शिष्यत्व का समर्पण आध्यात्मिक जीवन का सौभाग्य शिखर है। बड़े ही पुण्यवान जनों के हृदयों में शिष्यत्व अंकुरित होता है। यह अंकुरण सहज नहीं है। अनेकों जन्मों के तप, व्रत, जप, दान और अनगिन शुभ कर्मों के सुयोग से हृदय भूमि इतनी उर्वर हो पाती है कि उसमें शिष्यत्व अंकुरित हो सके। इस अद्भुत-अलौकिक अंकुरण का बड़े जतन से रख-रखाव करना पड़ता है। एक तरफ साँसारिक विषय-वासना की विपदाओं से बचना पड़ता है, तो दूसरी ओर बड़ी आध्यात्मिक विकलता से सद्गुरु को टेर लगानी पड़ती है। बड़े ही भाव-विह्वल हृदय से उन्हें पुकारना पड़ता है। सद्गुरु की पुकार के अमृत जल से ही शिष्यत्व का यह बिरवा पल्लवित-पुष्पित होता है।
विकसित होते शिष्यत्व में बड़ा ही दैवी आकर्षण होता है। समस्त मानवीय सद्गुण अपने आप ही इस ओर खिंचे चले आते हैं। आध्यात्मिक शक्तियाँ और अनुभूतियाँ, दिव्य लोकों के ऋषि व देवगण अनायास ही इस पर अपनी कृपा वृष्टि करते हैं। लेकिन शिष्यत्व तो बस अपने सद्गुरु के चरणों का चंचरीक होता है। गुरु प्रेम की पुकार उसके प्राणों में बसती है। गुरुभक्ति में उसकी भावनाएँ पलती हैं। गुरुश्रद्धा उसका सर्वस्व होती है। उसे तो बस एक ही धुन रहती है कब मेरे समर्पण को पूर्णता मिलेगी? कब मेरे आराध्य मेरे समूचे अस्तित्त्व को स्वीकारेंगे? कब वह मेरे हृदय की भावनाओं को अपना भवन बनाएँगे?
इस धुन में शिष्यत्व दिव्यता का महाचुम्बकत्व सघन हो जाता है। उसमें न लोक की कोई चाहत बचती है और न परलोक की। अब उसे न कोई कामना सताती है, न कोई वासना। स्वर्ग, मुक्ति, ज्ञान, ध्यान सबके सब गुरु प्रेम में विलीन हो जाते हैं। उसके प्रत्येक कर्म के कौशल में, विचारों के संवेदन में, भावनाओं की विह्वलता में बस समर्पण के स्वर गूँजते हैं। ‘सद्गुरु कृपा हि केवलम्, न हि अन्यत्र में जीवनम्’ प्राणों में बस यही एक गीत पलता है। शिष्यत्व की कोई माँग नहीं होती, उसकी कोई शर्त नहीं होती। वह तो अपने प्रभु पर न्यौछावर हो जाना चाहता है। स्वयं को उन पर लुटा देना चाहता है। उनके प्रत्येक संकेत व आदेश पर सौ-सौ बार जीना-मरना चाहता है। उसके इस समर्पण को पूर्णता देने के लिए परम कृपालु गुरुदेव उसकी अन्तर्चेतना में अवतरित होते हैं। शिष्यत्व में गुरुपूर्णिमा के प्रेरक पर्व की उमंगे बरस जाती हैं।
नैतिकता के यक्ष प्रश्न जीवन में सब तरफ हैं। जीवन का केन्द्र मनुष्य का व्यक्तित्व हो या फिर उसके विस्तार के रूप में समाज, इन कंटीले काँटों के घाव हर कहीं है। इन सवालों के सही और सटीक हल न खोजे जाने के कारण ही परिवार, समूह, समुदाय आदि समाज के सभी दायरों में विघटन एवं अलगाव हुआ है। भारत सहित दुनिया के प्रायः सभी देशों में एक सी स्थिति है। मानवीय जीवन की प्रायः हर संस्था टूट-दरक गयी है। हर देश की सामाजिक संरचना चरमरा गयी है। पुरानी नैतिक स्थापनाओं को नयी पीढ़ी किसी भी तरह स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है। पुरानी पीढ़ी अपने जमाने की नैतिक मर्यादाओं को स्थापित करना चाहती है, लेकिन नयी पीढ़ी इन्हें सिरे से अनुपयोगी बता रही है।
नयी पीढ़ी ने नैतिकता के औचित्य पर नए सवाल उठाए हैं। वह पुरानी पीढ़ी के पुराने पड़ चुके जवाबों से सन्तुष्ट-सहमत नहीं है। बुजुर्गों की यह बात उन्हें रास नहीं आती है कि हमारे बुजुर्गों ने कहा और हमने मान लिया। अब हम तुम्हें समझा रहे हैं तुम मान लो। श्रद्धा और आस्था की यह नैतिक परम्परा युवा पीढ़ी को अर्थहीन लग रही है। उन्हें तर्क और प्रयोगों का अर्थपूर्ण विज्ञान चाहिए। जिसमें उनके द्वारा उठाए गए यक्ष प्रश्नों के वैज्ञानिक हल हों। इस सम्बन्ध में सबसे पहला और केन्द्रीय सवाल है कि भोग के अर्जन और उसके उपभोग की क्षमता के रहते हुए स्वच्छन्द भोग क्यों नहीं? स्वच्छन्द भोग में जब इन्द्रिय सुख सर्वविदित है, तब फिर उसका त्याग किस महत्वपूर्ण सुख के लिए किया जाय?
नैतिकता के इन व्यक्तिगत सवालों के अलावा कई सामाजिक सवाल भी हैं। हालाँकि ये सवाल भी प्रकारान्तर से व्यक्तिगत जिन्दगी से जुड़े हुए हैं। ऐसे-सवालों में सर्वमान्य सवाल है कि जब संयुक्त परिवार व्यक्तिगत सुख में बड़ी ही स्पष्ट रीति से बाधक है, तब फिर उसका बोझ क्यों उठाया जाय? बुजुर्गों की सेवा करने की क्या जरूरत है? इन और ऐसे ही अनेकों यक्ष प्रश्नों का सारभूत तत्व इतना ही है कि नैतिक मर्यादाएँ, नैतिक वर्जनाएँ, नैतिक मूल्य प्रायः सुख-भोग में बाधा ही पहुँचाते हैं, तब ऐसे में उन्हें क्यों ढोया जाय? ये सभी सवाल आज के भारत के हैं, जहाँ के युवा आज धन कमाने के लिए किसी भी नैतिक आचरण की परवाह करने के लिए तैयार नहीं हैं। जहाँ के अफसर व नेता और अधिक धन व और ऊँचे पद के लिए किसी भी महाभ्रष्टता को बड़ी ही आसानी से अंगीकार कर लेते हैं।
नैतिकता के ये यक्ष प्रश्न उस रूप के हैं, जहाँ की बालाएँ भोगवाद की बाढ़ में बेतरतीब बह रही हैं। ये सवाल है जापान के, जहाँ स्कूल व कॉलेज जाने वाली छात्राओं का प्रिय शौक ‘इजोकोसाई’ (एक तरह का देह व्यापार) है। इसे वे अपनी हॉबी मानती हैं। नैतिकता के सवालों के इन कंटीले काँटों की फसल अमेरिका में भी खूब जोर-शोर से लहलहाती हुई झूम रही है। जहाँ पिछले दिनों लॉस ऐन्जिल्स शहर में एक किशोर ने अपने चचेरे भाई के साथ मिलकर केवल शौक के लिए अपनी चाची की हत्या कर दी। वहाँ बेतहाशा बढ़ते उन्मुक्त भोग ने बच्चों का बचपन एवं युवाओं का यौवन छीन लिया है। क्योंकि वहाँ बच्चे यौवन के सुख भोगना चाहते हैं। इस प्रवृत्ति से ग्रसित बचपन जब किशोर अवस्था की दहलीज पर कदम रखता है, तब तक उनकी जीवनी शक्ति उनसे विदा ले चुकी होती है।
इनमें से किसी को वेद वचन या सन्तवाणी पढ़कर समझाया नहीं जा सकता। क्योंकि वे इसे सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। सुकरात का, काण्ट का तत्वदर्शन इनके लिए अर्थहीन है क्योंकि इसमें वे अपने सवालों के सामयिक समाधान नहीं पाते हैं। इनके सवालों के हल के लिए हमें नैतिकता के नए विज्ञान को जन्म देना होगा। जो नैतिकता के अर्थ स्वरूप व उद्देश्य के साथ उसकी समसामयिक आवश्यकता को बड़े ही तर्क पूर्ण एवं प्रयोग सम्मत रीति से सिद्ध कर सके। इस नए विज्ञान की आधारभूत परिकल्पना यह है कि नैतिकता अपने वास्तविक अर्थों में जीवन पथ है, जिसका अन्तिम बिन्दु जीवन का चरम विकास है। जीवन के इस चरम विकास में सभी तरह की शान्ति है, परम आनन्द है और ज्ञान का प्रकाश है। नैतिकता के जीवन पथ से विचलित होने वाले जीवन के इस विकसित स्वरूप की अनुभूति कभी भी नहीं कर सकते।
नैतिकता के सभी यक्ष प्रश्नों के समाधान इस वैज्ञानिक परिकल्पना पर आधारित प्रयोगों में है। इस परिकल्पना के प्रयोगात्मक निष्कर्ष ही आज की युवा पीढ़ी को सार्थक समाधान दे सकते हैं। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इन प्रयोगों की शुरुआत भी कर दी है। इन्हीं में से एक एरिक फ्रॉम हैं। इन्होंने अपने निष्कर्षों को कुछ बिन्दुओं में स्पष्ट करने की कोशिश की है- 1. नैतिकता का औचित्य जीवन के सही स्वरूप बोध से स्वतः सिद्ध हो जाता है। जीवन बोध यदि विकृत है तो फिर नैतिकता की अवहेलना, उपेक्षा मनुष्य का स्वाभाविक कर्म बन जाएगी। 2. सुख भोग के लिए त्यागी जाने वाली नैतिकता का अन्त भयानक व विनाशक दुःखों में होता है। 3. नैतिक मर्यादाओं की अवहेलना करने वाले प्रायः मनोरोगी हो जाते हैं। यदि ऐसा अभी तक नहीं हुआ है, तो आगे ऐसा होना सुनिश्चित है।
एरिक फ्रॉम के ये तीनों निष्कर्ष उसके एक विशिष्ट प्रयोग पर आधारित हैं। अपने इस प्रयोग के लिए उसने विभिन्न किन्तु निश्चित आयु वर्ग के स्त्री व पुरुषों को लिया। इस प्रयोग के लिए पहले सभी को उनके आयु वर्ग के अनुसार अलग-अलग समूहों में बाँटा गया। इनमें से पहले समूह को यह समझाया गया, मनुष्य जीवन का सही स्वरूप व सार्थक रीति-नीति क्या है। इन्हें बताया गया मनुष्य सिर्फ देह और मन तक सीमित नहीं है। उसका केन्द्रीय तत्व आत्मा है। यही यथार्थ में ज्ञान, शक्ति व आनन्द का स्रोत है। परन्तु इसकी अनुभूति के लिए कुछ नीति-नियमों का पालन अनिवार्य है। जिस समूह को यह बात भली भाँति समझायी गयी वे बड़े ही उत्साह से नैतिक आदर्शों के पालन के लिए तैयार हो गए। इस प्रयोग समूह के विपरीत नियंत्रण समूह को नैतिक आदर्श तो बताए गए, परन्तु उन्हें जीवन का सच्चा स्वरूप नहीं समझाया गया। लगभग एक वर्ष तक चले इस प्रयोग के परिणाम यह रहे, कि जीवन का सही स्वरूप समझने वाले प्रयोगात्मक समूह के लोगों ने पूरी नियम निष्ठ के साथ नैतिक आदर्शों का पालन किया। इसके विपरीत कन्ट्रोल ग्रुप या नियंत्रण समूह के लोगों ने नीति-नियमों के पालन में उपेक्षा बरती।
प्रयोग समूह के जिन लोगों ने नैतिक आदर्शों का पालन बड़ी ही सच्चाई व निष्ठ के साथ की, उनकी मनोदशा में काफी गुणात्मक सुधार हुआ। उनके व्यक्तित्व की विभिन्न क्षमताओं में काफी बढ़ोत्तरी हुई। साथ ही कुण्ठा, अवसाद, अपराधबोध आदि विभिन्न मनोव्याधियों में भारी गिरावट हुआ। महिलाओं में यह प्रतिशत 99 व पुरुषों में 90 रहा। एरिक फ्रॉम ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि सम्भवतः महिलाएं आन्तरिक रूप से अधिक संवेदनशील होने के कारण पुरुषों की तुलना में ज्यादा ग्रहणशील होती हैं। इस प्रयोग में विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से यह वैज्ञानिक निष्कर्ष सुस्पष्ट हो गया कि नैतिक आदर्श व्यक्तित्व की विभिन्न क्षमताओं के विकास व प्रायः सभी तरह के मनोरोगों के निवारण में सहायक है।
कन्ट्रोल ग्रुप या नियंत्रण समूह के जिन लोगों ने नैतिक मर्यादाओं की उपेक्षा या अवहेलना की थी उनके व्यक्तित्व की विभिन्न क्षमताएँ घटीं और कुण्ठा, अवसाद व अपराधबोध आदि मनोरोगों में भारी बढ़ोत्तरी हुई। कई तो ऐसे उदाहरण सामने आए कि इस नियंत्रण समूह में जो लोग प्रायः स्वस्थ-सामान्य रह रहे थे, उनमें नैतिकता की भरपूर अवहेलना के कारण विभिन्न मनोरोग अंकुरित होने लगे। इससे यह वैज्ञानिक तथ्य प्रकट हुआ कि नैतिक मर्यादाओं की अवहेलना करने वाले लोगों में प्रायः मनोरोगी होने की सम्भावना रहती है।
एरिक फ्रॉम ने अपने इन प्रयोगों व निष्कर्षों को जब ‘मॉरल वैल्यूज एण्ड मेन्टल डिसऑडर्स’ के नाम से शोध पत्र के रूप में प्रकाशित किया, तो युवाओं में भारी हलचल मची। भारी संख्या में विश्व भर के युवा नैतिक आदर्शों को अपनाने के लिए उन्मुख हुए। उनमें से कुछ एक ने कहा कि उन्होंने नैतिकता के सम्बन्ध में जो प्रश्न उठाए थे, अब उनका समाधान होने लगा है। युवा वर्ग के विश्व-व्यापी सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष सामने आया कि नैतिकता के यक्ष प्रश्नों के समाधान के लिए तत्वदर्शन के सिद्धान्त नहीं वैज्ञानिक प्रयोग आवश्यक हैं। इन्हीं के निष्कर्षों से सभी सार्थक समाधान मिलेंगे।
उपनिषदों की बहुश्रुत श्रुति ‘पूर्णमदः पूर्णमिदम्’ में चेतना का स्वरूप बोध है। ऋषि कहते हैं, चेतना वह हो या यह, ईश्वरीय हो अथवा मानवीय सभी अपने रूपों में पूर्ण है। सभी तरह से पूर्ण ईश्वरीय चेतना की अंश जीव चेतना अपूर्ण नहीं हो सकती। क्योंकि ‘पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते’- पूर्ण से पूर्ण निकालने पर पूर्ण ही बचता है। ऋषि की इस आध्यात्मिक अनुभूति की झलक वैज्ञानिक अपने प्रयोगों में भी पाने लगे हैं। शोध अनुसन्धान की साधना में उन्हें यह अनुभव होने लगा है कि प्रकृति हो या पदार्थ सभी में परम पूर्ण की पूर्णता समायी है। खण्ड में भी अखण्ड ही झिलमिल झलकता है।
वैज्ञानिकों को इस सत्य का साक्षात्कार होलोग्राफिक मॉडल विकसित करते समय हुआ। दरअसल यह बहुत उच्च स्तरीय फोटोग्राफिक तकनीक है। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार होलोग्राम त्रिआयामी-त्रिपार्श्व छाया चित्र है, जो लेज़र किरणों से बनता है। यह छाया चित्र सामान्य छाया चित्रों से बहुत अलग और अद्भुत है। अब जैसे एक सेव का होलोग्राफ लिया जाय, तो इसमें सेव का त्रिआयामी चित्र उभरेगा। इस त्रियाआमी चित्र वाली फिल्म के दो टुकड़े कर लिए जाय तो हर टुकड़े में पूरे सेव का साफ चित्र दिखाई पड़ेगा। इस चित्र वाली फिल्म को भले ही चार, आठ, सोलह, बत्तीस आदि टुकड़ों में बाँटा जाय तो भी इसके प्रत्येक टुकड़े में सेव का वही सम्पूर्ण चित्र दिखाई देगा। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि होलोग्राफी पारदर्शिता से युक्त हर एक टुकड़े में सेव का समग्र बिश्ब होता है।
यह बात कुछ ऐसी है, जैसे आसमान के चाँद का बिम्ब नदी के जल के विस्तार में अपनी सम्पूर्णता से प्रकट होता है। लेकिन यदि नदी के थोड़े से पानी को यदि कई छोटे-छोटे घड़ों में भर लें, तो उन घड़ों में भी चन्द्रमा का सम्पूर्ण बिम्ब उभरेगा। पानी के इस बंटवारे से चन्द्रमा की छबि नहीं बटेगी। होलोग्राफी का सिद्धान्त भी कुछ ऐसा ही है। विज्ञानवेत्ता फ्लाइड का कहना है कि साधारण चित्रों में सूचनाओं के समूह काफी बिखरे होते हैं। इसलिए उसके किसी एक टुकड़े से समग्रता उभरती नहीं है। जबकि होलोग्राफिक रीति से लिए गए चित्र में सब कुछ एकमएक होता है। इसीलिए उसके सूक्ष्मता के अंश में भी सम्पूर्णता के दर्शन होते हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘फील्ड प्रॉपर्टी’ कहते हैं। यह गुणवत्ता भौतिक विज्ञानियों ने पदार्थ में भी खोज निकाली है। क्वाँटम सिद्धान्त के प्रवर्तक अब अणु में विभु के दर्शन को कल्पना नहीं सम्पूर्ण वैज्ञानिक सत्य मानते हैं। विज्ञानवेत्ताओं का मानना है कि यह होलोग्राफिक सिद्धान्त हमारे अपने जीवन एवं विचारों की संरचना में भी लागू होता है।
विज्ञान मनीषी स्टेनले आर. डीन ने इस होलोग्राफिक सिद्धान्त का साम्य भारत देश के ऋषियों की आध्यात्मिक दृष्टि से स्थापित किया है। उनके अनुसार इनमें काफी कुछ समानता व साम्य है। वह कहते हैं कि आध्यात्मिक साधनाओं के फलस्वरूप मिली जीवन दृष्टि होलोग्राफ प्रयोगों के निष्कर्षों की भाँति है। क्योंकि इस दृष्टि से जीवन व पदार्थ के कण-कण में चेतना की सम्पूर्णता, अविभाज्यता व अखण्डता बड़ी साफ-साफ दिखती है। इस दृष्टि से यह सच्चाई बड़े ही साफ तौर पर उजागर होती है कि बंटवारा पदार्थ का हो सकता है, चेतना का कदापि नहीं। गीता के महोपदेशक भगवान श्रीकृष्ण के शब्दों में- जो नष्ट हुआ, जिसका रूप बदला वह तो पदार्थ है। चेतना तो ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ देह कलेवर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती। यहाँ तक कि देह में वास करती हुई दैहिक सीमाओं से पार व परे है।
पश्चिमी दुनिया के बड़े ही प्रख्यात दार्शनिक ज्ञान में एक नए युग के प्रवर्तक लुडविग विटगेंस्टाइन को भी एक समय इसी ज्ञान का अनुभव हुआ था। ज्ञान की इस अनुभूति से वह आनन्द विभोर हो गए। उन्होंने अपने मित्रों परिचितों से कहा कि ‘मैं-पन’ की सभी बातें बेकार हैं। जो तुम हो, वही मैं हूँ। और जो मैं हूँ वही तुम हो। रोज-रोज मर रहे, बदल रहे इस झूठे शरीर को भेद का आधार मानना बेकार है। सभी पूर्ण है और सभी में वही अविभाज्य चेतना है। अपनी इस भावानुभूति के बाद युग प्रवर्तक दार्शनिक विटगेंस्टाइन ने दर्शनशास्त्र में एक नए तर्क की स्थापना की। उन्होंने कहा कि ‘मैं’ शब्द को दार्शनिक ज्ञान से हटा देना चाहिए। क्योंकि इससे झूठा और कोई शब्द ही नहीं है। यदि किसी मैं की अनुभूति हो सकती है तो सिर्फ एक समष्टि मैं की। कई मैं तो हो ही नहीं सकते। चेतना की भौतिक परिमाप करना सम्भव नहीं है। यह सर्वव्यापी और अनन्त है। मजे की बात है कि ऐसा होते हुए भी सभी में एक साथ, मनुष्यों में ही नहीं सृष्टि के प्रत्येक जीव में, प्रकृति व पदार्थ के प्रत्येक कण में यह अपने सम्पूर्ण रूप में अनुभव होती है।
विज्ञानवेत्ताओं को चेतना की यह दार्शनिक पहेली इन दिनों बड़ी रुचिकर लग रही है। वे इसे हल करने के लिए कई तरह के प्रयोग कर रहे हैं। इनमें से कइयों ने तो अपने प्रयोगों व शोध-अनुसन्धान की प्रक्रियाओं का आधार भारत देश के उपनिषद् ज्ञान को बनाया है। ऐसे ही एक वैज्ञानिक जे.ए. एशबी हैं। उन्होंने चेतना के कई रहस्यों को उजागर करने वाली एक किताब लिखी है, ‘होलोग्राफिक मॉडल ऑफ काँशियसनेस’। इस पुस्तक में प्रो. एशबी का कहना है कि पहेलियों जैसी लगने वाली उपनिषदों की श्रुतियाँ, दरअसल भारत के प्राचीन ऋषियों के गहन प्रयोगात्मक निष्कर्ष हैं। उन्होंने चेतना के बारे में हजारों साल पहले जो तथ्य उजागर किए थे, अब वे होलोग्राफिक सिद्धान्तों के वैज्ञानिक उजाले में प्रमाणित होने लगे हैं।
प्रो. एशबी ने अपने शोध-अनुसन्धान के प्रयोगों व इनके निष्कर्षों के क्रम में चेतना की अभिव्यक्ति की कई भावी सम्भावनाएँ जतायी हैं। कई विज्ञानवेत्ता इन्हें असम्भव सम्भावनाएँ मानते हैं। लेकिन जार्ज एशले एशबी का कहना है कि किन्हीं भी सम्भावनाओं को असम्भव कहना वैज्ञानिक सिद्धान्तों की मौलिक प्रकृति के विरुद्ध है। सच्ची वैज्ञानिकता जीवन व प्रकृति की सभी सम्भावनाओं को विकसित करके, उन्हें सार्थक अभिव्यक्ति देने व मूर्त रूप करने का प्रयास-पुरुषार्थ है। एशबी के अनुसार कोई भी मनुष्य अपनी अन्तर्चेतना को पुष्ट-परिपक्व व सक्षम बनाकर स्वयं को एक साथ अनेकों स्थानों पर अभिव्यक्त कर सकता है। अनेक स्थानों पर एक साथ उपस्थित होने पर भी उसकी चेतना की सम्पूर्णता में कोई भी फर्क नहीं पड़ेगा।
अपने इस तर्क को पुष्ट करने के लिए प्रो. एशबी ने तिब्बत जाकर कई आध्यात्मिक साधकों से मिलने वाली मैडम अलेक्जेण्डरा नील की पुस्तक में उल्लेखित कई प्रमाणों का हवाला दिया है। मैडम नील ने तिब्बत के कई दुर्गम स्थानों की साहसिक यात्राएँ कीं। वहाँ की गहन-गुफाओं में रहने वाले कई आश्चर्यजनक साधकों से वह स्वयं मिलीं। यहाँ तक कि वहाँ कुछ काल तक रहकर स्वयं भी साधनाएँ कीं। इसके बाद सभी तरह के संस्मरणों को लिपिबद्ध किया। ये संस्मरण उनकी कई कृतियों में प्रकाशित हुए। ऐसी ही एक कृति का नाम है- ‘माई जर्नी टु तिब्बत’। यह पुस्तक चेतना की आश्चर्यजनक सम्भावनाओं का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।
इस पुस्तक में तिब्बत के तवाँग मठ में साधना करने वाले शियात्सान राम्पा नाम के एक लामा का उल्लेख है। यह लामा आश्चर्यजनक आध्यात्मिक शक्तियों व विभूतियों का स्वामी था। मैडम नील का कहना है कि शियात्सान राम्पा नाम का यह लामा साधु अपने मठ में समाधिस्थ रहते हुए भी कई स्थानों पर एक साथ प्रकट हो सकता था। मैडम नील ने विभिन्न तरीकों के इसके प्रमाण भी जुटाए। जहाँ-जहाँ पर वह प्रकट हुआ, वहाँ एक साथ, एक ही समय किन्तु अनेक स्थानों पर उसके स्पर्श व आशीष की अनुभूति पायी। मैडम नील के अनुसार ऐसा वह अपने सूक्ष्म शरीर को विभाजित करके करता था। उसका यह विभाजित सूक्ष्म शरीर अपने संकल्प बल से कहीं भी स्थूल शरीर का निर्माण करके प्रकट हो जाता था। लेकिन सभी जगह उसकी चेतना सर्वथा अविभाज्य रहती।
सुविख्यात वैज्ञानिक जार्ज एशले-एशबी, अलैक्जेण्डरा नील के इस संस्मरण से सहमत हैं। उनका कहना है कि आध्यात्मिक प्रयोगों से यह सम्भव है। एशबी के अनुसार वैज्ञानिक सिद्धान्तों से सूक्ष्म शरीर के विभाजन की रीति तो अभी तक पता नहीं चल सकी है। पर होलोग्राफिक सिद्धान्त से किसी भी रूप में चेतना की सम्पूर्णता की स्थिति स्पष्ट है। जार्ज एशले कहते हैं कि चेतना की अभिव्यक्ति कितने ही स्थानों पर कितनी ही तरह से क्यों न हो, पर वह रहती सदा ही अखण्डित और अविभाज्य है। उनका मानना है जो सम्पूर्णता के इस रहस्य को जानते हैं, वही चेतना के सत्य को समझते हैं। सभी आध्यात्मिक साधनाएँ सिद्धान्त, प्रयोग व उनके निष्कर्षों में गहरी वैज्ञानिकता है। जो भविष्य में दिनों-दिन स्पष्ट होती जाएगी।
