सत्य केवल एक है, अनेक नहीं। हाँ, उस तक पहुँचने के द्वार जरूर अनेक हो सकते हैं। लेकिन जो द्वार के आकर्षण में उलझकर उसी के मोह में पड़ जाता है, वह द्वार पर ही ठहर जाता है। ऐसे में सत्य की समीपता उसके लिए कभी भी सुलभ नहीं होती हैं।
हालाँकि सत्य हर कहीं है। जो कुछ भी है सभी कुछ सत्य है। उसकी अभिव्यक्तियाँ अनंत है। वह तो सौंदर्य की ही भाँति है। सौंदर्य अगणित रूपों में प्रकट होता है, पर इससे क्या वह भिन्न भिन्न हो जाता है। जो रात्रि में तारों में झलकता है, जो सूर्य में प्रकाश बन चमकता है, जो फूलों में सुगंध बनकर महकता है, जो हरे भरे पहाड़ों से झरनों के रूप में झरता है, जो हृदय में भाव बन उमगता है और जो आँखों में प्रेम बनकर प्रकट होता है, वह भला क्या अलग-अलग है? हाँ, इनके रूप अलग-अलग हो सकते हैं। पर इन सभी में जो एकता स्थापित है, जो सबका सार है, वह तो एक ही है।
ऐसे ही जो शब्द बाँधे जाते हैं, उन्हें तो सत्य से वंचित रहना ही पड़ेगा। अब ये शब्द संस्कृत के हों या फिर अरबी के, हिब्रु के हों या फिर लैटिन के, शब्द तो शब्द ही हैं। सत्य उनकी लिखावट में नहीं, उनमें निहित भावों में हैं। जो भावों में पैठते हैं और गहराई से पैठते हैं, वे सत्य पा ही लेते हैं कि अपने साररूप में हर कहीं एक ही सत्य विद्यमान है। जो इस सचाई को जानते हैं, वे राह के अवरोधों को भी सीढ़ियां बना लेते हैं और जो नहीं जानते उनके लिए सीढ़ियाँ भी अवरोध बन जाती हैं।
विज्ञान हमें जीवन की सुविधाएँ देने वाला अक्षय कोष होने के साथ ही सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख कारक भी है। सामाजिक परिवर्तन में इसकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। विज्ञान मानव समाज के कार्यभार की सचेत अभिव्यक्ति है। इससे सामाजिक परिवेश में अपनी आवश्यकताओं को समझने, उन्हें सुनियोजित व संतुष्ट करने की सामर्थ्य भी मिलती है। विज्ञान और समाज का अंतर्संबंध गहरा है। संबंधों की यह गाथा मानव जाति के परिवर्तन से जुड़ी है। इतिहासकारों के अनुसार मानव जाति अभी तक केवल तीन बड़े परिवर्तनों से गुजरी है। पहला परिवर्तन था, समाज की स्थापना एवं दूसरा था सभ्यता का उदय। ये दोनों ही परिवर्तन इतिहास लिखे जाने से भी बहुत पहले संपन्न हो चुके थे। तीसरे परिवर्तन के द्वारा समाज में वैज्ञानिक बदलाव आया।
समाज की स्थापना को पहली क्राँति कहना अधिक उपयुक्त है। इसके द्वारा मनुष्य ने अपनी पहचान बनाई। उसने पीढ़ी दर पीढ़ी अपने अनुभवों का हस्ताँतरण कर विकास का नया आयाम खोला। दूसरी क्राँति थी सभ्यता की खोज। यह क्राँति कृषि एवं प्रौद्योगिकी पर आधारित थी। अनेक तकनीकों का आविष्कार इसी दौरान प्रारंभ हुआ। इससे शहर एवं व्यापार के सामाजिक रूपों की नींच पड़ी। इन दोनों क्रांतियों से मनुष्य में बौद्धिक कुशलता बढ़ी एवं साहस का नया संचार हुआ। मनुष्य ने स्वनिर्भर होना सीखा। कालक्रम के अनुसार देखें, तो यह सब छठी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक संपन्न हो चुका था। तब तक इसके दो ही केंद्र थे, भारत और मेसोपोटामिया।
इसके पश्चात नवजागरण काल तक सभ्यता का विकास अति मंथर गति से संपन्न हुआ। यह मान्यता पाश्चात्य विद्वानों की है। पंद्रहवीं सदी के मध्य में एक नूतन क्राँति का सूत्रपात हो रहा था। इसमें आधुनिक विज्ञान की संभावनाएँ जन्म ले रही थीं। हालाँकि इन दिनों पूँजीवाद का उदय भी हो रहा था। अठारहवीं सदी तक इसकी प्रक्रिया बड़ी धीमी रही। कृषि और प्रौद्योगिकी के रूप में विज्ञान का भविष्य बड़ा रोमाँचक लग रहा था। परंतु तब विज्ञान का भविष्य बड़ा रोमाँचक लग रहा था। परंतु तब विज्ञान व पूँजीवाद को पूरक माना जात था। इसके प्रति दृष्टिकोण का बदलाव तो वर्तमान समय की देन है। चंद हाथों का खिलौना बनकर रहना शायद विज्ञान को पसंद नहीं आया। वैज्ञानिक मानसिकता में इस बीच काफी परिवर्तन हुए है। तभी आज यह समाज में अपनी उपयोगिता सिद्ध करने में तत्पर है। समाज में विज्ञान का पदार्पण सर्वप्रथम धार्मिक अंधविश्वासों को तोड़ने के रूप में हुआ। जिसके अंतर्गत इसने मानव को तार्किक एवं प्रयोगधर्मी सोच दी है।
यही नहीं, विज्ञान ने सामाजिक जीवन को भी एकजुट करने का प्रयास किया। सामाजिक भूमिका के रूप में विज्ञान के कई और भी महत्वपूर्ण पहलू है। विज्ञान सुविधाएँ जुटाकर भौतिक विश्व की, मनुष्य की निर्भरता को काफी बढ़ा देता है या बढ़ाने का प्रयास करता है। ऐसी स्थिति में सामाजिक जीवन विज्ञान की बैसाखियों पर टिक जाता है। मनुष्य के लिए यह स्थिति किंकर्तव्यविमूढ़ता की है। ऐसे में एक उलझन को सुलझाने का प्रयास कई नई उलझनों को जन्म देता है। विज्ञान का यह पक्ष समाज के लिए सुविधाजनक होने के बावजूद बहुत अच्छा नहीं है।
हालाँकि वर्तमान युग विज्ञान का युग है। इसकी उपलब्धियों तले मानव समाज दब सा गया है। परंतु प्रश्न है विज्ञान का संचालन एवं नियमन करने का। आज यह आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों के जटिल ढाँचे का एक अंग बन गया है। अगर इसका दुरुपयोग हुआ, तो परिणाम फिर से उसी भूली हुई विभीषिका के समान हो सकता है। इससे बचने का उपाय एक ही है, विज्ञान का सृजनात्मक तत्वों के द्वारा नियमन। विज्ञान को फिर से उसे अपने मूलभूत उद्देश्य के प्रति सचेत व जागरुक करना पड़ेगा। तभी यह सामाजिक परिवर्तन में प्रमुख शक्ति बन सकता है। यह सच है कि विज्ञान के पथ अथाह शक्तियाँ हैं। यही इसे देव या दानव में परिवर्ती कर सकती हैं। हाँलाकि विज्ञान अपने सामाजिक महत्व से अभी काफी कुछ अपरिचित है एवं विकास से यथार्थ से भी अनभिज्ञ है। परंतु इसे इस कार्य में नियोजित किया जा सकता है। इसे जागरुक बनाने के लिए वर्तमान और भविष्य की समस्याओं के प्रकाश में देखा जाना चाहिए।
इच्छाशक्ति दृढ़ हो तो विज्ञान के माध्यम से समाज अपनी भौतिक समस्याओं का निदान ढूंढ़ सकता है। विज्ञान इन समस्याओं के मूल तक पहुँच सकता है और यह भी पता लगा सकता है कि समस्या वास्तविक है या काल्पनिक। जैसे -जैसे विज्ञान भौतिक सभ्यता की सचेतन निर्देशक शक्ति बनता जाता है वैसे -वैसे इसे संस्कृति के अन्य क्षेत्रों में भी प्रवेश की अनुमति मिल जाती है।
आज उच्च विकसित विज्ञान और संस्कृति दो भिन्न -भिन्न धाराओं में बह रहे हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि विज्ञान अभी सचेतन शक्ति नहीं बन पाया है। विद्वानों के अनुसार कोई भी समाज अपने समय के प्रभुत्व एवं प्रभावशाली विचारों से अनिश्चितकाल तक दूर नहीं रह सकता। अगर यह दूरी बनी रहेगी तो समाज की महत्ता खो जाएगी। यद्यपि विज्ञान अपने वर्तमान रूप में समाज व संस्कृति के साथ उचित सामंजस्य नहीं रख पा रहा। इसके लिए विज्ञान संरचना में परिवर्तन लाने होंगे। क्योंकि आज का विज्ञान अपना स्वयं का विज्ञान ही खो चुका है। अब तक विज्ञान का चरित्र मौलिक आवश्यकताओं एवं जरूरतों से निर्धारित होता रहा है। इसकी प्रकृति भी मुख्यतः आलोचनात्मक ही रही है। इसको तभी सफल माना जा सकता है, जब वह व्यवहार में भी खरा उतरे।
विज्ञान को अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु काफी मंजिलें तय करनी पड़ेगी। आज जो अन्वेषण एवं अनुसंधान हो रहे हैं, उन्हें देखकर लगता है कही कुछ खो गया है, कोई कड़ी लुप्त हो गई है। आज खोजों को प्रायः इंसानी प्रतिभा का चरम मानकर ही संतोष कर लिया जाता है। विज्ञान की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह मानवीय जीवन की ऐसी परिघटनाओं से उचित रूप में निबट पाने में असमर्थ है, जिनमें प्रकृति उसे चुनौती दे रही हो।
समाज और संस्कृति में स्थान पाने के लिए विज्ञान को अपनी यह कमी दूर करनी होगी। इसके निराकरण के बाद ही विज्ञान की शुष्क प्रकृति साँस्कृतिक संवेदना एवं भावना से एकाकार हो सकती है। इस तरह यदि विज्ञान का रूपांतरण संभव हो सका, तो समाज के अन्य क्षेत्रों के साथ भी इसका संपर्क बढ़ सकता है। इन बदले परिवेश में इतिहास, परंपरा एवं साहित्य आदि दृश्य विज्ञान से और भी निकट आते जाएँगे। विज्ञान का यह रूपांतरण एक नए अध्याय की शुरुआत करेगा, जिससे समाज की तस्वीर बदल सकती है।
विज्ञान के रूपांतरण के इस विचार से पूर्व की स्थिति देखें, तो स्वयं विज्ञान भी कई स्तरों एवं अवस्थाओं से होकर गुजरा है। विज्ञान की बाल्यावस्था रहस्यमयी ब्रह्मांड की जानकारी से आरंभ हुई। अब तो यह प्रौढ़ावस्था में पहुँच गया है और अज्ञेय संभावनाओं को खोलने लगा है। इसी अवस्था में इसकी जिज्ञासा बदली है। अब यह अपने सिद्धाँत और व्यवहार दोनों दृष्टि से मानव समाज की समस्याओं को सुलझाने में रुझान प्रकट कर रहा है।
इसके साथ ही विज्ञान ने तार्किकता के अनजान क्षेत्र में प्रवेश किया। याँत्रिकी, भौतिकी और रसायन का उद्भव इसी की परिणति है। पौर्वात्य मनीषा कहती है तर्क से सृजन संभव नहीं है। अतः जीवविज्ञान में तार्किकता का यह मिथक टूटा। विज्ञान ने विकास के कुछ और चरण बढ़ाए। उद्विकास सिद्धाँत में इसे नवीनता और इतिहास की मान्यता मिली। इतिहासविदों के मतानुसार इतिहास में सदैव नवीनता जुड़ी रहती है। अतएव इतिहास विज्ञान कभी नहीं बन सकता। चूँकि नवीनता विज्ञान की धुरी है इसलिए इतिहास और विज्ञान के सम्बन्ध की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
वैज्ञानिक परिदृश्य में एक और क्राँति तब हुई जब मार्क्सवादी विचारधारा तथा वैज्ञानिक सोच की दो विरोधी शक्तियाँ पास आने लगी। कार्लमार्क्स के विचारों के जन्म के साथ ही तार्किक अध्ययन का अध्याय पश्चिम में प्रारंभ के साथ ही तार्किक अध्ययन का अध्याय पश्चिम में प्रारंभ हुआ। इसी वजह से मानवीय विकास की भविष्यवाणी की जा सकी। परंतु वैज्ञानिक भविष्यवाणी तभी संभव है जब सारे कारक संपूर्ण रूप से ज्ञात हों। इस अंतर के बावजूद भी विज्ञान की सीमाओं के अंदर विकास के आयाम खुलें। चूँकि दोनों का उद्देश्य विकास है, इसलिए दोनों विचारधाराओं ने समाज की समस्याओं का स्पर्श किया।
विज्ञान मार्क्सवाद के कई कल्पित विचारों को हटाने में भी समर्थ हुआ। विज्ञान ने मार्क्सवाद को आर्थिक और सामाजिक विकास के निर्णायक महत्व रखने वाले अंग के रूप में दर्शाया। एक ओर जहाँ विज्ञान को मार्क्सवाद के अधिभूतवादी तत्वों को अलग किया है वही मार्क्सवाद ने विज्ञान को एक नई वैज्ञानिक सोच हेतु प्रेरित किया। मार्क्सवाद की व्यावहारिक उपलब्धियों के माध्यम से ही वैज्ञानिक चेतना ने मानव कल्याण की दिशा पाई।
अपने सार्थक स्वरूप में विज्ञान मानव समाज की एक जीवंत अभिव्यक्ति भी हैं, क्योंकि इससे विज्ञान प्रकृति के कई रहस्य खुले हैं। इसने प्रकृति के साथ मानव के सम्बन्धों की भी यथासंभव व्याख्या की है। भले ही व्याख्या की ये विधियाँ अपूर्ण हों, परंतु भविष्य के लिए एक संभावना तो बनती ही है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि विज्ञान को जानने के लिए मनुष्य को अपने व्यक्तित्व और उपलब्धि को खोना नहीं पड़ता है। यही नहीं, वैज्ञानिकता समाज व मानव को उद्देश्यपूर्ण ढंग से सचेत व जागरुक होकर जीना सिखाती है।
22 21वीं सदी के नवयुग में विज्ञान समाज के भावी परिवर्तन का एक प्रमुख कारक बन सकता है। परंतु इसके सुधार की स्थायी प्रक्रिया जीवन के दायरे में आनी चाहिए। सामाजिक जीवन में यह उपयोगी एवं लाभदायी हो, ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए इससे विज्ञान का महत्व एवं दायित्व बढ़ जाएगा और विज्ञान स्वयं को मानवीय और सामाजिक समस्याओं के समाधान के आस-पास केंद्रित करेगा। यह एक चुनौती है। इस चुनौती में उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ भी छुपी हुई है। यह तभी संभव हो सकता है जब विज्ञान का नियमन एवं नियंत्रण विवेकशील प्रज्ञावानों के हाथों में आए। इसी से अध्यात्मवादी भौतिकवाद का पथ प्रशस्त होगा।
परिशोधन का अर्थ है, मन की पवित्रता तथा अंतःकरण को दुर्भावनाओं से रहित करना। इसी लक्ष्य के लिए विविध साधनात्मक स्थूल उपचार किए जाते हैं। भीतरी पवित्रता का उद्देश्य यदि पूरा न हुआ तो बाह्य कर्मकांडों का कुछ विशेष लाभ नहीं मिल पाता।
मणियार ईश्वरभक्त था, किंतु उसका वैयक्तिक जीवन कुविचार और बुरे आचरणों में ग्रस्त होने कारण अशाँत था। उसकी धर्मपत्नी अर्बुद ने कहा, “स्वामी दुख और अशाँति का कारण अस्वच्छ मन है। आप ज्ञान के प्रकाश से पहले अंतरतम को धो लें, तभी शाँति मिलेगी।” मणियार ने कहा, “नहीं! हम लोग तीर्थ स्नान करने चलेंगे। तीर्थ स्नान से मन पवित्र हो जाता है।”
अर्बुद स्त्री थी, झुकना पड़ा। तीर्थ यात्रा पर चलने से पूर्व उसने एक पोटली में कुछ आलू बाँध लिए। जहाँ-जहाँ मणियार ने स्नान किया, उसने इन आलुओं को भी स्नान कराया। घर लौटते-लौटते आलू सड़ गए। अर्बुद ने उस दिन भोजन की थाली में वह आलू भी रख दिए, उनकी दुर्गंध कहाँ से आ रही है?” अर्बुद ने हँसकर कहा, “ये आलू तो तीर्थ स्नान करके आए हैं,’ फिर भी इनमें दुर्गंध है क्या?” मणियार ने वस्तुस्थिति को समझा और आत्मपरिष्कार की साधना में लग गया।
अकारण ही रुष्ट होकर महाराज प्रसिचेत ने अपनी पत्नी का परित्याग कर दिया। उनके इस अहंकारपूर्ण कृत्य से दुखी होकर राजपुरोहित ने उनका साथ छोड़ दिया। धीरे-धीरे बात प्रज्ञा के कानों में पहुँची। लोग स्पष्ट कहने लगे, जो व्यक्ति अपने स्वजन-सम्बन्धी की रक्षा नहीं कर सकता, वह प्रज्ञा जी रक्षा क्या करेगा। लोग राजाज्ञाओं का उल्लंघन करने लगे। इस स्थिति में पड़ोसी राजा ने प्रसिचेत पर आक्रमण कर दिया।
प्रसिचेत सेना लेकर मुकाबले के लिए चल पड़े। मार्ग में महर्षि अंगिरा कर आश्रम पड़ता था। वे महर्षि से मिलने को रुके, पहले तो महर्षि ने शासकोचित स्वागत की तैयारी की, पर तभी उन्हें पता चला कि महाराज ने अपनी पत्नी का परित्याग कर दिया है, तो उन्होंने स्वागत की सारी तैयारियाँ स्थगित कर दी और उनसे एक साधारण नागरिक की तरह मिले।
राजा ने इसका कारण पूछा, तो महर्षि ने कहा, राजन पत्नी का परित्याग करना अधर्म है, और धर्म से पतित कोई भी क्यों न हो, उसकी मान मर्यादा वैसे ही नष्ट हो जाती है जैसे आपकी। राजा ने भूल समझी और पत्नी को फिर बुला लिया, उससे उनकी शासन व्यवस्था भी संभल गई।
प्राचीन भारत देश मानवता के आदर्श गुणों से मूलतः परिपूर्ण रहा है। दिव्य गुणों पर आधारित होने के कारण यह महान आदर्शों का स्रोत रहा है अपने साँस्कृतिक आदर्शों के बल प इसने चिरकाल तक विश्वमानव के अंतस्तल में शासन किया है। इसने तलवारों की टनकारों से, युद्धोन्माद के आतंक से अपनी विस्तार नहीं किया है। वरन् प्रबल एवं प्रखर विचारों द्वा इसने चक्रवर्ती का गौरव पाया एवं विश्व का हृदय जीता। समस्त संसार को शासन-सूत्र संचालन का बोध कराने के कारण ही इसे चक्रवर्ती कहा गया। इसी कारण से जगद्गुरु का श्रद्धासिक्त सम्मान भी मिला।
राष्ट्र के इन साँस्कृतिक आदर्शों का उद्बोध युगद्रष्टा विश्व विश्रुत स्वामी विवेकानंद के आग्नेय वाणी द्वारा होता है, हमारा राष्ट्रीय आदर्श लुटेरा नहीं बनाता, यह बलवानों का दुर्बलों की छाती पर मूँग दलने की शिक्षा नहीं देता ओर न हमें बलवान बनाकर दुर्बलों का खून चूसने की शक्ति प्रदान करता है। यह ऐसे अभियानों के लिए प्रोत्साहित नहीं करता, जिसके पैरों के नीचे धरती काँपती है और जो संसार में रक्तपात, लूटमार और इतर जातियों का सर्वनाश करने में ही अपना गौरव मानती हैं।
संसार इस राष्ट्र का अत्यंत ऋणी है। सारा संसार हमारे सहिष्णु राष्ट्र का जितना ऋणी है, उतना और किसी देश का नहीं। स्वामी जी कहते हैं यह भी ठीक है कि किसी अन्य राष्ट्र की गतिशील जीवन तरंगों ने भी महान शक्तिशाली सत्य के बीजों को चारों ओर बिखेरा है परंतु यह हुआ है रण भेरी के निर्दोष तथा रणसज्जा के सज्जित सेना-समूह की सहायता से। बिना रक्तप्रवाह में सिक्त हुए, बिना लाखों स्त्री पुरुषों के खून की नदी में स्नान किए, कोई भी नया भाव आगे नहीं बढ़ा। प्रत्येक ओजस्वी भाव प्रचार के साथ ही असंख्य लोगों का हाहाकार, अनाथों और असहायों का करुण क्रंदन और विधवाओं का अजस्र अश्रुपात होते ही देखा गया है। प्रधानतः इसी उपाय द्वारा अन्यान्य देशों ने संसार को शिक्षा दी है। परंतु इस उपाय का अवलंबन लिए बिना ही अपना देश हजारों वर्षों से शांतिपूर्वक रहा है। संसार के सभी देशों में केवल एक अपने ही चक्रवर्ती देश ने लड़ाई झगड़ा करके किसी अन्य देश को पराजित नहीं किया है इसने हृदय परिवर्तन तलवार की नोंक पर नहीं वरन् प्रेम और त्याग के बल पर किया है।
स्वामी जी कहते हैं कि कितने ही वैभव शाली देश उठे और गिरे। विजयोल्लास और भावावेशपूर्ण प्रभुत्व का कुल काल का कलुषित राष्ट्रीय जीवन बिताकर सागर की तरंग की तरह उठकर फिर मिट गए। परंतु अपना राष्ट्र और उसकी राष्ट्रीयता जीवंत और जाग्रत है। जब कभी फारसी, यूनान, रोम, अरब या इंग्लैंड वाले अपनी सेनाओं को लेकर दिग्विजय के लिए निकले और जिन्होंने विभिन्न राष्ट्रों व एक सूत्र में गूँथा है, तब भी अपने यहाँ के साँस्कृतिक आदर्श एवं दार्शनिक चिंतन नवनिर्मित भागों द्वारा संसार की जातिय की धमनियों में होकर प्रवाहित होते रहे हैं। राजनीतिक श्रेष्ठता या सामरिक शक्ति प्रदान करना किसी काल में इन राष्ट्र का जीवनोद्देश्य न कभी रहा है और न कभी रहेगा इसका दूसरा ही जीवनोद्देश्य रहा है। वह यह कि अपना समग्र शक्ति को मानो किसी डाइनेमो में संगृहीत, संरक्षित और नियोजित किया गया हो, और यह संचित शक्ति सारा पृथ्वी के जन जीवन में जीवन जलप्लावन करती रही है।
समस्त मानवीय प्रगति में एवं राष्ट्रोत्थान में शांतिप्रिय इस देश को कुछ अपना योगदान भी है। स्वामी जी इस ज्योतिर्मय आलोक के रूप में साँस्कृतिक दान मानते हैं। उनके अनुसार हमारे इस देश में संस्कृति का जो स्रोत बहते हैं, उसकी बाढ़ समस्त जगत् को आप्लावित कर राजनीतिक उच्चाभिलाषाओं एवं नवीन सामाजिक संगठनों के प्रयासों में प्रायः समाप्तप्रायः, अर्द्धमृत तथा पतनोन्मुखी पाश्चात्य और दूसरे समाजों में नव जीवन का संचार करती रहती है विभिन्न प्रकार के मत-मताँतर एवं साँस्कृतिक विचारों के विभिन्न सुरों से अपने दश्ो का गगन गूंजता रहा है।
स्वामी जी के अनुसार इस पृथ्वी का क्षुद्र क्षितिज जो केवल कई एक हाथ ही विस्तृत है, हमारी दृष्टि को सीमित नहीं कर सकता। हमारा साँस्कृतिक आदर्श तो दूर तक बहुत दूर तक फैला हुआ है। यह इंद्रियों की सीमा से भी आगे तक फैला है। यह देश और काल के भी परे है। वह दूर और दूर विस्तृत होता हुआ उस सीमातीत स्थिति में पहुँचता है, जहाँ इस भौतिक जगत् का कुछ भी शेष नहीं रहता और सारा विश्व ब्रह्मांड ही आत्मा के दिगंतव्यापी महामहिम अनंत सागर की बूँद के समान दिखाई देता है। यह राष्ट्रीय आदर्श प्रकाँड मेधा तथा बुद्धि वाले मनीषियों से उद्भासित है, जो इस कथाकथित अनंत जगत् के साम्राज्य को भी गढ़हिया मात्र समझते हैं और वे क्रमशः अनंत जगत् को भी छोड़कर और दूर अति दूर चले जाते हैं। भौतिक प्रकृति को इस प्रकार अतिक्रमण करने की चेष्टा, किसी प्रकार प्रकृति से मुँह का घूँघट हटाकर एक बार उसे देश काल से परे तत्व के दर्शन का यत्न करना, यहाँ का स्वाभाविक गुण है। यही हमारा साँस्कृतिक आदर्श है।
स्वामी जी की मान्यता है कि जिस राष्ट्र का मूल मंत्र राजनीति प्रधान होता है उसका अस्तित्व संदेहास्पद होता है, परंतु यहाँ का प्रधान जीवनोद्देश्य साँस्कृतिक आदर्श है। केवल इसी से उन्नति, प्रगति एवं कास की आशा की जा सकती है। जिसका मूल मंत्र भाव हृदय में जागता है, वही उसका आधार है, अन्यथा इस राष्ट्र का मेरुदंड ही टूट जाएगा। जिस भित्ति के ऊपर यह विशाल भवन खड़ा है, वही नष्ट हो जाएगा। यहाँ के महापुरुष अपने को प्राचीन राजाओं अथवा पुरातन दुर्ग निवासी, पथिकों का सर्वस्व लूट लेने वाले डाकू वैरनों के वंशधर न बताकर अरण्यवासी अर्द्धनग्न तपस्वियों की संतान कहने में ही अधिक गौरव समझते हैं। इस राष्ट्र में बड़े-बड़े राजा अपने को किसी प्राचीन ऋषि की संतान प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं। यही साँस्कृतिक आदर्श की आधारशिला है।
यहाँ राजनीति सभी तरह की बौद्धिक कुटिलता सदा ही गौण समझी जाती हैं। चिर प्राचीनकाल से ही हमारे यशस्वी पूर्वजों ने अपने आदर्शों के पथ को ग्रहण कर लिया और संसार की समस्त भौतिकता को चुनौती दे दी। उन्होंने बताया कि हमारी समस्याओं को हल करने का रास्ता है वैराग्य, न्याय, निर्भीकता तथा प्रेम। यही तत्व अपनी संस्कृति के हृदय का मर्मस्थल है। यही अपनी संस्कृति की रीढ़ या नींव है, जिसके ऊपर अपन साँस्कृतिक आदर्श खड़ा है। स्वामी विवेकानंद का उद्घोष है कि संस्कृति हमारे जीवन का मुख्य केंद्र है और वही इस जीवनरूपी संगीत का प्रधान स्वर है। यदि कोई समाज अपनी स्वाभाविक जीवन शक्ति को दूर फेंकने का प्रयास करे, तो सारी सफलताओं के बावजूद वह समाज मृत हो जाएगा। यही कारण है कि अपने देश में राजनीति, समाज नीति अथवा अन्य किसी दूसरी नीति को अपनी जीवन शक्ति का केंद्र कभी नहीं बनाया।
स्वामी जी के अनुसार जब कभी भी संसार को इसकी आवश्यकता महसूस हुई, उस समय इस निरंतर बहने वाले आध्यात्मिक ज्ञान स्रोत ने संसार को प्लावित कर दिया है। राजनीति सम्बन्धी विद्या का विस्तार रणभेरियों और सुसज्जित सेनाओं के बल पर किया जा सकता है। लौकिक एवं समाज सम्बन्धी विद्या का विस्तार आग और तलवारों के बल पर हो सकता है, परंतु आध्यात्मिक विद्या का विस्तार तो शांति द्वारा संभव है। यही एक दान है, जो भारतीय समाज ने समस्त संसार को बारंबार दिया है। भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान की बाढ़ ने उमड़कर सारी दुनिया को हमेशा ही प्लावित किया है।
अपने साँस्कृतिक आदर्श का दान है, साँस्कृतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक ज्ञान। इसके प्रसार के लिए यह आवश्यक नहीं कि सेना उसके आगे मार्ग निष्कंटक करती हुई चले। साँस्कृतिक और आध्यात्मिक तत्व को शोणित प्रवाह पर से ढोने की आवश्यकता नहीं। ये साँस्कृतिक तत्व खून से भरे जरूरी आदमियों के ऊपर से सदर्प विचरण नहीं करते। ये शाँति और प्रेम के पंखों से उड़कर शाँतिपूर्वक आया करते हैं और सदा हुआ भी यही। जिस प्रकार चक्षु और कर्ण गोचर न होता हुआ भी मृदु ओस बिंदु गुलाब की कलियों को विकसित कर देता है, वैसा ही इस ज्ञान के विस्तार से होता है।
स्वामी जी के उक्ति स्वाभाविक है कि हमने कभी दूसरी जाति पर विजय प्राप्त नहीं की। यही हमारा महान गौरव है। अपने देश ने कभी खून की नदियाँ नहीं बहाई। उसने सदा आशीर्वाद और शाँति के शब्द कहे, सबको उसने प्रेम और सहानुभूति की कथा सुनाई। यहाँ राष्ट्रीय विस्तार विचारों के बल पर हुआ है। इसका सबसे बड़ा लक्षण है उसका शाँत स्वभाव और नीरवता। जो प्रभूत शक्ति उसके पीछे है, उसका प्रकाश बलपूर्वक जादू सा असर करता है शाँत, अज्ञेय किंतु महाशक्ति के अदम्ब बल से, तभी उसने सारे जगत् की दिशा राशि में क्राँति मचा दी हैं एक नया ही साम्राज्य एवं युग खड़ा कर दिया है। यही राष्ट्र का साँस्कृतिक आदर्श है, जिसने इसको विश्व पर विजयी एवं चक्रवर्ती बनाया और यही नवयुग का आधार भी है।
मनुष्य की सचाई का प्रमाण यह है कि उसने आदर्शों के लिए कितनी कठिनाइयों को झेला और कितना त्याग किया।
भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक अमर बलिदानी हुए हैं, जो इतिहास के पृष्ठों पर आने से रह गए। देशभक्ति की भावना से किया गया बलिदान गौरव की और इतिहास पुरुषों की ध्येय साधना में उस निष्काम साधक की कहानी भी प्रकाश में आ पाई। घटना महाराणा प्रताप के जीवनकाल की है। जब वह मुगल सेनाओं से अपने देश की रक्षार्थ संघर्ष करते हुए स्वातंत्र्य की यज्ञवेदी पर अपने सर्वस्व का होम कर जंगलों और पहाड़ियों में छिपकर कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे थे और भविष्य के अपने ध्येय की पूर्ति के प्रति चिंतित थे।
बड़े जंगल के साथ सटा हुआ यह एक पहाड़ी इलाका था। उसमें इस गाँव में बसी लगभग 3-4 झोंपड़ियाँ थीं। सायंकाल के समय उस दिन आकाश में घनघोर बादल छाए हुए थे। जिससे संपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र अंधकार के आँचल में सिमटा हुआ था। एक झोंपड़ी में एक बालक माँ को रोटी बनाते देखकर मुँह में बार-बार जीभ चला रहा था। यही कोई 12 वर्ष के आस-पास उसकी आयु होगी। भूख की व्याकुलता से उनका दिल कह रहा था कि बन रही रोटी तुरंत ही उसे प्राप्त हो, चाहे वह कच्ची ही क्यों न हो? पितृविहीन बालक को तीन दिन के पश्चात रोटी नसीब हो रही थी, ऐसे में उसकी व्याकुलता की सीमा क्या होगी, इसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है? अचानक उसके दिमाग में एक विचार कौंधा और उसने भोलेपन से माँ ने पूछा, “माँ! महाराणा प्रताप कई दिनों से ऊपर पहाड़ी पर छिपे हुए हैं। चारों तरफ से उन्हें शत्रुओं ने घेरा हुआ है। वह भोजन कैसे करते होंगे?”
माता का हृदय उस बालक के उद्गार सुनकर प्रसन्न हुआ, परंतु अगले ही क्षण वह चिंतित होकर बोली, “बेटा! न जाने कैसी हालत होगी उनकी? कई दिनों से उन्हें भोजन तो क्या अन्न का एक दाना भी नसीब नहीं हुआ होगा?”
“माँ!उनके छोटे बच्चे भी हैं न?”
“ हाँ।”
“वे भी तो भूखे होंगे। मेरी तरह।”
“हाँ ..... वे भी भूखे होंगे।
बालक किसी गहन सोच में डूब गया। पलभर पहले जो भूख की व्याकुलता उसे सताए हुए थी, वह विलुप्त हो गई और उसका चेहरा एक प्रदीप्त आभा से दमक उठा।
“माँ! मैं यह रोटी महाराणा प्रताप और उनके बच्चों को देने पहाड़ी पर जाऊँगा।”
माँ का मातृत्व पिघल उठा। एक ही सहारा था उसका। इकलौती संतान वह भी मौत के मुख में जाने के लिए आतुर थी, परंतु उसका विचार महान था। देश की रक्षार्थ वैभवविहीन वनों में आपत्तियों से संघर्ष कर स्वातंत्र्य देव की आराधना कर रहे महाराणा प्रताप और उसके बच्चों का भूख से आकुल चेहरा मन मस्तिष्क में घुस गया। वह बालक के सिर पर स्नेह के हाथ फेरते हुए बोली, “लेकिन बेटा चारों ओर तो शत्रुओं का पहरा है। रोटी देने कैसे जाओगे?”
