जो उदारतापूर्वक सबके हित की बात सोचता है, वही मनुष्य श्रेय का अधिकारी हो सकता है।
स्वार्थ की भावना से जो सेवा की जाती है, वह परोपकार नहीं प्रवंचना है।
अनेकों तरह से अनेक सम्पत्तियों की खोज में बाहर भटका। ये मिलीं भी, लेकिन अन्त में उन्हें विपत्ति पाया। फिर स्वयं में, अपने ही अन्दर सम्पत्ति की खोज-बीन शुरू की। जो मिला वही परमात्मा था। तब अनुभव हुआ कि परमेश्वर को खो देना ही विपत्ति है। और उसे पा लेना ही सम्पत्ति है।
पुरानी कथा है, किसी चारण ने एक सम्राट की बहुत तारीफ की। उसकी स्तुति में अनेक सुन्दर गीत गाए। यह सब उसने कुछ पाने की लालसा से किया। उसकी प्रशंसाओं से सम्राट हंसता रहा। फिर उसने स्तुति गान करने वाले उस चारण को सोने की बहुत सी मुहरें भेंट कीं। उस व्यक्ति ने जब इन मुहरों पर निगाह डाली, तो उसके अन्दर कुछ कौंध गया। एक चमक उसकी चेतना में बिखर गयी।
उसने आकाश की ओर कृतज्ञता भरी नजरों से देखा। लगा आकाश भी मौन स्वरों में उसके अन्तर भावों के साथ सहमति जता रहा है। अब उसने मुहरें फेंक दी और वह नाचने लगा। एक अनूठी कृतज्ञता उसके मुख पर छा गयी। उसका हाल कुछ का कुछ हो गया। उन मुहरों को देखकर उसमें न मालुम कैसी क्रान्ति हो गयी थी। अब वह चारण न रहा, सन्त हो गया। उसकी अन्तर्चेतना में कामना की बजाय प्रार्थना के स्वर गूँजने लगे।
बहुत वर्षों बाद किसी ने उससे पूछा, ऐसा क्या था उन मुहरों में? क्या वे जादुई थीं। वह हंसा और बोला, मुहरें नहीं, वह वाक्य जादुई था, जो उसमें लिखा था। कुछ पलों की आत्म निमग्नता के बाद उसने अपनी बात पूरी की, उस पर लिखा था ‘जीवन की सभी आवश्यकताओं के लिए परमात्मा पर्याप्त है।’
सच ही ‘परमात्मा पर्याप्त है।’ जो जानते हैं, वे सभी इस सच की गवाही देते हैं। यह जीवन की गहरी अनुभूति है, जिनके पास सब कुछ है, सारा ऐश्वर्य है, ईश्वर के बिना वे दरिद्र दिखाई देते हैं। और ऐसे सम्पत्तिशाली भी मिले, जिनके पास कुछ भी नहीं, केवल परमात्मा है। तभी यह सूत्र प्रकट हुआ, जिन्हें सब पाना है, उन्हें सब छोड़ देना होगा। जो सब छोड़ने का साहस रखते हैं, वे स्वयं प्रभु को पा लेते हैं। उनके सामने यह सच अनायास ही उजागर हो जाता है, कि ‘परमात्मा पर्याप्त है।’
‘आनंद’ आध्यात्म की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जो व्यक्ति इसे प्राप्त कर लेता है, उसकी अवस्था आध्यात्मिक दृष्टि से काफी उच्च मानी जाती है। यों बहिरंग की प्रफुल्लता सर्वसामान्य में भी देखी जाती है, पर वह भौतिकता से जुड़ी होने के कारण अस्थिर होती और घटती-बढ़ती रहती है, लेकिन ‘आनंद’ आत्मिक होने के कारण चिरस्थायी होता और समस्वर बना रहता है।
आमतौर पर आनंद ओर उत्फुल्लता को एक माना जाता है, किंतु दोनों में जमीन-आसमान जितना अंतर है। जो भेद सूर्य और चंद्रमा के प्रकाश के मध्य है, लगभग वैसा ही फर्क इन दोनों के बीच माना जाना चाहिए। बाह्य वस्तुओं में हमें जहाँ-जहाँ, जब-जब सुख की अनुभूति होती है, वह वस्तुतः हमारे अंतस् के आनंद का ही प्रकाश है, क्योंकि बाहरी उपादानों में सुख कभी होता नहीं। जो होता है, वह मात्र दुःख है। यदि भौतिक पदार्थ आनंद के स्रोत रहे होते, तो जिस चीज से एक को प्रसन्नता मिलती है, दूसरे के लिए भी वह उत्फुल्लतादायक ही होनी चाहिए थी, पर दैनिक जीवन में जो अनुभव होते हैं, वह इसके ठीक विपरीत है देखा जाता है कि जो सामग्री हमारे जीवन में सुख और शाँति लाती है, दूसरे के लिए वही महान दुःख का कारण बन जाती है। जड़ पदार्थ यदि सचमुच ही प्रसन्नता के उद्गम होते, तो किसी के लिए भी वे विपन्नता के निमित्त नहीं बनते। यदि बनते हैं, तो निश्चय ही समझने में कोई भूल हुई है। इस भूल को समझकर और सुधारकर ही हम उस चिरंतन आनंद को प्राप्त कर सकते है।
इस संसार में पदार्थ और चेतना दो प्रधान तत्व है। स्थूल जगत् में पदार्थ ही सर्वोपरि है, जबकि सूक्ष्म जगत् में आत्मा-परमात्मा से बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं। दोनों ही अपने-अपने प्रकार के सत्य हैं, पर यह संभव नहीं कि एक से संबंधित सत्य की उपलब्धि दूसरे में की जा सके, न यही शक्य है कि एक का सच दूसरे का पर्याय बने। द्रव्य का गुण आत्मा में ढूंढ़ना निरर्थक है और आत्मा का धर्म पदार्थ और संसार में तलाशना नासमझी। संसार में सौंदर्य भरा पड़ा है। कोई उसको निहारकर गदगद होता रहता है, जबकि दूसरे को उसमें वैसा सुख नहीं मिल पाता। यदि सौंदर्य है, तो इसकी खोज करने वाले प्रत्येक अन्वेषक को इससे सुख मिलना चाहिए, किंतु ऐसा कहाँ होता है? जिस सौंदर्य से, भोग और विलासिता से हमें आनंद मिलता है, उसी से कोई ‘बुद्ध’ भाग खड़ा होता है, विरागी बन जाता है। यदि सौंदर्य सच्चा है, तो यह विरोधाभास नहीं दिखलाई पड़ना चाहिए। कोई नयनाभिराम सौंदर्य के बीच रहकर भी अतृप्त बना रहता है, जबकि दूसरा घोर नरक जैसी परिस्थितियों में भी स्वर्गीय सुख की प्रतीति करता है। आखिर ऐसा क्यों? गहराई से विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि जिस शाश्वत संतोष की तलाश हम बाहर करते रहते हैं, वस्तुतः अंदर की वस्तु है। बाहर यदि उसकी अनुभूति होती है, तो वह भी भीतर का ही विस्तार है। जैसे-जैसे हम गहराई में प्रवेश करते चलते है, वैसे-वैसे इस तथ्य की अनुभूति और अधिक स्पष्ट होती जाती है। हम सुख को बाहरी वस्तुओं में ढूँढ़ना चाहते है। सुख वहाँ है नहीं, इसलिए दुःख भोगना पड़ता है। इतना जानते-समझते हुए भी व्यक्ति आज संसार में साधनों के पीछे शाँति के लिए भागता फिर रहा है। कोई उसे किसी चीज में खोजने का प्रयास कर रहा है, तो दूसरा किसी अन्य में अन्वेषण कर रहा है। सभी प्रयत्नशील है, पर आज तक इनमें से कोई भी इस सनातन सुख को उपलब्ध कर पाने में सफल न हो सका। पत्नी सोचती है कि उसे पति के सान्निध्य में सुख मिलेगा और पति सोचता है कि वह इसे पत्नी से प्राप्त कर लेगा। माँ, बेटे में सुख ढूँढ़ रही है, जबकि बेटे को इसकी तलाश माँ में है। पिता पुत्र में, पुत्र पिता में, संसारी संसार में और वैरागी विराग में इसे अपने-अपने ढंग से खोज रहे हैं, किन्तु उनकी अब तक की यह खोजयात्रा पूरी न हो सकी है और न भविष्य में पूरी होने की संभावना है, क्योंकि जिन्हें हम सुख का स्रोत मान बैठे हैं, वे इसके उद्गम हैं नहीं।
आश्चर्य तो तब होता है, जब यह विदित होता है कि जिन्हें हम शाँति का पुँज मानते और जिनमें हमें शाँति की तलाश है, वे वास्तव में अशाँत हैं और वे इसकी खोज कहीं अन्यत्र कर रहे है। शरीर उनका कुछ कर रहा है, मन कुछ और ढूंढ़ रहा है शरीर कहीं है, मन कहीं और। वे अपने में होते नहीं। उनका संपूर्ण अस्तित्व वहाँ विद्यमान नहीं होता। इसलिए उनसे भेंट संपूर्ण रूप से होती नहीं। मिलन मात्र शरीर से हो पाता है, जो मन-प्राण के बिना अधूरा है। जो तृप्ति का अन्वेषण वाह्य विश्व में करते रहते हैं, उनकी सत्ता हर वक्त अधूरी बनी रहती हैं। ऐसे लोगों को थोड़ी भी ठोकर लगती है, तो एकदम असंतुलित होकर गिर पड़ते है और गिरते ही चलते है। गिरने पर या तो आत्महत्या कर लेते हैं या फिर पागल हो जाते है। जो तनिक बुद्धिमान है, वे नाममात्र के विरागी बनकर इधर-उधर भटकने लगते हैं। यही कारण है कि इन दिनों विक्षिप्तों अर्द्धविक्षिप्तों और बैरागी कहे जाने वालों की संख्या द्रुतगति से बढ़ती जा रही है, कारण कि वर्तमान में लोगों की यात्रा भीतर से बाहर की ओर हो गई है, जबकि होना इसके विपरीत चाहिए था।
कभी यही स्थिति भर्तृहरि के समक्ष उपस्थित हुई थी। जब संसार की विषय वासनाओं में उन्हें बार-बार अतृप्ति और अशांति मिली, तो वे समझ गए कि उनकी तलाश गलत दिशा में, गलत ढंग से चल पड़ी है। इसके उपराँत उन्होंने एक पुस्तक लिखी, जिसका नाम था, ‘शृंगार शतक। इस पुस्तक में उन्होंने बाह्य जगत् में सुखोपलब्धि की व्यर्थता का विस्तार से उल्लेख किया है। इसके पश्चात उनकी अंतर्यात्रा शुरू हुई इसके अनुभवों को उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वैराग्य शतक’ में लिपिबद्ध किया है और बताया है कि स्थिर आनंद की उपलब्धि आँतरिक एवं आत्मिक हैं
मिलता-जुलता भाव प्रकट करते हुए मूर्द्धन्य मनीषी जुँग ने अपनी पुस्तक ‘मॉर्डन मैन इन सर्च ऑफ ऐ सोल’ में कहा है कि आरंभ में मनुष्य संबंधी मान्यता यह थी कि वह मात्र एक शरीर है और यह संसार उसके उपभोग के निमित्त है। ऐसी स्थिति में वह तुष्टि का संधान साधन-सामग्रियों में करता था और उसी के अधिकाधिक भोग में लिप्त रहता था। अब जबकि शरीर के अंदर आत्मा की उपस्थिति को विज्ञान ने करीब-करीब स्वीकार लिया है, तो संभव है उसकी उपलब्धि से संपूर्ण और शाश्वत सुख की उपलब्धि हो जाए और मनुष्य को पहले की तरह भटकना न पड़े। इसीलिए वे सलाह देते हुए कहते हैं कि यदि सचमुच में आदमी के अंदर वैसा कोई अद्भुत तत्व है, जिसकी प्राप्ति ही चरम प्राप्ति हो और जिसके उपलब्ध हो जाने से सब कुछ उपलब्ध हो जाता हो, तो मनुष्य को उसी परमतत्व की शोध में जुट जाना चाहिए।
‘स्प्रिचुअल क्राइसिस ऑफ मैन’ नामक ग्रंथ में विख्यात विचारक पाल ब्रंटन लिखते है कि अध्यात्म की खोज वस्तुतः अपने ही अंदर की खोज है, जबकि संसार जड़ पदार्थों के अनुसंधान की यात्रा है विज्ञान जड़युक्त है। अध्यात्म चेतनामय है। जड़ से जड़ की ही शोध की जानी चाहिए। उससे जो कुछ हस्तगत होगा, वह जड़वत् होगा, जबकि आनंद दिव्य चेतनात्मक स्थिति है। यह आत्मा का स्वाभाविक गुण है। आत्मा चैतन्य है, अस्तु उसे उपलब्ध कर ही उस अवस्था में प्रतिष्ठित हुआ जा सकता है, जिस अध्यात्म में ‘सच्चिदानंद’ कहकर निरूपित किया गया है। वे लिखते है कि इन दिनों भूल यह हो रही है कि जड़ में चेतन को खोजते फिर रहे है। परा प्रकृति को अपरा प्रकृति में ढूंढ़ रहे हैं, जबकि दोनों दो पृथक विज्ञान है। जिस दिन यह निरर्थक प्रक्रिया बंद होगी, उसी दिन से मनुष्य की वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा शुरू होगी। फिर उसे शाँति और संतोष के लिए बाहर भटकना नहीं पड़ेगा।
इसके लिए उपाय यही है कि हम उपलब्ध साधनों में संतुष्ट रहना सीखें। धीरे-धीरे संतोष को बढ़ाएं उसे साधन-संपदा से न जोड़े, तो एक दिन उस अवस्था में पहुँच सकते है, जिसको ‘सहजानंद’ कहा गया हैं यह उच्च आध्यात्मिक स्थिति है। फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम साधनहीन हैं या साधनसंपन्न। सच तो यह है कि उक्त मनोदशा का भौतिकता से कोई संबंध नहीं। यह एक अभौतिक अवस्था है। अस्तु, प्राप्तव्य है। इसके विपरीत यदि हम साधन-सुविधाओं से सुख-संतोष को जुड़ा मानें, तो उसके दुःख भी हमारे साथ संलग्न होते चले जाएंगे। यह बहुत ही कष्टकारक होगा। इसलिए विवेकवान् लोग सुख की सुविधाओं से नहीं संयुक्त करते, क्योंकि वे जानते है कि यह पंचभौतिक जगत् नश्वर है। जो संसार नश्वर है और जहाँ की समस्त वस्तुएं नाशवान हैं, उनसे प्रापित सुख शाश्वत कैसे हो सकता है। अतएव तत्ववक्ताओं ने प्रेम की वस्तु परमात्मा को बतलाया हैं हमारी आत्मा उसी की अंशधर है। आत्मपरिष्कार द्वारा आत्मा और परमात्मा को उपलब्ध करना एवं उनका मिलन करना अध्यात्म का उद्देश्य है। सर्वोच्च शाँति और परमानंद उसी अवस्था में प्राप्त किया जा सकता है। इसी निमित्त हम सबका प्रयत्न होना चाहिए।
योग साधकों के लिए सबसे पहले साधना के प्रवेश द्वार की पहचान जरूरी है। क्योंकि यही वह महत्त्वपूर्ण स्थल है, जहाँ से योग साधना की अन्तर्यात्रा शुरू होती है। महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में इसी के बारे में गूढ़ संकेत दिए हैं। इस प्रथम सूत्र में उन्होंने योग साधना की पूर्व तैयारियों, साधना में प्रवेश के लिए आवश्यक आवश्यकताओं एवं अनिवार्यताओं का ब्योरा सूत्रबद्ध किया है। समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद एवं कैवल्यपाद तथा 195 सूत्रों वाले योगदर्शन की आधारशिला यही पहला सूत्र है।
‘अथ योगानुशासनम्’ यानि कि अब योग का अनुशासन। योग सूत्रकार महर्षि के एक-एक शब्द को ठीक से समझना जरूरी है। क्योंकि महावैज्ञानिक पतंजलि एक भी शब्द का निरर्थक प्रयोग नहीं करते। इस सूत्र में पहला शब्द है- अथ। योग सूत्र की ही भाँति अथ शब्द ब्रह्मसूत्र में भी आया है। ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ यही पहला सूत्र है महर्षि बादरायण व्यास का। इसमें से अथ शब्द की व्याख्या में आचार्य शंकर एवं आचार्य रामानुज ने सुदीर्घ व्याख्याएँ की हैं। अपनी भारी मतभिन्नता के बावजूद दोनों आचार्य अथ के महत्त्व के बारे में एकमत हैं। जिन्हें सचमुच ही साधना में प्रवेश करना है, उन्हें अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि अथ को समझकर साधक का जीवन अर्थवान् बनता है। बिना अथ को समझे वह पूरी तरह से अर्थहीन रह जाता है।
‘अथ’- यानि कि ‘अब’। अब साधक के जीवन में वह पुण्य क्षण है जब उसके हृदय में उठने वाली योग साधना के लिए सच्ची चाहत अपने चरम को छूने लगी। उसकी अभीप्सा की ज्वालाओं का तेज तीव्रतम हो गया। उसकी पात्रता की परिपक्वता हर कसौटी पर खरी साबित हो चुकी। उसका शिष्यत्व पूरी तरह से जाग उठा। उसकी पुकार में वह तीव्रता और त्वरा आ गयी कि सद्गुरु उससे मिलने के लिए विकल-बेचैन हो उठे।
परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में ‘अथ’ का पुण्य क्षण 15 वर्ष की आयु में ही आ गया। वह पात्रता और पवित्रता की हर कसौटी पर पिछले जन्मों से ही खरे थे।श्री रामकृष्ण परमहंस, समर्थ स्वामी रामदास, संत कबीर के रूप में उन्होंने योग साधना के सत्य को पूरी तरह जिया था। अपने जीवन को इसकी अनुभूतियों के रस में डूबोया था। फिर भी उन्हें इस बार भी अपनी पात्रता को सिद्ध करना पड़ा। जो उन्हीं की भाषा में ‘पिसे को पीसा जाना था।’ उनकी जाग्रत् चेतना की पुकार इतनी तीव्र हो उठी कि उनके सद्गुरु हिमालय के गुह्यक्षेत्र से भागे चले आए।
उन्होंने इस सत्य को बताते हुए अपनी आत्मकथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ में लिखा ‘हमें गुरु के लिए भाग दौड़ नहीं करनी पड़ी। हमारे गुरुदेव तो स्वयं ही हम तक दौड़े चले आए।’ यह है महर्षि पतंजलि के योग सूत्र के प्रथम सूत्र के प्रथम शब्द को समझ लेने का चमत्कार। ‘अथ’ के रहस्य को जान लेने की अनुभूति। इसके प्रयोग को सिद्ध कर लेने का सच। गुरुदेव ने जगह-जगह पर अपने साहित्य में लिखा है, स्थान-स्थान पर अपने प्रवचनों में कहा है, कि हमारी मंशा अपने गुरु की जेब काटने की नहीं थी। हम तो उन्हें अपना शिष्यत्व समर्पित करना चाहते थे। हमारे अन्दर तो एक ही ख्वाहिश, एक ही अरमान था, सच्चा शिष्य बनने का। बस हम तो अपने गुरु के हो जाना चाहते थे। अपनी तो बस एक ही चाहत थी, बस एक ही नाता रहे, एक ही रिश्ता बचे गुरु और शिष्य का।
जीवन यदि भ्रान्तियों से उबर सका, यदि साधक आशा रहित हो सका। यदि देह के स्थान पर आत्मा की प्यास जग सकी। यदि वह हो सका, जिसे पश्चिम के मेधा सम्पन्न दार्शनिक कीर्केगार्द ने तीव्र व्यथा कहा है। यदि सारे सपने विलीन हो चुके हैं, नींद भली प्रकार टूट चुकी है, और यदि ऐसा क्षण आ गया है तो पतंजलि कहते हैं- अब योग का अनुशासन। केवल अब तुम योग के विज्ञान को, योग के अनुशासन को समझ सकते हो।
यदि ऐसा क्षण नहीं आया, तो किए चले जाओ योगशास्त्रों का अध्ययन, बन जाओ महाविद्यालय, विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, लच्छेदार प्रवचन देकर उठाते रहो सुनने वालों की तालियों का आनन्द, लेकिन योगी नहीं बन सकते। योगशास्त्र पर पी-एच.डी. कर सकते हो, करा सकते हो, लेकिन कभी योगी न बनोगे। अथ का पुण्य क्षण अभी तुम्हारे लिए नहीं आया है। क्योंकि यह रुचि बौद्धिक है, साधक के प्राणों से पनपी अभीप्सा के उजाले से कोसों दूर। ध्यान रहे, योग कुछ नहीं है, अगर यह अनुशासन नहीं है। योग कोई शास्त्र नहीं है, योग अनुशासन है। यह कुछ ऐसा है, जिसे तुम्हें करना है। यह कोई जिज्ञासा नहीं है, यह दार्शनिक चिन्तन भी नहीं है। यह इन सबसे कहीं गहरा है। यह तो सवाल है जीवन और मरण का।
‘अथ’ का पुण्य क्षण उनके जीवन में भी नहीं आ सकता, जो योग को सत्य नहीं सिद्धि समझते हैं। जो सोचते हैं कि लौकिक न पा सके, तो अलौकिक पा लो। या फिर लौकिक वैभव तो बटोरा ही, अब अलौकिक भी बटोर लो। ध्यान रहे चमत्कारों की चाहत रखने वाले, चमत्कारी बनने की महत्त्वाकाँक्षाओं को संजोने वाले बाजीगर तो बन सकते हैं। परन्तु अथ का पुण्य पल तो तभी आता है, जब यह अच्छी तरह से महसूस होने लगता है कि सारी दिशाएँ अस्त-व्यस्त हो गयी हैं, सारी राहें खो गयी हैं, भविष्य की कल्पनाएँ, जल्पनाएँ अब नहीं बचीं। इच्छाओं, आशाओं और सपनों की सारी गतियाँ समाप्त हो चुकी हैं- अब योग का अनुशासन। और यदि ‘अब’ नहीं आया तो योग के कितने भी रहस्य लिखे जाएं, लेकिन वे पढ़कर भी समझे न जा सकेंगे। ‘अथ’ का एक ही मतलब है- सच्चा शिष्यत्व, खरी पात्रता।
साधके के जीवन में यदि वह ‘अथ’ आ चुका है, तो उसे योग का अनुशासन बताने वाला सद्गुरु भी मिलेगा। अध्यात्म जगत् का यह वैज्ञानिक सत्य है, सौ फीसदी खरा और परखा हुआ सच है कि जिसमें शिष्यत्व ने जन्म ले लिया है, उसे सद्गुरु मिले बिना नहीं रहेंगे। और शिष्यत्व को अर्जित किए बिना यदि सद्गुरु मिल भी गए,तो भी कोई लाभ होने वाला नहीं है बंजर भूमि पर डाले गए बीज बेकार चले जाते हैं कोई समझदार बीजों को बंजर भूमि पर डालता भी नहीं है। साधक की अन्तर्भूमि उर्वर है, अन्तर्चेतना ग्रहणशील एवं उपजाऊ बन चुकी है, तो उसमें योग के बीज बोने वाले सद्गुरु अपने आप ही आ जाते हैं। वह आते हैं, शिष्य को योग का अनुशासन देने के लिए।
अनुशासन का मतलब है, होने की क्षमता, जानने की क्षमता, सीखने की क्षमता। परम पूज्य गुरुदेव की इन तीनों क्षमताओं को परखकर ही उनके हिमालय वासी सद्गुरु ने उन्हें 24 लाख के 24 गायत्री महापुरश्चरणों में प्रवृत्त किया। गुरुदेव के जीवन का पहला सच समझने के लिए हमें इन तीनों क्षमताओं का रहस्य जानना होगा। पतंजलि कहते हैं, यदि तुम अपना शरीर हिलाए बिना मौन रहकर कुछ घण्टे बैठ सकते हो, तब तुम्हारे भीतर होने की क्षमता बढ़ जाती है। अभी तो स्थिति यह है कि एक घण्टे भी बिना हिले-डुले नहीं बैठा जा सकता। अभी तो समूचा अस्तित्त्व एक कंपित ज्वरग्रस्त हलचल भर है। होने का अर्थ है, कुछ किए बिना बस ठहर जाओ, बिना कुछ किए, बिना किसी गति के, बिना किसी हलचल के। यह होना ही जानने की क्षमता विकसित करता है।
पन्द्रह वर्ष की किशोर वय में प्रतिदिन छः घण्टे एक आसन पर बैठकर नियमित गायत्री जप गुरुदेव के इसी ‘होने’ की क्षमता का परिचायक था। जानने की क्षमता तब आती है, जब मन अगतिमान होता है। साधक जब केन्द्रस्थ होता है, तभी वह जान सकता है। अभी तो सामान्य मनोदशा एक भीड़ की है। और इसी कारण गुरजिएफ ने कहा कि सामान्य व्यक्ति वादा नहीं कर सकता, संकल्प नहीं कर सकता, क्योंकि यह सब तो साधकों के गुण हैं, शिष्यत्व के लक्षण हैं।
गुरजिएफ के पास लोग आते और कहते अब मैं व्रत लूँगा। उसके शिष्य औस्पेन्सकी ने लिखा है, कि वह जोर से हंसता और कहता ‘इससे पहले कि तुम कोई प्रतिज्ञा लो, दो बार फिर सोच लो। क्या तुम्हें पूरा आश्वासन है, कि जिसने वादा किया है, वह अगले क्षण भी बना रहेगा?’ तुम कल से सुबह तीन बजे उठने का निर्णय कर लेते हो और तीन बजे तुम्हारे भीतर कोई कहता है, झंझट मत लो। बाहर इतनी सर्दी पड़ रही है। और ऐसी जल्दी भी क्या है? मैं यह कल भी कर सकता हूँ और तुम फिर सो जाते हो। दूसरे दिन सारे पछतावे के बावजूद यही स्थिति फिर से दुहराई जाती है। क्योंकि जिसने प्रतिज्ञा की, वह सुबह तीन बजे वहाँ होता ही नहीं, उसकी जगह कोई दूसरा ही आ बैठता है। अनुशासन का मतलब है, भीड़ की इस अराजक अव्यवस्था को समाप्त कर केन्द्रीयकरण की लयबद्धता उत्पन्न करना और तभी जानने की क्षमता आती है।
संकल्पवान ही आत्मतत्त्व को जान पाते हैं। गुरुदेव का समूचा जीवन इसी संकल्प का पर्याय था। उनके समूचे जीवन में, अन्तर्चेतना में अविराम लयबद्धता थी। तभी उनके गुरु ने उन्हें जो अनुशासन दिया, वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक पालन करते रहे। अनुशासन से मिलता-जुलता अंग्रेजी का शब्द है- डिसिप्लिन। यह डिसिप्लिन शब्द बड़ा सुन्दर है। यह उसी जड़, उसी उद्गम से आया है, जहाँ से डिसाइपल शब्द आया है। इससे यही प्रकट होता है कि अनुशासन शिष्य का सहज धर्म है। केन्द्रस्थ, लयबद्ध, संकल्पवान व्यक्ति ही गुरु के दिए गए अनुशासन को स्वीकार, शिरोधार्य कर सकता है। ऐसे ही व्यक्ति के अन्दर विकसित होती है, जानने की क्षमता।
सत्य और तत्त्व से अनभिज्ञ लोग संकल्पवान होने का मतलब हठी होना समझ लेते हैं। पर नहीं, अंतस् में केन्द्रित होने के साथ आवश्यक है विनम्रता, ग्रहणशीलता और सद्गुरु की चेतना की ओर खुला होना। जो तैयार है, सचेत है, प्रतीक्षारत और प्रार्थनामय है, उसी में सीखने की क्षमता आती है। यह सीखना गुरु के सान्निध्य में होता है। सद्गुरु के हृदय में जल रही सत्य की ज्योति के संस्पर्श से ही शिष्य के हृदय की ज्योति जलती है। यही है सत्संग का मतलब। वैसे तो सत्संग बहुप्रचलित शब्द है, लेकिन अर्थ कम लोगों को मालूम है। इस शब्द का प्रयोग प्रायः गलत ही किया जाता है।
सत्संग का मतलब है सत्य का गहरा सान्निध्य। इसका अर्थ है, सत्य के पास होना, उन सद्गुरु के अनुशासन में रहना, जो सत्य से एकात्म है। बस सद्गुरु के निकट बने रहना, खुले हुए ग्रहणशील और प्रतीक्षारत। यदि साधक की यह प्रतीक्षा गहरी और सघन हो जाती है तब एक गहन आत्ममिलन घटित होता है। इसके लिए जरूरी नहीं है कि सदा ही गुरु से शारीरिक निकटता हो। परम पूज्य गुरुदेव के शब्दों में- उन्हें जीवन भर में सिर्फ तीन बार अपनी गुरुसत्ता से मिलने का सौभाग्य मिला। पर आत्म मिलन अबाध, अविराम और सतत था। दरअसल गुरु के बताए गए अनुशासनों में उनकी चेतना तरंगित होती है। इन्हें स्वीकारने और अपनाने का अर्थ है- उनकी चेतना को स्वीकारना और अपनाना। ‘अथ’ के घटित होते ही, शिष्यत्व के प्रकट होते ही साधक को एक अलग ही भाषा समझ में आने लगती है। तब शारीरिक निकटता की जरूरी नहीं है, क्योंकि नयी भाषा है ही गैर शारीरिक। तब दूरी से कोई फर्क नहीं पड़ता, शिष्य एवं गुरु का संपर्क बना रहता है। केवल स्थान की दूरी ही नहीं, समय से भी कोई अन्तर नहीं पड़ता। गुरु का शरीर न रहे, लेकिन शिष्य का संपर्क तब भी बना रहता है। भौतिक शरीर को त्यागने के बावजूद भी गुरु-शिष्य बड़े मजे से मिलते रहते हैं। बिना किसी बाधा या व्यवधान के उनमें भावों एवं विचारों का आदान-प्रदान चलता रहता है।
यह चमत्कार है योग के अनुशासन का। गुरु द्वारा दिए गए व्रतबन्ध को श्रद्धापूर्वक स्वीकारने से शिष्य के जीवन में अनेकों चमत्कार घटते हैं। परम पूज्य गुरुदेव का जीवन स्वयं ही इसका जीता-जागता प्रमाण रहा। कोई गुरु कभी भी अपने शिष्य से दूर नहीं होता। वह कभी मरता नहीं उनके लिए जो श्रद्धा सहित उसके अनुशासन को स्वीकार कर सकते हैं।
वह मदद करता रहता है। वह हमेशा यहाँ ही होता है शिष्य के पास। उसका सच्चावास स्थान तो अपने शिष्य का हृदय होता है। प्रेम, श्रद्धा एवं आस्था स्थान और समय दोनों को मिटा देती है। अनुशासन देने वाला गुरु और प्राणपण से गुरु के अनुशासन को मानने वाला शिष्य दोनों एकदम पास-पास होते हैं। उनमें सदा ही सत्संग चलता रहता है।
‘अथ योगानुशासनम्’ के सूत्र का सार यही है- शिष्यत्व का जन्म और सद्गुरु की प्राप्ति। शिष्यत्व और सद्गुरु जब मिलते हैं- तभी योग साधना का प्रारम्भ होता है। अन्तर्यात्रा का विज्ञान जन्म लेता है। अस्तित्त्व में अनूठे प्रयोग शुरू होते हैं। महर्षि पतंजलि के इस प्रथम सूत्र को जो नहीं समझ पाते, योग साधना का प्रवेश द्वार उनके लिए कभी भी नहीं खुलता। परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में भी यह द्वार इसी रीति से खुला था। ‘अथ’ शब्द की समझ ने, और योग अनुशासन की स्वीकार्यता ने ही उन्हें महायोगी बनाया। अपने सुदीर्घ साधनामय जीवन का निष्कर्ष बताते हुए उन्होंने लिखा- अध्यात्म एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। इसके प्रयोगों के लिए हमें एक सच्चे वैज्ञानिक की भाँति सत्यान्वेषी बनना होगा। अध्यात्म की भाषा में शिष्यत्व ही इसका पर्याय और कसौटी है।
इन पंक्तियों को पढ़कर अपनी योग साधना प्रारम्भ करने वाले साधकों के लिए इस सूत्र की साधना के व्यावहारिक बिन्दु निम्न है- 1. इस समझ को- आत्मसात करना ही योग सत्य की प्राप्ति है, सिद्धि की प्राप्ति नहीं। 2. ‘अथ का पुण्य क्षण’ लाने के लिए गुरुदेव को पुकारना, उनकी कृपा का आह्वान करना। 3. योग के प्राथमिक अनुशासन के रूप में किसी सुखप्रद आसन (सुखासन, पद्मासन आदि) पर देर तक बैठकर गायत्री महामंत्र को जपने का अभ्यास, 4. इस विवेक पथ का अनुशीलन करके भी यदि अभी तक हमें योग की अनुभूति नहीं हो सकी है, तो इसका एक मात्र कारण यह है कि अपनी पात्रता अभी परिपक्व नहीं है, इसे परिपक्व करने के प्रयास में प्राणपण से जुटना।
इस सम्बन्ध में और अधिक व्यावहारिक ज्ञान पाने के लिए शान्तिकुञ्ज पत्र लिखकर परामर्श किया जा सकता है। अथवा फिर यहाँ नियमित रूप से संचालित होने वाले साधना सत्रों में भागीदारी करके अपनी जिज्ञासा का समाधान पाया जा सकता है। इस लेखमाला के भावी पृष्ठ भी जिज्ञासु साधकों के लिए समाधान सामग्री प्रस्तुत करते रहेंगे। योग अपने आप में क्या है, इसे अच्छी तरह से जान लेने पर इसकी सच्ची साधना सहज सम्भव है। महर्षि पतंजलि अपने अगले सूत्र में योग का सत्य बताते हैं और परम पूज्य गुरुदेव इसे अपने जीवन के प्रयोग से सिद्ध करते हैं। योग क्या है? इसे अपने जीवन में गुरुदेव ने कैसे अनुभव किया? साधना के प्रवेश द्वार के पश्चात् साधक को पहली अनुभूति क्या होती है? इन सवालों का सटीक समाधान अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में मिलेगा। इसे पढ़कर ‘योग का स्वरूप’ बोध होना निश्चित है।
तीन पहाड़ थे पास ही पास। उनसे लगा हुआ लंबा गहरा खड्ड था। उसके कारण उस ओर किसी का आवागमन नहीं होने पता था। एक बार देवता उधर से निकले, पहाड़ों से कहा, “इस क्षेत्र का नामकरण करना है। तुम तीनों में से किसी के नाम पर नामकरण किया जाएगा। तुम तीनों अपनी एक-एक इच्छा पूरी करा सकते हो। एक वर्ष बाद जिसका जितना विकास होगा, उस आधार पर नामकरण किया जाएगा।”
पहले पहाड़ ने कहा, “मैं सबसे ऊँचा हो जाऊँ, ताकि सबको दूर से दिखाई दूँ।” दूसरे ने कहा, “मुझे खूब हरा-भरा प्राकृतिक संपदा से भरा-पूरा बना दें, ताकि सब मेरी ओर आकर्षित हों।” तीसरे पहाड़ ने कहा, “मेरी ऊँचाई छीलकर इस खड्ड में समतल बना दें, ताकि यह सारा क्षेत्र उपजाऊ हो जाए और लोग यहाँ सुविधा से आ-जा सकें।” देवता तीनों की व्यवस्था बनाकर चले गए।
एक वर्ष बाद परिणाम देखने देवता पुनः पहुँचे। पहला पहाड़ ऊँचा हो गया था, दूर से दिखता था, पर वहाँ कोई जाता नहीं था। हवा, सरदी, गरमी की मार सबसे अधिक उसे ही सहनी पड़ती थी।
दूसरा पहाड़ प्राकृतिक संपदा से भर गया था, पर बीहड़ इतना था कि किसी के जाने की हिम्मत न पड़ती थी। वन्यपशुओं का आतंक भी उससे खूब बढ़ गया था।
तीसरा पहाड़ खड्ड पाटने से समतल हो गया था। उस सारे क्षेत्र में फसलें उगाई जा रही थी। खड्ड पट जाने से लोग वहाँ जाने लगे, बसने लगे। उपजाऊ भूमि का लाभ सबको मिलने लगा।
देवताओं ने उस क्षेत्र का नाम उसी तीसरे पहाड़ के नाम पर रखा, जिसने अपने निकटवर्ती क्षेत्र को भी उपयोगी बना दिया। लोगों के आने-जाने का मार्ग बना और उपजाऊ भी। इस प्रयास में उसने अपने अस्तित्व को ही दाँव पर लगा दिया। देवताओं ने कहा, “इसी ने इस क्षेत्र को अपना बनाया है। यह क्षेत्र इसी के परिवार के रूप में विकसित हुआ है, इसी के नाम से जाना जाएगा।”
भगवान् बुद्ध ने उसकी ओर देखा। बड़ी पारदर्शी और करुणापूर्ण थी वह दृष्टि। उनके अलौकिक जीवन की ही भाँति उनकी दृष्टि भी अनोखी थी। यह ऐसी दृष्टि थी जो बाहर ही नहीं भीतर भी देखती थी। रूप और आकार को ही नहीं, स्वभाव एवं संस्कारों को भी निहारती थी। बड़े ही सौभाग्यशाली होते वे, जिन्हें प्रभु भर नजर देख लेते। आज उसके जीवन में सौभाग्य-सूर्य की किरणें झिलमिलायी थी। प्रभु की करुणा उसे छू रही थी और वह धन्य हो रहा था।
बड़ी ही मुश्किल से मिले थे ये पल उसे। इन दिनों भगवान् आलवी नगर आए थे। उनके साथ पाँच सौ भिक्षु भी थे। प्रभु के साथ भिक्षुओं की उपस्थिति ऐसी थी, जैसे सूर्य के साथ किरणें होती हैं। ये किरणें चारों ओर सूर्य की प्रभा-प्रकाश बिखेरती हैं। इन्हें देखकर बरबस ही सूर्य की उपस्थिति का अहसास हो जाता है। प्रभु का भिक्षु संघ भी कुछ ऐसा ही था। भिक्षु संघ के सदस्यों से भगवान् की अलौकिक चेतना झरती, बहती और बिखरती थी। आलवी नगर में इस समय यही हो रहा था। भगवान् की उपस्थिति की सुगन्ध सब ओर फैल रही थी।
उसकी चेतना भी इसके स्पर्श से अछूती न रही। भगवान् आए हैं, उसने भी सुना, जाना और अनुभव किया। और तब- मैं भी भगवान् के दर्शन करूंगा। ऐसा निश्चय उसके मन में उभरा। इस निश्चय ने उसे भारी खुशी दी। उसकी अन्तर्चेतना खुशी की तरंगों से तरंगित होती रही। सुबह-सुबह उठकर भगवान् के वास-स्थान की ओर जाने के लिए उसने पहला-पग बढ़ाया ही था। तभी उसे दिखाई दिया कि उसका एक बैल कहीं गायब है। अब क्या करे? पहले से ही वह गरीबी के दंश का दर्द झेल रहा था। उसकी तरह गरीबी की मार सहने वाला, शायद पूरे आलवी नगर में और कोई न था। बैल के भाग जाने से गरीबी का दर्द अनायास ही असह्य एवं सघन हो गया।
व्यथित-पीड़ित वह बैल को खोजने के लिए चल पड़ा। गली, खेत, वन की भटकन से उसके पाँव दुःख आए। बैल को खोजते हुए बीच-बीच में वह सोचने लगता, क्या मेरे ही मन में कोई खोट है, जो प्रभु से नहीं मिल पा रहा हूँ। उसकी भटकन अब थकान बन गयी थी। अब उससे रहा न गया, वह व्यथित मन से पुकार उठा- अंगुलीमाल का उद्धार करने वाले हैं तथागत! प्रभु, मुझे भी अपनी शरण में लो। उसकी पुकार इतनी गहरी और सघन थी, कि उससे सूक्ष्म स्पन्दित हो उठा। इसका सुखद परिणाम भी उसे कुछ ही पलों में दिखाई दिया। उसका बैल वन में एक ओर खड़ा घास चर रहा था। उसने भागकर उसकी रस्सी पकड़ी और घर की ओर लौट पड़ा।
अब तक दोपहर हो आयी थी। उसने अभी तक कुछ खाया भी न था। पर भगवान् के दर्शन की खुशी ने उसकी भूख एवं थकान दोनों को ही हर लिया था। उसके हृदय में कृतज्ञता के अहोभाव थे। अन्तर्यामी प्रभु सब कुछ सुनते हैं, सभी कुछ जानते हैं। भक्ति के उद्रेक से उसकी गति तीव्र हो गयी। पल-क्षण पता नहीं चले, इनकी गणना भी कौन करे? वह तो बस भगवान् के समीप पहुँच गया। भीड़ से घिरे परम करुणावान भगवान् बुद्ध ने उसके पहुँचते ही उसे अपने पास बुला लिया। बड़ी ही प्रीतिपूर्ण नजरों से उसकी ओर देखा। फिर अपने एक शिष्य महाकाश्यप की ओर इशारा करके कहा- भन्ते! इनके लिए यहीं भोजन ले आओ।
भगवान् के इन वचनों से सभी को भारी अचरज हुआ। न कोई बात, न चीत, बस सीधे भोजन। वह भी भोजनालय में नहीं, ठीक अपने सामने। सबके सब कौतुहल एवं आश्चर्य में थे। लेकिन प्रभु-अनुगत महाकाश्यप ने शीघ्र ही आज्ञा पालन किया। उन्हें ज्ञात था कि भगवान् अकारण कुछ नहीं कहते, कुछ नहीं करते। भोजन की थाली से एक कौर तोड़कर प्रभु जब स्वयं उसको खिलाने लगे तो भिक्षु संघ का आश्चर्य शतगुणित हो गया। उसकी आँखों में तो आँसू आ गए। आँसू की इन गोल बूँदों में भक्ति का भूगोल उभर एवं छलक रहा था। उसे यह भी नहीं समझ में आया, कि जिन प्रभु की सेवा उसे स्वयं करनी चाहिए, वह स्वयं उनकी सेवा कैसे स्वीकार करे?
