मनुष्य का अन्तःकरण दर्पण की भाँति है। सुबह से साँझ तक इस पर धूल जमती रहती है। लगातार इस धूल के जमते रहने से अन्तःकरण का दर्पण अपने स्वाभाविक गुणों को गंवा देता है। और यह सच्चाई सर्वविदित है कि अन्तःकरण की अवस्था के अनुरूप ही मनुष्य को ज्ञान होता है। अन्तःकरण का दर्पण जिस मात्रा में स्वच्छ है, उस मात्रा में ही सत्य उसमें प्रतिबिम्बित होता है।
सूफी सन्त जलालुद्दीन रुमी से किसी व्यक्ति ने अपनी मानसिक चंचलता का दुखड़ा रोया। उसकी परेशानी थी कि साधना में उसका मन एकाग्र नहीं होता। किसी भी तरह से उसका ध्यान नहीं जमता। रुमी ने मुस्कराते हुए उसे अपने एक मित्र साधु के पास यह कहकर भेजा- जाओ और उनकी समग्र दिनचर्या को बड़े ध्यान से देखो। वहीं तुम्हें साधना का रहस्य ज्ञात होगा।
निर्देश के अनुसार वह व्यक्ति उस साधु के पास गया। वहाँ जाकर उसे भारी निराशा हुई। क्योंकि वह साधु एक साधारण सी सराय का रखवाला था। साथ ही वह स्वयं भी बहुत साधारण था। उसमें कोई ज्ञान के लक्षण भी दिखाई नहीं देते थे। हाँ, वह बहुत सरल और शिशुओं की भाँति निर्दोष मालूम पड़ता था। उसकी दिनचर्या भी सामान्य सी थी। उस साधु की दिनचर्या की छान-बीन करने पर बस इतना भर पता चला कि वह रात्रि को सोने से पहले और सुबह जगने के बाद अपनी सराय के बर्तनों को अच्छी तरह से धोता-माँजता है।
इस साधु के पास से काफी निराश होकर वह व्यक्ति जलालुद्दीन रुमी के पास लौटा। उसने साधु की दिनचर्या उन्हें बतायी। सूफी सन्त रुमी हँसते हुए बोले, जो जानने योग्य था, वह तुम देख आये हो, लेकिन उसे ठीक से समझ नहीं सके। रात्रि तुम भी अपने मन को माँजो और सुबह उसे पुनः धो डालो। धीरे-धीरे मन-अन्तःकरण निर्मल हो जाएगा। अन्तःकरण के निर्मल दर्पण में परमात्मा अपने आप ही प्रतिबिम्बित होता है। अन्तःकरण की नित्य सफाई ही साधना का रहस्य है। क्योंकि इस स्वच्छता पर ही साधना की सभी विधियों की सफलता निर्भर है। जो इसे विस्मरण कर देते हैं, वे साधना पथ से भटक जाते हैं।
विज्ञान की तरह वैदिक विवेचना भी प्रतीकात्मक है। इन अर्थों में वेद गूढ़ आन्तरिक प्रतीक का ग्रंथ है। सम्पूर्ण वेद की परिकल्पना रूपकों एवं प्रतीकों में ही की गई है। वेद का यथार्थ अर्थ गुह्य, गोपनीय एवं प्रतीकात्मक होने के कारण वह अनेक उपमाओं तथा साँकेतिक शब्दों द्वारा आवृत्त है। यह आवरण भले ही साधारण मनुष्यों के लिए अभेद्य हो, परन्तु वैदिक ज्ञान के साधकों के लिए झीना और सब अंगों का प्रकाशक वस्तु मात्र है। ऋषि या कवि जब इन प्रतीकों और अलंकारों का आवरण उठा देते हैं, तब प्रतीकों का स्पष्ट स्वरूप उभरकर आता है।
सृष्टि संरचना के वैदिक प्रतीक भी कुछ ऐसे ही हैं। यह वैदिक प्रतीकवाद ऋषियों की प्रज्ञा से निकला है। इसके गूढ़तम अर्थ हैं। सृष्टि संरचना के वेदों के प्रतीकवाद को दृष्टिगत करके ही वेदमंत्रों में निहित सृष्टि संरचना का ठीक-ठीक अर्थ किया जा सकता है। वैदिक सृष्टि संरचना के प्रतीक के रूप में कुछ प्रतीकों के स्वरूप की व्याख्या इस तरह मिलती है।
भृगु ज्वालाओं में उत्पन्न हुआ था। जो त्रिकाल शक्ति रूप रहता है वह भृगु है। महाभारत के अनुसार जो ज्वाला सहित उत्पन्न हुआ वह भृगु है। यह सृष्टि रचना में अग्नि से उत्पन्न होने पर भी अज्वलनशील है। यह सदैव ज्योतिर्मय शक्ति तत्त्व का द्योतक है। यह एक ऐसा तत्त्व है जो उत्पत्ति के समय एवं उसके पश्चात् भी अग्नि रूप में रहता है। यह त्रिकाल अग्नि वर्ण है। इसे ईश्वर द्वारा त्रिकाल नियंत्रित भौतिक तत्त्व भी कहा जा सकता है।
ऋग्वेद में ऊर्जा के त्रिकाल संरक्षित गतिशील सातत्य प्रवाह की परिकल्पना है। प्रलयकाल में भी ऊर्जा एकमात्र ईश्वरीय नियंत्रण में सुरक्षित रहती है, जिसका प्रयोग आगामी सृष्टिकाल के आरम्भ में ईश्वर द्वारा आदि संवेग उत्पन्न हेतु करने किया जाता है। अतः भृगु प्रलयकाल में संरक्षित रखी गयी शक्ति का प्रतीक है। दी यूनीवर्स स्टोरी में ब्रायन एबीम और थामस बेरी ने इसी ऊर्जा का संकेत किया है। संभवतः यही ऋग्वेद का भृगु है।
ऋग्वेद में इसकी विस्तृत विवेचना हुई है। मूल भौतिक शक्ति के दो भाग होते हैं। एक भाग त्रिकाल ईश्वरीय नियंत्रण में रहता है। इसी एक भाग का वैदिक नाम भृगु है। दूसरे अनियंत्रित भाग को वृत्र या शम्बर कहते हैं। क्रियात्मक मूल तत्त्व जब तक ईश्वरीय सृष्टि विकास योजना के अंतर्गत नहीं आता तब तक अपने आप वह सृष्टि निर्माण की दिशा में अक्षम रहता है। इस स्थिति में संलग्न द्रव्य अनन्तकाल तक भी सृष्टि सृजन नहीं कर सकता। इस स्थिति को वेद ने वृत्र प्रतीक के रूप में दर्शाया है। शम्बर आपः में स्वनिर्मित चक्रीय परिवर्तन रूपी अनेकानेक भंवरों के समग्र रूप का प्रतीक है। प्रकृति का यह दूसरा भाग प्रलयकाल में अपने स्वाभाविक स्वतंत्र रूप में होता है। इस भाग में सृष्टि उत्पादन सामर्थ्य का बीजारोपण करने के लिए भृगु (नियंत्रित) भाग से संवेग आरोपित किया जाता है। जगत् का उद्भव इसी का परिणाम है।
आदि सृष्टि काल में सुरक्षित ऊर्जा (भृगु) से प्रकृति के दूसरे भाग पर प्रक्षेपण किया जाता है। इसे वैदिक भाषा में वज्र संचालन के रूप में व्यक्त किया जाता है। इस क्रिया से बिग बैंग (महाग्निकाण्ड) होता है, जिसमें महाशक्ति का उद्भव होता है। इसकी परिणति महाप्रसार के रूप में होती है। ली स्मोलीन ने अपने शोधग्रंथ ‘द लाइफ आफ द काँस्मास’ में इसे विश्व का प्रसार कहा है। इस प्रकार वेदों में सुरक्षित अग्नि तत्त्व को भृगु कहा गया है।
भृगुओं से अग्नि तत्त्व को मातरिश्वा ने लिया। अग्निकाण्ड (बिग बैंग) से प्रज्वलित तरल चारों ओर प्रसारित हुआ। वेद में इस घटना का नाम मातरिश्वा है। यही विश्व का प्रसार है। जान डी बैरो ने भी द आर्टफुल यूनीवर्स में इसे प्रसारित विश्व के नाम से संकेत किया है। बिग बैंग से जो आदि संवेग उद्भूत होता है, उससे समस्त प्रज्वलित द्रव्यमण्डल तीव्र गति से चारों ओर प्रसारित होता है। पॉल डेविस के अनुसार आदिकाल में प्रदत्त संवेग से आज भी गैलेक्सियाँ परस्पर दूर जा रही हैं। इसे विश्व के प्रसारित होने का सिद्धान्त कहते हैं।
मातरिश्वा अग्निकाण्ड से उत्पन्न महाशक्ति से प्रज्वलित द्रव्य के तीव्र गति से चारों ओर प्रसार का द्योतक है। मातरिश्वा प्रवाह की उत्पत्ति आदिकाल में हुई थी। ऋग्वैदिक ऋचा (1/143/2) में इसका संकेत मिलता है। आदिकाल में महामण्डलाकार प्रज्वलित अग्निकाण्ड की परिणति मातरिश्वा के रूप में हुई जिसमें प्रज्वलित द्रव्य चारों ओर गतिमान हुआ। इसी बिखरे हुए एवं तीव्र गति से प्रसारित हुए द्रव्य से कालान्तर में गैलेक्सियों, नक्षत्र मण्डलों व प्रकाशित-अप्रकाशित लोकों की उत्पत्ति हुई।
मूल उत्पादन कारण ईश्वरीय कामना के परिणाम स्वरूप परिवर्तित व विकसित हुआ। इसी से सृष्टि उत्पत्ति की स्थिति बनी। बाद में भौतिक द्रव्य प्रजाओं और प्रकृति के विकारों को उत्पन्न करने में भी समर्थ हुआ। इसे ही प्रजापति कहा गया है। यही प्रजापति वेदों में अथर्वा नाम से अलंकृत हुआ है। गोपथ ब्राह्मण के अनुसार जब प्रकृति में ईश्वर की ईक्षण शक्ति के अनुरूप सृष्टि उत्पत्ति हेतु पृष्ठभूमि तैयार हो जाती है, तब उस प्राकृतिक स्वरूप को अथर्वा कहते हैं।
ऋग्वेद में उर्वशी को सर्वव्यापी प्रकृति की ओर इंगित किया गया है। उर्वशी को अप्सरा कहा गया है। उर्वशी एवं अप्सरा भौतिक तत्त्वों के वैदिक प्रतीक हैं। अप् क्रियात्मक मूल तत्त्व है एवं अप्सरा रूप का पर्याय है। उर्वशी विशाल क्षेत्र में नियंत्रण करने वाली एवं विस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करने वाली है। यह प्रकृति का क्रियात्मक रूप आपः या माया है। वैदिक मंत्रों से पुरुरवा जीवात्मा के रूप में वर्णित है।
मित्र-वरुण के वीर्य के संयुक्त रूप से उर्वशी के गर्भ में स्थापना से वशिष्ठ की उत्पत्ति बतायी गयी है। मित्र-वरुण मौलिक कण हैं, जो विपरीत चार्ज वहन करते हैं। यदि वरुण धनात्मक आवेश कणों का समुच्चय है तो मित्र ऋणात्मक आवेश का समुच्चय है। ये दोनों मिलकर आधुनिक विज्ञान का द्रव्यभाग बनाते हैं। मित्र-वरुण के अंशभूत कणों के संयोग से एक उदासीन (न्यूट्रॉन) कण की उत्पत्ति होती है। यह न्यूक्लियस का प्रमुख भाग है। इस नाभिकीय द्रव्य का नाम वशिष्ठ है। इस प्रकार वशिष्ठ विज्ञान का न्यूट्रॉन कण है। अतः वशिष्ठ व्यक्ति नहीं प्रकृति द्रव्य है।
ऋग्वैदिक ऋचा में वशिष्ठ (न्यूट्रॉन) की रचना का संकेत है। ऋषि शब्द का प्रयोग भी भौतिक शक्ति के लिए हुआ है। अथर्ववेद में ‘सप्त ऋषयः’ पद भौतिक शक्तियों के लिए प्रयुक्त हुआ है। सप्तवर्गी परमाणुओं को यहाँ सप्तऋषि कहा गया है। ऋग्वेद के अनुसार भी ऋषि वशिष्ठ भौतिक सत्ताएँ हैं। यह मूल भौतिक तत्त्व के नाभिक का परिणाम है।
द्रव्य ब्रह्म की अंशभूत तेजस् शक्ति है, जो क्रमशः आपः, बृहती आपः व अपाँ नपात् में रूपांतरित होती हुई सूर्य रूप में उद्भूत होती है। आपः मूल भौतिक कणों की उद्वेलित क्रियाशील अवस्था का समग्र रूप का प्रतीक है। क्रियात्मक होते ही त्रिवर्गी शक्ति की परस्पर क्रिया एवं संयोग के परिणामस्वरूप यौगिकों की उत्पत्ति हुई। प्रकृति के इस विस्तृत रूप को बृहती आपः कहा गया है। यह प्लाज्मा अवस्था के सदृश्य है। अपाँ नपात् नाभिकीय अवस्था का द्योतक है। इस प्रकार द्रप्सः मूल प्रकृति का शक्त्यंश है, जिसका वशिष्ठ की उत्पत्ति से निकट सम्बन्ध है।
वसु मूल तत्त्वों से बने यौगिकों की संज्ञा है और महावसु मूल तत्त्वों का प्रतीक है। ऋग्वेद में इन्द्र और वरुण को महावसु बताया गया है। मंत्रानुसार इन्द्र सम्राट है तथा वरुण स्वराट। ईश्वर सर्वनियंत्रक सर्वोच्च सत्ता है तथा वरुण अपने सीमित क्षेत्र भौतिक सत्तात्मक जगत् का राजा है। वरुण महावसु है अर्थात् तीनों मित्र, वरुण, अर्यमन् महावसु हैं। इन्द्र सृष्टि का निमित्त कारण अर्थात् रचयिता ईश्वर वाचक है तथा मित्र, वरुण, अर्यमा संयुक्त रूप से द्राव्यिक कारण के वाचक हैं। इस प्रकार महावसु मूल सत्तात्मक तत्त्व हैं जो वसु के कारण हैं, तथा वसु, महावसुओं के यौगिक हैं।
मित्र-वरुण के अंशभूत कणों के संयोग से जो प्रथम उदासीन कण बनता है, उसका ऋग्वैदिक नाम वसिष्ठ है। इस प्रथम यौगिक की रचना में स्थायित्व लाने के लिए एक और कण भाग लेता है, उस कण को ऋग्वेद में अगस्त्य कहा गया है। अगस्त्य मित्र-वरुण का अंश नहीं है। अतः यह अर्यमा उदासीन कणों का समूह है। इस प्रकार अगस्त्य भी उदासीन कण है। प्रोट्रॉन तथा इलेक्ट्रान संयोग करके न्यूट्रॉन बनाये हैं परन्तु इस न्यूट्रॉन रचना में एक उदासीन कण एण्टी इलेक्ट्रान न्यूट्रीनो भाग लेता है। इस संदर्भ में अगस्त्य एण्टी इलेक्ट्रान न्यूट्रीनो है। हेंज आर पेजल्स ने ‘द कास्मीक कोड’ में इस कण का इसी प्रकार उल्लेख किया है। ऋग्वेद के सोम को विज्ञान की विकिरण ऊर्जा कहा जा सकता है। प्रकृति अपने आपको दो रूपों में व्यक्त करती है। प्रकृति का द्रव्य भाग मित्र-वरुण में निहित है।
अर्यमा प्रकृति का विकिरण भाग है। सृष्टि में नियोजित होने के उपरान्त विकिरण की संज्ञा सोम है। ऋग्वेदानुसार सोम कण (फोटान) मूल तत्त्वों के साथ पकाये गये। उस उच्च तापमान पर विकिरण तीव्रता के साथ क्रियाशील हुआ। आदिकाल में मेटर व विकिरण का मंथन हुआ। मेटर निष्क्रिय थे। विकिरण (सोम) ने इन्हें सक्रिय किया। आदिकाल में सोम विभक्त होकर कण-प्रतिकण के रूप में विस्तार पाया और तब सूर्यों के समान प्रज्वलित सहस्रों कणों का समग्र पिण्ड उत्पन्न हुआ। इसे ही बिग बैंग कहते हैं। सोम समग्र गुरुत्वाकर्षण का कारण है। इसी कारण सोम (विकिरण) पर आश्रित हो नक्षत्र कण आकाश में अपनी-अपनी कक्षाओं में भ्रमण करते हैं। सोम आकाश में लोकों के संतुलन की आधारभूत ऊर्जा (विकिरण) है।
ऋभु चार प्रकार के आकर्षण के प्रतीक हैं। ऋग्वेद के अनुसार ऋभुओं ने जब यह जाना कि यह अग्नि ईश्वरीय संदेश लाया है तब उन्होंने उसे ग्रहण किया। अग्नि ने ऋभुओं से कहा एक ही मूल तत्त्व को चार प्रकार से संयुक्त करो। मूल तत्त्व के चार प्रकार से संगति करने से यौगिकों की उत्पत्ति होती है, जो देव संज्ञा से विभूषित हैं।
ऋभु आकाशस्थ मूल तत्त्व में कार्यरत शक्ति हैं। इसका कार्य क्रियाहीन तत्त्वों को क्रियाशील करना तथा नित्य तत्त्वों एवं कणों में विद्यमान शक्ति को प्रकट करना हैं। ऋभु मूल कणों को परस्पर संयुक्त करके आकर्षण के नियमानुसार यौगिक बनाने वाला बल है। ऋभु शक्ति से यौगिक रचना होती है। रासायनिक जगत् की उत्पत्ति ऋभु शक्ति के कारण हुई है। यह लोकों को चारों ओर से आच्छादित करके गति करती है। यह शक्ति घटकों के मध्य आकर्षण का संचार कर उन घटकों को आबद्ध रखती है। ऋभु शक्ति मौलिक कणों के मध्य आकर्षण करने वाला स्वाभाविक गुण है। यह बल को उत्पन्न करने वाली प्राकृतिक स्थिति है।
मरुत आकाश में व्याप्त शक्ति है जिसका कार्य ऋभुओं को पाना अर्थात् बल का संतुलन करना है। मरुत शक्ति विद्युत् बल एवं गुरुत्वाकर्षण बल से सम्बन्धित है। यह न केवल विद्युत् बल का प्रतिनिधित्व करती है वरन् यह गुरुत्वाकर्षण बल का भी नियमन करती है। चार बलों में से इन दो बलों का प्रभाव क्षेत्र असीम एवं व्यापक है। मरुत व्यापक बल का कार्य करते हैं। ये अनेक प्रकार के बलों का निरन्तर संरक्षण करते हैं। इनकी बल रेखाएँ चक्राकार गति करती हैं। इनका बल अखण्ड है। मरुत् वृहत गुरुत्वाकर्षण बल है, जो लोकों को थामता है और सृष्टि रथ संचालित करता है।
सृष्टि संरचना का यह वैदिक प्रतीकात्मक ज्ञान वैदिक सूक्तों में मणि-मुक्तकों की तरह बिखरा हुआ है। ऋग्वेद के कतिपय सूक्त तो इसको बड़ी ही विशिष्ट रीति से निरूपित करते हैं। विज्ञान की सामयिक विशिष्टताओं को आधुनिक युग के महान् वैज्ञानिकों ने भी बड़े ही प्रशंसित स्वर में स्वीकार किया है। उनकी शोध अनुसंधान की प्रवृत्ति एवं उससे प्राप्त निष्कर्षों से यह तत्त्व लगातार प्रभासित हो रहा है कि वैदिक ऋषि अध्यात्मवेत्ता होने के साथ महावैज्ञानिक भी थे। जिन्होंने प्रतीकों के माध्यम से दुर्लभ सृष्टि विद्या को प्रतीकों के रूप में अपने मंत्रगान में स्वरित किया।
जोधपुर महाराज एक युद्ध में लड़ने के लिए सेना समेत गए। हार होती देखकर अपनी जान बचाकर भाग आए, रात्रि को किले का दरवाजा खटखटाया, प्रहरी रानी के पास गए। उस स्थिति में रात्रि के समय दरवाजा उनकी आज्ञा से ही खुल सकता था।
रानी ने पूरा विवरण सुनने के बाद दरवाजा न खोलने का हुक्म दिया और राजा से कहलवा भेजा, जोधपुर नरेश होते तो पीठ दिखाकर न आते। या तो जीतकर लौटते या उनकी लाश वापस आती। भगोड़ा तो कोई छद्मवेशधारी हो सकता है।
राजा का पहरेदारों ने रानी का आदेश सुनाया। वे उल्टे पैर वापस लौट गए। पूरे जोश के साथ दुबारा लड़े और जीतकर वापस लौटे।
इस देश और जातीय जीवन की समर्थता ऐसे ही कठोर अनुबंधों के सहारे विकसित हुई थी।
अनेकों घटनायें तथा तथ्य प्रश्न बनकर मानवीय मस्तिष्क को चुनौती देते हैं। उन्हें असंभव मान लेने पर विचारों का विकास रुक जाता है। हमारा समाज हमारे विचारों का ही प्रतिबिम्ब है। विचार प्रवाह को अवरुद्ध कर देने से समाज के विकास की गति धीमी पड़ गयी है। अतः तथ्यों को असंभव मानने की अपेक्षा उनका नवीन दृष्टि से विश्लेषण करना ही उचित है।
न्यूटन की दृष्टि से भौतिक जगत् में प्रत्येक वस्तु की एक निश्चित पहचान और स्थान है। एक व्यक्ति एक समय एक ही स्थान पर रह सकता है। कपड़े का रंग हरा,नीला अथवा कोई और हो सकता है। क्वाण्टम फिजिक्स ने आज अथवा इस दृष्टिकोण पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, उसके अनुसार जो स्थूल नेत्रों से दिखाई दिया है,उसके परे भी सत्य है और हमें उस पर विश्वास करना सीखना होगा। हमारे मस्तिष्क के लिए यह एक नवीन दृष्टिकोण है अतः इसे अपनाना कठिन कार्य है। रिचर्ड पास्कल के अनुसार “कुछ विषयों पर विचार करना लगभग असंभव है क्योंकि हमारा मस्तिष्क उसका आदी नहीं है।”
वर्षों तक यह विवाद चलता रहा कि प्रकाश तरंगों से बना है अथवा कणों से। क्वाण्टम रियलिटी ने रहस्योद्घाटन किया कि प्रकाश तरंगों तथा कणों दोनों से बना है। किन्तु किसी प्रयोग में प्रकाश शृंखला बद्ध तरंगों के रूप में दिखता है तो किसी में कणों का प्रवाह। पर दोनों रूपों में एक साथ प्रकाश को नहीं देखा जा सकता। दोनों रूपों में से कोई एक अधिक प्रमुख भी नहीं है। दोनों समान रूप से एक दूसरे के पूरक हैं। क्वाण्टम थ्योरी के अनिश्चितता के सिद्धान्त के अनुसार हम प्रकाश से नहीं कह सकते, “अपने वास्तविक स्वरूप को दिखाओ।” परन्तु जो दिखायी नहीं देता उसके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। किसी वस्तु का एक साथ एक से अधिक रूपों में रहना भी असंभव नहीं।
मशीनों का एक निश्चित स्वरूप होता है। आसपास के वातावरण का उन पर नगण्य सा प्रभाव पड़ता है। किन्तु अणु-परमाणु अपना स्वरूप वातावरण के संपर्क में रहकर बदलते रहते हैं। जिस प्रकार प्रयोग किये गये स्थान के अनुसार एक ही शब्द के दो भिन्न स्वरूप अथवा अर्थ स्पष्ट होते हैं उसी प्रकार क्वाण्टम रियलिटी बाह्य वातावरण के अनुसार अपना स्वरूप बदल लेती है-जिसको ‘कान्टेक्स्चुएलिजम’ कहते हैं। सामाजिक जीवन में भी इसी नियम के तहत किसी सत्य का अन्वेषण उसके आसपास के देश,काल,परिस्थिति को ध्यान में रखकर करना ही समुचित परिणाम दे सकता है। फ्रेंच दार्शनिक मोरिस मर्लो पोण्टी के अनुसार सत्य की परिभाषा दी गयी परिस्थिति के अनुसार ही की जा सकती है।
प्रकाश का एक साथ कणों और तरंगों के रूप में रहना तथा अणुओं के बाह्य परिस्थिति-वातावरण के अनुसार स्वरूप बदल लेने की क्रियाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि जो कुछ हम देखते हैं वही सब कुछ नहीं है। ऐसा भी बहुत कुछ है जिसका हमें अनुभव नहीं हुआ अथवा जिसे व्यक्त अथवा प्रदर्शित करना संभव नहीं। अतः तत्कालीन परिस्थितियों की जानकारी करके वस्तुएँ क्या हैं इससे अधिक ध्यान कि वे कहाँ जा रही हैं तथा उनका स्वरूप कैसा बन रहा है, इस पर दिया जाए तो दृष्टिकोण अधिक विस्तृत तथा क्रान्तिकारी बनेगा।
समस्त संसार परिवर्तनशील है। आज का नन्हा बालक भविष्य में पूर्ण विकसित पुरुष या नारी में परिवर्तित हो जाता है। वर्तमान के गर्भ में आश्चर्यजनक भविष्य छुपा हो सकता है। आज के आधार पर कल का निर्धारण ठीक नहीं है। लोगों के व्यवहार एवं व्यक्तित्व को भी स्थायी नहीं माना जा सकता। जो आज असंभव लग रहा है कल वह संभव हो जाये तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। क्वाण्टम रियलिटी की दृष्टि से सिद्ध यह तथ्य हमें पुनः अपने पुराने दर्शन तथा अध्यात्म को स्वीकारने की प्रेरणा देता है।
अनिश्चितता क्वाण्टम रियलिटी का एक अंग है। नील बोर के अनुसार सामान्य अवस्था में परमाणु के भीतर अपनी ऊर्जा के अनुसार इलेक्ट्रान निश्चित परिधि में न्यूक्लियस के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं। पर जब परमाणु की आँतरिक ऊर्जा व्यवस्था में अनिश्चित कारणों से अस्थिरता आती है तब इलेक्ट्रान वर्तमान ऊर्जा स्तर से नीचे-ऊपर अथवा किसी अन्य एनर्जी लेवल में चले जाते हैं।
हालाँकि यह जानने का कोई उपाय नहीं है कि एक निश्चित इलेक्ट्रान किस पथ से और क्यों जायेगा। इससे भी अधिक आश्चर्यजनक तथ्य बर्नार्ड डि ऐस्पेग्नेट ने “रियलिटी एण्ड द फिजिसिस्ट” में दिया है कि इलेक्ट्रान सभी संभव मार्गों से एक ही समय पर जाता है-मानो पूरे स्थान विशेष में वह लीपा हुआ हो और एक ही समय में हर जगह उपस्थित हो। यही बात सामाजिक संदर्भ में भी लागू होती है। इलेक्ट्रान के नये एनर्जी लेवल पर पहुँचने के बाद ही उसका वास्तविक मार्ग निश्चित होता है। उसी प्रकार अनेकों संभावनाओं के सत्य घटना में परिवर्तित होने तक अनिश्चितता बनी रहती है। जीन्स में होने वाले परिवर्तन अगली पीढ़ी में व्यक्त होंगे अथवा नहीं-यह भी प्राकृतिक अनिश्चिंतता का एक उदाहरण है। इसलिए कहा गया है कि कोई भी कार्य प्रारंभ करने से पूर्व तदनुकूल परिस्थितियों का विश्लेषण करें और यह भी ध्यान रहे कि कुछ भी संभव हो सकता है।
हालाँकि यह जानने का कोई उपाय नहीं है कि एक निश्चित इलेक्ट्रान किस पथ से और क्यों जायेगा। इससे भी अधिक आश्चर्यजनक तथ्य बर्नार्ड डि ऐस्पेग्नेट ने “रियलिटी एण्ड द फिजिसिस्ट” में दिया है कि इलेक्ट्रान सभी संभव मार्गों से एक ही समय पर जाता है-मानो पूरे स्थान विशेष में वह लीपा हुआ हो और एक ही समय में हर जगह उपस्थित हो। यही बात सामाजिक संदर्भ में भी लागू होती है। इलेक्ट्रान के नये एनर्जी लेवल पर पहुँचने के बाद ही उसका वास्तविक मार्ग निश्चित होता है। उसी प्रकार अनेकों संभावनाओं के सत्य घटना में परिवर्तित होने तक अनिश्चितता बनी रहती है। जीन्स में होने वाले परिवर्तन अगली पीढ़ी में व्यक्त होंगे अथवा नहीं-यह भी प्राकृतिक अनिश्चिंतता का एक उदाहरण है। इसलिए कहा गया है कि कोई भी कार्य प्रारंभ करने से पूर्व तदनुकूल परिस्थितियों का विश्लेषण करें और यह भी ध्यान रहे कि कुछ भी संभव हो सकता है।
बिना किसी शक्ति अथवा संकेत का आदान-प्रदान किये किसी वस्तु का दूसरी से तत्काल संपर्क होने को हम भूत-प्रेतों का कार्य मानते हैं। रिलेटिविटी थ्योरी के अनुसार ऐसा कुछ भी नहीं जिसकी गति प्रकाश से अधिक तीव्र हो। अतः “तत्काल हेतुक प्रभाव” जैसा कुछ होना संभव नहीं। आइन्स्टीन ने भी इसे ‘भूतहा तथा बकवास’ कहा। अपने कथन को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने प्रख्यात् आइन्स्टीन-पोडोलस्की-रोजन पैराडॉक्स दिया, जिसे इस उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। बाल्यकाल में बिछुड़े दो जुड़वा भाई-बहन हैं जो दो सुदूर स्थानों में रहते हैं। वे एक दूसरे से पूर्णतया अनभिज्ञ हैं। किन्तु उनके जीवन में आश्चर्यजनक समानताएँ हैं। दोनों तिमञ्जिले मकान में रहते हैं,विवाह चिकित्सक से हुआ है,प्रिय रंग लाल है तथा दोनों ही उपन्यासकार हैं। आइन्स्टीन ने अपनी “थ्योरी ऑफ हिडन वैरियेबल्स” के द्वारा कहा कि दोनों में कोई गूढ़ तत्त्व इस साम्य का कारण है। वह तत्त्व समान अनुवाँशिक गुण भी हो सकता है। किन्तु आयरिश फिजिसिस्ट जॉन बेल ने ‘बेल्स थ्योरम’ के द्वारा आगे प्रतिपादित किया कि दोनों बच्चे विभिन्न नृत्य विद्यालयों में एक साथ प्रवेश लेते हैं। नृत्य करते समय एक का हाथ ऊपर उठता है तो तत्काल दूसरे का भी हाथ ऊपर उठता है। इस तत्काल घटित क्रिया के पीछे अनुवाँशिक कारण का होना संभव नहीं। न ही प्रकाश से अधिक तीव्र कोई संकेत हो सकता है जो उनको एक दूसरे की प्रत्येक क्रिया की जानकारी दे सके। फिर दोनों के व्यवहार में ऐसी समानता किस प्रकार संभव हो सकती है। मानो वे एक ही कमरे में नृत्य कर रहे हों। इसे ‘भूतहा या बकवास’ कहा तो जा सकता है पर ऐसी सत्य घटनाएँ जीवन का एक अंग हैं। विश्व में एक साथ एक जैसी क्रान्तियों का जन्म लेना या दो भिन्न स्थानों पर एक दूसरे से अनभिज्ञ दो व्यक्तियों द्वारा एक साथ एक जैसे विचारों का प्रतिपादन करने की अनेकों घटनाएँ हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन भारत में छिड़ा तब अन्य कई देशों में ऐसी ही क्रान्तियाँ भड़की। इसी प्रकार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक साथ अनेकों सन्तों एवं वीरों का जन्म लेना ऐसी ही एक घटना है।
समाजवादी तथा इतिहासकार इन घटनाओं के पीछे ‘संयोग‘ अथवा ऐसे अनेकों कारण बता सकते हैं। किन्तु क्वाण्टम फिजिक्स के अनुसार एक ऐसी सार्वभौमिक शक्ति “क्वाण्टम होल “ है, जिसका गूढ़ तंत्र इन घटनाओं को संचालित करता है। यही तंत्र उन एक जैसी घटनाओं के लिए भी उत्तरदायी है जो भिन्न समय में घटित होती हैं।
सम्पूर्ण ब्रह्मांड को संचालित करने वाली यह सार्वभौमिक शक्ति समस्त प्राणियों एवं ब्रह्मांड में घटने वाली प्रत्येक घटना को आपस में जोड़े हुये है। कोई राजनीतिज्ञ अथवा अधिकारी किसी घटना को उतना नियंत्रित अथवा प्रभावित नहीं कर सकता जितना एक संवेदनशील व्यक्ति जो लोगों की भावनाओं से गहराई तक जुड़ा है। वह जानता है कि किस विशेष परिस्थिति में जन मानस की तत्काल कैसी प्रतिक्रिया होगी। दृष्टिगत रूप से स्पष्ट है कि ताकत राजनीतिज्ञ अथवा अधिकारी के पास अधिक है। फिर ऐसी कौन सी अदृश्य शक्ति है जो एक संवेदनशील व्यक्ति को अधिक सामर्थ्यवान बना देती है। यह वही सर्वसामर्थ्यवान अदृश्य तंत्र है जो प्रत्येक मनुष्य की भावनाओं का नियंत्रण-संचालन करता है। असंभव को संभव बनाता है। यह बात समझ लेने पर सामाजिक-पारिवारिक संस्थाओं में व्याप्त कठोर अनुशासन तथा निश्चित कार्यों में उदारता का समावेश किया जा सकेगा। वैचारिक ढाँचे में होने वाले इस महत्त्वपूर्ण परिवर्तन में ही भावी समाज में क्रान्ति की सम्भावना निहित है।
महाकाल का संदेश
परमपूज्य गुरुदेव ने जीवन भर जनकल्याण हेतु साहित्य सृजन किया, उनके तप एवं ज्ञान का निचोड़ उनके साहित्य में है। सभी लोगों तक यह ज्ञानगंगा पहुँचे, इसीलिए पं. श्री राम शर्मा आचार्य वाङ्मय का प्रकाशन किया गया है। लाखों ने इसे पढ़कर जीवन धन्य बनाया है। हर घर में वाङ्मय की स्थापना होनी चाहिए, परिवार के लिए यह अमूल्य धरोहर एवं विरासत है।
यदि आपको भगवान ने श्री संपन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वाङ्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। विवाह, जन्मदिवस एवं अन्य उत्सवों पर अथवा पारितोषिक स्वरूप भी यह साहित्य अमूल्य भेंट सिद्ध होगा। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा, धन्य होगा। शास्त्रों में कहा है-
सर्वेषामेव दानानाँ ब्रह्मदाँन विशिष्यते। वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाज्जनसर्पिषाम॥ -मनुस्मृति 4/233
जल, अन्न, गौ, पृथ्वी, वस्त्र, तिल, सुवर्ण और घी, इन सबके दानों में से ज्ञान का दान सबसे उत्तम है।
श्रेशन्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप। सर्व कर्माखिंल पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥ -गीता 4/33
है परंतप! द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि जितने भी कर्म हैं, वे सब ज्ञान में ही समाप्त होते हैं। ज्ञानदान सर्वोपरि पुण्य है, शुभ कार्य है।
महामनीषी चाणक्य राज्य के प्रधानमंत्री भी थे। दिनभर वे संपर्क और व्यवस्था कार्यों में निरत रहते। रात्रि को सरकारी कार्य देखते और उपासना कृत्य पूरा करते।
उनके पास दो दीपक थे एक को तब जलाते, जब राज्य का काम करते, उसमें राजकोष का तेल जलता, पर जब वे उपासना करते, तो पहला दीपक बुझाकर दूसरा जलाते, जिसमें उनके निजी परिश्रम का उपार्जित तेल जलता।
चाणक्य कहते थे, उपासना निजी लाभ के निमित्त की जाती है, उसकी सुविधा में दूसरों की सहायता क्यों ली जाए?
पंचशाल गाँव के लोग आश्चर्यमिश्रित उत्साह से अभिभूत थे। पहले तो जब उन्होंने भगवान् तथागत के आने की बात सुनी तो, उन्हें भरोसा ही नहीं हुआ। भला भगवान् इस छोटे से पंचशाल गाँव में! श्रावस्ती, मगध, कोशल, कौशांबी आदि राज्यों के नरेश जिनके लिए पलक पाँवड़े बिछाए रहते थे। जिनके एक दर्शन के लिए सम्पूर्ण भारत भूमि के महाश्रेष्ठी अपना धनकोष लुटाने के लिए तैयार रहते थे। वे ही भगवान् इस साधना विहीन गाँव में आ रहे हैं। इस समाचार ने जैसे अचानक गाँव वालों को भाग्यवान बना दिया। गाँव के मुखिया सहित बूढ़े-बच्चे, युवक-युवतियाँ सभी भगवान् के स्वागत की तैयारियों में जुट गए।
देखते-देखते गाँव का कायाकल्प हो गया। आम्रपल्लव, आम्र मञ्जरी, कदली स्तम्भ एवं रंग-बिरंगी पुष्प मालाओं द्वारा की गई सज्जा ने सब भाँति पंचशाल गाँव को अनूठा बना दिया। गाँव की समूची प्राकृतिक समृद्धि भगवान् तथागत के स्वागत के लिए उमड़ पड़ी। कन्याओं के मंगल गान से ग्रामवीथियाँ गूँजने लगी। सबके सब अपनी हृदय भावनाओं का अर्घ्य भगवान् के श्रीचरणों में चढ़ाने के लिए उत्सुक थे। इन भोले ग्रामीणों के भाव संवेदनों को प्रभु अनुभव कर रहे थे, वे ठीक समय पर आनन्द, तिष्य स्थविर, मौद्गल्यायन, सेवत्, रेवत आदि भिक्षुओं के साथ गाँव में पधारे। ग्रामीण जन स्थान-स्थान पर प्रभु का स्वागत करते हुए उस मंच पर ले गए, जो उन्होंने विशेष तौर पर तथागत के लिए बनाया था।
पल्लवों एवं पुष्पों से सज्जित मंच पर विराजमान हो तथागत ने ग्रामीण जनों पर अपनी कृपा की अमृत वर्षा करते हुए मधुर उद्बोधन दिया। इस उद्बोधन में दिशा बोध था। उद्बोधन के पश्चात् आनन्द ने ग्रामवासियों से कहा, आप में से जो शास्ता से व्यक्तिगत ढंग से मिलना चाहते हैं, वे एक-एक करके आ जाएँ। इस कथन को सुनकर उत्सुक ग्रामीण जन पंक्तिबद्ध हो मंच की ओर बढ़ चले। भगवान् बुद्ध ने उनमें से प्रत्येक की कुशल पूछी। खेती-बाड़ी और परिजनों के समाचार जाने। जीवन के प्रकाश पूर्ण पथ पर चलने की प्रेरणा दी। बुद्ध के आशीषों को पाकर सब के चेहरे पुष्प की भाँति खिल उठे।
मिलने के इस उपक्रम में सबसे अन्त में एक कन्या आगे बढ़ी। वह जुलाहे की बेटी थी। अट्ठारह वर्ष की इस आयु में ही उसकी विचारशीलता सभी को चकित कर देती थी। उसकी बुद्धिमत्ता से समवयस्क ही नहीं गाँव के वृद्धजन भी हैरान हो जाते थे। उसने बुद्ध के पास पहुँच कर बड़े ही अहोभाव और उल्लास के साथ उनके चरणों पर सिर रखा। उसे देखकर तथागत मुस्कराए। उनकी यह मुस्कान बड़ी ही रहस्यमयी थी। इसमें ज्ञान एवं प्रेम का अनोखा सम्मिश्रण था। अपनी अलौकिक मुस्कान के साथ उन्होंने उससे पूछा- बेटी, कहाँ से आती हो? भंते नहीं जानती हूँ, उसने उत्तर दिया। बुद्ध ने एक और सवाल किया, बेटी- कहाँ जाओगी? भंते, नहीं जानती हूँ। फिर उसने अपना पुराना जवाब दुहराया। क्या नहीं जानती हो, बुद्ध ने पूछा। वह बोली भंते, जानती हूँ। जानती हो- बुद्ध ने पूछा। वह बोली, कहाँ भगवान्, जरा भी नहीं जानती हूँ।
ये अटपटी बातें सुनकर, गाँव के वृद्ध उस पर जोर से बिगड़ पड़े। कुछ लोग कहने लगे यह चारुलता वैसे तो बहुत ही विचारपूर्ण और बुद्धिमानी से भरी बातें करती है। पर आज यह अचानक बहकी-बहकी बातें क्यों करने लगी है। भला यह भी कोई ढंग है भगवान् से बातें करने का? यह भी कोई शिष्टाचार है? वृद्धजनों ने उसे डाँटते हुए कहा- चारु, यह तू किस तरह से बात कर रही है? तू होश में तो है? मालूम है तुझे, तू किससे बात कर रही है?
डाँट-डपट करने वाले इन वृद्धजनों को भगवान् ने टोकते हुए कहा, उसे डाँटने से पहले आप सब उसकी बातें सुने, जो वह कह रही है, उसे गुने। फिर उस कन्या की ओर देखते हुए वह बोले, बेटी चारु, तू इनको समझा कि तूने क्या कहा?
इस पर उस कन्या ने कहा- जुलाहे के घर से आ रही हूँ, भगवान् यह तो आप जानते ही हैं। इस सच्चाई से हमारे गाँव के लोग भी वाकिफ हैं। लेकिन मेरी जीवात्मा कहाँ से आ रही है? मेरा यह जीवन किन कर्मों के परिणाम स्वरूप जन्मा है? यह मैं भी नहीं जानती हूँ। मैं यहाँ से वापस जुलाहे के घर जाऊँगी, यह मैं भी जानती हूँ और आप भी जानते हैं। गाँव के लोगों को यह बात अच्छी तरह से मालूम है। लेकिन इस जीवन के अन्त में जब मृत्यु होगी, तब मैं कहाँ जाऊँगी, मुझे कुछ पता नहीं है। इसीलिए मैंने आपसे अभी कहा नहीं जानती हूँ।
शुरुआत में जब आपने मुझसे पूछा, कि कहाँ से आ रही है, जुलाहे के घर से? तो मैंने कहा, जानती हूँ। जब आपने पूछा कहाँ जा रही है? मैंने सोचा कि पूछते हैं, कहाँ वापस जाएगी, जुलाहे के घर? तो मैंने कहा, जानती हूँ। पर जब मैंने आपको मुस्कराते हुए देखा, आपकी आँखों में निहारा तो मैंने सोचा, नहीं-नहीं, भगवान् सम्यक् सम्बुद्ध ऐसे साधारण प्रश्न क्या खाक पूछेंगे। वह जरूर मुझसे पूछना चाहते हैं- तू कहाँ से यानि कि किस लोक से आ रही है? तेरा जीवन स्रोत क्या है? तो मैंने कहा- भगवान् मैं नहीं जानती हूँ। फिर जब मैंने सोचा कि जब आप पूछते हैं कि कहाँ जाएगी, तो इसका तात्पर्य यह है कि मरने के बाद कहाँ जाएगी, तो मैंने जवाब दिया, नहीं जानती।
हल्की हँसी के साथ बुद्ध ने कहा, तूने ठीक सोचा बेटी। तू सचमुच ही विचारशील एवं बुद्धिमती है। इसी के साथ उन्होंने सभी ग्रामवासियों को सुनाते हुए यह गाथा कही-
अधं भूतो अयं लोको तनुकेत्थ विपस्सति। सकुँतो जालभुत्तो व अप्पो सग्गाय गच्छति॥
यह सारा लोक अंधा बना है। यहाँ देखने वाला कोई विरला है। जाल से मुक्त हुए पक्षी की भाँति विरला ही स्वर्ग को जाता है।
इस गाथा को और अधिक स्पष्ट करते हुए तथागत ने कहा- बेटी, तेरे पास आँख है, ध्यान की आँख, विवेक की आँख। इसी कारण तू देखने में, समझने में समर्थ है। इन लोगों के पास आँख नहीं है। इसी कारण ये तेरी बातें समझ नहीं सके। आँखवाला जब कोई बात करता है, तो नेत्रविहीन लोगों को समझ में नहीं आती है। आँख वाला कहता है- कैसा प्यारा इन्द्रधनुष, पर जिनके पास आँखें नहीं है, वे उसे मूर्ख समझते हैं। इन सबके बीच एक तू ही है, जो देखने में सक्षम है। अपने कर्मों के जाल से मुक्त हो तू अवश्य अपने गन्तव्य को पहुँचेगी। भगवान् की इन बातों को सुनकर अन्य ग्रामीण जन भी ध्यान के लिए उत्सुक व उत्साहित हुए। ताकि वे भी तथागत के कृपाप्रसाद से नेत्रवान् बन सकें।
राजा गहरी नींद में सोया हुआ था। उसने देखा, राजमहल से एक देवपुरुष निकलकर जा रहे हैं और उसके पीछे तीन देवियाँ भी प्रयास कर रही हैं। राजा ने देवपुरुष से पूछा, आप कौन हैं और आपके पीछे जाने वाली यह तीन देवियाँ कौन हैं? आप सबके जाने का कारण क्या है?