बालक ने कहा, “माँ! “इस समय चारों ओर अंधकार छाया हुआ है। कुछ दिखाई नहीं दे रहा होगा। मैं पहाड़ी रास्तों से पूर्णतः परिचित हूँ। जिससे मुझे उनकी आँखों से बचकर निकल जाने में सफलता प्राप्त होगी बस माँ! तुम्हारे आशीर्वाद की आवश्यकता है।”
माँ ने उस अदम्य साहसी बालक को अपने हृदय से लगा लिया और आँसुओं की एक अविरल धारा उसके नेत्रों से बह निकली। यह मौन स्वीकृति थी उस माँ की, जो अपनी एकमात्र संतान को देश पर निछावर होने को प्रेरित कर रही थी।
रोटियों की पोटली बाँधकर ज्यों ही वह बालक झोंपड़ी से बाहर निकला, उसी समय जोर से बादल गरजे, बिजली चमकने लगी, और मूसलाधार बारिश होने लगी। परंतु वह बालक अपने ध्येय के मार्ग से बिल्कुल विमुख न हो, बाधाओं का बहादुरी से सामना करने का निश्चय कर, अविचल भाव से अपने अभीष्ट लक्ष्य की ओर बढ़ चला।
पहाड़ी के पथरीले रास्तों पर वह नंगे पाँव धीरे-धीरे सरककर शत्रु के जाल को तोड़ता हुआ आगे बढ़ गया। पैर लहूलुहान हो रहे थे। शरीर पर अन्य कई जगहों पर घाव हो गए थे। परंतु वह उनकी परवाह न कर लगातार आगे बढ़ता रहा।
अचानक जोरों से बिजली चमकी। नीचे से आते हुए मुगल सैनिक ने एक परछाई को ऊपर जाते हुए देखा। अंदाज से अपनी कटार निकालकर अंधकार में फेंक दी। वार बालक की पीठ पर जाकर लगा। परंतु उसने अपने मुँह से कोई चीख न निकाली। एक क्षण भी विचलित न होते हुए उसने नीचे की तरफ सिपाही को लक्ष्य बनाकर एक पत्थर लुढ़का दिया और अगले ही क्षण एक चीख वातावरण में तैर गई, लेकिन वह चीख बादलों की गड़गड़ाहट में दबकर रह गई।
असह्य दर्द को अपनी देश भक्ति के जस्ते से सहन करता हुआ, गिरता पड़ता वह गंतव्य स्थान पर जा पहुँचा। बाहर से द्वार पर दो-चार थपकियाँ देकर वह औंधे मुँह नीचे जमीन पर गिर पड़ा।
आवाज सुनकर महाराणा प्रताप द्वार खोलकर सन्नद्ध अवस्था में बाहर आए। मशाल की धीमी रोशनी में उन्होंने देखा कि एक बालक घायल अवस्था में पड़ा है। रोटियों की पोटली हाथ में बड़ी सख्ती से भींची हुई है। चेहरे पर कार्य को संपूर्ण करने की सफलता की एक दीप्त आभा प्रस्फुटित हो रही थी।
महाराणा प्रताप को पूरी बात समझने में देर न लगी। बालक ध्येय की वेदी पर शहीद हो चुका था। महाराणा प्रताप ने स्नेह से उसका मस्तक चूम साश्रुनयनों से श्रद्धाँजलि अर्पित करते हुए उस निष्काम योगी को चिर विदाई दी।
भारतमाता के उस अमर सपूत का नाम था दुग्धा। कितना दिव्य था लक्ष्य की बलिवेदी पर उसका बलिदान? जिसने स्वयं को राष्ट्रीय भावनाओं के लिए निछावर कर दिया।
भक्ति भावना सही अर्थों में दीन दुखियों के लिए अंतः से उद्भूत परमार्थ भावना ही है। भगवान ऐसे ही मान्यता देता है। चैतन्य महाप्रभु का कथन है,” परमात्मा कहता है, मैं भूखा था तुमने खाना दिया। मैं निराश्रित था, तुमने स्थान दिया। मैं नंगा था तुमने मुझे वस्त्र देकर सहायता पहुँचाई। चलो मेरे स्वर्ग में।”
धर्मात्माओं ने पूछा, “हमने कब आपको भोजन, पानी, आश्रय, वस्त्र, आदि दिए और कब सेवा-सहायता की?” प्रभु बोले, जो कुछ दीन-दुखियों के लिए किया गया, वह मेरे लिए है। यही करके तुम मेरे स्वर्ग- मुक्ति प्राप्ति के अधिकारी हो गए।”
श्रम की महत्ता कितनी अपार है जो अभाव, दरिद्रता ही नहीं, बीमारियों तक को भगाया जा सकता है, उसे समझाते हुए महात्मा आनंद स्वामी एक कथा सुनाया करते थे,
पहाड़ की अनुमति से बीमारियाँ पर्वत पर रहने लगी। कुछ दिन बीते, एक किसान को कृषि योग्य भूमि को कुछ कमी पड़ी। पहाड़ बहुत सारी जमीन दबाए खड़ा है, यह देखकर परिश्रमी किसान पहाड़ काटने और उसे चौरस बनाने में जुट गया। किसान ने बहुत सी भूमि कृषि योग्य कर ली। यह देखकर दूसरे किसान भी जुट पड़े। किसानों की संख्या देखते देखते सैकड़ों तक जा पहुँची। पहाड़ घबराया और अपने बचाव के उपाय खोजने लगा। कुछ और तो समझ में नहीं आया, उसने सब बीमारियों को इकट्ठा किया और फावड़े तथा कुदाल चलाते हुए किसानों की ओर संकेत किया और कहा, यह रहे मेरे शत्रु, तुम सबकी सब इन पर झपट पड़ो और मेरा नाश करने वालों का सत्यानाश कर डालो।
अपने-अपने आयुध लेकर बीमारियाँ आगे बढ़ी और किसानों के शरीर से लिपट गई, पर किसान तो अपनी धनु में लगे थे। फावड़े जितना तेजी से चलाते, पसीना उतना ही अधिक निकलता और सारी बीमारियाँ धुलकर नीचे गिर जाती। बहुत उपक्रम किया, पर बीमारियों की एक न चली। एक अच्छा स्थान छोड़कर उन्हें गंदवासिनी बनना पड़ा सो अलग।
पहाड़ ने जब देखा कि बीमारियाँ उसकी रक्षा नहीं कर सकीं, तो वह बड़ा कुपित हुआ और अपने पास से भगा दिया। तब से बीमारियाँ हमेशा गंदगी में प्रश्रय पाती है।
योग शब्द की निष्पत्ति ‘युज’ धातु से ‘योजाँ योग’ इस विग्रह के ‘भावे’ सूत्र भाव अर्थ में ‘छात्र’ प्रत्यय करने से होती है। इसका अर्थ है जोड़ना, संयोजित करना, सम्मिलित करना एवं तदाकार होना। योग का अर्थ जीवात्मा एवं परमात्मा का मिलन या सायुज्य है। ज्योतिष शास्त्र में योग का सम्बन्ध युग (काल) से है। गणित शास्त्र में दो या अधिक संख्याओं के जोड़ को योग कहा गया है। आयुर्वेद में विभिन्न प्रकार की औषधियों के मेल को योग कहते हैं। योग शब्द प्राचीन भारतीय आर्य भाषायी परिवार का है। यह जर्मन भाषा के जोक (छ्वशय़द्ग) एंग्लो सेक्शन के गेओक (त्रद्गशष्) इउक (द्यह्वष्) के ओक (ह्रष्) लैटिन के इउगम (द्यह्वद्दह्वद्व) तथा ग्रीक के जुगोम (ह्वद्दह्वद्व) के समकक्ष या समानार्थक है।
योग मनुष्य की चेतना के विकास का विज्ञान है। इसमें पदार्थ, जीवन और चेतना का समन्वय होता है। यह विज्ञान एवं अध्यात्म का योग भी कराता है। उपनिषदीय परंपरा में योग चेतना की एक उच्च अवस्था है। इसमें पाँचों ज्ञानेन्द्रियों तथा मन की वृत्तियाँ रुक जाती है और बुद्धि भी स्थिर हो जाती है। इस प्रकार इंद्रिय नियंत्रण से ध्यान स्थिर हो जाता है। पतंजलि के योगसूत्र के अनुसार योग “चित्तवृत्ति निरोध” की अवस्था है।
वैदिक वाङ्मय में सर्वप्रथम ऋग्वेद में योग शब्द मिलता है। ऋग्वेद के 1/14/4, 1/5/1, 3/52/1, 1/117/1, आदि मंत्रों में इसकी झलकियाँ मिलती हैं। यहाँ पर योग का संकेत आध्यात्मिकता की ओर है। उपनिषदों में प्रयुक्त योग भी आध्यात्मिक अर्थ को ही पुष्ट करता है। उपनिषदों में मुख्य रूप से कठोपनिषद् एवं श्वेताश्वेतर उपनिषद् में योग का उल्लेख हुआ हैं कपिल के साँख्य दर्शन एवं पतंजलि के योग दर्शन में भी योग के भिन्न-भिन्न स्वरूपों की ओर संकेत किया गया है। महाभारत में योग की अक्षय निधि संचित है। इसमें योग का प्रयोग उपाय के रूप में मिलता है। भगवद्गीता तो योग शास्त्र है ही। इसके अठारह अध्यायों में से प्रत्येक अध्याय का नाम योगाँत बताया गया है। रामायण में योग के ही समानार्थक तप शब्द का उल्लेख हुआ है ।इससे परम लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।
भगवद्गीता में योग की अनेक परिभाषाएँ प्राप्त होती है। गीता के दूसरे अध्याय के अड़तालीसवें मंत्र में सिद्धि असिद्धि में सम रहना योग बताया गया है। योग कर्मों की कुशलता भी है। आगे गीता कहती है कि जीवन में जो दुख का संयोग है उसका वियोग ही योग है। गीता द्वारा प्रतिपादित योग की परिभाषा पतंजलि योग की परिभाषा से शाब्दिक रूप में नहीं मिलती, परंतु उसके सन्निकट है। पतंजलि के अनुसार जब चित्तवृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती है, तो प्रकृति और पुरुष का भेद स्पष्ट होने लगता है। इसके परिणामस्वरूप समस्त दुखों से मुक्ति मिल जाती है। अर्थात् दुखों से वियोग हो जाता है। अतः कहा जा सकता है कि जब साधक युक्त हो जाता है, तभी दुखों से उनका वियोग हो जाता है।
योग का सामान्य अर्थ युक्त होना है। इसी परिप्रेक्ष्य में योगी याज्ञवल्क्य ने योग की परिभाषा दी है। उनके अनुसार जीवात्मा और परमात्मा का समान रूपात्मक संयोग ही योग है। समान रूपात्मक का अर्थ है बंधनमुक्त परमात्मा के सदृश्य जीवात्मा भी अपनी आसक्ति, वासना आदि बंधनों से रहित होकर उससे तदाकार हो जाए। स्मृतियों में योगाभ्यास की उन सभी क्रियाओं का वर्णन मिलता है। जिनसे मोक्ष की प्राप्ति संभव है। बौद्ध धर्म में बोधिसत्व की प्राप्ति कराने वाली प्रक्रिया को योग कहा गया है। जैन आचार्यों के मतानुसार वह समस्त साधन, जो सिद्धि एवं मोक्ष की प्राप्ति कराते हैं, योग कहलाते हैं।
योगशास्त्र के इतिहास की दृष्टि से भागवत पुराण का स्थान औपनिषदिक योग तथा पातंजल योग के बीच के काल में है। इसमें ज्ञानयोग, क्रियायोग, तथा भक्तियोग तीनों साधनों का वर्णन मिलता है। इसमें सिद्धि प्राप्त करने के साधन के रूप में योग का प्रतिपादन हुआ है। शिव महापुराण में दो प्रकार के योग का उल्लेख मिलता है।
पतंजलि द्वारा प्रतिपादित चित्तवृत्ति निरोधरूपी योग भी समानार्थक है। योग सूत्रों के भाष्यकार व्यास ने योग का लक्षण समाधि बताते हुए दोनों को अभिन्न माना है। परंतु योग सूत्रकार ने समाधि को अष्टाँग योगों में गिनाकर उसे योग का अंग या साधन माना है। श्री केएन मिश्र ने पतंजलि योग शास्त्र में भाव व्युत्क्रम रूप में प्रयुक्त योग या समाधि को अंग या साधन मानकर दोनों शब्दों के समानार्थक होने का सिद्धाँत स्वीकार किया है। इस प्रकार योग और समाधि शब्द पर्यायवाची एवं समानार्थक हैं।
विभिन्न ग्रंथों में योग का अर्थ भिन्न रूप में वर्णित है। अध्यात्मशास्त्र में प्रतिपादित मोक्ष प्राप्ति के लिए निर्दिष्ट साधना एवं उनकी यथाविधि सम्यक् साधना और उससे प्राप्त होने वाली आध्यात्मिक विकास की पूर्णता का नाम ही योग है। महान योगी श्री अरविंद ने योग समन्वय में स्पष्ट किया है कि परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना तथा इसे प्राप्त करना, यही सब योगों का स्वरूप है।
योग का विषय व्यापक रहा है। समय के साथ उसकी व्यापकता में और भी वृद्धि हुई। इस व्यापकता में योग के अनेक भेद दृष्टिगोचर होते हैं। इस क्रम में योग के कई प्रकार गिनाए गए है। ज्ञानयोग के अनुसार ब्रह्मा की एकता का ज्ञान हो जाना ही मोक्ष है। ब्रह्मा भाव की स्थिति को प्राप्त करना ही ज्ञानयोग की साधना कर लक्ष्य है। यह ज्ञान स्वरूप चैतन्य को अज्ञान से मुक्त कर देने पर प्राप्त होता है।
कर्म बंधन का कारण होते हैं। इनकी मुक्ति के लिए कर्मयोग का सहारा लिया जाता है। निष्काम कर्म में कर्म बंधन कारक नहीं होते अतः फल की इच्छा से रहित होकर कर्म करते हुए भगवत् प्राप्ति के मार्ग को कर्मयोग कहा जाता है। कर्मयोग साधना की प्रथम अवस्था में कर्म निष्कामपूर्वक करना चाहिए। अगली अवस्था में कर्तव्य कर्म भी भगवद् अर्पित हो जाता है। इसी स्थिति में भक्ति भावना उदय होती हैं। अंत में कर्मयोगी स्वयं को कर्ता भी नहीं मानता और वह कर्तव्य की भावना से रहित हो जाता है। कर्मयोग से लौकिक एवं अलौकिक दोनों कर्मों का उत्थान होता है।
भगवत् प्राप्ति का सबसे सरल एवं सुगम मार्ग भक्ति मार्ग है। युगद्रष्टा स्वामी विवेकानंद के अनुसार सच्चे और निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज को भक्तियोग कहते हैं प्रेम ही भक्ति का मूल सिद्धाँत है। शाँडिल्य सूत्रानुसार भी ईश्वर में परमानुरक्ति ही भक्ति है। भक्तियोग में भगवान ही एकमात्र केंद्र बिंदु होता है। परमात्मा के प्रति प्रेममय होकर तदाकार हो जाना ही भक्तियोग का लक्ष्य है।
मंत्रयोग को जपयोग के नाम से भी जाना जाता है। किसी मंत्र के जप के द्वारा परम लक्ष्य की प्राप्ति को जपयोग कहते हैं। योग सूत्र में मंत्र सिद्धि को माना गया है, और इसमें उल्लेख मिलता है कि इष्ट मंत्र के जप से इष्टदेव की प्राप्ति होती है। योगदर्शन में प्रणव अर्थात् ओंकार को ईश्वर का वाचक माना गया है और उसके अर्थ की भावना करते हुए जप करने का विधान बताया गया है। प्रणव के साथ ही गायत्री मंत्र को भी शास्त्रकारों ने अति महत्वपूर्ण बताया है।
योग के विभिन्न प्रकारों में लययोग का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान है। वैष्णव और शाक्त मतानुसार नाद बिंदु अमृत बिंदु, ध्यान बिंदु आदि का वर्णन मिलता है। इन बिंदु में स्वानुसंधानपूर्वक संहार करके अर्थात् नादमयी सारी भूमिकाओं को त्यागकर स्वरूप में स्थिति प्राप्त कर उसी में लीन हो जाना ही लययोग है। नाद में मन स्वभाव में विलीन होने लगता है। लययोग से भी मोक्ष प्राप्ति होती है।
हठयोग शास्त्रों के अनुसार ‘हकार’ (ह) का अर्थ पिंगला नाड़ी (सूर्य स्वर) या प्राण वायु होता है तथा ‘ठकार’ का अर्थ इड़ा नाड़ी (चंद्र स्वर) या अपान वाला होता है। इन सूर्य और चंद्र स्वरों अर्थात् प्राणवायु और अपान वायु के सम्मिलित स्वरूप को हठयोग कहा गया है। हठयोगियों की मान्यता है कि भगवान शिव ही इस योग के प्रवर्तक है। मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ के पूर्व भी हठयोग की क्रियाओं का प्रचलन था। हठयोग शरीर और मन दोनों को आपस में सम्बन्धित मानता है। योग की साधना का लक्ष्य शरीर और प्राण पर विजय प्राप्त करना है।
महायोग के प्रवर्तक महर्षि रमण माने जाते हैं। इसमें निदिध्यासन ही मुख्य साधन है। इस योग की साधना चिंतन से आरंभ होती है। महायोग का जो साध्य है वही साधना है। यद्यपि यह योग कठिन एवं दुर्गम है, परंतु भगवत्कृपा से यह भी सहज, सरल एवं सुगम हो जाता है। महर्षि रमण के अनुसार ‘हृदय गुह्य’ में केवल मात्र ब्रह्मा ही है। यह साक्षात आत्मस्वरूप में प्रकाशित होता है। रमण महर्षि कहते हैं उसी की खोज एवं उस में विलय ही महायोग है। यह महायोग एक प्रकार से ज्ञानयोग के समान ही है।
तंत्र भी एक योग है। इसे ‘आगम’ भी कहते हैं। आगम उस शास्त्र को कहा जाता है, जिसके द्वारा भोग और मोक्ष के उपाय सुझाए जाते हैं। शैव और शाक्त तंत्रों के अतिरिक्त वैष्णव, सूर्य और गणपत्य तीन और तंत्रों का उल्लेख मिलता है। इन पाँचों को पंचागम कहा जाता है। तंत्र योग एक ऐसी पद्धति है, जिसमें आँतरिक और बाह्य, व्यक्तिगत और सामूहिक क्रियाओं का समावेश करने का प्रयत्न किया गया है।
तंत्र योग के ही एक अंग कुँडलिनी योग में कुँडलिनी शक्ति को जाग्रत किया जाता है। यह षट्चक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार में जाकर शिव के साथ एक हो जाती है। यहाँ पर योगी को जीव और ब्रह्म की एकता की अनुभूति होती है।
प्राणायाम युक्त मनोवृत्ति को स्पर्श योग की संज्ञा दी गई है और यदि स्पर्श योग मंत्र के स्पर्श से रहित हो तो भावयोग कहा जाता है, परंतु जिसमें संपूर्ण विश्व तिरोहित हो जाता है, उसे अभाव योग कहते हैं, क्योंकि उसमें विद्यमान वस्तु का भी आभास नहीं रहता। चित्त का बाह्यार्थ संयोग किसी भूमि आदि से संयोग ही क्रिया योग कहा गया है। योग के इन भेदों के अलावा योग के और भी कई रूपों में भिन्नता है, शिव योग, मृत्युँजय योग, संपूर्ण योग आदि।
योग का यह वास्तविक प्राचीन स्वरूप औपनिषदिक परंपरा का ही अंग है। तत्वज्ञान एवं तत्त्वानुभूति के साधन के रूप में ही यह विकसित हुआ। कालाँतर में यही अष्टाँग योग के रूप में प्रतिपादित किया गया। पतंजलि ने अष्टाँग योग को यम नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के रूप में स्वीकारा है। शिव महापुराण एवं गरुड़ पुराण में भी अष्टाँग योग की चर्चा मिलती है। तत्वज्ञान और तत्त्वानुभूति आदि उच्च भावों की प्राप्ति में सहायक होने से शारीरिक तथा मानसिक विकास हेतु भी योग का प्रयोग हुआ है। आधुनिक काल में योग के कई प्रयोजन सुझाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, योग द्वारा सिद्धि प्राप्त करना, स्वास्थ्य संवर्द्धन रोगों की चिकित्सा चेतना का विकास आदि। वैसे कहना यही उचित है कि योग मुख्यतः तत्त्वानुभूति का विषय है और वह आत्मिक विकास पर केंद्रित हैं।
इसी तरह जीवन में चिंतन चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता का योग ही सच्चा योग माना जा सकता है। अतः योग मार्ग पर अग्रसर साधक को सदैव उस परमात्मा का अभीप्सा करते रहना चाहिए। यही सभी योगों का सार है।
भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के अंतिम समय में शिष्यों से कहा, “हे भिक्षुओं, जब तक तुम संयमी रहोगे, मित्र भाव रखोगे, मिल बाँटकर खाओगे, सत्य और धर्म पर दृढ़ रहोगे, तब तक असीम विपत्तियाँ आने पर भी तुम्हारी पराजय नहीं होगी।
संगठन व सहकारिता, भक्ति भावना की दो ऐसी परिणतियाँ है, जो हर स्थिति में मनुष्य को धन्य बनाती है
एक बार कई पक्षी एक बहेलिये के जाल में फँस गए। पक्षियों ने सलाह की और एक साथ जाल लेकर उड़ गए। व्याध भी उनके पीछे दौड़ा। किसी साधु ने पूछा, “ भाई अब इनके पीछे दौड़ने से क्या लाभ?” व्याध बोला, “महाराज जब तक ये पक्षी एक विचार और संगठन में हैं, तभी तक जाल का बोझ उठा सकेंगे।” ऐसा ही हुआ। थोड़ी ही देर में ‘कहाँ उतरें?” के प्रश्न पर उनमें विवाद हो गया। किसी किसी ने ढील दे दी और परिणाम यह हुआ कि वे जाल समेत नीचे गिरे और मारे गए।
एक व्यक्ति आया, बोला, महाराज! आमदनी कम है, बच्चे भूखों मरते हैं। संत ने पूछा, बाल बच्चे क्या काम करते है? आगंतुक अकड़कर बोला, क्या वे किसी के नौकर हैं, जो काम करें। संत ने कहा, भाई घर का बोझ उठाने के लिए अपनी -अपनी स्थिति के अनुसार सभी को कुछ न कुछ जरूर करना चाहिए। अकेले काम कैसे चलेगा? आदमी संतुष्ट होकर चला गया। कुछ दिन में फिर आया। इस बार काफी भेंट आदि भी लाया था। संत के चरणों में रखकर बोला, महाराज अब एक बच्चा जानवर चराता है, दूसरा खेती करता स्त्री भी हाथ बाँटती है। किसी तरह की कमी नहीं है। संत बोले - जिस घर के सब लोग हिल मिलकर परिश्रम करते हैं, उन्हें कभी भी तंगी नहीं आती।
सृजेता ने अपनी सृष्टि को बड़ा ही अद्भुत और आश्चर्यजनक बनाया है। इसका हरेक कण रहस्यों का पिटारा है। प्रत्येक कण में ब्रह्मांड की झलक-झाँकी देखी जा सकती है। इसलिए तो ऋषियों ने पिंड में ब्रह्माँड का सिद्धाँत प्रतिपादित किया है। जो अणु में है वह ब्रह्माँड में है और जो ब्रह्मांड में हैं, उसकी समस्त संरचना अणु के सूक्ष्म आकार में सिमटी हुई है। आज इस तथ्य को विज्ञान होलोग्राफी के नाम से प्रतिपादित करता है। अर्थात् किसी भी पदार्थ या वस्तु के एक छोटे से भाग का यदि होलोग्राफी चित्र लिया जाए, तो उस सूक्ष्म भाग में पदार्थ या वस्तु के संपूर्ण भाग को रेखाँकित किया जा सकता है। अब तो होलोग्राफ के आधुनिक अनुसंधानों ने ब्रेन होलोग्राम, काँस्मास होलोग्राम आदि का आविष्कार कर लिया है।
होलोग्राम एक ऐसी फिल्म है, जो किसी वस्तु या पदार्थ के सूक्ष्मतम भाग से उस वस्तु का संपूर्ण प्रतिबिंब उतार लेता है। होलोग्राम ग्रीक शब्द है। होलो (॥शद्यश) संपूर्ण तथा ग्राम (त्रह्ड्डद्व) अंकन अर्थात् संपूर्णता का अंकन। इससे स्पष्ट होता है कि वस्तु के एक छोटे से भाग में उसकी समस्त संरचना सन्निहित होती है। होलोग्राम के लिए लेजर किरणों का उपयोग किया जाता है। जब लेजर बीम को बिट स्प्लीटर में फेंका जाता है, तो यह दो भागों में बँट जाती है। लेजर का एक भाग वस्तु का चित्र खींचता है एवं दूसरी किरण परावर्तित किरण से टकराकर उस वस्तु का संपूर्ण चित्र बनाती है। यही होलोग्राम है।
कार्ल प्रिबम के अनुसार होलोग्राम त्रिआयामी चित्र होता है। यह ठोस, वास्तविक एवं पारदर्शी होता है। फोटोग्राफी एवं सिनेमेटोग्राफी में द्विआयामी चित्र होता है। जबकि होलोग्राफी (क्कड्डह्ड्डद्यद्यड्डफ् द्गद्धद्धद्गष्ह्ल) प्रदर्शित करता है। होलोग्राफी से वस्तु की वास्तविकता का पता चलता है। इससे अनंत आयामों एवं कोणों को परदे पर उतारा जा सकता है। डॉ. फिलीप आर वेस्टलैंड ने किसी वस्तु के वास्तविक एवं आभासी दो प्रतिबिंबों का वर्णन किया है। होलोग्राम में इन्हीं दो प्रतिबिंबों की पुनः संरचना होती है। फोटोग्राफी फिल्म में जहाँ पर वास्तविक प्रतिबिंब दिखता है। उस स्थान पर उस वस्तु के प्रतिबिंब का प्रकाश पड़ता है। होलोग्राम में उस स्थान पर किसी प्रकार के प्रकाश स्त्रोत न होने के बावजूद जो प्रतिबिंब बनता है, उसे आभासी प्रतिबिंब कहते हैं। होलोग्राम में इन्हीं दो आभासी एवं वास्तविक प्रतिबिंबों का गुण होता है। इससे प्राप्त प्रतिबिंब सिनेमा की तरह परदे पर प्राप्त नहीं होता है, बल्कि यह स्पेस में निर्मित होता है।
सर्वप्रथम डेनिश गेबर ने सन 1947 में होलोग्राम पर एक सूत्र दिया था। इसके पश्चात 1957 में प्रिबम का सिद्धाँत आया। डेनिशस गेबर का सूत्र गणितीय ढंग से था, जो अठारहवीं शताब्दी के फ्रेंच गणितज्ञ बीजे फूरीयर द्वारा प्रतिपादित किया गया था। इसके अनुसार कोई भी तरंग अपने वास्तविक प्रतिबिंब को दर्शा सकती है। जिस प्रकार टीवी कैमरा प्रतिबिंब को इलेक्ट्रोमैगनेटिक फ्रीक्वेंसी में और टीवी सेट इसे पुनः वास्तविक प्रतिबिंब में बदल देता है, ठीक उसी प्रकार तरंग से प्रतिबिंब का परिवर्तन एवं पुनर्परिवर्तन संभव हैं इसे ही फुरीयर परिवर्तन के रूप में जाना जाता है। गेबर ने इसी सिद्धाँत के तहत वस्तु के किसी एक भाग में उसकी संपूर्ण संरचना का होलोग्राम तैयार किया। प्रिबम ने 1967 के दशक में दृश्य इंद्रियों को आवृत्ति विश्लेषक मानते हुए मस्तिष्क को भी समाविष्ट किया।
उन्होंने इस तथ्य का अपने शोध ग्रंथ ‘ लेंग्वुएज ऑफ द ब्रेन’ में उल्लेख करते हुए कहा है कि होलोग्राफी की एक घनसेमी में तकरीबन दस अरब सूचनाओं (क्चद्बह्लह्य) का संग्रह किया जा सकता है। इसकी दो सबसे बड़ी विशेषताएँ हैं, प्रथम, होलोग्राफी चित्र होलोग्राम से दूर बनता है, दूसरी है इसकी आश्चर्यजनक संग्रहण क्षमता। विभिन्न प्रकार की आकृतियों के अनेकों चित्र एक ही प्लेट में अंकित हो सकते हैं। होलोग्राफी में किसी वस्तु के एक भाग को फोकस कर उसके संपूर्ण भाग का चित्र लिया जा सकता है। इस होलोग्राम के प्रत्येक बिंदु पर वस्तु की संपूर्ण जानकारी को क्रमबद्ध किया जा सकता है। इस प्रकार होलोग्राम के प्रत्येक बिंदु में वस्तु की समग्रता का दिग्दर्शन होता है। इससे सिद्ध होता है कि पदार्थ के सूक्ष्मतम भाग में उसकी संपूर्ण संरचना सन्निहित होती है। यह सिद्धांत अणु में विभु एवं सूक्ष्म में विराट सत्य को प्रतिपादित करता है ।
प्रिबम ने मस्तिष्क को भी होलोग्राम माना है। मस्तिष्क में दो तरह के कार्य होते हैं, न्यूरोसाइकोलॉजिकल एवं न्यूरोफिजियोलॉजिकल। न्यूरोफिजियोलॉजिकल के तहत मानव शरीर में क्रिया प्रतिक्रिया का अध्ययन किया जाता है। इसकी वृत्ति पदार्थ की ओर उन्मुख होती है, न्यूरोसाइकोलॉजी में व्यक्ति न केवल जगत् की ओर देखता है, बल्कि अपने अंदर भी झाँकने का प्रयास करता है। यह अंतर्मुखी वृत्ति है। मारिश पोंटी ने कुछ सीमा तक इसे स्वीकार किया है। डॉ. कार्ल प्रिबम के अनुसार क्रिया प्रतिक्रिया मॉडल नर्वस सिस्टम के अंतर्गत आने वाली क्रियाओं एवं उसकी गतिविधियों का अंतर नहीं कर सकता। इस प्रकार संवेदक को व्यक्ति के व्यवहार में प्रयुक्त आँतरिक प्रतिनिधि के समान स्वीकार किया गया। इसके पूर्व होलोग्राफी सिद्धाँत को प्रायोगिक एवं अनुभव विज्ञान के रूप में लिया जाता था। यह मनुष्य की क्रिया प्रतिक्रिया का सिद्धांत माना जाता था, जिसके जन्मदाता माँरिश मेली पोंटी थें कार्ल प्रिबम ने इसके आगे अपना मत प्रस्तुत किया। इन्होंने इसके लिए केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में किसी वस्तु के प्रतिक्षण परिवर्तन की ओर संकेत किया है।
महान वैज्ञानिक प्रिबम ने अपने प्रयोगों से यह प्रमाणित किया कि मस्तिष्क एक अद्भुत होलोग्राफ है। इस आश्चर्यजनक जादुई पिटारे के बारे में प्रतिष्ठित भौतिकविद् एवं गणिता जान वान न्यूमेन ने उल्लेख किया है कि मनुष्य का मस्तिष्क अपने जीवन काल में 2.8 ग 12 सूचनाओं का संग्रहण करता है। यह तो गणित की दृश्य गणना है। जबकि वास्तविकता इससे अनंत गुना अधिक सामर्थ्यशाली है। पीटर वान हीडैन ने आप्टीकल होलोग्राफी में संकेत दिया है कि एक वर्ग इंच की होलोग्राफी फिल्म में 5 बाइबिल समा सकती है। मस्तिष्क में होलोग्राफी मेमोरी को यदि अनावृत किया जाए, तो उसमें समाहित अनंत स्मृति ग्रंथों के पृष्ठों को अपने सामने रखे कंप्यूटर के परदे के समान स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। यह स्मृति प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करने वाले विशेषज्ञ जैसे संगीतकार, चित्रकार, इंजीनियर, पायलट, प्रोफेसर आदि सभी को इतना ही स्पष्ट एवं साफ संकेत प्रदान कर सकती है। मस्तिष्क में भरी स्मृति कार्य के संचालन के साथ ही अपनी संगृहीत सूचनाओं को सक्रिय कर उसे उद्देश्य विशेष के लिए भेजना प्रारंभ कर देती है। और उस क्षेत्र का विशेषज्ञ इस क्रियाविधि से अत्यंत मेधावी एवं दक्ष हो जाता है। यही मस्तिष्क का आँतरिक होलोग्राम कहलाता है।
प्रिबम के मस्तिष्कीय होलोग्राम के पश्चात डेविड बोहम ने संपूर्ण ब्रह्मांड को एक विराट होलोग्राम कहा। बोहम का यह सिद्धाँत ऋषियों के ‘पिंड में ब्रह्माँड’ मत की पुष्टि करता है। इसके अनुसार, एक सूक्ष्मतम परमाणु के परिकर में संपूर्ण ब्रह्मांड की झलक झाँकी देखी जा सकती है। आज का भौतिक वान क्वाँटा को सबसे सूक्ष्मतम कण के रूप में निरूपित करता है। ब्रह्मांड का निर्माण इन्हीं क्वाँटा कणों से माना जाता है। क्वाँटा क्वाँटम का बहुवचन है। एक इलेक्ट्रॉन को क्वाँटम कहते हैं तथा इलेक्ट्रॉन के समूह को क्वाँटा कहते हैं।
बोहम के अनुसार प्लाज्मा एक ऐसी गैसीय अवस्था है, जिसमें उच्च घनत्व के इलेक्ट्रॉन तथा धनात्मक आयन होते हैं, यहाँ परमाणु धनात्मक विभव प्रदर्शित करता है। इस स्थिति में इलेक्ट्रॉन संपूर्ण प्लाज्मा के सूक्ष्मतम प्रतिनिधि के समान व्यवहार करता है। बोहम ने अपने एक विशेष प्रयोग द्वारा प्लाज्मा में इलेक्ट्रॉन की इस इंटरफरेंसर (ढ्ढठ्ठह्लद्गह्द्धद्गह्द्गठ्ठष्द्गह्) प्रक्रिया को होलोग्राफी चित्र के रूप में प्रदर्शित किया है। बोहम ने सन् 1110 में अपने ‘होलनेस एंड द इंपलीकेट ऑर्डर’ नामक शोध ग्रंथ में इसे और भी स्पष्ट करते हुए लिखा है कि संपूर्ण ब्रह्माँड एक अद्भुत एवं आश्चर्यजनक होलोग्राम है।
उन्होंने जीवन एवं दैनंदिन घटनाओं को ही होलोग्राफिक बिंब के सदृश्य आभासी एवं काल्पनिक (इल्युजन) माना है। संसार का प्रत्येक कण जहाँ अपना अलग एक अस्तित्व रखता है वही सभी के बीच एक सामंजस्य एवं तारतम्य भी स्थापित करता है। यही होलोग्राफी फिल्म का निर्माण होता है। इसी के क्रमशः ढ्ढठ्ठद्धशद्यस्रद्गस्र शह्स्रद्गह् तथा ठ्ठद्धशद्यस्रद्गस्र शह्स्रद्गह् कहा जाता है। समस्त ब्रह्माँड इन्हीं दो क्रमों के बीच का परिणाम है। अतः एक इलेक्ट्रॉन मात्र कण ही नहीं वरन् समस्त ब्रह्माँड भी है। वैज्ञानिकों के अनुसार वस्तुतः कोई भी कण विनष्ट नहीं होता, बल्कि वह अपने मूल अस्तित्व की ओर लौट जाता है, जहाँ से उसकी उत्पत्ति हुई थी। होलोग्राफी फिल्म भी इन्हीं दो क्रमों के बीच बनती है। क्वाँटम सिद्धाँत के अनुसार तरंग और कण के बीच के परिवर्तन को भी इसी प्रकार समझा जा सकता है। इस तरह वैज्ञानिकों ने ब्रह्माँड को होलोग्राम के बजाय ‘होलोमूवमेंट’ कहना ज्यादा सार्थक समझा है।
आधुनिकतम वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार प्रत्येक तरंग में ऊर्जा की अनंत मात्रा भरी होती है। भौतिकविदों के अनुसार आकाश के एक घन से. मी. पोले भाग में विद्यमान ऊर्जा ब्रह्माँड के समस्त कणों की समन्वित ऊर्जा से भी अधिक होती है। यह ऊर्जा एक ट्रीलियन परमाणु बम के बराबर मानी जा सकती है। वैज्ञानिकों ने इस गुप्त एवं अनंत ऊर्जा से ही ब्रह्माँडीय होलोग्राम का प्रमाण प्रतिपादित किया है। ऊर्जा के अनंत सागर में सर्वत्र एक समान सृष्टि नहीं है। परंतु ये सभी अनंत विभिन्नता एवं विषमता में बावजूद एक सूत्र में बँधे है, जो एक में अनेक एवं अनेक में एक का मत प्रस्तुत करते हैं। वैदिक ऋषियों ने भी सृष्टि का मूल चेतना को माना है। वैज्ञानिकों ने इसे तरंग एवं कण के तहत निरूपित किया है। अतएव जब चेतना का गुणधर्म एक है, तो अंततः उसका निर्मित परिणाम एवं गुणधर्म भी उससे अवश्य सामंजस्य रखेगा। हीलोग्राफी के मतानुसार भी यही प्रमाण प्राप्त होता है। इस प्रकार क्वासर से महान् वैज्ञानिक स्टीफन हाँकिंग के मस्तिष्क तक तथा डी एन. ए. से आकाशगंगा तक सभी के मूल में यही चेतना तत्व विद्यमान है। विज्ञान ने इसे ही होलोग्राफी के रूप में निरूपित किया है।
ब्लैक होल के आधुनिक सिद्धाँत के जनक रोजर पेनरोज, क्वाँटम थ्योरी के विशेषज्ञ बर्नाड डी. एस्पेरनेट दोनों ही बोहम के यूनीवर्स होलोग्राफी को स्वीकारते हैं। उनके अनुसार यह भविष्य में सृष्टि के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने में सहायता प्रदान करेगा। सन् 1973 के नोबुल पुरस्कार विजेता केंब्रीज के ब्रायन जोसेप्सर ने बताया है कि यह सिद्धाँत आगामी समय में धर्म और विज्ञान का सही समन्वय प्रस्तुत कर सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में अँग्रेजी के महाकवि विलियम ब्लैक की दो पंक्तियाँ सही उतरती है कि बालू के कण में सृष्टि की झलक एवं जंगली गुलाब में स्वर्ग का अनुपम नजारा दिखता है।
सचमुच यह सुखद आश्चर्य है कि प्राचीन वैदिक ऋषियों के निष्कर्ष आधुनिक विज्ञान के शोध-निष्कर्ष बनते जा रहे है। होलोग्राफी भी ऋषियों के सूत्रों एवं सिद्धाँतों का एक वैज्ञानिक निरूपण है। जो यह स्पष्ट करता है पिंड में ब्रह्माँड की भाँति आत्मा व परमात्मा का भी अपूर्ण संयोग है। आत्मा परमात्मा का ही अविनाशी अंश है। अतः मनुष्य को सदा अपने इस गौरव का अहसास करते हुए अपने जीवन को उत्तरोत्तर दिव्य बनाते जाना चाहिए, ताकि हर पल उसमें परमात्मा की स्पष्ट झलक देखी जा सके।
गुजरात के प्रसिद्ध सेठ दानमल हँकाजी का पढ़ा लिखा जवान विवाहित बेटा दिवंगत हो गया, तो सेठ जी को बड़ा शोक हुआ, पुत्र वियोग का उतना नहीं, जितना अपनी जवान विधवा बहू का, जो एक वर्ष भी सुहागिन नहीं रह सकी थी। तो क्या वह जीवनभर वैधव्य की आग में जलती रहेगी? यह सोच सोचकर अत्याधिक दुखी हो जाते थे बेटे के जाने के बाद उसके हिस्से का प्यार भी बहू पर सिमट आया था।
बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने एक निश्चय किया। बहू उनकी पुत्री तुल्य है। वह उसका पुनर्विवाह करेंगे। उसे वैधव्य की आग में नहीं जलने देंगे। उन्होंने समाज के तीव्र विरोध को सहते हुए भी अपनी विधवा बहू का पुत्री की तरह पुनर्विवाह करके ही चैन की साँस ली।
मराठा सरदार राघोबा पेशवा पर अपने भतीजे ही हत्या का अभियोग था। जिस न्यायालय में उसका निर्णय होने वाला था, उसके न्यायाधीश श्री रामशास्त्री थे। श्री शास्त्री सत्यनिष्ठा के लिए दूर-दूर तक विख्यात थे, इसलिए राघोबा को भय था कहीं उसे सजा न मिल जाए।
राघोबा की धर्मपत्नी को एक उपाय सूझा। उन्होंने श्री रामशास्त्री को भोज दिया और इस विचार से उनकी खूब आवभगत की कि उससे प्रभावित होकर श्री शास्त्री उनके पक्ष में ही निर्णय देंगे। बात-बात में उन्होंने इस बात की चर्चा ही छेड़ दी, तो श्री रामशास्त्री ने कहा, “न्याय की दृष्टि से तो सरदार को प्राणदंड मिलना ही चाहिए।” राघोबा की पत्नी उनकी इस निर्भयता से प्रभावित तो हुई, पर उन्होंने कहा, “इस तरह का निर्णय देने का परिणाम जानते हैं आप क्या होगा? हम जिंदा ही आपकी जीभ कटवा लेंगे और किसी गड्ढे में गडवा देंगे।”
बिना उत्तेजित हुए श्री शास्त्री ने उत्तर दिया, “यह आप कर सकती है, पर उससे मुझे कोई दुःख नहीं होगा, गलत निर्णय देने की अपेक्षा तो जीभ क्या शिर काट लिया जाना ही अच्छा है।” अंततः विजय न्याय की ही हुई।
हिमालय मानवता का हृदय क्षेत्र है। अपनी पर्यावरण संपदा की समृद्धता के लिए यह सृष्टि के आदिकाल से ही विख्यात रहा है। इसी के आँचल में मनुष्य ने अपना आदि उद्भव देखा और साँस्कृतिक विकास का चरमोत्कर्ष पाया। मूल निवासी के रूप में मानव की उत्पत्ति हिमालय के उत्तराखंड क्षेत्र में हुई। यही (मध्य हिमालय) मानव जाति का उत्पत्ति स्थल एवं आर्ष संस्कृति का आदि स्त्रोत है। वेदों और पुराणों में, रामायण और महाभारत में वर्णित हिमवंत की समस्त गौरव गाथा स्पष्टतः मध्य हिमालय के इसी भूभाग पर केंद्रित रही है। भगवान् व्यास से लेकर महाकवि कालीदास और आचार्य शंकर ने यहाँ के अद्वितीय आध्यात्मिक सौंदर्य से ही नहीं, वरन् सर्वोत्कृष्ट प्राकृतिक सौंदर्य से भी चमत्कृत होकर अपने काव्य ग्रंथों में जो स्वाभाविक चित्रण किया वह महाभारत, अष्टादश-पुराण, मेघदूत, कुमारसंभव आदि संस्कृत भाषा के महत्वपूर्ण ग्रंथों में सुरक्षित है।
इसी दिव्य भूमि में सृष्टि का आदि काव्य वेद ज्ञान के रूप में अपने अलौकिक वैभव के साथ अवतरित हुआ। इसी के सुरम्य आँचल में तप-साधना में लीन ऋषियों ने वेद-उपनिषद्, दर्शन, पुराणों की ज्ञान गंगा बहाई। इसी दौर में मानवीय सभ्यता ने विकास का जो स्वर्ण युग देखा, वह प्रकृति के साथ मनुष्य के गहन सामंजस्य, सहयोग एवं सद्भाव की कहानी है। वैदिक ऋषि न केवल वेदमंत्रों के द्रष्टा थे, बल्कि वे कुशल वैज्ञानिक भी थे। प्रकृति-पर्यावरण के सूक्ष्म रहस्यों को जानने के लिए वे जितने उत्सुक थे, उतने ही पर्यावरण के संरक्षण के विषय में भी सजग थे। वेदों के सूक्तों में इस विषय के लिए विशेष स्थान मिला है। ऋग्वेद में अगस्त्य ऋषि पर्यावरण संरक्षण के मूल रहस्य को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ब्रह्माँड की सुरक्षा द्यावा पृथिवी की सुरक्षा पर निर्भर है। इसके अग्नि सूक्त में जल मंडल, स्थल मंडल व वायु मंडल का विशद् वर्णन किया गया है, जिनके जीवन युक्त भाग को जीवन मंडल या पर्यावरण कह सकते हैं। सूक्त का सार ऋषि के इस सूत्र में व्यक्त होता है, “माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” जिसमें पृथ्वी को माँ की संज्ञा दी गई है। इसी तरह यजुर्वेद का 36वां अध्याय प्रकृति के गुणगान से भरा हुआ है व इसके शाँतिपाठ में समग्र शाँति की सौम्य प्रार्थना की गई है।
वेदों की जैविकीय आधार पर व्याख्या करने वाली विदुषी डॉ. मार्टवनुची अपने शोधग्रंथ में लिखती है कि वैदिक ऋषियों ने प्रकृति के बाहरी अध्ययन के साथ इसके विभिन्न घटकों को जोड़ने वाले अंतर्निहित सूत्र ‘ऋत’ का भी साक्षात्कार किया था। प्रकृति से इस गहन तादात्म्य की स्थिति में ही मानवीय विकास को आध्यात्मिक आधार पर प्रतिष्ठित करने वाले अलौकिक धर्म का विकास हुआ, जो बाद में उपनिषदों के चिंतन में भी मुखरित होता है। इसमें भी जगह-जगह पर पर्यावरण के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। वन-अरण्यों की गोद में ही वस्तुतः इस काल की संस्कृति पुष्पित-पल्लवित हुई थी, जिस कारण यह ‘अरण्य संस्कृति’ के नाम से भी प्रख्यात हुई।
रामायण एवं महाभारत महाकाव्यों से भी प्रकृति एवं वन संरक्षण का यही संदेश प्रकट होता है। क्रमशः इनके अरण्य काँड एवं वनपर्व में वृक्ष एवं वनों का महत्व विशेष रूप से उद्घाटित होता है। इसी तरह पुराणों के पन्ने-पन्ने प्रकृति के महिमागान से भरे हुए है। इनमें श्रीमद्भागवत विशेष रूप से इसका मर्मोद्घाटन हुआ है। कालप्रवाह मौर्यकाल में महामनीषी चाणक्य के चिंतन में वन के महत्व एवं जीव संरक्षण पर सूक्ष्म विचार पाते हैं, जिसको चंद्रगुप्त ने व्यावहारिक रूप दिया था। अशोक के काल में हम इसका चरमोत्कर्ष पाते हैं। इसी परंपरा को गुप्तकाल में हर्षवर्धन ने आगे बढ़ाया है। इस काल में कालीदास से लेकर, माघ, बाण, बुद्धघोष, भवभूति, भारवि आदि कवियों द्वारा वन-उपवन एवं जीव-जंतुओं सहित मनुष्य के पर्यावरण के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंधों का उल्लेख मिलता है।
प्रकृति को साथ लेकर चलने वाली मनुष्य की यह प्रगति यात्रा प्रायः मुस्लिम काल में भी अपने धार्मिक विश्वास के तहत यथावत् चलती रही। पश्चिम में भी परंपरागत धार्मिक विश्वास के अंतर्गत यही स्थिति बनी रही। किंतु समय ने पलटा खाया। यूरोपीय पुनर्जागरण के साथ यूरोप में विज्ञान एवं बुद्धिवाद के उद्भव के साथ भौतिकता की ऐसी आँधी उठी कि इसने मनुष्य और प्रकृति के चिर पुरातन रिश्ते को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। प्रगति के नाम पर भोग-विलास एवं संकीर्ण स्वार्थ मनुष्य का आदर्श बनकर रह गया।
20वीं सदी पर्यावरण के प्रति मानव के निष्ठुर, निरंकुश एवं संवेदनहीन व्यवहार की साक्षी रही है। बढ़ते औद्योगीकरण के कारण वायु प्रदूषण की स्थिति सबसे गंभीर है। विश्व के वायुमंडल में सतत 4 करोड़ टन 42 घुलती रहती है। पृथ्वी की सुरक्षा छतरी 3 (ओजोन परत) में बढ़ते प्रदूषण के कारण यूरोप महादेश जितना छेद हो चुका है, जिसमें प्रवेश करती पराबैंगनी किरणें स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। उपर्युक्त कारणों से पृथ्वी का तापमान सतत बढ़ता जा रहा है। यदि स्थिति यही रही तो ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से शीघ्र ही जल-प्रलय की स्थिति आ सकती है।
पर्यावरण में असंतुलन के कारण प्रकृति प्रकोप, सूखा, बाढ़, अकाल, भूकंप, महामारी, तेजाबी वर्षा एवं चक्रवातों के रूप में कहर बरसा रही है। इस तरह तथाकथित विकास, विनाश का दूत बनकर सामने आया है। अमेरिकी मनीषी जे. एम. हाक अपने ग्रंथ में ठीक ही फरमाते हैं कि प्रकृति पर अंतहीन आक्रमण एवं बिना सोचे-समझे हेर-फेर ने विकास के नाम पर एक ऐसी सभ्यता को जन्म दिया, जो मरुस्थल की जगह मरु-उद्यान खड़ा करने की बजाय मरु-उद्यान को मरुस्थल में बदलने वाली सिद्ध हुई।
हिमालय के अंचल में नवगठित उत्तराँचल राज्य के विकास के संदर्भ में ये चुनौतियाँ और भी अधिक मुँह बाए खड़ी है। विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधुँध कटाई, अनियोजित सड़क निर्माण, बड़े बाँध, उत्खनन, वन्य जीवों का बेरहमी से शिकार, अविचारित पर्यटन एवं पर्वतारोहण आदि कुछ ऐसी मानवीय गतिविधियाँ है, जो इस क्षेत्र के पर्यावरण तंत्र को अस्त-व्यस्त कर रही है। इनमें सबसे प्रमुख समस्या वनों का विनाश है। जिससे अनेकों समस्याएँ पैदा हो रही है। राष्ट्र वन नीति द्वारा निर्धारित 60 प्रतिशत का वन आवरण घटकर मात्र 28 प्रतिशत रह गया है। प्राचीनकाल से जड़ी-बूटियों का भंडार रहे हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में 2 से अधिक पादप प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर है। इनमें से कुछ तो ऐसी है, जो मात्र इसी क्षेत्र में पाई जाती है। अनियोजित एवं अवैज्ञानिक विकास के कारण ही यहाँ हर दो किमी. बाद एक भूस्खलन और हर 1 किमी. पर विशाल भूस्खलन सक्रिय है। बाढ़ और भूकंप ही बारंबारता बढ़ती जा रही है। एक दशक में ही उत्तराँचल उत्तरकाशी एवं चमोली के दो विकराल भूकंपों की विनाशलीला देख चुका है। इस संदर्भ में टिहरी जैसी विशाल परियोजना की उपयोगिता संदिग्ध ही है। पर्वतारोहण एवं साहसिक खेलों के कारण हिमालय कूड़े-कचरे के ढेर में बदलता जा रहा है, जो बहुत चिंताजनक है।
उत्तराँचल के पहाड़ी क्षेत्र में अनियंत्रित विकास प्रक्रिया के कारण इसके वातावरण में कई अप्रत्याशित परिवर्तन आ रहे है। बादल फटने की घटनाएँ कुछ ही वर्षों से प्रकाश में आई है, जिन्हें विशेषज्ञ वन विनाश की प्रतिक्रियास्वरूप मान रहे है। ग्लेशियर तेजी से पिघलते जा रहे है और बर्फबारी कम हो रही है। ‘स्नोलाइन’ क्रमशः ऊपर सरकती जा रही है।
पर्यावरण संकट की वर्तमान स्थिति पर गंभीर विचार करते हुए सी. सी. द्विवेदी एवं वी. एन. तिवारी अपने शोध-ग्रंथ में लिखते हैं, “मनुष्य का असीमित लालच अज्ञानता एवं जीवन के प्रति भौतिकता की दृष्टि प्रमुखतम इसके लिए जिम्मेदार है और प्रकृति से छेड़खानी के दुष्परिणाम केवल बाह्य संकट तक सीमित नहीं है, इसके मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव और भी गंभीर है, क्योंकि मनुष्य के अंतः करण-प्रकृति पर्यावरण से सीधा जुड़ा हुआ है।” नार्वे के दार्शनिक अर्नेनीस ने पर्यावरण का संबंध समस्त संसार व इनसान के बीच घनिष्ठता से जोड़ा है। उनके अनुसार विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक ग्रंथ श्रीमद्भगवद् गीता के 7वें अध्याय में इस बात को और स्पष्ट ढंग से समझाया गया है। उन्हें अष्टधा प्रकृति कहा गया है। पहले पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश पाँच बाहरी एवं मन, बुद्धि, अहंकार तीन आँतरिक आपस में खूब गहराई से जुड़े है। बाहरी हलचलें आँतरिक प्रकृति को प्रभावित किए बिना नहीं रह सकती।
इसी कारण डब्ल्यू. इस्टेट सोशियल इकॉलाजी एंड ह्यूमन बिहेवियर में लिखते हैं कि विकास के नाम पर अंधी दौड़ ने मनुष्य को प्रकृति से पृथक् कर एक व्यापक असंतुलन पैदा किया है। इससे प्रदूषणजन्य रोगों में तो वृद्धि हुई ही है मनोविकारजन्य रोगियों की संख्या भी करोड़ों में बढ़ी है। इसी मरह एम. रुथ एवं डॉ. इग्लेवी जैसे मनःशास्त्री मनोरोगों के लिए पर्यावरण की गड़बड़ी को जिम्मेदार मानते हैं इनके अनुरूप पर्यावरण का विघटन, अंतःकरण के विघटन को जन्म देता है। मनोविद् डॉ. वी. आर. शर्मा अपनी कृति ‘फ्रस्ट्रेशन, रीएक्शन ऑफ गवर्नमेंट एक्जेक्यूटिव्स’ में लिखते हैं कि फ्रस्ट्रेशन अथवा आशाभग्नता का स्पष्ट कारण पर्यावरण संबंधी विकृति है।
इसकी ओर स्पष्ट करते हुए येल विश्वविद्यालय के जे. डोलार्ड, एल डब्ल्यू. डोस, एन. ई. मिलर एवं ओगमीटर अपने संयुक्त अध्ययन ‘फ्रस्ट्रेशन एंड एक्शन’ में लिखते हैं, भग्नता व्यक्ति को आक्रामक बनाती है। यही आक्रामकता हिंसा को बढ़ाती है। इसी का अंतर्मुखी रूप अंदर-ही-अंदर घुटने के लिए बाध्य करता है, जिससे व्यक्ति परिवार एवं समाज से टूटने लगता है। यही क्रमशः व्यक्तित्व के विखंडन की ओर ले जाता है, जो व्यापक स्तर पर समाज में अनास्था, अनिश्चितता एवं असंतोषजन्य वातावरण बनाता है। मनोवैज्ञानिक संक्रामक रोग की तरह जनमानस में फैल रहे इस विघटन का कारण फ्रायड द्वारा बताई गई कामुक वासनाओं के दमन को नहीं बल्कि पर्यावरण एवं अंतःकरण के संबंधों का भुला देने तथा पर्यावरण से उत्पन्न विघटन को बताते हैं तथा इसके भी मूल में मनुष्य की संकीर्ण स्वार्थपरता एवं लोभवृत्ति को प्रमुख मानते हैं।
इस तरह पर्यावरण की दृष्टि से हिमालय की छाया में उत्तराँचल के विकास का वर्तमान स्वरूप न केवल अपर्याप्त है, बल्कि स्पष्ट रूप से नुकसानदायक भी, क्योंकि यह आर्थिक, सामाजिक, साँस्कृतिक एवं जैविक जीवन को एक साथ लेने में असमर्थ है। 21वीं सदी में आवश्यकता एक नए दृष्टिकोण की है, जो पृथ्वी पर जीवन को प्रकृति के मूल में सक्रिय ऋत व उसके सहज धर्म से जोड़े। भारत की समृद्ध-साँस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर यह सहज ही संभव हो सकता है। इस पृष्ठभूमि में किए गए अनुसंधानों के निष्कर्षों के अनुरूप समाधान पहाड़ी विकास को समग्र रूप देने तथा मनुष्य एवं प्रकृति के वर्तमान संबंधों के पुनर्निर्माण में निहित है।
संत रामदास अपने शिष्यों के साथ धर्म प्रचार के लिए जा रहे थे। रास्ते में निर्जन प्रदेश पड़ा, दूर तक कोई गाँव दिखाई न देता था। भोजन की समस्या उत्पन्न हुई, तो उन्होंने कहा, जो कुछ तुम्हारे पास है, उसे इकट्ठा कर लो और मिल-बाँटकर खाओ।
शिष्यों के पास कुल मिलाकर पाँच रोटी और दो टुकड़े तरकारी निकली। शिष्यों ने उसे भरपेट खाया और जो भूखे भिखारी उधर से निकले, वे भी उसी से तृप्त हो गए।
भानुवा नामक शिष्य ने पूछा, गुरुवर! इतनी कम सामग्री में इतने लोगों की तृप्ति का रहस्य क्या है? संत ने कहा, हे शिष्यों! धर्मात्मा वह है जो खुद की नहीं, सबकी बात सोचता है। अपनी बचत सबके काम आए इस विचार से ही तुम्हारी पाँच रोटी अक्षय अन्नपूर्णा बन गई। जो जोड़ते हैं वे ही भूखे रहेंगे। जिनने देना सीख लिया है उनके लिए तृप्ति के साधन आप ही आ जुटते हैं।
एक बार देवता और असुरों में इस बात को लेकर झगड़ा हो गया कि दोनों में से कौन बड़ा है? निर्णय के लिए दोनों पक्ष ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी ने इसके लिए एक परीक्षा की कसौटी सामने रख दी। उन्होंने दोनों को दो पंक्तियों में बिठाया और भोजन के लिए स्वादिष्ट पदार्थ परोसवा दिए। जब खाने का समय आया तो प्रजापति ने कुछ ऐसा किया कि उन सभी के हाथ कोहनियों पर से मुड़ने बंद हो गए। भोजन करने में दोनों के लिए ही कठिनाई थी। दैत्यों को अपना ही स्वार्थ सूझता था। इसलिए वे मुट्ठी भरकर ऊपर ले जाते और वहाँ से मुँह में छोड़ते। इस तरह बहुत कम ही मुँह में पहुँचा, शेष चेहरे पर गिरा और इधर-उधर फैला, अंत में उन्हें भूखा रहना पड़ा। पर देवताओं ने उदारता और परस्पर सहयोग की नीति अपनाकर एक-दूसरे के मुख में ग्रास देने की विधि अपनाई। एक ने अपने हाथ से दूसरे को भोजन कराया। फलस्वरूप सभी का पेट भर गया।
लगभग साठ-पैंसठ वर्ष पहले की बात है। फ्राँस के आल्पस पहाड़ों में वह पदयात्रा कर रहा था। इस क्षेत्र का उत्तरी हिस्सा बिलकुल ही वीरान था। वैसे तो यह पर्वतमाला तीन-चार हजार फीट से अधिक ऊँचाई की न थी, परंतु थी बिलकुल नग्न एवं वृक्षविहीन। बीच-बीच में कहीं-कहीं जंगली काँटों से भरे झुँड आ जाते थे। बहुत भटकने के बाद वह एक वीरान गाँव में पहुँचा। उसे बहुत प्यास लगी थी, पर वहाँ जो कुआँ मिला वह सूखा था।
जून का महीना था। सूर्य सिर पर था। बिना पानी की जगह पर ठहरने में कोई सार न देखकर उसने अपना सामान उठाया और आगे बढ़ गया। लगातार पाँच घंटे चलने पर भी कहीं पानी नहीं मिला। इतने लंबे सफर के बाद भी वही भूगोल था, छोटे-छोटे पहाड़ और कहीं-कही उन पर काँटों के झुँड।
थोड़ी देर बाद दूर एक लंबी काली चीज दिखाई दी। कोई सूखा पेड़ होगा, यह सोचकर वह वहाँ जा पहुंचा। देखकर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, यह तो चरवाहा था। कितनी देर से यह बिलकुल सीधा खड़ा था। यह इर्द-गिर्द की झाड़ियों में चरने वाली तीस-चालीस भेड़ों की निगरानी कर रहा था।
अपने मोटे कपड़े के लोटे से उसने उसे चल पिलाया। उसकी प्यास की तीव्रता देखकर वह उसे घर ले गया। टीले के मैदान में उसका घर था और एक छोटा-सा टूटा-फूटा कुआँ भी था। उसे उसका पानी पीने अमृत-सा लगा।
इस बीच उन दोनों में कोई खास बातें नहीं हुई। शायद वह बहुत ही कम बोलता था। ऐसे ही निर्जन क्षेत्र में रहने वाले कम ही बोला करते हैं, परंतु उसके चेहरे पर उसने गजब का आत्मविश्वास देखा। ऐसे निर्जन क्षेत्र में वह रहता था, यही आश्चर्य था उसने एक गुफा की कुछ मरम्मत कर उसको रहने लायक घर बना लिया था। अंदर सामान कम था, लेकिन सब साफ-सुथरा था। उसके कपड़े थिगडी वाले थे, परंतु साफ थे।
रात का भोजन दोनों ने साथ किया। खाने के बाद उसने अपने झोले में से चिरुट निकालकर उसको दी। मुस्कराते हुए वह बोला, मैं तंबाकू नहीं पीता। घर की देहरी पर बैठा उसका कुत्ता भी वैसा ही शाँत प्रकृति का था।
उस वृद्ध चरवाहे ने झोले में से ओक की सूखी गाँठें निकालकर सामने रखी और उनमें से बहुत ध्यानपूर्वक एक-एक गाँठ अलग करता रहा। जबकि वह दरी पर बैठा चिरुट पी रहा था। बीच में उसने पूछा कि मैं कुछ मदद कर सकता हूँ? तो उसने कहा, नहीं, यह तो मेरा ही काम है। काफी देर तर वह अपना काम करता रहा और आखिर में अच्छी-से-अच्छी गांठें चुनकर उसने दस-दस गांठों के दस ढेर लगा दिए। फिर उसने चुनी हुई सौ गाँठें एक झोले में भरकर रख दी और सो गया।
इस आदमी के साथ रहने में आनंद आ रहा था, इसलिए दूसरे दिन उसने और एक दिन रहने की अनुमति माँगी। उस व्यक्ति ने भी सिर हिलाकर हाँ कह दी और बोला, आपके रहने से मुझे कोई तकलीफ नहीं होगी। उसे आराम की कोई जरूरत नहीं थी, वह तो बस इस रहस्यमय मनुष्य को जानना चाहता था।
सुबह सीटी बजाकर उसने अपनी भेड़ों को बाहर निकाला और जाने से रात को चुनकर रखी हुई आठ सौ ओक की गाँठों के झोले को पानी में भिगो दिया। फिर कोने से लोहे की पतली कुदाली उठा ली और भेड़ों को लेकर टीले के उस पार चला गया।
थोड़ी देर बाद वह भी उस दिशा में गया। उसने वहाँ जाकर देखा कि वह पेड़ लगा रहा है। वह जगह चुन लेता वहाँ छोटा-सा गड्ढा करता और अपने झोले में से एक गाँठ निकालकर वहाँ गाड़ देता और ऊपर से मिट्टी ढाँप देता। ओ हो! तो यह ओक के पेड़ लगा रहा है। उसने पूछा, यह तुम्हारी जमीन है? उसने कहा, नहीं। इस जमीन के मालिक को तुम पहचानते हो? सिर हिलाकर बोला, नहीं। यह जमीन किसकी है, इसकी उसको कोई चिंता नहीं थी। वह तो सिर्फ पेड़ बो रहा था। अत्यंत ध्यानपूर्वक उसने सौ गांठें बो दी।
दोपहर के भोजन के बाद फिर वही काम चला। वह उससे सवाल पूछता गया और वह चरवाहा जवाब देता गया। पिछले तीन सालों से वह उसी वीरान प्रदेश में वे लगा रहा था। अभी तक उसने एक लाख ओक की गाँठ बोई थी। उनमें से बीस हजार बीजों के अंकुर निकल आए थे। इस क्षेत्र की भीषण गरमी में दस एक हजार में तो वैसे ही सूख जाएँगे या चूहे उन्हें नष्ट कर देंगे। इसकी आशंका तो उसको भी थी, फिर भी उसका अनुमान था कि दस हजार पेड़ तो उगने ही चाहिए। जहाँ एक भी पेड़ नहीं, वहाँ दस हजार पेड़ लहराएँगे।
कितनी उम्र होगी? मैंने पूछा। पचपन साल। धीरे से उसने कहा। और नाम? मुझे एलफर्ड बाफियर कहते हैं।
दूर मैदान के क्षेत्र में उसकी खेती थी। पहले इकलौता बेटा भगवान् के पास चला गया, फिर पत्नी गई और घर-खेती छोड़कर अपनी भेड़ों को लेकर वह इस निर्जन वीरान प्रदेश में चला आया। उसने देखा, इतना अच्छा क्षेत्र है, परंतु वीरान है, उसके पास कोई जरूरी काम भी नहीं है, तो क्यों न यहाँ पेड़ लगाए जाएँ! इस तरह इस वीरान प्रदेश में ओक के पेड़ लगाने का काम उसने प्रारंभ कर दिया।
उसने कहा, अगले तीस सालों में यहाँ ओक के दस हजार पेड़ खड़े होंगे, तब यह दृश्य कितना भव्य होगा?
