सबसे बड़ी भूल ‘मैं’ का होना है। ‘मैं’ से बड़ी भूल और कोई भी नहीं। परमात्मा के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है। साधना पथ का यही महा अवरोध है। जो इस अवरोध को पार नहीं करते, सत्य के मार्ग पर उनकी कोई गति नहीं होती।
सूफी फकीर बायज़ीद एक गाँव से होकर गुजर रहे थे। उनके एक मित्र साधु भी उन दिनों उसी गाँव में रह रहे थे। उन्होंने सोचा जब यहाँ से गुजर रहा हूँ, तो अपने मित्र से भी मुलाकात करता चलूँ। चलते-चलते पथ की थकान भी हो आयी थी। रात भी आधी हो चली थी। थकान भी मिटेगी, रात्रि विश्राम भी हो जाएगा और साथ ही मित्र से मुलाकात भी।
इसी चाहत में उन्होंने एक बन्द खिड़की से प्रकाश को आते देख द्वार खटखटाया। भीतर से आवाज आयी-”कौन है?” उन्होंने यह सोचा कि उन्हें तो अपनी आवाज से ही पहचान लिया जाएगा। कहा-’मैं’। लेकिन भीतर से कोई भी उधर नहीं आया। फकीर बायज़ीद ने बार-बार द्वार पर दस्तक दी, पर कोई उत्तर न आया।
अब तो ऐसा लगने लगा कि जैसे यह घर बिलकुल निर्जन है। उन्होंने जोर से कहा-”मित्र, तुम मेरे लिए द्वार क्यों नहीं खोल रहे हो और चुप क्यों हो गए?” भीतर से कहा गया-”भला यह कौन नासमझ है, जो स्वयं को ‘मैं’ कहता है; क्योंकि ‘मैं’ कहने का अधिकार सिवाय परमात्मा के और किसी को भी नहीं है।”
सूफी फकीर बायज़ीद को अपनी भूल का अहसास हो गया। उन्होंने तत्क्षण यह सत्य अन्तरतम की गहराइयों में अनुभव कर लिया कि जीवन की सबसे बड़ी भूल ‘मैं’ के सिवा और कुछ भी नहीं। प्रभु के द्वार हमारे ‘मैं’ का ही ताला है। जो उसे तोड़ देते हैं, वे पाते हैं द्वार तो सदा से ही खुले थे। ‘मैं’ मिटा कि प्रभु प्रकट हुए। ‘मैं’ की क्षुद्रता विलीन हुई कि परमात्मा की महानता आप ही अपनी सम्पदा बन गयी। इस सबसे बड़ी ‘मैं’ पन की भूल को जो सुधार लेता है वह जीवन के सत्य को पा जाता है।
यम−नियम अष्टाँग योग के प्रारंभिक चरण हैं। जिस तरह अक्षर−ज्ञान के बिना बालक के लिए पुस्तकों का पठन−पाठन असंभव है, उसी प्रकार योगाभ्यासियों के लिए यह दो अतीव महत्त्वपूर्ण सोपान हैं। इसमें प्रशिक्षित हुए बिना प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि जैसी उच्चस्तरीय कक्षाओं में प्रवेश शक्य नहीं। इसलिए साधकों को सर्वप्रथम स्वयं को इनमें प्रशिक्षित करना पड़ता है, तब कहीं आगे के विकास की बात बनती है।
यम पाँच है, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। अहिंसा को आमतौर से किसी प्रकार की जीव−हत्या न करना माना जाता है, पर यहाँ अहिंसा का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक और सूक्ष्म है। किसी प्राणी को मन, वचन या कर्म से किसी प्रकार पीड़ा पहुँचाना भी हिंसा है, अतएव योगमार्ग के साधकों को इन विधि−निषेधों का कठोरतापूर्वक पालन करना पड़ता है। योगसूत्र में व्यास जी ने कहा भी है—
“अहिंसा सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोहः।”
अर्थात् सभी प्राणियों के प्रति हर प्रकार से विद्रोह भाव का परित्याग करना अहिंसा है। यह अहिंसा जाति, देश या काल के कारण सीमाबद्ध हो सकती है। उदाहरण के तौर पर मछुआरे को लिया जा सकता है। मछली मारना उसका धँधा है और जीविकोपार्जन का साधक भी, अतएव इसमें जीव−हिंसा होते हुए भी वह उसे नहीं छोड़ सकता, पर अन्य किसी प्रकार की हिंसा में वह लिप्त न हो, तो उसकी यह अहिंसा जातिगत कारणों द्वारा सीमाबद्ध हुई मानी जाएगी। अनेक लोग केवल तीर्थों में जाकर इस नियम का पालन करते हैं, जबकि अन्य जगहों पर हिंसा का त्याग नहीं कर पाते। ऐसी अहिंसा देश द्वारा सीमाबद्ध होती है। कई लोग पर्व−त्यौहारों के दिन ही यह अनुबंध अपनाते हैं इसलिए यह काल द्वारा सीमाबद्ध अहिंसा हुई। इसके अतिरिक्त भिन्न−भिन्न अवसरों पर अपनाई गई अहिंसा भी सीमाबद्ध हो सकती है, यथा सैनिकों द्वारा युद्ध−मोरचे को छोड़कर अन्यत्र इसका परिपालन करना, किसी व्यक्ति द्वारा आत्मरक्षार्थ अथवा दूसरे की रक्षार्थ बन पड़ी हिंसा के अतिरिक्त और समय में इससे परहेज करना आदि, किंतु जो साधक हैं और साधना मार्ग पर सफलतापूर्वक बढ़ना चाहते हैं, उनके लिए संपूर्ण अहिंसा व्रत का अनुपालन करना ही अभीष्ट होना चाहिए। इससे उनमें एक विशिष्ट सिद्धि आ जाती है। पातंजल योगसूत्र में लिखा है,
“अहिंसाप्रतिष्ठायाँ तत्सन्निधौ वैरत्यागः।” (2/35)
अर्थात् अहिंसा की पूर्णता और स्थिरता होने पर साधक के संपर्क में आने वाले सभी प्राणियों की हिंसा−बुद्धि दूर हो जाती है।
मन, वचन और कर्म में एकरूपता को ‘सत्य’ कहते हैं। यह सत्य भी समय और परिस्थिति को देखते हुए ही बोलने का निर्देश है। देश के रक्षक यदि गोपनीय सूचनाओं को शत्रुओं समक्ष प्रकट कर दें, तो इससे राष्ट्र−रक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा, अस्तु ऐसे सत्य को न प्रकट करना ही सबके हित में है।,
कथा प्रसिद्ध है कि एक बार एक कसाई अपनी बूढ़ी गाय को ढूंढ़ते हुए एक निर्जन स्थान से गुजरा। वहाँ एक ब्राह्मण वेद पाठ कर रहा था। कसाई ने उससे अपनी गाय के बारे में पूछा, तो उसने वस्तुस्थिति को भाँपते हुए उसका गोलमोल उत्तर दिया। कहा, जिसने देखा है, वह बोलती नहीं और जो बोलती है, उसने देखा नहीं। इससे एक साथ दो प्रयोजन सधे। गाय की प्राण−रक्षा हो गई, जो कि सत्य बोलने से शायद न हो पाती और दूसरा उसके मिथ्या न बोलने के संकल्प का निर्वाह हो गया।
ऐसे ही कठोर सत्य को न बोलने का निर्देश है। यदि अंधे को अंधा और लँगड़े, को लँगड़ा कह दिया जाए, तो यह सत्य होते हुए भी अपमानजनक संबोधन है। इसे गाली समझा जाता है, अतः ऐसे वचनों का शास्त्रों में निषेध किया गया है।
साधनाकाल में जो साधक इस सत्य तत्त्व पर पूर्णरूपेण प्रतिष्ठित हो जाता है, उसकी वाणी साधारण नहीं रह जाती, वह फलदायी हो जाती है। ऐसा व्यक्ति जो कुछ भी सोचता, विचारता या बोलता है, वह फलिता होने लगता है अर्थात् वह वाक्सिद्ध हो जाता है। इसी की ओर संकेत करते हुए पातंजल योगसूत्र कहता है, ‘सत्यप्रतिष्ठायाँ क्रियाफलाश्रयत्वम्।’ (2/36) अर्थात् सत्य की प्रतिष्ठा होने पर वाणी और विचारों में क्रियाफलदान की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।
दूसरे की वस्तु को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी रूप में पाने की आकाँक्षा न करना—’अस्तेय’ है। इससे व्यक्ति की लोभ−लिप्सा पर अंकुश लगता और मन इतना अनुशासित बनता है, किसी बिगड़ैल घोड़े को साधने के समान है। इसलिए साधना पथ के पथिकों के लिए अस्तेय की महत्ता कम नहीं, अपितु सर्वाधिक है। देखा गया है कि अनेक बार अनेक साधक सिर्फ इसलिए मार्ग−च्युत हो जाते हैं कि उनका मन निरंकुश होता है। वह किसी वस्तु के प्रति कई बार इस कदर पागल हो उठता है कि उसकी प्राप्ति ही उसके लिए सर्वप्रमुख बन जाती है, जबकि साधना, जीवन का प्रधान लक्ष्य होते हुए भी गौण बनी रहती है। इस प्रकार साधक शनैः−शनैः साधना पथ से दूर हटते हुए अंततः उससे विलग हो जाता है। योगमार्ग से वह विलगाव ही योगभ्रष्टता है। इसी कारण से ऐसे साधक योगभ्रष्ट कहलाते हैं। शांडिल्योपनिषद् में अस्तेय को परिभाषित करते हुए कहा गया है,
‘अस्तेयं नाम मनोवाक्कायकर्मभिः परद्र्रव्येष निःस्पृहता।’ (अं. 1/1)
अर्थात् शरीर, मन और वाणी द्वारा दूसरों के द्रव्य की इच्छा न करना अस्तेय कहलाता है।
अस्तेय तत्त्व पर आरुढ़ साधकों में जो सिद्धि प्रकट होती है, उस बारे में पातंजल योगसूत्र का कथन है, ‘अस्तेय−प्रतिष्ठायाँ सर्वरत्नोपस्थानम्।’ (2/37) अर्थात् अस्तेय की स्थिरता होने पर साधक के पास सर्वदेशस्य रत्न आ उपस्थित होते हैं।
मन को ब्रह्म या ईश्वरपरायण बनाए रखना ही ब्रह्मचर्य है। योगसूत्र (व्यासकृत) में कहा गया है, ‘ब्रह्मचर्य गुप्तेन्द्रियस्योपस्थस्य संयमः।’ अर्थात् गुप्त इंद्रिय के संयम को ब्रह्मचर्य कहते हैं। शांडिल्योपनिषद् इसकी और सूक्ष्म व्याख्या करते हुए कहती हैं,
“ब्रह्मचर्य नाम सर्वावस्थासु मनोवाक्कायकर्मभिः सर्वत्र मैथुनत्यागः।”
अर्थात् सर्वावस्था में सर्वत्र शरीर, मन, वाणी द्वारा मैथुन का त्याग ब्रह्मचर्य कहलाता है।
शास्त्रों में मैथुन के आठ प्रकार बताये गए हैं—
स्मरणं कीर्त्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम्। संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्पत्तिरेव च॥ एतन्मैथुनमष्टाँगं प्रवदन्ति मनीषिणः। विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मुमुक्षुभिः॥
अर्थात् काम भाव से स्त्री का स्मरण, उसके साथ क्रीड़ा, उसका स्पर्श, उसके साथ एकाँत में वार्त्तालाप, मैथुन का संकल्प, उस संकल्प को पूरा करने के लिए उपाय करना और क्रिया पूरी करना या संसर्ग करना, ये मैथुन के आठ प्रकार मनीषियों ने बताए हैं। इसके विपरीत इन सबका त्याग ही ब्रह्मचर्य है।
किसी महत्त्वपूर्ण यात्रा के आरंभ करने से पूर्व जिस प्रकार पूँजी जुटानी पड़ती है, ताकि मार्ग व्यय एवं आहार जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके, ठीक उसी प्रकार कुछ विशिष्ट भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रयोजनों की सफलता के लिए शक्ति−संचय की जरूरत पड़ती है। यह ब्रह्मचर्य पालन द्वारा ही शक्य है। इस दौरान यदि ऐसा नहीं किया गया, तो सफलता की संभावना क्षीण हो जाती और परिश्रम निरर्थक चला जाता है। अध्यात्म मार्ग में आगे बढ़ने और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए तो यह निताँत जरूरी है कि इंद्रिय−संयम का पालन किया जाए, पर भौतिक कार्यों की सफलता में भी इसका योगदान असंदिग्ध है। इसके परिपालन से वाणी में ओज, चेहरे में तेज, आँखों में चमक, बुद्धि में प्रखरता, शरीर में शक्ति और कितनी ही प्रकार की अन्यान्य विभूतियाँ पैदा हो जाती हैं।
ब्रह्मचर्य सिद्ध कर लेने वाले साधकों के संबंध में पातंजल योगसूत्र कहता है,
‘ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायाँवीर्यलाभः’ (2/38)
अर्थात् ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा होने पर साधक को वीर्यलाभ होता है। वीर्य लाभ होने से साधना के अनुकूल गुण समूह पैदा होते हैं, जिससे योगाभ्यासी को आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
पूर्ण अपरिग्रह को प्राप्त साधक में काल−ज्ञान संबंधी सिद्धि आ जाती है। पातंजल योगसूत्र का इस संबंध में कथन है,
‘अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः।’ (2/39)
अर्थात् अपरिग्रह के स्थिर होने से जन्म−वृत्तांत का ज्ञान प्राप्त होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि पूर्व जन्म में हम क्या थे? कैसे थे? इस जन्म की परिस्थितियाँ ऐसी क्यों हुई एवं हमारा भावी जन्म कब, कहाँ, कैसा होगा? इस ज्ञान का उदय होना अपरिग्रह साधना द्वारा ही संभव होता है।
यम यम−पंचक की चर्चा हुई। इसी प्रकार नियम भी पाँच हैं। शौच, संतोष, तपस्या, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान−ये पाँच नियम हुए।
शौच ‘पवित्रता’ को कहते हैं। बाह्य और आँतरिक सुचिता, यह दोनों ही इसके अंतर्गत हैं। साधक को बाहरी स्वच्छता की ही तरह भीतरी पवित्रता का भी ध्यान रखना पड़ता है। जैसे−जैसे यह सधती जाती है, वैसे−ही−वैसे उसकी आत्मोन्नति होती जाती है। योगसूत्र (व्यास भाष्य) में ऋषि कहते हैं—
शौंच मुज्जलादिजनितं मेध्याभ्यवहरणादि च बाह्मम् आभ्यंतरं चित्तमलानामाक्षालनम्।
अर्थात् मृत्तिका एवं जल आदि से स्नान तथा पवित्र आहार यह बाह्य शौच हुए। चित्त की मलिनता दूर करने को भीतरी शौच कहते हैं। प्राणायाम एवं जप−तप द्वारा इसे दूर करना पड़ता है। जिसमें यह शुद्धि पूर्णरूप से प्रतिष्ठित हो जाती है, उसमें आत्मदर्शन की योग्यता आ जाती है। पातंजल योगसूत्र का स्पष्ट उल्लेख है, ‘शोचात्स्वाँगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।’ (2/40) अर्थात् शौच की स्थिरता होने पर निज अंग समूह के प्रति घृणा और परदेह संसर्ग की अनिच्छा होती है।
ईश्वरेच्छा से या प्रारब्धवश जब जो कुछ मिले, उसी से सुखी होना ‘संतोष’ कहलाता है। शाँडिल्योपनिषद् का भी ऐसा ही कथन है, ‘संतोषो नाम यद्रच्छालाभ संतुष्टिः’ संतोष से परम सुख की प्राप्ति होती है। असंतोष ही अशाँति और दुःख का कारण है। इसलिए साधकों को स्वल्प में संतोष का निर्देश किया गया है, ताकि वे साधना संक्राति को भलीभाँति पार कर सिद्धि−लाभ कर सकें। पातंजल योगसूत्र इस विषय में लिखता है, ‘संतोषादनुत्तम−सुखलाभः। (2/42) अर्थात् संतोष की पूर्ण उपलब्धि होने पर अनुपम सुख प्राप्त होता है।
कष्ट−सहन को ‘तप’ कहते हैं। जो व्यक्ति स्वेच्छा से सीमित साधनों में निर्वाह करे और प्रसन्न रहे, वह तपस्वी कहलाता है। दीन−दरिद्र स्वल्प साधनों में जीवनयापन करते हैं, फिर भी वे तपस्वी नहीं, कारण कि ऐसा वे निजी इच्छा से नहीं मजबूरीवश करते हैं। शास्त्रवचन है, ‘तपः द्वंद्व−सहननम् द्वंद्वश्च जिघत्सापिपासे, शीतोष्णे स्थानासने काष्ठमौनाकारमौने च व्रतानि चैव यथायोगं कृच्छूचाँद्रायणसाँतपनादीनि।’ (योगसूत्र व्यासभाष्य) अर्थात् द्वंद्व−सहन तपस्या है। भूख−प्यास, शीत−उष्ण, उठना−बैठना, काष्ठ मौन (अर्थात् इशारों से भी अपना अभिप्राय प्रकट न करना), आकार मौन (बात न करना), चाँद्रायण और साँतपनादि व्रत का अनुष्ठान इन्हें तपस्या कहा गया है। इनके सधने पर नानाप्रकार की सिद्धियाँ प्रकट होती हैं। इस संबंध में पतंजलि अपने योगसूत्र ग्रंथ में लिखते हैं, ‘कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः।’ (2/43) अर्थात् तप सिद्ध होने से अशुद्धियों का क्षय होकर देह संबंधी अणिमादि और इंद्रिय संबंधी दूरदर्शन, दूरश्रवण आदि सिद्धियाँ प्रकट होती हैं।
श्रेष्ठ ग्रंथों के अध्ययन और श्रवण को स्वाध्याय कहते हैं। इसकी पूर्णता से इष्ट देवता की उपलब्धि और साक्षात्कार होता है, ऐसा भगवान पतंजलि का कथन है, ‘स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः।’ (2/44)।
परमात्मा में समस्त कर्म अर्पित कर देने को ईश्वर प्रणिधान कहा गया है। जिसे इसकी उपलब्धि होती हैं, वह समाधि सुख का आनंद लूटता है। उसे सब अवस्थाओं में सर्वत्र ईश्वर−दर्शन होते हैं। कहा भी गया है,
‘समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्’ (पातं योग सू. 2/45)
यम−नियम के इन आरंभिक सोपानों को जो सरलता−पूर्वक पार कर लेता है, उसके लिए आगे की सफलता सुगम और सुनिश्चित हो जाती है एवं वह आत्मोपलब्धि को प्राप्त करता है, ऐसा योगशास्त्र के आचार्यों का कथन है।
बात उन दिनों की है जब अमेरिका में अब्राहम लिंकन राष्ट्रपति पद पर सुशोभित थे। उनके मित्रों ने एक सभा का आयोजन किया था, जिसमें लिंकन महोद को पहुँचना था। सभास्थल की ओर जा रहे थे कि अचानक उनकी दृष्टि गड्ढे की ओर गई, जिसमें एक सुअर का पिल्ला कीचड़ में फंसा निकलने का असफल प्रयास करता तड़प रहा था। वे तुरंत बग्घी से नीचे आए। गड्ढे में उतरे, कीचड़ तक गए और उस पिल्ले को बाहर निकाला। इस बीच कपड़े कीचड़ से सन गए थे, जिसकी उन्हें कोई परवाह नहीं थी।
सभा का समय भी हुआ जा रहा था। वे हाथ−पाँव धोकर सभा में विराजमान हुए। सबकी निगाहें उनके कपड़ों की ओर थीं और प्रश्नभरी जिज्ञासा और कुतूहल भी। सबकी जिज्ञासा को शाँत करते हुए लिंकन महोदय ने सहज भाव से मंच पर अपने भाषण में कहा, “वास्तव में पिल्ला तड़प रहा था इसलिए उसे बाहर नहीं निकाला, वरन् उसे तड़पते देखकर मेरा स्वयं का अंतःकरण तड़पने लगा था। अतः उसके लिए नहीं, बल्कि मैं अपने लिए गड्ढे में गया और उसे बाहर निकाल कर लाया।”
स्वप्नों की अगम-अंजानी दुनिया सदा से ही मनुष्य के लिए जिज्ञासा एवं कौतूहल का विषय रही है। क्योंकि स्वप्नों का रहस्यमय लोक, सामान्य जीवन की सीमाओं से परे निराला एवं अद्भुत होता है। और इसकी भाषा भी गूढ़, अस्पष्ट एवं साँकेतिक होती है। किन्तु स्वप्नों की उपयोगिता असंदिग्ध रूप से मनुष्य जीवन के लिए सदैव से स्वीकारी गयी है। मनुष्य का शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक संतुलन नींद में आने वाले स्वप्नों से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। यह तथ्य आधुनिक शोध प्रयासों द्वारा भी सिद्ध हो चुका है। चूँकि स्वप्न मनुष्य के अचेतन लोक से उभरते हैं, अतः इनमें निहित गूढ़ संकेतों को यदि समझा जाय तो ये जीवन की समस्याओं के समाधान में भी अचूक उपाय सिद्ध हो सकते हैं और व्यक्तित्व के संगठन एवं निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ कि स्वप्न नींद की रेम (रेपिड आई मूवमेन्ट) अवस्था में आते हैं। इस दौरान बन्द पुतलियों के पीछे आँखें यूँ घूमती रहती हैं, मानों वे किसी दृश्य का अवलोकन कर रही हों। इस दौरान मस्तिष्क उतना ही सक्रिय होता है, जितना कि हल्की नींद की अवस्था में होता है, जबकि शरीर की कोशिकाएँ विश्रामावस्था में होती हैं। इस दौरान बाह्य उत्प्रेरकों के प्रति संवेदनशीलता भी बहुत गहरी नींद के समान न्यून होती है।
अधिकाँश शोधार्थियों का मत है कि स्वप्न रहित नींद (नॉन रेम स्लीप) प्रधानतया शारीरिक विश्राम का क्षण होती है। इस दौरान रक्तचाप, हृदयगति, तापमान आदि सभी शारीरिक गतिविधियाँ मंद व शान्त होती हैं। और शरीर के अंतः अवयवों की कोशिकाओं का विकास अधिक तीव्र गति से होता है। इस तरह स्वप्न मुक्त नींद को प्रमुखतया शारीरिक जीर्णोद्धार के क्षण माना जाता है। यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनवर्ग के डॉ. आस्वाल्ड के अनुसार नॉन-रेम नींद शारीरिक कोशिकाओं व उतकों के विकास एवं पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है, जबकि रेम नींद मस्तिष्क में ऐसी ही गतिविधियों की स्थिति है।
प्रयोग के तहत पाया गया है कि रेम नींद के दौरान व्यक्ति स्वप्न को स्पष्टतः बता सकता है। रेम नींद के पाँच मिनट बाद व्यक्ति बहुत धुँधला चित्रण कर पाता है और दस मिनट बाद प्रायः भूल जाता है। रेम नींद प्रायः 20-30 मिनट के कालखण्ड की और नॉन-रेम नींद 60-90 मिनट के कालखण्ड की होती है। इस तरह 7-8 घण्टे की नींद के दौर में व्यक्ति पाँच-छः बार स्वप्नों के दौर से गुजरता है। विशेषज्ञों के अनुसार लगभग दो घण्टे की स्वप्न युक्त नींद मनःस्वास्थ्य के लिए महत्त्वपूर्ण मानी गयी है।
शोध के अंतर्गत, रेम नींद से वंचित लोगों को जगाने पर क्रमशः अधिक चिढ़-चिढ़ा, उद्विग्न एवं असंतुलित पाया गया है। साथ ही इनकी एकाग्रता में कठिनाई देखी गयी व कुछ तो मतिभ्रम (हेल्यूसिनेशन) तक से पीड़ित पाये गए। दिन में अतिरिक्त व दीर्घ स्वप्न खण्डों में इसकी क्षतिपूर्ति करने पर उन्हें पूरा करना था। नशों का सेवन करने वाले रोगियों में भी जो ठीक हो रहे होते हैं, रेम नींद की अधिकता देखी गयी है। मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्तियों में भी, जिनमें मस्तिष्कीय क्रियाशीलता असामान्य और क्षीण होती है, रेम नींद की अधिकता देखी गयी है। गहरी नींद के लिए प्रसिद्ध बिल्लियों में भी इस प्रयोग के अंतर्गत देखा गया कि कई दिनों तक रेम नींद से वंचित किए जाने पर उनमें कुछ बेहद अशान्त और उग्र हो गई और कुछ बेहद आरामतलब। फ्रेंच वैज्ञानिक डॉ. जॉबेट द्वारा रेम नींद से वंचित बिल्ली 20 दिन में मर गई थी। इस तरह स्पष्ट होता है कि स्वप्न मस्तिष्कीय स्वास्थ्य एवं मानसिक संतुलन में कितनी प्रभावी भूमिका निभाते हैं।
स्वप्नों की वैज्ञानिक आधार पर सर्वप्रथम व्याख्या प्रख्यात मनोवैज्ञानिक सिग्मण्ड फ्रायड ने की। वे इन्हें अचेतन मन का राजमार्ग बताते थे। स्वप्न विषयक इनके महत्त्वपूर्ण प्रयोग एवं निष्कर्षों का संकलन ‘द इन्ट्रप्रीटेशन ऑफ ड्रीम्स’ में किया गया है, जिसमें फ्रायड ने स्वप्न को व्यक्ति के अचेतन मन की इच्छाओं और आकाँक्षाओं की पूर्ति का माध्यम माना है। जो कि जागृति की चेतन अवस्था में सामाजिक दबाव या नैतिक कारणों से दमित रहती है।
‘इंडिविजुअल साइकोलॉजी’ के जनक एल्फ्रेड एडलर, फ्रायड के इस मत से सहमत नहीं थे, कि स्वप्न जीवन की अतृप्त यौन इच्छाओं की पूर्ति के माध्यम भर हैं। एडलर के अनुसार स्वप्नों का जन्म हमारे दैनिक जीवन की उलझी समस्याओं से होता है। और ये हमारी महत्त्वाकाँक्षाओं को साकार करते हैं। इनका सम्बन्ध हमारी चल रही समस्याओं या जिनकी हम आशा कर रहे हैं, उनसे हो सकता है।
प्रख्यात स्विस मनोविशेषज्ञ कार्लजुँग भी फ्रायड के इस मत से सहमत नहीं थे, कि स्वप्न मात्र दमित काम भावनाओं की तृप्ति व रुग्ण व्यक्तियों के उपचार का माध्यम भर है। जुँग स्वप्न को व्यक्तित्व के विकास के चरण के रूप में देखते थे, जो व्यक्ति को आत्म-बोध की प्रक्रिया में सहायता कर सकते हैं। ये भूत की जटिलताओं की अपेक्षा, वर्तमान जीवन व भावी संभावनाओं के संकेत होते हैं। जुँग के अनुसार स्वप्नों का सामान्य कार्य मनोवैज्ञानिक संतुलन कायम करना है। व्यक्ति का मन ऐसे स्वप्नों की रचना करता है, जो सूक्ष्म रूप से समूचे मानसिक संतुलन को पुनर्स्थापित करता है। अर्थात् स्वप्न केवल आकाँक्षाओं की पूर्ति का साधन भर नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति के संगठन एवं निर्माण की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है।
एरिक फ्राम के अनुसार स्वप्नों में हम बाह्य अनुभवों से प्राप्त ज्ञान का प्रयोग करते हुए अपनी अन्तःभावनाओं को व्यक्त करते हैं। उदाहरण देते हुए वे स्पष्ट करते हैं कि जिसे हम कायर मानते हैं वह हमारे स्वप्न में चूजे का रूप ले लेता है। इस तरह स्वप्न के प्रतीक दैनन्दिन जीवन की बजाए अंदर के तर्क का अनुसरण करते हैं।
स्वप्नों की विवेकसंगतता एवं तर्कशून्यता की विवेचना करते हुए, अमेरिकी विचारक थामस येन कहते हैं कि मन की तीन क्षमताएँ क्रमशः- कल्पना, स्मृति और गुण-दोष विवेचन जाग्रतावस्था में सक्रिय रहती है और निद्रावस्था में शिथिल हो जाती है। उनके मतानुसार ये क्षमताएँ जितनी अधिक सक्रिय होंगी, हमारे स्वप्न उतने ही विवेकपूर्ण होंगे और जितनी अधिक शिथिल होंगी, स्वप्न उतने ही तर्क-शून्य होंगे।
ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक क्रिस्टोफर इवान स्वप्नों की तुलना कम्प्यूटर प्रोसेसिंग से करते हैं। जैसे कम्प्यूटर स्वयं को सामयिक एवं उपयोगी बनाए रखने के लिए अपने प्रोग्राम को संशोधित करता है, उसी प्रकार मस्तिष्क स्वप्नों की प्रक्रिया द्वारा अंतःस्थिति का सुधार करता है, जिसमें उपयोगी एवं अनुपयोगी तत्त्वों की काट-छाँट होती रहती है।
मनोविज्ञान के जेस्टाल्ट सम्प्रदाय के अनुसार स्वप्न अचेतन मन की विषय वस्तु है। तथा व्यक्तित्व के अधूरे पक्षों को व्यक्त करती हैं। उचित रीति से इनका उपयोग कर व्यक्ति कुँठित ऊर्जा को मुक्त कर व्यक्तित्व का पूर्णता की ओर संगठन कर सकता है। जेस्टाल्ट थैरेपी के अंतर्गत इस कार्य को समूह में अंजाम दिया जाता है, जिसमें व्यक्ति स्वप्न की विषय वस्तु के अनुरूप व्यवहार (अभिनय) करता है और समूह से उसे आवश्यक पुनर्निवेशन (फीडबैक) मिलता रहता है।
इसी तरह ह्यूमन पोटेन्शियल मूवमेन्ट के विविध सम्प्रदायों के मनोविदों के अनुसार अचेतन मन स्वास्थ्य एवं रुग्णता दोनों का स्रोत है। और स्वप्नों को व्यक्ति की
रुग्णता के उपचार में तथा उसके विकास एवं निर्माण में प्रयुक्त किया जा सकता है। स्वप्नों की असंदिग्ध उपयोगिता के बावजूद इनकी भाषा एवं अर्थ को समझना सरल कार्य नहीं है। डॉ. फ्राँसिस मेनीज के अनुसार स्वप्न कितना भी छोटा या नगण्य हो, इसका एक निश्चित अर्थ होता है और इसके माध्यम से हम समस्याओं को हल कर सकते हैं।
अमेरिकी मनोविशेषज्ञ केल्विन हॉल ने इस संदर्भ में व्यापक शोध-अनुसंधान किया है। हजारों व्यक्तियों के स्वप्नों के विश्लेषण के आधार पर इनकी मान्यता है कि अधिकाँश स्वप्न दैनन्दिन स्थितियों और समस्याओं से जुड़े होते हैं और उनके अर्थ खोजने में कोई विशेष कठिनाई नहीं आती। हाल के अनुसार स्वप्न व्यैक्तिक दस्तावेज होते हैं। इन्हें स्वयं को लिखा एक पत्र भी कह सकते हैं। इनके अर्थ के विषय में महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इसे किसी स्वप्न के दर्शन या सिद्धान्त में नहीं खोजा जा सकता, बल्कि यह स्वप्न में निहित होता है। इसी तरह जुँग का मत था कि प्रत्येक व्यक्ति के स्वप्न की व्याख्या अलग-अलग होनी चाहिए, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वप्न उसके सार्वभौम अनुभव से व्यैक्तिक सम्बन्ध को प्रतिध्वनित करता है। हाल के अनुसार स्वप्न हमारे मन की सोच की तस्वीर है और इसे देखकर इसके अर्थ को जाना जा सकता है।
किन्तु केल्विन के अनुसार स्वप्नों की व्याख्या इन पाँच तथ्यों के प्रकाश में की जानी चाहिए। 1. मेरा अपने प्रति कैसा दृष्टिकोण है. 2. मेरा दूसरों के प्रति दृष्टिकोण कैसा है? 3. मेरा संसार के प्रति दृष्टिकोण क्या है? 4. मैं अपने मनोवेगों को कैसे देखता हूँ, 5. मैं अपने द्वन्द्वों को कैसे देखता हूँ। इन पाँच स्थितियों की स्पष्टता के अनुरूप ही स्वप्नों की ठीक-ठीक व्याख्या की जा सकती है।
मनोविद पर्ल के अनुसार अचेतन मन की विशालता को ध्यान में रखते हुए स्वप्न की व्याख्या का काम अत्यन्त जटिल और दुरूह है। और प्रत्येक स्वप्न की नाप-जोख स्वतन्त्र रूप से और व्यापकता के साथ होनी आवश्यक है। प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तु का भी मत था कि स्वप्न नींद द्वारा विकृत हमारी भावनाओं की गूँज होते हैं, अतः वे खण्डित एवं अबूझ होते हैं। अतः स्वप्नों की भाषा निराली होती है व अनुभव पर आधारित गहन, गम्भीर अवलोकन ही इनके संकेतों एवं रहस्यों का अनावृत्त कर सकता है।
इस तरह स्वप्न जहाँ शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य एवं संतुलन का प्रकृति प्रदत्त एक वरदान है, वहीं इनकी सही व्याख्या द्वारा अचेतन मन की अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाया जा सकता है। इस संदर्भ में प्रत्येक स्वप्न हमें नई जानकारी ही प्रदान नहीं करता, बल्कि यह एक ऐसा साधन भी है, जिसकी मदद से हम नए व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते हैं।
विशेष ज्ञातव्य
पिछले दिनों अमेरिका के “वर्ल्ड ट्रेड सेंटर” एवं “पेंटागन” पर हुए आतंकी हमले तथा उसकी प्रतिक्रियास्वरूप एक विश्वव्यापी संकट की सी स्थिति आ गई है। निश्चित रूप से आतंकवाद समाप्त होना चाहिए एवं विश्वशाँति का मार्ग प्रशस्त होना चाहिए। इसके लिए प्रयास सभी ओर से चल रहे हैं। आध्यात्मिक स्तर पर भी प्रयास हों, इसके लिए “शिव गायत्री” का मंत्र जप करे हेतु सभी परिजनों से कहा जा रहा है। यदि दैनिक या साप्ताहिक यज्ञ करते हैं, तो इस मंत्र की पाँच आहुतियों से विशेष हवन किया जाए तथा इस युग के देवता महाकाल से चहुँओर शाँति की प्रार्थना की जाए। साथ ही सभी परिजन, मण्डल, शाखाएँ एवं शक्तिपीठ अपने यहाँ दिवंगतों की शाँति हेतु एक यज्ञ करके आहुति अवश्य दें। मंत्र एवं दोनों आहुतियाँ नीचे दी जा रही हैं।
जप हेतु शिव गायत्री मंत्र−
ॐ पञ्चवक्त्राय विद्महे, महादेवाय धीमहि। तत्रो रुद्रः प्रचोदयात्॥
इस मंत्र से एक माला जप सभी साधक करें। एक माला क्लीं बीज मंत्र के साथ गायत्री मंत्र की करें। मंत्र इस प्रकार हैं−
ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं क्लीं ॐ।
अनिष्ट निवारणार्थ विशेष आहुति−
ॐ पञ्चवक्त्राय विद्महे, महादेवाय धीमहि। तत्रो रुद्रः प्रचोदयात् स्वाहा॥ इदं रुद्राय, इदं न मम।
दिवंगत आत्माओं की आत्मा की शाँति के लिए आहुति−
ॐ शत्रो मित्रः शं वरुणः शत्रो भवत्यर्य्यमा। शत्रऽइद्रों बृहस्पतिः शत्रो विष्णुरुरुक्रमः स्वाहा॥
इदं दिवंगतानाँ शान्त्यर्थ इदं न मम।
पुराने जमाने में लीडिया नामक देश का बादशाह ‘कारुँ’ अपने धन के लिए बड़ा विख्यात था। उसने इतना अधिक सोना, चाँदी, रत्न, जवाहरात आदि अपने खजाने में संग्रह किए थे कि संसार में अभी तक उसका नाम उदाहरण के रूप में लिया जाता है। एक बार यूनान का एक महात्मा सोलन उसके दरबार में गया। वहाँ पर बादशाह ने उसे अपना अपार धन दिखाकर पूछा कि “क्या संसार में मुझसे बढ़कर और कोई सुखी हो सकता है?” सोलन ठहरे तत्त्वज्ञानी। उनने कहा, “मैं तो उसी व्यक्ति को सुखी समझता हूँ जिसका अंत सुखमय हो।” यह सुनकर बादशाह ने नाराज होकर बिना विशेष आदर−सत्कार के सोलन को विदा कर दिया। कुछ समय बाद राजा साइरस ने कारुँ को हराकर कैद कर लिया और उसे मृत्युदंड दिया। जब वह जीवित जलाया जाने लगा, तो उसे महात्मा सोलन की बात याद आ गई और उसके मुख से ‘हाय सोलन’ ‘हाय सोलन’ ‘हाय सोलन’ शब्द निकले। साइरस के पूछने पर उसने सोलन वाली बात बतला दी। साइरस पर भी इस उपदेश का प्रभाव पड़ा और उसने कारुँ को प्राणदान दे दिया।
अद्वैत वेदान्त के प्रसिद्ध विद्वान् श्री मधुसूदन सरस्वती ने ‘अद्वैत-सिद्धि’ लिखी, पर इससे उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। बाद में उन्होंने ‘आनन्द मन्दाकिनी’ एवं ‘सरस भक्तिशास्त्र-भक्ति रसायन’ की रचना की और यह स्वीकार किया कि अब उन्हें सच्चा सुख मिला है। सचमुच भक्ति इतनी सरस एवं मनमोहक है कि बड़े-बड़े ज्ञानी एवं तपस्वी भी प्रेम एवं आनन्द के इस महासागर में एक बार ही सही डुबकी अवश्य लगाते हैं।
भगवान् को भी भक्ति ही सबसे ज्यादा प्रिय है। श्री रामचरित मानस में प्रभु स्वयं कहते है- ‘यदि लोक और परलोक दोनों में आप सुख पाना चाहते हों तो मेरी यह बात गाँठ बाँध लीजिए कि सबसे सुलभ व सुख देने वाला मार्ग मेरी भक्ति (ईश्वर भक्ति) ही है। इस भक्ति की शाश्वत महिमा वेदों और पुराणों में भी गायी है। जब तक ज्ञान मार्ग पर चलने की बात है वह बहुत ही कठिन है और उसे पाने में बड़ी-बड़ी बाधाएँ आती हैं। उसका साधन भी सरल नहीं है। तथा मन के लिए कोई आधार भी नहीं है। यदि बहुत तपस्या करने पर कोई ज्ञान प्राप्त कर भी ले, तो भी यदि उसके हृदय में भक्ति न हो तो वह मुझे तनिक भी प्रिय नहीं लगता। मुझे भक्ति ही अत्यंत प्रिय है। वही मुझे आकर्षित करती है। मेरा और भक्त का मिलन कराती है।’
भक्ति में कहीं कोई विधि-निषेध नहीं है। भक्ति में सबका समान अधिकार है। उसे किसी भी अवस्था में शास्त्र से निषिद्ध नहीं कहा जा सकता। भक्ति विशुद्ध रूप से भगवान् के प्रति अनुराग है और अनुराग में अधिकार भेद का प्रश्न ही नहीं उठता। जिसके हृदय में भी भगवान् के प्रति अनुराग का उदय होता है, मनुष्य से लेकर पशु-पक्षी तक सभी पवित्र हो जाते हैं। ‘नारद भक्ति सूत्र’ में स्पष्ट कहा गया है कि भक्तों में जाति, विद्या, रूप, कुल, धन, क्रिया आदि का भेद नहीं होता।
भगवान् की भक्ति सर्वात्मा की ही सेवा है। इसी से भक्ति करने पर सम्पूर्ण विश्व को तृप्त करने का फल मिल जाता है। भक्त में सारे सद्गुण निवास करते हैं। भक्ति में स्वयं भगवान् भक्त के प्रति आकर्षित होते हैं। इतना आकर्षण धर्मानुष्ठान, योगाभ्यास, विद्या, तपस्या एवं त्याग में नहीं है क्योंकि भक्ति केवल परिश्रम, जानकारी अथवा स्पर्श मात्र नहीं है। यह प्रेम है। हृदय की एकता है। कहा भी गया है-भक्तेः फलमीश्वरवशीकारः।
अर्थात्- भक्ति में भगवान् को वश में करने की सामर्थ्य है।
भक्ति के आविर्भाव के साथ ही सारी अज्ञानता एवं पाप नष्ट हो जाते हैं। भागवत् के ग्यारहवें स्कंध में स्पष्ट वर्णित है कि ‘जैसे प्रदीप्त अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है वैसे ही भगवद् भक्ति संचितादि पाप समूहों को संपूर्णतः भस्म कर देती है।’ पद्म पुराण में कहा गया है कि ‘ भक्ति से पाप के तीनों रूप- कूट, बीज और फलोन्मुख नष्ट हो जाते हैं। भागवत् के चतुर्थ स्कंध में बताया गया है कि इंद्रियों के संयम और मन को निर्विषय बनाने में ग्रंथिभेद नहीं होता, परन्तु भक्ति कर्माशय ग्रंथि को सर्वथा निर्ग्रंथ बना देती है।’
यदि भक्ति सच्ची हो तो उपास्य देव के प्रति प्रेम बढ़ता जाता है। ध्यान में उन्हीं की छवि खेलने लगती है। ऐसी प्रतीति होने लगती है कि वे सदा समीप हैं। अंत में यह अवस्था आती है कि अंदर-बाहर वही है और वही सबके हृदय में है। उन्हें छोड़ ब्रह्मांड में और कोई नहीं। मेरे अंदर वही है और मैं भी वही हूँ। जब भी किसी जीवात्मा को ऐसा अनुभव हो तो समझना चाहिए कि उस पर इष्ट देव की असीम अनुकम्पा हुई है। कहा भी गया है- ‘मुक्तिः ददाति कश्चित् न भक्तियोगम्’ अर्थात् स्वयं भगवान् भी भजन करने वालों को मुक्ति सुलभ कर देते हैं, पर भक्ति सबको नहीं देते।
ऐसे प्राणी को साँसारिक मोह-माया फिर नहीं बाँध सकती। उसके अंदर सत्य का प्रकाश ज्योतिर्मान हो उठता है। वह स्वार्थपरता छोड़कर अन्य जीवों का भला सोचता है। देखने में एक साधारण मनुष्य होते हुए भी उसकी अन्तःस्फूर्ति प्रभु के द्वारा जाग्रत् हो चुकी होती है। वह दिव्य शक्ति स्वयं उसका पथ-प्रदर्शक बनती है। अहंकार तो उसे छू भी नहीं सकता। ‘मेरा मुझमें कुछ नहीं जो कुछ है सो तोर’ का अपने-आप चिंतन होने लगता है।
सभी भक्ति दर्शन ईश्वर के प्रति परमानुरक्ति को ही भक्ति कहते हैं। अंगिरा ने स्नेह, प्रेम एवं श्रद्धा के अतिरेक से ईश्वर के प्रति अलौकिक अनुराग को भक्ति की संज्ञा दी है। अज्ञातकतृक भक्ति मीमाँसा में भक्ति को मन के ‘उल्लास विशेष’ का नाम दिया गया है। उनके मत में रस की समग्र सामग्री से भक्ति का आविर्भाव होता है इसलिए वह रस ही है। वह जन्य नहीं है स्वयं उल्लसित रस है। स्वामी हरिहरानंदारण्य भक्ति के दो भेद मानते हैं। प्रथम, जिसमें शान्ति होती है वह परा भक्ति होती है, द्वितीय गौड़ी भक्ति है।
यह सत्य है कि ईश्वर के प्रति परमानुराग ही भक्ति है। परन्तु यह प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है कि उसकी व्यावहारिक पहचान क्या है? हमारे ऋषियों ने इसकी कई पहचान बतायी हैं-
1. पराशर नंदन व्यास का अभिमत है कि सम्पूर्ण विश्व को परमात्मा का स्वरूप मानकर उसकी सेवा के रूप में वह अभिव्यक्त होता है।
2. शाण्डिल्य ऋषि का कथन है कि परम प्रियतम ईश्वर की जो भी वस्तु अपने को प्यारी लगे उसी में रम जाना भक्ति का लक्षण है।
3. गर्गाचार्य का मत है कि प्रभु के चरित्र, नाम गुण आदि का श्रवण और उनको गुनगुनाना प्यारा लगता है।
4. भारद्वाज ऋषि कहते हैं परमानन्द में मग्न होकर परमेश्वर की महिमा का वर्णन करना भक्ति है।
5. कश्यप ऋषि का मत है कि अपने सभी कर्म भगवान् को अर्पण करना भक्ति का लक्षण है।
6. देवर्षि नारद के अनुसार, अपना समग्र आचरण प्रभु को अर्पित कर देना एवं कभी भगवद् विस्मरण हो जाये तो परम व्याकुलता का अनुभव करना भक्ति का लक्षण है।
7. ब्रजवासियों ने अपनी मति, रति, गति, जीवन एवं प्राण भगवान् में लीन कर देने को भक्ति माना है।
भक्ति का अर्थ है श्रेष्ठता से प्रगाढ़ स्नेह। भक्ति में देवत्व के अनुरूप आत्म विस्तार की भावना का समावेश होता है। सच्चे भक्त में आदर्शों के प्रति प्रेम के साथ ही पिछड़ों को उठाने की सहज उत्कंठा भी होती है। उसके भीतर उमड़ने वाली श्रद्धा और करुणा कोरी भावना नहीं होती। अपितु उसकी यह विह्वलता अनेकों असमर्थों को अनुप्राणित करती है। विषधर को मणिमाला में, काँटों को फूलों में, लोहे को स्वर्ण में एवं विष को अमृत में बदलने वाली यह विनय रूपिणी भक्ति संतप्त मानव के लिए किसी अलौकिक औषधि से कम नहीं।
भक्ति मन की वह दशा है जिसमें देवत्व का माधुर्य, मानवी मन को प्रबल रूप से अपनी ओर खींच लेता है। जिसे यह प्राप्त होती है उसके अंतर्मन का हर द्वन्द्व मिट जाता है। सारे तनाव एवं संघर्ष समाप्त होकर मन की शक्ति में सिमट जाते हैं। मन के सारे विकार नष्ट हो जाते हैं एवं उदात्त भावों की सृष्टि होती है। मनुष्य ऐसे पुनीत वातावरण में स्वयं को परिवेष्टित करता है, जिसमें सारे अशुभ संकल्प-विकल्प तिरोहित हो जाते हैं।