असमंजस में उसने काफी न-नुकुर की। भगवान् उसके संकोच को जान गए। वह बोले संकोच त्याग दो वत्स कौशल्यायन। इसे मेरी आज्ञा मानो या अनुरोध प्रीतिपूर्वक भोजन करो। भगवान् ने हठपूर्वक उसे भोजन कराया। उसका समूचा अस्तित्त्व रोमाँचित हो आया। जब से वह आया, तभी से चुप था। अभी भी वह कुछ न बोला। बस आनंदपूर्वक प्रभु के हाथों से कौर खाए। भोजन के उपरान्त भगवान् ने कहा, अब तुम उस पास के पेड़ के नीचे बैठकर विश्राम करो। बुद्ध की इस बात को सुनकर वह चुपचाप उठा और जाकर पेड़ के नीचे बैठ गया। बैठते ही वह गहरी समाधि में खो गया। उसकी यह भावदशा भिक्षुओं से छुपी न रही। उन्हें परम आश्चर्य हो रहा था कि ध्यान का परम फल भोजन से किस तरह मिल गया? अन्ततः सबने भगवान् से जिज्ञासा की।
तब भगवान् ने यह गाथा कही-
जिघच्छा परमा रोगा संखारा परमा दुखा। एतं ञत्वा यथाभूतं निब्बानं परमं सुखं॥
भिक्षुओं, भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़े दुःख हैं। ऐसा यथार्थ जो जानता है, वही जानता है कि निर्वाण सबसे बड़ा सुख है।
भगवान् की इस गाथा को भिक्षु संघ बड़े ही मनोयोग से सुन रहा था। भगवान् बता रहे थे, कौशल्यायन की भूख गहरी थी। उसका शरीर ही नहीं, उसकी जीवन चेतना भूखी थी। उसे अपने संस्कारों के गहरे दुःख का बोध था। मुझ तक पहुँचने तक उसकी वेदना ही वेद बन गयी थी। और यही कारण है कि जब मैंने उसे अपने हाथों से भोजन कराया, तो उसे परम तृप्ति मिली। अकेली देह नहीं, समूचा अस्तित्त्व तृप्त हो गया। वेदना वेद में रूपांतरित हो गयी। दुःख का घना अंधेरा ज्ञान के उजाले में बदल गया। और उसे पल में ही स्रोतापत्ति का फल मिल गया।
यह स्रोतापत्ति क्या है भगवन्? महाकाश्यप पहली बार बोले।
भदन्त स्रोतापत्ति का अर्थ है स्रोत में पड़ जाना। और स्रोतापत्ति के फल का मतलब है- स्रोत में पड़ जाना ही नहीं स्रोत में विलीन हो जाना। बुद्धत्व ही जीवन का परम स्रोत है। भन्ते कौशल्यायन की जीवन चेतना पहले तो तृप्ति की छुअन के साथ बुद्धत्त्व के परम स्रोत में पड़ी और अब तुम सब देखो वह गहरी समाधि में लीन है। यानि की वह बुद्ध के परम स्रोत में विलीन हो गए हैं। उन्होंने अब जान लिया है- ‘निब्बानं परमं सुखं’ अर्थात् निर्वाण परम सुख है।
भगवान् के इन वचनों के साथ ही सभी ने कौशल्यायन के मुख की ओर देखा। सचमुच ही उनके मुख पर निर्वाण का परमतेज छा गया था। चेहरे पर एक अनोखी अलौकिक आभा फैल रही थी। एक अनूठा संगीत उनके अस्तित्त्व में गूँज रहा था। जिसकी मधुर धुन उत्तरोत्तर गहरी होती जा रही थी। अब तो भिक्षु संघ के प्राण भी इससे झंकृत होने लगे। सभी जान गए कि कौशल्यायन के अस्तित्त्व में आज पात्रता और कृपा का मिलन हुआ है।
बुद्ध कह रहे थे- भिक्षुओं, पात्रता हो तभी कृपा असरकारक होती है। जो यह जान लेता है कि भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़े दुःख हैं, वही यह जानने में समर्थ होता है कि निर्वाण सबसे बड़ा सुख है।
इस धम्मपद को सुनाकर भगवान् मौन में डूब गए। भिक्षु उनके वचनों को सुनकर गुनने लगे। उनमें से कई तो स्रोतापत्ति की ओर अंतर्गमन भी करने लगे। भगवान् तथागत की कृपादृष्टि एवं कृपावृष्टि का अहसास अनुभव में बदलने लगा।
वनप्रदेश में भयंकर आँधी आने पर वे वृक्ष उखड़ जाते हैं, जो एकाकी खड़े होते है। इसके विपरीत घने उगे हुए पेड़ एक-दूसरे के साथ सटकर रहने के कारण उस दबाव को सहन कर लेते हैं। अंधड़ उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं पाते।
यह उदाहरण देते हुए भगवान बुद्ध ने कहा, “परस्पर स्नेह की सघनता मनुष्यों को इसी तरह नष्ट होने से बचाती और विकास का अवसर प्रदान करती है। संघारामों में सघन पारिवारिक स्नेह का अभ्यास इसीलिए कराया जाता है।”
नवरात्रि के नौ दिनों में सम्पूर्ण देश मातृमय हो रहा है। हम सभी देशवासियों का मन अपने मूल में उतरने की कोशिश में है। मनुष्य अपने जन्म और जीवन के आदि को यदि सही ढंग से पहचान सके, उससे जुड़ सके तो उसके सारे पाप-ताप अनायास ही शान्त हो जाते हैं। युगशक्ति जगन्माता गायत्री और उसके काली, दुर्गा, तारा आदि विविध रूपों की उपासना का रहस्य यही है। श्रद्धा, भक्ति एवं विश्वास रूपिणी माँ को सभी भूतों-प्राणियों, चर-अचर सभी में अनुभव कर मन अनायास पवित्रता से भर जाता है। माँ की उपासना से हमारी आत्मा को ढाँकने-ढाँपने वाला कुहासा कुछ-कुछ ही सही हटता है। नवरात्रि के पर्व की खासियत यही है कि समग्र भारतीय मन समेकित रूप में माँ के द्वार-दरबार पर आ खड़ा होता है।
सभी की कोशिश रहती है, अपने अनादि और आदि को देखने की, अपनी अनन्त जीवन यात्रा को आगे बढ़ाने की। जिसमें कुछ भी पुराना नहीं होता, नित्य नया-नया घटित होता रहता है। माँ की शक्ति के प्रभाव से बीज और वृक्ष का चक्र यूँ ही चलता रहता है। जीवन चक्र का कोई भी सत्य हो, सबमें बीज अवधारणा में है। बीज का अंकुरण, उसका पौधा बनना, तना बनना, फूल बनना, फल बनना और फिर बीज बन जाना। समूचा वृक्ष फिर से बीज में समा जाता है। अपनी नयी पूर्णता पाने के लिए। यही है चिर पुरातन, किन्तु नित्य नूतन सृष्टि का सनातन क्रम। इस सबका मूल, अनादि और आदि है ‘माँ’। मनुष्य के ही नहीं सृष्टि के अन्तर्बाह्य में मातृत्व का वास है।
माँ को केन्द्र में रखकर नवरात्रि के उत्सव का उल्लास छाता है। गली-गली में मेला जुड़ता है। इन मेलों का भी अपना एक खास कोमल मन होता है। मानव मन में समायी भाव संवेदना की अभिव्यक्ति होता है, मेला और मिलन। हमारे देश के मनीषियों ने चेताया है कि अलग-अलग आयु, लिंग और योग्यता के लोग मेले में मिलते हैं तो वे गिने जाने के लिए नहीं, अपनी किसी तोल, भाव के लिए नहीं, अलग से पहचान के लिए नहीं, वे भाव रूप में एक होने के लिए होते हैं। सबकी अलग-अलग मनौतियाँ होती हैं, सब अलग-अलग आए होते हैं, लेकिन माँ के द्वार पर सबका मिलन-मेला महान् माँगल्यमय होता है। विषम होते हुए भी सब एक क्षण के लिए सम हो जाते हैं।
जगन्माता की श्रद्धा में डूबे, अपने अनुष्ठान संकल्प-साधना में निमग्न सब ऐसे होते हैं, जैसे वे एक ही वृक्ष के पत्ते हों, फूल हों, फल हों, फल में निहित बीज हों। वे सिर्फ पहचान पाना चाहते हैं, अपने अस्तित्व के मूल की पहचान। अपनी सबकी माँ की पहचान, जो सब कुछ देती है, सतत् अविराम। जीवन भी उससे मिलता है, जीवन यापन के साधना की दात्री भी वही है। हम असंख्य इच्छाओं की पूर्ति की अछोर कल्प वल्ली हैं। लेकिन हमारी ये सभी इच्छाएँ माँ से जुड़कर ही पूर्ण होती है। जब हम अपने अन्तर का सब कुछ माँ के चरणों में न्यौछावर कर देते हैं और एक आन्तरिक शून्यता की अनुभूति पाते हैं, तो माँ बरबस ही इस शून्यता में पूर्णता भर देती है। क्योंकि शून्यता में ही पूर्णता भरती है। और जब अनेक एक साथ मिलकर मेला बनकर, माला की तरह गुँथकर, आन्तरिक शून्यता को पाते हैं, जो जीवन की परम सम्भावना प्रकट होती है।
जीवन की समस्त सम्भावनाओं की कोख क्या है? जिस कोख में ये सम्भावनाएँ, इस प्रकार के भाव और प्रतीति पलती हैं और जहाँ से वह प्रसवित होती है, वह है मनुष्य के लिए जननी की कोख और सृष्टि के लिए धरती की कोख। इसमें फर्क कोख का नहीं, क्रम का है, कर्म का है, ज्ञान का है। हमारी जननी का माँ होना ही हमारे लिए और सृष्टि के लिए विशिष्ट बात है। जन्म देना और जन्म लेना एक भौतिक एवं प्राकृतिक बात है। पर उसका अच्छा या बुरा होना, मंगलमय या अमंगलपूर्ण होना हमारी और प्रकृति की प्रवृत्ति, संकल्प और संस्कार पर निर्भर है। नारी जननी क्यों बनी? धरती पर अंकुर क्यों उगा? यदि वह ऊटपटांग ढंग से उगा होता तो जंगली होगा और यही किसी माली ने जतन से उगाया होगा तो उपवन और उद्यान की महक लिए होगा। यही क्रम है सृष्टि का, यही सार है मनुष्य के जन्मने और जीने का।यही है जननी के माँ होने का पुण्य प्रताप। अनादि को भी अपना आदि माँ से ही मिलता है।
नवरात्रि के नौ दिन इसी अनादि की आदि ‘माँ’ की पहचान करने के लिए है। अपवाद की बात छोड़ दें तो प्रायः किसी को यह सच्ची पहचान मिल नहीं पायी। हम माँ के द्वार दरबार में आते हैं, घर पर पूजा बेरी के ऊपर रखे माँ के चित्र के सामने माथा नवाते हैं, पर हृदय नहीं उड़ेलते। आन्तरिक शून्यता की अनुभूति नहीं कर पाते। और शून्यता के बिना माँ पूर्णता दे भी तो कैसे? हम दिखावे के लिए माँ की आरती उतारते हैं, पर दरअसल हम अपना आरत (दुःख) माँ के माथे मढ़ते हैं। भूखे रहकर मढ़ते हैं, कीर्तन करके मढ़ते हैं, जप करके मढ़ते हैं। उसकी पूजा करने का धोखा देकर मढ़ते हैं। जैसे माँ नहीं अपना दुःख, पीड़ा फेंकने का कोई कूड़ा-घर हो। भला यह कैसी पूजा, जिसमें श्रद्धा कम, लोभ और भय अधिक समाया रहता है। तनिक निहारें तो सही अपने अंतर्मन को कि नवरात्रि के ये नौ दिन हमारी श्रद्धा के हैं या स्वार्थ के? प्रार्थना के हैं अथवा फिर कामना या वासना के।
आरती का मतलब होता है श्रद्धास्पद का, पूज्य का, देवी माँ का, भगवान् का दुःख बाँटना। उसकी पीड़ा को अपने माथे पर लेना। उनका भार हल्का कर देना। अपने भिखारीपन को भुलाकर उनकी सेवा में अर्पित होना। उनके साथ अपनी एकात्मता की अनुभूति एवं प्रतीति पाना कि जैसे हम दुःखी-पीड़ित होते हैं, थकते हैं, वैसे ही माँ भी थकती होगी। उसे भूख सताती होगी। इसलिए उनका कष्ट अपने माथे पर लेने के लिए आरती उतारी जाती है। दीपों की लहराती जगमग ज्योति के बीच यह भाव व्यक्त किया जाता है कि ‘मैं प्रस्तुत हूँ माँ। जो तू चाहेगी, कहेगी, वही करूंगा।’ लेकिन हम हैं कि उनसे माँगते ही रहते हैं, उनको सताते ही चले जाते हैं। माँ मुझे धन दो, यश दो, सन्तान दो, क्या नहीं माँगते। मजे की बात तो यह है कि हमारे पास माँ से माँगने के लिए समय है, उसके पास बैठने के लिए समय नहीं है। इसके लिए बहुत हुआ तो किसी पण्डित, पुजारी को नौकर रख लेंगे। ठीक किसी कुपुत्र या कुपुत्री की तरह, जो अपनी माँ की सेवा न करके, इसके लिए किसी नर्स को रख देती है। भला नर्स की नौकरी और सन्तान की सेवा का सुख या परिणाम क्या समान हो सकता है?
नवरात्रि के दिनों में देश तो मातृमय हो रहा है, हम मन्दिरों और घरों में जुट भी रहे हैं। लेकिन उस परमानन्द के आदिस्रोत से नहीं जुड़ पा रहे, जहाँ से जीवन मिलता और चलता है। कहाँ है मेलों में मिलन का मूलभाव? किधर है विलग के विलीन होने की स्थिति? हमारे अपने-अपने अहं की दीवारें तो यथावत है। माँ को वाणी से तो माँ कह रहे हैं, जोर-जोर से कह रहे हैं, लेकिन हृदय से उसे माँ मान नहीं पा रहे। लगता है कि हम सिर्फ प्रतीक की परिक्रमा, पूजा एवं कर्मकाण्ड तक ही ठहर गए हैं। हम प्रतीति, प्रीति, श्रद्धा, संवेदना, प्रेम एवं माँ के चरणों में अनुराग की एक सच्ची सन्तान की भाँति निष्कपट हो जी नहीं पा रहे। अगर ऐसा होता तो हमारी यह नवरात्रि लोक परम्परा एवं लोक व्यवहार की लीक न रहकर माँ की अलौकिक प्रभा से जगमग कर रही होती। हमारे जीवनों में माँ का दिव्य ज्योति अवतरण हो रहा होता।
कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले वर्ष की ही भाँति हम इस वर्ष की नवरात्रि में फिर से चूक रहे हैं। हम माँ के होकर भी माँ के बन नहीं पा रहे। हम केवल रोटी बनकर उसके सामने माथा नवाते हैं। सुख-साधन, दाम, दुकान की कामना का दम्भ लेकर माँ के पास आते हैं। और यह जबरदस्ती करते हैं कि हम जो चाहते हैं, वह तो तुम्हें देना ही पड़ेगा। हाँ हमें तुम्हारे दुःख से कोई सरोकार नहीं रहा। रोज-मर्रा की तरह नवरात्रि के दिनों में भी हम यह नहीं जान पा रहे कि माँ हमसे यह चाहती है कि हम सब उसकी सन्तानें मिल-जुलकर, एक मन और एक प्राण होकर रहें। माँ की इच्छा है कि हमारा प्राण और हमारी प्रतिज्ञा समान हो। माँ की चाहत है कि वह जिस सृष्टि और जिस ब्रह्मांड की मंगलमयी अधिष्ठात्री देवी है, उसका किसी भी तरह अमंगल न हो। जिस दैवी सम्पदा, संस्कृति और परम्परा की रक्षा के लिए वह अपने सम्पूर्ण तप, संकल्प, सिद्धि, शक्ति, ममता, करुणा और मातृत्व का पुँज बनकर समय-समय पर प्रकट होती आयी है, हम उसकी प्राण-पण से रक्षा करें। नवरात्रि अनुष्ठान के साथ यदि हम इस महासत्य के लिए संकल्पित नहीं है, तो हमारा अनुष्ठान अधूरा है। और विडम्बना यही है कि बहुसंख्यक जनों की स्थिति ऐसी ही है। निजी स्वार्थ में वे सर्वभूत हितेरतः का बीज मंत्र या मातृ मंत्र भूल गए हैं।
सवाल यह है कि ऐसी स्थिति आयी ही क्यों? तो जवाब यह है कि हमारी यह प्रतीति ही खो गयी है कि हम किससे हैं? हम जिसके कारण हैं, वह कौन है? वह हमारी क्या है और सबसे बढ़कर हम उसके क्या हैं? हमने जननी को, माँ को केवल स्त्री मान लिया है। धरती माता, भारत माता हमारे लिए केवल एक मिट्टी का टुकड़ा बनकर रह गयी है। हमें यह तो याद है कि हमारे लिए माँ को राष्ट्रमाता को क्या-क्या करना चाहिए। लेकिन उसके प्रति किए जाने वाले हमारे कर्म-धर्म हमको अब याद नहीं रहे। स्थिति इतनी विकृत एवं बिगड़ी हुई है कि हम केवल प्रकृति एवं प्रवृत्ति को ही प्रदूषित नहीं कर रहे, नारी और उसके मातृत्व को भी अपवित्र बनाते जा रहे हैं। यही कारण है कि आज सन्तानों का जन्म किसी सद्संकल्प के कारण नहीं वासना के वशीभूत होकर होता है।
आज हर घर-आँगन में तुलसी के बिरवे की जगह यह प्रश्न रोपित-आरोपित है कि हमारे बच्चे बिगड़ैल एवं हमारा परिवार आतंकित क्यों है? इसका जवाब एकदम सीधा-सपाट है कि हमें मातृत्व का सम्यक् बोध नहीं रहा। हमारे देश की नारी ने आधुनिकता की दौड़ में जो पश्चिमी बालक बना रही है, उसके परिणाम में वह जननी तो बन जाती हैं, पर माँ नहीं बन पाती। यही स्थिति जन्म देने वाले की है। ध्यान रहे कि कभी भी वासना जीवन का वन्दनवार नहीं बन सकती। पश्चिमी आधुनिकतावादी कोख से जन्मी हमारी सन्तानें यदि विलासी, लम्पट एवं उच्छृंखल बन रही हैं, तो इसमें भला अचरज ही क्या है? उन्हें जन्म तो मिला पर संस्कार प्रदान करने वाली माँ नहीं मिली।
हमें यह बात किसी भी तरह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि ‘नारी’ अर्थात् ‘माँ’ इस जगती का सबसे सुकोमल, संवेदनशील एवं श्रेष्ठतम तत्त्व है। यह उन्हीं जगन्माता की अभिव्यक्ति का सबसे सार्थक माध्यम है, जिनकी उपासना हम नवरात्रि के दिनों में कर रहे हैं। यदि हमें अपना स्वत्व प्राप्त करना है अपने संकल्प को सिद्ध करना है तो हमें इस सत्य को पहचानना होगा। जो तरल प्रेम, वात्सल्य, ममता और परमेश्वरीय करुणा का विग्रह है, उस माँ को और उसके मातृत्व भाव को दूषित, प्रदूषित करने की प्रक्रिया, आधुनिकता के नाम से जानी जाने वाली परम्परा नहीं रुकी, तो पशुवत् मनुष्य ही जन्मेंगे, मनुष्यवत् देवता नहीं।
मातृत्व का सम्यक् बोध, माँ के सही स्वरूप की पहचान नवरात्रि की साधना का सार ही नहीं, हमारी संस्कृति का निष्कर्ष भी है। वेदों की घोषा, अपाला, लोपामुद्रा आदि मंत्रदृष्टाओं में अभ्भृण ऋषि की कन्या ‘वाक्’ का स्थान महिमामय है। उसके द्वारा रचित देवीसूक्त में भावी युगों की शक्ति उपासना का अंकुरण मिलता है। ‘अहं राष्ट्रीय संगमनी वसूनाँ’ एवं ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि’ आदि मंत्रों में वह कहती है कि ‘मैं राष्ट्र को बाँधने वाली शक्ति हूँ। मैं ही उसे ऐश्वर्यों से सम्पन्न करती हूँ। मैं ही ब्रह्मद्वेषियों के संहार के लिए रुद्र का धनुष चढ़ाती हूँ। मैं ही आकाश और पृथ्वी में व्याप्त होकर मनुष्य के लिए संहार करती हूँ।’ स्पष्ट ही इस सूक्त में महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली के विविध आयाम प्रकट हुए हैं।
यही है हमारे देश में व्याप्त होने वाला मातृभाव। यही है नवरात्रि के दिनों में सारे देश में होने वाला प्रेम, करुणा, ममता, वात्सल्य, सृजन एवं पालन, संरक्षण का मातृरूप अवतरण। इस दिव्य भावाभिव्यक्ति को प्रकट करना ही नवरात्रि के नौ दिनों में की जाने वाली साधना का सार है। इसी में निहित है मातृत्व की सम्यक् पहचान। जिसे हम अपनी मानसिक एवं सामाजिक बुराइयों को दूर करके ही पा सकते हैं। नवरात्रि के दिनों में गायत्री महामंत्र के 24 हजार अक्षरों वाले मंत्र के 24,000 जप का अनुष्ठान तो करें ही, पर साथ ही अपने संवेदनशून्य मन को माँ के प्रेम से भी संवेदित करें। अपनी माँ को सच्ची और सम्यक् प्रतिष्ठ प्रदान करने के अधिकारी बनने का अनुष्ठान भी करें। नारी के जीवन में- देश की व्यापकता में, धरती के कण-कण में व्याप्त माँ को यदि हम पहचान सके, उसकी भावभरी पूजा कर सके, तभी हमें सुख-समृद्धि एवं भक्ति-शक्ति के सारे सुफल मिल सकेंगे। माँ की अपार करुणा हम पर बरसेगी और देश ही नहीं हमारा अपना जीवन भी मातृमय हो सकेगा।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की प्रातः सब तरह से अनूठी है। हो भी क्यों नहीं? आज ही तो सुबह की सबसे पहली किरण के साथ नव सम्वत्सर हमारे घर-आँगन में, हमारे जीवन में आया है। समूची सृष्टि में वितान बनकर वही चहुँ ओर छाया है। उसके आगमन की खुशी में प्राची में ऊषा ने अपना प्राचीन आँचल उतार फेंका है। उसका मुख दिव्य रक्त कमल की भाँति उद्भासित है। हर क्षण तप्त स्वर्ण की कान्ति दसों दिशाओं में विकीर्ण कर रहा है। अलसाई सी, धीमे-धीमे बन्द दृगों को खोलती हुई वसुन्धरा के आँगन में नया सूर्य उदय हुआ है।
नए सूर्य की हर किरण में नयी सम्भावनाओं की झिलमिल है। जाग्रत् आत्माओं की अन्तर्चेतना में एक अहसास, एक अनुभूति है कि जगत् और जीवन में इस नव वर्ष में बहुत कुछ नया प्रस्फुटित होगा। भौतिक पदार्थों एवं परिस्थितियों की अप्रत्याशित उलट-पुलट के बीच कुछ नया झाँकेगा। आध्यात्मिक अन्तर्चेतना में एक नए आलोक का अवतरण होगा। समूची सृष्टि को अपनी स्वर्णित किरणों से द्युतिमान कर रहे आज के सूर्य का यही सन्देश है। यह सूर्य दिव्य चेतना से चेतन है। इसके प्रकाश में परिस्थितियों के भविष्यत् स्वरूप की, आध्यात्मिक अन्तर सम्भावनाओं की अनेकों झाँकियाँ झलक रही हैं।
सर्वज्ञ चेतना में उठने वाले नव सम्वत्सर की विशेषताओं को, विशिष्टताओं को साफ-साफ देख रहा है। उन्हें बहुत ही स्पष्ट ढंग से देश और धरती में कुछ नया अवतरित होता हुआ नजर आ रहा है। सम्भावनाओं का ज्वार सब ओर जोर-शोर से उमड़ रहा है। बाह्य और आन्तरिक जीवन की ओर भागी चली आ रही ये सम्भावनाएँ तो बड़ी ही प्यारी हैं। पर ये सच्चे ढंग से साकार तभी होंगी, जब हमारी साधना इन्हें बड़ी ही भावपूर्ण रीति से छुएगी।
आज के दिन हम एक नए युग में, स्वर्णिम युग में प्रवेश कर रहे हैं। यह घड़ी युगान्तर की है। प्राचीन पीछे छूट रहा है, नवीन, जिसे स्वर्णिम युग कहने में आन्तरिक प्रसन्नता हो रही है, वसुन्धरा के वातावरण में प्रवेश पा रहा है। हमें चाहिए नव सम्वत्सर के आगमन की इस भव्य बेला में, अपनी चिन्तनधारा को विस्तृत करें, उसे ऊँची उठाएँ। अपने हृदय के द्वार खोलें, उसे विश्व प्रेम से भरपूर करें। धार्मिक तथा जातीय सीमाओं का अतिक्रमण कर मानव मात्र को आत्मा का सखा मानें। आत्मीयता के आलिंगन में सम्पूर्ण मानवता को बाँधें। खोखली मान्यताओं से बाहर आएँ, युग ऋषि द्वारा अनुभूत सत्य को अपने विचारों का आधार बनाएँ।
नव सम्वत्सर की माँगों के अनुसार साधना करते हुए अपने स्वभाव में नमनीयता लाएँ। विकसित होती हुई मानवता के साथ अपने चिन्तन एवं दर्शन का भी विकास करें। शास्त्रों के मौलिक सत्य को अपरिवर्तित रखते हुए, उसके व्यावहारिक पक्ष में यथोचित हेर-फेर करें, नए क्षितिजों का प्रवेश सम्भव बनाएँ। जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण अपनाएँ, जो कि जीवन के त्याग में नहीं, उसे आध्यात्मिक स्तर पर उठाने में सच्ची सफलता मानता है। मानव मात्र का चेतना स्तर नए आलोक में सजाने-संवारने में पुरुषार्थ की सार्थकता समझता है।
नव वर्ष पर अवतरित होती हुई आध्यात्मिक चेतना के प्रति अगर आज हम सचेतन बनें, इसके आलोक में जीवन मार्गों पर अग्रसर हों, तो अवश्य उज्ज्वल भविष्य की संस्थापना हो जाएगी। धरती का कोना-कोना प्रकाशपूर्ण चेतना से भर उठेगा। सम्पूर्ण मानव जाति में युगान्तरीय चेतना के प्रति उद्घाटन ही वह कर्म है, जिसके द्वारा संसार अपनी सब समस्याओं का समाधान कर सकता है। इसके प्रति ग्रहणशीलता का भाव ही हमें ज्ञान तथा अज्ञान के मिश्रित वर्तमान जीवन स्तर से ऊपर उठाने में समर्थ होगा। तभी हमारी चेतना आध्यात्मिक विकास कर सकेगी। देश और धरती का भी कल्याण हो सकेगा। नव सम्वत्सर की प्रातः उदय हो रहे सूर्य का यही सन्देश है। उसकी किरणों की झिलमिलाहट में यही भाव जगमग है। उसकी प्रभा और प्रकाश में यही दीप्ति बिखरी है। उसकी ऊष्मा में इसी की ऊष्ण छुअन है। साधना ही सार है, यही सम्भावनाओं की द्वार है। नव सम्वत्सर का यही तत्त्वोपदेश है।
विज्ञान को व्यवस्था पूर्ण ज्ञान कहे जाने की रीति है। लेकिन सच तो यह है कि व्यवस्था कहीं भी और कैसी भी हो, कभी पूर्ण नहीं हुआ करती। फिर विज्ञान ने ज्ञान को जो व्यवस्था देने की कोशिश की है, वह भी उसकी प्रकृति के अनुरूप जड़ और सीमित है। जबकि ज्ञान न तो कभी जड़ हो सकता है और न ही सीमित। यह चैतन्यता का असीम प्रवाह है, जो प्रकृति, सृष्टि और ब्रह्मांड में सतत और अविराम प्रवाहित होता रहता है। मानव चेतना के स्पर्श से इसकी चैतन्यता को अभिव्यक्ति मिलती है। परन्तु यह अभिव्यक्ति मानव चेतना के विकास के अनुरूप थोड़े-बहुत अंशों में होती है। हमेशा ही बहुतेरा ज्ञान ऐसा बचा रहता है, जिसे देखा नहीं जा सकता, छुआ नहीं जा सका, जाना नहीं जा सका।
ज्ञान के इसी सत्य को अपनी समाधि में अनुभव करके ऋषियों ने इसे ‘सत्यम् ज्ञानमनन्तम् ब्रह्म’ कहा। उन तत्त्वदर्शी महर्षियों के अनुरूप ज्ञान सत्य है, अनन्त है और ब्रह्म है। आधुनिक विज्ञानवेत्ता ज्ञान के तत्त्व की इस समग्रता से अनजान हैं। वे केवल इतना जान पाए हैं कि ज्ञान सत्य है, इसकी अनन्तता एवं पूर्णता के ब्रह्मस्वरूप की उन्हें कोई खोज खबर नहीं। ज्ञान के जिस सत्य को वह व्यवस्था देने की कोशिश करते हैं, वह भी सामयिक होता है, शाश्वत नहीं। यही वजह है कि वैज्ञानिक सत्य हमेशा ही बदलते रहते हैं। जबकि आध्यात्मिक सत्य सदा ही अपरिवर्तनीय, शाश्वत एवं पूर्ण होते हैं। यही कारण है कि ऋषियों द्वारा कहा गया ज्ञान बदलते काल प्रवाह में भी समीचीन बना रहता है, अपनी उपयोगिता, उपादेयता नहीं खोता।
ज्ञान को व्यवस्था देने के फेर में वैज्ञानिक समुदाय ने अपने को बुद्धि के गलियारों में कैद कर लिया है। स्वयं को अनेकों जटिल नियमों-उपनियमों की रस्सियों से जकड़ लिया है। अपने को वस्तुनिष्ठ, स्पष्ट एवं तर्कपूर्ण सिद्ध करने के चक्कर में वे बहुत कुछ गंवा देते हैं और गंवाते चले जाते हैं। अपनी वैज्ञानिकता की उलझनों में भूल जाते हैं कि ज्ञान के बीज मनुष्य की बुद्धि में नहीं, उसकी अन्तःसंवेदना में अंकुरित होते हैं। बुद्धि तो सिर्फ इन अंकुरित बीजों की फसल काटती है। उस पर अपना झूठा अधिकार जताती है। यदि हृदय की अन्तःसंवेदना में जिज्ञासाएँ न जन्मती, परिकल्पनाएँ न पनपती तो बुद्धि किस ज्ञान को व्यवस्था देती और किस पर अपना अधिकार सिद्ध करती।
वैज्ञानिक प्रकृति को जानने और उसे नियमों में बाँधने का दावा करते हैं। परन्तु प्रकृति के किस सत्य को उन्होंने जाना और नियमों में बाँध हैं? उसके तत्त्व को या फिर तरंगों को। ध्यान रहे अमिट तो प्रकृति का तत्त्व है, तरंग का क्या अभी है और अभी मिट गयी। तत्त्व से अनजान तरंगों को बाँधने और जानने की कोशिश में जुटे वैज्ञानिकों का ज्ञान भी इन्हीं तरंगों की तरह बनता-मिटता रहता है। एक के प्रामाणिक निष्कर्षों को दूसरा अप्रामाणिक एवं झूठा करार कर देता है। एक के खोजे गए नियम, दूसरे का समय आते तक अपना औचित्य एवं अस्तित्त्व खो देते हैं। न्यूटन जिसे सार्वभौम और सर्वव्यापी बताते हैं, आइंस्टीन उसे हंसते हुए झुठला देते हैं। वह कहते हैं, अरे भाई, थोड़ा सुधार करो अपने में। गुरुत्वाकर्षण धरती का सच है, समूचे ब्रह्मांड का नहीं। धरती वाला गुरुत्वाकर्षण तो बच्चों के प्यारे चन्दा मामा भी नहीं मानते।
आज के बदलते जमाने में वैज्ञानिक अपनी खोजों को रेत के टीले की तरह ढहते, ताश के पत्तों की तरह बिखरते देख हैरान-परेशान हो रहे हैं। उन्हें यह चिन्ता खाए जा रही है कि अपने को ज्ञान का खोजी कैसे साबित करें। उनके द्वारा पाया और खोजा गया ज्ञान बात की बात में गायब हो जाता है। यह सच है कि वैज्ञानिकों ने दुनिया और समाज को बहुत सी नयी-नयी साधन-सुविधाएँ दी हैं। उसका सर्वनाश करने के लिए, संसार को नेस्तनाबूद करने के लिए भी ढेरों सरंजाम जुटाएँ हैं। उनका यह महापुरुषार्थ देख एक ओर तो लालच की लार टपकती है, दूसरी ओर भय की सिहरन छूटती है। यहाँ सब कुछ है, पर सत्य की शान्ति नहीं। कठोर व्यवस्था की अनचाही विवशता है, पर व्यापकता का परम विस्तार नहीं। तरंगों को पकड़ने की ख्वाहिश में यह हो भी नहीं सकता।
अपने ज्ञान के धराशायी होने से परेशान वैज्ञानिक समुदाय को यह कौन समझाए कि जो धराशायी हो रहा है, वह उनका ज्ञान नहीं, बल्कि ज्ञान का आधार है। वह जमीन काल के भूकम्प से मिट रही है, जिस पर उनका ज्ञान खड़ा था। उन्होंने जिसे जाना था वह तत्त्व नहीं था, तरंग थी। जिसे देखकर वह मोहित हुए थे, वे तो तरंग की क्षणिकाएँ थीं, तत्त्व की शाश्वतता नहीं। और तरंग तो मिटेगी ही, उसे तो मिटना ही है। वह तो बनी ही मिटने के लिए थी। जब स्वभाव से मिटने वाली तरंग ही मिट रही है, तब फिर उस पर टिकने का सहारा ढूंढ़ने वाला ज्ञान कैसे बना रहेगा। हाँ यदि बात तत्त्व के महासागर की होती, तो जरूर उसमें ज्ञान के महा जलयान अनन्तकाल तक तैरते रह सकते थे।
पर इसके लिए जड़ता से पार चैतन्यता के विस्तार में जाना पड़ेगा। यह बात कुछ को समझ में भी आने लगी है। इस संदर्भ में ब्रूनर और पोस्टमैन जैसे वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने सुझाव भी दिए हैं कि सत्य की अनुभूति करनी है तो खोज का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने मनोवैज्ञानिक सत्यों को प्रयोग में लाने की सलाह दी है। उनका कहना है कि परिस्थितियों का आँकलन मनःस्थिति ही करती है। इसलिए अन्वेषण-अनुसन्धान की प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिक सच्चाइयों का समावेश भी होना चाहिए। इस बारे में वैज्ञानिक चिन्तक जे.के. फाइबलमेन ने एक अनूठी पुस्तक लिखी है- ‘द साइंटिफिक फिलॉसफी’। इसमें उन्होंने कहा है कि वैज्ञानिक अनुसन्धान व्यवस्था को थोड़ा विस्तार देने की जरूरत है। इसमें दार्शनिक अन्तःसंवेदना का संस्पर्श, संयोग होना चाहिए।
आज की जो वैज्ञानिक विधियाँ हैं, उनसे वस्तु को तो जाना-जाँचा जा सकता है, पर विचार को नहीं। विज्ञान और वैज्ञानिकता के इस परिदृश्य में स्वयं वैज्ञानिक प्रत्यय जगह-जगह जाँच-पड़ताल की ठोकरों से चोटिल होते रहते हैं, परन्तु उनके बारे में कोई समीचीन और सार्थक निर्णय नहीं हो पाता। यही कारण है कि वैज्ञानिक जड़ता के इन अंधेरों में नवीनता की उज्ज्वल किरण बड़ी मुश्किल से ही आ पाती है। ‘परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व दें’- इस ऋषि सत्य को वैज्ञानिक पूरे मन से स्वीकार कर पाए होते तो अरस्तू की फिज़िका, टालमी की अल्मागेस्ट, लैवोजिए की केमिस्ट्री, न्यूटन की प्रिंसिपिया और लायल की जियोलॉजी आदि वैज्ञानिक ग्रन्थों की अस्तित्व में आने से लेकर प्रसिद्धि प्राप्त करने तक इतनी ज्यादा मुश्किलें न उठानी पड़तीं।
तारों और ग्रह-नक्षत्रों की बदली हुई परिस्थितियों से सम्बन्धित विश्लेषण करने वाले टालमीय सिद्धान्त को भारी सफलता मिली। परन्तु कोपरनिकस की घोषणा से पहले इसे बड़ी सन्देह भरी नजरों से देखा जाता था। कारण एक ही था- प्रचलित ज्ञान की व्यवस्था के खांचे में इसकी सही-सही फिट न बैठ पाना। न्यूटन के प्रकाश एवं वर्ण के सिद्धान्त को भी व्यवस्था की जड़ता की मार सहनी पड़ी। आधुनिक विज्ञान में अपना विशिष्ट स्थान बनाने वाले क्वाँटम याँत्रिकी को भी अनेकों आक्षेप-विक्षेप सहने पड़े।
इसी कारण अपने जमाने में मैक्सवेल का विद्युत् चुम्बकीय सिद्धान्त सर्वमान्य नहीं हो सका। क्योंकि कैथोड किरणों की प्रकृति के विषय में भौतिक विज्ञानियों में गहरा मतभेद था। एक्स-रे की खोज के साथ भी कुछ यही स्थिति बनी। जड़ता और सीमाबद्धता की वैज्ञानिक कूपमण्डूकता ने इसे काफी समय तक उपेक्षित किया। इसे लेकर वैज्ञानिक व्यवस्था को भारी ऊहापोह एवं उलझन बनी रही। विज्ञानवेत्ता लार्ड केल्विन ने तो यहाँ तक कह दिया कि रुण्टजेन का यह प्रयोग खूबसूरत-धोखाधड़ी के अलावा कुछ नहीं है। जबकि एक्स-रे की महिमा-महत्ता से आज कोई अनजान नहीं है।
विज्ञान जगत् में यूरेनियम के विखण्डन की प्रक्रिया को सही ढंग से स्वीकारने में पर्याप्त समय लगा। क्योंकि तब तक वैज्ञानिक ज्ञान की विधियाँ नाभिकीय अभिक्रिया के तहत उत्पन्न होने वाले अन्य कणों एवं ऊर्जा की जटिल प्रक्रियाओं से अनजान थीं। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में मेण्डलीफ की आवर्त सारणी के खाली स्थानों को भरने के लिए रासायनिक तत्त्व ढूंढ़े जाते थे। उनकी तलाश-खोज में सफलता भी मिलती थी। परन्तु किसी नए तत्त्व की खोज के बाद उसकी स्वीकारोक्ति सहज न थी। पूर्वाग्रहों की जड़ता एवं हठधर्मिता यहाँ भी आड़े आ जाती।
वैज्ञानिकों का युग सत्य कहे जाने वाले सापेक्षिता के सिद्धान्त को भी काफी तिरस्कार झेलना पड़ा। इसके पीछे लम्बी प्रक्रिया और अनेक कारण हो सकते हैं, परन्तु तथ्य एक ही समझ में आता है, तत्कालिक वैज्ञानिक विधि-व्यवस्था एवं मान्यताओं का आड़े आना। वैज्ञानिक विधियाँ, विज्ञान की व्यवस्थाएँ अपने समय का कितना ही बड़ा सच क्यों न हो, पर इनकी याँत्रिक प्रतिबद्धताओं के कारण इनका नजरिया एवं दायरा संकुचित व संकीर्ण हो जाता है। जिसकी ज्ञान की सत्यता का कोई नया उजाला, ज्ञान की अनन्तता की कोई नयी बयार नहीं आ पाती।
कमी कहाँ है, कठिनाइयाँ किधर है, इसकी पड़ताल एक युग प्रश्न है। वैज्ञानिक विधियों, अनुसन्धान प्रविधि की कमजोरी की वैज्ञानिक जाँच की जानी चाहिए। यह सत्य सर्वमान्य एवं सर्वस्वीकृत होना चाहिए कि महत्त्वपूर्ण ज्ञान है, न कि उसकी अनुसन्धान विधि। अनुसन्धान विधियों को ज्ञान के उन्नत आयामों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए, न कि ज्ञान के तल को अनुसन्धान विधि के दायरे में फिट बिठाने के लिए गिरा दिया जाय। ज्ञान की सत्यता, अनन्तता एवं पूर्णता सबकी सब विज्ञान की प्रयोगशाला एवं वैज्ञानिक विधियों की सीमाओं में समा नहीं सकती। प्रयोगशालाओं में जो जाना जाता है, वैज्ञानिक विधियाँ जिसे खोज पाती हैं, वह तो अंश मात्र है, केवल अणु जैसा लघु है। ज्ञान की व्यापकता तो विराट है, जो बुद्धि से उपजी जड़ व्यवस्थाओं और उसकी वैज्ञानिकता से परे है।
आध्यात्मिक अभिवृत्ति एवं साधना से उपजी संवेदना इस विराट् ज्ञान को छूने, जानने एवं पहचानने की सार्थक रीति है। इस रीति से जो जाना जाता है, उसे जानकर सब कुछ जान लिया जाता है। तभी तो उपनिषद् कहते हैं- ‘तस्मिन् विज्ञाते सर्वं विजानात्’ अर्थात् उसको जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। महर्षि अरविन्द ने ‘ द ह्युमन साइकिल’ में भी इसी सत्य को दुहराया है। उन्होंने कहा है कि अतिभौतिक प्रकृति के नियम और सम्भावनाओं को जाने बिना न तो भौतिक प्रकृति और न सम्भावनाएँ ही जानी जाती हैं।
इस सत्य ज्ञान के लिए वैज्ञानिक विधियों के साथ आध्यात्मिक साधनाओं से उपजी संवेदनाओं का भी सुयोग जुटाना होगा। तभी तत्त्व को भी जाना जा सकेगा और तरंग को भी। शाश्वत की अनुभूति और सामयिक का सदुपयोग- यह वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का ही सुफल हो सकता है। इसे तथ्य के रूप में स्वीकारते हुए पश्चिम के मेधा सम्पन्न दार्शनिक बट्रेण्ड रसेल का कहना है कि वैज्ञानिक ज्ञान के साथ विवेक का समीचीन प्रयोग होना चाहिए। वैज्ञानिक आध्यात्मवाद की इस रीति से ही ‘सत्यं ज्ञानमनन्तम् ब्रह्म’ की अनगिन चेतन धाराओं की अनुभूति पायी जा सकती है। ज्ञान के युग सत्य का बोध हो सकता है।
