सत्य की चाह

सत्य की चाह है, तो चित्त को किसी ‘आग्रह’ से मत बाँधो। जहाँ आग्रह है, वहाँ सत्य नहीं आता। आग्रह और सत्य में गहरा विरोध है। मुक्त-जिज्ञासा सत्य की खोज के लिए पहली सीढ़ी है। जो व्यक्ति सत्य की अनुभूति से पहले ही अपने चित्त को किन्हीं सिद्धान्तों, मतवादों एवं आग्रहों से बोझिल कर लेते हैं, उनकी जिज्ञासा कुँठित और अवरुद्ध हो जाती है।

जिज्ञासा- खोज की गति और प्राण है। इसी के माध्यम से विवेक जाग्रत् होता है और चेतना ऊर्ध्व बनती है। लेकिन, जिज्ञासा आस्था से नहीं, आश्चर्य से पैदा होती है। आश्चर्य-स्वच्छ चित्त का लक्षण है। उसके सम्यक् अनुगमन से सत्य के ऊपर पड़े हुए परदे क्रमशः गिरते जाते हैं। और एक क्षण सत्य का दर्शन होता है।

यहाँ यह बता देना जरूरी है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों ही आस्थावान् होते हैं। हाँ इतना अवश्य है कि आस्तिक की आस्था विधायक होती है तो नास्तिक आस्था निषेधात्मक या नकारात्मक। जबकि आश्चर्य चित्त की एक अलग ही अवस्था है। अव अविश्वास नहीं है और न ही विश्वास है। वह तो इन दोनों से मुक्त खोज के लिए स्वतंत्रता है। यहाँ किसी भी आग्रह या मत के लिए कोई स्थान नहीं है।

और भला वे सत्य की खोज कर भी कैसे सकते हैं, जो कि पहले से ही किन्हीं मतों से बंधे हैं। मतों अथवा आग्रहों के खूँटों से विश्वास या अविश्वास की जंजीरों को जो खोल देता है, उसी की नाव ही सत्य के महासागर में यात्रा करने में समर्थ हो जाती है।

सत्य के आगमन की अनिवार्य शर्त है चित्त की पूर्ण स्वच्छता, स्वतन्त्रता एवं स्थिरता। जिसका चित्त पूर्ण स्वच्छ नहीं है, जो किन्हीं सिद्धान्तों या आग्रहों से बंधे हैं अथवा जिनका चित्त अस्थिर या चंचल है, वे सत्य के महासूर्य के दर्शन से वंचित रह जाते हैं। इसलिए सत्य की चाह को पूरा करने के लिए चित्त को पूर्ण स्वच्छ, स्वतंत्र एवं स्थिर बनाना ही होगा।


पूर्ण मनुष्य को जन्म देगा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद

समस्याएँ मानव की हों, तो समाधान भी उसी की चेतना में मिलेंगे। यही दार्शनिक सत्य वैदिक चिन्तन यात्रा में पग-पग पर प्रकट हुआ है। वैदिक ऋषियों ने अपनी तपःपूत शोध साधना में मानव की समस्याओं पर गहराई से विचार किया है। और समाधान के लिए वे मानव चेतना के गहनतम प्रदेशों में प्रविष्ट हुए। अपने शोध निष्कर्षों में उन्होंने बताया- ‘एक ध्रुव सत्य है, जो कि सत्य से छिपा हुआ है। जहाँ सूर्य अपने अश्वों को विमुक्त करता है। वह जो एक तम है, उसकी दशशत (सहस्र) किरणें एक साथ एकत्रित हुई। मैंने देवों के अत्यन्त ज्योतिर्मय रूपों को देखा।’ (ऋग्वेद- 5/62/1)

यही नहीं ‘उन्होंने परमदेव की आत्मशक्ति को अपने ही सचेतन सक्रिय गुणों के द्वारा गहराई से छिपी हुई देखा।’ (श्वेताश्वेतर-1/3) और मानव चेतना के सम्बन्ध में कहा कि ‘मरणधर्मा प्राणी ने इस (चेतना) शक्ति का अविर्ज्ञान किया, यह शक्ति अपनी अनन्त कामनाओं को अपने भीतर रखती है, जिससे कि वह समस्त पदार्थों को धारण कर सके। वह समस्त अन्नों का आस्वादन लेती है और जीव के लिए घर बनाती है।’ (ऋग्वेद-5/7/6) मानव अस्तित्व में इस चेतना के सात मुख्य केन्द्र हैं, इस सत्य को स्पष्ट करते हुए ऋग्वेद के ऋषि का कथन है- ‘मन के द्वारा न जान सकने के कारण मैं देवताओं के सात पदों को, जो हमारे भीतर निहित हैं, जानने की इच्छा करता हूँ। सर्वज्ञ देवों ने एक वर्ष के शिशु को ग्रहण किया है। और उन्होंने यह वस्त्र बनाने के लिए उसके चारों ओर सात सूत्रों को बुना है।’

वैदिक ऋषियों ने जहाँ मानव चेतना की विशिष्टताओं को जाना, उसकी सम्भावनाओं को परखा, वहीं उन्होंने यह भी बताया कि मानव चेतना का विस्तार असीम है। बल्कि चेतना का यह सत्य ही सब कुछ है। ऋषि के शब्दों में वह सत्य और अनृत दोनों हुआ। वह सत्य हुआ और जो कुछ भी वह है वह सब भी हुआ। वैदिक ऋषियों के ये निष्कर्ष ही भारतीय दर्शन की विविध परम्पराओं में बहुविध रूप से मुखरित हुए। महर्षि दयानन्द ने इन्हें अपनी तप साधना से पुनः नव प्राण दिए। सत्य यही है कि मानव चेतना सम्बन्धी वैदिक निष्कर्षों को इस युग में प्रचारित करने का जितना श्रेय महर्षि दयानन्द को है, उतना और किसी को नहीं।

परन्तु आधुनिक युग में विज्ञान भी एक युग सत्य बनकर सामने आ खड़ा हुआ है। विज्ञान के आविर्भाव ने अपने नित नूतन आविष्कारों से मानव अस्तित्व को इस कदर घेर दिया है, कि मनुष्य को अपनी चेतना ही विस्मृत हो गयी है। आज मानव अपने हर समाधान के लिए विज्ञान पर निर्भर है। और विज्ञान की स्थिति यह है कि वह जितने समाधान जुटाता है, उससे कहीं अधिक समस्याओं को जन्म देता है। क्योंकि अतिभौतिक प्रकृति के नियम और सम्भावनाओं को जाने बिना न तो भौतिक प्रकृति के नियम और न सम्भावनाएँ ही जानी जाती हैं।

इसी वजह से न तो उसकी सत्य की शोध पूर्ण हो सकी और न वैज्ञानिक उपलब्धियाँ अपनी उपादेयता भली प्रकार सिद्ध कर सकीं। उल्टे विज्ञान के प्रयासों और उपलब्धियों का जो स्वरूप निखर कर आया उसे देखकर बर्ट्रेण्ड रसेल को कहना पड़ा- ‘हम एक ऐसे जीवन प्रवाह के बीच है, जिसका साधन है मानवीय दक्षता और साध्य है मानवीय मूर्खता। अगर मूर्खता लक्ष्य हो, तो उसकी सिद्धि के लिए कुशलता वृद्धि की दिशा में उठाया गया प्रत्येक कदम बुराई की ओर ले जाता है। मानव जाति अब तक जीवित रह सकी है, तो अपने अज्ञान व अक्षमता के कारण ही, परन्तु अगर ज्ञान व क्षमता मूढ़ता के साथ युक्त हो जाए तो उसके बच रहने की कोई सम्भावना नहीं है। ज्ञान शक्ति है, पर यह शक्ति जितनी अच्छाई के लिए है। उतनी ही बुराई के लिए भी है। निष्कर्ष यह है कि जब तक मनुष्य में ज्ञान के साथ-साथ विवेक का भी विकास नहीं होता, ज्ञान की वृद्धि दुःख की वृद्धि ही साबित होगी।’

पुरातन वैदिक ऋषियों की चिन्तन परम्परा और वैज्ञानिक उपलब्धियों के बीच मचे तुमुलद्वन्द्व के समाधान के युग ऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा ने महर्षि दयानन्द की परम्परा को और भी आगे बढ़ाया। उन्होंने महर्षि दयानन्द की पाखण्ड खण्डिनी पताका को और भी अधिक ऊँचाई दी। धार्मिक रूढ़ियों, पाखण्डों, मूढ़-मान्यताओं पर कड़े प्रहार करते हुए वैदिक ऋषियों के स्वर को फिर से मुखरित किया।

दार्शनिक चिन्तन के इतिहास में आचार्य श्री का व्यक्तित्व महाक्रान्ति बनकर उभरा। वह उन विरल प्रज्ञ पुरुषों में थे, जिनमें ऋषित्व और मनीषा एकाकार हुई थी। उन्होंने धर्म का आच्छादन तोड़ने, दर्शन को बुद्धिवाद के चक्रव्यूह से निकालने की हिम्मत जुटायी। यही नहीं, धर्म-दर्शन और विज्ञान के कटु-तिक्त, कषाय हो चुके सम्बन्धों को अपनी अन्तर्प्रज्ञा की निर्झरिणी से पुनः मधुरता प्रदान की। उन्होंने अपने आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर बताया कि मानव की समस्याओं का यथार्थ और सार्थक समाधान उसकी अपनी चेतना में है।

उनका यह निष्कर्ष उनकी गहन आध्यात्मिक साधना का परिणाम है, जिसे उन्होंने पन्द्रह वर्ष की अल्पायु में प्रारम्भ कर दिया था। चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण की चौबीस वर्षीय तप साधना से उन्होंने मानव चेतना पर किए जाने वाले अपने प्रयोगों-अनुसन्धानों की नींव रखी। पन्द्रह वर्ष की आयु से लेकर 80 वर्ष की आयु के अन्तिम पल तक उनका समूचा जीवन मानव चेतना के अध्ययन-अनुसन्धानों में बीता। अपने एक लेख में उन्होंने इस जीवन सत्य को अभिव्यक्त भी किया है। इस सम्बन्ध में उनके शब्द हैं- ‘हमारा जीवन रूढ़ियों और विडम्बनाओं की धुरी पर नहीं घूमा है। उससे अति महत्त्वपूर्ण प्रयोगों, परीक्षणों और अनुभवों का अच्छा-खासा भण्डार जमा हो गया है। हम चाहते थे कि यह उपलब्धियाँ जन-सामान्य को देते जाएँ, ताकि वे भी हमारी ही तरह जीवन की सार्थकता अनुभव कर सकें।’

उन्होंने यह भी कहा कि ‘मानव चेतना को सही और समग्र ढंग से जाने बिना विज्ञान को जानना अधूरा ज्ञान है। वह ऐसा ही है कि सारे जगत् में तो प्रकाश हो और अपने ही घर में अंधेरा हो। ऐसे अधूरे ज्ञान से अपनी ही चेतना को न जानने से जीवन दुख में परिणत हो जाता है। जीवन शान्ति, सन्तोष और कृतार्थता से भरे, इसके लिए वस्तुओं को जानना ही पर्याप्त नहीं है। उस तरह समृद्धि आ सकती है, पर धन्यता नहीं आती है। उस तरह परिग्रह आ सकता है पर प्रकाश नहीं आता है। और प्रकाश न हो तो परिग्रह बन्धन हो जाता है। वह अपने ही हाथों से लगायी फाँसी हो जाती है। जो मानव चेतना के ज्ञान से विमुख है, वह अधूरा है। और इस अधूरेपन से दुःख पैदा होते हैं।’

पदार्थ को जानने और पाने से शक्ति उपलब्ध होती है। विज्ञान उसी को खोज है। आज हम सबको पता है, कि विज्ञान ने अपरिसीम शक्तियों की रहस्य कुञ्जियाँ मानव के हाथों में दे दी हैं। पर उस शक्ति उपलब्धि से कुछ भी शुभ नहीं हुआ। शक्ति आयी है, पर शान्ति नहीं आयी है। शान्ति पदार्थ को नहीं चेतना को जानने से आती है। पदार्थ का ज्ञान मानव चेतना के ज्ञान के अभाव में अज्ञान के हाथों में शक्ति है। उससे शुभ फलित नहीं हो सकता है।

अब तक विज्ञान और अध्यात्म में जो विरोध रहा है, उसका परिणाम अशुभ है। जिन्होंने मात्र विज्ञान की खोज की है, वे शक्तिशाली हो गए हैं, पर अशान्त और सन्तापग्रस्त हैं। और जिन्होंने मात्र अध्यात्म का अनुसन्धान किया है, वे शान्त हो गए हैं। पर लौकिक दृष्टि से अशक्त और दरिद्र हैं। यह सब वैदिक ऋषियों की परम्परा को खण्डित करने का दोष है, जो अपने देश में बौद्ध प्रभाव से उपजा एवं पनपा। आवश्यकता वैदिक ज्ञान की परम्परा को महर्षि दयानन्द की भाँति नवजीवन देने की है। मेरे समस्त प्रयास इसी ओर केन्द्रित है। मैं शक्ति और शान्ति को अखण्डित रूप से चाहता हूँ। मैं विज्ञान और अध्यात्म में समन्वय को चाहता हूँ।

युगऋषि गुरुदेव के ये भावोद्गार युग सत्य हैं। क्योंकि ऐसा होने पर न केवल मानव चेतना का समग्र अनुसन्धान होगा, बल्कि उसकी सम्पूर्ण अभिव्यक्ति भी होगी। उससे पूर्ण मनुष्य का जन्म होगा, और एक पूर्ण संस्कृति का भी। जो अन्तर-बाह्य दोनों रूपों में समृद्ध होगी। मनुष्य न तो मात्र शरीर है, न मात्र आत्मा ही। वह दोनों का सम्मिलन है। इसलिए उसका जीवन किसी एक पर आधारित हो, तो वह अधूरा हो जाता है। इस अधूरेपन को पूरा करना ही युगधर्म है। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद इसी की सार्थक प्रणाली है।


अदृश्य जगत् के अलौकिक सहायक

जीवन के दो पहलू हैं, जन्म और मृत्यु। हर जन्म के बाद मरण अवश्यंभावी है, उसी प्रकार प्रत्येक मृत्यु के उपराँत जन्म। यह जन्म-मरण का चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक जीवात्मा अपनी मूल सत्ता से एकाकार न हो जाए। यह एकात्मता जीवन का चरम विकास है, किन्तु इस विकास-बिन्दु इस विकास-बिन्दु तक पहुँचने से पूर्व जीवन सरल नहीं होता। उसमें कितनी ही विद्रूपताएं और विपन्नताएं घुली होती हैं, इसे जन-जीवन में झाँककर देखा जा सकता है। इन मलीनताओं को दूर कर ही उस आत्यंतिक बिन्दु तक पहुँच पाना संभव है। यह शक्य नहीं कि हमारा लौकिक जीवन दूषित हो और मरणोत्तर जीवन शुद्ध सात्विकों जैसा बन जाए। वास्तव में परलौकिक जीवन प्रत्यक्ष जीवन की ही प्रतिच्छाया है। जीते-जी हमारा आचरण और व्यवहार जैसा होगा, मरने के बाद भी प्रवृत्ति वैसी ही बनी रहेगी। यदि प्रत्यक्ष जगत् में किसी को दूसरों को प्रताड़ित करने तंग करने, दुःख पहुँचाने में आनंद आता है तो मरने के बाद भी उसकी गतिविधियाँ वैसी ही बनी रहेंगी। इसके विपरीत कोई शुद्ध चरित्र, परोपकार, सेवा, सहायता में संलग्न रहकर कष्टपीड़ितों का सहयोग करता है, तो उसके मरणोत्तर क्रियाकलाप भी वैसे ही होते हैं, यह एक सुस्थापित तथ्य है।

जन्म-मरण की यह लंबी शृंखला वास्तव में क्यों हैं? यहाँ यह सहज जिज्ञासा उठ सकती है। इस संबंध में इतना ही कहा जा सकता है कि इसमें जीव चेतना को भवबंधनों में आबद्ध रखना अथवा उसकी प्रगति को विलंबित करने जैसी कोई बात नहीं। यह विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और उसमें व्यतीत होने वाला लंबा काल उसका एक अविच्छिन्न अंग। इसे न तो परमात्मा का पक्षपात कहा जा सकता है, न जीव चेतना की सुस्ती, कारण कि हर जीवात्मा की संस्कारजन्य अपनी पृथक योग्यता और क्षमता होती है। वह उस हिसाब से ही आगे बढ़ती है और ऊंचा उठती है। साइकिल की गति मोटरसाइकिल जितनी नहीं हो सकती एवं मोटर-साइकिल कभी कार का मुकाबला नहीं कर सकती है। सभी की अलग-अलग सामर्थ्य है। वे उसके अनुसार ही चलती और मंजिल तक पहुँचती है। उसमें लगने वाला समय भी तदनुरूप भिन्न-भिन्न होता है। यही बात जीवात्मा के साथ है।

साधारण जीवात्मा को अपनी यात्रा में लंबा समय लगता है। यह आत्मपरिष्कार की दृष्टि से आवश्यक है, क्योंकि चेतना का परिमार्जन वस्त्र धोने जैसी कोई सुगम प्रक्रिया नहीं, जिसे तुरत-फुरत में एक-दो जन्म में संपन्न किया जा सके। उसके लिए अनेक जन्म चाहिए। विशिष्टों की बात और है, जो जल्द ही उस स्थिति को उपलब्ध कर आत्मसत्ता को परिमार्जित कर लेते हैं। पूर्ण परिमार्जन के बाद ही वह सुयोग बन पाता है, जिसमें आत्मा का परमात्मा से मिलन हो सके। यही बंधन-मुक्ति है।

इस आत्मिक अवस्था को प्राप्त करने से पूर्व व्यक्ति में कितने ही ऐसे गुण परिलक्षित होने लगते हैं, जिन्हें साधारण नहीं, असाधारण और उच्चस्तरीय कहना चाहिए। वह करुणा, दया और उदारता की प्रतिमूर्ति बन जाता है। सात्विकता और सदाशयता उसके रोम-रोम से प्रस्फुटित होने लगती है। परदुःख कातरता उसकी प्रकृति का एक महत्त्वपूर्ण अंग होती है। परमार्थ प्रयोजनों में उनका जीवन निरत रहता और स्वास्थपूर्ण काया से मन हटने लगता है। भलाई और बुराई में से यदि कभी किसी एक के चयन की आवश्यकता पड़ी, तो वह भलाई को अपनाता है, भले ही उसमें उसका अपना अहित क्यों न होता हो। बुराई से वह कोसों दूर रहता है। सेवा और सहायता उसके व्यक्तित्व के दो उपयोगी उपादान बन जाते हैं। उनके बिना जीवन अधूरा समझा जाता है। तपस्वियों की तरह स्वल्प साधनों में निर्वाह करना और दूसरों के हित के लिए अपना अधिकार तक छोड़ने के लिए तत्पर रहना, उसकी विशेषता है। उसका अपना कोई निजी नहीं होता, संपूर्ण धरित्री ही उसके लिए कुटुँब समान होती है। स्वयं दुःख सहकर औरों को सुख पहुँचाना ऐसे लोगों का प्रधान ध्येय है, इसलिए उन्हें श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता तथा पूज्य समझा जाता है।

इस प्रकार के संत-सत्पुरुष तो प्रत्यक्ष जीवन में यत्र-तत्र देखे ही जाते रहते हैं, किन्तु मरणोत्तर जीवन संबंधी ऐसे उदाहरण यदा-कदा ही प्रकाश में आ पाते हैं। ऐसी ही एक घटना का उल्लेख प्रख्यात गुह्यविद काँलिन विल्सन ने अपनी आत्मकथा में किया है। वे लिखते हैं कि नोवा स्काँटिया (कनाडा) के नार्थ माउंटेन इलाके में एक नाविक परिवार रहता था। उसमें एक बालक पैदा हुआ। नाम था- जोशुआ। वह कुछ बड़ा हुआ, तो पिता के साथ समुद्री यात्राओं पर जाने लगा। उसमें उसे बड़ा आनंद आता। समुद्री जीवन के खतरों को समझते हुए अनेक बार पिता उसे साथ ले जाने से मना कर देते, तो वह मचलने लगता, जिससे विवश होकर उसे साथ ले जाना पड़ता।

एक बार नाव तूफान में फंस गई, तो वे परेशान हो उठे। उन्हें अपनी चिंता नहीं थी। डर था तो इस बात का कि जोशुआ भी साथ है ओर पिता के संग उसे भी मरना पड़ेगा। इतने पर भी हैरान कर देने वाली बात यह थी कि जोशुआ ऐसे समय में भी भयभीत नहीं होता और पिता को ढाढ़स बंधाता रहता। आरंभ से ही वह निर्भीक प्रकृति का था।

युवा होने पर वह अकेले ही समुद्री सैर पर निकलने लगा। इससे उसे काफी अनुभव प्राप्त हुआ और इस बात का भी पता चला कि ऐसे अभियानों में किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अनेक वर्षों की छोटी-छोटी यात्राओं के उपराँत उसके मन में आया कि क्यों न समुद्री मार्ग से संसार का चक्कर लगाया जाए। यह विचार आते ही उसने उसकी तैयारी शुरू कर दी। वह जानता था कि ऐसे कार्यों में जान जोखिम का भारी खतरा है, किन्तु इतने मात्र से वह इस अभियान को त्यागना नहीं चाहता था। दृढ़ संकल्पों वाला जोशुआ यह भलीभाँति समझता था कि कठिनाइयोँ के आगे हार मान लेने वह जीवन में कभी भी कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं कर सकेगा। अस्तु, संपूर्ण तैयारी के पश्चात 24 अप्रैल सन 1894 को अपनी पुरानी नाव के साथ उसने यात्रा का श्रीगणेश किया।

एक सप्ताह बीत गया। जोशुआ समुद्री मार्ग के सबसे कठिन और भयानक समझे जाने वाले भाग से गुजर रहा था। यहाँ पग-पग प्राण संकट का भय था, फिर भी वह मन को मजबूत कर बढ़ा चला जा रहा था। अंध महासागर के बारे में कहा जाता है कि करोड़ों वर्गमील क्षेत्र में फैला यह महासमुद्र इतना खतरनाक है कि नाविक कब वहाँ की भयानक शार्क और ह्वेल मछलियों का शिकार बन जाए, कहा नहीं जा सकता। इसके अतिरिक्त उसमें उठने वाले तूफान इतने प्रचंड होते हैं कि उनसे पार पाना लगभग असंभव है। फिर उसकी गहराई भी कोई कम नहीं। ऐसी प्रतिकूलताएं हों और व्यक्ति एकदम अकेला हो, तो मन का बार-बार बैठ जाना स्वाभाविक ही है। उस पर भी अंधमहासागर में मंडराने वाले भूतों का डर, सब मिलकर जोशुआ के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर रहे थे। रात में डर भगाने के लिए वह जोर-जोर से गीत गाता और दिन के समय कुछ सो लेता। नींद पूरी न होने और मेहनत अधिक पड़ने से उसे सुस्ती और थकान रहने लगी। इसी बीच भोजन में एक दिन उसने आलूबुखारा और पनीर साथ-साथ खा लिया, जिससे पेट में दर्द रहने लगा। वह किसी प्रकार कम न हो रहा था। इसके कारण कई दिनों तक उसे उपवास रखना पड़ा, फिर भी दर्द ठीक न हुआ, उलटे कमजोर गले और आ लगी। एक दोपहर जोशुआ केबिन में निढाल पड़ गया। अशक्तख के मारे उसका बुरा हाल था। लेटे-लेटे वह सोचने लगा कि अब शायद न बच पाए। उसकी मृत्यु सुनिश्चित है। वह क्या करता, स्वयं को नियति पर छोड़ दिया।

मध्य रात्रि थी। जोशुआ दर्द से व्याकुल था। ऐसे में नींद कैसे आती। वह छटपटा रहा था, तभी अकस्मात केबिन में किसी के पदचाप सुनाई पड़े। उसने पलटकर देखा तो हैरान रह गया। उसके सामने एक सुन्दर देहयष्टि वाला नौजवान खड़ा था। उसने जोशुआ पर एक स्नेहपूर्ण दृष्टि डाली, हाथ पकड़कर प्रेमपूर्वक उठाया और कहा, ‘तुम बहुत मूर्ख हो। तुम्हें जब आहार संबंधी नियम का पता नहीं, तो इतनी लंबी यात्रा पर निकलने की क्या जरूरत थी? मरना है क्या! अरे! पनीर के साथ क्या कभी आलूबुखारा खाया जाता है।’

इतना सुनते ही जोशुआ आश्चर्य से उसे देखने लगा, पूछा, ‘तुम कौन हो? मेरी नाव में अचानक कहाँ से, कैसे आ गए? मेरे बारे में तुम्हें यह सब कैसे मालूम?’

यह सुनकर वह मुस्करा दिया, कहा, ‘मैं चाहे कहीं भी, कभी भी पहुँच सकता हूँ। मेरे लिए स्थान और काल की कोई अड़चन नहीं। मैं पलक झपकते ही तुम्हारे जैसे मुसीबत में पड़े लोगों की सहायता में पहुंच सकता हूँ।’

इतना कहकर उसने कुछ दवाएं दीं और कहा, ‘इन्हें खा लो। कल प्रातः तक तुम स्वस्थ हो जाओगे। तब तक तुम्हारी नाव मैं चलाता रहूँगा।’

दवा लेते समय जोशुआ ने अनुभव किया, जैसे उस व्यक्ति का हाथ बर्फ जैसा ठंडा हो। वह समझ गया कि आगंतुक कोई मनुष्य नहीं, वरन् एक परोपकारी प्रेतात्मा है, उसकी जीवन रक्षा हेतु आई है।

सवेरा हुआ, तो प्रेतात्मा के कथानुसार वह बिलकुल स्वस्थ-सबल महसूस कर रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे बीमार था ही नहीं। वह तुरंत उसके लिए गरम कॉफी और नाश्ता ले आया। यह सब क्षणार्द्ध में कहाँ से आ गया, यह देख जोशुआ हैरान था, कारण कि उसके पास न तो काफी थी, न वह नाश्ता, जिसे वह उसे खाने को दे रहा था।

नाश्ता कर चुकने के उपराँत उस व्यक्ति ने कहा कि अभी थोड़ी देर में भयंकर तूफान आने वाला है। मैं इस तूफान से तुम्हारी रक्षा करूंगा। यह इतना दुर्धर्ष है कि न तुम, न तुम्हारी यह पुरानी नौका उसका मुकाबला करने में सक्षम है। मैं अपनी पराशक्ति के सहारे इस महाविपत्ति से तुम्हें सुरक्षित निकाल ले जाऊंगा। सावधान रहो और देखो। उसका यह अंतिम वाक्य अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि जोशुआ ने देखा कि समुद्र की उत्ताल ऊर्मियाँ उद्दाम और विकराल बनती जा रही है। थोड़ी ही देर में उसने रौद्र रूप धारण कर लिया। उस अजनबी ने नाव को संभाला और तूफान के शाँत होने तक उसे बचाए रखा। लगभग पंद्रह दिनों तक वह जोशुआ के साथ रहा। इस बीच यही कहता रहा कि जब तक तुम खतरे से बाहर नहीं निकल जाते, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।

इस मध्य उसकी नाव निरंतर आगे बढ़ती रही। कई दिन बीत गए। एक प्रातः उसने कैप्टन जोशुआ से कहा, ‘अब तुम अपनी नाव संभालो। हमारा काम पूरा हो गया। आगे तुम्हारी मंजिल निर्विघ्न है। निश्चिंत रहो और सतर्कतापूर्वक आगे बढ़ो। तुम अवश्य सफल होगे, इसे मैं पहले ही जान चुका हूँ। इस कार्य को करने वाले कदाचित तुम पहले और अंतिम व्यक्ति होगे, इसके पश्चात ऐसा दुस्साहस शायद ही कोई कर सके। तुमने साहस किया, इसलिए तुम्हें अलौकिक सहायता मिली। जो व्यक्ति दूसरों के भरोसे रहते हैं उनकी सफलता संदिग्ध बनी रहती है। इसे हृदयंगम कर लेना और यह स्मरण रखना कि परोक्ष सत्ता की सहायता सिर्फ उन्हीं को मिलती है, जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर हों। इस लोमहर्षक यात्रा को पूर्ण करने के उपराँत तुम अपना संस्मरण लिखना, जिसमें इस बात का भी उल्लेख करना कि संकल्प के पक्के शूरवीरों की सहायता करने वाली आत्माएं सिर्फ स्थल भाग में ही नहीं, वरन् धरती के उस हिस्से में भी विद्यमान हैं, जिसे समुद्र कहते हैं।’ इतना कहकर उसने सागर में छलाँग लगा दी और अदृश्य हो गया। जोशुआ की यात्रा 27 जून 1898 को संपूर्ण हुई।

मरण जीवन का अदृश्य पक्ष है। शरीराँत के बाद उसकी सत्ता समाप्त नहीं हो जाती, अपितु और अधिक समर्थ, सशक्त और क्रियाशील हो उठती है। स्थूल देह का भार हट जाने से उसका आवागमन भी अप्रतिहत हो जाता है। इस मध्य वह ठीक वैसा ही व्यवहार करती है, जैसी स्थूल सत्ता। पवित्रता से उसमें और समर्थता एवं प्रखरता आ जाती है तथा वह ऐसे-ऐसे उदात्त कार्य करने में सक्षम हो जाती है, जिसे आमतौर पर साधारण आत्मा नहीं कर पाती। इसके अतिरिक्त जीवन की यह पवित्रता में अगले जन्म में और अधिक उच्चतर भूमिका में प्रतिष्ठित करती हैं, अतएव हर एक को हर पल यह प्रयास करते रहना चाहिए कि हम अधिकाधिक शुद्ध और श्रेष्ठ बनें। जीवन को दिव्य और महान बनाने का यही एकमात्र उपाय है।


आत्मज्योति ही यथार्थता (kahani)

याज्ञवल्क्य राजा जनक की सभा में विराजमान थे। जनक ने पूछा, ‘प्रकाश का स्रोत क्या है और यदि वह न मिले, तो किससे आश्रय लिया जाए? याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘सूर्य प्रमुख है। सूर्य न हो तो चंद्रमा, चंद्रमा न हो दीपक, दीपक न हो तो विज्ञजनों से पूछकर प्रकाश प्राप्त करो।’

जनक ने पूछा, ‘कोई बताने वाला भी न दिखे तब?’ याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘तब अपने अंतःविवेक के आधार पर मार्ग अपनाएं। साँसारिक प्रकाश न मिलने पर आत्मज्योति ही यथार्थता बताती है।’


जीवन प्रभुमय बन जाए

उपासना का अर्थ- स्वयं को प्रभु के साथ जोड़ देना। चाहे यह सकाम उपासना के द्वारा हो या निष्काम के। इष्ट की समीपता के लिए नहीं, अपने अभीष्ट की याचना के निमित्त ही सही, प्रभु से हमारा जो संबंध जुड़ेगा, वही हमारे लिए अमूल्य निधि बन जाएगा।

अपने इष्ट से, भगवान से अपनी मनचाही चीज माँगने में कोई बुराई नहीं है, न ही इससे उपासना के नियमों की अवहेलना होती है। बुरा है तो यह कि हमारी माँगी हुई वस्तु ऐसी न हो, जिसमें जगत् के किसी भी प्राणी के लिए अमंगल या अहित की भावना हो। दूसरी बात यह कि मन में ‘प्रभु देंगे कि नहीं देंगे’ ऐसा संशय क्षण मात्र के लिए भी न आए। विश्वास किसी भी स्थिति में शिथिल नहीं होना चाहिए। विश्वास से हमारे अंदर अद्भुत शाँति एवं सहिष्णुता का संचार हो उठेगा। मन सर्वथा अनुद्विग्न एवं शाँत होकर एक अनिर्वचनीय आनंद से भर उठता है।

ऐसी स्थिति में दो बातों में एक बात अवश्य होगी या तो प्रभु हमें हमारी अभीष्ट वस्तु दे देंगे या हमारे मन से उस वस्तु के पाने की इच्छा को सदा के लिए मिटाकर हमें शाँति दे देंगे। साथ ही इससे अनजाने ही एक और बहुत बड़ा लाभ यह होगा कि हम जितने महीने, जितने दिन या जितने घंटे भी भगवान के समीप बैठे, किसी भी निमित्त उन्हें अपने हृदय में बसाया, वह इतनी मूल्यवान संपदा हस्तगत हो जाएगी कि जिसकी तुलना इस संसार के किसी भी पदार्थ से संभव नहीं। जैसे भी हो, किसी भी कारण हम प्रभु से जुड़ें, यही सार बात है।

प्रभु की सामर्थ्य तो अनंत, अपरिसीम है। भले ही प्रभु का अमित प्रभाव हमारी तर्कशील बुद्धि में स्थान न पावे। हम इस पर विश्वास न कर सकें, यह बात दूसरी है, पर इससे भगवान के साम्राज्य का अनंत वैचित्र्य मिटता नहीं है। जो सत्य है वह सत्य ही रहेगा। यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसे मानें ढूंढ़ें, पहचानें या उसकी ओर से मुँह मोड़ें रहें। किन्तु बुद्धिमानी इसी में है कि हम दुराग्रह त्याग दें। यदि प्रभु के अस्तित्व में थोड़ा भी विश्वास है, तब यही परम कल्याणकारी साधन है कि प्रभु पर विश्वास और दृढ़ करते हुए उनकी समीपता हम जिस किसी निमित्त भी पाएं, इसमें लाभ-ही-लाभ है।

उपासना के समय परम शुभ भाव रख परमात्मा के साथ एकाकार हो जाने वाला साधक प्रभु को जितना प्रिय है, उतना ही उन्हें वह साधक भी प्रिय है, जो उनसे विश्वासपूर्वक कुछ माँग रहा है। भगवान के लिए यह कदापि संभव नहीं कि पहले का सम्मान करे और दूसरे की उपेक्षा। उनके लिए दोनों ही समान हैं। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि पहला प्रभु की स्नेहधारा में बहकर अपनी यात्रा समाप्त करके प्रभु के आनंदरस सिंधु में निमग्न होने के लिए तट के अत्यंत समीप पहुँचा हुआ उनका प्रौढ़ पुत्र है और दूसरा उनकी स्नेह भरी गोद में खेलने वाला अबोध शिशु है, जो उनसे मिट्टी का एक खिलौना माँग रहा है।

यह सत्य है कि भगवान के साथ सर्वथा निष्काम संबंध ही उपासना का पवित्र आदर्श है। भगवान से कुछ भी माँगना वास्तव में अज्ञानता ही है। हमारे लिए जो भी आवश्यक है, उसे वे बिना माँगे ही आगे से आगे देते रहते हैं और देते रहेंगे। परमस्नेहमयी जननी की भाँति हमारे लिए सब कुछ वे पहले से ही सुव्यवस्थित कर रखते हैं। उनसे हम क्या माँगे क्यों माँगे? यह बुद्धि भी हमारे अंदर कहाँ कि हम यह निर्णय कर सकें कि हमें क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए, किन्तु जब हमें अभाव की अनुभूति हो रही है और प्रभु से विमुख होकर हम भटक रहे हैं, तब इस परिस्थिति में जो भी निमित्त हमें प्रभु से जोड़ सके, उसे अवश्य ग्रहण कर लेना चाहिए। यह संतों का अनुमोदित मत है कि जैसे भी हो हमारा झुकाव प्रभु की ओर हो जाए।


मानव चेतना और उसकी जटिल गुत्थियां

मानव चेतना के गहन अध्ययन की जितनी आवश्यकता आज है, उतनी शायद पहले कभी नहीं रही। क्योंकि आज के मनुष्य की समस्या का मुख्य कारण किसी भौतिक पदार्थ या परिस्थिति में होने के बजाय उसकी अपनी चेतना में है। तभी तो प्रज्ञावान मनीषियों ने मानवता के वर्तमान संकट को ‘मानव चेतना का संकट’ कहा है। एक आकलन के अनुसार 70 से 80 प्रतिशत बीमारियाँ मानव की आन्तरिक चेतना के विघटन से उपजती और पनपती हैं। एक शोध अध्ययन के मुताबिक इन दिनों 12 में से 5 व्यक्तियों को उपचार के तौर पर मनोवैज्ञानिक परामर्श की जरूरत पड़ती है।

इस तरह के अध्ययन-अनुसंधान की प्रक्रिया से जो तथ्य एवं आँकड़े प्रकाश में आए हैं, उनसे विज्ञजनों की हैरानी बढ़ी है। पिछले दशक से पहले जिन मनोरोगों की चर्चा मात्र किन्हीं लेखों, शोध पत्रों एवं संगोष्ठियों में होती थी, आज उनमें से प्रायः सभी जन सामान्य में व्याप्त हो गए हैं। प्रौढ़ों एवं युवाओं की ही नहीं किशोरों और नन्हें-मुन्ने बालकों की संख्या भी इस चक्रव्यूह में फँसती जा रही है। हर देश का हर वर्ग इस व्यथा से हैरान-परेशान है।

चाहे कहीं लोकतंत्र हो या पूँजीवाद, समाजवाद हो या साम्यवाद, सामूहिक विघटन और विश्व तनाव का मूल कारण मानव चेतना का विघटन और विखण्डन है। मानव ही परिवार, समाज और राष्ट्र की मूल इकाई है। यदि उसकी अन्तर्चेतना में दरारें होंगी, तो उसका बाहरी जीवन बिखरेगा ही। इस संदर्भ में मानव चेतना की सुविख्यात मर्मज्ञ इरा प्रोग्राफ ने अपने शोध निष्कर्ष को प्रस्तुत करते हुए कहा है कि आधुनिक मानव व्यक्तित्व में एक मौलिक चेतनात्मक रूपांतरण ही हमारी सभ्यता के सम्भावित ऐतिहासिक विध्वंस को रोक सकता है।

ऐसा नहीं है कि मानव मनीषा इस ओर से अपनी आंखें मूँदे है। उनके प्रयास जारी हैं, भले ही वे कारगर साबित नहीं हो रहे। इन कोशिशों में जो विश्लेषण किया गया है, उसके अनुसार वैज्ञानिक क्रान्ति से पूर्व जो वैचारिक ढाँचा, मूल्य एवं दार्शनिक परम्पराएँ थी और जो वैज्ञानिक क्रान्ति के बाद बनी, उनमें भारी संघर्ष आज की दशा का कारण है। इस संघर्ष में मानव चेतना लगातार दरकती-टूटती-बिखरती जा रही है। पहले सामाजिक नेतृत्व- दार्शनिक-आध्यात्मिक नेतृत्व के हाथों में था, लेकिन अब यह वैज्ञानिकों, मनोवैज्ञानिकों के हाथों में चला गया है। श्रद्धा और तर्क के इस संघर्ष ने, भाव और बुद्धि के इस तुमुलद्वन्द्व ने मानव चेतना की स्थिति को बहुत ही जटिल बना दिया है। अर्टुर आइजेनवर्ग ने इस स्थिति से उपजी मनोवैज्ञानिक असुरक्षा को मनोरोगों का कारण माना है।

समस्या इतनी जटिल होती जा रही है कि वह आज के वैज्ञानिक मस्तिष्क के बाहर की चीज हो गयी है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डेनियम सी. डरनेट के शब्दों में- ‘मेरी चेतना की व्याख्या पूर्णता से बहुत दूर है।’ विज्ञानवेत्ता ए.जी. केरन्स का मानना है कि चेतना एक रहस्य बनी हुई है। आज की अणु जैविकी भी इसे समझने में असमर्थ हैं। विज्ञानवेत्ताओं की मानव चेतना के बारे में अनभिज्ञता ने अब तक लगभग निराशा का रूप ले लिया है। निराशा के इस कुहासे से घिरे अब्राहम मैस्लो के शब्द हैं- ‘मेरे विचार से यह असम्भव है कि एक समग्र, नए एवं व्यापक चेतना विज्ञान के तंत्र को विकसित किया जाय।’

इस वैज्ञानिक चेतना के अधूरेपन से उपजी परिस्थितियों का विश्लेषण पॉल टिलिच ने कुछ यूँ किया है- ‘आधुनिक मनुष्य जीवन का अर्थ खो चुका है। इस खोएपन की शून्यता को प्रायः उथली विज्ञान पूजा से भरा जाता है। जिसके कारण वह अपने नैतिक जीवन में यहाँ तक कि भावनात्मक समस्याओं के लिए वैज्ञानिक समाधान खोजता है। इस खोजबीन में उसे तनाव, कुण्ठा व असुरक्षा ही हाथ लगती है। और वह दुश्चिन्ता की ग्रन्थि से बंध जाता है। आज यही युग की पहचान बनी हुई है।’

समस्या के समाधान के लिए कोशिश कर रहे वैज्ञानिक समुदाय को भी यह बात समझ में आ गयी है कि कहीं उनसे कुछ भूल हो रही है। उनके मुताबिक यह भूल है- मानव चेतना की एकाँगी समझ। डॉ. जेकिल एवं हाइड के अनुसार मानव चेतना के दो केन्द्र हैं। एक छद्म ‘स्व’ यानि की अहं, दूसरा सच्चा केन्द्र यानि की वास्तविक स्व अर्थात् ‘आत्मा’। आधुनिक शोध विज्ञानी इसी सच्चे ‘स्व’ को भूल गए हैं। इस भूल के कारण ही मानव चेतना के विभिन्न स्तरों में सामञ्जस्य की स्थिति नहीं बन पा रही है। एल्फ्रेड एडलर ने इस बात को बहुत नजदीक से समझा। अपनी समझ को उन्होंने ‘डेफ्थ साइकोलॉजी’ में ‘जेमन शाफ्टस सगेफुहेल’ नाम दिया। इस जर्मन शब्द में समायी धारणा का मतलब है- सामाजिक स्वार्थ एवं ब्रह्मांडीय भावना में समन्वय।

मानव चेतना की समग्रता को खोजने के लिए इन दिनों पश्चिमी मनोवैज्ञानिक भारतीय ज्ञान-विज्ञान एवं योग पद्धतियों की ओर काफी आकर्षित हुए हैं। कार्ल गुस्ताव युँग ने इस संदर्भ में ‘मॉर्डन मैन इन सर्च आफ ए सोल’ नाम के ग्रन्थ की रचना भी की। इसी तरह जीन हार्डी ‘साइकोलॉजी विथ ए सोल’ को लिखने के लिए प्रेरित हुई। बुद्धि के साथ भावनाओं की उपयोगिता को स्वीकार करने एवं उसे योग्यता का सर्वमान्य मानने का निर्णय डेनियल गोलमैन की रचना ‘इमोशनल इन्टेलीजेन्स’ में व्यक्त हुआ है। इस खोज बीन में जुटे पश्चिमी मनोचिकित्सकों ने भी माना कि ‘पश्चिमी दार्शनिक मूलतः प्राकृतिक दार्शनिक हैं, चीनी दार्शनिक सामाजिक दार्शनिक हैं, लेकिन भारतीय दार्शनिक मानव चेतना के दार्शनिक हैं। इस अन्वेषण में उन्होंने उपनिषदों को मानव चेतना के आधार के रूप में स्वीकारा। हालाँकि ये प्रयास अधूरे हैं, क्योंकि अपने अनुसंधान में उन्होंने यह पाया कि भारतीय दर्शन में मानव चेतना के ये सूत्र बहुत ज्यादा बिखरे हुए हैं।’