देवपुरुष ने कहा, मेरा नाम है सुसंस्कार। विवेक इसी से जन्म लेता है। जहाँ विलास और अधर्म के पैर जमते हैं, वहाँ मैं नहीं रहता और यह तीन देवियाँ भी मेरे साथ ही विदा हो जाती हैं। इनका नाम है- लक्ष्मी, कीर्ति और बुद्धि।
राजा की आँख खुली। उसने यथार्थता पर विचार किया और पाया कि उनके क्षेत्र में विलास और अधर्म बढ़ रहा है। सुसंस्कारजन्य प्रवृत्तियां घट रही हैं, अनाचार बढ़ रहा है। ऐसी दशा में इन विभूतियों का विदा होना स्वाभाविक ही है। राजा ने अपनी कार्यपद्धति में आमूल चूल परिवर्तन कर दिया।
दूसरे दिन स्वप्न आया कि वे चारों ही लौट आए हैं। जहाँ विवेक रहता हैं, चिंतन में श्रेष्ठता रहती है, वहाँ सभी विभूतियाँ बनी रहती हैं।
प्रेम आत्मा की अभिव्यक्ति है। इसे रत्नाकर सिन्धु की तरह समझा जा सकता है। जिस तरह गंगा, यमुना, कावेरी, ताप्ती, गोदावरी आदि सरिताएँ स्थल खण्डों में जब तक इधर-उधर भटकती हैं, तब तक उन्हें सरिताओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जाता है। पर जब ये सरित प्रवाह सिन्धु में समा जाते हैं। तब उनकी समूची शक्ति सामर्थ्य भी केन्द्रीभूत हो जाती है। अब उनका अस्तित्त्व रत्नाकर जैसा विशाल ही नहीं रत्नों का भण्डार भी हो जाता है। मनुष्य के गुण भी इन नदियों की तरह हैं। और इन सद्गुणों का पुञ्जीभूत रूप है प्रेम।
इसमें सारे गुण स्वतः ही समाये रहते हैं। अथवा यों कहा जाय कि यहाँ सारे गुण विलीन हो, निर्गुणत्व पा लेते हैं। इसी स्थिति को स्पष्ट करते हुए नारद भक्ति सूत्र में सः हि अनिर्वचनीयो प्रेमरुपः कहकर परमेश्वर को प्रेम रूप घोषित किया है। यह ही परम तत्त्व है। इसी का बोध होने में ज्ञान की सार्थकता है। इसी आशय को संत कबीर साहेब अपनी वाणी में कहते हैं- ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय अर्थात् ढाई अक्षरों में निहित प्रेम के दुर्जेय तत्त्व के बोध को प्राप्त कर लेने में ही पाण्डित्य की सार्थकता है।
इसमें ऐसा कौन सा तत्त्व निहित है? जिसे जानने से सब कुछ जान लिया जाता है। सामान्य भाषा में तो सब यही कहते हैं कि अमुक को पत्नी से प्रेम है। उसे बच्चों से प्रेम है, माँ से प्रेम है आदि आदि बातें करते हैं। इस सब में क्या कोई दूसरा प्रेम है।
इस पर चिन्तन करने से ज्ञात होता है कि पत्नी, बच्चों या अन्य किसी संकीर्ण दायरे में पनपने वाला प्रेम, प्रेम नहीं मोह होता है। इस मोह और प्रेम में विरोधाभास जैसी स्थिति है। यदि प्रेम को काया कहा जाय तो मोह को छाया कहा जाना उचित होगा। दोनों में अन्तर भी वही होता है जो काया और छाया में है। एक सजीव होती है दूसरी निष्प्राण। छाया को देखकर सजीवता का भ्रम तो होना सम्भव है, पर उससे काया का प्रयोजन पूरा नहीं हो पाता।
प्रेम व मोह में एक अन्य अन्तर और है- प्रेम चेतन से होता है मोह जड़ से। पत्नी आदि से किया जाने वाला तथाकथित प्रेम उसके रूप लावण्यमय जड़ शरीर से होता है न कि आत्मा से, अतएव यह मोह ही है। इसकी जड़ की ओर उन्मुखता मात्र हाड़-माँस वाले शरीरधारियों तक ही सीमित नहीं रहती। लकड़ी-पत्थर-चूने के बने मकान, विभिन्न प्रकार के सामानों तक बढ़ जाती है। पर इसके विस्तार का क्षेत्र रहता जड़ ही है। जबकि प्रेम तत्त्व के जानकार महर्षि याज्ञवल्क्य ने बृहदारण्यक उपनिषद् में स्पष्ट किया है, पत्नी-पत्नी होने के कारण नहीं अपितु आत्मा के कारण प्रिय है, सन्तान, सन्तान के कारण नहीं, आत्मा के कारण प्रिय है। यह स्थिति गीता के शब्दों में यो मयि पश्चति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति के कारण है। सर्वत्र व्याप्त चैतन्य तत्त्व के कारण वह आत्मवत् सर्वभूतेषु की स्थिति में रहता है। मोह जहाँ विभेद उत्पन्न करता है, प्रेम वहीं अभेद की स्थिति पैदा करता है।
प्रेम का प्रारम्भ सम्भव है किसी एक व्यक्ति से हो, पर उस तक सीमित नहीं रह सकता। यदि यह सीमित रह जाता है, कुछ पाने की कामना रखता है, तो समझना चाहिए कि यह मोह है। इसमें तो पाने की नहीं देने की उमंग रहती है। प्रेमी की प्रसन्नता और हित कामना सन्निहित रहती है। मोह में स्वार्थपरता, संकीर्णता पनपती है। इसमें आदान-प्रदान नहीं उपयोग की अपेक्षा होती है। प्रेम वस्तुओं से जुड़कर सदुपयोग की, व्यक्तियों से जुड़कर उनके कल्याण की और विश्व से जुड़कर परमार्थ की बात सोचता है। मोह में व्यक्ति, पदार्थ संसार से किसी न किसी प्रकार की स्वार्थ सिद्धि की अभिलाषा रहती है। जिसके प्रति मोह रहता है, उसे अपनी इच्छानुसार चलाने की ललक रहती है। इसमें तनिक सा व्यवधान उत्पन्न होने पर खीज़ असंतोष का उद्वेग उमड़ता है। प्रेम में इस तरह की कोई बात नहीं।
इस का अंकुरण निकट परिकर से होता है। और विकसित, पल्लवित, पुष्पित होते हुए उसकी शाखाएँ, प्रशाखाएँ समस्त समाज-विश्व में फैल जाती हैं। निकट परिकर तो प्रेम साधना की पाठशाला है। यह परिकर-परिवार और पड़ोसी भी हो सकते हैं। इसमें उनकी प्रसन्नता और विकास की बात सोची जाती है। इसमें उठाए गए कष्ट में सन्तोष की अनुभूति होती है। यह आरम्भिक प्रशिक्षण है। पर जब अपने सगे-सम्बन्धियों की प्रसन्नता-समृद्धि के लिए उचित-अनुचित का ध्यान नहीं रहता, आदर्शों की बलि दे दी जाती है, तो वह प्रेम नहीं रहता, मोह बन जाता है। जिसे गोस्वामी जी ने- मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला कहकर सम्बोधित किया है। सचमुच यह स्वयं से जुड़े हुए व्यक्तियों दोनों के लिए हानिकारक है।
प्रेम तो गंगाजल की तरह पवित्र व निश्छल है, जिसे जहाँ भी डाला जाय, पवित्रता ही पैदा करेगा। उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है। विवेकशीलता, सहृदयता, पवित्रता, सदाशयता जैसे गुण इसमें समाए रहते हैं। प्रेमी, जिससे भी प्रेम करता है, उसमें इन गुणों के अभिवर्धन के लिए सतत् प्रयत्नशील रहता है।
भाव सम्वेदनाएँ नित्य निरन्तर उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति समर्पित रहें। यही प्रेम है। इसे सीमा की संकीर्ण दीवारें बद्ध नहीं कर सकती। यह तो सूर्य की तरह है, जो उदय काल के समय तो मात्र पूर्व को ही प्रकाशित करता है। पर मध्याह्न में इसके प्रकाश से समस्त दिशाएँ प्रकाशित हो जाती हैं। इसकी भी यही विशेषता है, उसका आरम्भ भले ही निकट परिकर से हो, पर नित्य निरन्तर अभिवृद्धि करता हुआ, समाज, राष्ट्र और विश्व में बढ़ता जाता है। जिसके अन्तराल में प्रेम प्रस्फुटित हुआ है वह व्यक्ति देश, धर्म, संस्कृति और मानवजाति की सेवा साधना में निरत हो जाता है।
जीवन के उत्कृष्टतम रूप की अभिव्यक्ति इसी के माध्यम से होती है। यदि इसे हटा दें तो फिर मानव जीवन की कोई विशेषता नहीं रह जाती। संत कबीर के शब्दों में- जा घट प्रेम न संचरै सा घट जान मसान सचमुच उसका हृदय श्मशान की तरह होता है, जिसमें विभिन्न दुर्गुण, चिन्ता, सन्ताप, असन्तोष के भूत मंडराया करते हैं। ऐसा जीवन धरती के लिए भार स्वरूप ही होता है।
प्रेम की ज्योति- सामान्य दीपक की ज्योति नहीं है, जिसमें अनुताप हो; अपितु, यह दिव्य चिन्ता-मणि की शीतल व स्निग्ध ज्योति है। जिससे शरीर, मन, बुद्धि, अन्तःकरण प्रकाशित होते हैं। सारे सन्ताप शान्त होते हैं। ऐसे व्यक्ति के सान्निध्य में जो भी आते हैं, उन्हें भी निर्मलता, शीतलता का अनुभव होता है।
इसकी परिपूर्णता परमेश्वर में है। यहीं इसके यथार्थ तत्त्वदर्शन का बोध होता है। इस स्थिति में तो प्रेम का सरित प्रवाह नहीं अपितु महासागर लहराता है। चैतन्य महाप्रभु ने ऐसी ही दिव्य स्थिति पाई थी। उनका प्रेम इसी कोटि का था। तभी जघाई-मघाई जैसे कलुषित क्रूर डाकू सन्त बन गए। भगवान् तथागत के हृदय से उमड़ रहे प्रेम प्रवाह ने अंगुलीमाल जैसे दस्यु को भी भिक्षु बना दिया। इस स्थिति को पाने पर सर्वत्र सत्यं शिवं सुंदरम् का ही दर्शन होता है। उसकी सारी शक्तियाँ विराट् ब्रह्म के स्थूल रूप- विश्व ब्रह्मांड की सेवा में नियोजित होती हैं।
परम सत्ता के प्रति इस प्रकार की घनिष्ठता से स्वतः ही वह क्षुद्र से महान्, लघु से विभु, पुरुष से पुरुषोत्तम बन जाता है। प्रेम की इस दिव्यता के जीवन में अवतरित होने पर उदात्त भावनाएँ उमड़ने लगती हैं। इस स्थिति में अन्तराल से सत्-चित्-आनन्द की त्रिवेणी बहती है। जिसमें अवगाहन से सर्वत्र आत्म सत्ता की दिव्यानुभूति प्राप्त होती है।
‘सर्व खल्विदं ब्रह्म’ ‘वासुदेवः सर्वंमिति’- वेदान्त में वर्णित यही अद्वैत स्थिति है। जिसमें गीता में बताई गई स्थिति के अनुसार सर्वभूतस्थ महात्मानम् , सर्वभूतानि चात्मनि ही दिखाई देता है। इस चरम स्थिति को पाना ही मनुष्य जीवन का चरम ध्येय है। यहाँ तक पहुँचने के लिए मनुष्य को मोह रूपी छाया को छोड़ना तथा प्रेम की जीवन्त काया को पकड़ना होगा। आत्मीयता के विस्तार के लिए सतत् प्रयत्नशील रहने से योगिजन की दुर्लभ स्थिति सहजता से प्राप्त हो सकेगी।
प्रत्येक मनुष्य को दो प्रकार की शिक्षाएँ मिलती हैं। एक वह जो वह दूसरों से ग्रहण करता है और दूसरी वह जो वह स्वयं अपने को देता है और निश्चय ही दूसरी शिक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।
-गिबन
मृत्यु के पश्चात् प्राप्त जीवन पुनर्जन्म कहलाता है। यह मूलतः पूर्वी अवधारणा है जो विशुद्ध रूप से कर्म पर आधारित है। विश्व के सभी देशों व धर्मों में पुनर्जन्म की मान्यता को किसी न किसी ढंग से स्वीकार किया गया है। इसका सम्पूर्ण एवं समीचीन विश्लेषण उपनिषदों में मिलता है। पाश्चात्य विद्वानों, दार्शनिकों,मनीषियों का एक बड़ा वर्ग भी इस अवधारणा पर आस्था प्रदर्शित करता है। हालाँकि इनका मत एवं स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक पुनर्जन्म की प्राचीन परम्परा विद्यमान है।
पुनर्जन्म की यादें अधिकतर बच्चों में पायी जाती हैं। परामनोवैज्ञानिक स्टीवेन्सन के अनुसार एक हजार बच्चों में से एक बच्चा अपनी पिछली जिन्दगी के बारे में स्मृति रखता है। भारत में यह आँकड़ा 450 में एक है। हेंस टेन डेम ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एक्सप्लारिंग रिइनकार्नेशन’ में पुनर्जन्म का विस्तृत विवरण दिया है। हैंस ने पुनर्जन्म पर विश्वास रखने वाले छः क्षेत्रों का निर्धारण किया है। प्रथम क्षेत्र में दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, सेनेगल, घाना तथा इसके आसपास के देश आते हैं। इसी क्षेत्र में दक्षिण पूर्वी तुर्की, लेबनान और उत्तरी इजराइल का भाग आता है। विभाजन की तीसरी रेखा भारत सहित दक्षिण पूर्वी एशिया को दर्शाती है। जिसमें श्रीलंका, बर्मा, थाईलैंड, नेपाल, तिब्बत और वियतमान जैसे देश आते हैं। चौथा क्षेत्र जापान है। पाँचवे क्षेत्र में दक्षिण पूर्व अलास्का आता है। हैंस ने अंतिम क्षेत्र के रूप में पश्चिमी जगत् के यूरोप और अमेरिका को माना है। इन समस्त क्षेत्रों में पुनर्जन्म की मान्यता प्रचलित है।
मनीषी माग्रेट मीड ने अनेकों साँस्कृतिक मान्यताओं एवं परम्पराओं का अध्ययन एवं शोध किया है। एस्कियो एवं वेलीनीज पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं। ये बच्चों को दैवी वरदान मानते हुए इनकी बतायी बातों पर आस्था जताते हैं। अलास्का के लिंगीट एस्किमो के अनुसार दिवंगत आत्मा अपने माता-पिता का चयन स्वयं करती हैं। यह इसे भाग्य नहीं मानते हैं। इनकी नजर में यह एक विशिष्ट चयन प्रक्रिया है। अफ्रीका में भी इस अवधारणा पर आस्था जतायी जाती है। यहाँ पर 900 काले आदिवासी जातियों में से 47 आत्मा की निम्नयोनि में यात्रा को सही मानते हैं। 36 जातियाँ पुनर्जन्म पर प्रगाढ़ आस्था रखती हैं। 12 जातियाँ उपर्युक्त दोनों को स्वीकारती हैं। अफ्रीका में यह सिद्धान्त प्राचीन परम्परा के अंतर्गत आता है जबकि मेटेम साइकोसीस (पशु योनि) आधुनिक मान्यता है। जुलु इजिस्ट के नियमानुसार इसे पूर्णता की प्राप्ति का संकेत कहते हैं। पश्चिम अफ्रीका में इसे शुभ माना जाता है। यहाँ के प्रचलन से पता चलता है कि दिवंगत आत्मा संसार चक्र से मुक्त नहीं होना चाहता। जीव अपने ही परिवार में जन्म लेने की इच्छा प्रकट करता है। ये इसे आत्मा की अनन्त एवं सुखद यात्रा मानते हैं। योरुबा जाति में सत्कर्म को इसका आधार माना जाता है। काँगो, बैगाँगो और बोसाँगो के बच्चों में अपने पूर्व जीवन की स्मृति पायी जाती हैं।
एशिया के बौद्ध व हिन्दुओं में पुनर्जन्म एक दृढ़ मान्यता है। बर्मा के लोगों की मान्यता है कि वर्तमान जीवन मानव के पुनर्जन्म की दृढ़ इच्छा शक्ति का परिणाम होता है। बैलीनीज जीव को उसी परिवार में बारम्बार पैदा होने के प्रति विश्वास करते हैं। यूरोप के सेल्ट मृत्यु के बाद व्हाइट हेवेन प्राप्त करने की बात करते हैं। मृत्यु के पश्चात् जीव विश्राम करता है। गलत कर्म उसे निम्नयोनि में धकेलते हैं जबकि आत्मा की पवित्रता ईश्वर प्राप्ति का पथ प्रशस्त करती है। यह मान्यता अटलाँटिक की देन है जो आयरलैण्ड होते हुए यूरोप पहुँची। ट्यूटोन्स के अनुसार व्यक्ति का जन्म उसी परिवार में ठीक उसी नाम से होता है। डेन्स, नार्स, आइसलैण्डर्स, पूर्वी गोथ, लोम्बाइडियन, लेट्स और सैवसन आदि जातियाँ भी पुनर्जन्म के सिद्धान्त को स्वीकारती हैं। सैक्सन लोगों का मानना है कि मनुष्य को दिव्यत्व प्राप्ति के पूर्व कुछ कालावधि के लिए गुलाब या एक पाण्डुक पक्षी बनना पड़ता है। फीन्स और लैपलैर्ण्स संस्कृति में भी पुनर्जन्म की मान्यता प्रचलित है।
अमेरिका के दक्षिण पूर्व अलास्का और उत्तरपश्चिमी कनाडा के टिंगीट्स लोगों में यह विचार गहराई से जुड़ा हुआ है। इनके अनुसार दिवंगत आत्मा अपने भावी जीवन के लिए परिचय के दायरे में माता का चयन करती हैं। किसी दैवीय दुर्घटना से मृत व्यक्ति अपने परिवार से दूर जाकर जन्म लेता है। इण्डियन और एस्किमो आदिवासियों में भी यह विश्वास देखा गया है। एस्किमो का मानना है कि पाँच योनियों से गुजरने के पश्चात ही दुर्लभ मानव शरीर मिलता है। कनाडा के सान लोग पुनर्जन्म की अवधारणा को अपनाये हुए हैं। उत्तरी अमेरिका का सम्पूर्ण प्रदेश इस आस्था से जुड़ा हुआ है। इनके अनुसार पवित्र हृदय का व्यक्ति अपने पिछले जन्म को याद कर सकता है। यह विचार आइरीक्वेस, अलोंकिंस, क्रीक्स, डेकोटास, बीनबेगोस, किओवास, होपीस, माहोहावीस आदि जातियों में भी पाया जाता है। चिप्पावेस लोग स्वप्न के द्वारा अगले और पिछले जन्मों का संकेत प्राप्त करते हैं। प्यूबलोसों का कहना है कि बच्चे मरने के पश्चात् उसी परिवार में पैदा होते हैं इसलिए उसके मृत शरीर को घर के आसपास ही दफनाया जाता है। जिससे जीव को अधिक भटकना न पड़े। कई इण्डियन आदिवासी अपने पितरों को आसपास मण्डराते हुए देखते हैं।
मेक्सिको और उत्तरी अमेरिका के मायास, केरीबस, पेरुवियन आदि इण्डियन आदिवासियों में भी पुनर्जन्म की मान्यता प्रचलित है। मेक्सिको के मूल निवासी मानव से इतर एवं निम्नयोनि पर विश्वास करते हैं। अच्छे व्यक्ति सुन्दर पक्षियों एवं उच्चतर पशुओं में एवं बुरे व्यक्ति निम्नतम पशु बनकर पैदा होते हैं। इंकास लोगों के अनुसार जिस मृत शरीर को पूर्णता ममी के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है, वह फिर से उस शरीर में वापस आकर जीवित हो उठता है। इसी कारण ममी की प्रथा प्रारम्भ हुई। ब्राजील के चिरीक्बेस तथा पोटागोनियास भी कुछ ऐसी ही आस्था रखते हैं।
आस्ट्रेलिया एवं ओसिएनीया के प्रायः सभी मूल निवासी पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं। मुख्यतः मध्य और उत्तरी क्षेत्र के आदिवासी इस विश्वास के प्रबल पक्षधर होते हैं। यूरोपीय लोगों से संघर्ष के बाद इनकी मान्यता में एक विचित्र परिवर्तन देखा गया। इनके अनुसार मरने के पश्चात जीव श्वेत शरीर धारण करता है। उत्तरी पैसीफीक समुद्र तट के निवासी ओकिनावा का मानना है कि जीव मृत्यु के 49 दिन बाद ही शरीर छोड़ता है। सात पीढ़ी याने लगभग 200 वर्षों तक एक जीव अपने विभिन्न रूपों में मनुष्य शरीर में पैदा होता है। ये लोग मानव से निम्नतम योनि में जन्म लेने के विरुद्ध हैं। बोर्नियो, सेलेबीस, पापुआन्स, मोरिस, तस्मानियन, मोरक्वन तथा ताहिनी,फिजी सालोमान द्वीप और न्यु केलेडोनिया के दक्षिण भाग के लोगों में पुनर्जन्म के प्रति आस्था होती है।
प्रायः सभी धर्मों में पुनर्जन्म की घटना पर आस्था विश्वास प्रचलित है। हैंस के अनुसार पुनर्जन्म हिन्दू धर्म एवं दर्शन का मुख्य आधार एवं विशेषण है। यह विशुद्धतः कर्म पर आधारित होता है। 84 कोटि योनि के पश्चात् प्राप्त मनुष्य जीवन सर्वश्रेष्ठ जीवन माना जाता है। इसे कर्म योनि कहते हैं क्योंकि इस जीवन में मनुष्य अपने समस्त कर्मों का क्षय कर जीवन मुक्त या ईश्वर कोटि का जीव बन सकता है। प्रत्येक आत्मा को यह अधिकार प्राप्त है। अच्छा एवं बुरा कार्य जीव को स्वर्ग एवं नर्क की ओर धकेलता है। गीता के अनुसार दोनों प्रकार के कर्मों से परे निष्काम कर्म प्रभु प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। यहाँ भावी जीवन का निर्धारण वर्तमान जीवन के कर्म एवं अंतिम उत्कट इच्छा के द्वारा होता है। बौद्ध केवल अंतिम इच्छा को ही महत्त्वपूर्ण मानते हैं।
बौद्ध पुनर्जन्म में गहन आस्था रखते हैं। मोक्ष के समान इनमें भी निर्वाण होता है जो जीव को संसार चक्र से मुक्त करता है। गलत कार्य का परिणाम पशु योनि है। तिब्बत के बौद्ध लामा को अवतार मानते हैं। मनुष्य किसी कार्य के बीच में ही मर जाता है तो वह उसे पूरा करने के लिए पुनः पैदा होता है। महायान में निर्वाण प्राप्त पुरुष को बोधिसत्व कहा जाता है। ये जन्म मरण से परे होते हैं। चीन के बौद्धों के अनुसार इच्छाओं एवं आकांक्षाओं से किया गया कर्म पुनर्जन्म का कारण होता है। जैन धर्म में भी मोक्ष की परिकल्पना की गयी है। वे कर्म से अधिक नैतिकता पर अधिक बल देते हैं। दिवंगत आत्मा नौ माह के बाद शिशु रूप में जन्म धारण करता है। यदि यह समय नौ माह से अधिक होता है तो वह अपने पिछले जन्म का स्मरण रख सकता है।
कुछ विशिष्ट संस्कृति जैसे इजिप्ट एवं बेबीलोन के ऐतिहासिक साक्ष्यों से भी पुनर्जन्म का बोध होता है। हेरोडेटस के अनुसार यहाँ पर आत्मा को अमर माना जाता है। मानव शरीर का उद्देश्य पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए होता है, तत्पश्चात ही वह देवत्व प्राप्त करता है। मानव शरीर से निकलने के बाद जीव सभी प्रकार के वनस्पति एवं जीव योनियों से गुजरता है। इसके दौरान 3000 वर्ष के पश्चात् फिर वह मनुष्य एवं देवता बनता है। मनुष्य को निम्न जीवों में जाने से रोकने हेतु ही ममी प्रथा का प्रचलन हुआ।
ग्रीस का सिद्धान्त आर्फीक रहस्यवाद पर आधारित है। हेरोडेटस इसे इजिप्ट की देन मानता है। इनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में देवत्व एवं आसुरी वृत्ति होती है। देवत्व कम एवं आसुरी तत्त्व (टाइटन) प्रबल एवं बलवान होता है। मनुष्य का उद्देश्य इस आसुरी शक्ति को बाहर निकालना होता है। मनुष्य शरीर उसे पुरस्कार स्वरूप एवं दण्ड के कारण मिलता है। इसे एलिसियन रहस्यवाद से प्रेरित माना जाता है। पिण्डार्स का कहना है कि यह भारतीय दर्शन से काफी सामंजस्य प्रदर्शित करता है। यहाँ पुनर्जन्म की घटना आठ साल पश्चात् होती है। हरक्यूलियस मानव का जन्म मानव शरीर में ही मानते हैं । पाइथागोरस निम्नयोनि के हिमायती हैं। ये मानव को पशु एवं वनस्पति की ओर अधोगामी यात्रा दर्शाते हैं। एम्पीडाकल के अनुसार मनुष्य देवता है। वह पुरुष और स्त्री के रूप में 30,000 बार जन्म लेता है।
प्लेटो ने पुनर्जन्म को नई अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने इसे मेनो, फेड्स तथा रिपब्लिक के रूप में रेखाँकित किया है। जिसे अपने पिछले जीवन की स्मृति नहीं होती वे मेनो के अंतर्गत आते हैं। फेड्स में स्मरण होता भी है और नहीं भी। ‘द रिपब्लिक’ में मनुष्य को अपने जन्म-मरण का ज्ञान होता है। जीव अपने अनन्त आयामों का बोध करता है तथा आवश्यकतानुसार जीवन धारण करता है।
ईसाइयों में पूर्व पुनर्जन्म के प्रति आस्था कम दिखाई देती है। सीसरो जीवन को पाप का परिणाम कहता है। अपोलोनियस ने यह सिद्धान्त कश्मीर के आर्कास से प्राप्त किया था। प्लुटकि ने स्पष्ट किया है कि जब उच्चस्तरीय आत्माओं द्वारा गल्तियाँ होती हैं तो उसके प्रायश्चित्त के लिए उन्हें मानव योनि में आना पड़ता है। जुडेइज्म पुनर्जन्म पर कम विश्वास करते हैं। ओल्ड टेस्टामेंट में कहीं-कहीं आत्मा के पूर्व अस्तित्व का संकेत मिलता है। एजेन्स इसे स्वीकारता है। फेरीसीस के अनुसार मनुष्य या तो फिर से पैदा होता है या सदा के लिए समाप्त हो जाता है। यह अवधारणा 8 वीं शताब्दी में प्रचलित थी। परन्तु आठवीं शताब्दी के केरेट जेवेस इस पर विश्वास करते थे। ताहेव ने तो आदम को सेठ, नोआह, अब्राहम, मुसा आदि के रूप में आत्मिक विकास का क्रम माना है। यह सिद्धान्त केवल उच्चस्तरीय आत्माओं के लिए प्रतिपादित किया जाता है। न्यू टेस्टामेण्ट में भी पुनर्जन्म का उद्धरण मिलता है। मार्क, मैथ्यु, ल्युक आदि में इसका स्पष्ट संकेत प्राप्त होता है। कई चर्चों के फादर इसे स्वीकारते हैं। इसका सर्वोत्तम उदाहरण है जान का एलिजा के रूप में जन्म लेना।
इस्लाम इसे पूरी तरह से नकारता है। परन्तु इनके कुछ समुदाय एवं सम्प्रदाय आध्यात्मिक जन्म की व्याख्या करते हैं। भारत में बोरास सम्प्रदाय में पिंजरे की चिड़ियों को क्रय करके उन्हें उड़ा दिया जाता है। इनके पीछे इनकी मान्यता है कि इनमें उनके पूर्वजों की आत्मा निवास करती है। एकमात्र सूफी ही पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं। यह मुख्यतः सौराष्ट्र के पारसियों में अधिक देखा जाता है। इनके मतानुसार अमर आत्मा कुछ कालावधि के लिए उच्चलोक से निम्न लोक में जन्म धारण करने आती है। ये भी हिंदुओं की चौरासी लाख योनि को प्रतिपादित करते हैं, परन्तु इनमें संख्या का अन्तर है। सूफी जलालुद्दीन रुमी के अनुसार आत्मा खनिज पदार्थों से विकास करते हुए क्रमशः वनस्पति, जीव, मानव, देवता तथा उच्चतर अवस्था की ओर अग्रसर होती है। ड्रसेस समुदाय मृत्योपराँत शीघ्र ही जन्म लेने का समर्थन करते हैं। युद्ध, अकाल तथा दैवीय दुर्घटनाओं से मृत जीव तुरन्त पैदा होता है।
जर्मनी के गेटे के अनुसार मानव प्रकृति और ईश्वर के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। चार्ल्स फरीयर और शोपेन हावर के अलावा श्वीडन बर्ग, विलियम ब्लैक, शीलर मेजिनी, हर्मन मेलविली, लिओटाल्सटॉय, पाल ग्रेजीन, आर्थरकानन डायल, गुस्ताव मेहलर आदि सभी विद्वानों ने पुनर्जन्म के अस्तित्त्व को स्वीकार किया है। आधुनिक मनीषी डेविड लायल जार्ज, हेनरीफार्ड, रुडयार्ड किपलिंग, जीन सिक्लस और जनरल पेटन सेमी ने पुनर्जन्म को मानव अस्तित्व का अभिन्न अंग माना है। पुनर्जन्म का अस्तित्व का प्रमाण तो असंदिग्ध है। इसलिए बुद्धिमत्ता इसी में है कि भावी जीवन के लिए वर्तमान जीवन के प्रत्येक कर्म को श्रेष्ठ और पवित्र बनाया जाए।
एक राहगीर एक जंगल से गुजर रहा था। शाम हो चली थी। पशु पक्षी अपने घरों को लौट रहे थे। सहसा उसने देखा, एक शशक शावक किसी अज्ञात भय से पास के झुरमुट में आ छिपा। शावक बड़ा लुभावना था। राहगीर के मन में विचार उठने लगा, क्यों न इसे मैं घर ले चलूँ। दूसरे ही क्षण उसने देखा, एक अन्य शावक रास्ते के दूसरी ओर भागा जा रहा है। अगले ही पल उसे एक गीदड़ ने धर दबोचा।
राहगीर असमंजस में पड़ गया। वह झाड़ी में छिपे शावक को पकड़े या दूसरे की गीदड़ से रक्षा करे। एक क्षण में ही यह निर्णय लेना था। पल की भी देरी होती, तो शावक की जान चली जाती।
तभी आत्मा की आवाज उभरी, कर्तव्य धर्म सबसे बड़ा होता है। संकटकालीन घड़ी में किसी की जीवन रक्षा व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षा से बड़ी है। बुद्धि और समझदारी ने भी इसका समर्थन किया। फिर क्या था, छिपे शावक का मोह त्याग वह गीदड़ के पीछे भागा और खतरे में पड़े खरहे के बच्चे की प्राण रक्षा की।
अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने एक परीक्षण के लिए किसी व्यक्ति को ऑपरेशन टेबुल पर लिटाया और उसे कुछ मिनटों के लिए सम्मोहित कर सुला दिया। जब वह सम्मोहन अवस्था में सो रहा था, तो उसके गले पर एक छुरी चुभाई गई। उससे खून की एक बूंद छलक पड़ी। इसके बाद ही वैज्ञानिकों ने उसकी सम्मोहन निद्रा तोड़ दी और जगा दिया। यह सारा प्रयोग कुछ ही मिनटों में हो गया था और जितने समय तक वह व्यक्ति सोया, वह तो कुछ ही सेकेंड थे। उन कुछ ही सेकेंडों में उस व्यक्ति ने एक लंबा सपना देख लिया था।
डॉ. अलेक्जेंडर लिंबार्ड ने उस स्वप्न का उल्लेख करते हुए लिखा है कि इन कुछ ही सेकेंडों में उस व्यक्ति ने एक आदमी की हत्या कर दी थी। वह महीनों तक लुकता छिपता रहा था। अंततः पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उस पर हत्या का मुकदमा चला। मुकदमें का फैसला होने में दो ढाई साल लगे। जज ने उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई। और उसे जब फाँसी के तख्ते पर चढ़ाया जाना था, तो उसी क्षण उसकी नींद खुल गई।
वैज्ञानिकों का कहना था कि इस प्रयोग में वह व्यक्ति पाँच सात सेकेंड ही सोया था और इस अवधि में उसके लिए वर्षों का घटनाक्रम गुजर गया। यह प्रयोग आइंस्टीन के समय सिद्धाँत की सत्यता जानने के लिए किया जा रहा था, जिसके अनुसार समय का कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है। वह दो घटनाओं के बीच की दूरी मात्र है, जो कुछ भी हो सकता है, परंतु मनुष्य को अपने ज्ञान एवं अनुभूति के आधार पर ही लंबी अथवा छोटी लगती है।
क्या सचमुच समय कुछ भी नहीं है? सुबह से शाम तक और शाम से सुबह तक 24 घंटे होते हैं। इन चौबीस घंटों में हम कितने ही काम करते हैं। घड़ी अपनी चाल से चलती है। सूर्य अपनी गति से क्षितिज के इस पार से उस पार तक पहुँचता है। सब कुछ तो स्पष्टतः प्रतीत होता है, परंतु आइंस्टीन के अनुसार यह सब एक भ्रम मात्र है। फिर तो सारा संसार ही भ्रम हो जाएगा।
वस्तुतः सारी दुनिया ही एक भ्रम मात्र है। वेदाँत दर्शन के अनुसार संपूर्ण जगत् ही मायामय है। माया अर्थात् जो नहीं होने पर भी होता दिखाई दे। जिसका अस्तित्व नहीं है, लेकिन भासित होता है। आदि शंकराचार्य ने इस माया को परिभाषित करते हुए कहा है, माया यथा जगर्त्सवमिदं प्रसूयतों अर्थात् वही माया है, जिससे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है।
आइंस्टीन से पहले इंद्रिय बुद्धि द्वारा होने वाले अनुभवों और प्रत्यक्ष जगत् को ही सत्य समझा जाता था। इसके पूर्व के वैज्ञानिकों की मान्यता थी कि आप दौड़ रहे हों अथवा बैठे हों, जाग रहे हों या सोए हों, समय अपनी सीधी बँधी रफ्तार से सीधा आगे बढ़ता है, परंतु आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धाँत ने इस मान्यता को छिन्न-भिन्न कर दिया और यह सिद्ध हो गया कि समय कुछ घटनाओं का जोड़ भर है। यदि घटनाएँ न हों, तो समय का कोई अस्तित्व नहीं होता और घटनाएँ भी द्रष्टा की अनुपस्थिति में अस्तित्वहीन होती हैं।
इस बात को कतिपय उदाहरणों द्वारा आसानी से समझा जा सकता है समय को मापने का सबसे बड़ा मापदंड घड़ी है। घड़ी में सेकेंड की सुई 12 से चलकर 12 तक पहुँचने पर एक मिनट होता है। मिनट की सुई इतनी दूरी तय कर ले, तो मान लिया जाता है कि एक घंटा हो गया और घंटे की सुई इतनी दूरी तय कर लेने पर आधा दिन आधी रात बता देती है और 12 से 12 तक दूसरी बार पहुँचने पर 24 घंटे या दिन पूरा हुआ मान लिया जाता है। आइंस्टीन का कहना था कि घड़ी की सुई की गति बढ़ा दी जाए, तो यही 24 घंटे 36 घंटे में भी बदल सकते हैं और कम कर दी जाए तो 2 या उससे भी कम चाहे जितने हो सकते हैं अर्थात् यह बात अर्थहीन है कि दिन 24 घंटे का होता है अथवा उससे कम ज्यादा का।
इसी के अनुसार घड़ी का यह समय विभाजन पृथ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेने वाली घटना को आँकने के लिए किया गया। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि पृथ्वी एक बार सूर्य की परिक्रमा कर लेती है, तो 24 घंटे हो जाते हैं, लेकिन चंद्रमा सूर्य की परिक्रमा करने में इससे भी अधिक समय लगाता है। मंगल उससे भी अधिक और शुक्र का एक दिन नहीं होता है। वहाँ इससे अधिक समय में दिन रात होता है अर्थात् वहाँ के लिए दूसरे टाइम स्केल (समय मापदंड) निर्धारित करने पड़ेंगे।
आइंस्टीन के अनुसार समय इसी प्रकार घटनाओं पर निर्भर करता है। सोए हुए व्यक्ति के लिए बाहरी जगत् में भले ही पाँच मिनट का समय व्यतीत हुआ हो, किंतु वह जो स्वप्न देख रहा होता है, उसमें उन पाँच मिनटों के भीतर वर्षों की घटनाएँ घटित हो जाती हैं, तो उसके लिए पाँच मिनट बीम गए, यह कहना सही होगा अथवा यह कहना कि वर्षों बीत गए! यह विचारणीय है।
योगी यती निमिष मात्र में सामने वाले का भूत, भविष्य, वर्तमान जान जाते हैं जबकि सामान्य व्यक्ति उसका लेखा जोखा लें, तो उसे जन्म से बचपन, बचपन से यौवन और वर्तमान जानने में ही काफी लंबा समय लग जाएगा, जबकि भविष्य उसके लिए अविज्ञात स्तर का बना रहता है। किसी प्रकार उसे भी जानने की कोई विधा उसके पास हो, तो जन्म से मृत्युपर्यंत की घटनाओं की जानकारी एवं उनका आकलन, परीक्षण और विश्लेषण करने में शायद एक व्यक्ति का संपूर्ण जीवन लग जाए। ऐसा क्यों होता है? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि स्थूल जगत् और सूक्ष्म जगत् के ‘टाइम स्केल’ भिन्न भिन्न हैं। दोनों जगतों की घटनाओं को एक ही मापदंड द्वारा आँका और मापा नहीं जा सकता।
एक बार सूर्य विज्ञान के प्रणेता स्वामी विशुद्धानंद के पास रामजीवन नामक उनका एक शिष्य आया और अपनी टूटी हुई रुद्राक्ष माला को उन्हें देते हुए योग विद्या द्वारा उसे शास्त्रीय ढंग से गूँथ देने का आग्रह किया। विशुद्धानंद ने रुद्राक्ष के मनकों को एक झोले में रखा और थैले का मुँह बंद कर उसे दो तीन बार ऊपर नीचे किया। इसके बाद तैयार माला को निकाल कर उसे सौंप दिया। शिष्य के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, कारण कि उसकी कल्पना में माला तैयार होने में कम से कम पाँच सात मिनट लगने चाहिए थे, पर वह तो क्षणमात्र में तैयार हो गई बाद में स्वामी जी ने बताया कि इसे ‘क्षण विज्ञान’ के प्रयोग से इतनी जल्दी बनाया जा सका।
प्रसंगवश यहाँ अध्यात्म जगत् की चर्चा हो गई। भौतिक जगत् में पुनः वापस लौटते हुए अब यह देखते हैं कि वहाँ घटनाओं के अतिरिक्त समय का अस्तित्व और किस पर निर्भर है। विचार मंथन से ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य की बोध शक्ति पर भी समय की सत्ता आधारित है। उसका द्रुत या धीमी गति से गुजरना, यह पूर्णतः उसके बोध पर आश्रित है। कई बार ऐसा लगता है कि समय बिताए नहीं बीतता। दूर स्थान से अपने किसी अति आत्मीय स्वजन का दुःखद समाचार आया हो और वहाँ पहुँचना हो, तो गाड़ी आने में दस मिनट की देरी भी घंटों सी लगती है, क्योंकि व्यक्ति उस समय तनावग्रस्त और उद्विग्न मनःस्थिति में होता है, लेकिन किसी सुखद समारोह में भाग लेते समय, विवाह शादी के अवसर पर यह पता भी नहीं चलता कि समय कब बीत गया। उस समय व्यक्ति की बोध शक्ति चेतना पूरी तरह तन्मय हो जाती और समय भागता सा प्रतीत होता हैं।
इसे मच्छर के भी उदाहरण से समझा जा सकता है। मच्छर की आयु कुछ घंटों की होती है। वह इतने में ही एक मनुष्य की संपूर्ण उम्र जी लेता है। इतनी अवधि में ही वह बच्चा, जवान, बूढ़ा सब कुछ हो जाता है। और हमारे अनुसार थोड़े से घंटों तथा उसके अपने अनुसार 70-80 वर्ष की आयु पूरी कर मर भी जाता है। इसका कारण प्रत्येक जीव जंतु की अलग अलग बोध सामर्थ्य है और उसी के अनुसार समय सिमटता और फैलता है।
घटनाओं और बोध शक्ति के अतिरिक्त सापेक्षतावाद के अनुसार समय की चाल गति पर भी निर्भर करती है। आइंस्टीन ने सन 1940-50 में सापेक्षता का यह सिद्धाँत प्रतिपादित किया कि गति का समय पर भी प्रभाव पड़ता है। उसके अनुसार गति जितनी बढ़ेगी, समय की चाल उतनी ही घटती जाएगी। उदाहरण के लिए एक अंतरिक्ष यान प्रकाश की गति अर्थात् एक लाख छियासी हजार मील प्रति सेकेंड की गति से चलता हो, तो उसमें बैठे व्यक्ति के लिए समय की चाल एक बटा सत्तर हजार हो जाएगी अर्थात् प्रकाश की गति से चलने वाले यान में बैठकर कोई व्यक्ति नौ प्रकाश वर्ष (नौ वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी तय करे) दूर स्थित किसी तारे पर जाए और वहाँ से तुरंत लौट पड़े तो इस यात्रा में अठारह वर्ष लगेंगे, लेकिन उस यान में बैठे व्यक्ति के लिए यह समय अठारह वर्ष का सत्तर हजारवाँ भाग अर्थात् सवा दो घंटे ही होगा।
ऐसा भी नहीं कि पृथ्वी पर सवा दो घंटे ही बीतेंगे। पृथ्वी पर तो वही अठारह वर्ष ही व्यतीत होंगे। उस व्यक्ति के सगे संबंधी भी अठारह वर्ष बूढ़े हो चुके होंगे। जिन बच्चों को वह 12-13 वर्ष का छोड़ गया होगा, वे 30-31 वर्ष के मिलेंगे। उसकी पत्नी जो उससे उम्र में मात्र दो वर्ष छोटी 35 वर्ष की रही होगी, वह बूढ़ी हो चुकेगी, किंतु वह व्यक्ति जिस आयु और जिस स्थिति में गया होगा, उसमें सिर्फ सवा दो घंटे का परिवर्तन हुआ होगा अर्थात् उसकी आयु सवा दो घंटे ही बीती होगी। यह भी कहा जा सकता है कि वह अपनी पत्नी से आयु में सोलह वर्ष छोटा हो जाएगा।
यह बात पढ़ने सुनने में अनहोनी और आश्चर्यजनक लगती है कि कोई व्यक्ति 18 वर्ष बाहर रहकर आए और जब लौटे, तो ऐसे मानो कुछ घंटे ही बाहर रहा हो। उसके चेहरे और शक्ल में भी कोई परिवर्तन न आए। उसे देखकर कोई यह भी न कह पाए कि इस बीच वह 18 वर्ष और बड़ा हो चुका है, लेकिन आइंस्टीन ने प्रमाणों और प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया है। सापेक्षता के इस सिद्धांत को ‘क्लॉक पैराडॉक्स (समय का विरोधाभास) कहा गया है।
यद्यपि अभी कोई ऐसा यान बन नहीं सकता है, जिसके द्वारा की गई यात्रा से इस सिद्धाँत की सचाई को अनुभूत किया जा सके, परंतु समय विरोधाभास के जो समीकरण आइंस्टीन ने दिए, उनके अनुसार अमेरिका के भौतिकशास्त्री जोजफ हाफले और खगोल शास्त्री रिचर्ड किटिंग ने सन 1979 में दो बार प्रयोग किए। उन्होंने अपने साथ चार परमाणु घड़ियाँ ली और उनके साथ सर्वाधिक तीव्र गति से उड़ने वाले यान द्वारा पृथ्वी के दो चक्कर लगाए। ज्ञातव्य है कि परमाणु घड़ियाँ सेकेंड के खरबवें हिस्से तक का समय सही सही बता देती है। हाफले और कीटिंग ने भूल चूक से बचने के लिए हर तरह की सावधानियाँ बरती। प्रयोग पूरा होने के बाद उनने पाया कि तीव्र गति के कारण परमाणु घड़ियों ने अंतर बता दिया। इसके बाद दोनों वैज्ञानिकों ने घोषणा की कि आइंस्टीन का ‘क्लॉक पैराडॉक्स’ सिद्धाँत सही है।
समय की यह प्रतीति अनुभवकर्ता की गति पर आधारित थी। इसके अतिरिक्त घटनाएँ और बोध भी इस प्रतीति के माध्यम हैं। इस प्रकार सापेक्षता के यह समस्त सिद्धाँत वेदाँत की मूल मान्यताओं का समर्थन करते हैं। समय को जानने का सर्वसुलभ और सबसे सरल माध्यम घटनाएँ है। इसके अनुसार यही कहा जा सकता है कि यह विश्व और कुछ नहीं घटनाओं का समुच्चय है तथा घटनाएँ व्यक्ति की बोधशक्ति, संकल्प चेतना का ही प्रतिफल है। विराट् ब्रह्म के संकल्प से, उसकी उपस्थिति मात्र से यह मायामय संसार उत्पन्न हुआ। मनुष्य यदि चाहे, तो इस माया से मुक्त हो सकता है और सत्य के दर्शन कर सकता है। किंतु इसके लिए हमें पहले से बनी बनाई घटनाओं को वस्तु जगत पर थोपना बंद करना पड़ेगा। तत्वदर्शियों ने इसी को साक्षीभाव की सिद्धि कहा है।