किसी स्थान पर विशाल भवन का निर्माण हो रहा था। निर्माण-स्थल के समीप ही लगा हुआ था ईंटों का एक ढेर। ईंटों के ढेर में जमी ईंटों ने कहा- गगनचुंबी अट्टालिकाओं का निर्माण हमारे अस्तित्व पर ही आधारित है। भवन जब बनकर तैयार हो जाएगा, निस्संदेह उसके निर्माण का श्रेय हमें ही मिलेगा।
मिट्टी-गारे ने ईंटों की यह गर्व भरी बातें सुनीं, तो रहा न गया। वह बोली, तुम झूठ बोलती हो। क्या तुम नहीं जानती कि एक सूत्र में पिरोकर, ईंट से ईंट जोड़कर इस भवन को सुदृढ़ बनाने का श्रेय तो हमें ही है। मेरे अभाव में तो तुम्हारे ये ढेर एक ठोकर मारकर ही गिरा दिए जा सकते है।
किवाड़ और खिड़कियों ने इसका प्रतिवाद किया, यह तो सभी जानते हैं कि तुम ईंटों को जोड़-जोड़कर दीवारें खड़ी करती हो, पर यदि उस मकान में खिड़की-दरवाजे न रहेंगे, तो पूछेगा कौन? उसमें रहने के लिए जाएगा कौन? शिल्पी जो इन सबकी बातों को चुपचाप सुन रहा था, अब बोला, आप लोगों में भले ही कितना भी सहयोग क्यों न हो, परंतु जब तक मेरा हाथ न लगे, सब अपने-अपने स्थान पर ही पड़े रहेंगे।
अब भवन की बारी थी। भवन ने जो कुछ कहा, वह एक स्वीकार्य सत्य था। भवन बोला, सबका महत्त्व है, परंतु उससे भी महत्त्वपूर्ण है-सह अस्तित्व। यह अस्तित्व के अभाव में किसी का व्यक्तिगत कोई महत्त्व नहीं है, इसलिए आपको अपना झूठा अभिमान छोड़कर सहयोग का महत्त्व समझना चाहिए।
श्री रामनवमी की गहन अनुभूति श्री राम कथा है। इसमें श्री राम भक्ति की अनगिन उमंगे एवं अनन्त उछाह है। यही वह सच्ची अयोध्या है, जहाँ प्रभु श्री राम एवं उनके अनन्त गुण प्रकटे एवं प्रकाशित हुए। श्री राम कथा के अवगाहन एवं अनुशीलन से आज भी राम भक्तों को अपने प्रभु और उनकी कृपा का दरस-परस बड़ी ही सहज रीति से मिल जाता है। श्री राम कथा के प्राकट्य में ही प्रभु श्री राम के प्राकट्य का रहस्य है। जैसे प्रभु स्वयं हैं, ठीक वैसी ही उनकी कथा है। तभी तो भक्त शिरोमणि बाबा बुलसी ने कहा है-
राम अनन्त, अनन्त गुण, अमित कथा विस्तार।
ऐसी परम पावन श्री राम कथा के अरुणोदय का पहला स्थान महर्षि वाल्मीकि का मानस लोक है। महर्षि वाल्मीकि ने स्वरचित रामायण के चौबीस हजार श्लोकों के पाँच सौ सर्गों से युक्त सात काण्डों में प्रभु श्री राम के दिव्य चरित्र का वर्णन किया। इस आदिकाव्य में वर्णित राम चरित्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को देने वाला है। यथा-
‘चतुवर्गप्रदं नित्यं चरितं राघवस्य तु।’ (वा. रामा. उत्तर. 111/23)
महर्षि वाल्मीकि की ही भाँति महर्षि व्यास ने भी श्री राम कथा का गान किया। महर्षि व्यास प्रभु लीला-चिन्तन के अप्रतिम एवं परम मर्मज्ञ आचार्य थे। उन्होंने अपने ब्रह्मज्ञान के मन्दराचल से अध्यात्म सागर का मन्थन कर भगवद् रसामृत की प्राप्ति ही नहीं की, उसका प्रीतिपूर्ण वितरण भी किया।
महर्षि व्यास रचित प्रायः सभी पुराणों में भगवान् राम की लीला और महत्ता का चिन्तन है। हाँ, यह कहीं संक्षिप्त रूप में है, तो कहीं विशद् रूप में। महाभारत के वनपर्व में भी भगवान् राम का चरित संक्षिप्त रूप में उनके द्वारा वर्णित है। महर्षि वाल्मीकि के बाद भगवान राम के कथाकार रूप में महर्षि व्यास ही सर्वोपरि हैं। अग्नि पुराण के पाँचवें से ग्यारहवें अध्याय में श्रीरामावतार के वर्णन के प्रसंग में उन्होंने सात काण्ठों में वर्णित श्री रामायण की कथा का संक्षिप्त रूप निरूपित किया है। कूर्मपुराण के पूर्वार्ध के इक्कीसवें अध्याय में भगवान् राम के चरित का बड़ा ही युक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है। पद्मपुराण एवं स्कन्द पुराण में भी रामकथा पढ़ने को मिलती है। श्रीमद्भागवत पुराण के नवें स्कन्ध के दसवें और ग्यारहवें अध्यायों में महर्षि व्यास ने अत्यन्त प्रेरणाप्रद रीति से श्रीराम की लीला का चिन्तन किया है। इसी तरह श्री देवी भागवत पुराण में भी उन्होंने तीसरे स्कन्ध के 28वें से 30वें अध्यायों में श्रीराम के चरित्र का बड़ी श्रद्धा और भक्ति से चित्रण किया है।
भारतीय इतिहास में स्वर्णयुग में जन्म लेने वाले कविकुल शिरोमणि महाकवि कालिदास ने भी श्रीराम कथा गायी है। उन्होंने अपने महाकाव्य ‘रघुवंश’ में रामकथा को विस्तार दिया है। महाकवि कालिदास ने नवजात शिशु रूप में प्रभु श्री राम की एक अत्यन्त सुन्दर झलक प्रस्तुत की है। उनका यह अनोखा वर्णन तब से अब तक समस्त काव्य जगत् में स्पृहा की वस्तु है। वह कहते हैं-
शम्यागतेन रामेण माता शातोदरी बभौ। सैकताम्भोजबलिना जाह्नवीव शरत्कृशा॥ (रघुवंश 10/69)
अर्थात्- गर्भ में बालक को जन्म देने के परिणाम स्वरूप दुबली हुई माता कौशल्या नन्हें से राम को लिए हुए पलंग पर लेटी हुई ऐसी सुन्दर जान पड़ती थीं, मानों शरद् ऋतु में पतली धारा वाली गंगा जी के तट पर किसी के द्वारा नीला कमल पूजा की सामग्री के रूप में रख दिया हो।
महाकवि भवभूति का अत्यन्त प्रसिद्ध ग्रन्थ है- उत्तर रामचरित ‘नाटक’। इसमें श्री रामकथा के उत्तरवर्ती भाग को बड़े ही करुण रीति से प्रस्तुत किया गया है। उत्तर रामचरित नाटक के अन्त में महाकवि भवभूति श्री रामकथा की महिमा इन शब्दों में कहते हैं-
पाप्यभ्यश्च पुनाति वर्धयति च श्रेयाँसि सेयं कथा। मंगल्या च मनोहारा च जगतो मातेव गंगेव च॥ (उत्तर रामचरित 7/21)
गंगा और जननी की तरह मंगलविधायिनी यह मनोहर राम कथा पाप का नाश करके संसार के कल्याण की वृद्धि करने वाली है।
ग्यारहवीं शताब्दी में कश्मीर में जन्म लेने वाले महाकवि क्षेमेन्द्र राम कथा के अनूठे गायक के रूप में विख्यात हुए हैं। उन्होंने 1037 ई. में श्री वाल्मीकि रामायण को संक्षिप्त किया। 1066 ई. में उन्होंने दशावतार चरित की रचना की। अपने इस ग्रन्थ में उन्होंने लगभग तीन सौ छन्दों में श्री रामकथा का वर्णन किया है। रामायण मञ्जरी भी उनकी सुमनोहर रचना है। रामकथा साहित्य में इसे गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है।
देवभाषा संस्कृत के अलावा भारतीय भाषाओं के अन्य कवियों ने भी श्री रामकथा गायी है। हिन्दी के आदिकवि चन्दबरदायी ने अपने प्रसिद्ध ऐतिहासिक प्रबन्ध काव्य पृथ्वीराज रासो के द्वितीय समय के प्रारम्भ में श्री राम के चरित्र का गान-बखान किया है। वे हिन्दी में प्रभु श्री राम के यश का गान करने वाले पहले कवि थे। रामायण कथा के परम रसिक एवं मर्मज्ञ गोनबुद्ध ने सन् 1380 ई. में तेलगू भाषा में श्री रामकथा का गान किया। श्री गोनबुद्ध बुदपुर-बोत्थान नगर के आस-पास राज्य करने वाले सूर्यवंशी राजा विट्ठल के पुत्र थे। उनके द्वारा रचित इस ‘रंगनाथ रामायण’ में श्री रामकथा छः काण्डों में है।
उड़ीसा के प्रसिद्ध रामकथाकार सिद्धेश्वर परिड़ा ने उड़िया भाषा में रामकथा कही। अपनी ईष्ट देवी ‘शारला’ के नाम पर उन्होंने अपना नाम ‘शारलादास’ रख लिया था। ईसा की तेरहवीं शती में लिखी हुई उनकी रामायण शारलादास की रामायण के नाम से विख्यात है। अपनी इस अनूठी रामकथा में उन्होंने योग साधना के रहस्यों का अद्भुत रीति से उद्घाटन किया है।
16 वीं सदी में रामकथा कहने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी तो जगत् विख्यात हैं। उनके द्वारा लिखा गया महाकाव्य रामचरित मानस हिन्दी भाषा भाषियों के लिए वेद से कम श्रद्धास्पद नहीं है। इसके दोहे-चौपाइयाँ श्रद्धालु जन जब-तब मन ही मन गुनगुनाते-गाते रहते हैं। महाराष्ट्र के सन्त एकनाथ ने लगभग इसी समय में अपनी ‘भावार्थ रामायण’ लिखी। मराठी भाषा के ही महाकवि मोरोपन्त ने रामकथा का गायन अपनी ‘मंत्र रामायण’ में किया। मोरोपन्त कोरे कवि ही नहीं भावुक भक्त भी थे। रामकथा उनके जीवन का प्राण थी।
रामकथा का गान करने वाले कवियों में महाकवि केशवदास का स्थान अनुपम है। उनके द्वारा हिन्दी भाषा में रचित ‘रामचन्द्रिका’ में रामकथा का काव्यात्मक सौंदर्य प्रकट हुआ है। मलयालम भाषा के महान् संतकवि रामानुजन् एषुत्तच्छन रामकथा के गम्भीर रसिक थे। संस्कृत भाषा में रचित ‘अध्यात्म रामायण’ के आधार पर उन्होंने मलयाली भाषा में ‘अध्यात्म रामायण’ की रचना की। उनकी यह रचना केरल के घर-घर में श्रद्धा और आदर से पढ़ी जाती है। महाकवि बत्तलेश्वर ने कन्नड़ भाषा में रामकथा का गान किया। 16वीं सदी में लिखी गयी उनकी यह कृति ‘तोरवे-रामायण’ के नाम से जानी जाती है। और रामकथा गान करने के कारण महाकवि बत्तलेश्वर को कुमार वाल्मीकि भी कहा जाता है।
16वीं शती में जन्में रहीम खानखाना ने बड़ी भक्तिपूर्वक रामकथा को गाया और अपनाया। रहीम मुसलमान थे, परन्तु प्रभु श्रीराम पर उनकी अटल श्रद्धा थी। वह कहा करते थे-
रहिमन धोखे भाव से, मुख तें निकसे राम। पावन पूरन परम गति, कामादिक को धाम॥
उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘संसार सागर से पार उतरने का एक मात्र उपाय ही श्री राम प्रभु की शरणागति ही है। वे कृपामय प्रभु जगत् की विषय-वासना से प्राणी को मुक्त कर उसे अपनी भक्ति प्रदान कर निर्भय कर देते हैं।’ उनका कथन है-
गहि सरनागति राम की, भवसागर की नाव। रहिमन जगत उधार कर और न कछू उपाय॥
दक्षिण भारत के कोचीन शहर में जन्मे महाकवि रामपारशय ने भी रामकथा गायी है। उनके द्वारा 550 श्लोकों में रचित ‘श्रीराम पञ्चशती’ रामकथा का अद्भुत ग्रन्थ है। उनका यह काव्य सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण में वर्णित रामचरित प्रधान घटनाओं का संक्षिप्त रूप है। महाकवि रामपारशव ने अपनी रामपञ्चशती रचना में श्रीराम की भक्ति का सरस निरूपण किया है। उनका समूचा जीवन रामभजन का प्रतीक था।
भगवान राम का गुणगान करने वालों में महाकवि सेनापति हिन्दी काव्य जगत् की शोभा हैं। मध्यकालीन हिन्दी काव्य में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। भक्ति सिद्धान्त की दृष्टि से वे रामभक्त कवि थे। उनके दो ग्रन्थ ’काव्यकल्पद्रुम’ और ‘कवित्त रत्नाकर’ हैं। कवित्त रत्नासकर में ही उन्होंने रामायण और राम रसायन के शीर्षक के अंतर्गत रामकथा और भगवान् श्री राम के यश का वर्णन किया है। उन्होंने अपनी रामकथा की उपमा गंगा जी की धारा से दी है-
तीरथ सरण सिरोमनि सेनापति जानी, राम की कहानी गंगाधर सी बखानी है। (कवित्त. 4/76)
हिन्दी-साहित्य के मध्यकाल के तीसरे चरण की कविता में महाकवि पद्माकर को गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। उनके काव्य में महाकवि देव के शब्द सौंदर्य, महाकवि मतिराम के भाव माधुर्य और महाकवि सेनापति के अलंकार संयोजन नैपुण्य का एक ही साथ दर्शन होता है। उन्होंने अपने काव्य जगद्विनोद, पद्माभरण में प्रभु श्री राम का यश-स्मरण किया है। उनके द्वारा रचित ‘राम रसायन’ काव्य तो भक्ति गीत ही है। ‘प्रबोध पचासा’ में तो उन्होंने जैसे अपनी काव्य साधना सफल कर ली। इसमें उनके शब्द हैं-
ध्यायो राम रुप तब ध्याइबो रह्यो न कछु, गायो राम नाम, तब गाइबो कहा रह्यो॥ (प्रबोध पचासा- 10)
रामकथा के रसिकों में महाकवि भानुभक्त का स्थान अत्यन्त महिमापूर्ण है। उन्होंने भगवान् राम की भक्ति के सौंदर्य और माधुर्य से नेपाली साहित्य का शृंगार किया। वे काठमाण्डू से लगभग सौ मील पश्चिम में नेपाल के तनहूँ गाँव में जन्में भानुभक्त परिपूर्ण रामभक्त थे। उन्होंने संस्कृत भाषा में रचित अध्यात्म रामायण का नेपाली भाषा में सरस काव्य रूपांतर प्रस्तुत किया। उनके द्वारा रचित यह रामायण भानुभक्त के रामायण के नाम से जानी जाती है। और उन्हें नेपाली साहित्य का तुलसीदास कहा जाता है।
रामकथा के अनूठे माधुर्य और सौंदर्य से गुजराती भाषा भी कम समृद्ध नहीं है। समग्र गुजराती भाषा-भाषी गुजरात प्रदेश में महाकवि गिरधर कृत रामायण के प्रति लोगों की बड़ी पूज्य भावना है। उन्होंने विक्रमी सं. की उन्नीसवीं शती के अन्तिम चरण में ‘गिरधर रामायण’ की रचना की। उनकी यह रामकथा सात काण्डों में पूरी हुई है। गिरिधर की यह रामकथा भक्तिरस का समुद्र है। इसके एक कण का भी स्पर्श जीव को तीनों तापों से मुक्ति दिलाने के लिए पर्याप्त है। रामकथा का गिरिधर जी ने रामायण के रूप में वर्णन कर अपनी कीर्ति प्रभु भक्त के रूप में अमर कर ली। उनकी उक्ति है-
ए राम कथा शुद्ध भाव थकी जे सुणे मणे नर-नारी। आ लोक मधे ते भोग भोगवे अंते हरिपद सार जी॥ (गिरिधर रामा. उत्तर. 1/2/5)
‘इस रामकथा को जो स्त्री-पुरुष पवित्र भाव एवं श्रद्धा से श्रवण-प्रवचन करेंगे, उनको इस लोक में इष्ट भोग सुख की प्राप्ति होगी तथा अन्त समय में श्रीराम के पद में स्थान मिलेगा।’ महाकवि गिरधर का यह कथन सत्य है। रामकथा के अवगाहन से ही श्रीराम के आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा मिलती है। और जब जीवन में श्री राम के आदर्श समाहित हों गए हों, तो फिर भक्त-भगवान् का मिलन सहज संभव है।
एक संत मरने के बाद परलोक में पहुँचे। चित्रगुप्त ने उनसे कर्मों का लेख-जोखा पूछा। संत ने बताया, तीन-चौथाई जीवन तो घर-गृहस्थी के काम-धामों में बीता और एक-चौथाई एकाँत जीवन के भजन-पूजन में लगा।
जितना समय परिश्रम और पुण्य-प्रयोजनों में लगा, उसी को परमार्थ माना गया और उस अनुपात से पुण्य मिला। भजन-पूजन वाले दिन तो अपने निज के लाभ भर के लिए माने गए और उतने दिन परमार्थरहित होने के कारण सामान्य ही माने गए।
संत की मान्यता से चित्रगुप्त का निष्कर्ष ठीक उलटा निकला। जिस श्रम-साधना के समय को वे प्रपंच मानते रहे, वही अनेकों को सुविधा पहुँचाने और ऋण चुकाने के कारण परमार्थ गिना गया।
महाराज विश्वजित् विश्व के सर्वोच्च धर्म की खोज में थे। उन्हें एक ऐसे धर्म की खोज थी जो सब तरह के दोषों से मुक्त और सर्वश्रेष्ठ हो। अपने इस अन्वेषण में वह किशोर से वृद्ध हो चले, परन्तु उनकी खोज पूरी न हो पायी। और यह पूरी होती भी कैसे? क्योंकि जीवन है अल्प, और ऐसी खोज है विचित्र। जीवन अनन्त हो तो भी शायद इसे पूरा न किया जा सके। कारण कि धर्म तो वस्तुतः धर्म ही है, वह तो एक ही, शाश्वत और सनातन। इसलिए यहाँ ऊँचा-नीचा निकृष्ट और श्रेष्ठ, क्या और कैसे हो सकता है?
तात्त्विक दृष्टि से धर्म की अनेकता ही भ्रामक है, इसलिए सर्वोच्च की खोज भी सार्थक नहीं है। जहाँ अनेक नहीं है, एक ही है, वहाँ तुलना के लिए और तौलने के लिए न अवकाश ही है, न आवश्यकता। पर राजा विश्वजित् को इस तत्त्वज्ञान से क्या प्रयोजन? वह तो राजहठ के वशीभूत थे। उन्हें खोज तो थी सर्वोच्च धर्म की, किन्तु जीवन यात्रा गतिमान थी निष्कृष्ठतम अधर्म में। जब सत्य-धर्म उन्हें मिल ही नहीं रहा था, तो धर्म की दिशा में अपने जीवन को ले जाने का प्रश्न ही नहीं था। अंधेरे और अज्ञात में भला कहीं कोई जाता है? अधर्म के सम्बन्ध में कभी कोई सवाल नहीं करता। लेकिन धर्म के विषय में शायद ही कोई ऐसा हो जो पूछताछ न करे, तर्क और बहस में शामिल न होना चाहे। मानव जीवन की बड़ी ही निष्ठुर विडम्बना है कि अधर्म के बारे में कभी कोई विचार या खोज नहीं की जाती, उसे तो बस जिया जाता है। जबकि धर्म पूछताछ, तर्क जाल एवं बहस की कोठरी में कैद रहता है। शायद यह अधर्म में जीने और धर्म में जीने से बचने की कारगर विधि है।
महाराज विश्वजित् से यह सत्य कभी कोई कहता न था। उल्टे इस सच के उलट अलग-अलग धर्मों के पण्डित, मौलवी, पादरी, ग्रन्थी एवं दार्शनिक आते और उनकी खोज को प्रोत्साहन देते। वे एक दूसरे से लड़ते थे। एक-दूसरे के दोष दिखलाते थे। वे दूसरों के गुणों को भी दोष सिद्ध करते और अपने दोषों को गुण बताने का प्रयास करते। परस्पर भ्रान्ति एवं अज्ञान को सिद्ध करने में वे सबके सब भ्रान्ति एवं अज्ञान में घिर गए थे। उनके इस तरह के झगड़ों से राजा को भारी प्रसन्नता होती। इस भाँति उन्हें सहज ही आश्वासन की सुखद प्रतीति होती कि जब सारे ही धर्म दोषपूर्ण हैं, तो फिर अधर्म में जीते रहने में क्या बुराई है। विभिन्न धर्मों के नुमाइन्दे उसके सामने आपस में लड़ते रहते और उसे अधर्म में जीते रहने के नए-नए सहारे मिलते जाते।
अब राजा विश्वजित् को धर्म के के पक्ष में जीतना कठिन हो गया था। क्योंकि धार्मिकों के जितने भी पक्ष थे, उनमें से कोई स्वयं ही धर्म के पक्ष में नहीं था। सच भी यही है पंथ, पक्ष, सम्प्रदाय सिर्फ अपने अहंपूर्ण मतवाद के पक्ष में होते हैं, धर्म एवं सच्ची धार्मिकता से उनका कोई प्रयोजन नहीं होता। और हो भी नहीं सकता, क्योंकि जो सारे पक्ष छोड़ता है, वही धर्म का हो सकता है। निष्पक्ष हुए बिना धार्मिक होना सम्भव नहीं है। साम्प्रदायिकता अन्ततः धर्म की शत्रु और अधर्म की मित्र सिद्ध होती है।
लेकिन महाराज विश्वजित् को तो जैसे उनकी खोज एक खेल बन गयी थी। लेकिन जिस अधर्म में वे जी रहे थे, वह भी दुःख-चिन्ता एवं पीड़ा बढ़ाने लगा। यह हो भी क्यों नहीं, अधर्म के शाश्वत परिणाम है ये सब। अब तो उन्हें अपनी मृत्यु भी करीब दिखने लगी थी। जीवन की फसल काटने के दिन जब करीब आ गए, तो वह बहुत उद्विग्न व परेशान हो उठे। लेकिन अपने विचित्र आग्रह के कारण वह सर्वोच्च एवं आत्यंतिक निर्दोष व पूर्ण धर्म के अतिरिक्त कुछ भी स्वीकार करने के लिए तैयार न थे। साल दर साल बीतते गए और वह अपने ही हाथों स्वयं को गहरे कीचड़ में फंसाते चले गए। और अन्ततः उन्हें स्वयं मृत्यु की दस्तक साफ-साफ सुनायी देने लगी।
एक दिन अपढ़ सा लगने वाला एक युवा साधु उसके द्वार भीख माँगने आया। राजा को बेहद चिंतित, उदास व खिन्न मन देखकर उसने कारण पूछा। राजा ने उसकी ओर एक नजर देखा फिर निराशा जनक स्वर में कहा, जानकर भी तुम क्या करोगे? बड़े-बड़े पण्डित और आलिम भी मेरी समस्या नहीं सुलझा सके हैं। वह भिक्षुक साधु बोला- यह भी तो सकता है कि उनका बड़ा होना ही उनके लिए बाधा बन गया हो? फिर पण्डित और आलिम तो कभी कुछ नहीं कर सके हैं। एक पल रुककर उसने अपनी बात पूरी करते हुए कहा- कपड़ों से भी क्या साधु और सन्तों की पहचान होती है।
अब विश्वजित् ने उसे गौर से देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो सम्राटों की आँखों में भी नहीं होता। भिक्षा माँगने वाले इस युवा साधु को उसने मात्र भिखारी समझ लिया था। परन्तु उसके तेजोदीप्त निर्दोष नयन उसे कुछ विशेष बता रहे थे। राजा को असमंजस में पड़ा हुआ देख वह युवा कहने लगा- महाराज मैं तो कुछ भी नहीं कर सकता हूँ। असल मैं हूँ ही नहीं। लेकिन जो है, वह सचमुच ही कुछ कर सकता है, बहुत कुछ कर सकता है। उसकी बातें अद्भुत थीं। अब तक आए हुए विद्वानों, मठाधीशों से वह एकदम भिन्न था। राजा सोचने लगा, ऐसे दीन-हीन वेश में यह कौन है?
फिर भी प्रकट रूप में उसके मुख से यही स्वर मुखर हुए, मैं सर्वोच्च धर्म की खोज कर अपने जीवन को धर्ममय बनाना चाहता था, लेकिन यह नहीं हो सका और अब अन्त समय में मैं बेहद संतप्त हूँ। मैं अब तक समझ नहीं पाया कि कौन सा धर्म सर्वोच्च है, किसे स्वीकारा जाय। राजा की इन बातों पर भिक्षु सा दिखने वाला वह साधु खूब जोर से ठहाका लगाकर हंसा, फिर बोला- राजन! आप गाड़ी के पीछे बैल बाँधकर गाड़ी चलाना चाहते हैं, इसलिए दुःखी हैं। धर्म की खोज करने से जीवन धर्म नहीं बनता, जीवन के धर्म बनने से धर्म की खोज पूरी होती है। और यह किस तरह का पागलपन है कि आप सर्वोच्च धर्म खोजना चाहते हैं? अरे धर्म की खोज ही काफी है। सर्वोच्च धर्म? ये तो शब्द ही अनसुने और असंगत है। धर्म सिर्फ धर्म होता है, इसमें जोड़ने-घटाने जैसा कुछ भी नहीं है।
उस युवा साधु की बातें बड़ी ही प्रभावकारी थीं। वह कह रहा था- महाराज, जो पूर्णवृत्त नहीं है, वह वृत्त ही नहीं है। वृत्त का होना ही उसकी पूर्णता है। धर्म का होना ही उसकी निर्दोष, निरपेक्ष सत्यता है। सर्वोच्च धर्म को सिद्ध करने के लिए जो भी तथाकथित ज्ञानी आपके पास आए, वे किसी भी तरह से ज्ञानी नहीं, पागल या पाखंडी थे। क्योंकि जो ज्ञानी हैं, वह धर्मों को नहीं केवल धर्म को ही जानता है।
भाव विह्वल महाराज विश्वजित् उस युवा भिक्षु साधु के पाँव पकड़ लिए। उसने कहा, अरे यह क्या, मेरे पाँवों को छोड़े, इन्हें अपने हाथों से न बाँधे। मैं तो आपके पाँवों को भी बन्धन मुक्त करने के लिए आया हूँ। राजधानी के बाहर नदी के पार चलें। वहीं मैं धर्म के तत्त्व को बताऊँगा। राजा उस युवा साधु के साथ नदी-तट पर पहुँचे। नदी पार करने के लिए राजधानी की श्रेष्ठतम नावें मंगायी गयीं। लेकिन वह साधु हर नाव में कोई न कोई दोष बता देता। काफी देर तक इसे देखने और सहने के बाद विश्वजित् परेशान हो उठे। उन्होंने कहा- महात्मन्! हमें तो सिर्फ छोटी सी नदी पार करनी है। इसे तो मुझ जैसा वृद्ध व्यक्ति भी तैर कर पार लेगा। मैं तो कहता हूँ, छोड़ें इन नावों को, तैर कर ही इसे पार कर लें। बेकार में विलम्ब क्यों किया जाय?
साधु को जैसे राजा की इसी बात की प्रतीक्षा थी। उसने जवाब में कहा, यही तो मैं कहना चाहता हूँ महाराज। धर्म पंथों की नावों में क्यों अटकें हैं? क्या यह उचित नहीं है कि परमेश्वर की ओर स्वयं ही तैर चलें। सच तो यह है कि धर्म की कोई नाव नहीं है। नावों के नाम पर सब मल्लाहों का व्यापार है। एक मात्र मार्ग तो स्वयं ही तैरना है। सत्य स्वयं ही पाना पड़ता है, उसे कोई दूसरा नहीं दे सकता। सत्-चित-आनन्द रूपी सत्य-सागर में खुद ही तैरना होता है। यहाँ कोई दूसरा सहारा नहीं है, सहारा हो भी नहीं सकता। जो सहारे खोजते हैं वे किनारे ही डूब जाते हैं। और जो स्वयं तैरने का साहस करते हैं, वे डूबकर भी पार हो जाते हैं, अपने गन्तव्य तक पहुँच जाते हैं। साधु की इन बातों से राजा विश्वजित् को तत्त्व बोध हो गया। जो सत्य वर्षों-वर्ष विद्वानों की बहस में न मिला,वह एक पल में उजागर हो गया। जीवन की भटकन थम गयी। वह आत्म निमग्न होने लगे। उन्हें अपनी ही गहराइयों में कहीं अस्पष्ट, किन्तु मधुर गूंज सुनायी देने लगी- ‘तत्त्वमसि’। उन्हें अहसास हो गया कि यही सत्य तो धर्म का सतस्य सत्य एवं सर्वोच्च सार है।
आतंकवाद से उपजी जनपीड़ा एवं राष्ट्रीय वेदना के लिए प्रभु श्री राम समाधान की संजीवनी हैं। और यह संजीवनी औषधि आज भी उतनी ही असरकारक है, जितनी कि कभी उनके युग में थी। श्री राम जिस युग में जन्मे वह आसुरी आतंक का युग था। पड़ोसी देश के शक्तिशाली अधिपति रावण ने समूचे भारत देश में अपने आतंकी ठिकाने बना रखे थे। वह अकेला प्रायोजक था विभिन्न आतंकवादी संगठनों का। उन दिनों आतंकवादी असुरता के अनेक नाम, अनेक रूप, सब उसी से उपजे और पनपे थे। मिथिला अंचल में इसके मुखिया मारीच, सुबाहु एवं ताड़का थे। जबकि दक्षिण भारत के आतंकी सरगना सूर्पणखा सहित खर, दूषण एवं त्रिशिरा थे। देश का कोना-कोना इसके दहशत भरे कारनामों से थर्राया हुआ था। शासक, विचारक एवं जनता तीनों ही अलग-थलग घायल पड़े थे।
ऐसे में आए श्री राम। उन्होंने सबसे पहले अपने पराक्रम एवं सौजन्य से विचारशीलों को अभयदान दिया। आतंकवाद के चक्रव्यूह को ध्वस्त करने के लिए उनकी नीति का पहला बिन्दु यही था। उन्हें मालूम था कि समाज का विचारक वर्ग संस्कृति-संवेदना का स्रोत है। यही जनमानस को जीवन देता है। अपने विचारों से उसमें चैतन्यता एवं उत्साह का संचार करता है। और साथ ही शासकों को सही नीति सुझाता है, सही राह बताता है। यदि ऋषि जीवित है तो समाज जीवित रहेगा, मनुष्य जीवित रहेगा। ऋषि नहीं रहे, ऋषि नहीं बचे तो कुछ भी बाकी न बचेगा, न देश, न समाज और न ही संस्कृति। राजकुल में जन्में श्री राम इस संस्कृति सत्य से भली भाँति परिचित थे। यही कारण था कि आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध में उन्होंने किसी बड़े देश से गुहार नहीं लगाई। किसी समर्थ समझे जाने वाले अधिपति को चिट्ठी नहीं लिखी, उसकी चिरौरी नहीं की। उन्होंने देश के ऋषियों से मार्गदर्शन लिया।
महर्षि विश्वामित्र के मार्गदर्शन में उन्होंने आसुरी आतंक के ठिकानों को नष्ट करना शुरू किया। मारीच, सुबाहु एवं ताड़का मारे गए। परन्तु यह केवल शुभारम्भ था, आतंकवाद से युद्ध का प्रथम चरण। इसको और अधिक गति देने के लिए श्री राम वनवासी बने। उन्होंने सत्ता का मोह त्यागा, सिंहासन का लोभ छोड़ा। साधन और सुविधाओं से भरे जीवन का त्याग किया। सत्ता के गलियारों में कैद रहकर अधिपति होने का अहंकार तो सुरक्षित रखा जा सकता है, पर व्यापक समस्या के सटीक समाधान तो जनता के बीच ही मिलते हैं। प्रभु श्री राम की नीति का दूसरा बिन्दु था, जनता के होकर जनता में रहना। इसी कारण वह वनवासी हुए। आग्रहपूर्वक राज्य लौटाने के लिए आए भाई भरत को उन्होंने अपना उद्देश्य समझाकर वापस लौटा दिया। भाई भरत को भी श्री राम के उद्देश्य की महानता और पवित्रता समझ में आयी। उन्होंने भी संकल्प लिया कि आतंकवाद का समूल नाश होने तक वह शासन सूत्र तो सम्भालेंगे, पर शासक बनकर नहीं, श्री राम के प्रतिनिधि होकर, तपस्वी के रूप में।
महातपस्वी भरत ने शासन सूत्र सम्भाले और श्री राम जन-जन के बीच गए, वन-वन भटके। अरण्यवासी ऋषियों की, आतंक से घिरे विचारशीलों की दशा ने उन्हें द्रवित कर दिया। उन्होंने देखा कि आतंकवाद का असुर मानव समाज के ज्यादातर विचारशीलों को खा गया है। गोस्वामी जी महाराज ने इस स्थिति को दर्शाते हुए अपनी रामचरित मानस में कहा है-
निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥
अर्थात्- आतंकवादी असुरता ज्यादातर मुनियों को खा गई, यह देखकर-सुनकर श्री राम की आँखें डबडबा आयीं। लेकिन उनके ये आँसू किसी कवि के आँसू नहीं थे। जो स्थिति से विकल तो होता है, आतंकवादी हमले जिसे पीड़ित तो करते हैं, पर बेचारा कुछ कर गुजरने का साहस नहीं जुटा पाता। वह केवल कहता है, करने की कायर कल्पना करता है। शत्रु के गढ़ में घुसकर आतंकवादी ठिकाने ध्वस्त करने का साहसी संकल्प करना शायद उस कल्पनाशील कवि के बूते का नहीं होता। लेकिन प्रभु श्री राम न केवल जनपीड़ा से द्रवित हुए, बल्कि उन्होंने महासंकल्प किया। गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में-
निसिचर हीन करौ महि, भुज उठाई पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाई-जाई सुख दीन्ह॥
अर्थात्- आतंकवादी असुरता को दुनिया से मिटा दूँगा, उन्होंने हाथ उठाकर प्रण किया। और सारे ऋषियों के स्थानों पर वह जा-जाकर मिले।
पर उनके लिए इतना ही काफी न था। उनकी आतंकवाद विरोधी नीति का तीसरा बिन्दु था विचारशीलों एवं जनता के सघन संपर्क से एक व्यापक जन अभियान को जन्म देना। इस महाभियान को जन्म देने वाले श्रीराम शासक नहीं जननायक थे। उन्हें शासन की नहीं जन भावनाओं की शक्ति पर विश्वास था। प्रखर और तेजस्वी विचारक महर्षि अगस्त्य जहाँ एक ओर उनके इस व्यापक अभियान की प्राण-चेतना थे, वहीं सामान्य वनवासियों, कोल-किरातों, वानरों तक का उन्हें सहयोग प्राप्त था। आतंकवाद से संघर्ष यह किसी प्रान्त या क्षेत्र के शासक का नहीं जनता का नारा बन गया।
विचारशीलों ने, ऋषियों ने जन चेतना जगायी। एक व्यापक जन अभियान ने जन्म लिया। और जननायक श्री राम ने एक के बाद एक आतंकवादी ठिकानों को नष्ट करना प्रारम्भ कर दिया। दण्डकारण्य में अपना ठिकाना बनाए हुए खर-दूषण-त्रिशिरा के साथ उसके चौदह हजार साथी मारे गए। अपने द्वारा प्रायोजित आतंकवाद की इस लगातार की हार से पड़ोसी देश बौखला उठा। उसके अधिपति ने छद्म रूप धारण किया। वह राक्षस से साधु बना। हालाँकि इस बदले हुए भेष में उसने काम वही पुराना किया। साधु बनकर उसने सीता अपहरण किया। वह अकेले श्री राम की नहीं देश की जनता की भावनाओं पर चोट थी। भारत की संस्कृति के अपहरण की घटना थी। उद्वेलित जनभावनाएँ श्री राम के नेतृत्व में एक जुट हो उठी। जननायक श्री राम ने आतंकवाद प्रायोजित करने वाले देश के अधिपति को समझाने के कई प्रयास किए। परन्तु ये सब असफल रहे।
समाधान का अन्तिम बिन्दु और श्री राम की नीति का अन्तिम पग आक्रमण ही था। क्योंकि परिस्थितियों ने यह साबित कर दिया था कि आतंकवाद की जड़ को समाप्त किए बिना इसकी असुरता को मिटाया नहीं जा सकता। युद्ध सिर्फ युद्ध होता है। फिर यह तो मानव इतिहास का सबसे भीषण युद्ध था- राम-रावण युद्ध। भारत की देव संस्कृति के पक्षधरों का आतंकवादी असुरता से युद्ध। यह सभ्यता एवं बर्बरता के बीच युद्ध था। इस युद्ध में जनता अपने सर्वस्व की आहुति देने के लिए तत्पर थी। और यह इतिहास सत्य है- कि जनभावनाएँ कभी असफल नहीं होती, क्योंकि जनता ही तो जनार्दन है। यहाँ भी यही हुआ- आतंकवाद को मरना पड़ा। यदि उसे केवल हराया जाता तो शायद वह फिर से उठकर खड़ा हो जाते। पर श्री राम ने उसे जड़ मूल से मिटा दिया।
अपने इसी साहसी संकल्प और उससे उपजे पुरुषार्थ के कारण श्रीराम, प्रभु श्री राम कहलाए। उनके इस पुरुषार्थ के पीछे उनका यह जीवन मंत्र था- ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ अर्थात् माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। यदि भारत देश के नागरिक, शासक एवं विचारक ही नहीं देश की जनता भी श्री राम के इस जीवन मंत्र को अपना सके तो आज भी आतंकवाद मर सकता है। श्री राम की नीतियाँ ही आतंकवाद की समस्या का समाधान है। और इन्हीं नीतियों की चरम परिणति है- राम राज्य, जिसका एक ही अर्थ है- सबके लिए सुख और सबके लिए सौभाग्य।
एक सूफी कथा है-किसी प्रेमी ने अपनी प्रेयसी के द्वार को खटखटाया। भीतर से पूछा गया, कौन है? प्रेमी ने उत्तर दिया, मैं हूँ। तुम्हारा प्रेमी! प्रत्युत्तर मिला, इस घर में दो को स्थान नहीं है। कुछ दिनों बाद प्रेमी पुनः उसी द्वार पर लौटा। इस बार “कौन है” के उत्तर में उसका जवाब था, “तू ही है” ओर वे बंद द्वार उसके लिए खुल गए। ईश्वर और जीव के संबंध ऐसे ही होते हैं।
नव संवत्सर विक्रम संवत् 2059 का आगमन हो गया है। नव वर्ष की खुशियाँ प्रकृति में सब ओर छलक उठी है। गाँव के किसान अपनी नयी फसल को लेकर उत्साहित हैं। ज्योतिष के ज्ञाता अपने पंचाँग के पन्ने उलटकर भविष्य को बाँचने में जुटे हैं। उत्साह और भविष्य की ज्योति रश्मियों के साथ नव वर्ष का यह शुभारम्भ हम भारतवासियों के लिए प्रेरणा पर्व भी है। इसमें एक ऐसी शुभ प्रेरणा, जिसका प्रवर्तन सम्राट वीर विक्रमादित्य ने आज से 2058 वर्ष पूर्व किया था। धूमिल अतीत में सम्राट विक्रम के स्मारक स्वरूप जिस विक्रम संवत् का प्रवर्तन हुआ था, उसके पथ की वर्तमान रेखा यद्यपि तमसाच्छन्न है, फिर भी इस डोर के सहारे हम अपने आप को उस शृंखला के क्रम में पाते हैं, जिसके अनेक अंश अत्यन्त उज्ज्वल एवं गौरवमय रहे हैं।
विक्रम संवत् के ये दो हजार अट्ठावन वर्ष तो भारतीय इतिहास के उत्तरकाल के ही अंश हैं। विक्रम के उद्भव तक विशुद्ध वैदिक संस्कृति का युग, रामायण ओर महाभारत का समय, महावीर एवं गौतमबुद्ध का काल, पराक्रम सूर्य चन्द्रगुप्त मौर्य एवं प्रियदर्शी अशोक का काल, अन्ततः पुष्यमित्र शुँग की साहस गाथा सुदूरभूत बातें बन चुकी थी। वेद, ब्राह्मण, उपनिषद्, सूत्रग्रन्थ एवं मुख्य स्मृतियों की रचना हो चुकी थी। व्याकरणाचार्य पाणिनि एवं योगी पतंजलि अपनी कृतियों से पण्डितों एवं साधकों को चकित कर चुके थे। उन पिछले दो हजार अट्ठावन वर्षों की लम्बी यात्रा में भी भारत के शौर्य ने, उसकी प्रतिभा एवं विद्वता ने जो मान स्थित किए, वे अद्भुत एवं अनुपम हैं।
विक्रम संवत् के प्रवर्तन के प्रथम हजार वर्षों में सर्व प्रत्यक्षदर्शीकाल ने शिवनागों, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य, स्कन्दगुप्त, यशोधर्मन, विष्णुधर्मन आदि के बल और प्रताप के सम्मुख विदेशी शक्तियों को थर-थर काँपते हुए देखा, विश्वगुरु भारत का साँस्कृतिक एवं राजनैतिक वैभव देखा, भारत के उपनिवेश बसते देखे, भारत देश की संस्कृति और उसके धर्म का प्रसार बाहर के देशों में देखा। कालिदास, भवभूति, भारवि, माघ आदि की काव्य प्रतिभा तथा दण्डि और बाणभट्ट की विलक्षण लेखन शक्ति देखी, कुमारिल, भट्ट एवं शंकराचार्य का बुद्धि वैभव देखा और स्वतंत्रता की अग्नि को सदैव प्रज्वलित रखने वाली राजपूत जाति के संगठन व उत्थान को देखा। हालाँकि विक्रम संवत् की दूसरी शताब्दी में काल गति विपरीत हो गयी। भारत के भाग्य चक्र की गति उलट गयी। इसी उलटी एवं विपरीत गति ने भारतीय उपनिवेशों का उजड़ना दिखाया। और भारतीयों ने देखी अपनी हार और देखा अपना बहुमुखी पतन। परन्तु देश की आन्तरिक जीवनी शक्ति अभी चुकी नहीं थी। स्वतंत्रता के समर्थ आन्दोलन ने विदेशियों को देश से बाहर खदेड़ कर यह दिखा दिया कि गिरकर भी कैसे उठा जा सकता है?