मानव चेतना के समग्र अनुसंधान के ये प्रयत्न अधूरे इसलिए बने रहे, क्योंकि भारतीय दर्शन को वैज्ञानिक संदर्भ में सही ढंग से समझा नहीं जा सका। हालाँकि इस उद्देश्य से कतिपय भारतीयों ने भी उल्लेखनीय कार्य किया है। डॉ. जदुनाथ सिन्हा द्वारा रचित ‘इण्डियन साइकोलॉजी’ के तीन खण्ड इस पथ के प्रकाश स्तम्भ हैं। इसी तरह से स्वामी अखिलानन्द की ‘हिन्दू साइकोलॉजी’ एवं ‘मेण्टल हेल्थ एण्ड हिन्दू साइकोलॉजी’ भी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। इन प्रयासों का मूल्य एवं महत्त्व इसलिए है, क्योंकि इनमें भारतीय दर्शन में यत्र-तत्र बिखरे मानव चेतना के सूत्रों को समेटने-बटोरने का सराहनीय कार्य किया है। लेकिन इनमें दार्शनिकता एवं वैज्ञानिकता की समन्वित समग्रता की सोच का अभाव है। जिसके बिना समग्र मानव चेतना का अनुसन्धान असम्भव है।

अध्यात्मवाद के अंतर्गत मानव चेतना की जटिल गुत्थियों को सुलझाने का सार्थक प्रयास किया जा रहा है। जिसके सुपरिणाम दार्शनिक एवं वैज्ञानिक जगत् के यक्ष प्रश्नों का सार्थक समाधान प्रस्तुत कर सकेंगे। और मानव चेतना अपना खोया सौंदर्य पुनः पा सकेगी।


अर्जुन की चरित्रनिष्ठा (kahani)

देवताओं की सहायता के लिए अर्जुन उनके यहाँ असुरों के विरुद्ध लड़ने गए। उनके पराक्रम और सौंदर्य से प्रभावित उस लोक की वरिष्ठ सुन्दरी उर्वशी उनसे प्रणय निवेदन करने गई। बोली, ‘मुझे आप जैसी संतान चाहिए।’

अर्जुन ने उसकी चरणरजे मस्तक पर लगाते हुए कहा, ‘आप मुझे ही अपना पुत्र मान लें संतान के रूप में मुझ जैसा पुत्र मिलेगा ही इसका क्या भरोसा। प्रतीक्षा में बैठने की अपेक्षा यह क्या बुरा है कि तत्काल ही आपको पुत्र प्राप्ति हो जाए। मैं आपको सदाकुलीन माता के समतुल्य मानूँगा।’

देवताओं ने इस विवरण को सुना तो अर्जुन की चरित्रनिष्ठा से अत्यंत प्रभावित हुए और दिव्य अस्त्र गाँडीव उन्हें प्रदान किया


उत्खंडन की विशिष्ट हैं उपलब्धियाँ

अतीतकाल वर्तमान से जुड़ा हुआ है, तो वर्तमान भविष्य के साथ। जिस तरह अतीत वर्तमान में समाहित है, उसी तरह वर्तमान भविष्य में पल्लवित होने वाला है। अतीत, वर्तमान और भविष्य वस्तुतः के क्रम की एक ही अविरल धारा है, अटूट-अनंत प्रवाह है। जब हम अतीत के समानधर्मी मानव कृत्यों को भग्नावशेषों, पत्थरों, मिट्टी के ठीकरों, हड्डियों एवं जीवाश्मों के जरिए ढूंढ़ने लगते हैं, तब हमारा समूचा प्रयास अपने समूचे मानव स्वरूप को देखना होता है। इस प्रयास में पुरातात्त्विक करिश्मों का, फावड़े के चमत्कारों का तब एक कहीं अधिक स्थायी, मोहक एवं रोमाँचकारी दृश्य सामने आता है।

कुछ वर्ष पूर्व पाश्चात्य वैज्ञानिकों की यह मान्यता थी कि विश्व के प्राचीनतम नगर पाँच हजार वर्ष पूर्व सुमेरियन, लगास निप्यर, झरुडु, उर्क एवं उर ही थे। इसके पूर्व के नगरों के बारे में तब उन्हें के बारे में तब उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। ईसाई मतावलंबी तब इन नगरों के इतने प्राचीन होने के बारे में भी शंकाशील थे, क्योंकि बाइबिल के अनुसार परमेश्वर से सृष्टि का निर्माण 23 अक्टूबर से पूर्व की रात्रि में रविवार के दिन ईसा से 4004 वर्ष पूर्व किया था। सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में एक आर्क विशप द्वारा निर्धारित इस मान्यता को उन्नीसवीं शताब्दी तक प्रायः मान्यता मिली रही और इसे पत्थर की लकीर की तरह अकाट्य माना जाता रहा।

सन 1950 से 1958 के मध्य सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. केथलीन केनीयन ने जेरुसलेम और अमान के बीच एक प्राचीन टीले का उत्खनन करके एक ऐसे रहस्य का उद्घाटन किया, जिसने विवादग्रस्त सुमेरियन नगर, जिसके बारे में यह कहा जाता था कि यही विश्व का सर्वप्रथम नगर था, इस मान्यता को तथा बाइबिल में सृष्टि सर्जन की निश्चित तिथि के अकाट्य पत्थर की लकीर को सदा के लिए अविश्वसनीय ठहरा दिया। विख्यात कवि होमर के ‘इलियड’ काव्य की तरह यहूदियों का एक प्राचीन ग्रंथ ‘बुक ऑफ जोशुआ’ के छठवें अध्याय में वर्णन आता है कि जेरिचो या जेरिको नामक नगर के किले के द्वार कितने ही दिनों से बंद थे। यहूदियों ने इसे घेर रखा था, जिससे नगर से बाहर न कोई जा सकता था और न बाहर से कोई भीतर आ सकता था। जब जोसुआ नामक सरदार को स्वप्न में प्रेरणा मिली कि वह सात पुरोहितों के साथ जाकर सात बार बड़े जोर से किले के समान तुरही बजाए और मंत्रोच्चार करे। जोसुआ ने ऐसा ही किया। सातवीं बार तुरही एवं मंत्रों की ध्वनि के साथ ही जेरिचो नगर के द्वार अपने आप खुल गए। यहूदियों ने नगर में प्रवेश किया।

‘दि वर्ल्ड्स लॉस्ट मिस्टरीज’ नामक पुस्तक में इस तरह के अनेक साहसिक उत्खनन कार्यों एवं प्राचीन नगरों के अस्तित्व की प्रामाणिक जानकारी प्रस्तुत की गई है। उसके अनुसार द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अनेकों पुरातत्त्वविदों ने लगातार अनेक वर्षों तक जेरुसलेम और अमान नगर के मध्य के टीलों का उत्खनन किया, किन्तु कुछ कहने लायक सफलता न मिलने के कारण यही समझा गया कि ये प्राचीन नगर या तो मिट्टी में मिल गए होंगे अथवा यह मात्र दंतकथा होगी। किन्तु जैसा कि कहा गया है कि निष्ठापूर्वक किए गए पुरुषार्थ का प्रतिफल अवश्य मिलता है। यहाँ भी कुछ ऐसा ही चरितार्थ हुआ।

पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार जिस प्राचीनतम नगर जेरिचो याजेरिको की खोज करने में डॉ. केथलीन सने सफलता प्राप्त की थी, उसके संबंध में ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट में उल्लेख है कि पैगंबर मूसा जब पवित्र नगर जेरुसलेम की यात्रा के लिए निकले थे, तब उस नगर तक पहुँचने से पूर्व जोर्डन नदी के पार करने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई थी। अतः जोसुआ, जो उनका उत्तराधिकारी था, उसकी अगवानी में यहूदियों ने मरुभूमि को पार किया था। नदी पार करने के बाद उसने जेरिको नगर को घेरा और उस पर विजय प्राप्त की। बाइबिल में वर्णित उक्त घटना के आधार पर खुदाई करने पर उस नगर की प्राचीर की नींव छह फुट चौड़ी और दीवारें बीस फीट ऊंची पाई गई। कार्बन डेटिंग विधि से वैज्ञानिक जाँच करने पर पाया गया कि यह दीवार ईसा से सात हजार वर्ष पूर्व बनाई गई होगी। यहूदियों को यहाँ से हिजरत करनी पड़ी थी, जैसे कि मोहम्मद साहब को मक्का से मदीना तक हिजरत करनी पड़ी थी। संभवतः वह काल ईसा से पूर्व 1400 से 1250 का होगा। इस आधार पर जब यहूदियों ने ओल्ड टेस्टामेंट के अनुसार जेरिको नगर पर विजय प्राप्त की होगी, तब वह प्राचीर 5500 वर्ष होगी। इस प्राचीनतम नगर से एक तत्कालीन निवासी की प्रतिकृति अर्थात् पुतला पाया गया है, जो 9000 वर्ष ईसा से पूर्व काल का है। उसकी खोपड़ी पर मिट्टी की परत लगी हुई है और आँखें के स्थान में सीप लगी हुई है। संभव है पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए इस तरह की कृतियाँ प्रयुक्त की जाती रही होगी।

पुरानी बाइबिल में एक उल्लेख है कि एक ही जाति विशेष के लोगों का एक स्थान विशेष में एक महानगर बसाया गया था। इस जाति के पूर्व से आकर सिन्नार अर्थात् सुमेर में फैलने की बात की कही गई है। प्रख्यात पुरातत्वविद् होयल आदि कुछ विद्वानों ने अपने अध्ययन अनुसंधान के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि अगर अमेरिकन पूर्व से आए थे, तो उनका संबंध भारतवर्ष की विड़ जाति से हो सकता है। संभवतः वे समुद्र मार्ग से पाए थे, क्योंकि एक उपाख्यान में कहा गया है कि ओआनिज नामक देवता ने, जो समुद्री मार्ग से आया था, सुमेर के निवासियों को सभ्य बनाया था। डॉ. केथलीन के अनुसार यह नगर भी ट्राँय नगर की तरह एक ही स्थान पर कालाँतर के बाद बार-बार बसाया गया होगा। इसका आधुनिकतम निर्माण ईसा से 1900 वर्ष पूर्व लौहयुग में आ होगा।

ब्रिटिश इन्स्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी के अध्यक्ष प्रसिद्ध पुरातत्वविद् जेइम्स मेलार्ट ने सन 1964 में तुर्किस्तान ‘कताल हुयुक’ नामक प्राचीन नगर को खोज निकाला है। यह नगर ईसा से पूर्व 6000 वर्ष पुराना पाया गया है। वहाँ की एक दीवाल में 15 फुट लंबा और 5 फुट चौड़ा वृषभ का विशाल लाल रंग का भित्ति चित्र पाया गया है, जिसका नाम ‘दि ग्रेट रेड बुल’ रखा गया है। पुरातत्ववेत्ताओं ने सिंधुघाटी सभ्यता की खोज में मोहनजोदड़ो आदि स्थानों से भी इसी तरह के वृक्षभ भित्ति चित्र प्राप्त किए हैं। इस समानता को देखते हुए कताल हुयुक नामक प्राचीन नगर की सभ्यता की भारतीय होने की संभावना है। ‘पुरातत्व का रोमाँस’ नामक अपनी कृति में श्री भगवतशरण उपाध्याय का इस संदर्भ में कथन है कि यह वृक्षभ अर्थात् साँड़ कला के माध्यम से चलते-चलते मिस्र भी जा पहुँचा था, जहाँ उसको देवता के रूप में पूजा जाता था।

इसी तरह सन 1965 में यूगोस्लाविया में डेन्यूब नदी के दाहिने तट पर ‘लेपेन्सिक वीर’ नामक प्राचीन नगर का उत्खनन उगोस्लाव स्रेजोविक नामक प्राध्यापक ने किया था। इन खोलों के संबंध में पुरातत्ववेत्ता मेलार्ट ने लिखा है कि समकालीन किसान सभ्यता के अवशेषों की मंद एवं टिमटिमाती आकाशगंगा में ये प्रतीक सुपरनोवा तारे की तरह देदीप्यमान दीखते हैं। ये नगर एक सुविकसित अर्थतंत्र वाली शहरी, अत्यधिक धार्मिक एवं कलात्मक सभ्यता हैं, जबकि लेपेन्स्कि वीर सभ्यता पुरातन पाषाण युग की तस्वीर प्रस्तुत करती है।

वस्तुतः हम प्राचीन को वर्तमान के प्रतीकों द्वारा पहचानते हैं और वर्तमान के प्रतीक जब प्राचीन जीवन में मिलने लगते हैं, तब मानव के समसामयिक विस्तार के अतिरिक्त उसके कालाँतर से संगति भी प्रस्तुत हो जाती है और हम इसके स्वस्थ स्वरूप को दृष्टिगोचर कर लेते हैं। साहित्यिक साक्ष्य जैसे होमर के अमर काव्य इलियड एवं पुरानी बाइबिल के आख्यानों के आधार पर साहसी पुरातत्त्वविदों ने वैज्ञानिक दृष्टि से सत्य क्या है, इसकी छानबीन के लिए कितनी मुसीबतें उठाई, श्रमशक्ति लगी, संपदा खर्च की और अटूट धैर्य का परिचय देकर यह सिद्ध कर दिखाया कि ईश्वर केवल उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते है। अपना देश है, तो आध्यात्मिक देश पर लगता है कि आज हम इस तथ्य को भूल गए हैं कि अध्यात्म की नींव पात्रता के विकास पर खड़ी है। भौतिक उत्खनन कार्य से प्राचीन मानवी सभ्यताओं का पता लगाया जा सकता है, तो अध्यात्म के क्षेत्र में साधना के माध्यम से अपने अंदर अनंत काल से दबी एवं प्रसुप्त पड़ी दिव्य क्षमताओं को क्यों नहीं जाग्रत किया जा सकता?


कर्मक्षय हेतु गृहस्थ धर्म

तब भारत में नारी गरिमा सुप्रतिष्ठित थी। वह वैदिक स्वर्ण युग था, जब समूचे देश में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ का भाव गान हो रहा था। उस समय नारी निर्मात्री, अधिष्ठात्री थी। समाज ने उसकी स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया था। क्योंकि सामाजिक नेतृत्व को इस तथ्य का अहसास था कि नारी की स्वतंत्रता ही मानव को उसकी परम स्वतंत्रता ‘मोक्ष’ का सन्मार्ग प्रदर्शित करने में सक्षम है। महर्षि देवल न केवल इस सत्य के हिमायती थे, बल्कि उनका आचरण भी इसे प्रमाणित करता था। उन्होंने अपनी कन्या सुवर्चला का पोषण और शिक्षण इसी साँस्कृतिक गरिमा के अनुरूप किया था।

मनोयोग पूर्वक अध्ययन एवं कठोर तप ने सुवर्चला को ब्रह्मवादिनी बना दिया था। सुवर्चला रूपवती थी। उसके सौंदर्य की आभा से नारी सौंदर्य स्वयं आलोकित हो उठा था। पर इस सबसे कहीं बढ़कर वह मानवीय गुणों में अद्वितीय थी। उसके वैदुष्य के आगे प्रतिभाशाली महर्षिगण भी माथा नवाते थे। समस्त शुभ लक्षणों से युक्त अपनी कन्या के युवा होते ही महर्षि देवल उसके लिए योग्य वर हेतु चिंतित रहने लगे। एक दिन प्रातः अग्निहोत्र आदि सम्पन्न कर महर्षि ने अपनी पुत्री की ओर स्नेह से देखते हुए पूछा- बेटी! अब तुम विवाह योग्य हो गयी हो, तुम्हें अपने लिए कैसा वर चाहिए?

पिता का प्रश्न सुनकर सुवर्चला के अधरों पर हल्का सा स्मित झलका। पिता की ओर जिज्ञासु दृष्टि से निहारते हुए वह कहने लगी, पिताश्री! ब्रह्मवादिनी के लिए भी विवाह आदि का कोई प्रयोजन है क्या? महर्षि अपनी पुत्री के तत्त्वज्ञान से परिचित थे। उन्होंने कहा- पुत्री! कुछ विशेष कर्मों का अनुष्ठान मात्र कर्मक्षय के लिए करना पड़ता है। यह सुनकर सुवर्चला सोच में पड़ गयी और उसके मुख से मात्र एक अक्षर के चार शब्द निकले- हाँ सो तो है। उसके इस कथन से ऐसा लगा मानो उसने ब्रह्म के चार पदों की व्याख्या इन चार शब्दों में कर डाली।

वातावरण में कुछ देर तक चुप्पी छायी रही। हवाओं में मौन व्याप्त रहा। फिर सन्नाटे में एक मधुर गुँजन हुआ। सुवर्चला कह रही थी- पिताश्री! आप मुझे ऐसे यति के हाथ सौंपिए, जो अंधा हो और आँख वाला भी हो। महर्षि पुत्री के ये अटपटे वचन सुनकर, एक क्षण तो चौंके, पर पुनः सहज हो गए। क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि उनकी बेटी असामान्य है। उसकी बातों में हमेशा ही कुछ गूढ़ अर्थ निहित रहता है। इस अटपटे कथन में भी कुछ सार अवश्य होगा।

पर ऐसा व्यक्ति मिलेगा कहाँ? महर्षि ने पूछा।

आप ऐसा करिए कि मेरी इच्छानुसार मेरे योग्य ब्रह्मवेत्ताओं को आमंत्रित करिए। मैं उनमें से अपने योग्य वर का चुनाव स्वयं ही कर लूँगी।

‘सुवर्चला का स्वयंवर’ यह खबर अनेकों जनों के अन्तःकरण को आन्दोलित करने के लिए पर्याप्त थी। हर दिशा से ब्राह्मणों की कतारें महर्षि के आश्रम में पहुँचने लगी। इनमें से कुछ को उत्सुकता थी, कुछ को जिज्ञासा तो कुछ सचमुच ही सुवर्चला से पाणिग्रहण की आशा लेकर आए थे। उनकी सोच थी कि वे सुवर्चला जैसी रूपवती एवं विदुषी पत्नी पाकर धन्य हो जाएँगे।

ऐसे उत्सुक ब्राह्मणों की सभा में महर्षि देवल अपनी कन्या सुवर्चला को साथ लेकर पहुँचे। उन्होंने प्रत्येक से अपनी पुत्री का परिचय कराया। और घोषणा की कि उपस्थित ब्राह्मण समुदाय में मेरी कन्या जिस किसी को पसन्द करेगी, उसे मैं जमाता के रूप में स्वीकार कर लूँगा।

और तब महर्षि देवल की उस यशस्विनी कन्या ने समस्त ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणों को सादर नमन कर विनम्रता पूर्वक कहा- ‘यद्यस्ति समितौ विप्रो हयंधोऽनंधः स में वरः।’ अर्थात् इस ब्राह्मण सभा में मेरा पति वही हो सकता है, जो अंधा हो और अंधा न भी हो।

सभी को यह शर्त अतिविचित्र लगी। वे सब के सब एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। कुछ ने तो यह भी सोच लिया कि महर्षि की रूपवती कन्या अवश्य ही विक्षिप्त है। कतिपय फुसफुसाहट भरे स्वर सभा मध्य उभरे- कि अत्यधिक अध्ययन और तप की कठोरता से भी यदा-कदा मानसिक असन्तुलन हो जाता है। सुवर्चला उसी से पीड़ित हो चली है। कतिपय विद्वानों के अहं को सुवर्चला की यह बात सुनकर भारी ठेस लगी। उन्होंने सोचा कि अवश्य ही महर्षि ने हमारा अपमान कराने के लिए यहाँ पर बुलाया है।

परन्तु प्रत्यक्ष में किसी ने कुछ भी नहीं कहा। क्योंकि वे सभी महर्षि और उनकी पुत्री की लोक प्रतिष्ठ से परिचित थे। किन्तु वे सब के सब मन ही मन इन पिता-पुत्री की निन्दा करते हुए लौट गए। सुवर्चला शान्त भाव से अपने आश्रम में अन्तः प्रकोष्ठ में चली गयी। महर्षि को भगवद् विधान पर भारी आस्था थी। इसलिए उनका मन सदैव की ही भाँति शान्त रहा। महर्षि जानते थे कि जहाँ नियति का विधान अकाट्य है, वहीं तपस्वी का संकल्प भी अमोघ होता है। जब उनकी पुत्री के मन में यह विचित्र संकल्प उभरा है- तो सर्व समर्थ परमेश्वर को उसे पूरा ही करना पड़ेगा।

कुछ दिनों तक सब कुछ यथावत् चलता रहा। यहाँ तक कि स्वयं महर्षि भी ब्राह्मणों के आगमन को भूलने लगे। तभी एक दिन एक तेजस्वी तरुण महर्षि के यहाँ पहुँचा। उसने अपना परिचय देते हुए कहा- कि मैं ब्रह्मर्षि उद्दालक का पुत्र श्वेतकेतु हूँ। मेरे मन में आपकी पुत्री से मिलने की अभिलाषा है। मैं चाहता हूँ कि आपकी पुत्री भी अपना समाधान प्राप्त करें।

महर्षि देवल श्वेतकेतु के प्रभावी व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह सके। उनके मन के एक कोने में श्वेतकेतु के प्रति आदरभाव भी उमड़ा। पर वे अपनी दृढ़ प्रतिज्ञ पुत्री की संकल्प निष्ठ से परिचित थे। उसे स्मरण कर उन्होंने श्वेतकेतु से कहा- वत्स! क्या तुम मेरी पुत्री की अटपटी शर्त से परिचित हो। श्वेतकेतु मुस्कराए और बोले- इसमें भला अटपटा क्या है।

श्वेतकेतु के इस आत्मविश्वास से अभिभूत महर्षि उन्हें अपने साथ लेकर सुवर्चला के पास पहुँचे। विदुषी सुवर्चला से इस आगमन का मन्तव्य छिपा न रहा। वह सदा की भाँति मुस्करायी और उसने बड़े ही गम्भीर स्वर में पूछा- द्विजश्रेष्ठ आप कौन हैं?

श्वेतकेतु ने उसी गम्भीरता से कहा- देवी! आपने मुझे द्विजश्रेष्ठ कहकर सम्बोधित किया है, फिर तुम किससे पूछ रही हो? सुवर्चला कहने लगी- मैं हृदय गुहा में शयन करने वाले महात्मा से पूछ रही हूँ।

श्वेतकेतु ने सरल चित्त उत्तर दिया- भामिनी! वह तो कुछ कहेगा नहीं। क्योंकि वह आत्मा नाम और गोत्र से रहित है। जिसे हम अहं (मैं) कहते हैं, वह हृदय गुफा में स्थित परमार्थ तत्त्व नहीं है।

सुवर्चला बोली- ब्रह्मर्षि! फिर आप नाना प्रकार के क्रिया कलाप वाले गृहस्थ धर्म में क्यों पड़ना चाहते हैं? क्योंकि इससे तो आपके ज्ञान के विलुप्त हो जाने की सम्भावना है।

श्वेतकेतु ने उसी प्रकार सहज भाव से कहा- देवि! श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करते हैं, वही दूसरे लोग भी करते हैं। फिर ब्रह्मवेत्ता जनों के लिए संचित प्रारब्ध का क्षय करना अनिवार्य है। बस हम भी अपने कर्म क्षय हेतु गृहस्थ धर्म को स्वीकार करना चाहते हैं।

अपने इन प्रश्नों के सटीक उत्तर सुनकर सुवर्चला को यह तो ज्ञात हो गया था कि वह जिससे बातें कर रही है, वह सामान्य ब्राह्मण नहीं अपितु ब्रह्मविद् है। फिर भी उसे अपनी शर्त का ज्ञान था। वह हर हाल में दृढ़ प्रतिज्ञ एवं संकल्पनिष्ठ थी। अपनी उसी संकल्प निष्ठ को याद करते हुए उसने श्वेतकेतु से पूछा- हे ऋषि कुमार! क्या आप मेरी प्रतिज्ञा से परिचित हैं।

सोऽहं भद्रे समागतः! अर्थात् भद्रे मैं वही हूँ, जिसे तुम चाहती हो। मैं तुम्हारे लिए ही आया हूँ।

श्वेतकेतु के इस कथन के बावजूद सुवर्चला के नेत्रों में जिज्ञासा थी। जिसका समाधान करते हुए श्वेतकेतु ने कहा- मैं अंधा हूँ, क्योंकि अपने मन में मैं अपने को सदा ऐसा ही मानता हूँ। फिर भी मैं सन्देह रहित हूँ, अतः मैं अन्धा नहीं हूँ।

अपनी बात की सिद्धि के लिए श्वेतकेतु ने आगे प्रमाण देते हुए कहा- ‘जिस परमात्मा की शक्ति से जीवात्मा सब कुछ देखता है, ग्रहण करता, स्पर्शादि करता है वह परमात्मा ही चक्षु कहलाता है। जो इस चक्षु से रहित है, अर्थात् परमात्मा को नहीं जानता, वह प्राणियों में अन्धा है। मैं यह जानता हूँ अर्थात् मैं अन्धा नहीं हूँ। किन्तु इस मायने में अवश्य अंधा हूँ कि जगत् जिन आँखों से देखता, जिस कान से सुनता, जिस त्वचा से स्पर्श करता, जिस नासिका से सूँघता, जिस रसना से रस ग्रहण करता है और जिसे लौकिक चक्षु से सारा बर्ताव करता है। उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। अर्थात् साँसारिक कल्मष युक्त व्यवहार से मेरा कोई नाता नहीं है। इसलिए मैं अन्धा हूँ। साथ ही मैं तुम्हारा भरण-पोषण करने में समर्थ हूँ। अतः तुम मेरा वरण करो।’

श्वेतकेतु की इन बातों से सन्तुष्ट होकर सुवर्चला बोल पड़ी- ‘मनसासि वृतो विद्वान, शेषकर्त्ता पिता मम।’ अर्थात् विद्वान! मन से मैंने आपका वरण किया। शेष कार्य की पूर्ति, अर्थात् विवाह कार्य करने वाले मेरे पिता हैं। अब आप मुझे उनसे माँग लीजिए। ‘एष्य वेद विधिक्रमः’ अर्थात् यही वेद मर्यादा है।

पुत्री के इस कथन से महर्षि देवल को तो नवप्राण मिले। वह तो पहले से ही श्वेतकेतु के व्यक्तित्व से प्रभावित थे। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक सुवर्चला और श्वेतकेतु का विवाह सम्पन्न करवा दिया।

विवाह के अनन्तर श्वेतकेतु ने सुवर्चला से कहा- ‘शोभने! वेदों में जिन शुभ कर्मों का विधान है, मेरे साथ रहकर तुम उन सबका यथोचित रूप से अनुष्ठान करो और यथार्थ रूप से मेरी सहधर्मिणी बनो। हम दोनों ही ममता अहंकारादि से रहित होकर लोक व्यवहार को सिद्धि एवं आत्म कल्याण के लिए कर्त्तव्य कर्मों का अनुष्ठान करेंगे।’ श्वेतकेतु के इस कथन के साथ ही सुवर्चला ने नारी जीवन की मर्यादा को संसार से अपने जीवन के द्वारा सुप्रतिष्ठित करने ऋषि श्वेतकेतु के साथ गृहस्थ जीवन के लिए कदम बढ़ाया।


मातृत्व उदय हो आया (kahani)

युद्ध भूमि में रावण का मृत शरीर पड़ा था। उसमें सहस्रों छिद्र थे और उन सभी से रक्त बह रहा था।

अन्य दलनायकों के साथ राम-लक्ष्मण भी उसे देखने पहुँचे।

लक्ष्मण ने मृत शरीर में सहस्र छिद्र देखे तो चकित रह गए। राम से पूछा, ‘देव! आपने तो एक ही बाण में इसका वध किया था, फिर सहस्र छिद्र कैसे?’

राम ने गंभीरतापूर्वक कहा, ‘मैंने तो एक ही बाण मारा था। यह हजार छिद्र तो उसके अपने असंयमजन्य पाप कर्म के कारण है जो स्वयं ही फूटे और स्रवित हो रहे हैं।’ महा पंडित रावण की दुर्गति का कारण समझकर सबने इस मर्म को जाना कि संयम की उपेक्षा से हुए जर्जर जीवन के लिए एक ही प्रहार पर्याप्त है।’

एंथिस स्थित वेदाँत केन्द्र अमेरिका में उस दिन गीता के उन श्लोकों की व्याख्या स्वामी विवेकानंद द्वारा हो रही थी, जिसमें मन की उस कुदेय की विवेचना की गई, जिसमें कहा गया है कि वह न चाहते हुए भी कुमार्ग पर चला जाता है और मनुष्य को पतन के गर्त में गिरा दिया है।

भाषण बड़ा सारगर्भित और हृदयग्राही था। मंत्रमुग्ध श्रोतागण आदि से अंत तक उसे सुनते रहे। समाप्त होने पर विदा तो हुए पर लगा, किसी ने उनके अंतःकरण को हिला दिया हो।

सभी चले गए। विवेकानंद भी चाँदनी रात में अपने निवास गृह की ओर पैदल जा रहे थे। एक असाधारण सुन्दरी उनके पीछे-पीछे चल रही थी। विवेकानंद न झिझके, न विचलित हुए। अवसर देखकर उस सुन्दरी ने प्रणय निवेदन किया। उन्होंने युवती का हाथ थाम लिया और कहा, ‘माँ तुम कैसी कल्याणी हो। लगता है माँ शारदामणि का सा दुलार देने यहाँ आई हो। कितनी महान हो तुम।’

एक ईर्ष्यालु पादरी ने षडयंत्र बनाकर विवेकानंद को बदनाम करने के लिए उसे भेजा था, पर विवेकानंद का हाथ छूते ही उसे लगा कोई देवता उस पर अमृत बरसा रहा है। वापस लौटते हुए उसने इतना ही कहा, ‘देवता तुम्हें गिराने आई थी, पर तुम हो, जिसने मुझे आसमान तक उठा दिया।’ विकार के स्थान पर उसका मातृत्व उदय हो आया था।


मानवी प्रेम से दिव्य प्रेम की ओर लौटें

प्रेम विश्वव्यापी और सनातन है। वह स्वयं को सदा अभिव्यक्त करता रहता है। और अपने सार रूप में समरूप रहता है। यह भगवत् शक्ति है। प्रेम की गति मनुष्यों तक ही सीमित नहीं है यह सर्वत्र है। अपनी विशुद्ध गति में वह परमात्मा के साथ एक होने के लिए आत्मा की खोज है। यह एक ऐसी खोज है जो अन्य समस्त वस्तुओं से निरपेक्ष और निर्लिप्त रहती है। भागवत प्रेम स्वयं को समर्पित करता है, इसमें माँग नहीं है। प्रेम के द्वारा सृष्टि भगवान् की ओर उठती है और प्रत्युत्तर में भागवत् कृपा सृष्टि से मिलने के लिए नीचे की ओर झुकती है।

प्रेम उदासीन नहीं हो सकता, क्योंकि उदासीन प्रेम जैसा कोई भाव अस्तित्व ही नहीं रखता। वह एक बड़ी ही पवित्र, निश्चित एवं स्थिर वस्तु है। वह न तो अग्नि की तरह भभक उठता है और न ईंधन समाप्त होने पर बुझ जाता है। वह सूर्य के प्रकाश के समान स्थिर, सर्वग्राही तथा स्वयं सत् होता है।

प्रेम एक परम शक्ति है। शाश्वत चेतना ने इसे जगत् के उद्धार के लिए भेजा है। जब जगत् और मनुष्य अज्ञान व अंधकार में भटक गये थे, तभी प्रेम ने उन्हें जगाया एवं झकझोरा। उनके बंद कान में दिव्य संदेश फूँका- ‘एक वस्तु है जो इस योग्य है कि उसके लिए जागा जाये और उसके लिए जिया जाये और वह है प्रेम।’ जगत् में भगवान् के प्रेम की अभिव्यक्ति को मानव जीवन का उद्देश्य कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। भागवत् प्रेम स्वयं सत् है और बाह्य संपर्क या बाह्य अभिव्यक्ति पर निर्भर नहीं करता। यह आध्यात्मिक सत्य पर निर्भर करता है। भागवत प्रेम कोई वायवीय, शीतल और दूरस्थ वस्तु नहीं है। बल्कि एक ऐसा प्रेम है, जो पूर्णतः तीव्र, घनिष्ठ, एकत्व, समीपता व आनंदोल्लास से परिपूर्ण है। यह अपनी अभिव्यक्ति के लिए समस्त प्रकृति का उपभोग करता है।

भगवान् के प्रति सच्चा प्रेम है आत्मदान- माँग से मुक्त, नमन और समर्पण से युक्त। यह प्रेम कोई दावा नहीं करता, कोई शर्त नहीं रखता, कोई मोल-तोल नहीं करता। यह ईर्ष्या, अभिमान या क्रोध के अधिकार में नहीं होता है। इसमें कृत्रिमता नहीं होती। उसके बदले में भगवान् भी स्वयं को न्यौछावर कर देता है। उनका प्रेम प्रेमी को परिव्याप्त कर लेता है और भगवान् की ओर उन्मुख करता है। यही प्रेम है जिसे अपने समाज भागों में अनुभव करने और प्राप्त करने की सतत् अभीप्सा करनी चाहिए। यह प्रेम अनन्त व सीमाहीन है। समय और परिपूर्णता में भी इसकी कुछ सीमा नहीं है। अतः भागवत प्रेम गम्भीर, विशाल और प्रशान्त होता है।

भगवान् का प्रेम वह है जो ऊपर से आता है और भागवत् एकत्व तथा उसके आनन्द से मानव-सत्ता के ऊपर बरसता है। चैत्य प्रेम भागवत प्रेम का एक रूप है। जिसे वह मानव चेतना की आवश्यकता और संभावनाओं के अनुसार मनुष्य सत्ता के अन्दर ग्रहण करता है। वह सत्ता को एक आन्तरिक सघन समीपता का अनुभव प्रदान करता है। भागवत प्रेम एकत्व पर आधारित होता है और चैत्य प्रेम भागवत प्रेम से निःसृत होता है। चैत्य पुरुष भगवान् के साथ तादात्म्य हो जाय तो वह पृथक् नहीं हो सकता। पृथक्करण का अर्थ है एकत्व का अभाव। चैत्य अनुभूति है अनेकता में एकता की। यह समुद्र में पानी की एक बूँद की तरह लय हो जाने की अनुभूति नहीं है। क्योंकि ऐसी स्थिति में किसी प्रेम का होना सम्भव नहीं होगा जब तक कि वह प्रेम स्वयं अपने लिये ही न हो।

भागवत प्रेम मानवीय भावों का कोई उदात्तीकरण नहीं है, वह एक भिन्न गुण है। क्रिया और सारतत्त्व से युक्त एक निम्न प्रकार की चेतना है। भागवत प्रेम संभवतः भौतिक स्तर पर मानव जाति जैसा है। क्योंकि वह अभी उतनी पूर्णता और स्वच्छन्दता के साथ अभिव्यक्त नहीं हो सकता, जितना की वह अन्य स्थिति में अभिव्यक्त होगा। परन्तु इस कारण भागवत् प्रेम मानवीय प्रेम से कम घनिष्ठ या तीव्र नहीं हो जाता। भागवत प्रेम भागवत सत्य और शक्ति की उपस्थिति में अवतरित होता है और वह इसी संकल्प के अनुसार व्यक्तियों पर क्रिया करता है। परिणामतः वह उस व्यक्तिगत प्रेम की अपेक्षा कहीं अधिक विशाल, विशुद्ध एवं महान् वैयक्तिक प्रेम को उत्पन्न करता है, जिसकी कल्पना कोई मानवीय मन या हृदय कर सकता है। जिसे इस अवतरण का अनुभव हो, वही भागवत प्रेम के जन्म और कर्म का यंत्र बन सकता है।

उच्चतम अथवा गहनतम प्रेम में चैत्य तत्त्व होता है। जो हृदय की गहराई से एवं अन्तरात्मा से उत्पन्न होता है। यह एक प्रकार का आन्तरिक मिलन अथवा आत्मार्पण होता है। यह इसकी खोज में निरत रहता है। यह एक सम्बन्ध या उत्प्रेरणा होता है जो अन्य अवस्थाओं या तत्त्वों से स्वतंत्र होता है। यह स्वयं सत् होता है और किसी मानसिक, प्राणिक, शारीरिक सुख संतुष्टि, स्वार्थ, अभ्यास के लिए नहीं होता। परन्तु मानवीय प्रेम में विद्यमान यह चैत्य तत्त्व दूसरे तत्त्वों के साथ इतना मिश्रित दबा एवं छुपा हुआ होता है कि इसे अपनी स्वाभाविक पवित्रता व पूर्णता प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलता। शुरुआत में जब प्रेम भगवान् की ओर मुड़ता है तब भी उसमें यह सामान्य मानवी तत्त्व विद्यमान रहता है। व्यक्ति बदले में कुछ चाहता है और यदि वह वस्तु मिलती प्रतीत नहीं होती तो प्रेम क्षीण होने लगता है। इसमें स्वार्थ भी होता है एवं मानव की अभिलाषाओं को पूरा करने वाले भगवान् की चाह भी होती है। यदि ये माँगे पूरी नहीं होती हैं तो भगवान् के प्रति मान एवं अभिमान पैदा होता है। फिर विश्वास खो जाता है और उत्कण्ठा नष्ट हो जाती है। परन्तु भगवान् के प्रति सच्चा प्रेम अपने स्वभाव में ऐसा नहीं होता बल्कि चैत्य एवं आध्यात्मिक होता है। चैत्य तत्त्व व्यक्ति की अन्तरतम सत्ता के आत्मार्पण, प्रेम, भक्ति, अन्तर्मिलन के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह भगवान् द्वारा ही पूर्णतः सन्तुष्ट हो सकती है।

चैत्य प्रेम विशुद्ध तथा अहंपूर्ण माँगों से, शून्य आत्मदान के भाव से पूर्ण होता है। परन्तु यह मानवीय है और भूल कर सकता है एवं कष्ट भोग सकता है। भागवत प्रेम उससे कहीं अधिक विशाल और गम्भीर वस्तु है तथा ज्योति और आनन्द से ओतप्रोत रहता है।

अन्तरात्मा का प्रेम सत्य, सरल और पूर्ण वस्तु है। शेष चीजें केवल तभी अच्छी होती हैं, जब वे अन्तरात्मा के प्रेम को प्रकट करने का माध्यम होती हैं। अन्तरात्मा का प्रेम अन्दर से चैत्य पुरुष से आता है। जो ऊपर से आता है वह उच्चतर चेतना का आनन्द होता है। एक मात्र वस्तु जो स्थायी है वह है अन्तरात्मा व आत्मा। अतएव प्रेम केवल तभी स्थायी हो सकता है एवं संतोष दे सकता है जब वह इन पर आधारित हो, यदि उसका मूल वहाँ हो। विश्व प्रेम आध्यात्मिक होता है। वह सर्वत्र विद्यमान भगवान् के बोध पर स्थापित होता है। वह चेतना की आसक्ति तथा अज्ञान से मुक्त होकर एक विशाल विश्वगत चेतना में परिवर्तित हो जाता है। वैश्व प्रेम सर्वदा वैश्व होता है। चैत्य प्रेम व्यक्ति भावापन्न हो सकता है।

विश्व प्रेम सबके साथ एकात्म होने की अनुभूति पर निर्भर करता है। इस अनुभूति के बिना भी सबके लिए चैत्य प्रेम या सहानुभूति हो सकती है। वैश्व प्रेम का आधार है मनुष्य को शान्ति, पवित्रता, अहं से मुक्ति, विशालता और वैश्व चेतना की ज्योति। जब तक सभी प्रकार के दोषों, सीमाओं तथा सामान्य मानवीय प्रेम के कलुषता से मुक्त नहीं हो जाते हैं, तब तक इस प्रेम को पाना कठिन है। जितना अधिक मनुष्य विश्व भावापन्न होता जाता है उतना ही वह इन चीजों से मुक्ति पाता जाता है।

भावावेगों एवं उमंगों की तृप्ति के लिए अहंकार युक्त माँग ही माया है। यह सच्चा प्रेम नहीं है। सच्चा प्रेम मिलन और आत्मदान की तीव्र अपेक्षा रखता है। यही प्रेम भगवान् के प्रति निवेदित हो सकता है। इच्छाओं व वासनाओं से भरा प्रेम केवल दुख और निराशा का कारण ही बनता है। यह सुख का वाहक नहीं हो सकता और कभी संतुष्ट नहीं होता। ऐसा प्रेम स्थायी नहीं होता। इसमें चिर असन्तोष व्याप्त रहता है। यह तो एक वासना है जिसे प्रकृति ने एक क्षणिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए मनुष्य में संजोया है। इस प्रेम का आकर्षण अत्यन्त प्रबल होता है।

प्रेम में तो हर्ष, मिलन, विश्वास, आत्मदान और आनन्द का प्रस्फुटन होना चाहिए। परन्तु निम्नस्तरीय प्राणमय प्रेम केवल कष्ट, विपत्ति, निराशा, एवं वियोग का ही कारण होता है। इस प्रेम का एक अंश भी शान्ति के आधारों को हिला देता है। और आनन्द की ओर ले जाने के बदले मनुष्य को शोक, असन्तोष और निरानन्द में गिरा देता है। प्राण में भी दो प्रकार के प्रेम होते हैं। एक तो आनन्द और विश्वास और त्याग से पूर्ण, उदार, स्वार्थहीन तथा आत्मार्पण में अत्यन्त पूर्ण होता है। यह चैत्य प्रेम से बहुत मिलता-जुलता है। यह उसका पूरक बनने तथा दिव्य प्रेम को अभिव्यक्त करने का साधन बनने के लिए उपयुक्त होता है। चैत्य प्रेम अथवा दिव्य प्रेम कोई भी अपनी अभिव्यक्ति में भौतिक साधनों की अपेक्षा नहीं करते। परन्तु इन साधनों को पवित्र एवं शुद्ध होना चाहिए। भौतिक साधनों का उपयोग दिव्य प्रेम की प्राप्ति एवं आराधना के लिए किया जा सकता है और किया जाता भी है। ये भगवान् प्राप्ति के माध्यम हैं। ये साधन केवल तभी अनुपयुक्त सिद्ध होते हैं, जब इनका दुरुपयोग किया जाता है।

प्राणमय प्रेम का एक दूसरा भी प्रकार है। यह मानव प्रकृति का अधिक सामान्य तरीका है। यह अस्मिता और कामना का रूप है। यह लालसाओं, इच्छाओं और माँगों से पूर्ण होता है। इसकी प्रगति इसकी माँगों की पूर्ति पर निर्भर करती है। यह प्रेम सभी प्रकार की कल्पनाओं, मिथ्या धारणाओं, ईर्ष्या, द्वेषों और भ्रम से भरा होता है। यह तत्काल दुखी, मर्माहत एवं क्रुद्ध हो उठता है तथा अन्त में अवरुद्ध होकर समाप्त हो जाता है। यह दिव्य प्रेम का आधार नहीं बनाया जा सकता। जब प्राण प्रेम की शक्ति की क्रिया को अपने नियंत्रण में ले लेता है जिसके यथार्थ या दिव्य स्वरूप के विषय में वह अचेतन होता है। इसमें कई और चीजों के मिल जाने से विकृत हो जाता है।