आइंस्टीन के ‘समय विरोधाभास’ सिद्धाँत से मायावाद की और पुष्टि हो जाती है, जिसमें व्यक्ति को असंग भाव से कर्म करने की प्रेरणा दी गई है। उस स्थिति को प्राप्त हुए बिना अंतिम सत्य का पता लगाया ही नहीं जा सकता, कारण कि समय का बोध (आब्जेक्टिव टाइम) निरंतर भ्रमित स्थिति बनाए रखता है। उदाहरण के लिए पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, परंतु दिखाई यह देता है कि सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर जा रहा है। चलती हुई रेलगाड़ी में से दूर तक देखने पर पेड़, वृक्ष, टीले और पृथ्वी ही दौड़ती हुई दिखाई देती है, उसी प्रकार सीमाबद्ध आस्तित्व में यह सारी भ्राँतियाँ उत्पन्न होती है।
इन सब घटनाओं का साझी रहने वाला मायायुक्त अस्तित्व पहचाना जा सके, तो वस्तुस्थिति का ज्ञान सहज ही हो सकता है, तब जाना जा सकता है कि भिन्न-भिन्न स्तरों पर समय का पैमाना भिन्न-भिन्न क्यों होता है और यह कि ‘समय’ भी उस माया से मुक्त नहीं है, जिससे संसार आबद्ध है।
जड़ जगत की तरह ‘समय’ भी मायायुक्त है। हम इस माया से मुक्त होकर जब तक संसार के आदि कारण को नहीं समझेंगे, तब तक समय संबंधी सत्य को भी नहीं जान सकेंगे और बराबर उसके सापेक्ष अस्तित्व में ही उलझे रहेंगे।
इन दिनों रासायनिक हथियारों की चर्चा जोरों पर है। अमेरिका द्वारा वियतनाम पर नापाम बम बरसाये जाने के बाद सबका ध्यान इस ओर विशेष रूप से आकर्षित हुआ। 1980 के दशक में ईराक ने कुर्द अल्पसंख्यकों तथा ईरान पर इनका प्रयोग किया। प्रथम विश्व युद्ध में अश्रु गैस के अलावा जहरीली गैस तथा नापाम बमों का भी प्रयोग किया गया था। इस युद्ध में जर्मनी ने जिस ज्वलनशील प्रक्षेपास्त्र का प्रयोग किया था, नापाम बम उसी का परिवर्तित-संशोधित रूप है। इस प्रकार के 5 लाख टन नापाम बम अब तक विभिन्न देशों पर गिराये गये हैं। समस्त विश्व को हिलाकर रख देने वाले इन रासायनिक हथियारों की संहारक क्षमता से आज समस्त विश्व चिंतित है।
रासायनिक हथियारों का तात्पर्य ऐसे हथियारों से है,जिनमें संहारक पदार्थों के रूप में किसी विषैले रसायन का उपयोग किया गया हो। रासायनिक पदार्थ शरीर पर तीन तरह से अपना प्रभाव डालते हैं। श्वाँस के साथ शरीर में जाकर,खाने-पीने की वस्तुओं में मिलकर,त्वचा में उपस्थित सूक्ष्म रन्ध्रों से होकर शरीर में पहुँचकर। सैनिक दृष्टिकोण से इन तीनों में श्वाँस के साथ शरीर में प्रवेश करके अपना प्रभाव डालने वाले रसायनों का महत्त्व सबसे अधिक हैं क्योंकि इन्हें शरीर में प्रवेश करने के लिए किसी बाह्य साधनों की आवश्यकता नहीं होती। कोई भी रसायन दुश्मन की फौजों पर कितना अधिक घातक प्रभाव डाल पायेगा यह उस रसायन के अणुओं के आकार,स्थानीय जलवायु,वायुदाब तथा वायु में उपस्थित वाष्पकणों की मात्रा पर निर्भर करता है।
प्रथम विश्व युद्ध में रसायन विज्ञान,रसायन इंजीनियरिंग तथा शस्त्र तकनीक को एक साथ मिलाकर आधुनिक रासायनिक आयुधों को जन्म दिया। सन् 1915 से 1918 के बीच कुल मिलाकर विभिन्न प्रकार के लगभग एक लाख तेरह हजार टन रासायनिक पदार्थों का उपयोग किया गया था। उनमें से 46 प्रतिशत जर्मनी, 23 प्रतिशत फ्राँस, 24 प्रतिशत ब्रिटेन, 5.6 प्रतिशत इटली तथा 4 प्रतिशत रूस के हिस्से में आते हैं। इन रसायनों के उपयोग से लगभग एक लाख तीस हजार सैनिक प्रभावित हुए एवं 90 हजार लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। इसमें रासायनिक हथियारों के रूप में क्लोरीन अथवा फास्जीन से भरे सिलेंडरों तथा आँसू गैस,डाईफस्लजीन तथा मर्स्टड गैस आदि का खुलकर उपयोग किया। सबसे अधिक घातक क्लोरीन, फास्लीन तथा डाईफास्जीन गैसें सिद्ध हुई।
सन् 1915 में जर्मनी की फौजों ने तोप के गोलों के स्थान पर सीधे जहरीले गैसों से भरे हुए सिलेंडरों का उपयोग किया था। क्योंकि गोलों की कमी के कारण जर्मनी की सर्वोच्च कमाँड ने अंततः प्रोफेसर हेबर की सलाह से यह निर्णय लिया। 1917 में जर्मनी ने दुश्मन की फौजों को परेशान करने के लिए छींक लगाने वाले रसायनों का भी उपयोग किया। इनमें डाइक्लोरीफेनिकल आरसीन एवं डाइक्लोरोनिल, सायनों आरसीन प्रमुख थे। इसके जवाब में ब्रिटेन ने एक दूसरे छींक वाले रसायन एडेमसाइट का विकास किया। प्रथम विश्व युद्ध में ही अश्रुजनक रसायनों के रूप में जर्मनी ने डिनाइत्र एवं जिलाइलीन ब्रोमाइड, जबकि फ्राँस ने एक अधिक शक्तिशाली, अश्रुजनक रसायन के रूप में अल्का ब्रोमोबेंजिल सायनाइड का विकास किया।
प्रथम विश्व युद्ध में श्वाँस द्वारा शरीर में प्रवेश करके सैनिकों की जान लेने वाले रसायनों के रूप में क्लोरीन एवं फास्जीन गैसों का नाम उल्लेखनीय है। चूँकि इसका प्रभाव कुछ घण्टों बाद होता था इसलिए जर्मनी ने फास्जीन के स्थान पर डाइफास्जीन का प्रयोग किया। इसके बाद 1916 में फेफड़ों को नुकसान पहुँचाने वाले रसायन के रूप में क्लोरोपिकटीन का विकास किया। यह गैस मास्क को भी बेधने की शक्ति रखती है और फेफड़ों को हानि पहुँचाने के साथ अश्रु भी बहाता है। इस युद्ध में फ्राँस हाइड्रोजन सायनाइड का व्यापक उपयोग करने वाला अकेला देश था। हाइड्रोजन सायनाइड सीधे रक्त पर प्रहार करती है। 1917 में ‘मस्टर्ड गैस ने युद्ध के मैदान में मोर्चा संभाला। यह गैस त्वचा में उपस्थित सूक्ष्म रन्ध्रों के रास्ते से शरीर में प्रवेश करती है। इसीलिए गैस मास्क लगाने अथवा न लगाने से इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी के युद्ध बंदी शिविरों में 45 लाख यहूदी युद्ध बंदी सैनिकों को गैस चेंबरों में बंद करके कार्बन मोनो आक्साइड एवं हाइड्रोजन सायनाइड जैसी गैसें भरकर मार डाला गया। इसके अतिरिक्त वनस्पति विरोधी रसायनों का भी उपयोग किया गया, जिसके कारण उपजाऊ भूमि बंजर धरती के रूप में परिवर्तित हो गई। ऐसा सर्वप्रथम अमेरिका वियतनाम युद्ध में हुआ था। अमेरिकी प्रतिरक्षा सूत्रों के अनुसार इस युद्ध में 1972-79 के मध्य दक्षिणी वियतनाम के कुल 27 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वनस्पति विरोधी रसायनों का उपयोग किया गया था। इसमें से बीस हजार वर्ग किलोमीटर के पेड़-पौधों की पत्तियाँ नष्ट हो गई थीं। सिर्फ ठूँठ ही बच गये। अगले 20 वर्ष के लिए वे पुष्पित पल्लवित न हो सके, यह ऐसा खतरनाक रसायन था। तीन हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में खड़ी फसलों को नष्ट करने के लिए 2-4 डी, 4-5 डी कैको डायलिक एसिड तथा विकलें रैम खतरनाक रसायनों का प्रयोग किया गया। भले ही इन रसायनों का उपयोग पेड़-पौधों की पत्तियों को नष्ट कर देना था जिससे शत्रु सैनिकों को छिपने के लिए स्थान न मिल सके किन्तु वहाँ की बंजर भूमि अभी भी द्वितीय विश्व युद्ध एवं मनुष्य की क्रूरता की याद दिलाता है।
आधुनिक रासायनिक आयुधों के रूप में स्नायु गैसों का विकास हुआ है। जिसका श्रेय जर्मनी की रासायनिक कम्पनी आई.जी.फारबेन और वैज्ञानिक डॉ. जेरार्ड श्रेडर को जाता है। जिनको कीटनाशी दवा खोजते समय स्नायु गैस के सूत्र मिल गये। इसकी संहारक क्षमता में लम्बे समय तक कोई कमी नहीं आती तथा इसका प्रभाव भी तुरन्त होता है। स्नायु गैस का अर्थ है ऐसी गैस जिसका प्रभाव हमारे स्नायुतंत्र अर्थात् तंत्रिका तंत्र पर होता है। पहली स्नायु गैस का विकास द्वितीय विश्व युद्ध में हुआ जिसका नाम सैनिक भाषा में टैबून था। बाद में उससे भी खतरनाक सरीन एवं सामन नाम की स्नायु गैस का भी विकास हुआ। अमेरिका में विकसित वी.एक्स तथा रूस के वी.आर. 55 का जखीरा भी संकटों को आमंत्रित कर रहा है। इसके प्रयोग से मात्र सैनिक ही नहीं उस क्षेत्र के जीव-जन्तु ,कीड़े-मकोड़े,पशु-पक्षी भी प्रभावित होते हैं। लूले-लँगड़े, अन्धे,लकवा से ग्रस्त, बहरे जैसे लोगों की अधिकता इसका परिचायक है। उस क्षेत्र में अकारण ऐसे ही बच्चे जन्म लेते हैं।
प्रथम विश्व युद्ध रासायनिक आयुधों की विनाश लीला को देखकर उसके बाद से ही विश्व के अधिकाँश देशों ने हथियारों के निर्माण तथा युद्धों पर रोक लगाने के प्रयास प्रारंभ कर दिये थे। द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बमों की विनाशलीला के पश्चात इन प्रयासों में विशेष तेजी आ गई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्म इन्हीं प्रयासों की देन है। जिसके फलस्वरूप रासायनिक हथियारों के उपयोग को बंद करने के लिए कई नैतिक एवं कानूनी प्रतिबंध भी लगाये गये।
युद्धों में रासायनिक आयुधों के बढ़ते उपयोग और प्रतिवर्ष नये-नये तथा एक से बढ़कर एक संहारक शक्ति वाले रासायनिक आयुधों की खोज से आज सारा विश्व चिंतित है। इस चिंता का सबसे बड़ा कारण यह है कि इन आयुधों की मार केवल युद्ध क्षेत्र तक तथा युद्ध के समय तक ही सीमित नहीं रहती। वायु के साथ-साथ ये जहरीली गैसें युद्ध क्षेत्र से बहुत दूर तक पहुँचती है और अनेक निरीह असैनिक भी इसमें मारे जाते हैं। वनस्पति विरोधी रसायनों का उपयोग उस क्षेत्र की जमीन को अनुपजाऊ बना देता है तथा वातावरण में उपस्थित अनेक लाभदायक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। अतः रासायनिक हथियारों का प्रयोग युद्ध भूमि में करने की योजना बनाने वाले वैज्ञानिकों,राजनेताओं एवं विधि वेत्ताओं को एक बार पुनः सोचना चाहिए कि कहीं हम स्वयं अपने पैरों पर तो कुल्हाड़ी नहीं चला रहे हैं। बेहतरी मानवीय गरिमा को पहचानने और उसके अनुरूप नीतियाँ बनाने में है।
तितली और मधुमक्खी दोनों एक फूल पर आकर बैठती। दोनों झगड़ने लगी कि फूल पर मेरा अधिकार है।
फैसला कराने तोता को बुलाया गया। उसने मधुमक्खी के पक्ष में निर्णय दिया और कहा, यह बैठने का श्रम सार्थक करती है और दूसरों के लिए शहद निकालती है, इसलिए पुष्प पर अधिकार इसी का रहेगा।
इक्कीसवीं सदी नारी जीवन में सुखद सम्भावनाओं की सदी है। इस के उदीयमान स्वर्णिम प्रभात की झांकियां अभी से दिखने लगी हैं। महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे आने लगी हैं। समाज हो या राजनीति,विज्ञान हो या सेना,साहित्य,संगीत हो अथवा खेल की दुनिया महिलाएँ सभी क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का ध्वज लहरा रही हैं। पुरुषों के एकाधिकार समझे जाने वाले पद, प्रतिष्ठान एवं व्यवसाय में भी महिलाओं ने अपनी नवीन भूमिका से सबको आश्चर्यचकित कर दिया है। इक्कीसवीं सदी की नारी अब जाग्रत् एवं सक्रिय हो चुकी है। युग द्रष्ट स्वामी विवेकानंद ने ठीक ही कहा है-”नारी जब अपने ऊपर थोपे गए बेड़ियों एवं कड़ियों को तोड़ने लगेगी तो विश्व की कोई शक्ति उसे रोक नहीं सकेगी।”
आमतौर से विमान सेवा का क्षेत्र पुरुषों के आधिपत्य में है एवं वही इसके सक्षम उत्तराधिकारी समझे जाते हैं। परन्तु पिछले एक दशक के दौरान इस प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान में महिलाओं का पदार्पण हुआ है। 8 मार्च 1998 में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सभी महिला चालक सदस्यों वाली दो विमान सेवाओं ने दिल्ली और मुम्बई से प्रथम उड़ानें भरीं। कैप्टन संगीता काबरा और कैप्टन अनुपमा कोहली ने एयर बस-320 मुम्बई से कराची और फिर कराची से मुम्बई तक उड़ायी। प्रथम महिला कमाण्डर इन्द्राणी सिंह ने सह चालक कैप्टन अवन्तिका मित्तल के साथ एयर बस-300 दिल्ली से काठमाण्डू की उड़ान भरी। इससे पूर्व भी जनवरी 1986 में कैप्टन सौदामिनी देशमुख ओर उनकी सहयोगी चालक कैप्टन निवेदिता भसीन के नेतृत्व में एक अखिल भारतीय महिला चालक दल ने एफ-27 विमान द्वारा कलकत्ता से सिलचर की उड़ान भरी थी। 1989 में इसी दल ने बोइग-737 को मुम्बई से गोवा तक उड़ाया था। कैप्टन सौदामिनी व इन्द्राणी सिंह ने प्रथम महिला कमाण्डर होने का गौरव पाया है। सन् 1966 में दुबई बेनर्जी ने पुरुषों के इस आरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करके पुरुषों के एकाधिकार को तोड़ा था। अपने देश के विमान सेवा के विभिन्न भागों में 13 प्रतिशत महिलाएँ कार्यरत हैं। वर्तमान समय में भारतीय विमान में एक एक्जीक्यूटिव पायलट और 17 लाइन पायलट हैं। इनकी संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। इसराइल एयर लाइंस के प्रवक्ता नेकेमेन क्लाएमेन ने कहा है कि इसराइल में भी महिलाएँ विमान सेवा में प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं ।
सशस्त्र सेनाओं में कभी पुरुषों को प्राथमिकता दी जाती थी परन्तु यह रिकार्ड भी अब टूटने लगा है। कुछ साल पूर्व भारतीय वायुसेना में महिला लड़ाकू पायलट का एक दल शामिल किया गया था। स्कूल व विश्व विद्यालय स्तर पर एन.सी.सी. महिलाओं की सेना में प्रवेश में विशेष योगदान प्रदान करती है। सेना की मेडिकल विंग में महिलाओं का योगदान उल्लेखनीय है। सशस्त्र सेना के मेडिकल कॉलेज पुणे में लड़कियाँ अपने कौशल से सबको पीछे छोड़ दी हैं। इसरायली एयर फोर्स ने महिला सैनिकों को युद्ध प्रशिक्षण देना प्रारंभ कर दिया है। तीस महिला सैनिकों के एक दल को इस साल विमानरोधी बैटरियाँ चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। इसी वर्ष इसराइल की ही दो महिला पायलटों ने युद्ध पायलट प्रशिक्षण की परीक्षा सफलतापूर्वक प्राप्त की। वहाँ अस्सी के दशक के अंतिम वर्षों से महिला सैनिक युद्ध प्रशिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। ब्रिटेन की वायुसेना तथा नौसेना में महिलाओं को युद्ध क्षेत्र में काम करने की पहले ही अनुमति दी जा चुकी है। ‘सण्डे टाइम्स’ के अनुसार ब्रिटेन की नयी सरकार ने तोपखाना इंजीनियर्स की नयी शाखाएँ खोलने और टैंक व इंफेण्ट्री में महिलाओं की भागीदारी लेने की अनुशंसा की है। लन्दन की रॉयल जलसेना के 300 साल की प्राचीन परम्परा को तोड़ते हुए लेफ्टिनेंट सुमूरी और मील रीस ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी संभाली है। इनकी दोनों नौका में 12-12 सदस्य हैं। सैन्य बल मंत्री जानरीड के अनुसार महिलाओं की यह भागीदारी उनकी उच्च दक्षता एवं कार्यकुशलता के लिए प्रदान की गयी है।
अमेरिकी सेना ने भी महिलाओं को भर्ती का सुअवसर दिया है। अमेरिका की रैड्स नेशनल डिफैन्स रिसर्च इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार 1993 से 1994 के दौरान सैन्य सेवाओं के तहत 815 महिलाओं को प्रवेश दिया गया। अमेरिका में महिलाओं को थलसेना में सम्मिलित करना निषिद्ध है। इसके बावजूद थल सेनाओं की कुछ आवश्यक इकाइयों और प्रशासनिक पदों में कुछ महिलाएँ कार्यरत हैं। कनाडा और यूरोप के कई छोटे देशों में महिलाओं की साहसिकता एवं युद्ध कौशल के कारण उन्हें जमीनी युद्ध में लड़ने की अनुमति दी गई है।
नारी साहस एवं शौर्य का स्रोत है। समय आने पर इसे अपने जीवन में जीवन्त एवं क्रियान्वित भी कर सकती है। नोबेल शान्ति पुरस्कार विजेता जोड़ी विलियम्स ऐसी ही एक साहसी महिला है। इनका लक्ष्य है कि संसार में बारूदी सुरंगों का पूर्ण सफाया हो, क्योंकि इससे लाखों व्यक्ति मारे जाते हैं। इस प्रयास में वह सारे विश्व का दौरा कर रही हैं। उन्होंने अपने एकाकी प्रयासों से दक्षिण कोरिया के बारूदी सुरंगों पर प्रतिबंध की संधि पर हस्ताक्षर करने और विसैन्यीकृत क्षेत्र की बारूदी सुरंगों को हटाने के लिए भी समर्थन जुटाने का प्रयास किया है। सुश्री जीडी को नोबेल पुरस्कार बारूदी सुरंगों के विरुद्ध अन्तर्राष्ट्रीय अभियान में समन्वय स्थापित करने के प्रयास के लिए सन् 1996 दिसम्बर में प्रदान किया गया था।
घर की चार दिवारी से निकलकर ऊँची-ऊँची पर्वतों की चोटियाँ हों या विशाल अन्तरिक्ष यात्रा अथवा विज्ञान व टेक्नालॉजी का क्षेत्र, महिलाओं ने सभी जगह आगे आकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। ऐसा ही एक नाम है कल्पना चावला। जिन्होंने अन्तरिक्ष में उड़कर प्रथम एशियाई महिला होने का गौरव प्राप्त किया है। हरियाणा के करनाल जिले में 1961 में जन्मी कल्पना चावला 19-20 नवम्बर की रात अमेरिकी अन्तरिक्ष यान कोलम्बिया में एक पाँच पुरुषों के अभियान दल के साथ अन्तरिक्ष यात्रा के लिए प्रस्थान की थी। वह 6 दिसम्बर 1996 को इस महत्त्वपूर्ण अभियान से सकुशल धरती पर लौट आयी। अमेरिकी अन्तरिक्ष यान कार्यक्रम के इतिहास में यह पहला अवसर है जब 41 वर्षीय सुश्री कोलिन को अन्तरिक्ष यान का नेतृत्व सौंपा गया है। सुश्री कोलिन अमेरिका की पहली महिला अन्तरिक्ष पायलट की प्रोन्नति प्राप्त कर एक अन्तरिक्ष मिशन का कमाण्डर बन गयी है। कोलिन ने 1995 में पहली महिला अन्तरिक्ष यान पायलट होने का सम्मान प्राप्त किया। मई 1997 में वह दूसरी बार अन्तरिक्ष उड़ान पर गयी थी तब उसने रूसी अन्तरिक्ष स्टेशन मीर पर 419 से भी अधिक दिन बितायी।
विज्ञान के अनुसंधान एवं अन्वेषण में भी महिलाएँ पीछे नहीं रही हैं। सरला सुब्बाराव वे मलेशिया पर विशेष एवं महत्त्वपूर्ण शोध की है। उनकी इसी विशेषता एवं दक्षता के कारण न्यूयार्क एवं कैलीफोर्निया की प्रतिष्ठित संस्थाओं ने उन्हें आमंत्रित किया है। सरला ने इलियास यूनिवर्सिटी में जेनेटीक में पी-एच.डी. की। सन् 1991 में उन्हें आई.सी.एम.आर. अयंगा पुरस्कार प्रदान किया गया। सरला सुब्बाराव विज्ञान जगत् की दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। कृषि टेक्नालॉजी को विकसित करने में पुरुषों का योगदान होता है। परन्तु देहरादून के कृषि शोध संस्थान में स्वर्णलता आर्य की महान् उपलब्धियों को नहीं भुलाया जा सकता। विज्ञान के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट उपलब्धियों के लिए अब तक नौ महिलाओं को नोबेल पुरस्कार प्राप्त हो चुका है- सन् 1903 में मैरी क्यूरी, 1935 में आयरन जेलियट (रसायन), 1963 में मैरिया सियोपाट मायर (भौतिकी), 1964 में डोर्थी सी होटसीन (रसायन),तथा चिकित्सा में 1967 जटी डी कोरी,1977 राँसलीन एस यालोव, 1983 बारबरा मैग्लिटॉक, 1986 रीता लेवी मण्टाल सिनी तथा 1988 में जटरुडी पी. एलिपन को यह सम्मान प्राप्त हुआ।
साहित्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट योगदान के लिए भी महिलाओं ने नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया है। 1909 में सेल्मा वागरलोफ, 1926 में ग्रेसिया डेलेटा, 1928 में सिग्रिडे डण्डसेट, 1938 में पर्ल बक, 1945 में ग्रेब्रीलो मिस्डूल, 1966 में नेली चोक्स, 1992 में नर्डिन गार्डिमर तथा 1993 में डोनी मारिसन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। भारत में ज्ञानपीठ पुरस्कार साहित्य के विशेष उपलब्धि के कारण दिया जाता है। सन् 1976 में आशापूर्णा देवी, 1981 में अमृता प्रीतम, 1982 में महादेवी वर्मा, 1996 में महाश्वेता देवी को यह प्रतिष्ठ दी गई। कृष्णा सोबती को मैथिलीशरण सम्मान एवं महासुन्दरी देवी को ‘कबीर’ अलंकरण से अलंकृत किया जा चुका है। विख्यात इतिहासकार रोमिला थापर को अन्तर्राष्ट्रीय ऐकेडेमिक एवार्ड मिल चुका है। वह जापान द्वारा प्रदत्त इस पुरस्कार को पाने वाली प्रथम भारतीय महिला हैं। इस कड़ी में ‘द गाड ऑफ स्माल थिंग’ की उपन्यासकार अरुंधती राय ने तो इतिहास ही रच दिया है। इस उपन्यास को साहित्य गगन का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। विश्व के 16 भाषाओं में अनुवाद होकर इस उपन्यास की लाखों प्रतियाँ बिक चुकी हैं। कला द्वारा संवेदना एवं भावनाओं को रेखाँकित एवं प्रतिबिम्बित किया जाता है। इस क्षेत्र में महिलाओं को महारथ प्राप्त है। 1996 में कालिदास सम्मान नर्तकी शाँताराव को मिला। स्वर साम्राज्ञी लता मंगेश्कर को सन् 1989 में दादासाहब फाल्के पुरस्कार तथा 1995 में आदित्य बिड़ला पुरस्कार प्राप्त हुआ। डॉ. श्रीमती अबान ई. मिस्त्री प्रथम महिला तबलावादक हैं। इसकी कठिन लयकारियों के कारण इस वाद्य में पुरुषों का वर्चस्व माना जाता है, परन्तु चार दशक पूर्व अबान ई. मिस्त्री ने इस वाद्य पर अधिकार कर भारत के संगीतज्ञों में अपना स्थान बनाया। इन्हें ‘लालमणि’ की उपाधि प्राप्त है। भारत रत्न का गौरव कलाकारों को बहुत कम मिला है। एस. सुब्बालक्ष्मी इस सम्मान को प्राप्त करने वाली प्रथम भारतीय कलाकार हैं। 82 वर्षीया सुब्बालक्ष्मी ने कर्नाटक शैली में अपने शास्त्रीय और अर्धशास्त्रीय गायन द्वारा मानवीय अनुभूतियों का गहरा अहसास कराया है। उनके भक्ति संगीत से मिलने वाली शाँति के इच्छुक महात्मा गाँधी थे। उनके गायन के अन्य प्रशंसक थे- राजाजी, पं. नेहरू एवं सरोजनी नायडू। लार्ड माउण्ड बेटन उनके इतने प्रशंसक थे कि 1947 में उनकी फिल्म मीरा को उन्होंने ही रिलीज किया था। इस तरह संगीत एवं कला के क्षेत्र में महिलाओं का योगदान अभूतपूर्व रहा है।
खेल का क्षेत्र पुरुष एकाधिकार के अंतर्गत आता है। परन्तु यह मिथक टूटने लगा है। अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के अध्यक्ष जुआन एण्टोनियो समाराँव की घोषणा महिला जगत् के लिए अभूतपूर्व है। इनके अनुसार भविष्य में ओलम्पिक में उन्हीं खेलों को शामिल किया जायेगा, जिनमें महिलाओं की भागीदारी होगी। महिलाएँ ओलम्पिक में वाटरपोलो, भारोत्तोलन, पेंटाघालन, गोल्फ, बाउलिंग, स्कवैश, रावी आदि पुरुष प्रधान खेलों में भी सम्मिलित होंगी। मेलबोर्न क्रिकेट क्लब जैसे प्रतिष्ठित क्लबों में महिला खिलाड़ियों को स्थायी सदस्य बनाने का विचार किया जा रहा है। न्यूजीलैण्ड के क्रिकेट क्लब में महिला एवं पुरुष दोनों की सदस्यता बराबर है। न्यूजीलैण्ड के क्रिक्रेट इतिहास में पहली बार पुरुष क्रिकेटरों की उपस्थिति में किसी महिला क्रिकेटर को ‘न्यूजीलैण्ड क्रिकेट ऑफ द ईयर’ चुना गया है। यह सम्मान रन मशीन के तौर पर प्रसिद्ध डेबी हाकल को मिला है। लार्ड्स के मैदान पर महिला क्रिकेट के अन्तर्राष्ट्रीय मैचों के साथ 211 साल का पुराना इतिहास टूट गया। यहाँ न तो महिलाओं को मेरिलि बेन क्रिकेट क्लब (एम.सी.सी) की सदस्यता हासिल थी और न ही यहाँ महिलाओं को पुरुषों के साथ बैठकर मैच देखने की इजाजत। अब यह प्रथा टूट गयी है।
टेनिस जगत् में मार्टिना हिंगीस, मोनिका सेलेस, स्टेफीग्राफ, फ्राँस ओपन की विजेता अरान्ता साँचेज विकारियो आदि विख्यात नाम हैं। इस साल भारत में नीत दैवेया को प्रथम महिला टेनिस प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया है। बीस वर्षीया अर्पणा पोपट ने इस वर्ष बैडमिण्टन का राष्ट्रीय महिला खिताब जीता। बैडमिण्टन जगत् में इण्डोनेशिया की सुश्री सुशान्ति प्रसिद्ध ख्याति प्राप्त नाम है। इन्होंने अनेकों बार विश्व बैडमिण्टन खिताब जीता। भारोत्तलन में 29 वर्षीया कुँजारानी देवी अब तक 42 पदक जीत चुकी हैं। मल्लेश्वरी ने एशियाई महिला भारोत्तलन प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता है। सात साल की केतकी कुलकर्णी ने आठ वर्ष की कम उम्र की लड़कियों की ब्रिटिश शतरंज चैंपियनशिप जीती।
आज विश्व धार्मिक कट्टरता से जूझ रहा है। इसका सर्वाधिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ रहा है। धर्म के क्षेत्र में भी महिलाओं के बढ़ते कदम नूतन युग का सूत्रपात करते हैं। जून 1990 में इंग्लैण्ड के एक चर्च में पेन्नी जोमीशन को प्रथम महिला विशप के रूप में नियुक्त किया गया। पेन्नी के विशप बनाने की घटना को मार्टिन लूथर किंग की धार्मिक क्राँति से जोड़ा जा रहा है। यहाँ अद्भुत क्राँति है कि किसी महिला को विशप नियुक्त किया गया। मजहबी कठोरता के मामले में मुस्लिम समाज कुछ ज्यादा ही सख्त एवं कठोर समझा जाता है। किन्तु रूढ़िवादी कट्टरता भी टूटने दरकने लगी है। फरवरी 1998 में मुस्लिम महिला संगठनों और केरल विधान सभा की भूतपूर्व अध्यक्षा नफीसन बीबी के नेतृत्त्व में केरल के तिरुअनन्तपुरम स्थित पालायम मस्जिद में नमाज अदा की। महिलाओं द्वारा मस्जिद में नमाज अदायगी की एक और पहल लखनऊ में हुई थी। लखनऊ में 15 अगस्त 1997 को शिया समुदाय की महिलाओं ने आसफी इमामबाड़े में जुमे की नमाज अदा की। पुरुष समुदाय के घोर एवं तीव्र विरोध के बावजूद यह घटनाएँ महिलाओं के लिए सुखद एवं शुभसंदेश हैं।
मिश्र में में भी कई ऐसे प्रगतिशील कदम उठाए गए हैं। धीरे-धीरे सारे मुस्लिम मुल्कों की महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट हो रही हैं। इस मामले में जार्डन की महिलाएँ विशेष उल्लेखनीय हैं। जार्डन में महिलाओं ने सदन में उन्हें प्रतिनिधित्व दिये जाने के लिए कोटा निर्धारण करने की माँग की है। वहाँ की एक महिला संगठन की एक सदस्या नारिया शामरुख ने अपनी माँग के लिए दस लाख महिलाओं का हस्ताक्षर अभियान शुरू कर दिया है। बंगलादेश की राजनीति में यूँ तो प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजिद और विपक्ष की नेता खालिदा जिया शीर्ष पर हैं, परन्तु वहाँ पिछले दिनों सम्पन्न हुए यूनियन परिषद् के चुनावों ने महिला वर्ग में जागृति और सजगता का एक नया अध्याय जोड़ा। इन चुनावों में 26' महिलाओं ने अपने विरुद्ध खड़े पुरुष प्रत्याशियों को हराकर देश के राजनीतिक परिदृश्य में आ रहे बदलाव व परिवर्तन को उद्घाटित किया। इस चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया है कि बंगलादेश की रूढ़िवादी व्यवस्था की कड़ियाँ टूटने एवं दरकन के कगार पर हैं। महिलाओं ने कट्टरपंथियों के फतवों, फरमानों को नजरअन्दाज कर यह जीत प्राप्त की।
विश्व में सभी संसदों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 11.7' है। उसमें से 7.1 ' महिलाएँ संसदीय अध्यक्ष हैं। 10.8' राजनैतिक दलों में नेतृत्व पदों पर हैं। सन् 1989 में स्थापित फ्राँस के प्रजातंत्र में अब महिला साँसदों का पदार्पण प्रारम्भ हो गया है। अमेरिकी संसद में 10.9' तथा ब्रिटेन की पार्लियामेण्ट में 9.5' महिला साँसद हैं। भारत में 11 वीं लोकसभा में 36 महिला साँसद चुनी गई हैं। अमेरिका की विदेश मंत्री मेडिलिन अलब्राइट, भारत की सूचना प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज, श्रीलंका की प्रधानमंत्री चंद्रिका कुमारतुँगे, पाकिस्तान की विपक्षी नेता बेनजीर भुट्टो, भारत की सोनिया गाँधी, नेपाल की महिला एवं समाज विकास मंत्री सहाना प्रधान, न्यूजीलैण्ड की मंत्री मार्गेट शील्ड तथा आस्ट्रेलिया की महिला नेता रोसेमरी क्राउली जैसी महिलाएँ राजनीति के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
यू.एन.डी.पी. की 1997 की रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिक देशों के प्रशासनिक और व्यापारिक प्रबंधन में कार्यरत महिलाओं का प्रतिशत 27.4 है। यह संख्या अमेरिका में 42.2', कनाडा में 40' है। सिंगापुर, थाईलैण्ड, श्रीलंका, मलेशिया और चीन में महिला अफसरों का अनुपात 11 से 34' के बीच है। बाँग्ला देश में 5', पाकिस्तान में 3.5' तथा भारत में 2.5' है। इसी कारण शिक्षा के क्षेत्र में भी जबर्दस्त परिवर्तन आ रहा है। इस वर्ष केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा जारी दसवीं कक्षा का परिणाम सामाजिक सोच में आए बदलाव को रेखाँकित करता है। छात्राएँ बहुत तेजी से आगे बढ़ रही हैं। बारहवीं कक्षा में छात्राओं का प्रतिशत 78.5 है जबकि छात्रों का 68.3' आया है। यह भारत के सभी बड़े महानगरों में देखा जा सकता है। केरल में महिलाओं की शिक्षा दर 86.2' है।
पुरुषों के व्यवसाय में भी महिलाओं का प्रवेश होने लगा है। आमतौर से हजामत का कार्य पुरुष वर्ग करता है। परन्तु समाज के इस मिथक को तोड़कर साहसिक कदम रखने वाली एक महिला है थंगम्मा जो केरल के कोंडिचेरी के मीनमही गाँव में अपने पति के नाई की दुकान में पूर्णकालिक एवं नियमित रूप से पुरुष ग्राहकों के बाल काटती हैं तथा उनकी दाढ़ियाँ बनाती हैं। 50 वर्षीया थंगम्मा इसे अपनी एक बड़ी उपलब्धि मानती हैं। अमेरिका की शैला कोन्नोर्स ने न्यूयार्क के सबसे भव्य व महंगे प्लाजा होटल में दरबान की नौकरी कर होटल की दुनिया में प्रथम महिला दरबान होने का गौरव प्राप्त किया है। होटल के दरवाजे पर खड़ी 5 फुट 6 इंच लम्बी 31 साल की शैला पूर्व पुलिस अधिकारी हैं और होटल के 107 सालों के इतिहास में पहली महिला दरबान है।
आज विश्व के सभी क्षेत्रों में नारी क्राँति का शंखनाद होने लगा है। यह इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य बनाम नारी सदी की उद्घोषणा है। अतः हममें से प्रत्येक को अभी से नारी को सम्मान, सहयोग, स्नेह देकर उसे साथ लेकर बढ़ने का प्रयास पुरुषार्थ करना चाहिए।
एक पेड़ पर दो बाज प्रेमपूर्वक रहते थे। दोनों शिकार की तलाश में निकलते और जो भी पकड़ लाते, उसे शाम को मिल बैठकर खाते। बहुत दिन से उनका यही क्रम चल रहा था।
एक दिन दोनों शिकार पकड़कर लौटे, तो एक ही चोंच में चूहा था और दूसरे की में साँप। शिकार दोनों ही तब तक जीवित थे। पेड़ पर बैठकर बाजों ने जब उनकी पकड़ ढीली की, साँप ने चूहे को देखा और चूहे ने साँप को।
साँप चूहे का स्वादिष्ट भोजन पाने के लिए जीभ लपलपाने लगा और चूहा साँप के प्रयत्नों को देखकर अपने पकड़ने वाले बाज के डैनों में छिपने का उपक्रम करने लगा।
उस दृश्य को देखकर एक बाज गंभीर हो गया और विचारमग्न देखने लगा। दूसरे ने उससे पूछा, दोस्त, दार्शनिकों की तरह किस चिंतन मनन में डूब गए?
पहले बाज ने अपने पकड़े हुए साँप की ओर संकेत करते हुए कहा, देखते नहीं, यह कैसा मूर्ख प्राणी है। जीभ की लिप्सा के आगे इसे मौत भी एक प्रकार से विस्मरण हो रही है।
दूसरे बाज ने अपने चूहे की आलोचना करते हुए कहा, और इस नासमझ को भी देखो, भय इसे प्रत्यक्ष मौत से भी अधिक डरावना लगता है।
पेड़ के नीचे एक मुसाफिर सुस्ता रहा था। उसने दोनों की बात सुनी और एक लंबी साँस छोड़ते हुए बोला, हम मानव प्राणी भी तो साँप और चूहे की तरह स्वाद और भय को बड़ा समझते हैं, मौत तो हमें भी विस्मरण ही रहती है। स्वभावगत आग्रह मनुष्य को इसी प्रकार सत्य का विस्मरण कराते रहते हैं।
झपकी लेने को सामान्यतः समय की बरबादी या एक व्यसन माना जाता है। कहीं-कहीं तो इसे शारीरिक या मानसिक रोग का प्रतीक भी माना जाता है। परन्तु यह सब नहीं है। कार्य के अत्यधिक दबाव, पारी वाले कार्य के कारण या किसी अन्य कारणवश यदि हमारी रात की नींद अधूरी रह गई हो तो उसे हम झपकी लेकर दिन के समय पूरा कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि झपकी द्वारा हम जीवन को अधिक स्वस्थ, स्फूर्त एवं सफल बना सकते हैं। इसकी अपनी उपयोगिता के साथ-साथ यह विज्ञान सम्मत भी है।
मस्तिष्कीय तरंगों पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य में पूरे दिन में दो बार सोने की नैसर्गिक आवश्यकता है। एक रात्रिकाल में कई घण्टे तक लम्बी नींद की आवश्यक जरूरत और दूसरी दोपहर समय कुछ समय के लिए सोने की कम जरूरत। यही कारण है कि रात की सामान्य नींद लेते हुए भी हम दोपहर को उनींदे से महसूस करते हैं और अर्धजड़ित से हो जाते हैं। हमारे कार्य करने की क्षमता घट जाती है। इसी समय यंत्र मापन, रेलवे वार्निंग सिगनल, लेखा जोखा संबंधी कार्यों में सर्वाधिक चूक देखी जाती है, विशेषकर सड़क दुर्घटनाएँ इसी समय सबसे अधिक घटित होती हैं। एक अध्ययन के अनुसार सड़क दुर्घटनाओं में शराब के अलावा झपकी लेना दूसरा प्रमुख कारण है।
दोपहर को नींद की कम आवश्यक जरूरत को हम झपकी द्वारा पूरा कर सकते हैं। इससे हमारी शारीरिक थकान तो दूर हो जाती है साथ ही मानसिक क्षमता में भी वृद्धि हो जाती है। द सर्करे काऊर हॉस्पिटल माँट्रियल के नींद विशेषज्ञ रोजर गोडवोडर और जैक्स माँट प्लेजिर के अनुसार जो लोग झपकी लेते हैं उनका मानसिक सतर्कता का सूचक मानक ‘रिएक्शन टाइम’ अधिक पाया जाता है और दोपहर को लिए गए परीक्षणों में झपकी न लेने वालों की अपेक्षा वे गल्तियाँ भी एक तिहाई कम करते हैं।
झपकी हमारे मूड में भी आशाजनक सुधार लाती है, इससे मिलने वाली ताजगी तरह हमारे संबंधों को अधिक मधुर एवं सफल बनाती है। सेंल लाउस के मनोवैज्ञानिक जॉन टी.टाँव व उनके सहयोगी शोधार्थियों के अनुसार झपकी लेने वाले झपकी न लेने वालों की अपेक्षा अधिक स्मरण शक्ति दिखाते हैं, साथ ही अधिक प्रसन्न भी नजर आते हैं।
झपकी लेने का शारीरिक स्वास्थ्य से भी सीधा संबंध है। यूनान में आधे लोग झपकी लेते हैं और आधे नहीं। वहाँ पर किए गए अध्ययन के अनुसार जो व्यक्ति प्रतिदिन आधा घण्टा या अधिक झपकी लेते हैं उनमें कोरोनरी हृदय रोग की संभावना कम पाई गई। भूमध्यसागरीय और उष्णकटिबंधीय देशों में लोग दोपहर के समय विश्राम करते हैं, अधिकाँश लोग इस समय झपकी लेते हैं। उत्तरी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में झपकी लेना एक स्वस्थ परम्परा नहीं मानी जाती, स्वास्थ्य संबंधी आँकड़ों के अनुसार भूमध्यसागरीय एवं उष्णकटिबंधीय देशों में कोरोनरी हृदय रोग उत्तरी यूरोप व अमेरिका की अपेक्षा कम होते हैं।
यह मान्यता उचित नहीं है कि झपकी लेने वाले आलसी, रुग्ण या जराग्रस्त होते हैं। अमेरिका में हुए एक प्रयोग के अनुसार वहाँ तीन चौथाई लोग झपकी इसलिए लेते हैं कि पाली वाले कार्य, रात्रि समय का देर तक अध्ययन या शिशुचर्या के कारण वे पूरी नींद नहीं ले पाते हैं। दूसरों में अधिकाँश शौकिया तौर पर झपकी लेते हैं। लेकिन ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि वे किसी भी तरह झपकी न लेने वालों से अधिक सुस्त या अकर्मण्य थे।
झपकी अनिद्रा रोग का एक महत्त्वपूर्ण निदान है। मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर साइकिएट्री, म्यूनिच के युवा मनोवैज्ञानिक डॉ. जर्गन जुली के अनुसार झपकी द्वारा लिए गए नींद के हल्के डोज हमारे अनिद्रा रोग को बहुत कुछ ठीक कर सकते हैं। डॉ. जुली ने चार घण्टे के अंतराल में प्रातः 9 बजे,दोपहर 1 बजे व सायं 5 बजे झपकी के लिए रखे हैं। उनके अनुसार हमें प्राकृतिक ऊँघाई के क्षणों से काफी-चाय या व्यायाम द्वारा नहीं जूझना चाहिए। कुर्सी पर बैठे-बैठे पीठ के सहारे एक छोटी सी झपकी बेहतर है। लेकिन बहुत छोटी झपकी अधिक सहायक नहीं होती। 5-10 मिनट की ‘केटनेप’ के ऊपर प्रयोग कर देखा गया कि नींद से वंचित लोगों की स्थिति में इससे कोई सुधार नहीं होता।
झपकी कब लें इसके संदर्भ में विशेषज्ञों की राय जानना आवश्यक है। विशेषज्ञों के अनुसार झपकी तब ली जाय जब इसकी आवश्यकता सर्वाधिक महसूस की जाय। पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी के मनोचिकित्सक मार्टिन ऑर्न के अनुसार रोगनिरोधक झपकी सतर्कता के पुनर्स्थापन में अधिक सहायक होती है। ऑर्न के अनुसार बहुत थकने से पूर्व ली गई झपकी थकावट को रोक देती है।
झपकी के कई लाभ के साथ इसमें कुछ कमियाँ भी हैं जिनके प्रति ध्यान देना जरूरी है। अधिकाँश लोग जागने पर भी एक नशे में रहते हैं। नींद विशेषज्ञ इसे निद्रा जड़त्व कहते हैं। अतः यदि हमें अचानक उठकर किसी जटिल मशीन या याँत्रिक क्रिया को संचालित करना हो तो उससे पूर्व झपकी लेना खतरनाक सिद्ध हो सकता है क्योंकि अर्धचेतना में यह एक गम्भीर दुर्घटना का कारण बन सकती है। अतः काम के समय यदि हम उनींदे महसूस कर रहे हों तो झपकी ले सकते हैं लेकिन इसके बाद 10-15 मिनट तक इंतजार कर “निद्रा जड़त्व” समाप्त होने पर कार्य शुरू कर सकते हैं।
दूसरा, झपकी गहन नींद की आवश्यकता को भी कम कर देती है। अतः अनिद्रा रोग से पीड़ित व्यक्तियों के लिए झपकी रात में सोने की समस्या को और जटिल कर सकती है।
इस तरह झपकी की त्रुटियों को भी ध्यान में रखते हुए हम अपनी सुविधानुसार झपकी लेकर नींद व थकान को पूरा कर सकते हैं और शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक स्फूर्ति के साथ जीवन को अधिक सफलता पूर्वक एवं सानन्द जी सकते हैं।
रामकृष्ण परमहंस से एक बार उनके एक परिचित ने पूछा, महाराज, आप अपनी पत्नी के साथ गृहस्थ जीवन क्यों नहीं बिताते?
