महायोगी परम पूज्य गुरुदेव की अवतार लीला योग का परम प्रमाण है। उनकी जीवन कथा के प्रत्येक पृष्ठ में योग की दुर्लभ एवं रहस्यमयी साधनाएँ प्रकट व जीवन्त हुई हैं। पन्द्रह वर्ष की आयु में अपने मार्गदर्शक से प्रथम मिलन के पश्चात् महाप्रयाण दिवस तक उनकी प्रत्येक श्वास योग साधना के लिए समर्पित रही। वसन्त पंचमी 1926 ई. से गायत्री जयंती 1990 ई. तक उनके जीवन का हर वर्ष, हर माह, हर दिन और हर क्षण योग में बीता।
इस योग से अनुभूतियों एवं उपलब्धियों की जो अमृत वर्षा हुई, उसने केवल उन्हें ही नहीं, बल्कि उनकी अन्तरात्मा से जुड़े समस्त परिकर को छुआ, अभिसिंचित किया। लाखों-लाख जन कृतार्थ और कृतकृत्य हुए। इन कृतार्थ होने वालों में आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी सभी रहे। सभी को उसकी पात्रता के अनुसार सुफल मिला। परन्तु एक सत्य को सभी ने अनुभव किया, कि महायोगी भगवत् सत्ता का जीवन्त विग्रह होता है। भगवान् उसमें स्वयं विराजते हैं और उसके चिन्तन, चरित्र व व्यवहार के माध्यम से हर पल प्रकट होते हैं।
महायोगी की सत्ता देह तक सिमटी नहीं रहती। देह तो बस इतना बताती है कि जिसकी सुगन्ध चहुँ ओर बिखर रही है, वह पुष्प यहीं जन्मा। योग का यह पुष्प अविनश्वर है और तदनुसार उसकी सुगन्ध भी अविनाशी है। तभी तो महायोगी गुरुदेव ने अपने शिष्यों को चेताया- हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े। हमारे योग की तरह हमारा मिलन भी शाश्वत है।
उन्होंने अपने सभी परिजनों, शिष्यों के सामने स्वयं अपना उदाहरण देते हुए कहा- सतत् योग साधना करते हुए अपनी पात्रता विकसित करो। चिन्तन से ज्ञानयोगी बनो, चरित्र से भक्तियोगी और व्यवहार से कर्मयोगी। फिर तुम पर भी वैसी ही अनुभूतियों एवं उपलब्धियों की वर्षा होगी, जैसे कि मुझ पर हुई है। उनके इस अनुशासन को मानकर योग साधना में लगे हुए शिष्य समुदाय के लिए उनका एक ही आश्वासन है- ‘न में भक्तः प्रणश्यति’ मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता।
देवात्मा हिमालय की गहन उपत्यिकाओं में वैदिक ऋचाओं की गूँज के साथ ही योग की पुण्य परम्परा प्रारम्भ हुई। सभ्यता की पहली किरण के साथ ही मानवीय जीवन में योग का प्रकाश फैला। मननशील मानव ने अपने अस्तित्व की शुरुआत में ही यह अनुभव कर लिया था कि उसके जीवन में एक छोर पर यदि अनेकों सीमाएँ हैं, तो दूसरे छोर पर असीम और अनन्त सम्भावनाएँ भी हैं। जिन्हें स्वयं को परिशोधित कर, परमात्मा के विराट् अस्तित्व से अपने को मिलाकर ही साकार किया जा सकता है। आत्म परिशोधन और विराट् पुरुष से मिलन की यह प्रक्रिया ही योग है। प्राचीन ऋषियों की अपूर्व अंतर्दृष्टि, प्रतिभा एवं ज्ञान का मूल इसी में निहित रहा है।
योग की महत्ता एवं इसमें बतायी गयी प्रक्रियाओं का वर्णन श्रुति, स्मृति व पुराणों में पर्याप्त रूप से मिलता है। ऋग्वैदिक काल को भारतीय संस्कृति के साथ समस्त मानव जाति का उद्गम समय माना जाता है। इस विषय पर इतने शोध अध्ययन हो चुके हैं कि अब इस तथ्य को अनिवार्य रूप से सच मान लिया गया है। इस प्राचीनतम समय में ऋग्वैदिक संहिता का जो प्रणयन हुआ, उसमें भी योगाभ्यास सूचक मंत्र बहुलता से उपलब्ध होते हैं। आज भी ऋग्वेद के 10/114/4, 1/50/10, 3/52/10 एवं 10/177/1 मन्त्रों का अवलोकन कर इस सच्चाई को अनुभव किया जा सकता है। अथर्ववेद के कतिपय मंत्र, 10/2/31-32, 10/8/83 आदि भी इसी को प्रमाणित करते हैं।
वेदों की ही भाँति ब्राह्मणों एवं आरण्यकों में भी योग सम्बद्ध वर्णनों की कमी नहीं है। ऐतरेय आरण्यक- 2/17, 3/1, 3/4, 3/6; तैत्तिरीय आरण्यक- 2/2, 2/7, 2/9; शतपथ ब्राह्मण- 1/4/4/7, 14/3/2/3; तैत्तिरीय ब्राह्मण- 3/10/8/6, 1/2/6 आदि स्थलों पर योग की गहन प्रक्रियाओं का साँकेतिक वर्णन मिलता है। वैसे श्वेताश्वेतर उपनिषद् तो योग विद्या का प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता है। इन संहिताओं और उपनिषदों के अतिरिक्त पुरातत्त्व साक्ष्यों से भी योग की पुण्य परम्परा का प्राचीन होना सिद्ध होता है। मोहन जोदड़ो की खुदाई में मिली योगमुद्रावस्थित मूर्तियाँ इसका मुखर प्रमाण है।
वैदिक गोमुख से प्रवाहित हुई योग की यह पुण्य परम्परा महाभारत, भागवत पुराण, विष्णु पुराण, ब्राह्मण पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति एवं योग वशिष्ठ आदि ग्रन्थों में भी प्रवाहमान् हुई है। नारदीय शिक्षा आदि शिक्षा ग्रन्थों में भी योगमूलक विषय वर्णित है। शब्द विद्या मर्मज्ञों का योग नेतृत्व तो जगत्प्रसिद्ध है ही। वैयाकरण शब्द ब्रह्मोपासक होते हैं। अतः उनका योगी होना असन्दिग्ध है। समस्त योग साधन एकमात्र अपौरुषेय वेदों पर ही आधारित है। शैवागम के अंतर्गत तथा व्याकरण आगमों में भी वाग्योग अथवा शब्दयोग नामक योग प्रणाली का उल्लेख मिलता है। इस विद्या के गहन अध्येयता जानते हैं कि भर्तृहरि की ‘वाक्यपदीय’ की व्याख्या के अनुशीलन कर्त्ता वाग्योग से परिचित थे। व्याकृत शब्द की बैखरी दशा से मध्यमा पार करके पश्यन्ती दशा में आना इस योग का मुख्य उद्देश्य है। निरुक्त में भी यौगिक विषय स्पष्टतः स्वीकार किए गए हैं।
बौद्ध ग्रन्थों में योग का विशद् वर्णन उल्लेखनीय सच है। बौद्ध धर्म के मौलिक सिद्धान्त ‘धर्मचक्र प्रवर्तन सूत्र’ में हैं, जिनमें अष्टग योग (आर्य अट्ठगिक मार्ग) भी है। यहाँ तक कि प्राचीन बौद्ध ग्रन्थों में ‘पातंजल योग सूत्र’ का शब्दशः अनुकरण लक्षित होता है। महात्मा बुद्ध ने स्वयं योग में निर्देशित आसन, प्राणायाम आदि पूर्वक समाधि साधना की थी। जिनमें समाधि को उन्होंने मोक्ष के लिए सर्वोत्कृष्ट उपयोगी साधन माना। काम, क्रोध, भय, निद्रा एवं श्वास आदि का निरोध करके ध्यानावस्थित होना साँख्य-योग का साधन है। और भगवान् बुद्ध ने यही किया था।
जैन धर्म में भी योग साधना की पुण्य परम्परा सम्मानित हुई है। यहाँ योग में निर्देशित पाँच यम ही मुख्य साधन हैं। जिन्हें अणुव्रत कहा गया है। भगवान् महावीर स्वयं सिद्ध योगी थे। इतना ही नहीं कतिपय जैन ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर योग सूत्रों से शब्दशः साम्य है। हरिभद्र सूरिकृत ‘योगबिन्दु’ तथा यशोविजयकृत ‘अध्यात्म सार’ में पातंजल योग का स्पष्ट उल्लेख है। जैन ग्रन्थों में सम्यक्-चारित्र्य हेतु यम-नियम एवं ध्यान को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। यहाँ तक कि पातंजल योग में वर्णित अहिंसा से जैन सम्मत अहिंसा महाव्रत का स्वरूप बहुत अधिक मिलता है।
बौद्ध और जैन साधना पद्धतियों के अलावा भारतीय षड्दर्शनों में भी योग की पुण्य परम्परा को महत्त्वपूर्ण माना गया है। न्यायदर्शन के अनुसार षोडश-पदार्थों द्वारा सम्पूर्ण बाह्यांतर का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेना ही तत्त्वज्ञान है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार छः पदार्थों द्वारा तत्त्व निर्धारण होता है। इन दोनों ही दर्शनों में आत्मा एवं परमात्मा के अस्तित्व, प्रमाण एवं लक्षण सिद्धि के अनन्तर न केवल आत्म प्रत्यक्ष हेतु, अपितु अतीन्द्रिय जड़ पदार्थों के स्वरूप साक्षात्कार हेतु योग की आवश्यकता स्वीकार की गई है। यही नहीं योग की साधना के लिए इन दोनों ही दर्शनों- न्याय (4/2/42) एवं वैशेषिक (8/1/12-14) में प्रेरित-प्रोत्साहित भी किया गया है। इनमें न केवल यह कहा गया है कि समाधि के विशेष अभ्यास से तत्त्वज्ञान होता है, बल्कि यह भी बताया गया है कि मुक्त योगियों को समाधि के बिना भी अतीन्द्रिय द्रव्यों का साक्षात्कार होता है।
वेदान्त दर्शन में ज्ञान के आन्तरिक साधन के रूप में योग सम्मत यम-नियम आदि का विधान बताया गया है। यद्यपि उनके लक्षणों में थोड़ी भिन्नता अवश्य है। मीमाँसा तथा वेदान्त को उत्तर मीमाँसा कहते हैं। मीमाँसा दर्शन में यद्यपि कर्मकाण्ड का ही विशद् विवेचन हुआ है, अतएव इसमें योग की चर्चा स्पष्ट रीति से नहीं हो पायी है। लेकिन इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि मीमाँसकों को योग की महत्ता स्वीकार नहीं है। अग्निहोत्र दर्शपूर्णमासादि यज्ञों का अन्तर्योग से गहन सम्बन्ध है। हालाँकि यह सम्बन्ध गुरु परम्परा से ही ज्ञेय है। शास्त्रकारों के अनुसार पूर्व मीमाँसा के सूत्रकार जैमिनि महान्योगी थे। वेदान्त के ब्रह्मसूत्र में भी उनके मत का उल्लेख किया गया है। वैसे भी पूर्व मीमाँसा एवं उत्तर मीमाँसा के आत्मज्ञान सम्बन्धी तथ्यों में विशेष भिन्नता नहीं है।
वस्तुतः साधना चाहे किसी भी ढंग से की जाय, जब तक दैहिक आसक्ति से छुटकारा नहीं होता, मन समाहित नहीं हो पाता। और मन के समाहित हुए बिना शुद्धात्मतत्त्व का स्फुरण सम्भव नहीं है। जिस किसी भी प्रकार मन समाहित हो, वही अवस्था समाधि है, योग है। यही कारण है कि ईश्वर प्राप्ति हेतु जितने भी कर्म गीता में बतलाए गए हैं उन सभी को योग नाम से अभिहित किया गया है।
इस क्रम में साँख्य एवं योग की घनिष्ठता तो स्वतःसिद्ध है ही। इनमें तत्त्वज्ञान या ज्ञानकाण्ड को साँख्य एवं उसके व्यवहार पक्ष को योग कहा गया है। गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित हठयोग भी वस्तुतः राजयोग का साधन मात्र है- ‘केवलं राजयोगाय हठयोगोऽपदिश्यते’। हठयोग के अतिरिक्त तंत्र साधना का केन्द्रीय तत्त्व योग ही है। हालाँकि इतना जरूर है कि तन्त्र में मुक्ति के स्वरूप में तथा कैवल्य के स्वरूप में थोड़ा भेद है। तान्त्रिक साधना के प्रवर्तक मुक्ति में शिव-शक्ति अथवा विष्णु-शक्ति आदि के नित्य मिलन एवं आनन्द रूपता को स्वीकार करते हैं। योग का स्वरूप कहीं भी किसी भी तरह वर्णित हो, परन्तु प्रायः ये सभी पातंजल-योग से ही निःसृत होते हैं।
योगसूत्रकार महर्षि पतंजलि कौन हैं? और कब हुए हैं, इस बारे में विद्वानों में पर्याप्त मत भिन्नता है। श्रीरामशंकर भट्टाचार्य ने अपने ग्रंथ ‘पातंजल योगदर्शनम्’ की भूमिका में पतञ्जलि नाम के दस शास्त्रकारों का उल्लेख किया है- 1. सामवेदीय पातंजल शाखा प्रवक्ता, 2. सामवेदीय निदान सूत्र प्रवक्ता, 3. योग सूत्रकार, 4. महाभाष्यकार, 5. चरक संहिता के प्रवक्ता, चरक व्याख्याता अथवा चरक वार्तिककार, 6. 3/44 व्यासभाष्यघृतद्रव्य लक्षणकार, 7. युक्ति दीपिका घृतपतंजलि नामक आचार्य, 8. लोहशास्त्रकार, 9. रसशास्त्रीय ग्रन्थविशेषकार, 10. वात स्कन्धादि वैद्यक के ग्रन्थकार।
इन दस में से योग सूत्रकार महर्षि पतंजलि को भट्टाचार्य महोदय ने आर्षकालिक पुरुष माना है। साथ ही यह भी लिखा है कि मत्स्य पुराण के ‘गोत्र प्रवर प्रकरण’ में अंगिरस को पतञ्जलि के रूप में स्मरण किया गया है। साम शाखा के प्रवक्ता के रूप में पतंजलि का नाम लिया जाता है। यही पतंजलि योग सूत्रकार भी हैं। जिन्होंने योग साधना की पुण्य परम्परा को जीवन्तता दी।
आधुनिक समय में योग साधना के इस पुण्य प्रवाह को भगवान् श्रीरामकृष्ण परमहंस एवं उनके शिष्य समुदाय में अग्रणी स्वामी विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द तथा महर्षि अरविन्द जैसे देवमानवों ने प्रवाहमान् किया है। बीसवीं सदी के मध्य पूर्व से सन् 1990 तक महायोगी परम पूज्य गुरुदेव की उपस्थिति ने योग साधना की परम्परा को उत्कृष्टता एवं उत्कर्ष प्रदान किया।
परम पूज्य गुरुदेव ने वैदिक युग से लेकर अब तक प्रचलित सभी साधनाओं को अपने जीवन की प्रयोगशाला में ‘दशकों’ की साधना से खरा प्रमाणित किया। साथ ही उन्होंने उनकी युगानुकूल वैज्ञानिक व्याख्या भी प्रस्तुत की है। अपने साधनामय जीवन के महाप्रयोग का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया- मानवीय जीवन के सभी प्रश्नों का सार्थक हल योग साधना में निहित है। इतना ही नहीं इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना योग की अनिवार्यता को स्वीकार कर ही किया जा सकता है।
इक्कीसवीं सदी की शुरुआत, एक नए युग का प्रारम्भ है। यह नया युग सम्भावनाओं का युग है। अनेकों सुखद सम्भावनाएँ हैं, जो साकार हो सकती हैं। और यदि ये साकार हो जायँ, तो मानव के उज्ज्वल भविष्य में कोई संशय नहीं पर ये साकार तभी होंगी, जब उन अवसरों का सदुपयोग किया जाय, जो समय ने हमें दिए हैं। सवाल यह है कि हम क्या करें? और कैसे करें? इन सवालों का सही और सटीक जवाब पाने के लिए हम सबको विगत सदी के अनुभवों से सीखना होगा।
उपलब्धियों की दृष्टि से बीसवीं सदी का कम महत्त्व नहीं है। विज्ञान ने अपना शैशव और तरुणाई इसी सदी में पायी है। धरती से लेकर अनन्त अन्तरिक्ष की यात्रा इसी सदी में पूरी हुई है। पर साथ ही दो महायुद्ध और सैकड़ों छोटे-मोटे युद्ध भी इसी सदी में लड़े गए हैं। सीधे-सादे, सरल-संयमी जीवन से उच्छृंखल-असंयमी और विक्षिप्त जीवन की दूरी भी इसी दौरान पूरी की गयी है। यही है वह विरासत जिसे लेकर हमने इक्कीसवीं सदी में अपने पाँव रखे हैं। जिसमें वायरस पीड़ित संचार क्रान्ति के साथ हिरोशिमा और नागासाकी की चीखें भी शामिल हैं। भविष्य निर्माण के लिए हम अतीत को भुला नहीं सकते। और न ही अतीत की भूलों का सुधार किए बगैर सार्थक भविष्य निर्माण सम्भव है।
अतीत की सबसे बड़ी भूल यही है कि मनुष्य ने स्वयं को खो दिया। जड़ पदार्थों के ढेर में मानवीय चेतना भी जड़ हो गयी। यह जड़ता ही तो है कि कोई एक नहीं बल्कि हम सभी स्तब्ध और निःस्तब्ध हैं। प्रणालियाँ बदली जाती हैं, तरीके बदले जाते हैं। प्रशासन और सरकारें बदली जाती है पर समस्याएँ नहीं बदलती। और तब तक बदलेगी भी नहीं, इनका समाधान भी तब तक नहीं होगा जब तक इन्सान स्वयं नहीं बदलता। वह फिर से अपने सत्य स्वरूप को खोज नहीं लेता। इक्कीसवीं सदी में हमने जिन साधनों के साथ प्रवेश किया है, उनके सदुपयोग के लिए साधना चाहिए। जी हाँ, योग साधना, जो इक्कीसवीं सदी में प्रत्येक मानव का अनिवार्य कर्त्तव्य बन गयी है। यही वह औषधि है, जिसके द्वारा समय की समस्त व्याधियों का निदान सम्भव है।
योग साधना से ही स्वयं को सही ढंग से जाना जा सकता है। और जब हम स्वयं को जान पाएँगे, तभी यह अनुभूति होगी कि हमारे लिए क्या उपयोगी है और क्या अनुपयोगी? हर युग के सन्तों, भक्तों एवं महापुरुषों ने अपने-अपने युग में इन्सान को इसके लिए चेताने की कोशिश की हैं। पर कभी उन्हें सुना गया, तो कभी अनसुना किया गया। पर अब बात कुछ और है। अब की स्थिति यह है कि सोने के लालची सेठ की भाँति हमने अपने सारे सम्बन्धियों, कुटुम्बियों, यहाँ तक कि स्वयं को भी सोने में बदल डाला है। अब तो योग साधना से ही उजड़ी हुई इन्सानी दुनिया फिर से बस सकती है।
योग साधना के तत्त्वदर्शन को जानकर ही मनुष्य स्वयं को पा सकता है। इसी के द्वारा उसे खोई हुई शान्ति मिल सकती है। योग साधना का नियमित अभ्यास मनुष्य को स्वास्थ्य, सौंदर्य, प्रतिभा, विद्या, हंसी, खुशी के ढेरों वरदान दे सकती है। शास्त्र वचन है- योगी के लिए कुछ असम्भव नहीं। तो आइए इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना को साकार करने के लिए योग साधना के तत्त्वदर्शन को हृदयंगम करें।
जीवन के गहन अध्ययन के बाद महर्षियों ने तत्त्वदर्शन की खोज की। अपने कठोर तप एवं कठिन साधनात्मक प्रयोगों के निष्कर्ष स्वरूप उन्होंने बताया कि व्यष्टि का समष्टि से संयोग हुए बिना शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती। वैयक्तिक चेतना के विराट् विश्व में विस्तीर्ण सत्-चित्-आनन्दमय चेतना में मिलने पर ही मनुष्य की अतृप्ति व अशान्ति का स्थायी अन्त हो सकता है। मानव जीवन का लक्ष्य भी यही है। इसे पाने के लिए निर्दिष्ट समस्त पद्धतियाँ योग का ही अंग हैं। क्योंकि योग का अर्थ ही है व्यष्टि का समष्टि से तादात्म्य, लघु का विभु, अणु का महत् और जीवात्मा का परमात्मा से पूरी तरह जुड़ जाना, सदा-सदा के लिए एक हो जाना।
कहने और लिखने में यह सब बहुत सरल लगता है, पर है अत्यन्त कठिन। कठोपनिषद् में भगवान् यम अपने शिष्य नचिकेता को इसकी कठिनाइयों को, योग साधना की दुरुहताओं को बार-बार समझाते हैं। बाजिश्रवा के पुत्र नचिकेता की योग जिज्ञासा देख, यमाचार्य ने उन्हें बार-बार समझाया-
देवैरपि विचिकित्सितं पुरा, न हि सुविज्ञेयमणुरेणु धर्मः अन्यं वरं नचिकेता वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्, - कठ. 1/21
नचिकेता इसके सम्बन्ध में तो देवता भी सन्देहग्रस्त हैं। योग-विज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म है। वह शीघ्र समझ में नहीं आता। तुम इस कठिनाई में मत पड़ो। कोई अन्य वरदान माँग लो।
लेकिन आत्मजयी नचिकेता अटल और दृढ़ रहा। उसने समस्त इन्द्रिय भोगों, साँसारिक सुखों के प्रति गहरी अनासक्ति जताई। नचिकेता की सच्ची जिज्ञासा से यम सन्तुष्ट हुए और उन्होंने कहा- ‘जो दृढ़ निश्चयी है, जिसमें कठिनाइयों से जूझने का साहस है, वही योगी हो सकता है।’
यम के इस कथन में ही योग के तत्त्वदर्शन को जानने-समझने की पात्रता छुपी है। इस पात्रता को अर्जित किए बिना योग पर कितना ही कुछ क्यों न कहा और सुना जाय, उसका कोई अर्थ नहीं। यह पात्रता का अभाव ही है कि योग विषय पर अनेकों राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों, पुस्तकों, प्रवचनों, लेखों के बावजूद व्यक्ति और समाज में योग चेतना लुप्त है। इस लुप्त और सुप्त योग चेतना को जगाना तभी सम्भव है, जब योग के तत्त्वदर्शन को गहराई से आत्मसात किया जाय।
योग साधना के तत्त्वदर्शन का प्रथम सूत्र है- संयम। संयम का अर्थ प्रायः दमन से लिया जाता है। जो अपनी इच्छाओं, कामनाओं को जितना अधिक दबा सके, कुचल सके, वह उतना ही अधिक संयमी है। लोक प्रचलित इस मान्यता के विरुद्ध संयम का वास्तविक अर्थ है- जीवन की शक्तियों की बर्बादी को रोकना। जीवन ऊर्जा के क्षरण व अपव्यय पर प्रतिबन्ध लगाना। प्रकृति एवं परमेश्वर ने हममें से हर एक को क्रिया शक्ति, चिन्तन शक्ति एवं भाव शक्ति के अनुदान दिए हैं। इनमें से प्रत्येक शक्ति का सदुपयोग किया जाना चाहिए। उसे जीवन लक्ष्य के सुनिश्चित उद्देश्य के लिए नियोजित करना चाहिए। लेकिन व्यवहार में यह कहीं दिखता नहीं।
सामान्य जनों की बात तो दूर, अपने को योगी और साधक कहने और मानने वाले भी संयम के वास्तविक अर्थ से दूर रहते हैं। संयम किसी विशेष क्रिया-प्रक्रिया का नाम नहीं है। यह कोई दिखाऊ अथवा प्रदर्शन का तत्त्व भी नहीं है। यह तो गहन आन्तरिक तत्त्व है। और इसे वही कर पाता है, जो अपने को गहराई से जानने-समझने की चेष्टा करता है। गहन आत्म चिन्तन और गहरे आत्म विश्लेषण से ही जाना जा सकता है कि हम अपनी क्रिया शक्ति, चिन्तन शक्ति एवं भाव शक्ति का कितना सदुपयोग अथवा दुरुपयोग कर रहे हैं। इनके दुरुपयोग को तत्काल रोककर इन्हें आत्मोन्मुखी या ईश्वरोन्मुखी करना ही संयम है।
संयम के सधते ही परिष्कार या परिशोधन की प्रक्रिया चल पड़ती है। यह योग का द्वितीय महत्त्वपूर्ण सूत्र है। हालाँकि संयम से परिशोधन तक की यात्रा अनेकों कठिनाइयों से भरी है। क्योंकि संयम से परिशोधन की दूरी दो शब्दों के बीच की दूरी नहीं है, यह जीवन के दो आयामों का फासला है। इसे विवेकवान, धैर्यवान और दृढ़ निश्चयी ही तय कर पाते हैं। क्रिया, चिन्तन एवं भावना में बार-बार भटकाव आता है। चित्त और उसकी वृत्तियाँ बार-बार अपनी परिचित राहों पर दौड़ने-भागने के लिए लालायित होती हैं। लालसाओं के ये अनगिनत छिद्र ही बहुमूल्य जीवन ऊर्जा की बरबादी के कारण हैं।
सतत् अभ्यास और उत्कट वैराग्य से ही यह बरबादी रुकती है। इसी से वृत्तियाँ ईश्वरोन्मुखी होती हैं। और तब परिष्कार की प्रक्रिया स्वचालित यंत्र की भाँति चल पड़ती है। परिशोधन की यह क्रिया समूची अन्तर्चेतना को धोती-माँजती है। ऐसे में चिन्तन एवं भावनाओं की दशा और दिशा सभी कुछ बदल जाती है। एक नयी दुनिया के द्वार खुलते हैं। इसे अनुभवी ही देख, जान और समझ सकते हैं।
परिशोधन के बाद की यह अवस्था जागृति अथवा जागरण की है। और यही योग साधना के तत्त्वदर्शन का तृतीय सूत्र है। इस अवस्था में जीवन के सभी प्रश्नों का अपने आप ही समाधान हो जाता है। सभी समस्याओं का समाधान होने के कारण इस अवस्था को समाधि भी कहते हैं। योग की ओर झुकाव रखने वाले बहुतेरे लोग समाधि को कोई क्रिया समझ बैठते हैं और जिस किसी भी तरह करने के लिए परेशान होते हैं। पर वास्तव में समाधि चित्त और उसकी वृत्तियों के परिशोधन का स्वाभाविक परिणाम है।
योग में शारीरिक, मानसिक व्यायामों, साधनात्मक कर्मकाण्डों का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। पर तभी जब उनका उद्देश्य योग साधना के तत्त्वदर्शन के अनुरूप हो। योग का बहिरंग स्वरूप इन व्यायामों, कर्मकाण्डों के रूप में सामने आना आपत्तिजनक नहीं है। किन्तु है यह योग का कलेवर ही, यह तथ्य सदा ही स्मरण रखा एवं कराया जाना चाहिए। योग का प्राण- वह तत्त्वदर्शन ही है, जिसकी चर्चा उपरोक्त पंक्तियों में की गयी है। संयम, परिशोधन और जागरण के इन सूत्रों को त्रिपदा गायत्री के तीन चरण भी कहा जा सकता है। इसकी शुरुआत क्रिया शक्ति से होने पर कर्मयोग का स्वरूप प्रकट होता है। यदि प्रारम्भ चिन्तन शक्ति से किया गया तो ज्ञानयोग की सप्तभूमियाँ स्पष्ट होती हैं और भाव शक्ति के माध्यम से योग साधना के तत्त्वदर्शन का अभ्यास करने पर भक्तियोग का मार्ग प्रशस्त होता है।
योग साधना के तत्त्वदर्शन की आन्तरिक उमंगें यदि जग पड़े तो बहिरंग जीवन स्वतः ही योगमय हो जाता है। क्योंकि आन्तरिक भाव दशा से ही दिशा निर्धारण और परिस्थिति का निर्माण होता है। अन्तश्चेतना का यह मर्मस्थल संयमित-परिशोधित बने, तभी आत्म चेतना के जागरण की पुण्य घड़ी आती है। और योग साधना के तत्त्वदर्शन का लक्ष्य पूरा होता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कर्मयोग प्रथम चरण है।
कर्मयोग स्थूल शरीर की योग साधना है। इस साधना में सबसे प्रथम और सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान आलस्य और प्रमाद को निरस्त करना है। इसके लिए यह जरूरी है कि समय को बहुमूल्य व बेशकीमती समझा जाय। और एक-एक क्षण का पूरा सदुपयोग करने के लिए श्रम संलग्न रहा जाय। प्रातःकाल उठते ही-अथवा रात्रि को सोते समय अगले दिन किए जाने वाले कर्त्तव्य-कर्मों को ध्यान में रखते हुए दिनचर्या बना ली जाय और जब तक कोई अनिवार्य कारण न आ जाए, तब तक उस दिनचर्या को ईश्वर की आराधना मानकर पूर्ण मनोयोग पूर्वक पूरा किया जाय। इस क्रम में विश्राम का अवकाश भी रखा जा सकता है, पर उसके लिए ढेर सारा समय गंवाने की जरूरत नहीं है। कामों को बदल लेने से कार्य पद्धति में थोड़ा फेर बदल कर लेने से भी विश्राम की काफी कुछ जरूरत पूरी हो जाती है।
दरअसल शरीर को सुस्ताने की उतनी जरूरत नहीं पड़ती, जितनी जरूरत मन की ऊब को उतारने की होती है। शरीर के कल-पुर्जे तो सोते-जागते हर घड़ी काम करने के अभ्यस्त हैं। थकान मिटाने के लिए नियत समय पर नींद लेना और बीच-बीच में थोड़ा-बहुत विश्राम कर लेना अथवा कामों में फेर-बदल कर लेना पर्याप्त होता है। जिसे कर्मयोग की साधना करनी है, उसे विश्राम के नाम पर निठल्लेपन की प्रवृत्ति या आलसीपन से दूर रहना ही पड़ेगा। कर्मयोग साधना की दृष्टि से नियमित दिनचर्या का बनना और उस पर कठोरतापूर्वक आरुढ़ रहना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। कर्मयोग का इसे व्यावहारिक और सर्वप्रथम कदम कहा जा सकता है। निठल्लापन जड़ता का-तामसिकता का चिह्न है। इसे सौभाग्य नहीं दुर्भाग्य माना जाना चाहिए। शरीर की क्रिया शक्ति और मस्तिष्क की प्रखरता को नष्ट करने में आलस्य-प्रमाद से बढ़कर और कोई शत्रु नहीं।
कर्मयोग की साधना का दूसरा चरण यह है कि प्रत्येक कर्म स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं ईश्वर प्रेम के लिए किया जाना चाहिए। जब तक कर्म में उच्चतम उद्देश्य एवं महान् आदर्श का समावेश नहीं होगा, तब तक उसका कर्मयोग बनना सम्भव नहीं। यदि हम विचारशीलों की तरह सोचें, तो यही पता चलेगा कि हम जो भी करते हैं वह ईश्वर को सौंपें, शरीर को निर्वाह एवं श्रम देने के लिए। ईश्वर प्रदत्त मन को सुसंस्कृत बनाए रहने के लिए। ईश्वर के सौंपे परिवार उद्यान को कर्त्तव्यनिष्ठ माली की तरह सींचने-संभालने के लिए। सामाजिक-राष्ट्रीय कर्त्तव्यों के निर्वहन के लिए। और सबसे बढ़कर जीवन लक्ष्य को पाने के लिए। ऐसा उत्कृष्ट दृष्टिकोण रखकर किए जाने वाले सामान्य काम भी कर्मयोग की साधना का अंग बन जाते हैं।
कामों में विकृतियाँ तभी भरती हैं, जब उन्हें संकीर्ण स्वार्थ के लिए किया जाता है। कर्त्तव्यनिष्ठ सैनिक की तरह, यदि अपने को ईश्वर की सेना का अकिंचन सिपाही माना जाय तो सम्भवतः सब कुछ उत्कृष्टता की दिशा में चल पड़ता है। जिस तरह सैनिक राष्ट्रहित के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने और कड़े से कड़ा अनुशासन मानने के लिए तैयार रहता है, वैसी ही मनःस्थिति कर्मयोगी की होनी चाहिए। इस मनःस्थिति में रहकर किए गए सभी काम कर्मयोग की श्रेणी में गिने जाएँगे। और उनका परिणाम योगाभ्यास के लिए की गयी तप-साधना जैसा ही श्रेयस्कर होगा।
‘कर्म-भगवान् के लिए’ - ऐसा मानस बने तो समझो कि जीवन में कर्म योग आ गया। अनगढ़ मनःस्थिति के लिए शुरुआती दौर में यह अटपटा लग सकता है। पर यदि चौबीस घण्टे में एक-दो कर्म भी भगवान् के लिए हो सके, तो भी इस राह पर चला जा सकता है। महाराष्ट्र के सन्त एकनाथ को भी कर्म योग का रहस्य कुछ ऐसे ही अनुभव हुआ था। बात तब की है जब वह तीर्थयात्रा के लिए पैठण गये थे। वहाँ एक गली में एक नाई किसी के बाल बना रहा था। इसी समय सन्त एकनाथ वहाँ आ गए और उन्होंने कहा- भाई! भगवान् के लिए मेरे भी बाल काट दें।