आत्म समर्पण, एकाग्रता, निश्चलता, तीव्र उत्कंठा एवं दृढ़ श्रद्धा ही भक्ति को पल्लवित एवं पुष्पित करती है। भक्ति, भक्त के अंग-अंग, श्वास-श्वास से प्रकट होती है। भक्त का आचार, भक्त की शान्ति, भक्त की सेवावृत्ति, भक्त की सहज करुणा से सब स्वतः यह प्रकट कर देते हैं कि यहाँ भक्ति आ गई। अखण्ड को समझने के लिए स्वयं खण्ड-खण्ड होना पड़ता है। विराट् के आगे लघु बन जाना पड़ता है। भक्ति प्रवेश करती है दीनता के रूप में, प्रार्थना के रूप में। जब तक धन, रूप, वैभव, विद्या, पद का कुछ भी अभिमान अपनी पहचान का आकाँक्षी है तब तक भक्ति के रूप व ऐश्वर्य का आभास भी नहीं पाया जा सकता।
संत पलटू ने कहा है- ‘सीस उतारे हाथ से सहज आसिकी नाहिं’ अपने अन्तरतम के सिर को, अपने अहंकार को स्वयं ही काटना पड़ता है। इसे कोई दूसरा नहीं काट सकता। कोई अन्य उपाय नहीं है जिसके द्वारा इस भीतर के अहंकार को बाहर से काटा जा सके। वो अहंकार जो दूसरों की जरा सी चोट से तिलमिला जाता है। बदला और प्रतिशोध लेने को तैयार हो जाता है। इस अहंकार को स्वयं ही काट पाना निश्चित रूप से अत्यंत कठिन है।
समर्पण भक्ति की पहली शर्त है। समर्पण अर्थात् ‘मैं’ का विसर्जन। जिस ‘मैं’ के अहंकार को ज्ञानी व तपस्वी अंतिम कदम पर गिराते हैं, उसे भक्त को पहले ही कदम पर गिराना पड़ता है। जो यह सोचते हैं कि अपने को भी बचा लें और परमात्मा को भी पा लें निश्चय ही उसके लिए यह पथ महादुर्गम है।
सम्राट विजयकीर्ति की चहुँओर कीर्ति थी। उनके दान के सुसमाचार चारों दिशाओं में प्रसारित हो रहे थे। उनकी विनम्रता, त्याग, सादगी, सरलता आदि विविध गुणों की प्रशंसा करते लोग थकते न थे। इस अतुलनीय प्रशंसा का खाद-पानी पाकर उनके अंतर्मन में अहंकार का बीज अंकुरित हो चला था। हर रोज उनका विविध विधि पोषण होने से उसकी बढ़ोतरी का अन्त नहीं था। अब तो स्थिति यह थी कि परमात्मा से जितनी दूरी पर कोई मनुष्य हो सकता था, उतनी ही दूरी पर स्वयं सम्राट विजयकीर्ति खड़े थे।
सच्चाई यही है, मनुष्य की दृष्टि में ऊपर उठना जितना आसान है, परमात्मा के निकट पहुँचना उतना ही कठिन है। जो मनुष्यों की दृष्टि में ऊपर उठने का आकाँक्षी होता है वह अपने आप ही अनिवार्यतः परमात्मा की दृष्टि में नीचे गिर जाता है क्योंकि जो उसके बाहरी जीवन में दिखता है- ठीक उसके विपरीत ही उसके अंतस् में होता है। पर सामान्य जनों के चर्मचक्षु वहाँ तक नहीं पहुँच पाते। इसी कारण से वह आत्मवंचना में पड़ जाता है।
ऐसे में जरूरत स्वयं अपनी अंतःदृष्टि की होती है। क्योंकि इसके बिना सामान्य जनों की आँखों में बनने वाली अपनी प्रतिच्छवि का कोई मूल्य नहीं है। मूल्यवान तो बस वही प्रतिच्छवि होती है,जो स्वयं की अंतःदृष्टि के सामने अनावरित होती है। मनुष्य की वही मूर्ति और भी स्पष्टतर रूप में परमात्मा के दर्पण में प्रतिबिम्बित होती है। अत्यन्तिक रूप से व्यक्ति जो स्वयं के समक्ष है, ठीक वही वह परमात्मा के समक्ष भी होता है।
सम्राट विजयकीर्ति अपने यश की धुँध से घिर कर अपनी अंतःदृष्टि पूरी तरह से गंवा चुके थे। अब तो जैसे स्वयं के बारे में उनका कोई मत ही नहीं रह गया था। लोग जो कह रहे थे, उसी को वह सुन रहे थे, समझ रहे थे और मान भी रहे थे। सम्राट विजयकीर्ति की इस यश गाथा के बोझ तले उनकी आत्मा दबती गयी और दम तोड़ती गयी। कीर्ति बढ़ती गयी और आत्मा सिकुड़ती गयी। उसकी शाखाएँ फैल रही थी और जड़े निर्बल हो रही थी।
सम्राट विजयकीर्ति का एक अनन्य मित्र भी था। वह मित्र नगर का ही नहीं समूचे देश का धनकुबेर था। दूर-दूर से जैसी नदी, नाले, सागर की ओर दौड़ते हुए जाकर मिल जाते थे, वैसे ही धन की सरिताएँ उसकी तिजोरियों में। श्रेष्ठी विमलेन्दु के नाम से वह हर कहीं जाना जाता था। धनपति होने के बावजूद वह अपने सम्राट मित्र के ठीक विपरीत था। दान के नाम पर एक कानी कौड़ी भी उससे नहीं छूटती थी। उसकी बड़ी अपकीर्ति थी।
सम्राट विजयकीर्ति और श्रेष्ठी विमलेन्दु दोनों अब वृद्ध हो चले थे। एक अभिमान से भरा था, दूसरा आत्मग्लानि से। अभिमान सुख दे रहा था, जबकि आत्मग्लानि प्राणों को छेदे डालती थी। जैसे-जैसे सम्राट को मृत्यु निकट दिखाई पड़ती थी, वह अपने अहंकार को कस कर पकड़ते जाते थे। लेकिन धनपति की आत्मग्लानि अन्ततः आत्मक्रान्ति बनती जा रही थी। आखिर वह सहारा तो थी नहीं, उसे तो छोड़ना ही था।
लेकिन इस सम्बन्ध में एक सत्य यह भी था। कि आत्मग्लानि भी अहंकार का ही उल्टा रूप है। और इसलिए वह भी छूटती कठिनाई से ही है। प्रायः तो यह सीधी होकर स्वयं ही अहंकार बन जाती है। इसी कारण भोगी-योगी बन जाते हैं, लेकिन बुनियादी रूप में उनकी आत्माओं में कोई क्रान्ति कभी नहीं होती।
लेकिन श्रेष्ठी विमलेन्दु इस सबसे अलग आत्मक्रान्ति से गुजर रहा था। और इन्हीं पलों में वह अपने सद्गुरु के पास गया। उसने वहाँ जाकर कहा, मैं अशान्त हूँ, मुझे शान्ति चाहिए।
सद्गुरु उसकी दशा से परिचित थे। उन्होंने उससे कहा, जो धन तुम्हें शान्ति नहीं दे सका, उसे व्यर्थ क्यों ढो रहे हो।
श्रेष्ठी ने संकेत को समझा और अपने धन को लोकहित के कार्यों में लगा कर उल्टे पाँव लौट आया।
लेकिन सद्गुरु भी अद्भुत थे। उन्होंने उस दरिद्र श्रेष्ठी को अपने झोंपड़े से बाहर निकाल दिया। श्रेष्ठी विमलेन्दु चकित थे। वह सोच रहे थे कि पहले धन का संग्रह व्यर्थ था और अब उसका त्याग भी व्यर्थ गया।
वह उस रात्रि निराश्रित एक वृक्ष के नीचे सो रहा। उसका अब कोई सहारा न था, न साथी, न घर। न उसके पास संपदा थी, न शक्ति थी। न संग्रह था, न त्याग था। सुबह जागने पर उसने पाया कि वह अनिर्वचनीय शान्ति में डूबा हुआ था। सचमुच ही निराश्रित चित्त अनायास ही परमात्मा के आश्रय को पा लेता है।
वह भागा हुआ सद्गुरु के चरणों में गिरने को गया। पर यह यया समर्थ सद्गुरु तो पहले से ही उसे गले से लगाने के लिए द्वार पर खड़े थे।
सद्गुरु ने उसे हृदय से लगाते हुए कहा- पुत्र! धन छोड़ना आसान है, त्याग छोड़ना कठिन है। किन्तु जो त्याग का त्याग करता है, वही वस्तुतः धन भी छोड़ता है। धन का आश्रय हो, या त्याग का, आत्मग्लानि का आश्रय हो या अभिमान का। संसार का आश्रय हो या फिर संन्यास का। वस्तुतः जहाँ तक आश्रय है, वहीं तक परमात्मा तक पहुँचने में अवरोध है। सभी आश्रयों के टूटते ही परमात्मा का परम आश्रय उपलब्ध होता है।
सद्गुरु के इन वचनों को श्रेष्ठी से साधक बने विमलेन्दु ध्यानमग्न हो सुन रहे थे। सद्गुरु कह रहे थे- धन में आश्रय खोजा जाय अथवा फिर त्याग में। जब तक भी किसी आश्रय की खोज है- वह वस्तुतः अहंकार की ही रक्षा की खोज है। आश्रय मात्र छोड़ते ही, निराश्रय और असुरक्षित होते ही चित्त स्वयं की मूल सत्ता में निमज्जित हो जाता है। यही है शान्ति। यही है मोक्ष। यही है निर्वाण।
वह व्यक्ति जो न अब धनपति था, न दरिद्र था, उसे परम शान्ति के इन पलों में अपने मित्र सम्राट विजयकीर्ति का स्मरण हो आया। सम्राट इस समय मृत्यु शय्या में पड़े थे। श्रेष्ठी से साधक बने विमलेन्दु ने अपनी अनुभूति को सम्राट से कहा। बातें सम्राट की आत्मा को छू गयी। दीप से दीप जल उठा। अहंकार के पाश कटे। अब तक अहंकार के पाश में कसे बंधे सम्राट, इन पाशों के कटते ही परम शान्ति का अनुभव करने लगे।
अब दोनों मित्रों का अनुभव समान था। वे दोनों ही एक साथ कह उठे- दरअसल पाने के ख्याल में ही भूल है। हम दोनों ही उसके कारण ही खोए हुए थे। जो पाता है- वह तो पाया हुआ ही है। और अधिक पाने की इस बेवजह दौड़ में यही नित्य प्राप्त खो गया था। अब तो जो है, वही शान्ति है, वही परमात्मा है, वही मोक्ष है।
नेमिकुमार जी प्रसिद्ध जैन मुनि हुए हैं, तब युवा थे। विवाह हो रहा था। बंधु−बाँधवों एवं अभ्यागतों से भरे−पूरे घर में महोत्सव की घोषणा की जा रही थी। बारात निकाली जा रही थी। वहीं वर महाशय जी अपनी जीवनसंगिनी राजुल की सुखद कल्पना में खोए हुए थे। एकाएक पशुओं की चीत्कार सुनकर स्वप्न भंग हुआ और सारथी से पूछा, खुशी के इस क्षण में यह आर्तनाद कैसा? सारथी ने बताया, “कुमार! विवाह में शामिल म्लेच्छ राजाओं के भोज के लिए पशुओं का वध होना है, सो ठहात्, उन्हें बलपूर्वक लिए जाया जा रहा है।”
कुमार ने यह सुनकर आहत अनुभव किया। रथ रुकवाया उतरे और खुद पशुओं के पास जाकर उनके बंधन खोलने लगे। अपने हाथ का कंगन भी खोल डाला और वहाँ से निकल पड़े। बारातीगण मूकद्रष्टा बने रहे। अब वे बाहर−भीतर की सारी गाँठें खोलकर परम निर्ग्रथ हो गए। भोग से योग की ओर उन्मुख हो गए। सौभाग्यशाली राजुल भी दुल्हन का शृंगार उतारकर श्वेत वस्त्र पहने मुनि नेमिकुमार का अनुसरण कर जीवन के चरम फल की प्राप्ति के लिए गिरनार पर्वत की ओर बढ़ चली।
संगीत से स्वर्गीय आनंद एवं शाँति की सृष्टि होती है। इसके दिव्य सुरों में मन एवं हृदय अपने आप ही झूमने लगता है। वातावरण इसकी दिव्यता से आप्लावित हो उठता है। इसकी झंकार पेड़-पौधे को भी झंकृत कर देती है। प्रारंभ से ही भारतीय शास्त्रीय संगीत को उच्चस्तरीय विज्ञान माना जाता रहा है। आज के वैज्ञानिकों के आधुनिक अनुसंधान भी इसी बात की पुष्टि करते हैं। इसके अनुसार संगीत के सर्वाधिक प्रभाव मनुष्य के मस्तिष्क पर पड़ते हैं। सकारात्मक व सुन्दर संगीत से मस्तिष्क के सूक्ष्म तंतुओं में एक अनोखी हलचल होती है। जिससे स्मरण शक्ति, तनाव मुक्ति व अनेकानेक रोगों से सहज लाभ प्राप्त होता है। इससे पौधों की उत्पादक क्षमता भी बढ़ जाती है। सचमुच ही संगीत में नैसर्गिक आनन्द व जादुई चमत्कार भरे पड़े हैं।
‘कॉस्मिक मेमेरी नामक’ सुविख्यात शोध ग्रंथ में शीला ओरट्रेण्डर तथा लीन श्रेगर ने संगीत से मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन किया है। इस ग्रंथ में नाद ब्रह्म ॐ तथा ग्रेगेरीयन स्वर के प्रभावों का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है। डा. टोमेरीस ने इस क्षेत्र में अनेक शोध की है। डा. टोमेरीस का कहना है कि ॐ तथा ग्रेगेरीयन स्वर से मस्तिष्क अनायास शाँत एवं तनाव रहित हो जाता है। इसके उच्चारण से मस्तिष्क का कार्टेक्स इस ऊर्जा को समस्त शरीर में वितरित कर देता है।
डा. टोमेरीस का कहना है कि केन्द्रीय ग्रे न्यूक्लीआई कार्टेक्स में छोटी-छोटी इलेक्ट्रिक बैटरी के समान कार्य करते हैं। ये मस्तिष्क के ऊर्जा उत्पादन केन्द्र होते हैं। संगीत का स्वर इन्हें उच्च ऊर्जा स्तर से आप्लावित कर देता है।
संगीत जहाँ एक ओर मस्तिष्क को ऊर्जा से भर देता है वहीं उच्च आवृत्ति की ध्वनियों से इन्हें क्षति भी पहुँचती है। डा. अल्फ्रेड टोमेरीस के अनुसार 800 हर्ट्ज आवृत्ति की ध्वनि को 100 से 200 घंटे सुनने से मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ सकता है। इससे मस्तिष्क से सम्बन्धित सम्पूर्ण तंत्र को नुकसान पहुँच सकता है। भक्ति संगीत अथवा अन्य राग व शास्त्रीय धुन से यह तंत्र सतेज व सजग हो उठता है। इस प्रकार संगीत की ध्वनि कान के माध्यम से मस्तिष्क में आकर ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। कार्टेक्स इस ऊर्जा को समस्त कोशिकाओं में सम्प्रेषित करता है तथा मस्तिष्क व शरीर में संतुलन स्थापित करता है। संगीत कान व मस्तिष्क से सम्बन्धित साइव्रनेटिक सिस्टम को भी प्रभावित करता है। येन यूनिवर्सिटी के डा.विलियमसेन और लायड कुकने MEG (मैग्नेटीक ब्रेन मैपिंग) के आधुनिक अनुसंधान के तहत काफी अध्ययन किया है। इन्होंने संगीत द्वारा मस्तिष्क पर होने वाले विशिष्ट परिणामों का ग्राफ तैयार किया है। इनके अनुसार मस्तिष्क के विशेष क्षेत्र पर संगीत का भिन्न-भिन्न असर होता है।
संगीत से रोगों को भी ठीक किया जा सकता है। इस दिशा में साउण्ड थैरेपी अत्यन्त प्रचलित एवं लाभकारी सिद्ध हो रही है। ‘साउण्ड थैरेपी’ नामक पुस्तक की लेखिका पेट जुड्री के अनुसार संगीत से मनुष्य की सुषुप्त ऊर्जा को जागृत किया जा सकता है। उससे प्राण चेतना की अभिवृद्धि होती है तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता के बढ़ जाने से रोगों पर विजय प्राप्त की जा सकती है। साउण्ड थैरेपी में कान एण्टीना का कार्य करता है। इसके लिए दाएं कान को बाएं की अपेक्षा अधिक संवेदनशील माना जाता है।
शास्त्रीय संगीत का प्रभाव पेड़-पौधों पर आश्चर्यजनक रूप से देखा गया है। मिनीसोटा के डान कार्लसन ने संगीत पर कई सालों से लगातार शोध की है। कार्लसन स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भारतीय शास्त्रीय संगीत से पौधों में अतिशय वृद्धि व विकास होता है। इन्होंने एक प्रयोग किया। प्रयोग के दौरान इन्होंने कुछ विशेष पौधों का चुनाव किया तथा इनके पास एक ध्वनि प्रक्षेपक यंत्र द्वारा 5000 हर्ट्ज की शास्त्रीय स्वर प्रसारित की। एक माह के पश्चात किया गया अध्ययन अद्भुत एवं रोमाँचपूर्ण रहा। पौधों में श्वसन एवं खनिज पदार्थों का अवशोषण अच्छी तरह से हुआ। ध्वनि प्रसारण के समय छिड़काव किये गये खनिज पदार्थों के अवशोषण की दर 700 गुना अधिक हो गयी थी। कार्लसन ने अपने प्रयोग के निष्कर्ष स्वरूप भारतीय शास्त्रीय संगीत को पौधों की वृद्धि के लिए महत्त्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार पौधों की जीवनी शक्ति को बढ़ा देता है।
कार्लसन अपने फार्म में नित्य प्रति आधा घण्टा पौधों को शास्त्रीय संगीत एवं धुन सुनाते हैं। इसके पश्चात् जलीय पोषक पदार्थों का छिड़काव करते हैं। इसका परिणाम अत्यन्त उत्साहवर्धक एवं आशातीत रहा। संगीत के प्रभाव के कारण 99' पौधों में सामान्य से अधिक वृद्धि एवं विकास पाया गया। एक साढ़े चार इंच के पर्पल पेसन पौधे को रात्रि में उस पर जलीय पदार्थ के छिड़काव के समय ‘जेण्ट क्रिकेट म्यूजिक’ सुनाया गया। ढाई वर्ष में यह पौधा 14 फीट बढ़ गया, जबकि इसकी औसत लम्बाई 18 इंच ही होती है। संगीत द्वारा विकसित हुए इस पौधे के रिकार्ड का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड में भी उल्लेख है। संगीत के जादू ने अन्य पौधों पर भी असर डाला। पन्द्रह फुट के टमाटर के पौधे में 836 टमाटर का रिकार्ड उत्पादन, एक गुलाब की प्रत्येक डाली में 75 गुलाबों का गुच्छा, बीन्स, आलू, जैकोबा बीज की भी सामान्य आकार से 40' की अतिरिक्त वृद्धि दर्ज की गयी है। संगीत के असर से एक से पाँच माह के अवधि में तैयार होने वाली कई प्रकार की फसलें 20 दिन में ही तैयार हो गई। जेण्ट क्रिकेट की उच्चतर आवृत्ति के संगीत को वायलीन के ई तार के स्थान पर डी पर बजाने से रबर के पौधे वृक्ष जैसे बढ़ गये।
इस प्रकार कार्लसन ने पाया कि संगीत से पौधों में दुगुने से दस गुने तक विकास होता है। हवाई द्वीप समूह में मकदूनिया व एककेडो की फसल में 25 गुना वृद्धि हुई। हजारों वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग को सही पाया। संगीत का जादू ऊसर जमीन में भी अच्छी फसल उगाने में कामयाब हुआ है। इस पद्धति में रासायनिक खादों की विशेष आवश्यकता नहीं पड़ती। बीज व पौधे रोग प्रतिरोधक क्षमता से युक्त होते हैं। ग्रीन हाउस इफेक्ट पर आसानी से नियंत्रण करने में यह सहायक हो सकता है। अनेकों वैज्ञानिकों ने संगीत का स्वर सुनाकर पौधों के विकास व उत्पादन में आशातीत सफलता पायी है। कॉस्मिक मेमेरी में शला आस्केण्डर ने भारतीय शोधकर्त्ताओं का हवाला देते हुए लिखा है कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों को संगीत सुनाने पर इनकी वृद्धि दुगुनी हो जाती है। 5000 हर्ट्ज रेंज की संगीत ध्वनि पौधे एवं मनुष्यों में सकारात्मक असर डालती है।
संगीत का स्वर पेड़-पौधों पर प्रभाव डाल सकता है तो मनुष्यों पर क्यों नहीं डाल सकता है। डॉ. टोमेरीस की शोध से पता चलता है कि 4000 हर्ट्ज की ध्वनि मस्तिष्क कार्टेक्स को जल्दी रिचार्ज करता है। 5000 हर्ट्ज के शास्त्रीय स्वर में स्मरण शक्ति को बढ़ाने की क्षमता होती है। पेट जुड्री संगीत को स्वास्थ्य के लिए अनुकूल मानती है। वायलिन के ई तार से उत्पन्न 8000 हर्ट्ज रेंज की ध्वनि मस्तिष्क की संवेदनशीलता को बढ़ा देती है। पाइथोगोरस ने भी अच्छे संगीत को मन व विचारों के लिए सहायक माना है। यह तनाव, उदासी, हृदय रोग में भी लाभ पहुँचाता है। प्राचीन काल में साम गान के रूप में संगीत द्वारा रोग निवारण व प्राणशक्ति के अभिवर्धन के लिए अनेकों प्रयोग किये जाते थे। साउण्ड थैरेपी में 100 से 200 घण्टा या प्रतिदिन एक माह तक तीन घण्टा सुनाया जाता है। इससे मस्तिष्क कोशिकाएँ रिचार्ज हो जाती हैं। जूड्री के अनुसार इसके लिए मोजार्ट इफेक्ट के अलावा अन्य उच्च आवृत्ति के संगीत जैसे हैण्डेल, बीवाल्डी, बोकेरेनी, रोसिनी, टेलीमेन, हेडन, बच टेक्नोवेस्की आदि का प्रयोग किया जाता है।
क्रीस ग्रीसकाम ‘एकस्टेशीर इज़ ए न्यू फ्रीक्वेंसी’ नामक कृति में संगीत उपचार को तर्कसंगत ठहराते हुए कहती है कि संगीत इक्कीसवीं सदी के लिए वरदान साबित हो सकता है।
विज्ञान विदों के अनुसार संगीत से स्मरण शक्ति बढ़ती है तथा स्वास्थ्य में परिवर्तन होता है। आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी में हुई शोध के अनुसार संगीत का प्रभाव तुरन्त असरकारक होता है। एक प्रयोग में पाया गया कि कुछ महीनों में ही स्मरण शक्ति 24 प्रतिशत से बढ़कर 26 प्रतिशत हो गई। वैज्ञानिकों के पिछले तीस सालों के अध्ययन से पता चलता है कि स्लो बेरेक संगीत मानसिक सुकून तथा स्थिरता प्रदान करती है। इससे मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों के बीच साँयावस्था बनी रहती है। एक बीट प्रति सेकेण्ड का धीमा संगीत ब्लड प्रेशर को कम करती है। हृदय की धड़कन व मस्तिष्कीय तरंगों को नियमित व नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इस स्थिति में मानसिक दक्षता बढ़ी चढ़ी होती है। आजकल धीमे एवं शाँत संगीत का प्रचलन अधिक है। अच्छी नींद एवं आराम हेतु 60 बीट का टेम्पो सहायक होता है। कनास यूनिवर्सिटी के संगीत विशेषज्ञ एवं चिकित्सक जानेला हाफमेन का कहना है कि 60 बीट्स प्रति मिनट का टेम्पो संगीत हृदयगत बीमारी, माइग्रेन तथा रक्तचाप में कमी लाता है। रक्त चाप में 10 से 20 प्वाइंट कमी हो जाती है। इसका प्रयोग स्कूलों में काफी लाभदायक रहा। छात्रों के स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक दक्षता में अभिवृद्धि हुई।
संगीत उपचार और भी अनेक वैज्ञानिकों एवं संस्थाओं द्वारा हो रहा है। मोनरो इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड साइन्स के संस्थापक राबर्ट मोनरो ने इस क्षेत्र में कई प्रयोग व परीक्षण किये हैं। मोनरो ने हेमीसिंक पद्धति को उपयोग में लिया। इसमें हेडफोन के द्वारा बाएं कान को 300 हर्ट्ज तथा दाएं कान को 305 हर्टज का सिग्नल भेजा जाता है। इससे मानसिक ग्रहणशीलता में अतिशय वृद्धि होती है। सन् 1974 में दर्शन के प्रोफेसर डॉ. डेवन एड्रिंगटन ने टैकोया कम्यूनिटी कॉलेज में छात्रों पर हेमीसींक का प्रयोग किया। इससे लड़कों की स्मरण शक्ति व कार्यक्षमता में बढ़ोत्तरी हुई। मनोविज्ञान के छात्रों के अंकों के प्रतिशत में भारी वृद्धि हुई। टेकोया पब्लिक स्कूल के परीक्षा संयोजक ब्रूस आनाक्लेव की मान्यता है कि यह पद्धति मानसिक दक्षता के लिए आश्चर्यजनक परिणाम उत्पन्न कर सकती है। यहाँ पर लड़कों के अभिभावक, शिक्षक व अन्य लोग भी इस संगीत से अनेक प्रकार का लाभ प्राप्त कर चुके हैं। जापान में कोटो संगीत भी इसी प्रकार से लोकप्रिय होता जा रहा है।
डॉ. टोमेरीस के अनुसार तार वाद्य अन्य वाद्य यंत्रों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होते हैं। इसमें उच्च आवृत्ति की ध्वनि उत्पन्न होती है। वायलिन, मैंडोलीन, गिटार, सितार, वीणा आदि वाद्य यंत्र इसी श्रेणी में आते हैं। इन ध्वनियों से मस्तिष्क के न्यूरॉन्स ऊर्जान्वित हो उठते हैं। मीर जूनियर हाई, अनी अरुग तथा टाम अगोस्ती गीसलर ने अलास्का के अंकोरिज में सुपरलर्निंग संगीत का फ्रेंच व स्पेनिश अध्ययन करने वाले छात्रों पर प्रयोग किया। इससे प्राप्त निष्कर्ष अत्यन्त उत्साहवर्धक रहा। 85 प्रतिशत छात्रों में याद करने की क्षमता में वृद्धि हुई। मानसिक तनाव से ग्रस्त छात्रों को अच्छा लाभ मिला एवं उनके स्वास्थ्य में प्रगति हुई। उत्तरी अमेरिका सुपरलर्निंग के पायोनीयर डॉ. जीन बैंकक्राफ्ट ने टोरोन्टो यूनिवर्सिटी के स्केरबोरो कॉलेज में इसी प्रकार के कई परीक्षण व शोध किये हैं। इनके अनुसार संगीत से ध्यान में प्रगाढ़ता तथा स्मरण शक्ति में अभिवृद्धि होती है।
संगीत द्वारा मस्तिष्कीय तरंगों पर भी असर पड़ता है। सामान्य क्रम में EEG पर अल्फा 13 साइकिल प्रति सेकेण्ड, बीटा 13 साइकिल प्रति सेकेण्ड होती है। संगीत के प्रभाव से अल्फा में 6 प्रतिशत की वृद्धि, बीटा में 6 प्रतिशत की कमी देखी गयी है। मंत्रोच्चारण के समय अल्फा में अधिकता तथा बीटा में सामान्य बढ़ोत्तरी देखी गई। संगीत से पल्स 5 बीट्स प्रति मिनट कम हुई, जबकि मंत्रोच्चारण इसे और भी कम कर दिया। यह मानसिक दक्षता व शाँति की ओर संकेत करता है। ब्लड प्रेशर में औसत 4 डिवीजन मर्करी नीचे गिरा। शारीरिक व मानसिक शिथिलीकरण की स्थिति पाई गई। मंत्रोच्चारण से तो कई प्रकार के अद्भुत संकेत मिले हैं। रूस एवं पश्चिमी देशों में स्कूल, कॉलेज व सार्वजनिक स्थानों पर आदर्श धुनों का प्रचलन बढ़ रहा है। जिसका परिणाम आशाजनक एवं उत्साहवर्धक है। स्टीवन हार्ल्पन में स्पष्ट किया है कि संगीत वह जादू है जो शरीर, मन व भावना को प्रभावित करता है तथा अंतःकरण को पवित्र बनाता है। वैज्ञानिक अध्ययन के निष्कर्ष स्वरूप आज भारतीय शास्त्रीय संगीत व मंत्र गायन की उपयोगिता पूर्णतया निर्विवाद हो गयी है।
बात उस समय की है, जब स्वर्गीय डॉ. जाकिर हुसैन जामिया मिलिया में उपकुलपति थे। उनके एक परिचित सज्जन एक ऐसे छात्र को लेकर उनके पास आए, जो नवीं कक्षा में लगातार दो वर्षों से अनुत्तीर्ण होते आ रहा था। वे सज्जन अनुनय−विनय करने लगे कि वे अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग कर छात्र को उत्तीर्ण कर अगली कक्षा में दाखिल करा दें। डॉ. जाकिर हुसैन इस अप्रत्याशित आग्रह से ठगे से देखते रह गए। फिर बोले, “ठीक है आप चाहते हैं कि अपने खसूसी, अखत्यारात का गलत इस्तेमाल करूं, कोई बात नहीं है। वैसे आप दफ्तर से बी.ए. का एक फार्म ले आइए, मैं उसमें ही दाखिल करा देता हूँ, मेरे अख्त्यारात में यह भी है। गलत काम कराने आए ही हैं, तो बड़ा गलत काम क्यों नहीं कराते?” इस उलाहना भरे शब्द से वह सज्जन झेंप गए। छात्र सहित दोनों लज्जित हुए और क्षमा माँगकर फौरन अपनी राह ली।
श्री लालबहादुर शास्त्री जी ने अपनी निस्पृहता, सरलता, निःस्वार्थता, निष्कपटता और स्वयंसेवी वृत्ति के कारण अपनी एक अलग ही छाप लोगों पर छोड़ रखी थी। आत्मप्रशंसा से दूर रहते हुए आदर−सत्कार के कार्यक्रम को वे बराबर टाला करते। “आखिर आप टालते ही क्या रहते हैं?” अपने निकटस्थ मित्रों के यह पूछे जाने पर शास्त्री जी ने लालाजी (लाला लाजपतराय) बहुमूल्य संगमरमर पत्थर जिसका उपयोग गुँबज के लिए और यत्र−तत्र हुआ है, दूसरा एक नहीं। हमें जीवन में भी दूसरे प्रकार के पत्थर का ही अनुकरण करना चाहिए। अपनी प्रसिद्धि, प्रशंसा और आदर−सत्कार से हमेशा दूर रहकर सत्कर्म करते रहना चाहिए।” यही सीख मेरे जीवन में पेठ कर गई हैं और मैं उस नींव के पत्थर का अनुकरण करता रहता हूँ।
आज विश्व आतंकवाद की भीषण अग्नि में बुरी तरह झुलस रहा है। न केवल एक राष्ट्र बल्कि समस्त विश्व इसके क्रूर एवं निर्दयी बाहुपाश में छटपटा रहा है। आतंक, लूटपाट, अपहरण और कत्लेआम से सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है। आतंकवाद प्रतिदिन प्रातः बम के धमाके से प्रारंभ होता है और वीभत्स एवं हृदयविदारक नरसंहार को देख अट्टहास करता है, उत्सव मनाता है। आतंक का यह अंतहीन सिलसिला कहीं भी थमता नजर नहीं आता है। समाधान के स्वर विकट आतंक के इस दौर में उभरते भी हैं तो भी आशा की कोई किरण नजर नहीं आती है।
यह आतंकवाद विकृत एवं वीभत्स मानसिकता का परिचायक है। इसे आज की परिस्थिति में किसी भी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हिंसक, अलोकताँत्रिक, अमानवीय तथा अवैध तरीकों का प्रयोग कर मनुष्य में आतंक फैलाना ही आतंकवाद है। परन्तु यह इन बिन्दुओं में ही सिमटा हुआ नहीं है। आज इसे अनेक रूपों में देखा जा सकता है। कुछ संगठनों द्वारा भी यह जन्म लेता है और सत्ताधारियों की कोख से भी। यह कहीं धार्मिक संगठनों की हिंसक गतिविधियों के रूप में तो कहीं उग्र राजनीतिक विचारधाराओं के बीच हथियारबंद संघर्ष के रूप में तथा कहीं क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर मुखर हुए हिंसक गिरोहों के रूप में पनपता है। आतंकवाद भाषाई, साँस्कृतिक, धार्मिक व आर्थिक विषमताओं की प्रतिक्रिया स्वरूप जन्मे संगठनों के स्वरूपों में भी परिलक्षित होता है।
आतंकवाद का इतिहास कोई नया नहीं है। प्राचीनकाल से ही एक सशक्त कबीला अपने से दुर्बल एवं कमजोर कबीलों के प्रति हिंसात्मक कार्यवाही कर आतंक फैलाता रहा है। यह विकृत और हिंसक मानसिकता उसी काल से चली आ रही है। शान्ति, समृद्धि और विकास इसके दुश्मन हैं। हाँ उन दिनों इसकी प्रवृत्ति अपने लिए प्रचुर मात्रा में भौतिक शक्ति तथा सुख सुविधाएँ जुटाने के लिए थी। उसमें कोई स्पष्ट राजनैतिक उद्देश्य शामिल नहीं था। सामंतीयुग का आतंक आज के परिप्रेक्ष्य में इतना सुनियोजित एवं व्यवस्थित नहीं था। उस युग में विजेताओं द्वारा आतंक फैलाया जाता था और पराजित देश में भारी कत्लेआम किया जाता था। उन दिनों इसका उद्देश्य केवल आतंक का परचम फहराना था।
सामंती युग में भी तैमूर ने 1398 और नादिरशाह ने 1739 में अपने आक्रमण के दौरान दिल दहलाने वाला खूनी खेल व आतंक फैलाया था। परन्तु कम्बोडिया में 1979 में पालपोट द्वारा किये गये नरसंहार के पीछे आतंक और हिंसा की एक नई परिभाषा गढ़ ली गई थी। अब हिंसा का राजनैतिक आधार भी तैयार हो चुका था। इस आतंकवादी वहशीपन में 2 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। इसी तरह अमेरिकी सैनिकों ने वियतनाम में जो बर्बरतापूर्ण वारदातें की वह भी इसी कोटि की थी। इसमें एक विचारधारा को पराजित कर दूसरी विचारधारा की जबरन जड़ जमाना था।
उन्नीसवीं सदी के बाद और बीसवीं सदी के आरम्भ में जन्मे राजनैतिक और सामाजिक विचारधाराओं के संघर्ष ने आतंक के लिए सैद्धान्तिक आधार उपलब्ध कराया। यही संघर्ष आगे चलकर आतंकवाद में परिवर्तित हो गया।
बीसवीं सदी के राजनैतिक रंग के रंगने से पूर्व भी धर्म के नाम पर हिंसा और हत्या का खूनी खेल खेला जाता रहा है। परन्तु इस हिंसात्मक नरसंहार के मूल में धर्म विशेष को विस्तार देने या धर्म परिवर्तन की आड़ में अपनी सत्ता स्थापित करने तथा आर्थिक सम्पदा लूटने की प्रवृत्ति रही है। धर्म का सहारा तो मात्र उन्हें औचित्य प्रदान करना था। इसी वजह से सामंती युग का आतंक कोई वाद का आकार नहीं ले पाया था। जब इसमें राजनीति की निहित स्वार्थपरता एवं क्षुद्रता का समावेश हुआ तो यही आत्मघाती आतंकवाद का पर्याय बना।
यूँ देखा जाए तो आधुनिक आतंकवाद का इतिहास बीसवीं शताब्दी की शस्त्र सभ्यता के गर्भ से पैदा हुआ प्रतीत होता है। आतंकवाद की इस धारा को और अधिक पैना करने में बीसवीं सदी की कुटिल राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता ने अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। विश्व में समाजवाद और पूँजीवाद नामक दो परस्पर विरोधी विचारधाराएँ उभरीं। इनके सैद्धान्तिक और सत्तावादी संघर्ष हेतु घातक हथियारों की आवश्यकता पड़ी। और इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए आतंकवाद रूपी दानव को आमंत्रण किया गया। आज इस आतंकवाद ने स्वयं को अत्यन्त आधुनिकतम विनाशकारी अस्त्र-शस्त्रों से अलंकृत कर लिया है। इसके पास परमाणु या इसके समकक्ष हथियार होने से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।
इस महादैत्य के प्रश्रय एवं प्रसार के लिए पश्चिमी उपनिवेशवाद का प्रमुख हाथ है। पश्चिमी देशों ने अपनी आक्रामक गतिविधियों तथा सामरिक शक्तियों के सहारे अपनी सीमाओं को बेतहाशा बढ़ाया। उन्होंने विश्व के अनेक देशों को पराजित कर उन्हें अपने विस्तृत साम्राज्य में विलीन कर दिया। परन्तु जहाँ से उन्हें अपना विस्तार लपेटना पड़ा, उसे विकृत या विभाजित कर आतंकवादी और हिंसात्मक क्रियाओं के लिए अनुकूल वातावरण छोड़ गये। भारत और फिलिस्तीन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। अन्यथा पंजाब, कश्मीर और अरब आतंकवादी भला क्यों पैदा होते?
आतंकवादी हिंसा व हत्या को पैदा करने के लिए आधुनिक युग की दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। ये हैं समाजवादी दर्शन तथा पूँजीवादी लोकतंत्र। संसार विचारों के दो खेमों में बँट गया। समाजवादी पक्ष ने प्रचार एवं शक्ति के सहारे विश्व भर में अपने आपको फैलाना चाहा। दूसरी ओर पूँजीवादी लोकतंत्र ने उसके बढ़ते कदमों को रोकने के लिए बल प्रयोग का सहारा लिया। शीतयुद्ध इसी का परिणाम है। शस्त्रों की होड़ एवं उसके भारी उत्पादन के पीछे यही मुख्य कारण है।
हथियारों की इसी सर्वनाशी होड़ ने उग्रवाद को एक नयी पहचान दी। जो आज हिंसा, हत्या, लूटपाट मचाकर समस्त विश्व में फैल गया है। जर्मनी की रेड आर्मी तथा इटली के दक्षिण पंथी अराजक दल इसी शृंखला की एक कड़ी है। दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा के विरुद्ध पूँजीवादी खेमे की खड़ी की गयी गुप्तचर एजेन्सियाँ तथा अन्य विध्वंसक शक्तियाँ भी पूर्णरूपेण सक्रिय हो गई। जिन्होंने अपने मायावी व आततायी कुचक्रों में अफगानिस्तान, क्यूबा, वियतनाम जैसे देशों को फँसाकर तहस-नहस कर दिया।
आतंकवाद की यह खुली आँधी आज विश्व के हर कोने में फैली हुई है। खासकर अपना देश तो इस आग के दरिया में हिचकोले खाता नजर आ रहा है। विश्व के तमाम देशों में आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं और भीषण लूटपाट मचा रहे हैं।
जर्मनी में रेड आर्मी कुख्यात आतंकवादी संगठन है। इनकी हिंसात्मक वारदातों से पश्चिमी यूरोप के अनेक देशों में वर्षों तक आतंक व्याप्त रहा। रिवोल्दूरानी सैल तथा जर्मन एक्शन ग्रुप भी जर्मनी में तबाही मचाते रहे हैं। नियो आर्डर नामक आतंकवादी सरगना इटली के दक्षिण पंथियों का सबसे क्रूर और आक्रामक गुट माना जाता है। ब्लैक आर्डन नामक एक और आततायी ग्रुप ने रोम से म्यूनिख जाने वाली रेलगाड़ी को 1970 में बम से उड़ाकर सनसनी फैला दी थी। इन दक्षिण पंथी संगठनों के मुकाबले इटली में 22 अक्टूबर सर्किल तथा रिवोल्यूशनरी एक्शन मूवमेंट भी काफी चर्चित रहे। इसके अलावा इटली के रैड आर्मी एवं आर्म्ड प्रोलेटेरियन यूनिट भी बड़े खतरनाक गुट के रूप में जाने जाते हैं।
फ्राँस में डायरेक्ट एक्शन ग्रुप सबसे बड़ा आतंकी गुट है। यहाँ के दो अन्य दल इण्टरनेशनल रिवोल्यूशनरी ग्रुप और नापाम भी कुख्यात आतंकवादी संगठन है। साठ के दशक में भारी उत्पात मचाने वाले आततायी दल जापानीज रैड फ्रंट विश्व भर में कुख्यात है। अनेक बैंक डकैतियों, विमानों का अपहरण, पी.एल.ओ से मिलकर एयरपोर्ट काण्ड तथा दूतावासों पर हमले उसके खाते में दर्ज है।
यहूदियों ने फिलिस्तीन की धरती पर आकर अपना सबसे पहला संगठन यहूदीवादी कमीशन के नाम से बनाया था। 1920 में यहूदियों का एक और दल हागनाह के नाम से अस्तित्व में आया। 1940 तक यह सैनिक टुकड़ी के रूप में बदल गया। इसमें 40 हजार सशस्त्र उग्रवादी थे। इजरायल की स्थापना के उपरान्त प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियाला ने सन् 1951 में आतंकवादी दल हागनाह, हार्गुन तथा र्स्टन को आपस में मिलाकर एक गुप्तचर एजेंसी की बुनियाद डाली। आजकल यही माँसाद के नाम से जाना जाता है। 1966 में पूर्व सोवियत संघ में मिग-21 का अपहरण तथा जून 1967 में मिश्र की वायु सेना के जहाज पर अचानक हमला करके उसे ध्वस्त करना इसी के कारनामे थे। अब यह गुप्तचरी के क्षेत्र में विश्व विख्यात है।
यहूदियों द्वारा फिलिस्तीनी धरती पर किए गए अवैध कब्जे को हटाने के लिए अरबों ने कई संगठन बनाए। इसमें आतंकवाद के इतिहास में कई आयाम जुड़े। यासीर अराफात के नेतृत्व में पी.एल.आर फिलिस्तीन का सबसे बड़ा उग्रवादी संगठन रहा है। दुनिया की पहली महिला विमान अपहरणकर्ती लैला खानिद इसी गुट से संबंधित थी। यहाँ के अन्य दो आतंकी गुट अलफतहे तथा अबु निदाल अपनी क्रूरता के लिए बड़े ही कुख्यात हैं। फिलिस्तीन के अन्य चरमपंथी संगठन पापुलर फ्रंट फार लिबरेशन आफ फिलिस्तीन, अरब लिबरेशन फ्रंट वर्नेक सेप्टेम्बर, ब्लैक जून आदि हैं।
आर्मीनिया का सीक्रेट आर्मी फॉर द लिबरेशन ऑफ अमिर्निया एक भयानक आतंकवादी गुट है। असाला यहाँ का सबसे बड़ा उग्र पंथी है। स्पेन में सर्वाधिक खतरनाक गुट इबेरियन रिवोल्यूशनरी डायरेक्टेट ऑफ लिबरेशन है। इ.टी.ए के आतंकवादियों ने 1973 में स्पेन के प्रधानमंत्री लुईस ब्लाँकों की बम से हत्या कर सारे विश्व में सनसनी फैला दी थी। आयरलैंड में आई.आई.ए.पी.आई.ए.तथा आई.एम.एल.ए., एंग्री बिग्रेड अग्रणी उग्रवादी दस्ते हैं।
विश्व में सबसे पहले मानव बम का प्रयोग करने वाला एल.टी.टी.ई. श्रीलंका का सबसे खतरनाक उग्रवादी संगठन है। इसी ने भारत के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की मानव बम से हत्या करवा दी थी तथा श्रीलंका की राष्ट्रपति चन्द्रिका कुमार तुँगे पर बम से हमला कर घायल कर दिया था। इसने अपने खतरनाक मंसूबों से हजारों-लाखों लोगों को तहस-नहस कर दिया है।
अपना देश भी पिछले कई वर्षों से गंभीर आतंकवाद की चपेट में है।
उत्तरपूर्वी भारत में अल्फा बोडोलैंड, मीजो नेशनल फ्रंट आदि कई उग्रवादी गुट अभी भी सक्रिय हैं। नक्सलवाद से बिहार, आन्ध्रप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ झुलस रहा है। पंजाब में उग्रवादियों के खूनी खेल के थमते ही कश्मीर उस आग से धधक उठा। अब तो पहले कभी धरती का स्वर्ग कही जाने वाली इस वादी में प्रतिदिन बम के धमाकों के बीच क्षत-विक्षत फैले मानव के अंग, बिलखते-चीत्कार करती आवाजें सामान्य सी बात हो गई हैं।
कश्मीर में आतंकवाद की कमान पाकिस्तानी गुप्तचर एजेन्सी आई.एस.आई. के हाथों में है। हरकत उल अंसार, हिजबुल मुजाहिदीन, लश्करे तोयबा आदि आतंकवादी संगठनों में विदेशी भाड़े के कुख्यात आतंकवादी शामिल हैं। ये उग्रवादी संगठन सीधे पाकिस्तान से संचालित होते हैं। इन आतंकवादी गुटों पर पाकिस्तान हर साल अपने बजट से लगभग 8 से 10 करोड़ डालर खर्च करता है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में इन गुटों को खुला प्रशिक्षण दिया जाता है और चोरी छिपे कश्मीर में भेजा जाता है। चरारे शरीफ से लेकर कारगिल काण्ड तक के पीछे भी इस कुटिल आतंकवादी मानसिकता का ही परिचय मिलता है। जिसने केसर की महक और सुगंधित फूलों से भरी इस घाटी के जीवन को लहूलुहान कर दिया है। पिछले लम्बे अर्से से घाटी का जीवन मौत के सन्नाटे में गुम होकर रह गया है।
आतंकवाद किसी भी तरह का हो, आतंकवादी कोई भी हो, पर वे इन्सान और इन्सानियत के दुश्मन हैं। बेगुनाहों के खून से यदि कुछ मिल भी जाय तो वह कभी भी सुखद नहीं होगा। आतंकवाद की समस्या से निबटने का समाधान राजनैतिक से कहीं ज्यादा साँस्कृतिक है। साँस्कृतिक संवेदना ही आतंकवाद से बंजर होती जा रही धरती और देश को फिर से हरा-भरा एवं खुशहाल बना सकती है।
गुलाब से मधुमक्खी बोली, “तुम जानते हो कि एक−एक करके तुम्हारे सब पुष्प तोड़ लिए जाते हैं, फिर भी तुम पुष्प उत्पन्न करना बंद क्यों नहीं करते?” गुलाब ने हँसकर कहा, “देवि! मनुष्य क्या करता है, यह देखकर संसार को सुँदर बनाने के कर्तव्य से मैं क्यों गिरूँ?”
