प्रपंच की माया, मुक्ति के उपाय

प्रपंच की माया जादुई है। इसके सम्मोहक-आकर्षण से बिरले बच पाते हैं। ज्यादातर इसमें उलझकर भ्रमित होते हैं। उन्हें पता भी नहीं चल पाता कि वे भ्रम में भटके हुए हैं। जीवन के बहुमूल्य क्षणों को खो रहे हैं। जीवन लक्ष्य से दूर हो रहे हैं। प्रपंच की मायावी मुस्कानों में, इससे उपजे हंसी ठहाकों में जीवन ठगा जाता है। जिन्दगी की उजली सम्भावनाएँ कब पतन के अंधेरों में समा जाती हैं, पता ही नहीं चलता।

इसकी पहचान आसान नहीं है। परचर्चा से इसकी शुरुआत होती है। परनिन्दा का रस इसमें घुलने से इसके नशे का नशीलापन गाढ़ा, मायावी और जादुई बनता है। परचर्चा और परनिन्दा का घुला-मिला रूप ही प्रपंच है। इसकी मायावी चकाचौंध में सबसे पहले जीवन की विवेक दृष्टि खोती है। जीवन लक्ष्य की स्मृति विलीन होती है। फिर अनायास ही द्वेष दुर्मति एवं दुर्बुद्धि पनप जाते हैं। इसके मायावी जादू से मित्र, शत्रु नजर आते हैं। और भटकाने वाले प्रपंची जन सगे-सम्बन्धी लगने लगते हैं।

प्रपंच के अंकुर कभी भी, कहीं भी, किसी भी में फूट निकलते हैं। बस इसके विषय बीजों के लिए पर चर्चा और पर निन्दा का खाद-पानी चाहिए। इसकी विषवल्लरी के उपजते, पनपते और पल्लवित होते ही व्यक्ति आत्म विमुख व ईश्वर विमुख हो जाता है। अन्तःकरण में इसके जन्मते ही ईश्वर और आत्मा केवल दो शब्द बनकर रह जाते हैं। इनका अर्थ खो जाता है। प्रपंच की इस माया में सामान्य जन ही नहीं, साधक भी उलझकर भ्रमित होते और भटकने लगते हैं।

उनकी साधना बातों और कर्मकाण्ड तक सिमट जाती है। साधना की आकृति फलती-फूलती रहती है, पर उसकी प्रकृति के प्राण प्रपंच चूसता रहता है। इन साधकों की ऐसी स्थिति के बारे में सन्त कवियों ने कहा है- ‘ब्रह्मज्ञान बिनु बात न करहीं। परनिन्दा करि विष रस भरही॥’ ब्रह्मज्ञान के बिना कोई बात नहीं करते, लेकिन अन्तःकरण को परनिन्दा के विष रस से भरते रहते हैं। इनका उद्धार वेदान्त वचनों को पढ़ने, सुनने और प्रवचन करने से नहीं, प्रपंच के मायापाश से छूटने में है। सन्त कवि तुलसी के वचनों में सभी के लिए सीख है- ‘परचर्चा, परनिन्दा तजि, भजुहरि’ अर्थात् परचर्चा और परनिन्दा को छोड़कर हरि को भजो। तभी प्रपंच की जादुई माया से छुटकारा मिलेगा। मोक्ष की तात्विक अनुभूति होगी।


सच्चिदानंद रूप है हमारी जीवात्मा

परमात्मा को सच्चिदानंद स्वरूप कहा गया है। विराट् का ही एक अंश होने से जीवात्मा भी उन्हीं गुणों से सुशोभित है। सत्, चित् और आनंद-ये तीनों मिलकर कारणशरीर का ढाँचा बनाते हैं। सत् अर्थात् शाश्वत, अजर-अमर और अविनाशी स्वरूप। चित् अर्थात् चेतना, दिव्य गुणों से सुसज्जित, उच्चस्तरीय आदर्शों, आस्थाओं से युक्त। आनंद अर्थात् भाव संवेदनाओं, सरसता, मृदुलता से सिक्त अंतःकरण आशा, उत्साह, संतोष के परस्पर समन्वय पर आधारित जीवनक्रम। आत्मा का सहज स्वभाव है- ऊँचा उठना, अपने विराट् स्वरूप की स्वयं को प्रतिमूर्ति बनाने के लिए इन्हीं गुणों से स्वयं को समृद्ध करना तथा अंततः समस्त आवरणों को हटाते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करना। परिष्कृत जीवात्मा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आध्यात्मिक पुरुषार्थ करती है एवं जीव ब्रह्म सम्मिलन से निस्सृत परमानंद की स्थिति को प्राप्त करती है।

इस आत्मगरिमा से अपरिचित मनुष्य भौतिकता में भटकता है। यह विस्मृति अनेकानेक समस्याओं को जन्म देती है। यह विस्मृति अनेकानेक समस्याओं को जन्म देती है। इन्हें ही माया का आवरण, मनुष्य का विभ्रम कहा जा सकता है। ये ही रोग-शोकों के रूप में अंततः बाहर प्रकट होते हैं। सच्चिदानंद का पहला चरण है-सत्। सत् मनुष्य को जीवन के क्षणभंगुर होने का बोध कराता है। हम शाश्वत है, चिरंतन है, अविनाशी है, पंचतत्वों से बनी काया के बिखर जाने पर भी हमारी सत्ता बनी ही रहेगी, यह बोध बना रहे, तो भटकाव से बचा जा सकता है, पर हमारी इंद्रियों की बनावट ही कुछ ऐसी है कि वह बहिर्जगत् को देखती और जड़ पदार्थों के प्रति सहज ही आकर्षित हो जाती है। सत् की अनुभूति व्यक्ति को यह विचार करने पर विवश करती है कि शरीर मरणधर्मा है, परंतु आत्मा कभी नष्ट नहीं होती है। वह तो एक सतत प्रवाह है। आत्मा का साक्षात्कार ही मनुष्य की सारी सफलताओं का प्राण है। यह तभी संभव है, जब मानव अपने वर्तमान जीवन को श्रेष्ठ, उदार तथा उदात्त भावनाओं से युक्त करने का प्रयास करता है।

सत् से आस्था रखने वाला व्यक्ति सृष्टि को चलाने वाली बुद्धिमान, उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था में दृढ़ विश्वास रखता है। वह जानता है कि विधि-विधानों, नियमों के अनुरूप चलने वाली इस सृष्टि की व्यवस्था में किसी तरह की लापरवाही, अनुशासनहीनता, अनियंत्रण, अदूरदर्शिता का स्थान नहीं है। कर्मफल से पूर्णतः अवगत यह व्यक्ति अपनी समस्त गतिविधियों का निर्धारण सुघड़तापूर्वक करता है। वह जानता है कि आत्मा कभी नहीं बदलती है, बदलता तो यह चोला है।

कुछ भी खोता नहीं यहाँ पर केवल जिल्द बदलती पोथी। जैसे रात उतार चाँदनी पहने सुबह धूप की धोती।

यह पंक्तियाँ उसी अनाशवान आत्मा के लिए किसी कवि ने कही है। यदि व्यक्ति को इसका वास्तविक बोध हो जाए, तो तत्क्षण उसमें वैराग्य उदय हो जाएगा, फिर संपूर्ण संसार उसे स्वप्नवत् प्रतीत होगा। स्वप्न का अपना कोई अस्तित्व नहीं, वह तो अपने ही चिंतन का परिणाम है। वैसे ही यह काया आत्मा की छाया है, उसका ही प्रतिबिंब है। ईश्वर ने इसकी सृष्टि अपना ज्ञान कराने, अपना अस्तित्व दर्शाने हेतु किया है, इसलिए मूल, ईश्वर की अंशधर आत्मा ही हुई। देह तो माया-मिथ्या के समान है, इसकी प्रतीति होते ही व्यक्ति को वैभव-विलास, यश-कीर्ति की निरर्थकता स्पष्ट भासने लगती है। वह सोचता है, जो चिरस्थायी नहीं, उसके प्रति मोह कैसा। उसके लिए अनावश्यक संग्रह और परिग्रह का कोई औचित्य नहीं। ऐसा चिंतन प्रखर होने पर स्वयं को ऊँचा उठा हुआ पाता है। आत्मिक प्रगति के विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ अपने लक्ष्य तक जा पहुँचाता है।

आत्मा की दूसरी विशेषता है-चित्। उच्चस्तरीय आस्थाओं, मान्यताओं एवं आदर्शों से युक्त व्यक्ति चित् परायण कहलाता है। चित् अर्थात् स्वयं के विषय में उत्कृष्टतापूर्ण मान्यता, अपने लक्ष्य के प्रति चेतनता-सजगता। यह वे निष्ठाएँ हैं, जो मनुष्य की जीवनयात्रा की रूपरेखा बनाती हैं। देवत्व में आस्था, आदर्शवादी उत्कृष्टता में अटूट विश्वास, परम सत्ता के प्रति समर्पण भाव चित् के परिष्कृत स्वरूप हैं। चित् शिवम् अर्थात् कल्याणकारी भाव है।

चित् एक गुण है, जो परिष्कृत स्वरूप में व्यक्ति को महामानव बना देता है, पर जब यही विकृति की ओर अग्रसर हो जाता है, तो अनेकानेक समस्याओं, मानसिक असंतुलनों एवं शारीरिक संतापों को जन्म देता है। आदर्शवादिता से निष्ठा हटते ही पतन तेजी से होता है। दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण स्वयं के विषय में मान्यताएँ गरिमायुक्त नहीं रहती। श्रेष्ठ चिंतन का अभाव एवं उत्कृष्टता के प्रति अनास्था अंततः उद्दण्डता को जन्म देते हैं। विकृत चिंतन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धाँतों के प्रति, अपनी दिव्यता के प्रति अनास्था मनुष्य को एकाकी, स्वार्थी एवं अहंकारी बनाती है।

आवेश तथा जल्दबाजी के कारण व्यक्ति को जो भौतिक दृष्टि से हानि होती है, वह अविज्ञात नहीं है, परंतु वह व्यक्ति दृष्टि से हानि होती है, वह अविज्ञात नहीं है, परंतु वह व्यक्ति स्वयं इस तथ्य से अनजान बना रहता है कि वह उद्धत आचरण पलटकर उस पर ही हमला करेगा। मानसिक तनाव और उससे होने वाली समस्त मनोशारीरिक व्याधियाँ ऐसे व्यक्तियों को होती हैं, जो स्वयं उच्छृंखल हैं, फिर उसके अंग-अवयव, ऊतक भी क्योंकर किसी का कहा मानेंगे। आवेश-क्रोध से होने वाला स्राव समस्त शरीर-संस्थानों के परस्पर संतुलन को गड़बड़ा देता है। इसके विपरीत स्वयं की गरिमा एवं महत्ता में, चित् की विशिष्टता में, आदर्शों के प्रति निष्ठा रखने वाला व्यक्ति आत्मिक दृष्टि से तो संपन्न होता ही है, मानसिक संतुलन और समरसता तथा शरीरगत सुव्यवस्था भी उसकी एक बहुमूल्य अर्जित संपत्ति है।

सच्चिदानंद आत्मा का तीसरा और अंतिम पक्ष है-आनंद। इसके बिना आत्मा की पूर्ण व्याख्या संभव नहीं है। जीवात्मा का लक्ष्य ही आनंद है। इसे परिष्कृत भाषा में कहा गया है, रसो वै सः। वह परमात्मा रस से, आनंद से परिपूर्ण है। इस रस को प्राप्त करने के लिए विभिन्न मार्गों से साधक पुरुषार्थ करता है एवं संतोष का आनंद लेता है। इस रस का अंतरंग पक्ष है, भाव संवेदनाओं से लबालब अंतःकरण। करुणा, दया, सेवा-भावना, भक्तिभाव रस के परिष्कृत स्वरूप हैं। जब इनका विकास सहज-स्वाभाविक रूप से होता है,तो ये व्यक्ति को भावनात्मक दृष्टि से ऊँचा उठाते हैं। ऐसे महामानव विश्व मानवता की सेवार्थ अपने जीवन की आहुति दे देते हैं। इंद्रियों से प्राप्त होने वाला आनंद क्षणिक है, ऐसी मान्यता रखने वाले ये महापुरुष अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग उच्च उद्देश्यों की ओर नियोजित करने में करते हैं।

चेतना पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर के जो आवरण पड़े हैं, उनके कारण जीव इस उद्गम स्त्रोत तक नहीं पहुँच पाता। प्यास निरंतर बनी रहती है। कस्तूरी अपनी नाभि में लिए हिरण जिस प्रकार सुगंध की खोज में चारों ओर मारा-मारा फिरता है, उसी प्रकार जीव आनंद की खोज में विविध योजनाएँ बनाता, कल्पना करता एवं अथक प्रयत्न करता है। यह पुरुषार्थ असफल समाधानकारक ही होता है। अंतःकरण की गहन परतों में छिपे आनंद के स्त्रोत की खोज बाह्य जगत् में चलने के कारण भटकाव, थकान, अशाँति, निराशा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं मिलता।

आनंद की मिठास और भी गहन है। इसकी विकृति वासना, तृष्णा, अहंता के रूप में बाहर परिलक्षित होती है। आनंद की प्रतिच्छाया होने के कारण वासना आकर्षक और लुभावनी लगती है। विषयों के सेवन में मन लगने लगता है, तो व्यक्ति विलासी, प्रमादी, आलसी होता चला जाता है। जिह्वा का असंयम, कामेंद्रियों का उपभोग, संग्रह का लोभ अगणित मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों को जन्म देता है।

विषयों के सेवन में जब इतनी तृप्ति और तुष्टि मनुष्य को मिलती है, तो उसके मूल स्त्रोत में कितनी मिठास होगी, इसकी कल्पना मात्र से ही हृदय पुलकित हो उठता है। भगवान रसमय है, इस रस को आत्मसत्ता के रूप में ईश्वर ने मनुष्य को धरोहर बनाकर दिया है। यह रस भौतिक नहीं आत्मिक है। इसे अंतःकरण के उल्लास, संतोष, शाँति जैसी दिव्य संवेदनाओं के रूप में अनुभव किया जाता है। भक्तिरस की धाराएँ ऐसे ही अंतःकरण में बहती हैं। ये ही कभी मीरा, कभी चैतन्य, कभी रामकृष्ण, कभी योगी रामप्रसाद एवं कभी जगद्बंधु जैसी विभूतियों के रूप में प्रकट होती है। परम सत्ता परब्रह्म से मिलन-संयोग की स्थिति ऐसी ही जाग्रति पर आती है।


ज्योतिस्वरूप मानव का उपचार भी प्रकाश ही करेगा

प्रकाश ही जीवन है, अब यह मान्यता तथ्य के रूप में प्रकट और प्रत्यक्ष होती जा रही है और उस शास्त्रीय धारणा के निकट पहुँचती जा रही है, जिसमें कहा गया है कि जीव की मूल सत्ता (आत्मा) ज्योतिस्वरूप है। इतना ही नहीं, स्थूल उपादानों से निर्मित यह जड़ शरीर और जड़ पदार्थ भी उसी की अभिव्यक्तियाँ हैं। इन सबका अंतिम स्वरूप भी प्रकाशवान है, इसलिए विज्ञान यदि यह कहता है कि विभिन्न प्रकार की शारीरिक व्याधियाँ देह के अंदर प्रकाश के असंतुलन का परिणाम हैं, तो यह किसी भी प्रकार अनुचित नहीं है।

भारतीय अध्यात्म की यह शुरू से ही मान्यता रही है कि हर स्थूल के पीछे एक तेजवान सूक्ष्म है। यही सूक्ष्म उसके चारों ओर आभामंडल के रूप में बिखरा रहता है। योगी-यतियों के मुखमंडल पर विराजमान दीप्तिवान काँति इसी की परिणति है। प्राण के क्षरण के साथ-साथ इसकी तेजस्विता में कमी आती है। यही कारण है कि सर्वसाधारण के चेहरे पर वह ओज नहीं दीखता, जो दीखना चाहिए। इसका एक ही कारण है कि वे प्रमादवश उस तेज बल का अपव्यय करते रहते हैं। इससे प्रकाश शरीर कमजोर पड़ता जाता है। उसके दुर्बल बनने से उसका गोचर रूप स्थूल शरीर भी शक्तिहीन बन जाता है। अशक्ता रोग की जननी है, अतएव काया बीमार पड़ जाती है, तरह-तरह की व्याधियों से ग्रस्त हो जाती है।

यह बीमारी का एक पहलू हुआ। इसका दूसरा पक्ष यह है कि अव्यवस्थित दिनचर्या और असंयमित जीवन के कारण देह के भीतर का प्रकाश घटक असंतुलित और अस्त-व्यस्त हो जाता है। यह असंतुलन रोगों को न्यौता बुलाता है। इस प्रकार शरीर के अंदर चाहे प्रकाश तत्व की क्षीणता हो या उसकी अस्त-व्यस्तता, दोनों ही स्थितियाँ रुग्णता की कारण बनती हैं।

प्रकाश का जीव जगत् और वनस्पति जगत् से क्या संबंध है? इस संदर्भ में पहली बार गहन अध्ययन डॉ.जॉन आँट ने किया। उनने ही यह प्रथम बार बताया कि प्रकाश-वर्णक्रम का हर हिस्सा पोषण की दृष्टि से स्वयं में एक ऐसी कुँजी सँजोए हुए है, जो हमारे लिए विशेष प्रकार के विकास और वृद्धि के लिए जिम्मेदार है। उनके अनुसंधान से अब यह स्पष्ट हो गया है कि मानव शरीर एक जीवंत प्रकाश कोश है, जो प्रकाश ऊर्जा का उपयोग ऐसे मूलभूत तत्व के रूप में करता है, जिससे उसकी वृद्धि विकास, सक्रियता और स्वस्थता अक्षुण्ण रह सके। फोटो बायोलॉजी के क्षेत्र में मनुष्यों, पशुओं और वनस्पतियों के संबंध में उनकी यह शोध मील का पत्थर साबित हुई है। इससे प्रकाश प्रेरणा लेकर अनेक वैज्ञानिक इस दिशा में अनुसंधानरत हैं और नित-नए तथ्यों का उद्घाटन कर रहे हैं।

अब से पूर्व तक इसे सभी जानते थे कि प्रकाश जीवन के लिए आवश्यक है, पर यह क्यों और किस प्रकार उपयोगी है? इस संबंध में कोई उल्लेखनीय जानकारी वैज्ञानिकों के पास नहीं थी, विशेष रूप से मनुष्यों और जंतुओं के संदर्भ में। पेड़-पौधों के बारे में तो यह पता था कि वे सूर्य-प्रकाश से अपना भोजन तैयार करते हैं। फोटो सिंथेसिस की क्रिया उनमें दिन के उजाले में ही संभव है, रात के अँधेरे में नहीं, किंतु अब विदित हुआ है कि यह ज्ञान प्रकाश की वास्तविक भूमिका की तुलना में कितना नगण्य था।

मूर्द्धन्य विज्ञानी जैकब लिबरमैन ने अपनी पुस्तक ‘लाइट मेडिसिन ऑफ दि फ्यूचर’ में इस बात की चर्चा की है कि मानव शरीर का पोषण दो तरीके से होता है, एक तो सीधे सूर्य प्रकाश के माध्यम से तथा दूसरा, खाद्यान्नों, जल एवं वायु से। प्रथम स्थिति में मनुष्य जब रोशनी के प्रत्यक्ष संपर्क में आता है, तो उसकी किरणों से संपूर्ण शरीर में उद्दीपन आरंभ हो जाता है और जहाँ, जितनी एवं जिस प्रकार की किरणों की जरूरत पड़ती है, वहाँ वे उस परिमाण में अवशोषित हो जाती है। इससे शरीर स्वस्थ बना रहता है और आदमी सक्रिय। दूसरी अवस्था में जितने भी प्राकृतिक एवं खेतों में उगने वाले आहार है, उन सभी में सूर्य ऊर्जा प्रचुर मात्रा में संगृहीत होती है, वे अपने जीवनकाल में उसका अवशोषण कर लेते हैं। बाद में मानव जब उन्हें भोजन के रूप में ग्रहण करता है, तो स्थूल हिस्से से काया के स्थूल भाग का पोषण होता है एवं उसमें सन्निहित प्रकाश-ऊर्जा द्वारा उसके प्रकाश शरीर को पुष्टि मिलती है, किंतु वे कहते हैं कि खाद्यान्नों में प्रकाश तत्व उतनी मात्रा में नहीं होते, जितने से अंग-अवयवों का भलीभाँति परिपोषण हो सके, इसलिए वे सुबह की धूप के सेवन की सलाह देते हैं, ताकि उस कमी की पूर्ति हो सके। धूप-स्नान की परिपाटी विकसित करने वाले संभवतः मनुष्य शरीर की सूक्ष्म संरचना और प्रकाश के स्वास्थ्यकारी गुणों से अवगत रहे होंगे, अतएव उन्होंने प्राकृतिक ढंग से स्वास्थ्य-संरक्षण के लिए यह विधा विकसित की होगी। आज उस ओर पर्याप्त ध्यान ने देने के कारण हम बीमार पड़ते और दुःख भोगते हैं।

जैकब लिबरमैन लिखते हैं कि शरीर में प्रकाश तत्व की कमी अथवा रोशनी की प्रत्यक्ष अनुपस्थिति, यह दोनों ही दशाएँ देह और मन को निष्क्रियता की ओर ले जाती हैं। मन के निश्चेष्ट होने से दमित इच्छाएँ और वासनाएँ उभरने लगती हैं, इससे व्यक्ति परेशान हो उठता है। उक्त दुःखद स्थिति को टालने के लिए जब वह पुनः उन्हें दबाने का प्रयास करता है, तो द्वंद्व पैदा होता है। यह उसे अवसाद में धकेल देता है।

निश्चय ही प्रातः का उजाला हमें स्फूर्ति, उल्लास, सक्रियता और चैतन्यता प्रदान करता है। रात की तमिस्रा तो संपूर्ण धरित्री को आलस्य, निद्रा और निरानंद की गोद में पटक देती है। अब यह केवल दार्शनिक सत्य भर नहीं रहा, वरन् एक वैज्ञानिक तथ्य के रूप में भी सामने आया है। डॉ.जेन किम अपनी रचना ‘सनलाइट’ में कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति सूर्य प्रकाश के संपर्क में आता है, तो उसके अंदर विभिन्न प्रकार के शरीर-क्रिया संबंधी परिवर्तन घटित होते हैं। उदाहरण के लिए, उसकी रेस्टिंग पल्स एवं श्वसन पर घट जाती है, रक्तचाप कम हो जाता है। इसके अतिरिक्त खून में शक्कर और लैक्टिक एसिड की मात्रा न्यून हो जाती है, साथ ही ताकत, ऊर्जा और सहन शक्ति बढ़ जाती है। कुछ हारमोनल बदलाव भी देखे गए हैं। इससे व्यक्ति के अंदर प्रसन्नता और क्रियाशीलता आती है। रात्रिकालीन अंधकार की प्रतिक्रिया इससे ठीक उलटी है। उससे संपूर्ण अंतःस्रावी तंत्र प्रभावित होता है, जिसके कारण रक्त में कुछ ऐसे रसस्राव होते हैं, जो तन में शिथिलता ओर मन में अनुत्साह पैदा करते हैं, जो आदमी को स्वभावतः विश्राम करने और सोने के लिए प्रेरित करता है। कदाचित् इसी कारण से रात में सोते समय लोग प्रायः बत्ती बुझा देना पसंद करते हैं, ताकि शरीर फिजियोलॉजी को वह प्रभावित न कर सके और आदमी अधिक सुखपूर्वक नींद का आनंद ले सके।

अब यह पूर्णतः साबित हो चुका है कि हर जीवधारी नियमित रूप से प्रकाश ग्रहण और विसर्जन करता रहता है। प्रख्यात जर्मन रसायनशास्त्री और भौतिक विज्ञानी फ्रिटज-अलबर्ट पोप्प ने अपने परीक्षणों द्वारा यह दिखाया है कि किस प्रकार शरीर का प्रत्येक जीवकोश रोशनी विकीर्ण करता है। उन्होंने इस प्रकाश-कणों को ‘बायोफोटोन’ नाम दिया। उनका कहना है कि ये किरणें पराबैंगनी से लेकर अवरक्त तक का संपूर्ण इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वर्णक्रम स्वयं में धारण किए रहती हैं। उनकी तीव्रता बदलती रहती है। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि यह वस्तुतः उस समय उनके (सेल्स के) भीतर हो रही जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं का परिणाम है। कोशिका विकास के दौरान इसे सबसे अधिक तीव्र देखा गया है।

क्षरण और ग्रहण निसर्ग का निश्चित नियम है। माताएँ और गायें अपने बच्चों के लिए दूध लुटाती हैं, तो उसकी स्वतः पूर्ति होती रहती है। रक्तदान करने वालों का रुधिर कभी घटता नहीं, आहार द्वारा वह पूरा हो जाता है। भेड़ों हर वर्ष ऊन देती हैं, पर उन्हें उसकी कमी कहाँ होती है। उसी प्रकार बाल्यावस्था में जब कोशिकाओं का विभाजन और विकास अपने चरम पर होता है, तो उस दौरान अंतःप्रकाश का उत्सर्जन भी बड़े पैमाने पर होता रहता है, इसे फ्रिट्ज अल्बर्ट ने अपने प्रयोगों द्वारा प्रमाणित कर दिया है। वे कहते हैं कि प्रकृति की यह कैसी निपुण व्यवस्था है कि जब जीवन तत्व का सर्वाधिक ह्रास होता है, उस बचपन में बालक अधिकाँश समय बाहर ही खेलते रहते हैं। इस प्रकार वे उस क्षरित ऊर्जा की स्वाभाविक पूर्ति सूर्य प्रकाश द्वारा करते रहते हैं। बचपन बीतने के साथ-साथ बनावटी जीवन चालू होते ही इस क्रम में व्यक्तिक्रम आ जाता है, फलतः उसमें प्रकाश ऊर्जा की कमी पड़ने लगती है, जो रोगों का निमित्त कारण बनती है।

प्रकाश सप्तवर्णी है। सातों रंगों का अपना अलग-अलग स्वभाव और प्रभाव है। इन वर्णों की न्यूनाधिकता से शरीर और मन में पृथक-पृथक परिणाम प्रकट होने लगते हैं। कोई क्रोध, कोई प्रसन्नता, कोई शाँति, तो कोई स्थिरता के लिए जिम्मेदार है। जब तक इन रंगों का आनुपातिक संतुलन भीतरी प्रकाश में व्यवस्थित बना रहता है, तब तक हमारा व्यक्तित्व संतुलित रहता है और शरीर-मन स्वस्थ, किंतु उसके गड़बड़ाने से शरीर-मन लड़खड़ाने लगता है। ऐसा इसलिए, कारण कि हमारी समग्र सत्ता- कायिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक, इन सबको पोषण प्रकाश से ही मिलता है। जब पोष ही विकारग्रस्त हो, तो मानवी अस्तित्व के विभिन्न स्तरों पर उसका कुप्रभाव पड़े बिना कैसे रह सकता है?

शरीर पंचतत्वों का बना है। इन तत्वों के अपने-अपने प्रतिनिधि रंग हैं। पृथ्वी तत्व लाल, जल तत्व सिंदूरी वायु तत्व अरुण, आकाश तत्व धूम्र तथा अग्नि तत्व नील वर्ण का है। यही रंग षट्चक्रों में से क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि चक्र के हैं, आज्ञा चक्र श्वेत वर्ण का है। जब इन प्रकाश वर्णों में से कभी कोई रंग हावी हो उठता है, तो उस तत्व की प्रधानता काया में बढ़ जाती है और उसके लक्षण शरीर में प्रकट होने लगते हैं। इसके कारण उक्त रंग से संबंधित चक्र भी प्रभावित होता है, जो अपने से संबद्ध ज्ञानेंद्रियों ओर कर्मेंद्रियों को उद्दीप्त-उत्तेजित करना आरंभ करता है। बिना परिमार्जन-परिष्कार के चक्रों का उद्दीपन हानिकारक हो सकता है, कारण कि उससे मुक्त ऊर्जा को बरदाश्त करने की शक्ति शुद्धिरहित अवयवों में नहीं होती। ऐसे में व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तकलीफ हो सकती है। इस स्थिति में विशेषज्ञ शरीरगत प्रकाश-किरणों को पुनर्व्यवस्थित कर पंचतत्वों और चक्रों के क्रियाकलापों को सुव्यवस्थित करने और प्रकाराँतर से समग्र स्वस्थता प्राप्त करने की सलाह देते हैं।

अब प्रश्न यह है कि अपने आँतरिक प्रकाश की अस्तव्यस्तता को दूर कैसे किया जाए और उसकी सुव्यवस्था, द्वारा आरोग्य-लाभ का उपाय क्या हो? आचार्यों ने इसके कई तरीके बताए हैं, उनमें से एक यह है कि प्रातःकाल उदीयमान सूर्य के आगे गीले शरीर से बैठा जाए, चेहरा भी भीगा हुआ हो। अब कुछ क्षण अरुणोदय को देखकर नेत्र बंद कर लिए जाएँ और ध्यान में उसकी मानसिक कल्पना की जाए। बाहर प्रत्यक्ष सूर्य और भीतर उसकी मनोकल्पना, इससे सूर्य रश्मियाँ अवशोषित होने लगती हैं। गीले शरीर में यह कार्य अधिक सहजता और सफलतापूर्वक संपन्न होता है। इसके अतिरिक्त एक दूसरा विकल्प यह है कि कहीं भी बैठकर दिन या रात में उगते हुए सूर्य का ध्यान किया जाए। इससे भी वही लाभ मिलेंगे। एक तरीका रंगों का ध्यान का है, किंतु इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि देह में किन रंगों की कमी हुई है, तदनुसार उन वर्णों की किरणें लेने, उनका ध्यान करने अथवा उनसे उपचारित जल का सेवन करने से भी अभीष्ट की पूर्ति हो सकती है, लेकिन इसे कोई सुयोग्य जानकार ही बता सकता है। अतएव किसी विज्ञ रंग चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

डॉ.गैब्रियल काउसेंस ने अपनी कृति ‘स्प्रिचुअल न्यूट्रीशन एंड दि रेनबो डाइट’ में एक अन्य उपाय बतलाया है। उनका कहना है कि शाक-सब्जियाँ वास्तव में प्रकाश का घनीभूत रूप है। भिन्न-भिन्न वर्णों वाली शाक-सब्जियों का प्रभाव भी उन रंगों के समान ही होता है। सब्जियाँ और फूल जिस रंग के होते हैं, वे उसी रंग की किरणों को सूर्य प्रकाश से आकर्षित और अवशोषित कर लेते हैं। उन्हें खाने पर उस रंग की कमी की पूर्ति आसानी से हो जाती है। वे कहते हैं कि भोजन के अलग-अलग रंगों का संबंध चक्रों, ग्रंथियों एवं दूसरे अवयवों से भी है। विशिष्ट वर्ण वाला शाक या फल खाने से उस रंग से संबंधित उपाँगों को संतुलित-नियंत्रित किया जा सकना संभव है। इससे तत्संबंधी रोगों का शमन सरलता से हो जाता है।

उनका कहना है कि रंग और भावना में विज्ञान की दृष्टि से कोई अंतर नहीं है। दोनों का तरंग-दैर्घ्य समान है। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। वे कहते हैं कि यदि लाल रंग क्रोध के लिए जिम्मेदार है, तो इस मानवी भावना का तरंग-दैर्घ्य लाल रंग जितना ही होगा। लाल रंग की कमी से व्यक्ति दब्बू, डरपोक, प्रतिकूल परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देने वाला, असंघर्षशील तथा कमजोर मन वाला होता है। अतः इसकी पूर्ति के लिए उसे ऐसे वातावरण में रखना पर्याप्त होगा, जहाँ दुस्साहसिक एवं निर्भीक प्रसंगों की नियमित चर्चा होती हो। इससे उसे वहीं तरंगें प्राप्त होती रहेंगी, जो लाल वर्ण से मिल सकती थीं। इस प्रकार प्रत्यक्ष लाल रंग की कमी यहाँ तत्संबंधी भावनात्मक पोषण से पूरी कर ली जाती है।

इतना ही नहीं, मनुष्यों के बीच के पारिस्परिक प्रभाव एवं हमारी शरीर क्रियाएँ, यह सभी तरंगजनित प्रकृति की होती हैं। इन तरंगों में से प्रत्येक का पृथक-पृथक प्रभाव हमारी मनोदशा, व्यवहार और शरीर क्रिया पर पड़ता है। इनमें से किन-किन रंगों को ग्रहण करने की व्यक्ति में कितनी सामर्थ्य है? इस आधार पर यह आसानी से जाना जा सकता है कि शेष किन तरंगों के प्रति वह अग्रहणशील है। उन तरंगों की आपूर्ति करने पर वह बाकी की दूसरी तरंगों के साथ मिलकर एक संतुलित रेनबो डाइट (जिसमें प्रकाश के सातों वर्णों से संबंधित पोषण सामर्थ्य हो) का निर्माण करती है। इससे व्यक्तित्व के मानसिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक हर स्तर को पोषण मिल सकेगा और स्थूल देह की भी परिपुष्टि होगी। इस प्रकार व्यक्ति स्वस्थ बना रह सकेगा।

हम प्रकाशवान हैं। हमारा संपूर्ण अस्तित्व प्रकाशयुक्त है, किंतु हमारे अंदर के कल्मष उसे अभिव्यक्त नहीं होने देते और उसको दोषपूर्ण आवरण से ढक देते हैं। उसके प्रभाव में आकर भौतिक काया भी रुग्ण बनती और दुःख भोगती हैं। जब आत्मपरिष्कार कर हम बिल्कुल निर्दोष और निर्विकार स्थिति में पहुँचते हैं तब वह दिव्य प्रकाश प्रकट होकर हमारी संपूर्ण सत्ता को ओतप्रोत कर देता है। यही हमारा वास्तविक अस्तित्व है। इसे चेतना या आत्मा का प्रकाश भी कहते हैं, समग्र स्वास्थ्य की दृष्टि से यह एक आदर्श अवस्था है।


गुरु ही जीवन की पूर्णता है

आध्यात्मिक जीवन में गुरु की आवश्यकता क्यों अनुभव की जाती है? इसे यदि समझना हो, तो उस पुण्य परंपरा पर दृष्टि डालनी होगी, जिसने गुरु-शिष्य के अंतर्संबंधों को इतना सुदृढ़ और सुविकसित किया कि उससे आगे तथा उससे उच्चतर और कोई भूमिका ही शेष न हो। यह गुरुतत्त्व की अनुभूति के लिए शिष्यत्व की पराकाष्ठा है। इस आत्यंतिक विकास के बिना उस महत् तन्त्र की प्रतीति संभव नहीं। यहीं स्थूल गुरु की जरूरत पड़ती है।

जिन मनीषियों ने गुरु-शिष्य संबंधों का आविष्कार किया, उन्हें लौकिक संबंधों की सीमाओं के बारे में स्पष्ट अंतर्दृष्टि प्राप्त थी। वे इसे भलीभाँति जानते थे कि कोई अंधा किसी दूसरे अंधे का मार्गदर्शन नहीं कर सकता। लँगड़ा किसी लँगड़े के चलने में सहायक बने, भला इससे हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है। यह कार्य गुरु का है। जब कोई शिष्य पहली बार किसी उन्नत चेतना के पास आध्यात्मिक मार्गदर्शन हेतु पहुँचता है, तो वह अंधा-लँगड़ा दोनों होता है। उसके पास न तो आध्यात्मिक दृष्टि होती है न गति। वह इस संपूर्ण यात्रा का एक अति हेता है और गुरु इसका दूसरा छोर। एक अधम है, तो दूसरा उच्चतम। एक गिरा हुआ देवता है, तो दूसरा चेतना के सर्वोच्च बिंदु पर प्रतिष्ठित देव। जो संसार की संपूर्ण बाधाओं और बंधनों को ध्वस्त कर यहाँ तक पहुँचा हो, वही इस पथ का योग्य उपदेष्टा और सहायक हो सकता है ऐसा व्यक्ति सद्गुरु के अतिरिक्त दूसरा नहीं हो सकता।

गुरु जीवन की पूर्णता है। वह पवित्रता, शाँति, प्रेम और ज्ञान की साक्षात् प्रतिमूर्ति होता है। वही अंतःकरण के इन गुणों को प्रकट करने के उत्तरदायित्व को वहन करता है। जब कोई व्यक्ति इन विशेषताओं को अपने अंदर विकसित करना चाहता है, तभी उसे गुरु की आवश्यकता महसूस होती है। गुरु अपने लक्ष्य की पवित्रता द्वारा शिष्य को अपने आँतरिक विकास की ओर अभिमुख करता है। इसके लिए वह सर्वप्रथम शिष्य को उसके अंदर स्थित गुरुतत्त्व के प्रति सजग बनाता है। गुरुतत्त्व प्रत्येक व्यक्ति के अंदर विद्यमान है। इसे ‘आँतरिक गुरु’ भी कहते हैं। यह शिष्य के संपूर्ण जीवन के समस्त क्रियाकलापों का साक्षी है तथा अव्यक्त रूप से उच्चतर आत्मज्ञान की ओर उसका मार्गदर्शन करता है। सर्व साधारण जन अपनी ही उलझनों और समस्याओं से घिरे रहने के कारण उसकी आवाज को सुन-समझ नहीं पाते, जो सुनते हैं, वे उस अव्यक्त तत्व से परिचित नहीं होने के कारण उसे विभ्रम मान बैठते हैं और निरंतर उसके निर्देशों की उपेक्षा करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में गुरु ही इसके प्रति उसे जागरुक और सचेष्ट बनाता है। वह बताता है कि उक्त संकेत उसके अंदर के उच्चतम और पवित्रतम सत्व के हैं, जिसका आयु, स्थान एवं काल से काई संबंध नहीं। वह इन सबसे परे तथा अविनाशी है। मृत्यु के साथ उसका अंत नहीं होता। वह जन्म-जन्माँतर तक साथ चलता है। विकसित अंतर्दृष्टि वाले ही इस अंतर्ध्वनि को ठीक-ठीक ग्रहण करते और उसका परिपालन करते हैं। अविकसित अंतःकरण को तो इसका भान तक नहीं मिलता।

स्थूल गुरु इस गुरुतत्त्व का मूर्तिमान प्रतीक है। कोई भी शिष्य गुरु के आदेशों और आदर्शों को तथा अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को निष्ठापूर्वक अनुपालन करके ही उस महान तत्व को उद्बुद्ध कर सकता है। गुरु भी इसके लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं, पर शिष्य के सहयोग के बिना उनका यह प्रयास फलीभूत नहीं होता और पथरीले जमीन में बीज बोने की तरह वह निरर्थक चला जाता है। उसे जगाने का सबसे सरल उपाय यही है कि हम बाह्य गुरु के प्रति सच्चे और ईमानदार बनें। यदि मन की गहराइयों से हम ऐसा कर सकें, तो फिर यह कर्तव्यनिष्ठा ही हमारी सर्वोत्तम साधना बन जाएगी। फिर यह कर्तव्यनिष्ठा ही हमारी सर्वोत्तम साधना बन जाएगी। फिर किसी भी प्रकार के जप-अनुष्ठान, ध्यान-धारण अथवा योगाभ्यास की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी, पर आदमी अध्यात्म में भी सर्वथा सच्चा कहाँ बन पाता है। वह यहाँ भी उन्हीं तरीकों और तकनीकों का इस्तेमाल करना चाहता है, जो अपने पूर्ववर्ती जीवन में लोक प्रवंचना हेतु करता रहा था। इससे उसका आध्यात्मिक जागरण और विलंबित होता है, जिससे उबार पाना गुरु के बूते की बात नहीं होती है।

अध्यात्म के पवित्रता सर्वोपरि है। शिष्य यदि उसे अपने अन्तःकरण में धारण कर सके और गुरु के निर्देशानुसार चले, तो इतने भर से ही वह अध्यात्म तत्वज्ञान के उस चरम सत्य की उपलब्धि कर सकता है, जिसे पाने के लिए साधकों को जन्मों तक परिश्रम करना पड़ता है, पर शिष्य को इसे अपना निजी उपार्जन मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। यथार्थ में इसके पीछे भी प्रत्यक्ष गुरु की ही प्रच्छन्न भूमिका होती है।

जब शिष्य के भीतर शक्ति का जागरण होता है, तो वास्तव में यह आँतरिक गुरु का ही उन्नयन है। यही वह केंद्र है, जिसकी खोज जिज्ञासु युगों से करते रहे हैं। बाह्य जगत् में हम जिन सुखों के पीछे भागते रहे हैं, वे भ्रम के अलावा और कुछ भी नहीं। इसके विपरीत हमारा आँतरिक गुरु परमानंद का अनंत स्त्रोत है। यथार्थ में उसकी अचेतन खोज के क्रम में ही हम भौतिक जीवन से सुख की अपेक्षा करने लगते हैं। उसके संपर्क से होने वाली अनुभूति के प्रति हर कोई अवचेतन रूप से सजग है, किंतु अपनी अज्ञानता और माया के कारण हम बाह्य जगत् में उसे ढूंढ़ने का प्रयास करते हैं। वहाँ उसे हम पाते भी हैं, किंतु वह तो अंदर के आनंद का विस्तार है, भ्रमवश हम उसे भौतिक वस्तु से संबद्ध मान बैठते हैं और इसलिए उस अनुभव को पुनः प्राप्त करने के लिए उस वस्तु का पीछा करते हैं। इस बार आदमी किसी कामना से प्रेरित होता है, इस कारण उसका बोध प्रतिबंधित हो जाता है और उसकी अनुभूति पहले जैसी गहरी एवं आनंददायी नहीं होती। इससे वह निराश हो जाता है और उससे उबरने के लिए अन्यत्र आनंद की खोज करने लगता है। यह सिलसिला तब तक चलता रहता है, जब तक उसकी भेंट सत्य का साक्षात्कार कर चुके किसी महापुरुष से न हो जाए। इस मिलन से उसके अंदर पुनः वही प्रक्रिया शुरू हो जाती है, लेकिन गुरु चूँकि आँतरिक गुरु का ही प्रतिरूप होता है, अतः यह अनुभव यहाँ अधिक स्थायी होता है। गुरु के प्रति शिष्य का बाह्य अवबोधन आँतरिक गुरु के प्रति उसके बोध से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होता है। यदि गुरु से शिष्य का संबंध वास्तविक और गहरा है, तो इसके साथ ही शिष्य अपने आँतरिक गुरुतत्त्व से संबंध विकसित करने में भी सक्षम होता है। दोनों अनुभव समानाँतर चलते हैं और उनमें सह अस्तित्व होता है। बाह्य गुरु के संबंध विकसित होने के साथ-साथ आँतरिक गुरु के शिष्य का संपर्क सजीव, साकार ओर सुस्पष्ट होने लगता है। इस प्रकार गुरुतत्त्व प्रकट होने लगता है।