अपनी गहराई में प्रेम स्वयं अपने अंदर विद्यमान भागवत संभावना या सद्वस्तु के साथ संपर्क है। इस गुण को स्थापित करने एवं बनाये रखने की अक्षमता ही मानव प्रेम को स्थायी एवं अपूर्व बना देती है। मनुष्य जब भगवत् प्रेम में होता है तो आनन्द व विकास की समस्त संभावनाओं बनती हैं। परन्तु जैसे ही व्यक्ति इससे दूर हटता है, तो उसका पतन प्रारम्भ हो जाता है अन्ततः एक क्षीण, एक कम उल्लासपूर्ण क्रिया में डूब जाने का दण्ड मिलता है।

प्रेम अपने आप में पर्याप्त है। इसे अंधे की लाठी की आवश्यकता नहीं होती। इस संदर्भ में वह श्रद्धा तथा अन्य दिव्य शक्ति जैसा है। कोई व्यक्ति अपने स्वभाव में दिव्य बन जाने पर ही दिव्य भाव के साथ प्रेम कर सकता है। इसके अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है। यदि प्रेम अखण्ड और पूर्ण हो तथा उसके साथ इच्छा व आकाँक्षा न जुड़ी हुई हो तो भी वह दिव्य प्रेम की ओर उन्मुख हो सकता है।

वस्तुतः मानवीय प्रेम में प्राणिक और भौतिक तत्त्व मिश्रित होते हैं। इसे कुछ मानसिक समर्थन भी प्राप्त होता है। यह एक स्वार्थहीन, उच्च व शुद्ध रूप और अभिव्यक्ति को तभी प्राप्त हो सकता है, जब कि इसे चैत्य का सजल स्पर्श प्राप्त हो। अधिकाँशतः यह अज्ञान, आसक्ति, आवेग और कामना का एक मिश्रण होता है। फिर भी यदि मनुष्य भगवान् के पास पहुँचना चाहता है तो उसे कभी मानव प्रेमों और आसक्तियों का बोझ अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए। क्योंकि ये इस पथ के लिए कठिनाइयाँ, बेड़ियाँ तैयार कर देते हैं और विकासमान पग को रोकते हैं। उसे एकमात्र चरम विषय के ऊपर अपने हृदयावेगों को एकाग्र करने के बदले अन्य दिशा में मोड़ देते हैं।

भगवान् के लिए मनुष्य के प्रेम में प्राण भी सहयोग दे तो वह उस प्रेम में साहस, उत्साह, तीव्रता, पूर्णता, एकान्तिकता, आत्मत्याग का भाव, समस्त प्रकृति का सम्पूर्ण और आवेगपूर्ण आत्मदान ले आता है। सच पूछा जाय तो भगवान् के प्रति प्राणिक आवेग ही आध्यात्मिक वीरों, विजेताओं व हुतात्माओं को उत्पन्न करता है। अन्तरात्मा को भगवान् की ओर मोड़ने वाले प्रेम को अनिवार्य रूप से दिव्य होना चाहिए। चूँकि मानव प्रकृति से ही इसकी अभिव्यक्ति उठती है। अतः यह प्रारम्भ में मानवी प्रेम तथा भक्ति का रूप ग्रहण कर लेता है। जैसे-जैसे चेतना गहन बनती, महत्तर होती और परिवर्तित होती है, उसमें वह शाश्वत प्रेम विकसित होता और स्पष्ट रूप से मानवी प्रेम को दिव्य प्रेम बना देता है। इस दिव्य प्रेम को विकसित करना ही सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक साधना एवं भगवान् की उपासना है।


इच्छा शक्ति के विकास का राजमार्ग

जीवन की सफलता एवं विफलता के निर्णायक तत्त्वों में इच्छा शक्ति का स्थान सर्वोपरि है। इच्छा शक्ति के होने पर व्यक्ति जैसे शून्य में से ही सब कुछ प्रकट कर देता है। और इसके अभाव में व्यक्ति सब कुछ होते हुए भी दुर्भाग्य एवं असफलता का रोना रोता रहता है। वस्तुतः इच्छा शक्ति की न्यूनता जीवन की विफलताओं एवं संकटों का मूल कारण है। इसके रहते व्यक्ति छोटी-छोटी आदतों एवं वृत्तियों का दास बनकर रह जाता है और व्यक्तित्व तमाम तरह के छल-छिद्रों से भरता जाता है। छोटी-छोटी नैतिक व चारित्रिक दुर्बलताएँ जीवन की बड़ी-बड़ी त्रासदियों और दुर्भाग्यों को जन्म देती हैं। इच्छा शक्ति की दुर्बलता के कारण ही व्यक्ति छोटे-छोटे प्रलोभनों एवं दबावों के आगे घुटने टेक देता है और उतावलेपन में ऐसे-ऐसे दुष्कृत्य कर बैठता है कि बाद में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगता। जीवन की इस मूलभूत त्रासदी का स्वीकारोक्ति महाभारत में दुर्योधन के मुख से भगवान् श्रीकृष्ण के सामने कुछ इस तरह से होती है-

जानामि धर्मं न च में प्रवृत्तिः। जानाम्यधर्मं न च में निवृत्तिः॥

अर्थात् धर्म को, क्या सही है, इसको मैं जानता हूँ, किन्तु इसको करने की ओर मेरी प्रवृत्ति नहीं होती। इसी तरह अधर्म को, जो अनुचित व पापमय है, इसको भी मैं जानता हूँ, किन्तु इसको करने से मैं नहीं रोक सकता। दुर्योधन की इस स्वीकारोक्ति में मानवीय इच्छा-शक्ति की आत्याँतिक दुर्बलता एवं विफलता का मर्म निहित है।

जीवन की आत्याँतिक सफलता के लिए, एक मात्र रास्ता इच्छा शक्ति का विकास, रह जाता है। इसके विकास से पूर्व प्रथम यह जानना उचित होगा, कि इच्छा शक्ति है क्या? दर्शनकार की भाषा में यह माया अर्थात् प्रकृति से संयुक्त होने वाली आत्मा की प्रथम अभिव्यक्ति है। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में इच्छा, आत्मा और मन का संयोग है। व्यवहारिक जीवन में यह मन की वह रचनात्मक शक्ति है, जो निर्णित क्रिया को एक निश्चित ढंग से करने की क्षमता देती है और उतने ही निश्चित ढंग से अनिर्णित क्रिया को न करने में सक्षम होती है।

इच्छा शक्ति के विकास के संदर्भ में दूसरा तथ्य यह है कि इसको प्रत्येक व्यक्ति द्वारा बढ़ाया जा सकता है। इसी का आवाहन करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- ‘उठो, वीर बनो, शक्तिवान बनो! जानो कि तुम अपने भाग्य के निर्माता आप हो। सारी शक्ति एवं सफलता तुम्हारे अन्दर सन्निहित है, इस तथ्य को गहनता से हृदयंगम कर हम इच्छा शक्ति के विकास पथ पर आगे बढ़ सकते हैं।’

‘हाउ टू जेनेरेट विल-पावर इन द ह्यूमन सिस्टम’ के अंतर्गत स्वामी बुद्धानन्द लिखते हैं कि इसके लिए सर्वप्रथम हमें मस्तिष्क एवं हृदय, विचार एवं भाव के बीच के विभाजन को हटाना होगा। इसके लिए हमें अपने अस्तित्व के उच्चतम सत्य से प्रेम करना होगा, कि हम दिव्यता के अंशधर हैं, हम शाश्वत की सन्तान हैं। हमारे भीतर अनन्त संभावनाएँ विद्यमान हैं, जिन्हें हमें अभिव्यक्त करना है। यह वस्तुतः मन, वाणी एवं कर्म तथा विचार, भाव एवं क्रिया की एकता का प्रतिपादन है।

हो सकता है कि इस कार्य को सिद्ध करने में हमें लम्बा संघर्ष करना पड़े। इस संदर्भ में दो प्रधान व्यवधान कायरता एवं पाखण्ड के रूप में हमारे अंदर से ही आएँगे, जो इस कार्य को यथा सम्भव टालने का प्रयास करेंगे। श्री अरविन्द के शब्दों में अपनी अंतः प्रकृति में विद्यमान इस शाश्वत कुटिलता एवं धूर्तता से लोहा लिए बिना और कोई चारा नहीं। हमें वीर बनना होगा, और दोनों हाथों में साहस बटोर कर अपने सत्य का अनुसरण करना होगा। वास्तव में सत्य के प्रति हमारा प्रेम ही यहाँ निर्णायक तत्त्व है। जितना हम अपने अस्तित्व के दिव्य सत्य से प्रेम करेंगे, उतना ही हमारा इच्छा शक्ति के विकास का पथ प्रशस्त होता जाएगा।

इस रचनात्मक प्रक्रिया में दो प्रमुख व्यवधान हैं- 1. भूतकाल के पश्चाताप एवं 2. भविष्य की चिंताएँ। दोनों इच्छा शक्ति के विकास में बाधक है। भूत के प्रति अत्यधिक पछतावा और भविष्य की अतिचिंता, दोनों न केवल वर्तमान को नष्ट करते हैं व मन को दुर्बल बनाते हैं, बल्कि भविष्य को भी धूमिल कर देते हैं।

इनसे मुक्त होना अनिवार्य है। भूतकाल के पाप एवं दुष्कृत्यों के अपराध बोध से मुक्ति के लिए सच्चे हृदय से पश्चाताप करना होगा। यदि इन गतिविधियों में अभी भी संलग्न हैं तो उन्हें विराम देना होगा। और सच्चे हृदय से प्रभु के समक्ष पश्चाताप करना होगा व दुबारा न करने का दृढ़ संकल्प लेना होगा। इस कृत्य की सफलता के अनुरूप, हमारा इच्छा शक्ति के विकास का नया अध्याय शुरू होगा।

भविष्य की चिंता एक गम्भीर बीमारी है, और इसका उपचार वर्तमान को पूर्ण जागरुकता और होशोहवाश के साथ जीने में है। फ्रेंच दार्शनिक मेस्टर एहार्ट के शब्दों में- ‘इस क्षण के गर्भ में अनंत समाया हुआ है। यदि हम हर क्षण को सही ढंग से जीना सीख जाएँ, तो भविष्य के प्रति निश्चिंत हो सकते हैं, क्योंकि एक-एक क्षण को सही ढंग से जी कर हम अनंत भविष्य को अपने पक्ष में करते हैं।’

इस संदर्भ में जीवन मूल्यों का उचित ज्ञान व निर्धारण अनिवार्य है, जो दिशासूचक के रूप में जीवन को सही दिशा दे सकें। अन्यथा अनुचित दिशा में जाने वाला हर कदम जीवन के संकट को और बढ़ाता ही जाएगा। इस विषय में सद्गुरु की अमृतवाणी, महापुरुषों का सत्साहित्य व धर्मग्रन्थों का नित्य स्वाध्याय एवं चिंतन, मनन अतीव उपयोगी एवं सहयोगी हैं। इसी के प्रकाश में इच्छा शक्ति के जागरण एवं विकास की प्रक्रिया गति पकड़ती है, जिसमें तीन चीजें अभिन्न रूप से जुड़ी होती हैं- 1. सत् और असत्, उचित और अनुचित के बीच सतत विवेक, 2. जो सही है, उसको करने में संलग्नता और 3. जो अवाँछनीय व अनुचित है, उसके प्रतिकार में जागरुकता।

इस तरह जीवन मूल्यों का सम्यक् बोध एवं उनके अनुरूप जीवन की रीति-नीति के निर्धारण को इच्छा शक्ति के जागरण एवं विकास का प्राथमिक शुभारम्भ मान सकते हैं। किन्तु इसके विकास का मार्ग सीधा व सरल नहीं है। इसमें तमाम तरह के अवरोध आएँगे। वातावरण का दूषित प्रवाह, कुटुम्बी जनों व मित्रों के दुराग्रह एवं निरर्थक सुझाव, आदि जाने अनजाने में इसके उद्भव एवं विकास पर तुषारापात करने का प्रयत्न करेंगे। किन्तु अपनी सजगता व अध्यवसाय के बल पर इन्हें निरस्त किया जा सकता है। वस्तुतः इच्छा शक्ति का विकास सरल कार्य नहीं है। किसी ने ठीक ही कहा है कि सबसे कठिन कार्य बच्चे या बूढ़े की देखभाल नहीं, बल्कि अपनी देखभाल है, अपना निर्माण व विकास है।

इच्छा शक्ति के विकास में एकाग्रता की शक्ति बहुत सहायक है। वास्तव में दोनों अन्योन्याश्रित हैं। इसके लिए हम जो भी कार्य करें, उसे पूरे मन से करें। इससे इच्छा शक्ति के विकास में बहुत सफलता मिलेगी। साथ ही ऐसे कार्यों से बचें, जिनमें ऊर्जा का अनावश्यक क्षय होता है। वृथा बातें, उद्देश्यहीन कार्य, निरर्थक वाद-विवाद, परदोष दर्शन, पर निंदा, दिवास्वप्न आदि से दूर ही रहें। अपने व्यवहार व क्रिया-कलापों को दिशाबद्ध व संयत बनाएँ। मानसिक ऊर्जा का शारीरिक ऊर्जा विशेषकर काम ऊर्जा से सीधा सम्बन्ध है। काम ऊर्जा की अतिशय बर्बादी जहाँ शरीर ऊर्जा को बेतहाशा नष्ट करती है वहीं मन को भी उथला व इच्छा शक्ति को दुर्बल बनाती है। वास्तव में इच्छा शक्ति के विकास का मुख्य रहस्य ब्रह्मचर्य के उचित अभ्यास में निहित है।

सुव्यवस्थित दिनचर्या एवं इन्द्रिय संयम के साथ अपनी विचार प्रणाली पर समुचित ध्यान देना अनिवार्य है। इसके लिए सतत मन पर निगरानी रखनी होगी। इस प्रक्रिया पर अपना सारगर्भित संदेश सुनाते हुए भगवान् बुद्ध भिक्षुओं से कहते हैं- ‘भिक्षुकों! याद रखना गलत विचारों पर विजय का एक मात्र मार्ग समय-समय पर मन की गतिविधियों का पर्यवेक्षण करना, उन पर चिंतन-मनन करना और जो कुछ निम्न एवं हेय है उसको त्यागते हुए, श्रेष्ठ एवं उदात्त का वरण एवं विकास करना है। इस तरह जब भिक्षु अपने बुरे विचारों पर विजयी हो जाएगा, वह एक दिन अपने मन का स्वामी बनेगा और सदैव के लिए बुराई एवं दुःख से मुक्त हो जाएगा।’

इस तरह हेय विचारों पर विजय के अनुरूप हमारी इच्छा शक्ति की दृढ़ता भी बढ़ती जायगी। किन्तु अवाँछनीय विचारों को निरस्त कर, वाँछनीय विचारों की खेती इतना सरल कार्य नहीं। हम इस प्रयास में स्वयं को अपनी आँतरिक असहाय स्थिति एवं शर्मनाक दुर्बलताओं से आमना-सामना करते हुए पा सकते हैं। यदि हम अपनी वास्तविक दुर्बलता को अनुभव करते हैं, तो हमें विनम्रता से एक सरलतम कार्य करना चाहिए। हमें सर्वशक्तिमान प्रभु से इच्छा शक्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। अपनी असहाय एवं बेबस स्थिति में हम अपने परमपिता, अपने आदि स्रोत, अपने दिव्य अंशी से सहायता नहीं माँगे तो और किससे माँगे। सरल हृदय से किया गया यह विनम्र प्रयास अवाँछनीय विचार प्रवाह को निरस्त करने का एक अचूक उपाय है। अपने सच्चे प्रयास व प्रभु की कृपा के साथ हम इच्छा शक्ति के विकास पथ पर आगे बढ़ सकते हैं और प्रभु के प्रति समर्पण भाव के अनुरूप इसकी पूर्णता की ओर बढ़ सकते हैं। इसके पूर्ण विकास की अवस्था उस क्षण आएगी, जब हम आत्याँतिक सहजता एवं आनन्द के साथ हर स्थिति में कह सकें, कि प्रभु! तेरी इच्छा पूर्ण हो, मेरी नहीं।

अतः जितना हमारा जीवन आत्म जागरण, विकास एवं भगवद्भक्ति की पुण्य क्रिया में संलग्न होगा, उतना ही इच्छा शक्ति के विकास का पथ प्रशस्त होता जाएगा। और उतना ही हमारा जीवन सच्चे सुख, शान्ति व सफलता से परिपूर्ण होता जाएगा। इच्छा शक्ति के जागरण एवं विकास द्वारा जीवन के सर्वांगीण अभ्युदय का राजमार्ग हम सबके लिए खुला हुआ है। यह हमारी इच्छा पर निर्भर है कि हम इस पर कितना बढ़ पाते हैं।


कर्त्तव्यों के बंधन भी आवश्यक (kahani)

राजकुमार शालिवाहन गुरु आश्रम मैं अध्ययन कर रहे थे। आश्रम में अन्य प्राणियों के जीवनक्रम को देखने-समझने का भी अवसर मिला तथा मानवोचित मर्यादाओं के पालन की कड़ाई से भी गुजरना पड़ा। उन्हें लगा पशुओं पर मनुष्यों जैसे अनुशासन-नियंत्रण नहीं लगते, वे इस दृष्टि से अधिक स्वतंत्र हैं। मनुष्य को तो कदम-कदम पर प्रतिबंधों को ध्यान में रखना पड़ता है। एक दिन उन्होंने अपने विचार गुरुदेव के सामने रख दिए।

गुरुदेव ने स्नेहपूर्वक समाधान किया, ‘वत्स! पशु जीवन में चेतना कुएं या गड्ढे के पानी की तरह रहती है। उसे अपनी सीमा में रहना है, इसलिए उस पर बाँध या किनारे बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मनुष्य जीवन में चेतना प्रवाहित जल की तरह रहती है, उसे अपने गंतव्य तक पहुँचना होता है, इसलिए उसे मार्ग निर्धारण, बिखराव व भटकाव से रोक आदि की आवश्यकता पड़ती है। कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के बाँध बनाकर ही उसे मानवोचित लक्ष्य तक पहुँचाया जा सकता है।

पशु अपने तक सीमित हैं। मनुष्य को यह उत्तरदायित्व सौंपा गया है कि वह अनेकों का हित करते हुए विशाल आत्मीयता का बोध करते-कराते आगे बढ़े। इसलिए उसे प्रवाह की क्षमता भी मिली है और कर्त्तव्यों के बंधन भी आवश्यक हैं।


तनाव का उपचार आध्यात्मिक जीवन

तनाव आधुनिक युग का अभिशाप है और यह जीवन पद्धति का एक अभिन्न अंग बनता जा रहा है। इसकी प्रकृति जहर के समान है। यह दीमक की तरह अंदर से शरीर और मन को खोखला करता रहता है। तनाव के अनेकों कारण एवं प्रकार हो सकते हैं, किन्तु इसका मुख्य कारण है परमात्मा पर अविश्वास तथा मनःस्थिति और परिस्थिति के बीच सामंजस्य न होना। इसका शरीर और मन पर इतना दबाव पड़ता है कि हार्मोन और जैव रसायनों का संतुलन तार-तार हो जाता है। परिणाम स्वरूप शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक सुख-संतुलन का क्रमशः क्षय होने लगता है और जीवन तरह-तरह के मनोकायिक रोगों एवं मनोरोगों से ग्रसित होकर नारकीय यंत्रणा एवं संताप से भरने लगता है।

‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ अमेरिकाना’ के अनुसार सर्वप्रथम हैंस सेली ने तनाव (स्ह्लह्द्गह्यह्य) शब्द का प्रयोग किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इस शब्द का काफी प्रचलन हुआ। सेली के अनुसार तनाव मनःस्थिति और परिस्थिति के असंतुलन से उठा एक आवेग है। इसकी दाहक क्षमता अप्रत्यक्ष और अति खतरनाक होती है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान विषम परिस्थितियों के रहते इसके भयंकर परिणाम व्यापक स्तर पर देखे गए। और यह विषय वैज्ञानिक शोध अनुसंधान के दायरे में आ गया।

दो अमेरिकी मनःचिकित्सक थामस एच. होल्मस और रिचर्ड राडे ने तनाव के विषय पर व्यापक शोध अनुसन्धान किया। इन्होंने पाया कि व्यक्तिगत जीवन की अव्यवस्था तथा विसंगतियों के कारण 53' गम्भीर तनाव उत्पन्न होते हैं। इन्होंने विविध तनावों के मापन की ‘स्केल’ भी निर्धारित की, जिसके अनुसार तलाक से 63', मित्र या संबंधित परिजन की मौत से 36', बेरोजगारी से 56' तनाव होता है। उनके अनुसार तनाव की गम्भीरता में व्यक्ति मानसिक संतुलन खो बैठता है और यदि मनोबल दुर्बल है तो आत्महत्या जैसे जघन्य दुष्कृत्य तक कर बैठता है। नवीनतम रिपोर्ट से पता चला है कि उच्छृंखल वासना भी तनाव को जन्म देती है। और यह समस्या पश्चिम के विकसित देशों में अधिक गम्भीर है। पश्चिमी देशों में 55 से 80' लोग तनावजन्य रोगों से पीड़ित हैं और यह विषम स्थिति महामारी का रूप लेने जा रही है। इसे आधुनिक विज्ञान के वरदान के साथ उपजा अभिशाप कहें, तो गलत न होगा।

आज पश्चिमी देशों की उपभोक्ता संस्कृति की आँधी से विश्व का कोई भी कोना अछूता नहीं है। हमारा देश भी इससे बचा नहीं है। इसके प्रभाव ने व्यक्ति को अति महत्त्वाकाँक्षी बना दिया है। और अपनी बढ़ी-चढ़ी आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए उसे कई प्रकार की प्रतिस्पर्धाओं से गुजरना पड़ता है। उसमें तनिक भी असफलता नकारात्मक सोच एवं तनाव को जन्म देती है। इसी तरह अप्राकृतिक आहार-विहार एवं अति औपचारिक आचार-व्यवहार भी तनाव को जन्म देते हैं। साथ ही ईर्ष्या, द्वेष, सन्देह, संशय, दंभ जैसे मनोविकार तनाव के अन्य महत्त्वपूर्ण कारण हैं। इस तरह आज तथाकथित विकास की भागती जिन्दगी में तनाव जीवन का अनिवार्य घटक बन गया है। और जीवन, प्रगति की अंधी दौड़ में सुलझने की बजाय और भी उलझता जा रहा है।

यह तनाव रूपी अभिशाप किस तरह मन एवं मस्तिष्क की सूक्ष्म संरचना को प्रभावित कर गम्भीर एवं असाध्य रोगों का कारण बनता है, इसका अपना विज्ञान है, जिस पर शोधकर्त्ता गम्भीर अनुसंधान कर रहे हैं। हेन सेली के अनुसार, तनाव की प्रक्रिया को तीन अवस्थाओं में समझा जा सकता है। प्रथम अवस्था में, एड्रीनल कार्टेक्स, में तनाव की सूचना का सम्प्रेषण होता है। दूसरी अवस्था में लिम्फेटिक तन्त्र की सक्रियता द्वारा शरीर में उत्पन्न इस अप्रिय स्थिति के प्रति जेहाद छेड़ा जाता है। इसमें प्रतिरक्षा प्रणाल के अंतर्गत आने वाले थाइमस व स्पलीन प्रमुख कार्य करते हैं। तीसरी अवस्था में तनाव की अधिकता पूरे मनोकायिक तंत्र को अपने नियंत्रण में ले लेती है। इस कारण शरीर व मन में थकान तथा गहन उदासी के लक्षण स्पष्ट परिलक्षित होते हैं।

कर्टसीन ने सेरिब्रल कार्टेक्स में तीन तरह के मस्तिष्क खण्डों का वर्णन किया है- मेंटल ब्रेन, सोमेटिक ब्रेन तथा विसरल ब्रेन। सोमेटिक ब्रेन माँसपेशियों को तथा विसरल ब्रेन ‘ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम’ को नियंत्रित करता है। मेंटल ब्रेन फ्रंटल लोव से परिचालित होकर समस्त विचार व चेतना तंत्र को नियमित व संचालित करता है। सामान्यतया इन तीनों मस्तिष्क खण्डों का आपस में अच्छा अंतर्संबंध रहता है। तनाव इनके बीच असंतुलन पैदा कर देता है। और यहीं से मनोकायिक रोगों (क्कह्यब्ष्द्धशह्यशद्वड्डह्लद्बष् ष्ठद्बह्यशह्स्रद्गह्) की शुरुआत हो जाती है।

इस संदर्भ में तनाव को चार अवस्थाओं में विश्लेषित किया गया है- साइकिक फेज, साइकोसोमेटिक फेज, सोमेटिक फेज तथा आर्गेनिक फेज। साइकिक फेज में व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान रहता है। तथा इस दौरान केन्द्रिय तंत्रिका तंत्र अति क्रियाशील हो उठता है। रक्त में एसिटील कोलाइन की मात्रा बढ़ जाती है। यह रसायन हर स्तनधारी के मस्तिष्क में पाया जाता है। इसकी अधिकतम मात्रा मस्तिष्क के काडेट नाभिक में तथा न्यूनतम सेरीविलम में होती है। मस्तिष्कीय क्रियाकलापों के आधार पर इसमें उतार-चढ़ाव आता रहता है। तनाव सर्वप्रथम मस्तिष्क पर दबाव डालता है और एसिटीलकोलाइन का स्राव बढ़ जाता है। इससे उद्विग्नता, अति उत्साह, चिंता व अनिद्रा जैसे विकार पैदा हो जाते हैं। यह अवस्था कुछ दिनों से कुछ महीनों तक चलती है। यदि यह स्थिति और लम्बी हुई तो यह साइकोसोमेटिक अवस्था में परिवर्तित हो जाती है। इस अवधि में हाइपरटेंशन, कंपकंपी तथा हृदय की धड़कन बढ़ जाती है।

सोमेटिक फेज में कैटाकोलामाइन्स अधिक स्रावित होता है। कैटाकोलामाइन्स में तीन हार्मोन आते हैं- नार एड्रेनेलीन, एड्रेनेलीन तथा डोपामीन। तनाव से इन हार्मोन के स्तर में वृद्धि हो जाती है। नशे का प्रयोग भी इनकी मात्रा को बढ़ा देता है। तनाव का प्रभाव मनुष्य ही नहीं पशुओं में भी देखा गया है। तनाव से प्रभावित पशुओं के मूत्र परीक्षण में एड्रेनेलीन की मात्रा 2 से 3 नानीग्राम प्रति मिनट तथा नार एड्रेनेलीन 6 से 10 नानीग्राम प्रति मिनट पायी गयी। सर्दी, गर्मी, दर्द आदि से उत्पन्न तनाव में नार एड्रेनेलीन का स्राव बढ़ जाता है। इससे पेशाब के समय जलन होती है। आर्गेनिक फेज, तनाव की अगली अवस्था है। इसमें तनाव शरीर की प्रतिरोधी क्षमता पर बहुत बुरा असर डालता है। तनाव इस अवस्था में आकर मधुमेह, अस्थमा तथा कोरोनरी रोग का रूप धारण कर लेता है। इस दौरान डोपामीन के बढ़ने से व्यवहार में भी गड़बड़ी पायी गयी है।

इसके अलावा भी अनेक ऐसे हारमोन हैं जो तनाव से सीधा सम्बन्ध रखते हैं। सिरोटीनिन मस्तिष्क की तीन क्रियाओं को संचालित करता है- निद्रा, अनुभव तथा तापमान। तनाव से इसका स्तर बढ़ जाता है। फलस्वरूप अनिद्रा, भूख कम लगना तथा शरीर के तापमान में वृद्धि हो जाने की समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। हिस्टामीन शारीरिक विकास तथा प्रजनन में मुख्य भूमिका निभाता है। तनाव की अधिकता इसमें भी व्यतिक्रम डालती है। तनाव मुख्य रूप से श्रवणेन्द्रियों तथा आँखों के माध्यम से मस्तिष्क के सेरिब्रल कार्टेक्स तक पहुँचता है तथा वहाँ से समस्त शरीर में प्रसारित होता है। पेप्टिक अल्सर, गठिया, दिल का दौरा, मधुमेह आदि बीमारियाँ इसी के दुष्परिणाम हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में पेप्टिक अल्सर तथा हाइपरटेंशन की अधिकता पाई गई थी। यह स्थिति बाढ़, भूकम्प तथा अन्य प्राकृतिक प्रकोपों से प्रभावित प्रदेशों में भी देखी गयी है। इसके मूल में तनाव को ही जिम्मेदार माना गया है।

इस तरह की आपात परिस्थितियों में तनाव की अपरिहार्यता अपनी जगह है किन्तु जीवन की सामान्य स्थिति में भी तनाव को पूरी तरह बाहरी परिस्थितियों की उपज मानना, तनाव के उपचार के रहस्य से वंचित रह जाना है। क्योंकि तनाव परिस्थितियों से अधिक मनःस्थिति पर निर्भर करता है।

तनाव को बाहरी परिस्थितियों की उपज मानने के कारण ही, हम प्रायः उसके उपचार के लिए दवाइयों पर निर्भर रहने की भूल करते हैं। जबकि कोई भी दवा, तनाव से उत्पन्न बीमारी को ठीक करने में सफल नहीं हो सकती। तनाव से न्यूरान व हारमोन तंत्र (न्यूरोह्यमरल सिस्टम) बुरी तरह से प्रभावित होता है। तनाव के उपचार के लिए ली गई दवा, हारमोन की अतिरिक्त मात्रा को तो नियंत्रित कर लेती है,किन्तु ग्रंथि पूर्ववत ही बनी रहती है और दवा का प्रभाव ग्रन्थि तक नहीं पहुँच पाता। दवा का असर कम होते ही ग्रंथियाँ पुनः हारमोन का अत्यधिक स्राव करने लगती हैं तथा रोगी की स्थिति और भी चिन्ताजनक हो जाती है। अतः तनाव का उपचार मात्र चिकित्सीय औषधियों द्वारा सम्भव नहीं है। इसके लिए रोगी को स्वयं अपना चिकित्सक बनना होगा। तभी इसकी प्रभावी उपचार हो सकेगा। और इसके लिए आवश्यक है, प्राकृतिक आहार एवं नियमित दिनचर्या, सद्चिन्तन एवं उदात्त भावनाएँ। इसे अपनाकर व्यक्ति तनावजन्य विषाक्त परिस्थिति को क्रमशः तिरोहित करते हुए सुख-शान्ति से भरी-पूरी स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण कर सकता है।

इस संदर्भ में कुछ आधारभूत बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। हर व्यक्ति अपने विचारों व भावनाओं में जीता है। उसकी अपनी अच्छाइयाँ व बुराइयाँ होती हैं। इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिए कि कहीं हमारी बातों एवं व्यवहार से उसकी भावनाएँ तो आहत नहीं हो रही हैं। विचारों को तो चोट नहीं पहुँच रही है। अगर ऐसा हुआ तो वातावरण तनाव के कसैलेपन से भर उठेगा और व्यक्ति तनावग्रस्त हो जाएगा। अतः हमारा व्यवहार ऐसा हो जो किसी के मर्म बिन्दु को न छुए। बुराई को सार्वजनिक करने का तात्पर्य है-कीचड़ उछालना। बुराई को रोकने के लिए व्यक्ति को अकेले में प्रेमपूर्वक समझाना चाहिए। इसी में इसका समाधान है। कहीं भी व्यक्तिगत तौर पर प्रतिष्ठ का प्रश्न बनाकर उलझना बुद्धिमानी नहीं है। परिस्थितियाँ अपनी जगह है और व्यक्ति अपनी जगह। परिस्थितियों से तालमेल एवं सामंजस्य बिठाकर आगे बढ़ने में ही समझदारी है। परिस्थिति से तालमेल न बिठा पाना ही तनाव को जन्म देता है। अतः इनसे पलायन नहीं बल्कि विवेकपूर्ण समझौता ही एक मात्र निदान है।

इस संदर्भ में व्यक्ति का दृढ़ मनोबल एवं सकारात्मक मनोभूमि अपनी निर्णायक भूमिका निभाती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार दृढ़ मनोबल वाले व्यक्ति पर तनाव का प्रभाव अधिक नहीं होता है। ‘स्ट्रेस एण्ड इट्स मैनेजमेंट बाई योगा’ नामक सुविख्यात ग्रन्थ में के.एन. उडुप्पा तनाव मुक्ति के लिए विधेयात्मक विचारों को अपनाने पर बल देते हैं। ये इसके लिए अनेक प्रकार की यौगिक क्रियाओं का भी सुझाव देते हैं। उडुप्पा ईश्वर पर आस्था को तनाव मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ व असरदार उपचार मानते हैं। इनका कहना है कि ईश्वर विश्वासी की तनाव स्पर्श नहीं करता है।

और यह सत्य है कि ईश्वर पर आस्था और विश्वास की डोरी तनाव के तपते मरुस्थल से दूर शान्ति के प्रशाँत समुद्र की ओर ले चलती हैं। ईश्वर निष्ठ व्यक्ति विषम से विषम परिस्थिति में भी तनाव रूपी व्याधि को पास फटकने नहीं देता। कबीरदास विपन्न आर्थिक स्थिति में भी अपनी फकीरी शान में मगन रहते थे। मीराबाई अनेकों लाँछनों एवं अत्याचारों के बावजूद अपने कृष्ण में मस्त रहती थी। घोर पारिवारिक कलह के बीच भी तुकाराम की मस्ती में कोई कमी नहीं आती थी। क्रूस पर चढ़ने वाले ईसा, जहर का प्याला पीने वाले सुकरात को परमात्मा पर अगाध और प्रगाढ़ विश्वास था। उनको तनाव स्पर्श तक नहीं कर पाया था। वस्तुतः दाहक व दग्ध तनाव ईश्वर के प्रेम रूपी शीतल जल का स्पर्श पाते ही वाष्प बनकर उड़ जाता है। अतः व्यक्ति को नित्य आत्मबोध एवं तत्त्वबोध का चिन्तन तथा भगवद् भजन करना चाहिए। शिथिलीकरण एवं प्राणायाम जैसे सरल यौगिक क्रियाओं का भी अनुसरण किया जा सकता है। इन्हीं उपायों से मन को शान्त कर तनाव से मुक्त हो पाना सम्भव है। अतः ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से जीआ गया आस्था एवं श्रद्धापूर्ण जीवन और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार ही तनाव रूपी महाव्याधि के उपचार का एकमात्र प्रभावी उपाय है।


इस तरह मिटी मन की अशाँति

महर्षि पिप्पलाद की समाधिस्थ चेतना धीरे-धीरे बहिर्मुखी हुई। शनैःशनैः उन्होंने नेत्र उन्मीलित किए। चहुँ ओर प्रकृति शान्त थी। भगवान् भुवन भास्कर ने भी ऋषियों और देवों के देश भारत से विदा लेकर असुरों के देश पाताल लोक की ओर अपना रथ बढ़ा दिया था। अब तो आकाश पर उनके रथ के अश्वों के पाँवों और चक्रों से उड़ी लालिमा भर शेष रह गयी थी। महर्षि के आश्रम में आए जिज्ञासु अभी तक विदा नहीं हुए थे। और महर्षि का अनुमान था कि शीघ्र ही अन्य ऋषिकुमार भी उनके पास आते ही होंगे।

अभी उनके मन के विचार तन्तु परस्पर एक जुट हुए भी नहीं थे कि शौर्यायणी गार्ग्य ने उपस्थित होकर उनके चरणों में प्रणाम किया।

कहो वत्स कैसे हो? महर्षि ने उसकी कुशल क्षेम पूछने के पश्चात् उससे कहा- वत्स! अब तो तुम्हारा ब्रह्मवर्चस भी पूरा हो गया है। आश्रम के अन्य अन्तेवासियों की ही भाँति तुमने भी अपनी साधना पूरी कर ली है। मैंने पाया है कि तुम वेद-शास्त्रों का परिशीलन भली भाँति कर चुके हो। फिर भी यदि तुम्हें किसी विषय में कोई सन्देह रह गया हो, तो निःसंकोच मुझसे प्रश्न कर सकते हो।

शौर्यायणी मौन था। हालाँकि उसका मन ठीक से शान्त नहीं था। वह पिछली रात ठीक से सो भी नहीं पाया था। उसे इस बात के लिए अचरज था कि ठीक तरह से ब्रह्मचर्य पालन करने के बावजूद वह ढंग से सो नहीं सका। इस समय भी उसके मन में अनेकों तरह के रंग-बिरंगे विचार तन्तु परस्पर उलझ रहे थे। बार-बार उसके मन में यह विचार कौंध उठता कि प्रायः प्रयास करके भी मनुष्य रात्रि में सो क्यों नहीं पाता?

अलौकिक सिद्धियों एवं विभूतियों के स्वामी महर्षि पिप्पलाद अन्तर्यामी थे। गार्ग्य के मन की उधेड़-बुन उनसे छिपी न रह सकी। उन्होंने वात्सल्य पूर्ण स्वरों में पूछा- वत्स शौर्यायणी! ऐसा लगता है कि तुम रात्रि में ठीक ढंग से सो नहीं सके हो। यह तुम्हारी मानसिक अस्थिरता की पहचान है।

गुरुदेव इस तरह से सीधे सपाट ढंग से उसके मन का हाल बयान कर देंगे, गार्ग्य को यह स्वप्न में भी आशा न थी। वह शर्म और संकोच से गड़ गया। पर सच तो सच था। महर्षि की बातों को स्वीकार करके वह बोला- गुरुदेव! आप सचमुच ही अन्तर्यामी हैं। आप से भला क्या छिपा हुआ है भगवन्। आप ठीक कह रहे हैं, मैं विगत दो-तीन दिनों से मैं काफी अशान्त हूँ। मुझे यह भी पीड़ा होती रही है कि कुछ ही दिनों में यहाँ से लौटना होगा। और फिर गृहस्थाश्रम की उलझनों से सामना होगा। यही सब सोचकर संसार के बहुविधि जाल-जंजालों में मन फंसता उलझता-चला गया। और मैं अपने अनगिन प्रयासों के बावजूद ठीक से सो न सका।

न जाने कितने प्रकार की कल्पनाएँ मेरे मन में अपना रूप प्रकट करती रही हैं। समूची रात्रि में इन्हीं कल्पना चित्रों से घिरा रहा। मुझे शीघ्र ही यहाँ आना था। पर मैं समझ ही नहीं सका कि मुझे क्या करना चाहिए?

महर्षि ने उसे अबोध शिशु की भाँति धैर्य बंधाया और बोले वत्स! साधना, संयम, स्वाध्याय ओर सेवा यही जीवन के मूल मंत्र हैं। इन्द्रिय समेत मन को बुद्धि और आत्मा के नियंत्रण में रखकर ही गृहस्थ जीवन में सुख पाया जा सकता है। महर्षि के इस प्रबोध के बावजूद शौर्यायणी गार्ग्य अभी तक अशान्त थे। उसने ऋषिप्रवर के सम्मुख अपनी जिज्ञासा प्रकट की-

गुरुवर! मैं यह जानना चाहता हूँ कि कौन सी शक्तियाँ हैं, जो सो जाती हैं और कौन सोने के बाद जागती हैं। इस पुरुष में कौन सा वह देव है, जो इस पुरुष के भीतर बैठा हुआ स्वप्न देखता रहता है। किसको सुख होता है और किसमें जाकर ये सब एक हो जाते हैं।

पिप्पलाद गार्ग्य के ये प्रश्न सुनकर पलभर के लिए मौन हो गए। उन्हें इस बात के लिए सन्तोष हुआ कि उनका शिष्य सच्चे अर्थों में जिज्ञासु है। जिज्ञासा जागृति का लक्षण है। और जो जाग्रत् है उसका आत्म विकास सुनिश्चित है। अपने इन विचारों को उन्होंने अप्रकट रखते हुए गार्ग्य से कहा- हे वत्स! तुमने अस्त होते हुए सूर्य को देखा है, तो जैसे अस्ताचल को जाते हुए सूर्य की किरणें एकाकार होकर उसके तेजोमण्डल में समा जाती है और प्रातःकाल उदय होने के समय वे फिर पूर्ववत फैल जाती हैं।

गार्ग्य महर्षि की बात समाप्त होने के पहले ही बोल पड़ा- गुरुदेव ऐसा ही होता है, मैंने दोनों दृश्य देखे हैं। पिप्पलाद ने अपनी बात आगे बढ़ायी और बताया, इसी प्रकार सोने के समय प्राणी की इन्द्रिय रूपी किरणें मन रूपी सूर्य में समा जाती हैं। अर्थात् सारी इन्द्रियाँ मन में सिमट जाती हैं। इन्द्रियाँ जब मन में एकाकार हो जाती है, तब पुरुष न तो सुनता है, न देखता है, न स्पर्श करता है, न सूँघता है, न बोलता है, न कुछ पकड़ता है, न आनन्द लेता है। तब लोग समझते हैं कि पुरुष सो रहा है, किन्तु दरअसल पुरुष नहीं सोता बल्कि इन्द्रियाँ विश्राम करती हैं।

महर्षि इन वचनों को सुनकर जिज्ञासु गार्ग्य की जिज्ञासा और भी तीव्र हो उठी, उसने पूछा, ‘इन्द्रियाँ सो जाती हैं, तो सोते हुए इसमें जागता कौन है?’

महान् तत्त्वज्ञानी पिप्पलाद ने उसे समझाया, वत्स शौर्यायण! इन्द्रियों के सो जाने पर प्राण लगातार जगते रहते हैं। प्राणों की अग्नि कुछ इस तरह लगातार जागती रहती है, मानो वह मनुष्य की शरीर रूपी नगरी में पहरा दे रही हो।

देव! अग्नि क्या है?