“बहन, फूल टूटने का दुःख कम है, दूसरों को प्रसन्नता बाँटने का संतोष अधिक महत्त्व का है।”
पुनर्जन्म भारतीय संस्कृति का मुख्य आधार है। भारतीय दर्शन शरीर को नश्वर एवं आत्मा को अमर मानता है। साँख्य के प्रथम सूत्र के अनुसार पुनर्जन्म के कारण ही आत्मा शरीर, इन्द्रियों तथा विषयों से संबन्ध जुड़ते रहते हैं। न्याय दर्शन के अनुसार जीव को सुख-दुःख के भोगों के लिये बार-बार एक शरीर से दूसरे शरीर में भटकना पड़ता है। इसलिये आद्य शंकराचार्य ने कहा है- पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्। आत्मा अपने पूर्व जन्म के प्रबल संस्कारों को लेकर पुनः शरीर धारण कर लेती है। इसी को पुनर्जन्म कहते हैं। मुक्तात्मा के अलावा शेष समस्त जीवों के लिये यह नियम लागू होता है। विगत संस्कार की प्रबलता ही अगले जन्म में प्रतिशोध, हिंसा अथवा सहयोग या प्रेम में परिलक्षित होती है।
तीव्र प्रतिशोध की दहकती ज्वाला जन्म-जन्मान्तरों तक सुलगती रहती है और इसका पीछा करती है। सन् 1950 की बात है। वाराणसी के शिवालाघाट मुहल्ले में भुवन मोहन गाँगुली रहते थे। गाँगुली महाशय उच्च कोटि के तंत्र साधक थे। उनके एक मित्र थे राखाल बाबू जो विधुर थे। उनकी इकलौती संतान था शशाँक। वह आसाम के चाय बागान में नौकरी करता था। शशाँक का विवाह एक सुन्दर सुशिक्षित कन्या नमिता से हुआ। शशाँक अपनी नौकरी में व्यस्तता के कारण केवल तीन बार ही वाराणसी आया था। नमिता स्वभाव से शाँत, सौम्य, सरल तथा धर्मपरायण थी। उसके इस गुण के कारण राखाल बाबू नमिता को अपनी बेटी के समान चाहते थे। पहले वे एक किराये के मकान पर रहते थे परन्तु नमिता के आग्रह पर उन्होंने उसी किराये के मकान को खरीद लिया। मकान इकतल्ला था उसमें कुल चार ही कमरे थे। दो सामने दो पीछे व बीच में बड़ा सा आँगन।
मकान पहले किसी मुसलमान सज्जन का था, परन्तु राखाल बाबू की इस मकान को खरीदने के पीछे एक और मंशा थी। उन्होंने कहीं से सुन रखा था कि मकान में अपार संपत्ति गड़ी हुई है। इस बात की पुष्टि गाँगुली महाशय ने भी कर दी थी। फिर क्या था योजनाबद्ध तरीके से अमावस्या की रात्रि को समस्त ताँत्रिक क्रियाओं को संपन्न करने के पश्चात् खुदाई शुरू की गई। लगभग दस-बारह फुट गहराई तक खोदे जाने के बाद पुरानी ईंटों की बनी सीढ़ियाँ दिखाई पड़ीं। वह सीढ़ी जहाँ खत्म होती थी वहाँ पत्थर के चौकोर चबूतरे पर कब्र बनी थी। इसके पास ही एक गुप्त दरवाजा दिखाई दिया जो कीलों और पेंचों से कसकर बंद कर दिया गया था। दरवाजा को तोड़ने पर पाँच फुट लंबा एवं चौड़ा एक कमरा मिला जो नमिता के कमरे के ठीक नीचे बना था। उस कमरे में लोहे का भारी संदूक रखा हुआ मिला। उसमें संपत्ति के नाम पर जादुई वस्तुएँ, बंदर का पंजा, खोपड़ी, काठ के भयंकर पुतले, ताँबे-पीतल की कुछ ताबीज आदि।
उसमें सुनहरे फ्रेम में जड़ी एक छोटी सी तस्वीर भी मिली। यह तस्वीर किसी तीस-पैंतीस वर्ष के नवयुवक की रही होगी। उस रहस्यमय संदूक के दूसरे दराज में चौड़ी सी एक डिबिया भी पायी गयी। उसके भीतर एक भोज पत्र में उर्दू में कुछ अंकित था। उसका भावार्थ था-जब तक कब्र में मेरी लाश की आखिरी कतरा तक सड़ गल कर मिट्टी में नहीं मिल जाएगी तब तक मेरी प्रबल इच्छा शक्ति का प्रभाव इस मकान में बना रहेगा। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी इसी प्रबल इच्छा शक्ति के प्रभाव से आकर्षित होकर शकीला इस मकान में किसी न किसी रूप में अवश्य आएगी। खुदाई के समय उस कमरे में मनोहारी सुगन्ध फैल गई थी। परन्तु इन समस्त रहस्यों का कोई समाधान नहीं मिल पाया और यह बातें रहस्यमय ही रही। कब्र पर मिट्टी डालकर सारे रहस्य को दुबारा दफना दिया गया।
इस घटना के तीन महीने बाद ही भयंकर वज्रपात हुआ। शान्त, सुशील स्वभाव वाली नमिता आत्महत्या कर बैठी और दफनाये सारे रहस्यों को अपने लिखे एक पत्र में छोड़ गई। नमिता के पत्र में उस घटना को कुछ इस तरह से व्यक्त किया गया था-सन् 1950 के मार्च माह में मकान खुदाई के समय मेरे कमरे में गुलाब जैसी सुगन्ध फैली और मैं मदहोश हो गई। अचानक रात्रि के समय मेरे पति शशाँक के आने से मेरा उत्साह द्विगुणित हो गया। वे अपने साथ एक लिफाफा तथा फल एवं मिठाइयाँ भी लाए थे, परन्तु वे दिन को कहीं अचानक गायब हो जाते थे एवं रात्रि को आते। यह क्रम चलता रहा। कुछ समय के पश्चात् मुझे मालूम हुआ कि ये मेरे पति नहीं हो सकते, परन्तु मैं अवश थी। एक रात एक डिब्बे में बेहद कीमती मोतियों का सुन्दर सा हार लेकर आये। मैं उस रात सजग हो उन्हें पूछ बैठी तो वह बताने लगा-मैं ही तुम्हारा पति हूँ। इसके पिछले जन्म में मैं ईरान का शाहनवाज था और तुम मेरी पत्नी थी। मैं तुम्हें याने शकीला को बहुत प्यार करता था। शकीला के कहने पर ही मैं उसे साथ लेकर हिन्दुस्तान घूमने आया। ठीक उसी दौरान मेरे एक मित्र अब्दुल कादिर से मेरी बीबी शकीला को प्यार हो गया। मैं इससे तंग आकर वाराणसी के इसी मकान को खरीद कर रहने लगा। कादिर भी शकीला के साथ वाराणसी आ गया। उन दोनों ने मेरी एक षड्यंत्र के तहत हत्या कर दी। मरते समय मैंने दृढ़ प्रतिज्ञा कर ली थी कि इस हत्या का बदला मैं शकीला से अवश्य लूँगा। इधर अब्दुल कादिर भी शकीला को छोड़कर चला गया। अन्त में वह वहाँ मर गई। शकीला को दफना दिया गया। उसकी कब्र वाराणसी के कब्रिस्तान में आज भी विद्यमान है।
नमिता आगे लिखती है-अपनी कथा सुनाने के बाद उस आत्मा ने मुझे हीरे-मोती और नीलम का बहुमूल्य हार उपहार स्वरूप देने के पश्चात् कहा कि-मेरा बदला पूरा हुआ। यह मेरी अंतिम भेंट है। इसके बाद परिस्थितियाँ अप्रत्याशित ढंग से परिवर्तित हुई। मानसिक प्रताड़ना का कुछ ऐसा सघन दौर आया कि मुझे यह आत्मघाती कदम उठाना पड़ा। मृत्यु के बाद नमिता के पास सचमुच ही वह कीमती हार बरामद हुआ। और यह बात भी प्रमाणित हुई कि यह नमिता ही पूर्व जन्म में शकीला थी। जिससे उस आत्मा ने अपना बदला चुकाया।
पुनर्जन्म और प्रतिशोध की एक और घटना वाराणसी में घटी। अवधबिहारी शर्मा की एक लड़की थी उषा। उषा इकलौती लड़की थी। वह सुँदर, आकर्षक एवं मृदुभाषिणी थी। ऊषा एम.ए. प्रथम श्रेणी में पास की थी। 22 साल की उम्र में उनका विवाह सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय से हो गया। सुरेन्द्र मुम्बई विश्वविद्यालय में प्राध्यापक था। शादी के तीसरे दिन वह मुम्बई वापस चला गया था। आवास के अभाव में अन्य आवश्यक कारणों से वह एक साल तक वाराणसी न आ सका। एक दिन अचानक ऊषा को तेज बुखार हो गया। इस घटना के बाद ऊषा को उसके कमरे में किसी से जोर-जोर से बातें करने की आवाजें आती थीं। ऊषा की माँ लीलावती देवी इस परिवर्तन से परेशान हो उठीं। ऊषा का शरीर भी पत्तों सरीखा पीला पड़ने लगा और वह हमेशा मुरझायी एवं उदासी सी रहने लगी।
ऊषा को वाराणसी के प्रसिद्ध तंत्र साधक भवानी शंकर भादुड़ी को दिखाया गया। भवानीशंकर ने ऊषा की इस विचित्र घटना को पुनर्जन्म से संबंधित बताया। एक जिन्नात किसी खास कारण से ही ऊषा के पास आता है। प्रेत को उर्दू में जिन्न कहते हैं। संभवतः यह जिन्नात ऊषा को परेशान करता है। एक रात ऊषा एक खण्डहर में चली गई तथा एक कब्र में लिपटकर रोने लगी।
उस समय कब्रिस्तान का एक बूढ़ा चौकीदार अब्दुल मजीद वहाँ मौजूद था। उसने ऊषा के घरवालों को जो बातें बतायीं वह चौंकाने वाली थी। करीब सौ साल पूर्व अपने जमाने के बड़े विलासी प्रकृति के कमाल साहब रहते थे। उनके पिता के पास बेशुमार दौलत थीं तथा इसके वे इकलौते वारिस थे। अपनी विलासी प्रवृत्ति के कारण कमाल साहब ने दालमण्डी की एक नर्तकी चमेली बाई पर अपनी सारी दौलत लुटा दी। परन्तु सब लूट लेने के बाद चमेली बाई ने भी कमाल साहब को छोड़ दिया। इसी मानसिक तनाव व दुरावस्था के बीच उनकी दर्दनाक मौत हो गई। इस घटना का जिक्र करते समय मजीद का ध्यान अपने कमरे में टँगे चमेलीबाई की फोटो की ओर गया जो ऊषा की चेहरे से एकदम मिलती थी। लगता था यह ऊषा की ही फोटो हो। भवानीशंकर ने तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा-कमाल साहब की प्रेतात्मा ही ऊषा से अपना प्रतिशोध ले रही है। उन्होंने बताया कि कर्मफल का अटल विधान ही पुनर्जन्म की प्रक्रिया को संचालित करता है। जीव अपने कर्मों के भुगतान के लिए बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र से गुजरता है। इससे छुटकारा तो तभी संभव है, जब वह सभी राग-द्वेष से ऊपर उठकर ईश्वर परायण जीवनयापन करें। आध्यात्मिक साधना ही जन्म एवं जीवन का एकमात्र समाधान है।
समय और समाज के संदर्भ में सजग रहकर नागरिकों के दायित्व बोध कराने की कला ही पत्रकारिता है। पत्रकारिता गीता की शुभ दृष्टि तथा गाँधी की समदृष्टि द्वारा व्यवहृत होती है। समान हित में सम्यक् प्रकाशन को पत्रकारिता कहते हैं। पत्रकारिता समाज को नवीन दिशा प्रदान करती हैं। इसने भारतीय स्वतंत्रता आँदोलन में त्याग और बलिदान का प्रखर स्वर फूँका। क्राँति की चिंगारी दावानल बनकर भड़क उठी। इसके पश्चात् देश के सामाजिक विकास; राजनैतिक स्थिरता, धार्मिक प्रखरता एवं अनगिनत आयामों में कई प्रकार का योगदान दिया। असत्य, अशिव और असुन्दर पर सत्यं,शिवं सुंदरम् का पावन शंखनाद ही पत्रकारिता है।
पत्रकारिता के विषय में अनेकों विद्वानों ने अपना आशय प्रकट किया है। श्रीरामकृष्ण रघुनाथ खडिलाकर ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘आधुनिक पत्रकला‘ में स्पष्ट किया है कि ज्ञान और विचार का शब्दों तथा चित्रों के रूप में प्रचार-प्रसार ही पत्र कला है। बाद में इसका दायरा बढ़ गया। पत्रकारिता अंग्रेजी के जर्नलिज्म शब्द से प्रयुक्त होता है। इसका शाब्दिक अर्थ है दैनिक। 17 वीं एवं 18 वीं शताब्दी में इसके लिए लेटिन शब्द डियुरनल और जर्नल शब्दों का प्रयोग हुआ। 20 वीं सदी में इसके अंतर्गत गंभीर समालोचना और विस्तारपूर्ण प्रकाशन का समावेश किया गया। एनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका इसे समाचारों का संकलन, प्रसार, विज्ञापन की कला एवं पत्र का व्यावसायिक संगठन मानता है। इसमें समसामयिक गतिविधियों के संचार से सम्बन्धित सभी साधन चाहे वे रेडियो हो या टेलीविजन समाहित है।
जैसे-जैसे जीवन की विविधता और नूतन साधनाओं का विकास हुआ पत्रकारिता का दायरा भी बहुआयामी होता गया। इसका विविध आयामी स्वरूप झलकने लगा। इसके पश्चात् पत्रकारिता इन रूपों में आने लगी- अनुसंधानात्मक पत्रकारिता आर्थिक, ग्रामीण, व्याख्यात्मक, विकास, संदर्भ, संसदीय, खेल वृत्तांत, रेडियो, टेलीविजन, फोटो, सर्वोदय पत्रकारिता। हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास को झाँकने पर स्पष्ट होता है कि यह मुख्य रूप से तीन कालखण्डों में विभक्त हुई हैं-
1.उद्भव काल (उद्बोधन काल)-1826-84
2.विकास काल
(क) स्वातंत्र्य पूर्वकाल-1. जागरण काल (1885-1919)
2. क्रान्ति काल (1920-1947)
(ख) स्वातंत्र्योत्तर काल-नवनिर्माण काल (1948-74)
3.वर्तमान काल (बहुद्देशीय काल) 1975 से अब तक
परन्तु पत्रकारिता का इतिहास इससे भी प्राचीन है। आरम्भ में संत, फकीर, सूत, मागध, भाट और चारण आदि को पत्रकारों की श्रेणी में रखा जा सकता है। महर्षि नारद तो पत्रकारों के आदि पुरुष थे। कई विद्वानों ने पवन पुत्र हनुमान को पत्रकारों का अग्रज घोषित किया है। महाभारत के युद्ध में संजय की रिपोर्टिंग कुशल पत्रकार का परिचय है।
ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी में रोम में संवाद लिखे जाते थे। ईस्वी पूर्व 60 में रोमन साम्राज्य में जूलियर सीजर के हस्तलिखित तीन पत्र प्राप्त हुए हैं-एकता डायनी, एकता सिनेट्स तथा एकता पब्लिक। इससे राज्य प्रशासन की गतिविधियाँ छापी जाती थीं। प्राचीन समय में शिलाखण्डों, स्तम्भों अथवा मंदिरों में घोषणाएँ खुदवाई जाती थीं। अशोक के शिलालेख समाचार पत्रों का प्रारंभिक सोपान है। महान् राजनीतिज्ञ चाणक्य ने राजा चंद्रगुप्त को पटु गुप्तचरों की नियुक्ति की सलाह दी थी। आइने ए अकबरी में अबुल फजल ने उद्धृत किया है कि एक न्यूज लेटर संस्था मुगल राजाओं से पूर्व ही भारत में स्थापित थी। हर जिले में न्यूज राइटर होते थे। यह प्रथा मुगल सम्राट् औरंगजेब के समय में और भी विस्तृत और व्यवस्थित हुई। उस समय वाकयानवीस (संवाद लेखक), खुफियानवीस (गुप्त लेखक) और सवानहनवीस (जीवनी लेखक) प्रचलित थे। समाचार प्रेषक का कार्य धावकों, कारवाँ उवं हरकारों द्वारा होता था। बहादुरशाह के कार्यकाल में सिराजउल अखबार हस्तलिखित निकला। मान्यता है कि अवध के सुलतान ने 660 अखबारनवीसों की नियुक्ति की थी।
आधुनिक पत्र एकता डिअर्ना तथा चीन के पीकिंग गजट से पत्रकारिता का प्रारंभ माना जाता है। समाचार पत्रों की शुरुआती स्वरूप नीदरलैंड के न्यूजाइटुँग (1526) में मिलता है। सन् 1615 में जर्मनी में फैंकफुटैर जर्नल, 1631 में फ्राँस से गजट द फ्राँस, 1667 ई. में बेल्जियम से गजट बैन गाट, 1666 ई. में इंग्लैंड से लनुन गजट और 1690 में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से पब्लिक आँकरेन्सेज का प्रकाशन हुआ। भारत के गोवा में 1550 में मुम्बई से 1662 में, 1772 में मद्रास तथा कलकत्ता में 1779 उसे पत्रकारिता का प्रादुर्भाव हुआ। हिकीज गजट (1780), बंगाल जर्नल (1784) और इण्डियन वर्ल्ड (1791) कलकत्ता से प्रकाशित हुआ।
भारतीय पत्रकारिता को सम्यक् रूप से प्रारंभ करने वाले राष्ट्रीय नवजागरण के पुरोधा राजा राममोहनराय थे। इन्होंने ब्रह्मनिकल मैगज़ीन का प्रारंभ किया। दिसम्बर 1821 में सती प्रथा का विरोध और स्त्री शिक्षा के प्रसार के लिए बंगला साप्ताहिक ‘संवाद कौमुदी’ को निकाला। इसके अधिक व्यापकता के लिए उन्होंने फारसी में ‘मिराज उल अखबार’ का भी प्रकाशन किया। 30 मई 1926 को उदन्त मार्तण्ड के रूप में हिन्दी पत्रकारिता का उद्भव हुआ। इसके अग्रदूत थे हिन्दी पत्रकारिता के मनु पं. युगलकिशोर सुकुल। इसके बाद राजाराममोहन राय, केशवचंद्र सेन, बहादुरशाह जफर, स्वामी दयानंद सरस्वती के नेतृत्व में पत्रकार दल गठित हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य था भारतीय दुर्दशा को रेखाँकित करना। पत्रकारों ने प्रेस अधिनियम 1857 और ग्रेटिंग प्रेस एक्ट 1878 जैसे काले कानूनों की परवाह नहीं की।
सन् 1826 से 84 की अवधि में पत्रकारिता ने नूतन ज्ञान और विचार के प्रचार करने के साथ भारतीयों में स्वाभिमान का संचार किया। इसे उद्भव या उद्बोधन काल भी कहा जाता है। उदन्त मार्तण्ड, बंग दूत, समाचार सुधावर्षण, बनारस अखबार आदि ने देश में राष्ट्रीय चेतना का बीजाँकुर किया। भारतेन्दु मण्डल में हिन्दी, हिन्दू हिन्दुस्तान ने क्रान्ति का उफान खड़ा कर दिया।
हिन्दी के प्रथम पत्र के लिए मतान्तर है। कोई उदन्त मार्तण्ड को प्रथम पत्र मानता है, तो कोई दिग्दर्शन को। 1818 में दिग्दर्शन हिन्दी मासिक पत्रिका का संस्करण निकलने लगा। यह विद्यालय अधिकारियों तक ही प्रसारित होता था। इसके विपरीत उदन्त मार्तण्ड सबके लिए सुलभ था। इसमें क्षेत्रीय राष्ट्रीय समाचार आदि ज्वलन्त विषयों को प्रकाशित किया जाता था। इसका प्रकाशन काल 30 मई 1826 को माना जाता है। श्री युगलकिशोर सुकुल ने इस साप्ताहिक का प्रकाशन कलकत्ते के कोलूटोला से किया। भारतीयता के उन्नायक राजाराममोहनराय ने ‘बंगदूत’ द्वारा जनता को जगाने का प्रयास किया। श्री बृजेन्द्र नाथ वंदोपाध्याय ने जून 1834 को प्रजामित्र का प्रकाशन किया। 1844 में ग्वालियन शासन द्वारा ग्वालियर अखबार का प्रकाशन हुआ।
राजा शिवप्रसाद सितारहिन्द के प्रकाशन एवं गोविन्द रघुनाथ के संपादन में सन् 1845 को बनारस अखबार निकला। यह समसामयिक समस्या को जिक्र करता था। शेख अब्दुलका ने शिमला से 1848 ई. में शिमला अखबार का प्रकाशन प्रारंभ किया। इसका संपादन सुरुचिपूर्ण था। मालवा अखबार, 1 जनवरी 1848 में इन्दौर से पं. प्रेमनारायण के संपादन में प्रकाशित हुई। मध्यप्रदेश में हिन्दी पत्रकारिता को प्रारंभ करने का श्रेय इस पत्र को जाता है। पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने 1844 और 1849 में मार्तण्ड, ज्ञान दीपक और जगदीपक भास्कर नामक पत्रों के प्रकाशन की चर्चा की है। मार्तण्ड साप्ताहिक पाँच भाषाओं का प्रतिनिधित्व करता था। इसमें भाषाओं के विकास में सहायता मिली।
उद्बोधन काल के द्वितीय चरण (1867 से 1884)में भारतीय नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्दु हरिश्चंद्र की पत्रकारिता मण्डली ने भारतीय जन को आलोकित एवं आँदोलित किया। इस मण्डल में सर्वश्री बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, प्रेमधन, अदिबकादत्त, व्यास आदि वरिष्ठ पत्रकार थे। इन्होंने हिन्दी पत्रकारिता जगत् को ऊषाकाल का दर्शन कराया। 1857 के विफल क्रान्ति के पश्चात् क्रान्तिकारी पत्रकार भारतेन्दु ने 15 अगस्त 1867 में कवि वचनसुधा को नव आकार प्रदान किया। इसमें स्वाधीनता परक राजनीतिक लेख छापे जाते थे। कवि वचनसुधा पत्रिका ने देश में जड़ें जमाती अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली और क्रूर कानून के प्रति आक्रामक रुख अपनाया। इससे जनता में अंग्रेजी सरकार के प्रति विद्रोह की उफान उठने लगी। 1873 में बनारस से हरिश्चंद्र चंद्रिका प्रकाशित हुई। भारतेन्दू जी के संपादन में 1 जनवरी 1874 में एक मासिक पत्रिका ‘बालाबोधिनी’ निकली। इस पत्रिका ने नारी चेतना का विकास एवं नारी जागरण का प्रयास किया। महिला जगत् के लिए यह पत्रिका अनोखा उपहार साबित हुई।
आर्य समाज के सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार हेतु भी अनेक पत्र निकाले गए। आर्य पत्रिका, आर्य भूषण, आर्य वृत्त, आर्यव्रत, आर्यदर्पण आदि ऐसे पत्र हैं जिनसे स्वदेश प्रेम का पाठ पढ़ाया गया। इन पत्रों ने भारतीयों में नव जागरण एवं चेतना की लहर जगायी। 1879 के सारसुधानिधि ने भारतीय समाज की जीर्ण-शीर्ण अवस्था को बदलकर इसमें मनस्विता, तेजस्विता और ओजस्विता आदि गुणों का संचार किया। राजस्थान से प्रकाशित ‘देश हितैषी’, ‘स्वधर्म’, ‘स्वराज्य’, ‘स्वभाषा’ और ‘स्वदेशी’ ने जन-जागरण के लिए कदम बढ़ाए। उदयपुर गजट एवं जयपुर गजट ने राजस्थान के जनमानस को मुखरित किया। ‘क्षेत्रीय पत्रिका’ ने पूर्वांचल की राजनीति, सामाजिक और साहित्यिक चेतना को जगाने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। ‘ब्राह्मण’ का पहला अंक 15 मार्च 1883 को कानपुर से निकला। सरल प्राँजल और प्रवाह पूर्ण गद्य शैली के विकास में ‘ब्राह्मण’ का विशेष योगदान है।
स्वातन्त्र्य पूर्व काल 1885-1919 को कहा जाता है। इसे जागरण काल भी कहते हैं। इसी समय में राष्ट्रीय भावना का जागरण प्रारंभ हुआ। अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं ने जनता में राष्ट्रीय भावना भरने का कार्य किया। उन्हें भारतीय दुर्दशा से अवगत कराया। इस कालखण्ड की मुख्य बात ही सुप्त जनमानस को क्रान्ति के लिए तैयार करना था। सन् 1907 में वीराँगना भीकाजी कामा ने ‘वंदे मातरम्’ पत्र निकाला। यह पत्र विदेशों से छपकर पाण्डिचेरी होते भारत आता था। ‘वंदे मातरम्’ क्रान्ति की प्रचण्ड ज्वाला थी। स्वातंत्र्य आँदोलन का शंखनाद करने वाला सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्रभावशाली पत्र था युगान्तर। इसके संचालक श्री अरविन्द के भ्राता वारीन्द्र कुमार घोष और स्वामी विवेकानंद के भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त थे। यह पत्र धार्मिकता और राष्ट्रीयता के शोले उगलता था। युगान्तर के लेखक निर्भीक और निडर थे। भारतीय अस्मिता के प्रतीक तिलक ने 16 मार्च 1897 को ‘केसरी’ के माध्यम से सर्वत्र क्रान्ति का उफान ला दिया। इस पत्र को पढ़कर जनता ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आग के गोले बन जाती थी। ‘केसरी’ ने अंग्रेजी शासन को रोग से भी अधिक भयंकर बताकर जनता में जागृति पैदा की। 20वीं शताब्दी के प्रथम दो दशकों में राष्ट्रीय चेतना और स्वदेशी भावना को उभारने में जिन हिन्दी पत्रों की अनुकरणीय भूमिका रही इसका ज्वलन्त उदाहरण सरस्वती थी।
प्रतापगढ़ के कालाकाँकर में एक नवंबर 1185 को राजा रामपाल सिंह ने ‘हिन्दोस्तान’ दैनिक का प्रकाशन किया। इस पत्र ने 27 वर्षों तक भारत में नव जागरण का स्वर फूँका। इसके संपादक थे महामना मदनमोहन मालवीय। जो ग्रामीण वर्ग के विभिन्न पहलुओं एवं समस्याओं पर विशेष लेख लिखते थे। सन् 1887 में लखनऊ के प्रकाशित मासिक पत्र दिनकर समाज सुधार और राजनीति के बारे में विस्तृत विवरण देता था। 1890 में सर्वहित का प्रकाशन बूँदी से हुआ। इसने लगभग 14 वर्षों तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता के उन्नयन हेतु पाठकों का उद्बोधन किया। इसी वर्ष ही ‘बंगवासी’ भाषा गढ़ने की टकसाल के रूप में प्रकाशित हुआ। इसी क्रम में सद्धर्म प्रचारक, शुभचिंतक, नागरी नीरद आदि पत्रिकाओं ने राजनीति, राष्ट्रीयता तथा राष्ट्र के अनेकों पक्षों को उजागर किया। लोगों को अपने संघर्ष के प्रति जागरुकता लाने का भी अथक प्रयास किया। कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा प्रकाशित प्रताप भी इसी प्रयत्न की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी थी।
सन् 1920 से 1947 का काल क्रान्ति काल के रूप में जाना जाता है। इस दौरान स्वतंत्रता आँदोलन अपने चरम सीमा पर था। यह हिन्दी पत्रकारिता की ओजस्विता की अविस्मरणीय युग रहा। इस युग में ऐसी कोई भी पत्र-पत्रिका नहीं होगी जिसमें राष्ट्र का स्वर न गूँजता हो। ‘आज’ भारत के आयुदय और जन्मभूमि के प्रति समर्पित था। इसके अतिरिक्त टुडे, समाज, स्वार्थ, मर्यादा तथा चित्ररेखा पत्रों के प्रकाशन ने हिन्दू और हिन्दुस्तान की अनन्त सेवा की। सन् 1920 में ‘वर्तमान’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह पत्र विषयवस्तुओं की विविधता, रोचक शैली तथा समाज सुधार के लिए जाना जाता है। ‘स्वतंत्र’ दैनिक का प्रकाशन कलकत्ते से हुआ। यह पत्र असहयोग आँदोलन से संबन्धित समाचार तथा क्रान्तिकारियों का ओजस्वी नारों का प्रचार करता था।
इस युग में आध्यात्मिक महामानव भी अपना योगदान करने से न चूके। भाईजी श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार ने श्री जयदयाल गोयनका के सहयोग से सन् 1926 में मासिक पत्र ‘कल्याण’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह पत्रिका धर्म और अध्यात्म को प्रस्तुत करने के साथ देश हित के लिए समर्पित थी। इसी दौर में युग पुरुष पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने सन् 1940 में अखण्ड ज्योति मासिक का प्रकाशन प्रारम्भ किया। अखण्ड ज्योति संस्थान से प्रकाशित मासिक अखण्ड ज्योति, अध्यात्म के साथ जीवन के सभी क्षेत्र में अपना आत्मिक विकास के लिए प्रतिबद्ध हुई। यह प्रतिबद्धता युग की ज्वाला बन गयी, जिसमें प्रसाद, पंत, निराला, नवीन आदि सभी साहित्यकारों एवं पत्रकारों ने अपना-अपना योगदान दिया। और इसी के साथ क्रान्ति से भारत देश ने विकास के नए युग में प्रवेश किया।
स्वतंत्रता के पश्चात् नवनिर्माण काल (1948 से 1974) प्रारंभ हुआ। इस समय के पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा देश एवं समाज के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया। सन् 1947 में अवतरित नवभारत टाइम्स, नई दुनिया, प्रदीप, नवजीवन, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण, सन्मार्ग आदि दैनिक पत्रों ने भारत को विकास और उत्कर्ष का मार्गदर्शन प्रशस्त किया। बंग प्रान्त से विश्वमित्र, नया समाज, ज्ञानोदय। मध्यप्रदेश से जयभारत, नयाजमाना, नई दुनिया, मंगल प्रभात, नवप्रभात, आजाद हिन्द, स्वतंत्र भारत, अपना राज्य, हित चिंतक, देशबंधु, नवभारत, नई दुनिया। राजस्थान से अमर ज्योति, 15 अगस्त, स्वतंत्र भारत, नवयुग, लोकजीवन, जयहिन्द, लोकमत, लोकराज, राष्ट्रदूत आदि जनतंत्र की स्थापना में उल्लेखनीय योगदान दिये। बिहार में जनशक्ति, नवीन भारत, जनता, पंचायत राज, राष्ट्र संदेश। हिमाँचल से प्रजामित्र, सुधा, हिमाँचल संदेश, लोकतंत्र, भावना। पंजाब से वीरप्रताप, हिन्दी मिलाप, पंजाब केसरी, उजाला लोकमान्य दैनिक, विश्वमित्र, युगधर्म, धर्मयुग आदि पत्रों ने राष्ट्र को नव निर्माण को नूतन दिशा दी। राजधानी दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान, नवभारत टाइल्स, वीर अर्जुन, जनयुग आदि तमाम पत्रों ने भारत के लिए सराहनीय कार्य किया।
धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, किलट्ज और दिनमान साप्ताहिक पत्रों के अलावा हजारों पाक्षिक और मासिक पत्रों ने इस दौरान देश में साहित्य, राजनीति, शिक्षा, वाणिज्य, कृषि, विज्ञान, कम्प्यूटर, तकनीकी, चिकित्सा, खेल, फिल्म तथा धर्म संस्कृति के विविध पक्षों पर विस्तृत प्रकाश डाला। यह काल हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्ण युग है। इस समय में राजनीतिक, सामाजिक, साँस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियाँ उत्कर्ष के शिखर पर था।
पत्रकारिता का वर्तमान काल सन् 1975 से प्रारंभ होता है। समाज सेवा की यह धारा आज के अर्थप्रधान पूँजीवादी युग से बहुत प्रभावित हुई। आज पत्रकारिता व्यवसाय में सिमट गई हैं। इसकी सारी विधाएँ विवेक से मुक्त नजर आती हैं। वर्तमान पत्रकारिता में नैतिकता का ह्रास स्पष्ट दीखने लगा है। धर्मयुग जैसी कई साहित्यिक पत्रिकाएँ बंद हो चुकी हैं। अखण्ड ज्योति और कल्याण के अलावा धार्मिक पत्रिकाएँ नजर नहीं आतीं। पत्रकारिता समर्पित भावना, तपस्या से आरंभ होकर व्यवसाय के जाल-जंजाल में फंस गई है। सच्चे और निष्पक्ष पत्रकारों के सीने पर सदा भय का निशाना सधा रहता है। शुद्ध राजनीतिक स्वार्थपरता सत्तालोलुपता तथा आतंकवादी तत्त्वों से यह घिर गई है। अश्लीलता पत्रों का मुख्य आकर्षण एवं शृंगार का पर्याय बन चुकी है। प्रायः पत्र-पत्रिकाएँ सैन्स, हिंसा, हत्या, अपराध, भ्रष्टाचार आदि समाचारों को आकर्षक ढंग से छापती हैं।
पत्रकारिता के इस विषम युग में अखण्ड ज्योति आज भी अपने संस्थापक के तप का प्रकाश सतत वितरण करने में लगी हुई है। पत्रकारिता के मूलभूत उद्देश्य क्या है? इसका उत्तर इसमें जीवन्त एवं जाग्रत् देखा जा सकता है। इसमें शुभ दृष्टि भी है और सम दृष्टि भी। इसने अपने विचारों के धागे में लाखों व्यक्तियों के एक विशालकाय परिकर को पिरो रखा है। पत्रकारिता की इसी प्रेरक ज्योति से यदि प्रकाश पाया जा सके तो पत्रकारिता के युगधर्म को समझा-जाना और आत्मसात किया जा सकता है।
आत्म−उपदेश
परिवर्तन संसार की जान है। जिसको मौत समझते हो वही जीवन है। मिनट में तुम करोड़ों के वारिस और क्षणभर में लावारिस बन जाते हो। मेरा−तेरा, छोटा−बड़ा, अपना−बेगाना दिल से मिटा दो। ख्याल से हटा दो। फिर सब तुम्हारा है और तुम सबके हो। न यह जिस्म तुम्हारा है, न तुम इस जिस्म के हो। यह आग से बनता है और यह आग में मिल−जुल जाता है। मिट्टी से बनती है और मिट्टी में मिल जाता है। यह पानी से पैदा होता है और पानी में समा जाता है। यह हवा से भरा हुआ है और हवा में भर जाता है। न हड्डी रहती है, न जबान, कान, आँख का निशान बाकी रहता है, मगर फिर भी तुम्हारा वैभव वैसे−का−वैसा ही रहता है। फिर तुम सोचो कि तुम क्या हो?
—अखण्ड ज्योति, पृष्ठ 8, अप्रैल 1960
एक बार की बात है−एक विद्वान् लेखक जो नेता भी थे, गाँधी जी के आश्रम में आए। गाँधी जी से भेंट−परामर्श एवं शिष्टाचार संपन्न कर जब जाने लगे तो औपचारिकतावश कहा, “मेरे लायक कोई काम हो तो अवश्य बताएँ।” उनका अभिप्राय लेखक होने के कारण लेख आदि भेजने से था।
गाँधी जी ने कहा, “आश्रम को सेवाभावियों की बड़ी जरूरत है। यदि आपको अभी सेवा का समय हो तो काम बताऊँ?” उस सज्जन ने हामी भर दी। इस पर गाँधी जी उन्हें अपनी चक्की के पास ले गए और गेहूँ पीसने में लग जाने का संकेत किया और कहा, “सेवा के लिए मस्तिष्क ही काफी नहीं, उसमें शारीरिक श्रम का भी योगदान चाहिए।”
भाग्य के नाम पर दीन−हीन एवं निकृष्ट स्तर का जीवन जीना एक ऐसी विडंबना है, जो हमारे समाज में सब ओर बिखरी है। भाग्य के नाम पर अकर्मण्य व बेगार−सा जीवन जीने वाले इन व्यक्तियों के लिए भाग्य एक सर्वसमर्थ तत्त्व है, जिसके आगे किसी तरह के पुरुषार्थ का महत्त्व वे समझ नहीं पाते। जन्म कुँडली, हस्तरेखाएँ, ग्रह−नक्षत्र जीवन का निर्धारण एवं संचालन करने वाले अटल तत्त्व बन जाते हैं। व्यक्ति तब किन्हीं अज्ञात शक्तियों के हाथ में एक खिलौना मात्र रह जाता है। उसकी स्वतंत्र इच्छा, प्रयास और पुरुषार्थ का कोई महत्व नहीं रह जाता। जबकि कष्ट, पीड़ा एवं घोर पतन की स्थिति में भी मनुष्य अपने पुरुषार्थ एवं विवेक के सहारे उबर जाता है व भविष्य का उचित निर्धारण कर सकता है। लेकिन भाग्य−प्रारब्ध को सर्वोच्च शक्ति घोषित कर पुरुषार्थ को नकारते हुए व्यक्ति अकर्मण्य और पलायनवादी जीवन का वरण करता है और अपने लिए नारकीय व पतनकारी स्थितियों का सृजन करता है।
इस तरह यह भाग्य नाम की अदृश्य शक्ति एक भ्रामक एवं घातक धारणा है। इसका स्वयं में कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। भाग्य का अस्तित्व यदि है तो वह कर्म से जुड़ा है। यहाँ कर्म के सूक्ष्म भेद का जानना आवश्यक है। कर्म तीन प्रकार के होते हैं, क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध कर्म। क्रियमाण अर्थात् वर्तमान में हो रहे कर्म। संचित कर्म अर्थात् इस जन्म के पूर्व में किए गए कर्मों का समुच्चय, प्रारब्ध कर्म अर्थात् पूर्व जन्म के कर्मों का समुच्चय। इस तरह क्रियमाण कर्म ही संचित कर्म बनते हैं। संचित कर्म ही प्रारब्ध है। जब ये प्रारब्ध कर्म फलित होते हैं, तो इनके कारण उत्पन्न दृश्य एवं परिस्थितियों को समझ न पाने के कारण इसे भाग्यरूपी अदृश्य शक्ति का नाम देते हैं व इसका अस्तित्व मानने लगते हैं, जबकि यह कर्म से जुड़ा है। मनुष्य अपनी इच्छा व पुरुषार्थ द्वारा कर्म की गति को दिशा दे सकता है।
प्रारब्ध यदि कष्टकर हो तो भी उसे भोगना तो पड़ता है, लेकिन उसको हलका किया जा सकता है। ‘मंत्र तंत्रोषधी बलात्’ से उसको हलका किया जा सकता है। शूल की पीड़ा को सुई में बदला जा सकता है। दरिद्र व्यक्ति संचित कर्म का नाश तपस्या से कर सकता है। निःसंतान किसी तपस्वी के आशीर्वाद व अनुग्रह से पुत्र प्राप्त कर सकता है। अल्पायु तप आदि से दीर्घायु में परिवर्तित हो सकता है। अर्थात् मनुष्य अपने भाग्य (अर्थात् प्रारब्ध) को परिवर्तित, संशोधित एवं संवर्द्धित कर सकता है।
भविष्यदर्शन की विधाओं में निष्णात विद्वानों एवं ज्योतिषियों का भी यह मत है कि भाग्य को बदला जा सकता है। भविष्य के गर्भ में झाँककर आगत घटनाओं की पूर्व से सूचना देने वाले सुप्रसिद्ध फ्राँसीसी भविष्यवक्ता नास्त्रेदामस का कहना भी था कि भविष्य बदला जा सकता है। शेक्सपियर का मत था कि मनुष्य अपने भाग्य का स्वामी हो सकता है।
भविष्य पर शोध करने वाले प्रख्यात डॉ. एडमर मिटहेल का मत है कि मस्तिष्कीय वैचारिक तरंगों के बदलने से भविष्य की क्रियाओं को बदला जा सकता है।
हस्तरेखा के प्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान् विलियम जार्ज वेनहम का भी यह मत था कि भाग्य बदला जा सकता है। रेखाएँ बदली जा सकती हैं।
इसी मत की पुष्टि विश्वविख्यात भविष्यद्रष्टा कीरो हाथ की रेखाओं के संदर्भ में अपने इन विचारों द्वारा करते हैं, “हाथ की रेखाएँ एक इंजन चालक के समान हैं, जिसे इस बात की सूचना मिल चुकी है कि उससे कुछ ही मील की दूरी पर पटरी टूटी हुई है, जो उसके तथा समस्त रेलगाड़ी के यात्रियों के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। यदि चालक थोड़ा−सा भी निपुण है, तो वह चेतावनी से समझौता करके पटरी के ठीक होने तक की प्रतीक्षा करेगा व अपनी तथा सभी यात्रियों के जीवन की रक्षा कर लेगा। इसके अतिरिक्त यदि सूचना को अनदेखा कर गाड़ी बढ़ाता जाएगा, तो होने वाली दुर्घटना की कल्पना स्वयं ही की जा सकती है।”
अन्य स्थान पर कीरो कहते हैं कि व्यक्ति रूप में मनुष्य को ईश्वर ने अपने प्रतिरूप की भाँति सिरजा है। इसीलिए मनुष्य में ब्रह्मास्मि होने की शक्ति है। ज्ञानप्राप्ति की अदम्य कामना ही आत्मा को विद्यमानता का प्रमाण है और यही वह विभाजन रेखा है, जो मनुष्य को पशुजगत से अलग करती है। इसी ज्ञान के द्वारा मनुष्य होनी पर विजय पा सकता है, जो उसे ज्ञान के अभाव में भुगतनी पड़ती है।
पुरुषार्थ की भाग्य के ऊपर विजय का सशक्त प्रतिपादन योगवासिष्ठ में किया गया है। महर्षि वशिष्ठ जी इसके मुमुक्ष प्रकरण के षष्ठ सर्ग में कहते हैं—
द्वौ हुडाविव युध्येते पुरुषार्थों परस्परम्। य एव बलवाँस्तत्रस स एव जयति क्षणात्॥
अर्थात् पूर्वजन्म और इस जन्म के कर्मरूपी दो भेड़ें आपस में लड़ते हैं, उनमें जो बलवान होता है वह विजयी होता है। उदार स्वभाव और सदाचार वाले, इस जगत् मोहक दैव से (भाग्य के चक्र से) वैसे ही निकल जाते हैं जैसे पिंजरे से सिंह। पौरुष का फल हाथ में रखे गए आँवले के समान स्पष्ट है। प्रत्यक्ष को छोड़कर दैव के मोह में निमग्न लोग मूढ़ हैं।
स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। भाग्य पर आश्रित रहने वाले लोग मूर्ख हैं या कायर। संस्कृत सूक्तियाँ भी दैव की बातें करती हैं। लेकिन पुरुषार्थी लोग भाग्य के भरोसे नहीं जीते, वे भाग्य का निर्माण स्वयं करते हैं। मनोवैज्ञानिकों का मत है कि बूढ़े लोग प्रायः भाग्य की बातें किया करते हैं, जबकि पुरुषार्थपरायण लोग ज्योतिष में अधिक विश्वास नहीं रखते।
वैज्ञानिक भी कहते हैं कि मनुष्य स्वतंत्र इच्छाशक्ति लेकर जन्म लेता है। महर्षि अरविंद भारतीय दृष्टिकोण के अनुरूप प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि भाग्य का कारण कर्म है। अपने कर्मों के द्वारा स्वयं हम ही अपने भाग्य निर्माता है, पर हमारे द्वारा सृष्ट भाग्य हमें बाँधता है, क्योंकि हमने जो कुछ बोया है, उसे इस जीवन या दूसरे जीवन में हमें अवश्य काटना होगा। फिर भी हम लोग वर्तमान में भूतकाल से प्राप्त प्राचीन भाग्य को भोगते हुए ही भविष्य के लिए अपने भाग्य का निर्माण कर रहे हैं। यह बात हमारे संकल्प और कर्म को एक अर्थ प्रदान करती है।
अथर्ववेद में कहा गया है,
अयं में हस्तो भगवानयं में भगवत्तरः।
अर्थात् यह हाथ ही भगवान् है, यह भगवान् से भी बलवान है। कर्म ही भाग्य है। कर्म का कारण और फल दोनों ही हाथ में हैं।
अँगरेजी में कहावत है कि ईश्वर उसकी सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। अर्थात् जो क्रियाशील व पुरुषार्थी हैं, ईश्वर का वरद्हस्त उनके साथ है। लोग तर्क देते हैं कि भगवद् अनुग्रह से फलप्राप्ति बिना कर्म के भी हो जाती है। वे भूल जाते हैं कि भगवद् भक्ति, स्मरण, कीर्तन, चिंतन आदि भी तो कर्म हैं, कर्म नहीं बल्कि विशिष्ट कर्म हैं।
इस तरह भाग्य या प्रारब्ध कोई ऐसी शक्ति नहीं कि जिसके आगे मनुष्य घुटने टेक दे, उसके हाथों की कठपुतली बनकर दीन हीन, दरिद्र व निकृष्ट स्तर का जीवन जिए। बल्कि यह तो उसी के कर्मों की रचना है, जिसे मनुष्य अपने प्रयास−पुरुषार्थ अर्थात् नवीन कर्म द्वारा परिमार्जित कर सकता है। श्रेष्ठ कर्म करता हुआ वह अपने लौकिक एवं पारलौकिक जीवन का सफल और सार्थक बना सकता है, आखिर मनुष्य अपना भाग्यविधाता आप ही तो है।
नेपोलियन बोनापार्ट अपनी सहधर्मिणी के साथ संध्या के समय भ्रमण में निकले हुए थे। वे इसी क्रम में कहीं सँकरे रास्ते से होकर गुजर रहे थे। आगे से एक लकड़हारा सिर पर लकड़ी का बोझा लिए आता उन्हें दिखाई पड़ा। समीप में जैसे ही वह आया तो नेपोलियन ने संकेत से रास्ता देने के लिए अपनी पत्नी को कहा और खुद भी किनारे हो गए।
पत्नी झुँझलाकर बोली, उस अशिष्ट ने हमारा अभिवादन तक नहीं किया और आप उसे रास्ता भी दे रहे हैं?