भारत देश की देव संस्कृति पर दैवीदर्प रखने वालों के लिए यह कम गर्व और गौरव की बात नहीं है कि- आज भारत वर्ष में प्रचलित विक्रम संवत्सर, बुद्ध निर्वाण काल गणना छोड़कर संसार भर के प्रायः सभी प्रचलित ऐतिहासिक संवतों से अधिक प्राचीन है। हालाँकि इस प्राचीनता में निहित इसकी प्रेरणा दिव्य एवं नवीन है। सम्राट विक्रम की शौर्य गाथा, विदेशी घुसपैठियों शकों को खदेड़ भगाने की इतिहास कथा काल क्रम से भले ही पुरानी हो, परन्तु उसका तेज अभी भी प्रखर एवं भास्वर है।
इतिहासकारों को मतभिन्नता के कुहासे को भेदकर अपने आप ही प्रकट हो जाता है कि विक्रम अवन्तिनरेश गंधर्वसेन एवं माता सौम्यदर्शना के सुपुत्र एवं योगिवर महाराज भर्तृहरि के सहोदर भ्राता थे। किसी भी बात पर एकमत न होने का हठ रखने वाले इतिहासवेत्ता भी इस सत्य को तो स्वीकार करते ही हैं कि भारत देश में शकों-हूणों ने घुसपैठ की। यहाँ की संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया। भारतीय सभ्यता को अपनी बर्बरता से आतंकित करने की कोशिश की। उनके इस धृष्ट और दुष्ट प्रयास को धूल-धूसरित करने के लिए सम्राट विक्रम नाम के युग सत्य का आविर्भाव हुआ। और जिस तरह से त्रिपुरदैत्य को नष्ट करने के बाद भगवान् शिव त्रिपुरारि कहलाए, ठीक उसी तरह बर्बर आतंकवादी शकों को नष्ट करने के बाद सम्राट विक्रम शकारि कहाए।
इस ऐतिहासिक सत्य के अनुरूप ही विक्रम का शाब्दिक अर्थ भी है। वैदिककाल में विक्रम शब्द का प्रयोग आगे बढ़ने के अर्थ में होता था। बाद में यही शौर्य एवं बल का द्योतक हो गया। विक्रम के इन शाब्दिक अर्थों से यही बोध होता है कि सम्राट विक्रम का युग भारतीय इतिहास का वह युग था, जिसमें सभ्यता के धीमे पड़ते हुए स्रोत में एक ऐसी बाढ़ आयी, जिससे युग-युगान्तर से जमी हुई कीच-काई बह गई। और आप्लावित भूमि पर नयी, उर्वर मिट्टी की परत आयी, जिसमें उत्पादित अपार आत्मिक अन्नराशि ने मानव जाति का भरपूर मानसिक एवं आध्यात्मिक पोषण किया। साथ ही उसमें ऐसे अनगिन-अगणित रंग-बिरंगे सुगन्धित साँस्कृतिक पुष्प खिले, जिन्होंने अपनी सुरभि से दसों दिशाओं को भर दिया।
सभ्यता-संस्कृति की इसी विजय के उपलक्ष में सम्राट विक्रमादित्य ने विक्रम संवत् का प्रवर्तन किया। सम्राट विक्रम द्वारा विक्रम संवत् के इतिहास-सत्य को यूरोपीय विद्वानों में प्रमुख डॉ. स्टेनकरेनो ने मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है। यही बात इस जैन गाथा में भी स्वीकारी गयी है-
कालान्तरेण केणाई उप्पादिट्ण संगाण संबंसम्। जापो मालवराया नामेण विक्कमाइच्च॥65॥
तथा
नियवो संवच्छरो जेण॥68॥ (कालकाचार्य कथानक)
सम्राट वीर विक्रमादित्य की यह विजय बर्बर आतंकवाद पर भारतीय संस्कृति की विजय थी। उनकी यह विजय जन-गण की विजय थी, मालव विजय थी और सबसे बढ़कर मानव विजय थी। इस विजय में एक सन्देश था, जो सर्वकालिक है। यह सन्देश है कि बर्बरता के विरुद्ध यदि जन-आन्दोलित हो उठे, तो बर्बरता टिक नहीं सकती। आतंकवाद के विरोध में राष्ट्रनायक यदि विक्रमादित्य की भाँति संकल्पित एवं सजग होंगे- तो आतंक का सर्वनाश एवं देश की संस्कृति का उत्थान निश्चित है। विक्रमादित्य द्वारा किए गए संवत् प्रवर्तन में निहित इस सन्देश को उनके बाद के राष्ट्र नायकों ने समय-समय पर हृदयंगम करने की कोशिश की। और इसी का परिणाम है कि बाद में भी विदेशी घुसपैठियों से संघर्ष किया जाता रहा। जिसने भी इस संघर्ष में अपने अद्वितीय पराक्रम का प्रदर्शन करके विजय पायी, उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। सम्राट शालिवाहन एवं गुप्तवंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा विक्रमादित्य उपाधि धारण करना इसी इतिहास-सत्य को व्यक्त करता है।
बृहत्कथामञ्जरी में संवत्सर प्रवर्तक सम्राट वीर विक्रम की शक-विजय का विवरण इस प्रकार दिया गया है-
ततो विजित्य समरे कलिंगनृपतिं विभुः राजा विक्रमादित्यः स्रींप्रायः विजयश्रिम्।
अथ श्री विक्रमादित्यो हेलया निर्जिताखिलः।
म्लेच्छान काम्बोजयवनान् नीचान् हूणान् सबर्बरान्। तुषारान् पारसीकाँश्च त्यक्ताचारान् विशृंखलान्। हत्वाभ्रूमंगमात्रेण भुवो भारमवारयत्। तं प्राह भगवान् विष्णुस्त्वं ममाँशो महीपते। जातोसि विक्रमादित्य पुरा म्लेच्छशंशाकतः।
बृहत्कथामञ्जरी के इस विवरण में सम्राट विक्रमादित्य को भगवान् विष्णु का अंशावतार बताकर यह सत्य प्रकट किया गया है, कि उन्होंने शक-हूण-यवनों को मारकर, भगाकर पृथ्वी का भार दूर किया। आज भी भारत देश की धरती भारतवासियों के उसी शौर्य का आह्वान करती है। जो बर्बरता और आतंक को पराजित कर संस्कृति की विजय सिद्ध कर सके। विक्रम संवत् के प्रवर्तक सम्राट विक्रम का मान रख सके। देशवासियों का विक्रम संकल्प ही विक्रम संवत् की सही पहचान बन सकेगा। इसी संकल्प में नववर्ष के आगमन का सच्चा उल्लास और उछाह है।
गाँव से दूर एकान्त अरण्य में माँ गायत्री का प्राचीन मन्दिर था। काफी पुराना होने के कारण मन्दिर की भव्यता अब पहले जैसी न रही थी। परन्तु ग्रामीण जनों की सघन श्रद्धा इसकी दिव्यता को उत्तरोत्तर बढ़ा रही थी। गाँव वालों की आस्था थी कि माँ गायत्री अपने इस मन्दिर में एक अंश से नहीं बल्कि सम्पूर्ण रूप से निवास करती हैं। और सचमुच ही ऐसा था भी। मन्दिर के परिसर में एक अलौकिक शान्ति पसरी रहती, जिसका तनिक सा भी स्पर्श किसी के भी उद्विग्न मन को शान्त बना देता। गायत्री महामंत्र यहाँ के सूक्ष्म वातावरण में सदा ही स्पन्दित होता था। नवरात्रि के दिनों में तो जैसे यहाँ कोई अलौकिक लोक उतर आता। प्रातः-सन्ध्या गाँव के लोग यहाँ अपना अनुष्ठान सम्पन्न करते, तो रात्रि में यहाँ माँ की महिमा का गायन होता।
गायन का दायित्व कीर्तनलाल पर था। कीर्तन जाति से अन्त्यज था, परन्तु अपनी श्रद्धा एवं साधना के प्रताप से वह संगीत कुशल था। पं. गायत्री शरण ने आस-पास के गाँवों में रहने वाले रूढ़िवादी ब्राह्मणों के विरोध के बावजूद उसे गायत्री महामंत्र की दीक्षा दी थी। तब से नियमित गायत्री जप, नवरात्रि के नौ दिनों में 24,000 गायत्री महामंत्र के जप का लघु अनुष्ठान उसका नियम बन गया था। वर्ष की दोनों नवरात्रि के दिन उसके विशेष तप के दिन होते थे। वह एक समय आस्वाद भोजन करके दिन में अपना जप करता और रात्रि में माँ की महिमा का गायन करता। स्वयं के और परिवारजनों के भरण-पोषण के लिए उसके पास थोड़ी खेती थी, जिससे औसत भारतीय स्तर का जीवन निर्वाह हो जाता था।
माँ गायत्री की महिमा सम्बन्धी अनेक गीत उसकी स्वर लहरी में गाँधार, षड़ज, धैवत स्वर में गूँजते थे। नवरात्रि में रात्रि जागरण उसका नियम बन गया था। इन दिनों थोड़ी नींद उसके लिए पर्याप्त होती। तरह-तरह के भक्ति गीतों के गायन में उसे इतना आनन्द मिलता, कि तन और मन दोनों ही थकान से कोसों दूर रहते। बस इसी तरह उसकी जीवन यात्रा लम्बे समय से चल रही थी।
उस दिन चैत्र शुक्ल नवमी थी। आज रात्रि उसे माँ की महिमा के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम राम के भी भक्ति गीत गाने थे। एक साथ दुहरी खुशी थी। समस्त चराचर को जन्म देने वाली आदिशक्ति माँ गायत्री एवं उसके जैसे शूद्रों केवट एवं शबरी को अपनाने वाले प्रभु श्री राम। कल्पनाओं में ही उसका मन भाव विह्वल हो गया। भक्ति भाव से प्रणत वह संगीत मर्मज्ञ वन्य पुष्प चयन करने के लिए गाँव से दूर महावन में पहुँच गया। रात्रि का धुँधलका घिरने लगा था। इसी अंधेरे में एक महाराक्षस उसका पथ रोककर खड़ा हो गया। और उसे देखकर खाने को आतुर हो उठा।
आज मेरा आहार तू ही बनेगा। अट्टहास करते हुए राक्षस ने उसे पकड़ ही लिया। वह एक बारगी काँप गया। काँपते अन्तर से उसने राक्षस से कहा- ‘भगवन् आज तुम मुझे मत खाओ, कल प्रातः मुझे खाकर अपनी क्षुधा शान्त कर लेना। कीर्तनलाल ने सोचा, इससे छुटकारा पाना तो सहज नहीं है, किन्तु अनुष्ठान पूरा होने के बाद प्राण जाएं, यही ठीक होगा। इसी चिन्ता में लीन उसने एक बार फिर ब्रह्मराक्षस से कहा-
तुम मुझ पर विश्वास करो। मैं माता गायत्री का भक्त हूँ। प्रभु श्रीराम के प्रति मेरी श्रद्धा है। मैं सत्य कहता हूँ, यह समूचा अस्तित्व सत्य मूलक है। उसी सत्य को लेकर मैं पुनः आने की शपथ लेता हूँ। मेरा अनुष्ठान विफल हो, यदि मैं तुम्हारे पास न आऊँ। सूर्य, चन्द्रमा, पंचतत्त्व, दिन-रात, यम तथा दोनों सन्ध्याएँ अनुक्षण मनुष्यों की क्रियाओं को जानते हैं। हे ब्रह्मराक्षस, मैं अधिक शपथ क्या करूं? मेरी साधना की अन्तिम रात्रि में तुम विघ्न न डालो। माँ की महिमा का गायन करके मैं मन्दिर में ही हवन करूंगा और फिर घर न जाकर तुम्हारे ही पास आहार बनने आ जाऊँगा।’
उसकी बातों से ब्रह्म राक्षस को भारी विस्मय हुआ। उस गायत्री भक्त के आग्रहपूर्ण विश्वस्त वचनों को सुनकर द्रवित हो गया।
जाओ, सत्य की शपथ का ध्यान रखना। मैं रात भर तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा।
ब्रह्म राक्षस के शिकंजे से छूटते ही वह मन्दिर की ओर भाग चला और पुजारी को पुष्प दिए। पुजारी द्वारा पूजन के पश्चात् कीर्तनलाल उस रात्रि एक बार फिर संगीत भरे संसार में लौट आया। माँ की महिमा और श्रीराम भक्ति के मधुर गीतों का गायन करते हुए उसने सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत की। भक्ति संगीत की स्वर लहरियों से सारा वन प्रदेश अतीन्द्रिय लोक में जा पहुँचा। ब्रह्म मुहूर्त का स्पर्श होते ही उसने माँ गायत्री को साष्टांग प्रणिपात किया। नित्य क्रियाओं से निबटकर अपने अनुष्ठान की पूर्णाहुति हवन किया। और फिर अपने वचनों के पालनार्थ उसी दिशा में चल पड़ा, जहाँ बहेड़े के पेड़ में ब्रह्म राक्षस छिपा बैठा था।
रात्रि जागरण की भक्तिमयी स्मृतियों को समेटे वह मन्द स्वरों में अब भी गायत्री महामंत्र ही गुनगुनाता हुआ बढ़ रहा था। बीच-बीच में वह रामधुन भी गुनगुना लेता। एकान्त संगीत की मधुर लहरें वायु मण्डल में अब भी छायी थी तभी-
भद्र, तुम गाँव के पथ से दूर इस भयावह अरण्य में किसके समीप जा रहे हो? मार्ग रोककर किसी अपरिचित व्यक्ति ने उससे पूछा।
मैं सत्य की शपथ पूर्ण करके ब्रह्मराक्षस के समीप अपनी देह दान करने जा रहा हूँ।
कैसा मूर्खतापूर्ण कृत्य करने जा रहे हो, उस अपरिचित ने समझाने की कोशिश की।
क्या तुम्हें इतना भी नहीं ज्ञात है कि प्राण संकट और सर्वस्व अपहरण में मिथ्या बोलने से पाप नहीं लगता? तुम क्यों अपने प्राणों को गंवाना चाहते हो। अरे जब यह शरीर ही नहीं रहेगा, तो अपने जीवन की शेष धर्म साधना कैसे पूरी करोगे? पथ में मिले उस व्यक्ति ने उससे फिर कहा।
ऐसे परामर्श से तुम्हारा कल्याण हो। किन्तु, तुम्हें यह न भूलना चाहिए कि तीनों लोकों में सत्य की सदा जय होती है। सृष्टि में जो भी सुख है, वह सत्य से ही प्राप्त होता है। सत्य से ही सूर्य प्रकाशवान है, सत्य से ही जल, रस रूप होता है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष सभी की प्राप्ति होती है। माता गायत्री सत्य स्वरूप हैं, जिनके भक्ति गीतों का मैंने रात्रि में कीर्तन किया है, वे प्रभु श्रीराम सत्य प्रतिज्ञ हैं। सभी लोकों में सत्य ही परब्रह्म है। अतः किसी भी तरह सत्य का त्याग उचित नहीं है। यह कहते हुए कीर्तनलाल उस दिशा में चल पड़ा, जहाँ ब्रह्मराक्षस का निवास था।
अरे, तुम स्वयं चलकर मृत्यु के द्वार पर आ पहुँचे। ब्रह्मराक्षस विस्मय से काँप उठा। रुंधे गले से अस्फुट स्वरों में जिस किसी तरह वह अपनी बात कहने का प्रयास कर रहा था। महाभाग! सत्य वचन को पूर्ण करने में समर्थ, तुम इतने महान् सत्यात्मा हो, मुझे विश्वास नहीं होता। ब्रह्मतेज से प्रदीप्त व्यक्ति के अलावा अन्य किसी में इतना साहस नहीं हो सकता। कल्याणमय, तुम मुझे कृपाकर यह तो बताओ कि तुम कौन हो और रात्रि में मन्दिर में जाकर तुमने क्या किया? किसलिए तुम रात्रि में नहीं रुक सके थे।
सुनो बन्धु, जाति से मैं शूद्र हूँ, शूद्रों में भी अत्यन्त निम्न कोटि का अन्त्यज। परन्तु गायत्री महामंत्र के जप-अनुष्ठान के प्रभाव से मेरी अन्तर्चेतना ब्रह्मतेज से प्रदीप्त हो सकी है। पिछली रात्रि मन्दिर में मैं माता गायत्री की महिमा को गाता रहा हूँ। कल श्री रामनवमी भी थी, इसलिए प्रभु के भक्ति गीत मैंने गाए। तत्त्व की दृष्टि से मुझे यह बोध है कि आदिशक्ति माता गायत्री ही अपने अंश से श्रीराम प्रभु में अवतरित हुई। और उन्होंने अपनी अवतार लीला पूर्ण की।
उसके इन वचनों से ब्रह्मराक्षस सोच में पड़ गया। उसने सोचा, अवश्य इसकी साधना में कोई रहस्यपूर्ण चमत्कार है। अपने मन में ऐसा विचार करते हुए उसने उस गायत्री भक्त से कहा- कल्याणमय! तुम अपनी नवरात्रि साधना के मात्र एक दिन और रात्रि का पुण्य मुझे दे दो, तो मैं तुम्हें छोड़ दूँगा, अन्यथा मैं तुम्हारा भक्षण करके ही चैन लूँगा।
अरे राक्षस! कैसी मूर्खतापूर्ण बात कर रहे हो। मैं तो स्वयं ही अब तुम्हारे लिए भोज्य पदार्थ बनकर आ गया हूँ। तुम मुझे स्वेच्छा से खाते क्यों नहीं?
ब्रह्मराक्षस का विस्मय और बढ़ गया। वह सोचने लगा, कि यह निश्चय ही पुण्यात्मा है। इसे जीवन देने में मुझे भी पुण्य मिलेगा। यह सोचकर वह बोला, कैसी बात करते हो भद्र, कौन मूर्ख दुष्टबुद्धि तुम्हें पीड़ा देने के लिए तुम्हारी ओर दृष्टिपात भी कर सकता है, तुम तो अपनी साधना के द्वारा स्वयं सुरक्षित हो। हे महाभाग, यदि तुम अपनी साधना के एक दिन और एक रात का पुण्य नहीं देना चाहते तो कोई बात नहीं। रात्रि के अन्तिम प्रहर में माँ गायत्री की महिमा में जो अन्तिम गीत तुमने गाया है केवल उसी का पुण्य देकर, मुझे पाप से बचाओ। ब्रह्मराक्षस पुनः गिड़गिड़ाते स्वर में बोला।
कौन से पाप? कैसे दुष्कर्म? किस कारण तुम ब्रह्मराक्षस बने हो। गायत्री भक्त कीर्तनलाल ने पूछा।
मैं पूर्वजन्म में ब्राह्मण था, पर केवल जाति से। कर्म तो मेरे कदापि ब्राह्मण के न थे। सिर्फ ब्राह्मण जाति के दम्भ से मैं फूला, ऐंठा, इतराया फिरता था। मेरी स्वयं की गायत्री साधना में कोई रुचि न थी। पर अपनी जाति के अहं में मैं दूसरे गायत्री साधकों की निन्दा करता फिरता था। मेरे ही गाँव में एक अन्य तपस्वी रहते थे, जो जाति और कर्म दोनों से ही ब्राह्मण थे। उनमें न तो अपने कुलीन होने का अहं था और न ही जाति-भेद की पक्षपात पूर्ण भावना। वह बराबर कहा करते थे कि माँ गायत्री तो आदि जननी है, समस्त सृष्टि उनकी सन्तान है। गायत्री महामंत्र पर मनुष्य मात्र का अधिकार है। यह सत्य उनके कथन ही नहीं आचरण पर भी लागू होता था। उन्होंने शूद्रों-अंत्यजों को भी गायत्री दीक्षा दी।
उनके तप के प्रभाव से वे शूद्र और अन्त्यज भी गायत्री साधक और तपस्वी बन गए। पर मैं अपने अहंकार के वशीभूत होकर सदा उनकी निन्दा किया करता था। उन्हें अपमानित करने का कोई भी अवसर न चूकता। जिस किसी से भी उनके बारे में निन्दा पूर्ण अपशब्द कहता। उनका तिरस्कार करना ही मेरे अपने जीवन का लक्ष्य बन गया। हालाँकि वे तपस्वी बड़े दयालु थे। उन्होंने कभी भी मेरे ऊपर क्रोध न किया। सदा ही अपना प्रेम मुझ पर बनाए रखा। परन्तु विधाता तो न्यायकारी है। सृष्टि तो नियन्ता के कर्मफल विधान से संचालित है। मुझे अपने कर्म का फल तो मिलना था। अपने ही कर्म दोष से मुझे ब्रह्मराक्षस बनना पड़ा। इस योनि में मैं बड़ी पीड़ा पा रहा हूँ। ब्रह्मराक्षस की पीड़ा सचमुच ही उसके समूचे अस्तित्त्व में छलक उठी।
कीर्तनलाल इससे द्रवित हुए बिना न रहा। उसने विगलित हृदय से कहा, मैं तुम्हें भक्ति गीत का पुण्य दे सकता हूँ। किन्तु तुम्हें भी मेरे सत्य वचन का पालन करना होगा। कहो शीघ्र कहो, ब्रह्मराक्षस को उतावली थी। ऐसा कौन सा कार्य है, जिसे पूर्ण कर मैं इस योनि से मुक्ति पा सकूँगा। व्याकुल ब्रह्मराक्षस भक्त कीर्तनलाल के समीप प्रणत भाव से खड़ा था।
यदि तुम प्राणियों को इस प्रकार मारकर खाना बन्द कर दो, तो मैं तुम्हें अपने गायत्री गान का पुण्य दे सकता हूँ, कीर्तनलाल ने कहा।
मेरे नेत्र को तुम्हारे आचरण ने, तुम्हारी सत्यनिष्ठ ने खोल दिए हैं। इस संसार में मनुष्य दुष्ट प्रवृत्ति का त्यागकर ही मनुष्य जीवन का श्रेष्ठतम स्वरूप प्राप्त कर सकता है। अब मैं प्राणी हिंसा कदापि नहीं करूंगा।
तथास्तु कहते हुए उस परमभक्त ने अपने रात्रिभजन के अन्तिम भक्ति संगीत का पुण्य उसे देने का संकल्प किया। और आदि शक्ति माता गायत्री से उसके कल्याण के लिए प्रार्थना की।
चरणों में झुक गया वह हिंसक ब्रह्मराक्षस। भक्ति गीत का पुण्य ग्रहण कर वह माता गायत्री के मन्दिर में जा पहुँचा। यह मन्दिर तो जाग्रत् तीर्थ था। उसने इस मन्दिर में माँ के सामने ही अनशन करते हुए देह त्याग दी। भक्ति गीत एवं माँ गायत्री की महिमा से वह राक्षस योनि से मुक्ति पा गया। माँ गायत्री के प्रभाव से ब्रह्मलोक में स्थान पाया उसने।
महर्षि कश्यप की दो पत्नियाँ थीं, कद्रु और विनता। उन्होंने उन्हें अपने-अपने उत्तराधिकारियों के निमित्त वर माँगने को कहा। कद्रु ने 1 शक्तिशाली पुत्र माँगे। उसका विचार था कि बड़ी संख्या में शक्तिशाली पुत्र उसे विनता से अधिक सम्मान और यश दिला सकेंगे। विनता ने तेजस्वी, सुसंस्कारी मात्र दो पुत्र माँगे।
कद्रु के नाग हुए एक हजार। थोड़े समय के लिए उसका दबदबा बन भी गया, पर जब विनता के अरुण और गरुड़ का पराक्रम प्रकट हुआ, तो संख्या के ऊपर श्रेष्ठता का महत्व स्पष्ट हो गया। अरुण बने सूर्य भगवान के सारथी और गरुड़ बने भगवान विष्णु के वाहन। उन्होंने चंद्रलोक से अमृतकलश लाकर कद्रु के बंधनों से माँ विनता को मुक्त कराया। नाग उनके भय से थर-थर काँपते रहे।
गुप्तचर्या का आदिम रूप पूर्णतः बुद्धि-चातुर्य पर अवलंबित था, तब बौद्धिक निपुणता ही इसकी सफलता-विफलता का मूलभूत आधार हुआ करती थी। जो जितने मेधावी और प्रत्युत्पन्नमति संपन्न होते थे, उनकी इस विद्या में उतनी ही अधिक पैठ होती और वे इसे उतनी ही दक्षतापूर्ण संपादित करते थे, पर आज स्थिति दूसरी है। विज्ञान के पदार्पण ने इस कला को पूर्णरूपेण याँत्रिक बना दिया है। अब साधारण बुद्धि भी वैज्ञानिक यंत्र-उपकरणों के माध्यम से यह कार्य उतनी ही कुशलतापूर्वक कर गुजरती है, जितनी कि पहले प्रखर मेधा कर सकने में समर्थ थी। इसके लिए इन दिनों छोटे-बड़े नानाप्रकार के जासूसी उपकरणों का इस्तेमाल किया जा रहा है और इस विधा को एक नया आयाम दिया जा रहा है।
18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में जब विज्ञान ने मानवी जीवन को अनुगृहीत करना प्रारंभ किया, तो उसने समाज की कई धाराओं को भी प्रभावित किया और उन्हें सशक्त बनाया। इन्हीं में से एक गुप्तचर तंत्र भी ही। विज्ञान के निरंतर के अनुदानों से यह प्रणाली इतनी समृद्ध हुई कि देखते-देखते किसी की भी जासूसी कर लेना एकदम सरल हो गया। दूसरे शब्दों में कहें, तो यह विद्या विकास की उन ऊंचाइयों को स्पर्श करने लगी है, जिसकी कि शायद ही कभी कल्पना की गई हो।
विज्ञान जब किसी विध के साथ संयुक्त होता है तो उसकी क्षमता और दक्षता ही नहीं बढ़ती, अपितु उसका ऐसा कायाकल्प होता है कि वर्तमान रूप को देखकर उसके पूर्ण स्वरूप का अंदाज लगाना तक कठिन हो। आज की गुप्तचर पद्धति विज्ञान के अनुग्रह का ऐसा ही जीवंत प्रमाण हैं इसमें मुश्किल से दिखाई पड़ने वाले अत्यंत छोटे यंत्रों से लेकर आकाश में मंडराने वाले विशालकाय उपग्रह तक प्रयुक्त होते हैं। यह सभी अपने सहयोगी मनुष्यों को प्रतिपक्ष की महत्वपूर्ण सूचनाएं उपलब्ध कराते एवं उनकी वास्तविक शक्ति और प्रगति का अनुमान लगाने में मदद करते है। इससे दूसरे पक्ष को उन-उन क्षेत्रों में अपनी उन्नति और उत्कर्ष की रूपरेखा तैयार करने और तदनुरूप ताना-बाना बुनने में सहायता मिलती है।
उदाहरण के लिए उस कलाई घड़ी को लिया जा सकता है, जो पिछले दिनों अमेरिका की एक कंपनी ने विशेष रूप से तैयार की हैं यह घड़ी देखने में बिलकुल सामान्य प्रतीत होता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसे गुप्तचर्या के एक असाधारण औजार के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। इसके भीतर एक शक्तिशाली माइक्रोफोन फिट होता है, जो घड़ी धारण करने वाले के वस्त्र के अंदर एक छोटे टेपरिकॉर्डर से संबद्ध रहता हैं आवश्यकता पड़ने पर दोनों को आन कर किन्हीं की भी बातचीत कहीं और कभी भी टेप की जा सकती है। इसी तरह एक डिजिटल कलाई घड़ी भी विकसित की गई है। इसमें एक अति लघु कैमरा लगा है। यह कैमरा एक बार में सौ के करीब तस्वीरें खींच और स्टोर कर सकता है।
इसी प्रकार का एक अन्य छोटा कैमरा ‘मिनोक्स’ है। इसका आकार इतना लघु है कि उसे मुट्ठी में आसानी से घुमाया जा सकता हैं दस्तावेजों के चित्र उतारने के लिए वह आदर्श माना जाता है, किन्तु इसके साथ कठिनाई यह है कि दस्तावेजों को पठनीय बनाने के लिए निगेटिव को 25 से 30 गुना बड़ा करना पड़ता है। पूर्व सोवियत संघ ने ऐसे कार्यों के लिए चाबी के छल्ले जैसे दिखाई पड़ने वाले कैमरे तैयार करवाए थे। इसमें लैंस की जगह ‘पिनहोल’ का इस्तेमाल किया गया था। वस्तु या व्यक्ति दूर हो या पास, इससे खींची गई तस्वीर एकदम साफ होती थी। अब लोगों पर दृष्टि रखने के उद्देश्य से भी कैमरे बनाए जा रहे है। इन कैमरों का लेंस माचिस की तीली के सिर के बराबर होता है। इन्हें प्रायः दीवार घड़ी के भीतर फिट किया जाता है और इनका लेंस घड़ी की दोनों सुइयों को कसने वाले पेंच के स्थान पर होता है। जब से ऐसे कैमरों का प्रचलन शुरू हुआ, तभी से जासूसी में इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर आरंभ हो गया। ऐसे वीडियो कैमरे द्वारा की गई जासूसी का पहला मामला सन् 1979 में अमेरिका में तब प्रकाश में आया, जब ‘एबेस्कैम’ नाम से चलाए गए इस अभियान में सात अमेरिकी साँसद घूस लेते हुए पकड़े गये। उक्त वीडियो फिल्म द्वारा उपलब्ध कराए गए प्रमाण के कारण ही उन्हें जेल जाना पड़ा। पिछले दिनों भारतीय राजनीति में काफी समय तक छाए रहने वाले तहलका प्रकरण में भी ऐसे कैमरों का प्रयोग किया गया था।
आजकल सामान्य प्रयोग की वस्तुओं में ही ऐसे उपकरण लगा दिए जाते हैं कि सामने वाले को पता तक नहीं चलता कि वह साधारण-सी दीखने वाली वस्तु एक असाधारण जासूसी यंत्र है। ऐसी ही एक लिखने वाली कलम (पेन) गुप्तचर्या जगत् में विद्यमान हैं। यह दीखती और लिखती तो सामान्य कलम की तरह है, पर कार्य रेडियो ट्राँसमीटर जैसा करती है। इसमें एक अत्यंत शक्तिशाली नन्हा माइक्रोफोन फिट होता है। इसी के साथ एक सूक्ष्म ट्राँसमीटर ली लगा रहता है, जो कुशलतापूर्वक सिगनल भेजने का कार्य करता है। 5 मीटर की परिधि में बैठा कोई भी व्यक्ति रिसीवर के माध्यम से इन संदेशों को आसानी से सुन और रिकॉर्ड कर सकता है। पेन की बॉडी में एक छोटी बैटरी छिपी होती है, जिससे उसे लगातार ऊर्जा मिलती रहती है। यदि इस यंत्र से अनवरत रूप से काम लिया जाए, तो छह घंटे तक निरंतर उसे ऊर्जा मिलती रहती हैं
दिन के उजाले में तो किसी पर भी दृष्टि रखी जा सकती है, पर रात के अंधेरे में यह कार्य असंभव हैं मनुष्य की आंखें रोशनी में ही देखने की अभ्यस्त होती है, गहन निशा में तो उसे अपने शरीर के अंग भी दृष्टिगोचर नहीं होते। ऐसी स्थिति में शत्रु अपने कार्य आसानी से कर गुजरते है। इस दशा से बचने के लिए रात के अंधेरे में देखने वाले चश्मे विकसित किए गए है। इनसे इन्फ्रारेड किरणों की बौछार होती है, जो द्रष्टा को किसी भी वस्तु को साफ-साफ देखने में मदद करती है। इस चश्मे में टी.वी. कैमरे की तरह एक लेंस और ट्यूब लगी होती है, जो दृश्य बनाने का कार्य करती है। ट्यूबों की उपस्थिति में अंधकारपूर्ण दृश्य प्रकाशवान हो उठते है और जो आँख रात्रि में आमतौर पर कुछ भी नहीं देख पाती, उसे सब कुछ स्पष्ट दीखने लगता है। इस करिश्मे के पीछे चश्मे में लगी दो बैटरियों का महत्वपूर्ण हाथ है। यह बैटरियाँ चश्मे को ऊर्जा प्रदान करती है। ऊर्जा के अजस्र प्रवाह के कारण ही अवरक्त किरणों की निरंतर बौछार होती रहती है, जिसे सामने का शत्रु भलीभाँति दृश्यमान हो उठता है, जबकि उसे अपने प्रतिपक्षी का भान तक नहीं मिल पाता। ऐसा इसलिए कि अवरक्त किरणें अदृश्य स्तर की होती है। अतएव इन किरणों की मदद से देखने वाला सामने वाले को तो सुस्पष्ट देख लेता है पर स्वयं अगोचर बना रहता है।
इसी प्रकार रात के अंधेरे में तस्वीरें खींच सकने वाला एक कैमरा भी विकसित किया गया हैं। ऐसे कैमरे आमतौर पर जासूसी कार्य हेतु ही प्रयुक्त होता है। इन कैमरों की विशेषता यह है कि जलती सिगरेट से ही ये पर्याप्त प्रकाश ग्रहण कर बिलकुल साफ चित्र खींच सकते है। इसलिए इन कैमरों की आँखों से बचे रहने के लिए शत्रु पक्ष को सदा यह बात ध्यान में रखनी पड़ती है कि उसका कोई सदस्य ऐसी मुहिम में निकलने पर धूम्रपान से सदैव परहेज करे।
जासूसी प्रकरणों में यदि ‘बगिंग‘ और टेपिंग‘ जैसी प्रक्रियाओं का उल्लेख न हो, तो चर्चा अधूरी मानी जाएगी। यह दो ऐसी तकनीकें है, जिनका गुप्तचरी के कार्य में बढ़-चढ़कर उपयोग किया जाता है। शत्रुपक्ष क्या सोच रहा है और कैसी योजनाएं बना रहा है? यह उनके वार्तालापों से आसानी से जाना जा सकता है। उन्हें यदि सुन और टेप कर लिया जाए, तो उनके मनसूबों पर पानी फेरा जा सकना संभव हैं बगिंग और टेपिंग ऐसी ही दो प्रणालियाँ है, जिनमें प्रतिपक्ष की बातचीत को सुना और रिकॉर्ड किया जाता है। ‘बग‘ प्रायः उस मिनी और शक्तिशाली माइक्रोफोन को कहते है, जिन्हें जासूसी की जगह किसी उपयुक्त सामान में छिपा दिया जाता हैं। यह समान टेबल लैंप, गुलदस्ते, मेज, दीवार घड़ी, दरवाजे, पलंग, खिड़कियाँ आदि हो सकते है। इसके उपराँत जासूस किसी अन्य कमरे, भवन या पास खड़े वाहन में बैठकर अंदर की सारी बातचीत सुनते और रिकॉर्ड करते है। बगिंग की सबसे चर्चित घटना रूसियों द्वारा अमेरिकी दूतावास की जासूसी से संबद्ध हैं अमेरिका ने मास्को में जब पहली बार अपना दूतावास खोला, तो सोवियत संघ के दरवाजों पर लगाने वाले अमेरिकी प्रतीक चिन्ह उसके अधिकारियों को भेंट स्वरूप प्रदान किए। बाहर से देखने में तो यह सामान्य प्रतीक चिन्ह जैसे ही लगते थे, पर वास्तव में ये शक्तिशाली ‘बग‘ थे। इनके भीतर बड़ी कुशलतापूर्वक एक संवेदनशील स्प्रिंग लगाई गई थी। यह स्प्रिंग कमरे में होने वाली फुसफुसाहट जितनी धीमी बातचीत को भी पकड़ लेती थी और उन ध्वनि तरंगों के कारण काँपने लगती थी। रूसी जासूस इन कंपनों को राडार से पकड़कर उनकी बातचीत को जान लेते थे।
‘टेपिंग‘ प्रतिपक्ष की बातचीत को सुनकर रिकॉर्ड कर लेने की तकनीक को कहते है। इसका प्रयोग सामान्यतः टेलीफोन पर होने वाली बातचीत को सुनने और रिकॉर्ड करने में होता है। इसके लिए एक नन्हा ‘बग‘ टेलीफोन यंत्र लगा दिया जाता है। इससे संपूर्ण वार्तालाप टेप हो जाती हैं इस संदर्भ में ‘इनफिनिटी रिसीवर’ एक महत्वपूर्ण आविष्कार है। इस उपकरण को टेलीफोन लाइन के साथ संबद्ध कर दिया जाता हैं। उसके बाद जब उक्त कमरे का टेलीफोन नंबर डायल किया जाता है और साथ ही एक विशेष बटन दबाया जाता है, तो वह टेलीफोन अपना सामान्य काम करना बंद कर देता है और एक शक्तिशाली माइक्रोफोन में परिवर्तित हो जाता है। इस मध्य कमरे में हो रही किसी भी प्रकार की बातचीत को सुना ओर रिकॉर्ड किया जा सकता हैं। यह इतना शक्तिशाली यंत्र है कि विश्व के किसी भी स्थान में स्थित कमरे में हो रही वार्तालाप को सुना और टेप किया जा सकता हैं।
यह धरती पर धरती से होने वाली गुप्तचर्या की चर्चा हुई। इसके अतिरिक्त आकाश में उड़ने वाले टोही विमानों और निरंतर परिक्रमारत उपग्रहों से भी यह कार्य संपन्न होते है। जासूसी विमानों में अमेरिका का ‘ईपीफ्’ विमान सबसे आधुनिकतम हैं। इसे आमतौर पर ‘फ्लाइंग पिग‘ के नाम से जाना जाता है। अरबों डालर की लागत से बना यह विमान अपने उद्देश्यों में पूरी तरह सफल साबित हुआ है। इससे आसमान में उड़ रहे दूसरे विमानों के बीच की बातचीत और उनके तथा कंट्रोल टावर के बीच की वार्तालाप को सुना और रिकार्ड किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त इसमें टेलीफोन वार्तालाप को भी सुनने और टेप करने की व्यवस्था है। पिछले दिनों इसी विमान को लेकर अमेरिका और चीन में विवाद शुरू हुआ था। चीन का आरोप था कि वह उसके क्षेत्र में उड़कर जासूसी कर रहा था। इसी आधार पर उसने उसे अपने यहाँ उतार लिया। बाद में भारी जद्दोजहद के उपराँत उसे वहाँ से जाने की अनुमति दी गई।
ऐसे ही चौबीसों घंटे चक्कर लगाने वाले अमेरिकी जासूसी उपग्रहों की आँखों से कुछ भी छुपा नहीं रहता। हजारों किलोमीटर ऊपर परिक्रमा कर रहे इन उपग्रहों की आंखें इतनी पैनी होती है कि मकान की छत पर दाढ़ी बना रहे व्यक्ति की दाढ़ी के बाल बाँस की बल्लियों की तरह मोटे दिखाई पड़ते है। इतने पर भी इस क्षेत्र के प्रवीण पारंगत लोग उन्हें भी धोखा देने में सफल हो जाते है। पिछले दिनों भारत ने जो अति गोपनीय ढंग से सफल परमाणु विस्फोट किए, वह इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। महीनों पूर्व से हो रही इस तैयारी की भनक भी इन उपग्रहों को नहीं लग पाई, किंतु ऐसे प्रसंग यदा-कदा ही देखने में आते और अपवाद की श्रेणी में गिने जाते है। अधिकाँश अवसरों पर ‘ब्लैकवर्ड’, डार्क स्टार, ‘ईपीफ्’ जैसे टोही विमानों और चक्कर काटते उपग्रहों से बच पाना असंभव होता है।
अमेरिका जासूसी उपग्रहों की तर्ज पर अब योरोपीय समुदाय के देश ‘औरवेल’ प्रणाली की एक ऐसी परियोजना पर कार्य कर रहे हैं, जिसके द्वारा विश्व के किसी भी हिस्से को हर दो घंटे बाद अपने कंप्यूटर के परदे पर देखा जा सकेगा। 12 उपग्रहों और राडार से संयुक्त यह प्रणाली कंप्यूटर और इंटरनेट से संबद्ध होगी। इस परियोजना के अध्यक्ष स्टीफेन हाँब्स का कथन है कि यदि इस प्रणाली का उपयोग कर कोई व्यक्ति अपने शत्रु की निगरानी करना चाहेगा, तो सिर्फ अपना कंप्यूटर चालू करना पड़ेगा। उसके बाद शत्रु की गतिविधियाँ उसके समक्ष साकार हो उठेंगी। उसके घर, आँगन, छत, उपवन एवं इर्द-गिर्द के लोग और दृश्य कम्प्यूटर के परदे पर ऐसे उभर आएंगे, मानों वह उन्हें कंप्यूटर पर नहीं साक्षात देख रहा हो। इसमें राडार की मदद इसलिए ली गई कि रात का अंधेरा या मेघाच्छन्न आसमान इसमें कोई अड़चन पैदा न कर सके और किसी भी मौसम में कभी भी व्यक्ति अपने इच्छित स्थान का पर्यवेक्षण क्षण मात्र में कर ले। ऐसी उम्मीद है कि यह परियोजना सन 25 तक पूरी हो जाएगी और कार्य करना आरंभ कर देगी। तब इससे एक ही समय में दोहरे कार्य लिए जा सकेंगे। घर बैठे स्थान विशेष के भ्रमण-दर्शन भी हो जाएंगे और साथ ही वहाँ की टोह भी ली जा सकेगी।
विज्ञान के विकास ने गुप्तचर तंत्र को काफी संपन्न बनाया हैं जिस कार्य को करने में पहले लंबा समय लग जाता था, वह जासूसी उपकरणों के माध्यम से अब स्वल्प समय में संपादित हो जाते है। इससे समय, श्रम और शक्ति की तो बचत होती ही है, इसके अतिरिक्त अवाँछनीय कार्यों में जुटे लोगों की संलिप्तता के प्रत्यक्ष प्रमाण जुटा पाना भी अत्यंत सरल हो गया है। इससे पूर्व यह प्रमाण परोक्ष ही हुआ करते थे, जिसमें हेर-फेर की काफी गुंजाइश थी, पर वैज्ञानिक यंत्रों ने इस आशंका को बिलकुल नहीं तो काफी क्षीण अवश्य कर दिया है। अतएव इसका लाभ उठाया जाना चाहिए। जिस दिन इस विधा का पूर्णरूपेण सदुपयोग आरंभ हो जाएगा और विनाश की तुलना में उसे विकास में पूरी तरह नियोजित कर दिया जाएगा, समझा जाना चाहिए कि मानवी चिंतन ने विज्ञान के वरदान को अभिशाप में बदलने की मूर्खता छोड़ दी। यह उसके सुखद भविष्य का शुभ लक्षण होगा और मानवी उत्कर्ष का ब्रह्ममुहूर्त भी।
गुप्तचर्या एक कला है। वैज्ञानिक आविष्कारों से उसमें निखार आया है। यह निखार निष्कलंक तभी बना रह सकता है, जब उसमें हर एक के लिए मंगलकामना निहित हो। विद्वेषजन्य भावना उसके आत्मा की हत्या करती हैं तब वह प्रेरणा, प्रशिक्षण, शाँति और सुव्यवस्था की माध्यम न बनकर अराजकता की प्रेरक बन जाती हैं। यह खतरनाक स्थिति है। विश्व-मनीषा को इस ओर पर्याप्त ध्यान देना चाहिए।
चैत्र नवरात्रि तप-साधना का श्रेष्ठतम मुहूर्त है। यूँ तो साधना हरपल-हरक्षण शुभ होती है। किन्तु श्रेष्ठतम मुहूर्त में उचित रीति-नीति एवं विशेष विधान से की जाने वाली तप-साधना के परिणाम बहुत व्यापक और असरकारक होते हैं। ऐसे तप से कठिन प्रारब्ध के दुर्धर्ष दुर्योग कटते हैं और उज्ज्वल जीवन की प्रकाश किरणें अवतरित होती हैं। यह पूरी तरह से शास्त्र सम्मत एवं साधना विज्ञान के मर्मज्ञ महर्षियों द्वारा अनुभूत सत्य है कि चैत्र नवरात्रि की साधना के प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं। बशर्ते कि साधना की रीति-नीति एवं अनुशासनों का ढंग से पालन किया गया हो। इन दिनों ग्रहों की गति, सौर मण्डल में सूर्य के चारों ओर भ्रमण कर रही पृथ्वी की स्थिति कुछ अलग ही होती है। इन दिनों समूची प्रकृति कुछ ऐसे सरंजाम जुटाती है, जो चर्म चक्षुओं से भली प्रकार नजर न आने के बावजूद साधकों की साधना के लिए विलक्षण होते हैं।
जो जाग्रत् हैं, जिन्हें ठीक-ठीक समझ है, वे इन दिनों जीवन के अन्य सभी कामों को कम करके साधना अनुष्ठान के लिए संकल्पित होते हैं। अपने देव परिवार के सदस्यों की गणना ऐसे ही समझदारों में होती है। गुरुदेव को समर्पित शायद ही ऐसा कोई शिष्य-साधक हो, जो नवरात्रि साधना से वंचित रहा हो। यदि किसी के जीवन में कभी ऐसे अवसर आए भी हैं, तो अवश्य उसकी कोई मजबूरी रही होगी। अन्यथा तपोमूर्ति गुरुदेव की सन्तानें तप साधना से कब पीछे हटने वाली हैं। और वह भी तब, जब श्रेष्ठतम मुहूर्त ने द्वार पर दस्तक दी हो। साधना के अभ्यासी अपने तपस्वी परिजनों से इस विशेष नवरात्रि में कुछ विशेष ही उम्मीदें रखी गयी हैं। उनके सम्मिलित तप के महास्त्र का उपयोग युगान्तरीय चेतना अपने उच्चस्तरीय प्रयोजन हेतु करने वाली है।