प्रत्येक पदार्थ में शक्ति निहित है, किंतु उसकी प्राकृतिक अवस्था में हर कोई उसके अंदर की शक्ति को ढूंढ़कर उसका उपयोग नहीं कर सकता। एक निश्चित वैज्ञानिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही उस पदार्थ से शक्ति मुक्त होगी, तभी उसे एकत्रित कर उपयोग में लाया जा सकता है। यह प्रक्रिया एक वैज्ञानिक ही बता सकता है। अध्यात्म क्षेत्र में यह भूमिका समर्थ गुरु निभाता है। उसके मार्गदर्शन में ही शिष्य की अंतःऊर्जा का आविर्भाव और विकास होता है। अनाड़ी और अज्ञानी शिष्य यदि अपने बूते ऐसा करना चाहे, तो उसे असफलता के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ न लगेगा।

गुरु-शिष्य परंपरा में ‘शक्तिपात’ शक्ति हस्ताँतरण की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। ऐसा समझा जाता है कि योग्य गुरु अपनी उपार्जित शक्ति का एक अंश शिष्य को देकर उसे समर्थ बना देने में सक्षम होते हैं, लेकिन आधार समर्थ होने पर ही यह सब संभव है। कमजोर आधार अंशदान में मिली वह शक्ति बरदाश्त न कर सकेंगे और उलटे अपना अहित कर बैठेंगे, इसलिए गुरु उन्हें इस प्रक्रिया द्वारा शक्ति प्रदान करेंगे, ऐसी आशा अपात्र शिष्यों को नहीं करनी चाहिए। उनके लिए सामर्थ्यवान बनने का सबसे सरल तरीका यही है कि वे गुरुचरणों में आत्मसमर्पण कर दें और उनकी इच्छा में ही अपनी इच्छा मानें एवं उनके संतोष में अपना संतोष। शिष्य जब अपने आपे को संपूर्ण रूप से गुरु में विसर्जित कर देता है, तो वह महसूस करता है कि एक अज्ञात शक्ति निरंतर उसका सहयोग कर रही है, न सिर्फ भौतिक क्षेत्र में, वरन् आत्मिक प्रगति में भी समान रूप से। यह स्थिति तब भी बनी रहती है, जब गुरु अपने भौतिक शरीर में नहीं होते, कारण कि वे अपने सूक्ष्म शरीरों को तप-साधना से इतने समर्थ बना चुके होते हैं कि स्थूल देह के न रहने पर भी शिष्यों को सहयोग-संरक्षण मिलता रह सके। जो निष्ठावान शिष्य है, जिनके लिए गुरु कार्य ही सर्वोपरि है, ऐसे शिष्यों के प्रति गुरु भी अहैतुकी कृपा करते हैं। उन्हें अपना संरक्षण-मार्गदर्शन ही नहीं देते, अपितु आत्मोत्थान की सुनिश्चित गारंटी भी प्रदान करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे इस संसार में अब हैं या नहीं, कारण कि आत्मज्ञान प्राप्त गुरु कभी मरते नहीं, उनका सिर्फ परमात्मा में विलय होता है, लेकिन अभिन्न हृदय शिष्यों की आत्मिक प्रगति तक वे प्रतीक्षा करते रहते हैं।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना अनुचित न होगा कि आखिर ये अभिन्न हृदय शिष्य हैं कौन? क्या वे, उनसे स्नेह का दंभ भरते हैं या वे जो उनके आदर्शों का बखान मात्र करते हैं? अथवा वे जो हर वक्त उनके समक्ष दीन-हीन बने रहते हैं? निश्चय ही इनमें से कोई भी नहीं। उनके नाप-तौल का पैमाना दूसरा है। उनकी कसौटी में ऐसे जन कभी भी खरे नहीं उतरते। वे यह देखते हैं कि उनके कार्यों को कौन कितनी तत्परता और निष्ठापूर्वक करता है और कौन उसकी खानापूर्ति भर करता है। उनकी दृष्टि में वह शिष्य महान है, जो उनके आदर्शों पर चलकर निरंतर उनके कार्यों को अग्रगामी बनाने में संलग्न रहता है। ऐसे ही शिष्य उनके अंतरंग होते हैं। इन्हीं पर उनका विशेष अनुग्रह बरसता है।

हर व्यक्ति के अंदर शक्ति का एक स्त्रोत है, जो स्वयं को प्रकट करने हेतु फूटना चाहता है। इस शक्ति के एक अंश की अभिव्यक्ति के परिणामस्वरूप ही हम सोचते, अनुभव करते एवं कार्यरत होते हैं, किंतु इसके अतिरिक्त इसका एक बड़ा भाग सुषुप्त स्थिति में पड़ा रहता है, जो हमारे प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया में स्वयं को प्रकट करने लगता है। यह उच्चतर शक्ति है, जो मनुष्य की संपूर्ण अंतर्निहित शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।

जब यह शक्ति जाग्रत् होकर एक स्वरूप लेती है, तो इसकी तुलना एक बाँध की दीवार के टूटने से की जा सकती है, जिसका सारा जल तीव्र वेग से बहता हुआ मार्ग में आने वाले अवरोधों को तोड़ता-फोड़ता चलता है। रास्ता साफ होने से संपूर्ण जलराशि बिना किसी नुकसान के शाँतिपूर्वक प्रवाहित हो जाती है।

लगभग ऐसी ही स्थिति मनुष्य के अंदर शक्ति के स्वाभाविक एकत्रीकरण, स्थानाँतरण एवं विस्फोट के समय घटित होती है। सर्वप्रथम हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि यह शक्ति किसी भी व्यक्ति में किसी भी समय जाग्रत् होकर प्रकट हो सकती है। मनोभूमि के स्वच्छ होने पर ऐसे समय आनंद की अनुभूति होती है, पर उसके मलिन और बुरे संस्कारों से युक्त होने पर बहुत ही कष्ट होता है। यह कष्ट बीमारी, मानसिक वेदना, निराशा अथवा उदासी के रूप में प्रकट हो सकता है।

गुरु इस प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। वहाँ शक्ति चक्र का विघटन उद्दाम प्रवाह की तरह न होकर संतुलित ढंग से होता है, जिससे शिष्य को किसी प्रकार की पीड़ा का आभास नहीं होता और यदि होता है, तो इतना स्वल्प, जिसे वह आसानी से हँसते-हँसते झेल सके। इसके साथ ही उसके अंदर का रूपांतरण आरंभ हो जाता है और नए तत्व नए ढंग से पुनर्गठित होने लगते हैं। इस प्रकार शिष्य का विकास सुनियोजित ढंग से शनैः-शनैः होने लगता है।

सक्षम गुरु न हो, तो यह विकास-यात्रा बाधित होती और कंटकाकीर्ण बन जाती है। अतएव अध्यात्म पथ के प्रत्येक पथिक को एक ऐसे अनुभवी मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ती है, जो उसके प्रगति-प्रवाह को निर्बाध रूप से बनाए रख सकने में सहायक हो सके और अंततः उसके भीतर के गुरुतत्त्व से उसका साक्षात्कार करा सके। यह गुरुतत्त्व वास्तव में उसके विकसित आत्मतत्व के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं।

गुरु शिष्य संबंध निष्ठामूलक है। धीरे-धीरे वही श्रद्धा में रूपांतरित हो जाता है। जब वह पूर्ण प्रगाढ़ होता है, तो संपूर्ण गुरुतत्त्व शिष्य में संचरित हो जाता है। फिर वह साधारण नहीं, असाधारण बन जाता है। अतएव गुरु-शिष्य परंपरा में अंतर्संबंधों के महत्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती। गुरुपर्व (व्यास पूर्णिमा) से लेकर श्रावणीपर्व तक शिष्य द्वारा इसी संबंध की समीक्षा की जाती है और देखा जाता है कि हम अपने गुरु से और प्रकाराँतर से गुरुतत्त्व से कितने अधिक सन्निकट हुए और सघनता से जुड़े। यदि इसमें सकारात्मक लक्षण दीख पड़े, तो समझना चाहिए कि गुरुतत्त्व की प्राप्ति संबंधी प्रगति-यात्रा में हम ठीक-ठीक आगे बढ़ रहे हैं और लक्ष्य उपलब्धि की दिशा में निरंतर चल रहे हैं।


नारीशक्ति की अस्मिता की रक्षा का पर्व

आकाश में सूरज और बादलों की लुका-छिपी, धरती पर अंकुआई, हर्षाई हरियाली वाले मौसम में राखी पर्व की प्रसन्नता के रंग भरने आई है। 22 अगस्त के दिन इसके आगमन की आहट सुनकर भाई-बहिनों के मन-मयूर नाच उठे हैं। श्रावण पूर्णिमा के पुण्य पलों में रक्षा-बंधन का यह त्यौहार अपने साथ प्रकृति की अनोखी सुरम्यता लेकर आया है। ग्रीष्म ऋतु से तप्त हुई वसुन्धरा अब हरित वसना होकर अपनी उर्वरा शक्ति का परिचय देने में लगी है। आकाश के निर्गुण-निराकार विस्तार को सावन के मेघों ने सगुण-साकार बना दिया है। मेघों के बीच राखी के चमकीले धागों की तरह चमकती विद्युत् की छटा अनुपम है। पवन की गति में पर्व की प्रसन्नता भरी सिहरन और उल्लास के लास्य का संचार है। चारों ओर जलाशय जल से आप्लावित होकर गंधमयी धरा को रसवन्ती बना रहे हैं। सारे वातावरण में बहिनों के प्यार की महक छायी हुई है।

युगों से मनाए जाने वाले इस पर्व के साथ कई युग कथाएँ जुड़ी हुई हैं। पुराणों में कहा गया है कि देवासुर संग्राम में जब देवता निरन्तर पराजित होने लगे, तब इन्द्र ने अपने गुरु बृहस्पति से रण में विजय श्री दिलाने वाले उपाय की प्रार्थना की। इस प्रार्थना पर देवगुरु ने श्रावण पूर्णिमा के दिन आक के रेशों की राखी बनाकर, उसे रक्षा विधान सम्बन्धी मंत्रों से अभिमंत्रित करके इन्द्र की कलाई पर रक्षा-कवच के रूप में बाँध दिया। कथा यह भी है कि युद्ध प्रयाण के समय देवराज इन्द्र की पत्नी देवी शची ने गायत्री मंत्र का पाठ करते हुए उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा। और उन्हें आश्वासन दिया कि मेरे सत का प्रतीक यह धागा रणक्षेत्र में आपकी रक्षा करेगा। इन रक्षा-सूत्रों ने देवों में आत्मविश्वास जगाया और वे विजयी रहे। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि प्रारम्भ में राखी बाँधने वाला स्वयं रक्षा करने में सक्षम होता था, इसलिए वह रक्षा के लिए अभयदान देता था।

काल ने करवट बदली और परम्परा बदल गयी। रक्षा-सूत्र बाँधने वाले हाथों ने स्वयं अपनी रक्षा का वचन माँगा। इसकी शुरुआत तब हुई जब द्रौपदी ने भगवान् कृष्ण को राखी बाँधी। ऐसा कहा जाता है, तभी से बहनों ने भाइयों की कलाई पर राखी बाँधकर अपनी रक्षा का वचन माँगा। भगवान् कृष्ण ने विपद् की घड़ी में द्रौपदी की लाज बचाकर किस तरह राखी का मोल चुकाया, इस पुराण कथा को सभी जानते हैं। रक्षाबंधन के इस पौराणिक प्रसंग में बाद में कई इतिहास-कथाएँ भी जुड़ी। इन कथाओं में कर्णवती-हुमाँयु की कथा, रानी बेलुनावियार-टीपू सुल्तान की कथा, चाँदबीबी-महाराणाप्रताप की कथा, रमजानी-शाहआलम सानी की कथा अति प्रसिद्ध है। इतिहास के पृष्ठो में राखी की इन कथाओं का अमिट अंकन है। इतिहास के जानकर यह भी बताते हैं कि अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के शासन काल में रक्षाबंधन के पर्व की शान-शौकत बढ़ी-चढ़ी थी। इस अवसर पर किले में आठ दिन पहले से ही तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। हिन्दू महिलाएँ उन्हें राखी बाँधती और ब्राह्मण आशीर्वाद देते थे। सम्राट इन सबको तरह-तरह के उपहार दिया करते थे।

स्वातन्त्र्य युग में लार्ड कर्जन के काल में राखी का सफल भावनात्मक प्रयोग विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने किया था। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय तो राखी के धागों के कारण ही अस्तित्व में आया। महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय जी ने काशी नरेश को राखी बाँधी और बदले में विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए भूमि दक्षिणा में प्राप्त की। कवियित्री महादेवी वर्मा की राखी हिन्दी साहित्य के संसार में प्रसिद्ध थे। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, सुमित्रानन्दन पन्त, इलाचन्द्र जोशी, प्रेमचन्द्र, जयशंकर प्रसाद तथा महाप्राण निराला की भावनाओं को अपनी राखी के धागों से बाँधा था। घटनाक्रम आज के हों या इतिहास के अथवा इनके विवरण पुराणों में मिलते हों, सभी का सार इतना ही है कि रक्षाबन्धन राष्ट्रीय व सामाजिक मर्यादाओं एवं बहिनों की लाज की सुरक्षा हेतु संकल्पित होने का महापर्व है।

राखी के धागों को बाँधते हुए इतिहास व पुराण के प्रेरक प्रसंगों के स्मरण के साथ वर्तमान का चिन्तन भी जरूरी है। आज की कथा कहती है कि देखो तो सही हमारी बहिनें कितने संकट में है। समाज की अनगिन कमजोरियों एवं बुराइयों ने बहिनों के जीवन को संकटग्रस्त किया हुआ है। जहाँ एक ओर हम उनकी प्रगति के लिए बढ़ते अवसरों की बात करते हैं, वहाँ क्या यह सच नहीं है कि कितनी उमंगों के साथ नए घर में जाने वाली हमारी बहिनों को दहेज प्रताड़ना का शिकार बनना पड़ता है? क्या यह सच नहीं है कि कितनी बड़ी संख्या में लिंग-भेद पर आधारित भ्रूण हत्या के कारण बहिनों को जीवन में प्रवेश करने से ही वंचित कर दिया जाता है।

छोटी सी प्यारी सी बहिन राखी बाँध रही हो, इससे प्यारा और कोई दृश्य नहीं हो सकता है। पर भाइयों को यह भी सोचना पड़ेगा कि बड़ी संख्या में वे स्कूली शिक्षा से वंचित क्यों हैं? भाइयों से कई गुना अधिक बहिनें कुपोषण की शिकार क्यों हैं? लगातार बढ़ रही बाल वेश्यावृत्ति का जिम्मेदार कौन है? भाइयों के लिए एक विकल्प यह है कि बहिनों की इन सभी समस्याओं की ओर से हम आँख मूँद लें और राखी के त्यौहार को बस एक रस्म की तरह निभा दें। पर राखी का पवित्र धागा तो हर भाई की आत्मा को झकझोर कर यही कहता है कि बहिन के संकट को कभी मत भूलना। क्या भाई अपनी बहिन की इस पुकार को अनसुना कर देगा? क्या रक्षाबंधन का त्यौहार केवल एक मिठाई के डिब्बे और सौ रुपये के नोट तक सिमट जाएगा? या हम इस दिन बहिन के संकट को वास्तव में याद करेंगे और इसके लिए समाज में जरूरी बदलाव लाने के लिए विचार क्रान्ति अभियान की सक्रियता से स्वयं को जोड़ेंगे।

यह ठीक है कि रक्षाबन्धन के दिन बहन से राखी बंधवाने के लिए जा रहा भाई आज भी उत्साहित है। प्यारी बहिन से मिलने की उमंग हिलोरे ले रही है। पर बहुत से भाइयों के दिल में इस उत्साह और उमंग के साथ उदासी भी है। बहन को ससुराल में जो कष्ट सहना पड़ रहा है, इसकी उदासी है। उसे जो ताने सुनने पड़ते हैं, जो अपमान सहना पड़ता है, इसकी उदासी है। हालाँकि बहिन बहुत कुछ दुःख-दर्द अपने अपने मायके से छिपा जाती है, पर क्या भाई से उसकी परेशानी और आँखों का दर्द पूरी तरह से छिप सकता है? भाई उसके इस खामोश दर्द को जानता है और इसी कारण वह उदास है।

रक्षाबंधन के दिन आज अपने भाई को राखी बाँधने जा रही बहिन काफी उत्साहित है। कई दिनों बाद भाई से मिलने की उमंग है। पर इस उमंग और उत्साह के साथ एक उदासी भी है बहिन को धीरे-धीरे ऐसा लग रहा है, जैसे मायके में अब वह पराई होती जा रही है। भैया-भाभी भी नहीं चाहते कि वह अपना दुःख-दर्द उनसे खुलकर कहे। तो क्या जो कष्ट उसे झेलने पड़ रहे हैं वे अकेले उसी के रह जाएँगे। क्या उसे सहारा देने वाला, उसके दुःख-दर्द को बाँटने वाला कोई नहीं है? राखी बंधवाने वाले भाई को इन प्रश्नों की सच्चाई समझनी होगी। उसे यह महसूस करना होगा कि आज कई तरह से बहन का दुःख-दर्द न केवल बढ़ गया है, अपितु उसकी प्यारी बहन अपने में बहुत अकेली अनुभव करने लगी है।

निश्चय ही युग परिवर्तन के साथ मान्यताएँ, परम्पराएँ बदलते हैं। संस्कृति करवट लेती है। नए रूप में नए ओज से चमकती है। पर इसका मूल्य नहीं बिखरता। पुराण व इतिहास कथाओं के मूल्य आज भी प्रासंगिक है। आज की कथा में इन्हें पिरोने की जरूरत है। रक्षाबंधन के पर्व को मूल्यनिष्ठ बनाकर इसे नयी गरिमा व नया अर्थ देने की आवश्यकता है। बहनें, भाइयों की कलाई में राखी बाँधकर न सिर्फ अपने सम्मान की रक्षा, वरन् सभी नारियों के सम्मान का वचन लें। भाई भी अपनी बहिन के अकेलेपन व उदासी को दूर करने का संकल्प करें। यदि रक्षाबंधन के दिन प्रत्येक भाई अपनी बहिन के साथ प्रत्येक नारी की गरिमा, अस्मिता और सम्मान को चोट पहुँचाने वाले तत्वों से निपटने का संकल्प ले, तो राखी के पुण्य पर्व का प्राकृतिक एवं भावनात्मक शृंगार स्थायी बन जाएगा।


गुरु का ध्यान ही प्रेम की कसौटी

सूर्यदेव ने अपना रथ पश्चिम दिशा की ओर मोड़ लिया था। आकाश में उभरती हुई लालिमा एक छोर पर सिमटने लगी थी। प्रकृति में सूर्यदेव के थोड़े समय बाद अस्ताचल में जाकर विश्राम करने के संकेत स्पष्ट होने लगे थे। चारों ओर पक्षियों में यही चर्चा थी। वे अपनी भाषा में यही चर्चा करते हुए अपने बसेरों की ओर लौट रहे थे। इन पखेरुओं जैसा ही कुछ हाल बुद्ध संघ के भिक्षुओं का था। वे भी अपने शास्ता के परिनिर्वाण की चर्चा करने में लगे थे। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि ऐसे में क्या करें? बस चिन्ता, वेदना और विषाद की लहरें उसके मन को अनवरत भिगो रही थीं।

यह स्थिति तब से थी, जब एक दिन वैशाली में विहार करते हुए भगवान ने भिक्षुओं से कहा- ‘भिक्षुओं, सावधान! मैं आज से चार माह बाद परिनिवृत्त हो जाऊँगा। मेरी घड़ी करीब आ रही है। मेरी विदा का क्षण निकट आ रहा है। इसलिए जो करने योग्य हो, करो। अब देर करने के लिए समय नहीं है।’ तथागत के ये वचन गर्म लू के झोंकों की भाँति संघ के समस्त भिक्षुओं के अन्तःकरण को झकझोरने लगे। जिसने जहाँ भी यह खबर सुनी, वही विह्वल हो गया।

सभी भिक्षुओं में बड़ा भय उत्पन्न हो गया। सारा भिक्षु संघ महाविषाद में डूब गया। कुछ ऐसा लगा, जैसे अचानक अमावस हो गयी। भिक्षु रोने लगे, छाती पीटने लगे। विषाद में डूबे इधर-उधर बिलखने लगे। भिक्षुओं के झुण्ड-झुण्ड यहाँ-वहाँ इकट्ठे होकर रोते हुए सोचते, अब क्या होगा! अब क्या करेंगे! कई तरह की चिंताएँ उनको सता रही थी। कइयों को चिन्ता थी कि शास्ता के बाद संघ की व्यवस्था कैसे चलेगी? कई ऐसे थे जो सोच रहे थे कि परिनिर्वाण के बाद भगवान का उत्तराधिकार किसे मिलेगा?

कुछ ऐसे भी थे, जिनकी चिन्ताएँ थोड़े अलग किस्म की थीं। वे भगवान की देह के श्रद्धा-पूजा के मोह में थे। महाबुद्ध की महिमामय देह थोड़े दिनों बाद नहीं रहेगी, यह सोचकर वे विकल हो उठे। अपनी इस विकलता में वे भगवान की देह से जुड़ी चीजें जैसे- पुराने चीवर, कमण्डल आदि अपने लिए समेटने लगे। इस समेटा-बटोरी में उनमें आपस में थोड़ा सा मनमुटाव की नौबत भी आ गयी। इस चिन्ताकुल भिक्षुओं में कइयों ने अपने भविष्य की चिन्ता खाए जा रही थी। भिक्षु संघ में कई तरह की चिन्ताएँ अंकुरित हो रही थी। इनके रूप और प्रकार भले ही सब के लिए अलग-अलग हों पर प्रायः सभी को काई न कोई चिन्ता पाश जकड़े था।

लेकिन, भिक्षु तिष्य स्थविर की स्थिति इन सभी से काफी कुछ अलग थी। भगवान के भावी परिनिर्वाण की खबर सुनने के बाद वे न तो रोए, न ही उन्होंने किसी से कुछ कहा। शास्ता की पुरानी-नयी चीजों को भी बटोरने की उन्होंने कोई चेष्टा नहीं की। वे बस मौन हो गए। उन्हें इस तरह अचानक चुप हुआ देख दूसरे भिक्षुओं ने उनसे पूछने की कोशिश की, आपुस, आपको क्या हो गया है? क्या भगवान के जाने की बात से आपको इतना सदमा पहुँचा है? क्या आपकी वाणी खो गयी है? आप रोते क्यों नहीं? आप बोलते क्यों नहीं? तिष्य स्थविर को इस तरह चुप हुआ देख भिक्षुओं को डर भी लगा कि कहीं यह पागल तो नहीं हो गए?

भिक्षुओं का ऐसा सोचना बहुत गलत भी नहीं था। आघात ही ऐसा था कि कोई संवेदनशील हृदय सहन न कर पाए। ऐसे में पागल होना भी सम्भव था। जिनके चरणों में सारा जीवन समर्पित किया हो, उनके जाने की घड़ी आ गयी। जिनके सहारे अब तक जीवन की सारी आशाएँ बाँधी थी, उनके विदा होने का क्षण आ गया। यह कठिनतम स्थिति थी। ऐसी स्थिति में भिक्षुओं की शंकाएँ स्वाभाविक थी। लेकिन, तिष्य जो चुप हुए, सो चुप ही हो गए। वे भिक्षुओं की किसी भी शंका का कोई जवाब नहीं दे रहे थे। उनके जीवन में एकदम सन्नाटा हो गया था। वह एकदम मौन-शान्त और एकान्त थे।

भगवान के परिनिर्वाण की चिन्ता से चिन्तित भिक्षु थोड़ा और भी हैरान-परेशान हुए। अपने सद्व्यवहार के कारण तिष्य स्थविर सभी का प्रिय था। वह सहजरूप से सेवा परायण, मिलनसार, हंसमुख एवं मृदुभाषी था। उसकी अचानक चुप्पी सभी को खल रही थी। लेकिन कोई भी इस चुप्पी का समुचित कारण खोजने में असमर्थ था। पहले ही से चिन्तित भिक्षु इस एक नयी चिन्ता के दंश से विकल हो उठे। स्वयं इसके समाधान में असफल रहने पर उन्होंने भगवान के श्री चरणों में इस समस्या को निवेदित करने की बात सोची।

अन्ततः यह बात भगवान के पास पहुँच ही गयी कि भिक्षु तिष्य स्थविर को अचानक कुछ हो गया है। इन दिनों उन्होंने अपने आपको बिलकुल बन्द कर लिया है। जैसे कछुआ समेट लेता है अपने को और अपने भीतर हो जाता है, कुछ ऐसे ही उन्होंने अपने आप को अपने भीतर समेट लिया है। तिष्य स्थविर की सारी स्थिति का बयान करते हुए भिक्षुओं ने उन्हें अपनी शंकाएँ भी जता डालीं- यह कहीं, किसी तरह के पागलपन का लक्षण तो नहीं है? कहीं आपके निकट भविष्य में परिनिवृत्त होने की बात का आघात इतना तो गहन नहीं पड़ा कि उनकी स्मृति खो गयी है, वाणी विलीन हो गयी है।

भिक्षुओं की इन सारी बातों को सुनकर भगवान एक पल को आत्मनिमग्न हुए। पर अगले ही पल वह मुस्करा दिए। उन्होंने तिष्य स्थविर को अपने पास बुलाया। भिक्षु तिष्य स्थविर ने भगवान के समीप आकर उनके चरणों में माथा नवाया और मौन भाव से एक ओर बैठ गए। भगवान ने विंहस कर उनसे पूछा- वत्स! ये भिक्षु तुम्हारी स्थिति में बारे में जानना चाहते हैं। इनके सन्तोष के लिए तुम इन्हें अपनी भावदशा कहो। जैसी आज्ञा प्रभु! तिष्य बोले और उन्होंने कहना शुरू किया- आप चार माह बाद परिनिवृत्त होंगे, मैंने जब ऐसा सुना तो मैंने सोचा कि मैं तो अभी अवीतराग हूँ। आपके रहते हुए ही अर्हत्व पा लेना चाहिए। यही सोचकर मैं ध्यान में ही अपनी समस्त शक्ति उड़ेलने लगा हूँ।

यह कहते हुए तिष्य संयमित वाणी से बोले- आपने भिक्षुओं को यही आदेश दिया था, जो करने योग्य है, करो। देर मत करो। भगवन्! मैं आपके आदेश को यथासाध्य पालन करने की कोशिश कर रहा हूँ। अब आपसे आशीर्वाद माँगता हूँ कि मेरा संकल्प पूरा हो। आपके जाने से पहले तिष्य स्थविर विदा हो जाना चाहिए। आँसू भरी आँखों से तिष्य बोले- भगवन्! मैं अपने लिए मौत की माँग नहीं कर रहा हूँ। यह तिष्य स्थविर नाम का जो अहंकार है, यह विदा हो जाना चाहिए। मैं अपना प्राण पण लगा रहा हूँ, आपका आशीर्वाद चाहिए।

तिष्य के इस कथन में शास्ता के प्रति प्रगाढ़ भक्ति थी। उन्हें भगवान की कृपा शक्ति पर विश्वास था। वह अपना हृदय भगवान के श्री चरणों में उड़ेलते हुए कह रहे थे- अब न बोलूँगा, न हिलूँगा, न डोलूँगा। क्योंकि सारी शक्ति इसी पर लगा देनी है। आपके वचन मुझे सदा स्मरण रहते हैं। आपने कहा था- भिक्षुओं सावधान हो जाओ और जो करने योग्य है करो। तो मुझे यही करने योग्य लगा कि ये चार महीने जीवन की क्रान्ति के लिए लगा दूँ, पूरा लगा दूँ। इस पार या उस पार। मैं आपके आदेश पालन में तनिक सी भी कमी नहीं छोड़ना चाहता।

तिष्य के उद्गार सुनकर भगवान ने यह गाथा कही-

पविवेकं रसं पीत्वा रसं उपसमस्स च। निद्दरो होति निष्पापो धम्मपीति रसं पिवं॥

एकान्त का रस पीकर, शान्ति का रस पीकर मनुष्य निडर होता है। और धर्म का प्रेमरस पीकर निष्पाप होता है।

धम्मगाथा के भाव को प्रकाशित करते हुए भगवान बोले-एकान्त का अर्थ है, अपने भीतर डुबकी लो। कहीं दूर भागने का अर्थ एकान्त नहीं है। एकान्त का मतलब इतना ही है कि अब तक तुमने सम्बन्धों में बहुत ज्यादा ऊर्जा खपायी। उसे सम्बन्धों से मुक्त करो, आत्मलीन बनो। ऐसे एकान्त में ही शान्ति का रस घुला है। शून्यता की इस शान्ति रस को पीकर मनुष्य निडर होता है। फिर जीवन में कोई पीड़ा नहीं, कोई दुःख नहीं। जिसने इस भावदशा का स्वाद चखा, वहीं धर्म का प्रेमरस पीकर निष्पाप होता है। उसे ही धर्म का बोध होता है। वही निर्वाण की निष्पाप भावदशा को प्राप्त होता है।

अपने द्वारा कही गयी धम्म गाथा के अर्थ को प्रकट कर भगवान कहने लगे- भिक्षुओं, तिष्य इस धम्म गाथा को अपने जीवन में सार्थक कर रहा है। जो मुझ पर स्नेह करता है, उसे तिष्य के समान होना चाहिए। यही तो वह सत्य है, जो मैंने कहा था कि करो। रोने-धोने से क्या होगा? रो-धोकर तो जिंदगियाँ बिता दी तुमने। चर्चा करने से क्या होगा? झुण्ड के झुण्ड बनाकर विचार करने से और विषाद करने से क्या होगा। तुम मुझे तो न रोक पाओगे। मेरा जाना निश्चित है। रो-रोकर तुम यह क्षण भी गंवा दोगे। आंसू किसी भी काम नहीं आएँगे।

तिष्य स्थविर ने ठीक ही किया है। इसने मेरे प्रति अपने प्रेम को ध्यान बना लिया है। यह मेरी वास्तविक पूजा कर रहा है। अपनी वाणी के वेग कुछ पलों के लिए मन्द कर भगवान ने तिष्य की ओर कृपा पूर्ण दृष्टि से निहारा और पूर्ववत कहना शुरू किया- गन्धमाला आदि से पूजा करने वाले मेरी पूजा नहीं करते। वह वास्तविक पूजा नहीं है। जो ध्यान के फूल मेरे चरणों में रोज चढ़ाता है, वही मेरी पूजा करता है। ध्यान ही मेरे प्रति प्रेम की कसौटी है। रोओ मत ध्याओ। मेरी पुरानी जीर्ण वस्तुओं के मोह में मत बंधो, ध्याओ।

इसी के साथ भगवान ने फिर से एक धम्मगाथा कही-

धीरञ्च पञ्चञ्च बहुस्सुतं च धोरय्हसीलं वतंवतमरियं। त तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं भजेथ न क्खत्तपथं च चंदिमा॥

इस तिष्य को देखो, यह धीर है, प्राज्ञ है, बहुश्रुत है, शीलवान है, व्रतसम्पन्न है, आर्य है, बुद्धिमान है, इसका अनुगमन करो। रोओ-धोओ मत। इसके पीछे जाओ। इससे सीखो। जो इसे हुआ है, वही तुम अपने में होने दो।

महाबुद्ध के इन वचनों को सुनकर भिक्षुओं की क्षुब्ध अंतर्चेतना शान्त होने लगी। उनकी चिन्ता में से चिन्तन के स्वर फूटने लगे। सभी ने देखा तिष्य स्थविर ने शान्त भाव वे उठकर भगवान को प्रणाम किया। उसे आशीष देते हुए तथागत की वाणी मुखरित हुई-

कोलाहल से काल की निद्रा नहीं टूटती न धक्के मारने से समय का द्वार खुलता है। ध्यान के व्यूह में जाओ नीरवता और शान्ति को सिद्ध करो ध्यान की गहनता और एकान्त शक्ति के असली स्रोत है भीड़ के कोलाहल से बचो लक्ष्य को ध्यान के शर से विद्ध करो!

इस बुद्ध की वाणी में सभी के लिए प्रबोध था। सभी इस पर निदिध्यासन करते हुए अपने कुटीरों की ओर चल पड़े।


प्रेम के रूप में परिवर्तन (Kahani)

अनिंद्य सुँदरी उब्बरी राजमहिषी बनी। उनके रूप-सौंदर्य और गुण-स्वभाव की भी ख्याति थी। कुछ समय उपराँत उब्बरी ने एक कन्या को जन्म दिया, अपनी ही जैसी चंद्रमुखी। उसकी किलकारियों ने राजमहल की शोभा-सुषमा में चार चाँद लगा दिए। भाग्यविधान पलटा। कन्या का देहावसान हो गया। माता पर वज्रपात हुआ। वह विक्षिप्त जैसी हो गई। जिस श्मशान में बालिका की अंत्येष्टि हुई थी, वह उसी में जा पहुँचती और विलाप से आकाश हिला देती। दर्शकों की आँखों से आँसू ढुलकने लगते। उब्बरी इस शोक-संताप में सूख-सूखकर काँटा हो गई। किसी को प्रबोधन का उस पर प्रभाव नहीं हो रहा था।

एक दिन तथागत उस राह से गुजरे। रुदन सुनकर ठिठक गए। विवरण जाना तो क्रंदन करती युवती के पास जा पहुँचे। उब्बरी ने सिर उठाकर देखा और अनुग्रह की याचना करने लगती। बुद्ध ने कहा, देवि। इसी श्मशान में सहस्रों के मृत शरीर भस्मीभूत हुए हैं। उनके परिजन यदि ऐसा ही क्रंदन करते, तो इस संसार में शोक के अतिरिक्त गति पर विचार करो। जो चले गए, उन्हें जाने दो। अपनी आत्मा का विचार करो, जो पुत्री से भी अधिक प्रिय होनी चाहिए। ऐसा न हो कि तुम पुत्री की तरह आत्मा को भी गँवा बैठो। उब्बरी तथागत का एक-एक शब्द हृदयंगम करती गई। उसने अंतरात्मा को पहचाना और मृत का दामन छोड़कर उस जीवंत का परिपालन आरंभ कर दिया। कुछ दिन उपराँत उब्बरी महिला बौद्ध विहार की अधिष्ठात्री बनीं, सीमित मोह का व्यापक प्रेम के रूप में परिवर्तन जो हुआ था।


सृष्टि का जन्मोत्सव पर्व

मेघगर्जन की वाद्यधुन के साथ रिमझिम के गीतों को गाती हुई हरियाली की आकर्षक चादर ओढ़े सम्पूर्ण प्रकृति उत्सव मना रही है। यह हर्षोत्सव श्रावणी पर्व का है। श्रावणी सृष्टि का जन्मोत्सव पर्व है। इसी दिन परमेश्वर का ‘एकोऽहं बहुस्याम्’ संकल्प मूर्त हुआ। बहुआयामी सृष्टि जन्मी। प्रकृति की उर्वरता में जीवन के अनेक रूप-रंग अंकुरित हुई। सर्वसमर्थ पिता परमेश्वर की कृपा से आदिमाता प्रकृति की गोद अनगिन सन्तानों से भर गयी। जगत् को जन्म देने वाली जगन्माता के उल्लास का रहस्य यही है। इसमें अनेकों संकेत है, सन्देश है और भागीदार बनने के लिए आवाहन है। माता प्रकृति के ज्येष्ठ पुत्र मनुष्य का दायित्व तो कुछ अधिक ही है। श्रावणी इसी दायित्व बोध को अनुभव करने, उसे सही ढंग से निभाने के लिए संकल्पित होने का पर्व है।

श्रावणी पर्व को व्यवस्था पूर्ण रीति से मनाने के लिए आवश्यक कर्मकाण्ड के मुख्य बिन्दु निम्न है- 1. षट्कर्म, 2. तीर्थ आवाहन, 3. हेमाद्रि संकल्प, 4. दस स्नान, 5. यज्ञोपवीत नवीनीकरण, 6. तर्पण एवं 7. अर्घ्यदान नमस्कार। कर्मकाण्ड की इन सारी रीतियों को शान्तिकुञ्ज द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘कर्मकाण्ड भास्मर’ को पढ़कर जाना-सीखा और पूरा किया जा सकता है। अपने परिजनों द्वारा ऐसा किया भी जाना चाहिए। लेकिन इसी के साथ उस तत्व को जानने, उसका चिन्तन करने की आवश्यकता है, जो इस समस्त कर्मकाण्ड प्रकरण का सार है। जिसे समझे बिना श्रावणी पर्व की यथार्थ अनुभूति नहीं हो सकती है।

यह तत्व बोध उस महत् संकल्प के बारे में है, जो समस्त सृष्टि का आधार है। ब्रह्म संकल्प से सृष्टि जन्मी इस सत्य से सभी परिचित हैं। लेकिन जन्म किसी वस्तु का हो या व्यक्ति का या फिर स्वयं सृष्टि का उसके रक्षण और पोषण की व्यवस्था भी आवश्यक

है। ब्रह्म संकल्प से प्रकट हुई इस सृष्टि के रक्षण एवं पोषण में जो ब्रह्म के सहयोगी बनते हैं, उन्हें ही ब्राह्मण कहा जाता है। श्रावणी इसी ब्राह्मणत्व के लिए संकल्पित होने का महापर्व है। इसी की उच्चस्तरीय कक्षा ऋषित्व है। ऋषि अंतर्दृष्टि सम्पन्न वह व्यक्ति है, जो परमेश्वर के संकेतों को अपनी परिष्कृत अन्तर्चेतना में अनुभव करता है और तदनुरूप जीवन जीने के लिए निरत होता है।

श्रावणी पर्व पर किया जाने वाला हेमाद्रि संकल्प इसी ब्राह्मणत्व एवं ऋषित्व के सम्वर्धन एवं अभिवर्धन के लिए है। इसमें आन्तरिक एवं बाह्य सम्पूर्ण प्रकृति को प्रदूषण मुक्त करने का उद्घोष है। अपना अन्तःकरण यदि प्रदूषण से मुक्त हो तो ही व्यक्ति पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने में सहायक हो पाता है। अन्तःकरण एवं पर्यावरण दोनों ही गहराइयों में एक-दूसरे से जुड़े हैं। एक का प्रभाव दूसरे पर पड़े बिना नहीं रहता। बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण का कारण यही है कि इन दिनों व्यक्तियों के अन्तःकरण बुरी तरह से प्रदूषित हुए हैं। इन दोनों को ही प्रदूषण से मुक्त करने की प्रतिबद्धता ही हेमाद्रि संकल्प का यथार्थ है।

श्रावणी पर्व को मनाने की आदर्श रीति यही है कि पर्व के पुण्य क्षणों में कर्मकाण्ड के सारे विधान पूरा करते हुए, अपने अन्तःभूमि में कम से कम किसी एक सद्गुण का बिरवा रोपें। इसी के साथ प्रकृति के आँगन में कम से कम एक वृक्ष-पादप रोपित करें। साथ ही इन्हें पूरे वर्ष आवश्यक रक्षण-पोषण देने का संकल्प करें। इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए किए जाने वाले सतत प्रयास से अन्तःकरण और पर्यावरण दोनों ही प्रदूषण मुक्त होने लगेंगे। जीवन और प्रकृति में सुगन्ध फैलने लगेगी। श्रावणी पर किए गए इस हेमाद्रि संकल्प की महिमा स्वयं ही प्रकाशित हो उठेगी। ब्रह्म संकल्प के सहयोगी बनने के फलस्वरूप जीवन में अपने-आप ही ब्राह्मणत्व एवं ऋषित्व के वरदानों की छटा निखरेगी। सृष्टि के जन्मोत्सव की खुशियाँ अपने घर-आँगन में भी आएँगी।


गायत्री उपासना के मूल में निहित वैज्ञानिक सत्य

मंत्र विज्ञान ध्वनि विज्ञान पर आधारित एक विधा है। हमारे पूर्वज ऋषि इसके उद्भट जाता थे। उन्होंने ध्वनि तरंगों की विशिष्टता और महत्ता को पहचाना था। उस आधार पर उन्हें विशेष सम्मान और स्थान दिया। गायत्री मंत्र का महामंत्र संबोधन इसी तथ्य को उजागर करता है और बताता है कि आरोग्यशास्त्र की दृष्टि से यह कितना अप्रतिम और अद्भुत है।

सर्वप्रथम ‘गायत्री’ शब्द के अर्थ पर विचार करें। ऋषियों ने इसे ‘गायन्त त्रायते इति गायत्री’ कहकर परिभाषित किया है अर्थात् जो गाने वाले का त्राण करे, वह ‘गायत्री’ है। पिछले दिनों तक इसे एक शास्त्रीय मान्यता भर माना जाता था और आप्तवचन से अधिक कुछ नहीं स्वीकारा जाता था। अब जबकि गायत्री मंत्र पर अध्ययन-अनुसंधान हो रहे हैं, तब विदित हुआ है कि उक्त परिभाषा में सूत्रकार की कितनी अंतर्दृष्टि सम्मिलित है। वास्तव में यह सूत्र ‘गायत्री’ की शाब्दिक व्याख्या भर ही नहीं है, अपितु उसमें एक ऐसा वैज्ञानिक सत्य छिपा हुआ है, जो दिव्य सृष्टि संपन्न ऋषि से अविज्ञात न रह सका और उसे ज्यों का त्यों शब्दों में अभिव्यक्त कर दिया कि इसे जपने वाले का यह त्राण करती है, किंतु यह त्राण किसी प्रकार से होता है, बुद्धिवादियों के लिए यह रहस्य ही बना रहा। ऐसे ही ‘गायत्री कामधेनु है’, ‘गायत्री कल्पवृक्ष है’, ‘गायत्री पारसमणि है’ आदि कितनी ही धार्मिक धारणाएँ इस संबंध में प्रचलित हैं, पर उनका कोई वैज्ञानिक आधार स्पष्ट न होने से बौद्धिक लोग उन्हें तथ्य के रूप में अंगीकार करने में संकोच अनुभव करते रहे। अब जबकि ध्वनि विज्ञान के आधार पर गायत्री मंत्र का विश्लेषण हो चुका है, तब पता चला है कि उसमें शब्दों और अक्षरों का क्रम विन्यास कुछ इस प्रकार का है कि जब उसका उच्चारण किया जाता है, तो उससे ऐसी तरंगें निःसृत होती हैं, जो संपूर्ण शरीरतंत्र पर अनुकूल प्रभाव डालती हैं। इस तथ्य के प्रकाश में जब गायत्री विषयक मान्यताओं पर मनन किया गया, तो सभी बुद्धिसंगत प्रतीत हुई। वह गाने वाले का त्राण उसे समग्र रूप से स्वस्थ बनाकर करती है।