नेपोलियन गंभीर किंतु संयत स्वर में बोले, “देवी जी! कदाचित् आप श्रम का महत्व नहीं जानतीं। श्रम का अभिवादन सम्राट के अभिवादन से कहीं ज्यादा महत्त्व का है। अपने ऐश्वर्य से श्रम को मत तोलो।”
वह युवक था, पर उसमें युवकों जैसी उद्दंडता उच्छृंखलता न थी। उसमें तो प्रामाणिकता, परोपकारवृत्ति, सत्यनिष्ठा कूट−कूटकर भरी थी। लेकिन अपने अगणित सद्गुणों के बावजूद उसके पास वैभव न था। बचपन भी उसका गरीबी में बीता था और अभी भी उसकी जिंदगी गरीबी में ही कैद थी। उसके घर−परिवार में भी कोई नहीं था। अतः उसे अकेलापन बहुत सालता−सताता। अपनी गरीबी और अकेलेपन को मिटाने के लिए उसने कुलदेवी की आराधना की। देवी प्रसन्न हुई। उन्होंने इसे दर्शन देते हुए कहा, “बेटा! तेरी समस्याओं का समाधान महर्षि आर्जव करेंगे। वे महान् ज्ञानी पुरुष और दिव्यात्मा हैं। वह यहाँ से चार योजन दूर रहते हैं, तुम उनके पास चले जाओ।”
आशा से ओतप्रोत वह नवयुवक वहाँ से चल दिया। वाहन के लिए उसके पास धन नहीं था। फिर भी मन की उमंग और साहस के बलबूते वह चल पड़ा। अभी एक योजन ही वह चल पाया था कि थकान ने घेर लिया। पास में ही एक गाँव था। वहाँ उसने विश्राम करने का निश्चय किया। इस गाँव के जिस घर में वह पहुँचा, उसमें वृद्धा के साथ एक अति सुँदरी नवयुवती भी थी। स्नान−भोजन के बाद युवक वृद्धा के पास बैठकर घर−परिवार की चर्चा करने लगा। बातों−ही−बातें में युवक ने अपनी यात्रा का उद्देश्य और महर्षि आर्जव की महिमा भी कह सुनाई।
ये बातें सुनकर वृद्धा की आँखें भी चमक उठीं। उसने युवक से कहा—मेरी भी एक समस्या है। हो सके तो उसका समाधान भी महर्षि से पूछ लेना। यह कहकर उसने पुत्री की ओर इशारा करते हुए बताया कि मेरी इस बेटी का हठ है कि यह उसी नवयुवक से विवाह करेगी, जो सवा लाख रुपये का हीरा इसे लाकर देगा। तुम महर्षि से पूछना कि इसकी यह इच्छा कब पूरी होगी। युवक ने वृद्धा को पक्का आश्वासन दिया और अगले दिन आगे चल पड़ा। थकान ने उसको उस दिन भी एक योजन से अधिक आगे नहीं बढ़ने दिया। पास में कहीं गाँव नहीं था और उसे आश्रय की खोज थी। तभी उसे एक झोपड़ी दिखाई दी। वह वहाँ पहुँचा। एक संन्यासी वहाँ बैठे थे। युवक के आग्रह पर उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक निवास की अनुमति दे दी। कुछ समय में ही उन दोनों में प्रगाढ़ आत्मीयता, अंतरंगता हो गई। दोनों ने ही हृदय की बातें कहीं। उस युवक की यात्रा के उद्देश्य को सुनकर संन्यासी ने भी अपनी एक समस्या उसके समक्ष प्रस्तुत कर दी। उन्होंने कहा, तीस वर्ष से मैं साधना कर रहा हूँ, पर अब तक मन सध नहीं पाया है। इससे मैं बहुत विकल हूँ। महर्षि आर्जव से तुम कोई समाधान अवश्य पूछना और मुझे बताना।
सरल हृदय नवयुवक ने संन्यासी को भी वचन दे दिया और प्रातःकाल वहाँ से आगे प्रस्थान कर गया। तीसरे दिन पुनः एक योजन चला। एक गाँव में पहुँचकर उसने एक माली के यहाँ विश्राम किया। नवयुवक बहुत मिलनसार था, अतः उसने अपने व्यवहार से माली के हृदय को भी जीत लिया। पारस्परिक वार्त्तालाप में महर्षि आर्जव के पास जाने के उद्देश्य का पता माली को भी लग गया।
उसने भी व्यथा भरे शब्दों में कहा, मरणासन्न स्थिति में मेरे पिताजी ने एक आदेश दिया था कि मकान के उत्तर कोने में चंपक का वृक्ष अवश्य लगाना। इसके बाद वे कुछ भी कह नहीं सके थे और उन्होंने आँखें मूँद लीं। तब से अब तक मैं सदैव परिश्रम कर रहा हूँ पर चंपक का वृक्ष लगा ही नहीं पा रहा हूँ। मुझे इसकी बहुत पीड़ा है। महर्षि आर्जव से मेरी इस पहेली का समाधान पूछना।
युवक ने माली को भी विश्वास दिलाया कि वह उसकी समस्या का समाधान अवश्य पूछकर बताएगा। इसके साथ ही अगले दिन प्रातः वह आगे बढ़ गया। एक योजन चलने के बाद महर्षि आर्जव की झोंपड़ी उसे मिल गई। महर्षि आर्जव के चेहरे पर अद्भुत आभा थी। चारों ओर आत्मतेज और ब्रह्मवर्चस् का पराग बिखरा हुआ था। युवक ने श्रद्धा से अपना मस्तक झुकाया। महर्षि ने आशीर्वाद दिया तथा आने का उद्देश्य पूछा। युवक ने निवेदित किया, “आप महान् हैं, आपका ज्ञान अगाध है, जो भी व्यक्ति आपके चरणों में अपनी समस्या प्रस्तुत करता है, वह समाधान पाता है। मेरी भी कई समस्याएँ हैं। मैं उनके समाधान की साध लेकर आया हूँ। कृपया आप अनुग्रह करें।”
महर्षि आर्जव ने गौर से नवयुवक को देखा और कुछ क्षणों के बाद पूछा, “तेरे कितने प्रश्न हैं? मैं तीन सवालों से अधिक का उत्तर नहीं दूँगा।”
वह युवक कुछ झिझका। उसने साहस बटोरकर कहा, “मुझे तो केवल चार प्रश्न पूछने हैं। एक मेरा है तथा तीन औरों के हैं, जिनका मैंने मार्ग में आतिथ्य ग्रहण किया था। मेरे पर विशेष अनुग्रह करें। मैं आपसे चारों प्रश्नों का उत्तर पाकर धन्य हो जाऊँगा। यदि एक भी प्रश्न बाकी रहा, तो मैं कठिनाई में फँस जाऊँगा।”
महर्षि ने पुनः कहा, “मैं तीन से अधिक सवालों का जवाब नहीं दूँगा। तुम जिन तीन प्रश्नों को चाहो, उन्हें पूछ लो।”
युवक उलझ गया। उसे अपनी समस्या पीड़ित कर रही थी। उसे वह किसी भी प्रकार छोड़ना नहीं चाहता था। बुढ़िया, संन्यासी व माली को दिए गए अपने वचन भी उसे याद थे। वह उन्हें भी अपनी समस्या के समान ही समझता था। बहुत कुछ सोचने के बाद उसने अपनी समस्या को छोड़ने का दृढ़ संकल्प लिया। महर्षि को जब उसने अपने मनोगत विचार कहे, तो उन्हें भी आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई। उन्होंने तत्काल तीनों प्रश्नों के उत्तर दे दिए।
युवक उत्तर पाकर वहाँ से तत्काल लौट पड़ा। एक योजन मार्ग तय कर सबसे पहले वह माली के घर पहुँचा। माली ने उसका भरपूर आतिथ्य किया। युवक ने बताया कि महर्षि ने कहा है कि आपके पिता बहुत चतुर थे। जब वह मरणासन्न हुए तो वह आपको कुछ बातें कहना चाहते थे। पर उस समय वहाँ कुछ अन्य व्यक्ति भी बैठे थे। उनके समक्ष वह सब कुछ कहना नहीं चाहते थे, पर उन्होंने महत्वपूर्ण संकेत दे दिया। जिस उत्तर कोने में चंपक का वृक्ष लगाने का आदेश दिया है, वहाँ कुछ गहराई में प्रचुर मात्रा में धन गड़ा हुआ है। आप ऊपर से खोदते हैं। उतनी मिट्टी में वृक्ष लग नहीं सकता। गहराई में जड़ें जा नहीं सकतीं। बहुत गहरा खोदो, काफी मात्रा में धन मिलेगा।
माली ने तत्काल खुदाई की। चार स्वर्णकलश निकले। प्रत्येक में दस−दस सहस्र स्वर्णमुद्राएँ थीं। माली के हर्ष का पारावार नहीं रहा। युवक की ओर अभिमुख होते हुए उसने कहा, “यदि तुम न आते तो मुझे यह धन नहीं मिल सकता था। इस धन पर अब मेरा अधिकार नहीं, सिर्फ तुम्हारा ही अधिकार है। इसे तुम अपने घर ले जाओ।”
अनचाहा अपार धन मिल रहा था। फिर भी वह नवयुवक नहीं ललचाया। उसने इस प्रस्ताव को स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया और इस कथन को दूसरी बार न दुहराने की प्रार्थना करने लगा। किंतु माली भी उपकारी के प्रति समर्पण में दृढ़ था। उसने उस युवक की एक न सुनी।
अंततः समझौते के रूप में उसे बीस हजार स्वर्णमुद्राएं स्वीकार करनी पड़ीं।
एक दिन रुककर युवक आगे बढ़ा। बीस हजार स्वर्ण मुद्राएँ उसके साथ थीं। एक योजन मार्ग और तय करने पर उसी संन्यासी की कुटिया मिली, जो तीस वर्ष से लगातार साधना कर रहे थे, किंतु उनका मन नहीं सध पा रहा था। इस युवक को वापस आया हुआ देखकर वह फूले नहीं समाए। बोले, “आओ भाई! मेरी जटिल पहेली का क्या समाधान लेकर आए हो? मैं उसे जानने के लिए व्याकुल हूँ।”
युवक ने प्रतिप्रश्न किया, “संन्यासी बनने से पूर्व क्या आप किसी करोड़पति जौहरी के पुत्र थे।”
संन्यासी ने उदासीनता से कहा, “इससे भला तुम्हारा क्या प्रयोजन है? तुम तो मेरी पहेली का समाधान बतलाओ।”
युवक ने विलंब नहीं किया। उसने कहा, “महर्षि ने बतलाया है कि आप संन्यासी तो बने, पर वैराग्य से मन पूरा नहीं भींगा, कुछ कमजोरी रह गई थी। आपके मन में संशय था कि किसी कारण से यदि साधना में सफल नहीं हो पाया, तो फिर भविष्य का क्या होगा। यह सोचकर आपने सवा लाख रुपये मूल्य का एक हीरा अपने पास छुपा लिया था। वह हीरा ही आपके मन को व्यग्र कर रहा है तथा साधना में लीन नहीं होने दे रहा हैं।”
महर्षि आर्जव का सत्य कथन सुनकर संन्यासी की भावना में आध्यात्मिक ज्वार आया। अंतः निरीक्षण से चेतना सजग हुई। हीरे की ममता टूटी। उन्होंने तत्काल उसे युवक को दे दिया। युवक ने उस हीरे को लिया और अपनी मंजिल की ओर चल पड़ा।
तीसरे दिन वह वृद्धा के घर पहुँचा। वृद्धा ने उसका भरपूर आतिथ्य किया और पूछा, “महर्षि आर्जव ने मेरी लाड़ली के लिए क्या संकेत दिया है? कहीं तुम मेरे प्रश्न के बारे में पूछना ही तो नहीं भूल गए?” युवक ने विनम्रता से कहा, “माँ! मैं तुम्हारा आदेश भला कैसे भूल सकता था। महर्षि की कृपा से ही यह सवा लाख रुपये के मूल्य का हीरा मैं ले आया हूँ। आप इसे अपने पास रखें। जिस युवक को आप अपनी कन्या के योग्य समझें। उसी के हाथों से हीरा अपनी पुत्री को दिला दें।” यह कहते हुए उसने वृद्धा को वह हीरा दिखा दिया। हीरे की चमक और युवक की निस्पृहता से वृत्त अभिभूत हो गई।
वह युवक को एक पल रुकने का संकेत देकर तत्काल अंदर चली गई। उसके पाँव जमीन पर नहीं टिक पा रहे थे। अंदर से वह अपनी अति रूपवती बेटी को लेकर आई और कहने लगी, “पुत्र यह हीरा तुम्हीं अपने हाथों से मेरी पुत्री को सौंप दो।” वृद्धा के अति आग्रह को देखकर तुरंत नवयुवक ने सवा लाख मूल्य का बेशकीमती हीरा निकाला और उस कन्या की हथेली पर रख दिया। देखते ही कन्या उसके मूल्य को पहचान गई। ग्रहीत प्रतिज्ञा के अनुसार उसने भी अपने को समर्पित करने में विलंब नहीं किया। वृद्धा भी इस दृश्य को देखकर हर्ष से रोमाँचित हो गई और उसने भी आगे बढ़कर अपने दामाद का हार्दिक स्वागत−सत्कार किया। वह कभी हीरे को देखती, कभी अपनी बेटी को और कभी इस सुशील−सुदर्शन और सर्वथा योग्य इस नवयुवक को। उसने अपने को धन्य समझते हुए बेटी को अपनी ससुराल विदा किया।
अपने घर पहुँचकर युवक ने अपनी पत्नी के साथ कुलदेवी का पूजन किया। उस रात जब वह अपने पलँग पर सोया तो स्वप्न में देखा कि देवी माँ उसके सुखद जीवन के लिए आशीष देते हुए कह रही है, “पुत्र परोपकार में ही सच्चा कल्याण हैं। जो सदा ही दूसरों के हित चिंतन में लगे रहते हैं उनकी अपनी समस्या का समाधान स्वतः ही हो जाता है। लोककल्याण में ही आत्मकल्याण की पहेली का हल छुपा हुआ है।”
ईसा की विदाई का अंतिम दिन था। उस रात उन्होंने अपने प्रमुख शिष्यों को बुलाया और सभी को अभिवादन किया।
शिष्यों ने उस पर आश्चर्य व्यक्त किया, तो वे बोले, “जो तुम्हें पूजें, उनके प्रति तुम भी पूज्य भाव रखना, क्योंकि वे ही तुम्हें श्रेय प्रदान करते हैं। ऐसा न हो कि सम्मान पाकर इतराओ और अहंकार के दबाव से अपनी श्रद्धा गँवा बैठो।”
पौधे में संवेदनशील सिद्ध करने वाले जगदीश चंद्र वसु अपने प्रतिपादन को सही सिद्ध करने के लिए इंग्लैंड गए। उनका प्रदर्शन वैज्ञानिकों की भरी सभा में होने वाला था। एक पौधे को इंजेक्शन लगाकर वे उस विष के कारण पौधे पर होने वाली प्रतिक्रिया सिद्ध करना चाहते थे।
इंजेक्शन लगाया गया, पर पौधे को कुछ नहीं हुआ। वह जैसे का तैसा बना रहा। इस पर आत्मविश्वासी वसु ने कहा, यदि पौधे पर यह इंजेक्शन काम नहीं कर सकता, तो मेरे ऊपर भी नहीं करेगा। यह कहकर उसी तरह की दूसरी सुई अपनी बाँह में लगा ली, सभी स्तब्ध थे। जहर का इंजेक्शन लगाने पर क्या दुर्गति हो सकती है, यह सभी जानते थे।
वसु को भी कुछ नहीं हुआ। इस पर इंजेक्शन की जाँच−पड़ताल की गई। पता लगा कि गलती से विष के स्थान पर निर्विष इंजेक्शन का प्रयोग हो गया है।
दूसरी बार सही सुई लगाई गई। पौधे पर तत्काल प्रतिक्रिया हुई। अपनी खोज वे पूरी गंभीरतापूर्वक करते थे और प्रतिपादन से पूर्व प्रामाणिकता की भली−भाँति जाँच−पड़ताल कर लेते थे। आत्मविश्वास इसी कारण उपलब्ध हुआ था।
एक समय था जब हमारे युवाओं के आदर्श, सिद्धाँत विचार, चिंतन और व्यवहार सब कुछ भारतीय संस्कृति के रंग में रँगे हुए होते थे। वे स्वयं ही अपनी संस्कृति के संरक्षक थे, परंतु आज उपभोक्तावादी पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध से भ्रमित युवा वर्ग को भारतीय संस्कृति के अनुगमन में पिछड़ेपन का अहसास होने लगा है। आज अँगरेजी भाषा और अँगरेजी संस्कृति के रंग में रँगने को ही आधुनिकता का पर्याय समझा जाने लगा है।
जिस युवा पीढ़ी के ऊपर देश के भविष्य की जिम्मेदारी है, जिसकी ऊर्जा से रचनात्मक सृजन होना चाहिए, उसकी पसंद में नकारात्मक दृष्टिकोण हावी हो चुका है। संगीत हो या सौंदर्य, प्रेरणास्रोत की बात हो या राजनीति का क्षेत्र या फिर स्टेटस सिंबल की पहचान, सभी क्षेत्रों में युवाओं की पाश्चात्य संस्कृति में ढली नकारात्मक सोच स्पष्ट परिलक्षित होने लगी है।
आज महानगरों की सड़कों पर दौड़ती कारों का सर्वेक्षण करें, तो पता लगेगा कि हर दूसरी कार में तेज धुनों पर जो संगीत बज रहा है वह पॉप संगीत है। युवा वर्ग के लिए इसे बजाना दुनिया के साथ चलने की निशानी बन चुका है। उनके अनुसार, “जिंदगी में रफ्तार लानी हो या कुछ ठीक करना हो तो ‘गो इन स्पीड’ एवं पॉप संगीत सुनना तेजी लाने में सहायक है।” हमें साँस्कृतिक विरासत में मिले शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत के स्थान पर युवा−पीढ़ी ने पॉप संगीत को स्थापित करने का फैसला कर लिया है।
नए गाने तो बन ही रहे हैं, साथ ही पुराने को भी पॉप मिश्रित नए रंग−रूप में श्रोताओं के समक्ष पेश किया जा रहा है। आज बाजार की यह स्थिति है कि नई फिल्म के गाने का ‘रिमिक्स’ यानि तेज म्यूजिक डाले गए कैसेट आ जाने के बाद सामान्य कैसेट की बिक्री में बहुत ज्यादा गिरावट आई है। सब कुछ पॉप में ढालकर युवाओं को परोसा जा रहा है और वह पसंद भी किया जा रहा है।
विदेशी संगीत चैनल, एम.टी.वी. एवं चैनल वी अधिकाँश युवाओं की पहली पसंद हैं। इन संगीत चैनलों का ललित दर्शक वर्ग 15 से 35 वर्ष का युवा है। जनवरी 1996 में प्रारंभ इन चैनलों ने सुनियोजित तरीके से भारतीय युवाओं को पॉप कल्चर का दीवाना बना देने की ठान ली है और वे उसमें सफल भी हुए हैं।
आज युवाओं में ‘सौंदर्य’ के मानदंड एवं प्रयोजन भी परिवर्तित हो चुके हैं। दुनिया भर के विभिन्न देशों में अपनी सुँदरियों के वार्षिक चुनाव प्रतियोगिता से सौंदर्य का अब व्यवसायीकरण हो चुका है। सुँदर दिखने व उससे लाभ उठाने की आकाँक्षा ने युवतियों में येन−केन प्रकारेण सुँदर दिखने की अदभ्य लालसा पैदा कर दी है। पहले जहाँ दया, क्षमा, करुणा, ममता, लज्जा नारी सौंदर्य के अविच्छिन्न अंग हुआ करते थे, वहीं अब मानसिक उच्छृंखलता एवं शारीरिक नग्नता सौंदर्याभिव्यक्ति की अनिवार्य शर्त बन चुकी है।
बदलाव सिर्फ इन बाह्य क्रियाकलापों तक सीमित नहीं है। आज युवाओं के आँतरिक मूल्य एवं सिद्धाँत भी बदल चुके हैं और इस बदलाव से एकमात्र धन कमाना ही उनका उद्देश्य रह गया है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हर वह व्यक्ति उनका प्रेरणा स्रोत है, जो सफल है। उनकी दृष्टि में सफलता की सिर्फ एक ही परिभाषा है—दौलत और शोहरत, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो। इसके लिए वे कुछ भी करने के लिए तैयार हैं।
राजनीति का क्षेत्र भी युवाओं में आए मानसिक परिवर्तन से अछूता नहीं रहा। इतिहास पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पूरी तरह युवाओं के ही त्याग−बलिदान, साहस व जीवटता की कहानी है। अँगरेजों के शोषण, दमन एवं हिंसा भरी राजनीति से भारत को मुक्त कराने का श्रेय युवाओं को ही जाता है। भारतीय राजनीति के दमकते सूर्य को जब आपातकाल का ग्रहण लगा, तब इसी युवा पीढ़ी ने भयावह अत्याचारों को सहते हुए लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपना खून पसीना एक कर दिया था। आज जबकि परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ और ज्यादा विकट हैं, भारतीय राजनीति आकंठ भ्रष्टाचार में दब चुकी है देश आर्थिक गुलामी के संकट की ओर अग्रसर है, ऐसे में भ्रष्टाचार व कुशासन से लोहा लेने के बजाय समझौतावादी दृष्टिकोण युवाओं का सिद्धाँत बन गया है। उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में आज के युवा की आकाँक्षा सिर्फ भौतिक सुख−सुविधा समेटने तक सीमित रह गई है। उनके भोग−विलास पूर्ण जीवन में मूल्यों व संघर्षों के लिए कहीं कोई स्थान नहीं रहा।
भारतीय संस्कृति में सदा से मेहनत, लगन, सचाई का मूल्याँकन किया जाता रहा है, परंतु आज के युवाओं का तथा कथित स्टेटस सिंबल बदल चुका है, जिन्हें वे रुपयों के बदले दुकानों से खरीद सकते हैं। कुछ खास−खास कंपनियों के कपड़े, सौंदर्य−प्रसाधन एवं खाद्य सामग्री का उपयोग स्तर दर्शाने का साधन बन चुका है। महँगे परिधान, आभूषण, घड़ी, चश्मे, बाइक या कार आदि से लेकर क्लब मेंबरशिप, महँगे खेलों की रुचि तक स्टेटस−सिंबल के प्रदर्शन की वस्तुएँ बन चुकी हैं। संपन्नता दिखाकर हावी हो जाने का ये प्रचलन युवाओं को सबसे अलग एवं श्रेष्ठ दिखाने की चाहत के प्रतीक लगते हैं।
आखिर युवाओं की इस दिग्भ्राँति का कारण क्या है? इसका जवाब यही है कि कारण अनेक हैं। सबसे प्रमुख कारण है, प्रचार−प्रसार माध्यम। युवा पीढ़ी तो मात्र उसका अनुसरण कर रही है। आज भारत में हर प्रचार माध्यम के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता के स्थान पर पश्चिमी मानदंडों के अनुसार प्रतिद्वंद्वी को मिटाने की होड़ लगी हुई है। अच्छाइयों को सामने लाने से परहेज कर बुराइयों को सजा−सँवार कर रोचक व आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करना ही उनका ध्येय रह गया है। सनसनीखेज पत्रकारिता के नाम पर आज पत्र−पत्रिकाएँ ऐसी सामाजिक विसंगतियों की घटनाओं की खबरों से भरी होती हैं, जिसे पढ़कर युवाओं की उत्सुकता उसके बारे में और जानने की बढ़ जाती है। परिणाम होता है कि वे स्वयं उसे आचरण में उतारकर उसका अनुसार करने लग जाते हैं। दूरदर्शन के विभिन्न चैनल भी जन−जीवन की भारतीय परंपरा से हटकर अब मात्र उपभोक्ता वस्तुओं के प्रचार−प्रसार के साधन बन गए हैं। विभिन्न कार्यक्रमों व विज्ञापनों ने युवा पीढ़ी को असंयमित व असीमित इच्छा−आकाँक्षाओं से भर दिया है, जिसे हर हालत में पूरा करना ही उनका सपना रह गया है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारतीय बाजार में बढ़ता प्रभाव भी इस स्थिति के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में आकर बस गई विदेशी कंपनियां जो तरह−तरह के शीतल पेय, खाद्य पदार्थ सौंदर्य प्रसाधन बनाती हैं, उसके सबसे बड़े खरीददार युवा ही होते हैं। ये कंपनियों उपभोक्तावादी संस्कृति की पोषक होती हैं। अतः स्वाभाविक है कि जब ये किसी देश की सामाजिक व्यवस्था में अतिक्रमण करती हैं, तो उस देश के सामाजिक मूल्य अपना महत्त्व खोने लगते हैं और समाज में विसंगतियाँ फैलने लगती हैं।
परिवर्तन प्रकृति का नियम हैं, परंतु यह परिवर्तन उत्थान से पतन की ओर ले जाए, तो निश्चित रूप से घातक हैं। परिवर्तन का स्वरूप सदा सकारात्मक होना चाहिए जो अच्छाई से और ज्यादा अच्छाई की ओर ले जाए। भारतीय संस्कृति की कुछ मूलभूत विशेषताएँ हैं। इन विशेषताओं का अपना मूल्य है, जो शाश्वत हैं, जिनकी महत्ता सभी कालों में समान रूप से विद्यमान है। आज जबकि पूरा विश्व पुनः भारतीय संस्कृति की ओर उन्मुख है, हमारे युवाओं की पाश्चात्य संस्कृति के प्रति दीवानगी उनकी मानसिक कुँठा को ही दर्शाती है, जिसे किसी भी कीमत पर दूर किया ही जाना चाहिए।
हे सत्य! हे मेरी अंतरात्मा के बीच निवास करने वाले अंतर्निहित सत्य!! सब कुछ आप ही हैं। इस आत्मा में जो आप हैं, इसलिए फिर देश−काल, गंभीरता−निविडता की कोई सीमा नहीं। यह आत्मा अनंतकाल तक रहने वाला है। सत्यम् मंत्र इसका द्योतक है। आप हैं और केवल आप ही हैं। आत्मा की अतल−स्पर्श गंभीरता से यह मंत्र निकला है, मानों वह हमारे मन एवं संसार के अन्यान्य समस्त शब्दों को अपने में भरकर सबके ऊपर प्रकाशमान है। सत्यम् सत्यम्। उसी सत्य में मुझे पहुँचा दीजिए, हमारी उसी अंतरात्मा के गूढ़तम अनंत सत्य में, जहाँ ‘आप’ हैं और कोई भी नहीं।
जिसकी सेवा, त्याग एवं ममता की छाँव में पलकर पूरा परिवार विकसित होता है उसके आगमन पर पूरे परिवार में मायूसी एवं शोक के वातावरण का व्याप्त हो जाना विडम्बना पूर्ण अचरज ही है। कन्या जन्म के साथ ही उस पर अन्याय एवं अत्याचार का सिलसिला शुरू हो जाता है। अपने जन्म के परिणामों एवं जटिलताओं से अनभिज्ञ उस नन्ही सी जान के जन्म से पूर्व या बाद में उपेक्षा, यहाँ तक कि हत्या भी कर दी जाती है।
लोगों में बढ़ती पुत्र-लालसा और खतरनाक गति से लगातार घटता स्त्री-पुरुष अनुपात आज पूरे देश के समाजशास्त्रियों, जनसंख्या विशेषज्ञों, योजनाकारों तथा सामाजिक चिंतकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। जहाँ एक हजार पुरुषों में इतनी ही मातृशक्ति की जरूरत पड़ती है वहीं अब कन्या-भ्रूण हत्या एवं जन्म के बाद बालिकाओं की हत्या ने स्थिति को विकट बना दिया है। 1991 में किये गये सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार अब 1000 पुरुषों पर मात्र 927 महिलायें रह गई हैं। यह अंतर अब तक निश्चित रूप से और ज्यादा बढ़ गया होगा क्योंकि इन वर्षों में विज्ञान की प्रगति का पूरा लाभ पुत्री जन्म को कम करने के लिए समाज के सभी वर्गों द्वारा भरपूर ढंग से उठाया जा रहा है।
एकमात्र केरल ऐसा राज्य है जहाँ नारी की समाज में बहुलता है। वहाँ यह संख्या 1000 : 1036 है। यानि एक हजार पुरुषों पर एक हजार छत्तीस महिलाएँ हैं। दूसरी ओर अरुणाचल प्रदेश में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या बहुत कम है। वहाँ यह संख्या 1000 पुरुषों पर 859 महिलाओं की आँकी गयी है। अण्डमान-निकोबार द्वीप-समूह में नारी-पुरुष का अनुपात और भी कम है। वहाँ 1000 पुरुषों पर मात्र 790 महिलाएँ हैं। उत्तरप्रदेश में यह अंतर 1000 पर 897 का है।
भारत में शिशु मृत्युदर में कन्या मृत्युदर 1000 में 145 की आँकी गई है। भारत की जनसंख्या का एक चौथाई हिस्सा बालिकाओं का है। इन 22 करोड़ बालिकाओं में से 33 लाख बालिकाएँ हर वर्ष मर जाती हैं। प्रति वर्ष जन्म लेने वाली सवा करोड़ लड़कियों में से एक चौथाई लड़कियाँ तो 1 वर्ष की उम्र के भीतर ही मर जाती हैं। समाजशास्त्रियों एवं जनसंख्या विशेषज्ञों का मानना है कि असमय काल-कलवित होने वाली हर 6 लड़कियों में से एक की मौत का कारण लैंगिक भेदभाव होता है।
यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार एशिया में दस करोड़ महिलाओं के कन्या-भ्रूणों की जानबूझकर हत्या कर दी गयी। आज भी प्रत्येक नगर एवं महानगर में प्रतिदिन कन्या-भ्रूण हत्या हो रही है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि समाजसेवी संस्थाएँ और वैधानिक प्रावधान भी इस क्रूर पद्धति को रोकने में पूरी तरह असफल रहे हैं। किसी जमाने में बालिकाओं को पैदा होते ही मारे जाने और अपशकुन समझे जाने का अभिशाप झेलना पड़ता था, तो आज भी अनेक स्थानों पर उन्हें मौत की नींद सुलाने के उपाय मौजूद हैं।
तमिलनाडु के मदुरै जिले के एक गाँव में कल्लर जाति के लोग घर में कन्या के जन्म को अभिशाप मानते हैं। इसलिए जन्म के तीन दिन के अन्दर ही उसे एक जहरीले पौधे का दूध पिलाकर या फिर उसके नथुनों में रुई भर कर मार डालते हैं। भारतीय बाल कल्याण परिषद द्वारा चलाई जा रही एक संस्था की रिपोर्ट के अनुसार इस समुदाय के लोग नवजात बच्ची को इस तरह मारते हैं कि पुलिस भी उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कर पाती। जन्म लेते ही कन्या के भेदभाव की यह मानसिकता सिर्फ असभ्य, अशिक्षित एवं पिछड़े लोगों की नहीं है बल्कि कन्या अवमूल्यन का यह प्रदूषण सभ्य, शिक्षित एवं संभ्रांत कहे जाने लोगों में भी समान रूप से पाया जाता है। शहरों के तथाकथित विकसित एवं जागरुकता वाले माहौल में भी इस आदिम बर्बरता ने कन्या-भ्रूणों की हत्या का रूप ले लिया है। इसे नैतिक पतन की पराकाष्ठा ही कह सकते हैं कि जीवन-रक्षा की शपथ लेने वाले चिकित्सक ही कन्या भ्रूणों के हत्यारे बन बैठे हैं।
अस्तित्व पर संकट के अतिरिक्त बालिकाओं को पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि हर क्षेत्र में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। मानव संसाधन मंत्रालय के महिला एवं बाल विकास विभाग के नवीनतम सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार अधिकाँश बालिकाएँ आवश्यक पोषक तत्त्वों की मात्रा का दो तिहाई से भी कम अंश प्राप्त कर पाती हैं। अस्वस्थता की स्थिति में बहुत कम बच्चियों को समय पर पर्याप्त स्वास्थ्य रक्षण सहायता उपलब्ध हो पाती है। आज भी 7 वर्ष से नीचे की बालिकाओं का 61 प्रतिशत निरक्षर है। यह स्थिति सिर्फ गाँवों तक सीमित नहीं है अपितु शहर भी इससे बहुत आगे नहीं है।
वास्तव में अभिभावकों की संकीर्ण मानसिकता एवं समाज की अंध परम्पराएँ ही वे मूल कारण हैं जो पुत्र एवं पुत्री में भेद करने हेतु बाधित करते हैं। हमारे रीति-रिवाजों एवं सामाजिक व्यवस्था के कारण भी बेटा और बेटी के प्रति सोच में दरार पैदा हुई है। अधिकाँश माता-पिता समझते हैं कि बेटा जीवन-पर्यन्त उनके साथ रहेगा, उनका सहारा बनेगा। हालाँकि आज के संदर्भ में पुत्र को बुढ़ापे की लाठी मानना एक मृगतृष्णा ही है। लड़कियों के विवाह में दहेज की समस्या के कारण भी माता-पिता कन्या जन्म का स्वागत नहीं कर पाते। समाज में वंश-परम्परा का पोषक लड़कों को ही माना जाता है। ऐसे में पुत्र कामना ने मानव मन को इतनी गहराई तक कुँठित कर दिया है कि कन्या संतान की कामना या जन्म दोनों अब अनपेक्षित माने जाने लगे हैं।
बालिकाओं के प्रति उपेक्षा की इस समस्या से सिर्फ भारत ही नहीं अपितु दक्षिण एशिया के सारे देश इससे चिंतित हैं। इस समस्या से उपजने वाले गंभीर परिणामों को ध्यान में रखकर ही दक्षिण एशिया सहयोग संगठन (सार्क) के देशों ने सामूहिक रूप से इस सामाजिक समस्या को दूर करने का संकल्प लिया है। इस उद्देश्य के अंतर्गत ही 1990 को ‘बालिका वर्ष’ के रूप में मनाया गया एवं बालिकाओं के जन्म एवं जीवन को प्रोत्साहन देने के लिए एक विस्तृत कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई है। साथ ही विभिन्न सरकारी एवं गैर सरकारी एजेन्सियों के माध्यम से बालिका संबंधी शोध तथा उनके जीवन स्तर को सुधारने एवं उनके महत्त्व को स्थापित करने के लिए विविध प्रकार के कार्यक्रमों की घोषणा की गई। इन कार्यक्रमों को गतिशील बनाये रखने के लिए बाद में 1990 का पूरा दशक ही (1991-2000) ‘सार्क बालिका दशक’ के रूप में मनाने की घोषणा की गई। भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय कार्य योजना बनाई है जिसका मुख्य उद्देश्य पारिवारिक एवं सामाजिक परिवेश में बालिकाओं के प्रति समानतापूर्ण व्यवहार को बढ़ावा देना है।
सरकारी कार्यक्रमों, गैर सरकारी संगठनों के प्रयास एवं मीडिया के प्रचार-प्रसार से कुछ हद तक जनमानस में बदलाव अवश्य आया है परन्तु निम्न-मध्यम वर्ग एवं गरीब परिवारों में अभी भी लैंगिक भेदभाव जारी है। जहाँ बालिकाओं का जीवन पारिवारिक उपेक्षा, असुविधा एवं प्रोत्साहन रहित वातावरण में व्यतीत होता है। जहाँ उनका शरीर प्रधान होता है, मन नहीं। समर्पण मुख्य होती है इच्छा नहीं। बंदिश प्रमुख है, स्वतंत्रता नहीं।
बदलती हुई परिस्थितियों के साथ अब ऐसी मान्यताओं से ऊपर उठना होगा। बालिकाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। अब तक की गयी उपेक्षा के बाद भी जहाँ भी उन्हें मौका मिला है, वे सदा अग्रणी रही हैं। इक्कीसवीं सदी नारी वर्चस्व का संदेश लेकर आयी है। अगर हम अब भी सचेत नहीं हुए तो हमें इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
मंद वायु आँधी से बोली—”दीदी, मैं जहाँ जाती हूँ लोग स्वागत करते हैं। आपका आभास पाते ही डरते−छिपते हैं। हमारा लक्ष्य तो लोकमंगल का है, फिर क्यों आप इस रूप में सबको परेशान करती हैं।”
आँधी बोली—”बहन, तेरी उपयोगिता अपनी जगह है—मेरी अपनी जगह। स्थान−स्थान पर सड़न, जहरीला धुँआ, गुबार आदि एकत्रित हो जाते हैं। कहीं प्राणवायु की मात्रा कम हो जाती है। इनका निवारण तुम्हारी गति से संभव नहीं, इसीलिए कभी−कभी मैं सक्रिय हो जाती हूँ। तुम लोगों को तसल्ली देती हो, मैं घुटन पैदा करने वाले विकारों का निराकरण करती हूँ। लोकमंगल के लिए दोनों आवश्यक हैं। तुम्हारा सौजन्य भी और मेरा पराक्रम भी।”
भाषा भावों की अभिव्यक्ति है, विचारों का परिधान है। कल्पनाएँ अपना रंग भाषा के धरातल पर ही रंगती हैं। अव्यक्त इसी से प्राणवान हो व्यक्त होता है। धर्म, संस्कृति, इतिहास, साहित्य सभी अपना आकार भाषा के द्वारा लेते हैं। हरेक की अपनी भिन्न भाषा होती है। उपयोगिता के आधार पर इसका विकास होता है। भाषा रूपी इस साँस्कृतिक विरासत को नजरअंदाज करने से यह निरन्तर ह्रास होती जा रही है।
भाषा शब्द संस्कृति की भाषा धातु से बना है, जिसका अर्थ है बोलना या कहना। अर्थात् भाषा वह है जिसे बोला जाए। प्लेटो ने सोफिस्ट में वर्णन करते हुए कहता है विचार आत्मा की मूक या अध्वन्यात्मक संकेत हैं। यही जब ध्वन्यात्मक होकर शब्दों द्वारा प्रकट होता है तो इसे भाषा की संज्ञा दी जाती है। एनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका में इसे इस तरह से परिभाषित किया है-भाषा स्वर संकेत का वह इच्छित माध्यम है जिसके तहत मानव समाज में संस्कृति व विचारों को सम्प्रेषित करता है। कालरिज कहते हैं-भाषा मानव मस्तिष्क की वह शास्त्रशाला है जिसने अतीत की सफलताओं के जयस्मारक और भावी विकास के लिए अस्त्र-शस्त्र एक सिक्के के दो पहलू की तरह साथ रहते हैं।
