निर्दोषों की रक्षा करना आपका धर्म है। दोषी तो वास्तव में वह काहुना है, जिसने भ्रमित कर आपको यहाँ भेजा। आप, जो इस कार्य का वास्तविक अपराधी है, वहीं जाएँ और इस बालक को मुक्त कर दें।

इस प्रकार लगभग एक घंटे तक प्रार्थना करने के उपराँत उस आत्मा ने बालक को अपने चंगुल से आजाद कर दिया। अब वह पूर्ववत् स्थिति में आ गया। उसे एक बार फिर अपने पाँवों की अनुभूति होने लगी, सुन्नता समाप्त हो गई। वह सामान्य ढंग से चलने-फिरने में पुनः समर्थ हो गया। पहाड़ से लौटकर ब्रायघम ने जब उसके गाँव में उक्त काहुना का पता लगाया, तो ज्ञात हुआ कि आज ही उसकी मृत्यु हो गई। मरने से पहले उसने गाँव वालों को बताया कि वह गोरा व्यक्ति मृत्युदायी आत्मा को उसकी ओर वापस लौटाने में सफल हो गया। चूँकि वह इससे बचने के लिए कोई आवश्यक कदम नहीं उठा सका, अतः उसे इसका नतीजा अब भोगना ही पड़ेगा। इसके कुछ घंटे पश्चात् उसमें मृत्युदायी प्रार्थना के असर के लक्षण उभरने लगे और उसकी मौत हो गई।

यह एक प्रकार का ताँत्रिक अभिचार हुआ। इसमें वशवर्ती आत्माओं को निश्चित निर्देशों का पालन करना पड़ता है। जैसी आज्ञा हुई, उसी अनुरूप कार्य करते हुए वे लक्ष्यपूर्ति करती हैं। इसमें ननुनच करने या अनख दिखाने जैसी छूट उन्हें नहीं होती। वे एक तरह की गुलाम होती हैं और आदेशों का परिपालन उनकी मजबूरी।

किंतु जो आत्माएँ स्वेच्छा से किसी कलेवर में प्रवेश करती हैं, वे उसके जीवन से छेड़छाड़ और हास-परिहास तो करती हैं, पर प्राणहरण जैसी नौबत नहीं आने देतीं। ऐसी ही एक घटना का वर्णन काँलिन विल्सन अपने ग्रंथ ‘बियोण्ड दि अकल्ट’ में करते हैं। प्रसंग मैरी रीनोल्ड्स नामक एक लड़की का है। एक प्रातः जब वह सोकर उठी, तो वह अपनी संपूर्ण स्मृति खो चुकी थी। अब वह एक नवजात शिशु की तरह थी। उसकी काया भले ही एक किशोरी की थी, पर मानसिक स्तर शिशुओं जैसा अविकसित। उसे बोलना फिर से सीखना पड़ा। व्यवहार-बर्ताव की भी उसको शिक्षा देनी पड़ी। पाँच सप्ताह बाद वास्तविक मैरी फिर से उस शरीर में प्रकट हुई। उसे इस दौरान की किसी भी गतिविधि की जानकारी नहीं थी। संपूर्ण जीवन बारी-बारी से दोनों मैरी उस देह में इसी तरह आती-जाती रहीं। उसके माता-पिता इस संबंध में कभी भी आश्वस्त नहीं हो सके कि रात सोकर सुबह उठने वाली मैरी कौन होगी, वही या दूसरी? दोनों के स्वभाव एक-दूसरे के विपरीत थे, इसलिए उनकी पहचान आसानी से हो जाती थी। मूल मैरी एक सुस्त किस्म की लड़की थी, जो अक्सर अवसाद में चली जाती। इसके विपरीत दूसरी मैरी चंचल और शैतान थी। प्रथम मैरी को प्रकृति से कोई लगाव नहीं था, दूसरी मैरी इसका भरपूर आनंद उठाती।

मिलती-जुलती एक अन्य घटना कैलीफोर्निया की एक अट्ठाइस वर्षीया युवती की है। वह भी मैरी रीनोल्ड्स की ही तरह चार वर्ष की अवस्था से व्यक्तित्व परिवर्तन की शिकार थी; किंतु यहाँ एक अद्भुतता यह थी कि यह परिवर्तन नियमित रूप से हर चौथे वर्ष ही घटित होता था, किसी अन्य वर्ष नहीं। दोनों सत्ताएँ एक-दूसरे से अनभिज्ञ थीं। एक जब शरीर में होती, तो दूसरी को उस अवधि की घटनाओं की बिलकुल ही जानकारी नहीं होती।

जब वह चार वर्ष की थी, तो प्रथम बार उसकी देह पर दूसरी सत्ता ने अधिकार जमाया। फिर वह आठ वर्ष की उम्र में जगी। इस मध्य मूल सत्ता सुषुप्त बनी रही, इसलिए उसे इस कालक्रम का कोई ज्ञान नहीं। बारह वर्ष की आयु में वह पुनः तंद्रा की दशा में चली गई और बाहरी सत्त फिर से सक्रिय हो उठी। जब वह इस मूर्च्छा से जगी, तो सोलह साल की हो चुकी थी। यहाँ भी वास्तविक सत्ता शाँत और दब्बू प्रकृति की थी, जबकि उस पर कब्जा जमाने वाला बाहरी अस्तित्व आक्रामक था।

इससे छुटकारा दिलाने के लिए उसे सम्मोहित किया गया। सम्मोहनकर्त्ता ने बाहरी सत्ता को शरीर छोड़ देने की आज्ञा दी, पर इसका कोई असर नहीं हुआ। तब उसने दोनों व्यक्तित्वों को मिलकर एक हो जाने की सलाह दी। इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला। एक दिन युवती सम्मोहन क्रम में गहन मूर्च्छा की स्थिति में चली गई। इसी समय एक तीसरा नर स्वर उसके भीतर से उभरा। वह स्वयं को उन दोनों का अभिभावक बता रहा था। उसे दोनों के बारे में संपूर्ण जानकारी थी। उसने यह भी कहा कि दोनों दो भिन्न सत्ताएँ हैं और एक ही शरीर का उपयोग कर रही हैं। सम्मोहनकर्त्ता के यह कहने पर कि यदि दूसरी सत्ता ने शरीर नहीं त्यागा, तो वह लड़की को आजीवन सम्मोहन की अवस्था में बनाए रखेगा, उसने जवाब दिया कि तब वह दूसरी सत्ता सहित मूल सत्ता को भी वापस खींच लेगा और उसकी निष्प्राण देह ही शेष पड़ी रहेगी। हारकर उसे उसकी स्थिति पर छोड़ देना पड़ा। वह अंत तक दोहरे व्यक्तित्व वाला जीवन जीती रही।

व्यक्तित्व यदि दब्बू हो, वह मनोबल की दृष्टि से कमजोर हो तथा जीवन के संघर्षों से पराजित हो चुका हो, तो उस पर कोई भी हावी हो जाता है। अतृप्त आत्माएँ भी ऐसे ही शरीरों पर सवार होतीं और अपनी आकाँक्षाएँ पूरी करती हैं। दबंग आदमी से हर कोई डरता है। इसके लिए उसे ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती। उसकी निर्भीकता ही सामने वाले को यह आभास दे जाती है कि यहाँ टकराना खतरे से खाली नहीं है और वह किनारा कर लेता है। उसके लिए यही सरल और सुरक्षित है। हमारे लिए उचित यह है कि हम अपने अंतस् को बलवान बनाएँ और जीवन-संघर्ष को यह मानकर चलें कि वह टक्कर मार-मारकर घूँसों को मजबूत बनाने जैसा अभ्यास है। उसमें सबलता ही बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में निर्बलों को न 222 तंग कर सकेंगी, न मनुष्य ही।


यम-नियम-7 (संतोष) - शिकायत करना छोड़ें, प्रसन्न रहें


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1. उपलब्ध परिस्थितियों को भगवान् का अनुग्रह मानकर प्रसन्न रहना।

2. जहाँ तक हो सके अपनी साधन-संपदा की तुलना दूसरों से नहीं करना।

3. क्षुब्ध और निराश करने वाली स्थितियों से बचना।

आधे-अधूरे प्रयत्नों से जो मिल जाए उसी में मन मार कर रह जाना और श्रेष्ठ के लिए प्रयत्न छोड़ देने का नाम -संतोष’ नहीं है। वैराग्य के नाम पर ईश्वर की ललित-ललाम इस सृष्टि को कोसने वाले उपदेशक लौकिक उपलब्धियों को दिन-रात कोसते रहते हैं। उनके अनुसार किसी भी लौकिक उद्देश्य के लिए संकल्प करना पाप है, मन में किसी इच्छा का उदय होना आध्यात्मिक अपराध है और व्यक्ति संसार में जितना व्यस्त रहता है, ईश्वर से उतना ही दूर होता जाता है। इस तरह के निराशावादी विचारों के साधकों ने दुःख का आत्यंतिक निरोध करने वाले योग को संसार से पलायन की प्रेरणा देने वाला शास्त्र बना दिया है।

पतंजलि ने जिस संतोष को योग की तैयारी के चरण में रखा है, चित्तवृत्तियों को निर्मल और अनुशासित वाले उपायों के रूप में सम्मिलित किया है, वह वैराग्य का नहीं अनुग्रह का भाव है। उद्देश्य है किन्हीं भी कठिनाइयों, विपत्तियों और विफलताओं में चित्त को विक्षुब्ध नहीं होने देना। संतोष का शाब्दिक अर्थ तुष्टि है, मन का तृप्त हो जाना। कुछ और स्पष्ट करते हुए मनीषियों ने इसे ‘तृष्णा’ का सर्वथा अभाव बताया है। तृष्णा का अभाव एक स्थिति है। उसे प्राप्त करने का लक्ष्य योगशास्त्र के आचार्यों ने रखा है। स्थिति तक पहुँचने के लिए जिस मार्ग का आश्रय लेना चाहिए, उसमें पहली आवश्यकता प्रसन्न रहना है। हमें जो भी परिस्थितियाँ उपलब्ध हैं, उन्हें ईश्वर का अनुग्रह मानकर प्रसन्न रहें।

संतोष का अर्थ है, जो उपलब्ध है, उसके लिए ईश्वर को धन्यवाद देना। सामान्य बुद्धि से भी यह समझा जा सकता है कि हम जो कुछ हैं, वह अपने प्रयत्नों से ही नहीं हैं। अपना अस्तित्व यदि निजी पुरुषार्थ के कारण ही टिका रह सकता, तो वर्तमान स्थिति और सामर्थ्य के अनुसार कभी संभव ही नहीं था। अनुग्रह-बोध को गहन करने के लिए जिस चिंतनधारा को अपनाया जाता है, उसमें साधक कुछ इस तरह सोचता है, जिस प्राणवायु के बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रहा जा सकता, वह हमने स्वयं नहीं बनाई। संसार में अपने आस-पास और शरीर के भीतर भी वायु तथा आकाश का जैसा विस्तार है। वह बना सकना तो दूर, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। शरीर के भीतर और बाहर वायु के दबाव, गुरुत्वाकर्षण, गति देने वाली जैविक प्रक्रियाएँ, पोषण देने वाले उपादानों में से अपना बनाया कुछ भी तो नहीं है। यह विराट् अस्तित्व के ही अनुग्रह का फल है। आस्तिक भाषा में इसे ईश्वर की कृपा कहेंगे।

अनुग्रह-बोध की भावधारा अपने अस्तित्व के लिए विराट् जगत् या ईश्वर को श्रेय देते हुए आगे बढ़ती है, तो सोचती है कि मेरा अपना जीवन तक स्वयं के चाहने से नहीं है। अपने से इतर सत्ताएँ स्वीकार कर रही हैं, इसलिए वह टिका हुआ है। कुछ लोग भी तय कर लें कि इसका अस्तित्व नहीं होना चाहिए, तो अपने लिए संकट खड़ा हो जाएगा। यह भावधारा मन में कातरता या असहाय होने का भय नहीं, विनम्रता का कोमल संवेग जगाती है। अपना अस्तित्व ईश्वर की कृपा से ही दिखाई दे रहा है, दूसरे लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं, तो भी ईश्वर का अनुग्रह है और संसार में निर्वाह हो रहा है, तो भी परमसत्ता की करुणा है। इस चिंतन को अपनाने के बाद दैन्य-दुर्बलता टिकी नहीं रह सकती। विनम्रता के साथ एक सात्विक संतुलन बना रहने लगता है।

तृष्णा, वासना, कामना आदि विकारों का मूल कारण भी अभाव ही है। अंतरंग में बँध जाने वाली यह गाँठ व्यक्ति को अपने दीन-दुर्बल होने की चुभन से पीड़ित करती रहती है। साधक जब सोचता है या उसके मन में भाव आता है कि इसके पास औरों की तुलना में साधनों की बेहद कमी है। वैभव कम है, संपदा कम है, यश नहीं मिल रहा, पद-प्रतिष्ठा नहीं है, तो वह दुःखी होता है। अभाव क्यों दिखाई देता है? जब दूसरों से तुलना करते हैं, तभी अभाव दिखाई देता है। मनुष्य के अलावा कोई और प्राणी अभाव का रोना नहीं रोता, क्योंकि उसके पास तुलना करने वाली सोच नहीं है।

तुलना की आदत एकदम नहीं छूट सकती, इसका अभ्यास धीरे-धीरे ही किया जा सकता है। आरंभ अपने स्वजन-संबंधियों से किया जाए। स्पर्द्धा और ईर्ष्या भी सबसे पहले अपने परिजनों में ही होती है। दूर रहने वाले या जो अपने संपर्क क्षेत्र में नहीं हैं, उनसे लोग कम ही तुलना करते हैं। हजारीबाग में रहने वाला रामकिशोर सिंह मुँबई में रहने वाले किसी उद्योगपति से न तो तुलना करेगा और न ही उसकी प्रगति से दुःखी होगा। वह अपने पड़ोस में परचून की दुकान करने वाले रिश्तेदार श्याम सिंह की बिक्री बढ़ते देख या उसके मकान में एक और कमरा बन जाने पर दुःखी हो जाएगा। किसी स्वजन-संबंधी के तरक्की करने पर मन में तुलना का भाव आता है। इस आदत पर अंकुश लगाया जा सके, तो संतोष की सिद्धि की दिशा में एक पक उठ गया समझना चाहिए।

दूसरों के बजाय अपने आप से तुलना का नियम भी बनाया जा सकता है। वह आत्मविकास की दिशा में अग्रसर करती है। कल हम जिस स्थिति में थे, उससे आज कितना आगे बढ़े हैं? पिछले साल की तुलना में इस साल साधन-संपदा में कितना विकास हुआ है? आज की स्थितियाँ पिछली स्थितियों से कितनी बेहतर हैं? इन प्रश्नों के साथ अपनी स्थिति की समीक्षा की जाए, तो अगले प्रश्न यह भी रहेंगे कि और बेहतर बनने के लिए क्या किया जाए? अपने आपसे स्वयं की तुलना करते हुए वर्तमान स्थितियों और साधनों के श्रेष्ठ उपयोग की बात भी सोचनी चाहिए। उसके उपाय ढूँढ़ने चाहिए, योजना बनानी चाहिए, किन लोगों का सहयोग लिया जा सकता है, यह भी विचार करना चाहिए। ध्यान रहे, ये प्रयत्न मानसिक व्यायाम तक ही नहीं रह जाएँ। चिंतन मनन के बाद जो निर्धारण हो, उस पर अमल भी किया जाए। यह निर्धारण किसी और के साथ मिलकर नहीं, स्वयं ही करना चाहिए। तुलना और समीक्षा का यह अभ्यास संतोष की सिद्धि तक पहुँचाएगा।

महर्षि पतंजलि ने संतोष की फलश्रुति बताई है कि उसके सिद्ध हो जाने पर साधक जो भी इच्छा करता है, वह पूरी हो जाती है। वह आप्तकाम हो जाता है अर्थात् कामना उठते ही पूरी होने लगती है। यह फलश्रुति कथा-कहानियों में बताए जाने वाले चमत्कारों की तरह नहीं है कि साधक ने इधर इच्छा की कि महल में रहने लगूँ और उधर महल बनकर तैयार हो गया। इस तरह के चमत्कार दुनिया में कहीं नहीं होते। वे कल्पना में ही होते हैं। वास्तविक जगत् में भी उसी तरह के चमत्कार होने लगें, तो यह संसार एक क्षण भी नहीं रहे। दिनभर में हम लोग जितना दूसरों को कोसते हैं और दूसरे हमें जितना कोसते हैं, वह सब सही होने लगे, तो प्रत्येक व्यक्ति को दिनभर में हजारों-लाखों बार मरना और पतन के गर्त में गिरना पड़े। कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर इच्छाएँ हाथों-हाथ पूरी होने की स्थिति किसी भी सिद्धि के अंतर्गत नहीं आती।

योगशास्त्र एक विज्ञान है। योगसूत्रों के संबंध में तो विद्वान् आचार्य ही नहीं वैज्ञानिक भी मानते हैं कि वे गणित के फार्मूलों की तरह हैं। उनमें एक भी शब्द व्यर्थ नहीं है और न ही कोई आश्वासन लुभाने के लिए दिया गया। संतोष की सिद्धि इच्छा करते ही उसके पूरी हो जाने के रूप में की गई है, तो उसका अर्थ इतना है कि व्यक्ति तृष्णा, वासना, ईर्ष्या और द्वेष के ज्रलों में नहीं भटकता। इनके नुकीले और काँटेदार पत्तों में उलझने की बजाय वह अपने विकास के राजपथ पर चलता है। सार्थक और उचित इच्छाएँ ही उसके मन में उठती हैं। उन्हें पूरी करने के लिए वह सोचता, योजना बनाता और प्रयत्न करता है।

उत्साह और संतोष लौकिक और आध्यात्मिक दोनों ही दिशा में आगे बढ़ने के लिए उपयुक्त भूमिका बनाते हैं। वस्तुतः लौकिक और आत्मिक क्षेत्र अलग नहीं हैं, जिस बिंदु पर हमारी चेतना खड़ी है वहीं की प्रस्थान दिशाओं के नाम हैं। परम अवस्था में पहुँचने के बाद इस तरह के भाषा-विवेक की आवश्यकता नहीं पड़ती। साधना की अवस्था ये समझने के लिए ही है कि जब हम प्रस्थान बिंदु से जगत् की ओर यात्रा करते हैं, तो वह लौकिक हो जाता है और अपने भीतर मुड़ते हैं, तो आत्मिक हो जाती है।

संतोष की सिद्धि के लिए क्षुब्ध और निराश करने वाली स्थितियों से बचने का परामर्श दिया गया है। स्थितियों का अर्थ उन व्यक्तियों से भी है, जो हमारे मन, सोच और संकल्प को प्रभावित करते हैं। वह वातावरण भी छोड़ना चाहिए या उससे बचना चाहिए, जो अपने आप को क्षुब्ध करता हो। मन में निराशा भरता हो। क्षोभ और निराशा भी ईश्वर के प्रति अविश्वास का ही एक प्रकार है। जितनी देर हम निराश होते हैं, उतनी देर ईश्वर के मंगल विधान पर संदेह करते हैं। अपने विश्वास को डगमगा रहे होते हैं अपने उस विश्वास को सदैव स्थिर रखना चाहिए।


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यदि परमार्थपरक जीवन जीने का, एक-दूसरे को सहयोग देने का मार्ग अपनाया जाए, तो प्रतिक्रिया स्वरूप जनसहयोग एवं लोकसम्मान स्वतः मिलने लगेगा। सद्भाव पाने का एक ही मार्ग है-शिष्टाचार की पृष्ठभूमि पर टिका पारस्परिक सहकार।


विज्ञान की विकास यात्रा के साथ उठते कुछ प्रश्न

नई सहस्राब्दी में 3 से 7 जनवरी सन् 2001 को नई दिल्ली में भारतीय विज्ञान काँग्रेस का महाधिवेशन हुआ। इस महाधिवेशन का यही निष्कर्ष निकाला गया कि विज्ञान ने मानव समाज को अद्भुत एवं चमत्कारिक अनुदान प्रदान किए हैं। अंधविश्वासों से डरा-घिरा मानव वैज्ञानिक सोच पाकर स्वतंत्र एवं खुशहाल जिंदगी जी पाया है। वैज्ञानिक उपलब्धियों से भौतिक जीवन को एक नया आयाम मिला है। इससे रहन-सहन, आहार-व्यवहार और दर्शन में व्यापक बदलाव आ गया है। आज विज्ञान के बिना जीवन की गतिविधियाँ अधूरी प्रतीत होती हैं। विज्ञान ने दूरियों को घटाकर संसार को एक गाँव में तब्दील कर दिया है।

पश्चिमी दुनिया में कोपरनिकस ने एक नई वैज्ञानिक सोच की शुरुआत की थी। इस सोच की देकार्ते और आइंस्टीन ने व्यापक व्याख्या करके अद्भुत सूत्र रूप में पिरोया। इससे विज्ञान ने आधुनिक युग में प्रवेश किया। उच्च प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी यात्रा इन्हीं प्रयोगों के पश्चात् ही प्रारंभ हुई तब से आविष्कारों का सिलसिला ऐसा चला कि रुकने का नाम ही नहीं लेता।

आविष्कारों की यह कथा सही मायने में इटली के वैज्ञानिक गैलीलियो के जमाने में शुरू हुई थी। उन्होंने 1610 ई. में ऐ ऐसा टेलीस्कोप तैयार किया, जिसकी सहायता से किसी भी चीज को हजार गुना बड़ा देखा जा सकता था। अगले दो सौ साल तक इस उपकरण को परिष्कृत कर स्पेक्ट्रोस्कोप बनाया गया। इसके द्वारा न केवल ब्रह्माँड के दूसरे ग्रह-नक्षत्रों को देखा जा सकता था, बल्कि आकार के बारे में भी अनुमान लगाया जा सकता है।

सत्रहवीं शताब्दी में ब्रिटिश वैज्ञानिक और गणितज्ञ आइजक न्यूटन द्वारा प्रतिपादित गुरुत्वाकर्षण सिद्धाँत और गति के नियम मील के पत्थर साबित हुए। 1687 में न्यूटन ने ‘प्रिंसिपिया मैथेमेटिका’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रह्माँड में प्रत्येक पिंड एक दूसरे पिंड को अपनी ओर आकर्षित करता है और साथ ही प्रत्येक पिंड अपनी यथास्थिति भी बनाए रखने का प्रयास करता है। न्यूटन ने गति के तीन नियमों की व्याख्या भी की।

विज्ञान ने इस मुकाम तक पहुँचने से पहले कई दूसरे पड़ावों को भी पार किया। 1289 में उत्तल चश्मों का आविष्कार इटली के एक व्यक्ति द्वारा किया गया। सोलहवीं शताब्दी के अंत में नीदरलैंड के जेड जैनसन ने माइक्रोस्कोप की खोज की। सत्रहवीं शताब्दी में वैज्ञानिक विकास के चरणों में और तेजी आई। 1621 में स्लाइड रुल की खोज हुई एवं 1623 में विल्हेम शिकार्ड द्वारा अनुफलक निर्मित किया गया। 1644 में टाँरिसेल ने बैरोमीटर का विकास किया। 1656 में अमेरिकी विज्ञानी सी. हायगन्स ने लोलक घड़ी का एवं 1698 में ब्रिटेन के थामस सेवरी ने स्टीम इंजन का आविष्कार किया।

इस बीच चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भी कतिपय जानकारियाँ उपलब्ध हुईं। 1316 में इटली के मानडिनो ने पहली बार शारीरिक संरचना के बारे में बताया। 1648 में बेल्जियम के ज्याँ बैप्टिस्ट वैन हेलमंट ने जीव रसायन शास्त्र की स्थापना की एवं 1683 में ल्यूवेनहुक ने बैक्टीरिया की खोज की।

अठारहवीं सदी में विज्ञान के कई और आयाम खुले। 1725 में चीन में मापिनी घड़ी बनी। 1735 में ब्रिटेन के हैरिसन द्वारा क्रोनोमीटर का आविष्कार किया गया। 1765 में वाष्प इंजन का कंडेंसर विकसित हुआ, जिसे ब्रिटेन के जेमन वाट ने खोजा। 1766 में कैवडिश ने हाइड्रोजन का पता लगाया। 1769 में फ्राँसीसी वैज्ञानिक निकोलस कुगनोट ने वाष्प-कार का निर्माण किया। 1780 में बाइफोकल लैंस, 1783 में गुब्बारा, 1785 में पावरलूम, 1787 में टेलीग्राफ का आविष्कार हुआ। फ्राँस के ए.जे. गारनेरिन ने 1797 में पैराशूट का निर्माण कर मनुष्य को हवा में कुलाचें मारने की विद्या सिखाई।

इसी सदी में ही 1768 में जान हंटर ने प्रायोगिक और शल्य पैथालॉजी की नींव डाली। 1798 में ब्रिटेन के एडवर्ड जेननर ने टीके की खोज की। इस सदी के अंत में एंटमोलॉजी का स्वरूप सामने आ चुका था।

उन्नीसवीं सदी में विज्ञान के चमत्कारपूर्ण आविष्कारों एवं उपलब्धियों ने मानव समाज को आश्चर्यचकित कर दिया। इस सदी की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ थीं, बिजली का बल्ब, रेडियो, सिनेमा, फोटोग्राफी, टेलीफोन आदि।

1800 में इटली के विज्ञानी वोल्टा ने बैट्री की खोज की। 1804 में ब्रिटेन में इंजन का निर्माण हुआ। 1805 में ब्रिटेन में ही इलेक्ट्रोप्लेटिंग की तकनीकी विकसित हुई। 1807 में अमेरिकी वैज्ञानिक फुलर्टन ने पहली बार स्टीमबोट बनाई। 1808 में इटली के पी. टैरी ने टाइपराइटर का आविष्कार किया। 1824 में स्काटलैंड के जॉर्ज स्टफेंसन ने रेलवे इंजन का आविष्कार किया। 1816 में सेफ्टी लैंप, 1817 में डेंटल प्लेट, 1824 में ब्रिटेन में पोर्टलैंड सीमेंट की खोज हुई। 1824 में इटली के स्टरजियन ने विद्युत् चुँबक का आविष्कार किया। इसी वर्ष ब्रिटेन के डाँ. एम. एम. ट्यूरिंग ने इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर का निर्माण किया। 1826 में माचिस का अन्वेषण हुआ।

इन्हीं दिनों किसी हँसते-गाते क्षण को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने हेतु फोटोग्राफी को विकसित किया गया। 1830 में लुईस डेगुएरे ने कॉपर प्लेट का इस्तेमाल करते हुए सर्वप्रथम फोटोग्राफिक विधि विकसित की। उस विधि से किसी भी चित्र का मात्र एक प्रिंट ही बन सकता था। इसी दौरान ब्रिटेन के विलियम फाँक्स टालबोट ने कलोटाइप का निर्माण किया। इसकी सहायता से नेगेटिव इमेज बनाना संभव हुआ, जिसका पॉजिटिव चित्र प्रिंट किया जा सकता था। सबसे पहले अमेरिकी नागरिक एडुविर्या मुब्रिज ने मानवों और अन्य जानवरों के फोटो लिए।

1831 में माइकल फैराडे ने डायनेमो का अनुसंधान किया। 1834 में फ्राँस में ए.एम. एम्पियर ने गैल्वेनोमीटर का आविष्कार किया। 1837 में अमेरिका में टेलीग्राफिक संकेत की खोज हुई। 1842 में मैकमिलन ने साइकिल का निर्माण किया। 1843 में ब्रिटिश वैज्ञानिक ए. बैन ने फैक्स मशीन को विनिर्मित किया। 1852 में फ्राँसीसी विज्ञानी हेनरी गिफ्फार्ड ने वायुयान का अन्वेषण किया। 1861 में अलेक्जेंडर पार्क्स ने सेल्यूलायड का एवं डॉ. गैटलिंग ने मशीनगन का निर्माण किया।

1864 में अमेरिका के जे. ग्राम ने विद्युत् मोटर की खोज की। इसी वर्ष अमेरिकी वैज्ञानिक लूनिस द्वारा रेडियो टेलीग्राफी का आविष्कार किया गया। 1876 में अमेरिका के ग्राहम बेल ने टेलीफोन का आविष्कार कर सबको हैरत में डाल दिया। बेल टेलीफोन कंपनी ने सबसे पहले लंबी दूरी की टेलीफोन लाइन बिछाई। यह लाइन न्यूयार्क और बोस्टन के बीच थी। 1856 में पहला टेलीफोन केबिल डाला गया। उस समय केबिल के माध्यम से मात्र 26 काल एक समय में आते-जाते थे।

महानतम आविष्कारों में से एक एडीसन ने 1877 में ग्रामोफोन का एवं 1878-79 में बिजली के बल्ब का आविष्कार किया। इसके बाद एडीसन बिजली से सारे शहर को रोशन करने के उपायों पर काम करते रहे और 1882 में 85 ग्राहकों को एक ही जेनरेटर से बिजली की रोशनी दी।

1885 में फ्राँस के एल. प्रिंस ने फिल्म की खोज की। इस दिशा में पहल करते हुए फ्राँस के ई. जूल्स मैरी ने मूविंग पिक्चर कैमरा तैयार कर लिया। इस कैमरे से 12 तस्वीरें प्रति सेकेंड खींची जा सकती थीं। तत्पश्चात् काइनेटोस्कोप से तस्वीरों में चलने-फिरने का अहसास होने लगा। 1895 में फ्राँस के लुईस और एगस्ते लुमिएरे नामक दो भाइयों ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर सिनेमा का प्रदर्शन किया। परंतु सही मायने में फिल्म बीसवीं सदी में बनकर आई। 1927 में फिल्में बोलने लगीं और 1930 में इनमें रंग भी भर गया।

1885 में जर्मनी के जी. डैमलर ने मोटरसाइकिल का निर्माण कर आवागमन को सहज-सरल बनाया। 1888 में जर्मनी में पेट्रोल कार का आविष्कार कर इस दिशा में एक और कदम बढ़ाया। इसी वर्ष ब्रिटेन के एक टैस्ला ने इलेक्ट्रीक मोटर ए.सी. की खोज की। इस क्षेत्र में एक और महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ 1895 में जब जर्मनी के आर. डीजल ने डीजल इंजन का निर्माण करने में सफलता पाई। 1895 में उब्ल्यू. के. रोटेजेन ने एक्स रे की खोज की।

उन्नीसवीं सदी में चिकित्सा जगत् में मारफीन की खोज प्रारंभ हुई और इसके अंत तक प्रतिरक्षा विज्ञान ने भी विकास कर लिया था। इस बीच रेने लैनके का स्टेथोस्कोप, जेम्स सिंपसन का क्लोरोफार्म, लुई पाश्चर द्वारा रेबीज के टीके विकसित किए जाने की उपलब्धियाँ महत्त्वपूर्ण रहीं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध यानि 1872 में जर्मनी के फर्डिनान कोव को माइक्रोबायोलॉजी का जनक कहा गया। कुष्ठ रोग एवं हैजे के वायरस, मलेरिया और डिप्थीरिया के वायरस को खोज निकाला गया। अतः 1892 में वायरोलॉजी नाम से चिकित्सा विज्ञान की नई शाखा की शुरुआत हुई। अंततः हार्मान के क्षेत्र में भी अनुसंधान प्रक्रिया चल पड़ी।

बीसवीं सदी तो विज्ञान का युग है ही। इस सदी में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास हर क्षेत्र में हुआ है। इस सदी के आविष्कारों ने तो जैसे इतिहास को ही बदल डाला। चाँद की धरती में मानव का पहला कदम पड़ा एवं मंगल की सतह पर रोबोट उतारे गए। परंतु इसी सदी में मानवनिर्मित अणु बम विस्फोट से मानवजाति को भीषण संहार सहना पड़ा। इस घटना ने सभी को यह महसूस करने के लिए मजबूर किया कि वैज्ञानिक याँत्रिकता के साथ आध्यात्मिक भावनाओं का समागम एक अनिवार्य आवश्यकता है।

इस सहस्राब्दी के आखिरी चरण बीसवीं सदी में विज्ञान, कंप्यूटर एवं टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में इतना विकास हुआ है कि अगर इसे इससे पहले समस्त ज्ञात मानव विकास को सम्मिलित रूप से एक ओर कर दिया जाए, तो भी यह उस पर भारी पड़ेगा। इसी विकास के साथ मनुष्य ने इक्कीसवीं सदी में प्रवेश किया है। परंतु इसी विकास के साथ एक और प्रश्न खड़ा हो जाता है कि विज्ञान ने मनुष्य को जितनी अपार साधन-सुविधाएँ दी हैं, क्या मनुष्य उसे प्राप्त कर सुख-शाँति को वरण कर सका है? इस प्रश्न का एकमात्र हल है विज्ञान एवं अध्यात्म का गठजोड़। इस महासंबंध को स्थापित करने के बाद जो भी शोध-अनुसंधान होंगे, वे मनुष्य को सच्चे विकास की ओर ले जाएँगे। नई सहस्राब्दी वैज्ञानिकों-विचारशीलों से यही अपेक्षा करती है।


Quotation

मरण के उपराँत ही स्वर्ग, नरक या मोक्ष मिलता है, यह सोचना ठीक नहीं। ये जीवन काल से आरंभ होते हैं और लंबे समय तक बने रहते हैं।


नागरिक रक्षा के अभ्यास में (Kahani)

अकाल से पीड़ित नरेश बभ्रुवाहन ने निषेधाज्ञा प्रसारित की कि आज से कोई भी नागरिक रात्रि में विचरण नहीं किया करेगा। ऐसा करने वाला अपराधी होगा और उसे दंड दिया जाएगा।

एक रात जब सैनिक गश्त लगा रहे थे, तो उन्होंने किसी व्यक्ति को एक ओर जाते देखा। उन्होंने रोककर पूछा, “कौन हो? पता नहीं तुम्हें रात में घूमना अपराध है।” वह व्यक्ति भी चतुर था। उसने सोचा, यदि डर गए, तो सैनिक बंदी बना लेंगे, इसलिए उसने कड़ककर कहा, “मुझे टोकते हुए भय नहीं लगा, मूर्खों! स्वयं नरेश मेरी सह से काम करते हैं।”

सैनिक डर गए। उन्होंने सोचा कोई सचिव या राजपुरोहित होंगे, सो वह चुप पड़ गए। सिपाहियों के पीछे ही बभ्रुवाहन भी निरीक्षण के लिए निकले थे, उन्होंने जब शस्त्रधारी सैनिकों को डरते देखा, तो स्वयं आगे बढ़कर बोले, “ठहरो, पहले यह बताओ तुम कौन हो?” इस बार तो वह व्यक्ति घबड़ा गया और महाराज के चरणों में गिरकर बोला, “महाराज मैं दस्युराज आभंतक हूँ।”

बभ्रुवाहन ने सैनिकों से कहा, “तुम संख्या में अधिक व सशस्त्र होते हुए भी अंदर से उससे कमजोर क्यों बने? क्या तुममें इतना साहस नहीं कि स्वयं राजा आएँ, तो उनसे भी पूछो कि वे क्यों रात्रि में यहाँ घूम रहे हैं। यदि इस प्रारंभिक नागरिक रक्षा के अभ्यास में भी तुम सफल न हो सके, तो शत्रु के अधिक संख्या में सामने आने पर कैसे लड़ोगे?”


मनोभावों का दर्पण है हमारा चेहरा

अपने अंतराल की प्रसन्नता-अप्रसन्नता ही मनुष्य को बाह्य जगत् में दृष्टिगोचर होती है। संसार की हर वस्तु या व्यक्ति की सुँदरता-असुँदरता के साथ भी यही तथ्य जुड़ा हुआ है। यद्यपि वस्तुएँ जड़ परमाणुओं का समुच्चय हैं, उनके रूप, रंग, नाम और गुण अनेक हैं, फिर भी वे प्राणियों के समकक्ष नहीं आ सकतीं। उनका सुनिश्चित आकार-प्रकार होते हुए भी उनमें ऐसा कुछ नहीं होता, जिससे वे अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया अभिव्यक्त कर सकें। यह मनुष्य की अपनी मान्यता है, जो उसके साथ भले-बुरे का आरोपण करती तथा प्रिय-अप्रिय की मुहर लगाती है। अपने-पराये की यही भावना किसी को प्रिय बनाती, तो किसी को अनुपयुक्त एवं घृणास्पद ठहराती है।

किसी ने ठीक ही कहा है कि भ्राँतियाँ मनुष्य की स्वनिर्मित और स्वनिर्धारित हैं, जिनमें वह एक को भला और दूसरे को बुरा बताता है, अन्यथा स्रष्टा की हर संरचना अपने में विशिष्टता धारण किए हुए है। मनुष्य ही है, जो जिसके साथ चाहता है, प्रभावित होकर अपनत्व बढ़ाता, घनिष्ठता जोड़ता और राग-द्वेष का आरोपण कर लेता है, घृणा या प्रेम करता है, जबकि वस्तुतः ऐसा है नहीं। सभी प्राणी एवं वस्तुएँ नियति नटी के किसी महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिए रची गई हैं। उनकी अपनी-अपनी विशिष्टता एवं महत्ता है। यही तथ्य मनुष्य पर भी लागू होता है। दृष्टिकोण का परिवर्तन मनःस्थिति को भी बदलकर रख देता है। मान्यताओं के बदलते ही घृणा के स्थान पर प्रेम की रसानुभूति होते देर नहीं लगती।

सर्वत्र दृष्टिगोचर होने वाली व्यथाओं का कारण मनुष्य की अपनी स्वनिर्मित मान्यताएँ ही हैं। किन वस्तुओं या व्यक्तियों के प्रति, किसी का राग-द्वेष, कितनी प्रगाढ़ता लिए हुए है, उसके चेहरे पर या आँखों में झाँकने पर इसकी स्पष्ट झाँकी हो सकती है। कारण मन की प्रसन्नता-अप्रसन्नता, प्रियता-अप्रियता व्यक्त करने के यही दोनों दर्पण की भूमिका निभाते हैं। यह अपने हाव-भाव के पीछे गूढ़ रहस्य जो छिपाए बैठे होते हैं। मनोविज्ञानी इस तथ्य को भली-भाँति जानते हैं और कहते हैं कि मन और शरीर सहजीवी की तरह हैं। एक का दूसरे के साथ बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है और दोनों मिलकर चेहरे पर प्रसन्नता या दुःख की झलकियाँ प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि मनोचिकित्सक चेहरा देखते ही भांप जाते हैं कि व्यक्ति किस व्यथा से पीड़ित है।

विकृत दृष्टिकोण धीरे-धीरे मन को अपनी गिरफ्त में पूरी तरह जकड़ लेता है और उसे तनावग्रस्त बना देता है। इसका प्रभाव सौंदर्य पर भी पड़ता है और स्थूल रूप से स्वस्थ दीखते हुए भी व्यक्ति कुरूप लगने लगता है। वस्तुतः यह मन की कुटिलता ही है, जो अंदर की विषाक्त प्रवृत्ति को ढकने का प्रयत्न करती है, फलस्वरूप व्यक्ति बाह्य जगत् में कृत्रिम चेहरा बनाने का प्रयत्न करता है, पर गहराई से दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि तनावयुक्त माँसपेशियाँ विशेष प्रकार की स्थिति से ग्रस्त होकर कठोर बन गई हैं। ओंठ एवं तनी भौंहें अंततः यही सिद्ध करती हैं कि व्यक्ति किन्हीं विशेष मनःस्थितियों में उलझा है।

ईर्ष्या, द्वेष एवं घृणा की स्थिति में मन के धरातल में कंपन शीघ्र होने से नए-नए कुविचार शीघ्रता से उठते हैं, जबकि शाँत एवं स्थिर मन तटस्थ चिंतन करता है। ऐसी स्थिति में भावनाएँ, विचारणाएँ सात्विक ढंग से निस्सृत होती हैं और उनका आरोपण जिस किसी पर भी होगा, उसी में अपनत्व भरी तरंगों का प्रवाह प्रस्फुटित होने लगेगा। ऐसी दशा में स्वयं को प्रसन्नता होती है, स्नायुमंडल को विश्राम मिलता है और विरोधी आकाँक्षाएँ-भावनाएँ मिटती हैं। मन एवं उसकी शक्तियों का बिखराव भी रुकता है। यही शक्तियाँ मूल स्रोत पर पहुँचकर घनीभूत होती और तन-मन को स्वस्थ बनाती हैं।

चिंता एवं घृणा से मुक्त मन घनीभूत शक्तियों सहित अनंत चेतन सत्ता से, विराट् ब्रह्म से जुड़कर व्यापक प्रेम की अनुभूति कराने में सक्षम हो जाता है। इससे मनोभावनाएँ शुद्ध-पवित्र तो बनती ही हैं, समूचा व्यक्तित्व भी प्रभावित-परिवर्तित हुए बिना नहीं रहता। यही क्रिया अंतराल को देवत्व स्तर का बना देती है।

वस्तुतः इस संसार में कोई भी वस्तु या व्यक्ति असुँदर नहीं। स्रष्टा की इस धरित्री पर कुछ भी कुरूप नहीं है। हम जिससे घृणा करने लगते हैं, वही हमारे लिए असुँदर बन जाता है। यदि अपना दृष्टिकोण बदलकर आत्मीयता-अपनत्व का प्रकाश डालें और सृष्टि के सौंदर्य को सराहे, उसकी उपयोगिता पर ध्यान दें, तो ऐसा मानसिक कायाकल्प हो सकता है, जिसके कारण विश्व में कहीं भी कुरूपता दृष्टिगोचर न हो।


जाना ‘अयमात्मा ब्रह्म’ का रहस्य

‘तप-साधना का प्रभाव अद्भुत होता है। आत्मा का दिव्य आलोक अलौकिक होता है, जिसे केवल उन जैसे ही पा सकते हैं।’ ऐसा उन्हें देखने-जानने वाले हिंदू विद्वान् कहते थे। रुहानियत भी एक अजीब शय है। इसके रंग में रँगा शख्स तो बस अशरफ-उल-मखलूकात के लिए ही जिंदा रहता है। वह तो बस ऐसे ही हैं। उन्हें देखकर मुस्लिम-आलिम आपस में ऐसी ही बातें किया करते थे। ऐसा पहुँचा हुआ संत-फकीर तो पहले कभी देखने में ही नहीं आया। कैसी शक्ति है, उसकी तपस्या में। रोते हुए लोग उसके पास आकर हँसते हुए वापस जाते हैं। यह सामान्य जनता का अभिमत था।

ये मस्त फकीर वायजीद थे, जो नगर के बाहर कहीं भी पड़े रहते थे। जाड़े के दिनों में मैदान में ही सो गए, तो तन-बदन की सुधि नहीं। बगीचे की बुढ़िया अपनी ममता कुछ फटे-पुराने चिथड़ों के रूप में ढक दे तो ठीक, अन्यथा वह तो सबसे निरपेक्ष अपने ही आप में खोए रहते। कोई कुछ प्यार से दे गया, तो खा लिया, अन्यथा उन्हें कभी यह भी विचार न आता कि मानव शरीर को स्थिर रखने के लिए भोजन नाम की वस्तु की भी आवश्यकता होती है।

उनकी यह आत्मनिमग्नता भंग होती तो बस अग्निदत्त शास्त्री के सामने। शास्त्री जी नगर के जाने-माने विद्वान् ही नहीं, उच्चकोटि के साधक भी थे। गंभीर तत्त्वालोचना उनके लिए शास्त्रीय विषयवस्तु से कहीं अधिक आत्म-प्रत्यक्ष थी। इनके सामने ही वायजीद को संजीदा होते देखा जाता था। इन्हीं के साथ वह धर्म से संबंधित गूढ़ तत्त्वों पर खुलकर बातें करते। घंटों चर्चा परिचर्चा होती रहती। जो उन्हें अपनी गहन साधनाओं से प्रत्यक्ष हुआ, उसे वह अपनी दलीलों के साथ सामने रखते और जो शास्त्री जी कहते उसे समझने, समझकर पचाने-आत्मसात् करने का प्रयत्न करते।

जब ईश्वर, जीव एवं प्रकृति पर चर्चा की त्रिवेणी बहती, तो दोनों व्यक्ति घंटों संसार और साँसारिकता के अस्तित्व को भुलाकर किसी दूसरी दुनिया में विचरण करने लगते। सृष्टि व जीवन के गूढ़ तत्त्वों में खोए रहते। उलझे भावों की ग्रंथियों को खोलते रहते। टूटे विचारों की श्रृंखला जोड़ते रहते।

नगर निवासी आते। जो इस गंभीर चर्चा में रुचि रखते, वे इन दोनों की बातों में आनंद सुधा का रस अनुभव करते और जो इन गूढ़-गंभीर तत्त्वों को समझ न पाते, वे बस श्रद्धा से शीश झुकाए बैठे रहते। बच्चे बार-बार अपने शाह बाबा के चरण छू जाते। फलों का अंबार श्रद्धालु जन उनके सामने रखते जाते, बच्चे वह प्रसाद भी पा जाते। यदा-कदा कोई व्यक्ति प्रार्थना रूप में कुछ वाक्य कहकर उनकी बातों में व्यवधान भी बन जाता।

अच्छा होगा ............. वह सब अच्छा करेगा!! शाह वायजीद प्रार्थी की ओर देखे बिना ही आकाश की ओर हाथ उठाकर कह देते। सामने रखे फलों को बच्चों में बाँट देते। उनमें से जो बचे रहते, उन्हें वयस्कों को दे देते। अपने लिए कुछ न रखते। उन्हें उस सर्वशक्तिमान् में विश्वास था। संचय के द्वारा वह उसकी शक्तिमत्ता को लघु नहीं बनाना चाहते थे।

फकीर की शोहरत तो दूर-दूर तक फैल रही थी। भक्तजन मनौती मनाते। उनके स्थान पर उर्स-मेलों का आयोजन करते। बाजे बजवाते, तवर्रुख बाँटते, गाते-नाचते, किंतु शाह साहब तो दूसरी दुनिया के शाह थे। ये सब बातें तो उन्हें बच्चों की बातें जैसी लगतीं। वे इन सब प्रदर्शनों पर ध्यान नहीं देते, निरपेक्ष रहते।

वही सब कुछ करता है। वही सबसे बड़ा है। वही है, वही है। ईश्वर का प्रसंग आने पर वायजीद ने कहा, अल्ला हो अकबर और फिर कोई अरबी की आयत पड़ी। वह अरबी-फारसी आदि कई भाषाओं के आलिम थे, संस्कृत के भी ज्ञाता। श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न होने पर भी संसार के वैभव से विरक्त होकर उन्होंने गृहत्याग कर दिया था और अब तो तप-त्याग में इतने आगे पहुँच गए थे कि जाति-भेद तो दूर रहा, उन्हें अपनी ही देह की सुधि नहीं रहती थी।

“वह श्रेष्ठ है, सर्वशक्तिमान् है, किंतु यह क्या है? कौन है? इस पर भी क्या कभी विचार किया?” अग्निदत्त शास्त्री ने प्रश्न किया। वह है। वह सब कुछ है। उसकी शक्ति की क्या कोई शक्ल है? शक्ति तो ज्योति है, नूर हैं। वायजीद ने अपनी श्रद्धा को स्पष्ट किया वह सर्वशक्तिमान् अल्लाह ही परब्रह्म है। उसी की ज्योति सृष्टि के कण कण में व्याप्त है। उसी विराट् का अंश हैं हम जीवात्मा। सृष्टि के समस्त भूत प्राणी। वह सागर है, तो हम बिंदु हैं। बिंदुओं से मिलकर सागर बना है। बिंदु सागर का ही लघु रूप है। अद्वैतवादी दार्शनिक अग्निदत्त ने विराट् और क्षुद्र की व्याख्या की। अपनी मान्यता को वाणी का रूप दिया।

तो शास्त्री जी........शाह साहब चुप रह गए। जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रहे हों। वे उठकर टहलने लगे। इस तल्लीनता में वे भूल गए कि वे अभी एक विद्वान से वार्त्तालाप कर रहे थे। उन्हें न विद्वान् याद रहे, न उपस्थित अन्य जन। उन्हें तो बस याद रह गया केवल यह वाक्य “ईश्वर अंश जीव अविनाशी।”

फकीर वायजीद टहलते रहे। वे न तो किसी की ओर देख रहे थे और न किसी से कुछ कह रहे थे। वे तो अपने विचारों में ही खो गए थे। खोकर कुछ पा रहे थे। पाकर आनंदित हो रहे थे। आनंद की छटा उनके मुखमंडल पर चमक रही थी। उपस्थितजन उनके दर्शन-लाभ से मुग्ध थे।

थोड़ी देर तब सब लोग उनको एकटक देखते रहे, फिर लोगों की लौकिक भावनाओं ने जोर मारा। एक-एक करके सब लोग उठ गए। एक भी व्यक्ति वहाँ शेष न रह गया। वायजीद टहलते रहे, अकेले।

टहलते-टहलते वे एक वृक्ष के निकट पहुँचे। वे वृक्ष की जड़ के निकट वृक्ष से टिककर बैठ गए। पाँव फैलाकर वहाँ कुछ सोचने लगे। वे सोच रहे थे, “सत्य तो सत्य ही होता है। वह हिंदू कहे या मुसलमान, क्या अंतर पड़ता है। ब्रह्म सर्वशक्तिमान् है। मैं जीव हूँ, उसका अंश। वह सोने का बहुत बड़ा पुँज, मैं उसका एक छोटा-सा हिस्सा। वह सोना है, मैं भी सोना हूँ।”

मैं सोना हूँ। मैं ब्रह्म हूँ।....अयमात्मा ब्रह्म। अहं ब्रह्मास्मि। मैं अल्लाह हूँ।” वे जोर-जोर से कह उठे, परंतु वहाँ सुनने वाला कोई नहीं था। पूजा-इबादत करने वाला कोई नहीं था।

उनके स्थान पर बड़े सबेरे ही दर्शनार्थियों की भीड़ जमा हो रही थी। हिंदू आते, मुसलमान आते। बच्चे आते, बूढ़े आते। महिलाएँ आतीं, पुरुष आते। भक्ति श्रद्धा से उस महातपस्वी के चरणों में मस्तक नवाते। उनकी वाणी से निकले अमृत से अपनी आत्मा तृप्त करते और अपने भक्ति-विश्वास का फल लौकिक उपलब्धियों के रूप में पाते रहते थे।

फकीर के न सोने का समय निश्चित था और न जगने का। वे तो निर्बंध थे, निर्द्वंद्व थे। न आत्मा पर कोई बंधन था और न शरीर पर। सारी रात जागते रहे, तो कोई अचरज नहीं और सारे दिन सोते रहे, तो कोई नई बात नहीं। फिर भी बहुधा प्रातःकाल का शीतल समीकरण उन्हें अज्ञात प्रेरणा दे देता। वे उठ पड़ते। भले ही बातें करते-करते फिर से अपनी भाव समाधि में खो जाते।

उस दिन शाह के दर्शनार्थी एक बड़ी संख्या में उपस्थित थे। एक ओर शास्त्री अग्निदत्त बैठे थे, जिनके पीछे प्रतिष्ठित हिंदू स्त्री-पुरुषों की भीड़ थी। दूसरी ओर काजी नूर हसन थे, उनके पीछे एक बड़ी तादाद में मुसलमान बैठे थे। सभी शाह के उठने की प्रतीक्षा कर रहे थे। शाह अपनी गहन समाधि में लेटे हुए थे, झोंपड़ी की दीवार की ओर उनका मुख था, संसार की ओर उनकी पीठ थी।

सहसा उनका शरीर गतिशील हुआ। उन्होंने करवट बदली और “मैं वही हूँ! मैं ब्रह्म हूँ!! मैं अल्लाह हूँ!!!” कहते-कहते वे उठ बैठे।

सामने देखा तो लोगों की भीड़ जमा थी। ओ-हो शास्त्री जी, अच्छा काजी जी, आप लोगों को बहुत इंतजार करना पड़ा। और वे उठकर टहलने लगे। काजी ने शास्त्री को देखा और शास्त्री ने काजी को। फिर दोनों ने अपने-अपने पीछे बैठे जनसमुदाय को देखा।

थोड़ी देर बाद वायजीद अपने आसन पर बैठ गए। धर्मचर्चा होती रही। सब तृप्ति का आनंद लेते रहे। थोड़ी देर बाद शाह वायजीद बोले, अच्छा अब हम गुसल करने जाएँगे। जैसे कोई भूली हुई बात शाह साहब को याद आ गई हो। संकेत जानकर सब उठने लगे। शास्त्री जी, काजी जी और सभी उपस्थित जनसमुदाय एक-एक करके वहाँ से बाहर हो गए।

इन सबमें विचारमग्न काजी जी पीछे रह गए। सहसा वह बिना किसी से कुछ कहे लौट पड़े, जैसे कोई वस्तु आश्रम में पड़ी रह गई हो। चार-पाँच अन्य व्यक्ति भी काजी जी की देखा-देखी साथ लौटे। ये सभी आगंतुक जन वापस उसी स्थान पर बैठकर शाह साहब के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

क्यों काजी जी, अभी गए नहीं? गुसल से लौटकर फकीर वायजीद ने कहा।

“जी गया था, रास्ते से लौट आया, शाह साहब!” काजी ने सकुचाते हुए कहा। “क्यों कोई खास बात हो गई क्या?” शाह ने वाणी में जिज्ञासा भरकर कहा। “जी बस एक अहम बात पूछने को जी अकुला गया।” काजी ने अपने सवाल के लिए भूमिका बाँधी।

“कहिए! जरूर कहिए।” शाह ने जैसे अभय वचन दिया हो।

“यह जो आपने समाधि से उठते हुए कहा था कि मैं वह हूँ, मैं अल्लाह हूँ...” काजी पूरी बात कहते-कहते रुके।

हैं, शाह चौंके। मैंने यह कहा था कि मैं अल्लाह हूँ। .....उनके मुख पर बालकों की भाँति मुस्कान छा गई।

जी हुजूर, सभी उपस्थितजनों ने एक स्वर में साक्षी दी।

ओह, तब तो बहुत बुरी बात है। परम पिता की शान में ऐसी गुस्ताख़ी? बाप बेटे से हमेशा ही बड़ा होता है। क्या लड़के का यह फर्ज है कि वह अपने बाप की बराबरी करे? ठीक है कि एक दिन वही लड़का अपनी औलाद का बाप बनता है, परंतु बेटा बाप से ही भिड़ जाए, क्या यह सपूत लड़के का फर्ज है? यह तो अहंकार है। तकब्बुर है। पश्चात्ताप के स्वर में शाह वायजीद ने कहा।

कुफ्र है, हुजूरे आली। साहस करके धर्म का पारिभाषिक शब्द काजी ने प्रयोग किया।

बेशक कुफ्र है। लानतुल्ला! यह कसूर सजा के काबिल है, काजी साहब। वायजीद ने आत्मग्लानि के स्वर में कहा।

अब मैं क्या अर्ज करूं हुजूरे आली! अपनी मनचाही मुराद पूरी होते देख काजी अधिक नम्र पड़ गया।

अरे नहीं, तुम क्या कहोगे। मैं खुद कहता हूँ। यह तो बहुत बड़ा कसूर है। इसकी सजा तौबा नहीं, सजाए मौत है, दृढ़ स्वर में वायजीद बोले। हुजूर संशोधन-सा प्रस्तुत करते हुए काजी ने कोई तजबीज पेश करना चाहा।

नहीं हमारा यही फैसला है। लाओ एक तलवार यहाँ रख दो। अब ऐसे अलफाज मेरे मुँह से निकलते ही मेरी गरदन उड़ा दी जाए। फैसला खुद वायजीद ने सुनाया।

एक उपस्थित सैनिक ने सकुचाते हुए अपनी तलवार वायजीद के आसन के निकट रख दी। सब लोग उठकर चल दिए। वायजीद भी विचारमग्न हो गए।

त्लवार वायजीद के आसन के निकट ही रखी रहने लगी। समूचे नगर में इस बात की चर्चा फैल गई कि कुफ्र के वाक्य निकलते ही शाह साहब की गरदन उड़ा दी जाए, यह स्वयं उनकी आज्ञा है।

दर्शनार्थियों का जमघट अब पहले से भी अधिक जुटने लगा। ऐसे त्यागी पुरुष की झाँकी, जो अपने जीवन को सिद्धाँतों के सम्मुख तुच्छ मानता हो, सभी हृदयंगम कर लेना चाहते थे। लोग जुड़ जाते और धर्मचर्चा चलने लगती। वायजीद प्रश्नोत्तर करते, जीवन से बेपरवाह! न उन्हें जीवन से मोह था और न ही मृत्यु का भय। जो समझ में आता, कहने लगते। जब न कहना होता, चुप रह जाते। विचार करना होता, तो आँखें बंद कर लेते।

एक दिन सबेरे-सबेरे नगर निवासी एकत्रित होने लगे। शायद उस दिन कोई पर्व था। ज्ञानीजन आगे बैठे थे, श्रद्धालुजन पीछे। कुछ भेंटादि रखकर सभी अपने-अपने स्थान पर बैठते जा रहे थे।

धर्म की चर्चा चल रही थी। प्रश्नोत्तर, शंका-समाधान। सभी के द्वारा ज्ञान का क्षेत्र विकास को प्राप्त हो रहा था। सहसा शाह वायजीद कुछ विचारने लग गए। विचारते-विचारते वह मौन हो गए। मौन होकर उन्होंने आँखें बंद कर लीं। वे बेसुध से दीवार से टिक गए। पर दीवार से टिके हुए वे सो नहीं रहे थे। वह तो गहन-गंभीर समाधि में डूब चुके थे। उनकी आत्मचेतना परमात्मचेतना में निमग्न हो रही थी। यह एक का एकता में विलय था। शून्य का शून्य में विलय था। सब कुछ तद्रूप एवं तदाकार हो गया था। इस अलौकिक भावदशा की अलौकिक आभा शाह वायजीद के मुखमंडल पर भी छा चुकी थी।

इस अलौकिक भावदशा में उनके मुख से बड़े ही अस्फुट स्वरों में कुछ शब्द निकले, मैं देह नहीं, मैं जिस्म नहीं हूँ। मैं इंद्रियाँ और मन भी नहीं। प्राण या चित्त अथवा फिर अहंकार मेरा परिचय नहीं। मैं तो अविनाशी आत्मा हूँ। जो सदा ही परब्रह्म से तदाकार है। “अयमात्मा ब्रह्म।” मैं ब्रह्म हूँ। मैं अल्लाह हूँ। हाँ, मैं वही हूँ। अहं ब्रह्मास्मि।

यह कहते हुए वे आत्मलीन से उठकर टहलने लगे। समूचा जनसमुदाय अब सकते में था।

श्रोताओं ने एक-दूसरे की ओर देखा। काजी के संकेत पर एक युवा सैनिक उठा। आसन के निकट रखी तलवार उसने उठाकर म्यान से निकाल ली थी।

अपने गहन भावों में डूबे शाह की गरदन पर तलवार का एक प्रहार हुआ। तलवार के दो टुकड़े अलग-अलग जा गिरे। एक टुकड़ा निकट के एक पत्थर से जा टकराया।

जोर का झन्न शब्द सुनकर शाह वायजीद की भाव-समाधि टूटी। उन्होंने आँखें खोलीं।

क्या बात है? शाह वायजीद की वाणी मुखर हुई।

कुछ नहीं हुजूर। काजी जी अपने किए पर बेहद शर्मिंदा थे। उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि वह क्या कहें और क्या करें?

हाँ अग्निदत्त शास्त्री अवश्य उपनिषद् का एक मंत्र पढ़ रहे थे-

देह दृष्टा तु दासोऽहमं् जीदृष्टयात्वदंशकाः आत्मदृष्टात्वैवाहम्।

अर्थात् देहदृष्टि से मैं तेरा दास हूँ, जीव दृष्टि से तुम्हारा अंश और आत्मदृष्टि से मैं वही हूँ, जो तुम हो।

बिल्कुल ठीक कहा शास्त्री जी। शाह वायजीद बोले पड़े, अयमात्मा ब्रह्म का यही रहस्य है।


भविष्यसूचक ये विचित्र स्वप्न

स्वप्न दमित इच्छाओं की परिणति हैं, यह सत्य है, पर मिथ्या यह भी नहीं है कि उनमें भविष्यसूचक अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष संकेत छुपे होते हैं। यदि उन्हें भलीभाँति समझा और जाना जा सके, तो मनुष्य कितने ही प्रकार से स्वयं लाभान्वित हो सकता और अगणित अन्यों को भी लाभ पहुँचा सकता है। आएदिन होने वाले स्वप्न-दर्शन इसकी साक्षी हैं।

घटना सन् 1946 की है। तब विलवर राइट आर.ए.एफ. में फायटर पायलट थे। एक दिन प्रातः डाँग वोर्ले नामक उनका एक घनिष्ठ मित्र आया और कहने लगा कि आज की यात्रा से वह वापस नहीं लौट सकेगा, इसलिए उसका यह सामान उसके परिवार वालों तक पहुँचा दिया जाए।

अगली यात्रा वास्तव में उसके लिए प्राणघातक साबित हुई। उन दिनों द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ा हुआ था। डाँग वोर्ले बमबारी के लिए आगे-आगे चल रहा था। पीछे-पीछे उसका मित्र विलवर राइट अपना विमान उड़ा रहा था। अचानक डाँग वोर्ले के वायुयान में आग लग गई और वह मारा गया। इस प्रकार उसका स्वप्न सत्य सिद्ध हुआ।

इस घटना के बाद से विलवर राइट को भी ऐसे भविष्य-सूचक स्वप्न आने लगे, जो परीक्षा करने पर सत्य सिद्ध होते। उन्हें अक्सर घुड़दौड़ प्रतियोगिता के दृश्य दिखाई पड़ते। ऐसे स्वप्नों में वे प्रायः प्रतियोगिता स्थल पर मौजूद होते। साथ में उनका कोई मित्र भी होता। वे मित्र से जीतने वाले घोड़े का नाम पूछते। वह उसे बता देता। पीछे पता करने पर ज्ञात होता है कि सचमुच उसी नाम का घोड़ा विजयी हुआ।

विलवर को घुड़दौड़ में कभी रुचि नहीं रही, न वे कभी उसे देखने के लिए दौड़ स्थल पर गए, पर पता नहीं क्यों स्वप्न उन्हें प्रतियोगिता स्थल के ही दिखाई पड़ते थे। ऐसे ही एक दृश्य में वे उस मैदान में उपस्थित थे, जहाँ दौड़ का आयोजन हो रहा था। वे अपने मित्र से पूछते हैं कि जीत किसकी होगी? उसका उत्तर था, ‘एयरबोर्न’ नामक घोड़े की। विलवर प्रतिवाद करते हैं कि इस नाम का कोई अश्व दौड़ में हिस्सा नहीं ले रहा। साथी कहता है कि वह प्रतियोगिता जीत चुका है।

सपने की सचाई जानने के लिए विलवर ने सेंटलेगर में हो रही प्रतियोगिता में भाग ले रहे घोड़ों की लिस्ट मँगाई। उसमें ‘एयरबोर्न’ नामक घोड़े का नाम देखा, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। इसकी चर्चा उनने अपने मित्रों और कुटुँबियों से की, किंतु किसी ने उनकी बात पर विश्वास न किया। बाद में जब वह दौड़ में सचमुच प्रथम रहा, तो सभी को पछतावा होने लगा कि उसने उक्त अश्व पर बाजी क्यों नहीं लगाई। जिनने उस पर दाँव लगाए, उन-उनने भारी रकमें जीतीं। स्वयं विलवर ने भी इस स्वर्ण अवसर को खो दिया और पछताते रहे।

दो वर्ष पश्चात् उनने फिर एक स्वप्न देखा। इस बार उनसे कोई कह रहा था कि इसमें ‘एरिटिक प्रिंस’ बाजी मारेगा। प्रतियोगिता डर्वी में हो रही थी। पता लगाने पर विदित हुआ कि इस नाम का अश्व प्रतिभागियों में सम्मिलित है। उनने अपने एक मित्र से इसकी चर्चा की। दोनों ने उक्त घोड़े पर बाजी लगा दी। अंततः उसी की जीत हुई, फलतः उन्हें खूब धन प्राप्त हुआ।

अगला स्वप्न तब हुआ, जब विलवर सपत्नीक नेवार्क में ठहरे हुए थे। वहाँ उनका आतिथेय श्रीमती चेसराइट नामक एक महिला थी। इस बार के स्वप्न में घोड़े का नाम कुछ त्रुटिपूर्ण था। वह अपने एक अज्ञात मित्र से सपने में पूछते हैं कि अबकी बार प्रथम आने का गौरव किसे प्राप्त होगा? क्या ‘राडार’ नामधारी अश्व को? मित्र कुछ क्षण मौन रहकर सहमति में सिर हिलाता है, तभी विलवर की नींद टूट जाती है। इसकी चर्चा वे अपनी पत्नी और चेसराइट से करते हैं।

दूसरे दिन कैंब्रिजशायर में यह प्रतियोगिता होने वाली थी। चेसराइट को इसमें रुचि थी। अतः उसने दौड़ में भाग लेने वाले घोड़ों की जानकारी की। उसमें ‘राडार’ नामक कोई अश्व भाग नहीं ले रहा था। इसका निकटवर्ती नाम ‘नाहर’ ही हो सकता था, जो कि दौड़ में सम्मिलित था। अस्तु, उसने उसमें दाँव लगा दिया। जीत उसी की हुई। चेसराइट को इससे हजारों पाउंड प्राप्त हुए।

विलवर का यह अंतिम स्वप्न-दर्शन था। इसके बाद फिर कभी घुड़दौड़ संबंधी स्वप्न उसे नहीं दिखाई दिए।

अर्ल एटली ने अपने ‘संस्मरण’ में लिखा है कि किस प्रकार सपने में उन्हें एक सम्मेलन में भाग लेने का मौका मिला तथा किस तरह ‘ग्राँड नेशनल डे’ के दिन होने वाली घुड़दौड़ प्रतियोगिता में विजयी घोड़ों के क्रमाँक उनके हाथ लगे। यों तो एटली को घुड़दौड़ में कोई चाव नहीं था, न वे सपनों की सचाई पर विश्वास करते थे, किंतु उक्त स्वप्न के बाद उनकी उत्सुकता बढ़ी और वे देखे गए घोड़ों के क्रमाँकों पर दाँव लगा बैठे। वे ही प्रथम और द्वितीय स्थानों पर रहे, जैसा कि स्वप्न संकेत हुआ था। इस घटना के उपराँत एटली की सपनों के प्रति आस्था सुदृढ़ हुई। वे इस बात को स्वीकारने लगे कि निरर्थक सपनों के मध्य सार्थक स्वप्न भी आ सकते और स्वप्नद्रष्टा को भावी घटनाक्रमों की कुछ स्फुट झाँकी करा सकते हैं।

जान गाडले ऑक्सफोर्ड का छात्र था। बाद में उसे लार्ड किलव्रेकन बनाया गया। एक बार उसने स्वप्न देखा कि वहाँ जो अश्व प्रतियोगिता अगले महीने जोने जा रही है, उसमें ‘विंदिल’ एवं ‘जुलाद्दीन’ नामक घोड़े क्रमशः प्रथम, द्वितीय आ रहे हैं। समाचार पत्रों के माध्यम से ज्ञात हुआ कि ये दोनों घोड़े उसमें दौड़ने वाले हैं। गाडले ने 100 पौंड के टिकट खरीदे और उन पर बाजी लगा दी। उसकी जीत हुई।

इसके कुछ दिन पश्चात् उसने पुनः स्वप्न देखा कि ‘ट्यूवरगेज’ नामक अश्व आगामी प्रतियोगिता में जीतेगा। वैसा ही हुआ। विजयी घोड़े का नाम वास्तव में ‘ट्यूवरगेज’ था। अगले वर्ष उसने और कई बाजियाँ जीतीं। इसके उपराँत उसे हारने वाले घोड़ों के नाम दिखलाई पड़ने लगे। कुछ वर्ष पश्चात् एक बार पुनः उसे विजयी घोड़े का नाम दिखाई पड़ा। उसने देखा कि ‘ग्राँड नेशनल डे’ में ‘वाटमैन’ नाम के अश्व ने शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। पीछे यह भी सत्य साबित हुआ। अंत में वह ‘डेली मिरर’ समाचार पत्र में अपनी इसी लोकप्रियता के कारण ‘रेसिंग संवाददाता’ नियुक्त हुआ तथा अतींद्रिय दाँव लगाने वाले के नाम से विख्यात हुआ।

मिलता-जुलता प्रसंग इंडिपेंडेंट टेलीविजन के विज्ञान संवाददाता पीटर फेयरली से संबंधित है। एक दिन लंदन के ब्लैकन नामक स्थान पर घूमते हुए उसने अपने कार रेडियो में श्रीमती ब्लैकनी के लिए एक प्रार्थना सुनी। थोड़ी देर पश्चात् एक व्यक्ति से बातचीत के क्रम में ‘ब्लैकनी’ शब्द पुनः उसके कर्ण कुहरों से टकराया। वह इस शब्द के प्रति कुछ सतर्क हो गया। कार्यालय पहुँचा, तो सहयोगी के मुख से एक बार पुनः वही शब्द निकलता देख वह कुछ चिंतित हो उठा और सोचने लगा आज एक ही शब्द की पुनरावृत्ति भिन्न-भिन्न लोगों द्वारा क्यों कर हो रही है? इसी बीच दोपहर का भोजनावकाश हो गया। उसके मस्तिष्क में वही बात घूम रही थी। इसी विषय पर सोचते सोचते उसकी आँखें झपक गईं। कोई तंद्रावस्था में उससे कह रहा था, आज डर्वी की अश्व प्रतिस्पर्द्धा में ‘ब्लैकनी’ पुरस्कृत होगा। वैसा ही हुआ। जीत के साथ उसे काफी इनाम प्राप्त हुआ।

रात्रि की नीरवता हो या दिन की शाँति, इस स्थिति में चेतना जब निद्राकाल में शिथिल पड़ती और उत्तेजनारहित होती है, तो वह प्रकृति के गर्भ में पक रहे घटनाक्रमों को पकड़ने की क्षमता अर्जित कर लेती है। इसी को वह समय-समय पर सपनों के माध्यम से प्रकट करती है। इसलिए सपने हमेशा निरर्थक-निरुद्देश्य नहीं होते। कितनी ही बार उनमें सार्थक संकेत भी छुपे होते हैं। उपर्युक्त घटनाएँ इसी की प्रमाण हैं।


विदेश के लिए प्रस्थान (Kahani)

तब समुद्र द्वारा विदेश यात्रा को धर्म-विरुद्ध माना जाता था। धर्म-पुरोहितों से अनुमति लेकर समुद्री यात्राएँ हर धर्मपरायण व्यक्ति को करनी पड़ती थीं। वेदाँत के प्रचार के लिए स्वामी रामतीर्थ को विदेश जाना था। लोक-मर्यादापालन में लिए उन्होंने काशी के महामहोपाध्याय से परामर्श किया। पंडित जी बोले, वैसे तो समुद्री यात्रा करना धर्म के विरुद्ध है, पर यदि आप पाँच हजार रुपयों की व्यवस्था कर दें, तो आपको जाने की विद्वत्-मंडल द्वार अनुमति मिल जाएगी, अन्यथा आप जाति से बहिष्कृत कर दिए जाएँगे। रिश्वत देकर धर्मपरायण बनना रामतीर्थ को स्वीकार नहीं हुआ। उन्होंने कहा, आप लोग चाहे जो करें, पर धर्म के नाम पर मैं यह अनीति नहीं कर सकता। अनुमति दें अथवा न दें, मैं तो चलता हूँ। पंडित जी निरुत्तर हो गए। बिना किसी से अनुमति लिए स्वामी रामतीर्थ ने अपने महान् लक्ष्य के हेतु विदेश के लिए प्रस्थान कर दिया।


सामूहिक नरसंहार का मनोविज्ञान

मानवीय मनोविज्ञान अत्यंत जटिल होता है। इसमें अच्छाई और बुराई दोनों तत्त्व सन्निहित होते हैं। श्री अरविंद ने मनुष्य के एक तिहाई भाग को पशुतुल्य माना है। यह अनुकूल अवसर प्राप्त करने पर हिंसक और बर्बर हो उठता है। समाज में हिंसा के अनेक स्वरूप होते हैं। व्यक्ति से जब यह बाहर जाता है, तो सीरियल किलर वा माँस मर्डर जैसे वीभत्स व भयंकर दृश्य उपस्थित करता है। आज के आधुनिक समाज में हिंसा भी एक अंग बन चुका है। पाश्चात्य देश इस दुर्वह मार से त्रस्त व परेशान हैं। अपना समाज व राष्ट्र भी इससे अछूता नहीं है।

मनुष्य अपनी इस आक्रामक वृत्ति के जाग्रत् होते ही हिंस्र जानवर के समान व्यवहार करने लगता है। ब्रिटिश मनोविज्ञानी पभ्टर मार्श की मान्यता है कि मनुष्य का सामान्य हिंसक भाव किसी को क्षति नहीं पहुँचाता, परंतु यह जब सामाजिक स्तर पर बढ़ने लगता है, तो अत्यंत घातक होता है। यही समाज में संक्रमित होकर सामूहिक आँदोलन व विकराल हिंसा का रूप ले लेता है। ए. स्टार ने ‘ह्यूमेन डिस्ट्रक्टिवनेस’ में उल्लेख किया है कि आज की आधुनिक हथियारों की होड़ इसे और भी बढ़ा देती है। बड़े-बड़े युद्धों के इतिहास में हिंसा का यही भाव जिम्मेदार रहा है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, हिंसा सदैव एक निश्चित गति से बढ़ती है। टोकी द्वीप में चर्च के बाहर दो समुदाय के बीच प्रति सप्ताह में कई बार झ़डपों का होना सामान्य बात है। धीरे-धीरे यह झड़पें विकराल होती गईं और अंत में यह एक युद्ध में परिणत हो गईं। मनीषी लायल वाटसन के अनुसार, आक्रामकता मनुष्य के जेनेटिक कोड में होती है। क्रोध व हिंसा इसी का परिणाम होता है। व्यक्ति आक्रामकता व प्रतिशोध के बीच झूलता रहता है। इनके बीच एक पतली दीवार होती है, जैसे बंदर और मनुष्य के मध्य। आक्रामकता बंदर के व्यवहार की ओर धकेलता है, तो प्रतिशोध मनुष्य का जटिल मनोविज्ञान बनकर आता है। प्रतिशोध हिंसा का ही एक रूप है। इस स्थिति में विवेक समाप्त हो जाता है और इसके स्थान पर दुर्बुद्धि काम करने लगती है। अंततः यह जघन्य कृत्यों में परिवर्तित हो जाता है।

युद्ध में आवेशग्रस्तता या अंध क्रोध का नग्न नर्तन देखा जा सकता है। इस अवस्था में व्यक्ति लड़कर मर जाता है। पी. कर्लेट के सर्वेक्षणानुसार द्वितीय विश्वयुद्ध में केवल 25 प्रतिशत अमेरिकी सैनिकों ने अपने हथियारों का प्रयोग किया था। वह भी अत्यंत विपन्न परिस्थिति में। शेष सैनिक उन्माद एवं आवेशग्रस्त होकर मरते-मारते रहे। युद्ध का हिंसक आवेश अत्यंत प्रबल व तीव्रतम होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में लंबी दूरी के शस्त्रों के पीछे भी यही अंध मानसिकता प्रदर्शित हुई थी। इसी कारण हथियारों का आविष्कार एवं होड़ बढ़ी। लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व सुमेरियनों ने एक हजार फुट की दूरी तक मार करने वाले धनुष-बाण का आविष्कार किया था। इसके ठीक 2000 वर्ष बाद चीनियों ने भी इसी तरह के अनेक शस्त्रों का निर्माण किया था। इतिहास के उन पृष्ठों से लेकर आज के अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण की कहानी भी इसी तथ्य की पुष्टि करती है।

धनुष की खोज के बाद आग्नेयास्त्र के रूप में बंदूक का प्रचलन बढ़ा। इससे हिंसा को एक नूतन आयाम मिला। मौत और जिंदगी की दूरी सिमट गई। टी. जुनाडे के अनुसार अमेरिका में प्रति सेकेंड बीस बंदूकों का निर्माण होता है। प्रति 13.5 सेकेंड में एक बंदूक की बिक्री होती है। यह अमेरिका के लगभग आठ करोड़ घरों में पहुँच गई है। अमेरिका में हत्या की दर जापान की तुलना में 200 गुनी अधिक है। सन् 1992 में बंदूक द्वारा 13,220 लोगों की हत्या हुई। टी. जुनाडे ने स्पष्ट किया है कि 1990 से 1992 के बीच तीन वर्ष में इतने अमेरिकनों की हत्या हुई जितने कि 1963 से 73 के वियतनाम युद्ध में नहीं हुईं। वियतनाम युद्ध में 46,752 लोगों की हत्या हुई, जबकि तीन साल में मात्र बंदूक द्वारा 84,633 हत्या हुईं। यह कनाडा, जापान, स्वीडन, ब्रिटेन तथा आस्ट्रेलिया से 150 से 400 गुना अधिक है। सभ्य कहे जाने वाले देशों में पिछले पचास सालों में प्रति सेकेंड में एक व्यक्ति की हत्या हुई है। अब तो यह संख्या तीन गुना हो चुकी है। द्वितीय विश्वयुद्ध में 5.5 से 6 करोड़ के आसपास थी। अब तो बड़े युद्धों के बिना भी समस्त विश्व की हिंसक वारदातें इन आँकड़ों को छूने लगी हैं।

हिंसा का स्वरूप और भी अनेक रूपों में दिखाई देता है। आर.जे. गेलन ने ऐसे क्रूर व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जो न केवल नरसंहार करते हैं, बल्कि उनका माँस भी खा जाते हैं। कुछ आदिवासी परिवारों में हत्या दिनचर्या के समान है। परिवार में थोड़ा-सा तनाव व्याप्त हुआ कि भाले-बरछी चल पड़ते हैं। नित्य किसी-न-किसी का नरसंहार होना अनिवार्य है।

