नव वर्ष की सम्भावनाएँ भी नवीन है। तेजी से घूम रहा काल चक्र हर रोज अनगिन परिस्थितियों, घटनाचक्रों प्रक्रियाओं एवं उपक्रमों को जन्म दे रहा है। सब कुछ इतना तीव्र और आश्चर्य कारक है कि विश्लेषक चकित हैं और विशेषज्ञ भौचक। उपनिषदों की भाषा में कहें तो ‘न मेधया न बहुनाश्रुतेन’ यानि कि इसे न तो कोरी बुद्धि से समझा जा पा रहा है और न ही बहुत सुनने-गुनने वाले इसे समझने में सक्षम हैं। लेकिन जिनका अन्तःकरण आलोकित है, जिनके पास गहन अंतर्दृष्टि है, वे इन दिनों अनेकों नवीन सम्भावनाओं को जन्मते, पनपते एवं विकसित होते देख रहे हैं।
सन् 2002 में जो कुछ हो रहा है, वह मात्र प्रारम्भ है। प्रक्रिया सुदीर्घ है जो कई वर्षों तक चलने वाली है। अकेले हम ही नहीं समूचा विश्व इस सत्य का साक्षी होगा, कि क्रान्तियाँ किस तरह से मालगाड़ी के डिब्बों की तरह एक के बाद एक आयीं और देखते ही देखते सारा पुराना कूड़ा-करकट अपने साथ उड़ा ले गयी। वर्तमान जिस भविष्य का सृजन करने में तत्पर है वह साफ-सुथरा ही नहीं सुगन्धित भी है। आसुरी शक्तियाँ कितनी ही प्रबल, प्रचण्ड एवं विशालकाय क्यों न हों, पर काल चक्र उन्हें धूल में मिलाए बिना न रहेगा।
इन्हीं दिनों कुछ ऐसे घटनाक्रम जन्म लेंगे, कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उपजेंगी कि जो असुरता को अपने शिकंजे में बुरी तरह से जकड़ लेगी। उसे छटपटाहट के साथ दम तोड़ने के अलावा और कोई मार्ग न मिलेगा। इसी के साथ विश्व मानवता अपने नए इतिहास को रचेगी। कालचक्र के तीव्रगामी वेग से जन्मने वाली नवीन सम्भावनाएँ विश्व मानचित्र में कुछ अचरज भरी फेर बदल भी करेंगी। नवीन सम्भावनाएँ इतिहास को ही नहीं भूगोल को भी नयापन देगी।
इन विशिष्ट पलों में महाकाल के सेवकों-सहचरों का दायित्व भी विशिष्ट है। उन्हें न केवल अपने सृजन अभियान को तीव्र वेग देना है। बल्कि उन्हें इन्हीं दिनों कठोरतम तप साधनाएँ सम्पन्न करके प्रचण्ड आत्मबल भी अर्जित करना है। आत्मबल की धनी ऐसी तपस्वी आत्माएँ ही इन दिनों तीव्र गति से अन्तरिक्ष में उमड़-घुमड़ रही हलचलों को अपनी अन्तर्चेतना में अनुभव करेंगी। और नव वर्ष की नवीन सम्भावनाओं के साकार होने में समर्थ सहयोगी की भूमिका निभा सकेंगी।
हे परम ज्वाल, तू मर्त्य को परम अमृतत्त्व में जन्म देता है। जन्माभिलाषी ऋषि के लिए तू दिव्य तथा मानुषिक, दोनों आनन्दों का सर्जन करता है। ऋग्वेद की इस ऋचा में विकास क्रम का लक्ष्य निर्दिष्ट है और जिसके अंत में है आनन्द। भविष्य का देव मानव इसी आनन्द का प्रतीक-प्रतिनिधि है। इसी को श्री अरविन्द ने अतिमानव कहा है। श्री अरविन्द का कथन है कि मानव विकासक्रम की अन्तिम सीमा नहीं, वह एक संक्रमणकालीन जीव है। मानव जीवन की प्रयोगशाला में इसके सचेतन सदुपयोग से प्रकृति उसमें देवता का, अतिमानव का आविर्भाव करना चाहती है।
श्री अरविन्द के अनुसार अतिमानव ही सबसे स्वाभाविक मानव है। अतिमानसिक स्थिति प्राप्त करने पर ही मनुष्य अपने सच्चे स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। ‘द ह्यमन साइकिल’ में वह उल्लेख करते हैं- मनुष्य एक असामान्य जीव है, जिसने अपनी सामान्यावस्था को प्राप्त नहीं किया है। चाहे मनुष्य सही समझता हो कि वह अपनी यथार्थता को प्राप्त कर चुका है, चाहे वह अपने वर्ग में सामान्य मालूम पड़ता हो, परन्तु यह सामान्यावस्था एक तरह की अल्पकालीन व्यवस्था मात्र है। उन्होंने अतिमानव को भविष्य की नई मानव जाति माना है।
श्री अरविन्द ने अपने दार्शनिक ग्रंथों में अतिमानव या सुपरमैन शब्द का प्रयोग बहुत ही कम किया है। इसके स्थान पर उन्होंने अतिमानसिक मानव (सुप्रामेण्टल बींग) या प्रज्ञान पुरुष (नास्टिक बींग) कहना अधिक उपयुक्त समझा। आधुनिक पाश्चात्य दर्शन में विशेषकर फ्रेडरिक नीत्शे के बाद से अतिमानववादी दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ। अति मानववादी दार्शनिकों में सर्वप्रथम इन्हीं का नाम आता है। इनके अतिरिक्त एस अलेक्जैण्डर और हेनरी बर्गंसा की गणना भी अतिमानव के दार्शनिक के रूप में होती है। परन्तु अतिमानव शब्द को लोकप्रिय एवं प्रचलित करने का श्रेय नीत्शे को जाता है।
अपने कुछ अत्यन्त जटिल दार्शनिक ग्रंथों में नीत्शे ने अतिमानव का प्रतिपादन किया है। दि गाँस्पेल ऑफ सुपरमैन, दस स्पीक जरथुस्र, विल टु पावर, दि जिनीओलाँजी ऑफ माँरल्स आदि ग्रंथों में उन्होंने अतिमानव का उल्लेख किया है। उनके इन विचारों से एमर्सन, कार्लाइल, किंगडम, क्लिफोर्ड, सैमुअल बटूलर, कार्ल पियनि आदि प्रभावित थे। नीत्शे का विचार था कि मनुष्य जाति का परम लक्ष्य अतिमानव को जन्म देता है। वे कहते हैं- मनुष्य जाति नहीं, अतिमानव ही लक्ष्य है। अर्थात् वर्तमान मनुष्य जाति से ही अतिमानव का आविर्भाव होगा। और इसके जन्म से मनुष्य जाति अपने परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगी।
नीत्शे अतिमानव को ही आदर्श मानव मानते हैं। और इस आदर्श मानव का चरित्र, चिन्तन एवं व्यवहार ही भविष्य के लिए मूल्याँकन का मापदण्ड होगा। वर्तमान में कोई भी नैतिक आदर्श उस शिखर को स्पर्श नहीं कर सकता। वह वर्तमान मनुष्य की पहुँच से परे है। परन्तु जैसे ही इसमें अतिमानव का आविर्भाव होगा वैसे ही जीवन के हर क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाएंगे और प्रचलित परम्परा के मापदण्ड एवं मानदण्ड बदल जायेंगे।
परन्तु खेदजनक दृश्य यह है कि नीत्शे का अतिमानव आसुरी लक्षणोँ से युक्त है। उसमें दया, प्रेम, करुणा, सहानुभूति जैसे कोमल भावनाओं का सर्वथा अभाव है। वह अत्यन्त पाषाणी हृदय, क्रूर निर्दयी तथा प्रचण्ड शक्तिशाली पुरुष है। वह अतिमानव प्राचीन हेब्य्रू यो ट्यूटनों के समान कठोर और पशु शक्ति का पुजारी है। वह अपनी प्रबल शक्ति से दुर्बल जातियों पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहेगा। इसी कारण श्री अरविन्द ने नीत्शे की परिकल्पना को पूरी तरह से अस्वीकार किया है। एसेज ऑन दि गीता में कहते हैं- ‘दया मनुष्य की एक कमजोरी है और जो नार्वीजन नायक के समान ईश्वर को इसलिए धन्यवाद देता है कि उसने उसे कठोर हृदय दिया।’
नीत्शे अपने ग्रंथ ‘जिनीओलॉजी ऑफ मॉरल्स’ की भूमिका में स्पष्ट किया है कि दया पर आधारित नैतिकता आधुनिक यूरोपीय सभ्यता का सबसे खतरनाक लक्षण है। ईसाइयों के ईश्वर को उन्होंने दरिद्रों का ईश्वर कहा है। इस प्रकार अस्वाभाविक शारीरिक एवं जैविक शक्ति से ओत-प्रोत वर्तमान का यह बौद्धिक मानव ही नीत्शे की दृष्टि से अतिमानव है। भौतिक एवं जैविक शक्ति की प्रबलता ने उसे पशु के समान निष्ठुर और कठोर बना दिया है। इस संदर्भ में श्री अरविन्द एण्ड दि न्यू एज में अनिल वरुण राय की उक्ति अत्यन्त समीचीन प्रतीत होती है- भारतीय शब्दावली में असुर शब्द से नीत्शे के अतिमानव का स्वरूप मिलता है। अर्थात् वह एक आसुरी शक्ति है जो अपने क्षुद्र अहंकार से उन्मत्त होकर समस्त मानव जाति पर विजय प्राप्त करना चाहता है।
इसके ठीक विपरीत सैमुएल अलेक्जैंडर का अतिमानव दिव्य है। उसमें देवत्व के गुण हैं। अपनी विख्यात कृति ‘स्पेश, टाइम एण्ड डीटी’ में उन्होंने इस तथ्य की पुष्टि की है कि वर्तमान मानव विकास का अन्तिम परिणाम नहीं है। मानव का अगला विकास ‘डीटी’ में होगा। डीटी को अतिमानव की संज्ञा दी जाती है क्योंकि वह वर्तमान मानव की अंतिम संभावना है। वह आज के मानव का विकसित रूप होगा।
अलेक्जैंडर डीटी को दिव्य स्वरूप सम्पन्न समझते हैं। चूँकि स्वयं ईश्वर डीटी के धारक हैं। इसलिए इसमें नीत्शे के अतिमानव के समान आसुरी गुण नहीं होंगे। उनके अनुसार हमारी वर्तमान मानसिक स्थिति में बौद्धिक आधार पर डीटी की उपलब्धि नहीं हो सकती। इसी कारण वे इसके स्वरूप का वर्णन नहीं करते। वे इस सम्बन्ध में संकेत करते हैं कि डीटी मनस् नहीं है और न ही अध्यात्म है बल्कि प्रकार में उससे भिन्न है। डीटी के दैवी स्वरूप को बताते हुए अलेक्जैंडर श्री अरविन्द के समान यह नहीं कहते हैं कि इसके आविर्भाव के साथ-साथ सम्पूर्ण जगत् का आध्यात्मीकरण हो जाएगा और मानव जाति पूर्णतया परिवर्तित हो जायेगी।
जबकि बर्गसाँ के अनुसार मनुष्य अपनी स्थूल शरीर में दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर इसी संसार में दिव्य जीवन जी सकता है। उस दिव्य स्वरूप को जो प्राप्त करेंगे उन्हें ही ग्रैण्ड मिस्टिक्स या महान् रहस्यवेत्ता कहा जाता है। उन्होंने ‘टू सोर्सेज ऑफ मोरालिटी एण्ड रिलीजन’ नामक अपने विख्यात ग्रंथ में इसे ग्रैण्ड मिस्टिक की उपाधि दी है। इसी कृति में वे आगे उल्लेख करते हैं कि इस अतिमानव के जन्म के पश्चात् क्रमशः मानव में परिवर्तन आएगा और एक ऐसा समय आएगा जब समग्र मानव जाति पूर्ण रूपांतरित हो जाएगा।
बर्गसाँ के अतिमानव में नीत्शे के अतिमानव के समान आसुरी लक्षण नहीं है। कठोरता एवं निष्ठुरता के विपरीत प्रेम एवं विनम्रता उसकी मुख्य विशेषता है। वह कहते हैं कि अपने चरम विकास की उच्चतम अवस्था में पहुँचकर भी अतिमानव गर्वोन्नत नहीं होता बल्कि वह सदैव शिष्ट, शालीन बना रहेगा। प्रगाढ़ प्रेम उसका रहस्य है। वह प्रेम द्वारा ही दिव्यता को अभिव्यक्त करता है।
श्री अरविन्द का अतिमानव दैवीय गुणों से अलंकृत एक महायोगी है। वह नीत्शे के अतिमानव से भिन्न है। वह पार्थिव भोग-विलास, सुख-दुःख आदि से ऊपर उठकर ईश्वर की आराधना करता है। वह प्रचण्ड तपस्वी तथा प्रकाण्ड अध्यात्मवेत्ता है। अपनी समस्त दिव्य शक्तियों एवं विभूतियों को वह मानव मात्र के कल्याण के लिए नियोजित करता है। वह स्वयं रूपांतरित है एवं अपने आविर्भाव के साथ ही जगत् को भी रूपांतरित करने की क्षमता रखता है। वह सभी को ईश्वर में एवं ईश्वर को सभी में देखता है। उसकी नजर में जड़ चेतन सभी में एकमात्र ईश्वर व्याप्त है।
श्री अरविन्द का अतिमानव दैवीय गुणों से ओतप्रोत है तथा वह दिव्यता प्रदान कर सकता है। वह आत्म चरितार्थ एवं आत्मस्थ पुरुष है। अहंकार से वह सर्वथा मुक्त है। अतः उसका व्यक्तिगत संकल्प सामूहिक संकल्पों से अभिन्न है। अन्य सभी आत्माओं के साथ पूर्ण संगति एवं सामंजस्य से वह कार्य करता है। इस संदर्भ में श्री कविश्वर जी ने बड़े सुन्दर ढंग से उनके अतिमानव का वर्णन किया है- ‘श्री अरविन्द का अतिमानव महाप्रतापी दैत्य रावण नहीं है। वह सहस्रों मानवों के शारीरिक बल से सम्पन्न महाभारत का भीम भी नहीं है। वह सहस्रों योद्धाओं से बढ़कर युद्ध सामर्थ्य वाला तथा पाण्डवों के राजसूय यज्ञार्थ अनेकानेक राजाओं को जीतने वाला महापराक्रमी अर्जुन भी नहीं है। उनका अतिमानव तो गीता समाप्ति का वह अर्जुन है जो अपनी अद्वितीय शरशास्त्र प्रविद्या, सूक्ष्म बुद्धि और श्रेष्ठ ज्ञान के साथ अत्यन्त नम्रता से भगवान् श्रीकृष्ण के सामने सम्पूर्ण आत्मसमर्पण कर उन्हीं की इच्छा को अपनी इच्छा मानता है तथा ईश्वर का निमित्त मात्र होने को तैयार है।’
सर्वस्व समर्पण करके ही ईश्वर के हाथों यंत्र बनना सम्भव है। और जो परमात्मा का यंत्र बन सका उसी का जीवन सार्थक है। ऐसे जीवन में ही विकास की अनन्त संभावनाएँ सन्निहित होती हैं। यही जीवन देवत्व का पर्याय होता है। जो अपनी दिव्यता से अपने वातावरण को भी स्वर्गतुल्य बना देता है। अतः अतिमानव के इस यथार्थ को साकार करने लिए हमें अपने चरित्र, चिन्तन एवं व्यवहार को सुधारने एवं संवारने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर देनी चाहिए।
क्षण अति लघु है, परन्तु इसमें विराट् भावनाएँ समायी हैं। यही वह बेशकीमती उपहार है जिसे स्वयं भगवान् ने अपनी परमप्रिय एवं ज्येष्ठ सन्तान मनुष्य को सौंपा है। और बदले में सिर्फ इतनी सी चाहत रखी है कि वह उसके दिए गए इस उपहार का अपने लिए बेहतरीन उपयोग करे। वह इस सत्य को समझे कि उसे दिया गया प्रत्येक क्षण अमूल्य है। हर क्षण में एक अनोखी सम्भावना छिपी है। पर यह साकार तभी हो सकती है, जब इसका सुनियोजन सर्वोच्च स्तर पर हो। लेकिन हम सब इसका उपयोग कैसे और किस तरह से कर रहे हैं? यह एक अहम् सवाल हमसे और हममें से हर एक से है। जिसका जवाब हमें अपने आप में खोजना है।
क्योंकि इसके सही और सटीक जवाब से ही प्रत्येक क्षण के सुनियोजन की कला जानी और सीखी जा सकती है। और यही वह परम दुर्लभ कुञ्जी है, जिसके माध्यम से जीवन के परम लक्ष्य, सफलता के सर्वोच्च सोपान की दहलीज पर कदम रखा जा सकता है। हालाँकि इसके महत्त्व से जन सामान्य कतई अनभिज्ञ नहीं है। फिर भी यह विलक्षणता से परिपूर्ण तोहफा, जितना जाना-पहचाना लगता है, शायद उससे भी कहीं ज्यादा गूढ़, रहस्यमय और अनूठा है। जिसे या तो हम देख नहीं पाते, या फिर इसके अनेकों अदृश्य पहलू हमारे सामने एक अबूझ पहेली की तरह बने रहते हैं, जिन्हें हम सुलझा नहीं पाते।
हममें से बिरले जो ऐसा करने में सक्षम हो पाते हैं, वे स्वभावतः ही मानव के स्तर से उठकर देवमानव की श्रेणी तक पहुँच जाते हैं। इस अबूझ पहेली को सुलझा पाने और न सुलझा पाने वाले दो वर्गों में यदि हम मनुष्य का विभाजन करें तो प्रतीत होगा कि प्रथम वर्ग का प्रतिशत नगण्य सा ही है। कारण- अत्यधिक जन इसे अपनी सामर्थ्य के भीतर की बात न समझ कर प्रयास ही नहीं करना चाहते, या फिर चाहते हुए भी मन मारकर दिन खिसकाते रहते हैं। हालाँकि यह सुस्पष्ट सच है कि हर वो क्षण जो पार हो गया है-भले ही खाली ही क्यों न बीता हो, अपनी एक अनुभूति पास छोड़ जाता है। एक ऐसी अनुभूति जिसमें कई भावों का सम्मिश्रण होता है। यह अनुभव प्रायः हम सब का है।
यह सच है कि सभी क्षण एक समान नहीं हो सकते- अर्थात् एक क्षण दूसरे से अलग ही होगा, एक या दूसरे मायने में। यदि आज होठों पर हंसी है तो कल नयनों में नीर भी झिलमिला सकता है। पर इसमें भी एक अर्थ और गति है, जो पूर्णता की ओर हमें ले जाती है। कहावत है कि सुख के दिन छोटे होते हैं। इस अवधि में मनुष्य इतना खो जाता है कि वे क्षण अत्यन्त लघु मालूम पड़ते हैं। दूसरी ओर दुःख एवं संघर्ष के क्षण मनुष्य पर भारी पड़ते हैं और उससे अत्यधिक शारीरिक एवं मानसिक क्रियाशीलता की माँग करते हैं। अतः उसी अनुपात में वे बड़े मालूम पड़ते हैं।
कमजोर कलेजे के लोग प्रायः ऐसी परिस्थितियों में अपना संतुलन गवाँ बैठते हैं। ऐसे समय में वे घबराकर अपने आस्तिक होने का दावा करते हुए ईश्वर की शरण में जाने की बहाना खोजते हैं। हालाँकि ऐसे में उनका सौ प्रतिशत विश्वास न तो स्वयं पर होता है और न ही भगवान् पर। यदि वे सच्चे ईश्वर विश्वासी हैं, तो उन्हें इन पलों में कम से कम इतना विचार तो करना ही चाहिए कि जीवन के ये क्षण भी अपने ही परम प्रिय प्रभु द्वारा दिए गए विभिन्न रंगों के पुट में लिपटे हुए रंगीन उपहार है। जो जीवन को एक अलग ही शोभा एवं आकर्षण प्रदान कर रहे हैं। अतः इनका भी एक अलग अन्दाज और अनुभव है, जो आने वाले समय में धरोहर बन कर रहेगा।
इसलिए ऐसे में उदासीन, खिन्न व अन्यमनस्क न होकर उन्हें आत्मपरिष्कार की कठोर तप साधना मानकर साहस और जिन्दादिली के साथ जीना चाहिए। ये विपत्ति भरे क्षण प्रायः अगले आने वाले क्षणों पर हमारी पकड़ मजबूत करते हैं। हमारे अन्दर सुषुप्तावस्था में वर्षों से निष्क्रिय पड़े आत्मबल को जाग्रत् कर हमें जीवन्त बनाते हैं। साथ ही निराशा के अंधेरे क्षणों को चीर कर आशा की चमकदार किरणों की भरी-पूरी भीड़ सामने ला खड़ी करते हैं। परन्तु ये लाभ मात्र उन्हें ही प्राप्य है, जो इस कठिन एवं विपन्न स्थिति का सामना उतनी ही साहसिकता व उत्साह के साथ करते हैं, जितना कि ऐसे क्षणों में उनसे अपेक्ष्य है। क्षण दुःख के हों या फिर सुख के उनके सुनियोजन का मूल मंत्र एक ही है- ‘आत्मनो मोक्षार्थ जगद्हिताय च’ अर्थात् आत्म कल्याण एवं लोकहित के लिए ही इनका सदुपयोग किया जाना चाहिए।
लक्ष्य के अनुरूप ही जीवन की दशा एवं दिशा का निर्धारण होता है। यूँ तो मनुष्य जीवन ही श्रेष्ठता का पर्याय है अतः प्रत्येक मनुष्य का लक्ष्य भी महान् एवं पवित्र होना चाहिए। फिर भी हर व्यक्ति अपने लक्ष्य के चुनाव के लिए स्वतंत्र है। वह ईश्वर का चुनाव करे या फिर उसके ऐश्वर्य का। लक्ष्य चाहे जैसा भी हो उसको एकनिष्ठ भाव से पूरा करना चाहिए। अपनी समस्त शक्ति एवं प्रतिभा को उसमें होम देना चाहिए।
लक्ष्य क्या है? यह प्रश्न सबके लिए अलग-अलग है। अपनी प्रतिभा एवं अभिरुचि के अनुरूप लक्ष्य होना चाहिए। जिस क्षेत्र के प्रति भावना हुलस उठे, जिसे प्राप्त करने के लिए मन मचल उठे उसे ही लक्ष्य बनाना चाहिए, लेकिन इसका सार्थक एवं सर्वहितकारी होना अनिवार्य है। मनोनुकूल कार्य के प्रति उत्साह एवं उमंग का स्वाभाविक संचार होता है। उसे पूरा करने के लिए मन लगता है। और कठोर श्रम भी उबाऊ नहीं होता। परन्तु अनिच्छा पूर्वक अपनाये गये कार्य अन्ततः अपूर्ण होते हैं और उनसे असफलता ही हाथ लगती है। अतः जीवन में सदैव उसी लक्ष्य का चुनाव करना चाहिए, जिसके साथ हम न्याय कर सकें। ताकि वह अधूरा न छूटे एवं अन्त तक उस पर डटे रह सकें।
इस सृष्टि का हर घटक अनोखा है एवं हर व्यक्ति निराला। हरेक का अपना उद्देश्य होता है। ईश्वर ने उसे किसी विशिष्ट कार्य में नियोजित करने के लिए यहाँ भेजा है। अतः प्रत्येक का स्वभाव एवं प्रकृति भिन्न होती है। उसी के अनुसार उसे अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। जिस कार्य में अपनी मौलिक प्रतिभा जाग उठे उसे ही लक्ष्य बनाना चाहिए। गीता के अनुसार यही स्वधर्म है। किसी को कला के क्षेत्र में प्रवेश करना पसन्द होता है तो किसी को दर्शन का तत्त्वज्ञान अच्छा लगता है। कोई विज्ञान जगत् में पदार्थों का सूक्ष्म परीक्षण-निरीक्षण करना चाहता है तो कोई राजनीति-कूटनीति में महारथ हासिल करना चाहता है। यही अपनी अभिरुचि का क्षेत्र है। देखा जाए तो इसी का चुनाव ही लक्ष्य है।
लक्ष्य की पहचान के पश्चात् उसकी प्राप्ति हेतु प्रारम्भ होती है एक लम्बी यात्रा, एक सुदीर्घ प्रयास एवं पुरुषार्थ। सफलता और असफलता उसकी सहचरी होती हैं। परन्तु पुरुषार्थी अपने लक्ष्य पथ से कभी विचलित नहीं होता। उसे अपना लक्ष्य सदैव धनुर्धर अर्जुन की भाँति केवल मछली की आँखों की तरह याद रहती है। उसके विचार एवं संकल्प उस तीर के सदृश्य होते हैं जिसे अनुभव की दहकती भट्टी में पकाया एवं गढ़ा जाता है और उसी के द्वारा इस लक्ष्य भेद किया जाता है। निराशा-हताशा, उदासीनता लक्ष्य के प्रति सन्नद्ध व्यक्ति के पास नहीं फटकती। उसमें अनवरत उद्दाम उमंग एवं नूतन आशा संचरित होती रहती है। ऐसे प्रचण्ड पुरुषार्थी ही लक्ष्य भेदने में समर्थ एवं सफल होते हैं।
लक्ष्य चाहे जितना कठिन एवं दुर्गम दिखता हो, दृढ़ संकल्प एवं अटल विश्वास से उसे सहज-सरल बनाया जा सकता है। लक्ष्य के प्रति संकल्प ऐसा होना चाहिए कि जिसका कोई विकल्प न बन सके। राजा विश्वरथ का विश्वामित्र बनने का एवं तपस्वी अगस्त्य का विंध्याचल पर्वत को झुका देने के संकल्प को अपना आदर्श बनाना चाहिए, जिसके लिये इनका समस्त जीवन खप गया। लक्ष्य के प्रति मीरा जैसा दृढ़ विश्वास हो जिसमें पत्थर की मूरत में भी कोई संदेह न हो और वह सजीव हो उठे। विश्वास के बल पर महावीर हनुमान सागर लाँघने वाले ऐसे ही कोई लगनशील एवं साहसी योद्धा थे। वीर एवं योद्धा बनकर ही लक्ष्य भेदा जा सकता है। जहाँ पर व्यामोह एवं दुर्बलता का नामोनिशान न हो। साहसी और अपार साहसी ही अपने जीवन के अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति करते हैं।
उच्चतर लक्ष्य के लिए दैवी कृपा भी मिलती है। जब व्यक्ति श्रेष्ठ लक्ष्य हेतु अग्रसर होता है और उसके कदम आगे बढ़ने लगते हैं तो उसे अनायास ही साधन-सुविधाएँ मिलने लगती हैं। अन्दर से प्रेरणा जाग्रत् होने लगती है और उस कार्य को पूरा करने के लिए नवीन आशा एवं उत्साह का संचार होने लगता है। ऐसी स्थिति में मन का कुहासा छंटने लगता है और लक्ष्य का सूर्य चमकने लगता है। जिसके किरण पथ पर बढ़ते हुए वह अवश्य ही सफल होता है। फिर जीवन के समस्त क्रियाकलाप एक उसी लक्ष्य के लिए मचलने लगते हैं। शरीर का रोम-रोम मन का हर विचार एवं हृदय की सारी भावनाएँ एक उसी निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर चल पड़ती हैं। जीवन लक्ष्यमय हो उठता है। ऐसी स्थिति में भला लक्ष्य की प्राप्ति कैसे असम्भव हो? फिर तो ईश्वर का सिंहासन भी डोल जाता है, और वह दौड़ा-दौड़ा प्रह्लाद को बचाने चला आता है।
लक्ष्य के लिए इतनी लगन और निष्ठ अपरिहार्य है। ऐसी निष्ठ जिस क्षेत्र में लगा दी जाती है। उसका परिणाम सुनिश्चित हो जाता है। कवि अपनी कविता के लिए, चित्रकार अपने चित्र के लिए, कृषक अपनी फसल के लिए एवं भक्त अपने भगवद्लक्ष्य के लिए इसी प्रकार की भक्ति एवं निष्ठापूर्वक कर्म करते हैं। कर्म के इसी सोपान से बढ़ते हुए उन्हें अपनी मंजिल की प्राप्ति होती है।
लक्ष्य को लाँघने वाला व्यक्ति सदा वर्तमान में जीता है। वर्तमान के सर्वोत्तम क्षणों को मूर्त रूप देता है। वह आज के कार्य को कल के लिए नहीं टालता। उसे नियत समय में पूर्ण करके ही दम भरता है। अतीत की असफलता से वह सीख लेता है और उससे कभी परेशान एवं व्यग्र नहीं होता। बल्कि भविष्य में ऐसी त्रुटि न करने का संकल्प दुहराता है एवं अपने लक्ष्य हेतु योजना गढ़ता है। वह सदैव वर्तमान में जीकर अपने अभिप्सित लक्ष्य के प्रति समर्पित रहता है। वह कभी भी लक्ष्य पथ से विचलित नहीं होता। इसी कारण बड़ी-बड़ी विघ्न-बाधा को वह आसानी से पार कर जाता है। इसी कारण जेरेमी कोलीगर कहते हैं निरन्तर प्रयत्न और अद्भुत लगन से कठिनाइयाँ भी लजा जाती हैं और असम्भव सा दिखने वाला लक्ष्य सम्भव में परिवर्तित हो जाता है।
जिसने भी महानता अर्जित की है, सफलता पायी है अगर उनके जीवन के अन्दर झाँके तो प्रतीत होगा कि लक्ष्य ही उनका केन्द्र बिन्दु रहा है। उनका समस्त जीवन उनके लक्ष्य के इर्द-गिर्द ही घूमते नजर आएगा। सफलता एवं कठिनाइयों के आगे वे न तो हारे, टूटे और न बिखरे बल्कि असीम धैर्य के साथ अपने उद्देश्य की ओर बढ़ते ही चले गये।
धुन के पक्के एवं विश्वास के धनी जान इलियट बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हुए उपन्यास लेखन में सफल हुए। विपरीत परिस्थितियों में रहते हुए एक सुबह उनके विचारों ने एक स्वप्न बुन डाला और परिणाम यह हुआ कि एक कृति की रचना हो गई, जिसका नाम है- ‘सीन्स ऑफ क्लैरिकल लाइफ’ और उसे अत्यधिक लोकप्रियता मिली।
हर्बर्ट स्पेन्सर ने भी अपने जीवन में अद्भुत कार्य किया। उसके लिए उन्हें अपार कष्ट सहना पड़ा और अनन्त बाधाएँ झेलनी पड़ी। इस बीच उनका स्वास्थ्य भी साथ नहीं दे रहा था। तब कहीं जाकर छिहत्तर वर्ष की आयु में वे अपनी रचना का दसवाँ भाग पूरा कर सके। इसी प्रकार अप्रतिम साहस के योद्धा जेम्स गार्डन बनेट को न्यूयार्क हैराल्ड प्रारम्भ करते समय इतना भी अवकाश नहीं था कि मिलने वालों के साथ कुछ पल बैठकर विचार-विमर्श कर पाते, जब ग्राहक को किसी संस्करण की आवश्यकता होती तो वह ढेर की ओर संकेत कर देते और ग्राहक स्वयं कीमत देकर पत्र उठाते हुए चला जाता। ट्रिब्यून के लिए उन्हें और भी संघर्ष करना पड़ा। रोज वह अट्ठारह घण्टे काम करते। इस कठिन परिश्रम के बावजूद भी शनिवार को चौथाई डालर भी शेष न बच पाता। कभी हिम्मत न हारने वाला वह जुझारू वीर अपने लक्ष्य को कभी नहीं भूला। अन्त में चालीस वर्ष के कठोर एवं अथक श्रम के पश्चात् उन्होंने पत्रकारिता को नूतन आयाम दिये।
लक्ष्य के प्रति समर्पित इन महनीय जनों का जीवन अपने जीवन ध्येय के लिए ही उत्सर्ग हुआ। वस्तुतः जीवन में एक विशिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अटल संकल्प, दृढ़ विश्वास, उद्दाम साहस एवं असीम धैर्य की आवश्यकता पड़ती है। इसके द्वारा हर उस लक्ष्य को जिसके लिए संकल्प उठा हो प्राप्त किया जा सकता है। परन्तु ध्यान रहे कि ईश्वर के अलावा समस्त वैभव एवं सम्पदा नश्वर है। तो क्यों न जीवन के श्रेष्ठ एवं वास्तविक तत्त्व ईश्वर प्राप्ति को ही जीवन लक्ष्य बनाया जाय। क्यों न सम्पूर्ण एवं समस्त जीवन को एक उसी के लिए लगा दिया जाय, जो एकमात्र सत्य है। ईश्वर ही एकमात्र जीवनोद्देश्य है और इसी लक्ष्य के लिए निज को सर्वस्व रूप से उत्सर्ग एवं समर्पित कर देना चाहिए। ऐसा जीवन और उसका लक्ष्य दोनों ही श्रेष्ठ एवं वरेण्य होते हैं।
नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने एक विरोधी को उच्च पद पर नियुक्त किया, तो कुछ अधिकारियों ने कहा कि यह व्यक्ति आपके बारे में अच्छे विचार नहीं रखता।
नेपोलियन ने हँसते हुए कहा, “जिस पद के लिये मैंने उसे नियुक्त किया है, उसके लिये वह पूर्णतः योग्य हैं मेरे बारे में वह व्यक्ति ठीक विचार नहीं रखता, इस उत्तेजना में मैं राष्ट्र के लिये उपयोगी व्यक्ति की उपेक्षा करके राष्ट्र के साथ और स्वयं अपने साथ अन्याय कर बैठूँगा ।”
सौंदर्य अभिलाषी कौन नहीं है? सुन्दरता की चाह किसे नहीं है? हर व्यक्ति सुन्दर बनना चाहता है और किसी न किसी रूप में इसकी ओर आकर्षित होता है। यूँ तो प्रकृति का हर घटक सुन्दरता का पर्याय है। परन्तु दृष्टिकोण का फेर है कि कौन किसे सुन्दर मानता है और वह किसका पुजारी है। वस्तुतः अन्तर मन को उकेरे बिना वास्तविक सौंदर्य का दर्शन सम्भव नहीं है। अंतर्दृष्टि एवं हृदय की आँखों से ही इसे देखा एवं आनन्द उठाया जा सकता है।
यूनान के विख्यात दार्शनिक सुकरात ने सौंदर्य को परिभाषित करके उल्लेख किया है कि जो नेत्र और श्रवण के माध्यम से प्रीतिकर हो वही सुन्दर है। अर्थात् हो आँखों को पसन्द आ जाए तथा जिसके बारे में सुनने में भी अच्छा लगे वही सुन्दर है अर्थात् सुन्दरता के लिए रूप ही नहीं गुणों का भी महत्त्व है। इनके शिष्य प्लेटो ने सौंदर्य को सृष्टि का मूल तत्त्व माना है। उनके अनुसार सत्य ही सुन्दर एवं यही श्रेष्ठ है। एक अन्य दार्शनिक काण्ट के मत में यह दो तरह से होता है। इसको प्रतिपादित करने के लिए उन्होंने तर्कशास्त्र का सहारा लेते हुए स्पष्ट किया है कि एक सौंदर्य शुद्ध, पवित्र एवं निरपेक्ष होता है तथा दूसरा सापेक्ष होता है। एक स्वयं सुन्दर है इसके लिए किसी भी वस्तु को होना आवश्यक नहीं है। ईश्वर सुन्दर है। वह हर स्थिति में सुन्दर होता है। परन्तु सापेक्ष सुन्दरता उसके आसपास स्थिति किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु एवं स्थिति के तुलना पर आधारित होता है।
वास्तविक सौंदर्य में देवत्व एवं दिव्यत्व का भाव जुड़ा हुआ होता है। हीगेल ऐसी सुन्दरता को इन्द्रियों की अनुभूति माना है। परन्तु यथार्थ सौंदर्य तो इन्द्रियों एवं मन के अनुभव से परे है उसे भला कैसे प्रतिपादित किया जा सकता है। वह तो इन सबसे ऊपर है। अतः कालीदास ने कहा है ऐसा सौंदर्य गतिशील एवं नित्य नवीन होता है। इस प्रकार भारतीय दर्शन भी सौंदर्य से अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाया। पर इसने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बदलकर इसे इन्द्रियातीत कहा है। अर्थात् सौंदर्य की दिव्यता इतनी है कि वह इन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं की जा सकती। इसी वजह से वेदान्त ने इसे अनिवर्चनीयवाद के कलेवर से अलंकृत किया।
सौंदर्य के तत्त्व को सभी ने अपने-अपने ढंग से परिभाषित एवं विश्लेषित किया है। इस संदर्भ में शैव दर्शन ने इसे कला के रूप में मान्यता प्रदान की है। कला के पारखी ही इसे समुचित सम्मान एवं आदर दे सकते हैं। अतः इन्होंने सौंदर्य को कला के रूप में स्वीकारा। भक्ति साहित्य में उस दिव्य सौंदर्य को दैहिक अंग-प्रत्यंग के हाव-भाव के अंतर्गत देखा एवं परखा जाता है। इनके मतानुसार शरीर ही ऐसा माध्यम है जो उसे ठीक ढंग से अभिव्यक्त कर सकता है। इसी के द्वारा ईश्वर की अद्भुत सुन्दरता को अनुभव किया जा सकता है। हालाँकि उनके अनुसार यह पूर्ण सत्य नहीं है पर यह अनुभव बोध कराने का उसका एक यंत्र तो हो ही सकता है।
ईश्वरीय सौंदर्य को जिसने जितनी मात्रा में हृदयंगम किया, उसमें वह उसी अनुपात में अवतरित होता है। अगर यह शरीर में उतरता है तो इसकी चमक, कान्ति एवं रंग-रूप निखर उठता है। फिर शरीर सदैव स्वस्थ, निरोग एवं प्रसन्न रहता है। देह कुरूप हो या अच्छी, पर यह तो प्रकृति की देन है। इसके प्राकृतिक स्वरूप में ही सुन्दरता निहित है। प्राकृतिक दिनचर्या का अनुसरण कर प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सौंदर्य को बनाया रखा जा सकता है।
अष्टावक्र एवं सुकरात के शारीरिक सौंदर्य से भला कौन परिचित नहीं है। शारीरिक दृष्टिकोण से ये भले ही इतने अच्छे नहीं थे, पर इन्होंने ईश्वरीय सौंदर्य को अपने अन्दर उतारा था। और वे दिव्य हो गए थे। उनका कुरूप शरीर भी प्रभु का यंत्र बना ओर अत्यन्त सुन्दर बन गया। जिसकी सृष्टि में इतनी सुन्दरता अटी पड़ी है। उसका सृजनकर्त्ता-रचयिता कितना सुन्दर हो सकता है। यह कल्पना से परे की चीज है। फिर उसके स्पर्श से क्या यह देह सुन्दर नहीं बन सकती, यह काया कान्तिवान नहीं हो सकती। शरीर की वास्तविक सुन्दरता स्वस्थ एवं निरोग रहकर प्रभु का यंत्र बन जाने में ही है।शरीर द्वारा ही भगवद्कर्म सम्पादित होता है। अतः शरीर चाहे जैसा भी हो, इसे ऐसा बनाना चाहिए ताकि इसके माध्यम से कर्म के रूप में भगवत् चेतना झर सके। यही शरीर का सच्चा सौंदर्य है।
मन का सौंदर्य उसके दिव्य विचारों में सन्निहित है। श्रेष्ठ एवं सद्विचारों से मन के सौंदर्य में सदा निखार आता रहता है। चिन्तन और मनन से यह पुष्ट होता है। और इसका आधार है स्वाध्याय। स्वाध्याय की प्रक्रिया में ही मन का अप्रतिम सौंदर्य छिपा पड़ा है। यह अत्यन्त सहज-सुलभ है और हर कोई इसे प्राप्त कर सकता है। मनस्वी का मन बड़ा सुन्दर होता है। स्वाध्याय ही इसका गूढ़ रहस्य है। इसके अभाव में मन रूपी दिव्य दर्पण में कुविचारों की धूल जमती रहती है और इसकी नैसर्गिक सुन्दरता नष्ट हो जाती है।
ऐसा मन बड़ा ही कुरूप एवं विकृत होता है। यह समस्त मानवीय मनोविकारों का जनक है। यह मन कुमार्गगामी होता है और शरीर को भी सद्कर्मों से विरत कर देता है। क्योंकि यही शरीर को नियंत्रित एवं नियमित करता है। जिसमें भी ऐसा कुरूप मन का वास होता है उसका शरीर दिखने में चाहे कितना भी अच्छा क्यों न लगता हो, परन्तु सुन्दर नहीं हो सकता। अतः मन के सौंदर्य को उभारा जाय ताकि उसमें श्रेष्ठ एवं सुन्दर विचार उठ सकें। नित्य स्वाध्याय द्वारा मन रूपी दर्पण को सदा स्वच्छ एवं साफ रखा जाना चाहिए। जिससे कि आन्तरिक सुन्दरता की झलक-झाँकी देखी जा सके। मन ही वह तत्त्व है जो बाह्य और आन्तरिक दोनों प्रकार के सौंदर्य का अनुभव कर सकता है।
मन में जहाँ विचारों का सौंदर्य होता है, वहीं हृदय भावनाओं के सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करता है। वैचारिक सौंदर्य बड़ा ही प्रखर एवं प्रबल होता है, परन्तु भावनाओं के सौंदर्य में चाँदनी जैसी शीतलता होती है। किसी पीड़ित की पीड़ा से यह दयार्द्र हो उठता है और उसके प्रति मोम जैसा पिघलने लगता है। अपनी समुचित सेवा एवं सहयोग द्वारा उसके पीड़ा एवं कष्ट के निवारण करने करने लिए तत्पर हो उठता है। जिसमें भी ऐसी स्थिति आने लगी है और जो दुखी के दुःख से तथा पीड़ित की पीड़ा से व्यथित होने लगा हो तो समझा जा सकता है कि उसकी भावनात्मक सुन्दरता में वृद्धि होने लगी है।
सेवा एवं सहकार के माध्यम से भावनाओं के सौंदर्य में अभिवृद्धि होती है। क्योंकि इससे अहंकार गलता है। अहंकार ही ऐसा दृढ़ मलिन आवरण है जो भावना रूपी हृदय को आच्छादित किये रहता है। इसी हृदय में उस परम ऐश्वर्यशाली परमात्मा का गुप्त वास होता है। जिसे आत्मा के रूप में जाना जाता है। अहंकार गले बिना उसका आवरण हटे बगैर भला कैसे आत्मिक सौंदर्य का रसास्वादन किया जा सकता है। सेवा ही इस आवरण को हटाने की दिव्य साधना है। जिसके द्वारा हमें उस परम सौंदर्य की झलक-झाँकी दिखाती है। अतः आत्मिक सौंदर्य के आकाँक्षी को सदैव सेवा का व्रत अपनाये रहना चाहिए। इस व्रत से हृदय इतना पवित्र एवं परिष्कृत हो जाता है कि जीव में शिव का पावन सौंदर्य बोध होने लगता है।
इसी सत्य को अनुभव करके ऋषियों ने सौंदर्य को ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ के रूप में परिभाषित किया है। निःसंदेह सौंदर्य वही सच्चा है जो मंगलमय एवं कल्याणकारी हो। जीवन में चरित्र, चिन्तन एवं व्यवहार को उत्कृष्ट एवं परिष्कृत करके ही ऐसे दिव्य सौंदर्य का अनुभव बोध किया जा सकता है। जब इस परम सौंदर्य का अनुभव होता है तो जीवन सौंदर्य का पर्याय बन जाता है। ऐसा सौंदर्य ही महान् है। और इसी की अभीप्सा करनी चाहिए, जो हमें परमात्मा के दिव्य सौंदर्य से तदाकार-एकाकार कर दे।
महाराणा प्रताप ने अकबर से सुलह नहीं की। राजा मानसिंह आदि ने उन्हें समझाया, “समय का प्रवाह देखिए। सभी रियासतें अपना अस्तित्त्व बनाए रखने के लिये शहंशाह से सुलह कर रही हैं।” महाराणा ने कहा, “मेरे हिस्से में बापा रावल की परंपरा आई है। अन्य राजा-रईस अपनी परंपरा और ईमान देखकर निर्णय लें। मेरी परंपरा और अपना ईमान देखकर निर्णय लेना है। मुझे मेरी परंपरा और मरा अंतःकरण राष्ट्रीय गौरव खोकर सुख-सुविधा जुटाने की इजाजत नहीं देता। सुलह की बात समझानी है, तो बादशाह को समझाओ। अपने साँस्कृतिक गौरव की रक्षा हमारा कर्त्तव्य है, वही हम कर रहें हैं।”