कामधेनु के संबंध में यह प्रचलित है कि उसके समक्ष कोई भी कामना अधूरी नहीं रहती। गायत्री कामधेनु कैसे है? इस पर विचार करने से ज्ञात होता है कि गायत्री मंत्र के जप से जब व्यक्ति हर प्रकार से स्वस्थ-नीरोग बनता है, तो निश्चय ही धनोपार्जन के संबंध में उसकी स्थिति सर्वसाधारण से अच्छी होगी। वह औरों की तुलना में धन-संग्रह में कहीं अधिक समर्थता और सशक्तता का परिचय देगा। धनी व्यक्ति के लिए इस संसार में कुछ भी प्राप्त कर सकना असंभव नहीं, कारण कि वैभव भौतिक जगत् का सर्वोपरि बल है। इससे व्यक्ति अपनी समस्त आकाँक्षाओं को पूरा कर सकता है, इसलिए गायत्री को यदि कामधेनु कहा गया है, तो भौतिक दृष्टि से यह किसी भी प्रकार असंगत नहीं है। ‘गायत्री कल्पवृक्ष है’, ‘गायत्री पारसमणि है’ इन सभी को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

गायत्री संबंधी भौतिक चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अब यह देखते हैं कि पिछले दिनों उस पर जो शोध-अनुसंधान हुए हैं, उनसे उसकी ‘गायन्तं त्रायते’ संबंधी मान्यता की कितनी पुष्टि होती है। इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य ‘जबलपुर हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर’ में हृदय रोग विभाग के प्रमुख एवं मूर्द्धन्य हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ.आर.एस. शर्मा ने किया है। एक हृदय रोग विशेषज्ञ होने के नाते डॉ.शर्मा ने अध्ययन के लिए सर्वप्रथम हृदय रोग और उससे संबंधित उच्च रक्तचाप को चुना और उसमें औषधि सेवन के साथ-साथ गायत्री मंत्र जप को भी अनिवार्य बना दिया। कई रोगियों पर अनेक महीनों तक परीक्षण करने के उपराँत जो नतीजे सामने आए, वह काफी उत्साहवर्द्धक थे। पाया गया कि जिन रोगियों ने दवा और मंत्रजप दोनों को साथ-साथ अपनाया था, उनके और केवल दवा पर आश्रित रोगियों के स्वास्थ्य में भारी फर्क था। मंत्रजप को औषधि के साथ अनुपूरक चिकित्सा के रूप में अपनाने वाले मरीज शरीर, चेहरे और सक्रियता की दृष्टि से बिलकुल सामान्य प्रतीत हो रहे थे, जबकि केवल दवा पर निर्भर रोगियों के मुखमंडल निस्तेज ओर थके हुए मालूम पड़े और बीच-बीच में अन्य रोग भी उभरते रहे।

इन परिणामों से डॉ.शर्मा काफी उत्साहित हुए और उन्होंने गायत्री मंत्र का हृदय रोग और रक्तचाप पर पड़ने वाले प्रभावों का साँगोपाँग अध्ययन करने को सोचा। उसके लिए उन्होंने दो भिन्न-भिन्न आचार-विचार वाले लोगों का चयन किया। एक दल में ऐसे व्यक्ति रखे गए, जो आध्यात्मिक प्रकृति के थे एवं जो नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करते थे। दूसरे ग्रुप में उन लोगों को सम्मिलित किया गया, जिनकी जीवन शैली एवं चिंतन एकदम भौतिक था। वे न तो गायत्री मंत्र का जप करते थे, न जीवन में कभी किसी अन्य मंत्र की उपासना की थी। दोनों का एज-ग्रुप 25-35 वर्ष के बीच रखा गया। दोनों ग्रुपों के सभी लोगों की स्वास्थ्य-परीक्षा कर यह सुनिश्चित कर लिया गया कि वे पूर्णतः स्वस्थ है। उनमें से किसी को भी न रक्तचाप संबंधी रोग था, न हृदय संबंधी। आध्यात्मिक ग्रुप के लोगों को यह सलाह दी गई कि वे अपना जीवनक्रम हर स्थिति में आध्यात्मिक बनाए रखें और गायत्री मंत्र का जप नियमित रूप से प्रतिदिन करते रहें। जप अनुबंध कर्म-से-कम पाँच माला का रखा गया। कंट्रोल ग्रुप पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं था। अध्ययन तीन वर्ष तक चला। इस बीच दोनों ग्रुपों के लोगों का नियमित स्वास्थ्य-परीक्षण होता रहा। तीन वर्ष उपराँत जो परिणाम सामने आया, वह चौंकाने वाला था। गायत्री मंत्र का नियमित जप करने और आध्यात्मिक जीवन शैली अपनाने वाले दल के लोगों में हृदय अथवा रक्तचाप संबंधी किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं पाई गई, जबकि कंट्रोल ग्रुप में से अनेकों में इनके लक्षण उभर आए थे। आध्यात्मिक ग्रुप शाकाहारी था, जबकि कंट्रोल ग्रुप को आमिष-सामिष दोनों प्रकार के भोजन की छूट थी।

इसके अतिरिक्त डॉ.शर्मा ने उन हृदय रोगियों पर भी गायत्री मँत्र को आजमाया, जिनकी हृदय-गति या तो तीव्र थी या अनियमित। उन्होंने ऐसे बीमारों से सामान्य जाग्रत् अवस्था के 16 घंटों में से हर दो घंटे पर गायत्री मंत्र की एक माला जपने को कहा। एक माह तक यह प्रक्रिया चलाने के बाद मंत्र-जप को 24 घंटे में चार बार कर दिया गया। इसमें प्रातः सोकर उठने के बाद, रात्रि में सोने से पूर्व और बीच के दिन वाले हिस्से में दो बार, इस प्रकार का क्रम अपनाया गया। दूसरे महीने में जप-संख्या बढ़ाकर तीन माला कर दी गई। इसके बाद इसी प्रक्रिया को आगे के महीनों में जारी रखा गया। इससे कुछ ही महीनों में हृदय गति सामान्य होती देखी गई। प्रयोग में गायत्री मंत्र के ‘ऊँ’ वाले हिस्से के प्लुत उच्चारण (लंबा खींचकर) पर जोर दिया गया, साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा गया कि बीमार की हृदय-गति 50 से और रक्तचाप 90-60 से कम न हो।

इससे हृदय-गति एवं उसकी दूसरी अनियमितताएँ सामान्य कैसे होती है? इस संबंध में उनका कहना है कि उक्त मंत्र के शब्द विन्यास में ही चमत्कार है। उन शब्दों के क्रमिक रूप से बोलने या उच्चारण करने से कुछ असाधारण स्तर की ध्वनि तरंगें पैदा होती हैं, जो आटोनोमस नर्वस सिस्टम के सिंपैथेटिक वाले भाग को प्रभावित करना आरंभ करती है। तंत्रिका तंत्र के उस हिस्से के सक्रिय होते ही हृदय-गति एवं रक्तचाप सामान्य होने लगते हैं और रोगी स्वस्थ अनुभव करने लगता है।

अपने इन अध्ययनों के आश्चर्यजनक परिणामों को देखते हुए डॉ.शर्मा ने इनकी एक विस्तृत रिपोर्ट अखिल भारतीय भेषज विज्ञान विशेषज्ञ के सम्मेलन में भेजी, जो उन दिनों गुवाहाटी में संपन्न होने जा रहा था। शोध-पत्र स्वीकार कर लिया गया, जिसे बाद में ‘जरनल ऑफ एसोसिएशन ऑफ फिजीशियन्स’ नामक भेषज विज्ञान शोध-पत्रिका में प्रकाशित किया गया। सम्मेलन में शोधपत्र की काफी प्रशंसा हुई तथा गायत्री मंत्र को अन्य रोगों में भी आजमाने की अनुशंसा की गई।

गायत्री मंत्र एक वैदिक मंत्र होने के नाते उसके जप में संपूर्ण बाह्य शुचिता का विधान है, पर जो रोगग्रस्त हैं, उनके लिए इसमें इतनी भर छूट है कि वे चलते-फिरते, उठते-बैठते एवं लेटे हुए कहीं और किसी भी स्वच्छ-अस्वच्छ स्थिति में इसका मौन-मानसिक जप कर सकते हैं।

उनको गायत्री मंत्र से रोग-निवारण की प्रेरणा कब और कैसे मिल? इस संदर्भ में वे कहते हैं कि अपने लंबे चिकित्सीय जीवन में उनने अनेक युवा हृदय रोगियों का इलाज किया। इस क्रम में उनने देखा कि कई बार ऐसे रोगियों के साथ उनके माता-पिता अथवा दूसरे बड़ी उम्र के संबंधी होते। वे इतनी आयु में भी बिलकुल स्वस्थ दिखलाई पड़ते। उन्हें जिज्ञासा हुई कि आखिर पुत्र इस अल्पवय में ऐसी प्राणघातक व्याधि का शिकार कैसे हो गया, जबकि माता-पिता इस ढलती आयु में भी तंदुरुस्त बने हुए हैं? जिज्ञासा ने चर्चा का रूप लिया, तो कुछ ऐसी जानकारियाँ मिलीं, जो उनके जीवनक्रम में अभिन्न रूप से सम्मिलित थीं। वे शाकाहारी थे। इसके अतिरिक्त ब्रह्ममुहूर्त में उठना और संध्योपासना करना उनकी नियमित दिनचर्या थी। उपासना में वे गायत्री मंत्र का जप और अनुष्ठान करते और यदा-कदा गायत्री यज्ञों में भाग लेते।

वे कहते हैं कि गायत्री के संबंध में थोड़ी-बहुत जानकारी उन्हें भी थी। उनने सुन रखा कि गायत्री ब्राह्मणों अर्थात् सात्विक चिंतन वालों की कामधेनु है। इसके अतिरिक्त अथर्ववेद में कहा गया है, ‘ऊँ स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ताँ पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणं प्रजाँ पशुँ कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्। मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्।’ गायत्री मंत्र की फलश्रुति विषयक यह श्लोक भी उनका ध्यान खींच रहा था।

इन सब तथ्यों पर गहन विचार-मंथन के उपराँत उनने निर्णय लिया कि गायत्री मंत्र का स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर अध्ययन किया जाए। इस निश्चय के बाद उनने अपने ही रोगियों पर उक्त अध्ययन करना शुरू किया और जो परिणाम सामने आया, वह ऊपर वर्णित है। उनके कथानुसार इस प्रक्रिया द्वारा वे सैकड़ों हृदय रोगियों को स्वस्थ कर चुके हैं और अनेक ऐसे हैं, जो ठीक होने की स्थिति में आ गए हैं।

उनका कहना है कि चिकित्सा की इस विधा को दूसरे रोगों में भी अपनाकर उन क्षेत्रों में के भेषज विशेषज्ञों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि क्या उनमें भी गायत्री मंत्र का वैसा ही प्रभावकारी असर होता है अथवा नहीं? वे इस संबंध में अपना निजी मत व्यक्त करते हुए कहते हैं कि संभव है वहाँ भी यह चिकित्सा सफल साबित हो। इस सोच के पीछे उनकी अपनी धारणा है। वे कहते हैं कि यह संपूर्ण जगत् दोलायमान है। यहाँ की हर वस्तु कंपन कर ही है। अपना शरीर भी उससे पृथक् नहीं। वह भी तरंगित हो रहा है और उसके हर अवयव की इसमें हिस्सेदारी है। सभी अपने-अपने ढंग से अपनी-अपनी गति में सूक्ष्म रूप से प्रकंपित है। उनके इस कंपन में जब कभी व्यवधान या व्यतिक्रम उपस्थित होता है, तो वह अपनी स्वाभाविक अवस्था खो देते हैं और एक असहज दशा में आ जाते हैं यह असहज स्थिति ही व्याधि का कारण बनती और बाद में स्थूल रूप में प्रकट होकर व्यक्ति को बीमार बनाती है।

ऐसा आदमी जब गायत्री मंत्र का जप करता है, तो मंत्र जप से उद्भूत तरंगें रोगग्रस्त अंग की अव्यवस्थित तरंगों को पुनर्व्यवस्थित करती हैं। इस प्रकार कुछ काल की गायत्री उपासना के पश्चात् जब बीमार अवयव अपना स्वाभाविक स्पंदन प्राप्त कर लेता है तो वह स्वस्थ हो जाता है और व्यक्ति नीरोग। इसलिए डॉ.शर्मा का विश्वास है कि गायत्री-चिकित्सा की यह विधि हर रोग और हर परंपरा के लोगों के लिए सफल एवं कारगर सिद्ध होनी चाहिए, क्योंकि यह तरंग प्रधान चिकित्सा भी है। यदि साथ में आस्था और जुड़ जाए, तब तो यह सोने में सुहागे की तरह असर दिखाता है, किंतु न जुड़ने पर भी यह निष्फल नहीं जाता और धीरे ही सही, स्वास्थ्य-लाभ संबंधी प्रयोजन पूरा करके रहता है। इस तरह ‘गायन्त त्रायते’ संबंधी इसकी शास्त्रीय मान्यता सिद्ध हो जाती है।

ध्वनि तरंगों में कितनी शक्ति है, अब यह कोई छिपा तथ्य नहीं। इन्फ्रासोनिक और अल्ट्रासोनिक तरंगों के रूप में विज्ञान इनकी शक्ति को जानता है। मंत्र शास्त्र में इनका चिकित्सीय उपयोग हुआ है। गायत्री मंत्र इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। हममें से प्रत्येक को इस मंत्र की उपासना अवश्य करनी चाहिए। इससे एक साथ तीन लाभ प्राप्त होंगे-स्वास्थ्य, समृद्धि और आत्मिक प्रगति, ऐसा गायत्री महाविद्या के आचार्यों का कथन है।


तीर्थयात्रा का उद्देश्य देवदर्शन नहीं (Kahani)

श्रवणकुमार के माता-पिता अंधे थे, पर उनकी इच्छा तीर्थयात्रा की थी। श्रवणकुमार ने आश्चर्य से पूछा, जब आप लोगों को दिखता ही नहीं तो आप देवदर्शन कैसे कर सकेंगे? तो ऐसी यात्रा से क्या लाभ? पिता ने कहा, तात् तीर्थयात्रा का उद्देश्य देवदर्शन ही नहीं, वरन् विप्रजनों का घर-घर गाँव-गाँव जाकर जनसंपर्क साधना और धर्मोपदेश करना है। यह कार्य हम लोग बिना नेत्रों के भी कर सकते हैं। इससे इन दिनों जो निरर्थक समय बीतता है, उसकी सार्थकता बन पड़ेगी।


आत्मचिंतन का महापर्व : स्वाधीनता दिवस

15 अगस्त फिर से एक बार राष्ट्रीय जीवन में स्वाधीनता का उल्लास बिखेर रहा है। ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ का गौरव गान करते हुए जन-गण-मन हर्षित है। लेकिन इस हर्ष में, उल्लास के उजाले में अभी कुछ कोर-कसर है। सन् 1947 से लेकर वर्ष 2002 तक हमने स्वराज्य के पचपन वर्ष लिए हैं, फिर भी हम सब मिलकर इसे पूर्णता नहीं दे सके। वही पूर्णता जिसके बारे में राष्ट्रीय स्वाधीनता के मंत्रद्रष्ट ऋषि श्री अरविन्द ने कहा था- ‘पूर्ण स्वराज्य का विचार राष्ट्रीय जनमानस के लिए आकर्षक है। यदि पाश्चात्य भौतिकवाद के स्थूल रंग से मुक्त और शुद्ध भारतीय भावनाओं से परिपूर्ण मन से इस विचार को लोकमानस के समक्ष प्रस्तुत किया जाय तो उसका प्रभाव अजेय होगा।

...भारत का काम संसार को प्रकाश और नव जीवन का अनन्त स्रोत देना है। जब-जब आदि तेज का ह्रास होता है और पृथ्वी जराग्रस्त और क्षीण होती है। भौतिकवाद और समाधानहीन समस्याओं से त्रस्त हो जाती है, तब-तब भारत का काम होता है, मानव जाति में यौवन का पुनः संचार और उसे अमरत्व का दान.... संसार को भारत की आवश्यकता है- स्वाधीन भारत की। अब उसे वेदान्त के सिद्धान्तों के अनुरूप जीवन को ढालना है। और विदेशी शक्ति और विदेशी सभ्यता के साए से आक्रान्त रहते हुए वह इसे कर नहीं सकता। जब तक अपने जीवन की व्यवस्था उसके अपने हाथ में न हो, तब तक वह ऐसा नहीं कर सकता। उसे अपना जीवन स्वयं जीना चाहिए, किसी विदेशी साम्राज्य के जीवन का अंग बनकर या आधीन रहकर शासित जीवन जीकर नहीं।’

3 मई 1908 के ‘वन्दे मातरम्’ के साप्ताहिक संस्करण के सम्पादकीय में महर्षि अरविन्द ने स्वतन्त्र भारत के उद्देश्य की कल्पना इन शब्दों में व्यक्त की थी। 15 अगस्त सन् 2002 में राष्ट्रीय स्वाधीनता के महापर्व पर जबकि इन विचारों को प्रकट किए हुए लगभग 95 वर्ष बीत रहे हैं, इनमें व्यक्त की गई सम्भावनाएँ आज भी सामयिक और प्रासंगिक है। श्री अरविन्द के शब्द आज भी भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य, उसकी पूर्णता का स्मरण कराते हैं। यह महाप्रश्न देशवासियों से है, हमसे-आपसे और हममें से प्रत्येक से है कि क्या स्वाधीन भारत इस दिशा में कहीं आगे बढ़ा? जो राष्ट्रीय आकाँक्षा स्वाधीनता के महासाधक ऋषि अरविन्द के इन माँत्रिक पंक्तियों में अभिव्यक्त होती है, क्या उसकी पूर्ति के लिए कहीं प्रयत्न होता दिखाई देता है? श्री अरविन्द ने राष्ट्र जीवन की जिस व्यवस्था की चर्चा की है वह तो आज भी भारत के हाथ में नहीं है। उन्होंने संसार के लिए जिस भारत की आवश्यकता की ओर इंगित किया है, वह आज भी विदेशी सभ्यता से बुरी तरह से आक्रान्त है।

जिस समय उन्होंने ये बातें कहीं थी- उस समय फिर भी भारत देश में एक साँस्कृतिक प्रवाह सुस्पष्ट था। लेकिन आज तो आर्थिक उदारीकरण का हमला झेल रहे देश में सर्वत्र साँस्कृतिक बंजरपन ही बढ़ता दिखाई देता है। 15 अगस्त हमारी स्वतन्त्रता की जयन्ती है, तो यह शुभ दिवस महायोगी श्री अरविन्द का जन्मदिन भी है। यह शुभ संयोग दैवी योजना से घटित हुआ है। इसका कारण शायद यही है कि जब-जब हम राष्ट्रीय स्वतंत्रता का पर्व मनाए, तब-तब स्वाधीनता की साधना के महासाधक ऋषि अरविन्द के विचारों के परिप्रेक्ष्य में आत्मलोचन एवं आत्ममंथन भी करें। समस्याओं को परखें और उनके निवारण के उपाय ढूंढ़ें।

आज देश की परिस्थितियाँ चिन्ता और निराशा के कुहासे से घिरी है। राजनीतिज्ञों के चरित्र देश के भविष्य के प्रति भयास्पद सन्देह अंकुरित करना है। सभातन्त्र का भटकाव देशवासियों को राष्ट्रीय जीवन के प्रति हताश करता है। हम स्वतन्त्र भारत में लोकतन्त्र और लोक जीवन को जिस दिशा में ले गए वह किसी भी तरह से हमारे लिए ठीक नहीं था। जो राह हमने चुनी, वह हमारी राष्ट्रीय प्रकृति से मेल नहीं खाती। भारत की आत्मशक्ति के केन्द्र को समझे बिना, भारत देश के आत्मतत्व का साक्षात्कार किए बिना राजनीतिज्ञों ने, सभा पर आधिपत्य जमाने वालों ने सारे राष्ट्र को जिस ओर हाँक दिया है, वह विनाश, ह्रास, टूटन और पराजय की ओर ले जाने वाला पथ है। भारत की राष्ट्रीय भावनाओं में आध्यात्मिकता का अनुभव करने की जगह पश्चिम की चाकरी करने वाली बुद्धि एवं विचार की वजह से भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। भारत की राष्ट्रीयता को भौतिक राष्ट्रवाद बनाने की जो गलती हो रही है, उससे समूचा देश एक भयावह बियावान में भटकने लगा है। ठीक भी है जब भारत को मात्र भौतिक जड़ पदार्थों का समुच्चय मानेंगे, तो उसमें सनातन दिव्यत्व के दर्शन कैसे कर पाएँगे? भारत देश की समस्याओं का समाधान पाने के प्रयास जब पश्चिम से आयातित बुद्धिवाद से संक्रमित होंगे, तो भला इनका भारत की प्रकृति से किस तरह मेल हो पाएगा?

स्वतन्त्रता के बाद देश कैसा होगा? इस प्रश्न का जो उत्तर श्री अरविन्द ने प्रस्तुत किया था, उसमें एक दिव्य संस्पर्श था। उन्होंने जिस भावी भव्य भारत का चित्र रेखाँकित किया था, वह आध्यात्मिक था। उन्होंने स्वतंत्रता को ईश्वरीय योजना के क्रियान्वयन का महत्वपूर्ण उपकरण माना था। अपने एक सन्देश में उन्होंने कहा था- ‘स्वराज्य औपनिवेशिक प्रशासन या शासन का कोई अन्य रूप नहीं है। यह तो हमारे राष्ट्रीय जीवन की सिद्धि है। हम उसी की खोज में लगे हैं। ईश्वर ने हमें संसार में इसलिए भेजा है कि हम अपने वैयक्तिक जीवन में, परिवार में, समाज में, राष्ट्र में और मानव जाति में अपने निर्धारित काम करके भगवान् के प्रति खरे साबित हो सकें। इसी के लिए उसने हमें संसार में भेजा है। यही हमारा अभीष्ट है। क्योंकि पूर्णता ही जीवन है और उसका अभाव ही मृत्यु।’

लेकिन आज विश्व परिदृश्य में भारत की स्थिति देखकर यह कोई कैसे माने कि भारत को ईश्वर के प्रति खरा उतरने के लिए कुछ विशेष कार्यों को पूर्ण करना है। श्री अरविन्द ने जीवन की जिस पूर्णता को उपलब्ध किया, वह भला आज किस तरह हमारे पास आए? क्योंकि हमारे सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन को तो चारों ओर चरित्रहीनता, अनैतिकता एवं मूल्यों का घोर संकट घेरे है। जब राजनीतिज्ञों की राष्ट्र के प्रति प्रामाणिकता ही सन्देह के घेरे में हो, जब देश का संचालन करने वाली नीतियाँ क्षुद्र स्वार्थ और अदूरदृष्टि से ग्रस्त हों तो स्वतंत्रता दिवस के उल्लास में पूर्णता आए भी तो कहाँ से? देश का आम आदमी अपने लिए आदर्श ढूंढ़ता है, जिसका वह अनुकरण कर सके। वह देश में चल रही विभिन्न धाराओं और अन्यान्य आन्दोलनों से मार्गदर्शन खोजता है।

परन्तु कालप्रश्न यह है कि मात्र भौतिक विचारों वाली, राष्ट्र की स्थूल संकल्पना को लेकर चलने वाली धाराएँ सच्चे भारत का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकती है? भारत एक आध्यात्मिक राष्ट्र है। यहाँ के राष्ट्रीय जीवन की समस्याओं का समाधान, भावी चुनौतियों का उत्तर आध्यात्मिक आन्दोलनों से ही निकलेगा। आध्यात्मिक जागरण भारत में राष्ट्रीय जागरण की पहली और अनिवार्य शर्त है। भारतीय समाज का सामूहिक मन आध्यात्मिकता में ही रचता-बसता है। स्वतन्त्रता संग्राम के संघर्ष में जूझने-मरने वाले अनेक क्रान्तिकारियों और सत्याग्रहियों की प्रेरणा अध्यात्म ही था। लोकमान्य तिलक का जेल में बैठकर भगवद्गीता का भाष्य करना, खुदीराम बोस का भगवद्गीता को लेकर फाँसी के फंदे पर झूलना, युगऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा का जेल की कोठरी में बैठकर जप-ध्यान करना आध्यात्मिक जीवन न होकर और क्या है? श्री अरविन्द ने स्वयं भी पूर्ण स्वातन्त्र्य और स्वराज्य का वर्णन करते हुए स्वतंत्रता संग्राम को एक आध्यात्मिक सोपान पर अधिष्ठित किया है।

आज भारत की वर्तमान परिस्थिति को देखकर अर्जुन की तरह भ्रम-भय और मोह का व्यापना सहज है। अपनों के विरुद्ध ही एक निर्णायक संग्राम लड़ना हमारी परिस्थिति की नियति है। ऐसी परिस्थिति में भारत के भविष्य के लिए वही लड़ सकते हैं, जो अर्जुन की तरह से अपने मोह को नष्ट करके, अपने सम्पूर्ण कर्मों से अहम् को निकालकर उन्हें ईश्वर को ही अर्पित करते हुए समराँगण में उतरेंगे। शान्तिकुञ्ज ऋषि अरविन्द के इन्हीं उद्देश्यों के प्रति संकल्पित-समर्पित आध्यात्मिक राष्ट्रीय जागरण का दैदीप्यमान केन्द्र है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ने इसे राष्ट्र के आध्यात्मिक जागरण हेतु ही अपने प्रचण्ड तप से ऊर्जावान बनाया है।

राष्ट्र को अलौकिक दिव्यता तक ले जाने वाला यह जागरण जिस राष्ट्रवाद को, राष्ट्रीयता के जिस प्रवाह को प्रवाहित कर रहा है, उनमें अहंकार और उन्माद का कोई स्थान नहीं है। कट्टरता, संकीर्णता, घृणा के तत्व इससे पूरी तरह से बहिष्कृत कर दिए गए हैं। यह तो विश्वगुरु भारत की प्रतिष्ठ और उसकी सनातन प्रकृति और प्रवृत्ति अनुसार उदात्त, भव्य, दिव्य मानवतावादी, प्रेम से ओत-प्रोत और सर्वकल्याण इस सत्य का उद्घोष है कि भारत नारों और प्रस्तावों से अखण्ड नहीं होगा। भारत की अखण्डता राजनीतिक घोषणाओं और प्रदर्शनों से नहीं होगी। यह तो आध्यात्मिकता के भाव प्रवाह से ही सम्भव है। ऋषियों की संस्कृति साधना की डगर पर चल कर ही राष्ट्र की अखण्डता एवं एकता अक्षुण्ण रह सकती है।

राष्ट्रीय अखण्डता एवं एकता के साथ विभाजित होने का दर्द भी है। 15 अगस्त को मिली स्वाधीनता के साथ भारत ने यह असह्य पीड़ा भी झेली थी। नियति और ईश्वरीय संकल्प इस विभाजन को एक दिन अवश्य मिटाएँगे। श्री अरविन्द ने 15 अगस्त 1947 को दिए गए अपने सन्देश में विभाजन के बारे में स्पष्ट कहा था, इस तय किए गए विभाजन को पत्थर की लकीर नहीं मान लिया जाएगा..... क्योंकि यदि वह बना रहे तो भारत भयानक रूप से दुर्बल हो सकता है। उसमें गृह कलह की सम्भावना सदा ही सम्भव बनी रह सकती है। भारत की आन्तरिक उन्नति एवं समृद्धि रुक सकती है.....। यह नहीं होना चाहिए। देश का विभाजन दूर होना चाहिए। महायोगी श्री अरविन्द के जन्मोत्सव और राष्ट्रीय स्वाधीनता के प्रकाश पर्व पर देशवासियों को यह सन्देश ग्रहण करना चाहिए। हमारी मातृभूमि को इसी सन्देश की आवश्यकता है।

आज जबकि पश्चिमी देश अपनी भौतिक शक्ति के बल पर पुनः विविध प्रावधानों से गुलामी की डगर पर घसीटने में जुटें हैं, तब ऐसे में भारत को अपने आध्यात्मिक बल में अभिवृद्धि करनी चाहिए। भारत देश में पूरे वेग से आध्यात्मिक राष्ट्र जागरण का महान् कार्य होना चाहिए। इस जागरण की कल्पना करते हुए श्री अरविन्द ने भारत के जागरण को महिषासुर मर्दिनी के अवतरण से जोड़ा था। मातृभूमि के रूप में भारत में अलौकिकता के दर्शन को श्री अरविन्द ने अपनी भावपूर्ण रचना ‘भवानी मन्दिर’ में शब्दबद्ध करते हुए लिखा है- ‘हमारी मातृभूमि क्या है? वह एक भूमि का टुकड़ा ही तो नहीं है, न वाणी का एक अलंकार है और न मस्तिष्क की कल्पना की एक उड़ान मात्र है।’

‘वह एक महान् शक्ति है, जिसका निर्माण उन करोड़ों एककों की शक्तियों को मिलाकर हुआ है, जो राष्ट्र का निर्माण करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे सारे करोड़ों-देवताओं की शक्ति को एकत्र कर एक बल राशि संचित की गयी और उस परस्पर जोड़ पर एकता स्थापित की गयी। जिसमें से भवानी महिषासुर मर्दिनी प्रकट हुई। वह शक्ति जिसे हम भारतीय भवानी भारतमाता कहकर पुकारते हैं। करोड़ों लोगों की शक्तियों की जीती जागती एकता है।’ 15 अगस्त के स्वाधीनता पर्व पर स्वाधीनता के मंत्रद्रष्टा ऋषि श्री अरविन्द की इसी संकल्पना को साकार करने की आवश्यकता है। तभी भारत माता का सनातन सौंदर्य प्रकट होगा।


वेद की अनधिकारिणी

महर्षि अत्रि के वंश में उत्पन्न विदुषी विश्ववारा ने योगाभ्यास और विशाल अध्ययन के बल पर ब्रह्मवादिनी पद पाया। अपने ऋग्वेद के कितने ही अनुच्छेदों की गहन विवेचना की और उन लोगों का मुँह बंद कर दिया, जो स्त्रियों को वेद की अनधिकारिणी मानते हैं।


मानस का मर्म

श्रावण शुक्ल पक्ष की सप्तमी (14 अगस्त) गोस्वामी तुलसीदास की जन्मतिथि है। रामचरित मानस के ऋषि तुलसीदास इसी पवित्र दिन अपनी माता हुलसी की कोख से प्रकट हुए थे। उनका जन्म, जीवन एवं साधना सभी दिव्य थे। उनकी जीवन-साधना का सुफल रामचरित मानस तो दिव्यतम है ही। इस सत्य के तत्व से अपरिचित जन यदा-कदा उनके ऋषि जीवन और ऋषि कर्म में कमियाँ ढूंढ़ने की कोशिश करते रहते हैं, ऐसे लोगों के लिए महाकवि ने कहा है- ‘वचन वज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥’ इन्हें कठोर वचन रूपी वज्र सदा प्यारा लगता है। और ये हजार आँखों से दूसरों के दोषों को देखते हैं। लेकिन यथार्थ में ये कमियाँ उनकी अपनी कमियाँ होती हैं। जो उनके अज्ञान को, उनकी बुद्धि की क्षुद्रता को प्रकट करती हैं। हालाँकि गोस्वामी जी ने ऐसे लोगों की भी सच्चे भाव से वन्दना की है। वह कहते हैं- ‘बहुरि बन्दि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएं॥’ अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ। जो बिना ही कारण अपना हित करने वालों के भी प्रतिकूल आचरण करते हैं।

अपनी निन्दा करने वालों को भी नमन, वन्दन करने वाले, कष्ट सहिष्णु परम भक्त तुलसी ने अपनी भाव समाधि में रामचरित के सत्य का साक्षात्कार किया। अपने मानस में रामचरित के काव्य सरोवर की अनुभूति की। फिर इस मानसरोवर को लोकहित के लिए महाकाव्य के रूप में प्रकट किया। इसमें व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के सभी सूत्र एवं सत्य हैं। इन्हें अपना कर हर युग के लोग अपने युग प्रश्नों का समाधान पा सकते हैं। रामचरित मानस में शाश्वत सत्य सामयिक रूपों में प्रकट होता है। बस पहचानने के लिए विवेक चाहिए। ऐसे विवेकवानों के लिए तुलसी की प्रत्येक काव्य पंक्ति का महामंत्र जैसा महत्व है। वे इसकी साधना से अपने जीवन की सफलता और सार्थकता सिद्ध करते रहते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित के मानसरोवर और उसकी काव्य नदी का बालकाण्ड के दोहा क्रमाँक 35 से दोहा क्रमाँक 43 तक बड़ा ही मधुर वर्णन किया है। इसमें रामचरित मानस का स्वरूप एवं सत्य बड़ी तात्विक रीति से प्रकट हुआ है। इसे पढ़कर, इसका चिन्तन, मनन एवं निदिध्यासन करके गोस्वामी जी द्वारा रचित रामचरित मानस के सत्य की अनुभूति की जा सकती है। रामचरित के इस अद्भुत मानस सरोवर का शीतल स्पर्श किया जा सकता है। तुलसी की भक्ति साधना एवं काव्य सौंदर्य का रसपान किया जा सकता है। इसकी कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा है-

जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु। अब सोई कहऊँ प्रसंग सब, सुमिरि उमा वृषकेतु॥

यह राम चरित मानस जैसा है, जिस प्रकार बना है और जिस हेतु से जगत् में इसका प्रचार हुआ है, अब वही सब कथा मैं माता पार्वती एवं भगवान् शिव का स्मरण करके कहता हूँ।

इस अद्भुत मानसरोवर के निर्माण की कथा सुनाते हुए वह कहते हैं- सुन्दर सात्विक बुद्धि भूमि है। हृदय ही उसमें गहरा स्थान है। वेद-पुराण समुद्र हैं, और साधु सन्त मेघ हैं। इन साधु-सन्त रूपी मेघों ने भगवान् श्रीराम के सुयश रूपी मनोहर और मंगलकारी जल की वर्षा की है। भगवान् की सगुण लीला का विस्तार इस मानसरोवर के जल की निर्मलता है। इसमें समाया भगवत्प्रेम एवं भगवद्भक्ति इस जल की मधुरता और सुन्दर शीतलता है। इस मानस सरोवर का जल सत्कर्मों की फसल के लिए बड़ा ही लाभकारी है। भगवान के भक्तों का तो यह जीवन ही है। यह पवित्र जल सात्विक बुद्धि रूपी धरती पर गिरा और सिमटकर सुहावने कानों के रास्ते चलकर मानस (हृदय की गहरी भावनाओं) में भरकर वहीं स्थिर हो गया। ऐसे बना यह मानसरोवर सुन्दर, शीतल और सुखदायी।

इस मानसरोवर के चार उत्तम संवाद (काकभुशुण्डि-गरुड़जी, भगवान् शिव-माता पार्वती, याज्ञवल्क्य-भारद्वाज और गोस्वामी जी एवं रामचरित मानस के हम सभी भक्त पाठकगण) इस पवित्र और सुन्दर सरोवर के चार मनोहर घाट हैं। रामचरित मानस के सात काण्ड इस मानसरोवर की सुन्दर सात सीढ़ियाँ हैं। यही वेदान्त ज्ञान की सप्त भूमियाँ हैं। इन्हें ज्ञान की आँखों से देखने पर मन प्रसन्न हो जाता है। प्रभु की निर्गुण एवं निर्बाध महिमा का वर्णन इस सरोवर के जल की गहराई है। भगवान् श्रीराम एवं माता सीता का यश- इसका अमृत जल है। इसमें जो काव्य उपमाएँ हैं, वही इस जल में उठने वाली मनोहर तरंगें हैं। सुन्दर चौपाइयाँ ही इसमें घनी फैली हुई कमलिनी हैं। काव्योक्तियाँ मनोतियों को जन्म देने वाली सुहावनी सीपियाँ हैं।

इसमें जो सुन्दर छन्द, सोरठे और दोहे हैं, वही इसमें बहुरंगे कमलों का समूह है। इनका अनुपम अर्थ, ऊँचे भाव और सुन्दर भाषा ही इन कमल पुष्पों का पराग, मकरन्द और सुगन्ध है। सत्कर्मों के पुञ्ज कमल पुष्पों पर मंडराने वाले भौरों की पंक्तियाँ हैं। ज्ञान, वैराग्य और विचार इस मानसरोवर में विहार करने वाले हंस हैं। अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष, ज्ञान-विज्ञान के विचार, काव्य के नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्य के प्रसंग ये सभी इस मानसरोवर में निवास करने वाले जलचर जीव हैं। पुण्यात्मा जनों एवं साधुओं द्वारा किया जाने वाला श्रीराम का गान इस सरोवर के सुन्दर जलपक्षी हैं। सन्तों की संगति इस सरोवर के चारों ओर की अमराई है। भक्तों की श्रद्धा यहाँ सदा छाई रहने वाली वसन्त ऋतु है।

तरह-तरह से किया गया भक्ति का निरूपण और क्षमा, दया तथा दम इस सरोवर के पास वाले बगीचे में लताओं के मण्डप हैं। मन का नियंत्रण, यम और नियम ही इन लताओं पर उगने वाले फूल हैं। ज्ञान फल हैं और भगवान् के चरणों की भक्ति और प्रेम इस ज्ञान रूपी फल का रस है। इस रामचरित मानस में जो अन्य अनेकों कथाएँ हैं- वे ही इस बगीचे के तोते-कोयल आदि रंग-बिरंगे पक्षी हैं। कथा सुनने में होने वाला रोमाँच सरोवर के पास के वाटिका, बाग और वन हैं। इस कथा श्रवण से मिलने वाला सुख सुन्दर पक्षियों का विहार है। अपना निर्मल मन ही वह माली है, जो इन बगीचों को भगवत्प्रेम के जल से सींचता है।

रामचरित मानस का मानसरोवर और उसके आस-पास के सभी वाटिका बगीचे अत्यन्त सुन्दर है। गोस्वामी जी कहते हैं- जो लोग इस प्रभु चरित को सावधानी से (साधनापूर्वक) गाते हैं, वही इस सरोवर की चतुराई से रक्षा करने वाले हैं। और जो श्रोता है, वही इस सुन्दर सरोवर में आने वाले श्रेष्ठ देवता हैं। ऐसे देव तुल्य मनुष्य ही इसमें स्नान करके इस सरोवर की शोभा बढ़ाते हैं। कुसंग में पड़े, साधन पथ से भटके हुए तो यहाँ पहुँच ही नहीं पाते। ऐसे बगुले और कौओं का यहाँ कोई काम ही नहीं है। क्योंकि ये लोग तो काम कथा की कीचड़ और काई में रस लेते हैं। यहाँ तो राम-कथा का माधुर्य है। इसलिए यह अद्भुत सरोवर केवल भक्तों, साधकों, सन्तों के लिए है।

इस मानसरोवर को अपने काव्य में प्रकट करने वाले गोस्वामी जी का इसके बारे में कहना है- ‘रामकृपा बिनु आई न जाई’ राम कृपा के बिना यहाँ आया नहीं जाता। और जो प्रभु की कृपा से यहाँ आकर इस सरोवर में स्नान करता है, उसके बारे में उनके वचन हैं- ‘महा घोर त्रय ताप न जरई’ वह फिर महाभयानक त्रयताप (आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक ताप) से नहीं जलता। महाकवि और रामचरित मानस के महान् ऋषि तुलसीदास द्वारा प्रकट किए गए इस भक्ति सरोवर में स्नान करने वाले असंम्य जनों का कल्याण हुआ है। आगे भी असंम्य जन इसके अवगाहन से अपना कल्याण करते रहेंगे। इस सत्य की अनुभूति हम और आप भी तुलसी जयन्ती पर मानस के कथा प्रसंगों का पाठ व चिन्तन करके पा सकते हैं।


सार्थक आयु (Kahani)

राजा शतायुध प्रजा निरीक्षण के लिए निकले। एक झोंपड़ी में जराजीर्ण वयोवृद्ध दिखा। राजा रुक गए। कुतूहलवश पूछा, आपकी आयु कितनी है? वृद्ध ने झुकी गरदन उठाई और कहा, मात्र पाँच वर्ष। राजा को विश्वास न हुआ। फिर से पूछा, तो वही उत्तर मिला। वृद्ध ने कहा, पिछला जीवन तो पशु प्रयोजनों में निरर्थक ही चला गया। पाँच वर्ष ज्ञान उपजा और तभी से मैं परमार्थ प्रयोजन में लगा। सार्थक आयु तो तभी से गिनता हूँ।


एक वैदिक सत्य, जो बन रहा है वैज्ञानिक सत्य

‘सा प्रथम संस्कृतिः विश्ववारा’। जन-जीवन में व्याप्त यह सत्य अब वैज्ञानिक तथ्य बन गया है। चैन्नै के राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (एन. आई. ओ. टी.) के विज्ञानियों ने तथ्यान्वेषण का यह करिश्मा किया। उन्हें गुजरात के तट से 30 किमी. दूर खम्भात की खाड़ी में समुद्र जल प्रदूषण के स्तर की जाँच करते हुए यह अद्भुत उपलब्धि हाथ लगी। सामान्य क्रम में उन्होंने समुद्र तल की ‘सोनर फोटोग्राफी’ की। कुछ महीने के बाद इन तस्वीरों का विश्लेषण करते हुए समुद्र विज्ञानियों के इस दल को यह अहसास हुआ कि वे अनजाने में ही समुद्र में 40 मीटर नीचे दबी हुई विशाल नगर सभ्यता के अवशेषों की तस्वीर उतार लाए हैं। फिर कई हफ्ते तक उस स्थल को खंगालने और तकरीबन 2,000 शिल्पकृतियों को जुटाने के बाद इन विज्ञानियों को अपने पुरातात्त्विक तथ्यान्वेषण पर पक्का भरोसा हो गया।