भाषा की उत्पत्ति के बारे में दो मत हैं। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष। समय-समय पर अनेकों विद्वानों ने अपने मत व्यक्त किए हैं। 18वीं सदी में गियाम्बटिस्टा, ब्रसंस, काण्डिलाक, रूसो तथा हर्डर ने इस विषय पर शोध की थी। हर्डर की शोध को इसमें प्रमुख माना जाता है। 19वीं शताब्दी में इस विषय में शोध करने वालों में त्वायरग्रिम, राये, डार्विन, हम्बोल्ट, शइत्जर, अनेस्ट रेनन, जेर्म्पसन, मैक्समूलर, गाइगर, स्टाइन्थल, स्वीट, मार्टी, स्पेन्सर, रेगनाड तथा टेलर उल्लेखनीय हैं। भाषा उत्पत्ति का सिद्धान्त 20वीं सदी में वुन्ट, डिलेगुना, बर्नार्ड शाँ, होनिग्स्वाल्ड, रेवेज, जोहान्सन, हम्फरी तथा समरफेल्ट द्वारा दिया गया। यह सिद्धान्त दैवी उत्पत्ति सिद्धान्त, विकासवादी, धातु, निर्भय, अनुकरण, यो हे हो, इंगिन, टाटा, संगीत, संपर्क तथा समन्वित सिद्धान्त आदि रूपों में जाना जाता है। इसका वर्गीकरण भी कई आधारों पर किया गया है। महाद्वीप, देश, धर्म, काल, आवृत्ति, परिवार तथा प्रभाव के आधार पर यह वर्गीकरण हुआ है। इसका आकृतिमूलक वर्गीकरण योगात्मक तथा अयोगात्मक ढंग से किया जाता है। योगात्मक तीन भागों में बँटा है-शिष्ट, अशिष्ट तथा प्रतिशिष्ट। शिष्ट के अंतर्गत आने वाला बहुर्मुखी योगात्मक हिन्दी आदि भाषाओं की ओर संकेत करता है तो संस्कृत संयोगात्मक स्वरूप को दर्शाता है।
संस्कृत देव भाषा के रूप में जानी जाती है। यह प्राचीनतम भाषा है। मान्यता है कि शेष सारी भाषाओं की उत्पत्ति इसी से हुई है। अपनी राष्ट्र भाषा हिन्दी है। यह विश्व की तीसरे नम्बर की भाषा है। अपने देश में तकरीबन पचास करोड़ लोग इसका प्रयोग करते हैं। अपने देश की यह लोकप्रिय भाषा है। अहिन्दी क्षेत्र के रूप में माने जाने वाले आँध्रप्रदेश में 14 लाख 18 हजार 358 लोग हिन्दी बोलते हैं। केरल में इनकी संख्या 16466 हैं। पश्चिम बंगाल में 36,27,200 लोग इसका प्रयोग करते हैं। बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान तथा हिमाँचल की तो यह राजभाषा है। यूँ तो पूरी दुनिया में 6000 से अधिक भाषाएँ है। भाषा की दृष्टिकोण से सर्वाधिक विविधता अपने ही देश में हैं। यहाँ करीब 600 भाषाएँ हैं। 15 भाषा तो राजकीय भाषाओं के रूप में प्रयुक्त होती हैं।
विश्व में सबसे बड़ी भाषा चीनी है। सारे संसार में चीनी 60, अंग्रेजी 25, रूसी 18, स्पेनी 12, जर्मनी 10, जापानी 10, फ्राँसीसी 8, पुर्तगाली 6, इतालवी 6, अरबी 5 प्रतिशत लोगों द्वारा बोली जाती है। चीनी को मंदारिन भाषा भी बोला जाता है। साढ़े छियासी करोड़ लोग इसका प्रयोग करते हैं। चीन में सवा छः करोड़ कैंटनी, चार करोड़ बू, पाँच करोड़ मिन और दो करोड़ चीनी नागरिक होक्का बोलते हैं। यहाँ 70 लाख लोग उइगनू तथा 60 लाख लालोभाषी हैं। 50 लाख लोग मियाओ भाषा तथा 50 लाख तिब्बती भाषा का प्रयोग करते हैं। स्पेनिश का उपयोग 34 करोड़ लोग करते हैं। जापानी साढ़े 12 करोड़ लोगों के द्वारा बोली जाती है। सवा 7 करोड़ लोगों की भाषा कोरियन है। थाई भाषी कोई 5 करोड़ हैं। इस तरह संसार में मुश्किल से 10 प्रतिशत देश ऐसे हैं जिनकी राजकीय भाषा अंग्रेजी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व व्यापार की दृष्टि से अंग्रेजी सबसे बड़ी एवं समृद्ध भाषा मानी जाती है। यह ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अमेरिका, आयरलैण्ड, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड की राजभाषा है।
विश्व की जनसंख्या 6 अरब के आसपास है। और छः हजार भाषाएँ प्रचलित हैं। इस तरह एक भाषा के पीछे करीबन 9 लाख व्यक्ति आते हैं। कुछ भाषा विश्व के बहुसंख्यकों द्वारा बोली जाती हैं। और कुछ ऐसे हैं जो मात्र 5 हजार लोगों द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। भाषा की संख्या पश्चिम यूरोप में बहुत कम हैं। यहाँ 45 के करीब मूल भाषाएँ प्रचलित है। 1788 में आस्ट्रेलिया के स्थापना वर्ष में कम जनसंख्या के बावजूद यहाँ पर 250 भाषा थीं। कोलम्बस ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका में मूल रूप से 1000 भाषाएँ प्रचलित थी। न्यू गुएना और अन्य पैसिफिक द्वीप समूह इससे भी समृद्ध माने जाते हैं। यहाँ की आबादी 40 लाख हैं जो विश्व जनसंख्या का मात्र दो प्रतिशत हैं। फिर भी यहाँ 1400 भाषाओं का उपयोग होता है। समस्त संसार का यह 25 प्रतिशत है। वानटु में 105 तथा फिलीपिन्स में 107 भाषाओं का प्रयोग मिलता है।
जेरेड डायमण्ड ने डिस्कवरी के फरवरी 1993 के अंक में भाषा की विशद् विवेचना की है। इसके अनुसार न्यूगुएना की भाषा बड़ी समृद्ध है। एक लोकोक्ति है-कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी। इसी प्रकार न्यूगुएना में प्रति 10 से 20 किमी. के फासले पर भाषा एकदम परिवर्तित मिलती है। जैसे अमेरिकन और चीन की अंग्रेजी। यहाँ पर आपस में एक दूसरे की भाषा एकदम भिन्नता लिए होती है। कुछ कबीलों की स्थिति तो यह है कि मात्र 1000 लोग ही एक भाषा का प्रयोग करते हैं।
भाषा की विविधता ही इसकी शोभा है। यह भौगोलिक परिवेश तथा मानव की जनसंख्या के घनत्व पर भी निर्भर करती है।
लोकमान्य तिलक ने कहा है-भाषा की समृद्धि स्वतंत्रता का बीज है। जब भी भाषा के प्रचलन में आजादी मिली उसका विकास हुआ। इतिहास इस बात का गवाह है 6000 बीसी में तकरीबन 10 हजार भाषाएँ थीं परन्तु इसके समुचित प्रचलन व विकास के अभाव में इस अमूल्य धरोहर से वंचित होना पड़ रहा है। इनमें से मात्र इस्ट्रस्कन, हिहीट, सुमेरियन आदि की लिपि सुरक्षित रह पायी है। हजारों तो बिना किसी संकेत के समाप्त हो गई। कौन जानता है इन्स और पिक्ट की बोली कैसी थी।
वासवेल कृत टुर टू दि हेबरिडीज में डॉ. जॉनसन का उद्गार व्यक्त हुआ है। इनके अनुसार जब कोई भाषा नष्ट हो जाती है तो मुझे अपार दुःख होता है। क्योंकि भाषाएँ राष्ट्र की वंशावलियाँ होती हैं। किसी भी राष्ट्र या समाज को दृढ़ता, एकता व साँस्कृतिक समृद्धि का परिचायक वहाँ की प्रचलित भाषाएँ होती हैं। इस विषय में अलास्का यूनिवर्सिटी के माइकल क्रास ने एक सर्वेक्षण किया है जिसके अनुसार विश्व में मात्र 170 भाषाएँ ही विभिन्न
देशों की राजभाषा है। इसमें तो 15 तो अपने देश में हैं। बहुत सारे देशों में अंग्रेजी, स्पेनिश, अरबी, पोर्तुगीस राजभाषा के रूप में प्रयुक्त होती है। मात्र 70 देश ही अपनी मूल भाषा का प्रयोग करते हैं। अगर 200 भाषाएँ ही राजभाषा का दर्जा पाएंगी तो शेष 5800 की क्या स्थिति होगी, इसे कौन विकसित करेगा? क्रास के मतानुसार किसी एक भाषा के विशेष प्रचलन से अन्य छोटी भाषाओं के विनाश का संकट बढ़ जाता है।
भाषा की स्थिति का वर्तमान दौर बड़ा ही निराशाजनक है। उत्तर पश्चिम काकेशस की भाषा उबिख को बोलने वाला एक ही व्यक्ति जिन्दा है। दक्षिण कैलिफोर्निया की इण्डियन भाषा कपेनो को बोलने वाला रोसिका नोलेस्क्वेज अंतिम व्यक्ति था। 1987 में इसकी मृत्यु के साथ ही इस भाषा का अवसान हो गया। नवीनतम सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि विश्व में मूल भाषाओं को नई पीढ़ी उपेक्षित कर देती है। नई पीढ़ी प्रचलित भाषा को प्रयोग करती है जिससे मूल भाषा क्रमशः पतन की ओर अग्रसर हो रही है। अगर ऐसी स्थिति रही तो आगामी शताब्दी तक कुछ सौ की संख्या में ही भाषाएँ बची रह पायेंगी। भाषा का पतन न केवल कम संख्या में प्रयुक्त होती भाषा का हो रहा है बल्कि बण्डसी, ब्रंटेन तथा क्वेचुआ जैसी बड़ी भाषा का भी ह्रास हो रहा है। ब्रंटेन को एक लाख लोग तथा क्वेचुआ को साढ़े आठ लोग बोलते हैं। पतन के कारण को खोजने के लिए इसके धरातल का विश्लेषण करना होगा। इससे पता चलता है कि वैचारिक विभिन्नता, अवरोध तथा बड़े पैमाने पर हो रही उपेक्षा इसका मूल कारण है।
विश्व में भाषा के पतन का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कारण है उस पर डाला जाने वाला बाहरी दबाव। बाहरी ताकतों ने भाषाओं पर घोर अत्याचार किया है। सन् 1853 से 70 के बीच कैलीफोर्निया में ही इण्डियाना भाषा को उखाड़ फेंका गया। ब्रिटिश शासकों ने विश्व में सबसे अधिक तबाही मचायी। 1803 और 1835 में तस्मानिया की भाषा को नष्ट कर दिया। इन्होंने भारत में सैकड़ों वर्षों के शासन के दौरान भारतीय भाषाओं को समाप्त कर बलात् अंग्रेजी की स्थापना की। इसके लिए अनेकों प्रकार के हथकण्डों एवं कूटनीति का प्रयोग किया गया। नर्सरी से लेकर कान्वेंट स्कूल और कालेज खोले गए। नौकरी की सुविधा दी गई। अंग्रेजी को अन्य भाषाओं से श्रेष्ठ बताकर इसकी महत्ता प्रतिपादित की गई। लगभग यही स्थिति सारे विश्व के अन्य भागों की है।
भाषायी विविधता तथा पूर्वाग्रही मान्यता के कारण विश्व में अनेकों बार खून की नदियाँ बही हैं। यूगोस्लाविया का गृह युद्ध तथा सर्व और क्रोट्स के बीच भीषण युद्ध के पीछे भाषा भी एक कारण रही है। रूस के स्टालिन ने अपने ही देशों में लाखों लोगों की हत्या करा दी थी। इसके पीछे भाषा का संकट ही छाया हुआ था। यह भाषा संबंधी संकीर्ण सोच एवं दुराग्रह का परिणाम है। अन्यथा भाषा तो संस्कृति का वाहन है, उसका अंग है। इससे भला अशाँति, असंतोष कैसे फैलेगा? भाषा जो अंतर की अभिव्यक्ति है, प्रेम का प्रकाश बाँटना इसका धर्म है। यह तो हिंसक मानसिकता है जो ऐसा जघन्य कृत्य करती है।
मलयालम के शंकर कुरूप में इसकी महत्ता को इस प्रकार प्रदर्शित किया गया है। हे मानव! जबसे मैंने तुम्हारी भाषा सीखी तब से वह विश्वविमोहक भाषा भाल गया जिसमें स्नेह छोड़कर कोई शास्त्र नहीं, आनंद बिसारकर कोई अर्थ नहीं तथा रूप को त्यागकर कोई छंद नहीं। कविवर रवीन्द्र ने इसे बड़े ही आकर्षक ढंग से सजाया है-
हे समुद्र! तेरी क्या भाषा है? शाश्वत प्रश्न ही भाषा है। हे आकाश! तेरे उत्तर की क्या भाषा है? शाश्वत मौन की भाषा।
भाषा प्राणों का संचार करती है। यह हिम्मत, साहस और दृढ़ता का परिचायक है। बहुभाषी किसी भी देश में जाकर बस सकता है, परन्तु इसके लिए अपनी मूल भाषा को भुला देने की आवश्यकता नहीं। इस मामले में डेनमार्क बहुत समृद्ध हैं। 50 लाख डेन्स डेनिस का प्रयोग करते हैं। जो प्रायः सभी अंग्रेजी के साथ ही अन्य भाषा को भी जानते हैं। दो देशों, राज्यों व क्षेत्रों के सीमाओं के रहने वाले लोग भी कई भाषाओं के जानकार होते हैं। इससे विश्व में व्यापार, साँस्कृतिक आदान-प्रदान व शान्ति को बढ़ावा मिलता है। अतः हर व्यक्ति को अपने से संबंधित अन्य भाषाओं को जानना चाहिए। विनोबा कई भाषाओं के विद्वान थे। भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव भी दर्जनों भाषाओं के पण्डित मानते जाते हैं।
भाषा मनुष्य अस्तित्व का एक जटिल उत्पाद है। हरेक भाषा आपस में एक दूसरे में भिन्नता लिए हुए होती है। इसकी ध्वनि संरचना तथा विचारों की प्रक्रिया में भी विविधता होती है। यह मनुष्य के हजारों वर्षों के कठिन शोध के फलस्वरूप प्राप्त होती है। भाषा किसी राष्ट्र या समाज के सामाजिक, साँस्कृतिक तथा साहित्यिक तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करती है। इसके द्वारा मानव अपने विचार प्रकट करता है। लेखक, कवि अपनी अभिव्यक्ति को इसी के द्वारा समाज के सामने प्रकट करते हैं। भाषा में वह शक्ति व क्षमता निहित है जिससे कि मूर्छित राष्ट्र को जीवन्त और जाग्रत किया जा सके। वर्तमान समय को अश्लील और विषाक्त वातावरण के परिष्कार के लिए भाषा की पवित्रता तथा विचारों की उत्कृष्टता ही एकमात्र निदान है। अतः विश्व के छः हजार भाषाओं को सुरक्षित और विकसित करने का संकल्पबद्ध प्रयास होना चाहिए।
भाषाओं के विकास में ही राष्ट्रों व संस्कृतियों का विकास सन्निहित है। अतः विविध भाषाओं को समुचित सम्मान देकर विश्व शान्ति और सद्भावना की ओर कदम बढ़ाये जा सकते हैं। 21वीं सदी में एक विश्व भाषा की परिकल्पना की जा रही है। यह परिकल्पना सुखद है, पर इसका स्वरूप अवश्य ऐसा होना चाहिए कि भावी विश्व भाषा के आँचल में विश्व भर की सभी भाषाएँ अपना सुखमय विकास कर सकें।
महाभारत का घमासान युद्ध चल रहा था। दोनों पक्षों के असंख्य योद्धा घायल होते और मध्य रात्रि को युद्ध बंद करने का नियम था। अँधेरे होते ही युधिष्ठिर वेष बदलकर निकलते और दोनों पक्ष के घायलों को चिकित्सालय पहुँचाने से लेकर पानी पिलाने जैसे उपचार में लगे रहते, दिन निकलने से पूर्व घर लौट आते।
युद्ध समाप्त होने पर उनकी सेवा−सद्भावना का भेद खुला तो प्रजा ने उन्हें धर्मराज की उपाधि दी। उनमें अपने−पराये में भेद न था। इस धर्मपरायणता को अपनाने के कारण ही शक्ति की दृष्टि से हलका पड़ने वाला पाँडव पक्ष जीता और “यतो धर्मस्ततो जयः” का उद्घोष गूँजा।
इस संसार में अनेकों व्यक्ति ऐसे हैं जो अपने में अनेकानेक विलक्षणताएँ समेटे हुए हैं। इनमें से अधिकाँश अपनी विशेषता से अनभिज्ञ सामान्य−सा जीवनयापन करते हुए जीवन−यात्रा पूरी कर लेते हैं, पर कुछ अपने व्यक्तित्व की विचित्र विशेषता के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र बन प्रसिद्ध हो जाते हैं।
लौरिंकेप बलेरिज ऐसा व्यक्ति है, जो अपने शरीर में बिजली एकत्रित कर सकता है। बलेरिज जो टोकियो में आयोजित प्रदर्शनी ‘दुनिया के अजीबोगरीब व्यक्ति’ में शामिल हुआ। व्यावसायिक रूप से वह एक घुमंतू सेल्समैन है, लेकिन उसके विलक्षण गुणों के बारे में दूर−दूर तक कहानियाँ फैल चुकी हैं। वह अपने आश्चर्यजनक करतबों को दिखाने के लिए महीने के अधिकाँश दिनों में व्यस्त रहता है।
बलेरिज जब किसी बल्ब को अपने हाथ में पकड़ता है, तो बल्ब जब उठता है। इलैक्ट्रिक ओवन या पंखे के तार उसके शरीर के किसी भी भाग से स्पर्श होते ही वे चलने लग जाते हैं। उसकी अँगुलियों के छूने मात्र से कागज या रबड़ जलने लग जाते हैं। उसके इन कारनामों में सबसे मुख्य बात यह है कि वह अपनी इच्छानुसार जब चाहे अपने शरीर की बिजली को रोक अथवा चालू कर सकता है।
इटली के पास सिसिली द्वीप के एक परिवार में एक विलक्षण बालक पैदा हुआ, उसके तीन पैर थे। शिशु का नाम रखा गया फ्राँसिसे। छह बरस की उम्र तक फ्राँसिसे तीनों पैरों पर चल−फिर, उछल−कूद और भाग−दौड़ सकता था, पर उसके बाद उसके सामान्य पैर तीसरे पैर की अपेक्षा ज्यादा तेजी से बढ़ने लगे और अधिक लंबे हो गए। अब उसका तीसरा पैर उसके शेष दोनों पैरों की अपेक्षा तीन इंच छोटा था, किंतु वह उसे स्वतंत्र रूप से हिला−डुला सकता था एवं उससे फुटबाल भी खेल सकता था। वह सरकस में भरती हो गया। उसका तीन पैरों का फुटबाल का खेल सरकस के प्रमुख आकर्षणों में से था। फ्राँसिसे ने शादी की और उसके घर स्वस्थ−सामान्य बच्चे पैदा हुए। 71 वर्ष की उम्र में उसकी मृत्यु हुई।
इस तरह के आश्चर्य सिर्फ पुरुषों में ही नहीं पाए जाते, अपितु महिलाएँ भी इस मामलों में पीछे नहीं हैं। सुराहीदार गरदन शब्द का प्रयोग सामान्यतः महिलाओं की सुँदरता के संबंध में होता रहा है, परंतु स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम की एक महिला की, जिसका नाम एवासोएम है, गर्दन को किसी भी तरह सुराहीदार नहीं कहा जा सकता। उसे देखकर तो मन में एक मादा जिराफ की छवि उभरकर सामने आती है। इसे प्रकृति की एक विचित्र बात ही कहा जा सकता है कि एवा की गर्दन लगभग 32 इंच लंबी है। वह पूर्णतः सामान्य जीवनयापन कर रही है।
महिलाओं का सामान्य कद प्रायः पाँच से साढ़े पाँच फुट के मध्य होता है, किंतु लंदन की जेनी नाम की एक लड़की सिर्फ ग्यारह वर्ष की आयु में ही साढ़े छह फुट लंबी थी। मृत्यु के समय उसका कद सात फुट सवा ग्यारह इंच था। इसके विपरीत लंदन की ही एक लड़की पनीला की लंबाई 21 वर्ष की उम्र में भी 23, 2 इंच थी।
कुछ महिलाएँ अपने दूसरी तरह की अनोखी विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध हुई। इटली की पेनिसा नामक महिला रबड़ की गुड़िया जैसी थी। ऊँचे स्थान से गिरने पर वह गेंद की भाँति उछला करती थी, लेकिन उसे चोट कभी नहीं लगी। रोम की एक नर्तकी के गले से अँधेरे में लाल रंग का प्रकाश निकलता था। अफ्रीका की एक महिला की आँखों से रात में नीला धुआँ निकला करता। ये विलक्षणताएं प्रकृति माता के गर्भ से उपजे अनोखे आश्चर्य हैं और यत्र−तत्र−सर्वत्र इस तरह की विलक्षणता विद्यमान है। वैज्ञानिक अन्वेषण भी इस तरह के रहस्यों से परदा उठा पाने में असफल रहा है। ऐसे में यही कहना पड़ता है कि कोई अदृश्य शक्ति इन विचित्रताओं के रूप में हमें अपना खेल दिखाती रहती है।
भोजन के संदर्भ में मनुष्य शरीर में दाँतों का महत्वपूर्ण स्थान है। दाँत न हों, कम हों, कमजोर हो, तो खाने में आनंद नहीं आता, कारण कि स्वाभाविकता भोजन को चबाने में है, यों ही निगल जाने में नहीं। जब दाँतों द्वारा आहार को चबाया जाता है, तो इस क्रम में मुँह की लार भी आकर उसमें मिल जाती है। इससे व्यंजन का स्वाद बढ़ता है और उसका परिपाक भी आसान हो जाता है। यह स्थिति पोपले मुँह में नहीं बन पाती, इसलिए ऐसे लोगों की पाचन शक्ति अक्सर खराब रहती है। अब ऐसा संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि भविष्य में मनुष्य शायद पोपले ही हों, कारण, कि दाँतों की उपयोगिता शनैः−शनैः घटती जा रही है।
विकासवादी अवधारणा को सही मानें, तो यही कहना पड़ेगा कि मनुष्य के सार अवयव उनकी नियमित सक्रियता के कारण ही वर्तमान स्थिति में बने हुए हैं। निष्क्रियता ह्रास और विलुप्त पैदा करती है। नर मानवों में स्तन अवशेष, पूँछ की हड्डी, एपेंडिक्स इसी के उदाहरण हैं।
अब इसी शृंखला में विज्ञानवेत्ता दाँत को भी सम्मिलित कर रहे हैं। उनका कहना है कि मानवी दाँत का आकार धीरे− धीरे घटता जा रहा है और शायद आगे भी जारी रहे। यदि यह प्रक्रिया यथावत् बनी रही, तो इसकी चरम परिणति चूहों के छोटे−छोटे दाँतों के रूप में हो सकती है अथवा यह भी हो सकता है कि मुँह पूर्णतः दंतविहीन बन जाए। यह आशंका विज्ञानवेत्ताओं ने लंबे अध्ययनों के उपराँत प्रकट की है।
मिशिगन विश्वविद्यालय में मानव विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. सी. लोरिंग ब्रेस एवं उनके सहयोगियों डॉ. केविन डी. हण्ट और केरेन आर. रोजेनबर्ग ने 25 वर्षों तक इस दिशा में अथक खोज की है। उन्होंने विश्वभर की कब्रगाहों का भ्रमण किया और उनसे कंकालें खुदवाकर दाँतों की बारीकी से पड़ताल की। उनने मिश्र की प्राचीन ममियों के भी दाँत देखे और हजार हजार साल पुराने उन पिंजरों के दाँतों की भी नाप−तौल की, जो मानवी विकासवादी शृंखला की महत्त्वपूर्ण कड़ी माने जाती हैं। इस प्रकार उन्होंने एपमैन, क्रोमैगनन, निंडरथल जेसे आदि मानवों से लेकर वर्तमान मानव (होमोसेपियंस सेपियंस) तक के दाँतों का गहन अध्ययन किया। इस आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि आकार घटने की यह प्रक्रिया लगभग एक लाख वर्ष पूर्व तक आरंभ हुई, जब मनुष्य अपने विकासवादी कड़ी के निंडरथल पड़ाव पर था। तब उसका सिर बड़ा था, चिबुक बाहर की ओर निकला हुआ एवं दाँत वर्तमान मनुष्य से दुगने बड़े थे। उसे अपनी उदरपूर्ति जानवरों के कच्चे माँस से करनी पड़ती थी। इस कार्य में उनके बड़े−बड़े दाँत खूब सहायता करते। वे अपनी जिंदगी भली प्रकार गुजार रहे थे कि इसी बची एक प्राकृतिक आपदा आ उपस्थिति हुई। तापमान के अचानक गिर जाने से हिमयुग आ गया। इस विभीषिका से बहुत सारे जंतु मारे गए। जो बचे, अब उन्हीं से आदि मानवों को पेट भरना पड़ता। कई बार शिकार न मिलने के कारण उन्हें भूख भी रहना पड़ता। इसका हल उन्होंने कंद−मूल द्वारा निकाला। अब वे केवल माँसाहारी नहीं रहे, वरन् जीवित रहने के लिए वनस्पतियाँ भी खाने लगे। इस मध्य माँसाहार के साथ एक कठिनाई और आ गई। अतिशय ठंड के कारण अब वह जमने लगा। थोड़ी देर बाद ही वह इतना कठोर हो जाता कि उसे चीरना−फाड़ना दाँतों के बूते की बाहर की बात होती। इस समस्या को उन्होंने आग द्वारा दूर किया। वे माँस को गरम कर खाने लगे। इससे वह काफी मुलायम हो जाता और खाने में कम श्रम करना पड़ता। धीरे−धीरे यह आदत में सम्मिलित हो गया। इससे उनके दाँतों को काफी आराम मिलने लगा। इस आरामतलबी को उन्होंने और आगे बढ़ाया। संप्रति माँस आग में भूना जाने लगा। इससे दो लाभ हुए प्रथम, इसका स्वाद बढ़ गया एवं द्वितीय, दाँतों को खाने में बहुत ही कम मेहनत करनी पड़ती। इससे बड़े और नुकीले दाँतों की आवश्यकता समाप्त हो गई। प्रकृति का यह सामान्य नियम हैं कि जिस अंग की उपयोगिता या सक्रियता घट या मिट जाए, उसका ह्रास होने लगता है। बस यहीं से मनुष्य के दाँतों के आकार में घटोत्तरी शुरू हुई। शोधकर्त्ताओं का दावा है कि आज से दस हजार वर्ष पूर्व तक दाँतों का आकार प्रति दो हजार वर्ष में 1 प्रतिशत की दर से घट रहा था, पर वर्तमान में यह दर बढ़ गई है। अब दाँतों के आकार में 1 प्रतिशत हजार साल की दर से कमी आ रही है। आगे यह कमी और अधिक बढ़ सकती है—ऐसा अनुसंधानकर्त्ताओं का मत है।
वर्तमान मानवों में कुल दाँतों की संख्या 32 है, पर अन्वेषणकर्त्ता शरीरशास्त्रियों का कहना है कि आदि मानवों में इनकी संख्या 44 हुआ करती थी। जरूरत के हिसाब से इसमें भी कमी आई। जब खाने के तरीके में परिवर्तन हुआ, तो पुराने ढंग पर निर्मित दाँतों की बहुलता भी अनावश्यक प्रतीत होने लगी। फलतः शनैः−शनैः उसमें घटोत्तरी होती गई और अंततः 32 पर आकर स्थिर हुई। दाँतों की संख्या में इस कमी से जबड़े सिकुड़ते चले गए। जबड़ों के संकुचन से सिर और चेहरे के आकार भी घटे और ठुड्डी छोटी हुई। आगे यदि खाद्य शैली में और बदलाव आता है, तो न सिर्फ दाँतों के आकार घटेंगे, वरन् उनकी संख्या में भी कमी आएगी। इससे खोपड़ी भी छोटी होगी। इस प्रकार दाँतों की संख्या और आकार के साथ−साथ सिर भी छोटा होगा।
शोधकर्त्ताओं का कहना है कि आदमी के वर्तमान रुझान को देखते हुए यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि भविष्य में उसके खान−पान के तरीकों में और परिवर्तन न आएगा। वे कहते हैं कि विज्ञान के विकास के साथ−साथ मनुष्य की जीवन शैली में क्राँतिकारी बदलाव आया। साक्षरता बढ़ी, तो दैनिक जीवन में भी इसका असर पड़ा। लोग अब अधिक परिष्कृत तरीकों का इस्तेमाल करने लगे। इसके दो फायदे हुए, समय और श्रम की बचत एवं कार्य में सुविधा। विज्ञान के उद्भव के बाद जीवन की गति अधिक तीव्र हुई, इसलिए लोग उन तरीकों का उपयोग प्रायः हर क्षेत्र में करने लगे। खान−पान संबंधी आहार वाला क्षेत्र भी इससे अछूता न रहा। उदाहरण के लिए, वे बताते हैं कि दाँत धोने वाले ब्रुश के विकास से पूर्व लोग प्रायः वृक्ष की मुलायम टहनियों के दतुवन से दाँत साफ किया करते थे। इसके लिए उसके अग्रभाव को चबा−चबाकर सबसे पहले उसकी कूची तैयार करनी पड़ती। फिर उस कूची से दाँत रगड़−रगड़कर साफ किए जाते। दाँत धोने की इस प्रणाली में दाँतों को नियमित श्रम करना पड़ता। इससे वे मजबूत बने रहते। ब्रुश के विकास से दाँतों का वह श्रम समाप्त हो गया, जिससे वे कमजोर होने लगे। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में दाँत साफ करने का यही परंपरागत तरीका काम में लाया जाता है।
इसके अतिरिक्त खाने की प्रणाली में भी परिवर्तन स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। अब लोग खाने के प्राकृतिक उपायों को न अपनाकर कृत्रिम एवं अप्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। लोग फलों को सीधे तौर पर न खाकर उनका रस लेना पसंद करते हैं। गन्ने को चबाने और चूसने की अब किसे फुर्सत है? मशीन से तुर्त−फुर्त में निकला उसका ‘जूस’ ही सबको भाता है। आज ठोस आहार की प्रवृत्ति घट रही है और उसका स्थान तरल आहार लेता जा रहा है। इस तरल आहार से दाँत की उपयोगिता एक प्रकार से समाप्त हो जाती है। इसके पीछे मनुष्य की आरामतलबी की मानसिकता ही जिम्मेदार है। अब वह अंगों को कष्ट देने से बचना चाहता है। इससे उनके (विशेषकर खाने और चबाने संबंधी अवयवों के) दुर्बल पड़ने और अंततः विलुप्त हो जाने की गंभीर आशंका जताई जा रही है। दाँतों पर हुई उपर्युक्त शोध इस संदेह की पुष्टि करती है—तो क्या भविष्य में दाँतों के घटने−मिटने के साथ−साथ खोपड़ी का आकार भी छोटा हो जाएगा? विज्ञानवेत्ता इसका उत्तर ‘हाँ’ में देते हुए कहते हैं कि निश्चित रूप से इससे सिर के आकार में फर्क पड़ेगा और तब शायद हमारा सिर क्रिकेट बॉल से कुछ ही बड़ा रह जाए।
यह व्यापक अध्ययन ‘इवॉल्युशन’ नामक शोध पत्रिका में पिछले दिनों विस्तारपूर्वक प्रकाशित हुआ है। इससे इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि निसर्ग ने हमें जो अवश्व जिस उद्देश्य हेतु प्रदान किए हैं, उनका उन−उन कार्यों में भली भाँति उपयोग होना चाहिए, अन्यथा पेड़ की खराब या रोगग्रस्त टहनी को जिस प्रकार काटना−छाँटना पड़ता है, संभव है कालाँतर में वे अंग हमसे उसी प्रकार वापस ले लिए जाएँ।
दाँत चर्वण तंत्र के महत्त्वपूर्ण अवयव हैं। उनकी उपयोगिता का बखान तो कोई दंतविहीन वयोवृद्ध ही ठीक−ठीक कर सकता है। हम तो उस स्थिति की मात्र कल्पना भर कर सकते हैं। टाँगरहित अपाहिज की जो अवस्था चलने−फिरने में होती है, कुछ वैसी ही लाचारी दंतरहित दशा में उठानी पड़ती होगी। इसलिए हमें उनकी सुरक्षा, मजबूती और उपयोगिता पर बराबर ध्यान देना चाहिए।
पहले के लेखों में बताया जा चुका है कि विशेष प्रकार से तैयार की गई औषधीय हवन सामग्री से नित्य−नियमित रूप से सूर्य गायत्री मंत्र द्वारा हवन करने से सभी प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक आधि−व्याधियों से छुटकारा पाया जा सकता है। जिन स्थानों पर प्रतिदिन हवन या अग्निहोत्र होता है, वहाँ रोग उत्पन्न करने वाले रोगाणु−विषाणु पनपने ही नहीं पाते। यदि दूषित वातावरण या गंदगी अथवा संक्रमण के कारण फैल भी गए, तो यज्ञीय ऊर्जा के प्रभाव से वहाँ पर अधिक दिनों तक वे टिक नहीं पाते। यज्ञीय ऊर्जा केवल रोगाणुओं का ही शमन नहीं करती, वरन् वातावरण को सुगंधित बनाने, प्राणपर्जन्य उत्पन्न करने एवं पुष्टि प्रदान करने की महत्त्वपूर्ण भूमिका भी संपन्न करती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि हवन में जो पदार्थ डाले जाते हैं, वे वस्तुतः चार प्रकार के होते हैं, (1) पुष्टिकारक (2) रोगनाशक (3) सुगंधित और (4) मिष्ट। इनमें से मिष्ट और पुष्टिकारक औषधियों के सूक्ष्म परमाणु यज्ञाग्नि में पड़कर वायुभूत होकर पुष्टि−पोषण प्रदान करते हैं और सुगंधित औषधियाँ चित्त को प्रसन्न करती हैं। चिरायता, बच, गूगल, नीम, नागरमोथा, लौंग, जायफल, जावित्री, अपराजिता, कालमेघ, अगर, चंदन आदि के रोगनाशक परमाणु जीवाणुओं−विषाणुओं को नष्ट करते एवं रक्तशोधन कर जीवनीशक्ति का अभिवर्द्धन करते हैं।
पिछले अंकों में संक्रामक रोग, क्षय या राजयक्ष्मा के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया कि यज्ञ चिकित्सा द्वारा इस प्राणघातक बीमारी से किस तरह बचा जा सकता है। यहाँ इन पृष्ठों में चेचक, खसरा (मीजल्स) एवं प्लेग के अतिरिक्त अन्यान्य रोगों की विशिष्ट यज्ञोपचार प्रक्रिया का वर्णन किया जा सकता है।
खसरा एवं चेचक की विशेष हवन सामग्री :— ये दोनों बीमारियाँ प्रायः गंदगी के कारण फैलती हैं। बच्चों एवं महिलाओं पर इसका प्रकोप ज्यादा पाया जाता है। संक्रामक होने के कारण यह एक व्यक्ति से दूसरे तक शीघ्र फैलती हैं। मलिन बस्तियाँ में इसका प्रसार अधिकतर देखा जाता है। इससे बचने के लिए पहले से ही तथा रोगोत्पत्ति के समय या बाद में नीचे लिखी गई औषधियों से बनाई गई विशेष हवन सामग्री से रोगी के निकट अथवा रोगी के कमरे में नित्य हवन करने से न केवल चेचक एवं खसरे के प्रकोप को रोका जा सकता है, वरन् इसे पूरी तरह समूल नष्ट किया जा सकता है।
चेचक की विशिष्ट हवन सामग्री में प्रयुक्त होने वाली औषधियाँ इस प्रकार हैं—
मेहँदी की जड़ (2) नीम की छाल (3) हल्दी (4) पटोल पत्र (5) श्योनाक (6) टीक अर्थात् सागौन के फल (7) कलौंजी (प्याज के बीज) (8) जावित्री (9) बाँस की छाल (10) खैर की छाल (11) धमासा (12) धनिया (13) चौलाई की जड़ (14) गिलोय (15) तुलसी पत्र (16) बच (17) ब्राह्मी (18) हुलहुल (19) नागरमोथा (20) सारिवा (21) पाढ़ (22) कुटकी (23) खिरैंटी (24) खस (25) वासा−अडूसा (26) चिरायता (27) पित्त पापड़ा (28) चंदन (29) जायफल (30) दाख।
उपर्युक्त सभी 30 चीजों को बराबर मात्रा में लेकर कूट−पीसकर जौकुट पाउडर बना लेना चाहिए और उससे हवन करना चाहिए। इसी जौकुट पाउडर की कुछ मात्रा को खूब महीन पीसकर कपड़छन कर लेना चाहिए और सुबह−शाम एक−एक चम्मच जल के साथ रोगी व्यक्ति को खिलाते रहना चाहिए। चूर्ण रूप में यदि न देना चाहें तो इसे क्वाथ रूप में भी दे सकते हैं। 6-7 चम्मच चूर्ण को आधा लीटर पानी में मंद आँच में उबलने देना चाहिए और जब क्वाथ चौथाई रह जाए, तो उसे छानकर ठंडा होने पर रोगी को सुबह−शाम पिलाते रहने से वह जल्दी स्वस्थ होता है।
किसी भी व्यक्ति की किसी बीमारी की यज्ञ चिकित्सा करते समय इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि हवन करते समय रोग विशेष के लिए बनाई गई हवन सामग्री में अखण्ड ज्योति के विगत अंकों में वर्णित काँमन हवन सामग्री नंबर 1 को भी बराबर मात्रा में मिला लेना चाहिए। हवन का प्रभावी लाभ तभी मिलता है। इस काँमन हवन सामग्री में जो चीजें मिलाई जाती हैं, वे हैं—
अगर (2) तगर (3) देवदार (4) चंदन (5) लालचंदन (6) जायफल (7) लौंग (8) गूगल (9) चिरायता (10) गिलोय और (11) अश्वगंधा। खाने वाले पाउडर में इन्हें नहीं मिलाया जाता, इसलिए हवन करने से पूर्व ही रोग विशेष की हवन सामग्री की कुछ मात्रा कपड़छन करके अलग डिब्बे में रख लेते हैं। वन करने का मंत्र सूर्य गायत्री मंत्र ही रहेगा, अर्थात् “ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे दिवाकराया धीमहि तन्नः सूर्यो प्रचोदयात्।” यही सूर्य गायत्री मंत्र है।
हवन सामग्री बनाते समय पूर्वोक्त 30 औषधियों में से यदि सभी उपलब्ध नहीं हो पातीं, तो ऐसी स्थिति में जितनी भी चीजें आसानी से मिल जाती हैं, उन्हें ही जौकुट करके हवन चिकित्सा आरंभ कर देनी चाहिए। जो औषधियाँ अधिक महँगी हों, उनकी मात्रा कम की जा सकती है तथा उनकी भरपाई अन्य निर्धारित औषधियों की मात्रा बढ़ाकर की जा सकती है। जहाँ तक हो सके, हवन के लिए समिधा चीड़, सागौन, आम व देवदार में से किसी एक की उपयोग में लानी चाहिए। नीम व सिरस का प्रयोग सभी कार्यों में किया जा सकता है। नीम की पत्तियाँ द्वार पर टाँगी जा सकती हैं। इससे संक्रमण फैलने नहीं पाता।
खसरे एवं चेचक को फैलाने से रोकने के लिए यदि उपर्युक्त हवन सामग्री न जुटाई जा सके तो निम्नलिखित चीजों को मिलाकर भी हवन किया जा सकता है।—
(1) गूगल (2) सूखे अर्क पत्र (3) काला तिल (4) शक्कर और (5) घी।
इस संदर्भ में शास्त्र कहते हैं—
मधुत्रितयहोमेन नयेच्छान्तिं मसूरिकाम्। कपिलासर्पिषाहुत्वा नयेच्छान्तिं मसूरिकाम्। —देवीभागवत् 11/24/29/30
अर्थात् त्रिमधु− दूध, दही और घी का हवन करने से मसूरिका चेचक रोग को शाँति किया जा सकता है। इसी तरह अकेले कपिला गाय के घी से हवन करके भी चेचक रोग को ठीक किया जा सकता है। बड़−बरगद, मंजीठ, सिरस एवं गूलर की छाल को पीसकर घी मिलाकर लेप करने से भी चेचक के दाने जल्दी सूख जाते हैं और जलन शाँत हो जाती हैं।