उस नाई ने भगवान् का नाम सुनते ही दुकान पर बैठे एक अन्य ग्राहक से कहा- ‘अब थोड़ी देर मैं आपके बाल नहीं काट सकूँगा। भगवान् की खातिर इन सन्त की सेवा मुझे पहले करनी चाहिए। भगवान् का काम सबसे पहले है।’ नाई की बात सुनकर दुकान में बैठा ग्राहक कुछ बड़बड़ाता हुआ वहाँ से उठकर चला गया। लेकिन इस सबसे बेखबर नाई ने सन्त के बाल बड़े ही प्रेम और भक्ति से काटे। बाल कटवाने के बाद सन्त एकनाथ ने नाई को कुछ पैसे देने चाहे। एकनाथ के हाथ में पैसे देखकर नाई ने उन्हें बड़ी ही विचित्र नजरों से देखा और कहा- महाराज, यह क्या बात हुई? आप ने तो भगवान् की खातिर बाल काटने को कहा था, पैसों की खातिर नहीं। फिर तो जीवन भर सन्त एकनाथ अपने सत्संग में कहा करते थे, निष्काम कर्मयोग मैंने एक नाई से सीखा है।
भगवान् के लिए कर्म करने पर- कर्म के साथ केवल प्रेम और भक्ति ही जुड़ती है। किसी तरह के फल की चाहत वहाँ पनप ही नहीं पाती। बस एक ही धुन रहती है, किया जाने वाला कर्म अच्छा से अच्छा कैसे हो। निन्दा, प्रशंसा का झंझट भी कर्मयोगी को नहीं व्यापता। उसे तो बस अपने उच्चतम उद्देश्य और महान् आदर्श का ध्यान रहता है। और फिर सबसे बड़ी बात कर्मयोगी के लिए प्रत्येक कर्म शरीर द्वारा की जाने वाली भगवत्प्रार्थना है। जब इस प्रार्थना में उसे रस आने लगता है, तब धीरे-धीरे उसके सभी कर्म, कर्मयोग में समा जाते हैं।
कर्मयोग की इस साधना से मिलने वाली रसानुभूति कुछ इस कदर होती है कि कर्मयोगी अपनी श्रम निष्ठ और भगवत्प्रेम को ही अपनी आत्मतुष्टि का आधार मान लेता है। उसे किसी के मुख से प्रशंसा का प्रमाण पत्र पाने की जरूरत नहीं रहती। किसी के द्वारा की जाने वाली अकारण निन्दा उसे उद्विग्न नहीं कर पाती। उसका अपना अन्तःकरण ही उसके सन्तोष के लिए पर्याप्त आधार बना रहता है। इसी प्रकार उसे अभीष्ट परिणाम की उतावली नहीं होती। भगवत्प्रेम के लिए सत्कर्म-कर्त्तव्य कर्म की नीति अपनाना ही उसके लिए क्षण-क्षण में मिलने वाला सफलता जैसा उपहार होता है। उसकी परिष्कृत जीवन नीति ही उसे हर घड़ी सन्तोष देती रहती है। फलतः उस आन्तरिक प्रसन्नता को चेहरे की मुस्कान के रूप में हर घड़ी देखा जा सकता है।
इस मुस्कान में उसकी आत्मा का प्रकाश घुला-मिला होता है। जो कर्मयोगी की साधना की प्रगाढ़ता के अनुसार अनुदिन तीव्र से तीव्रतर होता चला जाता है। इस पथ पर चलने वाले साधक किसी से कहीं भी कमतर नहीं। क्योंकि इनकी साधना घण्टे-दो-घण्टे नहीं बल्कि अनवरत चलती है। इसके साथ ही अनवरत कर्मबन्धन ढीले पड़ते जाते हैं। जन्म-जन्मान्तर के कर्मों का स्वाभाविक क्षय होता जाता है। कर्मों का भार घटने से चिन्तन में ज्ञान का स्वाभाविक प्रकाश उत्पन्न होता है। जिसे ज्ञानयोग की साधना से और अधिक प्रखर बनाया जा सकता है।
ज्ञानयोग की शुरुआत आत्म जिज्ञासा से होती है। जब समूचा अस्तित्व एक जुट होकर अपने से यह सवाल पूछता है- कि मैं कौन हूँ? जब प्राणों में एक ही विकल गूँज उफनती है- कि मैं कौन हूँ? तब ज्ञान योग की साधना प्रारम्भ होती है। ज्ञानयोग की साधना दरअसल सूक्ष्म शरीर की साधना है। क्योंकि ज्ञानयोग में लीन साधक को सबसे पहला अहसास यही होता है कि पल-पल नष्ट होने वाला, हर घड़ी मृत्यु की ओर बढ़ने वाला स्थूल शरीर मेरा परिचय कभी नहीं हो सकता। यही अनुभूति ज्ञान योगी को नाशवान स्थूल से ऊपर उठाकर अविनाशी सूक्ष्म की ओर ले जाती है।
जब तक सच्ची आत्म जिज्ञासा नहीं पनपी, तब तक अन्य सारी बातें ज्ञान का आडम्बर ही हैं। अनगिनत पुस्तकों का अध्ययन, अनेकानेक विद्वतापूर्ण व्याख्यान, और ढेरों सुविचारित प्रश्न सब मिलकर भी किसी को ज्ञानयोगी नहीं बना सकते। रमण महर्षि के पास जब अंग्रेज लेखक पॉल ब्रन्टन गए थे, तब उनके पास अनेकों प्रश्न थे। उन्होंने लगभग पूरी दुनिया की यात्रा की थी, अनेकों पुस्तकें पढ़ी थी और कई पुस्तकें तो स्वयं भी लिखी थी। समूची दुनिया में उन्हें लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान् माना जाता था।
लेकिन रमण महर्षि ने उनके सारे प्रश्नों के प्रत्युत्तर में केवल एक बात कही कि सिर्फ एक प्रश्न सार्थक है- मैं कौन हूँ? बाकी सब प्रश्न तो अपने आप ही हल हो जाएँगे। तो पॉल ब्रन्टन ने कहा अच्छी बात है, यही पूछता हूँ, कि मैं कौन हूँ? उत्तर में महर्षि हंसने लगे, अब यह भी मुझसे पूछोगे? अरे आंखें बन्द करो और अपने आप से पूछो। पूछते जाओ, खोजते जाओ। अब इतना तो पक्का है कि तुम हो। इतना ही नहीं तुम हो और चेतन हो- यह भी पक्का है। अन्यथा मुझसे पूछते कैसे? अब आगे तुम खोजो।
इसी खोज में ज्ञानयोग की समूची साधना निहित है। इस खोज के लिए हमें स्थूल से सूक्ष्म में उतरना ही होता है। जैसे-जैसे खोज तीव्र होती है, आत्म जिज्ञासा परिपक्व होती है, सूक्ष्म शरीर भी परिष्कृत, प्रखर एवं पवित्र होता चला जाता है। बात अनुभव की है। यह नहीं कि कोई पूछता रहे मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ तो कुछ वैसा उत्तर आ जाए, जैसे परीक्षा की कापियों में उत्तर आ जाते हैं। यह बात नहीं है, बात तो यह है, जब प्रश्न तीव्र होगा, आत्म जिज्ञासा प्रगाढ़ होगी, तो उत्तर नहीं आएगा, एक दिन प्रश्न भी रुक जाएगा। अनुभूति आएगी। जीवन और चैतन्य का जो महामिलन हो रहा है, उसका साक्षात्कार होगा। यही साक्षात्कार ज्ञानयोग का फल है।
इसके बारे में महर्षि अष्टवक्र जनक से कहते हैं-
तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यास फलं तथा। तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकी रमते तुयः॥
उसे ही ज्ञान और योगाभ्यास का फल प्राप्त हुआ है, जो तृप्त है, शुद्ध इन्द्रिय वाला है और सदा एकाकी रमण करता है।
महर्षि अष्टवक्र के इन वचनों में ज्ञानयोग की समूची साधना और उसके फल का गुह्य वर्णन है। ज्ञानयोगी की अनिवार्य पहचान है- शुद्ध इन्द्रिय वाला। जिसने गहन आत्म जिज्ञासा से अपनी कल्पना, चिन्तन एवं चित्त वृत्तियों को परिशोधित कर लिया है, वही शुद्ध इन्द्रिय वाला हो सकता है। जो ज्ञानयोग को बौद्धिक क्रिया-कलापों से जोड़ते हैं, उनके लिए इस उपलब्धि को पाना सम्भव नहीं। क्योंकि ज्ञानयोगी के लिए महर्षि अष्टवक्र एक अन्य स्थान पर ‘गलित धीः’ शब्द का प्रयोग करते हैं। गलित धीः का अर्थ है जिसकी बुद्धि गल गयी है। सत्य यही है कि बुद्धि की सीमाओं से परे जाकर ही ज्ञानयोग की साधना सम्भव है। और तभी इसकी उपलब्धियाँ साधक के जीवन का अनुभव बनती हैं।
सूक्ष्म शरीर की पवित्रता ही साधक को तृप्ति दे पाती है। क्योंकि ऐसी ही भावदशा में उसे आत्मा के अमृत रस का स्वाद मिलता है। सूक्ष्म शरीर पवित्र हो जाए, तो फिर वासनाओं में रस नहीं मिलता। सूक्ष्म शरीर के पवित्र होने पर, इन्द्रियों के स्वच्छ होने पर, चेतना की संवेदनशीलता लाख-करोड़ गुनी बढ़ जाती है। ऐसे में आत्म चेतना, परमात्म चेतना में रमण करती है। उसे जड़ भोगों की कोई आवश्यकता नहीं रहती। तृप्ति उसका स्वभाव बन जाता है। यह तृप्ति ज्ञानयोग का सहज फल है। यह जागरण का फल है।
सूक्ष्म शरीर जब तक वासनाओं से मैला है, तब तक तृप्ति सम्भव नहीं। वासनाओं को जितना तृप्त करने की कोशिश करते हैं, अतृप्ति उतना ही भड़कती और बढ़ती जाती है। शरीर थक जाता है, पर वासना नहीं थकती। वह दौड़ती ही रहती है। जब शरीर मर जाता है, तब भी वासना अनन्त-अनन्त यात्राओं पर निकलती रहती है। अगर ऐसा न होता, तो दुबारा जन्म ही न होता। दुबारा जन्म का कारण ही है- अतृप्ति। यह भटकन तभी मिटती है जब इन्द्रियाँ शुद्ध होती हैं- सूक्ष्म शरीर पवित्र होता है। सूक्ष्म शरीर के पवित्र होते ही वासनाएँ मिटती हैं। और वासनाओं के मिटते ही अतृप्ति भी मिट जाती है। फिर तो बस तृप्ति ही स्वभाव बन जाता है।
ऐसा परम तृप्त ज्ञानयोगी एकाकी रमण करता है। यहाँ एकाकी का अर्थ गहराई से समझने की आवश्यकता है। क्योंकि एकाकी का अर्थ प्रायः अकेलापन लगाया जाता है। जबकि एकाकी का अर्थ होता है- एक पन। अकेलेपन का मतलब होता है कि दूसरे की याद आ रही है, दूसरा होता तो अच्छा होता। अकेलेपन का अर्थ है- दूसरे का अभाव खल रहा है, खाली-खाली लग रहा है, कोई जगह, बड़ी बेचैनी हो रही है। बैठे तो हैं अकेले, पर दूसरे की याद में परेशान हैं।
एकाकीपन का अर्थ है- अब रम गए एक में। अपने भीतर के पन्ने पलटते हुए रहस्य जान लिया। अब समझ में आ गया कि एक ही ने अनेक रूपों में विस्तार-प्रसार किया है। जैसे-जैसे एकाकी रमण करते हैं, अपने भीतर चलते हैं। तो चलते-चलते एक घड़ी आती है, जो मैं नहीं हूँ- वह सबका सब छूट जाता है। और जो मैं हूँ- वह बचा रहता है। इस परम सत्य का साक्षात्कार करते ही- ज्ञानयोग के सारे सुफल अपने आप ही जीवन में बिखर जाते हैं।
ज्ञानयोग की साधना जो करना चाहते हैं, उनके लिए एक ही सन्देश है, कि आप अपने भीतर, हाँ अपने ही भीतर महासूर्य को छिपाए चल रहे हो। जरा पूछो अपने से यह महाप्रश्न- मैं कौन हूँ? जरा खोलो भीतर की गाँठ, जरा भीतर की गठरी खोलो, जरा भीतर की गगरी फोड़ो, किरणें ही किरणें बरस जाएँगी। उन किरणों की वर्षा में स्वच्छ हो जाएँगी इन्द्रियाँ, पवित्र हो जाएगा सूक्ष्मशरीर, तृप्त हो जाएँगे प्राण, हो जाएगा परिचय अपने एक-पन से।
ज्ञानयोग के ऐसे महान् साधक के लिए शास्त्र कहते हैं- ‘ज्ञानयोगी इस जगत् में कभी दुःख को प्राप्त नहीं करता। क्योंकि उसी के एक-पन से यह ब्रह्मांड-मण्डल पूर्ण है। ज्ञानयोग की यह पूर्णता भक्तियोग में अपनी रसमयता प्राप्त करती है।’
भगवान् का रहस्य जानना हो, तो भक्त का रहस्य जान लो। भगवान् के सान्निध्य में रहना हो, तो भक्त के सान्निध्य में रहो। क्योंकि भक्त चेतना के गहनतम तल में जीता है। उसकी साधना स्थूल, सूक्ष्म से परे कारण शरीर की साधना है। उसे न तो कर्म की चाहत है, और न ही ज्ञानप्राप्ति की आकाँक्षा। वह तो आठों याम बस अपने प्रभु का दीवाना है। अपना सब कुछ देकर भी ‘दे दूँ कुछ और अभी’ के लिए फिक्रमन्द है। भक्त प्रेम की शुद्धतम एवं उच्चतम अवस्था में जीवन जीता है। प्रेम के इस शुद्धतम स्वरूप में ही भक्तियोग का मर्म निहित है।
प्रेम की तीन श्रेणियाँ हैं। पहली श्रेणी, जिससे सौ में निन्यानवे लोग परिचित हैं- काम है। काम का अर्थ है, दूसरे से लेना, लेकिन देना नहीं। वासना लेती है, देती नहीं। माँगती है, प्रत्युत्तर नहीं देती। वासना शोषण है। इसके लिए अगर देने का बहाना करना पड़े तो भी किया जाता है। क्योंकि अन्दर कहीं इस बात का अहसास होता है कि अगर देने का दिखावा न किया गया, तो मिलेगा नहीं। हालाँकि मंशा सिर्फ पाने की होती है, देने की नहीं।
इसीलिए ऐसे लोगों में जीवन भर क्रोध बना रहता है। क्योंकि प्रेम का स्वाँग भर कर दोनों ही एक दूसरे को धोखा देना चाहते हैं। दोनों की एक ही चाहत होती है कि प्यार देने के नाम पर दूसरे की भावनाएँ बटोर लें। उसके सब-कुछ का दोहन-शोषण कर लें। दूसरे की भी यही मनःस्थिति रहती है। फलतः दोनों ही शोषित होते हैं और दोनों ही पीड़ित होते हैं। इस पीड़ा में किसी को भी आनन्द मिलना सम्भव नहीं।
दूसरी श्रेणी है- प्रेम की। प्रेम का अर्थ है जितना देना-उतना लेना। बड़ा साफ-सुथरा सौदा है। काम शोषण है, प्रेम शोषण नहीं है। यहाँ जितना लिया जाता है, उतना ही दिया जाता है। हिसाब साफ है। इसलिए प्रेमी आनन्द को तो उपलब्ध नहीं होते, लेकिन शान्ति को उपलब्ध होते हैं। कामी को शान्ति भी नहीं मिलती। उसके पल्ले तो बस चिन्ता, शोक, सन्ताप और अशान्ति ही पड़ती है। जबकि प्रेम में शान्ति और सन्तुलन दोनों बने रहते हैं। प्रेमियों के बीच गहरी मित्रता भी पनप जाती है।
प्रेम का तीसरा रूप है-भक्ति। इसमें भक्त सिर्फ देता है, लेने की बात उसे किसी भी तरह नहीं सूझती। भक्ति काम से बिल्कुल उलटी घटना है। एकदम विरोधी छोर है। यहाँ भक्त देता है, सब देता है। अपने को पूरा दे देता है। कुछ बचाता ही नहीं पीछे। यही तो समर्पण है। जिसमें देने वाला खुद भी नहीं बचता, स्वयं को भी दे डालता है। बदले में माँगता कुछ भी नहीं। न उसे बैकुण्ठ की कामना होती है, न तो स्वर्ग और संसार की। माँग उठते ही भक्ति तत्क्षण पतित हो जाती है। भक्ति उलटकर काम बन जाती है। भक्ति तो तभी भक्ति है, जब अशेष भाव से भक्त अपने को पूरा उड़ेल दे।
ऐसा नहीं है कि भक्त को कुछ मिलता नहीं। भक्त को जितना मिलता है, उतना किसी को नहीं मिलता। सिर्फ उसी को मिलता है। लेकिन उसकी कोई माँग नहीं होती, न प्रत्यक्ष, न ही छिपी हुई। वह सिर्फ उड़ेल देता है। अपने को बिना राई-रत्ती बचाए, समूचा दे डालता है। और परिणाम में परमात्मा उसे पूरा मिल जाता है। लेकिन वह परिणाम है, भक्त की आकाँक्षा नहीं। वह तो बस गहन प्रेम में डूबा है। सन्त कबीर के शब्दों में उसकी दशा कुछ ऐसी हो जाती है-
अब मन रामहि ह्व रहा, सीस नवावै काहि। सब रग तंत रबाब तन, बिरह ब जावै नित्त। और न कोई सुन सके, कै साई कै चित्त॥
शरीर की रगें वीणा की तार हो गई, सारा तन वीणा हो गया। और उसमें तो बस एक ही गीत बजता रहता है- परमात्मा के विरह का। लेकिन इस विरह गीत को या तो परमात्मा सुन सकता है या फिर स्वयं।
इस कबीर वाणी में भक्ति योग की समग्रता है। हालाँकि बाबा कबीर एक भेद भरी बात भी कहते हैं, कि अब मेरा मन स्वयं राम हो गया, ऐसे में भला किसे सिर नवाऊँ। इस बात में उलटबांसी यह है कि जब मन ही राम हो गया है- तब फिर विरह क्यों? इस प्रश्न का सरल समाधान है कि भक्त स्वयं को पूरा मिटाना चाहता है। यहाँ तक कि देह की दीवाल भी गिरा देना चाहता है। अभी उसकी ख्वाहिश है- कब मिटिहौ, कब पाहिहौं पूरन परमानन्द। थोड़ा सा फासला है, मिलन है फिर भी विरह है।
यह विरह ही भगवान् को भक्त के पास आने को विवश करता है। भक्ति यदि कहीं परिभाषित करनी पड़े- तो यही कहेंगे कि भक्ति वही है जो भगवान् को भक्त के पास दौड़कर आने के लिए विवश कर दे। सचमुच भक्त को भगवान् के पास जाना नहीं पड़ता। वह स्वयं ही भागा हुआ भक्त के पास आता है। भक्त तो सिर्फ पुकारता है। उसे नहीं मालुम विधि-विधान, उसे नहीं मालुम कि कहाँ जायँ? किस दिशा में खोजें। भक्त को तो बस अपनी प्यास का पता है। वह अपनी प्यास को उभारता है। भक्त की प्यास ही सघन होती जाती है। यहाँ तक कि वह स्वयं विराट् प्यास बन जाता है- एक उत्तप्त विरह अग्नि। और इसी में भगवान् भागा हुआ आता है।
सभी जानते हैं कि गर्मी के बाद वर्षा होती है। ग्रीष्म के बाद आकाश में बादल घिरते हैं, मेघ छाते हैं। लेकिन ग्रीष्म के बाद ही ऐसा क्यों होता है? तो ऐसा इसलिए क्योंकि ग्रीष्म के कारण, घने ताप के कारण, जलते हुए सूरज के कारण, वायु विरल हो जाती है। गड्ढ बन जाते हैं, वायु में। तभी मेघ उन गड्ढों को भरने के लिए भागे चले आते हैं। क्योंकि इस जगत् में अस्तित्व गड्ढों को बरदाश्त नहीं करता। इसीलिए तो पहाड़ खाली रह जाते हैं और झीलें भर जाती हैं। ग्रीष्म के बाद बादलों का आ घिरना खाली गड्ढों को पैदा हुए शून्य को भरने के लिए होता है। शून्य में बड़ा प्रबल आकर्षण है। जहाँ-जहाँ शून्य है, वहाँ-वहाँ ऐसा ही आकर्षण है।
ऐसी ही घटना भक्ति योगी के जीवन में भी घटती है। प्यास जब प्रज्वलित हो जाती है। प्राण जब प्रभूत की आकाँक्षा, अभीप्सा से आतुर हो उठते हैं। विरह की अग्नि जब धधकती ज्वालाओं में बदल जाती है, तो अन्तर्चेतना में एक शून्य पैदा हो जाती है। इस शून्य को ज्ञानी ध्यान से पैदा करता है, बड़े श्रम से पैदा करता है और मुश्किल से सफल हो पाता है। इसी शून्य को भक्त प्रेम से पैदा कर लेता है- और आसानी से पैदा कर लेता है और सदा ही सफल हो जाता है। क्योंकि विरह में जल कर भक्त एक शून्य बना, त्यों ही परमात्मा के मेघ उसकी तरफ चलने शुरू हो जाते हैं। भक्त की सारी कला उसके आँसुओं में है। भक्ति योग की सारी साधना पद्धति उसके विरह में है।
लेकिन इस विरह में परम आनन्द है। यह विरह पीड़ा जैसा नहीं है। यह बड़ा ही मधुर और मिठास भरा है। एक शब्द है मीठी पीड़ा। यह विरह ऐसी ही मीठी पीड़ा है। काटती रहती है भीतर लेकिन संगीत की तरह। स्वर उसका गूँजता रहता है, लेकिन वीणा के स्वर की भाँति। धन्य हैं वे, जिन्हें भक्ति का स्वाद मिला। बाबा-कबीर के शब्दों में- ‘जिनका शरीर वीणा हो गया। और उस वीणा पर एक ही स्वर निरन्तर उठ रहा है- विरह का स्वर। मिलन के बाद विरह है और विरह के बाद महामिलन। हाँ इस महामिलन के लिए एक-एक करके पाँचों कोशों की शुद्धि आवश्यक है। जिसमें से सर्वप्रथम है अन्नमय कोश।’
योग साधना के अंतर्गत जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए अन्नमय कोश के परिष्कार को पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। शास्त्रों में इसके अनेक लाभों एवं सिद्धियों का उल्लेख मिलता है। अन्नमय कोश की योग साधना के द्वारा ही योगी आरोग्य के साथ शरीर संस्थान पर अद्भुत अधिकार प्राप्त कर लेते हैं। इच्छानुसार शरीर को गर्म या ठण्डा रखना, ऋतुओं के प्रभाव से अप्रभावित रहना, शरीर की ऊर्जा पूर्ति के लिए आहार पर आश्रित न रहकर सीधे प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त कर लेना, दीर्घ जीवन, शरीर में वृद्धावस्था के चिह्न न उभरना आदि सभी उपलब्धियाँ अन्नमय कोश की योग साधना पर निर्भर करती हैं।
ये सभी उपलब्धियाँ योग की उच्चस्तरीय कक्षा में पहुँचने के लिए काफी उपयोगी सिद्ध होती हैं। साँसारिक जीवन क्रम में भी इनका प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। हालाँकि इन उपलब्धियों में आकर्षण काफी नजर आता है, फिर भी ये योग की प्रारम्भिक सीढ़ियाँ मात्र हैं। लेकिन इनकी अनिवार्यता इसलिए है कि योग साधना के लिए आवश्यक साधना क्रम में शरीर अपनी असमर्थता प्रकट करके साथ देने से कतराने न लगे। अन्नमय कोश के शुद्ध व पुष्ट होने पर ही व्यक्ति साँसारिक उतार-चढ़ावों के बीच अपनी शरीर यात्रा को सन्तुलित क्रम से चलाता हुआ, अपने आत्मिक लक्ष्य की ओर अनवरत क्रम से आगे बढ़ सकता है।
अन्नमयकोश की योग साधना का एक सूक्ष्म पक्ष भी है। दरअसल आत्मिक प्रगति के क्रम में स्थूल शरीर में अनेकों दिव्य संवेदनाओं का संचार होता है। असंस्कारित अन्नमयकोश इसमें बाधक बनता है। अथवा उच्चस्तरीय साधना में अपना उचित सहयोग नहीं दे पाता। योग साधना के क्रम में अनेकों दिव्य साधनाएँ उभरती हैं, उन्हें धारण करना, उनके स्पन्दनों को सहन करके अपना सन्तुलन बनाए रखना बहुत आवश्यक है। ये सारी बातें परिष्कृत, जाग्रत् एवं सुविकसित क्षमता सम्पन्न अन्नमयकोश से ही सम्भव हैं।
इन सब उपलब्धियों एवं क्षमताओं का लाभ पाने के लिए अन्नमयकोश, उसके स्वरूप तथा सामान्य गुण धर्मों के बारे में साधक के मन-मस्तिष्क में स्पष्ट रूपरेखा होनी चाहिए। पाँचों कोशों की संगति में अन्नमय कोश की भूमिका और उसके महत्त्व को सही ढंग से समझना जरूरी है।
यह अनुभूत सत्य है कि हमारी सत्ता, स्थूल, सूक्ष्म अनेक स्तर के तत्त्वों के संयोग से बनी है। इनमें से हर एक घटक का अपना-अपना महत्त्व है। फिर भी हमारी संरचना में एक बड़ा भाग है, जिसका सीधा सम्बन्ध स्थूल पदार्थों-पञ्चभूतों से है। उसके अस्तित्व-पोषण एवं विकास के लिए स्थूल पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है। अपने अस्तित्व का यही भाग अन्नमयकोश कहा जाता है। यह अगणित छोटी-छोटी इकाइयों से बना है। इन्हें कोशिका कहते हैं। स्पष्ट है कि ये इकाइयाँ जिस प्रकार की, जिन गुण धर्मों से युक्त होंगी, संयुक्त शरीर संस्थान में भी वही गुण प्रकट होंगे। अन्नमयकोश की आवश्यकता के अनुरूप बनाने-ढालने के लिए उसकी मूल इकाई को भी ध्यान में रखना होगा।
इससे एक कदम और आगे बढ़ें तो अन्नमयकोश की सूक्ष्म क्षमताओं का स्वरूप भी उभर कर सामने आ जाएगा। किसी भी क्षेत्र में उच्चस्तरीय साधक का शरीर उसकी मुख्य साधना में सहयोगी बन जाता है। श्रेष्ठ चित्रकार जब किसी चित्र की कल्पना करता है तो उसके शरीर की हर इकाई उसके स्पन्दनों से प्रभावित होती है। शरीर की हलचल में उस कल्पना के स्पन्दन समाविष्ट हो जाते हैं तथा निर्जीव तूलिका सामान्य रंगों से जीवन्त चित्र का निर्माण कर देती है। यही स्थिति कला और ज्ञान के अन्य साधकों की भी है।
इन साधकों के चमत्कारों के पीछे यही तथ्य छिपा है कि उनके अन्नमयकोश की हर इकाई उनके अन्दर की सूक्ष्म संवेदनाओं को अनुभव करने, स्वीकार करने तथा उसके अनुरूप प्रभाव पैदा करने में सक्षम हो जाती है। किसी भी कला या ज्ञान की साधना से लेकर योग साधना तक के किसी भी क्षेत्र में उच्च स्तरीय कक्षा में पहुँचने के लिए अपने अन्नमयकोश को तदनुरूप ऐसी ही सुसंस्कृत, सुयोग्य एवं सक्षम स्थिति में लाना होता है। यही प्रक्रिया अन्नमयकोश की योग साधना है।
प्रश्न यह उठता है कि अन्नमयकोश की योग साधना के लिए व्यावहारिक तौर पर क्या करें? इस महाप्रश्न के उत्तर में पहला तथ्य यही है कि हम अपनी देह को भोग का साधन नहीं योग साधना का महत्त्वपूर्ण उपकरण माने। देह भगवान् का दिव्य मंदिर है- इस सत्य को दैनन्दिन जीवन में अनुभव किया जाय। जिनके जीवन में यह अनुभूति आएगी, वही अन्नमयकोश की योग साधना के अधिकारी हैं। दूसरों के लिए तो यह एक बौद्धिक पहेली भर है।
इस महत्त्वपूर्ण मान्यता के बाद आवश्यक है तदनुरूप आचरण। जो श्री भगवान् कृष्ण के शब्दों में-
‘युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्यकर्मसुः। युक्तस्वप्नाबोधस्य योगी भवतिः दुःखहाः।’
अर्थात्- उचित आहार, उचित विहार, कर्मों में उचित चेष्टा। सही समय पर सोना, जगना, ऐसा करने वाले योगी के सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं। गीता के इस तत्त्वोपदेश में मुख्यतः दो बातें हैं- 1. उचित आहार, 2. नियमित दिनचर्या। इसके अतिरिक्त एक तीसरी बात जो इन दोनों में समायी है वह है- इन दोनों की दिशा योग साधना की ओर हो।
उचित आहार का तात्पर्य यह है कि भोजन स्वास्थ्य के लिए किया जाय स्वाद के लिए नहीं। जो भोजन स्वास्थ्य के लिए किया जाता है वह सात्त्विक है। स्वाद के लिए किया जाने वाला भोजन राजसिक है। और जो भोजन स्वाद के लिए किया जाय और पेट भरने से भी ज्यादा किया जाय वह तामसिक है। सात्त्विक भोजन के साथ उपवास एवं अस्वाद अनिवार्य रूप से जुड़े हुए हैं। सप्ताह में एक दिन रविवार को उपवास और एक दिन बृहस्पतिवार को आस्वाद भोजन का नियम पालन करने पर अन्नमयकोश की योग साधना प्रारम्भ हो जाती है।
इस साधना में प्रखरता तब आती है जब नियमित दिनचर्या के साथ देह की समस्त क्रियाएँ भगवान् को समर्पित करने के लिए की जायँ। अन्नमयकोश की योग साधना करने वाले साधक को देह से ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिसे भगवान् को समर्पित करने में मन डाँवाडोल हो। यदि समूचे जीवन क्रम में इस नियम का समावेश हो सका तो अन्नमय कोश की पवित्रता एवं प्रखरता देखते ही बनेगी। उपरोक्त पंक्तियों में कही गयी बातें इसलिए नहीं कही जा रही हैं कि इन पर प्रयोग किए जाएँ। और इनसे प्राप्त निष्कर्षों की सच्चाई से शान्तिकुञ्ज के संचालकों को अवगत कराया जाय।
यह सभी के लिए ध्यान रखने की बात है कि अन्नमयकोश की साधना समस्त योग साधना का आधार है। इसी के द्वारा उच्च लक्ष्यों के लिए प्रखर तरंगें पैदा होती हैं। और उच्च स्तरीय चेतना को ग्रहण-धारण करने की सामर्थ्य विकसित होती है। जो सही मायने में योग साधना के अभिलाषी हैं, उन्हें अपनी साधना का प्रारम्भ अन्नमयकोश के परिष्कार से आज और अभी प्रारम्भ कर देना चाहिए। तभी वह भविष्य में प्राणमयकोश की साधना के लिए अपने कदम बढ़ा सकेंगे।
महायोगियों ने अपने अनुभव से सिद्ध किया है कि प्राणमय कोश के प्राणयोग से जीवन में चमत्कारी परिवर्तन सम्भव हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। वैज्ञानिकों ने प्रायोगिक दृष्टि से मस्तिष्क एवं हृदय जैसे विलक्षण केन्द्रों से लेकर त्वचा तक में व्याप्त प्राण संस्थान तथा उसके प्रभाव को स्पष्ट तौर पर स्वीकार किया है। योग दृष्टि तो इससे कहीं अधिक सूक्ष्म है। इसके द्वारा जो निष्कर्ष निकाले गए हैं, वे और भी अधिक गहन व व्यापक स्तर के रहस्यों को प्रकट करते हैं। यह सुनिश्चित सत्य है कि प्राणमय कोश को परिष्कृत एवं सबल बनाकर न केवल अपने शरीर, बल्कि दूसरे शरीरों को भी प्रभावित और विकसित किया जा सकता है।
योग विज्ञान का मत है कि प्राण शक्ति ही जीवात्मा की- ‘सत् सत्ता को’ चित् सत्ता से परिपूर्ण बनाती है। इन दोनों का समन्वय हो जाने से ही जीवन के विविध क्रिया-कलाप बन पड़ते हैं। सत्-चित्-आनन्द की सम्भावनाएँ हम सबके चारों ओर भरी-बिखरी पड़ी हैं। उपभोक्ता में ‘आत्मा’ की सत्ता मौजूद है। फिर भी सब कुछ असम्भव बना रहता है। अशक्ति जन्य दरिद्रता प्राणी को घेरे रहती है। प्राण शक्ति की न्यूनता के अतिरिक्त इस विपन्नता का कोई और कारण नहीं। जीवधारी को प्राणी कहे जाने का मतलब ही यही है कि उसके जीवन की प्रक्रिया प्राणशक्ति के सहारे ही चल पाती है। शरीर में ज्यों ही प्राण की कमी हुई कि ‘प्राणान्त’ की स्थिति सामने आ खड़ी होती है।
मनुष्य में जो चमक, चेतना, स्फूर्ति, तत्परता, तन्मयता दिखाई देती है, वह सब उसके प्राणमय कोश की ही ऊर्जा है। यह ऊर्जा जिसमें जितनी कम होगी, वह उतना ही निस्तेज, निर्जीव एवं निर्बल दिखाई देगा। उत्साह, साहस और सन्तुलन की उपलब्धियाँ प्राणशक्ति की मात्रा पर ही निर्भर रहती हैं। तपस्वी, मनस्वी, तेजस्वी, ओजस्वी महामानवों की प्रखरता उनमें विद्यमान प्राणमयकोश की ऊर्जा का परिमाण प्रकट करती है। पराक्रमी मनुष्यों की दैहिक संरचना में, मानसिक संगठन में कोई खासियत नहीं होती। इस दृष्टि से वे भी सामान्य जनों की ही तरह होते हैं। उनकी सारी विशेषता प्राण क्षमता के रूप में बढ़ी-चढ़ी होती हैं। संकल्प शक्ति, इच्छा शक्ति, दृढ़ता और सुनिश्चितता में यही प्रकट होती रहती है।