उन्होंने विश्व की प्राचीनतम संस्कृति के सत्य का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि समुद्र के गहरे जल में एक प्राचीन नदी के किनारे 9 किमी. के दायरे में संस्कृति के पुरावशेष फैले हैं। और नदी में बाँध बनाए जाने के भी संकेत हैं। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार पानी में डूबे हुए इस शहर और सिन्धु घाटी की सभ्यता के स्थलों में जोरदार समानता है। ओलम्पिक तरणताल के बराबर आकार वाले एक ढाँचे में उतरती हुई सीढ़ियाँ बनी हैं। यह मोहनजोदड़ो के प्रसिद्ध पोखर जैसा लगता है। 200 मी. लम्बा तथा 45 मी. चौड़ा आयताकार चबूतरा वैसा ही है, जैसा कि हड़प्पा में पाया गया था। मिट्टी की मोटी दीवारों से बना 183 मी. लम्बा अन्न भण्डार जैसा एक ढाँचा पहचाना सा लगता है। इन विशाल ढाँचों से थोड़ी दूर पर कुछ और आयताकार ढाँचे हैं, जो घरों के अवशेष लगते हैं। इनमें नालियाँ तथा मिट्टी की सड़कें बनी हुई हैं। यहाँ से मिली शिल्पकृतियों में पत्थर के तराशे औजार, गहने, मिट्टी के टूटे-फूटे बर्तन, जवाहरात, हाथी दाँत और मनुष्य के जबड़े तथा दाँत के पुरावशेष हैं।

इस संस्कृति अनुसन्धान में सबसे अचरज भरे तथ्य तब सामने आए, जब इस दल ने लकड़ी के काल निर्धारण के लिए उसके नमूने लखनऊ के बीरबल साहनी इन्स्टीट्यूट ऑफ पालियो बाँटनी ( बी.एस.आई.पी.) और हैदराबाद के नेशनल जियोफीजिकल रिसर्च इन्स्टीट्यूट (एन.जी.आर.आई.) में भेजे। बी.एस.आई.पी. ने उसे ईसा पूर्व 5,500 साल पहले का बताया, जबकि एन.जी.आर.आई. ने इसे 7, 500 साल पुराना कहा। इन निष्कर्षों ने दुनिया भर के पुराविदों, इतिहासवेत्ताओं और संस्कृति सत्य के अनुसन्धानियों को हैरत में डाल दिया। भारतीय पुरातत्व विशेषज्ञ कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के इतिहासकार दिलीप चक्रवर्ती ने तो यहाँ तक कहा, ‘ये काल गणनाएँ सही है तो विश्व के गाँव नगरों के विकास से सम्बन्धित अब तक की मान्यता में क्रान्तिकारी बदलाव आ सकता है।’

अभी तक पुराविशेषज्ञ व इतिहासवेत्ता यही मानते रहे हैं कि विश्व की पहली बड़ी नगर सभ्यता ई.पू. 4,000 से 3,500 साल पहले प्राचीन मेसापोटामिया की नदी घाटियों में जन्मी थी। इसके बाद मिश्र में नील नदी की घाटी में सभ्यता का विकास हुआ। सिन्धु घाटी सभ्यता करीब 1,000 वर्ष बाद ई. पू. 2,500 साल पहले प्रस्फुटित हुई। अब अचानक खम्भात की खाड़ी में अज्ञात शहर की खोज से यह सम्भावना बन गयी है कि सभ्यता कि प्राचीनतम ज्ञात निशान 2,000 वर्ष से भी पीछे जा सकते हैं। इतिहासविद् कहते हैं कि इससे हमारी समूची साँस्कृतिक समझ बदल सकती है। और ‘सा प्रथमा संस्कृतिः विश्ववारा’ का वैदिक सत्य एक वैज्ञानिक सत्य का रूप ले सकता है।

वर्तमान इतिहास हमें बताता है कि ई.पू. 7,500 से 5,000 तक का समय, जो खम्भात सभ्यता का समय है, सामाजिक संक्रान्ति का काल था। पुरातत्ववेत्ता इसे नव पाषाण काल कहते हैं। इसी दौरान लोगों ने शिकार वगैरह छोड़कर हल की खोज की। इन्हीं दिनों कृषि में क्रान्ति आयी। अनाज की अतिरिक्त उपज हुई, जिससे बड़ी बस्तियाँ बनी, साँस्कृतिक प्रभात बेला आयी और सभ्यता विकसित हुई। इस बेहद रचनाशील समय में विभिन्न समाजों में कई तरह के शिल्प पैदा हुए। इनमें मिट्टी के बर्तन बनाना, पत्थर के तराशे औजारों का प्रयोग और जानवरों को पालतू बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। प्रौद्योगिकी चक्र घूमने लगा। तो अनुसन्धानों का सिलसिला शुरू हुआ। इस युग के दौरान सिन्धु घाटी सभ्यता सहित पहली सभ्यताएँ विकसित हुई। इसके बाद राजनैतिक चेतना, लेखन कला और शहरी बस्तियों का विकास हुआ।

भारतीय उपमहाद्वीप में ई. पू. 7,500 में कृषि कार्य में लगी बड़ी बस्तियों के सबूत सिर्फ बलूचिस्तान में बोलान नदी की घाटी में मेहरगढ़ में मिले हैं। लेकिन भारत के सबसे अनुभवी समुद्र भूतत्त्वशास्त्री एस. राव सौराष्ट्र क्षेत्र में समानान्तर विकास की सम्भावनाओं को नकारते हुए भी खम्भात के इन पुरावशेषों को एक प्रागैतिहासिक स्थल के रूप में स्वीकार करते हैं। श्री राव को एन. आई. ओ. टी. के दल ने शिल्पकृतियों की समीक्षा के लिए बुलाया था। उनका यह मानना है कि खम्भात कम से कम भारत में तो प्राचीनतम ज्ञात मानव बस्ती हो सकती है।

दूसरे विशेषज्ञों का मानना है कि इस खोज को अगर मान्यता मिल गयी तो यह भ्रान्ति दूर हो सकती है कि भारतीय इतिहास बनाया गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय की इतिहासकार नयनजोत लाहिड़ी सम्भावनाओं से उत्साहित हैं, उनका कहना है कि इससे सभ्यता के सिद्धान्त में फेरबदल हो सकती है। अभी तक यही माना जाता रहा है कि नगर सभ्यता पश्चिम एशिया से सिन्धुघाटी और शेष भारत की ओर फैली। खम्भात की खोज से यह अर्थ स्पष्ट होगा कि प्राचीन भारतीय नकलची नहीं थे। भारत देश में सभ्यता यहाँ के लोगों की प्रतिभा और जीवन प्रक्रिया से उपजी थी। हालाँकि इतिहासविद् लाहिड़ी के अनुसार अभी इस सभ्यता की पर्याप्त खोज-बीन जरूरी है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान के पूर्व महानिदेशक श्री जगतपति जोशी लाहिड़ी की इन बातों से इत्तफाक रखते हैं। उनका भी यही मानना है कि ऐसी खोज बीन से ‘वह गुप्त सूत्र’ मिल सकता है, जिसको लेकर इतिहासकार वर्षों से माथापच्ची कर रहे हैं। अभी तक इतिहासकारों के पास यह बताने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं है कि भारतीय उपमहाद्वीप में प्रमुखतः कृषि प्रधान समाज में कैसे यह उछाल आया कि सिन्धुकाल में विश्व के कुछ बेहद सुनियोजित शहर बसाए जा सके। खम्भात नवपाषाण कालीन भारत की प्रारम्भिक मानव बस्तियों के बारे में नए क्षितिज की तरह है। अभी तक की जानकारी यह है कि ये बस्तियाँ पश्चिम एशिया में ही थी और इन्हीं से परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हुई। अब इस जानकारी में भारी फेर-बदल होने की अनेकों सम्भावनाएँ झाँकने लगी है।

विज्ञान जगत् में कुछ भी निश्चित व अन्तिम नहीं है। पुरातत्व विज्ञान के क्षेत्र में भी यही वैज्ञानिक सिद्धान्त लागू होता है। पुराइतिहास के क्षेत्र में पहले यह माना जाता था कि काँच की चूड़ियाँ पहले पहल ईस्वी सन् की पहली सदी में भारत-रोम सम्बन्धों का नतीजा थीं। फिर हस्तिनापुर पुरास्थल के पुरातात्त्विक उत्खनन में पायी गयीं। जिनका काल ई. पू. 7 आँका गया। इन चूड़ियों की काल गणना तब और पीछे गयी जब ये हाल ही में ई. पू. 2000 के हड़प्पा में पायी गयीं। इन तथ्यों के पीछे निहित सत्य को स्वीकारते हुए इंडियन आर्कियोलॉजिकल सोसायटी के अध्यक्ष एस.पी. गुप्ता का कहना है, वैज्ञानिक अनुसन्धान में कुछ भी स्थायी नहीं है। नई खोजों से काल गणना लगातार बदलती रहती है। उदाहरण के लिए गुजरात के धौलावीरा में हड़प्पाकालीन स्थल की खोज से हमारी सारी काल गणना 1,000 साल पीछे चली गयी।

एन. आइ. ओ. टी. की खोज ने विश्व भर के प्रमुख इतिहासकारों में दिलचस्पी जगायी है और कई प्रश्न सामने आए हैं। दक्षिण एशिया के पुरातत्व विशेषज्ञ हार्वर्ड विश्वविद्यालय के इतिहासकार रिचर्ड मीगे का मानना है कि खम्भात में नवपाषाणकालीन स्थल की खोज उस काल की मेहरगढ़ और पश्चिमी एशिया की घटनाओं के क्रम में है। हालाँकि इस सत्य को स्थापित करने के लिए अभी पर्याप्त अनुसन्धान करने की आवश्यकता है। मीगे का कहना है कि इस खोज को काफी महत्वपूर्ण मानकर इस क्षेत्र में अभी और भी शोध प्रयास करने होंगे। रिचर्ड मीगे का कथन है कि यह खोज इतनी महत्वपूर्ण है कि इस पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सामूहिक अध्ययन करने की आवश्यकता है। ये अध्ययन कुछ वैसे ही होने चाहिए जैसे कि टाइटैनिक के रहस्य को जानने के लिए किए गए थे।

खम्भात संस्कृति की आज से 9,000 वर्ष प्राचीन सच्चाई को जानने के लिए विशेषज्ञों ने एक बहुआयामी राष्ट्रीय परियोजना शुरू की है। इसमें आर्कियोलॉजिक सर्वे ऑफ इण्डिया, राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान, अहमदाबाद की भौतिक प्रयोगशाला के अलावा एन. जी. आर. आई., बी.एस.आई.पी. और देश भर के अनेकों प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय एन.आई.ओ.टी. की इस कार्य में मदद करेंगे। विशेषज्ञ इस प्रसंग में जिन प्रश्नों की विशेष तौर पर छान-बीन कर रहे हैं, उनमें से एक है यह खोज करना कि यह शहर किस तरह जलमग्न हुआ। और किस भाँति तट से 30 कि.मी. दूर चला गया। समुद्र विकास विभाग के सचिव और जाने-माने भूगर्भ विज्ञानी हर्ष गुप्त का मानना है कि सम्भवतः भारी भूकम्प इस तबाही का कारण बना होगा। वैसे भी यह क्षेत्र भूकम्प की आशंका वाले क्षेत्र में है। अभी पिछले सालों में भुज में आए भूकम्प ने यह बता दिया है कि यह राज्य कितनी आसानी से भूकम्प के चपेट में आ सकता है।

प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ने के लिए शोध प्रयास तो चलते रहेंगे। फिर भी शोध की वर्तमान उपलब्धि कम सन्तोषजनक नहीं है। इसने भारतीय संस्कृति के विश्व में सर्वाधिक प्रथम एवं प्राचीनतम होने का वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत किया है। भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं व आयामों के अन्वेषण के लिए किए जाने वाले इन अनुसंधानों से निश्चित रूप से राष्ट्रीय गौरव की अभिवृद्धि होगी। इस क्रम में शान्तिकुञ्ज भी प्रयत्नशील है। यहाँ नव स्थापित देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भारतीय संस्कृति से सम्बन्धित अनेक पाठ्यक्रम एवं परियोजनाएँ संचालित करने की शुरुआत हो रही है। ताकि ऋषियों की पुरातन संस्कृति, सत्यों एवं सूत्रों से राष्ट्रीय जीवन की विश्व वसुधा को परिचित कराया जा सके। खम्भात सभ्यता के वैज्ञानिक तथ्यों से इसमें और भी नए आयामों को जोड़ पाना सम्भव हो सकेगा।


यही है ब्रह्म (Kahani)

कन्फ्यूशियस के शिष्य रोज-रोज यह आग्रह किया करते थे कि किसी ब्रह्मज्ञानी के दर्शन कराके लाइए। रोज तो वे टाल देते, पर एक दिन तैयार हो गए। शिष्यों को लेकर वे एक गुफा में पहुँचे, जहाँ एक साधु भजन कर रहे थे। उन लोगों ने ब्रह्मज्ञान की कुछ बातें बताने का आग्रह किया। साधु बहुत नाराज हुआ, क्रोध में बोला, भग जाओ धूर्तों, व्यर्थ हैरान मत करो। मुझे अपना भजन करने दो। वे उलटे पैरों लौटे। अब मंडली एक तेली के घर पहुँची। पूछा, आपको लोग ब्रह्मज्ञानी बताते हैं, कुछ बतलाइए। तेली ने कहा, यह बैल ही मेरा ब्रह्म है। मैं इसे पूरा चारा-दाना देता हूँ और यह मेरे कुटुँब का पूरा पेट भरता है। हम दोनों ही एक-दूसरे से खुश हैं।

उससे आगे कन्फ्यूशियस अपनी शिष्य मंडली को एक बुढ़िया के यहाँ ले गए, जो चरखा कात रही थी। साथ ही पास में खेल रहे बाल-बच्चों में से किसी को समझाती, किसी को हँसाती, किसी को धमकाती हुई मगन थी। बुढ़िया से वही प्रश्न किया, तो उसने कहा, देखते नहीं, मरे ओर ब्रह्म ही ब्रह्म खेल रहा है। वह मुझ से लिपटा है और मैं उससे। इतनी यात्रा के बाद शिष्य मंडली समेत कन्फ्यूशियस वापस लौट आए और उन्होंने समझाया, स्वयं प्रसन्न रहना, दूसरों को प्रसन्न करना और तालमेल बिठाकर रहना, यही है ब्रह्म और यही है उसकी उपासना।


ऋषिचेतना के ज्ञान प्रसार का माध्यम लेखन कला

हाथों में थमी हुई लेखनी बड़ी सुघड़ता से कोरे-कागज पर अक्षरों व शब्दों की चित्रकारी करती है। इस कलात्मकता में भावनाओं और विचारों के अनेकों रंग उभरते एवं निखरते हैं। इन क्षणों में अपने पाठकों व परिजनों की आँखें अखण्ड ज्योति पत्रिका के जिन पृष्ठो को निहार रही है, उनमें भी लेखन कला का ही महिमामय प्रकाश है। अन्तर्चेतना के भावनात्मक सौंदर्य को इसी से अभिव्यक्ति मिलती है। विपुल साहित्य राशि का उद्गम स्रोत यही है। स्याह अक्षरों से ज्ञान की सफेदी फैलाने वाली यह लेखन कला अपने देश में कब और कैसे जन्मी? यह जिज्ञासा प्रायः सभी विबुध जनों की है। इसके समाधान में विभिन्न देशों में अनेकों वर्णन, विवरण प्राप्त होते हैं।

भारतीय साहित्य में नारद स्मृति के एक श्लोक को इतिहासवेत्ताओं ने प्रमाण के रूप में स्वीकार किया है। इस श्लोक के अनुसार-

ना करिष्यति यदि ब्रह्म लिखितं चक्षुरुामम्। तत्रेयमस्य लोकस्य नाभविष्यत् शुभाँगति॥

अर्थात्- यदि ब्रह्म लिखने के द्वारा उत्तम नेत्र का विकास नहीं करते, तो तीनों लोकों को शुभ गति प्राप्त नहीं होती।

बृहस्पति स्मृति में भी इसी प्रकार यह लिखा है कि पहले सृष्टिकर्त्ता ने अक्षरों को पत्तों पर अंकित करने का विधान किया। क्योंकि छः मास में किसी भी वस्तु के सम्बन्ध में स्मृति विभ्रमित हो जाती थी। बौद्ध ग्रन्थों में ललित विस्तार का काफी महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें 64 लिपियों का उल्लेख किया गया है। उनमें सबसे पहले ब्राह्मी लिपि का उल्लेख है। जैन ग्रन्थों में भी एक प्रसंग मिलता है कि आदि तीर्थंकर ऋषभनाथ को एक लड़की थी। उसका नाम बम्पी था। इसको पढ़ाने के लिए उन्होंने ब्राह्मी लिपि विकसित की। जैन साहित्य के समवायण सूत्र व पणवणासूत्र में 18 लिपियों का वर्णन मिलता है, जिसमें प्रथम नाम ब्राह्मी का है। इन्हीं सब प्रमाणों के आधार पर प्रख्यात इतिहासविद् डॉ. राजबली पाण्डेय, डॉ. गौरीशंकर ओझा एवं डॉ. ए.सी. दास आदि, भारतीय लेखन कला को विश्व परिदृश्य में पूर्णतया मौलिक एवं प्राचीनतम माना है। पुरातत्त्वविदों को वादामी के उत्खनन से ब्रह्म तथा सरस्वती की एक खड़ी युगल मूर्ति प्राप्त हुई है। इसमें सरस्वती के हाथ में एक मुड़ी हुई पुस्तक है। तथा ब्रह्म के हाथ में ताड़ पत्र का एक गुच्छा है। पुराविदों ने इन दोनों को भारतीय लेखन कला की पुरातनता का द्योतक माना है।

भारतीय लेखन कला को विश्व में प्राचीनतम बताने वाले प्रमाण अन्य देशों की परम्पराओं व अनुश्रुतियों में भी प्राप्त होते हैं। ऐसे देशों में चीन का स्थान सर्वोपरि है। भौगोलिक स्थिति तथा राजनीतिक, धार्मिक आदि सम्पर्कों से भारत तथा चीन एक-दूसरे के अत्यन्त समीप रहे हैं। इसी से एक-दूसरे की परम्परा परस्पर संचित है। चीन के साहित्य से ज्ञात होता है कि भारतीय लेखन कला विश्व में सबसे अधिक पुरातन है। चीन के विश्वकोश फा-वान-शू-लिन में लिखा है कि पुरातन विश्व में केवल तीन लिपियाँ ही प्रचलित थी। जिनमें सबसे प्राचीन लिपि ब्राह्मी थी। यह फस (ब्रह्म) द्वारा आविष्कृत थी। इसे बांई से दांई ओर लिखा जाता था और यह सभी लिपियों में सर्वोत्तम थी। ह्वनसाँग ने भी अपने भारत यात्रा-विवरण में लिखा है कि लेखन कला का प्रादुर्भाव सबसे पहले भारत वर्ष में ही हुआ था।

अरब देश में भी भारतीय लेखन से सम्बन्धित कई अनुश्रुतियाँ प्रचलित है। इन अनुश्रुतियों से पता चलता है कि भारत में वैदिक काल से ही लेखन की व्यवस्थित परम्परा थी। इतिहासकार अलबरूनी ने लिखा है कि भारतीय लोग कई कारणों से लेखन कला भूल गए थे, जिसे बाद में महर्षि व्यास ने पुनः अविष्कृत किया। यह कथन स्वतः ही इस बात का प्रमाण है कि महर्षि व्यास के पहले के युगों में भी भारत के लोग लेखन कला से परिचित थे।

यूनानी परम्पराओं व अनुश्रुतियों में भी भारतीय लेखन की प्राचीनता का भली भाँति उल्लेख है। सिकन्दर के साथ आने वाले यूनानी कर्मचारियों एवं इतिहासकारों ने यहाँ की कतिपय परम्पराओं व अनुश्रुतियों को अपने साहित्य में स्थान दिया है। नियार्कस नामक एक सेनापति ने लिखा है कि भारतवासी चिथड़ों तथा रुई से कागज बनाना जानते थे। कागज का प्रयोग लेखन सामग्री के लिए होता था। यह ऐतिहासिक तथ्य भारत की विकसित लेखन कला की ओर संकेत करता है। कर्टियस नाम के एक अन्य यूनानी यात्री ने भी अपने वर्णन में भारतीय लेखन का उल्लेख किया है। उसके अनुसार भारतवासी वृक्ष की छाल पर लिखते थे। इस क्रम में उसने भोजपत्र का उल्लेख भी किया है। पश्चिमी इतिहासविद् ब्यूलर ने इन तथ्यों का विश्लेषण करते हुए कहा है कि इन सभी तथ्यों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है, कि यूनानियों के आगमन के समय भारत में लेखन कला न केवल प्रचलित थी, बल्कि सुविकसित थी।

सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहने वाले यूनानी राजदूत मैगस्थनीज के उद्धरणों से ज्ञात होता है कि सड़कों के किनारे मील के पत्थर 10-10 स्टेडिया की एक निश्चित दूरी पर लगे हुए थे। जिससे सड़क की दूरी तथा ठहराव का ठिकाना ज्ञात होता था। इस तथ्य से भारतीय लेखन कला का परिचय मिलने के साथ यह भी पता चलता है कि भारतवासी गणना से सुपरिचित थे। मैगस्थनीज ने आगे यह भी कहा है कि भारतीय जन्म-कुण्डली देखकर वर्ष फल बतलाते थे। तथा स्मृतियों के आधार पर न्यायिक मसलों का निर्णय करते थे। यहाँ जन्म-कुण्डली के अध्ययन का उल्लेख यह संकेत करता है कि भारतवासी गणना की व्यवस्थित एवं उच्चतम स्थिति से परिचित थे। यहाँ स्मृति का अर्थ कुछ लोगों ने स्मरण शक्ति से लिया है, किन्तु डॉ. ब्यूलर का कहना है कि स्मृति का अभिप्राय स्मृति ग्रन्थों से है। डॉ. राजबली पाण्डेय ने भी इसका समर्थन किया है।

परम्पराओं व अनुश्रुतियों के इस क्रम में लंका देश का भी महत्व है। लंका में सुरक्षित त्रिपिटक साहित्य में न केवल ‘लेखा’ शब्द का प्रयोग मिलता है। अपितु इसमें ‘लेखक’ शब्द का उल्लेख किया गया है। यह इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि लेखन की परम्परा चिर अतीत से विकसित थी। जिसमें पारंगत लोग एक विशेष नाम ‘लेखक’ से सम्बोधित किए जाते थे।

विभिन्न देशों की इन परम्पराओं व अनुश्रुतियों के अलावा साहित्यिक साक्ष्य भी भारतीय लेखन कला की प्राचीनता को स्वीकार करते हैं। डॉ. राजबली पाण्डेय एवं डॉ. डी.आर. भण्डारकर ने वैदिक साहित्य के अनेक साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए यह प्रमाणित किया है कि लेखन कला वैदिक काल में ज्ञात थी। ऋग्वेद में गायत्री, त्रिष्टप, वृहती, विराज, अनुष्टप आदि अनेक छन्दों का उल्लेख इस तथ्य का प्रमाण है कि ऋग्वेद के लेखन में इन छन्दों का प्रयोग किया गया था। यजुर्वेद में भी लेखन सामग्री के साथ लम्बे अंकों का उल्लेख किया गया है। अथर्ववेद में तो बहुत ही स्पष्ट रीति से कहा गया है- हे पृथ्वी, हम तुम्हें भौतिक बन्धनों से आबद्ध कर देंगे। तुम्हारा शरीर दो योग का है- कृसमानी और वित, जो कुछ भी तुम पर लिखा गया है, वह एक विशिष्ट वस्तु से लिखा गया है- जिससे यह अर्जित ज्ञान शीघ्र ही लुप्त न हो जाय। इस उद्धरण से यही स्पष्ट होता है कि लेखन कला अथर्ववेद के रचना काल में पूर्ण विकसित थी। इसका कारण ज्ञान को स्थायी बनाना था।

वेदों के अलावा रामायण में भी एक प्रसंग आया है, जब हनुमान जी लंका गये और वहाँ उन्होंने अशोक वाटिका में माता सीता के सामने भगवान् राम की मुद्रिका गिराते हुए कहा-

रामनामाँकितं चेदि पश्य देवि अंगुलीयकम् । - वाल्मीकि रामायण

(तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुन्दर - मानस)

इतिहासवेत्ता डॉ. भण्डारकर ने इस तथ्य का विवेचन करते हुए कहा है कि रामायण काल में भी लिखने की कला प्रचलित थी, अन्यथा अंगूठी पर राम का नाम कैसे अंकित होता। इसी तरह महाभारत में भी ‘लिख, लेखन, लेखक’ आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है। आदि पर्व में तो इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख मिलता है महर्षि व्यास ने इसको लिखने के लिए लेखन कला में कुशल ‘गणेश’ को चुना। बर्नेल के अनुसार लेखन सम्बन्धी ये सभी तथ्य पूर्ण विश्वसनीय है।

इन सभी साहित्यिक साक्ष्यों के अलावा अनेकों पुरातात्त्विक प्रमाण भी भारतीय लेखन की प्राचीनता एवं मौलिकता को सिद्ध करते हैं। पुराविद् डॉ. गौरीशंकर ओझा ने अशोक कालीन अभिलेखों के पूर्व उत्कीर्ण दो अभिलेखों का विवरण प्रस्तुत किया है। इसमें एक अभिलेख अजमेर का है तथा दूसरा नेपाल घाटी का। इनमें से पहला अभिलेख तीर्थंकरों से 84 वर्ष पूर्व अंकित किया गया था। अर्थात् इसका काल 443 ई. पू. है। दूसरा अभिलेख डॉ. ब्यूलर के अनुसार 487 ई. पूर्व का है। इसकी पुष्टि इस तर्क से होती है कि अशोक के अभिलेखों में अंकित है कि उसने अपने लेखों को पत्थर पर इसलिए खुदवाया कि ये स्थायी बने रहें। इससे स्पष्ट होता है कि इसके पूर्व भी लेख लिखे जाते थे। पर वे किसी ऐसे आधार पर लिखे जाते थे। जिससे उसका स्वरूप स्थायी नहीं होता था। अशोक के पूर्व के कुछ अभिलेख- सौहगौरा, महथानगढ़, पिपरहवाँ में मिले भी हैं।

डॉ. प्राणनाथ विद्यालंकार के अनुसार इन सभी प्रमाणों से कहीं ज्यादा मुखर एवं प्रखर प्रमाण है। सिन्धु घाटी के पुरावशेष। सिन्धु घाटी के ठीकरों पर प्राप्त उभरे हुए चिह्नों को पुराविशेषज्ञों ने लेख माना है। कुछ विशेषज्ञों का मत है कि यह चित्रात्मक लिपि है। इस सम्बन्ध में डॉ. प्राणनाथ विद्यालंकार का कहना है कि यह लिपि भले ही आँशिक रूप से चित्रात्मक हो, पर इससे अक्षरों का भी बोध होता है। यह तथ्य भारतीय लेखन कला की प्राचीनता को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है। सर जॉन मार्शल के अनुसार यह काल 3000 ई. पूर्व हो सकता है। क्योंकि पुरातात्त्विक तथ्यों के अनुसार सिन्धु घाटी की सभ्यता इतनी ही प्राचीन है।

प्रमाण एक नहीं अनेक हैं, जो भारतीय लेखन कला की प्राचीनता एवं मौलिकता को प्रमाणित करते हैं। विख्यात विचारक विंटरनिब्ज का कहना है कि लेखन कला के ज्ञान के कारण ही भारत देश ज्ञान-विज्ञान में सबसे अग्रणी बना। यही वह वजह है कि भारतीय संस्कृति प्रथम होने के साथ ही विश्वव्यापी बनी। भारत देश विश्व गुरु के प्रतिष्ठित आसन पर आसीन हुआ। भारतीय एवं पश्चिमी विचारक एक स्वर से लेखन कला को एक दैवी विभूति बताते हुए यह प्रमाणित करते हैं कि यह जगत् स्रष्ट ब्रह्म से वेदों के द्रष्ट ऋषियों को मिली। इसी से ज्ञान का विस्तार हुआ। ज्ञान के प्रसार व विस्तार के लिए ऋषियों की यह परम्परा सर्वकालिक एवं शाश्वत है। इस लेखन कला के द्वारा ही अखण्ड ज्योति के पृष्ठ शाश्वत को सामयिक अभिव्यक्ति देकर ऋषि चिन्तन को विश्वव्यापी बना रहे हैं।


रणक्षेत्र में उतर जाना चाहिए (Kahani)

देवर्षि नारद को परिभ्रमण काल में एक वयोवृद्ध धनवान मिला। वो पूजा बहुत करता था, भक्त लगता था। उसकी ढलती आयु को देखकर नारद बोले, परिवार समर्थ हो गया, अब घर से निकलकर वानप्रस्थ लेना चाहिए और लोकसेवा में लगना चाहिए। बात धनवान के गले न उतरी। उसने कहा, अभी तो परिवार को संपन्न बनाना है, फिर कभी समय होगा, तो चलेंगे। बहुत वर्ष बाद नारद उधर से फिर निकले। धनी भक्त की याद आ गई। उसके घर पहुँचे, तो मालूम हुआ, वे कुछ समय पूर्व मर गए। नारद ने दिव्य दृष्टि से देखा, तो प्रतीत हुआ, वह मरकर बैल बन गया है और हल में चलता है। समीप जाकर नारद ने पूर्व जन्म की बात स्मरण दिलाई और कहा, अभी भी समय है, हमारे साथ चलो। बैल को पूर्व जन्म स्मरण हो आया। फिर भी उसने सिर हिलाया परिवार को कमाई करके खिलाता हूँ। मरे चल पड़ने से इन लोगों की कठिनाई बढ़ेगी। नारद चले गए।

कई वर्ष बाद फिर आना हुआ। बैल का समाचार पूछने गए, तो ज्ञात हुआ कि वह भी मर चुका। अब वह कुत्ता बन बैठा था उसी घर में। नारद बोले, कुत्ते की स्थिति में पड़े रहने से क्या लाभ? चलो विश्वकल्याण का कुछ काम करें। कुत्ता सहमत न हुआ। उसने कहा, विश्वकल्याण से क्या? परिवार कल्याण ही बहुत है। मैं चल पड़ूं, तो चोरों की रखवाली कौन करेगा? नारद चले गए फिर तीसरी बार उसी प्रकार लौटना हुआ और नारदजी ने इस बार भी पहले की तरह पूछताछ की। मालूम पड़ा कुत्ता मर गया। देखा तो वह साँप बना वहीं एक बिल में सिर चमका रहा था। नारद उसके समीप पहुँचे। ऐसी दुर्गति से क्या लाभ? अब तो इन लोगों की कोई सहायता भी नहीं बन पड़ती। चलो न? सर्प ने असहमति सूचक सिर हिलाया और कहा, घर में चूहे बहुत हैं। इन्हें निगलने और डराने का काम क्या कम है? परिवार का मोह कैसे छोड़ूँ? नारद इस बार भी चले गए। एक दिन साँप बिल से निकला ही था कि घरवालों ने उसकी डंडे से खबर ली और सिर कुचल दिया। ऐसी दुर्गति न हो, इसलिए आत्मीयजनों के प्रति अनावश्यक अतिशय मोह छोड़कर स्वयं को सत्प्रवृत्ति हेतु समाज रूपी रणक्षेत्र में उतर जाना चाहिए।


रिक्ता ही है, परम सिद्धि

नरक और कहीं नहीं है, यह महत्वाकाँक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमने वाले जीवन में है। महत्वाकाँक्षाओं के ज्वर से ही जीवन विषाक्त होता है। मनुष्य जिन बड़ी से बड़ी बीमारियों और विक्षिप्तताओं से परिचित है, महत्वाकाँक्षा से बड़ी बीमारी इनमें से कोई भी नहीं है। जो व्यक्ति महत्वाकाँक्षाओं की हवाओं से उद्वेलित हैं, शान्ति, संगीत और आनन्द उसके भाग्य में नहीं हो सकते। ये तो स्वयं में स्थित होने का फल है। आत्मस्थ होने के परिणाम हैं। जो स्वयं में नहीं हैं, वही अस्वस्थ है। स्वयं में स्थित होना ही तो स्वस्थ होना है।

किसी समय महर्षि रमण से पश्चिमी विचारक पॉल ब्रान्टन ने पूछा था- ‘इस महत्वाकाँक्षा की जड़ क्या है?’ महर्षि हँसकर बोले, हीनता का भाव। अभाव का बोध। बात थोड़ी अटपटी सी लगती है। हीनता का भाव और महत्वाकांक्षी चेतना परस्पर विरोधी दिखाई पड़ते हैं। लेकिन वे वस्तुतः विरोधी हैं नहीं। बल्कि एक ही भावदशा के दो छोर हैं। एक छोर से जो हीनता है, वही दूसरे छोर से महत्वाकाँक्षा है। हीनता स्वयं से छुटकारा पाने की कोशिश में महत्वाकाँक्षा बन जाती है। इसे सुसज्जित हीनता कहना थोड़ा भी गलत नहीं है। हालाँकि बहुमूल्य से बहुमूल्य साज-सज्जा के बावजूद न तो वह मिटती है और न नष्ट होती है। थोड़ी देर के लिए यह हो सकता है कि दूसरोँ की दृष्टि से वह छिप जाए, लेकिन अपने-आप को लगातार उसके दर्शन होते रहते हैं।

कपड़ों में छिपकर व्यक्ति औरों के लिए नग्न नहीं रह जाता, पर अपने आप के सामने उसकी नग्नता जस की तस होती है। यही वजह है कि दूसरों की आँखों के सामने जिनकी महत्वाकाँक्षाओं की सफलताएँ चकाचौंध पैदा करती रहती है, वे अपने भीतर हमेशा किन्हीं और बड़ी सफलताओं को पाने के लिए चिन्ताग्रस्त बने रहते हैं। उनकी हीनता का आन्तरिक भाव किसी बड़ी से बड़ी योजना के पूरा होने- किसी चकाचौंध वाली सफलता के मिलने के बावजूद नष्ट नहीं होता है। हर नयी सफलता उनके लिए किसी और बड़ी सफलता की चाहत की चिन्ता और बेचैनी लेकर आती है। इस तरह जिन सफलताओं को उन्होंने समाधान जाना था, वे और नई समस्याओं की जन्मदात्री भर सिद्ध होती है। यह ठीक भी है, सुविख्यात विचारक जे. एमरी ने अपनी पुस्तक ‘एट द माइन्डस लिमिट’ में कहा है कि जब भी किसी जीवन समस्या को गलत ढंग से पकड़ा जाता है, तो परिणाम यही होता है। समस्या के समाधान समस्या से बड़ी समस्याएँ बनकर आते हैं।

यह बात याद रखने की है कि किसी भी बीमारी को छिपाने से उससे कभी भी छुटकारा नहीं मिलता। इस तरह रोग मिटते नहीं, बल्कि बढ़ा करते हैं। हीन भाव की ग्रन्थि से पीड़ित चित उसे छिपाने और भूलने की कोशिश में महत्वाकाँक्षा से भर जाता है। इस त्वरा में स्वयं को भूलना आसान भी है। फिर यह महत्वाकाँक्षा संसार की हो या अध्यात्म की, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। किसी भी तरह से इसका नशा गहरी आत्मविस्मृति लाता है। हालाँकि नशे के बारे में एक बड़ा अनुभूत सत्य है कि व्यक्ति जिस नशे या नशे की जिस मात्रा का आदी हो जाता है, फिर उससे उसको मादकता नहीं आती। फिर तो उसको नशों की ज्यादा-ज्यादा मात्राएँ चाहिए, कुछ और नए-नए नशे चाहिए। इसीलिए महत्वाकाँक्षाएँ बढ़ती जाती है। उनका कोई अन्त नहीं आता है। उनका अथ तो है, पर इति नहीं है।

इस सम्बन्ध में एक सच्चाई और भी है। व्यक्ति जब अपनी असलियत से भागना चाहता है, तो उसे किसी न किसी रूप में महत्वाकाँक्षा का बुखार जकड़ लेता है। अपने आप से अन्य होने की चाहत में वह स्वयं जैसा है, उसे ढाँकता है और भूलता है। लेकिन किसी तथ्य का ढंक जाना और उससे मुक्त हो जाना एक बात नहीं है। हीनता की विस्मृति, हीनता का विसर्जन नहीं है। यह तो बहुत अबुद्धिपूर्ण प्रक्रिया है। इसीलिए ज्यों-ज्यों दवा की जाती है, त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता है। महत्वाकाँक्षी मन की प्रत्येक सफलता आत्मघाती है। क्योंकि वह अग्नि में घृत का काम करती है। सफलता तो आ जाती है, पर हीनता नहीं मिटती। इसीलिए और बड़ी सफलताएँ जरूरी लगने लगती है। मूलतः यह हीनता का निरन्तर बढ़ते जाना है।

विश्व का ज्यादा तर इतिहास ऐसे ही बीमार लोगों से भरा पड़ा है। तैमूल-सिकन्दर या हिटलर और भला क्या है? न न इन बेचारों पर हँसिए नहीं। क्योंकि बीमारों पर हँसना शिष्टता नहीं है। एक और वजह से भी इन पर हँसना ठीक नहीं है। क्योंकि थोड़े-बहुत रूप में इस बीमारी के कीटाणु हममें भी तो हैं। बात किसी एक की नहीं है। प्रायः सभी इस रोग से संक्रमित हैं। यही कारण है कि यह महारोग जल्दी किसी को नजर नहीं आ पाता। लेकिन नजर न आने पर भी रोग है तो मृत्यु का अनुचर ही। महत्वाकाँक्षा के साथ भी कुछ ऐसा ही है। यह विध्वंस है, हिंसा है, रुग्ण चित से निकली घृणा है, ईर्ष्या है। मनुष्य-मनुष्य के बीच साँसारिक संघर्ष यही तो है। युद्ध इसी का व्यापक रूप है। यह साँसारिक होती है तो इससे परहिंसा जन्म लेती है। यदि यह आध्यात्मिक है तो आत्महिंसा पर उतारू हो जाती है। अध्यात्म पथ पर चलने वाले भी यह कम ही जानते हैं कि अध्यात्म कहीं कुछ पाने की लालसा नहीं- बल्कि स्वयं को सही ढंग से जानने-पहचानने का विज्ञान है।

यह सृजनात्मक चेतना में भी सम्भव है। और केवल वही चेतनाएँ सृजनात्मक हो सकती है, जो महत्वाकाँक्षा से मुक्त हैं। सृजनात्मकता केवल स्वस्थ और शान्त चित में ही स्फूर्त हो सकती है। स्वस्थ चित स्वयं में स्थित होता है। कुछ और होने की दौड़ उसमें नहीं होती। कुछ और होने की दौड़ के धुएँ में व्यक्ति उसे नहीं जान पाता है, जो वह स्वयं है। और स्वयं को न जानना ही वह भूल और केन्द्रीय अभाव है, जिससे सारी हीनताओं का आविर्भाव होता है। आत्मज्ञानी के अतिरिक्त इस अभाव से और कोई मुक्त नहीं है। और उसके लिए चित से सभी महत्वाकाँक्षाओं की विदाई अत्यन्त आवश्यक है। इनके रहते तो जीवन की दशा और दिशा औंधी और उलटी ही रहेगी।

मनुष्य जब स्वयं में किसी भी तरह की हीनता पाकर उससे भागने लगता है तो उसकी दिशा अपने-आप से विपरीत हो जाती है। वह इस विपरीत दिशा में तेजी से दौड़ने लगता है। बस यहीं भूल हो जाती है। मनोवैज्ञानिक एच. गिब्सन ने अपने शोध पत्र ‘एम्बीशन : एन इन्ट्रोगेशन टु मेन्टल हेल्थ’ में इस भूल का खुलासा किया है। उनका निष्कर्ष है कि सब हीनताएँ बहुत गहरे में आन्तरिक अभाव की सूचनाओं से ज्यादा नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति ही आन्तरिक अभाव में है। एक रिक्तता प्रत्येक को ही अनुभव होती है। इस आन्तरिक रिक्तता को ही बाह्य उपलब्धियों से भरने की कोशिश चलती रहती है।

भला आंतरिक रिक्तता के गड्ढे को बाहरी उपलब्धियों से भरना किस तरह से संभव है, क्योंकि जो बाह्य है वह भला आन्तरिक कमी को किस भाँति पूरा करेगा? और फिर सभी कुछ तो बाह्य है। धन, पद, प्रभुता और भी ऐसी बहुत चीजें बाहरी ही हैं। सवाल पूछा जा सकता है, तब आन्तरिक क्या है? उस अभाव, उस रिक्तता, शून्यता को छोड़कर कुछ भी आन्तरिक नहीं है। इस शून्यता से भागना स्वयं से भागना है। उससे पलायन स्वयं की सत्ता से पलायन है। उससे भागने में नहीं, वरन् उसमें जीने और जागने में ही कल्याण है। जो व्यक्ति उसमें जीने और जागने का साहस करता है, उसके समक्ष वह शून्य ही पूर्ण बन जाता है। उसके लिए वह रिक्तता ही परम मुक्ति सिद्ध होती है। उस न कुछ में ही सब कुछ है। उस शून्य में ही सत्ता है। वह सत्ता ही परमात्मा है, जिसकी एक झलक में ही सभी अभाव पूरे हो जाते हैं, सभी हीनताएँ विलीन हो जाती है।


मृत्यु ही जीवन और अमरता (Kahani)

प्रातःकाल की पवन लहरी आई और गुलाब को स्पर्श कर चली गई। पत्ते ने हँसते गुलाब को देखा, तो आगबबूला हो गया। बोला, यह भी कोई जीवन है, माली आता है और असमय में ही तुम्हारी जीवनलीला समाप्त कर देता है, इतने अल्पजीवन में भी क्या आनंद? मैं रोज देखता हूँ, कितने फूल खिलते हैं और मुरझा जाते हैं। गुलाब ने बड़े शाँत स्वर में उत्तर दिया, भाई जीवन का अर्थ है, सच्ची सुगंध। इस प्रकार चारों ओर सुगंध को फैलाते हुए आमंत्रित मृत्यु ही जीवन और अमरता है।


यौगिक जीवन ही स्वस्थ मन दे सकेगा

इक्कीसवीं सदी में मनुष्य ने अनगिन मानसिक समस्याओं के साथ प्रवेश किया है। सूचना तकनीक, संचार क्रान्ति और याँत्रिकता ने मानवीय जीवन में साधन सुविधाओं की भरमार करने के साथ मानसिक स्वास्थ्य में अनेकों संकट भी खड़े किए हैं। मनुष्य का जीवन अपेक्षाकृत अधिक तनाव ग्रस्त एवं विषादपूर्ण हुआ है। मानसिक चिकित्सा की प्रचलित विधियाँ, मनोविश्लेषण के तौर तरीके मिल जुलकर भी इस चुनौती का सामना करने में प्रायः नाकाम रहे हैं। दुनिया के प्रायः हर देश में इनकी नाकामियाँ समझी और स्वीकारी जा चुकी हैं। ऐसे में चिन्तित विशेषज्ञों ने विश्व भर के पुरातन ज्ञान भण्डार में अपनी ढूंढ़-खोज शुरू की है। और उनकी दृष्टि भारत देश के प्राचीन ऋषियों द्वारा अन्वेषित योग विज्ञान पर जा टिकी है। यहीं उन्हें आज की मानसिक समस्याओं के सार्थक और सक्षम समाधान अंकुरित होते हुए दिखाई पड़ रहे हैं।