प्लेग की विशिष्ट हवन सामग्री
यों तो ‘प्लेग‘ नामक महामारी को चिकित्सकीय प्रयासों के कारण समाप्तप्रायः मान लिया गया है, लेकिन कभी−कभी चूहों में पाए जाने वाले एक विशेष प्रकार के पिस्सुओं के कारण फैलने वाली यह प्राणघातक महामारी देखते−ही−देखते बहुत बड़ी आबादी को अपने चपेट में ले लेती हैं। पिछले दिनों सन् 1994 में गुजरात के सूरत जिले व विस्तार में व्यापक पैमाने पर प्लेग फैला था। ऐसी स्थिति में एंटीबायोटिक दवाओं के अभाव में अधिकाँश संक्रमित व्यक्ति काल के ग्रास बनने लगते हैं। इन परिस्थितियों में जगह−जगह पर व्यापक पैमाने पर हवन करने से रोग के प्रसार को रोका जा सकता है और रोगग्रस्त व्यक्तियों को यज्ञोपचार के माध्यम से स्वस्थ किया जा सकता है।
प्लेग के लिए यज्ञोपचार में प्रयुक्त होने वाली विशिष्ट हवन सामग्री में जो औषधियाँ मिलाई जाती हैं, वे इस प्रकार हैं—(1) कुटकी 100 ग्राम (2) असगंध 200 ग्राम (3) चिरायता 100 ग्राम (4) गिलोय 100 ग्राम (5) कालमेघ 100 ग्राम (6) अपराजिता 200 ग्राम (7) नीमपत्र या नीम की छाल 100 ग्राम (8) बच 200 ग्राम (9) नागर मोथा 200 ग्राम (10) गूगल 200 ग्राम (11) लाल चंदन 100 ग्राम।
इन ग्यारह चीजों को मिलाकर जौकुट रूप में जो हवन सामग्री बनाई जाती है, उसी में से कुछ हिस्सा बारीक कपड़छन करके अलग डिब्बे में रख लेना चाहिए और रोगी व्यक्ति को सुबह−शाम एक−एक चम्मच शहर के साथ खिलाते रहना चाहिए।
हवन करते समय चेचक की विशिष्ट हवन सामग्री प्रकरण में बताई गई, ‘काँमन हवन सामग्री (नं. 1) को बराबर मात्रा में मिला लेना चाहिए। साथ ही इसमें घी 100 ग्राम, शक्कर 100 ग्राम और काला तिल 100 ग्राम अतिरिक्त रूप में मिलाकर तब हवन करना चाहिए।
प्लेग के कारण शरीर पर उभरी हुई गाँठों पर असगंध, जिसे गुजराती में ‘घोड़ाकुन’ और दक्षिण में ढोरगुँज’ तथा गोवा में ‘पत्थर फोड़ी’ कहते हैं एवं जिसका वानस्पतिक नाम ‘विथेनिया सोमनिफेरा’ है, इसकी ताजी या सूखी जड़ को पानी में घिसकर चंदन की तरह लेप करने से गाँठें सूख जाती हैं। इसके साथ ही सूजन वाले स्थान पर इसे लेप करने से सूजन एक जगह इकट्ठी हो जाती है और रोगी को आराम मिलता है। बराबर लेप करते रहने पर गाँठ पककर अंत में फूट जाती हैं। ऐसी स्थिति में गाँठ के मुँह पर गेहूँ के आटे की पुल्टिस बाँधने और आस−पास असगंध की जड़ का लेप लगाते रहने से सारा मवाद बाहर आज जाता है और रोगी व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। अंत में गाँठ के मुँह पर कोई भी एण्टीबायोटिक क्रीम, गाय का शुद्ध घी या मात्र पेट्रोलियम जेली मलहम लगाते रहने पर यह घाव पूरी तरह भर जाता है।
जीवन के अस्तित्व का हर पल हमारी संभावनाओं का बोध है। जीवन का अर्थ है जो हम हो सकते हैं उन संभावनाओं की सूची और साथ ही इन संभावनाओं में से एक का चयन, यानी इस बात का चुनाव कि हम वास्तव में क्या होने जा रहे हैं। हमारी परिस्थितियाँ अर्थात् संभावनाएं हमें प्रदत्त और हम पर आरोपित जीवन का अंश है। इन्हीं सबके कुल योग को हम संसार कहते हैं। यह एक नियति है जो हम पर इस संसार में, अभी तक इस क्षण के इस संसार में आते ही आरोपित हो जाते हैं। यह बन्दूक से निकली गोली के निश्चित प्रक्षेप-पथ से पूर्णतः भिन्न है। वह हम पर एक नहीं, अनेक पथ आरोपित करती है और हमें इस बात पर विवश करती है कि हम उन्हीं में से एक को चुनें। यह हमारे अस्तित्व की बड़ी विचित्र स्थिति है।
स्पेनी दार्शनिक एवं लेखक खोसे ओतेगा इ गास्संत के अनुसार जीवन की नियति निरी मशीनी नहीं, बल्कि एक जीवन्त परियोजना है। जीवन की संरचना का ज्ञान, संभावनाओं का चयन करना, निर्णय लेना अनिवार्य है। जीने का अर्थ है अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग करने के लिए नियति द्वारा बाध्य होना, यह निश्चय करना कि हम इस संसार में क्या बनना चाहते हैं। हमारी निर्णय लेने की प्रक्रिया एक क्षण के लिए भी नहीं रुकती। निराशा के क्षणों में भी जब हम कुछ भी नहीं बनने के लिए तैयार होते हैं, हमें निर्णय न लेने का निर्णय लेना पड़ता है। ऐसे में यह कहना ठीक न होगा कि जीवन में परिस्थितियाँ निर्णायक होती हैं, बल्कि परिस्थितियाँ तो वह दुविधा है जो हर पल बदलती है और जिसकी उपस्थिति में हमें निर्णय लेना होता है। परन्तु वास्तव में निर्णय हमारे चरित्र पर निर्भर करता है।
ओर्तेगा के जीवन्त तर्क की मीमाँसा अस्तित्ववादी चिंतन में व्यक्ति की मूलभूत स्वतंत्रता एवं दायित्व के सिद्धान्त के निकट है। सार्त्र के अनुसार हम स्वतंत्र होने के लिए दण्डित हैं और हम क्या हैं का निर्णय हमसे बाध्य नहीं है। सार्त्र ने एजिस्टेनियलिज्म एण्ड ह्यमनिज्म में कहा है कि कम से कम एक ऐसा प्राणी है जिसका अस्तित्व उसके सत्त्व का पूर्ववर्ती है। वह प्राणी है मनुष्य। व्यक्तिगत जीवन से सामूहिक जीवन की ओर बढ़ते हुए ओर्तेगा कहते हैं- यही बात सामूहिक जीवन पर भी लागू होती है। उसमें भी पहले संभावनाओं का एक फैला हुआ क्षितिज होता है और फिर एक निश्चय जिसके आधार पर इस सामूहिक अस्तित्व के स्वरूप का चयन एवं निर्णय होता है। यह निश्चय उस समाज के चरित्र पर अर्थात् उसमें प्रभावी व्यक्तियों के चरित्र पर निर्भर करना है।
ओर्तेगा अपनी प्रसिद्ध रचना ‘जनसमूहों का विद्रोह’ में उल्लेख करते हैं कि आधुनिक युग के सामूहिक जीवन एवं उसमें आधिपत्य रखने वाले व्यक्ति के चरित्र का विश्लेषण इन दो आयामों में किया जा सकता है। पहला भीड़ यानी जनसमूहों का सामाजिक सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण पाना और दूसरा भीड़ के आदमी अर्थात् जन मनुष्य का सामाजिक रंगमंच पर इस समझ के साथ आविर्भाव कि वह जो कुछ है उससे संतुष्ट है। उसे केवल अपने अधिकार से सरोकार है, दायित्वों से नहीं और न ही उन्हें निभाने की इच्छा।
जनजीवन केवल राजनीतिक नहीं होता, अपितु यह मूलतः बौद्धिक, नैतिक, आर्थिक एवं धार्मिक होता है। वह सभी सामूहिक रीति-रिवाजों का कुल योग होता है जिसमें वेशभूषा, मनोरंजन इत्यादि के साधन भी सम्मिलित हैं। आज हम उस भीड़ को देखते हैं जो सभी ओर विद्यमान है जिसने सहायता द्वारा रचे गए सभी साधनों को अपने वश में रखा है। इक्कीसवीं सदी के आगमन के साथ इसमें एक परिवर्तन आया है, एक नवीनता पैदा हो गई है जो कम से कम हमें पहले कुछ क्षणों के आश्चर्य भाव को एक औचित्य प्रदान करती है। चकित होना, सोच समझ की शुरुआत है। आश्चर्य से खुली आँखों के लिए संसार की प्रत्येक वस्तु एक खूबसूरत अजूबा है। आश्चर्यजनित उल्लास ऐसा उल्लास है जो बुद्धिजीवी को किसी दिव्यदर्शी के अविरल उन्माद की ओर ले जाता है। यह उन्माद क्रिकेट प्रेमी के उल्लास से जुदा किस्म का है। इसकी विशेषता है-उसकी आँखों में व्याप्त जिज्ञासा। इस भीड़ के घटक व्यक्ति किसी शून्य से नहीं उपजते हैं। ये विश्व भर में छोटे छोटे समूहों में अथवा अकेले ही यहाँ-वहाँ बिखरे हुए एक दूसरे से अलग और दूर जीवन जी रहे थे। उनमें से प्रत्येक व्यक्ति अथवा समूह का एक स्थान था जो संभवतः उसका अपना स्थान था। अब अचानक यही लोग विशाल जनसमूहों से जुड़े नजर आते हैं और जहाँ देखे वहाँ केवल भीड़ ही भीड़ नजर आती है। कुछ सीमा तक मानव संस्कृति की परिष्कृत रचनाएँ भी इससे अछूती नहीं है। समाज के महत्त्वपूर्ण स्थानों एवं संस्थानों पर भी यही भीड़ पाई जाने लगी है।
भीड़ की अवधारणा परिमाणात्मक एवं दृश्यमान है। समाज सदा से दो घटकों-अल्प योग्य जनों के समूह एवं विशाल जनसमूह की गतिशील एकता का योग है। योग्य जनों के समूह, व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के वे छोटे समूह हैं जो विशेष रूप से सक्षम हैं। जिनमें कोई विशेष योग्यता है। जनसमूह उन साधारण लोगों की भीड़ है जिनमें कोई विशेष योग्यता नहीं है। अतः जनसमूह का अर्थ है औसत व्यक्ति। भीड़ की संरचना उसके संघटक व्यक्तियों के विचारों, इच्छाओं एवं जीने के ढंग में समानता की अपेक्षा रखती है। ऐसे समूहों में जो भीड़ अथवा जन समूह नहीं है। किसी विचार, इच्छा अथवा आदर्शों की समानता, सदस्यों के एक साथ होने का आधार होती है, जिसके कारण अन्य व्यक्ति उसमें सम्मिलित नहीं किये जा सकते।
योग्य जनों का समूह बनाने के लिए चाहे वह कोई भी समूह क्यों न हो यह आवश्यक है कि उसके संघटक व्यक्ति अपेक्षाकृत किन्हीं विशेष व्यक्तिगत कारणों के आधार पर भीड़ से अलग हों। जनसमूह को मनोवैज्ञानिक तथ्य के रूप में परिभाषित करने के लिए यह आवश्यक नहीं कि व्यक्ति समूह में दिखे। मात्र एक व्यक्ति का परिचय ही यथेष्ट है कि वह जनसमूह है अथवा नहीं। जनसमूह हर वह व्यक्ति है जो अपना मूल्याँकन अच्छा या बुरा नहीं कर पाता, बल्कि स्वयं को सबकी तरह मानता है और फिर भी पीड़ा अनुभव नहीं करता, यहाँ तक कि दूसरों के साथ अपनी समानता देखकर प्रसन्न होता है।
जनसमूहों की भीड़ ने सामाजिक जीवन का केन्द्र बिन्दु बनने का निश्चय कर लिया है और इसके साथ ही स्थान घेरने, साधनों का उपयोग करने एवं उन सभी सुखों को भोगने का भी जो अब तक कुछ विशेष व्यक्तियों के लिए आश्रित थे। वर्तमान समय में इसका स्वरूप परिवर्तित हो गया है। विशेष समूहों के कार्यों को हथिया लेने का जनसमूह का यह निश्चय मात्र उल्लास एवं आनंद की रेखा तक सीमित नहीं है और न ही हो सकता है, क्योंकि योग्य जनों के समूह के आदर्श कुछ और ही होते हैं। फिर भी आज समाज और साम्राज्य जनसमूह का है।
जनसमूहों के इस साम्राज्य में सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों ही पहलू विद्यमान हैं। जनसमूह की सक्रियता का सकारात्मक पक्ष है-इतिहास के स्तर में उभार। जिसे हम अपने युग के मानव जीवन में संभावनाओं की महान वृद्धि के रूप में अनुभव कर रहे हैं। दुनिया अचानक बड़ी हो गई है। और इसके साथ ही जीवन भी। आज मनुष्य का जीवन सर्वव्यापी हो गया है।
स्वयं को अधिक विस्तृत, अधिक जीवन्त जानकर हमारा वर्तमान जीवन अतीत के प्रति आदर सम्मान खो चुका है। इसीलिए आधुनिक मनुष्य की अंतरात्मा में शक्ति का बोध तथा असुरक्षा का भाव-दोनों का विचित्र मिश्रण है। आज के जीवन की अपनी बड़ी हुई अंतःशान्ति के बोध ने उसके अपने अतीत को बौना कर दिया है। अपने बड़े हुए कार्य क्षेत्र के कारण मानव जीवन परम्परागत तौर-तरीकों, मान्यताओं एवं आदर्शों के ढाँचे से बाहर फैल गया है। जनसमूह के साम्राज्य का भयावह पक्ष यही है-हमारे युग का निर्देशन करने वाले मनुष्य का जीवन उद्देश्यहीन है। वह यूँ ही भीड़ के प्रवाह में बहे जा रहे हैं। इसके समक्ष बड़ी हुई संभावनाओं का जैविक संग्रह है, किन्तु क्रियाशीलता नहीं, लेकिन जनसमूह स्वयं को परिपूर्ण मानता है। उसकी आत्मा की अंतर्निहित वायुरुद्धता उसे अपनी निष्क्रियता पहचानने नहीं देती। इसीलिए वह उत्कृष्टता का प्रतिरोध है। उसके लिए तर्क, विवेक निरर्थक है। अतः वह उत्तेजक भाषणकर्त्ताओं का आसान निशाना बन जाता है।
जनसमूहों में रचे-बसे मनुष्य, मानव इतिहास के सिर चढ़े बालक हैं। जो अपने चारों ओर काव्य यंत्र, स्वास्थ्यकारी औषधियाँ, संरक्षक सरकारें और ऐशोआराम भरे विशेषाधिकार पाते हैं। किन्तु उन्हें अपने दायित्व का लेशमात्र भी आभास नहीं है। अतः जनसमूह के साम्राज्य ने एक द्वयअर्थक परिस्थितियों को जन्म दिया है। डेनियल बल ने ‘द कल्चरल काण्ट्रडिक्शन्स ऑफ कैपिटलिज्म’ ने इस द्यर्थक परिस्थिति के बारे में कहा है-आज मानवता का एक नई असाधारण व्यवस्था की ओर पारगमन हो सकता है, परन्तु यह उसकी नियति का ध्वंस भी हो सकता है। ओर्तेगा के मतानुसार जनसमूह का साम्राज्य यूरोपीय सहायता की ही स्वतः स्फूर्त उत्पना है और क्योंकि आधुनिक युग यूरोप के प्राधान्य का युग रहा है इसलिए स्वाभाविक है कि यूरोप की पतनशीलता उसकी साथ की घोषणा मानी जा सकती है। ओसबाल्ड स्पेंग्लर ने भी अपनी कृति ‘द डिक्लाइन ऑफ द वेस्ट’ में पाश्चात्य सहायता के पतन का उल्लेख किया है।
ओर्तेगा विश्वस्त हैं कि मानव सभ्यता का नैतिक केन्द्र न न्यूयार्क हो सकता है, न मास्को हालाँकि अपनी तमाम आपत्तियों के बावजूद वे स्वीकारते हैं कि साम्यवाद मानव प्रयास का भव्य प्रतीक था। क्योंकि यह मानवी कल्पना की ऊँची उड़ान थी। यदि मनुष्य के उल्लास के प्रति निरुत्साही प्राकृतिक शक्तियाँ इस प्रयास को विफल न करतीं और वे उसे पूर्णतः कार्यान्वित होने मात्र की स्वतंत्रता प्रदान कर देती तो इस महान् परियोजना की दीप्ति यूरोप के क्षितिज को मानो एक देदीप्यमान नक्षत्र के प्रकाश से भर चुकी होती। परन्तु साथ ही उनका यह भी संदेह था कि यूरोपीय रूसी साम्यवाद का समग्रीकरण नहीं कर पायेंगे क्योंकि इतिहास पर्यन्त उनके सभी प्रयास एवं शक्ति व्यक्तिवाद के मापक्रम में लगाए गए हैं।
रूसी साम्यवाद की विफलता यह सिद्ध करती है कि जनसमूह का साम्राज्य तभी टिक सकता है, जब उसे योग्यजनों के समूह का सहयोग मिले। योग्य जनों का दिशा-दर्शन ही जनसमूहों की प्रगति एवं सफलता का आधार है। ओर्तेगा की यही बातें परम पूज्य गुरुदेव के स्वतः स्फूर्त चिन्तन में उभरा। उनके द्वारा प्रेरित एवं प्रवर्तित विचार क्रान्ति अभियान योग्य जनों का ऐसा ही समूह है, जिसमें जीवन के अस्तित्व में समायी सम्भावनाओं की बोध कराने की क्षमता है। इसमें व्यक्ति, समाज एवं विश्व सभी के समुचित विकास की गहरी दृष्टि है। इसके द्वारा प्रचारित सूत्रों को समझकर मानवीय जीवन के उत्कर्ष के शिखर तक सुनिश्चित तौर पर पहुँचा जा सकता है।
गाँधी जी के जीवन की एक घटना है। बात चंपारण जिले की है। गाँधी जी उस क्षेत्र में असहयोग आँदोलन का वातावरण बनाने के लिए गाँव−गाँव घूम रहे थे।
एक गाँव में उन्होंने पशुबलि का जुलूस निकलते देखा। देवी को बकरा चढ़ाने एक समूह गाता−बजाता जा रहा था।
गाँधी जी ने दृश्य देखा, तो उन्होंने एकत्रित लोगों को वैसा न करने के लिए समझाया। न माने तो नया प्रस्ताव रखा। पशु के रक्त से मनुष्य का रक्त उत्तम ही होगा। तुम लोग अपने देवता पर मेरी बलि चढ़ा दो। उन्होंने सिर नीचे झुका लिया और वहाँ जा खड़े हुए, जहाँ बकरा कटना था। सन्नाटा छा गया। ग्रामीण लौट गए। वस्तुस्थिति समझी गई और उस क्षेत्र से बलि प्रथा सदा के लिए बंद हो गई।
गैरीबाल्डी इटली के महान् सेनानी थे। एक दिन उनके मित्र एडमिरल उनके घर पहुँचे। उनके घर में प्रकाश की कोई व्यवस्था न थी, सो दीवार से टकराए और चोट लग गई। एडमिरल व्यंग्य तथा झुँझलाहट के स्वर में बोले, क्यों गैरीबाल्डी तुम प्रकाश का भी प्रबंध नहीं रख सकते? उसे चोट लगी जानकर गैरीबाल्डी ने प्रकाश का प्रबंध करना चाहा, परंतु वहाँ एक मोमबत्ती तक न थी। वह उठा और उँगली पकड़कर घर में ले आया फिर कहा−मित्र क्षमा करेंगे, युद्ध मंत्री से सेनापति का दायित्व प्राप्त करते समय भोजन के अतिरिक्त मोमबत्तियों की व्यवस्था के लिए कोई धन मिलने की बातचीत नहीं हुई थी। खैर कोई बात नहीं, हम लोग अँधेरे में भी बात−चीत कर सकते हैं।
भेंट−वार्त्ता करने के बाद एडमिरल तत्कालीन युद्ध मंत्री के पास पहुँचे तथा गैरीबाल्डी के लिए पर्याप्त धन पहुँचा दिया। अगले दिन पत्नी ने पूछा कि क्या इन पैसों से कुछ मोमबत्तियाँ खरीद ली जाएँ। गैरीबाल्डी ने शाँत स्वर में उत्तर दिया, बिलकुल नहीं। हमें इस राशि से अपने लिए मोमबत्ती खरीदने का कोई आदेश नहीं मिला है। सारा धन सैनिकों में बँटवा दिया गया। ऐसी होती है प्रामाणिकता की कसौटी पर कसी गई नीतिनिष्ठा।
पूज्यवर द्वारा शाँतिकुँज परिसर में अक्टूबर, 1975 में दिए गए प्रवचन का साराँश
गायत्री मंत्र हमारे साथ−साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
देवियों, भाइयो! ज्ञानयोग और कर्मयोग इन दो योगों के संबंध में कल और परसों आपको हमने बताया कि आपको ज्ञानयोगी और कर्मयोगी होना चाहिए। ज्ञानयोग अर्थात् आपको ऐसा आदमी होना चाहिए, जिसे दूरदर्शी और विवेकवान कहते हैं। कर्मयोग अर्थात् आपको अपने कर्तव्यों और फर्जों को पूरा करने वाला होना चाहिए, जैसे कि कर्मठ, बहादुर और जिम्मेदार आदमी हुआ करते हैं। ज्ञानयोग और कर्मयोग के बाद में एक और सबसे बड़ा योगाभ्यास रह जाता है, जिसका नाम है ‘भक्तियोग‘। चिंतन में यही योग काम करता है। जीवन में इसका समावेश होना चाहिए । वे योग अलग है, जिनमें किसी तरह के अभ्यास किए जाते हैं। वह योगाभ्यास कहलाते हैं, जैसे—प्राणायाम वगैरह। उस योगाभ्यास की बात मैं आपसे नहीं कह रहा हूँ। मैं तो आपसे उस योग की बात कह रहा हूँ, जो कि इन्सान को भगवान् के साथ जोड़ने में सहायक होता है। आदमी का आत्मज्ञान इन्सान और भगवान् को जोड़ देने में समर्थ होता है। कर्मयोग अर्थात् कर्त्तव्यपालन भी इन्सान को भगवान् के साथ जोड़ देता है। तीसरा है ‘भक्तियोग‘ जिसके संबंध में ही आज आपके निवेदन करना है।
भक्ति का अर्थ भावोन्माद नहीं
भक्ति किसे कहते हैं? ‘भक्ति’ शब्द मैं जानबूझकर उपयोग नहीं करूंगा, क्योंकि भक्ति के संबंध में इतनी ज्यादा गलतफहमियाँ लोगों में छा गई हैं कि मैं क्या कहूँ। लोगों की संवेदनाएँ, भावनाएँ उभर आएँ और वह केवल रोने लगे, नाचने लगे, उचकने लगे, मस्तक झुकाने लगे, बस हो गई भक्ति? नहीं, यह भक्ति नहीं है। यह तो एक तरीके से भावोन्माद है, भाव संवेदना है, जो कइयों को, ढेरों आदमियों को होता है। लोग बात−बात पर हँस जाते हैं। बहुत−सी औरतें ऐसी होती हैं कि जरा−सी बात हुई, गलत बात हुई और वे रोने लगती हैं कि जरा−सी बात हुई, गलत बात हुई और वे रोने लगती है। यह भावुकता है। सामूहिक भावुकता भक्ति की निशानी नहीं है। जैसे कि आमतौर से लोग समझते हैं। देवी−देवताओं के सामने नाक रगड़ना, गिड़गिड़ाना, आँसू बहाना, उछलना−कूदना, हल्ला−गुल्ला मचाना, उलटा पड़ जाना, सीधा बैठ जाना, नाचने लग जाना आदि बातों को करने वालों को लोग−बाग समझते हैं कि वह व्यक्ति बहुत बड़ा भक्त है। नहीं मित्रो ! ये भावुकताएँ हैं। भावुकता की दृष्टि से तो ये क्रियाएँ ठीक हो भी सकती हैं, लेकिन जहाँ तक आध्यात्मिक उन्नति का संबंध है, इस तरह की भक्ति का योग से कोई सीधा संबंध नहीं है और न सीधे भगवान् से ही। यह भक्तियोग नहीं है।
भक्ति किसे कहते हैं? भक्ति का सीधा−सादा अर्थ होता है, प्यार और मोहब्बत। प्यार और मोहब्बत आदमी के भीतर की एक ऐसी विशेषता है, जो जिस आदमी के भीतर होगी, उसको आरंभ से ही स्नेह से लबालब, खुशहाल बनाए रखेगी। प्यार के बिना आदमी तो कहीं है ही नहीं। आनंद की तलाश में जीवात्मा इधर−उधर घूमती रहती है। कभी इसके पास जाता है, कभी उसके पास जाता है। कभी वहाँ जाता है कि कहीं तो इसको आनंद मिल जाए, कहीं सुख मिल जाए और वह जीवन का आनंद उठा ले। वस्तुतः लोग समझते हैं कि वस्तुओं में आनंद होता है, जैसे कि खाने−पीने की चीजों में लोग समझते हैं और कहते हैं कि आज तो बड़ा आनंद आया। खाने को मिठाई मिली, नमकीन मिली, कचौड़ी मिली। क्या यही आनंद है? नहीं यह आनंद नहीं है। यह तो संवेदना है, आदमी की जीभ का जायका है। यह स्थाई नहीं हो सकता। जितनी देर तक आपका पेट नहीं भरा है, उतने समय तक के लिए तो यह भी हो सकता है कि आपको खाने के लिए जायकेदार चीजें मिलें। लेकिन वह तो क्षणिक हुआ न।
इसी प्रकार दूसरी तरह की चीजें हैं, जैसे आँखों से कोई दृश्य देखना है, तो आप थोड़े समय तक ही तो उसे देखेंगे। दो−ढाई घंटे में सिर घूमने लगेगा और आपकी आँखें खराब होने लगेंगी। आप कितनी देर तक बैठेंगे सिनेमा में? ज्यादा देर तक नहीं बैठ सकते। यही बात कामवासना के संबंध में है। कामवासना का कितनी देर तक का सुख होता है? कुछ सैंकड़ों का सुख होता है और उसके बाद में वही बातें बड़ी बुरी मालूम होने लगती हैं।
भीतर की मोहब्बत ही है आनंद
मित्रो!आनंद उस चीज का नाम है जो इंद्रियों से ताल्लुक नहीं रखता, वरन् जीवात्मा से ताल्लुक रखता है। जीवात्मा का आनंद किस तरीके से मिल सकता है, इसका एक ही उत्तर है और एक ही जवाब है। क्या उत्तर है? यही कि आदमी के भीतर की मोहब्बत का ही दूसरा नाम आनंद है। उसी का नाम प्यार है। उसी का नाम प्रसन्नता है, उसी का नाम उत्साह है, उसी का नाम उल्लास है। उसी का नाम भाव−संवेदना है। यह सब प्यार के ऊपर टिका हुआ है। आपने देखा है न कि आप प्यार किसी चीज को करते है? जो अपना है, जिसको आप अपना समझते हैं, उसी से तो प्यार करते हैं। जैसे आपकी साइकिल है, तो उसी भर से आप प्यार करते हैं, अन्यथा उस साइकिल स्टैंड पर इतनी सारी साइकिलें रखी हैं कि उनमें से किसी में छेद हो रहा है, तो कोई धूप में पड़ी है, लेकिन आपको तो केवल अपनी साइकिल की ही फिक्र है कि इसे लेकर हमको चलना चाहिए। जब तक कोई मोटर आपकी है, तब तक तो आपको ख्याल है कि इसकी मरम्मत होनी चाहिए। जब कोई बच्चा इसको छूने लगता है, तो आप उसे भगा देते हैं, लेकिन अगर पड़ोसियों की मोटरें खड़ी हों। बस स्टैंड पर मोटरें खड़ी हों, तो तब आपको उनसे क्या लेना−देना? जो चीजें अपनी हैं, केवल वही चीजें प्यारी लगती हैं।
मित्रो! वस्तुतः यह प्यार ही खुशी की आवाज होती है। आप हर चीज को अपनी मानना शुरू कीजिए, फिर देखिए कि वह आपको प्यारी लगेगी कि नहीं? अपना बच्चा काला कुरूप होता है, नाक टपकती रहती है, पेट भी बढ़ा हुआ होता है, बहुत−सी बुरी आदतें भी होती हैं, फिर भी आप उसे गोदी में लिए फिरते हैं, क्योंकि वह हमारा है। लेकिन अगर पड़ोसी का बच्चा मचलता रहे और आपकी गोदी में आने की कोशिश करे, तो आप उसे धमकाकर भगा, देते हैं। क्योंकि बच्चे तो सब एक से होते हैं। नहीं साहब! वह हमारा है, इसलिए प्यारा है। ‘हमारा होने से’ जो कोई भी चीज हमारे पास है या होगी, बड़ी अच्छी मालूम पड़ेगी, खुशनुमा मालूम पड़ेगी, प्यारी मालूम पड़ेगी और उसकी उपस्थिति में भी आपको आनंद मिलेगा। जिनको साथ मिलने में कितना आनंद आता है। जिनको आप अपना मित्र मानते हैं, यदि वे आपके घर आ जाते हैं, तब कितनी खुशी होती है। क्यों? इसलिए कि आप उसको अपना मानते हैं।
अगर ऐसा न मानें तब? कोई भिखारी आ जाए तब? कोई ऐसा मेहमान आ जाए, जो आपका समय खराब करने चला आए, जिससे आपको कोई फायदा नहीं है, जिससे आपकी कोई जान−पहचान नहीं है, तब क्या आप उसको पसंद करेंगे? स्वागत करेंगे? चाय पिलाएँगे? घंटों बातचीत करेंगे? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। आपसे कोई कामकाज की बात भी होगी, तो दो मिनट में बात करने के बाद उसे आप भगा देंगे। कहेंगे कि भाई! समय मत खराब कीजिए। ऐसा क्यों? एक मित्र जो आपके नजदीक आया था, उसका आप इतना स्वागत कर रहे थे, घंटों घुल−मिलकर बात कर रहे थे। अपना काम भी हर्ज कर रहे थे। दूसरा भी तो आदमी था, उससे क्यों नहीं की? क्योंकि वह हमारा नहीं था।
डालें प्यार की, आत्मीयता की टार्च
मित्रो! अपने और पराये का जो यह फर्क है, वह बहुत बड़ा फर्क है। अपना घनिष्ठ होता है। आपने देखा है न कि जब कभी आप टार्च जलाते हैं, तो जितनी चीजों के ऊपर टार्च का प्रकाश पड़ता है, उतनी दायरे की चीजें चमकती हैं, लेकिन जहाँ टार्च का प्रकाश नहीं पड़ता, वहाँ अंधकार छाया रहता है। आप प्यार की टार्च, आत्मीयता की टार्च जहाँ कहीं भी डालेंगे, जिस किसी पर भी डालेंगे, वही चीज खुशनुमा मालूम पड़ेगी। हर तरीके से अच्छी−अच्छी बातें मालूम पड़ेगी, सुँदर मालूम पड़ेंगी, बढ़िया मालूम पड़ेंगी, लेकिन जिसको आप पराया मान लेंगे, वह कैसा ही सुँदर क्यों न हो, कैसा ही लुभावना क्यों न हो, आपको उससे कोई खास लगाव नहीं हो सकता। लैला और मजनू का किस्सा सुना होगा आपने। लैला स्याह काले रंग की थी, बिलकुल काली कलूटी, लेकिन मजनू उसके ऊपर इतना फिदा था कि उसने अपनी सारी जिंदगी को तबाह कर डाला। उसने कहा कि मैं लैला के बिना जिंदा नहीं रह सकता।
मित्रो! शकल−सूरत कैसी भी काली−कुरूप, भोंड़ी क्यों न हो, लेकिन जिस किसी के साथ भी आदमी अपनापन जोड़ लेता है, वह बहुत अच्छा मालूम पड़ता है, बड़ा आनंददायक मालूम पड़ता है। जो पराई चीजें होती हैं, डरावनी वही मालूम पड़ती हैं। शेर के बच्चे शेरनी के साथ खेलते रहते हैं, दूध पीते रहते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि ये हमारी है। शेरनी अपने बच्चों को देखकर प्रसन्न होती है। नाराज भी नहीं होती, लेकिन अगर लोमड़ी के बच्चे आ जाएँ, खरगोश के बच्चे आ जाएँ, तब शेरनी उनका सफाया कर देती है, क्योंकि वे पराये हैं। अपने और पराये में बहुत फर्क है।
साथियों! ‘रस’ को आनंद कहा जाता है। यही बात हमारे शास्त्रों में बताई गई है, “रसौ वै सः” अर्थात् भगवान् क्या है? रस है। रस किसे कहते हैं? रस, आनंद को कहते हैं। आनंद कहाँ है? भगवान् में है। भगवान् कैसा होता है? आत्मीयता आप जिसके ऊपर आरोपित कर लेते हैं, वही आपके आनंद का माध्यम बन जाता है। भगवान् के ऊपर आप अपनेपन का आरोपण कर लें तो भगवान् की भक्ति का आपको बेहद आनंद आएगा, फिर आप कहेंगे कि वे हमारे हैं और हम इनके हैं। मीरा ने अपना संबंध भगवान् से स्थापित कर लिया कि यही हमारे पति हैं। गोपियों ने भी यह मालूम कर लिया था कि ये हमारे सबसे अजीज और प्यारे हैं। बस क्या था, भगवान् श्रीकृष्ण उनको प्यारे लगने लगे, अपने लगने लगे। अगर उन्हें यह मालूम पड़ता कि ये पराये हैं, तो क्या होता? आपने देखा नहीं, भगवान् श्रीकृष्ण के बारे में जरासंघ की, कंस की, दुशासन की, शिशुपाल की, और भी ढेरों आदमी थे, उनके प्रति क्या मान्यता थी। उनको न वे भगवान् मालूम पड़ते थे, न सुँदर मालूम पड़ते थे। वरन् उन्हें वे कुरूप मालूम पड़ते थे, खराब मालूम पड़ते थे, चालाक और विरोधी मालूम पड़ते थे।
ध्वनि की प्रतिध्वनि है प्यार−ममत्व
शिशुपाल ने भगवान् को बहुत गालियाँ सुनाई थीं। अर्जुन की तरह वह भी भगवान् की प्रशंसा क्यों नहीं करता था? शिशुपाल उनको अपना बैरी मानता था, विरोधी मानता था, पराया मानता था। मित्रो! इस दुनिया में न कोई सुँदर चीज है, न कोई बिना सुँदर अर्थात् खराब चीज है, न कोई आनंद की चीज है और न कोई बिना आनंद की चीज है। यहाँ सब वस्तुएँ माने वस्तुएँ, प्राणी माने प्राणी, मनुष्य माने मनुष्य। आपको किससे प्यार मिलेगा। जिससे आप करेंगे। प्यार नहीं होगा तो आनंद कहाँ से आएगा। आनंद और प्यार एक ही चीज हैं। अतः यदि आपको इस जीवन में आनंद पाना है तो आपको अपने प्यार का माद्दा बढ़ाना पड़ेगा। प्यार का माद्दा बढ़ाने से क्या मतलब है? प्यार का मतलब सामयिक शिष्टाचार नहीं है, दिखावट नहीं है। दावत खिलाना नहीं है। कोई प्रेम−उपहार देना नहीं है। वरन् प्यार का मतलब यह है कि हम यह मानकर चलें कि यह हमारा है, अपना है। फिर आप देखिए कितना आनंद आता है और उसके साथ में आप कितनी सेवा करते हैं और उसके नजदीक रहने में कितनी प्रसन्नता अनुभव करते हैं। पहले आप अपने अपनत्व का दायरा तो बढ़ाइए, अपने आपको प्यार तो कीजिए।
मित्रो! आपने अपने शरीर को प्यार किया है न। जरा−सी बात हो जाती है, नुकसान हो जाता है, तो उसको ठीक करने की कोशिश करते हैं। इसको कपड़ा पहनाते हैं, इसकी सजावट करते हैं, शृंगार करते हैं, इसके बाल बनाते हैं। इसके लिए और न जाने क्या−क्या करते हैं, क्योंकि इसे आप अपना मानते हैं। पड़ोस में जो दूसरे आदमी रहते हैं, उनका भी आप बाल बनाते हैं क्या? कभी नहीं साहब! उनका तो हम नहीं बनाते। उनको कपड़ा पहनाते हैं क्या? नहीं पहनाते। उनको आप क्यों नहीं पहनाते? इसलिए नहीं पहनाते, क्योंकि वे हमारे नहीं हैं। अगर बच्चे हमारे हैं, तो हम उनकी बराबर देखभाल करते हैं, उनको सुँदर बनाते हैं। उनको पढ़ाते हैं, शिक्षा देते हैं, क्योंकि वे हमारे हैं। हमारेपन का, अपनेपन का माद्दा इन्सान के पास एक ऐसी चीज है, जो जहाँ कहीं भी टक्कर खाता है, वहीं से लौटकर आपके पास आ जाता है। ठीक उसी तरह से जिस तरह से रबर की गेंद फेंककर जब मारते हैं, तो मारने के बाद वह जिधर से मारी गई थी, लौटकर उसी स्थान पर आ जाती है। ठीक इसी तरीके से जब हम प्यार और मोहब्बत किसी के ऊपर फेंककर मारते हैं, तो वह लौटकर हमारे पास आ जाती है। आप जिससे भी प्यार कीजिए, गुँबज की आवाज की तरह से, कुएँ की आवाज की तरह से उसकी प्रतिध्वनि लौटकर आपके पास आ ही जाती है।
सर्वत्र अपना आपा बिखरा मानें
मित्रों! इसी तरीके से अगर संसार में आप द्वेष बुद्धि से देखेंगे तो आपको द्वेष बरसता दिखाई पड़ेगा। आप लोगों की उपेक्षा करना शुरू कर दें, तो आपको चारों ओर उपेक्षा, उदासी छाई हुई दिखाई पड़ेगी। परायापन दिखाई पड़ेगा। सब माया और मिथ्या दिखाई पड़ेगा। परंतु यदि आप सब चीजों के प्रति आत्मीयता की भावना रखें, सर्वत्र अपना आपा ही बिखरा हुआ दिखाई पड़ेगा। तुलसीदास के “सियाराममय सब जग जानी” की अनुभूति होने लगेगी। संसार का जर्रा−जर्रा सिया से भरा है, राम से भरा है। अपनत्व विकसित होने पर आपको हर जगह राम दिखाई पड़ेंगे और हर जगह सीता जी दिखाई पड़ेंगी। कब? जब आप उसे अपना मानेंगे तब। आप सबको अपना मानना शुरू कीजिए। अपनेपन के दायरे को बढ़ा दीजिए। अभी तो आपके अपनेपन का दायरा शरीर तक है, इसलिए शरीर में सुख है, तो आप सुखी हैं, शरीर में दुःख है तो दुखी हैं। अभी तो आपने अपना दायरा अपने कुटुँब तक सीमित रखा है। कुटुँबियों को अच्छी नौकरी मिल गई, खाना मिल गया, इज्जत मिल गई, तो आप खुश हैं और अगर नुकसान हो गया तो आप नाखुश हैं। अतः आप एक काम कीजिए, अपने इस छोटे−से दायरे को बढ़ा दीजिए। आप अपने आपको सारे विश्व तक फैला दीजिए, तब सारी चीजें आपकी हो जाएँगी।
स्वामी रामतीर्थ अपने आपको रामबादशाह कहते थे। वे कहते थे कि मैं बादशाह हूँ। आप किसके बादशाह हैं? बादलों का बादशाह, नदियों का बादशाह, पहाड़ों का बादशाह। वे कहते थे कि मैं इनके ऊपर जा सकता हूँ और देख सकता हूँ। यह सब उनका ख्याल था, क्योंकि वे समझते थे कि सारी दुनिया मेरी है। मैं दुनिया का मालिक हूँ। वे अपने को बादशाह कहते थे। इसमें कोई रुकावट थी बताइए? कोई रुकावट नहीं थी? कोई नदी का पानी पीना चाहे तो उसे कौन रोक सकता है? सड़क पर चलना चाहे तो कौन रोकता है? बादलों को निहारना चाहे तो कौन रोकता है? किसी चिड़िया के आगे दाना फेंकते हैं तो कौन रोकता है। किसी की सेवा−सुश्रूषा करने लगे तो कौन रोकता है? केवल बुराइयों के संबंध में तो रोकथाम हो भी सकती है कि किसी के साथ में आप चोरी का व्यवहार करें, लड़ाई−झगड़े का व्यवहार करें, तो कानून भी आपको रोक सकता है। लेकिन आप किसी से मीठे वचन बोलें, किसी की मदद कर दें, किसी के काम आएँ, तब भला आपको कौन रोकने वाला है?