क्या आप मीनल से परिचित हैं? जवाब में शायद आप सवाल करेंगे- यह मीनल कौन? आपका यह सवाल बिल्कुल वाजिब है। यहाँ पर मीनल की बजाय सोनल या रूपल के बारे में बात की गयी होती तब भी आप कुछ इसी तरह अपनी जिज्ञासा जताते। चलिए कोई बात नहीं, उसका नाम कल्पना, कामना, सरिता, सरस्वती कुछ भी हो सकता है। वह तो बस भारत देश की है। इसी देश के किसी शहर या गाँव की रहने वाली है। उसे थोड़ा बहुत जानने के बाद मन दर्द से बेचैन हो उठा। हो सकता है उसके बारे में कुछ सुनने के बाद आपको भी उसकी टीस और कसक का अहसास हो सके।
तो, मीनल छब्बीस-सत्ताईस साल की, दुबलेपन के निजी सौंदर्य में पगी स्त्री है। हालाँकि उसकी उम्र इतनी लगती नहीं। शायद उसका विवाह हो गया होता, गृहस्थी बस गयी होती, तो हो सकता है वह कुछ भरी-पूरी लगती। उसके चेहरे पर अब तक तृप्ति की आभा तैर रही होती। पर अब तो वह कुछ गुम-सुम सी, अपनी अंतर्संवेदनाओं में डूबती-तैरती, कामकाज की कर्मठता में थोड़ा भूली-बिसरी सी लगती है। कपड़े वह बहुत ही सलीके से पहनती है, पर होते ये बेहद सादे हैं। जो महंगे वस्त्रों को ही सुन्दर कहने व समझने के आदी हैं, उन्हें शायद उसके कपड़े ढंग के न लगे। वैसे उसकी इस सादगी के संवरेपन में बहुत कुछ ऐसा झलकता है, जो उसके भावुक, हुनरमन्द, घर-गृहस्थी के कामों में कुशल, सेवा भावी, बुद्धि-विवेक से सम्पन्न होने की बात बता ही देता है। जिसके अन्दर थोड़ी सी भी मानवीयता अभी कहीं किसी कोने में बची हुई है, वे उस पर एक नजर डाल कर उदास हो जाते हैं। उनकी यह उदासी प्रायः खुद की इस असहायता के अहसास के कारण होती है कि मैं इस सम्भावनाशील लड़की के लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूँ।
उम्र के तीसरे दशक को पूरा करने के लिए हर साल कदम-दर-कदम बढ़ाने वाली इस लड़की को यदि अनुकूल परिस्थितियाँ मिली होती, तो उसके व्यक्तित्व की न जाने कितनी सम्भावनाएँ उजागर हो गयी होती। प्रतिभा के हिसाब से यदि उसे पढ़ने की सुविधाएँ मिलती, तो वह एक अतियोग्य चिकित्सक, कुशल वैज्ञानिक या फिर आसमान की ऊँचाइयों को छूने वाली पायलट अथवा एम.बी.ए., सी.ए. कुछ भी हो सकती थी। यह भी हो सकता था कि उसके पिता किसी समृद्ध घराने में उसकी शादी कर देते। पर ऐसा हो नहीं सका। दुःखों, दुर्घटनाओं, कष्टों, कठिनाइयों, कृपाओं, असुविधाओं और अनचाहा जीवन जीने के लिए भी कठिन संघर्षों में, जिसे बचपन से अब तक की उम्र तय करनी पड़ी हो, उसकी भावनाओं को तो ठीक-ठीक शायद भावमय भगवान ही समझें।
हालाँकि मीनल की असली पहचान वह नहीं है, जिसके खुरदरे हस्ताक्षर काल ने उसके जीवन पर बनाए हैं। यह सब तो उस राह की परछाइयाँ भर हैं, जिस पर उसे नंगे पाँव चलने के लिए विवश होना पड़ा है। इस बारे में तो अनुभवी जन बड़ी विनम्रता से यह भी कह देते हैं कि वास्तव में यही कठिनाइयों का अखिल भारतीय मार्ग है। जिस पर चलने से पाँव में छाले पड़ ही जाते हैं। जो रिसते हैं, फूटते हैं, टीसते हैं, लेकिन उसी रफ्तार से नए बनते रहते हैं। हालाँकि सरकारी आँकड़ों के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे का जीवन गुजारने वालों की संख्या लगातार घट रही है। हो सकता है ये सरकारी बातें पूरी तरह से सच हों, पर इन्हीं के साथ एक सच यह भी है कि मानवीय चेहरों से खुशी लगभग गायब सी है। शायद यह खुशी आह्लाद और सन्तुष्टि भारत देश में तब थोड़ा व्याप्त थी, जब पहले-पहल अंग्रेज इस देश में आए थे। लेकिन मीनल के मन में पीड़ा के घन कुछ ज्यादा ही सघन है। उसकी कथा, उन असंख्य भारतीय नारियों से मेल खाती है, जिसके बारे में विवेकानन्द बिलख उठते थे, गाँधी जी जिसकी अनुभूति से छटपटा जाते थे। हालाँकि इस मीनल की कथा में कुछ और भी तत्त्व हैं, जो इस प्रभूत मात्रा में और इस प्राञ्जलता के साथ हर कहीं नहीं मिल पाते।
मीनल की वेदना से भीगी और स्वाभिमान से चमकती आँखों की भावुक तरलता में भारतीय नारी जीवन की एक पूरी पुस्तक समायी है। उसकी भावुक तरलता की प्रत्येक बूँद इस पुस्तक का एक पन्ना है। इस पुस्तक के बहुत से पन्नों को पढ़ने और उससे ज्यादा पन्नों को पढ़ने का साहस न कर पाने के बाद मन में एक अलग और खास तरह के विचलन का अनुभव होता है। जो इस भयावह भूचाल जैसे विचलन को महसूस नहीं कर पाते, शायद उन्हीं के लिए क्रूरता जैसा शब्द गढ़ा गया होगा।
मीनल की सादगी व सरलता के हर कण में उसकी बौद्धिक सजगता व प्रखरता झलकती है। उसमें व्यावहारिक बुद्धि भरपूर है। वह किसी भी परिस्थिति या घटनाचक्र के तार्किक ब्यौरे को आत्मसात करने में उतना ही समय लगती है, जितना की पलकों को एक बार उठाने या गिराने में लगता है। इसका एक कारण तो यह है कि जब उसने अपनी आस-पास की स्थितियों, घटनाक्रमों के प्रति होश सम्भाला है, तब से कई तरह के लोग और कई तरह की परिस्थितियाँ उसके सामने कई तरह की पृष्ठभूमि की नयी-नयी पोशाक बदल कर आती रही है। इसका मतलब यदि केवल यह लगाया जाय कि उसने अब तक केवल मनुष्यता का कृष्णवर्णीय छुद्र चेहरा देखा है, तो बात ठीक से समझी नहीं गयी। उसने बड़े-छोटे और मझोले आकार के देवमानव भी देखे हैं। यदि ऐसा न होता तो शायद अपनी भारत माता की गोद में बसे इस शहर या गाँव में वह इतना लम्बा अरसा न गुजार पाती।
पेंशन से गुजर-बसर जुटाने वाले बूढ़े पिता और छोटे-छोटे दो भाइयों की समय-कुसमय मदद कैसे कर पाती? दुःख के सघन घन हमारी अन्य क्षमताओं को कितना माँज पाते हैं, मालूम नहीं। पर बुद्धि को धारदार और पैना बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। खासतौर से जब इन दुःखों से मुलाकात छुटपन से ही शुरू हो जाय। यह बात मानी जा सकती है कि ये व्याख्याएँ एकदम पूरी तरह से ठीक नहीं हो सकती। क्योंकि कई बार बहुतेरे लोग दुःखों के बीच अपनी बौद्धिक धार खो भी देते हैं। पर सही कहें तो यह सब दुःख से ज्यादा अपने आप पर निर्भर है। जहाँ तक मीनल की बात है तो दुःख भरी परिस्थितियों ने उसकी बुद्धि पर धार ही चढ़ाई है। यह सब उसके विधेयात्मक चिन्तन का परिणाम भी माना जा सकता है।
मीनल इसलिए भी अपने आस-पास की लड़कियों या युवतियों में काफी अलग दिखाई देती है, क्योंकि उसने अब तक की अपनी जिन्दगी के किसी भी पड़ाव को अपना भाग्य नहीं माना। उसने अपने कर्मठ पुरुषार्थ को किसी भी सीमाओं में कैद नहीं किया। उसका सदा से यही सोचना रहा है कि भवत्कृपा एवं पुरुषार्थ के सुयोग-संयोग से कुछ भी सम्भव है। बारह-तेरह साल की आयु में ही उसकी माँ की असमय मृत्यु हो गयी। दरअसल घर में इतना पैसा ही नहीं था कि उनका सही इलाज हो सके। माँ की मौत के बाद उसके पिता गलते-घुलते चले गए। बीमारी के चलते उन्हें भी नौकरी से अवकाश लेना पड़ा। पूरा परिवार तहस-नहस होने की कगार में पहुँच गया।
लेकिन उसने आँसुओं के उमड़ते रेले को पलकों के बहुत भीतर तक धकेल दिया। ताकि वे उसकी राहों को धुँधला न कर पाएँ। उसने हिम्मत करके दिन में पढ़ाई और बाकी समय कई तरह के काम व नौकरियाँ करते हुए अपनी पढ़ाई का खर्चा तो निकाला ही, अपने छोटे भाइयों को भी किसी हीन भावना से घिरने नहीं दिया। उनके लिए भी स्कूल और पढ़ाई की व्यवस्था जुटायी। किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय में अपना नाम लिखाने की तो वह सोच भी नहीं सकती थी। क्योंकि कॉलेज के ही घण्टे तो उसके काम के घण्टे होते हैं। इन्हीं में तो वह अपने परिवार की रोजी-रोटी चलाती है। इसीलिए उसने सारी पढ़ाई पत्राचार से पूरी की। आज उसके पास हिन्दी साहित्य में एम.ए. का उपाधि पत्र है। जिसे वह बड़ी हसरत से देख लेती है। एम.ए. की यह उपाधि उसने कितनी तकलीफों से पायी, इसे वही जानती है। इस डिग्री के अलावा उसने पत्रकारिता का पाठ्यक्रम भी किया हुआ है।
निश्चित ही वह कुशाग्र बुद्धि है, दायित्व बोध उसमें भरपूर है। हाथ में लिए हुए काम में वह अपने को पूरी तरह होम देती है। समय की पाबन्दी, प्रत्युत्पन्नमति व अभिव्यक्ति की क्षमता उसमें गजब की है। संक्षेप में इस उम्र में जो मानसिक, बौद्धिक एवं भावनात्मक सौंदर्य होना चाहिए, वह उसमें पूरा-पूरा है। उसने इसे निखारने में कोई कोताही नहीं की है। जीवन मूल्यों के साथ उसने कहीं भी कोई छोटा सा भी समझौता नहीं किया है। सामान्य तौर-तरीकों के हिसाब से अब तक उसे व्यवस्थित हो जाना चाहिए था, उसकी शादी हो जानी चाहिए थी, परन्तु यह सब होता कैसे? उसके परिवार के पास दहेज की रकम जुटाने की सामर्थ्य जो नहीं है। योग्यता, लगन व आत्मविश्वास के बावजूद सिफारिश न होने के कारण कोई ढंग की नौकरी भी नहीं है। बस जैसे-तैसे एक साधारण सी फर्म में नौकरी कर रही है। वैसे वर्तमान काल का यह वाक्य सिर्फ अगले एक महीने तक ही टिकाऊ है। क्योंकि अगले चार हफ्तों में उसे दूसरी नौकरी ढूंढ़ने के लिए कह दिया गया है।
क्यों? क्योंकि वह अपने स्वाभिमान के साथ शील की रक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध है। स्वाभिमान एवं शील को घर पर छोड़ कर दफ्तर आने की शर्त उसने मान ली होती तो सम्भव था कि वह हजारों रुपये की महंगी साड़ी पहनती और अपनी निजी कार चलाते हुए दफ्तर पहुँचती। लेकिन उसे तो अपनी भारतीय नारी की गरिमा को हर हाल में बचाए-बनाए रखना है। इसी को उसकी सबसे बड़ी कमी माना जाता है। मीनल सोचती है कि यह कैसी बात है कि भारत देश में भारतीय नारी के मूल्यों को उसकी सबसे बड़ी कमी माना जा रहा है। झूठ, कपाट, अन्याय व अवसरवाद से वह छूत की बीमारी की तरह बचती है। इसे भी उसकी कमी समझा जाता है।
कमी गिनाने वाले उसकी एक कमी और गिनाते हैं कि उसे अंग्रेजी नहीं आती। ऐसा नहीं है कि मीनल को अंग्रेजी से बैर है। ग्रेजुएशन में उसने अंग्रेजी ली थी। जरूरत पड़ने पर वह अंग्रेजी बोल भी लेती है। और जब वह अंग्रेजी बोलती है तो वह अंग्रेजी उच्चारण एवं व्याकरण दोनों ही दृष्टि से शुद्ध होती है। फिर भी वह सामान्य क्रम में हिन्दी बोलना पसन्द करती है। अपने हिन्दी अनुराग के कारण ही उसने एम.ए. हिन्दी साहित्य में किया था। लेकिन अब तो अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति यह अनुराग उसके लिए पत्थर की तरह भारी बोझ बन गया है। जो न पानी में निर्बाध तैरने देता है, न सतह पर टिकने देता है, बस नदी की तलहटी में पूरे जोर से दबाए हुए है।
इस राष्ट्र भाषा अनुराग के कारण मीनल के अन्य सभी गुण दो कौड़ी के बने हुए हैं। शहर तो शहर गाँव में भी उसकी कोई इज्जत नहीं है। क्या कहें भारत के उन शहरों व गाँवों को जहाँ मीनल के लिए कोई जगह नहीं है। वह सोचती है कि क्या उस देश को स्वतंत्र कहा जा सकता है, जहाँ गुलामी के दौर में सीखी हुई दूर देशों की एक भाषा ने यहाँ की स्वतंत्रता पर अपना पूरा आधिपत्य एवं अधिकार जमा रखा हो। मीनल कहती है कि इससे तो अच्छा यही है कि भारत गूँगों का देश बन जाए। वाणी में ही लोकतंत्र नहीं होगा, तो भला विचारशील विद्वान बतायें कि यह कहाँ होगा? पाँच प्रतिशत लोगों की अंग्रेजियत 95 प्रतिशत लोगों की भाषाओं और भावनाओं को कुचलकर रख दिया है। अंग्रेजियत के पश्चिमी तौर तरीकों से कुचले जा रहे भारतीय जीवन मूल्यों, भारतीय नारी की गरिमा के नष्ट होने के अपराध को भारतीय दण्ड विधान में क्यों नहीं शामिल किया गया? क्या इसीलिए कि यह दण्ड विधान भी अंग्रेजी में लिखा हुआ है?
मीनल के सवाल कई हैं। उसका दर्द राष्ट्रीय भावनाओं का दर्द है, उसकी पीड़ा नारी शील को विद्रूप नजरों से घूरे जाने की पीड़ा है। वह कोई बहुत बड़ा धन या मान नहीं चाहती है। बस अपने भारत देश के किसी शहर या गाँव में इस देश के साँस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप जीना चाहती है। नारी की सम्पूर्ण मर्यादा, गरिमा व संवेदना को किसी भी कीमत पर अपने जीवन से अलग नहीं करना चाहती है। लेकिन लज्जा की बात यह है कि इतने सम्पन्न अवसर, बहुल और इतनी विविध गतिविधियों वाले देश में उसके लिए एक छोटी सी शालीन जगह नहीं मिल पा रही है। मीनल दुःखी है, वह कहती है कि यह मामला अकेले उसका नहीं, सभी भारतीय नारियों का है। जिनके लिए उचित जगहें पैदा करने के लिए इस देशवासियों को विश्वकर्मा बनना होगा। यहाँ बहुत कुछ तोड़ कर नया गाँव, नया शहर और नया देश बनाना होगा। जहाँ मीनल सहित सभी भारतीय नारियों की गरिमा व राष्ट्रीय भावनाएँ सुरक्षित हों।
कोतवाल को दादू महाराज से मिलना था। रास्ते में एक आदमी मिला, जो सड़क के काँटे साफ कर रहा था।
उससे पूछा, क्यों रे, दादू महाराज कहाँ रहते हैं? दादू जी ने इशारे से बता दिया कि सामने वाली झोंपड़ी उन्हीं की है।
रूखा जवाब सुनकर कोतवाल नाराज हुए और गाली देते हुए झोंपड़ी पर चले गए। सिर पर काँटे का गट्ठा लादे दादू पहुँचे, तो कोतवाल को गाली देने का दुःख हुआ और क्षमा माँगी। दादू ने कहा, इसमें आपका कोई दोष नहीं। दोष उस पूर्वाग्रह भरी आपकी मनुष्य संबंधी मान्यता का है, जो आपके मुख से ऐसे वचन निकालती है। मनुष्य मात्र में आप ईश्वर को देखने लगेंगे, तो आदत स्वतः छूट जाएगी।
देखने वाला थोड़ा चौंका। उसने सोचा, यह तो सम्भव नहीं है। भला कहीं ऐसा भी हो सकता है। जरूर यह मेरी आँखों का धोखा है। देखने वाला तेज गति से भागी जा रही अपनी कार पर बैठा हुआ था। एकदम चमचम करती हुई विदेशी मॉडल की बड़ी गाड़ी थी। वह कार वैभव के उत्कर्ष का प्रतीक लग रही थी। उसमें बैठने वाला व्यक्ति भी वैभव का प्रेमी लगता है। बनारस की सड़कों पर जब वह अपनी इस विदेशी कार में बैठकर पूरी शान से निकलता तो सड़क पर चलने वालों की नजरें बरबस उसकी इस शानो शौकत पर ठहर जातीं। पर आज तो कुछ उलटा ही हुआ। उसकी स्वयं की नजरें ही कहीं ठहर गयी थीं।
उसने अपने ड्राइवर से कहा, गाड़ी को थोड़ा पीछे ले लो। और सड़क के किनारे पर रिक्शे पर बैठे हुए जो बाबू जी जा रहे हैं, उनके पास गाड़ी रोक दो। ड्राइवर इस अचानक आदेश पर थोड़ा अचकचाया तो सही, पर आज्ञा के मुताबिक गाड़ी पीछे ले ली। थोड़ी ही देर बाद चमचम करती हुई वह विदेशी कार उस साधारण से पुराने रिक्शे के पास जाकर खड़ी हो गयी। कार में बैठे हुए सज्जन अपनी उस चमचमाती गाड़ी से बाहर निकले और रिक्शे पर बैठे हुए एक प्रौढ़ आयु के व्यक्ति को सम्बोधित करते हुए बोले- आचार्य जी आप! उसके इस सम्बोधन में सम्मान मिश्रित आश्चर्य था।
जिन्हें उसने आचार्य जी कहा था, वह थोड़ा मुस्कराए। साथ ही प्रश्न के उत्तर में सहज ही प्रतिप्रश्न किया- हाँ भाई मैं क्यों नहीं? पर जहाँ तक मुझे मालूम है, आप इन दिनों बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। विश्वविद्यालय की ओर से आपको एक नयी कार मिली हुई है। ऐसे में आप एक पुराने से रिक्शे में बैठकर जा रहे हैं। भला यह कहीं आपको शोभा देता है? लोग क्या सोचेंगे? अरे भई, इतने सारे सवाल एक साथ। रिक्शे में बैठे हुए सज्जन हंसते हुए बोले, चलिए मैं आपके प्रश्नों का समाधान कर देता हूँ। पहली बात यह कि मैं महामना मालवीय जैसे ब्रह्मर्षि द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय का कुलपति हूँ। मुझ पर उनके ऋषि चिन्तन के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है। सादगी व संयम के ऋषि आदर्श को निभाना मेरा दायित्व है। इसलिए मुझे यही शोभा देता है। रही बात लोगों के सोचने की, सो उनमें से जो विचारशील होंगे, सो ठीक ही सोचेंगे। और विचारहीनों की कभी परवाह नहीं की जानी चाहिए।
पर.....। पूछने वाला कोई नया सवाल पूछ पाता, इससे पहले आचार्य जी कहने लगे, परेशान मत होइए मैं सारी जिज्ञासाओं का समाधान कर दूँगा। आप जिस नयी कार की बात कह रहे हैं। यह ठीक है कि मुझे मिली है। पर मैंने उसका अतिथियों को लाने-ले जाने के लिए उपयोग करने का निश्चय किया है। लोग मुझे यानि कि आचार्य नरेन्द्र देव को एक समाजवादी चिन्तक के रूप में भी जानते हैं। समाजवादी वह है जिसकी जीवन दशा में सामाजिक दशा की झलक मिलती है। ऐसे में भला मैं ठाठ-बाठ किस तरह से बना सकता हूँ।
आचार्य नरेन्द्र देव जी कार वाले सज्जन को अपने जीवन के सत्य से अवगत करा रहे थे। उन्होंने कहा- किसी भी आचार्य का वैभव तप और विद्या है। फिर मैं तो कुलपति यानि की आचार्य कुल का मुखिया हूँ, उस पर इस आचार्य कुल यानि कि विश्वविद्यालय की स्थापना महामना जैसे महान् ऋषि ने की है। इतना ही नहीं मैं अपने को समाजवादी भी कहता और मानता हूँ। इस कारण मुझ पर एक साथ अनेक आदर्शों को निभाने की जिम्मेदारी है। इसलिए मेरे लिए कार नहीं रिक्शा ही ठीक है।
सुनने वाला नतमस्तक हो गया। हालाँकि वह आचार्य जी के साहित्य व विचारों से पहले से ही परिचित था। पर आज उनके विचारों की इस जीवन्तता को अनुभव करके उसे ऐसा लगा कि किसी महर्षि से मिलन हुआ है। उसने बड़े ही श्रद्धा भाव से उनके चरण छुए और अपने गन्तव्य की ओर चल पड़ा।
ध्यान में निमग्न होना हर साधक की चाहत है। हालाँकि इसमें विघ्न-बाधाएँ बहुत हैं। अनेकों व्युत्थान-व्यतिरेक इस चाहत को पूरा होने नहीं देते। मन बार-बार डोलता-डगमगाता है। अपने डोलने-डगमगाने के अनगिन कारण गिनाता है। जितना उसे स्थिर करने का प्रयास किया जाता है, उतना ही वह पत्ते की तरह काँप-काँप उठता है। कल्पनाओं, कामनाओं के झोंके उसे इधर-उधर उड़ाते रहते हैं। तर्क और विचारों के जाल में यह फँसा-उलझा रहता है। छूटने की हर कोशिश इसे और भी ज्यादा उलझा देती है। परिणाम, ध्यान साधना की परेशानी बन कर सामने आता है। इस परेशानी से उलझे साधक बार-बार यह सवाल करते हैं- मेरा ध्यान नहीं लगता? क्यों नहीं लगता? किस तरह लगेगा? इन सभी सवालों का एक ही जवाब है कि साधकों को ध्यान साधना की सच्चाई को जानना होगा। उसके सत्य और तत्त्व की अनुभूति करनी होगी। इस अनुभूति की प्रगाढ़ता में ही उन्हें अपने प्रश्नों के हल मिलेंगे।
प्रायः सोचा जाता है कि ध्यान कोई क्रिया है, उसे करना पड़ता है। पर दरअसल ध्यान क्रिया नहीं अवस्था है। अपने स्वरूप में होने की स्थिति है। पूरी तरह से क्रियाहीन एक भावदशा है। किसी भी क्रिया में हम अपने से बाहर के जगत् से सम्बन्धित होते हैं। अक्रिया में स्वयं से सम्बन्धित होते हैं। जब हम कुछ भी नहीं कर रहे हैं, तब हमें उसका बोध होता है जो कि हम हैं। अन्यथा, ढेरों क्रियाओं में फँसे उलझे हम स्वयं से अपरिचित रह जाते हैं। कभी यह याद भी नहीं आ पाता है कि हम भी कोई हैं। हमारी रोज-मर्रा की व्यस्तताएँ बहुत सघन हैं। शरीर दो क्षण विश्राम कर भी ले, लेकिन मन तो विश्राम करता ही नहीं है। जागते हुए सोचते हैं, सोते हुए स्वप्न देखते हैं। अपनी ही क्रियाओं की भीड़ में हम खो गए हैं। यही हमारे जीवन का आश्चर्यपूर्ण सत्य है। यही अपनी वस्तुस्थिति है। हम खो गए हैं- किन्हीं बाहरी लोगों की भीड़ में नहीं, बल्कि अपने ही विचारों, अपने ही स्वप्नों, अपनी ही व्यस्तताओं और अपनी ही क्रियाओं में। हम अपने आप में ही कहीं गुम हो गए हैं।
ध्यान-अपनी ही बनायी हुई इस भीड़ से बाहर होने का मार्ग है। खुद की काल्पनिक भटकन से उबरने का रास्ता है। अब यह रास्ता कोई क्रिया की व्यस्तता तो हो नहीं सकता। यह तो अव्यस्त या व्यस्तताहीन मनःस्थिति का नाम है। हालाँकि यह कहने में बड़ा अजीब सा लगता है कि ध्यान कोई कार्य या क्रिया नहीं है, बल्कि अक्रिया है। दरअसल इन्सान की भाषाएँ बड़ी कमजोर हैं। ये सभी तरह-तरह की क्रियाओं व कार्यों को प्रकट करने के लिए बनी हैं। इसी कारण ये आत्मा के सत्य को प्रकट करने में असमर्थ हो जाती हैं। ठीक भी है, जो वाणी के लिए बनायी गयी है, उनसे भला मौन को किस तरह अभिव्यक्ति मिल सकती है।