इस सम्बन्ध में मानवीय मन के विशेषज्ञ कार्ल रोजर्स ने बहुतायत में शोध कार्य किया है। अपनी दीर्घ कालीन अनुसन्धान प्रक्रिया से वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मानसिक स्वास्थ्य संकट के प्रश्न कंटक को निकालने के लिए मानवीय प्रकृति की संरचना व उसकी क्रियाविधि का समग्र ज्ञान चाहिए। तभी उसमें आयी विकृति की पहचान व निदान सम्भव है। कार्ल रोजर्स के अनुसार यह समस्त विज्ञान योग शास्त्रों में पहले से ही उपलब्ध है। समस्त योग शास्त्रों में उन्होंने महर्षि पतंजलि प्रणीत योगसूत्र में मनोचिकित्सा की सैद्धान्तिक एवं नैदानिक समग्रता के अपूर्व समन्वय को अनुभव किया है। इसी के आधार पर उन्होंने अपनी नान डायरेक्टिव चिकित्सा विधि भी विकसित की है।

सुविख्यात मनीषी जय स्मिथ के अनुसार प्रायः सभी मानसिक समस्याएँ मानवीय चेतना को विखण्डित करने वाली दरारों और इसमें उत्पन्न होने वाली ग्रन्थियों के कारण जन्मती व पनपती हैं। स्मिथ इन सभी का मूल कारण अहं को मानते हैं। उनके अनुसार यह अहंता ही है, जो एक ओर हमें उच्चतर चेतना से अलग करती है और दूसरी ओर हमको अपने साथी मनुष्यों के सामाजिक विस्तार से दूर करती है। स्मिथ के अनुसार योग विज्ञान की साधनात्मक प्रक्रियाएँ ही एक मात्र सार्थक एवं समर्थ समाधान है। इसी से मनुष्य की बिखरी और बंटी हुई चेतना फिर से अपनी एकात्मकता व सम्पूर्णता प्राप्त करती है। फिर से उसे अपना खोया हुआ स्वास्थ्य व सौंदर्य मिलता है।

मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य संकट का हल ढूंढ़ने के लिए आधुनिक समय में जितने भी अनुसन्धान कार्य हुए हैं और हो रहे हैं, उन सभी सार निष्कर्ष यही है। प्रायः सभी विशेषज्ञों ने एक स्वर से यही प्रामाणित किया है कि मानसिक स्वास्थ्य के सभी अर्थ योग विज्ञान में निहित है। कतिपय मनोविज्ञानियों ने मानसिक स्वास्थ्य के अर्थ को अपने शोध निष्कर्षों के आधार पर स्पष्ट भी किया है। स्ट्रेंज के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य सीखा गया वह व्यवहार है, जो व्यक्ति को सामाजिक रूप से अनुकूल बनाता है। और जिसकी वजह से व्यक्ति अपनी जिन्दगी की सभी समस्याओं से जूझने में सक्षम होता है। इस मानसिक स्वास्थ्य में आत्म सम्मान, अपनी अर्न्तशक्तियों का अनुभव, सभी से सार्थक एवं उत्तम सम्बन्ध बनाए रखने की क्षमता एवं मनोवैज्ञानिक श्रेष्ठता जैसे कई आयाम सम्मिलित होते हैं।

कार्ल मेनिंजर ने इसे अधिकतम खुशी तथा प्रभावशीलता के साथ वातावरण एवं दूसरे मनुष्यों से समायोजन के रूप में परिभाषित किया है। उनके अनुसार यह एक सन्तुलित मनोदशा, सतर्क बुद्धि, सामाजिक रूप से मान्य व्यवहार व प्रसन्नता बनाए रखने की क्षमता है। ये परिभाषाएँ भले ही थोड़ा आधी-अधूरी हों, पर इसमें कोई सन्देह नहीं है कि योग विज्ञान मनुष्य की इन सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हुए मानवीय चेतना की अंतःशक्तियों को जाग्रत् एवं सुविकसित करता है। पश्चिमी विद्वानों द्वारा दी गयी मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषाओं के इस अधूरेपन के बारे में वी. मधुसूदन रेड्डी का कहना है कि पाश्चात्य समाज में मानसिक बीमारी एक सामाजिक समस्या है। वहाँ के मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्री दोनों ही इस मानसिक एवं संवेदनात्मक विकृति के मूल कारणों को ठीक से जान समझ नहीं पाए हैं। हालाँकि फिर भी इनकी योग के बारे में कुछ समझ विकसित हुई है। इसी कारण ध्यान और हठयोग की ओर इनका झुकाव हो रहा है। इसी में इस समस्या का समाधान निहित है। मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से योग की ये पद्धतियाँ अनुभाविक एवं प्रायोगिक है।

एस. दलाल ने इस सम्बन्ध में काफी कुछ कहने-लिखने व समझाने की चेष्टा की है। उन्होंने अपनी एक पुस्तक ‘लिविंग विद इन’ में योग साधना के वैज्ञानिक एवं प्रायोगिक जीवन के सर्वथा नए क्षितिज पर जीवन साधना करने वाले महर्षि अरविन्द के पूर्ण योग के सत्यों की व्याख्या की है। अपने इस प्रस्तुतीकरण में श्री दलाल का कहना है कि- सामान्यतया मानसिक स्वास्थ्य संकट को तनाव, उदासी, चिन्ता, असुरक्षा का भाव, क्रोध, ईर्ष्या, सन्देह आदि की उपस्थिति से परिभाषित किया जाता है। इन मनोविकारों की अनुपस्थिति को मानसिक स्वास्थ्य समझा जाता है। परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। क्योंकि मनुष्य के आन्तरिक एवं विधेयात्मक भावों जैसे शान्ति, अन्तः सुरक्षा का भाव, विश्वास, इन्द्रिय निग्रह आदि का इसमें अभाव है। यौगिक जीवन ही मानसिक स्वास्थ्य की एक मात्र सही परिभाषा और उपयोगी समाधान है। योग ही एक मात्र साधन है जो मानसिक विकारों से मुक्ति देने में समर्थ है। पूर्ण यौगिक अवस्था न केवल सभी मनोविकारों से छुटकारा दिलाती है, बल्कि दिव्य गुणों का अभिवर्धन एवं विकास भी करती है।

इस सम्बन्ध में कैलिफोर्निया में एक अच्छी प्रयोगात्मक शुरुआत हुई थी, जिसमें काफी कुछ सफलता भी मिली। इसमें यह निष्कर्ष प्रतिपादित किया गया कि व्यक्तित्व के समग्र विकास के लिए आत्मज्ञान आवश्यक है। इन प्रयोगों के लिए एक ओर योग की तकनीकों व उपचार पद्धतियों को, दूसरी ओर मनोरोगों की पहचान व वैज्ञानिक जाँच के लिए मनोवैज्ञानिक पद्धतियों को सम्मिलित करना आवश्यक माना गया। विश्व भर के विशेषज्ञ अब यह सत्य स्वीकारने लगे हैं कि हठयोग, ध्यान, मूल्य चेतना, योग शिक्षा, ट्रान्सपर्सनल परिकल्पना व आत्मबोध के द्वारा ही सम्पूर्ण मानसिक स्वास्थ्य एवं आन्तरिक शक्तियों का विकास सम्भव है।

इस क्षेत्र में अभी जो कुछ हुआ है, वह बहुत स्वल्प एवं एकाँगी है। योग विज्ञान द्वारा मानसिक स्वास्थ्य उपलब्ध करने के सम्बन्ध में अभी बहुत कुछ करना बाकी है। शोध-अनुसन्धान के इस क्षेत्र में अभी और नए दीप जलाने की आवश्यकता है। युग की इसी आवश्यकता की अनुभव करके देव संस्कृति विश्वविद्यालय में योग विभाग की स्थापना की गयी है। इस विभाग के प्राध्यापक एवं विद्यार्थी ब्रह्मवर्चस शोध अनुसन्धान के शोध वैज्ञानिकों से मिलकर उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। इसके सामयिक निष्कर्ष अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर प्रकाशित भी हुए हैं। आगे आने वाले दिनों में इस शोध कार्य की गति और भी तीव्र होगी। ताकि उसके निष्कर्षों में प्रतिपादित यौगिक जीवन की तकनीकों को अपनाकर सामान्य जन उत्कृष्ट मानसिक स्वास्थ्य एवं उच्चतम आन्तरिक शक्तियों के जागरण व विकास से लाभान्वित हो सके।


विवेकपूर्ण सदुपयोग (Kahani)

राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन राज्यसभा के सदस्य थे, तब की बात है। एक बार अपने भत्ते का चेक लेने वे राज्यसभा के कार्यालय में गए। चेक लेकर वहीं बैठे एक सज्जन से पेन लेकर टंडन जी ने वह चेक लोकसेवा मंडल के नाम हस्ताँतरित कर दिया। इन महोदय से न रहा गया। कहने लगे, टंडन जी, मुश्किल से चार सौ रुपये मिल पाए हैं। उन्हें भी आपने लोकसेवा मंडल को दे दिया। पेन सौंपते हुए टंडन जी कहने लगे, देखो भाई, मेरे सात लड़के हैं और सब अच्छी तरह कमाते हैं। मैंने प्रत्येक पुत्र पर सौ रुपये का व्यय होता है, शेष रकम भी लोकसेवा मंडल को भेज देता हूँ। फिर यह तो और ऊपरी आय है। इसे मैं क्यों अपने लिए रखूँ? राजर्षि टंडन जी की यह निस्पृहता याद दिलाती है कि धन चाहे कितने ही रास्तों में व्यक्ति के पास आए, लोकहित में उसके विसर्जन से अच्छा कोई विवेकपूर्ण सदुपयोग नहीं होता।


राखी के कच्चे धागे ने बदला इतिहास

पेड़ों की चोटियाँ, आस-पास का हरा-भरा वन प्रदेश, वेगवती सिन्धु में किल्लोल करती हुई लहरें, हवा की शीतल बयार से मिलकर सारे वातावरण में एक नए ढंग की अचरज भरी चित्रकारी कर रही थीं। अचरज के रंगों के कुछ छींटे उन शिविरों के अन्दर भी पड़ रहे थे, जो यहाँ लगे थे। शिविरों की ये चहुँमुखी कतारें अपने आपको महान् कहलाने वाले सिकन्दर की थी। दाँव-घात और कुछ राष्ट्रद्रोहियों की मिलीभगत से अभी हाल में ही उसने भारत के थोड़े से सीमावर्ती इलाके जीते थे। अब तक की सभी सफलताओं में सबसे बड़ी सफलता पर्वतेश्वर पोरस की पराजय थी।

लेकिन अपनी इस सफलता पर वह स्वयं को हारा हुआ महसूस कर रहा था। पराजित हुए महाराज पोरस उसके सिंहासन की बगल में रखे हुए एक विशिष्ट आसन पर बैठे हुए थे। विजेता सिकन्दर के शिविर में सेल्यूकस एवं फिलिप आदि विशिष्ट सेनानायक भी थे। इनके चेहरों पर अभी तक युद्ध के आतंक की छाप थी पास ही में दूसरी ओर सिकन्दर की पत्नी सेलीना और सेल्यूकस की बेटी कार्नेलिया भी बैठी हुई थी। विजेता पक्ष के इन सभी जनों के चेहरों पर शर्मिन्दगी की गाढ़ी लकीरें थी। जबकि पराजित महाराज पोरस इन सबकी अपेक्षा कहीं अधिक महान्, कहीं अधिक प्रदीप लग रहे थे।

सिकन्दर को अभी भी वे पल याद थे। जब भीषणतम युद्ध में महाराज पोरस हाथी पर थे और वह स्वयं अपने घोड़े पर था। एक क्षण ऐसा भी आया जब पोरस ने सिकन्दर के घोड़े को मार गिराया। सिकन्दर नीचे धरती पर गिर पड़ा था और पोरस उसे अपने भाले से मारने ही वाला था....। लेकिन ठीक उसी समय उसकी नजर अपनी कलाई के धागे पर पड़ी। एक क्षण.... और अपनी झूठी महानता का स्वाँग भरने वाला सिकन्दर समाप्त हो गया होता। लेकिन महावीर पोरस ने अपना भाला पीछे खींच लिया। युद्ध में ऐसे कई अन्य अवसर और भी आए, जब पर्वतेश्वर उसकी जीवन लीला समाप्त कर सकते थे। परन्तु ऐसा उन्होंने किया नहीं।

युद्ध का निर्णय होने के बावजूद भी सिकन्दर को उन क्षणों का स्मरण करके सिहरन आ गयी। अपने पूरे शरीर में हल्की सी झुरझुरी अनुभव करते हुए उसने पूछा आपको युद्ध के मैदान में क्या हुआ था महाराज? आप मुझे मार देते तो आज आप विजेता होते। सिकन्दर के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए पोरस ने कहा- ‘इस प्रश्न का उत्तर आपकी पत्नी सेलीना बेहतर दे सकती है।’ अपने कथन को बीच में ही छोड़कर वह हल्के से हंस दिए।

सेलीना और सिकन्दर के मन के कैनवास पर कुछ अचरज भरे रंग उभरने लगे। उन्हें याद हो आया कि जब उसने भारत पर आक्रमण किया था। उसके डेरे सिन्धु के तट पर पड़े हुए थे। वर्षा ऋतु जल-थल को एक किए थी। सिन्धु सचमुच ही महासिन्धु बनी हुई थी। उछलती लहरें, उफनता फेन इसे समुद्र का विस्तार दे रही थी। सिकन्दर और उसकी फौजें प्रतीक्षा में थी कि सिन्धु का वेग कुछ थमे, तो वे नदी पार हो सकें।

उन्हीं क्षणों में भारतीय रीति-रिवाजों का थोड़ा-बहुत ज्ञान रखने वाले सिकन्दर को एक कूटनीति सूझी। महावीर पोरस के रणकौशल, उनकी व्यूह रचना, युद्धनीति से यवन सेना आतंकित थी। यवन सैनिकों में लड़ने का कोई उत्साह न था। वे तो सभी सिकन्दर की जोर-जबरदस्ती के कारण मजबूर थे। ऐसे में सिकन्दर ने पोरस की वीरता को अपनी कूटनीति के व्यूह में घेरना चाहा।

इसी कूटनीतिक अभियान के तहत एक नाव सिकन्दर के डेरे से नदी के उस पार भेजी गयी। सिकन्दर की पत्नी सेलीना उस पर सवार थी। श्रावण का महीना था। इन यूनानियों को यह मालूम था कि भारत में श्रावण के महीने में स्त्रियाँ अपने भाइयों के कलाई में राखी बाँधती हैं- इसे रक्षाबन्धन कहते हैं। भाई वायदा करता है कि वह अपनी बहन की रक्षा करेगा, चाहे इसके लिए उसे अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े। सिकन्दर की पत्नी सेलीना का पोरस के दरबार में स्वागत किया गया। उसे राजमहल में ले जाया गया।

पोरस ने पूछा- ‘आप क्यों आई? आपने मुझे बुला लिया होता, मुझे खबर भेजी होती तो मैं स्वयं आपके शिविर में आ गया होता। इस समय सिन्धु को पार करना बहुत जोखिम से भरा था।’ सेलीना बोली- ‘मुझे तो आना ही था... क्योंकि श्रावण का महीना है। मेरा कोई भाई नहीं है और मैं आपको अपना भाई बनाना चाहती हूँ।’

पोरस ने कहा था- ‘यह तो अच्छा संयोग है। मेरी भी कोई बहन नहीं है। मैं आपको अपनी बहन बनाकर बहुत प्रसन्न होऊँगा।’ सेलीना ने पोरस की कलाई पर राखी का धागा बाँध दिया। पोरस ने वचन दिया कि चाहे उसे अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े- वह उसकी रक्षा करेगा।

सेलीना बोली, भैया मैं आपकी बात पर भरोसा करती हूँ। मुझे मालूम है कि भारत देश के वीर अपने वचन के पक्के होते हैं। लेकिन मैं आपसे अपनी नहीं अपने सुहाग की रक्षा का वचन चाहती हूँ। आप बस इतना स्मरण रखें, कि शीघ्र ही आपका मेरे पति के साथ युद्ध होगा। आप बस इतना ख्याल रखें कि वह आपकी बहन का पति है और आपकी बहन विधवा न बने। सेलीना की इन बातों के जवाब में वीर शिरोमणि पोरस ने कहा था, ‘ठीक है बहन, यह एक भाई का वायदा है कि तुम मेरे जीवित रहते विधवा नहीं बनोगी।’

बीते हुए घटनाचक्र का स्मरण कर सेलीना की आँखों में कृतज्ञता बरस पड़ी। सिकन्दर का सिर भी नीचे हो गया। उसने कहा, वीरवर पोरस! मैं जानता हूँ कि सेलीना को आपके पास भेजकर राखी बाँधने के लिए प्रोत्साहित करना, मेरे लिए एक कूटनीति भर थी। मेरे जीवन में कभी भी साधनों का कोई प्रश्न नहीं रहा है। साध्य को ही मैंने सब कुछ समझा है। पर मैं जानता हूँ कि राखी के प्रति आपकी भावनात्मक प्रतिबद्धता के कारण ही मैं न केवल जीवित हूँ, बल्कि विजेता भी हूँ। लेकिन यह विजय और जीवन मुझे आपसे मिले हैं।

हंसते हुए पोरस ने कहा, यवनराज! राखी बाँधते हुए भारत देश के पुरोहित एक मंत्र पढ़ते हैं-

येन बद्धो बलीराजा, दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि, रक्षो मा चल मा चल॥

अर्थात्- यह वह रक्षा सूत्र है जिससे महाबलवान दानवों के राजा बली बाँधे गए। रक्षा सूत्र तुम चल-विचल मत हो, प्रतिष्ठित बने रहो।

रक्षा सूत्र की यह महिमामय प्रतिष्ठ हमारी गौरवपूर्ण साँस्कृतिक परम्परा है। मैंने आपको जीवन दान देकर अपने देश के साँस्कृतिक गौरव को अक्षुण्ण रखा है। वैसे भी हम भारतवासी दूसरे के देश में घुसकर आतंक फैलाने, उनकी भूमि हड़पने में यकीन नहीं रखते। हमारा यकीन तो हृदयों पर विजय पाने में है। हम तो साँस्कृतिक दिग्विजय को अपना जीवन अभियान मानते हैं।

भारत देश की साँस्कृतिक परम्परा और उसके जीवन्त प्रतीक महावीर पोरस के इन वचनों को सुनकर सिकन्दर अभिभूत हो गया। इतिहासवेत्ता भी इस तथ्य से सहमत हैं कि इसके बाद सिकन्दर वापस लौट गया। वह भारत में और आगे नहीं बढ़ा। कोई भी यह ठीक-ठीक नहीं बता पाया कि वह वापस क्यों लौट गया। क्योंकि वह तो युद्ध जीत गया था। अब तो पूरे भारत के द्वार उसके लिए खुले थे। वह दूसरे राज्यों में प्रवेश कर सकता था। पर्वतेश्वर का राज्य तो सीमा के पास का छोटा राज्य था। लेकिन तथ्यान्वेषी जानते हैं कि सिकन्दर की वापसी भारत देश की संस्कृति के सामने उसके समर्पित होने का परिणाम थी। यह राखी के बन्धन के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ पोरस की उदात्त भावनाओं के सामने सिकन्दर की भावनाओं की हार की परिणति थी। जिसके कारण उसे यह सच स्वीकार करना पड़ा कि यथार्थ में महान् वह नहीं, राखी का प्रण निभाने वाले सम्राट पोरस हैं।


‘सत्यं वद’ (Kahani)

पाँच पाँडव-सौ कौरव द्रोणाचार्य की पाठशाला में पढ़ने गए। सभी शिष्य एक पाठ रोज याद कर लेते, पर युधिष्ठिर को कई दिन से एक ही पाठ को रटते हो गए। गुरुजी ने झल्लाकर इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया, ‘सत्यं वद’ इस पहले पाठ को शब्दों से याद नहीं कर रहा हूँ। जीवन में उतारने का ताना-बाना बुन रहा हूँ। जब एक पाठ हृदयंगम हो जाएगा, तब दूसरा आरंभ करूंगा।


पैंसठ वर्ष की एक अनंत यात्रा के प्रारंभिक पड़ाव

अखण्ड ज्योति की अंतर्कथा से कम ही लोग परिचित हैं। ज्यादातर पाठक-परिजन तो इसके प्रभावशाली बाह्य विस्तार के आत्मीय बन्धन में अपने-आपको लपेटा-समेटा हुआ अनुभव करते हैं। उन्हें यह भी अनुभूति होती है कि अखण्ड ज्योति ईश्वरीय प्रकाश का प्रकाशन है। इसमें प्रकाशित होने वाले भाव और विचारों के साथ प्रकाशन व्यवस्था के प्रत्येक पहलू में इस दैवी प्रकाश की प्रदीप्ति है। इसके पवित्र उजाले से लाखों अन्तःकरण प्रतिमास प्रकाशित और प्रभावित होते हैं।

लेकिन यह आन्तरिक सत्य कम ही लोग अनुभव कर पाते हैं कि इस व्यापक प्रभाव का कारण प्रकाशन तंत्र का सर्वसमर्थ परमेश्वर के प्रति अटूट विश्वास और अडिग आस्था है। विश्वास व आस्था की इसी अविचलता ने अखण्ड ज्योति के पृष्ठो, पंक्तियों तथा प्रकाशन व्यवस्था के प्रत्येक क्रिया-कलापों में ईश्वरीय प्रकाश के दैवी अवतरण को सहज सम्भव बनाया है। अखण्ड ज्योति के सभी साधन और साध्य भगवद्-विश्वास के रस में भीगे और डूबे हैं। यही वह वास्तविक पूँजी है, जिसके बल बूते इसका प्रकाशन प्रारम्भ हो सका। वर्तमान में भी यही अलौकिक निधि काम आ रही है।

अपने जन्म से ही प्रचण्ड भगवद्विश्वास की प्राण शक्ति के सहारे अखण्ड ज्योति ने अपनी जीवन यात्रा शुरू की। कठिनाइयाँ और संकट पग-पग पर आए, पर हर बार प्रभुविश्वास ही सहारा बना। अखण्ड ज्योति की इस अंतर्कथा को उजागर करते हुए परम पूज्य गुरुदेव ने वर्ष 1940 के अप्रैल अंक में लिखा- ‘कदाचित कुछ प्रेमी इस बाहरी रूप को देखकर अखण्ड ज्योति की भीतरी स्थिति भी जानना चाहते होंगे। उन्हें कुछ थोड़ा सा भीतरी परिचय करा देना इसलिए आवश्यक प्रतीत होता है, क्योंकि पाठकों को हम अपना परिवार समझते हैं। उन्हें हक है कि अपनी चीज के बाहरी रूप को देखने के साथ भीतरी बातें भी जानें।’

इस अंतर्कथा का पहला सत्य यह है कि ‘अखण्ड ज्योति का संचालक इन पंक्तियों का लेखक, सम्पादक आर्थिक दृष्टि से कोई ऊँचा व्यक्ति नहीं है। अपनी कुछ एक हजार रुपये की छोटी सी पूँजी से उसने इतने बड़े उत्तरदायित्व के जहाज का लंगर खोल दिया है। उसका विश्वास है ‘नरसी भगत’ वाले ‘साँवलिय्य शाह’ इस जहाज को पार लगावेंगे। छह सात महीने में संचालक की वह पूँजी समाप्त हो गयी। और घाटे का मसान गला घोंटने के लिए सामने आ खड़ा हुआ। अर्थ चिन्ता बड़ी कठिन होती है। आमदनी बढ़ाना या खर्च घटाना यही दो सूरतें हो सकती थीं।

आमदनी बढ़ती न दिखी तो खर्च घटाया। तिरंगा मुख पृष्ठ छोड़ना पड़ा। भीतर का रंगीन तस्वीर बन्द हो गयी, कागज हल्का हुआ। दफ्तर का मकान पन्द्रह रुपये माहवार किराये से घटाकर चार रुपये महीने के छोटे कमरे में लाया गया। चन्द अनिवार्य कार्यकर्त्ताओं को छोड़कर शेष कर्मचारियों के कार्य भी सम्पादक ने अपने ही हाथ में ले लिया। और नित्य सोलह घण्टे स्वयं काम करने की व्यवस्था हुई। इस प्रकार खर्च में बहुत कुछ कमी करके घाटे को हल्का किया गया। फिर भी असुविधा दूर नहीं हो सकती। डेढ़ रुपया वार्षिक मूल्य के अखबार के कागज छपाई, पोस्टेज आदि के बाद इस महंगाई में भला क्या बच सकता है? ऐसी दशा में कार्य की महत्ता को देखते हुए घाटे का होना स्वाभाविक है।’

इस गहरी आर्थिक विपन्नता में परम पूज्य गुरुदेव की प्रकाशन नीति यथावत बनी रही। उन्होंने न तो भारी-भरकम धनराशि देने वाले विज्ञापन दाताओं का सहारा लिया और न ही धन राशि देकर अहसान जताने वाले धनवानों का। विपन्नता की इस संकट भरी दशा में उनका प्रभु विश्वास सम्पूर्ण रूप से समृद्ध रहा। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा- ‘अखण्ड ज्योति के लिए अपने उदार बन्धुओं से याचना करते तो झोली खाली न रहती। परन्तु हम इस बात पर विश्वास करते हैं कि लोकोपयोगी कार्य, जो जनता जनार्दन की निस्वार्थ सेवा के लिए पवित्र भावनाओं से किए गए हैं, यह है।

और यज्ञ की बाह्य व्यवस्था का भार प्रभु पर है। ‘योग क्षेम वहाम्यहम्’ के संकल्प से वह प्रतिज्ञाबद्ध है कि सत्य धर्म की रक्षा करें। फिर हम किसी से क्या याचना करें? यदि हमारा कार्य अपवित्र है, हमारी भावनाएँ हीन है, तो हमें नष्ट हो जाना चाहिए। और यदि हम धर्म प्रचार के मिशन के लिए जीवित हैं, तो वह घट-घट वासी परमात्मा जिन्हें निमित्त बनाना चाहता होगा, उनके हृदयों में प्रेरणा भरेगा कि इस मुरझाते हुए धर्म तरु को सींचने के लिए अपने भरे हुए जल पात्रों में से एक-एक चुल्लू पानी का इसके लिए भी त्याग करें।

अखण्ड ज्योति परिवार गुण ग्राहकों, सच्ची सेवा का महत्व जानने वाले बुध जनों, उच्च अधिकारारुढ़ों, धनी मानियों, महापुरुषों, साधु महात्माओं, ईश्वर भक्तों और सुहृदयों से भरा पड़ा है। ईश्वर जब उनके हृदयों में प्रेरणा करेगा तो वे अपनी श्रद्धानुसार इस मुरझाते हुए धर्मतरु को सींचने के लिए स्वयं दौड़ेंगे। यह काम हमारा नहीं है कि अपने विशुद्ध तप के कर्त्तव्य को पूरा करने के लिए साथ-साथ हम झोली भी फैलाये घूमें।’ इन पंक्तियों में परम पूज्य गुरुदेव की भावदशा की झलक है। उनके परम विश्वासी भक्त हृदय की अभिव्यक्ति है। ईश्वर के प्रति निष्ठावान, समर्पित भक्त की टेक है। अपने आराध्य पर श्रद्धासिक्त विश्वास है।

इसी सब को उन्होंने अपनी निधि माना था। इसी वास्तविक पूँजी के सहारे उन्होंने अखण्ड ज्योति का प्रकाशन शुरू किया था। जब-जब झंझावातों के दौर आए। तब-तब वह अपने प्रभु विश्वास की निष्कम्प ज्योति को लिए चलते रहे। उनका विश्वास हर बार विजयी हुआ। परिस्थितियों की चुनौती हर बार हारी। अखण्ड ज्योति सदा ही ईश्वरीय प्रकाश का वितरण करती रही। अपने जीवन का यही सत्य उन्होंने अपने अनुयायी शिष्यों-साधकों को भी सिखाया।

ईश्वर विश्वास को अपना दृढ़ अवलम्ब मानकर अधिक से अधिक श्रम करते रहना- यही अखण्ड ज्योति की प्रकाशन नीति है। परम पूज्य गुरुदेव ने यही सीख दी है कि अखण्ड ज्योति के साध्य से कभी विचलित मत होना। सर्व समर्थ प्रभु स्वयं ही साधनों के अम्बार लगा देंगे। भक्तों के प्रेरक भगवान् स्वयं ही अपने प्रिय भक्तों को इस पवित्र कार्य के लिए माध्यम बनाते रहेंगे। अखण्ड ज्योति की अंतर्कथा यूँ ही अपनी अनन्त यात्रा के भक्ति, विश्वास एवं श्रद्धा से परिपूर्ण विवरणों को अपने आप में संजोती रहेगी।


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महाकाल का संदेश

परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर जनकल्याण हेतु साहित्य सृजन किया, उनके तप एवं ज्ञान का निचोड़ उनके साहित्य में है। सभी लोगों तक यह ज्ञानगंगा पहुँचे, इसीलिए ‘पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय’ का प्रकाशन किया गया है। लाखों ने इसे पढ़कर जीवन धन्य बनाया है। हर घर में वाङ्मय की स्थापना होनी चाहिए, परिवार के लिए यह अमूल्य धरोहर एवं विरासत है।

यदि आपको भगवान ने श्री संपन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वाङ्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। विवाह, जन्मदिवस एवं अन्य उत्सवों पर अथवा पारितोषिक स्वरूप भी यह साहित्य अमूल्य भेंट सिद्ध होगा। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा, धन्य होगा। शास्त्रों में कहा है-

सर्वेषामेव दानानाँ ब्रह्यदानं विशिष्यते। वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाञ्जनसर्पिषाम्॥ - मनुस्मृति 4/233

जल, अन्न, गौ, पृथ्वी, वस्त्र, तिल, सुवर्ण और घी, इन सबके दानों में से ज्ञान का दान सबसे उत्तम है।

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञ्नयज्ञः परंतप। सर्व कर्मखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥ -गीता 4/33

हे परंतप। द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि जितने भी कर्म हैं, वे सब ज्ञान में ही समाप्त होते हैं। ज्ञानदान सर्वोपरि पुण्य है, शुभ कार्य है।


दुःख की चोटें बनाती हैं आदमी को

हवाओं में गर्मी का तीखापन था। मन को बेचैन करने वाली उमस अग-जग में सब ओर पसरी थी। लू के थपेड़े पल-पल में पथ पर चलने वाले बटोहियों के तन पर चोट करके चले जाते थे। इन चोटों से आने-जाने वालों का तन ही नहीं मन भी विकल हो उठता। इनमें से कई तो यह भी सोचने लगते कि शायद झुलसाने वाली गर्मी की पीड़ा से भरी हुई इन राहों की ही तरह जीवन की राहें भी हैं। किधर भी जाओ, कहीं भी पाँव बढ़ाओ गर्म हवाओं की चोटें लगेगी ही। दर्द के तीखे थपेड़ों को सहना ही पड़ेगा। समझ में नहीं आता कि जिन्दगी की राहों में इतना दर्द क्यों है? विश्व के वास्तुकार ने पीड़ा के चौबारे क्यूँ खड़े किए हैं? क्या इस दर्द का भी कोई अर्थ है? इसके बढ़ते-घटते, उभरते-उफनते रूपों का क्या रहस्य है।

इन प्रश्न कंटकों के साथ पाँवों ने ब्रह्मवर्चस से शान्तिकुञ्ज का सफर कब तय कर लिया, पता ही नहीं चला। उधेड़-बुन तो तब टूटी, जब द्वार-दरवाजे पार करने और सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद परम पूज्य गुरुदेव के दर्शन हुए। वह अपने कमरे में टहल रहे थे। वातावरण की बेचैन करने वाली गर्मी से वह सर्वथा अप्रभावित थे। चारों ओर के लू के थपेड़ों के बीच उनकी स्थितप्रज्ञता निष्कल्प, अचंचल एवं अडिग थी। कमरे में गर्मी की तपन तो थी, पर यह उनके महातप के सामने क्षुद्र, नगण्य और अस्तित्वहीन हो गयी थी। कमरे का पंखा ठहरा हुआ था। इस तीखी गर्मी में भी उन्हें इसकी कोई आवश्यकता नहीं महसूस हो रही थी।

जबकि आने वाले पसीने से लथ-पथ थे। गर्मी की विकलता से उनका चेहरा लाल हो रहा था। ‘अपने प्रति कठोरता-दूसरों के प्रति उदारता’ सूत्र के सूत्रकार गुरुदेव ने उनकी दशा समझकर मुस्कराते हुए पंखा चला दिया। पंखा चलाने के साथ ही वह अपने पलंग पर बैठ गए। पंखे की बढ़ती गति के साथ आने वालों को राहत मिलती गयी। उनकी सोच में कहीं यह भी अंकुरित हुआ कि दर्द और पीड़ा से भरी राहों में शायद कहीं सुख की छाँव भी है। भले ही इसकी अवधि कितनी भी क्यों न हो? पंखों की हवा में कुछ पल गुजारने के बाद उन्होंने लेख सुनाने का संकेत किया। लेख की पंक्तियाँ शुरू करने के साथ ही वह अपने पलंग पर लेट गए। लेटे हुए उनकी चेतना की चिन्तन धारा अविराम थी। पर साथ ही वह लेख की पंक्तियाँ भी सुन रहे थे।

जहाँ तक याद पड़ता है- उस दिन लेख की पंक्तियाँ कुछ यूँ थी- ‘संसार में सुख नहीं है, सुख स्वयं में है।’ यह सुनकर गुरुदेव बोले- इस बात का मतलब समझते हो? उनके इस प्रश्न को सुनकर लेख सुनाने वाला रुक गया। उसमें उम्मीद जगी कि गुरुदेव कुछ विशेष बताएँगे। उम्मीद के इस आँगन को अपनी शब्द किरणों से प्रकाशित करते हुए वह कहने लगे- संसार का मतलब ही यह होता है, जो स्वयं से चूक गया और दूसरे पर जिसकी नजर अटक गयी। तुम संसार का ठीक-ठीक अर्थ नहीं समझते। तुम समझते हो संसार का मतलब, ये वृक्ष, ये पहाड़, ये चाँद-तारे, ये बाजार, ये दुकान, यह संसार है। तुम संसार का मनोवैज्ञानिक अर्थ नहीं समझते।

संसार का अर्थ है, किसी दूसरे में सुख, किसी और में सुख, कहीं और सुख। इस तरह की जो अज्ञान दशा है, उसका नाम संसार है। और जो इस अज्ञान दशा में चलता जाता है, चलता जाता है, संसरण करता है- वह संसार में जी रहा है। अज्ञान दशा में संसरण करने वाला सोचता है, इधर नहीं मिला, उधर मिलेगा, वहाँ पहुँच जाता है। वहाँ भी नहीं मिलता तो और आगे बढ़ जाता है। ऐसे संसरण करने की प्रक्रिया का नाम संसार है।

जिस दिन तुम यह जाग कर समझ लोगे, कि सुख कहीं नहीं मिलता, न यहाँ और न वहाँ। जब तुम्हें ऐसा बोध होगा और तुम जागकर खड़े हो जाओगे। तुम्हारा होश का दीया जलेगा। आंखें दूसरे से हटकर अपने पर पड़ेंगी। तुम्हारी ज्योति तुम्हें ज्योतिर्मय करेगी, उसी क्षण सुख है।

जिन्दगी में जो दुःख की चोटें हैं, वे इसी सुख की ओर मोड़ने के लिए हैं। हर चोट इसी सच्चाई को बताने के लिए है। यदि अपना चिन्तन सही रखा जाय तो जीवन का प्रत्येक दुःख व्यक्ति को आध्यात्मिक बनाता है। दुःख की चोटों से मनुष्य की अन्तर्चेतना में निखार आता है। तो दर्द एकदम व्यर्थ नहीं है, दुःख एकदम व्यर्थ नहीं है। दुःख है बाहर, लेकिन वही चोट निहाई बनती है, हथौड़ा बन जाती है। वही चोट छेनी बन जाती है। वही चोट तुम्हारे भीतर जो-जो व्यर्थ है, बेकार है, उसे काट देती है, जला देती है। वही चोट तुम्हें जगाती है।

एक पंक्ति में इतना जीवन दर्शन है, इसका प्रबोध गुरुदेव के शब्दों से हुआ। दर्शन के लिए दृष्टि चाहिए। दृष्टि हो तो दर्शन है। दृष्टि न हो तो अंधियारे के सिवा और कुछ नहीं। और यह दृष्टि सद्गुरु कृपा से मिलती है। सद्गुरु कृपा के बिना इसका मिलना किसी भी तरह सम्भव नहीं है। सामान्य समझ दुःख में हमेशा दोष ही दोष देखती है। लेकिन दुःख का भी कोई उद्देश्य है, यह सत्य पहली बार पता चला। यह सच्चाई जीवन में पहली बार उजागर हुई कि दुःख का भी एक दर्शन है। बस इसे देखने वाली दृष्टि चाहिए।

हवाओं में अभी भी वैसी ही गर्मी थी। लू के थपेड़े अभी भी वातावरण में यथावत चोटें कर रहे थे। पर अब गुरुदेव के शब्द इन्हें अर्थ दे रहे थे। वह कह रहे थे- बेटा! गर्मी की विकलता ही बरसात की सुरम्यता बनती है। गर्म हवाएँ ही फसलें पकाती हैं। लू के थपेड़ों से ही धरती का जल वाष्पीभूत होकर मेघों का रूप लेता है। जीवन में भी कुछ ऐसा ही है। इसकी राहों में मिलने वाले दर्द का अगर थोड़ा समझपूर्वक उपयोग किया जाय तो इससे बहुत कुछ हो सकता है। इसी की चोटों से तुम्हारे भीतर छिपी हुई मूर्ति प्रकट होगी। दुःखों की आग जब तुम्हें जलाएगी, और जलाएगी, और जलाएगी, तभी तुम्हारा स्वर्ण निखरकर कुंदन बनेगा।

गुरुदेव के इन शब्दों में उनकी प्राण चेतना की अभिव्यक्ति थी। उनके जीवन के अनुभवों का जीवन्त सार था। वह जो कह रहे थे- वह केवल शब्दों का बन्धन नहीं था। उसमें उनकी चेतना की चमक थी। बड़ा गहरा अर्थ और भाव था उनके शब्दों में। वह बता रहे थे- जीवन में दर्द तो है, पीड़ा तो है, मगर यही पीड़ा निखारती है, माँजती है, सजाती है, संवारती है। जो लोग इस पीड़ा से पीछा छुड़ाकर किसी सुख की तलाश में भागते हैं। वे कहीं भी क्यों न जाएँ, पर संसार में ही भटकते हैं। और जो इस पीड़ा की सघनता में जागते हैं, वे अध्यात्म में जीते हैं। सुख की तलाश में भागे तो संसार। और यदि पीड़ा में जागे तो अध्यात्म। यह अच्छी तरह से जान लो कि अध्यात्म पीड़ा से भागने वाले कायरों का कर्म नहीं है। यह तो दर्द और पीड़ा की चोटों को सहते हुए जागने वालों वीरों का धर्म है।

अपनी बातों का सार निष्कर्ष बताकर गुरुदेव मौन हो गए। उन्होंने इन लोगों को वापस लौटने का संकेत करते हुए पंखे का स्विच ऑफ कर दिया। पंखे की गति मन्द पड़ने लगी। ये लोग भी उन्हें भक्ति पूर्ण प्रणाम करने के बाद अपने निवास की ओर चल पड़े। राहें अभी भी झुलसाने वाली गर्मी से घिरी थी। पर वापस लौटने वाले किसी एक की शान्त-शीतल अन्तर्चेतना में बोध के ये स्वर फूट रहे थे-

जीवन दर्द का झरना है जो भी जीते हैं दर्द भोगते हैं लेकिन हमें दर्द भोगते हुए जागना है यही तो जीवन की सत्य-साधना है दर्द नियति के आँगन में पड़ी निहाई है दर्द भगवान् के हाथों का हथौड़ा है भगवान् हम पर चोटें देकर हमें संवारता और गढ़ता है यह बात सुनिश्चित है कि आदमी दर्द में विकसित होता खूबसूरत बनता और बढ़ता है।


सद्गुरु से मिलना जैसे रोशनी फैलाते दिए से एकाकार होना

गुरुगीता साधक संजीवनी है। इसकी पहली कड़ी में साधकों ने गुरुतत्त्व की जिज्ञासा का प्रसंग पढ़ा। साधकों की आदिमाता महादेवी पार्वती ने परमगुरु भगवान् शिव से यह जिज्ञासा की। आदिमाता की इस जिज्ञासा पर भगवान् शिव अति प्रसन्न हुए। उच्चतम तत्व के प्रति जिज्ञासा भी उच्चतम चेतना में अंकुरित होती है। उत्कृष्टता एवं पवित्रता की उर्वरता में ही यह अंकुरण सम्भव हो पाता है। जिज्ञासा- जिज्ञासु की भावदशा का प्रतीक है। इसमें उसकी अन्तर्चेतना प्रतिबिम्बित होती है। जिज्ञासा के स्वरूप में जिज्ञासु की तप-साधना, उसके स्वाध्याय, चिन्तन-मनन व निदिध्यासन की झलक मिलती है। माता पार्वती की जिज्ञासा भी हम सब गुरुभक्तों की कल्याण कामना के उद्देश्य से उपजी थी। सर्वज्ञानमय माँ ने अपनी सन्तानों की आध्यात्मिक उन्नति के लिए देवेश्वर शिव से प्रश्न किया था।

उत्तर में भगवान् शिव बोले- ईश्वर उवाच

मम रुपासि देवित्वं त्वत्प्रीर्त्यथं वदाम्यहम्। लोकापकारकः प्रश्नो न केनाऽपि कृतः पुरा॥4॥

दुर्लभं त्रिषु लोकेषु तदशृणुस्व वदाम्यहम्। गुरुं विना ब्रह्म नान्यत् सत्यं सत्यं वरानने॥5॥