महाराणा प्रताप ने आदर्शों की कसौटी पर अपना कर्त्तव्य निर्धारित किया। जन-प्रवाह की कसौटी पर करते तो इतिहास के मूल्यवान नग न कहलाते।
मौन अन्तर का शृंगार है। यह आन्तरिक शक्तियों की अभिवृद्धि एवं अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ साधन है। इसमें असीम एवं प्रबल सामर्थ्य है क्योंकि यह आन्तरिक ऊर्जा के क्षरण को रोकता है। अतः प्रत्येक श्रेष्ठ एवं महान् कार्य की सफलता में गहन, गम्भीर मौन सहायक रहा है। यही मानव चेतना का गूढ़ रहस्य है।
सामान्यतः वाणी को विराम देना मौन कहलाता है। परन्तु सार्थक मौन उसे कहते हैं, जब मन में सद्चिन्तन होता रहे। यूँ ही जिह्वा को बन्द रखकर मन में ईर्ष्या-द्वेष का बीज बोते रहने को मौन नहीं कहा जाता। यह तो और भी खतरनाक एवं हानिकारक सिद्ध हो सकता है। मौन के साथ श्रेष्ठ चिन्तन, ईश्वर स्मरण आवश्यक है तभी मौन की सार्थकता है। इस संदर्भ में श्री अरविन्द आश्रम की श्री माँ कहती हैं कि सात दिन के गम्भीर मौन के बाद ही एक घण्टा सार्थक बोला जा सकता है। और एक वर्ष का मौन एक दिन बोलने की अनुमति प्रदान करता है। इससे मौन की महत्ता प्रतिपादित होती है।
मौन की महिमा एवं गरिमा अतुलनीय है। भले ही यह गम्भीर मौन सबसे न सधे पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस व्रत का पालन अवश्य ही करना चाहिए। मौन से जिह्वा पर नियंत्रण रहता है और अनर्गल प्रलाप से बचा जा सकता है। अन्यथा वाणी के दुरुपयोग से भला कौन अपरिचित है। महाभारत का भीषण युद्ध इसी बेलगाम वाणी का ही तो परिणाम है। अधिक बोलने वाले को वाचाल कहा जाता है। और ऐसे व्यक्ति की बातों पर विश्वास उठ जाता है। सारे अनर्थ का जड़ इसी में निहित है। सच्चा और सार्थक बोलने के लिए मौन रहना अनिवार्य है। इसी कारण कभी-कभी तो ऐसी वाणी को मौन की संज्ञा तक दे दी जाती है।
प्रकृति का हर घटक, इसका प्रत्येक जीव मौन रहकर अपने कर्त्तव्य कर्म में संलग्न है। न कहीं कोई व्यतिक्रम है और न ही अव्यवस्था। सभी मौन होकर अपने-अपने नियत कर्म में जुए हुए हैं। परन्तु सृष्टि का सबसे बुद्धिमान एवं श्रेष्ठ कहा जाने वाले मानव के हाल बड़े ही बेहाल है। वाणी का सर्वाधिक दुरुपयोग यही करता है। यह विडम्बना ही है पर जितना जल्दी हो सके इसे सुधार लेना चाहिए। क्योंकि मौन में वाणी से भी अधिक सामर्थ्य होती है।
मौन हमें अन्तर्मुखी बनाता है। हम अन्तर की आवाज को इसी अवस्था में सुन एवं समझ सकते हैं। तभी हमें प्रकृति की दिव्य वाणी सुनाई दे सकेगी और उसका आनन्द उठाया जा सकता है। सूरज ढलते ही संध्या का स्वर, रात में अपूर्व शृंगार से टिमटिमाते तारों की थिरकन एवं चन्द्रमा के शीतल प्रकाश को मौन रहकर ही अनुभव किया जा सकता है। प्रकृति का दिव्य स्वरूप मौन में ही निहित है। स्वयं मौन होकर ही इसकी झलक-झाँकी प्राप्त की जा सकती है। इसी मौन में ही कवि का सुकोमल भाव फूट पड़ता है। और काव्य धारा के रूप में निःसृत होता है।
जब धरती प्यास की अकुलाहट से तड़प उठती है तो ऊपर से उमड़ते-घुमड़ते बादल आते हैं और वर्षा कर इसकी प्यास को बुझा जाते हैं। हवा निरन्तर बहती रहती है और प्राणवायु बनकर अपने कर्त्तव्य धर्म पालन करती है। सूर्य देव जगत् के सभी जीवों में प्राण का संचार करते रहते हैं। ये सभी दैव शक्तियाँ सदा मौन रहते हुए अपने कार्य को संचालित करती हैं। कभी किसी ने दंभपूर्ण वाणी का प्रयोग नहीं किया।
अटल अविचल हिमालय अनन्तकाल से मौन खड़ा है। न जाने कितने योगी, यति, तपस्वियों की यह पावन आश्रयस्थली बना हुआ। यह मौन होकर अपने बर्फानी शरीर को गलाकर गंगा जैसी पुण्यतोया नदी को जन्म देता है। और यह पावन एवं पुण्य सलिला न जाने कितने संतप्तजनों को शीतलता का, पवित्रता का वरदान देती चली आ रही है। न इसमें इसका कर्त्तापन का अहंकार है और न कर्म के प्रति आसक्ति। ये तो सदा मौन व्रत धारण किये प्रकृतिगत कर्म बनकर औरों के लिए न्यौछावर होते रहे हैं।
मौन की भाषा अव्यक्त होकर भी अभिव्यक्त हो जाती है। यह अनकही होती है फिर कह देती है। यही इसकी विशेषता है। पुष्प को अपने बारे में बखान नहीं करना पड़ता। यह जब खिलता है तो वातावरण स्वतः ही सुगन्धमय हो उठता है। और उसके पास से हर गुजरने वाले किसी भी व्यक्ति को इसके अनुभव से वंचित होना नहीं पड़ता। डाली से कटकर मुस्कराते रहने की इसकी प्रेरणा भी मौन ही होती है, जिसे हृदयंगम कर हर परिस्थितियों में प्रसन्न रहा जा सकता है। दीपक भी मौन होकर निष्कम्प जलता रहता है। यह तमस की छाती को चीरकर आलोक का पथ गढ़ता है और हरेक को अपने निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए सहायता प्रदान करता है। दीपक का मौन क्या किसी प्रभावपूर्ण उपदेश या आख्यान से कम है। इसी मौन में भक्त भगवान का कृपापात्र बनता है। गहन मौन में लीन दार्शनिक का चिन्तन नवीन दर्शन को जन्म देता है, एवं वैज्ञानिक अपने शोध-अन्वेषण से एक नया आविष्कार करता है। ऐसा मौन ही सार्थक है।
अरुणाचलम् के महर्षि रमण सदैव मौन रहते थे। परन्तु उनका मौन उपदेश आत्मा की गहराई में उतर जाता था। बिना बोले वह हरेक की जिज्ञासा को शान्त करते और हर कोई उनसे अपनी गम्भीर समस्या का समाधान अनायास पा जाता था। उनके मौन आशीर्वाद से ही मनोकामना पूरी हो जाती थी। महायोगी श्री अरविन्द ने मौन में ही अतिमानस योग को सिद्ध किया। इस दौरान सन् 1926 से 1950 के अपने महानिर्वाण तिथि तक वह एक कोठरी में कैद हो गये थे। उन दिनों वे प्रायः मौन रहा करते थे। और उनकी इस मौन योग साधना ने मानव जाति को एक नूतन उपलब्धि दी।
मौन एक व्रत है। इस व्रत के व्रती आचार्य विष्णु गुप्त के अन्दर एक जीवट एवं महापराक्रमी चाणक्य ने जन्म लिया, जिसने अखण्ड भारत के भविष्य के उज्ज्वल स्वरूप को मूर्त रूप प्रदान किया। और इनके इस मौन का ही परिणाम था कि अब तक के इतिहास के सबसे बृहत्तर भारत का उदय हो सका। सबके दिलों में धड़कने वाले गाँधी जी के मौन का प्रभाव कितना विलक्षण एवं अद्भुत था इससे भला कौन परिचित नहीं है, जिसने अपने देश की सदियों पुरानी गुलामी रूपी लौह बेड़ी को तोड़कर एक अकल्पनीय स्वतंत्रता प्रदान की। क्या यह अटूट एवं प्रबल मौन से उपजी उनकी आत्मशक्ति नहीं थी, जिसने कभी न अस्त होने वाले साम्राज्य को पराजय एवं पराभव का कड़वा घूँट पिला ही दिया।
अंग्रेजी साहित्य के महान् कवि वर्ड्सवर्थ प्रकृति के उपासक थे। वह प्राकृतिक सौंदर्य को एकान्त में मौन होकर घण्टों निहारा करते थे। वह कहते हैं कि मैंने वर्षों पूर्व अपने पसंदीदा फूल डेफोडिल्स को देखा था। मैं प्रायः मौन एवं शान्त होकर उसे अपनी अन्दर की आँखों में देखता था। और उस क्षण मेरा हृदय आनन्दातिरेक से लिप्त होकर उसके साथ भाव-विभोर से उठता है। वह अपने काव्य को मौन एवं नीरवता का वरदान कहा करते थे।
विख्यात एवं महान् दार्शनिक बट्रेंड रसेल ने भी मौन की महत्ता-विशेषता को स्वीकारा है। उन्होंने इस संदर्भ में एक घटना का उल्लेख किया है। वह जिस नगर में निवास करते थे वहाँ पर एक विराट् ग्रंथालय था। जिस समय रसेल अध्ययन हेतु वहाँ जाते थे। उसी समय एक अन्य पाठक भी वहीं नित्य आता था। दोनों आते पढ़ते और मौन होकर वापस चले जाते और यह क्रम अनवरत चालीस वर्ष तक चलता रहा। यह अखण्ड मौन तब टूटा जब एक दिन रसेल ने सुना कि उस पाठक की मृत्यु हो गई और वे सहसा कह उठे- मैंने अपना एक अत्यन्त प्रिय मित्र को खो दिया।
अतः जीवन में श्रेष्ठ एवं सार्थक कार्य के लिए मौन को एक व्रत मानकर अपनाना चाहिए। प्रतिदिन न बन पड़े तो सप्ताह में एक निश्चित दिन के कुछ घण्टों से प्रारम्भ करके क्रमशः इसे बढ़ाते रहना चाहिए। क्योंकि जब व्यक्ति बोलता है तो जिह्वा हावी रहती है और मौन की अवस्था में अन्तर बोलता है। हमें अपने अन्तर को बोलने का अवसर प्रदान करना चाहिए। क्योंकि इसी में जीवन का सारा मर्म छिपा है। और इस दिव्य अवसर से हमें अवश्य ही लाभान्वित होना चाहिए। तभी इस सुरदुर्लभ जीवन की सार्थकता सम्भव हो सकती है।
तानाजी के पुत्र का विवाह था, तभी कोंडल दुर्ग के लिये युद्ध की सूचना आ पहुँची। तानाजी ने कहा, “अपने देश और समाज के आगे व्यक्तिगत स्वार्थ तुच्छ हैं।” वह युद्ध के लिये चल पड़े। युद्ध में जीत उन्हीं की हुई, पर उनका शरीर काम आ गया। उनकी स्मृति में ही इस दुर्ग का नाम सिंहगढ रखा गया। शिवाजी ने कहा, “तानाजी जैसी जीवन की सार्थकता बिरलों को मिलती है।”
‘चने ले लो, चने-भुने हुए चने, मसालेदार चने।’ यह आवाज अनगिन लोगों को चने के चटपटे पन का अहसास करा देती। पर इसमें जो टीस थी, जो दर्द था, जो विकलता थी, उसका अहसास कुछ इने-गिनों को ही था। स्कूल से आते ही अनिरुद्ध बिना कुछ खाए डोलची में चने रखकर बेचने के लिए चल पड़ता। चने बेचते हुए वह अपनी पढ़ाई की बातें भी सोचता रहता।
अनिरुद्ध के पिता रघुवीर स्वदेशी कॉटन मिल में काम करते थे, लेकिन मिल की छटनी में उन्हें निकाल दिया गया। अब वह बेकार थे, काम की तलाश में बस मारे-मारे घूमते थे। घर की हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी। दो समय की रूखी रोटियाँ मुश्किल हो रही थी। अब केवल अनिरुद्ध की माँ शकुन्तला की मेहनत-मजदूरी का सहारा था। वह कुछ सम्पन्न घरों में झाड़ू-चौका, बर्तन का काम करती थी। उधर अनिरुद्ध भी रोज चने बेच लेता। इस तरह जिस किसी तरह का घर का काम चल रहा था।
शकुन्तला को हर समय अनिरुद्ध की पढ़ाई की चिन्ता खाये रहती। किसी तरह अनिरुद्ध ने भी परिस्थितियों से जूझते हुए हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली। उसे अब ग्यारहवीं दर्जे में दाखिल लेना था, लेकिन उसके पास दाखिले की फीस के लिए रुपये नहीं थे। शकुन्तला बहुत परेशान थी, अनिरुद्ध भी रुआँसा था। ऐसे में शकुन्तला को मैनेजर साहब की पत्नी-अपनी मालकिन की याद आयी। वह सुबह ही उनके घर निकल गयी।
अनिरुद्ध इस आशा में साँस रोके बैठा था कि माँ की बात मालकिन कभी नहीं टालेंगी। उसके एडमीशन की फीस की व्यवस्था वहाँ जरूर हो जाएगी। क्योंकि उसकी माँ ने हर मुसीबत एवं परेशानी उठाकर उनकी भारी सेवा की थी।
अनिरुद्ध घर के दरवाजे पर खड़ा बहुत बेचैनी से अपनी माँ का इन्तजार कर रहा था। जब उसने माँ को आते हुए देखा तो उसे कुछ तसल्ली हुई, लेकिन उसने जब माँ को गौर से देखा तो उसकी परेशानी और बढ़ गयी। माँ के चेहरा बुझा-बुझा था। उदासी की काली झाँयीं उसके चेहरे को ढके थे। आते ही सीधे बिना उसकी ओर देखे भीतर चली गयी और चटाई पर धम्म से बैठ गयी। ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके शरीर का पूरा खून किसी ने निचोड़ लिया हो। अनिरुद्ध की हिम्मत नहीं हुई कि माँ से कुछ पूछे। फिर भी सहमते हुए उसने माँ से पूछा, माँ तुम्हारी तबियत तो ठीक है?
‘हार गयी बेटा मैं’ माँ ने आँसू पोछते हुए कहा-’मालकिन साफ मुकर गयीं। उन पर मुझे पूरा भरोसा था, पर वह मेरी बात सुनते ही अपना खुद का रोना लेकर बैठ गयी। कुछ जगहों पर और भी कोशिश की, पर कोई बात नहीं बनी। बड़े लोग हैं, जब जैसी मर्जी आए बोलने के लिए स्वतंत्र हैं। क्या करूं? कुछ समझ में नहीं आता मुझे माफ कर दो बेटा।’
आज एडमीशन का आखिरी दिन था। और अभी तक फीस के अभाव में अनिरुद्ध का दाखिला नहीं हो सका था। माँ-बेटा दोनों ही इसी सोच में उदास बैठे थे। तभी उधर से अनिरुद्ध के शिक्षक रामशरण निकले। वे अनिरुद्ध के पास आकर बोले-क्या बात है अनिरुद्ध तुमने अभी कॉलेज जाना शुरू नहीं किया?
अनिरुद्ध ने उठकर अपने मास्टरजी के पाँव छुए और रुंधे गले से कहा,कॉलेज कैसे जाएँ, मेरा तो दाखिला ही नहीं हुआ। इसके बाद की सारी कहानी माँ-बेटे के चेहरे ने कह सुनायी। जिसे रामशरण जी मौन भाव से समझ गए। सारी स्थिति को अनुभव करके उन्होंने कहा-परेशान न हो बेटे, हम तुम्हारी व्यवस्था करेंगे और साथ ही तुम्हें उसे महाशक्ति से भी परिचय करायेंगे जिसके स्मरण मात्र से जीवन के सारे दुःख दूर होते हैं।
श्री रामशरण जी गायत्री के साधक थे। गायत्री महामंत्र उनके जीवन का प्राण था। पर वे अपनी साधना बड़े ही गोपन भाव से करते थे। किसी को भी उनकी इस गहन साधना का अहसास था, पर आज उन्होंने अनिरुद्ध के सामने अपनी साधना का रहस्य सविधि समझा दिया। सूर्यमंडल में स्थिति गायत्री महाशक्ति का ध्यान चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र की जप विधि उन्होंने अनिरुद्ध को कह सुनायी। साथ ही उन्होंने बताया कि बेटा अनिरुद्ध-तप के बिना जप कुछ ऐसा है जैसे गर्मी से रहित अग्नि। जप के साथ जब तक तप की प्रक्रिया का योग नहीं होता, तब तक जप का प्रभाव नहीं होता।
और इसी के साथ उन्होंने उसे तप के चार सूत्रों का उपदेश दिया। उन्होंने कहा, अनिरुद्ध तप के चार सूत्र हैं-1. अर्थ संयम 2. समय संयम 3. इन्द्रिय संयम 4. विचार संयम। इस चतुः सूत्री साधना के साथ की गयी गायत्री उपासना सारे असंभव को संभव बनाने में सक्षम एवं समर्थ है। तुम समूचे विश्वास के साथ आदि शक्ति माता गायत्री का आँचल थाम लो। माँ कृपा से तुम्हारी सारी पीड़ाएँ दूर होंगी।
ये सारी बातें बताकर उन्होंने उसी दिन अनिरुद्ध का कॉलेज में दाखिला करवा दिया। उसकी पुस्तकों एवं अन्य अध्ययन सामग्री का प्रबन्ध किया। अन्य चीजों के लिए मास्टर जी ने आश्वासन दिया-कोई भी दिक्कत हो तो मुझे बताना। और कभी-भी हिम्मत मत हारना। हमेशा ही महायोगी श्री अरविन्द के इस वचन को याद रखना- Every thing can be possible if God touch is there. अर्थात्-यदि प्रभु का संस्पर्श बद्ध हो तो सब कुछ सम्भव है।
अनिरुद्ध ने मास्टर जी के पाँव छुए और जीवन साधना की राह पर चल दिया। मास्टर जी ने उसकी पढ़ाई का पहिया तो चला दिया था, लेकिन घर का पहिया अभी तक दलदल में फँसा था। इस कारण अनिरुद्ध को चने बेचने का काम लगातार करना पड़ता था। अपनी चतुः सूत्री साधना के साथ प्रति मास सवा लक्ष गायत्री महामंत्र के अनुष्ठान के साथ वह पढ़ाई की लालटेन को जलाए रखता। उसे मास्टर जी के द्वारा कहा गया महर्षि अरविन्द का वचन-यदि प्रभु का संस्पर्शबद्ध हो तो सब कुछ संभव है, हमेशा याद रहता। इसलिए चने बेचने की थकान के बावजूद वह अपनी साधना एवं अध्ययन को कभी नहीं भूलता।
गायत्री महामंत्र की सविधि उपासना से उसकी मेधा तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतम हो गयी। तमाम परेशानियों के बावजूद उसने इण्टर फिर बी.ए. किया। इन्हीं झंझावातों में एक दिन उसने एम. ए. की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली।
शकुन्तला के मुख पर इस खबर ने एक अनोखी आभा ला दी। उसकी आँखें खुशी से छलक पड़ी। माँ की आँखों में आँसू आया हुआ देखकर वह बोला-माँ अब चिन्ता क्यों करती हो? चाहे जैसे भी हो मुझे आइ.ए.एस. की परीक्षा पास करनी है।
माँ गायत्री सब सम्भव करेंगी बेटा! माँ के आँचल की छाया में तू जरूर आई.ए.एस. बनेगा।
अपने असीम भगवद् विश्वास के साथ वह तैयारियों में जुट गया। साथ ही अपने लिए एक छोटी सी फर्म में क्लर्क की नौकरी की व्यवस्था भी जुटायी, ताकि माँ का काम छुड़ाया जा सके।
अनिरुद्ध को अब तक पीड़ा सहने की आदत पड़ चुकी थी। उसने पीड़ा को भी तप का एक साधन मान लिया था। उसे इस तथ्य पर पूर्ण विश्वास था कि भगवद् कृपा एवं पुरुषार्थ का संयोग असम्भव को भी संभव किया करता है। अपने निश्चय पर अडिग वह आई.ए.एस. की तैयारियों में जुट गया, हाँलाकि इन दिनों उसकी माँ का स्वास्थ्य खराब था। अभाव और संघर्ष ने उसे तोड़ दिया था। भीतर ही भीतर घुलते रहने के कारण उसके शरीर में घुन सा लगा गया था। अब उसे ज्यादातर खाँसी आती रहती और बुखार बना रहता।
आई.ए.एस. की मुख्य परीक्षा के लिए उस दिन अनिरुद्ध अभी तैयार ही हो रहा था कि उसकी माँ को खाँसी का इतना जबर्दस्त दौरा पड़ा कि खाँसते-खाँसते उसके मुँह से खून भी निकल पड़ा। इसी के साथ वह बेहोश हो गयी। हे माँ गायत्री! यह कैसी विपदा आन पड़ी। अनिरुद्ध को घबराहट में गायत्री महामंत्र के अलावा और कुछ न सूझ पड़ा। उसके होंठ अस्फुट स्वरों में गायत्री जप रहे थे और मन जगन्माता से प्रार्थना करने में तल्लीन था। इसे माँ गायत्री की कृपा कहें या अनिरुद्ध की अगाध श्रद्धा का सजीव चमत्कार माँ को होश आ गया। लेकिन उसकी हालत अभी कुछ ज्यादा ठीक न थी। वह ऊहापोह में था कि परीक्षा के लिए जाय अथवा नहीं।
इस सोच-विचार में उसके माथे पर चिन्ता की लकीरें गहरी हो गयीं। इस समय वह बहुत से बेचैनी और घबराहट का अनुभव कर रहा था। लगता था कि उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा।
तभी शकुन्तला ने आँखें खोल दी, सामने परेशान खड़े अनिरुद्ध को देखकर उन्होंने क्षीण स्वर में कहा-बेटा अनिरुद्ध! आज तुम्हारी परीक्षा का दिन है, तुम गए क्यों नहीं? तुम जाओ मैं यहाँ ठीक हूँ।
पर माँ! तुम्हें इस हालत में छोड़कर भला मैं कैसे जाऊँ? अनिरुद्ध ने बेचैनी भरे लहजे में कहा-फिर मेरा मन भी ऐसे में किस तरह लगेगा?
माँ के होठों पर क्षीण सी मुस्कराहट आयी और वे बोली-पगले! जगज्जननी माँ गायत्री की कृपा पर इतना अविश्वास नहीं करते। मुझे कुछ नहीं होगा, माँ पर श्रद्धा रख।
गायत्री महामंत्र ने उसे इन क्षणों में प्राणों का नया अनुदान दिया। और वह श्रद्धा से मन ही मन गायत्री महामंत्र जपता हुआ परीक्षा देने जाने के लिए राजी हो गया।
परीक्षा के पश्चात् उसने जी जान लगाकर माँ की सेवा की। और सेवा की रंगत माँ के जीवन में साफ-साफ दिखने लगी। चिकित्सक की सहायता अनिरुद्ध की सेवा और माँ गायत्री कृपा से शकुन्तला ठीक हो गयी। हाँलाकि इस क्रम में महीनों गुजर गए।
तभी एक दिन उसके मित्र संजीव ने उसके दरवाजे पर दस्तक दी। संजीव की खुशी उसके चेहरे पर साफ-साफ झलक रही थी। उसने अनिरुद्ध को गले से लगाते हुए बधाई दी-अरे भाई अब तुम चने वाले अनिरुद्ध से आई.ए.एस. हो गए। मेरी बहुत-बहुत बधाई स्वीकार करो।
सच मैं पास हो गया। अनिरुद्ध को एकबारगी विश्वास ही नहीं हो रहा था। संजीव ने जब समाचार पत्र दिखाया तो उसे यथार्थ का ज्ञान हुआ। इस सफलता के समाचार ने उसकी आँखों में आँसू भर दिए। इन आँसुओं में श्रद्धा-कृतज्ञता एवं खुशी एक साथ छलक रही थी। उसने भाव भरे स्वर में कहा-यह सब माँ गायत्री की कृपा, मेरी माँ की तपस्या, पिता जी के आशीष एवं मेरे शिक्षक श्रीरामशरण जी की प्रेरणा का फल है।
अभी वह इतना कह ही रहा था कि उसके सामने मास्टर रामशरण जी को खड़ा पाया। उन्होंने अनिरुद्ध से गदगद होकर कहा-बेटा ध्यान रखना यह तुम्हारी गायत्री साधना के सुफल की शुरुआत है। माँ अपने साधकों को लौकिक यश-ऐश्वर्य-अलौकिक शान्ति सब कुछ देकर निहाल करती है। तभी तो गायत्री साधना की परिणति बताते हुए अथर्ववेद में कहा गया है-’ॐ स्तुता मया वरदा वेदमाता, प्रचोदयन्ताम् पावमानी द्विजानाम् आयुः प्राणं प्रजाँ पशुँ कीर्तिम् द्रविणम् ब्रह्मवर्चसम् मह्यम् दत्वा ब्रजत ब्रह्मलोकम्।’ मास्टर रामशरण जी उसे गायत्री की अगाध महिमा का बोध कराकर चले गए। और अनिरुद्ध इस महामंत्र के गहन चिन्तन में लीन हो गया।
हालैंड की पुरानी घटना है। नदी की बाढ़ से रेल का पुल टूट गया। गाड़ी आने का समय हो गया था। टूटने की जानकारी न होने से वह चली आती तो डूब जाती।
एक छोटा लड़का वहाँ मौजूद था। आने वाली गाड़ी को रोकने के लिये उसने तुरंत उपाय सोच लिया। कुर्ता फाड़कर झंडी बनाई। भुजा काटकर खून निकाला और उसे लाल रंग लिया। पटरी पर लकड़ी में लाल झंडा फहराता हुआ वह खड़ा था। गाड़ी चली आती, तो जान जोखिम का खतरा भी था, पर उसने उसकी परवाह न की। ड्राइवर ने लड़के को खड़ा देख लिया। गाड़ी रोकी। दुर्घटना रुकी। गाड़ी वापस लौटी। उस लड़के जार्ज स्टेनले को उस देश के निवासी और सुनने वाले कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करते और मन-ही-मन धन्यवाद देते हैं।
रैदास की निस्पृहता और कर्त्तव्यनिष्ठा से इंद्र बहुत प्रसन्न हुए, सोचने लगे इनकी दरिद्रता दूर करनी चाहिए, सो पारसमणि लेकर उनके पास पहुँचे और बोले, “इसे रखिए, जब आवश्यकता हो लोहे का इससे स्पर्श कराए और सोना बना लें। आपको किसी वस्तु का अभाव न होगा।”
संत ने इंद्र का सत्कार किया और उनका अनुग्रह स्वीकार करते हुए किसी कोने में सुरक्षित रख दिया। बहुत दिन बीते, इंद्र उधर से फिर निकले, सोचा रैदास की संपन्नता देखते चलें। सो उनकी कुटिया में जा पहुँचे। देखा, तो पहले जैसी ही अभावग्रस्त परिस्थितियाँ बनी हुई थी। संपन्नता का वैभव रंचमात्र भी नहीं था।
इंद्र ने पारस के उपयोग करने की बात का स्मरण दिलाया, तो उन्होंने इतना ही कहा, “बिना परिश्रम की संपदा का उपयोग करने पर संतवृत्ति से हाथ धोना पड़ेगा। इतनी हानि उठाते मुझसे नहीं बन पड़ेगी।”
कोने में से ढूंढ़कर पारस इंद्र को लौटा दिया और वे सच्ची संतवृत्ति के प्रति नतमस्तक होकर वापस स्वर्ग चले गए।
आज का युग विशुद्ध रूप से विज्ञान का युग है। यह प्रकृति और पदार्थ के रहस्य को अनावरण करता है। परन्तु यह रहस्य केले की पौधे के समान परत दर परत निकलता चला जा रहा है। स्थिति यह है कि विज्ञान जब तक किसी नियम एवं सिद्धान्त की रचना करता है तब तक एक नयी परिकल्पना उठ खड़ी होती है। और यह प्रक्रिया अन्तहीन सिलसिले के रूप में चलती रहती है। इसलिए परम सत्य की तो दूर की बात है अभी तक प्रकृति के कुछ अंश को भी नहीं जाना जा सका है।
विज्ञान का जन्म दर्शन के गर्भ से हुआ है। अतः शैशव काल के विज्ञान में दार्शनिकों का मत दृष्टिगोचर होता है। चूंकि विज्ञान का क्षेत्र ही पदार्थ जगत् है इसी कारण सर्वप्रथम दार्शनिक हेराक्लिटस ने सर्वप्रथम पदार्थ की ही व्याख्या की। उन्होंने इसे परिवर्तनशील माना। एक अन्य दार्शनिक पारमेनिडीज ने इस तथ्य की पुष्टि की। ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी तक यही मान्यता प्रचलित रही। परन्तु इसके पश्चात् डेमोक्रियस ने पदार्थ पर एक नवीन परिकल्पना की। उसके अनुसार मकान का निर्माण ईंटों से होता है। ईंटों से मिलकर ही भवन बन सकता है। ठीक उसी प्रकार प्रत्येक पदार्थ भी एक छोटे-छोटे कणों से जुड़कर विनिर्मित होता है। चीनी के एक दाने में असंख्य छोटे-छोटे कण होते हैं। अन्त में इन सूक्ष्मतम कणों को ही परमाणु कहा गया है। और यही से विज्ञान की यात्रा प्रारम्भ हुई।
इस प्रकार विश्व में शताब्दियों तक पदार्थवाद का प्रभाव छाया रहा। यहाँ तक कि इसे प्राण एवं चेतना का प्रमुख तत्त्व माना जाने लगा। उन दिनों इसी का बोलबाला रहा। परन्तु 1787 में आइज़ेक न्यूटन की ‘प्रिंसिपिया’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें उन्होंने गति के सिद्धान्तों की नवीन व्याख्या की। और सर्वप्रथम इसी ने पदार्थ (matter)को अक्रिय एवं जड़वत् माना। उनके अनुसार वे ठोस, अभेद्य एवं कम गतिशील होते हैं। यही वह बिन्दु है, एक मोड़ है, जहाँ से आधुनिक विज्ञान का प्रादुर्भाव हुआ।
विज्ञान के क्षेत्र में जड़त्व के सिद्धान्त ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। इसने पाश्चात्य जगत् में एक नई क्रान्ति खड़ी कर दी। यह ऐसी क्रान्ति जो अब तक किसी ने न तो की था और न ही इसकी परिकल्पना तक की थी। और इसी का परिणाम था कि अठारहवीं एवं उन्नीसवीं सदी का यूरोप औद्योगिक क्रान्ति के प्रेरणा के रूप में प्रख्यात हुआ। वहाँ पर समृद्धि एवं सम्पन्नता में बेशुमार वृद्धि हुई। इसी वजह से अनेक आविष्कार हुए। भाप और लोहे के संयोग से विशाल ट्रेन एवं जहाज का निर्माण होने लगा। और इसके लिए उपयोग में आने वाले अनुपयोगी लोहे एवं कोयले की महत्ता एकाएक बढ़ गई। ऐसा लगा कि विज्ञान ने पदार्थ पर विजय प्राप्त कर लिया है तथा प्रकृति की असीमित शक्ति व ऊर्जा को पालतू बना लिया है।
न्यूटन के गति का सिद्धांत से अंधपरम्पराएँ टूटी एवं बिखरीं। उन्होंने स्थिर माने जाने वाली पृथ्वी का उपर्युक्त स्थान स्पष्ट किया। हालाँकि इसके पूर्व कॉपरनिकस, केप्लर एवं गैलीलियो आदि भी ऐसा ही प्रतिपादन कर चुके थे। परन्तु न्यूटन के सिद्धान्त ने ग्रहों की गति एवं उसके कक्ष आदि का निर्धारणा किया। सौर मण्डल में ग्रह आपस में टकराते क्यों नहीं, वे अपनी कक्षा में कैसे घूमते रहते हैं। इसके अलावा उपग्रह एवं धूमकेतु आदि आकाशीय पिण्डों की जानकारी मिली। यही से अन्तरिक्षीय यात्रा की परिकल्पना साकार होने लगी कि अनन्त आकाश में तारों जैसे टिमटिमाते ग्रहों पर भी इन्सान अपने उपग्रह भेज सकता है एवं इसकी सैर कर सकता है। यह न्यूटन की देन थी।
इस अनुसंधान से चमत्कृत एवं हतप्रभ विश्व ने भौतिकवाद को अपना लिया। परिणामतः सभी क्षेत्रों में पदार्थ की इस भौतिक अवस्था का समावेश होने लगा। सभी की दृष्टिकोण एवं सोच इसी के इर्द-गिर्द घूमने लगा। पदार्थ से हटकर कोई परिकल्पना संभव ही नहीं हो सकती। और इस तरह जीवों एवं प्राणियों का अध्ययन-अनुसंधान करने वाला मनुष्य भी इसी के गिरफ्त में आ गया। जीवित प्राणी को स्वचालित यंत्र कहा एवं समझा जाने लगा। इसी वजह से जैव भौतिकवाद के मूर्धन्य वैज्ञानिक रिचर्ड डाकिन्स तक को मनुष्य एवं अन्य प्राणियों को जीव मशीन कहना पड़ा।
मनोविज्ञान भी इस प्रभाव से अनछुआ नहीं रह सका। मस्तिष्क को मन का माध्यम मानने के बजाए इसे मशीन माना गया। जिस प्रकार यंत्र काम करता है ठीक उसी प्रकार से मस्तिष्कीय क्रियाकलाप की व्याख्या की गई। मनुष्य में दया, संवेदना, भावना, करुणा, सेवा, सहयोग जैसे दुर्लभ मानवीय गुणों का कोई स्थान नहीं रहा। बस यंत्रवत वह कार्य कर सकता है। उसके आगे उसका कोई मूल्य नहीं है। इस तरह भौतिकवाद ने मनुष्य की मनुष्यता पर कुठाराघात किया। मनुष्य के मौलिक चिन्तन एवं अनुभव का कोई महत्त्व ही नहीं रहा। भौतिकता के उन्माद ने इंसानियत को निगल जाने का प्रयास किया। संभवतः इससे उपजे आक्रोश ने इस भौतिकवाद को ही नकार दिया। और कहा जाने लगा कि नीत्शे के ईश्वर के समान भौतिकवाद का भी अन्त हो गया।
यह भौतिकवाद मरा तो नहीं परन्तु एक नये रूप में फिर से खड़ा हो गया, जिसे मॉडर्न फिजिक्स कहा जाता है। अलबर्ट आइन्स्टीन का सापेक्षतावाद इसी नई भौतिकी की देन है, जिसने न्यूटन के टाइम-स्पेश को नया आयाम दिया। इसमें एक ओर जहाँ अवस्था के दिक्-काल का निर्धारण किया वहीं दूसरी ओर सामान्य जीवन को प्रभावित किया। किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना की जानकारी एक दूसरे से तुलना करके ही जानना सम्भव है। इसी तरह से इसे प्रतिपादित किया गया। इससे पदार्थ के पुराने सिद्धान्त एकदम बदल गए। नये ढंग से परमाणविक परिकल्पना होने लगी। न्यूटन के डिएरमिनीस्टिक मशीन के बदले वेव और पार्टिकल्स (तरंग कण) के नये समीकरण का गठजोड़ होने लगा। इसे क्वाण्टम थ्योरी के रूप में जाना जाता है। इस सिद्धान्त में ठोस पदार्थ का अस्तित्व विलीन हो गया। समस्त भौतिक जगत् को तरंग रूपी ऊर्जा का अनन्त भण्डार माना जाने लगा। इस कारण पूर्व प्रचलित नियम टूटे और इसके स्थान पर संयोग का नया नियम लागू हुआ।
इतनी सुदीर्घ यात्रा के बाद विज्ञान को यह मानना पड़ा कि ठोस रूप में दिखने वाला पदार्थ वस्तुतः कोई पदार्थ नहीं है बल्कि यह विराट् चेतना समुद्र का एक भौतिक रूप है। यही चैतन्य ऊर्जा घनिभूत होकर द्रव्य बनती है। और यह द्रव्य पुनः उसी ऊर्जा में परिवर्तित हो सकते हैं। क्वाण्टम फिजिक्स में इस ऊर्जा को तरंग एवं द्रव्य को कण के रूप में परिकल्पना की जाती है। जब इस द्रव्य को दिक्-काल के साथ जोड़ जाता है यही सुपरस्ट्रिंग थ्योरी कहलाती है। इस थ्योरी के प्रादुर्भाव होने के साथ ही न्यूटन का जड़त्व पिण्ड का सिद्धान्त समाप्त हो गया।
विज्ञान के इस सूक्ष्म विश्लेषण ने अनेकों सिद्धान्तों ने जन्म लिया। पदार्थ अपना स्वरूप कब बदलेगा यह कहा नहीं जा सकता। विज्ञान की अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी भी इसकी भविष्यवाणी कर पाने में असफल है। भले ही वह मौसम कर पूर्वानुमान लगा सकता है। इसे थ्योरी ऑफ केआस कहा जाता है। यह सिद्धान्त केवल इतना स्पष्ट करता है कि कोई भी पदार्थ अपनी प्रकृति के अनुरूप ही परिवर्तित होता है। इस प्रकार इस सिद्धान्त से न्यूटन का ‘क्लाक वर्क यूनीवर्स’ सिद्धान्त भी धराशायी हो गया। और यहीं से द्रव्य के संगठन एवं सूचना का आविर्भाव हुआ, जो वर्तमान के बहुविकसित इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी का मूल आधार है। इसी तरह से इसकी विकास यात्रा क्या होगी? भविष्य में और कितने नये सिद्धान्त बनेंगे तथा पुराने टूटेंगे कहा नहीं जा सकता।
वस्तुतः विज्ञान का उद्देश्य पदार्थ एवं प्रकृति के सत्य को खोजना, समझना एवं प्रयोग में लाना है। चूँकि प्रकृति अनन्त वस्त्रालंकारों से आवृत्त है। विज्ञान उसके एक परिधान को हटाता है तो उसे सब कुछ नया लगता है। प्रकृति का एक रहस्योद्घाटन होते ही पुराने नियम भरभराकर गिर जाते हैं। प्रकृति के इस रहस्य को जानने के लिए वैज्ञानिक मॉडल की परिकल्पना करते हैं।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति हेतु ‘बिग बैंग‘ मॉडल खड़ा किया गया। इसी मॉडल के आधार मानकर ही विज्ञान ब्रह्मांडीय उत्पत्ति, विकास आदि की परिकल्पना करता है। आधुनिक आइंस्टीन समझे जाने वाले स्टिफन हाँकिंग का ‘ब्लैक होल’ भी एक परिकल्पना मॉडल है। यह कोई ‘काला गड्ढ’ नहीं है। यह भारी मात्रा में ऊष्मा का विकिरण करता है। ठीक इसी प्रकार क्वाण्टम फिजिक्स के वेव पार्टिकल्स भी अपने सिद्धान्त के सत्यापन के लिए की गई एक परिकल्पना है। विज्ञान की मान्यता है कि प्रोट्रॉन भारी कण है। यह इलेक्ट्रान से 1836 गुना भारी है। हालाँकि ये कण एवं मॉडल कोई वास्तविक पदार्थ नहीं है। जिसे सामान्यतः देखा और परखा जा सके। फिर भी विज्ञान जगत् में इन परिकल्पनाओं का विशिष्ट मूल्य एवं महत्त्व है। क्योंकि इसी के आधार पर सभी वैज्ञानिक अन्वेषण अनुसंधान प्रतिष्ठित है।
जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने अपने प्रयोग के माध्यम से घोषणा की कि प्रकाश इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंग है। जिस प्रकार हवा में ध्वनि तरंग गतिशील होती है। एवं जल में लहरें ठीक उसी प्रकार प्रकाश की तरंगें ईथर में गति करती हैं। यह ईथर समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है। परन्तु यह क्या है? इसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि यह वैज्ञानिक परिकल्पित एक द्रव्य है। ठीक इसी प्रकार जीव विज्ञान एवं अन्य अनेक आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी ही परिकल्पना से की जाती है। वैज्ञानिक प्रकृति के फेस वैल्यू को आधार मानते हुए ऐसे मॉडल का निर्माण करते हैं। यही उनके प्रयोग-परीक्षण का मुख्य आधार है।
प्रकृति को खोजने की अदम्य लालसा से अभिप्रेरित वैज्ञानिक भी नये-नये प्रयोग करते हैं और जैसे ही इन्हें नयी जानकारी मिलती है तो इसी के अनुरूप नये सिद्धान्त रचे जाते हैं। और यह अन्तहीन क्रम चलता रहता है। हर नये के बाद पुरानी कड़ी टूट जाती है। और यह भी क्यों नहीं। यह सब होना ही तो इस तथ्य का उद्घोष करता है कि छोटा सा परमाणु ही नहीं समूची विशालकाय सृष्टि क्षण भंगुर है। अपनी सुदीर्घ यात्रा के पश्चात् आज विज्ञान के कदम उसी सत्य के द्वार पर दस्तक दे रहे हैं, जिनका अन्वेषण पुरातन महर्षियों ने किया था। आज दुनिया भर के वरिष्ठ वैज्ञानिक भी इस सत्य को स्वीकारने में लगे हैं कि इक्कीसवीं दी में पुराना विज्ञान यदि अपने स्वरूप का कायाकल्प करके वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का स्वरूप धारण करले तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।
नासिरुद्दीन दिल्ली के बादशाह थे, पर वे अवकाश के समय टोपियाँ बनाकर व कुरान की नकल करके जो धन मिलता, उसी से अपना खरच चलाते। बादशाह की बेगम हाथ से खाना पकाया करती थी।
एक बार खाना पकाते समय बेगम का हाथ जल गया। वह सोचने लगी, एक बादशाह की बेगम होते हुए भी उसे एक नौकर भी मयस्सर नहीं। उसने अपने पति से कहा, “आप राज्य के स्वामी हैं। क्या आप हमारे लिये भोजन पकाने वाले एक नौकर का प्रबंध नहीं कर सकते?”
“बेगम आपके लिये नौकर रखा जा सकता है, बशर्ते कि हम अपने सिद्धांतों से डिग जाएँ। राज्य, धन, वैभव तो प्रजा का है। हम तो उसके संरक्षक मात्र हैं। उसका उपयोग अपने लिये करें, यह तो बेईमानी होगी”। नासिरुद्दीन ने उत्तर दिया। उनकी सिद्धांत-निष्ठा के आगे पत्नी को झुकना ही पड़ा।
स्वाति नक्षत्र की वेला थी। खेतों को पानी की जरूरत पड़ी। बादलों में बसने वाली बूंदें मचलने लगी, बोली, “ हमें आसमान नहीं, जमीन चाहिए। उठने में क्या आनंद। नीचे वालों के साथ आत्मसात् बनकर क्यों न जिएँ।”
बादल अपने समुदाय को अंचल में ही समेट रखना चाहते थे। बरसने की उन्हें जल्दी न थी। फिर भी बूँद मचली सो मचली। आगे-पीछे सोचे बिना धरती पर टपक ही पड़ी। सहेलियों को यह उतावली भाई नहीं।
हवा ने साथ नहीं दिया। खेती तक दौड़ सकने की उसमें सामर्थ्य नहीं थी। फिर भी सोचती रही। मन मसोसकर क्यों रहा जाए ? जितना बन पड़े उतना ही क्यों न किया जाए ?