प्रश्न सुनकर परमहंस कुछ पल चुप रहे, फिर मुस्कुराते हुए बोले कि तुमने कार्तिकेय का किस्सा सुना है? एक दिन बालक कार्तिकेय ने खेल खेल में एक बिल्ली को नोंच खरोंच दिया। घर आए, तो अपनी माँ का मुख देखकर हैरान रह गए। माँ के गालों पर नाखूनों की खरोंच के वैसे ही निशान पड़े थे। कार्तिकेय ने आश्चर्य से खरोंच के निशानों का कारण पूछा, तो माँ बोली, बेटा यह तेरा ही कार्य है। तूने ही तो अपने नाखूनों से मुझे नोंचा है।
मैंने नोंचा है? बालक कार्तिकेय का आश्चर्य और बढ़ा। अविश्वास के स्वर में बोला, मैंने तुमको कब नोंचा?
क्यों, भूल गया क्या? आज तूने बिल्ली को नोंचा खरोंचा नहीं था?
बिल्ली को तो जरूर नोंचा था........कार्तिकेय ने उसी स्वर में कहा, लेकिन तुम्हारे गालों पर निशान कैसे पड़ गए?
अरे बेटा, माँ बोली, मेरे सिवा इस संसार में और है ही कौन? सारा संसार मेरा ही स्वरूप है। यदि तू किसी को सताता है, तो मुझे ही तो सताता है।
कार्तिकेय से कुछ कहते न बना। निश्चय कर लिया उसने, मैं विवाह ही नहीं करूंगा। संसार की सब स्त्रियाँ जब मातृवत् हैं, तो विवाह करूं भी तो किसके साथ?
रामकृष्ण ने इतना कहकर कारण बताया, कार्तिकेय के समान मेरे लिए भी संसार की सारी स्त्रियाँ मेरी माँ के समान हैं। तुम्हीं बताओ, गृहस्थ जीवन किसके साथ बिताऊँ?
सूफी फकीर जुन्नैद एक बार पहाड़ों की ओर गए। उनके कुछ शिष्य साथ में थे। पहाड़ों पर छाए नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य ने सभी के मन को अनूठे उल्लास से संवेदित कर दिया। हरी घास के बीच सिर उठाए खड़े छोटे-बड़े पेड़ हवाओं के साथ बड़ी मस्ती में झूम रहे थे। साँझ के सूरज की रश्मियाँ पेड़ों की डालों और पत्तियों से कुछ इस तरह से गले मिल रही थी, जैसे वे उनसे चलते-चलते विदाई ले रही हों। समाँ अनोखा था। सभी शिष्य अपने सद्गुरु को घेरे खड़े थे। लेकिन फकीर जुन्नैद उन सभी से बेखबर किसी दूसरी ही दुनिया में खोए थे।
तभी शिष्यों में से किसी एक को खेल सूझा। उसने अपने मुख से कुत्ते के भौंकने की आवाज निकाली। अगले ही क्षण जैसे अचरज हुआ, पहाड़ में कुत्ते के भौंकने की असंख्य ध्वनियाँ उभरी। दरअसल यह पहाड़ों में गूँजने वाली प्रतिध्वनि थी। जो कुत्ते की आवाज निकालने की प्रतिक्रिया स्वरूप उभरी थी। यह खेल एक दूसरे शिष्य को भी अच्छा लगा। उसने अपने गले से कोयल की सुरीली आवाज निकाली। पहाड़ों में अनोखी रीति से कुहू-कुहू की मधुर ध्वनि गूँज उठी।
शिष्यों का यह खेल देखकर फकीर जुन्नैद मुस्करा उठे। क्षण भर रुककर वह कुछ सोचते हुए बोले- बच्चों, संसार की रीति भी यही है। उसकी ओर हम जो भी फेंकते हैं, हम पर वही किसी न किसी तरह से वापस लौट आता है। फूल-फूल ले आते हैं और काँटे सब ओर काँटे बिखरा देते हैं। प्रेमपूर्ण हृदय के लिए सारा जगत् प्रेम की वर्षा करने लगता है और घृणा से भरे व्यक्ति के लिए सब तरफ पीड़ादायी लपटें जलने लगती हैं।
जुन्नैद की बातों ने सभी शिष्यों के मनों को एक बारगी खींच लिया। खेल में लगी उनकी मानसिक वृत्तियाँ अपने सद्गुरु की बातों की ओर बरबस आकर्षित हो गयीं। सभी की सोच का रुख बदल गया। इतनी देर में प्रकृति भी अपना रुख बदलने लगी थी। साँझ के आकर्षण में बंधकर सूरज कहीं पश्चिम दिशा में छुप गया था। अब कहीं किसी तरफ उसके दर्शन नहीं हो रहे थे। स्वयं संध्या ने भी निशा के परिधान पहन लिए थे। सितारों और चाँद के सुयोग-संयोग से उसका सौंदर्य शतगुणित हो गया था। चाँद से बरसती चाँदनी ने सारे वातावरण में एक अलौकिक मोहकता भर दी थी।
इस परिवर्तित वातावरण में भी शिष्यगण अपने सद्गुरु को घेर कर बैठ गए। सभी के मुख पर जिज्ञासा की सघन आभा झलक रही थी। फकीर जुन्नैद भी अपने शिष्यों की भावदशा से वाकिफ थे। आखिर शास्त्रवचन एवं सत्पुरुष भी तो सद्गुरु को इसी रूप में पहचानने पर बल देते हैं। उनका कहना है कि सद्गुरु वही है जो शिष्यों की अंतर्दशा पहचाने। उनकी मनोभूमि को उर्वर बनाकर उसमें ज्ञान के बीज बोए। इन बीजों के अंकुरण के उचित व्यवस्था जुटाए। उन्हें अपने तप-साधना का खाद-पानी दे।
इसी उद्देश्य से जुन्नैद उन्हें एक बोध कथा सुनाने लगे। सभी शिष्य अपने सद्गुरु के वचनों को सुनने के लिए उत्सुक थे। जुन्नैद उनसे कह रहे थे। एक बार एक छोटा लड़का पहली दफा अपने गाँव के पास वाले जंगल में गया। वह एकान्त से काफी ज्यादा भयभीत हो रहा था। जंगल में उभरने वाली आहटें और आवाजें उसे बार-बार चौंका देती थी। अभी उसने कुछ ही कदम आगे बढ़ाए थे कि उसे झाड़ियों में कुछ सरसराहट जैसी आवाज सुनायी पड़ी। उसने सोचा जरूर कोई व्यक्ति मेरा पीछा कर रहा है। अपनी इस आशंका से भयभीत होकर वह जोर से चिल्लाया- कौन है? उसकी आवाज जंगल के पास वाली पहाड़ियों से टकराई और चारों ओर जोरदार प्रतिध्वनि गूँज उठी- कौन है?
अब तो उसे वहाँ पर किसी के छिपे होने का पूरा-पूरा यकीन हो गया। डरा हुआ तो वह पहले से ही था। अब तो उसके हाथ-पाँव काँपने लगे। दिल की धड़कने भी एक बारगी बढ़ गयीं। लेकिन अपने को हिम्मत देने के लिए उसने अपनी कल्पनाओं के अनुसार छिपे हुए आदमी से कहा- डरपोक कहीं का। जवाब में प्रतिध्वनि हुई- डरपोक कहीं का। इस प्रतिध्वनि को सुनकर वह कुछ ज्यादा ही डर गया। फिर भी उसने आखिरी बार हिम्मत करके शक्ति जुटाई और चिल्लाया- मैं तुम्हें मार डालूँगा। उत्तर में पहाड़ और जंगल भी जोरों से चिल्लाए- मैं तुम्हें मार डालूँगा।
अब तो उसकी रही-सही हिम्मत भी जवाब दे गयी। वह लड़का उलटे पाँव सिर पर पैर रखकर अपने घर की ओर भागा। उसके खुद के पैरों की प्रतिध्वनि उसे ऐसी लगती थी जैसे वह आदमी उसका पीछा कर रहा है। लेकिन अब उसमें न तो पीछे मुड़ कर देखने का साहस था और न ही लौटने की थोड़ी सी भी हिम्मत बाकी बची थी। भागते-भागते वह जैसे-तैसे अपने घर पर पहुँचा और हाँफता-हाँफता घर के दरवाजे पर गिरकर बेहोश हो गया। उसकी माँ ने उसके सिर को अपनी गोद में रखा। उसके मुँह पर पानी के छींटे डाले और आँचल से हवा की। जैसे-तैसे उसको होश आया।
होश में आने पर उसने सारी बातें अपनी माँ को बतायीं। सारा किस्सा सुनकर माँ बहुत जोरों से हँसी और बोली- अरे बस इतनी सी बात। इसमें इतना डरते क्यों हो? कल तुम फिर से वहीं जाना और जो मैं बताऊँ, वह तुम उस रहस्यमय व्यक्ति से कहना। मैं तो उससे भली-भाँति परिचित हूँ। वह तो बहुत ही भला और प्यारा आदमी है। माँ की बात मानकर वह लड़का फिर से उसी जंगल गया। अबकी बार उसने जाकर कहा- मेरे प्यारे मित्र! जवाब में प्रतिध्वनि हुई- मेरे प्यारे मित्र। इस मैत्री पूर्ण ध्वनि ने उसे आश्वस्त किया। उसकी हिम्मत और शक्ति बढ़ गयी। अबकी बार उसने कहा- मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। उत्तर में पहाड़ों, जंगलों ने, सभी ने उसी मिठास के साथ दुहराया- मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ।
इस कथा को सुनाते हुए जुन्नैद ने अपने शिष्यों से कहा- यह प्रतिध्वनि की कथा ही तो अपने जीवन की कथा है। अरे हम सभी भी इस संसार रूपी जंगल में उस छोटे से लड़के की तरह अजनबी हैं। जो अपनी ही प्रतिध्वनियों को सुन-सुनकर भयभीत होते रहते हैं। हमारी अपनी वास्तविक स्थिति यही है।
यह कहते हुए जुन्नैद थोड़ा गम्भीर हुए और शिष्यों की ओर देखते हुए बोले- मेरे बच्चों, यह याद रखना कि मैं मार डालूँगा, यह प्रतिध्वनि है तो मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ यह भी प्रतिध्वनि है। पहली प्रतिध्वनि से छूटकर दूसरी प्रतिध्वनि से आसक्त हो जाना बचपने से छुटकारा नहीं है। ज्यादातर लोग पहली प्रतिध्वनि से घबराते हैं- तो दूसरी प्रतिध्वनि की आसक्ति से उलझकर मोहग्रस्त हो जाते हैं। हालाँकि बुनियादी तौर पर इन दोनों में कोई फर्क नहीं है। बचकानापन दोनों में ही है। जो ज्ञानी है- वह दोनों के भ्रमों से मुक्त होकर जीते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि जिन्दगी की सच्चाई प्रतिध्वनि में नहीं, बल्कि स्वयं अपने आप में अन्तर्निहित है।
महान ईसाई धर्मशास्त्री संत थामस एक्विनास ने विद्वान मित्र फादर रेजिनाल्ड के सहयोग से एक पाँडित्यपूर्ण शास्त्र लिखने का निर्णय लिया, परंतु शाम को सलीब के सामने प्रार्थना करने बैठे, तो भाव समाधि में ऐसे डूबे कि आंखों से अश्रुधारा बह निकली। घंटों मुग्धभाव से बैठे रहे। इसी बीच उनके विचारों में न जाने ऐसे परिवर्तन हुआ कि शास्त्र लिखने का निर्णय ही बदल दिया।
रात को फादर आए और उन्होंने धर्मशास्त्र लिखने की चर्चा छेड़ी, तो संत थामस का उद्रेक फूट पड़ा, शास्त्र अब कभी न लिखा जा सकेगा। आज प्रभु कृपा से सलीब ने मुझे यह अंतर्ज्ञान दिया है कि समग्र विश्व का कल्याण करना, उसकी आस्थाएँ एवं श्रद्धा विश्वास जगाना ही धर्म का सार है। पाँडित्यपूर्ण शास्त्र का ज्ञान तो अहंकार ही उत्पन्न करता है, जो मानव की प्रत्येक प्रकार की प्रगति में अवरोध उत्पन्न करता है।
जड़-चेतन के मिलन से बने इस विश्व में गुण दोष दोनों ही हैं। कहीं देवत्व है, कहीं असुरता। देवत्व का पोषण, अभिवर्धन और सम्मान किया जाना चाहिए, साथ ही असुरता की दुरभिसन्धियों, कुटिल-नीतियों से तथा होने वाले आक्रमण से अपना बचाव भी करना चाहिए।
देवत्व से भरे पूरे सज्जन पुरुष अपने आदर्श और व्यवहार पर स्थिर रहते हैं। सज्जनता की रीति-नीति से कभी विलग नहीं होते हैं। उनमें पारस्परिक टकराहट भी नहीं होती। यदि कोई स्वयं उनसे टकरा भी जाय तो टूटते नहीं। अपनी दिव्य सत्ता को अक्षुण्ण रखते हैं। किसी भी अनात्म तत्त्व के समक्ष उनका आत्मसमर्पण नहीं होता।
आसुरी प्रवृत्ति से ग्रसित दुर्जनों की रीति इससे बिलकुल विरोधी स्थिति होती है। ये सदा ही दूसरों से टकराने के लिए उतावले रहते हैं। इस टकराहट में दूसरों को कोई हानि भले ही न हो, पर टकराते-टकराते स्वयं तो नष्ट हो ही जाते हैं।
यह देवत्व और असुरत्व मात्र मनुष्यों तक ही सीमित हो- ऐसा नहीं है। विश्व ब्रह्मांड के कण-कण में यह व्याप्त है। दैवी गुण प्रधान सज्जन पुरुषों की तरह परमाणु की मूलसत्ता होती है। यह अपनी विशेषताओं को नष्ट नहीं होने देती।
ये परमाणु सृजन के काम में जुटे रहते हैं। वे एकत्रित होते-जुड़ते और हिल-मिलकर रहते हैं। उनकी संगठन और सृजन की भावना ही विभिन्न पदार्थों का निर्माण करती है। नींव के पत्थरों की तरह अदृश्य और अविदित रहकर वे सृजन के कार्य में अथक रूप से जुटे हैं। इस समूचे विश्व में जो कुछ भी सौंदर्य, सुषमा गोचर होती है। वह इन्हीं छोटे-छोटे परमाणुओं के परमार्थिक क्रिया-कलाप का ही सुखद परिणाम है।
ये नन्हें-नन्हें परमाणु एकाकी नहीं हैं। इनके भीतर और भी छोटा परिवार है। इसमें अच्छे-बुरे दोनों तत्त्वों का निर्वाह होता है। इसमें निहित इलेक्ट्रान-प्रोटान में पृथकतावादी नीति नहीं होती। इनकी परस्पर टक्कर टकराहट नहीं होती। इसे तो आपस में गले मिलने, अभिन्नता स्थापित करने की संज्ञा दी जा सकती है। इसके परिणाम स्वरूप वे परस्पर मिलकर अन्तःक्रिया द्वारा नवीन क्रिया में परिवर्तित हो जाते हैं।
परमाणु विद्या विशारदों ने इस परिवार के अब तक लगभग बीस सदस्य खोजे हैं, इलेक्ट्रान, प्रोटान के अतिरिक्त न्यूट्रॉन, पॉजीट्रान, मेसान, न्यूमेसान, पाई मेसान, के मेसान, हाइपरान, ड्यूट्रान, न्यूट्रिनो जैसे इन कणों से सारा विश्व विनिर्मित हुआ है। इन्हें विश्व भवन की ईंटें कहा जा सकता है।
इसी दैवी परमाणु चेतना में एक विरोधी असुर तत्त्व भी मौजूद है। समय-समय पर यही गिरगिट की तरह नाना प्रकार के रंग बदलता है। टूटता फूटता है और विग्रह विद्वेष उत्पन्न करता है। कुचक्रों का यही शिकार होता है और अन्ततः विनाश और दुर्गति भी इसी की होती है। इस संसार में मात्र देवत्त्व ही नहीं असुरत्व भी है। सम्भवतः इसी का परिचय देने के लिए यह प्रतिकण विद्यमान है।
परमाणु के प्रत्येक मूलकण के साथ एक प्रतिकण मौजूद रहता है। जैसे- इलेक्ट्रान का प्रतिकण पॉजीट्रान, प्रोटान का एण्टीप्रोटान, न्यूट्रॉन का एण्टी न्यूट्रॉन, न्यूट्रिनो का एण्टी न्यूट्रिनो है। यह सभी प्रतिकण अल्पजीवी होते हैं। ये जब अपने समान सामान्य कण से टकराते हैं तो दोनों एक दूसरे से भिड़ जाते हैं और भयंकर विस्फोट उत्पन्न होता है। इसी से विकिरण उत्पन्न होता है और भयानक ऊर्जा फैलती है।
ये विरोधी कण आते कहाँ से हैं? क्यों अवरोध उत्पन्न करते हैं? कुछ समझ में नहीं आता। विज्ञानवेत्ताओं का अनुमान है कि इस ब्रह्मांड में शायद कोई अन्य विश्व ऐसा है, जिसे सर्वथा विपरीत प्रतिविश्व कहा जा सके। उसकी संरचना इन विपरीत प्रकृति के प्रतिकणों से हुई होगी। वहाँ सब कुछ यहाँ से उलटा ही होगा। इस लोक में सारा पदार्थ एण्टी मैटर होगा। वहाँ के नाभिक- एण्टी प्रोट्रॉन और एण्टी न्यूट्रॉन के बने होंगे। उन प्रतिनाभिकों के इर्द-गिर्द इलेक्ट्रान के स्थान पर पॉजीट्रान भ्रमण करते हैं। वहीं से यह प्रतिकणों का प्रवाह धरती पर आता होगा और यह कि अणु रचना के साथ उसका सम्मिश्रण यह परस्पर विरोधी स्थिति उत्पन्न करता होगा। यह प्रतिविश्व कहाँ है? यह तो अभी तक नहीं ढूंढ़ा जा सका। पर उसका अस्तित्त्व एक प्रकार से तो मान लिया गया है।
इस तरह यह स्पष्ट हो जाता है कि कण-कण में परस्पर विरोधी तत्त्व विद्यमान हैं। कुछ गुणमय हैं। कुछ दोषमय। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी को जड़ चेतन गुण दोष मय, विश्व कीन्ह करतार। सन्त हंस गुण गहहि पय परिहरिवारि विकार॥ इस गुणदोषमय विश्व में किसे स्वीकारें, किसे छोड़ें? कौन उपयोगी है, कौन निरुपयोगी। इसका निर्धारण बाह्य कलेवर, उसकी चमक-दमक से होना असम्भव है। इसके लिए नीर-क्षीर को पृथक करने में समर्थ विवेक की आवश्यकता है।
यह विवेक परमात्मा ने मनुष्य को विरासत में सौंपा है। जिसके द्वारा वह अपनी विकासयात्रा सुगमता से पूरी कर सकता है। इसका अंजन लगाने से वह दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है- जिससे यात्रापथ के अवरोध समझ में आ जाते हैं। सम्भव है यह अवरोध आकार प्रकार की दृष्टि से लुभावने दिखे, पर यथार्थ में होते अवरोध ही हैं। इनसे बचना ही उत्तम है। अन्यथा मंजिल पा सकना दुष्कर ही नहीं असम्भव भी होगा। इनको त्याज्य मान त्याग करने में ही कल्याण है।
परमात्मा ने गुण-दोषमय विश्व की इस प्रकार की अद्भुत संरचना सम्भवतः मनुष्य के विवेक परीक्षण के लिए ही की है। सामान्यतया देखा यही जाता है कि हम इस परीक्षण में अनुत्तीर्ण घोषित हो जाते हैं। कारण कि विवेक की जगह चालाकी, धूर्तता अपनाने लगते हैं। परिणाम स्वरूप गुण दोषों का विवेचन तो बन नहीं पड़ता। गुणों की जगह दोष ही संग्रहित करते जाते हैं। हमारी स्थिति दुर्योधन की तरह बन पड़ती है। जो युधिष्ठिर की राजसभा में जल के स्थान थल और थल के स्थान पर जल के विभ्रम में आकर जगह-जगह ठोकर खाता और गिरता फिरा। उसकी जग हँसाई भी खूब हुई। इसमें उसने अपनी गलती तो स्वीकार नहीं की उल्टे तथ्य समझाने पर महाभारत रचा डाली।
इसी तरह हम भी संसार की चकाचौंध के सम्मोहन जाल में फँसकर, गुण-दोषों का विभेद करने में समर्थ न हो पाते हैं। इस तरह लगातार दोषों को ही इकट्ठा करते रहने के कारण- व्यक्तित्व भी असुरता से भरने लगता है। परिणाम यही होता है संसार हमारे ऊपर हँसता है। यदि कोई इस औचित्य अनौचित्य का भेद समझाने आता है, तो उसकी विवेक युक्त बातों को सम्मोहित-विभ्रमित बुद्धि स्वीकारती नहीं, उल्टे- क्रोधित हो, लड़ाई-झगड़ा करने हेतु प्रेरित करती है।
जहाँ प्रगति के सोपानों पर चढ़ते हुए उत्कर्ष की चोटी पर जा पहुँचना चाहिए था। वही अपने स्थान से भी लुढ़कते हुए अवगति के गर्त में गिरते जाते हैं।
ऐसी स्थिति आने ही क्यों दें? परमात्मा की दी अमूल्य मणि विवेक के प्रकाश का प्रयोग कर बाह्य जगत् की यथार्थता ही नहीं अपने अन्तराल की यथार्थता को पहचाने। संसार में जहाँ भी प्रगति के लिए उपयोगी और आवश्यक है, उसी को ग्रहण करे। संत कबीर के शब्दों में- सार-सार को गहि रहैं थोथा देहि उड़ाय की नीति अपनाने में ही कल्याण है।
बुद्धि को विवेकयुक्त बनाएँ तभी नीतिकार की उक्ति- यत् सारभूतं तदुपासितव्यं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमिक्षं का भली भाँति पालन कर सकना सम्भव बन पड़ेगा। ऐसा बन पड़ने से असुर सत्ता सम्पन्न दुनिया, जो बाहर भी है, और भीतर भी, की सारी कोशिशें नाकामयाब हो जाएगी। फिर तो दोषपूर्ण असुरता स्पर्श भी न कर पाएगी। प्रगति का पथ-प्रशस्त हो जाएगा। यात्रा सुगम और सहज बन पड़ेगी। इस सुगमता और सहजता के लिए हर किसी को विवेक का इस्तेमाल करने की हंस जैसी रीति-नीति अपनानी चाहिए। इसी में कुशलता और सार्थकता है।
अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी से दूर कुछ दिन कहीं प्रवास पर जाकर सुकून के दिन बिताना किसे अच्छा नहीं लगता? बदलाव की यह नैसर्गिक आकाँक्षा सिर्फ इंसानों में ही नहीं अपितु पक्षियों में भी पायी जाती है। तेज बारिश एवं कड़ी धूप में भी हजारों मील का सफर तय करके पक्षी अपने पर्यटन की आकाँक्षा पूरी करते हैं।
भारत में शरद ऋतु के प्रारम्भ होने के साथ ही प्रवासी विदेशी पक्षियों का आना शुरू हो जाता है। भारत के विभिन्न अभ्यारण्यों के जल-थल एवं नभ पर विविध गुंजन, कूक-कलरव क्रीडारत ये पक्षी चित्ताकर्षक महाकुम्भ का दृश्य उपस्थित करते हैं। ये पक्षी कुछ समय के प्रवास के लिए 15-20 हजार फीट ऊँची बर्फीली चोटियों को पार कर टील्स, गीज, पोचाड़, केन्स, पेलिकन्स आदि मध्य एशिया एवं उत्तरी यूरोप से भारत के आँतरिक क्षेत्रों में आते हैं। पंजाब से केरल तथा गुजरात से असम तक ये पक्षी अपने अनुकूल स्थानों को प्रवास के लिए चुन लेते हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान के भरतपुर क्षेत्र के घाना पक्षी अभ्यारण्य व केवला देव राष्ट्रीय उद्यान तथा मध्यप्रदेश के शिवपुरी क्षेत्र की दिहाला झील और बखखेड़ा तालाब में प्रतिवर्ष सौ प्रकार की जातियों से भी अधिक के पक्षी प्रवास हेतु एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।
काफी समय से वैज्ञानिक यह जानने का प्रयत्न कर रहे हैं कि ये पर्यटक पक्षी किन कारणों से इतनी लम्बी यात्राएँ करते हैं? इनका मार्ग निर्देशन कौन करता है? कौन इन्हें उपयुक्त समय की सूचना देता है? किस प्रयोजन से बच्चे,बूढ़े-जवान पक्षी अपनी मञ्जिल की ओर द्रुतगति से चले जाते हैं। पक्षी विशेषज्ञों ने इस पर्यटन के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए निरंतर अनेक प्रयोग किये,किन्तु इस संबंध में बहुत सी बातें अभी भी अबूझ हैं।
इसके लिए एक तरीका अपनाया गया है जो लाभदायक सिद्ध हुआ है और वह है इन पर्यटक पक्षियों के पैरों में धातु के बने छल्ले पहना देना। छल्ले पर, छल्ला पहनाने वाले का नाम, पता व छोटा सा अनुरोध लिखा रहता है कि यदि कोई इस पक्षी का शिकार करे या कैद करे तो इस छल्ले पर लिखे पते पर शिकार के स्थान का उल्लेख करते हुए वापस कर दे। यह विधि लगभग 65 वर्षों से सफल रूप से प्रयोग में लायी जा रही है। इससे यह पता चलता है कि पर्यटक पक्षी 2000 मील तक की यात्रा करते हैं। कई खंजन पक्षी जो सिर्फ शरद ऋतु में ही उत्तर भारत में दिखाई देते हैं, सुदूर साइबेरिया में मारे गये। उनके पैर के छल्लों को देखने से यह मालूम हुआ कि वे छल्ले उन्हें जाड़े के दिनों में सिंधु तीरे पर भारत में पहनाये गये थे। यह भी पता चला है कि कुछ पक्षी 27000 मील तक सफर करते हैं।
इंग्लैंड में पक्षियों की एक ऐसी जाति है जिसमें वयस्क और बूढ़े पक्षी पहले उड़कर चले जाते हैं और बच्चे को अपने पीछे आने का आदेश दे जाते हैं। यह बच्चे बिना किसी अनुभव के लंबे अनजान रास्तों को तय करते हैं और परिवार के वयस्कों के पास ठीक जगह पर जा पहुँचते हैं। किस प्रकार यह अपना मार्ग सही-सही तय कर लेते हैं, यह जानकारी अभी पूरी तरह नहीं मिल पाई है। सैलानी पक्षी समूह में तथा एकाकी प्रतिवर्ष हजारों-लाखों की संख्या में एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की यात्रा करते हैं। हिमालय की ऊंचाइयां एवं प्रशाँत महासागर की गहराइयाँ भी इनके मार्ग की बाधाएँ नहीं बन पातीं। ये पक्षी वर्ष की किसी ऋतु विशेष में देखने को मिलते हैं,ऋतु समाप्त होते ही अदृश्य हो जाते हैं और दूसरे वर्ष उसी ऋतु के आरम्भ होते ही पुनः आ जाते हैं।
छोटी-छोटी चिड़ियाँ जैसे गौरैया आदि फसल तैयार होने का समय आते ही किसी अज्ञात प्रेरणा शक्ति द्वारा शहरी इलाकों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों की ओर उड़ जाती हैं। ऐसा ये इसलिए करती हैं ताकि उन्हें खेत में गिरे दाने अथवा फसल चुगने का अवसर मिले, फसल कट जाने के बाद जब खेत अन्न कणों से रिक्त हो जाते हैं तब वे पुनः वापस लौट जाती हैं। भारत के प्रमुख पर्यटक पक्षियों में खंजन, राजहँस, चक्रवाक और कररी हैं। हंसों का सबसे प्रिय निवास स्थान मानसरोवर है।
छल्ले पहचानने के अतिरिक्त कुछ और परीक्षण भी इस विषय की विस्तृत जानकारी हासिल करने के लिए किये गये हैं। इनमें से एक है बर्डकास्ट नामक एक कार्यक्रम द्वारा राडारों से पक्षियों के प्रवास की पूरी जानकारी एकत्र करना। एक अन्य तकनीक बायोएकास्टिक यह बता पायेगी कि आसमान में उड़ने वाले पक्षी कौन सी प्रजाति के हैं। बर्डकास्ट प्रोग्राम के तहत पक्षियों की छवियां जब प्रसारित की गई तो मेरीलैंड के दर्शक स्लाइड शो देखने के पश्चात काफी प्रभावित हुये। प्रवास का दृश्य सूर्यास्त में दिखने वाले पक्षियों के झुण्ड से अलग होता है। साथ ही बड़ा भी। ये सिर्फ एक छोटा झुँड न होकर सैकड़ों-हजारों पक्षियों का होता है। पक्षी विज्ञानी की इस राडार प्रोग्राम बर्डकास्ट के द्वारा पक्षी प्रवास की ऑनलाइन फोरकास्ट किया जाता है। यह मध्य एटलाँटिक पक्षियों के बारे में अनुमान प्रसारित करता है जो कि गोधूलि बेला से मध्यरात्रि के दौरान होता है। यह वह समय है जब पक्षियों का प्रवास अपने चरम पर होता है।
बर्डकास्ट वेबसाइट पक्षियों की राडार छवियां उपलब्ध कराती है। यह छवियां राडार स्टेशनों से डाउनलोड की जाती हैं, जिससे कि नेशनल वेदर सर्विस द्वारा पहले दिन की भविष्यवाणी की सत्यता का मिलान किया जा सकता है। इस पूरे प्रोग्राम के बारे में इस प्रोजेक्ट के मुख्य सिडनी ए.गोथरॉक्स का कहना है कि “हमारी भविष्य वाणियाँ विस्मयकारी रूप में सही साबित हो रही हैं। ये भी सही है कि इन भविष्यवाणियों का आधार जलवायु पूर्वानुमान रहता है। मौसम पक्षी-प्रवास में एक बड़ा फैक्टर है।”
गोथरॉक्स कहते हैं कि यदि वाकई प्रवास हेतु स्थितियाँ अच्छी हैं और एक पक्षी के पास उड़ने के लिए बहुत कम ऊर्जा शक्ति है तो भी वह दो सौ मील तेज हवा के बहाव के साथ चला जाता है। हवा के बहाव के साथ तापमान आर्द्रता और बेरोमीट्रिक दबाव भी अन्य कारक हैं। आर्द्रता बढ़ने और प्रेशर के कम होने पर पक्षी ठण्ड में उत्तर की ओर प्रेरित होते हैं। ठीक इसके विपरीत तापमान और आर्द्रता घटने तथा बैरोमीट्रिक दबाव के बढ़ने से दक्षिण की ओर लौटते हैं। प्रवास करने वाले पक्षी तूफान और हवा के विपरीत दिशा में उड़ान को टालते हैं।
अंततः ऐसा कहा जा सकता है कि पक्षियों की लंबी-लंबी यात्राओं की कोई सीमा नहीं होती। ये पक्षी अपनी इन दीर्घकालीन यात्राओं को तैरकर, उड़कर, दौड़कर तथा साधारण गति से चलकर सभी तरह से सफल बनाते हैं। निःसंदेह सब प्राणियों पर समान रूप से अपनी कृपा-दृष्टि रखने वाले परम पिता परमात्मा ने अवश्य ही पक्षियों को कोई ऐसी शक्ति प्रदान की है जो उनके प्रवास की नैसर्गिक आकाँक्षा की पूर्ति में उनका मार्ग-निर्देशन करती हैं।
एक बार की बात है। वाँग ली नाम का एक योद्धा संत कन्फ्यूशियस के पास गया और बोला, स्वर्ग और नरक की परिभाषा बताइए।
संत ने कहा, तुम अभी कहाँ हो? भिखारी जैसे लगते हो। इस पर वाँग ली आग बबूला हो गया और म्यान से तलवार निकाल ली। कन्फ्यूशियस ने कहा, यह तलवार नकली है, मेरी गरदन नहीं काट सकती।
वाँग ली कुछ देर शाँत रहा और विचार करके तलवार म्यान में डाल ली।
कन्फ्यूशियस ने कहा, देख लिया न। जब तुम आग बबूला होकर तलवार चमका रहे थे, तब नरक में थे और जब सूझ-बूझ से काम लेकर तलवार म्यान में डाल ली, तब तुम स्वर्ग में पहुँच गए।
हवाओं में काफी मात्रा में ठंड घुल चुकी थी। भगवान सूर्यदेव द्वारा उदारतापूर्वक दी गई मखमली धूप वाली चादर के बावजूद यदा कदा ठंड का तीखा अहसास देह और मन को बींध देता था। हालाँकि ठंड के इस अहसास के बाद भी वर्ष 1989 के दिसंबर महीने के ये शुरुआती दिन बड़े ही सुखद, आश्चर्यजनक एवं आनंदपूर्ण थे, क्योंकि इन दिनों आनंद के सघन घन परमपूज्य गुरुदेव की गोष्ठियों में प्रतिदिन नियमित निरंतर बरस रहे थे। गुरुदेव की ये गोष्ठियाँ हर रोज होती थी और इनमें भागीदार होने वालो के तन मन अंतःकरण आनंद की फुहारों से भीग जाते थे। यह जीवन का ऐसा अनुभूत सत्य है, जिसकी कथा अनुभूति के स्तर पर ही कही, सुनी, जानी और समझी जा सकती है।
गुरुदेव की गोष्ठियों में इंद्रधनुषी रंगों की छटा छाई रहती थी। बड़ा ही अद्भुत होता था इन रंगों का रंजन, समंजन और सामंजस्य का वैविध्य। कभी मुक्त हास्य, कभी मृदु मधुर मुस्कान कभी नीरव गाँभीर्य की चुप्पी, कभी अग्नि स्फुल्लिंगों सी उनके वचनों की दाहक ऊष्मा तो कभी किसी रहस्यमय अलौकिक लोक से अवतरित होती उनकी शब्द चेतना। कुल मिलाकर उनकी गोष्ठियों की ये कथाएँ इतनी अकथ हैं कि कथाओं के कुछ अंशों को ही कहा और सुना जा सकता है, वह भी अनुभूति रस में अपने मन प्राणों को डुबाकर। जिस दिन की अमृत कथा हम आपको सुना रहे हैं, वह दिन बड़ा ही सौभाग्यशाली था। परमपूज्य गुरुदेव साधनामय जीवन के कुछ रहस्यमय सूत्र बता रहे थे।
अपनी बातों के प्रसंग में साधना का यह नया प्रसंग जोड़ते हुए बोले, पहली बात तो तुम लोग यह जान लो कि साधना कुछ धार्मिक पुस्तकों के पढ़ने का नाम नहीं है। यह करने का नाम है। किताबों में तरह तरह की मिठाइयों के लिखे हुए नाम और उनके भाँति भाँति के चित्र पढ़ने देखने से किसी भी मिठाई का कोई स्वाद नहीं मिलता। उसके लिए हलवाई की दुकान पर जाना पड़ता है, जेब के पैसे खरच करने पड़ते हैं, तब कही मिठाई मिलती है और उसे खाकर स्वाद का आनंद मिलता है। ठीक यही बात साधना के बारे में हैं। केवल गायत्री महाविज्ञान पढ़ने से, अखण्ड ज्योति के पन्ने उलट लेने से कुछ खास होने वाला नहीं है। गायत्री महाविज्ञान में जो लिखा है, उसे भावभरी श्रद्धा एवं दृढं संकल्प के साथ लंबे समय तक करके देखो, तुम्हारी पूरी जिंदगी बदल जाएगी। यह कहते हुए वह धीरे से बोले, गायत्री महाविज्ञान में ऐसा एक अक्षर भी नहीं है, जो मेरी अनुभूतियों से न गुजरा हो। उसमें लिखी हुई कोई बात हो, चाहे चौबीस हजार के लघु अनुष्ठान के बारे में हो, उसमें लिखे हुए सारे अनुशासनों को मानते हुए ये अनुष्ठान लंबे समय तक करते जाओ, फिर देखो कैसे बदलाव नहीं आता है।
गुरुदेव के ये शब्द सुनने वालों के हृदयों को सीधे बेधते हुए अस्तित्व की गहराइयों में प्रवेश की तीव्र हलचल मचा रहे थे। तभी एक प्रश्न ने बातों की दिशा को एक नया मोड़ दिया। प्रश्न था साधना में वातावरण का बहुत महत्व बताया जाता है? इस सवाल को सुनकर गुरुदेव किंचित गंभीर हो गए। वातावरण में कुछ मिनटों तक एक रहस्यमय चुप्पी छाई रही। प्रखर आध्यात्मिक तेज से परिपूर्ण गुरुदेव के नेत्रों का प्रकाश वहाँ उपस्थित जनों पर समान रूप से बिखरता रहा। मनों में समवेत ऊहापोह थी कि अब वे क्या कहेंगे? अब कौन सा रहस्य अनावृत होगा?