हे देवी! आप तो मेरा अपना स्वरूप हैं। आपका यह प्रश्न बड़ा ही लोकहितकारी है। ऐसा प्रश्न पहले कभी किसी ने नहीं पूछा। आपकी प्रीति के कारण इसके उत्तर को मैं अवश्य कहूँगा। हे महादेवी! यह उत्तर भी तीनों लोकों में अत्यन्त दुर्लभ है। परन्तु इसे मैं कहूँगा। आप सुने, सद्गुरु के सिवाय कोई ब्रह्म (कोई अन्य उच्चतम तत्व) नहीं है। हे सुमुखि, यह सत्य है, सत्य है।

भगवान् शिव के इस कथन के प्रथम चरण में गुरु और शिष्य की अनन्यता, एकात्मता और तादात्म्यता है। गुरु और शिष्य अलग-अलग नहीं होते। बस उनके शरीर अलग-अलग दिखते भर हैं। उनकी अन्तर्चेतना आपस में घुली मिली होती है। सच्चा शिष्य गुरु का अपना स्वरूप होता है। उसमें सद्गुरु की चेतना प्रकाशित होती है। शिष्य के प्राणों में गुरु का तप प्रवाहित होता है। शिष्य के हृदय में गुरु की भावनाओं का उद्रेक होता है। शिष्य के विचारों में गुरु का ज्ञान प्रस्फुटित होता है। ऐसे गुरुगत प्राण शिष्य के लिए कुछ भी अदेय नहीं होता। सद्गुरु उसे दुर्लभतम तत्व एवं सत्य बनाने के लिए सदा सर्वदा तैयार रहते हैं। शिष्य के भी समस्त क्रियाकलाप अपने सद्गुरु की अन्तर्चेतना की अभिव्यक्ति के लिए होते हैं।

महादेव शिव के कथन का अन्तिम सत्य यह है कि ‘गुरु ही ब्रह्म है।’ यह संक्षिप्त कथन बड़ा ही सारभूत है। इसे किसी बौद्धिक क्षमता से नहीं भावनाओं की गहराई से समझा जा सकता है। इसकी सार्थक अवधारणा के लिए शिष्य की छलकती भावनाएँ एवं समर्पित प्राण चाहिए। जिसमें यह पात्रता है, वह आसानी से भगवान् भोलेनाथ के कथन का अर्थ समझ सकेगा। ‘गुरु ही ब्रह्म है’ में अनेकों गूढ़ार्थ समाए हैं। जो गुरुतत्त्व को समझ सका, वही ब्रह्मतत्त्व का भी साक्षात्कार कर पाएगा। सद्गुरु कृपा से जिसे दिव्य दृष्टि मिल सकी, वही ब्रह्म का दर्शन करने में सक्षम हो सकेगा। इस अपूर्व दर्शन में द्रष्ट, दृष्टि, एवं दर्शन सब एकाकार हो जाएँगे। अर्थात् शिष्य, सद्गुरु एवं ब्रह्मतत्त्व के बीच सभी भेद अपने आप ही मिट जाएँगे। यह सत्य सूर्य प्रभाव की तरह उजागर हो जाएगा कि सद्गुरु ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही अपने सद्गुरु के रूप में साकार हुए हैं।

भगवान् शिव कहते हैं, सद्गुरु की कृपा दृष्टि के अभाव में-

वेदशास्त्रपुराणानि इतिहासादिकानि च। मंत्रयंत्रादि विद्याश्च स्मृतिरुच्चादनादिकम्॥6॥

शैवशाक्तागमादीनि अन्यानि विविधानि च। अपभ्रंशकराणीह जीवानाँ भ्रान्तचेतसाम्॥7॥

वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास, स्मृति, मंत्र, यंत्र, उच्चाटन आदि विद्याएँ, शैव-शाक्त, आगम आदि विविध विद्याएँ केवल जीव के चित को भ्रमित करने वाली सिद्ध होती है।

विद्या कोई हो, लौकिक या आध्यात्मिक उसके सार तत्व को समझने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है। विद्या के विशेषज्ञ गुरु ही उसका बोध कराने में सक्षम और समर्थ होते हैं। गुरु के अभाव में अर्थवान् विद्याएँ भी अर्थहीन हो जाती है। इन विद्याओं के सार और सत्य को न समझ सकने के कारण भटकन ही पल्ले पड़ती है। उच्चस्तरीय तत्वों के बारे में पढ़े गए पुस्तकीय कथन केवल मानसिक बोझ बनकर रह जाते हैं। भारभूत हो जाते हैं। जितना ज्यादा पढ़ो, उतनी ही ज्यादा भ्रान्तियाँ घेर लेती हैं। गुरु के अभाव में काले अक्षर जिन्दगी में कालिमा ही फैलाते हैं। हाँ यदि गुरुकृपा साथ हो तो ये काले अक्षर रोशनी के दीए बन जाते हैं।

चीन में एक सन्त हुए हैं। शिन-हुआ। इन्होंने काफी दिनों तक साधना की। देश-विदेश के अनेक स्थानों का भ्रमण किया। विभिन्न शास्त्र और विद्याएँ पढ़ी। परन्तु चित को शान्ति न मिली। सालों-साल के विद्याभ्यास के बावजूद अविद्या की भटकन एवं भ्रान्ति यथावत बनी रही। उन दिनों शिन-हुआ को भारी बेचैनी थी। अपनी बेचैनी के इन्हीं दिनों में उनकी मुलाकात बोधि धर्म से हुई। बोधिधर्म उन दिनों भारत से चीन गए हुए थे। बोधिधर्म के सान्निध्य में, उनके संपर्क के एक पल में शिन-हुआ की सारी भ्रान्तियाँ, समूची भटकन समाप्त हो गयी। उनके मुख पर एक ज्ञान की अलौकिक दीप्ति छा गयी। बात अनोखी थी। जो सालों-साल अनेकानेक शास्त्रों एवं विद्याओं को पढ़कर न हुआ, वह एक पल में हो गया।

अपने जीवन की इस अनूठी घटना का उल्लेख शिन-हुआ ने अपने संस्मरणों में किया है। उन्होंने अपने गुरु बोधिधर्म के वचनों का उल्लेख करते हुए लिखा है- विद्याएँ और शास्त्र दीए के चित्र भर हैं। इनमें केवल दीए बनाने की विधि भर लिखी है। इन चित्रों को, विधियों को कितना ही पढ़ा जाय, रटा जाय, इन्हें अपनी छाती से लगाए रखा जाय, थोड़ा भी फायदा नहीं होता। दीए के चित्र से रोशनी नहीं होती। अंधेरा जब गहराता है, तो शास्त्र और विद्याओं में उल्लेखित दीए के चित्र थोड़ा भी काम नहीं आते। मन वैसा ही तड़पता रहता है।

लेकिन सद्गुरु से मिलना जैसे जलते हुए, रोशनी को चारों ओर फैलाते हुए दीए से मिलना है। शिन-हुआ ने लिखा है कि उनका अपने गुरु बोधीधर्म से मिलना ऐसे ही हुआ। वह कहते हैं कि प्रकाश स्रोत के सम्मुख हो तो भला भ्रान्तियों एवं भटकनों का अंधेरा कितनी देर तक टिका रह सकेगा? यह कोई गणित का प्रश्नचिह्न है। इसका जवाब जोड़-घटाव, गुणा-भाग में नहीं, सद्गुरु कृपा की अनुभूति में है। जीवन में यह अनुभूति आए तो सभी विद्याएँ, सारे शास्त्र अपने आप ही अपना रहस्य खोलने लगते हैं। शास्त्र और पुस्तकें न भी हों तो भी गुरुकृपा से तत्वबोध होने लगता है। गुरुकृपा की महिमा ही ऐसी है। इस महिमा की अभिव्यक्ति गुरुगीता की अगली कथा-गाथा में होगी। अखण्ड ज्योति के अगले अंक में इसकी उज्ज्वल किरणें प्रकाशित होंगी। क्रमशः।


प्रभू के संदेश की अवहेलना (Kahani)

विधाता ने मनुष्य को सर्वसाधन संपन्न बनाकर धरती पर भेजा, पृथ्वी पर मनुष्य को शाँति न मिली।

वह विधाता के पास पहुँचा और कहा, “कृपाकर कुछ देवदूत भेज दीजिए, जिससे हमारी व्यथा दूर हो।” विधाता ने देवता भेजे। वे शाँति प्राप्त करने के उपाय संयम और कर्तव्य के रूप में समझाते रहे। किसी ने उनका परामर्श न सुना और अपनी ही बात कहते रहे। देवता दुःखी होकर लौट गए।

मनुष्य फिर पहुँचा और ईश्वर से सहायता करने के लिए इस बार और भी विनयपूर्वक अनुरोध किया।

विधाता ने सशर्त सहायता का वचन दिया। जो संयमशीलता, कर्तव्यपरायणता अपनाएँगे, उन्हीं को देवताओं की सहायता मिल सकेगी। तब से वे वही क्रम चला आया है, जो शर्त पूरी करते हैं, उन्हें ही देवता सुख-शाँति प्रदान करते हैं। वे दुर्भाग्यशाली हैं, जो प्रभू के संदेश की अवहेलना कर जीवन रूप अक्षय संपदा को सतत लुटाते और आँसू बहाते रहते हैं।


बस। मन को साक्षी भर बना लो

सभी योग साधकों ने पिछले महीने योग साधना के लक्ष्य को पहचाना। चित्तवृत्ति निरोध के सुफल को आत्मसात किया। इस सत्य पर निदिध्यासन किया कि यदि चित्तवृत्तियों का निरोध हो सके तो साक्षी होने का भाव उपलब्ध होता है। साक्षी की स्वयं के स्वरूप में अवस्थिति होती है। लेकिन यदि ऐसा न हो पाए तब? इस प्रश्न का उत्तर महर्षि पतंजलि अपने अगले सूत्र यानि कि समाधि पाद के चौथे सूत्र में देते हैं। वह कहते हैं- ‘वृत्तिसारुप्यमितरत्र (1/4)।’ साक्षी होने के अलावा अन्य सभी अवस्थाओं में मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य हो जाता है। ये वृत्तियाँ साधक की अन्तर्चेतना को मनचाहा भटकाती हैं। सुख-दुख के सपने दिखाती हैं। कभी हँसाती हैं, कभी रुलाती हैं। इच्छाओं के कच्चे धागों से बाँधती हैं। कल्पनाओं और कामनाओं की मदिरा पिला कर बेहोश करती हैं।

साक्षी होने के अतिरिक्त अन्य सभी अवस्थाओं का यही सत्य है। जिसे हम सभी किसी न किसी रूप में रोजमर्रा की जिन्दगी में अनुभव करते रहते हैं। मजे की बात तो यह है कि यदा-कदा हम में से कई या यूँ कहें कि प्रायः हम सभी इन्हीं कामनाओं की तृप्ति के लिए साधना भी करने लगते हैं। गाढ़ी बेहोशी को और गाढ़ा करने के लिए जप-तप-व्रत का सिलसिला शुरू करते हैं। इसकी सफलताओं पर खुशियों की अठखेलियों से खेलते हैं। और असफल होने पर गम के आंसुओं से अपने-आपको भिगोते हैं। वृत्तियों का यह बहुरंगी तमाशा हमारे जीवन का सामान्य परिचय है। इसमें स्वप्न तो अनेक हैं, सत्य एक भी नहीं। इसी तथ्य का संकेत महर्षि के सूत्र में है।

परम पूज्य गुरुदेव महर्षि पतंजलि के बारे में कहा करते थे कि वे अद्भुत हैं। वे साधक को तपाने में, उससे साधना कराने में विश्वास करते हैं। उनका इधर-उधर की कहानियाँ-किस्से सुनाने में कतई विश्वास नहीं है। बहलाने-फुसलाने में उनका कोई यकीन नहीं है। एक प्रसंग में गुरुदेव के सामने जब इस सूत्र की चर्चा चली तो उन्होंने कहा- ‘अब यहीं देखो कैसी दो टूक बात कह दी उन्होंने। साधकों के सामने बिलकुल बात साफ कर दी कि या तो साक्षी भाव को उपलब्ध कर अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाओ या फिर वृत्तियों के साथ तादात्म्य करके भटकते रहो। इन दो के अलावा कोई तीसरी सच्चाई नहीं हो सकती। जान सको तो जानो, मान सको तो मानो।’

गुरुदेव कहा करते थे, पतंजलि के सूत्र तो साधकों के लिए भेजे गए टेलीग्राम हैं। इनमें इधर-उधर का एक भी फालतू शब्द नहीं है। कभी-कभी तो एक सूत्र पूरा वाक्य तक नहीं है। वह तो अल्पतम सारभूत है। ये सूत्र ऐसे हैं, जैसे कोई तार करने जाय और वहाँ बेकार के अनावश्यक शब्द काट दे। तार का मतलब ही यही है, कम से कम शब्दों में सम्पूर्ण सन्देश कह दिया जाय। तार की जगह अगर पत्र लिखा जाता, तो शायद दस पन्ने भरने के बावजूद बातें पूरी न हो पाती। लेकिन एक तार में, दस शब्दों में वह केवल पूरा ही नहीं होता, बल्कि पूरे से भी थोड़ा अधिक होता है। वह सीधी हृदय पर चोट करता है। उसमें सारतम होता है।

इसी प्रसंग में गुरुदेव ने यह भी बताया कि उनकी मार्गदर्शक सत्ता ने भी उनसे बड़ी सीधी-सपाट भाषा में एकदम थोड़े शब्दों में कहा था, साधना करनी है, तो इन्द्रिय सुखों से मुँह मोड़ना होगा। एकदम रूखी-सूखी जिन्दगी जीनी होगी। ये बातें बताकर वह थोड़ा रुके फिर कहने लगे- यह तो बाद में पता चला कि इस रूखे-सूखे पन में आनन्द की अनन्तता समायी है। बस यही बात महर्षि पतंजलि के बारे में है। वह बहुत ही रूखी-सूखी धरती पर ले चलेंगे, मरुस्थल जैसी भूमि पर। लेकिन मरुस्थल का अपना सौंदर्य है। उसमें वृक्ष नहीं होते, उसमें नदियाँ नहीं होती, लेकिन उसका एक अपना विस्तार होता है। किसी जंगल की तुलना उससे नहीं की जा सकती। जंगलों का अपना सौंदर्य है, पहाड़ियों का अपना सौंदर्य है, नदियों की अपनी सुन्दरताएँ हैं। मरुस्थल की अपनी विराट् अनन्तता है। हाँ इस राह पर चलने के लिए हिम्मत की जरूरत है। पतंजलि का हर सूत्र साधकों के साहस के लिए चुनौती है। उनके विवेक को सावधान रहने की चेतावनी है।

पतंजलि बिलकुल साफ तौर पर कहते हैं कि यदि आपको, हमको, मनुष्य मात्र को यदि भटकन, उलझन, तनाव, चिन्ता, दुःख, पीड़ा अवसाद से सम्पूर्ण रूप से मुक्ति पानी है, तो साक्षी भाव को उपलब्ध होने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं है। क्योंकि अन्य अवस्थाओं में तो मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य बना ही रहेगा। मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी है। यह बात किसी एक पर, किसी व्यक्ति विशेष पर लागू नहीं होती। बात तो सारे मनुष्यों के लिए कही गयी है। मानव प्रकृति की बनावट व बुनावट की यही पहचान है। साक्षी के अतिरिक्त दूसरी सभी अवस्थाओं में मन के साथ तादात्म्य बना रहता है।

विचारों के प्रवाह के साथ कब एकात्मता सध जाती है, पता ही नहीं चलता। ये विचार कैसे भी हो सकते हैं, किसी भी तरह के हो सकते हैं। विचारों के बादलों के साथ हम एक हो जाते हैं। कई बार सफेद बादलों के साथ, कई बार वर्षा से भरे बादलों के साथ, तो कई बार वर्षा रिक्त खाली बादलों के साथ। लेकिन कुछ भी हो, किसी न किसी विचार के बादल के साथ तादात्म्यता बनी रहती है। और ऐसे में हम आकाश की शुद्धता गंवा देते हैं। अपने आत्म स्वरूप के अन्तरिक्ष की शुद्धता खो देते हैं। और बादलों का यह घिराव घटित ही इस कारण होता है, क्योंकि हम तादात्म्य जोड़ लेते हैं। विचारों के साथ एक हो जाते हैं।

ख्याल आता है कि हम भूखे हैं और विचार मन में कौंध जाता है। विचार इतना भर है कि पेट को भूख लगती है। बस उसी क्षण हम तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं। उसकी आसक्ति से घिर जाते हैं। हम कहने लगते हैं, मैं भूखा हूँ। मुझे भूख लगी है। मन में तो भूख का विचार भर आया था, पर हमने उसके साथ तादात्म्य बना लिया है। हम कहने लगे, मुझे भूख लगी है। बस यही तादात्म्य है।

ऐसी बात नहीं है कि ज्ञानियों को, योगियों को, साधकों को, सिद्धों को भूख महसूस नहीं होती। भूख तो वे भी महसूस करते हैं। बुद्ध भी भूख महसूस करते थे, पतंजलि भी भूख महसूस करते हैं। लेकिन पतंजलि कभी यह नहीं कहेंगे कि मुझे भूख लगी है। वे तो बस इतना कहेंगे कि शरीर भूखा है। वे कहेंगे, मेरा पेट भूख महसूस कर रहा है। बुद्ध कहेंगे, भूख तो पेट में है। मैं तो केवल साक्षी भर हूँ। पेट भूखा है, लेकिन योगीजन उसके साक्षी मात्र बने रहेंगे। लेकिन हम सब तादात्म्य बना लेते हैं, विचार के साथ एक हो जाते हैं।

विचार और वृत्तियों के बदलते स्वरूप के साथ हमारा तादात्म्य भी बदलता है। कभी हम एक के साथ होते हैं, तो कभी दूसरी, तीसरी, चौथी, और पांचवीं वृत्ति के साथ। ये तादात्म्य ही संसार बनाते हैं। दरअसल यही संसार है। यदि हम तादात्म्यों में हैं तो संसार में हैं, दुःख में हैं। और यदि इन तादात्म्यों के पार और परे चले गए तो समझो मुक्त हो गए। योग की परम सिद्ध एवं सम्बोधि की परम अवस्था यही है। यही है निर्वाण और कैवल्य। वृत्तियों से तादात्म्य टूटते ही हम इस दुःख भरे संसार से पार होकर आनन्द के जगत् में प्रविष्ट हो जाते हैं।

आनन्द का यह जगत् बिलकुल अभी और यहाँ है। बिलकुल अभी, इसी क्षण। इसके लिए एक पल भी प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है। बस मन का साक्षी भर होना है। केवल वृत्तियों से नाता तोड़ना है। यह तथ्य कुछ यूँ है-

सुख कहीं मिलेगा, इस भ्रान्ति का नाम संसार है, सुख अभी है, यहीं है, इस बोध का नाम निर्वाण है,

सुख किसी से मिलेगा, इस भ्रान्ति का नाम संसार है, सुख अपना स्वभाव है, इस जागृति का नाम मोक्ष है।

इस सच्चाई को और अधिक स्पष्ट रीति से समझने के लिए वृत्तियों का कुछ और परिचय जरूरी है। ये कितनी है, कैसी है, यह जानना आवश्यक है। वृत्तियों की यह योग कथा अन्तर्यात्रा विज्ञान की अगली कड़ी में प्रकाशित होगी।


गुरुसत्ता के महाप्रयाण के बाद मातृसत्ता का संदेश

(परमवंदनीया माताजी के यह वचनामृत गुरुसत्ता के महाप्रयाण के चौदह दिन बाद के प्रवचन से लिए गए हैं)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

बच्चों, तुम्हें मालूम होना चाहिए कि यह मिशन किसी तेजी से बढ़ता हुआ चला जा रहा है। उसमें आप लोगों का क्या योगदान होना चाहिए? आप लोगों का जो योगदान होना चाहिए, वह है हिम्मत का, साहस का। बुज़दिली का नहीं, रोने और चिल्लाने का नहीं होना चाहिए। भावना और भावुकता में अंतर होता है। भावुकता हमें बुज़दिली सिखाती है, भावुकता हमें कायरता सिखाती है और भावना? भावना हमें यह सिखाती है कि अपने इष्ट के प्रति जो हमारा समर्पण है, उसके लिए हमें क्या करना चाहिए। आपको याद होगा कि आप जब अपने घर से आए थे, आपकी क्या भावनाएँ थीं? न कि हम गुरुजी के लिए, गुरुजी के कार्य के लिए तथा मिशन के लिए, समाज-सेवा के लिए, राष्ट्र के उत्थान के लिए हम यह संकल्प लेते हैं कि हम आजीवन यह कार्य करते चले जाएँगे। यही था न?

बेटे, मैं एक और बात यह कह रही हूँ कि पूर्व में आपकी जो भावनाएँ थीं, वही विद्यमान रहनी चाहिए। जब हम उनमें मिल गए और तो हममें मिल गए, तो एकाकार हो गए। एकाकार हो गए, तो अब अलग कहाँ रहे। समय-समय पर जो हमारे अंदर कुसंस्कार उदय होते रहते हैं, उन कुसंस्कारों को तो हमें हटाना चाहिए और सद्संस्कारों का उदय होना चाहिए। हमारा हर कार्यकर्त्ता शक्तिशाली दिखाई पड़ना चाहिए, हनुमान जैसा, अर्जुन जैसा, एकलव्य जैसा, शिवाजी जैसा। उसका चिंतन और चरित्र दोनों ही उच्चस्तरीय होने चाहिए। जो चिंतन में होता है, वही चरित्र में भी होता है और जो चरित्र में होता है, वही व्यवहार में भी होता है। यह व्यवहार में होता है, तो स्वतः ही उसी प्रकार का वातावरण बना लिया जाता है। वह बाद में अपने आप बनता हुआ चला जाता है।

गुरुजी कैसे बनो

बेटे, गुरुजी ने ऐसा ही तो किया था न। बाल्यकाल से ही उन्होंने अपने चिंतन को इस तरीके से ढाला कि एक स्वयं सेवक की मनोवृत्ति उनके अंदर हमेशा से विद्यमान रही। जहाँ कहीं भी उन्होंने कार्य किया, लोग उन्हें सराहते रहे। सैनिक प्रेम में जब काम करते थे, तो जो उनसे बड़े थे, वे सबसे यही कहते थे कि कहिए साहब, मैं बाजार जा रहा हूँ, कोई आपका काम है क्या? उनने कहा, हमारी बीबी के बच्चा होने वाला है। अच्छा दायी का प्रबंध करता हूँ और कोई बात? हमारे पास चारपायी नहीं है। अच्छा, चारपायी का प्रबंध करते हैं। कहने का मतलब मेरा यह है कि उनमें जो स्वयंसेवी वृत्ति थी, वही वृत्ति पनपती हुई चली आई। उनके जीवन में शुरू से ही करुणा, त्याग और संवेदना विद्यमान रही। मैंने एक घटना उस रोग सुनाई थी, शायद सभी कार्यकर्ता थे।

बेटे मैंने आपको एक कबूतर की घटना सुनाई थी और एक उस हरिजन महिला की सुनाई थी, जिसमें कि उसके कीड़े पड़ गए थे और उन्होंने घाव धोया और मरहम लगाया। बेटे, चाहे तो रामकृष्ण परमहंस से जोड़ लें आप, चाहे अन्य किसी से जोड़ लें। जो भी ऋषि और संत-सुधारक हुए हैं, उनके अंदर जनमानस के लिए एक करुणा उदय होती है। करुणा जब आ जाती है सारे विश्वकल्याण के लिए, तो वह तिल-तिल करके अपने को समर्पित करता चला जाता है। जिसने अपने को समर्पित कर दिया है, श्रद्धा तो उसको मिलने ही वाली है। बनावटीपन में नहीं, बनावटीपन तो थोड़े दिन में खुल जाता है। फिर सब लोग छिटकते हुए चले जाते हैं। बनावटीपन यदि नहीं हैं, तो फिर आपको सहयोग मिलना ही चाहिए। जनश्रद्धा मिलनी चाहिए, मदद मिलनी चाहिए। आपने देखा भी है कि हमारे छोटे-छोटे, जरा-जरा से बच्चे, नाचीज बच्चे जब बाहर जाते हैं, तो जो सत्कार होता है, वो किसका होता है? आपका। आपका नहीं होता, यह मानकर चलना। जिसके अंदर यह अहंकार विद्यमान हो कि यह हमारा पुरुषार्थ है। यह हमारा नहीं बेटे, उस महापुरुष का है, जिसने सारा जीवन लोकमंगल के लिए, राष्ट्र के उत्थान के लिए लगा दिया। अंतिम क्षणों में भी उन्होंने एक ही बात कही कि हमें विश्वभर में विचार क्राँति का विस्तार करना है। यह यों ही थोड़े हो जाएगा।

संकल्प पूरे होंगे, उनके निमित्त जीकर

बेटे, जो संकल्प लिए गए हैं, ये यों ही पूरे हो जाएँगे क्या? ये यों ही पूरे नहीं होंगे। आजकल मुझे रात को नींद नहीं आती। सोचती हूँ कि ये जो संकल्प लिए गए हैं, वे अधूरे तो रह नहीं सकते, क्योंकि जो रग-रग में समाया है, काम तो उन्हीं इष्टदेव का है न। काम उनका है, पर काया अपनी है। इसमें कोई शक नहीं है। शरीर अपना है और बल उनका है। जब हमारे अंदर यह हिम्मत आ जाएगी और यह साहस आ जाएगा कि देने वाला तो दूसरा है, करने वाले हम हैं, फिर कोई भी काम अधूरा नहीं रहेगा। जिस दिन कहीं यह आ गया मैं-मैं-मैं-मैं-मैं क्या होती है? आपको मालूम होना चाहिए कि गुरुजी ने यह शब्द कभी नहीं कहे। यह शब्द कहे होंगे कि बेटा, तुम्हारे लिए भगवान से प्रार्थना करेंगे, सब ठीक हो जाएगा, हाँ ठीक हो जाएगा। वे कष्टों को लेते भी रहे, पर उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि मैं करूंगा। मैं शब्द उन्होंने कभी नहीं कहा।

एक दफा एक कार्यकर्ता अपने विद्यार्थी को लाया और बोला, गुरुजी, इसको भूत आ रहा है। भूत अच्छा, कैसा भूत? अब हम बढ़ावा देते हैं, तो लोगों की नजरों में गिर जाते हैं। उन्होंने क्या किया? उन्होंने कहा, अच्छा अभी देखता हूँ तेरा भूत। दो डंडे तुझमें लगाऊँगा और दस डंडे इसमें लगाऊँगा। पढ़ा-लिखा होकर, प्रोफेसर होकर और तू ये कह रहा है कि भूत आ रहा है। इसी तरह बहुत दिनों की शुरू-शुरू की बात है। हमारे यहाँ एक लड़की थी। अब वह सो गई, लेट गई। हमारी और छोरियाँ डर गई। बोलीं माताजी, इस को तो भूत आ गया। यह तो वहाँ हॉस्टल में रहती थी। मैंने कहा, अभी उतारती हूँ इसका भूत। मैंने रोल लेकर कहा, ऐ उठती है कि नहीं। या तो तू उठ, नहीं तो मैं एक जमाती हूँ तेरी कमर पर। अब वह छोरी झट से उठ बैठी। भूत हो तो ना। कहीं भूत थोड़े ही होता है। एक तो बनावटीपन होता है, दूसरे जो बढ़ावा देते रहते हैं, उनको बल मिलता रहता है।

बेटे गुरुजी ने कभी भी यह नहीं कहा कि आज हमको यह लगा, आज हमसे यह कहा गया। हाँ, उन्होंने यह जरूर कहा कि संवेदना के रूप में हमें एक ऐसा प्रकाश मिलता हुआ चला जाता है कि जो संकल्प हम करते हैं, वे पूरे होते हुए चले जाते हैं। हमारे गुरुदेव ने हमेशा कहा, लेकिन यह कभी नहीं कहा कि आज यह अनुभूति हुई, आज वह हुई। ऐसी बात अगर आप किसी के अंदर हो तो बेटे, उसे तो अपने मन से निकाल ही देना। अनुभूति जो होती है वह कहने की नहीं होती, वह संवेदना की होती है। कल-परसों की बात है। मैं स्नान कर रही थी। स्नान करते समय मुझे जोर से ऐसी आवाज आई शैलो। कोई बात होती थी तो वे मुझे शैलो कह करके आवाज देते थे। मैं समझ गई कि कुछ कह रहे हैं। मैं तिलमिला गई। जब मैं बाहर आई तो समझ गई कि वह क्या कहना चाहते हैं। अब भी मुझे स्वप्न में, जाग्रत् अवस्था में भी ऐसा प्रतीत होता है कि वे मेरे दायें-बायें हैं और जब मैं कभी डगमगाती हूँ तो मेरा हाथ पकड़ते हैं और कहते हैं कि चलो चलें। मैंने शपथ ली है और उन्होंने कहा है चलो, तो आगे तो बढ़ना ही है न।

बेटे, वे कह गए हैं कि हमने यह जो वृक्ष लगाया है कहीं ऐसा न हो कि सूख जाए। सो हिम्मत के साथ और दिलेरी के साथ आँसू पीना है और आगे बढ़ना है। हर बच्चे को आगे बढ़ाना है। तुम्हारा कोई दुःख, कष्ट-कठिनाई होगी बेटे, उसे हम जी-जान से निवारण करेंगे। आध्यात्मिक दृष्टि से भी निवारण करेंगे, शक्ति से भी निवारण करेंगे और औपचारिक दृष्टि से भी निवारण करेंगे। तुम हमारे बालक हो। हम तुम्हारे लिए जान पर खेल जाएँगे, इसमें कोई दो राय नहीं हैं। तुम्हारे अंदर कोई दोष-दुर्गुण होंगे, तो उन्हें हटाने के लिए में रिआयत नहीं करूंगी। बेटे, गुरुजी ने इस मामले में कभी रिआयत नहीं की। अब तक तो मैं रिआयत करती आई थी, पर अब नहीं करूंगी। क्यों नहीं करूंगी? क्योंकि उन्होंने कह दिया है कि मैं तुम्हारे अंदर समाया हुआ हूँ। जब मेरे अंदर पूर्ण समाए हैं तो बेटे, मैं माताजी का और गुरुजी का दोनों ही का रोल अदा करूंगी। दोनों रोल मुझे इसलिए करने पड़ेंगे, ताकि मिशन में काई गड़बड़ी न आने पाए। गड़बड़ी का जहाँ कहीं भी मुझे बीज मालूम पड़ेगा, वहाँ उस बीज को मैं नाबूद कर दूँगी। बिलकुल कर दूँगी, बगैर किसी मोह के कर दूँगी, चाहे कोई भी क्यों न हो।

ब्राह्मण बीज चाहिए

मुझे तो वह बीज चाहिए, जो कि ब्राह्मीय हो अर्थात् ब्राह्मण वृत्ति उनके अंदर पनपे और ब्राह्मण जैसा जीवन जिए। यही तो गुरुजी का उद्देश्य था बेटे। यहाँ बैठे हुए तुम सब ब्राह्मण ही हो। तुम्हारे लिए फिजूल का कहाँ है? तुम ब्राह्मण ही हो, पर कहीं भी चिंतन गड़बड़ाता हो, तो उस चिंतन को तुम साफ करना। आगे आने वाले समय में कितना काम करना है। मैं देख चुकी हूँ तुम्हारे साहस को। उस समय हमारे कुछ बच्चे बाहर गए थे। मुझे भीतर से वेदन हुई कि इन बच्चों को ऐसा लगा होगा कि हमने गुरुजी के अंतिम दर्शन भी नहीं किए। बेटे, जो बच्चे यहाँ नहीं थे, उनकी वेदना को मैं जानती हूँ, क्योंकि मैं वेदना से ग्रसित हूँ। इसलिए तुम्हारा दर्द समझती हूँ, लेकिन तुमने जो कार्य किया, उस कार्य में ही गुरुजी के दर्शन थे और गुरुजी हजार आँखों से, लाख आँखों से तुम्हें सराह रहे थे और आशीर्वाद दे रहे थे कि हमारे बच्चे कितने साहसी हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी जिन्होंने मनोबल बनाए रखा।

बेटे, हमें मनोबल बनाना है अपना और दूसरों का। स्वयं उठाना है और दूसरों को उठाना है। कहीं भी चिंतन न बिगड़े। क्या पूछना है? आपस में राजी-खुशी पूछो। एक-दूसरे के दुःख-दर्द में काम न आएँगे, तो और कौन आएगा। मैं तो यहाँ बैठी रहती हूँ, मुझसे कोई कहने आएगा, तभी तो मुझे मालूम पड़ेगा। मैं तुम्हारी माँ हूँ। कोई दुःख-कष्ट हो, फौरन मेरे पास आओ। तुम्हारे कष्ट का निवारण होगा। आपस में हो सकता हो, तो आपस में करना। सबसे मिलना-जुलना और सबके दुःख-कष्ट में शामिल होना, लेकिन एक कार्य में शामिल मत होना। कौन से में? चुगली वाले कार्य में। इससे बहुत ज्यादा नफरत है हमें। गुरुजी कभी भी किसी की ऐसी बात तो सुनते ही नहीं थे। कभी किसी का पत्र आता था और मैं कहती थी साहब, यह पत्र आया है, जरा मैं सुना दूँ क्या आपको। क्या है इसमें लाओ, उठाया और रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। उन्होंने उस पत्र को कभी महत्व नहीं दिया, चाहे किसी कार्यकर्त्ता ने दिया हो, चाहे बाहर की शाखाओं की कोई शिकायत ऐसी हो, जो आपस में प्रतिद्वंद्विता की हो, एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाली बात हो।

कार्य के लिए तो कंपटीशन होना चाहिए। कौन-सा कंपटीशन? आलस्य और प्रमाद का नहीं, वरन् उसका जो गुरुजी कहते थे कि आठ घंटे नौकर काम करता है, स्वयंसेवक बारह घंटे काम करता है और मालिक सोलह घंटे काम करता है। तुम सब जितने बैठे मालिक हो। एकोएक मालिक हो। सीनियर-जूनियर का यहाँ कोई चक्कर नहीं है। इतना तो है कि भाई जो पहले आए हैं, उनका अनुभव है। अनुभव के द्वारा काम तो हमें उनसे ही कराना है। अब प्रत्येक को थोड़े ही हम बुलाएँगे। हमने एक यूनिट बना रखी है, वह संचालन करेगी, बताएगी आप लोगों को। हमारे लिए भावनाओं की दृष्टि से चाहे बेटा गरीब हो, अमीर हो, छोटा हो, बड़ा हो, सब बच्चे एक से हैं। माँ के लिए बच्चा चाहे प्रोफेसर हो और चाहे रिक्शा चलाता हो, दोनों के लिए माँ की ममता एक–सी होती है। माँ ऐसी नहीं होती कि उसका दुलार किसी एक विशेष होता हो और किसी के लिए नहीं होता हो, फिर वह माँ ही कैसी है? ठीक है, जो नजदीक आते रहते हैं, बार-बार जिनको बुलाते रहते हैं, कार्य के लिए तो बेटा, बुलाया ही जाएगा, कहा भी जाएगा। अब एक-एक करके पाँच सौ आदमियों को कहाँ तक हम बुलाएँगे, दूसरे भी तो कार्य हैं। जो जिससे संबंधित है, कार्य तो उन्हीं से कराएँगे। पत्र व्यवहार से संबंध है, तो भी हमें संतोष तब होगा, जब कुछ आउटपुट निकलेगा। रिस्पोंस कुछ भी न निकले और दिखा दें साहब, ये दो चिट्ठी लिखी हैं तो धिक्कार नहीं है। तुम्हारे लिए धिक्कार है और हमारे लिए उससे भी ज्यादा धिक्कार है। क्यों? मिशन का खाते हो, दबाव सारा मिशन के ऊपर पड़ता है और काम एक घंटे का भी नहीं होता। ये सड़ना और सड़ाना, गलाना और गलाना छोड़ना चाहिए और स्फूर्ति बनाए रखनी चाहिए।

अपनी कमियाँ निकलें, पूर्ण बनें

बेटे, अब तक मान लो तुममें कुछ कमियाँ थीं, लेकिन अब आगे आने वाले समय में नहीं होनी चाहिए। आगे बहुत जिम्मेदारियाँ सँभालनी हैं। इतनी जिम्मेदारियाँ सँभालनी है कि बेटे क्या कहूँ? जो लेखन में हैं, वे भी अपना पुरुषार्थ दिखाएँ। कार्य की दृष्टि से भी, भावनाओं की दृष्टि से भी कि बस आनंद आ जाए। बेटे गुरुजी एक-एक दिन में मैं समझती हूँ तीन-तीन, चार-चार लेख लिखते थे। वैसे तो उन्हें कभी कुछ होता नहीं था। एक बार उनके पाँव में चोट लग गई। हुआ यों कि टट्टर में बंदर आ गए। उन्हें भगाने के चक्कर में उनका पैर टट्टर में फँस गया। पैर सूज गया, थोड़ा पक भी गया और टेंपरेचर भी होने लगा। मैं आपको बताती हूँ कि हमारे यहाँ मूँज की चारपाई थी। उस चारपाई में गड्ढा हो गया। क्यों? बैठे-बैठे। वे नित्यप्रति बैठ करके इतना लेखन करते थे कि मैं हैरान रह गई। मैंने कहा, जब कष्ट में इतना लिख सकते हो तो बगैर कष्ट में कितना लिखेंगे। वे अपने सारे शरीर को भुला देते थे, इतना कार्य करते थे। तुम सब उनके शिष्य हो, उनके बालक हो, हमारे बालक हो, तो तुम्हें भी अपने अंदर वही चेतना जाग्रत् करनी पड़ेगी। गुरुजी का अनवरत आशीर्वाद तुम्हें मिलता रहेगा।

बेटे, हमारी ममता भी तुम्हें मिलती रहेगी, पर गड़बड़ी फैलाएँगे तो हमें नाराजगी भी होगी। कटुभाषा से नाराजगी नहीं होगी, तो और क्या होगा? नहीं साहब, बिच्छू का डंक मारे बिना हमारा तो काम ही नहीं चलता। नहीं बेटे, अपनी जुबान पर जरा शहद लगाइए। जब आते हैं, अपना अहंकार दिखाते आते हैं, सबसे बाँसपना दिखाते हैं। कोई बाँसपना नहीं दिखाएगा यहाँ। यहाँ तो नम्रता चाहिए। नम्रता बहुत बड़ी चीज है। गुरुजी के अंदर नम्रता थी और इस सीमा तक थी बेटे कि इन हाथों में तुम्हारे सब के बरतन धोते-धोते, माँजते-माँजते हमें बीसियों साल बीत गए। हमारे जो पुराने परिजन होंगे, उनको मालूम है कि किस तरह हम बच्चों की सेवा करते थे। तब यहाँ तक का इतना लंबा सफर तय करके आए हैं। तुम्हें क्या मालूम है? गुरुजी परिजनों को अपने साथ ले जाया करते थे। उसके कंधे पर हाथ रखकर कहते, चल बेटा, जमुना जी वहाँ बैठेंगे। वे कंधे पर तौलिया डाले रहते थे, सो अपनी तौलिया बिछाई और वहाँ उसको बिठाते थे। यह है आत्मीयता, यह है घुलना-मिलना। यह नहीं होता कि हम मंच पर बैठ गए। ये कौन हैं? आ हा हा हा .....ये आए साहब। महंत जी, ओ हो हो हो .... अब इनको सुनो। अच्छा, तुम्हारी सुनो या गुरुजी को सुनो। बेटे, गुरुजी को सुनो। गुरुजी को जो सुनेगा, वह नम्र होगा। वह सबमें घुलता हुआ मिलता हुआ चला जाएगा। यह अनुकरण उनको करना चाहिए, जिन्होंने अभी तक नहीं किया। जिन्होंने किया है, उनकी सराहना है, उनके लिए ढेरों आशीर्वाद है।

सबको प्यार बाँटो, आत्मीयता दो

बेटे, सबको अपने समान समझो। अपने जो छोटे भाई हैं, उनको प्यार दो। अपने से जो बड़े हैं, उनका सम्मान करो। किसी को यह महसूस न होने पाए कि यहाँ गुरुजी नहीं हैं। यहाँ तो सारे निर्जीव बसते हैं, जैसे इनमें जान ही नहीं है। बेटे, सबको गुरुजी जैसा प्यार, आत्मीयता दो। मुझे कई बार उन लड़कों को झिड़कना पड़ता है, जो हमारे पास रहते हैं। नीचे तो मुझे नहीं दिखाई पड़ता, पर पास में तो मैं दो-तीन लड़कों को बहुत झिड़कती हूँ। क्या करूं, मेरा स्वभाव ऐसा नहीं है, पर जब देखती हूँ कि जब ये लोगों को मिलाते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे भेड़-बकरियों को आगे करते हैं। भेड़-बकरियों की तरह नहीं, बल्कि सभ्यता-शालीनता का क्रम चालू करो। जल्दी-जल्दी चलाओ, लेकिन तुम्हारी जुबान में मिठास होनी चाहिए। मिठास होगी तो क्या होगा? सारे-के-सारे व्यक्ति तुम्हारी सराहना करेंगे। दो तरह की मिठास होती है, एक तो प्रकृतिप्रदत्त-स्वभावगत और दूसरी चापलूसी। जिससे काम लेना है, उसी की चापलूसी करो। चापलूसी करने में छोटापन होता है, हेटापन होता है। उसमें व्यक्ति का बौनापन झलकता है। हमें बौना भी नहीं बनना है और अहंकारी भी नहीं बनना है चूँकि मिशन तुम्हारे द्वारा चलना है, तुम्हारे कंधों पर चलना है, इसलिए हमारा प्रत्येक कार्यकर्ता गुरुजी की दूसरी काँपी होना चाहिए।

सो कभी थोड़ा झल्ला जाते थे, लेकिन उन्होंने मन से कभी किसी से द्वेष नहीं माना। यहाँ तक कि जो हमको विरोधी मानते थे, उनके लिए भी उन्होंने कभी कुकल्पना नहीं कि। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि उसने हमारे साथ ऐसा किया है, तो हम इसका बदला लेंगे। उन्होंने उसके साथ सज्जनतापूर्ण व्यवहार किया, वे कभी भी बौखलाए नहीं। बस चाल उलटी बदल दी। उन्होंने कहा, अच्छा यह बात है, अपने काम की गति बढ़ा दो। बजाय सड़ने-कुढ़ने के उन्होंने सारा समय श्रेष्ठ चिंतन में लगा दिया। अरे, दूसरा तो सड़ ही रहा है, हम और उसके साथ सड़ जाएँ। क्यों? हमें मिशन चलाना है, तो हम में प्रखरता होनी चाहिए, नम्रता भी होनी चाहिए, साथ ही अपने अंदर साहस और बल भी होना चाहिए।

बेटे, हम ऐसे बुज़दिल भी न हों कि कोई आए, हाँ साहब कौन हैं? अरे हम तो संत हैं। अच्छा, तो एक इधर से भी दे जाए और एक उधर से भी दे जाए। ऐसा संत भी नहीं बनना है। मैं कई बार कह चुकी हूँ कि तुम लोग लाठी चलाओ, यह पुरुषार्थ का प्रतीक है। सारे आश्रमों की निगाहें हमारी तरफ जाती हैं। यह सब कहेंगे कि यहाँ मरे-मराए नहीं, जिंदादिल लोग रहते हैं। किसी ने कहा, कहाँ गए? अरे साहब, मंदिर गए तो पता चला कि वहाँ से घंटी-बंटी भी कोई उठा ले गया। उन्होंने कहा, यहाँ कौन बसते हैं यहाँ तो निर्जीव हैं, जिन्हें यह भी ध्यान नहीं कि हम यहाँ मंदिर में बैठे हैं और यहाँ से सामान भी चला गया। बेटे, हमारे यहाँ सभी जिंदादिल लोग ही रहने चाहिए।

दो महान् संकल्प

अब चलिए, मैं थोड़ा-सा प्रसंग बदल रही हूँ। यह इतना बड़ा काम है, मैंने उस रोज दोनों संकल्पों के बारे में बताया था न। हाँ बेटे, मैं फिर दोहरा रही हूँ कि हमने दो संकल्प ले लिए हैं। मैं समझती हूँ कि इन्हें पूरा कराने में वही मदद करेंगे, तभी होंगे पूरे। मेरा मन ऐसा कहता है कि वे मदद जरूर करेंगे, क्योंकि जब उनका हर कार्य पूरा होता हुआ चला गया, तो ये दो संकल्प भी पूरे होंगे। मैंने जो उस रोज निवेदन किया था और कहा था कि एक शादान श्रद्धाँजलि समारोह मनाएँगे। उसके लिए तुम्हारे पैरों में गति, तुम्हारी हिम्मत, तुम्हारा साहस अब और भी डबल होना चाहिए।

देखो बेटे, मेरा साहस डगमगाया नहीं हैं। कभी-कभी आँखों में आँसू तो आ जाते हैं, पर रोकती हूँ। आज जब एक गीत गाया जा रहा था, तो मैं अपने को नहीं रोक सकी और अंदर-ही-अंदर आँसू पीती रही। सामने वाला यह नहीं भाँप पाया कि माताजी की आँखों में आँसू भी हो सकते हैं। क्या करें बेटे? पचास साल जिसके साथ में गुजारे, उसे हम कैसे भुला सकते हैं? वह नहीं भुलाया जा सकता, लेकिन फिर भी मैं भीतर से इतनी कड़ी और इतनी हिम्मत वाली हूँ कि मैं आँसुओं को भुला दूँगी, उन्हें पी जाऊँगी। उनका जो उद्देश्य है, जो उनका लक्ष्य है, उसके लिए तो अब हमें मर मिटना है। इसी भूमि में वे समा गए और इसी में बेटा मुझे भी समाना है। तुम लोगों का भी यही लक्ष्य होना चाहिए कि जब हम यहाँ शाँतिकुँज में आए हैं, तो हमें नाक कटाकर नहीं रहना चाहिए। यह नहीं होना चाहिए कि मन में कुछ और है, तन में कुछ और। जो मन में है, वही तन में है। तुम सब अपने मन की परिशुद्धि करना, तभी तुम्हारी भावनाएँ और तुम्हारा समर्पण शुद्ध होगा। अभी तक तो तुम्हारा समर्पण है, आगे की तो मुझे मालूम नहीं। बेटे, आगे भी तुम इसी तरीके से बने रहना, शुद्ध भावना और पवित्र समर्पण के साथ।

बेटे, अब तीन महीने रह गए हैं। तीनों महीने कितने होते हैं? बहुत जरा से होते हैं। तीन महीने कितने होते हैं? बहुत जरा से होते हैं। दिन और रात तुम सबको श्रम करना पड़ेगा। दिन और रात एक करने पड़ेंगे, तब कहीं हम कार्य को पूरा कर पाएँगे। चैन की नींद सोते रहे, तो क्या ऐसे ही काम हो जाएगा? बेटे, ऐसे काम नहीं होगा। जरा-जरा से काम में कितना समय लगता है। जो छह यज्ञ हुए हैं, उनमें कितने लोगों ने दिन और रात एक किए हैं, तब सफल हुए हैं। सो भी उतने बड़े नहीं थे। यह कार्य तो कितना विशाल है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर का है। अंतर्राष्ट्रीय काम यों ही हो जाएगा क्या?