अपनी अनेक गतिविधियों के बावजूद प्राणतत्त्व एक है। जिस तरह शरीर के प्रमुख अवयव माँसपेशियों से बने होने के बावजूद अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं। ठीक यही बात प्राण के बारे में भी है। मानवी काया में प्राण शक्ति को जो विभिन्न उत्तरदायित्व निबाहने पड़ते हैं, उन्हीं के आधार पर उन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इस पृथकता के मूल में एकता विद्यमान है। प्राण अनेक नहीं हैं। उसके विभिन्न प्रयोजनों में व्यवहार पद्धति ही अलग है।
इसी के आधार पर शास्त्रकारों ने इसे कई भागों में विभाजित किया है। कई नाम दिए हैं और कई तरह से व्याख्या की है। उसका औचित्य होते हुए भी इस भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं है कि प्राण तत्त्व कितने प्रकार का है। और इन प्रकारों में किस तरह की भिन्नता एवं विसंगतियाँ है। शास्त्रीय विभाजन के अनुसार प्राण को दस भागों में बाँटा गया है। इनमें 5 प्राण और 5 उप प्राण हैं। प्राणमय कोश इन्हीं दस के सम्मिश्रण से बनता है। 5 मुख्य प्राणों को 1. अपान, 2. समान, 3. प्राण, 4. उदान, 5. व्यान कहा गया है। 5 उपप्राणों को 1. देवदत्त, 2. वृकल, 3. कूर्म, 4. नाग एवं 5. धनंजय नाम दिया गया है।
इनके कार्यों का विवेचन कुछ इस तरह से है- 1. अपान- शरीर के मलों को बाहर फेंकता है। 2. समान- पाचक रसों का उत्पादन और उसके स्तर को उपयुक्त बनाए रखता है। 3. प्राण- श्वास प्रक्रिया के साथ शरीर में बल का संचार करता है। 4. उदान- जीवनी शक्ति के ऊर्ध्वगमन की अनेकों प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष क्रियाओं को नियंत्रित रखता है। 5. व्यान- सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो संवेदनाओं का संचार करता है। उपप्राणों के प्रकरण में 1. देवव्रत है जो मुखमण्डल एवं उनसे जुड़े हुए अवयवों का प्रहरी है। 2. वृकल का अधिकार क्षेत्र कण्ठ और उससे होने वाली क्रियाओं पर है। 3. कूर्म- उदर क्षेत्र के अवयवों की सार-संभाल करता है। 4. नाग- जननेन्द्रियों का अधिकारी है। कुण्डलिनी शक्ति एवं प्रजनन आदि पर इसी का नियंत्रण है। 5. धनंजय का कार्य क्षेत्र जंघाओं से एड़ी तक है। गतिशीलता, स्फूर्ति एवं अग्रगमन का उत्साह इसी की समुन्नत स्थिति का सुपरिणाम है।
प्राणशक्ति का यथा स्थान सन्तुलन बना रहे तो जीवन सत्ता के सभी अंग-प्रत्यंग ठीक तरह से काम करते रहते हैं। शरीर स्वस्थ रहेगा तो मन भी प्रसन्न रहेगा, अन्तःकरण में सद्भाव-सन्तोष झलकेगा। किन्तु यदि इस क्षेत्र में विसंगति-विकृति उत्पन्न होने लगे तो उसकी प्रतिक्रिया आधि-व्याधियों के रूप में, विपत्तियों, विभीषिकाओं के रूप में सामने खड़ी दिखाई देगी। प्राणतत्त्व में असन्तुलन होने पर शारीरिक अवयवों की क्रियाशीलता लड़खड़ाती है। मनःक्षेत्र में उत्पन्न हुआ प्राण विग्रह असन्तुलनों, आवेगों और उन्मादों के रूप में दिखाई देता है। भावना क्षेत्र में विकृत हुई प्राण सत्ता मनुष्य को नर कीटकों-नर पिशाचों के घिनौने गर्त में गिरा देती है। पतन के अनेकों आधार प्राणतत्त्व की विकृति से सम्बन्धित होते हैं।
प्राणमय कोश का प्राणयोग ही इन सब विकृतियों से उबारने का एक मात्र उपाय-उपचार है। प्राणयोग के अंतर्गत आसन-प्राणायाम-बन्ध, मुद्राओं की अनेकानेक प्रक्रियाएँ आती हैं। इन सभी में प्राणायाम को विशेष दर्जा दिया गया है। यह प्राणायाम साधारणतया श्वास-प्रश्वास का एक व्यायाम प्रतीत होता है। आरोग्यशास्त्री इसका उपयोग श्वास रोगों के उपचार के रूप में बताते हैं। लेकिन योग-साधकों के लिए प्राणायाम का इस तरह उपयोग बाल कक्षा मात्र है।
प्राणायाम का वास्तविक प्रयोजन तो निखिल ब्रह्मांड में व्याप्त प्राणतत्त्व की अभीष्ट मात्रा को आकर्षित करना है। तथा इस उपलब्धि को अभीष्ट संस्थानों में पहुँचाना है। प्रयोजन के अनुसार प्राणायाम के प्रकार अनेकों हैं। सभी का अपना-अपना महत्त्व है। प्राणमय कोश के जागरण के लिए इनमें से कोई सरल सुगम विधि- उदाहरण के लिए प्राणाकर्षण प्राणायाम अथवा सोऽहं प्राणायाम को अपनाया जा सकता है। इसमें जितना महत्त्व प्रक्रिया का है उससे कई गुना महत्त्व इसमें नियोजित की जाने वाली भावना का है।
प्राणयोग साँस के आवागमन की कोई विशेष तरकीब भर नहीं है। क्योंकि साँस को प्राण नहीं कह सकते। साँस के साथ प्राण घुला होना- साँस के सहारे प्राणतत्त्व को आकर्षित कर सकना एक बात है और मात्र श्वास-प्रश्वास क्रिया करना सर्वथा दूसरी। प्राणायाम में प्रबल संकल्पशक्ति का समावेश करना पड़ता है। उसी के चुम्बकत्व से व्यापक प्राणतत्त्व को अनन्त ब्रह्मांड से खींच सकने में सफलता मिलती है। फिर उस उपलब्धि को अभीष्ट स्थान पर भेजना और वाँछित परिणाम प्राप्त करना भी प्रबल संकल्प बल से ही सम्भव है। प्राणायाम की क्रिया के साथ प्रचण्ड संकल्प बल का समावेश करने पर प्राणयोग की साधना बन पड़ती है। इसी से वे चमत्कारी परिणाम मिलते हैं, जिनका प्राणविद्या के अंतर्गत वर्णन किया गया है। प्राणविद्या की इस साधना के पश्चात् ही मनोमय कोश के परिष्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।
‘मन का मंथन ही मनोमय कोश का ध्यान योग है।’ इस सूत्र वाक्य पर जितनी गहनता और गहराई से विचार किया जाएगा, मनोमय कोश की साधना विज्ञान उतना ही सुस्पष्ट होगा। मनोमय कोश की साधना का प्रारम्भ मानसिक क्षेत्र की धुलाई-सफाई से होता है। लेकिन बाद में इसका विस्तार उसे समुन्नत, सुसज्जित एवं सुसंस्कृत बनाने तक जा पहुँचता है। अतीन्द्रिय शक्तियों का विकास एवं दिव्य क्षमताओं का उभार भी इसी क्रम में होता है।
इसके लिए क्या किया जाय? इस प्रश्न के उत्तर में मनोमय कोश की साधना की योजना बनाकर अपने इर्द-गिर्द ऐसा दिव्य वातावरण बनाना है, जिसके संपर्क में अन्तरात्मा को दिव्य अनुभूतियों का रस मिलने लगे। होता यह है कि संसार की अवाँछनीय गतिविधियाँ ही अपने चारों ओर बिखरी दिखती हैं। जन समूह वासना, विलासिता, तृष्णा, अहंता को जीवन में सर्वोपरि स्थान देता है। वातावरण की इस विषाक्तता का प्रभाव मन पर पड़े बिना नहीं रहता और वह अनजाने ही इस प्रवाह में सम्मोहित की तरह बिना आगा-पीछा सोचे बहने लगता है।
यही क्रम चलता रहे तो मन का पतन के गहरे गर्त में समा जाना तय है। हिमालय के धवल शिखरों पर से नीचे उतर कर बहने वाली नदियाँ क्रमशः गंदली होती जाती हैं। और अन्ततः समुद्र में गिर कर खारी व अपेय बन जाती हैं। पतन का यही क्रम है। उसमें क्रमशः तीव्रता आती है। वही ढर्रा अभ्यास का अंग बन कर मनभावन बन जाता है। न उसमें परिवर्तन की चाहत जगती है और न आत्मोत्कर्ष की सम्भावनाएँ ही नजर आती हैं।
पतन क्रम को उत्कर्ष में किस प्रकार बदला जाय? इस प्रश्न का सुनिश्चित उत्तर एक ही हो सकता है कि वातावरण बदला जाय। मनोमयकोश की साधना के द्वारा हम ऐसी मनःस्थिति विनिर्मित करें जो परिस्थितियों को दिव्य बनाने में सहायक सिद्ध हो सके। ऐसा दिव्य लोक कहीं है नहीं, उसे अपनी साधना से स्वयं ही बनाना पड़ता है। किसी के अनुग्रह से यह कार्य जादू की छड़ी घुमाने जैसी किसी क्रिया-प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकता। मनोमय कोश के ध्यान योग से दिव्य लोक के परिष्कृत वातावरण का सृजन स्वयं ही करना पड़ता है। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तरह स्वयं विधाता बनने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं।
मनोमय कोश की साधना विधि के रूप में स्वाध्याय, सत्संग, मनन और चिन्तन की चतुर्विधि साधन सामग्री से सभी परिचित हैं। इससे अपने मनःक्षेत्र को घेरे रहने वाला उपयोगी वातावरण बनता है। लेकिन इन सबसे कहीं अधिक सर्वसुलभ और सर्वश्रेष्ठ उपाय है- ध्यान। मनोमयकोश के परिष्कार की यह सर्वोत्तम साधना विधि है। ध्यानमग्न होकर हम अपने ईष्ट के साथ श्रद्धासिक्त घनिष्ठता स्थापित करके तादात्म्य की दिशा में बढ़ते चले जाते हैं।
ध्यानयोग वस्तुतः ऐसी विधि है, जिससे हमारा मनोमय कोश स्वर्गीय नन्दनवन बन जाता है। इसका सृजन, सम्वर्द्धन, परिपोषण हम ध्यान के माध्यम से करते हैं। इसे परिपक्व करते हैं। ध्यान के चमत्कार से ही यह पत्र-पल्लवों से सजे हुए फल-फूलों से लदे हुए परम मंगलमय उद्यान का रूप ले लेता है। और तब मनोमयकोश में रमण करते हुए आनन्द और उल्लास की अनुभूति होती है। ध्यान की प्रक्रिया इस ऊबड़-खाबड़, बेढंगी-बेतुकी दुनिया को बहुत अच्छी, बहुत सुन्दर, बहुत सुरम्य परिस्थितियों से भरी-पूरी एक नई दुनिया में बदल देती है। ध्यान योग को यदि दिव्य तथ्यों और आदर्शों के अनुरूप सम्पन्न किया जा सके, तो समझना चाहिए कि मनोमय कोश को ऐसे दुर्ग का स्वरूप दे दिया गया, जिसमें बैठकर माया के दुष्ट अनुचरों से सहज ही बचा जा सकता है। और अपनी आत्मिक विशिष्टता को सुरक्षित रखा जा सकता है।
मन का मंथन ही ध्यान योग की सही विधि है। आत्म जिज्ञासा या ईष्ट प्रेम की मथनी लेकर जब मन को मथते हैं, तब ध्यान योग की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। शुरुआत के इस दौर में मन का तरंगित होना, चंचल होना, उद्वेलित होना सामान्य सी बात है। आखिर इसके बिना मंथन होगा भी तो कैसे? कुसंस्कारों के महाविष का निष्कासन इसी समय होता है। इस महाविष की ज्वाला से घबराकर प्रायः लोग कुछ समय के पश्चात् ध्यान साधना छोड़ बैठते हैं। पर यह उनकी भूल है। इस महाविष के शमन का उपाय ध्यान साधना का त्याग नहीं ईष्ट प्रेम या सद्गुरु भक्ति का शिवत्व है। इस अवस्था में सद्गुरु ही शिव के रूप में आकर कुसंस्कारों के महाविषय का त्रास मिटाते हैं। और देववृत्तियों को अभयदान देते हैं।
ध्यान योग के साधक को सद्गुरु की कृपा पर विश्वास रखकर मन के मंथन को उत्तरोत्तर तीव्र करते जाना चाहिए। विचारों, भावनाओं, आकाँक्षाओं, आस्थाओं को एक-एक करके ईष्ट प्रेम और सद्गुरु भक्ति के इर्द-गिर्द लपेटते जाना ही मनोमंथन है। इसके लिए मन की सतह से मन की गहराई में उतरना पड़ता है। इस क्रम में कुसंस्कारों के महाविष के बाद अतीन्द्रिय सामर्थ्य के रूप में अनेकों दिव्य रत्न प्रकट होते हैं। ध्यानयोग के साधक में अतीन्द्रिय सामर्थ्य का प्रकट होना एक सुनिश्चित तथ्य है। पर यह ध्यान का मध्य है उसका अन्त नहीं। दिव्य सामर्थ्य का उभार सिर्फ यह बताता है कि अब साधक का मनोमय कोश परिष्कृत हो चला है।
मनोमय कोश की इस परिष्कृत अवस्था में ही स्वर्ग लोक के द्वार खुलते हैं। गुरुदेव, गायत्री, सूर्य आदि भगवान् का कोई भी रूप क्यों न हो? साधना की इसी अवस्था में उनके दर्शन मिलते हैं। ध्यान योग से प्राप्त दिव्य नेत्रों से उनका पूजन-अभिवादन किया जाता है। निराकार के साधकों को साधना की इसी भावदशा में ज्योतिपुञ्ज के दर्शन होते हैं। उनमें अनेकानेक दिव्य एवं स्वर्गीय संवेदनाएँ इसी समय प्रकट होती हैं।
मनोमय कोश की साधना का कथा-विस्तार बहुत है। इसे यदि एक पंक्ति में कहा जाय तो यही होगा कि- नरक की ज्वालाओं से उबर कर स्वर्ग के नन्दनकानन में प्रवेश। इस पंक्ति की सच्चाई को कोई भी ध्यान योग के साधनात्मक प्रयोग से अनुभव कर सकता है। योगीराज श्यामा चरण लाहिड़ी महाशय के एक शिष्य ने उनसे पूछा- गुरुदेव योग साधना का रहस्य क्या है? तो उन्होंने उत्तर में मात्र एक शब्द कहा- ध्यान। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वे बोले ध्यान कल्पवृक्ष है। इसकी सुखद छाँव में जो कोई बैठता है, उसकी सभी कामनाएँ अपने आप ही पूरी हो जाती हैं। इतना ही नहीं वह कामनाओं के सभी रूपों से ऊपर उठकर आप्तकाम हो जाता है।
तभी तो एक अनुभवी साधक ने मनोमय की ध्यान साधना के बारे में कुछ यूँ कहा है-
मन ही मुक्ति, मन ही बंधन चूक न अब तू कर मन का मंथन तू ही अपना प्रश्न, और तू ही अपना उत्तर
शेष रही अब क्या जिज्ञासा ध्यान योग तेरी परिभाषा दुग्ध फिरे नवनीत ढूंढ़ता क्या यह मूढ़ प्रयास न खलता
डूब तनिक अपनी गहराई में छोड़ सभी चिन्ता उलझन केवल कर अब मन का मंथन।
मन की इसी और ऐसे ही मंथन से योग साधक विज्ञानमय कोश की भावभूमि में प्रवेश करता है।
विज्ञान का अर्थ है- विशेष ज्ञान। सामान्य ज्ञान के द्वारा हम लोक व्यवहार को, अपनी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक समस्याओं और समाधानों को जानते-समझते हैं। राजनीति, शिल्प, चिकित्सा, रसायन, संगीत आदि विविध विषयों की ज्ञान धाराएँ भी इसी सामान्य ज्ञान के दायरे में आती हैं। इसी के आधार पर हम सब का सामाजिक-साँसारिक जीवन चलता है।
किन्तु इसकी सीमा रेखा यहीं तक है। आत्मा का इससे थोड़ा सा भी हित नहीं सधता। साँसारिक ज्ञान व्यक्ति को धनवान, प्रतिष्ठित बनाने में सहायक होता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि ऐसे लोग आत्मिक दृष्टि से भी उच्च हों। कई महानुभाव आत्मा-परमात्मा के बारे में बहुत बातें करते हैं। ईश्वर, जीव, प्रकृति, योग, वेदान्त के बारे में ढेरों प्रवचन देकर भीड़ को लुभा लेते हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि उन्हें आत्म ज्ञान हो ही।
उपनिषदों में वरुण और भृगु की कथा में विज्ञानमय कोश के इस सत्य का बड़ी मार्मिक रीति से बखान किया गया है। भृगु पूर्ण विद्वान् थे। वेद-शास्त्रों का उन्हें भली-भाँति ज्ञान था। फिर भी उन्हें मालूम था कि वे आत्मज्ञान, विज्ञान से वंचित हैं। इस विज्ञान को पाने के लिए उन्होंने वरुण से प्रार्थना की। वरुण ने महर्षि भृगु को कोई शास्त्र नहीं सुनाया, कोई पुस्तक नहीं रटायी और न ही कोई प्रवचन सुनाया। बस उन्होंने एक बात कही- योग साधना करो। योग साधना करते हुए भृगु ने एक-एक कोश का परिष्कार करते हुए विज्ञान को प्राप्त किया।
इस सत्य कथा का सार यही है कि ज्ञान का दायरा सिर्फ जानकारी पाने-बटोरने तक सिमटा है। जबकि विज्ञान का एक और सिर्फ एक अर्थ- अनुभूति है। इसीलिए विज्ञानमय कोश की साधना को आत्मानुभूति योग भी कहा गया है। आत्मविद्या के सभी जिज्ञासु यह जानते हैं कि आत्मा अविनाशी है- परमात्मा का सनातन अंश है। परन्तु इस सामान्य जानकारी का एक लघु कण भी उनकी अनुभूति में नहीं होता। शरीर के लाभ के लिए आत्मा के लाभों की उपेक्षा प्रतिक्षण होती रहती है। दीनता, लालसा, तृष्णा हर घड़ी घेरे खड़ी रहती है।
विज्ञान इसी अंधेरे से हमें बचाता है। जिस भावभूमि में पहुँचकर जीव यह अनुभव करता है कि मैं शरीर नहीं वस्तुतः आत्मा ही हूँ। उस मनोभूमि को विज्ञानमय कोश कहते हैं। अन्नमय कोश में जब तक स्थिति रहती है तब तक अपने को स्त्री-पुरुष, मोटा-पतला, काला-गोरा आदि शारीरिक भेदों से पहचाना जाता है। प्राणमय कोश की स्थिति में गुणों के आधार पर स्वयं की पहचान होती है। मूर्ख, विद्वान्, वैज्ञानिक, कवि आदि की मान्यताएँ प्राणमय कोश की भूमिका में पनपती हैं। मनोमय कोश की भावदशा में मान्यताएँ स्वभाव के आधार पर बनती है। इस सबसे परे विज्ञानमय कोश की भावदशा है, इसमें पहुँचकर जीव को यह स्पष्ट अनुभव होने लगता है कि मैं ईश्वर का राजकुमार हूँ।
इस सत्य को देने में कोई भी समर्थ नहीं। यह देने वाले की असमर्थता का नहीं सत्य के जीवन्त होने का संकेत है। यह कोई वस्तु नहीं- जिसे दिया या लिया जा सके। यह तो जीवन्त अनुभूति है। और अनुभूति स्वयं ही पानी होती है। ध्यान रहे कि मृत वस्तुएँ ली या दी जा सकती हैं, अनुभूतियाँ नहीं। क्या वह प्रेम की अनुभूति जो कोई एक करता है, दूसरे के हाथों में रख सकता है? क्या वह सौंदर्य और संगीत किसी एक को अनुभव होता है, किसी दूसरे को हस्तान्तरित किया जा सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर एक ही है- नहीं-कभी नहीं। अनुभूतियाँ बाँटी नहीं जाती, उन्हें स्वयं अर्जित करना पड़ता है।
आत्मा के जगत् का सत्य यही है। यहाँ जो पाया जाता है, वह स्वयं ही पाया जाता है। आत्मा के जगत् में कोई ऋण सम्भव नहीं है। वहाँ कोई पर-निर्भरता सम्भव नहीं। किसी दूसरे के पैरों पर वहाँ नहीं चला जा सकता। स्वयं के अतिरिक्त वहाँ कोई भी शरण नहीं है। विज्ञानमय कोश के आत्मानुभूति योग का यही रहस्य है। इस आत्मानुभूति की साधना को निम्न बिन्दुओं में समझा जा सकता है-
1. किसी शान्त, एकान्त, कोलाहल रहित स्थान का साधना के लिए चुनाव करके, हाथ-मुँह धोकर सुविधापूर्वक साधना में बैठना चाहिए। अधिक देर बैठने में दिक्कत हो तो इसे लेट कर भी किया जा सकता है।
2. पाँच बार गहरे-लम्बे श्वास लें, भावना यह रहे कि पाँचों कोश शुद्ध हो रहे हैं, इसके बाद शरीर के अंग-प्रत्यंगों को शिथिल करें। भावना यह रहे कि सारे शरीर में एक शान्त नीला आकाश व्याप्त हो रहा है। ऐसी शान्त शिथिल अवस्था कुछ दिनों की साधना के उपरान्त प्राप्त हो जाती है। इसके बाद हृदय-स्थान में अंगूठे के बराबर शुभ्र-श्वेत ज्योति स्वरूप प्राण शक्ति का ध्यान करना चाहिए- भावना यह रहे- मैं शुद्ध, बुद्ध, चैतन्य अविनाशी आत्मा हूँ।
इस अवस्था के प्रगाढ़ अनुभव के बाद आगे की सीढ़ी पर पाँव रखना चाहिए। अगली भूमिका का साधनाभ्यास निम्न है-
3. उपरोक्त पंक्तियों में दिए गए विवरण के अनुसार पहले स्वयं को शिथिलावस्था में लाएँ। फिर उस अवस्था में अखिल आकाश में नीलवर्ण आकाश का ध्यान प्रारम्भ करें। ध्यान की इस प्रक्रिया में उस आकाश में बहुत ऊपर सूर्य के समान ज्योति स्वरूप आत्मा को अवस्थित देखते हुए यह सुनिश्चित संकल्प करें- मैं ही यह प्रकाशवान आत्मा हूँ। भाव की इस प्रगाढ़ता में अनुभव करें कि अपना शरीर नीचे भूतल पर निस्पन्द अवस्था में पड़ा हुआ है। उसका प्रत्येक अंग-प्रत्यंग मेरी आत्मा के उपकरण से अधिक और कुछ भी नहीं। शरीर और है ही क्या- आत्मा के वस्त्र के सिवा। शरीर रूपी यह वस्त्र अथवा यंत्र मेरी आत्मा की शक्तियों की अभिव्यक्ति के लिए मिला है। ध्यान की इसी प्रगाढ़ता में इस निस्पन्द शरीर में खोपड़ी का ढक्कन उठाकर मन और बुद्धि को दो सेवक शक्तियों के रूप में अनुभव करें। अनुभूति के इन क्षणों में देखें- कि ये दोनों ही विनम्रभाव से आत्मा की आज्ञा मानने के लिए तत्पर हैं। इस अनुभूति की गहनता में यह संकल्प करें कि शरीर, मन और बुद्धि मेरी आत्मा के सेवक हैं। मैं उनका उपयोग केवल आत्म कल्याण के लिए ही करूंगा।
इस दूसरी अवस्था में ध्यान जब सहजता से होने लगे। इसमें उभरी भावनाएँ जब समूचे अस्तित्व में रम जाए तो आत्मानुभूतियोग की तीसरी अवस्था में कदम बढ़ाना चाहिए।
4. इसमें स्वयं को आकाश में अवस्थित सूर्य के रूप में अनुभव करें। अनुभूति के इन पलों में यह बोध प्रगाढ़ हो कि ‘मैं समस्त भू मण्डल पर अपनी प्रकाश किरणें फेंक रहा हूँ। समूचा संसार मेरा कर्मक्षेत्र और लीलाभूमि है। भूतल की समस्त वस्तुओं और शक्तियों को ‘मैं’ अपने इच्छित प्रयोजनों के लिए काम में लाता हूँ। पर ये मेरे ऊपर अपना कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। पञ्चमहाभूतों में जो भी क्रिया-प्रतिक्रिया, हलचलें हो रही हैं, वे मेरे मनोरंजन विनोद मात्र हैं। साँसारिक हानि-लाभ मुझे प्रेरित, प्रभावित नहीं कर सकते। मैं शुद्ध, चैतन्य, सत्यस्वरूप, पवित्र, निर्लेप, अविनाशी आत्मा हूँ। मैं परमात्मा का अभिन्न अंश हूँ।’
इस भाव भूमि में जब अपनी स्थिति प्रगाढ़ हो जाय और हर घड़ी जब यही भावना रोम-रोम से झरने लगे तो समझना चाहिए कि विज्ञानमय कोश का आत्मानुभूतियोग सध गया। इसमें सिद्धि मिलने के पश्चात् ही आनन्दमय कोश की साधना और सिद्धि के पल आते हैं।
ईश्वर आनन्द स्वरूप है। उसके अविनाशी अंश जीव के कण-कण में भी आनन्द परिव्याप्त है। ईश्वर की चिर संगिनी प्रकृति में सौंदर्य और सुविधा प्रदान करने की आनन्दमयी विशिष्टता भरी पड़ी है। यहाँ सर्वत्र आनन्द ही आनन्द है। आनन्द का यह कोश हममें से हर एक को असीम मात्रा में, सहज सुखद रूप से उपलब्ध है। निश्चित रूप से जीवन आनन्दमय है और हम सब आनन्दमय लोक में रह रहे हैं। इस अपरिमित सौभाग्य के साथ दुर्भाग्य भी लगभग वैसा ही है- जैसा कि बाबा कबीर अपनी एक उलटबाँसी में कह गए हैं-
पानी बिच मीन पियासी। मोहि लखि-लखि आवे हाँसी॥
यह उलटबाँसी सुनने में उलटी है, पर समझने में बड़ी सीधी और सच। आनन्दमय लोक में रहते हुए भी हममें से प्रायः सभी आनन्द से वंचित हैं। यह सच्चाई कुछ वैसी ही है, जैसे कोई व्यक्ति अपने घर का ताला बन्द करके कहीं चला जाय। और लौटने पर चाभी गुम हो जाने के कारण बाहर बैठा ठण्ड में सिकुड़े और दुःख भोगे। ठीक ऐसी ही दशा अपनी भी है। आनन्दमय कोश अपने में ही है। पर इसकी चाभी खो जाने के कारण रहना पड़ रहा है निरानन्द स्थिति में। कैसी विचित्र स्थिति है? कैसी विडम्बना है? यह अपने ही साथ अपना कितना विलक्षण उपहास है।
आनन्दमय कोश की साधना इसी दुःखद दुर्भाग्य को समाप्त करने के लिए है। इस साधना के बल पर उस ताले को खोला जा सकता है, जिसमें उल्लास का अजस्र भण्डार भरा पड़ा है। यह कार्य ईश्वर और जीव के मिलन की विधि-व्यवस्था बनाकर, रीति-नीति अपनाकर ही सम्भव हो सकता है। पंचकोशों की साधना के उच्चस्तर पर पहुँचकर इसी चाभी को ढूंढ़ना पड़ता है। और ताले को खोलने की जुगत बिठानी पड़ती है। जो इसे कर सका, उसे फिर यह नहीं कहना पड़ेगा कि हमारा जीवन निरानन्द और नीरस है। आनन्दमय कोश में समाया खजाना हाथ में लगते ही दुःख और दुर्भाग्य हजारों-हजार कोस दूर भाग खड़े होते हैं।
आनन्दमय कोश की साधना का स्वरूप ईश्वर और जीव के मिलन की व्यवस्था है। आमतौर पर हम ईश्वर के नाम भर से परिचित हैं। जब-तब उसका नाम ले भी लेते हैं। इस क्रम में दो-चार माला का जप या फिर लम्बे-चौड़े अनुष्ठान-उपवास भी किये जाते हैं। पर इन सबके पीछे मकसद यह नहीं होता है कि स्वयं को पूर्णतया भगवान् को दे डालें। प्रभु में अपने को विसर्जित कर दें। इस विसर्जन का, समर्पण का, समन्वय का कितना सुखद परिणाम हो सकता है, इसकी कभी कल्पना भी नहीं आती।
हाँ यह जरूर होता है कि पूजा-पत्री के बहाने हम भगवान् से क्या लूट-खसोट लें। जिस-किसी तरह भगवान् को बहला-फुसलाकर उनसे अपनी मनोकामनाएँ पूरी करा लें। ऐसे लोग आनन्दमय कोश का दुर्लभ खजाना कभी नहीं पा सकते। आनन्दमय कोश की साधना तो उनके लिए है- जो अपना समग्र समर्पण भगवान् के चरणों में करने के लिए आतुर-आकुल रहते हैं। आनन्दमय कोश की साधना का यही स्वरूप है। यह जहाँ भी अपने वास्तविक रूप में सम्पन्न होगी, वहाँ निश्चित रूप से आनन्दमय कोश का अमृत कलश छलक रहा होगा। स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनी होंगी। उल्लास बिखरा पड़ा होगा, सन्तोष की सुखद वायु बह रही होगी।
आनन्द का स्वरूप, आधार और स्थान मालुम पड़ जाने पर यह बात निश्चित हो जाती है कि क्या करने से क्या मिलेगा? यह निश्चित हो जाना, भगवान् के प्रति सच्चे समर्पण का भाव जाग्रत् हो जाना ही तत्त्वज्ञान है। इस तत्त्वज्ञान से ही आत्मिक समस्याओं का समाधान होता है। आत्मा की उलझनें समर्पण की इसी गहरी भाव दशा में सुलझती हैं। आनन्द प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम इसी आन्तरिक समाधान और दिशा निर्धारण का प्रयत्न करना पड़ता है। समाधि इसी स्थिति का नाम है। आनन्द की उपलब्धि के लिए सबसे पहले इसी हेतु प्रयत्न किया जाता है।
आमतौर पर समाधि का मतलब एक तरह की बेहोशी से माना जाता है। हठयोग के अंतर्गत ऐसे प्रयोग भी हैं, जिनमें श्वास क्रिया रुकती और हृदय की धड़कन घटती है। वैसी दशा में चेतना निःचेष्ट होकर बहुत समय तक पड़ी रहती है। पर आनन्दमय कोश के साधकों के लिए समाधि यह है, जिसमें चिन्तन की दिशा, आकाँक्षाएँ और विचारणाएँ सभी भगवान् के चरणों में अर्पित, समर्पित होने के लिए बह चलें। यह जाग्रत् समाधि है, जो एक केन्द्र पर सोचते रहने की मानसिक विधि नहीं, वरन् लक्ष्य का सुनिश्चित निर्धारण और अभिगमन है।
समाधि की आन्तरिक स्थिरता प्राप्त होने पर योगी का दृष्टिकोण परिष्कृत होता है। ऐसी दशा में विधेयात्मक एवं गुणग्राही चिन्तन अपने आप ही पनपता है। सृष्टि में यों कुरूपता भी विद्यमान है और मनुष्य में तामसिकता के अंश भी मौजूद हैं। पर समाधि का भाव प्रगाढ़ता होते ही मन-मस्तिष्क में अपने आप ही एक सात्त्विक उत्साह छा जाता है। और एक नूतन सौंदर्य दृष्टि विकसित हो जाती है। जिससे अपने आप ही विश्व व्यापी सौंदर्य के दर्शन होने लगते हैं। पदार्थों और प्राणियों में शिवत्व की झाँकी मिलती है। अपने आस-पास सर्वत्र स्वर्ग की उपस्थिति ही प्रतिभासित होती है।
समाधि और स्वर्ग के बाद आनन्दमय कोश की तीसरी उपलब्धि है मोक्ष। मोक्ष का वास्तविक अर्थ है- आत्म सत्ता को भौतिक न मानकर विशुद्ध चेतन तत्त्व के रूप में अनुभव करने लगना। इस मोक्ष की अवस्था में ही वास्तविक आनन्द भी है। सच यही है कि आत्मा आनन्द चाहती है पूर्ण आनन्द, क्योंकि तभी सभी चाहों में विराम आ सकता है। जहाँ चाह है वहाँ दुःख है, क्योंकि वहाँ अभाव है। आत्मा सब अभावों का अभाव चाहती है। अभावों का पूर्ण अभाव ही आनन्द है और वही परम स्वतंत्रता भी है, मुक्ति भी। क्योंकि जहाँ कोई भी अभाव है, वहीं बन्धन है, सीमा है और परतन्त्रता है। अभाव जहाँ नहीं है, वहीं परम मुक्ति में प्रवेश है।
मोक्ष की इस अवस्था में इस रस का स्वाद मिलता है कि आनन्द की अनुभूति पदार्थों में, भौतिक साधनों में असम्भव है, वह तो आनन्दमय कोश में सहज ही उपलब्ध है। यह आनन्द ही मोक्ष है और मुक्ति आनन्द है। यही हमारी परम आकाँक्षा भी है। निश्चय ही जो परम आकाँक्षा है, वह बीज रूप में प्रत्येक में सोयी होती है। क्योंकि जिस बीज में वृक्ष न छिपा हो, उसमें अंकुर भी नहीं आ सकता। हमारी जो चरम कामना है, वही हमारा अत्यान्तिक स्वरूप भी है। क्योंकि स्वरूप ही अपने पूर्ण विकास में आनन्द और मोक्ष के रूप में परिणित हो सकता है। आनंदमय कोश की भाव साधना में यही सत्य निहित है। और उसकी पूर्ण उपलब्धि ही जीवन में सन्तोष लाती है। इस सन्तोष की प्रगाढ़ता ही योग के आधार को प्रगाढ़ एवं पुष्ट करती है।.