अत्यंत सरलतापूर्वक उसने जवाब दिया, भगवान् की कृपा होगी और तीस साल जीने की मुझे इजाजत मिलेगी, तो भविष्य में मैं ही यहाँ इतने पेड़ लगाऊँगा कि दस हजार पेड़ की कोई गिनती ही नहीं होगी।
दूसरे दिन वह वहाँ से लौटा, अपने घर वापस आया। 1114 से 1118 तक उसे युद्ध के मोरचे पर रहना पड़ा। वहाँ पेड़-पौधों के बारे में सोचने का समय ही कहाँ था? सत्य बात तो यह थी कि उस घटना ने उसे इतना प्रभावित भी नहीं किया था। उसे तो केवल निरुद्देश्य घूमने का शौक था।
युद्ध खत्म हुआ। पाँच साल लगातार बारूद का धुआँ अंदर खींच-खींचकर उसकी नाक फट रही थी। शुद्ध हवा के लिए वह तड़प रहा था और एक दिन फिर से उस वीरान प्रदेश की ओर निकल पड़ा। अपने आप उसके पैर उस गाँव की ओर चल दिए। इतने साल के बाद वहाँ कुछ नहीं बदला था। एकाएक उसे वह चरवाहा याद आया और दस हजार ओक में पेड़।
पाँच साल के युद्ध में उसने अगणित लोगों को मरते देखा था। मौत के इस अनुभव के बाद एलफर्ड को भी मरा हुआ मानने में उसे कोई शंका नहीं थी। परंतु उस गुफा तक उसे पहुँचने पर मालूम हुआ कि वह मरा नहीं था। वह अच्छी तरह से स्वस्थ और प्रसन्न दिखाई देता था। लेकिन उसका धंधा जरूर बदल गया था। भेड़ों के बदले उसने मधुमक्खियों को पालने का काम शुरू कर दिया था। ओक के पेड़ों के लिए भेड़े दुश्मन सिद्ध हो रही थी। इस बीच में महायुद्ध हुआ, उसके बारे में उसको कुछ भी मालूम नहीं था। दुनिया लड़ती रही और यह बोफियर चुपचाप पेड़ लगाता रहा। इतने बड़े युद्ध ने उसके काम में थोड़ा सा भी अदल-बदल नहीं किया।
वर्षों पहले लगाए हुए पेड़ों की ऊँचाई अब उसके कंधों तक पहुँच चुकी थी। सामने का दृश्य कितना अद्भुत था। देखकर वह गदगद हो गया, कुछ भी बोल नहीं सका और वह चरवाहा भी चुप ही था। दिनभर वे दोनों चुपचाप जंगल में घूमते रहे। लगभग 11 किलोमीटर लंबा जंगल उसी चरवाहे की करामात थी। यह बात से बार झकझोरती रही। आधुनिक यंत्रों की कुछ भी मदद लिए बगैर बस लोटे और कुदाल के सहारे इस बोफियर ने कितना काम कर दिखाया। उसे लगा कि सृजन के बाद मनुष्य भगवान् से भी टक्कर ले सकता है।
जहाँ तक दृष्टि पहुँचती थी वहाँ तक कंधे बराबर ऊँचे पेड़ ही पेड़ लहराते नजर आ रहे थे। अब मजबूत हो गए थे और अब उन पर गरम हवा या चूहों का कोई असर नजर नहीं आता था। प्रलय के समय इन पौधों को कोई डर नहीं था।
उसके इस कार्य का असर चारों ओर फैल रहा परंतु वह उससे अनजान था। खंडहर में परिवर्तित उस कुएँ में फिर से पानी भर आया था। वर्षों से सूखी धरती पर अब अरण्य उग आने के कारण जगह जगह छोटे-छोटे झरने बहने लगे थे। छोटे-छोटे नदियों के आविर्भाव के कारण इस प्रदेश में हरियाली के मैदानों और जंगली फूल पौधों की बहार थी।
1902 के बाद हर साल वह बोफियर से मिलने जाने लगा। हर समय उसमें वही उत्साह और कार्य में निमग्नता थी। यह काम उसके लिए अत्यधिक कठिन था। एक साल उसने दस हजार बीज लगाए थे, परंतु उनमें से एक भी अंकुर नहीं फूटा था। पर उसने हिम्मत नहीं हारी।
एक सुनसान क्षेत्र में जंगल इतना बढ़कर खड़ा हो गया था और यह पराक्रम वर्षों से एकाकी जीवन बिताने वाले, वृक्ष लगाने वाले उसी चरवाहे का था, ऐसी कल्पना भी किस को नहीं हो सकती थी। उस क्षेत्र के सरकारी अधिकारियों ने तो मान ही लिया था कि वह प्रकृति की देन है और उस प्राकृतिक जंगल को संभालने के लिए कुछ वन विभाग भी शुरू हो गया था। 1933 में पहली बार वन अधिकारियों ने इस क्षेत्र का दौरा किया। जंगल की सरहद पर इस बूढ़े गड़रियों की झोंपड़ी देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। वह वहाँ पहुँचा तब बोफियर रसोई पका रहा था। उस अधिकारी ने उसको धमकाया। आग की चिंगारी कही जंगल में आग न फैला दें, इसके लिए उसको सावधान किया। वृद्ध बोफियर ने अधिकारी की सूचना का कोई जवाब नहीं दिया। जीवन के अंतिम दिनों में वह और भी कम बोलने लगा था। बोलने की अब शायद उसको जरूरत भी नहीं थी। वह 75 साल का हुआ था। अब वह अपनी झोंपड़ी से बाहर एक डेढ़ किलोमीटर दूर एक नया जंगल उगाने में मग्न था। रोज इतनी ज्यादा दूर आना-जाना अब उसकी शक्ति के बाहर लग रहा था। इसलिए उस नए जंगल के पास अपनी झोंपड़ी ले जाने की तैयारी में वह था ही। उसने अधिकारी को कोई जवाब देने की आवश्यकता महसूस नहीं की और वह वहाँ से चला गया।
1945 के जून महीने में जब वह उससे आखिरी बार मिला तब वह 87 साल का था। इस बार वह बस से गया था। “किसी दूसरे रास्ते से मैं उस गाँव में पहुँचा, ऐसा मुझे भ्रम हुआ, परंतु रास्ता वही था। वहाँ का सारा संदर्भ ही बदल गया। 1913 में इस गाँव में केवल तीन परिवार थे, परंतु आज वह गाँव आबाद और खुशहाल था। सभी घर साफ सुथरे थे। खेत हरियाली से लहलहा रहे थे और सब तो ठीक, स्वयं मौसम ही बदल गया था। पहले की सूखी गर्त हवा की जगह सुगंधित हवा चल रही थी। वह आवाज वृक्षों के साथ खेलने वाली हवा की आवाज थी। नजदीक से सुनाई देते झरने के निनाद ने तो मुझे चौंका ही दिया। उसी झरने के किनारे गाँव वालों ने एक नया जंगल खड़ा कर दिया। नई आशा और नई संभावना का मानो वह यहाँ पुनर्जन्म ही हुआ था।”
“पहले जहाँ खंडहर थे वहाँ अब मकान और लहलहाते खेत दिखे। दूर दूर तक अनेक नए गाँव बसे हुए थे। प्रदेश से आए हुए लोग प्रसन्नचित्त और हृष्ट-पुष्ट दिखाई दिए यौवन से प्रदीप्त चेहरों पर मुक्त हास्य देखने को मिला। अब इस क्षेत्र में हजार की नई आबादी संतोषपूर्वक अपना जीवन बिता रही है।”
वह सोच रहा था कि वह स्वयं फौज का उच्च अधिकारी है। बहादुरी के लिए उसे अनेक पुरस्कार मिले है। पर वास्तविक बहादुर कौन है, वह स्वयं अथवा बार वृद्ध चरवाहा? जिसने अकेले इतना विशाल सृजन कर दिया। आत्मचिंतन में मग्न उसकी आत्मा के स्वर फूटे “वास्तविक बहादुरी तो सृजन में हैं, ध्वंस में नहीं, क्योंकि सृजन में ईश्वर स्वयं अभिव्यक्त होता है।”
महर्षि दयानंद के एक शिष्य थे अमीचंद्र। वे गाते भी बहुत अच्छा थे व तबला भी बजाते थे। पर उन्हें शराब पीने की बुरी लत थी। दूसरे शिष्यों ने कहा, भगवन् इन्हें आप अपने साथ न रखें। इनसे हम सबकी प्रतिष्ठा गिरती है। स्वामी जी बोले, “पहले यह गाता था, पेट के लिए व मनोरंजन के लिए। अब जब से हम से जुड़ा है, भगवान की खातिर उन्हीं को सुनाकर गीत गाता है। यह स्वयं बदलेगा।” हुआ भी वही। प्रथा प्रभु के संदेश को फैलाने वाले गीत सुना सुनाते अमीचंद्र बदल गए, उनकी आदत भी छूट गई और समाज सुधार के कार्य स्वामी जी के सहयोगी बने।
दो भाई तीर्थयात्रा पर निकले। रुपये पैसे का उनके पास कोई अभाव न था। उनमें से एक भाई ने धन बाँटना प्रारंभ किया। वह हर भिखारी को धन बांटता चला जाता था। अच्छे बुरे, पवित्र, अपवित्र, इसे धन की आवश्यकता है अथवा नहीं, उसके मस्तिष्क में ऐसा कोई भी विचार न था। एक निर्धन गृहस्थ जो कई दिन के शीत के कारण व्याकुल था सामने से गुजरा। दूसरे भाई ने अपना कोट उतार कर उसे देते हुए कहा, लो भाई ठंडक से शरीर बचाओ, तुम्हारे पीछे एक परिवार लगा है।
छोटा भाई नत मस्तक हो गया। उसने अनुभव किया, तीर्थयात्रा का सही उद्देश्य तो भाई ने ही समझा है। जो पराये दुख को अपना मानता है, उसे जो आकुलता बाँटने की बनी रहती है, वही सच्ची भक्ति है।
भौतिकी के छात्र जानते हैं कि संसार में जितना भी पदार्थ विश्व संरचना के आदि में था, वह सदा सर्वदा यथावत ही बना रहता है; न घटता है, न बढ़ता है। मात्र उसका रूपांतरण होता रहता है। ठोस, द्रव, गैस के रूप में उसका परिवर्तनक्रम सतत चलता रहता है और नया बनने, पुराना बिगड़ने की सृष्टि प्रक्रिया अपने चित्र विचित्र रूप दिखाती, विश्व वसुधा की शोभा बढ़ाती है।
ठीक यही बात विचार संपदा के सम्बन्ध में भी लागू होती है। मनुष्य के सम्मुख कुछ मूलभूत प्रश्न हैं, कुछ सीमित इच्छाएँ आवश्यकताएँ है। सोचने, खोजने, समाधान निकालने के भी कुछ गिने चुने तरीके हैं। दैत्य और देव दो विचार पद्धतियाँ उनमें से प्रमुख है। एक वर्ग अन्यमनस्कों, अन्य संतोषियों का भी है, जिन्हें आलसी, प्रमादी, पिछड़े वर्ग जाता है। वे दबाव पड़ने पर ही कुछ सोचते और रहे हैं। इसी छोटी सी परिधि में मानवीय चिंतन और गतिविधि का गतिचक्र अपनी धुरी पर परिभ्रमण करता है। समय, सार नए तर्क, तथ्य, प्रकार, उदाहरण के कारण ताप बढ़ते घटते रहते हैं। मन क्षेत्र को जीवन का उद्गम उद्भव समझा जाना मनुष्य जैसा भी कुछ है, जैसा भी कुछ होने वाला है सब कुछ उसकी विचार संपदा का प्रतिफल है। चिंतन को यदि जीवनचर्या में सर्वोपरि स्थान मिले, उसे न तो अनुचित कहा जाना चाहिए और न अत्युक्ति। भगवान के बाद आदमी की इच्छा आवश्यकता मनःक्षेत्र जायेगी है। वही से उपलब्धियों का उपाय खोजा जाता है।
संसार पर्यटन में नया उपार्जन करने के लिए कि पुराना कचरा बुहारा जाता रहे। मल त्याग न करने पर आहार पेट में कैसे चलें? स्मृति का महत्व ही होता है। जिनकी स्मरण शक्ति तीव्र होती है, उन्हें और विभूतियाँ हथियाने की जरूरत अधिक होती है। और उसकी इच्छा सभी करते हैं।
स्मृति विस्मृति की सामान्य प्रक्रिया के मध्य कई बार ऐसी आवश्यकता पड़ती है कि किन्हीं बहुमूल्य विचार संपदाओं को विस्मृति के गर्त में उबारकर फिर से किया जाए और उस पुरातन का भी सामयिक लाभ लिया जाए, किंतु कठिनाई तब आती है, जब विस्मृति के उपयोगी स्मृतियों को खोज निकालना और क्षण भर प्रयत्न करने पर भी संभव नहीं होता।
सामान्य जीवन में भी लेन−देन में भूल पड़ने से कठिनाई होती है। उपयोगी व्यक्तियों का अत्यंत जाने से आवश्यकता पड़ने पर उस सूत्र के सहारे महत्वपूर्ण काम कर सकना संभव था, उसका मंच समाप्त हो जाती है। असामान्य जीवन इससे अरोग्य मानवीय अचेतन में प्रसुप्त विस्मृतियों का इतना भी डर भरा पड़ा है कि उसे एक छोटा मोटा ब्रह्मांड भी बना सकता है। जिस प्रकार कोई पदार्थ नष्ट नहीं होता उसी प्रकार मानसिक उपार्जन भी किसी न किसी रूप में उधम बना रहता है। इस अर्जित संपदा में से आवश्यकता है कुछ उपयोगी खोजा और बनाया जा सके निश्चित ही सामान्य न रहकर असामान्य स्तर कर सकेगा।
वंशानुक्रम की परंपरा में मनुष्य को पूर्वजों का तथा पीढ़ियों का संचित उत्तराधिकार उपलब्ध होता है। जन्माँतरों में जो सीखा गया था, वह भी पूर्णतः नहीं हो जाता। घटनाएँ इस जन्म की उस जन्म की। मनःसंस्थान में सुरक्षित रहती है। पर इसलिए प्रकृति उन्हें प्रसुप्त बनाकर स्थान भर है। मुरदे को जमीन में गाढ़ देने पर वह भी और जगत् भी नहीं घेरता। इतने पर भी उस अस्तित्व किसी न किसी रूप में चिरकाल तक है। ठीक इसी प्रकार सार्थक और निरर्थक विपुल भंडार मनुष्य के सीमित मनःसंस्थान में जमा रहता है।
प्रश्न यह है कि इन विस्मृतियों अतः के उपयोगी है, उन्हें किस तरह स्मृति के क्रम में लाया जाए यदि ऐसा है तो उत्तराधिकार से और जनम जन्माँतर जो समय -समय पर अर्जित होता रहा है, इतना अधिक लाभ उठाया जा सकता है कि मनुष्य सामान्य न रहे, देवमानवों की पंक्ति में जा बैठे, सिद्ध पुरुष कहा जाने लगे।
विस्मृति को स्मृति के रूप में बदला जा सकना संभव है। गरमी में दूब सूख जाती है, पर वर्षा होते ही उसे हरी होने में देर नहीं लगती। ठीक इसी प्रकार गुम गई स्मृति संपदा को फिर से जीवित जाग्रत बनाया और उसका समुचित लाभ उठाया जा सकता है। इस तथ्य को अब वैज्ञानिक समर्थन प्राप्त होने लगा है। अब नए सिरे से यह सोचा जाने लगा है कि नया ज्ञान प्राप्त करने को ही पर्याप्त क्यों माना जाए और क्यों न विस्मृत बहुमूल्य को पुनर्जागृत करके विलक्षण बना जाए। इस आकाँक्षा को उत्तेजित करने में विज्ञान की नवीनतम शोधें बहुत सहायक सिद्ध हो रही है।
स्मृति एक जटिल प्रक्रिया तंत्र है, जिसे जानने के लिए न्यूरोएनाटोमिस्ट, साइकोलॉजिस्ट, मॉलीक्यूलर बायोलॉजिस्ट एवं बायोकेमिस्ट वर्ग ने अनेकों प्रयास किए है। इन विभिन्न तथ्यों में से निष्कर्ष यह निकाला गया है कि स्मृति दो प्रकार की होती है, (1) क्षतिणक स्मृति, जो कुछ ही क्षणों तक याद रहती है जैसे, टेलीफोन डायरेक्टरी में नंबर देखने के बाद डायल घुमाने तक याद रहना। फिर आदमी सामान्यतया उसे भूल जाता है, बशर्ते वह नंबर नियमित अभ्यास में न हो।
(2) दीर्घकालीन स्मृति, जो संचित बनी रहती है और समय आने पर कुरेदबीन करने पर उभर आती है। मस्तिष्कीय ज्ञान तंतुओं में विद्यमान आर.एन.ए. स्मृति के स्वरूप के आधार पर आदेश देता है। इस रासायनिक परिवर्तन के कारण मस्तिष्क में घटनाएँ टाइप की तरह स्थायी रूप से लिख जाती है। वही प्रसंग पुनः आने पर वे घटनाएँ याद आती जाती हैं।
विस्मृति को स्मृति में बदलने के लिए सम्मोहन प्रक्रिया द्वारा मदद ली जा सकती है। मूर्द्धन्य मनोविज्ञानी इंवाँस ने एक घटना का अपने संस्मरणों में वर्णन किया है। पीट्सवर्ग में एक धनपति ने घर की दीवार में खजाना गाड़ने का एक रात स्थान बनवाया। संपत्ति रखकर दीवार चिन दी गई। बाद में सेठ की मृत्यु हो गई धन की आवश्यकता पड़ने पर पुत्र ने उस मिस्त्री को बुलवाया, जिसने वह गुप्त स्थान बनाया था। उससे वह स्थान बताने को कहा। दुर्भाग्यवश लाख कोशिश करने पर भी मिस्त्री विस्मृति के कारण वह बता सका। अंत में एक विशेषज्ञ के माध्यम से उसे सम्मोहित किया गया। वर्षों पूर्व की वह घटना उसे याद हो आई एवं उसी स्थिति में अनायास ही वह उस स्थान पर पहुँचकर इशारा करने लगा। खोदने पर वहाँ खजाना मिल गया।
प्रयोगों द्वारा पाया गया है कि 35 वर्ष की आयु के बाद मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं का पुनर्निर्माण नहीं होता। आयु बढ़ने के साथ मस्तिष्क को रक्त पहुँचाने वाली नलिकाएँ भी कड़ी होती चली जाती है, जिससे स्नायुकोष रक्त कम ही पाते हैं। उसी कारण वृद्धों को पुरानी संचित बातें तो ज्यों की त्यों याद रहती हैं, लेकिन वे तुरंत की बात को उसी समय भूल जाते हैं। ऑक्सीजन उपचार के माध्यम से कइयों को तुरंत की स्मृति को ठीक करने में सहायता मिली है, लेकिन प्राणवायु का प्रभाव समाप्त होते ही स्थिति पूर्ववत हो गई।
आधुनिक मनोविज्ञान ने सम्मोहन विद्या, इलेक्ट्रोडों द्वारा विद्युत प्रवाह, ऑक्सीजन उपचार के तीन उपाय सुझाए है और कहा है कि यदि इस दिशा में आवश्यक अनुसंधान और प्रयत्न किए जाएँ, तो मनुष्य जाति का अपार हित साधन हो सकता है और वह भूमि में गड़ा खजाना मिलने पर मालदार बन जाने वालों की तरह ज्ञान क्षेत्र में देखते जितनी विद्या पढ़ी थी, वह इस जनम में बिना अधिक परिश्रम किए देखते-देखते उपलब्ध हो सकती है और मंद बुद्धि समझे जाने वालो के लिए भी कालीदास जैसा विद्वान बन सकना संभव हो सकता है।
पुरातन मनोविज्ञान में समाधि, साधना, योगनिद्रा का उच्चस्तरीय प्रयोग होता रहा है। उसका छोटा रूप आधुनिक सम्मोहन विज्ञान है। इलेक्ट्रोडों द्वारा प्रसुप्त को जगाने के लिए जो झटके दिए जाते हैं, वह प्रयोजन ध्यान धारणा के सहारे प्रसुप्त संस्थानों को पुनर्जीवित करके भलीप्रकार पूरा हो सकता है। प्राणायाम में ऑक्सीजन उपचार के सुविस्तृत विज्ञान का समावेश है। इन उपचारों के सहयोग सामान्य मनुष्य का अनेक दृष्टियों से असामान्य बन सकना संभव है। विस्मृति के गर्त से निकलकर स्मृति का वाद पाया जा सकता है, इस प्रकार भूतकाल की संचित संपदा के सहारे, बिना नया उपार्जन किए, भविष्य को समुन्नत और सुसंपन्न बनाया जा सकता है।
एक संत से किसी ने पूछा, “मेरा दिल बहुत कड़ा है, इसमें मुलायमी लाने के लिए क्या करूं?” संत ने हंसकर कहा, “दररमंदो के सिर पर हाथ फिराया कर और अपनी रोटी बाँटकर खाया कर।”
(1) गीता, रामायण, भागवत, महाभारत और उपनिषद् आदि ग्रंथों का नियमित पाठ या अध्ययन करना।
(2) प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा जीवन को उत्कर्ष की ओर ले जाने वाले साहित्य का स्वाध्याय करना।
(3) ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत’ सूत्र के आधार पर अपनी समीक्षा करना।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि व्रतोँ से चेतना आध्यात्मिक उड़ान भरने की स्थिति में आती हैं। वह जितनी परिष्कृत और निर्मल होती जाती है, उतनी ही आँतरिक गहराइयों और जागतिक ऊँचाइयों को छूने लगती है। व्यावहारिक जीवन में जिन नियमों का अभ्यास किया जाता है, इस लेखमाला में जिनका दिग्दर्शन किया गया अथवा जो साधन संहिता सुझाई गई, उनका पालन करने से चेतना धीरे-धीरे निर्मल होती जाती है। लेकिन निर्मल होना अथवा उड़ान भरने की सामर्थ्य अर्जित करना ही पर्याप्त नहीं है। उड़ान, उत्कर्ष या विकास की दिशा क्या हो? यह भी महत्वपूर्ण है।
सिद्धि शक्ति मिल जाए और उपयोग के बारे में कुछ निश्चित नहीं हो तो उनका दुरुपयोग ही होता है। उपयोग नहीं किया जाए, तो वे व्यर्थ ही पड़ी और विकृत होती रहती हैं। धन की तरह सिद्धि सामर्थ्य की भी तीन ही दशाएँ हैं, उपयोग दुरुपयोग और संचय से निष्क्रियताजनित नाश। अहिंसा से तप तक यम नियमों के आठ अंग बता देने के बाद महर्षि पतंजलि ने नवाँ अंग स्वाध्याय बताया। मनीषियों ने स्वाध्याय की तुलना दर्शनेंद्रिय से की है, जो व्यवहार जगत् में देखती और अच्छा-बुरा समझकर देहपुरी के स्वामी को तदनुसार चलने का निर्देश देती है। देखने समझने की इस क्षमता को सक्रिय समर्थ बनाए रहने के उपाय का नाम है ‘स्वाध्याय’।
स्वाध्याय का मोटा अर्थ सत्शास्त्रों का अध्ययन है शाब्दिक अर्थ अपने आपका अध्ययन भी है। अपने आप के बारे में कोई पहचान या समझ अनायास ही नहीं आ जाती। वह मार्गदर्शक सत्ता से प्राप्त हुई हो, पिछले जनम के संस्कारों से उदित हुई हो या ईश्वर के अनुग्रह से जाग्रत हुई हो, तभी प्राप्त होती है। यह स्थिति ऊँची अवस्था में पहुँचे और किन्हीं कारणों से भटक गए साधकों को ही सुलभ होती है। भटकते रहने पर किसी घड़ी में कोई शुभ संस्कार जाग्रत होता है, तो अचानक ‘संबोधि’ का उदय होता है। वह क्षण दुर्लभ है और उसकी प्रतीक्षा में हाथ पर हाथ धरे नहीं रहना चाहिए।
साधकों के लिए निर्देश है कि गीता, रामायण, भागवत, महाभारत और उपनिषद् आदि ग्रंथों का नियमित पाठ करें। इसी शृंखला में अगला परामर्श प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा सत्साहित्य का अध्ययन करने के लिए ही गीता, रामायण, आदि ग्रंथों को शास्त्र कहा गया है। शास्त्र अर्थात् जो साधकों का शासन करते हैं, उन्हें व्यवस्थित होने की दिशा देते हैं। सभी धर्म-संप्रदायों में एक या एक से ज्यादा शास्त्र हैं। ये उस परंपरा में बहुत आगे तक गए साधकों या सिद्धजनों के अनुभव से निकलकर आए हैं। उनका अध्ययन मनन अनुयायी को साधना परंपरा में आगे बढ़ने के लिए शक्ति और प्रेरणा देता है। यहाँ गीता-रामायण आदि ग्रंथों का परामर्श कुछ विशेष कारणों से दिया गया है। गिनाए गए शास्त्रों को दो वर्गों में रख सकते हैं। एक तत्वदर्शनप्रधान और दूसरे कथानकप्रधान। गीता, उपनिषद् सूत्र आदि शास्त्र तात्विक है। रामायण, महाभारत और भागवत आदि ग्रंथों एक कथानक चलता है, जिसमें कई उपकथाएँ होती और उनके बीच में सिद्धाँत या व्यवहार का निरूपण होता है।
तात्विक ग्रंथों में भगवद्गीता का स्थान सर्वोपरि है। सात सौ श्लोकों के इस ग्रंथ में भारतीय दर्शन ही नहीं विश्व की सभी धर्म परंपराओं का तत्वज्ञान समाहित है। ज्ञान, भक्ति, कर्म, सदाचार, संन्यास, गृहस्थ, श्रद्धा तर्क, आत्मविद्या, समाज शास्त्र, व्यवस्था, राजनीति आदि विषयों का सूत्र रूप में आवश्यक मार्गदर्शन इस शास्त्र के उपदेश्यों ने कर दिया है। वर्णाश्रम धर्म के उपदेश से समाज शास्त्र युद्ध की अनिवार्यता और न्याय के लिए सन्नद्ध रहने के आशय से राजनीति, सात्विक तप और दैवी संपदा आदि के विवेचना से नैतिकता की विलक्षण समग्र प्रेरणाएँ इस शास्त्र में भरी हुई हैं।
सैकड़ों वर्षों से अकेला गीताशास्त्र धर्म दर्शन का समग्र संदेश दे रहा है। समय समय पर इस शास्त्र की युगीन व्याख्याएँ भी की जाती रही है। समय की आवश्यकता और परिस्थिति के अनुसार उन व्याख्याओं को समाज ने स्वीकार भी किया। मूल प्रेरणा एक ही है, “उद्वेरदात्मनाऽत्मानं” अपने आप अपना उद्धार करो। साधकों को इस शास्त्र के नियमित पाठ और भावों के चिंतन मनन की प्रेरणा इसलिए दी जाती है कि वे इसकी सहायता से अपने अंतर्जगत में प्रवेश करें। बिना किसी के बताए सिखाए लाखों लोग आज भी गीता के एक-एक अध्याय का नियमित पाठ करते हैं।
विकल्प के रूप में या गीता के साथ साधक उपनिषदों का अध्ययन भी कर सकते हैं दोनों ग्रंथों में अंतर नहीं है, कथ्य दृष्टि से गीता और उपनिषद् एक ही बात कहते हैं। आयाम और अनुभूति का क्षेत्र बदल जाने से शैली में अंतर हो सकता है। गीता को शास्त्रकारों ने सभी उपनिषदों का निचोड़ कहा है। वेदव्यास ने इसकी उपमा गौ के दुग्ध के रूप में देते हुए उपनिषदों को गायें कहा है, जिन्हें पार्थ रूपी बछड़े के लिए दुहकर श्रीकृष्ण ने साधकों के लिए प्रस्तुत कर दिया। लेकिन जिन्हें भगवद्गीता से संतोष नहीं है या जो अपना अध्ययन मनन का क्षेत्र और व्यापक रखना चाहते हैं, वे चाहें तो उपनिषदों का अध्ययन भी कर सकते हैं।
सत्साहित्य का अध्ययन ‘स्वाध्याय’ की अगली कड़ी है। आत्मविकास को दिशा देने और जीवन की गुत्थियाँ सुलझाने वाला साहित्य पढ़ने के लिए कम से कम आधा घंटा तो लगाना ही चाहिए। किस साहित्य को सत समझें और किसे असत्? इस प्रश्न का उत्तर कठिन है। जिसे पढ़ने से मन में आशा, उत्साह, स्फूर्ति, ऊर्जा और गुत्थियों को सुलझाने वाली दृष्टि का उदय हो, वह सत्साहित्य है। मनोरंजन, सूचना और देश काल की घटनाओं से परिचित रखने अथवा जीविका चलने का व्यवसाय में प्रगति करने वाला या सिखाने वाला साहित्य का अध्ययन इस श्रेणी में नहीं होगा। उसे पढ़ने की मनाही नहीं है, जितना आवश्यक हो उतना और उससे भी ज्यादा ऐसे संपर्क में रहे। स्वाध्याय का अर्थ उससे अलग है और वह सिर्फ आत्मचेतना के विकास में सहायक होने की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। इतना नहीं होगा कि परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखा गया सृष्टि या स्वयं सिद्ध और उत्कृष्ट श्रेणी की निधि है। साधना उपासना का प्रभाव हो रहा है या नहीं, इस सही दिशा में बढ़ रहे हैं या नहीं अथवा यथास्थिति ही बनी हुई है? यह जानने का उपाय समीक्षा के सिवा कोई नहीं हो सकता। साधना के क्षेत्र में जो भी पुरुषार्थ किया जाता है, उसका उद्देश्य अपने आपको ऊपर उठाना है। संत महात्माओं की प्रेरणा के अनुसार यह कार्य परमात्मा को पाना अथवा अपने क्षुद्र अहं को विराट चेतना में घुला मिला देना है। अपनी स्थिति की निरंतर समीक्षा की जाती रहे, तभी पता चलता है कि प्रगति हो रही अथवा नहीं? निश्चित और सुदृढ़ प्रगति अनायास नहीं हो जाती, न ही वह क्षण भर में घट जाने वाला चमत्कार है। अहंकार धीरे धीरे ही पोषण पाते हैं, आज जो ग्रहों किया जा रहा है। उसका स्थायी प्रभाव एक निश्चित अवधि बीतने पर ही पता चलता है। आज थोड़ी सी साधना कर लें और तीव्रता या मंद अभ्यास के अनुसार उसका प्रभाव देखने के लिए देर तक बैठे रहे, तो जीवनभर साधना करते हुए भी प्रगति नहीं होगी।
गायत्री परिवार के साधकों को आत्मसमीक्षा के लिए “हर दिन नया जनम और हर रात नई मौत” का एक ललित सूत्र आरीं से ही उपलब्ध है। सुबह उठते ही नया जन्म होने का बोध जगाना और दिनभर की योजना बनकर सूत्र का पूर्वार्द्ध है। इसमें अपने ईष्ट, ईश्वर या अस्तित्व अनुग्रह मानते हुए उन नियमों पर नजर दौड़ानी चाहिए, साधन संहिता में अंगीकार किए गए है। संकल्प करना चाहिए कि इनका यथाशक्ति पालन करेंगे। जानबूझ उल्लंघन नहीं होने दिया जाएगा इसके बाद दिनचर्या निर्धारण किया जाए और पूरे समय मनोयोग के साथ उस नियोजित रहा जाए।
ललित माँत्र का उत्तरार्द्ध सोने से पहले के लिए उस समय दिन भर के कामों की समीक्षा साधना संहिता पालन में हुई चूकों का पकड़ना और दोबारा उन्हें न होने देने का संकल्प करना चाहिए। समीक्षा के बाद आज का जीवन पूरा हुआ। जीवन यज्ञ में एक दिवस आहुति दी गई। अगले दिन और उत्कृष्ट आहुति प्रस्तुत करेंगे। यद्यपि ध्यान रखें कि साधन संहिता का उल्लंघन हुआ तो प्रायश्चित भी किया जाए। प्रायश्चित में कोई छोटा या कोई कम निश्चित किया जा सकता है।
बहुमूल्य जीवन को लोग आखिर क्यों गँवाते हैं? वे कौन से कारण हैं, जिनकी वजह से लोग आत्महत्या करते है? आत्महत्या के इन कारणों को व्यक्ति व समाज के सम्बन्धों में तलाश करते हुए सुविख्यात फ्रांसीसी समाज शास्त्री एमिल दुर्खिम कहते हैं कि आत्महत्या बहुत कुछ व्यक्ति का समाज के साथ सम्बन्ध, समाज की स्थिरता, अस्थिरता और समाज में संव्याप्त मूल्यों पर निर्भर करती है, जिससे कि व्यक्ति घिरा होता है। इस आधार पर अपनी पुस्तक ‘द स्यूसाइड’ में वह आत्महत्या को तीन रूपों में वर्गीकृत करते हैं, (1) एनामिक स्यूसाइड (2) इगोइस्टिक स्यूसाइड और (3) इल्ट्रइस्टिक स्यूसाइड। उनके अनुसार एनामिक स्यूसाइड तब होते हैं, जब सामाजिक संतुलन बुरी तरह से प्रभावित होता है। अमेरिका में 1931 के दौरान ‘ग्रेट डिप्रेशन’ का एक युग आया। जिसमें आत्महत्या की दर 10 से 16 प्रतिशत बढ़ गई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में अपने शत्रु से घिरे आस्ट्रियावासियों में आत्महत्या की यह वृत्ति अप्रत्याशित रूप से बढ़ी थी।
आतंकवाद से ग्रसित कश्मीर घाटी में भी इसी तरह से आत्महत्याओं को देखा जा सकता है। जिनकी संख्या तीव्र गति से बढ़ रही है। ‘द स्टेट्स ऑफ हेल्थ इन कश्मीर’ के नाम से छपे शोध पत्र में यह रहस्योद्घाटन छपा है कि आत्महत्या करने वाले अधिकाँश लोगों में किसी तरह के शारीरिक या मानसिक रोग की पूर्व शिकायत की थी। दुर्खिमब् ने विभिन्न देशों में अलग-अलग मानसिक कालखंडों में किए गए अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि विषम सामाजिक परिस्थितियों के अभाव के समय, आत्महत्या के विरुद्ध सबसे बड़ा सुरक्षा दल दूसरे लोगों के साथ मेल जोल व ऐक्य भाव होता है। आधुनिकतम अध्ययन की पुष्टि करता है।
स्यूसाइड में व्यक्ति अपने समाज के साथ साथ यहाँ बिना पाता। स्वयं को अलग थलग व असहाय अनुभव करता है। समूह या परिवार से दृढ़ पाकर उचित नहीं कर पाता। समाज का नियंत्रण उस पर कठोर होता है। यह स्थिति किसी शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न भी हो सकती है।
आत्महत्या का तीसरा स्वरूप है एल्ट्रइस्टिक स्यूसाइड। किसी समाज या संस्कृति के मूल्य उसके व्यवस्था तंत्र के कारण होते हैं। इन मूल्यों में गड़बड़ी के कारण व्यक्ति समाज या अपने परिवार कुटुँब के बंधनों में इतना जकड़ जाता है कि उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं बचता। अपने देश, जाति व समाज के नाम पर भावावेश में वह प्राणों का उत्सर्ग कर देता है भारत की सतीप्रथा व जापान की हाराकिरी इसके उदाहरण है। वियतनाम युद्ध में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा आत्महत्या व 1907 में जिम जोन के सौ से भी अधिक अनुयायियों द्वारा युयाना में आत्महत्या इसी के अन्य उदाहरण हैं।
मनःविशेषज्ञों के अनुसार आत्महत्या एक आक्रमण कृत्य है, जिसमें व्यक्ति का स्वयं को समाप्त करने के पीछे दूसरों को दुख देने का भाव निहित रहता है। सिम फ्रायड ने आत्महत्या पर सर्वप्रथम मनोवैज्ञानिक अध्ययन व शोध किया था। फ्रायड ने इसे आक्रामक वृत्ति का रूप माना है, इस कृत्य द्वारा व्यक्ति कल्पना में अपने नियम व आदर्श व्यक्ति पर प्रकार कर सुखानुभूति पाता है। स्वयं को समाप्त कर मानता है कि उसने उस व्यक्ति को खत्म कर दिया, जिसमें उसने अपनी पहचान बनाई फ्रायड का मानना था कि आत्महत्या किसी को मारने को नहीं इच्छा से पूर्व दमन के अभाव में नहीं हो सकती है। प्यार न मिल पाना भी व्यक्ति को आत्महत्या की ओर उकसा सकता है।
कार्ल मेनिंजर के अनुसार आत्महत्या व्यक्ति के रचनात्मक पक्ष पर उसके ध्वंसात्मक पक्ष की जीत है। मेनिंजर के अनुसार जीने की इच्छा ‘सुपर ईगो’ में विद्यमान स्वाभिमान के भाव पर निर्भर करती है। जब यह स्वाभिमान किसी भी कारण वश न्यून हो जाता है, तो आहत व्यक्ति भूखे व परित्यक्त शिशु की स्थिति में स्वयं को पाता है। जो समाविष्ट वस्तु का विनाश चाहता है। आत्महत्या क्षरा उस प्रिय वस्तु के नाश में सफल हो जाता है। जिसके समावेश ने सुपर ईगो की रचना में सहायता की थी। अपनी पुस्तक ‘मैन एगेन्स्ट हिमसेल्फ’ में मेनिंजर लिखते हैं कि व्यक्ति में किसी के प्रति हिंसा की भावना का अंत तीन रूपों में होता है, (1) मारने की इच्छा (2) मारे जाने की इच्छा और (3) मरने की इच्छा।
मनोवैज्ञानिक एल्फ्रेड एडलर आत्महत्या के कारण के रूप में मन में चल रहे द्वंद्वों की अपेक्षा व्यक्ति एवं समाज के बीच संबंधों को अधिक महत्व देते हैं। सामाजिक संबंध के बिना जीवन निरर्थक एवं निरुद्देश्य हो जाता है और आत्महत्या की ओर प्रेरित होता है।
मानव मन के मर्मज्ञ बौमेस्टर आत्महत्या को स्व से बचने या भागने का प्रयास का परिणाम मानते हैं। अपनी गलतियों कमियों व दुर्बलताओं के असहनीय अनुभवों के बोध से भागते ऐसे लोग अंततः ऐसी स्थिति में प्रवेश कर जाते हैं, जिसमें आत्महत्या के दुष्परिणाम के बारे में सोचने का अधिक श्रम करने की परवाह नहीं करते।
सुविख्यात मनीषी रोला के अनुसार मृत्यु ही जीवन को पूर्ण मूल्य देती है। अतः मृत्यु की निश्चितता हमें जीवन को गंभीरता से लेने के लिए प्रेरित करती है, जिससे कि हम अपनी क्षमताओं व शक्तियों का अधिकतम विकास व उपयोग कर सकें। इस संदर्भ में आत्महत्या जीवन से हार व इसे वृथा बरबाद करने का कृत्य है, क्योंकि इससे जीवन की समूची क्षमताओं की अनुभूति पर तुषारापात हो जाता है।
ब्राँस के अनुसार सभी आत्महत्याओं की पृष्ठभूमि छोटी -छोटी आत्महत्याओं द्वारा बनती है। जिनमें व्यक्ति दूसरों से कटता जाता है, जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेता है और जीवन मूल्यों की खोज बंद कर देता है। इस तरह आत्महत्या का अंतिम कुकृत्य अवास्तविक निर्णयों की एक लंबी शृंखला का परिणाम होता है।