बूँद बहुत दूर न चल सकी और जहां भी बन पड़ा वहीं बरस पड़ी। सरोवर तट पर बैठी हुई सीप ने उसकी ममता को परखा और मुँह खोल दिया, “देवी ! आओ तुम्हें कलेजे से लगाकर रखूँगी। तुम से बढ़कर कौन है इस संसार में जिसे अपना बनाऊं ।”
सीप और स्वाति बिंदु का संयोग मोती बन गया। अनुदानी और भाव पारखी दोने धन्य हो गए।
संगीत के कोमल स्पर्श से मन प्रसन्न हो उठता है तथा अन्तर आनन्दित। यह एक दिव्य अनुभव है, जिसमें द्वारा आन्तरिक गुप्त शक्तियों का विकास होता है। संगीत मनोरंजन का साधन भी है और मन की व्याधियों को ठीक करने का माध्यम भी। इसका प्रभाव बड़ा व्यापक होता है।
संगीत की विद्या अत्यन्त प्राचीन है। आर्ष ग्रंथों में यह नाद के रूप में प्रतिपादित हुआ है। नद् धातु से उत्पन्न शब्द नाद का अर्थ है अनाहत ध्वनि। इसलिए किन्हीं दो वस्तुओं के टकराने से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उसे आहत ध्वनि कहते हैं। बिना किसी आघात या टक्कर के दिव्य प्रकृति के गर्भ से जो ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें अनाहत कहते हैं। अनहद नाद दस प्रकार का माना गया है। इसके हरेक प्रकार के नाद में विशेष तरह की ध्वनियाँ निकलती हैं।
संहारक अनहद नाद से पायजेब की झंकार के समान स्वर तरंग उठती है। पालक नाद सागर की लहरों जैसी होता है। मृदंग की आवाज सृजक नाद की पहचान है। शंख की आवाज सहस्रदल नाद का प्रतीक है। आनन्द मण्डल में तुरही सदृश्य स्वर लहरी निकलती है। इस प्रकार चिदानंद में मुरली की, सच्चिदानन्द नाद में बीन सी, अखण्ड में सिंह गर्जन की, अगम में नफीरी की तथा अलख रूपी अनहद नाद में बुलबुल सा सुरीला स्वर निकलता है। ये अनहद नाद प्रकृति के अन्तराल से निरन्तर प्रवाहित होता रहता है, जिसे उच्च आध्यात्मिक मनोभूमि सम्पन्न साधक अनुभव कर सकते हैं।
इसी नाद ब्रह्म की अनुभूति संगीत द्वारा भी सम्भव हो सकती है। संगीत रत्नाकर में शारंगदेव ने इसकी पुष्टि की है। ऋषियों ने इसे दिव्य एवं पवित्र साधन माना है। इसलिए विख्यात संगीतकार पण्डित रविशंकर कह उठते हैं- कि संगीत के सोपान से ईश्वर तक पहुँचा जा सकता है। महान् कवि रवीन्द्रनाथ ने इसे अलौकिक शक्ति के रूप में प्रतिपादित किया है। वह कहते हैं कि संगीत ईश्वरीय अनुदान है जो विश्व के कण-कण में समाया हुआ है। बस अपनी अनुभव क्षमता को बढ़ाकर इसका आनन्द लिया जा सकता है।
विश्व रचना का मूल स्वर संगीत ही है। अपने कथन को बड़े रोचक ढंग से विश्लेषित करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि समष्टि जगत् का यह छन्द और ताल, व्यष्टि जगत् में जीवन के अनेक रूपों में प्रकट हो रहा है। संगीत वस्तुतः जीवनधारा है। जहाँ कहीं जड़ता, हताशा, निराशा है, वह इस विराट् जीवनधारा से अलग होने का परिणाम है। और इसीलिए मूल सृष्टि धारा से अनुकूल चलने वाली संगीत धारा से विमुख है। व्यक्ति में प्रकट होने वाला मोहक संगीत समष्टिगत जीवन प्रवाह के अनुकूल होने के कारण ही रमणीय है। इसी कारण यह समस्त मानवी मनोविकारों को विनष्ट कर देता है और जीवन में नवीन स्फूर्ति एवं चेतना का आविर्भाव करता है।
संगीत की स्वर लहरी से गाँधीजी भी प्रभावित थे। इसकी आकर्षण शक्ति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा है कि सुन्दर गायन द्वारा मुझे क्रोध पर नियंत्रण करने की शक्ति तथा अपूर्व शान्ति प्राप्त हुई है। उनके विचार से दिव्य संगीत हृदय पर अमिट छाप छोड़ता है। यह रूखे मनुष्य को संवेदनशील बना देता है। इसलिए ‘स्पिरिट ऑफ म्यूजिक’ में अर्नेस्ट हण्ट ने उल्लेख किया है कि संगीत सूक्ष्म अंतःवृत्तियों के उद्घाटन का सबल माध्यम है।
संगीत का स्वर उत्तप्त हृदय में आनन्द का उद्रेक करता है। इस तथ्य की पुष्टि करते हुए ही व्रलस योम कहती हैं कि संगीत जीवन को अनुप्राणित करता है। यह जीवन की समस्त निर्जीव शक्तियों को विनष्ट कर आशा, उत्साह एवं उमंग की सृष्टि करता है। यह एक ऐसा सृजनात्मक साधन है जो जीवन को मंगलमय एवं स्वर्णिम बना देता है। संगीत की इस विशेषता के कारण मार्टिन लूथर की भावाभिव्यक्ति इस प्रकार है-कि ‘संगीत मनुष्य को दयालु एवं बुद्धिमान बनाता है। यह ईश्वर की वह अनुकृति है जो मनुष्य के कष्टों को दूर कर उन्हें शान्ति पहुँचाती है।’ फ्रेडरिक ने तो यहाँ तक कह दिया है कि संगीत के कारण ही जीवन की सार्थकता है।
यह सुनिश्चित तथ्य है कि संगीत के प्रभाव से मानसिक विकार दूर होते हैं तथा शान्ति मिलती है। चिकित्साशास्त्रियों के अनुसार यह शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद सिद्ध हो रहा है। इसी वजह से आज संगीत एक उपचार की पद्धति बन गई है। जो पाश्चात्य जगत् में म्यूजिक थेरेपी के रूप में प्रचलित एवं लोकप्रिय हो रही है। अपने देश में भी इसका प्रचलन होने लगा है। यहाँ पर विशुद्ध भारतीय राग से रोगों का उपचार किया जा रहा है। जिस प्रकार दीपक राग से दीप जलने की एवं मेघ मल्हार द्वारा वर्षा होने की घटना प्रसिद्ध है उसी प्रकार अनेक राग ऐसे भी है, जिससे मानसिक शान्ति एवं आरोग्य का लाभ लिया जा सकता है। आवश्यकता है ऐसे रागों की पहचान एवं उसका उचित प्रयोग।
इस संदर्भ में सितारवादक पण्डित शशाँक कट्टी का प्रयोग बड़ा ही उपलब्धिजनक रहा है। वह सितार द्वारा एक विशेष राग को रोगी को सुनाते हैं। रोगी इसे सुनकर काफी राहत महसूस करता है। भिन्न-भिन्न रोग के लिए अलग-अलग रागों का प्रयोग किया जाता है। मुम्बई के प्रसिद्ध सरोदवादक विवेक जोशी ने भी ऐसा ही कुछ शोध-अनुसंधान किया है। यह इस थेरेपी की सफलता पर आशान्वित होकर कहते हैं कि संगीत मानसिक उत्तेजना को शान्त करता है। और यह इस तथ्य का द्योतक है कि रोगी पर इसका प्रभाव पड़ रहा है।
म्यूजिक थेरेपी के सफल प्रायोगिक निष्कर्ष से प्रेरित डॉ. अनिल पाटिल की मान्यता है कि राग से व्यक्ति को प्रभावित किया जा सकता है। जब सपेरा अपनी बीन की मोहक धुन से साँप जैसी विषैले जीव को झूमने के लिए विवश कर सकता है तो क्यों भला शारीरिक स्वास्थ्य पर इसका प्रकार नहीं पड़ सकता। इसी मान्यता से उत्साहित डॉ. रोगी के प्रारम्भिक जाँच पड़ताल के बाद उसकी पसंद के अनुरूप राग सुनाते हैं तथा इसकी सी डी तथा कैसेट उपलब्ध कराते हैं। अपने शोध अनुभव के आधार पर वह कहते हैं कि विलम्बित रागों का प्रयोग प्रतिक्रियाशील रोगी पर तथा इसके ठीक विपरीत द्रुत(तीव्र) धुनों को उत्साहहीन व्यक्तियों पर लाभप्रद होता है। अपने प्रयास से उन्होंने जैज सरीखी पाश्चात्य धुनों को भी उपचार योग्य बना दिया है।
संगीत का प्रभाव असाध्य रोगों पर भी हो सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में पश्चिमी दुनिया में विख्यात नैशविले अस्पताल में विख्यात गायक जॉन रिची के संगीत को चुना गया है। इस धुन को एक सत्तरह वर्षीया किशोरी केटी को प्रतिदिन प्रातः सुनाया जाता है। हालाँकि इस शोध का कोई निष्कर्ष तो अभी नहीं मिल पाया है, परन्तु इसका प्रारम्भिक परिणाम काफी आशानुकूल हैं।
संगीत के जादुई स्वरों में न केवल मनुष्य स्वस्थ-प्रसन्न होता है बल्कि जानवर भी इससे अनछुए नहीं रहते। उन पर भी संगीत का असर दिखाई देता है। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर की मान्यता है कि काफी राग के कोमल स्वरों से जानवर मस्त हो जाते हैं। उस समय उनकी चंचलता एवं चपलता देखने लायक होती है। अली खाँ के शिष्य चुन्नाजी तो अपने प्रयोगों में इससे एक कदम और आगे हैं। आस्ट्रेलिया की श्रीमती दिवाना शोल्ड के संगीत प्रयोग चमत्कारिक है। वह घने जंगलों में चली जाती हैं और संगीत से जंगली एवं अड़ियल घोड़ों को अपने वश में कर लेती हैं। प्रयोगों के इस क्रम में यूरोप में गायों को धीमे-धीमे धुन सुनायी गयी। इससे उनके दूध देने की क्षमता में वृद्धि हो गयी।
संगीत के सतरंगी स्वरों में मनुष्य एवं अन्य सभी प्राणी भी मदमस्त हो उठते हैं। यह संगीत एक उत्कृष्ट कोटि की कला है। इस कला को अपनाकर अपना जीवन भी संगीतमय हो सकता है। जिसने जीवन रूपी संगीत की कला को सीख लिया उसका समूचा जीवन सफल और सार्थक बने बिना नहीं रहता। ऐसे सार्थक जीवन के हर विचार एवं प्रत्येक कर्म से दिव्य संगीत झरता है। वह स्वयं आनन्दित रहता है और औरों को भी प्रसन्नता लुटाता है। जीवन का यह सुरीली तत्त्व निश्चित ही वरेण्य है, जिसे हर कोई अपनाकर धन्य हो सकता है।
एक बार एक संगीत अध्यापक अपने कुछ छात्रों के साथ लोक प्रसिद्ध पियानोवादक पादरेवस्की से मिलने गए। संगीत अध्यापक ने पादरेवस्की से पूछा, “आपकी सफलता का सूत्र कौन-सा है? “ पादरेवस्की ने कहा, “ मैं अभी भी हर दिन चार घंटे नित्य अभ्यास करता हूँ। सतत अपनी गलती ढूंढ़ता रहता हूँ।”
उन्होंने छात्रों को समझते हुए कहा, “ काम के प्रति निष्ठा और उसके लिए निरंतर प्रयास ही सफल होने का रहस्य है।”
आधुनिक अनुसंधान अपने सतत् प्रयास से इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि बालक अपने जन्म के पश्चात् नहीं बल्कि जन्म के पूर्व माँ के गर्भ से सीखने लगता है। यही कारण है कि शोधकर्त्ताओं का मत है कि संतान को सुयोग्य एवं सुसंस्कारित बनाने के लिए उसके जन्मदाता माता-पिता को भी सुसंस्कृत होना चाहिए। गर्भ से ही शिशु के शारीरिक, बौद्धिक एवं भावनात्मक विकास की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। यह विकास गर्भवती माता एवं उसके चारों ओर के वातावरण के द्वारा प्रभावित होता है। गर्भवती माता का खान-पान, आचार-विचार उत्कृष्ट एवं सात्विक हो तथा वातावरण अनुकूल व दिव्य हो तो श्रेष्ठ शिशु का जन्म होता है।
महाभारत में कथा है कि अभिमन्यु ने अपनी माता सुभद्रा के गर्भ में ही चक्रव्यूह वेधन की शिक्षा प्राप्त कर ली थी। व्यास पुत्र शुकदेव ने भी अपनी माँ के गर्भ में सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। ऐसे अनेकों पौराणिक आख्यान है, जिससे स्पष्ट होता है कि गर्भस्थ संतान अत्यन्त संवेदनशील होती है। इस तथ्य को आजकल वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं। उनका कहना है कि गर्भस्थ शिशु सुन सकता है एवं अनुभव भी कर सकता है। उसमें व्यक्ति के समान सपने देखने की क्षमता भी होती है। और यहाँ तक कि वह अपनी माँ द्वारा ग्रहण की गई भोज्य वस्तु का स्वाद भी परख सकता है।
शिशु का वास्तविक क्रियाविधि जन्म के कुछ सप्ताह पूर्व से ही प्रारम्भ हो जाती है। इस संदर्भ में जान हापकिन्स इन्स्टीट्यूट की मनोविज्ञानी जेनेट डियिएट्रो का कहना है कि एक नवजात शिशु एवं 32 सप्ताह के गर्भस्थ शिशु में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। दोनों का व्यवहार प्रायः एक समान होता है। नौ सप्ताह का विकासशील बालक हिचकी ले सकता है और हमारे आस-पास के वातावरण के प्रति संवेदनशील होने लगता है। उसे जैसा परिवेश मिलता है उसी के अनुरूप ही वह विकसित होता है। इन दिनों आस्तिकता का वातावरण बनाये रखना चाहिए। गर्भवती माता को नियमित रूप से उपासना-साधना का क्रम बनाये रखना चाहिए। इससे अन्तःकरण पवित्र एवं शुद्ध होता है।निश्चय ही इसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है।
श्रेष्ठ एवं परिष्कृत परिवेश में गर्भस्थ शिशु का समुचित विकास होता है। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए डियिएट्रो कहती हैं कि वातावरण के अनुरूप ही शिशु की संवेदना जाग्रत् होती है। और इसी आधार पर ही वह अपने सपनों की नन्हीं दुनिया बुनता है। अर्थात् शिशु को जैसा माहौल दिया जाता है, वह उसी तरह का सपना भी देखता है। कुछ वैज्ञानिकों का मत इससे भिन्न है। उनके अनुसार गर्भस्थ शिशु जब सपना देखता है तो उसकी आंखें एक वयस्क की आँखें के सदृश्य नींद में रैपिड आई मूवमेण्ट करती है।
लेकिन इस बारे में सब एक मत हैं कि गर्भवती माता को इन दिनों धैर्य, साहस, आशा और उत्साह के भाव बनाये रखना चाहिए। उसे सदा प्रसन्नचित्त रहना चाहिए। प्रसन्नता का यह प्रभाव उसके गर्भ में पलने वाले उस नन्हें बालक पर भी पड़ता है। इसकी पुष्टि करते हुए हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डेवलप मेण्टल साइकोलॉजिस्ट हीडेलाइज एल्ज ने एक रोचक विवरण प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार माँ जब प्रसन्न एवं खुश रहती है तब उसके वह शिशु की गतिविधियाँ अद्भुत एवं निराली होती हैं। इस दौरान वह कभी एक हाथ से चेहरे को स्पर्श करता है तो एक हाथ से दूसरे हाथ को छूता है। इस प्रकार वह बड़ा ही मस्त रहता है। परन्तु जैसे ही माँ उदास एवं तनावग्रस्त हो जाती है वह बालक बड़ा ही डरा सहमा सा व्यवहार करता है। एल्ज का कहना है कि विकासशील शिशु अपने माता के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होता है। अल्ट्रासाउण्ड के माध्यम से उसके इस क्रिया-कलाप को और भी अच्छी तरह से देखा जा सकता है। इस रिपोर्ट के अनुसार माँ के हंसने पर शिशु गर्भ में ऊपर-नीचे तैरता है और सिर को हिलाता है। जब कोई माँ स्क्रीन पर बालक के इस हरकतों को देखकर तेजी से हंसती है तो वह भी तेजी से ऊपर नीचे होता है।
इसके विपरीत यदि माँ की मनोभूमि ईर्ष्या, द्वेष, निराशा, चिन्ता, क्षोभ आदि मनोविकारों से ग्रस्त रहती है तो इसका प्रतिकूल प्रभाव उसके बच्चे पर भी पड़ता है। जो गर्भवती माताएँ ऐसी मनोभाव में रहती हैं, गर्भ में उनकी संतान ज्यादा उद्विग्न होती है। परिणाम स्वरूप जन्म के पश्चात वह उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन पाया जाता है। परन्तु शान्त एवं प्रसन्न रहने वाली माताओं की संतान गर्भ में भी शान्त एवं सहज बनी रहती हैं तथा जन्म के पश्चात् भी इन्हीं गुणों से युक्त पायी जाती हैं।
माता के आहार और व्यवहार का असर बच्चे के शरीर और मन पर देखा जा सकता है। प्रसिद्ध शिशु रोग विशेषज्ञ जेनेट के अनुसार पन्द्रह सप्ताह का गर्भस्थ शिशु इस प्रकार स्वाद ग्रहण करता है जैसे कि वह एक परिपक्व एवं वयस्क हो। उनका कहना है कि मिर्च-मसालेदार, अति ठण्डे-उत्तेजक भोजन में तीव्र गंध होती है। शिशु इस गंध के प्रति मातृगर्भ में आकर्षित होता है और बड़े होने पर उसे इस प्रकार के भोजन की लत पड़ जाती है। क्योंकि वह प्रारम्भ से ही ऐसे उत्तेजक भोजन के प्रति आकर्षित रहता है। परिणाम स्वरूप ऐसा बालक क्रोधी एवं जिद्दी स्वभाव का बन जाता है। इसकी पुष्टि करते हुए मोनेल केमिकल सेन्सेज सेण्टर फिलाडेल्फिया की जैव मनोवैज्ञानिक जली मेनेला कहती हैं कि शिशु माँ के भोजन से स्वाद ग्रहण करता है। इससे प्रतीत होता है कि वह अपने माता के भोजन के आधार पर परिपक्व एवं पोषित होता है। अन्त में यही आगे उसकी आदत बन जाती है। अतः गर्भवती माता को सात्विक, हल्का एवं पाचन योग्य भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। उसे अधिक मसालेदार एवं गरिष्ठ भोजन से परहेज करना चाहिए।
गर्भस्थ सन्तान आवाज के प्रति बड़ा ही संवेदनशील होती है। इस परिप्रेक्ष्य में हीडेलाइज एल्ज ने अनेकों अनुसंधान किए हैं। उनके प्रायोगिक निष्कर्ष अत्यन्त रोचक हैं। इन प्रायोगिक परिणाम के आधार पर वह कहती हैं कि गर्भस्थ शिशु अत्यन्त विचलित हो उठता है और पैर पटकता है या धक्का देता है। मनोवैज्ञानिक फाफर के अनुसार यह स्थिति तब भी आती है जब माँ तेजी से बोलती है या रोती है। माँ के गीत गुनगुनाने से एवं धीमी आवाज से बोलने से शिशु की हृदयगति धीमी हो जाती है। इन निष्कर्षों के अनुसार गर्भस्थ शिशु तेज आवाज पसन्द नहीं करता है।
इस संदर्भ में अस्सी के दशक में अमेरिका के मनोविज्ञान के प्रोफेसर एन्थेनी जेम्स डी कैस्पर ने कई प्रयोग किया था। अपने प्रयोगों के निष्कर्ष में इनका कहना है कि गर्भस्थ सन्तान किसी अजनबी की आवाज की अपेक्षा अपनी माँ की आवाज सुनना अधिक पसन्द करती है। जन्म के कुछ समय पूर्व से तो वह अपनी माँ के स्वर को याद रखना एवं पहचानना भी शुरू कर देती है। डि कैस्पर एवं उनके सहयोगियों का कहना है कि बच्चा अपनी माँ की मातृभाषा याने जिसे वह हमेशा प्रयोग करती है, उसी को सुनना पसन्द करता है।
पेरिस के जीन पिएरे ने इस सम्बन्ध में और भी अनेक रोचक तथ्य प्रस्तुत करते हुए कहा है कि गर्भस्थ शिशु अपनी माँ की आवाज से भली भाँति परिचित होता है। वह कई आवाजों के मध्य अपने माँ की ध्वनि को पहचान लेता है। पिएरे के अनुसार उसका यह गुण जन्मजात होता है। इनका कहना है कि यदि शिशु को माँ के पेट के पास कोई गीत या कहानी सुनाई जाती है तो उसके हृदय गति में कमी पड़ जाती है। इसके विपरीत किसी अपरिचित की ध्वनि से यह गति स्थिर रहती है। अतः शिशु का अपने माता की लोरी के प्रति गहन लगाव होना स्वाभाविक है। संभव है इसी कारण माता की थपकी से बच्चा शान्त एवं चुप हो जाता है।
फाफर के अनुसार गर्भ में पलने वाला शिशु कहानी या गीत के वास्तविक शब्दों को ग्रहण नहीं करता पर उसके स्वर एवं भाव को सुनता है एवं उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। इसलिए माता को चाहिए कि वह अपनी मनोभूमि को उच्चस्तरीय बनाये रखने के लिए स्वाध्याय करे। प्रेरणाप्रद जीवन निर्माण के साहित्य आदि के अध्ययन से उच्च विचारों का प्रवाह बना रहता है। यही प्रवाह बच्चों की मनोभूमि का निर्माण करता है। माँ जैसा चिन्तन करेगी उसी तरह से उसके बालक का स्वभाव विनिर्मित होगा। अतः गर्भवती माता को सदैव प्रसन्नचित्त, सन्तुष्ट एवं शान्त रहना चाहिए, जिससे कि उसके गर्भ से श्रेष्ठ आत्मा का अवतरण हो सके।
जिसके पास अच्छे विचारों व सत्साहित्य का भंडार है, वह कभी भी निर्धन व एकाकी नहीं रहता।
परिवर्तन जीवन का अनिवार्य अंग है। परिवर्तन की दिशा और दशा किसी ओर भी हो सकती है। इसकी दिशा अन्दर की ओर हो तो अंतर्जगत विकसित होता है और यदि वह बाहरी हो तो भौतिक जीवन सधता है। आज का भारतीय जीवन भौतिकता की ओर मुड़ गया है। परिणाम स्वरूप स्टेट्स सिम्बल रूपी नया मानदण्ड एवं मापदण्ड उभर कर सामने आया है। वहीं आज बहुसंख्यक लोगों के दृष्टिकोण का परिचायक है। बेशकीमती परिधान और खान-पान वैभव प्रदर्शन के प्रतीक बन गए हैं। आलीशान मकान, इम्पोर्टेड गाड़ियाँ और बैंक एकाउण्ट सफलता के मापदण्डों में गिने जाने लगे हैं।
कभी मानवीय मूल्यों को जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि माना जाता था, परन्तु वर्तमान की परिभाषा इससे एकदम भिन्न है। इसी नवीन परिभाषा एवं नूतन व्याख्या ने व्यक्ति की जीवन शैली में जबर्दस्त बदलाव ला दिया है। बदलाव का यह दौर बीसवीं शताब्दी से शुरू हुआ है। यूँ तो बीती शताब्दी मानव इतिहास में सर्वाधिक उथल-पुथल भरी रही। अनेकों छोटी-बड़ी घटनाएँ हुई। इसके अलावा एक और बड़ी उपलब्धि के लिए इसे याद रखा जाएगा क्योंकि इसी सदी में एशिया और अफ्रीका उपमहाद्वीप से गुलामी और राजशाही का ग्रहण हटा। आजादी के इस नए परिवेश में तमाम देशों की मूल संस्कृति और जीवन शैली को नए ढंग से पनपने एवं विकसित होने का अवसर मिला।
अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर सभी देशों को समानता एवं समरूपता का दर्जा मिला। वैश्वीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी की नई क्राँति आई। इसने विश्व की संस्कृति को काल खण्डों की सीमा से परे ले जाकर एक नवीन पहचान दी। विश्व संस्कृति को एक स्वरूप मिला और इसकी एक अलग पहचान बनी। वैश्वीकरण और उससे प्राप्त आर्थिक स्वतंत्रता के परिणामस्वरूप दशक-दर-दशक नए-नए स्टेट्स सिम्बल अस्तित्व में आने लगे। प्राचीनता के गर्भ से ही नूतनता का जन्म होता है। परन्तु यहाँ नवीनता ने पुरानी मान्यताओं को पूरी तरह से नकार दिया। इस प्रकार जीवन शैली में आधुनिकता का समावेश तो हुआ और स्टेट्स सिम्बल के रूप में नये मापदण्ड भी बने लेकिन सभी प्राचीन और स्वीकृत मान्यताओं को ध्वस्त करके।
बीसवीं सदी का प्रारम्भ इतना भव्य और वैभवपूर्ण नहीं था। इसका आगाज विक्टोरिया काल के चमकदार प्रभाव के बीच हुआ था। यह वह दौर था जब नारी और पुरुष के मध्य भारी भेद था। समाज में पुरुष का ही वर्चस्व था। नारी तो घर की चारदीवारी के अन्दर की एक वस्तु मात्र थी। उन दिनों जमींदारी प्रथा प्रबल थी। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में भारतीय जीवन शैली का स्टेट्स सिम्बल खानदानी रौब-दाब और आचार-व्यवहार हुआ करता था। रियासतों में रईस एवं धनाढ्य लोग ऐश्वर्य एवं विलासितापूर्ण जिन्दगी जीते थे। उनके विशालकाय बंगले होते थे। इतालवी झूमरों से सजे इन हवेलियों में फ्राँसीसी डिनरवेयर जैसी महंगी वस्तुओं की भरमार थी। दावतों और समारोहों के अवसर पर पार्शियन कालीनों से गुजर कर आते जाते लोग और गूँजती स्वर लहरियाँ किसी स्वप्नलोक जैसी थी। ये सब प्रतिष्ठ के चरम मापदण्ड थे।
वैभव एवं विलासिता का यह नजारा भारत के प्रमुख चार महानगरों में तेजी से विनिर्मित होते आलीशान भवनों में दृष्टिगोचर होता है। शाहदरी पहाड़ी, नीलगिरी और हिमालय की तलहटियों में भी ऐसे ही बंगलों का निर्माण हो रहा था, जहाँ पर समृद्ध एवं सम्पन्न लोग कुछ समय बिताने के लिए आया करते थे। इन भारतीय समुदाय की जीवन शैली बहुत कुछ अंग्रेजी सभ्यता में ढल चुकी थी। धनी लोग उन्हीं के जैसे अनुकरण करने को स्टेट्स सिम्बल मानते थे। इसलिए अपने महलों एवं मकानों को सजाने के लिए यूरोप और चीन से खूबसूरत फर्नीचर का आयात किया जाता था। ब्रितानी प्रभाव से प्रभावित इन कोठियों में बोन चाइना की क्राकरी, फ्राँसीसी क्रिस्टल और शैफील्ड सिल्वर आदि कीमती वस्तुएँ भी होती थीं। भारतीय किचन में अंग्रेजी भोज्य पदार्थों का प्रवेश हो गया था। उच्च वर्ग के इन लोगों के लिए लन्दन और पेरिस के सिले कपड़े स्टेट्स सिम्बल के पर्याय बन चुके थे।
इस प्रकार बीसवीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में भारत के उच्च वर्गों में अंग्रेजी सभ्यता के प्रति जबर्दस्त आकर्षण था। शिफान, हीरे-मोती, कार, शराब, सिगार और अन्तर्राष्ट्रीय क्रूज लाइनरों से देश-विदेश की यात्राएँ वैभव की नई कहानी कहती थीं। इस वर्ग की भारतीय महिलाओं में भी इसका भारी प्रभाव पड़ा। परिणाम स्वरूप बाँब बाल, ऊँची हील की सैण्डिल, पेरिस की प्रसिद्ध जार्जेट साड़ियाँ आदि वेशभूषा के प्रति आकर्षण बढ़ा। उन्हीं दिनों रेसकोर्स शुरू हुए और घोड़ों की दौड़, गार्डन पार्टी व कैण्डल लाइट डिनर आदि प्रभाव व प्रतिष्ठ का सफलतम मापदण्ड माने जाते थे।
इसके ठीक दूसरी ओर बाजारीकृत अर्थव्यवस्था पर आश्रित वर्गों में अपने तरह का स्टेट्स सिम्बल प्रचलित हुआ। इनमें शहरों के बीच बड़ी-बड़ी इमारतें बनाना, चाँदी के बर्तनों का प्रयोग तथा घरेलू कामों के लिए नौकरों की फौज रखना जीवन के अंग बने। भारत में फैशन के रूप में जीन्स का प्रचलन भी इन्हीं दिनों प्रारम्भ हुआ।
चरम भौतिकता और प्रदर्शन से ओत-प्रोत इन स्टेट्स सिंबल में एकाएक बदलाव आया जब गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका एवं ब्रिटेन से होकर भारत आये। अटूट देशभक्ति, नैतिक मूल्य और दृढ़ इच्छा शक्ति के प्रतीक गाँधी जी ने अपना वैभव त्यागा। उन्होंने अपनी स्विस घड़ियों, ब्रितानी सूटों को तिलाँजलि देकर मोटी व खुरदरी खादी को अपनाया। रियासत की हवेली त्यागकर आश्रम में रहने लगे। उनके इस त्यागमय जीवन का बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा। इसके इस प्रभाव से खादी देशभक्ति की प्रतीक बनने के साथ ही स्टेट्स सिम्बल भी बन गई। प्रत्येक समृद्ध परिवार में चरखा रखा जाने लगा जो बदलते समय का परिचायक था। सामूहिक प्रार्थना सभाएँ, आजादी के नारे, अखबारोँ में लेखन, प्रभात फेरी, मार्च और असहयोग जताते प्रदर्शन नए रूप में प्रतिष्ठित हुए।
आजादी के पश्चात् ‘सादा जीवन-उच्च विचार’ का नारा नया मानदण्ड बना। इसी कारण सत्ता और शासन से लेकर आम जनता तक खादी को आत्मसात कर लिया था। उन दिनों गाँधी टोपी, खादी कुर्ता, चूड़ीदार पायजामा और धोती, सभ्यता के नए प्रतिमान बने। नेहरू जैकेट, जोधपुरी कोट और हैण्डहूम की साड़ियों ने तो जैसे प्रतिष्ठ को नई परिभाषा गढ़ दी। उन दिनों स्वदेशी के प्रति प्रबल आकर्षण था।
साठ और सत्तर के दशक में प्रतिष्ठ के इन मानदण्डों में फिर से परिवर्तन आने लगा। विदेशी यात्रा और उच्चशिक्षा में सफलता का सूत्र ढूंढ़ा जाने लगा। मध्यवर्ग की पुरानी पीढ़ी में इसका खासा प्रभाव पड़ा। कारण वे अपने लड़के-लड़कियों को महंगे कान्वेण्ट स्कूलों और विख्यात महाविद्यालयों में पढ़ाने लगे। हजारों हजार युवाओं का उच्च शिक्षा हेतु इंग्लैण्ड और अमेरिका जाना प्रतिष्ठ का अंग बना। उस जमाने में परिवार के किसी सदस्य का विदेश में होना गर्व का विषय माना जाता था। इसी वजह से भारत में स्टर्लिंग, पाउण्ड एवं डालर जैसी विदेशी मुद्राओं का आगमन हुआ और ये भी स्टेट्स सिम्बल में गिने जाने लगे।
साठ का दशक महिला मुक्ति आन्दोलन का साक्षी बना। वैयक्तिक स्वतंत्रता के इस रूमानी कल्पना ने भारतीय महिलाओं को संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। इस दशक की महिलाएँ पश्चिमी प्रभाव को अंगीकार करने के लिए तैयार थीं। और इसी वजह से महिला कानूनों में बदलाव आया, पारिवारिक स्थिति बदली और महिला रोजगार के नए-नए अवसर सामने आए। उन दिनों स्वनिर्भर महिलाओं को भी प्रतिष्ठ के नए मानदण्डों में स्वीकारा जाने लगा। इस प्रकार अस्सी की शुरुआत और सत्तर के दशक में अपना व्यवसाय और सफल उद्यम सही मायने में स्टेट्स सिम्बल बने।
अस्सी की दशक वैश्वीकरण के लिए प्रसिद्ध है। आर्थिक उदारीकरण के कारण महानगरों में सम्पदा एवं शेयर की खरीददारी आकर्षण के नए केन्द्र बने। इलेक्ट्रानिक साजो-सामानों से भरा अत्याधुनिक बंगलों में रहना महंगे होटलों में खाना खाना, कीमती अलंकार एवं परिधान और कारों का प्रयोग सम्मानित दृष्टि से देखा जाने लगा। इस वैभव प्रदर्शन में सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त दम तोड़ चुका था। बेशुमार दौलत की आय के कारण एक नये नवधनाढ्य वर्ग का जन्म हुआ, जिनका एक ही उद्देश्य था अपनी सम्पदा का खुला प्रदर्शन। यह प्रतिष्ठ का उच्चतम आदर्श बना जिसे हर कोई रातों रात पाने को व्यग्र हो उठा। इस प्रकार कीमती कपड़े विदेशी भोजन एवं बैंक एकाउण्ट को चरम सफलता माना जाने लगा।
सत्तर और अस्सी के दशक में प्रारम्भ हुई आधुनिक जीवन शैली नब्बे के दशक में पूरे उफान पर रही। सेटेलाइट के इस युग में एशिया विश्व में भविष्य के महाद्वीप के रूप में उभरा। इस दौर में यूरोप की प्रचण्ड चुनौतियाँ समाप्तप्रायः हो चुकी थीं और अमेरिका प्रमुख आर्थिक स्रोत बन चुका था। ऐसे में एशिया का बदलता परिवेश और तकनीकी व औद्योगिक गतिविधियों ने भारतीयों में एक नई आशा एवं उत्साह का संचार किया। इस दौरान लोगों ने फिल्मों, पत्र-पत्रिकाओं और सेटेलाइट चैनलों के द्वारा अत्याधुनिक जीवन स्तर को गर्व के साथ अपनाया।
ऐश्वर्य एवं वैभव के इन नूतन मापदण्डों में प्रदर्शन व दिखावा ही एकमात्र उद्देश्य बना। इस चमक दमक से अभिभूत भारतीयों में सैण्ट्रो, होण्डासिटी, सिएना, सिएलो, ओपेल एस्ट्रा क्लब, मित्सुबीशी लेंसर, मर्सीडीज आदि इम्पोर्टेड गाड़ियाँ नए स्टेट्स सिम्बल बनीं। रिबॉक, एडीडास, नाइक, बुडलैण्ड ऐलेन सोली, लुडस फिलीप आदि ब्राण्डेड कंपनियों के डिजाइनर कपड़ों एवं जूते-चप्पलों को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है। इसीलिए आर्डेन, एस्टी लाँडर, लैक्काम, कार्टियर, अरमानी, शैनेल सरीखे पुराने प्रचलित ब्राण्ड के साथ-साथ काल्विन, कलीन, टाँमी, डेविडाँफ, वर्साचे, वास, शल्फ, लारेन, आइअडोर जैसे परफ्यूम के अत्याधुनिक ब्राण्ड प्रतिष्ठ के अंग बन गये हैं।
आभूषणों में प्लेटिनम आज का नया स्टेट्स सिम्बल बनकर उभरा है। हीरे की भाँति चमकते अजूबे काँच के क्रिस्टल प्रतिष्ठ के पर्याय बन गये हैं। ये बेहद महंगे हैं। क्रिस्टल फर्नीचर की कीमतें लाखों में ही नहीं करोड़ों में है। एक क्रिस्टल छिपकली डेढ़ लाख रुपये की तो क्रिस्टल का हंस दो लाख का होता है। बकार्ट क्रिस्टल फर्नीचर की कीमत सवा दो करोड़ तक की होती है। स्वैरोवस्की, लेलिक, लाड्रो, बकार्ट, बलेराय एण्ड बोश, डोम, जे.जी दुरेन्द्र क्रिस्ट डी अरब्यूज से लेकर वाटर फोर्ड रिडेल, नेचडमैन, मार्कएसल, एटलाण्टी और बी.एस.एल आदि के ब्राण्डों को रखना आज की चरम प्रतिष्ठ एवं सम्मान सूचक माना जा रहा है। पानी की तरह पैसों को बहाकर इन्हें केवल झूठी प्रशंसा पाने हेतु अपनाया जा रहा है।
फैशन और फिटनेश भारतीय परिवेश में आधी की तरह छा गया है। यह हर युवा एवं युवती का आदर्श बन गया है। परन्तु स्टेट्स सिम्बल रूपी इस उपलब्धि को पाने के लिए हमें अपनी दुर्लभ साँस्कृतिक विरासत एवं सामाजिक मूल्यों का बलिदान करना पड़ा है। अगर गहराई से इस उपलब्धि का विश्लेषण किया जाए तो पता चलेगा कि हमने भले ही झूठा सामाजिक सम्मान अर्जित किया हो लेकिन मानवीय मूल्य हमसे छिन गये हैं। पाने के नाम पर हमने पाया कुछ नहीं और खोया अधिक है।
इसकी भरपाई तभी सम्भव है जब सेवा, सहकार, सहयोग, उदारता, विनम्रता, सच्चाई, ईमानदारी आदि आन्तरिक मूल्यों की प्रतिष्ठ हो। परिष्कृत जीवन शैली को अपनाकर ही वास्तविक समृद्धि एवं सम्पदा का अधिकार पाया जा सकता है। इस प्रकार भौतिकता के साथ आन्तरिकता का समन्वय करके ही हम सच्चा स्टेट्स सिम्बल पा सकते हैं। यह कुछ ऐसा होगा जिस पर हम सही भावों में गर्व कर सकें।
दक्षिण भारत में कन्याकुमारी के निकट श्री नारायण गुरु जन्मे। कुछ ही दिन वे जप-तप में लगे कि उसे क्षेत्र के अछूतों की दुर्दशा देखकर उनका जी भर आया और उस समुदाय को ऊँचा उठाने के लिए उन्हीं में घुल-मिलकर काम करने लगे। नय्यर, पतवाह, छिया, उलिया, मरिहा आदि कितनी ही जातियाँ ऐसी थीं, जिन्हें कोई छूता भी न था और काम पर भी न लेता था। उन्हें संगठित करके कुछ उद्योग चलाने और अपने अधिकारों के लिए अड़ जाने का उन्होंने प्रशिक्षण दिया। अछूतों के लिए उनने एक मंदिर बनवाया, जहाँ वे उपासना भी करते और शिक्षा भी प्राप्त करते।
स्वामी नारायण गुरु को सवर्णों को कठिन विरोध सहना पड़ा, पर वे अपने काम में सुनिश्चित भाव से लगे रहे। उन्हें आशाजनक सफलता भी मिली। उनके आश्रम और कार्यक्रम की प्रशंसा सुनकर महात्मा गाँधी और ऐंड्रूज दर्शनों को गए। अकेला व्यक्ति भी ऊंचे उद्देश्य के लिए कार्यरत रहकर क्या कुछ कर सकता है, इसकी प्रत्यक्ष प्रतिमा थे-स्वामी नारायण गुरु।
इन दिनों वैज्ञानिक धरती के बढ़ते तापमान से चिन्तित है। उन्होंने अपने वैज्ञानिक भाषा में इस समस्या को ग्लोबल वार्मिंग नाम दिया है। इन दिनों यह दानवी विपदा समूचे संसार एवं मानव जाति के लिए विप्लवकारी सिद्ध हो रही है। इसकी वजह से जलवायु एवं मौसम में भयंकर उथल-पुथल मची हुई है। उसके परिणामस्वरूप ग्लेशियर पिघल रहे हैं। सर्दियों में गर्मी एवं ग्रीष्म में प्रलयंकारी बारिश का प्रकोप झेलना पड़ रहा है। असमय मौसम के इस बदलाव से छोटे-बड़े जीव-जंतुओं से लेकर पेड़-पौधे सभी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पा रहे हैं।
इस ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती के तापमान में अतिशय वृद्धि हो रही है। यह वृद्धि पूरे पृथ्वी के लिए अति खतरनाक सिद्ध हो सकती है। वैज्ञानिकों को आशंका है कि यह परमाणु युद्ध या धरती से एस्टेरायड (क्षुद्र ग्रह) का टकराने जितनी तबाही मचा सकती है। ग्लोबल वार्मिंग इन दिनों संसार में अपना प्रभाव दिखाने लगी है। यही वजह है कि हमारे देश में सन् 1998 पिछले पचास वर्षों में सर्वाधिक गर्म वर्ष रहा। इसी साल में 26 दिन तक चली भीषण लू ने देश में लगभग 2500 लोगों की जान ले ली। यह गर्मी न केवल अपने देश में पड़ी बल्कि पूरे विश्व में इसका असर देखा गया। यह धरती के मौसमी इतिहास की सबसे अधिक तेज गर्मी थी। इस दौरान चली लू ने देश के उत्तर और पश्चिमी क्षेत्रों के अलावा अप्रत्याशित रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु को भी अपनी चपेट में ले लिया। लू के इन थपेड़ों से एशिया प्रशान्त भी अछूता नहीं रहा। इस कारण यहाँ पर सैकड़ों लोगों को अपने जान से हाथ धोना पड़ा। किसी महामारी की तरह फैली इस गर्मी से हजारों लोग रुग्ण हो गए और सैकड़ों लोग मारे गए।
समूचे विश्व के संदर्भ में देखें तो 1995 की जुलाई में मात्र एक सप्ताह की गर्मी और लू में कोई 500 लोग चल बसे। 1998 में टेक्सास में भी भीषण गर्मी पड़ी। ऊँचे तापमान ने जनजीवन के साथ ही पेड़ पौधों और फसलों पर भी कहर ढाया। मई 2000 में कैन्साससे न्यू इंग्लैंड तक एकाएक गर्म हवा के थपेड़े चलने लगे। इससे भी भारी क्षति उठानी पड़ी।
बढ़ते तापमान का आकलन करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने इण्टरगवर्नमेण्ट पैनल आन क्लाइमेट चेंज याने आइपीसी नामक वैज्ञानिक दल का गठन किया था। इसके अनुसार पिछली सदी में धरती के औसत तापमान में आधी डिग्री की वृद्धि हुई है। इसके अन्वेषण से पता चलता है कि सन् 1990 का दशक मौसम विज्ञान के इतिहास में सर्वाधिक गर्म दशक था। इसका कहना है कि सन् 2100 तक पृथ्वी के औसत तापमान में 1-4 से 5-8 डिग्री सेल्सियस तक की विनाशकारी वृद्धि हो सकती है। पिछले हिमयुग का अवसान औसत तापमान में मात्र पाँच डिग्री सेल्सियस की बढ़त के कारण हुआ था।
इससे पूर्व का हिमयुग समाप्त हुए दस हजार वर्ष बीत चुके हैं। वैज्ञानिकों ने आधुनिक तकनीकों के माध्यम से पिछले 8,50,000 वर्षों के दौरान धरती के औसत तापमान का अनुमान लगाया है। इस अवधि ने पाँच प्रमुख इण्टर ग्लेशियल दौर गुजारे जो अत्यधिक गर्म थे। अर्थात् धरती का औसत तापमान 15 से 1 डिग्री सेल्सियस के बीच था। इन गर्म अवधियों के बीच में पाँच हिमयुग भी विद्यमान थे। उस समय धरती का तापमान आज की अपेक्षा केवल तीन डिग्री सेल्सियस ही कम था। धरती का वर्तमान औसत तापमान लगभग 14 डिग्री सेल्सियस माना जाता है।
इस अभिशप्त तापमान से विश्व के समस्त हिम शिखर एवं ध्रुव प्रदेश तेजी से पिघल रहे हैं। अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने का मौसम पिछले बीस वर्षों में तीन सप्ताह घट गया है। पूर्वी साइबेरिया की प्रसिद्ध बेकाल झील सौ वर्ष पूर्व की अपेक्षा जमने में ग्यारह दिन देरी करने लगी है। यदि इसी तरह गर्मी बढ़ती रही तो मौटाना के ग्लेशियर नेशनल पार्क के सभी 50 ग्लेशियर सन् 2060 तक विलुप्त हो जायेंगे। सन् 1972 में वेनेजुएला की पर्वत चोटियों पर छह ग्लेशियर थे परन्तु अब दो ही शेष बचे हैं। एक हजार ग्लेशियरों वाला अद्भुत अलास्का अन्य श्रेणी की अपेक्षा तेजी से गर्म हो रहा है। एक शताब्दी पूर्व विशाल कोलम्बिया ग्लेशियर इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा था कि इसके हिमखण्ड रास्ते के पेड़ों पर गिरते थे परन्तु पिछले पाँच दशकों में यह 12 किलोमीटर से भी अधिक सिमट चुका है।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक हिम सतह की मोटाई आश्चर्यजनक रूप से कम हुई है। यहाँ पर वसन्त और गर्मियों की समुद्री हिम सीमा 1950 के बाद 10-15 प्रतिशत घट चुकी है। रूस की काकेशस पर्वत माला के अधिकाँश ग्लेशियर विगत सौ वर्षों में लगभग आधे समाप्त हो चुके हैं। माउण्ट केन्या का सबसे बड़ा ग्लेशियर 92 प्रतिशत खत्म हो चुका है। इसी प्रकार माउण्ट फिलमेजरो का ग्लेशियर 1812 के बाद से 82 प्रतिशत सिकुड़ चुका है। उस समय में यह हिमक्षेत्र 121 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था जो अब केवल 22 वर्ग किलोमीटर में सिमट कर रह गया है। पिघलने की यह गति यथावत रही तो यह 15 वर्षों में ही अपना अस्तित्व खो देगा।
प्रसिद्ध भू विज्ञानी लोन्नी थामसन के अनुसार कोरी काँलिस ग्लेशियर 4-9 मीटर प्रतिवर्ष पीछे सरक रहा है। 1998 से 2000 के बीच तो यह तीव्रता से समाप्त हुआ है। इस अवधि में यह 155 मीटर प्रतिवर्ष खत्म हो रहा था अर्थात् प्रतिदिन एक फीट से भी अधिक अवसान की यह गति 1978 से 32 गुना अधिक है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2025 तक स्विस का आल्पस अपने हिम का 90 प्रतिशत खो देगा।
गंगा को जीवन देने वाले गोमुख ग्लेशियर पर भी संकट के बादल मण्डरा रहे हैं। संसार का तीसरा सबसे बड़ा यह ग्लेशियर 30 मीटर प्रतिवर्ष की तीव्र रफ्तार से सिकुड़ता जा रहा है। गढ़वाल विश्वविद्यालय की करेंट साइन्स नामक एक रिपोर्ट के अनुसार जब तक यह 260 वर्ग किलोमीटर तक सिमट गया है। 1936 से 96 के बीच में यह 2000 मीटर खत्म हो चुका है जो विगत 200 वर्षों में हुए अवसान के बराबर है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के ग्लेशियोलाजी डिवीजन के निर्देशक डॉ0 वी0पी0 वोहरा का मानना था कि 1935 से 76 तक यह 755 मीटर घट चुका है। सुविख्यात पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ0 सैयद इकबाल हुसैन और डॉ0 अरुण शास्त्री के सर्वेक्षण से पता चलता है कि गोमुख ग्लेशियर निरन्तर घट रहा है।
इस प्रकार विश्व भर के ग्लेशियरों एवं बर्फ के पिघलने से सागरों का जल स्तर लगातार उठता जा रहा है। आई पी पी सी की नवीन रिपोर्ट के अनुसार यदि सागर केवल एक मीटर ऊपर उठ गए तो मालदीव, बांग्ला देश, नील नदी का डेल्टा, फ्लोरिडा का तट और लुइसियाना का काफी बड़ा हिस्सा सदा के लिए विलीन हो जायेंगे। भारत में इसका पहला प्रभाव कच्छ पर होगा जो सदा के लिए सागर में समा सकता है और संभव है कि सुन्दर वन एवं लक्ष द्वीप भी हमेशा के लिए विश्व मानचित्र से लुप्त हो जाए।
ग्लेशियर पिघलने से धरती की जलवायु पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा। क्योंकि मौसम चक्र बनाए रखने में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। इनके पिघलने से पहले तो इनसे जुड़ी नदियों में बाढ़ आएगी परन्तु अंत में ये नदियाँ सूख जाएंगी। इसी प्रभाव के कारण गर्मी में लबालब भरी रहने वाली झेलम जैसी नदिया गर्मी में सूखी पड़ी रहती हैं।