इस तरह इस बार की चैत्र नवरात्रि हर दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। वैयक्तिक एवं वैश्विक दोनों ही दृष्टियों से इस अवसर पर किया जाने वाला तप संजीवनी औषधि की भाँति है। हमारी राष्ट्रमाता माँ भारती तो जैसे हमेशा ही अपनी तपस्वी सन्तानों को पुकारती रहती है। आज उसकी जो पीड़ा और छटपटाहट है, वह किसी भी हृदयवान को विकल कर देने के लिए पर्याप्त है। इससे छुटकारे के लिए तप का प्रचण्ड पराक्रम चाहिए। तप के महावज्र से ही माँ भारती को कष्ट देने वाले असुरों का संहार होगा। महातप की ऊर्जा का प्रबल वेग ही उन दुर्योगों को तहस-नहस करेगा, जिनमें हमारी राष्ट्रमाता कसी-जकड़ी, फंसी-बंधी है।
इस सच को जानकर भी महातपस्वी अगस्त्य के, अपने तप से नयी सृष्टि को जन्म देने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के वंशज तप में संलग्न न हों, भला यह कैसे सम्भव है? अपने समूचे जीवन तप की धधकती ज्वालाएँ बनकर जीने वाले परम पूज्य गुरुदेव की सन्तानों को तप ही शोभा देता है। नवरात्रि की शुभ घड़ी हमारे जीवन में तप की सुदीर्घ प्रक्रिया और परम्परा का शुभारम्भ करने आयी है। इन परम पावन दिनों में किए जाने वाले तप के स्वरूप से हम सभी परिचित हैं। पर हममें से कुछ ऐसे भी होते हैं, जो किसी जल्दबाजी या भूलवश तप की प्रक्रिया को आधा-अधूरा ही करके सन्तुष्ट हो जाते हैं। पर इस बार किसी भी तरह ऐसे भूल या भ्रम की कोई गुँजाइश नहीं है।
तप साधना प्रखर एवं प्रचण्ड तभी बनती है, जब उसमें सम्यक् उपासना के साथ साधना और आराधना के कठोर अनुशासन जुड़ें हों। उपासना के क्रम में साधकों को पूरी भक्ति एवं श्रद्धा के साथ 24,000 का जप पूर्ण करना होता है। नवरात्रि के दिनों के हिसाब से प्रतिदिन की जप संख्या का निर्धारण होता है। 30 माला जप करने से जप संख्या का विधान भली-भाँति पूरा हो जाता है। परन्तु जैसे-तैसे जप पूरा कर लेना उपासना नहीं है। इसके लिए प्रतिदिन निश्चित संख्या, निश्चित समय एवं निश्चित स्थान के नियम का पालन करते हुए अपनी पूजा वेदी पर गुरु और ईष्ट के पूजन के साथ जप करना चाहिए। जो अंतर्मन में सद्गुरु एवं ईष्ट की एकता को अनुभव करते हैं। उनके लिए गुरु पूजा ही पर्याप्त है। तप के साथ सूर्यमण्डल में स्थित गुरुदेव या माँ गायत्री कर ध्यान अनिवार्य है। गायत्री महामंत्र का जप सूर्य चेतना के सन्दोहन का विशिष्ट विज्ञान है। इसलिए जप काल में ध्यान की प्रगाढ़ता कुछ ऐसी होनी चाहिए कि साधक को यह स्पष्ट अनुभूति हो कि वह स्वयं अनन्त किरणों वाले सूर्य की एक प्रकाश किरण बन गया है।
उपासना काल में जिस ऊर्जा का अवतरण होता है, उसके धारण करने की प्रक्रिया साधना कही जाती है। छलनी में अमृत की धार भी गिरे तो भी वह टिकेगी नहीं। उपासना में प्राप्त तप शक्ति का अमृतत्त्व टिक सके इसके लिए साधना का समुचित पात्र चाहिए। साधना का अर्थ है कठोर संयम, शरीर ही नहीं मन पर भी नियंत्रण रखना। उन सभी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों को वर्जित समझना जो हमारी जीवनी शक्ति को नष्ट करती हैं, हमारी चिन्तन शक्ति को विकृत एवं बर्बाद करती हैं। यदि व्यावहारिक रूप से कतिपय साधना सूत्रों को अपनाना हो तो तप के विशेष समय में शारीरिक तल पर 1. ब्रह्मचर्य, 2. अस्वाद, 3. किसी से सेवा न लेना, 4. कठोर बिछौने पर शयन करना एवं 5. दिनचर्या को पूर्णतया नियमित एवं अनुशासित रखना जैसे सूत्रों को अपनाया जा सकता है।
मानसिक तल पर साधना के व्यावहारिक तल पर 1. किसी भी तरह के ईर्ष्या, द्वेष से बचना, 2. पर चर्चा, पर निन्दा से हर तरह से बचना, 3. विपरीत परिस्थितियों में भी क्रोध न करना, शान्त रहना, 4. परेशानी आने पर भी आदि शक्ति जगज्जननी माँ गायत्री एवं परम कृपालु गुरुदेव की कृपा पर विश्वास करके प्रसन्न रहना, एवं 5. नियमित स्वाध्याय करना जैसे सूत्रों को अपनाया जाना चाहिए। शारीरिक और मानसिक तल पर इन सभी अनुशासन सूत्रों को अपनाने वाला अपने आप ही सुपात्र, सत्पात्र बन जाता है। उसमें उपासना द्वारा प्राप्त शक्ति केबल पर ब्रह्मतेज चमकने, छलकने लगता है। यदि उपासना और साधना का ऐसा सुयोग कुछ वर्षों तक नियमित रूप से रह सके तो फिर उसके संकल्प मिथ्या नहीं होते। उसके द्वारा सोचे गए कार्य अनायास ही होने लगते हैं। दुर्धर्ष दुर्योगों के चक्रव्यूह अपने आप ही ध्वस्त होते हैं। साधक पर माँ आदिशक्ति की कृपा कुछ ऐसी होती है कि कुटिल काल भी अपनी चाल बदलने पर मजबूर होता है।
तप साधना का तीसरा महत्त्वपूर्ण आयाम है आराधना। यह दरअसल तप से उत्पन्न ज्ञान है। तप साधना की चरम परिणति है ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की प्रबल भावानुभूति है। तपस्वी यदि सच्चा है तो वह आराध्य के बगैर नहीं रह सकता। वह अपने तप के सुपरिणामों, सत्परिणामों का वितरण करता चला जाता है। आराधना तप की सुगन्ध है, तप का ज्योतिर्मय प्रकाश है, तप की ऊर्जा का अनुभूतिपूर्ण विस्तार है। यह स्वयं की आत्म चेतना का व्यापक विस्तार है। नवरात्रि के विशेष दिनों में यदि इसके व्यावहारिक सूत्रों पर चर्चा करनी हो तो 1.सबसे बिना किसी भेदभाव के प्रेमपूर्ण व्यवहार, 2. परिवेश-परिकर के अन्य जनों को साधना के लिए प्रेरित करना, 3. विचार क्रान्ति के सत्साहित्य को औरों को पढ़ाना, 4. छोटे स्तर पर ही सही किसी सुपात्र की सहायता करना एवं 5. सृष्टि के सभी प्राणी जगन्माता गायत्री की सन्तानें हैं, सबमें माँ ही समायी है, ऐसी भावानुभूति में जीना।
उपासना, साधना एवं आराधना के ये सभी सूत्र मिलकर तप की उच्चस्तरीय प्रयोग भूमि विनिर्मित करते हैं। इसके परिणाम कैसे और कितने प्रभावकारी है, यह कहने-सुनने की बात नहीं है। नवरात्रि के दिनों में इन्हें अपनाने वाले की अनुभूति अपने आप ही इसकी सत्यता बखान कर देगी। प्रयोग के अन्तिम दिन साधक को पूर्णाहुति के रूप में हवन का विशेष उपक्रम करना चाहिए। हवन की प्रत्येक आहुति के साथ यह भाव रखा जाना चाहिए। कि अपने देव परिवार के सदस्यों की सम्मिलित तप ऊर्जा से राष्ट्रीय आपदाएँ ध्वस्त हो रही हैं। माँ गायत्री की कृपा से समूचे राष्ट्र में उज्ज्वल भविष्य की सुखद सम्भावनाएँ साकार हो रही हैं। चैत्र नवरात्रि के विशेष अवसर पर गायत्री साधकों का सम्मिलित तप प्रयोग ऐसे सुखद और आश्चर्यकारी परिणाम उत्पन्न करेगा, जिससे दूसरे भी चकित एवं चमत्कृत हुए बिना न रह सकेंगे।
वातव्याधियों में गठिया वात या जोड़ों का दर्द सबसे अधिक पीड़ादायक होता है। इस रोग में शरीर के विविध जोड़ जैसे-उंगलियों के जोड़, कलाई, कोहनी, कंधे, टखने, पंजे, घुटने, पिंडलियों, कूल्हे, कमर, गरदन आदि प्रभावित होते है। मेडिकल साइंस में इसे ‘आर्थाइटिस’ कहते है। आर्थ्राइटिस का अर्थ है, जोड़ों की सूजन या क्षति। यह किन कारणों से उत्पन्न होता है, इसकी पूर्ण जानकारी मेडिकल साइंस के पास नहीं है। माना जाता है कि यह एक वायरस जन्य रोग है, ये वायरस जोड़ों की किन्हीं विशेष कोशिकाओं को संक्रमित कर उनमें विकृतियाँ उत्पन्न कर देते है। इसे कालाँतर में हड्डियों एवं उपस्थि मुड़ने व घिसने लगती है। जोड़ों की बाह्य सुरक्षा कवच- साइनोवियल झिल्ली में सूजन आ जाती है और वह अधिक मात्रा में साइनोवियल द्रव्य का स्राव करने लगती हैं इससे शोध बढ़ जाता है और जोड़ क्षतिग्रस्त होने लगते है। इससे रोगी को चलने-फिरने में कठिनाई होती है। खान-पान, रहन-सहन एवं आनुवंशिकता भी इसके लिए उत्तरदायी माने गए है।
आर्थ्राइटिस रोग कई प्रकार का होता है। इनमें से प्रमुख है, (1) रियूमेटाँइड आर्थाइटिस अर्थात संधिवाल, (2) आँस्टियों आर्थ्राइटिस या संधिशोथ, (3) गाउट या गाँठदार गठिया (4) जुवेनाइल रियूमेटाँठड आर्थ्राइटिस, (5) एंकाइलोजिंग स्पाँन्डिलाइटिस, (6) सोरियाटिक आर्थ्राइटिस आदि।
रियूमेटाँइड आर्थ्राइटिस अर्थात् संधिवात को आमवातीय जोड़ों का दर्द भी कहते है। यह ‘आटोइम्यून’ रोग माना जाता है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता (इम्यून सिस्टम) गड़बड़ा जाने के कारण जोड़ों में विकृति उत्पन्न हो जाती है और वे सूज जाते है। यह सूजन जोड़ों की झिल्ली जिसे ‘साइनोवियल मेम्ब्रन’ कहते है, से आरंभ होती है, जिसके कारण साइनोवियल फ्लूइड अधिक मात्रा में बनने लगता है और जोड़ों के रिक्त स्थानों में भर जाता है। आगे चलकर इसे कोमल अस्थियों-’कार्टिलेज’ को भारी क्षति पहुँचती हैं कभी-कभी ये गल तक जाती है, जिससे जोड़ों में जकड़न व दर्द बढ़ जाता है।
रियूमेटॉइड आर्थ्राइटिस का आरंभ हाथ-पैर के छोटे जोड़ों में दर्द व सूजन से आरंभ होता है। सर्वप्रथम यह हाथ-पैर के बीच की दोनों उंगलियों के जोड़ों से शुरू होता है और धीरे-धीरे पूरे हाथ, पंजे, कलाई, कोहनी, कंधे, टखने, घुटने और कभी-कभी गरदन की हड्डियों के जोड़ तक फैल जाता है। समय पर उपचार न होने से यह रोग धीरे-धीरे असाध्य बन जाता है। जोड़ों की संधियाँ संकुचित होने लगती है और हाथ-पैर टेढ़े होने लगते है। जोड़ों में दर्द के साथ-साथ शोथ भी रहता है। यह रोग किसी भी आयु के नर-नारी को हो सकता है, पर अधिकतर चालीस वर्ष के बाद इसका प्रकोप अधिक होता है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं इसकी चपेट में अधिक आती है। जोड़ों का दर्द सर्दियों में तथा सुबह के समय अधिक होता है। शरीर में जकड़न, थकान, बुखार, वजन में कमी, रक्ताल्पता, आँखों में सूजन, फेफड़ों में सूजन आदि के लक्षण भी आगे चलकर प्रकट होने लगते है, जो इस बीमारी की गंभीरता को दर्शाते है। इन्हें रियूमेटिक बीमारियाँ भी कहते हैं
आँस्टियों आर्थाइटिस अर्थात् अस्थि संधिशोथ, इसे बढ़ती आयु अथवा बुढ़ापे का रोग भी कहते है। पुरुषों में यह पैंतालीस वर्ष से पूर्व एवं महिलाओं में पचास-पचपन वर्ष के बाद होता है उन जोड़ों पर इसका आक्रमण अधिक होता है जिन पर शरीर का भार अधिक होता है अथवा जिनका प्रयोग अधिक होता है, जैसे घुटना, कूल्हा, गरदन, कमर का निचला हिस्सा तथा हाथों के जोड़। प्रायः देखा जाता है कि मोटापे से ग्रस्त व्यक्तियों को आँस्टियों आर्थ्राइटिस अधिक होता है, विशेषकर घुटने के एवं कूल्हे के जोड़ों का। इसका प्रमुख कारण यह है कि शरीर का वजन अधिक होने के कारण पूरे वजन का सीधा असर घुटनों एवं कूल्हे पर पड़ता है, जिससे ये अंग रोगग्रस्त हो जाते है। आँस्टियो आर्थ्राइटिस जहाँ शरीर के बड़े जोड़ों जैसे घुटने, कूल्हे आदि प्रभाव डालता है, वही रियूमेटाँइड आर्थ्राइटिस छोटे जोड़ों यथा उंगलियों, हाथ, पंजे, कलाई, कोहनी आदि पर असर करता हैं अधिक देर तक घुटने मोड़कर बैठना, पालथी मारकर बैठना, व्यायाम न करना, शरीर का वजन बढ़ना, मोटापा आदि कई कारण ऐसे हैं, जो इस महाव्याधि को पैदा करते है। इसके अतिरिक्त पुरानी गंभीर चोट या ऑपरेशन के कारण भी कई बार यह रोग पनप जाता है। उम्र बढ़ने के साथ जोड़ वाले हिस्से की माँसपेशियाँ, तंतु, लिगामेन्ट आदि कमजोर होने लगते है, जिसे उनमें आई विकृति भी संधिशोथ का कारण बनती है।
उक्त सभी प्रकार के जोड़ों के दर्द व सूजन की समय पर चिकित्सा उपचार न करने व रोग पुराना होने पर वे कठोर पड़ने लगते हैं और जोड़ों पर लाकिंग-सी हो जाती है, जिससे उठना-बैठना, चलना-फिरना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में कई बार शल्यक्रिया और जोड़ प्रत्यारोपण का सहारा लेना पड़ता है। सभी प्रकार के आर्थ्राइटिस राग जीवनी शक्ति की कमी, रोग प्रतिरोधी क्षमता का ह्रास व उपापचय प्रक्रिया में गड़बड़ी के कारण उत्पन्न होते है। इससे बचने के लिए आवश्यक है कि संतुलित आहार लें, घी, चीनी, चिकनाई कम खाएं, भोजन में कैल्शियम की मात्रा पर्याप्त लें, दूध, हरी शाक-सब्जी, गरम मसाले, मेथी, राई, फलियों वाली सब्जी खूब खाएं, व्यायाम करें, मेहनत करें और मोटापे से बचे। देर तक व लेटकर टी.वी. न देखें। कार्बाइड से पके फल, ठंडी चीजें, जूस, खट्टी व वातवर्द्धक चीजें, टमाटर, नीबू, दही, अचार, इमली, साइट्रिक व टारट्रिक एसिड मिश्रित चीजें, ठंडी हवा आदि से सेवन से बचना चाहिए।
सभी प्रकार के जोड़ों के दर्द, गठिया आदि से छुटकारा दिलाने में सबसे अधिक प्रभावी, सुरक्षित एवं निरापद चिकित्सा यज्ञोपचार सिद्ध हुई है। इसे प्रत्येक आयु-वर्ग का हर कोई व्यक्ति अपना सकता है और इस कष्टकारी महाव्याधि से मुक्त हो सकता है। इसकी विशेष हवन सामग्री इस प्रकार तैयार की जाती है।
गठियावात या जोड़ों के दर्द की विशिष्ट हवन सामग्री- 1-महारास्नादि क्वाथ (26 औषधियाँ), 2- दशमूल (दस औषधियाँ), 3- निर्गुन्डी, 4- नागरमोथा, 5- पाढ़ा, 6- भारंगी, 7-मूर्वा, 8-एरंड मूल, 9-गिलोय, 10-हरड़, 11-वायविडंग, 12-कुटकी, 13-गुग्गुल, 14-सर्पगंधा, 15-पिप्पलीमूल, 16-मुलहठी, क्स्त्र-अश्वगंधा, 17-त्रिकुट, 18−हींग, 19-अजमोद, 20-बच, 21-चित्रक, 22-इंद्रायण, 23-अकरकरा, 24-सलई गोंद, 25-ज्योतिष्मती, 26-वासा। इनमें से क्रमाँक 1 से 10 तक की औषधियाँ बराबर मात्रा में, क्रमाँक 11 से 18 तक उसकी आधी मात्रा में, क्रमाँक 19 से 26 तक की औषधियाँ चौथाई मात्रा में (1/4 भाग) एवं 27 की वासा को दो गुनी मात्रा में लिया जाता हैं।
उपर्युक्त सभी 26 चीजों को जौकुट करके ‘हवन सामग्री नंबर (2) के रूप में अलग डिब्बे में रख लेते है। इसी सम्मिश्रित पाउडर की कुछ मात्रा को बारीक पीसकर कपड़छन करके खाने के लिए रख लेते है और हवन के पश्चात् सुबह-शाम एक-एक चम्मच शहद के साथ नित्य नियमित रूप से खाते है।
हवन करते समय पहले से तैयार की गई, ‘काँमन हवन सामग्री नंबर (1) को बराबर मात्रा में लेकर उपर्युक्त नंबर (2) हवन सामग्री में मिलाकर तब हवन करते है। काँमन हवन सामग्री नं. (1) में अगर, तगर, देवदार, लाल चंदन, श्वेत चंदन, अश्वगंधा, गुग्गल, लौंग, जायफल आदि चीजें बराबर मात्रा में मिली होती है। हवन सूर्य गायत्री मंत्र से किया जाता है। कम-से-कम 24 बार मंत्रोच्चार करते हुए आहुति अवश्य डालनी चाहिए।
जोड़ों के दर्द में गठिया पीड़ित अंगों पर वातनाशक तैल की मालिश अवश्य करनी चाहिए। वातनाशक तैल में प्रयुक्त होने वाली सामग्री इस प्रकार है, (1) सरसों तेल-500 ग्राम, (2) काली हल्दी-8 ग्राम, (3) मेथी बीज-8 ग्राम, (4) धतूरा बीज-8 ग्राम, (5) पीले कनेर की जड़-8 ग्राम, (6) कुचला-8 ग्राम, (7) आकमूल-8 ग्राम, (8) शतावर-8 ग्राम, (9) विधारा-8 ग्राम, (10) चोपचीनी-8 ग्राम, (11) निर्गुन्डी-8 ग्राम, (12) केवाकंद-8 ग्राम, (13) हरसिंगार के पत्ते-8 ग्राम, (14) भाँग पत्ती-4 ग्राम, (15) लहसुन-4 ग्राम, (16) पिप्पली-4 ग्राम, (17) मिर्च बीज-3 ग्राम, (18) अजवायन-2 ग्राम, (19) भिलावा-2 ग्राम, (20) कंटकारी (भटकटैया) मूल-2 ग्राम, (21) कलिहारी मूल-1 ग्राम, (22) प्रियंगुबीज-5 ग्राम, (23) तंबाकू-1/4 ग्राम, (24) शंखिया-2 ग्राम, (25) अफीम-2 ग्राम , (26) पिपरमेंट सत-4 ग्राम, (27) अजवायन सत-4 ग्राम, (28) कपूर सत (भीमसेनी)-8 ग्राम, (29) मिथाइल सेलिसेलेट-3 मि.ली।
तैल बनाने की विधि इस प्रकार है-क्रमाँक 20 से 26 तक की सभी औषधियों को गेहूँ के दाने के बराबर टुकड़े-टुकड़े (जौकुट) करके उसे सरसों के तेल में डालकर धीमी आँच में पकाएं। बीच-बीच में बड़े चम्मच से चलाते रहें, ताकि जलने न पाए। जब सभी औषधियां पककर काली होने लगें और तेल जलने की सुगंध आने लगे, तब उतार लें। ठंडा होने पर कपड़े से छान लें। तत्पश्चात् क्रमाँक 26 से 28 तक की वस्तुओं को स्टील या काँच के बरतन में मिला लें, जिससे यह मिश्रण पानी बन जाएगा। फिर इस घोल में 3 मि.ली. मेथाइल सेलिसेलेट मिला दें। फिर इस मिले हुए घोल को छने हुए तेल में मिला दें। वातनाशक तैल तैयार है।
सभी प्रकार के आर्थ्राइटिस, जोड़ों का दर्द, गठियापन, साइटिका, माँसपेशियों का दर्द, चोट, मोच आदि सभी में यह तैल अत्यंत लाभकारी है। इसे हर कोई आसानी से बना सकता है।
‘उग्रश्रवा तुम्हारी तपश्चर्या कठोर एवं साधना उत्कृष्ट है। लेकिन अभी तुमने अध्यात्म ज्ञान के रहस्य को नहीं जाना है। अध्यात्म ज्ञान का यह रहस्य गुरुभक्त अनिमेष के पास है। उसकी दृष्टि क्रान्तिदर्शी एवं अन्तर्चेतना निर्दोष व निर्मल है। गुरुभक्ति के प्रभाव ने उसे सर्वथा अहंशून्य बना दिया है। प्रखर अध्यात्मवेत्ता होने पर भी उसमें कोई गर्व नहीं है। जबकि तुम अध्यात्म ज्ञान से शून्य होने पर भी हमेशा ही अपने तप का गर्वपूर्वक बखान किया करते हो।’
अपनी देह को मृतवत बनाकर सर्वसहिष्णु बनने की कामना से उन्होंने अखण्ड तपस्या करनी प्रारम्भ कर दी थी। वर्षा से गीली उनकी केशराशि उलझ कर वृक्ष की जटाओं जैसी बन गयी। सालों-साल तक अपनी जगह से तनिक सा भी न हिलने के कारण उनके शरीर पर धूल की मोटी परतें जम गयीं। निर्जल-निराहार तप करते-करते उनकी हृष्ट-पुष्ट देह सूखे काठ की भाँति होकर रह गयी। लेकिन तप के तेज उनके चित्त को सुस्थिर एवं व्यग्रता-विरहित बना दिया था।
काठ की भाँति जरा-जर भरे एक ठूँठ हुए सूखे पेड़ की भाँति दिखने वाले उनके सिर की जटाओं में अवसर पाते ही एक गौरैया ने घोंसला बना लिया। वहीं गौरैया ने अण्डे दिए और उसके नन्हें पक्षी वहीं बसेरा करने लगे। तपस्या में डूबे उग्रश्रवा का हृदय यह अनुभव करके करुणा से भर आया। उन्होंने अपनी जगह से बिना थोड़ा सा हिले-डुले, उन पक्षियों के सुख में सहयोग देकर अपनी साधना की सफलता का सुख अनुभव किया। इसमें एक समय ऐसा भी आया कि बच्चों सहित सभी पक्षी दूर कहीं उड़ गए और फिर नहीं लौटे।
उग्रश्रवा के लिए यह आनन्द एवं गर्व का विषय बन गया। वे यह सोचकर हर्षित हो गए कि पक्षियों का समूचा परिवार उनकी जटाओं में लम्बी अवधि तक रहा और वह तनिक भी विचलित नहीं हुए। उनकी साधना एक निष्ठ और अडिग बनी रही। अपनी इसी भावना से अभिभूत हो वह गर्व से भर उठे और आत्मालाप करते हुए अपने अंतर्मन की बातें कहने लगे- कि मैंने इस धरती पर अध्यात्म का रहस्य जान लिया है। सूर्य की प्रखरता एवं तेजस्विता से भी कहीं बढ़कर मेरी तपस्या का तेज है। मेरी यह तप साधना की महिमा पूरी दुनिया में प्रसारित होना चाहिए। मैंने कठिन से कठिन एवं विपरीत क्षणों में उग्र तप करके विजय पायी है।
मेरी तप साधना की बराबरी कर सके, ऐसा भला त्रिभुवन में कौन होगा? अतः अब मैं यहाँ से जाकर मनुष्य-समाज में पहुँचूँगा उन्हें इस अध्यात्म-रहस्य और अपने तप-तेज से परिचित करवाऊँगा। और उन सभी को बताऊँगा कि समूचे जगत् में ऐसी महान् साधना करने वाला दूसरा कोई भी नहीं है? आत्मश्लाघा और अहंकार से उनका मन-प्राण ओतप्रोत था, तभी उन्हें आकाशवाणी से ये वचन सुनने को मिले-
तुम अभी अध्यात्म के रहस्य से अनजान हो, उग्रश्रवा। जाओ और शिव नगरी-काशी जाकर गुरुभक्त अनिमेष से अध्यात्म के सच्चे स्वरूप की शिक्षा प्राप्त करो।
उद्विग्न हो उठे उग्रश्रवा। ईर्ष्या और क्रोध से उनके मुख की भंगिमाएँ विकृत हो उठीं। वह सोचने लगे- मेरी इतनी घोर साधना, दिन-रात, धूप-वर्षा, भीषण शीत, उग्रतपन किसी की भी चिन्ता किए बिना अविचलित भाव से बियावान, भीषण, भयानक जंगल में निराहार जीवन बिताया और काशी के साधारण से व्यक्ति अनिमेष के सामने उसकी सारी तपस्या निष्फल हो गयी। अन्तर्द्वन्द्व से उनका मन हाहाकार कर उठा। तप की स्थिरता क्षण भर में ही जल के फेन की भाँति विलीन हो गयी।
जैसे भी हो शीघ्र ही मुझे वाराणसी जाकर उस अनिमेष से भेंट करनी होगी। ऐसा क्या है उसके पास, जो आकाश के देवगण भी उसका यश-गान कर रहे हैं।
दुर्गम वन को पार करते हुए वह वाराणसी की ओर चल पड़े। पथ की बाधाएँ उन्हें विचलित न कर पायीं। विन्ध्याचल की दुर्लघ्य पर्वत श्रेणियाँ भी उनके लिए सुगम बन गयीं। एक बार फिर से वह दृढ़ निश्चयी बने, बिना थके, बिना रुके, उस पथ पर भूखे-प्यासे वह तब तक चलते रहे जब तक वाराणसी न पहुँच गए।वाराणसी में अनिमेष से सभी परिचित थे। गुरु आज्ञा के अनुसार वह अपना जीवन बिता रहे थे। सेवा-साधना एवं लेखनी व वाणी से गुरुज्ञान का प्रकाश, यही उनका जीवन मंत्र था। जो लोग उनके सान्निध्य में आते उन सबसे वह यही कहते- मैं तो अपने सद्गुरु का यंत्र हूँ। मेरे कार्य-विचार और जीवन में जो प्रकाश और सद्गुण है, वे सब के सब मेरे गुरुदेव के हैं। जो कमियाँ है, वे सिर्फ मेरी हैं। सामान्य रहन-सहन, सामान्य जीवन क्रम में हर कहीं उनकी गुरुभक्ति की सजलता छलकती थी। परन्तु द्वन्द्व से विचलित उग्रश्रवा को उनका यह जीवन कतई समझ में न आया। वह चुपचाप वहीं खड़े हो गए और अनिमेष से वार्ता की प्रतीक्षा करने लगे। अनिमेष उस समय पास खड़े किसी व्यक्ति की कोई उलझन सुलझा रहे थे।
मुझे ज्ञात है देव कि अविश्रान्त दुर्गमपथ पार करके आप मेरे समीप आए हैं। पथ में भूखे-प्यासे आपको अनेक कष्ट उठाने पड़े हैं। यह भी मुझे अपने गुरुदेव की कृपा से ज्ञात है कि स्वयं को अकेले मर्मज्ञ मानने के कारण आप जिज्ञासा भाव से आकाशवाणी सुनकर मेरे समीप आए हैं। आदर-भाव से अनिमेष अब तक उग्रश्रवा के समीप आ चुके थे। आप मेरे समीप ही कुछ समय विश्राम करें फिर मैं आपकी जिज्ञासा दूर करूंगा।
अनिमेष की विनम्र शान्तवाणी सुनकर उग्रश्रवा को आश्चर्य हुआ। अनिमेष एक बार फिर अपने कार्य में व्यस्त हो चले थे।
संध्या उतर आयी थी। दैनिक गायत्री तप से निवृत्त हो अनिमेष अब निश्चित भाव से आसन ग्रहण कर चुके थे, उग्रश्रवा की शंकाओं को दूर करने के लिए।
शान्त, संयमित वाणी में अनिमेष ने उन परम तपस्वी से निवेदन किया।
हे देव! मुझे भली भाँति ज्ञात है कि निरन्तर कठोर तप से आपने महती सिद्धि प्राप्त कर ली थी। इतना ही नहीं स्थाणु बनी आपकी देह में पक्षियों ने भी घोंसले बना लिए थे। आप लेशमात्र भी विचलित नहीं हुए। किन्तु ‘आप सबसे बड़े अध्यात्मवेत्ता हैं’ यही मिथ्या गर्व आपके लिए अनिष्टकर बन गया। साधना रूपी कल्पतरु को छिन्न-भिन्न करने वाला ‘अहंकार-कुठार’ दीर्घ साधना के बाद भी आप में छिपा रहा। यही आपके लिए घोर शत्रु बन गया और इसी कारण आपको आकाशवाणी सुनाई पड़ी। अब आप ही बताइए कि मैं आपका कौन सा प्रिय कार्य करूं? जिससे आपका कल्याण हो सके।
अनिमेष की ऐसी वाणी से उग्रश्रवा की आँखें खुल गयी। वह स्तब्ध रह गए। निर्जन अरण्य में उनके साथ जो भी हुआ, उसका रहस्य यहाँ इतनी दूर बैठे इस अनिमेष को कैसे मालूम हुआ? इसी विस्मय से भरे उन्होंने अनिमेष से प्रश्न किया, हे अनिमेष! आप मनीषी हैं, अपने सद्गुरु की आज्ञा के पालन में निरत हैं। परन्तु जितना मैंने आपके बारे में जाना-सुना है, उसके अनुसार आपने कोई कठोर तप नहीं किया। फिर आपने ऐसी अलौकिक सिद्धि कहाँ से, कैसे प्राप्त की। निरन्तर गुरु कार्य में लगे रहकर- गुरु के विचारों का प्रसार करते हुए आपको यह अध्यात्म रहस्य कहाँ से और कैसे प्राप्त हुआ? कृपया आप मुझे इस अध्यात्म ज्ञान को बताने की कृपा करें।
उग्रश्रवा का गर्व छंट चुका था, वाणी में विनम्रता उतर आयी थी।
अनिमेष ने पहले की ही भाँति संयत वाणी में अध्यात्म का रहस्य उग्रश्रवा के सामने रखा, ‘जो समस्त प्राणियों में मैत्री का भाव रखता है, और सबका हित चिन्तन करता है, वही सच्चा अध्यात्मवेत्ता है। किसी प्राणी के साथ द्रोह भाव विहीन जीवनवृत्ति ही श्रेष्ठ धर्म है। गुरुकृपा से मैंने इस सत्य को जाना और समझा है। हे मुनिवर! मेरे गुरुदेव ने अपनी देह का त्याग करने से पूर्व मुझे यह निर्देश दिया था कि समस्त मनुष्यों को बिना किसी भेदभाव के मेरे ज्ञान का प्रकाश बाँटना। अपमान-तिरस्कार, उपेक्षा-अवहेलना को प्रीतिपूर्वक सहन करते हुए अपने कर्त्तव्य कर्म में निरत रहना। गुरुप्रेम एवं गुरुभक्ति ही मेरा सर्वस्व है। यही मेरा वह अभेद्य कवच है- जिससे समस्त विपदाएँ टकराकर चूर-चूर हो जाती हैं। गुरुभक्ति ही मेरा तप है- इसी से धर्म जीवन का रहस्य जाना है।’
उग्रश्रवा विस्मय विमुग्ध भाव से अनिमेष के उपदेशामृत रस में डूबे हुए थे। किसी सिद्ध योगी की भाँति ज्ञान का सन्देश देती अनिमेष की वाणी अविराम स्रोतस्विनी सी बह रही थी।
गुरु श्रद्धा, गुरु निष्ठ, गुरुकार्य एवं गुरु भक्ति ही मेरी साधना है। इसी से मुझे गुरु कृपा का प्रसाद मिला है। मैं तो गुरुगत प्राण हूँ देव। अपने सद्गुरु की कृपा से मुझे इस सत्य की स्पष्ट अनुभूति होती है - कि देह सिर्फ मेरी है, इसमें प्राण गुरुदेव के विराजते हैं। केवल मन मेरा है- परन्तु इसके माध्यम से जो विचार प्रवाह उमड़ता है, वह गुरुदेव का है। केवल हृदय मेरा है, इसमें उफनने वाली भावनाएँ गुरुदेव की हैं। मैं यंत्र हूँ वे यंत्री। यदि कुछ दोष है तो यंत्र का है। यंत्री तो परम समर्थ है। यंत्र की असमर्थता के कारण उस परम समर्थ की समर्थता ठीक ढंग से नहीं अभिव्यक्त हो पाती है।
जब से गुरुकार्य के प्रभाव से, उपजी गुरुकृपा के कारण मेरी अहंता गुरुतत्त्व में विलीन हो गयी, तब से मैं जल गया हूँ- यह समस्त जगत् ब्रह्ममय है, इसमें न तो कुछ ऐसा है जिससे आसक्त हुआ जाय और न ही कुछ ऐसा है- जिससे दूर भागा जाय, विरक्त हुआ जाय। दूसरों की निन्दा-प्रशंसा से परे निश्चित भाव से परे मेरा मन इन्द्रिय विषयों में नहीं लगता। अब तो मेरी समूची अन्तर्चेतना गुरुतत्त्व में लीन रहती है। गुरुकृपा से मुझे यह भी ज्ञात हो गया है कि गुरु तत्त्व, आत्म तत्त्व एवं ईश्वर तत्त्व एक ही है।
अध्यात्म तत्त्व की ऐसी गूढ़ व्याख्या से उग्रश्रवा का अहं खण्ड-खण्ड होने लगा। उनकी जिज्ञासा और बढ़ चली, फिर पूछा, अज्ञानी व्यक्ति किस साधना के द्वारा अध्यात्म ज्ञान को पा सकते हैं।
सच्ची साधना, यथार्थ तप का मूल उद्देश्य अहं का उन्मूलन और उच्छेदन है। लेकिन इस सत्य से अनभिज्ञ अज्ञानी जन अपने जप-तप-व्रत इसलिए करते हैं, संसार उन्हें तपस्वी के रूप में जाने-माने एवं पहचाने। उनके तप से उन्हें कोई ऐसी सिद्धि मिले, जिससे वह लोक विख्यात हो सके। इस तरह उनके सारे प्रयास उलटी दिशा में चलते रहते हैं। वे अपनी साधना के द्वारा अहं के उन्मूलन के स्थान पर उसका पोषण एवं संवर्द्धन करते हैं।
हे तपोधन उग्रश्रवा, सच्ची साधना क्रिया में नहीं विचारों एवं भावनाओं में निहित है। विचार और भावनाओं की दिशा बदल जाय तो सामान्य क्रिया भी अध्यात्म प्रदायिनी हो जाती है। मेरे गुरुदेव कहा करते थे- बेटा जीवन का शीर्षासन ही अध्यात्म है। इसे वे अपनी खास शैली में- उल्टे को उलटकर सीधा करना भी कहते थे। उनके आदेशानुसार- मैंने यही किया है। मैंने अपनी सारी ऊर्जा किसी क्रिया विशेष को करने में नहीं बल्कि विचारों और भावनाओं के परिष्कार में नियोजित की। मैं न तो कोई विशेष तप करता हूँ और न किसी विशेष बीजमंत्र का विशेष ढंग से जप। मेरी आत्म परिष्करण भरी मेरी गुरुभक्ति ही मेरी साधना है। यही मेरी सिद्धि और यही मेरा अध्यात्म तत्त्व है। यही वह रहस्य है, जिसे पाने के लिए आपको दैवी-निर्देश प्राप्त हुआ है।
गुरुभक्त अनिमेष के वचनों से उसके सद्गुरु की चेतना प्रवाहित हो रही थी। इस पुण्य प्रवाह ने उग्रश्रवा के अस्तित्त्व को भी छुआ, वह भी इसमें निमग्न हुए। उनका गर्व-खर्व हो गया। उनका अहं इस पुण्य धारा में बह गया। अहंता के विलीन होते ही उन्हें भी आत्मज्ञान प्राप्त हो गया। अब उन्होंने सच्ची साधना एवं सच्ची सिद्धि के रहस्य को जान लिया।
महाराज बिंदुजात ने निश्चय किया कि राज्य में जो निराश्रय साधु हैं, उन्हें राज्यवृत्ति प्रदान की जाए। यह कार्य नीति-निपुण मंत्री गृत्समद् को सौंपा गया। गृत्समद् कई दिन तक धन की थैली लेकर घूमे, किन्तु एक भी स्वर्ण मुद्रा का वितरण न हो सका। हारकर उन्होंने अब तक का सारा ‘कोष’ सम्राट बिंदुजात को लोटा दिया।
महाराज ने पूछा-महामंत्री! धनराशि का वितरण नहीं हो पाया क्या? क्या इतने बड़े राज्य में एक भी साधु-संत ऐसा नहीं हो पाया। महामंत्री बोले, आर्य! कठिनाई यह है कि कोष उन साधु-संतों के लिए नियुक्त है, जो लोकमंगल का कार्य करते हों, ऐसे संत राज्य में कम नहीं, पर वे धन स्वीकार नहीं करते? उनकी सामान्य-सी आवश्यकताएँ हैं, उसके लिए सहयोग नहीं लेना चाहते। इस शर्त पर वे धन को स्वीकार कर सकते हैं कि लोकमंगल के कार्यों में खरच करेंगे। हे राजन! आप यदि देना ही चाहते हैं तो उन्हें व्यक्तिगत प्रयोग के नाम पर नहीं, लोककल्याण के लिए सहर्ष दे सकते है। उसके लिए वे तैयार हो जाएँगे, क्योंकि संसार की सेवा उन्हें अभीष्ट है। सेवा के लिए साधन भी आवश्यक है।
(गताँक से आगे)
यह अध्यात्म सही नहीं
मित्रों! अध्यात्म उस चीज का नाम है जो आदमी के व्यक्तित्व और स्तर ऊंचा उठा देता है। जो अध्यात्म आदमी के व्यक्तित्व और उसके स्तर को नीचे गिराता हो, मैं उसे अध्यात्म नहीं मानता। उसके पीछे मैं बहुत नाराज हूँ। इसलिए हर क्षेत्र में हम बगावत पैदा करते है। हम जहाँ अनैतिकता के विरुद्ध बगावत पैदा करते हैं, वही हम इस नकली अध्यात्म के विरुद्ध भी बगावत पैदा करते है। फिर तो आप कम्युनिस्ट हैं? कम्युनिस्ट तो नहीं है बेटे, पर हम कम्युनिस्टों की आवाज में आवाज लगाकर कह सकते हैं कि यह अवाँछनीय अध्यात्म जो आज हर जगह फैल गया है, अगर यह नष्ट होता है, तो आपको दुःख है? नहीं, मुझे प्रसन्नता है। आपका ये अखंड कीर्तन बंद हो जाए तो आपको नाराजगी है? नहीं मुझे कोई नाराजगी नहीं है, मुझे बहुत प्रसन्नता है। ये कौन से मंदिर, भिन्न-भिन्न देवियों के मंदिर गिर पड़े तो आपको नाराजगी है? नहीं बेटे, मुझे बहुत खुशी है। मनसा देवी, जो आपकी इच्छाओं को बिना कीमत चुकाए देना चाहती हैं, केवल पंद्रह पैसे का प्रसाद खा लीजिए और हमारी मनसा पूरी कर दीजिए। बेटे हम आपकी ऐसी मनसा देवी से बहुत नाराज हैं।
क्या कहते हैं आप? बेटे! मैं यह कहता हूँ कि आप अनैतिक आचरण पैदा करती हैं। आप लोगों को भिखमंगा बनाती हैं और आप लोगों को दरिद्र बनाती है और लोगों को ऐसे गंदे आश्वासन देती है जो आपको नहीं देने चाहिए। जो आपको शोभा नहीं देते और लेने वालों को भी शोभा नहीं देते, दोनों को शोभा नहीं देते, क्योंकि इंसानियत के लिए जो बेसिक सिद्धाँत है, फंडामेंटल सिद्धाँत हैं, आप उनको गलाती हैं, इसलिए आप भाग जाइए।
मित्रों! क्या करना चाहिए? मैं यह कह रहा था कि आध्यात्मिकता के मौलिक आधारों प्रतिपादन होना चाहिए, ताकि उससे हम वास्तविक फायदे उठा सकें, जैसे कि हमारे पूर्वजों ने उठाए थे। हमारे पूर्वजों ने आध्यात्मिकता से हर क्षेत्र में शानदार फायदे उठाये थे। उनके व्यक्तित्व बहुत शानदार होते थे। मैं आपको एक बात बताता हूँ कि जिन चीजों को आप चाहते हैं, जिन सुविधाओं को आप चाहते हैं, जो संपदाएं आप चाहते हैं, वे अच्छे व्यक्तित्व के पीछे-पीछे चलती है। रोशनी के पीछे छाया चलती है। आप रोशनी की तरफ मुँह करके चलिए छाया आपके पीछे चलेगी और आप छाया के पीछे चलिए, छाया की तरफ मुँह करके भागिए तो रोशनी भी हाथ से चली जाएगी और छाया भी पकड़ में नहीं आएगी। आप अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाइए।
वास्तविक अध्यात्म फिर क्या है?
मित्रों! आध्यात्मिकता का उद्देश्य था, आदमी के व्यक्तित्व को ऊँचा उठा देना, चिंतन को सही कर देना, आदमी के दृष्टिकोण को परिष्कृत कर देना। अगर कोई आदमी यह कर सके तो तब? तब मैं कहूँगा कि जीवन में वास्तविक अध्यात्म आ गया। वास्तविक अध्यात्म को प्राप्त करने के बाद में आप वो चीजें पाएंगे जो आपको मिलनी चाहिए। माँगने पर भी मिलेंगी, बिना माँगे भी मिलेंगी। महापुरुषों के नाम सुने नहीं आपने? आप उन महापुरुषों की हिस्ट्री तलाश कीजिए जनता ने जिनको निहाल कर दिया है। माँगने पर? माँगने पर नहीं, बिना माँगे निहाल कर दिया। कल मैं गाँधी जी का हवाला दे रहा था, बुद्ध का हवाला दे रहा था। जनता की बात कहूँ, हा जनता की बात कहूँगा और भगवान की बात? भगवान की बात भी कहूँगा, हरेक की बात कहूँगा। मैं कहूँगा कि अगर आपका व्यक्तित्व और आपका अंतर्मन सच्चे में, वास्तव में पात्र है, तो आपको तीनों ओर से सहायता मिलेगी। क्यों साहब, एक ओर से कि तीनों ओर से? आप एक ओर से आपको सहायता मिलेगी और इतनी अधिक सहायता मिलेगी, जिसको पाकर के आप निहाल हो जाएंगे।
साथियों! आप क्या चाहते हैं? हम ये चाहते हैं कि देवताओं की सहायता मिले। ये तो नहीं चाहते कि हमारे पड़ोसी से हमें सहायता मिलें? नहीं ये नहीं चाहते वो क्या सहायता देगा। पड़ोसी से तो लड़ाई है हमारी, वो हमें सहायता नहीं देगा और किससे माँगेंगे? पिताजी से। नहीं पिताजी भी हमसे नाखुश हैं, वा नहीं देंगे। तो भाई से माँग लीजिए। नहीं भाई ने भी मना कर दिया। तो फिर अपने साले से माँग लीजिए, कहिए हम आपके बहनोई हैं। साले से भी एक बार हमने कहा था कि हम पैसे की तंगी में हैं, हमें दो हजार रुपये दे दीजिए। साले ने कहा कि हम नहीं दे सकते, हम आपसे भी ज्यादा तंगी में है। हमारे पास नहीं है। किसी ने नहीं दिया। कोई और बाकी रह गया है? नहीं और कोई नहीं। हमें सबने इंकार कर दिया। एक भी आदमी हमारी सहायता करने के लिए रजामंद नहीं है। अब तो एक ही बाकी रह गया है और उसका नाम है ‘देवता’। इसे हम ट्राई करते हैं।
ट्राई कैसे करते हैं, अनुष्ठान करते हैं। अहा.........ये अनुष्ठान से पकड़ में आएंगे। सच-सच बताना, इसी का नाम अनुष्ठान है ना-देवताओं से ट्राई करना? क्या ट्राई करना? हमारा ट्राँसफर करा दीजिए। हमने वहाँ कहा-स्युपरिन्टेंडेंट से। उसने क्या कहा? उसने कहा कि 5 रुपये दे दीजिए, तो हम आपका ट्राँसफर करा देंगे। आपने फिर कमिश्नर से भी कोशिश की होगी, पर ट्राँसफर नहीं हुआ। अब कौन बाकी रह गया है? एक ही आदमी बाकी रह गया है, देवता। देवता ट्राँसफर कराता है? हाँ साहब! देवता के हाथ में सब कुछ है। तो क्यों देवता जी आपके पास क्या ट्राँसफर कराने का कोई डिपार्टमेन्ट है? नहीं साहब! हमारे हाथ में नहीं है ट्राँसफर। आप क्या काम करते है? हम डीलिंग में नहीं जाते है। ट्राँसफर में हमारी डीलिंग नहीं है।
ये देवी-देवता हमें क्या देंगे?