चक्र संस्थान के मूल में स्थित रहने के कारण मूलाधार चक्र-योग का आधार है। इससे हमारे समूचे अस्तित्व का मूल प्रभावित होता है। जीवन के स्पन्दन स्थूल देह के माध्यम से ही ऊपर की ओर बढ़ते हैं और सहस्रार में पहुँचकर व्यक्तित्व के जागरण की चरम सीमा के रूप में बदल जाते हैं। साँख्य दर्शन में मूलाधार को मूल प्रकृति कहा गया है। बात सही भी है, सम्पूर्ण संसार और सभी साँसारिक पदार्थों का एक आधार तो होगा ही, जहाँ से उसका विकास प्रारम्भ होता है और जहाँ विनाश के पश्चात् उनका वापस विलय हो जाता है। सब तरह के विकास का मूल स्रोत मूल प्रकृति है। मूल प्रकृति के आधार के रूप में मूलाधार ही बाह्यजगत की सम्पूर्ण संरचना के लिए उत्तरदायी है।
योग और तन्त्र विज्ञान के अनुभवी साधकों के अनुसार मूलाधार कुण्डलिनी शक्ति का वह स्थान है, जहाँ उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों के प्रकटीकरण की अपार क्षमताएँ समायी हैं। अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार यह बड़ी शक्ति एक कुण्डली मारे सर्प के रूप में सुप्तावस्था में है। जब यह शक्ति जाग्रत् होती है, तो सुषुम्ना के माध्यम से ऊपर की ओर तब तक बढ़ती है जब तक कि आत्मज्ञान की चरम अनुभूति के स्रोत सहस्रार तक न पहुँच जाए। इसीलिए योग साधना में मूलाधार चक्र के जागरण का बहुत अधिक महत्त्व है।
यह मूलाधार चक्र पुरुषों में पेरीनियम के थोड़ा अन्दर अण्डकोश और गुदा के बीच में स्थित होता है। यह उस तंत्रिका समूह का आन्तरिक पक्ष है, जो सब तरह की संवेदनाओं को ले जाने का काम करती है। महिलाओं में इस चक्र का स्थान गर्भाशय ग्रीवा के पिछले हिस्से में होता है।
पुरुषों और महिलाओं दोनों के शरीर में गाँठ की तरह एक अवशेषी ग्रन्थी पायी जाती है। शरीर विज्ञानियों एवं चिकित्साशास्त्रियों के मत में यह एक अवशेषी अंग भर है। परन्तु योग शास्त्र इस गाँठ या कन्द को ब्रह्म ग्रन्थि का नाम देते हैं। योगियों के अनुसार जब तक यह गाँठ बंधी रहती है, तब तक इस क्षेत्र की शक्ति अवरुद्ध रहती है। जैसे ही यह गाँठ खुलती है, वैसे ही शक्ति जाग्रत् हो जाती है। जब योग साधक पशु योनि की अपेक्षा अधिक शक्ति से उच्च दिव्य चेतना की सम्भावनाओं को जाग्रत् करने के लिए साधनारत होता है, तो यह ब्रह्म ग्रन्थि ढीली होने लगती है। जैसे-जैसे साधक में शक्ति का जागरण होता जाता है, वैसे-वैसे मूल केन्द्र से चेतना मुक्त होने लगती है।
योग और तन्त्र शास्त्रों में मूलाधार की संरचना एवं शक्तियों को प्रतीक रूप में दर्शाया गया है। यह प्रतीक एक गहरे लाल रंग का चार पंखुड़ियों वाला कमल है। प्रत्येक पंखुड़ी में वं, शं, षं, सं अंकित है। बीच में पीले रंग का एक वर्ग है- जो पृथ्वी तत्त्व का बोध कराता है। यह वर्ग चारों ओर से आठ सुनहरे बरछों से घिरा है, जिनमें से चार तो कोनों में और चार मूलभूत केन्द्रों में है।
पृथ्वी तत्त्व का बोध कराने वाला सुनहरा-पीला वर्ग एक ऐसे हाथी के ऊपर स्थित है, जिसकी सात सूड़ें हैं। हाथी पृथ्वी का सबसे बड़ा मजबूत और शक्तिशाली पशु है। यही मूलाधार चक्र में समायी शक्ति की विशेषता है। यहाँ सोई हुई शक्ति भी पूर्ण रूपेण स्थायी एवं ठोस स्थान में शान्त पड़ी है। हाथी की सात सूड़ें सात खनिजों की प्रतीक है। जिनकी अनिवार्यता स्थूल शरीर को क्रियाशील बनाए रखने के लिए आयुर्वेद शास्त्र में इन्हें सप्तधातु कहा गया है।
संस्कृत भाषा में ‘स्व’ का अर्थ है- ‘अपना’ और ‘अधिष्ठान’ का तात्पर्य है- ‘रहने का स्थान’। इस तरह स्वाधिष्ठान का शाब्दिक अर्थ है- ‘अपने रहने का स्थान’। यह चक्र मूलाधार के ठीक ऊपर स्थित है। इसका सम्बन्ध स्थूल शरीर में प्रजनन तथा मूल संस्थान से है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से यह प्रोस्टेट ग्रन्थि के स्नायुओं से सम्बन्धित है। इसकी स्थिति हड्डी के नीचे काक्सिक्स के स्तर पर अनुभव की गई है। दरअसल यह हड्डियों के एक छोटे बल्ब की तरह है जो गुदाद्वार के ठीक ऊपर है। पुरुषों और स्त्रियों दोनों में ही इसकी स्थिति मूलाधार के अत्यन्त नजदीक है।
योग साधना की दृष्टि से स्वाधिष्ठान चक्र को व्यक्ति के अस्तित्व का आधार माना गया है। मस्तिष्क में इसका प्रतिरूप अचेतन मन है। जो संस्कारों का भरा-पूरा भण्डार है। अध्यात्मवेत्ताओं का मानना है कि प्रत्येक कर्म, पिछला जीवन, पिछले अनुभव, अचेतन में संगृहीत रहते हैं। इन सभी का प्रतीक स्वाधिष्ठान चक्र ही है। तंत्र शास्त्रों में ‘पशु’ तथा ‘पशु का नियंत्रण’ जैसी एक धारणा है- सभी पाशविक प्रवृत्तियों का नियंत्रणकर्त्ता। यह भगवान् शिव का एक नाम और स्वाधिष्ठान चक्र का एक गुण है। इन अर्थों में स्वाधिष्ठान चक्र की साधना का अर्थ है पाशविक प्रवृत्तियों का नियंत्रण एवं उन्मूलन एवं देववृत्तियों का विकास।
योगशास्त्रों में स्वाधिष्ठान चक्र के स्वरूप एवं इसकी शक्तियों का रहस्य प्रतीकात्मक ढंग से समझाया गया है। इस विवरण के अनुसार स्वाधिष्ठान का रंग काला है। क्योंकि यह अचेतन का प्रतीक है। हालाँकि इसे छः पंखुड़ियों के सिन्दूरी कमल के रूप में चित्रित किया जाता है। हर पंखुड़ी पर बं, भं, मं, यं, रं और लं चमकीले रंगों में अंकित है।
इस चक्र का तत्त्व पानी है और इसका प्रतीक है- कमल के अन्दर एक सफेद अर्धचन्द्र। यह अर्धचन्द्रमा दो वृत्तों से मिलकर बना है, जिनसे दो यंत्रों की संरचना होती है। बड़े वृत्त से बाहर की ओर पंखुड़ियाँ निकलती हुई दिखाई देती है, जो भौतिक चेतना की प्रतीक हैं। अर्धचन्द्र के अन्दर वाले छोटे वृत्त में उसी प्रकार की अन्य पंखुड़ियाँ भी हैं। पर वे केन्द्र की तरह मुड़ी हैं। यह आकार विहीन कर्मों के भण्डार का प्रतीक हैं। अर्धचन्द्र के अन्दर स्थित इन दोनों यंत्रों को श्वेत रंग का एक मगर अलग-अलग करता है। यह ‘मगर’ अचेतन जीवन की सम्पूर्ण मनोलीला का माध्यम है। इसे सुप्तकर्मों के प्रतीक के रूप में भी अनुभव किया जा सकता है। वं बीज मंत्र इस मगर के ऊपर अंकित है।
मंत्र के बिन्दु के अन्दर भगवान् विष्णु एवं देवी राकिनी का निवास है। यहाँ भगवान् विष्णु अपने चतुर्भुज रूप में पीताम्बर पहने अत्यन्त मनमोहक रूप में सुशोभित हैं। देवी राकिनी का रंग नीले कमल की तरह है एवं वे दिव्य वस्त्र एवं आभूषणों से सजी हैं। ऊपर उठे हुए उनके हाथों में अनेक शस्त्र हैं। अमृतपान करने से उनका मन अतीत आनन्दित हैं। देवी राकिनी वनस्पतियों की अधिष्ठतृ शक्ति हैं। स्वाधिष्ठान चक्र का वनस्पति जगत् से निकटतम सम्बन्ध है, इसलिए इसकी साधना में शाकाहार को अत्यन्त सहायक माना गया है।
स्वाधिष्ठान चक्र का सम्बन्ध भुवः लोक से है। यह आध्यात्मिक जागृति का मध्य स्तर है। स्वाद की तन्मात्रा एवं संवेदना का इससे घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसकी ज्ञानेन्द्रिय जीभ है। और कर्मेन्द्रियाँ ‘किडनी’, मूत्र संस्थान, एवं यौन अवयव हैं। योग साधकों का अनुभव है कि स्वाधिष्ठान चक्र की साधना करके साधक अपनी आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों जैसे- काम, क्रोध, लालच, लोभ आदि से तुरन्त मुक्त हो जाता है।
स्वाधिष्ठान चक्र के जागरण की साधना अत्यन्त कठिन एवं दुष्कर है। किन्तु साधक यदि विवेकवान व वैराग्य सम्पन्न है, तो यह उतनी ही सुगम एवं सरल भी है। साधना के इस तल पर सभी अवशेष कर्म तथा नकारात्मक संस्कारों का निष्कासन प्रारम्भ हो जाता है। इस समय क्रोध, भय, यौन विकृतियाँ तथा दूसरी तरह की कामनाएँ, वासनाएँ उफनने-उमगने लगती हैं। सभी प्रकार की तामसिक वृत्तियों, तंद्रा, अकर्मण्यता तथा निराशा आदि के बवण्डर इसी दौरान पनपते हैं। इस समय हमेशा ही सोते रहने की इच्छा जोर मारती है। साधना की यह स्थिति शोधन काल कहलाती है। यदि महान् साधकों, योगियों की जीवनी पढ़ी जाय तो पला चलता है कि साधना के इस स्तर को पार करते समय उन्हें बहुत अधिक अशान्ति व मोह-माया का सामना करना पड़ा था।
भगवान् बुद्ध जब आत्मज्ञान के लिए बोधिवृक्ष के नीचे बैठे थे, तो उनके पास ‘मार’ आया था। इस ‘मार’ ने उन्हें तरह-तरह से सताया और प्रलोभन भी दिए। बौद्ध ग्रन्थों की ही भाँति बाइबिल में भी ऐसी कथाएँ हैं। जिनमें शैतान का और उसकी अनगिनत गतिविधियों का वर्णन किया गया है। ये मार और शैतान दो नहीं एक ही हैं। और इनकी उपस्थिति कहीं बाहर नहीं बल्कि अपने ही अन्दर होती है। इनका अस्तित्व व्यक्तित्व के अत्यन्त गहन स्तर पर मौजूद है। और इनमें माया उत्पन्न करने की क्षमता है। बौद्ध परम्परा में ‘माया’ को एक बड़े सर्प, बहुत बड़े-बड़े दाँतों वाली एक विकृत आकृति या एक बहुत सुन्दर नग्न स्त्री के रूप में दिखाया-दर्शाया गया है। जो योग-साधक को अपने बाहुपाश में लेने के लिए मंडरा रही है। इसमें कोई शक नहीं कि ये सभी प्रतीक रहस्यात्मक हैं। परन्तु इन्हें कोरी कल्पना नहीं समझना चाहिए। जिन्होंने स्वाधिष्ठान चक्र की साधना की है, वे इनकी वास्तविकताओं से भली-भाँति परिचित हैं।
ध्यान रहे कि प्रचण्ड साहसी एवं महासंकल्पवान् साधक ही स्वाधिष्ठान चक्र का जागरण एवं परिशोधन करने में समर्थ हो पाते हैं। प्रत्येक योग साधक को इस विशिष्ट अनुभूति के स्तर को, जो जीवन के रहस्यों के अन्तिम विस्फोट की भाँति होता है, पार करना ही पड़ता है। जो स्वाधिष्ठान चक्र की साधना के अनुभवों से परिचित हैं, उन्हें मालूम होगा कि मानव के जन्म-मरण की समस्या का प्रगाढ़ सम्बन्ध यहीं से है। इस चक्र की साधना करते समय यद्यपि कामनाओं और वासनाओं के संकट अनेक हैं, फिर भी गुरुकृपा, संकल्प शक्ति, आध्यात्मिक मार्ग में लगनशीलता, जीवन लक्ष्य के प्रति समर्पण व आत्मशोधन की प्रक्रिया एवं इसकी अनुभूतियों को ठीक से समझ कर साधक इस चक्र की साधना में उत्तीर्ण हो सकता है।
स्वाधिष्ठान चक्र की साधना यथार्थ में विवेक और वैराग्य की साधना है। और यह वैराग्य बौद्धिक नहीं वास्तविक एवं आन्तरिक होना चाहिए। योग साधक के मन में यह भाव होना चाहिए कि जीवन के सुखों का कोई अन्त नहीं। इच्छाओं को क्या कोई कभी पूरा कर सका है? भला कामनाओं, वासनाओं की अग्नि को विषय भोगों के घृत से आज तक कौन बुझा पाया है? यदि ये सच्चाई है- तो फिर आज और अभी ही क्यों न विषयासक्ति से नाता तुड़ा लिया जाय।
जो योग साधक अपने सद्गुरु की कृपा से इस सत्य से परिचित हैं कि कामनाएँ एक क्या एक हजार जन्मों में भी पूरी नहीं की जा सकती हैं। तो स्वाधिष्ठान चक्र की साधना बिना किसी विघ्न-बाधा के पूरी हो जाती है। और यदि साधक में इस ज्ञान का अभाव है तो उसके लिए स्वाधिष्ठान चक्र एक अभेद्य लोहे की दीवार की तरह से होता है, जिसे किसी भी जन्म में कोई भी पार नहीं कर सकता। ‘सद्गुरु कृपा ही केवलं’ यही स्वाधिष्ठान चक्र की साधना का मूलमंत्र है। जिसकी सहायता से साधक को इससे आगे मणिपुर चक्र की साधना का अवसर मिलता है।
मणिपुर का शाब्दिक अर्थ है- मणियों का नगर। तिब्बतीय परम्परा में इस चक्र को ‘मणिपद्म’ भी कहते हैं। जिसका अर्थ है- मणियों का कमल। चक्र संस्थान में इसका अपना विशेष स्थान है। यह सक्रियता, शक्ति, इच्छा तथा उपलब्धियों का केन्द्र है। योगियों ने इसकी तुलना सूर्य के तेज एवं ऊष्मा से भी की है। उनका मानना है कि जिस प्रकार सूर्य के अभाव में विश्व में जीवन का अस्तित्व सम्भव नहीं है। ठीक उसी तरह मणिपुर चक्र भी विभिन्न अवयवों, संस्थानों तथा जीवन की प्रक्रियाओं को नियमित करता है। इतना ही नहीं यह सम्पूर्ण शरीर प्राण ऊर्जा के प्रवाह का दायित्व वहन करता है।
इस चक्र का जितना महत्त्व स्थूल जीवन के क्रिया-कलापों के लिए है- उससे कहीं अधिक महत्त्व इसका सूक्ष्म चेतना के लिए है। भौतिक जगत् एवं भाव जगत् के बाद तीसरा जगत् है- सूक्ष्म जगत्। जिससे सम्बन्धित शरीर को योगशास्त्रों में सूक्ष्म शरीर कहा गया है। इस शरीर का बीज स्थान यही मणिपुर चक्र है। सूक्ष्म तल पर इसकी दो सम्भावनाएँ हैं। प्रथम है- सन्देह और विचार। दूसरी है-श्रद्धा और विवेक। पहली सम्भावना प्रकृति ने सभी को स्वाभाविक रूप से दी है। दूसरी मणिपुर चक्र की साधना का परिणाम है। जिसके फलस्वरूप सन्देह का रूपांतर श्रद्धा में होता है। और विचार-विवेक में रूपांतरित हो जाता है।
मणिपुर चक्र की निष्क्रिय व निस्तेज अवस्था में सन्देह एवं शंका व्यक्ति का स्वभाव बन जाते हैं। ऐसा व्यक्ति व्याधियों व अवसाद से ग्रस्त हो जाता है। उसमें प्रेरणा की कमी एवं अपने उत्तरदायित्वों के प्रति लापरवाही देखने को मिलती है। इसलिए मणिपुर चक्र की साधना योग साधकों के लिए तो महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है ही, साथ ही यह उनके लिए भी उपयोगी है, जो जीवन के सम्पूर्ण आनन्द की अनुभूति के लिए उत्सुक हैं।
यह चक्र नाभि के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी में स्थित है। अपनी इसी शारीरिक स्थिति के कारण इसे नाभिचक्र भी कहा जाता है। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार इस चक्र का सम्बन्ध सौर जालिका से है। जो पाचन क्रिया तथा शारीरिक ताप को नियंत्रित करती है। योग साधना की बौद्ध परम्परा में इस चक्र को समूची साधना का आधार माना गया है। बौद्ध साधकों में प्रचलित महामंत्र ‘ॐ मणिपद्मेहुँ’ प्रकारान्तर से इस चक्र के जागरण की ही साधना है।
योगशास्त्रों में मणिपुर चक्र के प्रतीकात्मक रहस्य को बड़ी अद्भुत रीति से दिखाया-दर्शाया गया है। इसके अनुसार दस पंखुड़ियों वाला एक चमकदार पीला कमल मणिपुर का प्रतीक है। कतिपय तन्त्रशास्त्र इस कमल की पंखुड़ियों के रंग को भूरे बादल की तरह बताते हैं। इनमें से प्रत्येक पंखुड़ी पर नील कमल के रंग में डं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं और फं अंकित है। कमल के मध्य में अग्नि का क्षेत्र है, जो एक गहरे लाल रंग का उल्टा त्रिकोण है। यह उगते हुए सूर्य की भाँति चमकदार है। त्रिकोण की प्रत्येक भुजा पर ‘ञ्ज’ के आकार के स्वास्तिक बने हैं।
इस त्रिकोण के नीचे भेड़ स्थित है। यह भेड़ मणिपुर की वाहक तथा क्रियाशीलता व अदम्य धैर्य का प्रतीक है। भेड़ के ऊपर मणिपुर का बीज मंत्र ‘रं’ है। उसके बिन्दु में देव रुद्र और देवी लाकिनी का निवास है। रुद्र देव शुद्ध सिंदूरी वर्ण के हैं और उनके पूरे शरीर में विभूति लिपटी है। उनकी तीन आँखें हैं। देवी लाकिनी सब का उपकार करने वाली हैं। उनके चार हाथ हैं, रंग काला और शरीर कान्तिमय है। उनके वस्त्र पीले हैं। वह अनेकानेक आभूषणों से सजी हुई और अमृतपान के कारण आनन्दमग्न है।
मणिपुर चक्र की तन्मात्रा दृश्य है। आँखें इसकी ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और पाँव कर्मेन्द्रियाँ हैं। इन दोनों ही इन्द्रियों का पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध है। क्योंकि व्यक्ति पहले देखता है- फिर क्रियाशील होता है। मणिपुर का लोक स्वः है। जो अस्तित्व का स्वर्गीय स्तर है। यह नश्वर जगत् की अन्तिम सीढ़ी है। हालाँकि यह प्रायः रजोगुणी है, जबकि निम्न चक्रों में जड़ता या तमोगुण ही विद्यमान रहता है। अग्नि इसका प्रधान तत्त्व है।
योग साधकों की अनुभूति है कि बिन्दु में स्थित चन्द्रमा से मणिपुर चक्र में अमृत झरता है। यह अमृत यहाँ स्थित सूर्य का आहार बनता है। यह प्रक्रिया ही जीवन के ह्रास का कारण बनती है। जिसका परिणाम बीमारी, वृद्धावस्था और मृत्यु के रूप में सामने आता है। मणिपुर चक्र की साधना से इस आत्मघाती प्रक्रिया पर रोक लगायी जा सकती है। इस योग साधना से प्राण ऊर्जा मणिपुर द्वार पुनः मस्तिष्क में वापस भेज दी जाती है। इस चक्र की साधना के अभाव में साँसारिक भोगों में ही जीवन की ऊर्जा क्षय हो जाती है। जबकि साधना द्वारा यदि इस चक्र को शुद्ध एवं जाग्रत् कर लिया जाय तो शरीर व्याधि रहित एवं कान्तिमय हो जाता है। साथ ही योगी की चेतना पुनः निम्न स्तरों पर वापस नहीं आती।
यही कारण है कि योग साधना की कतिपय परम्पराओं में मणिपुर के नीचे के चक्रों के बारे में चर्चा तक नहीं की गयी है। क्योंकि उनके अनुसार ये चक्र पशु जीवन के उच्च स्तरों से सम्बन्धित हैं। जबकि मणिपुर तथा उसके बाद के चक्र उच्च मानवीय स्तर से सम्बन्धित हैं। योग साधना की इन परम्पराओं में इस सत्य का स्पष्ट उल्लेख है कि यदि जाग्रत् चेतना मणिपुर चक्र तक आ सकी तभी जागृति को सुनिश्चित माना जाना चाहिए। इन सभी दृष्टियों से मणिपुर चक्र की साधना का विशेष महत्त्व है।
इस साधना के लिए साधक को अपने प्रयास में दृढ़ प्रतिज्ञ तथा लगनशील होना आवश्यक है। मणिपुर चक्र की साधना के क्रम में प्रायः योग सम्प्रदायों एवं शास्त्रों में स्वर योग की चर्चा की जाती है। स्वर योग को श्वास-विज्ञान या प्राणायाम की प्रक्रिया भी कहा जा सकता है। प्राणायाम की इस प्रक्रिया से प्राण एवं अपान के संयोग से मणिपुर चक्र का जागरण आसानी से हो जाता है। परन्तु इस साधना क्रम के लिए प्रत्यक्ष मार्गदर्शन अनिवार्य है। इसीलिए इन पंक्तियों में इस साधना प्रक्रिया का विस्तार नहीं किया जा रहा।
प्राणायाम अथवा स्वरयोग की इस प्रक्रिया के अतिरिक्त भी एक सरल-सहज और सुगम विधि भी है। यह विधि उन योग साधकों के लिए है, जो नियमित रूप से अपनी साधना सम्पन्न करते हैं। जप और ध्यान के नियमित अभ्यास के साथ यदि श्रद्धा की गहनता को जोड़ा जा सके तो मणिपुर चक्र का परिशोधन व जागरण बड़ी ही सहजता से हो जाता है। कुछ विशेष करने के अभ्यासियों को भले ही इस कथन पर विश्वास न हो रहा है, पर यह एक तथ्य है।
क्योंकि जप काल में यदि श्रद्धा की गहनता हो तो प्राण व अपान दोनों ही नाभिकेन्द्र में आकर मिलते हैं। सामान्य क्रम में जप वाणी से और जिह्वा से होता है। परन्तु श्रद्धा के अतिरेक में मंत्र के स्वर नाभि से उठते हैं। और इसी दौरान प्राण व अपान का संयोग भी होता है। मणिपुर में इन दोनों शक्तियों के मिलन से ऊष्मा और ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही वह ऊर्जा है जिससे मणिपुर चक्र का जागरण होता है। इस पर साधना शक्ति के परिणाम स्वरूप शरीर में प्राण प्रवाह पूर्ण रूपेण पुनर्संगठित होता है। जिससे मणिपुर चक्र की शक्तियाँ जाग्रत् एवं विकसित होने लगती हैं।
इस विकास के फलस्वरूप योग साधक एक उच्च आध्यात्मिक स्थिति में होता है। ऐसी स्थिति में उसे दूसरे विकसित लोकों की भी झलक दिखाई देने लगती है। मणिपुर चक्र की साधना करने वाले योग साधक को चेतना के अनन्त स्तर का ज्ञान होता है। इस स्तर पर चेतना का विस्तार अनन्त होता है। जो सुन्दरता, सत्य तथा पवित्रता से परिपूर्ण होता है। इस मानसदर्शन के साथ ही साधक की सभी पूर्व धारणाएँ अपने आप ही बदल जाती हैं। व्यक्तिगत द्वेष-मनोग्रंथियां तथा प्रवृत्तियाँ सभी समाप्त हो जाती हैं। क्योंकि अब चेतना के उच्च जगत् की अनन्त सुन्दरता तथा पूर्णता का समावेश हो जाता है, जो अनहद चक्र के जागरण के लिए अति आवश्यक है।
अनाहत का शाब्दिक अर्थ है- जो आहत न हुआ हो। यह नाम इसलिए है क्योंकि इसका सम्बन्ध हृदय से है। जो लगातार आजीवन लयबद्ध ढंग से तरंगित और स्पन्दित होता रहता है। योगशास्त्रों के विवरण के अनुसार अनाहद एक ऐसी अभौतिक एवं अनुभवातीत ध्वनि है, जो निरन्तर उसी प्रकार निःसृत होती रहती है, जिस प्रकार हृदय जन्म से लेकर मृत्यु तक लगातार स्पन्दित होता रहता है।
योगियों ने अनाहत चक्र को मेरुदण्ड की आन्तरिक दीवारों में वक्ष के केन्द्र के पीछे अनुभव किया है। इसका क्षेत्र हृदय है। यद्यपि इस चक्र को हृदय का केन्द्र भी कहते हैं, परन्तु इसका अर्थ सीने में स्थित शारीरिक हृदय से कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए। वैसे शरीर क्रिया विज्ञान की दृष्टि से इसका भौतिक अवयव तंत्रिकाओं की हृदयजालिका ही है, फिर भी यह भौतिक सीमाओं से कहीं परे है। योग साधकों ने इस चक्र को हृदयाकाश भी कहा है। जिसका अर्थ है- हृदय के बीच वह स्थान जहाँ पवित्रता निहित है। जीवन की कलात्मकता एवं कोमलता से भी इसका गहरा सम्बन्ध है।
अनाहत चक्र की रहस्यमयी शक्तियों का प्रतीकात्मक विवरण योगशास्त्र के निर्माताओं का प्रीतिकर विषय रहा है। इस विवरण के अनुसार अनाहत चक्र का रंग बन्धूक पुष्प की तरह है। हालाँकि कतिपय अनुभवी योग साधकों ने इसे नीले रंग का भी देखा है। इसकी बारह पंखुड़ियाँ हैं और हर पंखुड़ी पर सिन्दूरी रंग से कं, खं, गं, घं, , चं, छं, जं, झं, टं, एवं ठं अक्षर अंकित है।
इसका आन्तरिक क्षेत्र षट्कोणीय है। जो वायु तत्त्व को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है। यह षट्कोणीय क्षेत्र दो अन्तर्ग्रथित त्रिकोणों से मिलकर बना है, जो शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है। उलटा त्रिकोण शक्ति और सीधा त्रिकोण शिव का प्रतीक है। इसका वाहक एक काला हिरण है, जो चौकन्ने और फुर्तीलेपन के लिए जाना जाता है। इसके ऊपर गहरे भूरे रंग में ‘यं’ बीजमंत्र अंकित है। मंत्र के इस बिन्दु के ऊपर सूर्य की भाँति कान्तिमान देव ईश का निवास है। उनके साथ पीले रंग की सर्वजनहितकारी देवी काकिनी विराजमान हैं। इनके चार हाथ और तीन आँखें हैं। और ये सौभाग्य प्रदायिनी व आह्लादकारिणी हैं।
अनाहत कमल की फलभित्ति के केन्द्र में एक उल्टा त्रिकोण है, जिसमें अखण्ड ज्योति प्रज्वलित रहती है। यह अखण्ड ज्योति ही अपनी जीवात्मा है। अनाहत के मुख्य कमल के नीचे एक और लाल पंखुड़ियों वाला कमल है, जिसमें कल्पतरु है। अनेक योगियों का विचार है कि अनाहत में स्थित कल्पतरु या शान्त झील पर ध्यान करना चाहिए। अनाहत का लोक-महालोक है। यह अविनाशी जगत् का प्रथम स्तर है। इसकी तन्मात्रा स्पर्श है।
इस हृदय केन्द्र में ही विष्णु ग्रन्थि का वास स्थान है। जो आध्यात्मिक स्तर पर जीने की भावना का प्रतिनिधित्व करती है। यह विष्णु ग्रन्थि आध्यात्मिक जागरण के साथ भावनात्मक सन्तुलन व वृद्धि में भी सहायक है। ऐसा अनेकों साधकों का अनुभव है कि जो साधक हृदय कमल पर ध्यान करता है, उसके कर्म अपने आप ही श्रेष्ठ हो जाते हैं। उसकी इन्द्रियाँ पूरी तरह से उसके नियंत्रण में होती हैं तथा वह गहन ध्यान कर सकने में सक्षम होता है।
अनाहत चक्र का सीधा सम्बन्ध मनोमय शरीर से है। यह बड़ा विलक्षण किन्तु अनुभव सिद्ध सत्य है कि योग में जितनी भी सिद्धियों का वर्णन है, वे सब की सब इसी मनोमय शरीर में प्रकट होती हैं। हालाँकि योग साधक अपनी भाव साधना के विकास के लिए इन सिद्धियों के माया जाल में नहीं पड़ते। क्योंकि इन सिद्धियों का थोड़ा सा भी आध्यात्मिक मूल्य नहीं है।
अनाहत चक्र की साधना पीछे वर्णित सभी चक्रों की साधनाओं से सर्वथा परे है। इस स्तर पर योग साधक को इस तथ्य का पूरा ज्ञान रहता है कि यद्यपि भाग्य है, फिर भी इसे पूर्णतया बदला जा सकता है। यह अन्तरिक्ष में कुछ फेंकने की भाँति है। यदि किसी पदार्थ को इस गति से फेंका जाय कि वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकल जाय, तो फिर इसे पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति वापस नहीं खींच पाएगी। ठीक इसी भाँति अनाहत चक्र की साधना करने वाले साधक की चेतना का स्तर इतना ऊँचा उठ जाता है कि वह अपने प्रारब्ध के सहारे नहीं, बल्कि अपनी इच्छानुसार जीवन यापन करने में सक्षम हो जाता है।
इस चक्र की साधना करने वाले साधक योगी की श्रेणी में आ जाते हैं। इसके पहले वे मूलाधार, स्वाधिष्ठान अथवा मणिपुर किसी भी स्तर पर रहे हों, मात्र योगाभ्यासी ही कहे जा सकते हैं। अनाहत की साधना करने पर साधक योगी बन जाता है। क्योंकि तब उसकी चेतना पूर्णतया योगमय हो जाती है। ऐसी स्थिति में उसके निर्णय बाह्य जगत् या विश्वास अथवा कर्म प्रारब्ध पर आधारित न होकर पूर्णतया आत्मविश्वास एवं अपनी चेतना शक्ति पर आधारित होते हैं।
अनाहत चक्र की साधना, इसका परिशोधन व जागरण कैसे करें? यह प्रश्न प्रत्येक जिज्ञासु और साधक का होगा। इसके उत्तर में यहाँ हमें इतना ही कहना है कि प्राचीन योगशास्त्रों एवं साधना सम्प्रदायों में इस चक्र की साधना विधियाँ अनेक हैं। उन सबका अपना-अपना महत्त्व भी है। जिससे न इन्कार किया जा सकता है और न नकारा जा सकता है। पर यहाँ अनाहत चक्र की साधना की उस विधि को स्पष्ट करने का मन है, जो पूर्वोक्त सभी विधियों की अपेक्षा सहज, सरल, सुगम एवं निरापद है। इस विधि को अपनाने वाले साधक सर्वथा अभय होकर अनाहत चक्र और उससे सम्बन्धित मनोमय शरीर की उपलब्धियों से लाभान्वित हो सकते हैं।
यह साधना विधि गुरुभक्ति है। अपने हृदय कमल में सद्गुरु की दिव्य मूर्ति का ध्यान करने से अनाहत की शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं। ध्यान का यह अभ्यास प्रातः अथवा सायं कभी भी किया जा सकता है। परन्तु इसे जब भी किया जाय नियमित एवं निर्धारित समय पर लगातार लम्बे समय तक किया जाय। इस साधना क्रम में जो सबसे अनिवार्य तत्त्व है वह यह है कि सद्गुरु के प्रति भक्ति मात्र ध्यान के क्षणों में ही नहीं बल्कि अहर्निश पनपनी एवं उफननी चाहिए।
यह सुनिश्चित तथ्य है कि अनाहत चक्र की साधना करने वालों के जीवन में अहंकार का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इस साधना की प्रक्रिया इतनी सूक्ष्म होती है कि सद्गुरु की चेतना साधक के अहंकार को कब, कैसे और किन तरीकों से समाप्त करती है- पता ही नहीं चलता। इसी कारण प्रायः लोग बीच में ही घबराकर साधना छोड़ बैठते हैं। परन्तु जो गुरु की प्रत्येक चोट को सहते हैं गुरुभक्ति में निरत रहते हैं, उन्हें सफलता मिलना सुनिश्चित है। यहाँ यह बलपूर्वक एवं पूरे विश्वासपूर्वक कहा जा रहा है कि अनाहत चक्र के जागरण के लिए अनाहत कमल पर सद्गुरु की दिव्य मूर्ति के ध्यान से बढ़कर अन्य कोई श्रेष्ठ साधना नहीं है।
इस साधना अभ्यास को यदि नियमित रूप से एक वर्ष भी किया जा सके, तो अनाहत चक्र के जागरण के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इस चक्र के जागरण से साधक औरों के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाता है। उसमें अतीन्द्रिय दृष्टि, अतीन्द्रिय श्रवण या मनोगतिज क्षमता उत्पन्न हो जाती है। वह लोगों को अपने अथाह प्रेम से जीत सकता है। उसमें दूसरों के विचारों और अनुभवों के प्रति प्रखर संवेदनशीलता जाग जाती है। साथ ही उसमें सभी प्रकार की आसक्ति समाप्त हो जाती है। उसे न कोई चाहत सताती है और नहीं चिन्ता। बस उसे तो एक ही धुन लगी रहती है कि अपने सद्गुरु की कृपा के भरोसे चेतना के आगे के स्तरों पर गति कैसे हो? इस भावना के प्रगाढ़ होने पर ही विशुद्धिचक्र की साधना प्रस्फुटित होती है।
विशुद्धि चक्र ‘शुद्धिकरण का केन्द्र’ है। इसका सम्बन्ध जीवन चेतना के शुद्धिकरण व सन्तुलन से है। योगियों ने इसे अमृत एवं विष के केन्द्र के रूप में भी परिभाषित किया है। उनके अनुसार जो अमृत बिन्दु से झरता है, वह विशुद्ध अमृत तथा विषय के रूप में अलग-अलग हो जाता है। इसमें से विषय तो शरीर के बाहर निकल जाता है, और अमृत से शरीर को पोषण मिलता है।