ध्यान- शब्द के उच्चारण से लगता है कि यह भी कोई क्रिया होगी। पर ऐसा है नहीं। यह तो एक भावदशा है। इस भावदशा में होना ध्यान है। इसमें क्रिया का कोई धुआँ नहीं होता, बस आत्म सत्ता की अग्निशिखा प्रकाशित रहती है। केवल मैं रह जाता है। यह विचार भी नहीं अंकुरित हो पाता कि मैं हूँ। ‘होना’ मात्र रह जाता है। यह निर्विचार शून्यता ही ध्यान है। यही वह बिन्दु है जहाँ से संसार की नहीं, सत्य का दर्शन होता है। इस शून्य में ही वह दीवार ढह जाती है, जिसकी वजह से अब तक अपने को नहीं जाना जा सका। इस भावदशा में विचारों के सभी पर्दे उठ जाते हैं, प्रज्ञा अपनी सम्पूर्णता में प्रकट होती है। इस अवस्था में विचारा नहीं, जाना जाता है। कल्पनाएँ और तर्क नहीं किए जाते, देखा जाता है। यह दर्शन और साक्षात्कार की भावभूमि है। यद्यपि सच्चाई तो यह है कि इस अवस्था को प्रकट करने में शब्दकोश के सारे शब्द असमर्थ हैं। क्योंकि यहाँ ज्ञाता और ज्ञेय का कोई भेद नहीं है। यहाँ दृश्य और द्रष्ट का कोई भेद नहीं है। यहाँ न तो ज्ञेय है और न ज्ञाता। यहाँ तो बस ज्ञान है। यह अवस्था किसी शब्द से नहीं, बस मौन मुस्कान से प्रकट होती है।
ध्यान का सत्य हमारी किसी क्रिया में नहीं, बल्कि हमारे स्वभाव में है। क्रिया तो वह है जिसे हमारा मन हो तो करें, हमारा मन हो तो न करें। स्वभाव कोई क्रिया नहीं है। इसका हमारे करने या न करने से कोई सम्बन्ध नहीं है। स्वभाव की उपस्थिति हममें समायी है। वह हम स्वयं ही हैं। हमारा स्वरूप ही हमारा स्वभाव है। वह हमारा निर्माण नहीं, हमारा आधार है। वही हम हैं। स्वभाव यानि कि शुद्ध सत्ता। इसका अनुभव ही ध्यान है। यह अविच्छिन्न स्वभाव क्रियाओं के विच्छिन्न प्रवाह से ढंक जाता है, दब जाता है। सागर को जैसे लहरें ढाँप लेती हैं। सूरज को जैसे बदलियाँ घेर लेती हैं। ऐसे ही हम अपनी शारीरिक, मानसिक क्रियाओं से ढंके हुए हैं। सतह पर क्रियाओं के आवरण ने, गहराइयों में उपस्थित सत्य को छिपा लिया है।
छोटी-छोटी लहरें सागर की असीम गहराई को ओझल कर देती हैं। कैसा आश्चर्यजनक और विचित्र सत्य है कि क्षुद्रताओं से विराट् ढंक जाता है। आँख में यदि छोटा सा तिनका पड़ जाय, तो सामने खड़ा विशालकाय पर्वत भी नजर नहीं आता। हालाँकि यह मिटता नहीं है। इसकी उपस्थिति यथावत रहती है। सागर भी लहरों के कारण मिटता नहीं है। लहरों का प्राण भी तो वही है। लहरों में उसी की तो उपस्थिति है। जो जानते हैं, वे उसे लहरों में भी जानते हैं। जो नहीं जानते हैं, उन्हें लहरों के शान्त होने का इन्तजार करना पड़ता है। लहरों के शान्त होने पर सागर का असीम विस्तार व गहराई झलकने लगती है। ध्यान, इस स्वभाव में ही जीना है। लहरों को छोड़कर सागर में चलना है। अपनी उस गहराई को जानना है, जहाँ सत्ता है, सागर है, लेकिन कोई तरंग नहीं है। जहाँ आत्मा का प्रकाश तो है, पर वासना का अंधेरा नहीं है। वह निस्तरंग, निष्कम्प प्रज्ञा का जगत् हममें प्रतिक्षण उपस्थित है। बस हमीं उसकी ओर उन्मुख नहीं हैं।
हम अपनी रोज-मर्रा की क्रियाओं में, शारीरिक एवं मानसिक व्यस्तताओं में इस कदर उलझे हैं कि उस ओर देखने की फुर्सत ही नहीं निकाल पाते। हम बाहर की तरफ देख रहे हैं, वस्तुओं को देख रहे हैं, संसार को देख रहे हैं। इस सब में भी एक सच्चाई तो यह है कि हम देख रहे हैं। बस दिशा थोड़ी उलटी है। यह बात ठीक है कि जो दिखाई पड़ रहा है, वह संसार है। लेकिन जो देख रहा है, वह तो संसार नहीं है। वह तो स्वयं हम ही हैं। इस समूची प्रक्रिया में एक बात बड़ी सूक्ष्म है। इसे समझ लिया जाय तो सच्चाई सामने आ जाएगी। दृष्टि-दृश्य से बंधी हुई हो, तो विचार है। और यदि दृष्टि दृश्य से मुक्त हो, तो ध्यान है।
यह बात गहराई से समझने की है। देखना तो दोनों में है, एक में वह विषयगत है, दूसरे में आत्मगत है। हम विचार में हों या फिर ध्यान में, क्रिया में उलझे हों, या अक्रिया में शान्त हों, दर्शन दोनों में ही बना रहता है। जागते हुए हम संसार देखते हैं। सोते हुए सपने देखते हैं। समाधि में स्वयं को देखते हैं। लेकिन यह देखना हर दशा में बना रहता है। यह देखना हमसे हर स्थिति में जुड़ा हुआ है। यह हमारा अपना स्वभाव है। जो किसी भी स्थिति में हमसे अलग नहीं हो सकता। यहाँ तक कि मूर्छा या सुषुप्ति में भी नहीं। बेहोशी आ जाय, तो बेहोशी टूटने पर हम कहते हैं कि मैं कहाँ था, मुझे कुछ भी मालूम नहीं है। इसे अज्ञानता नहीं कहा जाना चाहिए। यह भी एक तरह का ज्ञान है। यदि देखना या दर्शन बिल्कुल भी खत्म हो गया होता तो ‘मुझे कुछ भी पता नहीं है’- यह बोध भी सम्भव नहीं था। उस स्थिति में वह समय ही मेरे लिए ‘नहीं’ हो जाता, जो बेहोशी में बीता है। वह मेरे जीवन का हिस्सा नहीं होता। और यादों की पुस्तक में उसका कोई लेखन नहीं होता।
हम जानते हैं कि हम किसी ऐसी स्थिति में थे कि कुछ भी नहीं जान रहे थे। यह ज्ञान ही है, दर्शन इसमें भी रहा है। हाँ यादों की लेखनी ने इस बीच कोई आन्तरिक या बाहरी घटना का लेखन नहीं किया। परन्तु दर्शन ने इस अन्तराल को, इस गेप को देखा जरूर है। बाहरी या आन्तरिक घटनाओं के बीच छूटा यही रिक्त स्थान बाद में यादें भी खोज लेती हैं। ऐसे ही सुषुप्ति में भी, जब कोई सपना नहीं आता है, तब भी दर्शन बना रहता है। सुबह-सबेरे उठकर हम कहते हैं कि रात नींद बड़ी गहरी आयी। यह स्थिति भी देखी गयी है। तो सच्चाई यह है कि स्थितियाँ बदलती हैं। भाव दशाएँ परिवर्तित होती हैं। चेतना के विषय बदलते हैं, पर दर्शन में किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं आता है। हमारे अनुभव में सब का सब बदल जाता है। सारे प्रवाह के बीच एक यह दर्शन ही नित्य उपस्थित है। यही अकेला सारे परिवर्तन, सारे प्रवाह का साक्षी है, गवाही है। इस नित्य की अनुभूति ही, स्व का अनुभव है। यही अकेला स्वभाव है, बाकी सब तो दूसरों पर निर्भर है। यही बाकी सब संसार है।
इस साक्षी को किसी क्रिया से नहीं पाया जा सकता। क्योंकि यह तो उन क्रियाओं का भी साक्षी है। यह तो बस ध्यान की अक्रिया में झलकता है। यह तो तब प्रकट होता है, जब न तो कोई कर्म है, न कोई दृश्य है। जब केवल साक्षी मात्र ही शेष रह गया है। जब हम देख तो रहे हैं, पर दिखाई कुछ नहीं दे रहा है। जब हम जान तो रहे हैं, पर जान कुछ भी नहीं रहे हैं। इस विषय शून्य चैतन्य में वह जाना जाता है, जो कि सबको जानने वाला है। दृश्य जब नहीं है, तब द्रष्ट के आवरण गिरते हैं। और जब ज्ञेय कुछ भी नहीं है, तब ज्ञान जाग्रत् होता है। तरंगें जब नहीं होती हैं, तब सागर के दर्शन होते हैं। बदलियाँ जब नहीं होती हैं तो नीलाकाश के दर्शन होते हैं। यह सागर हर एक के भीतर है। यह आकाश प्रत्येक के भीतर है। ध्यान इसी को पाने, इस तक पहुँचने की राह है।
यहाँ समझने की बात यह है कि प्रत्येक राह दो दिशाओं में, दो विपरीत दिशाओं में सत्ता रखती है। जो मार्ग आपको घर से शान्तिकुञ्ज तक लाया है, वही आपको वापस घर भी पहुँचाने में समर्थ है। मार्ग तो वही होगा, पर दिशा विपरीत होगी। संसार और आत्मा का मार्ग तो एक ही है। जो संसार में लाता है, वही आत्मा की ओर भी ले जाएगा। केवल दिशा विपरीत होगी। अभी तक जो सामने था, वही अब पीछे होगा। और जो पीछे की ओर था उस पर आँखें जमानी होगी। रास्ता वही है, बस मुड़ने भर की देर है। संसार की वासना से उलटी दिशा में ध्यान की साधना है। हम अभी किसके सम्मुख हैं? इसका विचार करें। हम किसे देख रहे हैं? इसे अनुभव हैं। फेफड़ों के व्रण, मोटापा, पेट दरद, अतिसार, पेचिश, प्रदर, पित्तदोष, आँतरिक सूजन, मधुमेह, जुकाम, कब्ज आदि रोग उपवास से जल्दी ठीक हो जाते हैं। सही कहा जाए तो सारे रोगों की जड़ अत्यधिक एवं स्वाद के लिए किया गया अनियमित भोजन ही है। उपवास इसकी जड़ पर आघात करता है अर्थात् भोजन का निषेध करता है। जब रोग का कारण ही नहीं होगा, तो रोग कहाँ से पनपेगा।
चिकित्सकों के अनुसार यह रोग निवारण की सफलतम उपचार पद्धति है। इस संदर्भ में डॉ. वारनर मैकफेडन ने कई प्रकार के रोगों में उपवास का परीक्षण किया। उन्हें सर्वाधिक एवं त्वरित सफलता निमोनिया में मिली। उपवास के माध्यम से निमोनिया के रोगी शीघ्र ठीक हो गए। डॉ. एडवर्ड डूकर ने अंशकालिक उपवास के महत्व को प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट किया है कि इससे न केवल रोगों लाभ होता है वरन् यह नेत्र ज्योति, श्रवण शक्ति , घ्राणेंद्रियों की सुप्त क्षमताओं को भी उभारता है। इनके प्रायोगिक निष्कर्ष चमत्कारिक कहे जा सकते है। इस संदर्भ में डॉ. एडवर्ड कहते हैं कि रोगियों को उपवास की शुरुआत मैंने प्रातः के स्वल्पाहार को छुड़वाकर करवाई। इससे पुराने दमा तथा बवासीर जैसी बीमारी में काफी लाभ मिला। संभवतः इसलिए प्रसिद्ध आँग्ल उपन्यासकार आप्टन सिंक्लेयर ने भी उपवास चिकित्सा पर अपनी गहन आस्था व्यक्त की है। उनके अनुसार उपवास पूर्ण एवं स्थायी स्वास्थ्य का जन्मदाता है। आगे उन्होंने स्पष्ट किया है, अपने उपवास संबंधी ज्ञान को मैं संसार की सभी मूल्यवान वस्तुओं से भी अधिक कीमती समझता हूँ।
उपवास की प्रक्रिया से केवल शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता है, ऐसी बात नहीं है। मनोविकारों के शमन के लिए भी अत्यंत उपयोगी है। प्रायः सभी मनोविकार बड़े हठीले होते हैं। इनकी जड़ें मन की अतल गहराइयों में होती है। दवा जैसी वस्तुएँ इतनी कारगर नहीं हो पातीं, क्योंकि इनकी गहराई तक पहुँच नहीं है, जबकि कुछ विशिष्ट प्रकार के उपवास ऐसे होते है, जो इनकी जड़ों को सुखा देते हैं, और उत्पात मचाने वाले विषय−विकारों से आसानी से छुटकारा दिला देते हैं।
हल्के−फुल्के मनोविकार जैसे तनाव, उदारी, चिड़चिड़ापन आदि तो उपवास के द्वारा आसानी से दूर हो जाते हैं। इसके अलावा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि प्रबल मनोविकार भी विशिष्ट प्रकार के उपवास के माध्यम से क्रमशः क्षीण होते हैं। यदि उपवास आस्था एवं नियमपूर्वक निरंतर किया जाए, तो सभी विषय−वासनाओं से निश्चय ही मुक्ति पाई जा सकती है।
योग साधना के गंभीर रहस्यवेत्ता एवं मर्मज्ञों ने उपवास की इस विशेषता एवं महत्ता को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। उनके अनुसार यह अन्नमय कोश के परिष्कार के लिए सर्वोत्तम साधन है। शरीर में अत्यंत सूक्ष्म एवं पतली−पतली डोरियाँ आपस में लिपटी हुई होती हैं। शरीरशास्त्री इन्हें नाड़ी गुच्छक कहते हैं। योग विज्ञान में इन्हें उपत्यिकाओं के रूप में माना जाता है। यही अन्नमय कोश की बंधन ग्रंथिकाएँ हैं। ये बड़ी जटिल एवं उलझी हुई होती हैं। मौत का क्रूर हथौड़ा ही इन्हें खोल पाता है अन्यथा ये जीवन भर बँधी−उलझी हुई होती हैं और जीवन को उलझाती−नचाती रहती है, क्योंकि ये गुच्छक शरीर के गुण−दोषों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जिसके शरीर में अमाया वर्ग के गुच्छक पाए जाते हैं, वह व्यक्ति अत्यंत कठोर स्वभाव का होता है। वह हठधर्मी होता है, जिस चीज को करने के लिए ठान लेता है, उन्हें छोड़ता नहीं। इनकी प्रकृति दृढ़ एवं मजबूत होती है। कोई भी कुपथ्य इन्हें रुग्ण नहीं कर सकता, परंतु जब ये गुच्छक विकार ग्रस्त होते हैं तो इन पर किसी भी प्रकार का उपचार कामयाब नहीं होता। दीपिका जाति के गुच्छक के कारण चर्मरोग, फोड़ा, फुँसी, पीला पेशाब तथा उसमें जलन आदि रोग होते हैं। काम−वासना की प्रबलता पूषा उपत्यिकाओं का परिणाम है। मान्यता है कि कामदेव ने कुसुम बाणों से शिवजी की इन्हीं ग्रंथियों को उत्तेजित कर डाला था।
योग विज्ञानी 96 प्रकार की उपत्यिकाओं के बारे में जान सके हैं। अत्याधुनिक विज्ञान आज तक इस संबंध में कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सका है। योगी ही इसके अविज्ञात रहस्य को अपनी साधना से भेद पाते हैं। इनके अनुसार यही शारीरिक एवं मानसिक रोगों के मूल कारण हैं। उपवास के माध्यम से इनका परिष्कार, परिमार्जन एवं सुसंतुलन बनाया जा सकता है। हालाँकि यह विद्या गहन, गंभीर एवं गुप्त है। विरले ही सही, पर अभी भी ऐसे योगी एवं तपस्वी ऋषि हैं, जिनको इस गूढ़ विज्ञान का साँगोपाँग ज्ञान है।
जिन्हें अनुभव है वे जानते हैं कि उपवास विशुद्धतः एवं वैज्ञानिक प्रक्रिया है। विशिष्ट समय में किए गए उपवास का परिणाम भी विशेष होता है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि मनुष्य का प्रकृति से घनिष्ठ संबंध है। प्रकृति इसे प्रभावित करती है। इसी कारण शरीर में विद्यमान छह अग्नियाँ ऋतु परिवर्तन के अनुरूप घटती, बढ़ती एवं बदलती रहती हैं। उपवास से इनका नियमन एवं नियंत्रण होता है। इन ऋतुओं में विधि−विधान से किया गया उपवास बड़ा ही लाभदायक होता है। करवाचौथ का उपवास दाँपत्य प्रेम बढ़ाने वाला होता है। इस दिन नक्षत्र एवं चन्द्रमा के सम्यक् प्रभाव से वैवाहिक जीवन सुखी एवं उल्लासपूर्ण बन जाता है।
दिन विशेष का भी अपना महत्व होता है, इसलिए उस दिन उपवास रखने पर उसके प्रभाव एवं परिणाम का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। सोमवार में चंद्रमा का विशेष प्रभाव होता है। अतः इस दिन के उपवास से उज्ज्वल भविष्य, कीर्ति, मान−प्रतिष्ठा आदि मिलती है। इस प्रकार मंगलवार दृढ़ता, कठोरता तथा बुधवार सौम्य, शिष्ट एवं कफ प्रधान होता है। गुरुवार का उपवास हृदय के परिष्कार−परिमार्जन के लिए सर्वोत्तम है। इससे श्रेष्ठ एवं पावन भावनाओं का विकास होता है। इसके अतिरिक्त विद्या, बुद्धि एवं धन लाभ भी होता है। शुक्रवार वात प्रधान है और शनि स्थिरता, सुखोपभोग एवं परिपुष्टि का अधिकारी है। इन दिनों का गुण उपवास करने वालों को अनायास मिल जाता है।
रविवार में सातों दिनों का समन्वित प्रभाव पड़ता है। इस दिन सातों ग्रहों की सम्मिलित शक्ति धरती पर उतरती है और यों भी सूर्य धरती और मनुष्य को अपने प्राणों से सींचता है। गायत्री महामंत्र का देवता भी यही है। अतः रविवार व्रत का बड़ा ही महत्त्व है। इस व्रत का सर्वप्रथम प्रभाव मन पर पड़ता है और मन ही जीवन का केन्द्र बिंदु है। लगातार नियमपूर्वक बारह रविवार के व्रत से मन पर आश्चर्यजनक परिवर्तन देखा जा सकता है। यह एक दिव्य अनुभव है, जो इसे करके ही अनुभूत किया जा सकता है। इसके साथ द्वादश आदित्यों का गूढ़ मर्म भी छिपा हुआ है।
रविवार व्रत के कुछ सामान्य एवं सहज नियम हैं, जिन्हें आसानी के साथ निभाया जा सकता है। भोजन में नमक वर्जित है। दूध, फल आदि चीजों को दोपहर बारह बजे के पश्चात् एवं सूर्योदय के पूर्व तक लिया जा सकता है। चावल की खीर भी ग्रहण की जा सकती है। इस दिन श्वेत या पीले वस्त्रों के प्रयोग का विधान है। प्रातः उठकर पाँच से ग्यारह माला गायत्री मंत्र का जप करते हुए सूर्य की पवित्रता एवं प्रखरता का ध्यान अवश्य करना चाहिए। आस्था एवं श्रद्धापूर्वक किए गए ध्यान से जीवन में सूर्य के समान प्रखरता एवं तेज उत्पन्न होता है। उपवास के वैज्ञानिक लाभ भी मिलने लगते हैं।
महाकाल का संदेश-
परमपूज्य गुरुदेव ने जीवन भर जनकल्याण हेतु साहित्य सृजन किया, उनके तप एवं ज्ञान का निचोड़ उनके साहित्य में है। सभी लोगों तक यह ज्ञानगंगा पहुँचे, इसीलिए ‘पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय’ का प्रकाशन किया गया है। लाखों ने इसे पढ़कर जीवन धन्य बनाया है। हर घर में वाङ्मय की स्थापना होनी चाहिए, परिवार के लिए यह अमूल्य धरोहर एवं विरासत है।
यदि आपको भगवान ने श्री संपन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वाङ्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। विवाह, जन्मदिवस एवं अन्य उत्सवों पर अथवा पारितोषिक स्वरूप भी यह साहित्य अमूल्य भेंट सिद्ध होगा। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा, धन्य होगा। शास्त्रों में कहा है−
सर्वेषामेव दानानाँ ब्रह्यदानं विशिष्यते। वार्यन्न गोमहीवासस्तिलकाच्चनसर्पिषाम्॥ − गीता 4/33
जल, अन्न, गौ, पृथ्वी, वस्त्र, तिल, सुवर्ण और घी, इन सबके दानों में से ज्ञान का दान सबसे उत्तम है।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥ − मनुस्मृति 4/233
हे परंतप! द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि जितने भी कर्म हैं, वे सब ज्ञान में ही समाप्त होते हैं। ज्ञानदान सर्वापति पुण्य है, शुभ कार्य है।
‘दीदी’ अब यही नाम हो गया था उसका। आस-पड़ोस के सब बच्चे उसे ‘दीदी’ कहकर बुलाते थे। बच्चों की देखा-देखी कुछ बड़े भी उसको जब-तब दीदी कहकर बुला लेते थे। पड़ोस के घरों की प्रौढ़वय की महिलाएँ उसे बच्चों की दीदी या स्कूल वाली दीदी के नाम से पुकार लेती थीं। जिन शब्दों से अनेक जन किसी को पुकारते हैं, वही उसका नाम हो जाता है। पुकारने के लिए प्रयोग किए जाने वाले अक्षरों का गठजोड़ ही तो नाम बन जाता है। इस तरह ‘दीदी’ ही उसका नाम था। ठीक-ठीक नाम न भी कहें तो लोक प्रचलित नाम तो था ही। अपने इस नाम के प्रचलन में उसकी मूक सहमति थी।
वैसे उसकी आयु अभी बहुत नहीं थी। बस यही कोई तेईस-चौबीस साल होगी। इकहरा शरीर, दुबली-पतली किन्तु लम्बी कद-काठी, उजले दूध में हल्का सा सिन्दूर मिला दिया गया हो, ऐसा गोरा रंग, बड़ी ही सूक्ष्मता और सफाई से तराशे गए नाक-नक्श उसके समूचे व्यक्तित्व को अतिशय सुन्दर कहने के लिए विवश करते थे। उसके चेहरे पर भोलेपन से लिपटी मासूमियत की बड़ी सम्मोहक आभा थी। बड़ी-बड़ी उसकी आँखों में पवित्रता-पारदर्शिता एवं तेजस्विता का प्रकाश चमकता रहता है। व्यक्तित्व के इस बाहरी देह कोश के घनीभूत सौंदर्य से कहीं अधिक सघन सुन्दरता उसके विचारों एवं भावनाओं में थी। पवित्र-उत्कृष्ट एवं प्रखर विचार, सुकोमल संवेदनशील भावनाएँ बरबस ही सबको अपना बना लेती थी। सब उसके अपने थे भी। वह भी सबकी अपनी थी।
हर एक काम में हाथ बंटाना उसके स्वभाव में था। लेकिन उसका सबसे प्रिय बच्चों को पढ़ाना, उन्हें शिक्षा और संस्कार देना था। यह करने में उसे एक गहरा आत्मिक सुख मिलता था। बच्चों के माता-पिता उसके गुणों से अभिभूत होकर उस पर अगाध विश्वास करते थे। बच्चों के बारे में उसकी सलाह के बिना किसी का काम न चलता था। उसका परामर्श सर्वोपरि था। एक तरह से वही आस-पड़ोस के सब बच्चों की अभिभावक थी। बच्चे भी अपनी दीदी के प्रति प्रेम से भरे थे। दीदी उन्हें कहानी सुनाती, होमवर्क कराती, खाने-पीने की चीजें देती और सबसे बढ़कर अपना भरपूर प्यार उन पर न्यौछावर करती। इन बच्चों के लिए उनकी दीदी सब कुछ थी और दीदी के लिए ये बच्चे सब कुछ थे।
इन बच्चों के सिवा उसका कोई अपना न था। माता-पिता बहुत बचपन में चल बसे थे। माँ का किसी गम्भीर बीमारी के कारण देहान्त हो गया था। तब वह बहुत छोटी थी। उसको माँ के बारे में ज्यादा कुछ याद नहीं। बस इतना याद है कि उसने पिता जी से जब माँ के बारे में जानना चाहा तो उनकी आँखें भर आयीं थी। वह कुछ बोल नहीं सके, बस आँसू उनकी अंतर्कथा और अन्तर्व्यथा कहते रहे। उस दिन सब मौन में समा गया। पर अगले दिन वह उसकी नन्हीं सी उंगली थाम कर पूजा के कमरे में ले गये। पूजा की अलमारी में रखी हुई एक तस्वीर को दिखाते हुए बोले, बेटी! यही माँ है, हमारी माँ है, सारे संसार की माँ है। न जाने किस अनजानी प्रेरणा से उसने उस दिन पूछ लिया था- माँ का नाम क्या है? उत्तर में पिता का बहुत गहरे दर्द में सना स्वर उभरा- ‘गायत्री’।
बाकी अपनी इस अनोखी माँ की कथा उसने पुस्तकों में पढ़ी। जगत्माता की वह सगी बेटी बन गयी। बालमन जब-जब माँ के लिए तड़पता, वह सृष्टि की आदिमाता के चित्र के सामने बैठकर रो लेती। कभी-कभी तो इसी तरह रोते-रोते सो जाती। पर जब जगती तो एकदम तरो-ताजा होती। बाद में एक दिन उसने पिता को बताया- कि तस्वीर वाली माता उसके स्वप्न में आती है। बहुत सारा प्यार करती है, कहती है तुम मेरी अपनी बेटी हो। सुनकर पिता की आँखें एक बार फिर उमड़ी- लेकिन इस बार भी वह मौन रहे। पढ़ते, घर का काम करते इसी तरह दिन-महीने-वर्ष बीते। तभी एक दिन पिता छोड़ कर चले गए। उसे तो ज्यादा कुछ पता ही नहीं चला, बस उस समय इतना मालूम हुआ था कि सोए हुए पिता जगे नहीं। पड़ोस के लोगों ने जब डॉक्टर को बुलाया तो उसने- ‘नो मोर’ कह दिया। उस दिन वह बहुत रोयी-बिलखी थी। माता-गायत्री की तस्वीर के सामने बैठकर बहुत उलाहने दिए थे। पर माँ ने स्वप्न में आकर उसे पता नहीं क्या समझाया कि वह एक बार फिर से मुस्करा पड़ी।