सभी के चिंतन की इन कड़ियों को उनके शब्दों ने एक आँतरिक झंकार के साथ बिखरा दिया। वह बोल रहे थे, बेटा, वातावरण का महत्व असाधारण और अद्भुत है, परंतु इसे ग्रहण करने के लिए इसे धारण करने के लिए भी योग्यता चाहिए। अब देखो, साधना के लिए सबसे अच्छा वातावरण हिमालय का माना जाता है, पर हिमालय जाने वाले, वहाँ रहने वाले सभी उसका लाभ कहाँ उठा पाते हैं? मैं जब हिमालय गया तो वहाँ देखा, दो साधु वेशधारी थोड़ी सी जमीन के लिए झगड़ा कर रहे हैं। यहाँ तक कि नौबत सिर फुटब्बल की आ गई। एक तरफ हिमालय में ऐसे लोभी लालची, द्वेष दुर्भाव से ग्रस्त लोग, दूसरी ओर उच्च साधनासंपन्न ऋषि और महायोगी भी हैं, जिन्होंने हिमालय के वातावरण में अपने को पूरी तरह से डुबा दिया है।
यह कहते हुए उन्होंने अद्भुत रहस्य उद्घाटित किया। वे बोले, बेटा, मैंने तुम लोगों को साधना का वातावरण प्रदान करने के लिए शाँतिकुँज बनाया है। यह अद्भुत, संस्कारवान स्थान है। यहाँ हिमालय का स्थूल रूप तो नहीं है, पर तुम लोग साधना की गहराई में उतर सको तो देख पाओगे कि मैंने यहाँ हिमालय की समूची चेतना को उतार दिया है। यहाँ पर साधना करने वालों को शीघ्र, अद्भुत एवं चमत्कारी परिणाम मिलें, इसके लिए मैंने और माताजी ने अपने जीवन भर की तपस्या लगा दी है। यही नहीं हिमालय में रहने वाले ऋषि, मुनि एवं महायोगी भी यहाँ अपनी छाया रखते हैं। शाँतिकुँज समूची धरती पर ऐसा विरल दिव्य धाम है, जो बसा तो इसी धरती पर है, पर जिसकी चेतना पूरी तरह अलौकिक हैं।
इन शब्दों को कहते हुए उनमें एक विचित्र भाव परिवर्तन झलका। एक पल को वहाँ सन्नाटा पसर गया। वह थोड़ा खिन्न मन से बोले, मैंने थाली परोसकर रख दी है, पर तुम लोग खा भी नहीं सकते। यहाँ रहने वालों को देखकर मुझे तरस आता है। आ तो गए हैं, पर साधना करने की लगन ही है। घर से यह कहकर आए थे कि गुरुजी का काम करेंगे और साधना करेंगे। माँ-बाप को रुलाया, रिश्ते नातेदारों को दुखी किया, पर यहाँ आकर इंचार्ज बनने के फेर में पड़ गए। जो कुँवारे हैं, वह शादी के लिए परेशान हैं। जिनकी शादी हो गई, उन्हें बच्चा चाहिए। जिनके एक बच्चा है, तो उन्हें एक की बजाय दो चाहिए। कार्यकर्ता, स्वयंसेवक बनने में शान नहीं महसूस करते, इंचार्ज बनना चाहते हैं। मैनेजर बनने के लिए परेशान हैं।
इन शब्दों में गुरुदेव की गहरी पीड़ा, सघन करुणा झलक रही थी। इन शब्दों में अपने बच्चों के लिए उनकी टीस और दर्द था। बिना किसी विराम के वह कह रहे थे, वातावरण का लाभ लेने के लिए उसमें अपने मन को डुबाना पड़ता है। दुनिया की चिंता छोड़कर अपने भाव उसमें भिगोने पड़ते हैं। वातावरण के प्रवाह में अपने प्राणों को प्रवाहित करना पड़ता है। ऐसा करो, फिर बताओ कि शांतिकुंज का वातावरण चमत्कारी है या नहीं। तुम लोगों के पास काम ज्यादा हो, लगातार अनुष्ठान न कर सको, तो कम से कम चौबीस घंटे सोते-जागते यही सोचो कि शाँतिकुँज में चारों ओर गुरुजी का तप प्राण बिखरा पड़ा है और हम उसे अपने रोम-रो से, साँस-साँस से ग्रहण धारण कर रहे हैं। गुरुजी की तपस्या हमारे आँतरिक जीवन को दिव्य और बाहरी जीवन को नैतिक व निर्मल बना रही है, इस भाव में दो साल जीकर देखो, फिर देखो इसके चमत्कार।
अरे बेटा, शाँतिकुँज साधारण जगह नहीं है। यह शिव की काशी हैं। जहाँ माता जी के रूप में स्वयं माता अन्नपूर्णा रहती है। स्वयं हम रहते हैं। हम दोनों की देह रहे या न रहे, पर हम दोनों यहाँ सदा सर्वदा रहेंगे। हम दोनों अपने इस दिव्य धाम को कभी किसी भी हाल में छोड़ने वाले नहीं हैं। शांतिकुंज तो महाकाल का घोंसला है। यहाँ महाकाल स्वयं रहते हैं। सृष्टि की अनंत दैवी एवं दिव्य शक्तियाँ यहाँ हमेशा क्रियाशील रहती है। जो साधना करेगा, वही इस रहस्य को जान पाएगा। यहाँ छोटी सी भी तप साधना बड़े भारी परिणाम देगी। करके तो देखो, मन को मथने वाली गुरुदेव की इन बातों ने अंतःकरण में हलचल मचा दी। इतने वर्षों के बाद भी उस हलचल के स्पंदन अभी भी महसूस हो रहे हैं। यदि ऐसा ही कुछ आपको भी महसूस हो रहा है, तो परमपूज्य गुरुदेव की आज्ञा को शिरोधार्य करके सत शिष्य के कर्तव्य निर्वहन में जुट जाइए। महासिद्ध के शिष्यों को साधक तो होना ही चाहिए। इसी में हमारी शान हैं।
फागुन का उल्लास प्रकृति के कण-कण में थिरक रहा था। रसाल के बौर की सुगन्ध, नवकिसलयों की चमक, कोयल का मधुरगान इसे मुखर अभिव्यक्ति दे रहे थे। वर्ष 1986 ई. के ये दिन सब भाँति अनूठे थे। प्राकृतिक उल्लास की यह छटा पूर्ण महाकुम्भ पर्व के आध्यात्मिक उल्लास के रंगों से भीगकर और भी अधिक सम्मोहक हो गयी थी। हरिद्वार में इन दिनों पूर्ण महाकुम्भ के अमृतकणों की वृष्टि हो रही थी। आध्यात्मिक कथा-कीर्तन-सत्संग की मधुर ध्वनियाँ हर ओर सुनी जाती थी। गंगा की धाराओं पर लकड़ी के पुल बन जाने से श्रद्धालुजनों का आवागमन सहज हो गया था। सप्तऋषि क्षेत्र में संव्याप्त युग-युगीन ऋषियों की तपश्चेतना इधर आने वालों के मस्तिष्क में बरबस स्पन्दित हो उठती थी।
युगऋषि गुरुदेव के प्रभाव से ये स्पन्दन शान्तिकुञ्ज में कुछ अधिक ही घनीभूत थे। महाकुम्भ का स्वाभाविक उल्लास भी यहाँ अपेक्षाकृत शत-सहस्रगुणित था। इसका प्रधान कारण परम पूज्य गुरुदेव की चुम्बकीय उपस्थिति थी। अभी वह कुछ ही दिनों पहले बसन्त पंचमी के दिन अपनी सूक्ष्मीकरण साधना से बाहर आए थे। भक्तों और शिष्यों के आतुर उत्कंठित प्राण उन महाप्राण से मिलकर एक अनोखी-आध्यात्मिक संतृप्ति का अनुभव कर रहे थे। सूक्ष्मीकरण साधना के वर्षों में प्रायः सभी से मिलना बन्द था। वन्दनीया माताजी के अलावा एक-आध निकटस्थ जन ही ऐसे थे, जो इन दिनों भी उनसे मिलते रहे थे। इसका कारण उनकी कई महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य कार्यों में सहभागिता थी। अन्यथा समदर्शी एवं शिष्य वत्सल गुरुदेव की भावनाएँ तो सभी के प्रति समान थी।
अब जब उन्होंने मिलना प्रारम्भ किया तो सभी से अति उदारतापूर्वक मिल रहे थे। देश के कोने-कोने से, यहाँ तक कि सुदूर देशों से भक्तजन अपने परम आराध्य सद्गुरु का दर्शन करने के लिए दौड़े-भागे चले आ रहे थे। महाकुम्भ की व्यापकता में सद्गुरु के प्रेम का अनोखा कुम्भ बरबस ही आयोजित हो गया था। इसमें भक्तजन अपने सद्गुरु के प्रेम-अमृत से अभिसिंचित होने के लिए, सद्गुरु के प्रेम-सरोवर में डुबकियाँ लगाने के लिए भागे आ रहे थे। शान्तिकुञ्ज-ब्रह्मवर्चस के निवासियों का तो खैर कहना ही क्या था? उनके सौभाग्य से तो देवता और सिद्धजन भी ईर्ष्या कर रहे थे। आने वाले शिष्यों-भक्तों एवं कार्यकर्त्ताओं से गुरुदेव मिलते थे। उन्हें मिशन की भावी योजनाएँ समझाते थे। गोष्ठियाँ उनकी भी होती थी, जो शान्तिकुञ्ज में रह रहे थे। जिन्हें काम का अनुभव थोड़ा अधिक था। ऐसे वरिष्ठजनों से गुरुदेव इन दिनों प्रायः रोज ही मिल रहे थे।
उस दिन भी ऐसी ही गोष्ठी चल रही थी। शान्तिकुञ्ज एवं ब्रह्मवर्चस के प्रायः सभी वरिष्ठ कार्यकर्त्ता बैठे हुए थे। इन्हीं दिनों शान्तिकुञ्ज में गायत्री माता के मन्दिर के पास के क्षेत्र में ऋषियों की मूर्तियों की स्थापना की जा रही थी। यह स्थापना प्रायः हो चुकी थी, बस प्राण प्रतिष्ठ का कार्य बाकी था। ये ऋषियों की वही मूर्तियाँ हैं, जिनके दर्शन इन दिनों लोग शान्तिकुञ्ज के ऋषिक्षेत्र में करते हैं। पहले यहाँ ये मूर्तियाँ नहीं थी। जो लोग वर्ष 1986 ई. के पहले शान्तिकुञ्ज आते रहे हैं, उन्हें ध्यान होगा कि इन स्थानों पर पहले विभिन्न तीर्थों के चित्र लगे हुए थे। ऋषियों की ये मूर्तियाँ सन् 1986 के कुम्भपर्व में ही स्थापित की गयी थी।
हाँ तो ये मूर्तियाँ अपने-अपने उपयुक्त स्थानों पर स्थापित हो चुकी थी। इनमें प्राण प्रतिष्ठ होनी बाकी थी। उस दिन परम पूज्य गुरुदेव की गोष्ठी की चर्चा का मुख्य बिन्दु भी यही था। पूज्य गुरुदेव उपस्थित कार्यकर्त्ताओं को समझा रहे थे- बेटा, यह हमारा मिशन ऋषियों का मिशन है। हम तो बस उनके प्रतिनिधि हैं। ऋषियों की दिव्य सत्ताएँ देवात्मा हिमालय के ध्रुव केन्द्र में अभी भी सूक्ष्म रूप से निवास करती हैं। सृष्टि संचालन की समस्त सूक्ष्म व्यवस्था का दायित्व उन्हीं पर है। वे ही अपनी तपशक्ति से सृष्टि में सामञ्जस्य बनाए रहते हैं। यह अपना मिशन भी उन्हीं की तपशक्ति से कार्य कर रहा है। यहाँ जो भी कार्यक्रम, गतिविधियाँ एवं योजनाएँ चलायी जाती हैं, सबके पीछे उन्हीं की प्रेरणा व इच्छा शक्ति क्रियाशील है।
गुरुदेव की वाणी का प्रत्येक शब्द जैसे कि नए रहस्य को अनावृत कर रहा था। सुनने वाले चकित और हतप्रभ थे। उन्हें लग रहा था कि जैसे दोनों जगत् पूज्य गुरुदेव के रूप में मूर्तिमान हो अपना परिचय दे रहे हों। गुरुदेव के रूप में स्थूल और सूक्ष्म जगत् की विधि-व्यवस्था का अद्भुत परिचय मिल रहा था। सभी यह जान पा रहे थे कि स्थूल की भाँति सूक्ष्म की भी एक विधि व्यवस्था है। इस क्रम में उन्होंने कतिपय अन्य रहस्यमयी बातें भी बतायी। बाद में उन्होंने अपनी बातों को बीच में ही अचानक खत्म करते हुए कहा, अच्छा अब तुम सब लोग जाओ, हमसे मिलने के लिए कुछ विशेष वी.आई.पी. आने वाले हैं।
उपस्थित जनों में से कुछ ने सोचा कि हरिद्वार में महाकुम्भ चल रहा है। प्रायः रोज ही राज्य एवं केन्द्र के मंत्री व वरिष्ठ अधिकारी आते रहते हैं। हो सकता है कि इन्हीं में से कोई आज गुरुजी से मिलने के लिए आ रहा हो। अन्तर्यामी गुरुदेव के लिए दूसरे के मनों की बात जान लेना बड़ा ही आसान था। वह अपने बच्चों के मनों में चल रहे ऊहापोह को पलभर में समझ गए और हँस पड़े। उनके मुक्त हास्य की निर्मल छटा बड़ी ही सुमनोरम थी। इस निर्मल हास्य को बिखराते हुए वह बोले- अरे भाई! तुम लोग जिन्हें वी.आई.पी. समझते हो, वे हमारे लिए कभी भी वी.आई.पी. नहीं हो सकते। फिर हमारे वी.आई.पी. लखनऊ या दिल्ली से नहीं आते। वे तो दिव्य लोकों से या फिर देवात्मा हिमालय के आध्यात्मिक ध्रुव केन्द्र से आते हैं।
वह दिन जैसे विभिन्न आध्यात्मिक रहस्यों के अनावृत होने का दिन था। पल भर की चुप्पी के बाद गुरुदेव बोले- बेटा, तुम सबको मालूम है कि ऋषियों की प्राण-प्रतिष्ठ होनी है। तो जिन ऋषियों की प्राण प्रतिष्ठ होनी है, वे ऋषि स्वयं ही सूक्ष्म शरीर से आज हमारे पास आ रहे हैं। अभी-अभी हमें अपने अन्तःकरण में उनका सन्देश प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा है कि वे स्वयं यहाँ आकर पहले मुझसे मिलेंगे, फिर अपने एक अंश की प्रतिष्ठ उन मूर्तियों में करेंगे, जिन्हें तुम लोगों ने स्थापित किया है।
बड़ी ही अद्भुत थी गुरुदेव की बातें। इन्हें सुनकर सबको अचरज के साथ भारी खुशी हुई। प्रायः सभी अपने मन में यह सोच रहे थे कि भले ही हम उन दिव्य महर्षियों को न देख पाएँ, पर वे तो हमें देखेंगे ही। हम पर उनके अनुग्रह की कृपा वर्षा होगी ही। और यह सब होगा केवल परम पूज्य गुरुदेव की कृपापूर्ण उपस्थिति के कारण। यही सोचते हुए सब लोग गुरुदेव के कमरे से वापस आ गए। उस दिन क्या हुआ यह किसी ने कुछ भी प्रत्यक्ष नहीं देखा। हाँ इतना अवश्य देखा गया कि उस दिन वन्दनीया माताजी समय से पहले दोपहर में ही गुरुदेव के कमरे में पहुँच गयीं। गुरुदेव एवं माताजी दोनों ही उस दिन किसी से नहीं मिले। रात्रि में भी उनके सेवक-सहचर उनसे दूर ही रहे। सुबह बस इतना भर पता चला ऋषियों की मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठ हो गयी है। कर्मकाण्ड की औपचारिक प्रक्रियाएँ बाद में सम्पन्न हुई। आज यह तथ्य कितना भी आश्चर्यजनक क्यों न लगे पर यह पूर्णतया सत्य है कि जिन ऋषियों को हम आप शान्तिकुञ्ज में प्रतिष्ठित देखते हैं, उनकी प्राण-प्रतिष्ठ स्वयं उन्हीं महर्षियों ने ही अपनी चेतना के एक अंश को प्रतिष्ठित करके की है। ये ऋषि मूर्तियाँ केवल मूर्तियाँ भर नहीं हैं। इनमें उन महर्षियों की जीवन्त प्राण चेतना विद्यमान है। यह सब पूज्य गुरुदेव की कृपा का ही सुफल है। जिसकी अनुभूति अभी भी होती है।
राजकुमार पद्य महामंत्री मार्तंड के संरक्षण में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे साधनों और विभूतियों का महत्व समझाते हुए महामंत्री ने एक उदाहरण रखा। दो युवक नकुल और प्रदीप को व्यवसाय करने के लिए अनुमति और साधन दिए गए। नकुल को नगर के बीच में तमाम अचल संपदा तथा लागत के लिए प्रचुर धनराशि दी गई। प्रदीप को अनुमति के साथ थोड़ा सा धन देकर विदा किया गया। कुछ दिनों के बाद उपस्थित होने के लिए कहा गया।
निर्धारित समय पूरा होने पर नकुल फटेहाल मे आए । बतलाया कि धन समाप्त हो गया, अचल संपत्ति बिक गई और वे श्रेष्ठी प्रदीप के दिनो को राहत कार्यक्रम के आधार पर गुजारा चला रहे हैं। श्रेष्ठी प्रदीप और कोई नहीं, सामान्य धन लेकर व्यवसाय प्रारंभ करने वाले युवक प्रदीप थे।
महामंत्री ने राजकुमार को समझाया देखा, नकुल जैसों के साधन विभूतियों के अभाव में नष्ट हो जाते हैं और प्रदीप जैसों के पास उनकी योग्यता, श्रमशीलता, लगन के आधार पर साधन पैदा हो जाते हैं। यह सत्य जो समझता है, वही सही विभूतियों को महत्व दे पाता है।
गुरुगीता के महामंत्र साधकों का पग-पग पर मार्गदर्शन करते हैं। साधना की सुगम, सरल, सहज विधियाँ सुझाते हैं। साधकों को इस गुह्यतत्त्व का बोध कराते हैं कि तुम क्यों इधर-उधर भटक रहे हो, क्यों व्यर्थ में परेशान हो? परम कृपालु सद्गुरु के होते हुए तुम्हें किसी भी तरह से भटकने या परेशान होने की जरूरत नहीं है। सद्गुरु के प्रति भाव भरा समर्पण सभी भव रोगों की अचूक दवा है। समस्याएँ भौतिक हों या आध्यात्मिक, लौकिक हों या अलौकिक गुरुचरणों में सभी के सारे समाधान समाए हैं। पिछली कड़ी में गुरुचरणों की इसी महिमा की चर्चा की गई थी। गुरु चरणों की कृपा से गुरुभक्त साधक को साधना का परम प्राप्य अनायास ही सुलभ हो जाता है। गुरु चरण सेवा से जीव ‘अयमात्माब्रह्म’ के दुर्लभ बोध को सुगमता से पा लेता है।
गुरुभक्ति की इसी भावकथा को आगे बढ़ाते हुए देवों के भी परम देव भगवान् सदाशिव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-
गुरुपादाम्बुजं स्मृत्वा जलं शिरसि धारयेत्। सर्वतीर्थावगहस्य सम्प्राप्नोति फलं नरः॥12॥
शोषकं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजसाम्। गुरुपादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकम्॥13॥
अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणम्। ज्ञानवैराग्यसिद्धर्य्थं गुरुपादोदकं पिबेत॥14॥
सद्गुरु के चरणों का स्मरण करते हुए जल को सिर पर डालने से मनुष्य को सभी तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है॥।12॥ श्री गुरु चरणों का जल पाप पंक को सुखाने वाला और ज्ञान तेज के दीपक को प्रकाशित करने वाला है। गुरुचरण जल की महिमा से मनुष्य ठीक तरह से संसार सागर को पार कर जाता है॥1॥ गुरु चरणों का जल पीने से अंतर्भूमि में गहराई से जमा हुआ अज्ञान का महावृक्ष जड़ से उखड़ जाता है। जन्म-कर्म के बन्धन का निवारण होता है। गुरु पादोदक के पान से साधक को ज्ञान-वैराग्य की सहज सिद्धि होती है॥14॥
भगवान् भोलेनाथ के मुख से उच्चरित ये महामंत्र गहरे और गहन भावों से भरे हुए हैं। इनका श्रवण और पठन सम्भव है। सामान्य जनों को कुछ अतिशयोक्ति जैसा लगे। किन्तु जो साधक इस पर मनन और निदिध्यासन करेंगे, उन्हें इन महामंत्रों से सत्य और ऋत् की प्रकाश किरणें फूटती अनुभव होगी। इस अनुभूति के क्षणों में उन्हें ऐसा लगेगा कि जो कुछ इन मंत्रों में है, वह तो मात्र संकेत है यथार्थ तो कहीं और भी अधिक विस्तृत और विराट् है।
इसे सुस्पष्ट रीति से समझाने के लिए इन पंक्तियों में एक गुरुभक्त साधक की अनुभूति कथा प्रस्तुत की जा रही है। यह अनुभूति कथा सम्पूर्णतया सत्य है। यह सत्य घटना श्री अरविन्द आश्रम पाण्डिचेरी के श्रेष्ठ साधक गंगाधरण के बारे में है। अभी कुछ ही वर्षों पूर्व वह अपनी पार्थिव देह को छोड़कर अपने सद्गुरु के चरणों में विलीन हुए। बातचीत के क्रम में उन्होंने अपने साधनामय जीवन का का रहस्य बताते हुए कहा कि श्रेष्ठ सुगम किन्तु सर्वाधिक फलदायी एवं प्रभावोत्पादक साधना अपने सद्गुरु के चरणों का चिन्तन और ध्यान है।
उन्होंने बताया कि जब मैं पाण्डिचेरी आश्रम महर्षि अरविन्द के पास आया, उस समय मेरी उम्र मात्र 17 साल थी। पढ़ा-लिखा कुछ खास था नहीं, सामान्य तमिल बोल पाता था। जिस समय वह अपना अनुभव बता रहे थे उस समय उनकी आयु लगभग 87 साल थी। तो अपने जीवन के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा- श्री अरविन्द से पहली बार मिलने पर उन्होंने पूछा- तुम यहाँ क्यों आए हो? और क्या चाहते हो? उनके इन सवालों के जवाब में मैंने कहा- प्रभु! मैं नहीं जानता कि मैं क्यों आया हूँ, नहीं मालूम मेरी चाहत क्या है? वैसे तो मैं काफी गरीब हूँ, पर मैं इतना कह सकता हूँ कि मैं यहाँ केवल रोटी खाने के लिए नहीं आया।
इस सरल उत्तर पर श्री अरविन्द बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने माताजी से कहा कि यह लड़का अपने योग के लिए तैयार है। इसके बाद गंगाधरण जी को आश्रम के कामों में लगा दिया गया। नाली साफ करना, गौशाला की सफाई करना जैसे साधारण काम उन्हें करने पड़ते थे। विगत यादों को कुरेदते हुए गंगाधरण जी ने बताया- कि मुझे दिए जाने वाले काम तो अतिसाधारण थे। पर मैं श्री अरविन्द के चरणों का चिन्तन करते हुए भक्ति के साथ करता था। काम के प्रति मेरा यही भाव था कि मैं आश्रम के साधारण काम नहीं बल्कि अपने सद्गुरु की व्यक्तिगत सेवा कर रहा हूँ।
दिन-महीने और साल बीतते गए। एक बार जन्म दिवस के अवसर पर माताजी से मिलना हुआ। प्रेमपूर्वक आशीष देते हुए माता जी ने पूछा- बोल, तुझे जन्मदिन के अवसर पर क्या चाहिए? उत्तर में मैंने विनम्रता से कहा, माँ! यदि आप कुछ देना चाहती हैं, तो मुझे आप अपनी और श्री अरविन्द की चरण रज एवं आप दोनों का चरण जल दीजिए। इस भक्तिपूर्व आग्रह को माताजी ने स्वीकार कर लिया। फिर तो हर वर्ष जन्मदिन के अवसर पर यह क्रम बन गया। बाद में चरण रज को सामान्य धूल में मिलाकर और चरण जल को गंगाजल में मिलाकर रखने की मेरी आदत बन गयी। बीतते वर्षों के साथ श्री अरविन्द ने शरीर छोड़ दिया। माताजी भी नहीं रहीं। परन्तु जिस किसी तरह मेरे पास उनकी चरण रज एवं चरण जल बनी रही।
गंगाधरण जी ने बताया कि अपनी पूजा की चौकी पर मैं इन दोनों दुर्लभ वस्तुओं को रखता था। इन्हीं के पास पूजा वेदी पर श्री अरविन्द के दोनों महाग्रन्थ ‘लाइफ डिवाइन’ एवं ‘सावित्री’ भी सजा कर रखे थे। श्री अरविन्द एवं माँ के महानिर्वाण के बाद इन दिव्य वस्तुओं की पूजा मेरे जीवन का आधार बन गयी। पढ़ा-लिखा न होने के कारण और करता भी क्या? लाइफ डिवाइन एवं सावित्री को समझ सकने लायक बुद्धि भी तो नहीं थी मेरी। सद्गुरु चरण रज एवं सद्गुरु चरण जल के साथ इनकी पूजा मेरा नित्य का क्रम था। साथ ही आश्रम के कामों को भी गुरुभक्ति समझ कर करता था।
एक दिन अपने सद्गुरु के बारे में सोचते हुए गंगाधरण जी का हृदय भर आया। वह सोचने लगे कि सत्तरह साल की आयु में आये थे और अस्सी से ज्यादा उम्र होने जा रही है। परन्तु अभी तक कोई विशेष अनुभूति नहीं हुई। यही सोच कर वह पूजा स्थली पर गुरु चरण रज एवं चरण की पूजा करते हुए प्रार्थना करने लगे- हे अन्तर्यामी गुरुदेव, हे जगन्माता! मैं तो आपका अज्ञानी बालक हूँ, पढ़ना-लिखना भी ढंग से नहीं जानता। जो आपने अपना दिव्य ज्ञान लिखा है। उसे मैं पढ़ भी नहीं सकता। हे सर्वसमर्थ प्रभु! मुझे तो बस आपकी कृपा का भरोसा है, उनकी यह भावभरी प्रार्थना अनवरत चलती रही। आँखों से आँसू झरते रहे। पता नहीं कितनी देर तक यह क्रम चला। उन्हें होश तो तब आया जब स्वयं श्री अरविन्द एवं माताजी अपने अतिमानसिक शरीर से उनके पास आए। अतिमानसिक प्रकाश से उनका कण-कण भर गया। श्री अरविन्द ने कृपा करके उन्हें अतिमानसिक जगत् की दिव्य अनुभूतियाँ प्रदान कीं। अपने इस संस्मरण का उपसंहार करते हुए गंगाधरण ने कहा- मुझे तो सब कुछ गुरुचरणों की रज एवं जल ने दे दिया। यह सत्य कथा हमारे-आपके जीवन की भी सत्यकथा बन सकती है। सद्गुरु चरणों की महिमा है ही कुछ ऐसी। इस तत्त्व का और अधिक विस्तार गुरुगीता के अगले अंक में साधक पढ़ेंगे। तब तक साधकगण गुरुगीता के उपरोक्त महामंत्रों के भाव का चिन्तन करें।
किचक राजा विराट का साला भी था और प्रधान सेनापति भी। वीर इतना कि जब पाँडव अज्ञातवास में थे, तो अकेले कौरवों को परास्त करके उन्हें संधि करने पर विवश कर दिया। द्रौपदी को देखकर वासना में बह गया। राजा स्तर के अधिकार उसके पास थे, किसी प्रकार की कमी न थी, परंतु दासी द्रौपदी के आगे प्रणय निवेदन में भी लाज न आई।
द्रौपदी ने सावधान भी किया, ऑर कहा-मेरे रक्षक गंधर्व हैं, वे क्रुद्ध होंगे, परंतु अहंता में उसने न राजा विराट की नाराजी को कुछ समझा, न गंधर्वों की परवाह की। वासना और अहंता की लपेट में उसे यश, सम्मान और जीवन से भी हाथ धोना पड़ा।
योग सूत्रकार महर्षि पतंजलि एवं महायोगी परमपूज्य गुरुदेव अपनी अनूठी अनुभव संपदा सौंपने के लिए हम सबके बीच आए, जो योग साधक एवं योग के विद्यार्थी इसे ग्रहण कर पाए हैं, उन्हें अपने अंतःकरण में प्रकाश धाराओं के अवतरण की अनुभूति हुई होगी। इन महासिद्धों की अनुभूति कथा उन्हें यौगिक अनुभूतियों एवं यौगिक विभूतियों के वरदान देगी। बस आवश्यकता इस योग कथा के पठन के साथ मनन और निदिध्यासन की है। आवश्यकता इस तत्वचिंतन के गहरे अभ्यास की है। पिछली कड़ी में सभी साधकों को मन की पाँचों वृत्तियों का सामान्य परिचय दिया गया था। यह बताया गया था कि ये पंचवृत्तियां मन की पाँच शक्तियाँ और विभूतियाँ हैं। इनके सम्यक् प्रयोग से योग साधक बहुत कुछ आश्चर्यजनक उपलब्धि हस्तगत करने में सक्षम हो सकते हैं।
अब अगले सूत्र में पतंजलि इन पंचवृत्तियों में पहल वृत्ति प्रमाण के बारे में सुस्पष्टता से समझाते हैं। वह कहते हैं, प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि (1/7)। सम्यक् ज्ञान अथवा प्रमाणवृत्ति के तीन स्रोत हैं- प्रत्यक्ष, बोध, अनुमान और योग सिद्ध आप्तपुरुषों के वचन। यही वे तीन विधियाँ हैं, जिनके द्वारा याग साधक को ठीक-ठीक ज्ञान हो सकता है। इनमें पहली विधि प्रत्यक्ष बोध की हैं। यह सम्यक् ज्ञान का साक्षात्कार। ज्ञाता और ज्ञेय के बीच किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं रहती। सत्य को समझाने बतलाने के लिए किसी दुभाषिये की आवश्यकता नहीं रह जाती।
बात बिल्कुल साफ है, सरल और सीधी है, फिर भी अनेकों अड़चनें हैं इसे समझने में। प्रायः योग सूत्र के भाष्यकारों, वार्तिककारों ने इस सीधी, सरल और साफ बात की बड़ी गलत व्याख्या की है। उन्होंने प्रत्यक्ष बोध को इंद्रिय बोध की सँकरी सीमा में समेट दिया है। उदाहरण के लिए कई आचार्यों का कहना है कि प्रत्यक्ष वही है, जो आंखों के सामने है, लेकिन यह ठीक-ठीक आमने-सामने कहाँ हुआ। आँखें तो बीच में हैं ही। इसी तरह यदि कुछ सुना जाता है, तो कान माध्यम बनते हैं और ये आँखें या कान गलत खबर भी तो देख सकते हैं। इंद्रिय बोध- सत्य बोध ही हो, यह कोई जरूरी तो नहीं। इंद्रियों में थोड़ा सा भी दोष आ गया, तो सारी खबर गलत मिलती है। कुछ का कुछ दिखाई सुनाई देने लगता है।
फिर प्रत्यक्ष बोध क्या है? इस सवाल के उत्तर में परमपूज्य गुरुदेव का चिंतन सूत्र कहता हैं, ‘चेतना प्रत्यक्ष’। यानि कि हमारी चेतना बिना किसी इंद्रिय माध्यम के सब कुछ साफ-साफ आमने-सामने देखे। गहरे ध्यान अथवा समाधि की भावदशा में ही साधक को यह स्थिति प्राप्त होती है। देखने के लिए जानने के लिए, किसी माध्यम की जरूरत नहीं रह जाती। किसी इंद्रिय की तो बिल्कुल भी नहीं। महात्मा बुद्ध महर्षि रमण, श्री अरविंद एवं परमपूज्य गुरुदेव जैसे महायोगी इसी रीति से सत्ता और सत्य की प्रत्यक्ष अनुभूति करते हैं। इसमें इंद्रियों की किसी तरह की कोई भागीदारी नहीं होती। ज्ञाता और ज्ञेय एकदम आमने सामने होते हैं। उनके बीच कुछ और नहीं होता। केवल प्रत्यक्षता ही सत्य अनुभव बनकर प्रकट होती है।
परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि प्रत्यक्ष को चेतना प्रत्यक्ष मानने से ही महर्षि पतंजलि जैसे महायोगी का भाव प्रकट होगा। यदि हम प्रत्यक्ष को केवल इंद्रिय प्रत्यक्ष की सीमा में सिकोड़ दें, तो हम उन्हें चार्वाक जैसे नास्तिक एवं जड़वादी दार्शनिकों की श्रेणी में खड़ा कर देंगे, क्योंकि चार्वाक दर्शन के प्रवर्तक बृहस्पति का प्रमुख मत यही तो है कि जो कुछ इंद्रियाँ अनुभव करती है, जो नजरों के सामने है, वही प्रमाण है। चार्वाक को भारतीय भौतिकवाद का स्त्रोत माना जाता है। इस दर्शन में बुद्धि चातुर्य तो है, पर चेतना का बोध नहीं है। चार्वाक कोरे बुद्धिवादी है, जबकि महर्षि पतंजलि सम्यक् बोध प्राप्त महायोगी है। उनके भाव को ठीक-ठीक समझने के लिए किसी महायोगी को बोध ही सहायक बन सकता है। परमपूज्य गुरुदेव हमें सहायता प्रदान करते है।
वह कहते है कि गहरे ध्यान अथवा समाधि में हमारी अंतर्चेतना जिस ज्ञान की अनुभूति करती है, वही सत्य है। उसी को प्रमाण माना जा सकता है। इंद्रियों से हमें जो जानकारी मिलती है, वह प्रायः आधी-अधूरी और दोषग्रस्त होती है। यही कारण है कि इंद्रियाँ हमें भटकाती और भ्रमित करती है। काम-क्रोध, लोभ-मोह की दशाएँ इंद्रियों को जब-तब आच्छादित करती है और परिणाम में व्यक्ति को कुछ-का-कुछ समझ में आने लगता है। कभी-कभी यही दशा नशेड़ी व्यक्ति की होती है। इस संबंध में गुरुदेव अपने पास का किस्सा सुनाया करते थे। उनके गाँव के पास के गाँव में एक ठाकुर बच्ची सिंह रहा करते थे। उनकी अफीम खाने की आदत थी। अफीम खाने के बाद वे नशे में काफी ऊट-पटाँग हरकतें करते थे। एक बार उन्होंने शाम को ज्यादा अफीम खा ली। नशा गहरा होने पर वे कहने लगे, देखो अब मेरे पास उड़ने की ताकत आ गई है। अब मैं उड़ सकता हूँ। ऐसा कहते हुए वह अपने मकान की छत से हाथ फैलाए हुए उड़ने की मुद्रा से नीचे कूद पड़े। सिर पर गहरी चोट लगने से उनकी मृत्यु हो गई। बेचारे वह जान भी नहीं सके कि नशे के असर में वह अपनी इंद्रियों द्वारा धोखा खा गए।
इंद्रियाँ भरोसे काबिल है भी नहीं। बिना नशे के वे हमें भटकती और भ्रमित करती रहती है। जो बचपन में समझ में आया, वह किशोरावस्था में बेकार नजर आता है। किशोरावस्था की बाते प्रौढ़ावस्था में बेमानी हो जाती हैं। यही सिलसिला चलता रहता है। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रत्यक्ष बोध आखिर है क्या? तो जवाब यह है कि प्रत्यक्ष बोध वह है, जिसे इंद्रियों के बिना जाना जा सके। इसलिए पहला सम्यक् ज्ञान केवल अपनी आँतरिक सत्ता का हो सकता है, क्योंकि इसके लिए किसी भी इंद्रिय सहायता की जरूरत नहीं है। कोई भी गहरे ध्यान अथवा समाधि में उतरकर इसे पा सकता है।
प्रमाणवृत्ति अथवा सम्यक् ज्ञान का दूसरा स्त्रोत अनुमान है। यह उनके लिए है, जो अभी प्रत्येक बोध के लायक नहीं हुए है। जिनकी स्थिति अभी ध्यान और समाधि की गहराई में प्रवेश करने की नहीं है। जो सम्यक् ज्ञान पाना चाहते है, अनुमान उनके लिए एक संभावना है। यह अनुमान क्या है? परमपूज्य गुरुदेव के शब्दों में यह है विवेकयुक्त तर्क। तर्क के बारे में गुरुदेव का कहना था कि तर्क दुधारी तलवार की तरह है, इसके इस्तेमाल के लिए गहरे विवेक की जरूरत है। विवेक के अभाव में यह सत्य ज्ञान की प्राप्ति में सहायक बनने की बजाय असत्य ज्ञान का पोषक भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, तर्क का प्रयोग चार्वाक एवं मार्क्स ने भी किया और आचार्य शंकर एवं महर्षि अरविंद ने भी। परंतु एक में विवेक का अभाव है तो दूसरे में विवेक का प्रभाव। इस स्थिति में इनके दर्शन और दार्शनिकता का पूरा-का-पूरा ढाँचा बदल गया है।
पतंजलि का कहना है कि सम्यक् ज्ञान के लिए हमें सम्यक् तर्क करना आना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि हम इस विराट् सृष्टि को देखें, गौर से निहारें और तर्क का सम्यक् प्रयोग करें, तो ईश्वर के अस्तित्व का अनुमान होता है। यह ठीक है कि ईश्वर की सत्ता इंद्रिय प्रत्यक्ष नहीं है। ईश्वर कही दिखाई नहीं देता, नजर नहीं आता। किंतु यदि सम्यक् तर्क का प्रयोग करे, यह सोचे कि विश्व-ब्रह्माँड की व्यवस्था कितनी सुसंगत है, कितनी उद्देश्यपूर्ण है, तो इस निश्चय पर जरूर पहुंचेंगे कि ईश्वर के रूप में इसकी संचालक सत्ता का भी अस्तित्व होगा। इस तरह सम्यक् तर्क से ईश्वरीय सत्ता का बड़ा ही स्पष्ट अनुमान हो सकता है। बाद में योग साधना के द्वारा उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति भी पाई जा सकती है।
अब है सम्यक् ज्ञान का तीसरा स्त्रोत, आगम। यह सबसे अधिक सौंदर्यपूर्ण है। आगम को सम्यक् ज्ञान के स्त्रोत के रूप में स्वीकारना महर्षि पतंजलि की अपनी विशिष्टता है। यह आगम क्या है? महर्षि कहते है कि आगम महायोगियों के वचन है। ये ऋषियों की अनुभूति को अभिव्यक्ति देने वाले शब्द है। इस बात को थोड़ा और स्पष्ट रीति से कहे, तो आगम उन महान विभूतियों के वचन है, जो जान चुके है। जो लक्ष्य तक पहुँच चुके है, जो कैवल्य ज्ञान को पा चुके है, जो ईश्वरीय सत्य का साक्षात्कार कर चुके है, उनके शब्द भी सम्यक् ज्ञान के स्त्रोत है।
परंपरा में आगम को वेद कहा जाता है। यह ठीक भी है, क्योंकि वेद सत्यद्रष्टा ऋषियों के वचन है, परंतु रूढ़ियों से ग्रस्त मूढ़जन वेद के विराट् स्वरूप को केवल कतिपय मेंत्रडडडड समुच्चय तक ही समेट देते है। यह ठीक नहीं है। आगम सत्यद्रष्टा ऋषियों के वचन है। भले ही संस्कृत में कहा गया हो अथवा किसी अन्य भाषा में। व्यापक अर्थों में आगम में कबीर की साखी, मीरा के पद, श्रीरामकृष्ण का वचनामृत, महर्षि रमण के वचन, योगिराज अरविंद का दिव्य जीवन संदेश और स्वयं परमपूज्य गुरुदेव के स्वर सभी कुछ समाहित हो जाता है। इन सत्यद्रष्टा ऋषियों-संतों के वचनों पर श्रद्धा, सम्यक् ज्ञान का स्रोत है। योगपथ पर चलने वाले साधकों के लिए सम्यक् ज्ञान का यह तीसरा स्त्रोत सबसे अधिक महत्वपूर्ण एवं व्यावहारिक है। योग साधना करने वालों के लिए यह भी कहा जा सकता है कि अपने सद्गुरु के वचनों पर परिपूर्ण श्रद्धा-सम्यक् ज्ञान का स्त्रोत है। सद्गुरु के वचन कभी-कभी बड़े अटपटे होते है, परंतु वे प्रेम लपेटे होते है। उन्हें ठीक-ठीक समझ न पाने पर भी यदि कोई साधक उन पर समग्र श्रद्धा के साथ आचरण करने लगता है, तो उसे अपने आप ही सम्यक् ज्ञान हो जाता है।
सद्गुरु के वचनों के संबंध में तर्क का कोई स्थान नहीं है, क्योंकि ये चेतना के जिस तल से कहे गए है, वहाँ तर्क-बुद्धि की पहुँच ही नहीं है। यदि इस बारे में तर्क किया जाए, तो हम वह सब गँवा बैठेंगे, जो हमें हमारे सद्गुरु देना चाहते है, क्योंकि वे न केवल यह जानते है कि उन्हे हम शिष्यों को क्या देना है? बल्कि वे यह भी जानते है कि जो हमारे लिए देने योग्य है, वह सब किस तरह से देना है, इसलिए केवल और केवल भक्तिपूर्ण श्रद्धा ही एकमात्र उपाय है। महर्षि पतंजलि कहते है कि सद्गुरु जो कहे, जिस भी तरह कहे, उसे परिपूर्ण श्रद्धा के साथ करने पर सम्यक् ज्ञान सुनिश्चित है। इसमें कोई संदेह नहीं। प्रमाणवृत्ति के ये तीनों स्त्रोत हमारी अंतर्यात्रा में सहायक है। इसके अगले सूत्र में महर्षि ने विपर्यय वृत्ति की चर्चा की है, जो अंतर्यात्रा में प्रधान बाधा है। इसकी विस्तृत व्याख्या अखण्ड ज्योति के अगले अंक में।
जस्टिम महादेव गोविंद रानाडे रेल का सफर कर रहे थे। गाड़ी देर तक खड़ी होती थी, सो वे नीचे उतरकर एक मित्र से बाते करने लगे। इतने में दो गोरे आए और रानाडे का सामान प्लेटफार्म पर फेंककर, सीट का कब्जा कर लिया।
रानाडे ने यह अनीति देखी, तो रेलवे अधिकारियों तथा पुलिस को तुरंत बुला लिया। प्रधान न्यायाधीश की सीट, इस तरह हथियाने के लिए गोरों की भर्त्सना हुई और वह दुम दबाकर भाग गए। सज्जनता अपनी जगह है, किंतु अनीति से जूझने हेतु पराक्रम का माद्दा भी अंदर होना चाहिए।
कुमारजीव के पिता बिहार प्राँत में एक रियासत के दीवान थे। उस कार्य में अनीति बरतनी पड़ती थी, उससे खिन्न होकर उनने नौकरी त्याग दी और धर्म-साधना में लग गए। उनकी माता ने भी बौद्ध भिक्षुणी के रूप में पति का अनुकरण किया।
बालक कुमारजीव जब थोड़ा समर्थ हुआ, तक कश्मीर के एक विद्यालय में संस्कृत, पाली तथा बौद्ध धर्म का अध्ययन किया। इसके उपराँत वे चीन में धर्मप्रचार के लिए चले गए। विदेशी जासूस समझकर उन्हें गिरफ्तार किया गया, पर वास्तविकता प्रकट होने पर वे छोड़ दिए गए।
कुमारजीव ने चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार करने का निश्चय किया। उनके तपस्वी जीवन से कई सामंत प्रभावित हुए और उनकी सहायता से वे चीनी भाषा में बौद्ध धर्म के ग्रंथों का अनुवाद एवं प्रचार करने में समर्थ हुए।
चीन में उनने कितने ही बौद्ध विहार और मठ स्थापित किए। हजारों अन्यायी बने और उन्हें उस देश के जनसमुदाय को बौद्ध बनाने में भारी सफलता मिली।
कुमारजीव चीन में ही स्वर्गवासी हुए। जीवनपर्यंत अपने लक्ष्य के अतिरिक्त और किसी ओर ध्यान नहीं दिया। कर्त्तव्य-धर्म निबाहते हुए देश से हजारों मील दूर वे आजीवन रहे, इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गए।
(गताँक से आगे)
मित्रों, पहले हमने आत्मशोधन की क्रिया बताई थी। अब गायत्री की पंचमुखी साधना का दूसरा वाला चरण बताता हूँ, जिसका नाम है, ‘देव-पूजन’। देव-पूजन किसे कहते है? बेटे, इस बारे में तो हम बताते रहते है कि गायत्री माता का एक फोटो रख लेना। हाँ, वह तो मैंने रख लिया है। और बेटे, धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत चढ़ा दिया करना, चंदन लगा दिया करना। हाँ गुरुजी, वह तो मैं लगा देता हूँ इसमें क्या रखा है? वह तो मैंने एक छोटी-सी डिबिया में रख लिया है और एक डिब्बी में धूपबत्ती भी रख ली है। हाँ बेटे, तूने यह बहुत अच्छा किया। महाराज जी, मैंने सेंट भी रखा हुआ है। यह तो और भी अच्छा किया। बेटे, नैवेद्य कितने पैसे का लाया था? गुरुजी, पच्चीस पैसे का लाया था। इससे दो महीने का काम चल जाता है। दो इलायची दाने रख देता हूँ। बेटे, तेरा नैवेद्य का काम तो बहुत बढ़िया है। यह तो बहुत दिन चल जाता होगा? हाँ महाराज जी, इसके अलावा और कमी हो तो मुझसे कहिए।
उपासना में मन को लगाइए