मित्रों! आप देवताओं से भी वो काम कराना चाहते हैं, जो देवता बेचारे नहीं कर सकते, जो उनके काबू में नहीं है, उनके पास भी नहीं है। क्या काबू में नहीं है? हनुमान जी से आप चाहते है कि हमारा ब्याह-शादी हो जाए और हमारे लड़के के बाल-बच्चे हो जाएं। एक बार हनुमान जी से हमने पूछा कि क्यों साहब! ये आपका डिपार्टमेन्ट है कि जब किसी की ब्याह-शादी नहीं होती तो आप जाकर ब्याह-शादी कराते है। फिर हमने दूसरी बात पूछी कि किसी के बच्चा न हो तो उसको बच्चा पैदा कराने का महकमा भी आपके पास है। हनुमान जी ने जवाब दिया कि आचार्य जी! आपको तो समझ है, आप तो पढ़े-लिखें आदमी हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि जिन कामों में हमारा कोई दखल नहीं है, कोई वश नहीं, उन्हें भला हम किस तरीके से कर सकते है। अगर ब्याह-शादी करने लायक हमारे अंदर शऊर होता तो हमारा भी ब्याह हो गया होता। हमारा ब्याह किसी ने नहीं कराया। नाई भी आए, पंडित भी आए। उन्होंने कहा, क्यों साहब आप हमारी लड़की के साथ शादी कर लीजिए। नहीं हम ब्याह नहीं करते।
हनुमान जी ने कहा, ‘राम काज कीन्हे बिना मोहि कहाँ विश्राम।” रामकाज में लगा रहता हूँ। न कोई खेती-बेती है, न नौकरी है, न धंधा, न घर, न स्कूटर, कुछ भी नहीं है हमारे पास। अतः सब चले गए। एक ने भी ब्याह नहीं किया। गुरुजी! आपको तो मालूम ही है कि हमारा किसी ने ब्याह नहीं किया। हाँ हमको मालूम है कि आपका किसी ने ब्याह नहीं किया था। तो अब आप ही बताइए कि बिना ब्याह वालों की हम कैसे मदद कर सकते हैं? फिर हमने पूछा कि शादी-ब्याह नहीं हुआ तो बाल-बच्चों की ही मदद कीजिए, केंकिडडडडड ये कहता है कि हमारे तीन लड़कियाँ है, एक-दो लड़के और हो जाएं तो अच्छा है। आप उनकी कुछ सहायता कीजिए। हनुमान जी ने कहा कि ये हमारा काम नहीं है, आप हमें बेकार क्यों तंग करते हैं। हम लड़के पैदा कर लेते तो आपके भी कर देते। भगवान शिवजी के पास ट्राई करते हैं और कहते हैं, महादेव जी! हमारा पक्का मकान बना दें। महादेव जी तो वहाँ रहते हैं मरघट में। इनके पास अगर मकान बनाने लायक पैसे होते, तो अपने लिए क्यों नहीं बनवा लिया होता। कपड़े तो पहनने को है नहीं, फिर मकान कैसे बनवाएं।
अपनी योग्यता बढ़ाइए
मित्रों! बेसिलसिले की बातें, बेतुकी बातें आप करते रहेंगे और पीछे शिकायतें करते रहेंगे कि हमारी मनोकामना पूरी नहीं। मैं कल भी नाराज हो रहा था इसी बात पर। आपको निराशा तो होगी, पर इससे बाद में पूरे अध्यात्म विज्ञान पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। आदमी अध्यात्म विज्ञान के प्रति नफरत करते चले जाएंगे और इसके प्रति जनसाधारण में जो श्रद्धा थी वो खत्म हो जाएगी। क्यों? क्योंकि आपकी मनोकामना पूरी नहीं हो सकती। आपकी मनोकामना पूरी करने की दो शर्तें है। क्या दो शर्तें है? साथियों! भगवान ने, देवताओं ने, ऋषियों ने दुनिया में एक से एक बड़ी मनोकामनाएं पूरी की हैं पर उसकी दो शर्तें पूरी करनी पड़ी है। एक तो आदमी की योग्यता बढ़ी-चढ़ी होनी चाहिए। आपको क्या मिलता है? हम तो साहब प्राइमरी स्कूल के मास्टर हैं। तो आप कहाँ तक पढ़े हैं? हमने साहब मैट्रिक पास किया है और बी.टी.सी. पास की है। इसीलिए हमको 2500 रुपये मिलते हैं। तो अब आप क्या चाहते हैं? हमको बड़ी नौकरी मिल जाए। अच्छा तो आप एक काम कर लीजिए-आप बी.ए. कर लीजिए, बी.एड कर लीजिए। फिर हमारे पास आना तो हम कोशिश करेंगे, किसी से सिफारिश करेंगे और आपको नौकरी दिला देंगे। नहीं साहब, बी.ए., बी एड तो हम नहीं कर सकते, आप हमें 7500 रुपये की तनख्वाह दिला दीजिए। बेटे, हम कैसे दिला दें, जो कायदा-कानून नहीं है, नियम नहीं है, उसे कैसे करा देंगे।
मित्रों! आदमी को अपनी मनोकामना पूरी करानी है तो उसे अपनी योग्यता बढ़ानी पड़ेगी। आप अपनी योग्यता बढ़ाइए। आदमी की जितनी योग्यता होती है, उतनी ही उसकी तरक्की होती, पैसा मिलता है और मिलता है मान-सम्मान। योग्यता आप बढ़ाते नहीं तो फिर किस तरह से आपकी सहायता करेंगे। दूसरी शर्त है-आप अपने में परिश्रम का माद्दा बढ़ाइए। आप में परिश्रम का माद्दा कम है। आपको जितना परिश्रम करना चाहिए, जिस स्तर का पुरुषार्थ करना चाहिए, उतना नहीं करते। मनोयोग और श्रम दोनों को मिलाकर परिश्रम की क्वालिटी बनती है। आप क्वालिटी क्यों नहीं बनाते? नहीं साहब! हम तो आठ घंटे काम करते हैं। आठ घंटे मनोयोग के साथ काम कीजिए तो वह दस घंटे के बराबर हो जाएगा, अट्ठाइस घंटे के बराबर होगा।
मित्रों! इफीशिएन्सी’ अर्थात् दक्षता का भी ध्यान रखिए। नहीं साहब! हम तो उसे ‘सीनिऑरिटि’ कहते हैं। बेटे, सीनिऑरिटि ही नहीं काम करती, ‘इफीशिएन्सी’ भी काम करती है। इफीशिएन्सी आप बढ़ाइए न, पुरुषार्थ बढ़ाइए न, फिर हम देखेंगे कि कौन है जो आपका रास्ता रोकता है। देखेंगे कौन आदमी आपकी तरक्की को रोकता है। आपकी तरक्की को कोई रोकता हो, तो आप इस्तीफा दे देना और हमारे पास आ जाना। हमारे पास जो लोग काम करते हैं, पूरे मन से करते हैं, हमको कहीं लगा दीजिए। क्या मिलता है आपको? 6500 रुपये मिलते हैं। अच्छा तो हम आपको 7500 रुपये दिलाएंगे और जगह दिला देंगे, परंतु आप तो परिश्रम की क्वालिटी नहीं बढ़ाते। अपनी योग्यता बढ़ाते नहीं हैं और मनोकामनाएं लिए फिरते है।
मित्रों! ये मनोकामनाएं अवैज्ञानिक हैं। अवैज्ञानिक बातें क्या निभेंगी कभी? अवैज्ञानिक बातें न कभी निभी थीं, न कभी निभेंगी। आप कया कह रहे थे? में यह कह रहा था कि आपको जो सबसे श्रेष्ठ धंधा, व्यवसाय बताया है, वह अध्यात्म है। अध्यात्म का व्यवसाय इससे ज्यादा शानदार, इससे ज्यादा फायदेमंद, इससे ज्यादा कीर्ति दिलाने वाला अर्थात् तीन तरह के फायदे या धंधा? और कोई धंधा नहीं है। जिसको आप व्यवसाय कहते हैं वह केवल एक ही फायदा कराता है। हम क्या कराते हैं? हम बेटे, ये धंधा जो पैसे वाला है, ये तो गौण है, बाहर वाला है। इसके अलावा हम तीन फायदे करा सकते है। उस अध्यात्म के बारे में बता रहे हैं जिसको सिखाने के लिए हमने आपको यहाँ बुलाया हैं जिसके लिए हम आपको अनुष्ठान कराते हैं। हमारे इस अध्यात्म को आप समझ लें तो फिर आपकी गाड़ी आगे बढ़ाऊँ। आप क्या सिखाना चाहते हैं? आप समझिए तो सही। आप तो नहीं रहते है। कहाँ? हमारी मनोकामना, भजन और माला। बेटे, ये तो गलत है।
पहले साधना तो हो
माला ओर मनोकामना का भी सिद्धाँत है और सही होता है तो फिर मैं एक चीज और शामिल करना चाहूँगा। क्या चाहेंगे? माला-एक। माला से व्यक्तित्व का विकास। व्यक्तित्व के विकास के फलस्वरूप साधना दो। यों है बेटे इसका चक्र। आप समझ गए, यह एक चक्र है। कौन-सा? इसमें तीन चीजें शामिल है, साधना एक। साधना सफल है, सही है या गलत है, इससे व्यक्तित्व का विकास जुड़ा हुआ है। व्यक्तित्व के विकास के बाद में वो करना, जिसको हम ऋद्धियाँ कहते है, सिद्धियाँ कहते है, सफलता कहते हैं। नहीं साहब! भजन करने से सिद्धियाँ मिलनी चाहिए। नहीं बेटे, आप गलत बात कहते हैं। भजन करने से सिद्धियाँ नहीं मिल जाती। नहीं साहब! हम तो यही ख्याल करते हैं। आप गलत ख्याल करते हैं। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप इस गलत ख्याल को निकाल दें। नहीं साहब हम तो नहीं निकाल सकते। जप करने से पैसा मिलता है। नहीं बेटे, जब करने से पैसा मिलता तो मंदिरों में- जो हिंदुस्तान में एक लाख से ऊपर मंदिर ऐसे हैं जहाँ पुजारी-नौकर रहते हैं, वे मालामाल हो गए होते। आप एक लाख पुजारियों का आयोग बैठा दीजिए। सर्वे कीजिए और रिपोर्ट मंगाइए इसकी। फिर देखिए क्या हाल है, इन पुजारियों में से हर आदमी मामूली मजदूर की अपेक्षा, एल.डी.सी क्लर्क की अपेक्षा, प्राइमरी स्कूल के मास्टर की अपेक्षा गई-बीती हैसियत में है।
मित्रों! जो व्यक्ति सारे दिन पल्लेदारी ढोते हैं और रिक्शा चलाते हैं, उनको एक तराजू में रखिए और पुजारी जी को एक तराजू में रखिए। देखिए साहब, क्या बात है? आप सिनेमा भी देखते हैं, सिगरेट भी पीते हैं, दिन में छह कप चाय भी पी जाते है। आप कौन हैं? आप रिक्शे वाले हैं और आप? पुजारी जी हैं। अरे सिनेमा देखते हैं? नहीं साहब सिनेमा हमारे भाग्य में कहाँ से आया। जाने का मन होता है? मन तो होता है, पर हम कैसे जा सकते हैं। आपकी ये बात वो बात सब तराजू में तौलते हैं, तो मालूम पड़ता है न रिक्शे वाला फायदे में है ओर न ये पुजारी जी। क्या बात है? आप समझते नहीं क्या? गलतफहमी को क्यों दबाए बैठे हैं। गलतफहमी को आप हटा दीजिए। मैं आपसे प्रार्थना करूंगा कि अगर आपके मन में यह गलतफहमी है कि भजन और माला के फलस्वरूप सिद्धि मिल जाएगी तो आप इसे निकाल दीजिए।
तो क्या करें? इसमें एक चीज आप और शामिल कर लें तो बात सही हो जाएगी। क्या शामिल कर लें? स्कूल में पढ़ाई करें और पढ़ाई के बाद नौकरी करें। नहीं साहब पढ़ाई के साथ ही नौकरी मिल जाए तो अच्छा है। अच्छा बेटे तू स्कूल जाएगा? हाँ साहब, लेकिन पढ़ाई करनी पड़ेगी। गुरुजी! मुझे यह नहीं पता था। अच्छा तो अब हम बता देते हैं कलम पकड़ और पी-एच.डी. हो जा। लेकिन एक कमी है। क्या? पकड़ने के साथ-साथ पढ़ाई भी करनी पड़ेगी। गुरुजी! हम तो यह जानते थे कि जिसके हाथ में कलम होती है, वही पी-एच.डी. हो जाता है। बेटे, कलम से पी-एच.डी. होती है, तेरी यह बात सही है, पर हमारी भी एक बात क्यों शामिल नहीं करता कि कलम के साथ-साथ में अध्ययन भी करना और तब लिखना चाहिए। थीसिस लिखने की कीमत होती है और होनी भी चाहिए।
मात्र क्रिया से परिणाम नहीं मिलता
गुरुजी! ये तो बड़ा झमेला पड़ गया है। हाँ बेटे, झगड़ा तो था ही। तू क्या समझता था? हम तो यह समझते थे कि ये सब प्रारंभिक वस्तुएँ है और उनसे ही सफलता मिल जाती है। मसलन आपके हाथ में छेनी और हथौड़ी दे दें और कहें कि इस पत्थर के टुकड़े को ले जाइए और इसमें से आप एक मूर्ति बना दीजिए। मूर्ति कितने रुपये की होती है? बहुत कीमती होती है। हमने जयपुर से एक मूर्ति मँगाई है, वह तीन हजार रुपये में आई है। इसमें कितने रुपये का पत्थर लगा होगा? मैं सोचता हूँ कोई पचास रुपये का पत्थर होगा। आप पचास रुपये का पत्थर ले लीजिए और छेनी, हथौड़ी ले जाइए, घिसने के लिए रेती ले जाइए और मूर्ति बनाकर लाइए। आपको तो पत्थर ही नहीं दिखाई पड़ा और ऊपर से छेनी और हथौड़ी भी तोड़ डाली और अपनी अँगुली पर भी पट्टी बाँध रहे हैं। आपने तो बताया था कि हम मूर्ति बनाएँगे तो क्या बन गई आपकी मूर्ति? कहाँ बनी गुरुजी! छेनी टूट गई, हथौड़ी टूट गई और देखिए हमारी अँगुली में चोट भी लग गई। बेटे, मूर्ति कहाँ गई? उसका क्या हुआ? तीन हजार की मूर्ति तो मिली नहीं? मिलती भी कैसे, मूर्तिकला का जो अभ्यास है, वह अलग है।
मित्रों! यह क्या है? यह एक टेक्नीक है। मूर्तिकला छेनी-हथौड़े की सहायता से विकसित तो की जाती है, पर इसके पीछे अभ्यास होता है, तब कहीं मूर्ति बनाना आता है। तब आदमी हजार रुपये महीने कमाता है। इससे कम में कमाए, इससे कम में नहीं कमा सकता। चित्रकार चित्र बनाते हैं। कितने का बिका ये चित्र? बहुत दाम का बिका। हम अखण्ड ज्योति के कवरपेज की डिजाइन बनवाते हैं। उसके लिए हमें पाँच सौ रुपये देने पड़ते है। चित्रकार दो दिन में बना देता है। गुरुजी! यह तो अच्छा धंधा है। एक दिन में एक चित्र बनाने के ढाई सौ रुपया रोज कमाता है। इससे महीने में कितना कमा लेगा और साल भर में कितना कमा लेगा? गुरुजी! मैं तो वही धंधा करूंगा, बेटे कर ले। इसके लिए क्या-क्या चीज चाहिए? कागज, ब्रश, रंग। लीजिए बनाइए चित्र। किसके लिए बनाएँ? हमारी अखण्ड ज्योति के लिए बनाइए। गुरुजी! आप तो पाँच सौ रुपये तो वैसे ही दे देंगे, देखिए चित्र बनाकर लाया हूँ। बेटे! ये तूने क्या बनाया? हमारा कागज भी बरबाद कर दिया और रंग भी खराब कर दिया और ऐसे ही लकीरें बना लाया। नहीं बेटे, लकीर नहीं बनानी चाहिए।
मित्रों! कागज काम तो आता है, पर यह भी ध्यान रखिए कि क्या चीज चाहिए। यहाँ एक और शब्द लगा हुआ है। ‘पर’ यह इसलिए लगा हुआ है कि चित्रकला का अभ्यास होना चाहिए। जो समयसाध्य और श्रमसाध्य है। नहीं साहब! हम तो इस झगड़े में नहीं पड़ेंगे। तो क्या करेंगे? हम यह करेंगे कि क्रिया के माध्यम से परिणाम पाना चाहेंगे। बेटे, यह तो संभव नहीं, असंभव बात है, जो आपने कल्पना बना रखी है। आप इस असंभव के पीछे भागेंगे तो आपको हैरानी कि सिवाय, परेशानी के सिवाय, खीझने के सिवाय, निराशा के सिवाय और कुछ पल्ले नहीं पड़ेगा। अब तक आप निराश हैं तो आगे भविष्य में अगर आपका यही सिद्धान्त रहा, तो मैं आपको शाप देता हूँ कि भविष्य में आपको हमेशा निराशा ही हाथ लगेगी और कभी आपको सफलता प्राप्त नहीं होगी।
साधना कोई शॉर्टकट नहीं
साहब! आप शाप क्यों देते हैं। इसलिए देते है कि आप उस सिद्धाँत को समझते नहीं, जिस सिद्धाँत पर चल करके आप वहाँ पहुँच सकते है। उस सिद्धाँत को स्वीकार भी नहीं करते। बेटे, ये ‘नेशनल हाइवे’ है, राजमार्ग है। साधना कोई शॉर्टकट नहीं है। किसी भी क्षेत्र में कोई शॉर्टकट रास्ता नहीं है। आप एम.ए. पास होने का शॉर्टकट बताइए। बेटे, हमें तो मालूम नहीं है। हमने तो जिनको देखा है, वे पढ़ते है और नंबर बाई नंबर, कक्षा दर कक्षा फीस देते हैं। अच्छा बंबई जाने का शॉर्टकट बताइए? बंबई जाने का शॉर्टकट यही है बेटे कि उधर से कोटा से होकर निकल जाए या भोपाल से होकर निकल जाए। कितना किराया लगता है? यही कोई लगता होगा सौ-डेढ़ सौ रुपये का टिकट। नहीं साहब! कोई शॉर्टकट रास्ता बताइए। जिससे कि इतना सफर भी न करना पड़े और पैसा भी खरच नहीं करना पड़े और मैं बंबई भी पहुँच जाऊँ। नहीं बेटे, ऐसा कोई शॉर्टकट रास्ता नहीं है।
मित्रों! आपने अध्यात्म माने शॉर्टकट समझ रखना है। आप चाहते हैं, “हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा आवे।” बेटे तू क्या चाहता है कि बंबई पहुँच जाऊँ। हाँ गुरुजी। ऐसा चमत्कार दिखाइए, जादू दिखाइए कि हम पाँच मिनट में बंबई पहुँच जाएँ ओर पैसा भी न खरच करना पड़े। आंखें बंद करते ही बंबई आ जाए। बताइए आपको ऐसा चमत्कार आता है। हाँ हमें आता है। अच्छा तो आप कितनी देर में पहुँचा देंगे? तू कितनी देर में पहुँचना चाहता है। हम तो तुझे पाँच मिनट में पहुँचा देंगे बंबई। अच्छा पाँच मिनट में आप इतने बड़े योगी हैं? तू पहले खड़ा तो हो जा, फिर देख पहुँचता है कि नहीं पाँच मिनट में। अच्छा एक काम कर आँख पर एक पट्टी बाँध ले। अगर पट्टी नहीं तो आँख पर हाथ रख ले, ताकि रास्ते का सफर तुझे दिखाई न पड़े। और देख जब मैं कहूँ तब एक पैर उठाना, फिर दूसरा पैर उठाना। जब मैं तो यहीं खड़ा हूँ। अरे देख यह लिखा हुआ है बंबई। गुरुजी आप तो हमारे साथ मजाक करते हैं।
मित्रों! आप भी तो अध्यात्म के साथ क्या करते हैं? मजाक और मखौल करते हैं। कौन-सी वाली? जो आप लिए फिरते हैं कि अमुक मंत्र का जब करेंगे और पैसा कमाएंगे। आप भगवान के साथ मखौल करते हैं सिद्धाँतों, आदर्शों के साथ मखौल करते हैं और प्राचीनकाल की ऋषि परंपरा के साथ मखौल करते हैं। आपको किसने बताया था यह सब? साहब! एक बाबाजी ने बताया था। मारा नहीं उस बाबाजी को? नहीं साहब! अच्छा अब की बार आए तो उसके कान पकड़ लेना और कहना कि गलत बात बता रहा है। मित्रों! क्या बताना चाहिए था? वह बताना चाहिए था, जिस शानदार अध्यात्म के लिए मैंने आपको बुलाया है। जिसके लिए मैं आपको अनुष्ठान कराना चाहता हूँ। जिसके लिए मैं चाहता हूँ कि आप उन सिद्धाँतों के जानकार हो जाएँ। आप सिद्धाँतों के जानकार हो जाएंगे तो फिर विधि बताने में मुझे देर नहीं लगेगी। विधि तो बहुत सरल है। जिस तरह ऑपरेशन करना बहुत सरल है। मोतियाबिंद का ऑपरेशन कितने मिनट लेता है। मुश्किल से एक मिनट लेता है। एक मिनट में डॉक्टर सुन्न करके खट् झिल्ली काट करके अलग कर देता है। क्यों साहब! आप एक मिनट में ऑपरेशन करना सिखा देंगे। लेकिन पहले सात साल तक मेडिकल की पूरी पढ़ाई करने के साथ-साथ तुझे प्रैक्टिस भी करनी होगी। तब हम तुझे बताएँगे।
अगले अंक में जारी
परम पूज्य गुरुदेव से मिलने पर दृष्टि बरबस उनके चरणों में थम जाती। बिन सोचे और बिन कहे हृदय की समस्त भावनाएँ, प्राणों का सारा अनुराग और मन की समूची कोमलता उनके श्री चरणों में समर्पित होने लगती है। यह अनुभूति किसी व्यक्ति विशेष की नहीं बल्कि उन असंख्य हजारों शिष्यों, सन्तानों, अनुरागी एवं श्रद्धालुजनों की है जो उनसे कहीं किसी अवसर पर कभी मिले। इनमें से कई ऐसे भी हैं जो शान्तिकुञ्ज आते और बार-बार मिलते थे। कुछ तो उनके श्री चरणों के ऐसे अनुरागी सिद्ध हुए कि उन्होंने शान्तिकुञ्ज को ही अपना घर बना लिया। सद्गुरु के चरणों को पाने की लालसा में गुरुधाम ही निजधाम बन गया।
अनोखे और अद्भुत थे गुरुवर के चरण। श्रद्धा एवं प्रेम अपने अभिभावकों एवं गुरुजनों के चरणों के प्रति भी उमड़ता है। उनके पावों का स्पर्श भी बड़ी विनम्रता के साथ किया जाता है, पर उन मृण्मय पाँवों में चिन्मय की अनुभूति नहीं होती। जबकि चिन्मय की चैतन्यता तो गुरुचरणों का स्वभाव होता है। पारस तो लोहे का केवल रूप बदलकर उसे सोना बना पाता है, उसकी जड़ता नहीं बदल पाता। गुरुचरणों के पावन परस से शिष्य की जड़ता चैतन्यता में बदलती है। उसकी आकृति तो वही रहती है, पर प्रकृति बदल जाती है। हृदय से भक्ति की गंगा बहती है, मन की संवेदनाओं का उफान उठता है और बुद्धि में विवेक का प्रकाश फैलता है।
प्रभु से प्रथम मिलन में ऐसे रूपांतरण का अंकुरण बड़ा ही सहज था। एक अनुभवी जब उनसे पहली बार मिला, तब वह अपने ऊपर वाले कमरे में सोफे पर बैठे थे। धवल धोती, हल्के बादामी रंग का कुर्ता और ऊपर भूरे रंग का हाथों से बना हुआ ऊन का जैकेट। इस जैकेट की ऊपर एक-दो बटने खुली थी। प्रातः के आठ-नौ बजे थे। सुबह का उजाला बड़े ही आहिस्ते से उनके कमरे में प्रवेश पाने की कोशिश कर रहा था। उजाले की उज्ज्वलता से मिलकर उनका दिव्य स्वरूप अवर्णनीय लग रहा था। उन दिनों वह सूक्ष्मीकरण साधना से अभी हाल में ही निवृत्त हुए थे। शान्तिकुञ्ज के नवागन्तुक कार्यकर्त्ताओं में से कुछ को प्रतिदिन बारी-बारी से बुलाकर अपना सहज प्यार बाँट रहे थे। उस सुबह भी यही क्रम था। लगभग आठ-दस को बुलाया था। वह भी इन्हीं आठ-दस में एक था। सर्वथा नया और सभी से अनजान। यह सुयोग ही था कि उसे आगे की पंक्ति में बैठने का मौका मिल गया। पास ही वरिष्ठ कार्यकर्त्ता श्री गौरीशंकर शर्मा जी भी बैठे थे।
गुरुदेव कह रहे थे, सभी सुन रहे थे। गुरुवाणी सुनते हुए भी उसकी नजर अपने आराध्य के चरणों में टिकी थी। आकार की दृष्टि से सुगढ़, गौरवर्णीय चरण। सोफे के पास रखे हुए लकड़ी की चरण पीठ पर प्रभु इन्हें आसीन किए हुए थे। इन युगल चरणों को देखकर मन ही मन ऐसा लगा कि आराध्य के चरणों को निरखने की जन्म-जन्मान्तर की आकाँक्षा पूरी हो गयी। मन में स्वर फूटे-
निरखा प्राण निछावर हो गये, दास हुआ श्री चरणों का।
नवागन्तुक कार्यकर्त्ताओं को उद्बोधन कर रहे प्रभु ने प्रत्यक्ष में भर नजर देखा और मुस्करा दिए। ऐसा लगा अन्तर्यामी गुरुदेव ने मन के स्वरों को सुन लिया और स्वीकार कर लिया। अपने प्रभु की प्रीति की प्रतीति या दृष्टि पुनः चरणों में टिक गयी। उनके चरणों और अंगुलियों की इतनी निर्दोष गढ़न और सौंदर्य को देखकर मन मुग्ध हो गया। ऐसे अपूर्व सुन्दर चरण। प्रत्येक अंगुलि की गढ़न कितनी सुन्दर और शोभायुक्त थी। गुरुदेव के पाँवों की अंगुलियों में उनके तप का तेज था। प्रत्येक नख मानों एक छोटा-छोटा सीप था। क्या ही सूक्ष्म शिल्पकारिता थी, कमल पुष्प की सुषमा और शिशिर की स्निग्धता मिलाकर गुरुवर के चरण बनाए गए थे। तेज, सौंदर्य और स्निग्धता का आश्चर्यजनक मिलन था प्रभु के चरणों में। पहले मिलन में ही इन्हें निरखने का यह अपूर्व सौभाग्य मिला था।
बचपन में पढ़ी गई श्रीरामचरित मानस के सोरण-चौपाई अंतर्हृदय में साकार हो रहे थे-
बंदऊँ गुरु पद कंज, कृपा सिन्धु नर रूप हरि। महामोह तम पुँज, जासु वचन रविकर निकर॥
मैं गुरुदेव के चरण कमल की वन्दना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और मनुष्य रूप में नारायण हैं। जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं।
श्री गुरु पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती॥
दलन मोह मत सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
गुरुदेव के चरण नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है। जिसका स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने वाला है। वह जिसके हृदय में आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं।
गुरुदेव के चरणों को निहारकर वह सत्य प्रत्यक्ष हो रहा था कि तुलसी बाबा ने जो कुछ कहा, उसमें काव्य सौंदर्य तो है, पर अतिशयोक्ति जरा भी नहीं। उन्होंने जो भी कहा वह उनके शिष्य जीवन की साधना सत्य है। जो साधना करने पर प्रत्येक शिष्य का जीवन सत्य बन सकता है।
सद्गुरु जिसे स्वीकारते हैं, उसे ही अपने श्री चरणों का सामीप्य देते हैं। उस दिन भी प्रभु ने अपनी बातों की समाप्ति इसी सत्य से की। उन्होंने कहा- ‘तुम्हें मैंने बुलाया है, तभी तुम आ सके हो। अब आ गए हो तो किसी ओर मत देखना, कहीं मन को न भटकाना। बस मुझे देखना, मेरी ओर निहारना।’ उन क्षणों में ऐसा लगा जैसे वह कृपापूर्ण हो बता रहें हो कि सद्गुरु चिन्तन और सद्गुरु ध्यान ही समस्त साधनाओं का सार है। उनके कथन की समाप्ति के बाद सभी एक-एक करके उठे, सबको अब चरण स्पर्श का सौभाग्य मिला था।
क्रमानुसार जब बारी आयी गुरुचरणों में माथा नवाने की, तो कुछ पलों के लिए काल चक्र जैसे थम गया। भूः लोक के मनुष्य ही नहीं स्वर्लोक के देवता, जनःलोक के सिद्ध, तपः लोक के महर्षि और सत्य लोक के ब्रह्मर्षि जिन चरणों में माथा नवाकर अपने को बड़भागी समझते हैं, आज उन्हीं चरणों पर इस अकिंचन को आत्मदान का सौभाग्य मिल रहा था। सच है, उनकी कृपा से सब सम्भव है। भुवन वन्दित गुरुदेव के चरणों की महिमा बुद्धि विचार से सर्वथा परे साधना सत्य है, समाधिगम्य है। वह अलौकिक स्पर्श, स्पर्श भर न रहा, स्पर्शयोग बन गया। उस दिन साधना का एक नया द्वार खुला।
उन चरणों की छुअन से अकेली देह नहीं, मन-प्राण सहित समूचा अस्तित्त्व रोमाँचित हो गया। पहली बार जाना महायोगी का साधनामय जीवन ही नहीं उनकी देह भी दिव्य होती है। वह तपोमूर्ति की तपस्या के तेज के प्रकट होने का माध्यम है। इस अलौकिक देह में सबसे अनुपम है प्रभु के चरण, शिष्यों के आश्रय स्थल। इन चरणों से जो गुरुकृपा की गंगा बहती है, उसके स्पर्श मात्र से त्रयताप छूट जाते हैं। इस स्पर्श की अनुभूति जीवन में बनी रहे, तो फिर और बाकी क्या रहा?
गुरुदेव के चरण स्पर्श की यह पहली अनुभूति लिए जब नीचे उतरना हुआ तो देखा पूर्व दिशा की ओर आकाश में सूर्य देव अपनी प्रभा बिखेर रहे हैं। उनकी रश्मियाँ चारों ओर विकीर्ण हो रही है। मन सोचने लगा परम पूज्य गुरुदेव के युगल चरण क्या इन्हीं सूर्य किरणों से गढ़े गए हैं? सूर्य के ध्यान की ही भाँति उनका ध्यान भी तो समर्थ है। बरबस ही मन में ये दो पंक्तियाँ स्वरित हो उठीं-
हे गुरुदेव, तुम्हारे करुणामय चरण अरुण सूर्य के रूप में सदा प्रत्यक्ष हैं।
चौदहवीं शताब्दी की बात है। वैज्ञानिक ओडार्नो ब्रसो ने अनेक तर्कों-प्रमाणों से यह सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी चटाई की तरह चौरस नहीं है, वरन् गोल है।
पुरातनपंथियों ने बाइबिल के मत को झुठलाने के जुर्म में ओडार्नो ब्रुसी को जिंदा जला देने का मृत्युदंड दिया। उन्मादी उसकी सफाई तक सुनने को तैयार न हुए। उन्होंने प्राण दे दिए, पर अपनी विचारधारा नहीं बदली। अंततः आगे चलकर जनसाधारण को उनकी बात स्वीकार करनी ही पड़ी। अपनी मान्यताओं के प्रति दुराग्रह की ऐसी ही दुःखद परिणतियाँ होती हैं।
सन् 2002 ई. के इस अप्रैल महीने में ‘अखण्ड ज्योति’ का 748 वाँ अंक आपके हाथों में है। पूरे 62 वर्ष और चार महीनों से यह अपने प्रकाश और प्रभा से लोकमानस में उजाला फैला रही है। देश-विदेश में बसे अपने देव-परिवार के असंख्य सदस्यों की गहरी भावनाएँ इससे जुड़ी हैं। इन सबके लिए ‘अखण्ड ज्योति’ मात्र एक पत्रिका नहीं, उनके परिवार की ज्येष्ठतम सदस्य है, उनकी अभिभावक है। जिसे वे बड़ी ही श्रद्धा एवं सम्मान से देखते हैं, पढ़ते हैं और उसके परामर्शों को भक्तिपूर्ण हृदय से स्वीकारते हैं। अखण्ड ज्योति के पठन-पाठन में उन्हें अपने सद्गुरु की चेतना के स्पर्श की अनुभूति होती है। इसके किसी भी अंक को माथा नवाकर उन्हें गुरु चरणों में माथा नवाने का सुख मिलता है।
देवमाता गायत्री की शक्ति से जन्में, पनपे और बढ़े और माता के नाम से जाने जाने वाले इस गायत्री परिवार में कई परिवार ऐसे हैं, जिन्हें अखण्ड ज्योति पीढ़ियों से अपना प्यार दे रही है। उनके लिए अखण्ड ज्योति गुरुदेव एवं गायत्री की जीवन्त प्रतिमा है। उनके आराध्य का साकार रूप है। मन को शान्ति, समाधान एवं प्रकाश देने वाला कल्पतरु है। गुरुदेव के विचारों को संजोने वाला अमृत कलश है। उनकी विचार चेतना का ऐसा अद्भुत पारस है, जिसकी छुअन से असंख्यों की लोहे जैसी काली-कुरूप अन्तर्चेतना में सोने की सी चमक पैदा हो जाती है। ये पंक्तियाँ कल्पनाएँ नहीं अनुभूतियाँ हैं, जिनसे कई परिवार पीढ़ियों से धन्य हो रहे हैं।
ऐसा ही एक परिवार श्री राजेन्द्र कुमार द्विवेदी का है। इस द्विवेदी परिवार की तीन पीढ़ियाँ अखण्ड ज्योति का प्रकाश पीकर ही पली-बढ़ी हैं। और अब तो उनके परिवार में चौथी पीढ़ी भी जन्म ले चुकी है, जिसे अपनी दादी-नानी के मुख से लोरी के साथ अखण्ड ज्योति में प्रकाशित होने वाली लघुकथाएँ और कहानियाँ सुनने को मिल रही है। श्री द्विवेदी के माता-पिता श्रीमती रामरती द्विवेदी एवं श्री चन्द्रसेन द्विवेदी परम पूज्य गुरुदेव से तब मिले और जुड़े, जब अखण्ड ज्योति का शुरुआती दौर था। इसे प्रकाशित होते हुए अभी कुछ ही वर्ष बीते थे।उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव एवं अखण्ड ज्योति दोनों को एक साथ गहन श्रद्धा से अपना लिया। अपने चारों पुत्रों एवं एक सुपुत्री यानि की पाँचों सन्तानों को उन्होंने उच्चशिक्षा एवं संस्कारों के साथ गुरुदेव की कृपा छाया एवं अखण्ड ज्योति का प्रकाश विरासत में दिया।
पहले कानपुर देहात के गोपालपुर गाँव, फिर ग्राम-बैरीपुर और अब लखनऊ शहर के राजाजीपुरम् में रह रहे इस द्विवेदी परिवार ने अपने निवास तो कई बदले पर उनकी अखण्ड ज्योति के प्रति आस्था नहीं बदली। अपने पिता की ही भाँति श्री राजेन्द्रकुमार द्विवेद्वी ने अपने तीनों बच्चों को अखण्ड ज्योति का अनुराग दिया। उनके सभी भाइयों और छोटी बहन ने भी अपने बड़े भाई का अनुगमन करते हुए अपनी सभी सन्तानों और रिश्तेदारों के जीवन में अखण्ड ज्योति की प्रकाश किरणें उड़ेंली। और आज श्री राजेन्द्र कुमार द्विवेदी के बच्चे अपने बच्चों को अखण्ड ज्योति के प्रति श्रद्धा एवं अनुराग का पाठ पढ़ा रहे हैं। इस तरह इस परिवार की चौथी पीढ़ी भी अपने पूर्व पुरुषों का अनुगमन कर रही है।
इस द्विवेदी परिवार में अखण्ड ज्योति में श्रद्धा यूँ नहीं पनपी। इन सभी लोगों ने अखण्ड ज्योति एवं उसके संस्थापक की कृपा की अनेकों अनुभूतियों को जिया है। अपने समूचे परिवार और इसकी पीढ़ियों को अखण्ड ज्योति से जोड़ने वाले श्री चन्द्रसेन द्विवेदी उत्तर रेलवे में स्टेशन-मास्टर थे। छुट्टियों में जब-तब वह अपने गाँव बैरीपुर आया करते थे। वहाँ गाँव वालों को, अपने परिवार के अन्य सदस्यों को गुरुदेव एवं अखण्ड ज्योति की पुरानी लेकिन प्रामाणिक बातें सुनाते। ऐसे ही उन्होंने अपनी भतीजी गिरजा के बेटे को सुनाते हुए कहा- राजा! जानते हो सन् 1942-45 के दिनों में अखण्ड ज्योति में छोटी-छोटी किन्तु बड़ी ही असरकारक साधनाएँ छपा करती थीं। ये साधनाएँ छपती तो अभी भी हैं, पर तब खास बात यह थी कि जिज्ञासा करने पर पत्र लिखने पर उन दिनों गुरुदेव अपने पास बुला लिया करते थे। और जिज्ञासु को इन साधनाओं को अपने सामने बिठाकर सिखा देते।
साधनात्मक शिक्षण के अलावा उन्होंने मुझे सूर्य चिकित्सा एवं प्राण चिकित्सा की विद्याएँ भी सिखायीं। मेरी ही तरह बहुतों ने उनसे इन सब चीजों को सीखा। लौकिक काम मुकदमा, बीमारी और घर-परिवार की ढेरों समस्याएँ तो गुरुदेव चुटकियों में हल कर दिया करते थे। सारी समस्याओं को सुनकर वह कहते तुम लोग चिन्ता क्यों करते हो, समस्याएँ हैं तो क्या हुआ, हम हैं, अखण्ड ज्योति है। जिज्ञासुओं की जिज्ञासा होती- गुरुदेव आप हैं यह तो समझ में आता है। आप अपने तप से हमें त्राण दिलाते हैं, परन्तु अखण्ड ज्योति इसमें क्या करेगी। गुरुदेव कहते- अखण्ड ज्योति को मुझसे अलग मत समझो। जो श्रद्धावान है, उन्हें सदा ही इसमें अपनी समस्याओं के समाधान मिलते रहेंगे। यह मेरी ही चेतना की अभिव्यक्ति है, मेरा अपना ही प्राकट्य है।
आज से तीन दशक से भी पूर्व स्वर्गीय श्री चन्द्रसेन द्विवेदी कहा करते थे- कि परम पूज्य गुरुदेव ने मुझसे कहा है कि मेरे न मिलने पर, मेरे न रहने पर अखण्ड ज्योति मिशन में गुरु की भूमिका निभाएगी। उनके अनुसार गुरुदेव कहते- ‘आज सिक्खों का गुरु कौन है, ग्रन्थ साहिब ही न। सिक्खों के लिए यह ग्रन्थ साहिब ही उनके गुरुओं के, सत्पुरुषों के सद्विचारों का प्रेरक प्रकाश पुञ्ज है। अखण्ड ज्योति का भी यही स्वरूप है। इसमें मेरी चेतना की धारा सतत प्रवाहित होती रहेगी। समय बीतता रहेगा, महीने बीतेंगे, वर्ष बीतेंगे, दशक बीतेंगे, शतक बीतेंगे, पर पुरातन होने पर भी अखण्ड ज्योति सनातन और नित्य नूतन बनी रहेगी।’ गुरुदेव के इन वचनों को श्री द्विवेदी ने अपने परिवार और पीढ़ियों को विरासत में दिया।
उनके परिवार एवं पीढ़ियों के साथ अपने देव परिवार में और भी परिवार एवं पीढ़ियाँ हैं, जो अखण्ड ज्योति को अपने परिवार एवं परम्परा की आदि माता मानती है। इनके लिए यह पत्रिका छपे हुए कागज की पुलिन्दा नहीं, सद्गुरु की पाती है। वे जानते हैं कि इसमें शब्दों को गूँथ कर पंक्तियाँ बनाने वाले हाथ भले ही लौकिक हों, पर पाती अलौकिक है। इसके माध्यम से आने वाला ऋषियों का सन्देश उन्हीं की भाँति दैवी एवं दिव्य है। श्रद्धा इसमें जीवन के समाधान पाती है। अखण्ड ज्योति श्रद्धावानों को अहसास ही नहीं होने देती कि परम पूज्य गुरुदेव आज नहीं हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि वे हैं, और हैं ही नहीं अखण्ड ज्योति के रूप में हर महीने अपने परिवार के सदस्यों से मिलने, अपने परिजनों को परामर्श देने उनके घर पहुँचते हैं।
असंख्य जनों की श्रद्धा, प्रेम एवं आतुर भावनाएँ बड़ी ही आकुलता से हर महीने अखण्ड ज्योति का इन्तजार करती हैं। दादा और दादी के साथ, नाना और नानी के साथ, पोते-पोतियों, नाती-नातियों और इनके माता-पिता इसकी प्रतीक्षा करते हैं। 62 वर्षों से यह क्रम चल रहा है, अब तो 63 वाँ साल भी लग चुका है। आगे भी अनगिन वर्ष बीतेंगे, कलम थामने वाली अंगुलियाँ बदलेंगी, पर सद्गुरु के विचार उसी तरह से प्रवाहित होते रहेंगे। न काल की गति रुकेगी, न अखण्ड ज्योति का प्रकाश मन्द पड़ेगा। इसकी प्रखर ज्योति में असंख्य परिवारों एवं इनकी अनगिन पीढ़ियों की भावनाएँ इसी तरह झिलमिलाती रहेंगी, जैसे कि आज और अभी जगमग ज्योतित हो रही हैं।
एक फकीर प्रतिदिन सुबह के समय हाथों में दो मशालें लेकर बाजार में जाता। हर दुकान के सामने थोड़ी देर ठहरता और आगे बढ़ जाता।
एक व्यक्ति ने पूछा- “बाबा तुम दिन के समय मशालें लेकर क्या देखते फिरते हो? क्या ढूँढ़ते हो?”