इसलिए मित्रो? भक्ति न केवल भाव संवेदना से ताल्लुक रखती है, वरन् व्यक्ति के बहिरंग जीवन से भी उसका ताल्लुक है। भक्ति या मोहब्बत यह सिखाती है कि हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए। आप जिससे भी मोहब्बत करेंगे, उसकी सेवा करने के लिए आप खुशी−खुशी तैयार हो जाएँगे। आपकी यदि अपनी साइकिल है, तो आप इसे झाड़ेंगे, पोछेंगे, उठाकर रख देंगे, तेल डालेंगे। आपका अपना बच्चा है तो उसे अपनी गोद में उठाएँगे, बैठाएँगे, पढ़ाएँगे, लिखाएँगे, शिक्षा देंगे। आप उनके माँ−बाप हैं, तो उनके लिए क्या कुछ करेंगे नहीं? आपकी धर्मपत्नी है तो क्या उनके लिए कुछ करेंगे नहीं? हम जिस किसी से भी आत्मीयता रखते हैं उसके लिए कुछ करने की इच्छा होती है। प्यार का वास्तविक स्वरूप यही है। प्यार का वास्तविक स्वरूप सेवा में निखरता है। आप किसके साथ में प्यार करते हैं और किसके साथ में प्यार नहीं करते, इसकी पहचान सिर्फ यही है कि जिसको आप प्यार करते हैं, उसकी आप सेवा करना चाहते हैं कि नहीं। प्यार सेवा करना सिखाता है। प्यार अनुदान सिखाता है। प्यार अपने प्यारे को सुखी बनाने के लिए स्वयं कष्ट उठाता है और सामने वाले प्रेमी को सुखी बनाता है। देश−भक्ति इसी का तो नाम है। विश्व−भक्ति इसी का तो नाम है। भगवान् की भक्ति इसी का नाम है कि भगवान् को आप प्रसन्न बनाएँ। इसके लिए योगदान करें। आप हैरान होते हों, तो हों, पर बच्चों को आप सुखी बनाएँ, देश को आप सुखी बनाएँ। ऐसी हैरानी में भी आदमी प्रसन्न रहता है।
भज् सेवायाम् ही है भक्ति
मित्रो! भक्ति न केवल मानसिक और भावनात्मक संपदा है, वरन् उसके आधार पर पुण्य करने और परमार्थ करने का मौका भी मिलता है। आप भक्ति कीजिए और सेवा भी कीजिए। प्यार का अर्थ जैसा कि आमतौर से आपने लगा रखा है, वह प्यार, प्यार नहीं हो सकता है। आपको खूबसूरत चीजों से प्यार है और बिना खूबसूरत चीजों से प्यार नहीं है। इसका क्या मतलब हुआ? खूबसूरत है तो क्या, बिना खूबसूरत है तो क्या? यह संसार एक बगीचा है। इसमें सभी तरह की चीजें हैं। हमारा सीमितपन क्यों हो? हम मोह के बंधन में क्यों बँधें? मोह और बंधन एक ही तरह से होते हैं। जिनसे हमको फायदा होता है, उसके साथ हमारी मोहब्बत होती है, लेकिन जिन लोगों के साथ हमारा फायदा नहीं होता। आमतौर से उन लोगों के साथ हमारी मोहब्बत नहीं होती। शंकर भगवान् के साथ उनके भक्त भूत−प्रेत भी रहते हैं। भूत−प्रेतों की भी वे सेवा करते हैं, मदद करते हैं। भक्ति है, तो हमसे गए−बीते हुए लोगों, पिछड़े हुए लोगों, गए−गुजरे हुए लोगों को भी सेवा करनी चाहिए। बच्चों को हम गोदी में लिए फिरते हैं, क्यों? जो हमसे इतने छोटे हैं, उनकी समझदारी भी कम होती है। जिनकी क्षमताएँ कम हैं, जो उठने में असमर्थ हैं, तो क्या उनकी सेवा नहीं करनी चाहिए? सेवा करनी चाहिए।
साथियों! सेवा और भक्ति दोनों एक ही चीज हैं। ‘भज् सेवायाम्’ संस्कृत में ‘भज्’ शब्द जो बना है, उससे भजन बना है, भक्ति भी बनी है। भक्ति का अर्थ क्या होता है? भक्ति का अर्थ सेवा होता है। कौन करेगा किसकी सेवा? वह करेगा और उसकी करेगा जिसको वह मोहब्बत करता है। तो आप अपनी मोहब्बत को बदल डालिए और उसका दायरा बढ़ाइए। बस यही भक्ति है। भक्ति का अभ्यास हम भगवान् से करते हैं। यह व्यायामशाला है। व्यायामशाला में हम प्रेरणा पाते हैं। कुश्ती लड़ना सीखते हैं। दौड़ लगाना सीखते हैं और जब दंगल होता है, प्रतियोगिताएँ होती हैं तब कमाल दिखाते हैं। आप भगवान् की कोठरी में बैठकर भक्ति किया कीजिए। किसकी भक्ति करें? सिद्धाँतों की भक्ति, आदर्शों की भक्ति। भगवान् क्या हैं? सिद्धाँतों का समुच्चय, आदर्शों का समुच्चय, श्रेष्ठताओं का समुच्चय ही भगवान् है। भगवान् व्यक्ति विशेष नहीं है, जिसको हम और आप मिठाई खिलाएँगे, लड्डू खिलाएँगे और उनको मुकुट पहनाएँगे, साड़ी पहनाएँगे। बेटे भगवान् कोई व्यक्ति थोड़े ही है। भगवान् तो एक सच है। भगवान् तो एक नियम है। भगवान् तो एक सत्ता है। भगवान् तो एक फायदा है, ऊँचे आदर्शों का समुच्चय है। उससे प्यार कीजिए, बस भक्ति का अभ्यास हो गया।
आदर्शों से असीम प्यार ही है भक्ति
भक्ति के लिए, पूजा−उपासना के लिए आपने कोई इष्टदेव की मूर्ति बनाकर रखी होगी तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन उसको आप सिद्धाँतों का समुच्चय मानिए, आदर्शों का समुच्चय मानिए। उसे व्यक्ति विशेष मत कीजिए। अगर व्यक्ति विशेष मानेंगे तो भ्रम और जंजाल में घूम रहे होगे। आपने अगर शंकर जी को एक आदमी माना होगा, जो बैल की सवारी करता हुआ जहाँ तहाँ घूमता रहता है और बेल के पत्ते खाता है। आक के फूल और धतूरे के फल खाता है, तो आप गलती कर रहे हैं। शंकर ऊँचे आदर्शों का समुच्चय है। शंकर जी के सिर से गंगा जी निकलती हैं, जो आदर्शों की गंगा हैं। गले में मुँडों की माला डाले फिरते हैं, जिसका अर्थ है कि वे मौत और जिंदगी को एक मानते हैं। यह क्या है—सिद्धाँत है। उनके मस्तक पर चंद्रमा टिका हुआ है अर्थात् वे मानसिक संतुलन बनाए हुए हैं। भूत−प्रेतों को हमेशा साथ लिए फिरते हैं, इसका मतलब है कि वे गए−गुजरे और पिछड़े हुए आदमियों की बात करते हैं। श्मशान में रहते हैं अर्थात् वहाँ रहते हैं जहाँ कि अस्तव्यस्तता छाई हुई है, जहाँ नीरसता छाई हुई है। जहाँ कोलाहल छाया है, वहाँ पर रह करके अपनी विशेषता के कारण शाँति और भक्ति का वातावरण बना देते हैं। ये शंकर भगवान् की विशेषता है।
इस तरह शंकर भगवान् क्या हैं? सिद्धाँतों का समुचित हैं। ठीक इसी तरीके से भगवान् का प्रत्येक रूप सिद्धाँतों का एक समुच्चय है। चाहे वे गणेश जी हों, चाहे वे हनुमान जी हों, चाहे वे रामचंद्र जी हों, चाहे लक्ष्मण जी हों, कोई भी क्यों न हों। ये सारे के सारे देवी−देवता या भगवान् के अवतार एक तरीके से सिद्धाँतों के समुच्चय हैं श्रेष्ठता के दिव्य गुणों के उच्च आदर्शों के समुच्चय हैं। आप इनसे भक्ति करते हैं, इस कारण से होना यह चाहिए कि आप यह देखें कि उन सिद्धाँतों के प्रति क्या करते हैं। आप सिद्धाँतों के प्रति प्यार करना सीखिए। अगर सिद्धाँतों के प्रति आपकी आस्थाएँ बलवान होती चली गई, मजबूत होती चली गई, तो आप उन सिद्धाँतों को क्रियान्वित करने में भी हिम्मत दिखाएँगे और उनको काम में भी लाएँगे। भक्ति का पूजा−पाठ से जहाँ तक ताल्लुक है, तो वह यहीं खत्म हो जाता है कि हम सिद्धांतों के लिए अपनी निष्ठाओं को मजबूत करें। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यह मानकर चलें कि यह सारी सृष्टि ईश्वर की क्रीड़ास्थली है और सबमें वही समाया हुआ है। अतः जिस भक्ति को हम भगवान् के प्रति करते हैं, उसी भक्ति को जन जन के प्रति करने में समर्थ हो सकें। अगर आपने ऐसा किया तो आप भगवान् के सच्चे भक्त कहलाएँगे।
भक्ति की फलश्रुति
मित्रो! अगर आप सच्चे अर्थों में भगवान के भक्त हैं तो ध्यान रखिए कि इससे आपको क्या फायदा होगा और क्या फायदा नहीं होगा? स्वर्ग में आप जाएँगे कि नहीं जाएँगे? ये बाद की बातें हैं, लेकिन आपको अपने विचारों में एवं चहुँओर ऐसा नजारा दिखाई पड़ेगा, जिसको कि हम स्वर्ग कहते हैं। आँखों में आपको स्वर्ग नाचता हुआ दिखाई पड़ेगा। सारे लोग अपने ही दिखाई पड़ेंगे। बुरे आदमी भी? हाँ, बुरे आदमी भी। कोई व्यक्ति रोगी होता है, तो उसका इलाज करते हैं, उसकी जान बचाने की कोशिश करते हैं। बीमारी को मारते हैं, उसकी जान बचाने की कोशिश करते हैं। बीमारी को मारते हैं और बीमार को बचाते हैं। बीमार व्यक्ति को कौन मारता है? नहीं साहब! अमुक आदमी इस दुनिया में इसलिए नहीं है कि आप उनसे घृणा करें। हाँ, बुराइयों के प्रति आप घृणा कीजिए और उसे ठीक कीजिए। बुराइयों से लड़िए। बुराइयों से जद्दोजहद कीजिए। अपने बच्चे में भी कोई बुरी आदत है, तो कोशिश कीजिए कि बुरी आदत से उसको छुटकारा दिला दें, न कि उस बच्चे को ही मार डालने की कोशिश करें।
आज चारों ओर फैली हुए घृणा और नफरत की दुनिया में और अधिक की गुंजाइश नहीं है। आप प्यार के आधार पर भी लोगों का सुधार कर सकते हैं। आप यह मत सोचिए कि प्यार का हथियार कमजोर है। प्यार का हथियार कमजोर नहीं है। प्रह्लाद की बात आपको मालूम नहीं है? प्रह्लाद ने अपने पिता से प्यार−मोहब्बत की। लेकिन उसने उनका कहना नहीं माना और उनसे बराबर जद्दोजहद करता रहा। क्योंकि पिता जब गलती करते थे, तो उनको सुधारने में प्यार से लगा रहता था कि व्यर्थ के कामों में इनका श्रम क्यों जाए। इसे रोकने के लिए उसने पिता से असहमत होकर उनकी अवज्ञा करनी शुरू कर दी। आप भी इस मामले में किसी से भी लड़ाई−झगड़ा शुरू कर सकते हैं, लेकिन उसके पीछे प्यार का, मोहब्बत का माद्दा अवश्य होना चाहिए। आप प्यार की लड़ाई लड़िए। प्यार की लड़ाई भी बहुत अच्छी है, प्यार के अंजाम भी बहुत अच्छे हैं। यह सबके लिए अच्छा है, हमारे लिए भी और आपके लिए भी। इससे हमारे आनंद में हजारों गुना वृद्धि हो जाती है। हमारी खुशहाली में वृद्धि होती है और हम गरीबी में रहते हुए भी, अभावों में रहते हुए भी चारों ओर प्यार और मोहब्बत की नजर डालते हैं, तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। यह आपके हाथ में है कि आप खुशी अपनी मुट्ठी में रखें, सब ओर खुशी देखें, आनंद देखें और प्यार देखें। अगर आप अपनी भक्ति के लिए यह दृष्टिकोण बना सकें तो आपके लिए चारों ओर आनंद−ही आनंद है। आनंद आपके अंदर ही छिपा हुआ है, साथ−ही−साथ आपके चारों ओर अमृत−ही−अमृत बिखरा हुआ है। आप चाहें तो इसे समेट भी सकते हैं और चाहें तो पी सकते हैं और दूसरों को भी पिला सकते हैं, ऐसा मेरा विश्वास है। आज की बात समाप्त।
॥ ॐ शाँति ॥
(समापन किस्त)
आम प्रचलन में ध्यान बैठकर करने की परंपरा है, पर बौद्ध मत में चलता−फिरता सचल ध्यान भी काफी लोकप्रिय है। इसे कोई भी कहीं और कभी भी कर सकता है, किंतु इसके लिए एकाँत जरूरी है। आरंभिक अभ्यास के बाद मन जब उस साँचे में ढलकर नियंत्रण में आ जाता है, तो फिर जन−संकुलता उसमें बाधक नहीं बनती और उसे चहल−पहल वाले स्थान में भी कर पाना कठिन नहीं रह जाता।
ध्यान वस्तुतः एक विशिष्ट मनोदशा का नाम है। जब मन को हर ओर से मोड़कर उसे एक केंद्र−बिंदु पर एकाग्र कर दिया जाता है, तो वह ध्यान बन जाता है। ध्यान के लिए शारीरिक स्थिरता अथवा एक स्थान पर साधक का बैठना−यह कोई आवश्यक शर्त नहीं, जो जरूरी है, वह यह कि साधक अपनी चेतना को बाह्य संसार से हटाकर अंतर्मुखी बना ले। दैनिक जीवन में इसे हम कितनी ही बार अनुभव करते हैं कि चलते−फिरते किसी विशिष्ट भावधारा या उधेड़−बुन में इस प्रकार खो जाते हैं कि आस−पास का भी ज्ञान नहीं रहता। साधक की स्थिति में यह खो जाना ही ध्यान बन जाता है, पर सर्वसाधारण और साधक के खोने में अंतर है। साधक जब खोता है, तो वहाँ दिव्यता घटित होती है, वह परमसत्ता से मिलन का एक सोपान बन जाता है, किंतु सामान्य व्यक्ति में जब इस प्रकार की कोई क्रिया दृश्यमान होती है तो इसका यह अर्थ हुआ कि वह भौतिकता के दलदल में फँसा हुआ है। यह भौतिक चिंता और चिंतन का परिणाम ही है, जो उसे चरम लक्ष्य से दूर ले जाता है। ध्यान उस दूरी को घटाने और चिंताओं एवं उलझनों से ग्रसित मन को शाँति का शीतल अनुभव कराने का एक माध्यम है।
चलता−फिरता ध्यान यों कहने− सुनने में कुछ अटपटा प्रतीत होता है, पर यह सत्य है कि चलते हुए भी ध्यान किया जा सकता है। बैठकर ध्यान करने के लिए किसी एकाँत स्थान का चयन करना पड़ता है। अस्थिर ध्यान की प्रक्रिया कुछ दूसरी है। उसमें व्यक्ति टहलता रहता है, आँखें खुली होती हैं, किंतु मन कुछ विशिष्ट बिंदुओं पर स्थिर होता है। वह स्थिरता ही यहाँ अभीष्ट है। शरीर गतिशील हो, अंग−अवयव हिलते−डुलते रहें, किंतु मन अचंचल रहे। यह मानसिक अचंचलता हर कदम के साथ जुड़ी हुई हो और हर चरण शाँति और आनंद की अनुभूति से ओतप्रोत हो, इसकी उपलब्धि ही इस ध्यान का वास्तविक उद्देश्य है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इसके माध्यम से व्यक्ति को एक बार फिर से चलना सिखाया जाता है, ऐसा चलना, जो तनाव और अशाँति को भगाता हो और प्रफुल्लतादायक हो। बचपन में बालक जब चलना प्रारंभ करता है, तो उसके कदम लड़खड़ाते हैं और पाँव धरती पर मजबूती से नहीं टिक पाते। ध्यान की इस प्रक्रिया में व्यक्ति दृढ़तापूर्वक चलता तो है, पर उसका मन डगमगाता रहता है। इस असंतुलन को दूर कर योगी जैसी मनः स्थिति प्राप्त करना ही इसका मुख्य प्रयोजन है।
आज का जीवन कितना जटिल है, उसमें कितनी उलझनें और अशाँति है, उसमें कैसी−कैसी तकलीफें और मुश्किलें हैं, वह किस कदर तनावयुक्त है और कितना विद्रूप हो चला है। यदि किसी को दिव्य दृष्टि मिल सकी होती, तो वह देख पाता कि मनुष्य का हर कदम पीड़ा की कैसी अकुलाहट से भरा है, वह अपने ही पदचिह्नों में किस प्रकार उसके निशान छोड़ रहा है, उस निशान में कितनी निराशा, कितना भय, कितना संत्रास और कैसी व्याकुलता है, इसे वह भली भाँति पहचान पाता। इसलिए यह आवश्यक है कि हमारा हर पग प्रसन्नता का प्रतीक बन जाए, उसमें पीड़ा का अंश−अवशेष न बचे। इसके लिए हमें चलना सीखना पड़ेगा और वह विधा समझनी पड़ेगी कि अपने प्रत्येक कदम के साथ चिंतामुक्त और तनावरहित कैसे बनते चलें और दिव्य शाँति एवं समरसता को किस भाँति प्राप्त करें। सचल ध्यान इसी रहस्य को उजागर करने वाली एक प्रणाली है। इसकी प्रक्रिया क्या है? इसे समझाते हुए थिकन्हाट हान्ह अपनी पुस्तक ‘ए गाइड टु वाकिंग मेडिटेशन’ में लिखते हैं कि सर्वप्रथम इसके लिए एक उपयुक्त स्थान का चुनाव करना पड़ता है। यह कोई आवागमनरहित रोड, पार्क, उपवन, वन, समुद्री किनारा, नदी तट या मकान की छत हो सकता है। इस प्रकार की जगहें ऐसे अभ्यास के लिए आदर्श मानी जाती हैं, किंतु जहाँ इनमें से कोई उपलब्ध न हो, वहाँ सुविधानुसार शाँत, एकाँत स्थान का चयन किया जा सकता है। स्थान−निर्धारण के संबंध में जिस एक बात का विशेष ध्यान रखना पड़ता है, वह यह है कि वह बहुत अधिक ऊबड़−खाबड़, चढ़ाई युक्त या ढलवाँ स्थान न हो। वह समतल और सपाट होना चाहिए।
समय के संबंध में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि आध्यात्मिक प्रयोजनों के लिए ब्राह्ममुहूर्त का समय सबसे अनुकूल माना गया है, फिर भी इस संदर्भ में किसी प्रकार का कोई दुराग्रह नहीं है। प्रातः का समय किसी कारणवश असुविधाजनक हो, तो सायंकाल को इसके लिए चुना जा सकता है। दोपहर की खुली धूप में एकाग्रता संबंधी कोई भी अभ्यास असंभव है, अतएव उक्त साधना के लिए कोई छायादार स्थान चुनना चाहिए, ताकि धूप की प्रचंडता या गरमी की उग्रता उसमें बाधक न बने।
अब टहलने की क्रिया शुरू करनी चाहिए। यह कार्य सामान्य भ्रमण से कुछ भिन्न है। टहलने में मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य−संवर्द्धन होता है, पर यहाँ उसका प्रयोजन सिर्फ ध्यान है, इसे हर अभ्यासी को हृदयंगम कर लेना चाहिए। कहना न होगा कि यहाँ भी स्वास्थ्य लाभ होता है, परंतु यह यहाँ गौण है। हमारा लक्ष्य हर हालत में केवल ध्यान होना चाहिए। चला धीमी रखें और मन को अपने कदमों पर एकाग्र करें। हर पग के प्रति हम सजग हों, इसका विशेष ध्यान रहे। सीधे आगे बढ़े। इस अग्रगमन के साथ प्रसन्नता और शाँति का भाव अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ हो। अब हर कदम के साथ धरती पर बनने वाले पदचिह्न की कल्पना करें। उसमें शीतलता, आनंद और उल्लास की झाँकी करें। हमारी चाल किसी महापुरुष की भाँति हो। जिस प्रकार महापुरुषों के रोम−रोम और कदम−कदम से उत्फुल्लता टपकती है, कुछ वैसा ही अनुभव यहाँ करना पड़ता है। यही जीवन है। तनावयुक्त पग तो हमें महामरण की ओर ले जाते हैं।
इसके अगले चरण में साँस पर ध्यान दें। सजगतापूर्वक श्वास लेना उस साँस से बिलकुल भिन्न है, जो नैसर्गिक रूप से चलती रहती है और जिसके प्रति आदमी जागरुक नहीं होता। सावधान रहते हुए इस बात पर गौर करें कि साँस लेते समय कितने कदम चले गए और साँस छोड़ते समय कितने। श्वास−प्रश्वास को नियंत्रित करने की कोशिश न करें। उसे सहज रूप से चलने दें। इस प्रकार साँस और कदमों के मध्य एक संबंध स्थापित हो जाएगा। इस संबंध से दोनों पर एक साथ नजर रख सकना सरल हो जाता है और अभ्यासी दोनों के प्रति जागरुक बना रहता है। चेहरे की मद मुसकान इस प्रक्रिया को और अधिक सुखद और शाँतिदायक बनाता है। इस प्रकार कई दिनों के गंभीर अभ्यास के उपरांत चारों तत्त्वों−साँस, साँस की गिनती, पग तथा मुस्कान का संतुलित समन्वय हो जाता है। चारों मिलकर एक हो जाते हैं। यह ‘समचित्तता’ है, जो कठोर अभ्यास से ही आ पाती है। एक बार यह अवस्था प्राप्त कर लेने के बाद फिर आगे कठिनाई नहीं रह जाती और सब कुछ बड़ी सहजता से अनायास होता चलता है।
शुरू में नए−नए अभ्यासी को यह काफी कठिन प्रतीत होता है। ऐसा लगता है, मानो एकदम असंभव कार्य हो, पर जैसे−जैसे अभ्यास बढ़ता जाता है, वह आसान बनता जाता है और अंत में चरम अवस्था उपलब्ध हो जाती है। इस चरमावस्था की प्राप्ति ही यहाँ अभीष्ट है। इसके फलस्वरूप व्यक्तित्व में धैर्य, स्थिरता, शाँति, सहजता जैसे तत्वों का जो अवतरण होता है, उससे उसमें और अधिक गहराई आ जाती है, उथलापन समाप्त होता है एवं साधक की महानता की दिशा में बढ़ चलने की मनोभूमि तैयार हो जाती है। साधना की उच्चतर अवस्थाओं को प्राप्त करने के इच्छुक साधकों के लिए यह आरंभिक अभ्यास अतीव उपयोगी साबित हो सकता है, इसमें रत्ती भर भी संदेह की गुंजाइश नहीं।
आरंभ में पदों की गणना में संभव है कि सांसों पर से ध्यान हट जाए और श्वास पर ध्यान टिकाने से पग−संख्या विस्मृत हो जाए। इस समस्या का हल सतत अभ्यास है। इसके बाद ‘समचित्तता’ का आविर्भाव होता है। इसके उपलब्ध होने पर भीड़−भड़क्का, जनसंकुलता भी प्रायः उसमें बाधक नहीं बनती हैं और यह क्रिया किसी स्वसंचालित प्रक्रिया की तरह अपने आप चलती रहती है।
चलता−फिरता सचल ध्यान एक उपयोगी अभ्यास है। इसके माध्यम से वही लाभ हस्तगत किए जा सकते हैं, जो बैठकर ध्यान करने से प्राप्त होते हैं। यह बौद्ध परंपरा की अनूठी खोज है। इससे हम सबको लाभान्वित होना चाहिए।
परम सत्ता को माँ के रूप में देखने और उस रूप में उसकी आराधना करने का प्रचलन भारतीय संस्कृति की एक मौलिक विशेषता है, जिसकी मिसाल विश्व के अन्य धर्मों या आस्था-परम्पराओं में खोज पाना दुर्लभ है। वहाँ ईश्वर को पिता या जगत् के स्वामी के रूप में ही देखा और पूजा जाता है, माँ के रूप में नहीं। नवरात्रि के रूप में इसी की आराधना का विशिष्ट पर्व मनाया जाता है। उसे शक्ति पर्व भी कहा जाता है। भारत में आदिकाल से चला आ रहा शक्ति पूजा का यह पर्व आज भी अगम्य आस्था के साथ जारी है। हमारी संस्कृति का प्रत्येक कालप्रवाह उसकी चर्चा, विवेचन एवं साधना से भरा पड़ा है।
भारतीय संस्कृति के आदि ग्रंथ ऋग्वेद के दशम मंडल में एक पूरा सूक्त शक्ति उपासना पर है, जिसमें शक्ति की व्यापकता का सुन्दर विवेचन किया गया है-”मैं ही ब्रह्म के दोषियों को मारने के लिए रुद्र का धनुष चढ़ाती हूँ। मैं ही सेनाओं को मैदान में लाकर खड़ा करती हूँ। मैं ही आकाश और पृथ्वी में सर्वत्र व्याप्त हूँ, मैं ही संपूर्ण जगत् की आधीश्वरी हूँ। मैं परमब्रह्म को अपने से अभिन्न रूप में जानने वाले पूजनीय देवताओं में प्रधान हूँ। संपूर्ण भूतों में मेरा प्रवेश है।’ इसी तरह ऋग्वेद के देवी सूक्त, ऊषा सूक्त और रात्रि सूक्त तथा सामवेद के रात्रि सूक्त सभी शक्ति साधना की परम्परा के निदेशक हैं।
कुरुक्षेत्र में महाभारत आरम्भ होने से पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण ने आदि शक्ति की ही उपासना की थी, ताकि युद्ध में अर्जुन विजयी हो। भगवान राम द्वारा इसकी उपासना का उल्लेख अनेक राम कथाओं में मिलता है। बौद्ध धर्म में मातृ शक्ति की पूजा विविध रूप में प्रचलित रही है। बौद्ध तंत्रों में तो शक्ति को शीर्ष स्थान प्राप्त रहा है। शाक्त पुराणों में देवी के स्वरूप, महिमा एवं उपासना विधि का विस्तार से वर्णन किया गया है। वस्तुतः पौराणिक युग को शक्ति उपासना का यौवन काल कह सकते हैं। पुराणों के व्यापक प्रचार से शक्ति की उपासना को इतना बल मिला था कि वह घर-घर में पूजी जाने लगी।
दैवी भागवत में शक्ति के लिए अनन्य शक्ति भाव प्रदर्शित किया गया है। मार्कण्डेय पुराण में शक्ति की व्यापकता का उल्लेख तीन रूपों में किया गया है-महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती। महाकाली आसुरी शक्तियों का संहारक है, अहंकार का नाश करती हैं और ज्ञान की खड्ग से अज्ञान को नष्ट करती हैं। महासरस्वती विवेक की देवी है। विद्या, साहित्य, संगीत, विवेक और ज्ञान की अधिष्ठात्री है। महालक्ष्मी ऐश्वर्य की देवी है। मार्कण्डेय पुराण में दैवी माहात्म्य की विशद् विवेचना को ‘दुर्गा सप्तशती’ नाम दिया गया है। स्कन्द पुराण में देवी के आविर्भाव का वर्णन है। ब्रह्मपुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि में भी देवी के अवतरण का उल्लेख मिलता है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ब्रह्माजी मार्कण्डेय ऋषि को कहते हैं कि देवी का पहला रूप शैल पुत्री है। इस क्रम में अन्य रूप ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री हैं। इन रूपों को नौ दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। दुर्गा की उत्पत्ति के संदर्भ में शिवपुराण में रुद्र संहिता के पंचम अध्याय में सुँदर आख्यान मिलता है।
वस्तुतः शक्ति का विस्तार, वैभव एवं लीला जगत् अनन्त है। सृष्टि की तमाम व्यापकता एवं विविधता के मूल में एक ही शक्ति विद्यमान है, इसे ब्रह्म की क्रिया शक्ति के रूप में आदि शक्ति के रूप में जाना जाता है। यही विविध अवसरों पर, विविध प्रयोजनों के लिए अलग-अलग नाम, रूप एवं शक्ति धारण करके प्रकट होती है। प्रकृति की जितनी भी शक्तियाँ हैं वे सब इसी की अभिव्यक्ति हैं। इनका स्फुरण, उद्भव एवं जन्म इसी आदि शक्ति के गर्भ से होता है। सृष्टि का पोषण एवं संवर्धन इसी के बल पर होता है। यही इसकी रक्षा करती है। यही ब्रह्म, विष्णु एवं महेश की जननी है। सृष्टिकर्त्ता इस सृजनकारिणी शक्ति से हीन होने पर सृष्टिकर्ता नहीं रह जाता है। स्कंदपुराण में उल्लेख आता है कि शक्ति से विहीन शिव शव के समान है, शिव का शिवत्व महाशाँति के सान्निध्य से ही जाग्रत् होता है।
दैवी के रूप को सर्वत्र व्याप्त देखा जा सकता है। समस्त प्राणियों में यही चेतना, बुद्धि, स्मृति, धृति, शक्ति, श्रद्धा, काँति, तुष्टि, दया और लक्ष्मी आदि रूपों में स्थित हैं। प्रत्येक प्राणी के भीतर मातृ शक्ति एवं मातृ प्रवृत्ति के रूप में वे ही प्रवाहित और प्रकाशित हैं। वह विविध रूप धारिणी है। सत्, रज एवं तम गुणों के आधार पर यह क्रमशः महा सरस्वती, महालक्ष्मी एवं महाकाली के रूप में अभिव्यक्त होती है। वस्तुतः विविध नाम रूपों में देवी के स्वरूप मूलतः एक ब्राह्मी शक्ति में सिमट जाते हैं जिसे प्रचलित रूप में गायत्री नाम से जाना जाता है। इस रूप में शक्ति साधना की आदि परम्परा गायत्री उपासना की ही रही है। नवरात्रि के पावन पर्व पर प्राचीन काल में गायत्री उपासना का ही एकमात्र प्रसंग मिलता है। विभिन्नताएँ मध्यकाल के अंधेरे युग की उपज हैं। जिसमें शक्ति-देवियों के नाम पर अनेकों रूप सामने आए। फिर भी प्रधानता गायत्री की ही रही है।
वैदिक संस्कृति में तो पूरी तरह एकरूपता, एकनिष्ठ, एक दिशा, एक लक्ष्य का ही निर्धारण था। ज्ञान और विज्ञान का आधार वेद और उपासना का समूचा विधि विधान गायत्री की धुरी पर परिभ्रमण करता था। उन दिनों सर्वसाधारण के लिए दैनिक सन्ध्या वंदन में गायत्री मंत्र ही उपासना का मेरुदण्ड था। योगी, तपस्वी इसी के सहारे अपना महालक्ष्य प्राप्त करते थे। देवताओं और अवतारों के लिए भी शक्ति का स्रोत यही थी। नवरात्रि के अवसर पर गायत्री मंत्र को केन्द्र मानकर विशिष्ट शक्ति साधना अनुष्ठान संपन्न किए जाते थे।
नवरात्रि की संधि (सर्दी-गर्मी) की वेला स्वयं में विशिष्टता लिए होती है। इसी समय कार्तिकी फसल पकती है। समूची प्रकृति अपने चरम उत्कर्ष पर होती है। इन्हीं दिनों कायातंत्र इकट्ठे विजातीय तत्त्व को बाहर फेंकने के लिए जोर मारता है। आयुर्वेद की शरीर शोधन की कल्प चिकित्सा इन्हीं दिनों संपन्न की जाती है। इसी तरह आध्यात्मिक साधनाओं के लिए नवरात्रि से बढ़कर और कोई अवसर नहीं हो सकता। यदि इसके साथ युग संधि का दुर्लभ सुयोग भी जुड़ा हो तो इसका महत्त्व शतगुणित हो जाता है। इसलिए नवरात्रि के इस पुण्य पर्व को हाथ से न जाने दिया जाए व समूची तैयारी के साथ इसकी आत्म शोधन एवं आत्मोत्कर्ष साधना में भागीदार हुआ जाए तो यह समझदारी भरा कदम होगा।
नवरात्रि साधना में 24 हजार मंत्र जप वाले लघु अनुष्ठान के नियमों का पालन करना होता है। इसमें 27 माला नियमित जपनी पड़ती है जो सामान्य गति के अनुरूप 3 घण्टे में पूरी हो जाती है। इस अवधि में उपवास के नियम का पालन कड़ाई से किया जाए तो अच्छा है अन्यथा ब्रह्मचर्य रहने वाला अनिवार्य नियम टूट सकता है। उपवास कई स्तर का हो सकता है। फल द्वारा, शाकाहार, खिचड़ी, दलिया आदि। मसाला इन दिनों छोड़ देना चाहिए। बिना नमक एवं शक्कर का भोजन भी एक प्रकार का उपवास ही है। अपनी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति के अनुरूप उपवास का क्रम बनाना चाहिए। नियम के क्रम में नौ दिवस तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन किया जाए, यदि स्वप्नदोष हो जाए तो दस माला प्रायश्चित की अतिरिक्त की जाए। इसके अतिरिक्त तीन अन्य नियम हैं-1.कोमल शैय्या का त्याग अर्थात् भूमि शयन या तखत पर सोना 2. अपनी शारीरिक सेवाएँ अपने हाथों करना 3. हिंसक पदार्थों का त्याग, चमड़े की वस्तुओं का त्याग।
इन पाँच नियमों के अतिरिक्त जप का शताँश हवन किया जाना चाहिए। पूर्णाहुति के बाद प्रसाद वितरण, कन्या भोज आदि अपनी सामर्थ्य अनुरूप उत्तम हैं। जो उपरोक्त अनुष्ठान न कर सकते हों वे 24 गायत्री चालीसा पाठ करके 2400 गायत्री मंत्र लिखकर भी सरल अनुष्ठान कर सकते हैं। इसके साथ पाँच प्रतिबन्ध अनिवार्य नहीं है। परन्तु ब्रह्मचर्य आदि नियम जितने कुछ पालन किए जा सके उतना ही लाभ अधिक होगा।
शक्ति पर्व के इस पावन अवसर पर किया गया साधनात्मक पुरुषार्थ, हमारे आत्मोत्कर्ष की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। अवतरित शक्ति का एक अंश उस ज्ञान को सक्रियता में बदल सकता है जो शक्ति के अभाव में भारी बोझ बना रहता है। इस शक्ति का एक अंश उस भात्ति के लिए ईंधन का काम कर सकता है जो शक्ति के अभाव में कोरी भावुकता बनकर रह जाती है। इस शक्ति का एक अंश उस श्रद्धा को निष्ठा में बदलकर इसकी सार्थकता सिद्ध कर सकता है जो शक्ति के अभाव में कुँठित होकर दम तोड़ती रहती है।
हीरक जयंती वर्ष के संदर्भ में विगत अंक के योग−साधना विशेषाँक में प्रथम कड़ी में गीता में योग की चर्चा कहाँ−कहाँ किस−किस रूप में हुई है, इसका विवरण दिया गया था। इसमें हमने गीता के प्रथम चार अध्यायों की ही चर्चा की थी। अब चौथे अध्याय के कुछ शेष प्रसंगों से लेकर अठारहवें अध्याय तक ‘गीता में योग‘ की चर्चा इस कड़ी में। आगामी माह से युगगीता—27 के साथ अगस्त 2001 के अंक के बाद प्रवाह को पाठकगण पढ़ सकेंगे।
श्री भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि कर्म करते हुए भी उनसे न बँधना सबसे बड़ा योग है। वे चौथे अध्याय के 22वें श्लोक में कहते हैं कि “जो बिना किसी प्रकार की इच्छा के प्राप्त हुए पदार्थों से संतुष्ट रहता है, ईर्ष्या का जिसमें अभाव होता है, हर्ष−शोक आदि द्वंद्वों से परे होता है तथा सिद्धि−असिद्धि में समान भाव बनाए रखता है, वही सच्चा कर्मयोगी है। उसे कर्म लिप्त नहीं करते। जो योगीजन अपनी समस्त इंद्रियों को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं, वे न केवल यज्ञ का मर्म जानते हैं, सच्चे साधक भी हैं (श्लोक 26 से 38 तक)। यही नहीं नियमित आहार करने वाले प्राण और अपान की गति को रोक कर प्राणों को प्राणों में ही हवन करने वाले योगी तो इस महायज्ञ द्वारा पापों को भी नष्ट कर देते हैं (श्लोक 29, 30)।
योग विज्ञान का पाठ्य पुस्तिका : गीता
श्रीमद्भगवद्गीता बड़ा निराला ग्रंथ है। गागर में सागर समाए इस ग्रंथ में जितने गोते लगाए जाते हैं, उतने ही रत्न मिलते चले जाते हैं। योग विज्ञान की तो यह एक पाठ्य पुस्तिका है। यह पाठक पर निर्भर है कि वह किस सूत्र को इसमें से अपने ऊपर लागू करे व मात्र पठन−पाठन नहीं क्रियान्वयन की गहराई तक उतरे। इतना होने पर ही गीता का योग जीवन−योग बन पाता है। योग और यज्ञ का सार्थक समन्वय जो गीता में है, वह कहीं भी इतनी सुँदर काव्यात्मक अभिव्यक्ति के रूप में नहीं मिलता। इसके लिए वे अगला संकेत देते हैं कि यदि यह ज्ञान तू पाना ही चाहता है, तो तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर भली−भाँति समझ, उनकी सेवा कर व निष्कपट सरल भाव से उनका उपदेश सुन (तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। श्लोक 34, अध्याय 4) एवं यही ज्ञानरूपी नौका तुझे आप समुद्र से तार पाएगी (श्लोक 36) । इंद्रियों में संयम रखकर, साधनापरायण होकर एवं अंदर श्रद्धा विकसित कर ही व्यक्ति ऐसे ज्ञान को प्राप्त होता है, जो उसे शाँति एवं भगवद्सत्ता से एकाकार कराती है (श्लोक 59)। कर्मयोग में ज्ञान एवं ज्ञानयोग में कर्म का निराला समन्वय इन श्लोकों में हुआ है।
योगी की भोगों में रुचि नहीं होती
आगे भगवान् पाँचवें कर्मसंन्यासयोग नामक अध्याय में कहते हैं कि कर्मयोग और संन्यास एक ही समझे जाने चाहिए। अंतःकरण को वश में करके योगी नवद्वारों वाले शरीररूपी घर में सब कर्मों को मन से त्याग कर आनंदपूर्वक सच्चिदानंद परमात्मा के स्वरूप में ही सदैव स्थित रहता है। (श्लोक 13, अध्याय 5)। बाहर के विषयों के प्रति आसक्ति छोड़ जो साधक आत्मा में स्थित ध्यानजनित सात्विक आनंद की प्राप्ति का प्रयास करता है, वह निश्चित ही उस ‘अक्षय आनंद’ की अनुभूति भी करता है (श्लोक 21, अध्याय 5)।” न तेषु रमते बुधः” के माध्यम से इसके अगले श्लोक में भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि योगी की भोगों में रुचि नहीं होती, क्योंकि वह जानता है कि ये दुःख के ही हेतु हैं। अतः बुद्धिमान−विवेकी पुरुष उनमें अपना मन नहीं लगाता। सचमुच यही तो सभी प्रकार से योग−साधना की सफलता की कुँजी है। इसी अध्याय में भगवान् ध्यानस्थ होने की विधि भी बताते हैं। वे कहते हैं कि “बाहर के विषय−भोगों का चिंतन न करते हुए उन्हें बाहर ही रख (मन में न आने देकर) नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके, जिसकी इंद्रियाँ, मन व बुद्धि जीत ली गई हैं, ऐसा मोक्ष की इच्छा रखने वाला योगी इच्छा, भय और क्रोध से रहित होकर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है अर्थात् मुक्त हो जाता है (श्लोक 27, 28 अध्याय 5)। यह एक प्रकार से ध्यान की विधि भी है, अंतः त्राटक की क्रियापद्धति भी तथा अंतर्गुहा में प्रवेश करने का मार्गदर्शन भी। इससे सुँदर योग का शिक्षण और क्या हो सकता है।
जीवन कला से ध्यान योग तक
जीवन जीने की कला ही योग है। इसके लिए व्यक्ति को सबसे पहले अपने मन को जीतना सीखना होगा। ‘आत्मसंयम योग‘ नामक छठे अध्याय में भगवान् इसी कारण एक पते की बात कहते हैं—
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
“योगी को चाहिए कि अपने द्वारा ही संसार समुद्र से अपना उद्धार करे, अपने को अधोगति में न डाले। यह मनुष्य स्वयं ही तो अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।” अपने विचारों पर नियंत्रण कर जो न इंद्रियों के भोगों में, न कर्मों की आसक्ति में रुचि रखे, सदैव श्रेष्ठ चिंतन कर अपने आत्मविकास के लिए अपना पथ प्रशस्त करता चले, ऐसा व्यक्ति ही सही अर्थों में योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार योगी है। भगवान् 13, 14 श्लोक में ध्यानयोग की क्रियापद्धति पुनः अर्जुन को सिखाते हैं। वे कहते हैं कि “योगी को काया, सिर और गले को समान एवं अचल रखते हुए, स्थिर शरीर रखकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखकर, ब्रह्मचर्य में स्थित होकर, बिना किसी भय के, शाँत अंतःकरण के साथ परमात्मा में मन लगाना चाहिए। ऐसे योगी को परमानंद की पराकाष्ठारूपी चिरस्थाई शाँति मिलती है।”
चंचल मन को साधें कैसे
योग किसका सध पाता है? भगवान् अगले श्लोकों में कहते हैं कि उन्हीं को यह सिद्धि मिल पाती है, जो न बहुत खाते हैं, न बिलकुल कम खाते, न बहुत शयन करते हैं, न ही सदा जागते रहते हैं, अर्थात् यथायोग्य आहार−विहार एवं नियमित दिनचर्या का पालन करते हैं (श्लोक 16, 17)। जब ध्यान सही लग जाता है, तो उसका पता कैसे चले? भगवान् कहते हैं कि “जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसे ही परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी का जीता हुआ चित्त जरा भी विचलित नहीं होता। (श्लोक 19), ध्यान से बुद्धि शुद्ध होती है एवं परमात्मा का साक्षात्कार भी होता है (श्लोक 20)। मन तो चंचल है। सहज ही भागेगा। भगवान् कहते हैं, “जिन विषयों में यह चंचल अस्थिर मन विचरता है उन विषयों से उसे हटाकर बार−बार परमात्मा में ही नियोजित करें, निरुद्ध करें।” (श्लोक 26)। इसी अध्याय में अर्जुन की शंका उभरकर आती है “चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्” यह मन बड़ा चंचल, जबर्दस्त स्वभाव वाला एवं दृढ़ है। इसे वश में करना तो वायु को रोकने के समान कठिन लग रहा है (श्लोक 34-अध्याय 6)। भगवान् कहते हैं—यह अभ्यास एवं वैराग्य के भाव के विकास से ही वश में आएगा। प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करते रहने से पिछले अनेक जन्मों के संस्कार बल से संसिद्ध होकर पापरहित हो परमगति को प्राप्त कराता है, ऐसा है यह योग (श्लोक 45)। इतना कहकर वे कहते हैं कि योगी तपस्वियों से भी श्रेष्ठ है, शास्त्र ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है तथा सकाम कर्म करने वालों की तुलना में योगी श्रेष्ठ है, इसलिए उसे योगी ही बनना चाहिए। (श्लोक 46)। तस्माद्योगी भवार्जुन के साथ समर्पण का संदेश देकर भगवान् का यह संदेश छठे अध्याय के आत्मसंयम योग के रूप में समाप्त हो जाता है।
पाठकगण ‘युगगीता’ की प्राथमिक भूमिका के पृष्ठो के माध्यम से जानते हैं कि गीता के प्रथम छह अध्याय कर्मयोग प्रधान हैं, अगले छह अध्याय भक्तियोग प्रधान तथा अंतिम छह अध्याय ज्ञानयोग प्रधान हैं। योग—गीता के श्लोकों में, सभी अध्यायों में भावरूप में समाया है। फिर भी क्रियापक्ष की चर्चा छठे अध्याय के बाद कम है। योगी बनने के लिए क्या कुछ जरूरी है, सही योग भावभूमि में कैसे सध पाता है, सच्चा ज्ञानी बनकर कैसे परमात्मा में स्वयं को लय किया जाए, यह बात स्थान−स्थान पर आई है। उसी क्रम में आगे चलते हैं।
मनुष्याणाँ सहस्रेषु
भगवान् ‘ज्ञान−विज्ञान योग‘ नामक सातवें अध्याय में कहते हैं, “अर्जुन! तू अनन्य प्रेम में भरकर, मुझमें आसक्ति रखकर मेरे परायण होकर, योग में लीन होकर, मेरे विभूतिवान स्वरूप को, जो गुणों से अभिपूरित है, बिना किसी प्रकार के संशय के जानने का प्रयास कर।” (प्रथम श्लोक) “हजारों मनुष्य जो जन्म लेते हैं, उनमें से कुछ ही मुझे प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। उन यत्न करने वाले योगियों में से भी कोई एक ही मेरे परायण होकर मुझे तत्त्व से यथार्थ रूप में जान पाता है।” (श्लोक 3, अध्याय 7) अब यह जानना जरूरी है कि भगवान् को तत्त्व से कैसे जाना जाए। भगवान् के सही स्वरूप को कैसे समझा जाए। जानने के बाद ही तो आत्मतत्त्व (माइक्रोकाँसमाँस) का परमात्मतत्त्व (मैक्रोकाँसमाँस) में विलय हो पाएगा। यह जानकारी देने के लिए ही वे बताते हैं कि उनकी परा−अपरा प्रकृति में कहाँ−कहाँ मौजूदगी है। चार प्रकार के भक्त वे बताते हैं। अर्थार्थी (साँसारिक पदार्थों के लिए भजन करने वाले), आर्त (संकट निवारण के लिए भजन करने वाले), जिज्ञासु (परमात्मा को तत्त्वरूप में जानने की इच्छा से भजन करने वाले) तथा ज्ञानी। ऐसे में भगवान को प्रेमभक्ति रखने वाला ज्ञानी ही अति उत्तम जान पड़ता है (श्लोक 16, 17)। फिर भी वे कहते हैं, “मेरे भक्त चाहे जैसे अंत में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।”
‘मद्भक्ता यान्ति मामपि’ (श्लोक 23)। भगवान् इस अध्याय के शेष तथा आठवें अध्याय में अपने परमधाम की तथा उनमें दत्तचित्त हुए योगी की गति, पुनर्जन्म आदि की चर्चा करते हैं।
योगक्षेमं वहाम्यहम्
अन्यान्य मन से मुक्त होकर भगवान् का भजन, इनके नाम और गुणों का कीर्तन तथा उन्हीं में ध्यानयुक्त होकर अनन्य प्रेम से प्रभु की उपासना भी योग का एक साधन है, यह भगवान नवें अध्याय के 13-14 वें श्लोक में बताते हैं। “ऐसे अनन्य प्रेमी भक्तजनों को जो निष्काम भाव से भजन करते हैं, मैं स्वयं योगक्षेम प्राप्त करा देता हूँ।” यह आश्वासन प्रभु ने इसी अध्याय के 22वें श्लोक में दिया है। “पत्र, पुष्प, फल, जल जो भी कोई भक्त प्रेमभाव से अर्पित करता है, उसे भी वे प्रीति के साथ ग्रहण करते हैं।” यह भी उनकी घोषणा है (श्लोक 26)। कर्मबंधन से मुक्ति का एक ही उपाय है, जो कर्म करते हैं, खाते हैं, हवन करते हैं, दान देते हैं, तप करते हैं, वह सब उन्हीं प्रभु को अर्पित करें। (श्लोक 27)। ऐसा न होने पर तो व्यक्ति योनियों के चक्र में उलझता ही चला जाएगा। इसीलिए तो भगवत्परायण होकर योग में स्थित होना मुक्ति का मार्ग बताया गया है। भगवान् कहते हैं कि दुराचारी हो या कोई भी, यदि वह मेरी निष्काम भक्ति करता है, तो वह कभी नष्ट नहीं होता। (श्लोक 31)।
कालीऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
दसवें अध्याय (विभूति योग) में भगवान् अर्जुन को अपनी विभूतियों की जानकारी कराते हैं तथा फिर इतनी जिज्ञासा जगाकर ग्यारहवें अध्याय (विश्वरूप दर्शन योग) में दिव्य अलौकिक चक्षु प्रदान कर अपने विराट् रूप का, योगशक्ति का दिग्दर्शन करा देते हैं। “नमो नमस्तेऽस्तु सहस्त्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते” कहने वाला अर्जुन अति व्याकुल होकर कह उठता है कि” आप तो मुझे अपने चतुर्भुज विष्णु रूप में ही दर्शन कराइए।” अर्जुन के स्थिर चित्त को प्राप्त होने पर भगवान् कहते हैं कि सुदुर्दर्श अर्थात् बड़े दुर्लभ दर्शन वाला यह चतुर्भुज रूप मात्र अनन्य भक्ति के द्वारा देखा जा सकता है (श्लोक 53, 54)। बारहवाँ अध्याय (भक्तियोग) समर्पण की पराकाष्ठा तक अर्जुन को ले जाता है। भगवान् इसमें अपने भक्त से कहते हैं, “तू मुझ में ही में ही मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा। इसके उपराँत तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।” (श्लोक 8, अध्याय 12)। यही कुँजी है योग की। भगवान् में, आदर्शों में सत्प्रवृत्तियों में, मन व बुद्धि का नियोजित होना ही सच्च योग है। भगवान् कहते हैं कि “मुझमें अर्पण किए हुए मन−बुद्धि वाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है।” (श्लोक 14) बारहवाँ अध्याय भक्तियोग के सर्वोपरि उत्कर्ष तक किसी भी योगी को ले जाता है। बीस श्लोकों वाला यह अध्याय हर साधक, हर योगी के लिए विशिष्ट महत्त्व वाला एवं नित्य पठनीय है।
श्रेत्रज्ञ एवं गुणात्रय की व्याख्या
तेरहवें से अठारहवें अध्याय तक ज्ञानयोगप्रधान गीता का उपदेश है। इसमें भी स्थान−स्थान पर योग साधनाप्रधान प्रसंग आए हैं। पहले ही श्लोक में श्री भगवान् कहते हैं कि यह शरीर एक ‘क्षेत्र’ है, खेत है, इसको जा जानता है वह क्षेत्रज्ञ तथा इसके तत्त्वज्ञान को जानने वाले को ज्ञानी कहते हैं। (श्लोक 1, अध्याय 13)। आगे भगवान् ज्ञान की परिभाषा देते हैं तथा परब्रह्म की व्याख्या करते हैं (ज्योतिषामपि तज्जयोतिः)। क्षेत्र−क्षेत्रज्ञ विभाग योग की यह व्याख्या प्रकृति, परब्रह्म व उससे एकत्व की परिणति पर केंद्रित है। अगला चौदहवाँ अध्याय गुणात्रय विभाग योग है। इसमें सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण की व्याख्या है। कोई कैसे जाने कि उसमें योग−साधना द्वारा कुछ परिवर्तन हो रहे हैं, प्रगति हो रही है, इस निमित्त भगवान् श्रीकृष्ण अपने शिष्य से श्लोक 11 में कहते हैं कि “जिस समय इस देह में तथा अंतःकरण और इंद्रियों में चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है।” (श्लोक 11 अध्याय 14)। सत्त्वगुण से ज्ञान प्रात होता है एवं फल के रूप में सुख, परमशाँति एवं वैराग्य आदि की प्राप्ति होती है (16, 17 श्लोक)। योगसाधक निश्चित ही सतोगुण की कक्षा में उच्च स्थिति पर विराजमान होते हैं, ऐसा योगेश्वर का मानना है। भगवान् कहते हैं कि इन गुणों से परे जाकर गुणातीत भी बना जा सकता है, पर उसके लिए कर्त्तापन का अभिमान त्यागकर स्वयं को सच्चिदानंदघन परमात्मा में स्थापित करना होता है।
सच्चे योगी का क्या हो लक्ष्य
पंद्रहवाँ अध्याय पुरुषोत्तम योग है। संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष के माध्यम से यहाँ ज्ञान की जो व्याख्या की गई है, वह अपने में निराली है। ऊर्ध्व मूल वाले परमेश्वर के माध्यम से आरंभ इस वृक्ष की शाखा ब्रह्मरूप में अधोक्षेत्र में स्थित है तथा वेद इसके पत्ते हैं। इस वेद का तत्त्वज्ञान जिसे है, भगवान् कहते हैं—वह सच्चा योगी है। इस संसाररूपी पीपल वृक्ष की रचना को समझकर वैराग्यरूपी शास्त्र से अहंता, ममता, वासना, तृष्णा आदि मूलों को काटना ही सच्चे योगी का लक्ष्य होना चाहिए (श्लोक 1 से 4 तक)। वास्तव में आत्मतत्त्व को जानना ही योग की सर्वोच्च सिद्धि है। किंतु भगवान् के अनुसार इसके लिए अंतःकरण की शुद्धि अनिवार्य है (श्लोक 11)। अगला 16वाँ अध्याय है, दैवासुर संपद विभाग योग। इस अध्याय में भगवान् ने प्रथम श्लोक में ही “ज्ञान योग व्यवस्थितिः” कहकर दैवी संपदा के लक्षण बताए हैं। इसके आगे वे तीसरे अध्याय की तरह काम, क्रोध एवं लोभ को नरक के द्वार बताते हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले हैं तथा योगी को पथभ्रष्ट करने वाले हैं। (श्लोक 21)।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषः
अगला सत्रहवाँ अध्याय श्रद्धात्रय विभाग योग पर है। इसमें भगवान् तीसरे श्लोक में कहते हैं—
सत्त्वानुरुपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्द्धः स एव सः॥
“हे भारत! सभी व्यक्तियों की श्रद्धा उनके अंतः करण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।” इसकी विस्तार से व्याख्या की जाए, तो योगदर्शन का एक अति महत्त्वपूर्ण प्रसंग उजागर होता है कि जो व्यक्ति जैसा अपने विषय में चिंतन करता है, वह वैसा ही बनता चला जाता है, इसके व्यक्तित्व का निर्धारण उसकी स्वयं के प्रति दृष्टि के अनुसार तथा विधेयात्मक−निषेधात्मक चिंतन के अनुसार होता है। इसी अध्याय में भगवान् योगी का आहार भी वर्णित करते हैं
आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा ह्द्या आहाराः सात्विकप्रियाः।
अर्थात् आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय ऐसे आहार अर्थात् भोज्य पदार्थ सात्विक साधक को प्रिय होते हैं अर्थात् योगी का यही आहार होना चाहिए। आगे भगवान कहते हैं कि योगी को मन संबंधी तप का भी पालन करना चाहिए। मन सदैव प्रसन्न हो, शाँत रहे उसका भगवत् चिंतन में नियोजन हो, मन का निग्रह होता रहे तथा अंतः करण के भाव पवित्र बने रहें (श्लोक 16)। भगवान् अंतिम श्लोक (28) में कहते हैं कि बिना श्रद्धा के किया गया कोई भी कार्य असत् है, न वह इस लोक में लाभदायक है, न मरने के बाद ही।
सात्विक धारणा शक्ति
अंतिम अठारहवाँ अध्याय है—मोक्ष संन्यासयोग। पूरी गीता सुनने के बाद इसी में अर्जुन अंत में (73 वें श्लोक) कह बैठते हैं कि इतना सब श्रवण करने के बाद मेरा मोह नष्ट हो गया व मैंने स्मृति प्राप्त कर ली। अब मैं बिना किसी संशय के आपकी आज्ञा का पालन करूंगा। इस अध्याय में यज्ञ, दान, तप आदि के कई प्रकारों की व्याख्या के बाद 33वें श्लोक में भगवान् ने कहा है—
धृत्या यया धारयते मनः प्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्याः धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
अर्थात् “हे पार्थ! जिस दोषरहित अव्यभिचारिणी धारण शक्ति से मनुष्य ध्यानयोग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्विकी है।” भगवान् जिसे अव्यभिचारिणी धृति कह रहे हैं, उसका आशय है, भगवान के सिवाय अन्य साँसारिक दोषों पर विचार एवं उन विषयों को धारण करना व्यभिचार दोष है। जो उस दोष से रहित है, वह अव्यभिचारिणी धारणा है। भगवान् सात्विक सुख भी उसे कहते हैं, जिसमें व्यक्ति भगवान् के भजन, ध्यान, सेवादि में रमण करता है। विवेकशील दूरदर्शी उसी सुख की तलाश में रहते हैं, ऐसा भगवान् का मत है। (श्लोक 36, 37) अंतःकरण के निग्रह करने, इंद्रियों का दमन कर सतत परमात्मा की अनुभूति करने वाले को भगवान् ब्राह्मण कहते हैं (श्लोक 42)।
योगी के लक्षण
श्लोक 51-53 में योग की पराकाष्ठा की पहचान हेतु भगवान् कुछ लक्षण बताते हैं, “विशुद्ध बुद्धि वाला, हलका सात्विक भोजन नियमित करने वाला, एकाँत, शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्विक धृति द्वारा अंतःकरण व इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वशीभूत कर लेने वाला, राग−द्वेष को सर्वथा नष्ट करके दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहं−−बल−काम−क्रोध−परिग्रह का त्याग कर निरंतर ध्यानयोग में लीन रहने वाला, ममता से दूर और परमशाँति से युक्त पुरुष सच्चिदानंद ब्रह्म में अभिन्न भाव से विराजमान होता है।”
कितनी सुँदर व विशद व्याख्या है एवं योग की फलश्रुतियों की पावन चर्चा है। परमेश्वर की शरण में ही जाने से परमशाँति मिलेगी, यह गीताकार का मत है। (श्लोक 62) एवं यही योग का लक्ष्य भी है। न प्रवचन से, न बहुत अध्ययन से, न ज्ञान से बल्कि परमात्मा को तत्त्व से समझकर आत्मसात् कर उनमें स्वयं को लय कर देना ही योग है एवं यही श्रीमद्भगवद्गीता का सबसे बड़ा व अनुपम संदेश है। इसी कारण वे कहते हैं,
सर्वधर्मान्परितयज्य मामेंकं शरणं व्रज। अहंत त्वा सर्वपापेभ्यों मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
तू संपूर्ण कर्त्तव्य−कर्मों को त्याग कर मुझमें उन्हें अर्पित कर के वल एक मुझ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।” (श्लोक 66)।
इतना सुनने के बाद अर्जुन ही नहीं, किसी भी संशय युक्त योगपथ पर चलने वाले के सभी संदेह, संताप दूर हो जाते हैं एवं एक ही वाणी गुँजित होती है—
करिष्ये वचनं तव! करिष्ये वचनं तव॥
अधिक मास बीत चला। नवरात्रि की बेला है। इसी संधिवेला में प्रायः आरोग्य विशेषज्ञ जीवन−शैली बदल लेने की सलाह देते हैं। आहार−विहार, खान−पान, अपने आस−पास के परिसर की सफाई से लेकर सभी पक्षों पर ध्यान देने को कहा जाता है। ज्यों ही नवदुर्गा समीप आती हैं, चारों ओर सात्विक हो जाता है। अंतरंग का परिशोधन प्रकृति स्वयं कराने लगती है। जैसे ही नवरात्रि बीतती हैं, दशहरा व फिर दीपावली सारे घर के कूड़े−कबाड़े की सफाई की बारी लेकर आती है। कोई घर में सफेदी कराता है, तो कोई वर्ष भर की गंदगी को बुहार कर लक्ष्मी को घर में आमंत्रित करने की क्रिया करता दिखाई पड़ता है। यह सारी प्रकृति की दिनचर्या ठंडक आने तक चलती है एवं फिर स्वास्थ−संवर्द्धन के लिए सही अवधि भी आ जाती है।
पाठकगण जब ये पंक्तियाँ पढ़ रहे हैं, वे समझ रहे होंगे कि नवरात्रि से लेकर शरद एवं शिशिर तक के मौसम का वर्णन किया जा रहा है। नहीं, इतना मात्र नहीं है। यहाँ हम गुरुसत्ता द्वारा लिखा एक पत्र, जो 28 अक्टूबर, 1943 को उनके द्वारा श्री धर्मपाल सिंह (अलीगढ़) को प्रेषित किया गया, उद्धृत कर रहे हैं। कैसे उपर्युक्त अनुशासन की अवज्ञा किसी को भी व्याधिग्रस्त बना सकती है, बनती रहती है व इस समय विशेष का कितना महत्त्व है, यह इसे पढ़कर समझा जा सकता है। पत्र है—
“हमारे आत्मस्वरूप,
टिकटों सहित आपका पत्र मिला। वृत्त जाना। बीमारी का इन दिनों देशव्यापी प्रकोप है। गैस और बारूदों ने जो वायुमंडल दूषित कर दिया है, उसकी पीढ़ी मनुष्यजाति को सहन करनी पड़ रही है। इधर भी बुखार बड़े जोरों से है। ऐसा मालूम पड़ता है कि बाणासुर ने शंकर के गण ज्वरों को पूर्वकाल में जिस उग्र रूप में फैलाकर सृष्टि का संहार किया था, उसकी पुनरावृत्ति हो रही हो। हम लोग बहुत ही संयम और सादगी से जीवन बिताने वाले हैं, पर पंद्रह दिन से सारा परिवार चारपाइयाँ तोड़ रहा है, हम स्वयं भी नहीं बच सके। बुखार तो चला गया, पर कमजोरी बेहद है। आप लोगों को बीमारी ने बहुत कष्ट दिया। अब ईश्वर की कृपा से आप लोग स्वस्थ रहते हैं, यह संतोश की बात है।”
पत्र की भाषा कितनी सरल है। बीमार धर्मपाल जी भी थे। तो उन्हें दिलासा दी कि तुम्हारा क्या हमारा भी इन दिनों यही हाल है। अपनी बीमारी की स्वीकारोक्ति एवं बड़ा प्यारा वर्णन किस तरह वायरल बुखार या मलेरिया फैलाता है, इसमें आया है। द्वितीय विश्वयुद्ध की वेला थी, तो वायुमंडल दूषण का भी जिक्र है। नवरात्रि की पूर्व बेला की कहीं चर्चा नहीं है, पर वर्णन उन्हीं दिनों (अठारह अक्टूबर से पूर्व का) का है। यह पत्रलेखन एक दिलासा देता है कि बीमारी किसी को भी जकड़ सकती है एवं दुर्बल बना सकती है। जरूरी है, तो उसके प्रति निज का दृष्टिकोण। एक आध्यात्मिक पुरुष के नाते गुरुवत् पूछी गई राय का उत्तर मित्रवत् दिया गया है। यही सबसे बड़ी विशेषता है परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी की कि एक साधारण−सा पत्र उनके व्यक्तित्व के कई बहुआयामी पक्षों को खोल देता है। इसी पत्र में आगे वे एक मार्के की बात कहते हैं।
“आप उलझन और कठिनाइयों में भी धैर्य को पकड़े रहें। दिन नहीं रहा तो रात भी न रहेगी। ईश्वर सब मंगल करते हैं। अमंगल में भी मंगल की भावना करने से मन को एक अद्भुत शक्ति प्राप्त होती है।”
इन पंक्तियों को पढ़ें जीवन जीने की कला का शिक्षण लें। हम सब इन्हीं दैनंदिन जीवन की उलझनों में उलझकर ही तो अपने जीवन को अस्त−व्यस्त कर लेते हैं। हमारी गुरुसत्ता अपने सार्वजनिक आध्यात्मिक जीवन की बहुत ही पूर्व की आज से भी प्रायः साठ वर्ष पूर्व की अवधि में जो बहुमूल्य परामर्श देती है, वह आपके लिए, हमारे लिए, सबके लिए है, सर्वकालीन है।
परिजन इन पत्रों के माध्यम से पूज्यवर के साथ इतना घुल−मिल जाते थे कि मन की सभी बातें खोलकर रख दिया करते थे। विशेष रूप से साधना क्षेत्र में मार्गदर्शन लेने के लिए वे निरंतर पत्र डालते एवं आश्चर्यजनक ढंग से उन्हें हर पत्र का जवाब भी मिलता। ऐसा ही पत्र एक अनाम साधक को 11/8/1850 का लिखा यहाँ हम दे रहे हैं।
आपका पत्र मिला। साधना क्षेत्र में हमारे सहचर होने के कारण आप अब इतने घनिष्ठ आत्मीय हो गए हैं कि जब आपका पत्र आता है, तो मिलने के समान प्रसन्नता होती है। आप तपस्या की पूँजी एकत्रित करने में उतनी ही तत्परता एवं उत्साहशीलता रखें जितनी कि लोभी लोग धन जोड़ने में रखते हैं। समय ही बतायेगा कि करोड़पति बनने का स्वप्न देखने वाले सही रहा पर हैं या आप। पिछले जन्मों के शुभ संस्कारों का भंडार आपके पास इतना अधिक एकत्रित है कि आप अपना उत्साह और प्रयत्न इसी प्रकार जारी रखें, तो विश्वासपूर्वक यह कहा जा सकता है कि आप इसी जन्म में जीवन−लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे। आवश्यकता केवल दृढ़ता की है। आपको हमारी सेवा−सहायता सदा उसी प्रकार प्राप्त होती रहेगी जैसी कि छोटे भाई को बड़े भाई की या पुत्र को पिता की प्राप्त होती है।”
पत्र की भाषा पर थोड़ा गहराई से ध्यान दें वह इन शब्दों पर चिंतन करें। आज हम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की रेलम−पेल में जी रहे हैं। हर किसी के मन में आज के उस उपभोक्तावादी जीवन में अधिक और अधिक पाने की कामना है। सारी अंधी नकल पश्चिम की हो रही है एवं हमारे घर में बैठा एक ‘बुद्धबाक्स’ हमें ललचाता रहता है। यहाँ पूज्यवर अपने अभिन्न मित्र, शिष्य, प्रिय सखा को बता रहे हैं कि तपस्या हेतु, योग−साधना हेतु किया जा रहा पुरुषार्थ उसी लगन से भरा होना चाहिए, जैसा कि मनुष्य धन जोड़ने या करोड़पति बनने के लिए करता है। पैसा कमाकर करोड़पति बनने वाले तो दिवास्वप्न ही देखते हैं, पर सही राह पर वही चल रहा है, जो अंतर्जगत् का पुरुषार्थ कर रहा है। ज्ञान की निधि हमारे चिरसंचित
संस्कारों का फल हमें देती है। उसकी जानकारी गुरु को होती है कि वह किसके पास कितना है। यहाँ पूज्यवर अपने साधक−शिष्य को बोध करा रहे हैं कि यदि वे लगनपूर्वक लगे रहें, उसी तीव्रता व ललक के साथ, जो कोई क्या, हर कोई अमीर बनने के लिए करता है, तो वे जीवनलक्ष्य, बंधनमुक्ति, मोक्ष इसी जीवन में प्राप्त कर लेंगे। मित्रो, पाठको! आप−हम भी इसी निधि को लेकर जन्में हैं। उस अंतर्विभूति को पहचानना एवं उसे निरंतर बढ़ाते रहने का प्रयास करना हम सभी का परम ध्येय होना चाहिए। यदि इस पत्र की इस भाषा को हम अपने पर लागू करें, तो क्या कुछ प्रेरणा हमें नहीं मिल सकती?