तब से किसी ने उसे कभी रोते हुए नहीं देखा। कोई करीबी रिश्तेदार था नहीं, उसने भी किसी का द्वार खटखटाना उचित नहीं समझा। पैतृक मकान था, बैंक में कुछ रुपया था। मदद करने के लिए जगन्माता के अदृश्य हाथ थे। उसने अपनी पढ़ाई जारी रखी। वेदमाता गायत्री के प्रति समर्पित उसके जप-तप ने उसे प्रखर मेधा का वरदान दिया था। विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय सभी स्तर पर उसे छात्रवृत्ति मिलती रही। एम.एस-सी. (वनस्पतिशास्त्र) में प्रथम श्रेणी में सर्वप्रथम स्थान पाकर वह उत्तीर्ण हुई। विश्वविद्यालय में उसे सर्वोच्च अंक मिले थे। इसी के साथ उसने सी.एस.आई.आर. द्वारा आयोजित की जाने वाली शोध छात्रवृत्ति की परीक्षा भी सर्वश्रेष्ठ अंकों से उत्तीर्ण की थी। और अब वह अपने ही विश्वविद्यालय में वनौषधियों पर कुछ विशेष शोध कार्य कर रही थी।
ये तो उसकी पढ़ाई-लिखाई के काम थे। इसके अलावा ढेरों काम ऐसे थे- जो वह पड़ोसियों के लिए, बच्चों के लिए करती थी। पड़ोस के बुजुर्ग अपने घरों में उसका उदाहरण देते हुए कहते थे- देखना है तो ‘तृप्ति’ को देखो। बनना है तो उसके जैसा बनो। कितनी शिष्ट-शालीन और सौम्य है। कर्मठता तो उसमें कूट-कूट कर भरी है। न कभी किसी से झगड़ा, न कभी किसी से शिकायत। अपने काम में जुटी रहती है। दूसरों के भी दस काम कर देती है। ऊपर से पूजा-पाठ करने के लिए समय भी निकाल लेती है। पढ़ाई-लिखाई में अव्वल है ही। बुजुर्गों द्वारा की जाने वाली इस प्रशंसा में अतिशयोक्ति तनिक भी न होती थी। पर वह स्वयं अपने इन सभी गुणों से अनजान थी। अपने बारे में स्वयं प्रशंसा करना या दूसरों के मुँह से अपनी प्रशंसा सुनना उसे एकदम पसन्द न था।
उसको सबसे ज्यादा पसन्द था, बच्चों को पढ़ाना, उन्हें सिखाना। आस-पास के सभी बच्चे अपनी दीदी के प्रभाव से बहुत कुछ सीख गए थे। प्रातः जल्दी उठना, नित्यकर्म से निवृत्त होकर नियमित गायत्री महामंत्र का कम से कम एक माला जप करना, माता-पिता और अपने बड़ों के रोज प्रातः चरण स्पर्श करना उन सबकी नियमित आदत बन गयी थी। सबने अपने पढ़ने और खेलने का समय निश्चित कर लिया था। यह सब किसी भय से नहीं प्रेम से हुआ था। दीदी बच्चों को कभी भी नहीं डाँटती थी। डाँटना तो जैसे उसे आता ही नहीं था। बस जब कभी बच्चों के किसी काम में कोई कमी दिखाई देती, तो वह उन्हें कुछ भी न कहकर बस अपनी कमी निकालने लग जाती। थोड़ा सा गम्भीर होकर कहने लगती- मुझमें ही कुछ कमी होगी। मैं ही नहीं तुम लोगों को ठीक से समझा पाती हूँगी। बच्चे अपनी दीदी की इन बातों से परेशान हो जाते थे। वे बार-बार वायदा करते कि अब किसी भी तरह से कोई गलती नहीं होने देंगे। उन्हें अपनी दीदी को थोड़ा सा भी दुःखी करना बिल्कुल भी मंजूर नहीं था।
दीदी भी बच्चों को मुस्कराते हुए देखना चाहती थी। लेकिन साथ ही उसकी यह भी चाहत थी कि बच्चे उच्चस्तरीय भावों में जिए। उनकी क्रिया में उनके विचारों की उत्कृष्टता एवं भावनाओं की सरलता हर तरह से झलके। इसके लिए उसने बच्चों से व्रत लिया था कि वे पूरे दिन में कोई न कोई एक अच्छा काम जरूर करेंगे। यह अच्छा काम पढ़ाई-लिखाई, खेलकूद या नियमित उपासना से अलग था। इसका मतलब था किसी की सेवा करना, किसी को सहायता पहुँचाना, किसी रोते हुए को हंसाना, किसी दुःखी जन को सुखी करना। बच्चे अपनी दीदी को सुखी करने के लिए दिन भर में एक न एक कोई अच्छा काम अनिवार्य रूप से कर लेते थे। कभी तो किसी बीमार को दवा लाकर देते, या फिर कभी उसकी कोई अन्य सेवा करते। कभी किसी वृद्ध या वृद्धा को सड़क पार करा देते। फिर प्रसन्नता से अपनी दीदी को अपने किए हुए कामों का ब्योरा देते।
छुट्टी के दिनों में बच्चों की दीदी बच्चों के खेलकूद में भागीदार होती। उनके लिए खासतौर पर लिखी गयी छोटी-छोटी कविताएँ सुनाती। अब तो बच्चों को ये कविताएँ रट गयी थी। वे सब मिलकर गाते थे-
जागो रे जागो, अब हुआ भोर, अब हुआ भोर डूबे प्रकाश में, सब दिशा छोर आयी जगने की नयी प्रात तुम रहो स्वच्छ मन, स्वच्छ गात निद्रा छोड़ो रे गयी रात उज्ज्वल जीवन, उजली प्रभात! कभी-कभी उनकी दीदी उन्हें सिखाती थी- गा रही मैं, गुनगुनाना सीख लो तुम, आँधियों में झिलमिलाना सीख लो तुम।
एक अकेली लड़की क्या-क्या करती है? क्या-क्या कर लेती है- देखकर लोग हैरत से हैरान हो जाते। टी.वी. सिनेमा, पॉप म्यूजिक के युग में एक नहीं अनेक बच्चों का उपासना, अध्ययन एवं सेवा में जुटे रहना किसी बड़े से बड़े अचरज से कम बड़ा नहीं था। पर वह स्वयं इसे आश्चर्य नहीं मानती थी। उसका कहना था कि सच्ची बात भले ही देर से समझ में आए, लेकिन जब आ जाती है तो न भूलती है, न छूटती है। फिर बच्चे तो वैसे भी बहुत समझदार होते हैं, बस उन्हें प्यार और धीरज से समझाने-बताने की जरूरत है। फिर तो वे ऐसे पक्के हो जाते हैं, कि कुछ पूछो मत। लेकिन बस एक बात है, उन्हें समझाने वाला वैसा स्वयं करें। बच्चों की एक बहुत खास बात है- वे देखकर सीखते हैं, सुनकर नहीं। उन्हें कितनी भी अच्छी बातें सुनाओ, उनके कुछ ज्यादा पल्ले नहीं पड़ती। लेकिन थोड़ा सा करके दिखाओ, फटाफट समझ में आ जाता है।
बेटी, तुम्हें कभी कोई इच्छा नहीं होती? तुम्हें कभी कोई चाहत नहीं होती? यदा-कदा पड़ोस की प्रौढ़-बुजुर्ग महिलाएँ व पुरुष उससे पूछ लेते। जवाब में वह हंस कर कहती- होती है, होती क्यों नहीं? पर मेरे पास एक कल्पवृक्ष है, जिससे सब कुछ मिल जाता है और प्रायः बिना माँगे मिल जाता है। ज्यादा पूछने पर वह उन्हें चौबीस अक्षरों वाला गायत्री मंत्र सुना देती। गायत्री मंत्र की चमत्कारी सामर्थ्य उसके अपने जीवन में प्रत्यक्ष थी। माता के आँचल की छाया में वह कितनी सुखी-प्रसन्न थी, इसे सब देख रहे थे। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या? लोगों को मानने पर विवश होना पड़ता। उसकी प्रत्यक्ष अनुभूतियों की वेगवती धारा ने अनेकों को अपने में बहा लिया था। गायत्री महामंत्र के अनुष्ठान के प्रति अनगिन लोगों की श्रद्धा प्रबल और प्रगाढ़ हो चली थी।
उसके मन में कोई चाहत नहीं बची थी। सतत् गायत्री साधना से उसका चित्त निष्कल्मष हो गया था। यदि कभी भी उससे कोई उसके भविष्य के बारे में पूछता तो वह हंस देती। इस हंसी में बहुत कुछ होता था। एक रहस्य, आत्मा से उपजी प्रसन्नता का उजलापन, आध्यात्मिक जीवन की जगमग ज्योति सभी कुछ इसमें घुले-मिले थे। उसकी रहस्यमयी हंसी के बारे में सबको तब पता चला, जब वह एक दिन देर तक अपने घर से बाहर नहीं आयी। बच्चे उसका हाल मालूम करने गए, देखा उनकी दीदी अपने पूजा वाले कमरे में पूजा वेदी के सामने पद्मासन पर बैठी है। पर न जाने क्यों आज उसका सिर माता गायत्री के चित्र के सामने पूजा की चौकी पर टिका है। बच्चे थोड़ा चौंके, घबराए, उन्होंने अपने-अपने माता-पिता को भाग कर बताया। सभी लोग दौड़े हुए आए। कुछ ने चिकित्सक को भी बुला लिया था।
थोड़ी ही देर में सभी को सत्य पता चल गया। सबने जान लिया कि बच्चों की दीदी के प्राण माता गायत्री में विलीन हो गए थे। प्राणों (गय) का त्राण करने वाली (त्री) माता ने अपनी बेटी के प्राणों का त्राण कर दिया था। आदि माता अपनी पुत्री को अपने आँचल में छुपाकर मुस्करा रही थी। बच्चों के साथ वृद्धजन भी एक बारगी बिलख उठे। हालाँकि थोड़ी देर बाद बच्चों से सबको पता चला कि दीदी ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि थोड़े ही दिनों में वे अपनी माँ के पास चली जाएँगी। लेकिन तभी बच्चों को याद आया कि दीदी ने उनसे कहा था कि वे उनके लिए अपना सन्देश छोड़ जाएँगी। सबने पूजा चौकी पर उलट-पुलट कर देखा। एक कागज के टुकड़े पर दो पंक्तियाँ लिखी थीं-
एक फूल झरता है, तो हजार खिल जाते हैं। एक द्वार बन्द होता है, तो हजार खुल जाते हैं॥
सचमुच ही दीदी के द्वारा गढ़े गए बच्चे- हजार फूलों, हजार द्वारों की तरह खिल-खुल रहे थे।
सर आइजक न्यूटन वर्तमान भौतिक विज्ञान के जनक कहे जाते हैं। उन्होंने चमत्कारी वैज्ञानिक अनुसंधान किए। उनके प्रशंसकों ने उनसे कहा कि आप तो विज्ञान की तह तक पहुँच गए हैं। इस पर न्यूटन बाले, विज्ञान एक महान् सागर है, मैं अभी बालक की तरह उसके किनारे के पत्थर मात्र चुन सका हूँ। उसमें प्रवेश और तह तक जाना, उसमें से मूल्यवान रत्न निकालना तो बहुत आगे की बात है।
बच्चे कहना नहीं मानते, यह शिकायत आम माता-पिता की है। कभी-कभी उन्हें इस शिकायत के चलते खीझ होने लगती है। कभी वे इसके लिए दुःखी-परेशान हो उठते हैं। इसकी वजह से यदा-कदा उनको हताशा-निराशा घेर लेती है। समझ में नहीं आता क्या करें, कैसे समझाएँ इन बच्चों को। जब देखो तब शैतानी, उठा पटक, तोड़-फोड़। थोड़ी देर भी चुपचाप एक जगह बैठे नहीं रहेंगे। यह नहीं कि अपना पाठ तैयार करें। इनकी जो हालत घर में है, वही हालत स्कूल के हैं। वहाँ भी टीचर परेशान रहते हैं। घर शिकायत भेजते हैं कि आपका बच्चा पढ़ाते समय एकाग्रता से पाठ नहीं सुनता, उल्टे दूसरों की तन्मयता को तोड़ता है। कक्षा में साथियों से खूब लड़ाई लड़ता है, रोज-रोज की इन शिकायतों से माता-पिता की परेशानी और दुगुनी हो जाती है।
समाधान की तलाश में अक्सर ये आपस में लड़ लेते हैं। उनकी इस लड़ाई से बच्चों की गतिविधियाँ और भी तेज हो जाती हैं। माता-पिता की अधीरता उन्हें पहले से भी अधिक शैतानी करने के लिए प्रेरित करती है। यह कथन कोई कल्पना नहीं, एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। जिसे विश्व भर के बाल मनोवैज्ञानिकों ने अपने कई प्रयोगों से प्रमाणित किया है। मनोवैज्ञानिक जार्ज ए. मिलर का कहना है कि आज की भागती-दौड़ती हमारी सामाजिक दिनचर्या ने बच्चों को हमसे दूर कर दिया है। और पर्याप्त भावनात्मक पोषण एवं सही देख-रेख के अभाव में बच्चे कुछ ज्यादा ही सुनी-अनसुनी करने लगे हैं। उनकी गतिविधियों में कुछ ज्यादा ही शैतानी शामिल हो गयी है।
यहाँ तक कि कभी-कभी यह शैतानी सीमा रेखा पार कर जाती है। और एक बीमारी की शक्ल ले लेती है। जिसे मानव मन के विशेषज्ञों ने ‘एटेंशन डेफेसिट डिसआर्डर’ या ‘एड’ का नाम दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले यह बीमारी केवल विदेशों के बच्चों में पायी जाती थी। भारत में इसका प्रतिशत प्रायः नहीं के बराबर था। लेकिन संयुक्त परिवारों के टूटने से, माता-पिता दोनों के नौकरी करने के कारण अब भारत में भी इस बीमारी का प्रतिशत काफी बढ़ गया है। ‘विद्यासागर इन्स्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एण्ड न्यूरो साइंसेज’ के द्वारा किए गए एक शोध सर्वेक्षण के अनुसार देश के 74 लाख बच्चे इस बीमारी की विकृति से ग्रस्त हैं। चूंकि अपने अज्ञान के कारण माँ-बाप इस पर ध्यान नहीं दे पाते, इसलिए उनमें से 22 लाख बच्चे बड़े होकर असामाजिक हो जाते हैं।
विद्यासागर इन्स्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एण्ड न्यूरो साइंसेज (विमहाँस) के विशेषज्ञों द्वारा किए गए व्यापक शोध सर्वेक्षण से ये तथ्य सामने आए हैं। इस संस्था के मनोचिकित्सकों का कहना है कि ऐसे बच्चों को केवल शरारती बच्चे कहकर पीछा नहीं छुड़ा लेना चाहिए। बल्कि सात से ग्यारह साल की उम्र में शिक्षक की मदद से ऐसे बच्चों की गतिविधियों का ध्यान रखना चाहिए। और स्थिति यदि ज्यादा बेकाबू हो तो मनोचिकित्सक से उपयुक्त परामर्श करना चाहिए। विमहाँस के मनोचिकित्सकों के अनुसार यह एटेंशन डेफेसिट डिसआर्डर या एड कई तरह का हो सकता है। शुरुआत में कम असर वाला, बाद में धीरे-धीरे बढ़कर ‘हाइपर एक्टिव’ या अतिसक्रियता एटेंशन डिसआर्डर या एडी एच डी का रूप ले सकता है।
विमहाँस के मनोचिकित्सक डॉ. नागपाल का कहना है कि प्रमुख तौर पर इसके तीन लक्षण हैं। पहला- एकाग्रहीनता, दूसरा- अतिसक्रियता एवं तीसरा- कभी भी काम को करने के लिए मजबूर हो जाना। इन तीन मुख्य लक्षणों के अलावा इस बीमारी से ग्रसित बच्चों में चित्त का बिखराव, अस्थिर व आक्रामक व्यवहार, अपने को हीन समझना, लोगों का ध्यान आकृष्ट करने वाले काम करना, ख्याली पुलाव पकाना, मिल-जुल कर न रहने की प्रवृत्ति, अति कमजोर याददाश्त, धैर्य की कमी, दूसरों को सताने वाला व्यवहार एवं चोरी करने जैसी प्रवृत्ति आम बातें हैं। समाज में स्वीकार्य व्यवहार करना इन बच्चों के बूते के बाहर हो जाता है। पढ़ाई करना ये छोड़ देते हैं। अक्सर ये अपनी स्कूली पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाते। जब-तब इन पर डिप्रेशन का दौरा पड़ता रहता है। उस समय इन पर काबू करना मुश्किल हो जाता है।
इस रोग के कारणों के बारे में विशेषज्ञ अभी ठीक से एक मत नहीं हो पाए हैं। वैसे इस बारे में हाल में हुए शोध अनुसन्धान से दो बातें पता चली है। पहली बात यह कि शुरुआती कारणों में भ्रूण अवस्था या बचपन में संक्रमण के कारण दिमाग को होने वाले मामूली नुकसान से ऐसा हो जाता है। इससे सम्बन्धित एक तथ्य यह भी है कि रोगियों के मस्तिष्क में रसायनों के अनियमित प्रवाह से ऐसा हो जाता है। लेकिन दूसरी बात जो इस सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है- वह है बच्चों को अनदेखा करने की प्रवृत्ति। एटेंशन डेफेसिट डिसआर्डर का शाब्दिक अर्थ ही यही है- देख-रेख की कमी से होने वाली व्याधि।
माता-पिता या अभिभावक आजकल बच्चों पर उतना ध्यान नहीं दे पाते, जितना कि आवश्यक रूप से दिया जाना चाहिए। प्रो. जीन ह्यस्टन ने इस बारे में एक बहुत ही सुन्दर शोध ग्रन्थ लिखा है- ‘चाइल्ड केयर : इट्स साइकोलाजिक मीनिंग।’ इस पुस्तक में उन्होंने बच्चों की गतिविधियों पर किए गए विभिन्न शोध कार्यों से सम्बन्धित प्रयोगों व उनके निष्कर्षों को प्रकाशित किया है। उनका कहना है कि एक स्थिति में माता-पिता अपने काम-काज में इतना मशगूल हो जाते हैं कि अपने बच्चों को धन व नौकरों के हवाले कर देते हैं। उनके पास बच्चों के लिए आवश्यक समय ही नहीं रहता है। दूसरी स्थिति में माता-पिता बच्चों पर कुछ ज्यादा ही ध्यान देते हैं। उनकी हर जायज-नाजायज माँग पूरा करते हैं। उनको इतना ज्यादा अपनी निगरानी में रखते हैं कि बच्चों का स्वतन्त्र विकास बाधित हो जाता है।
प्रो. ह्यस्टन का कहना है कि बच्चों का पालन-पोषण करने में एक माली की कुशलता चाहिए। उन्हें इतना भी अनदेखा न करें कि आवश्यक खाद-पानी भी न मिल सके। और इतनी भी देख-रेख की अति न कर दें कि उन्हें स्वाभाविक रूप से मिलने वाला हवा और प्रकाश भी अवरुद्ध हो जाए। बच्चे आपकी बात माने एवं शरारत व शैतानी कम करें, इसके लिए माता-पिता को कुछ बिन्दुओं का आत्मसात करना जरूरी है- 1. आप बच्चों के लिए रोल मॉडल बनें। कम से कम बच्चों के सामने स्वयं ऐसे काम कभी न करें, जिनके लिए आप उन्हें रोकते हैं। 2. बच्चों की हर जायज-नाजायज माँग पूरी करने के बजाय धीरे-धीरे उन्हें सही गलत का बोध कराएँ। 3. जीवन के व्यावहारिक विषयों जैसे दूसरों से व्यवहार, उठने-बैठने, चलने-दौड़ने के सही तौर-तरीके, शिष्टाचार के सामान्य ज्ञान के बारे में उन्हें धीरे-धीरे पर थोड़ा-थोड़ा रोज बताएँ-सिखाएँ। 4. बात-बात पर उन्हें झिड़के नहीं। अनजान लोगों के सामने उन्हें किसी भी कीमत पर अपमानित न करें। 5. अच्छा काम करने पर उन्हें प्रोत्साहित व प्रशंसित करें।
चंडीगढ़ स्थित मेडिकल एजुकेशन एण्ड रिसर्च में मनोचिकित्सा विभाग की एक विशेषज्ञ का कहना है कि बच्चे आपकी बात मानें, इसके लिए जरूरी है कि आप अपने प्रति बच्चों में विश्वास जगाएँ। उन्हें उनके प्रति अपने प्रेम से आश्वस्त करें। यहीं की एक विशेषज्ञ डॉ. सविता मल्होत्रा का कहना है कि शैतानी और शरारत की अति को कोई गम्भीर रोग मानकर घबरा जाना तो ठीक नहीं है, पर इसके प्रति लापरवाही भी उचित नहीं है। बच्चों की शैतानी व शरारत में खपने वाली ऊर्जा को यदि सृजनात्मक गतिविधियों में बदला जा सके तो उसकी प्रतिभा में आश्चर्यजनक बढ़ोत्तरी हो सकती है। बस इसके लिए जरूरत इतनी भर है कि बच्चों के प्रति उनकी सही देख-रेख के प्रति हमेशा जागरुक रहें। और उनकी जीवनी शक्ति को सृजनात्मक कार्यों की ओर प्रेरित करते रहें। लगातार धैर्यपूर्वक प्यार और सद्व्यवहार से ऐसा करने पर आपके बच्चे शरारत छोड़कर हमारी हर शिकायत को दूर कर सृजन प्रयोजनों में लगने लगेंगे।
सफलता का मापदंड विजय-पराजय अथवा धन-दौलत नहीं, बल्कि वे कर्त्तव्य हैं, जिनका किसी ने आपत्ति तथा हानि की स्थिति में भी निष्ठापूर्वक पालन किया है।
जेतवन के आम्रकुञ्ज में भगवान तथागत ध्यानस्थ थे। ध्यानस्थ अवस्था में भगवान का मंजुल सौंदर्य और भी मुखर हो उठा था। सुहानी प्रभात बेला इसमें और भी अभिवृद्धि करने के लिए भगवान के समीप आ जुटी थी। महादानी भुवन भास्कर अपनी सहस्र किरणों से भगवान के ऊपर सुवर्ण लुटाते हुए आकाश के आँगन में बढ़ आए थे। समूची प्रकृति ध्यानलीन महाबुद्ध की महिमा का गान कर रही थी। आम्रवन में पक्षियों के कलरव की मधुर गूँज प्रकृति के स्वरों को संगीत में सजाने के प्रयास में लीन थी। सब ओर महाबुद्ध के मंगलमय रूप की प्रभा बिखरी थी। अकेला आम्रकुञ्ज ही नहीं समूचे जेतवन के पूरे परिक्षेत्र में ध्यानस्थ भगवान का दिव्य आलोक छाया हुआ था।
भगवान से कुछ दूर बैठे हुए भिक्षुगण शास्ता के ध्यानोन्मीलन की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्हें प्रतीक्षा थी कि कब प्रभु नेत्र खोलें और कब वे सब उन्हें प्रणाम निवेदित करें। महाकाश्यप, मौद्ग्लायन, रेवत आदि सिद्ध साधकों के साथ नव भिक्षुदल के सभी सदस्य भगवान की वाणी को सुनने की त्वरा में थे। इस सबके साथ आज एक नए सदस्य लवकुँठक भद्दीय स्थविर की भी उपस्थिति थी। आयु में अल्पवयस होने के बावजूद लवकुँठक की साधना अत्यन्त गहन थी। मितभाषी, सेवाभावी, ध्यान परायण लवकुँठक सभी की प्रीति का केन्द्र था। महाकाश्यप एवं रेवत आदि सिद्धजन उस पर अपना हृदय उड़ेलते थे। भिक्षुसंघ के नए सदस्य उस पर अपनापन लुटाते थे।
लवकुँठक पिछले कुछ दिनों से प्रव्रज्या के लिए गया हुआ था। अभी कल ही रात्रि को वापस लौटा था। इन बीच के कुछ दिनों में वह कहाँ रहा, उसने क्या किया, किसी को भी पता नहीं था। हाँ, वापस लौटने के बाद से वह कुछ अधिक शान्त हो गया था। साथी भिक्षुओं ने आने पर रात्रि में थोड़ा-बहुत कुरेदने की कोशिश की, परन्तु बाद में उसे थका हुआ जानकर छोड़ दिया। लवकुँठक भी अपनी स्थिति पर मौन ही रहा। किसी की भी जिज्ञासा के उत्तर में उसने कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं समझी। हालाँकि साथियों को उसका यह मौन बड़ा ही रहस्यमय लगा। पर किसी ने ज्यादा कुछ नहीं कहा। सभी को प्रातः की प्रतीक्षा थी। हर कोई सोच रहा था कि प्रणाम के समय शास्ता अवश्य ही रहस्योन्मीलन करेंगे।
सभी भिक्षुओं के इन फंसते-उलझते, बनते-बुनते विचार तन्तुओं के पार और परे भगवान आसीन थे। उन्होंने धीरे-धीरे अपने नेत्र उन्मीलित किए। उनके उन्मीलित नेत्रों से करुणा और कृपा की धार सब पर बरस पड़ी। सभी अपने शास्ता को प्रणाम करने लगे। महाकाश्यप, रेवत, मौदग्लायन प्रणाम करके प्रभु के पास ही बैठ गए। अन्य भिक्षुओं के साथ लवकुँठक ने भी प्रणाम किया। लवकुँठक के प्रणाम करते ही भगवान बोले- भिक्षुओं, देखते हो इस भाग्यशाली भिक्षु को? यह माता-पिता को मारकर दुःख रहित होकर आ रहा है।
भगवान की वाणी सुनकर महाकाश्यप मुस्कराए। जबकि अन्य भिक्षु चौंके। उन्हें एक बारगी तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। वे चौंक कर एक-दूसरे का मुख देखने लगे कि भगवान ने यह क्या कहा? ‘माता-पिता को मारकर दुःख रहित होकर आ रहा है, इस भाग्यशाली भिक्षु को देखो।’ उन्हें तो अपने कानों पर भरोसा ही नहीं हुआ। वे सोचने लगे, माता-पिता की हत्या से बड़ा तो कोई और पाप नहीं है। भगवान यह क्या कहते हैं? कहीं कुछ चूक है। या तो हम सुनने में चूक गए या फिर भगवान कहने में चूक गए हैं। माता-पिता के हत्यारे को भाग्यशाली कहना, भला यह बात हुई?