क्रूर व हिंस्र व्यक्ति जानवर के समान होता है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज मोरक्कों का बादशाह मोले इस्माइल ऐसा ही एक नृशंस हत्यारा था। इसने अपने हाथों से ही तीस हजार लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। भोजन के दौरान वह अपने बंधकों का सिर धड़ से अलग कर देता था और अपने मेहमानों को प्रसन्न करता था। उसकी 500 बीबियाँ तथा 1000 बच्चे थे। पीलपोट उन कुख्यात राजनीतिज्ञों में गिना जाता है, जिन्होंने हत्या सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। हिटलर के बाद संभवतः पीलपोट ही एक ऐसा नृशंस हत्यारा था, जिसने 20 लाख व्यक्तियों को मरवा दिया।

हिंसा का स्वरूप विभिन्न संस्कृतियों में बदलता रहता है, किंतु उनके मूल्यों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। दक्षिण पूर्व ऐशिया में ‘अमाके’ तथा मलाया में ‘क्रिस’ का प्रचलन है। अमाके के अंतर्गत एक युवा व्यक्ति ब्लेड से मर्डर करता है। क्रिस वह प्रथा है, जिसमें भीड़भाड़ के स्थल पर यह अमानवीय व बर्बर कार्य किया जाता है। सन् 1996 में चार्ल्स ह्विटमेन नामक एक कुख्यात हत्यारे को आस्टिन के टेक्सास यूनिवर्सिटी के टावर में मृत पाया गया। इस ह्विटमेन ने मरने से पूर्व उसी टावर से अंधाधुँध गोली चलाकर 14 व्यक्तियों की हत्या एवं 31 व्यक्तियों को गंभीर रूप से घायल कर दिया था। कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा भीड़ में गोली चलाना इसी प्रथा के अंतर्गत माना जा सकता है।

नरसंहार की दर देशों के अनुरूप न होकर वहाँ के समयानुसार परिवर्तित होती है। यह विभिन्न समाज व राष्ट्र में भिन्नता लिए हुए होती हे। सोमालिया में एक व्यक्ति की मौत की कीमत 100 ऊँट के बराबर होती है। यह मूल्य 50 महिलाओं के मूल्य के समान है। यूगांडा के सेवई लोगों में एक नवयुवती की मृत्यु के बदले दस गाय व एक वृद्ध महिला की मृत्यु के लिए पाँच गाय की कीमत अदा की जाती है। डी.पी. फिलीप्स के अनुसार अमेरिका में प्रतिदिन 60 व्यक्तियों की हत्याएँ होती हैं। श्वेत और अश्वेत के बीच का संघर्ष तो और भी तनावपूर्ण है।

मानव प्रकृति के मर्मज्ञों के अनुसार हिंसा, हत्या व अपराध एक जटिल प्रक्रिया है, जो प्रकृति व दबाव तथा अनुवांशिकता व अनुभव के बीच पनपता है। मनीषी लायल वाटसन ने ‘डार्क नेचर’ में इसे सोशियोबायोलॉजिकल इंसटिक्ट के रूप में प्रतिपादित किया है। इसका महत्त्व उसके वातावरण पर निर्भर करता हे। इसी बायोलॉजिकल रुट्स से सीरियल किलर तथा माँस मर्डर की क्रूर मानसिकता का जन्म होता है। मनोविज्ञानी एड्रीन रेन ने इसका परीक्षण करने के लिए एक सर्वेक्षण किया। इनके दल ने कैलीफोर्निया में 4660 बच्चों का अध्ययन किया। ये सभी 1959 से 1961 के बीच पैदा हुए थ। इन्हें अपराध विरासत में मिला था। इनका परिवार एवं वातावरण अपराधी तत्त्वों से भरा हुआ था। 30 साल पश्चात् युवावस्था में पहुँचे इन लोगों में से 22 प्रतिशत कुख्यात अपराधी बन गए थे। इनमें से तो कुछ सीरियल किलर व माँस मर्डरर बन गए थे।


इसी ओर बढ़ना चाहिए (Kahani)

एक बार काशी विश्वविद्यालय में स्त्रियों को वेदाध्ययन का अधिकार है या नहीं, इस पर हिंदू संस्कृति के महाप्राण पं. मदनमोहन मालवीय ने विद्वानों की सभा आयोजित की। पंडितों ने अपनी-अपनी तरह के तर्क, रखे पर पंडित प्रमथ नाथ तर्क भूषण ने अपाला, घोषा, विश्ववारा के ब्रह्मवादिनी होने, मनु की पुत्री इला द्वारा ब्रह्माजी के यज्ञ का संचालन करने, गार्गी द्वारा याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करने, महाराज जनक द्वारा अपनी चारों पुत्रियों सीता, माँडवी, उर्मिला, श्रुतिकीर्ति का यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न कराने, रावण द्वारा सीताहरण के समय उनका यज्ञोपवीत तोड़ने जैसे अहाट्य तर्क रखे, तो एक भी विद्वान् उनका उत्तर नहीं दे पाया। तब से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में लड़कियों को भी वेद पढ़ाया जाने लगा। पर आज भी प्रतिगामिता उन तथ्यों की उपेक्षा और अवहेलना करती रहती है।

माँस मर्डर की घटना सदियों से होती चली आ रही है। पंद्रहवीं शताब्दी में फ्राँस का गिल्स डी रेस एक अत्यंत धनवान व्यक्ति था। इसने सौ से अधिक बच्चों की हत्या कर दी थी। सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड की एलिजाबेथ बेधरे एक ऐसी कुख्यात महिला थी, जिसने 650 युवतियों को मौत के मुँह सुला दिया था। वह युवती की हत्या करने के बाद उसके गरम खून से स्नान करती थी। इस परिप्रेक्ष्य में अपने रूप-जाल से रोम के साम्राज्य को हिलाकर रख देने वाली क्लियोपेट्रा भी आती है, जो प्रतिदिन एक हब्शी के खून से स्नान करती थी। उन्नीसवीं शताब्दी में पेरिस के जोसेफ फिलीप तथा लंदन के जैके ने असंख्य वेश्याओं को मार दिया था। जान वेन गेसी, फैक पाट्स, हेनरी लुइस वैलेस, डेविड बकौविट्ज, जेफरी, हेनरी ली ल्युकस और राबर्ट सी. हैलेन ऐसे कुख्यात अपराधियों के नाम हैं, जो लगभग 200 लोगों की हत्या में संलग्न थे।

अमेरिका के मनोवैज्ञानिक जोएल नाँरीस ने ऐसे लोगों के व्यवहार को सात अवस्थाओं में विभक्त किया है-

1- आँरा फेज-इसमें हत्यारा अपनी मानसिक विक्षिप्तता के कारण वास्तविकता के स्थान पर कल्पना का आवरण ओढ़ता है।

2- ट्रालिंग फेज-इस सक्रिय अवस्था में वह बड़ी ही सतर्कता व सावधानी से शिकार की खोज करता है।

3- वूइंग फेज-कुशलतापूर्वक खतरा व संकट मोल लिया जाता है।

4- केप्चर-हत्या के दौरान अजीब सा मनोभाव पैदा होता है।

5- मर्डर-क्रूरता का क्षण।

6- टाटेम फेज-हत्यारा अपनी सफलता पर पागल-सा हो जाता है।

7- डिप्रेशन फेज-उदासी की काली छाया फिर से मँडराने लगती है।

नाँरिस के अनुसार ऐसे व्यक्तियों का जीवन अत्यंत जटिल एवं आक्रामक होता है। वे सदा हिंसा, घृणा एवं अन्य घोर मनोविकारों के आवेग में उबलते रहते हैं। इसी कारण उनका चेहरा विकृत हो जाता एवं व्यवहार में असामान्यता आ जाती है। इनकी आँखों में यह भाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। शरीर की त्वचा शुष्क, भूरे नाखून एवं अपराधी वृत्ति इनको अलग से पहचान देती है।

मनोवैज्ञानिक नाँरिस के अनुसार हिंसा, हत्या, अपराध घातक मनोविकार हैं। परंतु व्यक्ति अपने प्रचंड संकल्प एवं पुरुषार्थ से इस दलदल से मुक्त हो सकता है। अपना प्राचीन इतिहास गवाह है कि अंगुलिमाल जैसे क्रूर, निर्दयी व्यक्तियों ने भी संत एवं योगी का जीवन जी सकने में सफलता प्राप्त की है। मनुष्य अपने संकल्प, साहस और प्रबल पुरुषार्थ से अपने अंदर की दानवी शक्ति को परास्त कर दैवीय शक्ति को जाग्रत् एवं जीवंत कर सकता है। हिंसा के स्थान पर रक्षा-दया एवं घृणा के बदले प्रेम का सुँदर जीवन ही श्रेयस्कर है। हर व्यक्ति को इसी ओर बढ़ना चाहिए।


अंतःचक्षु प्रदान करके रहूँगा (Kahani)

एक व्यक्ति एक पहाड़ी अभियान से भटककर किसी अज्ञात घाटी में पहुँच गया। दिन निकलने पर उसे मालूम हुआ कि वह किसी ऐसे स्थान पर पहुँच गया है, जहाँ सभी अंधे रहते हैं। उसने पानी व भोजन माँगा व वहाँ विश्राम के लिए रुक गया। पता चला किसी राजा के अन्यायपूर्ण शासन से त्रस्त होकर वे सब एक साथ वहाँ बस गए थे, पर वहाँ की मिट्टी व जल में किसी खनिज तत्त्व की कमी के कारण उनकी दृष्टि कम होती चली गई व धीरे-धीरे सभी अंधे हो गए। प्रकृति के किसी घटनाक्रम की जानकारी न होने से अंधों की इस चौथी पीढ़ी की यह धारणा बन गई थी कि समस्त संसार उनके गाँव तक ही सीमित है, वह चारों ओर चट्टानों से घिरा व लंबी-चौड़ी दत से ढका है। अजनबी ने अपनी ओर से सारे प्रयास किए, उन्हें दुनिया, आकाश, सूर्योदय, दृष्टि शक्ति की बातें समझाने की चेष्टा की, पर इन आँखों वाले राजा साहब का किसी ने जरा भी आदर न किया। उलटा वह एक निकम्मा और मूर्ख प्राणी ही समझा जाता था। उसे सुधारने के लिए गाँव की एक लड़की से विवाह करके अपने समाज में सम्मिलित करने का निश्चय किया गया, तो अजनबी ने स्वीकृति तो दे दी, पर उसी दिन उसने वहाँ से भाग निकलने का निश्चय किया। अंतिम दिन प्रातःकाल उसने पहाड़ी पर चढ़कर सूर्योदय का निरीक्षण किया, तो उसे नीचे बसी अंधों की दुनिया कालिमायुक्त अज्ञान से भरी जगह प्रतीत हुई। एक संकल्प के साथ वह वहाँ से निकल आया कि इस अज्ञान से जूझने के लिए एक व्यापक मोरचा खड़ा करके इन्हें अंतःचक्षु प्रदान करके रहूँगा।


एक मीठा जहर, जो हमें नित्य जर्जर कर रहा है

आज के दौर में टेलीविजन अधिकाँश लोगों की दिनचर्या का एक अनिवार्य अंग बन गया है। टी.वी. कार्यक्रमों की सतरंगी दुनिया में विचरण करना अब दर्शक के लिए मात्र मनोरंजन से कहीं ज्यादा है। सब कुछ भूलकर कार्यक्रमों के साथ इतना तादात्म्य स्थापित कर लेना कि आस-पास का भी भान न रहे, इस तथ्य की पुष्टि करता है।

टी.वी. में प्रसारित होने वाले कार्यक्रम कहीं-न-कहीं दर्शक के अंतर्जगत् की ही अभिव्यक्ति होते हैं, भले ही प्रतीकात्मक ही सही। तभी तो यह जानने के बावजूद कि जो दिखाया जा रहा है, वह सत्य नहीं है, वह उसके साथ सुख-दुःख का अनुभव करता है। यही कारण है कि मनुष्य की भावनाओं से लेकर स्थूल क्रिया−कलाप पर भी टेलीविजन का इतना व्यापक और गहरा प्रभाव परिलक्षित हो रहा है। अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र में भी चुनावी सर्वे के दौरान 75 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि वे टी.वी. पर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बहस संबंधी कार्यक्रमों को देखकर निर्णय लेते हैं। कुछ वर्ष पूर्व ब्रिटेन में बच्चों के चश्मे बहुत बिके। सर्वेक्षण से यह पता चला कि ऐसा टी.वी. देखने के कारण हुआ। साथ ही यह भी महसूस किया गया कि न सिर्फ बच्चों में वरन् बड़ों में भी दायित्व बोध का निरंतर ह्रास होता जा रहा है।

भारत की स्थिति इस संबंध में कुछ भिन्न है। प्रारंभ में सिर्फ एक ही चैनल का दूरदर्शन के कार्यक्रमों पर एकाधिकार था। तब तकनीकी दृष्टि से कार्यक्रम भले ही उच्चस्तरीय नहीं होते थे, पर गुणवत्ता की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी थे। उनमें मनोरंजन के अलावा ज्ञानपरक व प्रेरक सूचनाओं का समुचित समावेश रहता था। धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलीं और घरों में केवल टी.वी. और उपग्रह टी.वी. प्रसारणों का अवतरण हुआ। फिर तो जैसे टेलीविजन के छोटे परदे की रंगत में आमूल-चूल परिवर्तन हो गया।

एक-एक करके अनेक चैनल बाजार में आ गए। प्राइवेट चैनलों की भरमार हो गई। इन सारे चैनलों के आ जाने से 90-100 चैनलों वाले टी.वी. सेट भी आ गए। साथ ही पुराने टी.वी. में लगने वाले ऐसे साधन आ गए, जिससे चैनलों की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे में दर्शकों के प्रति टी.वी. प्रसारण का दृष्टिकोण ही बदल गया। उन्हें उद्देश्यपूर्ण ढंग से सूचना व ज्ञान से लाभान्वित करने का उत्तरदायित्व ही भुला दिया गया। अब तो दर्शक सिर्फ उपभोक्ता बन गया है और विभिन्न चैनलों ने दर्शकों के इसी रूप को भुनाने का व्यवसाय शुरू कर दिया है। लोकप्रिय मनोरंजन ही टेलीविजन का अभिप्राय हो गया है, क्योंकि उपभोक्तावादी तर्क के अनुसार ऐसे कार्यक्रमों की दर्शकता दर सर्वाधिक है। अन्य कार्यक्रम जो बहुत प्रेरक, उद्देश्यपूर्ण एवं आदर्श धारणाओं वाले थे, उनके प्रति उदासीनता बरती जाने लगी। ऐसे समय में जबकि बहुसंख्यक दर्शक टी.वी. कार्यक्रम देखते हैं, दर्शकों को बाँधे रखने के लिए सस्ती लोकप्रियता के मसालों से भरपूर कार्यक्रम पेश किया जाने लगा। विज्ञापनदाता भी सिर्फ इसी श्रेणी के कार्यक्रमों में पैसा लगाने को तैयार थे।


लूटमार की संस्कृति (Kahani)

एक व्यक्ति बड़ा निकम्मा था। हालाँकि वह खूब मोटा-ताज, शक्तिशाली और स्वस्थ था, परंतु काम कुछ नहीं करता। इसलिए लोग उसे साँड़ कहकर पुकारते थे। एक दिन वह कहीं जा रहा था। सामने से आता दिखाई दिया एक साँड़ (नन्दी)। उसके पीछे ही साँड़ का मालिक बाबाजी भी आ रहा था। उस निकम्मे व्यक्ति ने साँड़ को देखकर मौज से कहा, “आओ मित्र भाई हम तुम गले मिलें। हम दोनों में अंतर ही क्या है।” “और तो सब बराबर है, पर एक अंतर है। वह यह कि इस समय पर घास मिल जाती है और तुम्हारी भगवान् जाने-” बाबाजी बोले। वस्तुतः निकम्मे तथा आलसियों से पशु-जानवर भी अच्छे रहते हैं।

यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि जब प्रतिस्पर्द्धा बढ़ती है, तो उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार होता है, परंतु टी.वी. चैनलों के कार्यक्रमों पर दृष्टि डाले, तो निराशा ही हाथ लगती है। अधिकाँश कार्यक्रमों में हिंसा, अपराध व अश्लीलता को ही भिन्न-भिन्न तरीकों से दिखाया जाता है। ‘मीडिया एडवोकेसी’ शोध समूह द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुसार चार चैनलों के धारावाहिकों में देखे गए कुल 210 खंडों में न्यूनतम 351 घटनाएँ ऐसी देखी गईं, जो सीधे हिंसा केंद्रित कही जा सकती हैं। 458 घटनाएँ ऐसी थीं, जिन्हें हिंसात्मक कहा जा सकता है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि हर हिंसक घटना में एक से ज्यादा हिंसात्मक तरीके सक्रिय होते हैं और कुल कथा सामग्री के 72.3 प्रतिशत अंश में हिंसक घटनाएँ या हिंसात्मक गतिविधि होती है। ऐसे कार्यक्रमों से वा पीढ़ी को अपराध के नए-नए तरीके वह हिंसा सीखने के अतिरिक्त और क्या मिल सकता है? विदेशों में ही नहीं, भारत में भी हत्या, डकैती जैसे अपराध करने वाले कई अपराधी जिनमें किशोर व वयस्क दोनों शामिल हैं। पूछताछ में यह स्वीकार कर चुके हैं कि उन्होंने अमुक टी.वी. कार्यक्रम से प्रेरणा ली या अपराध करना सीखा। टी.वी. पर दिखलाए जाने वाले हिंसक घटनाएँ या प्रसंग टी.वी. दर्शकों के लिए दर्शन भर नहीं रह जाता, वह उपभोग बन जाता है। हिंसा का दर्शन इंद्रियों को सक्रिय करता है व लूटमार की संस्कृति को वैधता प्रदान कर जीने का तरीका बतलाता है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अन्य चैनलों के साथ राष्ट्रीय व मैट्रो चैनल भी निजी चैनलों से स्पर्द्धा करते हुए प्रायः जीवन के इन्हीं नकारात्मक पक्षों को दिखाने में जुट गए हैं, जबकि इन्हें अपेक्षाकृत अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। हिंसा, अपराध व अश्लीलता को लेकर फिल्म उद्योग की छवि तो पहले ही धूमिल हो चुकी है, अब उसकी काली छाया का प्रभाव टेलीविजन तक पहुँचना किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं कहा जा सकता।

‘इंटरनेशनल कम्यूनिकेशन्स फोरम’ की सलाहकार समिति के अध्यक्ष विलियम ई. पोर्टर का कहना है कि पहले व्यक्ति पर परिवार, स्कूल व धार्मिक संस्थाओं का प्रभाव पड़ता था और अब मीडिया का गहरा प्रभाव पड़ने लगा है। टी.वी. कार्यक्रम एक मीठा जहर है, जिसका सबसे ज्यादा असर बच्चों व किशोरों पर पड़ता है। अमेरिका में छपी एक खबर के अनुसार वहाँ के मनोविश्लेषकों और समाजशास्त्रियों ने समाज पर टी.वी. कार्यक्रमों के प्रभाव पर पिछले दस सालों में हजारों सर्वेक्षण व शोधग्रंथ प्रस्तुत किए हैं। अध्ययन से यह तथ्य उभरकर सामने आया कि बहुतों के बुढ़ापे का एक-चौथाई समय टी.वी. देखने में चला जाता है। लाखों बच्चे भी 20 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते अपनी जिंदगी के छह साल टी.वी. के सामने स्वाहा कर चुके होते हैं। अमेरिकी स्कूलों में हार महीने 52,500 हमले, चोरी व डकैती की घटनाएँ होती हैं। हर वर्ष स्कूल की इमारतों व उसके आस-पास 30 लाख अपराध होते हैं। लगभग एक लाख पैंतीस हजार बच्चे बंदूक लेकर स्कूल जाते हैं और बीस प्रतिशत बच्चे चाहे तो बंदूक प्राप्त कर सकते हैं। बीस प्रतिशत बच्चे विश्राम के लिए बने कमरों नहीं जाते, क्योंकि वहाँ उन्हें लूटे जाने या छेड़खानी किए जाने का भय रहता है। अमरीकी समाज में स्कूली छात्राओं के माँ बनने का प्रतिशत भी बहुत ज्यादा है।

भारत में भी हाल ही में किए गए एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण से पता चलता है कि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का स्तर गिर रहा है। गणित व भूगोल जैसे विषयों में बच्चे कमजोर हो रहे हैं। भाषा बिगड़ रही है, याददाश्त में कमी आती जा रही है। वे उन विज्ञापनों को जरूर याद रखते हैं, जो टी.वी. पर बार-बार दिखाए जाते हैं। साथ ही वे बच्चों के लिए बने उपदेशात्मक कार्यक्रमों को पसंद न कर बड़ों के कार्यक्रमों को देखना ज्यादा पसंद करते हैं। ये कार्यक्रम उन्हें ऐश्वर्य के झूठे सपने दिखाते हैं, उन्हें असहिष्णु व उग्र बनाते हैं। एक ऐसे कल्पनालोक में ले जाते हैं, जिसका कोई अस्तित्व नहीं। दूरदर्शन एवं अन्य टेलीविजन चैनलों में जो सुपरमैन, हीमैन, फैंटम जैसी कार्टून फिल्में दिखाई जाती हैं, वे बच्चों में विज्ञान चेतना व तर्क क्षमता पैदा करने के बजाय उनमें अंधविश्वास व चमत्कारों को सही मानने की भावना भरते हैं। बच्चों के चेहरे से बालसुलभ मुस्कान गायब होती जा रही है। उनकी आँखों में मासूम शरारत की जगह उद्दंडता और अवज्ञा के भाव परिलक्षित होने लगे हैं। उनके हाथ खिलौनों के बजाय चाकू व बंदूक से खेलने लगे हैं। कला, यथार्थ व मनोरंजन के नाम पर पश्चिमी संस्कृति का लुभावना दर्शन व्यक्ति को अपनी ही संस्कृति से कटने को विवश कर रहा है।

इतना ही नहीं, इस शोध-अध्ययन में टी.वी. से होने वाली शारीरिक बीमारियों का भी विस्तृत उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि हिंसा व अनैतिक गंदगी से भरे कार्यक्रमों का असर सीधे पेट पर होता है, फलस्वरूप अपच, गैस और आमाशय की अन्य खराबियों के साथ अल्सर भी हो सकता है। इसका असर श्वास प्रक्रिया पर भी पड़े बिना नहीं रहता। साँस लेने में तकलीफ होती है, धड़कन बढ़ जाती है, रक्तचाप तेज हो जाता है। कुछ लोगों में ‘डिप्रेशन’ एवं ‘मानसिक असंतुलन’ के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं। महिलाओं में हारमोन का असंतुलन तो होता ही है। गर्भस्थ शिशु को भी नुकसान पहुँच सकता है।

वैज्ञानिकों का मत है कि कार्यक्रमों को प्रसारित करने और देखने के बीच जो वैज्ञानिक प्रभाव हो सकते हैं, उसके बारे में हर टी.वी. दर्शक को जानकारी होनी चाहिए। जैसे टी.वी. के परदे पर जो तस्वीरें उभरती हैं, वे हमारे सामने इलेक्ट्रॉनिक स्कैनिंग के माध्यम से आती हैं। इस प्रक्रिया में लाखों छोटे-छोटे बिंदुओं को रेखाओं में बदलकर स्क्रीन पर लाया जाता है और एक सेकेंड में तीस-चालीस बार की रफ्तार से उस पर तेज रोशनी डाली जाती है। इससे आँखों व दिमाग को बार-बार झटका लगता है और चूँकि हमारा दिमाग इस तरह के झटके एक सेकेंड में बीस बार से अधिक सहने की शक्ति नहीं रखता, इसलिए आँखों और दिमाग दोनों को काफी नुकसान पहुँचता है।

आँकड़े बताते हैं कि हमारे देश में हर चार परिवारों में से एक के पास टेलीविजन है। इस सशक्त माध्यम का इस्तेमाल लोगों को शिक्षित व जागरूक बनाने के लिए किया जा सकता है। पारिवारिक कार्यक्रमों का निर्माण हो, साथ ही अपनी संस्कृति से जुड़े विषयों पर कार्यक्रम बनें। युवा पीढ़ी सबसे ज्यादा जागरूक व चिंतित रहती है अपने कैरियर के प्रति। टी.वी. पर ऐसे बेहतर व रोचक शैक्षणिक कार्यक्रम दिखाए जाने चाहिए, जिससे उन्हें मार्गदर्शन मिल सके। तकनीक का गलत इस्तेमाल नई पीढ़ी को बरबाद कर देगा। न उन्हें अपने देश की जानकारी होगी, न समाज की। ऐसा नहीं है कि अच्छे कार्यक्रम बन नहीं सकते। जब हमारे यहाँ उत्कृष्ट कलाकारों व निर्देशकों की कमी नहीं है, फिर कोई कारण नहीं हो सकता कि अच्छे कार्यक्रम न बनाये जा सकें। फिल्मी विज्ञापनों के बजाय अच्छे कार्यक्रमों को हाईलाइट किया जाना चाहिए, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग उसे देख सकें। निजी चैनलों को भी चाहिए कि समाज निर्माण में योगदान दें व बेहतर शैक्षणिक कार्यक्रम बनवाएँ। इससे सजग व कर्त्तव्यनिष्ठ पीढ़ी तैयार होगी। अभिभावकों को भी चाहिए कि वे केवल वही कार्यक्रम अपने बच्चों को देखने दें, जो उन्हें स्वस्थ मनोरंजन देते हों, शिक्षाप्रद हों। ऐसा करके ही हम वर्तमान सदी में स्वयं को और अपने परिवार एवं समाज को सँवार सकते हैं।


जड़ें ठीक हो तो व्याधियाँ आए क्यों

शरीर मन-मस्तिष्क का आज्ञाकारी सेवक है। दोनों आपस में अविच्छिन्न रूप से गुँथे हुए हैं। शरीर रोगी होता है, तो मस्तिष्क बेचैन-अशाँत पाया जाता है, नींद नहीं आती और सिर पर भारीपन छा जाता है। यही बात मन पर विपत्ति आने पर शरीर की दुर्दशा होने के संबंध में है। क्रोध में आँखें लाल हो जाती हैं, होंठ काँपने लगते हैं, शरीर आवेश से भर जाता है। भय की स्थिति में गला सूखता है, पैर काँपते हैं; रोंएं खड़े हो जाते हैं और गहरी साँसें चलने लगती हैं।

कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। यह कथन आरोग्य का महत्त्व समझाने की दृष्टि से कहा गया है; पर वास्तविकता इससे भिन्न है। विशेषज्ञ बताते हैं कि मन के स्वस्थ रहने पर ही शरीर स्वस्थ रह सकता है।

शरीर का सामान्य कार्य भोजन से चलता दीखता है, पर उसके साथ यह शर्त जुड़ी हुई है कि वह पच सके तो, अन्यथा अपच रहने की स्थिति में खाया हुआ भोजन विषतुल्य हो जाता है। वह सड़ता है, गैसें बनाता है और वे रक्त में मिलकर समूचे शरीर में घूमती हैं और जहाँ कहीं भी उन्हें अवसर दीखता है, वहाँ रुककर रोग खड़ा कर देती हैं।

अपच का एक कारण अधिक मात्रा में अभक्ष्य भक्षण करना है, किंतु दूसरा कारण है, मुख, आमाशय, जिगर, आँत आदि से उचित स्तर का, उचित मात्रा में पाचक रसों का स्राव न होना। इस स्थिति में सात्विक और स्वल्प मात्रा में खाया हुआ भोजन भी नहीं पचता। अपच का कोई भी कारण क्यों न हो, वह दुर्बलता और रुग्णता का निमित्त कारण बनता है। यह स्राव मानसिक स्थिति अस्त−व्यस्त होने की दशा में मात्रा में स्वल्प और स्तर के हिसाब से घटिया निकलते हैं। इनके कारण आहार पोषक न रहकर शोषक बन जाता है।

शरीर-पोषण में शुद्ध रक्त की जितनी भूमिका है, उससे भी अधिक उस विद्युत् प्रवाह की है, जो नाड़ी तंतुओं में निरंतर दौड़ता रहता है, जिसका उद्गम केंद्र मस्तिष्क है। यह नाड़ी तंतु जीव कोशिकाओं को गति भी देते हैं और पोषण भी। इसमें कमी पड़ जाने से भीतरी अवयवों की गतिशीलता शिथिल पड़ जाती है। अंदर का खोखलापन बाहर भी आता है। शरीर की क्रियाशक्ति घट जाती है और स्वास्थ्य-संतुलन लड़खड़ाने लगता है। इतने पर भी काम तो करना ही पड़ता है। नित्यकर्म से निपटने, भोजन करने आदि तक में श्रम पड़ता है। न्यूनाधिक मात्रा में चलना-फिरना तो पड़ता ही है। हाथ भी चलते ही हैं। श्रम के बिना शरीर की पाचन और मल-विसर्जन प्रक्रिया काम कैसे करे? यह तो सामान्य दिनचर्या की बात हुई। काम इतने से भी नहीं चलता। आजीविका उपार्जन के लिए भी काम करना पड़ता है और उसमें शारीरिक एवं मानसिक क्षमता लगती है। इस खरच का संतुलन यदि उत्पादन के साथ न बैठे, तो शरीर गलता और घिसता जाएगा, फलतः रोग दबोच लेंगे और अकाल मृत्यु असमय ही आ धमकेगी।

रक्त पेट में भोजन पर पैदा होता है। गुरदों, आँतों और फेफड़ों द्वारा उसका परिशोधन होता है। हृदय द्वारा नाड़ियों के माध्यम से उसे अंग-अवयवों तक पहुँचाया जाता है। हृदय देखने भर में स्वसंचालित प्रतीत होता है, पर वास्तविकता यह है कि अन्य अवयवों की भाँति हृदय को भी जिस क्षमता की आवश्यकता होती है, वह मस्तिष्क रूपी बिजलीघर में उत्पन्न होती है एवं मेरुदंड के साथ जुड़े हुए अनेक नाड़ी तंतुओं और गुच्छकों द्वारा पहुँचती है।

कुछ दिन एकाँत में रहकर यह साधना करनी चाहिए कि संसारभर में जो कुछ है ईश्वर का है। मैं तो वस्तुओं या प्राणियों का उपयोग उनकी इच्छानुसार किया करूंगा।

यह विद्युत् प्रवाह कितना अद्भुत और आश्चर्यजनक है, इसकी जानकारी अंतःस्रावी ग्रंथियों और उनके द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले हारमोनों का निरीक्षण-परीक्षण करने पर पता चलता है। प्रजनन माध्यम से वंशवृद्धि और तात्कालिक सरस संवेदनाओं में जिन ‘जीन्स’ का हस्तक्षेप होता है, उनकी संरचना एवं क्रियापद्धति और भी अद्भुत है। इन्हें अपने प्रयोजन के अनुरूप जो सामर्थ्य मिलती है, वह भी मेरुदंड के माध्यम से मस्तिष्क द्वारा प्रेरित होती है। जिस प्रकार मशीन के पुरजों को रगड़ द्वारा जलने-घिसने से बचाने के लिए उनमें मोबिल ऑयल की चिकनाई डालते रहना पड़ता है, उसी प्रकार रक्त, माँस, मज्जा आदि द्वारा एक सामान्य प्रयोजन की पूर्ति भर होती है। कारखानों में लगी मशीनों को चलाने के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता पड़ती है, वह तो जेनरेटर या इंजन से प्राप्त होती है। यह जेनरेटर मस्तिष्क ही है। वही है जो सोचने-विचारने के अतिरिक्त विद्युत् उत्पादन का भी केंद्र है। यह ऊर्जा उसे ब्रह्माँडव्यापी ऊर्जा से प्राप्त होती रहती है। इसीलिए मस्तिष्क को ब्रह्माँडीय शक्ति खींचते रहने वाले पृथ्वी के ध्रुव केंद्र के समतुल्य माना जाता है।

पुराने जमाने में रोगों का कारण वात, पित्त, कफ से, लवणों या रसायनों के कम पड़ने से तथा विषाणुओं के आक्रमण पर निर्भर माना जाता था और तदनुसार उपचार-साधनों के रूप में औषधियों का निर्माण और उपभोग किया जाता था। नवीनतम वैज्ञानिक खोजों ने यह माना है कि रोगों की जड़ मनोविकारों में है। मानसिक असंतुलन ही चित्र-विचित्र आकार-प्रकार वाली बीमारियों का प्रमुख कारण है। अन्य कारण तो सहायक मात्र हैं। मानसिक तनाव या विक्षोभ ही रोगों के मूल उत्पादक हैं। इसलिए आधुनिक चिकित्सक आहार-विहार की सामान्य खामियों के अतिरिक्त रोगी की मनोदशा का विवेचन-विश्लेषण करते हैं और उस क्षेत्र की विकृतियों को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। आवश्यक नहीं कि रोगी होने से पूर्व मनुष्य पागल ही हो जाता हो। पागलपन की हलकी-फुलकी इतनी शाखा-प्रशाखाएँ हैं, जिनसे पूरी तरह हम विरले ही बच पाते हैं। चिंता, भय, निराशा, क्रोध, घृणा, आवेश, उद्विग्नता जैसी सनकें भी विक्षिप्तता की ही छोटी बहनें या सहेलियाँ हैं। अनैतिक चिंतन या आचरण मनःक्षेत्र को मथ डालते हैं। आत्मिक प्रेरणा उनसे दूर रहने की प्रेरणा देती है, किंतु उद्धत चिंतन अनाचार ही नहीं, दुराचार और अत्याचार करने तक पर उतारू हो जाता है, फलतः अंतराल में अंतर्द्वंद्व उठ खड़े होते हैं, दुहरा व्यक्तित्व उभरता है। इस असंतुलन के कारण अविवेकी व्यक्ति की मनःस्थिति सनकी एवं उद्धत, अभिमानी जैसी हो जाती है। उस आवेश से सारा शरीर तन जाता है। यह तनाव जिस भी अंग-अवयव को कमजोर पता है, उसी के ऊपर अपना अधिकार जमा लेता है। उत्तेजित तनावों की भाँति हीनता, दीनता, भीरुता, आशंका आदि का भी ऐसा प्रभाव होता है, जिसे ‘अवसाद’ कह सकते हैं। मानसिक स्थिति में किसी पर आवेश छाए रहते हैं, किन्हीं पर अवसाद। इन्हीं ज्वार-भाटों से अस्थिरता उत्पन्न होती है और रोग उभरने की भूमिका बन जाती है।

शरीर की संरचना ऐसी ही है, जो आहार विहार ठीक कर लेने पर छुट पुट आए दिन की गड़बड़ियों से स्वयं निपटती रहती है, किंतु जब जड़ें ही सड़ने गलने लगें, तो पेड़ पौधों का दयनीय स्थिति में दीख पड़ना स्वाभाविक है। मन जड़ है और शरीर उसका कलेवर-आच्छादन। यदि किसी को स्वस्थ, निरोग, बलिष्ठ, दीर्घायु रहना हो, तो एक उपाय अनिवार्य रूप से अपनाना चाहिए कि मस्तिष्क शाँत-संतुलित रहे। यह विचारशील, विवेकवान् और नीतिवान् होने की स्थिति में ही संभव है।


अपूर्णता समाप्त हो गई (Kahani)

ज्ञान, कर्म, भक्ति का समुच्चय जीवन के समग्र विकास के लिए अनिवार्य है। बहुसंख्य व्यक्ति इस भ्रम में पड़े रहकर एकाँगी मार्ग पकड़ते हैं व स्वयं को जंजाल में उलझा लेते हैं। महाराजा अज के यहाँ यज्ञायोजन था। एक दिन महर्षि वशिष्ठ जब प्रधान पुरोहित का कार्य सँभालने जा रहे थे, तो मार्ग में उन्हें मंकी नामक व्यक्ति मिला। उसने अपना दुःख प्रकट करते हुए कहा, “देव! मैंने श्रमशीलता में कोई कमी नहीं छोड़ी, सदैव सदाचरण किया तथा ज्ञानार्जन हेतु सभी ग्रंथों का स्वाध्याय भी कर डाला, परंतु फिर भी अपने अंदर अपूर्णता ही पाता हूँ। न तो मेरी कोई प्रशंसा करता है, न मुझे कोई स्नेह ही देता है।” मुनीश्वर बोले, ‘तात! तुमने कर्म व ज्ञान की दो धाराओं की तो उपासना कर ली, पर भावपक्ष को तो भूल ही गए। तुम स्नेह बाँटो, बदले में दस गुना पाओगे। सब जीवधारियों में अपनी ही आत्मा समाई मानकर स्वयं को भक्तिप्रवाह में सराबोर कर डालो। अपनी धारा को परमात्मा के अक्षय आनंद रूपी गंगा से मिला दो, तो तुम सम्मान, श्रेय तो पाओगे ही, उस अभाव की पूर्ति भी होगी, जो तुम्हें त्रास दे रही है।” शीतल वचन सुनकर मंकी को दिशा मिली। वह अर्जित ज्ञान-धन-स्नेह बाँटने लगा और उसकी अपूर्णता समाप्त हो गई।


त्याग-बलिदान की संस्कृति-देव संस्कृति-5

(समापन किश्त)

त्याग-बलिदान ही भारतीय संस्कृति की मूल थाती रही है, इसी के बलबूते सतयुगी समाज की परिकल्पना की गई है। परमपूज्य गुरुदेव की विगत पाँच अंकों से प्रकाशित अमृतवाणी की यह समापन किश्त प्रस्तुत है।

अगले दिन और खराब होंगे

गुरुजी! हमारे घर का नरक तो दूर हो जाएगा। कैसे हो जाएगा? गुरुजी! हमने तो अपने चारों बच्चों को चार-चार सौ रुपया महीना देकर देहरादून के पब्लिक स्कूल में भेज दिया है। उससे क्या हो जाएगा? उससे गुरुजी! हमारे बच्चे एटीकेट सीखकर के आएँगे।ऐटीकेट क्या होता है? ऐटीकेट उसे कहते हैं, जब कोई आदमी आए और घर में पानी पीने को माँगे, तो उसको कहना चाहिए, “थैंक यू वैरी मच।” तो क्या इसी को ऐटीकेट कहते हैं? हाँ इसी को कहते हैं। हमने चार सौ रुपये महीने पर बोर्डिंग स्कूल में अपने बच्चे को दाखिल करा दिया है। वह क्रीज किया हुआ पैंट पहनेगा। हमारा लड़का अच्छा बनेगा। नहीं बेटे, तेरा लड़का अच्छा नहीं बन सकता, क्योंकि उसके भीतर, उसकी जीवात्मा में भाइयों के लिए, बहनों के लिए, माता-पिता के लिए जो प्रेम और सेवा की वृत्ति होनी चाहिए, वह कहाँ से जाएगी? बेटे, हमको ये मालूम पड़ता है कि अगले दिन बहुत बुरे आने वाले हैं। अगले दिनों युद्ध के दौर भी आ सकते हैं, बीमारियों के दौर भी आ सकते हैं। टेंशन बढ़ता हुआ चला जा रहा है। क्यों महाराज जी! सबको टेंशन हो जाएगा? शायद सबको जाए। अमेरिका में तो छाप भी दिया गया है कि सिगरेट पीजिए, टेंशन बुलाइए। सिगरेट पीजिए, कैंसर बुलाइए। तो क्या सबको टेंशन हो जाएगा? हाँ। अगर टेंशन न हुआ तो और बीमारी हो जाएगी। डायबिटीज हो जाएगी। नींद न आने की शिकायत हो जाएगी। पेप्टिक अल्सर हो जाएगा और बहुत-सी बीमारियाँ हैं, जो आदमी को धर दबोचेंगी।

ये कैसे हो जाएँगी? मित्रो! आदमी की जो घटिया वृत्तियाँ हैं, वे न केवल आदमी के शरीर को, वरन् उसके ईमान को और अंतःकरण को गलाती और जलाती चली जाएँगी। घर नरक बनते चलते जाएँगे। नहीं साहब! हमारे बेटे की बहू तो एम.ए. पास है। तो बेटे, तेरे घर में जल्दी नरक आएगा। हमारे बेटे की बहू तो इंटर पास हे। तो तेरे घर में थोड़ी देर भी हो सकती है। अरे साहब! औरत तो बिना पढ़ी-लिखी है। तो तेरे घर और भी कुछ ज्यादा दिन तक शाँति रह सकती है। लेकिन अगर तेरी बहू एम.ए. पास है, तो बेटे, तेरे घर में नरक जल्दी आएगा, तू देख लेना।

मित्रो! ऐसा क्यों होता चला जा रहा है? शिक्षा की दृष्टि से, धन की दृष्टि से, अमुक की दृष्टि से, सब तरह से आदमी संपन्न होता चला जा रहा है, लेकिन ईमान की दृष्टि से,, अंतरंग की दृष्टि से इतना खोखला होता चला जा रहा है कि उसके ऊपर मुसीबतें आएँगी। नेचर हमारे ऊपर मुसीबतें पटक देगी। वह हमें क्षमा करने वाली नहीं है। हमारे शरीर का स्वास्थ्य सुरक्षित रहने वाला नहीं है। हमको किसी से प्यार-मोहब्बत रहने वाली नहीं है। हम मरघट के प्रेत-पिशाच के तरीके से अब जिंदा रहने वाले हैं। मरघट के प्रेत-पिशाच में एक ही बात होती है कि न तो कोई उसका होता है और न वह किसी का होता है। प्रेत-पिशाचों में क्या फर्क होता है? बेटे, एक ही होता है, हर भूत के मन की ये बनावट होती है कि न वह किसी का और कोई उसका। तो महाराज जी! आपने देखे हैं कि भूत कैसे होते हैं? हाँ, हमने देखे हैं और आपको भी दिखा सकते हैं।

चलते-फिरते प्रेत-पिशाच

ये भूत आपको कहाँ मिलेंगे? मित्रो! आप पाश्चात्य देशों में चले जाइए। वहाँ आपको प्रेत मिलेंगे, पिशाच मिलेंगे। कैसे? जो अशाँत-ही-अशाँत हैं। पैसा जिनके पास अंधाधुँध है, लक्जरी जिनके पास बहुत सारी है, टेलीविजन है, पीने को फलों का जूस है, लेकिन वे इतने अधिक अशाँत हैं, टेंशन में हैं कि प्रेत-पिशाचों से कम नहीं हैं। न कोई उनका और न वे किसी के। न बीबी उसकी, न भैया उसका। दोनों-के-दोनों वेश्या और भड़ुवे हैं। जब तक दोनों आते हैं, तब तक तमाशा दिखाते हैं और जब मन भर जाता है, तो एक-दूसरे को लात मारकर भगा देते हैं। हम ये किसकी बात कह रहे हैं? बेटे, इसी को पिशाच कहते हैं। पाश्चात्य देशों में यही होता है।

मित्रो! इसका परिणाम क्या होगा? इसका परिणाम यह होगा कि हमारा अंतरंग खोखला होता चला जाएगा। पैसा बढ़ेगा, तो हम क्या कर सकते हैं? शिक्षा बढ़ेगी, सभ्यता बढ़ेगी, तो हम क्या कर सकते हैं? दौलत बढ़ेगी तो हम क्या कर सकते हैं? मित्रो! इससे आदमी के ऊपर मुसीबतें ही आएँगी। हम और आप जिस जमाने में रहते हैं, बेटे, हमारे प्राण निकलते हैं उसे देखकर। जब हम भविष्य की ओर देखते हैं, विज्ञान की ओर देखते हैं, तब हमें खुशी होती है कि हमारे बाप-दादे कच्चे मकानों में रहते थे और हम पक्के में रहते हैं। हमारे बाप-दादों में से कोई पढ़ा लिखा नहीं था और हम सब पढ़े-लिखे हैं। सुविधाओं को देखते हैं, तो हमारे पास टेलीफोन है और बहुत सारी चीजें हैं, लेकिन जब उनके साफ-सुथरे जीवन को, उज्ज्वल चरित्र को देखते हैं, तो उस दृष्टि से हम किस कदर दिनों दिन घटते हुए चले जा रहे हैं, यह स्पष्ट दिखाई देता है।

विवेकानंद के पास रामकृष्ण परमहंस जाया करते थे और कहते थे कि बेटा हमारा कितना काम हर्ज होता है? तू समझता नहीं है क्या? महाराज जीम बी.ए. करुँगा, एम.ए. करूंगा, नौकरी करूंगा। नहीं बेटे, तू नौकरी करेगा, तो मेरा काम हर्ज हो जाएगा और हम जिस काम के लिए आए हैं और तू जिस काम के लिए आया है, सो उसका क्या होगा? नहीं महाराज जी! देखा जाएगा, पहले तो मैं नौकरी करूंगा। नहीं बेटे, ऐसा नहीं हो सकता। एक दिन रामकृष्ण परमहंस रोने लगे। उन्होंने कहा, बेटे तू नौकरी करेगा, तो मेरा काम हर्ज होगा। मित्रो! विवेकानंद चले गए और रामकृष्ण ने उन्हें क्या-से-क्या बना दिया। कई आदमी कहते रहते हैं कि गुरुजी! हमको आशीर्वाद देकर आप विवेकानंद बना सकते हैं? बेटे, हम आपको बना सकते हैं। इसके लिए हम व्याकुल भी हैं और लालायित भी, लेकिन पहले तू कीमत तो चुका। नहीं, महाराज जी! कीमत तो नहीं चुकाऊँगा। आप तो आशीर्वाद दीजिए। बेटे, जो तू आशीर्वाद-ही-आशीर्वाद माँगता है, वह जीभ की नोंक से कह देने भर से आशीर्वाद नहीं हो जाता। उसे पुण्य देना पड़ता है, मनोयोग देना पड़ता है, तप देना पड़ता है, श्रम देना पड़ता है। नहीं, महाराज जी! जीभ हिला देते हैं, सो वही आशीर्वाद हो जाता है।

आशीर्वाद इतना सस्ता नहीं

बेटे, तू जीभ हिलाकर के आशीर्वाद माँगता है। मैं समझता हूँ तू जीभ हिलाकर के ही राम के नाम को भी हजम करना चाहता है, मंत्र को हजम करना चाहता है। जीभ को हिलाकर और न जाने क्या-क्या काम कराना चाहता है। मंत्र जपने से देवता मिल सकते हैं, स्वर्ग मिल सकता है, तो फिर गुरुजी का आशीर्वाद क्यों नहीं मिल सकता? जीभ की नोंक हिलाइए फिर देखिए, क्या करामात आती है। हाँ बेटे, जीभ की नोंक हिलाकर वहाँ चला जाना बैंक में और जीभ हिला देना-दीजिए दो हजार रुपये। देखें कहाँ से लाएगा जीभ हिलाकर। बेटे, तुझे सब जीभ-ही-जीभ दिखाई पड़ती है और कोई दूसरी चीज नहीं दिखाई पड़ती। गुरुजी का आशीर्वाद भी जीभ और हमारा भजन भी जीभ, सब जीभ-ही-जीभ। क्रिया की जरूरत ही नहीं पड़ेगी? हाँ गुरुजी! क्रिया की क्या जरूरत है। आप तो जीभ हिला दीजिए, बस हो जाएगा, आशीर्वाद। बेटे, ऐसा कोई आशीर्वाद नहीं है, न था और न कभी होगा।

युग की पुकार सुनिए

मित्रो! फिर क्या करना पड़ेगा? अब मैंने आपको इसलिए बुलाया है कि हमको आपकी आवश्यकता आ पड़ी है। हम तीस साल से कुटुँब बनाकर रह रहे थे और तीस साल से आपको बुला रहे थे। अब हम आपसे पूछते हैं कि क्या आपके लिए ऐसा संभव है कि आप अपने जीवन में दैवी संपदा का खरच और सबूत दे पाएँ। क्या आपके लिए यह संभव है कि आप अपने जीवन में त्याग का, सेवा का, बलिदान का, परोपकार का और परमार्थ का कोई प्रमाण दे सकते हैं कि नहीं? मित्रो! अभी ये लड़कियाँ गा रही थीं और मेरे मन में भी जहर आ रही थी। वे गा रही थीं, “जरूरत आ पड़ी है, काल की भी चाल मोड़ो तुम।” ये समय ने पुकार की है, युग ने पुकार की है, संस्कृति ने पुकार की है, देश ने पुकार की है, धर्म ने पुकार की है, मानवी सभ्यता ने पुकार की हे कि आपके पास कुछ है, तो आप दीजिए। गुरुजी हमारे पास नहीं है। ठीक है, जहाँ तक पैसे का सवाल है, मैं जानता हूँ कि आपके पास पैसा होता तो शायद आप मेरे पास न आते। मैं जानता हूँ आपकी गरीबी को और परेशानी को, पर इस गरीबी के बीच में भी मेरी ये आँखें चमकती हैं और एक चीज के बारे में दृष्टि डालती हैं, तो पाती हैं कि अभी भी आपके पास मन है, आपके पास कलेजा है। आपके पास दिल है। अगर आप अपने मन, अपने हृदय और अपने श्रम की बूँदें लगा सकते हों, तो इस परीक्षा की घड़ी में आपका आना जीवन धन्य बनाने के लिए पर्याप्त है।

मित्रो! अब परीक्षा की घड़ी सामने आ गई है। इसको हमने पुनर्गठन योजना कहा है। इसके कितने पहलू हैं, कल हमने इस बारे में बताया था और फिर आज बताएँगे कि इसके क्या परिणाम आ सकते हैं? हम अपने जवान कुटुँब से क्या कराना चाहते थे और क्या करा सकते हैं? क्या संभावना है? हाँ, सौ फीसदी संभावना है। महाराज जी! आप तो ऐसे ही सपने देखते हैं। हाँ बेटे, हमने सपने ही देखे हैं और हमारे सपने पूरे होकर रहे हैं। हमने सपने देखे, जब गायत्री तपोभूमि नहीं बनी थीं जब हमारे पास मात्र छह हजार रुपये थे, तब हमने ‘गायत्री तपोभूमि’ का एक नक्शा छापा था अखण्ड ज्योति पत्रिका में, तो लोगों ने कहा, क्यों साहब! आपने तो बड़ा लंबा-चौड़ा सपना छाप दिया। हाँ भाई ये सपना है। गायत्री तपोभूमि हम ऐसे ही बनाएँगे। महाराज जी! ये तो कितनों रुपयों की हो जाएगी? आपके पास इतने रुपये कहाँ हैं। देख बेटे, मेरे पास छह हजार रुपये हैं। इतने से नहीं बनेगी तो छह लाख से बन जाएगी।

मित्रो! हमारा ख्वाब और हमारा सपना पूरा होकर के रहा। गायत्री तपोभूमि जो बनी है, वह उससे तीन-चार साल पहले छपे हुए गायत्री तपोभूमि के चित्र से हू-बहू मिलती हुई बनाई गई है। हमारे सपने युग को बदलेंगे, नया जमाना लाएँगे। दैवीय सभ्यता और दैवीय संपदा की फिर से स्थापना करेंगे। हम असुरता को चैलेंज करेंगे। क्यों? क्योंकि हम मनुष्यता से प्यार करते हैं, क्योंकि हम मानवी भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहते हैं, क्योंकि हमको अपनी नई पीढ़ियों को बहुत प्यार करते हैं। जिन मुसीबतों से हम गुजर रहे हैं, अपनी नई पीढ़ियों को गुजरवाना नहीं चाहते, क्योंकि हम बच्चों को बहुत प्यार करते हैं।

इसलिए मित्रो! हम नई सभ्यता लाने के लिए और नया युग लाने के लिए प्रयत्न करते हैं और उस प्रयत्न के लिए आपसे सहयोग माँगते हैं। पुनर्गठन योजना हमारे और आपके समय की परीक्षा की एक कसौटी है। इसमें हम आपका पी.एम.टी. के लिए इम्तिहान लेते हैं, क्योंकि अगले चरण में, जिनमें हमको ब्रह्मवर्चस की स्थापना भी करानी है, अपने अनुदान भी देने हैं, आपके यश भी-अजर-अमर बनाने हैं, आपकी जीवात्मा में शक्ति का संचार भी करना है। इसके लिए यह देखना है कि आप लोगों में से कुछ में जान है, जिसको ‘दैवीय सभ्यता’ कहते हैं, ‘दैवीय संपदा’ कहते हैं। उसमें त्याग-बलिदान की बात होती है। क्या उसके लिए आप कुछ कर पाएँगे?

दैवीय संपदा का विस्तार करें

साथियो! दैवीय सभ्यता जिसका अर्थ भजन करना नहीं होता, वरन् जीवन को दैवीय सभ्यता के अनुरूप ढाल लेना होता है। छोटे-से अनुदान के रूप में से हर एक का हमने समय माँगा है। हमने जो कार्यक्रम बनाए हैं, सब एक उद्देश्य से बनाए हैं। वह सब इसलिए बनाए हैं कि हममें से कोई भी आदमी निष्क्रिय न रहने पाए। हर एक से कहा है कि अगर आपके अंदर निष्क्रियता है, तो उसे दूर कीजिए और अपने अंदर सक्रियता का विकास कीजिए। अपने युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को हम सक्रिय देखना चाहते हैं। किसके लिए? जो हमारा मिशन है, उसके लिए। गुरुजी! आपने किसको क्या-क्या सक्रियता सौंपी है? बेटे, हमने उन आदमियों के लिए भी, जो घोर व्यस्त है, कार्य सौंपा है। जिनके पास योग्यता है, उनको भी कार्य सौंपा है और कहा है कि आप इस विचारधारा को फैलाने में योगदान दीजिए, मदद कीजिए।

महाराज जी! हम आपकी मदद कैसे करें? बेटे, आपके पास जो हमारी रिसर्च है, जिसको आपने माना है, जो आप हमारी पत्रिकाएँ पढ़ते हैं, उनको आप पाँच आदमियों को पढ़ाइए। अगर आप पुस्तकालय नहीं चला सकते हैं, तो कोई बात नहीं, लेकिन आप एक पत्रिका को पाँच आदमियों को पढ़ा सकते हैं। इससे हमारा मिशन पाँच गुना अधिक दो महीने के भीतर हो जाएगा। इस तरह जितना हमने तीस साल में किया है, उतना आप एक साल में कर सकते हैं।

गुरुजी! और हम क्या कर सकते हैं? बेटे, कब से हमारे झोला पुस्तकालय चल रहे हैं, चल पुस्तकालय चल रहे हैं। इन्हें आप दो घंटे भी चला दिया करें, तो मजा आ जाए। दो घंटे का उदाहरण मैं अक्सर देता रहता हूँ। हमारे यहाँ सुल्तानपुर के कई बच्चे आए हुए हैं। वहीं के एक वकील हैं लखपति राय। वे अभी भी हैं, यद्यपि अब बुड्ढे हो गए, शरीर उतना काम नहीं करता। लेकिन अब से दस साल पहले उनका नियम था कि वे चल पुस्तकालय की धकेलगाड़ी लेकर चल पड़े बाजार में लीजिए साहब पुस्तक पढ़िए। लीजिए हमारे गुरुजी का साहित्य पढ़िए, युग निर्माण का साहित्य पढ़िए। जितने भी मुवक्किल थे, दुकानदार थे, सबको साहित्य देते हुए चले जाते थे। सारे-के-सारे सुल्तानपुर में उन्होंने इस तरह रौब गाँठ दिया।

एक अकेले का पुरुषार्थ

एक बार मैं सुल्तानपुर गया। पहले भी कई बार जा चुका था। लोग पाँच कुँडीय यज्ञ कराते थे, तब सौ पचास आदमी इकट्ठा हो जाते थे। मुझे याद है, एक-दो बार मेरे प्रवचन भी हुए थे। वकील साहब ने जब मुझसे कहा, गुरुजी! एक बार आप आ जाएँ, तो मजा आ जाए। मैंने कहा, क्या आएँगे आपके यहाँ, पाँच कुँडीय यज्ञ ही तो करते हैं? नहीं, गुरुजी! अबकी बार बड़ी जो से करेंगे। कैसे करेंगे? सौ कुँड का यज्ञ करेंगे। मित्रो यज्ञ करने का निर्धारण होने के बाद चलते समय मैंने उनसे कहा कि जाने से पहले गायत्री तपोभूमि के लिए कुछ पैसे छोड़ जाने का हमारा मन है। क्या आप कुछ पैसे इकट्ठा करा सकते हैं? हाँ गुरुजी! हम करा देंगे। कितना? पच्ची हजार का तो हमारा वायदा है, फिर आगे आपका भाग्य है।

मित्रो, उन्होंने क्या काम किया कि सारे शहर को हमारा साहित्य पढ़ा दिया और हर एक व्यक्ति से ये कहा, हमारे गुरुजी जिनका कि आपने साहित्य पढ़ा है, क्या आपको पसंद है? सबने एक स्वर से कहा कि अरे भाई! पढ़ा ही क्या, हम तो पगला गए हैं, उनके विचारों को पढ़कर। हम गुरुजी को बुलाकर लाएँ, तो आप उनके लिए कुछ खरच करेंगे क्या? उनको बुलाएँ, तो आप अपना कुछ समय हर्ज करेंगे क्या? हाँ साहब! खरच करेंगे। मित्रो! उन्होंने तीन-चार दिन का कार्यक्रम रखा था। जब मैं वहाँ गया, तो मैंने अचंभा देखा। देखा कि सुल्तानपुर, जो कि छोटी-सी बस्ती है, छोटा-सा जिला है, वहाँ उन्होंने लगभग पचास हजार आदमियों के बैठने के लिए पाँडाल बनाया था। मैं सोचता हूँ, उसमें एक लाख से कम आदमी नहीं थे। इतना बड़ा विशाल आयोजन देखकर मैं अचंभे में पड़ गया कि ये सुल्तानपुर है या और कोई शहर है। इसकी तो आबाद ही इतनी है। दूर-दूर के देहातों से लोग आए थे।

मित्रो! मैं यह एक व्यक्ति की बात कह रहा हूँ कि एक अकेले आदमी ने क्या-क्या कर डाला। एक आदमी की सक्रियता का परिणाम ये हुआ कि उसने सारे सुल्तानपुर को जगा दिया था। तीन-चार दिन यह चमत्कार मैंने देखा और जब विदा हुए, तो मैं समझता हूँ कि उन्होंने हमको यज्ञ में से बचाकर पैंतीस-चालीस हजार रुपये दिए थे। यह मैं एक आदमी की करामात कहता हूँ, जिसमें उसके सहयोगी भी शामिल थे। उन्होंने भी सहयोग किया, पर मैं बात एक की कहता हूँ। आपसे पूछता हूँ कि आप क्या ये काम नहीं कर सकते? आप एक घंटा समय नहीं दे सकते? दो घंटे समय नहीं दे सकते? कलेजा है आप में? हृदय है आप में? हिम्मत है आप में? जीवन है आप में? निष्ठा है आप में? श्रद्धा है आप में? अगर ये नहीं है, तो ये बहाने मत बनाइए कि शाखा बंद हो गई है। कोई आता नहीं है। सबमें लड़ाई हो गई है। सबमें फूट फैल गई है। गुरुजी! कोई सुनता नहीं है। कमेटी में कोई आता नहीं है। धूर्त, बेकार की बातें बकता है, वह नहीं करता, जो मैं कहता हूँ। कितनी बार एक ही बात को कहता है। मैं पूछता हूँ तू क्या करता है?

मिशन-नया युग-मानव का भविष्य

मित्रो! जब एक आदमी लड़ने के लिए खड़ा हो जाए, तो क्या कर सकता है, यह बात मैंने एक उदाहरण देकर बताई। ऐसे मैं ढेरों उदाहरण बता सकता हूँ आपको। एक आदमी सक्रिय हो गया, तो उसने सारे इलाके को सक्रिय कर दिया। आपसे मैं पूछता हूँ कि आपके अंदर अगर निष्ठा है, तो क्या आप समय नहीं दे सकते मिशन के लिए? मिशन से मतलब ‘नया युग’ से है। मिशन से मतलब मानवी सभ्यता, मानवी भविष्य। इस पर आपकी आस्था है या कुछ भी नहीं है? नहीं, महाराज जी! हमारी तो बेटे पर आस्था है और पैसे पर आस्था है। तो बेटे, मैं तुझे बालक मानूँगा और ये कहूँगा कि अध्यात्म की किरणें तेरे पास नहीं आईं। अध्यात्म की किरणें जब भी आई हैं, तो देवत्व को आसुरी सभ्यता खिलाफ खड़ा होना पड़ा है। हमारे अंदर जब गायत्री मंत्र आया, तो साथ में देवत्व भी आया। देवत्व और गायत्री मंत्र दोनों ने मिलकर चमत्कार दिखाया। बेटे, तू तो गायत्री मंत्र लिए ही फिरता है, देवत्व कहाँ है तेरा? देवत्व तो है ही नहीं। केवल मंत्र-ही मंत्र रटने चला है।

मित्रो! क्या करना पड़ेगा? मैं चाहता हूँ कि हमारी परीक्षा की घड़ी में आप लोग साथ दें। पुनर्गठन योजना आपकी एक परीक्षा है, ब्रह्मवर्चस् के आधार पर और दूसरों पर यह आपकी परीक्षा है। हम अपने कुटुँब को कुछ और मजबूत बनाना चाहते हैं, सक्षम बनाना चाहते हैं, लेकिन हम क्या कर सकते हैं? आप चाहें तो झोला पुस्तकालय के माध्यम से, चल पुस्तकालय के माध्यम से, इसे अकेले ही चला सकते हैं। तीर्थयात्राओं के माध्यम से, स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से अकेले ही चला सकते हैं। यह मैं एक व्यक्ति की बात कहता हूँ। अब हम नए किस्म के स्लाइड प्रोजेक्टर बनाने वाले हैं। अब कुछ ऐसी योजना बना रहे हैं, जिससे ये सब चीजें तीन सौ-साढ़े तीन सौ के भीतर ही तैयार हो जाएँ। आप तीन सौ रुपये खरच कीजिए और हर घर में हमारा सिनेमा दिखाइए।

मित्रो! यह मैं अकेले की बात कहता हूँ, ‘एकला चलो रे’-’एकला चलो रे’ की बात कहता हूँ। अकेले चलकर भी आप जाने क्या-से क्या कर सकते हैं। तीर्थयात्रा के लिए, साइकिल यात्रा के लिए, पदयात्रा के लिए आप निकल सकते हैं और एक-दो आदमी साथ ले सकते हैं। दीवारों पर सद्वाक्य लिखने का काम आप अकेले कर सकते हैं। अकेले के इस तरह ये इतने काम हैं, झोला पुस्तकालय, तीर्थयात्रा, दीवारों पर वाक्य-लेखन आदि। ये सब एक आदमी का काम है। इसे एक व्यक्ति अकेले ही कर सकता है। इसलिए अगर आप चाहें, अगर आपके अंदर जीवन हो, देवत्व की भावना उदय होती हो, तो आप इन सब चीजों को कर सकते हैं।

संगठित हों, इंजन बनें

यह तो हुई नंबर एक बात। नंबर दो-अगर आप अकेले नहीं कर सकते और आप में कोई संगठन की वृत्ति है, तो संगठन की वृत्ति के लिए आप हमारा हाथ बँटाइए और अपना थोड़ा समय दीजिए। टोली नायकों का काम स्थानीय है। आप उसमें सम्मिलित होकर के एक घंटा-दो घंटा समय लगा सकते हैं और आपको लगाना चाहिए। आप टोली में सम्मिलित हो सकते हैं और होना चाहिए। दस-दस आदमी की आप टोली बना लें और पचास पाठकों को इकट्ठा कर लें, तो बेटे, ये साठ की मंडली होती है। साठ व्यक्तियों की मंडली बहुत बड़ी होती है। साठ डाकुओं ने सारे चंबल को हिलाकर रख दिया था। साठ आदमियों का संगठन अगर आपके पास है, तो आप गजब कर सकते हैं। अगर आपके पास जीवट है, तो साठ डिब्बों की रेलगाड़ी जाने कहाँ-से-कहाँ जा सकती है। इंजन जिंदा हो तो, लेकिन अगर इंजन मरा हुआ हो तो बेटे हम नहीं जानते।

इसलिए मित्रो! टोली नायकों की दृष्टि से आपको काम करना चाहिए। आप चाहें तो समय दिए बिना अपने स्थानीय क्षेत्र में घर में रहकर एक काम यह भी कर सकते हैं कि आप जन्मदिन मनाने की परंपरा को जीवंत करने के लिए समय लगा सकते हैं। घर-घर में गोष्ठियाँ, घर-घर में सभा, घर-घर में सम्मेलन हम जन्मदिन के माध्यम से फिर से शुरू कर सकते हैं। शुरू के दिनों में दिक्कत मालूम पड़ेगी, फिर बाद में आप देखेंगे कि कितना ज्यादा लोग सहयोग देते हैं। पहले आपको साथ-साथ सत्संग में सहयोग नहीं मिलता था, लेकिन अगर आप देखें, तो पाएँगे जन्मदिन के आधार पर जन्मदिन मनाते समय लोग कितना खुश होते हैं। उसमें व्यक्ति को अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने का मौका मिलता है, खुशी का मौका मिलता है। सब आदमी आशीर्वाद देते हैं, कोई फूल चढ़ाता है और कोई प्रणाम करता है। आज हमारा जन्मदिन है। हम अपना मुँह शीशे में देखते हैं, तो कितनी खुशी होती है, आप ये भी नहीं जानते? इसमें जनता के सहयोग का कितना ज्यादा लाभ भरा पड़ा है, क्या आप इसे नहीं जानते? अगर आप हकीकत में आएँ, तो आप इसे देख सकते हैं। हकीकत में नहीं आएँ, तब मैं नहीं कह सकता। अगर आप जन्मदिन मनाने की परंपरा को फिर से फैला सकें, तो आप देखेंगे कि ये मिशन, जिसमें देवत्व के पुनर्जीवन का संकल्प छिपा हुआ है, उसको जिंदा करने के लिए आप क्या कर सकते हैं।

बेटे, एक और काम के लिए हमने आपसे कहा था कि अगले वर्ष हम और भी सामूहिक जोश उत्पन्न करेंगे, वार्षिकोत्सव के रूप में। अब यह नियम बना दिया गया है कि कोई भी शाखा ऐसी नहीं रहनी चाहिए, जिसका कि वार्षिकोत्सव न मनाया जाता हो। जो शाखा वार्षिकोत्सव नहीं मनाएगी, उसका हमारे रजिस्टर में से शाखा के नाम से नाम कट जाएगा। क्यों साहब! नाम कट जाएगा कि नाक कट जाएगी? चाहे जो समझ ले बेटा। तू अपने संबंध में समझ ले कि नाक कट गई और हम समझ लेंगे कि तेरा नाम कट गया। बात एक ही है।

मित्रो! हमने हर एक जीवंत शाखा के ऊपर यह वजन डाला है कि उनको वार्षिकोत्सव करना ही पड़ेगा और करना ही चाहिए। कम-से-कम कितने में यह कार्यक्रम हो सकता है? हमने छाप दिया है कि ढाई सौ से चार सौ रुपये तक में बहुत बढ़िया यज्ञ हो सकता है, आयोजन हो सकता है। इसमें हजार आदमी भी आएँ, तो यज्ञ भी हो जाए और जुलूस भी निकल जाए, सब हो जाए। यह सब चार-पाँच सौ रुपये में हो सकता है। इतना पैसा गुरुजी! हम इकट्ठा कर लेंगे। हाँ बेटे! इतना इकट्ठा करने में क्या लगता है। एक दिन की तनख्वाह निकालता हुआ चला जाए, तो एक साल में अकेले ही इतना खरच कर सकता है। बेटे, एक माह में तुझे कितने रुपये मिलते हैं? सात सौ रुपये मिलते हैं। तो एक दिन की तनख्वाह कितनी होगी? गुरुजी! इक्कीस-बाईस रुपये होती है। तो बाईस रुपया महीने के हिसाब से कितना हो गया? महाराज जी! ये तो कोई दो सौ साठ रुपये हो गए। बस बेटे, तू अकेला हो जा और हर महीने में एक दिन की तनख्वाह निकालता चल। अब साथ में दस व्यक्ति और ले ले। इसी से एक वार्षिकोत्सव पूरा हो जाएगा। नहीं, गुरुजी! इससे चंदा माँगूँगा। अपने पास से कुछ देगा? अपने में से तो कुछ नहीं दूँगा। कंजूस कहीं का, पहले अपने पास से निकाल, तब चंदा माँगना।

मित्रो! क्या करना चाहिए? वार्षिकोत्सव में कहीं कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। अगर आपके पास रोटी खाने के लिए आर्थिक तंगी नहीं है, सिगरेट पीने के लिए आर्थिक तंगी नहीं है, सिनेमा देखने के लिए आर्थिक तंगी नहीं है। हाँ, महाराज जी! इसके लिए तो तंगी नहीं है। बड़ा आया आर्थिक तंगी वाला। न उद्देश्य को समझता है, न धर्म को समझता है, न संस्कृति को समझता है और न देवत्व को समझता है। आर्थिक तंगी की रट लगाता है। मित्रो! चाहे तो यह सब एक आदमी अकेले ही कर सकता है।

हमारा एक ही लक्ष्य वार्षिकोत्सव

मित्रो! हम चाहते हैं कि वार्षिकोत्सव हर जगह हो। उसके लिए हमको एक और दिक्कत पड़ेगी। हमने छाप दिया है कि हमारा प्रतिनिधि आएगा, रिप्रजेंटेटिव आएगा। अब हमको वक्ता नहीं चाहिए। वक्ताओं से हमको घृणा होती चली जा रही है, क्योंकि वक्ता जीभ तो चलाते हैं, परंतु जीभ चलाकर जितना काम करना चाहिए, उससे चौगुना सफाया कर जाते हैं। अपना आचरण, अपना व्यवहार, अपना खान-पान, अपने रहन-सहन से ऐसी छाप डालकर आते हैं कि उसे देखकर लोग कहते हैं कि ऐसे वक्ता को गोली मारो। जो बक्-बक् करता है, उसका नाम ‘वक्ता’ है। हमें ऐसा वक्ता अब नहीं चाहिए जो बकता तो बहुत है, पर आचरण और व्यवहार में बिलकुल विपरीत है। अब हम वक्ता नहीं, अपना प्रतिनिधि भेजेंगे। यह प्रतिनिधि कैसा होगा? हमारा नमूना होगा और हमारे आचार्य कैसे होने चाहिए? उनका रहन-सहन, उनकी बोल-चाल, उनका व्यवहार, उनका आचरण, उनका उठना-बैठना, उनका खान-पान बिलकुल ऐसा होना चाहिए, जैसा कि हमारा है। उसे देखकर लोग ये कहें कि यह आचार्य जी का प्रतिनिधि है, आचार्य जी का बेटा है। बेटे, हमको ऐसे व्यक्तियों की बहुत तलाश है, क्योंकि हम ये घोषणा कर चुके हैं कि हम छह हजार शाखाओं का वार्षिकोत्सव करेंगे। इसे हम थोड़े ही समय में पूरा करने के इच्छुक हैं। अक्टूबर से लेकर मार्च तक पूरा कर लेना चाहते हैं, क्योंकि फिर गरमी आ जाती है, इम्तिहान आ जाता है। स्कूलों में स्पीकर लगाना बंद हो जाता है। गरमी में लू चलती है, आँधी-तूफान चलते हैं। इसलिए इस अभियान को हम जल्दी पूरा करना चाहते हैं।

मित्रो! इस कार्यक्रम के लिए हमें प्रतिनिधियों की विशेष रूप से आवश्यकता पड़ेगी। हमको आप लोगों में से जो अपने आपको इस लायक समझते हों कि हम गुरुजी के विचारों को, युग निर्माण के विचारों को, पुनर्गठन के विचारों को जन-साधारण के सामने व्यक्त कर सकते हैं, तो अपने नाम हमें नोट करा दें और जो ये प्रतिज्ञा कर सकते हों कि हम जाएँगे तो आपकी फजीहत कराकर नहीं आएँगे, आपकी बदनामी कराकर नहीं आएँगे, वहाँ आपकी बेइज्जती कराकर नहीं आएँगे। बेटे, वह आपकी बेइज्जती नहीं, हमारी बेइज्जती है। आप यहाँ से हमारे वक्ता हो करके जाएँगे और होटलों में चाय पिएँगे, तो वह आप नहीं हम पी रहे होंगे, क्योंकि आप हमारे प्रतिनिधि हैं, रिप्रजेंटेटिव हैं। रिप्रजेंटेटिव को न केवल वक्ता होना चाहिए, न केवल व्याख्यानदाता होना चाहिए, बल्कि उसके अंदर वे सारी विशेषताएँ होनी चाहिए, जो हमारे रहन-सहन में, उठने-बैठने में है।

वाणी से नहीं, आचरण से शिक्षण

मित्रो! ये आपको अभ्यास का मौका है। इस बहाने इस लोक–लाज के बहाने आपको हम बंधनों में इतना बाँधकर भेजेंगे कि अगर आप छह महीने का योगाभ्यास कर लें तो आप समझना कि आपने छह महीने का योगाभ्यास कर लिया। छह महीने की तप-साधना कर लेंगे आप। आपकी जीभ के ऊपर अंकुश, खान-पान के ऊपर अंकुश, उठने-बैठने के ऊपर अंकुश, हजार अंकुश लगाने पड़ेंगे। नहीं गुरुजी! हम तो व्याख्यान देंगे। बेटे, हमें नहीं कराना व्याख्यान। अगर हमारी शर्तें पूरी कर सकता है, तो तेरे व्याख्यान का स्वागत है। नहीं साहब! हम कोई शर्त पूरी नहीं करेंगे, हम तो बक्-बक् करेंगे और चाहे जैसे रहेंगे। बेटे, हम तुझे चाहे जैसे नहीं रहने देंगे।

इसलिए मित्रो! ऐसे लोगों की खासतौर से हमको आवश्यकता है, जो बक्–बक् से नहीं, अपने आचरण और व्यवहार से हमारा प्रतिनिधित्व करें। ये शिविर, जो हमने बुलाया है, इस हिसाब से भी बुलाया है कि हमको छह हजार शाखाओं में वार्षिकोत्सव कराने के लिए अपने छह हजार प्रतिनिधियों की जरूरत पड़ेगी। क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि अपने दो लाख मित्रों में से, जिनमें अधिकाँश व्यक्ति पढ़े हों, सुशिक्षित हों, इस लायक हों कि आत्मशोधन और आत्मनिर्माण के अलावा लोकनिर्माण की जिम्मेदारी निभा सकते हों, उनको छह महीने का योगाभ्यास कराना चाहते हैं। यह विशुद्ध प्रशिक्षण है, जिसमें लोक-नाज की वजह से और हमारी शरम की वजह से, दोनों दबावों की वजह से व्यक्ति अपने चरित्र को ठीक ढालता हुआ चला जाएगा और लोकहित के लिए, जिसमें मान-जाति का हित जुड़ा हुआ है, दोनों काम करता हुआ चला जाएगा। आप हमारे प्रतिनिधि के रूप में जाना और जो शाखाएँ, जो शक्तिपीठें निष्क्रिय पड़ी हुई हैं, उनमें उमंग पैदा करना और कहना कि आपको गुरुजी का सम्मेलन करना पड़ेगा, टोलियाँ बनानी पड़ेंगी, जन्मदिन मनाना पड़ेगा और अपने आचरण एवं व्यवहार से लोगों को शिक्षण देना पड़ेगा। यदि इतना काम आप कर सके, तो हमारा यह शिविर सार्थक हो जाएगा, हम और आप दोनों धन्य हो जाएँगे। आज की बात समाप्त।

। ॐ शाँति।


सहस्राब्दी का पहला होलिका पर्व

जीवन में हर क्षण उल्लास-उमंग का संचार रहे, इसीलिए हमारी संस्कृति में भाँति-भाँति के प्रावधान बनाए गए है। ऋतुक्रम में शीतकाल ठिठुरन में बीतता है। जैसे ही वसंत आता है, प्रकृति में हर जीव पर उल्लास छा जाता है। निष्क्रियता सक्रियता में, गरमी में बदल जाती है। वसंत से होलिका पर्व तक का समय प्रायः चालीस दिन की अवधि का होता है एवं यह सारी अवधि प्रकृति के परिपूर्ण यौवन-उल्लसित प्राणवान् उमंगों की प्रेरणाओं से भरी होती है। वातावरण में कुछ विलक्षण मादकता, पवित्रता-सात्विकता अनुभव की जाने लगती है। नवीन संवत्सर व ऋतु-परिवर्तन की नवरात्रि आने से पूर्व की यह वेला आध्यात्मिक अनुदानों की दृष्टि से बड़ी ही विशिष्ट है। जैसे सारी प्रकृति पुष्पों से, उनकी सुरभि से खिल उठती है, ठीक परमात्मसत्ता भी अनुदान लुटाने को तैयार बैठी होती है।

होलिका पर्व न केवल साँस्कृतिक दृष्टि से शरीर विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान एवं आज के भौतिक विज्ञान की कसौटी पर ऐसा खरा उतरता है कि कभी-कभी लगता है हमारे ऋषि-मुनियों ने कितना सोच-समझकर यह निर्धारण किया होगा। होलिका दहन व धुलैंडी इस तरह फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि बीच में रख दो दिनों तक मनाए जाने वाला उल्लास भरा पर्व है यह। पर अभी भी भारत के बहुसंख्य क्षेत्र में यह वसंत से मनाया जाने लगता है एवं रंगपंचमी तक चलता है। विविधता में एकता का दर्शन दिखाने वाली हमारी संस्कृति के रंग निराले हैं। ब्रज प्रदेशों में, राजस्थान में, मालवा में, बुंदेलखंड में, मिथिला में हर जगह होली एक उल्लास भरे पर्व के रूप में मनाई जाती है। हमारे ऋषियों ने इसे नवसंवत्सर के यज्ञीय पर्व के रूप में स्थापित किया था। भारत एक कृषिप्रधान देश है। अन्न देवता पहले यज्ञीय ऊर्जा से संस्कारित हों, फिर समाज को यह अन्न समर्पित हो, इसीलिए स्थान-स्थान पर होलिका दहन-नवसस्येष्टि यज्ञ का प्रचलन था। आज भी धरती के प्रदूषण के, बहुराष्ट्रीयकरण के एवं ढेर सारा अनाज परंतु आत्महत्या करते किसान, असमान वितरण इन परिस्थितियों में भी इस पर्व की गरिमा यथावत् है। यह पर्व एवं इसके दर्शन की स्थापना ही इन समस्याओं से इस कृषिप्रधान देश को मुक्ति दिला पाएगी।