सागर के तापमान में बढ़ोत्तरी से अलनीनो जल्दी-जल्दी अपना रंग दिखाने लगेंगे। स्पेनी भाषा में अलनीनो का अर्थ है- ईसा का शिशु। इसकी उत्पत्ति भूमध्य रेखा के पास प्रशान्त महासागर में होती है परन्तु इसका प्रभाव प्रायः सारे संसार के मौसम पर पड़ता है। सामान्यतया भूमध्य रेखा के पास बहने वाली हवाओं की दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर होती है। अलनीनो के दौरान इन टूडे विण्ड्स का रुख पलटकर पश्चिम से पूर्व की ओर हो जाता है। इसका मुख्य प्रभाव दक्षिण पूर्वी अफ्रीका, पश्चिमी प्रशान्त, दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया और दक्षिण एशिया के मौसम पर पड़ता है। यह प्रभाव उस देश के जलवायु के अनुरूप होता है। इस वजह से इससे प्रभावित देशों में सूखों, बाढ़ तथा अत्यधिक गर्मी एवं कड़ाके की सर्दी पड़ सकती है। इससे कहीं अति वृष्टि, कहीं अनावृष्टि भी हो सकती है।
संभवतः इसी मौसमी उलटफेर का परिणाम था कि सन् 2000 के अंतिम तीन महीनों में इंग्लैण्ड और वेल्स में प्रलयकारी बारिश हुई। इस बारिश ने ब्रिटेन के पिछले सारे रिकार्ड को ध्वस्त कर दिया। दिल्ली में इसी वर्ष जुलाई में 24 घण्टे में 16 इंच की बारिश हुई जो सन् 1947 के बाद सर्वाधिक है। इसी साल महानदी में आयी भीषण बाढ़ से कौन परिचित नहीं है? इस बाढ़ ने 60 लाख लोगों को सप्ताहों तक प्रभावित किया और करोड़ों की सम्पदा एवं फसल नष्ट कर दी। दो वर्ष पूर्व हृदय विदारक चक्रवात का प्रकोप भी इसी प्रदेश को झेलना पड़ा। इससे पूर्व विदेश की एक ओहियो नदी में मार्च 1997 में ऐसी विप्लवी बाढ़ आयी कि सैकड़ों लोग हताहत हुए और पाँच करोड़ डालर की संपत्ति बर्बाद हो गई।
अपने देश में तापमान के कारण मानसून में भारी व्यतिक्रम आने लगा है। समय से पूर्व बारिश के कारण सूखा के सामना करना पड़ रहा है। इसी साल उड़ीसा में कालाहण्डी एवं छत्तीसगढ़ का सूखा सर्वविदित है। इसी सूखे के कारण जुलाई 2000 में ग्रीस के सामोस द्वीप में भयंकर आग लग गई जिससे 20 प्रतिशत द्वीप तबाह हो गए।
इस अनोखे जलवायु संकट से पैदावार में गिरावट आ सकती है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ0 ए0 पी0 मिश्रा के अनुसार भारत में वर्ष 1990 से 2100 के दौरान चावल उत्पादन में 3 प्रतिशत एवं रबी गेहूँ की पैदावार में 55 प्रतिशत तक की भारी कमी की आशंका है। ग्लोबल वार्मिंग न केवल पैदावार को प्रभावित कर सकती है, वरन् इसकी वजह बदलती जलवायु ने तमाम तरह के खतरनाक वायरसों को पनपने की सुविधा प्रदान की है। शायद यही कारण है कि सारे संसार में डेंगू, मलेरिया, जापानी बुखार जैसे रोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अमेरिका के उत्तरी क्षेत्र में डेंगू का प्रकोप पहले शायद ही कभी देखा गया हो परन्तु अब यह वहाँ भी पसरता जा रहा है।
इस ग्लोबल वार्मिंग का कुप्रभाव जीव जंतुओं पर भी पड़ रहा है। वर्ष 1997-98 में जब प्रशान्त महासागर का तापमान 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया तो साल्मन मछली की बढ़ती तादाद समाप्त हो गई। इसी प्रकार ध्रुवों पर रहने वाले भालू और वहाँ के पक्षी भी बढ़ते तापमान से पीड़ित व परेशान हैं। उनकी संख्या घटने के साथ ही उनके व्यवहार में भारी अन्तर दिखाई देने लगा है। यहाँ तक कि कई स्थानों पर सुन्दर तितलियाँ भी अपना प्राकृतिक आवास छोड़ने के लिए विवश हैं। चूँकि धरती के हर छोटे-बड़े जीवों के मध्य आपस में संवेदनशील संबंध है। ऐसे में अपने कुदरती ठिकानों के साथ जीवों का लुप्त होना पर्यावरण के किस संकट को आमंत्रण देगा? बता पाना कठिन है। परन्तु यह है बड़ा ही खतरनाक।
ग्लोबल वार्मिंग के समाधान के लिए कई अन्तर्राष्ट्रीय समझौते एवं संधियाँ भी हो चुकी हैं, परन्तु कोई सार्थक समाधान नहीं निकल पा रहा है। यह विप्लवी समस्या और भी उग्र होती जा रही है। लेकिन ऐसा नहीं इसके समस्त द्वार बन्द हो गए हों। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग का कारण ग्रीन हाउस जैसे प्रभाव हैं जिसके अंतर्गत कार्बन डाई आक्साइड, जलवाष्प, नाइट्रस आक्साइड आदि गैसें आती हैं। पेड़ पौधे इन गैसों को सोखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। मात्र एक हेक्टेयर पर लगे जंगली पेड़ हर साल 136 टन कार्बन डाई आक्साइड अवशोषित कर सकते हैं। इस प्रकार यदि वृक्षारोपण पर बल दिया जाए तो इस संकट से निजात पाया जा सकती है।
धरती माता को बचाने के लिए हम सब धरती पुत्रों को हरीतिमा संवर्धन याने कि सुविधानुसार अपने आसपास पेड़ लगाने का संकल्प लेना चाहिए। इस दिशा में औरों को भी प्रेरित करना चाहिए जिससे पर्यावरण चेतना उत्पन्न हो। हम पर्यावरण को प्रदूषित करने से बचें एवं उसके प्रति संवेदनशील बनें। तभी धरती में पुनः स्वर्गीय वातावरण विनिर्मित हो सकेगा।
माँ शारदामणि महिलाओं का अलग सत्संग चलाती थीं। उसमें अधिकाँश धार्मिक प्रकृति की और संभ्राँत घरों की महिलाएँ आती थीं।
एक महिला सत्संग में ऐसी भी आने लगी, जो वेश्या के रूप में कुख्यात थीं। इससे अन्य महिलाएँ नाक-भौं सिकोड़ने लगीं और उसे न आने देने के लिए माताजी से आग्रह करने लगी।
इस पर माताजी ने कहा, सत्संग गंगा है। वह मछली-मेढ़कों के रहने पर भी अशुद्ध हो जाए, वह गंगा कैसी? तुम लोग सत्संग की शक्ति को पहचानो और उसे गंगा के समतुल्य मानो।
आचार्य वसु ने वटु को समझाया, जैसे अग्नि में डालकर सोना शुद्ध किया जाता है, उसका मल दूर किया जाता है, उसी प्रकार तप द्वारा कायागत, मनोनत स्वभावों का शोधन किया जाता है।
वटु ने पूछा, “आचार्य प्रवर! इस दृष्टि से तो तप सूक्ष्म-साधना क्रम है, पर लोग कष्टसाध्य स्थितियों में शरीर को रखकर उसे भी तप की संज्ञा देते हैं, यह कहाँ तक ठीक है।”
आचार्य ने समाधान किया, “वत्स श्रम शक्ति का अभाव तथा आलस्य आदि भी दोष हैं।
कष्टसाध्य स्थिति में शरीर को डालकर यह दोष हटाने में मदद मिलती है। इस दृष्टि से वह भी तप है। यह उद्देश्य पूरा न हो तो उसे दुराग्रहपूर्ण प्रक्रिया ही समझना चाहिए।” आगे वे बोले, “तप का अर्थ दमन नहीं है, संचित सामर्थ्य जो तितिक्षा द्वारा अर्जित की गई है, उसका सुनियोजन है। जो इस चिंतन से तप में निरत होते हैं, वे निश्चित ही दैवी अनुदानों के अधिकारी होते हैं।”
सद्व्यवहार उस पुष्प के समान होता है, जो धवल एवं दृढ़ चरित्र रूपी वृक्ष पर खिलता है। चिन्तन के सुरम्य वातावरण में सुगन्ध बिखेरता है तथा सजल भावनाओं से पोषित होता है। इसीलिए तो दिव्य जीवन के प्रणेता एवं महान् योगी श्री अरविन्द के मन का विचार निसृत हो कह उठा-’इनर रेगुलेट आउटर बीइंग‘ अर्थात् जीवन के समस्त बाहरी क्रिया व्यापार अन्दर से नियंत्रित एवं संचालित होते हैं। निःसंदेह बाह्य व्यवहार आन्तरिक चिन्तन एवं भावनाओं के गर्भ से ही जन्म लेता है, पल्लवित एवं विकसित होता है। व्यवहार विज्ञान इसी सत्य को घोषित करता है।
व्यवहार-शिष्टता, शालीनता, विनम्रता आदि अनेक गुणों का समुच्चय है। जिसमें भी यह अनमोल सम्पदा होगी उसका लोक व्यवहार अवश्य ही उत्कृष्ट होगा। ऐसे व्यवहार कुशल व्यक्ति की सफलता असंदिग्ध होती है। सफलता उसके चरण चूमती है और उसके लिए तो असफलता भी एक सीख होती है क्योंकि इसी से वह अपनी व्यावहारिक कमियों एवं खामियों के प्रति सजग-सतर्क होता है। व्यवहार ही तो है जो अपने को पराया और पराये को अपना कर दिखाने का चमत्कार करता है। मधुर व्यवहार से पशु-पक्षी तक प्रभावित हो जाते हैं, तो फिर इन्सान का दिल क्यों नहीं जीता जा सकता है।
अन्तर की भावना जब प्रस्फुटित होती है तो हृदय मक्खन सा कोमल हो उठता है और वाणी एवं व्यवहार में अमृत झरने लगता है। ऐसी संवेदनशीलता भला कैसे किसी के प्रति कठोर होगी वह तो औरों के हृदय में उतर जाती है और अपना बनाकर ही छोड़ती है। ऐसा शालीन व्यवहार मृदु मंद पवन के झोंके के समान सभी को प्रिय होता है और जब यह ठंडी बयार चलती है तो नदी-नद, झील-सरोवर, खेत-खलिहान झूम उठते हैं। कोपल एवं कलियाँ चटखने लगती हैं। फूलों की मादकता इठलाने लगती है। पक्षी चहचहाने लगते हैं और सभी ओर हरियाली और खुशहाली का दिव्य संगीत झरने लगता है, परन्तु अभद्र और अशिष्ट व्यवहार उस भीषण अंधड़ की तरह होता है जिससे लोग कतराते एवं घबराते हैं। वह तिरस्कृत होता है और अपमान सहता है।
अशिष्टता अनगढ़ता एवं रूखेपन का परिचायक है। इस तरह का व्यक्ति चाहे कितना ही प्रतिभा सम्पन्न क्यों न हो, पर लोक सम्मान अर्जित नहीं कर सकता। लोग इसकी अव्यावहारिकता के कारण उसके पास आने में कतराते हैं। उसके अपने परिजन भी उससे पराये जैसा बर्ताव करते हैं। अपने उद्धत एवं उद्दण्ड व्यवहार से वह अपने और औरों दोनों के लिए ऐसे आत्मघाती विष दंश का निर्माण करता है जिसमें वह खुद जलता है और दूसरों को जलाता है। इससे कड़वाहट ही फैलती है। अतः बुद्धिमानी इसी में है कि ऐसे व्यवहार से परहेज किया जाए और शालीन व्यवहार को अपनाया एवं विकसित किया जाए।
व्यवहार की शालीनता न केवल औरों को प्रसन्न करती है, उसके अधरों में मुस्कान की स्मित रेखा खींचती है, बल्कि स्वयं को भी आनंदित करती है। पारसमणि के अस्तित्व को स्वीकार करें या न करें, परन्तु अपने पास उपलब्ध व्यवहार रूपी पारसमणि से आसपास के सभी लोगों को स्वर्ण मंडित किया जा सकता है अर्थात् अपना बनाया जा सकता है। लौकिक लोक व्यवहार का यह गुप्त रहस्य है, दिव्य मंत्र है जिसे हृदयंगम कर सफलता एवं महानता अर्जित की जा सकती है।
ज्यों-ज्यों अन्तर परिष्कृत होता जाता है उसी के अनुरूप व्यवहार भी उत्कृष्ट होता रहता है। यह तो सीप के मोती के सदृश है जो सागर की गहराई में अवस्थित होता है। गहराई में डुबकी लगाकर ही यह हस्तगत होता है। इसी प्रकार व्यवहार की सच्चाई उन छोटी-छोटी आदतों-वृत्तियों की सीपियों में बंद पड़ी रहती है जिसे स्वयं के अन्दर प्रवेश करके और साहस के साथ तोड़कर निकाला जाता है। अतः इन छोटी मगर महत्त्वपूर्ण बातों का सतत ध्यान रखना चाहिए।
आदतों एवं वृत्तियों के प्रति सदैव जागरुक रहना चाहिए, ताकि व्यावहारिक धरातल पर कोई व्यक्ति भ्रम न फैला सकें। इससे व्यवहार कुशलता का बड़ा घनिष्ठ संबंध होता है। ये वृत्तियाँ हमारे व्यवहार को प्रभावित करती हैं। ये बड़ी हठीली होती हैं, परन्तु इन्हें जीता जा सकता है। हाँलाकि ये न चाहते हुए भी ये अपने व्यवहार में आ धमकती हैं और अनचाहे एवं आदतन हम भूल कर बैठते हैं। इसलिए आवश्यक है कि धैर्य एवं संकल्पपूर्वक अपने व्यवहार को शिष्ट एवं शालीन बनाये रखा जाए। हर पल हर क्षण इसमें सुधार लाते रहना चाहिए। व्यवहार को मधुर एवं श्रेष्ठ बनाकर सभी बाधाओं एवं कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
अच्छा यह है कि हमारे व्यवहार में सदैव बड़ों के प्रति आदर एवं सम्मान का भाव तथा छोटों के प्रति स्नेह झलके। हर व्यक्ति का अपना आत्म सम्मान होता है जो इसे समुचित सम्मान दे सका वही सच्चा व्यवहार कुशल है। जरा सी भी व्यावहारिक त्रुटि अर्थ का अनर्थ कर सकती है। अतः ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि सभी को उसके अनुरूप शिष्टतापूर्वक आदर दिया जाए। अपनी व्यावहारिक भूल को विनम्रता के साथ स्वीकार कर उसके प्रति सजग रहा जाए।
प्रत्येक व्यक्ति के नाम के साथ उसका आत्म सम्मान जुड़ा रहता है। व्यक्ति अपने नाम में स्व बोध का अनुभव करता है। इसमें आत्मीयता तरंगित होती है। यह अन्तर का ऐसा तार है जो मन को गुदगुदाता है, उसे झंकृत करता है। और यही वजह है कि किसी प्रतिष्ठित एवं महान् व्यक्ति के नाम लेकर बुलाने से गहन आत्मीयता का बोध होता है। इसलिए प्रयास यह होना चाहिए कि जिसका नाम लिया जा रहा हो उसके साथ जी का प्रयोग हो। इन्हीं व्यावहारिक सूत्रों में जीवन का मर्म छुपा हुआ है।
संयमित एवं कल्याणकारी वाणी व्यवहार की रीढ़ है। यह मुख्य आधार है। वाणी ब्रह्मास्त्र के समान होती है। यह तरकश से छूटते ही लक्ष्य को भेद जाती है। व्यवहार के समस्त ताने-बाने इसी के इर्द-गिर्द बुने जाते हैं। वाणी द्वारा ही व्यवहार बनता-बिगड़ता है। संयमित वाणी से व्यक्तित्व निखरता है। ऐसे व्यक्तित्व सम्पन्न मनस्वी में महान् आकर्षण होता है। चेतना की परमोच्च अवस्था में जीने वाले विश्वविश्रुत स्वामी विवेकानंद का लोक व्यवहार भी उनकी ही तरह आकर्षक था। हालाँकि ऐसे तपस्वी प्रसिद्ध साधक लोक व्यवहार से काफी ऊँचे उठे हुए रहते हैं, परन्तु स्वामी जी व्यवहार के धनी थे। इसी कारण किसी से न मिलते हुए भी उन्होंने अस्वस्थता की दशा में लोकमान्य तिलक से डेढ़ घण्टे तक आत्मीयता पूर्ण बातें की और इसी व्यवहार का ही परिणाम था कि तिलक के विचारों में व्यापक परिवर्तन हुआ और उसके पश्चात् ही वे राष्ट्र के प्रति पूर्णतया समर्पित हो गये श्री अरविन्द जी का व्यवहार भी बड़ा ही शिष्ट, शालीन एवं सभ्य था।
प्रसिद्ध उपन्यासकार चार्ल्स डिकेन्स अपने मधुर, शालीन व्यवहार के कारण अत्यन्त लोकप्रिय थे। वे किसी से भी खुले दिल से मिलते थे और जहाँ कहीं भी जाते अपने व्यवहार से सभी को मुग्ध कर देते थे। इसी तरह जर्मनी के महाकवि गेटे जो अपने व्यवहार के लिए भी विख्यात थे। उनके शिष्ट, शालीन व्यवहार से लोग बरबस खिंचे चले आते थे। नेपोलियन की धर्मपत्नी जोसेफीन अति व्यवहार कुशल थीं। नेपोलियन योद्धाओं के दिलों में बसते थे तो उसकी पत्नी लोगों के हृदय में।
यही सम्पूर्ण सच है कि सद्व्यवहार हृदय को विशाल बनाता है। जिसमें संवेदना और भावना उफनती रहती है, उसमें ईर्ष्या, द्वेष नहीं होते। यह उमड़ते-घुमड़ते बादल सा होता है। प्यासा देखा कि बरस उठा। जीवन इसी का पर्याय होना चाहिए और व्यवहार इसी के अनुसार। सद्व्यवहार से श्रेय सम्मान, मान प्रतिष्ठ सभी कुछ मिलते हैं। हमें भी चरित्र, चिन्तन को परिष्कृत एवं उन्नत कर सबसे सद्व्यवहार बनाए रखना चाहिए। ऐसा करके हम अपने आप ही सर्वोच्च लोक सम्मान के अधिकारी बन जायेंगे।
दक्षिणेश्वर मंदिर की निर्माता रानी रासमणि का जामाता मथुर बाबू ने एक विष्णु मंदिर बनाया और प्रतिमा को बहुमूल्य वस्त्र-आभूषणों से सजाया। कुछ ही दिन बीतने न पाए थे कि चोर सारा जेवर चुरा ले गए, मथुर बाबू उलाहना दे रहे थे कि भगवान् आप कैसे हैं, जो अपने परिधानों की रक्षा न कर सके।
रामकृष्ण परमहंस ने उनका समाधान किया कि जो धन लोकसेवा में नहीं लग सका, उसका आभूषण बनना और ईर्ष्या का निमित्त कारण बनना तथा चोरों के घर जा पहुँचना स्वाभाविक है। इस प्रवाह को भगवान् क्यों रोकें? रोकना होता तो चोरों से पहले भगवान् आपको रोकते।
आँसू की बूँद आँखें से ढुलक पड़ी। एकदम पारदर्शी और रंगहीन। पर इस रंगहीन गोल बूँद में उसे कई रंग नजर आए। घूमती हुई गोल दुनिया के अनेकों रंग। वह सोचने लगी कि रंगहीन आँसू की भी कैसी अलग-अलग रंगत है।
सोचते-सोचते अचानक उसके मन में बाईस-तेईस बरस पहले की यादें बरस पड़ी। जब माँ के घर से विदा होते समय ऐसे ही आँसू ढुलके थे। पर तब इन आँसुओं में कुछ और ही रंग था और इन्हें पोंछने वाली माँ की भी दो अंगुलियाँ थीं। आँसुओं की ढुलकती गोल बूँदों को पोछते हुए माँ ने कहा था, बेटी रोती क्यों हो? विवाह के बाद पति ही स्त्री का सब कुछ होता है।
और सचमुच ही उसके पति ऐसे ही थे। उसके सब कुछ। उन्होंने उसे सब कुछ दिया, वह सब कुछ जो वह दे सकते थे। उसके जीवन में तृप्ति के पल आए। तब भी आँखों से आँसू ढुलके थे। हालाँकि इन पलों में उसे जो तृप्ति मिली थी, उसमें कहीं तृष्णा छुपी थी। इसमें कहीं हल्की सी बेचैनी झाँक रही थी।
फिर भी उसे कुछ ऐसा लगा जैसे आसमान का चाँद, मुण्डेर फाँदकर मुस्कराता है। उसके एकान्त में झाँकने की कोशिश करता है, तो टिमटिमाते हैं, फूल खिलते हैं, कलियाँ चटकती हैं, सरसों फूलती हैं। उन दिनों जीवन के अनेक रंग बदले रंगहीन आँसू में भी कई रंग आए। आसमान का चाँद सचमुच ही उसके आँगन में उतरा। पता नहीं यह बात कितनों को सच लगेगी, पर कम से कम उसे तो सच लगी ही। यह उसका अपना सच था।
हालाँकि इसी बीच काल ने अचानक आकर उसके जीवन की पुस्तक के कुछ पृष्ठ पलट दिए। इनकी यादें तो रहीं, पर अब ये कभी फिर न पढ़े न जा सकते थे। उसकी हर मुश्किल में ‘मैं हूँ न!’ कहकर उसे ढाँढस देने वाले उसके पति न रहे। ऐसे में एक बारगी उसकी आँखें फिर छलकीं, फिर इनसे आँसू की बूंदें ढुलकीं। इस बार इनमें कुछ और ही रंग था। रंगहीन आँसुओं के इस रंग में कुछ ऐसा तीखापन था, उसके कलेजे को बेध गया।
पर उसने धैर्य रखा। आखिर अभी भी उसकी गोद में वह चाँद था, जिसने उसे आसमान से उतरते हुए महसूस किया था। उसे गोदी में भरके लगता कि हाँ वह है। यह आज नहीं तो कल आँसू पोंछेगा। उसे कलेजे से लगाकर थपक देती, तो जी को चैन पड़ता। सहारा वह देती, पर मन को कैसा सहारा सा मिल पाता। वह चलना सीखता, पैयाँ-पैयाँ, डगमग-डगमग, अंगुली पकड़ कर हर कदम पर चाहता कि माँ कहे कि आ-जा-मे-रा-बे-टा-आ-जा। वह कहती भी। वह दो-चार कदम चल हुमककर गोद में चढ़ जाता। लाड़-दुलार-प्यार-मनुहार उसे सब कुछ मिलता। दो थपकी देते ही उसके कंधे से लग कर सो जाता।
पाँव सम्हलने लगे तो वह अंगुली छुड़ाकर भागने लगा। इस तरह उसे भागते देखकर माँ-बेटा दोनों खुश होते। बेटा सोचता कि अब वह बड़ा हो गया और माँ सोचती उसका बेटा है। लेकिन तब उसने यह नहीं सोचा था कि अपने नन्हें पावों से भागने वाला उसका यह बेटा इतनी दूर भाग जाएगा, कि उसे न तो वह दौड़कर पकड़ सकेगी और न ही उसे बुला सकेगी।
पर काल की सोच कुछ अलग ही होती है। इस बार काल ने उसके जीवन की पुस्तक के पन्ने फिर से उलट दिए। पता नहीं आखिर उसे कौन सी जल्दी थी। उसकी आँखों से उनका नन्हा बेटा दूर चला गया। दूर-बहुत-दूर किसी अनजानी डगर पर। उसे ऐसा लगा कि उसकी गोद का चाँद फिर से आसमान का चाँद हो गया।
उसका घर जो उपवन हुआ था, अब सूखी झाड़ी बन गया। उसकी साँझें सूनी हो गयी और रातें अंधेरी। फिर अश्रु ढरे, इनकी रंगत उसे भायी- न सुहायी।
इस बीच उसके गाँव में गाँधी बाबा आए। बड़ा नाम सुना था उसने उनका। सुन रखा था कि बड़े महात्मा हैं, अनेकों लोग उनको पूजते थे। सब कुछ सुनकर उसने सोचा वह भी उनके दर्शन के लिए जाएगी। महात्माओं के दर्शन से पुण्य मिलता है। फिर हो सकता है कि गाँधी बाबा उसे भी कुछ बात बताएँ- राह दिखाएँ। और फिर ये भी तो हो सकता है कि कोई चमत्कार ही हो जाए। आखिर महात्मा चमत्कार भी तो करते हैं। कुछ ऐसा चमत्कार कि उसकी अंधेरी रातों में चाँदनी बरस पड़े।
अनेकों अरमानों को सजाकर- आशाओं को संजों कर, कल्पनाओं को संवारकर, भावनाओं को निखारकर वह वहाँ गयी। जहाँ गाँधी बाबा की सभा थी। छोटे से गाँव में भला सभा होती ही कितनी बड़ी। बड़ी तो थी गाँधी बाबा की बातें। ऐसी बातें जिन्हें सुनकर कलेजा हुलस जाता। सचमुच ही ये बातें ऐसी थी जिससे एक इन्सान तो क्या सारे गाँव और गाँव से भी बढ़कर सारे देश का जीवन संवर जाए।
वह भी इन बातों को सुनती-गुनती रही। और अन्त में गाँव के बड़े-बुजुर्गों की कृपा से गाँधी बाबा से मिली भी। एक बुजुर्ग ने उसका परिचय कराते हुए कहा- महात्मा जी! यह निर्मला है- हमारे गाँव की बहू- बेचारी का सब कुछ छिन गया। पहले पति फिर बेटा! उसकी सारी कथा का सार कह सुनाया।
गाँधी बाबा यह सब सुनते रहे- सोचते रहे। और जब गाँव के वह बुजुर्ग सज्जन चुप हो गए तो उन्होंने कहा- बेटी! भगवान् कभी निर्दयी नहीं होता। वह कुछ और ज्यादा देने के लिए कुछ थोड़ा सा छीन लेता है। अब से तुम सारे गाँव को अपना घर मानो। और यहाँ के बच्चों को शिक्षा दो- संस्कार दो।
अरे हाँ! यह तो उसने सोचा ही नहीं था। कितनी मीठी बात कही गाँधी बाबा ने। फिर उन्होंने यह भी तो कहा कि तुम मेरी अपनी बेटी हो, यदि कोई बात हो तो साबरमती आश्रम में मुझे पत्र लिखना। इन बातों ने उसे नए प्राण दिए- नया जीवन दिया।
गाँव के लोगों ने भी गाँधी बाबा की बातें सुनी थी। सभी की चाहत थी कि गाँव के बच्चों के लिए कुछ हो। उनके गाँव में भी बाल संस्कारशाला बने। जब निर्मला स्वयं इस काम के लिए आगे बढ़ी, तो सभी का सहयोग उमड़ पड़ा। उसका श्रम एवं सबका सहयोग। तिनके-तिनके करके आशियाना बनता है, ईंट-ईंट जुड़ती हैं तो महल बन जाता है। कुछ ऐसे ही उसके गाँव में बाल संस्कारशाला भी बन गयी।
गाँव के छोटे-छोटे बालक-बालिकाएँ उसके घर-आँगन में आने लगे। क्योंकि उसने अपने घर को ही बाल संस्कारशाला का रूप दे दिया था। ये सब बच्चे मिलकर पढ़ते-सीखते, गाते-गुनगुनाते, खेलते-दौड़ते-भागते, इसे देखकर उसका मन अनोखी तृप्ति से भर उठता। कभी जब उसका नन्हा-मुन्ना जन्मा था, तो उसने सोचा था कि आसमान से चाँद उतर आया। पर आज तो अनगिन चाँद उसके आँगन में अपनी चाँदनी बिखेर रहे थे। उसे लग रहा था कि घर-आँगन में ही नहीं, उसके मन के हर कोने में चाँदनी बरस रही है। इस अनोखी-अनूठी बरसात से उसके मन के हर कोने में उजाला हो रहा था। समाँ कुछ ऐसा था कि उसकी आँखें भी बरस पड़ी। एक के बाद एक आँसू की बूँद आँखों से ढुलक पड़ी। इस रंगहीन गोल बूँद में उसे जो कई रंग का नजारा दिखा उसमें भगवान् की कृपा थी- मनुष्य का पुरुषार्थ था, सेवा की भावना थी, क्षुद्र अहंता से छुटकारा था, बच्चों में थिरकती उमंगे थीं, सच्ची सेवा के परिणाम में उपजा अटूट जन सहयोग था और सबसे बढ़कर मन को मिलने वाली अनूठी तृप्ति थी। इन सात रंगों की इंद्रधनुषी छटा उसके इन आँसुओं से छलक रही थी-झलक रही थी।
अमेरिका के राष्ट्रपति लिंकन जब विद्यार्थी थे, गरीबी के कारण पढ़ाई-खरच मेहनत-मजदूरी करके निकालते थे। एक दुकान पर उन्हें सेल्समेन का काम मिला। इसी बीच सौदा बेचते समय किसी ग्राहक से भूल में एक रुपया अधिक वसूल हो गया। भूल का पता लगा, तो लिंकन कैशमेमो पर लिखे पते के आधार पर उसी समय पैदल चलकर उसके घर पहुँचे और क्षमा माँगते हुए पैसा लौटाकर बहुत रात गए घर, वापस आए।
उनकी प्रामाणिकता सर्वप्रसिद्ध थी। यही कारण था कि उनके अनेकों सच्चे मित्र थे। वे कहते रहते थे कि संपत्ति के नाम पर तो मेरे पास कुछ नहीं, पर सच्चे मित्रों के रूप में असाधारण वैभव का धनी हूँ।
प्रकृति का सुरीलापन पक्षियों से अभिव्यक्त होता है। शायद यही कारण है कि प्राचीन काल से पक्षियों के बोलने तथा गाने की ओर लोगों का ध्यान जाता रहा है। उनकी मधुर ध्वनियाँ आकर्षण का केन्द्र बिन्दु रही हैं। पौराणिक कथाओं में भी इस सम्बन्ध में रोचक विवरण प्राप्त होता है। जटायु द्वारा भगवान् राम के सीता अपहरण की सूचना तथा तोता-मैना की किस्सा से भला कौन परिचित नहीं है। जायसी के पद्मावत में तो हीरामन तोते ने ही समस्त कथानक को आगे बढ़ाया है। यह भले ही कल्पना पर आधारित हों परन्तु पक्षी समाज में भी भावों के आदान-प्रदान हेतु उनकी अपनी विशिष्ट भाषा का प्रयोग होता है। भले ही यह मानवेत्तर भाषा है, पर है यह उसी का स्वरूप ही।
बाग-बगीचों, खेत-खलिहानों तथा सुदूर नीले आकाश में उड़ते चहचहाते पक्षियों की बोलियाँ बड़ी ही मधुर लगती हैं। प्रातः उठते ही मुर्गे की बाँग, गौरैया की चहचहाट अपनी नीड़ से बाहर निकलकर उन्मुक्त आकाश में विचरते तोते की बोलियाँ अपनी बिरादरी के लिए संदेशयुक्त भाषा का ही एक प्रतिरूप है। पक्षी अपनी भाव-भंगिमाओं द्वारा तथा आँखों द्वारा भी आपस में बातें कर लेते हैं।
भाषा के रूप में पक्षी मुख्य रूप से दो प्रकार की ध्वनियों का प्रयोग करते हैं। पहली संगीतात्मक ध्वनि होती है, जिसे ‘पक्षी गान’ (bird song) कहते हैं। दूसरी सामान्य ध्वनि को पक्षियों का बोलना अर्थात् ‘पक्षी पुकार’ (bird call) कहा जाता है।
पक्षी गान अपनी संरचना में अत्यन्त जटिल होता है। इसका प्रयोग प्रायः नर पक्षी करते हैं। पक्षी जगत् में नर पक्षी संख्या में अधिक तथा मादाएँ अल्पसंख्यक होती हैं। सहवास ऋतु में मादा पक्षी को रिझाने के लिए नर पक्षी को काफी मेहनत करनी पड़ती है। इस प्रयास में वह खूब गाता है और विभिन्न प्रकार से गाता है। मिलन का यह मधुर गीत तब तक चलता रहता है जब तक उसे अपनी जीवन संगिनी न मिल जाए। पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार पक्षी का यह गीत कई प्रकार का होता है। इस गीत की खास विशेषता है कि नर पक्षी इसमें अपनी समस्त कला एवं कौशल को झोंक देता है।
पक्षी जगत् में नर पक्षियों की बहुलता होने के कारण उनका वर्चस्व रहता है। कुछ पक्षियों के गीतों में इसी वर्चस्व का स्वर भी सुनाई देता है। कुछ पक्षियों का अपना विशेष क्षेत्र होता है। इस पर अधिकार जताने तथा अपनी उपस्थिति का आभास करवाने हेतु भी पक्षी संगीतात्मक ध्वनि निकालता है। दूसरा पक्षी जब सीमा उल्लंघन कर किसी दूसरे पक्षी के क्षेत्र विशेष में गाना आरम्भ करता है तो उस क्षेत्र के पक्षी के गीत में सरलता की अपेक्षा क्रोध युक्त चुनौती होती है। वह इस ध्वनि के माध्यम से ये जताना चाहता है कि उसके क्षेत्र विशेष के अधिकार का अतिक्रमण न किया जाए।
अपने गाने के लिए मशहूर राबिन नामक पक्षी द्वारा तो इन दोनों परिस्थितियों के लिए भिन्न-भिन्न संगीत का प्रयोग किया जाता है। पक्षी जगत् में चकावा-चकवी की जीवन शैली कुछ भिन्न है। इनमें चकवी चकवे को प्रसन्न एवं खुश करने के लिए गाती है। चकवा जब खुश हो जाता है तो चकवी अण्डे देने के बाद सेने का उत्तरदायित्व उसे सौंप कर किसी दूसरे चकवे को प्रसन्न करने के लिए मुक्त हो जाती है। इधर चकवा अण्डे सेने से लेकर शिशुओं के पालन-पोषण तक की समस्त जिम्मेदारी निभाता है। और उधर चकवी दूसरे चकवे के साथ विवाह रचा लेती है। इसी प्रकार चकवी चकावा को रिझाने हेतु गाती है।
कुछ पक्षियों की ऐसी प्रजातियाँ हैं, जिनमें नर और मादा दोनों मिलकर गाते हैं। कभी-कभी तो इनमें गाने के चौदह घटक पाये गये हैं। इनमें से पहले चार नर द्वारा गाये जाते हैं फिर माता तीन घटक दुहराती है। पुनः नर चार और मादा तीन घटक गाकर समाप्त करती है। अनेक बार नर पहले पूरे गीत को गाता है और फिर मादा उसका अनुसरण करती है। परन्तु यहाँ पर दोनों की लय एवं गीत में थोड़ा सा अन्तर झलकता है, जो स्वाभाविक है। झाड़ी वाले क्षेत्रों में आपस में संपर्क बनाये रखने के लिए भी पक्षी थोड़े-थोड़े अन्तराल में गाते रहते हैं।
कुछ पक्षियों का गायन ऋतु एवं परिस्थितियों के अनुकूल होता है। चैपिंज वर्षा आने के पूर्व ही गाना शुरू करता है। इसके गीत में वर्षा का आमंत्रण होता है। प्रच्छन्न काले-काले मेघ को देखकर मोर अपना पंख फैलाये सरगम का स्वर अलापता है। कोयल की मीठी कूक में वासन्ती उमंग भरी रहती है। ऋतुराज वसन्त में कोयल की मधुर तान किसी स्वर्गीय संगीत का आभास कराती है। उषा के आगमन से पूर्व ही मुर्गा बाँग लगा देता है। कुछ पक्षी तो सदाबहार गाते हैं। हिमालय में पायी जाने वाली भूरे पंखों वाली काली तुरदुस बुलबुल गान के लिए विख्यात है। मालाबार की सीटी जैसी आवाज करने वाली थ्रुस और रामा भी खूब गाते हैं।
पक्षियों की सामान्य आवाज को पक्षी पुकार कहा जाता है। यह पक्षियों द्वारा भिन्न-भिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती है। साथ-साथ उड़ने, एक साथ नीचे उतरने तथा एक साथ रात्रि विश्राम के लिए भी अलग-अलग ध्वनियों के माध्यम से सूचना का प्रयोग किया जाता है। बड़े-बड़े झुण्डों में रहने वाली गौरैया उड़ने से पूर्व उड़ने के बीच तथा धरती पर उतरते समय तीन प्रकार की बोली बोलती है। इसका उद्देश्य होता है कि पूरे झुण्ड को एक साथ लेकर उड़ना और एक साथ उतरना।
साँप, नेवला, बिल्ली आदि जीव पक्षियों के जानी दुश्मन हैं। जब किसी पक्षी को इनसे सामना करना पड़ता है तो वह बड़ी कुशलता के साथ अपने अन्य साथी-सहयोगियों को इसकी सूचना पहुँचा देता है। इस अवसर पर निकाली गई ध्वनि आरोही और अवरोही होती हैं। खतरे की इस भाषा से पक्षी समाज अच्छी तरह से परिचित है तथा ये इसके लिए अत्यन्त सतर्क व सावधान होते हैं। पक्षी दोनों कानों से एक साथ नहीं सुन सकता। वह केवल एक ही कान से सुन सकता है। प्रकृति प्रदत्त यह विशेषता उनके लिए एक वरदान सिद्ध हुई है। जिस ओर आवाज आ रही हो उस ओर का कान पहले सुन लेता है तथा सुगमतापूर्वक उस आवाज के प्रति जानकारी प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार पक्षी खतरों से अपना बचाव करता है। यही नहीं जब स्थिति सामान्य हो जाती है तो एक विशेष प्रकार की ध्वनि द्वारा सूचना सम्प्रेषित की जाती है, जिसे सुनकर पक्षी नियमपूर्वक चहचहाने लगते हैं।
जुदाई पक्षियों के लिए भी असहनीय होती है। एक के मारे जाने पर दूसरे द्वारा अत्यन्त करुण विलाप किया जाता है ऐसे पक्षियों में क्रौंच प्रमुख है। बहेलिये द्वारा क्रौंच पक्षी के वध तथा बिछुड़े पक्षी के कारुणिक विलाप ने महाकवि वाल्मीकि को द्रवित कर दिया था और उनके द्रवित हृदय से निकली आह ही विश्व प्रसिद्ध काव्य का मंगलाचरण सिद्ध हुआ।
प्रवासी पक्षी स्वदेश वापसी के समय एक साथ एकत्रित हो जाते हैं तथा झुण्ड बनाकर यात्रा करने के लिए एक विशेष प्रकार की भाषा का प्रयोग करते हैं। इसी भाषा का अनुसरण करके ही वे अनुशासित सिपाही की तरह झुण्ड में आते और जाते हैं। भाषा सम्बन्धी यह ज्ञान प्रायः उन्हें सहजान रूप में प्राप्त होता है। गाने वाले पक्षियों में कुछ को यह गुण सहज रूप में प्राप्त होता है तथा कुछ सीखते भी हैं। पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार यदि कोयल के बच्चे को कोयल समाज से अलग रखकर अन्य पक्षियों की आवाजें सुनायी जायें तो वह तब भी कोयल की ही आवाज निकालेगा। दूसरी ओर बुलफिंच को जिस समाज में प्रारम्भ में रख दिया जाये वह उसी का गाना शुरू कर देता है।
भारतीय पक्षियों में पहाड़ी मैना इस मामले में निश्चय ही सबसे आगे है। वह मनुष्य की बोली को लगभग नकल कर लेती है। हालाँकि इस सिलसिले में तोते ज्यादा मशहूर हैं। तोते को मंत्र तक याद होते देखा गया है। भृंगराज एक गान-विधा-विशारद परन्तु वह अत्यन्त नकलची पक्षी है। इसकी सर्वोपरि विशेषता है विभिन्न गाने वाले पक्षियों के गानों की हूबहू नकल कर लेना। वह आस-पास के किसी भी पक्षी की नकल कर लेता है, जिससे भ्रम पैदा हो जाता है। संभवतः इसी वजह से जंगल का चक्रवर्ती सम्राट इससे बहुत चिढ़ता है और इसे देखना तक पसंद नहीं करता है।
जो भी हो पक्षी अपनी कोमल भावनाओं की अभिलाषी इन सुरीली तानों के माध्यम से करती हैं। यदि प्रकृति की इस नैसर्गिक धरोहर के प्रति हम भी संवेदनशील हों तो हमारे जीवन में भी अनेकों प्रकार की कोमल भावनाएँ फूट पड़ेंगी। जो हमें और औरों को भी प्रसन्न करने में सहायक होगी। हमारा जीवन और भी सरस और सुन्दर बन पाएगा।
मकड़ी एक लंबा जाला तान रही थी। उतना बन नहीं पड़ रहा था। बार-बार टूट जाता था। फिर भी वह निराश नहीं हुई। प्रयास जारी रखा और चौदहवें प्रयास में सफल हुई।
यह दृश्य पराजित ब्रुसो देख रहा था। उसने तेरह बार लड़ाई में मात खाई थी। मकड़ी के साहस से प्रभावित होकर उसने चौदहवीं बार लड़ाई की तैयारी की और दूने उत्साह से लड़ा और सफलता प्राप्त की।
लाल-लाल आँखें, काँपते होंठ, तमतमाता चेहरा भीषण क्रोधोन्माद का परिचायक है। अज्ञान के कुण्ड में धधकती क्रोधाग्नि सर्वप्रथम विवेक को जला डालती है। और फिर शुरू होती है जीवन के सर्वनाश की यात्रा। जिसका कहीं कोई अंत नहीं है। यह अपने शरीर एवं मन को जलाकर ही शान्त होता है। क्रोध का आवेश अपने आसपास के समूचे वातावरण को विषाक्त कर देता है। इस प्रकार यह शान्त-सरल जीवन में अमंगल का अभिशाप बनकर आता है।
क्रोध मूलतः मनोकायिक रोग है। इसे मस्तिष्कीय ज्वर भी कहा जा सकता है। यह निरन्तर सुलगने वाली आग है। जिसमें व्यक्ति गीली लकड़ी की तरह भीतर ही भीतर सुलगता रहता है। यह उत्तेजना का ताप है। प्राचीन जैन वांग्मय में क्रोध के कई रूपों का उल्लेख मिलता है- कोप, रोष, द्वेष, बैर, विरोध, कलह आदि। ये उत्तरोत्तर आवेश की एवं उग्र परिणामों के परिचायक हैं।
जो व्यक्ति को अपने सहज स्वभाव से विचलित कर दे वह कोप है। इससे व्यक्ति का सहज स्वभाव बदल जाता है। वह स्वभावतः जैसा होता है, वैसा रह नहीं जाता। कुपित व्यक्ति की सज्जनता, संवेदनशीलता, शालीनता, विनम्रता, उदारता आदि कुपित क्षण में परिवर्तित हो जाते हैं। उसके अन्दर की स्निग्धता रुक्षता में, गम्भीरता छिछलेपन में और सहृदयता क्रूरता में बदल जाती है। जब क्रोध स्थायी बन जाता है तो रोष बनकर प्रकट होता है। यही ‘रूठना’ कहलाता है। क्रोध से ही वैमनस्य भाव जागता है। यही वृत्ति आपसी विवादों एवं विग्रहों को जन्म देती है।
क्रोध एक मनोवृत्ति है। यह एक ऐसी भाव दशा है जो अतिशीघ्र प्रकट होती है। यह हमारी चित्त चेतना में सबसे ऊपरी तल पर स्थित रहता है। कुछ वृत्तियाँ जैसे कुटिलता, प्रवंचना आदि गूढ़ होती है और ये मन की गहराई में छिपी रहती हैं। परन्तु क्रोध मन के ऊपरी क्षेत्र में अवस्थित होने के कारण तत्क्षण प्रकट हो जाता है। इसे दबाया तो जा सकता है, लेकिन इसके प्रभावों को छिपाना सम्भव नहीं है। क्रोध मानवी व्यवहार के किसी न किसी पक्ष से उजागर हो ही जाता है।
मनोवैज्ञानिकों ने क्रोध को साइलेंट एवं वायलैट के रूप में वर्गीकृत किया है। साइलेण्ट क्रोध अन्तर्मुखी होता है। इससे व्यक्ति में हताशा, निराशा, उदासी छायी रहती है। वह स्वयं में हैरान और परेशान रहता है। अपनी मन की बात किसी से न कह पाने के कारण वह अन्दर ही अन्दर घुटता रहता है। क्रोध के उबाल को दबा देने के कारण उसकी आन्तरिक स्थिति और भी अस्थिर एवं अशान्त हो उठती है। एक प्रकार से यह भी एक भयावह स्थिति है। वायलेण्ट क्रोध बहिर्मुखी होता है। यह क्रोध अपने उफान को बाहर प्रकट करता है, इसके परिणाम स्वरूप कलह, लड़ाई-झगड़ा से लेकर दंगा-फसाद तक होते देखे जा सकते हैं। यह भी दो प्रकार का होता है- साधारण और असाधारण।
साधारण क्रोध अल्पकालिक एवं क्षणिक होता है। यह दूध के समान तुरन्त उफन पड़ता है। इसकी प्रतिक्रिया क्षीण ही सही परन्तु बड़ी तीव्र होती है। जैसे ही यह क्रोध शान्त होता है अपने किये कर्म पर बड़ा पश्चाताप होता है। परन्तु परिस्थिति आते ही यह फिर से अपना स्वरूप दिखाने लग जाता है। हालाँकि इसका प्रभाव लम्बे समय तक नहीं है लेकिन यह बड़ा घातक होता है।
असाधारण क्रोध तीव्र होने के साथ-साथ स्थायी होता है। इसका विषाक्त आवेश दीर्घकाल तक बना रहता है। यह आवेश मदिरा के समान होता है। इसके नशे में व्यक्ति लम्बे समय तक आत्मविस्मृत होकर बेसुध पड़ा रहता है। ऐसे व्यक्ति को कोई भी उपदेश एवं मार्गदर्शन देना सम्भव नहीं है क्योंकि वह अपने ही बुने ताने-बाने में जलता-पिटता रहता है। धीरे-धीरे वह उन्माद के बाहुपाश में जकड़ता चला जाता है। और उन्मादी वृत्ति उसके जीवन का अंग बन जाती है। उसके जीवन की समस्त गतिविधियाँ उल्टी दिशा में चलने लगती हैं। और अन्त में उसे विनाश के सिवाय कुछ भी उपलब्ध नहीं होता। ऐसे क्रोध एवं उन्मादग्रस्त व्यक्ति से सभी अपना सम्बन्ध काट लेते हैं। वह अपने ही परिवार एवं समाज के बीच निर्वासन की जिन्दगी जीने को मजबूर हो जाता है।
क्रोध मुख्यतः परिस्थितिजन्य कारणों से ही उत्पन्न होता है। मनोवैज्ञानिकों के अध्ययन-अन्वेषण से पता चलता है कि कुछ और भी कारण हैं जिससे यह उत्पन्न होता है। ये हैं- काम में व्यवधान आना, कटाक्ष एवं व्यंग्योक्ति, तनाव, भूख, थकान एवं कमजोरी, असफलता, असन्तोष आदि। वृद्धावस्था में व्यक्ति को अपने को अकेला, असहाय एवं बेसहारा महसूस करने के कारण भी उसे क्रोध जल्दी आने लगता है। उपरोक्त कारणों के अलावा कुछ मानसिक बीमारियों जैसे- डिप्रेशन, सिजोफ्रेनिया, मैनिया, चिन्ता आदि की वजह से भी व्यक्ति में क्रोध की प्रवृत्ति देखी जा सकती है।
किसी भी कारण से क्रोध जन्म ले सकता है। परन्तु जैसे ही मन में इसकी छोटी सी तरंग उत्पन्न होती है। वैसे ही यह संवेदना का योग पाकर मन की गहराई में उतरती चली जाती है। और यह शरीर के रोम-रोम में रम जाती है। तत्पश्चात् क्रोधाविष्ट व्यक्ति अपने उस अभिमत या व्यवहार का मौखिक समर्थन करता है, जिस कारण उसे क्रोध हुआ था। विभिन्न तर्कों एवं उपायों से वह उस कारण का औचित्य सिद्ध करता है। वह हर तरह से अपने पक्ष को यथार्थ एवं औचित्य पूर्ण ठहराता है। अपनी समस्त मानसिक कल्पनाओं का जाल इसी ओर बुनता रहता है। अपने आप ही वह उसका स्पष्टीकरण कर देता है और तर्क संगत शब्दाँकनों द्वारा उसे चिरपोषित करता है। वह अपने क्रोध को जायज एवं उचित मानता है।
क्रोधावेश की प्रक्रिया का सिलसिला अन्तहीन होता है। एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी, चौथी एवं अनगिनत कड़ियाँ जुड़ती चली जाती हैं और इस प्रकार भावावेश की लम्बी शृंखला बन जाती है। क्रोध का यह आवेश उत्तरोत्तर शक्तिशाली और लम्बा व गहरा होता चला जाता है। इस प्रकार क्रोध का कहीं कोई अन्त नजर नहीं आता। अन्ततोगत्वा यह व्यक्ति को खण्डित एवं विभाजित करके ही दम लेता है। इसका परिणाम बड़ा ही घातक एवं विनाशक होता है।
मनोवैज्ञानिकों ने क्रोधाविष्ट व्यक्तियों का मस्तिष्कीय एवं हार्मोन सम्बन्धी परीक्षण किया है। हालाँकि इनके प्रायोगिक निष्कर्षों में पूर्णता नहीं है। केप्लान एवं सैडोक ने अपनी कम्प्रीहेन्सीव टेक्टबुक ऑफ साइकियाट्री में उल्लेख किया है कि क्रोधित व्यक्ति अक्सर उत्तेजित हो जाते हैं। ऐसी दशा में उनमें CSF-5 HIAA (Cerebrospinal fluid, 5- Hydroxy indoleacetic acid) की मात्रा घट जाती है। इस एसिड की मात्रा अन्य सामान्य व्यक्तियों की तुलना में अति न्यून होती है। संभव है इसकी कमी से व्यक्ति अपना नियंत्रण खो बैठता है और क्रोध से उत्तेजित हो जाता है।
वैज्ञानिकों ने क्रोध से उत्पन्न हिंसा का भी परीक्षण किया है। इनके अनुसार मस्तिष्क के दोनों एमीगडल, अन्य टेम्पोरल लोव और लिम्बिक सिस्टम के द्वारा क्रोध एवं हिंसा का सम्बन्ध होता है। अत्यधिक क्रोध के कारण पतली रक्त वाहिनी के फट जाने का भी भय बना रहता है। ऐसे तो क्रोध से हार्मोन का सम्बन्ध स्पष्ट नहीं हो पाया है, परन्तु मिड्रोक्सी-प्रोजेस्ट्रान से इसका तारतम्य जुड़ने का आभास मिलता है। जो भी हो क्रोध एक अत्यन्त घातक मनोकायिक रोग है जो शरीर एवं मन दोनों को जलाता है। इसी कारण तत्त्वचिन्तकों, अध्यात्म के आचार्यों, वैज्ञानिकों, मनोवैज्ञानिकों सभी ने एक स्वर से इससे परहेज का सुझाव दिया है।
क्रोध प्रायः परिस्थितिवश पैदा होता है। आवश्यकता है उन परिस्थितियों का शान्त मन से सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए एवं उसकी गहराई में जाकर वास्तविक तथ्य का पता लगाया जाय। ऐसा किया जाय तो कोई कारण नहीं कि उसे नियंत्रित नहीं किया जा सके। आत्म समीक्षा एवं ईश्वर चिन्तन द्वारा इस असाध्य मनोरोग से मुक्ति सम्भव है।
एक धर्म प्रचारक, संघ के अधिष्ठाता से शिकायत कर रहे थे।इतने दिन उपदेश देते लोग न मुझे समझ पाए, न मेरे अनुयायी बने। अब मैं क्या करूं ?”