कभी−कभी गुरुसत्ता के पास ऐसे पत्र भी आते थे, जिसमें पत्र न मिलने के उलाहने होते थे। कई−कई लोग तो टी.डी. एस. (चिकित्सा की भाषा में एक शब्द−दिन में तीन बार) पत्र डाल देते थे व अपेक्षा रखते थे कि उन सबका जवाब मिले। जवाब आता, पर चार−पाँच का एक साथ। नौ जुलाई 1951 को श्रीमोहनराज भंडारी के पत्र को इसी परिप्रेक्ष्य में पढ़ें।
“चि. मोहनदास स्नेह
तुम्हारा पत्र मिला। संभवतः अब आयु की दृष्टि से तुम बड़े हो गए होगे, पर जब मथुरा आए थे। तब छोटे थे। हमारे मस्तिष्क में तुम्हारा वही चित्र सदा रहता है। नंद के लिए कृष्ण सदा बालक ही थे। हमें अपने घर के बालकों की ही तरह सदा लगते रहते हो। चिट्ठी−पत्री आने−जाने में कभी देर−सबेर हो जाए, तो ऐसा नहीं समझना चाहिए कि पं. जी का स्नेह या स्मरण कुछ कम हो गया है। काम का झंझट बहुत रहता है, इसलिए प्रायः आगत पत्रों का उत्तर ही जा पाता है। अपनी ओर से पत्र तो कभी ही शायद किसी को लिख पाते हैं। तुम अपनी ओर से पहल करके पत्र व्यवहार का क्रम चला दिया करो।”
जिन्हें जानना हो कि मिशन कैसे बीज से वट वृक्ष बना, उन्हें पत्र पढ़ना चाहिए। जिन्हें यह पता लगाने की इच्छा हो कि गायत्री परिवार इतना विशाल कैसे बना तो उन्हें इस पत्र में छिपे मर्म को जानना चाहिए। यही वह आत्मीयता थी, स्नेह की निधि थी, अपनत्व था जिसने यह संगठन खड़ा किया।
यही नहीं संगठन के लिए कभी मृदु होना पड़ता है, तो कभी प्रशासक की तरह कठोर भी। 5 दिसंबर 1966 को बालाघाट के श्री प्यारेलाल श्रीवास्तव को लिखा एक पत्र यही बताता है।
“यज्ञ आयोजन का आपका विचार उत्तम है। छोटे आयोजन देशभर में हो रहे हैं, होने भी चाहिए, पर सबमें हमारा पहुँचना आवश्यक नहीं। इन दिनों हम शास्त्रों के अनुवाद, देशव्यापी संगठन एवं अपनी विशेष तप−साधना में संलग्न हैं। हमें तभी बुलाना चाहिए जब कोई विशेष कारण हो। साधारण प्रचार के लिए हमारा दुर्बल स्वास्थ्य सर्वथा अनुपयुक्त है।”
पत्र की भाषा स्वयं में बताती है कि संगठन निर्माता को कभी कठोर भी होना पड़ सकता है। आत्मीयता की दुहाई देकर कोई भावनात्मक शोषण करें एवं अपनी ही बात मनवाने पर तुल जाए, यह ठीक नहीं। ये पत्र हमारे लिए शिक्षण का कार्य करते हैं एवं सभी को बताते हैं कि संगठन का आधार न केवल प्यार−अपनत्व है, पर अनुशासन भी है। यही तो वह बात है, जो हमारी गुरुसत्ता को औरों से निराली बनाती है।
तितली और मधुमक्खी दोनों एक फूल पर आकर बैठती। दोनों झगड़ने लगीं कि फूल पर मेरा अधिकार है।
फैसला फूल ने सुनाया। उसने मधुमक्खी के पक्ष में निर्णय दिया और कहा, “बैठने का श्रम सार्थक करती है और दूसरों के लिए शहद निकालती है। इसलिए इसी का अधिकार है।”
राजा पर्यंक सिंहासन दूसरों को सौंपकर ब्रह्म की खोज में चल पड़े। सत्संग किए और ध्यान मगन में लगे रहे। सुना−समझा तो बहुत, पर गले न उतरा और अतृप्ति निराशा की ओर बढ़ती गई।
खिन्न मन पर्याक तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। एक दिन बहुत थके थे, भूखे भी। किसी किसान के खलिहान में जा पहुँचे और थके−माँदे पेड़ की छाया में सुस्ताने लगे।
किसान थके− माँदे पथिक को देखकर काम छोड़कर उसके समीप पहुँचा।किसान समझ गया कि वह थका हुअा और भूखा है। उसने चावल निकाला, हाँडी में डाला और आग पर रखते हुए कहा, “उठो इसे पकाओ, पक जाए, तब कहना।”
राजा से मंत्र−मुग्ध की तरह वैसा ही किया। भात पक गया, तो किसान को बुलाया। दोनों ने भरपेट खाया। किसान काम में लग गया और राजा को गहरी नींद आ गई।
स्वप्न में देखा कि एक दिव्य पुरुष सामने खड़े हैं और कह रहे हैं, “मैं कर्म हूँ, मेरा आश्रय लिए बिना किसी को शाँति नहीं मिलती। तुम परमार्थ−पुरुषार्थ में लगो और लक्ष्य तक पहुँचो।”
नींद खुलने पर राजा ने अपनी कार्यपद्धति बदली। अब वे ज्ञानवर्षा कम करते और सेवा−पुरुषार्थ में अधिक संलग्न रहते।
देव संस्कृति महाविद्यालय का शुभारंभ
शांतिकुंज हरिद्वार के गायत्री कुँज परिसर में देव संस्कृति महाविद्यालय विधिवत् 16 अगस्त से आरंभ हो गया है। प्रारंभ में इसमें दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान, पुरातत्त्व, प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति तथा योग में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम का शिक्षण आरंभ किया गया है। समाज विज्ञान के लिए भी मान्यता का प्रयास चल रहा है। प्रथम चार विषयों में मान्यता प्राप्त हो हेमवतीनंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर से महाविद्यालय संबद्ध हो गया है। कुल अस्सी छात्र−छात्राओं को इसमें प्रवेश दिया गया है। भविष्य में इसी महाविद्यालय को डीम्ड यूनिवर्सिटी की मान्यता मिल जाएगी, जहाँ नालंदा−तक्षशिला की तरह देवालय प्रबंधन, औषधालय प्रबंधन, विद्यालय प्रबंधन तथा ग्राम प्रबंधन एवं समस्त भाषाओं, धर्मों का शिक्षण चलेगा।
वीडियो पत्रिका सेवा आरंभ
शाँतिकुँज से वीडियो पत्रिका आरंभ की जा रही है, ताकि दृश्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से युग संदेश जन−जन तक प्रज्ञा अभियान ‘पाक्षिक’ की तरह हर पंद्रह दिन में प्रसारित किया जा सके। इसमें देश−विदेश में चल रही गतिविधियों, प्रेरणादायी क्रियाकलापों के समाचार, शाँतिकुँज समाचार, गुरुसत्ता का संदेश, विभूतियों से साक्षात्कार एवं मिशन के गौरवशाली इतिहास का दिग्दर्शन कराया जाएगा। प्रायः एक घंटे के प्रसारण की सामग्री हर पंद्रह दिन में वी. एच. एफ. कैसेट या वीडियो सीडी द्वारा नियमित भेजी जाएगी। केवल आपरेटर्स से चर्चा कर इसे पूरे शहर या मोहल्ले में भी दिखाया जा सकता है। परिजन इसमें अपने क्षेत्र के समाचार भी वीडियो पर रिकार्ड कर या फोटो द्वारा भेज सकते हैं। परिजन ई. एम. डी. विभाग से संपर्क कर लें।
सीधी डी. टी. सी. बस सेवा शाँतिकुँज के लिए
दिल्ली ट्राँसपोर्ट कार्पोरेशन ने दिल्ली से शाँतिकुँज व वापसी के लिए एक सीधी बस सेवा आरंभ की है। यह बस प्रतिदिन दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे के प्लेटफार्म क्र. 39 से दोपहर 3 बजे चलकर रात्रि 10 बजे शाँतिकुँज पहुँचती है। रात्रि में यह यहीं रुकती है। प्रायः 7, 15 पर यहाँ से चलकर सीधे दिल्ली प्रस्थान करती है। परिजन इस सेवा का लाभ ले, रात्रि साधना का आनंद आश्रम में उठा सकते हैं।
विशिष्ट ग्रंथ का विमोचन
गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर ‘ऋषि चिंतन के सान्निध्य में ‘नामक ग्रंथ का विमोचन गायत्री तपोभूमि मथुरा के व्यवस्थापक पं. श्री लीलापत शर्मा जी के द्वारा किया गया। चार सौ पृष्ठ की यह ग्रंथ 1940 से 1966 तक की ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से लिए गए पूज्यवर के विचारों का संकलन है। दो सौ रुपये मूल्य की यह पुस्तक मँगाई जा सकती है एवं घर में स्थापित की जा सकती है।
फावड़वाहिनी, आपात् देववाहिनी
गाँवों में गंदगी का निवारण, जल व भू−संरक्षण हेतु केंद्र द्वारा आपदा विलेज फावड़ा फोर्स गठित करने की कार्ययोजना बनाई गई है। आपदाग्रस्त क्षेत्रों में राहत तुरंत पहुँचाने के लिए भी एक आपदा सेवावाहिनी गठित किए जाने की रूपरेखा बनी है। रचनात्मक प्रकोष्ठ शाँतिकुँज से विस्तृत जानकारी लें।
मलयाली, कन्नड़ प्रशिक्षण प्रारंभ
3 सितंबर 2001 से शाँतिकुँज में ‘सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज’ () मैसूर के तत्वाधान में मलयाली एवं कन्नड़ भाषा का त्रैमासिक प्रशिक्षण प्रारंभ हो गया है, जो तीन दिसंबर तक चलेगा। इसमें निष्णात विशेषज्ञों द्वारा बोलचाल एवं लिखने योग्य भाषा का प्रशिक्षण दिया जाता है। बाद में पत्राचार पाठ्यक्रम से और भी विशेषज्ञता उपलब्ध की जा सकती है। तमिल एवं तेलुगु भाषा का प्रशिक्षण गतवर्ष दिसंबर से आरंभ होकर इस वर्ष फरवरी में समाप्त हुआ था। उत्तर व दक्षिण को मिलाने का अद्भुत कार्य मानस गंगोत्री मैसूर एवं इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री शाँतिकुँज द्वारा हो रहा है।
तिरूपति महायज्ञ दिसंबर में
दक्षिण भारत के चारों प्राँतों के सम्मिलित प्रयासों से अब 23 से 27 दिसंबर 2001 की तारीखों में तिरूपति देवस्थानम् के सहयोग से एक 251 कुँडी विराट् गायत्री महायज्ञ एवं संस्कार महोत्सव संपन्न होने जा रहा है। इस विराट् महाकुँभ में उत्तर व दक्षिण भारत का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। हीरक जयंती वर्ष के इस अनुपम कार्यक्रम में तेलुगु, तमिल कन्नड़ मलयाली, संस्कृत, हिंदी व आँग्ल भाषा का अभिनव समन्वय परिजन देख सकेंगे। 23 दिसंबर को कलशयात्रा एवं 24, 25, 26 दिसंबर को देवपूजन एवं यज्ञ, दीपयज्ञ तथा 27 दिसंबर को महापूर्णाहुति होगी। परिजन संगठन प्रकोष्ठ से विस्तृत जानकारी मँगा लें।
ग्रामीण दिल्ली में अपना केंद्र झटीकरा
नजफगढ़−गुड़गाँव मार्ग पर स्थित इस्टीकरा गाँव में एक शिवालय सहित आश्रम जो चार हजार वर्ग गज की परिधि में फैला है, कामा पार्क उत्तमनगर नई दिल्ली के श्री महेंद्र शर्मा व उनकी पत्नी के सौजन्य से शाँतिकुँज को दान में प्राप्त हो गया है। यहाँ सारी व्यवस्था केंद्र की ओर से रहेगी। नियमित साधना व स्वावलंबन प्रशिक्षण भी चलेंगे। अभी आस−पास के प्रायः दो सौ गाँवों को जोड़ने के लिए 27 से 30 नवंबर 2001 की तारीखों में एक विराट् 108 कुँडी गायत्री महायज्ञ यहाँ आयोजित किया जा रहा है। विस्तृत जानकारी दिल्ली कार्यालय 0116917361 दूरभाष या संगठन प्रकोष्ठ शाँतिकुँज से लें।
अंतः भूमि का परिमार्जन इस स्तर का जहाँ दिव्य विभूतियों का अवतरण हो सके, वे स्थिर रूप से निवास कर सकें तथा समर्थ मार्गदर्शन की उपलब्धि, यह दो अनुदान जिस किसी को भी प्राप्त होते हैं, वे आत्मिक प्रगति के पथ पर सुनिश्चित गति से सफलतापूर्वक चल पड़ते हैं। परमपूज्य गुरुदेव को दोनों ही उपलब्धियाँ मिली एवं वे तप के आधार पर एक विराट् संगठन खड़ा कर सके।
अपनी एकवर्षीय हिमालय साधना में बीच में विराम लेकर परमपूज्य गुरुदेव फरवरी 1972 में एकाएक कुछ दिनों के लिए शांतिकुंज हरिद्वार वापस लौटे एवं परिजनों ने अप्रैल 1972 की ‘अखण्ड ज्योति’ के संपादकीय में पढ़ा ‘गुरुदेव क्यों आए? क्यों चले गए?’ तब उन्हें विदित हुआ कि हमारी गुरुसत्ता की यह साधना और उसके लीला उपक्रम के पीछे छिपे गूढ़ रहस्य क्या हैं! परमवंदनीया माताजी की वेदना पूज्यवर से देखी नहीं गई। बिना तार के, संदेश के परावाणी से भेजी पाती उन तक पहुँची एवं उनके हृदयावरोध के कष्ट के दौरान वे शाँतिकुँज कुछ दिनों के लिए आ गए। कई विषयों पर उन्होंने परमवंदनीया माताजी से चर्चा की, जो अपने आराध्य के आते ही स्वस्थ हो गई थी। परिजनों को जिज्ञासा थी, क्योंकि पूज्यवर पुनः वापस चले भी गए थे कि क्या−क्या निर्देश वे दे गए हैं। इसी को दृष्टिगत रख मई 1972 का पूरा अंक इसी को समर्पित हो प्रकाशित हुआ कि इस संक्षिप्त−सी अवधि में क्या−क्या निर्धारण हुआ।
प्राण−प्रत्यावर्तन सत्रों की वह निराली शृंखला
इस मई अंक में यह महत्त्वपूर्ण निर्धारण प्रस्तुत किया गया कि अब शाँतिकुँज से अनुदान वितरण, शक्ति हस्ताँतरण, प्राण−प्रत्यावर्तन का क्रम आरंभ होगा। प्रत्यावर्तन शब्द तब नया था। कई उसका अर्थ भी नहीं जानते थे। इसी मई अंक में समझाया गया कि अपनी शक्ति को दूसरे में सीधे प्रविष्ट करा देने की प्रक्रिया ही वस्तुतः प्रत्यावर्तन है। लोगों ने उसे पढ़ लिया, इसकी व्याख्या समझ ली, पर जब उनके पास जुलाई 1972 की अखण्ड ज्योति पहुँची व उसमें उनने ‘अपनों से अपनी बात’ के रूप में पढ़ा। “प्रत्यावर्तन की पात्रता विकसित की जाए” तब उन्हें गंभीरता समझ में आई। यह भी जानकारी मिली कि गुरुदेव बीच−बीच में आते रहेंगे एवं अब कुछ विशिष्ट होने जा रहा है। उसमें परमवंदनीय माता जी ने लिखा कि “युगनिर्माण अभियान यों एक आँदोलन सरीखा दिखता है, पर वस्तुतः वह युग−साधना है। यदि आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो उसे विशुद्ध योग−साधना एवं तपश्चर्या ही कहा जा सकता है। बड़े आदमी बनने की फसल चली गई। अब अमीरी को बड़प्पन के रूप में देखना बेकार है। अब समय महानता की गौरवगरिमा बढ़ने का आ गया है। इसे कार्यरूप में परिणत कैसे किया जाए, उसी का मार्गदर्शन युग−साधना करती है। प्रत्यावर्तन की पात्रता और पृष्ठभूमि यही है।” (पृष्ठ 63-64)
प्रस्तुत भूमिका इसीलिए दी जा रही है कि हमारे आज के परिजन युग−साधना को, इस हीरक जयंती वर्ष में चल रहे साधना आँदोलन को तथा शाँतिकुँज के इतिहास के एक मील के पत्थर को आज अट्ठाइस वर्ष बाद पुनः समझ सकें, आज की आवश्यकता से अवगत हो सकें कि वैसी ही इसी स्तर की पुनरावृत्ति की आवश्यकता क्यों आ पड़ी है। मई 1973 की अखण्ड ज्योति में प्राण−प्रत्यावर्तन साधना की सत्र−शृंखला का विस्तृत विवरण छपा तथा जून 1973 का पूरा अंक प्राण−प्रत्यावर्तन−साधना विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ। यह साधना निताँत मौन एकाकी साधना थी। चार दिनों में प्रतिदिन छह घंटे की साधना सभी से कराई गई। साधक अंतर्मुखी हो सकें, इसके लिए उन्हें छोटी कोठरियाँ सुलभ कराई गई। उपासनापद्धति में शिथिलीकरण मुद्रा, उन्मनी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, गायत्री जप, सोऽहम् साधना, बिंदुयोग, लययोग, तत्त्वबोध, नादयोग, दो बार के दस साधनाक्रमों का समावेश किया गया। अंतः करण की भावभूमिका को उच्चस्तरीय बना देना ही इसका प्रधान लक्ष्य था। आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया को प्रथम दिन महत्वपूर्ण स्थान दिया गया, जिसे पूज्यवर स्वयं व्यक्तिगत परामर्श के लिए मिले 15 मिनट के समय में संपन्न करते थे। बीच में दर्पण−साधना के दौरान भावभरे गीत टेपरिकॉर्डर से साधकों को सुनाए जाते थे तथा इन्हें सुनकर वे हलके ही नहीं होते, आत्मबोध की साधना भी कर पाते थे। एक घंटे का प्रवचन दो खंडों में सुनाया जाता था। इस समग्र दस सूत्री साधनापद्धति से भरा शिक्षण यद्यपि कुछ साधक (तीस से चालीस अधिकतम) पूरे शाँतिकुँज में रहकर करते रहे, पर जिनने भी इसमें भागीदारी की, वे आज तक अपना सौभाग्य सराहते हैं, उन दिनों की याद करते हैं। उन दिनों शाँतिकुँज छोटा था, पर्यटकों को आने की सख्त मनाही थी एवं कमरे भी गिने−चुने थे। सारा वातावरण साधनामय था। कुछ माह यह क्रम चलने के बाद सौभाग्यशाली एक हजार प्राणवान साधकों को प्राण अनुदान वितरण करने के बाद अन्य अनेक प्रकार के सत्र यहाँ चलने लगे, भवन का विस्तार होता चला गया एवं आज की इस स्थिति में आ पाया, जहाँ हम शाँतिकुँज का एक विराट् विस्तार देखते हैं।
नए निर्धारण—अंतः ऊर्जा जागरण सत्र
अब इस हीरक जयंती वर्ष में पुनः साधना आँदोलन को गतिशील करने के लिए उसी स्तर की क्रियाप्रणाली अपनाने हेतु विशिष्ट ‘अंतः ऊर्जा जागरण सत्रों’ की एक शृंखला 26 अक्टूबर 2001 नवरात्रि समापन के अगले दिन से आरंभ की जा रही है। ये शिविर पाँच दिवसीय होंगे एवं लक्ष्य एक ही होगा कि इसमें भागीदारी करने वाले प्राणवान−विभूतिवान बनकर समाज के लिए उपयोगी बन सकें, नवयुग की वेला में सच्चे साधक बनकर नेतृत्व कर सकें। सही अर्थों में अगले दिनों वे ही मार्गदर्शक कहलाएँगे, लोग उनकी ही सुनेंगे, जो सबसे पहले साधक होंगे। इसी उद्देश्य से प्राण−प्रत्यावर्तन स्तर की यह साधना अंतः ऊर्जा जागरण के पाँच−पाँच दिवसीय सत्रों के रूप में आरंभ की जा रही है। कुल उपलब्ध कक्ष 70 हैं, जिन्हें इस साधना के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। प्रत्येक में एक साधक अकेले रह सकेंगे। इनमें स्पीकर लगाए गए हैं। प्रज्ञापेय, सात्विक आहार आदि की व्यवस्था भी प्रत्येक के कक्ष में ही की जा रही है। कुल 72 कक्षों की (जिनमें शौच−स्नान आदि की सुविधा अलग से कमरों के साथ ही है। त्रिपदा की नवनिर्मित इस पूरी बिल्डिंग को साधनामय वातावरण दिया जाएगा। दो कक्ष केयर टेकर्स, समस्याएँ आने पर संदेशवाहक के रूप में वरिष्ठ बंधुओं तक चिट्ठी पहुँचाने एवं साहित्य, पूजन सामग्री आदि के लिए सुरक्षित रखे गए हैं।
मत्स्यावतार की तरह विराट् रूप ले रहे इस मिशन गायत्री परिवार के कई परिजन ऐसी साधना में भागीदारी करना चाहेंगे। हम 26 अक्टूबर से आरंभ कर 10 अप्रैल 2002 तक मात्र तैंतीस सत्र 5-5 दिन के चला पाएँगे। इस बीच 17 फरवरी 2002 के वसंत पर्व के कारण संभव है एक शिविर स्थगित भी करना पड़े। किंतु नियमित रूप से नवंबर, दिसंबर (2001), जनवरी, फरवरी, मार्च (2002) में 1 से 5, 3 से 10, 11 से 15, 16 से 20, 21 से 25, 26, से 30 की अवधि में दो ही सत्र हो पाएँगे। चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल से आरंभ हो जाएगी। इस प्रकार तैंतीस हुए तो कुल 2310 एवं बत्तीस सत्र (वसंत के वैकल्पिक अवकाश के कारण) हुए तो कुल 2240 साधक ही भागीदारी कर पाएँगे। शेष सभी सत्र 1 से 1, 11 से 19, 21 से 29 के नौ दिवसीय संजीवनी साधना सत्र, 1 से 29 की अवधि में चलने वाले एक मास के युगशिल्पी कार्यकर्त्ता सत्र, परिव्राजक सत्र, रचनात्मक प्रशिक्षण सत्र, विशिष्ट व्यक्तित्व परिष्कार सत्र यथावत् चलते रहेंगे, इसलिए स्थान वृद्धि की कोई गुँजाइश नहीं है। यही क्रम 2002 की आश्विन नवरात्रि के बाद 16 अक्टूबर से आरंभ कर 2003 की 31 मार्च तक चलाएँगे। इसमें भी तैंतीस या बत्तीस (6 फरवरी 2003 की बसंत पंचमी के कारण) सत्र ही हो पाएँगे। यह शृंखला आगामी चार वर्ष तक चलती रहेगी एवं दस हजार से अधिक प्राणवान कार्यकर्त्ताओं को प्राणवान−ऊर्जावान बनाती रहेगी। संभव है तब स्थान और अधिक बढ़ जाए, संख्या बढ़ाई भी जा सकती है।
अपेक्षाकृत गंभीर साधना उपक्रम है यह
स्थान सीमित, संख्या निर्धारित एवं पूरे पाँच दिन निताँत मौन, यह क्रम बनने पर विशेष निरीक्षण, जाँच−पड़ताल के बाद ही सत्रों में प्रवेश दिया जा रहा है। 16 अगस्त 2001 के पाक्षिक में परिजन विस्तार से पढ़ चुके होंगे कि इन सत्रों का क्रम व दिनचर्या आदि क्या होगी? प्रस्तुत शिविर उच्चस्तरीय सूक्ष्मशक्ति−प्रवाह से साधकों को जोड़ने एवं उनके अंदर की आध्यात्मिक ऊर्जा को जगाने के लिए आयोजित किए जा रहे हैं। आत्मशक्ति परिष्कृत होगी, तो ही वह शक्ति−प्रवाह उनके अंदर अवतरित हो सकेगा। इसीलिए अपेक्षाकृत गंभीर साधनात्मक अभ्यास इसमें रखे गए हैं। यहाँ साधकों को प्रायश्चित कर्म अपनी ही भाव−भूमिका में करना है। साक्षी सूक्ष्म रूप में विराजमान गुरुसत्ता को बनाना है। अपनी पापकर्मों का लेखा−जोखा प्राण प्रत्यावर्तन की तरह लिखकर नहीं देना है। परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी स्तर की दिव्य शक्तिमान सत्ता ही उन्हें झेल पाती थी। शाँतिकुँज एक जाग्रत् चैतन्य तीर्थ है, लाल मशाल हम सबकी मार्गदर्शिका है, संघ शक्ति के हम प्रवर्त्तक हैं। अतः कोई भी इन सत्रों को पूर्व के प्राण−प्रत्यावर्तन सत्रों से न जोड़े। प्रेरणा उन सत्रों से अवश्य ली गई है, पर अनुशासन अपने स्तर पर आज की परिस्थितियों के अनुरूप बनाए गए हैं।
विशिष्ट सत्रों के कड़े अनुशासन
सभी साधक जिन्हें पूरी जाँच के बाद स्वीकृति भेजी जाएगी, प्रत्यक्ष साक्षात्कार में उपयुक्त पाया जाएगा, निर्धारित सत्र की पूर्व संध्या में पहुँचकर अपना स्थान ले लेंगे, विधिवत साधना संकल्प प्रातः 5 से 6.30 कराया जाएगा, ताकि रात्रि देर से आने वाले भी भागीदारी कर सकें। जो पूर्व संध्या को आ जाएँगे, वे आवश्यक सामग्री प्राप्त करेंगे, साधना निर्देश पुस्तिका पढ़ेंगे, पंजीयन कराएँगे एवं अपने निर्धारित कक्ष में पहुँच जाएँगे। साधना प्रारंभ होने से समापन तक साधकों को मौन, एकाँत सेवन करते हुए अंतर्मुखी रहना होगा। मात्र अखण्ड दीपक−दर्शन एवं यज्ञ के समय वे कक्ष के बाहर निकल सकेंगे। साधना−स्वाध्याय हेतु निर्धारित पुस्तकें ही दी जाएँगी। शेष समय अंतः चेतना की गहराइयों में उतरने एवं अंतर्मुखी गहन चिंतन−मनन हेतु लगाना होगा। पढ़ने के लिए पूरी साधनावधि तक समाचार पत्र, अन्य कोई साहित्य उपलब्ध नहीं होगा। भोजन, गंगाजल एवं प्रज्ञापेय साधना कक्षा में ही दोनों समय पहुँचा दिए जाएँगे। भोजन में हविष्यान्न की एक रोटी, औषधियों की चटनी एवं साधक की इच्छानुसार चावल या दलिया की सब्जी मिश्रित खिचड़ी दी जाएगी। अन्य कोई पदार्थ सेवन नहीं कर सकेंगे। जप की संख्या पर कोई प्रतिबंध न होगा। संख्या की जगह सामूहिक ध्यान सहित उसकी गहराई और बढ़ाने, भावविह्वल होकर जप करने पर अधिक जोर दिया जाएगा।
लगभग छह घंटे विशिष्ट साधनाओं में, दो समय के 30-30 मिनट के प्रवचन में तथा 30-30 मिनट के इसी विषय पर मनन−चिंतन में लगेंगे। औसत दो घंटे स्वाध्याय−मनन−चिंतन हेतु होंगे। साधक अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को लिख सकेंगे। बाद में इस आधार पर परामर्श एवं जिज्ञासा−समाधान भी पत्र द्वारा प्राप्त कर सकेंगे। समापन पर वे युगधर्म के परिपालन के क्रम में अपने अंदर उभरे संकल्प भी लिखकर देंगे। इनका भी विधिवत संकल्प कराया जाएगा। साधना समाप्ति के बाद कुछ ही घंटों में स्थान खाली कर देना होगा, ताकि वह अगले सत्र के साधकों को उपलब्ध कराया जा सके। रुकना अनिवार्य हो तो पूर्व अनुमति लेकर आश्रम में कहीं और स्थान प्राप्त कर सकेंगे। वे अपने साथ किसी ऐसे साथी को भी नहीं लाएँगे, जिसे अलग न ठहराया जा सके या उसकी देखभाल की चिंता अलग न ठहराया जा सके या उसकी देखभाल की चिंता करनी पड़े। गंभीर व्याधि से पीड़ित कोई परिजन आवेदन न भेजें। जो साधक निर्धारित अनुशासन न निभा सकें, अकेले अपने कार्य स्वयं न कर सकें तथा एक कक्ष में अकेले न रह सकें, वे आवेदन न करें।
आवेदन कैसे भेजें
आवेदन पत्र में अपना नाम, पूरा पता, फोन नंबर आदि, जन्मतिथि, शिक्षा एवं योग्यता, दीक्षा कब−कहाँ ली, उपासना−साधना का नियमित क्रम, शाँतिकुँज, गायत्री तपोभूमि मथुरा में किए गए सत्र (सभी का स्मृति के अनुसार विवरण), अपने स्तर पर किए गए अनुष्ठान, समयदान एवं अंशदान का क्रम तथा समयदान के अंतर्गत किए गए उल्लेखनीय सप्त आँदोलनपरक या अन्य कोई सेवाकार्यों का विवरण लिख भेजें। साथ ही एक वर्तमान समय का पासपोर्ट साइज का फोटो भी भेजें। अनुमति मिलने पर ही आएँ।
समय विभाजन चक्र ऐसे होगा
प्रातः चार बजे जागरण के साथ ऊषापान का क्रम है। साउंड सिस्टम से कक्ष में ही यह व्यवस्था है। 4.05 से 4.15 आत्मबोध की साधना कैसेट द्वारा होती है 4.15 से 5.15 नित्य कर्म, व्यायाम, शिथिलीकरण निर्देशानुसार हलके वाद्य संगीत के साथ संपन्न होगा।
5.15 से 5.45 सामूहिक ध्यान पूज्यवर की वाणी में सभी अपने−अपने कक्ष में करेंगे। 5.45 से 6.00 प्राणसंचार प्राणायाम एवं 6 से 6.30 अमृतवाणी के साथ मनन−चिंतन का क्रम है।
6.30 से 7.00 कल्कसेवन कक्ष में एवं फिर पंक्तिबद्ध होकर मौन रहकर अखण्ड दीप दर्शन, पृथक यज्ञशाला में यज्ञ तथा फिर कक्ष में प्रज्ञापेय का क्रम है। मार्गदर्शक साथ रहेंगे।
8 से 8.45 मंत्र जप, सूर्यार्घदान, 8.45 से 9.30 सोऽहम् साधना तथा 9.30 से 10.00 नादयोग साधना का क्रम है। निर्देश कक्ष में ही मिलेंगे।
10 से 12 भोजन, विश्राम, कक्ष की स्वच्छता के लिए निर्धारित है। इस बीच वाद्य संगीत बजता रहेगा।
12 से 12.45 स्वाध्याय, मनन−चिंतन, 12.45 से अनुलोम−विलोम प्राणायाम, 13 से 13.30 जपयोग तथा 13.30 से 14.00 बिंदु योग अंतः त्राटक (दीपक की ज्योति) हेतु निर्धारित है।
14 से 14-45 आत्मदेव दर्पण साधना, 14.45 से 15.15 नादयोग की द्वितीय चरण की साधना के लिए है। 15.15 से 16.00 प्रज्ञापेय का अवकाश है, जो कक्ष में ही उपलब्ध होगा।
16 से 17 स्वच्छता−स्वाध्याय का क्रम रहेगा। अपना कक्ष साफ करेंगे, संगीत चलता रहेगा। 17 से 17.15 नाड़ी शोधन प्राणायाम 17.15 से 17.30 अमृतवाणी एवं 17.30 से 18 खेचरी मुद्रा का क्रम चलेगा।
12.00 से 19.15 से पुनः नादयोग की तृतीय चरण की साधना होगी। 18.15 से 19.00 भोजन के लिए सुरक्षित है। 19.00 से 19.30 सहज लयबद्ध श्वास−प्रश्वास का क्रम होगा।
19.30 से 20.15 स्वाध्याय, मनन−चिंतन हेतु रखा गया है तथा 20.15 से 20.50 तत्त्वबोध साधना (निर्देशों द्वारा) संपन्न होकर साधकों को योगनिद्रा एवं विश्राम में चले जाना है।
इसमें मात्र पहले दिन कल्पसेवन के पूर्व साधना संकल्प कराया जाना है। 8 से 8.30 जप, सूर्यार्घ्य तथा 8.30 से 9.00 निष्कासन तप अंतः की भावभूमिका में संपन्न होना है। 9 से 9.30 सोऽहम् साधना के बाद शेष क्रम यथावत् रहेगा। दूसरे, तीसरे व चौथे दिन निर्धारित क्रम वही रहेगा, जो ऊपर दिया गया। पाँचवें दिन प्रातः 8 से 10 समापन गोष्ठी आत्मप्रेरित संकल्पों का क्रम होगा। 10 से भोजन के बाद 12 से 1.00 के क्रम में परमवंदनीया माताजी के कक्ष में श्रद्धेय शैल जीजी से मिलेंगे। अपराह्न 1.30 पर साधना कक्ष खाली कर देंगे। इसी दिन अगले सत्र के साधक आएँगे, अतः स्वच्छ स्थिति में छोड़ेंगे।
समझा जाना चाहिए कि इन विशिष्ट सत्रों के फलितार्थ कितने विशेष परिणाम वाले होंगे। आशा की जाती है कि ढेरों प्राणवान साधक ऊर्जा का जागरण कर जाएँगे एवं अपने क्षेत्र को सेवा−साधना को आलोकित करेंगे।
खा गया है बहुत से इतिहास−पृष्ठों को अहं। और काले कर गया है, कई पृष्ठों को अहं॥
अन्यथा इतिहास को मिलते मनीषी और भी। त्याग के इतिहास को मिलते दधीची और भी। दे गया, कुछ रक्त प्यासे−क्रूर दुष्टों को अहं॥
पृष्ठ गौतम और गाँधी के न फिर से जुड़ सके। शिवा, राणा और भामाशाह फिर कब मिल सके। दे गया जयचंद्र, मानसिंह से निकृष्टों को अहं॥
हुए श्रद्धानंद, भगतसिंह फिर न पैदा राष्ट्र में। लक्ष्मी, दुर्गा, कमलापति सी वीरभद्रा राष्ट्र में। कर गया पैदा विलासी कई धृष्टों को अहं॥
राष्ट्र पुरोहित आदि शंकर, दयानंद से फिर नहीं। रुक गया क्यों, राष्ट्र जाग्रत बनाने का क्रम कहीं। जनक है पाखंडियों का और भ्रष्टों का अहं॥
अन्यथा इतिहास ही कुछ और होता राष्ट्र का ब्रह्मवर्चस, छात्रबल सिरमौर होता राष्ट्र का। कर गया चट, त्याग, तप, उत्सर्ग रिश्तों को अहं॥
व्यक्तिगत सारा अहं अब हो समर्पित राष्ट्र को। चंद्रगुप्त चाणक्य का हो युग्म अर्पित राष्ट्र को। राष्ट्रहित में गल, गला दे सब अनिष्टों को अहं॥
—मंगल विजय (विजयवर्गीय)
*समाप्त*