होली पर्व के पीछे क्या पौराणिक मान्यताएँ हैं, इन्हें यदि अलग रख दें, तो इसके साथ जुड़ी विशेषताएँ इसे समता का, पारस्परिक सद्भाव के विस्तार का पर्व स्थापित करती हैं। यही एकमात्र ऐसा त्योहार है, जिसमें हिंदू ही नहीं, सभी संप्रदायों के व्यक्ति, ऊँच-नीच का भेद छोड़ एक साथ मिलते हैं। हम सबका जीवन इन रंगों की तरह वैविध्यपूर्ण गुणों से भर जाए, व्यक्तित्व में ये गुण समा जाएँ, इस भाव से इसे मनाया जाता है। छोटे-से-छोटा व्यक्ति भी उच्च पद पर बैठे या धनाधीश के साथ पारस्परिक सौहार्द्र के साथ होली उस दिन खेल लेता है। इसीलिए इस पर्व के साथ प्रह्लाद के कथानक से जुड़े नृसिंह भगवान् का पूजन तो किया ही जाता है, मातृभूमि रज-त्रिधा समता देवी का पूजन एवं क्षमावरणी के माध्यम से पारस्परिक व्यवहार में शालीनता के समावेश जैसी विशिष्टता भी जुड़ी हुई हैं।

यह एक विडंबना ही है कि साँस्कृतिक प्रदूषण की आँधी में आज उसका स्वरूप फूहड़ होकर रह गया है। दिव्य प्रेरणाओं से भरा यह पर्व गंदे हँसी-मजाक से लेकर अश्लील प्रदर्शन एवं क्षुद्र चिंतन का परिचायक बनता जा रहा है। होली जलाई जाती है, तो उसके साथ सारा कूड़ा-करकट, ईर्ष्या-द्वेष, घृणा-कामुकता के भाव आदि भी जला दिए जाते हैं। परंतु इससे उल्टा ही हो रहा है। कई बार इसी पर्व पर दंगे उठ खड़े होते हैं। समाज में पारस्परिक सामंजस्य-समरसता स्थापित करने हेतु स्थापित यह पर्व ऐसी छिछालेदारी का पात्र बनेगा, यह कभी सोचा भी नहीं गया था। होली जले तो अश्लीलता की, अश्लील पोस्टरों की, उस कूड़ा-करकट की जो पिछले दिनों जमा हो गया है। यदि यह न होकर मात्र कुछ टन लकड़ी फूँक दी गईं, तो यह पर्यावरण प्रदूषित करने में सहायक ही हुआ।

आज की परिस्थितियों में युगऋषि के संकेतों के अनुसार पर्वों से लोकशिक्षण की परंपरा के अनुसार दो प्रेरणाओं के विस्तार पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिए, वे इस प्रकार हैं-1. इसे जातिवाद से, ऊँच-नीच के भेद से ग्रसित समाज में समानता-समरसता के विस्तार हेतु मनाया जाए। 2. इस दिन से यज्ञीय जीवन जीने का संकल्प लिया जाए। पारस्परिक प्रेमविस्तार एवं परमार्थपरायणता के विस्तार हेतु पीड़ानिवारण, पतननिवारण हेतु कुछ करने हेतु संकल्पित हुआ जाए। हिरण्यकश्यप व होलिका का दहन होना ही चाहिए। विकृतियों-सामाजिक विभेदों, अराजकताओं को इस होली में जलकर राख हो जाना चाहिए। प्रस्तुत पर्व संघौशक्ति कलौयुगे के संकल्प के साथ इस सहस्राब्दी का प्रथम होलिका पर्व है। अब राष्ट्र व विश्व में खून की नहीं, स्नेह-सद्भावना के विस्तार के, एक-दूसरे को आगे बढ़ाने की होली खेली जानी चाहिए। यदि इस रूप में यह पर्व मनाया जा सका, तो हम संस्कृति पुरोधाओं से व आगामी पीढ़ी से भी न्याय कर पाएँगे।


मोक्ष मूलम् गुरुकृपा

गुरुतत्त्व उच्चतम एवं पवित्रतम तत्त्व है। यह आयु, देश-काल की सीमा से परे एक अविनाशी तत्त्व है। इसकी अनुभूति विनम्र समर्पण से ही संभव है। अपने अंदर स्थित इस तत्त्व से घनिष्ठता स्थापित करने हेतु उस व्यक्ति की खोज की जाती है, जो हमारे आँतरिक गुरु का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि या प्रतिरूप हो। इसी उद्देश्य से गुरु-शिष्य संबंध को युगों से सुरक्षित एवं संरक्षित रखा गया है। जीवंत गुरु, शिष्य के अंदर स्थित गुरुतत्त्व का प्रतीक है।

यह श्रद्धेय तत्त्व प्रत्येक व्यक्ति के अंदर विद्यमान् रहता है। इसे आँतरिक गुरु कहा जाता है। स्थूल देह में आज्ञाचक्र गुरुतत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। अपने स्वयं के इस आँतरिक गुरु के साथ बिना किसी बाह्य गुरु के तादात्म्य अति दुष्कर कार्य है। अलौकिक आत्मबल के धनी महापुरुष ही इस पथ के पथिक होते हैं। श्री अरविंद, रमण महर्षि जैसे सिद्धयोगी इसी तरह के साधक हुए हैं। इनके कोई बाहरी गुरु नहीं थे। परमात्मा ही उनके गुरु थे। परंतु सामान्य शिष्य या साधक को इस मायारूपी संसार से मुक्त होने के लिए पग-पग पर मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है। उनके लिए प्रत्यक्ष गुरु का होना जरूरी है। इसीलिए गुरु के भौतिक स्वरूप को भी स्वीकार किया जाता है। गुरु के भौतिक शरीर को आँतरिक प्रबुद्ध चेतना का बाह्य आवरण माना जाता है।

विश्वगुरु स्वामी विवेकानंद ने ऐसे महान् व्यक्तित्व के प्रति इस तरह अपनी अभिव्यक्ति दी है, जिस व्यक्ति की आत्मा से दूसरी आत्मा में शक्ति का संचार होता है, वह गुरु कहलाता है और जिसकी आत्मा में यह शक्ति संचरित होती है, उसे शिष्य कहते हैं किसी की आत्मा में इस प्रकार शक्ति संचार करने के लिए आवश्यक है कि पहले तो जिस आत्मा से यह संचार होता हो, उसमें स्वयं इस संचार की शक्ति विद्यमान् रहे और दूसरे जिस आत्मा में यह शक्ति संचरित की जाए, वह उसे ग्रहण करने योग्य हो। स्वामी जी आगे कहते हैं, सच्चा गुरु वह है, जो सम-समय पर आध्यात्मिक शक्ति के भंडार के रूप में अवतीर्ण होता है और गुरु-शिष्य परंपरा द्वारा उस शक्ति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लोगों में संचरित करता है।

श्री अरविंद गुरुतत्त्व की महत्ता इस तरह व्यक्त करते हैं, “वह जिसने सत्य को उपलब्ध कर लिया है और स्वयं जिसे आत्मज्योति की अनुभूति प्राप्त है और जो उसका प्रकाश दान करने में समर्थ है। ऐसा पथ-प्रदर्शक, जो इतना सबल है कि राह की शिक्षा दे सकता है, राह बना सकता है और हाथ पकड़कर ले चल सकता है, कठिन राह पार करा सकता है। वही सत्ता गुरु कहलाती है।” श्री अरविंद के अनुसार सभी कठिनाइयों में जहाँ व्यक्तिगत प्रयास अवरुद्ध हो जाता है, गुरु की सहायता हस्तक्षेप कर सकती है और सिद्धि के लिए जो कुछ भी आवश्यक हो अथवा जो कुछ तात्कालिक स्थिति में आवश्यक हो, उसे संपन्न कर सकती है।

शास्त्रवचनों के अनुसार, जो ज्ञानरूपी अंजन की सलाई से अज्ञानरूपी अँधेरे से अंधी हुई आँखों को खोल देता है, उसे गुरु कहा जाता है। इसीलिए उपनिषद् कहती है, ‘गु’ शब्द का अर्थ है ‘अंधकार’; ‘रु’ शब्द का तात्पर्य है उसका निरोधक। अंधकार का निरोध या अज्ञान का नाश करने वाला तेजरूप ब्रह्म ही गुरु है। स्कंदपुराण का कथन है, गुरु विष्णु है, गुरु महेश्वर है। केवल ज्ञानमूर्ति, द्वंद्व से परे, आकाश के समान, नित्य, निर्मल, अचल, सदा साक्षी रूप, संसार से अतीत, तीनों गुणों से रहित और नित्य गुरु रूप में वे वरेण्य हैं। गुरु तो सर्वमयी चैतन्य सत्ता का एक प्रतीक है, जो सूर्य ज्ञान पिलाता है, वह तो जैसे अनंत ज्ञान की विकलता है। वह सत्य के ज्ञान की उत्कटता है। गुरु का न आदि है न अंत। गुरु का न पूर्व है न पश्चात्। गुरु है परिपूर्णता। उससे बढ़कर तीनों लोकों में कोई दूसरा नहीं है।

गुरु वे हैं, जिन्होंने अपनी चेतना को पूर्णतया संस्कारित कर दिया है। वे स्थूल देह धारण कर इस संसार में रहते हैं। परंतु उनकी आत्मा सदैव परमात्मा में निवास करती है। वे ईश्वरकोटि की आत्मा होते हैं, वे जीवन मुक्त होते हैं। उनका हृदय करुणा से ओत-प्रोत होता है। उनका जीवन भगवान् के लिए पूर्णतया समर्पित होता है। उनकी अपनी कोई इच्छा, आकाँक्षा या कामना नहीं होती है। वे सदैव विश्व कल्याण हेतु तत्पर होते हैं। ऐसे तपस्वी ही सच्चे गुरु होते हैं। इन्हीं के ज्ञान एवं तप के प्रभाव से सारा जग ज्योतिर्मय रहता है। वे संसार की अनंत गहराई में उतरकर अपने शिष्यों को मुक्त करते हैं।

ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में गुरु की अवधारणा का अंतर्निहित आधार यह है कि वे अति कृपालु, दयालु, न्यायपूर्ण तथा असीमज्ञान से युक्त हैं। भक्त या शिष्य उन्हें इसी रूप में देखते हैं। वह ईश्वर के सर्वाधिक निकट होते हैं। इसीलिए श्रीरामकृष्ण परमहंस ने गुरु या संतों के हृदय को भगवान् का डाक बँगला कहा है। ऐसे गुरु सचमुच ही ईश्वर के प्रतिरूप होते हैं। उनका अस्तित्व एक स्वच्छ दर्पण के समान है, जिसमें अपना ही प्रतिबिंब झलकता है। वे स्वयं में एक विशुद्ध, उज्ज्वल, देदीप्यमान् आत्मा हैं। वह प्रेम एवं आनंद के सागर हैं। अपने शिष्य के लिए वे माता, पिता, संबंधी और ईश्वर हैं। शिष्य के जीवन में जो कुछ है, सद्गुरु में ही निहित है। भक्ति ही गुरु-शिष्य के संबंध का आधार है। यही अंतर्निहित मूल सिद्धाँत है। शिष्य एक निष्ठावान् आज्ञाकारी सेवक है। गुरु उसके स्वामी। समर्पित सेवक एकमात्र उद्देश्य होता है अपने स्वामी द्वारा दिए गए कार्य को पूर्णता से संपादित करना। सेवा करना उनका उद्देश्य है, वह केवल इतना जानता है और इसी बात के लिए सतर्क व समर्पित होता है। गुरुभक्ति में दास्यभाव के अतिरिक्त वात्सल्य भाव, ईश्वर भाव भी निहित होता है।

गुरु की भक्ति मानो सत्य की पूजा है, ज्ञान की पूजा, अनुभव की पूजा, विचारों की पूजा है। जब तक मनुष्यों में ज्ञान की पिपासा है, श्रद्धा की भावना है, तब तक संसार में गुरुभक्ति अक्षुण्ण रहेगी। सूफी संत जायसी कहते हैं, “जहाँ पाँव गुरु राखे, चेला राखे माथा।”

गुरुकृपा कोई शर्त नहीं है। यह तो गुरु का शिष्य के प्रति अनंत प्रेम का उन्मुक्त बहाव है और यह कृपा का अनुदान वरदान शिष्य को कब मिलेगा, केवल गुरु पर निर्भर करता है, संभवतः सर्वस्व समर्पण एवं प्रेम से गुरु कृपा प्राप्त की जा सकती है। गुरुकृपा दुर्लभ चीज है। इसलिए स्वामी विवेकानंद कहते हैं, गुरुकृपा से सब कुछ संभव है। “गुरुकृपा ही केवलम्।”

गुरुकृपा सहजता से प्राप्त नहीं होती। इसे प्राप्त करने के लिए निष्कपट समर्पण आवश्यक है। गुरुकृपा की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि शिष्य का अपना म नहीं न हो। गुरु के प्रति श्रद्धा केवल अंधश्रद्धा हो। श्रद्धा केवल अंधी ही होती है। वह तर्क नहीं करती। जहाँ तर्क है वहाँ श्रद्धा कहाँ? श्रद्धा के बिना समर्पण नहीं प्राप्त हो सकता है। सर्वस्व समर्पण ही गुरुकृपा के लिए सुपात्रता की कसौटी हो सकती है।

यह कृपा अनेक रूपों में प्रकट हो सकती है। यह मधुर एवं प्रिय या कठोर एवं अप्रिय हो सकती है। गुरु उस बढ़ई के समान होते हैं, जो एक लकड़ी के टुकड़े को निर्दयतापूर्वक काट छाँटकर एक निश्चित स्वरूप देते हैं। गुरु शिष्य के अहंकार को काट-छाँटकर, निराई-गुड़ाई करता है। इस कार्य को वे निर्दयतापूर्वक तब तक करते रहते हैं, जब तक कि शिष्य को वाँछित स्वरूप नहीं मिल जाता। गुरु शिष्य को एक मुक्त जीवात्मा के रूप में परिवर्तित कर देते हैं, ताकि वह भी प्रकाशस्तंभ बन सके। इसके लिए शिष्य को लकड़ी के टुकड़े के समान शाँत, मौन एवं अहंकाररहित होना आवश्यक है, ताकि गुरु उसे एक निश्चित स्वरूप प्रदान कर सके। गुरुकृपा के लिए शिष्य को यही सचाई, प्रेम एवं समर्पण का भाव रखना चाहिए।

समस्त परंपराएँ, कला और विज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुरु से शिष्य को हस्तांतरित होते रहे हैं। गुरु-शिष्य का संबंध मानव अस्तित्व के महत्तर आयामों, श्रेष्ठतर कामनाओं से संबद्ध है। इसके बिना बाह्य जगत की विषमताओं में अपना अस्तित्व बचाना अति दुष्कर व कठिन है। सद्गुरु की रक्षात्मक कृपा ही जीवन में इस आँतरिक स्रोत की ओर हमारा मार्गदर्शन करती है। जहाँ से हमारी समस्त उच्चतम शक्तियाँ निःसृत होती हैं। इसी वजह से गुरुओं को महान् संस्कृतियों की आधारशिला माना गया है। उनके ज्ञान और प्रेरणा के बिना न तो परंपराएँ टिक सकेंगी और न संस्कृतियाँ ही जीवित रह सकेंगी।

युगगीता-21


जन्म कर्म च में दिव्यम्

(गीता के चतुर्थ अध्याय के ज्ञानकर्मसंन्यासयोग की व्याख्या की तीसरी कड़ी)

एक बड़े महत्त्वपूर्ण प्रकरण ‘अवतारवाद’ पर प्रारंभिक चर्चा विगत अंक में की गई। भगवान् कहते हैं, जो अपनी वासनाओं के कारण जन्म ले वह नर एवं जो अपनी अंतर्निहित माया द्वारा उस पर आरुढ़ होकर स्वयं को प्रकट करे, वह अवतार-नारायण। वस्तुतः लोकशिक्षण के लिए ही महाकरुणा का भाव लेकर अवतार आते हैं। इसी संदर्भ में हमने लिखा था कि गुरुदेव स्वयं कहते थे, “मुझे धकेला गया है, सृष्टि की संचालक सत्ताओं द्वारा धरती पर विशेष कार्य करने के लिए।” धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होने पर भगवान् स्वयं को प्रकट करते हैं। उनके हर युग में प्रकट होने का एक ही लक्ष्य होता है, साधु पुरुषों और आठवें इन दो श्लोकों की व्याख्या के माध्यम से समझाया गया था। आज की जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं, ऐसे में अवतार के प्रकटीकरण की कितनी बड़ी अनिवार्यता है, यह इस व्याख्या से समझा जा सकता है। श्री अरविंद ने अवतार के प्रकटीकरण की व्याख्या अपने ही ढंग से की है, जो बड़ी निराली है। वे लिखते हैं कि भगवत्सत्ता के दिव्य प्रकटीकरण के दो पहलू हैं, एक है अवतरण-मानव आकृति और प्रकृति में भगवान् का प्रकट होना और दूसरा आरोहण-भगवान् के भाव में मनुष्य का जन्म ग्रहण, भागवत् चेतना में उत्थान। योगीराज इस दूसरे पहलू को अधिक महत्त्वपूर्ण बताते हुए इसे जीव का नवजन्म कहते हैं। अवतार को उनने मानव जाति का भागवत् नेता बताया है, तो पूज्यवर गुरुदेव ने संत, सुधारक और शहीद के रूप में अंशावतार के प्रकटीकरण की बात कही है। अब उसके आगे की व्याख्या इस अंक में।

परमपूज्य गुरुदेव अगस्त 1979 अखण्ड ज्योति के प्रज्ञावतार विशेषाँक में लिखते हैं, “आदर्शवादी दुस्साहस ही अवतार है। वह एक भावनात्मक प्रवाह के रूप में उत्पन्न होता है और असंख्यों को अनुप्राणित करता है।” कितनी सटीक, आज के संदर्भ में युगानुकूल यह व्याख्या है। वे आगे लिखते हैं, “प्रज्ञावतार बुद्धावतार का उत्तरार्द्ध है। बुद्धिप्रधान युग की समस्याएँ भी चिंतनप्रधान होती हैं। मान्यताएँ, विचारणाएँ, इच्छाएँ ही प्रेरणा-केंद्र होती हैं और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप ही हो सकता है। लोकमानस को अवाँछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़ मान्यताओं से विरत करने वाली विचारक्राँति ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।” (पृष्ठ 23) इस व्याख्या से समझा जा सकता है कि अवतार स्वरूप परिस्थितियों के अनुरूप भिन्न-भिन्न होते हैं व उन्हें समझने के लिए दूरदर्शी विवेकशीलता-प्रज्ञा का जागरण अनिवार्य है। गायत्री साधना इसीलिए तो इस समय की विशेष साधना बताई गई है।

हम ‘संभवामि युगे युगे’ भगवान् के इस कथन की व्याख्या विगत अंक से करते आ रहे हैं। मैं हर युग में आता हूँ, हर समय में आता हूँ, प्रकट होता हूँ और मेरा उद्देश्य बड़ा स्पष्ट होता है, धर्म की स्थापना करना, उसके लिए उपयुक्त वातावरण बनाना। इस कथन से एक बात स्पष्ट होती है कि अवतार हमेशा आते रहते हैं। अवतार का प्रकटीकरण एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। “अवतार या इनकारनेशन इज नाट दि एंड।” अवतार कभी अंतिम प्रक्रिया के रूप में नहीं आता। रामकृष्ण मिशन के स्वामी अखिलानंदजी ने जेम्स हैविट की लिखी एक किताब ‘क्राइस्ट द सेवियर ऑफ ह्यूमन काइंड’ की समीक्षा करते हुए लिखा है कि इसका शीर्षक बदला जाना चाहिए। ‘क्राइस्ट द सेवियर’ नहीं ‘क्राइस्ट ए सेवियर’ होना चाहिए। वे लिखते हैं कि ‘द सेवियर’ का मतलब होता है एकमात्र ईसा ही उद्धारक हैं, अवतार हैं, जबकि ‘संभवामि युगे युगे’ से आशय यह है कि जब-जब भी जरूरत होगी, वे आएँगे। कभी बुद्ध, कभी राम, कभी कृष्ण, कभी पैगंबर व कभी ईसा रूप में। वे लिखते हैं, “अवतार को अंतिम मान लेना गलत चिंतन है। भगवान् जब भी आता है, हर युग में निरंतर होती रहने वाली परिवर्तन की प्रक्रिया को साकार करने के लिए आता है। चूँकि पश्चिम में सभ्यता का विकास, सोचने का विकास उस सीमा तक नहीं हुआ, जहाँ तक हमारे औपनिषदकालीन ऋषियों ने सोचा, इसीलिए उनने कह दिया कि क्राइस्ट इज द लिमिट’ यही अंतिम हैं। इसीलिए उनकी लेखनी एंटी क्राइस्ट की बात कहती है, जबकि हम नवयुग के आगमन की बात करते हैं।”

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं, “काल के परिवर्तन का प्रयोजन पूरा करने वाली शक्ति का नाम महाकाल है। युग परिवर्तन, युग प्रवर्तन इसी सत्ता द्वारा होता है। परिवर्तन अर्थात् बदलना एवं प्रवर्तन अर्थात् उसे आगे बढ़ाना। यह हमेशा रुद्र द्वारा रौद्र भाव से संपन्न होता है।” श्रीमद्भागवत में एक वाक्य आता है, “अवताराः ह्यै अनंतश्च” अर्थात् अवतार एक नहीं अनेकानेक होते हैं। यह ऋषि का वाक्य है कि अवतार किसी के अंदर, किसी की भी चेतना में अवतरित हो, उनसे महत्त्वपूर्ण कार्य करा सकता है। चाहे वे गुरु गोविंद सिंह जी हों, बंदा वैरागी, भगतसिंह अथवा सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गाँधी, श्री अरविंद, स्वामी विवेकानंद हों।

ठाकुर श्री रामकृष्ण कहते हैं, “पहले दस अवतार आने की बात मिलती है, फिर चौबीस अवतारों की और फिर असंख्यों की। जैसी-जैसी जमाने की समस्या होती है, भगवान् अवतार लेते हैं।” पश्चिम में हेगल, ह्यूम सभी ने सोचा, तरह-तरह की बातें भी कहीं हैं, पर उनकी बातों में, दार्शनिकों की व्याख्याओं में एवं ईशदूतों की बातों में अंतर है। दार्शनिक ‘हाइपोथिसीस’ करता है, कल्पना की उड़ान में चलता है और ऋषि वक्तव्य देते हैं, भविष्य के गर्भ में झाँकी करके आते हैं और बताते हैं। गीता एक ‘हाइपोथिसीस’ नहीं, बल्कि एक वक्तव्य है, स्टेटमेंट है, अनुभव है, अधिकार से कहा गया कथन है।

भगवान् अपने सातवें-आठवें श्लोक में की गई घोषणा की पुष्टि अगले श्लोक में करते हैं-

जन्म कर्म च में दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥

“इस तरह हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं, इस तथ्य को जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर त्याग के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, वस्तुतः मुझे ही प्राप्त करता है (मुझ तक ही पहुँचता है)।”

यह श्लोक बड़ा मार्मिक है। विशिष्ट गुह्य अर्थ लिए है। इसकी व्याख्या अवतारवाद की जब तक की गई चर्चाओं के बाद आरंभ होती है एवं पुनर्जन्म के सिद्धाँत व ‘तत्त्व’ से परमसत्ता को जान लेने, उन तक पहुँचने का मार्ग क्या हो, इसके प्रतिपादन तक चलती है।

भगवान् का शरीर धारण करना भी अलौकिक कार्य है एवं उनके कर्म भी दिव्य हैं। भगवान् इसे एक रहस्यपूर्ण गुत्थी बता रहे हैं। एक परिभाषा के अनुसार भगवान् ‘अज’ अर्थात् जन्मरहित हैं, उनका जन्म नहीं हो सकता। तथापि वे अपनी मायाशक्ति का अवलंबन लेकर देहधारी होते हैं, अवतरित होते हैं। वे प्राणिमात्र के दुःख से विगलित होकर दुःखों के सागर से उन्हें उबारने के लिए अवतरित होते हैं जब भी ऐसे विदेही आत्मा देहधारी हों, तब कहा जाता है कि भगवान् जन्म ग्रहण करते हैं। समस्त जीवों का जन्म कर्मफल के अनुसार होता है। हम सब अपने-अपने प्रारब्ध के वशीभूत हो जन्मे हैं, किंतु भगवान् अपनी इच्छा से तथा लोककल्याण के लिए जन्म ग्रहण करते हैं। शुभ या अशुभ किसी भी प्रकार का प्रारब्ध उनमें नहीं है। इस तरह भगवान् का जन्म प्रारब्धवश नहीं हो सकता है, वह तो दिव्य ही हो सकता है।

यहाँ थोड़ा भगवान् श्रीकृष्ण, यदुवंशी श्रीकृष्ण, सारथी श्रीकृष्ण की इस बात पर गौर करें, जो उनने कही है कि मेरा जन्म व मेरा कर्म। यह ‘मैं’ अहंजनित नहीं है। यह जो वाक्य है, ऋषि का वाक्य है, एक स्टेटमेंट है एवं एक अनुभव केन नाते प्रमाण रूप में कहा गया है। यह ईश्वर का, परब्रह्म का मैं है। दक्षिण भारत में स्वामी विवेकानंद परिव्रज्या कर रहे थे। पंडितों ने किसी शास्त्रचर्चा के दौरान कहा कि आद्य शंकराचार्य ऐसा कहा करते थे, तो स्वामी जी तुरंत बोल उठे कि उनने क्या कहा, इसे एक तरफ रखिए। “मैं विवेकानंद यह कह रहा हूँ, यह मेरी बात ध्यान से सुनो।” जब इस वार्त्तालाप पर श्री अरविंद से उनके शिष्यों ने टिप्पणी जानना चाही, तो उनने विवेकानंद की प्रशंसा की। उनने कहा, इसमें विवेकानंद का अहंकार नहीं है। वे अहंभाव से परे जाकर परब्रह्म की सत्ता में स्थित होकर बोल रहे थे। इसलिए वे जो भी बोल रहे थे, सत्य ही बोल रहे थे। ऐसे में यदि वे आद्य शंकराचार्य को गलत भी सिद्ध कर दें, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


Quotation

आदर्शों के लिए घाटा स्वीकार करते हुए लड़ मरने की साहसिकता का अनुदान अवतार के अतिरिक्त और किसी के पास नहीं होता।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

भगवान् का ‘मैं’ मंसूर का अनलहक है, सरमत का अनलहक है। मैं ही आत्मा हूँ। सरमत ने हाथी के पैरों से अपना सिर कुचलवा दिया, लेकिन सुल्तान को अल्लाह मानने से इंकार कर दिया। भगवान् का ‘मैं’ अर्थात् सृफी का मैं। हमारे उदाहरण मंसूर एवं सरमत बनना चाहिए। हम चूँकि शरीरधारी हैं, साधारण हमारा जन्म है। हम शरीर से परे जाकर आत्मा में, शुद्ध अहंभाव में स्थित नहीं हो पाते। यदि ऐसा कर सकें, तो फिर हम अवतार की भाषा में बोल रहे हैं। दिव्य जन्म वाला दिव्य कर्म के लिए आया अवतार सृष्टि को सारी संवेदना अपने अंदर साकार करके आता है। करुणा का महासागर ही उनके अंदर होता है एवं उसके वशीभूत होकर वे जन्म, वह भी दिव्य जन्म लेते हैं। अतः यदि अवतारीसत्ता “मेरा जन्म-मेरा कर्म” इस तरह से अपनी बात कहता है, तो गलत नहीं करता।

परमपूज्य गुरुदेव कहते थे, “तुम लोग अपने सुख-दुःख से परेशान हो और कहते हो कि आत्मज्ञान मिल जाए, किसी तरह। जिस दिन तुम्हें आत्मज्ञान मिल जाएगा, उस दिन दुनिया के दरद को देखकर तुम्हारी छाती फट जाएगी। दुनिया का दरद सहना सीखो, जीना सीखो, उसमें भागीदारी करना सीखो।” दरद सहने के लिए बड़ी भारी छाती चाहिए, वैसी जैसी कि स्वामी विवेकानंद की थी, परमपूज्य गुरुदेव की थी। सृष्टि के केंद्र में स्थित होकर, परब्रह्म के साकार रूप भगवान् कृष्ण जब अर्जुन को कुछ कहते हैं, तो उसे भलीभाँति समझना चाहिए। आगे चलकर वे विराट् रूप दिखाते हैं तब वह यह जान पाता है कि कृष्ण कौन हैं, दिव्य जन्म लेकर दिव्य कर्म करने आए महावतार हैं। मेरेपन से परे जाना व अवतार की चेतना में स्थित हो जाना बहुत बड़े पुरुषार्थ का कार्य है।

‘दिव्य’ शब्द का अर्थ रामानुजाचार्य जी ने एवं आचार्य शंकर ने किया है, अप्राकृत, ऐश्वर्य से परिपूर्ण। ‘तत्त्वतः’ का अर्थ किया है, ‘स्वरूपतः’ वास्तविक रूप में। भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि मेरा जन्म दिव्य है, कर्म भी दिव्य तथा अलौकिक हैं। हम अपनी साधारण बुद्धि से, उसके मापदंडों से उनके जन्म और कर्मों के कारण का निर्णय नहीं कर सकते। वे अमानव होते हुए भी मानव रूप में क्यों जन्म ग्रहण करते हैं और तीनों लोकों में उनका कोई कर्त्तव्य-कर्म न होते हुए भी वे क्यों कर्म करते हैं, इस बात को उच्चस्तरीय मनःस्थिति में जाकर ही स्वानुभूति द्वारा जाना जा सकता है। प्रारब्ध के वशीभूत न होते हुए भी वे क्यों जन्म ग्रहण करते हैं, कर्म करते हैं, यह रहस्य जान सकने वाला ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर चिरमुक्त हो जाता है। यही वास्तविक ज्ञान या विज्ञान है, गीता का मूल तत्त्वदर्शन है। इस ज्ञान को जान लेने वाला सदा के लिए मुक्त हो जाता है, फिर उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

जिस रहस्य को हर मनुष्य को जानना है वह है अज, अव्यय परमात्मा और उनके दिव्य जन्म-कर्म का रहस्य। इस ज्ञान से जो कर्म की धारा बहती है, उसमें स्नान करने वाला सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। क्योंकि उसके कर्म भी उस सर्वलोक महेश्वर के कर्म हो जाते हैं। अभी हम पिछले श्लोकों में देख चुके हैं कि भगवान् अपने जन्म का हेतु बता रहे हैं, भागवत् धर्म की रक्षा और युग की व्यवस्था का पुनर्गठन। यह दिव्य कर्म का बाह्य पहलू है और यही मानवजाति के भगवन्मुख प्रयासों को समस्त विघ्न-बाधाओं से उबारकर आगे बढ़ाता है। इस दिव्य कर्म का आँतरिक पहलू यह कि वह हमारी चेतना को दिव्य बनाने आता है, ताकि वह ऊर्ध्वमुखी हो सके और ऐसे लाखों-करोड़ों व्यक्तियों की चेतना में नवजीवन लाया जा सके। किसी बाहरी कर्म या बाहरी घटना अवतार के आने का मूल कारण नहीं होती, जैसा कि सामान्यतः समझा जाता है। जिस संकट की अवस्था में भगवान् आते हैं, वह बाहरी नजर से महज घटनाओं और जड़ जगत् के परिवर्तनों से भरा एक नाजुक काल प्रतीत होता है। परंतु यदि इसके वास्तविक स्वरूप को देखें, तो ज्ञात होता है कि यह संकट मानवचेतना में तब आता है, जब उसका रूपांतरण, कोई महान् परिवर्तन होने जा रहा हो। इस परिवर्तन के लिए ही दिव्य शक्ति की, अवतारी चेतना की आवश्यकता होती है।

विगत दो शताब्दियों को देखें, तो बड़ी तेजी से राजनीतिक, औद्योगिक, आर्थिक स्तर पर जनसाधारण की चेतना में परिवर्तन आए। एक प्रकार से इन क्राँतियों ने बीसवीं सदी की अंतिम वैज्ञानिक-कंप्यूटर क्राँति द्वारा इसे चरम स्थिति तक पहुँचा दिया है। यह फेरफार बौद्धिक-लौकिक है, आध्यात्मिक नहीं। जब यह कार्य आध्यात्मिक स्तर पर होता है, तो भगवान् का प्रादुर्भाव होता है एवं उसी को अवतार कहा गया है। दिव्य कर्म करने वाला एवं आज के संकट के मूल में आध्यात्मिक बीज देखते हुए सारे युग का प्रत्यावर्तन करने वाला भागवत् नेता ही आज का प्रज्ञावतार हैं एवं उसी व्याख्या में यह नवाँ श्लोक सारी बात हमें समझा रहा है।

भगवान् इस श्लोक में कहते हैं कि जो भी मनुष्य संसार में इस परमतत्त्व की अभिव्यक्ति और उसकी कार्यप्रणाली को भलीभाँति समझ लेता है, वह एक विशिष्ट दृष्टि से संपन्न हो जाता है। उसे यह भलीभाँति अहसास हो जाता है कि हमारे सभी कर्म उसी की दिव्य क्रीड़ा का एक अंग हैं तथा हमारी समस्त उपलब्धियाँ उसी परमसत्ता रूपी गुह्य शक्ति की लीला का एक हिस्सा हैं। हममें से किसी को भी वैयक्तिक रूप में अहंकार से भरकर अभिमान नहीं करना चाहिए कि यह हमने किया है। यह ‘कर्त्ता’ भाव की अभिव्यक्ति हट जाए, इससे निवृत्ति मिल जाए, तो हमने मुक्ति का पथ प्रशस्त कर लिया, यह माना जाना चाहिए।

ऐसे साधक, जो सर्वत्र उसी ईश्वर की क्रीड़ा-कल्लोल का दर्शन करते हैं, शरीर छोड़ने के बाद (त्यक्त्वा देहं) पुनः जन्म नहीं लेते (पुनर्जन्म नैति)। इसका अर्थ यह हुआ कि वे उस अहंभाव से उबर जाते हैं, जो उन्हें जन्म-जन्माँतरों तक योनियों में पटक-पटककर उत्पीड़ित करना। स्वार्थ की मूर्खताओं में घसीटे जाने से वे बच जाते हैं एवं जीवन-मुक्ति का लाभ ले लेते हैं। इतना ही नहीं भगवान् कहते हैं कि जो मेरे दिव्य जीवन और कर्म के मर्म को जानता है वह निश्चित ही मुझ ही को (मामेति अर्जुन) प्राप्त होता है। शुद्ध अहं व ब्रह्मभाव में जीना साधक की उच्चप्रगति की व्यवस्था का प्रतीक है। यही हर साधक का लक्ष्य भी 222 यह बड़ा कठिन। अहंकार को परिष्कृत कर कर्त्ताभाव से मुक्त होकर, आकर्षणों से विरत होने पर आगे की प्रगति-यात्रा का पथ प्रशस्त होता है। इसके बाद अहंभाव पुनः उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि भगवान् के आश्वासन के अनुसार वह भगवान् को प्राप्त हो जाता है, उनसे ही एकाकार हो जाता है एवं पुनर्जन्म के चक्र में नहीं उलझता।

एक ही श्लोक में मानो गागर में सागर की तरह सारा तत्त्वदर्शन छिपा पड़ा है। हम इस लेख के प्रारंभ से ही एक ही श्लोक की व्याख्या पर टिके हुए हैं, जिसका पूर्वापर संदर्भ है भगवान् के अवतरण का रहस्य और इसके बाद का संदर्भ है वीतराग बनकर भय को नष्ट कर भगवान् को प्राप्त हो जाने की प्रक्रिया को समझकर इस शैली को जीवन का एक अंग बना लेना। इस उत्तर पक्ष की व्याख्या दसवें श्लोक में आई है एवं हमें फिर सीधे कर्म-अकर्म-विकर्म की व्याख्या (लगभग श्लोक क्रमाँक 23) तक ले जाता है। कितना गुह्य व अलौकिक-दिव्य है गीता का ज्ञान, यह इसकी विस्तृत विवेचना के बाद ही संभव हो पाता है और उसके लिए कोरे ज्ञान की, तर्क की नहीं, भगवान् के भाव में जीने की आवश्यकता है। श्रद्धा से अभिपूरित हो अहंभाव को बलि पर चढ़ाने की जरूरत है। श्रद्धावान् को ही सच्चा ज्ञान मिलता है। यह इस अध्याय का अंतिम निष्कर्ष भी तो है।

“जन्म कर्म च में दिव्यम्” की व्याख्या के प्रकरण में श्री अरविंद लिखते हैं, “यह जगत् एक युद्ध की रंगभूमि है। इसके दो पहलुओं पर गीता जोर देती है, एक आँतरिक संघर्ष, दूसरा बाह्य युद्ध। आँतरिक संघर्ष, अपने अंतर्जगत् में विद्यमान् कामना, अज्ञान, मोह, लोभ व अहंकार जैसे घटकों से है। इन्हें मारना ही अंदर की विजय है। पर एक दूसरा युद्ध बहिर्जगत में भी चल रहा है। मानव समूह में धर्म और अधर्म की शक्तियों के बीच सतत संग्राम चलता रहता है। भगवान् का अवतरण अहंकार का आश्रय लेकर लड़ने वाली आसुरी अधर्मप्रधान ताकतों का संहार करने के लिए होता है। इसी के लिए उनका दिव्य जन्म होता है एवं सारे कर्म दिव्यता से भरे होते हैं।”

महाभारत का युद्ध प्रकाराँतर से देवासुर संग्राम का एक रूपक है, जिसके महानायक हैं श्रीकृष्ण। धर्मराज्य की स्थापना के लिए लड़ रहे पाँडव देवपुत्र हैं, मानव रूप में देवताओं की शक्तियों को धारण किए हुए हैं। कौरव आसुरी शक्ति के अवतार हैं। भगवान् प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में असुरों को नष्ट करने, उन्हें चलाने वाली आसुरी शक्ति का दमन करने और धर्म के आदर्शों की स्थापना के लिए पुनः अवतार लेते हैं। उनका सबसे बड़ा उद्देश्य होता है स्वर्ग राज्य को पृथ्वी के निकट तक ले आना, मानव में देवत्व को उभारना। उनके आने का सही लाभ उन्हीं को मिल पाता है, जो भगवान् की इस क्रिया के माध्यम से दिव्य जन्म और दिव्य कर्म के वास्तविक मर्म को जान लेते हैं और अपनी चेतना में सदैव भगवन्मय होकर जीते हैं। ‘मन्मया मामुपाश्रिताः’ के माध्यम से भगवान् ने ऐसे तत्त्वज्ञानियों को जो तपःपूत हैं, अपरा प्रकृति से उबरकर मुक्त हो जाते हैं, आश्वासन दिया है कि तुम मेरे स्वरूप और स्वभाव को ही प्राप्त होओगे॥ (मद्भावमागताः)। यह सारा प्रकरण जुड़ा नवें श्लोक से है, पर आया दसवें श्लोक में है, जिसकी व्याख्या हम अगले अंक में करेंगे। समापन से पूर्व परमपूज्य गुरुदेव के चिंतन द्वारा पाठक-परिजनों को अवतार की प्रत्यक्ष प्रेरणा से अनुप्राणित करना चाहेंगे।


संवेदना घनीभूत (Kahani)

अपने बेलूरमठ के कमरे में स्वामी जी बराबर बेचैनी से टहल रहे थे। संतों ने पूछा, स्वामीजी! क्या बात हुई? आप काफी परेशान हैं। वे बोले-इसी क्षण जापान के समीप समुद्र में एक जहाज डूबा है। मुझे उनका आभास हुआ है एवं मैं उनकी व्यथा सुन रहा हूँ। भक्तों ने कहा, स्वामीजी आप तो कलकत्ता में गंगा किनारे खड़े हैं, आपको कैसे पता चला? स्वामी जी कुछ जवाब न देकर मौन ध्यान में चले गए। अगले दिन समाचार आया कि ऐसी घटना जापान के समीप हुई, जिसमें पाँच सौ व्यक्ति डूब गए। जिस समय विवेकानंद बोल रहे थे, पाँच सौ व्यक्तियों की करुणा अवतारी चेतना रूपी विवेकानंद के हृदय से बोल रही थी। अवतार में सृष्टि की सारी संवेदना घनीभूत हो जाती है। वह उसी ब्रह्मभाव में जीता है।

परमपूज्य गुरुदेव अगस्त 1979 की अखण्ड ज्योति में लिखते हैं, “अवतार की प्रथम प्रेरणा, प्रथम प्रक्रिया देवमानवों के उत्पादन की होती है। वे आत्मपरिवर्तन का आदर्श उपस्थित कर अनेकानेकों को अनुगमन की प्रेरणा देते हैं। अग्रगमन ही साहसिकता है। यह पराक्रम देवमानवों के भाग्य में ही लिखा होता है। पीछे अनुगमन तो असंख्यों करने लगते हैं।” ............ “अवतार के द्वितीय चरण में अनेक व्यक्ति आदर्शवादी साहस का परिचय देते देखे जाते हैं। स्वार्थियों को परमार्थ अपनाते, पतितों को आदर्श अपनाते देखकर यही सिद्ध होता है कि हवा का रुख बदला और मौसम पलटा।” पूज्यवर के अनुसार इन दो प्रेरणाओं को लेकर ही दिव्य जन्म लेता है अवतार एवं दिव्य कर्म करने की प्रेरणा देता हुआ जीवन-मुक्ति, बंधन-मुक्ति का पथ प्रशस्त कर जाता है। अब इस अंक में इतना ही। शेष दिव्य कर्म की उत्तर व्याख्या वीतराग बनने के फलितार्थ-माहात्म्य अगले अंक में। क्रमशः

गुरुकथामृत-20


सत्पराम” देने वाला, मनोबल उछालने वाला मार्गदर्शन

सबसे बड़ा अवलंबन किसी के लिए भी जीवनपथ पर है, सच्चा मार्गदर्शन देने वाला-सत्परामर्श देने वाला सहयोगी, एक ऐसा व्यक्ति जिस पर विश्वास किया जा सके। साधना के क्षेत्र में गहरे उतरने की बात हो अथवा जीवन-संग्राम में पग-पग पर आने वाली बाधाओं से जूझने की, हम जब हमारी गुरुसत्ता के पत्रों के माध्यम से उनके जीवन-दर्शन को पढ़ने की कोशिश करते हैं, तो उनका वह पहलू नजर आता है, जो कभी किसी को सद्गुरु के रूप में परामर्श देता था, कभी लताड़ भी लगाता था तथा कभी मित्रवत् सलाह भी देता था। लक्ष्य एक ही होता था कि पत्र पाने वाला अपनी जिज्ञासा का सही समाधान पाए एवं इधर-उधर भटके नहीं। साथ ही उसका मनोबल भी बढ़े एवं दुगुने उत्साह के साथ वह कार्य में लग जाए। इस बार इस स्तंभ के लिए कुछ ऐसे पत्रों का चयन हमने किया है, जो 1944 से 1970 के बीच लिखे गए। देखें कितना महत्त्वपूर्ण शिक्षण देते हैं, हमें ये पत्र।

श्री देवराज जी ऋषि (रुड़की) को 11/2/44 को लिखा एक पत्र है-

“आपका पत्र मिला। निस्संदेह भगवान् की कृपा अनंत अपने प्रिय पुत्रों पर उनकी करुणा सदा ही बरसती रहती है। हम लोगों की धुँधली दृष्टि कभी किसी कठोर विधान को देखकर चकरा जाती है। अप्रिय प्रसंगों को देखकर प्रभु की नाराजी सोचते हैं। परंतु यथार्थ में यह भी उनकी दया ही होती है। प्रभु का हर एक कार्य हमारे कल्याण के निमित्त है। यदि हम लोग इस मर्म को समझ सकें, तो प्रभु शरणागति के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता।”

समर्पणयोग की शिक्षा का सारा मर्म उपर्युक्त पंक्तियों में छिपा पड़ा है। प्रिय-अप्रिय सभी में यदि प्रभु की ही इच्छा मान ली जाए, तो मन दुःखी क्यों हो। साधक की कितनी बड़ी असमंजस की स्थिति का समाधान हमारे आराध्य करते हैं कि विचलित न हों, गहना कर्मणो गतिः वाले इस जगत् में हर घटनाक्रम को प्रभु की लीला ही मानकर चलें। वही मार्गदर्शन तो जीवनयात्रा का पाथेय बन जाता है।

एक अन्य पत्र जो 24/10/45 को कासिमपुर अलीगढ़ के श्री धर्मपाल सिंह को लिखा गया, पूज्यवर लिखते हैं-

“गुरुतत्त्व में हम सबकी वैसी ही निष्ठा होनी चाहिए, जैसी कि अपने मन में धारण करने का आप प्रयत्न कर रहे हैं। परंतु इतना स्मरण रखना चाहिए, मनुष्य आखिर मनुष्य ही है। उसमें दोष होने संभव हैं। मुझे भी आप निर्दोष न समझें, इतना मानने के बाद ही अपनी निष्ठा को केंद्रीभूत करें। देवता मान लेने से आपकी साधन को हानि पहुँच सकती है।”

कितना मर्मस्पर्शी हृदय से निकला आत्मकथन है। उनने पूज्यवर में गुरु को खोजा। गुरु ने अपने भावी शिष्य को लिखा कि निष्ठा गुरुतत्त्व में रखें, किसी व्यक्ति में नहीं। अपने मनोभावों को परिपक्व बनाएँ एवं यह मानकर चलें कि गुरु भी हाड़-माँस का पुतला ही है। उसके बताए आदर्शों पर चलना-श्रद्धातत्त्व को नित्य गहरा बनाते चलना ही गुरुदीक्षा को पकाना है। इस श्रद्धा के सहारे ही वह सब मिलता चला जाता है, जो किसी गुरु से शिष्य को प्राप्त हो सकता है।

इसी प्रकार का एक तीसरा पत्र है, जो 9/7/52 को श्री रामदास (कानपुर) को लिखा गया था।

“गुरुभक्ति ईश्वरभक्ति का ही एक प्रारंभिक और सरल रूप है। वह प्रेम भी ईश्वर को ही पहुँचता है। जैसे पत्थर की प्रतिमा पूजन करने से उस पूजा का श्रेय प्रतिमा तक सीमित नहीं रहता और सीधा ईश्वर तक जा पहुँचता है। उसी प्रकार गुरुभक्ति भी किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं है, वह भी सीधी ईश्वर तक ही पहुँचती है।”

गुरुभक्ति की बड़ी सटीक व्याख्या है उपर्युक्त मार्गदर्शन में। गुरु व्यक्ति नहीं, परमात्मचेतना का प्रतिनिधि है एवं गोविंद से मिलाने के लिए नियुक्त एक प्रतिनिधि है। गुरुभक्ति को इस दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में समझने के बाद मन के सारे ऊहापोह मिट जाते हैं एवं आध्यात्मिक प्रगति की राह आसान हो जाती है। यही वह सारतत्त्व है, जो किसी के लिए भी दैनंदिन जीवन का एक सहारा बन जाता है।

अब एक पत्र ऐसा जो राजनीतिक स्तर पर आकाँक्षा रखने वाले एक सज्जन को लिखा गया है। वे पंडित नेहरू जी से मिलकर आए थे, बड़ी खुशी से यह समाचार उनने पूज्यवर को दिया था। पूज्यवर बड़ी आत्मीयता से उन्हें लिखते हैं 3/12/57 को यह पत्र।

“आपसे यहाँ पर दो-तीन दिन नहीं मिलना हुआ, पर ऐसा लगता है, मानो आप जन्म-जन्माँतरों के हमारे साथी हैं। पत्र पढ़ते समय ऐसा लगता है, मानो आप सामने ही बैठे हों।

पं. नेहरू से मिलन का समाचार पढ़कर संतोष हुआ। आपकी आत्मा भी उतनी ऊँची है, जितनी पं. नेहरू की। परिस्थितियों ने ही आपको इन दिनों ऐसा अव्यवस्थित बना दिया है। आप भी इसी जीवन में महापुरुष घोषित हों, तभी हमें संतोष होगा।”

मुँबई के श्री हर्षनारायण सिंह को यह पत्र तीन दिसंबर सत्तावन को लिखा गया था। पत्र बताता है कि उनकी हर्षाभिव्यक्ति जो पंडित जी से मिलकर हुई है, यह उन्हें उथले स्तर तक न रोक दे। वे यह भी जानें कि उनके अंदर भी वही तत्त्व छिपा पड़ा है। मात्र उसे ऊँचाइयों तक पहुँचाने के प्रयास की जरूरत है। बाद में श्री सिंह ने इस क्षेत्र में काफी प्रगति की एवं जन नेतृत्व के क्षेत्र में एक अग्रणी भूमिका निभाई।

एक पत्र बड़ा स्पष्टवादिता से भरा हुआ, लताड़ लगाता हुआ। अपने प्रिय आत्मीयों को वाँछित प्रगति न करते देख पूज्य गुरुदेव दुःखी होते थे, तो अपना मानकर लिख बैठते थे, 19/4/65 को श्री पहाड़िया जी को लिखे एक पत्र में वे कहते हैं-

“कभी आप हमारे अत्यंत निकटवर्ती आत्मीयजनों में से थे। हम बड़ी-बड़ी आशाएँ आप से बाँधे रहते थे और सोचते थे पहाड़िया जी किसी दिन देश के नररत्नों में से एक होंगे और इतिहास के पृष्ठों पर उज्ज्वल नक्षत्र की तरह चमकेंगे। पर आप धीरे-धीरे काफी शिथिल होते चले गए हैं। बेशक आपने नगरपालिका आदि का बहुत काम किया है, पर जिस अत्यंत अनिवार्य कार्य की आप जैसे प्रतिभाशाली लोगों से अपेक्षा की जाती है, वह तो उपेक्षित ही पड़े हैं।”

गुरुवर की अपेक्षा उनसे कुछ अधिक थी। पहाड़िया जी मात्र नगरपालिका बाँदा के सदस्य बनकर प्रसन्न थे। परमपूज्य गुरुदेव उनसे और बड़ा काम कराना चाह रहे थे। इसलिए यह भाषा उन्होंने प्रयुक्त की। पाठकगण पहाड़िया जी से परिचित हैं। बाद में वे शाँतिकुँज आ गए, 1971 से 1993 तक यहीं महाप्रयाण होने तक गुरुवर के अनन्य सहयोगी होकर जिए।

एक अंतिम पत्र 20/3/67 का, श्री रणसिंह जी के नाम लिखा, जो गुरुदेव की जन्मभूमि आँवलखेड़ा में सक्रिय थे। सभी जानते हैं कि अपनी माता श्री की स्मृति में ‘माता दानकुँवरि इंटर कॉलेज’ हेतु अपनी सारी पैतृक भूमि पूज्यवर ने दान में दे दी थी। रणसिंह जी उसी कॉलेज के व्यवस्था मंडल में थे। वे लिखते हैं-

“तुम्हारे जैसे प्रतिभाशाली सुशिक्षित युवक से मातृभूमि-जन्मभूमि ऐसी ही आशा करती थी। जिस तत्परता से तुम उधर ध्यान देते, परिश्रम करते और प्रयत्नशील रहते हो, उतना ही यदि गाँव के अन्य सुयोग्य व्यक्ति भी करते, तो आँवलखेड़ा की स्थिति न जाने कितनी अच्छी ऊँची रही होती। तुम्हारी तत्परता पर हमें बड़ा संतोष है और विश्वास है कि जो पौधा किसी प्रकार लग गया है, उसे तुम लोग सींचते-बढ़ाते रहोगे।”

पत्र की भाषा देखें एवं जानें कि किस मित्रभाव से ठाकुर साहब को प्रोत्साहित किया गया है। जीवन-संग्राम में जो चाहिए वे सारे गुण हमें पूज्यवर के पत्रों रूपी संजीवनी भरी लेखनी के माध्यम से मिलते हैं। इन्हें समझ लें तो प्रगति के उच्चतर आयाम खुलते चले जाएँगे।


जो सामने है (Kahani)

आपातकालीन अध्यात्म

साथियो! मैं यह कह रहा था आपसे कि यह आपत्तिकाल है, जिसमें से आप गुजर रहे हैं। इसे अगर आप हमारी आँखों से देख पाएँ, तो आप देख सकते हैं कि कैसे तूफान आ रहे हैं, कैसी आँधियाँ आ रही हैं? आपको अपनी आँखों से दिखाई नहीं पड़ सकता, क्योंकि आप सामने की चीजें देखते हैं। आपको केवल वही चीज दिखाई पड़ती है, जो सामने है।


हीरक जयंती विशेष - नारी जागरण वर्ष में इस आँदोलन की कथा-गाथा

हीरक जयंती आ पहुँची। युगचेतना के अवतरण को 75 वर्ष पूरे हुए। एक छोटा-सा साधारण-सा दीपक अचानक 18 जनवरी 1926 की ब्रह्ममुहूर्त की वेला में एक पंद्रह वर्षीय बालक के लिए अखण्ड दीपक बन गया। उसी दीपक की लौ में से उसके गुरु प्रकट हुए थे एवं उनने उसे बालक श्रीराम को बोध कराया था कि उसका अवतरण किसलिए हुआ है। सूक्ष्मशरीरधारी परोक्षजगत से पधारी गुरुसत्ता ने उस दिन, उस बोध दिवस के दिन अनायास ही गायत्री परिवार नामक एक संगठन को जन्म दे दिया, जो कि इस वर्ष अपने 75 वर्ष पूरे कर रहा है निरंतर जल रही अखण्ड अग्नि, अखण्ड दीपक की लौ-आभा के साथ।

बड़ा ही विलक्षण तपप्रधान इतिहास है वर्ष 1926 का। इसी वर्ष हमारी गुरुसत्ता ने अपने चौबीस-चौबीस लक्ष्य के चौबीस महापुरश्चरणों की श्रृंखला आरंभ की। इसी वर्ष उनकी जीवनसंगिनी, उनकी अंतरंग शिष्या, जिसे सत्रह वर्ष बाद अपने आराध्य के जीवन में प्रवेश करना था, जन्मीं। हाँ, वंदनीया, शक्तिस्वरूपा, स्नेहसलिला माता भगवती देवी आगरा शहर में, युगऋषि की जन्मस्थली आँवलखेड़ा से लगभग पंद्रह मील दूर लसवंतराय बोहरेजी के घर जन्मीं। जैसा बालक श्रीराम का जन्मकाल था, वैसा ही परमवंदनीया माताजी का भी पढ़ने को मिलता है। मात्र भजन-पूजन में रुचि। घर में वैभव के सब साधन, पर मन मात्र प्रभु में। उस मीरा को आखिर उसके कृष्ण नरतन में जो मिलने वाले थे।

1943 में परमपूज्य गुरुदेव के आगरा से मथुरा आकर घीयामंडी (वर्तमान अखण्ड ज्योति संस्थान कार्यालय) के भवन में आने के बाद उनने वही किया, जो उनके आराध्य ने कहा। हर श्वास में उनके पूज्यवर ही बसे थे। दोनों में आयु का बड़ा अंतर था, परंतु परमवंदनीया माताजी तो जैसे उनके साथ ढलने के लिए ही आई थीं। उनने अपनी आँखों से देखा कि आचार्य श्री ने नारी जागृति को अपने आँदोलन का मुख्य अंग माना है एवं स्वयं से शुरुआत करने के क्रम में, उनने सबसे पहले अपनी माँ को अक्षरज्ञान कराके सभी ग्रंथ पढ़ना सिखा दिए हैं। धीरे-धीरे वंदनीया माताजी भी पूज्य गुरुदेव के सुलेख-अभ्यासक्रम में शामिल हो गईं एवं फिर सास-बहू में मानो प्रतिस्पर्द्धा होने लगी किसकी लिखावट ज्यादा अच्छी है। उन दिनों महात्मा गाँधी ने प्रौढ़ शिक्षा का नारा दिया था। काँग्रेस के आँदोलन का यह एक अंग भी था। रात्रि में अखण्ड ज्योति संस्थान में पुरुष वयोवृद्ध पढ़ने आते, जीवन जीने की कला सीखकर जाते। दिन में माताजी पूज्यवर के साथ बैठतीं, कभी-कभी पूज्यवर की माता श्री (ताई जी जिन्हें प्यार से कहते थे) भी शामिल होतीं। कुछ माता-बहनें आतीं, जिनमें एक बूढ़ी मुसलमान दादी माँ भी थी। नाम तो था सलमा, पर नाम बदलकर लोगों ने सल्लो कर दिया। फिर उसकी बेटी सकीला भी उन क्लासों में शामिल हो गई।

प्रौढ़ शिक्षा की, नारी जागृति की यह प्रक्रिया 222 बढ़ी, परमवंदनीया माताजी के गुरुदेव की जीवनचर्या के एक अंग बनने के रूप में। नित्य न जाने कितने अतिथि आते, उनका सत्कार भी करना होता था। सभी भोजन प्रसाद पाकर ही जाते थे। वह कार्य भी परमवंदनीया माताजी को ही सँभालना था। साथ में दिन में प्रौढ़ शिक्षा की क्लास एवं दो-तीन घंटे गुरुसत्ता के साथ बैठकर पत्राचार का शिक्षण। पत्रों को वे पढ़ती जातीं, गुरुदेव जवाब लिखते चले जाते। जितनी देर में वे पत्र पढ़कर लिफाफे में रखना उतनी देर में जवाब लिखकर उनके पास लिफाफे में रख बंद करने के लिए आ जाता। यह अलौकिक चमत्कार वे रोज देखतीं। कभी-कभी प्रेस को सँभालने हेतु भी उन्हें नीचे जाना पड़ता, बाद में वे उसका क ख ग अच्छी तरह सीख गईं एवं गुरुदेव को अनुपस्थिति में भी अखण्ड ज्योति की छपाई का काम देखने लगीं।

एक महिला मंडल, संभवतः गुरुसत्ता द्वारा प्रथम महिला मंडल 1947 में माताजी की सहायता के लिए बनाया गया। कौशल्या, रतन, नारायणी एवं प्रेमवती ये प्रमुख महिलाएँ थीं, जो वंदनीया माताजी की साथिन बनीं। इन सबकी साहित्यिक रुचि बढ़ाने का प्रशिक्षण क्रमशः पूज्यवर ने वंदनीया माताजी को दिया। इन सभी का साँस्कृतिक उत्कर्ष हो, अपने पैरों पर खड़ी हो इस कार्य को बढ़ा सके, इसलिए उनने छोटी-सी शुरुआत की थी। उन्हीं दिनों आचार्य श्री की पुस्तक प्रकाशित हुई, ‘स्त्रियों का गायत्री अधिकार’ इस पुस्तक के तर्कों ने सबको हिला दिया। देखते-देखते अगणित महिलाएँ इस महान् यज्ञ में शामिल होती चली गईं। 1958 के सहस्रकुँडी महायज्ञ के बाद परमपूज्य गुरुदेव ने ‘अखण्ड ज्योति’ संपादन का भार परमवंदनीया माताजी को सौंप दिया। कहा कि अब हम हिमालय जाएँगे, आर्ष साहित्य का पुनर्लेखन-भाष्य करने हेतु तप भी करना है, एकाँत भी जरूरी है। छह माह उत्तरकाशी रहेंगे, छह माह नंदनवन-तपोवन में गोमुख के ऊपर अपने गुरुदेव के साथ। एक वर्ष लगा परमवंदनीया माताजी को सारा कार्यभार सँभालने में। अक्टूबर 1959 की अखण्ड ज्योति के पृष्ठ 4 पर एक लेख था, ‘अखण्ड ज्योति के उत्तरदायित्वों में परिवर्तन’ लेखिका के स्थान पर माता भगवती देवी पत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य लिखा था। मात्र तैंतीस वर्ष की आयु एवं यह महती जिम्मेदारी दो वर्ष के लिए पूज्यवर उन पर डालकर चले गए। 1961 की जनवरी तक उनने इस कार्य को बखूबी निभाया।

संगठन बढ़ता चला गया, लगाया गया पौधा विकसित हो वटवृक्ष बनता चला गया। नारी जागृति आँदोलन का आधार अब खड़ा हो रहा था। 1962 में गुरुदेव के हिमालय अज्ञातवास से लौटते ही युगनिर्माण योजना व उनके शत-सूत्री कार्यक्रम की घोषणा हो गई। यह भी बता दिया गया कि वे मात्र 9 वर्ष के लिए वापस आए हैं। पुनः 1971 में वे परमवंदनीया माताजी को हरिद्वार के शाँतिकुँज में छोड़कर हिमालय चले जाएँगे। यही हुआ। परमवंदनीया माताजी 20 जून 1971 को शाँतिकुँज आ गईं। भूल गईं आगरा-मथुरा, वहाँ से जुड़ी ममता। अब उनसे जुड़ गईं कुमारी कन्याएँ, जिनके साथ उन्हें अखण्ड दीपक की रक्षा करनी थी। साथ ही सीमित अवधि में वही तप संपन्न करना था, जो गुरुसत्ता ने पंद्रह वर्ष की आयु में आरंभ कर चौबीस वर्ष में पूरा किया था। अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा से शाँतिकुँज हरिद्वार आए अखण्ड दीपक की साक्षी में पहले दस, फिर सोलह, फिर चौबीस कन्याओं का अखण्ड जप चला। उनका प्रशिक्षण भी माताजी ने सँभाला। यहीं से गायत्री परिवार के महिला जागृति आँदोलन ने जड़ें मजबूत कीं।

देवकन्याओं का शिक्षण एवं उन्हें भाषण, संगीत, स्काउटिंग, स्वावलंबन का अभ्यास परमपूज्य गुरुदेव (जो 1972 में लौट आए थे) के परोक्ष मार्गदर्शन, संरक्षण एवं प्रत्यक्षतः शक्तिस्वरूप माताजी के सान्निध्य में होने लगा। इनके दल सारे भारत में गए एवं एक शिक्षण देकर आए कि नारी चाहे तो पुरुष के द्वारा किए जा रहे सारे कार्य कर सकती है। नारी अबला नहीं, सबला है। धर्मतंत्र उसी की वजह से टिका हुआ है। यदि उसे परिष्कृत कर राष्ट्र का मार्गदर्शन करना है, तो नारी ही आगे आकर यह कार्य करेगी।

1975-76 से अब तक की पच्चीस वर्ष की अवधि में महिला जागृति आँदोलन सारे देश व विश्व में फैला है। अब हर कार्य में आगे बढ़कर बहनें कमान सँभालती हैं। शक्तिपीठों के निर्माण की बात आई, तो बढ़-चढ़कर पुरुषार्थ महिला शक्ति ने ही दिखाया। अधिकाँश शक्तिपीठों के मूल में नारी शक्ति का त्याग बूँद-बूँद कर किया गया संकुल नहीं है। एक उदाहरण अभी-अभी का नहीं भूलता। गुजरात के सूरत जिले के समुद्री तट पर एक गाँव है मोर। इस गाँव में महिलाएँ ही निवास करती हैं। पुरुष वर्ग जहाज के खलासी व नाविकों के रूप में वर्षभर भारत से बाहर ही रहते हैं। जो लौट आते हैं, वे ऐसे ही पड़े रहते थे, कई व्यसन लेकर आते थे। गायत्री परिवार से जुड़ी महिलाओं ने व्यसन मुक्ति आँदोलन चलाया एवं फिर एक शक्तिपीठ चालीस बहनों ने अपने बलबूते विनिर्मित करके दिखा दी। इतनी शानदार पीठ है कि माँ की प्रतिमा का सौंदर्य एवं उस भवन का स्वरूप देखते ही बनता है, जिसके पिछवाड़े समुद्र की लहरें स्पर्श करती हैं। लगभग चालीस लाख रुपये बहनों ने ही अपने स्तर पर एकत्र कर यह भव्य निर्माण अपने हाथों से किया है।

यह वर्ष महिला शक्ति जागरण वर्ष है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सारा विश्व 2001 को इसी रूप में मना रहा है। सारे विश्व में नारी शक्ति उभरकर आगे आ रही है। इस वर्ष को विशेषतः गायत्री परिवार ने नारी जागरण का अलख जन-जन तक पहुँचाने के लिए मनाने हेतु संकल्प लिया है। इस वर्ष प्रशिक्षण की श्रृंखला केंद्र व क्षेत्र में भी चलेगी। संवेदना की मूर्ति नारी को उसकी वर्षों की घुटन से मुक्ति मिले, वह स्वावलंबी, शिक्षित, सुसंस्कारी हो पुरुष के साथ कंधे-से-कंधे मिलाकर आगे बढ़ सके। धर्मतंत्र के माध्यम से साँस्कृतिक नवोन्मेष की प्रक्रिया को मूर्त रूप दे सके, इसीलिए इस वर्ष को विशेष रूप से परमवंदनीया माताजी के जन्म के साथ युगचेतना के अवतरण, अखण्ड दीपक के प्रज्वलन की हीरक जयंती के रूप में उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। दहेज की समस्या से, जलती बहू-बेटियों के हाहाकार से, परोक्ष जगत् के विक्षुब्ध होने की प्रक्रिया से, अपव्यय-फैशनपरस्ती, अश्लील प्रदर्शन से घिरी विडंबना से नारी ही मुक्ति दिला सकेगी। आइए हम सभी इस आँदोलन रूपी महायज्ञ में एक समिधा बन स्वयं को समर्पित करने का संकल्प लें।


सात आँदोलन-व्यावहारिक कार्यक्रम

बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण के शक्तिप्रवाह ने जीवन-साधना तथा महापूर्णाहुति के पाँच चरणों ने जिन व्यक्तित्वों को, देवमानवों को जन्म दिया है, उन्हें सप्त आँदोलनों में नियोजित होने के लिए तुरंत प्रेरित किया जा रहा है। व्यावहारिक प्रशिक्षण उनका क्षेत्रीय स्तर पर भी चलेगा व केंद्र में भी, किंतु न्यूनतम तो किन्हीं सूत्रों से शुरुआत हो ही सकती है। ऐसे सूत्र यहाँ दिए जा रहे हैं।

(1) साधना आँदोलन

साधना संकल्पों के साथ जीवन-साधना का रूप ले। श्री अरविंद के अनुसार “सारा जीवन ही योग है।” हर श्वास को साधनामय बनाएँ।

अपनी उपासना नियमित बनाएँ। प्रातः आत्मबोध, रात्रि में तत्त्वबोध की साधना करें। षट्कर्म एवं ज पके साथ ध्यान का क्रम नियमित रखें। ध्यान के लिए परमपूज्य गुरुदेव की पुस्तक ‘उपासना के दो चरण जप और ध्यान’ देखी जा सकती है।

व्यक्तिगत स्तर पर यह अनुभूति जगाएँ कि दिव्य चेतना के प्राणप्रवाह के साथ कितना जुड़ पाए। आदर्शों को जीवन में उतारने का अभ्यास कितना संपन्न हुआ।

परिवार संस्था के स्तर पर एवं सामूहिक स्तर पर सुगम प्रार्थना, व्यवस्थित उपासना व जीवन-साधना का अभ्यास प्रखर बनाएँ। समाज के हर वर्ग, संप्रदाय को लोगों को उनकी श्रद्धा के अनुरूप उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना हेतु प्रेरित करें। स्थान-स्थान पर सामूहिक साधना सत्रों का समय-समय पर आयोजन करें।

‘सबके लिए सुगम उपासना-साधना’ पुस्तिका को इस आँदोलन के लिए माध्यम बनाएँ।

(2) शिक्षा आँदोलन

निरक्षरता उन्मूलन के लिए संकल्पित हों। अपने स्तर पर क्या प्रयास हो सकता है, सोचें व लागू करें।

शिक्षा जीवन विद्या के साथ जुड़े। जीवन जीने की कला के सूत्र शिक्षा के साथ गूँथकर पहुँचाए जाएँ। ‘शिक्षा ही नहीं, विद्या भी’ पुस्तिका को आधार बनाएँ।

बालसंस्कारशालाएँ चलें, विद्यालयों में विचार क्राँति का आलोक पहुँचे। नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम के साथ जुड़े।

संस्कृति मंडल बनाएँ। भारतीय संस्कृति ज्ञानपरीक्षा में भागीदारी कराएँ।

कामकाजी विद्यालय की योजना को लागू करें।

(3) स्वास्थ्य आँदोलन

आहार-विहार, चिंतन, जीवन शैली को संतुलित बनाएँ।

योग-व्यायाम-प्राणायाम आदि दिनचर्या का अंग बने।

स्वच्छता संवर्द्धन के प्रयोगों को बढ़ाएँ।

लाठी व्यायाम, सामूहिक श्रमदान की प्रवृत्ति को बढ़ावा दें।

वनौषधि उपचार को आधुनिक औषधियों की तुलना में वरीयता दें। उन्हें स्वयं भी अपनाएँ, उनके प्रचार-प्रसार हेतु स्मृति उपवनों (जड़ी-बूटी उद्यानों) को बढ़ावा दें तथा वैकल्पिक चिकित्सा तंत्र को खड़ा करें।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों को, चिकित्सकों को जनस्वास्थ्य शिक्षा हेतु प्रेरित करें, एक आँदोलन का रूप दें तथा संपन्नों द्वारा ऐसी सुविधाएँ विनिर्मित हों, इसके लिए प्रेरित करें।

(4) स्वावलंबन आँदोलन

अपना काम स्वयं करने की आदत डालें।

श्रम का सम्मान करें, रचनात्मक श्रम का महत्त्व जन-जन को बताएँ।

स्वयं सहायता बचत समूहों का निर्माण करें एवं इनके आधार पर स्वदेशी आँदोलन को गति दें।

गौ केंद्रित अर्थव्यवस्था को गति देने हेतु ऐसे केंद्र खड़े करें। कुटीर उद्योग गोपालन पर केंद्रित हो स्थान-स्थान पर चल पड़ें।

सभी के कौशल-श्रम का आर्थिक लाभ उन्हें मिले, इसके लिए सहकारी आँदोलन के स्तर पर इन प्रोजेक्ट्स को चलाएँ।

(5) पर्यावरण आँदोलन

प्रकृति का यज्ञीय चक्र व्यवस्थित बने, इसके लिए जन-जागरूकता बढ़ाएँ।

क्षणिक-अनगढ़ सुख के लिए, व्यसनों के लिए प्रकृति का शोषण कर बने फैशन उत्पादों के विरुद्ध आँदोलन चलाएँ।

कचरे का सही डिस्पोजल हो, इसकी व्यवस्था बनाएँ।

हरीतिमा संवर्द्धन हेतु लोगों को प्रेरित करें। न्यूनतम से आरंभ करें, पर देखें कि लगाए वृक्ष पनप रहे हैं कि नहीं।

प्लास्टिक कल्वर से संघर्ष करें। अपनी आदतें पहले ठीक करें।

सूक्ष्म पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रकृति को जड़ नहीं चेतन, अपनी माँ समान मानकर डीप इकोलॉजी के महत्त्व को स्वीकार करें।

(6) व्यसन मुक्ति/कुरीति उन्मूलन आँदोलन

व्यसन से बचाएँ, सृजन में लगाएँ, कुरीतियों में लगने वाला श्रम, समय, साधन श्रेष्ठ कार्यों में लगाएँ। जनशिक्षा हेतु आँदोलन छेड़ें।

व्यसन मुक्ति हेतु संकल्पशक्ति जगाएँ। देव दक्षिणा आँदोलन को गति दें।

विद्यालयों, विभिन्न संगठनों, संप्रदायों द्वारा इस आँदोलन को गति दिलाएँ।

व्यसन-कुरीति छोड़ने वालों को सम्मानित करें, उनके विषय में सबको बताएँ।

(7) नारी जागरण आँदोलन

नारी स्वयं में सक्षम-समर्थ बन अन्य नारियों को साथ ल चल सके, इस योग्य उसे खड़ा करें।

नारी का आत्मविश्वास जगाएँ, सुरक्षा बोध, स्वावलंबन, सुसंस्कारिता का ज्ञान कराएँ।

नारी को लोहे-सोने की जंजीरों से मुक्त कराएँ।

बेटा-बेटी, बेटी-बहू के भेद मिटें। नारी के प्रति नारी की संवेदना जागे।

क्षेत्रीय नारी संगठन खड़े हों। प्रशिक्षण क्रम भी चले। उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने हेतु स्वावलंबन तंत्र बने।


भयावह संकट की वेला में हम सबका दायित्व

अभी फरवरी अंक हेतु लिखे लेख ‘राष्ट्रव्यापी दुर्भिक्ष और हम’ की स्याही भी नहीं सूखी थी कि एक अति भयावह त्रासदी ने सारे भारत को गणतंत्र दिवस के दिन अपना ग्रास बना लिया। धरती के कंपन ने महाकाल की वह रौद्र लीला दिखाई है, जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। पूरे भारत, नेपाल, पाकिस्तान, ईरान तक अपना प्रभाव दिखाने वाले प्रायः 7.9 रिएक्टर स्केल पर आए इस भूकंप का केंद्र भुज-कच्छ (गुजरात) से 20 किलोमीटर उत्तर पूर्व में था। 26 जनवरी गणतंत्र दिवस को प्रातः 8.46 पर आए इस दैवी प्रकोप ने गुजरात में जो तबाही का ताँडव मचाया है, उसे देख लगता है कि सूखे से पहले से जूझ रही गुजरात की जनता अब उस त्रासदी को कैसे झेलेगी। इससे उबरने में वर्षों लगेंगे।

समृद्धि के केंद्र, औद्योगिक क्राँति की धुरी अहमदाबाद सहित सारे गुजरात ने यह कोप झेला है। भुज तो प्रायः पूरा नगर ही ध्वस्त हो गया है। ऐसा लगता है कि 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यहाँ आए भूकंप से मृत्यु देवता अघाए नहीं थे कि पुनः अपने काल के गराल में उनने हजारों को ले लिया। कच्छ के लोग अपनी जुझारू वृत्ति के लिए जाने जाते हैं। सारे भारत व विश्व में वे छाए हुए हैं एवं बड़े स्तर पर व्यापार उनके हाथ में है। किंतु अभी इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तो लगता है कि भूकंप का केंद्र होने के कारण सर्वाधिक जन-धन हानि कच्छ क्षेत्र को ही उठानी पड़ी है।

बापू की जन्मभूमि, सरदार पटेल की कर्मभूमि एवं बापा जलाराम की, अनेकों संतों की तपोभूमि गुजरात कुछ ही क्षणों में भूकंप की मार से इतना क्षतिग्रस्त हुआ है कि अभी यह अंदाज लगाने में ही बड़ा समय लगेगा कि नुकसान कितना हुआ है। भव्य गगनचुँबी भवन कुछ ही क्षणों में जमीन पर आकर बिस्मार हो गए। उनके मलबों में दबे-पिसे व्यक्ति जब तक निकल पाएँगे, मालूम नहीं कि वे जीवित हैं कि नहीं। यह पंक्तियाँ लिखे जाने तक मात्र गुजरात में ही जनहानि 20,000 की संख्या को पार कर रही थी। निश्चित ही यह संख्या बढ़ेगी। उनकी संख्या सर्वाधिक होगी, जिनके घर में एक या दो सदस्य रह गए, वे किसी तरह बच गए अथवा घायल होकर जो अब और भी विपन्न स्थिति में आ गए हैं। छत तो गई ही, सामान का भी नुकसान हुआ, अब औरों के आश्रय पर टिके हैं।

यह एक राष्ट्रीय त्रासदी है। पिछले पचास वर्षों में आए भूकंपों में यह सबसे अधिक मारक क्षमता वाला है। ऐसे में किसी को भी हाथ-पर-हाथ रखकर नहीं बैठना है। देश-विदेश से लगातार सहायता दौड़ी चली आ रही है, पर मूल आवश्यकता अभी उन स्वयंसेवकों की है, जो लोगों को सामयिक कष्ट से राहत दिला सकें। गिरे हुए-खंडहर हुए भवन तो फिर बन जाएँगे, पर ध्वस्त परिवार-आहत भावनाओं को पुनर्निर्मित करना सबसे कठिन कार्य है।

गायत्री परिवार सभी संकटों में एकजुट हो प्रयास करता रहा है। पहले भी लाटूर, उत्तरकाशी, चमोली में आए भूकंप तथा काँडला, एरेज्मा (उड़ीसा) की तूफानी विभीषिकाओं में इसके स्वयंसेवकों ने आगे बढ़-चढ़कर साहस दिखाया है एवं हर दृष्टि से सरकारी प्रयासों में सहयोगी की भूमिका निभाई है। अब इस संकट की घड़ी में भी सभी परिजनों से इस विषम परिस्थिति में एकजुट हो जूझने का आह्वान किया जा रहा है।

भूकंप आने के चौबीस घंटे के अंदर चार वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं की अगुआई में सहायता दल-चिकित्सकों, कंबलों, दवाओं, राशन आदि के साथ गुजरात रवाना कर दिए गए हैं। सारे परिजनों से कहा गया है कि वे राहत कार्य हेतु कैंप लगाएँ एवं केंद्रीय पर्यवेक्षक दलों का सहयोग करें। शासकीय सहायता अपने स्तर पर चलेगी। हमारे परिजन जो कि प्राणवान् हैं, गायत्री के तत्त्वदर्शन से जुड़े हैं, न्यूनतम दस लाख की संख्या में गुजरात में हैं एवं हमारे अपने प्रज्ञासंस्थान, शक्तिपीठ भी तीन सौ से अधिक हैं। सबसे बड़ी जरूरत जो अब पड़ेगी, वह है लाँगटर्म चिकित्सीय सहायता, आच्छादन-शेल्टर, मनोवैज्ञानिक परामर्श (काउंसिलिंग) तथा पुनर्वास की। यही वह समय है, जब सभी संवेदनशील परिजन चाहे वे गुजरात के हों, मध्यप्रदेश या महाराष्ट्र, राजस्थान के अथवा देश के किसी भी हिस्से के, बढ़-चढ़कर इस राहत कार्य में साथ दें, भागीदारी करें। पूरा यह माह परीक्षा से भरा हुआ है। दुःखी-पीड़ितों तक सहायता-सामग्री पहुँची कि नहीं, यह देखने का कार्य भी एक प्रामाणिक तंत्र के नाते गायत्री परिवार के स्वयंसेवकों को ही सँभालना है। अभी सभी परिजनों से राहत कार्यों में लगने एवं खुलकर तन-मन-धन से सहायता करने को कहा जा रहा है। जो चिरनिद्रा में सो गए, उनकी आत्मा को शाँति मिले एवं जो घायल हैं, परिजनों के विछोह से दुःखी हैं, दग्ध हैं, उन्हें संबल मिले, शक्ति मिले, यही वेदमाता से प्रार्थना है।