अधिष्ठाता ने दूसरे दिन के साथ अन्य प्रचारकों को भी बुलाया। दो बरतन पानी में भरकर रखे। सबको दिखाते हुए एक में तेल डाला और दूसरे में नमक तेल ऊपर तैर रहा था और नमक पानी में घुल गया था।
तात्पर्य समझाते हुए अधिष्ठाता ने कहा,कि तेल की तरह जनता के सिर पर छाने की कोशिश मत करो नमक की तरह जन-समुदाय के पानी में घुल जाओ, तो आत्मसात होकर रहोगे।"
तेजी से बदलते इस सामाजिक परिवेश में फास्ट फूड का प्रचलन बढ़ने लगा है। स्वाद एवं समय की बचत के कारण यह भागती-दौड़ती जिन्दगी का एक अनिवार्य अंग बन चुका है। परन्तु इसके तात्कालिक आकर्षण के पीछे कुछ खतरनाक पहलू भी हैं। इसी वजह से फास्ट फूड के आदि होते जा रहे लोगों में कई प्रकार के रोग पनपने लगे हैं।
चाउमीन, मैगी, पिज्जा, बर्गर, पेटीस एवं डिब्बा बन्द भोजन एवं पेय पदार्थ को सामान्यतः फास्ट फूड की संज्ञा दी गयी है। इनके कारण ही चावल, दाल, सब्जी, रोटी जैसी खाने की सादी परम्परा, पुरानी एवं बीते युग की बात हो चुकी है। ग्लोबलाइजेशन एवं उदारीकरण के प्रभाव से प्रभावित भारतीय जनमानस की खान-पान की संस्कृति बदल गई है। अब फास्ट फूड उनका स्टेटस सिम्बल बन चुका है। समाज के तथाकथित उच्च एवं अभिजात्य वर्ग में यह सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठित हो गया है। जिसका अन्धानुकरण करने में समाज के अन्य वर्ग भी अपने आप को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। परिणामतः आज हमारे देश के हर बड़े होटलों से लेकर ढाबे एवं छोटे-छोटे स्थानों पर इसका भरपूर प्रचलन चल पड़ा है।
इन दिनों फाइव स्टार होटलों के खाने की नकल प्रतिष्ठ एवं फैशन की बात बन गयी है। इसी वजह से फास्ट फूड हमारी संस्कृति में अनावश्यक रूप से समाहित होता जा रहा है। सम्भव है ये आधुनिक भोजन स्वाद में थोड़े अच्छे ही क्यों न हो, परन्तु इसके लम्बे समय तक सेवन करने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही इनको सुन्दर, स्वादिष्ट एवं आकर्षक बनाने के लिए जिन तरीकों का प्रयोग किया जाता है, वह भी कम घातक नहीं है।
ये फास्ट फूड दो प्रकार के होते हैं- शाकाहारी एवं माँसाहारी। इन दिनों शाकाहारी फास्ट फूड को स्वादिष्ट बनाने के लिए माँसाहार चीजों की पर्याप्त मिलावटें होने लगी हैं। इससे उनका स्वाद बदल जाता है और बिक्री बढ़ जाती है। आजकल मिठाइयों एवं अन्य खाद्य पदार्थों में अण्डे की मिलावट आम बात हो गई है। सैण्डविच, पराँठा, कुलचा, ब्रेड, केक आदि शुद्ध शाकाहारी माने जाने वाले भोज्य पदार्थ इससे अछूते नहीं हैं। यहाँ तक कि चाय जैसे पेय पदार्थ को जायकेदार बनाने के लिए माँस के अर्क मिलाये जाने की खबर भी बीते दिनों काफी प्रचलित रही। ऐसे भोजन शाकाहारी व्यक्ति की प्रकृति के लिए अत्यन्त प्रतिकूल है एवं उनकी नैतिक, धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध है।
फास्ट फूड के क्षेत्र में जैव टेक्नोलॉजी का ‘जेनेटिक फूड्स’ का भी प्रचलन बढ़ने लगा है। इसके अंतर्गत साग, सब्जी, फल, जीव-जन्तु, मनुष्य आदि के जीन को एक-दूसरे में मिलाकर जिन-नियंत्रित खाद्य वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। इसके द्वारा खाद्य पदार्थों को लम्बे समय तक सुरक्षित एवं संरक्षित किया जाता है तथा विश्व के विभिन्न देशों में भेजा जाता है। जेनेटिक फूड्स के रूप में दूध पाउडर, सोया पाउडर, आलू चिप्स, बेबी फूड्स आदि अपने देश के बाजार में भारी मात्रा में मिलने लगे हैं। अमेरिका में उत्पन्न सोयाबीन का पचास प्रतिशत और मक्के का पच्चीस प्रतिशत जेनेटिक संरक्षित होता है।
जेनटिक फूड्स का उत्पादन इन दिनों प्रचुर मात्रा में होता है। परन्तु यह कुछ समय के लिए लाभदायक होने के बावजूद कई प्रकार के रोगों को जन्म देने वाला है। अन्तर्राष्ट्रीय संस्था ग्रीन पीस के अनुसार इस तरह के खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं। इसमें जेनेटिक संक्रमण का भय बना रहता है। संभवतः इसी कारण फ्राँस जैसे यूरोपीय देशों ने जेनेटिक फूड्स पर प्रतिबन्ध लगा दिया है।
अपने देश में पेय पदार्थों का भी एक बड़ा उद्योग है। ये पदार्थ अनेकों ट्रेड नामों से बिकते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार अपने देश में लगभग पाँच से सात हजार प्रकार के बोतल बंद ठण्डे पेय एवं शरबत आदि का प्रयोग होता है। कोल, कोला, पेप्सी, लिम्का, मिरिण्डा, फेण्टा आदि ट्रेड ब्राण्ड के पेय तो प्यास बुझाने के लिए कम स्टेटस सिम्बल के रूप में अधिक बिकते हैं। चिकित्साशास्त्रियों के अनुसार इनके अधिक सेवन से विभिन्न प्रकार के पेट के रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है। इसके अलावा साँस, आचार, मुरब्बे, रबड़ी, कुल्फी, रसगुल्ला आदि खाद्य पदार्थों के रेडीमेड मसाले भी खूब बिक रहे हैं। जिनसे चर्म रोग तथा एलर्जी की शिकायत मिलने लगी है।
विभिन्न प्रकार के इन खाद्य पदार्थों को अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए ‘फूड कैनिंग‘ याने डिब्बा बन्द प्रक्रिया अपनायी जाती है। इन डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थों को उन क्षेत्रों में भेजा जाता है जहाँ पर ऐसे पदार्थों का उत्पादन नहीं होता। इन डिब्बाबंद खाद्य सामग्री में फल, फलों का रस, सब्जियाँ एवं अनेक तरह के फास्ट फूड होते हैं। चटपटे और जायकेदार स्वाद के कारण इन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। इन्हें प्रिजर्व करने के लिए सिरका, रंग, गंध, लवण और कृत्रिम शर्करा की प्रचुरता होती है। इसके अतिरिक्त इनमें एथिल, सोडियम क्लोराइड, एसिटिक एसिड आदि औषधीय तत्त्व मिलाये जाते हैं। कुछ भोज्य पदार्थों में एण्टीबायोटिक दवाइयों का भी उपयोग होता है। अब तो इसमें नाइट्राइड एवं आर्गेनिक रसायन का भी प्रयोग बढ़ने लगा है। विज्ञान के साधारण जानकार भी जानते हैं कि पदार्थ टाक्सिक होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक हैं।
इण्टरनेशनल फाउण्डेशन ऑफ नेचुरल हैल्थ एवं योग के डॉक्टर एन. एस. अधिकारी ने फास्ट फूड को अप्राकृतिक आहार का दूसरा रूप माना है। उनके अनुसार इनमें आवश्यक पोषक तत्त्वों का अभाव होता है। इसके बावजूद इसके प्रचार-प्रसार को देखकर हर व्यक्ति आज भ्रमित हो रहा है। उसे इस चकाचौंध में यह पता नहीं चल पाता कि स्वाद के नाम पर जिस खाद्यसामग्री को ग्रहण किया जा रहा है, वह कितनी स्वास्थ्यप्रद है। संभवतः इसी मानसिकता का लाभ उठाकर यह उद्योग काफी फल-फूल रहा है। इसलिए ‘फूड प्रोडक्ट्स आर्डर’ नामक एक सरकारी संस्था ने एक विज्ञप्ति जारी कर उल्लेख किया है कि हरेक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के अनुकूल आहार ग्रहण करना चाहिए, स्वाद के नाम पर नहीं। चटपटे स्वाद के रूप में फास्ट फूड को अल्सर, पेट के ट्यूमर, आदि का विषाक्त दंश झेलना पड़ सकता है।
प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय खाद्य संस्थाओं ने ऐसे अप्राकृतिक भोजन से परहेज रखने के लिए अत्यधिक बल दिया है। इनका कहना है कि फास्ट फूड थोड़े आकर्षक एवं स्वादिष्ट तो होते हैं, परन्तु ताजा न होने के कारण इनमें विटामिन एवं कैलोरी आदि की गुणवत्ता नष्ट हो जाती है। फैट रिच फास्ट फूड्स से मोटापे में काफी वृद्धि देखी गयी है। और इसे हृदय रोग के साथ-साथ कई अन्य रोग को भी जन्म देने वाला माना गया है।
इसलिए अच्छा यही है कि उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य के लिए प्राकृतिक एवं संतुलित आहार ग्रहण किया जाय। हरी सब्जियों, दूध, मौसमी फलों आदि में प्रायः सभी पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में होते हैं। ये प्राकृतिक आहार सात्विक एवं हल्के भी होते हैं। जिससे स्वास्थ्य भी ठीक बना रहता है। स्वस्थ एवं निरोगी शरीर में ही रोगों से लड़ने की अपार क्षमता होती है। ऐसे में ही स्वस्थ मन का निवास हो सकता है। इसीलिए शास्त्रों में अन्न की महत्ता गायी गयी है। अतः हममें से हर एक को फास्ट फूड रूपी पाश्चात्य शैली की सर्वनाशी अनुकरण पद्धति से बचना चाहिए और प्राकृतिक आहार एवं जीवन शैली को अपनाकर सदा निरोगी एवं स्वस्थ बने रहने चाहिए। यही स्वास्थ्य का मूल मंत्र है।
बुद्ध शिष्यों को धर्मप्रचार के लिए विदा कर रहे थे। लंबे प्रवास में कठिनाइयाँ आने और नए स्थानों पर विरोध होने, पराजय मिलने की आशंका व्यक्त की जा रही थी।
असमंजस का निवारण करते हुए तथागत ने सशर्त आशीर्वाद दिया, कहा, “जब तक तुम लोग संयमी रहोगे, परस्पर मित्र भाव बरतोगे, जो मिलेगा उसे मिल-बाँटकर खाओगे और लोकमंगल को धर्म मानते रहोगे, तब तक कठिनाइयाँ तुम्हें पराजित न कर सकेंगी।”
आदेशों को हृदयंगम करके वे देश-देशाँतरों में बिखर गए और धर्मचक्र प्रवर्तन को चरम सीमा तक सफल बनाने में समर्थ हुए।
इस शृंखला के अंतर्गत सियाटिका रोग के बारे में पिछले लेख में विस्तारपूर्वक बताया जा चुका है। यहाँ पर ‘आमवत’ नामक कष्टकारी वातव्याधि के संबंध में उल्लेख किया जा रहा है कि कारणों से पैदा होता है और यज्ञोपचार द्वारा उससे कैसे छुटकारा पाया जा सकता है। आमवात को समस्त वातविकारों का जनक कहा जा सकता है। आरंभ होने के साथ ही यदि सही ढंग से उपचार न किया जाए, तो आगे चलकर विविध प्रकार के कष्टसाध्य वातविकार जैसे संधिवात, संधिशोथ जिन्हें चिकित्साविज्ञानी ‘आथ्राइटिस’ कहते हैं, पैदा हो जाते हैं। गठिया, जोड़ों का दर्द, पंगुता आदि वात विकृतियाँ इसी की देन हैं।
आमवात की निरुक्ति दो प्रकार से की जाती है, ‘आमेन सहितः वातः’ तथा आमश्च वातश्च आमवातः। अतः स्पष्ट है कि यह दो शब्दों के मेल से बना है, आम.वात। वस्तुतः जो खाद्यपदार्थ हम आहार के रूप में ग्रहण करते हैं, यदि वह ठीक तरह से पचता नहीं है, जठराग्नि कमजोर है, तो उससे जो कच्चा अपक्व रस बनता है, वह आँत के ऊपरी भाग-आमाशय में इकट्ठा होता रहता है। आयुर्वेद में इसे ही ‘आम’ कहते हैं। जब शरीर में संचरण करने वाली वायु प्रकुपित होकर आम से मिल जाती है और दूषित वायु के साथ पूरे शरीर में परिभ्रमण करने लगती है, तब इसे ‘आमवात’ कहते हैं। शरीर के त्रिकस्थानों, संधिस्थलों, जोड़ो आदि में प्रवेश करके यह उन स्थानों को जकड़ लेती है, लॉक कर देती है, तब अंगों में सूजन आ जाती है और हड्डी टूटने, बिच्छू के डंक मारने जैसी पीड़ा होती है। इसके साथ ही भूख न लगना, अरुचि, प्यास, आलस्य, ज्वर, हृदय में भारीपन, पैर, पिंडली, जंघा, घुटना, कमर, ग्रीवा आदि में शोथ, अनिद्रा, पेशाब की अधिकता, आँतों में गुड़गुड़ाहट एवं शरीर में दाह जैसे लक्षण उभर आते हैं।सही ढंग से उपचार न होने पर आमाशय में जमा हुआ यही आमरस जब कफ और पित्त से मिल जाता है, तो यह उक्त संधि स्थानों में एकत्र होकर सूजन और असह्य दर्द पैदा करता है। ऐसी स्थिति में एकत्र होकर सूजन और असह्य दर्द पैदा करता है। ऐसी स्थिति में चलना-फिरना दुष्कर हो जाता है कि आमवात ने जकड़ लिया है। पित्ताधिक्य आमवात में दाह और लाली होती है, वाताधिक्य आमवात में शूल होता है। कफ की अधिकता वाले आमवात में शरीर में जड़ता, भारीपन और खुजली अधिक होती है।
यों तो आमवात वृद्धावस्था का रोग माना जाता है, परंतु पेट की खराबी, आवश्यकता से अधिक खाने, अधिक शराब पीने, वासी भोजन करने आदि कारणों से वह किसी भी उम्र में हो सकता है। वंशानुगत कारणों से भी यह रोग हो जाता है। आमवात के कारणों का उल्लेख करते हुए आयुर्वेद के ग्रंथ ‘बंगसेन’ में कहा गया है-
"विरुद्धाहार चेष्टस्य मंदाग्नेर्निश्चलस्य च। स्निग्धं भुक्तवतो हृान्नं व्यायामज्चाथ कुर्वतः॥
अर्थात् विरुद्ध आहार-विहार-प्रकृति विरुद्ध, समय विरुद्ध, संयोग विरुद्ध जैसे दूध-मछली आदि खाने और विरुद्ध चेष्टा करने, स्निग्ध आहार जैसे दूध, घी, मिठाई आदि गरिष्ठ पदार्थ लेने के पश्चात् बैठे रहने, शारीरिक श्रम न करने, जिह्वा पर नियंत्रण न रखने तथा भोजन करने के पश्चात् तुरंत व्यायाम करने या कठिन परिश्रम करने, नमी या सीलनयुक्त कमरों में निवास करने, धूप से आकर तुरंत ठंडे जल से स्नान करने या ठंडा जल पीने, ठंडी हवा में रात में खुले बदन सोने, पसीना रोकने, आम एवं वात को कुपित करने वाले वातावरण में रहने आदि कारणों से आमवात पैदा होता है। यदि यही आम पित्त स्थान में पहुँच जाए तो उसका पाचन हो जाता है, किंतु जब उपर्युक्त कारणों से यह वायु से संयुक्त होकर आमाशय, वक्षस्थल, कंठ, मस्तिष्क एवं संधिस्थलों आदि कफ वाले स्थानों में पहुँच जाता है तो अपक्व रह जाता है एवं धमनियों के मार्ग से चलने लगता है। प्रवाहित होता हुआ आमवात पित्त या कफ से संयुक्त होने पर दूषित हो जाता है और स्रोतों में रहने वाले रस को वहन करने वाली शिराओं को रोककर भारी कर देता है, जो आगे चलकर विविध प्रकार की दारुण वात-व्याधियों को जन्म देता है।
आयुर्वेद चिकित्सा में आमवात दूर करने वाले अनेकों औषधीय योग उपलब्ध हैं। अनेक विशिष्ट एवं बहुमूल्य रस-भस्मादि मिश्रित योग, क्वाथ, वातनाशक-दर्दनाशक तैल आदि के प्रयोग से नए पुराने आमवात को समूल नष्ट किया जा सकता है। इतने पर भी अनुभवी चिकित्सक एवं महंगी दवाओं की सहज उपलब्धता न होने के कारण जनसामान्य प्रायः इस दारुण कष्ट को झेलने के लिए विवश बने रहते हैं। ऐसी स्थिति में यज्ञ-चिकित्सा को अपनाकर हर कोई अपने आहार-विहार में परिवर्तन करते हुए सहज ही सभी प्रकार की वात व्याधियों से छुटकारा पा सकते हैं और नीरोग एवं दीर्घायुष्य जीवन आनंद उठा सकते हैं।
आमवात की विशेष हवन सामग्री
आमवात दूर करने के लिए जो हवन सामग्री बनाई जाती है, उसमें निम्नलिखित वस्तुएँ मिलाई जाती हैं, 1-रास्ना, 2-गिलोय, 3-अमलतास की पत्ती एवं फल का गूदा, 4-देवदार, 5-गोक्षुर, 6-एरंड की जड़, 7-पुनर्नवा (साँठी) 8-सोंठ, 9-बिल्वगिरी, 10-गंभारी छाल, 11 पाढ़ल छाल, 12-अरणी छाल, 13-अरलू, 14-शालिपर्णी पंचाँग, 15-पृश्निपर्णी, 16-छोटी एवं बड़ी कटोरी (दोनों), 17-कचूर, 18-बड़ी हरड़, 19-बच, 20-अतीस, 21-वासा, 22-गुग्गुल, 23-पीपर, 24-पिपरामूल, 25-शतावर, 26-असगंध, 27-विधारा, 28-प्रसारिणी, 29-पोहकर मूल, 30-अजवायन, 31-अजमोद, 32-वायविडंग, 33- चव्य, 34-चित्रक, 35-जीवंती, 36-इंद्रायण की जड़ व फलों का बीज, 37-कूठ, 38-जायफल, 39-कालीमिर्च, 40-सफेद जीरा, 41-गोरखमुँडी, 41-कुटकी, 42-निशोथ, 44-तेजपात, 45-दालचीनी, 46-कटसरैया, 47-मेथी, 48-मकोय, 49-इंद्र जौ और 50-बला।
उपर्युक्त सभी 5 चीजों को समान मात्रा में लेकर जौकुट पाउडर बना लेना चाहिए। यदि कुछ औषधियाँ न मिलें तो भी जितनी उपलब्ध हो सकें, उनसे ही यज्ञोपचार आरंभ कर देना चाहिए।
यज्ञोपचार में हवन करते समय पूर्व में बताई गई ‘काँमन हवन सामग्री नंबर 1’ को भी संभाग में मिला लिया जाता है। इस नंबर 1 की हवन सामग्री में जो चीजें मिलाई जाती हैं वे हैं, अगर, तगर, देवदार, श्वेत चंदन, लाल चंदन, जायफल, लौंग, गूगल, चिरायता, गिलोय एवं असगंध। इन्हें जौकुट करके एक अलग डिब्बे में पहले से ही तैयार करके रख लेते हैं और हवन करते वक्त प्रत्येक रोग की विशिष्ट हवन सामग्री में बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन करते हैं। हवन करने का मंत्र सूर्य गायत्री मंत्र ही रहेगा अर्थात् "ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।"
हवन करने के साथ ही उपयुक्त सभी पचास चीजों को अलग से बारीक पीसकर उनका कपड़छन चूर्ण तैयार कर लिया जाता है और सुबह-शाम एक-एक चम्मच कुनकुने जल के साथ आमवात के रोगी व्यक्ति को खिलाया जाता है। चूर्ण निगलने में प्रायः अरुचिकर लगता है, अतः इसका क्वाथ बनाकर निगलने से समस्या का समाधान भी हो जाता है और लाभ भी जल्दी मिलता है।
क्वाथ बनाने का सबसे सरल तरीका यह है, कि रात्रि में 5 ग्राम अर्थात् दस चम्मच उक्त चार चीजों के सम्मिलित पाउडर को लगभग एक लीटर शुद्ध जल में भिगो दिया जाए और सुबह उसे मंद आँच पर उबाला जाए। जब उबलकर क्वाथ का जलाँश चौथाई या 25 मि.ली. रह जाए, तो उसे ठंडा होने पर महीन कपड़े से छान लें और उसे ही सुबह-शाम दो बार में रोगी को पिलाएँ। अच्छा हो यदि अनुकूल पड़े तो पीते समय काढ़े में एक चुटकी सोंठ का चूर्ण और काला नमक मिला लिया जाए। इससे पाचन शक्ति को बल मिलता है और सूजन भी मिटती है। कभी-कभी क्वाथ में एरंड तैल (कैस्टर ऑयल-1 ग्राम) मिलाकर भी पिलाना चाहिए, जिससे आमाशय में एकत्र हुआ आम बाहर निकल जाता है।
आमवात-गठिया में जोड़ों में सूजन एवं असह्य दर्द मुख्य रूप से रुग्ण व्यक्ति को व्यथित करते हैं। इससे छुटकारा पाने का सबसे सरल तरीका यह है कि कपड़े में बालू की पोटली बाँधकर या यज्ञ भस्म को आग में या तवे पर बार-बार गरम करके सारे शरीर को कपड़े से ढ़ककर सिकाई की जाए। इससे पसीना निकलता है और शोथ तथा दर्द में राहत मिलती है। तदुपराँत दर्दनाशक तैल की हलकी मालिश करनी चाहिए।
आमवात के लिए दर्दनाशक तैल इस प्रकार बनाया जाता है, 1-मैदा, 2-महामेदास, 3-सौंठ, 4-मंजीष्ठ, 5-कूठ, 6-रास्ना, 7-लालचंदन, 8-जीवक, 9-ऋषभक, 10-काकोली, 11-क्षीरकाकोली, 12-कंटकारी, 13-एरंड जड़, 14-कटसरैया सभी 5-5 ग्राम लेकर कूट-पीसकर बारीक पाउडर बना लें। प्रसारिणी क्वाथ 5 ग्राम एवं तिल तेल एक किलोग्राम लेकर उसमें उक्त सभी चौदह चीजों का पाउडर डालकर तैल सिद्ध कर लें। जब सभी चीजें जल जाएं, केवल तैल शेष रहे, तो उसे ठंडा होने पर छान लें। यह तैल आमवात सहित सभी प्रकार के वात रोगों पर लाभदायक सिद्ध होता है।
आमवात पाचन तंत्र की गड़बड़ी के कारण उत्पन्न होता है, अतः रोगी के खान-पान में परहेज का अवश्य ध्यान रखना चाहिए। दूध, दही, गुड़ माँस, मछली, उड़द, बैंगन आदि एवं बादी करने वाली शीतल वस्तुएं आमवात के रोगी को नहीं खानी चाहिए। रात्रि जागरण, वेगों को रोकना, पुरवैया वायु, चिंता, शोक, आलस्य आदि इस महारोग के लिए अपथ्य हैं। परबल, करेला, बथुआ, कुलथी, लहसुन, सौंठ, मरिच, अजवायन, अदरक, एरंड तैल, कोदों, साँबा, मूँग, पुराना साठी चावल चना की दाल का युप आदि पथ्य हैं। पीने के पानी में 5-5 ग्राम चव्य, चित्रक, पीपर, पीपरामूल एवं सोंठ डालकर उबाल लें। 4 लीटर पानी उबलकर जब आधा रह जाए, तो छानकर ठंडा होने पर पीने को देते रहना चाहिए। आमवात रोगी के लिए यह जल अमृत के समान लाभकारी होता है।
योगासनों के क्षेत्र में ‘सूर्यनमस्कार’ एक अद्भुत अभ्यास है। इससे स्वास्थ्य, शक्ति और क्रियाशीलता में वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त यह आत्मोत्थान में भी सहायक है। इसका संयुक्त परिणाम चेतनात्मक विकास के रूप में सामने आता है। इसमें आसन, प्राणायाम तथा ध्यान की क्रियाएं साथ-साथ चलती हैं, अतएव यह एक पूर्ण अभ्यास है। कम समय, कम श्रम और व्यस्त जीवन वालों के लिए यह एक आदर्श योगासन है। इससे आश्चर्यजनक लाभ हस्तगत किए जा सकते हैं।
सूर्य नमस्कार का एकदम सीधा और सरल अर्थ है,’सूर्य को प्रणाम’। यह नामकरण कदाचित् इसलिए हुआ कि अरुणोदय काल में इसके करने का विधान है। इसकी पहली मुद्रा प्रणाम की मुद्रा है, जिसमें सूर्य की ओर मुख करके खड़ा हुआ जाता है। इसलिए इसे ‘सूर्य नमस्कार’ कहा गया। यह वैदिक काल के ऋषियों की देन है। प्राचीन काल में दैनिक कर्मकाँड के रूप में सूर्य की नित्य आराधना की जाती थी, क्योंकि प्राण-चेतना का यह एक स्थूल माध्यम है। इससे जड़-चेतन को प्रत्यक्ष जगत् में जीवन मिलता है और सूक्ष्म जगत् में ‘सविता’ के रूप में यह प्राण-प्रवाह का प्रखर पुँज है। समस्त संसार के लिए इसे कल्याणकारी माना गया है। अतः इसकी उपासना हमारे धार्मिक कर्मकाँड का अंग है, किंतु जब ‘सूर्य नमस्कार’ के रूप में इसे हम अपनाते हैं, तो यही अभ्यास चेतना का उन्नायक और स्वास्थ्य-संवर्द्धक बन जाता है। यह उन तत्वज्ञों का आविष्कार है, जिन्हें यह पता था कि इससे केवल स्वास्थ्य-रक्षा ही नहीं होती वरन् मानसिक शक्तियों के संतुलन,नियमन और सुनियोजन में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसकी विभिन्न 12 स्थितियों का साधक जब नियमित रूप से अभ्यास करता है, तो उससे उसकी सूक्ष्म ऊर्जा प्रभावित होती है, उसमें एक लयबद्धता आती और साधक की सोच संसार के प्रति सकारात्मक बनती जाती है।
योग निद्रा की भाँति सूर्य नमस्कार भी सजगता को विकसित करने का एक सरल उपाय है। इसे प्रारंभ करने से पहले ही यह अभ्यास करना चाहिए। खड़ी दशा में ही आँखें बंद कर लें, दोनों हाथों को बगल में नीचे लटकाए रखें। अब शरीर को पूरी तरह तनावरहित और शिथिल कर लें। अपनी चेतना को सजगतापूर्वक सिर से शुरू करते हुए पैरों तक घुमाएं। सजगता का यह विकास एक टार्च की तरह है, जिसका प्रकाश व्यक्तित्व के अंधकार को चीरता है। अब चेतना को पाँव के तलुवों पर ले जाएं तथा भूमि और तलुवों के संपर्क बिंदुओं का अनुभव करें। सोचें कि देह के, अंग-अवयवों के संपूर्ण तनाव पैरों के माध्यम से भूमिगत होते जा रहे हैं और शरीर शिथिल हो रहा है। कुछ समय इस अवस्था में रहने के उपराँत मूल अभ्यास शुरू करें। ऐसा करना इसलिए जरूरी होता है कि इससे शरीर की अकड़न शुरू में ही दूर हो जाती है और वह हर प्रकार से अभ्यास के अनुकूल बन जाता है।
सूर्य नमस्कार को नियमित रूप से करने से उससे शरीर के स्थूल-सूक्ष्म हर प्रकार के अंग-अवयव प्रभावित होते हैं। इससे चक्रों को प्रभावित करने के उक्त आसन के अंतर्गत आने वाली विभिन्न शारीरिक मुद्राओं के अनुरूप उन-उन चक्रों पर मन को केंद्रित करना पड़ता है, जिससे उनकी सक्रियता बढ़ने लगती है। क्रियाशीलता के बढ़ने से आध्यात्मिक शक्तियों का जागरण होने लगता है। इस जागरण से साधक का व्यक्तित्व बदलता है। यहाँ यह कहना अनावश्यक होगा कि सूर्य नमस्कार की विभिन्न स्थितियों का उसका अपना प्रभाव इन शक्ति संस्थानों पर नहीं पड़ता। उनसे भी उनमें उद्दीपन उत्पन्न होता है, पर जितनी अधिक उत्तेजना उन्हें आँतरिक सजगता, एकाग्रता तथा मानसिक कल्पना के संयुक्त प्रभाव से मिलती है, उसकी तुलना में वह कम होता है। सूर्य नमस्कार में सम्मिलित आसनों को करने से साधक की प्राणशक्ति में अभिवृद्धि होती है। इस अभिवृद्धि से शरीर के विभिन्न अंगों में उद्दीपन होना आरंभ होता है, जिससे चक्रों पर मानसिक तथा शारीरिक ऊर्जा को एकाग्र करने में सहायता मिलती है। इन आवेशित अंग-उपाँगों के प्रति मानसिक रूप से सजग होने से मन तथा शरीर, इड़ा तथा पिंगला नाड़ियों में सामंजस्य स्थापित होता है, जिससे चक्रों में उद्दीपन उत्पन्न होता है, जिसकी परिणति आत्मजागरण के रूप में सामने आती है। सूर्य नमस्कार की विभिन्न द्वादश स्थितियों का क्रमशः निम्न चक्रों पर असर पड़ता है, (1) प्रणामासन-अनाहत चक्र (2) हस्त उत्तानासन-विशुद्धि चक्र (3) पादहस्तासन-स्वाधिष्ठान चक्र (4) अश्वसंचालनासन-आज्ञा चक्र (5) पर्वतासन-विशुद्धि चक्र (6) अष्टाँग नमस्कार-मणिपुर चक्र (7) भुजंगासन- स्वाधिष्ठान चक्र। शेष पाँच स्थितियों में इन्हीं की पुनरावृत्ति होती है, तदनुसार उन्हीं-उन्हीं चक्रों पर पुनः दबाव पड़ता है।
चक्रों पर एकाग्रता के समय विभिन्न सूर्य मंत्रों के मानसिक उच्चारण को भी अपनाया जा सकता है। उसके स्पंदन भी चक्र जागरण में सहायक होते हैं। अभ्यास में पूर्णता आने के उपराँत ऐसा प्रतीत होगा मानों शब्द स्फुल्लिंग इन्हीं चक्रों से निर्गत हो रहे हैं।
प्रत्येक वर्ष सूर्य बारह विभिन्न स्थितियों से होकर गुजरता है। इन स्थितियों को ज्योतिष में ‘राशि’ कहते हैं। प्रत्येक राशि की अलग-अलग विशेषताएं होती हैं। इनके आधार पर ही उनके नामकरण किए गए हैं। इन 12 नामों से सूर्य नमस्कार के 12 सूर्य मंत्र संबंधित हैं, जो इसकी 12 स्थितियों का अभ्यास करते समय दोहराए जाते हैं। ये निम्न हैं।
(1) ॐ मित्राय नमः (2) ॐ रवये नमः (3) ॐ सूर्याय नमः (4) ॐ भानवे नमः (5) ॐ खगाय नमः (6) ॐ पूष्णे नमः (7) ॐ हिरण्यगर्भाय नमः (8) ॐ मरीचये नमः (9) ॐ आदित्याय नमः (10) ॐ सवित्रे नमः (11) ॐ अर्काय नमः (12) ॐ भास्कराय नमः।
ये सूर्य मंत्र मात्र सूर्य के नाम ही नहीं हैं। इनकी ध्वनि उस मूलभूत शाश्वत शक्ति की वाहक है, जिसका प्रतिनिधित्व स्वयं सूर्य करता है। एकाग्रतापूर्वक इन मंत्रों के उच्चारण से संपूर्ण मानसिक संरचना प्रभावित होती है।
योगाभ्यासों के माध्यम से शरीर की नाड़ियों, ग्रंथियों, उपत्यिकाओं, मातृकाओं को संतुलित-सुव्यवस्थित कर पाना संभव है। पीनियल ग्रंथि का जब क्षय शुरू होता है, तो उससे अनेक प्रकार की भावनात्मक समस्याएं पैदा होने लगती हैं। विशेषकर किशोर मन इन भावनात्मक आघातों को सह पाने में सक्षम नहीं होता, जिससे व्यक्तित्व में उलझाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इससे कई प्रकार के शारीरिक-मानसिक रोग पनपने लगते हैं। इस जटिलता को रोकने में सूर्य नमस्कार समर्थ है। बालकों के लिए यह विशेष महत्व रखता है, कारण कि 8 वर्ष की आयु से ही पीनियल ग्रंथि का क्षय होने लगता है। इससे 12 से 14 वर्ष की आयु में उनका यौवन आरंभ होने लगता है। शारीरिक और भावनात्मक विकास के इस असंतुलन के कारण उनका व्यक्तित्व-गठन सुचारु रूप से नहीं हो पाता, जिससे हर क्षेत्र में उनकी सफलता संदिग्ध बनी रहती है। पीनियल ग्रंथि के इस क्षय को सूर्य नमस्कार द्वारा नियंत्रित किया जा सकना सरल है। इसके अतिरिक्त शाँभवी मुद्रा तथा गायत्री मंत्र के जप द्वारा भी यह कार्य संपन्न होता है।
विशेषज्ञों का कथन है कि सूर्य नमस्कार का अभ्यास यदि 8-10 वर्ष की उम्र से ही बालकों को कराया जाने लगे, तो उसका परिणाम तब एकदम स्पष्ट रूप से सामने आ जाता है, जब ऐसे बच्चों की तुलना उन समवयस्कों से की जाती है, जो यह अभ्यास नहीं करते। अभ्यासी बालक अपने सहपाठियों से हर क्षेत्र में श्रेष्ठ पाए गए हैं।
सूर्य नमस्कार का असर संपूर्ण शरीर तंत्र पर पड़ता है, जिससे निष्क्रिय अंग सक्रिय हो उठते हैं और जहाँ अति सक्रियता होती है, उसकी क्रियाशीलता नियंत्रण में आ जाती है। इसकी प्रथम स्थिति प्रणामासन से अंतर्मुखता, शिथिलीकरण तथा शाँति की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। हस्तउत्तानासन से पीठ तथा गर्दन की पेशियाँ शिथिल होती हैं। इस आसन में गहरी श्वास अंदर लेते समय उदर की मालिश होती है तथा पाचन सुधरता है। मेरुदंड का व्यायाम होता है, मोटापा घटता है एवं थाइराइड ग्रंथि पर प्रभाव पड़ता है। पादहस्तासन से अंतरंग प्रभावित होते हैं। इनमें प्रमुख हैं, यकृत, वृक्क, पित्ताशय, अग्नाशय, एड्रीनल ग्रंथि, गर्भाशय तथा अंडाशय (ओवरी)। इसके कारण उदर संबंधी बीमारियाँ दूर होती हैं और पाचन शक्ति बढ़ती है। महिलाओं में गर्भाशय का अपने स्थान से हट जाना तथा अनियमित मासिक धर्म दूर होता है। मस्तिष्क में रक्तप्रवाह बढ़ता है तथा संपूर्ण अंतःस्रावी तंत्र पर दबाव पड़ता है। अश्वसंचालनासन से पीठ की पेशियाँ शिथिल पड़ती हैं। इस कारण उदर की पेशियों में खिंचाव आता है। प्रमुख खिंचाव श्रोणि प्रदेश (पेल्विक भाग) पर पड़ता है। साइनस में इससे आराम मिलता है। पर्वतासन से भुजाओं तथा पैरों की पेशियाँ मजबूत बनती हैं। मेरुदण्ड के स्नायु सबल होते हैं और पिंडलियों की पेशियों में भी खिंचाव उत्पन्न होता है। अष्टाँग नमस्कार आसन से वक्षस्थल में मजबूती आती है। इसके अतिरिक्त बाँह, कंधे और पाँव की शक्ति बढ़ती है। भुजंगासन से वक्ष एवं उदर दोनों पर दबाव पड़ता है, जिससे दमा, कब्ज, अपच, गुर्दे और यकृत की व्याधियों से मुक्ति मिलती है। मेरुदंड का व्यायाम होता है।
यह सूर्य नमस्कार का कायिक प्रभाव हुआ। इससे शरीर-स्वस्थता ठीक बनी रहती है और विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है, साथ ही आत्मिक विकास भी होता चलता है। यह इसका सबसे बड़ा लाभ है। इस अभ्यास से जिन समस्याओं का निराकरण होता है वह हैं फोड़े-फुँसियाँ, अग्निमंदता, रक्ताल्पता, दुर्बलता, गठिया, दमा, सिर दर्द, स्थूलता, फेफड़े संबंधी दोष, अपच, कब्ज, गुरदे के रोग, मधुमेह, निम्न रक्तचाप, मिर्गी, यकृत संबंधी व्याधि, अंतःस्रावी ग्रंथियों का असंतुलन तथा विभिन्न प्रकार के मनोरोग।
इसके अतिरिक्त यह व्यायाम इड़ा-पिंगला नाड़ियों में भी संतुलन-समीकरण स्थापित करता है। इन्हीं नाड़ियों की सक्रियता-निष्क्रियता के परिणामस्वरूप दो प्रकार के व्यक्तित्व सामने आते हैं, (1) बहिर्मुखी (2) अंतर्मुखी। बहिर्मुखी व्यक्ति पिंगला प्रधान होते हैं, जबकि अंतर्मुखी लोगों में इड़ा नाड़ी की गतिशीलता अधिक होती है। बहिर्मुखी आदमी अपनी आँतरिक अनुभूतियों से शून्य होता है। इसकी पूर्ति वे बाह्य साधनों, इच्छाओं और सुविधाओं से करते रहते हैं। बाहरी सुरक्षा और आनंद हेतु बाह्य साधनों पर निर्भर रहने से अंतः की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती। इससे कुँठा, तनाव बढ़ते हैं, जिससे व्यक्ति और ज्यादा बहिर्मुखी बन जाता है। उसमें अशाँति और चिड़चिड़ेपन के लक्षण उभरने लगते हैं।
इसके विपरीत अंतर्मुखी व्यक्ति दार्शनिक प्रकृति के होते हैं। वे सोचते तो बहुत हैं, किंतु अपने विचारों को क्रियारूप में परिणत नहीं कर पाते। ऐसे लोग अपनी भावनाओं के प्रति अत्यधिक सजग रहते हैं। उन्हें बाह्य घटनाओं और लोगों की प्रतिक्रियाओं के बारे में वास्तविकता से परे सोचने की आदत होती है। वे विपत्तियों का पूर्वानुमान लगाने में कोई कोताही नहीं बरतते। बाह्य जगत् की विभिन्न स्थितियों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण रखना उनके वश की बात नहीं होती।
यह दोनों ही प्रकृति आदर्श नहीं मानी जा सकतीं। एक में व्यक्ति अति उत्साह में आकर कुछ-का- कुछ करने लगता है, जबकि दूसरी स्थिति व्यक्ति को निष्क्रियता की ओर ले जाती है। सूर्य नमस्कार को नियमित रूप से करने से इन दोनों अवस्थाओं के मध्य एक संतुलन स्थापित होता है, इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ नियंत्रित ढंग से सुचारु रूप से कार्य करना आरंभ करती हैं, जिससे व्यक्ति के व्यवहार में स्पष्ट परिवर्तन परिलक्षित होने लगता है।
सूर्य नमस्कार प्रत्येक आयु-वर्ग के लोगों के लिए समान रूप से उपयुक्त हैं, किन्तु अधिक उम्र के लोगों को अधिक तनाव से बचना चाहिए। उच्च रक्तचाप या हृदयाघात से पीड़ित व्यक्तियों को इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। मेरुदंड की समस्या से ग्रसित आदमी को भी इससे परहेज करना ठीक है। इसे करने में एक और बात का ध्यान रखना चाहिए कि इसके अभ्यास से देह पर आवश्यकता से अधिक दबाव या खिंचाव न पड़े।
यों तो सूर्य नमस्कार सूर्योदय के समय करना ठीक रहता है, पर यदि प्रातःकाल किसी कारणवश इसका अभ्यास करना संभव न हो, तो दिन में कभी भी खाली पेट इसे किया जा सकता है। यथासंभव खुली हवा में ढीले कपड़े पहनकर इसे करना चाहिए, जिससे त्वचा आसानी से सूर्य ऊर्जा को ग्रहण कर सके।
सूर्य नमस्कार एक उपयोगी अभ्यास है। इससे शरीर और मन दोनों स्वस्थ-संतुलित बने रहते हैं और व्यक्ति शनैः-शनैः आत्मोत्कर्ष की ओर बढ़ता चलता है। प्रत्येक गायत्री साधक को यह अभ्यास अवश्य करना चाहिए, कारण कि दोनों में ही ‘सविता’ की सूक्ष्म प्राणचेतना साधक के विकास का मूलभूत आधार है।
विशेष सूचना
हमारे समर्पित परिजन जो दिन-रात एक करके परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना ‘अखण्ड ज्योति’ को घर-घर पहुँचाते हैं, उनके लिए एक विशेष योजना बनी है कि उन्हें विशिष्ट परिचयपत्र यहाँ से दिये जाएं। अभी यह योजना उन्हीं के लिए बनी है जो 1, 2 या 5 पत्रिका या उससे अधिक मंगाते हैं। इन भिन्न-भिन्न प्रकार के विशिष्ट परिचयपत्रकों के साथ विशेष सम्मान उन्हें मिलेगा। ऐसे परिजन अपने पासपोर्ट साइज का फोटो तथा पूरा विवरण लिखकर शीघ्रातिशीघ्र भेज दें। नाम, पूरा पता, सदस्य संख्या, जन्मतिथि, अखण्ड ज्योति की संख्या, मिशन की और किन्हीं पत्रिकाओं की संख्या, मिशन से कब जुड़े, संगठन की दृष्टि से सक्रियता आदि।