गार्ग्य के इस प्रश्न पर महर्षि कहने लगे- वत्स! मैं तुम्हें इन अग्नियों के बारे में विस्तार से समझाता हूँ। तुमने देखा होगा कि प्रत्येक गृह में पंचाग्नि प्रज्वलित रहती है। गृह की अग्नि- ‘गार्हपत्य अग्नि है। तात्विक दृष्टि से अपान वायु गार्हपत्य अग्नि है। यज्ञ में से जिस अग्नि को लेकर भोजन आदि पकाया जाता है वह दक्षिणाग्नि है। तत्त्ववेत्ता योगी व्यान वायु को ही दक्षिणाग्नि मानते हैं। गार्हपत्य अग्नि से जो अग्नि हवन कुण्ड में डाली जाती है वह आह्वनीय अग्नि है।’

दरअसल यज्ञ में दी जाने वाली आहुतियों से धूम्र उठता है वह आहुतियों के सभी तत्त्वों को एक-एक करके सभी जगह समान कर देता है। यज्ञ की आहुतियों का कार्य समान का प्रतिनिधि है। दान कर्त्ता मनुष्य का मन पंचाग्नि यज्ञ में यजमान का कार्य करता है। यज्ञ में जिस फल की आशा की जाती है वह उदान है। उदान का कार्य है ऊपर ले जाना। पंचाग्नि यज्ञ द्वारा मनुष्य ऊँचे स्तर पर उठ जाता है। प्राणाग्नि जो उदान स्वरूप है वह मनुष्य को उन्नत बनाती है, ब्रह्मज्ञान के मार्ग पर ले जाती है।

ब्रह्मवेत्ता महर्षि पिप्पलाद की तपःपूत वाणी को सुनकर शौर्यायणी गार्ग्य के मन के आवरण समाप्त होते जा रहे थे- महर्षि ने उसे स्पष्ट कर दिया था कि ये पाँचों प्राण प्राणाग्नि की ही भाँति है। जैसे अग्नि नहीं बुझती वैसे ही प्राण भी जागते रहते हैं, दिन-रात पुरुष को ब्रह्मज्ञान की प्रेरणा देते रहते हैं।

गार्ग्य ने महर्षि के समक्ष पुनः विनम्र शब्दों में अपनी जिज्ञासा प्रकट की- ‘भगवन्। स्वप्न की क्या स्थिति होती है?’ महर्षि पिप्पलाद ने कुछ पल ठहरकर फिर से प्रबोध करना प्रारम्भ किया- ‘वत्स गार्ग्य! तुम जो स्वप्न देखने वाले पुरुष की बात कर रहे थे, उसके बारे में सुनो, वह पुरुष आत्मा ही है, वह स्वप्न में बाहर का कुछ भी नहीं देखता रहता है। जागरण काल में हमारी जो अनेकों कामनाएँ अतृप्त रह जाती हैं, मन उन्हें स्वप्न में पूर्ण करता है। यहाँ तक कि जो अनुभव में नहीं आया है, उसका भी मन पुरुष को स्वप्न में अनुभव करा देता है।’

गार्ग्य की जिज्ञासा अब शान्त हो चली थी। उसने आत्मा का आनन्द अनुभव करने वाले महर्षि से एक अन्तिम प्रश्न पूछा- भगवान्! मैं केवल यह और जानना चाहता हूँ कि यह मन ज्ञान के किस महातेज में विलीन होकर आत्मानन्द का अनुभव करता है।

गार्ग्य ने यह प्रश्न जिस समय महर्षि से पूछा उस समय सन्ध्या बीत चली थी, पक्षीगण अपने नीड़ों का आश्रय ले चुके थे। महर्षि ने उस अनोखे वातावरण की ओर संकेत करते हुए बताया- पुत्र गार्ग्य! तुम देख रहे हो कि ये पक्षी दिन भर भ्रमण करने के बाद अब अपने नीड़ों का आश्रय ले चुके हैं। ठीक इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान की अवस्था में मन के सभी विकार, सभी कामनाएँ और मन के साथ लगातार चलने वाला यह दृश्य संसार सब आत्मा में विलीन हो जाता है। यह अवस्था सुषुप्ति से भी परे है। सुषुप्ति अवस्था में पांचों महाभूत भी आत्मा में विलीन हो जाते हैं। इस अवस्था में कोई स्वप्न नहीं आता। एक गहन निद्रा में अन्तर्चेतना विलीन रहती है। परन्तु ब्रह्मज्ञान की अवस्था तुरीय अवस्था कहलाती है। इसमें सुषुप्ति की विश्रान्ति है तो जागरण की परम चैतन्यता भी। वत्स! यह अवस्था अनुभवगम्य है।

उन्होंने आत्मलीनता का विस्तार से वर्णन करते हुए स्पष्ट किया कि यह आत्मा विज्ञानमय है। यह सभी इन्द्रियों को साथ लेकर प्राण और पंचमहाभूतों के साथ प्रतिष्ठित हो जाता है। यह आत्मा द्रष्ट है, यह स्पर्श करने वाला है, यही रसग्राही है, यही मननशील है, यही जानने वाला है। और यही कर्त्ता और विधाता है। छाया रहित और शरीर से परे इस आत्मतत्त्व को जो जान लेता है, वह महाज्ञानी और सर्वज्ञ हो जाता है।

शौर्यायणी गार्ग्य के मुख मण्डल पर अब एक अनोखी प्रदीप्ति छा गयी। उनके आत्म सन्तोष की आभा उनके मुख पर झलकने लगी थी। इन्हीं क्षणों में ब्रह्मवेत्ता महर्षि पिप्पलाद ने उनसे कहा- वत्स शौर्यायणी! इस आत्मदर्शन के बाद तुम निश्चित ही स्थिर मन होकर गृहस्थाश्रम में आनन्द का अनुभव कर सकोगे।

शौर्यायणी गार्ग्य की अन्तर्चेतना इन पलों में आनन्द सागर में हिलोरे ले रही थी। ब्राह्मी स्थिति को पा लेने से उनकी अवचेतना की तन्द्रा भंग हो गयी थी। अब वह अपनी आत्मचेतना में ब्रह्मज्ञान के स्वर्णिम आलोक के अवतरण को स्पष्टतया अनुभव कर रहे थे। आनन्द और उल्लास से परिपूरित गार्ग्य ने बड़ी ही भक्ति से महर्षि को प्रणाम किया।

महर्षि ने उसे उठाकर अपने हृदय से लगाते हुए कहा- वत्स! तुम्हारा यह आनन्द चिरकाल तक बना रहे। महर्षि के यहाँ से जब वह अपने अन्य मित्र अन्तेवासियों के पास गया तो सभी ने उसका स्वागत किया। गार्ग्य ने उन सभी को भी महर्षि द्वारा दिए गए गहन आत्मचिन्तन से परिचित कराया। अब तो सब भी गार्ग्य की ही भाँति आत्म साधना के लिए संकल्पित हो उठे। सभी के मनों में एक साथ- ‘तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु’ के संकल्प स्वर गूँज उठे।


ईश्वर का सच्चा भक्त (kahani)

‘कुबेर हो या रंक, जब तक परिश्रम से कमाए धन का एक अंश लोकहित में समर्पित नहीं करता, वह अधर्म खाता है।’ इतने से अक्षर महर्षि अनमीषि के लिए शास्त्र हो गए। उन्होंने पत्नी सहित यह प्रतिज्ञा की कि वे दीन-दुःखी को भोजन कराकर भोजन ग्रहण करेंगे।

उन्हें संकल्प निबाहते हुए वर्षों बीत गए। तप परीक्षा के बिना खरा सिद्ध हो गया हो, ऐसा कभी हुआ नहीं। एक दिन ऐसा आया कि उनके द्वार पर कोई झाँका भी नहीं। दोनों बहुत दुःखी हुए। तभी उन्होंने देखा-वृक्ष के नीचे एक वृद्ध रोगी पीड़ा से काँप रहा है। शरीर में घाव हो जाने से वह कराह रहा है। अनमीषि ने आगे बढ़कर कहा, ‘भोजन तैयार है, ग्रहण कर कृतार्थ करें।’ वृद्ध ने कराहते हुए कहा, ‘आर्य श्रेष्ठ! मैं आपकी उदारता का अधिकारी नहीं, क्योंकि मैं जाति का चाँडाल हूँ। संभव हो, तो घर में कुछ रोटियाँ बची हों, उन्हें यहाँ फेंक जाएं। उन्हें उठाकर अपना पेट भर लूँगा।’ वृद्ध की यह दशा देखकर अनमीषि की करुणा उमड़ उठी, आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। वह बोले, ‘ऐसा न कहें तात! हम जाति के पुजारी नहीं, जीव मात्र में व्याप्त आत्मा के उपासक हैं। आपके अंदर जो चेतन है, वही तो परमात्मा है। उसे छोड़कर हम अन्न ग्रहण करने का पाप कैसे कर सकते हैं।’

वे उसे सादर अपनी कुटिया पर ले गए। स्नान कराकर नूतन वस्त्र पहनाए, उसे भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन ग्रहण किया।

जब रात्रि में अनमीषि सोए तो अग्निदेव प्रकट हुए और बोले, ‘तू ही ईश्वर का सच्चा भक्त है जो ब्राह्मण, चाँडाल, हाथी व कुत्ते में कोई भेद नहीं करता।’


एक अनोखा प्रयोग, विलक्षण रहे जिसके निष्कर्ष

ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के उद्देश्यों की गरिमा सर्वविदित है यहाँ के शोध प्रयासों से अपने परिजनों के साथ समूचे विश्व के विज्ञों और विशेषज्ञों की विचार चेतना आलोकित-आन्दोलित है। सभी को आशा है कि यहाँ के शोध निष्कर्ष जाति, धर्म और देश के सभी सीमा बन्धनों से परे समूची मानवता को जीवन की नयी दिशा सुझायेंगे। मनःसंताप में डूबी मनुष्य जाति को जीवन जीने की कला बतायेंगे। और ऐसा हो भी रहा है। अभी पिछले दिनों अप्रैल 2001 में हुए एक प्रयोग के निष्कर्षों ने सुविख्यात मनोविज्ञानियों एवं मनःचिकित्सकों को आश्चर्यचकित कर दिया है।

यह प्रयोग शोध संस्थान के निदेशक के निर्देशन में अप्रैल माह की पाँच से पच्चीस तारीख के मध्य 20 दिन की अवधि में सम्पन्न हुआ। इस प्रयोग का उद्देश्य यह जानना था कि मनोरोगों के उपचार में यज्ञ की प्रक्रिया कितना सक्षम हो सकती है। अभी तक यज्ञ के अनेकों प्रयोग परीक्षण हुए हैं, इनमें स्वास्थ्य संवर्धन से लेकर पर्यावरण शोधन तक के विविध निष्कर्ष वैज्ञानिक कसौटी पर बहुत कुछ जाँचे परखे गये हैं। किन्तु मनःचिकित्सा में यज्ञ के प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन अभी तक नहीं हुआ था। जबकि शास्त्रीय प्रतिपादनों से लेकर विज्ञ जनों के अनुभव इसकी उपयोगिता को सदैव ही पुष्ट करते रहे हैं। परम पूज्य गुरुदेव ने अपनी गहन साधना एवं प्रयोग परीक्षणों के आधार पर ही यज्ञ को भावी युग की सफलतम चिकित्सा पद्धति के रूप में घोषित किया था। और इस सर्वांगपूर्ण चिकित्सा को ‘यज्ञोपैथी’ का नाम दिया था। तथा ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान को इसके विविध रहस्यों को अनावृत करने का दायित्व सौंपा था। इसी कड़ी में पिछले दिनों शोध संस्थान के निदेशक के निर्देशन में हुआ यह प्रयोग स्वयं में अनूठा एवं अद्भुत था।

यह प्रयोग शान्तिकुञ्ज के एक मासीय युग शिल्पी सत्र में आये साधक-साधिकाओं पर किया गया। शोध की योजना के अनुसार, सर्वप्रथम विशेषज्ञ मनोविश्लेषकों द्वारा मनोविज्ञान के सर्वमान्य (स्ह्लड्डठ्ठस्रड्डह्स्र) परीक्षणों के आधार पर पूरे समूह का मनोविश्लेषण किया गया। और इनमें प्रयोग के तहत लिये गये मनोविकारों से पीड़ित 20 व्यक्तियों का समूह चयनित किया गया। इनमें दस को ‘कन्ट्रोल ग्रुप’ एवं अन्य दस को ‘एक्सपेरिमेन्टल ग्रुप’ के अंतर्गत विभक्त किया गया। दोनों समूह में आधे पुरुष थे और आधी महिलायें।

‘कन्ट्रोल ग्रुप’ वाले वर्ग को शान्तिकुञ्ज के दिव्य वातावरण में आश्रम की संयमित एवं अनुशासित दिनचर्या का अनुसरण भर करना था। दूसरे ‘एक्सपेरीमेन्टल ग्रुप’ वाले वर्ग को उपरोक्त दिनचर्या के साथ विशेष आहुतियों के साथ होने वाले यज्ञ में भी नियमित भागीदारी करनी थी। इन पर यज्ञ के दौरान औसतन आधे घण्टे की गहन उपचार प्रक्रिया 20 दिन तक सम्पन्न होनी थी।

यज्ञ आहुति में प्रयुक्त होने वाली विशेष हवन सामग्री का चयन शोध संस्थान के निर्देशक के मार्गदर्शन में किया गया था। इसमें अपने चिकित्सकीय प्रभावों के लिए प्रख्यात्, दिव्य सुगंध एवं औषधीय गुणों से भरपूर जड़ी-बूटियों एवं हवन सामग्री का चुनाव किया गया था। 2.05 किलो हवन सामग्री में इन महत्त्वपूर्ण घटकों का अनुपात इस तरह से था- 1. ब्राह्मी- 100 ग्राम, 2. शंखपुष्पी- 100 ग्राम, 3. शतावर- 100 ग्राम, 4. गोरखमुण्डी- 100 ग्राम, 5. मालकाँगनी- 100 ग्राम, 6. मौलश्री की छाल- 100 ग्राम, 7. गिलोय- 100 ग्राम, 8. नागरमोथा- 200 ग्राम, 9. घुड़बच- 50 ग्राम, 10. मीठी बच- 100 ग्राम, 11. तिल- 100 ग्राम, 12. जौ- 100 ग्राम, 13. चावल- 100 ग्राम, 14. सुगंध कोकिला- 100 ग्राम, 15. घी-100 ग्राम, 16. खंसारी गुड़- 500 ग्राम।

मनोवैज्ञानिक परीक्षण के अंतर्गत लिये गये मनोविकार इस तरह से थे- उद्विग्नता (Anxiety), तनाव (Stress), अवसाद (Depression), प्रतियापन (Regression) और अपराध बोध (Guilt)। इन विकारों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या इस तरह से है।

उद्विग्नता से प्रभावित व्यक्ति चिन्तित एवं तनावग्रस्त रहता है। और भावनात्मक रूप से उद्विग्न रहता है। वह आसानी से उत्तेजित होता है तथा छोटी-छोटी बातों पर खीजना, क्रुद्ध होना और तुनकमिजाजीपन उसके स्वभाव के अंग बन जाते हैं।

तनाव (Stress) से पीड़ित व्यक्ति बहुत सारा दबाव महसूस करता है, व हमेशा भाग दौड़ में रहता है तथा विश्राम के लिए फुर्सत के कुछ क्षण नहीं निकाल पाता। वह खलबली में रहता है तथा बहुत तनाव अनुभव करता है।

अवसाद में डूबा व्यक्ति उत्साहहीन, हतोत्साहित एवं निराशा की दशा में अप्रसन्न रहता है। निराशावादी रुख अपनाये हुए वह किसी से सहमत नहीं होता और काम की उपयोगी वस्तुओं को भी याद करने में कठिनाई अनुभव करता है।

प्रतियापन (Regression) से पीड़ित व्यक्ति दिग्भ्रमित एवं अव्यवस्थित रहता है तथा किसी कार्य में एकाग्र नहीं हो पाता। जीवन की चुनौतियों का सामना करने में वह स्वयं को अक्षम पाता है और आवेश में काम करता है।

अपराध भावना से ग्रस्त व्यक्ति पश्चाताप से भरा रहता है और अपने दुष्कृत्यों पर ही ध्यान केन्द्रित रखता है। वह सही ढंग से नींद नहीं ले पाता और अपने प्रति असंतुष्ट रहता है तथा अपने साथ निर्दयता की हद तक कठोर व्यवहार करता है।

शोध संस्थान के निर्देशक द्वारा निर्धारित योजना के अनुसार, उपरोक्त मनोविकारों से पीड़ित ‘कन्ट्रोल ग्रुप’ के दस पुरुष एवं महिलायें शान्तिकुञ्ज में अपनी सामान्य दिनचर्या का अनुसरण करते रहे। और ‘एक्सपेरिमेन्टल ग्रुप’ के दस पुरुष एवं महिलाएँ नियमित रूप से यज्ञ में भाग लेते रहे। प्रयोग के अंतर्गत यज्ञ प्रातः सात बजे ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की यज्ञशाला में प्रारम्भ हो जाता था। यज्ञ विधा में निष्णात् साधकगण कर्मकाण्ड की प्रक्रिया का संचालन करते थे। यज्ञ पूरी तरह वैज्ञानिक विधि से सम्पन्न होता रहा। हवन सामग्री की तरह यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली समिधाओं के चुनाव में भी विशेष ध्यान रखा गया था। यज्ञ में आम्रकाष्ठ की सूखी लकड़ियों का ही उपयोग किया गया। यज्ञ में सस्वर मंत्रोच्चारण, यज्ञ क्रियाओं पर भावपूर्ण टिप्पणियों के साथ सात्विकता का पूर्ण ध्यान रखा गया था। यज्ञ के अंतर्गत गायत्री महामंत्र का 108 आहुतियों के साथ प्रयोग निर्धारित था। इस तरह यज्ञ चिकित्सा का अभिनव प्रयोग नियमित रूप से चलता रहा। इसमें भाग ले रहे साधकगण कुछ ही दिनों में इसके अद्भुत प्रभावों को अनुभव कर रहे हैं। और अपनी मानसिक दशा में आधारभूत सुधार होता देख रहे थे।

प्रयोग की अवधि का समय पूरा होते ही बीस दिन बाद पुनः दोनों वर्गों के साधकों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया जाएगा। और इस दौरान हुए परिवर्तनों का अध्ययन एवं विश्लेषण किया गया। इसके अंतर्गत जो निष्कर्ष सामने आए, उससे आधुनिक मनोविज्ञान एवं मनःचिकित्सा में निष्णात विज्ञजन चमत्कृत हुए। उनके अनुसार यज्ञ मनोविकार के उपचार में इतना प्रभावशाली हो सकता है यह उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। इन विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक मनःचिकित्सा के इतिहास में कोई भी विधा इतनी प्रभावशाली व कारगर नहीं पायी गयी है। और सही कहें तो आधुनिक चिकित्सा में मनोविकारों के उपचार की कोई भी सर्वांगीण प्रणाली उपलब्ध नहीं है। इस दिशा में जो भी उपचार चल रहे हैं वे आधे-अधूरे ही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यज्ञ उपचार एक अभिनव युग चिकित्सा पद्धति का रूप ले तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

अब यहाँ इस प्रयोग के परिणामों की चर्चा करना उचित होगा। शान्तिकुञ्ज के वातावरण में सात्विक एवं अनुशासित जीवनचर्या का प्रभाव इस तरह से रहा। इसके अंतर्गत औसतन 66' लोगों को लाभ मिला। जिसमें 60' पुरुष एवं 80' महिलाएँ थीं। इनमें एन्गजाइटी से प्रभावित 70' भागीदारों को राहत मिली। जिसमें 60' पुरुष और 80' महिलाएँ थीं। तनाव में 50' व्यक्तियों को लाभ मिला, इनमें 20' पुरुष और 80' महिलायें थीं। अवसाद में 70' लोगों को राहत मिली, इनमें 80' पुरुष और 60' महिलाएँ थीं। प्रतियापन में 70' भागीदार लाभान्वित हुए, इनमें 80' पुरुष और 60' महिलायें थी। अपराध भावना में 70' लोग को राहत पहुँचा, इनमें 60' पुरुष एवं 80' महिलायें थी।

इस तरह शान्तिकुञ्ज आश्रम के संस्कारित वातावरण में मात्र जीवन पद्धति के परिवर्तन भर से मनोरोगों के उपचार में आशाजनक परिणाम देखे गये। जिसमें औसतन 66' भागीदार लाभान्वित हुए। इसके साथ ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में जिन्होंने विशेष आहुतियों के यज्ञ में भाग लिया, उनमें लाभान्वित होने वालों का प्रतिशत 86 रहा।

यहाँ पर एन्गजाइटी में 90' भागीदारों को लाभ मिला। जिनमें 80' पुरुष और 100' महिलाएँ थीं। इसी तरह तनाव में 70' लोगों को राहत मिली, इनमें 60' पुरुष एवं 80' महिलायें थी। अवसाद के स्तर में 90' लोगों में उतार देखा गया, जिनमें 80' पुरुष और 100' महिलायें थीं। इसमें प्रतियापन एवं अपराध भाव में लाभान्वित होने वालों की प्रतिशत संख्या 90 थी। इनमें पुरुषों की संख्या 80' एवं महिलाओं की संख्या 100' थी।

उपरोक्त परिणामों से यह तथ्य भी उभरकर आया कि यज्ञ से लाभान्वित होने वालों में महिलाओं की संख्या अधिक थी, इसमें महिलाओं भाव समृद्धता के कारक को निर्णायक तत्त्व समझा जा सकता है। महिलायें, सर्वविदित है कि अधिक भावनाशील होती हैं। अतः यज्ञ जैसे आध्यात्मिक उपचार में श्रद्धा-भावना के सघन पुट के रहने से अधिक लाभान्वित होना स्वाभाविक एवं सुनिश्चित ही है।

मनोवैज्ञानिक अध्ययन में अंतर्गत यह भी विश्लेषण किया गया कि लाभान्वित होने वालों को मिलने वाले लाभ का प्रतिशत स्तर क्या था। मात्र जीवनचर्या में परिवर्तन करने वाले ‘कन्ट्रोल ग्रुप’ की यह प्रतिशत दर इस तरह से रही। इन्हें एन्गजाइटी में 26' राहत मिली, जिसकी प्रतिशत दर पुरुष एवं महिला भागीदारों के लिए क्रमशः 27 एवं 25 थी। तनाव में 52 प्रतिशत तक का लाभ मिला, इसमें पुरुषों को 50' एवं महिलाओं को 54' तक का लाभ मिला। अवसाद में 50' तक की राहत देखी गयी। इसमें पुरुषों का प्रतिशत 48 एवं महिलाओं का 52 रहा। प्रतियापन में 55' तक का लाभ देखा गया। इसमें यह दर क्रमशः 50 एवं 60' थी। अपराध भाव में 62 प्रतिशत की कमी देखी गयी, जो पुरुषों के लिए 60 प्रतिशत एवं महिलाओं के लिए 64 प्रतिशत।

इस तरह मनोवैज्ञानिक परीक्षण के अनुसार आध्यात्मिक जीवनचर्या अपनाने वालों को मनोविकारों के शमन में 50' से अधिक लाभ मिला और यज्ञ करने वालों में लाभ की यह प्रतिशत दर 73 से भी ऊपर रही। इनका विस्तृत विवरण इस तरह से है।

एन्गजाइटी में औसतन लाभ प्रतिशत 81 रहा। जो पुरुषों एवं महिलाओं दोनों के लिए समान था। तनाव में 70' तक का लाभ देखा गया, जो पुरुषों एवं महिलाओं के लिए क्रमशः 74' एवं 80' था। अवसाद में यह लाभ 74' तक रहा, जो पुरुषों में 72' एवं महिलाओं 76' था। प्रतियापन में यह लाभ 89' प्रतिशत तक रहा, जो पुरुष एवं महिलाओं में क्रमशः 88 एवं 90' था। अपराध भाव में 65' तक उतार देखा गया, जो पुरुषों में 60' तथा महिलाओं में 70' था।

इस तरह उपरोक्त मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि आध्यात्मिक जीवन पद्धति के अंतर्गत सात्विक एवं अनुशासित जीवनचर्या का पालन मनोविकारों के उपचार का सहज एवं निरापद मार्ग है। इसके अंतर्गत 66' भागीदारों को लाभान्वित होते पाया गया। और इनमें विविध मनोविकारों के शमन में औसतन 50' से अधिक का लाभ मिला। दूसरी ओर विशेष आहुतियों से युक्त यज्ञ प्रक्रिया को अपनाने वालों में 86' को लाभ मिला और इनके लाभान्वित होने का प्रतिशत 73' से अधिक ही रहा।

उपरोक्त प्रयोग परीक्षण के द्वारा मानसोपचार के क्षेत्र में यज्ञोपैथी की वैज्ञानिकता पुष्ट एवं प्रमाणित हुई है। और ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के प्रयोग परीक्षणों का यह दायरा क्रमशः विस्तार लेने जा रहा है। इसी के अंतर्गत विभिन्न योग-साधनाओं के मानव चिन्तन एवं चेतना पर होने वाले प्रभावों का शोध अध्ययन चल रहा है। इनके निष्कर्ष शीघ्र ही शोध ग्रन्थों एवं रिसर्च बुलेटिनों में प्रकाशित होने जा रहे हैं। देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ देव संस्कृति नाम की शोध पत्रिका का प्रकाशन शीघ्र ही होने वाला है। इनके माध्यम से यह निष्कर्ष अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित एवं प्रसारित किए जाएँगे। इनसे न केवल इस दिशा में चल रहे वैज्ञानिक अनुसंधानों को एक नई दिशा मिलेगी। बल्कि मानसिक रूप से संतप्त मानव जाति को जीवन जीने की कला का एक नया ज्ञान मिलेगा।


Quotation

आशा, उत्साह और गति का समन्वय ही जीवन है।


प्रतिभा पलायन रुके, संस्कृति की सेवा विभूतियाँ करें

प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति ही किसी समाज या राष्ट्र की वास्तविक संपदा होती है। इन्हीं की दशा एवं दिशा पर देश का भविष्य निर्धारित होता है। अपने स्वर्णिम अतीत में देश इन्हीं की बहुलता के कारण स्वयं में समृद्ध एवं खुशहाल और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में विश्व का अग्रणी देश था। देश-विदेश के जिज्ञासु, विद्वान् एवं प्रतिभासंपन्न लोग इसी कारण यहाँ खींचे चले आते थे और अपनी ज्ञान-पिपासा शान्त करके व ज्ञान भण्डार को समृद्ध करके अपने-अपने क्षेत्र एवं देशों में जाकर इसे वितरित करते थे। किन्तु आज स्थिति दूसरी ही है।

प्रतिभाओं की आज भी पूर्व काल की तरह देश में कोई कमी नहीं है, किन्तु उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। और चिन्ता का विषय है,’ब्रेनड्रेन’। यह गंभीर समस्या ‘ब्रेनड्रेन’ कोई बीमारी नहीं है, किन्तु यह किसी बीमारी से कम भी नहीं है। ब्रेन ड्रेन अर्थात् प्रतिभा पलायन। यह ऐसा रोग है जो देश के विकास को खाए जा रहा है। उसके अंतर्गत रोजगार और बेहतर अवसरों के लिए देश के बुद्धिमान और अति कुशल व्यक्ति विदेशों में जाकर बस रहे हैं। संस्कृत में एक कहावत अति प्रसिद्ध है ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’ परन्तु आज के प्रतिभावान शायद इस सत्य से पूर्णतया अनभिज्ञ हैं। तभी तो प्रतिभाएँ दूसरे देशों में जा बसने में गौरवान्वित अनुभव कर रही हैं।

वास्तव में प्रतिभा पलायन कोई नई समस्या नहीं है और न ही किसी एक देश तक सीमित है। यह समस्या दशकों पुरानी है और विश्व के अधिकतर विकासशील देश इससे पीड़ित हैं। लेकिन इससे सबसे अधिक नुकसान भारत का हो रहा है, क्योंकि प्रतिभा संपन्न लोगों के क्षेत्र में भारत विश्व का अग्रणी देश है और सबसे अधिक प्रतिभाओं का पलायन यहीं से हुआ है और हो रहा है।

यहाँ से हर वर्ष औसतन 5000 से लेकर 8000 तक छात्र विदेशों में जाते रहे हैं। इनमें से 75 से 80' प्रतिभाओं का पलायन पश्चिम के अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, जर्मनी और इंग्लैंड की ओर होता है। शेष 20-25' छात्र विश्व के अन्य विकसित देशों में चले जाते हैं। ज्ञातव्य है कि देश में एक इंजीनियर को तैयार करने के लिए लगभग साढ़े छः लाख रुपये का खर्च करदाताओं से वसूल की गई धनराशि से ही करना पड़ता है। चिकित्सक, इंजीनियर आदि तैयार करने में हमारे देश की अपेक्षा अमेरिका में दो तिहाई लागत अधिक लगती है। इस तरह दूसरे शब्दों में भारत, अमेरिका को ज्ञानदान की बौद्धिक सब्सिडी दे रहा है, जिसकी लागत अमेरिका द्वारा भारत को दी जा रही ऋण राशि से दुगुनी है। इसका अर्थ यह भी हुआ कि हमारा देश श्रेष्ठतम संसाधन का निर्यात सबसे कम मूल्य में कर रहा है। चिन्तनीय स्थिति यह है कि देश के सर्वोच्च इंजीनियरिंग संस्थान आई.आई.टी से तैयार होने वाले इंजीनियरों में से 60' विदेशों की राह पकड़ लेते हैं। इसी प्रकार अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान चिकित्सा संस्थान से प्रशिक्षित चिकित्सकों में 50' उच्च शिक्षा एवं नौकरी के बहाने विदेशों में चले जाते हैं। एक बार विदेश पहुँचने के बाद ये प्रशिक्षित मानव संसाधन विदेशों की राष्ट्रीय आय की वृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। औद्योगिक रूप से विकसित राष्ट्रों में नागरिकता प्राप्त करने वाले श्रेष्ठतम भारतीय विशेषज्ञों की संख्या 6000 तक पहुँच चुकी है। पलायन करने वालों में सर्वाधिक 32' डॉक्टर 5' व्यावसायिक तथा शेष 35' अन्य विषयों के विशेषज्ञ होते हैं।

अमेरिका सहित अधिकाँश विकसित राष्ट्रों में नए-नए आविष्कारों एवं प्रौद्योगिकी को विकसित करने का अधिकाँश श्रेय उनके अपने विशेषज्ञों को नहीं, बल्कि गरीब देशों से आने वाली इन प्रतिभाओं को जाता है। अर्थात् विकसित राष्ट्रों का व्यावसायिक आधारभूत ढाँचा विदेशी प्रतिभाओं के बूते पर टिका हुआ है। जर्मनी से प्रकाशित होने वली एक पत्रिका के अनुसार माइक्रोसॉफ्ट कंपनी में 34' और अमेरिका के राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र नासा में 36' भारतीय काम संभाले हुए हैं। पत्रिका का दावा है कि ये भारतीय यदि स्वदेश लौट जाएं तो अमेरिका के अहम् को चूर होने में अधिक वक्त नहीं लगेगा। एक सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका में लगभग 31' लाख भारतीय है जिनमें हजारों अति महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं। कम्प्यूटर क्रान्ति का सेहरा भले ही अमेरिका के सिर पर बँधता हो, पर यह सच है कि जावा के जरिये इंटरनेट पर होने वाली कम्पनी सन माइक्रो सिस्टम के सहसंस्थापक विनोद खोसला एक भारतीय हैं व पेंटियम चिप के आविष्कारक विनोद दाहम हैं। अमेरिका में इस क्षेत्र की प्रख्यात ‘सिलिकन वेली’ में अधिकाँश भारतीय प्रतिभाएँ अपनी प्रखरता का सिक्का जमा रही हैं। इनकी बहुलता को देखकर पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन आश्चर्य पड़ गए थे और उन्होंने चिन्ता भी जाहिर की थी।

प्रतिभा पलायन की समस्या को उदारीकरण ने और हवा दी है। 60 से 90 के दशकों में ज्यादातर 20-25 वर्ष की आयु की युवा प्रतिभाएँ ही देश से पलायन करती थी। फ्रेशर होने के कारण इन्हें इस उम्र में दूसरे देश के वातावरण और कार्य शैली में ढलने में आसानी होती थी। दूसरा उस समय अधिकतर वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर आदि ही अधिकतर जाते थे।

लेकिन 90 के दशक में ग्लोबलाइजेशन के कारण विश्व भर की कंपनियों की कार्य शैली और उत्पादन प्रक्रियाएँ लगभग एक जैसी हो गयी। परिणामस्वरूप अब प्रबंधन के क्षेत्र की उम्रदराज प्रतिभाएँ भी देश से पलायन कर रही हैं। इस कारण आज देश में योग्य डॉक्टर, इंजीनियर एवं वैज्ञानिकों के साथ कुशल प्रबंधकों की भी कमी हो गयी है।

प्रतिभा पलायन की समस्या के पीछे कई कारण सक्रिय है। किन्तु यदि कोई खास कारण खोजना हो तो वह है-जॉब सेटिसफेक्शन न होना अर्थात् कार्य में संतुष्टि न होना। इसके भी कई कारण हैं जैसे-रुचि के अनुरूप काम न मिलना, काम के बदले उचित पारिश्रमिक न मिलना, बढ़िया काम करने के बावजूद सम्मान न मिलना, काम के लिए अच्छा माहौल न मिलना, काम करने के लिए पर्याप्त सुविधा-साधन न मिलना, अपने स्तर के अनुरूप काम न मिलना आदि। इसके शोध प्रतिष्ठानों में बढ़ती राजनीतिक एवं अनावश्यक प्रशासनिक हस्तक्षेप भी महत्त्वपूर्ण कारक हैं। इस संदर्भ में पाश्चात्य भोगवादी चकाचौंध एवं भोग की लालसा को भी नकारा नहीं जा सकता।

राष्ट्र के विकास को गति देने के लिए प्रतिभाओं के पलायन को रोकना अति आवश्यक है। इसके लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ एवं वातावरण बनाना होगा। यह सरकार की इच्छा शक्ति एवं महत्त्व पर बहुत कुछ निर्भर करता है। वह इस दिशा में जितनी शीघ्र ठोस कदम तो उचित होगा। दूसरा हर विचारशील एवं संस्कृत प्रेमी प्रतिभा का यह दायित्व बनता है कि वह पलायन कर रही प्रतिभाओं की जगह डॉ. चंद्रशेखर वेंकटरमन, डॉ. शांतिस्वरूप भटनागर, डॉ. होमी जहाँगीर भामा, जगदीशचंद्र वसु, मेघनाथ साहा, एच.एन.सेठ, विक्रम सेन, अब्दुल कलाम जैसी विभूतियों को भी देखें व उनका अनुसरण करे जिन्होंने इन्हीं साधन एवं सुविधाओं के बीच उल्लेखनीय उपलब्धियों से राष्ट्र के गौरव को बढ़ाया है। आदर्श यदि राष्ट्र एवं संस्कृति सेवा के रूप में जीवन के सार्थक नियोजन का हो तो भौतिक प्रलोभन एवं असुविधाओं को असमाधेय अवरोध नहीं माना जा सकता।


कभी उपेक्षा नहीं बरती (kahani)

शल्य विज्ञान के क्षेत्र में अनेकानेक अनुसंधान, आविष्कार करने वाले जान हंटर से किसी ने पूछा, ‘आपकी इतनी सफलताओं का कारण क्या है?’

उन्होंने कहा, ‘मैं पूरी गहराई से यह विचार करता हूँ कि कल्पना और क्षमता की दृष्टि से यह काम संभव और सही है क्या? जो आज की परिस्थितियों में शक्य है, उसी में हाथ डालने की आदत ने मुझे अनेकों सफलता दिलाई है। कल्पनाओं की व्यावहारिकता को कसौटी पर कसने में कभी उपेक्षा नहीं बरती।’


असामाजिक होने की परिणति

मानवी जीवन जितना सरल प्रतीत होता है, उतना वह है नहीं। उसमें कठिनाई, जटिलता, अवरोध और अड़चनें इतनी है कि पग-पग पर व्यक्ति को उनसे दो-चार होना पड़ता है। अनेक बार वह ऐसे क्षणों में गहरे अवसाद में डूब जाता और अपनी ओर से भरपूर प्रयास करने पर भी उससे उबर नहीं पाता है। ऐसे ही मौकों पर प्रेरणा, प्रोत्साहन, मार्गदर्शन, मंत्रणा जैसे महत्त्वपूर्ण तत्व उसे उस विषय स्थिति से उबारते और सामान्य मनोदशा में लाते हैं। इसलिए सामाजिकता के महत्व को हर एक ने स्वीकारा और उसे अपनाए जाने पर बल दिया है। जिनके लिए समाज का महत्व सिर्फ अपने मतलब से मतलब रखने भर तक सीमित है और जो इससे आगे संपर्क रखने की आवश्यकता महसूस नहीं करते, समाज से नहीं घुलते-मिलते उनका चिंतन इतना एकाँगी हो जाता है कि कई बार वे ऐसे निर्णय ले लेते हैं जो भयावह होते हैं।

ऐसा ही एक प्रसंग बिहार के बेरमो प्रखंड के अमलो नामक ग्राम का है। उक्त गाँव में एक ब्राह्मण परिवार रहता था। परिवार के मुखिया शिवनंदन पाँडेय थे। वे अपने छह सदस्यीय परिवार का निर्वाह पौरोहित्य कर्म द्वारा करते थे। उनके चार संतानें थीं- तीन पुत्र, एक पुत्री। पुत्र जब तक छोटे थे, उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। प्रायः निकलकर वे सायं ही घर लौट पाते। बच्चे कुछ बड़े हुए, तो स्कूल जाने लगे। गाँव में प्राथमिक पाठशाला थी। वहाँ शिक्षा पूरी हुई तो गाँव से 4 कि. मी. दूर मिडिल स्कूल में भरती हुए। वहाँ की पढ़ाई पूर्ण करने के बाद उनकी शिक्षा रोक दी गई। बच्चों के बड़े होने के साथ परिवार की आवश्यकताएं बढ़ने लगीं। लड़की की शादी के लिए भी कुछ धन संग्रह करना था, अतएव अब वे उन्हें कर्मकाँड सिखाने लगे, ताकि छोटे-मोटे पूजा-विधान वह भी संपन्न कराकर संपत्ति कमाने में पिता का सहयोग कर सकें।

चारों संतानों की उम्र अब क्रमशः 17, 15, 12 एवं 8 वर्ष की हो चुकी थी। लड़की सबमें बड़ी थी। उस परिवार में एक विचित्र बात यह थी की बच्चों के पाठशाला जाने, पिता के पुरोहिताई कराने और माँ-बेटी के गाँव के कुएं से पानी लाने- इतने तक ही उनका सामाजिक संपर्क सीमित था। शेष समय में उनकी छोटी सी दुनिया अपने घर तक ही परिमित रहती। न किसी के यहाँ आना-जाना, न गाँव में किसी से बात करना, यह उस परिवार का स्वभाव था, फलतः शेष बस्ती से उनका संपर्क लगभग नहीं के बराबर था।

आदमी जब समाज से कटकर अर्द्ध सामाजिक बनता है, तो उससे उसे दो प्रकार की हानि होती है प्रथम, आड़े समय में साथ देने वाला कोई नहीं होता और द्वितीय दुःखों को दूसरों का सुनाकर जी हलका करने तथा उसे बटाने वाला भी काई नहीं होता। उस परिवार के अलग-थलग रहने की प्रवृत्ति के कारण विवाह समारोहों एवं धार्मिक अनुष्ठानों जैसे सार्वजनिक जीवन के कार्यों में वे सदा अनुपस्थित रहते। जीवन की जटिलताओं को समझने, धैर्यपूर्वक उनका सामना करने और विवेकसम्मत समाधान निकालने जैसे प्रसंगों से वे सदा अनभिज्ञ रहे।

समाज कुम्हार के अवे के समान हैं। उसकी विसंगतियों में तपकर मनुष्य इतना अधिक सुदृढ़ हो जाता है कि प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी उसे नहीं डिगा पातीं। फिर विपरीतताओं के एवरेस्ट के मध्य भी वह ऐसा अलमबरदार बनकर प्रस्तुत होता है कि अटल चट्टानें भी राजमार्ग देने के लिए विवश हो जाती हैं।

इस गुण का उक्त परिवार में विकास नहीं हो सका था, अतएव छोटी-से-छोटी कठिनाइयाँ भी उन्हें विचलित कर जाती, पर पिता परिपक्व और अनुभवी थे। ऐसे मौकों पर वे सबको संबल देते, स्थिति संभलती तो परिवार की गाड़ी फिर से पुरानी पटरी पर लुढ़कने लगती।

अब सब बालक बड़े हो गए थे। लड़की की शादी हो चुकी थी। बड़े लड़के का विवाह अभी-अभी संपन्न हुआ था। मंझले की कोल इंडिया में नौकरी लग गई थी। कुल मिलाकर परिवार की आर्थिक स्थिति संतोषजनक थी। पिता अपने पूजा-पाठ के पैतृक धंधे में लगे हुए थे। अब बड़े और छोटे पुत्र भी उनके साथ जाने लगे। रविवार को मंझले की छुट्टी रहती। उस दिन वह भी साथ हो लेता। जब चारों पिता-पुत्र एक साथ घर से निकलते, उस समय का दृश्य बड़ा ही रोचक होता। सब अपनी-अपनी साइकिलों पर सवार होकर घंटी बजाते, राहगीरों से बचते-बचाते एक लाइन में चलते हुए एक चौराहे पर पहुँचते और वहाँ से चार दिशाओं में अपने-अपने क्षेत्र की ओर चल देते, फिर शाम तक लौटकर घर आते। यह उनका नियमित क्रम था।

इस क्रम में व्यवधान तब पैदा हुआ, जब एक दिन पिता बीमार पड़ गए। वास्तविक मुसीबत का आरंभ यहीं से हुआ। बढ़ती आयु, बूढ़ा, अशक्त अंग, दुर्बल अवयव आखिर कब तक इस भाग दौड़ को बर्दाश्त कर पाते, एक-न-एक दिन तो उन्हें क्षीण होना ही था, सो वह शय्याशायी हो गए। खूब इलाज कराया गया, अच्छी-से-अच्छी दवाएं दी गई, पर वे ठीक न हो सके। एक शाम अस्पताल में परलोक सिधार गए।

पत्नी इस घटना से व्याकुल हो उठी। उसका संकीर्ण दृष्टिकोण सक्रिय हो उठा। पुत्रों को वह समझाने लगी कि जब पिता ही न रहे, तो हम सब जीकर क्या करेंगे? अब यह जीवन व्यर्थ है, इसे त्याग देना चाहिए। पुत्रों की सीमित सोच वाले मस्तिष्क में यह चिंतन गहराई तक पैठ गया। माँ के विचारों पर सहमति व्यक्त करते हुए कोई योजना बनाने में निमग्न हो गए।