अपनों से अपनी बात- - युगचेतना अभ्युदय-अवतरण की हीरक जयंती के प्रत्यक्ष कार्यक्रम

अब संगठन-प्रशिक्षण का आधार इस तरह बनेगा

युगवंसत (29/1/2001) से युगचेतना के अवतरण की हीरक जयंती वर्ष का शुभारंभ हो गया। यह आगामी वसंत (17/2/2002) पंचमी तक चलेगा। यह वर्ष विशेष शक्ति-सौभाग्य के अनुदान लेकर आया है। पर यह मिलेंगे उन्हें ही, जो युगदेवता की कसौटी पर खरे सिद्ध हों। व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों ही स्तरों पर अब ऐसे संघबद्ध प्रयास किए जाने चाहिए कि हमारी रचनात्मक छवि सभी के समक्ष उभरकर आ सके। इन प्रयासों का आधार एक ही होगा। सशक्त-समर्थ-सुव्यवस्थित संगठन। इस एक वर्ष में संगठन का ढाँचा इतना मजबूत हो जाना चाहिए कि जन-जन को अशासकीय स्तर पर कार्य कर रहा यह विराट् आध्यात्मिक-पारमार्थिक संगठन गायत्री परिवार अलग से खड़ा दिखाई दे, जो राष्ट्र को समर्थ-सशक्त बनाने हेतु सदैव तैयार है।

संगठन का सशक्त आधार

जाग्रत् आत्माओं की जीवन-साधना एवं उस आधार पर विनिर्मित संगठन की धुरी पर ही अगले दिनों हमारे सारे क्रिया−कलाप चलेंगे। जैसा कि सभी जानते हैं, परमपूज्य गुरुदेव जीवनभर कहते रहे, लिखते रहे कि यह गायत्री परिवार ईश्वरीय योजना को प्रत्यक्ष जगत् में लागू करने के लिए दैवी संकल्प के साथ बनाया गया संगठन है। विभिन्न शाखाओं-मंडलों में बँटे परिवार को सक्रिय-संगठित समूह (स-3) बनाने तथा उनके संचालन हेतु समर्थ समयदानी-सहयोगी समूह (स-4) गठित करने की बात विगत डेढ़ वर्ष से सतत समझाई जाती रही है। इसमें स-4 वाला वर्ग वह है, जो प्राणवान् है, पुरोहित-प्रशिक्षक स्तर का है। इन समयदानियों के माध्यम से जन-जन को युग-साधना से जोड़ने के लिए योजनाबद्ध प्रयास करने की बात सतत कही जाती रही है। विगत सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ में सबने इसे गंभीरतापूर्वक समझा भी व अपनाने हेतु स्वयं को तत्पर भी किया है।

सात आँदोलन-सात विधाएँ

अब इस वर्ष के लिए घोषित सात आँदोलनों को गति देने की बात आती है। उन सभी को अब संगठित करना होगा, जो इस दिशा में रुचि और उत्साह रखते हैं, उस विधा से जुड़े हैं अथवा गायत्री परिवार के सात आँदोलनों में से किसी एक या अधिक प्रकल्पों से जुड़कर अपनी विभूति-प्रतिभा का योगदान समाज को देना चाहते हैं। सभी जानते हैं कि साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण, नारी-जागरण, व्यसन-मुक्ति एवं कुरीति-उन्मूलन आँदोलन इन सात खंडों में रचनात्मक क्रिया–कलापों को बाँटा गया है। यही हमारे शीघ्र आरंभ होने जा रहे देव-संस्कृति विश्वविद्यालय की विधाएँ भी हैं। विभूतियों के सुनियोजन की बात इन विधाओं के संदर्भ में ही विगत एक वर्ष से सतत की जा रही है। अब क्षेत्रीय स्तर पर इन सातों आँदोलनों से जुड़े परिजनों को संगठित करने की बात आती है, तभी वह प्रक्रिया वहाँ सुव्यवस्था से संचालित की जा सकेगी एवं सफलता उनके कदम चूमेगी।

आँदोलन समूह या ‘आस’

एक प्रक्रिया अपने परिजनों को तुरंत करनी होगी ‘आँदोलन समूहों’ का गठन। ये आँदोलन को गति देने के लिए हर क्षेत्र में आँदोलन विशेष के प्रति रुचि रखने वालों के समूह होंगे। वे गायत्री परिवार से जुड़े नैष्ठिक परिजन भी हो सकते हैं एवं किसी अन्य संगठन से जुड़े हुए हमारे प्रति शुभेच्छा लिए हुए उस आँदोलन के प्रति निष्ठावान् व्यक्ति भी। दोनों का समन्वित स्वरूप उस समूह का निर्माण करेगा। इनको दो स्तरों पर गठित किया जा सकेगा, पहला स्थानीय, दूसरा क्षेत्रीय। स्थानीय ‘आस’ (आँदोलन समूह का संक्षिप्त) वे होंगे, जहाँ स्वाभाविक रूप से जो आँदोलन गति पकड़ ले, उससे संबद्ध जिम्मेदार लोगों का वह समूह कार्य करने लगे। इनमें आँदोलन के लिए समय दे सकने वाले उत्साही, अनुशासित कार्यकर्त्ता होने चाहिए। ऐसे व्यक्ति भी हों, जो आँदोलन की तकनीकी जानकारी रखते हों, विशेष स्तर के हों तथा प्लानिंग क्रियान्वयन की विधा में सक्षम हों। इसमें उन्हें भी शामिल किया जा सकता है, जो समय तो नहीं दे सकते, न ही उनके पास तकनीकी क्षमता है, किंतु अपने साधन व प्रभाव से आँदोलन को गति दे सकते हैं। समाज में उनकी अच्छी स्थिति भी है एवं जनसेवा के इन कार्यों में वे आगे बढ़-चढ़कर योगदान देते रहते हैं। उनका पत्र, फोन या उपस्थिति भी कभी-कभी आँदोलन को गति देने में एक महती भूमिका निभाती है। ऐसे समर्थों को भी ‘आस’ का एक अंग माना जाना चाहिए।

अभी आँदोलन समूहों को एक सामयिक संगठित इकाई भर मानकर बनाए जाने को कहा जा रहा है। समय-समय पर जैसे-जैसे नए कार्यकर्त्ता जुड़ेंगे, इसका स्वरूप बदलता रहेगा। ये छोटी इकाइयाँ आधार बनेंगी क्षेत्रीय स्तर पर गति पकड़ने वाले आँदोलन समूहों की।

क्षेत्रीय मंडल या ‘क्षेम’

किसी क्षेत्र में, गाँवों का समुच्चय, ब्लॉक, नगर या जिले में जब अनेक स्थानों पर कोई एक ही आँदोलन गतिशील होने लगेगा, तो उन्हें व्यापक जनसंपर्क की, एक-दूसरे के अनुभवों से लाभ उठाने की आवश्यकता महसूस होने लगेगी। स्थान-स्थान पर जो ‘आस’ गठित होंगे, उनके सक्षम प्रतिनिधि समयानुसार क्षेत्रीय स्तर पर मिल-बैठकर आँदोलन के क्षेत्र को अधिक व्यापक बनाने व स्वरूप को अधिक प्रभावी करने हेतु परामर्श कर सकते हैं। एक विशेष आँदोलन के जहाँ क्षेत्रीय स्तर पर ‘आस’ के प्रतिनिधि मिल-जुलकर कार्य योजना बनाने लगें, तो उन्हें उस आँदोलन का क्षेत्रीय मंडल (क्षेम) कहा जाएगा।

भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है, योगक्षेमं वहाम्यहम्। श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए आवश्यक साधनों को जुटाना, उनका संकलन करना जहाँ योग है, वहाँ प्राप्त निधि का समुचित संरक्षण-सुनियोजन क्षेम कहा जाता है। परमपूज्य गुरुदेव ने योग का प्रवाह अनुकूल वातावरण पैदा करके बना दिया है। ऋषि तंत्र उज्ज्वल भविष्य लाने हेतु सही सशक्त प्रवाह बनाने का योग बिठा रहा है। अब इस सुयोग को जिम्मेदारीपूर्वक सुनियोजित कर देना क्षेम का कार्य है।

शक्तिपीठ-प्रज्ञा संस्थान समर्थ बनें

परमपूज्य गुरुदेव ने 1979 में जब शक्तिपीठों की योजना प्रस्तुत की थी, तो उनकी परिकल्पना थी कि वे आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित 4 मठों की तरह चौबीस केंद्रों का निर्माण करेंगे, जो साँस्कृतिक नवजागरण का कार्य करेंगे। पूज्यवर कहते थे कि देश में मंदिरों की कमी नहीं है। हम तो जन-जागृति के केंद्र बनाना चाहते हैं, जहाँ से सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन को दिशा देने वाले रचनात्मक कार्यक्रम चलें। ये आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार भी करेंगे एवं वेदमाता गायत्री को घर-घर पहुँचाएँगे।

समझा जाना चाहिए कि पूज्यवर का आशय कभी भी यह नहीं था कि गायत्री मंदिर ऐसे केंद्र बनें, जहाँ मात्र घंटी बजती हो, पूजा-अर्चा होती हो। वे सारे राष्ट्र के वातावरण को गायत्रीमय बनाना चाहते थे, आध्यात्मिक क्राँति लाना चाहते थे एवं उसी के लिए ऊर्जा संचार केंद्रों की स्थापना कर रहे थे। बाद में चौबीस से संख्या बढ़ाकर दो सौ चालीस तक जा पहुँची। आज छोटे-बड़े सभी देवालय-पीठ मिलाकर कुल संख्या प्रायः ढाई हजार तक जा पहुँची है। संख्या भले ही बढ़ गई हो, पर मूल उद्देश्य वह न रहा, जो कभी गुरुसत्ता ने सोचा था। सभी ऐसे हैं, यह बात तो नहीं, पर अधिकाँश ऐसे हैं, जो गायत्री माता की प्रतिमा वाले मंदिर बनाकर औपचारिकता पूरी करके संतुष्ट हैं अथवा जहाँ व्यावसायिक गतिविधियाँ चल रही हैं। अब इस हीरक जयंती वर्ष में सारे भारतव्यापी संगठन के साथ केंद्र ने संकल्प लिया है कि सारे शक्तिपीठों, प्रज्ञासंस्थानों का ढाँचा सुव्यवस्थित बनाया जाए। उन्हें सही अर्थों में ऊर्जाकेंद्र बनाया जाए। इसके लिए पीठों का, प्रज्ञा संस्थानों का नए सिरे से नामकरण करके वर्गीकरण करना जरूरी है।

पीठों का वर्गीकरण अब इस प्रकार से होगा

गायत्री मंदिर वे कहे जाएँगे जहाँ एक कोठरी में गायत्री माँ की प्रतिमा भर स्थापित कर दी गई है एवं किसी तरह पूजा-आरती की व्यवस्था वहाँ हो गई है। बस इसके अलावा वहाँ कुछ और नहीं हो रहा। गायत्री साधना केंद्र वे कहे जाएँगे, जहाँ मंदिर के साथ गायत्री उपासना सिखाने, संस्कार कराने तथा युगसाहित्य जन-जन को उपलब्ध कराने जैसी गतिविधियाँ नियमित रूप से चलती हैं। नवरात्रियों में कभी-कभी वहाँ साधनाएँ भी संपन्न होती हैं एवं वर्ष में कुछ दिन यज्ञ होता रहता है।

उक्त दोनों तंत्रों में भले ही बोर्ड प्रज्ञापीठ/शक्तिपीठ का लगा हो, लेकिन केंद्रीय संगठन तंत्र के अंतर्गत उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं दी जाएगी। हाँ, यदि वे हीरक जयंती वर्ष के इस संगठन के पुनर्गठन क्रम में अपने आपको अपग्रेड कर लें, अपना स्तर बढ़ा लें, तो उन्हें सर्वे करने गए केंद्रीय पर्यवेक्षकों को दिए प्रमाणों के आधार पर मान्यता मिल जाएगी।

तीसरा स्तर है शक्तिपीठ या प्रज्ञापीठ का। यह मान्यता उन चुने हुए संस्थानों को दी जाएगी, जो विभिन्न कसौटियों पर खरे उतरते हों, जो पूज्यवर ने बनाई हैं। ये इस प्रकार हैं- (अ) संस्थान या पीठ के लिए बनाया गया ट्रस्ट केंद्रीय नियम व्यवस्था के अनुरूप पंजीकृत हो। जमीन, ट्रस्ट, भवन आदि सभी कानूनी स्तर पर निर्विवाद हों।

(ब) ट्रस्टीगणों में पारस्परिक तालमेल हो, वे निर्धारित आचार-संहिता का पालन भी कर रहे हों तथा उस क्षेत्र में युगचेतना के विस्तार के लिए सक्रिय हों।

(स) शक्तिपीठ या प्रज्ञापीठ के साथ निकटस्थ शहर या जिले की संगठित इकाइयाँ स 3, स 4 पर्याप्त संख्या में जुड़ी हों एवं पारस्परिक विश्वास-सहयोग के साथ कार्य करने की स्थिति में हों।

(द) साधना सामूहिक स्तर पर तथा कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण के लिए इनके पास समुचित स्थान व संसाधन हों।

(इ) क्षेत्रीय मंडलों द्वारा चलाए जा रहे आँदोलनों के लिए व स्थान सुलभ करा सकें, कोई एक या अधिक आँदोलन को गति देने हेतु तैयार हों अथवा उनका मार्गदर्शन-सहयोग देने के लिए समर्थ समयदानियों की व्यवस्था सँभाल सकते हों।

शक्तिपीठों पर प्रशिक्षण सत्र

जैसा कि पिछले अंक में भी लिखा था, केंद्र की तरह ही क्षेत्रों में, शक्तिपीठों में जिन्हें उपर्युक्त मानदंडों पर खरा पाया जाएगा, साधना सत्र चलाए जाएँगे। साधना आँदोलन को गति देने के लिए ये सत्र प्रतिमाह चलेंगे, संचालन केंद्रीय तंत्र का होगा। इसके अतिरिक्त एक कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण सत्र भी चलाने हेतु उन्हें कहा जा रहा है। अभी जनवरी माह में वसंत पर्व तक 60 शक्तिपीठों पर एक-एक दिन के सत्र चलाकर एक प्रयोग किया गया, जो बड़ा सफल रहा। प्रथम दृष्टि में जो बड़े समर्थ-महत्त्वपूर्ण पीठ दिखे, वहीं पर ये आयोजन किए गए। अब इनकी संख्या अधिक होगी। इस वर्ष कम-से-कम 200 शक्तिपीठें इस योग्य हो जानी चाहिए कि दो-तीन माह के अंतराल पर एक साधना सत्र एवं एक कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण सत्र चला सकें। ये सत्र पाँच-पाँच दिन के होंगे। क्षेत्रीय स्तर पर विभूतियों के मंथन के क्रम में ढेरों नए व्यक्ति जुड़े हैं। ये सभी शाँतिकुँज तो आ नहीं सकते। दूसरे संख्या इतनी बड़ी है कि इस कार्य में बिना पीठों की भागीदारी हुए एक बड़ी संख्या को साधक बनाना, प्रशिक्षित समयदानी बनाना संभव नहीं है। इसीलिए क्षेत्रीय प्रशिक्षण का ढाँचा बनाया गया है।

किन-किन शक्तिपीठों पर यह सत्र चलें, यह निर्धारण वसंत पर लौटी केंद्रीय प्रतिनिधि टोलियों से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर हो चुका होगा एवं यह अंक आपके हाथ में पहुँचने सातों आँदोलनों को गति देने के लिए भी होगा एवं अपने क्षेत्र में संगठन को व्यवस्थित आधार देने का भी। इनकी भी तारीखें यथासमय निर्धारित हो परिजनों को उपलब्ध होंगी।

इस माह कम-से-कम सभी पीठें नवरात्रि साधना (25-3 से 2-4-01) हेतु सामूहिक आयोजन अवश्य कर लें। इससे भावी साधना सत्रों का आधार बन जाएगा।

केंद्र का प्रशिक्षण तंत्र अब ऐसा होगा

शाँतिकुँज में नौ दिवसीय साधना सत्र सतत चलते रहते हैं। वे तथा एक माह के युगशिल्पी सत्र यथावत् चलेंगे। मात्र ग्रीष्म ऋतु में 15 मई से 30 जून तक 5-5 दिन के तीर्थसेवन सत्र चलेंगे, जो कि हर वर्ष चलते हैं। इस अवधि में नौ दिवसीय सत्र नहीं चलेंगे। इनके अतिरिक्त अब इस वसंत से एक-एक माह के (पूर्व में पंद्रह दिन के) परिव्राजक सत्रों का क्रम भी आरंभ हो गया है। प्रतिमाह रचनात्मक संकाय के दो सत्र नियमित रूप से विगत 3 वर्षों से चल रहे हैं।

इनके अतिरिक्त पाँच दिन के विशेष साधना सत्र (1 से 17 मार्च 2001 तथा आश्विन नवरात्रि 2001 से चैत्र नवरात्रि 2002 तक) चलाए जाने की घोषणा विगत अंक में की गई थी। यह सत्र प्राण-प्रत्यावर्तन स्तर के होंगे। एक कक्ष में एक ही साधक रहेगा। पूर्ण एकाँत एवं मौन साधना के साथ निर्धारित जप, प्राणयोग, ध्यानयोग आदि की साधनाओं में रत रहना होगा। टेपरिकॉर्डर से ध्वनि प्रसारण यंत्र द्वारा प्रत्येक कमरे में गुरुदेव के विचार पहुँचाएँगे। पढ़ने हेतु भी साहित्य निर्धारित विचारों को लिए मिलेगा। मात्र यज्ञ एवं अखण्ड दीप-दर्शन के लिए 24 घंटे में एक बार बाहर निकलेंगे, वह भी पूर्णतः मौन की स्थिति में। 1 से 5 मार्च, 7 से 11 मार्च, 13 से 17 मार्च के तीन सत्र इस अंक के पहुँचने तक चल रहे होंगे। यह अभी एक औपचारिक शुरुआत भर है। बाद में फिर आश्विन नवरात्रि 2001 से यह श्रृंखला शीत, वसंत व उसके बाद चैत्र नवरात्रि 2002 तक चलेगी, जिसमें प्रायः तीस से अधिक सत्र संपन्न होंगे।

आँदोलन प्रधान सत्र दूसरे विशिष्ट सत्र होंगे, जो सप्त आँदोलनों की क्रियापद्धति के प्रशिक्षण हेतु चलेंगे। ये भी पाँच दिवसीय होंगे एवं आगामी अप्रैल माह से आरंभ होकर 15 मई तक तथा फिर जुलाई से अक्टूबर तक चलेंगे। विभिन्न विधाओं के लिए भिन्न-भिन्न सत्र होंगे। इनकी सूचना भी प्रज्ञा अभियान पाक्षिक के फरवरी अंकों से ली जा सकती है।

महिला जागरण सत्र

यह हीरक जयंती परमवंदनीया माताजी की भी है, अखण्ड दीपक की भी, जिसकी साक्षी में करोड़ों का जप संपन्न हो चुका है। परमवंदनीया माताजी ने ही 1972-73 में नारी जागृति आँदोलन की बागडोर अपने हाथ में ली थी, जिसकी परिणति देवकन्याओं की क्षेत्रीय परिब्रजा में हुई। अब इस ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला शक्ति जागरण वर्ष’ में, हीरक जयंती वर्ष में हमारे सात में से एक आँदोलन महिला जागरण को विशेष रूप से हाथ में लिया जा रहा है। उसके लिए केंद्र में शाँतिकुँज की ब्रह्मवादिनी बहनों का सुव्यवस्थित प्रशिक्षण आरंभ हो चुका है। क्षेत्र की अग्रणी भूमिका निभाने वाली बहनों के लिए ग्रीष्म के बाद प्रशिक्षण सत्र केंद्र में चलाए जाएँगे। महिला मंडल मला संगठन इस बीच स्वयं को व्यवस्थित कर लें, ताकि वे सभी आँदोलन अपने बलबूते चला सकें, दीप यज्ञ, संस्कार भी करा सकें। उनके क्षेत्रीय प्रशिक्षण हेतु भी केंद्रीय बहनों की टोलियाँ इस वर्ष निकलेगी, जिनकी घोषणा समयानुसार की जाती रहेगी।

संगठन-सुगठन-प्रशिक्षण ही इस हीरक जयंती वर्ष के मूल मंत्र हैं। हर परिजन से अपेक्षा रहेगी कि वे हर वर्ष की तरह आगे बढ़-चढ़कर युगचेतना के अवतरण की, अभ्युदय की इस हीरक जयंती को उसी उत्साह के साथ मनाएँगे, जैसे कि विगत दो विशिष्ट वर्षों को वे मनाते रहे हैं। इस वर्ष हमारा संगठन इन प्रशिक्षण सत्रों द्वारा कई गुना बड़ा व व्यवस्थित हो जाएगा। यही इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य का आधार बनेगा।


बंदिनी को मुक्त करो


बंदिनी को मुक्त करो (Kavita)

छोटे-से घरौंदे में ही बंद किया नारी को, अनुभव से हीन कर दिया बंदिनी बिचारी को।

क्वारे मन में उसने भी स्वप्न कुछ सँजोए थे, मधुर-मधुर बीज हृदय की धरती पर बोए थे,

कौशल्या-दशरथ जैसे सास-ससुर पाऊँगी, राम संग अपना जीवन धन्य मैं बनाऊँगी,

उसके पैरों में तुमने बेड़ियाँ लगाई हैं, सेविका बनाकर रक्खा है सुता दुलारी को।

आधी शिक्षा भी उसकी हो सकी न पूरी है, हर इच्छा हर अभिलाषा रह गई अधूरी है,

घर की देहरी तक उसके विचरण की सीमा है, केवल घूँघट ही उसके चिंतन की सीमा है,

सारी प्रतिभाएँ उसकी कुँठित कर डाली हैं, मन में अनजाने दे दी दीनता दुःखारी को।

भोर से शयन तक सबकी चाकरी बजाती है, स्नेह बिना जीवन-बाती सिर्फ टिमटिमाती है,

आशा का नहीं न मन में एक पल उलाजा है, मन में आशंका-भय का धुआँ घुटन वाला है,

भोजन-परिधान, दया के बोल कभी मिलते तो, भूले-भटके ही मिलते ज्यों किसी भिखारी को।

किसी ने न पूछा उससे आँख क्यों भिगोई है, जागती रही है सारी रात क्यों न सोई है,

कैसा भी पति हो उसका करना अभिनंदन है, नारी के लिए नियम हैं, सारा अनुशासन है,

हीन-भावना में डूबी, अपने से ऊबी-सी, जीवित शव जैसा जीवन मिला थकी-हारी को।

जिस घर में माँ आदर्शों-अनुभव से खाली है, वहाँ न सुख-चैन कहीं है, वहाँ न खुशहाली है,

अनियंत्रित पशुओं जैसा बच्चों का जीवन है, सबके हित वह घर केवल एक विषैला वन है,

केवल मुँह ढक लेने का मर्यादा नाम नहीं, ढकने से लाभ भला क्या जलती चिनगारी को।

-शचीन्द्र भटनागर

*समाप्त*


विविध रोगों की यज्ञोपचार प्रक्रिया-2

अथर्ववेद के तीसरे काँड के ‘दीर्घायु प्राप्ति’ नामक 11वें सूक्त में ऐसे अनेक प्रयोगों का उल्लेख है, जिनमें यज्ञाग्नि में औषधीय सामग्री का हवन करके कठिन-से-कठिन रोगों का निवारण एवं जीवनी शक्ति का संवर्द्धन किया जा सकता है। इसी सूक्त में उल्लेख है-

यदि क्षितायुर्यदि व परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव। तमा हरामि निऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय॥

अर्थात् यदि व्यक्ति की आयु क्षीण हो गई हो, जीवनी शक्ति समाप्त हो गई हो और वह मरणासन्न हो, तो भी यज्ञ चिकित्सा के माध्यम से वह व्यक्ति रोग के चंगुल से छूट जाता है और सौ वर्ष तक जीवित रहने की शक्ति प्राप्त करता है।

सभी जानते हैं कि हृष्ट-पुष्ट शरीर न केवल रोगों से सुरक्षित रहता है, वरन् जीवन के सारे आनंद निरोग एवं पुष्ट शरीर वाला मनुष्य ही भोगता है। हवन में जो औषधीय एवं पुष्टिकारक पदार्थ डाले जाते हैं, उनके सूक्ष्म परमाणु शरीर में पहुँचकर उसे परिपुष्ट बनाते हैं। पुष्टिकारक एवं रोगनिवारक औषधियों-पदार्थों का खाना भी काया को बल प्रदान करता है, अतः इन्हें अवश्य खाया जाना चाहिए, परंतु उससे भी अधिक उपयोगी इनका हवन कर उससे उत्पन्न यज्ञीय ऊर्जा का लाभ उठाना है। हवन में दो गुण विशेष हैं- प्रथम यह कि खाने में संभव है कि एक साथ अधिक पौष्टिक पदार्थों का सेवन कर लेने पर लाभ के स्थान पर हानि उठानी पड़े, परंतु हवन के साथ यह समस्या नहीं रहती। उसके सूक्ष्म परमाणु सीधे रक्तप्रवाह में पहुँचते हैं और पाचन शक्ति पर कोई बोझ नहीं डालते। तभी तो पुत्रेष्टि यज्ञ में जब खाने के पदार्थों से वीर्य पुष्ट नहीं होता और अधिक खाने से पाचन शक्ति बिगड़ती है, उस समय हवन यज्ञ में डाले गए पौष्टिक पदार्थों के सूक्ष्म परमाणु सीधे रक्त में पहुँचकर आँतरिक शोधन करते हैं और मनवाँछित परिणाम प्रस्तुत करते हैं। दूसरे यज्ञीय ऊर्जा से परिमार्जित वस्तुओं की स्वच्छता एवं स्थिरता बढ़ जाती है। शारीरिक-मानसिक रुग्णता को हटाने-मिटाने में यज्ञ चिकित्सा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पिछले अंक में बताया जा चुका है कि किस रोगी के लिए किस स्तर की हवन सामग्री प्रयुक्त की जाए। सामान्य रोगों के लिए सर्वोपयोगी हवन सामग्री एवं सूर्य गायत्री मंत्र का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। इसे हर स्तर का व्यक्ति अपनाकर हर प्रकार की दुर्बलता एवं रुग्णता से छुटकारा पा सकता है। आगे की पंक्तियों में सर्वप्रथम पाचन तंत्र से संबंधित कुछ रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री का वर्णन किया जा रहा है, क्योंकि समस्त रोगों का उद्भव पाचन तंत्र की गड़बड़ी पर निर्भर करता है।

लीवर (यकृत) एवं तिल्ली तथा उससे संबंधित रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री का उल्लेख अखण्ड ज्योति के पिछले अंक में किया जा चुका है। यहाँ आम उदर रोगों जैसे अपच, वमन, डायरिया, हैजा, बवासीर आदि को दूर करने के लिए प्रयुक्त होने वाली विशेष हवन सामग्री का वर्णन किया जा रहा है। इसके साथ पूर्व वर्णित हवन सामग्री-’नंबर एक’ अर्थात् (1) अगर, (2) तगर (3) देवदार (4) चंदन (5) रक्त चंदन (6) गुग्गुल (7) लौंग (8) जायफल (9) चिरायता और (10) असगंध को भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन किया जाता है। यज्ञोपचार का पूर्ण लाभ तभी मिलता है।

(2) अपच अर्थात् भोजन न पचना एवं संबंधित रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री-

अपच के लिए निम्नाँकित औषधियों को बराबर मात्रा में लेकर तैयार किया जाता है-

(1) तालीसपत्र (2) तेजपत्र (3) पोदीना (4) हरड़ (5) अमलतास (6) नागकेसर (7) कालाजीरा (8) सफेद जीरा।

हवन करने के साथ ही उपर्युक्त आठों चीजों के कपड़छन चूर्ण को मिलाकर सुबह-शाम एक-एक चम्मच मट्ठा या जल के साथ रोगी को खिलाने से शीघ्र लाभ मिलता है।

(3) वमन अर्थात् कै, उल्टी तथा संबंधित रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री-

इसके लिए निम्नलिखित चीजों को मिलाकर हवन सामग्री तैयार की जाती है-

(1) वायविडंग (2) पीपल (3) छोटी पिप्पली (4) ढाक या पलाश के बीज या सूखे फल (5) गिलोय (6) निशोथ (7) नींबू की जड़ या सूखे फल (8) आम की गुठली (9) प्रियंगु (10) धाय के बीज

उक्त सभी दस चीजों के महीन छने हुए चूर्ण को सुबह-शाम एक-एक चम्मच शहद से खिलाना भी चाहिए।

(4) उदर रोग के लिए विशेष हवन सामग्री-

इसके लिए जिन औषधियों को हवन सामग्री बनाने में प्रयुक्त करते हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं-

(1) चव्य (2) चित्रक (3) तालीस पत्र (4) दालचीनी (5) आलूबुखारा (6) छोटी पिप्पली।

हवन करने के साथ-साथ इन छह चीजों को मिलाकर बनाए गए सूक्ष्म चूर्ण को एक-एक चम्मच जल के साथ सुबह-शाम रोगी को खिलाते रहना चाहिए।

(5) दस्त, डायरिया एवं संबंधित रोगों के लिए प्रयुक्त होने वाली विशेष हवन सामग्री-

(1) सफेद जीरा (2) दालचीनी (3) अजमोद (4) चित्रक (5) बेलगिरी (6) अतीस (7) सोंठ (8) तालमखाना (9) ईसबगोल (10) मौलश्री की छाल (11) तालमखाना (12) छुआरा।

उपर्युक्त सभी बारह चीजों को हवन के साथ ही सूक्ष्म चूर्ण बनाकर घोट-पीस एवं कपड़े से छानकर एक-एक चम्मच सुबह शाम दही या मट्ठे के साथ रोगी को पिलाते रहना चाहिए। जब दस्त लग रहे हों, तो परहेज का, पथ्यापथ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है। ऐसी स्थिति में दूध व दूध से बने मीठे पदार्थ, तली-भुनी चीजें एवं गरिष्ठ चीजें नहीं देनी चाहिए।

(6) हैजा की विशेष हवन सामग्री

(1) धनिया (2)कासनी (3) सौंफ (4) कपूर (5) चित्रक।

इन्हीं पाँचों हव्य पदार्थों के सूक्ष्म पाउडर को हवन के साथ-साथ एक-एक चम्मच सुबह-शाम खिलाते रहना चाहिए।

(7) आँव-पेचिश आदि के लिए विशेष हवन सामग्री

(1) मरोड़फली (2) अनारदाना (3) पोदीना (4) आम की गुठली (5) कतीरा।

हवन के साथ-साथ उक्त पाँचों के महीन चूर्ण को जल के साथ एक-एक चम्मच सुबह-सायं रोगी को खिलाते रहने से द्विगुणित लाभ मिलता है।

(8) पाइल्स अर्थात् बवासीर, अर्श एवं तत्संबंधित रोगों के लिए विशिष्ट हवन सामग्री-

खान-पान की गड़बड़ी से प्रायः कब्ज बने रहने एवं अमीबायोसिस आदि के कारण यह बीमारी अधिकाँश लोगों में पाई जाती है। शुष्क एवं रक्तार्श दोनों ही स्थितियों में निम्नलिखित औषधियों से बनी हवि सामग्री अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।

(1) नागकेशर (2) हाऊबेर (3) धमासा (4) दारुहल्दी (5) नीम की गुठली (निमोनी) (6) मूली के बीज (7) जावित्री (8) कमल केशर (9) गूलर के फूल।

इन सभी नौ चीजों को मिलाकर बारीक चूर्ण करके कपड़े से छान लेना चाहिए और हवन के साथ सुबह-शाम एक-एक चम्मच जल के साथ रोगी व्यक्ति को खिलाते रहना चाहिए।

असह्य पीड़ा की स्थिति में निम्नलिखित औषधियों की धूप भी दी जा सकती है। इस संबंध में वृहत् निघंटु-10, में उल्लेख है-

अश्वगंधोऽथ निर्गुण्डी वृहती पिप्पली फलम्। धूपोऽयं र्स्पशमात्रेण र्ह्यशसं शमने ह्यलम्॥

अर्थात् अश्वगंधा, निर्गण्डी, बड़ी कटेरी (कंटकारी), एवं पिप्पली, इन्हें अग्नि में जलाकर धूप देने से बवासीर-अर्श की पीड़ा शाँत होती है।

भावप्रकाश, निघंटु एवं अन्यान्य आयुर्वेद ग्रंथों में विभिन्न रोगों के लिए यज्ञोपचार में प्रयुक्त होने वाली कितनी ही वनौषधियों का वर्णन किया गया है। उनमें से हवन सामग्री में काम आने वाली कुछ प्रमुख वनौषधियों के नाम इस प्रकार हैं-ब्राह्मी, शतावरी, अश्वगंधा, विधारा, जटामाँसी, मंडूकपर्णी, शालपर्णी, इंद्रायण की जड़, मकोय, अड़ूसा, गुलाब के फूल, अगर, तगर, रास्ना, क्षीरकाकोली, पंडरी, प्रोक्षक, तालमखाना, बादाम, मुनक्का, जायफल, जावित्री, बड़ी इलायची, बड़ी हरड़, आँवला, बहेड़ा, छोटी पीपल, पुनर्नवा, नगेंद्र वामड़ी, चीड़ का बुरादा, गिलोय, चंदन, कपूर, केशर, गुग्गल, पानड़ी, मोथा, चिरायता, पितपापड़ा आदि। हवन सामग्री बनाने के लिए इन सभी औषधियों को बराबर मात्रा में लिया जाता है तथा इनका दसवाँ भाग शक्कर एवं आठवाँ भाग शहद डालकर गोघृत में लड्डू बनाकर सूर्य गायत्री मंत्र से हवन किया जाता है।

(9) विष निवारण की विशिष्ट हवन सामग्री-

(1) वन तुलसी के बीज (2) अपामाग्र (3) इंद्रायण की जड़ (4) करंज की गिरी (5) दारुहल्दी (6) चौलाई के पत्ते (7) विनौला गिरी (8) लाल चंदन।

हवन के साथ ही इन्हीं आठ चीजों को मिलाकर बारीक चूर्ण बनाकर सुबह-शाम एक-एक चम्मच जल के साथ देते रहने से तत्काल लाभ मिलता है।

यज्ञ-हवन से रोगोपचार की महिमा अनंत है। आवश्यकता मात्र औषधि चयन, नियमितता एवं भाव-श्रद्धा की गहनता की त्रिवेणी के समन्वय की है। औषधि चयन के संदर्भ में आयुर्वेद ग्रंथों में कहा भी गया है-

सुरभीणि सुपुष्टेश्च कारकाणि सितादिकम्। द्रव्यारामादाय जुहुयाच्चतुर्थं रोगनाशकम्॥

अर्थात् सुगंधित, पुष्टिकारक, मधुर एवं रोगनाशक चार प्रकार के पदार्थों का हवन करने से नानाप्रकार के रोगों का निवारण होता है। क्रमशः


स्वतंत्रता का अर्जन

परतंत्रता जन्मजात है। वह तो प्रकृतिप्रदत्त है। हममें से किसी को उसे अर्जित नहीं करना होता। होश सँभालते ही मनुष्य पाता है कि वह परतंत्र है। वासना की जंजीरों के साथ ही उसका इस जगत् में आना हुआ है। अगणित सूक्ष्म बंधन उसे बाँधे हुए हैं। इन बंधनों की पीड़ा हर पल उसे सताती है। परतंत्रता में भला कोई सुखी भी कैसे हो सकता है।

सुखी होने के लिए तो स्वतंत्रता चाहिए। यह स्वतंत्रता किसी को भी जन्म के साथ नहीं मिलती। इसे तो अर्जित करना होता है और यह उसे ही उपलब्ध होती है, जो उसके लिए श्रम एवं संघर्ष करता है। स्वतंत्रता के लिए मूल्य देना होता है। हो भी क्यों नहीं? जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, वह निर्मूल्य नहीं मिल सकता।

ध्यान रहे, प्रकृति से मिली परतंत्रता दुर्भाग्य नहीं है। दुर्भाग्य तो है स्वतंत्रता को अर्जित न कर पाना। दासता में जन्म लेना बुरा नहीं है, पर दासता ढोते हुए, दास स्थिति में ही मर जाना अवश्य बुरा है। अंतस् की स्वतंत्रता को पाए बिना जीवन में कुछ भी सार्थकता और कृतार्थता तक नहीं पहुँचता है।

वासनाओं की अँधेरी काल-कोठरियों की कैद में जो बंद हैं, जिन्होंने विवेक का निरभ्र व मुक्त आकाश नहीं जाना है, समझना यही चाहिए कि उन्होंने जीवन तो पाया, पर वे जीवन को जानने से वंचित रह गए। उन्होंने न तो खुली हवा में साँस लेने का सुख पाया, न ही अनंत आकाश में चाँद-सितारों की जगमगाहट देखी। सुबह के सूरज की उजास का भी वे अनुभव नहीं कर पाए, क्योंकि ये सारे अनुभव स्वतंत्रता के हैं।

पिंजड़ों में कैद पक्षियों और वासनाओं की कैद में पड़ी आत्माओं के जीवन में कोई भेद नहीं, क्योंकि दोनों ही स्वतंत्रता एवं स्वामित्व का आनंद नहीं पा सकते।

प्रभु को जानना है, तो हर मनुष्य को चाहिए कि वह स्वतंत्रता का अर्जन करे। जो परतंत्र, पराजित और दास हैं, प्रभु का राज्य उनके लिए नहीं है।


भारतभूमि स्वर्गादपि गरीयसी

प्रचलित इतिहास में हमें बचपन से यह ज्ञान दिया जाता है कि हमारे पूर्वज आर्य जाति के यायावर जंगली (अर्द्ध सभ्य) लोग थे और वे मध्य एशिया के रहने वाले थे। उन्होंने उत्तर-पश्चिम भाग से भारत में प्रवेश किया। यहाँ उस समय एक सहस्र वर्ष से भी अधिक समय से सिंधु घाटी की सभ्यता फल-फूल रही थी, जिसके निवासी मूलतः द्रविड़ थे। आक्राँता आर्यों ने इस सभ्यता को रौंद दिया व द्रविड़ों को दक्षिण की ओर खदेड़ा। फिर कुछ सदियों में वेदों की रचना की, संस्कृत का प्रचार पूरे भारत में किया व महान् गंगा सभ्यता का निर्माण किया।

हमारे पूर्वजों का विदेश से आने वाला यह बर्बर, जंगली एवं असभ्य रूप एक भी ठोस तथ्य पर आधारित नहीं है, बल्कि भारत विद्वेषी यूरोपीय शासकों, मिशनरियों एवं इतिहासकारों द्वारा कल्पित षड्यंत्र का एक हिस्सा था। इस छद्म जाल से सावधान रहने की चेतावनी देते हुए, स्वतंत्रता का मंत्र देने वाले बंकिमचंद्र चटर्जी ने देशवासियों से कहा था, मुझे तुम लोगों को अपनी चेतावनी कड़े शब्दों में कह देनी है, क्योंकि तुम लोगों को प्रमाणित करने वाले यूरोपीय विद्वानों की सामान्य वृत्ति हमारे भूतकालीन इतिहास को लाँछित करने की है। उसकी गौरवमय स्मृतियों को तुम लोगों के मस्तिष्क से मिटाने की है और तुम लोगों को विपरीत दिशा में भटकाने की है। विदेशी बहकावे में अपने गौरवमयी अतीत को भुलाने की यह बात आज भी प्रासंगिक है।

सच तो यह है कि आर्यों का विदेशी आक्राँता होने का मत कभी भी किसी ठोस तथ्य पर आधारित नहीं रहा है। झूठ के आधार पर खड़ा इसका वैचारिक महल आज सत्यान्वेषियों के शोध-निष्कर्षों के प्रहारों से धराशायी हो गया है। आर्य विदेश से आए बर्बर आक्राँता थे, भारत के मूल निवासी नहीं, इस मत को सर्वप्रथम चुनौती स्वामी दयानंद सरस्वती ने दी, जिन्होंने स्पष्ट किया कि वेद में उल्लेखित आर्य शब्द कोई जाति न होकर नैतिक व आँतरिक गुण का परिचायक है।

इसके बाद स्वामी विवेकानंद ने अपनी दिव्य शक्ति से देशवासियों को अपने अतीत की गौरव-गरिमा से परिचित करवाया। उन्हें न केवल भारतीय ग्रंथों का अनुभूत बोध था, बल्कि पाश्चात्य इतिहास एवं धर्म का भी गहन ज्ञान था। उन्हें आर्यों के संदर्भ में पश्चिम की कुटिलता को समझने में देर न लगी। तभी तो अमेरिका के एक भाषण में उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा था, “तुम्हारे पाश्चात्य विद्वान् आर्यों को विदेशी भूमि से आकर आदिवासियों की भूमि छीनकर उन्हें भगा, वहाँ निवास करने की बात करते हैं। यह सब विशुद्ध बकवास है, मूर्खतापूर्ण-नादान बातें हैं। आश्चर्य कि हमारे भारतीय विद्वान् भी इन्हें आँख मूँदकर मानते हैं।” स्वामी जी ने दुःखी होकर कहा था कि ये सब भयंकर झूठ हमारे बच्चों को पढ़ाए जाते हैं।

आगे चलकर श्री अरविंद ने अपने ग्रंथ ‘सिक्रेट ऑफ दि वेदाज’ में देशवासियों को वेद के संदर्भ में यूरोपीय विद्वानों की दुर्भाग्यपूर्ण गलत धारणाओं से सावधान एवं सचेत किया है और उत्तर-पश्चिम से आर्य आक्राँताओं के सिद्धाँत को निराधार एवं अनिश्चित तथ्यों पर आधारित बताया है। उनके अनुसार इसका वेदों में कहीं उल्लेख नहीं है। इसी तरह आर्य एवं द्रविड़ों की भिन्नता भी भ्राँतिपूर्ण तथ्यों पर आधारित है। तमिल के गहन अध्ययन के उपराँत श्री अरविंद ने संस्कृत एवं तमिल के बीच गहन संबंध पाया व दोनों भाषाओं को एक विलुप्त आदि भाषा की दो शाखाओं के रूप में देखा।

श्री अरविंद के 10 वर्ष बाद गणितज्ञ एवं भाषाविद् आर. स्वामीनारायण अय्यर भी द्रविड़ भाषाओं के गहन शोध के आधार पर तमिल व संस्कृत के बीच गहन संबंध के निष्कर्ष पर पहुँचे। उनके अनुसार द्रविड़ क्रियाएँ (verbes) इंडो-आर्यन श्ज्ञबछज्ञै। क्ज्ञ था, जो समय के साथ बहुत विकृत हो गया व पहचानना बहुत कठिन हो गया है। दक्षिण भारत के ही भाषाविद् एवं गणितज्ञ एन. एस. राजाराम का भी अपने शोध-निष्कर्षों के आधार पर कहना है कि द्रविड़ भाषाएँ संस्कृत की तरह समरूपता पर प्रकाश डालती हैं। कुछ मायनों में द्रविड़ भाषाओं ने संस्कृत के प्राचीन स्वरूप को हिंदी जैसी उत्तर भारतीय भाषाओं की अपेक्षा बेहतर ढंग से संरक्षित रखा है।

भारतीय संविधान के निर्माता वी.आर. अंबेडकर भी अपने वेदों के अध्ययन-अनुशीलन के उपराँत इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि आर्यों के आक्राँता होने का मत एक ऐसा आविष्कार है, जो तथ्यों पर आधारित नहीं है। यह सिद्धाँत पूर्व कल्पनाओं पर आधारित है, जिसमें तथ्यों को तोड़-मरोड़कर इन्हें सिद्ध करने के लिए प्रयुक्त किया गया है। वेदों में आर्य नाम की जाति का कोई उल्लेख नहीं है। वेदों में आर्य जाति द्वारा भारत पर आक्रमण का भी कोई प्रमाण नहीं है। भारत के मूल निवासी दास-दस्युओं पर विजय, आर्य एवं दस-दस्युओं के बीच जातिभेद जैसी किसी चीज का प्रमाण नहीं है। न ही इसके बीच रंगभेद जैसी किसी बात का उल्लेख है। यदि मानवशास्त्र (Anthropology) एक विज्ञान है, जो जाति का निर्धारण करने में सहायक है, तो इसकी खोज यह सिद्ध करती है कि ब्राह्मण और अछूत एक ही जाति के हैं। यदि ब्राह्मण आर्य हैं, तो अछूत भी आर्य हैं। यदि ब्राह्मण द्रविड़ हैं, तो अछूत भी द्रविड़ हैं।

आर्यों के संबंध में न ही वेद और न ही अन्य संस्कृत ग्रंथों में भारत के बाहर किसी मूलभूत गृहभूमि का उल्लेख आया है। वास्तव में आर्यों की भूमि के संदर्भ में आए सभी स्थान जैसे सप्तसिंधु, आर्यावर्त, भारतवर्ष सभी भारतीय प्रायद्वीप में ही हैं। रामायण, महाभारत व पुराणों में भी उच्चस्तरीय विकसित सभ्यता की चर्चा भारत में ही है, जो कई सहस्राब्दियों तक चली।

बहुचर्चित लेखक भगवान् एस. गिडवाणी ने भी अपनी पुस्तक ‘रिटर्न ऑफ द आर्यन्स’ में इस ऐतिहासिक विश्वास का खंडन किया है कि यूरोपीय मूल के आर्यों ने उत्तर-पश्चिम से भारत में घुसकर हड़प्पा सभ्यता को तहस-नहस किया था। श्री गिडवाणी ने यह निष्कर्ष भारत, यूरोप एवं एशिया के लगभग 20 देशों के लोगों में युगों से प्रचलित आर्यों के गीतों, पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक प्रमाणों के मंथन से निकाला है। उनका दृढ़ विश्वास है कि आर्य मूल रूप से भारतवर्ष के निवासी थे।

1920-22 में भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में हुई खुदाई ने इस विषय पर गहन प्रकाश डाला है। इसके बाद के वर्षों में कई अन्य स्थानों पर भी ऐसे ही स्थल पाए गए, जो इस सभ्यता की व्यापकता ही नहीं, बल्कि इसके विकसित स्वरूप पर भी प्रकाश डालते हैं। इस सभ्यता को सिंधु घाटी की सभ्यता नाम दिया गया था, लेकिन बाद की खोजों के अनुसार यह सभ्यता मुख्यतः सरस्वती नदी के किनारे बसी थी। अतः इसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता कहना अधिक उचित होगा। यह 1500 से 1900 ई. पू. तक फली-फूली। अब तक खोजे गए लगभग 1500 स्थलों के आधार पर यह पूर्वानुमानित सीमा से कहीं अधिक व्यापक थी। इसका विस्तार पश्चिम में ईरान की सीमाओं तक, उत्तर में कश्मीर और हिंदुकुश पर्वत से आगे तुर्कमानिया, बैकट्रिया, तजाकिस्तान के पामीर पर्वतों के चरणों तक, दक्षिण में गोदावरी नदी तक तथा पूर्व में दिल्ली से भी आगे तक, लगभग 20 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में था। जो समकालीन मिश्र या मेसोपोटामिया की सभ्यता से बहुत बड़ी थी। यह निस्संदेह महानतम सभ्यताओं में एक थी।

सिंधु-सरस्वती क्षेत्र में हुए तमाम पुरातत्त्वीय खोजों से ऐसा कोई प्रमाण हाथ नहीं लगा है, जो आर्यों के बाहर से आने की बात को सिद्ध करे। यहाँ के बरतन, हथियार, लिपि, कला, मूर्तियाँ आदि इसकी पुष्टि नहीं करते। इसके विपरीत इस सभ्यता का वैदिक स्वरूप ही प्रमाणित होता है।

ऋग्वेद में न केवल जहाजरानी एवं समुद्री जहाजों का उल्लेख है, बल्कि नगरों से लेकर व्यापार एवं उद्योगों का भी उल्लेख है, जो सभी सिंधु-सरस्वती सभ्यता के साथ साम्य रखते हैं व इनका मध्य एशिया के यायावरों से कोई संबंध नहीं बैठता। इस सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता इसकी नगरीय विकास एवं व्यवस्था थी, जिसका स्तर यूरोप में 2000 वर्षों बाद देखने को मिलता है। इसके विदेशों में आँमन, बहरान, सुमेर जैसे देशों से व्यापार संबंध थे। इसके ‘लोथल’ को विश्व की सर्वप्रथम बंदरगाह (dockyard) एवं ज्वारीय अवरोधक (tidal lock) होने का गौरव प्राप्त है।

यहाँ पाई गई मुद्राओं से धार्मिक प्रचलनों का वैदिक स्वरूप उजागर होता है। देवताओं की मूर्तियाँ योगमुद्रा में बैठी या खड़ी पाई गई हैं। अग्नि पूजा, शक्ति उपासना, नंदी, पशुपति, शिव आदि रूपों में वैदिक सभ्यता के सशक्त प्रमाण मिले हैं। योग-आसन में ध्यान करते हुए योगी की मुद्रा, उस समय की योग-साधना पर प्रकाश डालते हैं। सैकड़ों मुद्राओं से उपलब्ध रहस्यमयी सिंधु लिपि का संस्कृत से संबंध पाया गया है।

अपने व्यापक रूप में सिंधु-सरस्वती सभ्यता वैदिक स्वरूप की थी अर्थात् जिसकी साँस्कृतिक पृष्ठभूमि वेद से जुड़ी थी। 6000 वर्ष पुरानी मिट्टी से ऐसा कुछ नहीं खोदा गया है, जो (आज हिंदू धर्म के रूप में) प्रचलित वैदिक सभ्यता से कुछ भिन्नता लिए हो। आर्य आक्राँता दर्शन के प्रबल समर्थक जॉन मार्शल भी ‘मोहनजोदड़ो एण्ड द इंदु सिविलाइजेशन’ में यह कहने के लिए बाधित हुए कि सिंधु घाटी के लोगों का धर्म इतना भारतीय है कि इसे वर्तमान हिंदू धर्म से किसी भी रूप में अलग नहीं ठहराया जा सकता। मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा दोनों जगह की सभ्यता एक आरंभिक सभ्यता नहीं है, बल्कि एक परिपक्व सभ्यता है, जिसके पीछे सहस्राब्दियों का मानवीय श्रम निहित है।

सिंधु-सरस्वती सभ्यता की प्रमुख नदी सरस्वती का आज भले ही कोई अस्तित्व न हो। लेकिन पुरातत्त्वीय खोजों से इसके पुरातन अस्तित्व का पता चलता है। उपग्रहीय चित्रों के द्वारा इसको प्रमाणित किया जा चुका है। यह हिमालय के चरणों में शिवालिक की पहाड़ियों से बहती थी। पंजाब में अंबाला के समीप मैदानों को छूती थी। सिंधु नदी के प्रायः समानाँतर चलती हुई राजस्थान के रेगिस्तानों से होती हुई अंततः गुजरात में कच्छ के रन में जाती थी और वहाँ अरब सागर में गिरती थी। यह तीन से दस कि.मी. चौड़ी एक विशाल नदी थी। एक समय सतलज एवं यमुना भी इसी की धाराएँ थीं। इनका प्रवाह 10,000 ई.पू. समाप्त हुए अंतिम हिमयुग में हिमालय के ग्लेशियर एवं बर्फशिलाओं के पिघलने के कारण अक्षुण्ण था। विस्तृत अन्वेषणों से यह तथ्य उजागर हुआ है कि सरस्वती नदी ने कई बार बाढ़ एवं भूकंपों के कारण अपनी राह बदली, जिससे सतलज नदी सिंधु नदी की ओर व यमुना पूर्व की ओर अपना रुख बदलती चली गई। प्रमाणों से यह भी स्पष्ट होता है कि बीच में सदियों लंबे सूखे पड़े, जिसके कारण सरस्वती कई खंडों में खंडित हो गई व अंततः 2000 ई. पूर्व तक पूर्णतः सूख गई।

वैदिक काल में ऋषि-मुनियों (आर्यों) के क्रिया–कलापों-तप-साधना की यह केंद्रीय स्थली रही है। ऋग्वेद काल में यह अपने पूरे वेग से प्रवाहित होती थी। आर्य लोग इसके किनारे रहते थे व इसके विविध अनुदान-वरदानों से अभिभूत होकर इसका स्तुतिगान करते थे। ऋग्वेद में इसकी स्तुति श्रेष्ठ माँ व श्रेष्ठ नदी के रूप में की गई है। (ऋग्. 2-41/16)।

ऋग्वेद, महाभारत एवं अन्य पुराणों से नदी की स्थिति का ज्ञान इसके किनारे बसे तीर्थस्थलों के रूप में हो जाता है। ऋग्वेद में लिखा है कि यह महान् नदी पर्वत से सागर तक बहती है। महाभारत में इसके रेगिस्तान में विलुप्त होने की बात कही गई है। आर्यों का विदेशी आक्राँता मत इन सभी ग्रंथों को 1000 ई.पू. के बाद के काल का बताता है अर्थात् सरस्वती नदी सूखने के 1000 वर्ष बाद की बात करता है, जो पूरी निराधार सिद्ध होता है।

सूखे में सरस्वती नदी का अंत हुआ। इससे कई अन्य क्षेत्र भी प्रभावित हुए थे। मेसोपोटामिया की सुमेरन सभ्यता भी इसी में क्षत-विक्षत हो गई थी। सिंधु-सरस्वती सभ्यता के पतन के साथ इसके वासी पहले यमुना के नए प्रवाह की ओर बढ़े और फिर गंगा की ओर आए। यहीं उन्होंने नई सभ्यता का निर्माण किया, जो हम सबको विरासत में मिली है, जिसके आधार पर हम गर्व के साथ यह कह सकते हैं कि हमारे आदि पूर्वज ‘आर्य’ भारतवासी ही थे। जिन्होंने अपनी इस भारतभूमि को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ बनाया।


Quotation

भलाई का पुरस्कार पाने और बुराई का दंड भुगतने में देर नहीं लगती। आत्मा के संतोष और पश्चाताप के रूप में वह हाथों-हाथ मिलता है।


सूर्य की भाँति देदीप्यमान (Kahani)

सुलोचना ने जीवनभर पतिव्रत की कठोर साधना द्वारा मेघनाद को वह बल प्रदान किया था कि उसके आगे देवता भी नहीं टिक सकते थे। ऐसे अपराजेय योद्धा को मारने वाले महारथी लक्ष्मण को भी यह सौभाग्य उनकी महान् पतिव्रता उर्मिला ने ही प्रदान किया था। उर्मिला भारतीय नारी के गौरवमय इतिहास का चंद्रमा, जिसने चौदह वर्ष तक अपने पति की अनुपस्थिति में पलक ऊपर उठाकर किसी पुरुष के दर्शन भी नहीं किए थे। उसने राज्य-भोग, आभूषण और स्वादयुक्त भोजनों का केवल इसलिए परित्याग कर दिया था, क्योंकि उसके पति वनवासी थे। ऐसी निष्ठाएँ भारतीय समाज को वह शक्ति प्रदान करती रही हैं, जिनकी यश-गाथाएँ आज भी विश्व-इतिहास के अंतरिक्ष में सूर्य की भाँति देदीप्यमान हैं।


सत्य की अभीप्सा

सत्य की खोज में सर्वाधिक अनिवार्य तत्त्व है ‘साहस’। स्वयं के यथार्थ को जानने का साहस। हम जो हैं, वैसे ही स्वयं को जानना सबसे अधिक जरूरी है। यह काम है तो बहुत कठिन, लेकिन इसके बिना सत्य में कोई गति भी संभव नहीं है। स्वयं के यथार्थ को जानने से ज्यादा बड़ा तप और क्या है? लेकिन सत्य की उपलब्धि के लिए वही मूल्य चुकाना होता है। उससे ही व्यक्ति की सत्य के प्रति अभीप्सा की घोषणा होती है। स्वयं के प्रति सच्चाई ही तो सत्य के प्रति प्यास की प्रगाढ़ता की अभिव्यक्ति है।

असत्य के तट से जो स्वयं को बाँधे हुए हैं, वह अपनी नौका सत्य के सागर में कैसे ले जा सकेगा? असत्य के तट को तो छोड़ना ही होगा। वह तट ही तो सत्य की यात्रा के लिए बाधा है। वह तट ही तो बंधन है। संभव है कि उस तट में सुरक्षा का आभास होता हो। यह सुरक्षा का मिथ्या आभास और उसकी चाहत ही तो असत्य का गढ़ है। सत्य की यात्रा में सुरक्षा का मोह नहीं, वरन् अज्ञात को जानने का अदम्य साहस चाहिए। असुरक्षित होने का जिसमें साहस नहीं है, वह अज्ञात का खोजी भी नहीं हो सकता।

तनिक सोचें तो सही, क्या इस झूठी सुरक्षा की चाहत ने हमारी सत्ता के सत्य को आवृत नहीं कर रखा है। क्या हमारी सारी वंचनाएँ सुरक्षा की ही आयोजनाएँ नहीं हैं? यह कैसी उलटबाँसी है कि आज लोभी त्यागी बना है। शोषक दान करता है। हिंसक ने अहिंसक के वस्त्र पहन रखे हैं और घृणा से भरे चित्त प्रेम की भाषा बोल रहे हैं। यह आत्मवंचना बहुत सुगम है। नाटकों में अभिनय कब कठिन रहे हैं। अभिनय के बाजार में सुँदर मुखौटे सदा से ही सस्ते दामों में मिलते रहे हैं। लेकिन याद रहे, जो सौदा ऊपर से सस्ता है, अंततः वही सबसे महँगा सिद्ध होता है, क्योंकि जो व्यक्ति मुखौटों में सत्य को छिपाता है, वह स्वयं से और सत्य से निरंतर दूर होता चला जाता है।

सत्य और उसके बीच एक अलंघ्य खाई बन जाती है। फिर तो उसकी आत्मा स्वयं के अनावरण के भय से सदा ही त्रस्त रहने लगती है। वह फिर स्वयं को छिपाता ही चला जाता है। वस्त्रों के ऊपर वस्त्र, मुखौटों के ऊपर मुखौटे। असत्य अकेला नहीं आता है। उसकी सुरक्षा के लिए उसकी फौजें भी आती हैं। असत्य और भय का फिर ऐसा जाल बन जाता है कि उसके ऊपर आँखें उठाना भी असंभव हो जाता है। व्यक्ति जब स्वयं के ही मुखौटों के उठ जाने के भय से पीड़ित हो, तो वह सत्य के पात्र को उघाड़ने की हिम्मत और सामर्थ्य कहाँ से जुटा सकता है?

यह शक्ति तो स्वयं को उघाड़ने के साहस से ही अर्जित होती है। सत्य का साक्षात्कार करने के लिए तो भयभीत चित्त शत्रु है। उस दिशा में तो बस अभय ही मित्र है। चित्त की अभयता उसे ही प्राप्त होती है, जो स्वयं के यथार्थ को स्वयं ही सब भाँति उघाड़कर भय से मुक्त हो जाता है। स्वयं को ढकने से भय बढ़ता जाता है और आत्मा शक्तिहीन होती जाती है, किंतु स्वयं को उघाड़ते ही ज्ञान के प्रकाश में सारे भय अपने आप ही भाग जाते हैं और शक्ति के अभिनव और अमित स्रोतों की उपलब्धि होती है। यही साहस है, स्वयं को उघाड़ने और जानने की क्षमता ही साहस है।

ब्रह्म विद्या पाने की दिशा में यही पहला और अनिवार्य चरण है। सत्यकाम ने यही साहस किया था। ऋषि हरिद्रुमत गौतम के आश्रम में पहुँचकर उसने ऋषि के चरणों में सिर रखकर कहा, आचार्य मैं सत्य की खोज में आया हूँ। ऋषि ने उससे पूछा, वत्स तेरा गोत्र क्या है? तेरे पिता कौन हैं? उनका नाम क्या है?

उस किशोरवय सत्यकाम की वाणी से निःसंकोच सत्य प्रस्फुटित हो उठा। उसने बिना किसी हिचक के कहा, “भगवन्! मुझे अपने गोत्र का ज्ञान नहीं है। न ही मैं अपने पिता को जानता हूँ। हाँ, मेरी माँ का नाम जाबाला है। इसलिए मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।”

हरिद्रुमत इस सरल सत्य से अभिभूत हो उठे। उन्होंने उस किशोर को हृदय से लगा लिया और बोले, “मेरे प्रिय! तू निश्चय ही ब्रह्मविद्या का अधिकारी है, क्योंकि जिसमें स्वयं के प्रति सच्चा होने का साहस है, सत्य स्वयं ही उसे खोजता हुआ उसके द्वार आ जाता है।”


पाप प्रकट करने में लज्जा (Kahani)

एक चोर संत नानक के पास पहुँचा और इस बुरी आदत से छुटकारा पाने का उपाय पूछा। नानक ने जो उपाय बताए, वे उससे निभते नही थे। किसी प्रकार भी वह आदत न छूटी, तो उन्होंने चोर को बताया कि तुम अपने पाप सबके सामने प्रकट करने लगो। चोर को पाप प्रकट करने में लज्जा लगती थी, सो उसने चोरी करना ही बंद कर दिया।


इक्कीसवीं सदी में सविता देवता के तेवर

सौरमंडल में सूर्य प्रधान है। वेदों के अनुसार सूर्य मनुष्य को जगाकर अभीष्ट कार्य करने में प्रवृत्त करते हैं। ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ कहकर सूर्य को सभी चराचर की आत्मा माना गया है। इस समस्त भूमंडल पर सर्वसाक्षी सूर्य सर्वत्र गूढ़ विचरण कर जीवों और मनुष्यों की गतिविधियों को देखते हैं। ग्रीक भाषा में सूर्य को ‘हेलियस’ कहा गया है। इस शब्द का अर्थ है तेजोमय।

सूर्य का यह तेज उसमें उत्पन्न अनंत ऊर्जा का परिणाम। इसी ऊर्जा के कारण पृथ्वी में प्राण का संचार होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी से आग के गोले के रूप में दिखने वाले सूर्य में भी हलचलें होती हैं। जो सौरज्वाला एवं काले धब्बों के रूप में देखी जा सकती हैं।

हालाँकि सूर्य सौरमंडल की मुख्य धुरी है, परंतु अपनी आकाशगंगा में यह भी एक छोटा-सा तारा है। सूर्य और पृथ्वी के मध्य 14 करोड़ 96 लाख किलोमीटर का फासला है। फिर भी सूर्य की किरणें यह लंबी दूरी मात्र आठ मिनट में तय कर लेती हैं। सूर्य का व्यास 13 लाख 92 हजार किलोमीटर है, जबकि पृथ्वी का लगभग 12 हजार 756 कि.मी. है। यह कल्पना करना आसान नहीं है कि पृथ्वी से कई गुना बड़ा एवं भारी सूर्य एक जलता हुआ पिंड है।

इसके समस्त भागों का तापमान एकसमान नहीं होता। इसका सतही तापमान लगभग 6000 डिग्री सेल्सियस है। सूर्य की रोशनी और गरमी के पीछे सौर ऊर्जा कार्य करती है। यही ऊर्जा पृथ्वी का प्राण है। इसी प्राण से पृथ्वी में जीवन का विकास संभव हो सका है। यह ऊर्जा सूर्य के केंद्र में न्यूक्लियर क्रिया से उत्पन्न होती है। इसके परिणाम-स्वरूप हाइड्रोजन गैस हीलियम में परिवर्तित होती रहती है। सूर्य के केंद्र में 5640 लाख टन हाइड्रोजन एक सेकेंड में 5400 लाख टन हीलियम में बदल जाती है। इससे 40 लाख टन हाइड्रोजन के बराबर की ऊर्जा किरणों के रूप में सूर्य से बाहर निकलती है। सूर्य प्रति सेकेंड 3.8 फ् 10-26 ‘जे’ ऊर्जा अंतरिक्ष में उत्सर्जित करता है।

पिछले पाँच अरब वर्षों से सूर्य अपनी गैस को ऊर्जा में परिवर्तित करता चला आ रहा है। ऊर्जा की खपत भी उसी अनुरूप होती है। इसकी सतह का जो तापमान है, वह पूरी सतह पर एकसमान नहीं है। सूर्य के फोटोस्फीयर में 6000 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान होता है। इसमें अनियंत्रित गैसों की एक परत क्रोमोस्फियर होती है। इन दोनों के बीच एक और परत होती है, जिसका तापमान 4500 डिग्री सेंटीग्रेड होता है। यह सूर्य का सबसे ठंडा प्रदेश होता है। इसे सूर्यग्रहण के प्रारंभ एवं अंत में मैग्नेटा फ्रीज के रूप में देखा जा सकता है।

सूर्य के जिस सतही स्थान पर तापमान कम होता है एवं अँधेरा व ठंडा मात्र होता है, उसे ‘मन स्पॉट’ कहा जाता है। सन स्पॉट का तापमान अपनी निकटवर्ती गैस के तापमान से 2000 सेंटीग्रेड कम होता है। यह फोटोस्फीयर में काले धब्बे के रूप में होता है। इनकी संख्या एक हजार से चालीस हजार के बीच होती है। ये धब्बे जोड़ी या समूह में भ्रमण करते हैं तथा इनका जीवनकाल कुछ दिनों से लेकर कुछ महीनों तक होता है। इन धब्बों को खोजने का सर्वप्रथम श्रेय महान् वैज्ञानिक गैलीलियो का जाता है।

सूर्य कभी शाँत नहीं रहता। उसके अंदर हलचलें उठती रहती हैं। ये हलचलें कभी-कभी इतनी तीव्र होती हैं कि सूर्य की सतह पर ऊँची-ऊँची ज्वालाएँ फूट पड़ती हैं। अमेरिकी भौतिकविज्ञानी यूनीन नॉरमन पार्लर के अनुसार हाइड्रोजन और हीलियम की आयनीत गैस से बनी एक धारा लगातार और अनवरत रूप से सूर्य से प्रवाहित होती रहती है। इस प्रवाह में प्रोटानों और इलेक्ट्रानों की संख्या बराबर होती है। इसे ही सौर वायु के नाम से जाना जाता है। सौर वायु की गति 1.26 से 2.88 मिलियन किलोमीटर प्रति घंटा होती है।

सौर्य ज्वाला ‘सन स्पॉट’ से ऊर्जा के रूप में फूट पड़ती है। ये भारी मात्रा में सौर वायु में कणों को बिखेर देती हैं, जो ऊर्जा के कण धरती में जबर्दस्त चुँबकीय क्षेत्र का निर्माण करते हैं। इससे धरती में संचार माध्यम पूरी तरह ध्वस्त हो सकते हैं। सौर ज्वाला अंतरिक्ष में सैकड़ों मील के दायरे में फैल जाती हैं। अब तक सौर ज्वालाएँ अत्यधिक उग्र रूप में 28 फरवरी 1942, 19 नवंबर 1949, 13 सितंबर 1971 तथा अप्रैल 1990 को देखी गई थीं।

बीसवीं शताब्दी के आखिरी पड़ाव सन् 2000 में सूर्य की हलचलें फिर से अपने प्रचंड रूप में देखी गईं। अभी पिछले वर्ष मार्च 2000 की 3 और 4 तारीख को सूर्य की बाहरी सतह पर सौ-सौ मेगाटन क्षमता के करोड़ों हाइड्रोजन बमों के बराबर शक्ति के विस्फोट हुए। इससे पृथ्वी के अंदर घातक पराबैगनी किरणों का भीषण तूफान प्रवेश कर गया। प्रसिद्ध अंतरिक्ष भौतिकविद् आर.एस. श्रीवास्तव के अनुसार, इस घटना से पृथ्वी पर एक्स किरणों तथा पराबैगनी विकिरण की वर्षा के कारण दिन में 11 से डेढ़ बजे का समय अत्यंत खतरनाक था।

अमेरिका के जे.एम. फ्रीज एवं डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, सूर्य के कोरोना क्षेत्र में दो बिंदु हैं। इन्हें 8882 तथा 8881 नाम से जाना जाता है। वर्तमान कालावधि में ये दोनों बिंदु अचानक अत्यधिक सक्रिय हो गए हैं। इन दोनों स्थानों से 20 करोड़ टन कोरोना द्रव्य का आवेशित किरण पुँज बाहर निकल रहा है। इसकी गति 3000 किलोमीटर प्रति सेकेंड है। इसकी दिशा पृथ्वी की ओर कभी भी मुड़ सकती है। सामान्य रूप से इसकी यह प्रक्षेपण गति दस गुना अधिक है। इन किरणों में बीटा और गामा किरणें भी सम्मिलित हैं। इस खगोलीय घटना के संदर्भ में दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक प्रोफेसर विष्णु भाटिया ने स्पष्ट किया है कि कभी-कभी पृथ्वी का चुँबकीय क्षेत्र सूर्य से निकलने वाले उच्च ऊर्जा कणों को विचलित कर देता है। इस बार भी कुछ इसी तरह की घटना घटी और पृथ्वी एक बड़े खतरे से बच गई।

धरती पर तूफानों का विध्वंसक रूप तो कभी-कभी देखने में आता है, परंतु सूर्य पर इससे भी विकराल, भयंकर एवं तेज तूफान सदैव चक्कर काटते रहते हैं। इस तूफान की वजह से सूर्य पर विद्यमान् सौरकलंक की सक्रियता प्रत्येक बारहवें वर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है। इससे सूर्य के आभामंडल के आकार और आकृति में समय-समय पर परिवर्तन होता रहता है। इन सौरकलंक के तीव्र चुँबकीय 222 के निकट का तापमान शेष क्षेत्र की तुलना में कम होता है। दूसरी ओर के चुँबकीय क्षेत्र में अत्यधिक तापमान पर इलेक्ट्रॉन, प्रोटान एवं परमाणविक आयनों सदृश्य विद्युत्करण अत्यंत जटिल पथों पर भ्रमण करते हैं। सूर्य की सक्रियता ग्यारह वर्षीय चक्र चलने का यही कारण है। प्रत्येक बारहवें वर्ष में यह सक्रियता अपनी चरम सीमा पर होती है। 24 अप्रैल 1990 को इसी सौर हलचल के दौरान सूर्य उत्तर-पश्चिम भाग से सूर्य का कुछ पदार्थ अत्यंत वेग के 222 अलग होकर जाते देखा गया था। यह सूर्य से 10 लाख किलोमीटर दूर तक छिटककर पहुँच गया था।

सौरकलंक की अधिकतम सक्रियता के कारण प्रायः 222 पर बहुतरंगीय ध्रुवीय ज्योति प्रकट होती है। इस ज्योति को उत्तरी ध्रुव में ‘अरोरा बोरियालिस’ तथा दक्षिण ध्रुव में ‘अरोरा आस्ट्रियालिस’ कहते हैं। सौर कलंकों से उठने वाले चुँबकीय तूफानों के विद्युत्कृत कणों को पृथ्वी का चुँबकीय क्षेत्र अवशोषित कर लेता है। इसी के परिणाम-स्वरूप पृथ्वी के उत्तर और दक्षिण ध्रुव पर प्रकाश के मनोहारी एवं सुँदर दृश्य दृष्टिगोचर होते हैं।

सौरकलंक में होने वाली अभिक्रियाओं से निकलने वाली किरणें पृथ्वी के आयनमंडल तक पहुँच जाती हैं। इससे पृथ्वी का भू-चुँबकीय क्षेत्र भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। सौर-हलचलों की अधिकतम तीव्रता हुए बिना नहीं रहता। सौर-हलचलों की अधिकतम तीव्रता पृथ्वी के आयनोस्फियर में उथल-पुथल मचा देती है। इस वजह से धरती में चुँबकीय तूफान आने की संभावना बढ़ जाती है। इससे रेडियो संचार में बाधा पड़ती है और विद्युत् आपूर्ति के अस्त-व्यस्त होने की आशंका रहती है। हमारी पृथ्वी कई बार इन घटनाओं का कटु अनुभव झेल चुकी है। इन खगोलीय घटनाओं से अनेक देशों में विद्युत् व्यवस्था ध्वस्त हो गई थी। इसी वजह से कनाडा का हाइड्रोक्यूबिक विद्युत् संयंत्र भी नष्ट हो गया था और कनाडा एवं अमेरिका के कई शहर घंटों अँधेरे के साये में डूबे रहे।

वर्तमान सौरकलंकों के बढ़ने की शुरुआत 1996 से हुई और मार्च 2000 में अपनी चरम सीमा पर रही। सूर्य पर जब चुँबकीय सक्रियता अधिक होती है, तो उसके आभामंडल में समरूपता रहती है, परंतु जब उस पर चुँबकीय सक्रियता कम होती है, तो उसके आभामंडल में अनेक ज्योति रेखाएँ नजर आती हैं, जो अंतर्ग्रहीय अंतरिक्ष में दूर तक प्रवेश कर जाती हैं। अमेरिका के नेशनल ओशनिक एण्ड एटमाँस्फेरिक एडमिनिस्ट्रशन के मौसम विज्ञानी गैरी हैकमेन का कहना है कि इस बार सौरचक्र में होने वाले विस्फोट और इसके कारण आने वाली किरणों का घातक तूफान पृथ्वी से एक लाख पचास हजार किलोमीटर दूर से गुजर गया, इसे एक दैवी कृपा ही कहा जा सकता है। अन्यथा अंतरिक्ष में स्थापित प्रायः सभी कृत्रिम उपग्रह और उन पर आश्रित आधुनिक उद्योग एक बड़ी दुर्घटना के शिकार हो जाते।

सूर्य में होने वाली ये सभी हलचलें व्यापक परिवर्तन की परिचायक हैं। वैज्ञानिकों का यह मानना है कि इन हलचलों के परिणामस्वरूप आने वाले समय में धरती पर बड़ी मात्रा में परिवर्तन होंगे। उनका कहना है कि धरती की आकृति तो वही रहेगी, पर प्रकृति पूरी तरह बदल जाएगी। इसे इक्कीसवीं सदी में होने वाले युगपरिवर्तन के रूप में भी देखा जा सकता है। “


विभूतिसंपन्न हिमालय

सिद्धि सामान्यतः किसी भी मनचाहे मनोरथ को पूरा करने की क्षमता को व्यक्त करती है, किंतु आध्यात्मिक एवं परामनोवैज्ञानिक क्षेत्र में इसका अर्थ और व्यापक एवं गूढ़ हो जाता है। यहाँ यह असाधारण एवं अद्भुत कार्यों को अंजाम देने की क्षमता की पर्याय है। जनसाधारण के अनुभव इनके सामने बौने सिद्ध होते हैं और बुद्धिजीवियों के तर्क-वितर्क भी असहाय महसूस करते हैं। उदाहरण के लिए, बिना ज्योतिष या अन्य सहारा लिए किसी व्यक्ति का भविष्य बता देना, बिना किसी साधन के मनचाही वस्तु उपस्थित कर देना, बिना औषधि के असाधारण रोग से मुक्त कर देना आदि सामान्यजन के लिए असंभव हैं और इन्हें सिद्धि की श्रेणी में रखा जाता है और इन्हें संपन्न करने वाला व्यक्ति सिद्धपुरुष कहलाता है।

पूर्वकाल में हमारे ऋषि विशिष्ट सिद्धिसंपन्न होते थे। किंतु कालक्रम के साथ इनका सर्वथा अभाव-सा होता गया। वर्तमान युग में भी ऐसे क्षमतायुक्त सिद्धपुरुष हुए हैं, जिन्होंने समय-समय पर अलौकिक क्षमताओं के अस्तित्व को प्रमाणित कर आधुनिक विज्ञान को सोचने व करने के लिए नूतन आधार दिया है और जगत् में इस संदर्भ में व्याप्त अनास्था के बादलों को भी छाँटा है। हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में आज भी ऐसे दिव्य आश्रम एवं तपस्थली हैं, जहाँ ऐसे सिद्धपुरुष तपस्या में लीन हैं व इनके लिए सिद्धियाँ तो मानो बायें हाथ का खेल हैं।

पुराणों में वर्णित हिमालय अवस्थित कालापग्राम ऐसा ही एक दिव्य आश्रम है, जहाँ हजारों सिद्ध-योगी सूक्ष्मशरीर में विचरण करते हैं और साधना में लीन हैं। यह आश्रम मानसरोवर और कैलाश से भी आगे स्थित है, जिसे स्थूल दृष्टि से देखा जाना संभव नहीं है। मात्र दिव्यदृष्टिसंपन्न कृपापात्र व्यक्ति ही इसका दर्शन कर सकते हैं। मीलों लंबा यह दिव्य क्षेत्र स्वयं में अद्वितीय है। यह ऋतु काल एवं वायुमंडल जैसे भौतिक कारकों से सर्वथा मुक्त है। यहाँ गरमी सरदी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कालप्रवाह के साथ विश्व में सृष्टि निर्माण एवं प्रलय कितनी बार हुआ, किंतु यह आश्रम अविचल रूप से स्थित है व इसके निवासी कालजयी हैं।

अनुभवी जनों के अनुसार वैदिक काल के वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कणाद, पुलस्त्य ऋषि आज भी इस स्थान पर सशरीर विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं। इस सिद्ध भू-भाग में महायोगी गोरखनाथ, जगद्गुरु शंकराचार्य आदि योगीजन भी विचरण करते हुए स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके अतिरिक्त कई अज्ञातनामा योगी भी यहाँ साधनारत हैं। कुछ योगी तो सैकड़ों वर्षों से यहाँ ध्यानस्थ हैं। केवल योगी, साधु और संन्यासी ही नहीं, अपितु संन्यासिनियों और योगिनियाँ भी इस कालापग्राम में विचरण करती हुई दिखाई देती हैं। यहाँ पर किसी प्रकार का छल, कपट, द्वेष, व्यभिचार आदि नहीं है, बल्कि साधना के क्षेत्र में उन्नत, प्रकृति के अज्ञात रहस्यों की खोज में सभी अपने आप में निमग्न हैं।