एबनॉर्मल साइकोलॉजी इरविन और बखरा सरासान लिखते हैं कि 9 प्रतिशत व्यक्ति आत्महत्या करते समय किसी न किसी मनोरोग के शिकार होते हैं। मनोरोग में अवसाद व मूढ़ विकास को प्रमुख कारण माना गया है। इसके बाद व्यक्तित्व दोष एवं मादक द्रव्यों के सेवन को भी आत्महत्या का प्रमुख कारण बतलाया गया है। व्यक्तित्व दोष में समस्या के समाधान में अक्षमता, रचनात्मक दृष्टिकोण का अभाव, बिगड़े अंतर्वैयक्तिक संबंध, शरीर व मनःरोगों पर नियंत्रण का अभाव, सामाजिक सामंजस्य का अभाव आदि हो सकते हैं। अमेरिका में ऐसे 2379 व्यक्तियों पर किए गए अध्ययन के दौरान पाया गया है कि इनमें 98 प्रतिशत किसी न किसी प्रकार से रुग्ण थे। इनमें 94 प्रतिशत मनःरोग से पीड़ित थे।
एक आश्चर्यजनक तथ्य अध्ययन के दौरान उभरकर आया है कि अवसाद की गहनतम दशा से उबरने के दौरान ही आत्महत्या के अधिकाँश निर्णय लिए जाते हैं। अवसाद की घटना के दौरान मात्र एक प्रतिशत खतरा होता है, जबकि इससे राहत के दौर में खतरा 15 प्रतिशत अधिक बढ़ जाता है।
‘एबनॉर्मल साइकोलॉजी एंड मॉर्डन लाइफ’ पुस्तक के अंतर्गत फारवेदी और लिएमेन आत्महत्या करने वाले को 3 श्रेणी में विभाजित करते हैं। प्रथम श्रेणी वाले वास्तव में मरना नहीं चाहते। वे दूसरों पर अपने विषाद व आत्महत्या के विचार को व्यक्त करना चाहते हैं। ये न्यूनतम जहर न्यून जख्म या ऐसे ही गैरघातक तरीके अपनाते हैं और बचाव की पर्याप्त तैयारी रखते हैं। आत्महत्या का प्रयास करने वालों में दो तिहाई लोग इसी वर्ग में आते हैं। दूसरे श्रेणी के लोग मरने के लिए कृत संकल्पित होते हैं और कोई संकेत नहीं छोड़ते। ये अधिक घातक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। इस वर्ग में तीन से पाँच प्रतिशत लोग ही आते हैं। तीसरी श्रेणी में लोग अनिश्चित मनःस्थिति में रहते व मौत को भाग्य के हाथ छोड़ देते हैं। इसमें 3 प्रतिशत लोग आते हैं। इनके उत्प्रेरक कारण मनचाही वस्तु का खो जाना, जीवन में अर्थहीनता, आर्थिक समस्या, बिगड़े संबंध आदि कुछ भी हो सकते हैं, जिनमें समाधान की कुछ आशा शेष नहीं रहती है।
आत्महत्या के जैविक कारणों पर भी वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मनोचिकित्सक जे जॉन मान, वर्षों लंबे शोध के आधार पर आत्महत्या को गहरे विषाद का परिणाम नहीं बल्कि मानसिक दुर्बलता का परिणाम बताते हैं, जिसके कारण व्यक्ति भावनात्मक आवेग को सहन नहीं का पाता और इसके प्रवाह में बह जाता है। डॉ. मान आत्महत्या की प्रवृत्ति की जड़ मस्तिष्क के विशेष भाग प्रिफ्रंटल कॉर्टेक्स में तलाशते हैं मस्तिष्क का यही भाग मानवीय भाव संवेदनाओं की गंगोत्री है। इसी में सेराटॉनिन नामक न्यूरोट्राँसमीटर पाया जाता है। डॉ. मान की शोध के अनुसार सेराटॉनिन की मात्रा जितनी कम होगी, व्यक्ति आत्महत्या के लिए उतना ही अधिक उद्यत होगा। शराब सेवन करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में देखा जाता है कि सेराटॉनिन का स्राव कम होने लगता है। यही कारण है कि शराब पीने वालों में आत्महत्या की संख्या अधिक होती है।
‘एबनॉर्मल साइकोलॉजी- करेंट परस्पेक्टिव’ में रिचार्ड बूटनिम और जॉन रोस आत्महत्या का प्रमुख कारण अवसाद को मानते हुए कहते हैं कि इस स्थिति में आत्महत्या के विचार से शायद ही कोई बच पाता हो। सबसे उन्मत्त से लेकर सबसे सौम्य एवं विचारशील व्यक्ति तक जीवन में हताशा-निराशा के दौर में ऐसे विचारों की चपेट में आ सकता है। फ्रायड जैसा मनोचिकित्सक तक इस विचार से अछूता नहीं रह पाया। 39 वर्ष की आयु में ऐसे ही एक दौर में अपने एक आत्मीय संबंधी के नाम उसने लिखा था कि लंबे समय से मेरे मन में जीवन को समाप्त करने का विचार उठ रहा है, जो तुम्हारे खोए जाने की घटना से अधिक दर्द भरा नहीं है। विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक व भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एस राधाकृष्णन ने लिखा है कि विधेयात्मक विचारों के अभाव में हर व्यक्ति अपने जीवन में एक बार आत्महत्या की बात अवश्य सोचता है।
आत्महत्या के विचार एवं इसके वीभत्स कृत्य के बीच की दूरी व्यक्ति की संघर्ष शक्ति व जीवटता द्वारा निर्धारित होती है। जो कि आधुनिक युग में भोग लिप्सा एवं प्रगति की अंधी दौड़ में बेतहाशा निचुड़ती जा रही है। इसका रहस्य आत्मसंयम- सादगी व उदारता सहिष्णुता वाली जीवनशैली में निहित है। आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को अपनाकर ही हम आत्महत्या के विचार प्रवाह को ध्वस्त कर पाएँगे व आत्महत्या की बाढ़ को थाम पाएँगे और तभी मालूम हो सकेगा कि जीवन बहुमूल्य और बेशकीमती है।
किसी व्यक्ति ने सुना, बीस फुट मिट्टी खोद लेने से पानी निकल आता है, कुआँ बन जाता है। वह कुआँ खोदने में लग गया। बीस की अपेक्षा पच्चीस फुट खुद गया, फिर भी पानी नहीं निकला वह व्यक्ति उस आदमी के पास गया और पानी न निकलने की शिकायत की।
अगले दिन उस व्यक्ति ने जाकर देखा तो पाया, कुआँ खोदा तो गया, पर गहराई में नहीं लंबाई में। उसने कहा, भाई इतना परिश्रम करने की अपेक्षा पहले विधि पूछ लेते तो अच्छा था। ज्ञान की सार्थकता, उसे पूरी तरह समझ लेने में ही है, अधूरी वार्ता सुनकर कृत्य करने वाले धोखा ही खाते हैं।
संस्कृत का उद्भट विद्वान वरदराज कभी विद्यालय का सबसे बुद्धू लड़का था। बहुत पढ़ने पर भी उसे कुछ याद न होता। दुखी होकर वह घर से भाग गया। रात एक सराय में बिताई। वहाँ उसने देखा, एक टूटे पंखों वाला पतिंगा दीवार पर चढ़ता और गिर जाता है। बीस बार असफल रहने के बाद इक्कीसवीं बार वह दीवार पर चढ़ गया। इस दृश्य से वरदराज को एक नई हिम्मत मिलीं वह घर लौटा और फिर पढ़ने में जुट गया। इस बार उसकी असफलता सफलता में बदल गई।
एक किसान था। स्वभाव से था काहिल। दिनभर में चार बार घर लौटता, बार-बार खाना माँगता। पत्नी न तो कुछ उत्साह दिखाती और न ही हर बार खाना देती। उसकी इस टाल मटोल और उपेक्षा से किसान बड़ा दुखी रहता था। यह बात उसने अपने मित्र को बताई। मित्र ने उसके कानों में कुछ कहा। किसान खुशी होकर चल पड़ा। उस दिन वह घर नहीं गया सूर्यदेव सिर पर चढ़ आए, तो देखा पत्नी स्वयं ही भोजन लिए खेतों पर आ उपस्थित हुई। यही नहीं उसने सत्कार भी जताया, प्यार भी। उस दिन का भोजन उसे विशेष तृप्तिदायक लगा। उसने पत्नी से पूछा, प्रिये! पहले तुम उपेक्षा दिखाती थी और आज अपनत्व। श्रम तो मैं पहले भी करता था, अभी भी, फिर तुम्हारे व्यवहार में अंतर क्यों? पत्नी बोली, “स्वामी! आपने श्रम को मनोयोग पूर्वक करने की महत्ता समझ ली। हमारी समृद्धि और प्रसन्नता का मूल भी यह है। बस समझ लें, यह उसी की प्रतिक्रिया है।’
भ्रष्टाचार भौतिक पदार्थ नहीं है। यह मनुष्य की अंतर्निहित चारित्रिक दुर्बलता है। जो मानव के नैतिक मूल्य को डिगा देती है। यह एक मानसिक समस्या है। भ्रष्टाचार धर्म, संप्रदाय, संस्कृति, सभ्यता, समाज, इतिहास एवं जाति की सीमाएँ भेदकर व्यापकता का परिचय देता है। वर्तमान समय में शासन, प्रशासन, राजनीति एवं सामाजिक जीवनचक्र भी इससे अछूते नहीं हैं। इसने असाध्य महामारी का रूप ग्रहण कर लिया है। यह किसी एक समाज या देश की समस्या नहीं है वरन् समस्त विश्व की है।
आचार्य कौटिल्य ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘अर्थशास्त्र’ में भ्रष्टाचार का उल्लेख इस तरह से किया है, ‘अपि शक्य गतिर्ज्ञातु पतताँ खे पतत्त्रिणाम्। न तु प्रच्छन्न भवानाँ युक्तानाँ चरताँ गति।’ अर्थात् आकाश में रहने वाले पक्षियों की गतिविधि का पता लगाया जा सकता है,किंतु राजकीय धन का अपहरण करने वाले कर्मचारियों का गतिविधि से पार पाना कठिन है। कौटिल्य ने भ्रष्टाचार के आठ प्रकार बताए हैं। ये हैं प्रतिबंध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन एवं अपहार। विभिन्न विद्वानों ने इस विषय में अपना भिन्न-भिन्न मत प्रतिपादित किया है। जनरल नेजुशन ने भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय कैंसर की मान्यता प्रदान की है। उनके अनुसार यह विकृत मन मस्तिष्क की उपज है। जब समाज भ्रष्ट हो जाता है, तो व्यक्ति और संस्थाओं का मानदंड भी प्रभावित होता है। ईमानदारी ओर सचाई के बदले स्वार्थ और भ्रष्टता फैलती है। इस परिप्रेक्ष्य में चीन के सक्रिय समाजसेवी वाँग एन शिन्ह (121 - 86 एडी) का कहना है कि सामाजिक दुरवस्था का कारण है, कानूनी दोष एवं गलत अनैतिक तत्वों का प्रभुत्व स्थापित हो जाता है। यही से भ्रष्टाचार का अंकुरण होता है।
इस्लामी विद्वान अब्दुल रहमान इबन खाल्दुन (1332-1406) समाज की नींव में भ्रष्टाचार रूपी दीमक को नष्ट करने में कामयाब न हो सके। अतः अपने कडुए अनुभव से उन्होंने कहा, व्यक्ति जब भोगवाद वृत्ति का अनुकरण करता है, तो वह अपनी आय से अधिक प्राप्ति की प्रबल कामना करता है, इसलिए वह मर्यादा की हर सीमाएँ लाँघ जाना चाहता है और जहाँ ऐसा प्रयास सफल होता है, तो भ्रष्टाचार का ‘चेन रिएक्शन’ प्रारंभ होता है। राजनीतिक विचारकों के अनुसार मनुष्य के लोभ का बढ़ना मानसिक द्वंद्व को जन्म देता है व पूँजीवादी औद्योगिक व्यवस्था के कारण भ्रष्टाचार का जन्म होता है।
डब्ल्यू एफ वर्थिम ने ‘सोशियोलाजिकल एस्पेक्ट्स ऑफ करप्शन इन साउथ ईस्ट एशिया’ में स्पष्ट किया है। कि भ्रष्टाचार आमतौर पर सार्वजनिक व्यय में घोटाले के दोष को कहा जाता है इस तरह भ्रष्टाचार तीन तरह के अर्थों के लिए प्रयुक्त होता है, रिश्वत, लूट-खसोट और भाई भतीजावाद। इन तीनों की प्रकृति एक समान होती है। अगर इसके चरित्र का विश्लेषण किया जाए, तो इस तरह होगा, यह सदा एक से अधिक व्यक्तियों के बीच होता है। जब यह दुष्कृत्य एक व्यक्ति द्वारा होता है, तो उसे धोखेबाज कहते हैं और एक से अधिक व्यक्तियों के बीच होता है। तो भ्रष्टाचार कहलाता है। मुख्यतः यह गोपनीय कार्य है। व्यक्ति आपसी मंत्रणा कर अपने निहित स्वार्थ हेतु यह कदम उठाते हैं। इसमें नियम और कानून का खुला उल्लंघन नहीं किया जाता है, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से जालसाजी की जाती है।
भ्रष्टाचार भिन्न-भिन्न देशों में उसकी स्थिति एवं साँस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर होता पाया गया है रिश्वतखोरी अविकसित देशों में अधिक पाई जाती है। वहाँ पर मूल्य नियंत्रण, उत्पादन एवं व्यापारिक गतिविधियाँ इससे अत्यंत प्रभावित होती है। भारत में भ्रष्टाचार की एक विशिष्ट शैली है जो विश्व के अन्य देशों से एक दम अलग है।
भ्रष्टाचार पनपने के कई कारण है। नेतृत्व क्षमता में कमी से भ्रष्टाचार पनपता है। चीन और जापान में एक कहावत हैं, “बाँसुरी जितनी तिरछी होगी उससे प्रवाहित हवा उतना ही प्रभावित होगी।” इसी तरह भ्रष्टाचार नेतृत्व क्षमता पर निर्भर करता है। यदि यह क्षमता कुशल एवं सुग्राही है, तो भ्रष्टाचार की संभावना कम होती है, अन्यथा यह बढ़ती है। भ्रष्टाचार के आम कारणों में धार्मिकता और नैतिकता की कमी, उपनिवेशवाद, अशिक्षा, गरीबी, काफी के प्रति निष्ठा और ईमानदारी का अभाव, शासन की संरचना, सामाजिक अवस्था आदि आते हैं।
भ्रष्टाचार की उत्पत्ति कहाँ एवं कैसे हुई? इस संबंध में विद्वानों में मताँतर है। कुछ विद्वान पूर्वी यूरोप के रुमानिया एवं नाइजीरिया जैसे साम्यवादी देशों में इसकी उत्पत्ति मानते हैं। वहाँ पर भ्रष्टाचार के नए-नए कीर्तिमान स्थापित किए गए है। विश्व का भ्रष्टतम माने जाने वाला देश नाइजीरिया है। जहाँ लोगों के बैंक खाते भी सुरक्षित नहीं माने जाते। स्टाँशिस्लाव एंड्रेस्की के मतानुसार लेटिन अमेरिका के दो राष्ट्रपति क्रमशः 7 करोड़ एवं 4 करोड़ अमेरिकी डालर के घोटाले में लिप्त थे प्राचीन ग्रीस, रोम, चीन और भारत में यह दुष्प्रथा चली आ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार एशिया में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भ्रष्टाचार का तीव्र विकास हुआ।
‘द ग्लोबल कंपीटीटीवनेस रिपोर्ट 1996 ने दुनिया में भ्रष्ट देशों का आँकड़ा प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार ये देश हैं, इटली, स्पेन, चीन, अर्जेन्टीना, तुर्की, मैक्सिको, इंडोनेशिया, भारत फिलीपींस, पाकिस्तान कोलंबिया बेनेजुएला और रूस। सन 1999 में भारत चार सबसे भ्रष्टतम देशों में से एक था। विश्व बैंक ने 69 देशों के 36 फर्मों का सर्वेक्षण किया। इनमें से 4 प्रतिशत से अधिक फर्मों ने रिश्वत की बात स्वीकारी। सर्वेक्षण में पाया गया कि भ्रष्टाचार के मामले पूर्व सोवियत संघ और अफ्रीका में अधिक थे। पूर्वी एशियाई देशों में यह दर आर्थिक विकास के साथ साथ बढ़ी। विश्व में भ्रष्टाचार 5 से 7 प्रतिशत है। परंतु भारत में यह 20 से 28 प्रतिशत है। सितंबर 1999 में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में दिल्ली का एक बैंक सबसे भ्रष्ट बैंक की सूची में था।
भ्रष्टाचार सदियों से मानव सभ्यता को प्रभावित करता रहा है। भारत की तो यह ज्वलंत समस्या है। लगता है भ्रष्टाचार का दुष्ट ग्रह भारत की कुँडली में स्थायी रूप से आसन जमाकर बैठ गया है। इसके निराकरण का हर प्रयास उसे पूर्व की अपेक्षा और अधिक प्रबल और प्रभावी बनाता आ रहा है। एक युग था जब घोटाले हजारों रुपयों में होते थे, बहुत हुआ तो चंद लाख रुपयों में। अब तो करोड़ों और अरबों रुपयों में घोटाले हो रहे हैं।
भारत में यह एक सामान्य बात हो गई है। पिछले पचास सालों में अनेक घोटाले हुए है। सर्वप्रथम 1947 में जीप घोटाला सामने आया। पाकिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण किए जाने के समय ब्रिटेन स्थित भारतीय उच्चायुक्त बी. के. कृष्णमेनन ने एक कंपनी को 463 जीपों का ऑर्डर दिया। ये जीपें सही नहीं पाई गई और युद्ध विराम के बाद पहुँची। 1941 में रत्न ठेका घोटाले में विंध्य प्रदेश के उद्योगमंत्री रँगे हाथों पकड़े गए। उन्होंने पन्ना के एक रत्न ठेकेदार से 25 रुपये की रिश्वत ली थी। मंत्री जी को तीन साल की सजा हुई।
सन् 1951 का साइकिल पाट्स रेकेट काँड में केंद्रीय आयोग और व्यापार सचिव एस. ए. वेंकटरमन सम्मिलित थे। उन्होंने एक कंपनी को साइकिल के पाट्स आयात करने का बड़ा ठेका दिया। इसमें धाँधली हुई थी। सन् 1951 में कानपुर के उद्योगपति हरिदास मूँधरा ने अपनी कंपनी के भाव बढ़ाने के लिए जीवन बीमा निगम से एक करोड़ रुपये हासिल किए। इस घोटाले में तत्कालीन वित्त मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था। सन् 1962 में जयंती धर्मसिंह ने जहाजरानी कंपनी खोली, जिसमें उसने अपने मात्र 2 रुपये लगाए और सरकार से 22 करोड़ रुपये का कर्ज लिया, उसने ग्राहकों से बड़ी मात्रा में अग्रिम भुगतान लेकर लीथेस्टाइन बैंक में जमा किया। यह एक बड़ा घोटाला था।
सन् 1964 में एक कमेटी ने अपनी जाँच में पाया कि पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रिश्तेदारों ने उनके कार्यकाल में अथाह संपत्ति जमा कर ली थी। उस अरोप के बाद मुख्यमंत्री को अपना पद छोड़ना पड़ा। सन् 1971 में भूतपूर्व सेना अधिकारी रुस्तम सोहराब नागरवाला ने स्टेट बैंक के मुख्य कैशियर में इंदिरा गाँधी की नकली आवाज पर 6 लाख रुपये निकलवा लिए। इस काँड में अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल पाए गए, परंतु उन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई।
सन् 1974 में पाँडिचेरी के तुलमोहन राम नामक व्यापारी ने 21 साँसदों के फर्जी हस्ताक्षर करके केंद्रीय उद्योग मंत्रालय को आयात लाइसेंस देने की अर्जी दी। जब इसका पर्दाफाश हुआ, तो अनेक अधिकारी पकड़े गए, परंतु उन पर भी कोई कार्यवाही न हो सकी। सन 1982 में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पर चुरहट बाल कल्याण संस्था के नाम पर 5.4 करोड़ रुपये इकट्ठा करने का आरोप लगा।
इन घटनाओं के बाद तो घोटालों की बाढ़ सी आ गई। कोई भी वर्ष किसी एक घोटाले के लिए याद किए जाने के लिए कम पड़ने लगा। तेजी से घटे घोटालों की यह शृंखला आगे बढ़ चली। अन्य चर्चित घोटालों में सीमेंट घोटाला, एचडब्ल्यू डी पनडुब्बी और बोफोर्स तोपों का मामला (1987), एबीबी लोको सौदा (1993), चीनी घोटाला (1994), जैन हवाला काँड (1995), यूरिया घोटाला (1996), टेलीकॉम घोटाला (1996), इंडियन बैंक घोटाला (1996), आयुर्वेद घोटाला (उप्र 1997-98) आदि हैं।
हमारे देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार अपने चरम सीमा पर पहुँच गया है। इसके अलावा शासन, प्रशासन, संस्थाएँ सभी इस महामारी की चपेट में हैं। सामान्य जीवनचक्र भी इससे अछूत नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु तक की हर गतिविधियाँ इसके दायरे में आ गई है। सरकारी अस्पताल में निःशुल्क जन्म एवं प्रमाण पत्र के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। इसके लिए 1 से 3 रुपये तक खरच करने पड़ते हैं। किसी अच्छे स्कूल, कॉलेज या व्यावसायिक संस्था में प्रवेश के लिए डोनेशन न्यूनतम राशि 5 ये 5 लाख रुपये तक हो सकती है। रिश्वत के बगैर तो रोजगार एवरेस्ट शिखर फतह करने जैसा है। इंजीनियरिंग क्षेत्र के लिए दो से पाँच लाख, लेक्चररशिप हेतु एक से तीन लाख, कंपनी मैनेजर के लिए पाँच से दस लाख रुपये देने पड़ते हैं। यहाँ तक कि आर.टी.ओ. आफिस के बाबू बनने के लिए कई लाख खरचने पड़ सकते हैं। जो संस्था या दफ्तर जितना महत्वपूर्ण है, उसके कर्मचारी भी उतने महँगे साबित होते हैं।
भ्रष्टाचार का यह दर्शन बेहद अमानवीय है। पहले तो यह जनसामान्य को अमानवीयता, असम्मान, अन्याय, असुरक्षा और असमानता के हवाले छोड़ देता है। किसी की पीड़ा एवं कसक इसके लिए बेमानी नजर आती है।
भ्रष्टाचार उन्मूलन हेतु केवल कानून बनाना ही एक मात्र विकल्प नहीं हो सकता। इसके लिए व्यक्ति के लिए अंदर चारित्रिक सुदृढ़ता, ईमानदारी और साहस होना अनिवार्य है। क्योंकि भ्रष्टाचार रूपी दैत्य से जूझने के लिए अंदर और बाहर दोनों मजबूत होना चाहिए। भ्रष्टाचार की जड़ें इन दोनों क्षेत्रों में गहरी हैं। अतः जागरुकता यह पैदा की जाए कि व्यक्ति को लोभ, मोह को छोड़कर साहस एवं बलशाली होना चाहिए। यह विचार एवं भाव सभी जाते के अंदर से उमगे, तो ही भ्रष्टाचार रूपी महाकुरीति का उन्मूलन संभव है।
मदनमोहन मालवीय किसी अँग्रेज अफसर से मिलने जा रहे थे। अभी थोड़ी ही दूर पहुँचे थे कि रास्ते में पड़ी हुई एक निर्धन स्त्री दिखाई दी। उसके पाँव में घाव हो गए थे। मक्खियाँ काट रही थी, इससे उसे असह्य वेदना हो रही थी।
मालवीय जी ने अपनी घोड़ागाड़ी रुकवाई। स्वयं उतरे और उस स्त्री को उठाकर गाड़ी में बैठाकर अस्पताल की ओर चल पड़े। एक युवक ने यह देखा, तो दौड़-दौड़ आया और बोला, पंडित जी इस स्त्री को लाइए मैं अस्पताल पहुँचा देता हूँ। आप किसी आवश्यक कार्य से जा रहे है, वहाँ जाइए। आपका समय ज्यादा मूल्यवान है।
मालवीय जी ने कहा, यह कार्य ज्यादा आवश्यक है, मैं इसी के लिए जिंदा हूँ। यह कहकर उन्होंने गाड़ी आगे बढ़वाई और उस स्त्री को स्वयं अस्पताल पहुँचाकर आए।
गीता में कृष्ण अर्जुन संवाद में जो चर्चा हुई है वह वस्तुतः हर व्यक्ति के अंतरंग पर लागू होती है। अर्जुन के व्यामोह को देख सूत्र संचालक भगवान श्रीकृष्ण सचेत हुए और बाहर से प्राणवान दीखने पर भी भीतर से दीन दयनीय, कृपण कायर की तरह व्यवहार कर रहे अर्जुन को धिक्कारा, उसे आत्मबोध का ज्ञान कराया। वस्तुतः यही आत्मबोध अर्जुन का दूसरा जन्म था। गाँडीवधारी अर्जुन ने जब श्रीकृष्ण से कहा-
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव॥
उनका अंतः का ऊहापोह दूर हुआ और वे भगवान के निर्देशानुसार चलने को उद्यत हुए। यह आत्मबोधजन्य उपलब्धि है। अपना अंतः जिसे कहे, उस आत्मज्ञान की प्राप्ति के बाद, ईश्वरीय संदेश मानकर जब मनुष्य चल पड़ता है तो ध्येय प्राप्ति सुनिश्चित है।
वृक्ष वनस्पतियाँ भी मनुष्य की ही तरह संवेदनशील होती हैं। वे परिवेश की सरदी-गरमी एवं ऋतु प्रभावों को ही ग्रहण नहीं करती, बल्कि वातावरण में विद्यमान ध्वनि, प्रकाश एवं विचार प्रवाह से भी प्रभावित होती है। संगीत की सुमधुर स्वरलहरियाँ जहाँ उन्हें आनंदित करती हैं व उनके विकास को गति देती हैं, वही कर्कश ध्वनियाँ उन्हें कष्ट पहुँचाती है व उसके विकास में अवरोध बनती हैं। वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षणों की कसौटी पर कसते हुए ये तथ्य प्रकाश में आ रहे हैं और कण-कण में व्याप्त चैतन्य सत्ता के अस्तित्व को प्रमाणित कर रहे हैं।
टेंपल बुअल कॉलेज, डेनवार की श्रीमती डोरोथी रिटलेक ने पौधों पर स्थानीय रेडियो स्टेशन से प्रसारित होने वाले रॉक संगीत को आजमाया और अन्य पौधों पर दूसरे स्टेशन से प्रसारित क्लासिकल संगीत को आजमाया। रॉक संगीत के प्रति पौधों की नकारात्मक प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी, जिसमें पौधों को 8 अंश के कोण पर विपरीत दिशा में झुकते देखा गया। उनकी जड़ संरचनाएँ उथली थीं और संगीत केंद्र से दूर फैली थीं। पौधों के तने और पत्ते छोटे व दुर्बल थे और कुछ तो प्रयोग के कुछ दिन बाद ही मुरझा गए। इनमें ‘पेंटुनियम’ पौधे ने तो फूलना ही बंद कर दिया।
दूसरी ओर ‘स्कवैशवाइन’ के पौधों ने रेडियो के चारों ओर लिपटकर ऊपर चढ़ना शुरू किया, जिससे मधुर क्लासिक एवं धार्मिक संगीत बज रहा था। पेंटुनियम का पौधा भी छह सुँदर फूलों से खिल उठा था। इन पौधों की जड़ें मजबूत हुई और पौधे भी बड़े एवं पुष्ट दिखाई दिए।
इन परिणामों से उत्साहित होकर श्रीमती रिटलेक ने दूसरे वर्ष इसी प्रयोग को पुनः दुहराया। इस बार शोध के आयामों को और विस्तार दिया गया और पौधों को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों पर कड़ी नजर रखी गई। परिणाम पुनः वही थे। रिटलेक का कहना है कि इन प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर वनस्पति जगत् को पृथ्वी की जड़ इकाई मान बैठना, मनुष्य की बड़ी भूल होगी, क्योंकि इनमें मनुष्य की तरह अनुकूल व प्रतिकूल प्रवाह को अनुभव करने की पर्याप्त संवेदनशीलता विद्यमान है। हाँ, इनकी अभिव्यक्ति की क्षमता व तरीकों में अंतर अवश्य है।
इसी तरह ओहियो एग्रीकल्चर एक्सपेरिमेंट स्टेशन में बागीवानी के प्रो. डेल क्रेचमैन ने भी उक्त निष्कर्षों को पुष्ट किया। वनस्पतिशास्त्री डॉ. जॉन विलर्स्टन ने भी पौधों की इस संवेदनशीलता को प्रयोगशाला में जाँचा-परखा है, इसके अंतर्गत अनुकूल संगीत के प्रभाव में पौधों को तीव्र गति से बढ़ते हुए देखा गया। एक पौधा तो मात्र छह माह में ही फूलते देखा गया, जो सामान्यतः दो वर्षों में पुष्पित होता था।
वृक्ष-वनस्पति अपनी बीजावस्था में भी इस संवेदनशीलता से संपन्न पाए गए है। दक्षिण भारत के अन्नामलाई विश्वविद्यालय के डॉ. टी. सी. एन. सिंह ने इस संदर्भ में कई प्रयोग किए है। उनके अनुसार, संगीत द्वारा अभिमंत्रित बीज सामान्य बीजों की तुलना में एक तिहाई समय में ही अंकुरित हो जाते हैं। अंकुरित बीजों को अत्यधिक मात्रा में संगीत सुनाने से इसका विकास रुक जाता है। जबकि दिन के विशेष समय में विशेष धुन सुनाने से इनका विकास तीव्र हो जाता है और इनकी उत्पादक क्षमता भी बढ़ जाती है। जिसे 6 से 1 प्रतिशत तक बढ़ते देखा गया है। इस संदर्भ में भारतीय शास्त्रीय संगीत की बाँसुरी तथा वायलिन की धुनों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया सबसे सकारात्मक भी देखी गई है। यह भी देखा गया है कि धुनों की पसंद प्रत्येक पौधे की अपनी-अपनी होती है।
इंडियन स्टेट ऑफ पाँडिचेरी के कृषि विभाग ने डॉ. सिंह के निष्कर्षों के तहत कृषि सुधार के प्रयोग किए। चावल, गन्ना और टेरीआका पर हुए प्रयोगों ने इनकी विकास दर में 28 से 61 प्रतिशत तक की आश्चर्यजनक वृद्धि को दर्ज किया। सेंट लुइस की मेंगल डाँरक बीज कंपनी के शोध वैज्ञानिक जार्ज स्मिथ ने भी इसी तरह ग्रीन हाउस में कई प्रयोग किए। मक्का व सोयाबीन की फसलों को दो खंडों में विभाजित किया गया। एक को बिना संगीत वाले ग्रीन हाउस में तो दूसरे को संगीत युक्त ग्रीन हाउस में रखा गया, जिसमें दिन के चौबीसों घंटे लगातार बीस दिन तक संगीत चलता रहा। इन पौधों का अंकुरण शीघ्र हुआ व विकास गति भी तीव्र रही। दूसरा प्रयोग खेतों में किया गया। यहाँ लंबे खंभों पर लाउडस्पीकर द्वारा तरह-तरह के संगीत बजाए गए। पुनः विकास की गति तीव्र पाई गई और उत्पादन में 2 प्रतिशत वृद्धि रही।
इसी तरह एक प्रयोग के अंतर्गत, असम में गुवाहाटी के पास स्थित आई. सी. एल. फलोरा एक्सोटिका नामक फल उद्यान में फलदार वृक्ष, भक्ति संगीत व धार्मिक गीतों को सुनकर फल-फूल रहे हैं। पाँच एकड़ के क्षेत्र में फैले इस फल उद्यान में 2 से 3 फुट की दूरी साउंड बॉक्स लगाए गए है। जहाँ लगभग एक लाख फलदार पेड़ों को प्रतिदिन सुबह सात से ग्यारह बजे तक मधुर धार्मिक गीत सुनाए जाते हैं। उद्यान से जुड़े वनस्पति शास्त्री डॉ. के. रोकियो का दावा है कि जब से फल वाले पेड़-पौधों को गीत-संगीत की खुराक दी जा रही है, तब से इनमें आश्चर्यजनक परिवर्तन आए है और इनके फलों एवं फूलों की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है।
पौधों में संगीत के प्रति संवेदनशीलता का यह गुण वनस्पति जगत् का एक आश्चर्यपूर्ण एवं रोमाँचकारी अध्याय है, जो ध्वनि संगीत के आगे मानवीय विचार एवं भावों से भी जुड़ा हुआ है। इंग्लैंड के वनस्पति विज्ञानी जेम्स विलियम ने भी पौधों पर इसी तरह के रोचक निष्कर्षों को प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार पेड़-पौधे भी मनुष्य के विचार-व्यवहार से प्रभावित होते हैं। अपमान, तिरस्कारपूर्ण व्यवहार उन्हें खिन्न करता है। इससे उनका विकास अवरुद्ध होता है, जबकि शाँति, मधुरता एवं सद्व्यवहार भरा वातावरण उनमें सुखद परिवर्तन लाता है। उनकी विकास दर से लेकर उत्पादक क्षमता तक सभी इससे प्रभावित होते हैं।
वनस्पति जगत् में भी संवेदनशीलता के ये आश्चर्यजनक प्रमाण मनुष्य को काफी कुछ सोचने के लिए मजबूर करते हैं। आधुनिक वनस्पति विज्ञान के जनक कार्लवान लिनिअस ने ठीक ही कहा था, “पौधे बोलने व कुछ सीमा तक गति करने के अलावा मानव से किसी अर्थ में कम नहीं है।” 19वीं सदी में चार्ल्स डार्विन ने पौधों में गति भी सिद्ध कर दी थी। 20वीं सदी की शुरुआत में जगदीश चंद्र वसु जैसे वैज्ञानिक ने वृक्ष-वनस्पति जगत् के संवेदनशील अस्तित्व पर समुचित प्रकाश डाला था, तब से विज्ञान जगत् क्रमशः इस तथ्य पर और अधिक अनुसंधान करता आ रहा है। अध्यात्मवेत्ताओं ने तो पहले से ही बता रखा है कि सृष्टि के कण-कण में उस परम चैतन्य सत्ता का अस्तित्व विद्यमान है। आज हम वैज्ञानिक दृष्टि से देखे या आध्यात्मिक दृष्टि से, निष्कर्ष यही निकलता है कि वनस्पति जगत् भी मनुष्य के संवेदनशील व्यवहार का हकदार है।
प्रतिभाएं परमात्मा की देन होती हैं, ऐसा माना जाता है। इसी कारण हजारों में एक वैज्ञानिक, दार्शनिक अथवा विषय विशेष का निष्णात प्रकाँड पंडित बन पाता है। वस्तुतः परमपिता की यह कृपा बरसती सब पर एक साथ है, लाभ वे ही उठाते हैं, जो अपने विचार को रचनात्मक चिंतन एवं कर्तृत्व में नियोजित कर लेते हैं।
सम्राट पुष्यमित्र का अश्वमेध सानंद संपन्न हुआ और दूसरी रात को अतिथियों की विदाई के उपलक्ष्य में नृत्योत्सव रखा गया। यज्ञ के ब्रह्मा महर्षि पतंजलि उस उत्सव में सम्मिलित हुए। महर्षि के शिष्य चैत्र को उस आयोजन में महर्षि की उपस्थिति अखरी। उस समय तो उसने कुछ न कहा, पर एक दिन जब महर्षि योगदर्शन पढ़ा रहे थे, तो चैत्र ने उपालंभपूर्वक पूछा, “गुरुवर! क्या नृत्य-गीत के रस-रंग चित्तवृत्तियों के निरोध में सहायक होते हैं।”
महर्षि ने शिष्य का अभिप्राय समझा। उन्होंने कहा, “सौम्य! आत्मा का स्वरूप रसमय है। रस में उसे आनंद मिलता है और तृप्ति भी। वह रस विकृत न होने पाए और अपने शुद्ध स्वरूप में बना रहे, इसी सावधानी का नाम ‘संयम’ है। विकार की आशंका से रस का परित्याग कर देना उचित नहीं। क्या कोई किसान पशुओं द्वारा खेत चर लिए जाने के भय से कृषि करना छोड़ देता है? यह तो संयम नहीं पलायन रहा। रसरहित जीवन बनाकर किया गया संयम प्रयत्न ऐसा ही है जैसे जल का तरलता और अग्नि को ऊष्मा से वंचित करना। सो हे भद्र! भय मत करो।”
गाँव की चौपाल खचाखच भरी हुई थी। भीड़ में अधिकाँश युवा चेहरे ही नजर आ रहे थे। प्रतीत होता था जैसे गाँव का संपूर्ण युवारक्त चौपाल पर एकत्रित हो गया है! हर युवा चेहरा कुछ कर गुजरने को कटिबद्ध दिखाई दे रहा था। उल्लास, उमंग और उत्साह के कारण उनकी भुजाएँ फड़कती दीख रही थी। प्रत्येक चेहरा दृढ़ संकल्प की आभा से आलोकित हो रहा था। चौपाल पर एकत्रित युवा दृष्टियाँ भीड़ के मध्य खड़े हुए एक प्रौढ़ व्यक्तित्व पर केंद्रित थी। उन्नत ललाट, गंभीर, परंतु शाँत चेहरा जो कि श्रम एवं अध्ययन के दिव्य आलोक से आलोकित था। चेहरे पर उगी हुई घनी दाढ़ी-मूंछें चेहरे की गंभीरता को कुछ अधिक घनीभूत करने में अपना पूर्ण योग प्रदान कर रही थी। सिर की लंबी जटाएँ उनकी संत प्रकृति की घोषणा करती प्रतीत हो रही थी। श्रम की कठोरता से बनी बलिष्ठ भुजाएँ एवं चौड़ा वक्ष-स्थल टाट के बने चोगे में छिपा हुआ था। शायद टाट के खाकी रंग के ही कारण लोग उस प्रौढ़ व्यक्तित्व को खाकी बाबा कहते थे।
चौपाल पर उपस्थित सभी युवाजन उस प्रौढ़ व्यक्तित्व को सुनने के लिए बेताब थे। खाकी बाबा के होंठ हिले और होठों के शब्दोच्चारण से पूर्व ही आकाश की ऊँचाइयों को छूने वाला युवारक्त एक साथ शाँत हो गया। नीरव स्तब्धता को भंग करते हुए बाबा ने गंभीर एवं सटीक शब्दों में कहना प्रारंभ किया, बच्चों! इस ब्रजधाम का यह ग्राम आपका ही नहीं मेरा भी है। बहुत बार आप सभी ने मिलकर इस गाँव में और आसपास के क्षेत्र में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से टक्कर ली है। आज उस गाँव को एक बार फिर आपके सहयोग की आवश्यकता है। प्रति सप्ताह इस गाँव से एक-दो शव यमुना की ओर जाते देखता हूँ, तो मेरी आंखें छलक उठती है। इस प्रकार असमय ही अपने परिवार के सदस्यों को यमुना को समर्पित करना क्या आपको सोचने के लिए विवश नहीं करता कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों हमारे भाई-बहन एक-एक कर हमारा साथ छोड़ यमुना की गोद में समाते जा रहे है? आखिर यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा?