सोच जब निषेधात्मक बनती है, तो वह परिणामों की चिंता कहाँ करती है, विवेक रहे, तो भले-बुरे का ज्ञान हो पर वह तो पहले ही मर जाता है। फिर जीवन-मरण दोनों समान प्रतीत होने लगते हैं। न जीने में खुशी का एहसास होता है, न मरने के नाम पर दुःख। जिस सुरदुर्लभ मनुष्य तन के लिए करोड़ों जन्मों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है और जो सर्वोच्च विकास का उपयुक्त और अनुकूल शरीर है, उसे एक झटके में त्याग दिया जाता है, उसमें कुछ सुन्दर-श्रेष्ठ करके भगवान के दरबार में अपनी योग्यता साबित करें। पर ऐसा कहाँ हो पाता है? चिंतन जब गूलर के भुनगे की तरह बंद परिपथ में घूमने लगे, तो परिणाम भयंकर होता है। हुआ भी यही। एक दिन उसके घर से धुएं का गुबार उठता दिखलाई पड़ा। गाँव वालों ने पूछताछ की तो बताया कि बहुत सारे पुराने पन्ने इकट्ठे हो गए थे, उन्हीं को अग्नि की भेंट कर रहा हूँ, जबकि सचाई इससे भिन्न थी। उन लोगों ने सर्वप्रथम आँगन में एक बड़ा गड्ढा खोदकर घर के सारे बरतन उसमें डाल दिए। फिर उसे ढ़ककर उस पर दक्षिणा से प्राप्त नए-पुराने कपड़ों की होली जलानी शुरू की। जितने जला सके, जलाए। उसके बाद एक टैक्सी बुलवाई गई। घर के सारे सदस्य उसमें सवार हो गए। पूछने पर बताया गया कि पिकनिक पर जा रहे है। तदुपराँत वे मुँगेर के निकट एक झीलनुमा जलाशय पर पहुँचे। योजनानुसार वहाँ एक झाड़ी की आड़ में जाकर विष घोला गया। फिर सबने उसका एक-एक प्याला पिया। बहू और उसकी ढाई वर्षीय बेटी भी साथ में थी योजना से अनभिज्ञ बहू को कुछ शक हुआ। उसने उसे पीने से इनकार किया, तो माँ-बेटी के मुँह में बलपूर्वक उसे उड़ेल दिया गया। तत्पश्चात बहू को लेकर सबने उसमें छलाँग लगा दी। जहर ने असर दिखाया, बाकी सब बेहोश होकर डूब गए, किन्तु माँ-बेटी कम पीने के कारण बच गई। राहगीरों ने उन्हें निकाल लिया और पुलिस को सूचना दी। बाद में चारों लाशों को भी निकाल लिया गया। इस प्रकार गाँव से कटकर रहने, विचारों का आदान-प्रदान न होने और व्यापक चिंतन के अभाव में एक परिवार का दुःखद अंत हो गया।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे हर वक्त प्रेरणा, प्रोत्साहन, मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है। यदि वह सामाजिकता का परित्याग कर एक सीमित दायरे में सीमाबद्ध हो जाए, तो चिंतन को जो पोषण और प्रखरता जनसंपर्क से मिलनी चाहिए, वह बंद हो जाती है। ऐसी स्थिति में प्रतिगामी सोच आदमी को वह सब करने के लिए प्रेरित करती हैं, जो लोमहर्षक घटनाक्रम के रूप में ऊपर घटित हुआ।


जहाँ चाह वहाँ राह

जीवन में अमुक सफलता न मिलने पर कोई साधनों के अभाव की शिकायत करता है। तो कोई परिस्थितियों की प्रतिकूलता की मार की बात कहता है। कुछ अवसर के उपलब्ध न होने का रोना रोते हैं। स्वस्थ, सुयोग्य एवं प्रतिभाशाली होते हुए भी ऐसे व्यक्ति दीन-हीन एवं असफल जीवन जीने के लिए बाध्य होते हैं। जबकि मनुष्य के जीवन में सफलता साधनों, अवसरों एवं परिस्थितियों से अधिक उसकी मनःस्थिति पर निर्भर करती है। वस्तुतः मनुष्य बना ही कुछ ऐसी धातु का है, जिसके संकल्प एवं पुरुषार्थ की प्रचण्डता के सामने कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। स्वस्थ एवं सामान्य व्यक्ति की बात तो दूर, विकलाँग व्यक्ति तक अपने दृढ़ संकल्प, साहस एवं पुरुषार्थ के बूते अपनी मनमाफिक सृष्टि का सृजन कर सकते हैं। प्रस्तुत है ऐसे ही कुछ जीवट के धनी स्त्री-पुरुष, जिनके साथ नियति ने क्रूर मजाक किया, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी व जीवन की चुनौती को सहर्ष स्वीकार करते हुए नए सिरे से नए जीवन के निर्माण में जुट गए। ये अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियों के साथ में दूसरों के लिए भी प्रेरणा के स्रोत बनें हैं।

कंचन गावा, एक अंधी युवती है। आठ वर्ष की आयु में ‘ऑप्टिकल नर्व’ के निष्क्रिय होने के कारण वह देख नहीं सकती। लेकिन उसकी रगों में पर्वतारोहण जैसे रोमाँचकारी एवं साहसिक खेल का उत्साह दौड़ रहा था, आँखों में एक स्वप्न था और हृदय में इसे साकार करने का दृढ़ संकल्प। भारतीय स्काउट गाइड के सान्निध्य में साढ़े चार वर्ष की कठोर श्रम साधना ने उसे ट्रेकिंग, रॉक क्लाइंविंग, स्विफट क्रासिंग जैसी पर्वतारोहण की प्राथमिक क्रियाओं में निष्णात कर दिया। आज वह पर्वतारोहण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त किये है। वह 10,000 फुट ऊँची टोगलू चोटी चढ़ चुकी है, टाइगर हिल अभियान में भाग ले चुकी है, 14,500 फुट ऊँची जोंगरी चोटी की चढ़ाई कर चुकी है। इसकी उपलब्धियों को देखते हुए ब्रिटेन में गाइड के अन्तर्राष्ट्रीय केंप में उसे आमंत्रित किया गया, जिसमें 120 देशों के 600 गाइड प्रतिनिधि आए थे। गावा इनमें एकमात्र विकलाँग प्रतिनिधि थी। वह उन 40 व्यक्तियों में से एक थी जिन्होंने प्रशिक्षण की 41 चुनौतियों में सभी को पार किया। हिमालय माउंटेनीयरिंग इंस्टीट्यूट दार्जलिंग से प्रशिक्षण प्राप्त कंचन गावा का कहना है कि ‘पर्वत मेरे रक्त में है। मैं इन्हें हृदय से अनुभव करती हूँ। बादल कैसे होते हैं मैं यह नहीं बता पाती हूँ लेकिन हृदय की आँखों से देखना अधिक महत्त्वपूर्ण है। मुझे लगता है कि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में विकलाँग होता है। मेरे पास आँखें नहीं है, दूसरों के पास साहस नहीं होता।’

पर्वतारोहियों में ही दुस्साहस, जीवट एवं साधुता के जीवन्त उदाहरण हैं माउण्ट एवरेस्ट पर विजय पताका फहराने वाले मेजर एच.पी.एस. आहलुवालिया, जो युद्ध के मैदान में गोली लगने के कारण व्हील चेयर पर चलने के लिए बाधित हैं, लेकिन इनके बुलंद हौसले एवं आशावादी दृष्टिकोण असंख्य लोगों के लिए प्रेरणा एवं आशा का स्रोत बने हुए हैं।

1965 में माउण्ट एवरेस्ट के सफल आरोहण के कुछ ही माह बाद उनके जीवन में नियति ने क्रूर मोड़ लिया। कश्मीर में पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ गया था। मेजर आहलुवालिया भी इस मोर्चे पर डटे हुए थे। युद्ध के दौरान रीढ़ की हड्डी में गोली लगी, जिसके कारण वे अपंगता का त्रास सहने व जीवन भर के लिए व्हील चेयर पर बैठने व चलने के लिए बाधित हुए। लेकिन जीवट एवं साहस के धनी मेजर आहलुवालिया ने हिम्मत नहीं हारी। चल फिर नहीं सकते तो क्या हुआ, व्हील चेयर पर बैठे ही वे अनवरत रूप से सक्रिय हैं व कई महत्त्वपूर्ण एवं साहसपूर्ण कार्यों को अंजाम दे चुके हैं। अपने अथक श्रम से उन्होंने इण्डियन स्पाइनल इंजरीज सेंटर, बसंत कुञ्ज की स्थापना की, जो विकलाँगों की आशाओं का प्रकाश पुञ्ज बना हुआ है।

मेजर आहलुवालिया 13 पुस्तकें लिख चुके हैं। जिनमें ‘हायर देन द एवरेस्ट’ पर फिल्म भी बनने वाली है। इस पुस्तक के सात संस्करण बिक चुके हैं। जीवन की व्यस्तता के बीच ये हृदय में विद्यमान रोमाँच एवं दुस्साहस के जज्बे को कई चुनौतीपूर्ण अभियानों के माध्यम से क्रियान्वित कर चुके हैं। 1994 में जीप में चीन के ऐतिहासिक रेशम मार्ग पर 12000 किमी. लम्बी यात्रा पूरी कर चुके हैं। जो विश्व की सबसे खतरनाक घाटियों में से होकर जाती है। अपने संघर्षमय एवं रोमाँचकारी जीवन के हृदयस्पर्शी प्रेरक शब्द इन्हीं के शब्दों में- ‘मुझसे प्रायः पूछा जाता है कि एवरेस्ट शिखर पर पहुँच कर कैसा अनुभव हुआ? मेरा उत्तर होता है- खुशी भी और दुःख भी। खुशी शिखर पर पहुँचने की और दुःख इस बात का कि माउँट एवरेस्ट से ऊँचा और पर्वत शिखर नहीं है जिस पर विजय प्राप्त की जा सके। इस ऊँचे शिखर पर आरोहण के बाद तो अब सभी रास्ते उतार की ओर ही ले जाएँगे। लेकिन इसके बाद मैंने अनुभव किया कि जीवन में कठिनाइयों एवं समस्याओं के अनगिनत शिखर हैं जिन पर विजय प्राप्त करनी होगी। हमें भीतर के शिखरों पर चढ़ना होगा, जिनकी कोई अंतिम सीमा नहीं होगी।’

संजय भटनागर 33 वर्षीय ऐसे विकलाँग युवा हैं जो माँसपेशियों के संकुचन के रोग से पीड़ित हैं तथा हमेशा व्हील चेयर का इस्तेमाल करते हैं। अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर वे ऐसे पहले विकलाँग व्यक्ति हैं जो खुली प्रतियोगिता में केन्द्रिय सेवा में चुने गए।

10 वर्ष की आयु में जब संजय भटनागर इस रोग से पीड़ित हुए तो उन्हें स्कूल की सीढ़ियाँ चढ़ पाना भी अत्यन्त कठिन हो गया था। वह चल-फिर नहीं सकता था, सहपाठी मजाक उड़ाते थे। उनकी परवाह किए बिना संजय अपना ध्यान पढ़ाई में केन्द्रित रखते। लेकिन स्थिति बिगड़ती गई और स्थिति ऐसी आई कि दूसरों को ही स्कूल की बस में उठाकर चढ़ाना व उतारना पड़ता। अंततः एक दिन ऐसा आया जब व्हील चेयर का सहारा लेना पड़ा। लेकिन संजय दृढ़ संकल्पित थे कि वे अपनी विकलाँगता के विरुद्ध डटकर संघर्ष करेंगे और अपने जीवन में एक श्रेष्ठ कार्य करेंगे। अपने अथक श्रम के बूते वे दिल्ली विश्वविद्यालय के टॉपर बने व एम.ए. की परीक्षा में भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। कुछ दिन रोजमर्रा की एक दुकान भी चलाते रहे। साथ ही सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी प्रारम्भ की, जिसमें वे एलाइड सर्विस में चुने गए। संजय ने अपनी विकलाँगता को बोझ नहीं समझा बल्कि आशावादी चिन्तन एवं दृढ़ संकल्प से जीवन को सकारात्मक दिशा दी।

समीर घोष, टाटा स्टील में एक उच्च पद पर आसीन हैं। आठ वर्ष की आयु में खेल के मैदान में एक दुर्घटना के शिकार हो गए थे, जिसमें इनके दोनों हाथ तीव्र विद्युत करंट से बेकार हो गए थे। अपनी यह स्थिति देख मन को गहरा धक्का लगा, लेकिन धीरे-धीरे जीवन का सामान्य क्रम चल पड़ा। माँ का इसमें बहुत बड़ा हाथ रहा जो सदैव निराशा से दूर रहने की प्रेरणा देती रही। अपनी विकलाँगता से उत्पन्न हताशा से दीर्घकालीन संघर्ष चलता रहा। लेकिन सभी समस्याओं के बावजूद समीर ने हिम्मत नहीं हारी।

स्कूल, कॉलेज तथा विश्वविद्यालय तक की शिक्षा प्राप्त करने के लिए संघर्ष चलता रहा। हृदय में दृढ़ संकल्प रहा कि अपने बूते ही जीवन को नये सिरे से गढ़ना है। अपने लक्ष्य के प्रति अनन्य निष्ठ एवं लगन का ही परिणाम था कि वह लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से स्वर्ण पदक प्राप्त किये। टाटा स्कूल ऑफ सोशल साइंसिस से मास्टर इन सोशल वर्क में भी प्रथम स्थान पर रहे। रामपुर विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण किए।

आज समीर स्वयं ही प्रायः सभी कार्य कर लेते हैं। यहाँ तक कि पंजों से ही कम्प्यूटर के कीबोर्ड संचालित कर सकते हैं। टाटा संस्थान के वरिष्ठतम अधिकारी के रूप में वह सब कुछ कर लेते हैं, जो कि उनसे उपेक्षित हैं। अपनी कार तक स्वयं चला सकते हैं व किसी की सहायता के लिए मोहताज नहीं हैं। अपनी इच्छा से प्रत्येक कार्य करने में स्वतंत्र हैं।

46 वर्षीय प्रभाशाह भी स्वयं में एक उदाहरण हैं। वे जन्म से बधिर हैं लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक विकलाँगता को अपनी प्रतिभा के विकास में बाधा नहीं बनने दिया। बचपन से ही चित्रकला के प्रति तीव्र रुचि रही। कक्षा में सहेलियों, अध्यापिकाओं व कहानियों के चित्र बनाया करती। स्कूल की प्रिंसीपल ने उसकी प्रतिभा को भाँप लिया व चित्राँकन के लिए प्रोत्साहित किया। बालिका की सृजनशीलता तीव्र गति से विकसित होती गयी। उसे राष्ट्रमण्डल बधिर समिति लंदन से पुरस्कार मिला। इसके बाद कई राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। व आज वह देश की श्रेष्ठ महिला चित्रकारों में से एक हैं। उनकी कृतियाँ राष्ट्रपति भवन की दीवारों, गलियों, कई राजनिवासों, नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट, ललित कला अकादमी, एयर इण्डिया, भारतीय पर्यटन विभाग में तथा विदेशी कला गैलरियों में लगी हुई है। जम्मू की इस मूक बधिर का कहना है कि वह अपने रंगों से ही अपनी बात कहती है।

पूर्व टेस्ट क्रिकेट खिलाड़ी बी.एस. चन्द्रशेखर भी ऐसी ही एक मिसाल हैं। पाँच वर्ष की आयु में पोलियो के शिकार हो गए थे, जिसके कारण दाँया हाथ अर्ध विकलाँग हो गया था। लेकिन हृदय में क्रिकेट के प्रति अदम्य उत्साह रहा, अतः कभी भी नियति प्रदत्त विकलाँगता की परवाह नहीं की। घण्टों अभ्यास करने के बाद इसे दूर किया और चन्द्रशेखर स्पिन गेंदबाजी के महानतम खिलाड़ियों में एक बनें। 58 टेस्ट में 242 विकेट, रंजीत टॉफी में 400 विकेट इनकी उपलब्धियों की एक झलक है। 1981 में रिटायर होने वाले इस मधुरभाषी खिलाड़ी का कहना है कि इसने कभी विकलाँगता को खेल के बीच नहीं आने दिया।

अपनी अपंगता के बावजूद इंग्लिश चैनल को पार करने वाले 30 वर्षीय मसुदूर रहमन वैद्य जिजीविषा एवं दृढ़ संकल्प की अजेयता के जीवंत उदाहरण हैं। वैसे अभी तक 23 भारतीय इस चैनल को पार चुके हैं, लेकिन मसुदूर की उपलब्धि इन सबसे महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उनके दोनों पैर नहीं हैं। मसुदूर जब मात्र 12 वर्ष के थे तो स्कूल जाते समय एक दुर्घटना के कारण दोनों पैर गंवा बैठे। बचपन में ही पोखर में तैरते हुए महारत हासिल कर ली थी, लेकिन दोनों पाँव गंवाने वाले शिशु मन में ‘बड़ा तैराक’ बनने की बात रह गयी। लेकिन विकलाँगता के बावजूद अपना अभ्यास जारी रखा। विकलाँगता तैराकी प्रतियोगिता में भाग लेते-लेते वह मुर्शिदाबाद में होने वाले 12 मील और 19 मील तैराकी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने लगा। इसी बीच विश्व की सबसे लम्बी दूरी 81 किमी. की मुर्शिदाबाद-गंगा तैराकी प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर सबको चौंका दिया। इसमें पाँचवा स्थान रहा। इस तैराकी की सफलता के बाद मसुदूर ने इंग्लिश चैनल पार करने का निर्णय लिया। और इसे सफलतापूर्वक अंजाम दिया। इस तरह मसुदूर एशिया के प्रथम व विश्व के द्वितीय तैराक हैं, जिसने अपंगता को भी अंगूठा दिखाते हुए इंग्लिश चैनल को पार किया।

कैनटकी के टॉमी स्ट्रक साहस एवं जिजीविषा के अद्भुत उदाहरण हैं। इनके दोनों हाथ नहीं हैं। इसके बावजूद ये किसी भी सामान्य व्यक्ति से कम नहीं, बल्कि भारी ही पड़ते हैं। टॉमी के जन्म से ही दोनों हाथ नहीं हैं। बचपन से ही नन्हें बालक ने संकल्प लिया था कि वह वे सभी कार्य करेगा जो बाजुओं वाले करते हैं, बल्कि उनसे भी अधिक अच्छा करके दिखायेगा। बालक का प्रण था कि वह अपंगता को मार्ग में आड़े नहीं आने देगा। आज टॉमी अपने पैरों को हाथ की तरह इस्तेमाल करता है, वह अपने पैरों से बन्दूक थाम कर अचूक निशाना लगाने में सिद्धहस्त है, वह लिख लेता है और केनटकी के पर्वतों की टेड़ी-मेढ़ी सड़कों पर ट्रक चलाने का काम करता है। साहसी स्ट्रक मछली मारने भी जाता है। घोड़ों की नाल भी लगा लेता है, यहाँ तक कि कंचे खेल सकता है और केवल अपने पाँवों की उँगलियों और पाँवों के सहारे सुई में धागा तक डाल लेता है। स्ट्रक का कहना है कि वह केवल एक काम नहीं कर सकता जो एक सामान्य व्यक्ति कर सकता है, वह है चुटकी बजाना। आगे स्ट्रक कहते हैं ‘जन्म से ही अपंग होने का मुझे जरा भी खेद नहीं है। .... मैं समझता हूँ कि जीवन ने आपको जो कुछ भी थोड़ा सा दिया है, परिश्रम व लगन से इसे बहुत कुछ में बदल सकते हैं।’

ये सभी उदाहरण इस सत्य को उजागर करते हैं कि व्यक्ति के जीवन में सफलता एवं उपलब्धियों की प्राप्ति का मूल उसके मन का दृढ़ संकल्प है। इससे भरा व्यक्ति अदम्य उत्साह एवं साहस के साथ अपने कठोर श्रम, मनोयोग एवं अध्यवसाय द्वारा बड़ी से बड़ी प्रतिकूलता को निरस्त कर सकता है और अपंगता एवं दुर्भाग्य को भी अपनी प्रगति के मार्ग में रोड़ा नहीं बनने देता। यदि व्यक्ति के हृदय में सच्ची चाह हो तो राह उसे मिल ही जाती है। यहाँ दुष्यंत कुमार की इस उक्ति का उल्लेख करना उचित होगा-

कौन कहता है कि आसमाँ में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो जरा।


उसमें भूल क्या (kahani)

ईसा ने उस दिन एक वेश्या का निमंत्रण स्वीकारा और उसके घर भोजन को गए। सारा शिष्य समुदाय भी साथ चला। चारों ओर काना-फूँसी चल पड़ी। यह कैसा भगवान का बेटा है, जो पापिनी से घृणा तक नहीं करता। शिष्यों में से धनाढ्य और मुखर सिमोन ने अपने मन की बात ईसा से कह भी दी, ‘उद्धार करना  तो सज्जन  का ही काम है, जो आप दुर्जनों के यहाँ जाते और बदनामी सहते हैं।’

ईसा ने उलटकर पूछा, ‘सिमोन यदि तुम चिकित्सक होते तो किसी जुकाम पीड़ित और शस्त्राहत रोगी में से किसे प्राथमिकता देते? तुम्हारा विवेक ऐसी स्थिति में तुम्हें क्या करने को प्रेरित करता?’ सिमोन ने शस्त्राहत की प्राणरक्षा के लिए जुकाम पीड़ित की तुलना में प्राथमिकता देने की बात कही।

ईसा ने फिर पूछा, ‘यदि मैं अधिक पापी को सुधारने को कम अपराधी की तुलना में प्राथमिकता देता हूँ, तो उसमें भूल क्या हुई?’


प्राकृतिक जीवन शैली अपनाए,कैंसर दूर भगाएं

जितनी तेजी से रोग निवारक औषधियों का आविष्कार हो रहा है उतनी ही तेजी से मनुष्य रोगों के शिकंजे में कसता जा रहा है। इनमें कुछ रोग तो ऐसे भी हैं, जिनका अभी तक कोई निश्चित निदान नहीं खोजा जा सका है। कैंसर भी एक ऐसा ही रोग है। रासायनिक दवाओं से कीमोथेरेपी, विकिरण से रेडियोथेरेपी, हारमोन से हारमोन थेरेपी, शल्य तथा इम्यूनोथेरेपी जैसी आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों के बाद भी कैंसर से मरने वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की नवीनतम शोध रिपोर्ट के अनुसार सन् 2000 से पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख मौत कैंसर के कारण होंगी। इनमें दो तिहाई मौतें सिर्फ विकासशील देशों में होंगी जहाँ कैंसर से लड़ने के संसाधन अत्यन्त कम हैं। विकसित देशों में व्याप्त जानलेवा रोगों में कैंसर का स्थान चौथा है और 6 प्रतिशत मौतों का कारण है। भारत में मौत के दस प्रमुख कारणों में से कैंसर एक मुख्य कारण है। यहाँ एक लाख लोगों में से सत्तर लोगों में कैंसर का प्रकोप देखा गया है और हर आठ में एक को कैंसर होने की संभावना है। हर वर्ष यहाँ कैंसर के पाँच लाख नये मरीज बन जाते हैं।आखिर कैंसर क्या है? शरीर के हर अंग में कोशिकाओं का एक समूह होता है। स्वस्थ कोशिकाएँ एक नियमित क्रम से विभाजित होती हैं। नई कोशिकाएँ नष्ट हुई पुरानी कोशिकाओं की जगह पर काम करने लगती हैं। लेकिन यदि किसी कारण से इन कोशिकाओं का विभाजन तेजी से और अनियमित हो जाये तो जरूरत से ज्यादा नई कोशिकाएँ बनने लगती हैं। ये नई कोशिकाएँ संपूर्ण नहीं होती। उनमें उस अंग विशेष के कामकाज की क्षमता भी नहीं होती। इस अनियमित प्रक्रिया का परिणाम ही कैंसर का जनक है। नई असम्पूर्ण व अविकसित कोशिकाएँ तेजी से विभाजित होती रहती हैं और धीरे-धीरे उस अंग विशेष के क्रियाकलाप में बाधा पड़ने लगती है। यदि यह रक्त का कैंसर हो तो नई कोशिकाओं के बावजूद एनीमिया होने लगता है। यदि ठोस अंग हो तो उनमें गाँठ पड़ने लगती है, जो बराबर बढ़ती रहती है। यह प्रक्रिया सिर्फ उसी अंग विशेष में सीमित रहे तो इस गाँठ को बिनाइन ट्यूमर कहते हैं। यदि ये कोशिकाएँ रक्त व लिंम्फ के द्वारा शरीर के दूसरे हिस्सों में कैंसर फैला देती हैं तो इन्हें मैलिंग नैट कहते हैं। इस प्रकार के कैंसर खतरनाक होते हैं और इनका इलाज भी मुश्किल होता है।

कैंसर एक गैर संक्रामक रोग है। यह कोई वंशानुगत बीमारी भी नहीं है। फिर भी कभी-कभी कुछ परिवारों में यह रोग एक से अधिक सदस्यों को अपनी चपेट में ले लेता है। जैसे परिवार में किसी एक को स्तन कैंसर होने की दशा में अन्य महिला सदस्यों में इसके होने की संभावना दस गुना बढ़ जाती है। कैंसर किसी भी आयु में किसी भी व्यक्ति को हो सकती है। स्त्री-पुरुष, बच्चे, युवा, वृद्ध सभी इसके शिकार हो सकते हैं।

कैंसर का सबसे बड़ा कारण है-पर्यावरण प्रदूषण। दो तिहाई कैंसर इसी की देन है। 35 प्रतिशत कैंसर गलत खान-पान व रहन-सहन की आदतों के कारण होता है। जैसे-तम्बाकू, बीड़ी, सुपारी, पान-मसाला, शराब आदि का अत्यधिक सेवन। कुछ दवाइयाँ हारमोन्स, एक्स-रे एवं अल्ट्रा वायलेट किरणें भी कैंसर का कारण बन सकते हैं। यह मानव शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है।

आजकल गुटका या पान-मसाला खाने का व्यसन जिस तेजी से बढ़ा है उसी अनुपात में मुँह के कैंसर रोगियों में भी वृद्धि हुई है। सैकड़ों नामों से बिक रहे पान-मसालों एवं गुटकों पर अगर अविलम्ब रोक नहीं लगायी गयी तो मुँह का कैंसर जल्दी ही एक महामारी का रूप ले सकता है। एक तिहाई मुँह के कैंसर रोगी भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बंगलादेश, सिंगापुर आदि देशों में पाये जाते हैं। कैंसर रोग के वरिष्ठ चिकित्सा सलाहकार डॉ. ए.के.आनंद के अनुसार पान-मसाला या गुटका खाने का शौक शुरू होते ही मुँह का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। जैसे ही यह शौक व्यसन का रूप लेने लगता है वैसे ही बीमारी मुँह में जड़ जमाना शुरू कर देती है। पहले दाँत, फिर मसूड़े और उसके बाद श्वास नली की बीमारियाँ पैदा होने लगती है। मुँह से बदबू आने लगती है। जीभ के प्रभावित होने पर खाना खाने एवं बोलने में कठिनाई होती है। गालों के प्रभावित होने की स्थिति में मुँह पूरी तरह खुल नहीं पाता। धीरे-धीरे ल्यूकोप्लेकिया या सबम्यूकसा फाइब्रोसिस नामक जानलेवा बीमारी पनपने लगती है।

मुँह के कैंसर के इलाज की अब कई आधुनिक विधियों का आविष्कार हो चुका है। अब ऐसे तरीके निकल आये हैं कि रेडियोथैरेपी बारीक नलियों द्वारा दी जा सकती है। इससे विकिरण से नुकसान की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है। इन नई विधियों के बाद भी अगर यह बीमारी हो जाये तो आज भी उसका शत-प्रतिशत इलाज संभव नहीं है। साधारणतया मुँह का कैंसर उन व्यक्तियों में अधिक होता है जो तम्बाकू का प्रयोग चूने के साथ मिलाकर करते हैं एवं बीड़ी, सिगरेट या सिगार पीते हैं। तम्बाकू मिलाकर बनाये जाने वाले मंजन एवं सुपारी खाने से भी बचना चाहिए, क्योंकि इस बीमारी के ये भी प्रमुख कारण है।

ग्रास नली के कैंसर के रोगियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। इसका मुख्य कारण भोजन प्रदूषण है। माइकोटोक्सिन और नाइट्रोसामाइन्स जैसे पदार्थ कैंसर पैदा करने वाले पाये गये हैं। तम्बाकू व शराब के सेवन का भी इसमें योगदान होता है। कुछ चिकित्सकीय व्याधियाँ जैसे टाइलोसिस पामेरिस, पैटर्सनब्राउलन कैलीसिंड्रोम भोजन में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया ग्रास नली का एक्लेजिया और ग्रास नली का बैरट रोग इस कैंसर के अन्य कारण है।

खाना निगलने में परेशानी होना इस कैंसर का प्रमुख लक्षण है। धीरे-धीरे पानी तथा अन्य द्रव्य पदार्थों के लेने में भी दिक्कत होने लगती है। रोग अधिक बढ़ने पर दर्द का अनुभव भी होने लगता है। रोग का प्रसार निकटस्थ अंगों और तंत्रिकाओं में होने पर दर्द अधिक होता है। खाने की नली से श्वाँस नली में रोग का प्रसार होने पर पानी पीने पर खाँसी की शिकायत होने लगती है। यकृत और उसके पास स्थित सीलियस प्लेक्सस में रोग का प्रसार हो जाये तो पीलिया या पेट दर्द की शिकायत हो जाती है।

ग्रास नली के कैंसर का उपचार कीमोथेरेपी, बाह्य विकिरण चिकित्सा और अंतः विकिरण चिकित्सा के समन्वित सहयोग से किया जाता है। जिसके अच्छे परिणाम सामने आये हैं। इसके बाद भी यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि बीस से तीस प्रतिशत रोगियों में ही पूर्णरूपेण रोग मुक्त होने की संभावनाएँ बन पाती हैं।

रक्त कैंसर की बीमारी से भी हर वर्ष हजारों लोग मौत के मुँह में जा रहे हैं। रक्त कैंसर को दो समूहों में बाँटा जा सकता है। एक वर्ग ‘क्राँनिक रक्त कैंसर’ का होता है तथा दूसरा वर्ग ‘एक्यूट रक्त कैंसर’ का होता है। क्राँनिक रक्त कैंसर में कैंसर वृद्धि की रफ्तार धीमी होती है। एक्यूट रक्त कैंसर में कैंसर की वृद्धि तेजी से होती है और कुछ माह में ही रोगी की स्थिति गम्भीर हो जाती है।

एक्यूट रक्त-कैंसर अनेक प्रकार के होते हैं, परन्तु प्रमुख दो हैं। पहला एक्यूट माइलायड रक्त कैंसर। दूसरा एक्यूट लिप्फैटिक रक्त कैंसर। श्वेत रक्त कोशिकाओं में असाधारण वृद्धि अक्सर इस कैंसर की पहली सूचना होती हैं। कमजोरी महसूस होना, वजन में कमी आना, बार-बार खाँसी, जुकाम, शरीर में काले या नीले चकत्ते पड़ना, गले या शरीर के अन्य हिस्सों में गिल्टियाँ हो जाना, यकृत या प्लीहा का बढ़ जाना, रक्ताल्पता तथा नियमित बुखार इसके मुख्य लक्षण हैं।

एक्यूट माइलायड रक्त कैंसर का उपचार काफी जटिल होता है। एक्यूट लिम्फैटिक रक्त कैंसर का इलाज अपेक्षाकृत सहज और बेहतर परिणाम देने वाला होता है। दवाओं का उपयोग कैंसर विशेषज्ञ के सलाह से ही करना चाहिए अन्यथा इसके स्थाई दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।

कुछ कैंसर ऐसे होते हैं जो सिर्फ महिलाओं को होते हैं। इनमें से एक है स्तन कैंसर। पैंतीस से 54 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को होने वाला सबसे घातक रोग स्तन कैंसर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2000 से प्रतिवर्ष पाँच लाख महिलाओं की मृत्यु का कारण स्तन कैंसर होगा। इसमें से बीस प्रतिशत से अधिक महिलाएँ भारतीय उपमहाद्वीप की होंगी।

वैज्ञानिकों के अनुसार स्तन कैंसर हार्मोन में परिवर्तन, बी.आर.ए.सी.जीन, वंशानुगत प्रभावों, अधिक उम्र में गर्भ धारण, कम रेशेवाले भोजन, मासिक चक्र, रजोनिवृत्ति और पर्यावरण में मौजूद कैंसर जन्य पदार्थों के कारण हो सकता है। वैसे अब तक किये गये शोध प्रयासों के अनुसार स्तन कैंसर का सबसे प्रमुख कारण महिलाओं द्वारा बच्चों को स्तनपान न कराना माना गया है। हाल में किये गये एक अन्य अध्ययन के अनुसार धूम्रपान का भी स्तन कैंसर से गहरा सम्बन्ध पाया गया है। अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट रिसर्च के वैज्ञानिकों के मत से प्रतिदिन 20 या अधिक सिगरेट पीने वाली महिलाओं में स्तन कैंसर की संभावना सामान्य महिलाओं की अपेक्षा चार गुना बढ़ जाती है। एक अन्य अध्ययन से यह भी स्पष्ट हुआ कि सिगरेट पीने वाले पुरुषों की पत्नियों में नहीं पीने वालों की अपेक्षा बीस प्रतिशत इस रोग के चपेट में आने की संभावना ज्यादा होती है।

वक्ष कैंसर यदि अत्यधिक उग्र रूप धारण कर चुका हो तो उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। स्तन कैंसर का प्रारंभिक अवस्था में दवाइयों, इंजेक्शनों आदि की मदद से अथवा कैमोथेरेपी चिकित्सा पद्धति द्वारा इलाज किया जाता है। सर्जरी, रेडिएशन एवं हार्मोन थैरेपी स्तन कैंसर के उपचार की अन्य विधियाँ हैं।

कैंसर के विभिन्न प्रकारों के अनुसार उसके कारण भी बहुआयामी है परन्तु विभिन्न शोध प्रयत्नों से उभरा यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि उसके रोकथाम में शरीर की आँतरिक क्षमता की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण हो सकती है। कैंसर जैसे रोग के हो जाने के बाद इलाज भले ही कठिन है लेकिन थोड़ी वैज्ञानिक जीवन शैली और थोड़े संतुलित आहार के सहारे काफी हद तक अपने आप को कैंसर से सुरक्षित रखा जा सकता है।

नवीनतम शोध अध्ययन के परिप्रेक्ष्य में समुचित खान-पान कैंसर से लड़ने का एक प्रमुख हथियार बन कर उभरा है। सामान्यतः कैंसर कुछ हफ्तों या महीनों में नहीं होता बल्कि शरीर में इसका विकास होने में वर्षों लग जाते हैं। इस विकास क्रम को भोजन के द्वारा विभिन्न अवस्थाओं में रोका जा सकता है। यहाँ तक कि प्रारम्भिक कैंसर को ठीक भी किया जा सकता है। न्यूयार्क यूनिवर्सिटी के एन्वायरन्मेंटल मेडिसिन के प्रोफेसर वाल्टर टोल का कथन है कि कैंसर को नियंत्रित करने में सक्षम विटामिन ‘ए’ और ‘बी’ केरोटीन तत्त्व प्राकृतिक रूप से साग-सब्जियों में पाये जाते हैं। ये मेथी, पालक, हरी गोभी, हरे बुखारे एवं गाजर आदि में उपलब्ध होते हैं। डॉ. टी. के. सालुँखे के मतानुसार गोभी के रस में कई ऐसे गुण पाये जाते हैं जो आमाशयिक व्रण एवं कैंसर को समाप्त करने में सक्षम हैं। प्रातःकाल खाली पेट कम से कम आधा कप गोभी के रस का नियमित सेवन करने से वृहद् आँतरिक प्रदाह एवं प्रारंभिक अवस्था में कैंसर से मुक्ति मिलती है।

नेशनल रिसर्च काउंसिल तथा संसार के दूसरे चिकित्सा वैज्ञानिकों के सर्वेक्षणों के मतानुसार जिन देशों प्रदेशों के लोग भोजन में हरी साग-सब्जी एवं ताजा फलों का सेवन करते हैं वहाँ कैंसर के रोगी बहुत कम दिखाई पड़ते हैं। कैंसर पर विटामिन ‘सी’ के प्रभाव पर शोधरत डॉ. पोलिंग के मतानुसार विशेष प्रकार के कैंसर रोगियों को विटामिन ‘सी’ अधिक मात्रा में सेवन कराने से उनके जीवन काल में तिगुनी बढ़ोत्तरी होती है। विटामिन ‘सी’ की प्रचुरता के लिए मशहूर टमाटर के नियमित सेवन से कई प्रकार के कैंसरों से बचा जा सकता है। पैक्ड जूस में मिश्रित अप्राकृतिक रंग, शर्करा व रसायन से जहाँ कैंसर जैसे रोग उत्पन्न होते हैं, वहीं दाँतों एवं स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचता है। अतः कैंसर से बचाव हेतु पैक्ड-रस का सेवन उचित नहीं है।

उक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सीधी-सरल प्राकृतिक जीवन शैली अपनाकर एवं साग-सब्जी तथा ताजे-फलों के नियमित सेवन से कैंसर जैसी घातक बीमारी से दूर रहा जा सकता है। इस हेतु लोगों में जागरुकता पैदा करने पर कैंसर के भयावह शिकंजे से मुक्त रहने का सामूहिक प्रयास किया जाना चाहिए। सादा जीवन-सादा भोजन का सूत्र ही मानव जाति को इस भयावह बीमारी से बचा सकता है।


पुरुषार्थ आरंभ किया (kahani)

निर्विकल्प समाधि की साधना में जब सफलता न मिली, तो महर्षि उद्दालक ने सोचा, असफल होकर जीना क्याें? निराहार रहकर मृत्यु का वरण करना चाहिए। उन्होंने अन्न-जल त्याग कर मरण  साधना आरंभ कर दी। जिस वटवृक्ष के नीचे महर्षि का अनशन व्रत चल रहा था, उसके कोटर में वीरुध नामक एक बूढ़ा तोता रहता था। उसने ऋषि को संतप्त दृष्टि से देखा और सजल नेत्रों से कहा, ‘वाचालता क्षमा करें, तो एक बात पूछूँ?’ उद्दालक ने आँखें खोलीं और तोते से बोले, ‘कहो क्या कहना है?’ वीरुध बोला, ‘शरीर तो मरणधर्मा है ही, उसकी मृत्यु-योजना करने में क्या पुरुषार्थ हुआ? मृत्यु को अमरता में बदलने के लिए ऐसा ही दृढ़ निश्चय किया जाए और इतना ही त्याग किया जाए, तो क्या अमृत की प्राप्ति न होगी?’