अनुभवी साधकों के अनुसार यहीं पर सिद्ध योग झील अपने आप में दिव्य, मनोहर और अद्वितीय है। मीलों लंबी प्रकृति निर्मित इस झील का पानी निरंतर बहता हुआ निर्मल, स्वच्छ और स्फटिक के समान है। शीतलता और पवित्रता की दृष्टि से यह जल अद्वितीय है। इस जल को स्पर्श करने से ही सारा शरीर दिव्य, पवित्र और अलौकिक हो जाता है। इस जल की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि इसमें स्नान करने से वृद्धता और रोग स्वतः समाप्त हो जाते हैं। सिद्ध योग झील के किनारे-किनारे स्फटिक से निर्मित नावें पड़ी हैं, जिन्हें खोलकर कोई भी योगी या साधक झील में विचरण कर सकता है। सारा प्रदेश सुगंधित पुष्पों से आच्छादित है। सारी धरती मखमली हरी दूब और द्रुमों से भरी है। असंख्य प्रकार के पुष्प खिले रहते हैं। जो हमेशा स्वस्थ, तरोताजा और सुगंधित बने रहते हैं। इस दिव्य क्षेत्र में यहाँ के कल्पवृक्षों के नीचे बैठकर साधक जो भी इच्छा करता है, वह उसी समय पूर्ण हो जाती है।

देश के कई उत्कृष्ट संन्यासी-योगी सिद्धाश्रम जा चुके हैं। स्वामी अखिलेश्वरानंद जी ऐसे ही एक सिद्ध संत थे, जिन्हें इस दिव्यभूमि का अनुभव रहा है। सिद्धियाँ उनके लिए महज खेल के समान थीं। ‘हिमालय के महायोगियों की गुप्त सिद्धियाँ’ नामक पुस्तक में इनके योग-चमत्कारों व सिद्धियों का विस्तार से वर्णन है। इनमें से बारह उल्लेखनीय सिद्धियाँ इस प्रकार से हैं-(1) परकाया प्रवेश सिद्धि, (2) आकाशगमन सिद्धि, (3) जलगमन प्रक्रिया, (4) हादि विद्या, जिसके माध्यम से बिना आहार ग्रहण किए वर्षों जीवित रहा जा सकता है। (5) कादि विद्या, इसके माध्यम से साधक या योगी कैसी भी परिस्थिति में अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है, उस पर गरमी-सरदी, बरसात, आग, हिमपात आदि का कोई प्रभाव नहीं होता। (6) काल सिद्धि, जिसके माध्यम से हजारों वर्ष पूर्व के क्षण को या घटना को देख सकता है, साथ ही आने वाले हजार वर्षों के कालखंड को जाना जा सकता है कि उसमें कहाँ-क्या घटित होने वाला है और वह किस प्रकार घटित होगा। (7) संजीवनी विद्या, जो शुक्राचार्य या कुछ अन्य ऋषियों को ही ज्ञात थी, इसके माध्यम से मृत व्यक्ति को भी जीवनदान दिया जा सकता है। (8) इच्छामृत्यु, इसके माध्यम से काल पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त होता है और साधक चाहे तो सैकड़ों-हजारों वर्षों तक जीवित रह सकता है। (9) कायाकल्प सिद्धि, जिसके माध्यम से व्यक्ति शरीर में पूर्ण परिवर्तन लाया जा सकता है, ऐसा परिवर्तन कि वृद्ध एवं रोगी व्यक्ति भी सुँदर, युवा, रोगरहित व स्वस्थ रूप ले सकता है। (10) लोकगमन सिद्धि, इसके माध्यम से पृथ्वी लोक में ही नहीं, अपितु अन्य लोकों में उसी प्रकार विचरण किया जा सकता है, जैसे कि हम वाहन द्वारा एक शहर से दूसरे शहर में जाते हैं। इसके माध्यम से व्यक्ति भू-लोक, भुवः लोक, स्वः लोक, महः लोक, जनः लोक, तपः लोक, सत्य लोक, चंद्र लोक, सूर्य लोक, पाताल और वायु लोक में भी जाकर वहाँ के निवासियों से मिल सकता है, वहाँ की श्रेष्ठ विद्याएँ प्राप्त कर सकता है। (11) शून्य साधना, इसमें प्रकृति से कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। खाद्य सामग्री, वस्तु, बहुमूल्य हीरे, जवाहरात आदि शून्य से प्राप्त कर मनोवाँछित सफलता एवं संपन्नता पाई जा सकती है। (12) सूर्य विज्ञान, इसके माध्यम से एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ में रूपांतरित किया जा सकता है।

सूर्य सिद्धाँत महर्षि पतंजलि का महत्त्वपूर्ण सिद्धाँत है। जिसे उन्होंने सबसे पहले स्पष्ट किया था। इसके बाद उनके शिष्य सुधन्वा, प्रियुकु देदेत्त्व आदि ने उसे आगे बढ़ाया। वर्तमान समय में भी निमिष, चैतन्य, लाहिड़ी, वरोचन, स्वामी विशुद्धानंद आदि इसमें निष्णात हुए हैं।

पतंजलि ने अपने सूत्रों में स्पष्ट किया है कि सूर्य की किरणों में विभिन्न रंगों से युक्त रश्मियाँ होती हैं, जिसका समन्वित रूप श्वेत है, जिसे विशुद्धात्मक तत्त्व कहा जाता है। इस श्वेत रश्मि को 24 कोणीय स्फटिक के माध्यम से ही पकड़ा जा सकता है। इस स्फटिक के प्रत्येक कोण एक-दूसरे से वर्तुलावस्था में होते हैं। जब सूर्य किरण इस स्फटिक लैंस पर पड़ती है, तो घनीभूत होती हुई एक वर्तुल से दूसरे वर्तुल में प्रवाहमान होती है और जब 24वें 222 में प्रवेश करती है, तो सर्वथा शुभ्र-स्वेत रंग की होकर रह जाती है और यह रश्मि निकलकर जिस पदार्थ पर पड़ती है, तो मनोवाँछित पदार्थ परिवर्तन हो जाता है। पत्थर को हीरे में बदला जा सकता है। सूर्य सिद्धाँत के ज्ञाता को यह ज्ञान होता है कि प्रकृति का कौन-सा पदार्थ कितने वर्तुलों से युक्त है। स्वामी अखिलेश्वरानंद जी इस सिद्धाँत का प्रयोग करते हुए अपने शिष्यों को दो मिनट में पत्थर से हीरा बनाकर दिखा देते थे।

अपनी पुस्तक ‘ए सर्च इन सिक्रेट इंडिया’ में पाश्चात्य खोजी मनीषी पाल ब्रंटन ने महायोगी स्वामी विशुद्धानंद जी का उल्लेख किया है, जो सूर्य सिद्धाँत के मर्मज्ञ थे। उनके पास सूर्य सिद्धाँत से हजारों प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त थीं। पतंजलि के ‘जायंतर परिणाम’ अर्थात् एक वस्तु को दूसरे में परिवर्तित कर देने की व्याख्या करते हुए उन्होंने इसका वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत किया है।

उनके अनुसार विश्व में हर जगह सत्ता मात्र रूप या शाश्वत रूप में सभी चीजें विद्यमान् हैं, पर सब व्यक्त नहीं हैं। जिस पदार्थ की मात्रा अधिक विकसित व अधिक प्रस्फुटित होती है वही व्यक्त होता है, वही दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए, लोहे का टुकड़ा मात्र लोहे का टुकड़ा नहीं होता, उसमें सब पदार्थ अव्यक्त रूप में उपस्थित रहते हैं। इसमें स्वर्ण तत्त्व भी विद्यमान् होता है, किंतु सूक्ष्म रूप में। किंतु यदि इसके विलीन भाव को प्रबुद्ध किया जाए और उसकी मात्रा बढ़ा दी जाए, तो लौह भाव दब जाएगा और स्वर्ण का विलीन भाव प्रबुद्ध होने से लोहे का टुकड़ा सोने का हो जाएगा।

वास्तव में न लोहा नष्ट हुआ और न सोने की नवीन सृष्टि हुई। दोनों पहले भी विद्यमान् थे और अब भी हैं। अंतर मात्र इनके अनुपात एवं घनत्व का है। इस अव्यक्त एवं व्यक्त के अंतर के ठीक-ठीक रहस्य व क्रिया-कौशल को जानकर किसी भी स्थान पर, किसी भी वस्तु का आविर्भाव किया जा सकता है। यही योग शक्ति के माध्यम से पदार्थ की सत्ता के रूपांतरण का रहस्य है और यही सूर्य विज्ञान की सहायता से भी किया जा सकता है।

एक पदार्थ को दूसरे रूप में रूपांतरण करना जहाँ सूर्य सिद्धाँत द्वारा संभव है, वहीं योगबल से भी इस कार्य को बिना किसी स्फटिक यंत्र का सहारा लिए किया जा सकता है। योगबल की व्याख्या करते हुए स्वामी अखिलेश्वरानंद ‘हिमालय के महायोगियों की गुप्त सिद्धियाँ’ पुस्तक में लिखते हैं, बाहर विश्व में सूर्य देदीप्यमान है, उससे करोड़ों गुना तेज और ताप लेकर एक सूर्य हमारे अंदर निहित है, किंतु उसका तेजस् एवं ताप बिखरा हुआ है। योग साधनाओं के माध्यम से इसकी रश्मियों को घनीभूत करके व नेत्रों के माध्यम से पदार्थ पर उनका प्रभाव डालकर मनोवाँछित पदार्थ में इसे रूपांतरित किया जा सकता है।

इसी प्रकार इस पुस्तक में परकाया प्रवेश, रोग निवारण, मृत्यु निवारण आदि के प्रयोगों का उल्लेख है। ऐसी ही एक विशिष्ट क्रिया है शून्य मार्ग से यात्रा की, जिसमें कुछ ही क्षणों में जितना चाहे उतना सामान लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा की जा सकती है। इस प्रक्रिया का गूढ़ रहस्य बताते हुए वे कहते हैं कि इसमें पूरे शरीर को नियंत्रित कर इड़ा व पिंगला को समन्वित करना होता है। ऐसा होते ही पूरा शरीर वायु से भी अत्यंत हल्का और वेगवान बन जाता है।

इस तरह हिमालय के योगियों की सिद्धियों का संसार अद्भुत एवं विलक्षण है, जो सहज ही विश्वसनीय नहीं लगता और पर्याप्त कौतुक एवं आश्चर्य का विषय बन जाता है। किंतु समय-समय पर प्रकट होने वाले प्रामाणिक संदर्भ इसके अस्तित्व पर मोहर लगाते रहते हैं। हालाँकि सिद्धियों की चकाचौंध में सामान्यतः जो पक्ष उपेक्षित-सा रह जाता है, वह है इससे अभिन्न रूप से जुड़ा साधना का पक्ष। साधना के साथ क्रमशः सिद्धियों का प्रस्फुटन भी शुरू हो जाता है, किंतु जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति में इनकी चकाचौंध को बाधस्वरूप मानकर हमेशा इनसे बचने का ही निर्देश रहता है। साधना की परिपक्व अवस्था में सिद्धपुरुषों और योगियों के लिए सिद्धियाँ कौतुक का विषय नहीं रहतीं, बल्कि अनुचर बनकर रह जाती हैं, जिनका उपयोग मात्र लोककल्याण के हित ही किया जाता है, जो भी हो, सिद्धियों का अस्तित्व अध्यात्म विज्ञान की असीम समर्थता को स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है।


राजपुरोहित के मतानुसार (Kahani)

राजस्थान के हीरालाल शास्त्री साधारण अध्यापक थे। उनने नौकरी से पेट पालते रहने की अपेक्षा नारी शिक्षा को जीवन का लक्ष्य बनाया और एक छोटे देहात में अपने बल-बूते छोटा कन्या विद्यालय चलाने लगे। लगन और उपेक्षा के आधार पर किए गए कामों में जमीन-आसमान जितना अंतर होता है। लगनपूर्वक चलाए गए कन्या विद्यालय की सार्थकता और लोकप्रियता आकाश चूमने लगी। समर्थन की कमी न रही। छप्पर के नीचे आरंभ किया गया वनस्थली बालिका विद्यापीठ देश की मानी हुई शिक्षण संस्थाओं में से एक है। शास्त्री जी के प्रति जनता की अपार श्रद्धा थी। लोकसेवा ने उन्हें राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित किया। उनकी स्मृति में डाक टिकटें तक छपीं। इस महान् उपलब्धि के पीछे लोकसेवा की प्रेरणा ही छिपी हुई थी।

काशिराज युवराज संदीप के विकास से संतुष्ट थे। वे प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाते, व्यायाम, घुड़सवारी आदि में प्रवृत्त रहते। समय पर अध्ययन और राजदरबार के कार्यों में रुचि लेना आदि सभी प्रवृत्तियाँ ठीक थीं। एक क्षण भी न गँवाते और न किसी दुर्व्यसन में उलझते, किंतु राजपुरोहित बार-बार आग्रह करते कि उन्हें कुछ वर्षों के लिए किसी संत के सान्निध्य में, आश्रम में रखने की व्यवस्था बनाई जाए। काशिराज सोचते थे कि राजकुमार को इसी क्रम में राजकार्य का अनुभव बढ़ाने का अवसर दिया जाए।

तभी एक घटना घटी। राजकुमार नगर भ्रमण के लिए घोड़े पर निकले। जहाँ वे रुकते, स्नेह भाव से नागरिक उन्हें घेर लेते। एक बालक कुतूहलवश घोड़े के पास जाकर पूँछ सहलाने लगा। घोड़े ने लात फटकारी और बालक दूर जा गिरा। उसके पैर की हड्डी टूट गई। राजकुमार ने देखा, हँसकर बोले, असावधानी बरतने वालों का यही हाल होता है, और आगे बढ़ गए। सिद्धाँततः बात सही थी, पर लोगों को व्यवहार खटक गया। काशिराज को सारा विवरण मिला, तो वे भी दुःखी हुए। राजपुरोहित ने कहा, महाराज! स्पष्ट हुआ है कि युवराज में संवेदनाओं का अभाव है। मात्र सतर्कता-सक्रियता के बल पर वे जनश्रद्धा का अर्जन और पोषण न कर सकेंगे। हो सकता है कभी क्रूरकर्मी भी बन जाएँ। अस्तु समय रहते युवराज की इस कमी को पूरा कर लिया जाना चाहिए। राजा का समाधान हो गया तथा उन्होंने राजपुरोहित के मतानुसार व्यवस्था कर दी।


गुरु के कोप ने दिखाई आत्मज्ञान की दिशा

वह जेठ की दुपहरी थी। तपिश और धूल के बवंडर के बीच किसी ने उसका द्वार खटखटाया। द्वार खोलने पर उसने देखा कि धूल से सना लिपटा एक साधु उससे कह रहा है, बेटा, मुझे प्यास लगी है, मुझे थोड़ा पानी पिला दें। साधु की बात सुनकर उसने अपनी विवशता बताते हुए कहा, “महाराज! मैं तो एक मुसलमान हूँ, मेरा नाम अफजल है। आप हिंदू साधु हैं। मेरे घर का पानी आप कैसे पी सकेंगे?”

“बच्चे! त्री सत्यवादिता से मैं प्रसन्न हुआ। पर मैं भेद-भाव को नहीं मानता। तू मुझे पानी पिला।” साधु ने उसकी ओर कृपापूर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा।

अफजल तुरंत कोठरी में जाकर जल लाया, साधु ने जल पीकर अपनी प्यास बुझाई और उसकी भक्ति एवं सत्यवादिता से प्रसन्न होकर उससे कहा, “बेटा! तू ने पूर्व जन्म में उत्तम कर्म किए हैं, जिसके फलस्वरूप ही मुझसे तेरी मुलाकात हुई है। मैं तुझे योग की दुर्लभ सिद्धियाँ देता हूँ, पर तू इनका उपयोग केवल परमार्थ कार्यों के लिए करना। अपने स्वार्थ के लिए इनका उपयोग कभी भूलकर भी न करना।”

मंत्रमुग्ध बने उस किशोर अफजल को सिद्धियों की प्रक्रिया समझाकर वह साधु वहाँ से अदृश्य हो गए। अफजल ने उस योग प्रक्रिया का बीस वर्षों तक निष्ठापूर्वक अभ्यास किया। उसके चमत्कारिक कार्यों ने दूर-दूर तक के लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उसकी सहायता के लिए एक अशरीरी आत्मा भी हर समय उसके साथ रहती थी, जिसे वह ‘हजरत’ के नाम से पुकारता था। यह अदृश्य आत्मा उसकी सभी इच्छाओं को पूरा कर देती थी।

समय बदला। अफजल के हृदय में अपनी सिद्धियों का अभिमान उत्पन्न हो गया। अभिमान के भयानक अँधेरे में फंसकर वह विपरीत मार्ग पर चलने लगा। अपने गुरु की अवज्ञा करके उसने अपनी सिद्धियों का दुरुपयोग करना प्रारंभ कर दिया। जिन-जिन पदार्थों को उठाकर वह पुनः रख देता, वे तुरंत अदृश्य हो जाते और उनका पता तक नहीं लगता। वह समय-समय पर वाहक के रूप में कलकत्ता के बड़े-बड़े जौहरियों की दुकानों पर जाता। वहाँ वह जिस वस्तु को स्पर्श कर लेता, वह वस्तु उसके दुकान से चले जाने के बाद अदृश्य हो जाती। ऐसे कौतुकों के कारण चारों ओर हाहाकार मच गया। उसके कारनामों से पीड़ित होकर जनता ने पुकार की, उसे पकड़ने की गुहार की। पर उसे बंदी बनाने में पुलिस असफल रही, क्योंकि उसके केवल यह कहने से कि ‘हजरत यह उठा लो’ समस्त प्रमाण गायब हो जाते, नष्ट हो जाते।

एक धनी व्यक्ति का उसके साथ परिचय हुआ और उसने उसे अपने यहाँ बुलवाया। उस समय अन्य लगभग बीस पड़ोसी भी वहाँ उपस्थित थे। उनके साथ महान् योगी लाहिड़ी महाशय के एक प्रमुख शिष्य भी वहाँ उपस्थित थे। अुजल ने उनकी ओर देखकर कहा, तेरे हाथ अत्यंत सुदृढ़ हैं। नीचे जाकर एक चिकना पत्थर लेकर उस पर अपना नाम लिखकर कहीं दूर फेंक दे।

उन्होंने वैसा ही किया। तत्पश्चात् अफजल ने उन्हें कहा, एक घड़ा लेकर सामने से गंगाजल भर ला। अफजल के कथनानुसार जब वे साधु गंगाजल से घड़ा भरकर ला रहे थे, तभी अफजल ने आवाज दी, “हजरत पत्थर को घड़े में डाल दो।” यह कहते ही पत्थर घड़े में आ गया। उसने देखा कि उनका नाम लिखा हुआ यह वही पत्थर है। अफजल के इस चमत्कार ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया।

उस समय एक बाबूजी भी इस आश्चर्य को देख रहे थे। उनकी घड़ी भी अफजल के स्पर्श करने के बाद अदृश्य हो गई थी। जब बाबूजी ने उससे बहुत निवेदन किया कि मेरी घड़ी बहुत कीमती है, मुझे लौटा दो, तब अफजल ने कहा, “तुम्हारी तिजोरी में पाँच सौ रुपये हैं, पहले तुम वे रुपये मुझे दो।” घबराया हुआ वह बेचारा अपने घर जाकर बताई गई रकम ले आया। तत्पश्चात् अफजल ने कहा, “तुम्हारे घर के पास जो पुल है, वहाँ जाकर हजरत को पुकारो कि मेरी घड़ी लौटाए।” उस व्यक्ति ने वैसा ही किया, तब घड़ी हवा में से उतरती हुई उसके दाहिने हाथ में आ गई।

इस घटना के पश्चात् अफजल ने उन सबको कहा कि आप लोग जो पेय पदार्थ पीना चाहें, बताएँ। हजरत वही पेय ला देंगे और सचमुच ही थोड़ी देर बाद प्रत्येक की अपनी इच्छानुसार दूध, विभिन्न फलों के रस आदि उन लोगों के पास उपस्थित हो गए।

इसके बाद भोजन की बारी आई। उनमें से कई लोगों का प्रस्ताव था, भोजन बहुत ही बढ़िया होना चाहिए और प्रत्येक खाद्यपदार्थ सोने की थालियों एवं सोने की प्लेटों व कटोरियों में परोसा जाना चाहिए। इसी के साथ प्रत्येक व्यक्ति ने अपनी-अपनी पसंद के खाद्य पदार्थ मँगवाने की इच्छा व्यक्त की।

अफजल ने अदृश्य हजरत को संबोधित किया और वहाँ अत्यंत कोलाहल हुआ और स्वादिष्ट सब्जी, पूड़ियाँ एवं अनेक प्रकार के फल तथा मेवों से भरी स्वर्ण की जगमगाती थालियाँ अतिथियों के समक्ष आ उतरीं। प्रत्येक पदार्थ असाधारण रूप से स्वादिष्ट था। घंटेभर से भी अधिक समय तक सबका भोजन चलता रहा और जब यह भोजनकार्य समाप्त हो गया तथा लोग जाने लगे, तब एक ध्वनि हुई। क्षणभर में वहाँ खाद्य सामग्री एवं सोने के बरतनों का नामों-निशान तक न रहा।

इस तरह अफजल अपने चमत्कारों से सबको मंत्र-मुग्ध कर देता था। उसे आत्मज्ञान तो न था, परंतु कतिपय यौगिक प्रक्रियाओं पर उसका प्रभुत्व था। जिससे सूक्ष्म लोक में प्रविष्ट हो सकने से उसकी प्रत्येक इच्छा तुरंत पूर्ण हो जाती थी। वह हजरत के माध्यम से किसी भी पदार्थ के अणुओं को खींच सकता था।

परंतु उस चमत्कारी अफजल के जीवन में एक दिन ईश्वरीय न्याय का दिन भी आ गया। उसे राह चलते एक लँगड़ा वृद्ध मिला। उस समय उसके हाथों में स्वर्ण का एक गोला था। अफजल ने ज्यों ही उस स्वर्ण के गोले का स्पर्श किया, वह गोला गायब हो गया। इस पर उस वृद्ध ने उसे पुकारा और कहा, “क्या तू मुझे नहीं जानता? तनिक देख मेरी ओर और पहचान मुझे।”

अफजल अवाक् रह गया, क्योंकि यह तो वही महात्मा थे, जिनने उसे बहुत समय पहले योग-दीक्षा दी थी। अफजल के द्वारा पहचानते ही वह वृद्ध व्यक्ति अपने मूल रूप में आ गया। वह उसे फटकारते हुए कहने लगा, “मैं देख रहा हूँ कि तूने अपनी शक्तियों का दुःखी मनुष्यों की सहायता के लिए उपयोग नहीं किया। बल्कि तू लोगों को लूटने में अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर रहा है। मैं अपनी समस्त सूक्ष्म शक्तियाँ अब तुझसे वापस ले रहा हूँ। अब हजरत भी तुझसे अलग हो गया है।”

यह सुनकर अफजल उस योगी के चरणों में गिर पड़ा और बोला, “हे मेरे गुरुदेव! आपने मेरा भ्रम दूर कर दिया। मैं आपका अत्यंत उपकार मानता हूँ। मैं अपनी समस्त अभिलाषाओं को त्याग करने का वचन देता हूँ और अपने दुष्ट कृत्यों का प्रायश्चित करने के लिए मैं पहाड़ों की कंदराओं में चला जाऊँगा।”

अफजल के सच्चे पश्चात्ताप से द्रवित होकर योगी ने कहा, “तेरे द्वारा आज्ञापालन एवं प्रायश्चित करने की प्रतिबद्धता से प्रसन्न होकर मैं तुझे वरदान देता हूँ कि तेरी अन्य सिद्धियाँ तो लुप्त हो गई हैं, परंतु अपने भोजन एवं वस्त्रों की आवश्यकता के लिए तू हजरत को आज्ञा प्रदान कर सकेगा और तेरी आज्ञा पूर्ण होगी। तू आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए हिमालय की कंदराओं में चला जा, भगवान् तुझे अवश्य सफलता प्रदान करेंगे।”

इसी के साथ वह योगी अदृश्य हो गया। अफजल के पाँव भी अपनी नई यात्रा की ओर बढ़ चले। उस अब ज्ञात हो चुका था कि सच्ची सिद्धि तो बस आत्मज्ञान ही है। जिसका दुरुपयोग कभी भी संभव नहीं है। वह यह भी अनुभव कर रहा था कि गुरु के कोप में भी कृपा ही है।


Quotation

मनुष्य का पौरुष जहाँ लड़खड़ाता है, वहाँ गिरने से पूर्व ही सृजेता के लंबे हाथ असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए अपना चमत्कार प्रस्तुत करते दिखाई पड़ते हैं। यही है स्रष्टा का लीला-अवतरण, प्रकटीकरण।”

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


सच्ची सफलता हेतु कुछ अनिवार्य शर्तें

सफलता मात्र संयोग का नाम नहीं है। यह दृष्टिकोण का परिणाम है। नीतिपूर्वक चलकर ही सच्ची सफलता अर्जित की जा सकती है। इस राह पर प्राप्त असफलता भी उतनी ही श्रेष्ठ एवं वरेण्य है। सफलता एक अनुभव है। सफलता कोई रहस्य नहीं, वरन् कुछ बुनियादी नियमों का सतत पालन करने का सुखद परिणाम है। इसके विपरीत असफलता कुछ गलतियों को लगातार दुहराने का नतीजा है।

अर्ल नाइटिंगेल के अनुसार, “मूल्यवान् लक्ष्य की लगातार प्राप्ति का नाम ही सफलता है।” सफलता सतत प्रयास का नाम है। सफलता एक सफर है, मंजिल नहीं। मंजिल या लक्ष्यप्राप्ति के पश्चात् ठहर जाना सफलता का अंत है। लक्ष्य मिलने पर एक सुखद अनुभव होता है। सफलता इसी अनुभूति का विषय है। इसे अंदर अहसास किया जा सकता है। सफलता का सफर लक्ष्य की मूल्यता के महत्त्व पर निर्भर करता है। यदि लक्ष्य उत्कृष्ट एवं ऊँचा है, तो सफलता भी उतनी ही महान् एवं पावन होगी। यही सफलता की कहानी है, परंतु यह कहानी पूर्णता और संतोष के बिना अधूरी है।

श्रेष्ठता का प्रयास ही सफलता है। संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे सुधारा या सुगढ़ नहीं बनाया जा सकता। पूर्णता की प्राप्ति एक असंभव तो नहीं, हाँ, दुष्कर लक्ष्य हो सकता है। परंतु श्रेष्ठता पाई जा सकती है। श्रेष्ठता में सफलता समाहित है। इस प्रयास हेतु संघर्ष की आवश्यकता पड़ती है। सफलता संघर्ष के बिना नहीं मिल सकती। बिना संघर्ष कठिनाइयों से जूझने की कला सिखाता है। आत्मविश्वास तभी जग सकता है, जब मुसीबतों व कठिनाइयों का सामना किया जाता है, उनको जीता जाता है। कष्ट-कठिनाइयाँ जीवन का अपरिहार्य अंग हैं। इनसे जूझना ही संघर्ष है। विजेता कभी मायूस एवं निराश नहीं होता। वह संघर्षरत रहता है। संघर्ष ही सफलता है। हर चीज आसान होने से पहले कठिन होती है। कठिनाइयों से नहीं भागना चाहिए। इसलिए कहा गया है, “शाँत समुद्र में नाविक कभी कुशल नहीं बन पाता।”

सच्ची सफलता का मापदंड है उचित कार्य को उचित ढंग से पूर्ण करना और अपने लक्ष्य को प्राप्त करना। जीवन में सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि दूसरों की तुलना में हम क्या कर रहे हैं। हमारी सफलता तो इस तथ्य पर आधारित है कि हम अपनी क्षमताओं की तुलना में क्या कर रहे हैं। सफल व्यक्ति स्वयं से लड़ा करते हैं। वे अपने ही कार्यों में सदैव सुधार लाते हैं और प्रगति करते हैं। सफलता का मानदंड प्राप्त ऊँचाई नहीं हो सकती, वरन् यह इस बात से तय होता है कि हम गिरकर कितनी बार उठते हैं। गिरकर बार-बार उठने की शक्ति ही सफलता का पथ प्रशस्त करती है।

सफलता का पथ दुष्कर नहीं तो सरल भी नहीं है। इस पथ पर अनेक मुसीबतें आती हैं। ये मुसीबतें हैं, अहंकार, सफलता-असफलता का डर, योजना की कमी, लक्ष्य का अभाव, जिंदगी का बदलाव, विश्वास की कमी, आर्थिक असुरक्षा, असह्य पारिवारिक दायित्व, दिशाहीनता, अकेलेपन का अहसास, सारा बोझ स्वयं उठाना, क्षमता से अधिक स्वयं को बाँधना, प्रशिक्षण, दृढ़ता व प्राथमिकता की कमी। इन कठिनाइयों को पार करके ही सफलता का सेहरा सिर पर बँधता है।

सफलता के लिए आवश्यक है दृढ़ मनःस्थिति की। किसी स्थिति में हम अपने आपको कैसे सँभालते और ढालते हैं, उसी से हमारी सफलता तय होती है। असफल दो प्रकार के होते हैं, वे जो करते तो हैं, परंतु सोचते नहीं। दूसरे वे जो सोचते तो हैं, परंतु कुछ करते नहीं। सोचने-विचारने की क्षमता का प्रयोग किए बिना जीवन जीना ठीक उसी तरह है जैसे बिना निशाने के तीर चलाना।

सफल नहीं हो पाने के कई कारण हैं। चुनौती स्वीकारने में झिझक भी एक वजह है। जीवन में खतरे भी आते हैं, उनसे डरना सफलता के लिए घातक है। खतरा उठाने वाले सदैव सतर्क व सजग होते हैं और असफलता उनके पास नहीं फटकती। सतत प्रयास-पुरुषार्थ के अभाव से असफलता हाथ लगती है। जब कठिनाइयाँ भारी पड़ती हैं, तो पलायन सबसे आसान तरीका नजर आता है। विजेता बारंबार असफलता के बावजूद हार नहीं मानता। अधिकतर लोग ज्ञान और प्रतिभा की कमी से नहीं हारते, बल्कि वे इसलिए हार जाते हैं कि क्योंकि वे भाग खड़े होते हैं। सफलता का रहस्य है सतत कोशिश और विरोध। राल्फवाल्डो इमर्सन के शब्दों में कहें तो कोई व्यक्ति इसलिए नायक नहीं होता कि वह किसी और से ज्यादा बहादुर है, वरन् दूसरों की तुलना में दस मिनट ज्यादा दिखाता है।

असफलता के कारणों में आते हैं, तुरंत इच्छापूर्ति, प्राथमिकताओं की कमी, कामचोरी, स्वार्थ और लालच। लालच का अंत नहीं है। स्वाभिमान की कमी से लालच पैदा होता है। लालच झूठा अहंकार, आडंबर, दिखावा, प्रदर्शन या बराबरी की आदत के रूप में दिखाई देता है। स्वार्थी और लालची व्यक्तियों के जीवन में सच्ची सफलता कभी नहीं आ सकती। विश्वास का अभाव भी असफलता का एक कारण है। यह साहस और आत्मविश्वास की कमी द्योतक है। ऐसे लोग दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए दूसरों के साथ चलते हैं। वे दूसरों की नजर में अच्छा रहने के लिए जान-बूझकर गलत काम करते रहने को मजबूर होते हैं। दृढ़ विश्वास आस्था से उपजता है। आस्था के बिना सभी कार्य दिवास्वप्न के समान होते हैं। आस्था चमत्कार का इंतजार नहीं करती। परंतु उसे साकार बनाती है। इसी वजह से हेनरी फोर्ड ने कहा है अगर आप सोचते हैं कि आप कर सकते हैं या आप यह सोचते हैं कि आप नहीं कर सकते, तो आप दोनों ही तरह ठीक हैं।

प्रकृति या ईश्वर के नियमों को समझने का अभाव भी असफलता का कारण बन सकता है। परिवर्तन एवं बदलाव प्रकृतिप्रदत्त नियम हैं। हर प्रगति एक बदलाव है, परंतु हर बदलाव एक प्रगति नहीं है। अतः परिवर्तन या बदलाव को जाँच-परखकर स्वीकारना चाहिए। असफलता के कारणों में योजना बनाने और तैयारी करने की अनिच्छा भी आती है। इस परिप्रेक्ष्य में विंस लिंबार्डी का कथन बड़ा ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है। उनके अनुसार जीतने की इच्छा सभी में होती है, परंतु जीतने के लिए तैयारी करने की इच्छा बहुत कम लोगों में होती है। सफलता और असफलता के बीच वही अंतर है, जो बिलकुल सही और लगभग सही में है।

किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए पूरी तैयारी करना आवश्यक है। इसके लिए जरूरी है, उद्देश्य, सिद्धाँत, योजना, अभ्यास, सतत प्रयास, धैर्य और गर्व। इसी से पूरी तैयारी होती है। तैयारी का तात्पर्य है अपनी गलतियों से सीख लेना। किसी त्रुटि एवं भूल को सुधारने का सबसे अच्छा तरीका है, जल्दी ही गलती स्वीकारना, उस पर अड़े न रहना, उससे सीखना, उसे दुहराना नहीं और न बढ़ाना और न दूसरों पर दोषारोपण करना। बहानेबाजी, अवसरों को पहचानने में अयोग्यता, डर, अनुशासन की कमी, कमजोर स्वाभिमान, ज्ञान का अभाव, भाग्यवादी दृष्टिकोण, उद्देश्य की कमी, साहस का अभाव भी असफलता के कारणों में आते हैं। इन कारणों को दूर करके ही सफलता का सौभाग्य प्राप्त किया जा सकता है।

असफलता के गर्भ से ही सफलता रूपी शिशु का जन्म होता है। इसी वजह से टाम वैटरसन कहते हैं, “जब भी असफलता की दर दुगुनी या इससे अधिक होने लगती है, तो समझना चाहिए कि सफलता मिलने वाली है।” बस इससे जूझने हेतु साहस सँजोने की आवश्यकता भर है। सफलता की कहानियाँ बड़ी असफलता की कहानियाँ भी होती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने असफलता के तप्त रेगिस्तान में सफलता रूपी भव्य महल खड़ा किया था। लिंकन हजार बार असफल हुए, परंतु उन्होंने हार नहीं मानी।

1913 में जी.डी. फारेस्ट ने ट्रायोड ट्यूब का आविष्कार किया। इस आविष्कार के पूर्व उन्हें बारंबार असफलता मिली और धोखाधड़ी जैसा कठोर आरोप भी लगाया गया। 10 दिसंबर 1903 के न्यूयार्क टाइम्स के संपादकीय में ‘राइट ब्रदर्स’ की समझ पर सवालिया निशान लगाया गया था। परंतु वे इस उलाहने एवं असफलता से निराश नहीं हुए थे और वायुयान की खोज की थी। 65 साल की उम्र में कर्नल सैंडर्स के पास एक पुरानी कार और सोशल सिक्यूरिटी से प्राप्त मात्र 100 डॉलर थे। उन्होंने इनसे कुछ करने की इच्छा की । हजारों दरवाजे खटखटाए, तब उन्हें पहला खरीददार मिला। असफलता के इस दौर में वे कभी निराश व हताश नहीं हुए। इसी के परिणामस्वरूप आज केंटुकी, फ्रायड चिकन के नाम से विख्यात है।

युवा कार्टूनिस्ट वाल्ड डिस्नी के कार्टूनों को अत्यंत निम्नस्तरीय माना जाता था। वे हिम्मत नहीं हारे और उन्होंने अंततः मिनी हाउस की परिकल्पना की। महान् वैज्ञानिक थामस एडीसन के जीवन में भी हजारों बार असफलता का अंतहीन दौर आया था, परंतु इसके आगे उनने घुटने नहीं टेके। संसार को रोशनी देने वाली बिजली का बल्ब उन्हीं के आविष्कार का नतीजा है।

सफल व्यक्ति छोटे-छोटे कार्यों को ही कुशलता एवं धैर्यपूर्वक करते हैं। वे किसी महान् कार्य के इंतजार में नहीं बैठे रहते। हेनरी फोर्ड ने जो पहली कार बनाई थी, उसमें ‘रिवर्स गेयर’ डालना ही भूल गए थे। फिर वे चालीस साल की उम्र में दीवालिया हो गए थे। उन्होंने सफलता पाने के लिए अथक् परिश्रम एवं धैर्य को बनाए रखा और उसे पाया। युवा बीथोवन से कहा गया था कि उसमें संगीत की प्रतिभा नहीं है। उन्हीं बीथोवन ने संगीत की सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ करके संसार को आश्चर्यचकित कर दिया।

जीवन में असफलताएँ तो सच्ची सहचरी हैं। इनका स्वागत करना चाहिए। ये विनम्रता, संयम और धैर्य की शिक्षा देती हैं। कष्ट-कठिनाइयों में प्राप्त साहस और विश्वास असफलता से जूझने और उबरने में सहायता प्रदान करता है। व्यक्ति को सदैव कठिन परिस्थितियों से ऊपर उठकर जीना व जीतना सीखना चाहिए।

सफल होने के लिए कई गुणों की आवश्यकता पड़ती है। दृढ़ इच्छा शक्ति से सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है। नैपोलियन हिल का कहना है कि इंसान जो सोच सकता है और जिसमें विश्वास करता, वह उसे प्राप्त भी कर सकता है। प्रतिबद्धता सफलता का आवश्यक गुण है। निष्ठा और बुद्धिमता प्रतिबद्धता बनाने के दो दृढ़ आधार हैं। यहाँ पर निष्ठा का अर्थ है, नुकसान वह क्षति होने पर भी अपना कार्य पूरा करना। बुद्धिमत्ता का तात्पर्य है कि ऐसे गलत कार्य ही न करना।

सफलता के लिए जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। सच्चरित्र व्यक्ति जिम्मेदारियों को स्वीकारते हैं। वे अपना फैसला स्वयं करते हैं और अपने जीवन को दिशा भी स्वयं ही देते हैं। सफलता इतनी सहज एवं सरल नहीं है कि यूँ ही अनायास संयोग से मिल जाए। इसके लिए कड़ी मेहनत की जरूरत है। मेहनत अपने आप में प्रारंभ भी है और अंत भी। कठोर मेहनत ही सफलता की कुँजी है। पैराडाइज लास्ट लिखने के लिए मिल्टन प्रतिदिन प्रातः चार बजे उठ जाते थे। उन्होंने वर्षों तक यह परिश्रम किया। नोहा वैबस्टर को वैबस्टर डिक्शनरी का संकलन करने में छत्तीस वर्ष लगे। चार्ल्स डार्विन ने अपनी प्रख्यात कृति ‘ओरिजीन ऑफ स्पिशीज’ बीस वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद पूर्ण की थी।

चरित्र सफलता का अपरिहार्य गुण है। चरित्र व्यक्ति के नैतिक मूल्यों, विश्वासों और शख्सियत से मिलकर बनता है। जॉर्ज वाशिंगटन कहते हैं, मैं उम्मीद करता हूँ कि मुझमें सदैव इतनी दृढ़ता और चारित्रिक गुण हों कि मैं एक ईमानदार व्यक्ति के रूप में जाना जा सकूँ। यह मेरे संसार के किसी भी महत्त्वपूर्ण पद-प्रतिष्ठा से बढ़कर है। चिंतन की उत्कृष्टता सफलता का एक अंग है। सही सोच क्षमताओं का भरपूर उपयोग करने में सहायक होती है। सच्चा विश्वास इसी सोच से कई गुना बढ़कर है। सच्चा विश्वास आत्मविश्वासी होने का दृष्टिकोण है। यह व्यापक तैयारियों से ही उपलब्ध होता है।

सच्ची सफलता के लिए शर्त है कि जितना पाएँ उससे अधिक प्रदान करें। देने वाले का कोई प्रतियोगी नहीं होता। वह स्वयं ही प्रतियोगी बन जाता है। इससे ईर्ष्या-द्वेष का भाव नहीं पनपता और न ही उसके बढ़ते कदमों का कोई प्रतिकार करता है। यह गुण किसी भी डिग्री से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। इसके अलावा साहस का संबल, प्रभु समर्पित कर्म, सतत जिज्ञासु प्रवृत्ति सफलता के सूत्र हैं। इन सूत्रों द्वारा व्यक्ति सफलता का दरवाजा खटखटा सकता है एवं सफलता के भव्य भवन में प्रवेश कर सकता है।

सफलता के कुछ मुख्य उपाय हैं, जिंदगी जीने के लिए है हार के लिए नहीं, सदैव दूसरों की गलतियों से सीखना, चरित्रवान् व्यक्तियों के साथ संबंध बनाना, पाने की अपेक्षा देने की सोचना, बिना कुछ दिए कभी पाने का प्रयास नहीं करना। दूरगामी सोच, विवेक एवं साहस के साथ कदम बढ़ाना और बढ़ाकर कभी वापस न लेना - सफलता का सूत्र है। सफलता प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को अपनी ईमानदारी के साथ कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए।


इसके पास शब्द नहीं (Kahani)

एक यहूदी अनपढ़ था और ग्रामीण भी। प्रायश्चित पर्व पर सबको प्रार्थना करते देखकर वह भी बैठ गया और वर्णमाला के अक्षरों का ही पाठ करता हुआ भावना करने लगा, “हे प्रभु! मुझे तो कोई मंत्र याद नहीं, इन अक्षरों को जोड़कर तुम्हीं मंत्र बना लेना। मैं तो तुम्हारा दास हूँ, पूजा के लिए नए भाव कहाँ से लाऊँ?” जब तक दूसरे लोग प्रार्थना करते रहे, वह ऐसे ही भगवान् का ध्यान करता रहा।

सायंकाल जब सब सामूहिक प्रार्थना में सम्मिलित हुए, तो धर्मगुरु रबी ने उस ग्रामीण को भक्तों की अग्रपंक्ति में रखा। यह देखकर साथी ने आपत्ति की, “श्रीमान जी! इसे तो मंत्र भी अच्छी तरह याद नहीं।” “तो क्या हुआ” रबी ने आर्द्र कंठ से कहा, “इसके पास शब्द नहीं, भाव तो हैं।”


मानवी काया पर कब्जा

अबाबीलों और चमगादड़ों की ऐसी प्रकृति है कि वह जहाँ कहीं भी खाली-परित्यक्त मकान देखते, वहीं अपना अड्डा जमा लेते हैं, जैसे वह उन्हीं के लिए निर्मित हुए हों। इस प्रकार की प्रवृत्ति मृतात्माओं में भी देखी जाती है। वे हीन मनोबल वालों या मृत देहों में ऐसे प्रवेश कर जाती हैं, मानो वे उनके ही घोंसले हों।

इस तरह की घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं। एक प्रसंग मेलबोर्न का है। ‘दि माइंड्स ऑफ बिली मिलिगन’ नामक कृति में इसका वर्णन करते हुए डेनियल की लिखते हैं कि एक बार बिली मिलिगन नामक एक युवक बलात्कार केस में गिरफ्तार हुआ। पुलिस पूछताछ में ऐसा लगा, जैसे वह मानसिक रोगी हो। अस्तु, उसकी मनःचिकित्सकों से जाँच करवाई गई। वहाँ मामला कुछ और निकला। पड़ताल में उसे बहुव्यक्तित्व वाला आदमी घोषित किया गया। उसकी देह में तेईस आत्माओं का कब्जा था। उनमें से एक आत्मा यूगोस्लाव थी, जो सर्बो क्रोट भाषा बोलती थी। मिलिगन ने जीवन में कभी यह भाषा नहीं सीखी थी, परंतु जब वह उक्त आत्मा के अधीन होता, तो वह यह भाषा धाराप्रवाह बोलता। सब इसे सुनकर अचरज करते। उसके शरीर में एक अन्य लेस्बियन आत्मा का निवास था। मिलिगन ने बलात्कार का जो अपराध किया था, वह इसी के वश में आकर किया था। यों मिलिगन की मूल सत्ता एकदम सरल प्रकृति की और सदाचार पसंद थी।

विविध व्यक्तित्व संबंधी एक अन्य घटना का बखान करते हुए फ्लोरा रीटा स्क्रीबर अपनी पुस्तक ‘दि डिवाइडेड सेल्फ’ में लिखती हैं कि कई बार इस तरह के अनेकानेक व्यक्तित्व किसी आदमी के अंदर से तब उभरकर सामने आते हैं, जब बचपन या यौवन में उसके साथ कोई अप्रिय प्रसंग घटित हुआ हो। वे लिखती हैं कि ऐसे अनेक पुरुषों और महिलाओं के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि इन घटनाक्रमों से वे हीन भावना का शिकार हो जाते हैं, उनका मनोबल बुरी तरह टूट जाता है, वे आत्मविश्वास की कमी अनुभव करने लगते हैं। यही बाहरी सत्ताओं के प्रवेश की अनुकूल अवस्था है। उनका मत है कि ऐसे ही अधिकाँश शरीरों में बाहरी आत्माओं का निवास होता है। अपने उक्त ग्रंथ में उनने एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख किया है, जिसके चौदह व्यक्तित्व थे। उसमें एक साथ चौदह सत्ताओं का आधिपत्य था। सब बारी-बारी से उस पर अधिकार जमाती और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के उपराँत निष्क्रिय हो जातीं। वह बताती हैं कि इन चौदह आत्माओं में से एक आत्मा किसी साहित्यकार की थी। इसके अतिरिक्त चित्रकार, संगीतकार, भवन निर्माता, कृषक, इंजीनियर एवं प्राध्यापक जैसी सत्ताएँ उनमें सम्मिलित थीं। रोचक बात यह थी कि जब कोई आत्मा उसमें अभिव्यक्त होती, तो वह अपना काम पूर्ण करके ही विराम लेती थी। एक बार कृषक आत्मा ने उस पर लंबे समय तक अधिकार जमाए रखा। इस दौरान उसे खेती विषयक बात के अतिरिक्त और कुछ नहीं सूझता। वह खेती के तरीकों और बारीकियों पर ही बातें किया करता। जब तक यह सत्ता उस पर हावी रही, कृषि करता रहा। संबंधियों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता कि जिस व्यक्ति को खेती संबंधी तनिक भी ज्ञान नहीं और जिसे इसमें थोड़ी भी रुचि नहीं, वह अचानक इसमें कैसे रस लेने लगा और उसे इतनी सूक्ष्म जानकारी अकस्मात् कहाँ से आ गई? चित्रकार आत्मा जब उस देह में सक्रिय हुई, तो वह उच्चकोटि के चित्र और पेंटिंग बनाने लगा। कभी वह भवन निर्माण का विशेषज्ञों जैसा कार्य करने लगता, तो यदा-कदा ऐसे विद्वत्तपूर्ण निबंध लिख डालता, जिसकी उस जैसे साधारण ज्ञान वाले व्यक्ति से कल्पना नहीं की जा सकती। कुल मिलाकर उसका जीवन बड़ा ही कठिनाई पूर्ण रहा। वह जब तक जीवित रहा, इनसे मुक्ति नहीं पा सका। उसकी सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि वह अपने हिसाब से उनका कभी भी उपयोग नहीं कर सका। इसके विपरीत वह उनके वशवर्ती बना रहा और उन्हीं की इच्छानुवर्ती कार्य करता रहा। उल्लेखनीय बात यह थी कि वह समस्त सत्ताएँ एक परिवार की तरह उस शरीर में रहती थीं। जब ई.ई.जी. लिया गया, तो आश्चर्यजनक ढंग से उसकी तरंगीय गतिविधियाँ भिन्न-भिन्न थीं। एक मस्तिष्क में अनेक ‘ब्रेन पैटर्न्स’ सह चिकित्सा जगत् के लिए एक अजूबा था, कारण कि मस्तिष्कीय शैली भी ‘फिंगर प्रिंट’ की तरह बिलकुल व्यक्तिगत होती है और एक का मस्तिष्कीय नमूना दूसरे से सर्वथा पृथक् होता है। वैज्ञानिक इस गुत्थी को अंत तक नहीं सुलझा सके और यही कहते रहे कि चिकित्सा विज्ञान के लिए यह मामला एक गूढ़ रहस्य है।

भारतीय दर्शन इस तथ्य को स्वीकारता है कि देहरहित सत्ताएँ दूसरे के शरीरों को अपना माध्यम बनाकर ऐसे-ऐसे क्रिया कृत्य कर सकती हैं, जो सामने वाले को अचंभे में डाल दे। प्रेत, पिशाच, जिन्न जैसी निकृष्ट स्तर की आत्माएँ तो बदले की भावना से प्रेरित रहती हैं। वे न तो स्वयं चैन से रहती हैं, न औरों को शाँतिपूर्वक रहने देती हैं। जिस शरीर को आधार बनाती हैं, उसके जीवन को नारकीय बनाकर रख देती हैं। उनका मुख्य प्रयोजन ही सताना होता है। इसके विपरीत यदि उच्चस्तरीय आत्माओं को कभी ऐसी भूमिकाओं में संलग्न होने की जरूरत पड़ी, तो उनका रुख पूरी तरह सहयोगात्मक ही होता है। दूसरों को ऊँचा उठाना, आगे बढ़ाना और मार्गदर्शन करना ही इसके पीछे का प्रधान लक्ष्य होता है। शरीर में रहते हुए भी वे परोपकारवृत्ति में निरत रहती हैं और शरीर छूटने के उपराँत भी उसकी मनःस्थिति वैसी ही पवित्र बनी रहती है, जबकि विक्षुब्ध आत्माएँ जीते-जी अशाँत बनी रहती हैं और मरकर भी उस मनोदशा से उबर नहीं पातीं। इस संसार में इस स्तर की कितनी ही सूक्ष्म सत्ताएँ मौजूद हैं। डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी, राकिनी, ब्रह्मराक्षस, बेताल आदि इसी श्रेणी में आते हैं। तंत्र शास्त्र की संपूर्ण नींव इन्हीं पर टिकी है। अभिचार, कृत्या, घात, मूठ, चौकी जैसी ताँत्रिक क्रियाओं के माध्यम से जब इन शक्तियों को किन्हीं लक्ष्यों पर प्रक्षेपित किया जाता है, तो वह आज्ञाकारी सेवक की तरह अपने कार्य संपादन में लग जाती हैं। इसे कोरा बकवास नहीं, सुस्थापित तथ्य कहना चाहिए। समय-समय पर इसके उदाहरण सामने आते ही रहते हैं।

ऐसे ही एक प्रकरण की चर्चा करते हुए मार्क्स फ्रीडम लाँडग अपनी पुस्तक ‘दि सीक्रेट साइंस बिहाइंड मिरैकल्स’ में लिखते हैं कि सन् 1917 में वे जब पहली बार एक अध्यापक के रूप में हवाई द्वीप गए, तो वहाँ के मूल ‘हुना’ धर्म की उन्हें जानकारी मिली। इसमें मृत्युदायक प्रार्थना की एक बहुचर्चित प्रथा है, जो तब आम थी। जब किसी पर इस प्राणघातक प्रार्थना का प्रयोग किया जाता है, तो सर्वप्रथम उसके पैरों में एक चुभन का अनुभव होता, जो बाद में सुन्न में परिवर्तित होकर पाँवों को चेतनाशून्य बना देती है। पीछे यह सुन्नता पैरों से ऊपर की ओर बढ़ते हुए संपूर्ण काया को अपना शिकार बना लेती है। इसके उपराँत उस व्यक्ति की मौत हो जाती है। सुनने में यह बात बेतुकी प्रतीत हो सकती है, पर जब मैक्स ने होनेलूलू के क्वीनस अस्पताल में इसकी पड़ताल की, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि वहाँ इस प्रकार के मरीज प्रतिवर्ष एक, दो या कभी-कभी अधिक की संख्या में आ जाते हैं। उन्हें अच्छी-से-अच्छी चिकित्सकीय सेवाएँ देने के बावजूद भी डॉक्टर किसी को भी बचा पाने में अब तक सफल नहीं हो सके हैं। जानकार लोग इसका कारण उस शैतान सत्ता को बताते हैं, जिसे ऐसा करने के लिए ही प्रेरित प्रक्षेपित किया जाता है। एक बार वहाँ का एक मंत्री इस विद्या के विशेषज्ञ ‘काहुना’ के कुचक्र में पड़ गया। उसने अपनी काहुना विद्या का प्रयोग कर उसके साथी मंत्रियों को एक-एक कर मारना शुरू किया। इससे परेशान होकर उस मंत्री ने स्वयं इसे सीखा और उस काहुना पर इसका प्रयोग कर उसे मार डाला। यह सारा प्रसंग मंत्री की डायरी से मैक्स को विदित हुआ।

विलियम टफ्ट्स ब्रायघम नामक एक डॉक्टर उक्त विद्या पर काफी खोज-अध्ययन किया है। इसमें उस घटना का भी उल्लेख है कि किस प्रकार उनके साथ रहने वाला एक स्थानीय बालक इसकी चपेट में आया और कैसे डॉ. ब्रायघम ने उसे मौत के मुँह से बाहर निकाला। घटनाक्रम का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि एक बार वे उस लड़के के साथ एक पर्वत पर कुछ खोजबीन के लिए जा रहे थे, तभी उसने पाँवों में सुन्नता की शिकायत की। स्पष्ट था, वह मृत्युदायी प्रार्थना का शिकार हो चुका था। पूछताछ से ज्ञात हुआ कि वहाँ के स्थानीय काहुना ने उसे किसी गोरे के साथ काम न करने की चेतावनी दी थी और इसकी उपेक्षा करने पर मृत्यु की सुनिश्चित संभावना भी प्रकट की थी। बाद में बालक इस बात को भूल गया। आज उसी का परिणाम उसे भुगतना पड़ रहा था।

बालक की इस आकस्मिक विपत्ति का दोषी ब्रायघम स्वयं को मान रहे थे, अतएव उसे बचाने का उपाय करना भी उसका कर्त्तव्य है, यह सोचकर वह उस बालक पर झुक गए और उक्त आत्मा को संबोधित कर कहने लगे कि यह लड़का निर्दोष है। इसकी कोई गलती नहीं। आप दयावान् और कृपालु हैं। निर्दोषों की रक्षा करना आपका धर्म है। दोषी तो वास्तव में वह काहुना है, जिसने भ्रमित कर आपको यहाँ भेजा। आप, जो इस कार्य का वास्तविक अपराधी है, वहीं जाएँ और इस बालक को मुक्त कर दें।

इस प्रकार लगभग एक घंटे तक प्रार्थना करने के उपराँत उस आत्मा ने बालक को अपने चंगुल से आजाद कर दिया। अब वह पूर्ववत् स्थिति में आ गया। उसे एक बार फिर अपने पाँवों की अनुभूति होने लगी, सुन्नता समाप्त हो गई। वह सामान्य ढंग से चलने-फिरने में पुनः समर्थ हो गया। पहाड़ से लौटकर ब्रायघम ने जब उसके गाँव में उक्त काहुना का पता लगाया, तो ज्ञात हुआ कि आज ही उसकी मृत्यु हो गई। मरने से पहले उसने गाँव वालों को बताया कि वह गोरा व्यक्ति मृत्युदायी आत्मा को उसकी ओर वापस लौटाने में सफल हो गया। चूँकि वह इससे बचने के लिए कोई आवश्यक कदम नहीं उठा सका, अतः उसे इसका नतीजा अब भोगना ही पड़ेगा। इसके कुछ घंटे पश्चात् उसमें मृत्युदायी प्रार्थना के असर के लक्षण उभरने लगे और उसकी मौत हो गई।

यह एक प्रकार का ताँत्रिक अभिचार हुआ। इसमें वशवर्ती आत्माओं को निश्चित निर्देशों का पालन करना पड़ता है। जैसी आज्ञा हुई, उसी अनुरूप कार्य करते हुए वे लक्ष्यपूर्ति करती हैं। इसमें ननुनच करने या अनख दिखाने जैसी छूट उन्हें नहीं होती। वे एक तरह की गुलाम होती हैं और आदेशों का परिपालन उनकी मजबूरी।

किंतु जो आत्माएँ स्वेच्छा से किसी कलेवर में प्रवेश करती हैं, वे उसके जीवन से छेड़छाड़ और हास-परिहास तो करती हैं, पर प्राणहरण जैसी नौबत नहीं आने देतीं। ऐसी ही एक घटना का वर्णन काँलिन विल्सन अपने ग्रंथ ‘बियोण्ड दि अकल्ट’ में करते हैं। प्रसंग मैरी रीनोल्ड्स नामक एक लड़की का है। एक प्रातः जब वह सोकर उठी, तो वह अपनी संपूर्ण स्मृति खो चुकी थी। अब वह एक नवजात शिशु की तरह थी। उसकी काया भले ही एक किशोरी की थी, पर मानसिक स्तर शिशुओं जैसा अविकसित। उसे बोलना फिर से सीखना पड़ा। व्यवहार-बर्ताव की भी उसको शिक्षा देनी पड़ी। पाँच सप्ताह बाद वास्तविक मैरी फिर से उस शरीर में प्रकट हुई। उसे इस दौरान की किसी भी गतिविधि की जानकारी नहीं थी। संपूर्ण जीवन बारी-बारी से दोनों मैरी उस देह में इसी तरह आती-जाती रहीं। उसके माता-पिता इस संबंध में कभी भी आश्वस्त नहीं हो सके कि रात सोकर सुबह उठने वाली मैरी कौन होगी, वही या दूसरी? दोनों के स्वभाव एक-दूसरे के विपरीत थे, इसलिए उनकी पहचान आसानी से हो जाती थी। मूल मैरी एक सुस्त किस्म की लड़की थी, जो अक्सर अवसाद में चली जाती। इसके विपरीत दूसरी मैरी चंचल और शैतान थी। प्रथम मैरी को प्रकृति से कोई लगाव नहीं था, दूसरी मैरी इसका भरपूर आनंद उठाती।

मिलती-जुलती एक अन्य घटना कैलीफोर्निया की एक अट्ठाइस वर्षीया युवती की है। वह भी मैरी रीनोल्ड्स की ही तरह चार वर्ष की अवस्था से व्यक्तित्व परिवर्तन की शिकार थी; किंतु यहाँ एक अद्भुतता यह थी कि यह परिवर्तन नियमित रूप से हर चौथे वर्ष ही घटित होता था, किसी अन्य वर्ष नहीं। दोनों सत्ताएँ एक-दूसरे से अनभिज्ञ थीं। एक जब शरीर में होती, तो दूसरी को उस अवधि की घटनाओं की बिलकुल ही जानकारी नहीं होती।

जब वह चार वर्ष की थी, तो प्रथम बार उसकी देह पर दूसरी सत्ता ने अधिकार जमाया। फिर वह आठ वर्ष की उम्र में जगी। इस मध्य मूल सत्ता सुषुप्त बनी रही, इसलिए उसे इस कालक्रम का कोई ज्ञान नहीं। बारह वर्ष की आयु में वह पुनः तंद्रा की दशा में चली गई और बाहरी सत्त फिर से सक्रिय हो उठी। जब वह इस मूर्च्छा से जगी, तो सोलह साल की हो चुकी थी। यहाँ भी वास्तविक सत्ता शाँत और दब्बू प्रकृति की थी, जबकि उस पर कब्जा जमाने वाला बाहरी अस्तित्व आक्रामक था।

इससे छुटकारा दिलाने के लिए उसे सम्मोहित किया गया। सम्मोहनकर्त्ता ने बाहरी सत्ता को शरीर छोड़ देने की आज्ञा दी, पर इसका कोई असर नहीं हुआ। तब उसने दोनों व्यक्तित्वों को मिलकर एक हो जाने की सलाह दी। इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला। एक दिन युवती सम्मोहन क्रम में गहन मूर्च्छा की स्थिति में चली गई। इसी समय एक तीसरा नर स्वर उसके भीतर से उभरा। वह स्वयं को उन दोनों का अभिभावक बता रहा था। उसे दोनों के बारे में संपूर्ण जानकारी थी। उसने यह भी कहा कि दोनों दो भिन्न सत्ताएँ हैं और एक ही शरीर का उपयोग कर रही हैं। सम्मोहनकर्त्ता के यह कहने पर कि यदि दूसरी सत्ता ने शरीर नहीं त्यागा, तो वह लड़की को आजीवन सम्मोहन की अवस्था में बनाए रखेगा, उसने जवाब दिया कि तब वह दूसरी सत्ता सहित मूल सत्ता को भी वापस खींच लेगा और उसकी निष्प्राण देह ही शेष पड़ी रहेगी। हारकर उसे उसकी स्थिति पर छोड़ देना पड़ा। वह अंत तक दोहरे व्यक्तित्व वाला जीवन जीती रही।

व्यक्तित्व यदि दब्बू हो, वह मनोबल की दृष्टि से कमजोर हो तथा जीवन के संघर्षों से पराजित हो चुका हो, तो उस पर कोई भी हावी हो जाता है। अतृप्त आत्माएँ भी ऐसे ही शरीरों पर सवार होतीं और अपनी आकाँक्षाएँ पूरी करती हैं। दबंग आदमी से हर कोई डरता है। इसके लिए उसे ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती। उसकी निर्भीकता ही सामने वाले को यह आभास दे जाती है कि यहाँ टकराना खतरे से खाली नहीं है और वह किनारा कर लेता है। उसके लिए यही सरल और सुरक्षित है। हमारे लिए उचित यह है कि हम अपने अंतस् को बलवान बनाएँ और जीवन-संघर्ष को यह मानकर चलें कि वह टक्कर मार-मारकर घूँसों को मजबूत बनाने जैसा अभ्यास है। उसमें सबलता ही बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में निर्बलों को न 222 तंग कर सकेंगी, न मनुष्य ही।


यम-नियम-7 (संतोष) - शिकायत करना छोड़ें, प्रसन्न रहें


Quotation

1. उपलब्ध परिस्थितियों को भगवान् का अनुग्रह मानकर प्रसन्न रहना।

2. जहाँ तक हो सके अपनी साधन-संपदा की तुलना दूसरों से नहीं करना।

3. क्षुब्ध और निराश करने वाली स्थितियों से बचना।

आधे-अधूरे प्रयत्नों से जो मिल जाए उसी में मन मार कर रह जाना और श्रेष्ठ के लिए प्रयत्न छोड़ देने का नाम -संतोष’ नहीं है। वैराग्य के नाम पर ईश्वर की ललित-ललाम इस सृष्टि को कोसने वाले उपदेशक लौकिक उपलब्धियों को दिन-रात कोसते रहते हैं। उनके अनुसार किसी भी लौकिक उद्देश्य के लिए संकल्प करना पाप है, मन में किसी इच्छा का उदय होना आध्यात्मिक अपराध है और व्यक्ति संसार में जितना व्यस्त रहता है, ईश्वर से उतना ही दूर होता जाता है। इस तरह के निराशावादी विचारों के साधकों ने दुःख का आत्यंतिक निरोध करने वाले योग को संसार से पलायन की प्रेरणा देने वाला शास्त्र बना दिया है।

पतंजलि ने जिस संतोष को योग की तैयारी के चरण में रखा है, चित्तवृत्तियों को निर्मल और अनुशासित वाले उपायों के रूप में सम्मिलित किया है, वह वैराग्य का नहीं अनुग्रह का भाव है। उद्देश्य है किन्हीं भी कठिनाइयों, विपत्तियों और विफलताओं में चित्त को विक्षुब्ध नहीं होने देना। संतोष का शाब्दिक अर्थ तुष्टि है, मन का तृप्त हो जाना। कुछ और स्पष्ट करते हुए मनीषियों ने इसे ‘तृष्णा’ का सर्वथा अभाव बताया है। तृष्णा का अभाव एक स्थिति है। उसे प्राप्त करने का लक्ष्य योगशास्त्र के आचार्यों ने रखा है। स्थिति तक पहुँचने के लिए जिस मार्ग का आश्रय लेना चाहिए, उसमें पहली आवश्यकता प्रसन्न रहना है। हमें जो भी परिस्थितियाँ उपलब्ध हैं, उन्हें ईश्वर का अनुग्रह मानकर प्रसन्न रहें।

संतोष का अर्थ है, जो उपलब्ध है, उसके लिए ईश्वर को धन्यवाद देना। सामान्य बुद्धि से भी यह समझा जा सकता है कि हम जो कुछ हैं, वह अपने प्रयत्नों से ही नहीं हैं। अपना अस्तित्व यदि निजी पुरुषार्थ के कारण ही टिका रह सकता, तो वर्तमान स्थिति और सामर्थ्य के अनुसार कभी संभव ही नहीं था। अनुग्रह-बोध को गहन करने के लिए जिस चिंतनधारा को अपनाया जाता है, उसमें साधक कुछ इस तरह सोचता है, जिस प्राणवायु के बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रहा जा सकता, वह हमने स्वयं नहीं बनाई। संसार में अपने आस-पास और शरीर के भीतर भी वायु तथा आकाश का जैसा विस्तार है। वह बना सकना तो दूर, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। शरीर के भीतर और बाहर वायु के दबाव, गुरुत्वाकर्षण, गति देने वाली जैविक प्रक्रियाएँ, पोषण देने वाले उपादानों में से अपना बनाया कुछ भी तो नहीं है। यह विराट् अस्तित्व के ही अनुग्रह का फल है। आस्तिक भाषा में इसे ईश्वर की कृपा कहेंगे।

अनुग्रह-बोध की भावधारा अपने अस्तित्व के लिए विराट् जगत् या ईश्वर को श्रेय देते हुए आगे बढ़ती है, तो सोचती है कि मेरा अपना जीवन तक स्वयं के चाहने से नहीं है। अपने से इतर सत्ताएँ स्वीकार कर रही हैं, इसलिए वह टिका हुआ है। कुछ लोग भी तय कर लें कि इसका अस्तित्व नहीं होना चाहिए, तो अपने लिए संकट खड़ा हो जाएगा। यह भावधारा मन में कातरता या असहाय होने का भय नहीं, विनम्रता का कोमल संवेग जगाती है। अपना अस्तित्व ईश्वर की कृपा से ही दिखाई दे रहा है, दूसरे लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं, तो भी ईश्वर का अनुग्रह है और संसार में निर्वाह हो रहा है, तो भी परमसत्ता की करुणा है। इस चिंतन को अपनाने के बाद दैन्य-दुर्बलता टिकी नहीं रह सकती। विनम्रता के साथ एक सात्विक संतुलन बना रहने लगता है।

तृष्णा, वासना, कामना आदि विकारों का मूल कारण भी अभाव ही है। अंतरंग में बँध जाने वाली यह गाँठ व्यक्ति को अपने दीन-दुर्बल होने की चुभन से पीड़ित करती रहती है। साधक जब सोचता है या उसके मन में भाव आता है कि इसके पास औरों की तुलना में साधनों की बेहद कमी है। वैभव कम है, संपदा कम है, यश नहीं मिल रहा, पद-प्रतिष्ठा नहीं है, तो वह दुःखी होता है। अभाव क्यों दिखाई देता है? जब दूसरों से तुलना करते हैं, तभी अभाव दिखाई देता है। मनुष्य के अलावा कोई और प्राणी अभाव का रोना नहीं रोता, क्योंकि उसके पास तुलना करने वाली सोच नहीं है।

तुलना की आदत एकदम नहीं छूट सकती, इसका अभ्यास धीरे-धीरे ही किया जा सकता है। आरंभ अपने स्वजन-संबंधियों से किया जाए। स्पर्द्धा और ईर्ष्या भी सबसे पहले अपने परिजनों में ही होती है। दूर रहने वाले या जो अपने संपर्क क्षेत्र में नहीं हैं, उनसे लोग कम ही तुलना करते हैं। हजारीबाग में रहने वाला रामकिशोर सिंह मुँबई में रहने वाले किसी उद्योगपति से न तो तुलना करेगा और न ही उसकी प्रगति से दुःखी होगा। वह अपने पड़ोस में परचून की दुकान करने वाले रिश्तेदार श्याम सिंह की बिक्री बढ़ते देख या उसके मकान में एक और कमरा बन जाने पर दुःखी हो जाएगा। किसी स्वजन-संबंधी के तरक्की करने पर मन में तुलना का भाव आता है। इस आदत पर अंकुश लगाया जा सके, तो संतोष की सिद्धि की दिशा में एक पक उठ गया समझना चाहिए।

दूसरों के बजाय अपने आप से तुलना का नियम भी बनाया जा सकता है। वह आत्मविकास की दिशा में अग्रसर करती है। कल हम जिस स्थिति में थे, उससे आज कितना आगे बढ़े हैं? पिछले साल की तुलना में इस साल साधन-संपदा में कितना विकास हुआ है? आज की स्थितियाँ पिछली स्थितियों से कितनी बेहतर हैं? इन प्रश्नों के साथ अपनी स्थिति की समीक्षा की जाए, तो अगले प्रश्न यह भी रहेंगे कि और बेहतर बनने के लिए क्या किया जाए? अपने आपसे स्वयं की तुलना करते हुए वर्तमान स्थितियों और साधनों के श्रेष्ठ उपयोग की बात भी सोचनी चाहिए। उसके उपाय ढूँढ़ने चाहिए, योजना बनानी चाहिए, किन लोगों का सहयोग लिया जा सकता है, यह भी विचार करना चाहिए। ध्यान रहे, ये प्रयत्न मानसिक व्यायाम तक ही नहीं रह जाएँ। चिंतन मनन के बाद जो निर्धारण हो, उस पर अमल भी किया जाए। यह निर्धारण किसी और के साथ मिलकर नहीं, स्वयं ही करना चाहिए। तुलना और समीक्षा का यह अभ्यास संतोष की सिद्धि तक पहुँचाएगा।

महर्षि पतंजलि ने संतोष की फलश्रुति बताई है कि उसके सिद्ध हो जाने पर साधक जो भी इच्छा करता है, वह पूरी हो जाती है। वह आप्तकाम हो जाता है अर्थात् कामना उठते ही पूरी होने लगती है। यह फलश्रुति कथा-कहानियों में बताए जाने वाले चमत्कारों की तरह नहीं है कि साधक ने इधर इच्छा की कि महल में रहने लगूँ और उधर महल बनकर तैयार हो गया। इस तरह के चमत्कार दुनिया में कहीं नहीं होते। वे कल्पना में ही होते हैं। वास्तविक जगत् में भी उसी तरह के चमत्कार होने लगें, तो यह संसार एक क्षण भी नहीं रहे। दिनभर में हम लोग जितना दूसरों को कोसते हैं और दूसरे हमें जितना कोसते हैं, वह सब सही होने लगे, तो प्रत्येक व्यक्ति को दिनभर में हजारों-लाखों बार मरना और पतन के गर्त में गिरना पड़े। कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर इच्छाएँ हाथों-हाथ पूरी होने की स्थिति किसी भी सिद्धि के अंतर्गत नहीं आती।

योगशास्त्र एक विज्ञान है। योगसूत्रों के संबंध में तो विद्वान् आचार्य ही नहीं वैज्ञानिक भी मानते हैं कि वे गणित के फार्मूलों की तरह हैं। उनमें एक भी शब्द व्यर्थ नहीं है और न ही कोई आश्वासन लुभाने के लिए दिया गया। संतोष की सिद्धि इच्छा करते ही उसके पूरी हो जाने के रूप में की गई है, तो उसका अर्थ इतना है कि व्यक्ति तृष्णा, वासना, ईर्ष्या और द्वेष के ज्रलों में नहीं भटकता। इनके नुकीले और काँटेदार पत्तों में उलझने की बजाय वह अपने विकास के राजपथ पर चलता है। सार्थक और उचित इच्छाएँ ही उसके मन में उठती हैं। उन्हें पूरी करने के लिए वह सोचता, योजना बनाता और प्रयत्न करता है।

उत्साह और संतोष लौकिक और आध्यात्मिक दोनों ही दिशा में आगे बढ़ने के लिए उपयुक्त भूमिका बनाते हैं। वस्तुतः लौकिक और आत्मिक क्षेत्र अलग नहीं हैं, जिस बिंदु पर हमारी चेतना खड़ी है वहीं की प्रस्थान दिशाओं के नाम हैं। परम अवस्था में पहुँचने के बाद इस तरह के भाषा-विवेक की आवश्यकता नहीं पड़ती। साधना की अवस्था ये समझने के लिए ही है कि जब हम प्रस्थान बिंदु से जगत् की ओर यात्रा करते हैं, तो वह लौकिक हो जाता है और अपने भीतर मुड़ते हैं, तो आत्मिक हो जाती है।

संतोष की सिद्धि के लिए क्षुब्ध और निराश करने वाली स्थितियों से बचने का परामर्श दिया गया है। स्थितियों का अर्थ उन व्यक्तियों से भी है, जो हमारे मन, सोच और संकल्प को प्रभावित करते हैं। वह वातावरण भी छोड़ना चाहिए या उससे बचना चाहिए, जो अपने आप को क्षुब्ध करता हो। मन में निराशा भरता हो। क्षोभ और निराशा भी ईश्वर के प्रति अविश्वास का ही एक प्रकार है। जितनी देर हम निराश होते हैं, उतनी देर ईश्वर के मंगल विधान पर संदेह करते हैं। अपने विश्वास को डगमगा रहे होते हैं अपने उस विश्वास को सदैव स्थिर रखना चाहिए।


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यदि परमार्थपरक जीवन जीने का, एक-दूसरे को सहयोग देने का मार्ग अपनाया जाए, तो प्रतिक्रिया स्वरूप जनसहयोग एवं लोकसम्मान स्वतः मिलने लगेगा। सद्भाव पाने का एक ही मार्ग है-शिष्टाचार की पृष्ठभूमि पर टिका पारस्परिक सहकार।


विज्ञान की विकास यात्रा के साथ उठते कुछ प्रश्न

नई सहस्राब्दी में 3 से 7 जनवरी सन् 2001 को नई दिल्ली में भारतीय विज्ञान काँग्रेस का महाधिवेशन हुआ। इस महाधिवेशन का यही निष्कर्ष निकाला गया कि विज्ञान ने मानव समाज को अद्भुत एवं चमत्कारिक अनुदान प्रदान किए हैं। अंधविश्वासों से डरा-घिरा मानव वैज्ञानिक सोच पाकर स्वतंत्र एवं खुशहाल जिंदगी जी पाया है। वैज्ञानिक उपलब्धियों से भौतिक जीवन को एक नया आयाम मिला है। इससे रहन-सहन, आहार-व्यवहार और दर्शन में व्यापक बदलाव आ गया है। आज विज्ञान के बिना जीवन की गतिविधियाँ अधूरी प्रतीत होती हैं। विज्ञान ने दूरियों को घटाकर संसार को एक गाँव में तब्दील कर दिया है।

पश्चिमी दुनिया में कोपरनिकस ने एक नई वैज्ञानिक सोच की शुरुआत की थी। इस सोच की देकार्ते और आइंस्टीन ने व्यापक व्याख्या करके अद्भुत सूत्र रूप में पिरोया। इससे विज्ञान ने आधुनिक युग में प्रवेश किया। उच्च प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी यात्रा इन्हीं प्रयोगों के पश्चात् ही प्रारंभ हुई तब से आविष्कारों का सिलसिला ऐसा चला कि रुकने का नाम ही नहीं लेता।

आविष्कारों की यह कथा सही मायने में इटली के वैज्ञानिक गैलीलियो के जमाने में शुरू हुई थी। उन्होंने 1610 ई. में ऐ ऐसा टेलीस्कोप तैयार किया, जिसकी सहायता से किसी भी चीज को हजार गुना बड़ा देखा जा सकता था। अगले दो सौ साल तक इस उपकरण को परिष्कृत कर स्पेक्ट्रोस्कोप बनाया गया। इसके द्वारा न केवल ब्रह्माँड के दूसरे ग्रह-नक्षत्रों को देखा जा सकता था, बल्कि आकार के बारे में भी अनुमान लगाया जा सकता है।

सत्रहवीं शताब्दी में ब्रिटिश वैज्ञानिक और गणितज्ञ आइजक न्यूटन द्वारा प्रतिपादित गुरुत्वाकर्षण सिद्धाँत और गति के नियम मील के पत्थर साबित हुए। 1687 में न्यूटन ने ‘प्रिंसिपिया मैथेमेटिका’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रह्माँड में प्रत्येक पिंड एक दूसरे पिंड को अपनी ओर आकर्षित करता है और साथ ही प्रत्येक पिंड अपनी यथास्थिति भी बनाए रखने का प्रयास करता है। न्यूटन ने गति के तीन नियमों की व्याख्या भी की।

विज्ञान ने इस मुकाम तक पहुँचने से पहले कई दूसरे पड़ावों को भी पार किया। 1289 में उत्तल चश्मों का आविष्कार इटली के एक व्यक्ति द्वारा किया गया। सोलहवीं शताब्दी के अंत में नीदरलैंड के जेड जैनसन ने माइक्रोस्कोप की खोज की। सत्रहवीं शताब्दी में वैज्ञानिक विकास के चरणों में और तेजी आई। 1621 में स्लाइड रुल की खोज हुई एवं 1623 में विल्हेम शिकार्ड द्वारा अनुफलक निर्मित किया गया। 1644 में टाँरिसेल ने बैरोमीटर का विकास किया। 1656 में अमेरिकी विज्ञानी सी. हायगन्स ने लोलक घड़ी का एवं 1698 में ब्रिटेन के थामस सेवरी ने स्टीम इंजन का आविष्कार किया।

इस बीच चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भी कतिपय जानकारियाँ उपलब्ध हुईं। 1316 में इटली के मानडिनो ने पहली बार शारीरिक संरचना के बारे में बताया। 1648 में बेल्जियम के ज्याँ बैप्टिस्ट वैन हेलमंट ने जीव रसायन शास्त्र की स्थापना की एवं 1683 में ल्यूवेनहुक ने बैक्टीरिया की खोज की।

अठारहवीं सदी में विज्ञान के कई और आयाम खुले। 1725 में चीन में मापिनी घड़ी बनी। 1735 में ब्रिटेन के हैरिसन द्वारा क्रोनोमीटर का आविष्कार किया गया। 1765 में वाष्प इंजन का कंडेंसर विकसित हुआ, जिसे ब्रिटेन के जेमन वाट ने खोजा। 1766 में कैवडिश ने हाइड्रोजन का पता लगाया। 1769 में फ्राँसीसी वैज्ञानिक निकोलस कुगनोट ने वाष्प-कार का निर्माण किया। 1780 में बाइफोकल लैंस, 1783 में गुब्बारा, 1785 में पावरलूम, 1787 में टेलीग्राफ का आविष्कार हुआ। फ्राँस के ए.जे. गारनेरिन ने 1797 में पैराशूट का निर्माण कर मनुष्य को हवा में कुलाचें मारने की विद्या सिखाई।

इसी सदी में ही 1768 में जान हंटर ने प्रायोगिक और शल्य पैथालॉजी की नींव डाली। 1798 में ब्रिटेन के एडवर्ड जेननर ने टीके की खोज की। इस सदी के अंत में एंटमोलॉजी का स्वरूप सामने आ चुका था।

उन्नीसवीं सदी में विज्ञान के चमत्कारपूर्ण आविष्कारों एवं उपलब्धियों ने मानव समाज को आश्चर्यचकित कर दिया। इस सदी की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ थीं, बिजली का बल्ब, रेडियो, सिनेमा, फोटोग्राफी, टेलीफोन आदि।

1800 में इटली के विज्ञानी वोल्टा ने बैट्री की खोज की। 1804 में ब्रिटेन में इंजन का निर्माण हुआ। 1805 में ब्रिटेन में ही इलेक्ट्रोप्लेटिंग की तकनीकी विकसित हुई। 1807 में अमेरिकी वैज्ञानिक फुलर्टन ने पहली बार स्टीमबोट बनाई। 1808 में इटली के पी. टैरी ने टाइपराइटर का आविष्कार किया। 1824 में स्काटलैंड के जॉर्ज स्टफेंसन ने रेलवे इंजन का आविष्कार किया। 1816 में सेफ्टी लैंप, 1817 में डेंटल प्लेट, 1824 में ब्रिटेन में पोर्टलैंड सीमेंट की खोज हुई। 1824 में इटली के स्टरजियन ने विद्युत् चुँबक का आविष्कार किया। इसी वर्ष ब्रिटेन के डाँ. एम. एम. ट्यूरिंग ने इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर का निर्माण किया। 1826 में माचिस का अन्वेषण हुआ।

इन्हीं दिनों किसी हँसते-गाते क्षण को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने हेतु फोटोग्राफी को विकसित किया गया। 1830 में लुईस डेगुएरे ने कॉपर प्लेट का इस्तेमाल करते हुए सर्वप्रथम फोटोग्राफिक विधि विकसित की। उस विधि से किसी भी चित्र का मात्र एक प्रिंट ही बन सकता था। इसी दौरान ब्रिटेन के विलियम फाँक्स टालबोट ने कलोटाइप का निर्माण किया। इसकी सहायता से नेगेटिव इमेज बनाना संभव हुआ, जिसका पॉजिटिव चित्र प्रिंट किया जा सकता था। सबसे पहले अमेरिकी नागरिक एडुविर्या मुब्रिज ने मानवों और अन्य जानवरों के फोटो लिए।

1831 में माइकल फैराडे ने डायनेमो का अनुसंधान किया। 1834 में फ्राँस में ए.एम. एम्पियर ने गैल्वेनोमीटर का आविष्कार किया। 1837 में अमेरिका में टेलीग्राफिक संकेत की खोज हुई। 1842 में मैकमिलन ने साइकिल का निर्माण किया। 1843 में ब्रिटिश वैज्ञानिक ए. बैन ने फैक्स मशीन को विनिर्मित किया। 1852 में फ्राँसीसी विज्ञानी हेनरी गिफ्फार्ड ने वायुयान का अन्वेषण किया। 1861 में अलेक्जेंडर पार्क्स ने सेल्यूलायड का एवं डॉ. गैटलिंग ने मशीनगन का निर्माण किया।

1864 में अमेरिका के जे. ग्राम ने विद्युत् मोटर की खोज की। इसी वर्ष अमेरिकी वैज्ञानिक लूनिस द्वारा रेडियो टेलीग्राफी का आविष्कार किया गया। 1876 में अमेरिका के ग्राहम बेल ने टेलीफोन का आविष्कार कर सबको हैरत में डाल दिया। बेल टेलीफोन कंपनी ने सबसे पहले लंबी दूरी की टेलीफोन लाइन बिछाई। यह लाइन न्यूयार्क और बोस्टन के बीच थी। 1856 में पहला टेलीफोन केबिल डाला गया। उस समय केबिल के माध्यम से मात्र 26 काल एक समय में आते-जाते थे।

महानतम आविष्कारों में से एक एडीसन ने 1877 में ग्रामोफोन का एवं 1878-79 में बिजली के बल्ब का आविष्कार किया। इसके बाद एडीसन बिजली से सारे शहर को रोशन करने के उपायों पर काम करते रहे और 1882 में 85 ग्राहकों को एक ही जेनरेटर से बिजली की रोशनी दी।

1885 में फ्राँस के एल. प्रिंस ने फिल्म की खोज की। इस दिशा में पहल करते हुए फ्राँस के ई. जूल्स मैरी ने मूविंग पिक्चर कैमरा तैयार कर लिया। इस कैमरे से 12 तस्वीरें प्रति सेकेंड खींची जा सकती थीं। तत्पश्चात् काइनेटोस्कोप से तस्वीरों में चलने-फिरने का अहसास होने लगा। 1895 में फ्राँस के लुईस और एगस्ते लुमिएरे नामक दो भाइयों ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर सिनेमा का प्रदर्शन किया। परंतु सही मायने में फिल्म बीसवीं सदी में बनकर आई। 1927 में फिल्में बोलने लगीं और 1930 में इनमें रंग भी भर गया।

1885 में जर्मनी के जी. डैमलर ने मोटरसाइकिल का निर्माण कर आवागमन को सहज-सरल बनाया। 1888 में जर्मनी में पेट्रोल कार का आविष्कार कर इस दिशा में एक और कदम बढ़ाया। इसी वर्ष ब्रिटेन के एक टैस्ला ने इलेक्ट्रीक मोटर ए.सी. की खोज की। इस क्षेत्र में एक और महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ 1895 में जब जर्मनी के आर. डीजल ने डीजल इंजन का निर्माण करने में सफलता पाई। 1895 में उब्ल्यू. के. रोटेजेन ने एक्स रे की खोज की।

उन्नीसवीं सदी में चिकित्सा जगत् में मारफीन की खोज प्रारंभ हुई और इसके अंत तक प्रतिरक्षा विज्ञान ने भी विकास कर लिया था। इस बीच रेने लैनके का स्टेथोस्कोप, जेम्स सिंपसन का क्लोरोफार्म, लुई पाश्चर द्वारा रेबीज के टीके विकसित किए जाने की उपलब्धियाँ महत्त्वपूर्ण रहीं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध यानि 1872 में जर्मनी के फर्डिनान कोव को माइक्रोबायोलॉजी का जनक कहा गया। कुष्ठ रोग एवं हैजे के वायरस, मलेरिया और डिप्थीरिया के वायरस को खोज निकाला गया। अतः 1892 में वायरोलॉजी नाम से चिकित्सा विज्ञान की नई शाखा की शुरुआत हुई। अंततः हार्मान के क्षेत्र में भी अनुसंधान प्रक्रिया चल पड़ी।

बीसवीं सदी तो विज्ञान का युग है ही। इस सदी में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास हर क्षेत्र में हुआ है। इस सदी के आविष्कारों ने तो जैसे इतिहास को ही बदल डाला। चाँद की धरती में मानव का पहला कदम पड़ा एवं मंगल की सतह पर रोबोट उतारे गए। परंतु इसी सदी में मानवनिर्मित अणु बम विस्फोट से मानवजाति को भीषण संहार सहना पड़ा। इस घटना ने सभी को यह महसूस करने के लिए मजबूर किया कि वैज्ञानिक याँत्रिकता के साथ आध्यात्मिक भावनाओं का समागम एक अनिवार्य आवश्यकता है।

इस सहस्राब्दी के आखिरी चरण बीसवीं सदी में विज्ञान, कंप्यूटर एवं टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में इतना विकास हुआ है कि अगर इसे इससे पहले समस्त ज्ञात मानव विकास को सम्मिलित रूप से एक ओर कर दिया जाए, तो भी यह उस पर भारी पड़ेगा। इसी विकास के साथ मनुष्य ने इक्कीसवीं सदी में प्रवेश किया है। परंतु इसी विकास के साथ एक और प्रश्न खड़ा हो जाता है कि विज्ञान ने मनुष्य को जितनी अपार साधन-सुविधाएँ दी हैं, क्या मनुष्य उसे प्राप्त कर सुख-शाँति को वरण कर सका है? इस प्रश्न का एकमात्र हल है विज्ञान एवं अध्यात्म का गठजोड़। इस महासंबंध को स्थापित करने के बाद जो भी शोध-अनुसंधान होंगे, वे मनुष्य को सच्चे विकास की ओर ले जाएँगे। नई सहस्राब्दी वैज्ञानिकों-विचारशीलों से यही अपेक्षा करती है।


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मरण के उपराँत ही स्वर्ग, नरक या मोक्ष मिलता है, यह सोचना ठीक नहीं। ये जीवन काल से आरंभ होते हैं और लंबे समय तक बने रहते हैं।


नागरिक रक्षा के अभ्यास में (Kahani)

अकाल से पीड़ित नरेश बभ्रुवाहन ने निषेधाज्ञा प्रसारित की कि आज से कोई भी नागरिक रात्रि में विचरण नहीं किया करेगा। ऐसा करने वाला अपराधी होगा और उसे दंड दिया जाएगा।

एक रात जब सैनिक गश्त लगा रहे थे, तो उन्होंने किसी व्यक्ति को एक ओर जाते देखा। उन्होंने रोककर पूछा, “कौन हो? पता नहीं तुम्हें रात में घूमना अपराध है।” वह व्यक्ति भी चतुर था। उसने सोचा, यदि डर गए, तो सैनिक बंदी बना लेंगे, इसलिए उसने कड़ककर कहा, “मुझे टोकते हुए भय नहीं लगा, मूर्खों! स्वयं नरेश मेरी सह से काम करते हैं।”

सैनिक डर गए। उन्होंने सोचा कोई सचिव या राजपुरोहित होंगे, सो वह चुप पड़ गए। सिपाहियों के पीछे ही बभ्रुवाहन भी निरीक्षण के लिए निकले थे, उन्होंने जब शस्त्रधारी सैनिकों को डरते देखा, तो स्वयं आगे बढ़कर बोले, “ठहरो, पहले यह बताओ तुम कौन हो?” इस बार तो वह व्यक्ति घबड़ा गया और महाराज के चरणों में गिरकर बोला, “महाराज मैं दस्युराज आभंतक हूँ।”

बभ्रुवाहन ने सैनिकों से कहा, “तुम संख्या में अधिक व सशस्त्र होते हुए भी अंदर से उससे कमजोर क्यों बने? क्या तुममें इतना साहस नहीं कि स्वयं राजा आएँ, तो उनसे भी पूछो कि वे क्यों रात्रि में यहाँ घूम रहे हैं। यदि इस प्रारंभिक नागरिक रक्षा के अभ्यास में भी तुम सफल न हो सके, तो शत्रु के अधिक संख्या में सामने आने पर कैसे लड़ोगे?”