महाकाश्यप, रेवत, मौद्ग्लायन को छोड़कर अन्य सभी के सन्देह और विभ्रम गाढ़े हो गए। ये तीनों सिद्धजन शास्ता की बातें सुनकर मुस्करा रहे थे। स्वयं लवकुँठक मौन था। उसके लिए तो भगवान का हर शब्द उनका कृपाशीष था। अन्य भिक्षुओं से तो रहा ही नहीं गया। उन्होंने तो भगवान से पूछ ही लिया- आप यह क्या कह रहे हैं प्रभु? ऐसी बात न तो आँखों देखी और न ही कानों सुनी।
भगवान तब विंहसे और कहने लगे- अरे बात इतनी ही नहीं है। इस अपूर्व भिक्षु ने और भी हत्याएँ की हैं। और बड़ी सफलता से की है, बड़ी कुशलता से की है। मैं तो कहता हूँ हत्या करने में इसका कोई सानी नहीं है। भिक्षुओं तुम भी इससे कुछ सीख लो। तुम भी इस जैसे बनो तो तुम भी दुखःसागर के पार हो जाओगे। भिक्षुओं ने कहा- आप क्या कहते हैं, भगवान? लेकिन तथागत तो जैसे आज रहस्य को और भी गहरा, घना और गाढ़ा करने में तुले थे। उन्होंने सभी को चकित करते हुए ये गाथाएँ कही-
मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च खत्तिये। रट्ठ सानुचरं हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो॥ मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च सोत्थिये। वेय्यग्घपञ्चमं हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो॥
भगवान द्वारा कही गयी इन धम्म गाथाओं ने सभी को और उलझा दिया। सारे भिक्षुओं की बुद्धि चकित और स्तब्ध थी। सब के सब हैरत से हैरान थे। भिक्षुओं को इस तरह उलझन में फंसे देखकर महाबुद्ध की करुणा उमड़ आयी। उन्होंने महाकाश्यप से इन धम्म गाथाओं के गूढ़ अर्थ को प्रकट करने का संकेत किया। शास्ता का संकेत पाकर सबसे पहले महाकाश्यप ने उनके चरणों में सिर नवाया। फिर उपस्थित सभी जनों को बुद्धवाणी के मर्म को प्रकट करने लगे।
उन्होंने कहा- भिक्षुओं! माता-तृष्णा है, पिता अहंकार है। इन्हीं के कारण जीव बार-बार जन्म-मरण के चक्र में फँसता है। इन्हें मारने वाले का जन्म-मरण के दुःख से छूटना निश्चित है। सभी भिक्षु इस गुह्य अर्थ को सुनकर अवाक् थे। महाकाश्यप निर्विघ्न भाव से अपने शास्ता की वाणी को अर्थ दे रहे थे- दो क्षत्रिय राजा आस्तिकता और नास्तिकता के मत वाद हैं। सारे शास्त्रीय सिद्धान्त इनके अनुचर हैं। ये किसी न किसी तरह से जीव को अपने शासन में रखते हैं। जो इन्हें मारता है, वह स्वतंत्र होता है। आसक्तियों सहित अपने भीतर का संसार ही राष्ट्र है, जो इसे मारता है वह सभी सीमा बन्धनों से छुटकारा पाता है।
उपस्थित भिक्षु जन अभी कुछ और कह पाते कि उन्हें सम्बोधित करते हुए महाकाश्यप ने कहा- भिक्षुओं! व्याघ्र पंचम, अपनी ही पाँच इन्द्रियाँ हैं। इन पंच इन्द्रियों की वासनाओं को, इनकी तन्मात्राओं की आसक्ति को जो मारता है, वह व्याघ्रपंचम को मारने वाला है। जिसने इन सभी को एक साथ मारने की सफलता प्राप्त की, समझो उसकी महामृत्यु हो गयी। उसने अपनी भी हत्या कर ली। उसे निर्वाण प्राप्त हो गया। भन्ते लवकुँठक भद्दीय स्थविर को यही महामृत्यु प्राप्त हुई है। पहले उन्होंने अपनी ध्यान साधना से उपजे बोधि के दिव्यास्त्र से एक-एक करके सबको मारा। और अन्त में उन्होंने स्वयं को भी मारने में सफलता प्राप्त की। अब वह निर्वाण को उपलब्ध हो चुके हैं।
भिक्षुसंघ शास्ता के रहस्यमय वचनों की इस अपूर्व व्याख्या को सुनकर सम्बोधि चेतना की छुअन को अनुभव करने लगा था। महाकाश्यप सभी के लिए सदा से श्रद्धास्पद थे। सब को यह विश्वास था कि भगवान की अन्तर्चेतना में महाकाश्यप की अन्तर्चेतना समर्पित, विसर्जित एवं विलीन हो चुकी है। महाकाश्यप अद्भुत एवं अपूर्व शिष्य हैं। शास्ता तो परम गुरु हैं ही। आज सभी को शिष्य एवं गुरु के इस अनोखे अन्तर्मिलन का प्रमाण मिल गया। सबके सब महाबुद्ध के वचनों पर ध्यानस्थ होने का प्रयास कर रहे थे। भगवान की धम्मगाथाएँ सब के लिए राह प्रकाशित कर रही थी। यह वही राह थी जिस पर अभी-अभी लवकुँठक भद्दीय स्थविर चल कर आए थे। महाकाश्यप जिस पर काफी पहले चल चुके थे। धम्म सन्देश देने वाला आज का प्रभात सभी के लिए मंगल पर्व बन गया। सभी के मन-प्राण, अन्तर्भावनाओं में इन धम्म गाथाओं के निदिध्यासन का सूर्य प्रकाशित होने लगा। जीवन में हर्ष की हिलोरें उठने लगी।
अध्यात्म की मान्यता व्यक्ति को सदाचरण और आदर्शवादी कर्त्तव्य−पालन के लिए घाट उठाने तक के लिए प्रोत्साहित करती है। यही वह प्रवृत्ति है, जिससे व्यक्ति का स्तर और समाज का गठन सुव्यवस्थित और समुन्नत रखा जा सकता है।
वात−व्याधियों में सर्वाधिक कष्टप्रद एवं चिकित्सा की दृष्टि से कष्टसाध्य ‘पक्षाघात’ होता है। अस्सी प्रकार की वात−व्याधियों में यह सबसे अधिक दुःसाध्य माना जाता है। यह एक चिरकालिक रोग है, जो अचानक उत्पन्न होता है और इसके कारण रोगी को असह्य कष्ट उठाने पड़ते हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि पक्षाघात दो शब्दों से मिलकर बना है− पक्ष + आघात। पक्ष का अर्थ होता है, अंग या शरीरार्द्ध एवं घात का अर्थ होता है, नाश या नष्ट होना अर्थात् शरीर के किसी अंग का घात होना या उसकी प्राकृतिक क्रिया का नष्ट होना। आयुर्वेद ग्रन्थों में एकाँग वात, पक्षवध, सर्वांगघात, अधराँगघात, अर्दित आदि नामों से इसके विविध रूपों का वर्णन किया गया है। उसके अनुसार शरीर के आधे या परे भाग अथवा किसी अंग विशेष की चेतना व सक्रियता का ह्रास होना ही पक्षाघात कहलाता है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान एलोपैथी पक्षाघात को पैरालिसिस कहता है। यह भी दो शब्दों पार + लिसिस से मिलकर बना है। पारा का अर्थ है− आभ्यंतर और लिसिस का अर्थ है− शिथिलता या निष्क्रियता। यह निष्क्रियता या शिथिलता चाहे माँसपेशियों की विकृति के कारण उत्पन्न हुई हो अथवा किसी अन्य कारण से, किसी अंग विशेष या समूचे शरीर की निष्क्रियता, संज्ञाशून्यता पैरालिसिस के अंतर्गत ही मानी जाती है। इसके अनुसार पक्षाघात स्वतंत्र व्याधि न होकर अन्य व्याधियों के लक्षण स्वरूप उत्पन्न होता है। यह शरीर के किसी भी अंग में, आधे शरीर में या सर्वांग में हो सकता है। यह अस्थायी भी हो सकता है और स्थायी भी। 50-60 वर्ष के बाद मनुष्य में पक्षाघात का खतरा ज्यादा रहता है। महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में इस व्याधि की संभावना अधिक रहती है।
अन्यान्य वात व्याधियों की भाँति ही पक्षाघात भी दूषित वायु प्रकोप के कारण ही उत्पन्न होता है। आयुर्वेद के अनुसार जब प्रकुपित वायु शरीर की वातवाहिनी शिराओं एवं स्नायुओं को सुखाकर शरीर के संधिबंधनों को शिथिल कर शरीर के एक भाग या परे शरीर को निष्क्रिय कर देता है तो कहा जाता है कि उस भाग को लकवा मार गया है। आयुर्वेद शास्त्रों में उल्लेख है−
गृहीत्वार्धन्तनो वायुः शिरास्नायुर्विशोष्य च। पक्षमन्यतमं हन्ति साधिबन्धान्विमोक्षयन्॥ कृत्स्नोर्धकायं तस्य स्यादकर्म्मण्यो विचेतनः। एकाँगरोगन्तं केचिदन्ये पक्षवधं विदुः॥
अर्थात् जिस रोग में वायु आधे शरीर को पकड़कर शिरा और स्नायु को सुखाकर संधिबंधन को ढीला कर शरीर के एक ओर के अंग को निष्क्रिय कर देती है, जिससे शरीर का आधा भाग कार्य करने में असमर्थ हो जाता है, उसे पक्षाघात कहते हैं। जब सारे अंग शिथिल या चेष्टारहित हो जाते हैं, तब उसे सर्वांगघात कहा जाता है। अतः स्पष्ट है कि वात की विकृति ही पैरालिसिस का प्रमुख कारण है। यह वातविकृति दो प्रकार से होती है− 1. धातुक्षय जनित और 2. आवरण जनित वात विकृति। चरक संहिता चिकित्सा स्थान में कहा भी गया है, “वायोर्धातुक्षयात् मार्गस्यावरणेन च वा।”
कैंसर एवं हृदयाघात के पश्चात् पक्षाघात सर्वाधिक प्राणघातक बीमारी है। इसकी उत्पत्ति के अनेक कारण हैं। उनमें से प्रमुख हैं− आहारजन्य विहारजन्य, मानसिक एवं अन्य हेतु। आहारजन्य कारणों में खान−पान में गड़बड़ी प्रमुख है। इसमें अति रुक्ष, शीत, लघु, अल्प, गुरु, ठंडा, वासी अन्न, शुष्क, विषमाशन, विरुद्ध आहार, अनशन या अधिक उपवास आते हैं, जिनके कारण वायु प्रकुपित होती है। विहारजन्य हेतुओं में आते हैं− अपने से अधिक बलवान व्यक्ति से लड़ना, अति व्यायाम, अत्यधिक परिश्रम, अधिक पैदल चलना, देर तक नदी−तालाब में तैरना, उल्टी−सीधी कसरत करना, रस, रक्त , माँस, मेद, मज्जा, शुक्र आदि धातुओं में से किसी एक अथवा कई धातुओं का क्षीण हो जाना आदि। मानसिक कारणों में− अधिक तनाव, क्रोध, चिंता, भय, शोक आदि आते हैं। अन्य कारणों में क्षय आदि रोगों के कारण उत्पन्न दुर्बलता, कष्टदायक बिस्तर पर सोना, कष्टदायक आसन पर देर तक बैठना, मल−मूत्रादि वेगों को रोकना, चोट लगना, मस्तिष्क, हृदय आदि मर्मस्थानों पर आघात लगना, कष्टकारी सवारी पर लगातार यात्रा करना आदि आते हैं। इन सभी कारणों से वायु प्रकुपित होती है और शरीर के रिक्त स्थानों को भरती हुई एकाँगवात से लेकर सर्वांगघात तक विभिन्न प्रकार के पक्षाघात रोग उत्पन्न करती है।
आधुनिक चिकित्साविज्ञानी पैरालिसिस अर्थात् पक्षाघात को स्वतंत्र बीमारी नहीं मानते, वरन् उसे अन्य रोगों के लक्षण स्वरूप मानते हैं। उसके अनुसार पक्षाघात उत्पन्न होने के प्रमुख कारण हैं− मस्तिष्कगत रक्त स्राव (ब्रेन हेमरेज), थ्रोम्बोसिस, ब्रेन ट्यूमर, मेनिन्जाइटिस, इंकेफेलाइटिस, सेप्टीसीमिया आदि। इसके अतिरिक्त डायबिटीज, हृदय रोग, गर्भ निरोधक गोलियों का लंबे समय तक सेवन करते रहने से भी पक्षाघात हो जाता है। पक्षाघात की प्रायः अधिकाँश घटनाएँ उच्च रक्त चाप के कारण मस्तिष्कीय धमनियों के फटने तथा मस्तिष्क पर चोट लगने के कारण उत्पन्न ब्रेन हेमरेज के कारण होती है। दुर्घटनावश उच्च वोल्टेज की विद्युत करंट लग जाने के कारण भी अंग विशेष में लकवा मार सकता है।
आयुर्वेद ग्रन्थों के अनुसार पैरालिसिस अर्थात् पक्षाघात चार प्रकार का होता है− 1. मोनोप्लेजिया या एकाँगघात 2. हेमिप्लेजिया या अर्द्धांगघात या फालिज 3. क्वाड्रीप्लेजिया या सर्वांगघात और 4. पैराप्लेजिया अर्थात् अधराँगघात। चेहरे के लकवे को, जिसे अर्दित या आननघात कहते हैं, आयुर्वेद शास्त्रों में पक्षाघात से अलग माना गया है, किंतु मेडिकल साइंस में यह पैरालिसिस या पक्षाघात के अंदर ही गिना जाता है और ‘बेल्स पाल्सी’ कहलाता है। इस तरह ‘फेसियल पैरालिसिस’ (बेल्स पाल्सी) को मिलाकर पाँच प्रकार के पक्षाघात हो जाते हैं।
मोनोप्लेजिया अर्थात् एकाँगघात
जिस पक्षाघात में प्रकुपित वायु शरीर के दायें या बायें भाग में से किसी एक भाग पर आक्रमण करके उसकी शिराओं एवं स्नायुओं को सुखाकर एक हाथ या पैर को संकुचित कर देता है और प्रभावित अंग में सुई चुभाने जैसी पीड़ा होती है, मोनोप्लेजिया या एकाँगघात कहलाता है। इसमें हाथ या पैर में से किसी एक में लकवा होता है।
हेमिप्लेजिया या पक्षवध
इसे ही एकाँग रोग, अर्द्धांग या फालिज कहते हैं। इससे शरीर के एक ओर का आधा भाग सिर से लेकर पैर तक लंबाई में प्रभावित होता है। इस कारण दाहिने या बायें में से एक ओर से प्रत्येक अंग जैसे− एक हाथ, या पैर, एक आँख, एक ओर की आधी जीभ, आधा चेहरा आदि सभी अंग पक्षाघातग्रस्त होकर अपनी स्वाभाविक शक्ति को खो बैठते हैं और निष्क्रिय−निश्चेष्ट हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण ब्रेन हेमरेज, रक्त का थक्का जमना, ब्रेन ट्यूमर, हृदय रोग, वृक्क रोग, वातरक्त , उपदंश तथा अतिशय मद्यपान आदि होते हैं।
शरीर−क्रिया विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क के दाहिने भाग का संबंध काया के बायें भाग से होता है तथा बायें मस्तिष्क का संबंध शरीर के दाहिने भाग से होता है। उक्त कारणों से उत्पन्न अवरोध के कारण जब मस्तिष्क के कुछ हिस्सों को ठीक से रक्त व ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं हो पाती, तो वह भाग क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इन अवरोधों के फलस्वरूप मस्तिष्क एवं शरीर के अंग−अवयवों के मध्य चलने वाला सूचना−संवेदनाओं का आदान−प्रदान रुक जाता है और वे सभी स्वाभाविक क्षमता को खो बैठते हैं। विकृति मस्तिष्क के जिस भाग में होती है, ठीक उसके विपरीत हिस्से में शारीरिक अपंगता आती है।
क्वाड्रीप्लेजिया अर्थात् सर्वांगघात
जब प्रकुपित वायु संपूर्ण शरीर में व्याप्त होकर सारे शरीर की क्रियाशीलता को समाप्त कर देता है, तो उसे सर्वांगघात या सर्वांग रोग कहते हैं। इसके अभाव से दोनों ओर के सभी अंग शिथिल और निष्क्रिय हो जाते हैं तथा सर्वांग में पीड़ा होती है।
पैराप्लेजिया अर्थात् अधराँगघात
इसे पादाघात, उरुस्तंभ, पैरों का लकवा, निजली देह शाखा एवं निचले धड़ का पक्षाघात कहते हैं। इसमें शरीर का आधा भाग, कमर से ऊपर का अथवा कमर से नीचे का भाग निष्क्रिय हो जाता है। प्रायः शरीर का निचला भाग ही निष्क्रिय होता है, जिससे दोनों टाँगें बेकार हो जाती हैं और व्यक्ति अपंग हो जाता है, इसीलिए इसे दोनों टाँगों का लकवा कहते हैं। यह प्रायः मेरुदंड या मेरुरंजु−पुच्छ के चोट लगने, स्पाइनल कॉर्ड में सूजन आने, स्पॉण्डीलाइटिस, हिस्टीरिया, पेरीफेरल न्यूराइटिस एवं तंत्रिका तंत्र के पोषण संबंधी विकास आदि के कारण उत्पन्न होता है। यह व्याधि धीरे−धीरे प्रकट होती है। यदि सही समय पर चिकित्सा उपचार न किया जाए, तो प्रभावित अंग क्रमशः सूखने और सिकुड़ने लगते हैं और तब रोग असाध्य हो जाता है।
फेसियल पैरालिसिस अर्थात् अर्दित
इसे चेहरे का लकवा, मुँह का लकवा, आननघात आदि नामों से भी पुकारा जाता है। चिकित्साविज्ञानी इसे ही ‘बेल्स पाल्सी’ नाम से संबोधित करते हैं। यह मस्तिष्क की चेहरे की ‘सातवीं’ फेसियल नर्व के क्षतिग्रस्त होने या उसमें चोट आदि लगने के कारण होता है। इसका भी प्रमुख कारण मस्तिष्कगत रक्त स्राव या मस्तिष्कगत धमनी अवरोध माना जाता है।
यों तो पक्षाघात या लकवा का आक्रमण होने पर रोगी को तुरंत अस्पताल पहुँचाना चाहिए, क्योंकि पक्षाघात के आक्रमण के पश्चात् के 24 घंटे रोगी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। समय पर चिकित्सा−सहायता आदि मिल जाने से ब्रेन हेमरेज या हृदयाघात आदि कारणों से उत्पन्न जटिलताओं से पक्षाघातग्रस्त रोगी की जीवनरक्षा हो जाती है। इतने पर भी प्रायः देखा जाता है कि अधिकाँश लकवाग्रस्त मरीजों को अपनी पूर्व स्वाभाविक स्थिति में आने या पूर्ण स्वस्थ होने में बहुत समय लग जाता है। कई बार तो वे ठीक भी नहीं होते और अपंग−अपाहिज−सा जीवन जीने को बाध्य होते हैं। पारिवारिक सदस्यों की उपेक्षा सहने, पराश्रित जीवन जीने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं सूझता। आर्थिक स्थिति गड़बड़ाने या विपन्नता के चलते वे महँगी दवाएँ, रसायन−भस्में भी नहीं खरीद पाते। ऐसी स्थिति में यदि उन्हें यज्ञोपचार प्रक्रिया अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके और उसके लिए आवश्यक हवन सामग्री आदि जुटाई जा सके, जो सहज ही सर्वत्र उपलब्ध हो जाती है, तो न केवल पक्षाघात से मुक्ति पाई जा सकती है, वरन् स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन का पूरा आनंद उठाया जा सकता है।
पक्षाघात के उपचार के उपचार हेतु यज्ञ चिकित्सा सबसे अधिक सुरक्षित, निरापद, सरल व सर्वसुलभ चिकित्सापद्धति है। इसे हर स्थिति का एवं प्रत्येक आयु वर्ग का व्यक्ति स्वयं अकेले या सामूहिक रूप से अपने घर पर ही नित्य−नियमित रूप से संपन्न करके पूर्ण लाभ उठा सकता है। सभी प्रकार के पक्षाघात या लकवों के लिए विशिष्ट हवन सामग्री बनाई जाती है।
पक्षाघात की विशिष्ट हवन सामग्री में निम्नलिखित सामग्री मिलाई जाती है−
1. एरंड मूल 2. कौंच बीज 3. खिरैंटी (बला) मूल 4. उड़द 5. सोंठ 6. सुगंधि तृण (आज्ञा घास) 7. रास्ना 8. अश्वगंधा 9. शतावर 10. पिप्पली 11. पीपलामूल 12. चित्रक 13. ज्योतिष्मती (मालकाँगनी) के बीज 14. सौंफ 15. बिल्व छाल 16. नागबला 17. मीठी बच (अथवा इसकी चौथाई कड़वी बच−उग्रगंधा) 18. धमासा 19. देवदार 20. कचूर 21. अडूसा (वासा) 22. हरड़ 23. चव्य 24. नागरमोथा 25. पुनर्नवा 26. गिलोय 27. विधारा 28. गोक्षुरु 29. चोपचीनी 30. गोरखमुँडी 31. अमलतास का गूदा 32. कटसरैया 33. धनिया 34. छोटी कटेरी 35. बड़ी कटेरी 36. ब्राह्मी। यह सभी 36 चीजें बराबर मात्रा में लें अर्थात् 100-100 ग्राम लें एवं 37. अतीस 5 ग्राम लें।
उपर्युक्त सभी 37 चीजों को लेकर उनका जौकुट पाउडर बना लेते हैं और इसे ‘पक्षाघात रोग की विशिष्ट हवन सामग्री नं. 2’ का लेबल लगाकर एक डिब्बे में सुरक्षित रख लेते हैं। हवन करते समय पहले से तैयार की गई ‘कॉमन हवन सामग्री नं.1’ की बराबर मात्रा लेकर नं. 2 की समान मात्रा में अच्छी तरह मिला लेते हैं, तत्पश्चात् सूर्य गायत्री मंत्र से हवन करते हैं। ‘कॉमन हवन सामग्री नं. 1’ में निम्नलिखित चीजें समान मात्रा में मिलाई जाती हैं− 1. अगर 2. तगर 3. देवदार 4. लाल चंदन 5. सफेद चंदन 6. अश्वगंधा 7. गुग्गुल 8. लौंग 9. जायफल और 10. गिलोय। इन सभी चीजों का जौकुट पाउडर पहले से तैयार कर लेते हैं। हवन करने का मंत्र इस प्रकार है− “ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि। तत्रः सूर्यः प्रचोदयात्।”
उक्त सूर्य गायत्री मंत्र का सस्वर उच्चारण करते हुए मंत्र के अंत में “स्वाहाः इंद सूर्याय इदम् न मम” बोलते हुए कम−से−कम चौबीस आहुतियाँ नित्य देनी चाहिए।
हवन करने के साथ ही उपर्युक्त 37 चीजें जो पक्षाघात की विशिष्ट हवन सामग्री नं. 2 में प्रयुक्त की गई हैं, उन सभी की सम्मिश्रित कुछ मात्रा लेकर अधिक बारीक कूट−पीसकर एक अलग मात्रा में रख लेना चाहिए। इसी पाउडर में से प्रतिदिन 40 ग्राम (आठ चम्मच) पाउडर लेकर रात्रि को 750 मिली लीटर (तीन पाव) पानी में स्टील के एक भगोने में भिगो देना चाहिए। सुबह इसी को बर्नर या चूल्हे पर चढ़ाकर मंद आँच में क्वाथ बनाना चाहिए। जब पानी उबलकर चौथाई रह जाए, तो उतारकर ठंडा होने पर बारीक कपड़े से छान लेना चाहिए। तैयार क्वाथ की आधी मात्रा सुबह एवं आधी मात्रा शाम को पक्षाघात पीड़ित व्यक्ति को नित्य−नियमित रूप से पिलाते रहना चाहिए। क्वाथ पिलाते समय उसमें एक चुटकी सोंठ चूर्ण या पिप्पली चूर्ण डाल देना चाहिए। कभी−कभी सप्ताह में एक बार चूर्ण के स्थान पर 10 मिली एरंड तेल (कैस्टर ऑयल) मिलाकर पिलाना चाहिए। फेसियल पैरालिसिस अर्थात् चेहरे के लकवे या अर्दित से पीड़ित व्यक्ति के क्वाथ में उक्त चूर्ण के स्थान पर भुना जीरा 1 ग्राम, सैंधा नमक 2 ग्राम एवं घी से भुनी हुई हींग 25 मिग्रा., तीनों का महीन पिसा हुआ चूर्ण मिलाकर ऊपर से 100 मिली. एरंड तेल मिलाकर तब पिलाना चाहिए। इससे अर्दित रोग जल्दी ठीक होता है।
यह चिकित्सा के साथ ही पक्षाघात पीड़ित अंग पर वातनाशक तेल की मालिश करनी चाहिए। आयुर्वेद चिकित्सा में अभ्यंग−मालिश के लिए माषादि तेल, महानारायण तेल, बला तेल, ज्योतिष्मती तेल, (मालकाँगनी तेल) आदि प्रभावकारी बताए गए हैं लेकिन यहाँ पर एक सर्वाधिक प्रभावी व बनाने में सरल पक्षाघातनाशक तेल की विधि बताई जा रही है, जिसे हर कोई आसानी से बना सकता है व सभी प्रकार के लकवे या पक्षाघात तथा वात दरदा के अभिशाप से मुक्ति पा सकता है। तेल इस प्रकार बनाया जाता है−
1. आँक के हरे पत्ते 2. सेहुँड (थूहर) 3. काले धतूरे के हरे पत्ते 4. एरंड के हरे पत्ते 5. बकायन या निर्गुंडी के हरे पत्ते 6. सँभालू के हरे पत्ते 7. सहजने के पत्ते 8. भृंगराज के पत्ते 9. महुए के पत्ते 10. भाँग के पत्ते 11. सहदेई 12. असगंध के पत्ते 13. मालकाँगनी के पत्ते या बीज। इन सभी को संभाग से लेकर कूट−पीसकर इनका रस निकाल लें। रस के वजन के बराबर मात्रा में काले तिल का तेल मिलाकर उसे एक कड़ाही में मंद आँच पर पकने दें। जब मात्र तेल बच रहे, तब ठंडा होने पर उसे छानकर बोतल में भर लें। पीड़ित अंग पर दो−तीन बार मालिश करते समय तेल में थोड़ा−सा पिप्पली एवं कालीमिर्च का चूर्ण मिला लें। लकवा, फालिज एवं संधिवात आदि सभी वात व्याधियों में यह अतीव लाभकारी सिद्ध होता है।
संवेदना जब जीवन से झरती है, तो सन्देश बनती है। यदि इसका उद्गम स्रोत अस्तित्व की गहराइयों में समाए सघन अहसास हैं, तो इससे दिल को छूने वाले काव्य के स्वर फूटते हैं। वे स्वर असंख्यों को प्रेरित-परिवर्तित करते हैं। ग्यारह वर्षीय मैटी स्टेपनेक इन दिनों ऐसी ही काव्य सृष्टि कर रहा है। माँसपेशियों की असाध्य बीमारी से उसका जीवन रस लगभग सूख चुका है। लेकिन जो कुछ भी थोड़ी सी बूँदें बाकी है, उन्हें वह उदारतापूर्वक अपने काव्य स्वरों से बाँट रहा है। उसकी कविताएँ बेहद मर्मस्पर्शी है। पढ़ने वाले के निराशा भरे जीवन में बरबस आशा कि किरणों का उजाला बिखेर देती है।
चिकित्सा विशेषज्ञ हैरान और हतप्रभ हैं इस मरणोन्मुख बालक की अदम्य जिजीविषा से। वे स्वयं भी उससे प्रेरणा पाते हैं। पिछले वर्ष ग्यारह सितम्बर को अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर पर हुए हमले के बाद से अमेरिकन सुकून हासिल करने के लिए मैटी की कविताओं से अपने जीवन के लिए प्रेरणा व दिशा पा रहे हैं। मैटी स्टेपनेक की कविताओं का जीवन दर्शन है ‘जिन्दगी में आए हर तूफान के बाद उत्सव मनाया जाय।’ वह इन दिनों अमेरिका में सबसे ज्यादा बिकने वाला लेखकों की सूची में शीर्ष पर है।