उद्दालक बहुत देर तक सोचते रहे। वीरुध की वाणी उनके अंतस्तल तक प्रवेश करती गई। अनशन त्याग कर ऋषि ने अमृत की प्राप्ति के लिए प्रबल पुरुषार्थ आरंभ किया, तो निर्विकल्प समाधि भी उनके सामने आ उपस्थित हुई।


यज्ञ से प्रमेह एवं मधुमेह का उपचार

प्रमेह रोग प्रायः जिन कारणों से होता है उनमें प्रमुख हैं, एक स्थान पर सुख से बैठे रहना, आवश्यकता से अधिक सोना, माँस खाना, नवीन अन्न तथा नया पान खाना, गुड़ शक्कर से बने मीठे पदार्थ अधिक खाना तथा कफ कारक पदार्थों का सेवन करना। इसका सामान्य लक्षण पेशाब की अधिकता तथा उसका गंदलापन होना अर्थात् पेशाब के साथ चिकना पदार्थ एल्ब्यूमिन (प्रोटीन) का निकलना है। यही प्रमेह चिकित्सा न होने पर कालाँतर में एक-दूसरे रूप मधुमेह में परिवर्तित हो जाता है, जिसे ‘डायबिटीज’ कहते हैं। आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘बड्गसेन’ में उल्लेख है-

सर्व एव प्रमेहास्तु कालेना प्रकारिणः। मधुमेहत्वमायान्ती तदाऽसाध्या भवन्ति हि॥

आयुर्वेद ग्रंथों में बीस प्रकार के प्रमेह बताए गए हैं। खान, पान, आहार विहार संतुलित रखने एवं संयमित जीवन जीने से तथा यज्ञोपचार करने से सभी प्रकार के प्रमेह रोगों एवं मधुमेह से पूरी तरह छुटकारा पाया जा सकता है और स्वस्थ एवं दीर्घजीवन का लाभ उठाया जा सकता है। यहाँ पर प्रमेह अर्थात् पेशाब के साथ चिकने पदार्थ का स्वतः निकलना एवं डायबिटीज या सुगर (मधुमेह) के लिए अलग-अलग यज्ञ चिकित्सा का वर्णन किया जा रहा है।

प्रमेह रोग की विशेष हवन सामग्री-

इसके लिए निम्नलिखित औषधियों को बराबर मात्रा में लेकर उनका जौकुट पाउडर बनाया जाता है-

तसनमखाना 2. मूसली सफेद 3. मूसली 4. गोक्षरु बड़ा 5. कौंचबीज 6. सुपारी 7. बबूल के बीज या फूल 8. शतावर 9. छोटी इलायची 10. इमली के बीज 11. असगंध 12. बला के बीज अर्थात् बीज बंद (खिरेटी के बीज) 13. सालम मिश्री 14. गोरखमुँडी 15. दारुहलदी 16. देवदार 17. आँवला 18. हरड़ 19. बहेड़ा 20. नागरमोथा 21. बड़ अर्थात् बरगद की छाल 22. हल्दी 23. जामुन के बीज की मींगी 24. खदिर 25. अग्निमंथ 26. भुइ आमला।

इन सभी 26 चीजों को बराबर मात्रा में एकत्र करके हवन सामग्री बनाई जाती है। इसी समग्र सामग्री के पाउडर की कुछ मात्रा को घोट-पीस करके कपड़छन कर लिया जाता है ओर एक अलग डिब्बे में रख लिया जाता है। हवन करने के पश्चात इस पाउडर में से सुबह-शाम एक-एक चम्मच मलाई या घी तथा शक्कर के साथ प्रमेह पीड़ित व्यक्ति को नियमित रूप से खिलाते रहने से वह स्वस्थ हो जाता है।

पाउडर के स्थान पर यदि इस चूर्ण की गोली बनाना चाहो तो इसे और अधिक सूक्ष्म रूप में कपड़छन कर लें तथा घृतकुमारी का रस मिलाकर चने के बराबर छोटी-छोटी गोलियाँ बना लें। सुबह और शाम भोजन से पहले दो से चार गोली तक जल के साथ निगल जाएं। थोड़े दिनों में ही प्रमेह से छुटकारा मिल जाएगा। यह गोली सभी प्रकार के प्रमेह में लाभप्रद सिद्ध हुई है।

हवन करते समय उक्त 26 चीजों से निर्मित हवन सामग्री में पहले से तैयार की गई ‘काँमन हवन सामग्री नंबर 1.’ को भी बराबर मात्रा में मिला लेना चाहिए। इसमें 1. अगर 2. तगर 3. देवदार 4. चंदन 5. लाल चंदन 6. जायफल 7. लौंग 8. गूगल 9. डचरायता 10. गिलोय और 11. अश्वगंधा आदि चीजें मिली होती हैं। इसी में जौ, तिल, शक्कर एवं घृत मिलाकर नित्यप्रति हवन करना चाहिए। इन चीजों से बनी हवन सामग्री नंबर 1 को खाने वाले पाउडर में नहीं मिलाया जाता। इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। हवन करने का मंत्र सूर्य गायत्री मंत्र सूर्य गायत्री मंत्र ही रहेगा अर्थात् ‘ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यो प्रचोदयात्।’ यही सूर्य गायत्री मंत्र हैं।

जहाँ तक को सके हवन के लिए समिधा आम, पाकर, बरगद, पीपल आदि की लेनी चाहिए। यदि औदुँबर अर्थात् गूलर की समिधा ली जा सके तो अत्युत्तम है। इस संदर्भ में देवी भागवत महापुराण के एकादश स्कंध के चौबीसवें अध्याय के 28-29वें श्लोक में स्पष्ट उल्लेख हैं, ‘औदुँबर समिद्धोमादतिमेहः क्षयं व्रजेत्। प्रमेहं शमयेद्धुत्वा मधुनेक्षुरसेनवा।’ अर्थात् औदुँबर अर्थात् गूलर की समिधाओं से हवन किया जाए, तो प्रमेह नष्ट होता है। इसी तरह मधु-शहद अथवा ईख के रस शर्बत से हवन करने पर भी प्रमेह की शाँति होती है।

प्रमेह रोगी को पथ्य-परहेज का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। मिर्च, मसाला, खटाई, अत्यंत मीठे पदार्थ, भारी पदार्थ खाने से बचना चाहिए, साथ ही औषधि सेवनकाल ही नहीं यथासंभव ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

2. डायबिटीज या सुगर अर्थात् मधुमेह की विशेष हवन सामग्री-

जिस रोग में मूत्र विसर्जन शर्करायुक्त मधुर या शहद के समान मीठा हो, वह ‘मधुमेह’ रोग कहलाता है। आयुर्वेद ग्रंथों में सभी प्रकार के प्रमेहों को कालाँतर में मधुमेह में परिणत हो जाने की बात लिखी है है, यथा ‘कालेनोपोसेता सर्वे मद्यन्ति मधुमेहिनाम्।’ आधुनिक चिकित्सा विज्ञानी इसे ‘डायबिटीज’ या ‘सुगर की बीमारी’ कहते है। इसका प्रमुख कारण अनियमित आहार-विहार, खान-पान में गड़बड़ी माना जाता है। दूध, दही, घी, मक्खन, चीज, गुड़ शक्कर आदि पदार्थ एवं इनसे बनी हुई मिठाइयों का अधिक सेवन, व्यायाम आदि शारीरिक श्रम का अभाव, आरामतलबी, दिन में शयन, मल, मूत्र एवं वायु आदि वेगों को रोकना, अत्यधिक उपवास करना, रात्रि जागरण, चिंता, भय, शोक, उद्विग्नता, अत्यधिक मानसिक तनाव आदि डायबिटीज अर्थात् मधुमेह का कारण बनते हैं। शक्ति से अधिक परिश्रम करना, प्रमेह की समय रहते चिकित्सा न कराना भी मधुमेह की उत्पत्ति अथवा वृद्धि का कारण बनता है। कइयों में आनुवंशिकता भी रोगवृद्धि का एक मूल कारण होती है।

यों तो एलोपैथी चिकित्सा में डायबिटीज में खाने-पीने की अनेक औषधियों से लेकर कृत्रिम इन्सुलिन के इंजेक्शन तक प्रचलित हैं, परन्तु प्रायः देखा यही जाता है कि इनसे चिरस्थायी समाधान नहीं मिलता। दवा बंद करने एवं परहेज बिगड़ने पर रोग पुनः उभर आता है और अनेकानेक जटिलताएं पैदा हो जाती हैं।

ऐसी स्थिति में यज्ञ चिकित्सा एक ऐसी निरापद एवं प्रभावी उपचार प्रक्रिया है, जिसके द्वारा डायबिटीज को पूरी तरह निर्मूल किया जा सकता है। इसके लिए जो हवन सामग्री तैयार की जाती हैं, उसमें निम्न औषधियाँ बराबर मात्रा में मिलाई जाती हैं-1. हल्दी 2. निर्मली बीज 3. कालमेध 4. पप्तरंगी 5. डगलोय 6. खस 7. लाजवंती (छुईमुई) के बीज 8. पुनर्नवा 9. शिलाजीत 10. बिल्व पत्र 11. कूठ-कड़वी 12. कुटज 13. मेथीदाना 14. अतीस कड़वी 15. आम की गुठली की मींगी 16. दारु हल्दी 17. रसौत 18. हरड़ 19. कैथ का गूदा 20. कुटकी 21. विजया (भाँग) 22. खुरासानी अजवायन 23. जामुन की गुठली 24. विजयसार (बीजा) 25. गुड़मार 26. करेला का फल एवं पत्र 27. मेढ़ासिंगी 28. उलट कंबल 29. गूलर के फल।

उक्त सभी 29 औषधियों को कूट-पीसकर जौकुट कर लिया जाता है और इन्हीं की कुछ मात्रा को अत्यधिक बारीक करके कपड़छन कर अलग डिब्बे में रख लिया जाता है। इसका उपयोग हवन करने के बाद सुबह-शाम एक-एक चम्मच जल के साथ खाने के लिए किया जाता है। इसे गोली के रूप में भी खा सकते हैं। कपड़े से छने हुए सूक्ष्म पाउडर को घृतकुमारी (ग्वारपाठा) के रस से गूंथकर चने के बराबर छोटी-छोटी गोली बना लेनी चाहिए और छाया में सुखाकर उसे डिब्बे में रख लेना चाहिए। भोजन से पूर्व दो से चार गोली तक सुबह और शाम को जल के साथ मधुमेह रोगी को नित्य देना चाहिए। हवन और औषधि सेवन दोनों मिलकर रोगी को रोगमुक्त बना देते हैं।

हवन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उपर्युक्त 29 औषधियों के जौकुट हवन सामग्री में ही हवन करते समय प्रमेह रोग में वर्णित ‘काँमन हवन सामग्री नंबर-1’ को भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब सूर्य गायत्री मंत्र से कम-से-कम चौबीस आहुति का हवन प्रतिदिन करना चाहिए। समिधाएं वही रहेंगी, जो प्रमेह के लिए निर्धारित हैं।

डायबिटीज में परहेज करना अति आवश्यक है। इसमें मीठा, मिठाई अधिक मीठे फल, चावल, आलू नहीं खाना चाहिए। हलके मीठे फल जैसे सेव, मौसमी, अनार, देसी पपीता, अमरूद आदि खा सकते हैं, किन्तु यदि रक्त में सुगर की मात्रा अधिक बढ़ी हो तो इन्हें भी नहीं खाना चाहिए। करेला, जामुन, मेथी, नीम तथा गेहूँ व चने से मिश्रित आटे की रोटी खाना चाहिए। इस तरह उपर्युक्त उपचार उपक्रम अपनाते हुए आहार-विहार के संयम द्वारा मधुमेह से पूरी तरह छुटकारा पाया व स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है।

क्रमश:


देवपूजन का मर्म - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!

देवियो, भाइयो! देवता का अनुग्रह पाने के लिए देवता का पूजन करना आवश्यक है। इसके बिना देवता प्रसन्न नहीं हो सकते, देवता का अनुग्रह नहीं मिल सकता, देवता का प्यार नहीं मिल सकता, देवता की कृपा नहीं हो सकती। देवता का पूजन करने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, अगर हम उसे बताने लगें, तो बात लंबी हो जाएगी। इसलिए पंचोपचारपरक देवपूजन की व्याख्या तो मैं यहाँ नहीं कर सकता। लेकिन इस पंचोपचार की व्याख्या मैंने हजारों बार की है, जिंदगी भर की है और सारी जिंदगी भर करूंगा, ताकि आपकी देवात्मा पर आस्था बनी रहे।

अपना निर्धारण स्वयं करें

अगर आप सच्चे अध्यात्मवादी हैं तो आप या तो हिन्दू हो जाइए या मुसलमान हो जाइए। नहीं साहब! हम मरना भी नहीं चाहते और जिंदा भी नहीं होना चाहते हैं। तो फिर क्या होना चाहते हैं? अच्छा तो वही रहिए जो आप इस समय हैं। इस समय न आप मरे हुए हैं और न जिंदा हैं। न आप भौतिकवादी हैं और न अध्यात्मवादी हैं। अगर आप भौतिकवादी हैं तो कम्यूनिस्ट हो जाइए। यह आपकी मर्जी है कि आप भगवान का नाम नहीं लेंगे और आप अगर अध्यात्मवादी हैं तो सच्चे मायने में अध्यात्मवादी हो जाइए, जैसा कि हम आपको सिखाते हैं। जिस तरह हम आपको सिखाते हैं, उस तरह का अध्यात्मवाद भी आपको मंजूर नहीं और उस तरह का कम्यूनिज्म भी मंजूर नहीं। अतः कम्यूनिज्म भी आपके लिए उतना ही मुश्किल-कठिन है, जितना की अध्यात्म।

मित्रो! कम्यूनिज्म भी यह सिखाता है कि आप मशक्कत कीजिए और अपनी योग्यता बढ़ाए। इससे कम में कुछ नहीं मिल सकता। आप वह भी नहीं करना चाहते। नहीं साहब, हमको तो ऐसे दिलवाइए, जादू से, चमत्कार से दिलवाइए। कम्यूनिस्ट जी, हाँ साहब! बताइए आपको चमत्कार पर विश्वास है? मशक्कत पर विश्वास है? आपको मशक्कत इसलिए कहा जाएगा तो आपका अध्यात्म गायब हो जाएगा, फिर आप क्या करेंगे? साईं बाबा की पूजा करेंगे, मनसा देवी की पूजा करेंगे। क्या करेंगे इनकी पूजा करके? कम्यूनिज्म बहुत कष्टसाध्य है, उसे आप बर्दाश्त नहीं कर सकते। प्रत्येक क्रिया के लिए आपको उचित मूल्य चुकाना पड़ेगा और अपनी क्षमता का विकास करना पड़ेगा। आपको वह भी मंजूर नहीं है और यह भी मंजूर नहीं है, फिर आप क्या है? मैं नहीं जानता कि आप क्या हैं?

ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है कि न आप हिन्दू हैं, न आप मुसलमान हैं, न आप पशु हैं, न आप पक्षी हैं और न आप भौतिकवादी हैं और न अध्यात्मवादी है। भौतिकवादी आपकी इच्छाएं हैं और अध्यात्मवादी आपकी क्रियाएं हैं। आप अध्यात्मवादी इच्छाएं कीजिए और भौतिकवादी क्रियाएं कीजिए। नहीं साहब! हम भौतिकवादी इच्छाएं रखेंगे और अध्यात्मवादी क्रियाएं करेंगे। बेटे यह कैसे हो सकता है? ऐसा नहीं हो सकता। इसलिए आपको एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए।

देवपूजन का शिक्षण

मित्रो! पाँच चीजें हैं, जो देवताओं के पूजन में लगानी पड़ती हैं। आखिर ये क्या हैं? बेटे ये इशारे हैं। किसके इशारे हैं? वे उसी के लिए हैं, जो अध्यात्म का मूल उद्देश्य हैं, ‘आत्मसंशोधन’। सारा-का-सारा अध्यात्म इसी पर खड़ा हुआ है। बेटे, इसलिए मैं कहता हूँ कि हमको अपने आपकी सफाई करनी चाहिए। सचाई पैदा करने के लिए परिश्रम करना चाहिए। यही श्रद्धा है। देवपूजन के लिए मैंने कितनी बार आपको बताया है, कितनी बार व्याख्याएं की हैँ। आपको मैंने हमेशा यही कहा है कि धूपबत्ती जलाने का मतलब अपने जीवन की सुगंध को फैला देना है, जिसे सूँघकर आदमी को प्रसन्नता हो। गंदगी को सूँघकर नाक फड़फड़ाती है और व्यक्ति कहता है कि अरे साहब! कहाँ से बदबू आ रही है। दूसरी ओर खुशबू को सूँघकर मन प्रसन्न हो जाता है और कहता है कि यहाँ तो बड़ी खुशबू आ रही है। यह तो जबाकुसुम-सी मालूम पड़ती है।

देवपूजन में हम धूपबत्ती जलाते हैं, जिसका मतलब है कि हमारा जीवन और हमारा व्यक्तित्व ऐसा हो जिसकी सुगंध, जिसकी खुशबू जहाँ कहीं भी जाए, वहाँ हर आदमी की तबियत खिल पड़े, प्रसन्न हो जाए। अच्छा मान लीजिए, यहाँ आप मोहनलाल का जिक्र कर रहे हैं। हाँ साहब! क्या कहना उनके व्यक्तित्व को। बेचारे संत थे। जब हम उनकी दुकान पर गए, तो उन्होंने कहा कि जो चाहिए शाँतिपूर्वक ले जाइए। पैसे भी आपके जमा हैं। आप सारे बाजार में घूम आइए। अगर कोई माल हमारे माल से एक पैसे कम में भी मिलता हो तो आप उस चीज को ले जाना। हमारे यहाँ बेईमानी का कोई चक्कर नहीं है। खराब माल दिखाई पड़े, तो आप घर से वापस ले आना, हम आपको ठीक चीज देंगे और सही कीमत पर देंगे। साहब! मोहनलाल ऐसे व्यक्ति थे। उनका बोलना, बातचीत करना, व्यवहार क्या शानदार था कि उसके क्या कहने? उसने इस तरह देखा। उसने उससे प्रशंसा की और उसने उससे। इस तरह उनकी खुशबू फैलती गई। इसे कहते हैं व्यक्तित्व की खुशबू।

मित्रो! धूपबत्ती का मतलब यह नहीं है कि आप एक लकड़ी को जला दें और सुगंध फैला दें। उस धूपबत्ती से देवता प्रसन्न नहीं हो सकते। उससे आपके कमरे की सफाई हो सकती है। इससे आपका कमरा जरूर खुशबूदार हो जाएगा, लेकिन आपकी धूपबत्ती भगवान तक नहीं पहुँच सकती, क्योंकि भगवान बहुत दूर रहते हैं। भगवान जहाँ रहते हैं, वहाँ आपकी अगरबत्ती का धुआँ कैसे पहुँच सकता है? वहाँ तो केवल आपकी जिन्दगी की महक ही पहुँच सकती है।

इसी तरह दीपक जलाने का मतलब मैंने कई बार आपको बताया है। कई बार तो मैं इसका मखौल उड़ाने लगता हूँ और कहने लगता हूँ कि भगवान की आँखों में लाइट अभी ठीक है। सभी कुछ दिखाई पड़ता है। सूरज-चाँद निकलते रहते हैं। मैं उन लोगों का मजाक उड़ाता हूँ, जो यह ख्याल करते हैं कि केवल दीपक जलाने से भगवान को प्रसन्न कर सकते हैं। कई लोग मुझसे बहस करने लगते हैं और कहते हैं कि गुरुजी! किसका दीपक जलाएं? कोई कहता है कि हमारे यहाँ गाय का घी है, तो कोई कहता है कि भैंस का घी है। मैं उनसे यही कहता हूँ कि गाय का है तो उसे ही जला लिया करें। भैंस का है तो उसे जला लें। वे कहते हैं कि अभी तो आप गाय का कह रहे थे। बेटा मैं क्या कह रहा हूँ, बात तो कुछ समझता नहीं है, केवल ‘गाय का घी’ या ‘भैंस का घी’ के झगड़े में पड़ा है। असलियत को समझना नहीं चाहता।

काया का दीपक व भावना का घी

मित्रो! काया को दीपक और भावना को घी कहते हैं तथा श्रम को बत्ती कहते हैं और उसके भीतर जो प्रकाश काम कर रहा है, वह अंतरात्मा का है। हमारी अंतरात्मा की ज्योति दीपक में जला करती है और हमारे श्रम की वर्तिका उसमें लगी रहती है और प्यार उसमें भरा रहता है। पात्रता का दीपक, जो मिट्टी का शकोरा होता है, उसे पात्र कहते हैं। हमारे जीवन में पात्रता एक, जीवन स्नेह से भरा हो दो, श्रम-लगनशीलता की वर्तिका उसमें जलती हो तीन और उसके अंदर भगवान का प्रकाश चमक रहा हो चार। अगर इन चारों से युक्त हमारा व्यक्तित्व है, तो वह भगवान के चरणों पर रखने योग्य है। ऐसा व्यक्तित्व भगवान को प्रकाश दे सकता है और अपने आपको प्रकाश दे सकता है। हमने कितनी बार कहा है कि आप दीप यज्ञ करें। जीवन दीपक का प्रतीत है। अच्छा साहब! दीपक प्रतीक है तो दीपक जलाऊंगा और भगवान को पकड़कर लाऊंगा। बेटे, दीपक से कैसे पकड़ सकता हैं तू भगवान को बता तो सही? दीपक का मकसद, धूपबत्ती का मकसद समझिए, तब भगवान को पकड़ने का प्रयास कीजिए।

स्नान अर्थात् पसीना परहित के लिए

देवपूजन में पानी क्यों चढ़ाते हैं? हम तो एक चम्मच जल छोड़ देते हैं और कहते हैं, ‘स्नानम् समर्पयामि।’ अच्छा तो बता बेटे, तूने भगवान जी को एक चम्मच जल से कैसे स्नान करा दिया। तू अपनी स्त्री को क्या कभी एक चम्मच जल से स्नान करा सकता है, फिर गायत्री माता तो बड़ी हैं, उन्हें कैसे करा देगा स्नान? महाराज जी! ‘स्नानम् समर्पयामि’ कहकर। बेटे! तू असली मकसद को समझता नहीं है, केवल पानी, चम्मच आदि के चक्कर में ही घूम रह है। अरे उससे आगे बढ़ और स्नान का मतलब समझ। स्नान का अर्थ यह है कि हम अपने पसीने की बूँदें श्रम की संपत्ति लोकमंगल के लिए खर्च करेंगे। अभी तो तेरा सारा पसीना अपने बेटे के लिए पैसे के लिए खर्च होता रहता है। तेरे पसीने की एक बूँद समाज के काम न आ सकी, श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए खर्च न हो सकी। सारा-का-सारा समय, सारा-का-सारा श्रम और सारा-का सारा स्वेद बिन्दु पसीने की बूँदें हमारी हमारे ही काम में खर्च हो गई, भगवान अब हम पसीने की बूँदें आपके लिए टपकाएंगे। पानी से, स्नान से यही मतलब है।

अक्षत अर्थात् एक अंश भगवान का

अक्षत से क्या मतलब है? अक्षत से मतलब है, हमारी कमाई का एक हिस्सा भगवान के लिए, समाज के लिए लगना चाहिए। हम जो कुछ कमाते हैं, स्वयं के लिए नहीं खा जाएंगे। जो आप कमाता है और आप ही खाता रहता है, वह चोर है। जो व्यक्ति समाज के सहयोग से कमाता है और स्वयं ही सब खाकर खत्म कर देता है, वह चोर है। भाईसाहब आप अपनी कमाई का एक हिस्सा समाज के लिए दीजिए। आप गवर्नमेंट को टैक्स देते हैं, औरों को देते हैं, आप धर्म को भी टैक्स दीजिए, समाज को टैक्स दीजिए। सत्प्रवृत्तियों को टैक्स दीजिए, हिस्सा निकालिए। नहीं साहब! हम नहीं निकाल सकते। नहीं आपको निकालना पड़ेगा। यही है ‘अक्षतं समर्पयामि’ संक्षेप में अक्षत का मतलब यह है कि हम अनाज कमाते हैं, पैसा कमाते हैं, वस्तुएं कमाते हैं, उसका एक अंश भगवान के लिए अलग से निकालना पड़ेगा।

मित्रो! भगवान हमारी जिंदगी का पार्टनर है। उस पार्टनर का शेयर चुकाए। नहीं साहब! उसका तो हम शेयर नहीं चुकाएंगे, हम ही अकेले खा जाएंगे। नहीं बेटे! वह हिस्सेदार है, वह दावा कर देगा तेरी अकल ठिकाने लगा देगा। पचास फीसदी का हकदार है भगवान। हमारे जीवन में पचास फीसदी का ‘मैटर’ और पचास फीसदी का ‘अध्यात्म’ है। पचास फीसदी का प्राण और पचास फीसदी का शरीर। ये तेरे आधे का पार्टनर है। कौन? भगवान अतः उसके लिए भी निकाल। अरे, महाराज जी! मैं तो थोड़ा-सा ही निकालूँगा। कितना निकालेगा? बस ‘अक्षतं समर्पयामि’ मैं तो सात चावल रोज निकालूँगा। नहीं बेटे, ऐसा नहीं हो सकता। पचास परसेंट का हकदार है भगवान तो पच्चीस परसेंट, दस परसेंट कुछ तो दे। उसमें से पाँच परसेंट तो दे। एक परसेंट तो दे। नहीं साहब! मैं तो केवल ‘अक्षतं समर्पयामि’ करूंगा। अहा−−। अच्छा तो ये मामला है। इसीलिए तू अक्षत चढ़ा रहा था कि बाकी सारा माल स्वयं हजम कर ले। आपको पच्चीस हजार का जो फायदा हुआ, उसमें से लाइए पचास परसेंट। नहीं साहब, उसमें से पंद्रह पैसे लेना हो तो ले जाइए भावनापूर्वक, प्रेमपूर्वक, श्रद्धापूर्वक! अहा−−−। बड़ा चालाक है तू।

इस तरह से मित्रो ‘अक्षतं समर्पयामि’ का उद्देश्य समझिए। आप उद्देश्य नहीं समझेंगे, बस चावल फैलाते रहेंगे तो इससे अच्छा है कि उस चावल को चिड़िया को खिला दें अन्यथा उस चावल को बाहर डालेंगे, झाड़ से झाड़कर बाहर फेंक देंगे और वह बेकार हो जाएगा। अनाज और खराब हो जाएगा। अगर आप यह सब नहीं समझना चाहते, इसका उद्देश्य ग्रहण नहीं करना चाहते, उसकी प्रेरणा करना आपको मंजूर नहीं तो आप उस चावल को कहीं और लगा दीजिए। किसी चिड़िया को या किसी पक्षी के बच्चे को खिला दीजिए, फेंकिए मत। इन चावलों को फेंकने से क्या फायदा।

गुणों की सुगंधि

इसी तरह मित्रो! जब हम चंदन चढ़ाते हैं तो इसका मतलब होता है कि हम अपने व्यक्तित्व से अपने समीपवर्ती वातावरण में उसी तरह से सुगंध बिखेर दें जिस तरह से चंदन का दरख्त अपने आस-पास के छोटे-छोटे पौधों को अपने समान सुगंधित बनाता चला जाता है। आप जहाँ कहीं भी रहें और जो भी आपके संपर्क में आए, उसे श्रेष्ठ बनाए। दूसरों को अपनी अच्छाई का फायदा जरूर दीजिए। आप दूसरों को अच्छा जरूर बनाइए। नहीं साहब! हम तो अच्छे रहेंगे, किन्तु किसी को अच्छा नहीं बनाएंगे? नहीं बेटे! औरों को भी अच्छा बनाना चाहिए जैसे कि चंदन बनाता है।

मित्रो! मैं आपको यही समझा रहा था कि आप इस खुशबू को फैलाइए। एक से दस के रूप में विस्तृत हो जाइए। आप चंदन के दरख्त की तरह हो जाइए और अपनी खुशबू को दूसरों में फैलने दीजिए। मैं आपसे यही कह रहा था कि सारी-की-सारी वस्तुओं का विकास देवपूजन के पीछे जुड़ा हुआ है। देवपूजन के सिद्धाँत के पीछे समर्पण का भाव छिपा हुआ है, लेकिन यहाँ तो हमारा सारा जीवन राक्षस के लिए जुड़ा हुआ है। अभी तक हमने सारा जीवन असुर के लिए पशु के लिए खर्च किया है।

क्या होते हैं देवी-देवता

देवत्व का अर्थ होता है-श्रेष्ठताएं। देवता कहाँ रहते हैं? हमें नहीं मालूम। हम एक बार कैलाश पर्वत पर थे तो मरते-मरते बचे थे। देवता कहाँ रहते? पीपल के पेड़ पर रहते होंगे। अच्छा तो चलिए दिखाइए। नहीं साहब, वहाँ तो देवी रहती है। कहाँ रहती हैं? महाराज जी! वह तो नागरकोट में रहती है, कलकत्ता में रहती है। अच्छा तो वहीं चलो। मैं तो कलकत्ता में रहती है। अच्छा तो वहीं चलो। मैं तो कलकत्ता देख आया हूँ। वहाँ काली जीभ निकालकर चिढ़ा कर चिढ़ा रही है। किसी स्टूडेंट ने पूछा था कि क्यों साहब! काली देवी जीव निकालकर क्यों चिड़ाती है? अरे भाई! जीभ निकालना उनका शौक है। महाराज जी! एक देवी नागरकोट में रहती है। मेरे बाल-बच्चों का मुँडन वहाँ होगा। अच्छा बेटे! तेरी कुलदेवी कहाँ रहती है। महाराज जी! बाड़मेर में, जैसलमेर में। तो वहाँ क्या करेगा? बच्चे का मुँडन कराऊंगा। और कहीं करा ले तो? नहीं महाराज जी, देवी नाराज हो जाती है। क्या कहती है तेरी देवी? यों कहती हैं कि मैं बाल खाऊंगी, तू बाल यहीं काट। बेटे तू ऐसा भी कर सकता है कि घर पर मुँडन करा ले और बाल एक डिब्बे में बंद करके उसे देवी के पास पार्सल से भेज दे, देवी के काम आएगा। नहीं महाराज जी! देवी कहती है कि मुँडन के लिए हमारे यहाँ ही आना पड़ेगा, नहीं तो वह नाराज हो जाएगी।

साथियो! आपने देवी देखी है क्या? अगर देखी हो तो मुझे भी बता देना। मैंने तो देखी नहीं ऐसी देवी जो मुँडन कराती हो और बाल खाती हो। मैंने जो देवी देखी है, वह विचारणाओं के रूप में, भावनाओं के रूप में, सिद्धाँतों के रूप में देखी है। मनोवृत्तियों के रूप में और कृतियों के रूप में देवियाँ देखी हैं। इनमें से एक का नाम दया की देवी, एक का नम करुणा की देवी, एक का नाम श्रद्धा की देवी, एक का नाम दान की देवी है। मैंने असंख्य देवियों की पूजा की है और उनके साथ में इतना आनंद उठाया है कि वे मेरी सहेलियों की तरह, मित्रों की तरह बन गये।


आत्म-उजास की थाती-महापर्व दीपावली

उत्सवधर्मिता भारतीय संस्कृति का सनातन संस्कार रहा है। जीवन रस का सामूहिक गान ही त्यौहारों की मूल संवेदना है। इस रूप में दीपावली आर्य संस्कृति की महत् गरिमा से मण्डित दीपों के प्रकाश का महान साँस्कृतिक पर्व है। युगों से ज्ञान का यह आलोक प्रवाह सभ्यता के घाटों को प्रदीप्त करता रहा है। आलोक पर्व, दीप पर्व, प्रकाश पर्व, दीपोत्सव, दीपमालिका, दीपावली, सुखरात्री या यक्षरात्रि आदि अनेक रूपों से विख्यात यह पर्व आत्मोद्धार का प्रतीक होने के साथ-साथ तपोनिष्ठ जीवन की गरिमा भी सँजोता है।

दीपावली हमारी ज्ञान-गामिनी साँस्कृतिक धरोहर है। यह उतनी ही पुरानी एवं प्राचीन है जितनी कि स्वयं संस्कृति। हमारी संस्कृति में सुख हो या दुःख दोनों अवस्थाओं में प्रकाश करने की परम्परा रही है। वैदिक काल में यह प्रकाश अग्नि रूप में था, बाद में मंदिर के आरती-दीप के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। इस प्रकार वैदिक काल के वर्तमान तक दीपों की गौरवमय गरिमा से संयुक्त इस पर्व की ऐतिहासिक, साँस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं मौलिक महत्ता के आलोक में दीपावली का अनुष्ठान किया जाता रहा है। एक ओर दीपावली जहाँ बुराई पर अच्छाई की जीत एवं भाईचारे का पर्व है, वहीं दूसरी ओर अंधकार को निराशा और प्रकाश को आशा का प्रतीक मानकर दीपों की शृंखला प्रज्वलित कर अंधकार दूर भगाने की प्रकृति का त्यौहार है। दीपावली, आत्म उजास की थाती है। मान्यता है कि होली महोत्सव है और दशहरा महानुष्ठान, जबकि एकमात्र दीपावली ही सम्पूर्ण अर्थों में महापर्व है।

अमावस्या को आयोजित होने वाला दीपावली का पर्व महालक्ष्मी के आह्वान के साथ ही मानव के द्वारा अज्ञान और अंधकार के पराजय एवं पराभव का पर्व है। इस दिन दीपों का प्रकाश कर हम दीप प्रज्वलन की पुरातन परम्परा को गतिमान बनाते हैं। तथा दीप्ति रूप प्रकाश के सतोगुणी स्वरूप से आत्मा का साक्षात्कार कराते हैं। दीपदान की प्रथा समस्त विश्व में पुरातन काल से विद्यमान रही है। पहले वनस्पति पूजा की शुरुआत हुई। तत्पश्चात् ज्योतिर्मय लिंग की पूजा के साथ प्रदीप की तेजोमय आभा एकीभूत हो गयी। शास्त्रों की उक्ति है- ‘दीपो ज्योतिः ज्योति जनार्दनः।’ दीप हमारी आस्था के सबसे सनातन प्रमाण है। महाकवि अश्वघोष ने सौदरानेक में मोक्ष की उपमा दीपक की निर्वाण दशा से दी है। कालजयी महाकवि कालिदास प्रदीप्त दीपों की कतारों को देखकर कह उठते हैं- प्रवर्तिनों दीप इव प्रदीपात्।

दीपावली का धार्मिक पर्व के रूप में सर्वप्रथम सम्यक् विवेचन भविष्य पुराण में मिलता है। मात्र लौकिक मान्यताओं, वैभव एवं प्रदर्शन से पृथक् पद्म पुराण ने इस पर्व को शालीन एवं सुसंस्कारित आवरण पहनाकर धार्मिकता एवं सात्विकता से ज्योति मण्डित किया है। अन्य साहित्य धाराओं में दीपावली का लौकिक परिदृश्य प्रकट होता है। गुह्य सूत्रों के अनुसार चन्द्र संवत्सर नववर्ष के प्रारंभ होने के कारण दीप पर्व पर सफाई आदि की जाती थी। बुद्धघोष का राजगृह इसी महापर्व पर सजता था और धम्मपद अल्प कथा के अनुसार कौमुदी महोत्सव का आयोजन इसी शुभ पर्व पर रात्रि भर चलता था।

दीपावली की पर्व शृंखला संस्कृति की अनेक धाराओं को स्थान देती हैं। यह पर्व एक साथ पाँच पर्वों की लड़ी हैं। पहला पर्व त्रयोदशी की धनतेरस में पड़ता है। पौराणिक कथानुसार सागर मंथन के समय अमृत घट उत्पन्न हुआ था जिसे विष्णु के एक अंश धन्वन्तरी लेकर प्रकट हुए थे। इसी स्मृति में धनतेरस की व्रत-पूजा होती है। त्रयोदशी की संध्या में यमदीप दान का अनुष्ठान किया जाता है।

इसके बाद का दिन नरक चतुर्दशी, पितरों को अर्घ्यदान देने का पर्व है। इसके पीछे मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने इसी दिन नरकासुर का वध किया था। अमावस्या की रात्रि में दीपोत्सव मनाया जाता है। धर्मसिन्धु के अनुसार इस दिन मनुष्य देवों से अपने पितरों की परम गति के लिए प्रार्थना करते हैं। दीपावली के बाद प्रतिपदा आती है। यह प्रारंभ में नवान्न पूजा का पर्व था जो बाद में अन्नकूट पूजा में परिवर्तित हो गया।

लोक परम्परा में दीपावली की रात को मुख्यतया लक्ष्मी गणेश के संयुक्त पूजा का विधान है। यह वस्तुतः समृद्धि एवं सद्बुद्धि दोनों की आराधना के साथ श्रेष्ठ मूल्यों एवं आदर्शों की स्थापना है। लक्ष्मी समृद्धि, विभूति एवं सम्पत्ति की देवी है और गणपति सद्बुद्धि एवं सद्ज्ञान के सर्वसमर्थ देवता। समृद्धि का तात्पर्य विलासिता नहीं है, बल्कि यह सत्कर्मों में नियोजन है। सद्बुद्धि के प्रकाश में ही समृद्धि का सुनियोजन संभव है। अतः सद्बुद्धि के अभाव में समृद्धि हितकारी नहीं हो सकती और विपुल बुद्धि भी धनाभाव के कारण मंद पड़ जाती है।

वैदिक पुरुषसूक्त से पुराणों तक लक्ष्मी परमेश्वर की ऐश्वर्यशक्ति के रूप में प्रकाशित हैं। इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि लक्ष्मी केवल बाहरी वस्तु नहीं है, यह वस्तुतः आत्मविभूति है जो बीज रूप में सारे प्राणियों के अन्दर विद्यमान है। परन्तु जो अपनी आत्मज्योति को प्रकाशित कर पाता है वही इससे यथार्थ रूप में लाभान्वित होता है। महर्षि मार्कण्डेय भी इसे कोई बाह्य वस्तु न बताकर आन्तरिक तत्त्व की संज्ञा देते हैं। मानव के आभ्यन्तर में जो सार्वभौम शक्ति विद्यमान है वही बाह्य सम्पत्ति का का अर्जन विसर्जन करती रहती है। तभी तो लक्ष्मी कमल पर आसीन है। कमल विवेक का प्रतीक है, पंक से उत्पन्न होकर भी पंक रहित स्वच्छ, पावन, सुगन्धित। सम्पत्ति तभी वरेण्य है जब वह पवित्रता पर आधारित हो।

दीपावली अर्थात् दीपों की अवली याने कि प्रकाशित दीपों की पंक्तियाँ, जिन्हें देख कर कुछ यूँ लगता है कि नन्हें-नन्हें दीप संघर्षशील मानवीय चेतना के प्रमाण बनकर जग से तम को हर लेने की कोशिश करने में जुटे हैं। इन प्रकाशित दीपों से यह सत्य भी प्रकट होता है कि जीवन में स्नेह (प्रेम) बना रहे तो प्रकाश की कमी नहीं पड़ती। भावनात्मक टूटन से प्रायः जीवन में अंधेरा फैल जाता है। यदि हमारे जीवन का प्रत्येक कोना भावना और साधना की परम ज्योति से ज्योतित हो। और हमारा प्रत्येक आचरण कर्म और आदर्श से मण्डित हों तो न केवल जीवन प्रकाश से पूर्ण होगा बल्कि हम लक्ष्मी की वैभव -विभूति, उसकी श्री-सम्पदा से भी लाभान्वित होंगे।

दीप पर्व के अनुष्ठान की सार्थकता तभी है जबकि हमारे अन्दर ज्ञान और प्रेम की ज्योति जल उठे। इस ज्योति का प्रकाश ही बाह्य जीवन को विभूति और वैभव से सम्पन्न और सक्षम बनाने में समर्थ है। इस पावन बेला में दीपों की पंक्तियाँ कुछ इस तरह से जगमगाएँ कि विश्व में सद्बुद्धि की उजास बढ़े। सद्बुद्धि का यह उजाला ही समृद्धि को सुरक्षित और विकसित करने का आधार है। सद्ज्ञान और सद्बुद्धि के साथ समृद्धि का समन्वय ही इस पर्व की प्रेरणा है। हमारे जीवन में यह चरितार्थ हो तभी दीपावली मनाने की सार्थकता है।


कुछ भय न रहा (kahani)

संत तुकाराम शूद्र जाति में जन्मे थे। उनकी भक्ति भावना से पंडित लोग चिढ़ते थे। उस क्षेत्र के प्रख्यात पंडित रामेश्वर भट्ट ने उन्हें बुलाया और धमका कर धर्मप्रचार करने और गीत लिखने से मना कर दिया।

तुकाराम नम्रता की मूर्ति थे। उन्होंने पंडित जी से पूछा, ‘जो गीत अब तक लिखे जा चुके हैं, उनका क्या करूं?’ पंडित जी ने कहा, ‘नदी में फेंक दो’। उन्होंने वैसा ही कर दिया।

संत बहुत दुःखी थे। किसी वंश में जन्म लेने में मेरा क्या दोष है? भगवान! मुझे भक्ति से क्यों वंचित किया जा रहा है? आपकी गुण-गाथा गाने में मेरे ऊपर प्रतिबंध क्यों लग गया?’ यही बात वे निरंतर सोचते रहते। खाना-पीना तक छूट गया।

रात्रि को सपने में भगवान ने दर्शन दिए और कहा, ‘तेरे भक्ति गीत मैंने डूबने नहीं दिए। निकालकर नदी किनारे रख दिए हैं। उन्हें वापस लाकर पहले की तरह धर्मप्रचार के पवित्र कृत्य में लगा।’ तुकाराम ने वैसा ही करना आरंभ कर दिया। अब किसी के विरोध का उन्हें कुछ भय न रहा।


युगगीता-26 - कैसे बनें दिव्यकर्मी और कैसे हो बंधनमुक्त

(गीता के चतुर्थ अध्याय की युगानुकूल व्याख्या-नवीं कड़ी)

युगगीता के विगत अगस्त माह के अंक (26वीं कड़ी) में ‘गहना कर्मणोगतिः’ शीर्षक के साथ कर्म की गहन गति, कर्म-अकर्म-विकर्म की बड़ी विशद व्याख्या प्रस्तुत की गई थी। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा इसी शीर्षक में लिखी गई पुस्तक के उद्धरणों के माध्यम से पाठकों ने जाना कि कर्मफल विधाता का कितना बड़ा, अकाट्य एवं माहात्म्य से भरा सिद्धाँत है। इसी क्रम में इस लेख के उत्तरार्द्ध में गीता के चौथे अध्याय के 19, 20, 21वें श्लोक का भावार्थ समझाया गया था कि ज्ञान की धधकती प्रबलता एवं पवित्रता से भरी अग्नि में बुद्धिमान (तमाहुः पंडितं बुधा) व्यक्ति के कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं। उसके सभी कार्य बिना किसी कामना या उद्विग्नता से होते हैं। ऐसा ज्ञानी व्यक्ति कर्मफल की आसक्ति को छोड़कर सदैव प्रभु में तृप्त रहता है। इसी व्याख्या के दिव्यकर्मी महामानवों के लक्षणों के रूप में इन तीन श्लोकों के भावार्थ के माध्यम से विगत अंक में आँशिक रूप से समझाया गया था। अब इसी व्याख्या को आगे बढ़ाते हैं- चौथे अध्याय के बीसवें तथा इक्कीसवें श्लोक को और स्पष्ट करते हुए इस अंक में।

दिव्यकर्मी की विवेचना

जिसकी समस्त वासनाएं ज्ञान की अग्नि में जलकर भस्म हो गई हो, जो कार्य करते हुए भी उत्तेजित न हो तथा जिस कार्य को भी हाथ में ले उसे दिव्यता के शिखर पर ले जाए- श्रीभगवान के अनुसार वह पंडित है, ज्ञानी है, बुद्धिमान है। जब संकल्प व्यष्टि से हटकर समष्टि से जुड़ जाते हैं, तो कामनारहित हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति सही अर्थों में साधक बन जाता है। मात्र वह ज्ञानी ही नहीं होता, अंदर-बाहर से पवित्रता से घनीभूत हो वह ईश्वर का सच्चा पुत्र भी बन जाता है। ऐसे दिव्यकर्मी के विषय में स्वयं प्रभु श्रीकृष्ण बीसवें श्लोक में कहते हैं-

‘ऐसा व्यक्ति सब प्रकार की कर्मफल आसक्ति छोड़कर सदैव प्रभु में तृप्त रहता है, प्रभु के अतिरिक्त किसी अन्य पर आश्रित न होकर वह सब प्रकार के कर्मों को करता हुआ भी वस्तुतः कुछ भी नहीं करता’ (कर्म में अकर्म)। (कर्मण्यभिप्रवृत्तेऽपि नैव किच्चित्करोति सः) 4/20। एक दिव्यकर्मी के विषय में भगवान कह रहे हैं कि वह अपनी स्वाध्यायजनित समझ-बूझ के माध्यम से हर क्षण प्रभु में ही लीन होकर कार्य करता है। वह जो भी कार्य करता है, चूँकि उसकी उसके फल के प्रति आसक्ति नहीं है, वह करता हुआ भी उसे न करने वाला बन जाता है।

पंत वस्तुतः ऐसे ही व्यक्तियों को कहा जाता है। इन्हें दुनिया में दुःखी-ही-दुःखी दिखाई देते हैं। वे दुःखों के निवारण का प्रयास करते हैं। दूसरी ओर दुःखी भी वे ही होते हैं, जिनकी कामनाएं अतृप्त होती हैं। उन्हें भोग-विलास में ही सब कुछ नजर आता है। हमारे पास यह सब साधन होते तो कितना अच्छा होता। यही सब सोच-सोचकर वे दुःखी होकर विकर्म कर बैठते हैं और फिर पाप के भागी बनते हैं।

दुःखों की गठरी कैसे घटे

दुःखों को कैसे बंटाया जाए और उनसे कैसे निबटा जाए, इस संबंध में बायजीद नामक एक सूफी फकीर ने बड़ी सुन्दर कथा कही है। उस फकीर ने एक दिन प्रार्थना की, हे मेरे भगवान! मेरे मालिक!! मेरा दुःख किसी और को दे। मुझे थोड़ा छोटा दुःख दे दो, मेरे पास बहुत दुःख है। प्रार्थना करते-करते उसकी नींद लग गई। उसने स्वप्न देखा कि खुदा मेहरबान है। दुनिया के सब लोग आकर उसके पास दुःखों की गठरियाँ टाँगते चले जा रहे हैं। भगवान कह रहे हैं कि अपनी गठरियाँ मेरे पास बाँध दो और मनचाही वह दूसरी लेते जाओ। बायजीद मुस्कराए, सोचा भगवान ने मन की बात सुन ली। अब मैं भी अपनी दुःखों की गठरी बाँधकर हलके दुःखों वाली गठरी ले जाता हूँ। सब अपनी-अपनी गठरी बदल रहें हैं। मैं भी पीछे क्यों रहूँ। बायजीद ने आश्चर्य से देखा कि दुनिया में दुःख तो बहुत है। न्यूनतम दुःखों वाली गठरी भी उसकी गठरी से दुगनी थी। सपने में ही वह भागा कि अपनी गठरी पहले उठा लूँ। कहीं ऐसा न हो कि मेरे जिम्मे दुगने दुःखों वाली गठरी आ जाए और मेरी गठरी कोई और ले जाए। माँगा तो था मैंने कम दुःख और कोई मुझे अधिक दुःख पकड़ा जाए।

यदि इस कथा का मर्म हमारी समझ में जाए, तो हम भगवान से, अपने खुदा से, अपने इष्ट से कभी प्रार्थना नहीं करेंगे कि हमारे दुःख कम हों, कहेंगे कि औरों के दुःख कम हो, उनकी फलों में आसक्ति कम हो, वे विकर्मी नहीं दिव्यकर्मी बनें। दुःख हमारे हित में है। दुःख को तप बना लेना ज्ञानी का काम है। सुख को यही ज्ञानी योग बना लेता है। जो दुःख में, कष्ट में परेशान हो जाए, उद्विग्न हो जाए तथा सुख में भोग-विलासी बन जाए, वह अज्ञानी है। ज्ञान की पवित्र अग्नि में कर्मों को भस्म कर व्यक्ति यही पहला मर्म सीखता है कि मुझे औरों के लिए जीना चाहिए। जीवन भर परमपूज्य गुरुदेव यही शिक्षण तो हमें दे गए। उन्होंने कहा, ‘औरों के हित जो जीता है, औरों के हित जो मरता है उसका हर आँसू रामायण, प्रत्येक कर्म ही गीता है।’ इसी आग ने तो कइयों के अंदर परहितार्थाय मर मिटने की अलख जगा दी और देखते-देखते एक विराट संगठन गायत्री परिवार का खड़ा होता चला गया।

भगवान कामनाओं से निवृत्ति दिलाने के लिए दुःख देता है। इससे वासनाएं छूटती चली जाती है और क्रमशः हम कर्म में अकर्म को देखने लगते हैं। अकर्म ज्ञान में होता है। कर्म कई बार अज्ञान में हो जाता है, तो वह विकर्म में बदल जाता है। यह रहस्य जो समझ लेता है, वह जीवन की मझधार से पार हो जाता है।

सिद्धपुरुष के लक्षण

इक्कीसवें श्लोक में भगवान कहते हैं, ‘जिसका अंतःकरण और इंद्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, जिसने समस्त भोगों की सामग्री का, संग्रह वृत्ति का परित्याग कर दिया है, ऐसा उद्विग्नता से मुक्त (आशारहित), व्यक्ति केवल शारीरिक कर्म करता हुआ भी किसी पाप को प्राप्त नहीं होता।’ (श्लोक 4/21)।

अब जरा इस श्लोक के मर्म को आत्मसात करने का प्रयास करें। यह समझ में आ गया तो ही समझ में आएगा कि यज्ञमय कर्म क्या है, यज्ञार्थाय कैसे जीना चाहिए। यज्ञ वस्तुतः है क्या व कितने प्रकार के हैं। यही सब व्याख्या तैंतीसवें श्लोक तक आई, जहाँ श्रीकृष्ण पुनः अपनी पटरी पर वापस आकर ‘ज्ञानयज्ञ’ की महत्ता स्थापित करते हैं एवं कहते हैं कि ज्ञानरूपी नौका से पापियों से भी अधिक पापी मनुष्य भी पाप-समुद्र से तर जाता है (छत्तीसवाँ श्लोक, चौथा अध्याय)।

इस श्लोक में एक पूर्ण पुरुष का, पूर्ण कर्म करने वाले सिद्ध पुरुष का चित्राँकन भगवान ने किया है। भगवान कहते हैं कि ऐसा सिद्धपुरुष जिन विशेषताओं से युक्त होता है, वे इस प्रकार हैं-

1. उसका अपने अंतःकरण और इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है। 2. वह अपरिग्रही होता है (त्यक्तसर्वपरिग्रहः)। ब्राह्मणोचित जीवन जीता है।

3. वह ‘बिना आशा वाला’ जीवन जीता है। अर्थात् ‘निराश होकर संसार की सेवा नहीं करता (निराशीः यत् चित्तात्मा) वरन् भविष्य में प्राप्त होने वाले फलों के लिए चिंतित न होकर कर्म करता है। ‘आशा शब्द सदैव भविष्य में घटने वाली घटनाओं के विषय में प्रयुक्त होता है। ‘आशावादी’ हर मनुष्य को होना चाहिए, परंतु जब दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में ‘बिना आशा वाला’ शब्द आया है तो उसका अर्थ है- कर्मफल के लिए चिंतित न होना।

4. ऐसा व्यक्ति मात्र शरीर से जीवन निर्वाह हेतु कर्म करता है। उसके मन और बुद्धि दोनों ही पूर्णतः लक्ष्य पर केन्द्रित होते हैं। ऐसे कर्म करने से उसके ये कर्म पाप का कारण नहीं बरते। (न आप्नोति किल्बिषम्)। पाप वस्तुतः कर्मों-संकल्पों-कामनाओं-विचारों की भीड़भाड़ द्वारा पीछे छोड़ी गई दुःखकारक वासनाएं ही हैं। चूँकि इस सिद्धपुरुष में अहंकेन्द्रित कामनाएं नहीं होती, शरीर स्तर पर उसके कर्म केवल वासना क्षय का कारण बनते हैं, नई वासनाओं की बेड़ियों को जन्म नहीं देते।

अब समझ में आता है कि कितना बड़ा तथ्य भगवान के श्रीमुख से निःस्सृत हुआ है। पाप-पुण्य की सारी व्याख्याएं सुनाने के बाद पापों को काटने का मर्म भी भगवान बता रहे हैं एवं उनके होने, संचित होते रहने की प्रक्रिया भी समझा रहे हैं। जो जितेंद्रिय हो, अपरिग्रही जीवन जीता हो, बिना कर्मफल की आशा रखे जीवन यात्रा संपन्न करता हो, शरीर से जीवन निर्वाह मात्र के लिए कर्म करे, वह कभी पाप को प्राप्त नहीं होता। उसका जीवन यज्ञमय हो जाता है।

बंधनमुक्त कौन?