मनोभावों का दर्पण है हमारा चेहरा

अपने अंतराल की प्रसन्नता-अप्रसन्नता ही मनुष्य को बाह्य जगत् में दृष्टिगोचर होती है। संसार की हर वस्तु या व्यक्ति की सुँदरता-असुँदरता के साथ भी यही तथ्य जुड़ा हुआ है। यद्यपि वस्तुएँ जड़ परमाणुओं का समुच्चय हैं, उनके रूप, रंग, नाम और गुण अनेक हैं, फिर भी वे प्राणियों के समकक्ष नहीं आ सकतीं। उनका सुनिश्चित आकार-प्रकार होते हुए भी उनमें ऐसा कुछ नहीं होता, जिससे वे अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया अभिव्यक्त कर सकें। यह मनुष्य की अपनी मान्यता है, जो उसके साथ भले-बुरे का आरोपण करती तथा प्रिय-अप्रिय की मुहर लगाती है। अपने-पराये की यही भावना किसी को प्रिय बनाती, तो किसी को अनुपयुक्त एवं घृणास्पद ठहराती है।

किसी ने ठीक ही कहा है कि भ्राँतियाँ मनुष्य की स्वनिर्मित और स्वनिर्धारित हैं, जिनमें वह एक को भला और दूसरे को बुरा बताता है, अन्यथा स्रष्टा की हर संरचना अपने में विशिष्टता धारण किए हुए है। मनुष्य ही है, जो जिसके साथ चाहता है, प्रभावित होकर अपनत्व बढ़ाता, घनिष्ठता जोड़ता और राग-द्वेष का आरोपण कर लेता है, घृणा या प्रेम करता है, जबकि वस्तुतः ऐसा है नहीं। सभी प्राणी एवं वस्तुएँ नियति नटी के किसी महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिए रची गई हैं। उनकी अपनी-अपनी विशिष्टता एवं महत्ता है। यही तथ्य मनुष्य पर भी लागू होता है। दृष्टिकोण का परिवर्तन मनःस्थिति को भी बदलकर रख देता है। मान्यताओं के बदलते ही घृणा के स्थान पर प्रेम की रसानुभूति होते देर नहीं लगती।

सर्वत्र दृष्टिगोचर होने वाली व्यथाओं का कारण मनुष्य की अपनी स्वनिर्मित मान्यताएँ ही हैं। किन वस्तुओं या व्यक्तियों के प्रति, किसी का राग-द्वेष, कितनी प्रगाढ़ता लिए हुए है, उसके चेहरे पर या आँखों में झाँकने पर इसकी स्पष्ट झाँकी हो सकती है। कारण मन की प्रसन्नता-अप्रसन्नता, प्रियता-अप्रियता व्यक्त करने के यही दोनों दर्पण की भूमिका निभाते हैं। यह अपने हाव-भाव के पीछे गूढ़ रहस्य जो छिपाए बैठे होते हैं। मनोविज्ञानी इस तथ्य को भली-भाँति जानते हैं और कहते हैं कि मन और शरीर सहजीवी की तरह हैं। एक का दूसरे के साथ बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है और दोनों मिलकर चेहरे पर प्रसन्नता या दुःख की झलकियाँ प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि मनोचिकित्सक चेहरा देखते ही भांप जाते हैं कि व्यक्ति किस व्यथा से पीड़ित है।

विकृत दृष्टिकोण धीरे-धीरे मन को अपनी गिरफ्त में पूरी तरह जकड़ लेता है और उसे तनावग्रस्त बना देता है। इसका प्रभाव सौंदर्य पर भी पड़ता है और स्थूल रूप से स्वस्थ दीखते हुए भी व्यक्ति कुरूप लगने लगता है। वस्तुतः यह मन की कुटिलता ही है, जो अंदर की विषाक्त प्रवृत्ति को ढकने का प्रयत्न करती है, फलस्वरूप व्यक्ति बाह्य जगत् में कृत्रिम चेहरा बनाने का प्रयत्न करता है, पर गहराई से दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि तनावयुक्त माँसपेशियाँ विशेष प्रकार की स्थिति से ग्रस्त होकर कठोर बन गई हैं। ओंठ एवं तनी भौंहें अंततः यही सिद्ध करती हैं कि व्यक्ति किन्हीं विशेष मनःस्थितियों में उलझा है।

ईर्ष्या, द्वेष एवं घृणा की स्थिति में मन के धरातल में कंपन शीघ्र होने से नए-नए कुविचार शीघ्रता से उठते हैं, जबकि शाँत एवं स्थिर मन तटस्थ चिंतन करता है। ऐसी स्थिति में भावनाएँ, विचारणाएँ सात्विक ढंग से निस्सृत होती हैं और उनका आरोपण जिस किसी पर भी होगा, उसी में अपनत्व भरी तरंगों का प्रवाह प्रस्फुटित होने लगेगा। ऐसी दशा में स्वयं को प्रसन्नता होती है, स्नायुमंडल को विश्राम मिलता है और विरोधी आकाँक्षाएँ-भावनाएँ मिटती हैं। मन एवं उसकी शक्तियों का बिखराव भी रुकता है। यही शक्तियाँ मूल स्रोत पर पहुँचकर घनीभूत होती और तन-मन को स्वस्थ बनाती हैं।

चिंता एवं घृणा से मुक्त मन घनीभूत शक्तियों सहित अनंत चेतन सत्ता से, विराट् ब्रह्म से जुड़कर व्यापक प्रेम की अनुभूति कराने में सक्षम हो जाता है। इससे मनोभावनाएँ शुद्ध-पवित्र तो बनती ही हैं, समूचा व्यक्तित्व भी प्रभावित-परिवर्तित हुए बिना नहीं रहता। यही क्रिया अंतराल को देवत्व स्तर का बना देती है।

वस्तुतः इस संसार में कोई भी वस्तु या व्यक्ति असुँदर नहीं। स्रष्टा की इस धरित्री पर कुछ भी कुरूप नहीं है। हम जिससे घृणा करने लगते हैं, वही हमारे लिए असुँदर बन जाता है। यदि अपना दृष्टिकोण बदलकर आत्मीयता-अपनत्व का प्रकाश डालें और सृष्टि के सौंदर्य को सराहे, उसकी उपयोगिता पर ध्यान दें, तो ऐसा मानसिक कायाकल्प हो सकता है, जिसके कारण विश्व में कहीं भी कुरूपता दृष्टिगोचर न हो।


जाना ‘अयमात्मा ब्रह्म’ का रहस्य

‘तप-साधना का प्रभाव अद्भुत होता है। आत्मा का दिव्य आलोक अलौकिक होता है, जिसे केवल उन जैसे ही पा सकते हैं।’ ऐसा उन्हें देखने-जानने वाले हिंदू विद्वान् कहते थे। रुहानियत भी एक अजीब शय है। इसके रंग में रँगा शख्स तो बस अशरफ-उल-मखलूकात के लिए ही जिंदा रहता है। वह तो बस ऐसे ही हैं। उन्हें देखकर मुस्लिम-आलिम आपस में ऐसी ही बातें किया करते थे। ऐसा पहुँचा हुआ संत-फकीर तो पहले कभी देखने में ही नहीं आया। कैसी शक्ति है, उसकी तपस्या में। रोते हुए लोग उसके पास आकर हँसते हुए वापस जाते हैं। यह सामान्य जनता का अभिमत था।

ये मस्त फकीर वायजीद थे, जो नगर के बाहर कहीं भी पड़े रहते थे। जाड़े के दिनों में मैदान में ही सो गए, तो तन-बदन की सुधि नहीं। बगीचे की बुढ़िया अपनी ममता कुछ फटे-पुराने चिथड़ों के रूप में ढक दे तो ठीक, अन्यथा वह तो सबसे निरपेक्ष अपने ही आप में खोए रहते। कोई कुछ प्यार से दे गया, तो खा लिया, अन्यथा उन्हें कभी यह भी विचार न आता कि मानव शरीर को स्थिर रखने के लिए भोजन नाम की वस्तु की भी आवश्यकता होती है।

उनकी यह आत्मनिमग्नता भंग होती तो बस अग्निदत्त शास्त्री के सामने। शास्त्री जी नगर के जाने-माने विद्वान् ही नहीं, उच्चकोटि के साधक भी थे। गंभीर तत्त्वालोचना उनके लिए शास्त्रीय विषयवस्तु से कहीं अधिक आत्म-प्रत्यक्ष थी। इनके सामने ही वायजीद को संजीदा होते देखा जाता था। इन्हीं के साथ वह धर्म से संबंधित गूढ़ तत्त्वों पर खुलकर बातें करते। घंटों चर्चा परिचर्चा होती रहती। जो उन्हें अपनी गहन साधनाओं से प्रत्यक्ष हुआ, उसे वह अपनी दलीलों के साथ सामने रखते और जो शास्त्री जी कहते उसे समझने, समझकर पचाने-आत्मसात् करने का प्रयत्न करते।

जब ईश्वर, जीव एवं प्रकृति पर चर्चा की त्रिवेणी बहती, तो दोनों व्यक्ति घंटों संसार और साँसारिकता के अस्तित्व को भुलाकर किसी दूसरी दुनिया में विचरण करने लगते। सृष्टि व जीवन के गूढ़ तत्त्वों में खोए रहते। उलझे भावों की ग्रंथियों को खोलते रहते। टूटे विचारों की श्रृंखला जोड़ते रहते।

नगर निवासी आते। जो इस गंभीर चर्चा में रुचि रखते, वे इन दोनों की बातों में आनंद सुधा का रस अनुभव करते और जो इन गूढ़-गंभीर तत्त्वों को समझ न पाते, वे बस श्रद्धा से शीश झुकाए बैठे रहते। बच्चे बार-बार अपने शाह बाबा के चरण छू जाते। फलों का अंबार श्रद्धालु जन उनके सामने रखते जाते, बच्चे वह प्रसाद भी पा जाते। यदा-कदा कोई व्यक्ति प्रार्थना रूप में कुछ वाक्य कहकर उनकी बातों में व्यवधान भी बन जाता।

अच्छा होगा ............. वह सब अच्छा करेगा!! शाह वायजीद प्रार्थी की ओर देखे बिना ही आकाश की ओर हाथ उठाकर कह देते। सामने रखे फलों को बच्चों में बाँट देते। उनमें से जो बचे रहते, उन्हें वयस्कों को दे देते। अपने लिए कुछ न रखते। उन्हें उस सर्वशक्तिमान् में विश्वास था। संचय के द्वारा वह उसकी शक्तिमत्ता को लघु नहीं बनाना चाहते थे।

फकीर की शोहरत तो दूर-दूर तक फैल रही थी। भक्तजन मनौती मनाते। उनके स्थान पर उर्स-मेलों का आयोजन करते। बाजे बजवाते, तवर्रुख बाँटते, गाते-नाचते, किंतु शाह साहब तो दूसरी दुनिया के शाह थे। ये सब बातें तो उन्हें बच्चों की बातें जैसी लगतीं। वे इन सब प्रदर्शनों पर ध्यान नहीं देते, निरपेक्ष रहते।

वही सब कुछ करता है। वही सबसे बड़ा है। वही है, वही है। ईश्वर का प्रसंग आने पर वायजीद ने कहा, अल्ला हो अकबर और फिर कोई अरबी की आयत पड़ी। वह अरबी-फारसी आदि कई भाषाओं के आलिम थे, संस्कृत के भी ज्ञाता। श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न होने पर भी संसार के वैभव से विरक्त होकर उन्होंने गृहत्याग कर दिया था और अब तो तप-त्याग में इतने आगे पहुँच गए थे कि जाति-भेद तो दूर रहा, उन्हें अपनी ही देह की सुधि नहीं रहती थी।

“वह श्रेष्ठ है, सर्वशक्तिमान् है, किंतु यह क्या है? कौन है? इस पर भी क्या कभी विचार किया?” अग्निदत्त शास्त्री ने प्रश्न किया। वह है। वह सब कुछ है। उसकी शक्ति की क्या कोई शक्ल है? शक्ति तो ज्योति है, नूर हैं। वायजीद ने अपनी श्रद्धा को स्पष्ट किया वह सर्वशक्तिमान् अल्लाह ही परब्रह्म है। उसी की ज्योति सृष्टि के कण कण में व्याप्त है। उसी विराट् का अंश हैं हम जीवात्मा। सृष्टि के समस्त भूत प्राणी। वह सागर है, तो हम बिंदु हैं। बिंदुओं से मिलकर सागर बना है। बिंदु सागर का ही लघु रूप है। अद्वैतवादी दार्शनिक अग्निदत्त ने विराट् और क्षुद्र की व्याख्या की। अपनी मान्यता को वाणी का रूप दिया।

तो शास्त्री जी........शाह साहब चुप रह गए। जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रहे हों। वे उठकर टहलने लगे। इस तल्लीनता में वे भूल गए कि वे अभी एक विद्वान से वार्त्तालाप कर रहे थे। उन्हें न विद्वान् याद रहे, न उपस्थित अन्य जन। उन्हें तो बस याद रह गया केवल यह वाक्य “ईश्वर अंश जीव अविनाशी।”

फकीर वायजीद टहलते रहे। वे न तो किसी की ओर देख रहे थे और न किसी से कुछ कह रहे थे। वे तो अपने विचारों में ही खो गए थे। खोकर कुछ पा रहे थे। पाकर आनंदित हो रहे थे। आनंद की छटा उनके मुखमंडल पर चमक रही थी। उपस्थितजन उनके दर्शन-लाभ से मुग्ध थे।

थोड़ी देर तब सब लोग उनको एकटक देखते रहे, फिर लोगों की लौकिक भावनाओं ने जोर मारा। एक-एक करके सब लोग उठ गए। एक भी व्यक्ति वहाँ शेष न रह गया। वायजीद टहलते रहे, अकेले।

टहलते-टहलते वे एक वृक्ष के निकट पहुँचे। वे वृक्ष की जड़ के निकट वृक्ष से टिककर बैठ गए। पाँव फैलाकर वहाँ कुछ सोचने लगे। वे सोच रहे थे, “सत्य तो सत्य ही होता है। वह हिंदू कहे या मुसलमान, क्या अंतर पड़ता है। ब्रह्म सर्वशक्तिमान् है। मैं जीव हूँ, उसका अंश। वह सोने का बहुत बड़ा पुँज, मैं उसका एक छोटा-सा हिस्सा। वह सोना है, मैं भी सोना हूँ।”

मैं सोना हूँ। मैं ब्रह्म हूँ।....अयमात्मा ब्रह्म। अहं ब्रह्मास्मि। मैं अल्लाह हूँ।” वे जोर-जोर से कह उठे, परंतु वहाँ सुनने वाला कोई नहीं था। पूजा-इबादत करने वाला कोई नहीं था।

उनके स्थान पर बड़े सबेरे ही दर्शनार्थियों की भीड़ जमा हो रही थी। हिंदू आते, मुसलमान आते। बच्चे आते, बूढ़े आते। महिलाएँ आतीं, पुरुष आते। भक्ति श्रद्धा से उस महातपस्वी के चरणों में मस्तक नवाते। उनकी वाणी से निकले अमृत से अपनी आत्मा तृप्त करते और अपने भक्ति-विश्वास का फल लौकिक उपलब्धियों के रूप में पाते रहते थे।

फकीर के न सोने का समय निश्चित था और न जगने का। वे तो निर्बंध थे, निर्द्वंद्व थे। न आत्मा पर कोई बंधन था और न शरीर पर। सारी रात जागते रहे, तो कोई अचरज नहीं और सारे दिन सोते रहे, तो कोई नई बात नहीं। फिर भी बहुधा प्रातःकाल का शीतल समीकरण उन्हें अज्ञात प्रेरणा दे देता। वे उठ पड़ते। भले ही बातें करते-करते फिर से अपनी भाव समाधि में खो जाते।

उस दिन शाह के दर्शनार्थी एक बड़ी संख्या में उपस्थित थे। एक ओर शास्त्री अग्निदत्त बैठे थे, जिनके पीछे प्रतिष्ठित हिंदू स्त्री-पुरुषों की भीड़ थी। दूसरी ओर काजी नूर हसन थे, उनके पीछे एक बड़ी तादाद में मुसलमान बैठे थे। सभी शाह के उठने की प्रतीक्षा कर रहे थे। शाह अपनी गहन समाधि में लेटे हुए थे, झोंपड़ी की दीवार की ओर उनका मुख था, संसार की ओर उनकी पीठ थी।

सहसा उनका शरीर गतिशील हुआ। उन्होंने करवट बदली और “मैं वही हूँ! मैं ब्रह्म हूँ!! मैं अल्लाह हूँ!!!” कहते-कहते वे उठ बैठे।

सामने देखा तो लोगों की भीड़ जमा थी। ओ-हो शास्त्री जी, अच्छा काजी जी, आप लोगों को बहुत इंतजार करना पड़ा। और वे उठकर टहलने लगे। काजी ने शास्त्री को देखा और शास्त्री ने काजी को। फिर दोनों ने अपने-अपने पीछे बैठे जनसमुदाय को देखा।

थोड़ी देर बाद वायजीद अपने आसन पर बैठ गए। धर्मचर्चा होती रही। सब तृप्ति का आनंद लेते रहे। थोड़ी देर बाद शाह वायजीद बोले, अच्छा अब हम गुसल करने जाएँगे। जैसे कोई भूली हुई बात शाह साहब को याद आ गई हो। संकेत जानकर सब उठने लगे। शास्त्री जी, काजी जी और सभी उपस्थित जनसमुदाय एक-एक करके वहाँ से बाहर हो गए।

इन सबमें विचारमग्न काजी जी पीछे रह गए। सहसा वह बिना किसी से कुछ कहे लौट पड़े, जैसे कोई वस्तु आश्रम में पड़ी रह गई हो। चार-पाँच अन्य व्यक्ति भी काजी जी की देखा-देखी साथ लौटे। ये सभी आगंतुक जन वापस उसी स्थान पर बैठकर शाह साहब के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

क्यों काजी जी, अभी गए नहीं? गुसल से लौटकर फकीर वायजीद ने कहा।

“जी गया था, रास्ते से लौट आया, शाह साहब!” काजी ने सकुचाते हुए कहा। “क्यों कोई खास बात हो गई क्या?” शाह ने वाणी में जिज्ञासा भरकर कहा। “जी बस एक अहम बात पूछने को जी अकुला गया।” काजी ने अपने सवाल के लिए भूमिका बाँधी।

“कहिए! जरूर कहिए।” शाह ने जैसे अभय वचन दिया हो।

“यह जो आपने समाधि से उठते हुए कहा था कि मैं वह हूँ, मैं अल्लाह हूँ...” काजी पूरी बात कहते-कहते रुके।

हैं, शाह चौंके। मैंने यह कहा था कि मैं अल्लाह हूँ। .....उनके मुख पर बालकों की भाँति मुस्कान छा गई।

जी हुजूर, सभी उपस्थितजनों ने एक स्वर में साक्षी दी।

ओह, तब तो बहुत बुरी बात है। परम पिता की शान में ऐसी गुस्ताख़ी? बाप बेटे से हमेशा ही बड़ा होता है। क्या लड़के का यह फर्ज है कि वह अपने बाप की बराबरी करे? ठीक है कि एक दिन वही लड़का अपनी औलाद का बाप बनता है, परंतु बेटा बाप से ही भिड़ जाए, क्या यह सपूत लड़के का फर्ज है? यह तो अहंकार है। तकब्बुर है। पश्चात्ताप के स्वर में शाह वायजीद ने कहा।

कुफ्र है, हुजूरे आली। साहस करके धर्म का पारिभाषिक शब्द काजी ने प्रयोग किया।

बेशक कुफ्र है। लानतुल्ला! यह कसूर सजा के काबिल है, काजी साहब। वायजीद ने आत्मग्लानि के स्वर में कहा।

अब मैं क्या अर्ज करूं हुजूरे आली! अपनी मनचाही मुराद पूरी होते देख काजी अधिक नम्र पड़ गया।

अरे नहीं, तुम क्या कहोगे। मैं खुद कहता हूँ। यह तो बहुत बड़ा कसूर है। इसकी सजा तौबा नहीं, सजाए मौत है, दृढ़ स्वर में वायजीद बोले। हुजूर संशोधन-सा प्रस्तुत करते हुए काजी ने कोई तजबीज पेश करना चाहा।

नहीं हमारा यही फैसला है। लाओ एक तलवार यहाँ रख दो। अब ऐसे अलफाज मेरे मुँह से निकलते ही मेरी गरदन उड़ा दी जाए। फैसला खुद वायजीद ने सुनाया।

एक उपस्थित सैनिक ने सकुचाते हुए अपनी तलवार वायजीद के आसन के निकट रख दी। सब लोग उठकर चल दिए। वायजीद भी विचारमग्न हो गए।

त्लवार वायजीद के आसन के निकट ही रखी रहने लगी। समूचे नगर में इस बात की चर्चा फैल गई कि कुफ्र के वाक्य निकलते ही शाह साहब की गरदन उड़ा दी जाए, यह स्वयं उनकी आज्ञा है।

दर्शनार्थियों का जमघट अब पहले से भी अधिक जुटने लगा। ऐसे त्यागी पुरुष की झाँकी, जो अपने जीवन को सिद्धाँतों के सम्मुख तुच्छ मानता हो, सभी हृदयंगम कर लेना चाहते थे। लोग जुड़ जाते और धर्मचर्चा चलने लगती। वायजीद प्रश्नोत्तर करते, जीवन से बेपरवाह! न उन्हें जीवन से मोह था और न ही मृत्यु का भय। जो समझ में आता, कहने लगते। जब न कहना होता, चुप रह जाते। विचार करना होता, तो आँखें बंद कर लेते।

एक दिन सबेरे-सबेरे नगर निवासी एकत्रित होने लगे। शायद उस दिन कोई पर्व था। ज्ञानीजन आगे बैठे थे, श्रद्धालुजन पीछे। कुछ भेंटादि रखकर सभी अपने-अपने स्थान पर बैठते जा रहे थे।

धर्म की चर्चा चल रही थी। प्रश्नोत्तर, शंका-समाधान। सभी के द्वारा ज्ञान का क्षेत्र विकास को प्राप्त हो रहा था। सहसा शाह वायजीद कुछ विचारने लग गए। विचारते-विचारते वह मौन हो गए। मौन होकर उन्होंने आँखें बंद कर लीं। वे बेसुध से दीवार से टिक गए। पर दीवार से टिके हुए वे सो नहीं रहे थे। वह तो गहन-गंभीर समाधि में डूब चुके थे। उनकी आत्मचेतना परमात्मचेतना में निमग्न हो रही थी। यह एक का एकता में विलय था। शून्य का शून्य में विलय था। सब कुछ तद्रूप एवं तदाकार हो गया था। इस अलौकिक भावदशा की अलौकिक आभा शाह वायजीद के मुखमंडल पर भी छा चुकी थी।

इस अलौकिक भावदशा में उनके मुख से बड़े ही अस्फुट स्वरों में कुछ शब्द निकले, मैं देह नहीं, मैं जिस्म नहीं हूँ। मैं इंद्रियाँ और मन भी नहीं। प्राण या चित्त अथवा फिर अहंकार मेरा परिचय नहीं। मैं तो अविनाशी आत्मा हूँ। जो सदा ही परब्रह्म से तदाकार है। “अयमात्मा ब्रह्म।” मैं ब्रह्म हूँ। मैं अल्लाह हूँ। हाँ, मैं वही हूँ। अहं ब्रह्मास्मि।

यह कहते हुए वे आत्मलीन से उठकर टहलने लगे। समूचा जनसमुदाय अब सकते में था।

श्रोताओं ने एक-दूसरे की ओर देखा। काजी के संकेत पर एक युवा सैनिक उठा। आसन के निकट रखी तलवार उसने उठाकर म्यान से निकाल ली थी।

अपने गहन भावों में डूबे शाह की गरदन पर तलवार का एक प्रहार हुआ। तलवार के दो टुकड़े अलग-अलग जा गिरे। एक टुकड़ा निकट के एक पत्थर से जा टकराया।

जोर का झन्न शब्द सुनकर शाह वायजीद की भाव-समाधि टूटी। उन्होंने आँखें खोलीं।

क्या बात है? शाह वायजीद की वाणी मुखर हुई।

कुछ नहीं हुजूर। काजी जी अपने किए पर बेहद शर्मिंदा थे। उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि वह क्या कहें और क्या करें?

हाँ अग्निदत्त शास्त्री अवश्य उपनिषद् का एक मंत्र पढ़ रहे थे-

देह दृष्टा तु दासोऽहमं् जीदृष्टयात्वदंशकाः आत्मदृष्टात्वैवाहम्।

अर्थात् देहदृष्टि से मैं तेरा दास हूँ, जीव दृष्टि से तुम्हारा अंश और आत्मदृष्टि से मैं वही हूँ, जो तुम हो।

बिल्कुल ठीक कहा शास्त्री जी। शाह वायजीद बोले पड़े, अयमात्मा ब्रह्म का यही रहस्य है।


भविष्यसूचक ये विचित्र स्वप्न

स्वप्न दमित इच्छाओं की परिणति हैं, यह सत्य है, पर मिथ्या यह भी नहीं है कि उनमें भविष्यसूचक अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष संकेत छुपे होते हैं। यदि उन्हें भलीभाँति समझा और जाना जा सके, तो मनुष्य कितने ही प्रकार से स्वयं लाभान्वित हो सकता और अगणित अन्यों को भी लाभ पहुँचा सकता है। आएदिन होने वाले स्वप्न-दर्शन इसकी साक्षी हैं।

घटना सन् 1946 की है। तब विलवर राइट आर.ए.एफ. में फायटर पायलट थे। एक दिन प्रातः डाँग वोर्ले नामक उनका एक घनिष्ठ मित्र आया और कहने लगा कि आज की यात्रा से वह वापस नहीं लौट सकेगा, इसलिए उसका यह सामान उसके परिवार वालों तक पहुँचा दिया जाए।

अगली यात्रा वास्तव में उसके लिए प्राणघातक साबित हुई। उन दिनों द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ा हुआ था। डाँग वोर्ले बमबारी के लिए आगे-आगे चल रहा था। पीछे-पीछे उसका मित्र विलवर राइट अपना विमान उड़ा रहा था। अचानक डाँग वोर्ले के वायुयान में आग लग गई और वह मारा गया। इस प्रकार उसका स्वप्न सत्य सिद्ध हुआ।

इस घटना के बाद से विलवर राइट को भी ऐसे भविष्य-सूचक स्वप्न आने लगे, जो परीक्षा करने पर सत्य सिद्ध होते। उन्हें अक्सर घुड़दौड़ प्रतियोगिता के दृश्य दिखाई पड़ते। ऐसे स्वप्नों में वे प्रायः प्रतियोगिता स्थल पर मौजूद होते। साथ में उनका कोई मित्र भी होता। वे मित्र से जीतने वाले घोड़े का नाम पूछते। वह उसे बता देता। पीछे पता करने पर ज्ञात होता है कि सचमुच उसी नाम का घोड़ा विजयी हुआ।

विलवर को घुड़दौड़ में कभी रुचि नहीं रही, न वे कभी उसे देखने के लिए दौड़ स्थल पर गए, पर पता नहीं क्यों स्वप्न उन्हें प्रतियोगिता स्थल के ही दिखाई पड़ते थे। ऐसे ही एक दृश्य में वे उस मैदान में उपस्थित थे, जहाँ दौड़ का आयोजन हो रहा था। वे अपने मित्र से पूछते हैं कि जीत किसकी होगी? उसका उत्तर था, ‘एयरबोर्न’ नामक घोड़े की। विलवर प्रतिवाद करते हैं कि इस नाम का कोई अश्व दौड़ में हिस्सा नहीं ले रहा। साथी कहता है कि वह प्रतियोगिता जीत चुका है।

सपने की सचाई जानने के लिए विलवर ने सेंटलेगर में हो रही प्रतियोगिता में भाग ले रहे घोड़ों की लिस्ट मँगाई। उसमें ‘एयरबोर्न’ नामक घोड़े का नाम देखा, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। इसकी चर्चा उनने अपने मित्रों और कुटुँबियों से की, किंतु किसी ने उनकी बात पर विश्वास न किया। बाद में जब वह दौड़ में सचमुच प्रथम रहा, तो सभी को पछतावा होने लगा कि उसने उक्त अश्व पर बाजी क्यों नहीं लगाई। जिनने उस पर दाँव लगाए, उन-उनने भारी रकमें जीतीं। स्वयं विलवर ने भी इस स्वर्ण अवसर को खो दिया और पछताते रहे।

दो वर्ष पश्चात् उनने फिर एक स्वप्न देखा। इस बार उनसे कोई कह रहा था कि इसमें ‘एरिटिक प्रिंस’ बाजी मारेगा। प्रतियोगिता डर्वी में हो रही थी। पता लगाने पर विदित हुआ कि इस नाम का अश्व प्रतिभागियों में सम्मिलित है। उनने अपने एक मित्र से इसकी चर्चा की। दोनों ने उक्त घोड़े पर बाजी लगा दी। अंततः उसी की जीत हुई, फलतः उन्हें खूब धन प्राप्त हुआ।

अगला स्वप्न तब हुआ, जब विलवर सपत्नीक नेवार्क में ठहरे हुए थे। वहाँ उनका आतिथेय श्रीमती चेसराइट नामक एक महिला थी। इस बार के स्वप्न में घोड़े का नाम कुछ त्रुटिपूर्ण था। वह अपने एक अज्ञात मित्र से सपने में पूछते हैं कि अबकी बार प्रथम आने का गौरव किसे प्राप्त होगा? क्या ‘राडार’ नामधारी अश्व को? मित्र कुछ क्षण मौन रहकर सहमति में सिर हिलाता है, तभी विलवर की नींद टूट जाती है। इसकी चर्चा वे अपनी पत्नी और चेसराइट से करते हैं।

दूसरे दिन कैंब्रिजशायर में यह प्रतियोगिता होने वाली थी। चेसराइट को इसमें रुचि थी। अतः उसने दौड़ में भाग लेने वाले घोड़ों की जानकारी की। उसमें ‘राडार’ नामक कोई अश्व भाग नहीं ले रहा था। इसका निकटवर्ती नाम ‘नाहर’ ही हो सकता था, जो कि दौड़ में सम्मिलित था। अस्तु, उसने उसमें दाँव लगा दिया। जीत उसी की हुई। चेसराइट को इससे हजारों पाउंड प्राप्त हुए।

विलवर का यह अंतिम स्वप्न-दर्शन था। इसके बाद फिर कभी घुड़दौड़ संबंधी स्वप्न उसे नहीं दिखाई दिए।

अर्ल एटली ने अपने ‘संस्मरण’ में लिखा है कि किस प्रकार सपने में उन्हें एक सम्मेलन में भाग लेने का मौका मिला तथा किस तरह ‘ग्राँड नेशनल डे’ के दिन होने वाली घुड़दौड़ प्रतियोगिता में विजयी घोड़ों के क्रमाँक उनके हाथ लगे। यों तो एटली को घुड़दौड़ में कोई चाव नहीं था, न वे सपनों की सचाई पर विश्वास करते थे, किंतु उक्त स्वप्न के बाद उनकी उत्सुकता बढ़ी और वे देखे गए घोड़ों के क्रमाँकों पर दाँव लगा बैठे। वे ही प्रथम और द्वितीय स्थानों पर रहे, जैसा कि स्वप्न संकेत हुआ था। इस घटना के उपराँत एटली की सपनों के प्रति आस्था सुदृढ़ हुई। वे इस बात को स्वीकारने लगे कि निरर्थक सपनों के मध्य सार्थक स्वप्न भी आ सकते और स्वप्नद्रष्टा को भावी घटनाक्रमों की कुछ स्फुट झाँकी करा सकते हैं।

जान गाडले ऑक्सफोर्ड का छात्र था। बाद में उसे लार्ड किलव्रेकन बनाया गया। एक बार उसने स्वप्न देखा कि वहाँ जो अश्व प्रतियोगिता अगले महीने जोने जा रही है, उसमें ‘विंदिल’ एवं ‘जुलाद्दीन’ नामक घोड़े क्रमशः प्रथम, द्वितीय आ रहे हैं। समाचार पत्रों के माध्यम से ज्ञात हुआ कि ये दोनों घोड़े उसमें दौड़ने वाले हैं। गाडले ने 100 पौंड के टिकट खरीदे और उन पर बाजी लगा दी। उसकी जीत हुई।

इसके कुछ दिन पश्चात् उसने पुनः स्वप्न देखा कि ‘ट्यूवरगेज’ नामक अश्व आगामी प्रतियोगिता में जीतेगा। वैसा ही हुआ। विजयी घोड़े का नाम वास्तव में ‘ट्यूवरगेज’ था। अगले वर्ष उसने और कई बाजियाँ जीतीं। इसके उपराँत उसे हारने वाले घोड़ों के नाम दिखलाई पड़ने लगे। कुछ वर्ष पश्चात् एक बार पुनः उसे विजयी घोड़े का नाम दिखाई पड़ा। उसने देखा कि ‘ग्राँड नेशनल डे’ में ‘वाटमैन’ नाम के अश्व ने शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। पीछे यह भी सत्य साबित हुआ। अंत में वह ‘डेली मिरर’ समाचार पत्र में अपनी इसी लोकप्रियता के कारण ‘रेसिंग संवाददाता’ नियुक्त हुआ तथा अतींद्रिय दाँव लगाने वाले के नाम से विख्यात हुआ।

मिलता-जुलता प्रसंग इंडिपेंडेंट टेलीविजन के विज्ञान संवाददाता पीटर फेयरली से संबंधित है। एक दिन लंदन के ब्लैकन नामक स्थान पर घूमते हुए उसने अपने कार रेडियो में श्रीमती ब्लैकनी के लिए एक प्रार्थना सुनी। थोड़ी देर पश्चात् एक व्यक्ति से बातचीत के क्रम में ‘ब्लैकनी’ शब्द पुनः उसके कर्ण कुहरों से टकराया। वह इस शब्द के प्रति कुछ सतर्क हो गया। कार्यालय पहुँचा, तो सहयोगी के मुख से एक बार पुनः वही शब्द निकलता देख वह कुछ चिंतित हो उठा और सोचने लगा आज एक ही शब्द की पुनरावृत्ति भिन्न-भिन्न लोगों द्वारा क्यों कर हो रही है? इसी बीच दोपहर का भोजनावकाश हो गया। उसके मस्तिष्क में वही बात घूम रही थी। इसी विषय पर सोचते सोचते उसकी आँखें झपक गईं। कोई तंद्रावस्था में उससे कह रहा था, आज डर्वी की अश्व प्रतिस्पर्द्धा में ‘ब्लैकनी’ पुरस्कृत होगा। वैसा ही हुआ। जीत के साथ उसे काफी इनाम प्राप्त हुआ।

रात्रि की नीरवता हो या दिन की शाँति, इस स्थिति में चेतना जब निद्राकाल में शिथिल पड़ती और उत्तेजनारहित होती है, तो वह प्रकृति के गर्भ में पक रहे घटनाक्रमों को पकड़ने की क्षमता अर्जित कर लेती है। इसी को वह समय-समय पर सपनों के माध्यम से प्रकट करती है। इसलिए सपने हमेशा निरर्थक-निरुद्देश्य नहीं होते। कितनी ही बार उनमें सार्थक संकेत भी छुपे होते हैं। उपर्युक्त घटनाएँ इसी की प्रमाण हैं।


विदेश के लिए प्रस्थान (Kahani)

तब समुद्र द्वारा विदेश यात्रा को धर्म-विरुद्ध माना जाता था। धर्म-पुरोहितों से अनुमति लेकर समुद्री यात्राएँ हर धर्मपरायण व्यक्ति को करनी पड़ती थीं। वेदाँत के प्रचार के लिए स्वामी रामतीर्थ को विदेश जाना था। लोक-मर्यादापालन में लिए उन्होंने काशी के महामहोपाध्याय से परामर्श किया। पंडित जी बोले, वैसे तो समुद्री यात्रा करना धर्म के विरुद्ध है, पर यदि आप पाँच हजार रुपयों की व्यवस्था कर दें, तो आपको जाने की विद्वत्-मंडल द्वार अनुमति मिल जाएगी, अन्यथा आप जाति से बहिष्कृत कर दिए जाएँगे। रिश्वत देकर धर्मपरायण बनना रामतीर्थ को स्वीकार नहीं हुआ। उन्होंने कहा, आप लोग चाहे जो करें, पर धर्म के नाम पर मैं यह अनीति नहीं कर सकता। अनुमति दें अथवा न दें, मैं तो चलता हूँ। पंडित जी निरुत्तर हो गए। बिना किसी से अनुमति लिए स्वामी रामतीर्थ ने अपने महान् लक्ष्य के हेतु विदेश के लिए प्रस्थान कर दिया।


सामूहिक नरसंहार का मनोविज्ञान

मानवीय मनोविज्ञान अत्यंत जटिल होता है। इसमें अच्छाई और बुराई दोनों तत्त्व सन्निहित होते हैं। श्री अरविंद ने मनुष्य के एक तिहाई भाग को पशुतुल्य माना है। यह अनुकूल अवसर प्राप्त करने पर हिंसक और बर्बर हो उठता है। समाज में हिंसा के अनेक स्वरूप होते हैं। व्यक्ति से जब यह बाहर जाता है, तो सीरियल किलर वा माँस मर्डर जैसे वीभत्स व भयंकर दृश्य उपस्थित करता है। आज के आधुनिक समाज में हिंसा भी एक अंग बन चुका है। पाश्चात्य देश इस दुर्वह मार से त्रस्त व परेशान हैं। अपना समाज व राष्ट्र भी इससे अछूता नहीं है।

मनुष्य अपनी इस आक्रामक वृत्ति के जाग्रत् होते ही हिंस्र जानवर के समान व्यवहार करने लगता है। ब्रिटिश मनोविज्ञानी पभ्टर मार्श की मान्यता है कि मनुष्य का सामान्य हिंसक भाव किसी को क्षति नहीं पहुँचाता, परंतु यह जब सामाजिक स्तर पर बढ़ने लगता है, तो अत्यंत घातक होता है। यही समाज में संक्रमित होकर सामूहिक आँदोलन व विकराल हिंसा का रूप ले लेता है। ए. स्टार ने ‘ह्यूमेन डिस्ट्रक्टिवनेस’ में उल्लेख किया है कि आज की आधुनिक हथियारों की होड़ इसे और भी बढ़ा देती है। बड़े-बड़े युद्धों के इतिहास में हिंसा का यही भाव जिम्मेदार रहा है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, हिंसा सदैव एक निश्चित गति से बढ़ती है। टोकी द्वीप में चर्च के बाहर दो समुदाय के बीच प्रति सप्ताह में कई बार झ़डपों का होना सामान्य बात है। धीरे-धीरे यह झड़पें विकराल होती गईं और अंत में यह एक युद्ध में परिणत हो गईं। मनीषी लायल वाटसन के अनुसार, आक्रामकता मनुष्य के जेनेटिक कोड में होती है। क्रोध व हिंसा इसी का परिणाम होता है। व्यक्ति आक्रामकता व प्रतिशोध के बीच झूलता रहता है। इनके बीच एक पतली दीवार होती है, जैसे बंदर और मनुष्य के मध्य। आक्रामकता बंदर के व्यवहार की ओर धकेलता है, तो प्रतिशोध मनुष्य का जटिल मनोविज्ञान बनकर आता है। प्रतिशोध हिंसा का ही एक रूप है। इस स्थिति में विवेक समाप्त हो जाता है और इसके स्थान पर दुर्बुद्धि काम करने लगती है। अंततः यह जघन्य कृत्यों में परिवर्तित हो जाता है।

युद्ध में आवेशग्रस्तता या अंध क्रोध का नग्न नर्तन देखा जा सकता है। इस अवस्था में व्यक्ति लड़कर मर जाता है। पी. कर्लेट के सर्वेक्षणानुसार द्वितीय विश्वयुद्ध में केवल 25 प्रतिशत अमेरिकी सैनिकों ने अपने हथियारों का प्रयोग किया था। वह भी अत्यंत विपन्न परिस्थिति में। शेष सैनिक उन्माद एवं आवेशग्रस्त होकर मरते-मारते रहे। युद्ध का हिंसक आवेश अत्यंत प्रबल व तीव्रतम होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में लंबी दूरी के शस्त्रों के पीछे भी यही अंध मानसिकता प्रदर्शित हुई थी। इसी कारण हथियारों का आविष्कार एवं होड़ बढ़ी। लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व सुमेरियनों ने एक हजार फुट की दूरी तक मार करने वाले धनुष-बाण का आविष्कार किया था। इसके ठीक 2000 वर्ष बाद चीनियों ने भी इसी तरह के अनेक शस्त्रों का निर्माण किया था। इतिहास के उन पृष्ठों से लेकर आज के अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण की कहानी भी इसी तथ्य की पुष्टि करती है।

धनुष की खोज के बाद आग्नेयास्त्र के रूप में बंदूक का प्रचलन बढ़ा। इससे हिंसा को एक नूतन आयाम मिला। मौत और जिंदगी की दूरी सिमट गई। टी. जुनाडे के अनुसार अमेरिका में प्रति सेकेंड बीस बंदूकों का निर्माण होता है। प्रति 13.5 सेकेंड में एक बंदूक की बिक्री होती है। यह अमेरिका के लगभग आठ करोड़ घरों में पहुँच गई है। अमेरिका में हत्या की दर जापान की तुलना में 200 गुनी अधिक है। सन् 1992 में बंदूक द्वारा 13,220 लोगों की हत्या हुई। टी. जुनाडे ने स्पष्ट किया है कि 1990 से 1992 के बीच तीन वर्ष में इतने अमेरिकनों की हत्या हुई जितने कि 1963 से 73 के वियतनाम युद्ध में नहीं हुईं। वियतनाम युद्ध में 46,752 लोगों की हत्या हुई, जबकि तीन साल में मात्र बंदूक द्वारा 84,633 हत्या हुईं। यह कनाडा, जापान, स्वीडन, ब्रिटेन तथा आस्ट्रेलिया से 150 से 400 गुना अधिक है। सभ्य कहे जाने वाले देशों में पिछले पचास सालों में प्रति सेकेंड में एक व्यक्ति की हत्या हुई है। अब तो यह संख्या तीन गुना हो चुकी है। द्वितीय विश्वयुद्ध में 5.5 से 6 करोड़ के आसपास थी। अब तो बड़े युद्धों के बिना भी समस्त विश्व की हिंसक वारदातें इन आँकड़ों को छूने लगी हैं।

हिंसा का स्वरूप और भी अनेक रूपों में दिखाई देता है। आर.जे. गेलन ने ऐसे क्रूर व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जो न केवल नरसंहार करते हैं, बल्कि उनका माँस भी खा जाते हैं। कुछ आदिवासी परिवारों में हत्या दिनचर्या के समान है। परिवार में थोड़ा-सा तनाव व्याप्त हुआ कि भाले-बरछी चल पड़ते हैं। नित्य किसी-न-किसी का नरसंहार होना अनिवार्य है।

क्रूर व हिंस्र व्यक्ति जानवर के समान होता है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज मोरक्कों का बादशाह मोले इस्माइल ऐसा ही एक नृशंस हत्यारा था। इसने अपने हाथों से ही तीस हजार लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। भोजन के दौरान वह अपने बंधकों का सिर धड़ से अलग कर देता था और अपने मेहमानों को प्रसन्न करता था। उसकी 500 बीबियाँ तथा 1000 बच्चे थे। पीलपोट उन कुख्यात राजनीतिज्ञों में गिना जाता है, जिन्होंने हत्या सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। हिटलर के बाद संभवतः पीलपोट ही एक ऐसा नृशंस हत्यारा था, जिसने 20 लाख व्यक्तियों को मरवा दिया।

हिंसा का स्वरूप विभिन्न संस्कृतियों में बदलता रहता है, किंतु उनके मूल्यों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। दक्षिण पूर्व ऐशिया में ‘अमाके’ तथा मलाया में ‘क्रिस’ का प्रचलन है। अमाके के अंतर्गत एक युवा व्यक्ति ब्लेड से मर्डर करता है। क्रिस वह प्रथा है, जिसमें भीड़भाड़ के स्थल पर यह अमानवीय व बर्बर कार्य किया जाता है। सन् 1996 में चार्ल्स ह्विटमेन नामक एक कुख्यात हत्यारे को आस्टिन के टेक्सास यूनिवर्सिटी के टावर में मृत पाया गया। इस ह्विटमेन ने मरने से पूर्व उसी टावर से अंधाधुँध गोली चलाकर 14 व्यक्तियों की हत्या एवं 31 व्यक्तियों को गंभीर रूप से घायल कर दिया था। कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा भीड़ में गोली चलाना इसी प्रथा के अंतर्गत माना जा सकता है।

नरसंहार की दर देशों के अनुरूप न होकर वहाँ के समयानुसार परिवर्तित होती है। यह विभिन्न समाज व राष्ट्र में भिन्नता लिए हुए होती हे। सोमालिया में एक व्यक्ति की मौत की कीमत 100 ऊँट के बराबर होती है। यह मूल्य 50 महिलाओं के मूल्य के समान है। यूगांडा के सेवई लोगों में एक नवयुवती की मृत्यु के बदले दस गाय व एक वृद्ध महिला की मृत्यु के लिए पाँच गाय की कीमत अदा की जाती है। डी.पी. फिलीप्स के अनुसार अमेरिका में प्रतिदिन 60 व्यक्तियों की हत्याएँ होती हैं। श्वेत और अश्वेत के बीच का संघर्ष तो और भी तनावपूर्ण है।

मानव प्रकृति के मर्मज्ञों के अनुसार हिंसा, हत्या व अपराध एक जटिल प्रक्रिया है, जो प्रकृति व दबाव तथा अनुवांशिकता व अनुभव के बीच पनपता है। मनीषी लायल वाटसन ने ‘डार्क नेचर’ में इसे सोशियोबायोलॉजिकल इंसटिक्ट के रूप में प्रतिपादित किया है। इसका महत्त्व उसके वातावरण पर निर्भर करता हे। इसी बायोलॉजिकल रुट्स से सीरियल किलर तथा माँस मर्डर की क्रूर मानसिकता का जन्म होता है। मनोविज्ञानी एड्रीन रेन ने इसका परीक्षण करने के लिए एक सर्वेक्षण किया। इनके दल ने कैलीफोर्निया में 4660 बच्चों का अध्ययन किया। ये सभी 1959 से 1961 के बीच पैदा हुए थ। इन्हें अपराध विरासत में मिला था। इनका परिवार एवं वातावरण अपराधी तत्त्वों से भरा हुआ था। 30 साल पश्चात् युवावस्था में पहुँचे इन लोगों में से 22 प्रतिशत कुख्यात अपराधी बन गए थे। इनमें से तो कुछ सीरियल किलर व माँस मर्डरर बन गए थे।


इसी ओर बढ़ना चाहिए (Kahani)

एक बार काशी विश्वविद्यालय में स्त्रियों को वेदाध्ययन का अधिकार है या नहीं, इस पर हिंदू संस्कृति के महाप्राण पं. मदनमोहन मालवीय ने विद्वानों की सभा आयोजित की। पंडितों ने अपनी-अपनी तरह के तर्क, रखे पर पंडित प्रमथ नाथ तर्क भूषण ने अपाला, घोषा, विश्ववारा के ब्रह्मवादिनी होने, मनु की पुत्री इला द्वारा ब्रह्माजी के यज्ञ का संचालन करने, गार्गी द्वारा याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करने, महाराज जनक द्वारा अपनी चारों पुत्रियों सीता, माँडवी, उर्मिला, श्रुतिकीर्ति का यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न कराने, रावण द्वारा सीताहरण के समय उनका यज्ञोपवीत तोड़ने जैसे अहाट्य तर्क रखे, तो एक भी विद्वान् उनका उत्तर नहीं दे पाया। तब से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में लड़कियों को भी वेद पढ़ाया जाने लगा। पर आज भी प्रतिगामिता उन तथ्यों की उपेक्षा और अवहेलना करती रहती है।

माँस मर्डर की घटना सदियों से होती चली आ रही है। पंद्रहवीं शताब्दी में फ्राँस का गिल्स डी रेस एक अत्यंत धनवान व्यक्ति था। इसने सौ से अधिक बच्चों की हत्या कर दी थी। सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड की एलिजाबेथ बेधरे एक ऐसी कुख्यात महिला थी, जिसने 650 युवतियों को मौत के मुँह सुला दिया था। वह युवती की हत्या करने के बाद उसके गरम खून से स्नान करती थी। इस परिप्रेक्ष्य में अपने रूप-जाल से रोम के साम्राज्य को हिलाकर रख देने वाली क्लियोपेट्रा भी आती है, जो प्रतिदिन एक हब्शी के खून से स्नान करती थी। उन्नीसवीं शताब्दी में पेरिस के जोसेफ फिलीप तथा लंदन के जैके ने असंख्य वेश्याओं को मार दिया था। जान वेन गेसी, फैक पाट्स, हेनरी लुइस वैलेस, डेविड बकौविट्ज, जेफरी, हेनरी ली ल्युकस और राबर्ट सी. हैलेन ऐसे कुख्यात अपराधियों के नाम हैं, जो लगभग 200 लोगों की हत्या में संलग्न थे।

अमेरिका के मनोवैज्ञानिक जोएल नाँरीस ने ऐसे लोगों के व्यवहार को सात अवस्थाओं में विभक्त किया है-

1- आँरा फेज-इसमें हत्यारा अपनी मानसिक विक्षिप्तता के कारण वास्तविकता के स्थान पर कल्पना का आवरण ओढ़ता है।

2- ट्रालिंग फेज-इस सक्रिय अवस्था में वह बड़ी ही सतर्कता व सावधानी से शिकार की खोज करता है।

3- वूइंग फेज-कुशलतापूर्वक खतरा व संकट मोल लिया जाता है।

4- केप्चर-हत्या के दौरान अजीब सा मनोभाव पैदा होता है।

5- मर्डर-क्रूरता का क्षण।

6- टाटेम फेज-हत्यारा अपनी सफलता पर पागल-सा हो जाता है।

7- डिप्रेशन फेज-उदासी की काली छाया फिर से मँडराने लगती है।

नाँरिस के अनुसार ऐसे व्यक्तियों का जीवन अत्यंत जटिल एवं आक्रामक होता है। वे सदा हिंसा, घृणा एवं अन्य घोर मनोविकारों के आवेग में उबलते रहते हैं। इसी कारण उनका चेहरा विकृत हो जाता एवं व्यवहार में असामान्यता आ जाती है। इनकी आँखों में यह भाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। शरीर की त्वचा शुष्क, भूरे नाखून एवं अपराधी वृत्ति इनको अलग से पहचान देती है।

मनोवैज्ञानिक नाँरिस के अनुसार हिंसा, हत्या, अपराध घातक मनोविकार हैं। परंतु व्यक्ति अपने प्रचंड संकल्प एवं पुरुषार्थ से इस दलदल से मुक्त हो सकता है। अपना प्राचीन इतिहास गवाह है कि अंगुलिमाल जैसे क्रूर, निर्दयी व्यक्तियों ने भी संत एवं योगी का जीवन जी सकने में सफलता प्राप्त की है। मनुष्य अपने संकल्प, साहस और प्रबल पुरुषार्थ से अपने अंदर की दानवी शक्ति को परास्त कर दैवीय शक्ति को जाग्रत् एवं जीवंत कर सकता है। हिंसा के स्थान पर रक्षा-दया एवं घृणा के बदले प्रेम का सुँदर जीवन ही श्रेयस्कर है। हर व्यक्ति को इसी ओर बढ़ना चाहिए।


अंतःचक्षु प्रदान करके रहूँगा (Kahani)

एक व्यक्ति एक पहाड़ी अभियान से भटककर किसी अज्ञात घाटी में पहुँच गया। दिन निकलने पर उसे मालूम हुआ कि वह किसी ऐसे स्थान पर पहुँच गया है, जहाँ सभी अंधे रहते हैं। उसने पानी व भोजन माँगा व वहाँ विश्राम के लिए रुक गया। पता चला किसी राजा के अन्यायपूर्ण शासन से त्रस्त होकर वे सब एक साथ वहाँ बस गए थे, पर वहाँ की मिट्टी व जल में किसी खनिज तत्त्व की कमी के कारण उनकी दृष्टि कम होती चली गई व धीरे-धीरे सभी अंधे हो गए। प्रकृति के किसी घटनाक्रम की जानकारी न होने से अंधों की इस चौथी पीढ़ी की यह धारणा बन गई थी कि समस्त संसार उनके गाँव तक ही सीमित है, वह चारों ओर चट्टानों से घिरा व लंबी-चौड़ी दत से ढका है। अजनबी ने अपनी ओर से सारे प्रयास किए, उन्हें दुनिया, आकाश, सूर्योदय, दृष्टि शक्ति की बातें समझाने की चेष्टा की, पर इन आँखों वाले राजा साहब का किसी ने जरा भी आदर न किया। उलटा वह एक निकम्मा और मूर्ख प्राणी ही समझा जाता था। उसे सुधारने के लिए गाँव की एक लड़की से विवाह करके अपने समाज में सम्मिलित करने का निश्चय किया गया, तो अजनबी ने स्वीकृति तो दे दी, पर उसी दिन उसने वहाँ से भाग निकलने का निश्चय किया। अंतिम दिन प्रातःकाल उसने पहाड़ी पर चढ़कर सूर्योदय का निरीक्षण किया, तो उसे नीचे बसी अंधों की दुनिया कालिमायुक्त अज्ञान से भरी जगह प्रतीत हुई। एक संकल्प के साथ वह वहाँ से निकल आया कि इस अज्ञान से जूझने के लिए एक व्यापक मोरचा खड़ा करके इन्हें अंतःचक्षु प्रदान करके रहूँगा।


एक मीठा जहर, जो हमें नित्य जर्जर कर रहा है

आज के दौर में टेलीविजन अधिकाँश लोगों की दिनचर्या का एक अनिवार्य अंग बन गया है। टी.वी. कार्यक्रमों की सतरंगी दुनिया में विचरण करना अब दर्शक के लिए मात्र मनोरंजन से कहीं ज्यादा है। सब कुछ भूलकर कार्यक्रमों के साथ इतना तादात्म्य स्थापित कर लेना कि आस-पास का भी भान न रहे, इस तथ्य की पुष्टि करता है।

टी.वी. में प्रसारित होने वाले कार्यक्रम कहीं-न-कहीं दर्शक के अंतर्जगत् की ही अभिव्यक्ति होते हैं, भले ही प्रतीकात्मक ही सही। तभी तो यह जानने के बावजूद कि जो दिखाया जा रहा है, वह सत्य नहीं है, वह उसके साथ सुख-दुःख का अनुभव करता है। यही कारण है कि मनुष्य की भावनाओं से लेकर स्थूल क्रिया−कलाप पर भी टेलीविजन का इतना व्यापक और गहरा प्रभाव परिलक्षित हो रहा है। अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र में भी चुनावी सर्वे के दौरान 75 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि वे टी.वी. पर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बहस संबंधी कार्यक्रमों को देखकर निर्णय लेते हैं। कुछ वर्ष पूर्व ब्रिटेन में बच्चों के चश्मे बहुत बिके। सर्वेक्षण से यह पता चला कि ऐसा टी.वी. देखने के कारण हुआ। साथ ही यह भी महसूस किया गया कि न सिर्फ बच्चों में वरन् बड़ों में भी दायित्व बोध का निरंतर ह्रास होता जा रहा है।

भारत की स्थिति इस संबंध में कुछ भिन्न है। प्रारंभ में सिर्फ एक ही चैनल का दूरदर्शन के कार्यक्रमों पर एकाधिकार था। तब तकनीकी दृष्टि से कार्यक्रम भले ही उच्चस्तरीय नहीं होते थे, पर गुणवत्ता की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी थे। उनमें मनोरंजन के अलावा ज्ञानपरक व प्रेरक सूचनाओं का समुचित समावेश रहता था। धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलीं और घरों में केवल टी.वी. और उपग्रह टी.वी. प्रसारणों का अवतरण हुआ। फिर तो जैसे टेलीविजन के छोटे परदे की रंगत में आमूल-चूल परिवर्तन हो गया।

एक-एक करके अनेक चैनल बाजार में आ गए। प्राइवेट चैनलों की भरमार हो गई। इन सारे चैनलों के आ जाने से 90-100 चैनलों वाले टी.वी. सेट भी आ गए। साथ ही पुराने टी.वी. में लगने वाले ऐसे साधन आ गए, जिससे चैनलों की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे में दर्शकों के प्रति टी.वी. प्रसारण का दृष्टिकोण ही बदल गया। उन्हें उद्देश्यपूर्ण ढंग से सूचना व ज्ञान से लाभान्वित करने का उत्तरदायित्व ही भुला दिया गया। अब तो दर्शक सिर्फ उपभोक्ता बन गया है और विभिन्न चैनलों ने दर्शकों के इसी रूप को भुनाने का व्यवसाय शुरू कर दिया है। लोकप्रिय मनोरंजन ही टेलीविजन का अभिप्राय हो गया है, क्योंकि उपभोक्तावादी तर्क के अनुसार ऐसे कार्यक्रमों की दर्शकता दर सर्वाधिक है। अन्य कार्यक्रम जो बहुत प्रेरक, उद्देश्यपूर्ण एवं आदर्श धारणाओं वाले थे, उनके प्रति उदासीनता बरती जाने लगी। ऐसे समय में जबकि बहुसंख्यक दर्शक टी.वी. कार्यक्रम देखते हैं, दर्शकों को बाँधे रखने के लिए सस्ती लोकप्रियता के मसालों से भरपूर कार्यक्रम पेश किया जाने लगा। विज्ञापनदाता भी सिर्फ इसी श्रेणी के कार्यक्रमों में पैसा लगाने को तैयार थे।


लूटमार की संस्कृति (Kahani)

एक व्यक्ति बड़ा निकम्मा था। हालाँकि वह खूब मोटा-ताज, शक्तिशाली और स्वस्थ था, परंतु काम कुछ नहीं करता। इसलिए लोग उसे साँड़ कहकर पुकारते थे। एक दिन वह कहीं जा रहा था। सामने से आता दिखाई दिया एक साँड़ (नन्दी)। उसके पीछे ही साँड़ का मालिक बाबाजी भी आ रहा था। उस निकम्मे व्यक्ति ने साँड़ को देखकर मौज से कहा, “आओ मित्र भाई हम तुम गले मिलें। हम दोनों में अंतर ही क्या है।” “और तो सब बराबर है, पर एक अंतर है। वह यह कि इस समय पर घास मिल जाती है और तुम्हारी भगवान् जाने-” बाबाजी बोले। वस्तुतः निकम्मे तथा आलसियों से पशु-जानवर भी अच्छे रहते हैं।

यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि जब प्रतिस्पर्द्धा बढ़ती है, तो उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार होता है, परंतु टी.वी. चैनलों के कार्यक्रमों पर दृष्टि डाले, तो निराशा ही हाथ लगती है। अधिकाँश कार्यक्रमों में हिंसा, अपराध व अश्लीलता को ही भिन्न-भिन्न तरीकों से दिखाया जाता है। ‘मीडिया एडवोकेसी’ शोध समूह द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुसार चार चैनलों के धारावाहिकों में देखे गए कुल 210 खंडों में न्यूनतम 351 घटनाएँ ऐसी देखी गईं, जो सीधे हिंसा केंद्रित कही जा सकती हैं। 458 घटनाएँ ऐसी थीं, जिन्हें हिंसात्मक कहा जा सकता है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि हर हिंसक घटना में एक से ज्यादा हिंसात्मक तरीके सक्रिय होते हैं और कुल कथा सामग्री के 72.3 प्रतिशत अंश में हिंसक घटनाएँ या हिंसात्मक गतिविधि होती है। ऐसे कार्यक्रमों से वा पीढ़ी को अपराध के नए-नए तरीके वह हिंसा सीखने के अतिरिक्त और क्या मिल सकता है? विदेशों में ही नहीं, भारत में भी हत्या, डकैती जैसे अपराध करने वाले कई अपराधी जिनमें किशोर व वयस्क दोनों शामिल हैं। पूछताछ में यह स्वीकार कर चुके हैं कि उन्होंने अमुक टी.वी. कार्यक्रम से प्रेरणा ली या अपराध करना सीखा। टी.वी. पर दिखलाए जाने वाले हिंसक घटनाएँ या प्रसंग टी.वी. दर्शकों के लिए दर्शन भर नहीं रह जाता, वह उपभोग बन जाता है। हिंसा का दर्शन इंद्रियों को सक्रिय करता है व लूटमार की संस्कृति को वैधता प्रदान कर जीने का तरीका बतलाता है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अन्य चैनलों के साथ राष्ट्रीय व मैट्रो चैनल भी निजी चैनलों से स्पर्द्धा करते हुए प्रायः जीवन के इन्हीं नकारात्मक पक्षों को दिखाने में जुट गए हैं, जबकि इन्हें अपेक्षाकृत अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। हिंसा, अपराध व अश्लीलता को लेकर फिल्म उद्योग की छवि तो पहले ही धूमिल हो चुकी है, अब उसकी काली छाया का प्रभाव टेलीविजन तक पहुँचना किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं कहा जा सकता।

‘इंटरनेशनल कम्यूनिकेशन्स फोरम’ की सलाहकार समिति के अध्यक्ष विलियम ई. पोर्टर का कहना है कि पहले व्यक्ति पर परिवार, स्कूल व धार्मिक संस्थाओं का प्रभाव पड़ता था और अब मीडिया का गहरा प्रभाव पड़ने लगा है। टी.वी. कार्यक्रम एक मीठा जहर है, जिसका सबसे ज्यादा असर बच्चों व किशोरों पर पड़ता है। अमेरिका में छपी एक खबर के अनुसार वहाँ के मनोविश्लेषकों और समाजशास्त्रियों ने समाज पर टी.वी. कार्यक्रमों के प्रभाव पर पिछले दस सालों में हजारों सर्वेक्षण व शोधग्रंथ प्रस्तुत किए हैं। अध्ययन से यह तथ्य उभरकर सामने आया कि बहुतों के बुढ़ापे का एक-चौथाई समय टी.वी. देखने में चला जाता है। लाखों बच्चे भी 20 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते अपनी जिंदगी के छह साल टी.वी. के सामने स्वाहा कर चुके होते हैं। अमेरिकी स्कूलों में हार महीने 52,500 हमले, चोरी व डकैती की घटनाएँ होती हैं। हर वर्ष स्कूल की इमारतों व उसके आस-पास 30 लाख अपराध होते हैं। लगभग एक लाख पैंतीस हजार बच्चे बंदूक लेकर स्कूल जाते हैं और बीस प्रतिशत बच्चे चाहे तो बंदूक प्राप्त कर सकते हैं। बीस प्रतिशत बच्चे विश्राम के लिए बने कमरों नहीं जाते, क्योंकि वहाँ उन्हें लूटे जाने या छेड़खानी किए जाने का भय रहता है। अमरीकी समाज में स्कूली छात्राओं के माँ बनने का प्रतिशत भी बहुत ज्यादा है।

भारत में भी हाल ही में किए गए एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण से पता चलता है कि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का स्तर गिर रहा है। गणित व भूगोल जैसे विषयों में बच्चे कमजोर हो रहे हैं। भाषा बिगड़ रही है, याददाश्त में कमी आती जा रही है। वे उन विज्ञापनों को जरूर याद रखते हैं, जो टी.वी. पर बार-बार दिखाए जाते हैं। साथ ही वे बच्चों के लिए बने उपदेशात्मक कार्यक्रमों को पसंद न कर बड़ों के कार्यक्रमों को देखना ज्यादा पसंद करते हैं। ये कार्यक्रम उन्हें ऐश्वर्य के झूठे सपने दिखाते हैं, उन्हें असहिष्णु व उग्र बनाते हैं। एक ऐसे कल्पनालोक में ले जाते हैं, जिसका कोई अस्तित्व नहीं। दूरदर्शन एवं अन्य टेलीविजन चैनलों में जो सुपरमैन, हीमैन, फैंटम जैसी कार्टून फिल्में दिखाई जाती हैं, वे बच्चों में विज्ञान चेतना व तर्क क्षमता पैदा करने के बजाय उनमें अंधविश्वास व चमत्कारों को सही मानने की भावना भरते हैं। बच्चों के चेहरे से बालसुलभ मुस्कान गायब होती जा रही है। उनकी आँखों में मासूम शरारत की जगह उद्दंडता और अवज्ञा के भाव परिलक्षित होने लगे हैं। उनके हाथ खिलौनों के बजाय चाकू व बंदूक से खेलने लगे हैं। कला, यथार्थ व मनोरंजन के नाम पर पश्चिमी संस्कृति का लुभावना दर्शन व्यक्ति को अपनी ही संस्कृति से कटने को विवश कर रहा है।

इतना ही नहीं, इस शोध-अध्ययन में टी.वी. से होने वाली शारीरिक बीमारियों का भी विस्तृत उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि हिंसा व अनैतिक गंदगी से भरे कार्यक्रमों का असर सीधे पेट पर होता है, फलस्वरूप अपच, गैस और आमाशय की अन्य खराबियों के साथ अल्सर भी हो सकता है। इसका असर श्वास प्रक्रिया पर भी पड़े बिना नहीं रहता। साँस लेने में तकलीफ होती है, धड़कन बढ़ जाती है, रक्तचाप तेज हो जाता है। कुछ लोगों में ‘डिप्रेशन’ एवं ‘मानसिक असंतुलन’ के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं। महिलाओं में हारमोन का असंतुलन तो होता ही है। गर्भस्थ शिशु को भी नुकसान पहुँच सकता है।

वैज्ञानिकों का मत है कि कार्यक्रमों को प्रसारित करने और देखने के बीच जो वैज्ञानिक प्रभाव हो सकते हैं, उसके बारे में हर टी.वी. दर्शक को जानकारी होनी चाहिए। जैसे टी.वी. के परदे पर जो तस्वीरें उभरती हैं, वे हमारे सामने इलेक्ट्रॉनिक स्कैनिंग के माध्यम से आती हैं। इस प्रक्रिया में लाखों छोटे-छोटे बिंदुओं को रेखाओं में बदलकर स्क्रीन पर लाया जाता है और एक सेकेंड में तीस-चालीस बार की रफ्तार से उस पर तेज रोशनी डाली जाती है। इससे आँखों व दिमाग को बार-बार झटका लगता है और चूँकि हमारा दिमाग इस तरह के झटके एक सेकेंड में बीस बार से अधिक सहने की शक्ति नहीं रखता, इसलिए आँखों और दिमाग दोनों को काफी नुकसान पहुँचता है।