विशुद्धि चक्र की साधना से एक ऐसी स्थिति प्रकट होती है, जिससे जीवन में अनेकों विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभूतियाँ आती हैं। इससे साधक के ज्ञान में वृद्धि होती है। जीवन कष्टप्रद न रहकर आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। दरअसल ऐसी स्थिति में योग साधक जीवन को सहज रूप में स्वीकार लेता है। एवं वह सभी तरह के द्वन्द्वों से मुक्त रहकर जीवन की घटनाओं के प्रति अनासक्त रहता है। योग शास्त्रों के अनुसार विष तथा अमृत सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। इन दोनों का ही अवशोषण एवं शुद्धिकरण विशुद्धि चक्र के माध्यम से होता है। शुद्धिकरण की इस प्रक्रिया के कारण साधक में ज्ञान व विवेक का उदय होता है।
आत्म शरीर के रूप में पाँचवे शरीर का विकास विशुद्धि चक्र की क्षमता का कहीं अधिक सूक्ष्म पक्ष है। इस क्षमता से अनभिज्ञ साधकों के लिए आत्म शरीर एक शब्द मात्र है। जो लोग पहले या दूसरे शरीर पर रुक गये हैं, वे शरीरवादी और भौतिकवादी हैं। उनके लिए आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। उनकी दृष्टि में शरीर ही सब कुछ है। शरीर मर गया तो उनके लिए सब कुछ मर गया। लेकिन विशुद्धि चक्र के साधक के लिए आत्मा ही सब कुछ है। उसके अलावा अन्य निम्न चीजें अर्थहीन है। बस उनकी दृष्टि में परम स्थिति का बल आत्मा है।
यह चक्र ग्रेव जालिका में गले के ठीक पीछे स्थित है। इसका क्षेत्र गले के सामने या थॉयराइड ग्रन्थि पर है। शारीरिक स्तर पर विशुद्धि का सम्बन्ध ग्रसनी तथा स्वर यंत्र तंत्रिका जालकों से है।
योगशास्त्रों में इसे प्रतीकात्मक रूप से गहरे भूरे रंग के कमल की तरह बताया गया है। परन्तु कतिपय साधकों ने इसका अनुभव 16 पंखुड़ियों वाले बैंगनी रंग के कमल की तरह किया है। ये 16 पंखुड़ियाँ इस केन्द्र से जुड़ी नाड़ियों से सम्बन्धित हैं। प्रत्येक पंखुड़ी पर संस्कृत का एक अक्षर चमकदार सिंदूरी रंग से लिखा है- अं, आँ, इं, इ, उं, ऊं, ऋं, ऋं, लृं, लृं, एं, ऐं, ओं, औं, अं, अः। इस कमल की फल भित्ति का वृत्त पूर्ण चन्द्रमा की भाँति धवल है। यह आकाश तत्त्व का प्रतीक है। विशुद्धि चक्र के उस साधक के लिए जिसकी इन्द्रियाँ निर्दोष तथा नियंत्रित है, यह आकाश मोक्ष का द्वार है।
इस चन्द्रमा के अन्दर एक अत्यन्त सफेद रंग का हाथी है। इसे भी आकाश तत्त्व का ही प्रतीक माना गया है। इसका बीज हं है, जो आकाश तत्त्व का स्पन्दन है। विशुद्धि चक्र के देवता सदाशिव हैं। जिनका रंग एकदम श्वेत है। उनकी तीन आँखें, पाँच मुख तथा दस भुजाएँ हैं। और वे एक व्याघ्र चर्म लपेटे हुए हैं। उनकी देवी साकिनी हैं, जो चन्द्रमा से प्रवाहित होने वाले अमृत के सागर से भी ज्यादा पवित्र हैं। उनके परिधान पीले हैं। उनके चार हाथों में से प्रत्येक में एक-एक धनुष, बाण, फंदा तथा अंकुश है।
इस चक्र का सम्बन्ध जनःलोक से है। जीवन के अन्त तक रहने वाली ‘उदान’ इसकी वायु है। इसका प्रवाह सदा ही ऊपर की ओर रहता है। आज्ञा चक्र के साथ मिलकर ‘विशुद्धि’ विज्ञानमय कोष के आधार का निर्माण करता है। जहाँ से अतीन्द्रिय विकास प्रारम्भ होता है। इसकी तन्मात्रा, श्रवण शक्ति है। इसकी ज्ञानेन्द्रिय आँखें है और कर्मेन्द्रिय स्वर रज्जु हैं।
योग शास्त्रों में ऐसा स्पष्ट उल्लेख है कि सिर के पिछले भाग में बिन्दु स्थित चन्द्रमा से अमृत का स्राव होता रहता है। यह अमृत बिन्दु विसर्ग से व्यक्तिगत चेतना में गिरता है। इस दिव्य द्रव को अनेक नामों से जाना जाता है। अंग्रेजी में ईसाई सन्तों से इसे ‘हृद्गष्ह्लशह् शद्ध त्रशस्र’ कहा है। वेदों में इसे ही सोम कहा गया है। सूफी सन्तों ने इसे ‘मीठी शराब’ कहा है। जिसके सेवन से सदा ही मादकता का आनन्द बना रहता है। वस्तुतः हर साधना पद्धति में जिसका सम्बन्ध व्यक्ति की उच्च चेतना के जागरण से है, आनन्द की अवर्णनीय अनुभूति हेतु अपने अलग-अलग प्रतीक हैं।
बिन्दु और विशुद्धि के बीच में एक अन्य छोटा सा अतीन्द्रिय केन्द्र है। इसे योगियों ने ‘ललना चक्र’ कहा है। विशुद्धि चक्र से इसका बहुत ही नजदीकी सम्बन्ध है। जब अमृत बिन्दु से झरता है तो इसका भण्डारण ललना में होता है। यह केन्द्र एक ग्रन्थीय भण्डार की तरह है, जो नासा ग्रसनी के पीछे कोमल तालू के ऊपर के आन्तरिक गड्ढ में वहाँ स्थित है, जहाँ नासिका मार्ग आकर खुलता है। खेचरी के समय जीभ को ऊपर व पीछे की ओर मोड़ा जाता है। जिसका मकसद यही है कि अमृत के प्रवाह क्षेत्र में आवश्यक उद्दीपन लाया जाय।
यद्यपि इस द्रव को अमृत कहते हैं, परन्तु यह अमृत और विषय दोनों का ही काम कर सकता है। जब तक यह बिन्दु से उत्पन्न होकर ललना में संग्रहीत रहता है तब कि इसमें किसी भी प्रकार का अन्तर कर पाना सम्भव नहीं है। सामान्य क्रम में यह विशुद्धि से होते हुए बिना किसी बाधा के मणिपुर चक्र तक पहुँच जाता है। तथा इसे मणिपुर चक्र द्वारा आत्मसात कर लिया जाता है। इसका परिणाम विष की तरह होता है, जो क्रमशः शरीर के उतकों का ह्रास करता है।
लेकिन कुछ अभ्यासों जैसे खेचरी मुद्रा आदि से अमृत ललना से स्रावित होकर शुद्धिकरण के केन्द्र विशुद्धि चक्र तक पहुँचता है। जब विशुद्धि जाग्रत रहता है तो यह दिव्य द्रव वहीं रुक जाता है। और वहीं पर इसका प्रयोग कर लिया जाता है। इसी के साथ इसका स्वरूप अमरत्व प्रदायक अमृत के रूप में बदल जाता है। वस्तुतः चिर युवा रहने का रहस्य विशुद्धि चक्र के जागरण से सम्बन्धित है।
विशुद्धि चक्र के जागरण की सरल साधना नादयोग है। योगशास्त्रों में विशुद्धि और मूलाधार स्पन्दनों के दो आधार भूत केन्द्र माने गए हैं। नादयोग की प्रक्रिया में चेतना के ऊर्ध्वीकरण का सम्बन्ध संगीत के स्वरों से है। प्रत्येक स्वर का संबंध किसी एक चक्र विशेष की चेतना के स्पन्दन स्तर से सम्बन्धित होता है। बहुधा वे स्वर जो मंत्र, भजन तथा कीर्तन के माध्यम से उच्चारित किए जाते हैं, विभिन्न चक्रों के जागरण के समर्थ माध्यम हैं।
‘सा रे गा म’ की ध्वनि तरंगों का मूलाधार सबसे पहला स्तर एवं विशुद्धि पाँचवा स्तर है। इनसे जो मूल ध्वनियाँ निकलती हैं, वही चक्रों का संगीत है। ये ध्वनियाँ जो विशुद्धि यंत्र की सोलह पंखुड़ियों पर चित्रित हैं- मूल ध्वनियाँ हैं। इनका प्रारम्भ विशुद्धि चक्र से होता है। और इनका सम्बन्ध मस्तिष्क से है। नादयोग या कीर्तन का अभ्यास करने से मन आकाश की तरह शुद्ध हो जाता है। और विशुद्धि चक्र के जागरण की फलश्रुतियाँ साधक के जीवन में आने लगती हैं।
इसके जागरण से कायाकल्प तो होता ही है। साथ ही जो शक्ति प्राप्त होती है, वह नष्ट नहीं होती तथा ज्ञान से पूर्ण होती है। व्यक्ति को वर्तमान के साथ भूत-भविष्य का भी ज्ञान होने लगता है। मानसिक क्षमताओं के तीव्र विकास के कारण उसी श्रवण शक्ति अत्यन्त तीव्र हो जाती है। मन हमेशा विचार शून्य स्थिति में तथा भय और आसक्ति से मुक्त रहता है। ऐसा व्यक्ति कर्मों के परिणामों की आसक्ति से सर्वथा मुक्त रहकर अपने साधना पथ पर अग्रसर रह सकता है। यहीं उसे वह सारी सामर्थ्य मिलती है, जिसके आधार पर आज्ञा चक्र की सिद्धि मिल सके।
आज्ञा से एक ही अर्थ ध्वनित होता है- आदेश। इस अर्थ में आज्ञा चक्र समूचे अस्तित्व का नियंत्रण केन्द्र है। ज्योतिष शास्त्र में इसे बृहस्पति का केन्द्र बताया गया है, जो गुरु का प्रतीक है। बृहस्पति देवगुरु हैं, इसलिए इसे गुरु चक्र भी कहा गया है। इसे अंतर्ज्ञान चक्षु के नाम से भी जाना जाता है। यही वह मार्ग है, जिसके माध्यम से व्यक्ति चेतना के सूक्ष्म एवं अतीन्द्रिय आयाम में पहुँचता है। इस चक्र का सबसे प्रसिद्ध नाम- तीसरी आँख भी है। प्रत्येक देश में प्रचलित साधना पद्धतियों में किसी न किसी रूप में इसकी चर्चा की गयी है। इसे शिव की आँख भी कहा जाता है, क्योंकि शिव को ध्यान का सार माना गया है, जिसका आज्ञा चक्र से सीधा सम्बन्ध है। कतिपय योगशास्त्रों में इसका वर्णन दिव्य चक्षु या ज्ञान चक्र के रूप में भी मिलता है। क्योंकि इसके द्वारा योग साधक को छिपे हुए अस्तित्त्व की प्रकृति का पता चलता है।
यह वह स्थान है, जहाँ तीन प्रमुख नाड़ियाँ- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का मिलन होता है। ये तीनों एक प्रवाह के रूप में चेतना के सर्वोच्च केन्द्र- सहस्रार तक पहुँचती हैं। योग सम्प्रदायों में यह प्रचलित विश्वास है कि अपने देश की तीन पवित्र नदियाँ इन तीन नाड़ियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इड़ा नाड़ी की प्रतीक गंगा है, पिंगला की प्रतीक यमुना है, जबकि सरस्वती- सुषुम्ना का प्रतिनिधित्व करती है। इन तीनों का संगम आज्ञा चक्र का प्रतीक है। जब इस स्थान पर ध्यान की गहनता पनपती है, तब तीन बड़ी शक्तियों के मिलन के फलस्वरूप व्यक्तिगत चेतना का रूपांतरण हो जाता है।
व्यक्तिगत चेतना में मुख्यतया अहं की प्रधानता होती है। यह व्यक्तिगत अहं ही द्वैत भाव का या भेदबुद्धि का कारण है और जब तक यह द्वैत अथवा भेदबुद्धि है, तब तक समाधि अवस्था की प्राप्ति असम्भव है। आज्ञाचक्र की साधना इस द्वैत भाव को सर्वथा विलीन-विसर्जित कर देती है। साधना के इस क्रम में एक मजेदार बात यह भी है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में आज्ञाचक्र अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय होता है। इसलिए वे अधिक सूक्ष्म, संवेदनशील और ग्रहणशील होती है। यही कारण है कि महिलाओं में पूर्वाभास की क्षमता पुरुषों की तुलना में ज्यादा होती है।
आज्ञाचक्र की उपस्थिति मस्तिष्क में भ्रूमध्य के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी के एकदम ऊपर मेरुरज्जु में अनुभव की गयी है। हालाँकि साधना के प्रारम्भ में इसकी स्थिति और स्थान जो जानना बहुत कठिन है। इसीलिए भ्रूमध्य में उसके क्षेत्र विशेष पर ध्यान किया जाता है। जहाँ यह कह देना भी आवश्यक है कि आज्ञा चक्र और पीनियल ग्रन्थि दोनों एक ही हैं। जबकि पीयूषिका ग्रन्थि सहस्रार है। पीनियल और पीयूषिका ग्रन्थियों की ही भाँति आज्ञाचक्र एवं सहस्रार में नजदीकी सम्बन्ध है। यदि आज्ञा चक्र का जागरण हो चुका हो तो सहस्रार के जागरण की उपलब्धियों एवं अनुभूतियों को सम्भाला जा सकता है।
बायीं पंखुड़ी पर हं तथा दायीं पंखुड़ी पर क्षं अंकित है। ‘हं’ और ‘क्षं’ चमकीले सफेद रंग में है और ये शिव-शक्ति के बीज मंत्र हैं। इनमें से एक चन्द्र नाड़ी या इड़ा का प्रतीक है और दूसरा सूर्य नाड़ी या पिंगला का प्रतीक है। इस चक्र के नीचे तीनों नाड़ियाँ आकर मिलती हैं। बायीं तरफ से इड़ा, दायीं तरफ से पिंगला एवं बीच में सुषुम्ना।
आज्ञा चक्र के द्विदल कमल के भीतर एक पूर्णवृत्त है, जो शून्य का प्रतीक है। इस वृत्त के अन्दर एक त्रिकोण है जो शक्ति की रचनात्मकता एवं अभिव्यक्ति का बोध कराता है। कुछ उच्चस्तरीय योग साधकों ने इसे ब्रह्मयोगी के रूप में भी जाना है। इस त्रिकोण के ऊपर एक काला शिवलिंग है। यह साधक के सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है। जो साधक की चेतना के विकास के अनुरूप परिवर्तित रंग में दिखाई पड़ सकता है।
जब कोई अविकसित साधक ध्यान करता है, तो उसे यह शिवलिंग धुएँ की तरह दिखाई देता है। और बार-बार प्रकट होता-लोप होता रहता है। गहरे और शान्त ध्यान में यह शिवलिंग काला दिखाई देता है। इस काले शिवलिंग पर ध्यान करने से प्रकाशमान सूक्ष्म चेतना से ज्योतिर्लिंग प्रकट होता है। जो साधक की उच्चस्तरीय एवं विकसित चेतना का द्योतक है। इस शिवलिंग के ऊपर परम्परागत प्रतीक ॐ है। यही आज्ञाचक्र का प्रतीक एवं बीज मंत्र है। परम शिव आज्ञा चक्र के देवता हैं। जो एक प्रकाश की माला की भाँति चमकते हैं। छः मुखवाली हाकिनी इसकी देवी हैं, जो अनेक चन्द्रमा की भाँति दिखाई देती हैं।
आज्ञा चक्र की तन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रिय सभी कुछ मन है। यहाँ मन को सूक्ष्म माध्यमों से ज्ञान व संकेत प्राप्त होते हैं। आज्ञा चक्र की साधना से मन स्थूल शरीर की सहायता के बगैर बहुत अच्छी तरह से काम कर सकता है। आज्ञा चक्र का लोक-तपलोक है। यही वह आधार है, जहाँ अपूर्णताओं के अवशेषों का शुद्धिकरण होता है एवं कर्म का क्षय होता है। आज्ञा चक्र की साधना के साथ ही साधक अपने छठे शरीर, जिसे ब्रह्मशरीर कहते हैं, में प्रवेश करता है। ऐसी दशा में वह हमेशा ब्रह्म के साथ एकाकार अवस्था में रहता है और अनेकानेक शक्तियों का स्वामी होता है।
आज्ञाचक्र के जागरण की साधना- ध्यान है। भ्रूमध्य में ज्योति अथवा उगते हुए सूर्य का ध्यान करने से आज्ञा चक्र स्फुरित और जाग्रत् होने लगता है। ध्यान साधना के इस क्रम में अपने ईष्ट देव-देवी का भी ध्यान किया जा सकता है। इन सबके बावजूद आज्ञाचक्र की सिद्धि के लिए जो सबसे प्रभावी एवं शीघ्र फलदायी उपाय है, वह है- उगते हुए सूर्य मण्डल के मध्य परम पूज्य गुरुदेव का ध्यान। यदि यह ध्यान साधना नियमित एवं प्रगाढ़ हो, तो मात्र छः महीने में ही अपनी सफलता के संकेत देने लगती है। इस शीघ्र सफलता का एक कारण यह भी है कि आज्ञा चक्र- गुरु चक्र है। गुरु तत्त्व की अनुभूति जितनी सघन यहाँ हो पाती है, उतनी और कहीं सम्भव नहीं।
इस साधना से लोक-लोकान्तर के द्वार खुलते हैं। आज्ञाचक्र की इस साधना के क्रम में दिव्य लोक की शक्तियों से संपर्क-सान्निध्य एक सामान्य सी बात बन जाती है। परन्तु यह तो इस साधना क्रम की शुरुआती सफलता भर है। अपने सद्गुरु के सन्देश और आदेश भी इसी साधना से जाने-सुने और समझे जाते हैं। संक्षेप में आज्ञा चक्र की साधना के परिणाम अनुभूति के विषय हैं। इन्हें लिख पाना- एक लेख तो क्या एक महाग्रन्थ में भी सम्भव नहीं है। परन्तु यहाँ यह कह देना निहायत अनिवार्य है- कि आज्ञा चक्र के साधक के लिए समूचा जीवन तपोमय होना चाहिए। अन्यथा सारी उपलब्धियाँ, अनुभूतियाँ कपूर की भाँति उड़ जाती हैं। तपोनिष्ठ जीवन ही आज्ञाचक्र की ध्यान साधना और उसकी सिद्धि का आधार है। मन-वचन और कर्म से तप, यही आज्ञा चक्र की सफलता का मूल मंत्र है।
आज्ञाचक्र के साधकों और जिज्ञासुओं के लिए यहाँ एक बात बता देना अनिवार्य है- कि आज्ञा चक्र के जागरण के अनगिनत लाभों में जो सबसे कीमती लाभ है, वह यह कि साधक इससे प्राप्त अंतःदृष्टि से स्वयं को भली तरह से पहचान सकता है। यहाँ पर विद्यमान शिव ग्रन्थि का भेदन करके अपनी योग साधना के अवरोधों का निवारण-निराकरण कर सकता है। इस शिव ग्रन्थि का भेदन होते ही सारी अलौकिक शक्तियों-सिद्धियों से लगाव अपने आप ही समाप्त हो जाता है। इसके बाद तो जीवन का हर पल-सृष्टि की हर घटना भगवत् लीला के रूप में अनुभव होने लगती है। इस अनुभूति की प्रगाढ़ता और इससे एकात्मता के लिए साधक को सहस्रदल कमल- सहस्रार में प्रवेश करना पड़ता है।
सत्साहित का अध्ययन भावी जीवन के विभेदों और संकटों को शाँति और प्रसन्नता में बदलता है।
सहस्रार का शाब्दिक अर्थ है- एक हजार। इसी कारण इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल अथवा सहस्रदल कमल के रूप में भी कहा और जाना जाता है। इसमें निहित तात्पर्य यह है कि इसमें छिपी हुई शक्ति अनन्त है, इसका महत्त्व असीम है। इसीलिए इसका वर्णन योगियों ने एक ऐसे अनन्त पंखुड़ियों वाले कमल के रूप में भी किया है, जिसकी पंखुड़ियाँ या तो लाल हैं या फिर अनेक रंगों वाली हैं। शास्त्रकारों ने इसे बड़ी ही साँकेतिक रूप से स्पष्ट किया है-
सहस्रारं महापद्मं शुक्लवर्णमधोमुखम्। अकारादिक्षकारान्तैः स्फुद्वर्णेर्विराजितम्॥
अनुभवी साधकों ने इस साँकेतिक स्पष्टीकरण की व्याख्या करते हुए कहा है कि आज्ञाचक्र के ऊपर महानाद है। इसके ऊपर शंखिनी नाड़ी है। उसके अग्रभाग में अर्थात् शून्याकार स्थान में तथा ब्रह्मरन्ध्र में स्थित प्रकृति रूप विसर्ग के निम्न प्रदेश में प्रकाश स्वरूप पूर्ण चन्द्रमा के समान अत्यन्त श्वेत वर्ण अधोमुख आनन्द स्वरूप सहस्रदल कमल है। इसका केशर समूह रक्त और भास्वर है तथा अकार से लेकर क्षकार पर्यन्त पचास मातृकाओं से यह कलम विभूषित है।
इस सहस्रदल कमल में दलों के बीस घेरे हैं। प्रति घेरे में पचास दल हैं। इनमें से प्रत्येक वृत्त के दलों में ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ पर्यन्त पचास अक्षर सुशोभित हैं। इस सहस्रदल कमल की वर्णिका में स्निग्ध, निर्मल, पूर्ण चन्द्र मण्डल है। उसके भीतर विद्युत के समान चमकदार त्रिकोण है। इस त्रिकोण के मध्य में सब देवों से सेवित अत्यन्त गुप्त शून्य रूप पर बिन्दु है। महामोक्ष का प्रधान मूल रूप यह सूक्ष्म कन्द ‘अमा’, ‘कला’ और ‘निर्वाण’ कला से युक्त है।
इस चक्र की स्थिति अन्य चक्रों से बहुत परे है। इसीलिए चक्र संस्थान का वर्णन करते समय प्रायः षट्चक्रों की ही चर्चा की जाती है। क्योंकि अन्य चक्रों की स्थिति मानसिक स्तर पर है। अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय चक्र के आधार पर ही चेतना के स्तर का प्रकटीकरण होता है। इस सम्बन्ध में यह भी कहा जा सकता है कि सहस्रार चक्र बिना किसी माध्यम के ही क्रियाशील होता है। और साथ ही साथ इसकी क्रियाशीलता में सभी माध्यमों का योगदान है। वस्तुतः इसकी स्थिति परात्पर है, फिर भी अनुभवगम्य है। यह पूर्ण रूप से विकसित चेतना का चरम बिन्दु है। इस क्रम में यह भी उल्लेखनीय है कि अन्य चक्रों की शक्ति उनमें समाहित नहीं होती। ये चक्र तो मात्र स्विच की तरह है और उनकी सभी क्षमताएँ सहस्रार में ही निहित रहती हैं।
इसकी स्थिति अनुभवातीत होने के कारण निर्विकार है। इसके बारे में बहुत कुछ कहना अथवा लिखना सम्भव नहीं। बस बहुत अधिक कुछ बताना ही हो तो शाब्दिक संकेत भर किए जा सकते हैं। यह शून्य है अर्थात् पूर्ण रूप से रिक्त है। यह ब्रह्म है। यह सब कुछ है और कुछ भी नहीं है। सच तो यह है कि यह तर्क से सर्वथा परे की स्थिति एवं अवस्था है। क्योंकि तर्क में एक की दूसरे से तुलना की जाती है। लेकिन सहस्रार तो सम्पूर्णता का द्योतक है। फिर भला इसकी तुलना और व्याख्या, विवेचना किस तरह से की जाय। दरअसल यह सभी मान्यताओं का स्रोत होते हुए भी सारी मान्यताओं से परे है। यह चेतना और प्राण का मिलन बिन्दु है। योग साधना का चरम बिन्दु यही है।
योगी की जाग्रत् चेतना शक्ति जब यहाँ तक पहुँचती है तो इसे शिव और शक्ति का मिलन कहते हैं। इस महामिलन की अनुभूति सर्वथा भिन्न एवं विशिष्ट है। इसी के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में आत्मज्ञान अर्थात् समाधि अवस्था का प्रारम्भ होता है। इस अवस्था में व्यक्तिगत अहं का लोप हो जाता है। इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि स्थूल देह का ही नाश हो जाता है। बस इसका तात्पर्य तो इतना ही है कि व्यक्तिगत भावना ही समाप्त हो जाती है। ऐसी दशा में साधक में अपने पराए-पन का भान नहीं रहता। दृश्य एवं दृष्ट दोनों एक रस हो जाते हैं। यहाँ द्वैत भाव अपना अस्तित्व ही खो देता है। बस एक मात्र परा चेतना ही सर्वत्र समरस-एकरस होकर विराजती है।
इस अद्भुत स्थिति का वर्णन दुनिया की प्रत्येक साधना पद्धति में अपने-अपने ढंग से किया गया है। योग के विभिन्न सम्प्रदाय, समुदाय एवं मार्ग इसी में अपने चरम बिन्दु को खोजते हैं। कुछ ने इसे निर्वाण कहा, जबकि अन्य ने समाधि, कैवल्य, ब्रह्म साक्षात्कार आदि अनेक नामों, संज्ञाओं से बताने-समझाने की कोशिश की है। यदि विभिन्न रहस्यात्मक तथा योग परम्पराओं एवं शास्त्रों का अध्ययन किया जाय तो सहस्रार के बारे में बहुत सारे वर्णन मिलते हैं। परन्तु इन सभी का अध्ययन एक अलग ढंग से, चेतना के एक भिन्न स्तर से किया जाना चाहिए, तभी उसके सार को समझा जा सकता है।
सहस्रार की उपलब्धि एवं अनुभूति का सबसे अधिक सुग्राह्य एवं कवित्वपूर्ण वर्णन महायोगी स्वामी विवेकानन्द ने किया था। इस सम्बन्ध में उनकी कविता समाधि की पंक्तियाँ इसके रहस्य को उद्घाटित करती हैं-
सूर्य भी नहीं, ज्योति- सुन्दर शंशाक नहीं, छाया सा व्योम में यह विश्व नजर आता है।
मनो आकाश अस्फुट, भासमान विश्व वहाँ अहंकार स्रोत में ही तिरता डूब जाता है।
धीरे-धीरे छायादल लय में समाया जब धारा निज अहंकार मन्द गति बहाता है।
बन्द वह धारा हुई, शून्य में मिला है शून्य ‘अवांग मनस गोचरम’ वह जाने जो ज्ञाता है।
सहस्रार की यह अनुभूति योगी को उसके निर्वाण शरीर का परिचय देती है। यह अस्तित्व के विकास का सातवां एवं अन्तिम सोपान है। यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि निर्वाण शरीर या सूक्ष्म शरीर दरअसल कोई शरीर ही नहीं है। यह तो परम अवस्था है। यहाँ केवल शून्य है। शून्य के अलावा कुछ भी नहीं है यहाँ। निर्वाण-शब्द का अर्थ ही है- सब कुछ समाप्त, शून्य बिल्कुल। जिस तरह जलता हुआ एक दीपक बुझ जाता है, फिर क्या होता है? खो जाती है ज्योति। उस समय कोई न कुछ कह पाता है और न बता पाता है। बस ज्योति- महाज्योति में विलीन हो जाती है।
सहस्रार की यह साधना कैसे हो? इसकी सिद्धि किस तरह की जाय? तो इन सवालों का जवाब एक ही है कि इसकी साधना समस्त सिद्धियों का सुपरिणाम है। यदि इसके स्वरूप को बहुत कुछ जानना ही हो, तो फिर इतना ही कहेंगे कि ऐसे जिज्ञासु योग साधक को सतत् गुरु कृपा का आवाहन करना चाहिए। योगिराज श्यामा चरण लाहिड़ी महाशय के शिष्य स्वामी प्रणवानन्द ने इस उपलब्धि को इसी तरह से पाया था। उन्होंने वर्षों की साधना की, भारी तप किया। इस सबके बावजूद जब वह सहस्रार का भेदन व जागरण में सफल नहीं हुए, तो उन्होंने योगिराज लाहिड़ी महाशय से निवेदन किया। गुरुकृपा स्वरूप उन्हें वह सब मिल गया, जो चेतना के विकास का चरम व परम लक्ष्य है।
सद्गुरु कृपा के आह्वान के अलावा सहस्रार के जागरण व सिद्धि की अन्य समर्थ साधना नहीं है। बाकी जो कुछ- जहाँ कहीं भी वर्णित है, वह बस शब्दाडम्बर मात्र है। यदि उसमें कोई सार है भी तो भी उसका प्रायोगिक मूल्य बहुत ही न्यून और अल्प है। जबकि सद्गुरु की कृपा के अवतरण को धारण व ग्रहण करने से यह महासाधना शीघ्र ही परम सिद्धि में परिणत हो जाती है, ऐसा अनेकों महायोगियों के अनुभव हैं। इन अनुभवों का साक्षात्कार कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया के माध्यम से भी किया जा सकता है।
कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया के प्रति योग साधकों की जिज्ञासा अगाध है। योग मार्ग का प्रत्येक अनुयायी अपने मन में यह चाहत संजोये रखता है कि उसकी कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत् हो। और वह इसकी उपलब्धियों एवं विभूतियों से लाभान्वित हो सके। साधकों की इस महती आकाँक्षा, अभीप्सा, अभिलाषा के बावजूद ऐसे विरले ही होते हैं, जो कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया को सफलतम रीति से कर पाते हैं, अधिकाँश को तो शाब्दिक एवं बौद्धिक सन्तोष ही करना पड़ता है। इसका एक ही कारण समझ में आता है- कुण्डलिनी तत्त्व की सही जानकारी न होना और उपयुक्त मार्गदर्शन का अभाव।
संस्कृत में ‘कुण्डल’ शब्द का अर्थ है- घेरा बनाए हुए। यह एक परम्परागत मान्यता है। जिसके सही स्वरूप को प्रायः नहीं समझा गया है। वैसे कुण्डलिनी शब्द ‘कुण्ड’ से बना है। और इसका अर्थ है- कोई गहरा स्थान, छेद या गड्ढ। हवन के लिए आग जलाते हैं, उसे भी कुण्ड कहते हैं। योगियों के अनुसार- कुण्डलिनी शब्द का तात्पर्य उस शक्ति से है- जो गुप्त एवं निष्क्रिय अवस्था में है। किन्तु इस शक्ति के जाग्रत् होने पर उसे अपनी अनुभूति के आधार पर ही महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती अथवा अन्य किसी भी नाम से जाना जाता है।
शास्त्रकारों एवं तत्त्वदर्शियों ने इस सम्बन्ध में अपने-अपने अनुभव के आधार पर कई मत व्यक्त किये हैं। ज्ञानर्णव तन्त्र में कुण्डलिनी को विश्वजननी और सृष्टि संचालिनी शक्ति कहा गया है- ‘शक्तिः कुण्डलिनी विश्व जननी व्यापार बद्धोद्यता’। विश्व व्यापार एक घुमावदार उपक्रम के साथ चलता है। परमाणु से लेकर ग्रह-नक्षत्रों और आकाश गंगाओं तक की स्थिति परिभ्रमण परक है। आत्मा का परिभ्रमण भी कुछ इसी तरह से है। कुण्डलिनी सृष्टि संदर्भ में समष्टि और जीव संदर्भ में- शक्ति संचार करती है।
उपनिषदों में भी कुण्डलिनी शक्ति की चर्चा हुई है। कठोपनिषद् में यम-नचिकेता संवाद में जिस पंचाग्नि विद्या की चर्चा हुई है, उसे कुण्डलिनी शक्ति की पंचविधि विवेचना कहा जा सकता है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् में उसे योगाग्नि कहा गया है-
‘न तस्य रोगो न जरा मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्नि भयं शरीरं।’
जान वुडरफ सरीखे तत्त्वान्वेषियों ने उसे ‘सर्पेन्ट पावर’ नाम दिया है। महान् साधिका मैडम ब्लावतास्की ने इसे ‘कास्मिक इलेक्ट्रिसिटी’ कहा है। ईसाई परम्परा में बाईबिल में ‘साधकों का पथ’ अथवा ‘स्वर्ग का रास्ता’ नाम से कुण्डलिनी शक्ति के जागरण को ही बताया गया है। इन सभी कथनों का सार यही है कि आध्यात्मिक जीवन में जो कुछ भी होता है, वह कुण्डलिनी जागरण से ही सम्बन्धित है। किसी भी प्रकार की योग साधना का सार कुण्डलिनी शक्ति का जागरण ही है।
परन्तु यह जागरण अति दुष्कर है और बहुत आसान भी। यदि जाग्रत् कुण्डलिनी नियंत्रित न की जा सके, तो वह फिर महाकाली बनकर प्रलय के दृश्य उपस्थित करती है। और यदि उसे नियंत्रित करके अर्थ पूर्ण बनाया जा सके तो यही शक्ति दुर्गा का सौम्य रूप ले लेती है। योग साधकों के अनुभव के अनुसार अचेतन कुण्डलिनी का प्रथम स्वरूप काली एक विकराल शक्ति है। जिसका शिव के ऊपर खड़े होना उसके द्वारा आत्मा पर पूर्ण नियंत्रण को व्यक्त करता है। कुछ लोग कभी-कभी मानसिक अस्थिरता के कारण अपने अचेतन के संपर्क में आ जाते हैं, जिसके फलस्वरूप अशुभ और भयानक भूत, पिशाच दिखाई देने लगते हैं। परन्तु जब साधक की अचेतन शक्ति का जागरण होता है तो यह ऊर्ध्वगमन के बाद आनन्द प्रदायिनी, उच्च चेतना दुर्गा का रूप धारण कर लेती है।
कुण्डलिनी जागरण के साथ ही जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन होने लगते हैं। कुण्डलिनी के जाग्रत् होते ही हमारे मन में परिवर्तन आता है। हमारी प्राथमिकताओं और आसक्तियों में परिवर्तन आता है। हमारे सभी कर्मों को परिवर्तन की इस प्रक्रिया से गुजरना होता है। इस बात को कुछ यूँ भी समझा जा सकता है कि बचपन में हम सभी खिलौनों के लिए लालायित रहते हैं। परन्तु बाद में सारी मनोवृत्तियाँ बदल जाती हैं। इसी प्रकार कुण्डलिनी जागरण के साथ ही एक प्रकार का रूपांतरण प्रारम्भ हो जाता है। उस समय सम्पूर्ण जीवन के सुव्यवस्थित एवं पुनर्गठित होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