फकीर ने उत्तर दिया- “मैं मनुष्य खोज रहा हूँ। इतनी भीड़ में हमें अभी तक कोई मनुष्य नहीं मिला।”
उस व्यक्ति द्वारा मनुष्य की परिभाषा पूछने पर फकीर बोला-”मैं उसको मनुष्य कहता हूँ, जिसमें काम की वासना और क्रोध की अग्नि न हो, जो इंद्रियों का दास न होकर उनका स्वामी हो और क्रोध के आवेश में आकर अपने लिए और दूसरों के लिए आग की लपटें उभारने का यत्न नहीं करता हो।”
(गीता के चतुर्थ अध्याय की युगानुकूल व्याख्या चौदहवीं कड़ी)
‘यज्ञों में श्रेष्ठतम ज्ञानयज्ञ’ शीर्षक से विगत अंक में अति महत्वपूर्ण इस चौथे अध्याय में तैंतीसवें एवं चौंतीसवें श्लोक के माध्यम से ज्ञानयज्ञ की महिमा का प्रतिपादन किया गया था। योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्पष्ट मत है कि मनुष्य के सारे कर्म इस ज्ञानयज्ञ में समाप्त हो जाते हैं एवं अज्ञान से मुक्ति ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। इसी प्रक्रिया में परमपूज्य गुरुदेव के विचार चक्र परिवर्तन की चर्चा की गई थी। उन्होंने ज्ञानयज्ञ को पतन निवारण की सेवा नाम दिया है। इसी क्रम में युगधर्म के रूप में समयदान की बात कही गई थी। ज्ञान की विस्तृत व्याख्या के अंतर्गत श्री अरविंद द्वारा प्रतिपादन एवं उपनिषदों का चिंतन भी पिछली कड़ी में दिया गया था। यह ज्ञान प्राप्त कैसे किया जाए, उसके लिए भगवान अर्जुन को राय देते है, वह इसके लिए उन तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाए जिनने इस सत्य को प्रत्यक्ष देखा है (ज्ञानिनः तत्वदर्शिनः)। वे कहते हैं कि बिना किसी छल के भाव से सरलतापूर्वक जिज्ञासा व्यक्ति करने से वह ब्रह्मज्ञान हर किसी को ज्ञानी महात्माओं से, उनकी सेवा करने से प्राप्त हो सकता है। शिष्य पात्रता विकसित करने के लिए अपना सब कुछ यदि गुरु को अर्पित कर दे, तो वह उनसे ब्रह्मज्ञान पा सकता है। इसी ज्ञान के बारे में चर्चा और विस्तार से इस अंक में-
जिस ज्ञान के लिए भगवान अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को तत्वदर्शियों-गुरुजनों के पास जाकर समझने को कह रहे हैं, उसके विषय में आगे कहते हैं-
यज्ञात्वा न पुनर्मेहमेवं यास्यसि पाँडव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥ 4/35
“जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन! जिस ज्ञान के द्वारा तू संपूर्ण भूतों को (समस्त प्राणियों को) पहले अपने में और तदनंतर मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा में देख सकेगा।”
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृश्रमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि॥ 4/36
“यदि समस्त पापियों से भी तू अधिक पापी आपने को मानता है तो ज्ञानरूपी बेड़े (नौका) में सवार होकर निस्संदेह तू इस पाप समुद्र से पार हो सकेगा।”
एक महती आश्वासन
कितना बड़ा आश्वासन है परमसत्ता का इन दो श्लोकों में। वे कहते हैं कि इस ज्ञान को जानकर मनुष्य पुनः मोह के दलदल में नहीं फँसता। सब जगह परमात्मा की चेतना को संव्याप्त देख वह आसक्ति के बंधन में नहीं फँसता। ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि एक बार तुम्हें परमात्मा की झलक मिल गई तो स्वर्ग की रंभा, तिलोत्तमा जैसी सुँदर अप्सराएँ भी चिता की भस्म की तरह प्रतीत होंगी। फिर उनका आकर्षण किसी के ऊपर व्यापेगा नहीं। स्वर्गीय सौंदर्य भी अनाकर्षक लगने लगेगा। ईश्वरीय बोध हो जाने पर तीनों लोकों की संपदा भी उसके सामने तुच्छ हो जाती है। जब मनुष्य संपूर्ण संसार में संव्याप्त परमात्मा के प्रति अपने मन में प्रेमभाव उत्पन्न कर लेता है, तो वह सारे संसार के साथ ही अपने तादात्म्य का अनुभव करने लगता है, तब वह संपूर्ण जीवन को आत्मा के दिव्य प्रकाश का परिधान पहने हुए अर्थात् सब में एक ही अंत आत्मा अथवा प्रभु के मनमोहक आवाहदमय आलिंगन में स्वयं को बंधा हुआ साक्षी भाव से देखने लगता है। (येन भूतानि अशेषेण द्रक्ष्यस्यगत्मन्यथो मयि)।
यह ज्ञान-दिव्य ज्ञान मनुष्य के अंदर प्राणी-प्राणी में भेद बुद्धि के कारण जो मोहग्रस्त छाई पड़ती है, उसे ज्ञान चक्षु खुलने के बाद समाप्त कर देता है। ऐसा ज्ञान मिलते ही सारे पाप कर्म भस्म हो जाते है। यदि व्यक्ति पापियों में भी पापी (यहाँ भगवान ने अर्जुन के लिए पापिष्ट शब्द नहीं प्रयुक्त किया है- वे जानते हैं कि वे स्वयं भगवान हैं व अर्जुन उनके ही अंश हैं, नर-नारायण हैं, अतः पापकृत्तम (अधिक पापी) शब्द उन पर लागू नहीं होता, तो भी ज्ञानरूपी नौका में बैठकर वह पार हो जाता है, इतनी महिमा है ज्ञान की। पापसमुद्र से जो तार दे वह ब्रह्मज्ञान कितना पवित्र है, कितनी अनिर्वचनीय महिमा है उसकी, पराकाष्ठा की ओर ले जाने वाला श्लोक है यह। यहाँ तो ज्ञान की महिमा के परिप्रेक्ष्य में यह श्लोक आया है किन्तु भगवान की दृष्टि कितनी उदारता से भरी है-पापी से भी पापी व्यक्ति को शरण देने को आतुर हैं, उसका आभास वे एक और श्लोक में नवें अध्याय में भी देते हैं जब वे कहते हैं-
अपि चेत्सुदुराचारों भजाते मामनन्यभाक्। साधुरेव व मनतवयः सम्यग्यवसितों हि सः॥9/3
“यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है। अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है।”
चौथे अध्याय के इस छत्तीसवें श्लोक की ही व्याख्या का अगला चरण है यह। भगवान कृपासिंधु है, करुण के सागर हैं, वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अंबपाली, सदन कसाई, अजामिल भी उनकी शरण में जाते ही तर जाते हैं। भगवान को जान लेना, उनको भजने लगना ज्ञान के माध्यम से उनकी छाया में आ जाना यही वह राजमार्ग है जिस पर चलकर पापी व्यक्ति भी तर जाता है, बंधनमुक्त हो जाता है।
अपरंपार है ज्ञान की महिमा
गीता की यही विशेषता है कि कर्म-ज्ञान-भक्ति की त्रिवेणी इसके श्लोकों में कूट-कूटकर भरी है। यदि कर्म समर्पण भाव से भगवान को ही चारों ओर संव्याप्त मानकर हर क्षण उनको श्वास में जीते हुए इस ज्ञान को आचरण में उतारते हुए किए जाएँगे, तो निश्चित मानिए कि यदि कहीं व्यक्ति का पूर्व का जीवन गलतियों से, पापकर्मों से भरा पड़ा है तो भी वह तर जाएगा, बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होगा।
परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं, “ज्ञान को आत्मा का नेत्र कहा गया है। नेत्रविहीन व्यक्ति के लिए सारा संसार अंधकारमय हैं इसी प्रकार ज्ञानविहीन व्यक्ति के लिए संसार में जो भी कुछ उत्कृष्ट है, उसे देख पाना असंभव है। ज्ञान के आधार पर ही धर्म का, कर्त्तव्य का, शुभ-अशुभ का, उचित-अनुचित का विवेक होता है और पाप-प्रलोभनों के पार यह देख सकना संभव होता है कि अंततः दूरवर्ती हित किसमें है। ज्ञान के दीपक का प्रकाश ही इंद्रियों की वासना और प्रलोभनों की तृष्णा से होने वाली दुर्दशा से बच सकता है।” (वाङ्मय खंड 48/1.7 पृष्ठ)
भगवान राम ने जब सद्गुरु वशिष्ठ से साँसारिक क्लेशों के भवबंधनों से छुटकारा पाने का उपाय पूछा तो उन्होंने यही कहा, “हे राम! यदि भवसागर से पार होने की इच्छा है तो सबसे प्रथम ज्ञान संचय का प्रयत्न करे। ज्ञान से ही दुःख दूर होते है। ज्ञान से ही अज्ञान का निवारण होता हैं, ज्ञान से ही सिद्धि प्राप्त होती है और किसी उपाय से नहीं” (योगवशिष्ठ 5/88/12)
छांदोग्य उपनिषद् में एक कथा आती है। एक बाद इंद्र और विरोचन में एक जिज्ञासा पैदा हुई, “मैं क्या हूँ।” वे बार-बार सोचते-विचारते रहे, लेकिन उन्हें मैं का अता-पता नहीं लगा। आखिर दोनों मिलकर आदरपूर्वक शिष्य भाव से हाथ में समिधाएँ लेकर आचार्य प्रजापति के पास गए और नम्रतापूर्वक उनसे अपनी जिज्ञासा प्रकट की। प्रश्न का जवाब देने के पूर्व ही प्रजापति ने उनकी योग्यता, पात्रता को जानने के लिए एक युक्ति निकाली। उन्होंने कहा, “एक थाली में पानी भरकर अपना-अपना मुँह देखो, उसमें तुम्हें अपना स्वरूप दिखाई देगा।” दोनों ने तुरंत सज-धजकर पानी से भरी थाली में अपने को देखने का प्रयास किया। विरोचन को अपना सजा-सँवरा रूप देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई और वे अपने साथियों में जाकर अभिमान के साथ कहने लगे, भाई! मैंने तो ‘मैं’ का पता लगा लिया है, लेकिन उधर इंद्र का कोई समाधान नहीं हुआ। वह कुछ बुद्धिमान था। वह पुनः आचार्य के पास पहुँचा व बोला कि भगवन्! इस असंस्कृत शरीर की प्रतिच्छाया ही प्रतिबिंब में दिखाई देती है। यदि यह शरीर काना-लूला, लँगड़ा होता तो प्रतिच्छाया भी वैसी ही दिखाई देती। वस्त्रालंकारों को उतार देने पर प्रतिबिंब का सौंदर्य भी नष्ट हो जाता है और शरीर के नष्ट हो जाने पर यह भी नहीं रहता। इसीलिए इसे मैं कैसे अपना स्वरूप मानूँ? मुझे इसमें शाँति नहीं मिलती। प्रजापति ने इंद्र को सच्चा जिज्ञासु माना व ज्ञान का उपदेश दिया। विरोचन देहात्मवादी कहलाए व आसुरी संस्कृति के पोषक बने।” (अध्याय 8, खंड सप्तम से पंचदश)
विज्ञान नहीं ज्ञान
उपर्युक्त कथा आज के उपभोक्तावादी युग में बड़ी सटीक है व सभी को प्रेरणा देती है कि जो प्रत्यक्ष है, भोगने योग्य है, उसी को सब कुछ न मानें, जो अगोचर है, ज्ञान का मर्म है, उसे जानने का प्रयास करें। विज्ञान ने आज सभी के चिंतन को बहिर्मुखी बना दिया हैं भोग ही सब कुछ बनकर रह गया है, इसीलिए चारों और आसुरी चिंतन दिखाई देता है। यदि कलियुग की स्थिति सुधरती है, सतयुगी समाज वापस लाना है, पापियों की संख्या में कमी करनी है तो एक ही रास्ता है ज्ञान की आराधना का। वह ज्ञान जो पाप समुद्र से भलीभाँति सभी को तार देता है।
भगवान अर्जुन को उपदेश देने के समय बार-बार ज्ञान के महात्म्य एवं परमात्मसत्ता के प्रति समर्पण की चर्चा करते है। अर्जुन हम सबके अंदर है एवं यदि हम उस उपदेश को अपने लिए मान सकें तो हमारा कल्याण सुनिश्चित है। पापों से तारने का आश्वासन भगवान ने अठारहवें अध्याय में गीता के शिक्षण की पराकाष्ठा पर पहुँचने के बाद भी दिया है, जब वे कहते हैं, “तू सभी कर्त्तव्य-कर्मों को त्यागकर मुझ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।” (अहं त्वा सर्वपापेभ्यों मोक्षयिष्यामि मा शुचः) हम कल्पना कर सकते हैं कि भगवान कितने करुणानिधान हैं। वे बार-बार अपने शिष्य को साधक को, किसी भी जिज्ञासु पाठक को पापों से मुक्त करने का आश्वासन दे रहे हैं, शर्त एक ही है, हम तत्व से परमात्मा को जानें। चारों और उसे संव्याप्त मानें एवं फिर एकनिष्ठ भाव से उसके प्रति समर्पित हो जाएँ।
एक सामान्य व्यक्ति के लिए जो भौतिकवादी जीवन जी रहा है एवं आध्यात्मिक मार्ग की ओर आने में किसी प्रकार की हिचकिचाहट अनुभव करता है, भगवान की स्पष्ट घोषणा है कि वे ज्ञानरूपी नौका में निश्चित ही तर जाएंगे। भगवान हर उस व्यक्ति को इस वाक्य के द्वारा उत्साहित करते हैं कि यदि तुम पापियों में से भी सबसे बड़े पापी भी क्यों न हों तब भी तुम्हारे लिए आशा है। तुम जाग्रति की स्थिति में आओ, व्यापक दिव्य चैतन्य का अनुभव करो। जागों और अहंभाव से ऊपर उठ जाओ। ज्ञान की नौका तुम्हें तार देगी।
इस नौका पर बैठकर तो देखें
अब मनुष्य यह समझे कि वह निरंतर पापकर्म करता रहे तथा ज्ञानप्राप्ति का कर्मकाँड किसी तरह करते रहे, तो उसकी मुक्ति नहीं है। ‘ज्ञान’ तो वह साबुन है जो कषाय कल्मषों को आत्मसत्ता पर से साफ कर देता है, फिर वह मनुष्य की वृत्ति भी बदल देता है। यह वह ज्ञान है जिसे प्राप्त कर मनुष्य कभी मोह को प्राप्त नहीं होता एवं वह दृष्टि मिल जाती है कि वह सब प्राणियों के साथ एकात्मभूत हो जाता है। एक प्रकार की दार्शनिक समता की प्राप्ति हो जाती है। इस सर्वव्यापी आध्यात्मिक एकता में सबका ‘अशेषेण’ (येन भूतानि अशेषेण-4/35) बिना अपवाद के समावेश होता है। जो कुछ अच्छा है, सुँदर है, वहीं नहीं बल्कि जो नीच-पतित, पापी या घृणित हो, वह भी उसके अंदर आ जाता है। फिर सबके भीतर से साधु-महात्मा ही नहीं, चोर वेश्या एवं चाँडाल के भीतर से भी वे ही प्रियतम ताकते हैं और पुकार कर कहते हैं कि मुझे देख मैं यहाँ हूँ। “सब भूतों में जो मुझको प्यार करता है” ऐसी दिव्य प्रेम की शक्तिशाली घोषणा एवं पापों से विमुक्ति का आश्वासन संसार के किसी भी दर्शन शास्त्र या धर्म में, किसी भी ग्रंथ में नहीं हुआ है, जैसा कि गीता में वर्णित हुआ है।
फिर भी पूर्वकाल में मूर्खतावश जो कुछ भी हम कर बैठे हैं, उसके परिणाम तो भोगने ही होंगे। ईश्वरीय न्याय तो अपना कार्य करेगा ही। संचित और क्रियमाण कर्म तो नष्ट हो जाएंगे, पर प्रारब्ध नष्ट नहीं होगा। प्रारब्ध तो एक बँधी हुई फाइल की तरह साथ-साथ चलता है। कभी-कभी कोई समर्थ गुरु आता है, उस गुरु की कृपा होती है, तो वह प्रारब्ध भी उसकी कृपा से घटता चला जाता है, परिष्कृत होता चला जाता है। फिर मनुष्य साक्षी भाव में जीने लगता है। शरीर का कष्ट, कष्ट नहीं लगता। सदा आनंदभाव से जीने की मन में इच्छा होती है। कष्ट आते हैं तो साधक उन्हें तप बना लेता है। कर्म-विधान की भी अवहेलना नहीं होती। इसीलिए भगवान अगले श्लोक में किसी भी साधक की शंका का पूर्वानुमान कर कहते हैं-
यथैघाँसि समिद्धोऽग्निर्भस्म सात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते यथा ॥4/36
“हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को जलाकर राख कर देती है, उसी तरह ज्ञानरूपी अग्नि संपूर्ण कार्यों को भस्म कर देती है।”
कर्म वासनाएँ एवं पाप-पुण्य
यहाँ ‘कर्म’ शब्द का प्रयोग भगवान ने किया है। भूतकाल के हमारे जीवन में स्वार्थपूर्ण जीवन, कामना प्रेरित कार्यों के कारण जो वासनाएँ जन्मीं, उन्हीं की और यह संकेत हैं किसी भी कर्म की प्रेरक ये ‘वासनाएँ’ ही होती हैं और इनके शुभ व अशुभ प्रकारों से ही व्यक्ति को सुख या दुःख की प्राप्ति होती है। अशुभ वासनाएँ ही पाप कर्म को जन्म देती है। भगवान कहते है कि जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को जलाकर राख कर देती है, उसी तरह ज्ञान की अग्नि संपूर्ण कर्मों-वासनाओं को भस्मीभूत कर देती है। चूँकि साधक ज्ञानी है, उसके अहंकार भस्मसात् हो चुका है, वह समर्पण भाव से कर्म करता हुआ जी रहा है, उसके पाप दुग्ध हो जाते है। इसी तरह अहंकेंद्रित जीवन में इकट्ठे किए पापों की चूँकि शुद्ध आत्मा तक पहुँच नहीं, वे बने रहते है, त्रास देते रहते हैं तब तक, जब तक कि मनुष्य ज्ञानरूपी अग्नि में उन्हें जलाए नहीं, स्वयं को उस परमपिता सच्चिदानंदघन परमात्मा की शरण में सौंपे नहीं। ज्ञान के माध्यम से जो उपचार श्रीकृष्ण ने दिया है, वह बड़ा अद्वितीय है, क्योंकि अत्यंत पतितों-पापी से भी पापी व्यक्तियों के लिए यहाँ आशा की किरण नजर आती है।
प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य पाप क्यों करता है, क्यों वह पापकर्म में लिप्त होता है? कर्म कब पाप बनता है, कब पुण्य, यह गुत्थी भी युगों-युगों से चली आ रही है। आखिर आदमी ‘सुरदुर्लभ मानव तन’ पाकर पापकर्म में लिप्त होता ही क्यों है? यह भी समझ में नहीं आता। परमपूज्य गुरुदेव इसका समाधान अपनी लेखनी से देते है। वे लिखते हैं, “सामान्य मानव में कर्म के प्रेरक तत्व उसकी अभिरुचि, आदतें व जन्माँतरों की प्रवृत्तियां होती है। इन्हीं सबके अनुसार वह जीवन ऊर्जा को नष्ट करता बिखेरता रहता है, जबकि साधनारत दिव्य-कर्मी विधाता द्वारा दी गई ‘कर्म की स्वतंत्रता’ का ठीक-ठीक उपयोग करने में समर्थ होता है। वह स्वयं की अभिरुचियों, आदतों एवं प्रवृत्तियों को नए सिरे से गढ़ता है। उसके अंतराल में नए संस्कार जन्म रकने की लालसा, अहंकार का झंडा ऊँचा करने की चाहत नहीं रह जाती। प्रत्येक काम लोक के प्रति करुणा, आत्मविकास के सोपानों पर चढ़ने के उद्देश्य से होता है। यही कर्म पुण्य बन जाते हैं। इसके लिए सुसंस्कृत साधक पहले बनना होता है।” (अखण्ड ज्योति अगस्त 1942 पृष्ठ 36)। वास्तविकता यही है। गौरव बोध से होने वाला काम, जिसके पीछे स्वार्थ और अहं की प्रेरणा न हो, पुण्य बन जाता है। अंतर्मन में ग्लानि, कुँठा, हीनता की चोट सहनी पड़े, ऐसे काम पाप बन जाते हैं।
‘पाप’ शब्द की धुरी पर ईसाई धर्म की नींव रखी हुई है। पापों का प्रायश्चित (कन्फ्रेशन) यही विधान उनके यहाँ प्रभु के द्वार पर पहुँचने का राजमार्ग बनाता है। भारतीय संस्कृति का चिंतन इससे भी आगे परिष्कृत मार्ग अपनाता है एवं हर श्वास में योग, हर श्वास में जीवन साधना जीने का मंत्र सिखाता है। जब जीवन साधना निखरने लगती है, तो पापकर्म स्वतः नहीं बन पड़ते। रोजमर्रा के कषाय-कल्मषों एवं पापकर्मों के बीजों को भूनकर राख कर देने के लिए उनका स्वरूप बदलने के लिए इसीलिए परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री की ज्ञानगंगा बहाई। कभी जो प्रतिबंधों से घिरी थी, उस साधना को जन-जन के लिए उपलब्ध करा दिया। गायत्री मंत्र का भर्गतश्रव पापनाशक सविता देव का तेज धारण करने की प्रेरणा देता है। यह ज्ञान यदि जीवन का अंग बन जाए तो व्यक्ति भवबंधन में फँसेगा ही क्यों? ज्ञान की और अधिक व्याख्या अगले अंक में क्रमशः
वासवदश्रा अपने समय की श्रावस्ती को अनिंद्य सुंदरी नगरवधू थी। सारा कुलीन समुदाय उसे पाने की भौंरे की तरह मँडराता। भिक्षु उपगुप्त उन दिनों महान तपस्वी ही नहीं सौंदर्य और सौष्ठव की प्रतिभूति भी थे, वासवदश्रा केवल उन्हें चाहती थी किंतु आत्मा के उपासक उपगुप्त पर उसका कुछ भी प्रभाव न पड़ा। जीवन के उत्तरकाल में वृद्धा वासवदश्रा बीमार हो गई। तब एक दिन उपगुप्त उधर पहुँचे। वासवदश्रा उन्हें देखकर बोली-तात! आप अब आए हैं, जब मेरे पास आपके लिए कुछ बचा नहीं।
आत्मज्ञानी उपगुप्त की आँखें उमड़ा पड़ी। उन्होंने अत्यन्त आदर और स्नेहपूर्वक वासवदश्रा से कहा- भद्र सौंदर्यता आत्मा की होती है और वह अविनाशी है। यह कहकर वे उसकी सेवा में जुट गए।
साठ वर्ष तक निरंतर लेखनी की साधना करने वाले, अपनी चिंतन क्षमता, कल्पनाशक्ति, भाव संपदा खपाने वाले तपस्वी युगद्रष्टा आचार्य श्री को पत्रकारिता के क्षेत्र में भी एक पथप्रदर्शक के रूप में याद रखा जाना चाहिए। उन्होंने दार्शनिक, साहित्यकार एवं मार्गदर्शक तीनों की भूमिका निभाई। जीवनभर वे अपनी लेखनी से, पुस्तकों-पत्रिकाओं, पत्रों व प्रत्यक्ष चर्चा से औरों को भी प्रोत्साहित करते रहे, ताकि सकारात्मक लेखन चलता रहे, जिस किसी के भी अंदर पात्रता हो, वह युगसाहित्य के निर्माण में भागीदारी करे। कार्य बड़ा था, वे स्वयं भी सामर्थ्य रखते थे एवं अस्सी वर्ष की आयु पूरी होने तक उन्होंने जो लिखा, वह अपने आप में एक कीर्तिमान है। फिर भी वैज्ञानिक अध्यात्मवाद हो, चाहें काव्यलेखन, विभिन्न स्तर की साहित्यिक प्रतिभाओं को सतत प्रेरित कर उनका पथ प्रदर्शन जीवन भर किया। इन पंक्तियों का लेखक भी एक चिकित्सक था, जिसे कुछ भी प्रशिक्षण हिंदी लेखन में नहीं मिला था। लेकिन उसकी उँगली पकड़ कर भी उन्होंने लिखना सिखा दिया, ताकि अनेकों प्राणचेतना के संवाहकों में एक वह भी बन सके।
पूज्यवर के पत्रों के माध्यम से यह संवेदनासिक्त मार्गदर्शन झलक देता है। इस बार के गुरुकथामृत में हमने कुछ ऐसे ही पत्रों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। पहला पत्र 4 मई, 1952 को लिखा गया है अजमेर के श्री मोहनराज भंडारी को। उन्हें वे अपना अन्नय भी मानते थे एवं उसी मित्र भाव से लिखते भी थे। वे लिखते हैं-
हमारे आत्मस्वरूप,
आपका पत्र मिला। इन दिनों आपने जो ठोक साहित्यिक कार्य किए हैं, उनका विवरण जानकर हमें बड़ी प्रसन्नता होती है। आपके द्वारा, आपकी लेखनी द्वारा राष्ट्रनिर्माण का बहुत कार्य होने की आशा है।
‘कुसुम’ मिला, पर उससे प्रसन्नता नहीं हुई। आप पहेलियों का क्या झंरुट ले बैठे? आपकी उज्ज्वल कीर्ति में इससे कमी ही होगी। आप इसे साहित्यिक ही रखते तो अधिक अच्छा होता।
कहानी लिखने का अभ्यास अब छूट गया है, धार्मिक लेख ही लिखता रहता हूँ। फिर भी तुम्हारे लायक कुछ लिखूँगा। पारिश्रमिक भेजने की कतई जरूरत नहीं है। तुम्हारा आत्मभाव ही उच्चकोटि का बहुमूल्य पारिश्रमिक है। घर के सब लोगों को हमारा यथोचित नमस्कार कहना।
-श्रीराम शर्मा
पत्र की भाषा शिक्षण देती है। उनकी लेखन शैली के बहुविध आयाम भी दर्शाती है। पहले पैराग्राफ में वे उनकी पीठ थपथपाते हैं व कहते है कि आपसे हम राष्ट्र निर्माण के स्तर पर लेखन की अपेक्षा रखते हैं। इतने ऊंचे स्तर की आशा-अपेक्षा है एवं उन्होंने अपनी पत्रिका निकाली भी तो ‘क्विज’ पहेलियों वाली। इस पर उन्होंने खिन्नता व्यक्त की है। लेखक-साहित्यकार युगनिर्माता होता है। वह जीवन को दिशाधारा देने का कार्य करता है, न कि “कौन बनेगा करोड़पति’ स्तर की प्रतिस्पर्द्धा वाला पहेली भंडार बनाने वाला व्यवसायी। वे अपने लिए भी लिखते हैं कि पारंपरिक औपन्यासिक कहानियाँ जो मनोरंजन करती है, वे नहीं लिखते, मात्र धार्मिक साहित्य का लेखन करते है। जिसका प्रमाण उनकी पंद्रह वर्षीय पुरानी अखण्ड ज्योति पत्रिका थी, जिसके माध्यम से मोहनराज जी जुड़े थे। पारिश्रमिक पर जो टिप्पणी है, वह भी हृदय को स्पर्श कर जाती है। यह एक पत्र नहीं, दस्तावेज है, एक नूतन उभरते साहित्यकार को दिए जा रहे मार्गदर्शन का, उँगली पकड़कर सिखाने वाले स्तर की गुरुसत्ता के परामर्श का।
दूसरा पत्र है मथुरा के ही डॉ. त्रिलोकी नाथ ब्रजवाल को लिखा गया, जो उन दिनों पिलानी में अध्यापक थे। काव्य में उनकी गति थी। गायत्री तपोभूमि मथुरा से 20 मार्च 1954 को लिखे गए इस पत्र में पूज्यवर कहते हैं-
“पत्र तथा कविताएँ मिलीं, जीवन यज्ञ के तीसरे अंक में आपकी कविता दे रहे हैं। अन्य कविताएँ आगे छपती रहेगी। जीवन यज्ञ आपके पास बराबर पहुँचता रहेगा। आपकी आत्मीयता के लिए कृतज्ञ है। कुछ अधिक अक्षरों की अधिक लंबी लाइनें हों, चार-चार लाइन के छंदों की शैली हमें अधिक रुचिकर लगती है। जीवन यज्ञ तथा अखण्ड ज्योति में आप अक्सर वैसी ही कविताएँ देखते होंगे। इस प्रकार की रचनाएँ बनाने का प्रयास करें तो हमें और भी अधिक प्रसन्नता होगी। आशा है आप सानंद होंगे।
-श्रीराम शर्मा
अखण्ड ज्योति, जीवन यज्ञ दो पत्रिकाएँ उन दिनों निकलती थीं। बाद में जीवन यज्ञ बंद हुआ फिर युगनिर्माण योजना पत्रिका प्रकाशित की गई। प्रत्येक में काव्य को स्थान दिया गया था। प्रारंभिक व अंतिम पृष्ठ पर फड़फड़ा देने वाली कविताएँ होती थी। इस युग काव्य ने एक नई विधा को जन्म दिया, जिसमें साधना, उपासना व राष्ट्र आराधना का अद्भुत समन्वय होता था। पृथक से प्रकाशित पुस्तकों रहित विभिन्न कवियों को हमारे गुरुवर ने लिखना सिखाया, छंदबद्ध करना सिखाया एवं प्रायः दो से तीन हजार कविताएँ इनसे लिखवा लीं। इन्हीं का समन्वित रूप काव्य के वाङ्मय के खंडों के रूप में शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा हैं। देखने योग्य बात है- कविता लेखन पर सुव्यवस्थित मार्गदर्शन। कवि अपनी भाव संवेदनाओं को पिरोते हुए कैसे लिखें, यह स्टीक बिंदुवार चिंतन वे सतत देते रहते थे। एक ऐसा ही पत्र हमारे मिशन की सुपरिचित कवयित्री श्रीमती मायावर्मा को लिखा हम यहाँ दे रहे है। गुरुसत्ता ने अपनी शिष्या की अंतर्वेदना को समझा व उन्हें काव्य लिखने को प्रेरित किया। वे जीवनपर्यंत लिखती रहीं। 22-12-67 को लिखे एक पत्र में पूज्यवर लिखते हैं-
चि. माया आशीर्वाद स्नेह
तुम्हारा पत्र मिला। कविता भी। तुम्हारी दोनों पुस्तकों प्रेस में है। कविताएँ सुधार ली हैं। जिन कविताओं में अधिक सुधार होना है, उन्हें रोक लिया है। तुम जब कभी इधर आओगी, तब उनका सुधार समझाकर तुम्हारे ही हाथों उसे ठीक कर लेंगे, ताकि आगे से तुम्हें इन बातों का ध्यान रहे। अपना लेखनकार्य चालू रखें। उसका अधिकाँश भाग तो काम में आता ही रहेगा। सुधार समझाना पत्र में नहीं, प्रत्यक्ष ही संभव हो सकेगा। सो कभी सुविधानुसार आना।
ग्वालियर की माया वर्मा वैसे माया सक्सेना थीं, पर उन्होंने अपनी बेटी (मानसपुत्री) का काव्य की दृष्टि से नामकरण माया वर्मा कर दिया। उन्होंने उनके पति ने स्वीकार कर लिया। कई पुस्तिकाएँ, एकाँकी, मार्गदर्शक नाटक उनसे लिखवाए। वे समय-समय पर मथुरा जाती रहतीं व प्रत्यक्ष मार्गदर्शन प्राप्त करती थीं। विशेष बात यह थी कि सुधार भी पूज्यवर ही करते थे, पर उसे वे उन्हीं के हाथों लिखवाना चाहते थे, ताकि अभ्यास हो जाए। फिर आगे काव्य में त्रुटि न हो। प्रत्यक्ष चर्चा में कई पहलू आते हैं, जो समझा दिए जाते हैं। इसी आधार पर आत्मीयता से भरे मार्गदर्शन की धुरी पर उन्होंने युगपीर का निर्वाह करने वाली कविताएँ लिखवा लीं माया जी से, जो आज मील का पत्थर बन गई।” जिसका हर आँसू रामायण प्रत्येक कर्म ही गीता है” से लेकर ”ओ सविता देवता संदेशा मेरा तुम ले जाना” इसी शक्तिपात की परिणति है।
सिवनी के श्री ध्रुवनारायण जौहरी अच्छे चिंतक हैं, शिक्षाविद् हैं एवं ‘अखण्ड ज्योति’ का वैज्ञानिक अध्यात्मवादपरक परिवर्द्धक होने के बहुत पूर्व से पूज्यवर से जुड़े रहे हैं। आज भी वे हमारे संपर्क में हैं, समय-समय पर हमें भी परामर्श देते रहते हैं। उन्हें 17-1-70 को लिखे एक पत्र में पूज्यवर लिखते हैं-
“आपका भेजा अतींद्रिय विज्ञान का अनुवाद यहाँ यथासमय आ गया था। हमें आजकल बहुत करके बाहर ही करना पड़ रहा है, सो लौटने पर पत्र लिख रहे हैं।
अपना यह प्रयास बराबर जारी रखें। इस प्रयास से उपर्युक्त पाठ्य सामग्री प्राप्त करने में बहुत सहायता मिलेगी। वेदाँत का जितना काम हो चुका हो, जब तुम साकोली महासमुँद आओ, तब साथ लेते आना। बाकी जितना काम होता जाए, उतना भेजते जाना।”
पत्र सरल-सा है, पर जरा इसकी भाषा पर ध्यान दें। उपर्युक्त पाठ्य सामग्री मधुसंचय की तरह से पूज्यवर द्वारा एक नहीं, ढेरों व्यक्तियों को प्रेरित कर लिखवा ली गई। समय-समय पर उसका अखण्ड ज्योति पत्रिका में उपयोग भी हुआ, पर विलक्षण बात यह थी कि विज्ञान, परामनोविज्ञान की सामग्री भेजने वाला लेखक-शिष्य भी जब छपकर आए लेख को देखता था तो बस उँगली दाँतों तले दबाकर रह जाता था। वैज्ञानिक तथ्यों की गवाही लेकर किस तरह ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ स्थापित किया गया, इस पर समय रहते जब भी शोध होगी, कई अनजाने पहलू सामने आएंगे। गुरुसत्ता ने सभी को अवसर दिया, वे स्वाध्याय करें, पाठ्य सामग्री का संकलन करें व उसे नियमित भेजते रहें। वे अपने कार्यक्रम जिनमें वे अति व्यस्त रहते थे, वहाँ भी उस सामग्री को बुलवाने में संकोच नहीं करते। इससे लेखक शिष्य को भी सरलता हो जाती थी, प्रत्यक्ष मार्गदर्शन भी मिल जाता था। श्री जौहरी जी के बालावा सतींद्रदत्ता, रमाकाँत शर्मा रमन, निर्मलराय, श्री प्रभाकर सहित ऐसे न जाने कितने नाम हमारे स्मृतिपटल पर आ जाते हैं, जो अपने दैनंदिन जीवन के अतिरिक्त इसी साधना में नियोजित कर दिए गए। इसका लाभ उन्हें भी मिला एवं मिशन को भी।
जहाँ तक इस पाठ्यसामग्री का प्रश्न है, एक अनुभूति इस स्तंभ लेखक की है, जो बताना जरूरी है। वे सभी को विषय देते थे व अगले दिन पढ़कर लेख लाने को कहते थे। 1983-84 की बात है। एक विषय पर लेखन हेतु पढ़कर अगले दिन आने को कहा गया। विषय स्नायु विज्ञान व उसकी जटिलताओं से संबंधित था। पढ़ा गया एक छोटा-सा आलेख तैयार कर अगले दिन प्रातः अपनी ही भाषा में लाया गया तो प्रत्युत्तर में एक लिख हुआ लेख दे दिया गया, जो उसी दिन प्रातः अर्द्धरात्रि को लिखा गया था। अपने सभी प्रतिपादन उस लेख में देखकर आश्चर्य हुआ, क्योंकि वे मौलिक थे, गुरुसत्ता के शिक्षण के आधार पर तथ्यों को एकत्र कर लिखे गए थे। आश्चर्य मिटा गुरुदेव की वाणी सुनकर, जिस समय वे बोले, “जब तुम पढ़ रहे थे मैं यहाँ लिख रहा था। तुम्हारे मस्तिष्क को मैं यही से बैठे पढ़ रहा था। आश्चर्य मत करना। यह सारा सूक्ष्म परोक्षजगत का लीला संदोह है।” ऐसे में इनमें से कोई भी यदि यह सोचने लगे कि हम लिखते हैं, तो हम कितने नादान हैं। लिखाने वाले भी वे ही हैं, सोचने की प्रेरणा देने वाले भी वे ही हैं, यह समर्पण भाव मन में रहे तो क्यों तो अहंकार आए व क्यों चिंतन गड़बड़ाए?