आँकड़े बताते हैं कि हमारे देश में हर चार परिवारों में से एक के पास टेलीविजन है। इस सशक्त माध्यम का इस्तेमाल लोगों को शिक्षित व जागरूक बनाने के लिए किया जा सकता है। पारिवारिक कार्यक्रमों का निर्माण हो, साथ ही अपनी संस्कृति से जुड़े विषयों पर कार्यक्रम बनें। युवा पीढ़ी सबसे ज्यादा जागरूक व चिंतित रहती है अपने कैरियर के प्रति। टी.वी. पर ऐसे बेहतर व रोचक शैक्षणिक कार्यक्रम दिखाए जाने चाहिए, जिससे उन्हें मार्गदर्शन मिल सके। तकनीक का गलत इस्तेमाल नई पीढ़ी को बरबाद कर देगा। न उन्हें अपने देश की जानकारी होगी, न समाज की। ऐसा नहीं है कि अच्छे कार्यक्रम बन नहीं सकते। जब हमारे यहाँ उत्कृष्ट कलाकारों व निर्देशकों की कमी नहीं है, फिर कोई कारण नहीं हो सकता कि अच्छे कार्यक्रम न बनाये जा सकें। फिल्मी विज्ञापनों के बजाय अच्छे कार्यक्रमों को हाईलाइट किया जाना चाहिए, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग उसे देख सकें। निजी चैनलों को भी चाहिए कि समाज निर्माण में योगदान दें व बेहतर शैक्षणिक कार्यक्रम बनवाएँ। इससे सजग व कर्त्तव्यनिष्ठ पीढ़ी तैयार होगी। अभिभावकों को भी चाहिए कि वे केवल वही कार्यक्रम अपने बच्चों को देखने दें, जो उन्हें स्वस्थ मनोरंजन देते हों, शिक्षाप्रद हों। ऐसा करके ही हम वर्तमान सदी में स्वयं को और अपने परिवार एवं समाज को सँवार सकते हैं।


जड़ें ठीक हो तो व्याधियाँ आए क्यों

शरीर मन-मस्तिष्क का आज्ञाकारी सेवक है। दोनों आपस में अविच्छिन्न रूप से गुँथे हुए हैं। शरीर रोगी होता है, तो मस्तिष्क बेचैन-अशाँत पाया जाता है, नींद नहीं आती और सिर पर भारीपन छा जाता है। यही बात मन पर विपत्ति आने पर शरीर की दुर्दशा होने के संबंध में है। क्रोध में आँखें लाल हो जाती हैं, होंठ काँपने लगते हैं, शरीर आवेश से भर जाता है। भय की स्थिति में गला सूखता है, पैर काँपते हैं; रोंएं खड़े हो जाते हैं और गहरी साँसें चलने लगती हैं।

कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। यह कथन आरोग्य का महत्त्व समझाने की दृष्टि से कहा गया है; पर वास्तविकता इससे भिन्न है। विशेषज्ञ बताते हैं कि मन के स्वस्थ रहने पर ही शरीर स्वस्थ रह सकता है।

शरीर का सामान्य कार्य भोजन से चलता दीखता है, पर उसके साथ यह शर्त जुड़ी हुई है कि वह पच सके तो, अन्यथा अपच रहने की स्थिति में खाया हुआ भोजन विषतुल्य हो जाता है। वह सड़ता है, गैसें बनाता है और वे रक्त में मिलकर समूचे शरीर में घूमती हैं और जहाँ कहीं भी उन्हें अवसर दीखता है, वहाँ रुककर रोग खड़ा कर देती हैं।

अपच का एक कारण अधिक मात्रा में अभक्ष्य भक्षण करना है, किंतु दूसरा कारण है, मुख, आमाशय, जिगर, आँत आदि से उचित स्तर का, उचित मात्रा में पाचक रसों का स्राव न होना। इस स्थिति में सात्विक और स्वल्प मात्रा में खाया हुआ भोजन भी नहीं पचता। अपच का कोई भी कारण क्यों न हो, वह दुर्बलता और रुग्णता का निमित्त कारण बनता है। यह स्राव मानसिक स्थिति अस्त−व्यस्त होने की दशा में मात्रा में स्वल्प और स्तर के हिसाब से घटिया निकलते हैं। इनके कारण आहार पोषक न रहकर शोषक बन जाता है।

शरीर-पोषण में शुद्ध रक्त की जितनी भूमिका है, उससे भी अधिक उस विद्युत् प्रवाह की है, जो नाड़ी तंतुओं में निरंतर दौड़ता रहता है, जिसका उद्गम केंद्र मस्तिष्क है। यह नाड़ी तंतु जीव कोशिकाओं को गति भी देते हैं और पोषण भी। इसमें कमी पड़ जाने से भीतरी अवयवों की गतिशीलता शिथिल पड़ जाती है। अंदर का खोखलापन बाहर भी आता है। शरीर की क्रियाशक्ति घट जाती है और स्वास्थ्य-संतुलन लड़खड़ाने लगता है। इतने पर भी काम तो करना ही पड़ता है। नित्यकर्म से निपटने, भोजन करने आदि तक में श्रम पड़ता है। न्यूनाधिक मात्रा में चलना-फिरना तो पड़ता ही है। हाथ भी चलते ही हैं। श्रम के बिना शरीर की पाचन और मल-विसर्जन प्रक्रिया काम कैसे करे? यह तो सामान्य दिनचर्या की बात हुई। काम इतने से भी नहीं चलता। आजीविका उपार्जन के लिए भी काम करना पड़ता है और उसमें शारीरिक एवं मानसिक क्षमता लगती है। इस खरच का संतुलन यदि उत्पादन के साथ न बैठे, तो शरीर गलता और घिसता जाएगा, फलतः रोग दबोच लेंगे और अकाल मृत्यु असमय ही आ धमकेगी।

रक्त पेट में भोजन पर पैदा होता है। गुरदों, आँतों और फेफड़ों द्वारा उसका परिशोधन होता है। हृदय द्वारा नाड़ियों के माध्यम से उसे अंग-अवयवों तक पहुँचाया जाता है। हृदय देखने भर में स्वसंचालित प्रतीत होता है, पर वास्तविकता यह है कि अन्य अवयवों की भाँति हृदय को भी जिस क्षमता की आवश्यकता होती है, वह मस्तिष्क रूपी बिजलीघर में उत्पन्न होती है एवं मेरुदंड के साथ जुड़े हुए अनेक नाड़ी तंतुओं और गुच्छकों द्वारा पहुँचती है।

कुछ दिन एकाँत में रहकर यह साधना करनी चाहिए कि संसारभर में जो कुछ है ईश्वर का है। मैं तो वस्तुओं या प्राणियों का उपयोग उनकी इच्छानुसार किया करूंगा।

यह विद्युत् प्रवाह कितना अद्भुत और आश्चर्यजनक है, इसकी जानकारी अंतःस्रावी ग्रंथियों और उनके द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले हारमोनों का निरीक्षण-परीक्षण करने पर पता चलता है। प्रजनन माध्यम से वंशवृद्धि और तात्कालिक सरस संवेदनाओं में जिन ‘जीन्स’ का हस्तक्षेप होता है, उनकी संरचना एवं क्रियापद्धति और भी अद्भुत है। इन्हें अपने प्रयोजन के अनुरूप जो सामर्थ्य मिलती है, वह भी मेरुदंड के माध्यम से मस्तिष्क द्वारा प्रेरित होती है। जिस प्रकार मशीन के पुरजों को रगड़ द्वारा जलने-घिसने से बचाने के लिए उनमें मोबिल ऑयल की चिकनाई डालते रहना पड़ता है, उसी प्रकार रक्त, माँस, मज्जा आदि द्वारा एक सामान्य प्रयोजन की पूर्ति भर होती है। कारखानों में लगी मशीनों को चलाने के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता पड़ती है, वह तो जेनरेटर या इंजन से प्राप्त होती है। यह जेनरेटर मस्तिष्क ही है। वही है जो सोचने-विचारने के अतिरिक्त विद्युत् उत्पादन का भी केंद्र है। यह ऊर्जा उसे ब्रह्माँडव्यापी ऊर्जा से प्राप्त होती रहती है। इसीलिए मस्तिष्क को ब्रह्माँडीय शक्ति खींचते रहने वाले पृथ्वी के ध्रुव केंद्र के समतुल्य माना जाता है।

पुराने जमाने में रोगों का कारण वात, पित्त, कफ से, लवणों या रसायनों के कम पड़ने से तथा विषाणुओं के आक्रमण पर निर्भर माना जाता था और तदनुसार उपचार-साधनों के रूप में औषधियों का निर्माण और उपभोग किया जाता था। नवीनतम वैज्ञानिक खोजों ने यह माना है कि रोगों की जड़ मनोविकारों में है। मानसिक असंतुलन ही चित्र-विचित्र आकार-प्रकार वाली बीमारियों का प्रमुख कारण है। अन्य कारण तो सहायक मात्र हैं। मानसिक तनाव या विक्षोभ ही रोगों के मूल उत्पादक हैं। इसलिए आधुनिक चिकित्सक आहार-विहार की सामान्य खामियों के अतिरिक्त रोगी की मनोदशा का विवेचन-विश्लेषण करते हैं और उस क्षेत्र की विकृतियों को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। आवश्यक नहीं कि रोगी होने से पूर्व मनुष्य पागल ही हो जाता हो। पागलपन की हलकी-फुलकी इतनी शाखा-प्रशाखाएँ हैं, जिनसे पूरी तरह हम विरले ही बच पाते हैं। चिंता, भय, निराशा, क्रोध, घृणा, आवेश, उद्विग्नता जैसी सनकें भी विक्षिप्तता की ही छोटी बहनें या सहेलियाँ हैं। अनैतिक चिंतन या आचरण मनःक्षेत्र को मथ डालते हैं। आत्मिक प्रेरणा उनसे दूर रहने की प्रेरणा देती है, किंतु उद्धत चिंतन अनाचार ही नहीं, दुराचार और अत्याचार करने तक पर उतारू हो जाता है, फलतः अंतराल में अंतर्द्वंद्व उठ खड़े होते हैं, दुहरा व्यक्तित्व उभरता है। इस असंतुलन के कारण अविवेकी व्यक्ति की मनःस्थिति सनकी एवं उद्धत, अभिमानी जैसी हो जाती है। उस आवेश से सारा शरीर तन जाता है। यह तनाव जिस भी अंग-अवयव को कमजोर पता है, उसी के ऊपर अपना अधिकार जमा लेता है। उत्तेजित तनावों की भाँति हीनता, दीनता, भीरुता, आशंका आदि का भी ऐसा प्रभाव होता है, जिसे ‘अवसाद’ कह सकते हैं। मानसिक स्थिति में किसी पर आवेश छाए रहते हैं, किन्हीं पर अवसाद। इन्हीं ज्वार-भाटों से अस्थिरता उत्पन्न होती है और रोग उभरने की भूमिका बन जाती है।

शरीर की संरचना ऐसी ही है, जो आहार विहार ठीक कर लेने पर छुट पुट आए दिन की गड़बड़ियों से स्वयं निपटती रहती है, किंतु जब जड़ें ही सड़ने गलने लगें, तो पेड़ पौधों का दयनीय स्थिति में दीख पड़ना स्वाभाविक है। मन जड़ है और शरीर उसका कलेवर-आच्छादन। यदि किसी को स्वस्थ, निरोग, बलिष्ठ, दीर्घायु रहना हो, तो एक उपाय अनिवार्य रूप से अपनाना चाहिए कि मस्तिष्क शाँत-संतुलित रहे। यह विचारशील, विवेकवान् और नीतिवान् होने की स्थिति में ही संभव है।


अपूर्णता समाप्त हो गई (Kahani)

ज्ञान, कर्म, भक्ति का समुच्चय जीवन के समग्र विकास के लिए अनिवार्य है। बहुसंख्य व्यक्ति इस भ्रम में पड़े रहकर एकाँगी मार्ग पकड़ते हैं व स्वयं को जंजाल में उलझा लेते हैं। महाराजा अज के यहाँ यज्ञायोजन था। एक दिन महर्षि वशिष्ठ जब प्रधान पुरोहित का कार्य सँभालने जा रहे थे, तो मार्ग में उन्हें मंकी नामक व्यक्ति मिला। उसने अपना दुःख प्रकट करते हुए कहा, “देव! मैंने श्रमशीलता में कोई कमी नहीं छोड़ी, सदैव सदाचरण किया तथा ज्ञानार्जन हेतु सभी ग्रंथों का स्वाध्याय भी कर डाला, परंतु फिर भी अपने अंदर अपूर्णता ही पाता हूँ। न तो मेरी कोई प्रशंसा करता है, न मुझे कोई स्नेह ही देता है।” मुनीश्वर बोले, ‘तात! तुमने कर्म व ज्ञान की दो धाराओं की तो उपासना कर ली, पर भावपक्ष को तो भूल ही गए। तुम स्नेह बाँटो, बदले में दस गुना पाओगे। सब जीवधारियों में अपनी ही आत्मा समाई मानकर स्वयं को भक्तिप्रवाह में सराबोर कर डालो। अपनी धारा को परमात्मा के अक्षय आनंद रूपी गंगा से मिला दो, तो तुम सम्मान, श्रेय तो पाओगे ही, उस अभाव की पूर्ति भी होगी, जो तुम्हें त्रास दे रही है।” शीतल वचन सुनकर मंकी को दिशा मिली। वह अर्जित ज्ञान-धन-स्नेह बाँटने लगा और उसकी अपूर्णता समाप्त हो गई।


त्याग-बलिदान की संस्कृति-देव संस्कृति-5

(समापन किश्त)

त्याग-बलिदान ही भारतीय संस्कृति की मूल थाती रही है, इसी के बलबूते सतयुगी समाज की परिकल्पना की गई है। परमपूज्य गुरुदेव की विगत पाँच अंकों से प्रकाशित अमृतवाणी की यह समापन किश्त प्रस्तुत है।

अगले दिन और खराब होंगे

गुरुजी! हमारे घर का नरक तो दूर हो जाएगा। कैसे हो जाएगा? गुरुजी! हमने तो अपने चारों बच्चों को चार-चार सौ रुपया महीना देकर देहरादून के पब्लिक स्कूल में भेज दिया है। उससे क्या हो जाएगा? उससे गुरुजी! हमारे बच्चे एटीकेट सीखकर के आएँगे।ऐटीकेट क्या होता है? ऐटीकेट उसे कहते हैं, जब कोई आदमी आए और घर में पानी पीने को माँगे, तो उसको कहना चाहिए, “थैंक यू वैरी मच।” तो क्या इसी को ऐटीकेट कहते हैं? हाँ इसी को कहते हैं। हमने चार सौ रुपये महीने पर बोर्डिंग स्कूल में अपने बच्चे को दाखिल करा दिया है। वह क्रीज किया हुआ पैंट पहनेगा। हमारा लड़का अच्छा बनेगा। नहीं बेटे, तेरा लड़का अच्छा नहीं बन सकता, क्योंकि उसके भीतर, उसकी जीवात्मा में भाइयों के लिए, बहनों के लिए, माता-पिता के लिए जो प्रेम और सेवा की वृत्ति होनी चाहिए, वह कहाँ से जाएगी? बेटे, हमको ये मालूम पड़ता है कि अगले दिन बहुत बुरे आने वाले हैं। अगले दिनों युद्ध के दौर भी आ सकते हैं, बीमारियों के दौर भी आ सकते हैं। टेंशन बढ़ता हुआ चला जा रहा है। क्यों महाराज जी! सबको टेंशन हो जाएगा? शायद सबको जाए। अमेरिका में तो छाप भी दिया गया है कि सिगरेट पीजिए, टेंशन बुलाइए। सिगरेट पीजिए, कैंसर बुलाइए। तो क्या सबको टेंशन हो जाएगा? हाँ। अगर टेंशन न हुआ तो और बीमारी हो जाएगी। डायबिटीज हो जाएगी। नींद न आने की शिकायत हो जाएगी। पेप्टिक अल्सर हो जाएगा और बहुत-सी बीमारियाँ हैं, जो आदमी को धर दबोचेंगी।

ये कैसे हो जाएँगी? मित्रो! आदमी की जो घटिया वृत्तियाँ हैं, वे न केवल आदमी के शरीर को, वरन् उसके ईमान को और अंतःकरण को गलाती और जलाती चली जाएँगी। घर नरक बनते चलते जाएँगे। नहीं साहब! हमारे बेटे की बहू तो एम.ए. पास है। तो बेटे, तेरे घर में जल्दी नरक आएगा। हमारे बेटे की बहू तो इंटर पास हे। तो तेरे घर में थोड़ी देर भी हो सकती है। अरे साहब! औरत तो बिना पढ़ी-लिखी है। तो तेरे घर और भी कुछ ज्यादा दिन तक शाँति रह सकती है। लेकिन अगर तेरी बहू एम.ए. पास है, तो बेटे, तेरे घर में नरक जल्दी आएगा, तू देख लेना।

मित्रो! ऐसा क्यों होता चला जा रहा है? शिक्षा की दृष्टि से, धन की दृष्टि से, अमुक की दृष्टि से, सब तरह से आदमी संपन्न होता चला जा रहा है, लेकिन ईमान की दृष्टि से,, अंतरंग की दृष्टि से इतना खोखला होता चला जा रहा है कि उसके ऊपर मुसीबतें आएँगी। नेचर हमारे ऊपर मुसीबतें पटक देगी। वह हमें क्षमा करने वाली नहीं है। हमारे शरीर का स्वास्थ्य सुरक्षित रहने वाला नहीं है। हमको किसी से प्यार-मोहब्बत रहने वाली नहीं है। हम मरघट के प्रेत-पिशाच के तरीके से अब जिंदा रहने वाले हैं। मरघट के प्रेत-पिशाच में एक ही बात होती है कि न तो कोई उसका होता है और न वह किसी का होता है। प्रेत-पिशाचों में क्या फर्क होता है? बेटे, एक ही होता है, हर भूत के मन की ये बनावट होती है कि न वह किसी का और कोई उसका। तो महाराज जी! आपने देखे हैं कि भूत कैसे होते हैं? हाँ, हमने देखे हैं और आपको भी दिखा सकते हैं।

चलते-फिरते प्रेत-पिशाच

ये भूत आपको कहाँ मिलेंगे? मित्रो! आप पाश्चात्य देशों में चले जाइए। वहाँ आपको प्रेत मिलेंगे, पिशाच मिलेंगे। कैसे? जो अशाँत-ही-अशाँत हैं। पैसा जिनके पास अंधाधुँध है, लक्जरी जिनके पास बहुत सारी है, टेलीविजन है, पीने को फलों का जूस है, लेकिन वे इतने अधिक अशाँत हैं, टेंशन में हैं कि प्रेत-पिशाचों से कम नहीं हैं। न कोई उनका और न वे किसी के। न बीबी उसकी, न भैया उसका। दोनों-के-दोनों वेश्या और भड़ुवे हैं। जब तक दोनों आते हैं, तब तक तमाशा दिखाते हैं और जब मन भर जाता है, तो एक-दूसरे को लात मारकर भगा देते हैं। हम ये किसकी बात कह रहे हैं? बेटे, इसी को पिशाच कहते हैं। पाश्चात्य देशों में यही होता है।

मित्रो! इसका परिणाम क्या होगा? इसका परिणाम यह होगा कि हमारा अंतरंग खोखला होता चला जाएगा। पैसा बढ़ेगा, तो हम क्या कर सकते हैं? शिक्षा बढ़ेगी, सभ्यता बढ़ेगी, तो हम क्या कर सकते हैं? दौलत बढ़ेगी तो हम क्या कर सकते हैं? मित्रो! इससे आदमी के ऊपर मुसीबतें ही आएँगी। हम और आप जिस जमाने में रहते हैं, बेटे, हमारे प्राण निकलते हैं उसे देखकर। जब हम भविष्य की ओर देखते हैं, विज्ञान की ओर देखते हैं, तब हमें खुशी होती है कि हमारे बाप-दादे कच्चे मकानों में रहते थे और हम पक्के में रहते हैं। हमारे बाप-दादों में से कोई पढ़ा लिखा नहीं था और हम सब पढ़े-लिखे हैं। सुविधाओं को देखते हैं, तो हमारे पास टेलीफोन है और बहुत सारी चीजें हैं, लेकिन जब उनके साफ-सुथरे जीवन को, उज्ज्वल चरित्र को देखते हैं, तो उस दृष्टि से हम किस कदर दिनों दिन घटते हुए चले जा रहे हैं, यह स्पष्ट दिखाई देता है।

विवेकानंद के पास रामकृष्ण परमहंस जाया करते थे और कहते थे कि बेटा हमारा कितना काम हर्ज होता है? तू समझता नहीं है क्या? महाराज जीम बी.ए. करुँगा, एम.ए. करूंगा, नौकरी करूंगा। नहीं बेटे, तू नौकरी करेगा, तो मेरा काम हर्ज हो जाएगा और हम जिस काम के लिए आए हैं और तू जिस काम के लिए आया है, सो उसका क्या होगा? नहीं महाराज जी! देखा जाएगा, पहले तो मैं नौकरी करूंगा। नहीं बेटे, ऐसा नहीं हो सकता। एक दिन रामकृष्ण परमहंस रोने लगे। उन्होंने कहा, बेटे तू नौकरी करेगा, तो मेरा काम हर्ज होगा। मित्रो! विवेकानंद चले गए और रामकृष्ण ने उन्हें क्या-से-क्या बना दिया। कई आदमी कहते रहते हैं कि गुरुजी! हमको आशीर्वाद देकर आप विवेकानंद बना सकते हैं? बेटे, हम आपको बना सकते हैं। इसके लिए हम व्याकुल भी हैं और लालायित भी, लेकिन पहले तू कीमत तो चुका। नहीं, महाराज जी! कीमत तो नहीं चुकाऊँगा। आप तो आशीर्वाद दीजिए। बेटे, जो तू आशीर्वाद-ही-आशीर्वाद माँगता है, वह जीभ की नोंक से कह देने भर से आशीर्वाद नहीं हो जाता। उसे पुण्य देना पड़ता है, मनोयोग देना पड़ता है, तप देना पड़ता है, श्रम देना पड़ता है। नहीं, महाराज जी! जीभ हिला देते हैं, सो वही आशीर्वाद हो जाता है।

आशीर्वाद इतना सस्ता नहीं

बेटे, तू जीभ हिलाकर के आशीर्वाद माँगता है। मैं समझता हूँ तू जीभ हिलाकर के ही राम के नाम को भी हजम करना चाहता है, मंत्र को हजम करना चाहता है। जीभ को हिलाकर और न जाने क्या-क्या काम कराना चाहता है। मंत्र जपने से देवता मिल सकते हैं, स्वर्ग मिल सकता है, तो फिर गुरुजी का आशीर्वाद क्यों नहीं मिल सकता? जीभ की नोंक हिलाइए फिर देखिए, क्या करामात आती है। हाँ बेटे, जीभ की नोंक हिलाकर वहाँ चला जाना बैंक में और जीभ हिला देना-दीजिए दो हजार रुपये। देखें कहाँ से लाएगा जीभ हिलाकर। बेटे, तुझे सब जीभ-ही-जीभ दिखाई पड़ती है और कोई दूसरी चीज नहीं दिखाई पड़ती। गुरुजी का आशीर्वाद भी जीभ और हमारा भजन भी जीभ, सब जीभ-ही-जीभ। क्रिया की जरूरत ही नहीं पड़ेगी? हाँ गुरुजी! क्रिया की क्या जरूरत है। आप तो जीभ हिला दीजिए, बस हो जाएगा, आशीर्वाद। बेटे, ऐसा कोई आशीर्वाद नहीं है, न था और न कभी होगा।

युग की पुकार सुनिए

मित्रो! फिर क्या करना पड़ेगा? अब मैंने आपको इसलिए बुलाया है कि हमको आपकी आवश्यकता आ पड़ी है। हम तीस साल से कुटुँब बनाकर रह रहे थे और तीस साल से आपको बुला रहे थे। अब हम आपसे पूछते हैं कि क्या आपके लिए ऐसा संभव है कि आप अपने जीवन में दैवी संपदा का खरच और सबूत दे पाएँ। क्या आपके लिए यह संभव है कि आप अपने जीवन में त्याग का, सेवा का, बलिदान का, परोपकार का और परमार्थ का कोई प्रमाण दे सकते हैं कि नहीं? मित्रो! अभी ये लड़कियाँ गा रही थीं और मेरे मन में भी जहर आ रही थी। वे गा रही थीं, “जरूरत आ पड़ी है, काल की भी चाल मोड़ो तुम।” ये समय ने पुकार की है, युग ने पुकार की है, संस्कृति ने पुकार की है, देश ने पुकार की है, धर्म ने पुकार की है, मानवी सभ्यता ने पुकार की हे कि आपके पास कुछ है, तो आप दीजिए। गुरुजी हमारे पास नहीं है। ठीक है, जहाँ तक पैसे का सवाल है, मैं जानता हूँ कि आपके पास पैसा होता तो शायद आप मेरे पास न आते। मैं जानता हूँ आपकी गरीबी को और परेशानी को, पर इस गरीबी के बीच में भी मेरी ये आँखें चमकती हैं और एक चीज के बारे में दृष्टि डालती हैं, तो पाती हैं कि अभी भी आपके पास मन है, आपके पास कलेजा है। आपके पास दिल है। अगर आप अपने मन, अपने हृदय और अपने श्रम की बूँदें लगा सकते हों, तो इस परीक्षा की घड़ी में आपका आना जीवन धन्य बनाने के लिए पर्याप्त है।

मित्रो! अब परीक्षा की घड़ी सामने आ गई है। इसको हमने पुनर्गठन योजना कहा है। इसके कितने पहलू हैं, कल हमने इस बारे में बताया था और फिर आज बताएँगे कि इसके क्या परिणाम आ सकते हैं? हम अपने जवान कुटुँब से क्या कराना चाहते थे और क्या करा सकते हैं? क्या संभावना है? हाँ, सौ फीसदी संभावना है। महाराज जी! आप तो ऐसे ही सपने देखते हैं। हाँ बेटे, हमने सपने ही देखे हैं और हमारे सपने पूरे होकर रहे हैं। हमने सपने देखे, जब गायत्री तपोभूमि नहीं बनी थीं जब हमारे पास मात्र छह हजार रुपये थे, तब हमने ‘गायत्री तपोभूमि’ का एक नक्शा छापा था अखण्ड ज्योति पत्रिका में, तो लोगों ने कहा, क्यों साहब! आपने तो बड़ा लंबा-चौड़ा सपना छाप दिया। हाँ भाई ये सपना है। गायत्री तपोभूमि हम ऐसे ही बनाएँगे। महाराज जी! ये तो कितनों रुपयों की हो जाएगी? आपके पास इतने रुपये कहाँ हैं। देख बेटे, मेरे पास छह हजार रुपये हैं। इतने से नहीं बनेगी तो छह लाख से बन जाएगी।

मित्रो! हमारा ख्वाब और हमारा सपना पूरा होकर के रहा। गायत्री तपोभूमि जो बनी है, वह उससे तीन-चार साल पहले छपे हुए गायत्री तपोभूमि के चित्र से हू-बहू मिलती हुई बनाई गई है। हमारे सपने युग को बदलेंगे, नया जमाना लाएँगे। दैवीय सभ्यता और दैवीय संपदा की फिर से स्थापना करेंगे। हम असुरता को चैलेंज करेंगे। क्यों? क्योंकि हम मनुष्यता से प्यार करते हैं, क्योंकि हम मानवी भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहते हैं, क्योंकि हमको अपनी नई पीढ़ियों को बहुत प्यार करते हैं। जिन मुसीबतों से हम गुजर रहे हैं, अपनी नई पीढ़ियों को गुजरवाना नहीं चाहते, क्योंकि हम बच्चों को बहुत प्यार करते हैं।

इसलिए मित्रो! हम नई सभ्यता लाने के लिए और नया युग लाने के लिए प्रयत्न करते हैं और उस प्रयत्न के लिए आपसे सहयोग माँगते हैं। पुनर्गठन योजना हमारे और आपके समय की परीक्षा की एक कसौटी है। इसमें हम आपका पी.एम.टी. के लिए इम्तिहान लेते हैं, क्योंकि अगले चरण में, जिनमें हमको ब्रह्मवर्चस की स्थापना भी करानी है, अपने अनुदान भी देने हैं, आपके यश भी-अजर-अमर बनाने हैं, आपकी जीवात्मा में शक्ति का संचार भी करना है। इसके लिए यह देखना है कि आप लोगों में से कुछ में जान है, जिसको ‘दैवीय सभ्यता’ कहते हैं, ‘दैवीय संपदा’ कहते हैं। उसमें त्याग-बलिदान की बात होती है। क्या उसके लिए आप कुछ कर पाएँगे?

दैवीय संपदा का विस्तार करें

साथियो! दैवीय सभ्यता जिसका अर्थ भजन करना नहीं होता, वरन् जीवन को दैवीय सभ्यता के अनुरूप ढाल लेना होता है। छोटे-से अनुदान के रूप में से हर एक का हमने समय माँगा है। हमने जो कार्यक्रम बनाए हैं, सब एक उद्देश्य से बनाए हैं। वह सब इसलिए बनाए हैं कि हममें से कोई भी आदमी निष्क्रिय न रहने पाए। हर एक से कहा है कि अगर आपके अंदर निष्क्रियता है, तो उसे दूर कीजिए और अपने अंदर सक्रियता का विकास कीजिए। अपने युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को हम सक्रिय देखना चाहते हैं। किसके लिए? जो हमारा मिशन है, उसके लिए। गुरुजी! आपने किसको क्या-क्या सक्रियता सौंपी है? बेटे, हमने उन आदमियों के लिए भी, जो घोर व्यस्त है, कार्य सौंपा है। जिनके पास योग्यता है, उनको भी कार्य सौंपा है और कहा है कि आप इस विचारधारा को फैलाने में योगदान दीजिए, मदद कीजिए।

महाराज जी! हम आपकी मदद कैसे करें? बेटे, आपके पास जो हमारी रिसर्च है, जिसको आपने माना है, जो आप हमारी पत्रिकाएँ पढ़ते हैं, उनको आप पाँच आदमियों को पढ़ाइए। अगर आप पुस्तकालय नहीं चला सकते हैं, तो कोई बात नहीं, लेकिन आप एक पत्रिका को पाँच आदमियों को पढ़ा सकते हैं। इससे हमारा मिशन पाँच गुना अधिक दो महीने के भीतर हो जाएगा। इस तरह जितना हमने तीस साल में किया है, उतना आप एक साल में कर सकते हैं।

गुरुजी! और हम क्या कर सकते हैं? बेटे, कब से हमारे झोला पुस्तकालय चल रहे हैं, चल पुस्तकालय चल रहे हैं। इन्हें आप दो घंटे भी चला दिया करें, तो मजा आ जाए। दो घंटे का उदाहरण मैं अक्सर देता रहता हूँ। हमारे यहाँ सुल्तानपुर के कई बच्चे आए हुए हैं। वहीं के एक वकील हैं लखपति राय। वे अभी भी हैं, यद्यपि अब बुड्ढे हो गए, शरीर उतना काम नहीं करता। लेकिन अब से दस साल पहले उनका नियम था कि वे चल पुस्तकालय की धकेलगाड़ी लेकर चल पड़े बाजार में लीजिए साहब पुस्तक पढ़िए। लीजिए हमारे गुरुजी का साहित्य पढ़िए, युग निर्माण का साहित्य पढ़िए। जितने भी मुवक्किल थे, दुकानदार थे, सबको साहित्य देते हुए चले जाते थे। सारे-के-सारे सुल्तानपुर में उन्होंने इस तरह रौब गाँठ दिया।

एक अकेले का पुरुषार्थ

एक बार मैं सुल्तानपुर गया। पहले भी कई बार जा चुका था। लोग पाँच कुँडीय यज्ञ कराते थे, तब सौ पचास आदमी इकट्ठा हो जाते थे। मुझे याद है, एक-दो बार मेरे प्रवचन भी हुए थे। वकील साहब ने जब मुझसे कहा, गुरुजी! एक बार आप आ जाएँ, तो मजा आ जाए। मैंने कहा, क्या आएँगे आपके यहाँ, पाँच कुँडीय यज्ञ ही तो करते हैं? नहीं, गुरुजी! अबकी बार बड़ी जो से करेंगे। कैसे करेंगे? सौ कुँड का यज्ञ करेंगे। मित्रो यज्ञ करने का निर्धारण होने के बाद चलते समय मैंने उनसे कहा कि जाने से पहले गायत्री तपोभूमि के लिए कुछ पैसे छोड़ जाने का हमारा मन है। क्या आप कुछ पैसे इकट्ठा करा सकते हैं? हाँ गुरुजी! हम करा देंगे। कितना? पच्ची हजार का तो हमारा वायदा है, फिर आगे आपका भाग्य है।

मित्रो, उन्होंने क्या काम किया कि सारे शहर को हमारा साहित्य पढ़ा दिया और हर एक व्यक्ति से ये कहा, हमारे गुरुजी जिनका कि आपने साहित्य पढ़ा है, क्या आपको पसंद है? सबने एक स्वर से कहा कि अरे भाई! पढ़ा ही क्या, हम तो पगला गए हैं, उनके विचारों को पढ़कर। हम गुरुजी को बुलाकर लाएँ, तो आप उनके लिए कुछ खरच करेंगे क्या? उनको बुलाएँ, तो आप अपना कुछ समय हर्ज करेंगे क्या? हाँ साहब! खरच करेंगे। मित्रो! उन्होंने तीन-चार दिन का कार्यक्रम रखा था। जब मैं वहाँ गया, तो मैंने अचंभा देखा। देखा कि सुल्तानपुर, जो कि छोटी-सी बस्ती है, छोटा-सा जिला है, वहाँ उन्होंने लगभग पचास हजार आदमियों के बैठने के लिए पाँडाल बनाया था। मैं सोचता हूँ, उसमें एक लाख से कम आदमी नहीं थे। इतना बड़ा विशाल आयोजन देखकर मैं अचंभे में पड़ गया कि ये सुल्तानपुर है या और कोई शहर है। इसकी तो आबाद ही इतनी है। दूर-दूर के देहातों से लोग आए थे।

मित्रो! मैं यह एक व्यक्ति की बात कह रहा हूँ कि एक अकेले आदमी ने क्या-क्या कर डाला। एक आदमी की सक्रियता का परिणाम ये हुआ कि उसने सारे सुल्तानपुर को जगा दिया था। तीन-चार दिन यह चमत्कार मैंने देखा और जब विदा हुए, तो मैं समझता हूँ कि उन्होंने हमको यज्ञ में से बचाकर पैंतीस-चालीस हजार रुपये दिए थे। यह मैं एक आदमी की करामात कहता हूँ, जिसमें उसके सहयोगी भी शामिल थे। उन्होंने भी सहयोग किया, पर मैं बात एक की कहता हूँ। आपसे पूछता हूँ कि आप क्या ये काम नहीं कर सकते? आप एक घंटा समय नहीं दे सकते? दो घंटे समय नहीं दे सकते? कलेजा है आप में? हृदय है आप में? हिम्मत है आप में? जीवन है आप में? निष्ठा है आप में? श्रद्धा है आप में? अगर ये नहीं है, तो ये बहाने मत बनाइए कि शाखा बंद हो गई है। कोई आता नहीं है। सबमें लड़ाई हो गई है। सबमें फूट फैल गई है। गुरुजी! कोई सुनता नहीं है। कमेटी में कोई आता नहीं है। धूर्त, बेकार की बातें बकता है, वह नहीं करता, जो मैं कहता हूँ। कितनी बार एक ही बात को कहता है। मैं पूछता हूँ तू क्या करता है?

मिशन-नया युग-मानव का भविष्य

मित्रो! जब एक आदमी लड़ने के लिए खड़ा हो जाए, तो क्या कर सकता है, यह बात मैंने एक उदाहरण देकर बताई। ऐसे मैं ढेरों उदाहरण बता सकता हूँ आपको। एक आदमी सक्रिय हो गया, तो उसने सारे इलाके को सक्रिय कर दिया। आपसे मैं पूछता हूँ कि आपके अंदर अगर निष्ठा है, तो क्या आप समय नहीं दे सकते मिशन के लिए? मिशन से मतलब ‘नया युग’ से है। मिशन से मतलब मानवी सभ्यता, मानवी भविष्य। इस पर आपकी आस्था है या कुछ भी नहीं है? नहीं, महाराज जी! हमारी तो बेटे पर आस्था है और पैसे पर आस्था है। तो बेटे, मैं तुझे बालक मानूँगा और ये कहूँगा कि अध्यात्म की किरणें तेरे पास नहीं आईं। अध्यात्म की किरणें जब भी आई हैं, तो देवत्व को आसुरी सभ्यता खिलाफ खड़ा होना पड़ा है। हमारे अंदर जब गायत्री मंत्र आया, तो साथ में देवत्व भी आया। देवत्व और गायत्री मंत्र दोनों ने मिलकर चमत्कार दिखाया। बेटे, तू तो गायत्री मंत्र लिए ही फिरता है, देवत्व कहाँ है तेरा? देवत्व तो है ही नहीं। केवल मंत्र-ही मंत्र रटने चला है।

मित्रो! क्या करना पड़ेगा? मैं चाहता हूँ कि हमारी परीक्षा की घड़ी में आप लोग साथ दें। पुनर्गठन योजना आपकी एक परीक्षा है, ब्रह्मवर्चस् के आधार पर और दूसरों पर यह आपकी परीक्षा है। हम अपने कुटुँब को कुछ और मजबूत बनाना चाहते हैं, सक्षम बनाना चाहते हैं, लेकिन हम क्या कर सकते हैं? आप चाहें तो झोला पुस्तकालय के माध्यम से, चल पुस्तकालय के माध्यम से, इसे अकेले ही चला सकते हैं। तीर्थयात्राओं के माध्यम से, स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से अकेले ही चला सकते हैं। यह मैं एक व्यक्ति की बात कहता हूँ। अब हम नए किस्म के स्लाइड प्रोजेक्टर बनाने वाले हैं। अब कुछ ऐसी योजना बना रहे हैं, जिससे ये सब चीजें तीन सौ-साढ़े तीन सौ के भीतर ही तैयार हो जाएँ। आप तीन सौ रुपये खरच कीजिए और हर घर में हमारा सिनेमा दिखाइए।

मित्रो! यह मैं अकेले की बात कहता हूँ, ‘एकला चलो रे’-’एकला चलो रे’ की बात कहता हूँ। अकेले चलकर भी आप जाने क्या-से क्या कर सकते हैं। तीर्थयात्रा के लिए, साइकिल यात्रा के लिए, पदयात्रा के लिए आप निकल सकते हैं और एक-दो आदमी साथ ले सकते हैं। दीवारों पर सद्वाक्य लिखने का काम आप अकेले कर सकते हैं। अकेले के इस तरह ये इतने काम हैं, झोला पुस्तकालय, तीर्थयात्रा, दीवारों पर वाक्य-लेखन आदि। ये सब एक आदमी का काम है। इसे एक व्यक्ति अकेले ही कर सकता है। इसलिए अगर आप चाहें, अगर आपके अंदर जीवन हो, देवत्व की भावना उदय होती हो, तो आप इन सब चीजों को कर सकते हैं।

संगठित हों, इंजन बनें

यह तो हुई नंबर एक बात। नंबर दो-अगर आप अकेले नहीं कर सकते और आप में कोई संगठन की वृत्ति है, तो संगठन की वृत्ति के लिए आप हमारा हाथ बँटाइए और अपना थोड़ा समय दीजिए। टोली नायकों का काम स्थानीय है। आप उसमें सम्मिलित होकर के एक घंटा-दो घंटा समय लगा सकते हैं और आपको लगाना चाहिए। आप टोली में सम्मिलित हो सकते हैं और होना चाहिए। दस-दस आदमी की आप टोली बना लें और पचास पाठकों को इकट्ठा कर लें, तो बेटे, ये साठ की मंडली होती है। साठ व्यक्तियों की मंडली बहुत बड़ी होती है। साठ डाकुओं ने सारे चंबल को हिलाकर रख दिया था। साठ आदमियों का संगठन अगर आपके पास है, तो आप गजब कर सकते हैं। अगर आपके पास जीवट है, तो साठ डिब्बों की रेलगाड़ी जाने कहाँ-से-कहाँ जा सकती है। इंजन जिंदा हो तो, लेकिन अगर इंजन मरा हुआ हो तो बेटे हम नहीं जानते।

इसलिए मित्रो! टोली नायकों की दृष्टि से आपको काम करना चाहिए। आप चाहें तो समय दिए बिना अपने स्थानीय क्षेत्र में घर में रहकर एक काम यह भी कर सकते हैं कि आप जन्मदिन मनाने की परंपरा को जीवंत करने के लिए समय लगा सकते हैं। घर-घर में गोष्ठियाँ, घर-घर में सभा, घर-घर में सम्मेलन हम जन्मदिन के माध्यम से फिर से शुरू कर सकते हैं। शुरू के दिनों में दिक्कत मालूम पड़ेगी, फिर बाद में आप देखेंगे कि कितना ज्यादा लोग सहयोग देते हैं। पहले आपको साथ-साथ सत्संग में सहयोग नहीं मिलता था, लेकिन अगर आप देखें, तो पाएँगे जन्मदिन के आधार पर जन्मदिन मनाते समय लोग कितना खुश होते हैं। उसमें व्यक्ति को अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने का मौका मिलता है, खुशी का मौका मिलता है। सब आदमी आशीर्वाद देते हैं, कोई फूल चढ़ाता है और कोई प्रणाम करता है। आज हमारा जन्मदिन है। हम अपना मुँह शीशे में देखते हैं, तो कितनी खुशी होती है, आप ये भी नहीं जानते? इसमें जनता के सहयोग का कितना ज्यादा लाभ भरा पड़ा है, क्या आप इसे नहीं जानते? अगर आप हकीकत में आएँ, तो आप इसे देख सकते हैं। हकीकत में नहीं आएँ, तब मैं नहीं कह सकता। अगर आप जन्मदिन मनाने की परंपरा को फिर से फैला सकें, तो आप देखेंगे कि ये मिशन, जिसमें देवत्व के पुनर्जीवन का संकल्प छिपा हुआ है, उसको जिंदा करने के लिए आप क्या कर सकते हैं।

बेटे, एक और काम के लिए हमने आपसे कहा था कि अगले वर्ष हम और भी सामूहिक जोश उत्पन्न करेंगे, वार्षिकोत्सव के रूप में। अब यह नियम बना दिया गया है कि कोई भी शाखा ऐसी नहीं रहनी चाहिए, जिसका कि वार्षिकोत्सव न मनाया जाता हो। जो शाखा वार्षिकोत्सव नहीं मनाएगी, उसका हमारे रजिस्टर में से शाखा के नाम से नाम कट जाएगा। क्यों साहब! नाम कट जाएगा कि नाक कट जाएगी? चाहे जो समझ ले बेटा। तू अपने संबंध में समझ ले कि नाक कट गई और हम समझ लेंगे कि तेरा नाम कट गया। बात एक ही है।

मित्रो! हमने हर एक जीवंत शाखा के ऊपर यह वजन डाला है कि उनको वार्षिकोत्सव करना ही पड़ेगा और करना ही चाहिए। कम-से-कम कितने में यह कार्यक्रम हो सकता है? हमने छाप दिया है कि ढाई सौ से चार सौ रुपये तक में बहुत बढ़िया यज्ञ हो सकता है, आयोजन हो सकता है। इसमें हजार आदमी भी आएँ, तो यज्ञ भी हो जाए और जुलूस भी निकल जाए, सब हो जाए। यह सब चार-पाँच सौ रुपये में हो सकता है। इतना पैसा गुरुजी! हम इकट्ठा कर लेंगे। हाँ बेटे! इतना इकट्ठा करने में क्या लगता है। एक दिन की तनख्वाह निकालता हुआ चला जाए, तो एक साल में अकेले ही इतना खरच कर सकता है। बेटे, एक माह में तुझे कितने रुपये मिलते हैं? सात सौ रुपये मिलते हैं। तो एक दिन की तनख्वाह कितनी होगी? गुरुजी! इक्कीस-बाईस रुपये होती है। तो बाईस रुपया महीने के हिसाब से कितना हो गया? महाराज जी! ये तो कोई दो सौ साठ रुपये हो गए। बस बेटे, तू अकेला हो जा और हर महीने में एक दिन की तनख्वाह निकालता चल। अब साथ में दस व्यक्ति और ले ले। इसी से एक वार्षिकोत्सव पूरा हो जाएगा। नहीं, गुरुजी! इससे चंदा माँगूँगा। अपने पास से कुछ देगा? अपने में से तो कुछ नहीं दूँगा। कंजूस कहीं का, पहले अपने पास से निकाल, तब चंदा माँगना।

मित्रो! क्या करना चाहिए? वार्षिकोत्सव में कहीं कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। अगर आपके पास रोटी खाने के लिए आर्थिक तंगी नहीं है, सिगरेट पीने के लिए आर्थिक तंगी नहीं है, सिनेमा देखने के लिए आर्थिक तंगी नहीं है। हाँ, महाराज जी! इसके लिए तो तंगी नहीं है। बड़ा आया आर्थिक तंगी वाला। न उद्देश्य को समझता है, न धर्म को समझता है, न संस्कृति को समझता है और न देवत्व को समझता है। आर्थिक तंगी की रट लगाता है। मित्रो! चाहे तो यह सब एक आदमी अकेले ही कर सकता है।

हमारा एक ही लक्ष्य वार्षिकोत्सव

मित्रो! हम चाहते हैं कि वार्षिकोत्सव हर जगह हो। उसके लिए हमको एक और दिक्कत पड़ेगी। हमने छाप दिया है कि हमारा प्रतिनिधि आएगा, रिप्रजेंटेटिव आएगा। अब हमको वक्ता नहीं चाहिए। वक्ताओं से हमको घृणा होती चली जा रही है, क्योंकि वक्ता जीभ तो चलाते हैं, परंतु जीभ चलाकर जितना काम करना चाहिए, उससे चौगुना सफाया कर जाते हैं। अपना आचरण, अपना व्यवहार, अपना खान-पान, अपने रहन-सहन से ऐसी छाप डालकर आते हैं कि उसे देखकर लोग कहते हैं कि ऐसे वक्ता को गोली मारो। जो बक्-बक् करता है, उसका नाम ‘वक्ता’ है। हमें ऐसा वक्ता अब नहीं चाहिए जो बकता तो बहुत है, पर आचरण और व्यवहार में बिलकुल विपरीत है। अब हम वक्ता नहीं, अपना प्रतिनिधि भेजेंगे। यह प्रतिनिधि कैसा होगा? हमारा नमूना होगा और हमारे आचार्य कैसे होने चाहिए? उनका रहन-सहन, उनकी बोल-चाल, उनका व्यवहार, उनका आचरण, उनका उठना-बैठना, उनका खान-पान बिलकुल ऐसा होना चाहिए, जैसा कि हमारा है। उसे देखकर लोग ये कहें कि यह आचार्य जी का प्रतिनिधि है, आचार्य जी का बेटा है। बेटे, हमको ऐसे व्यक्तियों की बहुत तलाश है, क्योंकि हम ये घोषणा कर चुके हैं कि हम छह हजार शाखाओं का वार्षिकोत्सव करेंगे। इसे हम थोड़े ही समय में पूरा करने के इच्छुक हैं। अक्टूबर से लेकर मार्च तक पूरा कर लेना चाहते हैं, क्योंकि फिर गरमी आ जाती है, इम्तिहान आ जाता है। स्कूलों में स्पीकर लगाना बंद हो जाता है। गरमी में लू चलती है, आँधी-तूफान चलते हैं। इसलिए इस अभियान को हम जल्दी पूरा करना चाहते हैं।

मित्रो! इस कार्यक्रम के लिए हमें प्रतिनिधियों की विशेष रूप से आवश्यकता पड़ेगी। हमको आप लोगों में से जो अपने आपको इस लायक समझते हों कि हम गुरुजी के विचारों को, युग निर्माण के विचारों को, पुनर्गठन के विचारों को जन-साधारण के सामने व्यक्त कर सकते हैं, तो अपने नाम हमें नोट करा दें और जो ये प्रतिज्ञा कर सकते हों कि हम जाएँगे तो आपकी फजीहत कराकर नहीं आएँगे, आपकी बदनामी कराकर नहीं आएँगे, वहाँ आपकी बेइज्जती कराकर नहीं आएँगे। बेटे, वह आपकी बेइज्जती नहीं, हमारी बेइज्जती है। आप यहाँ से हमारे वक्ता हो करके जाएँगे और होटलों में चाय पिएँगे, तो वह आप नहीं हम पी रहे होंगे, क्योंकि आप हमारे प्रतिनिधि हैं, रिप्रजेंटेटिव हैं। रिप्रजेंटेटिव को न केवल वक्ता होना चाहिए, न केवल व्याख्यानदाता होना चाहिए, बल्कि उसके अंदर वे सारी विशेषताएँ होनी चाहिए, जो हमारे रहन-सहन में, उठने-बैठने में है।

वाणी से नहीं, आचरण से शिक्षण

मित्रो! ये आपको अभ्यास का मौका है। इस बहाने इस लोक–लाज के बहाने आपको हम बंधनों में इतना बाँधकर भेजेंगे कि अगर आप छह महीने का योगाभ्यास कर लें तो आप समझना कि आपने छह महीने का योगाभ्यास कर लिया। छह महीने की तप-साधना कर लेंगे आप। आपकी जीभ के ऊपर अंकुश, खान-पान के ऊपर अंकुश, उठने-बैठने के ऊपर अंकुश, हजार अंकुश लगाने पड़ेंगे। नहीं गुरुजी! हम तो व्याख्यान देंगे। बेटे, हमें नहीं कराना व्याख्यान। अगर हमारी शर्तें पूरी कर सकता है, तो तेरे व्याख्यान का स्वागत है। नहीं साहब! हम कोई शर्त पूरी नहीं करेंगे, हम तो बक्-बक् करेंगे और चाहे जैसे रहेंगे। बेटे, हम तुझे चाहे जैसे नहीं रहने देंगे।

इसलिए मित्रो! ऐसे लोगों की खासतौर से हमको आवश्यकता है, जो बक्–बक् से नहीं, अपने आचरण और व्यवहार से हमारा प्रतिनिधित्व करें। ये शिविर, जो हमने बुलाया है, इस हिसाब से भी बुलाया है कि हमको छह हजार शाखाओं में वार्षिकोत्सव कराने के लिए अपने छह हजार प्रतिनिधियों की जरूरत पड़ेगी। क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि अपने दो लाख मित्रों में से, जिनमें अधिकाँश व्यक्ति पढ़े हों, सुशिक्षित हों, इस लायक हों कि आत्मशोधन और आत्मनिर्माण के अलावा लोकनिर्माण की जिम्मेदारी निभा सकते हों, उनको छह महीने का योगाभ्यास कराना चाहते हैं। यह विशुद्ध प्रशिक्षण है, जिसमें लोक-नाज की वजह से और हमारी शरम की वजह से, दोनों दबावों की वजह से व्यक्ति अपने चरित्र को ठीक ढालता हुआ चला जाएगा और लोकहित के लिए, जिसमें मान-जाति का हित जुड़ा हुआ है, दोनों काम करता हुआ चला जाएगा। आप हमारे प्रतिनिधि के रूप में जाना और जो शाखाएँ, जो शक्तिपीठें निष्क्रिय पड़ी हुई हैं, उनमें उमंग पैदा करना और कहना कि आपको गुरुजी का सम्मेलन करना पड़ेगा, टोलियाँ बनानी पड़ेंगी, जन्मदिन मनाना पड़ेगा और अपने आचरण एवं व्यवहार से लोगों को शिक्षण देना पड़ेगा। यदि इतना काम आप कर सके, तो हमारा यह शिविर सार्थक हो जाएगा, हम और आप दोनों धन्य हो जाएँगे। आज की बात समाप्त।

। ॐ शाँति।


सहस्राब्दी का पहला होलिका पर्व

जीवन में हर क्षण उल्लास-उमंग का संचार रहे, इसीलिए हमारी संस्कृति में भाँति-भाँति के प्रावधान बनाए गए है। ऋतुक्रम में शीतकाल ठिठुरन में बीतता है। जैसे ही वसंत आता है, प्रकृति में हर जीव पर उल्लास छा जाता है। निष्क्रियता सक्रियता में, गरमी में बदल जाती है। वसंत से होलिका पर्व तक का समय प्रायः चालीस दिन की अवधि का होता है एवं यह सारी अवधि प्रकृति के परिपूर्ण यौवन-उल्लसित प्राणवान् उमंगों की प्रेरणाओं से भरी होती है। वातावरण में कुछ विलक्षण मादकता, पवित्रता-सात्विकता अनुभव की जाने लगती है। नवीन संवत्सर व ऋतु-परिवर्तन की नवरात्रि आने से पूर्व की यह वेला आध्यात्मिक अनुदानों की दृष्टि से बड़ी ही विशिष्ट है। जैसे सारी प्रकृति पुष्पों से, उनकी सुरभि से खिल उठती है, ठीक परमात्मसत्ता भी अनुदान लुटाने को तैयार बैठी होती है।

होलिका पर्व न केवल साँस्कृतिक दृष्टि से शरीर विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान एवं आज के भौतिक विज्ञान की कसौटी पर ऐसा खरा उतरता है कि कभी-कभी लगता है हमारे ऋषि-मुनियों ने कितना सोच-समझकर यह निर्धारण किया होगा। होलिका दहन व धुलैंडी इस तरह फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि बीच में रख दो दिनों तक मनाए जाने वाला उल्लास भरा पर्व है यह। पर अभी भी भारत के बहुसंख्य क्षेत्र में यह वसंत से मनाया जाने लगता है एवं रंगपंचमी तक चलता है। विविधता में एकता का दर्शन दिखाने वाली हमारी संस्कृति के रंग निराले हैं। ब्रज प्रदेशों में, राजस्थान में, मालवा में, बुंदेलखंड में, मिथिला में हर जगह होली एक उल्लास भरे पर्व के रूप में मनाई जाती है। हमारे ऋषियों ने इसे नवसंवत्सर के यज्ञीय पर्व के रूप में स्थापित किया था। भारत एक कृषिप्रधान देश है। अन्न देवता पहले यज्ञीय ऊर्जा से संस्कारित हों, फिर समाज को यह अन्न समर्पित हो, इसीलिए स्थान-स्थान पर होलिका दहन-नवसस्येष्टि यज्ञ का प्रचलन था। आज भी धरती के प्रदूषण के, बहुराष्ट्रीयकरण के एवं ढेर सारा अनाज परंतु आत्महत्या करते किसान, असमान वितरण इन परिस्थितियों में भी इस पर्व की गरिमा यथावत् है। यह पर्व एवं इसके दर्शन की स्थापना ही इन समस्याओं से इस कृषिप्रधान देश को मुक्ति दिला पाएगी।

होली पर्व के पीछे क्या पौराणिक मान्यताएँ हैं, इन्हें यदि अलग रख दें, तो इसके साथ जुड़ी विशेषताएँ इसे समता का, पारस्परिक सद्भाव के विस्तार का पर्व स्थापित करती हैं। यही एकमात्र ऐसा त्योहार है, जिसमें हिंदू ही नहीं, सभी संप्रदायों के व्यक्ति, ऊँच-नीच का भेद छोड़ एक साथ मिलते हैं। हम सबका जीवन इन रंगों की तरह वैविध्यपूर्ण गुणों से भर जाए, व्यक्तित्व में ये गुण समा जाएँ, इस भाव से इसे मनाया जाता है। छोटे-से-छोटा व्यक्ति भी उच्च पद पर बैठे या धनाधीश के साथ पारस्परिक सौहार्द्र के साथ होली उस दिन खेल लेता है। इसीलिए इस पर्व के साथ प्रह्लाद के कथानक से जुड़े नृसिंह भगवान् का पूजन तो किया ही जाता है, मातृभूमि रज-त्रिधा समता देवी का पूजन एवं क्षमावरणी के माध्यम से पारस्परिक व्यवहार में शालीनता के समावेश जैसी विशिष्टता भी जुड़ी हुई हैं।

यह एक विडंबना ही है कि साँस्कृतिक प्रदूषण की आँधी में आज उसका स्वरूप फूहड़ होकर रह गया है। दिव्य प्रेरणाओं से भरा यह पर्व गंदे हँसी-मजाक से लेकर अश्लील प्रदर्शन एवं क्षुद्र चिंतन का परिचायक बनता जा रहा है। होली जलाई जाती है, तो उसके साथ सारा कूड़ा-करकट, ईर्ष्या-द्वेष, घृणा-कामुकता के भाव आदि भी जला दिए जाते हैं। परंतु इससे उल्टा ही हो रहा है। कई बार इसी पर्व पर दंगे उठ खड़े होते हैं। समाज में पारस्परिक सामंजस्य-समरसता स्थापित करने हेतु स्थापित यह पर्व ऐसी छिछालेदारी का पात्र बनेगा, यह कभी सोचा भी नहीं गया था। होली जले तो अश्लीलता की, अश्लील पोस्टरों की, उस कूड़ा-करकट की जो पिछले दिनों जमा हो गया है। यदि यह न होकर मात्र कुछ टन लकड़ी फूँक दी गईं, तो यह पर्यावरण प्रदूषित करने में सहायक ही हुआ।

आज की परिस्थितियों में युगऋषि के संकेतों के अनुसार पर्वों से लोकशिक्षण की परंपरा के अनुसार दो प्रेरणाओं के विस्तार पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिए, वे इस प्रकार हैं-1. इसे जातिवाद से, ऊँच-नीच के भेद से ग्रसित समाज में समानता-समरसता के विस्तार हेतु मनाया जाए। 2. इस दिन से यज्ञीय जीवन जीने का संकल्प लिया जाए। पारस्परिक प्रेमविस्तार एवं परमार्थपरायणता के विस्तार हेतु पीड़ानिवारण, पतननिवारण हेतु कुछ करने हेतु संकल्पित हुआ जाए। हिरण्यकश्यप व होलिका का दहन होना ही चाहिए। विकृतियों-सामाजिक विभेदों, अराजकताओं को इस होली में जलकर राख हो जाना चाहिए। प्रस्तुत पर्व संघौशक्ति कलौयुगे के संकल्प के साथ इस सहस्राब्दी का प्रथम होलिका पर्व है। अब राष्ट्र व विश्व में खून की नहीं, स्नेह-सद्भावना के विस्तार के, एक-दूसरे को आगे बढ़ाने की होली खेली जानी चाहिए। यदि इस रूप में यह पर्व मनाया जा सका, तो हम संस्कृति पुरोधाओं से व आगामी पीढ़ी से भी न्याय कर पाएँगे।


मोक्ष मूलम् गुरुकृपा

गुरुतत्त्व उच्चतम एवं पवित्रतम तत्त्व है। यह आयु, देश-काल की सीमा से परे एक अविनाशी तत्त्व है। इसकी अनुभूति विनम्र समर्पण से ही संभव है। अपने अंदर स्थित इस तत्त्व से घनिष्ठता स्थापित करने हेतु उस व्यक्ति की खोज की जाती है, जो हमारे आँतरिक गुरु का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि या प्रतिरूप हो। इसी उद्देश्य से गुरु-शिष्य संबंध को युगों से सुरक्षित एवं संरक्षित रखा गया है। जीवंत गुरु, शिष्य के अंदर स्थित गुरुतत्त्व का प्रतीक है।

यह श्रद्धेय तत्त्व प्रत्येक व्यक्ति के अंदर विद्यमान् रहता है। इसे आँतरिक गुरु कहा जाता है। स्थूल देह में आज्ञाचक्र गुरुतत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। अपने स्वयं के इस आँतरिक गुरु के साथ बिना किसी बाह्य गुरु के तादात्म्य अति दुष्कर कार्य है। अलौकिक आत्मबल के धनी महापुरुष ही इस पथ के पथिक होते हैं। श्री अरविंद, रमण महर्षि जैसे सिद्धयोगी इसी तरह के साधक हुए हैं। इनके कोई बाहरी गुरु नहीं थे। परमात्मा ही उनके गुरु थे। परंतु सामान्य शिष्य या साधक को इस मायारूपी संसार से मुक्त होने के लिए पग-पग पर मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है। उनके लिए प्रत्यक्ष गुरु का होना जरूरी है। इसीलिए गुरु के भौतिक स्वरूप को भी स्वीकार किया जाता है। गुरु के भौतिक शरीर को आँतरिक प्रबुद्ध चेतना का बाह्य आवरण माना जाता है।

विश्वगुरु स्वामी विवेकानंद ने ऐसे महान् व्यक्तित्व के प्रति इस तरह अपनी अभिव्यक्ति दी है, जिस व्यक्ति की आत्मा से दूसरी आत्मा में शक्ति का संचार होता है, वह गुरु कहलाता है और जिसकी आत्मा में यह शक्ति संचरित होती है, उसे शिष्य कहते हैं किसी की आत्मा में इस प्रकार शक्ति संचार करने के लिए आवश्यक है कि पहले तो जिस आत्मा से यह संचार होता हो, उसमें स्वयं इस संचार की शक्ति विद्यमान् रहे और दूसरे जिस आत्मा में यह शक्ति संचरित की जाए, वह उसे ग्रहण करने योग्य हो। स्वामी जी आगे कहते हैं, सच्चा गुरु वह है, जो सम-समय पर आध्यात्मिक शक्ति के भंडार के रूप में अवतीर्ण होता है और गुरु-शिष्य परंपरा द्वारा उस शक्ति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लोगों में संचरित करता है।

श्री अरविंद गुरुतत्त्व की महत्ता इस तरह व्यक्त करते हैं, “वह जिसने सत्य को उपलब्ध कर लिया है और स्वयं जिसे आत्मज्योति की अनुभूति प्राप्त है और जो उसका प्रकाश दान करने में समर्थ है। ऐसा पथ-प्रदर्शक, जो इतना सबल है कि राह की शिक्षा दे सकता है, राह बना सकता है और हाथ पकड़कर ले चल सकता है, कठिन राह पार करा सकता है। वही सत्ता गुरु कहलाती है।” श्री अरविंद के अनुसार सभी कठिनाइयों में जहाँ व्यक्तिगत प्रयास अवरुद्ध हो जाता है, गुरु की सहायता हस्तक्षेप कर सकती है और सिद्धि के लिए जो कुछ भी आवश्यक हो अथवा जो कुछ तात्कालिक स्थिति में आवश्यक हो, उसे संपन्न कर सकती है।

शास्त्रवचनों के अनुसार, जो ज्ञानरूपी अंजन की सलाई से अज्ञानरूपी अँधेरे से अंधी हुई आँखों को खोल देता है, उसे गुरु कहा जाता है। इसीलिए उपनिषद् कहती है, ‘गु’ शब्द का अर्थ है ‘अंधकार’; ‘रु’ शब्द का तात्पर्य है उसका निरोधक। अंधकार का निरोध या अज्ञान का नाश करने वाला तेजरूप ब्रह्म ही गुरु है। स्कंदपुराण का कथन है, गुरु विष्णु है, गुरु महेश्वर है। केवल ज्ञानमूर्ति, द्वंद्व से परे, आकाश के समान, नित्य, निर्मल, अचल, सदा साक्षी रूप, संसार से अतीत, तीनों गुणों से रहित और नित्य गुरु रूप में वे वरेण्य हैं। गुरु तो सर्वमयी चैतन्य सत्ता का एक प्रतीक है, जो सूर्य ज्ञान पिलाता है, वह तो जैसे अनंत ज्ञान की विकलता है। वह सत्य के ज्ञान की उत्कटता है। गुरु का न आदि है न अंत। गुरु का न पूर्व है न पश्चात्। गुरु है परिपूर्णता। उससे बढ़कर तीनों लोकों में कोई दूसरा नहीं है।

गुरु वे हैं, जिन्होंने अपनी चेतना को पूर्णतया संस्कारित कर दिया है। वे स्थूल देह धारण कर इस संसार में रहते हैं। परंतु उनकी आत्मा सदैव परमात्मा में निवास करती है। वे ईश्वरकोटि की आत्मा होते हैं, वे जीवन मुक्त होते हैं। उनका हृदय करुणा से ओत-प्रोत होता है। उनका जीवन भगवान् के लिए पूर्णतया समर्पित होता है। उनकी अपनी कोई इच्छा, आकाँक्षा या कामना नहीं होती है। वे सदैव विश्व कल्याण हेतु तत्पर होते हैं। ऐसे तपस्वी ही सच्चे गुरु होते हैं। इन्हीं के ज्ञान एवं तप के प्रभाव से सारा जग ज्योतिर्मय रहता है। वे संसार की अनंत गहराई में उतरकर अपने शिष्यों को मुक्त करते हैं।

ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में गुरु की अवधारणा का अंतर्निहित आधार यह है कि वे अति कृपालु, दयालु, न्यायपूर्ण तथा असीमज्ञान से युक्त हैं। भक्त या शिष्य उन्हें इसी रूप में देखते हैं। वह ईश्वर के सर्वाधिक निकट होते हैं। इसीलिए श्रीरामकृष्ण परमहंस ने गुरु या संतों के हृदय को भगवान् का डाक बँगला कहा है। ऐसे गुरु सचमुच ही ईश्वर के प्रतिरूप होते हैं। उनका अस्तित्व एक स्वच्छ दर्पण के समान है, जिसमें अपना ही प्रतिबिंब झलकता है। वे स्वयं में एक विशुद्ध, उज्ज्वल, देदीप्यमान् आत्मा हैं। वह प्रेम एवं आनंद के सागर हैं। अपने शिष्य के लिए वे माता, पिता, संबंधी और ईश्वर हैं। शिष्य के जीवन में जो कुछ है, सद्गुरु में ही निहित है। भक्ति ही गुरु-शिष्य के संबंध का आधार है। यही अंतर्निहित मूल सिद्धाँत है। शिष्य एक निष्ठावान् आज्ञाकारी सेवक है। गुरु उसके स्वामी। समर्पित सेवक एकमात्र उद्देश्य होता है अपने स्वामी द्वारा दिए गए कार्य को पूर्णता से संपादित करना। सेवा करना उनका उद्देश्य है, वह केवल इतना जानता है और इसी बात के लिए सतर्क व समर्पित होता है। गुरुभक्ति में दास्यभाव के अतिरिक्त वात्सल्य भाव, ईश्वर भाव भी निहित होता है।

गुरु की भक्ति मानो सत्य की पूजा है, ज्ञान की पूजा, अनुभव की पूजा, विचारों की पूजा है। जब तक मनुष्यों में ज्ञान की पिपासा है, श्रद्धा की भावना है, तब तक संसार में गुरुभक्ति अक्षुण्ण रहेगी। सूफी संत जायसी कहते हैं, “जहाँ पाँव गुरु राखे, चेला राखे माथा।”

गुरुकृपा कोई शर्त नहीं है। यह तो गुरु का शिष्य के प्रति अनंत प्रेम का उन्मुक्त बहाव है और यह कृपा का अनुदान वरदान शिष्य को कब मिलेगा, केवल गुरु पर निर्भर करता है, संभवतः सर्वस्व समर्पण एवं प्रेम से गुरु कृपा प्राप्त की जा सकती है। गुरुकृपा दुर्लभ चीज है। इसलिए स्वामी विवेकानंद कहते हैं, गुरुकृपा से सब कुछ संभव है। “गुरुकृपा ही केवलम्।”

गुरुकृपा सहजता से प्राप्त नहीं होती। इसे प्राप्त करने के लिए निष्कपट समर्पण आवश्यक है। गुरुकृपा की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि शिष्य का अपना म नहीं न हो। गुरु के प्रति श्रद्धा केवल अंधश्रद्धा हो। श्रद्धा केवल अंधी ही होती है। वह तर्क नहीं करती। जहाँ तर्क है वहाँ श्रद्धा कहाँ? श्रद्धा के बिना समर्पण नहीं प्राप्त हो सकता है। सर्वस्व समर्पण ही गुरुकृपा के लिए सुपात्रता की कसौटी हो सकती है।

यह कृपा अनेक रूपों में प्रकट हो सकती है। यह मधुर एवं प्रिय या कठोर एवं अप्रिय हो सकती है। गुरु उस बढ़ई के समान होते हैं, जो एक लकड़ी के टुकड़े को निर्दयतापूर्वक काट छाँटकर एक निश्चित स्वरूप देते हैं। गुरु शिष्य के अहंकार को काट-छाँटकर, निराई-गुड़ाई करता है। इस कार्य को वे निर्दयतापूर्वक तब तक करते रहते हैं, जब तक कि शिष्य को वाँछित स्वरूप नहीं मिल जाता। गुरु शिष्य को एक मुक्त जीवात्मा के रूप में परिवर्तित कर देते हैं, ताकि वह भी प्रकाशस्तंभ बन सके। इसके लिए शिष्य को लकड़ी के टुकड़े के समान शाँत, मौन एवं अहंकाररहित होना आवश्यक है, ताकि गुरु उसे एक निश्चित स्वरूप प्रदान कर सके। गुरुकृपा के लिए शिष्य को यही सचाई, प्रेम एवं समर्पण का भाव रखना चाहिए।

समस्त परंपराएँ, कला और विज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुरु से शिष्य को हस्तांतरित होते रहे हैं। गुरु-शिष्य का संबंध मानव अस्तित्व के महत्तर आयामों, श्रेष्ठतर कामनाओं से संबद्ध है। इसके बिना बाह्य जगत की विषमताओं में अपना अस्तित्व बचाना अति दुष्कर व कठिन है। सद्गुरु की रक्षात्मक कृपा ही जीवन में इस आँतरिक स्रोत की ओर हमारा मार्गदर्शन करती है। जहाँ से हमारी समस्त उच्चतम शक्तियाँ निःसृत होती हैं। इसी वजह से गुरुओं को महान् संस्कृतियों की आधारशिला माना गया है। उनके ज्ञान और प्रेरणा के बिना न तो परंपराएँ टिक सकेंगी और न संस्कृतियाँ ही जीवित रह सकेंगी।

युगगीता-21


जन्म कर्म च में दिव्यम्

(गीता के चतुर्थ अध्याय के ज्ञानकर्मसंन्यासयोग की व्याख्या की तीसरी कड़ी)

एक बड़े महत्त्वपूर्ण प्रकरण ‘अवतारवाद’ पर प्रारंभिक चर्चा विगत अंक में की गई। भगवान् कहते हैं, जो अपनी वासनाओं के कारण जन्म ले वह नर एवं जो अपनी अंतर्निहित माया द्वारा उस पर आरुढ़ होकर स्वयं को प्रकट करे, वह अवतार-नारायण। वस्तुतः लोकशिक्षण के लिए ही महाकरुणा का भाव लेकर अवतार आते हैं। इसी संदर्भ में हमने लिखा था कि गुरुदेव स्वयं कहते थे, “मुझे धकेला गया है, सृष्टि की संचालक सत्ताओं द्वारा धरती पर विशेष कार्य करने के लिए।” धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होने पर भगवान् स्वयं को प्रकट करते हैं। उनके हर युग में प्रकट होने का एक ही लक्ष्य होता है, साधु पुरुषों और आठवें इन दो श्लोकों की व्याख्या के माध्यम से समझाया गया था। आज की जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं, ऐसे में अवतार के प्रकटीकरण की कितनी बड़ी अनिवार्यता है, यह इस व्याख्या से समझा जा सकता है। श्री अरविंद ने अवतार के प्रकटीकरण की व्याख्या अपने ही ढंग से की है, जो बड़ी निराली है। वे लिखते हैं कि भगवत्सत्ता के दिव्य प्रकटीकरण के दो पहलू हैं, एक है अवतरण-मानव आकृति और प्रकृति में भगवान् का प्रकट होना और दूसरा आरोहण-भगवान् के भाव में मनुष्य का जन्म ग्रहण, भागवत् चेतना में उत्थान। योगीराज इस दूसरे पहलू को अधिक महत्त्वपूर्ण बताते हुए इसे जीव का नवजन्म कहते हैं। अवतार को उनने मानव जाति का भागवत् नेता बताया है, तो पूज्यवर गुरुदेव ने संत, सुधारक और शहीद के रूप में अंशावतार के प्रकटीकरण की बात कही है। अब उसके आगे की व्याख्या इस अंक में।

परमपूज्य गुरुदेव अगस्त 1979 अखण्ड ज्योति के प्रज्ञावतार विशेषाँक में लिखते हैं, “आदर्शवादी दुस्साहस ही अवतार है। वह एक भावनात्मक प्रवाह के रूप में उत्पन्न होता है और असंख्यों को अनुप्राणित करता है।” कितनी सटीक, आज के संदर्भ में युगानुकूल यह व्याख्या है। वे आगे लिखते हैं, “प्रज्ञावतार बुद्धावतार का उत्तरार्द्ध है। बुद्धिप्रधान युग की समस्याएँ भी चिंतनप्रधान होती हैं। मान्यताएँ, विचारणाएँ, इच्छाएँ ही प्रेरणा-केंद्र होती हैं और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप ही हो सकता है। लोकमानस को अवाँछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़ मान्यताओं से विरत करने वाली विचारक्राँति ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।” (पृष्ठ 23) इस व्याख्या से समझा जा सकता है कि अवतार स्वरूप परिस्थितियों के अनुरूप भिन्न-भिन्न होते हैं व उन्हें समझने के लिए दूरदर्शी विवेकशीलता-प्रज्ञा का जागरण अनिवार्य है। गायत्री साधना इसीलिए तो इस समय की विशेष साधना बताई गई है।

हम ‘संभवामि युगे युगे’ भगवान् के इस कथन की व्याख्या विगत अंक से करते आ रहे हैं। मैं हर युग में आता हूँ, हर समय में आता हूँ, प्रकट होता हूँ और मेरा उद्देश्य बड़ा स्पष्ट होता है, धर्म की स्थापना करना, उसके लिए उपयुक्त वातावरण बनाना। इस कथन से एक बात स्पष्ट होती है कि अवतार हमेशा आते रहते हैं। अवतार का प्रकटीकरण एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। “अवतार या इनकारनेशन इज नाट दि एंड।” अवतार कभी अंतिम प्रक्रिया के रूप में नहीं आता। रामकृष्ण मिशन के स्वामी अखिलानंदजी ने जेम्स हैविट की लिखी एक किताब ‘क्राइस्ट द सेवियर ऑफ ह्यूमन काइंड’ की समीक्षा करते हुए लिखा है कि इसका शीर्षक बदला जाना चाहिए। ‘क्राइस्ट द सेवियर’ नहीं ‘क्राइस्ट ए सेवियर’ होना चाहिए। वे लिखते हैं कि ‘द सेवियर’ का मतलब होता है एकमात्र ईसा ही उद्धारक हैं, अवतार हैं, जबकि ‘संभवामि युगे युगे’ से आशय यह है कि जब-जब भी जरूरत होगी, वे आएँगे। कभी बुद्ध, कभी राम, कभी कृष्ण, कभी पैगंबर व कभी ईसा रूप में। वे लिखते हैं, “अवतार को अंतिम मान लेना गलत चिंतन है। भगवान् जब भी आता है, हर युग में निरंतर होती रहने वाली परिवर्तन की प्रक्रिया को साकार करने के लिए आता है। चूँकि पश्चिम में सभ्यता का विकास, सोचने का विकास उस सीमा तक नहीं हुआ, जहाँ तक हमारे औपनिषदकालीन ऋषियों ने सोचा, इसीलिए उनने कह दिया कि क्राइस्ट इज द लिमिट’ यही अंतिम हैं। इसीलिए उनकी लेखनी एंटी क्राइस्ट की बात कहती है, जबकि हम नवयुग के आगमन की बात करते हैं।”

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं, “काल के परिवर्तन का प्रयोजन पूरा करने वाली शक्ति का नाम महाकाल है। युग परिवर्तन, युग प्रवर्तन इसी सत्ता द्वारा होता है। परिवर्तन अर्थात् बदलना एवं प्रवर्तन अर्थात् उसे आगे बढ़ाना। यह हमेशा रुद्र द्वारा रौद्र भाव से संपन्न होता है।” श्रीमद्भागवत में एक वाक्य आता है, “अवताराः ह्यै अनंतश्च” अर्थात् अवतार एक नहीं अनेकानेक होते हैं। यह ऋषि का वाक्य है कि अवतार किसी के अंदर, किसी की भी चेतना में अवतरित हो, उनसे महत्त्वपूर्ण कार्य करा सकता है। चाहे वे गुरु गोविंद सिंह जी हों, बंदा वैरागी, भगतसिंह अथवा सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गाँधी, श्री अरविंद, स्वामी विवेकानंद हों।

ठाकुर श्री रामकृष्ण कहते हैं, “पहले दस अवतार आने की बात मिलती है, फिर चौबीस अवतारों की और फिर असंख्यों की। जैसी-जैसी जमाने की समस्या होती है, भगवान् अवतार लेते हैं।” पश्चिम में हेगल, ह्यूम सभी ने सोचा, तरह-तरह की बातें भी कहीं हैं, पर उनकी बातों में, दार्शनिकों की व्याख्याओं में एवं ईशदूतों की बातों में अंतर है। दार्शनिक ‘हाइपोथिसीस’ करता है, कल्पना की उड़ान में चलता है और ऋषि वक्तव्य देते हैं, भविष्य के गर्भ में झाँकी करके आते हैं और बताते हैं। गीता एक ‘हाइपोथिसीस’ नहीं, बल्कि एक वक्तव्य है, स्टेटमेंट है, अनुभव है, अधिकार से कहा गया कथन है।

भगवान् अपने सातवें-आठवें श्लोक में की गई घोषणा की पुष्टि अगले श्लोक में करते हैं-

जन्म कर्म च में दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥

“इस तरह हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं, इस तथ्य को जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर त्याग के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, वस्तुतः मुझे ही प्राप्त करता है (मुझ तक ही पहुँचता है)।”

यह श्लोक बड़ा मार्मिक है। विशिष्ट गुह्य अर्थ लिए है। इसकी व्याख्या अवतारवाद की जब तक की गई चर्चाओं के बाद आरंभ होती है एवं पुनर्जन्म के सिद्धाँत व ‘तत्त्व’ से परमसत्ता को जान लेने, उन तक पहुँचने का मार्ग क्या हो, इसके प्रतिपादन तक चलती है।