हाँ बेटे, तेरी उपासना में एक कमी है। तू यह सारी-की-सारी क्रियाएँ करने के साथ में उपासना में मन को क्यों नहीं लगाता। जब भी कोई क्रिया करे, तो उसमें अपने मन को लगा लिया कर। इन वस्तुओं के साथ में जो शिक्षण दिया हुआ है, उसे हृदयंगम करने से ही उपासना का प्रतिफल मिलता है। क्या शिक्षण दिया हुआ है? पंचोपचार में पाँच चीजें आती है। जब इसमें से एक चीज चढ़ाया करे, तब अपनी विचारणा को, विचारों को उन वस्तुओं के साथ उसी प्रकार से लगा लिया करे, जिसका शिक्षण उसका आधार बनाया गया है। क्या आधार बनाया गया है? सबसे पहले हम जिस देवता का पूजन करते है, जल चढ़ाते है और मंत्रोच्चार करते है- ‘पाद्यं समर्पयामिः’, ‘अर्ध्यं समर्पयामि’, ‘आचमंन समर्पयामिः’। ये तीन चीजें है। तीन चम्मच जल से यह प्रक्रिया पूरी होती है। बेटे, तू यह तीन चम्मच से कराता है या तीन बालटी से ? महाराज जी, मैं तो तीन चम्मच से कराता हूँ और कहता हूँ, ‘स्नानं समर्पयामि।’ अच्छा बता, तीन चम्मच से तू कैसे नहा लेगा? इस चम्मच से या तो तू नहा ले या अपने बच्चे को नहला ले। जब तेरा बच्चा नहा लेगा, तब हम जानेंगे कि भगवान को नहला सकता है। नहीं महाराज जी, मैं तो ऐसे ही कर देता हूँ, ‘आचमनं समर्पयामि।’ अच्छा बेटे, तो यह बता कि जब कुल्ला करता है तो कितना पानी खरच कर देता है? महाराज जी, एक लोटा तो खरच हो ही जाता है, हाथ-मुँह धोने और कुल्ला करने में। अच्छा तो अब तू ही बता कि एक चम्मच जल से भगवान जी का होठ भी गीला नहीं होगा, फिर आचमन क्या कराता होगा? भगवान से मखौल करता है, दिल्लगीवाजी करता है और कहता है कि एक चम्मच जल से भगवान जी को स्नान कराता हूँ। बेटे, भगवान का पूजन इस तरह से नहीं होता।
महाराज जी, आपने ही तो बताया था यह। बेटे, मैंने तो बहुत-सी बातें बताई थी, वह तो याद नहीं रखी, केवल क्रिया याद रखी। यह याद नहीं कि जल चढ़ाते समय क्या वृत्ति रहनी चाहिए। उस समय यह वृत्ति रहनी चाहिए कि हम अपने आपका समर्पण करें। देवता से माँगना मत, वरन् यह भाव व्यक्त करना कि हम आपको समर्पण करेंगे। आपको हम देंगे। जो देता है, वही देवता कहलाता है। देवताओं ने भगवान को दिया है और आपको भी देवता की कृपा प्राप्त करने के लिए देने की वृत्ति सीखनी पड़ेगी। जब तक आपके अंदर देने की वृत्ति नहीं आएगी, कोई भी देवता आपके ऊपर कृपा नहीं कर सकता।
देने का भाव सदा मन में हो
मित्रों, देने की वृत्ति का अर्थ यह है कि हम जो जल चढ़ाते हैं, उसके पीछे भगवान को यह आश्वासन दिलाते हैं कि हमारी पसीने की बूंदें, हमारे श्रम की बूंदें, हमारी मेहनत, हमारा वक्त और हमारा समय आपके कामों के लिए लगा करेगा। जल चढ़ाते समय हम बार-बार विचार करते हैं कि हमारा श्रम अर्थात् पसीने की बूंदें अर्थात् मेहनत। मेहनत माने पसीने की बूंदें, जो जल का प्रतीक है, अपने समय का हिस्सा है, ये समाज के लिए, देश के लिए, संस्कृति के लिए, धर्म के लिए अर्थात् भगवान के लिए लगा करेगा। भगवान कोई व्यक्ति नहीं है, यह आप ध्यान रखना। भगवान के लिए हम देते हैं। कहाँ है भगवान? साहब, वह तो मंदिर में बैठा हुआ है। नहीं बेटे, जो मंदिर में बैठा हुआ है, वह तो कोई खिलौना है। फिर कहाँ है भगवान? मनुष्य की श्रेष्ठता के रूप में, ऊँचे समाज के रूप में भगवान है। भगवान ने जब अर्जुन को, यशोदा माता को अपना विराट् रूप दिखाया था, तो सारे समाज के रूप में दिखाया था। समाज ही भगवान का रूप है। समाज की सेवा के लिए लोकहित के लिए, लोकमंगल के लिए तू जो पसीना बहाता है, श्रमदान करता है, वास्तव में यह जल चढ़ाना उसी का प्रतीक है।
ध्यान के लिए भगवान को रिश्तेदार बनाइए
भगवान निराकार है। निराकार भगवान श्रेष्ठ विचारणा के रूप में, आदर्शों के रूप में, सिद्धांतों के रूप में है। भगवान कोई व्यक्ति नहीं है। महाराज जी, हमने तो व्यक्ति बना रखा है। बेटे, हमने उसे ध्यान के लिए बना रखा है। ध्यान करने के लिए किसी-न-किसी चीज पर मन को एकाग्र करना पड़ता है। इसलिए ध्यान में एकाग्रता के लिए हम कोई-न-कोई शक्ल बना लेते है और केवल शक्ल ही नहीं बनाते, वरन् उससे कोई-न-कोई रिश्ता भी कायम कर लेते हैं, जबकि भगवान किसी का रिश्तेदार नहीं है। बिजली किसी की रिश्तेदार नहीं है। नहीं महाराज जी, भगवान हमारा रिश्तेदार है बेटे, भगवान को हमें रिश्तेदार बनाना पड़ता है, ताकि मनुष्य का ध्यान उनमें लगा रहे। ध्यान की तीव्रता के लिए, मन की चंचलता को दूर करने के लिए मन की वृत्ति को ध्यान में लगाए रखने के लिए हम किसी-न-किसी रूप की कल्पना करते है। कल्पना करने के पश्चात उसमें अपना मन लगाए रहते हैं। यह मन को एकाग्रचित्त करने का तरीका है।
मित्रो, असल में भगवान एक ही है। अगर दुनिया में इतने तरह के देवी-देवता होते, तो आपस में मार-काट फैल जाती, लड़ाई-झगड़ा होता, मुकदमेबाजी शुरू हो जाती, फिर फौजदारी खड़ी हो जाती। ये संतोषी माता, वह काली माता। काली माता कहती कि हमारे अच्छे चेले को संतोषी माता झटक ले गई। अच्छा मैं उनके बाल उखाडूँगी। संतोषी माता का चेला, जो कल तक शुक्रवार के दिन खटाई-मिठाई नहीं खाता था, अब रात्रि में चंडी की पूजा करने लगा, तो संतोषी माता गाल फुला के बैठ गई। संतोषी माता का चेला चंडी के यहाँ और चंडी माता का चेला संतोषी माता के यहाँ चला गया, तो वे आपस में लड़ मरेगी। जिस तरह औरतों में लड़ाई होती है, चेलों में लड़ाई होती है, सबमें लड़ाई होती है, उसी तरह देवी-देवताओं में लड़ाई होती और सबके कचूमर निकल पड़ते। तो महाराज जी, यह क्या चक्कर है? बेटे, कोई चक्कर नहीं है। दुनिया में भगवान एक ही है। तो अनेक तरह के देवी-देवता क्या हैं? ये बेटे कल्पनाएँ हैं। कल्पना न होती, तो इतने तरह के फर्क कैसे हो जाते? अगर दुनिया में हजारों भगवान होंगे, तो मुश्किल आ जाएगी। भगवान एक है, अनेक भगवान नहीं हैं। फिर दुनिया में तरह-तरह की शक्लों वाले भगवान कैसे हो गए? बेटे, मुसलमानों ने अपना दाढ़ी वाला बना लिया है, हमने अपना मोर मुकुट वाला बना लिया है। अमुक ने अपना अमुक तरह का बना लिया है, ये सब कल्पनाएँ हैं।
तो महाराज जी, असली भगवान क्या है? बेटे, उच्च एवं श्रेष्ठ विचारणा के समुच्चय को, उत्कृष्टता के समुच्चय को, सद्गुणों के समुच्चय को भगवान कहते हैं। बेटे, भगवान जब कभी आता है, तो श्रेष्ठ विचारों के रूप में आता है, आदर्श उत्कृष्टता के रूप में आता है। उत्कृष्ट चिंतन के रूप में आता है, शक्ल के रूप में नहीं आता। महाराज जी, हमने रात को हनुमान जी को देखा। तो देखा होगा, अच्छी बात है। बेटे, भगवान करे तुझे रोजाना दिखाई पड़े। महाराज जी, हमें तो कल लक्ष्मी जी दिखाई पड़ी। बेटे लक्ष्मी जी दिखाई पड़ी तो तुझे कुछ रुपया-पत्ता भी दे गई कि नहीं? नहीं महाराज जी, दे-दिवा तो कुछ नहीं गई। बेटे, तूने ख्वाब देख लिया है, अन्यथा यदि लक्ष्मी जी तेरे घर आई होती, तो खाली हाथ क्यों चली गई, कुछ तो दे जाती। नहीं साहब, कुछ दिया तो नहीं है, वैसे ही शक्ल दिखाकर भाग गई। नहीं बेटे, ये तेरे अपने जाल-जंजाल हैं, मैं इन पर विश्वास नहीं करता।
आदर्शों का समुच्चय भगवान
श्रेष्ठता के प्रति, आदर्शों के प्रति, जिसको मैं भगवान कहता हूँ, उस श्रेष्ठता का, आदर्शों का जिन्होंने पालन किया, वह भगवान के भक्त कहलाए और भगवान के अनुग्रह के अधिकारी होते चले गए। देव-पूजन के साथ जुड़े हुए जो लोग श्रेष्ठता के विचार है, वही हमारे विचार होने चाहिए कि हम अपना श्रम, अपना पसीना अच्छे उद्देश्यों के लिए, श्रेष्ठ कामों के लिए निरंतर खरच किया करेंगे। आप जितनी देर तक जल चढ़ाया करें, आचमन चढ़ाया करें, पानी चढ़ाया करें, उतनी देर तक अपने विचारों को इस तरह घुमाते रहे कि हम अपना श्रम यानि पसीना लोकहित के लिए समर्पित करेंगे। जब अक्षत चढ़ाएं, ‘अक्षतं समर्पयामि’ तब क्या विचार करना चाहिए? महाराज जी अक्षत से क्या फायदा है? बेटे, अक्षत से आपके विचार से यह फायदा है कि गणेश जी को कोई खाना दे जाता है, कोई नहीं देता। तो जो वह चार-पाँच चावल तू उन पर फेंक देता है, तो गणेश जी खा जाते है, उनके चूहे खा जाते है। नहीं महाराज जी, चार-पाँच चावलों से क्या हो जाता है? बेटे, कुछ भी नहीं होता है।
महाराज जी, तो फिर हम चावल क्यों चढ़ाते हैं? चावल हम इसलिए चढ़ाते हैं कि अपने आपको हम शिक्षित करे कि देख भुलक्कड़, तुझे सब कुछ पाकर सब कुछ याद है। अपनी नौकरी और प्रमोशन याद है, अपने बेटे को वकील बनाना भी तुझे याद है, पर यह याद नहीं है कि इतने करोड़ों रुपये मूल्य का यह जो जीवन भगवान ने दिया है, उसका भी कुछ कर्ज चुकाना है। उसकी भी कुछ ब्याज देनी है। उसकी भी कुछ सेवा करनी है, इसलिए हम चावल लेकर रोजाना अक्षत चढ़ाते हैं और ये कहते है कि अपनी कमाई का एक अंश आपको निष्ठापूर्वक (अक्षत की तरह बिना टूटे) नियमित रूप से देते रहेंगे। आप हमारी जिंदगी के हिस्सेदार हैं। आप हमारे शेयर होल्डर हैं। ये हमारी जिंदगी की दुकान है। इसमें अकेले मनुष्य का ही हिस्सा नहीं है। इसमें कुछ भगवान का भी हिस्सा है। इसमें भगवान की भी कुछ पूँजी लगी हुई है। इसमें भगवान ने भी कुछ रकम लगाई है। भगवान की मशीनें इस फैक्टरी में काम कर रही है। इसमें सब कुछ आपका ही नहीं है। आपकी अपनी अकल है, पर बेटे, सारी-की-सारी मशीनें तो किराये की है। तुझे मालूम नहीं है क्या कि जिससे तू देख रहा है, जिसकी अकल तू ले रहा है, जो कंप्यूटर तेरे दिमाग में फिट किया हुआ है, यह तेरा नहीं है। यह किसी और का है। उसका भी कुछ शेयर है। क्या सारा माल तू ही हजम कर जाएगा कि उसको भी कुछ देगा? तो क्या महाराज जी, उसको भी कुछ देना पड़ेगा? हाँ बेटे, क्योंकि इसमें सारा धन उसी का लगा हुआ है। तू तो केवल उसकी फैक्टरी में काम करता है। तू तो काम करने वाला मुनीम है, मालमत्ता तो सारा उसी का है।
भगवान के लिए निकालिए अपना एक अंश
इसलिए मित्रों, जो अक्षत-चावल हम चढ़ाते हैं, उसके पीछे यह शिक्षण छिपा हुआ है कि हमारे मन में इस वृत्ति या भावना का उदय होना चाहिए कि हमारी कमाई का एक अंश ब्याज के रूप में, कर्ज चुकाने के रूप में अपने शेयर होल्डर का, अपने पार्टनर का हिस्सा-शेयर अपने हिस्से में से हमको निरंतर देना पड़ेगा, तो हम निरंतर देते रहेंगे। भगवान को हम अपना रिश्तेदार मानते हैं। चलिए आप भगवान को अपना रिश्तेदार तो क्या मानेंगे, अपना बेटा ही मान लें। साहब, हमारे चार बेटे हैं, तो पाँचवाँ बेटा हम भगवान को भी मान सकते हैं। नहीं महाराज जी, भगवान तो हमारा गुरु है। नहीं बेटे, गुरु तो मत मान, बेटा ही मान ले। अब तुझे क्या करना पड़ेगा? चार बेटों को खिलाता-पिलाता है। हाँ गुरुजी, उन्हें खिलाता-पिलाता हूँ, कपड़े पहनाता हूँ। तो बेटे, पाँचवें को भी पहना। पाँचवाँ कौन-सा है- भगवान। अच्छा बेटे, एक पर कितना खरच आता है? महाराज जी, किसी की पढ़ाई में ढाई सौ रुपये महीना खरच करता हूँ, किसी में सवा सौ रुपये खरच करता हूँ, किसी में पौने दो सौ रुपये खरच करता हूँ, किसी में चालीस रुपये खरच करता हूँ। बेटे, एक और को भी ले ले। नहीं महाराज जी, भगवान को तो मैं धूपबत्ती खिलाऊँगा। और बेटे को? बेटे को जलेबी खिलाऊँगा। अच्छा तो बेटे को भी धूपबत्ती खिला? नहीं साहब, अपने बेटों को जलेबी खिलाएगा और भगवान को धूपबत्ती खिलाएगा, बदमाश कही का।
मित्रों, क्या करना पड़ेगा? हमको वास्तविकता के धरातल पर उतरना पड़ेगा। हमको यथार्थता पर आना पड़ेगा। हमको यह मानकर चलना पड़ेगा कि भगवान हमारा कोई रिश्तेदार है। भगवान ने हमारे जीवन में जितनी ज्यादा सुविधाएँ और संपदाएँ दी हैं, उसके लिए हमको कुछ करना चाहिए। हमारा अक्षत, हमारे चावल, हमारा श्रम, हमारी कमाई, हमारा उपार्जन, जिसमें पैदा भी शामिल है, बुद्धि भी शामिल है, भाव भी शामिल है, प्रतिभा भी शामिल है, इसका एक हिस्सा लोकहित के लिए है। वह समाज के कल्याण के लिए, देश के लिए, धर्म और संस्कृति के लिए खरच होना चाहिए। जब आप अक्षत चढ़ाएं, तो साथ-साथ में ये विचार, ये भाव भी करते जाएँ।
महाराज जी, ऐसा ध्यान बताइए कि जिससे मन एक जगह एकाग्रचित्त हो जाए। मन कहीं भागे नहीं। बेटे, ऐसा एकाग्र मन जैसा तू चाहता है, कैसे हो सकता है? तूने अभी मनोविज्ञान पढ़ा नहीं है, न्यूरोलॉजी पढ़ी नहीं है, इसलिए तू बोलता रहता है कि मन एक बिंदू पर एकत्र हो जाए। बेटे, मन एक बिंदु पर हो ही नहीं सकता। हम जो साकार उपासना बताते हैं, गायत्री माता की उपासना बताते हैं, उसमें गायत्री माता के एक हाथ में कमंडल, एक हाथ में पुस्तक, एक हंस, एक मोर मुकुट है। ये क्या चीज है? यह क्या चक्कर है महाराज जी? बेटे, चक्कर यह है कि मन को सीमाबद्ध करने के लिए इसे इतने बड़े दायरे में घुमाना पड़ेगा। कभी कमल को देख, कभी हंस को देख, कभी मुकुट को देख, कभी उनके होठों को देख, कभी साड़ी को देख, कभी इसको देख। इतने ही दायरे में जब मन भागेगा, तो जो मन कभी भी घंटों में ध्यान से नहीं रुकता था, वह इतने ही दायरे में यहाँ-वहाँ भागता रहेगा। मन एक सीमा में भागता रहेगा, एक सीमा में घूमता रहेगा।
ऐसे आएगी तन्मयता-एकाग्रता
मित्रो, ध्यान में मन को एक सीमा में घुमाया जाता है। एक मिनट के लिए भी अगर मनुष्य का मन एकाग्र हो जाता है, तो मनुष्य समाधि में चला जाता है। बार-बार मन को एकाग्र करने की बात करता है कि हमारे मन को एकाग्र कर दीजिए। मनुष्य समझता नहीं कि मैं क्या कह रहा हूँ। अगर मन एक बिंदु पर एक मिनट के लिए भी इकट्ठा हो जाए, तो वह समाधि में चला जाएगा, बेहोश हो जाएगा, इसलिए हम कहते है कि एकाग्रता का मतलब होता है- एक धारा, एक दिशा। सबेरे जब हम आपको ध्यान कराते हैं एक धारा देकर, एक दिशा देकर कराते है। मन को एकाग्र होने का दावा नहीं करते, वरन् एक दिशा देते है। वैज्ञानिकों की एक दिशा होती है, एक धारा होती है। प्रयोग-परीक्षण करके वह सिद्ध कर देता है कि इसमें ये कैमिकल मिल जाएगा, तो ये हो सकता है। ये मिल जाएगा, तो अमुक हो सकता है। सारी-की-सारी इतनी शतरंज बिछी हुई है कि पास में से चूहा गया है, तो यह मालूम नहीं है, क्योंकि उसे अपने काम की जल्दी पड़ी है। वह उसके साथ एकाकार हो गया है, एकाग्र हो गया है।
महाराज जी, अभी तो आप कह रहे थे कि वह हजारों तरह के विचार करता है। हाँ बेटे, हजारों तरह के विचार करता है। उसे मैं एकाग्रता कहता हूँ। उसकी इच्छा एक है, दिशा एक है। अपने उद्देश्य से एक हो गया है, बस इतनी एकाग्रता हो सकती है। अंतर केवल इतना है कि आप जो विचार करते हैं, वह असंभव विचार करते हैं। मन कहीं भागने ही न पाए, एक विशेष अवस्था में लगा रहे, यह हो सकता है। बेटे, जब हम लेख लिखते हैं, तो एकाग्र हो जाते हैं। लोकमान्य तिलक के पैर का ऑपरेशन होने वाला था। डॉक्टरों ने उनसे कहा कि आपको बेहोश करना पड़ेगा। उस जमाने में बेहोशी का तरीका बहुत घटिया था। एक बार क्लोरोफार्म सुँघा दिया, तो महीने भर तक उल्टियाँ आती रहती थी, सिर चकराता रहता था। बहुत शिकायतें रहती थीं। उन्होंने कहा कि महीने भर तो आपको दिक्कत रहेगी। तिलक ने कहा कि फिर तो महीने भर में मेरा काम बड़ा हर्ज होगा। आप ऐसा कीजिए कि बिना बेहोशी के ही ऑपरेशन कर दीजिए, मैं चिल्लाऊँगा नहीं।
डॉक्टर ने कहा, आप चिल्लाएँगे। उन्होंने कहा, बिल्कुल नहीं, लाइए हम अपनी गीता की पुस्तक पढ़ना शुरू करते हैं। इसे पढ़ने में हम इतना तन्मय हो जाएँगे कि इतने समय में आप मुझे काटकर पटक देना। अच्छी बात है। तिलक ने गीता की पुस्तक मँगाई। उन्होंने अपनी टाँग लंबी कर दी और पढ़ने में तन्मय हो गए। ध्यान से सुनना, वे पुस्तक में से पढ़ने लगे, “स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥” और वे समाधि में चले गए। डॉक्टर ने झट से पाँव का ऑपरेशन करके रुग्ण भाग को काटकर फेंक दिया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन हुआ कि नहीं हुआ। अरे हो तो गया। बहुत जल्दी ऑपरेशन कर दिया।
हो एक विषय पर गहरा चिंतन
बेटे, यह क्या बात है? ध्यान का खेल है। ध्यान की बात यह है कि एक विषय पर, एक धारा पर, एक सब्जेक्ट पर आदमी इतनी गहराई से चिंतन करे कि बाकी बातों को, सबको भूल जाए, केवल ध्यान की बात रह जाए। जब हम लेख लिखते है, तब इतने एकाग्र हो जाते है कि हमें पता ही नहीं चलता कि कौन बैठा हुआ है और कौन चला गया। कौन आ गया और कौन क्या कर गया, कुछ पता ही नहीं चलता। बस हम अपने काम में लगे रहते हैं। उस समय हमारे मन की दिशा एक होती है और इतने तरह के विचार आते है, इतने रिफरेंस आते हैं कि अमुक विद्वान ने ये कहा, उसने ये कहा। हमारे हाथ लिखते चले जाते हैं और हमारे दिमाग की फिल्म इतनी तेजी से दौड़ रही होती है कि सिनेमा वाली फिल्म तो एक कोने पर रखी रहेगी। हजारों किताबों हमारे दिमाग में मिनटों और सेकेंडों में घूमती चली जाती है। इस तरह हमारे दिमाग की चाल तेज होती है। अगर आप लोग कभी हमारे दिमाग की चाल को देख ले, तो कहेंगे कि महाराज जी, ऐसी चाल तो हमने कभी देखी नहीं। बेटे, तूफान की चाल और हमारे दिमाग की चाल एक होती है, जो एकाग्र होती है।
महाराज जी, जब हम एकाग्र होते हैं, तो स्थिर नहीं होते। बेटे, एकाग्र होना अलग बात है और स्थिर होना अलग बात है। समझता तो है नहीं और चिल्लाता रहता है कि हमारे मन को स्थिर कर दीजिए। कैसे स्थिर कर दे, खा जा अफीम की गोली, फिर स्थिर कर देंगे। सनक में डूबा रहेगा और कहेगा कि महादेव जी दिखते हैं। ऐसे कोई स्थिर नहीं होता। मीरा जो थी, हमेशा कहती रहती थी, “घायल की गति घायल जाणै, जो कोई घायल होय।” हर वक्त वह बेचैन मालूम पड़ती थी। रामकृष्ण परमहंस उछलते रहते थे। चैतन्य महाप्रभु जब चिंतन करते थे, तो उछलकर बेहोश हो जाते थे और कीर्तन करते थे। वे एकाग्रचित्त हो जाते थे। अरे, कैसे एकाग्र हो जाएँगे? एक विषय पर, एक धारा पर आदमी का दिमाग लगा रहे, तो वह एकाग्र हो जाता है, लेकिन एक तरह के विचारों पर बहुत देर तक आदमी का मन स्थिर नहीं रह सकता, इसलिए हम सबेरे भी आपको ध्यान कराते हैं, छोटे-छोटे पीसों में कराते हैं। अलग-अलग तरह के वैराइटीज में कराते हैं, ताकि आपको एक विचार के ऊपर, एक क्रियापद्धति पर ध्यान को लगाने का, सीखने का मौका मिले। आपको यही करना चाहिए।
मित्रों, उपासना का जब समय आए, तो आप अपनी उपासना के समय जो क्रिया-कृत्य करते हैं, तो उसके पीछे जो शिक्षण दिए गए हैं, उनके साथ अपने आपको मिलाइए। जब आप देवता को फूल चढ़ाते हैं, तो इस चक्कर में मत पड़िए कि साहब, ये चमेली का फूल है कि गेंदा का फूल है कि गुलाब का फूल है या बेला का फूल है। महादेव जी न आक का फूल खाते हैं, न गणेश जी चमेली का फूल खाते हैं और विष्णु भगवान गुलाब का फूल खाते हैं। ये बेकार की बाते छोड़िए और सोचिए कि आदमी का जीवन फूल जैसा होना चाहिए। फूल जैसा कोमल जीवन होगा, तो भगवान के चरणों में भी स्थान मिल सकता है, गले में भी स्थान मिल सकता है, सिर में भी वे स्थान दे सकते हैं। हर जगह स्थान मिल सकता है। शर्त केवल यह है कि हम फूल जैसा मुलायम जीवन, सुगंधित जीवन बनाने की हम कोशिश करें।
हर वस्तु अर्पण के साथ गुणों का चिंतन
इन विचारों के साथ जब आप फूल चढ़ाया करे, तो यही विचार करे कि हम अपना जीवन फूल जैसा बनाएँगे। हमारा जीवन फूल जैसा बनना चाहिए। फूल जैसा जीवन बनाना अपना उद्देश्य होना चाहिए। फूल चढ़ाता रहे और बेकार की बाते सोचता रहे कि गुलदस्ता बनाऊँ या माला बनाऊँ, ये करूं या वो करूं। इन बेकार की बातों में अपना समय खराब करता रहता है और यह नहीं सोचता कि हमको अपना जीवन फूल जैसा बनाना है।
मित्रों, हम जब दीपक चढ़ाते है, उस समय हमारा विचार होना चाहिए कि भगवान को दीपक दिखाने की जरूरत नहीं है। भगवान के पास तो दो दीपक जलते ही रहते है। दिन में सूरज जलता रहता है और रात में चंद्रमा जलता रहता है। आप भगवान के लिए दीपक नहीं जलाएँगे, तो भगवान का कोई हर्ज नहीं हो सकता। महाराज जी, फिर तो हम बार-बार दीपक जलाने में पैसा क्यों खरच करें?
क्यों बार-बार दीपक जलाएँ? बेटे, उसका भी एक कारण है। एक ऐसा बेवकूफ आदमी है, जो आँखों से अंधा है, जिसको कुछ दिखाई नहीं पड़ता। उसके सामने दीपक दिखाओ तो कुछ तो दिखाई पड़े। कौन है वह बेवकूफ और अंधा आदमी? वह है तू और हम, जिनको अंधे कह सकते है। जिन्हें कुछ पता ही नहीं हैं, कुछ दिखता ही नहीं है, कुछ सूझता ही नहीं हैं। जिन्हें न अपना मरना दीखता है और न जीना दीखता है। बस एक ही चीज दिखती है- विलासिता, एक ही चीज दिखती है। तृष्णा एक ही चीज दिखती हैं- वासना, एक ही चीज दिखती है- भोग, एक ही चीज दिखती है- लोभ। वह एक ही चीज देखता है और कुछ नहीं। उसकी आँखें खराब है। उसे मोतियाबिंद की शिकायत है। अतः अँधेरे में भटकने वालों को रोशनी की जरूरत है।
दीप प्रज्वलन का अर्थ रोशनी भरा जीवन
मित्रो, इसलिए हम भगवान के सामने दीपक जलाते हैं, ताकि भगवान के बहाने हम अपने आपको देख सकें कि हमारी जिंदगी का स्वरूप ऐसा होना चाहिए, जैसा कि दीपक का है। रोशनी, रोशनी माने जीवन। रोशनी कैसी, जैसे दीपक की, बिजली की। महाराज जी, दीपक की, बिजली की बत्ती तो मैं रोजाना ही जलाता रहता हूँ। नहीं बेटे, उससे हमारा मतलब नहीं है। रोशनी से हमारा मतलब, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ से है। इससे है कि हमको अंधकार से प्रकाश की ओर लेकर चलिए। इसका मतलब ये नहीं है कि टार्च आ गया और उसे जलाते चलिए और आकर के हमको अँधेरे में से ले चलिए। हमारा मतलब इस चमक की रोशनी से नहीं है, वरन् रोशनी से हमारा मतलब है- ज्ञान। दीपक जब हम जलाते हैं, तो इसका मतलब यह है कि हमारा मस्तिष्क ज्ञान से भरा हुआ हो, विचारणा से भरा हुआ हो, प्रज्ञा से भरा हुआ हो, रोशनी से भरा हुआ हो। अगर हमारा मस्तिष्क इन सबसे भरा हुआ हो, तो हम क्या काम करें? बेटे, तब हम जलने की बात सोचें, जलने की बात सीखें, दूसरों के फायदे की बात सीखें, कुरबान होने की बात सीखें, समन्वय की बात सीखें, शरणागति की बात सीखें, विसर्जन की बात सीखें, विलय की बात सीखें, नहीं साहब, हम तो लेने की बात सीखेंगे। नहीं बेटे, लेने वालों की यह कंपनी नहीं है, यह देने वालों की है।
बेटे, तू कौन सी कंपनी में दाखिल हो गया है? अरे महाराज जी, मैं तो भजन करने वालों में आ गया। इसमें क्यों आ गया? महाराज जी, इसमें इसलिए आ गया कि भजन करने वालों को बड़ा नफा होता है। अरे बेटे, तुझे किसी ने गलत बहका दिया है। भजन करने वालो को इसमें नफा नहीं होता और अगर होता भी है, तो उनको तो ऐसा शाप लगा हुआ है कि वह स्वयं नहीं खा सकते हैं, केवल दूसरों को खिला सकते हैं। बाजीगर से एक बार हमने पूछा, क्यों भाई, एक बात बताओ कि अभी जो आपने आम के पेड़ से फल तोड़े और डिब्बे में से मिठाई निकाली और सबको खिलाया। क्या यह सच्ची मिठाई है। हाँ साहब, सच्ची मिठाई है। तब तो आप रोजाना मिठाई बनाते होंगे और अपने बाल बच्चों को खिलाते होंगे। नहीं साहब, इसको हम नहीं खा सकते। किसी और को खिला सकते हैं। क्यों, आप भी खा लिया करो। नहीं साहब, हम स्वयं नहीं खा सकते, औरों को खिला सकते हैं।
भगवत्कृपा से जुड़ा एक शाप
मित्रों, भगवान की दया में, कृपा में एक शाप लगा हुआ है कि यदि आप उसे खाने की कोशिश करेंगे, तो वह आपके पास नहीं रह पाएगी। आप खिला सकते हैं, खा नहीं सकते। संत खा नहीं सकता। संतों ने जब खाना शुरू कर दिया, तो संत का संतपन उसी दिन खत्म हो गया। भगवान हमको दीजिए, भगवान हमको दीजिए। बेटे, भगवान देता तो है, पर उसकी कृपा पारे की तरह है। पारे को आप देख लीजिए और दिखा लीजिए, पर खाए मत। भगवान की कृपा को भी खाना मत। संत खाते नहीं हैं, ऋषि कभी खाते नहीं तपस्वी कभी खाते नहीं। अगर आप भगवान की कृपा को स्वयं खाना शुरू करेंगे, तो फिर आपकी देने की ताकत खत्म हो जाएगी। खा लीजिए, फिर देखिए आप किसी को कुछ दे नहीं सकते, किसी की सहायता नहीं कर सकते। आप चाहें कि खाने के बाद में हम अध्यात्म की किसी का फायदा कर दें, तो आप नहीं कर सकते। पैसा लेकर अनुष्ठान शुरू कीजिए, ठीक है, आपकी जीविका चल जाएगी। उसका प्रभाव होता होगा तो होगा, लेकिन आपकी वाणी के अंदर जो शक्ति है, वह नहीं रहेगी। फिर आप चाहें कि किसी का भला कर दें , तो नहीं कर सकते।
मित्रों, भगवान की कृपा खाई नहीं जा सकती। इस बारे में मैं लोगों को बताता रहता हूँ कि तुम्हें भगवान की कृपा से अगर फायदा कराना हो, तो इसकी अपेक्षा यह ज्यादा अच्छा है कि तुम नौकरी कर लो। धंधा कर लो। नहीं साहब, उसमें कम फायदा होता है। तो बेटे, चोरी कर ले। चोरी करेगा तो तीन महीने की सजा हो जाएगी, लेकिन भगवान की कृपा से जो लिया हुआ है या प्राप्त हुआ है, वह सब परमार्थ के लिए होता है, लोकहित के लिए होता है। याद रखिए, भगवान की कृपा से सुख नहीं, शक्ति मिलती है। हर एक को शक्ति मिली है, सुख किसी को नहीं मिला है। यदि शक्ति की जरूरत हो, तो भगवान की कृपा से चक्कर में फँस और यदि तुझे सुख की जरूरत है, तो भगवान से दूर रहो। हाँ, भगवान से दूर रहने वालों में जितने भी तेरे संसाधन दिखाई पड़ते हैं, हर साँसारिक आदमी उस दृष्टि से गरीब दिखाई पड़ता है, कंगाल दिखाई पड़ता है।
खाना नहीं, खिलाना सीखो
महाराज जी, क्या भगवान की कृपा पाने वाले कंगाल नहीं होते। हाँ बेटे, भगवान जिस पर कृपा करते है, उसे कंगाल तो नहीं करते, परंतु यह बात जरूर है कि भगवान की कृपा पाने वाले इतने उदार हो जाते हैं कि वे खा नहीं सकते, खिला सकते हैं। वे खाते नहीं, खिलाते रहते है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर को पाँच सौ रुपये आते थे, तो उनकी अपनी जिंदगी के वे दृश्य सामने आ खड़े होते थे, जब उन्हें बिजली के अभाव में, रोशनी के अभाव में सड़क के किनारे खड़े होकर पढ़ना पड़ता था। सड़क के किनारे लगे खंभों पर जो बिजली जलती है, उसके नीचे खड़े होकर किताब पढ़नी पड़ती थी। सारे विद्यार्थी, जो सड़क के किनारे खड़े होते थे, उनकी आँखों के आगे खड़े हो जाते थे। उन्हें अब पाँच सौ रुपये तनख्वाह मिलती है। जब पढ़ते थे, तब उनके पास चार आने महीने होते थे, जिसमें से मिट्टी का तेल खरीदकर उसकी बत्ती के प्रकाश का प्रबंध भी पूरा नहीं हो पाता था। आज उनकी आँखों के सामने इसी तरह के हजारों बच्चे आ खड़े होते और कहते कि हमारी मदद कीजिए।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने निश्चय कर लिया था कि पचास रुपये महीने में हम अपना गुजारा करेंगे और साढ़े चार सौ रुपया महीना उन लोगों के लिए सुरक्षित रखेंगे जिनको फीस की जरूरत है, जिनको किताबों की जरूरत है, जिनको दूसरी चीजों की जरूरत है। वे हजारों परेशानियाँ सहते रहे, पर अपना गुजारा पचास रुपये में ही करते रहे। महाराज जी, फिर तो वह गरीब ही रहे, अमीर नहीं बन पाए। हाँ बेटे, वह अमीर नहीं बन पाए। संत अमीर नहीं हो सकता। भगवान के भक्त के हिस्से में अमीरों नहीं आई है। वह अमीर बना तो सकता है, पर स्वयं अमीर नहीं बन सकता। गाँधी जी ने बादशाह तो ढेरों बनाए, किंतु स्वयं बादशाह नहीं बन सके। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को तो बादशाह बनाया, पर स्वयं बादशाह नहीं बन सके। चाणक्य ने चंद्रगुप्त को बादशाह तो बनाया, पर स्वयं बादशाह नहीं बन सके। संत बादशाह नहीं बन सकता, इसलिए यदि संत बनना है, भगवान की कृपा, भगवान की दया प्राप्त करनी है, तो उसे बाँटना सीखिए, दूसरों को खिलाना सीखिए। स्वयं मत खाइए।
(अगले अंक में जारी)
कर्मसंन्यासयोग नामक गीता के पाँचवे अध्याय की चौथी किश्त
इस धारावाहिक शृंखला की पिछली कड़ी में पाठकों ने जाना था कि योग साधन है एवं साँख्य लक्ष्य। ज्ञान व कर्म एक-दूसरे के पूरक है, यह भगवान का मत है। इस दृष्टि के विकसित होने पर अहंभाव का विसर्जन हो जाता है। इसके जाते ही भोक्त भाव भी समाप्त हो जाता है। यह ज्ञातव्य है कि प्रथम छह अध्याय गीताजी में कर्मयोग की महत्ता के प्रतिपादक है। अतः द्वितीय अध्याय से ही भगवान इसी की महिमा गाते चले जा रहे है। भगवान बड़े स्पष्ट ढंग से कहते है कि कर्म के द्वारा ईश्वर के साथ संयोग ही कर्मयोग है। जिस कर्म में ईश्वर से मेल न हो, वह तो मात्र कर्म है, कर्मयोग नहीं। योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी, नाग महाशय आदि के माध्यम से गृहस्थ में भी संन्यास का जीवन जीने वाले कर्मयोगियों की महत्ता बताई गई थी एवं यह भी कहा गया था कि आज संन्यास के नाम पर कैसा पाखंड व अकर्मण्यता का साम्राज्य संव्याप्त है। इस अध्याय के छठे श्लोक के माध्यम से बताया गया था कि कर्मों का त्याग कर्म संपादन के बिना संभव नहीं। योग के आचरण से शुद्ध हों एवं भगवत्स्वरूप का सतत मनन करते रह कर्मयोगी बनने का प्रयास करे, यही हमारा आदर्श होना चाहिए। वे यह भी कहते है कि निष्काम कर्म के अनुष्ठान के बिना संन्यास दुःख प्राप्ति का मार्ग बनकर रह जाता है। परमपूज्य गुरुदेव के कथनों व अनुभवों से आज के संन्यास की विडंबना भी विगत अंक में बताई गई थी। अब आगे पढ़े।
चिकित्सक-शिक्षक श्रीकृष्ण
इस महत्वपूर्ण पाँचवें अध्याय का का छठा श्लोक हमें बड़े स्पष्ट रूप में कह रहा है कि कर्मों के संपादन के बिना कर्मों का त्याग संभव नहीं है अर्थात् मन, इंद्रिय और शरीर द्वारा होने वाले संपूर्ण कर्मों में कर्त्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है। योग के आचरण से शुद्ध हुआ भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी का त्याग प्राप्त होना कठिन है। योग के आचरण से शुद्ध हुआ भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है (न चिरेण ब्रह्म अधिगच्छति)।
अब इस बात को समझने का प्रयास करें। यज्ञीय भाव से निरंतर कर्म में लोग रहना ही श्रेयस्कर है, ऐसा श्रीकृष्ण का आदेश है। कर्मों का संपादन, आसक्ति का त्याग, शुचिता का विकास, ध्यानयोगी बनने का अध्यवसाय एवं फिर परब्रह्म परमात्मा की-परमपद की प्राप्ति। यही राजमार्ग वे अर्जुन को व उसके माध्यम से हम सभी को समझा रहे है। साथ में वे कहते भी है व एक सावधानी की मुद्रा में बता जाते है, निष्काम कर्म का अनुष्ठान किए बिना संन्यास मात्र दुःख प्राप्ति का निमित्त बनकर रह जाता है (संन्यासस्तु दुःखमाप्तम् अयोगयतः)। ऐसा मार्ग अपनाया ही क्यों जाए, जो दुःख दे व जीवन में शाँति कभी आने ही न दे।
हम सबके जीवन में एक स्पष्ट लक्ष्य होना चाहिए और इस लक्ष्य के प्रति पूरा समर्पण भी होना चाहिए। भीतर छिपी वासनाएँ हमारे विचार रूपी मानसरोवर को सदा गंदा ही करती रहेंगी, यदि हमने उनके क्षय का मार्ग न निकाला और वासनाओं का क्षय निष्काम कर्मयोग के बिना संभव नहीं। समाज की सेवा हमारे लिए हृदयशुद्धि-आत्मसत्ता के लिए एक शिक्षण एवं संस्कृति के विकास का अवसर लेकर आती है। यह समाजसेवा योगानुशासन से भरे कर्म से ही संभव है, सकाम कर्म से नहीं। हर किसी के लिए यह अनिवार्य भी है। कर्मयोग से ध्यानयोग व उसके बाद योगयुक्त मुनि बनने का एक सरल-सा मार्ग है, पर संन्यास सभी कर्मों का त्याग, इस मार्ग पर नहीं ले जाता, इसलिए सभी के लिए कर्मयोग का मार्ग ही निर्धारित है। जिस योगी ने कर्मयोग का दीर्घकाल तक अभ्यास कर लिया है, वह संन्यास के मार्ग पर प्रतिष्ठित हो सकता है, यह सम्मति श्रीकृष्ण की है। ‘अयोगतः’ अर्थात् कर्मयोग न करने वाले के लिए तो संन्यास दुःख का ही कारण बनता है, यह भी वे बताते है।
मानव की सेवा पहले, फिर प्रभु की सेवा यह श्रीकृष्ण का निर्देश है। इस बात को बताते-बताते व अगले श्लोक की ओर बढ़ते हुए भगवान एक तथ्य स्पष्ट कर जाते हैं कि अहींवडडडड से संपादित होने वाले सभी कर्म कर्त्ताभाव से जुड़े होते है। यह जब तक विसर्जित नहीं होगा, मनुष्य तनाव-अशाँति में जिएगा, कभी प्रभु से उसका साक्षात्कार हो न पाएगा। बिना अहंकार के, बिना किसी प्रकार की कामना के जीवन जीने की कला का शिक्षण देने वाले श्रीकृष्ण एक सर्वश्रेष्ठ शिक्षक भी है, मनोचिकित्सक भी।
अगला श्लोक कहता है-
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥ 5/7
जिसने समर्पित कर्मों द्वारा अपने मन को अपने वश में कर लिया है, इंद्रियाँ जिसकी वश में है एवं जिसकी बुद्धि-अंतःकरण इन कर्मों से शुद्ध हो गए है तथा जो सतत यह अनुभव करता है कि संपूर्ण प्राणियों की आत्मा रूप परमात्मा ही उसके भीतर है, ऐसा मनुष्य कर्म करते हुए भी उनमें कभी लिप्त नहीं होता।
सच्चे योगी के तीन लक्षण
भगवान इस श्लोक में एक साथ कई बाते कह गए है। वे कहते है कि जिसका मन अपने नियंत्रण में है तथा जो शुद्ध अंतःकरण वाला है, वही योगी है। इतना ही नहीं, जो जीवन जीते हुए सतत एक ही अनुभूति करता रहता है कि संपूर्ण प्राणियों की आत्मा परमात्मसत्ता के रूप में उसके अंदर भी है, वह भी उनके साथ एक भाव रखते हुए सतत कर्म कर रहा है। यदि वह ऐसा कहता है, तो वह कर्म करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता अर्थात् ये कर्म उसके लिए बंधन-आसक्ति का कारण नहीं बनते। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस बात को इस तरह कहा है, ‘मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवन्त’ अर्थात् इस भाव से कर्म कि मैं तो सेवक मात्र हूँ, ये सारे कर्म तो भगवान के लिए ही है। यह सेव्य भाव जिस दिन आ जाता है, उस समय व्यक्ति को कोई भी कर्म बंधनों में नहीं बाँधता। किसी भी कर्म की फिर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। फिर वे पुण्यों की सूची में जुड़ते चले जाते है। कोई क्रोध दिलाए, तो क्रोध नहीं आता। कोई तारीफ करे, तो हम प्रभावित नहीं होते। एक तरह से स्थितप्रज्ञ जैसी स्थिति हमारी हो जाती है। कोई भी कर्म करते हुए भी ऐसा लगता है कि हम उसमें तनिक भी लिप्त नहीं है। हम तो उस कर्म के निमित्त मात्र है।
किसी के भी मन में प्रश्न आ सकता है कि श्रीकृष्ण यह क्या कर रहे है। अहंकाररहित व्यक्तित्व वाला व्यक्ति क्या कर पाएगा? वह तो कर्मों की दृष्टि से नाकारा और किसी भी जाति-समाज की उन्नति में बाधक ही सिद्ध होगा। यदि ऐसा होता, तो श्रीकृष्ण अर्जुन को ऐसी शिक्षा क्यों देते। वस्तुतः वे इन श्लोकों के माध्यम से अर्जुन को साधक के रूप में विकसित करने का प्रयास कर रहे है। अहंकाररहित दृष्टिकोण का विकास ही वह साधना है जो कर्मयोगी के रूप में अर्जुन को करना चाहिए-ऐसा श्रीकृष्ण का मानना है। वे कहते है कि अहंभाव-कर्त्ताभाव का समावेश करता है। यह यहाँ तक तो ठीक है कि कर्म का गौरव हम अनुभव करे, किंतु यदि यह अनावश्यक रूप से निरर्थक जिम्मेदारियों का बोझ आप पर लाद दे व सारी दुनिया के आप ठेकेदार स्वयं को महसूस करने लगे तो फिर मानसिक तनाव-अशाँति का ही कारण बनेगा।
स्वामी चिन्मयानंद जी (चिन्मय मिशन) बड़े सुँदर ढंग से इसे समझाते हैं, “एक नदी बह रही है। वह स्वभावतः ही वह रही है, लेकिन आप यदि किसी चट्टान पर बैठ जाएँ और नदी के जल में अपना पैर डाल-हिलाने लगे तो यह आपकी मौज है। परंतु यह अनुभव करना और फिर आग्रह करने लगना कि मेरा पैर हिलाना ही नदी के प्रवाह का कारण है- “मैं ही नदी को बहा रहा हूँ।”- एक मिथ्या दृष्टिकोण है। इससे हमें थकावट, चिंता और मानसिक तनाव की ही प्राप्ति होगी।” (पृष्ठ 225, ‘मानव निर्माण कला’ से)।
कर्मों द्वारा वासनाओं से मुक्ति कैसे मिले
हम सभी को बिना अहंकेंद्रित कामनाओं के जीने और श्रेष्ठतम ढंग से कार्य करते हुए सेवा करते रहने की कला सीखनी ही होगी। इसी में हमारे जन्म की सार्थकता है, हमारा गौरव है। ऐसे ही कार्यों से हमें मानसिक शाँति मिलेगी। कर्मों द्वारा अपने व्यक्तित्व को वासनाओं से कैसे मुक्त किया जाए, इसकी कार्यशाला श्रीकृष्ण इस श्लोक में हमें समझा रहे है। ऐसा करने के लिए उनके अनुसार तीन बातों की आवश्यकता है।
1. सबसे पहले अपने को श्रेष्ठ योगी बना, हर श्वास में योगमय जीवन जीते हुए अपनी बुद्धि-अंतःकरण को शुद्ध करना-ऐसे कर्म करना। (योगयुक्तो विशुद्धात्मा)
2. फिर अपने मन को अपने वश में करना, इंद्रियों पर अपना नियंत्रण स्थापित करना। (विजितात्मा जितेन्द्रियः)