दूसरा संकल्प स्मारक बनाने का है, तो वह भी यों ही हो जाएगा क्या? चलो, उसे तो यह भी है कि हम अपने द्वारा पूरा कर लेंगे, लेकिन यह जो श्रद्धाँजलि का कार्य है, इसके लिए तो तुम्हें अपना मन और अपना तन दोनों ही समर्पण करने पड़ेंगे। इसके लिए बेटे, अपनी हिम्मत अपना साहस और अपनी भावनाएँ होंगी। भावनाओं के बगैर कोई भी कार्य पूरा हो नहीं पाता। इसके बिना हम भगवान की पूजा भी नहीं कर पाते हैं। हाथ में माला तो जरूर लगी रहेगी, पर दिमाग हमारा दूसरी तरफ लगा रहेगा। क्यों? इसलिए लगा रहेगा कि भगवान के प्रति जो हमारा उदात्त भाव, जो हमारा समर्पण, जो हमारी करुणा होनी चाहिए, वह करुणा ही नहीं पैदा हुई, तो हम भगवान की पूजा कैसे करेंगे? इस तरह क्या हम भगवान के बताए रास्ते पर चल सकेंगे, तो हम गुमराह होते जाएँगे। गुमराह होते ही हम पलायनवादिता की ओर चलते चले जाएँगे, जबकि उपासना, साधना और आराधना तीनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।

तीनों योग जीवन में अनिवार्य

उपासना भगवान के समीप बैठना अर्थात् उसमें मिल जाना। अनुभूति होना, करुणा पैदा होना, दया पैदा होना। ये सब कौन और क्या हैं? ये भक्ति का स्वरूप हैं और दूसरा वह है जिसका मन शुद्ध, जिसके अंदर दया, करुणा और संवेदना होती है, फिर वह अपने तक सीमित नहीं रहता, वरन् वह ऊँचा उठ जाता है, जिस तरीके से वाल्मीकि ने एक पक्षी के जोड़े को तिलमिलाते हुए देखा और उनकी करुणा फूट पड़ी। इसी तरह संत तुलसीदास की करुणा फूट पड़ी। ऐसा व्यक्ति ही जनमानस के लिए समर्पित होता है और अपने जीवन का धन्य बनाता है।

‘साधना’ माने-अपने जीवन को ऊँचा उठाना, अपने को साधक बनाना ताकि वह जनसेवा कर सके। जनसेवा हमारा मुख्य ध्येय है। इसीलिए तो गुरुजी आए। सारी जिंदगी उन्होंने यही तो किया था। बेटे, जितनी उन्होंने उपासना की, उससे कम उपासना कलम की नहीं की, और उससे कम उपासना उन्होंने समाज की नहीं की। जितनी गायत्री माता के प्रति उनकी श्रद्धा थी, उससे ज्यादा कलम के लिए थी और उससे भी ज्यादा समाज सेवा के लिए थी। वे समाज को ऊँचा उठाना चाहते थे। वे समाज को, राष्ट्र को बहुत से होनहार नागरिक देना चाहते थे, यही उनका उद्देश्य था। उनकी सारी जिंदगी इसी में लग गई। यह कौन-सा कार्य है? यही साधना है।

आराधना-समाज सेवा है। ये तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। बेटा, अब हमको उपासना तो नित्यप्रति करनी ही है। हमारे जो कार्यकर्ता हैं वे बजाय आलस्य के चाहें तो आधा घंटा उपासना करें। मैं यह तो नहीं कहती कि सारे दिन माला लेकर तुम बैठे रहो। बैठे रहेंगे तो काम कौन करेगा। चाहे तुम पंद्रह मिनट ही उपासना करो, पर ऐसे तल्लीन हो जाओ कि बस आनंद आ जाए। हमारे यहाँ अखण्ड ज्योति कार्यालय में एक चित्र है, जो अभी भी है। गुरुजी जब उपासना में बैठते थे तो छह घंटे यह नहीं मालूम पड़ते थे कि जाने कहाँ निकल गए। फिर सारा दिन काम करते थे। छह घंटे तो नहीं, तुम्हारे लिए आधा घंटा ही बहुत है। आधा घंटा नित्यप्रति जब खाना खाएँ तो पहले उपासना कर लें। इसके बाद अपने जीवन का शोधन करें, कहाँ-कहाँ हमारी कमियाँ हैं, किस तरीके से अपनी इन कमियों को हम निकालें।

बेटे, अपनी कमियाँ व्यक्ति को नजर नहीं आतीं। जिस दिन अपनी कमियाँ नजर आ जाएँगी, तो व्यक्ति न जाने कहाँ-से-कहाँ पहुँच जाएगा। हम दूसरों की कमियाँ तो देखते हैं कि अमुक में ये कमी है, अमुक में वो कमी है, पर अपने गरेवान में मुँह डालकर नहीं देखते कि हम में कितनी कमियाँ हैं। हमारे प्रत्येक कार्यकर्ता को चाहिए कि वह अपनी कमियों को खोज-खोजकर निकालें। दूसरों से पूछे-क्यों भाई साहब। आज यह बताइए कि मुझसे कोई दुर्व्यवहार तो नहीं हुआ? मेरे अंदर कोई कटुता तो नहीं आई? दूसरा तुम्हारी कमियाँ निकाले तो उस पर खीजो मत, वरन् उसको सराहो कि हमारी कोई कमी निकालने, बताने वाला तो है। हमारे अंदर जो कमी है उसे निकालिए। बेटे, गुरुजी का यह गुण था कि चाहे वे आर्य की खुली छूट थी। गुरुजी ने कहा कि कोई कहने वाले तो है, जिससे मालूम तो पड़े कि हमारे अंदर क्या कमी है। हम उस कमी को निकालेंगे। उन्होंने चाहे पाँच साल का बालक ही क्यों नहीं हो, कोई बात उसके मुँह से निकली है और वह फिट बैठती है तो वे उसकी भी बात मान लेते थे। यह नहीं कहते थे कि मैं इतना बड़ा हूँ और जरा से बच्चे की बात मानूँगा। वे सबकी मानते थे।

क्रमशः (उत्तरार्द्ध आगामी विशेषाँक में)


Quotation

बीज को गलकर वृक्ष का रूप लेने की प्रक्रिया समयसाध्य है। जो अधीरता बरतते हैं, कर्मों का प्रतिफल तुरंत चाहते हैं, उन्हें निराश ही होना पड़ता है। इससे यह नहीं सोचना चाहिए कि दुष्कर्मों की प्रतिक्रिया नहीं होती और सत्कर्मों के पुण्यफल प्राप्त नहीं होते। जो दूरदर्शी होते हैं, वे कर्मफल व्यवस्था में सच्चे आस्तिकवादी की तरह विश्वास रखते हैं।


भविष्य उज्ज्वल बनाने का अवसर (Kahani)

एक व्यक्ति ने अपनी संपदा परमार्थ प्रयोजनों के लिए दान कर दी और लोकसेवा के कार्यों में निरत रहने लगा।

उसकी सर्वत्र प्रशंसा होने लगी। इस परिवर्तन के लिए लोग उसकी भूरि-भूरि सराहना करने और बधाई देने आते।

उत्तर में वह एक प्रश्न करते, आपके झोले में कंकड़-पत्थर भरे हैं और अनायास कोई बहुमूल्य वस्तु मिले, तो उन पत्थरों को फेंककर मूल्यवान वस्तु उसमें भरेंगे या नहीं? लोग उत्तर में सिर हिला देते।

मैंने कोई त्याग नहीं किया, मात्र विवेकशील का, चयन की दूरदर्शिता का परिचय दिया है। जो व्यर्थ ही बटोर रखा था, वह बोझ बढ़ाता और अनर्थ सिखाता था। अब उस जंजाल को फेंक देने पर मनःस्थिति परमार्थ करने जैसी बन गई और वे कार्य हो सके, जिनकी प्रशंसा आप सब करते हैं और मुझे संतोष पाने तथा भविष्य उज्ज्वल बनाने का अवसर मिला है।


कर्मसंन्यास व कर्मयोग में कौन-सा श्रेष्ठ है

(कर्मसंन्यासयोग नामक गीता के पाँचवें अध्याय की प्रथम किश्त)

इस अंक से कर्मसंन्यासयोग नाम से श्रीमद् भगवद्गीता का पाँचवाँ अध्याय आरंभ करते हैं। युगगीता का यह भावप्रवाह द्वापर में कही गई गीता एवं प्रज्ञावतार की सत्ता के लीलासंदोह पर आधारित है। नवयुग आगमन की बेला में इस युगगीता की व्याख्या-विवेचना में वह सब कुछ है, जो आज एक साधक के रूप में हम सभी को अभीष्ट है, करने योग्य एक कर्तव्य है, युगधर्म है। श्री गीताजी के प्रथम छह अध्याय कर्मयोग प्रधान हैं। यों स्थान-स्थान पर इसमें भक्तियोग-ज्ञानयोग गुंथा पड़ा है। मोहग्रस्त किंतु जिज्ञासु शिष्यभाव में स्थित अर्जुन के प्रश्नोत्तरों के माध्यम से कुछ ऐसे प्रसंग आए हैं, जो आज की युगपरिवर्तन की संक्रमण वेला में सभी को प्रेरणा देते हैं। चौथा अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग पर था, जिसकी व्याख्या में ‘युगगीता’ पुस्तक का दूसरा खंड एवं उसके सोलह लेख समा गए। प्रस्तुत अध्याय ‘कर्मसंन्यासयोग‘ प्रकरण पर है। अर्जुन ने ज्ञान का महत्व जान लिया, किंतु अभी भी कर्मयोग के संबंध में उसके मन में कुछ संदेह है। वह बोलता तो प्रारंभ में ही है, पर श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कान के साथ उसकी मानसिकता का अध्ययन कर रहे हैं एवं उसका प्रश्न समाप्त होते ही कर्मों से संन्यास व कर्मयोग तथा संन्यासयोग अर्थात् साँख्ययोग की महत्ता समझाने लगते है। ज्ञान में कर्मों का संन्यास (ज्ञानकर्मसंन्यासयोग) चौथे अध्याय का प्रकरण था, जहाँ ‘उठो भारत, अज्ञान से जन्में संशयों से मुक्त होकर विवेक-ज्ञान को जीवन में उतारकर समत्वरूपी योग में स्थित हो जाओ’, इस संदेश के साथ योगेश्वर सद्गुरु द्वारा समापन किया गया था।

लोकसेवियों की मार्गदर्शिका

अब एक प्रकार से पुनः इसी विषय को गहरी जाँच-पड़ताल के साथ, पी.एच-डी. स्तर के गहन अध्ययन की तैयारी के साथ श्रीकृष्ण प्रस्तुत करना चाह रहे हैं। यह विषय हर कार्यकर्ता के लिए, स्वयंसेवक के लिए, एक आदर्श राष्ट्रनिष्ठ लोकसेवी के लिए समझना बहुत जरूरी है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञान को सर्वोपरि मानकर उसी के आधार पर अपने व्यक्तिगत अहं की बलि दी जानी चाहिए। अहंकार का समर्पण हो एवं व्यक्ति निष्काम कर्म की ओर बढ़े, चाहे कितनी ही मुश्किल क्यों न आएँ। अब इस ‘अहं’ से मुक्ति कैसे पाई जाए? यह अहंकार है क्या? इस मद को पहचाना कैसे जाए? किसी तरह हम इसके स्वरूप को जान लें एवं शुद्ध अहं के गरिमामय रूप को जानकर उसमें प्रतिष्ठित होने की सोचें, तो कितना बड़ा परिवर्तन आ सकता है? यह सब कार्यकर्त्ताओं की आचार-संहिता का प्रकरण इस अध्याय में आया है, जो उसे साधना की धुरी पर जीवनकला को निखारने की बात भी समझाता है। संन्यास वेशधारी तो लाखों की संख्या में समाज में हैं, पर क्या वे अपना ‘अहं’ छोड़ पाए हैं? वास्तविक संन्यास क्या होता है व कर्मयोग व संन्यास का परस्पर समन्वय कैसे स्थापित किया जाए, इसकी विशिष्ट व्याख्या इस अध्याय में श्रीकृष्ण करते है। अहंकार के नाश की विधि इसमें वर्णित की गई है, इसीलिए इस अध्याय का नाम ‘कर्मसंन्यासयोग‘ है।

इन अध्याय के 29 श्लोकों में सारे कर्म-सिद्धाँत को योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा बड़े सरल ढंग से समझाने का प्रयास किया गया है। इस अध्याय में स्थान-स्थान पर कर्मसंन्यास की व्याख्या एवं कर्मयोग की महत्ता बताते हुए भगवान श्रीकृष्ण अहंकार से रहित सिद्धपुरुषों के लक्षण भी अर्जुन को बताते हैं। अहंकाररहित होना एक बड़ी सिद्धि है एवं इतना भर हो जाने पर मनुष्य किस तरह सामान्य से असामान्य हो जाता है, यह पढ़ने पर पाठक के मन में भी ललक पैदा होने लगती है। स्थान-स्थान पर आसक्ति को छोड़कर कर्म करने की महत्ता इस अध्याय में प्रतिपादित की गई है, पर अर्जुन इतने मात्र से संभवतः इतना प्रभावित नहीं है। उसकी आशंकाएँ अभी भी यथावत् है, क्योंकि वह व्यावहारिकता के धरातल पर मार्गदर्शन चाहता है। विगत दो अध्यायों के चरम सोपान पर पहुँचा देता है यह पाँचवाँ अध्याय, जहाँ अंतिम श्लोकों में ध्यान की विधि भी योगेश्वर द्वारा बता दी जाती है। जीवन कैसे जिया जाए, कर्मों को दिव्य कैसे बनाया जाए, औरों से अधिक बेहतर जीवन किस तरह जिया जाए, विचारों व भावनाओं का सुव्यवस्थित विकास कैसे संभव हो, यह श्री गीताजी के काव्य की विशेषता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि जीवन को एक खेल की तरह मानकर ठीक तरह जी लिया जाए, तो हमारा जीवन सुसंस्कृत एवं चरित्रनिष्ठा से भरा-पूरा होता चला जाता है। जीवन पूर्णतः रूपांतरित होने लगता है। सदाचारमय जीवन जीते-जीते मनुष्य क्रमशः उन्नति की ओर बढ़ने लगता है-आध्यात्मिक भी एवं भौतिक भी। उसके अंदर का दानव मिटता चला जाता है एवं देवत्व जागने लगता है। छठे अध्याय में आत्मसंयम के योग को समझाने से पूर्व श्रीकृष्ण अर्जुन में जिज्ञासा जगाकर इस पाँचवें महत्वपूर्ण अध्याय में कर्मयोग की पराकाष्ठा तक उसे पहुँचा देते हैं। यही है पाँचवें अध्याय में प्रवेश की भूमिका।

कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है?

पाँचवाँ अध्याय अर्जुन की एक जिज्ञासा से प्रारंभ होता है। वह अभी-अभी सुन चुका है, ‘योगमातिष्ठोतिष्ठ भारत’ हे भारत, उठो एवं योग का आश्रय लो। अपनी अहंकेंद्रित कामनाओं को त्यागो। वस्तुतः यही सच्चे अर्थों में संन्यास है।

तत्काल की वह अपनी जिज्ञासा श्रीकृष्ण के सम्मुख रख देता है-

अर्जुन उवाच-

सन्नयासं कर्मणाँ कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छे्रय एतयोरेकं तन्में ब्रूहि सुनिश्चितम्॥5/1

अर्जुन बोले. “हे कृष्ण. आप कर्मों का त्याग करने (कर्मणाँ सन्नयासं) और फिर उन्हें करते रहने (कर्मयोग) पर जोर देते हैं, इनकी प्रशंसा करते हैं। इन दोनों मार्गों में से कौन-सा एक मेरे लिए भलीभाँति निश्चित, कल्याणकारक व श्रेष्ठ हो, यह आप मुझे बताइए।”

यहाँ अर्जुन पूर्णतः भ्रमित है। उसे दोनों मार्ग परस्पर विरोधी दिखाई दे रहे हैं। पहले मार्ग के अनुसार तो यह स्पष्ट होता है कि तमाम कर्मों का त्याग कर दिया जाना चाहिए (संन्यास) और दूसरा मार्ग हमें सामाजिक और व्यक्तिगत रूप से जीवन में रुचि लेने-कर्मयोग में निरत होने की बात कहता है। अर्जुन की बुद्धि में यहाँ वह गंभीर भाव नहीं आ पा रहा है, जो दोनों मार्गों की तत्व से उसे जानकारी करा सके।

भगवान श्री जो यहाँ कहना चाह रहे हैं, उसके अनुसार कर्मों से अहंकार का त्याग ही ‘कर्मणाँ सन्न्यासं’ है, कर्मों का त्याग है तथा कर्मफल उपभोग के प्रति हमारी चाह के त्याग का कर्मयोग कहा गया है। कितना बारीकी से रखा गया दशन है, पर वह समझ में तब ही आ सकता है, जब हम उसका मर्म समझ सकें। जैसे ही वह समझ में आ जाता है, हम समष्टि में संव्याप्त इस परमात्मसत्ता को भी जान लेते हैं। बाधक मात्र अहंकार है, उसके उद्वेग हैं। कर्ता का भाव व भोक्ता का भाव यदि निकल जाए, तो हम अपने दिव्य स्वरूप को जान सकते हैं, मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन जीने की स्थिति में प्रतिष्ठित हो सकते हैं। फिर हम उन ग्रंथियों में उलझने से बच सकते हैं, जो हमें देवता के राजमार्ग से हटाकर इंद्रियपुष्टि की ओर, अहं की पूर्ति की ओर, स्वार्थ की पूर्ति की ओर ले जाती है।

कर्त्ताभाव का त्याग ही कर्म-संन्यास

उत्तर जो मिलने जा रहा है, उसकी भूमिका समझ लें, तो हमें अर्जुन का प्रश्न अच्छी तरह समझ में आ जाएगा। कर्त्ताभाव के त्याग की विधि कर्मों का संन्यास है और भोक्ताभाव से ऊपर उठने की विधि कर्मयोग है। अहंकार का त्याग करके लोकसेवा में लगना ‘संन्यास’ है एवं कर्मफल की लालसा पर नियंत्रण रख लोकसेवा में लगना ‘कर्मयोग‘ है। शास्त्रों में वर्णित इन दो शब्दों को समझ लेने के बाद इस अध्याय का एवं कर्मयोग का मर्म समझ में आ जाता है, परंतु अर्जुन चाहता है कि उसके गुरु श्रीकृष्ण उसका एक ही निश्चित मार्ग, पूर्ण संन्यास अथवा पूर्ण कर्मयोग (संन्यास एवं योग) के विषय में मार्गदर्शन करें।

गलती उसकी भी नहीं है। अर्जुन ने पहले ज्ञानयोग की महिमा सुनी, सुना कि ज्ञान से अधिक पवित्र धरती पर कुछ भी नहीं वे उसे उसके लिए श्रद्धावान बनना होगा, फिर चौथे अध्याय में उसने सुना कि कर्मयोगी बनना चाहिए, दिव्यकर्मी होना चाहिए। अर्जुन किसी बीच के मार्ग, किसी शॉर्टकट की, बायपास मार्ग की तलाश में है। युद्ध में लगने का उसका मन है नहीं, कर्मयोगी वह अभी बनना नहीं चाहता, क्योंकि उसमें बार-बार युद्ध करने की बात कही जा रही है। हाँ, यदि किसी तरह संन्यास मिल जाए, तो जान बच सकती है। संन्यास ले लेंगे, तो कर्म से बच जाएँगे। एक पावन आश्रम परंपरा की दुर्गति अनादिकाल से होती चली आई है। संन्यास अर्थात् कर्मों से पलायन। भगवान उसे दुविधा से निकालते हैं एवं उससे कहते हैं-

श्री भगवानुवाच-

सन्नयासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसन्नायासार्त्कमयोगो विशिष्यते॥5/2

श्री भगवान बोले, “कर्मसंन्यास (कर्मों का त्याग) और कर्मयोग (कर्मों का संपादन) दोनों ही हमें मोक्ष की ओर ले जाते हैं, किंतु इन दोनों में से कर्मों के त्याग की अपेक्षा कर्मयोग साधना में सुगम होने से अधिक श्रेष्ठ है।”

मार्ग दोनों ही श्रेष्ठ, परंतु....

दोनों ही परमकल्याणकारी हैं, दोनों से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है, परंतु इनमें से भी कर्मयोग जिसमें कर्मों का संपादन करते-करते सफलता की ओर बढ़ा जाता है, सर्वाधिक श्रेष्ठ है, यह श्री भगवान का स्पष्ट मत है। यह एक प्रारंभिक साधक के लिए, युद्धभूमि में खड़े योद्धा के लिए, मोहग्रस्त अर्जुन के लिए दिया जा रहा है कि कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्मों का संपादन करते-करते जीना ही सर्वश्रेष्ठ है (तयो अस्तु कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगी विशिष्यते)। बिना रजोगुण पार किए जो सतोगुण सीधे पाना चाहता हो, उसे यह जान लेना चाहिए कि राजमार्ग मात्र एक ही है। हर कोई तमोगुणी की (मोह की, अहंता की) स्थिति में पलायनवादी बनकर हिमालय जाने की बात कहता है, क्योंकि वह मार्ग सीधा-सच्चा दिखाई देता है, पर यह तो छलावा है। ऐसे व्यक्ति वापस तमस की ओर लौटते हैं एवं यदि जीवन में सच्चा मार्गदर्शन नहीं मिला तो जन्म-जन्माँतरों तक भटकते रहते हैं।

भगवान एक ही बात कहते हैं, “तुम्हारे लिए कर्मयोग ही श्रेष्ठ है। यही युगधर्म है और इसी में तुम्हें ही नहीं, किसी भी काल के मानव को सर्वप्रथम अपने आपको नियोजित करना चाहिए।” यह पूरा अध्याय युगधर्म की ही बात करता है व हमें बताता है कि हमारे कर्मों को किस दिशा में नियोजित किया जाना चाहिए। आज के युग में चारों ओर आपाधापी मची हुई है। मनुष्य दूषित हो रहा है, उसके कर्म दूषित हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में ऐसे युगधर्म की अपेक्षा है, जो हमें बता सके कि हमारे कर्म प्रदर्शन के योग्य बन सकते हैं, हम औरों को अपने कर्मों से शिक्षण दे सकते हैं। आज की परिस्थिति में गेरुए कपड़े पहनकर वैराग्य को जीना संभव नहीं है। कभी संन्यास धर्म प्रतिष्ठित रहा होगा, पर आज तो युगधर्म का परिपालन करने वाले वानप्रस्थ, परिव्राजक वर्ग के कर्मयोगियों की सर्वाधिक आवश्यकता है।

युगधर्म की व्याख्या परमपूज्य गुरुदेव के एक लेख के माध्यम से समझाना चाहेंगे। यह लेख ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका अप्रैल 1983 के लिए लिखा गया था, शीर्षक था, ‘जागृतात्माएं युगधर्म का निर्वाह करें’ (पृष्ठ 51)। पूज्यवर लिखते हैं, “आपत्तिकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए समर्थ भावनाशीलों को आगे आना पड़ता है। अग्निकाँड, भूकंप, बाढ़, महामारी, दुर्भिक्ष जैसे संकट आ खड़े होने पर उदारचेता अपने काम-धंधे में हर्ज करके भी दौड़ते और संत्रस्त जनसमुदाय की सहायता करने में कुछ उठा नहीं रखते। स्थानीय चिकित्सकों की जिम्मेदारी और भी अधिक है। इस अवसर पर उनकी योग्यता विशेष रूप से आवश्यक होती है। यदि वे मरहम-पट्टी करने के लिए आने से इंकार या आनाकानी करें, तो यह तत्काल के संकट से परे रहना अंततः हानिकारक ही सिद्ध होगा। इस निष्ठुरता के लिए उन्हें आत्मप्रताड़ना और लोकभर्त्सना दोनों ही सहनी पड़ेंगी।”

युगधर्म की अति महत्वपूर्ण व्याख्या करने के बाद पूज्यवर आगे लिखते हैं, “प्रज्ञा परिजनों की स्थिति सुयोग्य चिकित्सकों जैसी है और समय की विपन्नता भयानक दुर्घटना जैसी। इन दिनों आस्था संकट के सर्वनाशी घटाटोप पूरी प्रौढ़ता पर है। साधनसंपन्न परिस्थितियों में भी मनुष्य को दिनोदिन अधिकाधिक कष्टदायक स्थितियों में फँसना पड़ रहा है। आज की परिस्थितियों को यदि कोई परदा उघाड़कर देखे, तो प्रतीत होगा कि दृश्यमान चमक-दमक के पीछे कितनी अधिक पीड़ा, खीज, निराशा संव्याप्त है। व्यक्ति की तरह ही समाज की चूलें भी चरमरा रही हैं। लोग ऐसे माहौल में जी रहे हैं, जिसमें आतंक, अनाचार और प्रपंच-पाखंड के अतिरिक्त और कुछ बचा नहीं रहा। कहना न होगा कि समय को जिस स्तर की उद्धार क्षमता चाहिए, उसकी उपयुक्त मात्रा प्रज्ञा परिजनों के अतिरिक्त कदाचित् ही अन्यत्र कहीं दिखाई पड़े।”

कर्मयोगी बनें, युगधर्म निबाहें

यह पूरा लेख पढ़ने योग्य है, पर इसका जो अंश यहाँ उद्धत है, वह हम सबके लिए है, हर देवमानव के लिए है, जिसके भी मन में समाज के प्रति थोड़ी भी पीड़ा है, उसके लिए है। यह लेख 1983 में लिखा गया था, पर आज बीस वर्ष बाद भी यह उतना ही सामयिक है। जो भी कुछ विवरण ऊपर दिया गया है, वह आज के समाज की जन्मकुँडली है, पूरा वास्तविक लेखा-जोखा है। ऐसे में हमसे एक सुयोग्य चिकित्सक की भूमिका निभाने को कहा जा रहा है। हम अर्थात् ‘अखण्ड ज्योति’ के पाठक, संवेदना की धुरी से मिशन के उद्देश्यों से जुड़े परिजन, लोकसेवी, कर्मयोग में निरत हर कोई सामान्यजन। परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि हमें कर्मसंन्यास व कर्मयोग दोनों में से चुनना पड़े, तो युगधर्म की छवि से चिकित्सक वाला, लोकशिक्षण वाला कर्मयोग का मार्ग चुनना चाहिए। कभी-कभी संन्यासी बनने की हुड़क मन में उठती है। लगता है कि संन्यास ले लिया होता, तो ज्यादा श्रेष्ठ कहलाते। आनंद का जीवन होता। आज जो संन्यासी समुदाय है, उसकी तरह भोग का जीवन जीते। सन् 1980-81 की बात है। परमपूज्य गुरुदेव के आदेश से हमें एक आश्रम में जाने का मौका मिला, इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम की मशीन लेकर। एक आश्रम में एक स्वामी जी को हार्ट अटैक हुआ था। जिस कक्ष में से होकर हम गुजरे, वहाँ कई संन्यासी भोजन कर रहे थे। अत्यधिक गरिष्ठ, मेवाप्रधान भोजन। आज की दृष्टि से हाई कोलेस्ट्रॉल फूड। अंदर ईसीजी लिया। तुरंत तात्कालिक उपचार किया, दिल का दौरा पड़ा था। रक्त की चरबी की ठीक से चेकअप कराने हेतु सैंपल भेजा। उसी कक्ष से लौटना हुआ। लगा कि यदि सभी स्वामी जी जो बड़े-बड़े मठों में रहते हैं, यह भोजन करते होंगे, तो हार्ट अटैक नहीं होगा तो क्या होगा? यह नहीं कर रहे कि सारे संन्यासी ऐसे होते हैं, पर आज जो स्थिति हो गई है, संन्यास आश्रम की, धर्म की जो दुर्गति हो गई है, उसमें कर्मयोग से परे हटकर पलायनवादी बनकर जीने वाले अधिक हैं वह इनकी संख्या प्रति कुँभ में बढ़ती चली जाती है। बाहर तो भगवा है, किंतु अंतरंग में क्या है, यह किसी को दिखाई नहीं देता। नंगे पाँव चलते हैं, कुछ तप-तितिक्षा के व्रत साध लिए हैं, मौन रहते हैं, पर जीवन वैसा-का-वैसा ही है, क्योंकि तमस् से ऊपर नहीं उठ पाए। यदि अंदर-बाहर दोनों और कर्मणाँ न्यासं, कर्मसंन्यास सही अर्थों में स्थापित हो जाए, तो वह स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद की तरह, आद्य शंकराचार्य की तरह लाखों के दिशादर्शक बन जाते हैं।

युगधर्म की बात से उपर्युक्त प्रसंग उभरे। युगधर्म का परिपालन ही कर्मयोग को जीवन में उतारना है। पीले कपड़े, जो त्याग, तप, बलिदान व उल्लास के प्रतीक है, पहने गायत्री परिवार के कार्यकर्ता स्थान-स्थान पर सातों आँदोलनों में निरत दिखाई देते हैं। गुरुवर चाहते तो वे भी सभी को गेरुए कपड़े पहना देते, पर उनने कहा, “आपको हम पीले कपड़े पहना रहे हैं। आपको लोग गाली देंगे, अपमानित करेंगे, क्योंकि धर्मतंत्र बुरी तरह पददलित हुआ है, अपमानित हुआ है। आपको जीवनविद्या की पुनर्स्थापना करनी है, इसलिए आपको पीले कपड़े पहनाए हैं, ताकि आप धर्मतंत्र को पुनर्जीवित कर सकें।” कर्मयोगी बनकर ही अर्जुन की तरह हम भी मोह, बहं के भवबंधन पार कर सकते हैं। यह व आगे के तीसरे श्लोक की व्याख्या अगले अंक में। (क्रमशः)


ब्राह्मण सिर धुनकर पछताता रहा (Kahani)

ब्रह्म देश में अश्वत्थ वृक्ष की जड़ में एक देव सर्प रहता था। एक ब्राह्मण ने उसे पहचान लिया, सो रोज एक कटोरा दूध बाँबी पर रखकर उसकी पूजा करने लगा।

सर्प देव प्रसन्न हुए। वे नित्य दूध पी जाते और बदले में एक स्वर्ण मुद्रा उसी कटोरे में रख जाते। ब्राह्मण का धन भी बढ़ने लगा और लालच भी।

ब्राह्मण ने सोचा, सर्प की बाँबी में स्वर्ण मुद्राओं का भंडार होगा, सो उसे मारकर एक ही दिन में क्यों न वह सारी राशि प्राप्त कर ली जाए। उसने घात लगाकर सर्प को मार डाला।

खोदने पर बाँबी में कुछ भी न निकला। अति लालच से होने वाली हानि का अनुभव करके ब्राह्मण सिर धुनकर पछताता रहा।


द्रष्टा स्तर की प्रेम से लबालब सत्ता

भाग बिना नहिं पाइए, प्रेम प्रीति की भक्त। बिना प्रेम नहीं भक्ति कछु भक्ति भर्यो सब जक्त॥

प्रेम बिना जो भक्ति है सो निज दंभ विचार। उदर भरन के कारने, जनम गंवायौ सार॥ (संत कबीर की साखियाँ, पृष्ठ 41)

भक्ति के आदर्श की घोषणा कर संत कबीर ने अपनी बेबाक वाणी में कहा है कि बिना प्रेम भक्ति संभव नहीं है। गुरु-शिष्य का संबंध भी कुछ ऐसा ही होता है। आत्मीयता-अनन्य भाव-प्रेम के बाद भक्ति विकसित होती है एवं परिपूर्ण समर्पण बनने पर फिर आदान-प्रदान होने लगता है। यह कार्य दोनों ओर से होता है। परमपूज्य गुरुदेव एवं उनके शिष्य के संबंध बड़े अंतरंग स्तर के वह निराले थे। वे अपना सब कुछ उन पर उड़ेल देते थे, जो उनके अपने थे। अपने शिष्य की उपलब्धियों पर प्रसन्नता व्यक्त करना, वह भी उनके अपने अनुदानों के बलबूते भी प्राप्त हुई हों, तो भी उनका हौसला बढ़ाना उसी प्रेम भरे संबंधों की ही प्रतिक्रिया होती थी। समय-समय पर लिखे पत्र इस तथ्य का प्रतिपादन करते हैं।

यहाँ हम परमपूज्य गुरुदेव का दिल्ली के श्री शिवशंकर जी को लिखा एक पत्र प्रस्तुत कर रहे हैं, जो 21-9-1951 को लिखा गया था-

हमारे आत्मस्वरूप,

आपका पत्र तथा भेजा हुआ साप्ताहिक हिंदुस्तान मिला। प्रथम पृष्ठ पर आपका लेख पढ़कर बड़ी प्रसन्नता हुई। ईश्वर आपको एक दिन साहित्य क्षेत्र का उदीयमान नक्षत्र बनावे।

आपके कुटुँब के प्रति हमें असाधारण ममता है। आप हमारे लिए छोटे भाई या पुत्र के समान हैं। हमारी हर चीज पर आपका अधिकार है। जैसे आपको अपने बड़े भाई या पिता की वस्तुओं का उपयोग करने का अधिकार प्राप्त है, वैसे ही आप हमारी हर वस्तु का उपयोग कर सकते हैं। आपने हमारी पुस्तक से कुछ लेख ले लिए, इसमें कोई अनोखी बात नहीं हुई। यदि अखण्ड ज्योति प्रकाशन में से कभी कोई वस्तु उपयोगी जँचा करें, तो भी उसे बिना पूछे निस्संकोच उसका उपयोग कर लिया करें।

आपके लेख को पढ़कर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। आप अपनी लेखनी द्वारा राष्ट्र की महत्वपूर्ण सेवा कर सकेंगे, ऐसा हमें लगता है।

पत्र की भाषा से एक पिता का, बड़े भाई का स्नेह, अनंत स्तर की आत्मीयता का प्राकट्य होता दिखाई देता है। आज ‘कॉपीराइट’ पर कितने मुकदमें हो जाते हैं, पर अच्छे विचार फैलने चाहिए एवं इसके लिए यदि कोई प्रयास हुआ है, तो उसके लिए शिष्य की पीठ ठोकी जानी चाहिए, यह मान्यता एक बड़े दार हृदय वाला ही रख सकता है। शिवशंकर जी एम.ए. कर चुके थे। एल.एल.बी. व एल.एल.एम. की तैयारी कर रहे थे। बाद में वे पूज्यवर के ट्रस्ट के सलाहकार व फिर ट्रस्टी भी बने। उनके जीवन में कई क्राँतिकारी मोड़ आए। ‘लॉ’ के हर पहलू पर उनका गजब का अधिकार था। साहित्यकार तो वे बन नहीं पाए, पर जीवन के आरंभ की वेला में यह आशीष उनको अपने आराध्य का प्रेमभरा अनुदान दे गया। जीवनभर में अपने विषय पर लिखते रहे। सबसे बड़ी बात गुरुसत्ता की प्रीति उनके प्रति निरंतर बढ़ती रही।

परमपूज्य गुरुदेव को सर्वाधिक प्रिय अपना मिशन था, अपना नवयुग के निर्माण का लक्ष्य था। हर पत्र में कहीं-न-कहीं उसका हवाला अवश्य रहता था। प्यार के दो बोल लिखने के बाद वे यह लिखने में नहीं चूकते थे कि अखण्ड ज्योति पत्रिका को वे न्यूनतम 5 या 10 व्यक्तियों को अवश्य पढ़ाएँ अथवा युगनिर्माण योजना (मिशन-शतसूत्री संकल्प) के उद्देश्यों से अवगत कराएँ। 24-12-1963 में श्री ब्रजेंद्र लाल गुप्त को लिखे पत्र का हवाला लेते हैं-

युगनिर्माण योजना को व्यापक बनाया जाना आवश्यक है। उसके लिए यदि दौरा करना पड़े, तो वह भी करना ही चाहिए। अभी ठंड है, पर जब अवकाश निकले, तब एक चुनाव लड़ने की तरह यह कार्य करने में भी लगना ही चाहिए।

श्री ब्रजेंद्र लाल गुप्त पहले विधानसभा का चुनाव लड़ चुके थे। आगे भी इच्छा रखते थे। उन्हें उदाहरण भी दिया गया, तो यह कि चुनाव लड़ने में जितनी तत्परता, लगन एवं अथक प्रयासों की आवश्यकता पड़ती है, उससे कम में युगनिर्माण योजना के उद्देश्यों को फैलाया नहीं जा सकता। जैसा व्यक्ति वैसी भाषा। प्रेरणा हो तो इस स्तर की। प्रेम के नाते अधिकार जो था उनका सब पर। उसी संबंध के आधार पर वे इस तरह की प्रेरणाएँ लक्षाधिक व्यक्तियों को पत्रों से दे गए।

पिता-गुरु से जो स्नेह से संवेदना मिलती है, वह और कहीं से दुर्लभ है। गुरुवर के शिष्य इसकी अनुभूति करते थे। श्री बेजनाथ शौनकिया जी के पिताश्री का स्वर्गवास हुआ। उनने अपना दुःख गुरुसत्ता तक प्रेषित किया। वहाँ से जो जवाब मिला, संलग्न है-

हमारे आत्मस्वरूप, 7-3-1958

छंदबद्ध पत्र मिला। पिताजी के स्वर्गवास के समाचार से दुःख हुआ। ईश्वर की लीला प्रबल है। उसकी इच्छा के आगे मनुष्य का कुछ वश नहीं चलता। अब धैर्य और संतोष में ही दूरदर्शिता है। स्वर्गीय आत्मा की शाँति और सद्गति के लिए माता से आँतरिक प्रार्थना है।

आप आपने को पितृविहीन न समझें। हम अभी हैं। आपको चिंता करने का कोई कारण नहीं हैं। जो जिम्मेदारियाँ पिताश्री के चले जाने से आपके कंधों पर आई है, वे सभी सानंद पूर्ण होती चलेंगी।

त्रयोदशी संस्कार के समय हम सशरीर न आ सकेंगे, पर हमारी हार्दिक सद्भावना आपके साथ रहेगी।

पत्र सरल-सा है, पर एक-एक शब्द में अपनापन है, अपने सगे के प्रति संवेदना है एवं आश्वासन है। यदि यह प्यार न हो, तो जग कैसा दीखने लगेगा। आज यही संवेदना तो मर गई है, पत्राचार ने ई-मेल का रूप ले लिया है, वहाँ कहाँ यह स्नेह, यह ममत्व, यह भाव परायणता।

एक और पत्र यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, जो न केवल भविष्य-दर्शन की झाँकी कराता है, हम सबके लिए कर्तव्यबोध का सूचक भी है। इस पत्र में आज जो भी कुछ घटित हो रहा है, उसकी एक झलक भी है। पत्र लेखक शिष्य ने अपनी आशंकाएँ आज की परिस्थितियों को देखते हुए व्यक्त की थीं। वर्ष था 1954 का। हम आज 48 वर्ष बाद सोच भी नहीं सकते कि कोई इतना स्पष्ट चित्रण हमारे समक्ष कर सकता है, आगत का, भवितव्यता का। परंतु अपने प्रिय शिष्य की जिज्ञासा मिश्रित आशंका पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए गुरुसत्ता ने पूरा खुलकर लिखा। वह जो आज हो रहा है। यह पत्र 30-4-54 को श्री सुमंत कुमार मिश्र को लिखा गया-

हमारे आत्मस्वरूप,

पत्र मिला, आपकी आशंकाएँ सच्ची हैं। यदि आज की घुमड़ती हुई घटाएँ बरस पड़ीं, तो इस विश्व के नष्ट होने में कुछ संदेह नहीं है। वह एक खंड प्रलय ही होगी। भय संत्रस्त जनता के दुःखकातर लोगों को वे उपाय करना चाहिए, जो इन घटाओं को हटा सकते हैं, पर इसके लिए सच्चे आत्मदान देने वाले साधकों की जरूरत है। हम लोग कुछ तप-त्याग करने को तत्पर हों, तो बहुत कुछ हो सकता है।

अणुयुद्ध आध्यात्मिक तपश्चर्याओं से ही रोका जा सकता है। हमें अदृश्य को जानने की नहीं, अपने कर्तव्य का पालन करने की आवश्यकता है। आपका समाधान आपकी अंतरात्मा स्वयं कर देगी।

श्रीराम शर्मा

पत्र अपने आप में अद्भुत है एवं आज की परिस्थितियों का पूरा विवरण देता है। अदृश्य को जानने की अपेक्षा कर्तव्यपरायणता, अपना-अपना योगदान ही गुरुवर ने एकमात्र मार्ग बताया है। विश्व आज आतंकवाद से ग्रसित है। चारों ओर युद्धोन्माद छाया दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो प्रलय अब आई। विगत वर्ष सितंबर माह में अमेरिका पर हुए हमले से लेकर कश्मीर की सीमाओं पर चल रहा सीमापार का आतंकवाद राष्ट्र ही नहीं, विश्व को विनाश की चुनौती दे रहा है। ऐसे में आज से 50 वर्ष पूर्व दिया गया संदेश, आध्यात्मिक तपश्चर्या, जीवन-पद्धति में परिवर्तन, समूह साधना एवं संवेदना का जागरण उतना ही समयानुकूल है, जितना तब था। सचमुच सर्वांगपूर्ण व्यक्तित्व के धनी थे हमारे गुरुदेव, जो द्रष्टा भी थे एवं एक अभिभावक भी, संवेदनाशील पिताश्री।


सेवा और कर्तव्यपरायणता (Kahani)

ईसामसीह केपर नामक नगर में पहुँचे। वे अशिक्षित और अज्ञानी लोगों के पाए गए। नगर के प्रतिष्ठित लोग ईसा के दर्शनों को पहुँचे, तो उनने आश्चर्य से पूछा, ‘भला इतने बड़े शहर में आपको सज्जनों के साथ रहने की जगह न मिली या आपने उनके बीच रहना पसंद नहीं किया?”