भगवान कृष्ण 22वें श्लोक में अब एक और बात जोड़ते हैं-

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः। पमः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥

जो किसे बिना किसी इच्छा के जो कुछ भी प्राप्त हो जाता है, उसी में तृप्त रहता है, जो ईर्ष्या-द्वंद्व आदि से अप्रभावित है तथा सफलता-असफलता, (हर्ष-शोक) आदि में समबुद्धि रखता है, ऐसा सिद्धि-असिद्धि में समभाव रखने वाला कर्मयोगी कर्म करते हुए भी किसी बंधन को प्राप्त नहीं होता (अर्थात् बंधनमुक्त हो जाता है, मोक्ष को प्राप्त होता है)।

ऐसी योग्यता एक कर्मयोगी के चरित्र को पूर्णता देती है एवं उसकी बड़ी सही परिभाषा प्रस्तुत करती है। वह व्यक्ति चाहे किसी भी कार्यक्षेत्र का हो, एक प्रबंधक हो अथवा कृषक, एक अध्यापक हो अथवा मजदूर, एक चिकित्सक हो अथवा छात्र, जिस किसी ने भी अपने भीतरी जीवन मूल्यों तथा बहिरंग जगत् के साथ अपने संबंधों में इन क्राँतिकारी परिवर्तनों को व्यावहारिक रूप दे दिया है, वह कर्मों में पूर्णता प्राप्त कर बंधनमुक्त हो जाता है। ऐसा ही व्यक्ति सही लोकसेवी बन पाता है।

इस संबंध में परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं, ‘दूरदर्शी विवेकशील का जागरण ही आत्मबोध, आत्मकल्याण, ईश्वरदर्शन, प्रभु अनुग्रह आदि नामों से जाना जाता है। वह सचमुच ही किसी मात्रा में उपलब्ध हो सके, तो ऐसा मनुष्य उतनी ही तत्परता से आत्मकल्याण की बात सोचेगा और उतना ही मनोयोग भरा पराक्रम। सद्भावनाएं, सद्विचारणाएं, सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए नियोजित करेगा। यह एक दूसरी ही दुनिया है।’ आगे वे लिखते हैं, ‘जिस मुक्ति को अध्यात्म क्षेत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया है, वह किसी लोक विशेष में जा बसने जैसी बात नहीं है। उसका सीधा सा अर्थ है, भव बंधनों से छुटकारा। संकीर्ण स्वार्थपरता के चक्रव्यूह से निकलकर समष्टि विराट के साथ एकात्मभाव स्थापित कर लेना। जो इस स्तर पर पहुँचता है, वह किसी एक का या कुछेक का होकर नहीं रहता। वह अपने को सबका और सबको अपना अनुभव करता है।’ ‘देवत्व देना सिखाता है। जिसने आत्मभाव बढ़ाना और जाना, उसे धरती का देवता ही कहना चाहिए।’ (प्रज्ञा अभियान संयुक्ताँक नव. दिस. 1982, पृष्ठ 36-37)।

निश्चित ही ऊपर जो व्याख्या दी गई है, वह एक ऐसे कर्मयोगी को दी गई है, जो सिद्धि-असिद्धि में संभाव रख सतत परहितार्थाय कर्म करता रहता है, वह वस्तुतः लोभ, मोह, अहं के बंधनों से मुक्त हो चुका है। यही आदर्श हममें से प्रत्येक का होना चाहिए।

मुक्त पुरुष दिव्यकर्मी

श्री अरविंद कहते हैं, ‘मुक्त पुरुष भगवत्संकल्प की प्रेरणानुसार चलता है। जो भी कुछ प्राप्त होता है, उसे बिना किसी राग-द्वेष के ग्रहण कर लेता है। उसका अपना हृदय एवं कर्म उसके वश में होते हैं। वह समस्त प्रतिक्रियाओं-आवेशों से मुक्त रहता है। उसके जो भी कर्म रहते हैं वे मात्र शारीरिक कर्म (शारीरं केवलं कर्म) होते हैं, क्योंकि बाकी सब कुछ तो ऊपर से आता है, मानव स्तर पर वह पैदा ही नहीं होता। भगवान पुरुषोत्तम के संकल्प, ज्ञान और आनंद का प्रतिबिंब उसे हस्तगत होता रहता है। इसीलिए वह कर्म और उसके उद्देश्यों पर जोर देकर अपने मन-हृदय में वे पाप नहीं उत्पन्न होने देता, जिन्हें हम षडरिपु पाप कहते हैं। ऐसे−−−ऐसे व्यक्ति के सभी कर्मों में सहज शुद्धता बनी रहती है। वह दिव्यकर्मी का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण हैं।’ (गीता प्रबंध पृष्ठ 184)।

इस अध्याय के 19वें से 22वें श्लोक तक एक ही ध्वनि गुँजित हो रही है- साधारण मानव दिव्यकर्मी कैसे बने? मुक्त पुरुष की सर्वोच्च उपलब्धि को कैसे प्राप्त करे? मुक्त पुरुष वस्तुतः जीव की अहंभावजन्य प्रतिक्रियाओं से मुक्त होते हैं, वे आत्मा बन जाते हैं, प्रकृति से परे चले जाते हैं, वे भगवान की अनंत सत्ता के एक विशुद्ध पात्र बन जाते हैं।

भगवान पहले सोलहवें श्लोक (चौथे अध्याय) में कह चुके हैं, ‘मैं तुझे वह कर्म बताऊंगा, जिसे जानकर तू अशुभ से मुक्त हो जाएगा।’ यह अशुभ ही कर्म बंधन है। इससे मुक्ति ही भगवान के सारे उपदेश का सार है, जो इस व विगत तीन युगगीता की कड़ियों में प्रस्तुत हुआ है। भगवान अर्जुन को दिव्यकर्मी बनाना चाह रहे हैं। उनके बताए दिव्यकर्मी के लक्षण इस प्रकार हैं-

1. कर्त्तव्य-अभिमान से शून्य होकर मोक्षदायक ज्ञान में स्थित होकर समस्त कर्मों को करना (श्लोक 18)।

2. कामना से मुक्त होकर भगवान के संकल्प बल से जुड़कर कर्म करना (श्लोक 19)।

3. वैयक्तिक संकल्प से परे होकर आध्यात्मिक जीवन जीना (श्लोक 20)।

4. समत्व में स्थित होकर द्वंद्वातीत जीवन जीना (श्लोक 21)। मनुष्यों से मिलने वाले मान-अपमान या निंदा-स्तुति का उस पर कोई असर नहीं होता, क्योंकि उसे प्रेरणा देने वाली शक्ति साँसारिक पुरस्कार पर नहीं किसी और उच्चस्तरीय बल पर निर्भर होती है। जो कर्त्तव्य-कर्म को जानता है, वह फल को अपने से कार्य कराने वाले ईश्वर के हाथों में छोड़ देता है। पाप-पुण्य के भेद से भी वह ऊपर उठ चुका होता है।

गीता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में इस संदेश की महत्ता को समझें। अर्जुन को यह सब कहा जा रहा है। हमारा नायक अर्जुन अज्ञान में जी रहा है। वह सोचता है कि युद्ध से हटना पाप होगा, फिर साथ ही यह भी सोचता है कि खून बहाना तो हर हालत में पाप है और रक्तपात का समर्थन तो किया भी नहीं जाना चाहिए। भगवान उसे मुक्त पुरुष की दृष्टि दे रहे हैं, ताकि वह स्वयं यह देखे कि विकासशील धर्म की रक्षा के लिए कौन-सा कर्म आवश्यक है, जो परमात्मा मुझसे कराना चाह रहे हैं। दिव्य आत्मा के अंदर का वह करुणा भाव पैदा होना चाहिए, जहाँ से वह अपने उच्च स्थान से सभी को करुणा भरी दृष्टि से देखे, शरीर के परे जो जीवन है उसे जीवन माने, शरीर को मात्र एक उपकरण माने। उसकी करुणा इससे युद्ध भी कराती है, पर उदार समबुद्धि के साथ।

एक आदर्श कर्मयोगी-दिव्यकर्मी-बंधनमुक्त पुरुष को ही यह सौभाग्य मिलता है कि वह एक लोकसेवी बने, युग की तत्कालीन परिस्थितियों से मोरचा ले एवं विजयी हो नवयुग लाने, स्वर्गोपम परिस्थितियाँ धरती पर उतारने योग्य बन सके। श्रीकृष्ण भगवान का सारा उपदेश इसी बिन्दु पर केन्द्रित है। उनके अनुसार जो व्यक्ति बहिरंग जगत् से अपनी अनंत व्यक्तिगत कामनाओं को पूरा करने की अपेक्षा रखे, वह समाजसेवा कर कैसे सकता है? उसकी भोगवृत्ति, संग्रहवृत्ति, मजा लूटने की वृत्ति उसे सेवाभाव के प्रतिकूल आचरण करने को विवश कर देगी। जहाँ-जहाँ जनसमुदाय जागरुक होता है, लोग स्वयं ऐसे लोभी नेता, तथाकथित मार्गदर्शकों के विरुद्ध उठ खड़े होते हैं, उन्हें निकाल बाहर करते हैं। जब लोगों के उद्धार के लिए, उन्हें उबारने के लिए प्रयत्नशील, कर्म में निरत लोकसेवी बिना माँगे जो कुछ उसे प्राप्त हो जाता है, उसी में संतुष्ट रहता है (यदृच्छा लाभ संतुष्टः) तो यह कहा जा सकता है कि उसने समाज के प्रति अपने सेवाभाव में पूर्णता प्राप्त कर ली। वह द्वंद्वातीत हो जाता है। ऐसे कर्मों में पूर्णता प्राप्त व्यक्ति की मनःशक्तियों का नाश बंद हो जाता है, वे उच्चस्तरीय प्रयोजन में खपने लगती है। वह ईर्ष्यारहित (विमत्सरः) हो जाता है। मानवजाति का यह नायिक निःस्वार्थ उत्साह से भरकर तुच्छ सफलताओं और असफलताओं के धक्कों के मध्य मन को संतुलित करना सीख लेता है (समः सिद्धावसिद्धौ च)। ऐसा व्यक्ति कभी कर्मबंधन में नहीं बंधता। (कृत्वापि न निबध्यते)। उसके कर्मों से कोई नई वासनाएं जन्म नहीं लेती। इसी कारण उसका व्यक्तित्व लालसा-कामना-कामोद्वेग से परे होकर एक महान दिव्यकर्मी के जीवन का पर्याय बन जाता है।

ढेर सारे उदाहरण समाजसेवियों के मिलते हैं, परंतु उपर्युक्त 19वें से वें श्लोक की कसौटी पर जब हम विभिन्न दिव्यकर्मियों को कसते हैं, तो हमें सबसे समीप हमारे आराध्य दिखाई देते हैं। जीवनभर उन्होंने संघर्ष किया। बिना माँगे जो मिल गया, उसी में संतुष्ट रहे। अपने पास जो भी कुछ था, वह भगवान के खेत में बो दिया। ईर्ष्यारहित जीवन जीकर हम सबके लिए एक नमूना प्रस्तुत कर गए। सफलताओं-असफलताओं के हिचकोलों के बीच संगठन की नैया चलाते हुए एक ऐसे मोड़ पर पहुँचा गए, जहाँ उनके ढेरों अर्जुन उसे खेने के लिए तैयार खड़े थे। वे जीवनभर अपनी करुणा लुटाते रहे, ममत्व भाव का विस्तार करते रहे, पर किसी बंधन में नहीं बंधे। ऐसे कर्मबंधनमुक्त, जीवनमुक्त दिव्यकर्मी का जीवन (हमारी वसीयत और विरासत) हम सबके लिए अनुकरणीय है, एक महानायक का जीवन है व हम सबके लिए एक जीवंत शिक्षण है। आगामी अंक में इस चतुर्थ अति महत्त्वपूर्ण अध्याय के तेईसवें श्लोक की व्याख्या के साथ दिव्यकर्मी प्रसंग को और आगे बढ़ाएंगे।


मंत्री बना दिया (kahani)

एक बादशाह ने बहुत शराब पी रखी थी। मदहोशी में वे गृहस्थों के घरों में घुसने लगे। साथ में वफादार नौकर था, उसने वहाँ जाने से रोका और वापस राजमहल में ले आया। होश में आने पर दूसरे दिन दरबारियों ने नौकर की गुस्ताख़ी बताई और उसे सजा देने को कहा।

बादशाह ने उसे राज्य का मंत्री बना दिया और कहा वफादारी इसमें है कि मालिक को गलत रास्ते पर चलने से रोके।


गुरुकथामृत-26 - संगठन निर्माण में सहायक-मार्गदर्शक ये पत्र

महामानवों के जीवन में एक विशेषता जो देखने में आती है, वह यह कि वे अत्यधिक सरल होते हैं। सरलता के नाते वह सामने वाले को उसका स्तर छोटा होते हुए भी सम्मान देते हैं। यही विभूति उन्हें अन्य अनेक सामान्य जनों से ऊपर पहुँचा देती है। सरलता के साथ उनके जीवन की गहराई, उससे जुड़े अनुभव, व्यावहारिक ज्ञान कुछ ऐसा होता है, जो जन-जन का मार्गदर्शन करता है। हमारे आराध्य देव परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के जीवन में हम यही तथ्य देखते हैं। उनके द्वारा आज से पचास-पचपन वर्ष पूर्व लिखे पत्र हो, चाहे उनकी लेखनी से लिखी ‘अपनों से अपनी बात’ सभी में यही तथ्य दृष्टिगोचर होता है। लोक-शिक्षण, पग-पग पर मार्गदर्शन व शब्दों में कूट-कूटकर भरी गई विनम्रता सरलता हृदय को छू लेती है।

यहाँ हम एक पत्र का उल्लेख करेंगे जो पूज्यवर ने 24/2/1957 को सिवनी के श्री ध्रुवनारायण जौहरी जी को लिखा था। वे लिखते हैं, ‘हमारे अंगरक्षक के रूप में आप जो साधना बढ़ा रहे हैं, उसके लिए कृतज्ञ हैं। आशा है आपका ऐसा ही प्रेमभाव-आत्मभाव आगे भी बना रहेगा।’

पंक्तियों दो ही हैं पर भाव तो देखिए, कितनी विनम्रता एवं सरलता से भरा है। 1958 के सहस्रकुँडी यज्ञ के निमित्त श्री जौहरी जी द्वारा किए जा रहे अतिरिक्त जप को पूज्यवर ने अपने लिए अंगरक्षक की भूमिका में की जा रही साधना माना और उसके लिए अपना आभार आत्मीयता की अभिव्यक्ति के रूप में प्रकट किया। यही तो महापुरुषों की, गुरुजनों की लीला है। इनकी दो पंक्तियों में उनकी महानता कूट-कूटकर भरी दिखाई पड़ती है।

इसी तरह इसी प्रसंग में गुरुसत्ता के 22/1/60 को लिखे टीकमगढ़ के श्री बैजनाथ शौनकिया जी को संबोधित पत्र का उल्लेख करने का मन है। लिखते हैं, ‘माताजी के नाम आपके पत्र प्राप्त हुए। वे आपकी उच्च भावनाओं से बहुत प्रभावित हुई हैं। हमारे चले जाने से जो अभाव प्रतीत होगा, आप लोग उसे अपने मातृभाव से पूरा करते रहें। कभी-कभी उनकी पूछताछ कर लिया करेंगे, तो इससे भी उन्हें बहुत संतोष मिलेगा।’

पाठकगणों को वैसे तो जानकारी है, पर बता दें कि परमवंदनीया माताजी 1959 की मध्य से 1961 के मध्य तक ‘अखण्ड ज्योति’ का संपादन भार संभाले हुए थीं। उस अवधि में परमपूज्य गुरुदेव अपने आराध्य के निर्देशानुसार तप हेतु हिमालय जा रहे थे। वर्ष में 9 माह पर गंगोत्री दुर्गम-हिमालय में तथा 3 माह उत्तरकाशी व ऋषिकेश निवास था। उद्देश्य एक और था, सभी आर्ष ग्रंथों का भाष्य, प्रकाशन की व्यवस्था तक की तैयारी एवं मिशन की भावी रीति-नीति का स्वरूप बनाना। इस अवधि में भी उनके लिखे कई पत्र जो गंगोत्री-उत्तरकाशी या ऋषिकेश से पोस्ट किए गए, हमें मिलते हैं। उन्हें सप्ताह भर की इकट्ठी महत्त्वपूर्ण डाक भेज दी जाती थी एवं वे वहीं से उसका उत्तर देते थे। वे अपने तप-साधना के, एकाँतसेवन से शौनकिया जी द्वारा गुरुसत्ता को दिए गए आश्वासन का हवाला देते हुए लिख रहे हैं कि गुरुदेव चिंता न करें, उनके शिष्य माताजी का ध्यान रखेंगे। कितनी सरलता के साथ उच्चस्तरीय सत्ता ने अपने शिष्य के मातृसत्ता संबंधी आश्वासन का जवाब दिया है। स्वयं जगज्जननी को किसी प्रकार के किसी संरक्षण की क्या आवश्यकता? वे लिखते हैं कि कभी-कभी माताजी से पूछताछ कर लिया करें। यही परिजनों की आत्मीयता पारिवारिकता का भाव तो हमारी गुरुसत्ता को औरों से अलग एवं संगठन के निराले स्वरूप को स्थापित करता है। यहीं पर तो हम उनकी भावाभिव्यक्ति के कायल हो जाते हैं कि किस तरह कुछ शब्दों से उन्होंने अपने शिष्य का मान व मनोबल बढ़ाया व अपनी माताजी की महानता उसके समक्ष स्थापित की। वस्तुतः ये पत्र जीवंत-जाग्रत मार्गदर्शक हैं। हमें हमारे आसपास के परिकर के प्रति कैसा संवेदनशील होना चाहिए, कैसे आत्मीयता को मूल धुरी में रखकर कार्य करना चाहिए, इसका प्रत्यक्ष संकेत इन पंक्तियों में मिलता है।

पूज्यवर के ढेरों शिष्य थे, पर प्रत्येक की इन्हें खबर रहती थी। वे चाहे मथुरा रहें दौरे पर या दूर हिमालय की गोद में, अपने प्रिय शिष्यों को स्मरण कर लिया करते थे। श्रीरामजी खंडेलवाल (तब कोटा, आज जयपुर) को 4 जुलाई 1960 को लिखा एक पत्र हमारे पास है, जो उनके अनंत प्रेम का द्योतक है। यह पत्र गंगोत्री से लिखा गया था। वे लिखते हैं।

‘हमारे आत्मस्वरूप,

हम आज यहाँ सकुशल आ पहुँचे। लक्ष्य स्थान तक गुरुपूर्णिमा तक पहुँच जाएंगे। एक वर्ष तक अब मिलना तथा पत्र-व्यवहार तो संभव नहीं, फिर भी हम सब प्रकार समीप ही हैं।’

तीन पंक्तियों में सब कुछ कह दिया गया है। सकुशल पहुँचने की खबर किसी अपने अनन्य आत्मीय को ही दी जाती है। लक्ष्य स्थान या नंदनवन प्रायः चालीस मील ऊपर गोमुख (12,000 फीट) से भी ऊपर का दुर्गम हिमालय का वह क्षेत्र, जहाँ उन्हें अपने इष्ट, अपने गुरु से मिलना था। वे यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि अब एक वर्ष तक पत्राचार तो संभव नहीं, किन्तु श्री खंडेलवाल जी को कभी उनकी दूरी अनुभव होगी नहीं, सूक्ष्म रूप में वे साथ बने रहेंगे ही। ऐसा ही हुआ। समय-समय पर अपनी श्वास की तकलीफ में उन्होंने गुरुसत्ता को स्मरण किया, उन्हें राहत मिली, सत्परामर्श भी। ऐसे एक नहीं अनेक पत्र गंगोत्री से लिखे हमारे पास हैं, जो बताते हैं कि आध्यात्मिक अभिभावक कभी किसी को भूलते नहीं। जब उन्होंने सारा बीड़ा हाथ में लिया है, तो उसे वे पूरा करते भी हैं।

1971 में मथुरा छोड़कर हरिद्वार आ बसने की तैयारी चल रही थी। परमवंदनीया माताजी को हरिद्वार रहकर तप करना था तथा पूज्यवर एक वर्ष के लिए हिमालय जा रहे थे। पूरे देश में सतत अनवरत सघन दौरे चल रहे थे। ऐसे में कवयित्री मायावर्मा जी को, जिन्हें पूज्यवर ने स्वयं गढ़ा था, वे थोड़ा-सा अवकाश मिलते ही पत्र द्वारा मार्गदर्शन देने में नहीं चूकते थे। यह पत्र जो 29/4/1961 को भारी व्यस्तता में लिखा गया था, पूरा हम इसलिए दे रहे हैं कि पाठकों का शांतिकुंज के जन्म की कथा भी विदित हो जाए।

‘चि. माया आशीर्वाद,

तुम्हारा ता. 19 का लिखा पत्र यथासमय यहाँ आ गया था। हम 19 को प्रवास से लौटते ही हरिद्वार चले थे। वहाँ माताजी के आश्रम (आज के शाँतिकुँज) में कुआँ तथा क्वार्टर बन रहा है, सो इस संबंध में वहाँ व्यवस्था के लिए जाना पड़ा। कल 28 की रात को ही लौटे हैं। पत्र तुम्हारा पत्र पढ़ा। उत्तर लिख रहे हैं।

तुम शिविर में आ रही हो, इसकी बड़ी प्रसन्नता है। तुम बच्चों को देखने के लिए निरंतर उत्कंठा बनी रहती है।

लेखनक्रम जारी रखना चाहिए। अभ्यास से योग्यता में दिन-दिन निखार आता चला जाएगा। अभ्यास और अनुभव से ही प्रतिभा में निखार आता है। तुम अपना लेखन-कार्य एक साधना के रूप में करती रहना। जितना छप जाए, वह तो एक अतिरिक्त लाभ की बात है।’

इस पत्र में अभिव्यक्ति ध्यान देने योग्य है। उनकी व्यस्तता उनके बताए दौरे के क्रम से जाहिर होती है। साथ ही इस पत्र से प्रकाराँतर से शाँतिकुँज के निर्माण की प्रक्रिया, जो उस समय चालू थी, हमें ज्ञात होती है। इसके साथ ही एक आत्मीयता भरे स्पर्श (तुम बच्चों को देखने के लिए निरंतर उत्कंठा बनी रहती हैं) के साथ वे काव्यलेखन संबंधी परामर्श भी देते हैं। यह भी लिखते हैं कि छपना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि उसका निरंतर लिखते चले जाना। लेखनी की साधना उन्हें करनी है। इससे उनकी प्रतिभा परिष्कृत होगी। आज के साहित्यकार लिखते बाद में हैं, पहले छपने की चिंता करते हैं। पूज्यवर ने निरंतर अपने सक्षम हाथों से कई अनगढ़ों को गढ़ा। जो लिखना नहीं जानते थे, उन्हें लिखना सिखाया। स्व. मायाजी के, जो दो वर्ष पूर्व एक दुर्घटना के माध्यम से अपनी गुरुसत्ता के पास चली गई, काव्यलेखन में यही निखार, सुगढ़ता एवं गुरुसत्ता के प्रति भावभरा आत्मसमर्पण दिखाई देता है।

छत्तीसगढ़ के स्तंभ, एक बड़े ही वरिष्ठ एवं पूज्यवर के प्रिय कार्यकर्त्ता श्री ज्वाला प्रसाद को लिखा एक पत्र परिजन-पाठकों को पढ़ाने का मन है। यह पत्र नौ जनवरी 1958 को लिखा गया था। पूज्यवर लिखते हैं-

‘समाचार बराबर भेजते रहना चाहिए, ताकि वहाँ की परिस्थिति का पता चलता रहे। हर जगह कलियुग काम कर रहा है। परिस्थितियों को देखकर बुद्धिमत्तापूर्वक काम चलाना चाहिए। काम इन्हीं लोगों से लेना है, सो अच्छे लोग न मिलने पर भी किसी प्रकार काम चलाना ही है। यज्ञों का हिसाब ठीक रहे, इसके लिए एक कड़ा लेख अखण्ड ज्योति में छाप रहे हैं।’

यह पत्र सहस्रकुँडी महायज्ञ नवंबर 1958 की पूर्व वेला में लिखा गया था। स्वाभाविक था कि यज्ञ के चंदे के नाम पर ढेरों तथाकथित धर्म के ठेकेदार उपज रहे थे। हिसाब-किताब की पारदर्शिता के संबंध में पूज्यवर बहुत कड़े थे। निरंतर अपने आत्मीय परिजनों की सतर्क करते रहते थे। यहाँ भी वे कलियुग का हवाला देकर बता रहे हैं कि ऐसे लोगों से श्री ज्वालाप्रसाद जी को कैसे निबटना चाहिए। अच्छे लोगों की प्रतीक्षा में कार्य रुके, उसके स्थान पर जो भी हैं, उन्हें किसी तरह आर्थिक प्रबंधन में कड़ाई करके उनका उपयोग किया जाना है। व्यावहारिक परामर्श है एवं बताता है कि संगठन ऐसे ही सत्परामर्शों से खड़ा होता है। साधनों की शुचिता अनिवार्य है, परन्तु लक्ष्य साध्य यदि युगनिर्माण है, तो व्यक्ति-व्यक्ति का निर्माण करना होगा एवं इन्हीं को निमित्त बनाना होगा। शिकायतों से कुछ होने वाला नहीं है। गायत्री परिवार रूपी वटवृक्ष की सिंचाई, उसका पालन-पोषण हमारी गुरुसत्ता के पत्रों में दिए गए ऐसे ही कुछ सत्परामर्शों, आत्मीयता भरे स्पर्शों ने किया है। तभी तो यह संगठन इतना शक्तिशाली, समर्थ एवं जनदेहात एक, दूर-दूर तक फैला नजर आता है। इन जड़ों को पोषण देते रहना कम सबका कर्त्तव्य है।


ऊर्जा जागरण साधना सत्र क्या, क्यों, कैसे व किसके लिए

‘युगपरिवर्तन की इस पर्व वेला में अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति के लिए ऐसी आत्मबलसंपन्न विभूतियों की आवश्यकता पड़ेगी, जो भौतिक साधनों से नहीं, अपने आत्मबल से जनमानस के विपन्न प्रवाह को उलट सकने का साहस कर सकें। यह कार्य न तो व्यायामशालाएं-पाठशालाएं पूरा कर सकती हैं और न शस्त्रसज्जा से, अर्थ साधनों से यह पूरा हो सकता है। इसके लिए ऐसे अग्रगामी लोकनायकों की आवश्यकता पड़ेगी, जो मनस्वी और तपस्वी बनने में अपना गर्व-गौरव अनुभव करें और जिनकी महत्त्वाकांक्षाएं भौतिक बड़प्पन से हटकर आत्मिक महत्ता पर केन्द्रीभूत हो सकें। भौतिक लाभों के लिए लालायित, लोभ-मोह के बंधनों में आबद्ध व्यक्ति इस स्तर के लाभ से लाभान्वित कदाचित ही हो सकें।’

ये पंक्तियाँ फरवरी 1973 की अखण्ड ज्योति पृष्ठ 61 से उद्धृत हैं। परमपूज्य गुरुदेव का इन पंक्तियों के माध्यम से स्पष्ट अभिमत है कि तप के माध्यम से प्रखर आत्मबल संपन्न विभूतियाँ ही नवयुग की आधारशिला रखेंगी। इसी अंक के संपादकीय में प्राण प्रत्यावर्तन की महत्ता बताई गई थी एवं कहा गया था कि प्रत्यावर्तन में किसी प्रकार के जादू-चमत्कार आदि के कुतूहल जैसी कोई अनुभूति इंद्रियों को नहीं होनी है। यह प्रकरण विशुद्धतः आध्यात्मिक बताते हुए पूज्यवर ने लिखा था कि ऐसे साधकों का अंतःकरण निरंतर यह अनुभव करेगा कि इस पर रखे हुए मल आवरण और विक्षेप के भार हलके हो रहे हैं। स्वच्छता और निर्मलता का प्रकाश समाविष्ट हो रहा है। यह एक प्रकार से धुलाई है। इन्हीं के साथ रंगाई की बात कहते हुए पूज्यवर ने लिखा था कि सभी साधकों को लगेगा कि अपने भीतर कुछ नया भरा जा रहा है। गर्भवती को तुरंत अनुभव होता है कि वह भारी हो चली, उस पर भार लद गया। अपनी निजी सत्ता में किसी अतिरिक्त सत्ता का समावेश हो चला। प्राण प्रत्यावर्तन में एकाकीपन का स्थान युग्म संवेदना ले लेती है। यही रंगाई है।

परमपूज्य गुरुदेव ने आह्वान करते हुए कहा था कि नवयुग अवतरण में महामानवों को महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। वे ही अग्रगामी बनेंगे और असंख्यों को अपने पीछे अनुगमन की प्रेरणा देंगे। ऐसे लोग धरती पर मौजूद हैं। दुर्भाग्य ने उन पर मलीनता का आवरण आच्छादित कर दिया है। अंधकार में वे अपना कर्त्तव्य देख-समझ नहीं पा रहे हैं और साहसिकता के अभाव में उस दिशा में कदम बढ़ा नहीं पा रहे हैं, जिसके लिए उनमें समुचित पात्रता पहले से ही मौजूद है। पूज्यवर यह कहना चाह रहे थे कि यदि ऐसी प्रसुप्त प्रतिभाओं को तप-साधना द्वारा प्रखर बनाया जा सके, उन्हें आत्मिक अनुदान लेने योग्य बनाया जा सके तो वे एक महत्त्वपूर्ण दायित्व युगनिर्माण के इस महायज्ञ में निभा सकेंगे।

प्रायः एक वर्ष तक चली प्राण प्रत्यावर्तन साधना के लगभग अट्ठाइस वर्षों बाद वैसा ही सुयोग पुनः आया है, जब प्रखर तप द्वारा स्वयं की धुलाई-रंगाई करने का अवसर सभी के समक्ष आया है। हीरक जयंती वर्ष जो युगचेतना के अभ्युदय की पिचहत्तरवीं वर्षगाँठ के रूप में सारे भारत व विश्व में मनाया जा रहा है, सभी धारकों के लिए एक अनुदान के रूप में तैंतीस पाँच दिवसीय सत्रों की यह शृंखला लेकर आया है। 26 अक्टूबर 2001 नवरात्रि समापन के आरंभ हुई यह शृंखला निरंतर चैत्र नवरात्रि 2002 तक चलती हुई 10 अप्रैल को समाप्त होगी। इसके पश्चात चैत्र नवरात्रि आरंभ हो जाएगी, जिसके विशिष्ट सत्र में सभी भागीदारी कर सकेंगे।

कुल मिलाकर सत्तर कक्षों की व्यवस्था अभी शाँतिकुँज के त्रिपदा-2 (नवीन नाम-पातंजलि भवन) में बनाई गई है। इस व्यवस्था−क्रम के विषय में विस्तार से परिजन विगत अक्टूबर अंक में पढ़ चुके हैं। इन सत्रों की मूलभूत विशेषताएं हैं-

1. पाँच दिन तक निताँत मौन रहकर एकाकी साधना।

2. निष्कासन तप द्वारा आत्मशोधन।

3. प्रतिदिन चौबीस घंटे में मात्र एक बार अखंड दीप दर्शन तथा गायत्री यज्ञ हेतु कक्ष से बाहर निकलना। इस अवधि में भी मौन बने रहना।

4. स्वाध्याय के क्रम में मात्र निर्धारित पुस्तकों का ही पठन-पाठन, चिंतन-मनन।

5. अपेक्षाकृत गंभीर व साधनात्मक अभ्यासों द्वारा अपनी आत्मशक्ति के परिष्कृतीकरण एवं ऊर्जा के जागरण का प्रयास। इन अभ्यासों को समझने के लिए एक निर्देशिका भी सभी को उपलब्ध कराई गई है। ये सभी अभ्यास, निर्देशिका तथा साउंड सिस्टम द्वारा दिए जाने वाले निर्देशों के माध्यम से कक्ष में ही संपन्न होंगे।

6. संतुलित-सात्विक आहार जो परमवंदनीया माताजी के भोजनालय से उनके कक्ष में पहुँचेगा, साथ ही औषधि कल्क व प्रज्ञापेय।

7. अप्रतिबंधित जप। जप की संख्या पर नहीं, ध्यान सहित मंत्रार्थ पर चिंतन कर उसकी गहराई पर जोर देना। भावविह्वल होकर जप करने की प्रधानता।

परिजन पाठक उपर्युक्त बिन्दुओं से इस वर्ष के ‘अंतः ऊर्जा जागरण साधना सत्रों’ की विशिष्टताओं को समझ सकते हैं। यह भी जान सकते हैं कि अंतर्मन की गहराई में भावपूर्वक जप किए जाने से कितनी प्रखरता आती है एवं मनोबल बढ़ता है। चिरस्थायी शाँति एवं अंतःउल्लास की अनुभूति तो साथ होती ही है।

प्रातः से सायं तक साधनात्मक जो विशेष उपक्रम हैं, वे इस प्रकार हैं-

1. प्रातः 4 बजे जागरण, उषापान के पश्चात आत्मबोध की साधना।

2. प्रातः 5.15 से प्रातः 5.49 तक पूज्यवर की वाणी में सामूहिक ध्यान।

3. 5.49 प्रातः से 6.00 प्रातः तक प्राण संचार प्राणायाम।

4. 6.00 प्रातः से 6.30 प्रातः तक अमृतवाणी (गुरुसत्ता)।

5. 8.00 प्रातः से 8.49 प्रातः तक मंत्रजप, सूर्यार्घदान।

6. 8.49 प्रातः से 9.30 तक सोऽहम् साधना।

7. 9.30 प्रातः से 10.00 प्रातः तक नाद साधना (प्रथम चरण)।

8. 12.49 अपराह्न से 10.. अपराह्न तक अनुलोम-विलोम प्राणायाम।

9. 1.00 अपराह्न से 10.30 अपराह्न तक जपयोग।

10. 1.30 अपराह्न से 2.00 अपराह्न तक बिन्दुयोग (अंतःत्राटक)।

11. 2.00 अपराह्न से 2.45 अपराह्न तक आत्मदेव की दर्पण साधना।

12 2.49 अपराह्न से 3.15 अपराह्न तक नाद साधना (द्वितीय चरण)।

13. 5.00 सायं से 5.15 सायं तक नाड़ी शोधन प्राणायाम।

14. 5.15 सायं से 5.30 सायं तक अमृतवाणी (गुरुसत्ता)।

15. 5.30 सायं से 6.00 सायं तक खेचरी मुद्रा।

16. 6.00 सायं से 6.15 सायं तक नाद साधना (तृतीय चरण)।

17. 7.00 सायं से 7.30 सायं सहज लयबद्ध श्वास-प्रश्वास का अभ्यास क्रम।

18. 8.15 रात्रि से 8.30 तत्त्वबोध की साधना एवं तदुपराँत विश्राँति, योगनिद्रा।

इस क्रम में रात्रि में 7.30 घंटे विश्राम, प्रातः 4.15 से 5.15 नित्यकर्म-व्यायाम, प्रातः 6.30 से 8.00 कल्क सेवन (कक्ष में) के बाद मौन-अखण्ड दीपदर्शन, यज्ञशाला में हवन तथा प्रज्ञापेय, 10 से 12 अपराह्न भोजन विश्राम, अपराह्न 3.15 से 4 प्रज्ञापेय का अवकाश तथा 4 से 5 अपराह्न कक्ष स्वच्छता व स्वाध्याय का अवकाश तथा 6.015 सायं से 7 रात्रि तक का समय भोजन के लिए सुरक्षित रखा गया है। रात्रि 7.30 से 8.15 स्वाध्याय, मनन-चिंतन हेतु रखा गया है। इस समग्र दिनचर्या से साढ़े चार दिन में साधक काफी कुछ शक्ति का उपार्जन कर सकेंगे, अपनी जीवन की दिशाधारा का निर्धारण कर सकेंगे। प्रत्येक सत्र में 20 व्यक्तियों को ही स्थान दिया गया है, साथ ही इनका पंजीयन कड़ी जाँच-पड़ताल के बाद किया जा रहा है। इसलिए जिस किसी को भी आना हो, पत्राचार करके सुनिश्चित अनुमति मिल जाने के बाद ही आना चाहिए।

जैसा कि सभी परिजन जानते हैं कि गायत्री परिवार संगठन का बीजारोपण तप की पृष्ठभूमि में हुआ। इसके मूल में गायत्री साधना रही है। नवसृजन के लिए भी पूज्यवर ने आधार साधना को ही बनाया। 1926 से आरंभ हुए इस संगठन के इतिहास को जब हम 1971 तक गहराई तक परखकर देखते हैं, तो यही पाते हैं कि गायत्री साधनारूपी सद्ज्ञान और यज्ञ आँदोलनरूपी सत्कर्म ही इसकी मूल धुरी में रहे हैं। 1962 के बाद परमपूज्य गुरुदेव ने हिमालय प्रवास से लौटकर सभी से पंचकोषी साधना कराई। बाकायदा पत्राचार से नियमित अखण्ड ज्योति के माध्यम से यह क्रम चलता रहा एवं फिर ‘अखण्ड ज्योति’ में विज्ञानसम्मत प्रतिपादनों के साथ साधनाएं प्रकाशित होने लगीं। एक बहुत बड़ा वर्ग इसे पढ़कर मिशन से जुड़ा व आगे चलकर इस समर्थ तंत्र का मेरुदंड बना। गायत्री महाविज्ञान व आगे चलकर उनकी साधनामय जीवन गाथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ (माय लाइफः इट्स लिगेसी एंड मेसेज) को पढ़कर तो कई प्रतिभावान-विभूतिवान जुड़ते चले गए।