व्यवस्थापक, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
(पूर्वार्द्ध)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ -
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
देवियों, भाइयों! आप जिस सत्र में शामिल हुए हैं, उसका नाम परिवार सत्र है। आपको ऐसा मालूम पड़ रहा है कि आपको यहाँ किसी छोटे काम के लिए एकत्रित कर लिया है, परंतु ऐसी कोई बात नहीं है। किसी खास मकसद से आपको यहाँ बुलाया गया है। आप इस परिवार के सदस्य हैं। परिवार कोई मजाक की बात नहीं है। अरे साहब! परिवार में हम कैसे रह रहे हैं, यह तो हम स्वयं जानते हैं। परिवार हमारे लिए मुसीबत है।
मित्रों! आमतौर से परिवार माने मुसीबत, परिवार माने झंझट, यही परिवार की परिभाषा है। परिवार माने झंझट, आपत्ति, झगड़ा-आमतौर से लोग इसे ही परिवार कहते हैं। तो क्या हमने इसीलिए आपको बुलाया है ? क्या नमक, तेल हल्दी के मामलों की बात, दैनिक घरेलू कार्यों की बात बतलाने हेतु हमने आपको बुलाया है ? नहीं, मित्रों! इस शिविर का बहुत महत्व है। यह हमारा बहुत प्यारा शिविर है।
पारिवारिकता ही होगा अगले दिनों लक्ष्य
साथियों! परिवार शब्द के साथ बहुत-सी महान् चीजें जुड़ी हुई हैं, इसलिए परिवार शब्द से हमें बहुत प्रेम है। परिवार हमें बहुत प्यारा लगता है। अगले दिनाँक में जब नए युग का निर्माण होने जा रहा है, तो इसके सिद्धाँत क्या होंगे, आदर्श क्या होंगे ? क्रियाकलाप क्या होगा ? यही बतलाने के लिए हमने यह शिविर बुलाया है। इसका मतलब कुटुँब एवं पारिवारिकता है।अगले दिनों संसार का यही लक्ष्य होगा। अगले दिनों इसके विशेष निर्धारण होने हैं। आपने देखा नहीं है कि जिस घर में आपाधापी होती है, वह घर नरक बन जाता है। बच्चे जेवर चुराकर भाग जाते हैं। लड़कियाँ अपने जेवर मायके में रख आती हैं। औरतें काम नहीं करती हैं। आपने देखा नहीं है कि बच्चे किस प्रकार गद्दी पर से दुकान पर से रुपये चोरी करके आ जाते हैं। बहुएं अपने पति के साथ अलग रहना चाहती हैं। इस तरह आपाधापी से परिवार के बरबाद होने से दुनिया बरबाद हो जाती है तथा समाज में तबाही आ जाती है।
आज दुनिया के सामने, जिसे हम नवयुग की समस्या कहते हैं, उसके सामने बहुत-सी समस्याएं हैं, कठिनाइयाँ हैं। आज बहुत सारी दिक्कतें हैं, जिन्हें सुनने के बाद ऐसा लगता है कि इसका कोई समाधान ही नहीं है। मित्रों ! आपको इस पर विचार करना होगा, क्योंकि आज दुनिया बहुत छोटी हो गई है। पहले जमाने में दुनिया बहुत बड़ी थी, बहुत फैली थी। एक आदमी का दूसरे से कम ताल्लुक था। अपना गाँव ही अपनी दुनिया थी। सभी जगहों से कोई मतलब नहीं था। गाँव की महिलाएं घूँघट मारती थीं। पहले दुनिया ससुराल से घर तक सीमित थी, लेकिन आज दुनिया बहुत फैल गई है। आज सिनेमा की दुनिया से बच सकते हैं आप ? बचकर दिखलाइए न। लड़के फैशन वाले पैंट पहने फिरते हैं, सिनेमा के गाने गाते फिरते हैं। उससे बचकर दिखलाइए न। उसे रोकर दिखलाइए न। घर में बगावत हो जाएगी।
मित्रों! आपका लड़का आपसे तो नहीं कहता, परंतु अपने दोस्तों से कहता फिरता है कि हम फिल्म के ऐक्टर बनेंगे। वह अपनी मम्मी का जेवर चुराकर घर से भाग जाता है। हाँ साहब!वह मुँबई चला गया था। क्यों गया था, जब आपने पूछा, तो उसने बताया था कि हम फिल्मों में काम करेंगे। फिल्मी ऐक्टर बनेंगे। लेकिन वहाँ फिल्म वालों ने इसे घुसने भी नहीं दिया, तो भागकर वापस आ गया। इसलिए कहता हूँ कि आप सिनेमा से बच्चों को बचाकर दिखाइए। साहब! हम तो रामायण पढ़ते हैं और हम अपने बच्चों को गुरुदीक्षा दिलाकर लाएंगे। अरे आप गुरुदीक्षा दिलाकर तो दिखाइए तब जानें। जमाने की हवा ने आपकी लड़की को क्या बना दिया ? आप इस बारे में शर्म के मारे कुछ कहना नहीं चाहते हैं।
जमाने की हवा तो देखिए
मित्रों! जमाने की हवा से हम जुड़े हैं, उससे अलग नहीं हो सकते। आप कहते हैं कि हम अलग दुनिया बसा लेंगे। साथियों पहले कभी सौ-दो सौ, पाँच सौ साल पहले था ऐसा जमाना, लेकिन अब ऐसा बनाना तथा जीवन जीना संभव नहीं है। आज दुनिया आपके साथ जुड़ी है तथा आप दुनिया के साथ जुड़े हैं। आज की दुनिया में आपको कुटुँब के आधार पर जीना होगा। कुटुँब का एक ही सिद्धाँत है, मिल-जुलकर रहना तथा मिल-बाँटकर खाना। अरे! हम तो जमा करेंगे। नहीं, आप अपने लिए जमा नहीं कर सकते हैं। आप मिल-जुलकर काम कीजिए तथा मिल-जुलकर खाइए। हम कमाते हैं तो हम जमीन खरीदेंगे, मकान बनाएंगे, अपनी बीबी को जेवर खरीदेंगे, कपड़े बनवाएंगे। आप अभी से इसे कर लीजिए, हम कौन होते हैं आपको रास्ता बताने वाले परंतु मित्रों, इससे आपकी समस्याएं, गुत्थियाँ बढ़ेंगी ही, उलझेंगी ही, समाप्त नहीं होंगी। उनका समाधान नहीं होगा। इसका एक ही समाधान है कि आदमी को कुटुँब के रूप में आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो अगले दिनों रहना होगा। इसके अलावा कोई समाधान नहीं हैं।
साथियों! कुटुँब का एक सिद्धाँत है। इसमें ऐसा नहीं होता कि जिसमें योग्यता, पुरुषार्थ, पराक्रम ज्यादा है और जो जितना अधिक कमाता है, वह उतना ही ज्यादा खाएगा। नहीं भाई साहब! वह ज्यादा नहीं खाएगा। उसे दूसरों को कुटुँब को भी खिलाना होगा। यह कुटुँब का सिद्धाँत है, जिसके आधार पर हमारा कुटुँब-परिवार चलता है तथा उसका विकास होता है। आगे भी यही कुटुँब का आधार होगा। अगले वाली दुनिया का, आने वाले समय का यह एकमात्र सिद्धाँत होगा। अगले दिनों जो नियम, कानून एवं मर्यादा बनेगी, धर्म एवं संस्कृति बनेगी, जो भी आचार संहिता मनुष्य को चलाने-बढ़ाने के लिए बनेगी, उसका नाम होगा, ‘पारिवारिकता’ ‘कुटुँब’।
प्राचीनकाल में ऋषियों ने इसके लिए एक नारा दिया था, ‘वसुधैव कुटुँबकम्‘ अर्थात् सारी दुनिया को एक कुटुँब के रूप में रहना चाहिए। अतः आप मिल-बाँटकर खाइए और हिल-मिलकर रहिए। अगर इस बात को इंसान नहीं समझेगा तो उसकी ऐसी पिटाई होगी कि होश ठिकाने आ जाएंगे। आप अगर इसे अध्यात्मवादी-साम्यवाद कहें तो हमें कोई ऐतराज नहीं होगा। लेकिन हम कहेंगे कि आप कोई ऐसा फार्मूला बनाएं जिसमें मनुष्य चैन से रहे और दूसरों को चैन से रहने दे। स्वयं खाए, प्रगति करे तथा दूसरों को भी खाने दे तथा प्रगति करने दे। आदमी हंसे तथा दूसरों को हंसने दें। वह स्वयं खिले और दूसरों को खिलने दें। आदमी जिए और दूसरों को जीने दे। यही वह सिद्धाँत है, जिसे पारिवारिकता कहते हैं। इन्हें आसानी से ग्रहण कर लें तो ठीक है, वरन् ऐसी जबरदस्त ताकतें आ रही हैं। जो आपको मजबूर करेंगी कि आपको मिल-जुलकर ही रहना पड़ेगा और मिल-जुलकर ही खाना पड़ेगा। इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।
क्यों भाई! आप अमीर बनेंगे ? हाँ साहब! अरे मिल जुलकर खाइए न। नहीं साहब! हम कमाएंगे और स्वयं खाएंगे। चुप, धूर्त कहीं का, ऐसा करेगा तो मार-मार कर दुनिया तुझे ठीक कर देगी। मित्रों! आप कमाइए तो सही परंतु दूसरों के लिए भी खरच कीजिए। नहीं, साहब! हम तो बेटे के लिए खरच करेंगे। चुप बदमाश कहीं का, अरे साहब! हम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, भजन करते हैं, प्राणायाम करते हैं। बेटे, इससे क्या होता है। सिद्धाँत तो समझता नहीं है, भजन करता है, मक्कार कहीं का। यह पूजा-पाठ भगवान को खुश करने के लिए नहीं बनाया गया है।
यह पूजन किस काम का?
मित्रों! एक बार हमने एक भवान् जी से पूछा कि आपका क्या ख्याल है? दुनिया वालों का तो ऐसा ख्याल है कि आप प्रसाद चढ़ाने वालों, सुपारी व नारियल चढ़ाने वालों, आरती उतारने वालों पर खुश हो जाते हैं। यह क्या मामला है। भगवान हम पर बहुत क्रोधित हो गए। गुस्सा हो गए। उन्होंने कहा गुरु जी! आप तो पढ़े-लिखे हैं और पढ़े-लिखे होकर भी इस प्रकार के बेहूदेपन को पसंद करते हैं। क्या हम इतने घटिया और छोटे हो सकते हैं, जो इस छोटे से पूजा पाठ से खुश हों जाएं और आशीर्वाद दें ? भगवान् जी! हम तो नहीं मानते हैं, लेकिन हमारे चेले यही मानते हैं। तो फिर आप ऐसे चेलों की पिटाई कीजिए, जो हमारे ऊपर इस प्रकार का लाँछन लगाते हैं और हमें इस प्रकार का जलील समझते हैं। दोस्तों! आपकी पूजा, आपकी उपासना आपको मुबारक हो, लेकिन अध्यात्मवाद को इससे कोई मतलब नहीं है। इन सब प्रक्रियाओं से एक ही मतलब है कि आदमी का चरित्र, आदमी का व्यवहार, आदमी का व्यक्तित्व ऊँचा उठे, परिष्कृत बने।
साथियों! देवता बहुत व्यस्त रहते हैं, हमसे भी ज्यादा व्यस्त रहते हैं। भगवान् के पास आपकी बेहूदी बातों के लिए समय नहीं है। छोटी-छोटी कंपनियाँ होती हैं, उसे संभालने में आदमी का कचूमर निकल जाता है, फिर भगवान तो इतनी बड़ी सृष्टि की व्यवस्था को देखता है। आपको मालूम नहीं है कि हमारे पास कितना काम है। ब्रह्मवर्चस का काम हमारे पास है, लेखन का काम हमारे पास है, मिशन का काम हमारे पास है। इतना काम हमारे पास है कि हमारे पास बेकार के कामों के लिए फुर्सत नहीं है। इंदिरा गाँधी से मालूम कीजिए न उनका सेक्रेटरी आपको डंडे मारकर भगा देगा। गुरुजी! हम तो आपको माला पहनाएंगे, चरण धोएंगे। मक्कार कहीं का, हमारा समय खराब करता है। भगवान् से ज्यादा व्यस्त समय किसी के भी पास नहीं है। आप बेकार की बातें मत करें। इस संसार में जितनी भी महत्वपूर्ण शक्तियाँ हैं, उनके पास समय नहीं होता है। वे पूरे समय व्यस्त रहते हैं।
मित्रों! पूजा-पाठ का एक ही मतलब है, इसे चाहे एक बार सुनिए, चाहे निन्यानवे बार सुनिए। इसका तथ्य एक ही है कि इंसान के सोचने का ढंग, विचार करने का ढंग इंसान के तरीके से हो जाए यानि उनका व्यक्तित्व ऊपर उठ जाए। जैसे-जैसे आप सही इंसान बनते जाते हैं, वैसे-वैसे आप भगवान के नजदीक पहुँचते जाते हैं। उस समय आप भगवान् के सान्निध्य का लाभ एवं भगवान् की ऋद्धि एवं सिद्धियों को आप प्राप्त कर सकते हैं। स्वर्ग, चमत्कार, मुक्ति सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं। आपसे हम यह कहना चाहते हैं कि यह सारा का सारा अध्यात्म मनुष्य के पूजा-पाठ से संबंध नहीं रखता है, बल्कि मनुष्य के चिंतन एवं चरित्र से संबंध रखता है। आपको यह मालूम होना चाहिए कि जैसे-जैसे आपका चिंतन, चरित्र ऊँचा उठता चला जाएगा, आपके अंदर सिद्धियाँ आती चली जाएंगी। यह अध्यात्म सुभाष चंद्र बोस के अंदर आया था, नेहरू, पटेल के अंदर आया था। यह उन लोगों के अंदर आया था, जिनका चिंतन और चरित्र महान् बना।
साथियों! आप तो देवताओं की हजामत बनाने वाले हज्जाम हैं, चिड़ियों को मारने वाले चिड़ीमार हैं। इससे काम नहीं चलेगा। आप देवताओं को पकड़ना चाहते हैं। ऐसा अध्यात्म कभी हुआ है क्या ? मछलीमार जैसा अध्यात्म, चिड़ीमार जैसा अध्यात्म कभी नहीं हुआ, जैसा कि आज है। अरे साहब! कोई भी देवी-देवता हमारे चंगुल में नहीं आया और हमारी मनोकामना पूर्ण नहीं हुई। इस तरह काम कैसे चलेगा ? चुप रह मक्कार कहीं का, बड़ा आया भक्त बनने। ख्वाब मत देखिए, वास्तविकता के पास आइए और अपने सोचने एवं काम करने का ढंग बेहतरीन बनाइए। आप बेहूदेपन की पूजा बंद कीजिए। आपने तो पूजा के नाम पर उलटे जंजाल फैला दिया है। इससे आपको कोई लाभ होने वाला नहीं है।
नवयुग-सतयुग
मित्रो! मैं यह कहना चाहता था कि अगली दुनिया जिसमें सब लोग प्रसन्नता का जीवनयापन करेंगे, खुशहाली, शाँति, सिद्धि, चमत्कार का जीवन जिएंगे, यह युग सतयुग होगा, धर्मयुग होगा। इसे चाहे जो भी आप नाम दें, इसमें हमें कई नाराजगी नहीं होगी, लेकिन नवयुग का आधार एक होगा, कानून एक होगा। नवयुग की संस्कृति एक होगी। तब क्या होगा ? पारिवारिकता का वातावरण होगा। वह क्या है ? आप जो दायरा अभी इस्तेमाल करते हैं, वह बड़े दायरे में करना होगा। आपको आठ सौ पचास रुपया मिलता है, इससे आप क्या करते हैं? अरे साहब! खाने में, बीबी-बच्चों में खरच हो जाता है। छोटा भाई स्कूल जाता है, उसमें खरच हो जाता है। कुछ शादी में कर्ज लिया था, उसको दे देते हैं। क्यों अपने लिए ही तो खरच नहीं करते हैं? नहीं साहब! इतना पैसा हम अकेले में कैसे खरच करेंगे? हमें अपनी बहन को भेजना पड़ता है।
साथियों! जो सिद्धाँत आज आप अपने कुटुँब में लागू कर रहे हैं, उसे सारे समाज में लागू करना होगा। आपके पास धन है, आप संपन्न व्यक्ति हैं, इसका श्रेय आपको मिलेगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप स्वयं अकेले खाएंगे, मौज-मस्ती करेंगे। अगर आप ऐसा करते हैं, तो लोग आपका गला दबाकर उल्टी करा देंगे। अध्यात्म का युग आएगा, तो इसी प्रकार का आएगा। अनावश्यक चीजें आपको नहीं मिलेंगी। आपके पेट में जितनी जगह है, उतना ही खाइए, शेष बाँटिए, नहीं तो लोग आपका गला दबाएंगे तथा उल्टी करा देंगे । तो गुरुजी ! क्या ऐसा जमाना आ रहा है? हाँ बेटे, बिल्कुल आ रहा है।
मित्रों! आपके चाहने से आपके लिए दुनिया तो नहीं बदलेगी। आप अपनी चाह, अपनी मरजी को अपनी जेब में रखिए। दुनिया की समस्या का हल जिस तरह से होना है वह उसी प्रकार से होगा। ऋषियों ने जो नारा लगाया था, आज हम पुनः उस नारे को लगाते हैं, ‘वसुधैव कुटुँबकम्‘ का। इसके आधार पर ही दुनिया में मोहब्बत, चलन, रिश्ते, व्यवहार एक होंगे। इसका विकास पारिवारिकता की भावना से ही होगा।
हमारा अपना गायत्री परिवार
‘परिवार’ शब्द से हमें बहुत प्यार है। हमने अगर विश्वास किया है, तो पारिवारिकता पर किया है। हमने जो संगठन बनाया है, तो उसका आधार कौटुँबिकता है। कुटुँब पर मैं विश्वास करता हूँ। हर ईमानदार आदमी अपना सारा का सारा समय, संपदा अपने कुटुँब तथा परिवार के विकास के लिए खरच करता है। हमने भी गायत्री परिवार के नाम से जो परिवार बनाया है, उसके लिए खरच करते हैं। जब मिशन छोटा था और हम तपोभूमि में रहते थे, उस समय अखण्ड ज्योति निकलती, तो हमने ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ शब्द का इस्तेमाल किया है। पुराने लेटर पैड पड़े होंगे, उनमें यही छपा है। जब गायत्री का प्रचार हमने शुरू किया तो ‘गायत्री परिवार’ बना दिया। उसके बाद ‘युग निर्माण परिवार’ बना दिया। अब प्रज्ञा अभियान शुरू किया तो ‘प्रज्ञा परिवार’ बना दिया।
मित्रों! यह परिवार हमारे प्राणों का अंश है। आप देखते नहीं हैं ? इसको हमने सींचा है, बढ़ाया है। हमारा परिवार किस तरह से जुड़ा है, आप देखते नहीं ? माताजी आपकी माताजी हैं। वे अगर आपकी माताजी हैं, तो हम भी आपके पिताजी हैं। आपने इस परिवार में यह नहीं देखा होगा कि कोई इस परिवार में छोटा है तथा कोई बड़ा है। हमारे यहाँ परिवार के अलावा अन्य कोई व्यवहार, सिद्धाँत है नहीं। इसके अलावा हम किसी चीज पर विश्वास नहीं करते हैं।
साथियों! परिवार शब्द बड़ा महान् है। इसके साथ मानवीय समस्याएं, विश्व की समस्याएं जुड़ी हुई हैं। आप यह कहते हैं कि घर-परिवार से निश्चित हो जाएंगे, तो उसे छोड़ देंगे। उस समय मैं खून का घूँट पीकर रह जाता हूँ तथा आपको कुछ कहता नहीं हूँ। जब आप यह कहते हैं कि गुरुजी! घर का जंजाल छूटा और हम आपके शरण में आए, तो हमें हंसी आ जाती है और मैं कहता हूँ कि जब यहाँ आएगा, तो बड़ा परिवार तेरे ऊपर हावी हो जाएगा। अभी तेरे परिवार में कितने आदमी हैं। गुरुजी! माँ, पत्नी और दो बच्चे हैं। अच्छा! तो पाँच का परिवार है। तू क्या समझता है कि यहाँ बाबा जी लोग रहते हैं, बेकार के लोग रहते हैं, जो तू निश्चिंत होकर आएगा। नहीं साहब मैं तो सब तरह से ‘फ्री’ होकर आऊँगा और यहाँ आकर माला जपूँगा। गुरुजी आपकी सेवा करूंगा। चल हट मक्कार कहीं का, ऐसा डंडा मारूंगा कि अकल ठीक हो जाएगी। परिवार को छोड़कर आएगा। अरे!हमारे पास भगोड़ों के लिए कोई जगह नहीं है।
मित्रो! जोधपुर के महाराज युद्ध में हार गए। सारे सैनिक मारे गए। राजा साहब किसी तरह जान बचाकर आ गए और उन्होंने गेट पर से, जो बंद था, आवाज लगाई। रानी ने कहा, "राजा साहब! आप अकेले कैसे आ गए ? आपको सैनिकों के साथ आना चाहिए था। बिगुल बजाकर आना चाहिए था।" गेट खोलने जा रहे अपने सिपाही से रानी ने कहा कि ठहर जा। वे महल के ऊपर चढ़ गई और बोली, "आप राजा नहीं हो सकते। सेना कहाँ गई?" उन्होंने कहा कि सेना मारी गई। रानी ने कहा, "जोधपुर का महाराज ऐसा बेहूदा नहीं हो सकता। आप हमारे पति नहीं हो सकते। आप वहीं जाइए तथा युद्ध कीजिए। आप यदि मारे भी जाएंगे, तो आपके सिर को लेकर मैं प्यार करूंगी। भगोड़े को मैं प्यार नहीं करूंगी। इसी तरह यदि आप भी भगोड़े बनकर आ जाएंगे, घर छोड़कर आ जाएंगे, तो आपके लिए शाँतिकुँज का यह दरवाजा बंद मिलेगा। हम आपको घुसने नहीं देंगे। आप कहते हैं कि हम जिम्मेदारी से निवृत्त हो जाएंगे तब आएंगे। क्या निवृत्त हो जाएंगे? क्या समाज का उत्तरदायित्व नहीं है आपके ऊपर? देश का उत्तरदायित्व नहीं है ? नहीं साहब! अभी तो बेटी की शादी करनी है, उससे निवृत्त हो जाऊँगा, तब आऊँगा। तब ऐसी चपत लगेगी कि होश ठिकाने आ जाएंगे। पारिवारिकता बहुत विशाल चीज है।
समझें अध्यात्म के मर्म को
आध्यात्मिकता के बारे में भी क्या आप कुछ सोचते हैं, जानते हैं, इसके सिद्धाँतों को, आदर्शों को भी समझिए। नहीं साहब ! हम जप करेंगे, प्राणायाम करेंगे तो हमें सिद्धि मिलेगी। बड़े आए सिद्धि वाले ? देवताओं का साक्षात्कार करेंगे ? बेटे ! देवता इतने फालतू नहीं हैं कि आपने पुकारा और वे आ गए। आप शंकर भगवान् को बुलाना चाहते हैं न ? वे आपसे कोसों दूर हैं। उन्हें आप ऐसे नहीं बुला सकते हैं। आप स्वामी जी को बुलाते हैं, तो उनको फर्स्ट क्लास का टिकट दिया है या नहीं ? आप हमें बुलाएंगे तो दान-दक्षिणा देंगे कि नहीं ? आप पेट्रोल का खरच तो देंगे ही। हाँ साहब!हम देंगे। अच्छा तो यह पक्की बात है। आप शंकर भगवान् को बुलाना चाहते हैं, तो जरा उन्हें पेट्रोल का खरच दीजिए। आप लक्ष्मी-नारायण हो बुलाना चाहते हैं, तो उन्हें पैट्रोल का खरच दीजिए। हम उन्हें फोन कर देंगे और वे आ जाएंगे। अरे साहब! लक्ष्मीनारायण जी दस हजार किलोमीटर दूर हैं। चुप रह, सारे दिन बक-बक करता रहता है कि देवता का दर्शन करा दीजिए। अज्ञानी कहीं का। पहले आध्यात्मिकता का सिद्धाँत समझिए।
आदमी अपने ऊपर तो हावी हो सकता है, किंतु देवताओं के ऊपर नहीं हो सकता और न ही उन पर हावी होने की जरूरत है। देवता के सामने नाक रगड़ने की भी आवश्यकता नहीं है। आप अपने आप अपनी नाक रगड़िए, अपने आपको सही कीजिए। आप अपने आपको ठीक करना शुरू कीजिए, फिर देखिए आपको सिद्धि मिलती है या नहीं। आप अपने को बनाने का प्रयास नहीं करते हैं। आप तो देवता की हजामत बनाने के लिए उस्तरा, कैंची लिए फिरते हैं। इसे बंद कीजिए।
मित्रों! अगले दिनों अध्यात्म का नया स्वरूप सामने होगा। तब आपकी जो भी भावना अपने परिवार की बच्ची के प्रति है, वही भावना व व्यवहार समाज की बच्ची के साथ रखना होगा। पारिवारिकता में वे सारी चीजें शामिल हैं। नारी के प्रति अभी जो दृष्टिकोण आपका है, उसे बदलना होगा। बच्चियों के प्रति आपका दृष्टिकोण कैसा हो, माँ-बाप के प्रति तथा संसार में जो इस उम्र के हैं, उनके प्रति आपका दृष्टिकोण क्या हो ? इसका सही रूप से मूल्याँकन करना होगा।
घर को तपोवन, परिवार को प्रयोगशाला बनाइए
अगर आपको अध्यात्म सीखना हो, तो जंगलों में तप करने, तपोवन बनाने मत जाइए। अपने घर को ही तपोवन बनाइए, उसे ठीक कीजिए। हमने ढेर सारी पुस्तकें इस संदर्भ में लिखी हैं। उन्हें पढ़िए एवं अपने घर, को स्वर्ग बनाइए। परिवार एक प्रयोगशाला है। आप अपने माता-पिता के प्रति अहसान चुकाइए। आप तो केवल अपने बीवी-बच्चों का ही ख्याल रखते हैं। बुढ़िया को दमे की शिकायत है, उसका इलाज कराइए तथा एहसान चुकाइए और भी जिनका एहसान आपके ऊपर है, उसे चुकाइए। अगर आप अपने माता-पिता का एहसान नहीं चुकाएँगे, तो कल आपके बच्चे कैसे आपकी कदर करेंगे ? मित्रो! इससे अच्छी प्रयोगशाला कहीं भी नहीं है। आपके अंदर जो श्रेष्ठ गण हैं, उसे आप कहाँ से सीखेंगे और परखेंगे? कौन-सा योगाभ्यास करेंगे? परिवार जैसी लैबोरेटरी संसार में कहीं भी नहीं। क्या आप अपनी धर्म-पत्नी से नहीं सीखते हैं कि उसने कितना बड़ा आदर्श उपस्थित किया है, जो आप नहीं कर सकते हैं। उसके आत्मसमर्पण के सिद्धाँत को आप स्वीकार नहीं करेंगे क्या? वह अपने माँ-बाप, भाई-बहन को छोड़कर आपके घर आई। उसने अपनी जवानी, अपनी सेहत, अपना पुरुषार्थ, जेवर, पैसा, सब कुछ आपको अर्पित कर दिया था। जब आपके ऊपर कर्ज हो गया था, तो उसने अपना जेवर आपके हाथ में रख दिया था।
मित्रों! आपको सिखाने वाला एक मास्टर माँ के रूप में क्या नहीं मिला, जिसने अपने कलेजे का खून सफेद दूध में परिवर्तित करके पिलाया। स्वयं गीले में सोती रही और आपका इस प्रकार निर्माण कर दिया। अभी आपने अध्यात्म को समझा नहीं। आप गुफा में जाएँगे ? भाड़ में जाएँगे। आश्रम में जाएँगे? हम कहते हैं कि इससे बड़ा आश्रम कहाँ है, जिसमें आपकी माँ रहती है, बाप रहता है, बीवी, बच्चे, भाई, बहन रहते हैं। मित्रों! हम संयम सिखाने आपको कहाँ ले जाएँगे। आप यह संयम अपनी बहन से, बेटी से सीखिए न। वे आपको सिखाती हैं कि आपकी आँखों में शैतानी नहीं आनी चाहिए। इसका व्यावहारिक शिक्षण-अध्यात्म देने के लिए आपकी बहन, बेटी एक उत्तम अध्यापिका हो सकती हैं। आपको संयम सिखाने के लिए इससे बड़ी अध्यापिका हम कहाँ से लाएँगे। आपने इस अध्यात्म को सीखने-समझने का कभी प्रयास नहीं किया, फिर कौन-सा महात्मा, संत, योगी लाऊँ आपके लिए। आपकी माता, बाप, पत्नी, बच्चे, बच्चियाँ, बहन, भाई अलग-अलग तरह की नसीहतें देते हैं, जो आपको व्यावहारिक अध्यात्म बतलाते हैं। इससे बड़ा प्रशिक्षण आपके पास हम कहाँ से लाएँ? आपके लिए यह लैबोरेटरी आपको अध्यात्म के पूरे-के-पूरे प्रशिक्षण देने में सक्षम है। आपको इसे समझना चाहिए ।
गुरुजी! आप परिवार से अलग हो सकते हैं ? बेटे! हम परिवार से कभी भी अलग नहीं हुए हैं। वह परिवार जिसे आप वंश कहते हैं, उससे हमारा उतना मतलब नहीं है, जितना कि यह ‘गायत्री परिवार’ ‘प्रज्ञा परिवार’ युग निर्माण परिवार, आपको हम परिवार बढ़ाने के लिए कहते हैं, वंश बढ़ाने के लिए नहीं कहते। आपको इसे ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहिए। आपके छोटे भाई हैं न, भतीजे हैं न उनको योग्य बना दीजिए। यह क्यों नहीं करते हैं आप? आपकी संतान नहीं करते हैं? आपका वंश डूब जाए, ऐसे वंश से क्या फायदा ? ऐसा स्वार्थी आदमी जो अपनी बीबी के पेट से निकले बच्चे को ही अपना बच्चा समझता है तथा बाकी बच्चों को बकरी के बच्चे समझता है, उसे मैं बेहूदा, मक्कार, नालायक कहता हूँ।
आज जनसंख्या बढ़ती जा रही है। लोग मक्खी, मच्छरों, सुअरों की तरह का वंश बढ़ाते जा रहे हैं। उनके लिए रोटी, कपड़ा, मकान की समस्या बढ़ रही है। ऐसे लोगों को इस बात की भी जानकारी नहीं है कि बच्चे खेलेंगे कहाँ? आप तो केवल वंश के पीछे पड़ गए हैं। आप यह नहीं समझना चाहते कि आपके बच्चे, भाई के बच्चे भी आपके बच्चे हैं। उनका लालन-पालन करिए। आप अकेले तो रह नहीं सकते हैं। कहीं-न-कहीं तो रहेंगे ही, चाहे वह जेलखाना ही क्यों न हो, घर बसाकर रहेंगे। आपको यहाँ आना हो तो अपने उत्तरदायित्व को पूरा करके आएँ। हमारे पारिवारिकता के सिद्धाँत अलग हैं। हम मिल-जुलकर रहते हैं, एक साथ रहते हैं, एक साथ खाना खाते हैं। यह है हमारा पारिवारिकता का सिद्धाँत। यह पारिवारिकता ही हमारे परिवार की समस्या, कुटुँब की समस्या, समाज की समस्या और राष्ट्र की समस्या हल करती है।
सही अर्थों में कुटुँब
साथियो! आपका कुटुँब कहाँ है? कितना बड़ा है। गुरुजी! हमारा कुटुँब बहुत बड़ा है। परिवार में अनेक सदस्य हैं। बेटे! उसे घर नहीं, जेलखाना कहिए। उसे भेड़ों का बाड़ा कहिए। एक ही बिल में से कितने चूहे निकलते हैं? आपने भेड़ों का झुँड नहीं देखा, एक ही जगह से कितनी भेड़ें निकलती हैं। आपने जेलखाना नहीं देखा है? आपने भटियारों का सराय नहीं देखा है? आपने कुटुँब का मजा कभी नहीं चखा है? आपने तो भटियारों का मजा चखा है। उनके पास मुसाफिर आते हैं। उन्हें वे रोटी बनाकर खिला देते हैं। खाट बिछाकर सोने की व्यवस्था कर देते हैं। आपका कुटुंब भी इसी प्रकार का भटियारखाना है। आप सराय में रहते हैं, भटियारखाने में रहते हैं, जहाँ न त्याग है, न सेवा है, केवल एक ही चीज है जालसाजी। आज बीबी-मरद का, मरद बीबी का, भाई-भाई का नहीं है, केवल शतरंज की विशात बिछी हुई है सर्वत्र। कौन किसको मात देगा, कहा नहीं जा सकता कि ऊँट घोड़े को मात देगा या घोड़ा हाथी को मात देगा अथवा प्यादा बादशाह को मात देगा। सभी जगह शतरंज की चाल बिछी हुई है। क्या ऐसा ही कुटुँब होता है? ऐसे कुटुँब पर लानत है, जो किसी को देखना ही नहीं चाहता, जहाँ केवल अपना स्वार्थ ही सबको दिखाई देता है।
कुटुंब कैसे होते हैं? यही बताने के लिए हमने आपको बुलाया है। हम चाहते हैं कि सारा समाज ही अगर बने तो कुटुँब के आधार पर बने, पारिवारिकता के आधार पर बने। कोई भी कानून बने, नीति बने, मर्यादा बने, चाहे वह सामाजिक हो अथवा राजनीतिक, वह इसी आधार पर हो। अगर आध्यात्मिक, नैतिक, सामाजिक कानून बने, तो वह भी इसी आधार पर बने। प्राचीनकाल में समाज इसी आधार पर बनाया जाता था। इसी आधार पर हमने यह पारिवारिक सत्र बुलाया है। यह हमें प्राणों से भी प्यारा है। आपको व्यक्तिगत स्वार्थ प्यारा है न। चलिए आप इसी के द्वारा अपना शारीरिक स्वास्थ्य मजबूत बनाना चाहते हैं न? आप मन में शाँति चाहते हैं न? आपके साथ जो रहते हैं, उनसे आत्मीयता, प्रेम चाहते हैं न? आप जो पैसा कमाते हैं, उसमें किफायत करके बचत करना चाहते हैं न? तो हम आपसे एक बात कहना चाहते हैं कि कुटुँब को नए सिरे से देखिए। उन पर नए सिरे से गौर करना, विचार करना शुरू कीजिए। उस पर ध्यान रखना शुरू कीजिए।
मित्रो! आपके ख्याल में कुटुँब का मतलब आपके खानदान वालों के साथ है। उन्हें ज्यादा-से-ज्यादा खुशहाल कैसे रख सकते हैं? चमकदार कैसे बना सकते हैं? अभी आप जब 12 रुपये महीने पाते हैं, तो अपनी लड़की को खुशहाल बनाने के लिए ऐसे कपड़ा बनाना चाहते हैं, उसकी ऐसी कटिंग करना चाहते हैं कि जब वह स्कूल या कॉलेज जाए, तो वहाँ सारी-की लड़कियाँ उसे देखें तथा लड़के भी उसे देखें। लोग कहें कि बाबू जी की लड़की आई है। अभी आप तनिक-सी खुशहाली के लिए लड़के एवं लड़की को जो छूट दे रहे हैं, उसकी सजावट के लिए, प्रसन्नता के लिए जो आप कर रहे हैं, वह एक दिन आपके लिए मुसीबत लेकर आएगी, आप तबाह हो जाएँगे। ऐसी खुशहाली आपको कहीं का नहीं छोड़ेगी। आपकी लड़की मरेगी तथा उसे गुंडे तंग करेंगे। वह बार-बार जो शीशे में आँखें देखती है, काजल लगाती है, देख लेना जब वह ससुराल जाएगी तथा शादी होगी तो उसके ऊपर क्या आफत आएगी।
फैशनपरस्ती को बढ़ावा देकर आप लड़की को मार डालेंगे क्या? उसका ड्रेस बनाकर, फैशन बढ़ाकर क्या करेंगे? उसे हिप्पी बनाएँगे, सिनेमा की ऐक्ट्रेस बनाएँगे, क्या करेंगे उसका? बेदिमाग, बेहूदापन के आगे आप अपने कुटुंब को भाड़ में झोंक रहे हैं। आप कहते हैं कि समाज में मेरी लड़की मेरे लड़कों की इज्जत होती है। आप इस भटियारखाने को समाज कहते हैं। भेड़ों को आप समाज कहते हैं। आप समझते नहीं हैं कि आज का कुटुंब कितना नालायक हो गया है। जब तक आप कमाएँगे, व्यापार करेंगे, आपके कुटुंब के लोग आपकी बात को सहते रहेंगे, परंतु आप जैसे ही अवकाश प्राप्त करेंगे, रिटायर होंगे, आपकी घर में, कुटुँब में कोई इज्जत नहीं होगी। कोई आपको एक गिलास पानी देने वाला नहीं होगा, क्योंकि आपने उसे संस्कारवान् बनाया नहीं है। सादगी का जीवन जीना सिखाया नहीं है, प्रेम, त्याग बतलाया नहीं है। आपने मूक दर्शक बने रहकर अपना तथा परिवार का कचूमर निकाल दिया है।
मित्रों! ऐसी स्थिति में आप जब कमजोर हो जाएंगे, आज जब अवकाश प्राप्त कर लेंगे, तब आपकी दुकान भी नहीं है, क्योंकि वह तो बेटे की है। आपने उसे सौंप दिया है। तब आप देख लेना कि आपके कुसंस्कारी लड़के, बहू किस तरह आपके साथ व्यवहार करते हैं। उनकी दुर्भावना भरी आदतें, व्यवहार आपको शीघ्र ही मौत की नींद सुला देंगे। आपने तो उन्हें कुछ सिखाया ही नहीं, संस्कार देने से आप मुँह मोड़ते रहे। संस्कार के नाम पर आपने केवल अपने बच्चे, लड़की और पत्नी की बातें मानी। उन पर दबाव डाला नहीं, त्याग सिखाया नहीं। अब क्यों रोते हैं? परेशान क्यों होते हैं? मित्रों! यही हालत आपकी होगी जब आप कमजोर हो जाएँगे याद रखिए। आपने जिस कुटुंब के लिए ईमानदारी, बेईमानी करके उसे इतना बड़ा किया है, जिसके लिए आपने उचित तथा अनुचित ढंग से विकास करने का प्रयास किया है, देखना आपके कमजोर होने पर वे क्या करते हैं? आपने कल को देखा नहीं? आपने समय को देखा नहीं? केवल आप अपने बीबी, बच्चे को देखते रहे और उन्होंने अब क्या हाल कर दिया आपका? कुसंस्कारी जो बनाया है आपने उन्हें? देखना वे अपने आप दुःखी होंगे, आपको दुखी करेंगे तथा अपने परिवार वालों को, बीबी-बच्चों को दुख करेंगे।
(उत्तरार्द्ध अगले अंक में)
12 जनवरी 1863 ई. की सुबह भारत देश के युवाओं के लिए प्रेरक सुबह थी। इसी दिन स्वामी विवेकानन्द के रूप में इस महादेश के युवाओं के लिए ईश्वरीय सन्देश का अवतरण हुआ था। श्रीरामकृष्ण परमहंस ने इस दैवी अवतरण की अनुभूति अपनी समाधिस्थ चेतना में की। बाद में उन्होंने एक दिन बातचीत के प्रसंग में अपने शिष्यों से कहा था-”एक दिन देखा-मन समाधि के मार्ग से ज्योतिर्मय पथ में ऊपर उठता जा रहा था। चन्द्र, सूर्य, नक्षत्रयुक्त स्थूल जगत् का सहज ही में अतिक्रमण कर वह पहले सूक्ष्म भाव जगत् में प्रविष्ट हुआ। उस राज्य के ऊँचे स्तरों में वह जितना ही ऊँचे उठने लगा, उतना ही अनेक देवी-देवता पथ के दोनों ओर दिखाई पड़ने लगे। क्रमशः उस राज्य की अन्तिम सीमा पर वह आ पहुँचा। वहाँ देखा, एक ज्योतिर्मय परदे के द्वारा खण्ड एवं अखण्ड राज्यों का विभाग किया गया है। उस परदे को लाँघकर वह क्रमशः अखण्ड राज्य में प्रविष्ट हुआ।”
वहाँ पर मूर्त कुछ भी नहीं था। यहाँ तक कि दिव्य देहधारी देवी-देवता भी वहाँ प्रवेश करने का साहस न कर सकने के कारण बहुत दूर नीचे अपना-अपना अधिकार फैलाकर अवस्थित हैं, किन्तु दूसरे ही क्षण दिखाई पड़ा कि दिव्य ज्योतिर्घनतनु सात प्राचीन ऋषि वहाँ समाधिस्थ होकर बैठे हैं। मेरी अन्तर्चेतना ने समझ लिया कि ज्ञान और पुण्य में तथा त्याग और प्रेम में ये लोग; मनुष्य का क्या कहना, देवी-देवताओं तक से भी परे पहुँचे हुए हैं। विस्मित होकर इनके विषय में मैं सोचने लगा। इसी समय सामने देखता हूँ, अखण्ड भेदरहित ज्योतिर्मण्डल का एक अंश घनीभूत होकर एक दिव्य शिशु के रूप में परिणत हो गया।
वह देवशिशु उनमें से एक के पास जाकर अपने कोमल हाथों से आलिंगन करके अपनी अमृतमयी वाणी से उन्हें समाधि से जगाने की चेष्टा करने लगा। शिशु के कोमल स्पर्श से ऋषि समाधि से जाग्रत हुए और अधखुले नेत्रों से उस अपूर्व बालक को देखने लगे। उनके मुख पर प्रसन्नोज्ज्वल भाव देखकर ज्ञात हुआ मानो वह बालक उनका बहुत दिनों का परिचित हृदय का धन है। वह अद्भुत देवशिशु अति आनंदित हो उनसे कहने लगा-’मैं जा रहा हूँ, तुम्हें भी आना होगा।’ उसके अनुरोध पर ऋषि के कुछ न कहने पर भी उनके प्रेमपूर्ण नेत्रों से अन्तर की सम्मति प्रकट हो रही थी। इसके अनन्तर ऋषि बालक को प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखते हुए पुनः समाधिस्थ हो गए। उस समय आश्चर्यचकित होकर मैंने देखा कि उन्हीं के शरीर-मन का एक अंश उज्ज्वल ज्योति के रूप में परिणित होकर विलोम मार्ग से धराधाम में अवतीर्ण हो रहा है। नरेन्द्र को देखते ही मैं जान गया था कि यही वह है। श्रीरामकृष्ण देव के यही नरेन बाद में विश्ववंद्य ‘स्वामी विवेकानन्द’ के नाम से जगत् विख्यात हुए।