भगवान् का शरीर धारण करना भी अलौकिक कार्य है एवं उनके कर्म भी दिव्य हैं। भगवान् इसे एक रहस्यपूर्ण गुत्थी बता रहे हैं। एक परिभाषा के अनुसार भगवान् ‘अज’ अर्थात् जन्मरहित हैं, उनका जन्म नहीं हो सकता। तथापि वे अपनी मायाशक्ति का अवलंबन लेकर देहधारी होते हैं, अवतरित होते हैं। वे प्राणिमात्र के दुःख से विगलित होकर दुःखों के सागर से उन्हें उबारने के लिए अवतरित होते हैं जब भी ऐसे विदेही आत्मा देहधारी हों, तब कहा जाता है कि भगवान् जन्म ग्रहण करते हैं। समस्त जीवों का जन्म कर्मफल के अनुसार होता है। हम सब अपने-अपने प्रारब्ध के वशीभूत हो जन्मे हैं, किंतु भगवान् अपनी इच्छा से तथा लोककल्याण के लिए जन्म ग्रहण करते हैं। शुभ या अशुभ किसी भी प्रकार का प्रारब्ध उनमें नहीं है। इस तरह भगवान् का जन्म प्रारब्धवश नहीं हो सकता है, वह तो दिव्य ही हो सकता है।

यहाँ थोड़ा भगवान् श्रीकृष्ण, यदुवंशी श्रीकृष्ण, सारथी श्रीकृष्ण की इस बात पर गौर करें, जो उनने कही है कि मेरा जन्म व मेरा कर्म। यह ‘मैं’ अहंजनित नहीं है। यह जो वाक्य है, ऋषि का वाक्य है, एक स्टेटमेंट है एवं एक अनुभव केन नाते प्रमाण रूप में कहा गया है। यह ईश्वर का, परब्रह्म का मैं है। दक्षिण भारत में स्वामी विवेकानंद परिव्रज्या कर रहे थे। पंडितों ने किसी शास्त्रचर्चा के दौरान कहा कि आद्य शंकराचार्य ऐसा कहा करते थे, तो स्वामी जी तुरंत बोल उठे कि उनने क्या कहा, इसे एक तरफ रखिए। “मैं विवेकानंद यह कह रहा हूँ, यह मेरी बात ध्यान से सुनो।” जब इस वार्त्तालाप पर श्री अरविंद से उनके शिष्यों ने टिप्पणी जानना चाही, तो उनने विवेकानंद की प्रशंसा की। उनने कहा, इसमें विवेकानंद का अहंकार नहीं है। वे अहंभाव से परे जाकर परब्रह्म की सत्ता में स्थित होकर बोल रहे थे। इसलिए वे जो भी बोल रहे थे, सत्य ही बोल रहे थे। ऐसे में यदि वे आद्य शंकराचार्य को गलत भी सिद्ध कर दें, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


Quotation

आदर्शों के लिए घाटा स्वीकार करते हुए लड़ मरने की साहसिकता का अनुदान अवतार के अतिरिक्त और किसी के पास नहीं होता।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

भगवान् का ‘मैं’ मंसूर का अनलहक है, सरमत का अनलहक है। मैं ही आत्मा हूँ। सरमत ने हाथी के पैरों से अपना सिर कुचलवा दिया, लेकिन सुल्तान को अल्लाह मानने से इंकार कर दिया। भगवान् का ‘मैं’ अर्थात् सृफी का मैं। हमारे उदाहरण मंसूर एवं सरमत बनना चाहिए। हम चूँकि शरीरधारी हैं, साधारण हमारा जन्म है। हम शरीर से परे जाकर आत्मा में, शुद्ध अहंभाव में स्थित नहीं हो पाते। यदि ऐसा कर सकें, तो फिर हम अवतार की भाषा में बोल रहे हैं। दिव्य जन्म वाला दिव्य कर्म के लिए आया अवतार सृष्टि को सारी संवेदना अपने अंदर साकार करके आता है। करुणा का महासागर ही उनके अंदर होता है एवं उसके वशीभूत होकर वे जन्म, वह भी दिव्य जन्म लेते हैं। अतः यदि अवतारीसत्ता “मेरा जन्म-मेरा कर्म” इस तरह से अपनी बात कहता है, तो गलत नहीं करता।

परमपूज्य गुरुदेव कहते थे, “तुम लोग अपने सुख-दुःख से परेशान हो और कहते हो कि आत्मज्ञान मिल जाए, किसी तरह। जिस दिन तुम्हें आत्मज्ञान मिल जाएगा, उस दिन दुनिया के दरद को देखकर तुम्हारी छाती फट जाएगी। दुनिया का दरद सहना सीखो, जीना सीखो, उसमें भागीदारी करना सीखो।” दरद सहने के लिए बड़ी भारी छाती चाहिए, वैसी जैसी कि स्वामी विवेकानंद की थी, परमपूज्य गुरुदेव की थी। सृष्टि के केंद्र में स्थित होकर, परब्रह्म के साकार रूप भगवान् कृष्ण जब अर्जुन को कुछ कहते हैं, तो उसे भलीभाँति समझना चाहिए। आगे चलकर वे विराट् रूप दिखाते हैं तब वह यह जान पाता है कि कृष्ण कौन हैं, दिव्य जन्म लेकर दिव्य कर्म करने आए महावतार हैं। मेरेपन से परे जाना व अवतार की चेतना में स्थित हो जाना बहुत बड़े पुरुषार्थ का कार्य है।

‘दिव्य’ शब्द का अर्थ रामानुजाचार्य जी ने एवं आचार्य शंकर ने किया है, अप्राकृत, ऐश्वर्य से परिपूर्ण। ‘तत्त्वतः’ का अर्थ किया है, ‘स्वरूपतः’ वास्तविक रूप में। भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि मेरा जन्म दिव्य है, कर्म भी दिव्य तथा अलौकिक हैं। हम अपनी साधारण बुद्धि से, उसके मापदंडों से उनके जन्म और कर्मों के कारण का निर्णय नहीं कर सकते। वे अमानव होते हुए भी मानव रूप में क्यों जन्म ग्रहण करते हैं और तीनों लोकों में उनका कोई कर्त्तव्य-कर्म न होते हुए भी वे क्यों कर्म करते हैं, इस बात को उच्चस्तरीय मनःस्थिति में जाकर ही स्वानुभूति द्वारा जाना जा सकता है। प्रारब्ध के वशीभूत न होते हुए भी वे क्यों जन्म ग्रहण करते हैं, कर्म करते हैं, यह रहस्य जान सकने वाला ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर चिरमुक्त हो जाता है। यही वास्तविक ज्ञान या विज्ञान है, गीता का मूल तत्त्वदर्शन है। इस ज्ञान को जान लेने वाला सदा के लिए मुक्त हो जाता है, फिर उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

जिस रहस्य को हर मनुष्य को जानना है वह है अज, अव्यय परमात्मा और उनके दिव्य जन्म-कर्म का रहस्य। इस ज्ञान से जो कर्म की धारा बहती है, उसमें स्नान करने वाला सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। क्योंकि उसके कर्म भी उस सर्वलोक महेश्वर के कर्म हो जाते हैं। अभी हम पिछले श्लोकों में देख चुके हैं कि भगवान् अपने जन्म का हेतु बता रहे हैं, भागवत् धर्म की रक्षा और युग की व्यवस्था का पुनर्गठन। यह दिव्य कर्म का बाह्य पहलू है और यही मानवजाति के भगवन्मुख प्रयासों को समस्त विघ्न-बाधाओं से उबारकर आगे बढ़ाता है। इस दिव्य कर्म का आँतरिक पहलू यह कि वह हमारी चेतना को दिव्य बनाने आता है, ताकि वह ऊर्ध्वमुखी हो सके और ऐसे लाखों-करोड़ों व्यक्तियों की चेतना में नवजीवन लाया जा सके। किसी बाहरी कर्म या बाहरी घटना अवतार के आने का मूल कारण नहीं होती, जैसा कि सामान्यतः समझा जाता है। जिस संकट की अवस्था में भगवान् आते हैं, वह बाहरी नजर से महज घटनाओं और जड़ जगत् के परिवर्तनों से भरा एक नाजुक काल प्रतीत होता है। परंतु यदि इसके वास्तविक स्वरूप को देखें, तो ज्ञात होता है कि यह संकट मानवचेतना में तब आता है, जब उसका रूपांतरण, कोई महान् परिवर्तन होने जा रहा हो। इस परिवर्तन के लिए ही दिव्य शक्ति की, अवतारी चेतना की आवश्यकता होती है।

विगत दो शताब्दियों को देखें, तो बड़ी तेजी से राजनीतिक, औद्योगिक, आर्थिक स्तर पर जनसाधारण की चेतना में परिवर्तन आए। एक प्रकार से इन क्राँतियों ने बीसवीं सदी की अंतिम वैज्ञानिक-कंप्यूटर क्राँति द्वारा इसे चरम स्थिति तक पहुँचा दिया है। यह फेरफार बौद्धिक-लौकिक है, आध्यात्मिक नहीं। जब यह कार्य आध्यात्मिक स्तर पर होता है, तो भगवान् का प्रादुर्भाव होता है एवं उसी को अवतार कहा गया है। दिव्य कर्म करने वाला एवं आज के संकट के मूल में आध्यात्मिक बीज देखते हुए सारे युग का प्रत्यावर्तन करने वाला भागवत् नेता ही आज का प्रज्ञावतार हैं एवं उसी व्याख्या में यह नवाँ श्लोक सारी बात हमें समझा रहा है।

भगवान् इस श्लोक में कहते हैं कि जो भी मनुष्य संसार में इस परमतत्त्व की अभिव्यक्ति और उसकी कार्यप्रणाली को भलीभाँति समझ लेता है, वह एक विशिष्ट दृष्टि से संपन्न हो जाता है। उसे यह भलीभाँति अहसास हो जाता है कि हमारे सभी कर्म उसी की दिव्य क्रीड़ा का एक अंग हैं तथा हमारी समस्त उपलब्धियाँ उसी परमसत्ता रूपी गुह्य शक्ति की लीला का एक हिस्सा हैं। हममें से किसी को भी वैयक्तिक रूप में अहंकार से भरकर अभिमान नहीं करना चाहिए कि यह हमने किया है। यह ‘कर्त्ता’ भाव की अभिव्यक्ति हट जाए, इससे निवृत्ति मिल जाए, तो हमने मुक्ति का पथ प्रशस्त कर लिया, यह माना जाना चाहिए।

ऐसे साधक, जो सर्वत्र उसी ईश्वर की क्रीड़ा-कल्लोल का दर्शन करते हैं, शरीर छोड़ने के बाद (त्यक्त्वा देहं) पुनः जन्म नहीं लेते (पुनर्जन्म नैति)। इसका अर्थ यह हुआ कि वे उस अहंभाव से उबर जाते हैं, जो उन्हें जन्म-जन्माँतरों तक योनियों में पटक-पटककर उत्पीड़ित करना। स्वार्थ की मूर्खताओं में घसीटे जाने से वे बच जाते हैं एवं जीवन-मुक्ति का लाभ ले लेते हैं। इतना ही नहीं भगवान् कहते हैं कि जो मेरे दिव्य जीवन और कर्म के मर्म को जानता है वह निश्चित ही मुझ ही को (मामेति अर्जुन) प्राप्त होता है। शुद्ध अहं व ब्रह्मभाव में जीना साधक की उच्चप्रगति की व्यवस्था का प्रतीक है। यही हर साधक का लक्ष्य भी 222 यह बड़ा कठिन। अहंकार को परिष्कृत कर कर्त्ताभाव से मुक्त होकर, आकर्षणों से विरत होने पर आगे की प्रगति-यात्रा का पथ प्रशस्त होता है। इसके बाद अहंभाव पुनः उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि भगवान् के आश्वासन के अनुसार वह भगवान् को प्राप्त हो जाता है, उनसे ही एकाकार हो जाता है एवं पुनर्जन्म के चक्र में नहीं उलझता।

एक ही श्लोक में मानो गागर में सागर की तरह सारा तत्त्वदर्शन छिपा पड़ा है। हम इस लेख के प्रारंभ से ही एक ही श्लोक की व्याख्या पर टिके हुए हैं, जिसका पूर्वापर संदर्भ है भगवान् के अवतरण का रहस्य और इसके बाद का संदर्भ है वीतराग बनकर भय को नष्ट कर भगवान् को प्राप्त हो जाने की प्रक्रिया को समझकर इस शैली को जीवन का एक अंग बना लेना। इस उत्तर पक्ष की व्याख्या दसवें श्लोक में आई है एवं हमें फिर सीधे कर्म-अकर्म-विकर्म की व्याख्या (लगभग श्लोक क्रमाँक 23) तक ले जाता है। कितना गुह्य व अलौकिक-दिव्य है गीता का ज्ञान, यह इसकी विस्तृत विवेचना के बाद ही संभव हो पाता है और उसके लिए कोरे ज्ञान की, तर्क की नहीं, भगवान् के भाव में जीने की आवश्यकता है। श्रद्धा से अभिपूरित हो अहंभाव को बलि पर चढ़ाने की जरूरत है। श्रद्धावान् को ही सच्चा ज्ञान मिलता है। यह इस अध्याय का अंतिम निष्कर्ष भी तो है।

“जन्म कर्म च में दिव्यम्” की व्याख्या के प्रकरण में श्री अरविंद लिखते हैं, “यह जगत् एक युद्ध की रंगभूमि है। इसके दो पहलुओं पर गीता जोर देती है, एक आँतरिक संघर्ष, दूसरा बाह्य युद्ध। आँतरिक संघर्ष, अपने अंतर्जगत् में विद्यमान् कामना, अज्ञान, मोह, लोभ व अहंकार जैसे घटकों से है। इन्हें मारना ही अंदर की विजय है। पर एक दूसरा युद्ध बहिर्जगत में भी चल रहा है। मानव समूह में धर्म और अधर्म की शक्तियों के बीच सतत संग्राम चलता रहता है। भगवान् का अवतरण अहंकार का आश्रय लेकर लड़ने वाली आसुरी अधर्मप्रधान ताकतों का संहार करने के लिए होता है। इसी के लिए उनका दिव्य जन्म होता है एवं सारे कर्म दिव्यता से भरे होते हैं।”

महाभारत का युद्ध प्रकाराँतर से देवासुर संग्राम का एक रूपक है, जिसके महानायक हैं श्रीकृष्ण। धर्मराज्य की स्थापना के लिए लड़ रहे पाँडव देवपुत्र हैं, मानव रूप में देवताओं की शक्तियों को धारण किए हुए हैं। कौरव आसुरी शक्ति के अवतार हैं। भगवान् प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में असुरों को नष्ट करने, उन्हें चलाने वाली आसुरी शक्ति का दमन करने और धर्म के आदर्शों की स्थापना के लिए पुनः अवतार लेते हैं। उनका सबसे बड़ा उद्देश्य होता है स्वर्ग राज्य को पृथ्वी के निकट तक ले आना, मानव में देवत्व को उभारना। उनके आने का सही लाभ उन्हीं को मिल पाता है, जो भगवान् की इस क्रिया के माध्यम से दिव्य जन्म और दिव्य कर्म के वास्तविक मर्म को जान लेते हैं और अपनी चेतना में सदैव भगवन्मय होकर जीते हैं। ‘मन्मया मामुपाश्रिताः’ के माध्यम से भगवान् ने ऐसे तत्त्वज्ञानियों को जो तपःपूत हैं, अपरा प्रकृति से उबरकर मुक्त हो जाते हैं, आश्वासन दिया है कि तुम मेरे स्वरूप और स्वभाव को ही प्राप्त होओगे॥ (मद्भावमागताः)। यह सारा प्रकरण जुड़ा नवें श्लोक से है, पर आया दसवें श्लोक में है, जिसकी व्याख्या हम अगले अंक में करेंगे। समापन से पूर्व परमपूज्य गुरुदेव के चिंतन द्वारा पाठक-परिजनों को अवतार की प्रत्यक्ष प्रेरणा से अनुप्राणित करना चाहेंगे।


संवेदना घनीभूत (Kahani)

अपने बेलूरमठ के कमरे में स्वामी जी बराबर बेचैनी से टहल रहे थे। संतों ने पूछा, स्वामीजी! क्या बात हुई? आप काफी परेशान हैं। वे बोले-इसी क्षण जापान के समीप समुद्र में एक जहाज डूबा है। मुझे उनका आभास हुआ है एवं मैं उनकी व्यथा सुन रहा हूँ। भक्तों ने कहा, स्वामीजी आप तो कलकत्ता में गंगा किनारे खड़े हैं, आपको कैसे पता चला? स्वामी जी कुछ जवाब न देकर मौन ध्यान में चले गए। अगले दिन समाचार आया कि ऐसी घटना जापान के समीप हुई, जिसमें पाँच सौ व्यक्ति डूब गए। जिस समय विवेकानंद बोल रहे थे, पाँच सौ व्यक्तियों की करुणा अवतारी चेतना रूपी विवेकानंद के हृदय से बोल रही थी। अवतार में सृष्टि की सारी संवेदना घनीभूत हो जाती है। वह उसी ब्रह्मभाव में जीता है।

परमपूज्य गुरुदेव अगस्त 1979 की अखण्ड ज्योति में लिखते हैं, “अवतार की प्रथम प्रेरणा, प्रथम प्रक्रिया देवमानवों के उत्पादन की होती है। वे आत्मपरिवर्तन का आदर्श उपस्थित कर अनेकानेकों को अनुगमन की प्रेरणा देते हैं। अग्रगमन ही साहसिकता है। यह पराक्रम देवमानवों के भाग्य में ही लिखा होता है। पीछे अनुगमन तो असंख्यों करने लगते हैं।” ............ “अवतार के द्वितीय चरण में अनेक व्यक्ति आदर्शवादी साहस का परिचय देते देखे जाते हैं। स्वार्थियों को परमार्थ अपनाते, पतितों को आदर्श अपनाते देखकर यही सिद्ध होता है कि हवा का रुख बदला और मौसम पलटा।” पूज्यवर के अनुसार इन दो प्रेरणाओं को लेकर ही दिव्य जन्म लेता है अवतार एवं दिव्य कर्म करने की प्रेरणा देता हुआ जीवन-मुक्ति, बंधन-मुक्ति का पथ प्रशस्त कर जाता है। अब इस अंक में इतना ही। शेष दिव्य कर्म की उत्तर व्याख्या वीतराग बनने के फलितार्थ-माहात्म्य अगले अंक में। क्रमशः

गुरुकथामृत-20


सत्पराम” देने वाला, मनोबल उछालने वाला मार्गदर्शन

सबसे बड़ा अवलंबन किसी के लिए भी जीवनपथ पर है, सच्चा मार्गदर्शन देने वाला-सत्परामर्श देने वाला सहयोगी, एक ऐसा व्यक्ति जिस पर विश्वास किया जा सके। साधना के क्षेत्र में गहरे उतरने की बात हो अथवा जीवन-संग्राम में पग-पग पर आने वाली बाधाओं से जूझने की, हम जब हमारी गुरुसत्ता के पत्रों के माध्यम से उनके जीवन-दर्शन को पढ़ने की कोशिश करते हैं, तो उनका वह पहलू नजर आता है, जो कभी किसी को सद्गुरु के रूप में परामर्श देता था, कभी लताड़ भी लगाता था तथा कभी मित्रवत् सलाह भी देता था। लक्ष्य एक ही होता था कि पत्र पाने वाला अपनी जिज्ञासा का सही समाधान पाए एवं इधर-उधर भटके नहीं। साथ ही उसका मनोबल भी बढ़े एवं दुगुने उत्साह के साथ वह कार्य में लग जाए। इस बार इस स्तंभ के लिए कुछ ऐसे पत्रों का चयन हमने किया है, जो 1944 से 1970 के बीच लिखे गए। देखें कितना महत्त्वपूर्ण शिक्षण देते हैं, हमें ये पत्र।

श्री देवराज जी ऋषि (रुड़की) को 11/2/44 को लिखा एक पत्र है-

“आपका पत्र मिला। निस्संदेह भगवान् की कृपा अनंत अपने प्रिय पुत्रों पर उनकी करुणा सदा ही बरसती रहती है। हम लोगों की धुँधली दृष्टि कभी किसी कठोर विधान को देखकर चकरा जाती है। अप्रिय प्रसंगों को देखकर प्रभु की नाराजी सोचते हैं। परंतु यथार्थ में यह भी उनकी दया ही होती है। प्रभु का हर एक कार्य हमारे कल्याण के निमित्त है। यदि हम लोग इस मर्म को समझ सकें, तो प्रभु शरणागति के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता।”

समर्पणयोग की शिक्षा का सारा मर्म उपर्युक्त पंक्तियों में छिपा पड़ा है। प्रिय-अप्रिय सभी में यदि प्रभु की ही इच्छा मान ली जाए, तो मन दुःखी क्यों हो। साधक की कितनी बड़ी असमंजस की स्थिति का समाधान हमारे आराध्य करते हैं कि विचलित न हों, गहना कर्मणो गतिः वाले इस जगत् में हर घटनाक्रम को प्रभु की लीला ही मानकर चलें। वही मार्गदर्शन तो जीवनयात्रा का पाथेय बन जाता है।

एक अन्य पत्र जो 24/10/45 को कासिमपुर अलीगढ़ के श्री धर्मपाल सिंह को लिखा गया, पूज्यवर लिखते हैं-

“गुरुतत्त्व में हम सबकी वैसी ही निष्ठा होनी चाहिए, जैसी कि अपने मन में धारण करने का आप प्रयत्न कर रहे हैं। परंतु इतना स्मरण रखना चाहिए, मनुष्य आखिर मनुष्य ही है। उसमें दोष होने संभव हैं। मुझे भी आप निर्दोष न समझें, इतना मानने के बाद ही अपनी निष्ठा को केंद्रीभूत करें। देवता मान लेने से आपकी साधन को हानि पहुँच सकती है।”

कितना मर्मस्पर्शी हृदय से निकला आत्मकथन है। उनने पूज्यवर में गुरु को खोजा। गुरु ने अपने भावी शिष्य को लिखा कि निष्ठा गुरुतत्त्व में रखें, किसी व्यक्ति में नहीं। अपने मनोभावों को परिपक्व बनाएँ एवं यह मानकर चलें कि गुरु भी हाड़-माँस का पुतला ही है। उसके बताए आदर्शों पर चलना-श्रद्धातत्त्व को नित्य गहरा बनाते चलना ही गुरुदीक्षा को पकाना है। इस श्रद्धा के सहारे ही वह सब मिलता चला जाता है, जो किसी गुरु से शिष्य को प्राप्त हो सकता है।

इसी प्रकार का एक तीसरा पत्र है, जो 9/7/52 को श्री रामदास (कानपुर) को लिखा गया था।

“गुरुभक्ति ईश्वरभक्ति का ही एक प्रारंभिक और सरल रूप है। वह प्रेम भी ईश्वर को ही पहुँचता है। जैसे पत्थर की प्रतिमा पूजन करने से उस पूजा का श्रेय प्रतिमा तक सीमित नहीं रहता और सीधा ईश्वर तक जा पहुँचता है। उसी प्रकार गुरुभक्ति भी किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं है, वह भी सीधी ईश्वर तक ही पहुँचती है।”

गुरुभक्ति की बड़ी सटीक व्याख्या है उपर्युक्त मार्गदर्शन में। गुरु व्यक्ति नहीं, परमात्मचेतना का प्रतिनिधि है एवं गोविंद से मिलाने के लिए नियुक्त एक प्रतिनिधि है। गुरुभक्ति को इस दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में समझने के बाद मन के सारे ऊहापोह मिट जाते हैं एवं आध्यात्मिक प्रगति की राह आसान हो जाती है। यही वह सारतत्त्व है, जो किसी के लिए भी दैनंदिन जीवन का एक सहारा बन जाता है।

अब एक पत्र ऐसा जो राजनीतिक स्तर पर आकाँक्षा रखने वाले एक सज्जन को लिखा गया है। वे पंडित नेहरू जी से मिलकर आए थे, बड़ी खुशी से यह समाचार उनने पूज्यवर को दिया था। पूज्यवर बड़ी आत्मीयता से उन्हें लिखते हैं 3/12/57 को यह पत्र।

“आपसे यहाँ पर दो-तीन दिन नहीं मिलना हुआ, पर ऐसा लगता है, मानो आप जन्म-जन्माँतरों के हमारे साथी हैं। पत्र पढ़ते समय ऐसा लगता है, मानो आप सामने ही बैठे हों।

पं. नेहरू से मिलन का समाचार पढ़कर संतोष हुआ। आपकी आत्मा भी उतनी ऊँची है, जितनी पं. नेहरू की। परिस्थितियों ने ही आपको इन दिनों ऐसा अव्यवस्थित बना दिया है। आप भी इसी जीवन में महापुरुष घोषित हों, तभी हमें संतोष होगा।”

मुँबई के श्री हर्षनारायण सिंह को यह पत्र तीन दिसंबर सत्तावन को लिखा गया था। पत्र बताता है कि उनकी हर्षाभिव्यक्ति जो पंडित जी से मिलकर हुई है, यह उन्हें उथले स्तर तक न रोक दे। वे यह भी जानें कि उनके अंदर भी वही तत्त्व छिपा पड़ा है। मात्र उसे ऊँचाइयों तक पहुँचाने के प्रयास की जरूरत है। बाद में श्री सिंह ने इस क्षेत्र में काफी प्रगति की एवं जन नेतृत्व के क्षेत्र में एक अग्रणी भूमिका निभाई।

एक पत्र बड़ा स्पष्टवादिता से भरा हुआ, लताड़ लगाता हुआ। अपने प्रिय आत्मीयों को वाँछित प्रगति न करते देख पूज्य गुरुदेव दुःखी होते थे, तो अपना मानकर लिख बैठते थे, 19/4/65 को श्री पहाड़िया जी को लिखे एक पत्र में वे कहते हैं-

“कभी आप हमारे अत्यंत निकटवर्ती आत्मीयजनों में से थे। हम बड़ी-बड़ी आशाएँ आप से बाँधे रहते थे और सोचते थे पहाड़िया जी किसी दिन देश के नररत्नों में से एक होंगे और इतिहास के पृष्ठों पर उज्ज्वल नक्षत्र की तरह चमकेंगे। पर आप धीरे-धीरे काफी शिथिल होते चले गए हैं। बेशक आपने नगरपालिका आदि का बहुत काम किया है, पर जिस अत्यंत अनिवार्य कार्य की आप जैसे प्रतिभाशाली लोगों से अपेक्षा की जाती है, वह तो उपेक्षित ही पड़े हैं।”

गुरुवर की अपेक्षा उनसे कुछ अधिक थी। पहाड़िया जी मात्र नगरपालिका बाँदा के सदस्य बनकर प्रसन्न थे। परमपूज्य गुरुदेव उनसे और बड़ा काम कराना चाह रहे थे। इसलिए यह भाषा उन्होंने प्रयुक्त की। पाठकगण पहाड़िया जी से परिचित हैं। बाद में वे शाँतिकुँज आ गए, 1971 से 1993 तक यहीं महाप्रयाण होने तक गुरुवर के अनन्य सहयोगी होकर जिए।

एक अंतिम पत्र 20/3/67 का, श्री रणसिंह जी के नाम लिखा, जो गुरुदेव की जन्मभूमि आँवलखेड़ा में सक्रिय थे। सभी जानते हैं कि अपनी माता श्री की स्मृति में ‘माता दानकुँवरि इंटर कॉलेज’ हेतु अपनी सारी पैतृक भूमि पूज्यवर ने दान में दे दी थी। रणसिंह जी उसी कॉलेज के व्यवस्था मंडल में थे। वे लिखते हैं-

“तुम्हारे जैसे प्रतिभाशाली सुशिक्षित युवक से मातृभूमि-जन्मभूमि ऐसी ही आशा करती थी। जिस तत्परता से तुम उधर ध्यान देते, परिश्रम करते और प्रयत्नशील रहते हो, उतना ही यदि गाँव के अन्य सुयोग्य व्यक्ति भी करते, तो आँवलखेड़ा की स्थिति न जाने कितनी अच्छी ऊँची रही होती। तुम्हारी तत्परता पर हमें बड़ा संतोष है और विश्वास है कि जो पौधा किसी प्रकार लग गया है, उसे तुम लोग सींचते-बढ़ाते रहोगे।”

पत्र की भाषा देखें एवं जानें कि किस मित्रभाव से ठाकुर साहब को प्रोत्साहित किया गया है। जीवन-संग्राम में जो चाहिए वे सारे गुण हमें पूज्यवर के पत्रों रूपी संजीवनी भरी लेखनी के माध्यम से मिलते हैं। इन्हें समझ लें तो प्रगति के उच्चतर आयाम खुलते चले जाएँगे।


जो सामने है (Kahani)

आपातकालीन अध्यात्म

साथियो! मैं यह कह रहा था आपसे कि यह आपत्तिकाल है, जिसमें से आप गुजर रहे हैं। इसे अगर आप हमारी आँखों से देख पाएँ, तो आप देख सकते हैं कि कैसे तूफान आ रहे हैं, कैसी आँधियाँ आ रही हैं? आपको अपनी आँखों से दिखाई नहीं पड़ सकता, क्योंकि आप सामने की चीजें देखते हैं। आपको केवल वही चीज दिखाई पड़ती है, जो सामने है।


हीरक जयंती विशेष - नारी जागरण वर्ष में इस आँदोलन की कथा-गाथा

हीरक जयंती आ पहुँची। युगचेतना के अवतरण को 75 वर्ष पूरे हुए। एक छोटा-सा साधारण-सा दीपक अचानक 18 जनवरी 1926 की ब्रह्ममुहूर्त की वेला में एक पंद्रह वर्षीय बालक के लिए अखण्ड दीपक बन गया। उसी दीपक की लौ में से उसके गुरु प्रकट हुए थे एवं उनने उसे बालक श्रीराम को बोध कराया था कि उसका अवतरण किसलिए हुआ है। सूक्ष्मशरीरधारी परोक्षजगत से पधारी गुरुसत्ता ने उस दिन, उस बोध दिवस के दिन अनायास ही गायत्री परिवार नामक एक संगठन को जन्म दे दिया, जो कि इस वर्ष अपने 75 वर्ष पूरे कर रहा है निरंतर जल रही अखण्ड अग्नि, अखण्ड दीपक की लौ-आभा के साथ।

बड़ा ही विलक्षण तपप्रधान इतिहास है वर्ष 1926 का। इसी वर्ष हमारी गुरुसत्ता ने अपने चौबीस-चौबीस लक्ष्य के चौबीस महापुरश्चरणों की श्रृंखला आरंभ की। इसी वर्ष उनकी जीवनसंगिनी, उनकी अंतरंग शिष्या, जिसे सत्रह वर्ष बाद अपने आराध्य के जीवन में प्रवेश करना था, जन्मीं। हाँ, वंदनीया, शक्तिस्वरूपा, स्नेहसलिला माता भगवती देवी आगरा शहर में, युगऋषि की जन्मस्थली आँवलखेड़ा से लगभग पंद्रह मील दूर लसवंतराय बोहरेजी के घर जन्मीं। जैसा बालक श्रीराम का जन्मकाल था, वैसा ही परमवंदनीया माताजी का भी पढ़ने को मिलता है। मात्र भजन-पूजन में रुचि। घर में वैभव के सब साधन, पर मन मात्र प्रभु में। उस मीरा को आखिर उसके कृष्ण नरतन में जो मिलने वाले थे।

1943 में परमपूज्य गुरुदेव के आगरा से मथुरा आकर घीयामंडी (वर्तमान अखण्ड ज्योति संस्थान कार्यालय) के भवन में आने के बाद उनने वही किया, जो उनके आराध्य ने कहा। हर श्वास में उनके पूज्यवर ही बसे थे। दोनों में आयु का बड़ा अंतर था, परंतु परमवंदनीया माताजी तो जैसे उनके साथ ढलने के लिए ही आई थीं। उनने अपनी आँखों से देखा कि आचार्य श्री ने नारी जागृति को अपने आँदोलन का मुख्य अंग माना है एवं स्वयं से शुरुआत करने के क्रम में, उनने सबसे पहले अपनी माँ को अक्षरज्ञान कराके सभी ग्रंथ पढ़ना सिखा दिए हैं। धीरे-धीरे वंदनीया माताजी भी पूज्य गुरुदेव के सुलेख-अभ्यासक्रम में शामिल हो गईं एवं फिर सास-बहू में मानो प्रतिस्पर्द्धा होने लगी किसकी लिखावट ज्यादा अच्छी है। उन दिनों महात्मा गाँधी ने प्रौढ़ शिक्षा का नारा दिया था। काँग्रेस के आँदोलन का यह एक अंग भी था। रात्रि में अखण्ड ज्योति संस्थान में पुरुष वयोवृद्ध पढ़ने आते, जीवन जीने की कला सीखकर जाते। दिन में माताजी पूज्यवर के साथ बैठतीं, कभी-कभी पूज्यवर की माता श्री (ताई जी जिन्हें प्यार से कहते थे) भी शामिल होतीं। कुछ माता-बहनें आतीं, जिनमें एक बूढ़ी मुसलमान दादी माँ भी थी। नाम तो था सलमा, पर नाम बदलकर लोगों ने सल्लो कर दिया। फिर उसकी बेटी सकीला भी उन क्लासों में शामिल हो गई।

प्रौढ़ शिक्षा की, नारी जागृति की यह प्रक्रिया 222 बढ़ी, परमवंदनीया माताजी के गुरुदेव की जीवनचर्या के एक अंग बनने के रूप में। नित्य न जाने कितने अतिथि आते, उनका सत्कार भी करना होता था। सभी भोजन प्रसाद पाकर ही जाते थे। वह कार्य भी परमवंदनीया माताजी को ही सँभालना था। साथ में दिन में प्रौढ़ शिक्षा की क्लास एवं दो-तीन घंटे गुरुसत्ता के साथ बैठकर पत्राचार का शिक्षण। पत्रों को वे पढ़ती जातीं, गुरुदेव जवाब लिखते चले जाते। जितनी देर में वे पत्र पढ़कर लिफाफे में रखना उतनी देर में जवाब लिखकर उनके पास लिफाफे में रख बंद करने के लिए आ जाता। यह अलौकिक चमत्कार वे रोज देखतीं। कभी-कभी प्रेस को सँभालने हेतु भी उन्हें नीचे जाना पड़ता, बाद में वे उसका क ख ग अच्छी तरह सीख गईं एवं गुरुदेव को अनुपस्थिति में भी अखण्ड ज्योति की छपाई का काम देखने लगीं।

एक महिला मंडल, संभवतः गुरुसत्ता द्वारा प्रथम महिला मंडल 1947 में माताजी की सहायता के लिए बनाया गया। कौशल्या, रतन, नारायणी एवं प्रेमवती ये प्रमुख महिलाएँ थीं, जो वंदनीया माताजी की साथिन बनीं। इन सबकी साहित्यिक रुचि बढ़ाने का प्रशिक्षण क्रमशः पूज्यवर ने वंदनीया माताजी को दिया। इन सभी का साँस्कृतिक उत्कर्ष हो, अपने पैरों पर खड़ी हो इस कार्य को बढ़ा सके, इसलिए उनने छोटी-सी शुरुआत की थी। उन्हीं दिनों आचार्य श्री की पुस्तक प्रकाशित हुई, ‘स्त्रियों का गायत्री अधिकार’ इस पुस्तक के तर्कों ने सबको हिला दिया। देखते-देखते अगणित महिलाएँ इस महान् यज्ञ में शामिल होती चली गईं। 1958 के सहस्रकुँडी महायज्ञ के बाद परमपूज्य गुरुदेव ने ‘अखण्ड ज्योति’ संपादन का भार परमवंदनीया माताजी को सौंप दिया। कहा कि अब हम हिमालय जाएँगे, आर्ष साहित्य का पुनर्लेखन-भाष्य करने हेतु तप भी करना है, एकाँत भी जरूरी है। छह माह उत्तरकाशी रहेंगे, छह माह नंदनवन-तपोवन में गोमुख के ऊपर अपने गुरुदेव के साथ। एक वर्ष लगा परमवंदनीया माताजी को सारा कार्यभार सँभालने में। अक्टूबर 1959 की अखण्ड ज्योति के पृष्ठ 4 पर एक लेख था, ‘अखण्ड ज्योति के उत्तरदायित्वों में परिवर्तन’ लेखिका के स्थान पर माता भगवती देवी पत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य लिखा था। मात्र तैंतीस वर्ष की आयु एवं यह महती जिम्मेदारी दो वर्ष के लिए पूज्यवर उन पर डालकर चले गए। 1961 की जनवरी तक उनने इस कार्य को बखूबी निभाया।

संगठन बढ़ता चला गया, लगाया गया पौधा विकसित हो वटवृक्ष बनता चला गया। नारी जागृति आँदोलन का आधार अब खड़ा हो रहा था। 1962 में गुरुदेव के हिमालय अज्ञातवास से लौटते ही युगनिर्माण योजना व उनके शत-सूत्री कार्यक्रम की घोषणा हो गई। यह भी बता दिया गया कि वे मात्र 9 वर्ष के लिए वापस आए हैं। पुनः 1971 में वे परमवंदनीया माताजी को हरिद्वार के शाँतिकुँज में छोड़कर हिमालय चले जाएँगे। यही हुआ। परमवंदनीया माताजी 20 जून 1971 को शाँतिकुँज आ गईं। भूल गईं आगरा-मथुरा, वहाँ से जुड़ी ममता। अब उनसे जुड़ गईं कुमारी कन्याएँ, जिनके साथ उन्हें अखण्ड दीपक की रक्षा करनी थी। साथ ही सीमित अवधि में वही तप संपन्न करना था, जो गुरुसत्ता ने पंद्रह वर्ष की आयु में आरंभ कर चौबीस वर्ष में पूरा किया था। अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा से शाँतिकुँज हरिद्वार आए अखण्ड दीपक की साक्षी में पहले दस, फिर सोलह, फिर चौबीस कन्याओं का अखण्ड जप चला। उनका प्रशिक्षण भी माताजी ने सँभाला। यहीं से गायत्री परिवार के महिला जागृति आँदोलन ने जड़ें मजबूत कीं।

देवकन्याओं का शिक्षण एवं उन्हें भाषण, संगीत, स्काउटिंग, स्वावलंबन का अभ्यास परमपूज्य गुरुदेव (जो 1972 में लौट आए थे) के परोक्ष मार्गदर्शन, संरक्षण एवं प्रत्यक्षतः शक्तिस्वरूप माताजी के सान्निध्य में होने लगा। इनके दल सारे भारत में गए एवं एक शिक्षण देकर आए कि नारी चाहे तो पुरुष के द्वारा किए जा रहे सारे कार्य कर सकती है। नारी अबला नहीं, सबला है। धर्मतंत्र उसी की वजह से टिका हुआ है। यदि उसे परिष्कृत कर राष्ट्र का मार्गदर्शन करना है, तो नारी ही आगे आकर यह कार्य करेगी।

1975-76 से अब तक की पच्चीस वर्ष की अवधि में महिला जागृति आँदोलन सारे देश व विश्व में फैला है। अब हर कार्य में आगे बढ़कर बहनें कमान सँभालती हैं। शक्तिपीठों के निर्माण की बात आई, तो बढ़-चढ़कर पुरुषार्थ महिला शक्ति ने ही दिखाया। अधिकाँश शक्तिपीठों के मूल में नारी शक्ति का त्याग बूँद-बूँद कर किया गया संकुल नहीं है। एक उदाहरण अभी-अभी का नहीं भूलता। गुजरात के सूरत जिले के समुद्री तट पर एक गाँव है मोर। इस गाँव में महिलाएँ ही निवास करती हैं। पुरुष वर्ग जहाज के खलासी व नाविकों के रूप में वर्षभर भारत से बाहर ही रहते हैं। जो लौट आते हैं, वे ऐसे ही पड़े रहते थे, कई व्यसन लेकर आते थे। गायत्री परिवार से जुड़ी महिलाओं ने व्यसन मुक्ति आँदोलन चलाया एवं फिर एक शक्तिपीठ चालीस बहनों ने अपने बलबूते विनिर्मित करके दिखा दी। इतनी शानदार पीठ है कि माँ की प्रतिमा का सौंदर्य एवं उस भवन का स्वरूप देखते ही बनता है, जिसके पिछवाड़े समुद्र की लहरें स्पर्श करती हैं। लगभग चालीस लाख रुपये बहनों ने ही अपने स्तर पर एकत्र कर यह भव्य निर्माण अपने हाथों से किया है।

यह वर्ष महिला शक्ति जागरण वर्ष है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सारा विश्व 2001 को इसी रूप में मना रहा है। सारे विश्व में नारी शक्ति उभरकर आगे आ रही है। इस वर्ष को विशेषतः गायत्री परिवार ने नारी जागरण का अलख जन-जन तक पहुँचाने के लिए मनाने हेतु संकल्प लिया है। इस वर्ष प्रशिक्षण की श्रृंखला केंद्र व क्षेत्र में भी चलेगी। संवेदना की मूर्ति नारी को उसकी वर्षों की घुटन से मुक्ति मिले, वह स्वावलंबी, शिक्षित, सुसंस्कारी हो पुरुष के साथ कंधे-से-कंधे मिलाकर आगे बढ़ सके। धर्मतंत्र के माध्यम से साँस्कृतिक नवोन्मेष की प्रक्रिया को मूर्त रूप दे सके, इसीलिए इस वर्ष को विशेष रूप से परमवंदनीया माताजी के जन्म के साथ युगचेतना के अवतरण, अखण्ड दीपक के प्रज्वलन की हीरक जयंती के रूप में उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। दहेज की समस्या से, जलती बहू-बेटियों के हाहाकार से, परोक्ष जगत् के विक्षुब्ध होने की प्रक्रिया से, अपव्यय-फैशनपरस्ती, अश्लील प्रदर्शन से घिरी विडंबना से नारी ही मुक्ति दिला सकेगी। आइए हम सभी इस आँदोलन रूपी महायज्ञ में एक समिधा बन स्वयं को समर्पित करने का संकल्प लें।


सात आँदोलन-व्यावहारिक कार्यक्रम

बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण के शक्तिप्रवाह ने जीवन-साधना तथा महापूर्णाहुति के पाँच चरणों ने जिन व्यक्तित्वों को, देवमानवों को जन्म दिया है, उन्हें सप्त आँदोलनों में नियोजित होने के लिए तुरंत प्रेरित किया जा रहा है। व्यावहारिक प्रशिक्षण उनका क्षेत्रीय स्तर पर भी चलेगा व केंद्र में भी, किंतु न्यूनतम तो किन्हीं सूत्रों से शुरुआत हो ही सकती है। ऐसे सूत्र यहाँ दिए जा रहे हैं।

(1) साधना आँदोलन

साधना संकल्पों के साथ जीवन-साधना का रूप ले। श्री अरविंद के अनुसार “सारा जीवन ही योग है।” हर श्वास को साधनामय बनाएँ।

अपनी उपासना नियमित बनाएँ। प्रातः आत्मबोध, रात्रि में तत्त्वबोध की साधना करें। षट्कर्म एवं ज पके साथ ध्यान का क्रम नियमित रखें। ध्यान के लिए परमपूज्य गुरुदेव की पुस्तक ‘उपासना के दो चरण जप और ध्यान’ देखी जा सकती है।

व्यक्तिगत स्तर पर यह अनुभूति जगाएँ कि दिव्य चेतना के प्राणप्रवाह के साथ कितना जुड़ पाए। आदर्शों को जीवन में उतारने का अभ्यास कितना संपन्न हुआ।

परिवार संस्था के स्तर पर एवं सामूहिक स्तर पर सुगम प्रार्थना, व्यवस्थित उपासना व जीवन-साधना का अभ्यास प्रखर बनाएँ। समाज के हर वर्ग, संप्रदाय को लोगों को उनकी श्रद्धा के अनुरूप उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना हेतु प्रेरित करें। स्थान-स्थान पर सामूहिक साधना सत्रों का समय-समय पर आयोजन करें।

‘सबके लिए सुगम उपासना-साधना’ पुस्तिका को इस आँदोलन के लिए माध्यम बनाएँ।

(2) शिक्षा आँदोलन

निरक्षरता उन्मूलन के लिए संकल्पित हों। अपने स्तर पर क्या प्रयास हो सकता है, सोचें व लागू करें।

शिक्षा जीवन विद्या के साथ जुड़े। जीवन जीने की कला के सूत्र शिक्षा के साथ गूँथकर पहुँचाए जाएँ। ‘शिक्षा ही नहीं, विद्या भी’ पुस्तिका को आधार बनाएँ।

बालसंस्कारशालाएँ चलें, विद्यालयों में विचार क्राँति का आलोक पहुँचे। नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम के साथ जुड़े।

संस्कृति मंडल बनाएँ। भारतीय संस्कृति ज्ञानपरीक्षा में भागीदारी कराएँ।

कामकाजी विद्यालय की योजना को लागू करें।

(3) स्वास्थ्य आँदोलन

आहार-विहार, चिंतन, जीवन शैली को संतुलित बनाएँ।

योग-व्यायाम-प्राणायाम आदि दिनचर्या का अंग बने।

स्वच्छता संवर्द्धन के प्रयोगों को बढ़ाएँ।

लाठी व्यायाम, सामूहिक श्रमदान की प्रवृत्ति को बढ़ावा दें।

वनौषधि उपचार को आधुनिक औषधियों की तुलना में वरीयता दें। उन्हें स्वयं भी अपनाएँ, उनके प्रचार-प्रसार हेतु स्मृति उपवनों (जड़ी-बूटी उद्यानों) को बढ़ावा दें तथा वैकल्पिक चिकित्सा तंत्र को खड़ा करें।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों को, चिकित्सकों को जनस्वास्थ्य शिक्षा हेतु प्रेरित करें, एक आँदोलन का रूप दें तथा संपन्नों द्वारा ऐसी सुविधाएँ विनिर्मित हों, इसके लिए प्रेरित करें।

(4) स्वावलंबन आँदोलन

अपना काम स्वयं करने की आदत डालें।

श्रम का सम्मान करें, रचनात्मक श्रम का महत्त्व जन-जन को बताएँ।

स्वयं सहायता बचत समूहों का निर्माण करें एवं इनके आधार पर स्वदेशी आँदोलन को गति दें।

गौ केंद्रित अर्थव्यवस्था को गति देने हेतु ऐसे केंद्र खड़े करें। कुटीर उद्योग गोपालन पर केंद्रित हो स्थान-स्थान पर चल पड़ें।

सभी के कौशल-श्रम का आर्थिक लाभ उन्हें मिले, इसके लिए सहकारी आँदोलन के स्तर पर इन प्रोजेक्ट्स को चलाएँ।

(5) पर्यावरण आँदोलन

प्रकृति का यज्ञीय चक्र व्यवस्थित बने, इसके लिए जन-जागरूकता बढ़ाएँ।

क्षणिक-अनगढ़ सुख के लिए, व्यसनों के लिए प्रकृति का शोषण कर बने फैशन उत्पादों के विरुद्ध आँदोलन चलाएँ।

कचरे का सही डिस्पोजल हो, इसकी व्यवस्था बनाएँ।

हरीतिमा संवर्द्धन हेतु लोगों को प्रेरित करें। न्यूनतम से आरंभ करें, पर देखें कि लगाए वृक्ष पनप रहे हैं कि नहीं।

प्लास्टिक कल्वर से संघर्ष करें। अपनी आदतें पहले ठीक करें।

सूक्ष्म पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रकृति को जड़ नहीं चेतन, अपनी माँ समान मानकर डीप इकोलॉजी के महत्त्व को स्वीकार करें।

(6) व्यसन मुक्ति/कुरीति उन्मूलन आँदोलन

व्यसन से बचाएँ, सृजन में लगाएँ, कुरीतियों में लगने वाला श्रम, समय, साधन श्रेष्ठ कार्यों में लगाएँ। जनशिक्षा हेतु आँदोलन छेड़ें।

व्यसन मुक्ति हेतु संकल्पशक्ति जगाएँ। देव दक्षिणा आँदोलन को गति दें।

विद्यालयों, विभिन्न संगठनों, संप्रदायों द्वारा इस आँदोलन को गति दिलाएँ।

व्यसन-कुरीति छोड़ने वालों को सम्मानित करें, उनके विषय में सबको बताएँ।

(7) नारी जागरण आँदोलन

नारी स्वयं में सक्षम-समर्थ बन अन्य नारियों को साथ ल चल सके, इस योग्य उसे खड़ा करें।

नारी का आत्मविश्वास जगाएँ, सुरक्षा बोध, स्वावलंबन, सुसंस्कारिता का ज्ञान कराएँ।

नारी को लोहे-सोने की जंजीरों से मुक्त कराएँ।

बेटा-बेटी, बेटी-बहू के भेद मिटें। नारी के प्रति नारी की संवेदना जागे।

क्षेत्रीय नारी संगठन खड़े हों। प्रशिक्षण क्रम भी चले। उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने हेतु स्वावलंबन तंत्र बने।


भयावह संकट की वेला में हम सबका दायित्व

अभी फरवरी अंक हेतु लिखे लेख ‘राष्ट्रव्यापी दुर्भिक्ष और हम’ की स्याही भी नहीं सूखी थी कि एक अति भयावह त्रासदी ने सारे भारत को गणतंत्र दिवस के दिन अपना ग्रास बना लिया। धरती के कंपन ने महाकाल की वह रौद्र लीला दिखाई है, जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। पूरे भारत, नेपाल, पाकिस्तान, ईरान तक अपना प्रभाव दिखाने वाले प्रायः 7.9 रिएक्टर स्केल पर आए इस भूकंप का केंद्र भुज-कच्छ (गुजरात) से 20 किलोमीटर उत्तर पूर्व में था। 26 जनवरी गणतंत्र दिवस को प्रातः 8.46 पर आए इस दैवी प्रकोप ने गुजरात में जो तबाही का ताँडव मचाया है, उसे देख लगता है कि सूखे से पहले से जूझ रही गुजरात की जनता अब उस त्रासदी को कैसे झेलेगी। इससे उबरने में वर्षों लगेंगे।

समृद्धि के केंद्र, औद्योगिक क्राँति की धुरी अहमदाबाद सहित सारे गुजरात ने यह कोप झेला है। भुज तो प्रायः पूरा नगर ही ध्वस्त हो गया है। ऐसा लगता है कि 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यहाँ आए भूकंप से मृत्यु देवता अघाए नहीं थे कि पुनः अपने काल के गराल में उनने हजारों को ले लिया। कच्छ के लोग अपनी जुझारू वृत्ति के लिए जाने जाते हैं। सारे भारत व विश्व में वे छाए हुए हैं एवं बड़े स्तर पर व्यापार उनके हाथ में है। किंतु अभी इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तो लगता है कि भूकंप का केंद्र होने के कारण सर्वाधिक जन-धन हानि कच्छ क्षेत्र को ही उठानी पड़ी है।

बापू की जन्मभूमि, सरदार पटेल की कर्मभूमि एवं बापा जलाराम की, अनेकों संतों की तपोभूमि गुजरात कुछ ही क्षणों में भूकंप की मार से इतना क्षतिग्रस्त हुआ है कि अभी यह अंदाज लगाने में ही बड़ा समय लगेगा कि नुकसान कितना हुआ है। भव्य गगनचुँबी भवन कुछ ही क्षणों में जमीन पर आकर बिस्मार हो गए। उनके मलबों में दबे-पिसे व्यक्ति जब तक निकल पाएँगे, मालूम नहीं कि वे जीवित हैं कि नहीं। यह पंक्तियाँ लिखे जाने तक मात्र गुजरात में ही जनहानि 20,000 की संख्या को पार कर रही थी। निश्चित ही यह संख्या बढ़ेगी। उनकी संख्या सर्वाधिक होगी, जिनके घर में एक या दो सदस्य रह गए, वे किसी तरह बच गए अथवा घायल होकर जो अब और भी विपन्न स्थिति में आ गए हैं। छत तो गई ही, सामान का भी नुकसान हुआ, अब औरों के आश्रय पर टिके हैं।

यह एक राष्ट्रीय त्रासदी है। पिछले पचास वर्षों में आए भूकंपों में यह सबसे अधिक मारक क्षमता वाला है। ऐसे में किसी को भी हाथ-पर-हाथ रखकर नहीं बैठना है। देश-विदेश से लगातार सहायता दौड़ी चली आ रही है, पर मूल आवश्यकता अभी उन स्वयंसेवकों की है, जो लोगों को सामयिक कष्ट से राहत दिला सकें। गिरे हुए-खंडहर हुए भवन तो फिर बन जाएँगे, पर ध्वस्त परिवार-आहत भावनाओं को पुनर्निर्मित करना सबसे कठिन कार्य है।

गायत्री परिवार सभी संकटों में एकजुट हो प्रयास करता रहा है। पहले भी लाटूर, उत्तरकाशी, चमोली में आए भूकंप तथा काँडला, एरेज्मा (उड़ीसा) की तूफानी विभीषिकाओं में इसके स्वयंसेवकों ने आगे बढ़-चढ़कर साहस दिखाया है एवं हर दृष्टि से सरकारी प्रयासों में सहयोगी की भूमिका निभाई है। अब इस संकट की घड़ी में भी सभी परिजनों से इस विषम परिस्थिति में एकजुट हो जूझने का आह्वान किया जा रहा है।

भूकंप आने के चौबीस घंटे के अंदर चार वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं की अगुआई में सहायता दल-चिकित्सकों, कंबलों, दवाओं, राशन आदि के साथ गुजरात रवाना कर दिए गए हैं। सारे परिजनों से कहा गया है कि वे राहत कार्य हेतु कैंप लगाएँ एवं केंद्रीय पर्यवेक्षक दलों का सहयोग करें। शासकीय सहायता अपने स्तर पर चलेगी। हमारे परिजन जो कि प्राणवान् हैं, गायत्री के तत्त्वदर्शन से जुड़े हैं, न्यूनतम दस लाख की संख्या में गुजरात में हैं एवं हमारे अपने प्रज्ञासंस्थान, शक्तिपीठ भी तीन सौ से अधिक हैं। सबसे बड़ी जरूरत जो अब पड़ेगी, वह है लाँगटर्म चिकित्सीय सहायता, आच्छादन-शेल्टर, मनोवैज्ञानिक परामर्श (काउंसिलिंग) तथा पुनर्वास की। यही वह समय है, जब सभी संवेदनशील परिजन चाहे वे गुजरात के हों, मध्यप्रदेश या महाराष्ट्र, राजस्थान के अथवा देश के किसी भी हिस्से के, बढ़-चढ़कर इस राहत कार्य में साथ दें, भागीदारी करें। पूरा यह माह परीक्षा से भरा हुआ है। दुःखी-पीड़ितों तक सहायता-सामग्री पहुँची कि नहीं, यह देखने का कार्य भी एक प्रामाणिक तंत्र के नाते गायत्री परिवार के स्वयंसेवकों को ही सँभालना है। अभी सभी परिजनों से राहत कार्यों में लगने एवं खुलकर तन-मन-धन से सहायता करने को कहा जा रहा है। जो चिरनिद्रा में सो गए, उनकी आत्मा को शाँति मिले एवं जो घायल हैं, परिजनों के विछोह से दुःखी हैं, दग्ध हैं, उन्हें संबल मिले, शक्ति मिले, यही वेदमाता से प्रार्थना है।


अपनों से अपनी बात- - युगचेतना अभ्युदय-अवतरण की हीरक जयंती के प्रत्यक्ष कार्यक्रम

अब संगठन-प्रशिक्षण का आधार इस तरह बनेगा

युगवंसत (29/1/2001) से युगचेतना के अवतरण की हीरक जयंती वर्ष का शुभारंभ हो गया। यह आगामी वसंत (17/2/2002) पंचमी तक चलेगा। यह वर्ष विशेष शक्ति-सौभाग्य के अनुदान लेकर आया है। पर यह मिलेंगे उन्हें ही, जो युगदेवता की कसौटी पर खरे सिद्ध हों। व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों ही स्तरों पर अब ऐसे संघबद्ध प्रयास किए जाने चाहिए कि हमारी रचनात्मक छवि सभी के समक्ष उभरकर आ सके। इन प्रयासों का आधार एक ही होगा। सशक्त-समर्थ-सुव्यवस्थित संगठन। इस एक वर्ष में संगठन का ढाँचा इतना मजबूत हो जाना चाहिए कि जन-जन को अशासकीय स्तर पर कार्य कर रहा यह विराट् आध्यात्मिक-पारमार्थिक संगठन गायत्री परिवार अलग से खड़ा दिखाई दे, जो राष्ट्र को समर्थ-सशक्त बनाने हेतु सदैव तैयार है।

संगठन का सशक्त आधार

जाग्रत् आत्माओं की जीवन-साधना एवं उस आधार पर विनिर्मित संगठन की धुरी पर ही अगले दिनों हमारे सारे क्रिया−कलाप चलेंगे। जैसा कि सभी जानते हैं, परमपूज्य गुरुदेव जीवनभर कहते रहे, लिखते रहे कि यह गायत्री परिवार ईश्वरीय योजना को प्रत्यक्ष जगत् में लागू करने के लिए दैवी संकल्प के साथ बनाया गया संगठन है। विभिन्न शाखाओं-मंडलों में बँटे परिवार को सक्रिय-संगठित समूह (स-3) बनाने तथा उनके संचालन हेतु समर्थ समयदानी-सहयोगी समूह (स-4) गठित करने की बात विगत डेढ़ वर्ष से सतत समझाई जाती रही है। इसमें स-4 वाला वर्ग वह है, जो प्राणवान् है, पुरोहित-प्रशिक्षक स्तर का है। इन समयदानियों के माध्यम से जन-जन को युग-साधना से जोड़ने के लिए योजनाबद्ध प्रयास करने की बात सतत कही जाती रही है। विगत सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ में सबने इसे गंभीरतापूर्वक समझा भी व अपनाने हेतु स्वयं को तत्पर भी किया है।

सात आँदोलन-सात विधाएँ

अब इस वर्ष के लिए घोषित सात आँदोलनों को गति देने की बात आती है। उन सभी को अब संगठित करना होगा, जो इस दिशा में रुचि और उत्साह रखते हैं, उस विधा से जुड़े हैं अथवा गायत्री परिवार के सात आँदोलनों में से किसी एक या अधिक प्रकल्पों से जुड़कर अपनी विभूति-प्रतिभा का योगदान समाज को देना चाहते हैं। सभी जानते हैं कि साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण, नारी-जागरण, व्यसन-मुक्ति एवं कुरीति-उन्मूलन आँदोलन इन सात खंडों में रचनात्मक क्रिया–कलापों को बाँटा गया है। यही हमारे शीघ्र आरंभ होने जा रहे देव-संस्कृति विश्वविद्यालय की विधाएँ भी हैं। विभूतियों के सुनियोजन की बात इन विधाओं के संदर्भ में ही विगत एक वर्ष से सतत की जा रही है। अब क्षेत्रीय स्तर पर इन सातों आँदोलनों से जुड़े परिजनों को संगठित करने की बात आती है, तभी वह प्रक्रिया वहाँ सुव्यवस्था से संचालित की जा सकेगी एवं सफलता उनके कदम चूमेगी।

आँदोलन समूह या ‘आस’

एक प्रक्रिया अपने परिजनों को तुरंत करनी होगी ‘आँदोलन समूहों’ का गठन। ये आँदोलन को गति देने के लिए हर क्षेत्र में आँदोलन विशेष के प्रति रुचि रखने वालों के समूह होंगे। वे गायत्री परिवार से जुड़े नैष्ठिक परिजन भी हो सकते हैं एवं किसी अन्य संगठन से जुड़े हुए हमारे प्रति शुभेच्छा लिए हुए उस आँदोलन के प्रति निष्ठावान् व्यक्ति भी। दोनों का समन्वित स्वरूप उस समूह का निर्माण करेगा। इनको दो स्तरों पर गठित किया जा सकेगा, पहला स्थानीय, दूसरा क्षेत्रीय। स्थानीय ‘आस’ (आँदोलन समूह का संक्षिप्त) वे होंगे, जहाँ स्वाभाविक रूप से जो आँदोलन गति पकड़ ले, उससे संबद्ध जिम्मेदार लोगों का वह समूह कार्य करने लगे। इनमें आँदोलन के लिए समय दे सकने वाले उत्साही, अनुशासित कार्यकर्त्ता होने चाहिए। ऐसे व्यक्ति भी हों, जो आँदोलन की तकनीकी जानकारी रखते हों, विशेष स्तर के हों तथा प्लानिंग क्रियान्वयन की विधा में सक्षम हों। इसमें उन्हें भी शामिल किया जा सकता है, जो समय तो नहीं दे सकते, न ही उनके पास तकनीकी क्षमता है, किंतु अपने साधन व प्रभाव से आँदोलन को गति दे सकते हैं। समाज में उनकी अच्छी स्थिति भी है एवं जनसेवा के इन कार्यों में वे आगे बढ़-चढ़कर योगदान देते रहते हैं। उनका पत्र, फोन या उपस्थिति भी कभी-कभी आँदोलन को गति देने में एक महती भूमिका निभाती है। ऐसे समर्थों को भी ‘आस’ का एक अंग माना जाना चाहिए।

अभी आँदोलन समूहों को एक सामयिक संगठित इकाई भर मानकर बनाए जाने को कहा जा रहा है। समय-समय पर जैसे-जैसे नए कार्यकर्त्ता जुड़ेंगे, इसका स्वरूप बदलता रहेगा। ये छोटी इकाइयाँ आधार बनेंगी क्षेत्रीय स्तर पर गति पकड़ने वाले आँदोलन समूहों की।

क्षेत्रीय मंडल या ‘क्षेम’

किसी क्षेत्र में, गाँवों का समुच्चय, ब्लॉक, नगर या जिले में जब अनेक स्थानों पर कोई एक ही आँदोलन गतिशील होने लगेगा, तो उन्हें व्यापक जनसंपर्क की, एक-दूसरे के अनुभवों से लाभ उठाने की आवश्यकता महसूस होने लगेगी। स्थान-स्थान पर जो ‘आस’ गठित होंगे, उनके सक्षम प्रतिनिधि समयानुसार क्षेत्रीय स्तर पर मिल-बैठकर आँदोलन के क्षेत्र को अधिक व्यापक बनाने व स्वरूप को अधिक प्रभावी करने हेतु परामर्श कर सकते हैं। एक विशेष आँदोलन के जहाँ क्षेत्रीय स्तर पर ‘आस’ के प्रतिनिधि मिल-जुलकर कार्य योजना बनाने लगें, तो उन्हें उस आँदोलन का क्षेत्रीय मंडल (क्षेम) कहा जाएगा।

भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है, योगक्षेमं वहाम्यहम्। श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए आवश्यक साधनों को जुटाना, उनका संकलन करना जहाँ योग है, वहाँ प्राप्त निधि का समुचित संरक्षण-सुनियोजन क्षेम कहा जाता है। परमपूज्य गुरुदेव ने योग का प्रवाह अनुकूल वातावरण पैदा करके बना दिया है। ऋषि तंत्र उज्ज्वल भविष्य लाने हेतु सही सशक्त प्रवाह बनाने का योग बिठा रहा है। अब इस सुयोग को जिम्मेदारीपूर्वक सुनियोजित कर देना क्षेम का कार्य है।

शक्तिपीठ-प्रज्ञा संस्थान समर्थ बनें

परमपूज्य गुरुदेव ने 1979 में जब शक्तिपीठों की योजना प्रस्तुत की थी, तो उनकी परिकल्पना थी कि वे आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित 4 मठों की तरह चौबीस केंद्रों का निर्माण करेंगे, जो साँस्कृतिक नवजागरण का कार्य करेंगे। पूज्यवर कहते थे कि देश में मंदिरों की कमी नहीं है। हम तो जन-जागृति के केंद्र बनाना चाहते हैं, जहाँ से सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन को दिशा देने वाले रचनात्मक कार्यक्रम चलें। ये आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार भी करेंगे एवं वेदमाता गायत्री को घर-घर पहुँचाएँगे।

समझा जाना चाहिए कि पूज्यवर का आशय कभी भी यह नहीं था कि गायत्री मंदिर ऐसे केंद्र बनें, जहाँ मात्र घंटी बजती हो, पूजा-अर्चा होती हो। वे सारे राष्ट्र के वातावरण को गायत्रीमय बनाना चाहते थे, आध्यात्मिक क्राँति लाना चाहते थे एवं उसी के लिए ऊर्जा संचार केंद्रों की स्थापना कर रहे थे। बाद में चौबीस से संख्या बढ़ाकर दो सौ चालीस तक जा पहुँची। आज छोटे-बड़े सभी देवालय-पीठ मिलाकर कुल संख्या प्रायः ढाई हजार तक जा पहुँची है। संख्या भले ही बढ़ गई हो, पर मूल उद्देश्य वह न रहा, जो कभी गुरुसत्ता ने सोचा था। सभी ऐसे हैं, यह बात तो नहीं, पर अधिकाँश ऐसे हैं, जो गायत्री माता की प्रतिमा वाले मंदिर बनाकर औपचारिकता पूरी करके संतुष्ट हैं अथवा जहाँ व्यावसायिक गतिविधियाँ चल रही हैं। अब इस हीरक जयंती वर्ष में सारे भारतव्यापी संगठन के साथ केंद्र ने संकल्प लिया है कि सारे शक्तिपीठों, प्रज्ञासंस्थानों का ढाँचा सुव्यवस्थित बनाया जाए। उन्हें सही अर्थों में ऊर्जाकेंद्र बनाया जाए। इसके लिए पीठों का, प्रज्ञा संस्थानों का नए सिरे से नामकरण करके वर्गीकरण करना जरूरी है।

पीठों का वर्गीकरण अब इस प्रकार से होगा

गायत्री मंदिर वे कहे जाएँगे जहाँ एक कोठरी में गायत्री माँ की प्रतिमा भर स्थापित कर दी गई है एवं किसी तरह पूजा-आरती की व्यवस्था वहाँ हो गई है। बस इसके अलावा वहाँ कुछ और नहीं हो रहा। गायत्री साधना केंद्र वे कहे जाएँगे, जहाँ मंदिर के साथ गायत्री उपासना सिखाने, संस्कार कराने तथा युगसाहित्य जन-जन को उपलब्ध कराने जैसी गतिविधियाँ नियमित रूप से चलती हैं। नवरात्रियों में कभी-कभी वहाँ साधनाएँ भी संपन्न होती हैं एवं वर्ष में कुछ दिन यज्ञ होता रहता है।

उक्त दोनों तंत्रों में भले ही बोर्ड प्रज्ञापीठ/शक्तिपीठ का लगा हो, लेकिन केंद्रीय संगठन तंत्र के अंतर्गत उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं दी जाएगी। हाँ, यदि वे हीरक जयंती वर्ष के इस संगठन के पुनर्गठन क्रम में अपने आपको अपग्रेड कर लें, अपना स्तर बढ़ा लें, तो उन्हें सर्वे करने गए केंद्रीय पर्यवेक्षकों को दिए प्रमाणों के आधार पर मान्यता मिल जाएगी।

तीसरा स्तर है शक्तिपीठ या प्रज्ञापीठ का। यह मान्यता उन चुने हुए संस्थानों को दी जाएगी, जो विभिन्न कसौटियों पर खरे उतरते हों, जो पूज्यवर ने बनाई हैं। ये इस प्रकार हैं- (अ) संस्थान या पीठ के लिए बनाया गया ट्रस्ट केंद्रीय नियम व्यवस्था के अनुरूप पंजीकृत हो। जमीन, ट्रस्ट, भवन आदि सभी कानूनी स्तर पर निर्विवाद हों।

(ब) ट्रस्टीगणों में पारस्परिक तालमेल हो, वे निर्धारित आचार-संहिता का पालन भी कर रहे हों तथा उस क्षेत्र में युगचेतना के विस्तार के लिए सक्रिय हों।

(स) शक्तिपीठ या प्रज्ञापीठ के साथ निकटस्थ शहर या जिले की संगठित इकाइयाँ स 3, स 4 पर्याप्त संख्या में जुड़ी हों एवं पारस्परिक विश्वास-सहयोग के साथ कार्य करने की स्थिति में हों।

(द) साधना सामूहिक स्तर पर तथा कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण के लिए इनके पास समुचित स्थान व संसाधन हों।

(इ) क्षेत्रीय मंडलों द्वारा चलाए जा रहे आँदोलनों के लिए व स्थान सुलभ करा सकें, कोई एक या अधिक आँदोलन को गति देने हेतु तैयार हों अथवा उनका मार्गदर्शन-सहयोग देने के लिए समर्थ समयदानियों की व्यवस्था सँभाल सकते हों।

शक्तिपीठों पर प्रशिक्षण सत्र

जैसा कि पिछले अंक में भी लिखा था, केंद्र की तरह ही क्षेत्रों में, शक्तिपीठों में जिन्हें उपर्युक्त मानदंडों पर खरा पाया जाएगा, साधना सत्र चलाए जाएँगे। साधना आँदोलन को गति देने के लिए ये सत्र प्रतिमाह चलेंगे, संचालन केंद्रीय तंत्र का होगा। इसके अतिरिक्त एक कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण सत्र भी चलाने हेतु उन्हें कहा जा रहा है। अभी जनवरी माह में वसंत पर्व तक 60 शक्तिपीठों पर एक-एक दिन के सत्र चलाकर एक प्रयोग किया गया, जो बड़ा सफल रहा। प्रथम दृष्टि में जो बड़े समर्थ-महत्त्वपूर्ण पीठ दिखे, वहीं पर ये आयोजन किए गए। अब इनकी संख्या अधिक होगी। इस वर्ष कम-से-कम 200 शक्तिपीठें इस योग्य हो जानी चाहिए कि दो-तीन माह के अंतराल पर एक साधना सत्र एवं एक कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण सत्र चला सकें। ये सत्र पाँच-पाँच दिन के होंगे। क्षेत्रीय स्तर पर विभूतियों के मंथन के क्रम में ढेरों नए व्यक्ति जुड़े हैं। ये सभी शाँतिकुँज तो आ नहीं सकते। दूसरे संख्या इतनी बड़ी है कि इस कार्य में बिना पीठों की भागीदारी हुए एक बड़ी संख्या को साधक बनाना, प्रशिक्षित समयदानी बनाना संभव नहीं है। इसीलिए क्षेत्रीय प्रशिक्षण का ढाँचा बनाया गया है।

किन-किन शक्तिपीठों पर यह सत्र चलें, यह निर्धारण वसंत पर लौटी केंद्रीय प्रतिनिधि टोलियों से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर हो चुका होगा एवं यह अंक आपके हाथ में पहुँचने सातों आँदोलनों को गति देने के लिए भी होगा एवं अपने क्षेत्र में संगठन को व्यवस्थित आधार देने का भी। इनकी भी तारीखें यथासमय निर्धारित हो परिजनों को उपलब्ध होंगी।

इस माह कम-से-कम सभी पीठें नवरात्रि साधना (25-3 से 2-4-01) हेतु सामूहिक आयोजन अवश्य कर लें। इससे भावी साधना सत्रों का आधार बन जाएगा।

केंद्र का प्रशिक्षण तंत्र अब ऐसा होगा

शाँतिकुँज में नौ दिवसीय साधना सत्र सतत चलते रहते हैं। वे तथा एक माह के युगशिल्पी सत्र यथावत् चलेंगे। मात्र ग्रीष्म ऋतु में 15 मई से 30 जून तक 5-5 दिन के तीर्थसेवन सत्र चलेंगे, जो कि हर वर्ष चलते हैं। इस अवधि में नौ दिवसीय सत्र नहीं चलेंगे। इनके अतिरिक्त अब इस वसंत से एक-एक माह के (पूर्व में पंद्रह दिन के) परिव्राजक सत्रों का क्रम भी आरंभ हो गया है। प्रतिमाह रचनात्मक संकाय के दो सत्र नियमित रूप से विगत 3 वर्षों से चल रहे हैं।

इनके अतिरिक्त पाँच दिन के विशेष साधना सत्र (1 से 17 मार्च 2001 तथा आश्विन नवरात्रि 2001 से चैत्र नवरात्रि 2002 तक) चलाए जाने की घोषणा विगत अंक में की गई थी। यह सत्र प्राण-प्रत्यावर्तन स्तर के होंगे। एक कक्ष में एक ही साधक रहेगा। पूर्ण एकाँत एवं मौन साधना के साथ निर्धारित जप, प्राणयोग, ध्यानयोग आदि की साधनाओं में रत रहना होगा। टेपरिकॉर्डर से ध्वनि प्रसारण यंत्र द्वारा प्रत्येक कमरे में गुरुदेव के विचार पहुँचाएँगे। पढ़ने हेतु भी साहित्य निर्धारित विचारों को लिए मिलेगा। मात्र यज्ञ एवं अखण्ड दीप-दर्शन के लिए 24 घंटे में एक बार बाहर निकलेंगे, वह भी पूर्णतः मौन की स्थिति में। 1 से 5 मार्च, 7 से 11 मार्च, 13 से 17 मार्च के तीन सत्र इस अंक के पहुँचने तक चल रहे होंगे। यह अभी एक औपचारिक शुरुआत भर है। बाद में फिर आश्विन नवरात्रि 2001 से यह श्रृंखला शीत, वसंत व उसके बाद चैत्र नवरात्रि 2002 तक चलेगी, जिसमें प्रायः तीस से अधिक सत्र संपन्न होंगे।

आँदोलन प्रधान सत्र दूसरे विशिष्ट सत्र होंगे, जो सप्त आँदोलनों की क्रियापद्धति के प्रशिक्षण हेतु चलेंगे। ये भी पाँच दिवसीय होंगे एवं आगामी अप्रैल माह से आरंभ होकर 15 मई तक तथा फिर जुलाई से अक्टूबर तक चलेंगे। विभिन्न विधाओं के लिए भिन्न-भिन्न सत्र होंगे। इनकी सूचना भी प्रज्ञा अभियान पाक्षिक के फरवरी अंकों से ली जा सकती है।

महिला जागरण सत्र

यह हीरक जयंती परमवंदनीया माताजी की भी है, अखण्ड दीपक की भी, जिसकी साक्षी में करोड़ों का जप संपन्न हो चुका है। परमवंदनीया माताजी ने ही 1972-73 में नारी जागृति आँदोलन की बागडोर अपने हाथ में ली थी, जिसकी परिणति देवकन्याओं की क्षेत्रीय परिब्रजा में हुई। अब इस ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला शक्ति जागरण वर्ष’ में, हीरक जयंती वर्ष में हमारे सात में से एक आँदोलन महिला जागरण को विशेष रूप से हाथ में लिया जा रहा है। उसके लिए केंद्र में शाँतिकुँज की ब्रह्मवादिनी बहनों का सुव्यवस्थित प्रशिक्षण आरंभ हो चुका है। क्षेत्र की अग्रणी भूमिका निभाने वाली बहनों के लिए ग्रीष्म के बाद प्रशिक्षण सत्र केंद्र में चलाए जाएँगे। महिला मंडल मला संगठन इस बीच स्वयं को व्यवस्थित कर लें, ताकि वे सभी आँदोलन अपने बलबूते चला सकें, दीप यज्ञ, संस्कार भी करा सकें। उनके क्षेत्रीय प्रशिक्षण हेतु भी केंद्रीय बहनों की टोलियाँ इस वर्ष निकलेगी, जिनकी घोषणा समयानुसार की जाती रहेगी।

संगठन-सुगठन-प्रशिक्षण ही इस हीरक जयंती वर्ष के मूल मंत्र हैं। हर परिजन से अपेक्षा रहेगी कि वे हर वर्ष की तरह आगे बढ़-चढ़कर युगचेतना के अवतरण की, अभ्युदय की इस हीरक जयंती को उसी उत्साह के साथ मनाएँगे, जैसे कि विगत दो विशिष्ट वर्षों को वे मनाते रहे हैं। इस वर्ष हमारा संगठन इन प्रशिक्षण सत्रों द्वारा कई गुना बड़ा व व्यवस्थित हो जाएगा। यही इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य का आधार बनेगा।


बंदिनी को मुक्त करो


बंदिनी को मुक्त करो (Kavita)

छोटे-से घरौंदे में ही बंद किया नारी को, अनुभव से हीन कर दिया बंदिनी बिचारी को।

क्वारे मन में उसने भी स्वप्न कुछ सँजोए थे, मधुर-मधुर बीज हृदय की धरती पर बोए थे,

कौशल्या-दशरथ जैसे सास-ससुर पाऊँगी, राम संग अपना जीवन धन्य मैं बनाऊँगी,

उसके पैरों में तुमने बेड़ियाँ लगाई हैं, सेविका बनाकर रक्खा है सुता दुलारी को।

आधी शिक्षा भी उसकी हो सकी न पूरी है, हर इच्छा हर अभिलाषा रह गई अधूरी है,

घर की देहरी तक उसके विचरण की सीमा है, केवल घूँघट ही उसके चिंतन की सीमा है,

सारी प्रतिभाएँ उसकी कुँठित कर डाली हैं, मन में अनजाने दे दी दीनता दुःखारी को।

भोर से शयन तक सबकी चाकरी बजाती है, स्नेह बिना जीवन-बाती सिर्फ टिमटिमाती है,

आशा का नहीं न मन में एक पल उलाजा है, मन में आशंका-भय का धुआँ घुटन वाला है,

भोजन-परिधान, दया के बोल कभी मिलते तो, भूले-भटके ही मिलते ज्यों किसी भिखारी को।

किसी ने न पूछा उससे आँख क्यों भिगोई है, जागती रही है सारी रात क्यों न सोई है,

कैसा भी पति हो उसका करना अभिनंदन है, नारी के लिए नियम हैं, सारा अनुशासन है,

हीन-भावना में डूबी, अपने से ऊबी-सी, जीवित शव जैसा जीवन मिला थकी-हारी को।

जिस घर में माँ आदर्शों-अनुभव से खाली है, वहाँ न सुख-चैन कहीं है, वहाँ न खुशहाली है,

अनियंत्रित पशुओं जैसा बच्चों का जीवन है, सबके हित वह घर केवल एक विषैला वन है,

केवल मुँह ढक लेने का मर्यादा नाम नहीं, ढकने से लाभ भला क्या जलती चिनगारी को।

-शचीन्द्र भटनागर

*समाप्त*