परमपूज्य गुरुदेव अपनी अखण्ड ज्योति पत्रिका में निरंतर अपने शोध-निष्कर्ष जो उन्होंने साधना के विषय में किए थे, प्रकाशित करते रहे। मंत्र विज्ञान-शब्द शक्ति उनकी विशेष अभिरुचि का विषय रहा। वे एक स्थान पर लिखते हैं- ‘मंत्र शास्त्र का विशाल अध्ययन और अन्वेषण हमने किया है। महामाँत्रिकों से हमारे संपर्क हैं और साधना पद्धतियों के सूक्ष्म अंत-प्रत्यंतरों को हम इतना अधिक जानते हैं, जितना वर्तमान पीढ़ी के मंत्र ज्ञाताओं में से शायद ही कोई जानता हो। लोगों ने एकाँगी पढ़ा-लिखा होता है, पर हमने शोध और जिज्ञासा की दृष्टि से इस विद्या को अति विस्तार और अति गहराई के साथ ढूँढ़ा समझा है।’ (अखण्ड ज्योति वर्ष 30 मई अंक पृष्ठ 60) इस शोध के निष्कर्ष रूप में वे बताते हैं कि ‘यदि लेखक को हिन्दू धर्मानुयायी होने और एक मंत्र विशेष पर उसका पक्षपात होने के दोष से मुक्त किया जा सके तो उसे यह कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि गायत्री मंत्र की शब्द संरचना अनुपम और अद्भुत है। आगम और निगम का समस्त भारतीय अध्यात्म इसी पृष्ठभूमि पर खड़ा है। मंत्र और तंत्र की अगणित शाखा-प्रशाखाएं इसी का विस्तार परिवार है। अन्य धर्मावलंबियों के अन्य मंत्र हो सकते हैं, पर जब कभी सार्वभौम एवं सार्वजनीन मंत्र की खोज, पूर्वाग्रहों को दूर रखकर निष्पक्ष भाव से उसकी निजी महत्ता के आधार पर की जाएगी, तो उसका निष्कर्ष गायत्री मंत्र ही निकलेगा। इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर स्वयं में बीज जैसे शक्ति का स्रोत हैं।’ (अखण्ड ज्योति वर्ष 54, अंक 12, पृष्ठ 26)।

उपर्युक्त उद्धरणों से परमपूज्य गुरुदेव की साधना विज्ञान में गहराई, उनकी गायत्री मंत्र में अगाध श्रद्धा एवं निज के जीवन का जिया गया यथार्थ परिलक्षित होता है। वास्तव में हम देखें तो विभिन्न व्यक्तियों ने एक या दो साधना पद्धतियाँ हाथ में लीं व उनमें भी अधिक गहराई तक न जाकर साधकों को उथला ज्ञान भर दे पाए। परमपूज्य गुरुदेव ने साधना विज्ञान के हर पक्ष को न केवल गहराई तक पढ़ा, बल्कि सबसे समक्ष उसकी क्रियापद्धति रखी एवं उसका एक-एक विस्तार खोलकर सामने रख दिया। इसी दृष्टि से प्रत्यावर्तन पर आधारित यह अंतःऊर्जा जागरण सत्र का क्रम और भी निराला बन जाता है।

गुरुसत्ता का जीवन साधनात्मक प्रयोगों की एक कार्यशाला रहा है। गायत्री तपोभूमि, मथुरा में भी उन्होंने कल्प साधना, कृच्छ्र चाँद्रायण, हविष्यान्न द्वारा अन्नमय कोश का परिष्कार ऐसे कई प्रयोग कराए। युग के अनुरूप जो व्यक्तियों के शरीर-मन आज ढल गए हैं, उनमें सबसे सरल पद्धति क्या हो सकती है, इससे लेकर कठिनतम का सतत विकास पूज्यवर की साधना-प्रणालियों में पाया जाता है। ध्यान को पूज्यवर ने बड़ा सुगम एवं सभी के लिए करने योग्य बना दिया है। ध्यान हेतु बिन्दुयोग, दीपक की लौ या उगते सूर्य की ज्योति अवधारणा की साधना, विधेयात्मक चिंतन में तल्लीन होकर ध्यान रंगों का इष्ट का ध्यान इस संबंध में जो विज्ञानसम्मत प्रस्तुति पूज्यवर ने दी, वह बिरले ही कहीं एक स्थान पर देखने को मिलती है। ध्यानयोग, लययोग एवं नादयोग की योगत्रयी को उन्होंने शाँतिकुँज आश्रम ही नहीं, सभी केन्द्रों व शक्तिपीठों का एक अनिवार्य रुटीन बना दिया। प्रज्ञायोग तो उनकी मानव मात्र के लिए एक बहुमूल्य देन है।

यह एक समझने योग्य तथ्य है कि अंदर छिपे देवत्व को उभारने के लिए, भटके हुए देवता को मार्ग दिखाने के लिए किसी सूत्र की आवश्यकता होती है। ये सूत्र मानवी चेतना के स्तर पर भिन्न-भिन्न होते हैं, किन्तु कोई एक महापुरुष ऐसा आता है जो युगानुकूल, सार्वभौम, ऐसे सुनिश्चित सूत्र दे जाता है कि वे हर स्तर पर विकसित चेतना के लिए सहायक होते हैं। पूज्यवर द्वारा प्रणीत साधना पद्धति में यही बात स्थान-स्थान पर दिखाई देती है। इसी का एक विकसित रूप अब इस हीरक जयंती वर्ष की विशिष्ट साधना सत्र शृंखला में दिखाई देता है। श्री अरविंद के अतिमानस के महावतरण की वेला से हम गुजर रहे हैं। उसे चाहे हम महाप्रज्ञा कह लें या अतिमानस, बात एक ही है। इसके लिए एक नहीं अनेक सुपात्र चाहिए, जो विश्व-वसुधा को वर्तमान विडंबनाओं से उबार सकें। कुँठारहित, ग्रंथिमुक्त व्यक्तित्व जन्में, प्रतिभाशाली साधक स्तर के व्यक्ति समाज में बढ़ें, इसके लिए उच्चस्तरीय साधना अनिवार्य थी एवं वह सही समय पर आरंभ कर दी गई है।


VigyapanSuchana

विशिष्ट सत्रों के विशिष्ट अनुशासन

1. निताँत मौन-एकाकी साधना जो कर सकें, अंतर्मुखी होने का मन हो या अभ्यास हो, वे ही इनमें आएं। 2. स्थान सीमित है। बिना पूरी जाँच-पड़ताल के तथा पूर्व अनुमति के कोई भी न आएं। निश्चित दिन स्थान खाली करदें 3. निर्धारित पुस्तकों का ही स्वाध्याय कर सकेंगे। समाचार पत्रों की दुनिया से पाँच दिन कटकर रहना होगा। 4. भोजन साधक की स्थिति के अनुसार यहीं से निर्धारित कर दिया जाएगा। अन्य किसी पदार्थ का सेवन नहीं कर सकेंगे। 5. अपने साथ किसी भी ऐसे व्यक्ति को लेकर नहीं आएंगे, जिन्हें अलग न ठहराया जा सके या उसकी देखभाल की चिंता करनी पड़े। 6. किसी भी प्रकार की गंभीर व्याधि से पीड़ित कोई साधक आवेदन न भेजें। 7. जो निर्धारित अनुशासन निभा सकें, अपने कार्य स्वयं कर सकें, एक कक्ष में अकेले रह सकें, वे ही आवेदन करें। 8. अनुमति मिल जाने पर भी यदि किसी साधक को कड़े अनुशासन पालने में अक्षम समझा गया, तो उन्हें साधना सत्र में शामिल नहीं किया जाएगा। 9. साधक अपनी अनुभूतियाँ लिख सकेंगे। सत्र समापन पर कोई परामर्श या जिज्ञासा-समाधान भी पा सकेंगे।


केन्द्र के समाचार-विश्वव्यापी हलचलें

विश्व धर्म प्रसार यात्रा में भागीदारी

इस वर्ष काँची कामकोटी पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती के शुभाशीष से प्रारंभ हुई विश्व धर्म प्रसार यात्रा में शाँतिकुँज की भी भागीदारी रही। यह यात्रा 15 अगस्त, 2001 को छतरपुर नहीं दिल्ली के विशाल आडिटोरियम से एक विशाल धर्म सभा के रूप में आरंभ हुई। शक्ति मंदिर के भव्य मार्कंडेय हॉल में विश्व हिन्दू परिषद (ओवरसीज) के श्री भूपेंद्र कुमार मोदी, श्री विष्णु नरहरि डालमिया तथा मानव संसाधन विकास मंत्री श्री मुरली मनोहर जोशी की उपस्थिति में सतगुरु जगजीत सिंह जी को धर्मरत्न की उपाधि के सम्मानित किया गया। साध्वी ऋतंभरा, डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं भंते ज्ञान जगत् के उद्बोधन हुए तथा इस प्रकार सभी को यहाँ से विदाई दी गई। यहाँ से यह यात्रा त्रिनिदाद, सूरीनाम होते हुए अमेरिका पहुँची, जहाँ मियामी (फ्लोरिडा) तथा अटलाँटा (जार्जिया) के बाद साध्वी ऋतंभरा, जगद्गुरु शंकराचार्य भानपीठाधीश्वर श्री दिव्यानंद जी तीर्थ तथा परमार्थ निकेतन के श्री मुनि चिदानंद सरस्वती जी के साथ डॉ. प्रणव पण्ड्या के उद्बोधन विराट धर्म सभाओं में वाशिंगटन डीसी, टोरोंटो तथा शिकागो में भी हुए। प्रत्येक स्थान पर हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध सभी समुदायों का एक साथ उपस्थित रहना एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। प्रवासी परिजनों ने देवसंस्कृति के गौरव को जाना एवं नई पीढ़ी के लिए धर्म-धारणा के विस्तार की रूपरेखा संत समुदाय से सुनी, आत्मसात की।

पहला विश्वस्तरीय गायत्री चेतना केन्द्र लेस्टर यू. के. में खुला

परमपूज्य गुरुदेव की इच्छा थी कि जिस तरह गायत्री शक्तिपीठों की एक सुव्यवस्थित आधारशिला भारत में रखी गई है, उसी तरह विश्व के अन्य देशों में भी ऐसे केन्द्र बनें। वे उनका नाम परंपरागत शक्तिपीठों से अलग ‘गायत्री चेतना केन्द्र’ (सेंटर फॉर गायत्री कान्शसनेस) रखना चाहते थे। उन्हीं की इच्छानुसार परिजनों ने प्रयास किया, घर-घर ज्ञानघट रखे गए एवं एक चार मंजिली इमारत लेस्टर शायर इंग्लैण्ड की रेंडेल रोड पर खरीद ली गई। लेस्टर के मेयर के मेयर जॉन एलन की उपस्थिति में डॉ. प्रणव पण्ड्या ने 27 अगस्त को इसको लोकनिर्माण किया। लेस्टर इंटरफेथ कौंसिल के रेशमसिंह संधु, प्रवासी परिजन एवं ढेरों ब्रिटिश नागरिक इस कार्यक्रम में उपस्थित रहे। इस केन्द्र में मूलतः 8 वर्ष में 25 वर्ष के बालकों को लक्ष्य में रख योग-साधना, ध्यान, भाषा प्रशिक्षण, बाल संस्कारशालाएं आयुर्वेद एवं वैकल्पिक चिकित्सा तथा भारतीय चिकित्सा का सर्वांगपूर्ण प्रशिक्षण जैसे कार्य चलेंगे। इसमें लगभग दस बड़े कक्ष हैं एवं विधिवत शिक्षण आरंभ हो गया है। इसी तरह न्यूजर्सी (अमेरिका) की फ्रैंकलिन नगरी में भी छह एकड़ का एक प्लाँट वाजपेय यज्ञ के अनुयाज के रूप में ऐसा ही चेतना केन्द्र बनाने के लिए खरीद लिया गया है। शिकागो के परिजन भी स्थान देख चुके हैं। एक वर्ष के अंदर ये दोनों केन्द्र बन जाएंगे।

विराट महिला जाग्रति सम्मेलनों की शृंखला आरंभ

राष्ट्रव्यापी महिला सशक्तीकरण अभियान की कड़ी में इस हीरक जयंती वर्ष में अब, लगभग पच्चीस वर्ष बाद पुनः एक अक्टूबर 2001 से सारे देश में विराट महिला जाग्रति सम्मेलनों की एक शृंखला आरंभ हुई है। ब्रह्मवादिनी बहनें, जिन्हें स्वयं श्रद्धेय शैली दीदी ने प्रशिक्षण दिया है, अब आँवलखेड़ा तथा हरिद्वार के महापूर्णाहुति कार्यक्रमों के बाद नारी जागरण का शंखनाद करती उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, पं. बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में भी दिखाई दे रही है। छह बहनों, दो अभिभावक एवं एक वाहन चालक के साथ ऐसी तीन टोलियाँ नारी जागरण पर केंद्रित प्रदर्शनी के साथ 30 सितंबर की प्रातः शाँतिकुँज नारी जागरण पर केंद्रित प्रदर्शनी के साथ 30 सितंबर की प्रातः शाँतिकुँज से रवाना हो गई। इससे पूर्व 29 सितंबर को एक भव्य समारोह में उन्हें विदाई दी गई।

तिरूपति अश्वमेध महायज्ञ एवं झटीकरा (दिल्ली) में प्राण प्रतिष्ठा, एक सौ आठ कुँडी यज्ञ का प्रयाज

इस वर्ष दो बड़े आयोजन प्रस्तावित किए गए थे। एक पूरे उत्तर व दक्षिणी भारत को एक केन्द्र तिरूपति बालाजी में आमंत्रित कर 23, 24, 25, 26, 27 दिसंबर 2001 की तारीखों में छह वर्ष बाद पहला अश्वमेध महायज्ञ तथा दूसरा झटीकरा (बाहरी दिल्ली) में ग्रामीण महाशक्ति एवं दुर्गा माता, राधाजी, कृष्ण जी की मूर्ति की 27, 28, 29, 30 नवंबर की तारीखों में प्राण प्रतिष्ठा। पिछले दिनों प्रयाज के क्रम में यहाँ कलश स्थापना, कार्यालय की स्थापना व वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं के सघन दौरे संपन्न हुए।

प्रज्ञा अभियान एवं अखण्ड ज्योति अब वेब पृष्ठ पर भी

गायत्री परिवार की आधिकारिक वेबसाइट GayatriPariwar.org पर अब अखण्ड ज्योति पत्रिका के पृष्ठ एवं प्रज्ञा अभियान पाक्षिक हिन्दी में सभी पढ़ सकते हैं। इस वेबसाइट पर नवीनतम गतिविधियों को देने का क्रम भी अपडेटिंग के साथ चालू है।

आयुर्वेदिक अनुसंधान केन्द्र का औषधि निर्माण केन्द्र गायत्री कुँज में

विश्वविद्यालय निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहे गायत्री कुँज में महाविद्यालय तो आरंभ हो ही गया है, साथ ही आयुर्वेद के विज्ञानसम्मत अनुसंधान हेतु एक विराट फार्मेसी व अनुसंधान केन्द्र का निर्माण व विधिवत शुभारंभ भी हो गया। अब एक वर्ष के अन्दर ऊं के आकार का एक भवन बनकर तैयार हो जाएगा, जहाँ विधिवत प्रशिक्षण तंत्र आधुनिक यंत्रों से सज्जित प्रयोगशाला एवं आडिटोरियम भी बन जाएंगे, जहाँ से स्वास्थ्य प्रबंधन के कोर्स चलेंगे। 2003 से इनके आरंभ होने की संभावना है।


अखण्ड ज्योति-एक पत्रिका नहीं एक मिशन, एक आन्दोलन

अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचाकर ही हम सच्चा ज्ञानयज्ञ कर पाएंगे

‘अखण्ड ज्योति’ एक पत्रिका नहीं, प्रेरणा पुँज हैं, प्राणचेतना की संवाहिका है। ‘अखण्ड दीपक’ जो 1926 से प्रज्वलित होकर 1972 में शाँतिकुँज आने के बाद से सतत प्रज्वलित है, अपनी हीरक जयंती इस वर्ष मना रहा है तथा परमपूज्य गुरुदेव के प्रखर तप का प्रतीक है। इसी ‘अखण्ड दीपक’, के, जो अब अखण्ड अग्नि, अखण्ड यज्ञ का स्वरूप ले चुका है, दिव्य प्रभामंडल में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का 1938 की वसंत पंचमी को शुभारंभ हुआ। हाथ से बने कागज पर हाथ से चलने वाली मशीन की मदद से इसकी छपाई मात्र दो सौ पत्रिका से आरंभ यह पत्रिका कुछ समय के लिए बंद हो गई। पुनः पूरी तैयारी के साथ फ्रीगंज आगरा से वसंत पर्व 1940 से इसका प्रकाशन आरंभ हुआ। तब से अनवरत चलते हुए इसने 64 वर्षों की यात्रा पूरी कर ली है। मात्र दो सौ पचास पाठकों से आरंभ हुई यह पत्रिका मत्स्यावतार की तरह विराट रूप लेती गई एवं आज सभी अन्य भाषाओं सहित प्रायः साढ़े बारह लाख की संख्या में प्रकाशित होती है। संभवतः इतनी बड़ी संख्या किसी भी आध्यात्मिक पत्रिका की नहीं है, जो बिना किसी विज्ञापन-लाभ की कामना के साथ प्रकाशित होती हो।

‘अखण्ड ज्योति’ एक मिशन है, एक आँदोलन है, युगऋषि का ज्ञानशरीर है। जिस जिसने इसे पढ़ा, उसका चिंतन बदल गया, जीवन की दिशाधारा दूसरी दिशा में मुड़ गई एवं उसका आमूल-चूल कायाकल्प हो गया। चिंतन के ऊर्ध्वगामी होने के सत्परिणाम निश्चित ही जीवन-व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देने लगते हैं। सफलताएं हस्तगत होने लगती हैं। आत्मविश्वास बढ़ जाता है तथा चौबीसों घंटे स्फूर्ति बनी रहती है। लगता है सतत मार्गदर्शन देने वाला कोई सच्चा घनिष्ठ मित्र मिल गया। ‘जीवन जीने की कला’ का शिक्षण देने वाली यह पत्रिका लाखों लोगों द्वारा पढ़ी जाती है एवं सभी वर्ग-समुदाय के व्यक्तियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी 19878 जनवरी की ‘अखण्ड ज्योति’ के संपादकीय में लिखा है कि आज गायत्री तपोभूमि, ब्रह्मवर्चस, गायत्री नगर, शाँतिकुँज एवं शक्तिपीठों के रूप में जो भी विस्तार नजर आता है, वह ‘अखण्ड ज्योति’ से ही जन्मा है। यह पत्रिका एक जीता-जागता मिशन है, जिसने इतना बड़ा संगठन खड़ा कर दिया। इसी आधार पर उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी थी, ‘नवयुग का मत्स्यावतार’। कहने का अर्थ यह कि जिस किसी ने भी मिशन को जाना है, गायत्री परिवार के उद्देश्यों को समझा है, उसने सबसे पहले अपनी प्राणप्रिय ‘अखण्ड ज्योति’ से साक्षात्कार किया है। आगे भी जो नए नीतिवान जुड़ेंगे, वे इसी ज्ञानयज्ञ के माध्यम से जुड़ेंगे।

परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी की सूक्ष्म व कारण सत्ता को घर-घर पहुंचाने, श्रवण कुमार की तरह उन्हें कंधे पर बिठाकर भारतव्यापी तीर्थयात्रा कराने का किसी का मन हो तो उसे ‘अखण्ड ज्योति’ को जन−जन तक पहुँचाना चाहिए। इससे बड़ा कोई पुण्य नहीं, परमार्थ नहीं, संस्कृति-सेवा नहीं। सभी को जानकारी है कि आज की विपरीत परिस्थितियों में जहाँ कागज के दाम आसमान छू रहें हों, प्रिंटिंग आदि का खर्च बढ़ता चला रहा हो, आसन्न तृतीय विश्वयुद्ध की विभीषिका से महंगाई और भी बढ़ती जा रही हो, इसे निर्धारित चंदे के आधार पर छापना कितना कठिन है। किन्तु बिना लाभ, बिना नुकसान के आधार पर किसी तरह यह आज के वार्षिक चंदे की राशि 72 रुपये प्रतिवर्ष पर प्रकाशित हो रही है। इसके समकालीन कादम्बिनी एवं कल्याण से तुलना की जा सकती है। यही दो पत्रिकाएं हैं, जो अंग्रेजी पत्रकारिता के झंझावातों में भी जीवित रही हैं। कल्याण के साथ तो भावनाशीलों का नियमित अनुदान जुड़ा है, फिर भी 75 वर्षों से प्रकाशित यह धार्मिक पत्रिका अपने 42 पृष्ठ के कलेवर में एक सौ बीस रुपये वार्षिक चंदे पर सभी मंगाते हैं। कादम्बिनी कथा प्रधान पत्रिका है, उसका वार्षिक चंदा दो सौ तीस रुपए हैं। ऐसे में सागर गर्भित सामग्री लिए विज्ञान और अध्यात्म की समन्वयात्मक ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मात्र 72 रुपये में अपने 68 पृष्ठों के साथ पाठक परिजनों तक पहुँचती है। अंतर सभी को स्पष्ट देख लेना चाहिए व जान लेना चाहिए कि किस तरह अंश-अंश की कटौती करके यह आँदोलन हम सभी ने जीवित बनाए रखा है।

इस पत्रिका को, आँदोलन को जितने अधिक व्यक्तियों तक पहुँचाया जाएगा, उतना ही वह श्रम सार्थक कहा जाएगा, जिसमें सैंकड़ों प्राणवान लगे हुए हैं। इसमें अब कई नए आकर्षण जोड़े जा रहे हैं। रंगीन पृष्ठ बढ़ाने का मन है। पाठ्य सामग्री का स्तर और भी ऊंचा रखते हुए जीवन के हर पहलू को स्पर्श करने की इच्छा है। कागज की क्वालिटी उपलब्ध मूल्य पर जितनी अच्छी हो सकती है, दी जा रही है, पर इसे भी बढ़ाने का मन है। इस वर्ष चंदा विगत वर्ष की तरह 72 रुपए वार्षिक है, विदेश के लिए 750 रुपये प्रतिवर्ष तथा आजीवन 900 रुपये निर्धारित है। इसे इतना ही रखा जाएगा, बस परिजनों से यही भावभरी अपेक्षा है कि वे 2002 से इसकी संख्या पाँच गुनी न सही दूनी तो कर ही दें। हीरक जयंती पर यह सबसे बड़ी पुष्पाँजलि गुरुचरणों में होगी।


अपनों से अपनी बात - विश्वयुद्ध के कगार पर खड़ा यह सारा संसार

यह सहस्राब्दी 2001 से प्रारंभ हुई मानी जाती है। हर गिनती 1 से आरंभ होती है, अतः हम यह मानकर चलें कि नूतन मिलेनियम, नई सदी-नई सहस्राब्दी 1 जनवरी 2001 से आरंभ हुई। इस वर्ष के घटनाक्रमों ने यह समय आने तक ही हर किसी को बदल दिया है। जनवरी की 26 तारीख की प्रातः आए भूकंप ने गुजरात को लगभग तबाह कर दिया, पूरा कच्छ जमींदोज हो गया एवं अभी उसकी सामान्य स्थिति आने में वर्षों लगने की संभावना है। अभी उस झटके से भारत उबर भी नहीं पाया था कि 11 सितंबर मंगलवार की काली सुबह आ गई। इस मनहूस दिन तक स्वतंत्र उन्मुक्त उपभोक्तावादी सभ्यता के हिमायती देश संयुक्त राज्य अमेरिका की अस्मिता के, राष्ट्रीय गौरव के तथा समृद्धि के प्रतीक न्यूयार्क स्थित ‘वर्ल्ड ट्रेड टावर’ आत्मघाती दस्तों वाले विमानों की टक्कर से धराशायी कर दिए गए। वाशिंगटन के, जो कि अमेरिका की राजधानी है, राष्ट्रीय रक्षा मुख्यालय पेंटागन पर एक विमान गिरा दिया गया तथा एक विमान जिसका संभावित लक्ष्य व्हाइट हाउस (अमेरिकी राष्ट्रपति चर्चा स्थली) रहा होगा, इस स्थान से बीस किलोमीटर पेन्सिलवेनिया प्राँत में जाकर गिरा।

आध्यात्मिक पुरुषार्थ ही हमें महाविनाश से बचा सकेगा

न्यूयार्क और वाशिंगटन न सिर्फ एक राष्ट्र के दो महानगर हैं बल्कि अमेरिका साम्राज्यवाद एवं स्वतंत्रता के प्रतीक हैं। पूँजीवाद की जीवंत प्रतीक आसमान को छूती दो स्टील एवं शीशे से चमचमाती इमारतें 11 सितंबर की काली सुबह के पूरी तरह आने तक न्यूयार्क की ‘स्कायलाइन’ पर मौजूद थीं, पर जिन्हें 200 किलोमीटर प्रति घंटे के तूफान या बोइंग 707 विमान की किसी वजह टक्कर लगने पर भी कभी टूटने न वाली विनिर्मित किया गया था, कुछ ही मिनटों में भरभराकर गिर पड़ी, धराशायी हो गई। कितने आश्चर्य की बात है कि जिन तथाकथित आत्मघाती दस्तों ने यह कार्य किया, वे इस तबाही के मंजर को इस ‘विश्वग्राम’ (ग्लोबल विलेज) में सीधे टेलीविजन पर सारे विश्व को दिखा पाने में सफल रहे। कोई कुछ भी नहीं कर पाया।

ये इमारतें सारे विश्व के व्यापार का केन्द्र थीं। 110 से भी अधिक मंजिलों वाले इन भवनों में हमले के समय प्रायः चालीस हजार से अधिक लोग मौजूद थे। पहला बोइंग 767 (अमेरिकन एयरलाइंस II बोस्टन-लॉसएंजेल्स) 92 विमान यात्रियों सहित प्रातः 8.45 उत्तरी टावर से टकराया तथा दूसरों बोइंग 767 (यूनाइटेड एयरलाइंस 175 बोस्टन लॉसएंजेल्स) मात्र 21 मिनट बाद 65 यात्रियों के साथ प्रायः 9.06 बजे दक्षिणी टावर से टकराया। भयंकर आग लग गई, टनों विमान का ईंधन विस्फोट के साथ विमान ही नहीं, पूरे भवन को धराशायी कर, स्टील को पिघलाकर सब कुछ नष्ट कर गया। जन-हानि के साथ-साथ पिघलकर सब कुछ नष्ट कर गया। जन-हानि के साथ-साथ शुरुआती आँकड़े तीस अरब डालर की क्षति के हैं।

अकल्पनीय दुस्साहस

अमेरिका जैसे देश में मौलिक अधिकारों की स्वतंत्रता है साथ ही यात्रा भी अति सुगम। अभी मात्र एक सप्ताह पूर्व (घटनाक्रम के) सात सदस्यीय शाँतिकुँज का दल विश्वधर्म प्रसार यात्रा संपन्न कर भारत लौटा था। एक तीन सदस्यीय दल तो उसी दिन लंदन से फ्रैंकफर्ट होकर रात्रि भारत लौटा। वस्तुतः उनकी फ्लाइट यूरोप से उड़ने वाली अंतिम थी। उसके बाद तो सारे विश्व का वायुपथ विमानों के लिए रोक दिया गया था। यात्रा का हमारा जो अनुभव रहा वह यह कि ‘इलेक्ट्रॉनिक टिकट’ से आप कभी भी आसानी से सफर कर सकते हैं। सुरक्षा की जाँच-पड़ताल भी कुछ अधिक नहीं। ऐसे देश में यात्रियों से भरे विमान को मिसाइल बनाकर कोई खचाखच भरे दुनिया के व्यापार के केन्द्र इन ‘ट्रेड टॉवर्स’ को ध्वस्त भी कर सकता है, यह किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।

इमारतों की स्टील के पिघलने (प्रायः 2500 सेंटीग्रेड तापमान) से सारा ढाँचा ध्वस्त होकर 10 से 10.30 बजे तक के बीच नीचे आ गिरा। धुएं का एटमी विस्फोट जैसा गुबार उठा, जिसने पहले झटके के बाद बिल्डिंग में घुसे राहत दस्तों सहित आसपास के भवनों को भी तहस-नहस कर डाला। न जाने कितने निर्दोष यात्री, आत्मघाती पायलट बने अपहरणकर्त्ताओं व कार्यालय में काय करने वाले हजारों कर्मचारियों सहित इस हादसे में जान गंवा बैठे हैं। उनके शव अब कभी नहीं मिल पाएंगे। वे तो उस उच्च ताप में वाष्पीकृत हो गए, पूरी तरह कोयला बन गए, (चाक्टड) समाज इन हमलों के बाद एक प्रश्नचिह्न सारी मानवजाति के समक्ष लेकर आया है कि क्या विश्वास की इस तरह हत्या होगी? ईर्ष्या-द्वेष-नफरत के चलते तथाकथित विकास कितना ही कर लिया जाए, क्या ऐसा नहीं लगता कि हम ‘कम्प्यूटर एज’ की इस तकनीकी से भरी इक्कीसवीं सदी में और भी असुरक्षित हो गए हैं, एक तरह से सामूहिक आत्मघात की ओर बढ़ रहे हैं? हम किसी राष्ट्र को, इसकी विचारधारा को, उसके दर्शन को नहीं चाहते तो क्या यही एक तरीका बाकी रह गया है अपना आक्रोश जाहिर करने का? औद्योगिक, आर्थिक एवं वैज्ञानिक क्राँति के माध्यम से शिखर पर पहुँचने वाला विश्व इस तरह महाप्रलय की ओर बढ़ेगा, ऐसा किसी ने कभी सोचा था क्या?

क्या विश्वयुद्ध होगा?

कुछ भी हो, तृतीय विश्वयुद्ध हो, ऐसे आसार बन गए हैं, ऐसा अब सब मानने लगे हैं। अमेरिका ही नहीं, विश्व भर में हुई प्रार्थना सभाओं में सभी ने न केवल भाग लिया, आतंकवाद के खिलाफ अपनी एकजुटता भी प्रदर्शित की। लाखों भारतीय विदेश में रहते हैं, वहीं के नागरिक हैं वहीं की रक्तवाही नलिकाएं बन गए हैं अपनी प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं एवं पूरे विश्व के साथ न केवल प्रार्थना कर रहे हैं, मोमबत्तियाँ जला रहे तथा मृतात्माओं की शाँति की तथा आतंकवादी के समाप्त होने की कामना कर रहे हैं। असहायता से भरा एक गुस्सा सभी के चेहरों पर दिखाई देता है। यह तकनीकी तथाकथित उपभोक्तावादी समाज पर एक जमकर लगा तमाचा है एवं इस प्रहार ने सभी को अंतर्मुखी होने, जीवन-शैली बदलने एवं अब क्या कितना इस होड़ में इकट्ठा करना है, इस संबंध में सोचने पर विवश कर दिया है। विश्व एक परिवार बनना था, बन गया एक बाजार। उस बाजार की इस असमता से भरे एवं अपने-अपने विश्वासों को लेकर जी रहे छह अरब नागरिकों से भरे जमाने में यह फजीहत तो होनी ही थी। इसके बिना मनुष्य सीख भी कहाँ पाता है?

क्या कहते हैं भविष्यकथन?

फ्राँसीसी भविष्यवेत्ता माइकेल डी. नोस्ट्रेडेमस पुनः सुर्खियों में हैं। उन पर ढेरों किताबें लिखी जा चुकी हैं। पीटर नारी एक विशेषज्ञ के रूप में ‘हिस्ट्री ऑफ फ्यूचर’ सहित भविष्यवाणियों पर तीस से अधिक किताबें लिख चुकें हैं। यह किताब 1999 में प्रकाशित होकर 2000 में आई। औरों की तरह हमने भी उसके पन्ने पलटे। लगता है 11 सितंबर यह क्रूर दासताँ इस चिकित्सा भविष्यवक्ता ने अपनी ‘सेंचुरीज’ में प्रायः साढ़े चार सौ वर्ष पूर्व लिख दी थी। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध, नेपोलियन व हिटलर के आविर्भाव, दुनिया के कई प्रमुख नेताओं की हत्या, अकाल, भुखमरी, जापान में महाविनाश सहित तकनीकी प्रगति एवं इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक से ही उज्ज्वल भविष्य की भविष्यवाणी करने वाले नोस्ट्रेमस ने लगता है 11 सितंबर की इस काली सुबह का अहसास काफी पूर्व कर लिया था। वे लिखते हैं-

45 डिग्री अक्षाँस पर जल उठेगा आसमान आग इस नए महानगर की ओर बढ़ेगी अग्नि से वे उनके शहर को तबाह कर देंगे एक बेहिस और क्रूर हृदय खून की नदियाँ बहेंगी, किसी पर रहम नहीं होगा।

कविता की भाषा में लिखी गई यह भविष्यवाणी भावार्थ मात्र है, जो फ्रेंच में लिखी चतुष्पदी का अनुवाद है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह महानगर जिसका विवरण है, न्यूयार्क है। मानवता के लिए आतंक फैलाने वाला यह कौन है-तीसरा ईसा विरोधी (एंटीक्राइस्ट) जो लगभग विश्व को तीसरे विश्वयुद्ध में धकेल देगा, किस तरह का है, कहाँ का रहने वाला है, इस पर भी उन्होंने एक चतुष्पदी में संकेत किया है। नीली पगड़ीधारी इस खलनायक पर कई काया लगाए जा रहे हैं, अभी कुछ कहना कठिन है, पर इस स्तर पर पूर्वाभास बताता है कि व्यक्ति को पूरी खबर थी। एक बड़े लंबे युद्ध की इस प्रोफेट ने कल्पना की है, किन्तु यह भी लिखा है कि पूर्व से आने वाली शक्ति के माध्यम से दहशत मिटेगी, नई धरा उसके अधीन होगी एवं विश्व पर एक हजार वर्ष तक के लिए शाँति का साम्राज्य छा जाएगा। हजारों व्यक्तियों ने इन चतुष्पदियों का अर्थ अपनी समझ से, अपने स्वार्थों के साथ भी किया है, इसलिए इन शब्दों को हम उतना महत्व न भी दें, पर एक बात सुनिश्चित है कि परोक्ष जगत् ही नहीं प्रत्यक्ष जगत् आगामी एक दशक तक बड़े व्यापक परिवर्तनों से गुजर रहा है। इसमें आध्यात्मिक पुरुषार्थ का संपुट लगने की सर्वाधिक आवश्यकता है।

आस्तिकता का उभार

नोस्ट्रेडेमस की भविष्यवाणी वाली किताबों की बिक्री अनायास ही बढ़ गई है। धर्म के प्रति आस्था भी पूरे विश्व में अचानक बढ़ गई है। लोग चर्च जाने लगे हैं। प्रत्यक्षवाद पर विश्वास करने वाले भी अब भगवान की सत्ता को मानने पर मजबूर हो रहे हैं। आध्यात्मिक साहित्य की बिक्री बढ़ोत्तरी पर है। एक दूसरा पहलू यह कि साँप्रदायिक नफरत और भी बढ़ी ऐसे दिए जा रहे हैं, जिनसे इस प्रगति के चरम विकास पर पहुँची दुनिया को अनायास ही आग की झोंक में डाल देने की सी मंशा दिखाई देती है। भारत जो 1947 में तीन भागों में बंट गया, आतंकवाद का विगत 50 वर्षों में सर्वाधिक शिकार हुआ है। शाँति की बात करने वाला, अध्यात्म का संदेशवाहक हमारा राष्ट्र पश्चिमी, उत्तरी, पूर्वी सभी सीमाओं से ‘क्रास बार्डर टेररिज्म’ झेल रहा है। अभी भूखों को भी अनाज न दे पाने वाला, अन्न वितरण की सही व्यवस्था भी न बना पाने वाला, प्रतिवर्ष बाढ़ व सूखे तथा महामारी की चपेट में आ जाने वाला, विश्व की दूसरी बड़ी आबादी (102 करोड़), वाला यह देश समय-समय पर आतंकवाद के दहशती हिचकोलों से दहल जाता है। अराजकता जैसी स्थिति देती है। 11 सितंबर को विश्व साम्राज्य के एक बड़े स्तंभ पर हुए हमले ने तो अब इस आतंकवाद को वैश्विक बना दिया है एवं सभी के अस्तित्व पर एक प्रश्न चिह्न लगा दिया है।

किया क्या जाए? क्या सब कुछ समाप्त हो जाने की प्रतीक्षा की जाए? नहीं, गायत्री परिवार के अधिष्ठाता, संस्थापक, संरक्षक परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं, ‘भारत की महान भूमिका में जाने से पूर्व विश्वव्यापी महाभारत जैसी परिस्थितियाँ बनेंगी। जब अर्जित शक्ति के द्वारा सारा विश्व बहकने लगेगा। कुछ छिटपुट वारदातों के माध्यम से झड़पों के द्वारा विश्व का महाविनाश अल जाएगा। सद्बुद्धि का साम्राज्य होगा। विचारक्राँति ही सबके विचारों को बदलेगी और देखते-देखते सारा विश्व आध्यात्मिक भाव-प्रवाह में आबद्ध होता दिखाई देगा।’ परमपूज्य गुरुदेव 1965-66 से यह बात लिखते आ रहे हैं। हमने उनकी लिखी एक-एक भविष्यवाणी का विश्लेषण किया है एवं विगत 35 वर्षों में वे वैसी ही घटित होती चली गई है। चाहे वह स्कायलैब के गिरने के समय कराया गया सामूहिक साधनात्मक उपक्रम हो, चाहे 1980 में ‘जुपिटर इफेक्ट’ (वृहस्पति प्रभाव) के कारण आई प्राकृतिक विपदाओं की शृंखला, चाहे वह सौर कलंकों की बाढ़ हो एवं प्रकृतिगत विक्षोभों की शृंखला, पूज्यवर ने आध्यात्मिक पुरुषार्थों ही सर्वोपरि बताया। एक बीस वर्षीय महापुरश्चरण 1980 से 2000 तक चला। उसी को तीव्र वेग देकर 1981 से 2000 की अवधि में युगसंधि महापुरश्चरण नाम दिया गया एवं 2400 करोड़ प्रतिवर्ष गायत्री जप के माध्यम से वह संपन्न हुआ- महापूर्णाहुति गतवर्ष इसी माह की गई। संकट अभी टला नहीं है। यदि यह सब महापुरुषार्थ न चल रहा होता तो कुछ-का-कुछ हो गया होता। 01981 से 2000 का समय शीतयुद्ध की स्थिति में निकल गया। अब इस पुरुषार्थ के विश्वहितार्थाय और प्रखर किए जाने की आवश्यकता है।

प्रखर साधनात्मक पुरुषार्थ अनिवार्य

1986-87 वर्ष को परमपूज्य गुरुदेव ने युगचेतना के अभ्युदय की स्वर्ण जयंती वर्ष के रूप में मनाया था। उसी की हीरक जयंती इस वर्ष हम मना रहे हैं। इस क्रम में कई साधनात्मक उपचार कराए गए, साथ ही पूज्यवर की सूक्ष्मीकरण साधना के अनुयाज क्रम में जनवरी 1987 का अखण्ड ज्योति अंक ‘कुँडलिनी जागरण अंक’ (विश्वराष्ट्र कुँडलिनी) के रूप में तथा फरवरी 1987 का अंक इक्कीसवीं सदी विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ। फरवरी के इस अंक में विचारपरक पूर्वार्द्ध में पूज्यवर ने ‘हम विनाश की कगार पर खड़े हैं’ ‘सर्वनाश का एक ही कारण दुर्मति’ जैसे लेख लिखे तो उत्तरार्द्ध में जो क्रियापरक था, ‘विनाश की विभीषिकाओं का अंत होकर रहेगा’ ‘विश्वशाँति में भारत की भूमिका तथा परिवर्तन की अदृश्य किन्तु अद्भुत प्रक्रिया’ जैसे लेख लिखे। यह पूरा अंक आज घट रही घटनाओं का दस्तावेज है।

वे फरवरी 1987 की इस ‘अखण्ड ज्योति’ में लिखते हैं, ‘नवयुग के फलितार्थ होने की सही अवधि इक्कीसवीं सदी है। हमारी भविष्यवाणी का पहला आधार है- अदृश्य जगत् का वह सूक्ष्म प्रवाह, जो कुछ नई उथल-पुथल करने के लिए उद्गम से चल पड़ा है और अपना उद्देश्य पूरा करके ही रहेगा। दूसरा आधार है-हमारा निज का संकल्प जो किसी उच्चसत्ता की प्रेरणा से महाकाल की चुनौती की तरह अवधारित किया गया है। इस प्रयोजन में हमसे भी अधिक बड़ी और समर्थ सत्ता इस तूफानी प्रवाह को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है।’

विशिष्ट साधनाएं प्रस्तुत समय के लिए

वस्तुतः यह लोभ-मोह अहंकार प्रदर्शन का समय नहीं, विषम व विशेष समय है। यह समय साधनात्मक पुरुषार्थ को और प्रखर करने का है। इसी उद्देश्य से चेतना जगत् से आए प्रवाह ने अभियान साधना को इस वर्ष गुरुपूर्णिमा से आगामी कम से-कम एक या डेढ़ वर्ष तक चलाए जाने हेतु परिजनों को प्रेरित किया। लाखों परिजन उसमें एकजुट हो लग पड़े। अब प्रस्तुत समय हेतु कुछ विशिष्ट मंत्रजप एवं आहुतियों का भी अनुरोध किया गया है, जिनके बारे में विगत अंक में तथा प्रज्ञा अभियान पाक्षिक (1 व 15 अक्टूबर) में विस्तार से दिया गया है। साराँश यही है कि अपनी नियमित जप संख्या के साथ-साथ परिजन का एक माला अतिरिक्त शिव गायत्री मंत्र की तथा एक गायत्री मंत्र के साथ ‘क्लीं’ बीज मंत्र लगाकर करने का क्रम बना लें।

शिव गायत्री मंत्र हैं-’ॐ पञ्चवक्त्राय विद्महे, महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।’

महाकाल इस युग के देवता हैं, देवाधिदेव महादेव स्वयं इन परिस्थितियों से मोर्चा लेंगे। अधिक हो सके तो 3 या 5 माला का भावपूर्वक जप करें।

‘क्लीं’ बीज मंत्र के साथ जप इस तरह किया जाना है, ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं ऊँ।’ इसकी भी एक, तीन या पाँच माला का जप किया जा सकता है। जप के साथ यह ध्यान करें कि विश्वकल्याण हेतु हमारी भी एक छोटी-सी आहुति दी जा रही है। यह सूर्य के प्रभामंडल में जाकर उससे एकाकार हो रही है। हम भी उसी विराट ‘आँरा’ के घेरे में हैं, पूर्णतः सुरक्षित हैं।

निश्चित ही भविष्य उज्ज्वल है, होकर रहेगा। छोटे-बड़े इन झकोलों से विचलित न हों। परीक्षा की घड़ी है यह। हम सभी विश्वासी एकजुट होकर इसका मुकाबला कर लेंगे।


राह आदर्शों की

*समाप्त*