कुण्डलिनी जागरण से होने वाले परिवर्तन, सामान्यतया सकारात्मक होते हैं, परन्तु यदि मार्गदर्शन सही न हो तो ये नकारात्मक भी हो सकते हैं। जब शक्ति का जागरण होता है तो शरीर को सभी कोशिकाएँ पूरी तरह से चार्ज हो जाती हैं और कायाकल्प की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। आवाज बदल जाती है, शरीर की गंध बदल जाती है। शरीर में होने वाले हार्मोन के स्राव भी परिवर्तित हो जाते हैं। शरीर और मस्तिष्क की कोशिकाओं का रूपांतरण सामान्य अवस्था से कहीं अधिक तेज गति से होने लगता है। सच तो यह है कि एक बार इस महान् शक्ति के जागरण के बाद मनुष्य निम्न स्तर के मन या निम्न प्राण शक्ति द्वारा संचालित होने वाला स्थूल शरीर नहीं रह जाता। बल्कि उसके शरीर की प्रत्येक कोशिका कुण्डलिनी की उच्च प्राण शक्ति से भर जाती है। जब यह जागरण पूर्ण होता है, तब मनुष्य एक छोटा भगवान् हो जाता है, अर्थात् उसका स्वरूप दिव्य हो जाता है।
इस महान् उपलब्धि को कैसे पाएँ? अर्थात् कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया को कैसे सम्पन्न करें? अथवा कुण्डलिनी योग की साधना किस तरह करें? इन सभी प्रश्नों के उत्तर में हम यहाँ सरल, निरापद उपायों की चर्चा करेंगे। सामान्य क्रम में प्रचलित साधनाओं में हठयोग की कठिन प्रक्रियाओं की चर्चा सुनने को मिलती है। इससे होने वाले लाभ निश्चित रूप से है, पर तनिक सी असावधानी होने पर हानियाँ इतनी अधिक हैं कि साधक का समूचा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। फिर उसे बचा पाना किसी के लिए सम्भव नहीं होता। इसलिए ऐसी जटिल प्रक्रियाओं को न अपनाना ही श्रेष्ठ व श्रेयस्कर है।
कुण्डलिनी साधना का सरलतम उपाय है- गायत्री महामंत्र का नियमित जप। यह एक बहुत शक्तिशाली, सरल एवं निरापद मार्ग है। परन्तु इसमें अपेक्षाकृत समय तथा धैर्य की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार किसी शान्त झील में कंकड़ फेंकने पर उसमें तरंगें उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार मंत्र को बार-बार दोहराने से मन रूपी समुद्र में तरंगें उत्पन्न होती हैं। लाखों-करोड़ों बार गायत्री मंत्र के जप से अस्तित्व का कोना-कोना झंकृत हो जाता है। इससे अपने शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक तीनों स्तरों की शुद्धि हो जाती है।
इस साधना में आवश्यकता यह है कि गायत्री महामंत्र का जप मानसिक स्तर पर भावनात्मक प्रगाढ़ता के साथ मन्द गति से किया जाना चाहिए। ऐसे ढंग से मंत्र का जप करने से कुण्डलिनी जागरण बिना किसी परेशानी के सही ढंग से हो जाता है। साधना के इस क्रम में उपासना के समय के अतिरिक्त भी श्वास के साथ हर पल गायत्री महामंत्र के जप में साधक को संलग्न रहना चाहिए।
कुण्डलिनी जागरण को इस साधना को और अधिक तीव्र एवं प्रखर बनाने के लिए गायत्री महामंत्र के जप के साथ तप के अनुबन्धों का होना आवश्यक है। ध्यान रहे कि तपस्या शुद्धिकरण की एक क्रिया है। उसे ठण्डे पानी अथवा कड़ी धूप में खड़े रहने जैसी अन्य हरकतें मानकर भ्रमित नहीं होना चाहिए। तपस्या का निहितार्थ- संस्कारों एवं वासनाओं का समूल क्षय है। इसके रहस्य को परम पूज्य गुरुदेव ने गायत्री महाविज्ञान के प्रथम खण्ड में विस्तार से बताया है। गायत्री महाविज्ञान के प्रथम भाग में ‘पापनाशक एवं शक्तिवर्धक तपश्चर्याएँ’ शीर्षक के अंतर्गत विधियों को अपनाकर इस साधना की तीव्रता को और अधिक बढ़ाया जा सकता है। इन प्रक्रियाओं को जीवन में आत्मसात करके यदि प्रातः काल तीन घण्टे गायत्री महामंत्र की साधना की जाय तो कुण्डलिनी शक्ति के जागरण के संकेत साधक को मिलने लगते हैं। लगातार छः वर्षों की इस साधना के साथ ही योग साधक पर जाग्रत् कुण्डलिनी का अमृत बरसता है। जिसके परिणाम स्वरूप जीवन में विशेषताओं और विभूतियों की सम्पदा अनायास ही अंकुरित और पल्लवित होने लगती है। जिसके सतत् अभिवर्द्धन के लिए समर्थ सद्गुरु का संरक्षण अनिवार्य है।
योग के रहस्य कहाँ पाएँ? साधना के सूत्र कहाँ खोजें? इन सवालों का उत्तर एक ही है- ‘सद्गुरु की शरण’। पोथी और किताबें पढ़ने से योग का रहस्य नहीं प्रकट होता। प्रवचन करने और सुनने से साधना के सूत्र नहीं मिला करते। यदि ऐसा सम्भव हो पाता तो आज चहुँ ओर अनगिन योगी गण विचरण कर रहे होते। क्योंकि इन दिनों योग साधना से सम्बन्धित जितनी पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है, उतना पहले कभी नहीं था। योग सूत्रों पर प्रवचन करने और सुनने वाले भी कम नहीं हैं। फिर भी अँधियारा है। साधना के दीए किसी ओर भी जलते दिखाई नहीं देते। आखिर ये दीए जले भी तो कैसे? इसके लिए पहली जरूरत है- मिट्टी के उस दीए को, जो गुरुभक्ति के स्नेह से लबालब भरा है। जिसके प्राण बाती की तरह जलने की आतुर प्रतीक्षा में है।
योग साधना के लिए पहली और अनिवार्य जरूरत है- शिष्यत्व की। शिष्यत्व- गहन आत्म क्रान्ति है। शिष्यत्व पनपेगा तो सद्गुरु मिले बिना न रहेंगे। आज के युग में योग विद्या बाल कौतुक बन कर रह गयी है। जगह-जगह सीखने और सिखाने वालों की भीड़ लगी है। और सबसे मजे की बात है कि इसके लिए लम्बी-चौड़ी फीसें भी हैं। योग विद्या और हजारों का लेन-देन, यह उलटबाँसी इन दिनों जीवन की विडम्बना बन गयी है। प्राणों में प्यास नहीं है तो शिष्यत्व कैसे पनपेगा। अपने समूचे अस्तित्व को हर पल जलाने के लिए तैयार नहीं है तो सद्गुरु की ज्योति भला कहाँ उतरेगी।
पहला, अनिवार्य और महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि वे सद्गुरु कहाँ है, जो हमारी योग साधना के प्रति जिज्ञासा पूरी करेंगे? सबसे गहन और अनिवार्य सवाल यह है कि क्या हमारे अन्दर सच्चे शिष्यत्व ने जन्म ले लिया है? क्या हमारे पास वे आँखें हैं जो उन्हें देख और पहचान सकें? अपने अन्दर इन प्रश्नों का समाधान खोजे बगैर सद्गुरु की कृपा नहीं मिल सकती है। और सद्गुरु की कृपा के बिना योग साधना के रहस्य नहीं जाने जा सकते। हाँ लोक प्रचलन में योग के नाम पर जो बाजीगरी सीखी और सिखायी जा रही है- उसे अवश्य जाना और पाया जा सकता है। ‘सद्गुरु की शरण सद्गुरु की कृपा ही योग साधना के रहस्यों की कुञ्जी है।’ यह तथ्य त्रिकाल सत्य है। इसे कोई कभी मेट और मिटा नहीं सकता।
बाबा कबीर कहते हैं-
दुख-सुख वहाँ कछु नहिं व्यापै दरसन आठो याम। नूरै ओढ़न, नूरै डासन, नूरै का सिरहान, कहै कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरु नूर तमाम।
अर्थात्- ‘सतगुरु के दर्शन होने पर फिर आठों पहर सुख-दुःख नहीं व्यापते। और वे सद्गुरु कैसे हैं? इसके बारे में वह कहते हैं कि प्रकाश ही उनका ओढ़ना है, प्रकाश ही उनका बिछौना है, प्रकाश का ही उनका सिरहाना है। अरे भाई, सद्गुरु तो समूचा प्रकाश पुञ्ज ही है। यानि कि बस वे प्रकाश पुरुष हैं।’ ऐसे प्रकाश पुरुष सद्गुरु के मिलने पर भला जीवन में अन्धकार कहाँ टिक सकता है।
सद्गुरु की इस रूप में पहचान, जीवन में बड़ी अनूठी घटना है। क्योंकि गुरु इस जगत् में सबसे बड़ा चमत्कार है। क्योंकि वह होते तो सामान्य आदमी जैसे ही हैं, फिर भी उनमें जो कुछ है, वह आम आदमी जैसा नहीं है। इस रहस्य को तभी अनुभव किया जा सकता है। जब अन्तर्चेतना में शिष्यत्व अंकुरित हो। इसके बिना तो योग साधना असम्भव है।
गाण्डीवधारी अर्जुन योगेश्वर श्रीकृष्ण के निकट सम्बन्धी थे। बचपन से उन्होंने श्रीकृष्ण के चमत्कारों की कथा भी सुनी थी। विश्वास और प्रेम भी था। परन्तु उनके जीवन में योग साधना तभी पनपी, जब उनका रोम-रोम पुकार उठा- ‘शिष्यस्तेऽहं शाधि माँ त्वा प्रपन्नं’। हे जगद्गुरु! मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे बोध कराओ, मैं आपकी शरण में हूँ। प्राणों की इस पुकार पर ही जगद्गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण उनके सद्गुरु हुए। और फिर तो एक-एक करके योग के सभी रहस्य उनके अंतर्हृदय में खुलते चले गए।
इस सम्बन्ध में सूफियों में एक बड़ी रोचक कथा है- एक युवक के मन में योग साधना के प्रति जिज्ञासा अंकुरित हुई। इस जिज्ञासा के साथ ही उसने सद्गुरु की खोज शुरू की। अपनी इस खोज में वह भटकता हुआ एक पेड़ के पास पहुँचा। वहाँ पहुँच कर उसने देखा कि एक फकीरनुमा व्यक्ति वहाँ बैठा हुआ ईश्वर स्मरण कर रहा है। जिज्ञासु युवक ने उससे निवेदन किया, बाबा! आप फकीर हैं, साधना के जानकार हैं। मुझे योग साधना के कुछ सूत्र बताइए, ताकि मैं भी अपनी छिपी हुई शक्तियों को जान सकूँ, आपकी तरह से चमत्कारी बन सकूँ, साथ ही ईश्वर लाभ भी कर सकूँ।
जवाब में फकीर ने उस युवक की ओर देखा। उस फकीर की दृष्टि में करुणा छलक रही थी। कुछ पल मौनभाव से देखते हुए उसने युवक से कहा- बेटा! योग साधना में दीक्षा देने का अधिकार केवल सद्गुरु को है। वही तुम्हारी सभी कामनाओं को तृप्त कर सकते हैं। मैं तो बस इतना कर सकता हूँ कि यदि तुम चाहो तो, तुम्हारे सद्गुरु की पहचान बता सकता हूँ। फकीर की इन बातों से युवक को भारी राहत मिली। उसने कहा- चलो यही सही, आप पहचान बताएँ।
बूढ़ा फकीर धीमी आवाज में बोला- बेटा! तुम्हारे सद्गुरु सामान्य नहीं है, वे प्रकाश पुरुष हैं। बस तुम उन्हें ढूंढ़ते रहो। एक दिन तुम उन्हें ऐसे ही किसी पेड़ के नीचे बैठा हुआ पाओगे। उनकी देह से प्रकाश निकल रहा होगा। उनकी आँखों में तुम्हारे लिए अपार वात्सल्य होगा। बस तुम उन्हें ढूंढ़ो। फकीर के इन वचनों के साथ युवक अपने सद्गुरु की तलाश में चल पड़ा। दिन-मास-वर्ष बीतते गए। उसने अनेकों नगर-वन-उपवन, रेगिस्तान की खाक छानी।
आखिर एक दिन वह इस ढूंढ़ खोज में भटकता हुआ एक पेड़ के पास पहुँचा। उस पेड़ के पास पहुँचते ही उसका मन आश्चर्य से भर उठा। वहाँ तो सब ओर प्रकाश की छटा थी। एक वृद्ध फकीर प्रकाश पुरुष के रूप में उसके सम्मुख था। युवक फकीर के चरणों में गिर पड़ा। फकीर उसे बड़े प्यार से अपनाया। इस सब के बाद युवक ने जब फकीर को गौर से देखा- तो उसका अचरज दुगुना हो गया। अरे यह तो वही फकीर था- जिसने उसे सद्गुरु के मिलन का मार्ग सुझाया था।
युवक ने फकीर से भाव विह्वल स्वर में पूछा- बाबा! आपने मुझे इतना भटकाया क्यों? आपने मुझे पहले क्यों नहीं अपनाया। वृद्ध फकीर ने कहा- बेटा! मैं तो वही हूँ, हाँ तुम अब बदल गये हो। पहले तुममें मात्र कौतुक था। अब तुममें शिष्यत्व जाग उठा है। बस इसी शिष्यत्व के जगते ही तुम मुझे पहचानने में समर्थ हो गए। कुछ पल रुक कर फकीर ने पुनः कहा- बेटा! सिद्ध, सन्त, योगी, महायोगी बहुतों को मिल जाते हैं। पर योग साधना का रहस्य बताने वाले सद्गुरु तो बस सच्चे शिष्य को मिला करते हैं।
सूफियों की यह कथा हम सबका अपना सच भी है। परम पूज्य गुरुदेव हमें मिले, हम सबको मिले। किसी ने उन्हें विद्वान् के रूप में पाया, तो किसी ने समर्थ सिद्ध के रूप में। पर योग साधना का रहस्य तो उसी को मिलेगा, जो उन्हें सद्गुरु के रूप में पहचान सकेगा। यह पहचान ही उसके जीवन में योग साधना के सूत्रों और उनमें समाए, रहस्यों को उजागर उद्घाटित करेगी। यह उद्घाटन सही और समुचित रीति से हो, इसके लिए उपयुक्त वातावरण की भी आवश्यकता है।
किसी भी पौध का बीज उचित वातावरण एवं खाद-पानी के रहते ही अंकुरित होकर फूलने-फलने की अवस्था तक बढ़ जाता है। इसी तरह योग-साधना की सफलता एवं प्रगति के लिए अनुकूल वातावरण का होना अनिवार्य है। विरले आत्मबल सम्पन्न मनस्वी ही वातावरण के विपरीत प्रभाव को निरस्त करते हुए उसे तोड़-मरोड़ कर बदल पाने में सफल होते हैं, अन्यथा सामान्य जन इसके प्रवाह में ढलने, गलने व बहने के लिए विवश पाए जाते हैं।
इसका कारण है अनगढ़ मन की सहज प्रवृत्ति जो स्वभाव से निम्नता की ओर अभिमुख रहती है। जिस तरह गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से गिरती वस्तु और गति पकड़ती है, इसी प्रकार वातावरण के दूषित प्रवाह में मन की निम्न प्रकृति और मुखर हो उठती है। इसी क्रम में कुसंस्कारों का उभार, भ्रष्ट चिन्तन की लिप्तता एवं दुराचरण की आँधी-व्यक्ति को जीवन आदर्श एवं ध्येय से विचलित कर पशु-पिशाच स्तर पर लाकर पटक देती है।
योग साधना का उद्देश्य मन की निम्नगामी प्रवृत्ति को उर्ध्वगामी दिशा देना है। इसमें साधनात्मक पुरुषार्थ की अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है, किन्तु यदि इसमें उचित वातावरण का पुट भी लग जाय, तो कार्य सरल हो जाता है। अन्यथा वातावरण की विषमता में मन को साधना कितना दुष्कर कार्य बन जाता है, इसे सामान्य जीवन क्रम में ही अनुभव किया जा सकता है। शहर का कोलाहल, गंदगी एवं भीड़ भरा वातावरण स्वस्थ व्यक्ति तक को अर्ध पागल जैसी स्थिति में ला देता है। अस्पताल एवं मरघट के वातावरण में जीवन की नश्वरता एवं सत्य का बोध कितनी सहजता से होता है इसे हर कोई जानता है। इसी तरह राग-रंग भरे भड़काऊ वातावरण में मन के निग्रह की दुष्वारिता समझी जा सकती है।
जबकि इस वातावरण से दूर शान्त, एकान्त एवं प्राकृतिक सुरम्यता के ग्राम्य या पहाड़ी आँचल में प्रवेश करते ही मन में हल्कापन एवं शान्ति स्वतः ही उमड़ने लगती है। इसके साथ ही यदि भूमि में दिव्यता के संस्कार विद्यमान हो तो, मन की सौम्य-स्थिरता एवं नीरवता सहज ही स्थापित हो जाती है।
दैनन्दिन जीवन में वातावरण के प्रभाव के ये अनुभव व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरा समूह, जाति एवं जन समुदाय इसके प्रभाव एवं विशेषताएँ अनुभव करता है। सुप्रसिद्ध विद्वान् जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपने ग्रंथ ‘प्रिंसिपल ऑफ पॉलिटिकल इकोनॉमी’ में इसको कई उदाहरणों सहित स्पष्ट किया है। उनके अनुसार- कही के निवासी अधिक बहादुर व साहसी होते हैं तो कहीं के खूँखार। किसी जाति में चरित्रनिष्ठ अधिक दिखाई देती है। जापान, इसराइल, डेनमार्क आदि देशों के निवासी अधिक परिश्रमी पाये जाते हैं। सरहदी पठानों का खूँखारपन प्रसिद्ध है। मिल के अनुसार स्थान विशेष के निवासियों में ये विशेषताएँ वातावरण के प्रभाव का परिणाम है। प्रसिद्ध दार्शनिक जूलियस हक्सले ने इस विशेषता को ‘साँस्कृतिक विशेषता’ की संज्ञा दी है और कहा कि कोई भी व्यक्ति इस विशेषता को उस वातावरण में रहकर प्राप्त कर सकता है।
वातावरण के प्रचण्ड प्रभाव के उदाहरण हमारे धर्मग्रंथों में भरे पड़े हैं। कथा प्रचलित है कि हस्तिनापुर के उत्तर में मयदानव के क्षेत्र में जब मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार गुजर रहे थे, तो वे माता-पिता को काँवर सहित वहीं छोड़कर आगे चल दिए। उस क्षेत्र से बाहर निकलने पर उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और वे पुनः अपने माता-पिता को साथ लेकर आगे चल पड़े। महाभारत का युद्ध क्षेत्र ऐसा स्थल चुना गया था जहाँ हिंसा एवं रक्तपात के प्रबल संस्कार विद्यमान थे। कुरुक्षेत्र के समीप ही पानीपत की ऐतिहासिक लड़ाइयाँ प्रसिद्ध हैं जो बाबर-राणासाँगा, बाबर-इब्राहिम लोदी और हुमायू-लोधी के बीच लड़ी गई थी। तीनों लड़ाइयाँ वर्षों के अन्तराल के बाद हिंसा एवं रक्तपात से संस्कारित एक ही स्थान पर लड़ी गई थीं।
वातावरण में आसुरी प्रवाह की तरह दिव्यता के प्रचण्ड शक्ति प्रवाह का भी अपना प्रभाव रहता है। रामायण काल में अगस्त्य मुनि की वेदपुरी इसका एक जीवन्त उदाहरण है। राक्षसराज रावण तक इसके आभामण्डल के पास फटकने का साहस नहीं कर पाता था। उसका अपने अनुचरों को स्पष्ट आदेश था कि वे इसमें प्रवेश करने का दुस्साहस न करें, अन्यथा प्राणों से हाथ धो बैठेंगे। इसी तरह का ताजा उदाहरण अलीपुर जेल का है। इसकी एक काल कोठरी में बंद कैदी यहाँ किसी भी तरह रह न सका, उसकी शिकायत थी कि उसका मन गहराइयों में डूब रहा है। प्रारम्भ में यह बात किसी को समझ में नहीं आई। गहरी खोजबीन करने पर पता चला कि राजनैतिक सक्रियता के दिनों में श्री अरविंद ने जेल के दिन इस कोठरी में बिताए थे और तप साधना द्वारा इसे दिव्यता से ओतप्रोत कर दिया था। वही वातावरण की दिव्य प्रखरता कैदी पर हावी हो रही थी। इसी वातावरण के प्रभाव से प्राचीन ऋषियों के आश्रमों में शेर व गाय एक घाट पर पानी पीते थे। इस युग में भी महर्षि रमण के आश्रम में ऐसा ही दृश्य दिखाई पड़ता था। जब हिंसक जीव पालतू पशुओं की भाँति महर्षि व उनके पास आने वाले दर्शनार्थियों के साथ घूमते थे।
इसी तरह हिमालय, युगों से तपस्वियों एवं सिद्ध पुरुषों द्वारा अनुप्राणित दिव्य स्थल रहा है। सूक्ष्मदर्शी मनीषियों के मत में अभी भी इसकी दुर्गम कंदराओं एवं गुह्य क्षेत्रों में ऋषिगण स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर में तप-साधना कर रहे हैं। हिमालय का कण-कण इनके तपःतेज से आवेशित है। इसके दिव्य प्रभाव के कारण ही व्यक्ति इसके आँचल में प्रवेश करते ही उच्चभाव भूमिका में विचरण करने लगता है। हिमालय की गोद में रहने वाले पहाड़ी लोगों की सरलता एवं सच्चरित्रता को इसी के प्रभाव की परिणति मान सकते हैं।
पुरातन ऋषि एवं आचार्यगण वातावरण के प्रचण्ड प्रभाव से भली भाँति परिचित थे। अतः इसके चमत्कारिक प्रभाव से जन-मानस को आवेशित करने के लिए उन्होंने तीर्थों की स्थापना की थी। ये सामान्यतया जन कोलाहल से दूर नदी या सरोवर के किनारे प्रकृति की सुरम्यता के बीच स्थित होते थे। साथ ही ये साँस्कृतिक प्रेरणाओं से सम्पन्न व ऋषियों की तप-साधना द्वारा संस्कारित होते थे।
दिव्य वातावरण से युक्त ये तीर्थ स्थल सहज ही आगंतुक के मनःमस्तिष्क को योग साधना की गहनता से ओतप्रोत कर देते थे। यहाँ आकर जीवन की दशा एवं दिशा पर गंभीर चिन्तन-मनन के लिए प्रेरित होता था। यहाँ रह रहे तपस्वी एवं ज्ञानी पुरोहितों-आचार्यों के मार्गदर्शन में जीवन की गुत्थियों का समाधान मिलता था और भावी जीवन की रीति-नीति का निर्धारण होता था, इस तरह उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन को गढ़ने व सँवारने के संकल्प एवं आत्मबल के साथ व्यक्ति तीर्थ से प्रस्थान करता था। साँस्कृतिक गौरव गरिमा का पुरातन अध्याय वस्तुतः इस वातावरण के प्रभाव की ही गाथा है।
काल क्रम में इसका आभामण्डल मन्द पड़ता गया। आज तीर्थ तो हैं किन्तु कुछ अपवादों को छोड़कर वह वातावरण कहीं उपलब्ध नहीं है। अधिकाँश तीर्थ स्थल श्रद्धालुओं की धर्म भावना के शोषण का केन्द्र बने हुए हैं। उच्चस्तरीय वातावरण के संकट की इस स्थिति में युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य एवं परम वन्दनीया माताजी द्वारा स्थापित एवं संस्कारित हरिद्वार के सप्तसरोवर क्षेत्र में स्थित शान्तिकुञ्ज एक आशा की किरण बनकर सामने आया है। योग साधना के लिए उपयुक्त सभी विशेषताओं से युक्त वातावरण यहाँ उपलब्ध है। और युग तीर्थ के रूप में यह नैष्ठिक साधकों को साधना के लिए भाव-भरा आवाहन एवं स्नेह निमंत्रण दे रहा है।
सप्त सरोवर हरिद्वार में स्थित गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज, वातावरण की उन तमाम विशेषताओं को अपने में समाये हुए है, जो इसे योग-साधना के लिए एक आदर्श स्थली बनाता है। एक ओर शिवालिक पर्वत शृंखला तो दूसरी ओर गढ़वाल हिमालय इसे अपने सुरम्य आँचल में समेटे हुए हैं। हरियाली के सघन आच्छादन के साथ गंगा का सान्निध्य इसे सहज ही उपलब्ध है। कभी सप्तऋषि गण इसी क्षेत्र में तप-साधना किया करते थे और गंगा जी यहाँ सात धाराओं में बहती थी। इनमें एक धारा शान्तिकुञ्ज क्षेत्र से होकर प्रवाहित होती थी, जिसके प्रमाण अभी भी थोड़ी सी खुदाई करने पर प्रकट होने लगते हैं।
हिमालय की छाया एवं गंगा की गोद में स्थित शान्तिकुञ्ज का यह सुरम्य क्षेत्र स्वयं में कई पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक विशेषताएँ लिए हुए है, जो इसके दिव्य वातावरण से जुड़े विशिष्ट संस्कारों को उजागर करती है।
उत्तराखण्ड हिमालय का द्वार होने के कारण इस क्षेत्र का नाम हरिद्वार पड़ा। पुराणों एवं धर्म ग्रंथों के पृष्ठ इसकी महिमा से भरे पड़े हैं। यह क्षेत्र पुरातन काल में सती एवं शिव के अलौकिक लीला प्रसंगों की भूमि रही है। व पार्वती ने इसी क्षेत्र में तप किया था। यह क्षेत्र सप्तपुरियों में एक मायापुरी के नाम से प्रख्यात रहा है।
हिमालय की छत्र-छाया एवं गंगा के सान्निध्य के कारण यह भूमि सदैव ही साधना की दृष्टि से एक आदर्श क्षेत्र रही है। रामायण काल में महर्षि वशिष्ठ सहित श्रीरामचन्द्र जी एवं उनके भाइयों को साधना के लिए यही क्षेत्र भाया था। गुरु वशिष्ठ के निर्देशानुसार श्रीराम ने देवप्रयाग, लक्ष्मण ने लक्ष्मण झुला, शत्रुघ्न ने मुनि की रेती व भरत ने ऋषिकेश को अपनी साधना स्थली चुना तथा वशिष्ठ जी स्वयं वशिष्ठ गुफा में स्थिर हुए थे।
द्वापर युग में हिमालय यात्रा के दौरान पाण्डव इसी क्षेत्र से होकर आगे बढ़े थे व अपने तप साधना का अधिकाँश समय इसी वातावरण के सान्निध्य में बिताया था। गोरखनाथ सम्प्रदाय के साधना संस्कार भी इस भूमि से जुड़े हुए हैं। महाराजा भर्तृहरि आजीवन इस वातावरण की कामना करते रहे, जो उनकी अमरकृति वैराग्य शतक में कुछ इस तरह मुखरित हुई-
गंगा तीरे हिमगिरि शिला बद्ध पद्मास्नस्य, ब्रह्मध्यानाम्यसनविधिना योग निद्राँगतस्य। किंतेर्माण्यं मय सुदिवसैर्थल ते निविशंक, मण्डूयन्तो जरठहरिणाः स्वांग मंग मदीये॥38॥
अर्थात् क्या वे मेरे अच्छे दिन आवेंगे, जब मैं गंगा के तट पर हिमालय पर्वत की गोद में पद्मासन लगाकर बैठा रहूँ? उस समय निर्भय होकर बूढ़े हरिण अपने सींगों की खुजलाहट को मिटाने के लिए मेरे शरीर से रगड़ने के लिए आया करें। गुरु गोरखनाथ की कृपा से उनकी यह कामना यही सप्त सरोवर क्षेत्र में जीवन के उत्तरार्द्ध में पूरी हो पाई थी, जब वे अपना राजपाट छोटे भाई विक्रमादित्य को सौंपकर, इस क्षेत्र के दिव्य वातावरण में साधना के लिए प्रवृत्त हुए थे। इसी तरह अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान आदि शंकराचार्य को यह वातावरण भाया था।
इस वातावरण की महत्ता को समझते हुए ही परम पूज्य गुरुदेव ने इस क्षेत्र का चुनाव अपनी साधनास्थली के रूप में किया। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से यह भी देख लिया था कि यह भूमि गायत्री महामंत्र के मंत्र द्रष्ट ऋषि विश्वामित्र की तपस्थली रह चुकी है। जब 1971 में पूज्यवर हिमालय प्रवास में थे तो परम वन्दनीया माताजी 24 कन्याओं के साथ 24 लाख के 24 पुरश्चरण द्वारा इस भूमि के प्रसुप्त संस्कारों को जाग्रत् कर रही थीं। गुरुदेव के हिमालय से आगमन के साथ ही यहाँ विशिष्ट साधना शिविरों का सिलसिला शुरू हुआ। एक दशक के अन्तराल में यहाँ प्राण प्रत्यावर्तन, वानप्रस्थ शिविर, ब्रह्मवर्चस साधना सत्र, कल्प साधना, प्रज्ञायोग जैसे कितने ही सामूहिक साधनात्मक प्रयोग सम्पन्न हुए। तीर्थ के दिव्य वातावरण एवं प्रखर मार्गदर्शन का लाभ ले रहे सौभाग्यशाली साधकों ने यहाँ अपने जीवन का कायाकल्प होते देखा। शान्तिकुञ्ज रूपी कल्पवृक्ष की छत्रछाया में न केवल उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण हो रही थीं, बल्कि वे एक नया मनोबल एवं आत्मबल सम्पादित कर रहे थे। साधना सत्रों का यह क्रम आगे एक माह व नौ दिवसीय सत्रों के रूप में जारी रहा व आज भी अनवरत रूप से चल रहा है जिसमें बढ़ते हुए साधकों की संख्या यहाँ के वातावरण के प्रति बढ़ती श्रद्धा एवं तप-साधना के प्रति बढ़ती निष्ठ, दोनों को ही प्रमाणित कर रही है।
परम पूज्य गुरुदेव के द्वारा सूक्ष्मीकरण साधना का विशिष्ट प्रयोग यहीं सम्पन्न हुआ था। 1984 से 87 तक तीन वर्ष तक चली इस साधना का उद्देश्य सूक्ष्म प्रकृति में हेर-फेर करना था, जिससे कि युग परिवर्तन की संभावनाएँ साकार हो सके। आध्यात्मिक साधना के इतिहास में इस तरह का पुरुषार्थ इससे पूर्व केवल ब्रह्मऋषि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। जब वे नई सृष्टि के निर्माण के लिए संकल्पित हुए थे। इतिहास को दोहराता हुआ नूतन प्रयोग परम पूज्य गुरुदेव द्वारा पुनः उसी भूमि में सम्पन्न हुआ। इसी के बाद पूज्यवर ने 21वीं सदी उज्ज्वल भविष्य की उद्घोष किया था भावी प्रज्ञायुग की रूपरेखा प्रस्तुत की थी।
इन विविध प्रयोगों एवं लोककल्याण की गतिविधियों के साथ शान्तिकुञ्ज का वातावरण एक जीवंत जाग्रत् तीर्थ के रूप में विद्यमान है। परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीया माताजी के प्रचण्ड तप की प्रभा आज भी इसके कण-कण में विद्यमान है, जिसे कोई भी नैष्ठिक साधक अनुभव कर सकता है। इसका चिरसाक्षी 1926 में प्रज्वलित अखण्ड दीपक आज भी अपनी दिव्य आभा बिखेर रहा है। इसके सान्निध्य में अब तक करोड़ों की संख्या में गायत्री महामंत्र का जप हो चुका है। यहाँ निवास कर रहे व बाहर से आने वाले हजारों साधकों द्वारा नित्य लक्षाधिक जप चलता रहता है। इसी तरह नौ कुण्डीय यज्ञशाला में नित्यप्रति दो-तीन घण्टे यज्ञ होता है। युगसंधि महापुरश्चरण के अंतर्गत हुए सामूहिक साधनात्मक पुरुषार्थ ने इसके वातावरण की दिव्यता को और प्रखर किया है। इसी के अंतर्गत करोड़ों गायत्री मंत्र का जप सम्पन्न हुआ है व लाखों युग साधक नवसृजन के लिए संकल्पित हुए हैं।
देवात्मा हिमालय का प्राणप्रतिष्ठित देवालय भी यहाँ के वातावरण को एक विशेष दिव्यता प्रदान करता है। इसके प्रतिनिधि ऋषियों की भी यहाँ के परिसर में प्राण प्रतिष्ठ की गई है। साथ ही पुरातन काल में इनके द्वारा संचालित सभी ऋषि परम्पराएँ नए सिरे से जीवंत एवं सक्रिय की गई हैं।
इस वातावरण के साथ, परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीया माताजी के तप, स्नेह एवं मार्गदर्शन का प्रवाह आज भी इसके सुयोग प्रतिनिधियों के माध्यम से सहज उपलब्ध है। साथ ही गुरुसत्ता का संरक्षण एवं दिव्य अनुदान वर्षण अनवरत रूप से जारी है। युगतीर्थ से जुड़ी इन विशिष्टताओं का सही-सही लाभ उठाने के लिए आवश्यकता है योग साधना की उस मनोभूमि की जो इसके सूक्ष्म स्पन्दनों को ग्रहण कर सके। इस ग्रहणशीलता को और अधिक बढ़ाने के लिए आहार-विहार का समुचित निर्धारण भी अभीष्ट है।
इस वातावरण के साथ, परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीया माताजी के तप, स्नेह एवं मार्गदर्शन का प्रवाह आज भी इसके सुयोग प्रतिनिधियों के माध्यम से सहज उपलब्ध है। साथ ही गुरुसत्ता का संरक्षण एवं दिव्य अनुदान वर्षण अनवरत रूप से जारी है। युगतीर्थ से जुड़ी इन विशिष्टताओं का सही-सही लाभ उठाने के लिए आवश्यकता है योग साधना की उस मनोभूमि की जो इसके सूक्ष्म स्पन्दनों को ग्रहण कर सके। इस ग्रहणशीलता को और अधिक बढ़ाने के लिए आहार-विहार का समुचित निर्धारण भी अभीष्ट है।
योग साधना में आहार-विहार से जुड़े नियमों का पालन आवश्यक है, अन्यथा साधना की सफलता संदिग्ध ही रह जाती है। और इसके वर्णित लाभों से वंचित ही रहना पड़ता है। योग साधना में अवतरित होने वाले दिव्य शक्ति प्रवाह से ठीक-ठीक लाभान्वित होने का सुयोग भी तभी बन पड़ता है, जब मनोभूमि इसके अनुरूप संवेदनशील एवं संस्कारवान बनाई जाय। इस संदर्भ में आहार-विहार का निर्धारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