बाबा ने अपनी गीली आंखों को पोंछा। एक दृष्टि चौपाल पर फैले शाँत, मूक समुद्र पर डाली और शब्द पुनः उनके होठों से प्रस्फुटित होने लगे। बच्चों! इस गाँव में होने वाली असामयिक दुर्घटनाओं का मूल कारण है ‘गंदगी’। मैं यह देख रहा हूँ कि मेरे इस गाँव की गलियाँ कूड़े-कचरे से भरी पड़ी हैं। जगह-जगह पड़े हुए कचरे के ढेर छोटे पहाड़ जैसे प्रतीत होते हैं। इन ढेरों से उठती दुर्गंध और इस पर भिनभिनाती मक्खियाँ, क्या है यह सब?
बाबा पुनः बोले? मैं ही नहीं, आप भी समझ रहे होगे कि यही है वे वस्तुएँ, जो हमारे स्वजनों को हमसे दूर कर रही है। तो आओ, क्यों न आज ही और अभी हम सब मिलकर अपने गाँव की दुश्मन इस गंदगी को अपने गाँव से निकाल बाहर करे और दृढ़ संकल्प करे कि भविष्य में अपने इस दुश्मन को अपने गाँव की चहारदीवारी में कदम रखने की अनुमति न देंगे।
बाबा के समर्थन में एक साथ अनेक युवा स्वर गूँज उठे, हम संकल्प करते हैं कि इस गंदगी को अपने गाँव में पनपने का अवसर कभी न देंगे।
भीड़ को चीरते हुए बाबा आगे बढ़े और अपने ही हाथों फावड़े से टोकरी में कचरा भरकर और उस कचरा भरी टोकरी को सिर पर रखकर गाँव के बाहर की ओर चल दिए।
बाबा के पीछे-पीछे कचरा भरी टोकरी उठाए अनेक युवक गाँव से बाहर जाते हुए दीख रहे थे। श्रद्धेय खाकी बाबा द्वारा प्रेरित यह सफाई अभियान गति पकड़ता जा रहा था। गलियों में स्थान-स्थान पर बने कचरे के ढेर धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे थे। गाँव के प्रायः सभी गलियों में बने हुए गंदे पानी के छोटे-छोटे तालाब भी अब नालियों में सिमटते जा रहे थे। गलियों एवं नालियों की सफाई के साथ-साथ मक्खी-मच्छरों की सेना भी कम होती जा रही थी। युवा ललाट पर स्वेद कण चमकने लगे थे। शरीर पसीने से लथपथ हो चुका था, परंतु फिर भी न तो सशक्त युवा हाथ रुक रहे थे और न ही युवा कदम थक रहे थे। खाकी बाबा के प्रोत्साहित करने वाले अमृतवचन बार-बार गूँज जाते थे। वे अंतःप्रेरित शब्द युवा शक्ति के लिए एक अनोखे टॉनिक का कार्य कर रहे थे, जो कि उस दृढ़ संकल्पित युवा लोगों को थकने नहीं दे रहा था। श्रम-स्वेद ने अपना रंग दिखाया और कुछ ही दिनों की मेहनत से गाँव की काया पलट हो गई। इस घटना को हुए कुछ समय बीत गया।
आज दिन की प्रखर आभा को भगवान् भास्कर अपनी किरणों में समेटते हुए विश्रामस्थल की ओर बढ़ रहे थे। सूर्यदेव के पीछे-पीछे सहज गंभीर संध्या वेला बढ़ती चली आ रही थी। दूर गायो का झुँड, धूल के बादल उड़ाता आ रहा था और मेरे कदम श्रद्धेय खाकी बाबा की कुटिया की ओर बढ़ते चले जा रहे थे। हरीतिमा खंडों से सुसज्जित वह आश्रम एक मूक आमंत्रण-सा देता प्रतीत हो रहा था। आश्रम में कुटिया के चारों ओर विभिन्न प्रकार के रोगों में काम आने वाली जड़ी-बूटियों के पेड़ लगे हुए थे। आश्रम के पीछे से कल-कल करती यमुना अपने गंतव्य की ओर नवयौवना-सी इठलाती हुई बढ़ती चली जा रही थी।
बाबा अपना वही टाट का बना चोगा पहने कुटिया के सामने बैठे हुए थे। वे कुछ अस्वस्थ दीख रहे थे, परंतु उत्साह में तनिक भी ह्रास न था। अस्वस्थ होने पर भी उनकी वाणी में वही ओज था, वही गंभीरता थी। वे बड़े ही मनोयोग से पाठ कर रहे थे-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सगडोऽस्त्वकर्मणि॥
पाठ रुक गया। सामने बैठे हुए अपने युवक सहयोगियों को उन्होंने उनके कार्य की प्रशंसा करते हुए अपना भावी कार्यक्रम बतलाना प्रारंभ किया, बच्चों! कर्म ही ईश्वर है और कर्म ही पूजा है। कर्म में भी सर्वोत्कृष्ट है समाज सेवा। पिछले दिनों आप सभी ने संगठित होकर जो कार्य किया है, सचमुच प्रशंसनीय है, परंतु अभी हमारा अभियान पूर्ण नहीं हुआ है। हमें अभी अपने अस्वस्थ भाई-बहनों को स्वस्थ करना है। मैं अभी से अपने आश्रम में जड़ी बूटियों को इकट्ठा कर दवाएँ बनाना शुरू करता हूँ और हम सभी कल से ही अपना नया अभियान प्रारंभ करे। घर-घर जाकर स्वास्थ्य की जाँच करने का, आवश्यक होने पर दवा वितरण का और रोगियों की सेवा-सुश्रूषा करने का कार्य प्रारंभ करना होगा।
रात-दिन जागरण और कठिन परिश्रम करके बाबा ने दवाएँ बनाना शुरू किया। उनके युवा सहयोगी घर-घर जाकर दवा वितरण करने लगे। उनकी सेवा-सहायता करने लगे। मेहनत रंग लाने लगी। रोगी स्वस्थ होने लगे, परंतु बाबाजी की अस्वस्थता अपार श्रम के कारण बढ़ती गई। फिर भी उनके परिश्रम में तनिक भी प्रमाद न आने पाया। समय के साथ-साथ गाँव की खुशहाली बढ़ती जा रही थी और उधर बाबा की रुग्णता भी। अचानक बाबा की तबियत अधिक खराब हो गई परिणामस्वरूप सूर्योदय से पूर्व ही चैत्र वदी नवमी के दिन वह महान संत समाज पर अपना सर्वस्व निछावर कर सदैव के लिए चल बसा। गाँव के बच्चे-बच्चे ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें भावभरी श्रद्धाँजलि दी।
उनकी स्मृति में गाँव के प्रवेश द्वार पर एक भव्य समाधि बनवा दी गई। उस कर्मधर्मी महान् संत की चिर-स्मृति को सँजोये रखने के लिए उनकी स्मृति में आज भी उनकी पुण्य तिथि के दिन प्रतिवर्ष एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। आज भी उनकी समाधि से कर्मण्येवाधिकारस्ते के शब्द प्रस्फुटित होते हुए प्रतीक होते हैं, जो जन-जन को निःस्वार्थ भाव से कर्म करने की प्रेरणा देते हैं।
एक मनुष्य किसी गाँव को जा रहा था। धूप-प्यास का मारा वह एक पेड़ के नीचे विश्राम करने को लेट गया। पेड़ की ठंडी छाया में उसका मन बड़ा प्रसन्न हुआ। वह कल्पना करने लगा, “काश! यहाँ पीने के लिए पानी होता।” इतने में हो उसने देखा कि एक ठंडा पानी का झरना फूट पड़ा। उसने पानी पिया, प्यास बुझाई। फिर उसने सोचा, कुछ खाने को होता तो कैसा रहता। इतने में ही एक स्वादिष्ट पदार्थों से भरा हुआ थाल आ गया। उसने भोजन करके सोने के लिए-शैय्या की कल्पना की, तो एक पलंग वस्त्र बिछा हुआ दिखाई दिया। इन सब घटनाक्रमों से उसे भय हुआ कि कही यहाँ कोई मायावी राक्षस तो नहीं है। इतने में ही एक राक्षस सामने आ खड़ा हुआ। “यह मुझे खा न जाए” इस विचार के साथ ही वह राक्षस उस यात्री को खा गया। वस्तुतः वह वृक्ष कल्पवृक्ष था, जो मन की इच्छा के अनुसार फल देता था। मनुष्य का चिंतन एवं मनोबल एक प्रकार से कल्पवृक्ष ही है। उसका सदुपयोग करने वाला जीवनलक्ष्य की प्राप्ति का अभीष्ट उद्देश्य पूर्ण कर सकता है।
महाशक्ति गायत्री की सतोगुणी शक्ति को सरस्वती कहते हैं। मानसिक जड़ता मिटाने एवं निर्मल बुद्धि प्रदान करने में विद्या की अधिष्ठात्री इसी महाशक्ति का हाथ होता है बुद्धि-वैभव की, वाणी की, विद्या की, प्रतिभा की देवी सरस्वती ही है। मस्तिष्कीय क्षमताओं की अभिवृद्धि, बौद्धिक विकास, प्रतिभा-प्रखरता, स्मरणशक्ति की अभिवृद्धि, परीक्षा में उत्तीर्ण होने और अच्छे अंक लाने के लिए सरस्वती गायत्री का प्रयोग किया जाता है। असफलता, निराशा, चिंता और खिन्नता उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करके सफलता का आशाजनक वातावरण उत्पन्न करने की स्थिति विनिर्मित करने में सरस्वती शक्ति का विशेष महत्व है, सरस्वती गायत्री मंत्र द्वारा विशिष्ट प्रकार की औषधियों से बनी हवन सामग्री से हवन करने पर मनोवांछित दिशा में सफलता मिलती है। यज्ञ द्वारा सरस्वती महाशक्ति का आह्वान, अनुमोदन करके उनके अनुदानों से प्रत्येक आयु-वर्ग का व्यक्ति लाभान्वित हो सकता है।
सरस्वती गायत्री का मंत्र इस प्रकार है-
“ॐ सरस्वत्यै विऽहे ब्रह्मपुज्यै धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात्।”
विभिन्न प्रयोजनों की सिद्धि के लिए, अभीष्ट लाभ प्राप्त करने के लिए इस मंत्र के साथ जिन वस्तुओं या औषधियों के साथ हवन करना चाहिए, उनमें से कुछ प्रयोग इस प्रकार है-
(1) मंदबुद्धि मिटाने की विशेष हवन सामग्री-
मंदबुद्धि मिटाने, मानसिक जड़ता हटाने तथा मस्तिष्कीय क्षमता बढ़ाने के लिए निम्नलिखित औषधियों से हवन करना इसलिए (1) शतावर (2) ब्राह्मी (3) ब्रह्मदंडी (4) गोरखमुँडी (5) शंखपुष्पी (6) मंडूकपर्णी (7) मीठी बच (8) मालकाँगनी के बीज।
यहाँ इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि उक्त सभी वस्तुएँ बराबर मात्रा में ली जाएँ। इन आठ चीजों में कुछ करके हवन सामग्री बनाते समय कुछ मात्रा बारीक होने के रूप में अलग से निकालकर, कपड़े से छानकर एक-एक डिब्बे में रख लेनी चाहिए और हवन करने के पश्चात् हुए शाम एक-एक चम्मच शहद के साथ खाना-खिलाना चाहिए। यह जान लेना भी जरूरी है कि इन आठ चीजों से वर सामग्री से ही हवन करते समय अखण्ड ज्योति के पूर्व अंकों में वर्णित नंबर (1) लेबल वाली सामग्री भी समान मात्रा में मिला लेनी चाहिए। उस नंबर () किसी सामग्री में जो औषधियां मिलाई जाती है, वे है- अगरबत्ती, तगर, देवदार, चंदन, लाल चंदन, जायफल, लौंग, गृगन, चिरायता, गिलोय एवं अश्वगंधा।
(2) विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों के लिए बुद्धि, स्मरण शक्ति एवं मेधा संवर्द्धक ‘सरस्वती पंचक’-
परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित सरस्वती पंचक का यह प्रयोग सभी के लिए उपयोगी व लाभकारी है। नर, नारी, बच्चे, युवा, वृद्ध सभी आयु-वर्ग के व्यक्ति इसके सेवन से लाभ उठा सकते हैं। जिन लोगों को अपने मन-मस्तिष्क से ज्यादा काम लेना पड़ता है, जैसे विद्यार्थी, कंपटीशन में बैठने वाले, लेखक, वकील, कलाकार आदि के लिए ‘सरस्वती पंचक’ सबसे उत्तम टॉनिक है। दिमागी थकान, सिर दर्द, तनाव, उदासी, उत्तेजना, हिस्टीरिया, पागलपन, अनिद्रा आदि मस्तिष्कीय रोगों में लाभकारी होने के साथ ही यह हृदय की धड़कन को भी सामान्य बनाता है। उन विद्यार्थियों के बिन यह विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होता है, जो अपनी ‘मेमोरी’ अर्थात् स्मरणशक्ति को बढ़ाना और उसे अक्षुष रखना चाहते हैं, मेधावी और प्रतिभावान् बनना चाहते हैं। मंदबुद्धि बच्चों के लिए यह वरदान साबित होता है।
‘सरस्वती पंचक’ निम्नलिखित पाँच औषधियों मिलाकर बनाया जाता है-
(1) ब्राह्मी (2) शंखपुष्पी (3) शतावर (4) गोरखमुँडी, (5) मीठी बच।
इन सभी पाँचों औषधियों को समान मात्रा में पाउडर बनाकर कपड़े में छान करके एक डिब्बे में रखते मात्रा-बच्चों को आधा-आधा चम्मच एवं बड़ों को एक एक चम्मच सुबह-शाम दूध के साथ (आवश्यकता पड़ने पर दूध में मिश्री मिलाई जा सकती है) नित्य देते रहने पर उपर्युक्त सभी लाभ दृष्टिगोचर होने लगते हैं।
(3) सरस्वती पंचक की विशिष्ट हवन सामग्री-
सरस्वती पंचक खाने के साथ ही साथ नित्य प्रगति इन्हीं औषधियों से विशेष रूप से बनाई गई हवन सामग्री हवन करते रहने पर द्विगुणित लाभ मिलता है। हवन सामग्री बनाने के लिए निम्नलिखित वस्तुएँ बराबर मात्रा में ली जाती है।
(1) ब्राह्मी, (2) शंखपुष्पी, (3) शतावर, (4) गोरखमुँडी, (5) मीठी बच, (6) तिल, (7) चावल, (8) जौ, (9) गुड, (1) घी।
इन दस चीजों को मिलाकर तैयार की गई हवन सामग्री के बराबर ही पहले से बनी हुई हवन सामग्री नंबर (1) अर्थात् अगर-तगर आदि ग्यारह औषधियों युक्त हवन सामग्री को लेकर मिश्रित करके तब हवन करना चाहिए।
(4) निर्मल बुद्धि प्राप्त करने के लिए विशेष हवन-सामग्री-
चिरग्रहणी निर्मल बुद्धि प्राप्त करने के लिए और भी कई अन्य शास्त्रीय विधान है। देवी भागवत् में उल्लेख है।
पयो हुत्वाप्नुयान्मेधामाज्यं बुद्धिमवाप्नुयात्। अभिमंर्त्य पिबेदब्रह्मं रसं मेधामवाप्नुयात्॥
अर्थात् दूध का हवन करने से तथा घृत की आहुतियाँ देने से बुद्धि-वृद्धि होती है। ब्राह्मी के रस को गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके मंत्रोच्चार करते हुए पान करने से चिरग्रहणी निर्मल बुद्धि प्राप्त होती है।
(5) बुद्धि प्राप्ति हेतु ब्राह्मी प्रयोग।
सरस्वती विद्या की अधिष्ठात्री देवी है। विद्या प्राप्त करने के लिए इसी महाशक्ति की आराधना आवश्यक है। विलक्षण बुद्धि चाहने, प्रज्ञा संपन्न बनने के लिए ब्राह्मी का प्रयोग अनुष्ठानपूर्वक करना चाहिए।
ब्राह्मी तीन प्रकार की होती है-
(1) ब्राह्मी-सफेद फूल सतोगुणी, (2) मण्डूकपर्णी (ब्राह्मी) लालफूल-रजोगुणी, (3) बेकोपामोनिएरा (जलनीम)- दक्षिण भारतीय ब्राह्मी, नीलाफूल-तमोगुणी।
इच्छानुसार कोई भी व्यक्ति ब्राह्मी का प्रयोग कर सकता है। इन्हें बगीचे या गमले में घर पर भी लगाया जा सकता है।
प्रयोग विधिः-
(1) सामान- जल, धुले चावल, हल्दी, पुष्प, अगरबत्ती
(2) तिथि- माघ शुक्ल त्रयोदशी को संध्या (शाम) के समय ब्राह्मी को निमंत्रण देना चाहिए।
(3) निमंत्रण मंत्र- “ऊँ कुमार अंजनायै नमः”
(4) विधि-इक्कीस बार, ‘ऊँ कुमार अंजनायै नमः’ इस मंत्र को बोलकर छह इंच से लेकर एक फुट के घेरे में ब्राह्मी के पौधों के आस-पास चहुंओर एक घेरा बना दें। फिर उस पौधे के नीचे श्रद्धाभाव पूर्वक हल्दी, चावल, अगरबत्ती लगाकर प्रणाम करें।
(5) रात्रि में कंबल या कुश के ऊपर अथवा साफ धुले बिस्तर पर शयन करें।
(6) प्रातःकाल चतुर्दशी में 4 बजे उठकर (चाहे स्नान करें या न करे) बिना किसी से कुछ बोले ब्राह्मी के निमंत्रित पौधों को 21 बार नीचे लिखे मंत्र को बोलकर उखाड़ लें।
(7) ब्राह्मी उखाड़ने का मंत्र-”ऊँ ऐं बुद्धि वृर्द्धिन्यै नमः”।
(8) ब्राह्मी उखाड़ने के पश्चात् उसे गंगाजल या साफ जल में अच्छी तरह साफ करके मिक्सी, खरल या सिलबट्टे में नीचे लिखे मंत्र को 21 बार बोलकर पीस लें।
(1) ब्राह्मह पीसने का मंत्र- “ऊँ ऐं ही ब्राह्मयै नमः।”
इसके पश्चात् गंगातट या नदी किनारे स्नान करके निम्न मंत्र का 18 बार जप करे।
(1) जप करने का मंत्र - “ॐ ऐं ह्नीं श्रीं क्लीं वाग्वादिनी सरस्वती मम जिह्नाग्रे वद वद सर्वां विद्याँ देहि देहि स्वाहा।”
तदुपराँत कमर तक पानी में खड़े होकर “सरस्वती माता की कृपा से मुझे विद्या अवश्य प्राप्त होगी” इस तरह बोलते एवं भाव करते हुए रस पी लें।
रस पीने के बाद तीन घंटे तक कुछ नहीं खाना चाहिए। तत्पश्चात् खा लें। जो बालक या वृद्ध इस मंत्र का प्रतिदिन क्त्त् बार जप करता है, उसमें अद्भुत चमत्कार प्रतिभा दिखाई देती है। छोटे बच्चों हेतु माता-पिता संकल्पित होकर स्वयं जप कर सकते हैं। जप करने के बाद उपर्युक्त विधि से ब्राह्मी का रस निकालकर बच्चे को पिला दें। उलटी न होने पाए, इसलिए थोड़ा-थोड़ा करके चम्मच से पिलाएँ और उसमें मिश्री आदि मिला दें।
(6) विद्या प्राप्ति हेतु सिद्ध ह्यग्रीव मंत्र के साथ गिलोय प्रयोग-
इस प्रयोग को कभी भी शुभ दिन से शुरू किया जा सकता है। जप करने का मंत्र इस प्रकार है-
“ऊँ ऐं ह्नीं ह्नौं ह्यग्रीवाय नमो माँ विद्याँ देहि देहि बुद्धि वर्द्धय वर्द्धय हुँ फट स्वाहा।”
इस मंत्र का चौबीस हजार बार जप करना चाहिए। इसके पश्चात् गायत्री पद्धति से हवन करना चाहिए। आहुति हेतु मंत्र यही रहेगा। इसके लिए हवन सामग्री निम्न औषधियां बराबर मात्रा में लेकर तैयार करते हैं-
(1) गिलोय (2) अपामार्ग (3) शंखपुष्पी (4) ब्राह्मी (5) मीठी बच (6) सोंठ (7) शतावर। हवन करते समय इन सातों की कुल मात्रा के बराबर हवन सामग्री नंबर (1) मिला लेते हैं।
हवन करने के पश्चात् इन्हीं सातों औषधियों को 3-3 ग्राम लेकर कपड़े में छानकर डिब्बे में रख लें। रोज एक माला जप के बाद घी-शक्कर से 5 ग्राम खा लें। डेढ़ माह बाद अंतर स्पष्ट देखा जा सकता है।
क्रमशः
युद्ध विध्वंस एवं विनाश का पर्याय है। मानव अपने अधिकार क्षेत्र के विस्तार के लिए युद्ध का सदैव से सहारा लेता रहा है। युद्ध आत्मरक्षा की भावना से प्रेरित होकर भी होता है। युद्ध में समय एवं परिस्थितियों के आधार पर परिवर्तन होता रहा है, परंतु इसके सिद्धाँत सदा स्थायी रहे है। प्रत्येक युद्ध विगत युद्ध से भयंकर एवं विप्लवकारी होता है। पाषाणयुगीन युद्ध ही यह यात्रा परमाणु युग में प्रवेश कर चुकी है। आज युद्ध की विभीषिका ने समस्त संसार को अपनी परिधि में समेट लिया है।
संसार के प्रसिद्ध युद्धों का विवेचन-विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि यह कितना भयंकर होता है। युद्ध के इतिहास में 5 ई. पूर्व महाभारत का युद्ध प्रथम एवं विशाल युद्ध माना जाता है। 18 दिन के इस युद्ध का वर्णन महाभारत के 415 अध्यायों एवं 22,177 श्लोकों में किया गया है। कुरुक्षेत्र में मैदान में पाँडवों की सात अक्षौहिणी तथा कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच यह युद्ध हुआ था। एक अक्षौहिणी सेना में 21,87 हाथी, 2187 रथ, 65,61 घोड़े तथा 1,1,35 पैदल सैनिक होते थे। इस महासागर में धर्म पक्षधर पाँडवों को विजय प्राप्त हुई थी। यह संग्राम अपने आप में अनोखा एवं अद्भुत है। इस युद्ध में इतने सैनिक मारे गए कि खून की नदियाँ वह निकली। महाभारत के बाद ईरानी शासक डेरियस तथा ग्रीस के मध्य मैराथन का संग्राम 41 ई. पूर्व हुआ। ईरान ने भारी जहाजी सेना के आक्रमण द्वारा ग्रीस पर अधिकार करने का जोरदार प्रयास किया। मैराथन के मैदान में उसने अपनी सेना का पड़ाव लगा दिया। ईरानी सेना का मुकाबला करने के लिए प्लेटिका के ग्रीक लोगों को स्पार्टा का सहयोग मिला। स्पार्टा के सहयोग से तथा प्रतिभाशाली एवं साहसी मिल्टियाड्स के कुशल नेतृत्व में ग्रीक ने ईरान को पूर्णतया पराजित कर दिया। इसमें हजारों की संख्या में सैनिक मारे गए।
अरबेला का युद्ध 331 ई. पूर्व हुआ। यह संग्राम सिकंदर और ईरानी शासक डेरियस के बीच लड़ा गया। इस भयंकर युद्ध में सिकंदर का कुशल नेतृत्व काम आया और उसे महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक सफलता प्राप्त हुई। झेलम का प्रसिद्ध युद्ध 326 ई. पूर्व सिकंदर तथा भारतीय सेनानायक पोरस के मध्य झेलम नदी के निकट लड़ा गया। पोरस की सेना परंपरागत ढंग से ‘चतुरंग बल’ पर संगठित थी, जबकि सिकंदर की सेना फैलेक्स पद्धति पर आधारित थी। डाथोडोरस के अनुसार इस संग्राम में 12, भारतीय सैनिक मारे गए तथा 1 बंदी बनाए गए। सिकंदर की सेना के 7 पैदल तथा 21 अश्वारोही सैनिक मारे गए। यह संख्या अतिशयोक्तिपूर्ण जान पड़ती है। सिकंदर को इस युद्ध में विजय तो मिली, परंतु वह आगे बढ़ने के बजाय पीछे लौट गया।
ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में भारत की राजनैतिक अवस्था बड़ी दयनीय थी। इसी कारण से गजनी के सुलतान महमूद ने 1 ई. से 126 ई. को देलवाडा (गुजरात) के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। इस संघर्ष में 5, हिंदू सैनिक मारे गए। मंदिर के पुजारी छत पर खड़े होकर तमाशा देख रहे थे कि मंदिर से भगवान् शंकर स्वयं निकलकर अपने तीसरे नेत्र से इन अफ़गान आक्राँताओं को विनष्ट कर देंगे। परिणामतः महमूद मंदिर का समस्त धन एवं बहुमूल्य वस्तुएँ मंदिर के विशाल दरवाजे समेत लूटकर गजनी वापस लौट गया।
शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी भारत पर आक्रमण करने वाला तीसरा मुस्लिम शासक था। 111 में गोरी ने भटिंडा के किले पर आक्रमण करके इसे अपने अधिकार में कार्य लिया। परंतु पृथ्वीराज चौहान की सेना ने उसे कड़ी शिकस्त दी। तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। अंततः इस संग्राम में पृथ्वीराज चौहान की मौत हुई। इसके परिणामस्वरूप राजपूतों की सैन्य शक्ति का विनाश हो गया तथा भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ। भारत में हुए युद्धों के इतिहास में पानीपत की पहली, दूसरी एवं तीसरी लड़ाइयों के साथ खानवा, हल्दीघाटी के युद्धों का भारी महत्व रहा। इन युद्धों ने तो जैसे राष्ट्र और समाज की आकृति के साथ प्रकृति भी बदल दी।
यह बदलाव भारत के साथ अन्य देशों में भी आया, तभी तो ट्राफलगर का सामुद्रिक संग्राम फ्राँस के सेनापति नेपोलियन तथा ब्रिटिश नौ सेना के एडमिरल के बीच 21 अक्टूबर 185 को भूमध्य सागर में जिब्राल्टर के निकट ट्राफलगर में लड़ा गया। इसमें नेपोलियन को पराजित होना पड़ा। इस युद्ध में इंग्लैंड के 441 नौसैनिक मारे गए, जबकि फ्राँस की सेना के लगभग 14, नौसैनिक हताहत हुए।
लिपजिंग का संग्राम अक्टूबर 1813 ई. में नेपोलियन के नेतृत्व में फ्राँस द्वारा प्रशा, रूस तथा आस्ट्रिया आदि देशों के मध्य हुआ, जिसमें नेपोलियन को फिर एक बार पराजय का मुँह देखना पड़ा। इस संग्राम में नेपोलियन के लगभग 1,5, सैनिक मारे गए तथा तकरीबन 5, सैनिक बीमारी के शिकार हुए। वाटरलू का संग्राम नेपोलियन तथा अँग्रेज सेनानायक वेलिंग्टन के मध्य 18 जून 1815 ई. को लड़ा गया। इस संग्राम का विशेष महत्व है, क्योंकि जिस नेपोलियन का लगभग समस्त यूरोप पर अधिकार हो गया था, उसे इस संग्राम में अपनी ही भूल के कारण पराजित होना पड़ा।
लेकिन युद्धों का यह क्रम रुका नहीं, अनवरत चलता रहा। सन् 1104-05 में रूस एवं जापान के बीच युद्ध हुआ। 11 अगस्त 1104 के प्रथम आक्रमण अभियान में 3, रूसी तथा 15, जापानी सैनिक मारे गए। 25 अगस्त 1105 को एक अन्य अभियान में रूस के 16,5 तथा जापान के 32,615 सैनिक हताहत हुए। 23 फरवरी से 1 मार्च 115 के लंबे युद्ध में रूस के 6, सैनिक हताहत हुए तथा 25, सैनिक हताहत हुए। इस युद्ध में एक लाख से अधिक सैनिक मारे गए। एक संधि के साथ इस युद्ध का समापन हुआ। परंतु शायद यह चिंगारी बुझी नहीं और प्रथम विश्वयुद्ध सुलग उठा।
यह प्रथम विश्वयुद्ध 1914 से 1918 ई. के बीच हुआ। इस युद्ध में यूरोप के दो प्रमुख गुट भाल ले रहे थे, जिन्हें केंद्रीय शक्ति तथा मित्र राष्ट्रों के गुट के नाम से जाना जाता है। केंद्रीय शक्ति के रूप में आस्ट्रिया, हंगरी और जर्मनी, तुर्की, बुल्गारिया तथा मित्र राष्ट्रों में ब्रिटेन, फ्राँस तथा रूस सम्मिलित थे। बाद में मित्र राष्ट्रों के साथ सर्बिया, जापान एवं अमेरिका भी शामिल हो गए। 4 वर्ष तथा 15 सप्ताह के इस भीषण युद्ध में एक करोड़ तीस लाख लोग काल कवलित हुए तथा प्रति 3 सैनिक घायल हुआ। 11 नवंबर 1918 को यह युद्ध शाँति में बदल गया। पर यह शाँति अस्थायी ही रही, क्योंकि कुछ ही वर्षों बाद द्वितीय महायुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हो गई।
द्वितीय महायुद्ध 1931 से 1945 ई. तक चला। एक सितंबर 1931 में एडाल्फ हिटलर के द्वारा पोलैंड पर आक्रमण के साथ ही युद्ध के बारूद में चिंगारी लग गई। ब्रिटेन और फ्राँस ने जर्मनी की उस कार्यवाही के कारण उसके विरुद्ध विधिवत युद्ध की घोषणा कर दी। 6 अगस्त 1945 को अमेरिका के बमवर्षक वायुयान ने जापान के हिरोशिमा शहर में तथा 1 अगस्त 1945 को नागासाकी शहर पर परमाणु बम गिराए। इस भीषण विनाश से जापान ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व की मानवता चीख पड़ी थी। 14 अगस्त 1945 को जापान के आत्मसमर्पण ही घोषणा के साथ ही इस महायुद्ध की समाप्ति हो गई। इस युद्ध ने मानवता के विनाश का सबसे अधिक आंकड़ा तैयार कर दिया था, जिसमें लगभग पाँच करोड़ लोग काल के गाल में समा गए थे। इसके अलावा रेडियोधर्मी विकिरणों ने समस्त संबंधित क्षेत्र को दूषित करके रख दिया।
युद्धों की इस शृंखला में अगला नाम पाकिस्तान ने लिखाया। पाकिस्तान राष्ट्र की बुनियाद की झूठ, फरेब और ईर्ष्या पर स्थित है। पाकिस्तान ने अलग होने के तुरंत बाद ही भारत को भीषण आघात पहुँचाने के लिए 1947-48 में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। पाक के इस नापाक इरादे का जवाब भारतीय सेना ने डटकर दिया और पाक के मंसूबों पर पानी फिर गया।
पर 2 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारत के उत्तर पश्चिम लद्दाख के चिपचैप से लेकर उत्तर पूर्व सीमाँत एजेंसी (नेफा) अथवा वर्तमान अरुणाचल प्रदेश के खिंजमान व ढालों चौकी के बीच अनेक भारतीय चौकियों पर आकस्मिक धावा बोल दिया। इस अप्रत्याशित आक्रमण से भारत को भारी हानि उठानी पड़ी। इस युद्ध में चीन ने भारत के लगभग 12,5 वर्ग मील भू-क्षेत्र को हड़प लिया। चीन के सैनिक भारतीय भू-क्षेत्र के काफी अंदर बढ़ते आ गए थे, परंतु अचानक वापस क्यों मुड़ गए, यह युद्ध के इतिहास में अब तक रहस्य बना हुआ हैं।
पाकिस्तान अपने ओछी हरकतों से कभी बाज न आया। उसकी गिद्ध दृष्टि सदैव कश्मीर पर लगी रही है। 1 अप्रैल 1965 को पाकिस्तान की 71 वीं ब्रिगेड ने कच्छ की सीमा पर हमला कर दिया। भारत ने उसका मुंहतोड़ जवाब दिया। कच्छ की पराजय के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच भयंकर सीमा युद्ध हुआ, जिसमें भारतीय सेना लाहौर के निकट पहुँच गई थी। अतंतः ताशकंद समझौते के अनुसार भारत पाकिस्तान में संधि हुई। इस युद्ध में पाकिस्तान एवं भारत के क्रमशः 47 एवं 2226 सैनिक मारे गए। भारत के 787 जवान घायल हुए। भारत ने पाकिस्तान के 475 टैंक एवं 74 वायुयान नष्ट कर डाले, जबकि अपने 123 टैंक तथा 35 वायुयान नहीं नष्ट हुए।
युद्धों की इस शृंखला में 3 से 17 दिसंबर 1971 तक लड़ जाने वाले 14 दिनों तक का भारत-पाक युद्ध भी बड़ा महत्वपूर्ण हैं। इस युद्ध के फलस्वरूप बंगलादेश का उदय ही गया और पाकिस्तान का यह हिस्सा सदा के लिए अलग हो गया। इस युद्ध में लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी के नेतृत्व में 73, सैनिकों ने भारतीय पूर्वी क्षेत्र के कमाँडर लेफ्टिनेंट जगजीत सिंह अरोरा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इतनी बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण की यह घटना भी आश्चर्यजनक हैं। इस युद्ध के संदर्भ में मेजर जनरल डी के पालित का कथन है, "विश्व के लंबे इतिहास में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि इतने थोड़े दिनों में किसी ने साढ़े सात करोड़ लोगों को आजाद किया।"
युद्धों का यह क्रम रुका नहीं, खाड़ी में ईरान एवं ईराक के बीच जो भीषण एवं लंबी अवधि तक संघर्ष हुआ, उससे मानव सभ्यता एवं अर्थव्यवस्था की भारी आघात पहुँचा। यह 21 सितंबर 1970 से आरंभ होकर जुलाई 1988 में समाप्त हुआ। इस संग्राम में लाखों की संख्या में दोनों देशों के सैनिक एवं नागरिक काल-कवलित हो गए। इस युद्ध में सैनिक ठिकानों के साथ ही आर्थिक स्रोतों को भी अपना लक्ष्य बनाया गया।
खाड़ी युद्ध 1990-91 में लड़ा गया। 17 जनवरी 1990 को अमेरिकी नेतृत्व वाली बहुराष्ट्रीय सेनाओं के अति आधुनिक लड़ाकू विमानों के द्वारा बगदाद पर आक्रमण किया गया। यह विनाशकारी युद्ध 42 दिनों तक चला। इस युद्ध में स्कड, पेट्रियाट जैसे प्रक्षेपास्त्रों का उपयोग हुआ। बहुराष्ट्रीय सेनाओं ने लाखों हवाई उड़ानें भरी तथा लार टन विस्फोटक पदार्थों का उपयोग किया गया। इससे लाख की संख्या में सैनिक मारे गए होंगे। हांलाकि उसका सुनिश्चित आँकड़ा प्राप्त नहीं हो पाया है।
संसार के इन विश्वप्रसिद्ध युद्धों के अलावा भी बोस्निया-हरजोगॉविनीया का रक्तरंजित पृष्ठ, रूस का चेचन्या पर धावा, नाटो का यूगोस्लाविया के ऊपर आक्रमण आदि घटनाएँ भी हो चुकी है। पाकिस्तान की बदनिय कारगिल के रूप में फिर एक बार सामने आई। फिर उसे मार भगाया गया। आज भी समस्त विश्व युद्ध रूपों ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा है, जहाँ एक चिंगारी विनाश के लिए पर्याप्त है।
युद्ध जितना विनाशकारी होता है, उसका परिणाम और भी घातक एवं भयावह होता है। युद्ध केवल विध्वंस होता है। आज विश्व को युद्ध नहीं शांति चाहिए। सृजनशीलता का प्रतीक है। शांति में ही सुख, समृद्धि विकास की संभावनाएँ सन्निहित हैं। यह बात समझी जा सके, तो 21 वीं सदी विश्व में शांति और सृजन का बन सकती हैं।
देवासुर युद्ध में देवताओं की सहायता करने के लिए अर्जुन स्वर्गलोक गए और वहाँ उन्होंने देवताओं को विजयी बनाया।
अर्जुन के पराक्रम से प्रसन्न होकर सुरपुर की सर्वश्रेष्ठ सुँदरी उर्वशी उन पर मुग्ध हुई और नाटकीय ढंग से स्वयं को दीन-दुःखी बताकर अर्जुन से सहायता का वचन लिया। कष्ट पूछने पर उसने बताया कि मैं आपके द्वारा आपके जैसा ही पुत्र चाहती हूँ।
अर्जुन उर्वशी का प्रयोजन समझ गए। उनने गंभीर होकर कहा, “पुत्र के लिए प्रतीक्षा की क्या आवश्यकता है। मैं स्वयं आपके पुत्र रूप में आज से ही मौजूद हूँ। मुझे ही आप पुत्र रूप में मानें।” अर्जुन का सदाचरण और दृढ़ता देखकर उर्वशी अवाक् रह गई।
शरशैय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह उत्तरायण सूर्य आने पर प्राण त्यागने की तैयारी में लगे थे। कुरु और पाँडुकुल के नर-नारी उन्हें घेरे बैठे थे। पितामह ने उचित समझा कि उन्हें कुछ धर्मोपदेश दिया जाए वे धर्म और सदाचार की विवेचना करने लगे।
सब ध्यानपूर्वक सुन रहे थे, पर द्रौपदी के चेहरे पर व्यंग्य-हास की हल्की-सी रेखा दौड़ रही थी। भीष्म ने उसे दिखा और अभिप्राय को समझा। वे बोले, बेटी ! मेरी कल की करनी और आज की कथनी में अंतर देखकर तुम आश्चर्य मत मानो। जिन दिनों राजसभा में तुम्हारा अपमान हुआ था, उन दिनों कौरवों का कुधान्य खाने से मेरी बुद्धि मलिन हो रही थी, इसलिए तुम्हारे पक्ष में न्याय की आवाज उठा न सका। इन दिनों मुझे लंबी अवधि का उपवास करना पड़ है, सो भावनाएँ स्वतः वैसी हो गई, जैसी कि मैं इस समय धर्मोपदेश में व्यक्त कर रहा हूँ।
संत मंसूर का जन्म ईरान के बैजर गाँव में हुआ था। शिक्षा ईराक में हुई। पढ़-लिखकर जब वह समझदार हुए, तो ईरान वापस चले गए। अब उन्हें किसी योग्य गुरु की तलाश थी। भटकते-भटकते एक दिन वह शूस्तर नामक शहर जा पहुँचे। उन दिनों वहाँ सुहेल बिन अब्दुला का बड़ा नाम था। वे अपने जमाने के पहुँचे हुए सिद्ध संत थे। अध्यात्म विद्या में उनका कोई सानी नहीं था। लोग उनकी शगिर्दी के लिए तरसते थे। सुहेल बिन अब्दुल्ला चेहरा देखकर ही भाँप लेते थे कि किसमें कुछ पाने की कितनी तड़प है। उनके पास भरपूर दमखम वाला ही टिक सकता था।
मंसूर इन्हीं संत के सामने घुटने टेककर रहम की भीख माँगने लगे। संत ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं, मंसूर की आँखों में से पानी का स्त्रोत फूट रहा था। संत ने उन पतीली आँखों में से काफी कुछ खोज लिया। वे मंसूर के मन की गहराइयों तक जा पहुँचे। दुआ कबूल हो गई। मंसूर सुहेल बिन अब्दुल्ला के शागिर्द हो गए। वह अपने पीर से पूरे 18 साल तक अध्यात्म विद्या सीखते रहे । जब वह निपुण हो गए, तो सुहेल ने उन्हें जाने की इजाजत दे दी। मंसूर भी अपने पीर का प्रचार करने अरब और ईराक की ओर चल पड़े।
बगदाद में उन दिनों सूफी संतों का बहुत जोर था। अबुल हसन सूरी और जुनैद बगदादी उन दिनों वहाँ के ख्याति प्राप्त संत थे। उनकी चर्चाएँ काफी दूर-दूर तक फैली हुई थीं। मंसूर भी इन संतों के साथ में रहने लगे।
उन्हें इन संतों के पास रहते-रहते पाँच वर्ष बीत गए। एक दिन जुनैद बगदादी बोले, मेरे बच्चे ! तू जो सीख गया, वह काफी है। तू उसी की तकसीम कर।
मंसूर बोले, मेरे हुजूर ! अभी तो मैं कुछ जानता ही नहीं।
क्या करेगा अब और जानकर। मैंने तेरी आँखों में इबारत पढ़ कर ली है। चिंगारियाँ फूट रही है, पर बुझ जाती है। मेरे बच्चे ये अच्छे शकुन नहीं होते।
मंसूर बेचैन हो उठा। बोला, हुजूर क्या होता है इसका मतलब ?