3. सभी जीवों में वही परमात्मा समाया है, जो अपने भीतर है, इस तथ्य की सतत अनुभूति करते हुए निरंतर कर्म करते रहना। (सर्व भूतात्म भूतात्मा)। यदि ऐसा होता है, तो कर्म बंधन का कारण नहीं बनते। (कुर्वन्नपि न लिप्यते)
हर कर्म निःस्वार्थ समर्पण भाव से हो, दैनंदिन जीवन में ऐसा करते हुए प्रतिक्षण हम अपनी वासनाएँ क्षीण करते चले, यही संक्षोभों-विक्षोभों से मुक्ति का एकमात्र मार्ग है। इससे बुद्धि में चल रहे सारे विभ्रम शाँत हो जाते है। बुद्धि के शाँत होते ही मन भी स्वाभाविक रूप से नियंत्रित हो जाता है। जिस पल हमारी कामनाएँ-इच्छाएँ तिरोहित हो जाएँगी, उसी पल हम अपने अंदर शाँति का साम्राज्य स्थापित कर लेंगे, इंद्रियाँ हमारी अपने नियंत्रण में आ जाएँगी। जब बुद्धि, मन व काया तीनों हमारे द्वारा साध लिए गए, तो साधक अपनी आत्मसत्ता में एक ऐसे सत्य की अनुभूति करने लगता है कि उसकी अंतरात्मा ही सब भूतों में, जीवमात्र में स्थित आत्मा है। वह एक विलक्षण प्रसन्नता की अनुभूति करने लगता है।
कुर्वन्नपि न लिप्यते
आत्मतत्व की अनुभूति कैसे हो? यह प्रश्न कई साधकों के मन में आता रहता है। इसके लिए वे हाथ-पाँव मारते व कई तरह के पुरुषार्थ करते है। कोई किताबें चट कर जाता है, तरह-तरह के ग्रंथों में उसे ढूंढ़ने की कोशिश करता है, वैरागी होने का ढोंग रचता है व अकर्मण्य बन किसी तरह ध्यानस्थ होने की बात मन में विचारता है। पर आत्मा का दर्शन उसे ही होगा, जो श्रीकृष्ण की इस श्लोक में कही गई बातों पर अमल करेगा। जब यह होगा एवं उसे सर्वात्मा के रूप में परमसत्ता ही अपने भीतर चहुँओर दिखाई देने लगेगी, तो उसे किसी भी अवस्था में कोई भी कर्म कभी भी लिप्त नहीं कर सकते, वह अनासक्त ही बना रहेगा (कुर्वन्नपि न लिप्यते)।
सच्चा कर्मयोगी वही है, जो जीवन के विभिन्न कर्म करते हुए भी परमात्मा से कभी विलग नहीं होता। कर्म करते हुए भी कर्म नहीं करता, अकर्म की स्थिति में जीता है। उसकी आस्था उसके अनुभवों में बदल जाती है एवं तब सच्चे संन्यास का जन्म होता है। वह भावुक भी होता है, भावनाशील भी। परमार्थ परायण भी होता है तथा ईश्वर अंश जीव अविनाशी की तरह सभी के अंदर उसे वही परमात्मा की सत्ता दिखाई देती है, जो उसके निज के अंदर भी विद्यमान है। परमपूज्य गुरुदेव का जीवन इसी दर्शन से ओत-प्रोत हम देखते है।
आत्मवत् सर्वभूतेषु
‘हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ’ प्रसंग से अखण्ड ज्योति पत्रिका में एक धारावाहिक शृंखला परमपूज्य गुरुदेव की विदाई की पूर्ववेला में प्रकाशित हुई थी। इसमें उनने अपनी जीवन-साधना के तीन चरणों का उल्लेख किया था, मातृवत् परदारेषु-परद्रव्येषु लोष्ठवत् एवं तीसरा आत्मवत् सर्वभूतेषु। अपने समान सबको देखना। वे लिखते है कि कहने-सुनने में ये शब्द मामूली से लगते है और सामान्यतः नागरिक कर्तव्यों का पालन, शिष्टाचार-सद्व्यवहार की सीमा तक पहुँचकर बात पूरी हो गई दीखती है, पर वस्तुतः इस तत्वज्ञान की सीमा अति विस्तृत है। उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है, जहाँ परमात्मा के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है। साधना के लिए दूसरे के अंतरंग के साथ अपना अंतरंग जोड़ना पड़ता है और उसकी संवेदनाओं को अपनी संवेदना समझना पड़ता है। (सुनसान के सहचर, पुस्तक पृष्ठ 13 से)
वस्तुतः हमारी गुरुसत्ता ने इस तत्वदर्शन को अपने जीवन में उतारा एवं यही उनकी सिद्धि का मूल बना। वे लिखते है कि ऐसी साधना करने वाला मनुष्य अपने तक सीमित नहीं रह सकता, स्वार्थों की परिधि में आबद्ध रहना उसके लिए कठिन हो जाता है। दूसरों का दुःख मिटाने और सुख बढ़ाने के प्रयास उसे बिलकुल ऐसे लगते है मानों यह सब वह निताँत व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए कर रहा हो। जैसे ही अपनी आत्मवत् सर्वभूतेषु की संवेदना प्रखर हुई, अंदर की निष्ठुरता उसी क्षण गल-जल कर नष्ट हो गई। जी में केवल करुणा शेष रही। वही अब तक के जीवन के इस अंतिम अध्याय तक यथावत बनी हुई है। उसमें कमी रत्तीभर भी नहीं है, वरन् दिनोदिन बढ़ोत्तरी ही होती गई। (सुनसान के सहचर, पृष्ठ 17)
साक्षीभाव में पहुँचा निष्काम कर्मयोगी
सर्वभूतात्म भूतात्मा शब्द जो सातवें श्लोक में आया है, उसकी समीचीन व्याख्या ऊपर के शब्दों में हो जाती है। समस्त प्राणियों के आत्मारूपी परमेश्वर के साथ अपने को अभिन्न देखने वाले निष्काम कर्मयोगी के गुणों का वर्णन योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जो यहाँ किया है, वह काव्य की दृष्टि से अद्भुत है, ऐसे व्यक्ति स्वप्न से जाग उठते हैं, जो परम चैतन्य से अब एकाकार हो गए है। अब उन्हें निम्न अवस्थाओं के कर्म प्रभावित नहीं करते। इसीलिए अगले दो श्लोकों में श्रीकृष्ण कहते हैं-
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यञश्रृण्वन्स्पृशञिघ्रत्रश्रन्गच्छन्स्वपञश्वसन्॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्नन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥ (5/7-1)
इस प्रकार तत्व को जानने वाले साँख्य योगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ तथा आँखों को खोलता-मूँदता हुआ भी (चक्षु उन्मीलन) सभी इंद्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही है। (इंद्रियाँ विषयों में विचर रही है,) ऐसी धारणा करते हुए यह मानता है कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।
यह व्याख्या वस्तुतः पूर्व श्लोक का उत्तरार्द्ध है, जिसमें पूर्व में कहा गया था, ऐसे आत्मज्ञ व्यक्ति कर्म करके भी लिप्त नहीं होते। यह कैसे संभव हो सकता है, यहाँ बताया गया है। ‘युक्त’ अर्थात् निष्काम कर्मयोग में लगा व्यक्ति योगी जब सिद्धियों के उच्चतर आयानों पर पहुँचता है, तो वह पंच ज्ञानेंद्रियों के द्वारा दर्शन-श्रवण-स्पर्श-घ्राण-स्वाद ग्रहण तथा कर्मेंद्रियों के द्वारा गमन, निद्रा, श्वास ग्रहण, वाक्य कथन, मल-मूत्रादि त्याग, ग्रहण चक्षु उन्मीलन-निमीलन करते हुए भी वह कुछ भी नहीं करता, ऐसा मानता है, क्योंकि उसकी धारणा है कि वह निर्लिप्त है एवं इंद्रियों का सारा व्यापार स्वतः चल रहा है।
ठाकुर परमहंस देव ने एक उद्धरण के माध्यम से कहा है, एक चाँडाल माँस का बोझ लेकर जा रहा था। शंकराचार्य गंगा नहाकर आ रहे थे। चाँडाल ने उन्हें छू लिया। आचार्य ने असंतुष्ट होकर कहा कि तूने मुझे अपवित्र कर दिया। चाँडाल ने कहा, महात्मन् मैंने आपको नहीं हुआ, न आपने मुझे छुआ। आप स्वयं विचार कीजिए कि क्या आप शरीर है या मन या बुद्धि, आप क्या है? शुद्ध आत्मा तो निर्लिप्त होती है। सत्, रज, तम इन तीनों में से किसी में भी वह लिप्त नहीं है। एक तरह से चाँडाल के माध्यम से स्वयं परमात्मा ने आद्यशंकर को गीता का यह दर्शन समझाया।
द्रष्टा दिव्यकर्मी
जब यह मान्यता हो जाती है, नैव किंचित करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित। मैं कुछ भी नहीं करता, तो वह कर्त्ताभाव से मुक्त हो जाता है। इन समस्त शारीरिक क्रियाओं में कही भी उसका कर्त्ताभाव आड़े नहीं आता। आँतरिक जागरुक की इस अवस्था में वह देखता और अनुभव करता है कि इंद्रियाँ ही है, जो विषयों में विचरण करती है (इंद्रियाणीद्रिंयार्थेषु वर्तंत इति धारयन्)। ऐसी स्थिति में वह आस-पास के लौकिक क्रियाकलापों के प्रति साक्षी भाव जाग्रत् कर विकसित स्थिति को प्राप्त हो जाता है। वस्तुतः द्रष्टा बन जाता है। यह भाव विकसित होना साधना की उच्चतम स्थिति में पहुँच जाना है। अहंभाव से रहित होते ही हैं सही अर्थों में दिव्यकर्मी बन जाते है एवं समाज के एक कर्मठ सेवा बनकर पूरे उत्साह के साथ लग जाते है। बंधन मुक्ति का तत्वदर्शन-अहंभाव से मुक्ति का यह चिंतन गीता का अमृत है। जिसने इसे समझ लिया, उसने मानो ब्रह्म को पा लिया।
(क्रमशः)
रावण का सारे भूमंडल पर दबदबा था। सभी राज्य और संपन्न व्यक्ति उसे कर देते थे, पर उससे उसकी तृष्णा शाँत न हुई। उसने ऋषियों से भी कर वसूलना आवश्यक समझा। सलाहकारों ने ऋषियों की शक्ति और उनके क्रोध की बात समझाने का प्रयास भी किया, तो अहंता ने उसे कुछ महत्व न दिया। उसने व उसके साथियों ने ऋषियों के कार्य में विघ्न डाल-डालकर उन्हें रुष्ट किया। ऋषियों ने कर के रूप में एक-एक बूँद रक्त घड़े में भरकर भेज दिया, उसी से सीता का जन्म हुआ और रावण का सपरिवार विनाश के गर्त में जाना पड़ा।
मथुरा की दूसरी यात्रा
हिमालय जाते हुए वापस आने के बाद श्रीराम ने अपनी मरजी से आंवलखेड़ा की सीमा भी नहीं लाँघी थी। ननिहाल गए थे, लेकिन वह भी पिता के साथ और पूरे परिवार के साथ लौटना हुआ था। मथुरा ने श्रीराम को आकर्षित किया था। पिता के श्राद्ध कर्म के बाद एक दिन श्रीराम ने ताईजी से कहा, “माँ, अगर मैं आपको वचन दूँ कि वापस आ जाऊँगा, तो क्या आप मुझे मथुरा जाने की अनुमति देंगी?” जिस तरह अनुमति माँगी गई थी, उसने नहीं होने का सवाल ही नहीं था। पूछा कि कितने दिन में वापस लौटोगे, तो बोले यही कोई आठ-दस दिन में। ताईजी ने सहर्ष अनुमति दी। उस समय यातायात के पर्याप्त साधन नहीं थे। आंवलखेड़ा से मथुरा आने-जाने में ही तीन-चार दिन लग जाते। फिर बारह वर्ष की अबोध उम्र। एक बार तो मन हुआ कि मना कर दें, लेकिन बेटे का मन टूट जाएगा। ताईजी ने किसी को साथ ले जाने लिए कहा, लेकिन श्रीराम अकेले जाना चाहते थे। उन्होंने वैसा ही व्यक्त किया और अनुमति मिल गई। अगले दिन तीन-चार जोड़ी कपड़े और ओढ़ने-बिछाने के लिए दरी, चादर के अलावा आने-जाने, रहने आदि के लिए खरच का इंतजाम कर दिया।
गाड़ी, घोड़े और रेल से यात्रा करते हुए श्रीराम दूसरे दिन मथुरा पहुँचे। वहाँ कुछ रिश्तेदार रहते थे, लेकिन उनके घर न जाकर श्याम जी की बगीची में पड़ाव डाला। द्वारकाधीश के दर्शन कर विश्राम घाट आदि जगह होते हुए वे वृंदावन मार्ग पर स्थित एक बगीची में आ गए। छोटा-सा कुआँ जिसे वहाँ कुइया कहा जाता था, नहाने और विश्राम करने की सुविधा के साथ पास ही बने दो-चार खुले-खुले के कमरे वाली बगीचियाँ मथुरा-वृंदावन के रास्ते में थी। ब्रज क्षेत्र में इस तरह की बगीचियों की भरमार रही है। संपन्न लोग यहाँ शाम का समय बिताया करते थे। इन जगहों पर कुछ पेड़ और फूलों के पौधे भी लगे होते थे। सब मिलकर मनोरम वातावरण बना देते। कुइया के पास किसी देवी-देवता की मूर्ति भी होती है। मूर्ति प्रायः हनुमान की हुआ करती, लेकिन कही-कहीं राधा-कृष्ण, दुर्गा या किन्हीं संत-महात्माओं की भी होती। श्रीराम जिस बगीची में ठहरे, वहाँ कोई देवी प्रतिमा लगी थी। पूछा कि किस देवी की है, तो नियमित आने-जाने वाले भी स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए। कोई दुर्गा की तो कई लक्ष्मी या राधा और सीता की बताकर रह गए, लेकिन वह प्रतिमा श्रीराम को बहुत भाई।
करीब एक सप्ताह तक श्रीराम वही रहे। सुबह नहा-धोकर निकल जाते और तीसरे प्रहर लौटते। मथुरा-वृंदावन में जगह-जगह भंडारे चलते। कुछ नहीं करते हुए भी वहाँ आराम से गुजर हो सकती है। आज इस आश्रम में, तो कल उस आश्रम में। भंडारा खाकर आज भी कई लोग गुजारा चला लेते है। श्रीराम इन आश्रमों में तो जाते थे, लेकिन भोजन-प्रसाद में उन्होंने कभी रुचि नहीं ली। घर से चलते हुए माँ ने जो सत्तू और भूना हुआ दलिया बाँधा था, उसी का आहार करते। बदलाव के लिए द्वारकाधीश मंदिर के पास बनी फूलचंद पेड़े वाले की दुकान या चौक से कुछ हलका-फुलका खाद्य खरीद लेते थे। बाकी समय भ्रमण में व्यतीत करते।
बाबा से साक्षात्कार
भ्रमण में मंदिर आदि स्थानों पर तो एकाध बात ही गए। कुँज, आश्रम और यमुना के किनारे ही उनका समय ज्यादा बीता। लग रहा था जैसे कुछ खोज रहे है। बगीची में जितनी देर रहते, देवी-प्रतिमा पर बार-बार ध्यान देते। उठकर उसे देखने जाते। जो भी आता उससे पूछते, यह किनकी प्रतिमा है? एक दिन विलक्षण ढंग से उनके प्रश्न कर उत्तर मिला। हुआ यह कि कोई संत बगीची में आए। नाम था उनका बाबा रामदास। लेकिन लोग उन्हें काठिया बाबा कहते थे। उन्होंने कौपीन की जगह लकड़ी का बनाया लंगोट जैसा आवरण पहन रखा था। बाबा ने उसे खास ढंग से तैयार कराया था कि वह कमर में अटका रहता था और जरूरत पड़ने पर उतारा या ढीला भी किया जा सकता था। काठ की कौपीन पहनने के कारण ही लोग उन्हें काठिया बाबा कहते थे।
काठिया बाबा वृंदावन में रहते थे, लेकिन अपना कोई आश्रम नहीं बनाया था। उस दिन सुबह पाँच बजे वे बगीची में आ गए और ‘जय अंबे’ का उद्घोष किया। कुइया पर स्नान कर वे पास ही स्थित भगवती के दर्शन के लिए गए। देर तक बैठे रहे। पूजा-पाठ कुछ करते दिखाई नहीं दिए। स्पष्ट वे ध्यान कर रहे थे। श्रीराम उन्हें कुतूहल से देख रहे थे। ध्यान करके उठे, तो लपककर उनके चरण छूने लगे। काठिया बाबा ‘ना बाबा ना’ कहते हुए दस कदम पीछे हट गए। फिर सहज होकर बोले, “कहाँ से आए हो?” श्रीराम ने अपना सामान्य परिचय दिया। बाबा ने पूछा, “कहाँ जाना है?” श्रीराम ने उत्तर दिया, “गंतव्य तो सभी का एक है, लेकिन जाना कैसे है, यह पता नहीं है।” सुनकर काठिया बाबा के चेहरे पर प्रसन्नता फूट पड़ी। कहने लगे, लेकिन तुम तो अपनी दिशा में ठीक जा रहे हो। कैसे कहते हो मार्ग नहीं मालूम?
काठिया बाबा ने बताया अपने बारे में
दोनों में चर्चा छिड़ गई। देर तक बातचीत चलती रही। काठिया बाबा ने अपनी साधना और अब तक की यात्रा के बारे में विस्तार से बताया। उन्हीं बाबा से यह समाधान हुआ कि देवी प्रतिमा गायत्री की है। यहाँ कभी एक आश्रम हुआ करता था। तीन-चार सौ साल पहले एक संन्यासी के सान्निध्य में बीस-पच्चीस साधक हमेशा रहते थे। वे गायत्री जप करते और वेद-शास्त्रों के अध्ययन में निरत रहते। बाबा ने ही बताया कि सैकड़ों साल पहले इस स्थान पर भगवान प्रवचन भी हुआ करते थे। अपने बारे में बाबा ने जो बताया, उसके अनुसार उनके मन में सहज ही प्रेरणा उठी कि गायत्री मंत्र का जप अधिक परिमाण में किया जाए। यज्ञोपवीत के समय मंत्र दीक्षा लेने ही रखी थी, साधना शुरू हुई।
बाबा का जन्म कहाँ हुआ या उनके परिवार में कौन है? इस बारे में कुछ नहीं बताया। संन्यासी के लिए अपने पूर्व आश्रम का परिचय देना वर्जित है। साधक जब संन्यास लेता है, तो प्रतीकात्मक रूप से उसकी अंत्येष्टि भी कर दी जाती है, विधिवत् उसकी अर्थी सजाई जाती है, उसे चिता पर लिटाया जाता है और आग लगाने के बाद वापस उतार लिया जाता है। इन क्रियाओं का उद्देश्य यह बोध जगाना है कि अब नया जन्म हो रहा है। पिछले या अब तक के लौकिक जीवन को भूल जाना ही श्रेयस्कर है। वह जीवन समाप्त हुआ। मृत्यु जिस तरह समूचा व्यक्तित्व, पहचान और उपलब्धियाँ छीन लेती है, उसी तरह अब तक का जीवन भी तिरोहित हुआ।
काठिया बाबा ने इतना ही बताया कि विद्या पढ़ते थे। बाद में घर वापस आए, तो इच्छा क्षण-प्रतिक्षण बलवती होने लगी कि गायत्री अनुष्ठान किया जाए। घर के पास ही एक बगीचा था। बगीचे में एक बड़ा वटवृक्ष था। उसके नीचे आसन जमाने की ठानी और कवच आदि विधि-विधान के साथ अनुष्ठान आरंभ कर दिया। विधि-विधान गुरु के घर में भलीभाँति सीखा हुआ था। कोई कठिनाई नहीं हुई।
अनुष्ठान का एक भाग पूरा होते-होते प्रेरणा उठी कि शेष जप ज्वालामुखी जाकर पूरा किया जाए। प्रेरणा का स्वरूप ऐसा था, जैसे कोई सामने खड़ा होकर कह रहा हो या वटवृक्ष से आवाज आ रही हो। पूर्व आश्रम में बाबा का जहाँ निवास था, वहाँ से ज्वालामुखी लगभग सत्तर किलोमीटर दूर था। वटवृक्ष के नीचे से उठकर बाबाजी घर नहीं गए। सीधे ज्वालामुखी की ओर रवाना हो गए। बाबा के साथ उनका एक भतीजा भी जप-तप किया करता था। वह भी पीछे-पीछे चल दिया। दोनों अविराम चलते रहे। रास्ते में एक महात्मा के दर्शन हुए। किसी भूमिका या परिचय का आदान-प्रदान किए बिना उन्होंने पूछा, वैराग्य लोगे? काठिया बाबा ने भी आगा-पीछा नहीं सोचा और कह दिया, हाँ। वैराग्य की तैयारी चलने लगी, भतीजे ने रोका। रोया और हठ भी किया कि संन्यासी मत बनो। कोई असर नहीं हुआ। वह उलटे पाँव दौड़ा गया और अपने दादाजी को बुला लाया।
काठिया बाबा के पिताजी आए, तब तक देर हो गई थी। उनके हस्तक्षेप जैसी स्थिति नहीं रह पाई थी। पिताजी ने आकर देखा, तो बेटा संन्यासी हो चुका था। वे दुःखी हुए। पुत्र को मनाने लगे। घर वापस चलने के लिए कहा। बेटे ने कहा कि वैराग्य धारण किया जा चुका है। इस आश्रम से वापसी नहीं होती। पिताजी ने समझाया कि किसने देखा? मुँडन ही तो हुआ है। गाँव चलकर कोई दूसरी वजह बता देंगे। किसने देखा है कि संन्यासी हो गए। काठिया बाबा पर जरा भी असर नहीं हुआ। नए आश्रम के अनुसार उन्होंने पिता को पहचानने से भी मना कर दिया। थक-हारकर वे वापस चले गए।
जहाँ संन्यास लिया था, वही वटवृक्ष के नीचे काठिया बाबा ने आसन लगाया। देर गत तक ध्यान करते रहे। आधी रात बीत गई। कुछ देर सो गए और सुबह उठकर फिर जप-ध्यान में लग गए। ध्यान-समाधि के इसी क्रम में भगवती का साक्षात्कार हुआ। काठिया बाबा ने बताया कि माँ ने वरदान माँगने के लिए कहा। अपनी कोई कामना शेष नहीं रह गई थी। कह दिया कि वैराग्य ले चुका हूँ, अब कोई कामना शेष नहीं रही। इसका उदय ही न हो, ऐसा आशीर्वाद दीजिए। काठिया बाबा को कई तरह की सिद्धियाँ प्राप्त थी। वे जो कह देते, वही हो जाता था। आर्त्तभाव से उनकी शरण गए लोगों को उन्होंने कई बार कष्टों से छुटकारा दिलाया।
विलक्षण बगीची व गायत्री विग्रह
काठिया बाबा ने बगीची में ठहरे श्री राम को उस स्थान के संबंध में विलक्षण बातें बताई। उनमें एक तो यही थी कि त्रेता युग में इस जगह दुर्वासा मुनि ने गायत्री साधना की थी। कंस का वध करने के लिए जाते हुए श्रीकृष्ण और बलराम ने यहाँ संध्या वंदन किया था। समय समय पर हुए या अनुष्ठानों के बारे में भी बताया और अपने साथ चलने के लिए कहा। श्री राम उनके साथ चल दिए। बगीची से करीब तीन किलोमीटर दूर एक टीले के पास जाकर वे रुक गए। टीले के पास इन दिनोँ मथुरा में एक कॉलेज चल रहा है। वयोवृद्ध लोग इस टीले को गायत्री टीले के नाम से जानते है।
बाबा श्री राम को टीले के ऊपर ले गए। वहाँ एक कुटिया में वयोवृद्ध संत लेटे हुए थे। दोनों ने उन्हें प्रणाम किया। इन संत का नाम बूटी सिद्ध महाराज था। तीस चालीस वर्ष से उन्होंने मौन व्रत लिया हुआ था। किसी से बोलते नहीं थे। जरूरत होती, तो इशारों से बात कर लेते। कभी कभार लिखकर भी अपनी बात कह देते। वे अलवर के रहने वाले थे और दसियों साल से यहाँ आकर रहते थे। काठिया बाबा ने ही बूटी सिद्ध महाराज के बारे में बताया कि उन्होंने एक करोड़ जप किया है। निष्ठापूर्वक किए गए जप से उन्हें गायत्री का अनुग्रह मिला और आत्मसाक्षात्कार हो गया।
सिद्धि के बाद उन्होंने टीले पर गायत्री की एक प्रतिमा स्थापित की और मथुरा के चतुर्वेदी ब्राह्मणों का भंडारा किया। कुटिया में गायत्री की स्थापना के बाद वह अपने ढंग से भव्य और अद्वितीय आयोजन था। इसके लिए आवश्यक साधनों की व्यवस्था कहाँ से हुई? इस बारे में बूटी सिद्ध बाबा के अलावा किसी को कुछ नहीं मालूम। लोगों का मानना है कि बूटी बाबा के पास कोई विलक्षण यंत्र है। उसकी आराधना करते ही साधन अपने आप प्रकट हो जाते हैं। बाबा के पास दुखी, संतप्त और रोगी लोग भी आया करते थे वे कुछ कहते तो नहीं थे, हाथ उठाकर सिर्फ आशीर्वाद देते थे। उनके हाथ का उठना ही संकट का निवारण होना माना लिया जाता था और कई लोगों के संकट सचमुच दूर हो भी जाते थे।
संतों के आशीष
धौलपुर ओर अलवर रियासत के राजा उनके पास आया करते थे। बूटी बाबा स्वयं कही नहीं जाते थे। एकांत सेवन के लिए जाना होता, तो कुटिया के पास बनी गुफा में चले जाते थे। काठिया बाबा ने बूटी सिडडडड महाराज ने श्रीराम का परिचय कराया। उनकी साधना और निष्ठा से बूटी सिद्ध बाबा अभिभूत हो उठे। दोनों हाथ उठाकर आशीष दिया और फिर गले से भी लगा लिया। काठिया बाबा इसके बाद अपनी राह चले गए और श्रीराम वापस बगीची में आ गए। इस भेंट के कुछ दिन बाद बूटी सिद्ध बाबा ने अपना शरीर छोड़ दिया।
इस बगीची में ही किसी श्रद्धालु से सुना था कि वृंदावन में यमुना के पार एक संत आए है। वे यमुना और गंगा का किनारा छोड़कर कहीं नहीं जाते। किनारे पर एक मचान बनाकर रहते है। वहीं बैठकर लोगों से बातें करते है। कभी-कभार मचान के पास जमीन पर बनी झोपड़ी में भी रहते है। साधना-उपासना के बाद थोड़ा-बहुत समय बचता है, वह जनसंपर्क में लगाते है। उन सब के बारे में और लोगों से तरह-तरह की बातें सुनी। उन्हें भूख-प्यास नहीं लगती। कभी किसी ने कुछ आहार लेते नहीं देखा। उन्हें शौच आदि के लिए भी नहीं जाना पड़ता। भूख-प्यास पर विजय प्राप्त कर लेने से काफी समय बच जाता है। उस समय का उपयोग ध्यान-धारणा में करते है।
उन संत की आयु के बारे में भी विचित्र बातें कही जाती थी। कोई कहता कि वे दो सौ वर्ष के है, किसी के अनुसार छह-सात सौ साल के है। हमारे बाबा या परबाबा ने भी उन्हें इसी अवस्था में देखा था। शरीर और स्वास्थ्य के अनुसार वे तीस-पैंतीस साल से ज्यादा के नहीं लगते थे। लोगों का कहना था कि योग की सिद्धियों के आधार पर वे अपने आपको इस योग्य बनाए रखते है। यह भी कि वे जब चाहे अपना कायाकल्प कर लेते है। उसी शरीर को नया कर लेते है या चाहे तो पुराने शरीर का त्याग कर वैसे ही रूप-रंग का नया शरीर रच लेते है। श्रीराम इन बातों को कुतूहल के साथ सुनते। सुनकर कोई प्रतिक्रिया नहीं करते। उनके मन में सिर्फ उत्सुकता जगी और वृंदावन की राह पकड़ी। गरमी का मौसम था, यमुना तब आज की तरह सूखी नहीं थी। काफी पानी बहता था। इन दिनों मई, जून के महीनों में इतनी सूख जाती है कि उसे पैदल चलकर पार किया जा सकता है, लेकिन तब बहुत पानी बहा करता था। (क्रमशः)
त्रेता में भगवान राम के साथ निषादराज का भी अवतरण हुआ था। जनजाति वर्ग के, दूसरों को नाव से नदी पार कराने वाले निषादराज ने वनवासी श्रीराम, माँ सीता व लक्ष्मण जी को पैर पखारने के बाद नदी पार कराई थी। भगवान राम ने अंत तक अपनी मित्रता निभाई एवं अपने सखा को जिन्हें उनने गले लगाकर सम्मानित किया था, अपने राज्याभिषेक के समय पुनः याद किया। ऐसे ही इस युग के एक निषादराज स्तर के भक्त की कथा-गाथा यह है। यह भक्त मल्लाह तो नहीं था, पर घनघोर जंगलों में रहने वाला निमाड का एक आदिवासी था। इसने भी इस युग के श्रीराम परमपूज्य गुरुदेव की प्रज्ञावतार की सत्ता का सान्निध्य पाया एवं उनकी अनंत कृपा उस पर बरसी।
अपनी बीमारी का इलाज कराने यह आदिवासी भाई अपने गाँव से प्रायः 7 किलोमीटर दूर सालीकलाँ पहुँचा। वहाँ संयोग से वह जिन चिकित्सक डॉ. सिकरवार के पास गया, वे परमपूज्य गुरुदेव के शिष्य थे। क्लीनिक में गुरुदेव-माताजी रूपी ऋषियुग्म के फोटो लगे थे। युवक आदिवासी इन्हें देख अपनी बीमारी की बात भूल गया व डॉक्टर साहब से पूछने लगा कि ये दोनों कौन हैं? परिचय कराने पर वह बोला कि मैं बड़ी उलझन में पड़ा हूँ। रोज स्वप्न में देखता हूँ कि दो पीपल के पत्ते मेरे सामने से उड़ते आ रहे हैं। उनमें मुझे श्रीराम व सीता के दर्शन हो रहे हैं। थोड़ी देर में यह दृश्य बदल जाता है व इसके बदले मुझे इन बाबाजी व माताजी के दर्शन होने लगते हैं। जब मैंने उनके चेहरे पर ध्यान देकर सोचा, तो वे मुस्कराने लगे। बोले, डेमनिया, तुम्हें मेरा काम करना है। अपनी जाति का उद्धार करना है। तुम कई जन्मों से हमसे जुड़े हो। एक बार हमारे पास आ जाओ। अब मुझे समझ में नहीं आता कि इनसे मिलने कहाँ जाऊँ?
डॉ. सिकरवार ने यह सब जानने के बाद कहा, इनसे मिलने चलोगे। डेमनिया ने आर्थिक कमी एवं यात्रा रूट की अनभिज्ञता की बात कही, तो डॉ. सिकरवार ने कहा कि यात्रा खरच मैं वहन करूंगा। पहले तुम ठीक हो जाओ। दवा दी गई एवं यात्रा कर दोनों गुरुधाम पहुँचे।
कुछ देर प्रतीक्षा के बाद गुरुदेव का ऊपर से बुलावा आ गया। ऐसा लगा कि वे पहले से ही प्रतीक्षा कर रहे थे। गुरुवर ने डेमनिया को छाती से लगा लिया व कहा कि तुम मेरे निषादराज हो। रामावतार के समय की मित्रता अब भी निभाओगे ना? डेमनिया की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। गला रुँध गया। कहने लगा कि आज मेरा जीवन धन्य हो गया है। मेरा तन-मन सब आपको चरणों में अर्पित है। आप जो कहेंगे, वही करूंगा। यह वर्ष था 1979 का। उसी साल शक्तिपीठों के निर्माण की घोषणा हुई थी व पूज्यवर का मन था कि आदिवासी क्षेत्र में भी एक पीठ बननी चाहिए। वे डेमनिया भाई से बोले, तुम अपने यहाँ भी एक शक्तिपीठ बनाओ। हमारा तुम्हारे घर आने का मन है। जब पीठ बन जाएगी, तब हम प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में आएँगे। तुम्हारी पीठ से आदिवासी क्षेत्र के उद्धार की कई योजनाएँ चलाने का मन है।
डेमनिया असमंजस में पड़ गया कि यह सब कैसे संभव होगा। जो अपने परिवार के रहने के लिए मकान भी नहीं बना पाया हो, वह भला शक्तिपीठ जैसा भव्य निर्माण कैसे बना पाएगा? उसके असमंजस को भगवान ने ताड़ लिया। भक्त को आश्वस्त करते हुए वे बोले कि तुम मात्र शुरुआत कर देना, शेष काम पूरा हो जाएगा, तुम चिंता लेशमात्र भी न करना। प्रभु के आश्वासन को सुनकर डेमनिया ने वही संकल्प लिया कि मैं अपनी पाँच एकड़ भूमि इस कार्य के लिए दूँगा एवं निर्माण हेतु स्वनिर्मित ईंटें लगवा दूँगा।
संकल्प फलित हुआ। सुदामा-निषादराज का संस्करण दुहराया गया। डेमनिया के छोटे से त्याग ने एक शक्ति पीठ का निर्माण कर दिया। देखते-देखते जनसहयोग जुटता चला गया एवं एक वर्ष की अवधि में ही सुदूर घने जंगल व पहाड़ियों के बीच प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ बन गई। अब भगवान की वायदा निभाने की बारी थी।
परमपूज्य गुरुदेव प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरे के क्रम में सेंधवा होकर सालीकर्ता पहुँचे। शक्तिपीठ स्थल जहाँ था, वहाँ तक गाड़ी नहीं जा सकती थी। लगभग दो किलोमीटर पैदल का रास्ता था। डेमनिया की झोंपड़ी भी वहीं कुछ दूरी पर थी जहाँ वह परिवार सहित रहता था। गुरुदेव पैदल कीचड़ में, ऊबड़-खाबड़ जमीन में होते हुए शक्तिपीठ पहुँचे। प्राण प्रतिष्ठा उत्सव संपन्न हुआ। पूरे निमाड़ के परिजन पहुँचे थे। तभी तृप्त हो गए। गुरुदेव के भोजन की व्यवस्था परिजनों ने अलग से एक सेठ जी के यहाँ राजमार्ग पर एक पक्के मकान में रखी थी, किन्तु भक्तवत्सल गुरुवर तेज कदम बढ़ाते हुए डेमनिया की झोंपड़ी पर पहुँच गए व कहने लगे कि जो बना है, वही खा लूँगा। बता, क्या बनाया है मेरे लिए। कहाँ खिलाएँ- कहाँ बिठाएँ- किंकर्तव्यविमूढ़ डेमनिया कभी इधर भागे कभी उधर। इतने में डेमनिया की पत्नी चार ज्वार की मोटी रोटी, मूँग की दाल व दही एल्युमीनियम की थाली में परोस लाई। पुरा भोजन गुरुदेव ने चाव से खाया व कहने लगे कि मेरी कई जन्मों की भूख तृप्त हो गई। पिछली बार की तेरे साथ भोजन करने की आकाँक्षा पूरी हो गई। साथ में उनने दो-तीन कौर डेमनिया को भी खिलाए। यह दृश्य देख उपस्थित समुदाय धन्य हो गया। सुना भर है कि सुदामा के चावल व विदुर के केले के छिलके भगवान कृष्ण ने खाए थे, पर इस युग में श्रीराम ने उसी परंपरा को निभाकर यह सिद्ध कर दिया कि दुनिया में कोई ऊँचा-नीचा, बड़ा छोटा नहीं है। भगवान तो भाव के भूखे होते हैं। उन्हें तो बस वही चाहिए। भोजन कर सभी को आशीर्वाद दे गुरुदेव आगे बढ़ गए व भविष्य की ओर संकेत कर गए कि आगे चलकर इस केंद्र का और भी विस्तार होगा।
त्याग समर्पण की गाथा तो कइयों की है। ढेरों व्यक्तियों ने अपने साधन गुरुवर को दिए हैं, पर डेमनिया के त्याग व समर्पण का आज मूल्याँकन करें तो वह करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से भी अधिक है। उस छोटे से शक्तिपीठ से कार्य कर डेमनिया ने सैकड़ों आदिवासी बंधुओं के जीवन को बदल दिया। शराब, भाँग, गाँजा, तंबाकू, बीड़ी आदि व्यसनों को छुड़ाने का उसने अभियान चलाया। पढ़ा-लिखा न होने पर भी वह उन्हीं की भाषा में प्रवचन भी करता है, जो सभी के गले उतरते चले जाते हैं। वह या कर्मकाँड भी संपन्न करा लेता है। उसकी पत्नी, बच्चे, भाई, बहुएँ शांतिकुंज के एक माह के युगशिल्पी सत्रों में भाग ले चुके हैं। पूरा परिवार मिशन के प्रचार प्रसार में अहर्निश लगा हुआ है।
डेमनिया अपने जाति बंधुओं में माँसाहार छुड़ाने के लिए ऐसे तर्क देता है कि लोग उसकी बात सुनकर माँस खाना भी छोड़ देते हैं। वह कहता है कि मनुष्य योनि में आने से पहले हम चौरासी लाख योनियों में भटकते हैं। हम जिस मुर्गे या बकरे को मारकर खा रहे हैं, हो सकता है कि उस योनि में हमारा कोई पूर्वज हो। क्या हम अपने पूर्वजों को मारकर खा सकते हैं? यह प्रश्न वह सभी से पूछता है। फिर खुद ही जवाब देता है, कदापि नहीं। इस मार्मिक तर्क को सुन निमाड़ के आदिवासी क्षेत्र के बहुत से व्यक्तियों ने माँसाहार छोड़ दिया है।
यही नहीं, डेमनिया भाई ने बलिप्रथा बंद करा दी एवं शराब का ठेका बंद करा दिया। अब गाँव में आस-पास कही भी देशी शराब कोई नहीं पीता। हाँ गैर आदिवासी तथाकथित प्रगतिशील से उसकी झड़प होती रहती है, जो विदेशी शराब के नाम पर वहाँ नशे का व्यापार फैलाना चाहते रहते हैं, पर अभी भी उसके क्षेत्र में उन्हें सफलता नहीं मिली है।
डेमनिया गाँव का सरपंच भी रहा है। मिशन से जुड़ने के बाद उसकी प्रतिष्ठा भी बढ़ी है साथ ही ईर्ष्यालु भी। एक बार किसी कार्यक्रम को संपन्न कराने वह सपरिवार गाँव से बाहर गए थे, तो किसी ने घर में आग लगा दी। कपास की फसल जो घर में रखी थी, उसे काफी नुकसान पहुँचा। हजारों का नुकसान हुआ, पर डेमनिया पर विदेह की तरह इसका कोई प्रभाव न पड़ा। उसने कहा, जो भी था गायत्री माता व यज्ञ पिता का दिया था। उन्हीं के पास चला गया। हाँ, यह अवश्य हुआ कि जिसने यह काम किया था, उसे प्रभु ने स्वयं दंड दे दिया।
डेमनिया व्यावहारिक अध्यात्मवाद से परिपूर्ण व्यक्तित्व का नाम है। वैसा ही सादा रहन-सहन। ठंड हो या तेज धूप, वह वैसे ही पैदल नंगे पाँव चलता है। पीली धोती, कुरता ही पहनता है। स्वयं अपने खेत में परिश्रम आज भी करता है। उसने जन जागरण हेतु कार्यकर्ताओं की कई टोलियाँ प्रशिक्षित की हैं, जो बैलगाड़ी पदयात्रा द्वारा गिरीवासियों, सुदूर जंगलों तक जाती हैं। प्रलोभनवश जिनने धर्मांतरण कर लिया था, उन भाइयों को भी उसने पुनः यज्ञ पिता-गायत्री माता से जोड़ा है। प्रत्येक ऋषि पंचमी पर सामूहिक यज्ञोपवीत परिवर्तन का आयोजन वह करता है, जिसमें ढेरों आदिवासी भाई बहन एकत्र होते हैं। जिस गाँव में चोरी करके घर चलाने वाले लोग रहते थे, उन्हें भी पट्टा दिलाकर खेती कराके उसने स्वावलंबी बना दिया। भूमि सुधार, उन्नत कृषि, जलागम विकास की योजनाओं को व वृक्षारोपण अभियान को डेमनिया ने गति दी है। इस भक्त के बारे में जितना कहा जाए, कम है। सच है कि गुरुकृपा जिस पर होती है, उस पर सभी अनुदान बरसते हैं। ऐसे हैं हमारे डेमनिया भाई।
एक खुशखबरी हमारे परिजनों को मिली होगी एवं न मिली हो, तो अब हम दे रहे हैं कि श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट शाँतिकुँज, हरिद्वार को दिए गए अनुदानों पर सौ प्रतिशत आयकर में छूट मिल गई है। यह छूट धारा 13 ।4 के अंतर्गत मिशन के द्वारा स्थापित देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कार्यों के विस्तार, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन के क्षेत्र में किए जाने वाले कार्यों के निमित्त मिली है। बड़े-बड़े कार्य करना हो, तो इस स्तर का प्रमाणीकरण संस्था को मिलना अनिवार्य था एवं वह भारत सरकार के एक अध्यादेश द्वारा 26 जुलाई, 22 को पारित हो गया। सभी परिजन जाते हैं कि गायत्री परिवार ने कभी भी सरकार से कोई अनुदान किसी भी कार्य के लिए नहीं लिया। परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि सरकार जनता से लेती है व किसी को जब देती है, तब जनता के हित के लिए मिली राशि में से देती है। अतः स्वैच्छिक संस्थाओं को सरकार से नहीं, सीधे जनता से लेना चाहिए।
परमपूज्य गुरुदेव के इन निर्देशों को ध्यान में रखते हुए ही हमने बड़ी विनम्रता से राज्य केंद्रीय सरकार से कोई भी अनुदान न लेने की शर्त पर विश्वविद्यालय खड़ा करने का संकल्प लिया। आगे भी कभी सरकार के समक्ष हम हाथ नहीं पसारेंगे, ऐसा हम गुरुसत्ता को सुनिश्चित आश्वासन देते हैं।
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की कीमती मशीनें व भवन जब खड़े किए गए, तब विज्ञान व तकनीकी विभाग से शोध एवं विकास संस्थान (आर एंड डी इंस्टीट्यूशन) की मान्यता मिलने की बात आई थी। इससे लाभ बहुत मिलता, पर नुकसान यही था कि अनुदान लेना अनिवार्य था। पूज्यवर ने कहा कि हमें जनता यह मान्यता देगी एवं उसकी मान्यता सर्वोपरि मानी जाएगी। यही दुआ व इतना बड़ा तंत्र खड़ा हो गया। अब उससे भी सौ गुनी बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। आयुर्वेद एवं वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों (ब्।डडडडड) पर जो शोध अनुसंधान तंत्र खड़ा होना है, स्वावलंबन हेतु जो नए प्रोजेक्ट बनने हैं, उनके शिक्षण प्रशिक्षण हेतु प्रायः दो सौ करोड़ रुपये की राशि की आवश्यकता अगले दिनों पड़ेगी। निर्माण कार्य चालू है एंपडडडड प्रायः बीस करोड़ की राशि का निर्माण होकर विश्वविद्यालय चालू हो गया है। इंडाँलाजी (भारतीय प्राच्य विद्याओं) के पुनर्जीवन का एक पूरा तंत्र अभी और खड़ा होना हैं।
बूँद-बूँद से सरोवर भरता है, वह उक्ति तो सही है, पर उसमें समय लगता है। हमें तो यह कार्य आगामी 3 से 6 वर्ष में कर ही देना हैं, क्योंकि कार्य हाथ में ले लिया गया है। अब यदि रुकेगा, तो मूल संकल्प में अवरोध आएगा, इसीलिए इस अधिसूचना के माध्यम से परिजनों पाठकों द्वारा श्रीसंतों उद्योगपतियों- संस्कृति में रुचि रखने वाले बड़े घरानों से कहा जा रहा है कि व आयकर छूट का लाभ भी लें एवं उदारतापूर्वक दान दें। जो भगवान के खेत में बीज बोता है, वह उसकी फसल उतनी ही काटता भी है, यह प्रकृति का एक सिद्धाँत है।
परिजनों की जानकारी के लिए हम कुछ सूचनाएं दे रहे हैं, ताकि दान संग्रह में उन्हें कठिनाई न हो।
1. जहाँ तक हो सकें, दानदाता से धनराशि का ड्राफ्ट ही लें। चेक स्वीकार किए जा सकते हैं, पर भुगतान प्राप्त होने पर ही 35 ।4 का प्रमाण पत्र जारी हो सकेगा। यदि नकद देते हैं, तो प्रत्येक दान की रसीद का अलग-अलग ड्राफ्ट बनवाकर भेजें।
2. ड्राफ्ट या चेक श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट (प्रोजेक्ट) के नाम से हरिद्वार में देय हो। दानदाता की पूरी जानकारी दानदाता विवरण पत्रक पर अलग साफ साफ लिखकर भेजें।
3. क्षेत्र से दान एकत्र करने हेतु दानदाता को एक ‘प्रॉवीजीनल’ रसीद दी जा सकती है, परन्तु छूट का प्रमाण पत्र राशि केंद्र में जमा होने पर ही जारी हो सकेगा।
4. जो परिजन डीडी बनवाने, रजिस्ट्री आदि का खरच वहन करने में असमर्थ हैं, वे शाँतिकुँज में रसीद बुक व राशि जमा कर वाउचर्स देकर व्यय ले सकते हैं।
5. व्यावसायिक संस्थाओं, कंपनी, भागीदारी, फर्मों प्रोपायटर्स को भी इस छूट की पात्रता प्राप्त है। व्यावसायिक खरच का एक हिस्सा दान बन जाता है व छूट का प्रमाण पत्र भी मिल जाता है। कोई भी ट्रस्ट या समिति भी अनुदान दे सकती है।