यदि हम अपनी चिन्तन शक्ति तथा दृष्टि को थोड़ी सूक्ष्मता के साथ गहन करें तो हमें सहज ही स्पष्ट हो जाएगा कि स्वामी जी की चेतना ने सदा ही भारत देश के युवाओं के हृदय में बोध के तार झंकृत किए हैं। श्रीअरविन्द, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू ये सभी अपनी युवावस्था में स्वामी जी की वैचारिक-आध्यात्मिक चेतना से प्रेरित-प्रभावित रहे हैं। स्थिति आज भी वही है। प्रत्येक आदर्शनिष्ठ युवा के प्रेरणा स्रोत और कोई नहीं, स्वामी विवेकानन्द हैं। उनका सुन्दर मुख हमें आकर्षित भी करता है और प्रेरित भी। उनका सिंह के समान साहस व निर्भयता, उनकी आँखों में ज्ञान की गहराई के साथ प्राणी मात्र के लिए करुणा का सागर लहराता हुआ दिखाई देता है।
स्वामी जी की वाणी और हृदय में अशिक्षित, पददलित व गरीब मनुष्यों के प्रति अपार प्रेम भी है और पीड़ा भी। उनके स्वरों में सिंह का गर्जन भी है और मधुर संगीत का प्रवाह भी। उनके हृदय से उत्पन्न हुए स्वरों को जो आज विविध पुस्तकों के पृष्ठों में अंकित हैं, यदि हम पढ़ें तो हमें ऐसा अनुभव होता है मानों स्वामी विवेकानन्द अपने मन की बात, अपने हृदय की पीड़ा हमारे सामने रख रहे हैं। उनकी वाणी से ऐसा लगता है कि उनके हृदय में भारत देश की युवा पीढ़ी के प्रति असीम प्रेम है और दृढ़विश्वास भी। सम्भवतः इसीलिए उनका प्रत्येक शब्द युवा पीढ़ी के लिए ध्वनित हुआ है। युवा पीढ़ी के लिए उनका स्नेह और विश्वास ही नवयुवकों के लिए प्रेरक शक्ति का कार्य करता है। नवयुवकों पर उनकी बातों का प्रभाव भी विद्युत् तरंगों के समान पड़ता है। स्वामीजी की यह उन्हीं के जीवन की भाँति बहुआयामी है।
आज जब कोई युवक अपने लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु परिश्रम करता है और यदि वह असफल हो जाता है, तो उसका मन टूट जाता है और उसे असफलता के कारण जीवन व्यर्थ, बोझ के समान लगने लगता है। हताशा का अंधकार उसे घेर लेता है और व्यक्ति या तो आत्महत्या का निर्णय ले लेता है अथवा फिर समझौतावादी बन जाता है।
ऐसे में युवकों के लिए स्वामी विवेकानन्द आशावादी तथा संघर्ष के स्वरों में एक मधुर गीत के समान कुछ पंक्तियाँ अपने एक भाषण में इस प्रकार कहते हैं-’असफलता तो जीवन का सौंदर्य है। यदि तुम हजार बार भी असफल हो तो एक बार फिर सफल होने का प्रयत्न करो।’ युवकों के प्रति अपनी इस वाणी से घोर निराश के अंधकार में भी आशा की किरण के साथ वह उन्हें जीवन संग्राम में डटकर संघर्ष करने की ओर प्रेरित करते हैं और यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो उनका ही जीवन सौंदर्यमय है, जिनके जीवन में निरन्तर संघर्ष है।
मानव जीवन का संग्राम एक ऐसा युद्ध है, जो हथियार से नहीं जीता जा सकता। वह तो मनुष्य के भीतर छुपी शक्ति को प्रकट करके ही जीता जा सकता है। इसीलिए तो स्वामी जी सिंह गर्जन करते हुए कहते हैं कि ‘यह ध्रुव सत्य है कि शक्ति ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। शक्ति ही अनन्त सुख है, चिरन्तन और शाश्वत जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। दुर्बल व्यक्ति के लिए न तो इस जगत् में और न ही किसी दूसरे लोक में कोई स्थान है। दुर्बलता ही हमें सभी प्रकार की गुलामी की ओर ले जाती है। दुर्बलता ही शारीरिक व मानसिक रूप से निरन्तर तनाव का कारण है। यह दुर्बलता ही मानव की देह ही नहीं चेतना की भी मृत्यु है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि दुर्बलों एवं कायरों की आवश्यकता नहीं है। मुझे चाहिए ऐसे नवयुवक जिनके स्नायु लोहे के बने हो और माँस पेशियाँ फौलाद की बनी हो। तथा जिनकी वृत्ति लोभ और स्वार्थ की सीमाओं के बाहर हो।’
वह अपनी दिव्य वाणी से युवाओं को चेताते हैं कि ध्यान रहे जब मनुष्य के भीतर शक्ति का संचार होता है, तो अपनी सभी असफलताओं को सफलता में परिवर्तित कर लेता है। उसका शक्ति के अभाव में मृत हुआ जीवन पुनः जीवित हो जीवन के संघर्ष में उतर पड़ता है। आत्म शक्ति से भरा व्यक्ति असफलता को धूल के समान झटक कर फेंक देता है। और सिंह गर्जन कर निःस्वार्थ बन अपने जीवन को विस्तारित करता है।
जीवन के इस विस्तार प्रक्रिया में हृदय के संवेदनों की भी जरूरत पड़ती है। संवेदनहीन व्यक्ति को मनुष्य नहीं कहा जा सकता। इसलिए स्वामी जी नवयुवकों में संवेदना का भाव प्रवाह प्रवाहित करने के लिए इस प्रकार कहते हैं कि ‘बच्चो! तुम्हारे हृदय में सबके लिए दर्द हो, गरीब, मूर्ख, पददलित मनुष्यों के दुःख को तुम अनुभव करो। संवेदना से तुम्हारे हृदय का स्पन्दन बढ़ जाए, मस्तिष्क चकराने लगे, तुम्हें ऐसा प्रतीत हो कि तुम पागल तो नहीं हो रहे हो, फिर ईश्वर के चरणों में अपना हृदय खोल दो, तभी शक्ति, सहायता और अदम्य उत्साह तुम्हें मिल जाएगा। आज मैं तुम्हें भी अपने जीवन का मूलमंत्र बताता हूँ वह यह है कि प्रयत्न करते रहो, जब तुम्हें अपने चारों ओर अंधकार ही अंधकार दिखता हो तब भी मैं कहता हूँ कि प्रयत्न करते रहो। किसी भी परिस्थिति में तुम हारो मत, बस प्रयत्न करते रहो। तुम्हें तुम्हारा लक्ष्य अवश्य ही मिलेगा। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं।’
12 जनवरी 1863 ई. को जन्मी दिव्य चेतना जो देह धारण की थी, वह आज भले ही न हो, पर उनकी चेतनता आज भी उतनी प्रखर एवं तेजस्वी है। यदि हम चाहे तो आज भी हम अपने हृदय में उसे पवित्रता, प्रखरता एवं तेजस्विता के रूप में खोज सकते हैं। यह सुनिश्चित तथ्य है कि स्वामी जी के विचारों को अपनाकर आज भी उन्हें पाया जा सकता है। वह अपने विचारों के रूप में उपस्थित रहकर आज भी और अभी भी भारत देश के युवाओं को प्रेरित, परिवर्तित एवं रूपांतरित करने के लिए व्याकुल हैं।
(गीता के चतुर्थ अध्याय की युगानुकूल व्याख्या-ग्यारहवीं कड़ी)
विगत अंक में दिव्यकर्मा साधकों की चर्चा को विशेष रूप से इसी अध्याय के चौबीसवें श्लोक की विस्तृत व्याख्या के साथ प्रस्तुत किया गया था। कर्मों को यज्ञमय कैसे बनाया जाए, इसकी व्याख्या, इस श्लोक में लो श्रीमद्भगवद्गीता का एक सुप्रसिद्ध श्लोक है तथा प्रत्येक भारतीय घर में प्रतिदिन भोजन के पूर्व प्रभुस्मरणा के रूप में उच्चारित किया जाता है, ब्रह्मकर्म के माध्यम से की गई है। फिर से उसी श्लोक को उद्धृत कर पाठकों को याद दिला देते हैं-
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गंतव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥
“ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्मरूपी कर्म द्वारा आहुति देने वाली क्रिया भी ब्रह्म ही है, क्योंकि उसमें अर्पण अर्थात् खुवा आदि भी ब्रह्म हैं और हवन किए जाने वाले द्रव्य भी ब्रह्म ही हैं । इस तरह कर्म में ब्रह्मदर्शन करने से ब्रह्म की ही प्राप्ति होती है।”
मूल बात है कर्म में ब्रह्म का दर्शन करने से ब्रह्म की ही प्राप्ति। कर्मयोग की सिद्धि ‘द्वैत’ का भाव मिटाने पर ही हो पाती है। तत्त्वदृष्टि ऐसी विकसित की जानी चाहिए कि सब कुछ ब्रह्मकर्म ही है। रामकृष्ण लीला प्रसंग के माध्यम से स्वामी शारदानंद जी के, विज्ञानानंद जी के प्रसंग भी इसी संदर्भ में उद्धत किए गए थे। तीन प्रकार की समाधियों के साथ ब्रह्मकर्म समाधि की भी चर्चा विस्तार से की गई थी। हर क्षण जो हमारे कर्म का हो भक्तिमय हो, परमात्मामय हो, यज्ञीय भाव से हो। वस्तुतः उिच्ष्कमर्र कसे बंधनमुक्ति ब्रह्म से युक्त होकर ही मिल सकती है। परमपूज्य गुरुदेव की ‘अखण्ड ज्योति’ के दो संदर्भों के माध्यम से इसी भाव की पुष्टि की गई थी । अब आगे की चर्चा इस अंक में।
यज्ञाग्नि ब्रह्माग्नि
भगवान् श्रीकृष्ण यज्ञ की अग्नि को भौतिक अग्नि नहीं मानते, अपितु यह ब्रह्माग्नि है, ब्रह्म की ओर जाने वाली ऊर्जा है। यज्ञ पुरोहित के रूप में अंतः में विराजमान वह दिव्यशक्ति है, जिसमें आहुति दी जाती है। जिस प्रकार वेदों की भाषा रूपकों की भाषा भी उसी तरह की है। भगवान् के शब्दों में अग्नि आत्मसंयम रूप भी हो सकती है अथवा आत्मार्पणरूपी यज्ञ की अग्निशिखा भी । यज्ञ का यह विस्तृत विवरण ही यज्ञ की एक ऐसी विशाल और व्यापक व्याख्या तक हमें ले जाता है, जिसमें स्पष्ट रूप से यह घोषणा की गई है कि यज्ञ की क्रिया, यज्ञ का भोक्ता, यज्ञ का ध्येय, यज्ञ का उद्देश्य सब कुछ वह ब्रह्म ही है। (चौबीसवें श्लोक का भावार्थ)। इस श्लोक के माध्यम से हमें जो ज्ञान मिलता है उसी से युक्त होने पर मुक्त पुरुष यज्ञ कर्म कर पाता है। सोऽहं, सर्व खल्विदं ब्रह्म, सच्चिदानंदोऽहम्, ब्रह्म एवं पुरुषः जैसे वेदाँत के महावाक्यों द्वारा इसी ज्ञान की घोषणा ऋषिगण करते रहे हैं। यह ज्ञान समग्र एकत्व का ज्ञान है। जिस विश्वशक्ति में निज के कर्म की आहुति दी जाती है, वह स्वयं भगवान् हैं, आहुति की उत्सर्ग की हुई शक्ति भी भगवान् का ही कोई रूप है, होता भी वास्तव में मनुष्य के अंदर के स्वयं भगवान् ही हैं। क्रिया, कर्म, यज्ञ सभी गतिशील भगवत् का ही कोई रूप है, होता भी वास्तव में मनुष्य के अंदर के स्वयं भगवान् सत्ता ही हैं। जिस साधक को, लोकसेवी को यह ज्ञान होता है उसके लिए कर्म कभी बंधन का कारण नहीं बन सकते। उसका कोई भी कर्म अपना व्यक्तिगत अहं युक्त नहीं हुआ करता।
परमसत्ता से संचालित इस जगत् में कर्म करने का लक्ष्य जीव का यही होना चाहिए, भगवान् के साथ एक होकर, भगवान् की स्थिति और चेतना के ज्ञान को प्राप्त करना, अपना उन पर अधिकार स्थापित करना। जो इस तत्त्वज्ञान को जान लेता है, इसी चैतन्य भाव में सदैव विराजमान होता है, वह मुक्त हो जाता है, पर भगवान् कहते हैं कि संभव है कि सभी योगी इस ज्ञान तक नहीं पहुँच पाएँ। इसीलिए वे अगले (25वें) श्लोक में कहते हैं,
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्याग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्नति॥
“अन्य योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और दूसरे अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूपी अग्नि में अभेद दर्शन रूप यज्ञ के द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं।”
बारह भिन्न प्रकार के यज्ञ
यहाँ जो आत्मरूप यज्ञ की बात कही गई है, उससे गीताकार का आशय है- “परमात्मा में ज्ञान द्वारा एकीभाव से स्थित होकर ब्रह्मरूप अग्नि में यजन करना।” इस श्लोक में भगवान् यह कह रहे हैं कि इंद्रादि देवताओं को उद्देश्य विशेष के साथ अनुष्ठित होकर दैवयज्ञ किए जाते हैं। ब्रह्माग्नि में जीवात्मा की आहुति देने को ज्ञानयज्ञ करते हैं। ब्रह्मरूपी अग्नि में जीवात्मा की आहुति देकर जीवात्मा और परमात्मा की एकत्व भावना से होम संपादित करना श्रेष्ठतम यजन प्रक्रिया है। यज्ञ शब्द को गीताकार ने परंपरागत रूढ़िवादी अर्थों से मुक्ति करके विस्तृत-विराट् अर्थों में प्रयुक्त किया है। इसी तथ्य को हम छब्बीसवें से इकतीसवें श्लोक तक देखते हैं। भगवान् यहाँ बारह विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन करते हैं व उनका मर्म समझते हैं।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुहृति। शब्दादीनीन्वषयानन्य इन्द्रिग्निषु जुह्यति॥
अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इंद्रियों को संयमरूपी अग्नि में हवन किया करते और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इंद्रियरूपी अग्नि में हवन करते हैं।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसयंमयोगाग्नौ जुह्यति ज्ञानदीपिते॥
“अन्य योगीजन इंद्रियों की संपूर्ण क्रियाओं और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म-संयम रूप अग्नि में हवन किया करते हैं। अर्थात् सच्चिदाँनदघन परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का भी चिंतन न करना ही सब क्रियाओं का हवन करना है।”
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥
“कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करने वाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही अहिंसा आदि तीक्ष्ण व्रतों से युक्त स्वाध्यायरूपी ज्ञान यज्ञ करने वाले हैं।”
आपने जुह्यति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणयामपरायणः॥
अपरे नियताहाराः प्राणन्प्राणेयषु जुह्यति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥
दूसरे कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राण वायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायामपरायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों का मर्म समझने वाले हैं।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्यज्ञस्य कुतोऽयः कुरुसत्तम॥
“हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है ?”
अब तनिक उपर्युक्त छह श्लोक पर दृष्टि डालें। इनमें 26वें से 30वें श्लोक तक यज्ञ के बारह स्वरूपों का वर्णन है, तो गीताकार ने अंतिम 31वें श्लोक में यज्ञ का माहात्म्य बता दिया है। इसके बाद भी वह माहात्म्य की चर्चा करते हुए ज्ञानमय की महिमा एवं ज्ञान को क्यों व किस प्रकार एक दिव्यकर्मी के रूप में धारण किया जाए, इसको इस अध्याय के अंत तक समझाते हुए अंततः अर्जुन की काफी कुछ भ्राँतियाँ निर्मूल करने में समर्थ हो जाते हैं।
साधक अपने जीवन को यज्ञमय बना लें, इसके लिए श्रीकृष्ण बारह विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन करते हैं। इन सभी का संबंध व्यक्ति के आँतरिक क्रियाओं तथा बहिरंग संबंधों से है। इससे मनुष्य मात्र का सार जीवन यज्ञमय बन जाता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए बारह प्रकार के यज्ञ इस प्रकार है। एक सूची से हमें सब समझ में आ जाएगा।
(1) देवताओं का पूजन-यज्ञानुष्ठान-देवयज्ञ (2) ब्रह्म रूपी अग्नि में जीवात्मा की आहुति देकर एकत्व भावना से होम (3) इंद्रियों का संयमाग्नि में हवन (4) इंद्रियाग्नि में विषयों का हवन (5) समस्त इंद्रियकर्मों-प्राणकर्मों का ज्ञानदीप्त आत्मसंयमयोगरूपी अग्नि में हवन (6) द्रव्य यज्ञ (7) तपोयज्ञ (8) योगयज्ञ (9) स्वाध्याय यज्ञ (10) अपान में प्राणवायु का यजन (11) प्राण का अपान वायु में यजन (12) प्राणों का प्राणों में यजन।
उद्देश्य : अनंत से तादात्म्य
उपर्युक्त सभी का उद्देश्य एक ही है-साधक की शुद्धि। परमलक्ष्य की प्राप्ति हेतु तैयारी । इन यज्ञों का स्वरूप सामान्य पाठकों को समझने में थोड़ी कठिनाई हो सकती है पर थोड़ा सरलीकरण करें, तो यज्ञों का गूढ़ अर्थ भलीभाँति समझ में आ जाएगा। भगवान् यहाँ यज्ञों का मर्म बताते हुए कहते हैं कि इनके प्रकार कुछ भी हों, हमें तीन लक्ष्य मानते हुए यज्ञ करना चाहिए। पहला ऊर्ध्वगामिता-हमारे विचार ईश्वरोन्मुख हों, दूसरे कषाय-कल्मषों का परिशोधन, अशुद्धियों का निवारण एवं तीसरा अनंत के प्रति तादात्म्य भाव का विकास। हमारे विचार-चिंतन सदैव विधेयात्मक, उत्कृष्टतावादी होने चाहिए। लोकहितार्थाय जीवन जीने के लिए जो महत्वपूर्ण आवश्यकता है, अंतः की पवित्रता, उसे अर्जित करना एवं अनंत के प्रति इतना नजदीकपन विकसित कर लेना कि दोनों में कोई अंतर न रहे। एक पाश्चात्य लेखक ने ‘इनट्यूनिंग विथ इन्फीनीरी’ पुस्तक में लिखा है कि अनंत के साथ एकाकार होने का हिंदुओं का जो श्रेष्ठतम तरीका है यज्ञ, उसके समकक्ष किसी भी धर्म-संप्रदाय में कोई भी विधि-विधान देखने में नहीं आता। विद्वान् लेखक जो स्वयं क्रिश्चियन धर्म को जीवन में उतारता था, नित्य यज्ञ करता था एवं सभी को इनका महत्त्व समझाता था। यज्ञ जब "इदं न मम्" भाव से किए जाते हैं। तो हमारे कर्म हमारे न होकर अनंत के, प्रभु के हो जाते हैं एवं अकर्म बन जाते हैं। यज्ञ का अर्थ मात्र ज्योति प्रज्वलित कर द्रव्यों आदि का हवन नहीं है, अपितु यज्ञ एक विराट् अर्थ में जीवनयज्ञ है। जो भी मेरे कर्म हों, मेरे क्षुद्र अहं के लिए नहीं, अनंत से तादात्म्य स्थापित करने के लिए हों।
भगवान् बारह प्रकार के यज्ञों की चर्चा करके मानव मात्र की विविध प्रकृति के लिए तरह-तरह की लक्ष्य सत्ता तक पहुँचने की विधियाँ भी बता देते हैं। वे कहते हैं कि कुछ योगी देवताओं की प्रीति के लिए यज्ञ करते हैं। देवयज्ञ अर्थात् देवशक्तियों रूपी ट्राँसफार्मर के माध्यम से परमात्मारूपी पावर हाउस तक पहुँचना। देवशक्तियों को तृप्त करके परमात्मचेतना से संबंध स्थापित करना। दैवयज्ञ करने वाले भगवान् की परिकल्पना उनके विविध रूपों और शक्तियों में करते हैं। वे आगे कहते हैं कि कुछ आत्मनियंत्रण और आत्मसंयमरूपी आँतरिक यज्ञ करते हैं, जिससे एकत्वभाव प्राप्त हो, उच्चतर आत्मज्ञान की प्राप्ति हो। (1,2) कुछ योगी इंद्रियों के विषयों को ग्रहण तो करते हैं, पर उसे इंद्रिय व्यापार से मन को क्षुब्ध नहीं होने देते, मन पर उनका कोई असर नहीं पड़ने देते, इंद्रियों को ही विशुद्ध यज्ञाग्नि बना लेते हैं (3,4,5)। यह एक साधना है, जिनमें इंद्रियों को इतना स्तब्ध कर दिया जाता है कि अंतरात्मा अपने विशुद्ध शाँत रूप में मन से बाहर निकलकर स्वतः प्रकट हो जाती है।
सिद्धि का साधक योगी अपनी आहुति द्रव्यमय भी दे सकता है। द्रव्ययज्ञ अर्थात् चेरीटी दान के निमित्त पारमार्थिक भाव से किए गए कार्य। धर्मशाला बना देना, गौशाला खड़ी करना, नेत्रदान यज्ञ, पीड़ा निवारण के सभी कार्य, अविद्या को मिटाने के लिए, पतन को मिटाने के लिए किए गए परमार्थ भाव से संपन्न कार्य द्रव्ययज्ञ में आँत हैं। कोई इस शब्द से भ्रमित न हों कि फलाना द्रव्य डालना, उसी से आहुति करना द्रव्ययज्ञ कहलाता है। (6) यह यज्ञ भगवान् के अनुसार तपोयज्ञ भी हो सकता है अर्थात् आत्मसंयम का वह तप जो किसी महत्तर उद्देश्य के लिए किया जाए। संयम साधकर चेतना को अपने व्यक्तित्व के माध्यम से झरने देना तपोयज्ञ कहलाता है। (7)। इसके अतिरिक्त यह योगयज्ञ भी हो सकता है, योग व तप में अंतर भगवान् ने छठे अध्याय के अंतिम श्लोक में "तपस्विभ्याऽधिको योगी..... नामक श्लोक में सूक्ष्मतम ढंग से समझाया है। इसका अर्थ है- योगाग्नि में कर्म संस्कारी का दहन। श्रेष्ठ योगी साधक न केवल अपने कर्मों को बल्कि स्वयं भी योगाग्नि में भरमकर ब्रह्मलोक की प्राप्ति करते हैं। शबरी ने भगवान् राम से मिलन एवं ज्ञान की प्राप्ति के बाद अपने आपको योगाग्नि से युक्त कर परमचेतना से तादात्म्य कर लिया था। सती का योगाग्नि में भस्म होना तो विख्यात है ही। शरीर से बड़ी बात है जीवित रहते अपनी कर्म-वासनाओं, संस्कारों को योगी बनकर भस्मीभूत कर देना। योग का पहला काम है- व्यक्ति को अंतर्मुखी कर देना। इंद्रियों को मन की ओर मुड़ना। संयम की अग्नि में हवन करना। संयम दमन का नाम नहीं है। संयम का अर्थ है- पूरे होशोहवास में किए गए कर्म। पूरे होश में रहकर मन को चंचलता की ओर से अंदर की ओर मोड़ना। (8) भगवान् आगे स्वाध्याय की-स्व के प्रशिक्षण व अध्ययन की प्रक्रिया को भी यज्ञ बताते हैं (9) तथा अंत में कहते हैं कि यह राजयोगी एवं हठयोगी गणों द्वारा किए गए प्राणायाम जैसे योग भी हो सकते हैं। (10, 11, 12)
समझें यज्ञ का मर्म-परम रहस्य
अब उपर्युक्त यज्ञों के विस्तार को समझकर योगेश्वर की मूल शिक्षा को समझा जाए। भगवान् कहते हैं कि विषयों का हवन इंद्रियों में कीजिए, इंद्रियों का मन में तथा मन का चित्त में। चित्त का हवन अहं में कीजिए तथा अहं का हवन आत्मा में कीजिए। शुद्ध निरंजन, शुद्ध बुद्धि आत्मा में इस प्रकार हवन होते ही अशुद्धियाँ जलने लगती हैं, ऊर्ध्वगमन होने लगता है तथा अनंत से तादात्म्य की परिस्थितियाँ बन जाती हैं। भगवान् कहते हैं (तीसवें श्लोक में) कि इस प्रकार यज्ञ का मर्म समझ लेने वाले सभी साधक यज्ञों द्वारा पाप का नाश कर देने वाले और यज्ञों के मर्म को जानने वाले होते हैं (यज्ञक्षपितकल्मषाः) हम सभी यज्ञ करते तो हैं, पर यज्ञ को मानते नहीं हैं। मानते हैं तो समझते नहीं। बहिरंग की क्रिया को ही सब कुछ मानकर चलते हैं तो हाथ कुछ नहीं लगता। यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान समझे बिना, उनके ज्ञानमय वाले मर्म को समझे बिना किया गया यजन तो मात्र अग्निहोत्र है, जबकि यज्ञ हर श्वास में, जीवन की हर क्रिया में, हर विचार में संपादित किया जाने वाला एक दिव्य कर्म है।
भगवान् इसके पूर्व यज्ञ से ही सृष्टि के उत्पन्न होने की बात तीसरे अध्याय में (3/1 तथा 11 से 15 तक) विस्तार से कर चुके हैं। शास्त्र कहता है, "यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म" यज्ञ श्रेष्ठतम किए जाने वाले कार्य ही हैं (शतपथ ब्राह्मण)। परमपूज्य गुरुदेव ने ‘यज्ञ’ की सही अर्थों में पुनर्प्रतिष्ठा की। यज्ञ मात्र कर्मकाँड तक कुछ प्रतिष्ठित समृद्धिसंपन्न व्यक्तियों तक सीमित होकर रह गए थे। उन्होंने जन-जन के लिए प्रत्येक की क्षमता-योग्यतानुसार सुलभ बना दिया। दान, देवपूजन, संगतिकरण की (यज्ञ धातु के तीन अर्थ) उन्होंने युगानुकूल व्याख्या की एवं जन-जन की यज्ञीय वृत्ति को जगा दिया। यज्ञों की परंपरा को पुनर्जीवित किया एवं पूरे युग को यज्ञमय कर सतयुग की वापसी की प्रक्रिया को गति दी। पुरुष सूक्त कहता है कि इस सर्वहुत यज्ञ से ही चारों वेद जन्मे, उन्हीं का विस्तार ज्ञान में, वैदिक संपदा के सब तक पहुँचने के रूप में हुआ। परमपूज्य गुरुदेव का जीवन यज्ञमय रहा। वे इसमें जीवन भर एक समिधा बनकर जले एवं तिल-तिल कर अपने कण-कण की आहुति देकर एक दिव्यकर्मी को कैसा होना चाहिए, उसका शिक्षण दे गए। हम उनके जीवन से यही शिक्षण लेकर स्वयं के जीवन को भी यज्ञमय बना सकें, यही प्रेरणा हमें मिलनी चाहिए। शाँतिकुँज के ‘युगसंगीत प्रकोष्ठ’ द्वारा एक बड़ा सुँदर गीत गाया जाता है- "हे प्रभु! जीवन हमारा यज्ञमय कर दीजिए" यदि इस गीत के मर्म को जीवन में उतारा जा सके तो सभी का जीवन सही अर्थों में दिव्य बन सकता है।
यज्ञीय वृत्ति अर्थात् निम्नगामी प्रकृति की क्रियाओं को अपने अधीन करके उस दिव्य आनंद का रसास्वादन किया जाए, जो यज्ञ से, आत्मबलिदान से, श्रेष्ठ उद्देश्यों पर निछावर होने से प्राप्त होता है। यही भावार्थ यज्ञावशिष्ट के सेवन के माध्यम से प्रभु ने इकतीसवें श्लोक में समझाया है, इसकी व्याख्या अगले अंक में। (क्रमशः)
प्रसिद्ध कवि इकबाल को अरबी, फारसी का विद्वान बनाने का श्रेय उनके गुरु मौलवी मीर हसन को था। इकबाल में शायरी के प्रति रुचि जाग्रत करने वाले भी यही मौलवी साहब थे। अतः अपने गुरु के प्रति इकबाल जीवन भर श्रद्धा व्यक्त करते रहे।
एक बार अंग्रेजी सरकार ने प्रसन्न होकर इकबाल को ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया। इकबाल ने वह उपाधि लेने से इनकार करते हुए कहा, "जब तक मेरे गुरु का सम्मान नहीं किया जाता, तब तक मैं किसी भी उपाधि को ग्रहण करने का अधिकारी नहीं हूँ, क्योंकि आज की स्थिति तक पहुँचाने वाले तो मेरे गुरु ही हैं।"
इकबाल की शर्त मंजूर कर ली गई। पहले उनके उस्ताद मीर हसन को ‘शम्स उल उलेमा’ का खिताब दिया गया और बाद में इकबाल ने उपाधि ग्रहण की।
आज जब शिष्यों द्वारा गुरुओं का घेराव किया जा रहा हो और उनकी बात को उपहास के रूप में माना जा रहा हो, उस समय यह घटना प्रकाश की एक किरण के समान दोनों को ही अपने संबंध सुधारने के लिए प्रेरणा प्रदान करती है।
किसी भी व्यक्ति के मन में धर्म-धारणा की स्थापना करनी हो तो उसका विश्वस्त बनना पड़ता है। उसके मन में पल रहे संदेहों, जिज्ञासाओं का समाधान भी देना होता है। यदि आप नहीं देंगे तो भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धाँतों की स्थापना गहराई से नहीं कर पाएँगे। गायत्री और यज्ञ दो ऐसी महत्त्वपूर्ण विधाएँ हैं, जो हमारी गुरुसत्ता ने जन-जन के मन में स्थापित कर दीं। इसमें निश्चित ही इस साहित्य ने बड़ी भूमिका निभाई, जो ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के रूप में प्रकाशित हो रहा था तथा गायत्री साहित्य के छोटे-छोटे ट्रैक्ट्स के रूप में उपलब्ध था। फिर भी मन तो शंकालु होता है। ऐसी कई बातों का समाधान तो मात्र पत्रों से हो पाता है या व्यक्तिगत चर्चा से। परमपूज्य गुरुदेव के पत्रों की भाषा पर जब हम दृष्टि डालते हैं तो लगता है कि किसी आध्यात्मिक मनश्चिकित्सक की तरह उन्होंने भूमिका निभाई। एक पत्र यहाँ प्रस्तुत है। यह श्री मदनमोहन सारस्वत जी को जोधपुर शहर में 21/12/1955 को लिखकर भेजा गया था।
“आप पति-पत्नी श्रद्धापूर्वक गायत्री उपासना में संलग्न हैं, यह देखकर हार्दिक प्रसन्नता होती है। अगहन सुदी 11 या पूर्णिमा को आप थोड़ा ब्रह्मभोज कर दें। आजकल प्राप्त हो, इसलिए पुस्तक वितरण का ब्रह्मभोज ही श्रेष्ठ है। यों दो-चार ब्राह्मणों को भोजन करा देने में भी हानि कुछ नहीं। हवन, तिल, जौ, चावल, घी, शक्कर, मेवा इन चीजों को मिलाकर कर लें। अच्छी हवन सामग्री बाजार में मिलती नहीं, इससे यही चीजें ठीक है।”
पत्र सामान्य है। यह लिखा गया है गायत्री महाविज्ञान, यज्ञविधान के लेखक के पूर्व तथा 1948 के ऐतिहासिक सहस्र कुँडी महायज्ञ के पूर्व। वह महायज्ञ स्वतः में एक शिक्षण था एवं उसके बाद वनौषधि प्रधान हवन सामग्री सबको सुलभ होती चली गई। सबसे महत्त्वपूर्ण बात है ब्रह्मभोज के संबंध में एक क्राँतिकारी चिंतन, जिसमें आज से प्रायः 46 वर्ष पूर्व वे लिखते हैं कि ब्राह्मणों को भोजन कराने की अपेक्षा उत्तम होगा कि वे श्रेष्ठ विचारों का प्रचार-प्रसार करने वाला ज्ञानयज्ञ कर लें। यही क्राँतिकारी चिंतन-चेतना ढेरों रूढ़िवादिताओं से भरी मान्यताओं को ध्वस्त करती चली गई।
एक दूसरा पत्र यज्ञ के कौतुकी प्रकारों से संबंधित है, जिसमें वे बड़ा स्पष्ट समाधान देते हैं। यह पत्र 21/2/1957 को श्री बैजनाथ प्रसाद शौनकिया जी को ( टीकमगढ़ म.प्र. ) लिखा गया था। वे लिखते हैं-
‘धनुषयज्ञ’ क्या होता है ? यह समझ में नहीं आया। यह हमने सुना भी नहीं है। शास्त्रों में भी यह शब्द कहीं देखते को नहीं मिला। राजा जनक के यहाँ धनुष टूटा जरूर था, पर नाम उसका भी धनुषयज्ञ नहीं था। ऐसे ऊटपटाँग मनमाने आयोजन चलाने की अपेक्षा यदि इन स्वामी जी को आए गायत्री यज्ञ के लिए तैयार कर सकें तो जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा सफल हो सकता है। आप इस दिशा में प्रयत्न अवश्य करें। सफल हो गए तो एक बहुत बड़ी बात होगी।
हमारी धर्म-संस्कृति में सभी को छूट है। मनोकामना प्रधान, दैवयज्ञ प्रधान ( जिनका जिक्र इस अंक की युगगीता में किया गया है ) कई आयोजन इस देश में होते रहते हैं, पर हमारी गुरुसत्ता तर्क की कसौटी पर बैजनाथ जी को समझाने व नेतृत्व लेकर मूढ़ मान्यताओं को मिटाने के लिए प्रेरित करती है कि ऐसे बेसिर-पैर के नाम पर यज्ञ कर जनता की कमाई पर गुलछर्रे उड़ाने वाले स्वामी जी का पर्दाफाश होना चाहिए । यह उस समय को देखते हुए एक क्राँतिधर्मी चिंतन था। जो गुरु द्वारा शिष्य को दिया गया। यों यज्ञ सदैव हितकारी होते हैं, किए जाने चाहिए, पर यह तो न ज्ञान-विज्ञान पर आधारित है, न किसी प्रकार की तर्क की कसौटी पर । ऐसे में यज्ञ के नाम पर फैलाने वाला पंडावाद तोड़े कौन ? परमपूज्य ने यही कार्य जीवनभर कर यज्ञ की सही अर्थों में पुनः प्रतिष्ठा की ।
कई व्यक्ति आज मिशन का इतना विराट् स्वरूप देखते हैं। 27 आश्वमेधिक, एक वाजपेय यज्ञ स्तर का पुरुषार्थ करने वाला, देव संस्कृति दिग्विजय करने वाला यह मिशन अभी-अभी तिरूपति का कार्यक्रम संपन्न करके चुक है। ऐसी स्थिति में लगता है कि गुरुसत्ता अपने जीवनकाल में जहाँ भी जाती होगी, वहाँ अपार भीड़ उमड़ती होगी, बड़े आयोजन होते होंगे। बड़े ही सरल मन वाले आत्मीयता के अमृत जन-जन को पिलाने वाले आचार्य श्री ने इस आधार पर संगठन नहीं खड़ा किया। वे 22/12/69 को मथुरा से विदाई लेने के लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व इलाहाबाद हम जाने से पूर्व एक बार जरूर आएँगे। इस वर्ष का तो सारा समय घिर गया। अगले वर्ष ही अपना संभव होगा। दृष्टि में छोटे-बड़े कार्यक्रमों का कोई महत्त्व नहीं। अब तो केवल अपने बच्चों से मिलने और भरपूर प्यार कर लेने की कामना शेष रह गई है। सो अगले वर्ष जरूर आएँगे।”
पत्र की भाषा स्वतः अपने निर्मल भावों से बताती है कि पूज्यवर के लिए कार्यक्रम नहीं, अपने अभिन्न आत्मीय शिष्यों से मिलना ज्यादा महत्त्वपूर्ण था। इसी आधार पर तो यह संगठन खड़ा है। अब चलते-चलते एक छोटा-सा पत्र और।
हमारे स्वरूप, 18/9/54
पत्र मिला। समाचार हमें आपके पत्र के बिना भी विदित होता रहता है, फिर भी आप पत्र तो देते ही रहें। प्रयत्न जारी है।
श्रीराम शर्मा आचार्य
पत्र पढ़ें वे मनोभावों को देख कि पत्र लिखे बिना भी, पाए बिना भी परमपूज्य गुरुदेव अपने लाखों शिष्यों के बारे में जान लेते थे। पत्र तो निमित्त होते थे, पर इनसे सामीप्य का बोध होता था व लगता था व लगता था बिना मथुरा गए गुरुजी से मिल लिए हों। ऐसी सबके मनों को पढ़ने वाली गुरुसत्ता को उनके आध्यात्मिक जन्मदिवस (76वाँ) की पूर्व वेला में शतशत नमन-शतशत नमन।
क्वमाधवराव पेशवा अपने जन्मदिन पर दान कर रहे थे। अन्न, वस्त्र, स्वर्ण सभी कुछ था, परन्तु ब्राह्मण कुमार ने कह दिया- इन नाशवान वस्तुओं का दान नहीं चाहिए मुझे। दान देना हो तो स्थायी वस्तु का दान करें। स्थायी क्या है?
विद्या।
पेशवा ने इस कुमार को काशी पढ़ने भेजा । यही कुमार आगे चलकर प्रसिद्ध न्यायाधीश रामशास्त्री हुआ।
परमपूज्य गुरुदेव : एक असमाप्त जीवन गाथा (1)
इस अंक से हम एक धारावाहिक जीवन कथा यात्रा ‘श्रीरामलीलामृतम्‘ नाम से आरंभ कर रहे हैं। इसमें सद्यः प्रकाशित गुरुसत्ता की जीवनी के अंश दिए जाते रहेंगे। होंगे ये समय अनुक्रमणिका के अनुसार ही, पर संपादित अंश होगे। पूरी जीवनी के लिए प्रायः चार सौ पृष्ठों की प्रकाशित चेतना की शिखर यात्रा का प्रथम खंड पढ़े। दूसरा भाग भी आगामी रामनवमी तक तैयार होकर उपलब्ध हो सकेगा।
भारत भाग्य विधाता
बीसवीं शताब्दी या पिछले सौ साल भारतीय समाज ही नहीं, विश्व इतिहास में भी उथल-पुथल और गहन परिवर्तन के साल रहे है। सन् 1905 में बंगाल विभाजन से भर में जो प्रतिक्रिया हुई और बाद के वर्षों में जिस तरह राष्ट्रीय चेतना जागी, उसकी परिणति बयालीस वर्ष बाद भारत को स्वतंत्रता मिलने के रूप में दिखाई दी। बंग भंग की घटना एक निमित्त मात्र थी। व्यापक परिप्रेक्ष्य में वह इतनी महत्वपूर्ण नहीं थी कि ब्रिटिश साम्राज्य की नियति ही बदल जाए। छह साल बाद विभाजन रद्द हो गया था, लेकिन उस निमित्त ने राष्ट्र को जगा दिया। जनमानस में स्वतंत्रता की प्यास निरंतर बढ़ती गई। बंगाल के विभाजन ने माँ भारती की लाखों-करोड़ों संतानों को अपना बोध कराया। वे सक्रिय होते गए और रौलट एक्ट का विरोध, जलियावाला बाग, असहयोग आँदोलन, सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह आँदोलन से लेकर साइमन कमीशन बहिष्कार और भारत छोड़ो आँदोलन जैसे पड़ावों से गुजरते हुए 15 अगस्त 1947 तक पहुँचे। कितने ही आरोह और अवरोह से होते हुए राष्ट्र की चेतना जिस शिखर पर पहुँची, उसकी प्रत्येक भारतीय को गौरव से अभिभूत कर देती है। क्या भारत वास्तव में आजाद हुआ या नियति ने उसका भाग्य लिख ही दिया था?