अब वह घड़ी आ गई है, जब तेरे ऊपर वतन के मुल्लाओं और मुफ्तियों का कहर बरसेगा।
युवक मंसूर तड़प उठे, बोले, नहीं मैं ऐसा नहीं होने दूँगा। बगदादी बोले, मेरे बच्चे! अल्लाह के करम पर क्या कोई कैद लगा सकता है। मुझे साफ दीख रहा है, एक लकड़ी का पैना सिरा धीरे-धीरे तेरी ओर सरकता चला आ रहा है। वह सिरा तेरे खून से रंगने के लिए बेचैन हो रहा है।
मंसूर को यह बहुत बुरा लगा। बोला, हुजूर! मैं नहीं चाहता कि आपके शागिर्द का यह हश्र हो। पर देख लेना मेरे हुजूर, अगर मैं सूली पर चढ़ गया, तो उससे पहले आपको अपना चोला बदलना पड़ेगा।
और उन्होंने एक दिन बगदाद छोड़ दिया। खुरासान, ईरान, सीस्तान, फारस, बसरा और न जाने वे कहाँ-कहाँ घूमते रहे। इस्लाम का प्रचार करते हुए वे एक दिन मक्का जा पहुँचे। जिस समय वे मक्का पहुँचे, उस समय लगभग चार सौ प्रतिष्ठित एवं विद्वान शेख उनके शागिर्दों में थे। इससे उनके अनुयायियों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
वह अब संत मंसूर हो गए थे। उन्हें मक्का बहुत भाया। चौबीस घंटे में नमाज की चार सौ आयतें पढ़ते, तब कहीं उन्हें तसल्ली होती। कंपकंपाती सरदी और पिघलाने वाली धूप में मंसूर काबा की ओर मुँह किए पूरे एक साल तक खड़े रहे। दिनभर रोजा रखते और जब खोखते तो सिर्फ एक ही रोटी नसीब होती।
संत मंसूर अब पूर्णरूपेण तप चुके थे। जब उनका मन मक्का से ऊब गया, तो भारत होते हुए वे चीन जा पहुँचे चीन में वह इस्लाम का भरपूर प्रचार करते रहे। जब चीन से मन भर गया, तो फिर मक्का वापस आ गए। अब मंसूर, मंसूर नहीं रह गए थे। मस्ती के आलम का रंग पक्का पड़ा गया था। वे अब समाधि और तल्लीनता की स्थिति में आ गए थे। बेहद मस्ती का आलम था। बस अब तो उन्हें केवल एक ही रट लगी थी, ‘अन अल हक’ (अहं ब्रह्मास्मि)। अद्वैत पूरी तरह उनके मानस में रम गया था। जहाँ जाते, वहीं वे कहते, मैं वहीं हूँ जिसे मैं चाहता हूँ। जिसे वह चाहता है वह भी मैं ही हूँ। हम दोनों एक ही हैं।
कुछ दिनों के बाद मंसूर मक्का छोड़कर बगदाद आ गए। उनके आते ही मुनियों और मौलवियों की सत्ता हिल उठी। मौलवी भड़क उठे और जोर से चीत्कार उठे, मंसूर काफिर है। यह कुफ्र का कलमा पढ़ने लगा है। इस्लाम खतरे में है। यह काफिर हम सबका ईमान बिगाड़ रहा है।
खिलाफत का यह तूफान दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा, पर मंसूर इस तूफान से बिलकुल अनभिज्ञ थे। वह तो लगातार अन-हल-हक की रट लगाए हुए थे। उन्हें यह तक पता नहीं था कि उन्हें काफिर करार दिया गया है और कैद एवं काल उनका इंतजार कर रहा है।
मंसूर के किस्से और मुल्लाओं की चीख खलीफा के दरबार तक जा पहुँची। मुल्लाओं को खलीफा के सामने पेश कर दिया और बोला, हुजूर! काफिर मंसूर जो कुछ कर रहे हैं, उसके ये लोग चश्मदीद गवाह है।
खलीफा ने चारों ओर नजर दौड़ाई और पूछा, मंसूर कहाँ हैं?
उनको नहीं बुलाया गया है। वजीर ने बताया।
हम एकतरफा बयान सुनने को तैयार नहीं है। मंसूर को भी पेश किया जाए। खलीफा उठकर चल दिया। सभी अवाक् रह गए।
दूसरे दिन मंसूर को भी खलीफा के सामने पेश किया गया। सभी एक ओर थे, मंसूर बिलकुल अकेले थे।
एक मौलवी आगे बढ़ा और बोला, हुजूर! यह काफिर इस्लाम के खिलाफ बोलता ही नहीं, लिखता भी है।
खलीफा ने कहा, है कोई ऐसी तहरीर, जो इसने इस्लाम के खिलाफ लिखी हो?
मौलवी ने एक किताब खलीफा के सामने रख दी, यह देख लीजिए, हुजूरे आला।
तहरीर बेशक इस्लाम के खिलाफ थी। उसे देखते हुए खलीफा बोले, ये इबारत तुमने शरीअत के खिलाफ क्यों लिखी?
यह इबारत मेरी अपनी नहीं है। इसे तो मैंने एक किताब से नकल किया है। मंसूर ने निडरतापूर्वक अपना पक्ष रखा।
कजी उमरम भी वहीं बैठे थे। तुरंत बोले, यह गलत है हुजूरे आला। मैंने सारी किताबें पढ़ी हैं, किसी में भी ऐसा नहीं लिखा।
सब एक स्वर से बोल पड़े, मंसूर झूठा है, उसे सूली पर चढ़ाया जाए।
दूसरा मौलवी बोला, हुजूरे आला! यह मंसूर मजहब में ही नहीं, सियायत में भी दखल देता है। लोगों से कहता है कि सल्तनत की सारी जमीन मेरी है। सब लोग जमीन बाँट लो। हुजूर! इस तरह तो यह शख्स सल्तनत को बहुत माली नुकसान पहुँचाएगा।
वजीर बोले, हुजूर! मेरी राय में मंसूर को कैद में डाल देना चाहिए। वह काफिर है।
खलीफा शांत हो, हाथ ऊपर उठाकर बोले, नहीं! मंसूर काफिर नहीं है। तुममें से है कोई ऐसा, जो मंसूर की बराबरी कर सके?
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। सभी एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे।
खलीफा पुनः बोले, यूँ क्या देख रहो हो?
जब तुम लोग इतने काबिल नहीं हो तो तुम्हें मंसूर को सजा देने का क्या हक है? मजहब का मामला है। इस पर फैसला हम नहीं कर सकते। इसका फैलता सिर्फ शेख जुनैद बगदादी ही कर सकते हैं। वे हम सबसे काबिल हैं। हम उनके फैसले की इज्जत करेंगे।
बगदादी वहीं बैठे थे। वे इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते थे। अतः वे अब तक खामोश ही बैठे थे। उन्होंने बहुत टालने की कोशिश की, पर वजीर अब्बास नहीं माना। एक तरफ ले जाकर न जाने क्या-क्या समझाते रहा। बगदादी पशोपेश में पड़ गए। हारकर उन्होंने सूफियाना लबादा उतार दिया और आलिमाना जबादा पहन लिया और बोले, ‘अल्लाह’! फिर दोनों कान पकड़ लिए। कुछ क्षण तक आँखें बंद किए खड़े रहे। आँखें खोली तो वजीर अब्बास का क्रूर चेहरा उन्हें घूरता नजर आया। बगदादी सहम गए। बोले, जाहिर के लिहाज से मंसूर को कत्ल का फतवा दिया जा सकता है। अंदर का हाल तो अल्लाह ही बखूबी जानता है।
मंसूर जोर से अट्टहास करने लगे। चिल्लाकर बोले, हुजूर! आज मेरी बात सही निकली। याद है एक दिन मैंने क्या कहा था आपसे। बदलना पड़ा न आपको अपना सूफियाना चोला।
बगदादी कुछ बोल न सके। बाहर शून्य में ताकते रहे। मंसूर को कैद में डाल दिया गया। खलीफा मंसूर को सूली पर चढ़ाना नहीं चाहते थे। उन्होंने सुलेमान नामक एक विश्वासपात्र सेवक मंसूर के पास भेजा। अगर मंसूर माफी माँग ले तो उसे रिहा किया जा सकता है।
लेकिन मंसूर तो मस्ती के आलम में थे। बोले, कौन माफी माँग ले?
मंसूर!
मंसूर मुस्कराए और बोले, कहाँ है मंसूर? मुझे तो वह दिखाई ही नहीं देता। मुझे तो हर ओर प्रपंच, झूठ के सिवाय कुछ नजर ही नहीं आता। मंसूर मरता है, तो मरने दो उसे। मेरा क्या बिगड़ेगा?
सुलेमान हार मानकर चला गया।
मंसूर कैदखाने में खामोश नहीं बैठे रहे। वहाँ वे कैदियों को इकट्ठा करते और तरह-तरह के चमत्कार दिखलाते। एक दिन सुहेल नाम का कैदी बोला, जब आप इतने चमत्कारी है, तो यहाँ क्यों आए? आप भाग क्यों नहीं जाते?
तुम भागना चाहते हो क्या? मंसूर ने पूछा।
यहाँ भला कौन रहना चाहेगा?
मंसूर ने दीवार की ओर संकेत किया। चूने से जड़ी पत्थर की दीवार भरभराकर गिर पड़ी। मंसूर चिल्लाया जा...ओ...भाग...जाओ.... जल्दी से चले जाओ........।
सब कैदी भाग गए। सिर्फ एक कैदी रह गया। वह असमंजस में पड़ा हुआ सब कुछ आश्चर्यचकित होकर देख रहा था।
पगले! तू यहाँ क्यों खड़ा हैं? भाग क्यों नहीं जाता। उस समय तो कह रहा था कि सब भागना चाहते हैं, अब क्यों नहीं भाग जाता? मरना है क्या? मंसूर बोले।
नहीं! मैं नहीं जाऊँगा।
क्यों?
जब तक आप नहीं चलेंगे, मैं भी नहीं चलूँगा।
मंसूर ने उसे समझाया, पगले! समझदारी से काम लो, यह खलीफा की जेल हैं और तुम सब खलीफा के कैदी हो। मैं खलीफा का कैदी नहीं हूँ, अल्लाह का कैदी हूँ। मैं यहाँ से भागकर कहाँ जाऊंगा? अल्लाह की कैद से बच सकता हूँ क्या? तू जा.... भाग..... जा.......। कैदी चुपचाप चला गया।
मंसूर के और जुर्म तो शायद माफ हो जाते, पर खलीफा की जेल से कैदियों को भगा देना तो संगीन जुर्म था खलीफा ने मंसूर को सूली पर चढ़ाने के आदेश दे दिए।
24 जी क्राद, हिजरी सन् 39 का वह दिन था। जब संत मंसूर को सूली की ओर ले जाया जा रहा था। उन महान् संत के पीछे-पीछे जनसमूह उमड़ पड़ा। इतनी भीड़ कि शुमार करना भी मुश्किल था। मंसूर मस्ती के आलम में चले जा रहे थे। चेहरे पर शिकन तक न थी। मंसूर संपूर्ण शरीर से दिव्य तेज फूट रहा था। वातावरण में ओर ‘अन अल हक’ गूँज रहा था। सूली पर चढ़ाए गए मंसूर की देह तो निःशब्द हुई, पर आत्मा के स्पंदन सब ओर फैल गए।
दो संत तीर्थयात्रा पर जा रहे थे। एक विशालकाय वृक्ष के नीचे उन्होंने आश्रय लिया और आगे बढ़े। पर्यटन के उपराँत अगले वर्ष जब वे वापस लौटे, तो उन्होंने पाया कि जिस सघन वृक्ष की छाया में उन्होंने भोजन किया था, विश्राम किया था, गिरा पड़ा है। पहले ने अपने से वरिष्ठ संत से पूछा, महात्मन्! यह कैसे हुआ कि इतनी अल्प अवधि में यह वृक्ष गिर गया है? संत बोले, तात्! यह वृक्ष छिद्रों के कारण गिरा है। प्राण था इसका जीवन रस, जो गोंद रूप में सतत बहता रहा। उसे पाने की लालसा में मनुष्य ने उसमें छेदकर उसे खोखला बना दिया। खोखली वस्तु कभी खड़ी नहीं रह सकती। झंझावातों को सहन न कर पाने के कारण ही इसकी यह गति हुई हैं
शिष्य ने गुरु से पूछा, देव! आप कहते हैं कि सारी संपदा इस जगती में भगवत् प्रदत्त हैं, पर हम दैनंदिन जीवन में देखते हैं कि व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से संपत्ति एकत्र करता है, जबकि भगवान् की उपासना, पूजा-अर्चना, प्रार्थना-मनुहार का तो उसमें कोई योगदान भी नहीं होता। गुरु बोले, “वत्स! यदि मनुष्य के पास भगवान् की दी हुई दैवी संपदा-समय, श्रम व सुदृढ़ स्वास्थ्य न हो तो वह संपत्ति जिसे तुम पुरुषार्थजन्य कह रहे हो, कभी एकत्र नहीं कर सकता। यदि पूर्व में दैवी संपत्ति का उपयोग कर साधनसंपन्न बन भी जाता है, तो यह नहीं मानना चाहिए कि वह अपना उद्देश्य पा गया। जरा-सा भी भटकने पर ऐश्वर्य में प्रमाद, श्रम से जी चुराना, इंद्रिय असंयम, विचारों की कुमार्गगामिता अथवा बिखराव एवं समय की हानि इनमें से एक धुन लग जाने पर वह फिर खोखला हो जाता है और अर्जित संपदा खो देता है।” संपत्ति और संपदा संबंधी अपनी जिज्ञासा का तर्क-तथ्य पूर्ण समाधान सुनकर शिष्य संतुष्ट हो गया।
(29/7/73 को शांतिकुंज परिसर में दिया गया उद्बोधन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो या नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो! भजन-पूजन की बात आप सुन चुके, स्वाध्याय और सत्संग की बात भी कर ली। इसके अतिरिक्त पूजापरक-उपासनापरक दो और भी आध्यात्मिक प्रयोग हैं, जो आपको करने ही चाहिए। इनमें से एक का नाम है, ‘चिंतन’ और दूसरे का नाम है, ‘मनन’। चिंतन और मनन के लिए किसी कर्मकाँड की जरूरत नहीं है, किसी पूजा-विधान की जरूरत नहीं है और किसी समय निर्धारण की जरूरत नहीं है। अच्छा तो यह हो कि इन सब कामों के लिए आप सबेरे का समय ही रखें। अध्यात्म साधना के लिए सबसे अच्छा प्रातःकाल का ही है। दूसरे कामों के लिए भी प्रातःकाल का ही हैं, यानी कि चौबीस घंटों में जो सबसे अच्छा समय हैं, वह प्रातःकाल का ही हैं। प्रातःकाल के समय को आप जिस भी काम में लगा देंगे, उसी काम में आपको बड़ी प्रसन्नता मिलेगी और सफलता भी मिलेगी।
अंतर्गुहा में प्रवेश करें
इसलिए चिंतन और मनन की एकाँत साधना के लिए अगर आप प्रातःकाल का समय निकाल पाएँ, तो बहुत अच्छा। कदाचित् प्रातःकाल का समय निकालना आपके लिए संभव न हो तो आप ऐसा करें कि और कोई समय एक साथ मनोयोगपूर्वक काम करने हेतु आप निकाल ले। जब कभी आप यह देख पाएँ कि एक आधा घंटा या पंद्रह मिनट का समय ऐसा निकलता है, जिसमें आप शांतचित्त है। इसमें मन के लिए शांतचित्त होना जरूरी है। भागदौड़ में, रास्ता चलते, चलते-फिरते कहीं भी जप कर लेंगे, नहीं, ऐसा मत कीजिए। चिंतन-मनन के लिए ऐसा संभव नहीं है। इसके लिए ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ बाहरी विक्षेप उत्पन्न न होता हो और आपका मन शांत और एकाग्र हो जाता हो। इसके लिए कोई मुनासिब एकाँत का स्थान मिल जाए, तो और भी अच्छा, लेकिन अगर न मिले, तो आप आँखें बंद करके भी ऐसी जगह बैठ सकते हैं, जहाँ कोलाहल न हो। आँखें बंद कर लेंगे, तब भी गुफा निवास की स्थिति बन जाती है। गुफा में चले जाना और शांत-एकाँत में चले जाना एक की बात है। अगर ऐसा संभव न हो तो आप आँखें बंद कर लें। आँखें बंद करना भी एक काम है। आँखें बंद करने से भी बहुत काम बन सकता है। आँखें बंद करने से भी बहुत काम बन सकता है। आँखें बंद कर लेने पर भीतर-ही-भीतर का दिखता है, बाहर न कुछ है और न दिखता है।
अतः आप अपनी आँखें बंद करके अपने आपको एकाँत में समाया हुआ देखें। इस समय जैसे भी काम चल सकता हो, चिंतन-मनन के लिए आप कहीं थोड़ी देर के लिए शांतचित्त से बैठ जाएं और यह समझें कि हम अकेले हैं, कोई हमारा साथी और सहकारी नहीं है। साथी अपनी जगह पर, सहकारी अपने स्थान पर, कुटुँबी अपने स्थान पर, पैसा अपने स्थान पर, व्यापार अपने स्थान पर, खेती बाड़ी अपने स्थान पर इन सबको अपने-अपने स्थान पर रहने दीजिये। आप तो सिर्फ यह अनुभव कीजिए कि हम एकाकी हैं और एकाँत में बैठे हुए हैं। फिर क्या करें? फिर आप दो तरह के विचार करना शुरू कीजिए। यह विचार करने की शैली है। यह ध्यान की शैली है। यह ध्यान की शैली नहीं हैं, यह विचारणा है। चिंतन और मनन में विचार करने की गुंजाइश हैं, मन को भागने की पूरी छूट है। ध्यान में तो एक केंद्र ही करना पड़ता है, पर इसमें एक केंद्र में नहीं कर पड़ता। इसके लिए विचार करने के लिए काफी लंबी-चौड़ी गुंजाइश है।
चिंतन अर्थात् अपनी समीक्षा
चिंतन उसे कहते हैं जिसमें भूतकाल के लिए विचार किया जाता है कि हमारा भूतकाल किस तरीके से व्यतीत हुआ। इसके बारे में आप समीक्षा कीजिए। आप अपने समीक्षा तो नहीं कर पाते, लेकिन दूसरों की समीक्षा कर अच्छी तरह जानते हैं। आप पड़ोसी की समीक्षा कर सकता है, अपनी बीबी के दोष निकाल सकते हैं, भाग्य ने गलती बता सकते हैं। कोई भी ऐसा नहीं है जिसकी आप गलती न बताते हों, लेकिन अपनी गलती? अपनी गलती पर तो आप विचार भी नहीं करते। अगर अपनी गलतियों पर विचार करना शुरू करें, अपनी स्वयं की समीक्षा करें, तो ढेरों-ढेरों चीजें ऐसी मालूम पड़ेंगी, जो हमको नहीं करनी थी। ढेरों चीजें ऐसी मालूम पड़ेंगी कि जिन कामों को हमने किया है। जिन बातों को अपनाया है, उनको नहीं अपनाना चाहिए था। यह विचार कभी आता है आपको? नहीं कभी नहीं आता।
मित्रो! मन की बनावट ही कुछ ऐसी है कि अपना जो कुछ है सो अच्छा। हमेशा मन में यही बात बनी रहती है कि अपना स्वभाव भी अच्छा, अपनी आदतें भी अच्छी, अपना विचार भी अच्छा, सब कुछ अपना ही अच्छा, अपना विचार भी अच्छा, सब कुछ अपना ही अच्छा, बाहर वालों का गलत। आमतौर से लोगों की यही मनोवृत्ति होती है और यह मनोवृत्ति गलत है। अध्यात्मिक उन्नति में यह मनोवृत्ति बहुत भयंकर है। आध्यात्मिक उन्नति में इसके बराबर अड़चन डालने वाला दूसरा और कोई व्यवधान है ही नहीं। इसलिए आप पहला काम वहाँ से शुरू कीजिए, आत्मसमीक्षा से। एकाँत में चिंतन के लिए जब आप बैठें तो आप यह विचार किया करें कि हम पिछले दिनों क्या भूल करते रहे हैं। हम रास्ता भटक तो नहीं गए, भूल तो नहीं गए। इसके लिए ही जन्म मिला था क्या? पेट के लिए जितनी जरूरत थी, उससे ज्यादा कमाते रहे क्या? कुटुँब की जितनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी थीं, उसके स्थान पर अनावश्यक संख्या में लोग बढ़ाते रहे क्या और जिन लोगों को जिस चीज की जरूरत नहीं थी, उनको प्रसन्न रखने के लिए उपहार रूप में लादते रहे क्या? क्यों? आखिर क्या वजह थी? यह सब गलतियाँ हैं। इनकी समीक्षा करना शुरू कीजिए।
इसी तरह अपने खान-पान के लिए, स्वास्थ्य के लिए, आहार-विहार के लिए, जैसा रखना था, वैसा ही रखा क्या? चिंतन की शैली में जैसी शालीनता का समावेश होना चाहिए था, वैसा रखा क्या? नहीं। न हमने शरीर के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया, न अपने मस्तिष्क के प्रति कर्त्तव्य का पालन किया, न अपने कुटुँबियों के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया। कर्तव्यों की दृष्टि से हम बराबर पिछड़ते हुए चले गए। अतः जहाँ-जहाँ पिछड़ते हुए चले गए, उन सबके विषय में एक बार फिर विचार कीजिए।
आत्मसुधार की प्रक्रिया
क्यों, विचार करने से क्या फायदा है? विचार करने से यह फायदा है कि गलतियाँ जब समझ में आ जाएंगी, तो सुधार की भी गुंजाइश बढ़ेगी। गलतियाँ समझ में नहीं आएंगी, तो आप सुधारेंगे ही क्यों? बीमारी का निर्धारण हो जाए, कोई चैकिंग करके पता चला ले कि आपके भीतर टी.बी. की शिकायत हैं, तभी तो आप उसका इलाज कराएंगे न? अगर आपको मालूम ही नहीं है, तो यही कहेंगे कि हमारा तो ऐसे ही शरीर ढीला हो जाता है, कोई बीमारी नहीं है। इसलिए समीक्षा जो हैं, नाड़ी परीक्षा की तरह है, उसे अपने आप ही कीजिए-भूतकाल के संबंध में। पापों को ही ‘क्राइम’ नहीं कहते। पाप उन्हें भी कहते हैं, जो कि जीवन को ठीक तरीके से जीने का क्रम हैं, उसका व्यतिक्रम भी पाप में आता है। ‘क्राइम’ तो यह है चोरी, डकैती, अपहरण, हत्या वगैरह। यह तो बुरे कर्म हैं ही, मगर यह भी कम बुरा कर्म नहीं है कि आप आलस्य और प्रमाद में ही समय काट दें। आप अपने स्वभाव को गुस्सेबाज बनाकर रखें, ईर्ष्या किया करें, चिंतन और मनन को अस्त-व्यस्त बनाकर रखें। यह भी कोई ढंग हैं? यह क्या हैं? यह भी गलतियाँ है। व्यक्तिगत जीवन में आपके गुण, कर्म, स्वभाव संबंधी गलतियाँ क्या हुई और क्राइम-अपराध, जुर्म करने के संबंध में क्या भूलें हुईं? इन दोनों के बारे में एक बार विचार किया कीजिए, यह विचार करना बहुत जरूरी है। इससे यह मालूम होता है कि हमारी गलतियाँ कहाँ हैं और इस कितनी चूक करते रहे हैं और चूक कर रहे हैं।
आत्मनिरीक्षण द्वारा इन चूकों को सुधारने वाला अगला कदम आता है-आत्मपरिष्कार अर्थात् आत्मनिरीक्षण के बाद में आत्मपरिष्कार का दूसरा नंबर आता है। सुधार कैसे करें? सुधार में बात करनी होती है? सुधार में रोकथाम करनी है, मसलन आप शराब पीते हैं, तो शराब पीना बंद कीजिए। आप बीड़ी पीते हैं, सिगरेट पीते हैं, अपना कलेजा जलाते हैं, तो अब विचार कीजिए कि अब हम कलेजा नहीं जलाएंगे। आत्मपरिशोधन इसी का नाम है कि जो गलतियाँ आपसे हुई हैं, उनके विरुद्ध आप रुकावट खड़ी कर दें, रोकथाम के लिए आमादा हो जाएं और संकल्प लें कि जो भूलें हमसे हुई हैं, अब न हों। इसके लिए स्कीम बनाएं।
अपने मन से स्वयं लड़िए
मित्रो! गलतियाँ न होने देने का तरीका क्या है? अपने अंदर जो कमजोरियाँ, कच्चाइयाँ आई हैं, उन्हें कैसे दूर करेंगे? यह कमजोरियाँ और कच्चाइयाँ जब मजबूर करेंगी कि जो ढर्रा चलता रहा है, वही चलता रहना चाहिए, तब फिर क्या करेंगे? अपने साथ में पक्षपात और रियायत करने का जब आपका मन उठे तब आप स्वयं अपने मन के विरोधी हो जाइए। मन को निग्रहित कीजिए, मन को तोड़िए-मरोड़िए, मन से लड़ाई कीजिए। मन भला आदमी है क्या, जो कहने से मान जाता है? नहीं, किसी का मन कहने से माना नहीं है। आप सबको यही शिकायत रहती है न कि हमारा मन नहीं लगता। तो फिर मन को लगाइए न। मन क्या कोई ऐसा भला आदमी है, जो अच्छे कामों में लग जाएगा? नहीं लगेगा, क्योंकि मन के ऊपर कुछ कुसंस्कार जमे हुए है। आप यह उम्मीद करते हैं कि आपका मन अच्छे कामों में लगेगा? ध्यान में लगेगा? भजन में लगेगा? नहीं लगेगा। इसको लगाना पड़ता है। जिस तरह बैल को हल में चलना सिखाना पड़ता है, घोड़े को जिस तरह जबरन तांगे में चलाना पड़ता है, जैसे सरकस के जानवरों को कोड़े मार-मारकर अभ्यास करना पड़ता है, ठीक उसी तरीके आपको अपने मन को मारना पड़ेगा, मन को मारना पड़ेगा, मन को तोड़ना-मरोड़ना पड़ेगा, मन से प्रतिद्वंद्विता करनी पड़ेगी, मन से बगावत करनी पड़ेगी। उसको सजा देने का भी जरूरत पड़ेगी, जिससे घूम-फिरकर वह सही रास्ते पर आ जाए।
प्रश्न उठता है कि अगर मन न माने तब? तब फिर अपने खाने में और सोने में किफायत कर डालिए। इतने पर भी यदि मन नहीं माना और आप जहाँ सोचना नहीं चाहते थे, जो करना नहीं चाहते थे, किया, तो आप एक समय का खाना बंद कर सकते हैं। पूरा खाना न बंद करना हो तो आप उसमें कटौती कर सकते हैं। आप चार रोटी खाते हैं और अगर आपका मन गड़बड़ी करता है, तो दो रोटी खाइए, आधा बंद कर दीजिए। कहने का तात्पर्य यह है कि आप खाने और सोने के साथ में कटौती कीजिए। रोज आप पाँच बजे उठते हैं, तो आज आप प्रातः तीन बजे उठेंगे। दो घंटे हम इसीलिए जागेंगे और टहलेंगे। जैसे मिलिट्री के सिपाही जब गलती करते हैं, तो उनको सजा बोल दी जाती है और वे मिट्टी ढोते हैं, दौड़ लगाते हैं। आप भी जगने की सजा बोल दीजिए कि हम दो घंटे जगेंगे। रोज नौ बजे सोते हैं, तो आज हम ग्यारह बजे सोएंगे, बाहर टहलते रहेंगे, रामायण पढ़ते रहेंगे, नींद से लड़ेंगे। क्यों? यह दंड है।
मित्रो! अपने आपको दंड देने की पद्धति भी आवश्यक है। इसके बिना सुधार होना संभव नहीं है। दंड की प्रक्रिया भी जरूरी है। समझाने भर से ही कहाँ मान जाते हैं, खासतौर से दुराग्रही लोग, दुराग्रही जानवर और दुराग्रही मन। खासतौर से दुराग्रही मन से आप यह उम्मीद मत कीजिए कि आपके कह देने से, पढ़ लेने से या सुन लेने से या समझा देने से बात बन जाएगी। ऐसे नहीं बनेगी। इसके लिए आपको लड़ना पड़ेगा। मन के साथ बगावत को क्या करना है और उस खाई को कैसे पाटना है, यह तभी तो करेंगे जब पिछली बाते याद आएँ। पिछली बातें याद करने का नाम हैं, ‘चिंतन’। चिंतन आप जरूर किया कीजिए।
मनन भी उतना ही जरूरी
दो बातें हो गई न। एक हो गया आत्मनिरीक्षण और एक हो गया, आत्मपरिष्कार या आत्मपरिशोधन। यह हो गया चिंतन। चिंतन की दो ही धाराएँ हैं, गलतियों को याद करना और गलतियों को सुधारने के लिए हिम्मत इकट्ठी कर लेना और तदनुरूप कार्यपद्धति बना लेना। इस तरह एकाँत का आधा काम समाप्त। इस एकाँत सेवन के चिंतन को याद कीजिए। इसके बाद दूसरा वाला कदम उठाइए। यह दूसरा कदम हरदम आपको एकाँत में बैठकर उठाना पड़ेगा। इसका नाम है ‘मनन’। मनन क्या है? मनन के भी दो हिस्से हैं। जिस तरह चिंतन के दो हिस्से हैं, उसी तरह मनन के दो हिस्से हैं। इनमें से एक का नाम हैं, ‘आत्मनिर्माण और दूसरे का नाम है आत्मविकास आत्मनिर्माण क्या है? आत्मनिर्माण उसे कहते हैं कि जो चीज आपके पास नहीं है या जो उच्चस्तरीय गुण, कर्म, स्वभाव आपके व्यक्तित्व में शामिल नहीं है, वह शामिल कीजिए। मसलन आप पढ़े-लिखे नहीं हैं, विद्या नहीं है आपके पास, तो आप कोशिश कीजिए कि आपको विद्या पढ़नी है। हम ईमानदारी से रहते हैं, बीड़ी भी नहीं पीते? आपकी बात सही है, लेकिन मैं यह पूछता हूँ कि विद्या की जो कमी हैं, उसे आप पूरा क्यों नहीं करते? विद्या की कमी को आप पूरा नहीं करेंगे, तो उन्नति कैसे होगी? आपके ज्ञान का दायरा कैसे बढ़ेगा? बुद्धि का विकास कैसे होगा? इसलिए यहाँ आत्मनिर्माण के लिए भी ढेरों काम करने हैं।
आपका स्वास्थ्य कमजोर हैं, तो इसी से काम नहीं चल जाएगा कि आप पहले बीड़ी पीते थे और अब पीना बंद कर दिया है। बीड़ी पीना तो बंद करना ही पड़ेगा, पर साथ में एक काम और करना पड़ेगा। स्वास्थ्य संवर्द्धन करने के लिए आपको अपने आहार में क्रांतिकारी परिवर्तन करना पड़ेगा, ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ेगा और व्यायाम का कोई नया तरीका अख़्तियार करना पड़ेगा। ये जो नए तरीके अख़्तियार करना है, इसके लिए, प्रगति के लिए यह सब कार्य आत्मनिर्माण में आते हैं। कमी को सुधारने से थोड़े ही काम चल जाएगा, कमी को पूरा भी तो करना पड़ेगा। विद्या को आप नहीं पढ़ेंगे, स्वास्थ्य को आप नहीं सुधारेंगे, जनसंपर्क नहीं बढ़ाएंगे, सेवा के लिए कदम नहीं बढ़ाएंगे, तो काम कैसे बनेगा? अतः जो काम करने हैं, वह तो करने ही पड़ेंगे। आप अपनी गलती को सुधारिए और अपनी योग्यताओं को, अपनी क्षमताओं को और अपनी भावनाओं को विकसित कीजिए। इसी को हम ‘आत्मनिर्माण’ कहते हैं।
आत्मनिर्माण में बराबर यह देखना पड़ेगा कि हमारे जीवन में क्या कमी है और उस कमी को कैसे पूरा करें? इसके लिए अपने स्वभाव को, अपनी आदतों को हम ठीक बनाएँ। निर्माण का मतलब बनाना होता है। अपने आप को बनाइए। अपने स्वास्थ्य को बनाइए। अपने व्यक्तित्व को बनाइए। अपने चरित्र को बनाइए। अपने स्वभाव को बनाइए। अपनी कार्यशैली को बनाइए। प्रत्येक चीज को बनाइए। इन सबको बनाने के अतिरिक्त एक और बात का ध्यान रखिए, आप अपने कुटुँब को बनाइए। निर्माण उसका भी जरूरी है। हम अकेले संत बन जाएंगे और रामायण पढ़ेंगे, मिठाई नहीं खायेंगे। आपका कहना ठीक हैं, परंतु वह भी तो आपका ही अंग है। जो कुटुँब है, वह भी तो आपके साथ जुड़ा हुआ है, निर्माण उसका भी करना पड़ेगा। अगर आप उसका निर्माण नहीं करेंगे, तो सारे-के-सारे आपके घर वाले कमीने, उजड्ड, मूर्ख, दुष्ट बनकर रहेंगे। ऐसी स्थिति में आपकी शांति कैसे स्थिर रहेगी? फिर आप भजन कैसे कर लेंगे? फिर आप अच्छी जिंदगी कैसे जी लेंगे? फिर आप मीठे वचन का अभ्यास कैसे कर लेंगे? जब हर आदमी हैरान करेगा, तो आपको गुस्सा कैसे नहीं आएगा?