ईसा ने कहा, “वैद्य मरीजों को देखने जाता है या चंगे लोगों को? ईश्वर का पुत्र पीड़ितों और पतितों की सेवा के लिए आया है। उसका स्थान उन्हीं के बीच तो होगा। यही सच्ची सेवा और कर्तव्यपरायणता है।”


केंद्र के समाचार-क्षेत्र की हलचलें

जम्मू वासियों तक पहुँचा शाँतिकुँज का संदेश

आतंकवाद की आग में झुलस रहे जम्मू एवं कश्मीर में पहली बार समाजनिष्ठ भावनाशीलों के बीच शाँति एवं एकता का संदेश पहुँचाने का प्रयास संपन्न हुआ। छह अप्रैल को जम्मू विश्वविद्यालय के ब्रिगेडियर राजेन्द्रसिंह ऑडिटोरियम में आयोजित इस कार्यक्रम में प्राँत के मुख्यमंत्री डॉ. फारुख अब्दुल्ला सहित कई गणमान्य हस्तियों ने भाग लिया। जम्मू मंदिरों का शहर है। सुरक्षा का बंदोबस्त भी काफी है, पर समय-समय पर होती रहने वाली घटनाओं के बावजूद आम लोगों का मनोबल काफी ऊँचा है एवं सारे कार्य चलते रहते हैं। प्रायः ढाई सौ से अधिक जम्मू व आसपास के कठुआ-ऊधमसिंह जिले, पंजाब की सीमा से जुड़े पाँच जिले एवं हिमाचल के समीप के जिलों के कार्यकर्ता इस कार्यक्रम में पहुँचे। जम्मू नगर के गणमान्य नागरिक भी इसमें उपस्थित थे। डॉ.फारुख अबदुल्ला व केंद्रीय प्रतिनिधि के भावभरे उद्बोधन को सभी ने सुना। मल्टीमीडिया पावर पाइंट प्रेजेटेंशन द्वारा इक्कीसवीं सदी के धर्म, वैज्ञानिक धर्म की महत्ता को जाना। कार्यकर्ता गोष्ठी में आगे इस क्षेत्र में कार्य विस्तार की चर्चा हुई। केंद्रीय दल रात्रि दीपयज्ञ के बाद लौट आया।

गोदावरी तीर्थ की सद्भावनाओं का प्रतीक शिवलिंग विश्वविद्यालय आएगा

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्राँगण में ठीक मध्य में एक साधना-कक्ष का निर्माण धरातल के नीचे किया जा रहा है, जिसमें एक हजार व्यक्ति एक साथ बैठकर ध्यान कर सकेंगे। इसके ठीक ऊपर केंद्र में एक शिवालय बनाया जा रहा है, जहाँ महाकाल के प्रतीक की स्थापना होगी। नासिक रोड के श्री के.सी. पाँडे जी के ‘गारगोटी अंतर्राष्ट्रीय मिनरल म्यूजियम’ द्वारा नवरात्रि के दौरान साढ़े सात सौ किलोग्राम के एक बड़े शिवलिंग एवं छह छोटे शिवलिंगों के पूजन हेतु शाँतिकुँज प्रतिनिधि को आमंत्रण गया। इन्हें इसी शिवालय में स्थापित किया जाना है। 18 अप्रैल को केंद्रीय दल गया एवं नासिक के अपने सभी परिजनों तथा कैलाश मठ ट्रस्ट के महंत आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी संविदानंद जी की उपस्थिति में इसका विधिवत् पूजन-अर्चन किया गया। मुँबईवासी व आसपास के सभी कार्यकर्ता उपस्थित थे। सात फीट लंबे व प्रायः साढ़े तीन फुट चौड़े इस विशाल शिवलिंग को इस वर्ष के अंत में महाकाल रथयात्रा में नासिक से हरिद्वार लाया जाएगा। प्रायः डेढ़ माह बाद यह रथयात्रा हरिद्वार पहुँचेगी एवं संभवतः आगामी वसंत पर्व (6 फरवरी) या महाशिवरात्रि (1 मार्च) को इसकी प्राणप्रतिष्ठा विधिवत् संपन्न होगी। निश्चित ही विश्वविद्यालय के लिए यह ऊर्जा का केंद्र बनेगा।

विश्वविद्यालय की प्रथम कार्यशाला संपन्न

25 एवं 26 अप्रैल को देवसंस्कृति विश्वविद्यालय परिसर शाँतिकुँज में ‘समाज में मूल्य आधारित शिक्षा एवं मूल्य विकास के पावन प्रयास’ पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई। उत्तरांचल के समापन समारोह में आए तथा उद्घाटन सत्र को एन.सी.ई.आर.टी. के डॉ. जे.एस. राजपूत ने संबोधित किया। इसमें पूरे भारत के प्रायः ढाई सौ से अधिक शिक्षाविद् पधारे। शिक्षा एवं विद्या के सार्थक समन्वय पर विचार-विमर्श चला। दो सौ से अधिक शोधपत्र पढ़े गए एवं सकारात्मक निष्कर्ष निकाले गए, ताकि आज की शिक्षा नीति में बदलाव लाया जा सके। संगोष्ठी को कुमायूँ, गढ़वाल, रुहेलखंड, चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय के विभिन्न विद्वानों के अतिरिक्त लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के कुलपति डॉ. वाचस्पति उपाध्याय ने भी संबोधित किया।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में शिक्षण सत्र का शुभारंभ

3 जून को प्रथम कुलपति डॉ. एस.पी. मिश्र के पदभार ग्रहण करते ही विश्वविद्यालय सक्रिय हो उठा है। प्रायः दो सौ छात्र परिसर में आ चुके हैं एवं एंट्रेंस टेस्ट के बाद योग में एम.ए./एम.एससी. का 2 वर्षीय, 1 वर्ष का डिप्लोमा, 3 माह का सार्टीफिकेट कोर्स तथा मनोविज्ञान (आयुर्वेद आधारित) में एम.ए./एम.एससी. के पाठ्यक्रमों का शिक्षण प्रारंभ हो चुका है। विश्वविद्यालय की वेबसाइट डीएसवीवी.ऑर्ग पर विस्तृत जानकारी ली जा सकती है।

महिला जागरण सम्मेलनों की द्वितीय शृंखला

सफलतापूर्वक संपन्न- विगत 20 अप्रैल से जून से आरंभ तक तीन टोलियों के माध्यम से प्रायः तीस कार्यक्रम सारे भारत के कोने-कोने में महिला जागरण सम्मेलन के रूप में संपन्न हुए। ब्रह्मवादिनी बहनों के माध्यम से युगऋषि का संदेश सुनकर जन-जन प्रभावित हुआ है। अब आगामी शृंखला 1 अक्टूबर से मार्च 2003 के अंत चलेगी एवं स्थान-स्थान पर शिक्षण सत्र भी आयोजित किए जाएँगे।


भागवत भूमि का सेवन

सन् 1924 का पहला या दूसरा महीना था। श्रीराम अपने पिता के साथ ननिहाल गए। वहाँ भागवत सप्ताह का आयोजन था। पारायण करने वाले विद्वान दूसरे ही थे, पंडित रूपकिशोर जी को जामाता की हैसियत से निमंत्रित किया गया था। ताई जी वहाँ पहले ही पहुँच चुकी थीं। पिता-पुत्र कथा आरंभ के एक दिन पहले आँवलखेड़ा से रवाना हुए और यथासमय पहुँचे। रास्ते में पुत्र ने पिता से कुछ जिज्ञासाएँ कीं या यों कहें कि छपको प्रसंग के समय मन में उठे कुछ सवाल रखे। एक सवाल यह था कि आप भागवत का उपदेश करते हैं। उस अधिकार से भी छपको की सेवा को उचित ठहरा सकते थे, लेकिन कल्याण पंडित को गायत्री उपासना का हवाला क्यों दिया?

पिताश्री ने समझाया, इसलिए कि भागवत शास्त्र गायत्री मंत्र की ही व्याख्या है। भागवत ही नहीं, सभी शास्त्र इसी के विस्तार हैं। यह बीज रूप है। श्रीराम ने सुनकर कहा, लेकिन हमने भी आपकी कथा सुनी है, उसमें गायत्री मंत्र की ऐसी महिमा कहीं नहीं लिखी है। पिता ने उत्तर दिया जिसमें दिशा भी थी। उन्होंने कहा, उस महिमा का अनुसंधान तुम्हें करना है। तुम अभी शास्त्रीय पक्ष ही समझो। शास्त्रीय पक्ष यह है कि भागवत का आरंभ गायत्री मंत्र की व्याख्या है। उसमें गायत्री के कई पद और अर्थ विद्यमान हैं।

श्लोक का अर्थ है, ‘जिसमें इस जगत् की सृष्टि स्थिति और प्रलय होते हैं, क्योंकि जो आकाश आदि पदार्थों में अनुगत भी हैं और जिसमें इसका अभाव भी है, जो सर्वज्ञ है, सर्वशक्तिमान है और प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मा जी को वेद का उपदेश किया है, जिसके संबंध में बड़े-बड़े विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। मरु-मरीचिका के समान मिथ्या जगत् भी जिनके आधार से सत्य प्रतीत होता है, उन स्वयं प्रकाश ज्योति से सर्वदा और सर्वथा मायावान और मायातीत रहने वाले सत्य रूप परमात्मा का हम ध्यान करते हैं।’

प्रारंभ का श्लोक सुनाकर पिताश्री ने कहा, इस पद में ‘जन्माद्यस्य यतः’ पद से सवितुः शब्द का अर्थबोध होता है। ‘स्वराट्’ शब्द ‘देवस्य’ का बोध कराता है। इसी प्रकार ‘धाम्ना स्वेन सदा निरस्त कुहकं’ पद से ‘वरेण्य भर्ग’ और ‘तेने ब्रह्महृदा च आदिकवये’ पद गायत्री में निहित स्वराट् या त्रिभुवन को संचालित करने वाली परमशक्ति का उद्बोधन करता है। ‘सत्यं परं धीमहि’ गायत्री मंत्र की मूल प्रेरणा को स्वयं ही व्यक्त करता है। यही नहीं भागवत शास्त्र का उपसंहार भी ‘सत्यं परं धीमहि’ से होता है। द्वादश स्कंध के तेरहवें अध्याय का उन्नीसवाँ श्लोक परम शुद्ध माया-मल से रहित और परमात्मा के सत्य को अपने भीतर धारण करने की प्रार्थना से संपन्न होता है। अर्थ से और शब्द से दोनों विधि से भागवत शास्त्र गायत्री का ही व्याख्या-विस्तार है।

मत्स्य और वामन पुराण के संदर्भ से भी पंडित जी ने समझाया कि भागवत शास्त्र को गायत्री ने ही अधिकृत किया है। उसका आरंभ गायत्री से हुआ है, इसलिए वह भागवत है। ननिहाल तक का रास्ता इस विषय पर चर्चा में कट गया कि गायत्री सभी शास्त्रों का, इस युग के प्रतिनिधि ग्रंथ भागवत का आधार है, क्योंकि समझाया, वाल्मीकि ने गायत्री के चौबीस अक्षरों के आधार पर चौबीस हजार श्लोकों में रामकथा लिखी थीं। रामायण की जो प्रतियाँ इस समय मिलती हैं, उनमें पूरी रामायण में एक निश्चित अंतराल से एक श्लोक गायत्री के एक अक्षर से आरंभ होता है। उसी अंतराल के बाद एक श्लोक अगले अक्षर का उद्घोष करता है।

कुछ सौ साल पहले गोस्वामी तुलसीदास ने लोकभाषा में रामकथा गानी चाही। सनातन धर्म का स्वरूप उस समय के अनुरूप समझाना चाहा, तो रामायण और भागवत दोनों का आश्रय लिया। रामायण से उन्होंने भगवान का चरित्र लिया और भागवत से भक्ति। दोनों का समन्वय कर उन्होंने रामचरितमानस लिख दिया। जानते हो गोस्वामी जी को यह ग्रंथ रचने की प्रेरणा कैसे मिली थी? बाबा वेणीमाधव ने गुसाई चरित में गाया है कि संध्या गायत्री कर चुकने के बाद शिव-पार्वती ने उन्हें रामचरित लिखने का आदेश दिया था। संवत् 1631 की रामनवमी के दिन प्रातः संध्या के बाद उन्होंने ग्रंथ की रचना आरंभ की थी। साधक किसी को भी अपना इष्ट बनाए, उसे गायत्री जप से ही आरंभ करना पड़ता है।

श्रीकृष्ण के आँगन में

कुछ देर रुककर उन्होंने कहा, यों समझो कि गायत्री मंत्र चाभी है और सभी साधनाएँ कोष भंडार। इस चाभी के बिना भक्ति, ज्ञान और योग का भंडार सुलभ नहीं होता। सप्ताह परायण की अवधि में पिताश्री गायत्री महिमा के साथ भागवत शास्त्र और धर्म की बातें बताते रहे। उन बातों में श्रीराम का मन अच्छी तरह लग रहा था। कथा पूरी होने के दिन पिता-पुत्र दोनों वापस चलने की तैयारी करने लगे। ताई जी ने भी चलने का मन बनाया। बाद में किसी को छोड़ने के लिए आना पड़े, इससे अच्छा है कि साथ ही निकल आया जाए। साथ चलना तय हो गया, सो ताई जी ने कहा, यहाँ तक आए हैं, मथुराजी पास में ही हैं। आपको असुविधा नहीं होता हो, तो द्वारिकाधीश के दर्शन करते चलें। नए कार्यक्रम में लगने वाले समय का हिसाब लगाते हुए पंडित जी सोचने लगे। ताई जी ने अपनी बात को थोड़ा और वजन दिया, श्रीराम भी साथ में ही है, उसने भी द्वारिकाधीश के दर्शन नहीं किए हैं। यमुनाजी के दर्शन भी हो जाएँगे। ताई जी का आग्रह सुनकर पंडित जी हँसे। उन्होंने मथुरा होते हुए आँवलखेड़ा लौटने का कार्यक्रम बना लिया। इस तरह निकलने पर यात्रा में दो दिन और लग जाते थे।

ब्रजमंडल में घने छायादान वृक्षों का अभाव रहा है। रेत और धूल-मिट्टी से सने रास्ते में यात्रियों को प्रायः असुविधा ही होती है, लेकिन जिन दिनों इस परिवार ने मथुरा का रास्ता लिया, उन दिनों जाड़े का मौसम था। उतरते हुए माघ के दिनों में कड़कड़ाती ठंड पड़ती थी, इसलिए सहपऊ से मथुरा आते हुए असुविधा नहीं हुई। गुनगुनी धूप ने जाड़े को दूर भगा दिया और दोपहर ढलने से पहले ही मथुरा के पास आ गए। मुश्किल से दो-ढाई किलोमीटर की दूरी रही होगी, एक टेकरी दिखाई दी। ऊपर मंदिर था। घंटियों की आवाज आ रही थी, इससे लगता था कि लोग आते-जाते होंगे।

श्रीराम ने पिताश्री से पूछा, यह किसका मंदिर है? नगर के बाहर होने से अनुमान लगाया, ग्राम देवता का मंदिर होगा। नगर या बस्ती की सीमा शुरू होने के पहले हर जगह इस तरह के स्थान होते हैं। पुत्र ने वहाँ चलने की इच्छा जताई। ताई जी और साथ के लोगों सहित सभी टेकरी पर चढ़ गए। मंदिर में गोविंद जी की प्रतिमा स्थापित थी। उनके दर्शन कर थोड़ी देर सुस्ताने लगे। गर्भगृह के बाहर बने चबूतरे के नीचे कुछ क्षण ही बीते थे कि गरजती हुई आवाज गूँजी, ‘जय जय राधे’। पंडित जी ने देखा, एक साधु उनकी ओर देखता हुआ चला आ रहा है। लंबी दाढ़ी और सिर के उड़े हुए बालों वाले इस संन्यासी की उम्र साठ-पैंसठ के आस-पास रही होगी।

पंडित जी ने उन्हें प्रणाम कहा। साधु ने उत्तर में पूछा, कुछ आहार बचा है भगत। ताई जी ने अपनी गहरी में से चार पूड़ियाँ निकालीं और उन पर अचार रखकर पंडित जी को ओर बढ़ाया। पंडित जी ने वह भोजन साधु को आदरपूर्वक दे दिया। जीते रहने की दुआ देता हुआ साधु जिस दिशा से आया था, उस दिशा में जाने लगा। ताई जी के पास चुपचाप बैठे श्रीराम यह सब देख रहे थे। साधु को जाते हुए देखते ही उन्होंने पुकारा, बाबाजी। आपने भगवान को देखा है? साधु बच्चे की आवाज से ठिठका और कुछ सँभलते हुए बोला, नहीं लेकिन देखना चाहता हूँ। उन्हें पाने के लिए ही उनकी भूमि में भटक रहा हूँ।

भटकना छोड़ो

इतना कहकर साधु निहारने लगा। श्रीराम ने कहा, बाबाजी भटकना छोड़िए, भगवान की भूमि का सेवन कीजिए। वे यहीं मिलेंगे। बात बहुत सीधी-सरल थी, लेकिन साधु के मन को पता नहीं, कहाँ छू गई। सेवन का न जाने क्या अर्थ समझा कि वह गोविंद जी के मंदिर के बाहर मिट्टी में लोट गया। रज का स्पर्श पाकर जैसे उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा। वह अनुग्रहीत-सा कहे जा रहा था, “तुमने राह दिखाई बच्चा, मेरा भटकाव पूरा हो गया। प्रभु तो मिले ही हुए हैं, मैं ही अपने लोचन बंद किए था।” यह कहते हुए साधु ने श्रीराम को प्रणाम करना चाहा। वह पास आए, इससे पहले ही ब्राह्मण कुमार दूर दौड़ गए थे।

ताई जी और पिताश्री साधु और पुत्र के संवाद को सुनकर चुपचाप बैठे थे। श्रीराम के दौड़ लगाने पर उन्होंने रुकने के लिए कहा और रुकने पर उठकर साथ चल दिए। द्वारिकाधीश तक की यात्रा इसके बाद चुपचाप संपन्न हुई। रास्ते में कोई कुछ नहीं बोला। द्वारिकाधीश के दर्शन के बाद ताई जी ने गोविंद टेकरी वाली घटना के बारे में प्रतिक्रिया व्यक्त की, ठाकुर जी ही मेरे लाल के मुँह से बोले थे। उनके धाम में किसी को भटकने की क्या जरूरत वह तो यहाँ पहुंचते ही मुक्त हो जाता है।

मथुरा पहुंचकर ताई जीन ने द्वारिकाधीश के दर्शन किए। श्रीराम ने मंदिर और मथुरा के बारे में पिताश्री से अनेक प्रश्न किए। इन प्रश्नों में कुतूहल और जिज्ञासा दोनों भाव समाहित थे। द्वारिकाधीश मंदिर मुश्किल से दो सौ साल पुराना है। सन् 1814 में बनवाए इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की राजसी प्रतिमा विराजमान है। कृष्णवर्ण की इस प्रतिमा का पूजन वल्लभमार्गीय विधान से होता है। द्वारिकाधीश के दर्शन करने के बाद पूरा परिवार कटरा केशवदेव गया। भगवान कृष्ण का जन्म वहीं हुआ समझा जाता है। इन दिनों वहाँ एक भव्य मंदिर और भागवत भवन आदि स्थापनाएँ हैं जिन दिनों श्रीराम अपने स्वजनों के साथ गए थे, तब एक साधारण-सा मंदिर था।

कटरा केशवदेव से निकलकर परिवार विश्राम घाट पहुँचा। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि केशवदेव मंदिर में से, जहाँ पहले कंस किला था, भगवान सीधे यमुना किनारे गए थे। उन्होंने और बलदाऊ ने कुछ समय यमुना तट पर बिताया था। भक्तों की भाषा में कंस और उसके रक्षकों से हुए संघर्ष के कारण भगवान को जो क्लाँति हुई थी, उसे यमुना तट पर दूर किया था। जिस जगह भगवान ने विश्राम किया, उसे विश्राम घाट कहते हैं। बालक श्रीराम ने कहा, पिताजी क्या हम लोग भी यहाँ केशवदेव मंदिर के दर्शन से हुई थकान उतारने आए हैं। यह जगह हमारे लिए भी विश्रामघाट है। पुत्र की नटखट बात सुनकर पिता हँसे बिना न रहे।

विश्रामघाट पर क्षोभ

मथुरा-वृंदावन की हवाओं में कृष्ण भक्ति का रस आज भी घुला हुआ है। संवेदनशील चित्त वहाँ पहुँचते ही भक्ति की तरंगों को पकड़ने लगता है, लेकिन यात्रियों को तीर्थ-पुरोहितों अथवा पंडों के कारण बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इन दिनों स्थितियाँ थोड़ी सुधरी हैं, लेकिन किसी समय यह स्थान कुछ शरारती, उपद्रवी और लोभी पंडों के कारण बहुत बदनाम था। पिताश्री वहाँ के पंडों से अच्छी तरह परिचित थे, इसलिए परेशानी नहीं हुई। फिर भी दूसरे यात्रियों को सताए जाते हुए तो उन लोगों ने देखा ही। पंडों से घिर जाने पर एक यात्री कह रहा था, आप लोग आने वालों की दान-दक्षिणा के भरोसे रहते हैं। उन्हें इसके लिए मजबूर करते हैं। कोई और काम-धंधा क्यों नहीं अपनाते? एक पंडे ने कहा, क्या काम-धंधा करें लाला? यात्री ने कहा, कुछ भी, कोई भी काम कर सकते हैं। पंडे ने उसके सुझाव का उपहास उड़ाते हुए कहा, एक मेहनत तो हम कर ही सकते हैं कि तू अगर मर जावे, तो तुझे जमुना जी में फेंक दें, फिर तेरे पास जो मिलेगा, वह हमारी मेहनत की कमाई होगी।

यह उत्तर सुनकर आस-पास खड़े पंडों समेत दूसरे लोग भी खी-खी कर हँस दिए। श्रीराम ने पिताश्री की ओर आश्चर्य से देखा। उन्होंने पुत्र की बाँह पकड़ी और चलने का इशारा किया। श्रीराम ने कहा कि वे लोग यात्री को परेशान कर रहे हैं, कोई कुछ करता क्यों नहीं? पिताश्री ने कहा, पंडे संख्या में ज्यादा हैं। कोई कुछ कहेगा, तो वे सब एक हो जाएँगे। उन लोगों से लड़ना मुश्किल है। श्रीराम ने बालसुलभ सहजता और निराशा से कहा, यह भगवान कृष्ण की नगरी है या कंस की?

ताई जी ने कहा, “है तो भगवान की नगरी, लेकिन कंस का असर यहाँ हमेशा रहा है।” श्रीराम ने प्रश्न का दूसरा हिस्सा दोबारा कहा, “क्या यह इसी तरह चलता रहेगा। कोई सुधार नहीं होगा?” पिता ने आश्वस्त किया, “ऐसा नहीं है। स्थितियाँ सदा एक जैसी नहीं रहती। बदलती भी हैं।” वे विश्रामघाट के सती बुर्ज की ओर मुड़ रहे थे। एक गली की ओर इशारा किया और कहा, अब से पचास-साठ साल पहले इस गली में एक संन्यासी रहते थे। वे प्रज्ञाचक्षु थे, लेकिन वेद−शास्त्रों के प्रकाँड विद्वान थे। वे भी मथुरा की इन स्थितियों से दुखी थे। धर्मक्षेत्र में और भी कई बुराइयाँ हैं, उन सभी बुराइयों से लड़ना चाहते थे, लेकिन उन्हें दिखाई नहीं देता था, इसलिए ज्यादा कुछ कर नहीं सकते थे।”

पिताश्री अपने पुत्र को स्वामी दयानंद के गुरु स्वामी विरजानंद की कथा सुनाने लगे थे। उन संन्यासी के पास एक दिन गुजरात का एक ब्रह्मचारी आया। उस ब्रह्मचारी ने कहा, मैं वेद−शास्त्रों का अध्ययन करना चाहता हूँ, ताकि सत्यधर्म की शोध कर सकूँ। संन्यासी ने कहा, दक्षिणा क्या दोगे? ब्रह्मचारी ने कहा, आप जो भी आदेश करेंगे। संन्यासी ने कहा, पाखंड का नाश। धर्म के नाम पर चल रहे अधर्म का विरोध। कुरीतियों उन्मूलन। शिष्य ने यह दक्षिणा देना स्वीकार किया और गुरु के पास रहकर समस्त विद्या पढ़ी। विद्या ग्रहण करने के बाद शिष्य ने पूरे देश का भ्रमण किया। धर्म का आवरण ओढ़े अधर्म के प्रति लोगों को जाग्रत किया। और धर्म के असली स्वरूप से परिचित कराया। श्रीराम ने उत्सुकता जताई कि अकेले व्यक्ति ने कैसे यह सब कर लिया? पिताश्री ने कहा, साहस और संकल्प हो, तो असंभव दीखने वाले काम भी सहज ही संपन्न हो जाते हैं। क्रमशः


एक महान सृजन सेनानी गुरुतत्त्व में विलीन

14 मई, रात्रि 1 बजकर 35 मिनट पर महान सृजन सेनानी, परमपूज्य गुरुदेव के निष्ठावान शिष्य, अपनी गुरुभक्ति एवं समर्पण के कारण असंख्य गायत्री-परिजनों के प्रेरणा स्त्रोत, युगनिर्माण के आधार स्तंभ, गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक एवं संचालक पं. लीलापति शर्मा स्थूल देह का त्याग कर गुरुतत्त्व में विलीन हो गए। पंडित जी की पूज्य गुरुदेव से पहली मुलाकात सन् 1956 के आस-पास हुई। गुरुदेव उस समय किसी कार्यक्रम के सिलसिले में ग्वालियर आए हुए थे। पंडित जी उन दिनों ग्वालियर क्षेत्र की डबरा नाम की जगह में राइस मिल में मैनेजर थे। पंडित जी के प्रभावशाली व्यक्तित्व की उस समय आस-पास के सेठ-साहूकारों एवं वहाँ के प्रशासनिक क्षेत्र में बड़ी धाक थी, लेकिन इस प्रभावशाली व्यक्तित्व की गहराई में जो भावनाशील-समर्पित शिष्य छिपा हुआ था, उसे केवल गुरुदेव ने पहचाना। प्रथम मुलाकात में ही उन्होंने पंडित जी को अपना लिया।

पंडित जी भी गुरुदेव के तपोनिष्ठ जीवन व सादगी से अभिभूत होकर सदा के लिए उनके हो गए। अपने इस प्रथम मिलन को बताते हुए पंडित जी बताया करते थे कि तब मेँ बड़ा तार्किक था। मैंने शुरू-शुरू में गुरुजी को परखने की कोशिश की। गुरुजी तो सौ प्रतिशत खरे थे। गुरुजी की इस सौ प्रतिशत शुद्धता, उच्चता एवं सच्ची आध्यात्मिकता को समझ लिया, तो फिर मैंने अपनी सारी तर्कबुद्धि को कूड़े में फेंक दिया और एक ही निश्चय किया, ‘श्रद्धा सो श्रद्धा, समर्पण सो समर्पण। गुरुदेव में ही अपने को विलय करना है। उन्हीं के लिए अपने सारे जीवन को झोंक देना है। ‘उनका समूचा जीवन उनके इस संकल्प का प्रमाण है। इसकी तारीफ स्वयं गुरुदेव एवं माताजी बार-बार अपने मुख से करते थे। संकल्प के धनी, दृढ़ प्रतिज्ञ पंडित जी गुरुदेव के सामने जहाँ कर्मकुशल समर्पित शिष्य की भाँति रहते थे, वहीं वंदनीया माताजी के सामने उनका व्यवहार मातृभक्त बालक की भाँति होता था। वह माताजी के बड़े ही अनुरागी भक्त थे।

अपनी पहली मुलाकात के थोड़े ही दिनों के बाद पंडित जी गुरुदेव के काम में लग गए। सन् 1958 के सहस्रकुंडीय यज्ञ में उन्होंने भरपूर जिम्मेदारी निभाई। गुरुदेव ने जब उन्हें पूरी तरह सब कुछ छोड़कर आने के लिए कहा, तो बिना कोई आगा-पीछा देखे या सोचे वह सन् 1965 में पूर्ण रूप से आ गए। 1971 में पूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा के समय से उन्होंने गुरु आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए गायत्री तपोभूमि के संचालन व व्यवस्था की संपूर्ण जिम्मेदारी उठाई। अपने इस काम के बारे में वह कहते थे कि मैं तो हनुमान की भाँति श्रीराम प्रभु का सेवक हूँ। अपनी इस समर्पित भावना के साथ उन्होंने गायत्री तपोभूमि के स्वरूप एवं कार्यों का व्यापक विस्तार किया। उन्हीं के प्रयासों से भव्य प्रज्ञानगर बना। युगनिर्माण विद्यालय का संचालन करते हुए उन्होंने भारी मात्रा में गुरुदेव के साहित्य का प्रकाशन व प्रचार किया। जहाँ कभी पहले केवल एक ट्रेडिल मशीन हुआ करती थी, वहाँ उनके प्रयासों से दो रोटरी ऑफसेट मशीनें लग गई।

सन् 1981 में उन्हें पहला हृदयाघात हुआ, लेकिन संकल्प व जिजीविषा के धनी पंडित जी ने अपने किसी काम में कोई कमी न आने दी। अपनी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को झेलते हुए उन्होंने गुरुदेव के साहित्य प्रसार की कई योजनाएँ चलाईं। मासिक पत्रिका युगनिर्माण योजना का संचालन करते हुए उसे ढाई लाख तक पहुँचा दिया। अपने बाद के जीवन में उन्होंने शारीरिक पीड़ाओं के साथ अनेकों भावनात्मक पीड़ाएँ भी झेलीं। अपने युवा पुत्र के विछोह का आघात सहा, पर उनके समर्पण वह कर्मनिष्ठा में कोई कमी नहीं आई। गुरुदेव के साहित्य को उन्होंने विभिन्न विषयों के अनुरूप पॉकेट बुक्स के रूप में प्रकाशित किया। इसे भारी लोकप्रियता मिली। सतत कर्म करते हुए उन्होंने गायत्री तपोभूमि की स्थापना के इस स्वर्ण जयंती वर्ष में देह का त्याग कर दिया। उनके अंतिम संस्कार में उनके स्वजनों एवं गायत्री तपोभूमि के कार्यकर्ताओं के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान के परिजनों तथा शाँतिकुँज के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उन्हें भावभीनी अंतिम विदाई देते हुए सभी के हृदयों से यही पुकार उठ रही थी कि पंडित जी की ज्योतिर्मय आत्मा सदा ही हम सभी को, अपने गायत्री परिजनों को उच्चस्तरीय प्रेरणा व प्रकाश देती रहे। परम गुरुभक्त, गुरुदेव एवं माताजी के अमर सपूत पं. लीलापति शर्मा को शत्-शत् नमन, शत्-शत् नमन।


गायत्री परिवार का संगठनात्मक ढाँचा अब ऐसा होगा

विगत अंक में ‘गुरुसत्ता के चरणों में समर्पित होंगे हीरकमाल’ शीर्षक से संगठन-सशक्तीकरण वर्ष के लिए गए संकल्पों की चर्चा की गई थी। ‘अखिल विश्व गायत्री परिवार’ रूपी संगठन ऋषियुग्म की अवतारी सत्ता द्वारा संवेदना-ममत्व की धुरी पर खड़ा किया गया एवं भावनाशीलों के समयदान को पूँजी की तरह प्रयुक्त किया गया छह जोनों में पूरे भारत को बाँटने की चर्चा विगत अंक में की गई थी, जिसमें पश्चिमोत्तर, पूर्वोत्तर, दक्षिण भारत, मध्य क्षेत्र, नेपालतराई क्षेत्र तथा राजस्थान-गुजरात क्षेत्र में विभाजन की बात कही गई थी। संगठनात्मक संरचना का स्वरूप आखिर कैसा होगा, यह जानने का मन सभी का होगा। यहाँ संक्षेप में उसे हम दे रहे हैं। विस्तार से अक्टूबर अंक में तथा पाक्षिक में विभिन्न कड़ियों में उसे प्रकाशित कर रहे हैं।

(अ) हमारी प्रारंभिक इकाई है हमारे परिजन। ये अखण्ड ज्योति वह अन्य पत्रिकाओं के पाठक भी हो सकते हैं, दीक्षित भी, उपासक भी, ज्ञानघट, धर्मघटधारी, अंशदानी, सहयोगी, श्रद्धालु एवं समर्थक भी। इनकी संख्या आज लगभग पाँच से सात करोड़ के बीच आँकी जाती है।

(ब) परिजनों की संयुक्त इकाई है-प्रज्ञामंडल एवं महिला मंडल। ये ग्राम/वार्ड/मुहल्ले/कालोनी स्तर तक फैले एक जिले में कई हो सकते हैं। 2000 से 5000 की आबादी तक एक मंडल बनाए जाने की योजना रही है। इनमें पाँच से पचास सदस्य हो सकते हैं, जिनकी साप्ताहिक न्यूनतम एक संयुक्त गोष्ठी होती है।

(स) ग्राम पंचायत/वार्ड/कस्बा या क्षेत्र स्तर पर हमारी दो इकाइयाँ हैं- स-3, स-41

सक्रिय संगठित समूह का नाम ही स-3 है। इसमें ग्रामीण क्षेत्र में 5 से 25 प्रज्ञामंडल जुड़े हो सकते हैं। प्रत्येक समूह की बीच की दूरी 10 से 15 किलोमीटर या कम भी हो सकती है। शहरी क्षेत्र में 5 से 50 प्रज्ञामंडल भी इसमें हो सकते हैं। सभी मंडलों के दो-दो सक्रिय सदस्य मिलाकर एक समन्वय समिति बन जाती है। न्यूनतम 11 सदस्य होने चाहिए, जिनमें तीन केंद्रीय संपर्क हेतु जिम्मेदार कार्यकर्ता हों। गोष्ठी प्रतिमाह न्यूनतम एक होनी चाहिए।

समर्थ समयदानी सहयोगी समूह का नाम ही स-4 है। इसमें आँशिक व पूर्णकालिक समयदानी होते हैं। प्रचारक, पुरोहित, प्रशिक्षक स्तर के अथवा उत्प्रेरक, नियोजक, समन्वयक स्तर के कार्यकर्ता इसमें होते हैं।

(द) विकास खंड स्तर पर संयुक्त समन्वय समिति (न्यूनतम 11 सदस्य) एवं स-4 के रूप में समर्थ समयदानी-सहयोगियों का समूह इसमें कार्य करेंगे। संयुक्त समन्वय समिति में सभी ग्राम पंचायतों, वार्डों, क्षेत्रों की समन्वय समिति के नामित सदस्य होंगे। साथ ही भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के सहयोगी, शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों के नामित ट्रस्टीगण तथा रचनात्मक केंद्रों, ट्रस्टों के नामित सदस्य होंगे। तीन मास में एक बार गोष्ठी अनिवार्य होगी। केंद्रीय संपर्क सूत्र हेतु पाँच जिम्मेदार कार्यकर्ता निर्धारित होंगे।

(ई) तहसील स्तर पर विकास खंड की ही तरह संयुक्त समन्वय समिति (न्यूनतम 11 सदस्य) एवं स-4 के सदस्यों की दो स्तरीय इकाइयाँ इसमें होंगी। इस समन्वय समिति में सभी विकास खंडों (ब्लॉक्स) की संयुक्त समन्वय समिति के नामित सदस्य होंगे। शेष क्रम उसी प्रकार रहेगा जैसा विकास खंड में होगा।

(फ) संयुक्त समन्वय समिति (11 सदस्यों की) एवं समर्थ समयदानी सहयोगी समूह (स-4) की भागीदारी इसमें होगी। इनकी गोष्ठी छह माह में एक बार अवश्य होनी चाहिए। अनिवार्य हो तो दो या कई बार हो सकती है।

उपर्युक्त सभी इकाइयों में बँटे जिले अपने जोन (क्षेत्र) द्वारा सीधे केंद्र से जुड़े रहेंगे। केंद्रीय तंत्र शाँतिकुँज हरिद्वार के ही वरिष्ठ दो भाई एवं 10 सहयोगी भाई 3-3 माह के लिए जोन के लिए निर्धारित केंद्रों में बैठकर सीधे केंद्र के संपर्क में रहेंगे। केंद्र के निर्देश उन्हें जोन्स में बैठे केंद्रीय दल के कार्यकर्ताओं के माध्यम से मिलते रहेंगे। विशेष परिस्थितियों में परिजन सीधे संगठन प्रकोष्ठ शाँतिकुँज से भी संपर्क कर सकेंगे।

जोन (क्षेत्र) जैसा कि सभी जानते हैं, छह हैं। इनके केंद्र हैं- सिलिगुड़ी टाटानगर (पूर्वोत्तर), चंडीगढ़ (मोहाली), शाँतिकुँज एवं नोयडा (पश्चिमोत्तर), नागपुर, रायपुर एवं हैदराबाद (दक्षिण भारत), मुजफ्फरनगर-बस्ती (नेपाल एवं तराई का उ.प्र., बिहार), चित्रकूट-आँवलखेड़ा (दक्षिण बिहार, शेष झारखंड, उ.प्र. व म.प्र.) तथा क्राँतिकुँज अहमदाबाद, गाँधीधाम एवं पुष्कर (गुजरात तथा राजस्थान)। यह एक मोटा ढाँचा है। आशा है 2004 की वसंत तक यह सारा तंत्र सक्रिय रूप ले लेगा।


आत्मबोध


आत्मबोध (Kavita)

दुर्लभ यह देवों को, यह जान लीजिए। स्वामी हैं आप इसके, पहचान लीजिए॥

ऐसा है साधन-धाम यह, जैसा कहीं नहीं। यह संपदा अकूत है, कोई कमी नहीं। इससे न कुछ असंभव, अगर ठान लीजिए॥ स्वामी हैं आप इसके, पहचान लीजिए॥

क्यों भ्रमित हुए हैं कि है भोगों का द्वार यह। है वासनाओं के लिए, प्राणों का ज्वार यह। यह भ्राँति ‘सर्वनाश’ है, यह मान लीजिए। स्वामी हैं आप इसके, पहचान लीजिए॥

स्वामी। क्यों दास बन रहे हो, इंद्रियों के तुम। भोगों में क्षरण कर रहे, क्यों शक्तियों को तुम। मन को दबोच करके, कान तान दीजिए। स्वामी हैं आप इसके, पहचान लीजिए॥

मन के ही हारे हार है, मन के ही जीते जीत। मन ही हमारा शत्रु है, मन ही हमारा मीत। मन वफादार-मित्र है, गर ध्यान दीजिए। स्वामी हैं आप इसके, पहचान लीजिए॥

सुनिएगा। अंतर आत्मा आवाज दे रही। गुरुसत्ता निजानंद का है राज दे रही। कर अंतःऊर्जा जागरण, रसपान कीजिए। स्वामी हैं आप इसके, पहचान लीजिए॥

-मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’

*समाप्त*