श्री अरविंद भारत को मिली आजादी के विषय में लिखते हैं-"सही बात तो यह है कि इंग्लैंड ने भारतवर्ष को कभी जीता नहीं। उसे ‘क्यों और कैसे’ का पता लगे, उससे पहले ही भारत को उसके हाथों में सौंप दिया गया। सामान्यतः जिन लोगों ने इंग्लैंड के लिए काम किया, कुछ अपवादों को छोड़कर वे बहुत छोटे आदमी थे। भागवत् कृपा के बिना वे यूरोप में या कहीं और इतिहास में अपने लिए कोई स्थान नहीं बना पाते। भारत को हराने का सेहरा न तो जीतने वालों की विशेष प्रतिभा या क्षमता के सिर बाँधा जा सकता है और न ही परतंत्र जाति की दुर्बलता को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। यह इतिहास का एक ऐसा चमत्कार है, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। कहा जा सकता है कि यह एक ऐसा उदाहरण है, जिसमें किन्हीं विशेष गुणों के बिना ही एक महान उद्देश्य सौंपा गया था और एक सौभाग्य विशेष उसकी निगरानी कर रहा था कि वह अपना उद्देश्य पूरा कर सके।"
"यह उद्देश्य पूरा होते ही भगवान का वह देवदूत जो इंग्लैंड की रक्षा करने के लिए उसके पास खड़ा है और हाथ के इशारों से आने वाली सभी कठिनाइयों और विपदाओं को दूर कर देता है, उसकी ढाल नहीं बनेगा। इंग्लैंड यहाँ तभी तक रह सकता है, जब तक भारत को उसकी जरूरत है। जरूरत पूरी होते ही उसे हट जाना होगा, क्योंकि अँगरेजी राज न तो अपने भुजबल से यहाँ आया है और न ही अपने बलबूते पर खड़ा है, जो वह ठहर सके। अगर इंग्लैंड इस देश की सहायता करना चाहे तो उसकी सहायता लेकर और यदि नहीं करना चाहे तो उसके बिना और विरोध करे तो विरोध के होते हुए भी भारत अपने लक्ष्य को चरितार्थ करके रहेगा ।" श्री अरविंद को योगविद्या की प्रारंभिक शिक्षा देने वाले योगी विष्णु भास्कर लेले ने भी विभाजन के खिलाफ खड़े हुए क्राँतिकारियों को भगवान का यंत्र बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि भगवान् भारत की नियति लिख चुके हैं। भारत भगवान का चुना हुआ देश है। वह आजाद होगा और उसे देवशक्तियाँ सतत संरक्षण देती रहेंगी।
अगली पंक्तियों में जिस प्रसंग का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है, उसका संदेश इसी से मिलता-जुलता है। सन् 1972 का एक चर्चा प्रसंग है। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी हिमालय के गुह्य प्रदेशों में करीब छह महीने का अज्ञातवास बिताकर शांतिकुंज लौटे थे, वर्ष था 1972। शाँतिकुँज के मुख्य भवन में पहली मंजिल पर जहाँ आज उनकी और माताजी की पादुकाएँ प्रतिष्ठित हैं, वहाँ गुरुदेव कुर्सी पर बैठे हुए थे। भारत के विराट् और महिमावान् स्वरूप का परिचय विश्वसमाज को कराने के लिए शोध-अनुसंधान पर चर्चा चल रही थी। दुनिया को अपनी महिमा और गरिमा से अवगत कराना है, तो तथ्य और प्रमाण भी चाहिए। शोध-अनुसंधान का उद्देश्य वैसी सामग्री जुटाना था। यह शोध-अनुसंधान बाद में ‘समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान’ पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। गुरुदेव के लेखों और उद्बोधनों में भारत के दिव्य लीला भूमि होने की स्थापना मुखर रही है। किन्हीं परिजन ने उनसे पूछ लिया, "ईश्वर को भारत से विशेष लगाव क्यों है कि वह यहीं अवतार लेता है? हम अपने आपको सभ्यता और संस्कृति का प्रकाश उपलब्ध करने वाली सबसे पुरानी जाति मानते हैं। कहीं हम श्रेष्ठता की ग्रंथि से पीड़ित तो नहीं है। अगर हम शक्ति, ज्ञान कौशल और संगठन में किसी से कमजोर नहीं है, तो सदियों तक गुलाम क्यों रहे? अगर हम महाबली और रणबाँकुरे थे, तो हमलावरों को यहाँ सफलता मिलनी ही नहीं चाहिए थी।"
परिजन के प्रश्न में संदेह या उगक्षेप नहीं, जिज्ञासा भाव था। अज्ञातवास से लौट आने की सूचना ज्यादा लोगों को नहीं थी। मुश्किल से चार-छह व्यक्ति प्रतिदिन आते थे। गुरुदेव तब माताजी के कक्ष के दायें वाले कमरे में बैठकर, लेखन और भावी कार्यक्रमों का निर्धारण करते थे, परिजन के पूछने पर गुरुदेव ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया, "भारत भगवान् का चुना हुआ देश है। देखते नहीं हो, यहाँ ईश्वर ने स्वयं शरीर धारण कर सत्य और धर्म की प्रतिष्ठा की। चौबीस अवतार हुए हैं यहाँ। ऋषि-मुनि, योगी-यति और सिद्ध-संतों की संख्या का कोई अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता। दुनिया के और देशों में हुए संतों की गणना की जाए, उनकी विभूतियों का विवरण इकट्ठा किया जाए, तो वह सब भारत में हुई अध्यात्म विभूतियों के एक अंश के बराबर नहीं होगा। जितने विचार, विश्वास और साधना-संप्रदाय यहाँ हैं, उतने संसार के बाकी सभी देशों को मिलाकर भी नहीं होंगे। यहाँ उन सभी विद्या धाराओं में सामंजस्य है, जो कही और मुखर हो तो उनके अधिकारी विद्वान आपस में ही टकरा जाएँ।
प्रकृति, ऋतु, नदी-नद, पर्वत, मैदान, प्राणिजगत् और निवासियों तक में विविधता है। इस विविधता को देखते हुए क्या नहीं लगता कि भारत भगवान का चुना हुआ देश है? वह यहाँ अपनी लीला या प्रकृति के नए-नए प्रयोग कर रहा है।"
कुछ क्षण रुककर गुरुदेव ने उन परिजन को निहारा। शब्दों में जितना कुछ कल गया उससे कहीं ज्यादा, कई गुना सेदेश उस दृष्टि-निक्षेप में संप्रेषित कर दिया गया। गुरुदेव को निहारते देखकर ऐसा नहीं लगा कि कोई बौद्धिक सीख मिली हो। उन परिजन ने अपनी अनुभूति लिखते हुए कहा, "मुझे अपना बचपन याद हो आया, जब कोई जटिल प्रश्न सामने आता तो अपने पिताश्री से पूछने जाता था। वे मेरे प्रश्न का उत्तर किसी किताब में से नहीं देते थे। न ही वे किसी सूचना या तथ्य का उल्लेख करते थे। बस कुछ सैद्धाँतिक बातें समझाते और स्नेह से देखने लगते थे। मैं भूल जाता था कि जो पूछा है उसका उत्तर क्या है? उनकी बातें सुनकर और उससे भी ज्यादा उनकी दृष्टि पीकर संतुष्ट हो जाता था। ऐसा प्रतीत होता था कि चाभी मिल गई है। पुस्तक एक बंद पिटारी है, जिसमें ताला लगा हुआ है। चाभी लगाओ, ताला खोलो और पिटारी में बंद समाधान प्राप्त कर लो। गुरुदेव के संक्षिप्त से उद्बोधन और कुछ पल के दृष्टि निक्षेप ने उनके बचपन की उस अनुभूति को हरा कर दिया।"
"समाधान तर्क से चाहिए तो वह भी है।" गुरुदेव ने फिर कहा, "संसार एक चक्र की तरह है। वह घूमता रहता है। कुछ अरे ऊपर जाते हैं, तो दूसरे नीचे आते हैं। भारत के साथ भी यही हुआ। कोई भी जाति सदा के लिए शिखर पर नहीं होती। उत्थान के साथ पतन भी है। कुछ सौ साल की गुलामी को पतन मान सकते हैं, लेकिन उसने भारत को नष्ट नहीं कर दिया। कई जातियाँ अथवा समाज पचास-सौ साल के दमन में ही नष्ट हो गए। यूनान, मिस्र, ईरान, और रोम की प्राचीन सभ्यताएँ अपनी रक्षा नहीं कर सकीं। उनका मूल अस्तित्व कभी का समाप्त को गया। भारत उन देशों की सभ्यताओं से ज्यादा रौंदा और कुचला गया, फिर भी वह आज उठकर खड़ा हो गया है। इसे भारत का नष्ट होना कहोगे या उसकी जिजीविषा का प्रमाण? तथ्यों के प्रकाश में देखोगे तो भी पाओगे कि कुछ बात है जो भारत को अजर, अजेय और अक्षुण्ण बनाए हुए है।"
ऋषि सत्ताओं के अनुग्रह की एक और बानगी दिसंबर 1971 में एक बड़ी घटना के रूप में देखी गई। उन दिनों भारत और पाकिस्तान का युद्ध चल रहा था। युद्ध आरंभ होने से पहले की स्थितियाँ प्रायः सभी जानते हैं। पूर्वी पाकिस्तान(अब बाँग्लादेश) से हजारों लोग दल के-दल बनाकर भारत चले आ रहे थे। वहाँ के शासक जनता का बुरी तरह उत्पीड़न कर रहे थे। पूर्वी पाकिस्तान अथवा बाँग्लादेश की प्राकृतिक संपदा का दोहन वहाँ से दो हजार किलोमीटर दूर स्थित पश्चिमी पाकिस्तान के हुक्मरान कर लेते थे और उसे अपने यहाँ उपयोग में ले लेते थे। उत्पादक देश अथवा क्षेत्र के हिस्से में शोषण, दलाली और उत्पीड़न ही आता था। बाँग्लादेश के लोग बीस साल तक सहते रहे, उचित और न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहे। उन्हें सुनने के स्थान पर शासक उपेक्षा और दमन की नीति अपनाते रहे। दमन-उत्पीड़न असह्य होने लगा तो पूर्वी पाकिस्तान के लोग बागी हो गए। उस हिस्से ने स्वतंत्र राज्य की घोषणा कर दी। दमन चक्र और तेज हुआ तो प्रतिरोध और क्राँति की ज्वाला भी भड़कने लगी।
बाँग्लादेश में चल रहे संग्राम का प्रभाव भारत पर भी पड़ा। जो लोग उत्पीड़न और दमन का मुकाबला नहीं कर सके या जिनके लिए स्थितियों दूभर हो उठीं, वे भारत आने लगे। यहाँ आते जा रहे लोगों की संख्या कुछ हजार, हजार से लाख और लाख के बाद करोड़ के ऊपर पहुँच गई। इतने लोगों की देखभाल का जिम्मा भारत सरकार को उठाना पड़ रहा था, साधन उन दिनों बेहद कम थे। उन्हें निचोड़कर और यहाँ के नागरिकों पर अतिरिक्त कर लगाकर किसी तरह शरणार्थियों की व्यवस्था की जा रही थी।
पाकिस्तान को बाँग्लादेश की जनता के उत्पीड़न से ही संतोष नहीं हुआ। अपनी राजनैतिक विवशताओं के चलते वहाँ के शासकों ने भारत पर युद्ध भी थोप दिया। पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर जुलाई 1971 से ही दबाव बढ़ने लगा, जो कुछ ही सप्ताहों में युद्ध के रूप में बदल गया। महाशक्तियाँ भी उन दिनों ऐसा लगता था कि पाकिस्तान के साथ थीं।युद्ध घोषित हुआ। पूर्वी और पश्चिमी पर घमासान छिड़ने लगा। दो-तीन दिन में ही पाकिस्तानी सेना के पाँव उखड़ने लगे। वह पीछे हटने लगी। बाँग्लादेश के मोरचे पर प्रतिपक्षी सेना का दबाव कम पड़ने लगा और भारतीय सेना आगे बढ़ती दिखाई दी, तो आक्राँता के साथ खड़े देशों ने पहल की। पहल पाकिस्तान के पक्ष में ही थी। इस पहल का नेतृत्व अमेरिका कर रहा था। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में मामला ले जाने की तैयारियाँ की जाने लगीं। इन तैयारियों का उद्देश्य किसी देश पर नैतिक दबाव डालना ही होता है।
अमेरिका इस तैयारी पर ही ठहरा नहीं रहा। उसने सामारिक दबाव भी बढ़ाया और सातवें जहाजी बेड़े (सेवन्थ फलीट) का रुख हिंद महासागर की करने के आदेश दिए। उस समय तक वह संसार का सबसे बड़ा जहाजी बेड़ा था, जिस पर युद्धक विमान, प्रक्षेपास्त्र, विमानभेदी तोपें, हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और पर्याप्त गोला-बारूद से लैस सैनिक टुकड़ियाँ थीं। सामर्थ्य की दृष्टि से सातवाँ बेड़ा इतना सक्षम था कि भारत-पाक यह की स्थिति उलट सकता था। तब भारत की नौ सेना इतनी सक्षम नहीं थी कि बेड़े को ध्वस्त कर सकें या उसके मुकाबले देर तक टिकी रह पाए। भारत-पाक युद्ध ने घमासान रूप ले लिया, तो निर्णय हफ्ते-दस दिन के भीतर ही हो जाना तय था। निर्णायक स्थितियाँ बन रही थीं, लेकिन सातवें बेड़े का मुंह हिंद महासागर की ओर होने के बाद स्थितियां दूसरा ही रुख ले रहीं थीं। अचानक 7 दिसंबर सन 1972 की सातवीं तारीख को सूर्य उदय होने बाद की पहली खबर दिया है और वह भारतीय सीमा से दूर खिसकने लगा है।
क्या हुआ ? रातोरात स्थितियां कैसे बदल गई ? कोई कूटनीतिक पहल नहीं, विश्व जनमत का कोई दबाव नहीं। अमेरिकी शासन व्यवस्था को बारीकी से समझने वाले बताते हैं कि इस स्तर पर पहुँचने के बाद वहाँ का सुरक्षा मुख्यालय पेंटागान अपना निर्णय कभी नहीं बदलता। जहाजी बेड़ा रवाना होने के बाद वापस लौटने का उदाहरण अमेरिकी इतिहास में एक भी नहीं है। सेनाओं के कूच करने, युद्ध की घोषणा होने और समर शुरू होने के बाद तुरंत वापसी या विराम होने की घटनाएँ दूसरे देश में भी नहीं घटी है । अमेरिकी प्रतिरक्षा मंत्रालय ने रातोरात निर्णय क्यों पलट दिया? युद्ध राकने, बंद करने अथवा आक्रमण वापस लेने का विलक्षण फैसले का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति को ही है। तत्कालीन राष्ट्र रिचर्ड निक्सन के सामने अचानक ऐसी क्या विवशताएँ आ गई कि उन्हें बेड़ा वापस बुलाने का निर्णय लेना पड़ा। अमेरिकी मामलों के विशेषज्ञ-विश्लेषक इस प्रश्न का उत्तर आज तक नहीं ढूँढ़ पाए है।
क्या कोई दैवी हस्तक्षेप हुआ ? श्रद्धालु जनों के मन में उस समय भी जिज्ञासा थी। राजनाँदगाँव (छत्तीसगढ़) के एक साधक मोहन देवाँगन ने 7 दिसंबर 1971 की भोर एक सपना देखा कि अमेरिकी बेड़ा हिंद महासागर पार कर बंगाल की खाड़ी में प्रवेश कर रहा है। श्रीलंका की सीमा को धड़धड़ाता हुआ पार कर रहा है। गति क्षण-प्रतिक्षण तेज होती जा रही है । कोई प्रत्यक्ष चिह्न नहीं दिखाई दिया, लेकिन आभास हुआ कि समुद्र में ठीक उसी स्थान की सीध में पहुँचा जहाँ रामेश्वर सेतु बाँधा गया था। उस जगह कुछ पत्थर तैरते हुए दिखाई दिए। पत्थरों पर ‘राम’ नाम खुदा हुआ था। स्वप्न में यह दृश्य देख रहे साधक ने देखा कि उन पत्थरों के बीच में एक बड़ा युद्धपोत (स्पष्ट ही सातवाँ बेड़ा ) गुजर रहा है। अचानक जैसे बिजली कौंधती है और समुद्र का सीना चीर कर एक हाथ मुट्ठी बाँधे प्रकट होता है। पहले मुट्ठी बाहर आती है फिर कलाई और कुहनी तक बाहर आते हुए हाथ की ऊँचाई आकाश छूने लगती है, मुट्ठी खुलते ही पंजा चौड़ा होता दिखाई देता है और धीरे से युद्धपोत को ढक लेता है। इस तरह ढक लेता है कि पोत का कोई भी हिस्सा दिखाई देना बंद हो जाता है। अगले ही क्षण स्थिति सामान्य हो जाती है। समुद्र शाँत हैं साधक इस दृश्य को देखते हुए अनुभव भी कर रहे थे कि हाथ की आकृति ‘लाल मशाल’ थामे हुए हाथ जैसी है।
शाँतिकुँज के अखंड दीप के सामने जप कर रही कुछ देव कन्याओं को भी इसी तरह की अनुभूति हुई थी। सातवें बेड़े के पास जाने की खबर प्रसारित होने से पहले वंदनीया माताजी ने प्रणाम के लिए आए साधकों से कहा था, अब खतरा टल गया है। इस युद्ध में भारत की जीत सुनिश्चित है। दुनिया की कोई भी शक्ति उसे परास्त नहीं की सकती। युद्ध समाप्त होने के बाद देखना भारत दिनोदिन प्रगति करेगा। उसे विश्व का मार्गदर्शन करने का दायित्व निभाना है और जल्दी ही वह इस योग्य हो जाएगा। अनेक साधकों को दिखाई दिए स्वप्न, आभास और अनुभूतियों के इस दस दिन बाद युद्ध समाप्त हों चुका था कि वह सत्य-न्याय के मार्ग पर है। भौतिक दृष्टि से प्रत्यक्ष समर्थ नहीं दिखाई देते हुए भी वह दुनिया भर के अनुचित-अवाँछनीय विरोध का सामना करने में सक्षम है । उसे पराभूत करना अब किसी के वश में नहीं है।
विजय के बाद भारत ने शक्ति, साधना और सिद्धि के क्षेत्र में दिनोदिन प्रगति की है। उसकी यह नियति पहले ही लिखी जा चुकी थी। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 के अपने प्रसिद्ध भाषण में जिसे नियति से साक्षात्कार का उद्घोष किया था, वह नियति भी वर्षों पहले अंकित हो गई थी, लेकिन उसके अक्षर जिस समय उभरते दिखाई देने लगे थे, वह सन् 1911 का वर्ष था, जिससे आचार्य श्रीराम शर्मा जी का जन्म हुआ था। क्रमश:
स्वदेशी कार्यशाला शाँतिकुँज में
नवंबर की 1,11 तारीखों में शाँतिकुँज परिसर में स्वदेशी जागरण मंच, गोविज्ञान अनुसंधान एवं गायत्री परिवार के राष्ट्रव्यापी तंत्र के चुने हुए कार्यकर्त्ताओं की एक कार्यशाला संपन्न हुई। व्यापक विचार विमर्श के बाद स्वदेशी के साथ आर्थिक स्वावलंबन जोड़ने, जनचेतना जगाने तथा कार्यकर्त्ताओं का परिपूर्ण शिक्षण देने जैसे निष्कर्ष सामने निकलकर आए। इसमें स्वदेशी से जुड़े शीर्ष स्तर के कार्यकर्त्ताओं-संस्थाओं का एक नेटवर्क बनाने का संकल्प भी लिया गया। निश्चित ही इन निष्कर्षों का बड़ा व्यापक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा, जहाँ तेजी से आर्थिक गुलामी का शिकंजा कसता चला जा रहा है।
ब्रह्मवादिनी बहनों के नारी जागरण कार्यक्रम संपन्न
एक अक्टूबर को प्रारंभ हुए तीन दलों में चल रहे नारी जागरण प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरे भारत में बड़े विराट् रूप में संपन्न हुए। एक दल आगरा, गुना, भोपाल, इंदौर, मंदसौर, भीलवाड़ा, बाँदा, झाँसी, रीवाँ, वाराणसी, गोरखपुर, लखनऊ, शाहजहाँ एवँ बुलंदशहर होता अलख जगाता आया। दूसरा दल अलवर, श्रीमार्धोपुर, बीकानेर, जयपुर, राजसमंद, जामनगर, अमरेली, बड़ौदा, भुसावल, खरगोन, नागपुर, बालाघाट, भिलाई, कोरबा, इलाहाबाद, होकर लौटा तथा तीसरा दल बाराबकीं, देवरिया, अयोध्या, बसखारी, बलिया, पटना, बोकारो, धनबाद, कोलकाता, हजारीबाग, राँची, आरा, सुल्लानपुर, बरेली, मुरादाबाद होकर अपने सशक्तीकरण वर्ष में एक महत्त्वपूर्ण सोपान बना है एवं इसके दीर्घकालीन परिणाम क्षेत्र स्तर नारी शक्ति के घर-घर अलख जगाने के रूप में दिखाई देखें।
बाहरी दिल्ली में जनजागरण, प्राणप्रतिष्ठा, भूमिपूजन
दिल्ली देश की राजधानी ही नहीं, एक पूरा राज्य है व ‘इसका नेशलन केपीटल रीजन’ (राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र) बड़े व्यापक क्षेत्र में फैला है। पिछले दिनों झटीकरा ( नजफगढ़) के श्रीनारायण गुरुकुल आश्रम में, जो श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के आधीन है, एक विराट् 18 कुंडी यज्ञायोजन तथा माँ गायत्री, दुर्गा सहित राधा-श्रीकृष्ण की मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम 27 से 30 नवंबर की तिथियों में संपन्न हुआ। बाहरी दिल्ली व साथ लगे हरियाणा, उ. प्र. के पाँच सौ गांवों का साधन मंथन इस माध्य से हुआ है। लाखों व्यक्ति का समागत रहा। इसके साथ ही 36 नवंबर को नोयडा के सेक्टर 12 में केंद्रीय राजधानी स्तर के एक बहुद्देशीय पाँच मंजिले भवन का भूमिपूजन भी संपन्न हुआ। इसे सारी दिल्ली वाले मिलकर बनाएंगे। मार्गदर्शन शाँतिकुँज का रहेगा। इस केंद्र को गायत्री चेतना केंद्र’ कहा जाएगा।
न्यूजर्सी में केंद्रनिर्माण प्रक्रिया आरंभ
भारत से बाहर एक हमारा अपना केंद्र लेस्टर ( यू . के .) में पहले ही आरंभ हो चुका है। प्रशिक्षण देने हेतु दो भाइयों का दल वहाँ दिसंबर प्रथम सप्ताह में पहुँच गया।अब दूसरा केंद्र अमेरिका के न्यूयार्क से लगे गार्डन स्टेट कहे जाने वाले न्यूजर्सी के फ्रैंकलिन शहर में बनने जा रहा है। भूमि क्रय की जा चुकी। इस सेंटर फॉर गायत्री काँशसनेय (गायत्री चेतना केंद्र) में छह एकड़ भूमि में एक मंदिर, शिक्षण हेतु हाल्ँस, एक विराट् संस्कृति प्रधान प्रदर्शनी तथा एक विशाल ऑडिटोरियम के साथ एक गुरुकुल बनेगा। 11 सितंबर के हमले से उबरने के बाद तुरंत ही पूरा भारतीय समुदाय एकजुट हो इस कार्य हेतु धन जुटाने में लग गया है।
तिरूपति अश्वमेध भूमिपूजन एवं समारोह अंतिम चरण
पूरे आँध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक का व्यापक मंथन कर शाँतिकुँज से भेजा गया आश्वमेधिक कलश तिरूपति पहुँचा व वहाँ 24 नवंबर को भूमिपूजन संपन्न हुआ। वैश्य समाज के विराट् प्राँगण में समयदानी भाइयों द्वारा तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। विस्तृत समाचार चित्र सहित तो फरवरी-मार्च में ही मिल सकेंगे, किंतु अब तक की तैयारी से लगता है कि गंगा, कावेरी, यमुना, कृष्णा का, उत्तर-दक्षिण का यह संगम अनूठा ही होगा।
नागपुर की सूर्य विज्ञान कार्यशाला
विगत दिनों अक्टूबर की 21, 22 तारीखों में नागपुर में एक अपने में निराली सूर्य व विज्ञान पर आधारित कार्यशाला संपन्न हुई । लगातार तीसरे वर्ष वैज्ञानिक अध्यात्मवादपरक कार्यशालाओं को संपन्न कर गायत्री शक्तिपीठ नागपुर ने एक कीर्तिमान बनाया ।अब एक वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर आधारित एक फोरम का गठन किया गया है, जिसमें भारत भर के वैज्ञानिक चिंतन वाले अध्यात्मविद् एवं वैज्ञानिक होगे।
पूर्वांचल (उ. प्र. ) व नेपाल का व्यापक मंथन
नवंबर की 1 से 4 तारीखों में बस्ती , गोरखपुर , महाराजगंज , अयोध्या , फैजाबाद क्षेत्र में उ.प्र. के प्रायः तीस जिलों तथा नेपाल के तराई के पाँच जिलों का व्यापक मंथन संपन्न हुआ। कार्यकर्ता सम्मेलनों में भाग लेने वाले नई दिशा लेकर गए। महाराजगंज जो नेपाल सीमा से जुड़ा है, में शक्तिपीठ पर प्राणप्रतिष्ठा संपन्न हुई।
सप्तसूत्री आंदोलन को तीव्र गति देकर भारत को महानायक बनाएँगे
एक नया युद्ध हम लड़ेंगे। परशुराम की तरह लोकमानस में जमी हुई अवाँछनीयताओं को विचार अस्त्रों से हम काटेंगे।सिर काटने से मतलब विचार बदलना भी है।परशुराम की पुनरावृत्ति हम करेंगे। जन-जन के मन-मन पर गहराई तक गड़े हुए अज्ञान और अनाचार के आसुरी झंडे हम उखाड़ फेंकेंगे। इस युग का सबसे बड़ा और सबसे अंतिम युद्ध हमारा ही होगा, जिसमें भारत एक देश न होगा, महाभारत बनेगा और उसका दार्शनिक साम्राज्य विश्व के कोने-कोने में पहुँचेगा । निष्कलंक अवतार यही है। सद्भावनाओं का चक्रवर्ती सार्वभौम साम्राज्य जिस युगावतारी निष्कलंक भगवान् द्वारा होने जा रहा है, वह और कोई नहीं, विशुद्ध रूप में अपना युगनिर्माण आँदोलन ही है।”(परमपूज्य गुरुदेव ‘अखण्ड ज्योति’ 1970 − पृष्ठ 60)।यह सिंह-गर्जना परमपूज्य गुरुदेव की है।
आज बत्तीस वर्ष बाद भी इन स्वरों को सुना जा सकता है। किसी के भी मन में युगपरिवर्तन संबंधी भविष्यवाणियों पर संदेह है, वह इनके माध्यम से अपना असमंजस मिटा सकते हैं।
वैचारिक युद्ध ही वह प्रक्रिया है जो इस समय युगप्रत्यावर्तन की प्रक्रिया को अंजाम देने जा रही है।विचारों की विचारो से काट,दुर्बुद्धि पर सद्बुद्धि की विजय एवं असुरता के जीवन-मरण के संघर्ष में देवत्व की उस पर जीत,यही अब इस की नियति है। हमारा ज्ञानयज्ञ अभिमान इस कार्य को बखूबी संपन्न कर रहा है।लाखों लोगों के मनों में बदलाव आया है।सभी परिवर्तन चाहते हैं।
भ्रष्टाचार से, बढ़ती अराजकता से, जातिवाद पर आधारित राजनीति से सभी ऊब चुके हैं। अब एकमात्र आशा है तो वह है अध्यात्मवाद। संवेदना पर आधारित उत्कृष्टतावादी आस्थाओं को सबल बनाने वाला चिंतन ही आज की विषम समस्याओं से विश्वमानवता को उबार सकता है। गायत्री परिवार के सप्तसूत्री आँदोलनों की मूल धुरी यही अध्यात्म है, जीवनसाधना है।
विगत वर्ष हीरक जयंती के रूप में सारे देश व विश्व में मनाया गया। युगचेतना के अभ्युदय ही हीरक जयंती एक ही संदेश सबके लिए लेकर आई कि प्रखर तप साधना से, सजल संवेदना विकसित करने से एवं परमात्मचेतना के धरती पर आने के आश्वासन को जीवन में निरंतर जीने से निश्चित ही धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण बनेगा एवं मानव में देवत्व अवतरण होगा। साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण, नारीजागरण, कुरीति उन्मूलन, नशा निवारण जैसे प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने वाले कार्यक्रम भविष्य के परिवर्तन की आधारशिला रख रहे हैं। चारों ओर इनकी धूम मची हुई है। अब इस वर्ष को 2002 की वसंत से 2003 की वसंत तक ‘संगठन सशक्तीकरण वर्ष’ मनाने का निर्णय हुआ है। यदि साधना की धुरी पर चलने वाले अपने राष्ट्रव्यापी-विश्वव्यापी संगठन को सशक्त बनाया जा सका तो जो भी आँदोलन हाथ में लिए जाएँगे, वे सफलता के चरम शिखर तक पहुँचाकर रहेंगे।
जीवन-साधना की प्रखरता का आँदोलन जैसा कि हमने बार-बार लिखा हैं, हर धर्म-संप्रदाय के लिए है। हमारी उपासना-पद्धतियाँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, पर जीवन-साधना संयम-साधना, तो सबके लिए एक जैसी ही हैं। फिर उन पर विवाद कैसा? सद्बुद्धि की प्रार्थना तो सभी के लिए की जा सकती है। उसे किसी धर्म विशेष से जोड़कर किसी को क्या मिलेगा? वस्तुतः साधना आँदोलन मानवी व्यक्तित्व के परिष्कार का, तनाव मुक्ति का, जीवन जीने की कला के शिक्षण का आँदोलन है। यह हर विद्यालय, घर-परिवार, कार्यालयों, क्लब-कंपनियों तथा सामाजिक संगठनों में चलना चाहिए। हर व्यक्ति को हर श्वास में साधना (‘द होल लाइफ इन योगा’ श्री अरविंद ) वाले सिद्धाँत को आत्मसात् कराया जाना है। तभी यह भोगवादी तृष्णा, आत्मघाती प्रतिद्वंद्विता मिटेगी। उपभोक्ता प्रधान इस युग में हम सभी से तो अपेक्षा नहीं कर रहे कि वे गाँधी की नकल करें, पर क्या अपव्यय पर रोकथाम लक्ष्मी की आराधना एवं अपने निज नहीं पकड़ सकता। यदि श्रेष्ठ साहित्य का स्वाद जन-जन को बताकर उसकी लत लगाई जा सके तो श्रेष्ठ विचारों का, विधेयात्मक आस्थाओं का साम्राज्य ही छाया दिखाई पड़ेगा।
शिक्षा की वर्तमान नीति ने हमारे देश में ब्रह्मराक्षस अधिक पैदा किए हैं, विनम्र राष्ट्रवादी कार्यकर्ता नगण्य ही। आज शिक्षा की बुनियाद ही गलत है। यह लालच पर, सत्ता के मद पर , अधिक-से-अधिक कमाने की होड़ पर आधारित है, इसके स्थान पर विद्या को प्रतिष्ठित करना होगा।वह विद्या जो मुक्ति की ओर ले जाए, जो अमरत्व का शिक्षण दे। इसके लिए बाल्यकाल से ही संस्कारों की प्रतिष्ठा तथा शिक्षा के साथ विद्या को गूँथकर नैतिकता को पाठ्यक्रम में गूँथकर पढ़ाने की कला शिक्षकों को सिखानी होगी।भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में जहाँ सारे भारत में उत्साह है एवं पूरे भारत में 23 लाख से अधिक बच्चे बैठे हैं, वहाँ अब उनके परिणाम घोषित होने के साथ ही संस्कृति मंडलों की स्थापना के संकल्प लिए जाने चाहिए। 5 से 1 छात्रों का एक मंडल पूरी कक्षा को संस्कृति प्रधान चिंतन हेतु प्रेरित कर एक युगसाहित्य का पुस्तकालय चला सकता है। क्रमशः यह प्रक्रिया हर कक्षा में दुहराई जा सकती है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना के मूल में ही इन छात्रों की परिकल्पना की गई है, जो आगे चलकर लीग से हटकर पढ़ाई जा रही विद्या-विस्तार की नीति में भागीदारी करेंगे।
स्वास्थ्य बढ़ते औषधालयों-चिकित्सकों के बावजूद जर्जर हुआ है।आहार-विहार जीवन शैली के दूषित हों जाने से पूरी तरह गड़बड़ा गया है। इसका परिपूर्ण शिक्षण व बीमार नहीं जाए, ऐसी नौबत न आए यह प्रशिक्षण स्वास्थ्य आँदोलन के अंतर्गत दिया जाना है। पौष्टिक आहार के सरल-सस्ते विकल्प-अंकुरित अन्न एवं खाना पकाने के तरीके में अंतर यह भी शिक्षण का एक अंग है। वनौषधियों के माध्यम से ‘गमलों में स्वास्थ्य ‘ से लेकर घरेलू नुस्खों का वैज्ञानिक प्रतिपादन तथा जीवनशक्ति संवर्द्धन हेतु इनका प्रयोग घर-घर पहुँचाए जाने की आवश्यकता है। इसी निमित्त ‘ जैन स्वास्थ्य संरक्षक’ प्रशिक्षण की योजना केंद्र में बन रही है। इसके अतिरिक्त वैकल्पिक चिकित्सा के सभी उपादानों रेकी, चुँबकीय, प्राकृतिक, वर्ण चिकित्सापद्धतियों, एक्यूप्रेशर आदि का वैज्ञानिक आधार सिद्ध करने का एक व्यापक तंत्र देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में खड़ा किया जा रहा है। यह शिक्षण ‘होलिस्टिक मैनेजमेंट’ के स्तर पर जब प्रशिक्षित डॉक्टर्स-वैद्यों को दिया जाएगा तो वे बहुद्देशीय कार्य कर सकेंगे।
आर्थिक स्वावलंबन मिशनरी-कमर्शियल प्रोजेक्ट्स के घर-घर तक विस्तार की योजना पर चलेगा। ऐसे ग्रामोद्योग जो मिशनरी स्तर पर व्यापारिक खपत को देखते हुए समूहों द्वारा तैयार किए जा सकें, लगभग सौ से अधिक तलाश लिए गए है एवं वे कहीं भी, किसी के द्वारा, कभी भी आरंभ किए जा सकते हैं। गौशालाँए बड़े शहरों में बन तो नहीं सकतीं, वहाँ मुहल्लों कह घिचपिच में जगह कहाँ है परंतु शहरी विस्तार एवं ग्रामीण परिवेश में इनका जाल खड़ा किया जा सकता है। यदि गोरक्षा आँदोलन चलना है तो वह गोविज्ञान अनुसंधानशालाओं के गौशालाओं के साथ खलने पर ही चल पाएगा। यहाँ गोमूत्र व गोमय से बनने वाले कीटनाशक, खाद तथा मानव मात्र के लिए उपयोगी संजीवनी औषधियों का तंत्र खड़ा किया जा सकता है। अपने पावन युगतीर्थ आँवलखेड़ा को ग्रामोत्थान के प्रतीक मॉडल के रूप में इसीलिए खड़ा किया जा रहा है।
हरीतिमा संवर्द्धन-पर्यावरण संरक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। बढ़ते औद्योगीकरण-प्रदूषण ने जनचेतना जगाई है। शहरों का विकेंद्रीकरण एवं बढ़ता हरीतिमा कवच यही एकमात्र विकल्प है, जिससे धरती को जलप्राय से रोका जा सकता है। वृक्षों के कटने से हजार वर्षों में बनने वाली एक सेंटीमीटर की उपजाऊ मिट्टी समुद्र के गर्भ में समा रही है। जिस तरह अपनो बच्चों को हम पालते हैं, ठीक उसी तरह वृक्षों को लगाना, उनका पालन-पोषण करना हमें सीखना-सिखाना होगा। सूक्ष्म पर्यावरण के संरक्षण-संवर्द्धन हेतु भी हमें सामूहिक-साधनात्मक उपचारों को बढ़ाना होगा।
नारी संवेदना की प्रतीक है एवं पर्यावरण तथा भूमि के साथ उसका भी शोषण होता रहा है नारी की अवमानना ने ही धरती पर नरक की स्थिति पैदा की है। नारी शिक्षा , स्वास्थ्य, स्वावलंबन, सुसंस्कारिता, सुरक्षा एवं सहभागिता के क्षेत्र में नारी को ही स्वयं बढ़-चढ़कर आगे आना होगा एवं अपना स्थान स्थापित करना होगा। विगत वर्ष केंद्र से तीन दल भारत भर में गए व इन ब्रह्मवादिनी बहनों ने नारी शक्ति में अलख जगाया। अब जनपद स्तर पर हर वर्ग की बहनों को एकजुट हों व्यापक प्रशिक्षण चलाना होगा, ताकि एक दशक में हम नारी को नेतृत्व करता देख सकें।
कुरीतियों में दहेज, शादियों में अपव्यय तथा सामाजिक रूढ़िवादिताओं के खिलाफ वातावरण बनना तथा दुर्व्यसनों से मुक्ति हेतु संघर्ष छेड़ना समय की महती आवश्यकता है।दहेज व खरचीली शादी सारे समाज को दरिद्र-बेईमान बना रही हैं तथा दुर्व्यसन राष्ट्र की हर पीढ़ी के स्वास्थ्य व समृद्धि को जर्जर बना रहे है। युवा पीढ़ी एवं नारीशक्ति दोनों इस आँदोलन को हाथ में लेकर रैली-प्रदर्शनी जन-जागरुकता अभियान, असहयोग आदि का सहारा लेकर गति दें।
इस संगठन वर्ष में यदि उपर्युक्त छह में से एक आँदोलन भी विभिन्न समूहों ने गति देकर आगे बढ़ा दिया तो 24 तक परिवर्तन दिखाई देने लगेगा। सातवाँ साधना आँदोलन तो प्रत्येक की धुरी में समाया हुआ है ही सद्भावनाओं का साम्राज्य निश्चित ही स्थापित होगा एवं भारत पुनः जगद्गुरु बनेगा, ऐसा हम सभी का अपनी गुरुसत्ता की ही तरह दृढ़ विश्वास है।
आज की बेचैनी -तनावभरी परिस्थितियों में यदि कहीं कोई ऐसी जगह है, जहाँ शाँति है, जीवन जीने की कला का शिक्षण है तथा तन के साथ मन को भी विश्राम है, तो हर कोई वहाँ जाना चाहेगा। जहाँ धर्म -संस्कृति का विज्ञानसम्मत स्वरूप दिखे तथा जन -जन को अपनी दिशाधारा तय करने का मार्गदर्शन मेले तो व्यक्ति वहाँ पहुँचेगा ही । कुछ ऐसा ही शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ के साथ है। अपनी स्थापना के तीस वर्ष बाद इसके मत्स्यावतार की तरह हुए विस्तार में अब आने वालों की संख्या बढ़ती ही चली जा रही है। कोई जिज्ञासा का भाव लिए आते हैं, कोई मात्र दर्शन हेतु तो कोई व्यवस्थित रूप में नियत अवधि का शिक्षण लेने । यदि सभी पहले से समय का नियोजन कर व्यवस्थित दंग से नियमित चलने वाले सत्रों में आएँ तो वे इस आनंद को पा सकते हैं, जो इस कल्पवृक्ष की छाँव में बैठने पर मिलता है। कहने का आशय यह कि वर्षभर चलने वाली विविधता से भरी सत्र -शृंखला में भागीदारी करने का मन लेकर आएँ। इससे सभी को हरिद्वार आने -जाने का ,किराया खरच करने ,कष्ट उठाने के बदले ढेरों गुना लाभ मिलेगा ,जो संभवतः अचानक पहुँचने पर नहीं मिलता ।
शाँतिकुँज में प्रतिमाह 1 से 29 की तारीखों में युगशिल्पी प्रशिक्षण सत्र चलते हैं। इनमें भागीदारी करने वाले सत्रारंभ से एक दिन पूर्व आ जाते हैं, सत्र अनुशासन समझकर नियत दिन से अपनी दिनचर्या आरंभ कर देते हैं। इन सत्रों में कार्यकर्ताओं का सुव्यवस्थित ‘धर्मतंत्र से लोकशिक्षण ‘पर आधारित प्रशिक्षण चलता है। वे लोकरंजन से लोकमंगल की विधा द्वारा संगीत का भी शिक्षण लेते हैं एवं उद्बोधन देने, अपनी बात को सही ढंग से कहने की विधा सीखते हैं। स्वावलंबन प्रधान शिक्षण उन्हें रचनात्मक सोच देता है। भारतीय संस्कृति की सभी मान्यताओं का विज्ञानसम्मत प्रस्तुतीकरण यहाँ होता है। वे नियमित साधना करते हैं, तो उनका शारीरिक -मानसिक परीक्षण भी यहाँ की प्रयोगशाला में नियमित रूप से चलता है। इससे साधना -आहार -जप आदि का प्रभाव देखा जा सकता है।
एक माह यहाँ रहने के बाद परिव्राजक स्तर का प्रशिक्षण लेने वालों को पंद्रह दिन का अतिरिक्त समय वरिष्ठ कार्यकर्ता देते हैं। युगनेतृत्व की हर विधा से साधकों को परिचित कर विभिन्न शक्तिपीठों -देवालयों -रचनात्मक आँदोलनों का संचालन करने के लिए भेजा जाता है। जो ग्राम प्रबंधन, आर्थिक स्वावलंबन तथा राष्ट्र की समृद्धि हेतु किए जा रहे रचनात्मक कार्यों का शिक्षण लेना चाहते हैं, वे 1 दिन के लिए 21 से 8 एवं 1 से 18 तारीखों में आ सकते हैं। एक माह के बाद रुक भी सकते हैं व अलग से भी पूर्वानुमति लेकर आ सकते हैं। रचनात्मक प्रकोष्ठ, गौशाला निर्माण, स्वदेशी आँदोलन से लेकर नाडेप -कंपोस्ट निर्माण तथा वाटर हार्वेस्टिंग ( पानी की खेती ) आदि सभी का शिक्षण वर्ष भर देता है। माह में एक बार एक सप्ताह के ‘रिप्रोडक्टिव एण्ड चाइल्ड हेल्थ’ (आर. सी .एच.) योजना के अंतर्गत मातृ व शिशु स्वास्थ्य व जनसंख्या नियंत्रण पर प्रशिक्षण भी यहाँ चलते हैं।
अपनी जीवन साधना को प्रखर बनाने का जिनका मन हो, वे 1-1 दिन के संजीवनी साधना सत्रों में भागीदारी कर सकते हैं, जो 1 से 1, 11 से 11 व 29 तारीखों में वर्ष भर चलते हैं। कसी हुई दिनचर्या वाले इन सत्रों में गायत्री साधना से लेकर जीवन जीने के हर सूत्र व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण तक की प्रक्रिया का आमूलचूल शिक्षण दिया जाता है। इस अवधि में साधक चौबीस हजार का एक गायत्री अनुष्ठान भी संपन्न कर लेते हैं एवं वरिष्ठ साधकों की अनुभूति प्रधान अमृतवाणी का लाभ लेते हैं, साथ ही साधना विज्ञान के गूढ़तम सूत्रों को गुरुसता द्वारा कराए गए ध्यान द्वारा सीख कर जाते हैं। सभी के लिए पूर्वानुमति लेना आवश्यक है।
जो मौन-एकाकी अंतर्मुखी साधना करना चाहते हैं, उनके लिए आश्विन नवरात्रि से चैत्र नवरात्रि की अवधि में चलने वाले सत्रों हेतु आमंत्रण है। इन सत्रों का नाम है अंतः ऊर्जा जागरण सत्र। इनमें प्रतिदिन दस प्रकार की साधनाएँ कराई जाती हैं। लगभग पाँच दिन मौन रहा जाता है। एक कमरे में एक ही साधक का निवास है। साधनाएँ आडियो माध्यम से संकेतों द्वारा होती हैं। बड़ी उच्चस्तरीय साधना का दमखम रखने वालों के लिए ही इनका प्रावधान है। इनमें अनुमति सभी को नहीं मिलती । पहले विस्तृत विवरण भेजना पड़ता है। व मार्गदर्शिका का अध्ययन कर लेना होता है। जनवरी 22 के अंत तक तो ये सत्र 1 से 4, 6 से 10, 11 से 14, 16 से 20, 21, से 24, व 26 से 30 की तारीखों में चलेंगे, पर फरवरी में वसंत पर्व ( 17/2/2002) होने के कारण 16 से 2 वाला सत्र स्थगित रहेगा। अगले सत्र 21 से आरंभ होने के स्थान पर 2 से 25, 24, फरवरी से 1 मार्च तथा 2 से 6, 7 से 11, 12, से 16, 17 से 21, 22, से 26 से 31 मार्च की तारीखों में चलेंगे। परिवर्तित तारीखें नोट कर लें। अप्रैल 22 में मात्र 2 सत्र है। 1 से 5 व 6 से 1।
शाँतिकुँज में 5 दिवसीय तीर्थसेवन सत्र 14 मई से 3 जून तक नियमित रूप से चलते हैं। इस अवधि में फिर 1 दिवसीय अतिथि सत्र में कोई भी पूर्व सूचना देकर आ सकता है, संस्कारादि संपन्न करा सकता है। अकस्मात् आना पड़े, तो भी व्यवस्था है, पर प्रयास यह रहना चाहिए कि पूर्व सूचना फैक्स, ई-मेल या फोन से दे दें। अति वृद्धों, बीमारों, अनपढ़ आदत वालों, छोटे बच्चों को लेकर चलने वालों के लिए सदा से निषेध रहा है। प्रयास यही होना चाहिए कि 22 में इन सत्रों का अधिकाधिक लाभ उठाया जाए।
रक्त से लिखा गया है, विजय का इतिहास जो। राष्ट्र का वंदन है, उस उत्सर्ग के उल्लास को॥
रक्त की हर बूँद, जन-जन के हृदय में लिख गईं। राष्ट्र-श्रद्धा, आपके हाथों सहज ही बिक गई॥ बल दिया बलिदान ने, इस राष्ट्र के विश्वास को। राष्ट्र का वंदन है, उस उत्सर्ग के उल्लास को॥
राष्ट्र की रग-रग फड़कती, आपके बलिदान से। राष्ट्र प्यारा हो गया है, हम सभी को प्राण से॥ राष्ट्र पर हम भी करेंगे समर्पित हर सांस को। राष्ट्र का वंदन है, उस उत्सर्ग के उल्लास को॥
आपकी गाथा सुनाई जाएँगी, संतान को। और माताएँ भरेंगी सुतों में स्वाभिमान को॥ छू लिया है आपने बलिदान के आकाश को। राष्ट्र का वंदन है, उस उत्सर्ग के उल्लास को॥
आपका परिवार अब राष्ट्रीय धरोहर हो गया। त्याग उसका, राष्ट्र के सम्मुख उजागर हो गया॥ राष्ट्र मुरझाने न देगा, आपके मधुमास को । राष्ट्र का वंदन है, उस उत्सर्ग के उल्लास को॥
आओ! सब मिल, शहीदों को श्रद्धाँजलि अर्पित करें। राष्ट्र के रक्षार्थ, सब कुछ मिटाने का व्रत धरें॥ ताकि जीवित रख सकें, उत्सर्ग के इतिहास को॥ राष्ट्र का वंदन है, उस उत्सर्ग के उल्लास को॥
-मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’