इसलिए मित्रो! क्या करना चाहिए? अपना व्यक्तिगत जीवन सुख और शांतिमय बनाने के लिए अपने कुटुँब और परिवार के बारे में ठीक वही नीति निर्धारण कीजिए, जो कि अपने बारे है। कुटुँबी भी तो अपने अंग है, ठीक उसी तरीके से जैसे अपने हाथ-पैर हैं। आप यदि कहें कि हम हाथ को तो धोएंगे, पर पैर नहीं धोएंगे। यह क्या बात हुई, आप पैर को क्यों नहीं धोएंगे? आपको पैर भी धोना पड़ेगा। इस तरीके से अपने व्यक्तिगत जीवन को ही अच्छा बनाना पर्याप्त नहीं है। अपने कुटुँब और परिवार का निर्माण करना भी इसी शृंखला में शामिल होता है और समाज निर्माण भी। इन सबको बनाइए, इनके भीतर भलमनसाहत पैदा कीजिए, आदर्श पैदा कीजिए, चरित्र पृष्ठ पैदा कीजिए, सत्प्रवृत्तियाँ पैदा कीजिए।
सबसे बड़ा निर्माण-आत्मनिर्माण
आप संपन्न बन जाएँ या न बन पाएँ, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। गरीबी में भी लोगों ने शानदार जिंदगियाँ जी है और अमीर रहते हुए भी आदमी ने इतने कलह उत्पन्न किए हैं कि वे स्वयं तो मरे ही हैं, दूसरों को भी मार डाला है। इसलिए संपन्नता की बात मैं आपसे नहीं कहता। निर्माण से मेरा मतलब गुण, कर्म, स्वभाव से है। आप इन विशेषताओं को, आदमी की शालीनता को, आदतों को और चिंतन की शैली को बदलने के लिए जो कुछ कर सकते हैं, वह सब कुछ कीजिए, लेकिन परिवार के लिए भी कीजिए। परिवार के पंचशीलों में ‘श्रमशीलता’ का नाम आता है, सुव्यवस्था का नाम आता है, मितव्ययिता का नाम आता है, सहकारिता, शालीनता का नाम आता है। यह सब बाते उसमें आती है। आप इन सब बातों का स्वयं निर्धारण कीजिए और घरवालों को धारण करवाइए। यह व्यक्तित्व के निर्माण, चरित्र के निर्माण, चिंतन के निर्माण करने का एक शानदार तरीका है। आप इसको किस तरीके से कार्यान्वित कर सकते हैं, इसके बारे में एकाँत में चिंतन और मनन करने जब बैठें, तब यह विचार किया कीजिए। यह तीसरी वाली बात निर्माण वाली धारा है।
चौथी वाली एक और धारा है, जिसे ‘मनन’ का दूसरा हिस्सा कह सकते हैं अथवा चिंतन-मनन की चौथी वाली कड़ी कह सकते हैं। उसका नाम है, ‘आत्मविकास’ आत्मविकास का क्या मतलब है? आत्मविकास का यह मतलब है कि अपने आपका, अपने ‘अहं’ के दायरे को बढ़ा देना। लोगों का दायरा कूप-मंडूक के तरीके से बहुत छोटा है। वे अपने शरीर को ही अपना मानते हैं। यह नहीं मानते कि हम समग्र समाज के एक घटक मात्र हैं। रक्त के एक कण की क्या कीमत हो सकती है? रक्त के सारे कण, का समूह जब मिल जाता है, तभी तो खून का संचार होता है। एक कण से क्या होता है, संयुक्त होने पर ही बात बनती है। इसलिए आप अपने दायरे को सीमित मत कीजिए, आप संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँचे उठने की कोशिश कीजिए। अपने ‘मैं’ के स्थान पर आप ‘हम’ कहना सीखिए। आप ‘मैं-मैं’ करते रहेंगे, तो आप बकरे की तरह सीमित जाएँगे और कूप मंडूक के तरीके से एक ऐसे छोटे दायरे में घिरे रहेंगे, जिसमें आप और आपका कुटुँब, बस ही आदमी रह जाएंगे। आपका समाज से अथवा भगवान् से कोई संबंध ही नहीं रह जाएगा, इसलिए अपने आपका दायरा विकसित कीजिए।
आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना
“हम सबके है और सब हमारे हैं” इस तरीके से विचार कीजिए। आप “आत्मवत् सर्वभूतेषु” इस तरीके से विचार कीजिए। यह सारा संसार हमारे की समान है। इसी के सहयोग से हम जिंदा है। अतः हमारा सहयोग सबको मिलना चाहिए। अगर आप इस तरह से विचार करेंगे, तो आप समाजनिष्ठ होते चले जाएंगे, चरित्रवान नागरिक होते चले जाएंगे, देश, धर्म, समाज और संस्कृति के प्रति आप अपना लगाव व्यक्त करने लगेंगे और उनकी समस्याओं को भी अपनी समस्या मानने लगेंगे। यह क्या हो गया आत्मा का विस्तार। आत्मा का विस्तार यही है जिसको कि हम आध्यात्मिक उन्नति के नाम से पुकारते हैं। आत्मिक प्रगति के नाम से पुकारते हैं, यही वह रास्ता है, जिस पर चलते हुए आदमी का पूर्ण लक्ष्य तक पहुँचाना संभव है। आपके लिए भी यही रास्ता है।
मित्रो! आपके लिए एवं सभी के लिए एक ही रास्ता है अपने आपके दायरे को बढ़ा देना। संतों ने यही किया था, महापुरुषों ने यही किया था। वे अपने लिए नहीं जिए। समाज के लिए जिए, देश, धर्म और संस्कृति के लिए जिए। सबके दुःखों में शामिल हुए, औरों के दुःख बँटाते रहे और अपने सुख बाँटते रहे। अपने सुखों को बाँट देना और दूसरों के दुखों को बंटा लेना, यहीं कौटुँबिक प्रवृत्ति है। आप अपनी प्रवृत्तियों को कौटुँबिक बनाइए, पारिवारिक बनाइए। अपने परिवार को जिस तरह आप अपना समझते हैं, ठीक उसी तरीके से सारे समाज को भी अपना समझिए, सारे देश के अपना समझिए, सारी मानव जाति को, प्राणिमात्र को अपना समझिए और अपना दायरा बढ़ाइए।
मित्रो! जो चीजें आपको अपनी मालूम पड़ती हैं, उनसे प्रसन्नता होती है और उनको आप अपना समझते हैं। लेकिन अगर आप सबको अपना मान लें तब? आपको कितना गौरव और प्रसन्नता का अनुभव होगा, कह नहीं सकते। तब सूरज भी आपका, चाँद भी आपका, सितारे भी आपके, नदी भी आपकी, पहाड़ भी आपके, जमीन भी आपकी, सारे इन्सान भी आपके, सारे कुटुँब भी आपके, सारा संसार भी आपका। इस तरह अपना दायरा चौड़ा कर लें तब? तब आपकी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा। अभी तो आपने थोड़े-से लोगों को, थोड़ी-सी वस्तुओं को आपने अपना माना है। उससे भी कुछ-न-कुछ तो आपको राहत मिलती है, प्रसन्नता होती है, लेकिन जिस दिन आप सबको अपना मानने लगेंगे और अपने को सबका मानने लगेंगे, तब आप देखना कि आपको कैसा मजा आता है, कितना आनंद आता है और जीवन में, गतिविधियों में कैसा हेर-फेर होता है और आपकी प्रसन्नता किस तरीके से जमीन से आसमान को छूने लगती है। इस तरह आप अपने अंदर ऐसी स्थिति पैदा कीजिए।
संक्षेप में कहे तो चिंतनपरक-आत्मसमीक्षा एक, आत्मसुधार दो और मननपरक आत्मनिर्माण एक और आत्मविकास दो। दो मनन की धाराएँ और दो चिंतन की धाराएं चारों को मिला दीजिए। यह चारों वेदों का सार है। यह चारों दिशाओं से भगवान् के बरसने वाले अनुदानों को प्राप्त करने का सही तरीका है। आपकी उपासना में चिंतन और मनन का भी स्थान रहना चाहिए और न केवल स्थान रहना चाहिए, बल्कि उसे मजबूती से पकड़े रहना चाहिए। छोड़ना किसी भी कीमत पर न हो, अगर आपका ऐसा संकल्प हो तो आप अध्यात्म जीवन में तेजी से आगे बढ़ेंगे और वह लाभ प्राप्त करेंगे जो अध्यात्मवाद की शक्ल में प्राप्त होते रहें हैं।
॥ॐ शांति॥
जब तक आपने को उठाने और सुधारने के लिए तुम स्वयं तैयार नहीं होते, तब तक कोई दूसरा तुम्हें उठा या सुधार नहीं सकता।
एक साधु द्वार पर बैठे तीन भाइयों को उपदेश कर रहे थे, “वत्स! जो कछुए की तरह अपने हाथ-पाँव सब ओर से समेटकर आत्म-लीन हो जाता है, ऐसे निरुद्योगी पुरुष के लिए संसार में किसी प्रकार का दुख नहीं रहता।
घर के भीतर बुहारी लगा रही माँ के कानों में साधु की यह वाणी पड़ी तो वह चौकन्ना हो उठी। बाहर आई और तीनों लड़कों को खड़ा करके छोटे से बोली, ‘ले यह घड़ा पानी भर कर ला।” मझले से कहा, “तू चल और सब कूड़ा उठाकर बाहर फेंक।” अंत में साधु की ओर देखकर उस कर्मावती ने उपदेश दिया, “महात्मन्! निरुद्योगी मैंने बहुत देखें हैं, कई पड़ोस में ही बीमारी से ग्रस्त, ऋण-भार से दबे शैतान की दुकान खोले पड़े है।”
ज्ञान को कर्म का सहयोग न मिले, तो कितना ही उपयोगी होने पर भी वह ज्ञान निरर्थक है।
“हमारे आत्मस्वरूप,
पत्र मिला। आपकी चिंता तथा कठिनाई की और भी अधिक गहरी जानकारी हुई। समाज का जो दृष्टिकोण हैं, वह अपनी जैसी अनेक कन्याओं के गले में नागपाश बनकर उनका दम घोंट रहा है। आपकी व्यथा हम जानते हैं। लगभग ऐसी ही व्यथा एक-तिहाई हिंदू धर्मानुयायियों को सहन करनी पड़ती है। चूँकि हर कोई अपनी सफलता व्यक्त करता है और व्यथा छिपता है, इसलिए वस्तुस्थिति का पूरा पता नहीं चलता, पर वस्तुस्थिति को बारीकी से परखा जाए, तो पता चलेगा कि लोक-मानस की जो अवाँछनीय स्थिति बन गई हैं, उससे कितना भारी उत्पीड़न हो रहा है। कई बार जी जल उठता है और लगता है जिस हिंदू समाज की महिमा गाते-गाते हमारे गले सूख गए अब उसकी बखिया उधेड़ने का काम आरंभ किया जाए। कन मसोसकर रह जाना पड़ता है। आपके सामने अपनी बच्ची की समस्या है, हमारे सामने ऐसी ही उससे मिलती-जुलती समस्याओं में उलझे हुए हजारों-लाखों अभिभावक हैं। उनकी व्यथा हमें रुला देती है।”
हमारे आत्मस्वरूप,
एक मिली। आपकी दयनीय तथा कठिनाई की और भी अधिक भी जानकारी हुई। समाज कर जो हम इकाई उतनी नई अनेक के समस्याओं के काम मात्र है।
परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से यह पत्र एक अभिभावक श्री बी. एल. गुप्ता को 16/3/1968 के दिन लिखा गया था। कितना कटु सत्य एवं वेदना भरी है इन पंक्तियों में। एक समाज सुधारक-संत के अंतःकरण में करुणा का स्तर क्या हो सकता है, इसका अनुमान इन पंक्तियों को पढ़कर लगाया जा सकता है। परमपूज्य गुरुदेव अंदर से माता समान थे एवं यही उनकी सजलता इनकी नारी जाति के उत्थान हेतु एक आँदोलन के रूप में विकसित हुई, जो परमवंदनीया माता जी का साथ पाने के बाद और गति पकड़ती चली गई। कोई भी आँदोलन जब तक करुणा नहीं उपजती, आध्यात्मिक आधार नहीं खड़ा होता, सफल नहीं हो पाता। नारी जागरण आज के समय की एक अनिवार्यता है, यह सभी जानते हैं। अविवाहित लड़कियों की बढ़ती समस्या, जलती बहुएं, दहेज-नेग की बलिवेदी पर लाखों अंतःकरणों का निरंतर जलते रहना यही बताते हैं कि गलित कुष्ठ की तरह से पनप रही इस समस्या का समाधान सभी को खोजना होगा। आज के भौतिकवादी युग में हम आधुनिक भी बने हैं, यथाकथित विज्ञान के आविष्कारों के चरम शिखर पर भी पहुँच चुके हैं, किंतु संवेदना की दृष्टि से हम शून्य होते चले गए हैं, यही कारण है कि अब यह घटनाएँ, ये समाचार और अधिक कष्ट नहीं देते। हमारी अंतश्चेतना को छूते नहीं।
परमपूज्य गुरुदेव ने 1942-43 से लेकर परमवंदनीया माताजी के शांतिकुंज आकर 1971 में नारी जागरण आँदोलन की बागडोर खड़ी करने तक अपनी लेखनी-वाणी द्वारा जो आग लगाई, उसी का परिणाम गायत्री परिवार है। इस संगठन के सत्तर प्रतिशत सक्रिय कार्यकर्ता नारी समुदाय से हैं। इसी से पता लगता है कि इस आंदोलन का आधार कितना सशक्त है। परमपूज्य गुरुदेव की नारी जागरण की पृष्ठभूमि उनकी श्रद्धासिक्त संवेदना है, जो नारी मात्र है।
प्रति है, उसके उत्पीड़न के विरुद्ध है। इसी पात्र में वे आगे लिखते हैं-
“आपकी बच्ची की समस्या हल होनी ही है। हो ही जाएगी। लड़की को समझाकर थोड़ा कम आजीविका वाला लड़का ढूंढ़ा जा सकता है। दोनों मिलकर आसानी से गुजर कर सकते हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त कर वह समाज कल्याण के रचनात्मक कार्यों में लग सकती है। विवाह जरूरी लगता तो हैं, पर है नहीं। इस जमाने में तो वह सुविधाजनक भी है।”
“आपकी सभी समस्या हल हो जाएंगी। है ही सच्ची। लड़की को समस्या कर थोड़ा कम आजीविका वाला लड़का मिलना आवश्यक है। सच कल भर आसानी से कहना आवश्यक है।
पत्र की एक-एक पंक्ति आज के अभिभावकों के लिए मार्गदर्शन है। आज की परिस्थितियों में कितने सही उतरने वाले आधुनिकतम विचार है। सभी अपनी लड़कियों के लिए अधिक कमाने वाले लड़का चाहते हैं। इसी में समय बीतता जाता है। यौवन ढल जाता है। यदि मानसिक पृष्ठभूमि बना ली जाए, तो बिना विवाह किए सुविधाजनक ढंग से भी रहा जा सकता है और अधिक समाज सेवा की जा सकती है तथा उस त्रासदी से भी बचा जा सकता है, जो जबर्दस्ती किसी अनपढ़ के साथ गले बाँध देने पर पैदा होती है।
इसी पत्र की आगे की पंक्तियाँ पूज्यवर की वास्तविक अंतर्व्यथा बताती है एवं आपसे व हम सभी से समाधान माँगती हैं।
“पर आपकी समस्या हल होने मात्र से क्या बनता हैं? रोग बहुत बड़ा और बहुत व्यापक है। इस महामारी से जूझने के लिए हमें अपने जीर्ण-शीर्ण शरीर और टूटे-फूटे साधनों को लगाना ही चाहिए। इसके बिना हमारी प्रबुद्धता निरंतर हमें धिक्कारती रहेगी। लोग बड़े-बड़े काम कर सकें, क्या हम लोग हिंदू धर्मानुयायियों के बीच सामाजिक क्राँति संपन्न नहीं कर सकते? यदि नहीं भी तो उसका बीजारोपण तो किया जा सकता है। आप जैसे थोड़े से भी समर्थ व्यक्ति इस दिशा में उठ खड़े हों, तो पहाड़ की बराबर काम हो जाए, पर आपकी भी विवशताएं हैं। क्या किया जाए? कैसे किया जाए? यही घुटन हर समय बनी रहती है।”
पर अपनी समस्या हल होने पर से कब बनता है।
गुरुसत्ता की व्यथा-वेदना किसी भी महामानव की अंतर्वेदना है। इसी व्यथा ने कभी महर्षि दयानंद को भी दुखी किया था एवं स्वामी विवेकानंद को भी। परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से निकला एक-एक वाक्य भले ही संबोधित उन अभिभावक बंधु को हो, पर चुनौती सारे समाज के लिए है। इसी से संबंधित एक और पत्र पाठकों को पढ़वाने का मन है। यह पत्र 29/8/57 को सिवनी के श्री ध्रुवनारायण जौहरी को लिखा गया था।
“शादी के लिए बहुत ऊँचा दृष्टिकोण न रखें। बहुत धनीमानी घरों में जाकर लड़कियाँ मानसिक दृष्टि से सुख नहीं पातीं। मध्यम स्थिति के अपने से कुछ कम माली हालत तथा शिक्षा के लोगों में पैसे की तंगी भले ही रहे, पर लड़कियों का सत्कार होता है। इस दृष्टिकोण को रखकर ढूंढ़-खोज की जाए, तो गुत्थी सरलतापूर्वक सुलझ जानी चाहिए, ऐसी आशा है।”
शादी के लिए बहुत ऊंचा दृष्टिकोण न जाने। बहुत धनी लोग ये जानकर लड़कियाँ आवश्यक दृष्टि से प्राप्त नहीं करती। बात चाहे किसी की पुत्री की हो, बहिन की या मौसी की, सभी पर यह तथ्य लागू होता है। हम कितने चिंतित एवं दुखी बने रहते हैं, यह सभी जानते हैं। कई व्यक्ति तो रोगी हो जाते हैं एवं इसी चिंता में घुलकर मृत्यु के द्वार तक जा पहुँचते हैं। समाधान खोजना होगा एवं बड़े व्यापक स्तर पर इसके लिए जन-जागृति पैदा करनी होगी।
परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर यही प्रयास किया कि ऐसी बहिनों का मनोबल बढ़े, गृहस्थ जीवन सुखमय बने एवं वे रचनात्मक कार्यों में जुटें। ऐसा एक पत्र जो 4/12/51 को बदायूँ (उ. प्र.) की श्रीमती कुँती शर्मा के नाम लिखा, यहाँ उद्धृत है।
“प्रिय पुत्री कुँती,
आशीर्वाद। तुम्हारा पत्र मिला। पढ़कर बड़ा दुख हुआ। तुम्हारी जैसी लक्ष्मी महिला को पाकर जिन्हें अपना भाग्य सराहना चाहिए था, वे लोग इस प्रकार तिरस्कार करते हैं, यह उनके भाग्य की हीनता ही है। तुम इसे प्रारब्ध भोग मानकर अपने चित्त को समझा लो।
तुम विद्या पढ़ने में पूरा ध्यान दो। नारी की सबसे बड़ी दुर्बलता यह होती है कि वह परावलंबी होती है। यदि स्वावलंबी हो जाए, तो तरह-तरह के तिरस्कार न सहने पड़ें। तुम विद्या पढ़कर स्वावलंबन प्राप्त करो, तभी तुम्हारी रोज की मानसिक अशांति का मार्ग मिलेगा।”
पत्र की भाषा देखें, सत्परामर्श का स्वरूप देखें एवं समझने का प्रयास करें कि एक गुरु अपनी शिष्या का उंगली पकड़कर किस प्रकार मार्गदर्शन करता है। यही वह विधा है जिसने सक्रिय प्राणवान् नारियों की एक कार्यकर्ता वाहिनी खड़ी कर दी। यही तो वह संवेदनासिक्त मलहम हैं, जिसकी नारी को सर्वाधिक आवश्यकता है।
रचनाधर्मी काव्य का सृजन करने वालों में मिशन की मूर्द्धन्य कवयित्री के रूप में माया वर्मा को जाना जाता है। इन्हें यह स्वरूप दिया परमपूज्य गुरुदेव ने। उनने उन्हें इसी तरह गढ़ा जैसे कि कुम्हार घड़े का निर्माण करता है। समय-समय पर वे उन्हें पत्र लिखते, मार्गदर्शन करते। पत्र की पंक्तियों के माध्यम से जो प्राणशक्ति प्रवाहित होती थी, वही उनकी जीवनमूरि थी। 1/11/1969 को लिखा एक पत्र यहाँ प्रस्तुत हैं।
“तुम्हारी भावभरी सद्भावना पत्रों में लिपटकर जब आती हैं, तब सारी थकान दूर हो जाती है।
तुम्हें जो काम सौंपा है, उसे तन्मय होकर हर बार अधिक उत्कृष्टता लाने में, अधिक मनोयोग लगाने का प्रयत्न करती रहना। कोई चीज हलकी लगे, तो उसे दूसरी बार एक संशोधनकर्ता की तरह स्वयं ही सुधारा करो और दुबारा लिखा करो। आमतौर से सभी अच्छे लेखकों का क्रम यह रहा है कि एक बार प्राथमिक लेख लिखते हैं। दो-तीन दिन उसे पड़ा रहने देते हैं। तब तक जी ठंडा हो जाता है। फिर उसी रचना को किसी नौसिखिये की लिखी समझकर कड़ी समीक्षा करते हैं और कर्मियों पर निशान लगाते हैं। इसके बाद दुबारा उसे लिखते हैं। आमतौर से सभी अच्छे लेख दो बार लिखे जाते हैं।
तुम हर लेख को तो नहीं, पर जो हलके लगें, उन्हें दुबारा जरूर लिखा करो। इससे श्रम तो बेकार गया लगता है, पर अपनी प्रतिभा और उत्कृष्टता बढ़ती है। यह बढ़ोत्तरी बहुत बड़ा लाभ है। संशोधन के लिए हमारे ऊपर निर्भर रहना धीरे-धीरे छोड़ देना चाहिए और इस कार्य को स्वयं ही संभालना चाहिए। इसी क्रम से तुम्हारा स्तर लिखने के संबंध में ऊँचा उठेगा।
तुम्हारी याद भी सद्भावना से जब आती है। तब सजती है।
तुम्हें जो समझ हैं उस तन्मय होकर ही बाहर उत्कृष्टता सभी में अधिक समायोजित होती है।
माया वर्मा जी इसी शिक्षण को पाकर एक कवियित्री बन गई। आरंभ उनने गद्य से किया था, पर गति उन्हें पद्य लेखन में मिली। इसमें निश्चित ही उनको गढ़ने वाली गुरुसत्ता का प्रत्यक्ष-परोक्ष दोनों ही स्तर पर मिला अनुदान है।
नारी को नर के समान स्थान दिलाने के लिए सतत तत्पर रहे, इसीलिए तो वे एक पत्र में लिखते हैं।
“कन्या बहुत ही शुभ घड़ियों में जन्मी है। इस आप पुत्र से भी बढ़कर समझें। आपकी क्या उच्चकोटि की आत्मा है, वह आपके वंश को उज्ज्वल करेगी।”
कन्या बहुत ही शुभ जन्मी है। आपकी कन्या उच्च कोटि को आता है।
श्री बिहारी लाल दुबे विलासपुर को लिखा 13/11/1963 का यह पत्र इस गुरुसत्ता के एक सुधारक-चिंतक स्तर के स्वरूप को दर्शाता है। इक्कीसवीं सदी नारी सदी है। नया युग संवेदना की धुरी पर, नारी के द्वारा किए जाने वाले सृजन के माध्यम से ही आएगा। हम-आप सभी उसी भवितव्यता को साकार करने में अपनी ऊर्जा का नियोजन करने में लगाएँ।
श्री रामकृष्ण परमहंस के गले में नासूर हो गया था। इसी समय शशिधर चूड़ामणि उनके पास आए और बोले, “स्वामी जी! यदि आप अपने मन को एकाग्र करके कहें कि ‘रोग चला जा’ तो आपका रोग अवश्य मिट जाएगा।” परमहंस बोले, “जो हृदय मुझे सच्चिदानंद माँ का स्मरण करने हेतु मिला है, उसे मैं साँसारिक कार्य में क्यों लगाऊँ?” इस पर अनेक शिष्यों को संतोष नहीं हुआ। उन्होंने मिल-जुलकर आग्रह किया कि आप माँ से कहें कि वह आपको रोग-मुक्त कर दें।
इस पर रामकृष्ण परमहंस मुस्करा कर बोले, “मैं ऐसी मूर्खता क्यों करूं? माँ दयामयी, सर्वज्ञ और सर्व-समर्थ हैं। उन्हें मेरे कल्याण के लिए जो उचित लगा, वही किया, फिर में उनकी व्यवस्था में छिछोरापन क्यों लाऊँ? अपना ओछापन क्यों बताऊँ?” महामानव अपनी संपदाओं को लोकहित में अर्पण करने के कारण ही महान बनते हैं।
(गीता के चतुर्थ अध्याय ज्ञानकर्म संन्यासयोग की युगानुकूल व्याख्या)
चौथे अध्याय के दसवें श्लोक के अंतर्गत विगत अंक में एक महत्वपूर्ण प्रतिपाद दिया गया कि वीतराग हो जाने पर, भय व क्रोध पर नियंत्रण पा लेने पर, शरणगति भाव से तप करने वाले भगवान् के स्वरूप को ही प्राप्त हो जाते हैं। गीता आत्मानुशासन का शिक्षण करने वाली एक पाठ्य पुस्तिका है। भगवान् कहते हैं कि जो मेरे साथ एक भाव को प्राप्त हो जाते हैं, वे आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्ति पा लेते हैं। आसक्ति पर विजय-वीतराग होना कितने उच्चस्तर की सिद्धि है, इसका प्रमाण पिछले अंक में महात्मा बुद्ध के एक शिष्य, कुतुक ऋषि एवं शुकदेव जी के उदाहरणों द्वारा दिया गया। भगवान् के स्वरूप को जान लेने के बाद, एकत्व की सिद्धि प्राप्त करने के बाद जीवन में जो आनंद का सागर लहराने लगता है, वह अवर्णनीय है। ध्यान में परमात्मा की उपस्थिति मानकर जब कर्तव्य कर्मों का संपादन किया जाता है, तो क्रमशः वासनाओं का क्षय होने लगता है। दिव्य प्रेरणाएँ मिलती हैं एवं अलौकिक कर्म होने लगते हैं। ग्यारहवें श्लोक में इस तथ्य को स्पष्ट किया गया कि ईश्वर एक प्रकार से आइना है, एक दर्पण है। भगवान् कहते हैं, "जो जिस भावना से मेरी उपासना करते हैं, उसी के अनुसार मैं उनकी कामनाओं को पूरा करते हूँ।" इसी बात को संत कबीर के एक दोहे द्वारा भी समझाया गया था। अब इसी श्लोक की व्याख्या के साथ आगे की यात्रा करेंगे।
योगेश्वर कृष्ण कह रहे हैं कि मनुष्य चाहे जिस तरह से भगवान् को अपनाते, उनसे प्रेम करते और आनंदित होते हों, भगवान् उन्हें उसी तरह अपनाते, उनसे प्रेम करते और आनंदित होते हैं। "ये यथा माँ प्रपद्यंते ताँस्तथैव भजाम्यहम्" के पीछे यही तथ्य निहित है। यह इसलिए ही कहा जा रहा है कि सभी मनुष्य सभी प्रकार से प्रभु के बताए मार्ग का ही अनुसरण करते हैं (मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वषः)। यहीं हमारी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता, सहनशीलता, सामासिकता का दिग्दर्शन हमें होता है। चाहे कोई भी उपासना-पद्धति हो, सभी साधनाएँ एक ही लक्ष्य उस अनंत सौंदर्य-आनंदस्वरूप-तत्त्वरूप परमात्मा की ओर ले जाने वाली पगडंडियाँ ही तो हैं।
मिलेगा आह्वान की तीव्रता के अनुपात में
यदि व्यक्ति निर्माण की दृष्टि से देखा जाए, तो आह्वान का तरीका कुछ भी हो, यदि अनिवार्य शर्तें पूरी हो रही हैं, तो मनुष्य की कामनाओं की पूर्ति निश्चित ही होती है। मनुष्य के लिए कुछ भी असंभव नहीं। आवश्यकता है, तो केवल उसे अपने मन का अवलोकन करने की, वंचित तीव्रता व एकात्मता के साथ अपनी क्षमताओं का बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयोग करने की, फिर जो भी कुछ वह चाहता है, उसे मिलकर ही रहेगा, चाहे वह आध्यात्मिक ज्ञान हो अथवा साँसारिक उपलब्धियाँ। प्रत्येक को अपने आह्वान की तीव्रता के अनुपात में अपने कार्यक्षेत्र में सफलता मिलती है, लेकिन यह उपलब्धि होती प्रभु से ही है, मार्ग भले ही विशुद्धात्मा सर्वशक्तिमान् सत्ता ही क्यों न हो। प्रत्येक सफल कार्य, चमत्कारिक उपलब्धि कहीं भी किसी समय अर्जित किए जाते हैं, तो वह आत्मा के शुद्ध चैतन्य से ही प्रेरित होते हैं।
भगवान् की ग्यारहवें श्लोक में कही गई बात को अब सीधे-सादे ढंग में समझने का प्रयास करें, तो ऐसा कुछ निष्कर्ष निकलता है, सारी आसक्ति, भय और क्रोध को त्यागकर स्थिर मन से अपने ही स्वरूप का ध्यान करने वाले साधक परमात्मा के अनंत सौंदर्य का दर्शन कर पाते हैं। कुछ लोग अपनी मनोकामनाओं के वशीभूत हो उनकी आराधना करते हैं, तो उन्हीं की कृपा के बल के सफलता पाते हैं। निम्न स्वार्थ से ग्रसित लोग धन, सम्मान, इंद्रिय-भोगों की कामना करते हैं। उनकी भी इच्छाएँ पूरी होती चली जाती है। सारा खेल मन का है। आपने जैसी कामनाएँ कीं, वैसा ही मनोयोग बना, क्रियाएं हुई और फल की प्राप्ति हुई।
ठाकुर एवं आचार्य श्री के जीवंत उदाहरण
वर्तमान में हम देखते हैं भगवान् श्री रामकृष्ण देव एवं परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम आचार्य "ये यथा माँ प्रपद्यन्ते" जैसे श्लोक के जीवित भाष्य के रूप में अवतरित हुए हैं। जहाँ ठाकुर ने अपने जीवन में विभिन्न धर्मों, मार्गों, मतों तथा साधना-प्रणालियों का अवलंबन कर सिद्धि के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचकर दिखाया, वहीं पूज्यवर ने भगवत् प्राप्ति के सभी मार्ग हमारे समक्ष खोलकर रख दिए। उनने विभिन्न प्रकार की साधना-प्रणालियों का मूल गायत्री बताकर सभी को उसके मर्म को जीवन में उतारने को कहा, वह चाहे किसी भी जाति या धर्म का क्यों न हो। सभी पहुँचते विभिन्न मार्गों से एक ही केंद्रबिंदु की ओर हैं, यही निष्कर्ष पूज्यवर के जीवन-दर्शन के अमृत-मंथन से निकलता है। कभी वैदिक युग में ऋषियों के मुख से "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" निकला था, किंतु द्वापर में "ये यथा माँ प्रपद्यन्ते" की घोषणा के बाद इस उदार महावाक्य को उन्नीसवीं में जीने के लिए ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस को एवं बीसवीं शताब्दी में श्रीराम शर्मा आचार्य जी को आना पड़ा।
बौद्ध, ईसाई, मुस्लिम आदि विभिन्न धर्मों के अभ्युदय और प्रधानता के कारण तथा विभिन्न देवताओं का उपासना अद्वैत, विशिष्ट द्वैत, द्वैताद्वैत आदि की साधना, षड्दर्शन-ज्ञान, कर्म, भक्ति, योग साधन, तंत्र आदि के मार्गों के प्रचलन के कारण विगत चार-साढ़े चार हजार वर्षों में एक कठिन परिस्थिति उत्पन्न हुई। अनेक धर्म-मतों के अनुयायी राजशक्ति की सहायता से अपने-अपने धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए परस्पर संघर्षरत हुए। "मेरा धर्म सत्य है" इस भाव से बहुत कुछ रक्त इस धरती पर बहा है। ऐसे में ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस की जीवन-साधना अवतरित हुई व उनने बता दिया कि सभी धर्म-मत सत्य हैं, अनंत मत-अनंत पथ हैं। इसीलिए तो श्री रामकृष्ण के संबंध में भाव-विभोर होकर स्वामी विवेकानंद कह उठते हैं, "उनका जीवन एक असाधारण प्रकाश स्तंभ है, जिसके तीव्र प्रकाश से लोग हिंदू धर्म के समाज अंग और आशय को समझ सकेंगे। ऋषि और अवतार जिस यथार्थ शिक्षा को देना चाहते थे, वह उसे अपने जीवन से दे गए हैं। शास्त्र-मतवाद मात्र हैं, परंतु वह थे उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति। यह व्यक्ति इक्यावन वर्षों के जीवन से पाँच हजार वर्षों का जातीय-आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करके भावी वंशधरों के लिए अपने को दृष्टाँत रूप बना गए है।" (श्रीमद्भागवत् गीता, स्वामी संपूर्णानंद जी, रामकृष्ण शिवानंद आश्रम बारासात पं बंगाल से उद्धत)।
एकता, समता, शुचिता, ममता
परमपूज्य गुरुदेव ‘अपनों से अपनी बात’ के अंतर्गत अखण्ड ज्योति जून 1969 की पंक्तियों में लिखते हैं, "नया युग कुछ आदर्शों को लेकर आ रहा है। एकता, समता, शुचिता और ममता, ये सत्प्रवृत्तियाँ जब उमगने और छलकने लगेंगी, तो आज प्रत्येक क्षेत्र में संव्याप्त विकृतियों अव्यवस्थाओं, उलझनों, कुंठाओं और समस्याओं को कोई कारण नहीं रह जाएगा। सर्वत्र सुख-शांति, प्रगति एवं समृद्धि भरली स्वर्गीय परिस्थितियाँ परिलक्षित होने लगेंगी। विवेक का तकाजा है कि धर्म की एकरूपता हो। समस्त विश्व का एक ही धर्म हो, मानवीय आस्थाओं और प्रक्रियाओं को जो पशुता के स्तर से ऊँचा उठाकर देवत्व की दिशा में विकसित कर सके, वही विश्वधर्म हो सकता है। अगले दिनों ऐसे ही विश्वधर्म का विकास होना है।"
परमपूज्य गुरुदेव भी अपने अस्सी वर्ष के जीवन में पाँच व्यक्तियों का जीवन जी कर गए एवं एकत्व कर समता का शिक्षण अपने जीवन से देकर गए। जिसने उन्हें जिस रूप में देखा, जैसी उनकी आराधना की, वैसा ही मिलता चला गया। यही सारी व्याख्या इस ग्यारहवें श्लोक की है, जो मनुष्य की सफलता-असफलताओं की, भौतिक-आध्यात्मिक उपलब्धियों की हमें कहानी सुनाती है।
गीता के चौथे अति महत्वपूर्ण इस अध्याय का अगस्त श्लोक ग्यारहवें का उत्तरार्द्ध भी कहा जा सकता है। भगवान् कहते हैं-
काड्क्षन्तः कर्मणाँ सिंद्धि यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥412
अर्थात् इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले देवताओं का पूजन करते हैं और उनके कर्मों से उत्पन्न हुई सिद्धि भी उन्हें शीघ्र भी उन्हें शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है।
जाकी रही भावना जैसी
साँसारिक स्तर पर किए गए पुरुषार्थ सरत कई लोगों के पुरुषार्थ के पीछे प्रलोभन भी यही रक्त है यह कार्य सरल होने के कारण लोग सांसारिक लाभ और भौतिक सफलताओं के लिए दौड़ते हैं। गजन स्तर के प्रयासों की उनमें आवश्यकता नहीं है। आध्यात्मिक क्षेत्र में हर व्यक्ति को अकेले ही प्रयास करना पड़ता है, अपने प्रखर आत्मबल के संपादन द्वारा अपना आँतरिक सौंदर्य निखारना होता है। शारीरिक श्रम और प्रयास के बदले भगवान् दे भी सरलता से देते हैं, किंतु मानसिक नियंत्रण और अनुशासन अपेक्षाकृत अधिक कठिन है।
सामान्यतः देखने में यही आता है कि फल की आकाँक्षा से देवताओं की पूजा करते हैं। ऐसे व्यक्ति धन, ऐश्वर्य आदि पा भी लेते हैं, पर भगवान् यहाँ कहते हैं कि ऐसे फल मोक्ष की तुलना में अल्पकालिक-अस्थाई होने के कारण तुच्छ है। देवता निर्वाण नहीं दे सकते। यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। कैवल्य मुक्ति देने की शक्ति केवल परमेश्वर में ही है। इसीलिए निष्काम कर्म का फल अति महान् बताया गया है। इससे चित्त शुद्धि होकर भगवान् की प्राप्ति होती है। परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे,"अध्यात्म एक विज्ञान है। यह कहता है कि भगवान् से जब भी माँगो, कीमती चीज माँगो। कीमती होता है, व्यक्तित्व का परिष्कार-आत्मोत्थान। जबकि छोटी-छोटी उपहार प्रधान चीज पाकर संतुष्ट हो जाने वाला मनुष्य इसी को सब कुछ मान बैठना है।""गुरुवर की धरोहर परमपूज्य गुरुदेव के प्रवचनों पर आधारित पुस्तक है। इसके प्रथम भाग के एक प्रवचन में पूज्यवर कहते हैं, "आपको जिस आदमी ने यह बात सिखा दी है कि अध्यात्म देवी-देवताओं की खुशामद को कहते हैं, गुरु की खुशामद को कहते हैं, सिद्ध पुरुषों की खुशामद को कहते हैं और कमाई किए बिना, मेहनत किए बिना, चापलूसी से जीभ की नोंक की हेरा-फेरी करके, माला पहना करके, सवा रुपये दक्षिणा देकर के यह चीजें पाई जा सकती हैं, तो वह गलत आदमी था। आप उससे भी गलत आदमी हैं, जो ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं। दुनिया कायदे पर बनी हुई, नियम पर टिकी है।"
सकाम और निष्काम के फलितार्थ
योगेश्वर श्रीकृष्ण बार-बार अर्जुन को इस सकाम और निष्काम के फलितार्थ बताकर उसे कर्मसंन्यास की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं।"कर्मणा सिद्धिं जयते" कर्म से उत्पन्न होने वाली सिद्धि के बारे में वे बता रहे हैं कि चाहे प्रेत-पितरों की पूजा कर लो, चाहे देवी-देवताओं की, तामसिक व सात्विक सिद्धि मिल जाएगी, परंतु यह लौकिक स्तर की होगी। किंतु जब कोई भगवान् की इच्छा के अनुसार जीवन जाता है, तो उसकी आकांक्षा समाप्त हो जाती है। पूरे श्लोक का भाव है, आकाँक्षारहित होकर जीवनयापन करना।
जापान में एक संत इसुनू हुई हैं। कभी भोजन करतीं, कभी पंद्रह-पंद्रह दिन भूखी रह जातीं। शरीर पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। वे भगवान् से पूछतीं-भगवन् आज खाना खा लें, तो यदि उत्तर ‘हाँ’ में मिलता, तो वे खा लेती थीं। इसी प्रकार एक दिन उनने कहा कि आज मेरे प्रभु बुला रहे हैं एवं इतना कहकर अंतिम भोजन किया, शाम को शरीर स्वेच्छा से छोड़ गईं। यह है प्रभु समर्पित जीवन। यह सिद्ध महिला-संत भगवान् के लिए जीती थीं, खाती थीं और उनसे सीधा वार्तालाप करती थीं। हम उपवास करते हैं, तो गिन-गिनकर सतत उसका हिसाब लगाते रहते हैं। वह हिसाब से परे थे, इसीलिए उन्हें भगवत् प्राप्ति हो गई।
गुण-कर्म के आधार पर विभाजन
आगे तेरहवें श्लोक में भगवान् कहते हैं-
चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागषः। तस्य कर्तारमपि माँ विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥ 4/13
अर्थात् “गुणों और कर्मों के आधार पर चार वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की रचना मेरे द्वारा ही की गई हैं। यद्यपि मैं उनका रचयिता हूँ, तथापि तू मुझे अविनाशी परमेश्वर को वास्तव में अकर्ता और अपरिवर्तनशील ही जान।”
भगवान् कहते हैं कि गुण-कर्मों के आधार पर चार वर्ण मेरे द्वारा बनाए गए हैं। यह विभाजन जाति के आधार पर नहीं है। कौन-कौन से हैं यह? जिन्हें ज्ञान की ललक है। जो सृष्टि के रहस्यों को जानकर उसे सृष्टि में फैलाने का संकल्प लेकर आए हैं, परमात्मज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना चाहते हैं, वे ब्राह्मण बनते हैं। शूद्र कौन? वह जिसकी श्रम करेंगे, तो धन आएगा। अर्थ शक्ति का प्रवाह फैलेगा, समाज के हर अंग तक पहुँचाया जाएगा। यह वैश्य का धर्म है। प्रभाव में वृद्धि हुई, सामर्थ्य बढ़ी, तो औरों की समाज के विभिन्न अंगों की रक्षा की ताकत भी आ गई। यह वर्ग क्षत्रिय कहलाएगा। इसके बाद जब साँसारिकता से ऊपर उठ जाते हैं और ज्ञान पाने की आकाँक्षा बढ़ने लगती हैं, तो ब्राह्मण कहलाते हैं।
परमपूज्य गुरुदेव ने कहा, हम गायत्री के माध्यम से सभी को ब्राह्मण बनाएंगे। जो गायत्री को जीवन में उतारेगा, श्रम से शुरुआत कर अर्थ का नियोजन करना सीखेगा, उल्लास एवं शक्ति-सामर्थ्य का अर्जन करेगा एवं फिर ब्रह्म तत्व की प्राप्ति का प्रयास करेगा। वे कहते थे कि यदि आइंस्टीन आज होते, तो उन्हें ब्राह्मण कहा जाता। उन्हें क्रिश्चियन नहीं कहा जाता। परशुराम ब्राह्मण थे, पर कर्म से क्षत्रिय थे। गाँधी वैश्य थे, पर कर्म से ब्राह्मण भी थे व क्षत्रिय भी। पुरातन मान्यता रहीं है कि जो जिस जाति में जन्मा है, उसी में मरेगा। पूज्यवर ने कहा है कि ऐसा नहीं है। ब्राह्मणत्व एक सिद्धि है, जिसका राजमार्ग श्रम की साधना से आरंभ होना है एवं पराकाष्ठा तक पहुँचने पर ज्ञान की प्राप्ति होने तक चलता चला जाता है।
स्वामी विवेकानंद जी के अनुसार, “ऐसा व्यक्ति जिसमें सात्विक भावनाएँ प्रबल हों, ब्राह्मण कहलाता है। इस श्रेणी में बौद्धिक, विचारक, वैज्ञानिक और अन्वेषक आते हैं रजोगुण गतिशीलता-सक्रियता का प्रतीक है। जब यह प्रधान हो, तमोगुण पर्याप्त हो, किंतु सत्वगुण न्यून हो, तो उन्हें वैश्य कहा जाता है। इनमें व्यापारी आदि आ जाते हैं। मंद और निम्न वासनाओं की प्रबलता तामसिक गुणों में गिनी जाती है। जब तमोगुण की प्रधानता हो, तो शूद्र कहे जाते हैं। इनमें कारीगर, मजदूर, श्रमिक आदि आते हैं। जब रजोगुण प्रधान, सत्वगुण पर्याप्त एवं तमोगुण न्यून हो, तो उन्हें क्षत्रिय कहा जाता है। इनमें कर्मठ-सक्रिय लोग, राजनीतिज्ञ आदि आते हैं।”
जन्म से नहीं, कर्म से
चारों वर्णों का कारण जन्म विशेष नहीं है। आज जो जातिवाद की समस्या एक विष की तरह चारों ओर असमानता के रूप में बढ़ती दिखाई दे रही है, यह हमारे, मनुष्यों के निहित स्वार्थों के कारण पैदा की हुई हैं। भगवान् कहते हैं कि चारों वर्ण वासनाओं के स्वरूप (गुण) और कर्मों के प्रकार (कर्म) पर ही आधारित है। “वर्ण व्यवस्था मानव जाति का वैज्ञानिक, सार्वभौमिक, प्राकृतिक, मानसिक वर्गीकरण हैं, लेकिन तोड़ा-मरोड़ा, उलझा हुआ वर्ण धर्म और अनैतिक विकृतियाँ ये सब हमारे मन की कुरूपताएँ है।” यह स्वामी चिन्मयानंद जी की मान्यता है।
भगवान् इस सुप्रसिद्ध श्लोक में यह भी कहते हैं कि प्रत्येक हृदय का प्रकाशक चैतन्य तत्व होने के नाते वे निस्संदेह सब प्रकार के मानवी कर्मों के पीछे विद्यमान एक शक्ति के रूप में हैं, फिर चाहे वह पुण्य करने वाला हो या पापकर्म करने वाला, तथापि वे उसमें शक्ति होते हुए भी अकर्ता और अविनाशी ही हैं। माँ विद्धिः अकर्तारमव्ययम्। अपने भीतर की वासनाओं की अभिव्यक्ति ही हमारे बहिरंग में दिखाई देती है। भगवान् अपरिवर्तनशील हैं। उनकी ही दिव्य सत्ता सभी के हृदय में विराजमान हैं, चाहे वह पुण्यवान् हो अथवा पापी चांडाल। यह वासनाओं के परिशोधन एवं सतोगुणी प्रकृति के विकास पर निर्भर करता है कि कौन कहाँ तक पहुँच पाया। आध्यात्मिक विकासवाद की बड़ी सुँदर व्याख्या यहाँ भगवान् के श्रीमुख से प्रस्तुत हुई हैं।
वर्ण व्यवस्था का मूलभूत आधार
ऋग्वेद संहिता के पुरुष सूक्त के द्वादश ऋचा में आया है-
ब्राह्मणोस्य मुखम् आसीत, बाहू राजन्यः कृतः। ऊरुतदस्य यद् वैष्य, पद्भ्याँ षूद्रोऽजायत॥
अर्थात् “उस परम पुरुष ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, बाहुओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य और पैरों से शूद्र का जन्म हुआ।” इसका आशय यह है कि ब्राह्मण ज्ञान, धर्म और कर्म की शिक्षा देते हैं, इसी कारण वे मानव समाज के मुख स्वरूप हैं। जो लोग बाहुबल से समाज की रक्षा करते हैं, वे क्षत्रिय हैं और समाज के बाहु स्वरूप हैं। जो लोग समाज के अन्न-वस्त्र आदि का प्रबंध करते हैं, वे वैश्य हैं और समाज के उदर या उरुस्वरूप हैं। जो लोग समाज को गतिशील रखते हैं, सेवक हैं, वे समाज के पैरों के समान हैं। चारों में से किसी को भी नीचा या ऊँचा ऋषि ने नहीं कहा है। हाँ एक विकास की यात्रा कही है, जो श्रमप्रधान जीवन से आरंभ होकर ज्ञान प्रधान, तपप्रधान जीवन पर समाप्त होती हैं। चारों वर्ण ही समाज की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु सभी समय समाज में बने रहते हैं।
भगवान् ने इसी श्लोक में यह कहा है कि इन चतुर्वष का स्रष्टा होते हुए भी तू मुझे अविकारी, अकर्ता ही जान इसकी व्याख्या अगले श्लोक (चौदहवें) के साथ अब उत्तर प्रस्तुत की जाएगी, क्योंकि वहाँ भगवान् कहते हैं, कर्मफल में मेरी आकाँक्षा नहीं है, न ही मुझे कर्म लिप्त करते हैं। यह विस्तार से समझेंगे, अगले जून के अंक में।
जो बीत गया, वह यदि अनुपयुक्त रहा हो, तो भी इतनी गुंजाइश अभी भी है कि शेष का सदुपयोग करके, बन पड़े अनर्थ का परिमार्जन किया जा सके। सूर, तुलसी, अंबपाली, अंगुलिमाल, अजामिल, अशोक आदि आरंभ से ही वैसे न थे, जैसे कि विवेक का उदय होने पर पीछे हो गए। नए सिरे से अपनाई गई श्रेष्ठता इतनी समर्थ होती है कि उसके दबाव से पिछले दिनों बरती गई अवाँछनीयता को दबाया-दबोचा जा सके। ऊर्ध्वगमन का निश्चय बन पड़ने पर देवता लंबे हाथ पसारते और डूबते को उबारने में कुछ भी कोर-कसर नहीं रखते हैं। ऊर्ध्वगामियों को भगवान् ने सहारा दिया है। दिव्य जीवन जीने के लिए संकल्प उभारने, साहस करने और ऊँची छलाँग लगाने के लिए उद्धत-समर्पित लोगों में से किसी को भी मझधार में डूबना नहीं पड़ा है।
-वाङ्मय 28, पृष्ठ 7.42
ज्योतिर्विज्ञान की बड़ी महिमा गाई जाती है। भारतीय खगोल गणित के विद्वान् कहते हैं कि आगत की भविष्यवाणी पहले से की जा सकती है। उनके अनुसार यह इतनी सुनिश्चित होती है कि उसमें रत्तीभर का फर्क नहीं देखा जा सकता। पिछले दिनों गुजरात में भयावह बर्बादी लाने वाला भूकंप आया। इस महाविनाश की भविष्यवाणी क्या संभव थीं? यदि हाँ, तो क्यों नहीं इस अति महत्वपूर्ण विधा का उपयोग किया गया? क्या इससे व्यापक जन-धन की हानि को बचाया नहीं जा सकता था?
इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए सर्वप्रथम यह देखना होगा कि इन भविष्यवाणियों का विज्ञानसम्मत आधार कितना ठोस है। व्यक्तिगत स्तर पर राजनेताओं से लेकर बड़े-बड़े ब्यूरो कैट्स ज्योतिर्विदों की क्षरण में आते देखे जाते हैं। पर सरकार या एक वैज्ञानिकों का तबका इसे सामूहिक त्रासदी के स्तर पर किस सीमा तक मानने को तैयार हैं? प्रश्न को यहीं अनुत्तरित छोड़कर हम यह देखें कि ज्योतिर्विद् एवं वैज्ञानिक दोनों क्या कहते हैं।
एक जर्मन ज्योतिर्विज्ञानी के अनुसार विगत वर्षों के 75 भूकंपों का अध्ययन किया गया, तो यह पाया गया कि 75 प्रतिशत भूकंप तब हुए, तब यूरेनस नक्षत्र भूकंप के उद्गम घात के ठीक ऊपर था तथा इसके कक्ष में होने का यह अति विषम समय बताया गया। एक और विश्वास ज्योतिर्विज्ञानीगणों को होता जा रहा है। वह यह कि अधिकांश भूकंप ग्रहणों के बाद होते हैं। विशेष तौर पर ऐसे पर ऐसे क्षेत्रों में जहाँ ग्रहण के समय चौथे या दसवें स्थान पर उस क्षेत्र को शासित करने वाले नक्षत्र थे। यह भी विश्वास किया जाता है कि अगर ग्रहण के समय शनिग्रह एक स्थान में स्थायी हैं एवं उस क्षेत्र के दसवें घर के साथ 45 डिग्री पर है, तो संसार के उन भागों में भूकंप आते हैं जो ग्रीनवीच से पूर्व या पश्चिम में समान दूरी पर शनिग्रह के स्थिति के अनुसार हों। यह तब भी देखा जाता है कि जब ज्यादा जल्दी जल्दी आते हैं जब ग्रह विशेषता शनि, गुरु तथा मंगल, वृषभ और वृश्चिक राशि में भूकंप उन स्थानों में ज्यादा आते हैं, जहाँ ग्रहों का महायोग के स्थान पर पड़ता है। यह तब भी देखा जाता है कि जहाँ उनके ग्रह प्रधान स्थान के ऊपर या नजदीक हो जैसे कि तनाव मकर की प्रथम डिग्री में।
‘द टाइम्स ऑफ एस्ट्रालॉजी’ की संपादिका राजेश्वरी संकर के अनुसार अगर ज्यादातर ग्रह जिनमें गुरु, शनि और मंगल ने भूमि के चिन्ह अपने नियंत्रण में किए हुए हैं एवं उपर्युक्त संयोग मौजूद हैं, तो भूकंप की संभावनाएँ उस क्षेत्र विशेष में काफी बढ़ जाती है। यदि 26 जनवरी 21 के भुज के दुर्भाग्यशाली चार्ट पर एक दृष्टि डाली जाए, तो हर पाते हैं कि गुरु और शनि वृषभ राशि में स्थित हैं तथा दूसरा मकर राशि में सूर्य, चंद्र, यूरेनस एवं नेपच्यून हैं और ये सभी मंगल ग्रह द्वारा दृष्ट हैं। शनि और गुरु ने अपनी वक्री चक्र को पूर्ण किया है और इस घटना के बाद चाल बदलकर पूरी तरह सीधे हो गए हैं। पारंपरिक रूप में शनि और मंग दोनों ने शुक्र को जकड़ रखा है और एक-दूसरे से षडाष्ट (6/1) की स्थिति में है। इसी दुर्भाग्यशाली दिन की समयविशेष की कुँडली देखने पर पता लगता है कि चौथा घर जो जनसंख्या का घर है, पूर्णतः गलत प्रभाव में है। ये शनि एवं राहु के बीच स्थित है। यह सारा योग पापकर्ता योग बनता है। दसवाँ स्थान जो कि चौथे स्थान के वक्रीय है, केतु और मंगल के बीच लटका हुआ है तथा यह परिस्थिति भी पापकर्तारी योग को बढ़ा रही है। इसके अलावा प्लूटो भी चौथे स्थान के वक्रीय है।
उपर्युक्त सारा विश्लेषण गणित ज्योतिष के आधार किया गया है। जनसामान्य की समझ के बाहर भी हो सकता है, पर यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि काफी 1 जनवरी को इस योग की भविष्यवाणी की जा सकती हैं। यह भूकंप 9 जनवरी के ग्रहण के बाद आया, लगभग दिन बाद। ग्रहण हर 19 वर्ष के बाद इस तरह के योगों साथ आया करते हैं। क्या ऐसे प्रकोप आए हैं, यह विश्लेषण, अभी नहीं किया जा सका, पर यह शोध का विषय है। 15 जनवरी 1934 को पटना में जो भूकंप आया था, उन भारी नुकसान हुआ था। वह भी ग्रहण के बाद था, पर वर्ष के अंतराल के क्रम में 1991 एवं 21 की मध्य में यह आ गया। उस समय भी गुरु कन्या में एवं राहु में एवं सूर्य उच्चभाव में थे। राहु, मंगल, सूर्य और शनि में राशि में बड़ा निर्मम योग बनाते हैं।
इतना सब होते हुए भी स्पष्ट कह पाना असंभव ज्योतिर्विदों की भविष्यवाणियों से महाविनाश रोका जा सकता है, एक बड़ी जनसंख्या को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जा सकता है। संभवतः अब तक के अध्ययन के आधार पर पूरी तौर पर नहीं, परंतु आज के विज्ञान के युग में जब हमारे पास तकनीकी स्तर पर सारी उपलब्धियाँ हैं, ज्योतिर्विज्ञान, वास्तुशिल्प एवं भवन विज्ञान के समन्वय से यदि मानवमात्र का भला संभव है तो क्यों नहीं यह कार्य किया जाना चाहिए। विशेषतः इस कारण भी कि जिस व्यापक स्तर पर तबाही हुई है, उसने देश को ही नहीं, व्यापारिक जगत् को ही नहीं, पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया है। अब हम ‘ग्लोबल विलेज’ में रह रहे हैं, ऐसे में प्रयास दोनों ओर से मानवमात्र के लिए चलने चाहिए। जनसंख्या का घनत्व अब विकासशील देशों में बढ़ रहा है, योग मात्र है कि कच्छ क्षेत्र में यह घनत्व कम था। जहाँ अधिक था, यथा भुज, अंजार, भचाऊ, गाँधीधाम, रापर, अहमदाबाद, सूरत वहाँ तबाही हुई जान की भी, माल की भी। परंतु इतने व्यापक क्षेत्र वाला यह दैवी प्रकोप यदि उत्तर प्रदेश में आता, तो मरने वालों की संख्या करोड़ों में होती।
वैज्ञानिकों का कहना है कि भूकंप के समय की पूर्व जानकारी व अच्छी प्लानिंग से काफी जिंदगियाँ बचाई जा सकती हैं। अमेरिका के सान फ्राँसिस्को से लेकर लॉस एंजेल्स तक की पैसिफिक से जुड़ी पट्टी बड़ी संवेदनशील है। वहाँ इसी एक सदी में विनाशकारी भूकंप भी आए हैं। पर वहाँ उन्होंने भूकंपरोधी मकानों को बनाने की तकनीक सीख ली है। नींव में स्टील के पाइप तथा रबर ‘शॉक एब्जार्बर’ के रूप में रखे जाते हैं। मकान लकड़ी के होते हैं। लगभग पूरे अमेरिका, कनाडा, यूरोपीय देशों में लकड़ी के मकान बनने के कारण वहाँ जान की हानि काफी कम होती है। जापान में जहाँ प्रतिवर्ष दस हजार से अधिक भूकंप के झटके आते हैं, वैज्ञानिकों ने ‘स्मार्ट मकान’ बनाने की शैली विकसित की है। भूकंप तरंगों, रेडाँन गैस के निकलने की अभिवृद्धि के प्रति संवेदनशील उपकरण लगाकर ये मकान बनाये गए हैं। आधारतल में लगे संवेदनसूचक ये तंत्र तरंगों को पकड़ते हैं। तथा शीघ्रता से यह सूचना कम्प्यूटर तक पहुँचाते हैं। कंप्यूटर तब हाइड्रोलिक पावर उपकरणों को क्रियाशील कर देता है, जो कि शीघ्र ही मकान के गुरुत्वाकर्षण केंद्र को एक स्टील के वजन की मदद से बदल देते हैं।
माना कि भारतवर्ष में यह सब आर्थिक दृष्टि से एवं जनसंख्या को देखते हुए संभव नहीं है, तो भी कम-से-कम बड़े शहरों, विशेषकर संवेदनशील जोन्स में एक ‘माइक्रोजोनेषन तकनीक’ अपनाकर निर्माण को नियंत्रित किया जा सकता है। आपदा प्रबंधन के अंतर्गत भूगर्भ विज्ञानियों का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण औजार है। सर्वाधिक संवेदनशील जोन्स में बड़े-बहुमंजिली मकान न बनाए जाएँ एवं यदि कुछ चार मंजिल तक के अनिवार्य ही हों, तो उनमें समस्त सावधानियाँ रखी जाएँ।
वैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसी त्रासदी में हमें सूचना तंत्र की सक्रियता पर पुनर्विचार करना चाहिए। एरेज्मा के सुपर हरीकेन में भी तथा गुजरात के भूकंप में भी ‘हैम रेडियो’ ही काम आए। अब इसकी आवश्यकता बढ़ गई है कि स्कूल कॉलेजों में हैम रेडियो का विधिवत प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि आपदा आने की स्थिति में तुरंत पहुँचा जा सके। जापान में स्कूली बच्चों को लगातार भूकंप कवायद कराई जाती है। यदि यह क्रम भारत में भी आरंभ हो सके, तो अच्छा है।
ज्योतिर्विदों-वैज्ञानिकों के मत जानने के बाद आइए यह भी जानें कि अध्यात्मवादी क्या कहते हैं। आगामी सात आठ वर्ष द्रष्टा-मनीषियों की दृष्टि से बड़े विषम हैं। अभी भूकंप का ‘शॉकिंग’ प्रभाव पूरे देश पर बना हुआ है। सूखे से सारा राष्ट्र त्रासित है। झारखंड, बिहार में कोयला खदानों में हुई घटनाओं में कई जानें गई हैं। वेदमंत्रों के माध्यम से भू-शोधन संस्कार करने की अभी बड़ी आवश्यकता है। यजुर्वेद के 1/25 मंत्र से सामूहिक आहुतियाँ कम-से-कम सप्ताह में एक बार दी जानी चाहिए। मंत्र यहाँ दिए जा रहे हैं, जिन्हें प्रचारित कर सबके द्वारा प्रयुक्त किया जा सकता है, ताकि पृथ्वी का प्रकोप शांत हो। यजुर्वेद के 1/25 के मंत्र “ऊँ पृथिवि देवयजन्योषध्यास्ते मूलं मा हि श्श् सिषं व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्बधान देव सवितः परमास्याँ पृथिव्याँ श्श् षतेन पाषैर्योऽस्मोन्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौक्॥”
अर्थात् “हे पृथ्वी! आप पर देवों के लिए हवन किया जा रहा है। आप पर उगने वाली औषधियों के मूल को हमारे द्वारा क्षति न पहुँचे। हे मृत्तिके! आप गौओं के निवास स्थान में जाएँ। द्युलोक आप पर यथेष्ट वर्षा करे। हे सृजनकर्ता सविता देव! जो दुष्ट हम सभी को कष्ट पहुँचाता है, जिससे सभी द्वेष करते हैं, उसे विशाल पृथिवी में अपने सैकड़ों बंधनों से बाँध दें, उसे कभी मुक्त न करें।” इस से पृथिवी का पूजन करना चाहिए। यजुर्वेद 35/21 के मंत्र ॐ स्योना पृथिवी नो भवानृक्षरा निवेषनी। यच्छा नः षर्म सप्रथाः। अप नः षोषुचदधम् स्वाहा। अर्थात् “हे पृथिवी देवि! आप हमारे लिए सुखप्रद, संकटों एवं कष्टों से रहित और निवास योग्य हों। आप सम्यक् रूप से विस्तीर्ण होकर हमें सुख एवं शरण प्रदान करें। आप हमारे पापों को भस्मीभूत करके दूर करें।” इस से सामूहिक आहुतियाँ दी जानी चाहिए। परमसत्ता से प्रार्थना की जानी चाहिए कि मानवजाति में सद्बुद्धि का अभिवर्द्धन हो। विश्वभर में शांति का वातावरण बने। अहिंसा प्रधान समाज बने तथा वैश्वीकरण की होड़ से हम पीछे हट, अध्यात्मिक विकास की बात अधिक सोचें।
तीन स्तर पर यह एक्सरसाइज (एक प्रकार की कसरत) जन-समुदाय द्वारा संपन्न की जानी है-जिला, राज्य एवं राष्ट्र स्तर पर। मात्र सरकारी अधिकारी नहीं, प्रत्येक परिजन-पाठक-नागरिक इसमें भागीदारी कर सकते हैं।
जिला स्तरीय पूर्वाभ्यास
प्रथम स्तर (एल एक्सरसाइज)
(1) अपने जिले का आपदा प्रबंधन निम्न चार स्तरों पर पुनः व्यवस्थित (अपडेट) कर लिया जाए।
(अ) सभी क्रमशः बदलते रहने वाले टेलीफोन नंबर्स
(ब) जिम्मेदार अधिकारी व गैर सरकारी संगठनों की स्थिति
(स) कोई नई आपदा के होने की संभावना
(द) पिछला कोई संदर्भ जो दैवी आपदा से जुड़ा हो एवं अब राहत में उपयोगी हो।
(2) स्वैच्छिक गैर शासकीय संगठनों की अपने स्तर पर आपदा से पूर्व की तैयारी इस प्रकार हो।
(अ) अफवाहों से बचने एवं गरीबों, अनाश्रितों को जो प्रभावित हो सकते हैं, पहचानने का तंत्र बने।
(ब) संग्रह केंद्र औषधियों, भोज्य पदार्थ एवं कंबल-कपड़ों आदि के लिए चिह्नित कर लिए जाएँ।
(स) आच्छादित सुरक्षित क्षेत्र अस्थाई (टेंट्स हेतु स्थान) एवं स्थाई (पक्के मकान) मनुष्यों एवं पशुओं के लिए ढूंढ़ लिए जाएँ।
(द) पका हुआ भोजन कौन व कैसे-कब आपूर्ति कर सकेगा, यह निश्चित कर लिया जाए।
(ई) राहत सामग्री के वितरण का पूरा तंत्र बना लिया जाए।
(फ) गाँव/मोहल्लों की नागरिक सुरक्षा समिति बना ली जाए, ताकि आपदा के समय अपराधी तत्वों से बचा जा सके।
(म) एन. एस. एस. के स्वयंसेवक, स्काउट एवं गाइडिंग के कार्यकर्ता प्रत्येक स्थान पर पहले से चिह्नित हो जाएं तथा फर्स्ट एड देने वाले स्थान, रेडक्रॉस सोसायटी की सुविधाएं, डॉक्टर्स, नर्सें आदि की उपलब्धता पता लगा ली जाए।
(ह) अंतर्जिला राहत सामग्री वितरण परिवहन हेतु पहले से जिला अधिकारी से चर्चा कर व्यवस्थित तैयारी कर लें।
(य) एक अस्थाई कंट्रोल रूम जिला स्तर पर चिह्नित कर लिया जाए, जो कि एक गोडाऊन या फैक्ट्री भी हो सकता है, जहाँ काफी संख्या में टेलीफोन लाइन्स हों।
(ज) संवेदनशील क्षेत्रों से प्रभावित हो सकने वाले लोगों हटाने एवं सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने की पूर्व तैयारी हेतु स्वैच्छिक संगठन जन-जन को शिक्षण दें।
(क) स्वैच्छिक सामुदायिक संगठन (वी. सी. ओ.) एक विशिष्ट जिम्मेदारी यह संभाल लें कि ऐसी आपदाओं से जो भावनात्मक एवं मनोवैज्ञानिक टूटन होती हैं, उससे कैसे मोर्चा लें एवं पुनर्वास की संवेदनशील प्रक्रिया के नियंत्रण हेतु स्वयं को तैयार कर लें।
(3) जिम्मेदार नागरिकों, स्वेच्छिक संगठनों एवं सरकारी अधिकारियों की मिली-जुली एक टीम साप्ताहिक मुख्यालय से संवेदनशील क्षेत्रों तक की पदयात्रा निकाल, ताकि जन जागरुकता बढ़े।
द्वितीय स्तर (एल-1 एक्सरसाइज)
(1) चूँकि यह कार्य एक सप्ताह भर में होना है, प्रत्येक दिन को किसी विशेष आपदा प्रबंधन तैयारी हेतु मुकर्रर किया जा सकता है, ताकि प्रति सप्ताह अभ्यास हो सके।
(2) पर्यवेक्षक अलग-अलग समूहों की गोष्ठियाँ तथा कहाँ कहाँ किस प्रकार की खामी रिस्क्यू (बचाव) एवं रिलीफ (राहत) कार्य के प्रशिक्षण में रह गई, यह बताएँ।
प्रस्तुत सावधानियाँ आपदा प्रबंधन की उच्चस्तरीय समिति (एच. पी.सी.) द्वारा निर्धारित की गई हैं। इन्हें अप्रैल-मई 21 में प्रत्येक जिले में किया जाना प्रस्तावित था। इस समिति का शांतिकुंज भी एक प्रमुख सदस्य है। इस नाते अब न सही मई-जून में भी इन पूर्वाभ्यासों को कर लिया जाए, तो तैयारी अच्छी हो सकती है। परिजनों को लग सकता है कि ये कार्य तो अधिकांश अधिकारीगणों से जुड़े हुए है, पर बिना संकोच के जिला व राज्य स्तर के अधिकारियों से इस संबंध में जाकर चर्चा की जा सकती है, अपना सहयोग भरा हाथ बढ़ाया जा सकता है।
(3) एक जिम्मेदार व्यक्ति प्रत्येक गतिविधि का निर्धारित हो जाए। साथ ही हर विभाग व उसकी कार्यपरिधि भी सुनिश्चित हो जाए। कोई जरूरी नहीं कि यह जानकारी सबको दी जाए, पर संबंधित व्यक्ति या अधिकारी को तथा विभाग को सुधार हेतु बताया जा सकता है।
(4) सुनियोजित पदयात्राएँ, बैनर्स सहित प्रथम स्तर पर बनाई सावधानियों को चिह्नित करती हुई निकाली जाएँ।
राज्यस्तरीय पूर्वाभ्यास
प्रथम स्तर (एल एक्सरसाइज)
(1) आपदा न आएँ, ऐसे उपायों तथा आधारभूत व्यवस्था तंत्र को सभी विभागों एवं मंत्रीगणों द्वारा स्वैच्छिक आशाओं के सहयोग से पुनरीक्षित कर लिया जाए। यथा जिला वार तथा राज्य मुख्यालय पर बचाव एवं बहुत से जुड़े उपकरणों की सूची।
(ब) यदि अनुपलब्धता तो राज्य द्वारा केंद्रीय शासन से उन्हें उपलब्ध कराने पर अनिवार्यता वाली कार्यवाही।
(स) संचार प्रणाली नीचे गाँव स्तर तक भी एवं ऊपर केंद्र तक की भी पुनः ली जाए।
(द) प्रशिक्षित व्यक्तियों की जो रिस्क्यू, सिर्फ में प्रयुक्त होते रहे हैं या हो सकते हैं, सूची राज्य कमिश्नर तक पहुँचे। ऐसे लोगों को चिह्नित कर सूचना पर तैयार रहने को कहा जाए।
(2) चारा एवं अन्न आदि के अंतर्जिला स्तर पर जाने संबंधी प्रक्रिया को जिला मजिस्ट्रेटों के माध्यम से सुविधाजनक बनाना।
(3) चिकित्सीय उपकरणों-औषधियों के बल्क हेतु स्थान देख लिए जाएं एवं हर जिले में चौबीस घुले रहने वाले केमिस्टों की सूची तैयार हो।
(4) ‘बिल्डिंग कोड’ का सुव्यवस्थित ढंग से परिपालन क्या है कि नहीं, यह सुनिश्चित कर लिया जाए।
(5) हमारे भवन सुरक्षित हों, विशेष रूप से क्षेत्रों में, इसके लिए ‘रेट्रोफिटिंग क्लीनिक’ यत्किंचित् फेरबदल से उन्हें भूकंपरोधी बनाना) योजित किए जाएं।
(6) राज्य में ऊँची अट्टालिकाओं में आग लगने से सावधानियों का पुनर्निरीक्षण करा लिया जाए।
तीसरा स्तर (एल-1 एक्सरसाइज)
(1) राज्य का संचार तंत्र पूरी तरह जाँच लिया जाये अनुभवों को देखते हुए विभिन्न लालफीताशाही से जुड़े उपक्रमों का कार्य किया जाए।
(2) स्तर पर सोची गई सभी सावधानियों एल 1 स्तर पर राज्य के अधिकारीगण समझ लें एवं तदनुसार एक निर्देशक बना लें।
(3) केंद्रीय रिलीफ कमिश्नर तक ये सारी जानकारियाँ यथाशीघ्र पहुँच जाएं।
राष्ट्रस्तरीय पूर्वाभ्यास
प्रथम स्तर (एल एक्सरसाइज)
(1) एच. पी. सी. (उच्चस्तरीय समिति) द्वारा निर्देशित आपदाओं हेतु मानक तैयारियों की एक सुव्यवस्थित क्रियापद्धति हर विभाग बना लें।
(2) यह मानक क्रियापद्धति (स्टैंडर्ड ऑपरेशन प्रोसीजर) राज्य स्तर पर विभागों में पहुंचा दी जायेगी राज्यों के अधिकारियों की टिप्पणियों को वहाँ की परिस्थितियों को देखते हुए मंगा लिया जाए।
(3) हर विभाग अपनी संचार प्रणाली तुरंत जानकारी पहुँचने के तंत्र को सुव्यवस्थित बना लें।
(4) बड़े स्तर पर बचाव व राहत में काम आने वाले उपकरणों (यथा जे. से. बी. डोजर्स, कटिंग उपकरण, उड़ान से पहुँचने सकने वाले अस्थाई अस्पताल) की स्थिति व उपलब्धता को सुनिश्चित कर लिया जाए।
(5) विशेषज्ञों के दल को सूचीबद्ध कर हर विभाग अपने पास उसे रखे एवं उन्हें पहले से संभावित आपदा क्षेत्र निर्देश दिए जाएं।
(6) चिह्नित बचाव राहत स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण हो।
द्वितीय स्तर (एल 1 एक्सरसाइज)
(1) हर विभाग अपने से संबंधित राज्य विभागों के संपर्क में रहे एवं प्रत्येक विभाग के ही अधिकारियों के नाम, टेलीफोन, नंबर, पते आदि नोट कर लिए जाएँ।
(2) यही प्रक्रिया उन विशिष्ट व्यक्तियों पर हो, जो आपदा प्रबंधन में विशेषज्ञ रखते हैं।
(3) हर विभाग राष्ट्र स्तर पर यह प्रयोग कर ले आपदा की स्थिति में संबंधित राज्य के विभाग से सहायता सुनिश्चित समय में पहुँचाया है।
यही सारी व्यवस्थाएं इस बात पर सोची कहीं हम सोते हुए न पकड़े जाएं। हरीकेन 1999 तथा गुजरात के भूकंप। 21 सभी को सचेत कर दिया है। यह कार्य मात्र स्पष्ट का नहीं है, यह सभी ने देख लिया है। और स्वैच्छिक संगठन एवं सर्स्कष तैयारियों को समय रहते कर ले की तरह अधिकारियों को भी संपर्क करते रहें तो भावी आपदा में से निकाला जा सकेगा।
परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी पर आधारित एक पुस्तक हैं, ‘गुरुवर की धरोहर’। इस पुस्तक के भाग-1 में वे कहते हैं, “इस समय जिसमें आप हमारी बात सुन रहे हैं, ऐसा समय है जिसको सामान्य नहीं कहा जा सकता। इसे असामान्य ही कहा जाएगा, यह बहुत भयंकर समय है। इस भयंकर समय में प्रत्येक आदमी के ऊपर नहीं, बहुत आदमियों के ऊपर, सारे संसार के ऊपर। प्रकृति हमसे नाराज हो गई हैं। जब उसकी मौज आती हैं, तो अंधाधुंध बरसा कर देती है और जब मूड़ आता है, तो अंधाधुंध बरसा कर देती हैं और जब मूड़ आता है, तो सूखा नजर आता है। कहीं मौसम का ठिकाना नहीं, भूकंप कब आ जाए, कोई नहीं कह सकता। बाढ़ कब आ जाए, कोई ठिकाना नहीं। नेचर हम सबसे बिलकुल नाराज हो गई हैं, इसलिए उसने काम करना बंद कर दिया है। यह ऐसा भयंकर समय है। ऐसे भयंकर समय में अपना सारा वक्त आपको केवल पेट पालने के लिए, संतान पैदा करने के लिए जाया नहीं करना है।” (पृष्ठ 1-11 भाग एक) अप्रैल ही प्रासंगिक माना जा सकता है, जितना कि यह सत्रह वर्ष पूर्व था।
वस्तुतः वही सब घट रहा है। विगत महापुरश्चरण की बारह वर्ष की अवधि (1988-2) में हमने देखा कि जहाँ एक ओर अंधकार अपनी विनाशलीला सृजे हुए था, वहीं आध्यात्मिक स्तर पर एक महापुरुषार्थ भी संपन्न हो रहा था। कभी-कभी लगता है कि यह आध्यात्मिक पराक्रम तथा इससे मिलते-जुलते अन्य संगठनों के प्रयास न चल रहे होते तो न जाने इस वसुधा का क्या हुआ होता? सब कुछ समाप्त हो गया होता। हम आदिम-बर्बर युग में जी रहे होते।
प्रस्तुत वर्ष 21 का वर्ष हीरक जयंती वर्ष है। 1926 से जलते आ रहे इस अखण्ड दीपक ही हीरक जयंती जिसके प्रकाश में गायत्री परिवार जन्मा, एक बीज से वटवृक्ष बना एवं आज चारों ओर छाए घने कुहासे के बीच सभी के लिए एक आशा की किरण की तरह है। यह वर्ष हमारे 12 वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण का अनुयाज वर्ष भी है। अनुयाज कहते हैं किसी भी महत्वपूर्ण कार्य के ‘फालोआप’ को। जो भी कुछ निर्धारित किया गया था, सोचा गया था गुरुसत्ता द्वारा, हम सबके लिए निर्देश रूप में दिया गया था, उसे प्रचारात्मक प्रक्रिया से उबरकर ठंडे दिमाग से संगठित रूप में क्रियान्वित करना। कार्यरूप में परिणत कर उसको व्यावहारिक आँदोलन का रूप देना। जन-जन की उसमें भागीदारी होना। 1958 के सहस्रकुंडी महायज्ञ से लेकर 1988 की ऐतिहासिक आश्विन-नवरात्रि तक के समय को यदि प्रयाज माना जाए, तो एक विराट् साधनाप्रधान महाप्रज्ञा करोड़ों भावनाशीलों द्वारा याज रूप में 1989 से 2-21 की वसंत तक संपन्न किया गया। इस सहस्राब्दी ही नहीं, युग के इतिहास में यह एक मील का पत्थर बन गया है, जिसमें देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत करोड़ों व्यक्तियों की साधनात्मक भागीदारी हुई। अखण्ड जपप्रधान साधनात्मक आयोजन हुए, रजवंदन से लेकर ग्रामतीर्थ की प्रदक्षिणा-आश्वमेधिक पुरुषार्थ से लेकर संस्कार-महोत्सवों का गरिमापूर्ण आयोजन तथा दो विराटतम स्तर की महापूर्णाहुतियाँ संपन्न हुईं। एक 1995 में आँवलखेड़ा में तो दूसरी भारत की आध्यात्मिक राजधानी कुँभनगरी हरिद्वार में 2 के अंत में। अब अनुयाज की बारी है।
यदि हमें युगपरिवर्तन की इस प्रक्रिया को निरंतर गतिशील बनाए रखना है, तो हमारा पहला कर्तव्य यह होना चाहिए कि एक पाठक-साधक-परिजन के रूप में हम अपना निज की जीवन साधना की इस वर्ष विशेष में और प्रखर बना लें। जिसकी जीवन साधना जितनी तीव्रतम होगी, उसमें जितना संकल्प भरा प्राण होगा, उतना ही वह आने वाले समय की कई गुना बड़ी महत्व वाली जिम्मेदारियाँ निबाहने को तैयार हो जाएगा। एक राजपुत्र से तपस्वी भगीरथ बनकर वह कार्य हो पाया था, जिसे गंगावतरण कहते हैं। गंगा यों ही धरती पर नहीं आई। पुण्यतोया सुरसरि हिमालय क्षेत्र में भगवान् महाकाल की जटाओं से निस्सृत होकर निकलीं, तो उसके पीछे भगीरथ का तप था। आज भी आर्यावर्त उसे भागीरथी कह उस तप का सम्मान करता है। गंगा-हिमालय हमारे देश में है और कही भी नहीं, इस पर हमें नाज है। यह सारा तप, साधना का चमत्कार है।
यदि अब नवयुग आना है, 21 से 211-212 के बीच की अवधि के इस भारी विषम समय में जगती का ताप मिटाना है, प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलना है, तो उसका आधार भी एक ही होगा-साधना। साधना एक आँदोलन के रूप में जन-जन तक पहुँच जाए। इस आंदोलन की सफलता ही अन्य बड़े परिवर्तनों का, अन्य आँदोलनों की सफलता का आधार बनाएगी। हमारी उपासना पद्धति कुछ भी क्यों न हो, हमारे इष्ट भिन्न-भिन्न क्यों न हों, साधना तो जीवन देवता की है। एक कल्पवृक्ष के रूप में विकसित हो सकने वाले जीवन की है। इसीलिए इस आँदोलन में भागीदारी हर वर्ग की है, हर जाति, पंथ, मत, संप्रदाय, वर्ग, लिंग के भावनाशील की है। उपासना-साधना के सार्वभौम सूत्रों को अपनाकर वे न केवल युग निर्माण की प्रक्रिया को गति देंगे, एक नए विश्व, देव संस्कृति प्रधान राष्ट्र के नेतृत्व वाले ग्लोबल ग्राम के रूप में देखे जाने वाले मानव-समुदाय की भवितव्यता रच रहे होंगे। निश्चित ही यह सब कुछ अपने अंदर उस गहरे स्तर की संवेदना विकसित किए, जीवन जीने की कला में सुगढ़ता लाए तथा सद्बुद्धि को अंगीकार किए बिना संभव नहीं है। इसीलिए बार-बार इस साधना आँदोलन की धुरी जाग्रत् संवेदना, व्यक्तित्व परिष्कार एवं गायत्री महाशक्ति को ही मानकर आगे चलने को कहा जा रहा है।
साधना को आँदोलन के रूप में सारे समाज में संव्याप्त होते ही परिष्कृत प्रतिभावनाओं की, संकल्पित विभूतिवानों की संख्या बढ़ने लगेगी। ऐसे प्राणवान् ही वह कार्य कर पाएंगे, जिसे विभिन्न आँदोलनों के रूप में बताया गया है। ये आँदोलन कोई नए नहीं है। पहले भी इनकी चर्चा होती रही हैं एवं अनेकानेक सामाजिक संगठन, शासकीय विभाग भी इन्हीं कार्यों में लगे हैं। वे सफल इस कारण नहीं होते कि उनकी धुरी अध्यात्म, नैतिकता या साधना नहीं, मात्र बौद्धिक प्रतिपादन होते हैं। बौद्धिक आँदोलन स्थाई नहीं होते। सामाजिक क्राँतियाँ तभी चिरस्थाई परिणाम वाली होती हैं, जब उनका आधार अध्यात्मिक हो, व्यक्ति का संवेदनामूलक विकास हो, साधना उनकी रग-रग में हो। ऐसा नहीं है तभी तो एन.जी.ओ. (नॉन गवर्नमेंट आर्गेनाइजेशन्स स्वैच्छिक संगठनों) के कुकुरमुत्तों की तरह सारे समाज में फैले जाल को देखकर भी किसी के मन में आस नहीं जगती, उत्साह की किरण नहीं फूटती। उलटे अधिकांश एन.जी.ओ. से जुड़े भ्रष्ट तंत्र को देखकर जुगुप्सा होने लगती है और सरकार का तो कहना ही क्या? तहलका डाट-काम के पर्दाफाश से बेनकाब हमारा भ्रष्ट राजतंत्र क्या किसी को दे सकता है, कैसे राष्ट्र की, हम सबकी रक्षा कर सकता है, यह प्रश्न चिह्न हम सबके समक्ष खड़ा है।
कही कोई आशा किसी को हैं, कहीं कोई प्रेरणा स्त्रोत है तो वे आध्यात्मिक आंदोलन को गति देने वाले संगठन ही है। गायत्री परिवार उनमें एक वरिष्ठ भूमिका निवाह रहा है, अपनी सदाशयता का परिचय दे सभी एक ही उद्देश्य से कार्य कर रहे संगठनों का संगतिकरण करने को आमंत्रण दे रहा है।
कुसंस्कारिता को निर्मूल कर सुसंस्कारी शिक्षा वाली क्राँति साधनात्मक आधार पर ही आएगी। साक्षरता का कार्य वर्षों से चल रहा है, पर राष्ट्र अभी तक साक्षर नहीं हो पाया। कामकाजी विद्यालयों की योजना से लेकर जीवनमूल्यों को स्थापित करने वाली नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम के अंग-अंग में पिरोकर नई शिक्षण पद्धति का जनम गायत्री परिवार देगा। ऐसे क्राँतिकारी शिक्षक तैयार करेगा जो श्री श्रीराम चंद्र जी की तरह से ढेरों गाँधी तैयार कर सकें। स्वास्थ्य के क्षेत्र में यदि कोई आमूलचूल परिवर्तन होना है, तो वह अपने देश की परिस्थितियों के अनुरूप आयुर्वेद की समग्र चिकित्सा, ‘होलिस्टीक मेडीसीन’ वाली पद्धति के विकास से ही संभव है। जन स्वास्थ्य संरक्षणों का प्रशिक्षण एवं नए बने एलोपैथी के आयुर्वेद-होम्योपैथी के चिकित्सकों को रोगी-प्रबंधन-रुग्णालय प्रबंधन में शिक्षित करके, आयुर्वेद के विज्ञानसम्मत आधार को उनके अंदर प्रविष्ट करा के ही हम पूरे विश्व को 21 तक नीरोग बनाने की घोषणा कर सकेंगे। स्वावलंबन ही भविष्य की आर्थिक नीति की धुरी बनेगा। ग्रामोद्योग का प्रचलन, स्वदेशी आँदोलन, गौ संवर्द्धन ही विश्व के बाजारीकरण का सही प्रत्युत्तर है। बड़े विराट् स्तर पर यह कार्य गायत्री परिवार अपने हाथ में ले रहा है एवं भूमंडलीकरण वैश्वीकरण-शहरीकरण लाने वाली नीति का चुनौती दे रहा है। इससे संबंधित सारा प्रशिक्षण क्रम बनाया जा रहा है।
पर्यावरण के प्रति जागरुकता पैदा कर स्थूल व सूक्ष्म जगत् में उसके संशोधन हेतु रचनाधर्मी कार्यों का नियोजन, क्षीण होते जा रहे हरीतिमा के कवच का पुनर्निर्माण एवं पर्यावरण वाहिनियों के माध्यम से वातावरण का परिष्कार अपने साधना केंद्रित आँदोलन का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। नारी जागरण मूलतः एक आध्यात्मिक आँदोलन हैं, सामाजिक नहीं। राष्ट्र की आधी जनशक्ति को जगाकर उसके स्थूल सौंदर्य नहीं, मूल संवेदना प्रधान स्वरूप का जागरण शक्तिपूजा करने वाले इस देश का गौरव पुनः लौटाएगा। सारे विश्व में नारी का भिन्न-भिन्न रूपों में शोषण हो रहा है। यह रुकेगा तब, जब नारी स्वयं आगे आएगी। व्यसन मुक्ति एवं कुरीति उन्मूलन आँदोलन भी चलेंगे जाग्रत मंडलों से, युवाशक्ति एवं जागी हुई नारी से। व्यसन से बचाकर सृजन में लगाने की प्रवृत्ति को छूत की बीमारी की तरह अध्यात्म क्षेत्र के साधक फैलाएंगे, तो समाज शराब-तंबाकू जैसे विषों एवं ढेरों कुरीतियों से मुक्त होता दिखाई देने लगेगा।
सभी कार्यक्रमों आँदोलनों की धुरी साधना ही है, प्रतिभा परिष्कार ही है। शांतिकुंज के तत्वावधान में बनकर खड़े हो रहे देव संस्कृति विश्वविद्यालय की विधाएं (फैकल्टी) उपर्युक्त सातों उपक्रम होंगे। फिर नालंदा तक्षशिला की परंपरा पुनर्जीवित होती देखी जा सकेंगी। पुनः भारत का स्वर्णयुग लौटेगा एवं हमारा देश जगद्गुरु कहलाएगा। किसी को भी इसमें संदेह नहीं करना चाहिए।
गुजरात के भूकंप को आए चार माह बीतने को आ रहे हैं, पर मानवी संवेदना ने घनीभूत हो किस तरह इस राष्ट्रीय आपदा में कार्य किया है, इसे देखकर कलियुग की वर्तमान स्थिति पर अविश्वास होने लगता है। सभी संगठनों ने एकजुट होकर जीवट-जिजीविषा के धनी कच्छ-सौराष्ट्र के प्राणवानों-नागरिकों में जिस तरह कार्य किया है, उस पर जब भी ग्रंथ लिखा जाएगा, कर्त्तव्यपरायणता के महायज्ञ की कहानी वह सबको सुनाएगा। हाँ, गिद्ध-कौए, नोंचने वाले, खसोटने वाले ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर अपनी पौ-बारह करने वाले कहाँ नहीं होते ? ऐसे घटनाग्रस्त भी घटे हैं, पर जीत देवत्व की हुई है। यही सबसे विधेयात्मक एवं प्रसन्नता देने वाली खबर है।
गायत्री परिवार के परिजनों ने स्थान-स्थान से अपना अंशदान भी भेजा एवं स्वयं समयदान हेतु भी पहुँचे। भारत ही नहीं, विश्व के कोने-कोने से परिजनों ने अपनी आहुतियाँ इस महायज्ञ में दी है। अब कच्छ-सौराष्ट्र के नवनिर्माण का महायज्ञ होना शेष है। स्वाभिमान संपन्न कच्छी औरों से मदद कम ही लेते हैं, संभवतः सरकार को इस क्षेत्र में निराशा ही हाथ लगे कि किसी ने मदद माँगी ही नहीं, परंतु जन-जन का विश्वास स्वैच्छिक संगठनों, आध्यात्मिक संगठनों पर कितना है, यह पिछले दिनों अपनी त्रैमासिक राहत कार्य की साधना में केंद्र के कार्यकर्त्ताओं ने देखा।
राहत कार्य के अंतर्गत गायत्री परिवार द्वारा क्या किया गया, इसका लेखा-जोखा हमने लिया, तो यह निष्कर्ष निकला-
(1) भचाऊ आधार शिविर द्वारा प्रतिदिन पाँच से दस हजार डाइट्स का वितरण 27 जनवरी 21 से 1 मार्च तक किया गया। बाद में 18 मार्च तक इनकी संख्या आधी रह गई एवं फिर इस कार्य को गाँधीधाम-अंजार गायत्री शक्तिपीठ से किया जाने लगा। 18 मार्च से आधार शिविर बंद कर दिया गया।
(2) इसके अतिरिक्त भूकंप पीड़ितों के बीच गाँव-गाँव जाकर 3,61,5 किलोग्राम आटा, 2,62,55 किलोग्राम चावल, 2,31 किलोग्राम चीनी, 28,725 किलोग्राम तेल, 16,115 किलोग्राम दाल, 3,31 किलोग्राम दूध पाउडर, 535 किलोग्राम चाय, 115 किलोग्राम गुड़, 21,75 किलोग्राम नमक भी राशन के रूप में वितरित किया गया। इनके अलावा 42,1 किलोग्राम बाजरा, 42,5 किलोग्राम गेहूँ, 4155 किलोग्राम मसाला, 1,14, फूड पैकेट्स (नमकीन, बिस्किट आदि)। 3,51 पानी के पाउच तथा 2,5, पानी की बोतलें वितरित की गई। यह सारा सामान जिन्हें दिया गया, उनके हस्ताक्षर सहित पूरा रिकार्ड केंद्र में है।
(3) 1,36,131 टेंटस (तालपत्री 18 18) 1,54 कंबल, 1,145 चद्दरें, 55,5 लालटेन तथा 55,8 बर्तन किट (जिसमें रसोई के व दैनिक आवश्यकता के सभी सामान हैं) वितरित किए गए।
(4) कुल मिलाकर 3,67,174 डाइट्स (एक समय का पूरा भोजन) भचाऊ कैंप से अपने पंद्रह वाहनों द्वारा गाँव-गाँव जाकर वितरित किया गया। जो एन. जी. ओ. या सरकारी अधिकारी ड्यूटी पर थे, उनको भी भोजन दिया गया एवं उनके ही पास पहुँचाने की व्यवस्था की गई।
(5) 311 गाँवों में दस चिकित्सकों के दल ने नियमित जाँच-परीक्षण कर चिकित्सा सामग्री पहुँचाई एवं प्रायः अस्सी हजार मरीजों तक यह लाभ पहुँचा। सभी गाँवों की सूची व प्राप्त करने वालों के हस्ताक्षर सहित मौजूद हैं।
(6) दो साल तक चल सके, ऐसे बाँस-चटाई-मजबूत तालपत्री की गोल गुँबदनुमा झोंपड़ियों में स्कूल आरंभ कर दिए गए। ऐसे 8 स्कूल अभी चल रहे हैं। प्रारंभिक मनोवैज्ञानिक आघात से उबरकर बच्चे पढ़ाई भी कर रहे हैं व खेलकूद भी रहे हैं। रहने के लिए इसी तरह की 35 झोंपड़ियों लगभग सत्तर गाँवों में रापर ताल्लुका में तथा 8 गांवों में 4 झोंपड़ियाँ भचाऊ ताल्लुका में दी गई। लीलपर, रामपर, कोंधेंल काँट आदि गाँवों में सारी आबादी इन्हीं में खुशी से रह रही है।
(7) टीन शेड्स के रूप में 15 हाईस्कूल स्तर के विद्यालय भचाऊ नगर तथा आसपास के क्षेत्र में आरंभ कर पाठ्य सामग्री वितरित की गई।
(8) आठ सौ से अधिक गाँवों में शाँतिपाठ किया गया एवं प्रतिदिन 5 से 1 व्यक्तियों द्वारा श्राद्ध-तर्पण आधार शिविर में कराया गया।
(9) भचाऊ नगर के सामने बीस एकड़ की श्री नवीन गया जिसमें 35 परिवार अभी भी रहे हैं।
अब आगे जो किया जाना है, वह बड़ा महत्वपूर्ण है। राहत कार्य गाँधीधाम व अंजार गायत्री शक्तिपीठ से सतत चल रहे हैं। एक गाँव का पूर्ण स्थाई निर्माण बिना किसी सरकारी सहायता के शांतिकुंज करना चाह रहा है। यदि परिजनों का सहयोग मिला, तो सानगढ़ नामक रापर ताल्लुक का यह गाँव प्रायः दो करोड़ रुपयों की राशि से खड़ा हो सकेगा। गाँववासी इसे एक आदर्श ग्राम तीर्थ के रूप में बन के लिए सहमति दे चुके हैं। इसके लिए गाँवों की सूची बन रही है। पशुधन की रक्षा हेतु 3 पशुओं के लिए कैटल कैप तीन स्थान पर खोलने की योजना है। आशा है परमसत्ता कार्य भी कराएगी।
बिखरावों से दूर रहें हम यूँ सच्चे साधक बन जाएँ। क्षमताओं का संचय करके जन-मंगल के लिए लगाएँ।
केवल साधक ही जीवन में तप बल का संचय कर पाते, साधक ही अपनी क्षमताएँ सीमित से अक्षय कर पाते,
अर्जित शक्ति और क्षमता का जनहित में सुनियोजन कर लें, यूँ हम महाकाल के अनुदानों से अपनी झोली भर लें,
हम विभीषिकाओं में रहकर भी दैवी संरक्षण पाएँ। क्षमताओं का संचय करके जन-मंगल के लिए लगाएँ।
जो भी मंत्र हमें आता हो मिल-जुलकर उसका जप कर लें अपने हित सर्वदा किया श्रम अब औरों के हित तप कर लें,
सब पाएं सद्बुद्धि यही जप में हमने कामना करी हो, जन-जन के उज्ज्वल भविष्य की ही मन में भावना भरी हो,
संयम सेवा स्वाध्याय के निज जीवन का अंग बनाएँ। क्षमताओं का संचय करके जन-मंगल के लिए लगाएँ।
सामूहिक प्रार्थना इबारत से प्रभु कृपा सहज मिल जाती, ज्यों सावनी फुहारों में उपवन की कली-कली खिज जाती,
सामूहिक साधना विश्व-संकट का समाधान है भारी, विघ्नों में भी विजयी होगी इससे ही मानवता सारी
समय और सामर्थ्य जरा भी आज प्रदर्शन में न गंवाए। क्षमताओं का संचय करके जन-मंगल के लिए लगाएँ।
युग-परिवर्तन की वेला में मूल्य समय का हम पहचानें, जाग्रत रहकर महाकाल के सकता को समझ जान,
हर वसंत से पहले पीले पत्तों को झरना पड़ता है, वर्षा से पहले अंबर को मेघों से घिरना पड़ता है,
इसीलिए हम अवरोधों को देख न बिलकुल भी घबराएँ। क्षमताओं का संचय करके जन-मंगल के लिए लगाएँ।
समय धूप का है, पगडंडी बहुत सँकरी है राहों की है न समझदारी ऐसे में इच्छा सुविधाओं छाहों की
एक साथ चलकर ही केवल हमें सफलता मिल पाएगी कुछ पल का ही कोलाहल है फिर सुख-शांति यहाँ छाएगी
ऐसों में जो दिखे अलग-सा हम उसको फिर से समझाएँ। क्षमताओं का संचय करके जन-मंगल के लिए लगाएँ।
-शचीन्द्र भटनागर
*समाप्त*