यह एक सामान्य सा तथ्य है कि आहार से शरीर निर्माण होता है, किन्तु इसके मन पर पड़ने वाले प्रभाव से अधिकाँशतः अनभिज्ञता की स्थिति बनी रहती है। मानवीय चेतना के मर्मज्ञ मनीषियों के अनुसार आहार से शरीर ही नहीं बल्कि मन का भी निर्माण होता है। छान्दोग्योपनिषद् (6-5.1) के अनुसार- ‘खाया हुआ अन्न तीन प्रकार की गति को प्राप्त होता है। उसका अत्यन्त स्थूल भाग मल बनता है, मध्यम भाग से माँस बनता है और अत्यन्त सूक्ष्म भाग से मन बनता है।’ इस तरह अन्न के संस्कारों एवं प्रकृति का मन से सीधा रिश्ता है।
अतः योग साधना की दृष्टि से शुद्ध एवं सात्विक आहार की उपयोगिता समझी जा सकती है। यहाँ गीता के 16 वें अध्याय में आहार सम्बन्धी किया गया सूक्ष्म विश्लेषण विचारणीय है। आहार को गीताकार ने सात्विक, राजसिक एवं तामसिक तीन भागों में बाँटा गया है। बासी, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, जूठा, अपवित्र व भारी भोजन तामसिक प्रकृति के अंतर्गत आता है। यह भोजन मन को स्थूल बनाता है व शरीर में आलस, तन्द्रा व नींद को लाता है। उत्तेजक, तेज स्वाद वाले, बहुत चटपटे, खट्टे पदार्थ राजसिक आहार के अंतर्गत आते हैं। इनका सेवन मन में उत्तेजना पैदा करता है व इन्द्रियों को चंचल बनाता है। इनके विपरीत रसयुक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले और स्वभाव से मन को प्रिय लगने वाले पदार्थ सात्विक आहार के अंतर्गत आते हैं। फल, दूध, दही, घी, गेहूँ, चावल आदि इसी श्रेणी में आते हैं।
गीताकार के शब्दों में जो व्यक्ति शरीर के साथ अपने मन, विचार, भावना व संकल्प को भी शुद्ध, पवित्र एवं निर्मल रखना चाहता हो, उसे राजसिक व तामसिक आहार का त्याग कर सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए।
आहार के सम्बन्ध में आधुनिक आहार शास्त्रियों एवं मनोवैज्ञानिकों के शोध निष्कर्ष भी इसी लाभ की पुष्टि करते हैं। मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक डॉ. कैलग अपनी पुस्तक ‘प्लैन फैक्टस’ में लिखते हैं कि ‘आहार का मन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। मन का पोषण आहार में विद्यमान सूक्ष्म प्राण के अवशोषण के फलस्वरूप होता है। अतः इसकी दूषणता एवं सात्विकता के अनुरूप ही मन की चंचलता एवं स्थिरता निर्भर करती है।’ डॉ. जीन आँरनिश और डॉ. जान कावत जिन्न भी अपने क्रान्तिकारी शोध अध्ययन के अंतर्गत इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि योग-साधना की सफलता बहुत हद तक आहार के उचित निर्धारण पर निर्भर करती है। इसी तरह डॉ. वेलेन्टाइन ‘ट्राँजीशन टू वेजीटेरिएनिज्म’ में सात्विक सुपाच्य एवं पोषक तत्त्वों से भरे शाकाहारी आहार को शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक स्थिरता एवं स्वास्थ्य के लिए आवश्यक मानते हैं।
इस तरह योग साधना की दृष्टि से आहार शुद्ध-सुपाच्य व सात्विक होना चाहिए। साथ ही इसे उचित मात्रा में ग्रहण किया जाए। अन्यथा अत्यधिक मात्रा में लिया गया सात्विक आहार भी आलस, निद्रा व तन्द्रा को ही न्यौता देता है। इस संदर्भ में योगाचार्यों का यह नियम अनुकरणीय है कि आमाशय को भोजन से आधा भरें, इसके चौथे भाग को जल से भरें और शेष चौथे को हवा के आने जाने के लिए खाली रखें। अन्यथा मिताहार के अभाव में घेरण्ड संहिता (16) के अनुसार योग रोग नाशक नहीं अपितु भयंकर रोगों का उत्पादक बन जाता है-
मिताहारं बिना यस्तु योगारम्भं तु कारयेत्। नाना रोगो भवेतस्य किंचितद्योगो न सिद्धयति॥
इस तरह आहार के संदर्भ में शुद्ध-सात्त्विक एवं मिताहार का नियम ही वरेण्य है।
आहार के बाद विहार का क्रम आता है विहार अर्थात् रहन-सहन। इसे इन्द्रिय संयम भी कह सकते हैं। इसके अंतर्गत कामेन्द्रिय ही प्रधान है। योग साधना के दौरान इसकी निग्रह, शुचिता एवं पवित्रता अनिवार्य है। ब्रह्मचर्य व्रत के द्वारा इसी कार्य को सिद्ध किया जाता है। इसमें शारीरिक चेष्टाओं की ही तरह कामुक चिंतन पर भी अंकुश लगाना पड़ता है। विपरीत लिंग के प्रति सतत् पवित्र भाव का आरोपण किया जाता है व ऐसे साहित्य, संग व वातावरण से दूर ही रहा जाता है, जिनसे कि निम्नवृत्तियाँ भड़क न उठे।
इस संदर्भ में पुनः आहार का विषय विचारणीय है। स्वादेन्द्रिय का कामेन्द्रिय से सीधा सम्बन्ध है। स्वाद पर अंकुश लगते ही काम सहज ही काबू में आ जाता है। अन्यथा चटोरेपन के रहते यह कार्य असंभव प्रायः बना रहता है। डॉ. आर्थर कोवेन अपनी पुस्तक ‘साइंस आफ न्यू लाइफ’ में ठीक ही फरमाते हैं कि ‘काम-वासना को उत्पन्न करने वाले कारणों में दूषित आहार प्रमुख है और यह कल्पना करना कि खान-पान में माँस, मदिरा, अण्डा, बीड़ी-सिगरेट, मिर्च-मसाला, आचार-खटाई और चाय-काफी का स्वाद जिह्वा चखती रहे और व्यक्ति कामुकता से बचा रहे, एक असम्भव कल्पना है।’
इस संदर्भ में योग साधना के पथिकों द्वारा अपनाए जाने वाले सम्बन्धी कठोर नियम समझे जा सकते हैं। पुरातन काल में पिप्पलाद ऋषि केवल पीपल के फल खाकर निर्वाह करते थे। औदुम्बर ऋषि केवल गूलर खाकर शरीर निर्वाह करते थे। मौदगल ऋषि का आहार केवल मूँग था। परम पूज्य गुरुदेव ने 24 वर्षीय पुरश्चरण जौ की रोटी एवं छाछ के सहारे पूरा किया था। इसी तरह गाँधी जी ने एक सप्त महाव्रतों में अस्वाद को प्रथम स्थान दिया था। हालाँकि सर्व सामान्य के लिए इस संदर्भ में अति कठोरता एवं विलासिता की दोनों अतियों से बचना ही बेहतर है। अपनी स्थिति एवं प्रकृति के अनुरूप मध्यम मार्ग का निर्धारण किया जाय, जिसको ठीक ढंग से निभाया जा सके।
इंद्रिय संयम के अंतर्गत वाणी का संयम भी अभीष्ट है। साधना के दौरान वाणी का न्यूनतम एवं आवश्यक उपयोग ही किया जाय व व्यवहार को भी संयत रखा जाय। निंदा, चुगली एवं वाद-विवाद से सर्वथा बचना चाहिए। जहाँ ऐसे प्रसंग चल रहे हों वहाँ से उठकर अन्यत्र चले जाना ही उचित है। अवाँछनीय दृश्य एवं प्रसंगों से स्वयं को सर्वथा दूर ही रखना चाहिए है। आहार की तरह विहार में भी अधिकाधिक सात्विकता एवं पवित्रता का समावेश किया जाना चाहिए।
आहार-विहार में अपनाई गई शुद्धता एवं सात्विकता से छान्दोग्योपनिषद् (7-2, 6-2) की वह उक्ति शनैः-शनैः चरितार्थ होती जाएगी, जिसमें ऋषि घोषणा करते हैं-
आहार शुद्धौ सत्वशुद्धि सत्व शुद्धो ध्रुवा स्मृतिः। स्मृतिर्लब्धे सर्वग्रन्थीनाँ प्रियमोक्षः॥
अर्थात्- आहार के शुद्ध होने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है, अन्तःकरण के शुद्ध होने से बुद्धि निश्छल होती है और बुद्धि के निर्मल होने से सब संशय और भ्रम जाते रहते हैं तथा तब मुक्ति का मिल सकना सुलभ हो जाता है। इस सुलभता का एक महत्त्वपूर्ण रहस्य योग और स्वास्थ्य प्रकरण में भी केन्द्रित है।
योग साधना की सतत् उपेक्षा के कारण पनपी आधुनिक युग की विकृत जीवन शैली के कारण रोगों की जैसे बाढ़ सी आ गई है। इनमें मनोकायिक एवं मानसिक रोगों की अप्रत्याशित वृद्धि स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट का कारण बनी हुई है। इनकी जटिल एवं सूक्ष्म प्रकृति के कारण आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इनके सामने असहायपन की स्थिति में पड़ा हुआ है। इस स्थिति में चिकित्सा विज्ञानियों का योग पद्धति की ओर मुड़ना स्वाभाविक ही है। योग अपनी समग्र एवं सूक्ष्म दृष्टि के कारण समग्र स्वास्थ्य का आश्वासन दे रहा है और इस दिशा में जो अनुसंधान अन्वेषण हुए हैं व हो रहे हैं, वे भी उत्साहवर्द्धक निष्कर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।
मनोकायिक रोग मन की गहराइयों में पलते हैं व शरीर के धरातल पर प्रकट होते हैं। इस श्रेणी के रोगों में कुछ हैं- दमा, पेप्टिक अल्सर, क्रोनरी थ्रोम्बोसिस, अल्सराइटिस कोलाइटिस, मधुमेह, कैंसर, एंग्जाइटी न्यूरोसिस, हाइपरटेन्शन आदि। आधुनिक चिकित्सा पद्धति मात्र शारीरिक लक्षणों के आधार पर इनका उपचार करती है व इनके निदान में असफल प्रायः रहती है। इस संदर्भ में किए गए प्रयोगों के तहत यौगिक क्रियाओं को आशाजनक सफल पाया गया है।
हाइपरटेन्शसन आज का सर्वाधिक प्रचलित रोग है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अंतर्गत इसका कोई सटीक इलाज नहीं है। इसके अंतर्गत केटेकोमिन स्रावों की अधिकता रहती है। के.एन. उडुप्पा ने अपने गहन शोध अन्वेषण के अंतर्गत, शवासन की सरल यौगिक प्रक्रिया द्वारा इसका संतोष जनक उपचार पाया है, कुछ अन्य आसनों (शीर्षासन, भुजंगासन आदि) तथा प्राणायामों (सूर्यभेदन, चन्द्रभेदन, उज्जयी) को साथ जोड़ने पर इसमें अद्भुत परिणाम देखे गये हैं।
क्रोनरी थ्रोम्बोसिस, हाइपरटेन्शन की विकसित अवस्था है। इसकी प्रारम्भिक स्थिति में शवासन के नियमित अभ्यास को उपयोगी पाया गया है। क्राँनिक पेप्टिक अल्सर में एसिटाइकोलिन, हिस्टाँमिन तथा प्लाज्मा कार्टिसाल की मात्रा बढ़ी चढ़ी रहती है, जो कि तनाव से उत्पन्न होते हैं। उडुप्पा के अनुसार, इसकी प्रारम्भिक अवस्था में योगासनों को उपयोगी पाया गया है। इसी तरह अल्सराइटस कोलाइटिस में यौगिक क्रियाओं को संतोषजनक लाभप्रद पाया गया है।
एन्ग्जाइटी न्यूरोसिस एक अन्य प्रचलित व्याधि है। यह प्रायः चिंता करने वाले व अत्यधिक चिंतनशील व्यक्ति में पनपता है। इसके अंतर्गत रक्त में एसिटाइकोलिन की मात्रा बढ़ी-चढ़ी रहती है। इसके उपचार में आसन (शल्भासन, भुजंगासन, सर्वांगासन, हलासन, पद्मासन आदि) तथा प्राणायाम (उज्जयी, अनुलोम विलोम) को विशेष लाभदायक पाया गया है। इसके अंतर्गत प्रारम्भिक योगाभ्यास 6 मास में ही अद्भुत परिणाम देखे गये हैं।
दमा आधुनिक चिकित्सा के लिए एक अन्य लाइलाज रोग है। योग उपचार को इसमें प्रभावी पाया गया है।
मधुमेह एक अन्य प्रचलित मनोकायिक रोग है। नियमित आसन व प्राणायाम (भस्मिका) को इसमें उपयोगी पाया गया है। इनके द्वारा रक्त में केटेकोलामिन की मात्रा घटती है, जो कि रक्तशर्करा बढ़ाने में जिम्मेदार होता है। अमेरिका के ‘यौगिक ट्रीटमेंट सेन्टर’ ने 300 मधुमेह रोगियों पर विशेष अध्ययन किया है। इसमें रोगियों का योगासनों व संतुलित आहार का उपचार दिया गया। तीन माह बाद रोगियों में आशातीत परिवर्तन देखे गए। 50' रोगियों के रक्तशर्करा की मात्रा में काफी कमी हो गयी थी। इसी तरह हृदय रोगियों पर भी कुछ आरम्भिक परीक्षण किए गए व काफी उत्साहजनक परिणाम उत्पन्न हुए। मेडिकल कॉलेज मद्रास के डॉ. लक्ष्मीकांत ने हृदय रोगियों पर योगासनों के प्रभाव का विशेष अध्ययन किया है। इस संदर्भ में हलासन, सर्वांगासन व विपरीतकरणी मुद्रा उपयोगी पाई गई है। इसी तरह प्रो. जुलियन ने शवासन को हृदयरोग में भी विशेष उपयोगी पाया है। विशेष आसनों को अपनाते हुए एक वर्ष के अन्तराल में तकलीफें काफी कम हो गई थीं। शोधकर्त्ताओं ने अर्थराइटस में भी योगासनों से विशेष लाभ देखा और अनुभव किया है।
कैंसर जैसे गंभीर रोग में भी योग की महत्त्वपूर्ण भूमिका पाई गई है। अमेरिका के एम.हाल ने इस संदर्भ में विशेष शोध कार्य किया है। उनके अनुसार यौगिक क्रियाओं द्वारा कैंसर से लड़ने वाली कुछ विशिष्ट कोशिकाओं (जैसे- टी एण्ड बी लिम्फोसाइट) की सक्रियता असाधारण रूप से बढ़ जाती है। ऐसे ही निष्कर्ष एम. एरिक्सन एवं ई रोसी ने ‘सजेस्टिव थैरेपी एक्सप्लोरेटरी केसबुक’ नामक शोध कृति में प्रस्तुत किए हैं।
आस्ट्रियाई अनुसंधान परिषद के स्टीफन सैडरसन ने लम्बे अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि यदि आसनों को नियमित रूप से किया जाय तो व्यक्ति स्वस्थ जीवन जी सकता है। सैडरसन ने आसन-प्राणायाम द्वारा अनेक दमाग्रस्त रोगियों को ठीक किया है। इसके अतिरिक्त उनके अनुसार मधुमेह, मिर्गी, उच्चरक्तचाप एवं हृदय संबंधी प्राणघातक रोगों को भी योगाभ्यास से ठीक किया जा सकता है। चैकोस्लोवाकिया के एम.राँथ ने भुजंगासन को रक्तचाप एवं मानसिक तनाव में विशेष लाभकारी बताया है।
आसन व प्राणायाम के साथ ध्यान की प्रक्रिया को भी जोड़ने से योग समग्र स्वास्थ्य का वरदान बन जाता है। तनाव जन्य रोगों एवं मनोरोगों की आँधी आज जब थमने का नाम नहीं ले रही है, ऐसे में ध्यान एक प्रभावी उपचार के रूप में सामने आया है।
वाल्टर एवं ग्रीन ने माइग्रेन एवं तनाव से जुड़े सरदर्द में ध्यान द्वारा सफल उपचार प्रस्तुत किया है। प्रयोग के अंतर्गत लिए गए रोगियों में 81' रोग मुक्त हो गए थे। मिनिसोटा के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. डेविड डब्ल्यू ओर्मेजान्सन ने ‘आँटोनोमिक स्टैबिलिटी एण्ड मेडीटेशन’ नामक अपने शोध निष्कर्ष में बताया है कि ध्यान द्वारा तंत्रिका तंत्र में एक नई चेतना आती है। इससे त्वचा की बाह्य वातावरण के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है तथा इससे वातावरण के तनाव, मनोकायिक रोग एवं तंत्रिका तंत्र के रोग आदि दूर हो जाते हैं। चिकित्सक जॉनसन ने ध्यान को हाइपोकोन्ड्रिया, सीजोफ्रेनिया, एन्ग्जाइटी जैसी तनाव जन्य मानसिक बिमारियों में असाधारण रूप से लाभदायक पाया है। इसी तरह डॉ. थयोफोर ने भी अपने अनुसंधान के अंतर्गत ध्यान के असाधारण प्रभावों को देखा। उनके अनुसार ध्यान व्यक्ति को घबराहट, उत्तेजना, मानसिक तनाव, मनोकायिक रोगों, एवं संकीर्ण स्वार्थपरता जैसे विकारों से मुक्ति दिलाकर एक स्वस्थ जीवन का उपहार देने में सक्षम है।
ध्यान से रक्त में विद्यमान अम्ल रूपी विष लेक्टेट की मात्रा में भारी कटौती होती है, इससे निरोगिता के अनेकों लाभों के साथ उच्च रक्तचाप का गहरा उपचार हो जाता है। इसी तरह फेफड़े का वायु प्रदेश के प्रति प्रतिरोध 20' तक घट जाता है, जिससे दमा के रोगियों को ध्यान भारी राहत दिलाता है। उपरोक्त संदर्भ में डॉ. श्रीनिवास ने ध्यान के अंतर्गत योगनिद्रा को बहुत उपयोगी पाया है। डॉ. फ्रैंक के अनुसार ध्यान द्वारा जीवनी शक्ति बढ़ती है, जिससे ‘इम्यून सिस्टम’ सशक्त होता है। इससे संक्रामक बिमारियों से सहज ही छुटकारा मिल जाता है। एलर्जी से ग्रस्त रोगियों में अधिकाँश इससे लाभान्वित हुए हैं।
इस तरह ध्यान का नियमित अभ्यास, तनावजन्य व्याधियों का सफल उपचार करता है। इम्यून तंत्र को सशक्त कर शरीर को स्वस्थ बनाता है व शाँत तथा स्थिर मनोभूमि का निर्माण कर मानसिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करता है। आज यह सुनिश्चित सत्य है कि योग अपने नाम के अनुरूप न केवल आत्मा और परमात्मा के संयोग का सूक्ष्म विज्ञान भर है बल्कि यह स्वस्थ जीवन का समग्र विधान भी है। इसकी आसन, प्राणायाम व ध्यान जैसी प्रक्रियाएँ न केवल शारीरिक रोगों का उपचार करने में सक्षम है बल्कि मनोरोगों का भी सफल उपचार करती है व स्वस्थ जीवन का आधार प्रस्तुत करती है। इसी आधार पर योग मार्ग का सूक्ष्म पथ प्रशस्त होता है, जिसके अपने अवरोध हैं व तदनुरूप इसकी अपनी सूक्ष्म निवारण-निराकरण प्रक्रिया है।
योग साधना का मार्ग तरह-तरह की कठिनाइयों से भरा हुआ है। पग-पग पर इसमें साधक को विविध प्रकार के अवरोधों का सामना करना पड़ता है। पथ की विषमता के कारण ही इसे छुरे की धार के समान दुर्गम बताया गया है। आश्चर्य नहीं कि साधक इसमें कई बार गिरता है, किन्तु अपने ध्येय के प्रति समर्पित साधक हर बार उठकर अधिकाधिक उत्साह, वीरता एवं प्रसन्नता के साथ आगे बढ़ता है। यदि साधक अपने लक्ष्य के प्रति एकनिष्ठ है व साथ ही समर्थ गुरु का संरक्षण प्राप्त है तो प्रत्येक अवरोध उसकी सफलता की सीढ़ी बनता जाता है।
लक्ष्य का सही निर्धारण न होना व अपनी यथास्थिति का सही परिचय न होना योग मार्ग का प्रथम बड़ा अवरोध है। इस कारण साधक ध्येय का मनोकल्पित लुभावना चित्र बनाकर, बड़े उत्साह के साथ यात्रा प्रारम्भ करता है, किन्तु मार्ग की विषमता उसके अरमानों पर तुषारापात कर देती है, परिणाम स्वरूप साधक थक-हार कर प्रयास छोड़ देता है।
साधना के दौरान खान-पान का असंयम, ब्रह्मचर्य का अभाव, साधना पथ पर संदेह, अस्त-व्यस्त दिनचर्या आदि प्राथमिक बाधाएँ हैं, जिनके कारण व्यक्ति आलस्य-प्रमाद एवं हताशा-निराशा के झूले में झूलता रहता है।
व्यर्थ की गपशप, दूसरों की बातों को जानने का कौतुहल तथा दूसरों के मामले में टाँग अड़ाने की प्रवृत्ति योगमार्ग का एक स्पष्ट विघ्न है। इनके अतिरिक्त बुरी संगत, परदोषारोपण, अनैतिक जीवन, व्यवहार व कार्य में अति, आदि अन्य बाधाएँ हैं। इसके साथ ही अपनी क्षमता से बहुत अधिक की आकाँक्षा, दूसरे की प्रगति पर ईर्ष्या, द्वेष, हीनता एवं अपराध बोध आदि वृत्तियाँ साधना को दुष्कर बनाती हैं। उदासी, अवसाद, शंका, सन्देह, भय आदि मार्ग की अन्य बड़ी बाधाएँ हैं।
योग साधना में अतिवादी जीवन पद्धति भी एक बड़ी बाधा है। अति भोजन या अति तप के अंतर्गत शरीर को अतिशय सताना, अति वार्तालाप या अति मौन, लोगों के साथ अति मिलना या अति आत्मकेन्द्रित हो जाना, ये सभी योग मार्ग के व्यवधान हैं।
नाम, यश एवं शक्ति की कामना योग मार्ग का एक सूक्ष्म एवं प्रबलतम व्यवधान है। यह अहंकार को पुष्ट करता है। साँसारिक प्रलोभनों से भी अधिक शक्तिशाली सूक्ष्म लोक के प्रलोभन होते हैं जो उच्चस्तरीय साधकों के लिए कसौटी बनकर आते हैं।
वस्तुतः साधना मार्ग के अधिकाँश अवरोध मन की रज व तम वृत्ति से पैदा होते हैं। मन की रजोगुणी व तमोगुणी स्थिति इनकी उर्वर भूमि सिद्ध होती है।
‘पंचदशी’ में स्वामी विद्यारण्य इस विषय पर सुन्दर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि सतोगुणी मन से अनासक्ति, क्षमा, उदारता, रजोगुणी मन से काम, क्रोध, लोभ तथा तमोगुणी मन से आलस, विभ्रम तथा तंद्रा आदि पैदा होते हैं। सत्व से सद्गुणों का तथा रजस से दुर्गुणों का संचय होता है। जबकि तमस से न सद्गुणों का और नहीं दुर्गुणों का संचय होता है। बल्कि जीवन यूँ ही व्यर्थ नष्ट हो जाता है। घृणा, ईर्ष्या, क्रोध, भय, काम, क्रोध, दंभ आदि निम्नवृत्तियाँ मन के रजस एवं तमस गुणों से पैदा होती हैं। ये ही साधना के दौरान विविध रूपों में विघ्न-बाधाएँ बनकर उपस्थित होती हैं।
विवेक चूड़ामणि में आदि शंकराचार्य के अनुसार तमस व रजस की प्रधानता के कारण बुद्धि में सदैव विवेक का अभाव रहता है और यह अन्तहीन अवरोधों का कारण बनती है। गीता के 13 वें अध्याय में इस विषय की विशद् विवेचना करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि तमोगुण अज्ञान व बंधन का कारक है, तथा रजोगुण अस्थायी सुख देते हैं, किन्तु इनकी प्रतिक्रिया स्वरूप दुःख ही मिलता है। जबकि सतोगुण पवित्रता, शान्ति एवं प्रकाश की ओर ले जाता है।
अतः योगमार्ग के अवरोधों के निराकरण में मन की तमोगुणी व सतोगुणी प्रकृति का रूपांतरण ही मूलतत्त्व है। श्रीमद्भागवत् का इस संदर्भ में स्पष्ट निर्देश है कि सात्विक अर्थात् पवित्र एवं शुद्ध वस्तुओं के उपयोग से सत्त्व का विकास होता है। और अध्यात्म का पथ प्रशान्त होता है। इस विषय में आहार-विहार के विषय में सत्त्व शुद्धि की चर्चा पिछले लेख में पर्याप्त विस्तार से हो चुकी है।
श्रीकृष्ण गीता के 13 वें अध्याय में गुणों के दस मूल कारणों की विवेचना करते हुए कहते हैं कि सत्त्व की वृद्धि के लिए इन कारणों का सात्त्विकता से ही जुड़ा रहना चाहिए। इसके लिए उनके अनुसार (गीता 13, 6)- मात्र उन्हीं ग्रंथों का स्वाध्याय करना चाहिए, जो निवृत्ति मार्ग का प्रतिपादन करते हैं अर्थात् ब्रह्म (ईश्वर) की एकता का प्रतिपादन करते हैं। (उत्तेजक, हिंसक नहीं) मात्र पवित्र जल का ही सेवन किया जाना चाहिए। (शराब या अपवित्र जल आदि का नहीं) आध्यात्मिक लोगों का ही संग करना चाहिए (प्रपंची या दुष्ट लोगों का नहीं)। एकाँत स्थान को प्राथमिकता देनी चाहिए (भीड़ या जुआ घर नहीं)। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त का या कोई ऐसा समय ध्यान के लिए चुनना चाहिए। जिससे कि न्यूनतम व्यवधान हो। निस्वार्थ एवं परमार्थिक कार्यों को ही करना चाहिए (न कि स्वार्थ या नुकसानदायक कर्म)। पवित्र व अहिंसक धर्म में ही दीक्षित होना चाहिए (अशुद्ध व अकल्याणकारी धर्म में नहीं)। ध्यान प्रभु का ही करना चाहिए न कि विषय वस्तुओं या दुश्मनों के अहित का। गायत्री महामंत्र जैसे मंत्र ही चुने जाय। न कि वे जो मात्र साँसारिक समृद्धि ही दें या दूसरों को नुकसान पहुँचाए। हमें मन की पवित्रता में रुचि लेनी चाहिए (न कि केवल शरीर व घर की ही देखभाल पर)।
इस तरह क्रमशः तम एवं रज गुणों का रूपांतरण करते हुए सत्त्व गुणों की स्थापना करनी चाहिए। प्रकृति में सत्त्व गुणों की प्रधानता के साथ ही योग मार्ग के आधे अवरोधों को नष्ट हुआ मान सकते हैं। पूरे इसलिए नहीं कि सत्त्व भी अपनी आसक्ति के कारण मनुष्य को बाँधता है। रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में ‘सत्त्व भी मनुष्य को अंतिम सत्य का परमज्ञान नहीं दे सकता। हाँ यह प्रभु के परमवास का मार्ग अवश्य दर्शाता है। परन्तु यह भी ब्रह्म ज्ञान से काफी दूर है।’
गीता के 14 वें अध्याय में भगवान् कृष्ण इसका सरल समाधान प्रस्तुत करते हुए कहते हैं ‘जो मेरी (भगवान् की) अनन्य भक्ति भाव से सेवा करता है, वह गुणों से परे जाता है, व ब्रह्म स्वरूप बनने योग्य हो जाता है।’
अतः जब तक गुणों का पूरी तरह से रूपांतरण नहीं हो जाता, योग पथ के अवरोध विविध रूपों में साधक के सामने प्रकट होते रहते हैं। किन्तु यदि साधक अपने ध्येय के प्रति एकनिष्ठ है व अपने गुरु एवं इष्ट के प्रति अनन्य भाव से समर्पित है तो हर अवरोध उसकी प्रगति पथ का सोपान बनता जाता है। ऐसे साधक के विषय में श्रीकृष्ण अर्जुन से 9 वें अध्याय (30-31) में जो कहते हैं वह मनन योग्य है- ‘यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है, अर्थात् उसने भली प्रकार निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है। इसलिए वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है। हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।’ प्रभु प्रणीत योग के इस प्राचीन सत्य में ही आधुनिक विज्ञान का तथ्य भी है।
योग की प्राचीनता काल की पुरातनता के सघन कुहासे से आच्छादित है, फिर भी हम इसके उद्भव को वेदों में खोज सकते हैं। वनों व अरण्यों की गोद में पली बढ़ी इसकी विकसित अवस्था को हम उपनिषदों में पाते हैं। यही योग जीवन की पूर्ण सक्रियता के बीच महाभारत की युद्ध भूमि में श्रीकृष्ण के मुख से गीता के रूप में मुखरित हुआ है। पातंजलि के योग सूत्र में यह अपना सुव्यवस्थित रूप पाता है, जो यम, नियम, बहिरंग योग (आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार) व अंतरंग योग (धारणा, ध्यान, समाधि) के रूप में क्रमबद्ध हैं।
प्राचीन योग की ऐतिहासिक यात्रा क्रमशः गौतम बुद्ध, शंकराचार्य के साथ आगे बढ़ती हुई इस युग में रामकृष्ण परमहंस तक आ पहुँची। भारत भूमि में विकसित योग का विश्वव्यापी विकिरण सर्वप्रथम स्वामी विवेकानन्द के विश्वविजयी तुमुल घोष के साथ हुआ। इसी परम्परा में श्री अरविन्द, महर्षि रमण, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, (स्वामी योगानन्द, स्वामी शिवानन्द, स्वामी चिन्मयानंद, स्वामी प्रभुपाद) आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इस तरह प्राचीन योग पर्वत, गुहा एवं कन्दराओं की निविड़ गुह्यता से बाहर निकलकर विश्व समाज के सामने प्रस्तुत हुआ है। इसकी शक्ति, सामर्थ्य एवं अलौकिकता से जन सामान्य की तरह वैज्ञानिक समुदाय भी आकर्षित हुआ। किन्तु अपने भौतिक दृष्टि कोण के कारण उसने आसन व प्राणायाम को ही योग का पर्याय माना व अधिक हुआ तो साथ में मानसिक एकाग्रता को भी इसमें जोड़ दिया। और अपने यंत्रों एवं उपकरणों द्वारा इनकी उपयोगिता परखने लगा।
आसनों में शीर्षासन को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस पर सर्वप्रथम वैज्ञानिक अध्ययन पोलैंड के ‘थर्ड क्लीनिक ऑफ मेडिसिन’ के डायरेक्टर प्रो. जुलियन ने किया। इसके लिए एक्सरे व ई.सी.जी. आदि उपकरणों की मदद ली गई। उन्होंने रोग निरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ इसके रक्त, फेफड़े व हृदय पर आश्चर्यजनक प्रभाव देखे। ‘फर्स्ट कान्फ्रैन्स ऑन द एप्लिकेशन ऑफ योगा इन रिहेविलिटेशन थैरेपी’ के अंतर्गत चैकोस्लोवाकिया में भुजंगासन पर वैज्ञानिक शोध हुआ, व इसे रक्तचाप व मानसिक तनाव में सहायक पाया गया।
अमेरिका के ‘यौगिक ट्रीटमेंट’ ने आसनों की चिकित्सकीय उपयोगिता पर महत्त्वपूर्ण प्रयोग किए हैं। इस संदर्भ में रूस के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने भी व्यापक अनुसंधान किया है। सेन्ट्रल क्लीनिकल हास्पिटल मास्को के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अनातोली वैस्टकाई रोगियों को साधारण आसनों का ही उपचार बताते हैं। भारत में भी आसनों पर वैज्ञानिक अध्ययन हुआ है। इस संदर्भ में बम्बई के डॉ. के.के. दत्ते, पटना के डॉ. श्री निवास, मद्रास के डॉ. लक्ष्मीकान्त आदि के नाम उल्लेखनीय है।
अपने प्रयोगों के आधार पर आधुनिक विज्ञान, आसनों को एक पूर्णता वैज्ञानिक पद्धति मानता है, जिससे सूक्ष्म अवयवों का व्यायाम होता है व इनसे ऐसे रहस्यमयी एवं आश्चर्यजनक लाभ उठाए जा सकते हैं जो अन्य व्यायामों से सम्भव नहीं।
आसन की तरह आधुनिक विज्ञान प्राणायाम की उपयोगिता को अपनी कसौटियों पर कसने में लगा हुआ है। यद्यपि अभी तक उसकी समझ ‘डीप ब्रीदिंग‘ तक ही सीमित है व इसके स्वास्थ्य सम्वर्धन तक ही इसके लाभ को ही प्रमुख मानता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इस पर व्यापक प्रयोग हुए। अमेरिका में श्री टामसन ने फौजियों को युद्ध के काबिल व सशक्त बनाने में इसके सफल प्रयोग किए। अपनी साधारण प्रक्रिया व असाधारण लाभ के कारण यह प्रचलित हो गया। यूरोप व अमेरिका में इस पर अनेक वैज्ञानिक अनुसंधान हुए।
मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. थ्रिसे ब्रूजे ने इसके प्रभावों का गहन अध्ययन किया व स्पष्ट किया कि इसके लाभों को वैज्ञानिक उपकरणों से मापा जा सकता है। सुविख्यात चिकित्सा विज्ञानी रोमार्ड ने प्रयोगों द्वारा दिखाया कि इससे फेफड़े का आयतन (वाटल केपेसिटी) बढ़ती है, जिसका जीवनी शक्ति से सीधा सम्बन्ध है। चिकित्सा विज्ञानी जे.एफ.नन अपनी शोध कृति ‘एप्लाइड रेस्पीरेटरी फिजियोलॉजी’ में निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्राणायाम से फेफड़े की क्षमता में असाधारण वृद्धि होती है। इससे न केवल ऑक्सीजन के अवशोषण करने की क्षमता बढ़ती है बल्कि प्राणवायु की अधिकाधिक वृद्धि के साथ शरीर एवं मन की क्षमताओं में भारी वृद्धि होती है। वैज्ञानिक विलियम के अनुसार श्वास प्रक्रिया का सीधा प्रभाव मनःस्थिति पर पड़ता है। इसी तरह डॉ. फेरिंग ने ‘पर्सनल हाइजीन’ में श्वास-प्रश्वास को भावनात्मक स्तर के उतार-चढ़ाव से जोड़ा है इस तरह उन्होंने प्राणायाम को मानसिक स्वास्थ्य में लाभदायक माना है। इस तरह प्राणायाम पर अनेकानेक वैज्ञानिक प्रयोग चल रहे हैं। व इसके नए-नए पक्षों को उजागर कर रहे हैं।
आसन, प्राणायाम की तरह वैज्ञानिक समुदाय योग के ध्यान पक्ष पर भी अपने प्रयोग परीक्षण कर रहा है। ध्यान के शारीरिक एवं मानसिक प्रभावों को जानने के लिए तंत्रिका विशेषज्ञों ने प्रमुखतया ईईजी, ईसीजी, ईएमजी पॉलीग्राफ आदि यंत्रों का सहारा लिया है।