न्यूयार्क टाइम्स ने इस वर्ष की पिछली तीन फरवरी के पखवाड़े की बेस्टसेलर सूची में मैटी की किताब ‘जर्नी थ्रू हार्ट साँग्स’ को पहले स्थान पर रखा है। इस पुस्तक में मैटी की वे कविताएँ शामिल हैं, जो उसने बहुत कम उम्र में लिखी थीं। विख्यात प्रकाशकों के सुप्रसिद्ध न्यूज़लेटर ‘पब्लिशर वीकली’ के चार्ल्स एबट का कहना है- अपने जीवन को असाध्य बीमारी के कारण लगभग खो चुका मैटी सबको भरपूर जीवन बाँट रहा है। उसका सन्देश है कि भगवत्कृपा की सघन वृष्टि सब पर लगातार होती रहती है। बात सिर्फ उसे अनुभव करने की है। जीवन के प्रत्येक दुःख व दुर्घटना में भगवत्कृपा समाया रहता है। जब तुम्हें मालुम हो कि तुम्हारा सब कुछ छिन गया है, अब तुम्हारे पास न धन बचा है, न जीवन। तब ऐसे में प्रभु पर विश्वास करके अपने अस्तित्व को एक बार फिर विश्वास पूर्वक निहारो। तुम पाओगे कि तुम्हारे पास अभी बहुत कुछ है। जो खोया वह तो थोड़ा सा था, जो मिला वह बहुत ज्यादा है। भगवत्कृपा से मिले इस अनोखे अनुदान में जीवन की मौलिकता है, नवसृजन की महक है।
पिछले साल जुलाई में मैटी वाशिंगटन के एक अस्पताल में जिन्दगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा था। तब उसने अपनी माँ से अपनी कविताओं को छपवाने की इच्छा जाहिर की थी। इसके बाद एक स्थानीय प्रकाशक ने हार्ट साँग्स की 200 प्रतियाँ छापी थी, लेकिन बाद में तो इस पुस्तक को एकायक भारी प्रसिद्धि मिल गयी।
मैटी के दो भाई व एक बहिन माँसपेशियों की इसी असाध्य बीमारी से मर चुके हैं। उसकी माँ जेनी को 30 वर्ष की उम्र के आस-पास से यह बीमारी है। वह व्हील चेयर के सहारे ही चल पाती है। लेकिन माँ-बेटे दोनों ही अपने जीवन के कष्टों को भगवान् का वरदान मानते हैं। मैटी का कहना है कि जब मैं अपनी माँ को कम्प्यूटर पर काम करते हुए देखता, तो उनसे कहता मैं बोलता जाता हूँ, आप उसे लिखती जाएँ। बाद में माँ ने बताया कि यह तो कविता है। तब मन में आया, काश! इसे औरों में बाँटा जा सके। और बस प्रभु ने वैसी व्यवस्था भी जुटा दी।
उसकी कविता ‘फ्यूचर इको’ में उसकी जीवन संवेदना बड़ी मार्मिक रीति से उभरी है। इसमें उसने कहा है कि एक दिन ऐसा आएगा, जब वह बिल्कुल चल नहीं सकेगा। लेकिन ये भी उसके प्रभु प्रेम के क्षण होंगे। इन दिनों यही स्थिति है। वह अब केवल व्हील चेयर से जुड़े वेंटीलेटर के सहारे ही साँस ले सकता है। इसके बगैर वह एक पल जिन्दा नहीं रह सकता। इन पंक्तियों के प्रकाशित होने तक हो सकता है वह न रह पाए। लेकिन उसका जीवन सन्देश सदा-सदा मानव जीवन को सुरभित-सुगंधित करता रहेगा। प्रत्येक परिस्थिति में भगवत्कृपा की अनुभूति करने के लिए प्रेरित करता रहेगा।
व्यक्तित्व की व्याधियाँ इन दिनों बेतहाशा बढ़ी हैं। अनजाने ही आदमी इनके चक्रव्यूह में उलझ कर रह गया है। कुण्ठा, निराशा, हताशा, अवसाद, चिन्ता, तनाव आदि के अनेकों कुचक्र उसे घेरे हुए हैं। इनमें से किसी एक से जैसे-तैसे यदि वह निकल पाया तो अनायास ही दूसरे में फँस जाता है। कारण अनेकों होते हैं, पर परिणाम मनस्ताप के रूप में सामने आता है। मानसिक और भावनात्मक पीड़ा की छटपटाहट उसे घेर लेती है। व्यक्तित्व की अनेकों व्याधियाँ उसे व्याकुल कर देती हैं। इनसे छुटकारा पाने के कोशिशें कम नहीं हुई। मनोविज्ञान का समूचा सरंजाम इसी के लिए जन्मा और जुटाया गया है। इसके सभी सिद्धान्तों के प्रचलन का एक मात्र मकसद यही रहा है। फिर भी आज के दौर में प्रचलित कोशिशें बहुत ही अपर्याप्त साबित हुई है।
फ्रायड के सिद्धान्त, मनोविश्लेषण की तकनीकें, आज के युग में कारगर साबित नहीं हो रही हैं। इस विषय में लगातार शोध-अनुसंधान करने वाले विशेषज्ञों का मत है कि फ्रायड के ईड, इगो एवं सुपरइगो के तत्व व्यक्तित्व की सार्थक एवं समग्र व्याख्या करने में अक्षम हैं। ऐसे ही एक अनुसंधान विज्ञानी नोना कॉक्सहेड का कहना है कि किसी भी तत्व की विकृति को समझने व उसका निदान खोजने के पहले उसकी सही प्रकृति एवं क्रियाविधि को जानना जरूरी है। समूची प्रकृति को सही ढंग से समझे बगैर उसकी विकृति के स्वरूप एवं कारणों की खोज नहीं की जा सकती। और विकृति के मूल कारण को खोजे बिना भला उसका निदान किस तरह सम्भव है। इसलिए यदि मनुष्य के व्यक्तित्व को व्याधिमुक्त करना है, तो उसकी प्रकृति की सही ढंग से पहचान करनी होगी।
मनोविज्ञानी ह्यूस्टन स्मिथ इस पहचान का पहला तत्व बताते हुए कहते हैं कि मानव व्यक्तित्व विराट् है। उसके इस विराट् स्वरूप को क्षुद्रता व संकीर्णता में कैद करने की कोशिश ही व्याधियों का कारण है। स्मिथ का कहना है जीवन में क्षुद्रताएँ व संकीर्णताएँ जितनी ज्यादा बढ़ती हैं, व्यक्तित्व उतना ही ज्यादा व्याधिग्रस्त होता है। स्मिथ के अनुसार इस क्रम में दूसरा तत्व है दिए जाने की प्रवृत्ति। उनका मानना है मानव में अनन्त शक्तियाँ व असीमित सम्भावनाएँ हैं। वह अपनी इन शक्तियों व सम्भावनाओं से धरती व जीवन के सौंदर्य में लगातार अभिवृद्धि करने के लिए जन्मा है। लेकिन उसकी ये शक्तियाँ व सम्भावनाएँ तभी जाग्रत् व विकसित होगी जब वह इन्हें बाँटे व बिखेरे, इन्हें लोक हित में लगाए। ऐसा न करके जब वह माँगने की, चाहने की, कामनाओं के वशीभूत होने की क्षुद्रता अपना लेता है, तो वह व्याधिग्रस्त हो जाता है। ह्यूस्टन स्मिथ के अनुसार मानव व्यक्तित्व को व्याधिमुक्त करने के लिए उसके सही व यथार्थ स्वरूप की पहचान करनी होगी।
सुविख्यात मनीषी फ्रान्सेस वान के अनुसार ‘ट्रान्सपर्सनल साइकोलॉजी’ इसी उद्देश्य के लिए किया गया एक वैज्ञानिक प्रयास है। कई विशेषज्ञ इसे बिहैवियरज्म एवं ह्यमेनिस्टिक साइकोलॉजी का अतिविकसित रूप मानते हैं। लेकिन फ्रान्सेस वान ने इसके यथार्थ को बहुत ही सुन्दर रीति से समझाया है। उनका कहना है- ट्राँसपर्सनल का शाब्दिक अर्थ है वैयक्तिकता से परे। वान का कहना है कि व्यक्तित्व को अहंता से आबद्ध किए जाने का सामान्य प्रचलन है। ट्राँसपर्सनल साइकोलॉजी की रीति इस सामान्य प्रचलन से काफ अलग है। इसका विश्वास अहंता की गाँठ को खोलकर मानवीय व्यक्तित्व को सभी संकीर्णताओं और सीमाओं से मुक्त करने में है।
मानव चेतना के मर्मज्ञ मनीषी वान अपने निष्कर्षों में गोस्वामी तुलसीदास जी से काफी कुछ साम्य रखते हैं। गोस्वामी जी इस अहंता की ग्रन्थि के बारे में कहते हैं- ‘जदपि मृषा छूटति कठिनई’ अर्थात् यह गाँठ है तो एकदम झूठी, फिर भी यह छूटती बड़ी मुश्किल से है। वान भी यही कहते हैं। उनका कहना है कि अहंता का वास्तविक अस्तित्व नहीं है, फिर भी इसका बोध मनुष्य को घेरे हुए है। यह मिथ्या बोध ही अहंता की ग्रंथि है। यही व्यक्तित्व की समस्त व्याधियों का मूल है। मानवीय सम्पूर्णता की सभी सम्भावनाओं की अभिव्यक्ति भारी अवरोध है। इस अवरोध को हटा देने पर मनुष्य सहज ही अपने विराट् स्वरूप की अनुभूति कर सकता है। अपने में समायी समस्त सम्भावनाओं एवं शक्तियों को जान सकता है और उनका सार्थक उपयोग कर सकता है।
इन अर्थों में ट्राँसपर्सनल साइकोलॉजी के सिद्धान्त, प्रयोग, तकनीकें एवं निष्कर्ष केवल मनुष्य के व्यक्तित्व को व्याधिमुक्त करने तक सीमित नहीं है। यह तो उनका पहला कदम भर है। अपने अगले कदम में यह मानवीय व्यक्तित्व की विराटता में समायी अनन्त सम्भावनाओं एवं असीमित शक्तियों को उजागर करने की प्रणाली है। इसके सिद्धान्त इस सत्य का ज्ञान कराते हैं कि मानवीय सम्बन्धों के सूत्र, आपस में एक दूसरे से यहाँ तक कि प्राकृतिक परिवेश एवं वातावरण से जुड़े हुए हैं। यहाँ तक कि अस्तित्व की गहराइयों में ये सभी आपस में एकात्म है, सघन रूप से एक हैं। इसलिए जब कभी मनुष्य को व्याधिमुक्त करने की बात होती है, तो वैश्विक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय परिदृश्य को भी व्याधिमुक्त करने के प्रयास भी स्पष्ट होते हैं।
कई विचारशील जन ट्राँसपर्सनल मनोविज्ञान के सिद्धान्तों में धार्मिक एवं दार्शनिक तत्वों का आरोपण करते हैं। इनमें पारस्परिक साम्य व सामञ्जस्य बिठाने की कोशिश करते हैं। फ्रान्सेस वान को यह स्थिति स्वीकार नहीं है। उनका कहना है कि धार्मिक व दार्शनिक तत्व चिन्तन के प्रचलित स्वरूप में प्रायोगिक वैज्ञानिकता का कोई स्थान नहीं है। जबकि ट्राँसपर्सनल मनोविज्ञान का सारा ढाँचा वैज्ञानिक प्रयोगों पर टिका है। वान के अनुसार यह भारी फर्क है। एक तरफ सिर्फ श्रद्धा व आस्था है, तो दूसरी ओर तर्क एवं प्रयोग। वान को इन दोनों के मिलन का कोई बिन्दु नजर नहीं आता। फ्रान्सेस वान अपने स्थान पर सही हैं, क्योंकि उनका परिचय केवल बाइबिल के पृष्ठो तक रहा है। वैदिक ज्ञान, उपनिषद् एवं योग के प्रयोगों से वह अपरिचित हैं।
यदि ऋषियों की अनुसन्धान साधना से वह परिचित होते, तो वे अपने प्रयोगों को और भी अधिक सराहनीय एवं समग्र बना सकते हैं। लेकिन फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि ट्राँसपर्सनल साइकोलॉजी पश्चिम की विज्ञान साधना एवं ऋषियों के आध्यात्मिक प्रयोगों के बीच एक सुदृढ़ सेतु हो सकती है। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में इसके प्रायोगिक स्वरूप को विकसित करने की कोशिश इन दिनों की जा रही है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के आचार्यगण भी इसमें महत्वपूर्ण सहयोग कर रहे हैं। मानवीय व्यक्तित्व को व्याधिमुक्त करने के लिए ट्राँसपर्सनल साइकोलॉजी एवं अध्यात्म विज्ञान की तकनीकों की समन्वित प्रयोग विधियाँ विकसित की गयी हैं।
वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के अध्ययन क्षेत्र में यह एक नयी तकनीक है। इसमें व्यक्तित्व की व्याधि के मूल कारण को खोजने के साथ उसको हटाने व मिटाने के लिए अध्यात्म साधना की कोई उपयुक्त विधि निर्देशित की जाती है। इस प्रयोग विधि से होने वाले परिणामों की जाँच परख ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के वैज्ञानिक उपकरणों के साथ स्टैंडर्ड मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के द्वारा की जाती है। इससे मिलने वाले आँकड़ों की साम्यकीय गणना से वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के प्रायोगिक निष्कर्ष उजागर होते हैं। इस तकनीक में जीवन शैली पर विशेष ध्यान दिया गया है। क्योंकि व्यक्तित्व को व्याधिग्रस्त करने का यथार्थ कारण इसी का कोई न कोई बिन्दु है। इस कारण को मिटाने के लिए इसमें अपेक्षित बदलाव जरूरी है।
व्यक्तित्व को व्याधिमुक्त करने वाले ये प्रयोग अभी प्रारम्भिक दशा में है। फिर भी कुछ प्रयोगों के जो निष्कर्ष सामने आए हैं, वे अति उत्साहवर्धक है। जिज्ञासु इन्हें अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर पढ़ेंगे। इन निष्कर्षों से जहाँ अध्यात्मविद्या की समर्थता प्रकट होती है। वहीं यह सत्य भी प्रकट होता है कि देश व विश्व के जन-जन को इनसे लाभान्वित करने के लिए इनमें आधुनिक विज्ञान की तकनीकों का समावेश जरूरी है। निष्कर्षों के वैज्ञानिक आँकलन की दृष्टि से भी यह अनिवार्य है। अभी तक के निष्कर्ष यही प्रमाणित करते हैं कि अहंता की सूक्ष्मताओं से परिचित होकर हमें इससे छुटकारा पाने का साहस जुटाना ही होगा। ट्राँसपर्सनल साइकोलॉजी भी इसी ऋषि चिन्तन की ओर संकेत करती है।
पूजा−पाठ, योग−ध्यान अथवा व्यक्ति गत मोक्ष−मुक्ति के लिए साधना करते रहना ही ‘अध्यात्म’ नहीं हैं। सच्चा अध्यात्म है− अपने सारे गुणों, सारी उपलब्धियों और सारी संपदा को समाज−हित पर निछावर कर देना।
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की अनुसन्धान प्रक्रिया में नए आयाम उद्घाटित हो रहे हैं। यहाँ संचालित होने वाले प्रत्येक प्रयोग से आध्यात्मिक साधनाओं की वैज्ञानिकता प्रकट हो रही है। अध्यात्म विद्या के वैज्ञानिक निष्कर्ष स्पष्ट हो रहे हैं। अभी पिछले दिनों एक प्रयोग अध्यात्म विद्या के सारतत्व ‘ओम्’ पर किया गया। इस प्रयोग परियोजना का विषय था- An investigation to study the effect of Pranav (Om) jap on anxiety and stress levels of individuals.. अर्थात् प्रणव या ओम् के जप का व्यक्तियों के चिंता एवं तनाव के स्तर पर प्रभाव की जाँच। शोध कार्य की इस लघु परियोजना से ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की प्रयोगशाला के शोधकर्मियों की उद्देश्यनिष्ठ एवं उनके कार्य की सार्थकता एक बार फिर प्रकाश पुञ्ज बन कर प्रकट हुई।
अध्यात्मवेत्ताओं और अध्यात्मशास्त्रों ने पग-पग पर ओम् की महिमा के बीत गाए हैं। शास्त्रकारों ने ओम् को प्रणव भी कहा है। लोमश ऋषि ने महामृत्युञ्जय स्तोत्र में कहा है- ‘त्वमोंकरोऽसि वेदानाँ देवानाँ च सदा शिवः’ यानि कि प्रभु तुम्हीं वेदों में ओंकार और देवों में सदाशिव हो। विष्णु सहस्रनाम में इसे वैकुण्ठ पुरुष विष्णु का प्राण बताते हुए कहा है- ‘वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः।’ सप्तशती में समस्त देवगण माता आदिशक्ति की ओंकार से एकात्मकता अनुभव करते हुए प्रार्थना करते हैं- ‘शब्दात्मिका सुविमलर्ग्युजुषाँ निधानमुद्गीथ रम्य पदपाठवताँ च साम्नाम्।’
अध्यात्म साधना करने वाले अनुभव करते हैं कि निश्चल प्रकृति में सृष्टि निमित्त जो क्षोभ की ध्वनि है, वही प्रणव नाद है। आचार्य शंकर एवं उनके दादा गुरुदेव गौड़पादाचार्य ने अपनी इन्हीं साधनात्मक अनुभूतियों को आधार बनाकर ओंकार पर विशद् भाष्य लिखा है। ध्यान बिन्दु उपनिषद् में कहा गया है- ‘यही आदि शब्द है, जो नाद अथवा ध्यान में निहित है। यह सभी वेदों का सार तत्व व सृष्टि के विकास का सूत्र है।’ सभी विरोधों का इससे समाहार व शमन होता है। आचार्यगण कहते हैं- ‘तत् प्रत्यक्चेतना अधिगमः अपि अन्तराय अभावश्च’ अर्थात् ओम् से सभी अन्तराय यानि कि चित्त के विक्षेप दूर होते हैं। यह सभी मंत्रों का सेतु है। सभी वैदिक मंत्र इसी से प्रारम्भ होते हैं। वैदिक वाङ्मय में तो मुनित्व की व्याख्या भी ओम् से सम्बद्ध है- ‘ओंकारो विदितो चे न मुनिर्नेन्तरो जनः।’
गायत्री महामंत्र में सबसे प्रथम स्थान इसी का है, बाद में व्याहृतियाँ एवं मूल मंत्र है। महामृत्युञ्जय मंत्र में भी यही सर्वप्रथम है। श्री मद्भगवद्गीता में इसे अक्षर ब्रह्म कहा गया है। योग सूत्रकार महर्षि पतंजलि ने ‘तस्य वाचकः प्रणव’ कहकर इसे ईश्वर का वाचक बताया है। ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण में वर्णन है, ‘ओऽमित्य चः प्रतिगर एवं तथैति गाथा या ओमिति वैदेव तथेति मानुषम्।’ यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा में सर्वप्रथम प्रणव का उल्लेख किया है। कृष्ण यजुर्वेद के संहिता भाग में इसकी महत्ता स्पष्ट की गयी है। अथर्ववेद में इसे सेतु कहा है। ऋग्वेद के प्रथम मंत्र ॐ अग्निमीले का प्रारम्भ ओम् से और इसके आरण्यक का अन्त इत्योम् से होता है। इसी प्रकार यजुः में ‘ॐ इषेत्वीर्जेत्वा’ और अन्त में ‘ॐ खं ब्रह्म’ है।
उपनिषदों में तो न जाने कितनी बार कितने रूपों में इसकी मीमाँसा की गयी है। इससे यही समझा जाता है कि यह विश्वात्मक व विश्वातीत दोनों है। अथर्वशिरा के अनुसार जो हृदय में नित्य रहता है, उसी को ‘अ उ म’ तीन मात्रा कहा जाता है। इसमें बताया गया है कि हृदय में स्थित पुरुष का उत्तर भाग ओंकार है। और वही सर्वव्यापी अनादि अनन्त, सूक्ष्मातिसूक्ष्म और ब्रह्म है। वही रुद्र और महेश्वर है। अथर्वशिरा में इसका स्वरूप निर्दिष्ट है। इसके एक बार उच्चारित होने से मन के साथ सकल प्राणवायु षट्चक्र भेदकर सुषुम्ना से शिरोदेश में उठती है। योग संहिताओं में भी इसके जप के महत्त्व को दर्शाया गया है।
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की लघु शोध परियोजना में ‘ओम्’ के इस शास्त्रीय महत्त्व को वैज्ञानिक प्रयोग के द्वारा परखा गया है, इस प्रयोग में मैच ग्रुप डिज़ाइन एवं कन्ट्रोल ग्रुप डिज़ाइन का इस्तेमाल किया गया। मैच ग्रुप रिसर्च डिज़ाइन से प्रयोगात्मक समूह पर होने वाले प्रभावों की प्रमाणिकता नियंत्रण समूह से तुलना करके जाँच की जाती है। इन दोनों में सदस्यों की संख्या समान होती है। इन रिसर्च डिजाइनों के अनुरूप देव संस्कृति महाविद्यालय के 20 से 30 आयुवर्ग के 12 छात्रों का प्रयोगात्मक अध्ययन के लिए चुनाव किया गया। इनमें से 6 छात्र प्रयोगात्मक समूह में रहे व 6 छात्र कन्ट्रोल ग्रुप या नियंत्रण समूह में रखे गए।
ओम् की जप साधना प्रारम्भ करने से पहले इन सभी छात्रों की चिन्ता व तनाव का परीक्षण स्टैंडर्ड मनोवैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा किया गया। इस पहले परीक्षण के बाद कन्ट्रोल ग्रुप के लोग अपनी सामान्य दिनचर्या शान्तिकुञ्ज परिसर में रहकर बिताते रहे। जबकि प्रयोगात्मक समूह के लोगों ने अपनी ओम् जप की 20 दिवसीय साधना प्रारम्भ की। साधना कराने के लिए मार्गदर्शन का दायित्व योगविभाग के आचार्यगणों ने वहन किया। इसके लिए सारे प्रयोग परीक्षण ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की प्रयोगशाला में यहाँ के शोध कर्मियों के द्वारा सम्पन्न किए गए।
महीने की पाँच तारीख के प्रथम परीक्षण के बाद प्रयोगात्मक समूह के व्यक्ति एक स्थान पर समूह में बैठकर प्रतिदिन एक घण्टे की ओम् जप साधना करते रहे। इस जप साधना के अतिरिक्त उनके सभी बाकी क्रियाकलाप कन्ट्रोल ग्रुप के व्यक्तियों की ही भाँति रहे। महीने की 25 तारीख को यानि की साधना के बीस दिन हो जाने पर चिन्ता एवं तनाव का दूसरा मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया गया। इस दूसरे परीक्षण से प्राप्त आँकड़ों का वैज्ञानिक विधि से साँख्यकीय आँकलन किया गया। इसके निष्कर्षों से यह पता चला कि ओम् जप साधना से प्रत्येक व्यक्ति की चिन्ता व तनाव के स्तर में भारी कमी आती है। इस साँख्यकीय गणना व निष्कर्षों का प्रारूप कुछ इस तरह रहा-
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
चिन्ता स्तर
t value= 4.1
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
तनाव स्तर
t value= 3.57
इन दोनों में ही .01 level की महत्ता प्रदर्शित हुई।
सामान्य पाठकों के लिए इस साँख्यकीय गणना का सार इतना ही है कि चिन्ता स्तर के साधना के बाद परीक्षण में कन्ट्रोल ग्रुप की चिन्ता का औसत 11.2 था। वही प्रयोगात्मक समूह के लोगों की चिन्ता का मध्यमान या औसत 3.5 रहा। इसी आधार पर इनका मानक विचलन क्रमशः 3.55 एवं 2.94 रहा। इसमें N नम्बर या संख्या का द्योतक है। जो दोनों में बराबर 6 व 6 थी। यहाँ df का अर्थ डिग्री ऑफ फ्रीडम या स्वतंत्रता का अंश है, जो 5-5 थे। इसकी प्रयोगात्मक महत्ता को देखने के लिए साँख्यकीय का टी टेस्ट लगाया गया। जिसका मूल्य 4.1 आया। जो प्रयोगात्मक परिणामों की महत्ता के .01 लेवल को दर्शाता है। इसका साधारण मतलब यही है कि ओम् जप की साधना से 100 में से 99 लोगों को या 100 में से 99 बार चिन्ता में फायदा होता है।
लगभग यही स्वरूप तनाव के स्तर में प्रदर्शित हुआ। इसमें कन्ट्रोल ग्रुप व प्रयोगात्मक समूह का मध्यमान व मानव विचलन क्रमशः 10.83, 5.66 व 1.37, 3.27 रहा। दोनों में संख्या बराबर 6-6 थी। स्वतंत्रता के अंश दोनों में 5-5 थे। टी टेस्ट के द्वारा इसका मूल्य 3.57 निकला। टी के इस मूल्य से भी साँख्यकीय तालिका के अनुसार प्रयोगात्मक परिणामों की महत्ता .01 लेवल की प्रदर्शित होती है। इसका साधारण मतलब यही है कि ओम् जप की साधना से 100 में से 99 लोगों को या 100 में से 99 बार तनाव में फायदा होता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से ये निष्कर्ष काफी प्रभावकारी परिणाम दर्शाते हैं। इन निष्कर्षों से यह पता चलता है कि ओम् के जप से शास्त्र कथन के अनुसार जहाँ आध्यात्मिक विभूतियाँ जीवन में प्रकट होती है। वहीं इसके जप से सामान्य जन अपनी चिन्ता व तनाव में भारी लाभ उठा सकते हैं। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के ये शोध निष्कर्ष प्रमाणित करते हैं कि चिन्ता व तनाव को दूर भगाने के लिए किसी मनोचिकित्सक के पास जाने या मनोव्याधि की औषधि लेने की जरूरत नहीं है। इसके लिए थोड़ी सी पर भावपूर्वक ओम जप की साधना ही पर्याप्त है।
अखण्ड ज्योति के पुराने पन्नों में परम पूज्य गुरुदेव के जीवन के नए रहस्य हैं। इनमें गुरुदेव के ‘जन्म कर्म च में दिव्यमेवं’ की झलक है। उनकी सेवा-साधना का प्रकाश है। सन् 1940 ई. की अप्रैल और जून माह की अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर ऐसा ही एक रहस्यमय प्रसंग अंकित है। उन दिनों गुरुदेव ने ‘आनन्द प्रतिष्ठान’ नाम की एक संस्था की स्थापना की थी। यह संस्था तंत्र विज्ञान की साधना-शिक्षण एवं इसकी विभूतियों व उपलब्धियों से लोक सेवा हेतु संकल्पित थी। महायोगी परम पूज्य गुरुदेव तंत्र विद्या के महान् आचार्य भी थे। अखण्ड ज्योति जून 1940 के ये कुछ पृष्ठ उनके इसी आचार्यत्व का प्रामाणिक दस्तावेज हैं।