6. वेतन से प्राप्त आय वाले परिजन धारा 8डडडडळ। की तरह सारे लाभ उससे दो गुने स्तर पर इस धारा से ले सकते हैं। दानदाता अपना पैन (च्।छडडडड) नंबर अवश्य लिखें। अनिवासी भारतीय (छत्प्डडडड) भी भारत में होने वाली आमदनी पर इस धारा का लाभ ले सकते हैं।
आशा है कि परिजन-पाठक इस समाचार को सब तक पहुँचाएँगे एवं भामाशाह की भूमिका निभाकर साँस्कृतिक नवोन्मेष के इस कार्य में योगदान का निमित्त बनने हेतु अनेकों को सहमत करेंगे, स्वयं भी अग्रगामी होंगे।
अखण्ड ज्योति पत्रिका अधिकाधिक तक पहुँचे, यही हमारा लक्ष्य हो
अखण्ड ज्योति पत्रिका विगत 65 वर्षों से निरंतर प्रकाशित हो, अब इस माह के साथ 66वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। गिनी चुनी पत्रिकाएँ ही हैं, जो इतनी लंबी यात्रा पूरी कर पाई हैं। गंगा गंगोत्री से निकलती है, तो उसकी धारा इतनी कम चौड़ाई की होती है कि कोई लंबी कूद वाला खिलाड़ी उसे पल में छलाँग जाए, पर ज्यों-ज्यों यह आगे बढ़ती है, देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलती हैं, मार्ग में झरनों से अनेकानेक छोटी सरिताओं से मिलकर मैदानी क्षेत्र में उतरती है, तो इसका विराट् स्वरूप देखते बनता है। और भी विराटता देखनी हो तो पटना मोकामा क्षेत्र में इसे स्टीमर से पार कर देखिए या पटना के विशाल गाँधी सेतु पर खड़े होकर उसका विहंगम दृश्य देखिए। अखण्ड ज्योति भी ज्ञान की गंगा को लेकर 1937-38 में प्रकाशित होकर आरंभ हुई एवं इसी तरह बढ़ते बढ़ते उस स्वरूप में आ गई, जहाँ ढाई सौ से बढ़कर अब छह लाख उनके हिंदी में एवं इतने ही अन्य भाषाओं में ग्राहक हैं। इससे पाँच से दस गुना पाठक माने जाने चाहिए, जो इसे नियमित पढ़ते हैं। लाखों व्यक्तियों के जीवन को इसने बदला है, उनका कायाकल्प कर दिया है। यह वस्तुतः इसी अखण्ड दीप की साक्षी में गुरुसत्ता की प्राण चेतना के रूप में हमारे समक्ष आती है, जो विगत 1926 से सतत प्रज्वलित है एवं इन दिनों शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ में प्रकाशित हो करोड़ों व्यक्तियों को आलोकित कर रहा है। जिस जिसने इस पत्रिका को पढ़ा है व इसके प्रतिपादनों को आत्मसात किया है, वह प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। आस्था संकट, साँस्कृतिक प्रदूषण, वैचारिक विभ्रम के इस युग में आस्था का एक दीप जलाए यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है। यह पत्रिका नहीं, एक आँदोलन है, एक मिशन है एवं अस्सी वर्षों तक की गई एक साधक की साधना का, युगऋषि के चिंतन का नवनीत है। इसे पढ़ना पढ़ाना एक प्रकार का पावन पुण्य माना जाना चाहिए।
विज्ञान और अध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों निष्कर्षों को इस पत्रिका ने जिस तरह प्रस्तुत किया है, उसने लाखों शोधकर्ताओं को नई दिशा दी है। अध्यात्म के प्रति लोगों की रुचि जागी है एवं अब युवापीढ़ी तेजी से भारतीय संस्कृति को अंगीकार करती नजर आती है। पिछले दिनों इसी वर्ष हमने गायत्री जयंती की वेला में ‘देवसंस्कृति विश्वविद्यालय विशेषाँक’ तथा परमवंदनीया माताजी के महाप्रयाण की बेला में ‘मातृसत्ता विशेषाँक’ प्रकाशित किए। इससे पूर्व भी प्रतिवर्ष दो विशेषाँक विभिन्न विषयों पर प्रकाशित किए जाते रहे हैं। यह कार्य कोई प्रोफेशनल स्टाफ नहीं करता, साधना को जीवन में उतारने वाले भारतीय संस्कृति को हर श्वास में जीने वाले अनुदान पाए एवं उनके ज्ञान के विराट् पिटारे से थोड़ा कुछ आत्मसात किया है। वस्तुतः बिना साधना किए उस स्तर को बनाए रखना संभव नहीं, जो गुरुसत्ता ने स्थापित किया था। अभी भी प्रेरणा के अनंत ज्ञान के स्त्रोत वे ही हमारे गुरुवर हैं, जिनकी सूक्ष्म व कारण सत्ता की उपस्थिति प्रत्यक्ष अहर्निश होती रहती है।
आज पत्रिकाओं के दाम कागज, प्रिंटिंग की क्वालिटी पोस्टेज बढ़ते चले जाने के कारण कितने बढ़ गए हैं, यह सभी प्रत्यक्ष देख सकते हैं। ‘इंडिया टुडे’, ‘आउटलुक’ पत्रिकाओं के महँगे हिंदी संस्करण सभी बड़े चाव से पढ़ते हैं व लौकिक क्षेत्र के बारे में जानकारी लेते हैं। आज के इस प्रतिस्पर्द्धा के युग में प्रायः घाटा सहते हुए भी विगत तीन वर्षों से यह पत्रिका मात्र रु. 72 वार्षिक (विदेश के लिए रुपये 750 प्रतिवर्ष तथा आजीवन भारत में रुपये 900) चंदे के आधार पर 68 पृष्ठों के आकार में प्रकाशित हो रही है। परिजनों पर भार न पड़े, इसलिए इस वर्ष भी चंदा बढ़ाया नहीं जा रहा। पत्रिका माह आने से पूर्व ही सबको उपलब्ध हो जाती है। गेटअप में भी निरंतर सुधार किया जा रहा है। जहाँ तक संभव हो, प्रेरणादायी पैनेल एवं चित्र लगभग हर लेख में देने का प्रयास किया जा रहा है। इस वर्ष अनेकानेक विषय लेने का मन है।
अब हमारे परिजनों का यह कर्तव्य है कि ग्राहक संख्या इस संगठन-सशक्तीकरण वर्ष के उत्तरार्द्ध विद्या विस्तार अवधि में न्यूनतम पाँच गुना कर दें। इसके अतिरिक्त आजीवन पाठक जितने अधिक बढ़ाए जाएँगे, उतनी ही सुनिश्चितता ज्ञान प्रसार की निरंतरता की होती चली जाएगी। जिसके घर हर माह पत्रिका पहुँचेगी, वह घर साँस्कृतिक चेतना से अनुप्राणित होता चला जाएगा। वर्ष के अंत व 2003 के आगमन की वेला में यही अनुरोध है कि हम अभी से पाठक ग्राहक बढ़ाने के अभियान में लग जाएँ। यही गुरुवर को सच्ची श्रद्धाँजलि भी हैं।
स्वर्ण जयंती शपथ समारोह एक यादगार मिसाल बन गया
जिस पावन तपस्वी ने, अवतारी चेतना की अंशधर सत्ता ने एक विराट् संगठन का शुभारंभ एक ऋषि स्थापना से किया था, उसके जीवन दर्शन पर गहन मंथन, चिंतन व तदनुसार ही संकल्प शपथ के साथ गायत्री तपोभूमि मथुरा के स्वर्ण जयंती वर्ष का पहला प्रकल्प संपन्न हो गया। सभी पाठक परिजन जानते हैं कि यह गायत्री तपोभूमि, मथुरा की स्थापना का स्वर्ण जयंती वर्ष है, जो जून 2002 से जून 2003 की अवधि में मनाया जा रहा है। शपथ समारोह इसी का एक अंग था, जिसे प्रायः चालीस हजार प्राणवान साधकों ने 20, 21, 22 अक्टूबर की तारीखों में शरद चंद्र की पावन रश्मियों एवं जलते दीपों की उर्मियाँ की साक्षी में अपने संकल्पों द्वारा सुशोभित किया। पूरे वर्ष यह स्वर्ण जयंती संकल्प समारोह चलता रहेगा एवं वह चलेगा- ली गई शपथ को अमल करने के रूप में, अपनी गुरुसत्ता के एक सच्चे सुपात्र बनने के रूप में।
संवत् 2009 की पावन वेला में बाल्यकाल में देखी गई, बार-बार स्वप्नों में दिखाई देती रही, दुर्वासा ऋषि की तपःस्थली के इस भाग को आचार्य श्रीराम शर्मा जी ने अपने सीमित साधनों में क्रय किया था। सबसे पहली अनुदान राशि गुरुदेव की माताजी (माता दानकुँवरि देवी, जिन्हें हम सभी ताईजी के नाम से संबोधित करते हैं) के 1100 रुपये के अनुदान द्वारा आई। भूमि क्रय व मंदिर, सीमित परिसर तथा यज्ञशाला निर्माण के लिए परमवंदनीया माता जी ने अपने कीमती जेवर बिक्री के लिए दिए। इस तरह 11,000, रुपये की राशि से गीता जयंती संवत् 2009 की पावन बेला में भूमि ले ली गई एवं फिर क्षेत्रीय स्तर पर गहन तप मंथन आरंभ हुआ, जो प्रायः वर्ष भर चला। सहस्रांशु जप, सवा करोड़ से अधिक मंत्र लेखन, उपवास, गायत्री चालीसा पाठ से ऊर्जा भरा वातावरण बनाया गया एवं संवत् 2010 की पावन गायत्री जयंती (22 जून, 1953) से जुड़ी 19 से 24 जून की तारीखों में कुल 240 साधकों का एक अनुपम समागम हुआ एवं एक अलौकिक दैवी वातावरण में गायत्री महाशक्ति के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा कर दी गई।
इस वर्ष इस पावन स्थापना की स्वर्ण जयंती है, पचास वर्ष पूरे हो गए हैं। यह वर्ष गायत्री तपोभूमि के पावन तप प्रधान संस्कारों को पूरे भारत भर में पहुँचाकर पूरी भारतभूमि को तपोभूमि बनाने का वर्ष है। इसी संदर्भ में गायत्री महामंत्र लेखन अभियान को, जीवन साधना को प्रखर बनाने की प्रक्रिया को गति दी गई। साथ ही साथ शाँतिकुँज हरिद्वार स्थित मुख्य केंद्र से सात जोनों के निर्माण का संगठनात्मक पुरुषार्थ भी चलता रहा, सभी वरिष्ठ कार्यकर्ता भाइयों ने सघन मंथन प्रधान दौरे किए एवं संगठन का एक सशक्त सुव्यवस्थित स्वरूप अब क्रमशः उभर कर आ रहा है। शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ एवं गायत्री तपोभूमि, मथुरा दोनों ने ही अब साधना की धुरी पर संगठन को गति देने हेतु मिलकर प्रचंड पुरुषार्थ करने की ठानी है, ताकि इस वर्ष हम अधिकाधिक प्राणवान संकल्पित समर्थ समयदानी तैयार कर सकें। इसके लिए चर्चाओं के कई दौर हुए एवं फिर इस समारोह में पधारे क्षेत्र के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भी गहन चिंतन, परामर्श होता रहा। निष्कर्ष जो निकलकर आए हैं, वे समुद्र मंथन के चौदह रत्नों की तरह हैं एवं इतने मूल्यवान हैं कि इस राष्ट्र एवं जगती की काया पलट करके रख देंगे, ऐसा लगता है।
भव्य कलश यात्रा से शुभारंभ
इस स्वर्ण जयंती वर्ष के शपथ समारोह का शुभारंभ बीस अक्टूबर आश्विन शुक्ल चतुर्दशी 2059 की प्रातः की वेला में हुआ, जब एक विराट् कलश यात्रा का शुभारंभ गायत्री तपोभूमि से प्रातःकाल 8 बजे हुआ। हर शुभ कार्य के पहले नारीशक्ति के मस्तक पर कलश धारण करो उसमें विद्यमान तैंतीस कोटि देवताओं की शक्ति के आह्वान स्थापन का प्रयास इस माध्यम से किया जाता है। शपथ समारोह जैसे आयोजन के पूर्व भी नारी शक्ति को ही अग्रगामी बनाया गया। गुजरात प्राँत, उत्तर प्रदेश, उत्तराँचल, बिहार, मध्यप्रदेश, पं. बंगाल, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, हिमालय, झारखंड सहित दक्षिण एवं पूर्वोत्तर भारत के चुने हुए कार्यकर्ता भाई बहनों ने इस शोभायात्रा में भाग लिया। अमेरिका व कनाडा से आए प्रवासी भाई की इसकी शोभा बढ़ा रहे थे। बीस अक्टूबर की प्रातः गुरुसत्ता के वरिष्ठ प्रतिनिधिगणों द्वारा कलशधारी नारियों पर पुष्पवर्षा कर गायत्री तपोभूमि के प्राँगण (प्रज्ञानगर के मध्य स्थित संस्कारशाला) से यात्रा आरंभ हुई। प्रायः वे ही कार्यकर्ता भाई-बहन इसमें सम्मिलित थे, जो अपने अपने क्षेत्र में न्यूनतम 100-100 लोगों से प्रत्येक से चौबीस सौ गायत्री मंत्र लेखन की साधना कराकर आए थे।
दृश्य बड़ा अद्भुत था। सारी मथुरा नगरी यमुना तट से लेकर इसकी विभिन्न गलियों तथा बाहरी क्षेत्र में पीले वस्त्रधारी गायत्री परिजनों से भरी दिखाई दे रही थी। कलश पर जवारे रख पंक्तिबद्ध चल रही बहनों के साथ पाँच आकर्षक झाँकियाँ, घोड़े तथा बैंड के इक्यावन वादकों का एक दल चल रहा था। बैंड के प्रमुख रईस कुरैशी पीले वस्त्र धारण कर गायत्री मंत्र एवं मिशन के गीत गाते बजाते चल रहे थे। एक विलक्षण साँप्रदायिक सौहार्द्र का नमूना था यह पूरी यात्रा में मिशन के उद्घोष भी गुंजायमान होते रहे। जब कलशयात्रा का एक सिरा नगर से बाहर आकर यज्ञशाला में प्रविष्ट हो रहा था, तब अंतिम सिरा चौक बाजार से निकल रहा था। प्रायः सात किलोमीटर लंबी यात्रा के बाद तपस्वी बहनों के चेहरे प्रफुल्लित थे। रास्ते भर मथुरा के नागरिकों ने उन पर पुष्पों की वर्षा की थी। विभिन्न संगठनों द्वारा स्थान-स्थान पर जलपान, शरबत, जल, दूध आदि की व्यवस्था की गई थी। लगभग डेढ़ बजे मध्याह्न तक तेज धूप में पूरा यज्ञ क्षेत्र लौटकर आई पीत वस्त्रधारी नारीशक्ति से भर चुका था। बहनों को एक संक्षिप्त उद्बोधन के बाद उनकी आरती उतारी गई। प्रसाद वितरित कर सभी को भोजन हेतु रवा किया गया। भाइयों से सम्मेलन स्थल पर गोष्ठी हेतु एकत्र होने को कहा गया जहाँ क्षेत्रीय संगठन के सुनियोजन एवं आँदोलनों के संचालन पर चर्चा होनी थी।
प्रदर्शनी, बेस कैंप एवं आवास
इससे पूर्व गायत्री परिजनों के लिए लगाई गई एक संक्षिप्त किंतु समग्र जानकारी देने वाली प्रदर्शनी का उद्घाटन अखण्ड ज्योति संस्थान के व्यवस्थापन श्री मृत्युँजय शर्मा जी द्वारा हो चुका था। भारी संख्या में मथुरा नगरवासी व तीर्थयात्री इसे देखने आए। संध्या सात बजे से काफी पूर्व सभी ओर से कार्यकर्ताओं के दल प्रवचन स्थल (चूड़ी वालों की बगीची) की ओर कतारबद्ध होकर जाते दिखाई दे रहे थे। ये विभिन्न नगरों में ठहरे थे, जिन्हें गायत्री तपोभूमि के निकट यमुना तट पर खेतों में गायत्री नगर, गौतम नगर जमदग्नि नगर तथा विश्वामित्र नगर के रूप में बसाया गया था। टेंटों में सभी व्यवस्थाएँ थी। इसके अतिरिक्त नगर की सभी धर्मशालाएँ भी परिजनों के लिए आरक्षित कर ली गई थी। 2 अक्टूबर की शाम तक प्रायः चालीस हजार कार्यकर्ता सारे देश से आ चुके थे। सभी की सारी व्यवस्थाओं का, देख-रेख का संचालन शाँतिकुँज से प्रायः पंद्रह दिन पूर्व पहुँचकर बस कैंप बनाकर कार्य करने वाले सौ व्यक्तियों का दल कर रहा था। श्री गौरीशंकर शर्मा व्यवस्थापक शाँतिकुँज जनजागरण प्रेस ( बिरला मंदिर के सामने) के समीप बने इस बेस कैंप से इस तंत्र को देख रहे थे।
शाम सात बजे गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक श्री द्वारिका प्रसाद जी चैतन्य के प्रारंभिक उद्घाटन उद्बोधन से कार्यक्रम आरंभ हुआ। श्री चैतन्य जी ने इस पूरे वर्ष की महत्ता, पूर्व की तैयारी व भविष्य की संभावनाओं के बारे में बताया। उससे मेजबान होने के नाते प्रबंध ट्रस्टी श्री मृत्युँजय शर्मा व गायत्री तपोभूमि के सभी कार्यकर्ताओं की ओर से देशभर से आए सभी चुने हुए साधक कार्यकर्ताओं का स्वागत किया। किसी भी प्रकार की असुविधा के लिए क्षमा माँगते हुए उनने कहा कि संकल्पों द्वारा ही हम इस कार्यक्रम को एक यादगार आयोजन बना सकते हैं। सभी प्राणवान कार्यकर्त्ताओं को उनने अधिकाधिक समय मिशन के लिए निकालने का भाव भरा आह्वान किया।
स्नेहसिक्त मार्गदर्शन, साथ में सुने संस्मरण
शाँतिकुँज से आई संस्था प्रमुख श्रीमती शैलबाला पंड्या ने अपने भावभरे उद्बोधन से जन-जन को गुरुसत्ता के स्नेह भरे स्वरूप का स्मरण करा दिया। उनने अपने उद्बोधन में परमवंदनीया माता जी से जुड़े संस्मरणों का हवाला देकर,
किस तरह गायत्री तपोभूमि विनिर्मित हुई एवं कैसे यह लंबी यात्रा तप-त्याग तितिक्षा के बल पर पूरी हुई, यह परिजनों को बताया। विशेष रूप से उनने भारी जागरण आँदोलन हेतु सभी परिजनों को सक्रिय होने को कहा ताकि राष्ट्र की आधी जनशक्ति पंगु स्थिति से उबर सके एवं उसकी तपःशक्ति से भारतीय संस्कृति सारे विश्व में छा सके। अंतिम उद्बोधन देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति व इस पत्रिका के संपादक का था। उनने गुरुसत्ता के प्रतिनिधि रूप में परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माता जी के तपस्वी स्वरूप का सबको भान कराया। कई अब तक अविज्ञात संस्मरण उनने सुनाए, जो गायत्री तपोभूमि की स्थापना के पूर्व 1949 से 1953 तक की अवधि के थे। ये सभी प्रसंग ‘चेतना की शिखर यात्रा’ पुस्तक के भाग दो में प्रकाशित हो रहे हैं। परिजनों ने जाना कि सिद्धाग्नि व दिव्याग्नि रूपी अखण्ड अग्नि की स्थापना से लेकर प्राण प्रतिष्ठा के समय हुई आलौकिक घटनाओं से इस दिव्य पावन संस्थान की स्थापना के माहात्म्य की जानकारी मिलती है। अब पचास वर्ष बाद ये तप के संस्कार बीज बनकर सारे भारत में छा जाएँ, यही गुरुवर की अभिलाषा एवं इस कार्यक्रम का उद्देश्य है, यह उनने बताया। उनने इसी वर्ष गुरुसत्ता से एकाकार हुए श्रद्धेय पंडित लीलापति जी शर्मा का भी भाव भरा स्मरण किया व बताया कि किस तरह उनने अहर्निश लगकर गायत्री तपोभूमि का विस्तार पूज्यवर के मथुरा से प्रस्थान के बाद किया।
सारे कार्यक्रम का सीधा प्रसारण पूरे मथुरा में फैले केबल नेटवर्क द्वारा हो रहा था। इस तरह सारा नगर भी इस आयोजन में भागीदारी कर रहा था। सभी अपने बुजुर्गों द्वारा बताई 1953, 1956, 1958, के ऐतिहासिक आयोजनों से जुड़ी घटनाओं तथा 1971 के विराट् विदाई सम्मेलन की घटनाओं को याद कर रहे थे। इस कार्यक्रम के विराट् स्वरूप से उन्हें विगत में संपन्न हो चुके समागमों का एक आभास हो रहा था। ईटीवी, जीटीवी, स्टार टीवी, सहित सभी न्यूज चैनलों ने अपने समाचारों में इस कार्यक्रम की जानकारी भारत भर के कार्यकर्ताओं को दी। दूरदर्शन ने वरिष्ठ प्रतिनिधियों के विशेष इंटरव्यू रिकॉर्ड किए। मथुरा व आगरा के प्रेस क्लब से जुड़े विशिष्ट पत्रकार बंधुओं से भी पत्रकार वार्ता में इस आयोजन के विषय में जाना, स्वयं भागीदारी की तथा अपने’-अपने पत्रों में पर्याप्त कवरेज भी दिया।
सभी साधकों के लिए भोजन की व्यवस्था किशोरी रमण वाटिका स्थित भोजनालय में की गई थी। इस विराट् भोजनालय में एक बार में पाँच से सात हजार परिजन भोजन कर सकते थे। सारी व्यवस्था स्वयंसेवकों द्वारा नियंत्रित थी एवं सभी भोजन-प्रसाद पाकर तृप्त थे। अगले दिन प्रातः काल मूर्ति स्थापना कार्यक्रम से आरंभ होना था। रात्रिभर पूरे आयोजन स्थल में हलचल बनी ही रही। लोग मथुरा से वृंदावन तक बीस किलोमीटर की परिधि में विभिन्न धर्मशालाओं, विश्रामगृहों तथा टेंटों की नगरियों में ठहरे थे। कई अपने साथ कुछ नए प्रबुद्ध परिजनों को भी लेकर आए थे, जिन्हें संकल्पों की जानकारी दी गई थी।
प्रतिष्ठित हुए ब्रह्ममुहूर्त में गुरुसत्ता के विग्रह
प्रातः गायत्री तपोभूमि परिसर में संस्कार शाला से लेकर मंदिर के सामने स्थित हॉल में जहाँ स्थान मिले, वहाँ परिजन मौन जप कर रहे थे। वे मंदिर में चल रहे मूर्ति स्थापना समारोह में अपनी भागीदारी भी कर रहे थे। जिन्हें यहाँ स्थान नहीं मिला, वे यज्ञस्थल पर प्रातः जल्दी पहुँचकर अपना सान यज्ञकुँडों के चारों ओर ले चुके थे। मूर्ति स्थापना के बाद यही पर 151 कुँडीय यज्ञशाला में विशेष यज्ञ संपन्न होना था।
तपोभूमि का गायत्री मंदिर 1953 में विनिर्मित किया गया था। जिस सुँदर मातृशक्ति -वेदमाता गायत्री की मूर्ति को प्राण प्रतिष्ठा चौबीस दिन के जल उपवास के बाद पूज्य गुरुदेव द्वारा 22 जून, 1953 को की गई थी, वह तो वहाँ थी ही, उसके दोनों ओर स्थित कक्षों में ऋषियुग्म परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं परमवंदनीया माता भगवती देवी की मूर्ति की स्थापना 21 अक्टूबर शरदपूर्णिमा की प्रातः ब्रह्ममुहूर्त की वेला में होनी थी। जैसा कि सभी जानते है कि गायत्री माता का यह मंदिर पूज्यवर द्वारा 1952-53 की अवधि में बनवाया गया था। कालाँतर में इसके शिखर से लेकर फर्श आदि में संगमरमर की स्थापना हो गई, पर मूल स्वरूप यथावत ही रहा। मूर्ति के बायीं ओर स्थित कक्ष में चौबीस सौ पवित्र तीर्थों की जल रज स्थापित की गई थी एवं दायीं ओर चौबीस करोड़ गायत्री महामंत्र लेखन स्थापित किए गए थे। बाद में 1971 में गुरुसत्ता के मथुरा से हरिद्वार प्रयाण के बाद जल रज वाले कक्ष में परमपूज्य गुरुदेव की पादुकाओं एवं उनके एक चित्र की तथा मंत्रलेखन वाले कक्ष में परमवंदनीया माता जी की पादुकाओं तथा उनके चित्र की भी स्थापना कर दी गई।
यह सभी को होना चाहिए कि श्री कृष्ण की ही तरह परमपूज्य गुरुदेव विदाई सम्मेलन में घोषणा कर मथुरा छोड़कर जाने के बाद पुनः मथुरा नहीं आएं वे शक्तिपीठों के उद्घाटनों की शृंखला हेतु निकलने पर मथुरा के बायपास मार्ग से निकल गए, अंदर प्रवेश नहीं किया। दोनों अवतारी सत्ताओं में कितना साम्य है, कितना रहस्यपूर्ण यह सब है, यह देखकर अचरज होता है। परमवंदनीया माताजी के लिए पाबंदी मात्र दस वर्ष की थी, तो उसके बाद वे दो तीन बार मथुरा भी गई व आंवलखेड़ा भी।
विलक्षण अलौकिक छटा तपो भूमि की
ठीक इकत्तीस वर्ष वाद स्वर्ण जयंती वर्ष के पावन प्रसंग में पूज्यवर के चित्र के स्थान पर उनकी एक भव्य संगमरमर की बनी मूर्ति की तथा परमवंदनीया माता जी की भी इतनी ही सुँदर मूर्ति की स्थापना चित्र के स्थान पर शरदपूर्णिमा की वेला में प्रातः होनी थी। एक संक्षिप्त कर्मकाँड पं. चंद्रभूषण मिश्र द्वारा संपन्न कराया गया। वरिष्ठ प्रतिनिधिगण पूजन क्रम में बैठे। जिसकी शक्ति कण-कण में, हर कार्यकर्ता के हृदय में विद्यमान हो, उसकी प्राण प्रतिष्ठा क्या हो, अतः मात्र मूर्ति स्थापना का एक संक्षिप्त भावभरा क्रम रखा गया था। ठीक 6.45 प्रातः मूर्तियों का अनावरण आरती व गुरुवंदना का क्रम संपन्न हुआ। साथ ही कार्यकर्ताओं द्वारा क्षेत्र से लाए गए विभिन्न तीर्थों की जल रज व सैकड़ों की संख्या में इस वर्ष लिखे गए मंत्र लेखन की पुस्तिकाओं का भी पूजन आरती का क्रम चला। पूज्यवर एवं मातृसत्ता द्वारा 1971 में अपने पैरों से निकालकर रखी गई पादुकाएं भी सबके लिए स्पर्श दर्शन हेतु रख दी गई एवं मंदिर दर्शन हेतु खोल दिया गया। प्रातः सात से प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा, फिर ऋषि युग्म सहित आद्यशक्ति गायत्री की मूर्ति, चरण पादुकाओं का दर्शन पंक्तिबद्ध हो चलता रहा। यह क्रमशः रात्रि तक सतत चलता रहा, जब तक कि सभी ने दर्शन नहीं कर लिए। पंक्ति कभी नहीं टूटी। लगभग डेढ़ किलोमीटर लंबी सतत बनी रही। अनुशासन देखने योग्य था।
प्रातः 7.30 से 151 कुँडीय यज्ञशाला में गायत्री महायज्ञ का शास्त्रोक्त विधि से शुभारंभ हुआ। वैदिक स्वर में सामगान व समवेत मंत्रों के उच्चारण से सारा नगर गुँजित हो उठा। नगरवासी भी भारी संख्या से या हेतु पधारे। आठ पारियों में यज्ञ हुआ। गायत्री महामंत्र, महामृत्युँजय मंत्र, देवसंस्कृति संवर्द्धन पर्यावरण संशोधन तथा राष्ट्र की समृद्धि हेतु आहुतियाँ दी गई। दीक्षा संस्कार भी संपन्न हुआ, जिसमें प्रायः सात हजार से अधिक ने भागीदारी की। इसी प्रकार तपोभूमि में प्रज्ञा नगर में संस्कारशाला में संस्कारों का क्रम चलता रहा। यज्ञोपवीत, पुँसवन, अन्नप्राशन, नामकरण शिखा स्थापन, वानप्रस्थ आदि संस्कार संपन्न हुए। संस्कृति जननी गौ माता, महामृत्युँजय मंत्र के ऑडियो कैसेट्स तथा गुरुकृपा गुरुधाम आराधना और युगधर्म की सीडी का भी विमोचन यज्ञ मंच से हुआ।
चाँदनी रात में दीप महायज्ञ एवं शपथ समारोह
शाम को विराट् दीप महायज्ञ से पूर्व श्रीमती शैलबाला पंड्या व डॉ. प्रणव के उद्बोधन हुए। इस क्रम में अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख ने परमपूज्य गुरुदेव के भावभरे संस्मरण नरमेध यज्ञ से लेकर उनके तपोभूमि छोड़ने तक के सुनाए। अपने पिता अपने आराध्य, इष्ट की भावभरी स्मृतियों को सुनकर सारा समुदाय अनुप्राणित था। इस पत्रिका के संपादक ने परमपूज्य गुरुदेव के ‘योगी’ रूप में जीवन दर्शन की व्याख्या घटनाक्रमों द्वारा की। यह भी बताया गया कि वे हमसे भी योगी बनने की अपेक्षा रखते थे। हमारा समर्पण गुरुकार्यों के प्रति और भी तीव्र हो, गति पकड़े यही इस शपथ समारोह में हमारा लक्ष्य होना चाहिए, यह सभी ने जाना। दीप महायज्ञ बड़ा ही विलक्षण था। शरदपूर्णिमा का चंद्रमा अपनी आलौकिक छटा बिखर रहा था। सवा लाख दीपक साधकों के संकल्प के साथ एक साथ जल उठे एवं लगभग बीस हजार साधकों ने मुट्ठी ऊँची कर अपनी शपथ आराध्य सत्ता के कार्यों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए ली। अनुशासित समुदाय पूरे चार घंटे बैठा रहा व अपलक इस दृश्य को निहारता रहा आरती व सत्संकल्प के साथ इस दिन के कार्यक्रम का समापन हुआ। समापन से पूर्व आठ पुस्तकों की स्वर्ण जयंती पुस्तकमाला का विमोचन भी किया गया जो गायत्री तपोभूमि द्वारा प्रकाशित की गई है।
कार्यक्रम का प्राणः गोष्ठियाँ
इस कार्यक्रम का प्राण था कार्यकर्ता सम्मेलन। भारी संख्या एवं स्थान के सीमा बंधन को देखते हुए सम्मेलन कार्यकर्ता गोष्ठियों को चार खंडों में बाँट दिया गया। सभी कार्यकर्ताओं ने न्यूनतम किसी एक में भागीदारी हेतु कहा गया। प्रत्येक गोष्ठी ब्रजवासी मंडप वाला यह स्थान खचाखच भरा रहा। ऐसी स्थिति में भी प्रायः छह
हजार कार्यकर्ता प्रत्येक में बने रहे। विषयवस्तु का केंद्र मात्र यही था कि अब समय बहुत कम बचा है। अब सभी कार्यकर्ताओं को एक जुट हो अधिकाधिक समय मिशन के कार्यों हेतु देना है। सुनिश्चित लक्ष्य निर्धारित कर आगामी डेढ़ वर्ष में हम सभी को अपने संगठन को सुव्यवस्थित कर देना है तथा आँदोलनों की कार्य योजना बना लेती है। पारस्परिक चर्चाओं का क्रम भी चला। विभिन्न समूहों में भी लोग कार्यशाला गोष्ठी के बाद वरिष्ठ भाइयों तथा व्यवस्थापक विचारक्राँति अभियान मथुरा, अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख से मिलते रहे व अपनी अभिव्यक्ति देते रहे। प्रायः दस हजार संकल्प पत्र परिजनों ने भर कर दिए, जिनमें तीन हजार समूहगत थे।
इन कार्यशालाओं को श्री कालीचरण शर्मा, श्री वीरेंद्र तिवारी, प्रो. प्रमोद भटनागर द्वारिका प्रसाद जी चैतन्य एवं श्री प्रमोद शर्मा ने संबोधित किया। सभी प्रायः एक साथ बैठे एवं अपनी बात कहने के साथ समूहगत मार्गदर्शन देते रहे। श्री कालीचरण शर्मा जी ने गुरुवर के कथनों की साक्षी देकर अपने स्थानीय संगठन को पारिवारिकता की धुरी पर विकसित करने की बात कही। उनने कहा कि जो व्यक्ति रोज नए पाँच व्यक्ति मिशन से जोड़ता है, वही असली युगनिर्माण का कार्य करता है। श्री वीरेंद्र तिवारी ने बताया कि साधना की धुरी पर ही संगठन सशक्त बन सकता है। साधक बनेंगे, तो अहंकार गलेगा, संयम विकसित होगा। बची ऊर्जा स्वाध्यायशील साधक द्वारा जनसेवा में लगेगी। तीनों पत्रिकाएँ हर परिजन पढ़ें, इस पर उनने विशेष जोर दिया।
प्रमोद भटनागर जी ने सच्चे शिष्य की परिभाषा बताई। साथ ही ऐसे प्राणवानों के संकल्पों के फलित होने की बात भी कही। प्रतिदिन साहित्य का विस्तार व कोई न कोई सेवा का कार्य हर व्यक्ति का एक निश्चित कर्तव्य हो। श्री द्वारिकाप्रसाद जी चैतन्य ने कहा कि मनोरथ कभी पूरे नहीं होते, संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते। जनचेतना जगाने वाले गाँधी जी के प्रयोगों की चर्चा कर उनने गुरुदेव के छोटे-छोटे आँदोलनों की बात कही। सद्ज्ञान घर-घर पहुँचे एवं सत्कार्यों का अभ्यास बढ़े, यही गुरुवर की इच्छा थी, जिसे सबको पूरा करना है। श्री प्रमोद शर्मा ने मंत्र लेखन साधना, स्वाध्याय, अंशदान की नियमितता एवं गौसेवा के लिए किए जाने वाले प्रयासों की चर्चा की। संकल्पों की भावभरी पृष्ठभूमि इन चार गोष्ठियों ने बना दी थी, इसीलिए शाम का दीपमहायज्ञ अलौकिक वातावरण में शपथ के साथ सम्पन्न हुआ।
पुण्य स्मृति बन गया यह आयोजन
22 अक्टूबर मंगलवार का दिन पूर्णाहुति व विदाई का दिन था। सभी यज्ञ में भी भाग ले रहे थे, पुनि-पुनि तपोभूमि आकर माता के विग्रह के साथ ऋषियुग्म के दर्शन कर रहे थे एवं आपस में अपने गुरुभाइयों से मिल परिचित हो रहे थे तीन दिन के लिए ‘मिनी भारत’ बने इस साधकों के कुँभ ने अपने सुनिश्चित लक्ष्य की पूर्ति की एवं नया उत्साह कार्यकर्ताओं में प्रवाहित किया। भोजन व्यवस्था से लेकर संपूर्ण सुरक्षातंत्र श्री गौरीशंकर शर्मा जी एवं गौरी शंकर सैनी ने व्यवस्थित ढंग से संचालित किया। कही भी भगदड़ नहीं मची। सभी भोजन प्रसाद पा ज्ञान प्रसाद हेतु समय पर पहुँचते रहे। इन सब व्यवस्थाओं के मूल में श्री मृत्युँजय शर्मा का सौम्य मार्गदर्शन एवं शपथ समारोह संकल्प
सभी संकल्प जो लिए गए हैं, भलीभाँति पढ़े जाएंगे एवं उनका सही ढंग से क्रियान्वयन हो, यह कार्य केंद्र देखेगा। समयदान के सुनियोजन का एक तंत्र बनाया जा रहा है, जिसमें न्यून से अधिकतम समय देने वाले परिजनों को सतत स्पश्रडडडड करने का क्रम बनाया जाएगा। आँदोलनों की मॉनीटरिंग हेतु एक केंद्रीय नियंत्रण कक्ष शाँतिकुँज हरिद्वार में बनाया जा रहा है। संकल्पों की एक प्रति गायत्री तपोभूमि, मथुरा रहेगी, एक शाँतिकुँज हरिद्वार में। सातों जोन्स में सक्रियता लाने के लिए बनाए गए केंद्रों में भी संकल्पित समयदानियों की वर्कशॉप्स चलेंगी।
कार्यों का सुनियोजन देखने योग्य था। अखण्ड ज्योति संस्थान, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं शाँतिकुँज हरिद्वार के सभी कार्यकर्ताओं ने कंधे से कंधा मिलाकर यज्ञीय भाव के साथ इस पुण्य आयोजन को एक मिसाल बना दिया। सन 1971 के बाद संपन्न हुआ यह कुँभ सभी की स्मृति में ऐसा समा गया है कि अब हर पल उसी का ध्यान मन में रहेगा। लिए गए संकल्प सतत याद आते रहें एवं सक्रियता का उफान निश्चित ही युग परिवर्तन की प्रक्रिया को त्वरित गति देगा, यह विश्वास है।
स्वर्ण जयंती शपथ समारोह कुछ झलकियाँ
पूरे राष्ट्र के कोने-कोने से हर प्राँत के विशिष्ट कार्यकर्ताओं की भागीदारी रही।
तपोभूमि क्षेत्र में स्थान-स्थान पर गायत्री महामंत्र लेखन की सौ सौ प्रतियाँ लिए ढेरों व्यक्ति देखे जा सकते थे।
कलश यात्रा से लेकर पूर्णाहुति तक अनुशासन देखते बनता था। पत्रकारों तथा अनेक संगठनों की उक्तियाँ इस सम्बन्ध में प्रमाण है।
तपोभूमि से डेढ़ किलोमीटर पूर्व ( दक्षिण की ओर ) अखण्ड ज्योति संस्थान से लेकर जनजागरण प्रेस, बिड़ला मंदिर (उत्तर की ओर ) तथा पूरे वृंदावन में पीत वस्त्रधारी ही चारों ओर दिखाई दे रहे थे।
स्वर्ण जयंती शपथ समारोह कुछ झलकियाँ पूरे राष्ट्र के कोने-कोने से हर प्राँत के विशिष्ट कार्यकर्ताओं की भागीदारी रही। तपोभूमि क्षेत्र में स्थान-स्थान पर गायत्री महामंत्र लेखन की सौ सौ प्रतियाँ लिए ढेरों व्यक्ति देखे जा सकते थे। कलश यात्रा से लेकर पूर्णाहुति तक अनुशासन देखते बनता था। पत्रकारों तथा अनेक संगठनों की उक्तियाँ इस सम्बन्ध में प्रमाण है।तपोभूमि से डेढ़ किलोमीटर पूर्व ( दक्षिण की ओर ) अखण्ड ज्योति संस्थान से लेकर जनजागरण प्रेस, बिड़ला मंदिर (उत्तर की ओर ) तथा पूरे वृंदावन में पीत वस्त्रधारी ही चारों ओर दिखाई दे रहे थे। मूर्ति स्थापना समारोह के बाद अनेकों परिजनों ने वैसी ही अनुभूति की, जैसी कि प्राण प्रतिष्ठा के समय 1952-53 में साधकों ने की थी। चर्चा के समय सभी ने अपनी अनुभूतियाँ बताई।
स्वर्ण जयंती शपथ समारोह
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
रईस कुरैशी के प्रकाश बैंड के 59 मुस्लिम भाई गायत्री मंत्र, गुरु वंदना एवं प्रज्ञागीत गाते पीतवस्त्रों में एक अलग ही समाँ बना रहे थे। कलश यात्रा देखने वालों का कहना था कि गायत्री परिवार ने जाति का भेद मिटाया है, अब साँप्रदायिक विषमता भी मिटेगी।
नगर के सभी उद्योग व्यापार समाज सेवा से जुड़े संगठनों ने उस शोभायात्रा में भागीदारी भी की। इसका स्वागत भी किया।
‘देवसंस्कृति विश्वविद्यालय प्रदर्शनी में सभी की जिज्ञासा का मुख्य केंद्र रहा। इसके बारे में अधिकाधिक जानने की इच्छा सबकी थी।
किसी भी राजनैतिक या बड़े पद से जुड़े व्यक्ति को इस आयोजन में मंचीय कार्यक्रम हेतु नहीं बुलाया गया था। आमंत्रण सभी को था, पर मूलतः यह नैष्ठिक स्वयंसेवकों का कार्यक्रम था। किसी भी नेता को मंच पर न देख सभी को सुखद आश्चर्य हुआ।
पाक्षिक प्रज्ञा अभियान के इस आयोजन में पाँच हजार सदस्य बने। यह अब तक का कीर्तिमान है। मिशन के सभी क्रियाकलापों की जानकारी देने वाला यह समाचार पत्र शाँतिकुँज, हरिद्वार से 1 व 16 तारीख को प्रतिमाह प्रकाशित होता है।
स्वर्ण जयंती शपथ समारोह कुछ महत्वपूर्ण तथ्य रईस कुरैशी के प्रकाश बैंड के 59 मुस्लिम भाई गायत्री मंत्र, गुरु वंदना एवं प्रज्ञागीत गाते पीतवस्त्रों में एक अलग ही समाँ बना रहे थे। कलश यात्रा देखने वालों का कहना था कि गायत्री परिवार ने जाति का भेद मिटाया है, अब साँप्रदायिक विषमता भी मिटेगी।नगर के सभी उद्योग व्यापार समाज सेवा से जुड़े संगठनों ने उस शोभायात्रा में भागीदारी भी की। इसका स्वागत भी किया। ’देवसंस्कृति विश्वविद्यालय प्रदर्शनी में सभी की जिज्ञासा का मुख्य केंद्र रहा। इसके बारे में अधिकाधिक जानने की इच्छा सबकी थी। किसी भी राजनैतिक या बड़े पद से जुड़े व्यक्ति को इस आयोजन में मंचीय कार्यक्रम हेतु नहीं बुलाया गया था। आमंत्रण सभी को था, पर मूलतः यह नैष्ठिक स्वयंसेवकों का कार्यक्रम था। किसी भी नेता को मंच पर न देख सभी को सुखद आश्चर्य हुआ। पाक्षिक प्रज्ञा अभियान के इस आयोजन में पाँच हजार सदस्य बने। यह अब तक का कीर्तिमान है। मिशन के सभी क्रियाकलापों की जानकारी देने वाला यह समाचार पत्र शाँतिकुँज, हरिद्वार से 1 व 16 तारीख को प्रतिमाह प्रकाशित होता है। गुजरात के परिजन पूरे समारोह में हर दिशा में, हर क्षेत्र में क्रियाशील नजर आए। मेहसाणा से विष्णुभाई का सौ स्वयंसेवकों का दल तो बीस दिन पूर्व से ही आ गया था।
भावी कार्यक्रम
परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1980-81 में शक्तिपीठों की प्राण प्रतिष्ठा का क्रम क्षेत्र में चला था। 2005-2006 में इस ऐतिहासिक शुभारंभ की रजत जयंती का वर्ष आ रहा है। केंद्र की इच्छा है कि जिन स्थापनाओं ने वातावरण को गायत्रीमय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उन सभी को इस विशिष्ट वर्ष 2005-2006 (वसंत से बसंत तक) में अपने केंद्र का वार्षिकोत्सव विशिष्ट उद्देश्यों के साथ समाना चाहिए। उनकी शृंखला केंद्र में यहाँ बनाई जाएगी तथा समयदानियों के माध्यम से ही इस क्रम को संपन्न कराया जाएगा। इस सम्बन्ध में विस्तार से भावी पत्रिकाओं के संपादकीय पढ़ें,
अगला वर्ष संगठन- सशक्तीकरण वर्ष का उत्तरार्द्ध है, यह जनवरी 2004 तक पूर्णता तक पहुँचेगा। इस पूरे वर्ष एक अतिरिक्त दायित्व वाङ्मय की स्थापना एवं पत्रिकाओं के पाठक बढ़ाया जाना एक विशेष जिम्मेदारी के रूप में लिया जाएगा।
कृपया ध्यान दें
बड़े भाव भरे वातावरण में अपना शपथ स्वर्ण जयंती समारोह संपन्न हुआ। साथ ही ऋषियुग्म की युगल मूर्ति की स्थापना भी हुई। परमपूज्य गुरुदेव प्रायः तीस वर्ष एवं परमवंदनीया माता जी प्रायः 26 वर्ष इस पावन मथुरा नगरी में विराजमान रहे। उसी आधार पर यह निर्धारण हुआ कि वेदमाता गायत्री के विग्रह के दोनों ओर दोनों की सुँदर सी मूर्तियाँ इस वर्ष के क्रम में जो गायत्री तपोभूमि की स्थापना का पचासवाँ वर्ष है, सबके दर्शनार्थ स्थापित की जाएँ। ब्रह्मा जी का मंदिर मात्र पुष्कर में है और कही नहीं, ऐसे ही इस युग के विश्वामित्र गायत्री महाशक्ति को लुप्त होने से बचाने वाले गुरुदेव का विग्रह मात्र मथुरा में ही स्थापित रहेगा, और कही नहीं। सजल श्रद्धा प्रखर प्रज्ञा भारत में कही भी स्थापित की जा सकती हैं। सबसे महत्वपूर्ण है उनके ज्ञान शरीर की स्थापना। जितना प्रयास इस दिशा में चलेगा, उतना ही परिजन गुरु अनुकंपा के भागीदार बनेंगे।
ज्ञातव्य
‘प्रज्ञा परिषद’ की स्थापना पूरे भारत वर्ष के हर जनपद में होनी हैं। सातों जोनों के केंद्रों द्वारा ही मुख्य केंद्र से इनका संचालन होगा। अभी कोई अपने मन से इनका गठन न करें। इसके लिए शाँतिकुँज द्वारा विधिवत एक संविधान उसके नियम उपनियम बनाए जा रहे हैं। यह विशुद्ध रूप से अपने परिजनों के माध्यम से प्रबुद्ध वर्ग के विशिष्ट व्यक्तियों को मिशन की कार्यविधि से जोड़ने वाला माध्यम बनेगा। परिजन अभी फरवरी 23 की तीनों पत्रिकाओं के अंकों की प्रतीक्षा करें। जब यह भलीभाँति समझ में आ जाए, तब इस कार्य को गति दें, ध्यान रखें कि यह कोठ्र समानांतर तंत्र नहीं। यह हर जनपद या जोनल समन्वय समिति का एक घटक ही होगी एवं पूर्णतः जोनल केंद्रीय अनुशासन में कार्य करेगी। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की रजत जयंती के उपलक्ष्य में 24 में वर्षभर इसके माध्यम से सारे देश में प्रबुद्ध वर्ग के सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे।
*समाप्त*