एक पत्र और जो श्री रामस्वरूप खरे को 1-1-67 को लिखा गया। यहाँ अंश रूप में प्रस्तुत है-
कल्याण, सरस्वती आदि में आपकी रचना छपने की बड़ी प्रसन्नता है। आप साहित्यिक जगत् में उज्ज्वल नक्षत्र की तरह यशस्वी हों, ऐसी आँतरिक कामना है।
यदा-कदा अपनी पत्रिकाओं के लिए भी कुछ रचनाएँ भेजते रहें।
पत्र में मंगलकामनाएँ हैं कवि के लिए व पूर्व से दिया जा रहा आह्वान है कि वे अपनी कविताएँ अन्य पत्रिकाओं के अलावा अखण्ड ज्योति, युगनिर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान पाक्षिक आदि पत्रिकाओं के लिए भी भेजते रहें। पं. रामस्वरूप जी निरंतर काव्य-लेखन करते रहे एवं पूज्यवर अपनी पत्रिकाओं में उन्हें अग्रणी स्थान देते रहे। पत्र छोटा-सा है, पर एक साधक-कवि को प्रेरणा दी गई है एवं उसके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ व्यक्त की हैं। अंत में दुर्ग के श्री सुमंत कुमार मिश्र को लिखा गया एक पत्र दे रहे हैं, जिसमें उनसे पत्रिकाओं का, प्रकाशित योजना का फीडबैक माँगा गया है।
3-4-67 को लिखे पत्र में वे लिखते हैं-
“मार्च की अखण्ड ज्योति आपने पढ़ी होगी। न पढ़ी हो तो उसे एक बार फिर पढ़ लें। आगामी गायत्री जयंती से जो युगनिर्माण विद्यालय आरंभ होने जा रहा है, उसके तथा प्रथम पंचवर्षीय योजना के संबंध में अपना अभिमत लिखें। प्रस्तुत योजना का सफल बनाने के लिए आपके सुझाव तथा परामर्श की विशेष रूप से आवश्यकता अनुभव की जा रही है।”
ऐसे एक नहीं, कई सुमतों को पूज्यवर ने ऐसे पत्र लिखे हैं। विनम्रतापूर्वक अपने पाठक-शिष्यों से अभिमत माँगना, सुझाव-परामर्श की बात लिखना, यह बताता है कि किस उच्च स्तर पर पूज्यवर का हर कार्य नियोजित होता था। इतना बड़ा मिशन-विराट् वटवृक्ष यों ही नहीं खड़ा हो गया है। उसके पीछे गुरुसत्ता का तप तो है ही, ऊपर उद्धृत पत्रों की भूमिका कितनी है, हर कई समझ सकता है।
राजा शतायुघ प्रजा निरीक्षण के लिए निकले। एक झोपड़ी में जराजीर्ण वयोवृद्ध दीखा। राजा रुक गए। कुतूहलवश पूछा, “आपकी आयु कितनी है?” देखने में वे शतायु की परिधि तक पहुँचे दीखते थे। वृद्ध ने झुकी गरदन उठाई और कहा, “मात्र पाँच वर्ष।” राजा को विश्वास न हुआ। फिर से पूछा तो वही उत्तर मिला। वृद्ध ने कहा, “पिछला जीवन तो पशु-प्रयोजनों में निरर्थक ही चला गया। पाँच वर्ष पूर्व ज्ञान उपजा और तभी से मैं परमार्थ प्रयोजन में लगा। सार्थक आयु तो सभी से गिनता हूँ।”
(परमपूज्य गुरुदेव एक असमाप्त जीवन गाथा-4)
मातृत्व की विलक्षण अनुभूति
आँवलखेड़ा में एक पुरानी हवेली थी। भाई-भतीजे, चाचा-ताऊ सब उसी में रहते थे। संयुक्त परिवार था। यजमानों, जिज्ञासुओं और स्वजन-संबंधियों का आना-जाना भी बना रहता था। खासी चहल-पहल रहती। पंडित रूपकिशोर जी तब पचपन वर्ष के थे। उनकी पत्नी दानकुँवरि को घर में सब लोग ताई जी कहते थे। पंडित रूपकिशोर सब भाई-बहनों में बड़े थे। घर में जितने भी बच्चे थे, उनका पंडित जी को ताऊ जी और उनकी जीवन-संगिनी को ताई कहना स्वाभाविक ही था। वे परिवार के सभी सदस्यों का ध्यान रखतीं। देवरानियों और बहुओं के लिए वे जेठानी या रिश्ते में सास नहीं, वात्सल्य और क्षमा से भरी बड़ी बहन या माँ से भी बड़ी ताई ही लगती थीं। रात के चौथे पहर उठतीं और देर रात तम जागते हुए स्वजन संबंधियों का और मेहमानों का ध्यान रखने में व्यस्त रहा करतीं।
सन् 1911 में उन्हें मातृत्व का आभास हुआ। पहली संतान गर्भ में आई। ताई जी को कुछ विलक्षण अनुभव होने लगे। बहुत सहजता से वे बताती थीं कि इन अनुभवों से उन्हें डर नहीं लगता, अटपटा भी महसूस नहीं हुआ। पास-पड़ोस की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों से चर्चा की तो उन्होंने बताया कि कुल देवता प्रसन्न हो रहे हैं। ये प्रतीतियाँ वही करवा रहे हैं। बहुत बाद में स्पष्ट हुआ कि ये अनुभव पूर्वजों या कुल देवताओं के अनुग्रह-आशीर्वाद स्वरूप ही नहीं हैं। वे बताया करती थीं कि एक सुबह घर में दूध औटाया जा रहा था। चूल्हे पर बरतन चढ़ा हुआ था। स्नान-पूजा से निवृत्त होकर वे और दिनों की तरह बाद में किए जाने वाले कार्यों के बारे में सोच रही थी। शरीर में इतनी स्फूर्ति और सक्रियता थी कि देर रात तक काम करना पड़ा, तो भी कभी सुस्ती नहीं आई। कठोर परिश्रम करने पर भी थकान अनुभव नहीं हुई। उस सुबह न जाने क्या हुआ कि झपकी लग गई। वे बैठी हुई थीं और पलकें मुँद गईं। लगा जैसे नींद आ गई है और कोई सपना देख रही है।
सपना किसी अज्ञात प्रदेश के वन में था। वे उस निर्जन प्रदेश में अकेली हैं। चारों और सूर्य की स्वर्णित आभा बिखरी है। पूर्व दिशा में तप्त अग्नि पिंड की तरह सिंदूरी लाल रंग का गोला उदित हो रहा है। उसी उदित सूर्य का प्रकाश चारों और फैल रहा है।
वातावरण में व्याप्त सुगंध ने ताई जी को अभिभूत कर दिया। स्वप्न दृश्य में ही वे अपनी सुध-बुध खो बैठीं। फिर पूर्व दिशा में उदयाचल के पीछे से उभरता सूर्य पिंड धीरे-धीरे प्रखर होता जा रहा है। पिंड के मध्य में एक नारी आकृति की झलक दिखाई दे रही हैं। स्वर्णिम काँति से युक्त वह आकृति हंस पर बैठी है। दायें हाथ में कमंडल और बायें हाथ में पत्राकार पोथी। ताई जी उस समय स्पष्ट नहीं देख पाईं कि कौन-सा ग्रंथ है। वे समझी कि भागवत है, क्योंकि पतिदेव इसी शास्त्र का पाठ-कथा और अनुष्ठान संपन्न कराते थे। वह आकृति कुछ क्षण तक दिखाई दी, फिर लुप्त हो गई। देखा तो दूध उफन आया है। पतीले से उफनकर कुछ चूल्हे में भी गिर गया। जलती हुई लकड़ियों पर गिरने से छनन-छिन की आवाज आ रही थी। उस आवाज से ही तंद्रा टूटी।
पतिदेव को यह दृश्य सुनाया। ताई जी ने यह भी कहा कि उस देवी के हाथ में भागवत की पोथी थी। पंडित जी ने स्पष्ट किया कि वह पोथी श्रीमद्भागवत् की नहीं, वेद की है। भागवत् शास्त्र उस पोथी के एक मंत्र की व्याख्या-विस्तार ही है। भागवत् रामायण आदि ग्रंथों का गायत्री मंत्र की विवेचना में लिखे जाने या उनकी प्रेरणाओं को स्पष्ट करने वाला शास्त्र कहा जाता है। ताई जी को यह दृश्य बाद में भी दिखाई दिया। एक बार दोपहर के समय, तब वे भोजन आदि से निपट चुके स्वजनों का कुशलक्षेम पूछने के बाद कुछ देर के लिए बैठी थी। उस समय वे शाम को किए जाने वाले कार्यों की तैयारी करती हुई रसोई में ही थीं।
ताई जी ने एक बार भाव समाधि की दशा में देखा कि वे एक सरोवर के किनारे खड़ी हुई हैं। उसमें कमल खिले हुए हैं। एक बड़े कमल पर वही आकृति विराजमान दिखाई दी, जो पहले कभी सविता मंडल में विराजी हुई थी। एक स्वप्न में पूर्व दिशा से देवताओं के विमान उड़ते हुए दिखाई दिए। उनमें बैठी देवसत्ताएं फूल बरसा रहीं थी। पंडित जी के अनुसार ये दृश्य अंतर्जगत में हो रही हलचल के संकेत थे। संकेतों को चेतना में होने वाले परिवर्तन भी कह सकते हैं। जब भी किसी पुण्य आत्मा को शरीर धारण करना होता है और वह गर्भ में आ चुकी होती है, तो इस तरह के स्वप्न दिखाई देते हैं।
घर-आँगन में भी उन दिनों कुछ विचित्र घटनाएँ होने लगीं। ताई जी बताया करती थीं कि अचानक घर में सुगंध फैल जाती, जैसे अगरबत्तियां जलाई हों या हवन किया जा रहा हो। सुगंध भीनी-भीनी होती थीं। कुछ समय यह सुगंध कायम रहती और धीरे-धीरे कम हो जाती। हवेली में अचानक गायें बहुत आने लगीं। गाँव का घर था, पास ही गायों को बाँधने के लिए गोठ भी थी। घर की गाये तो होती हीं, बाहर से भी आ जातीं। कभी-कभार आठ-दस गायें रात भर रुक जातीं। वे आंवलखेड़ा के दूसरे ग्रामीणों की गोठ से ही आतीं। लोग उन्हें ढूँढ़ने निकल पढ़ते और पंडित जी के यहाँ पाकर आश्चर्य करते। सामान्य दशा में पराये पशुओं को भगा दिया जाता है, लेकिन ताई जी के मन में उन दिनों विलक्षण परिवर्तन आया कि गायों को भगाने की बजाय वे उनकी सेवा करने लगतीं, उन्हें चारा-पानी देतीं।
ताई जी उस समय जरूर थोड़ी असहज हुई जब हवेली में मधुमक्खियाँ आकर भिनभिनाने लगीं। जिस तेजी से वे उड़ती हुई आईं, सप्ताह भर में उन्होंने हवेली में चार-पाँच छत्ते बना लिए। परिवार के सभी लोगों को असुविधा हुई। मधुमक्खियाँ किसी को काट नहीं रही थीं। फिर भी घर का वातावरण तो उनके कारण बिगड़ ही रहा था। वहाँ के लोगों ने मधुमक्खियों को भगाने के उपाय सोचे। गाँवों में एक ही उपाय होता है कि आग जलाकर धुआँ किया जाए।
ताई जी को पता चला कि मधुमक्खियों को भगाने के उपाय किए जा रहे हैं, तो वे बिगड़ गईं। हालाँकि घर में वही सबसे ज्यादा चलती-फिरती थीं, उन्हीं असुविधा भी होती थीं, लेकिन उन्हें अच्छा नहीं लगा कि कोई उनके छत्ते उजाड़े। वे किसी को काट-पीट नहीं रहीं। वे अपने घर में रह रही हैं। उन्हें नुकसान क्यों पहुँचा रहे हो। वे हमारा कुछ नहीं बिगाड़ रहीं तो हम ही क्यों उनका घर उजाड़ें? ताई जी के डपटने पर सब शाँत हो गए।
पंडित रूपकिशोर जी उस समय कथा कहने के लिए बाहर गए हुए थे। आठ-दस दिन बाद लौटे। घटनाक्रम पता चला तो उन्होंने भी ताई जी का समर्थन किया। यह आध्यात्मिक तथ्य समझाया कि मधुमक्खियों का आना और घर में छत्ते बनाना शिव संकेत है। परिवार में जब कोई दिव्य आत्मा आने वाली हो तब तो यह शिव का वरदान है। उनके भेजे हुए प्राणी फूलों की सुवास और मधु संचित कर ला रहे हैं। यह शिव का अनुग्रह और आने वाली आत्मा के लिए आश्वासन भी है।
गाँव-घर में बजी बधाई
संवत् 1968 में आश्विन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि (20 सितंबर सन् 1911) को आगरा-जलेसर मार्ग पर स्थित उस गाँव की हवेली में सुबह नौ बजे श्रीराम का जन्म हुआ। पितृपक्ष चल रहा था। सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार इन दिनों शरीर छोड़ना और जन्म लेना दोनों ही विलक्षण हैं। कहते हैं कि जो लोग देह छोड़ते हैं, वे परलोक में ज्यादा नहीं भटकते। उनकी ऐसी कोई भोगवासना शेष नहीं रह जाती कि उसकी तृप्ति के लिए अशरीरी अवस्था में रहना पड़े। वे आत्माएँ या तो सीधे पितृलोक चली जाती हैं अथवा नया शरीर धारण कर लेती हैं। इस अवधि में जन्म लेने वाली आत्माएँ भी मुक्तप्राय होती हैं। उनकी एकाध सूक्ष्म वासना शेष रहती है, जिसे पूरा करने के लिए वे शरीर में आती हैं।
यह भी कि पितृपक्ष में जन्म लेने वाले लोग उसी वंशपरंपरा के कोई मेधावी पूर्वज होते हैं। वे अपनी परंपरा को आगे बढ़ाने, उसे समृद्ध करने, गौरव बढ़ाने या पिछले जन्मों में जिन लोगों का अनुग्रह-उपकार रह गया हो, उसे चुकाने के लिए आते हैं। पितृपक्ष और जन्म से पहले होने वाली घटनाओं के आधार पर आंवलखेड़ा के पंडितों ने भी कहा कि रूपकिशोर जी के यहाँ योगी, यति आत्मा प्रकट हुई है। पचपन वर्ष की उम्र में उनका सौभाग्य उदित हुआ है।
शिशु का जन्म घर में ही नहीं, गाँव में भी उल्लास का विषय बन गया। तीस-चालीस घर थे। गायों के आने, मधुमक्खियों के छत्ते बनाने, ताई जी की कही हुई बातें आश्चर्यजनक रूप से चरितार्थ होने की चर्चा आसपास के घरों में ही नहीं गाँवों में भी फैल गई थी। धर्म-धारणा और लोकोत्तर ज्ञान के सहज बोध के चलते बुजुर्ग ग्रामीण उन घटनाओं के समय ही कह चुके थे कि पंडित जी के घर में योगी-यति-आत्मा जन्म लेने वाली है। जन्म हो गया तो आस-पास के गाँवों के जिन श्रीमंतों और कुलीन परिवारों में पंडित जी कथा कहने जाते थे, वहाँ से भी लोग आए।
गाँव के लोगों को उन सबका आना सहज लगा। विशेष लगा तो यह कि गाँव में साधु-संन्यासियों का आना-जाना बढ़ गया। पहले कभी इक्का-दुक्का साधु ही भूले-भटके आता था। शिशु का जन्म होने के बाद चार-पाँच संन्यासी प्रतिदिन आने लगे। जिस दिन जन्म हुआ उस दिन दस बजे एक ऊँचा, पूरा और तेजस्वी संन्यासी हवेली के बाहर आकर खड़ा हो गया। रुदन सुनकर उसने बच्चे को देखने की इच्छा व्यक्त की। ताई जी को संकोच हुआ, लेकिन पंडित जी के समझाने पर मान गई। बच्चे को देखकर संन्यासी ने दोनों हाथ उठाए और दीर्घायु-यशस्वी होने का आशीर्वाद देकर वापसी का रुख कर लिया।
ताई जी बताया करती थीं कि श्रीराम का जन्म होने के बाद कोठरी में मधुर संगीत गूँजने लगा। अगले दिन सुबह तक मंत्रों के पाठ और रामायण की धुन सुनाई देती रहीं। ताई जी की आँतरिक स्थिति के कारण भी यह अनुभव हो सकता है, लेकिन संन्यासियों के आने-जाने से उन्हें परेशान होते हुए कई लोगों ने देखा। साधु-महात्माओं को घर के दरवाजे पर आकर ठिठक जाने और बिना कुछ बोले चुपचाप खड़े रहने से वे भी थोड़े परेशान हुए। उन्हें भेंट-पूजा दी जाती, तो मना कर देते। सौरिगृह की और टकटकी लगाकर देखते रहते। बच्चे के रोने की आवाज सुनकर वे चले जाते। साधुओं के आने से पंडित जी को अजीब तो लगता था, लेकिन वे परेशान नहीं होते। ताई जी परेशान होतीं तो उन्हें समझाबुझा देते।
बालक सोलह-सत्रह दिन का हुआ होगा। सूतक निवारण के बाद नामकरण संस्कार की व्यवस्था की गई। उस दिन एक विलक्षण घटना घटी, जिससे ताई जी के साथ पंडित जी भी थोड़े विचलित हुए। संस्कार के लिए विजयादशमी का दिन चुना गया। गाँव में रामलीला या रावण-दहन जैसे कार्यक्रम नहीं होते थे। घरों में नवाहृ पारायण बिठा लिया जाता था। सप्तदशी पाठ का प्रचलन भी था, लेकिन ज्यादा लोग रामचरितमानस का ही पाठ करते। बच्चे का जन्म होने के कारण घर में सूतक मनाया गया। संध्यावंदन और पूजा-पाठ के नियम कर्म तो यथावत् जारी रहे, लेकिन नवरात्रि की विशेष पूजा नहीं हुईं। नवमी के दिन सूतक निवारण हुआ। उसी दिन रामचरित्रमानस का अखण्ड पाठ रख लिया गया। अगले दिन पूर्णाहुति, यज्ञ और यज्ञ के साथ नामकरण संस्कार।
मानस पूर्णाहुति, या और संस्कार आयोजन में गाँव के लगभग सभी लोग आए। विजयादशमी के दिन लोगों का आना शुरू हुआ। जो भी आया उसने देखा कि हवेली के द्वार पर एक संन्यासी खड़ा हुआ है। कुछ देर बाद वहाँ एक साध्वी भी आ गई। दोनों में कोई संवाद नहीं हुआ, लेकिन नामकरण आरंभ होने तक वे एक ही जगह अविचल खड़े रहे। संस्कार आरंभ हुआ तो दोनों अंदर आ गए। ताई जी की गोद में लेटे शिशु को दोनों अपलक देखते रहें। संस्कार आरंभ हुआ तो ताई जी की निगाह उन दोनों पर पड़ गई। पहली बार देखकर वे सहमीं और शिशु को पल्ले से ढकने लगीं। साधु ने कहा, “रहने दे माई, हमें भी लाल को देख लेने दे। जी भर कर देख लें, फिर पता नहीं हम देख पाएँ या नहीं।” साधु ने अपनी ओर इंगित किया था कि पता नहीं हम लोग बाद में में रहें या न रहें। लेकिन ताई जी को लगा कि वह बच्चे के बारे में कुछ कह रहे हैं। उन्हें गुस्सा आ गया। वे वेदी से उठीं और साधु को डपटने लगीं। साध्वी को भी आड़े हाथों लिया। दोनों अपनी सफाई देते रहे, लेकिन ताई जी का गुस्सा सिमटने में ही नहीं आ रहा था। पंडित जी उठे और उनके मुँह से अनायास निकल आया, “रहने दो श्रीराम की माँ। तुम्हारे बच्चे का कोई अनिष्ट नहीं होगा। वह कुशलमंगल ही रहेगा।”
संन्यासियों में भी जगी ललक
पंडित जी का कहना था कि साधु ने कहा, हम जाते हैं माई, लेकिन हमारी थोड़ी-सी बात मानना। बच्चे का नाम श्रीराम ही रखना, जो उसके पिता के मुँह से अपने आप निकला है। यह प्रभु की इच्छा है। पंडित जी ने भी साधु के मत से अपना मत मिला दिया। संन्यासी और योगिनी को फिर ताई जी ने कुछ नहीं कहा। वे संस्कार संपन्न होने तक अपने स्थान पर खड़े रहे। शिशु के नामकरण में पिता और अनाहूत संन्यासी की अनियोजित सहमति थी।
किसी और दिन एक वृद्ध संन्यासी के डेढ़ घंटे तक हवेली के सामने खड़े रहने की एक और घटना है। ताई जी उस संन्यासी से भी बहुत घबराई थीं और बड़बड़ाती हुई घर से बाहर निकली थी। संन्यासी का व्यक्तित्व देखकर वे ठिठक-सी गई। कातर भाव से उन्होंने कहा, मेरे बच्चे पर क्यों नजर गड़ाते हो? क्या बिगाड़ा है उसने आपका? संन्यासी ने आश्वस्त किया कि हम बच्चे का अमंगल करने नहीं उसका दर्शन आए हैं। ऐसी भावना आई थी कि हिमालय की एक सिद्ध आत्मा आपकी गोद में आई है। हम लोगों को किसी तरह पता चला तो देखने आए हैं। एक झलक देखकर चले जाएंगे। माँ ने संन्यासी का मन रख लिया और झलक दिखाकर मुड़ते ही बोलीं, नहीं मैं किसी को भी अपने लाड़ले की झलक नहीं दिखाऊँगी। साधु बाबा यहाँ नहीं आया करें।
अपने कमरे में जाकर अपने इष्ट द्वारिकाधीश के आगे बैठ गईं और देर तक रोती रहीं। हिमालय की आत्मा, संन्यासी, सिद्ध पुरुष, दर्शन और इसी तरह के संबोधनों ने माँ को व्यथित कर दिया था कि उनका बेटा आगे चलकर बिछुड़ न जाए। वह भी कहीं बाबा-जोगी न बन जाए। माँ ने अपने इष्ट से यही माँगा होगा कि उसका शिशु हमेशा उसके पास रहे। कभी दूर नहीं हो। भक्त ने अपने भगवान से क्या माँगा, यह दोनों का निजी संवाद है। बहरहाल उस घटना के बाद परिवार में साधु-संन्यासियों का आना और सुखद, किंतु विलक्षण स्थितियाँ बनना बंद हो गया।
शुरू के तीन-चार साल बाल-लीलाओं और अपने शिशु के हाथ-पाँव चलाने से लेकर तोतली जबान में बोलते देख माता-पिता के प्रसन्न होने में ही बीत गए। श्रीराम के जन्म के बाद ढाई-तीन साल बाद परिवार में एक कन्या और आई। नाम रखा गया किरण देवी। कालाँतर में दूसरी बहन आई थी। उसका नामकरण अग्रज के नाम से ही लिया गया, रामदेवी। बहन के जन्म लेने के बाद माता का ध्यान थोड़ा बँटना ही था। अभी तक भोजन बनाने से लेकर पूजा-पाठ करने और आगंतुकों की देखभाल करने तक माँ की निगाहें बेटे पर ही रहती। माँ अपने पुत्र को पिता और परिवार के दूसरे सदस्यों के भरोसे कम ही छोड़ती। जन्म के समय संन्यासियों के आने और उनके द्वारा कही गई चित्र-विचित्र बातें ताई जी के मन-मस्तिष्क में गूँजती रहती। यह अज्ञात भय सताता रहता कि कोई संन्यासी श्रीराम पर अपनी छाया न डाल जाए। किरण देवी का जन्म हुआ तो ताई जी को दूसरे लोगों का भरोसा करना पड़ा। इस मामले में भी उन्होंने पुत्र को सिर्फ पिता के हवाले ही छोड़ा। बेटी की देखभाल के साथ वे श्रीराम का भी पूरा ध्यान रखती। पंडित जी घर पर नहीं होते, तो पुत्र को नवजात कन्या के साथ ही सुलातीं। पिता बाहर से आते तब उनकी छत्रछाया में कुछ ढील दे देतीं। क्रमशः
पूर्वोत्तर समृद्धिकरण गायत्री महायज्ञ-समाचार लिखे जाने तक पूरा पूर्वोत्तर-आसाम, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल, सिक्किम, नेपाल व भूटान वहाँ संपन्न हो रहे समृद्धिकरण गायत्री महायज्ञ (251 कुँडी) की तैयारियों में लगा था, गायत्री महामंत्र से गुँजायमान हो रहा था। यह अंक हाथ में आने तक यह महायज्ञ संपन्न हो चुका होगा। गुवाहाटी के परिजन शाँतिकुँज पहुँचे और कलश पूजन के पश्चात गायत्री तीर्थ की परिक्रमा कर उसे सीधे कामाख्या पीठ ले गए, जहाँ से एक शोभायात्रा निकाली गई। आठों प्राँतों-नेपाल व भूटान में स्थान-स्थान पर गोष्ठियाँ, दीपयज्ञ, स्वागत-समारोह संपन्न हो रहे हैं और एक नया उत्साह जाग रहा है। यह महायज्ञ 15 से 18 मार्च की तारीखों में प्रस्तावित है और निश्चित ही इसके परिणाम बड़े विलक्षण व राष्ट्र को संगठित-अखंड बनाने की दिशा में नियोजित होंगे।
संगठन दौरों से पूरा गुजरात मथ गया
संगठन सशक्तीकरण की पूर्व वेला में वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं द्वारा संपन्न जनवरी की 11 से 16 तारीख के बीच उत्तर गुजरात, 23 से 28 तारीख के बीच दक्षिण गुजरात तथा फरवरी के तीन से तेरह तारीखों के बीच सौराष्ट्र व कच्छ क्षेत्र का अति महत्त्वपूर्ण मंथन संपन्न हुआ। कार्यकर्त्ता सामूहिक रूप से संगठन में भागीदारी कैसे करें, जिला स्तर पर संगठन को शक्तिपीठों से जोड़कर कैसे सशक्त बनाएँ, इस दिशा में एक दिशाबद्ध प्रयास किया गया। इसी के साथ बड़ौदा में गुजरात स्तरीय भारतीय संस्कृति ज्ञानपरीक्षा पर एक सेमीनार को भी का भी आयोजन किया गया। साथ-ही-साथ दीव, वीरवल, तलाला, चलाला आदि स्थानों पर कार्यकर्त्ता समागम तथा अहमदाबाद-गांधी नगर में प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम (क्राँतिकुँज) भी संपन्न हुआ, जिसमें सारे प्राँत के कार्यकर्त्ता पहुँचे। मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जहाँ गाँधीनगर के ‘वैक्सीनेशन कार्यक्रम’ का शुभारंभ करने पहुँचें, वहाँ अहमदाबाद मेडीकल एसोसिएशन एकाउन्टेंट जनरल (आडिट) कार्यालयों में वर्कशॉप-सेमीनार का आयोजन हुआ। एक तरह से दोनों नगर ज्ञान गंगा में नहा गए। यह कार्यक्रम 20, 21 जनवरी को हुए।
संस्कृति ज्ञान परीक्षा पुरस्कार वितरण स्थान
स्थान पर-सारे देश में अब प्राँतीय स्तर के संस्कृति ज्ञानपरीक्षा पुरस्कार वितरण समारोहों के साथ-साथ शिक्षा व विद्या के सार्थक समन्वय पर राष्ट्रीय स्तर की बहस चल पड़ी है। सभी की निगाहें देवसंस्कृति विश्वविद्यालय पर लगी हैं। पिछले दिनों अंबाला में (2 फरवरी) हरियाणा स्तर के तथा शाँतिकुँज में (3 फरवरी) उत्तरांचल स्तर के विद्यार्थियों के पुरस्कार वितरण के कार्यक्रम संपन्न हुए। साथ ही 15, 16 फरवरी की तारीखों में शाँतिकुँज में राष्ट्रीय स्तर की एक सेमीनार भी हुई, जिसमें वर्ष 22-23 की रूपरेखा बनाई गई। यह तथ्य जानने योग्य है कि इस वर्ष 23 लाख बच्चों ने पूरे भारतवर्ष में इस परीक्षा में भाग लिया है। यह संख्या दुगनी होने की अब इस वर्ष संभावना है।
बंगभूमि में प्रबुद्धों के बीच सक्रिय भागीदारी
कलकत्ता नगरी के नेताजी सुभाष स्टेडियम में 26-27 जनवरी की तारीखों में राष्ट्रभक्ति-मल्टीमीडिया सम्मेलन में प्रबुद्ध वर्ग की उपस्थिति में विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय पद दो दिवसीय कार्यक्रम संपन्न हुए। इसी के साथ कार्यकर्त्ता सम्मेलन, रक्त व नेत्र दान शिविर भी आयोजित हुए। बंगभूमि के केंद्र में गायत्री चेतना केंद्र की स्थापना का संकल्प संघबद्ध प्रयास के रूप में लिया गया।
वैदिक मूल्य एवं प्रबंधन पर वर्कशॉप
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय एवं गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय के एक समन्वित प्रयास के रूप में 22, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय एवं गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय के एक समन्वित प्रयास के रूप में 22, 23, 24 फरवरी को गुरुकुल व शाँतिकुँज परिसर में सारे भारत व विश्वभर के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रबंधन विशेषज्ञों की सेमीनार आयोजित हुई। उसमें व्यापक स्तर पर शोधपत्र पढ़े गए एवं सभी ने वैदिक मूल्यों के साथ प्रबंधन को साकार रूप में भी देखा व गायत्री तीर्थ के वातावरण से स्वयं को जोड़कर धन्य बनाया।
आपदा प्रबंधवाहिनी का फ्लीट तैयार- गुजरात भूकंप के बाद आपदा प्रबंध की तत्कालीन व्यवस्था जुटाकर एक आपदा प्रबंधवाहिनी बनाने की घोषणा की गई थी। अब राष्ट्र में कहीं भी प्राकृतिक विपदा आने पर दो एंबुलेंस, एक मोबाइल अस्पताल, एक जेनरेटर सहित बड़ी गाड़ी, एक टैंकर एवं एक वाहिनी कार्यकर्त्ताओं तथा टेंट आदि ले जाने वाले वाहन का एक फ्लीट तैयार हो गया है। विगत मार्च से विधिवत् गुजरात में स्थान-स्थान पर इसके कैंप भी संपन्न होते चले जा रहे है। साथ ही चार विद्यालयों को गलपादर, गाँधीधाम, मोरबी, लींबडी क्षेत्र में राज्यशासन को निर्मित कर सौंप दिया गया है।
‘युगप्रवाह पत्रिका’ अब अत्यधिक लोकप्रिय - वीडियो पत्रिका (पाक्षिक) युगप्रवाह अब सारे भारत के केबल नेटवर्क पर दिखाई जा रही है। इसका अपना एक विलक्षण प्रभाव जन-जन पर पड़ रहा है। अब तक उसके आठ अंक निकल चुके हैं। वार्षिक शुल्क 15 रुपये है, जिसमें 24 सीडी दी जाती है।”
सन् 1977 की गुरुपूर्णिमा से 1978 की वसंत पंचमी तक की अवधि को परमपूज्य गुरुदेव ने युगनिर्माण परिवार गायत्री परिवार की पुनर्गठन वेला घोषित किया। उसमें उन्होंने जो कुछ महत्वपूर्ण बिंदु दिए, वे इस प्रकार थे-
(1) हमें शरीर के नहीं, चेतना के संबंधी चाहिए, जो मिशन की विचारधारा के प्रति आस्था रखते हों। (2) अधिक से अधिक वे परिजन चाहिए जो कर्मठता से न्यूनतम एक घंटा समय दे सकते हैं और दस पैसा प्रतिदिन ज्ञानयज्ञ के लिए निकालते हों। (3) हम कार्यकर्त्ताओं को तीन स्तरों में विभाजित करना चाहते हैं, (4) सहयोगी, समर्थक, स्नेही, परिचित (5) पत्रिकाओं के सदस्य-नियमित पाठक (6) अंशदान प्रस्तुत कर मिशन की सक्रिय सहायता करने वाले। (7) इनमें से दो अंतिम श्रेणी के कार्यकर्त्ताओं का न्यूनतम दायित्व होना चाहिए कि वे कम से कम पाँच अन्य व्यक्तियों को ‘अखंड ज्योति’ पत्रिका के विचारों को पढ़ाएँ। सुनाएँ। विचारशील व्यक्तियों की सूची तैयार कर लें। ज्ञानघट जिनके यहाँ स्थापित हैं, उनसे राशि लेकर झोला पुस्तकालय द्वारा साहित्य पहुँचाएँ। हो सके तो ज्ञानरथ योजना को गति दें। माह में एक दिन की आय इसके निमित्त देने वाले एवं प्रतिदिन चार घंटा समय देने वाले अधिकाधिक कर्मयोगी निकाले जाएँ।
परमपूज्य गुरुदेव ने जुलाई 77 (पृष्ठ 54-55) की अखण्ड ज्योति के संपादकीय में लिखा, “परिवार शब्द हमारी नस-नस में उत्साह भर देता हैं। उसका निखरा हुआ स्वरूप कहीं भी बनता दिखे तो आँखें चमकने लगती है। गायत्री परिवार, युगनिर्माण परिवार नामकरण हम इसी दृष्टि से करते आए हैं। इस नामकरण के साथ ही हम वह भाव भी पिरो देना चाहते है, जो हमें पुलकित करता रहता है। हम अपने पीछे ऋषि-परंपरा के अनुकूल एक आदर्श परिवार छोड़ जाना चाहते हैं।” इन शब्दों ने लाखों परिजनों के मर्म को स्पर्श किया एवं एवं उन्होंने स्वयं को पुनर्गठित कर विधिवत् कार्य आरंभ भी किया।
पुनर्गठन वर्ष के कार्यक्रम -गुरुसत्ता ने इसके साथ कुछ कार्यक्रम दिए। वे इस प्रकार थे-
(1) जन्मदिन मनाने की परिपाटी विकसित हो।
(2) आदर्श वाक्य लेखन बनाम बोलती दीवारें खड़ी हों।
(3) चल पुस्तकालय अधिकाधिक हों।
(4) तीर्थयात्रा-धर्मप्रचार फेरी का आयोजन नियमित हो।
(5) वसंत पर्व व गुरुपूर्णिमा के दो स्थानीय कार्यक्रम सभी शाखाएँ मनाएँ।
(6) केंद्रीय व्यवस्था के माध्यम से स्थानीय स्तर पर साधना सत्र एवं क्षेत्रीय कार्यकर्त्ताओं के सम्मेलनों के आयोजन हों। प्रतिवर्ष एक-एक यह आयोजन निश्चित रूप से हो।
(7) महिला जागरण शाखाएँ नियमित रूप से चलें।
(8) शाखा स्तर पर लोकरंजन व लोकमंगल के साधन विकसित हों।
(9) सभी गठित शाखाओं का साधना सत्र के रूप में ढाई दिवसीय वार्षिकोत्सव हो, जिसमें केंद्र का एक प्रतिनिधि भी सम्मिलित हो।
पुनर्गठन से 1990 तक-उपर्युक्त कार्यक्रम सारे क्षेत्र में चलें। जागरूकता पैदा हुई एवं जुलाई-अगस्त दो माह के अंदर ही अधिकाँश कार्यकर्त्ता पुनर्गठित टीम के एक अंग बनते चले गए। बीस मार्गदर्शक पुस्तिकाएँ प्रकाशित हुई एवं अधिकाँश प्राणवानों 1 अक्टूबर से 3 जून 78 तक शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ के शिविरों में भागीदारी की। पुराने परिजन सभी जानते हैं कि उन्हीं दिनों केंद्र में देव परिवार बसने, गायत्री नगर का निर्माण होने के साथ-साथ ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की स्थापना का कार्य चल रहा था। इसी बीच क्षेत्रीय स्तर पर जन-जाग्रति केंद्रों के रूप में शक्तिपीठों के निर्माण की घोषणा हो गई। शिलान्यास हेतु व कहीं-कहीं निर्माण होने की स्थिति में प्राणप्रतिष्ठा हेतु 1980-81 में स्वयं परमपूज्य गुरुदेव क्षेत्रीय दौरों पर निकले। सारे राष्ट्र का मंथन हुआ, अति विशाल सभाएँ हुई एवं सारा देश एक प्रकार से गायत्रीमय हो गया। पूज्यवर के प्रवास का क्रम 1982 के पूर्वार्द्ध में रुक गया, क्षेत्रीय दौरे अन्य कार्यकर्त्ता करने लगे, इस बीच पूज्यवर की सूक्ष्मीकरण साधना आरंभ हुई, जिसकी पूर्णाहुति के उपलक्ष्य में 1986-87 में सारे भारत में 108 कुँडी यज्ञों सहित राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों की एक वृहत शृंखला चली। बीच-बीच में शक्तिपीठों, प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञापीठों की स्थापनाएँ, प्राण प्रतिष्ठाएँ होती रही। 1989-90 की अवधि इस मिशन की अति महत्वपूर्ण अवधि है, जिसमें पूज्यवर ने अपने सारे जीवन भर की साधना का निचोड़ नवयुग की आचार संहिता के रूप में क्राँतिधर्मी साहित्य लिखकर प्रस्तुत कर दिया, साथ ही बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण एवं दीपयज्ञों के माध्यम से उसकी महापूर्णाहुति की घोषणा भी वे कर गए। 2 जून गायत्री जयंती को महाप्रयाण के साथ ही उनका अंतिम संदेश एक आश्वासन दे गया कि संगठन का कार्य और बढ़ेगा एवं परमवंदनीया माता उसे दिशा देंगी।
श्रद्धाँजलि समारोह से हीरक जयंती तक की महायात्रा
1990 की अक्टूबर की शरदपूर्णिमा की वेला में संपन्न श्रद्धाँजलि समारोह, विदेश-मंथन हेतु कार्यकर्ताओं का प्रवास, शपथ समारोह, देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत भारत व विदेश में सत्ताईस आश्वमेधिक आयोजन, आँवलखेड़ा की पूर्णाहुति, संस्कार महोत्सवों के साथ-साथ रचनात्मक आँदोलन की शुरुआत और फिर सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ (नवंबर 2001) तथा विराट् विभूति ज्ञानयज्ञ नई दिल्ली (अक्टूबर 2000) ने मिशन का विस्तार सौ गुने से भी अधिक कर दिया। 1994 की मध्यवेला तक सशरीर परमवंदनीया माताजी ने मार्गदर्शन दिया, फिर वे भी गुरुसत्ता से एकाकार हो गईं, किंतु उनका आश्वासन मिशन के सत्स्यावतार की तरह फैलने के रूप में सभी ने प्रत्यक्ष फलीभूत होते देखा।
महापूर्णाहुति के सफल-सुव्यवस्थित आयोजन के तुरंत बाद हीरक जयंती वर्ष आ गया, जिसे त्रिविध रूप में युग चेतना के अभ्युदय (भगवत् सत्ता के धरती पर अवतरण), अखण्ड दीप रूप में प्रखर प्रज्ञा के निरंतर प्रकाशित होते रहने तथा परमवंदनीया माताजी के जन्म के 75 वें वर्ष पूरे होने के साथ सजल श्रद्धा के अनवरत अनुदान बरसने की प्रक्रिया रूप में संपन्न किया गया। सप्तसूत्री आँदोलन घोषित हुए एवं सारे भारत में क्रांतिकारी गतिविधियाँ चल पड़ी। प्रखर साधना वर्ष की शुरुआत के साथ ही इस विराट संगठन को सशक्त बनाने की प्रक्रिया आरंभ हो गई थी, किंतु अब हीरक जयंती महोत्सव मनाने एवं उसकी पूर्णाहुति के प्रसाद रूप में देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के विधिवत् बन जाने के बाद उसकी क्रियापद्धति शुरू करने के साथ इस बसंत से संगठन-सशक्तीकरण वर्ष की शुरुआत की गई है। पुनर्गठन से सशक्तीकरण की इस महायात्रा का यह विवरण इसीलिए परिजनों के समक्ष प्रस्तुत किया गया कि वे उस भूमिका को समझ सकें, जो अब उन्हें संगठन को सशक्त बनाने के लिए निभानी है।
पुनर्गठन वर्ष से जो प्रक्रिया आरंभ हुई, उसे चौबीस वर्ष पूरे होकर रजत जयंती वर्ष में भी प्रवेश कर गए है। इस विराट संगठन पर सभी की दृष्टि है। इसका सुव्यवस्थित होना, योजनाबद्ध ढंग से सुसंचालन होना अब अनिवार्य है। यह संगठन-सशक्तीकरण अब केंद्र में भी होना चाहिए एवं जिला स्तर पर पूरे देश के कोने-कोने में।
इस वसंत का चिंतन मंथन
इसी विषय पर इस वर्ष वसंत पंचमी का पूरा मंथन केंद्रित रहा। सभी के मन में एक ही वेदना थी, एक ही दृष्टि थी, एक ही लक्ष्य था कि हम और भी व्यवस्थित होकर अपने आपको सशक्त बना लें, सुसंगठित बनाएँ। इसी उद्देश्य से सभी चर्चाएं हुई, उद्बोधन हुए एवं कार्यकर्ताओं की कार्यशालाएं चलीं। हमारे पास अब इस नवरात्रि से आगामी वसंत पर्व छह फरवरी तक का समय है इस अवधि में हमें सारे राष्ट्र के संगठन को साधना की धुरी पर सुव्यवस्थित-संगठित बना देना है। एक प्रकार से यह पुनर्गठन की महापूर्णाहुति एवं सारे प्रचार-दिग्विजयी पुरुषार्थ से उपजी ऊर्जा के आगामी आठ वर्षों में सुनियोजन का एक प्रकार से श्वेत पत्र होगा।
अब सभी परिजनों को यह कहा जा रहा है कि वे अपनी जिला-समन्वय समिति को सुव्यवस्थित-पुनर्गठित कर लें। पूरे भारत में मिशन तीन तरह से सक्रिय है। एक तो वह जहाँ दशकों से कार्य चल रहे हैं, वह पूर्णतः जाग्रत क्षेत्र है, अधिकाँश लोग गायत्री व यज्ञ को जानते हैं। यह विकसित खेत्र हुआ। देश के प्रायः साढ़े तीन सौ जिले इस परिधि में आते है। दूसरा अर्द्ध विकसित अर्थात् जहाँ अभी मात्र प्रचार-प्रसार ही हो पाया है। राष्ट्र के प्रायः दो सौ जिले इसके अंतर्गत आते है। शेष विस्तार वह है, जहाँ मिशन अभी किन्हीं कारणों से नहीं पहुँच पाया है। उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व, सुदूर दक्षिण के प्रायः डेढ़ सौ जिले इसमें आते है। यह अविकसित क्षेत्र है।
जिला समन्वय समितियों का गठन हो
सरकारी जिले अलग होते है। हमारे संगठन में हम दो या तीन जिलों को मिलाकर प्रवृत्तियों की दृष्टि से एक जिला गठित कर उसकी समन्वय समिति बना सकते है। उसमें उन सभी को स्थान हो, जो यज्ञ-पौरोहित्य से जुड़े हो, प्रबुद्ध वर्ग से संपर्क रखते हों, मिशन की सभी पत्रिकाओं, वीडियो मैगज़ीन आदि के प्रचार-प्रसार में गति रखते हों, स्वयं समयदान देकर साधना व कार्यकर्ता प्रशिक्षण की योग्यता रखते हों, ज्ञानरथ, झोला पुस्तकालय द्वारा ज्ञानयज्ञ में सक्रिय भागीदारी करते हों तथा मीडिया आदि कार्यों से जुड़े हों। इस जिला समन्वय समिति को उस जिले (या जिलों के समुच्चय) की शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, सक्रिय प्रज्ञामंडलों, महिला मंडलों, स्वाध्याय मंडलों से जाड़ा जाएगा। इस समिति के सदस्यों का निर्धारण क्षेत्रीय स्तर पर सर्वसम्मति से होकर केंद्र द्वारा उसका अनुमोदन होगा। तदुपराँत सभी एक ही बैनर तले विभिन्न प्रकोष्ठों में कार्य करेंगे। चाहे वह उस जिले के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हो, प्रज्ञा संस्थान/संस्थानों के वार्षिकोत्सव हों, प्रज्ञापुराण या महिला जागरण सम्मेलनों के आयोजन हों अथवा प्रबुद्ध वर्ग के सम्मेलन, वर्कशॉप या भारतीय संस्कृति ज्ञानपरीक्षा संबंधी गोष्ठियाँ-सभी एक ही मंच तले संपन्न होगी। केंद्र द्वारा अनुमोदित इस जिला स्तरीय समन्वय समिति का एक सुनिश्चित कार्यकाल होगा तथा निष्क्रिय सदस्यों को बदला जाता रहेगा। कोई भी अपने नाम का पृथक-पृथक पैड नहीं छपवाएगा। सभी एक ही अभियान की संगठन की धुरी पर कार्य करेंगे।
उस जिले में किसी भी स्तर का छोटा सा बड़ा आयोजन होगा तो जिला समन्वय समिति का अनुमोदन अनिवार्य होगा, तभी केंद्रीय दल वहाँ जाएगा। यह इसलिए सुनिश्चित किया जा रहा है, ताकि व्यवस्थित ढंग से सारे भारत को एक कड़ी में बाँधा जा सके। अपनी मनमर्जी से कोई भी कार्यक्रम की माँग न कर वर्ष के शुभारंभ में ही अपनी नीति बना ले, सभी मिलजुलकर बैठक कर लें एवं फिर उस जिले के सातों आँदोलन के विस्तार, रचनात्मक क्रियाकलापों सहित अनिवार्य यज्ञ-सम्मेलन आयोजनों की व्यवस्था बनाएं। सभी उन कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए अपना पूरा श्रम लगा दें। पत्रिकाओं के पाठक बढ़ाने, संस्कृति ज्ञान परीक्षा में अधिक से अधिक की भागीदारी, साधकों (वैयक्तिक सामूहिक) की संख्या में वृद्धि तथा रचनात्मक आँदोलनों की विविधता से भरी गतिविधियों के क्षेत्र में जिलों में प्रतिस्पर्द्धा हो। यह प्रतिस्पर्द्धा मिशन को शिखर तक पहुँचाने की हो, न कि किसी व्यक्ति विशेष या शक्तिपीठ विशेष को ‘हाई लाइट’ करने की दृष्टि से।
एक आदर्श सुसंगठित तंत्र ही लक्ष्य
यदि यह आदर्श स्थिति बन गई तो देखते-देखते सात सौ जिलों का एक प्रामाणिक-सुव्यवस्थित-सुगठित तंत्र खड़ा दिखाई देगा। सभी को एक-दूसरे की व्यवस्थित जानकारी मिलेगी। अनुभवों से दूसरे सीखेंगे एवं अपने क्षेत्र में उन योजनाओं को लागू करेंगे। युवाओं के महिला जाग्रति के क्षेत्र में विशिष्ट पुरुषार्थ होने लगेंगे। व्यसनमुक्ति, कुरीति उन्मूलन, पर्यावरण जाग्रति, वृक्षारोपण, स्वदेशी स्वावलंबन जैसे क्षेत्रों में नए-नए आयाम उभरकर आएंगे। इस क्षेत्र में कार्य कर रहे अनेकों संगठनों से सहकार उभर कर आएगा एवं परमपूज्य गुरुदेव का युग के अभिनव निर्माण का लक्ष्य पूरा होता दिखाई देने लगेगा।
जिला समन्वय समिति में एक व्यवस्था-बुद्धि के धनी हों, जो मूलतः कोआर्डीनेशन कर सकें, दूसरे आयोजनों की व्यवस्था बनाने वाले, तीसरे पत्राचार करने वाले, चौथे मीडिया से संपर्क रखने वाले, पाँचवें प्रबुद्ध वर्गों, अधिकारियों से तालमेल रखने वाले, छठे विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों के प्रभारी इस तरह कई फैकल्टी के लोग हो सकते है। ये सभी सदस्य किसी भी संगठन को खा जाने वाली, समाप्त कर देने वाली कुछ वृत्तियों से बचें, पहली आपसी तालमेल की कम्युनिकेशन की कमी, दूसरी वाणी की कटुता एवं अहंता के प्रदर्शन की वृत्ति तथा तीसरी एकाउंट संबंधी पारदर्शिता में कमी। यदि यह तीनों वृत्तियों साधना की धुरी पर संभाल ली गई तो संगठन सभी शक्तिपीठों के ट्रस्टीगणों-प्रज्ञामंडलों, महिला मंडलों के समन्वय से द्रुतगति से जिला स्तर पर चल पड़ेगा एवं एक वर्ष में वह परिणाम देने लगेगा जो वह विगत तीस वर्ष में नहीं दे पाया।
पुनर्गठन के रजत जयंती वर्ष में जिला समन्वय समितियों का सुव्यवस्थित गठन अपने विराट संगठन को सशक्त बनाने के लिए किया जा रहा है, ताकि हम अपनी शक्ति स्वयं आँक सकें। हम कहाँ खड़े है, कितने व्यक्ति भिन्न-भिन्न फील्ड के हमारे पास कितने हैं, यह आँकड़े व्यवस्थित ढंग से हमारे पास न केवल हों, पूछा जाने ही हम उन विभूतियों को सामने प्रस्तुत भी कर सकें। निश्चित ही इस वर्ष का यह महापुरुषार्थ संवेदनशील साधकों के सुसंगठन को गति देगा।
उत्तरांचल राज्य के महामहिम राज्यपाल के द्वारा विशेष आदेश द्वारा विश्वविद्यालय निर्माण की घोषणा के साथ ही अब एक महती जिम्मेदारी भरा कार्य आ गया है। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय मूलतः कर्मठ-प्राणवान कार्यकर्त्ताओं के निर्माण का, देवमानवों के सुनियोजित प्रशिक्षण का कार्य करने जा रहा है। परंपरागत कोर्स इसमें नहीं होंगे, परंतु जो कोर्स प्रारंभ होने जा रहे हैं, उनके पाठ्यक्रम शीघ्रातिशीघ्र लिखे जाने हैं। इन्हीं सब उद्देश्यों को दृष्टिगत रख स्वायत्तशासी, पूर्णतः परिजनों के अंशदान पर निर्भर इस अद्वितीय विश्वविद्यालय पर एक विशेषांक जून, 22 के अखण्ड ज्योति अंक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। परिजनों को वह पुस्तकाकार में भी मिल सकेगा। सभी से उसको पढ़कर फीडबैक भेजने का अनुरोध किया जा रहा है, ताकि इसका सुव्यवस्थित संचालन आरंभ किया जा सके। जुलाई तक फीडबैक मिलने पर कुछ विधाएँ तुरंत आरंभ हो सकेंगी।
कुलाधिपति, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय शान्तिकुञ्ज हरिद्वार (उत्तरांचल)
विश्व प्राण गायत्री माता, प्राणों का संचार करें। ओजस्-तेजस्-वर्चस् से त्रयतापों का उपचार करें॥
सविता मध्यस्थिता माता, सविता की आभा अनुपम। वह प्रकाश की पुँज अनूठी, शेष नहीं रह पाता तम। प्राण पीयुष पिला शिशुओं को, प्राणामृत की धार घरें। विश्व प्राण गायत्री माता, प्राणों का संचार करें॥
पथ प्रशस्त करती शिशुओं का, सद्पथ सदा दिखाती है। जब तक बालक सँभल न पाए, उँगली पकड़ चलाती है। ज्ञान प्रकाश सदा विखराकर, वह अज्ञान-अंधकार हरें। ओजस्-तेजस्-वर्चस् से त्रयतापों का उपचार करें॥
दुख से मुक्त करातीं मन को, सुख-स्वरूप का ज्ञान करा। और निरोग बनाती तन को, भोगवाद से त्राण करा। सुख-समृद्धि बढ़ाने वाली जीवन विधि आधार करें। विश्व प्राण गायत्री माता, प्राणों का संचार करें॥
वे सुषुप्त-देवत्व जगातीं, पाप पतन से बचने को। जगती के उज्ज्वल भविष्य का स्वर्ग धरा पर रचने को। वसुधा-कुटुँब बनाने वाला संवेदन विस्तार करें। ओजस्-तेजस्-वर्चस् से त्रयतापों का उपचार करें॥
गायत्री सद्बुद्धि विश्व की आओ ! उसको वरण करें। सद्भावी का स्वर्ग धरा पर, सब मिलकर अवतरण करें। सद्बुद्धि ही विभीषिकाओं, विपदाओं से पार करें। दुश्चिंतन दुर्भावग्रसित जनमानस का उद्धार करें॥
- मंगलविजय विजयवर्गीय
*समाप्त*