डॉ. वेन्सन ने ध्यान के प्रभावों का गहन अध्ययन किया है। अपनी कृति ‘रिलैर्क्सज रिस्पोन्स’ में उनका निष्कर्ष है कि नियमित 20 मिनट का ध्यान पूरे दिन तरोताजा, हल्का-फुल्का व शाँतचित्त बनाने के लिए पर्याप्त है। डॉ. वालेस ने इनके साथ मिलकर शोध किया है, जिसके निष्कर्ष इस तरह से रहे- ध्यान के क्षणों में उपलब्ध कुछ मिनट की विश्राँति कई घण्टे की नींद के बराबर होती है। इस दौरान ख् की खपत 16' घट जाती है। जबकि 5 घण्टे की नींद में यह मात्र 8' कम होती है। लंदन इंस्टीट्यूट ऑफ साइकिएट्री के डॉ. पीटर फेन्विक ने खोज की कि नींद में मिली गहरी शान्ति जागते ही क्षीण होने लगती है, जबकि ध्यान की विश्राँति का प्रभाव अधिक गहरा व देर तक रहता है।
टेक्सास विश्वविद्यालय (अमेरिका) के डॉ. डेविड ओर्म जॉनसन ने जी.एस.आर. मशीन द्वारा देखा कि ध्यान से त्वचा की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिससे कि व्यक्ति तनाव से वातावरण के दुष्प्रभावों से कम प्रभावित होता है। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के डॉ. राबर्ट कीथ बैलेस ने पाया कि ध्यान से हृदयगति, रक्तचाप, नाड़ी एवं श्वासगति में एक स्वस्थ संतुलन स्थापित होता है। इंस्टीट्यूट ऑफ लिविंग हार्ट फाँर्ड के डायरेक्टर डॉ. बर्नार्ड सी. ग्रु एक ने भी ध्यान के वैज्ञानिक प्रभावों का अनुसंधान किया व तनाव मुक्ति एवं निरापद शान्ति के लिए ध्यान को ही सबसे अधिक कारगर उपाय बताया।
मिशिगन विश्वविद्यालय के डॉ. माइकेल, डॉ. ह्यवर एवं डॉ. मैकनान ने संयुक्त शोध के अंतर्गत पाया कि ध्यान में तनाव व्यक्त करने वाले ‘केटई कोलोमिन’ नामक यौगिक की मात्रा में भारी कमी आती है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक विलियम सीमेन अंतःवृत्ति नियंत्रण व चिंतन मुक्ति के साथ व्यक्तित्व संघटन में ध्यान के प्रभावों को मानते हैं। डॉ. थयोफोर ने मनोरोगों के उपचार एवं मानसिक संतुलन में ध्यान की प्रभावी भूमिका को पाया। नीदरलैण्ड के वैज्ञानिक विलियम पी. वानडेनवर्ग तथा वर्टमुल्डा ने गहरा अध्ययन के बाद पाया कि ध्यान दृष्टिकोण परिवर्तन का अचूक नुस्खा है। वैज्ञानिक अध्ययनों ने यह भी सिद्ध किया है कि ध्यान के क्षणों में मस्तिष्क से अल्फा तरंगों का प्रस्फुटन होता है, जो कि गहन शान्ति की द्योतक होती है। अर्थात् ध्यान मानसिक स्थिरता एवं शान्ति का निरापद उपाय है।
इस संदर्भ में भारत में भी अनेकों वैज्ञानिक प्रयोग हुए हैं। इस संदर्भ में दिल्ली के डॉ. वी. के. आनन्द, वाराणसी के डॉ. के.एन. उडुप्पा, बेंगलोर के डॉ. टी. देसीराजू, बम्बई के डॉ.. दत्ते, मद्रास के डॉ. राममूर्ति आदि नाम उल्लेखनीय हैं।
इस तरह आधुनिक विज्ञान, प्राचीन योग की विविध क्रियाओं को अपनी प्रयोगशाला में जाँच परख रहा है व इसकी उपयोगिता को स्वीकार कर रहा है। साथ ही वह अपनी सीमाओं का भी अहसास कर रहा है कि मात्र यंत्रों द्वारा योग के समग्र स्वरूप का अध्ययन नहीं कर सकता। आवश्यकता अपने शरीर व मन को इसकी प्रयोगशाला के रूप में ढालने की है, ताकि योग मशीनी अध्ययन तक ही सीमित न रहकर जीवन जीने की कला का पर्याय बन जाए। शान्तिकुञ्ज के ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में कुछ ऐसे ही प्रयोग सम्पन्न किये जा रहे हैं।
शान्तिकुञ्ज से आधा किमी. की दूरी पर गंगा के तट पर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान स्थापित है। पुरातन समय में यह भूमि कणाद ऋषि की तपःस्थली रह चुकी है। यहाँ से गढ़वाल हिमालय एवं शिवालिक की पर्वत शृंखलाओं का विहंगम दृश्य सहज ही सुलभ है। विज्ञान एवं अध्यात्म के समन्वय के लिए समर्पित इस संस्थान में पुरातन योग के विविध पक्षों पर आधुनिक विज्ञान के अभिनव प्रयोग चल रहे हैं। इसके अंतर्गत यहाँ बहुमूल्य एवं आधुनिकतम यंत्रों से सुसज्जित प्रयोगशाला विद्यमान है। साथ ही सुशिक्षित एवं निष्ठावान वैज्ञानिकों एवं चिकित्सकों का समुदाय इस संस्थान के निदेशक के मार्गदर्शन में इस शोध कार्य में समर्पित भाव से निरत है।
शोध कार्य के लिए ‘सब्जेक्ट्स’ सहज ही उपलब्ध रहते हैं। इनका चुनाव शान्तिकुञ्ज में आए एक मासीय युगशिल्पी साधना सत्रों में आए साधकों के बीच किया जाता है। प्रारम्भिक शारीरिक एवं मानसिक जाँच-पड़ताल के बाद इन्हें आहार-विहार, आयुर्वेदीय वनौषधि एवं साधना सम्बन्धी परामर्श दिया जाता है। योग साधना के अंतर्गत आसन, प्राणायाम, मंत्र जप, ध्यान, यज्ञ, उपवास, चांद्रायण व्रत जैसी क्रियाओं का अभ्यास कराया जाता है।
आसन के अंतर्गत परम पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रवर्तित प्रज्ञा योग का अभ्यास कराया जाता है, जिसमें सभी प्रमुख आसनों का सुन्दर समन्वय किया गया है। प्राणायाम के अंतर्गत प्रमुखतया प्राणाकर्षण, सूर्यभेदन जैसे सरल एवं उपयोगी प्राणायाम लिए गये हैं। मंत्र जप एवं ध्यान में गायत्री मंत्र एवं इसके देवता उगते हुए सूर्य का निर्धारण है। आहार-विहार में सात्त्विक खान-पान एवं संयत तथा अनुशासित दिनचर्या का समावेश रहता है। यज्ञ के लिए शारीरिक एवं मानसिक रोगों के अनुरूप या उद्देश्य के अनुसार जड़ी-बूटियों का चुनाव किया जाता है।
वैज्ञानिक शोध के अंतर्गत उपरोक्त वर्णित यौगिक क्रियाओं का कई विधियों से प्रयोग चल रहा है। कुछ में इनका अलग-अलग प्रभाव तथा कुछ में इनका मिला-जुला प्रभाव देखा जाता है।
अनुसंधान के तहत साधना का विशेषकर आहार-विहार एवं वनौषधियों का प्रभाव, हेमेटोलॉजी एवं बायोकेमिस्ट्री चेम्बर में किया जाता है। हिमेटोलॉजी कक्ष में रक्त से जुड़े हीमोग्लोबिन, डब्ल्यू वी.सी, आर.बी.सी. तथा ल्यू विभिन्न ल्यूकोसाइट काउण्ट, ई.एस.आर. आदि परीक्षण किये जाते हैं। बायोकेमिस्ट्री परीक्षणों के अंतर्गत रक्त शर्करा, कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड, यूरिया, यूरिक एसिड, क्रिएटिनीन, विल्रुबीन, एस.जी.ओ.टी., एस.जी.पी.टी., कैल्शियम, प्रोटीन व एल्केलाइन फोस्फेटस् आदि जैव रसायनों का परीक्षण किया जाता है।
रक्त व अन्य शरीर द्रव्यों के सूक्ष्म परीक्षण में आधुनिक कम्प्यूटरीकृत यंत्र प्रमुख है। जीवन शक्ति के लिए उत्तरदायी इम्यूनोग्लोबुलीन्स का मापन इलेक्ट्रोफोरेंसिक उपकरण द्वारा किया जाता है। कंप्यूटराइज्ड आर.ए.-भ् मशीन आने से बायोकेमिस्ट्री के परीक्षण में और सरल हो गए हैं। प्रयोगों के द्वारा साधना के दौरान शरीर में होने वाले सूक्ष्म जैव रासायनिक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। कार्डियालॉजी चेम्बर में हृदय की गति, लय तथा विद्युत् तरंगों का मापन कर साधक की स्वस्थ व अस्वस्थ स्थिति का पता लगाया जाता है। तथा साधना के दौरान आसन व ध्यान साधना के हृदय पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। हृदय सम्बन्धी प्रयोग ई.सी.जी. (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम) तथा टी.एम.टी (ट्रेडमिल टेस्टिंग) उपकरणों द्वारा किए जाते हैं।
पल्मोनरी चेम्बर में प्राणायाम के फेफड़ों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। इसमें वायटेलोग्राफ, फेफड़ों की कार्यक्षमता का ग्राफिक मापन करता है। पी.एच.मीटर, रक्त की अमलता का स्तर मापता है। व ब्लड गैस एनालाइज़र, रक्त में विद्यमान CO2, O2 और वाइकार्बोनेट्स का मापन करता है। प्राणायाम द्वारा फेफड़ों पर पड़ने वाले प्रभावों का मापन वायटल केपेसिटी (वी.सी.), पी.ई.एफ.आर. आदि के रूप में मेडएसपायरर द्वारा किया जाता है।
साधना के दौरान जैव विद्यत्त् (बायो इलेक्ट्रिसिटी) पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन इलेक्ट्रो फिजियोलॉजी चेम्बर में किया जाता है। इसमें जी.एस.आर. (गाल्बोनिक स्किन रेजिस्टेन्स) बायोफीडबैक द्वारा ध्यान के अंतर्गत त्वचा की प्रतिरोधक क्षमता का मापन किया जाता है। इ.एम. जी. (इलेक्ट्रोमायोग्राम) शिथिलीकरण के दौरान माँसपेशियों के तनाव का मापन करता है। ई.ई.जी. (इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राफ) द्वारा ध्यान के क्षणों में मस्तिष्क से उत्सर्जित होने वाले विद्युत् तरंगों की जाँच की जाती है, अल्फा ई.ई.जी. विशेष रूप से अल्फा तरंगों को स्कैन करता है, जो कि ध्यान की प्रशान्तावस्था की द्योतक होती है।
योग साधनाओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन साइकोमैट्री चैम्बर में किया जाता है। इसके अंतर्गत आहार-विहार, तप-तितिक्षा, प्रायश्चित आदि का मनोविकारों के उपचार व व्यक्ति के समग्र विकास पर प्रभाव देखा जाता है। इसके अंतर्गत अब तक मिरर ट्रेसिंग, रिएक्शन टाइम टेस्ट, मेमोरी टेस्ट, आत्म प्रत्यय परीक्षण, स्टेडिनेस टेस्ट, मूलर लायर इल्यूजन टेस्ट आदि परीक्षण होते रहे हैं। जो प्रमुखतः सीखने की प्रक्रिया व क्षमता (लर्निंग प्रोसेस), निर्णय क्षमता, स्मरण शक्ति, बुद्धिलब्धि (आई. क्यू.), माँसपेशियों पर मस्तिष्कीय नियंत्रण, दृष्टिभ्रम आदि मानसिक घटकों का अध्ययन करते थे।
मनोवैज्ञानिक शोध अध्ययन का दायरा बढ़ाते हुए मनोरोगों को भी इसकी परिधि में लिया जाता है। मनोरोगों की युग विभीषिका के अनुरूप यह कदम समीचीन भी है। इसके अंतर्गत डिप्रेशन, एन्ग्जाइटी, गिल्ट, टेन्शन, स्ट्रेस, अराउजल, फैटींग आदि पैरामीटर लिए गए हैं। विशेष मनोवैज्ञानिकों द्वारा गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के बाद ‘सब्जेक्ट्स’ का चुनाव किया जाता है। तथा उन पर योग साधनाओं का प्रभाव देखा जाता है। इसी वर्ष इस संदर्भ में ध्यान एवं यज्ञ के प्रयोग हुए हैं, जिनके परिणाम वैज्ञानिक समुदाय को चमत्कृत करने वाले रहे। प्रयोग के तहत यज्ञ ऊर्जा, वनौषधि, एवं मंत्र शक्ति के आधार पर अग्निहोत्र, यज्ञोपैथी के रूप में मनोविकारों की एक सफल चिकित्सा पद्धति के रूप में उभर कर आई है व इस पर व्यापक अनुसंधान कार्य अभी चल रहा है। इसी तरह अन्य यौगिक क्रियाओं के परिणाम उत्साहवर्धक रहे हैं।
परीक्षणों का यह क्रम सर्वसाधारण के लिए अपरिचित लगते हुए विज्ञ वैज्ञानिकों के लिए सुपरिचित लग सकता है। परन्तु इसमें जो बात विशेष महत्त्व की है, वह है यहाँ चल रहे प्रयोगों का विधि-विधान और इनके उच्चस्तरीय उद्देश्य। जिसके अंतर्गत योग-साधना का प्रभाव मात्र शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य तक सीमाबद्ध नहीं किया गया है। इसमें वे चेष्टाएं एवं प्रक्रियाएँ भी शामिल हैं, जिससे कि आन्तरिक जीवन का कायाकल्प हो सके। साथ ही व्यक्ति की इन्द्रिय चेतना, अतीन्द्रिय स्तर का स्पर्श पा सके। इस विषय में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के निदेशक अपनी व्यस्ततम दिनचर्या एवं देश-विदेश के अनेकानेक कार्यक्रमों के बावजूद शोध कार्य का मार्गदर्शन करते हैं। उनकी प्रभा ने अन्य विद्वानों-विशेषज्ञों को भी इस कार्य के लिए प्रभावित एवं आकर्षित किया है। इस क्रम में गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय के लाइफ साइंसेज संकाय के डीन प्रो. बी.डी. जोशी का योगदान सराहनीय है। प्रख्यात मनोवैज्ञानिक प्रो. ओ.पी. मिश्र भी इस शोध में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं।
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण शीघ्र ही रिसर्च बुलेटिनों एवं शोध ग्रंथों के रूप में प्रकाशित होने जा रहे हैं। चल रहे प्रयोगों के अनुसार यह स्पष्ट है कि विविध यौगिक क्रियाएँ वैज्ञानिक कसौटी पर खरी उतर रही हैं। ये न केवल शारीरिक व मानसिक रोगों के उपचार में सक्षम हैं बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक संतुलन को स्थापित कर व्यक्तित्व के विकास एवं उसमें निहित दिव्य सम्भावनाओं को भी चरितार्थ करने में पूरी तरह सक्षम है। इस दिशा में चल रहे ब्रह्मवर्चस के वैज्ञानिक अनुसंधान के निष्कर्ष शीघ्र ही विश्व मनीषा एवं वैज्ञानिकों की चिंतनधारा को नई दिशा दे, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। चिन्तन की इसी नवीन गरिमा से अनुप्राणित होकर आधुनिक युग में योग के प्रचार की आवश्यकता है।
भौतिकवाद के विकास- विस्तार की एकाँगी प्रगति ने मानवी सुख-शान्ति की जड़ें हिलाकर रख दी हैं। सर्वत्र यह गम्भीरतापूर्वक सोचा जा रहा है कि प्रगति को एकाँगी रहने देने में खतरा ही खतरा है। चिंतन के इस मोड़ ने संसार का ध्यान योग-विज्ञान की ओर आकर्षित किया है। इन दिनों विश्व भर में योग-विज्ञान के प्रति भारी उत्साह है और उस दिशा में उत्सुकतापूर्वक खोज और प्रयोग के लिए प्रयास चल रहे हैं। चूँकि भारत योग के उद्गम, उत्थान एवं परीक्षण प्रयोग का क्षेत्र रहा है इसलिए भारत की ओर सहज ही सबका ध्यान चला जाता है।
पिछले दिनों योग-प्रचार के लिए गये हुए भारतीयों की विदेशों में इतनी सफलता मिली है, जिसकी उन्होंने स्वयं भी आशा नहीं की थी। वहाँ पर भारतीयों द्वारा चलाये जाने वाले योग शिक्षा केन्द्रों की संख्या सैकड़ों से बढ़कर हजारों तक पहुँच गई है। वे विभिन्न देशों में अपने-अपने ढंग से अपना काम कर रहे हैं, किन्तु विदेशों में चल रहे योग-प्रचार का यह क्रम सिर्फ छोटी-मोटी शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं तक ही सीमाबद्ध होकर रह गया है। आमतौर से अंगों को तोड़ने-मरोड़ने की क्रिया आसन पद्धति को ‘मॉर्डन योग‘ का प्रमुख आधार माना गया है। इन योग-केन्द्रों में ऐसा ही कुछ शिक्षण चलता है। गहरी श्वास लेने के कई तरीकों को उलट-पुलट कर प्राणायाम बता दिया जाता है। इससे आगे की दो मानसिक साधनाएँ हैं, एक ध्यान की एकाग्रता, मेडीटेशन, दूसरी स्वसंकेतन हिप्नोटिम। बस सारा योग इतने में ही समाप्त हुआ समझा जाता है। विदेशों में भारतीयों द्वारा चलाए जाने वाले योग-केन्द्र इसी परिधि में चक्कर काटते हैं। क्रिया-कलाप एवं शिक्षा-विधि में, कहने समझाने के ढंग में थोड़ा-बहुत अन्तर हो सकता है। पर तथ्य इसी सीमा में भ्रमण करते रहते हैं।
इस शिक्षा से कुछ लाभ भी होते हैं। आसनों के अभ्यास से पाचन सम्बन्धी तथा दूसरी छोटी-मोटी शारीरिक कठिनाइयाँ हल हो जाती हैं। प्राणायाम से फेफड़े खुलते हैं और स्फूर्ति का अनुभव होता है मेडिटेशन भी मस्तिष्क की घुड़दौड़ घटा कर मानसिक विश्राम की आवश्यकता को कुछ हद तक तो पूरा करता ही है। हिप्नोटिज्म-स्वसंकेत से अनियंत्रित मानसिक प्रवाह को अभीष्ट दिशा में मोड़ने की थोड़ी सी सहायता मिल जाती है। बस इतना ही लाभ इस योग शिक्षा का है।
वस्तुतः योग-विज्ञान को इन छुट-पुट शारीरिक, मानसिक व्यायामों तक सीमाबद्ध कर देना उसकी गरिमा को नष्ट करना है। विश्व जिस आशा से मानवी समस्याओं के समाधान का हल योग-विज्ञान से निकालने की उम्मीद लगा रहा है उसे निराश बना देना है। भारतीय योग-विज्ञान को इस दिशा में समय रहते सचेत होना चाहिए अन्यथा समय की माँग पूरा न कर सकने पर यह अवसर सदा के लिए हाथ से चला जायेगा। यह अत्यन्त ही उपयुक्त अवसर है जबकि प्राचीन काल की तरह योग का सही और सुसंतुलित रूप विश्व को समझाया जा सकता है। योग की गरिमा का वर्चस्व समझाकर सम्पूर्ण मानवता की महती सेवा की जा सकती है।
वस्तुतः योग-विज्ञान को इन छुट-पुट शारीरिक, मानसिक व्यायामों तक सीमाबद्ध कर देना उसकी गरिमा को नष्ट करना है। विश्व जिस आशा से मानवी समस्याओं के समाधान का हल योग-विज्ञान से निकालने की उम्मीद लगा रहा है उसे निराश बना देना है। भारतीय योग-विज्ञान को इस दिशा में समय रहते सचेत होना चाहिए अन्यथा समय की माँग पूरा न कर सकने पर यह अवसर सदा के लिए हाथ से चला जायेगा। यह अत्यन्त ही उपयुक्त अवसर है जबकि प्राचीन काल की तरह योग का सही और सुसंतुलित रूप विश्व को समझाया जा सकता है। योग की गरिमा का वर्चस्व समझाकर सम्पूर्ण मानवता की महती सेवा की जा सकती है।
योग-विज्ञान के द्वारा मनुष्य के इस मानसिक असंतुलन को संतुलन में बदल कर, अशाँत उद्विग्नता को शान्त समस्वरता में परिणित किया जा सकता है। व्यक्ति की कायिक और मानसिक चेतना के अंतर्गत एक अत्यंत सुविस्तृत रहस्यमय क्षेत्र का अस्तित्व स्वीकार किया जा चुका है। और यह भी स्वीकार किया जा चुका है कि यदि मानवी सत्ता के इन रहस्यमय परतों का उद्घाटन किया जा सके तो मनुष्य में ऐसी असाधारण विशेषताएँ प्रकट हो सकेंगे, जैसे कि योगी और सिद्ध पुरुषों में बताई, पाई जाती है। आखिरकार योग इन्हीं रहस्यमयी शक्तियों को उभारने और उनका अभीष्ट उपयोग करने की महत्त्वपूर्ण विद्या ही तो है।
योग में शारीरिक मानसिक व्यायामों के लिए, साधनात्मक कर्मकाण्ड के लिए भी स्थान है, पर उसकी मूल प्रवृत्ति चिंतन के स्वरूप को ऊँचा उठाना है। अपनी सत्ता और दिशा को परिष्कृत करना है। पदार्थों और व्यक्तियों के प्रति दृष्टिकोण का परिमार्जन करना है। वस्तुतः योग एक दर्शन है। सर्वत्र आत्म-सत्ता की अनुभूति से विश्व मानव की, विश्व परिवार की भावना विकसित होती है। और स्नेह-सौजन्य का उभार आता है। इसी पृष्ठभूमि में ममता और आत्मीयता घनिष्ठ होती है। चरित्र निखरता है संयम और सेवा के लिए उत्साह उमँगता है। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों की जड़ें कटती हैं। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का आधार तो वे आत्मवादी आस्थाएँ ही हो सकती हैं जिनकी प्रतिष्ठापना के लिए योग एवं अध्यात्म का सुविस्तृत कलेवर खड़ा किया गया है। योग-शिक्षा की पृष्ठभूमि में इसी परिष्कृत दार्शनिकता का प्रसार होना चाहिए। भौतिकता से विक्षुब्ध लोक-मानस को राहत उन्हीं आस्थाओं की लोक-मानस में पुनः स्थापना से मिलेगी।
योग का बहिरंग रूप शारीरिक और मानसिक व्यायामों के रूप में सामने आये तो हर्ज नहीं। कर्मकाण्डों और साधना-विधानों का भी उसमें स्थान रहना चाहिए, परन्तु इस सत्य को विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए कि यह योग का कलेवर है, उसका प्राण नहीं। प्राण तो उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व की प्रेरणा देने वाले उपनिषद् प्रतिपादित उस योग-दर्शन में है जिसे प्राचीन काल में ब्रह्मविद्या कहा जाता था। इसके आधार पर व्यक्ति अपनी सत्ता का समष्टि में समर्पण करता था। आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुँचाना, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम, अणु को विभु, लघु को महान् बनाना जिसका लक्ष्य था। चिन्तन की अंतरंग उमंगें ही बहिरंग जीवन का पर आच्छादित होती हैं। उन्हीं से परिस्थितियाँ बनती हैं, घटनाएँ घटती हैं और दिशाएँ मुड़ती हैं। योग शिक्षा का उद्देश्य इसी भावनात्मक मानवी मर्मस्थल को परिष्कृत और संतुलित करना होना चाहिए। योग की सार्थकता इसी प्रयास की सफलता के साथ जोड़ी, आँकी जानी चाहिए।
विदेशों में भारतीयों द्वारा चलाये जाने वाले वर्तमान योग प्रचार में इन तथ्यों का अभाव है। उनमें बाल-सुलभ चपलता और कौतूहलप्रियता की उथली तृप्ति मात्र है। सस्ते प्रयास से अधिकतम लाभ लेने की जुआ प्रवृत्ति के आधार पर जो किया जा रहा है उससे आरम्भ में बचकानी भीड़ एकत्रित की जा सकती है परन्तु उनमें उच्चस्तरीय दार्शनिकता का अभाव रहा तो वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकेगा, जिसके लिए भौतिकता से विक्षुब्ध प्रगतिशील जन-मानस ने योग-विज्ञान की ओर आशा लगाना आरम्भ किया है। अच्छा हो विदेशों में योग प्रसार के स्वर्णिम अवसर को हम गम्भीरतापूर्वक देखें और विश्व मानव की माँग को पूरा करने के लिए ऐसे कदम बढ़ायें, जिससे योग की गरिमा को पुनः प्राचीन काल जैसी सर्वोच्च श्रद्धा के रूप में विश्व-व्यापी बनाना सम्भव हो सके। इस अवसर को यदि हमने खिलवाड़ में गँवा दिया तो यह भारत के लिए, योग के लिए दुःखद दुर्भाग्य की ही बात होगी। ऊँची आशा दिलाकर आरम्भिक उत्साह तो जगाया जा सकता है किन्तु कुछ समय बाद ही जो असफलताजन्य निराशा सामने आयेगी उससे उबरना कठिन ही नहीं असम्भव हो जायेगा। इस युग की इस महानतम देन के प्रति हमारा दृष्टिकोण लोकरंजन का नहीं अपितु लोकमंगल का होना चाहिए।
योग-विज्ञान के प्रति पाश्चात्य देशों में आकर्षण भौतिकवाद की अवाँछनीय अभिवृद्धि के कारण उत्पन्न हुई समस्याओं की विभिन्न प्रतिक्रिया है। समय की माँग ने योग के प्रति वह आकर्षण उत्पन्न किया है जो विदेशों में भारतीयों द्वारा योग प्रचार की सफलता के रूप में परिलक्षित हो रहा है। वैज्ञानिक आर्थिक और बौद्धिक प्रगति ने सुख-सुविधा के कितने ही अधिक साधन क्यों न जुटाये हों, निश्चित रूप से उसने मनुष्य की मानसिक स्थिति को वीभत्स वातावरण में रहने को बाध्य कर दिया है। उन्नतिशील देश अनुभव करते हैं कि एकाँगी भौतिक प्रगति उन्हें बहुत महंगी पड़ी है। इस दिशा में गहरा चिंतन करने पर, भूतकाल के ऋषि-युग की सुख-शान्ति का उज्ज्वल इतिहास उन्हें समाधान के लिए अपनी ओर आकर्षित, आमंत्रित करता है।
यदि योग को उथले कर्मकाण्डों तक सीमित कर दिया गया तो निकट भविष्य में इस दिशा में उत्पन्न हुआ आकर्षण समाप्त हो जायेगा। फिर उससे उत्पन्न हुई अनास्था को मिटा सकना कठिन हो जायेगा। योग प्रचारकों को इस खतरे का ध्यान रखना चाहिए और अपनी योग-शिक्षा में उस दार्शनिकता का समन्वय करना चाहिए जो उद्विग्न लोकमानस को समुचित समाधान दे सके।
देवसंस्कृति का सही अर्थ देवभूमि भारत के ऋषियों, सन्तों एवं मनीषियों द्वारा स्थापित जीवन मूल्यों, परम्पराओं एवं प्रयोगों में निहित है। इन्हें अपनाकर मनुष्य सहज ही अपने दैवी एवं दिव्य गुणों को विकसित कर सकता है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय का उद्देश्य देवसंस्कृति के सभी मौलिक तत्त्वों के व्यापक अध्ययन-शिक्षण एवं आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में इनके शोध-अनुसन्धान का सुव्यवस्थित तंत्र खड़ा करना है। और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के अपने आदर्श सूत्र के अनुरूप इसके द्वारा बिना किसी भेदभाव के समूचे देश एवं विश्व भर में फैली समूची मानव जाति को लाभान्वित करना है।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के भविष्यत् कार्य के मूल बिन्दु 1. साधना 2. स्वास्थ्य 3. शिक्षा एवं 4. स्वावलम्बन होंगे। ये बिन्दु ही मनुष्य की यथार्थ प्रगति एवं विकास का आधार है।
इनमें से 1. साधना का अर्थ है-मानव चेतना में आदर्शोन्मुखी चिन्तन एवं प्रवृत्तियों के विकास सम्बन्धी प्रयोग एवं शिक्षण। 2. स्वास्थ्य के अंतर्गत मनुष्य के शारीरिक, मानसिक स्वस्थ जीवन के लिए आयुर्वेद सहित अन्य वैकल्पिक चिकित्सा विधियों पर गहन शोध, शिक्षा एवं चिकित्सा की व्यवस्था जुटायी जाएगी। 3. शिक्षा के अंतर्गत मानव जीवन के सभी आयामों को दैवी जीवन के अनुरूप प्रशिक्षित करने वाले दार्शनिक, साहित्यिक एवं वैज्ञानिक पाठ्यक्रमों को लागू किया जाएगा। 4. स्वावलम्बन के अंतर्गत उन पाठ्यक्रमों एवं योजनाओं को क्रियान्वित किया जाएगा जो ‘बहुजन हिताय एवं बहुजन सुखाय’ की नीति का पालन करते हुए युवा पीढ़ी को मूल्यनिष्ठ, स्वावलम्बी एवं सुखी बना सके, साथ ही पर्यावरण के अनुकूल हों।
यही वे उद्देश्य हैं जिनके लिए स्वयं को समर्पित कर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय न केवल ऋषि भूमि उत्तराँचल, बल्कि समस्त भारत देश का गौरव बनेगा। देश एवं विदेश के हर भाग से आने वाले युवा जन यहाँ शिक्षा प्राप्त कर उत्तराँचल की इस अनूठी सम्पदा का कुछ अंश अपने साथ ले जायेंगे और इस प्रदेश की कीर्ति का विस्तार करेंगे।
सात सूँड़ वाला यह हाथी मन व रचनात्मकता का वाहन है।
हाथी की पीठ पर स्थित वर्ग के बीच में एक गहरे लाल रंग का उल्टा त्रिकोण है। यह त्रिकोण उस शक्ति का प्रतीक है, जो उत्पादकता तथा अभिवृद्धि के लिए उत्तरदायी है। त्रिकोण के बीच सूक्ष्म शरीर का प्रतीक धूम्रवर्णी लिंग है। इस लिंग के चारों ओर कुण्डली साढ़े तीन बार लिपटी हुई है, जिससे प्रकाश निकलता रहता है। इस कुण्डली के तीन फेरे मनुष्य के तीन गुणों के प्रतीक हैं। जब तक ये तीन गुण कार्यरत हैं, तब तक व्यक्ति अहंकार की सीमा में ही क्रियाशील रहता है। इस कुण्डली का आधा फेरा उसके उत्कर्ष की सम्भावनाओं का प्रतीक है।
शास्त्रों में इस सर्प को महाकाल का स्वरूप बताया गया है। मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी भी समय तथा काल से परे है। जाग्रत् अवस्था में यह हमारी आध्यात्मिक क्षमताओं की प्रतीक है। जबकि सुप्तावस्था में यह जीवन के उस सहज स्तर का प्रतीक है, जो हमारे अस्तित्व का आधार है। मूलाधार चक्र में ये दोनों ही सम्भावनाएँ निहित हैं।
मूलाधार में स्थित त्रिकोण के सबसे ऊपर लं बीज अंकित है। मंत्र के ऊपर बिन्दु के अन्दर देव गणेश एवं देवी डाकिनी का निवास है। देवी डाकिनी के चार हाथ और चमकदार लाल आँखें हैं। यह देवी डाकिनी अनेक सूर्यों की भाँति प्रकाशवान है और इसी के साथ यह निर्मल बुद्धि की वाहक भी है। मूलाधार चक्र से सम्बन्धित तन्मात्रा या संवेदना सुगन्ध है। और यहीं से अतीन्द्रिय गन्ध का प्रकटीकरण होता है।
इस मूलाधार चक्र की दो ही सम्भावनाएँ हैं। पहली सम्भावना है- कामवासना। और दूसरी सम्भावना है- ब्रह्मचर्य। पहली है प्रकृति प्रदत्त और दूसरी है साधना प्रदत्त। काम वासना प्राकृतिक है। लेकिन जब योग साधक मूलाधार चक्र के जागरण में सफल होता है तो उस अवस्था में कामवासना तिरोहित हो जाती है। और उसके स्थान पर ब्रह्मचर्य फलित होता है। वास्तव में यह कामवासना का रूपांतरण है।
शास्त्रकारों-आचार्यों एवं योग साधकों ने मूलाधार चक्र के जागरण की अनेकों विधियाँ बतायी हैं। सभी का अपना-अपना महत्त्व भी है। किन्तु यदि सर्वसामान्य के लिए यदि किसी सर्वमान्य विधि की खोज करनी हो, तो यही कहना पड़ेगा कि ब्रह्मचर्य की साधना ही मूलाधार को जाग्रत् करती है। और इसी से योग का आधार दृढ़ होता है।
ब्रह्मचर्य की महिमा और महत्ता योग साधना के जिज्ञासुओं ने किसी न किसी तरह सुनी ही रखी होगी। परन्तु प्रायः परिचय इसके स्थूल स्वरूप से हो पाता है। आमतौर पर ब्रह्मचर्य का अर्थ काम के दमन से लिया जाता है, जो किसी भी तरह ठीक नहीं है। इस पवित्र साधना में कहीं भी कोई, किसी भी तरह के निषेधात्मक भाव नहीं होते। इसमें तो सब कुछ विधायी और विधेयात्मक है। ब्रह्मचर्य में एक ही भाव निहित है- ब्रह्म के चिन्तन एवं ब्रह्म में रमण का।
मूलाधार चक्र के जागरण की साधना के लिए हमें इसी भाव को प्रगाढ़ करने की जरूरत है। ध्यान के नियमित अभ्यास के समय यदि यह भावानुभूति गहन हो सके कि मूलाधार में सोयी शक्ति क्रमिक रूप से ऊपर उठ रही है, और रेतस् ओजस् में रूपांतरित हो रहा है- तो मूलाधार का जागरण सम्भव है। अन्त में यह समझ लेना चाहिए कि जब तक साधक मूलाधार चक्र का जागरण नहीं कर लेता और जब तक भौतिक शरीर पर कामवासना को ब्रह्मचर्य में रूपांतरित अथवा परिवर्जित नहीं कर लेता, तब तक दूसरे चक्र यानि की स्वाधिष्ठान चक्र या भाव शरीर के साथ साधना करना कदापि सम्भव नहीं।