व्यक्तिगत चर्चाओं में वह यदा-कदा तंत्र विद्या के कतिपय गोपनीय रहस्यों की ओर संकेत कर दिया करते थे। ऐसी ही एक चर्चा में उन्होंने यह भी बताया था कि उनके मार्गदर्शक ने उन्हें तंत्र विज्ञान के उन आयामों की शिक्षा दी है, जो आज लोक में दुर्लभ है। किसी युग में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को तंत्र का यह रहस्यमय विज्ञान मालूम था। विश्वामित्र द्वारा प्रवर्तित ये साधनाएँ कालान्तर में लुप्त हो गयीं। गुरुदेव की मार्गदर्शक सत्ता ने तंत्र विद्या का यह रहस्यमय विज्ञान ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की कारण सत्ता से प्राप्त किया। बाद में समय आने पर इसे अपने सुयोग्य शिष्य हम सबके गुरुदेव को सौंपा। अनेकों वर्षों की कठिन व कठोर साधनाओं के बाद वह इसमें पारंगत व प्रवीण हुए। अनेकानेक विद्याओं व साधनाओं में आचार्य होने के साथ वह तंत्र विज्ञान के भी सुप्रतिष्ठित आचार्य बने। आनन्द प्रतिष्ठान में उनकी तंत्र विद्या का यही साधना सत्य प्रकट हुआ।
यह आनन्द प्रतिष्ठान उत्तरप्रदेश में आगरा शहर के फ्रीगंज मुहल्ले में स्थापित किया गया था। यह तंत्र विद्या की उपासना का केन्द्र था। इसमें परम पूज्य गुरुदेव एवं उनके द्वारा प्रशिक्षित कुछ साधक तंत्र विज्ञान की दुरूह क्रियाएँ करके जो शक्ति प्राप्त करते, उसे जनहित में बाँट देते। गुरुदेव द्वारा प्रवर्तित तंत्रविद्या की इन साधनाओं व प्रक्रियाओं की सूक्ष्मता बहुत अधिक थी। तदानुसार उनका प्रभाव भी बहुत व्यापक व दीर्घकालिक होता था। इसकी गूढ़ क्रियाओं द्वारा उत्पन्न किए गए सूक्ष्म कम्पन इतने शक्तिशाली होते थे कि हजारों मील दूर बैठे हुए आदमी पर भी उतना ही असर पड़ता, जितना कि पास बैठे हुए आदमी पर होता। इसका प्रभाव क्षण भर खेल दिखाकर ही समाप्त नहीं होता, बल्कि जिसके ऊपर उपचार किया जाता, उसके गुप्त मन में इतना गहरा उतर जाता कि उसके शरीर व मन में आश्चर्यजनक व चमत्कारी परिवर्तन हो जाते थे।
आनन्द प्रतिष्ठान ने अपना ऐसा कार्यक्रम बनाया था कि कठिन साधना द्वारा प्राप्त शक्ति को पीड़ितों की सेवा में लगाया जाय। और इसके बदले किसी भी गरीब-अमीर से कुछ भी न लिया जाय। अर्थात् लोगों के कष्टों को दूर करने का उपचार बिल्कुल मुफ्त में किया जाय। हाँ लाभ होने पर यदि कोई बिना माँगे अपने मन से थोड़ा-बहुत कुछ दे दे, तो उसे सन्तोषपूर्वक साधकों के जीवन निर्वाह के लिए ले लिया जाय। यहाँ तंत्र विद्या द्वारा कठिन से कठिन शारीरिक रोग, मानसिक रोग, बुरी आदतों, सन्तान सम्बन्धी चिन्ता, गृहकलह, बुरे दिन, अनिष्ट की आशंका, भूत बाधा, अशान्ति आदि का बड़ी आसानी से उपचार कर दिया जाता था। जिन लोगों को कोई ऐसा रोग होता, जिससे कि उसकी जिन्दगी खतरे में पड़ने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती, ऐसे लोगों के उपचार को यहाँ वरीयता दी जाती थी।
परम पूज्य गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर ‘तंत्र विज्ञान की अद्भुत शक्ति! अपने कष्ट मिटाने में हमारी सेवा स्वीकार कीजिए।’ शीर्षक से एक आमंत्रण लेख लिखा था। इसमें गुरुदेव ने लिखा- ‘शारीरिक रोगों की चिकित्सा के लिए अब यह नियम बना दिया गया है कि केवल वे ही रोगी पत्र व्यवहार करें जिन्हें जीवन का खतरा है। साधारण छोटे-मोटे रोगों के लिए अपने यहाँ चिकित्सकों से इलाज करा लेना चाहिए।’ असाध्य शारीरिक रोगों के अलावा स्मरण शक्ति की कमी, चिन्ता, उद्विग्नता, हीनता की भावना, बुरे कामों में प्रवृत्ति, क्रोध, बुरी आदतें आदि मानसिक व्याधियों का यहाँ बड़ी सरलता से उपचार किया जाता था। इस प्रसंग में गुरुदेव ने बहुत ही स्पष्ट करते हुए लिखा- ‘एक बात हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन आदि पापपूर्ण क्रियाएँ किसी के पक्ष या विपक्ष में किसी भी दशा में नहीं करते। इसके लिए कोई सज्जन लिखा पढ़ी नहीं करें। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तेजी मन्दी का भाव, दड़ा, सट्टा, गढ़ा धन आदि हम नहीं बताते, इसलिए कोई महानुभाव इन कामों के लिए पूछने-ताछने का कष्ट न उठावें।’
आनन्द प्रतिष्ठान का उद्देश्य तंत्र विज्ञान द्वारा विशुद्ध लोकसेवा का था। इसके द्वारा शारीरिक-मानसिक व बाहरी कष्टों से दुःखी पीड़ित जनों को बचाने के लिए प्रयत्न किए जाते थे। यह प्रक्रिया पूरी तरह से वैज्ञानिक थी। इसके बारे में गुरुदेव ने लिखा भी- ‘किसी अन्धविश्वास, ढोंग, भ्रमजाल फैलाने से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। स्पष्ट है कि जब हम किसी से कोई फीस नहीं लेते, रुपए नहीं ऐंठते, तो क्यों किसी को धोखे में डालेंगे और क्यों ढोंग फैलावेंगे।’ इस केन्द्र की उपचार प्रक्रिया सभी के लिए सुलभ थी। बस इसके लिए बन्द लिफाफे में अपनी परेशानी का विवरण भेजना होता था। इस प्रतिष्ठान में तंत्र विद्या से उपचार करने के लिए रोगी की चार चीजें आवश्यक समझी जाती थी। 1. रोग का कारण- वर्तमान स्थिति और रोगी के वर्तमान समय का पूरा परिचय। 2. रोगी का फोटो (यह पाँच साल से अधिक पुराना न हो), 3. रोगी के शिखा स्थान (चोटी) के 11 बाल, 4. सफेद स्याही सोख (फ्लाटिंग पेपर) पर टपकाया हुआ रोगी के बाएँ अंगूठे में से एक बूँद खून। इन चार चीजों से उपचार में बड़ी आसानी हो जाती थी। साथ ही इसके परिणामों के बारे में सुनिश्चितता भी हो जाती। उपचार इन चारों के बिना भी होता था, पर उस स्थिति में देर लगने की सम्भावना बनी रहती थी।
विभिन्न रोगों के सार्थक, समर्थ व समग्र उपचार के अलावा यहाँ अध्यात्म विद्या व तंत्र विद्या की शिक्षा देने की व्यवस्था भी जुटायी गयी थी। इस प्रशिक्षण क्रम में उन लोगों को प्रवेश दिया जाता था, जो अपनी आध्यात्मिक उन्नति करना चाहते हों अथवा दूसरों की चिकित्सा करने की ताँत्रिक शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। इस शिक्षा पद्धति में अलौकिक व गुप्त बातों को जानने की योग्यता का शिक्षण भी शामिल था। यह शिक्षा यहाँ बिल्कुल मुफ्त दी जाती थी। बस साधक को इस बात के संकल्पित होना पड़ता था कि वह अपनी विद्या का उपयोग विशुद्ध रूप से परोपकार के लिए करेगा। गुरुदेव अपनी दिव्य दृष्टि द्वारा ऐसे साधकों की भली भाँति जाँच-परख किया करते थे। इस सम्बन्ध में उनका स्पष्ट कथन था, ‘अपनी नीच वासनाओं की पूर्ति या अपना अनुचित स्वार्थ साधन करने के लिए इस विद्या का उपयोग करने वाले लोगों को हमारे द्वारा किसी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने की आशा न करनी चाहिए।’
रोगियों के उपचार एवं साधकों के प्रशिक्षण का सारा खर्च गुरुदेव स्वयं करते थे। आनन्द प्रतिष्ठान से बहुमूल्य रामबाण दवाएँ, रसायन, जड़ी-बूटियाँ, साधना यंत्र, कवच, रक्षा विधान आदि सब चीजें बिल्कुल मुफ्त भेजी जाती थी। बस लाभार्थी को केवल डाक खर्च वहन करना पड़ता था। इस अद्भुत केन्द्र के द्वारा गुरुदेव ने वर्षों तक जन सेवा की। तंत्र विज्ञान की वैज्ञानिकता को खरा व प्रामाणिक साबित किया। असंख्य लोगों ने यहाँ से लाभ उठाया। अनेकों असाध्य रोगी यहाँ से संपर्क करके स्वस्थ हुए। बहुतों के जीवन में दुःख का कुहासा मिटा। अवसाद के बादलों के स्थान पर आनन्द का सूर्योदय हुआ। कार्य की व्यस्ततावश उन्हें इस प्रतिष्ठान को बन्द करना पड़ा। परन्तु आज भी यह उनके जीवन की पुस्तक का स्वर्णिम अध्याय है। जिसकी आभा और प्रभा अभी भी वैसी ही प्रकाशित है।
महिला संत राबिया अपने पूजा स्थल पर एक जल कलश रखती थी और एक जलता अंगारा।
लोग इन पूजा−प्रतीकों का रहस्य पूछते, तो वे कहतीं, मैं अपनी आकाँक्षाओं को पानी में डुबाना चाहती हूँ और अहंकार को जलाना चाहती हूँ, ताकि पतन के इन दोनों अवरोधों से पीछा छुड़ाकर प्रियतम तक पहुँच सकूँ।
किसी ने कहा, आप तो संत हैं, सिद्ध हैं, आप में अब दोष कहाँ रह गए, जिन्हें डुबाना−जलाना चाहती हैं। राबिया बोलीं, जिस दिन अपने आपको त्रुटिहीन मान लूँगी, उस दिन संत तो क्या, इंसान भी न रह जाऊँगी।
गुरुपूर्णिमा विशेष−2
गुरुपूर्णिमा पर्व नजदीक था। वर्षा की हल्की फुहारों से प्रकृति रसमय हो रही थी। ग्रीष्म का आतप कब का वाष्प बनकर विलीन हो गया था। धरती की माटी में पड़े हुए बीज शायद अब अंकुरण की तैयारी में लग गए थे। बाहर के इस वातावरण का शिष्य-साधक के अन्तःकरण से अद्भुत मेल था। साधक के अन्तःकरण को भी गुरुकृपा की अमृतवृष्टि होने तक कठिन तप से तपना पड़ता है। लेकिन गुरुकृपा की हल्की फुहारें पड़ते ही उसकी समूची आन्तरिक प्रकृति रसमय हो जाती है। साधना के बीज उसके अन्तःकरण की उर्वर भूमि में अंकुरित होने की तैयारी करने लगते हैं। गुरुकृपा आध्यात्मिक जीवन के प्रत्येक रहस्य को खोलने वाली दिव्य शक्ति है। गुरुदेव की कृपा से सारे असम्भव सम्भव हो जाते हैं। शास्त्र यही कहते हैं, ऋषि वचनों से यही प्रमाणित होता है। अनुभवी साधक, सन्त, सिद्धगण, आध्यात्मिक विभूतियों से सम्पन्न महापुरुष सभी का यही मत है। पर यह गुरु कृपा हो कैसे?
इस महाप्रश्न की हलचलों को शायद अन्तर्यामी परम पूज्य गुरुदेव ने अनुभव कर लिया। अखबार पढ़ते हुए वह हल्के से मुस्कराए और फिर से अखबार के पन्नों में अपनी नजर टिका दी। ये वर्ष 1987 ई. के दिन थे। मार्च महीने की नवरात्रि से गुरुदेव ने ब्रह्मवर्चस के लोगों को लेखन सिखाना शुरू किया था। सभी की बंटी हुई पारियाँ थीं। एक समूह में तीन या चार लोग थे। प्रत्येक समूह के लोगों को अपनी पारी में गुरुदेव के पास जाना पड़ता था। हर एक समूह की सप्ताह में दो पारी होती थी। सब लोग पुस्तकालय में पढ़ते, उपयुक्त अंशों को खोजते और बाद में जैसा भी बन पड़ता उसे लेखबद्ध करते। इस तरह लिखे गए लेखों को गुरुदेव सुना और सुधारा करते थे। उनकी टिप्पणियाँ बड़ी मार्मिक होती थीं। इस समूचे क्रम में महत्वपूर्ण लेख या लेखन नहीं था। महत्वपूर्ण होता था उन्हें सुनना, विभिन्न विषयों पर उनके विचारों से परिचित होना।
यदा-कदा लेखों से हटकर भी वह कुछ बताया करते थे। ये क्षण बड़े ही अनुभूति पूर्ण और दिल को छूने वाले होते थे। ऐसा एक बार नहीं, कई बार हुआ कि मन में उठ रहे प्रश्नों व उद्वेलनों को अन्तर्यामी-कृपालु गुरुदेव ने जान लिया। और उनका समाधान करते हुए अपने जीवन के कुछ संस्मरण कह सुनाए। आज भी उन्होंने हाथ के अखबार को सोफे के पास रखी हुई छोटी टेबल पर रखा। सोफे से उठे और धीमे किन्तु दृढ़ कदमों से चलकर पास में पड़े हुए अपने तखतनुमा पलंग पर आकर बैठ गए। उनकी आँखों में करुणाजन्य आर्द्रता एवं तप की प्रखरता के बड़े ही अद्भुत स्वरूप की झलक थी। होठों पर प्रायः उपस्थित रहने वाला मधुर हास्य था। उनके समूचे मुखमण्डल पर आज यही तेजस्विता और मधुरता विकीर्ण हो रही थी।
उन्होंने पलंग पर बैठते हुए- अपने सामने टाट पर बैठे हुए लोगों से पूछा- क्यों लड़कों, क्या सोच रहे हो तुम लोग? सोचने वाला इस तरह पूछने पर एकदम अचकचा गया। उसे सूझा ही नहीं कि वह क्या कहे। बस मन में आया कि गुरुदेव स्वयं ही बता दें, कि गुरु कृपा कैसे होती है? कैसे मिलती है? गुरु का प्रिय बनने के लिए क्या करना पड़ता है? ये सारे प्रश्न सोचने वाले के मन के दरवाजे पर सहमे-ठिठके खड़े थे। सभी एक-साथ बाहर आना चाहते थे। सभी को अपने समाधान से मिलने की चाह थी। पर कोई भी प्रश्न इसके लिए हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। एक-दूसरे की ठेल-पेल में सत्ती प्रश्न वहीं के वहीं रह गए। लेकिन मन में आपस में ही धक्का-मुक्की करते हुए प्रश्नों के इस हाल को गुरुदेव ने अनुभव कर लिया।
उनके होठों पर हल्की मुस्कान आ गयी। वह कहने लगे- प्रकृति कभी किसी सत्पात्र को वंचित नहीं करती है। अब देखो धरती सूरज के तप में तपी तो बरसात आ गयी। जिन्दगी में भी कुछ ऐसा ही है। तप से पात्रता मिलती है और पात्रता से अनुदान मिलते हैं। ‘गुरु कृपा के लिए क्या करना पड़ता है?’ पूछने वाले ने गुरुदेव को प्रसन्न भाव से बोलते हुए देखकर हिम्मत जुटायी। ‘शिष्य बनना पड़ता है।’ गुरुदेव बोले। अपने अन्दर शिष्यत्व पनप गया हो, तो गुरुदेव अपने आप ही उसे ढूंढ़ते हुए आ जाते हैं। स्वयं न भी आए तो ऐसे शिष्य को अपने पास बुला लेते हैं। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द से इसी तरह मिले थे। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को उसके घर के पास जाकर ढूंढ़ लिया था।
फिर धीरे से बोले- बेटा! मेरे गुरु भी मुझे ढूंढ़ते हुए चलकर मेरे घर आए थे। इसके लिए मुझको बाहरी तौर पर कुछ भी नहीं करना पड़ा। बस जब से मैंने होश संभाला, अपने अंतर्मन को भगवान की ओर, आदर्शों की ओर लगाता गया। मन को इस बात के लिए पक्का किया, संसार की वासनाओं, कामनाओं के पीछे नहीं भागना है। जिन्दगी भगवान के लिए जीनी है। भगवान सब के मन की बात जानते हैं। उन्होंने मेरे मन की बात भी जान ली। और अपने प्रतिनिधि के रूप में गुरु को मेरे पास भेज दिया। उन्होंने आते ही मेरे ऊपर कृपा उड़ेल दी। तब से लेकर आज तक हर रोज-हर दिन उनकी कृपा की वर्षा थमने का नाम ही नहीं लेती। मैं लेते-लेते भले थक जाऊँ, पर वे देते-देते नहीं थकते।
इसके लिए आपको क्या करना पड़ा? पूछने वाले की भावनाओं में व्याकुल आतुरता थी। वह अन्तःकरण में शिष्यत्व को उपजाने वाले रहस्यमय ज्ञान को जान लेना चाहता था। गुरुदेव भी आज करुणा के साकार रूप बनकर शिष्यत्व का मर्म बताने के लिए तैयार थे। उन्होंने पूछने वाले की ओर गम्भीर नजरों से देखा, फिर कहने लगे- मैंने गुरु को कभी भी भगवान से अलग नहीं जाना। मेरा गुरु ही मेरे लिए भगवान है। इस बात को मैंने केवल कहा और सोचा नहीं, बल्कि पल-पल, उम्र भर जिया। अपने गुरु की कृपा, सामर्थ्य एवं प्रेम पर इस तरह से विश्वास किया, जैसे कोई दुधमुँहा बच्चा अपनी माँ पर करता है। गुरु को ही अपना सब कुछ मान लिया। वही मेरे जीवन आधार बन गए।
बेटा, एक बात मैंने और की, मैंने अपने गुरु से कभी भी कुछ नहीं माँगा। उनके चरणों पर अपने को लुटाकर स्वयं को धन्य माना। जिस दिन से मुझे मेरे मार्गदर्शक मिले, उस दिन से मैंने अपनी चिन्ता छोड़ दी। अपना अतीत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ उनके हाथों में सौंप कर निश्चिंत हो गया। मेरा कब क्या होगा? न कभी इसकी चिन्ता की, न परवाह की और न इसके लिए कभी परेशान हुआ। मन में सदा एक सरल विश्वास रहा मेरे गुरुदेव, जो कुछ भी मेरे लिए आवश्यक समझेंगे, वह अपने आप ही कर देंगे। मुझे अलग से कुछ करने और सोचने की भला क्या जरूरत है। यदि मन में कभी कोई चाहत आयी, तो वह यही थी कि मैं गुरुदेव की हर कसौटी पर खरा उतरूँ। उम्र भर उनका सच्चा शिष्य एवं सेवक बना रहूँ।
मेरी यही भावनाएँ गुरुकृपा के लिए चुम्बक बन गयी। गुरुकृपा के बादल चारों ओर से उमड़-घुमड़ कर आते रहे और मेरे ऊपर बरसते रहे। धीरे-धीरे मेरा हृदय, मेरा अन्तःकरण मेरे गुरुदेव का घर बन गया। यह कहते हुए गुरुदेव थोड़ा सा भावुक स्वर में बोले- ‘अब तो बेटा स्थिति यह है कि मैं अपने में कहीं अपने को खोज ही नहीं पाता। मेरे गुरुदेव ही मेरे रोम-रोम, मन, प्राण, जीवन में समाए हैं। वही सब कुछ बन गए हैं। वही नियन्ता हैं, वही सूत्रधार हैं, वही संचालक हैं, जीवन में जो कुछ है, सो वही हैं।’ गुरुदेव के इन उद्गारों में उनकी प्रगाढ़ भावनाओं का उजाला था। एक अलौकिक चमक थी जो बहुत ही साफ अनुभव हो रही थी।
कहते-कहते, उनका स्वर बदल गया। इसमें वेदना की कसक उभर आयी। वह गम्भीर होकर बोले- ‘बेटा, मैं भी तुम लोगों के लिए बहुत कुछ करना चाहता हूँ, पर चाहकर भी कुछ कर नहीं पाता। क्योंकि तुम सबने अपने द्वार-दरवाजे बन्द कर रखे हैं। जिधर से घुसने की कोशिश करो, उधर ही अहं का पहरा नजर आता है। हर तरफ क्षुद्रताएँ एवं संकीर्णताएँ रास्ता घेरे हैं। जब कभी सूक्ष्म रूप से तुम लोगों की बातें सुनता हूँ तो हल्केपन के सिवा कुछ नजर ही नहीं आता है। यदि तुम यह चाहते हो कि तुम्हारी जिन्दगी में भी वैसे ही चमत्कार हों, जैसे कि मेरी जिन्दगी में हुए, तो फिर शिष्य बनो। इस तरह पास बैठना, मिलना भी कोई पास होना या मिलना है। सच्चा मिलना तो वह है, जब शिष्य की अन्तर्चेतना अपने गुरु के अन्तर्चेतना से मिलती है। समर्पण, विसर्जन एवं विलय की अनुभूति पाती है। तब आती है जीवन में पूर्णता, तब पता चलता है गुरु पूर्णिमा का मानी-मतलब।’ गुरुदेव के इन स्वरों में उनका शाश्वत प्राण है। इन्हें जीवन में विचार बनाकर नहीं कर्म कौशल बनाकर उतार पाए तो ही समझें कि हमने इस गुरु पूर्णिमा में उन्हें भक्ति पूर्ण रीति से प्रणाम किया। गुरु पूर्णिमा का सच्चा मतलब समझा।
गुरु चरणों की भक्ति में तप साधना की पूर्णता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी काव्य व्यञ्जना में इसे तात्विक अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने रामचरित का गान करने से पहले सद्गुरु चरणों का चरित बखान किया है। उनकी कालजयी दैवी कृति श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड के प्रारम्भ में यह प्रकरण है- मंगलाचरण के सात श्लोकों व वन्दना के चार दोहों के बाद गुरु चरणों की महिमा का गान है। कलेवर की दृष्टि से अत्यन्त लघु होते हुए भी भक्ति संवेदना की दृष्टि से यह प्रकरण महाविराट् है। इसमें सद्गुरु चरणों के स्वरूप का दर्शन है। इसका आध्यात्मिक तत्व चिन्तन है। साथ ही इनकी भक्ति का साधना विज्ञान है। इसका गुरु भक्ति में लीन साधकों के लिए विशेष महत्व है।
इसके चिन्तन, मनन, पाठ-पठन व निदिध्यासन से अनेकों को अपने गुरुदेव का संग-सुपास मिला है। उन्होंने दिव्य लोक में रह रहे अपने सद्गुरु की चेतना का संस्पर्श पाने में सफलता प्राप्त की गोस्वामी जी के शब्दों का माँत्रिक महत्व है। इसकी गुणवत्ता तब शत-सहस्र गुणित हो जाती है, जब अन्तर्चेतना में इसका अर्थ बोध समाहित हो जाय। गुरुचरण चरित के मंत्रदृष्टा महाकवि तुलसी इसका प्रारम्भ करते हुए कहते हैं-
बंदउँ गुरु पद कंज, कृपा सिन्धु नर रूप हरि। महामोह तम पुञ्ज, जासु वचन रविकर निकर॥
मैं सद्गुरु के चरण कमल की वन्दना करता हूँ। मेरे गुरुदेव कृपा के सागर और नर रूप में स्वयं नारायण हैं। उनके वचन महामोह के घने अंधेरे का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं।
गोस्वामी जी की इन काव्य पंक्तियों में बड़ी स्पष्टोक्ति है कि सद्गुरु मनुष्य देहधारी होते हुए भी सामान्य मनुष्य नहीं हैं। वह नर रूप में नारायण हैं। जो उनके प्रति इसी गहरी श्रद्धा के साथ स्वयं को अर्पित करता है, उसे ही उनके वचनों से तत्व बोध होता है। उसके जीवन में सद्गुरु के वचन सूर्य की किरणों की तरह अवतरित हो हैं। और महामोह के घने अंधेरे को पल भर में नष्ट कर डालते हैं। महाकवि आगे कहते हैं कि गुरुदेव भगवान् के चरण ही नहीं, उनके चरणों की धूलि की भी भारी महत्ता है। वह उसकी भी वन्दना करते हैं-
बंदउँ गुरुपद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिय मूरिमय चूरन चारु। समन सकल भवरुज परिवारु॥
सुकृति सम्भु तन विमल विभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥
जन मन मंजु मुकर मलहरनी। किए तिलक गुन गन बस करनी॥
सद्गुरु के चरण कमलों की धूलि की मैं वन्दना करता हूँ। गोस्वामी जी का कहना है कि यह चरण रज साधारण नहीं है। इसको श्रद्धाभाव से धारण किया जाय, तो इससे जीवन में कई तत्व प्रकट होते हैं। इनमें से पहला तत्व सुरुचि है। वर्तमान में हममें से प्रायः सभी कुरुचि से घिरे हैं। हमारी रुचियाँ मोह और इन्द्रिय विषयों की ओर है। सुरुचि के जाग्रत् होते ही उच्चस्तरीय जीवन के प्रति जागृति होती है। दूसरा तत्व है सुवास। गुरु चरणों की धूलि का महत्व समझ में आते ही जीवन सुगन्धित हो जाता है। वासनाओं व कामनाओं की मलिन, दूषित दुर्गन्ध हटने-मिटने लगती है। इसके साथ ही तीसरा तत्व प्रकट होता है- सरसता का-संवेदना का। निष्ठुरता विलीन होती है, संवेदना जाग्रत् होती है। इन सारे तत्वों के साथ विकसित होता है अनुराग, अपने गुरुदेव के प्रति। जीवन में गुरुभक्ति तरंगित होती है।
गुरुचरणों की यह धूलि अमरमूल या संजीवनी बूटी का चूर्ण है। इससे समस्त भवरोग अपने पूरे परिवार के साथ नष्ट हो जाते हैं। यह चरण रज महापुण्य रूपी शिव के शरीर पर शोभित होने वाली पवित्र विभूति है। इससे जीवन में सुन्दर कल्याण और आनन्द प्रकट होते हैं। यह गुरु चरणों की रज गुरुभक्तों के मन रूपी दर्पण के मैल को दूर करने वाली है। इसे धारण करने से सभी सद्गुण अपने आप ही वश में हो जाते हैं। गोस्वामी जी के इस कथन में काव्योक्ति तो है पर अतिशयोक्ति जरा भी नहीं है। सद्गुरु के चरणों से तप तेज झरता है। उनकी चरण धूलि धारण करने का अर्थ है कि हम गुरुदेव भगवान् द्वारा बतायी गयी जीवन नीति के अनुगमन-अनुसरण के लिए प्रतिबद्ध हो गए हैं। इससे कुछ भी असम्भव नहीं है। महाकवि आगे कहते हैं-
श्री गुरु पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती॥
दलन मोहतम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
उघरहिं विमल विलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥
सूझहिं रामचरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहं जो जेहि खानिक॥
सद्गुरु के चरण नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान हैं। इनके स्मरण से हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। गुरुदेव चरणों के स्मरण-ध्यान से साधना जगत् के महासत्य का बड़े ही सहज ढंग से साक्षात्कार हो जाता है। इससे हृदय में जो दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है, उससे साधक के जीवन में एक अपूर्व रूपांतरण होता है। जीवन का सारा अन्धकार प्रकाश में परिवर्तित-रूपांतरित हो जाता है। बड़े भाग्यशाली होते हैं वे जो इस रूपांतरण की अनुभूति प्राप्त करते हैं। सद्गुरु के चरणों का ध्यान जब हृदय में प्रगाढ़ होता है, तो हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं। संसार की महारात्रि-कालरात्रि विलीन-विसर्जित हो जाती है। उसके दुःख, दोष भी मिट जाते हैं। हृदय के निर्मल नेत्रों के खुलने से ईश्वर तत्व का, राम चरित या परमात्म तत्व का बोध हो जाता है। इसमें जहाँ-जिस जगह मणि-माणिक के रत्न भण्डार गुप्त पड़े हैं, सबके सब नजर आने लगते हैं। सद्गुरु चरणों की कृपा से उलझी जीवन की पहेली सुलझ जाती है। मानव जीवन का रहस्य उद्घाटित-उजागर हो जाता है। गुरुचरणों के ध्यान से उपजी दिव्यदृष्टि का प्रभाव बताते हुए गोस्वामी जी महाराज की काव्य पंक्तियाँ हैं-
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान। कौतुक देखत सैल बन भूतल भूमि निधान॥
गुरुपद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिय दृग दोष विभंजन॥
गुरु चरणों की रज को यानि कि गुरु चरणों से निकल रही तप-तेज की किरणों का अपनी आँखों में अंजन लगाने से सारे दृष्टि दोष नष्ट हो जाते हैं। सामान्य क्रम में साधारण आँखों से सभी को सामान्य रूप से दिखता ही है। फिर भी प्रायः सभी की विवेक दृष्टि दूषित होती है। सत् और असत् का भेद समझ में नहीं आता। जीवन की सही राहें समझ नहीं आतीं। यह दृष्टिदोष सद्गुरु के चरणों की धूलि से अर्थात् उनके तप-कणों के प्रसाद से ही ठीक होता है। और तब साधक को बड़ी ही अद्भुत दृष्टि का वरदान मिलता है।
गोस्वामी जी कहते हैं कि कुछ ऐसा होता है, जैसे साधक ने अपनी आँखों में सिद्धाञ्जन लगा लिया हो। यह सिद्धाञ्जन नाथ योगियों की ताँत्रिक परम्परा में तैयार किया जाता है। यह एक तरह का आँखों में लगाया जाने वाला काजल है। इसे लगाने से पर्वत, वन और पृथ्वी में गड़े गुप्त खजाने साफ-साफ नजर आने लगते हैं। गुरु चरणों के तत्वद्रष्टा महाकवि तुलसी कहते हैं कि ठीक ऐसा ही होता है गुरुचरणों के झरने वाले तप-तेज को अपनी आँखों में लगा लेने पर। इससे ऐसी दिव्य दृष्टि का वरदान मिलता है कि संसार की ओट में छिपा हुआ ईश्वर तत्व बड़ा ही साफ नजर आने लगता है। मंत्रद्रष्टा महाकवि तुलसीदास जी महाराज के इस तत्व ज्ञान का कथा सार अत्यन्त सूक्ष्म किन्तु बड़ा ही प्रभावशाली है। वह कहते हैं- गुरुभक्ति से, गुरुचरणों की ध्यान साधना से गुरुभक्त साधक के जीवन में तप-साधना की प्रत्येक उपलब्धि सहज रूप में अवतरित हो जाती है। गुरु चरणों की कृपा से तत्वज्ञान, ब्रह्मतादात्म्य, ईश्वर कृपा सभी कुछ सुलभ हो जाती है। हममें से हर एक के लिए यह गुरुपूर्णिमा- गुरु चरणों की इसी कृपा की अनुभूति का पर्व है।
कार्तिक मास की पूर्णिमा थी। वातावरण में शीतल, सुरभित, समीर संव्याप्त था। हृदय की सुकोमल भावनाएँ यदा-कदा उसके स्पर्श से संवेदित हो जाती थी। विचार तरंगें अनायास ही सामने लहरा रहे असीम विस्तार लिए महासागर की लहरों से होड़ करने में निमग्न थी। यदा-कदा उनमें पल दो पल के लिए नीरवता, निस्तब्धता, निस्पन्दता छा जाती। लेकिन अगले ही क्षण वे एक तेज उत्ताल उछाल गर्जन भरा हुँकार करने लगती। निरभ्र आकाश में चन्द्रदेव अपने पूर्ण सौंदर्य एवं सज-धज के साथ तारक वृन्दों से घिरे हुए विहार कर रहे थे। वे मानस की तरंगों एवं सागर की लहरों का सारा खेल बड़े ही मधुर अन्दाज से देख रहे थे। दोनों की ही स्थिति के प्रेरक वही थे। इस सुविदित तथ्य को भला कौन नहीं जानता कि पूर्णिमा का चन्द्रमा मनुष्य के मानस को और प्रकृति के सागर को उद्वेलित करता है।
इस सत्य से सुपरिचित वह सागर के तीर पर बैठा था। एक अन्तर अभीप्सा उसे यहाँ तक खींच लायी थी। कुछ आकर्षण था इस पुण्य क्षेत्र का उसके मन में। कई कारणों ने उसके मन को उत्प्रेरित, आकर्षित किया था। इन कारणों में एक कारण था, शास्त्रों, सद्ग्रन्थों, पुराणों व इतिवृत्त का गम्भीर अध्ययन। स्थान-स्थान पर उसने महर्षि अगस्त्य एवं उनकी इस दिव्य तपोभूमि की चर्चा पढ़ी थी। महातेजस्वी महर्षि से जुड़ी अनेकों कथाएँ, अनगिन किंवदंतियाँ प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में मुखरित एवं प्रचारित हैं। ऐसे महर्षि की तपःस्थली इस वेदपुरी को देखने की चाहत ने उसे यहाँ आने के लिए प्रेरित किया था।
एक अन्य कारण भी था, जिसका चुम्बकत्व उसके मानसिक स्पन्दनों में व्याप्त हुआ था। दिव्य जीवन के मंत्रद्रष्टा ऋषि अरविन्द इस कारण का केन्द्र थे। भारत देश के स्वातन्त्र्य काल में उन्होंने पाण्डिचेरी नाम से परिचित प्रख्यात इस वेदपुरी नाम के स्थान में दिव्य जीवन के अतिमानसिक महामंत्र की साधना की थी। कुछ ग्रन्थों में इस पुण्य क्षेत्र के बारे में कई किंवदंतियों का उल्लेख है। इन्हीं किंवदंतियों में एक बड़ी मधुर कथा है। ऋषि अगस्त्य की तप साधना के बहुत काल बाद वेदपुरी परमात्मा के मन्दिरों का नगर बन गया। बाद में किसी प्राकृतिक कारण वश इस नगर का अधिकाँश भाग महासागर में डूब गया। कथा के आगे के अंश की कल्पना अतिविचित्र है। कथाकार का कहना है कि उस सागर में डूबे उन मंदिरों की घंटियाँ आज भी बजती रहती हैं। केवल सन्नाटी रातों में उन्हें सुना जा सकता है। कथाकार कहता है, शायद पानी के धक्के उन्हें बजा देते होंगे। या फिर यहाँ-वहाँ भागती मछलियों से टकराकर वे बजती होंगी। जो भी हो किंवदंती यही कहती है, घंटियां आज भी बजती हैं। और आज भी उनके मधुर संगीत को सागर के तट पर सन्नाटी रात में बैठकर सुना जा सकता है।
उसके युवा मन में भी एक कौतूहल था। वह भी उस संगीत को सुनना चाहता था। पुस्तकों में छपी इस दन्त कथा को पढ़कर आज वह भी सागर के किनारे बैठा हुआ था। शाम से रात हो आयी थी। किन्तु यहाँ तो सागर का तुमुलनाद गूँज रहा था- लहरों के थपेड़े चट्टानों से टकराकर उस एकान्त में अनन्त गुना प्रतिध्वनित हो रहे थे। न तो वहाँ कोई संगीत था, न किन्हीं मन्दिरों में बजती कोई घण्टियाँ थी। उसे सागर तट पर बहुतेरा कान लगाकर सुनने की कोशिश की, लेकिन वहाँ तो तट पर टूटती लहरों की ध्वनि के अतिरिक्त और कुछ भी न था।
फिर भी कुछ हठवश, कुछ उत्सुकतावश वह रुका रहा। रुकने का एक अन्य कारण कार्तिक मास की पूर्णिमा की शुभ्र ज्योत्सना की सम्मोहक छटा भी थी। पूर्णिमा के चाँद को जिसने सागर की लहरों पर ढेर की ढेर चाँदनी उड़ेलते देखा है, वही इसकी सुकल्पना कर सकता है। बड़ी ही मधुर छटा होती है यह। चन्द्रमा अपनी मंजुल कर किरणों से ढेर की ढेर चाँदनी लुटाता है और महासागर अपनी लहरों के अनगिन हाथ पसार कर उसे संजोता है। चन्द्रमा की चन्द्रिका वृष्टि को लहरोँ के हाथ उठा-उठा कर लपकने की यह क्रीड़ा बड़ी दर्शनीय और अवर्णनीय है। इसे निहारते हुए कब कितनी रात बीत गयी, पता ही न चला।
फिर इस प्राकृतिक क्रीड़ा में उलझे हुए मन का व्यर्थ समय गंवाने का पछतावा हुआ। पश्चाताप के इन्हीं क्षणों में उस यात्री को अपने गुरुदेव स्मरण हो आए। उनके स्मरण से मन की चिन्तन धारा उन्हीं के श्रीचरणों की ओर मुड़ चली। मन की लहरों, उसके स्पन्दनों का संवेग थमने लगा। कुछ ऐसा ही जादू था इस भक्तिपूर्ण स्मरण में। आन्दोलित, उद्वेलित, संवेगित मन- निस्पन्द, नीरव, अचंचल होने लगा। अन्तर की हलचलें शान्त होते ही बाहर की हलचलों का श्रवण भी मन्द पड़ गया। तभी अचानक कुछ ऐसा हुआ कि लगने लगा कि डूबे हुए मन्दिरों की घंटियां बज रही हैं। और उनका मधुर संगीत प्राणों को आन्दोलित करने लगा।
न जाने कैसी बात थी यह, पर थी और सच थी। उस संगीत को सुनकर अन्तर्चेतना में अपूर्व जागरण हुआ। सारी थकान और खुमारी पता नहीं कहाँ गायब हो गयी। निद्रा तो जैसे कहीं थी ही नहीं। लगा कि भीतर अब तक बहुत कुछ सोया हुआ था, लेकिन अब जाग रहा है। निरन्तर बज रही घंटियों की सुमधुर ध्वनि देह को नहीं चेतना को जगा रही हैं। अर्द्ध निशा के आस-पास यह बड़ी अटपटी प्रभाती बेला थी। इसे कोई कितना भी अविश्वसनीय कहे, काल्पनिक बताये, पर यह तो अनुभव किया हुआ सच है। प्राणों को संवेदित करने वाले इस संगीत से रोम-रोम निनादित हो उठा।
आसमान का चाँद कहीं अन्दर उतर गया। प्राणों में, अस्तित्व के कण-कण में आलोक भर गया। बड़ी प्यारी अवस्था हो गयी, न निद्रा, न अन्धकार। अचानक यह न जाने कैसी आनन्द वृष्टि हो गयी। लगा कि पूरा अस्तित्व आनन्द से घिरा है। सब ओर आनन्दमयता छायी हुई है। ठीक भी है। जहाँ परमात्मा के मन्दिर का संगीत है, वहाँ दुःख कहाँ? भाव समाधि जैसे इस अनुभव में रात्रि व्यतीत हो गयी। समूचे यात्रा काल में इसकी मधुर गूँज बनी रही। यह सब गूँगे के गुड़ जैसा था। इसके अपरिमित स्वाद के विषय में, वाणी बताने में असमर्थ थी, और मन सोचने, समझने में असहाय था।
बाद में गुरु चरणों की कृपा से पता चला वे तो अनाहद् के स्वर थे। प्रबोध देते हुए गुरुदेव ने कहा- प्राचीन वेदपुरी में परमात्मा के मन्दिरों के सागर में डूबने की कथा पता नहीं कितनी सच है, कौन जाने। अगर यह कभी किसी काल का सत्य रहा भी हो, तो भी अब उसके डूबे हुए मन्दिरों की घण्टियों को सुनने-सुनाने की बात निरी दिवा स्वप्न है, एक काल्पनिक चेष्टा है। ऐसी उलझनों में उलझने से कोई फायदा नहीं है। रात भर जगकर घंटियों की आवाज को सुनने की मूर्खता में बैठे रहना बेकार है, अर्थहीन है। ऐसे प्रयास निरर्थक है।
हाँ, यदि तुम उस सागर के किनारे चलना चाहते हो, जहाँ तुम्हें तुममें से प्रत्येक को परमात्मा के डूबे हुए मन्दिर का संगीत सुनायी पड़ेगा। तो चलो। स्वयं के भीतर चलो। स्वयं की हृदय ही वह सागर है और उसकी गहराइयों में परमात्मा के डूबे हुए मन्दिरों का नगर है। लेकिन उसके मन्दिरों का संगीत सुनने में केवल वे ही समर्थ होते हैं, जो सब भाँति शान्त और शून्य हो पाते हैं। विचार और भावना का कोलाहल जहाँ है, वहाँ उसका संगीत कैसे सुनाई पड़ेगा? यह समस्त कोलाहल इधर-उधर भटकने से शान्त हो जाने की बजाय थोड़ा ज्यादा ही बढ़ जाता है। कभी-कभी व्यर्थ के एकान्त की तलाश में भटकने से इसके शान्त होने की भ्रान्ति जरूर होती है। पर यथार्थ में स्वयं को कुछ खास मानने का अहंकार ही बढ़ता है।
हृदय सागर में डूबे हुए परमात्मा के मन्दिरों के अतिप्राकृतिक संगीत ध्वनि सुनने के लिए गुरु स्मरण, गुरु निष्ठ चाहिए। क्योंकि यही गुरुकृपा के अवतरित होने का आधार है। सत्य-अनुभव के इस कथानक में नाम, रूप और स्थान के मिथ्या नामों की तलाश मत कीजिए। क्योंकि व्यक्ति कोई भी हो और स्थान कहीं भी हो, वह सब क्षण भंगुर है। शाश्वत तो भाव सत्य है। जो आपका अपना और निजी है। इसकी अनुभूति आप जब चाहें, जहाँ चाहें अपने हृदय-सागर के किनारे जीवन मास आत्म चन्द्र की पूर्णिमा की ज्योत्सना की छाँव में बैठाकर कर सकते हैं।
संसार न माया है, न मिथ्या। वह भगवान का विराट् रूप है। उससे अलग होने पर किसी जीवित का निर्वाह नहीं।
गुरुपूर्णिमा के पुण्य पर्व पर प्रत्येक शिष्य सद्गुरु कृपा के लिए प्रार्थनालीन है। वह उस साधना विधि को पाना-अपनाना चाहता है, जिससे उसे अपने सद्गुरु की चेतना का संस्पर्श मिले। गुरुतत्त्व का बोध हो। जीवन के सभी लौकिक दायित्वों का पालन-निर्वहन करते हुए उसे गुरुदेव की कृपानुभूतियों का लाभ मिल पाए। शिष्यों-गुरुभक्तों की इन सभी चाहतों को पूरा करने के लिए प्राचीन ऋषियों ने गुरुगीता के पाठ, अर्थ चिन्तन, मनन व निदिध्यासन को समर्थ साधना विधि के रूप में बताया था। इस गुरुगीता का उपदेश कैलाश शिखर पर भगवान सदाशिव ने माता पार्वती को दिया था। बाद में यह गुरुगीता नैमिषारण्य के तीर्थ स्थल में सूत जी ने ऋषिगणों को सुनायी। भगवान व्यास ने स्कन्द पुराण के उत्तरखण्ड में इस प्रसंग का बड़ी भावपूर्ण रीति से वर्णन किया है।
शिष्य-साधक हजारों वर्षों से इससे लाभान्वित होते रहे हैं। गुरुतत्त्व का बोध कराने के साथ यह एक गोपनीय साधना विधि भी है। अनुभवी साधकों का कहना है कि गुरुवार का व्रत रखते हुए विनियोग और ध्यान के साथ सम्यक् विधि से इसका पाठ किया जाय, तो शिष्य को अवश्य ही अपने गुरुदेव का दिव्य सन्देश मिलता है। स्वप्न में, ध्यान में या फिर साक्षात् उसे सद्गुरु कृपा की अनुभूति होती है। शिष्य के अनुराग व प्रगाढ़ भक्ति से प्रसन्न होकर गुरुदेव उसकी आध्यात्मिक व लौकिक इच्छाओं को पूरा करते हैं। यह कथन केवल काल्पनिक विचार नहीं, बल्कि अनेकों साधकों की साधनानुभूति है। हम सब भी इसके पाठ, अर्थ चिन्तन, मनन व निदिध्यासन से गुरुतत्त्व का बोध पा सकें, परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से लाभान्वित हो सके, इसलिए इस ज्ञान को धारावाहिक रीति से क्रमिक ढंग से प्रकट किया जा रहा है। अब से प्रत्येक महीने की अखण्ड ज्योति में मंत्र क्षमता वाले गुरुगीता के श्लोकों की भावपूर्ण व्याख्या की जाएगी।
लेकिन सबसे पहले साधकों को इसकी पाठ विधि बतायी जा रही है। ताकि जो साधक इसके नियमित पाठ से लाभान्वित होना चाहें, हो सकें। गुरुगीता के पाठ को शास्त्रकारों ने मंत्रजप के समतुल्य माना है। उनका मत है कि इसके पाठ को महीने के किसी भी गुरुवार को प्रारम्भ किया जा सकता है। अच्छा हो कि साधक उस दिन एक समय अस्वाद भोजन करें। यह उपवास मनोभावों को शुद्ध व भक्तिपूर्ण बनाने में समर्थ सहायक की भूमिका निभाता है। इसके बाद पवित्रीकरण आदि षट्कर्म करने के पश्चात् पूजा वेदी पर रखे गए गुरुदेव के चित्र का पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात् दाँए हाथ में जल लेकर विनियोग का मंत्र पढ़ें-
ॐ अस्य श्री गुरुगीता स्तोत्रमंत्रस्य भगवान सदाशिव ऋषिः। नानाविधानि छंदासि। श्री सद्गुरुदेव परमात्मा देवता। हं बीजं। सः शक्तिः। क्रों कीलकं। श्री सद्गुरुदेव कृपाप्राप्यर्थे जपे विनियोगः॥
विनियोग मंत्र पढ़ने के बाद हाथ के जल को पास रखे किसी पात्र में डाल दें। दरअसल यह विनियोग साधक को मंत्र की पवित्रता, महत्ता का स्मरण कराता है। मंत्र के ऋषि, देवता, बीज, शक्ति व कीलक की याद कराता है। साथ ही साधक के मन को एकाग्र करते हुए पाठ किए जाने वाले स्तोत्र मंत्र की शक्तियों को जाग्रत् करता है। ऊपर बताए गए विनियोग मंत्र का अर्थ है- ॐ (परब्रह्म का स्मरण) इस गुरुगीता स्तोत्र मंत्र के भगवान् सदाशिव द्रष्ट ऋषि हैं। इसमें कई तरह के छन्द हैं। इस मंत्र के देवता या ईष्ट परमात्म स्वरूप सद्गुरुदेव हैं। इस महामंत्र का बीज ‘हं’ है, शक्ति ‘सः’ है, जो जगज्जननी माता भगवती की प्रतीक है। ‘क्रों’ बीज से इसे कीलित किया गया है। इस मंत्र का पाठ या जप सद्गुरुदेव की कृपा पाने के लिए किया जा रहा है।
इस विनियोग के बाद गुरुदेव का ध्यान किया जाना चाहिए।
ध्यान मंत्र निम्न है-
योग पूर्णं वेदमूर्तिं तपोनिष्ठ तेजस्विनम्। गौरवर्णं प्रेममूर्तिं माता भगवती सह शोभितम्॥
कारुण्यामृत सागरं शिष्यभक्तादि सेवितम्। ध्यायेद् सद्गुरुं तं श्रीरामम् आचार्यवरम्॥
इस ध्यान मंत्र का भाव है, गौरवर्णीय, प्रेम की साकार मूर्ति गुरुदेव वन्दनीया माताजी (माता भगवती देवी) के साथ सुशोभित हैं। गुरुदेव योग की सभी साधनाओं में पूर्ण, वेद की साकार मूर्ति, तपोनिष्ठ व तेजस्वी हैं। शिष्य और भक्तों से सेवित गुरुदेव करुणा के अमृत सागर हैं। उन आचार्य श्रेष्ठ श्रीराम का, अपने गुरुदेव का साधक ध्यान करें।
ध्यान की प्रगाढ़ता में परम पूज्य गुरुदेव को अपना आत्मनिवेदन करने के बाद साधक को गुरुगीता का पाठ करना चाहिए। जिससे साधकगण उनके गहन चिन्तन से गुरुतत्त्व का बोध प्राप्त कर सकें। इसके पठन, अर्थ चिन्तन को अपनी नित्य प्रति की जाने वाली साधना का अविभाज्य अंग मानें।
गुरुगीता का प्रारम्भ ऋषियों की जिज्ञासा से होता है-
ऋषयः ऊचुः
गुह्यत् गुह्यतरा विद्या गुरुगीता विशेषतः। ब्रूहि नः सूत कृपया शृणुमस्त्वत्प्रसादतः॥
नैमिषारण्य के तीर्थ स्थल में एक विशेष सत्र के समय ऋषिगण महर्षि सूत से कहते हैं- हे सूत जी! गुरुगीता को गुह्य से भी गुह्यतर विशेष विद्या कहा गया है। आप हम सभी को उसका उपदेश दें। आपकी कृपा से हम सब भी उसे सुनने का लाभ प्राप्त करना चाहते हैं।
महर्षि सूत ने कहा- सूत उवाच
कैलाश शिखरे रम्ये भक्ति सन्धान नायकम्। प्रणम्य पार्वती भत्या शंकरं पर्यपृच्छत॥1॥
ऋषिगणों, यह बड़ी प्यारी कथा है। इस गुरुगीता के महाज्ञान का उद्गम तब हुआ, जब कैलाश पर्वत के अत्यन्त रमणीय वातावरण में भक्तितत्त्व के अनुसन्धान में अग्रणी माता पार्वती ने भक्तिपूर्वक भगवान सदाशिव से प्रश्न पूछा।
श्री देव्युवाच-
ॐ नमो देवदेवेश परात्पर जगद्गुरो । सदाशिव महादेव गुरुदीक्षा प्रदेहि में ॥2॥
केन मार्गेण भोः स्वामिन् देही ब्रह्ममयोभवेत्। त्वं कृपाँ करु में स्वामिन नमामि चरणौ तव॥3॥
देवी बोलीं- हे देवाधिदेव! हे परात्पर जगद्गुरु! हे सदाशिव! हे महादेव! आप मुझे गुरुदीक्षा दें। हे स्वामी! आप मुझे बताएँ कि किस मार्ग से जीव ब्रह्म स्वरूप को प्राप्त करता है। हे स्वामी! आप मुझ पर कृपा करें। मैं आपके चरणों में प्रणाम करती हूँ।
यही है आदि जिज्ञासा। यही है प्रथम प्रश्न। यही वह बीज है, जिससे गुरुतत्त्व के बोध का बोधितरु अंकुरित हुआ। भगवान शिव की कृपा से पुष्पित-पल्लवित होकर महावृक्ष बना। इस मधुर प्रसंग में आदिशक्ति, जगत्माता ने स्वयं शिष्य भाव से यह प्रश्न पूछा है। चित् शक्ति स्वयं आदि शिष्य बनी हैं। जगत् के स्वामी भगवान् महाकाल आदि गुरु हैं। इस प्रसंग का सुखद साम्य परम वन्दनीया माताजी एवं परम पूज्य गुरुदेव की कथा गाथा से भी है। इस परम विशाल, महाव्यापक गायत्री परिवार की जननी वन्दनीया माताजी आदि शिष्य भी थीं। उन्होंने हम सबके समक्ष शिष्यत्व का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। वे हम सबके लिए माता पार्वती की भाँति हैं। जिनकी जिज्ञासा और तप से ज्ञान की युग सृष्टि हुई।
माता पार्वती ने अपनी भक्तिपूर्ण जिज्ञासा से भूत-वर्तमान और भविष्य के सभी शिष्यों व साधकों के समक्ष ‘विनयम् ददाति पात्रताम्’ का आदर्श सामने रखा। जो अपने सम्पूर्ण अन्तःकरण को गुरुचरणों में समर्पित करके गुरुदीक्षा प्राप्ति की प्रार्थना करता है। वही तत्वज्ञान का अधिकारी होता है। किसी भी तरह से अहंता का लेशमात्र भी रहने से ज्ञान व तप की साधना फलित नहीं होती है। जो जगत्माता आदि जननी की भाँति स्वयं को अपने गुरु के चरणों में अर्पित कर देते हैं। गुरु कृपा उन्हीं का वरण करती है। करुणा सागर कृपालु गुरुदेव उन्हीं को अपनी कृपा का वरदान देते हैं। इस गुरु पूर्णिमा पर हम सब अपने शिष्यत्व में कुछ ऐसा ही निखार लाएँ। शिष्यत्व की इस साधना को सतत करते रहें। विश्वगुरु भगवान महेश्वर ने विश्वमाता से क्या कहा, यह अगले अंक में।
अन्तर्यात्रा विज्ञान की पिछली कड़ी में योग को परिभाषित किया गया था। चित्तवृत्तियों का निरोध योग है। इस सत्य को सभी योग साधक जान चुके हैं। इस ज्ञान के साथ उनमें इस जिज्ञासा का अंकुरण सहज है कि चित्तवृत्तियों का निरोध करने वाले योगी की क्या भाव दशा होती है? इसका समाधान ही चौथी कड़ी की विषय वस्तु है। जो साधक महर्षि पतंजलि प्रणीत योगदर्शन के प्रथम पाद के दो सूत्रों का तत्त्वचिंतन कर चुके हैं, उनके लिए महर्षि तीसरा सूत्र प्रकट करते हैं। यह तीसरा सूत्र है- ‘तदा द्रष्टः स्वरुपेऽवस्थानम्।’ इस सूत्र का शब्दार्थ कुछ यूँ होगा- तदा=तब (वृत्तियों का निरोध होने पर); द्रष्टः= द्रष्ट की; स्वरुपे=स्वरूप में; अवस्थानम्= अवस्थिति (होती है)।
यह योगी की भावदशा है। चित्तवृत्ति निरोध की योग साधना का सुफल है। किसी भी योग साधक की साधना का लक्ष्य है। महर्षि पतंजलि विश्व भर के मानव इतिहास में सर्वाधिक अनूठे व्यक्तित्व हैं। उन्हें मानव चेतना का सम्यक् ज्ञान है। उनको मनुष्य की कमियों, कमजोरियों, अच्छाइयों व विशेषताओं के बारे में भली प्रकार पता है। उन्हें मानव चेतना की सीमाएँ मालूम हैं, तो सम्भावनाएँ भी ज्ञात हैं। योग सूत्रकार महर्षि इस सच्चाई को अच्छी तरह जानते हैं कि गन्तव्य पता हो, तो ही चलने वाले के पाँवों में गति आती है। उसके मन में हर पल उत्साह उमगता रहता है। लक्ष्य का स्वरूप स्पष्ट होने से ही पथ अर्थवान् होता है। राहें गुणवान बनती हैं। मंजिल का ही पता न हो तो भला राही किधर जाएगा? उसके पाँवों की सारी मेहनत मंजिल के अभाव में भटकन की थकान बन कर रह जाएगी।
यही वजह है कि महर्षि योग साधक के सामने सबसे पहले उसका लक्ष्य स्पष्ट करते हैं। साधकों को बताते हैं कि तुम्हारा मकसद क्या है? तुम्हारी मंजिल कौन सी है? योग क्या है? और योगी कैसा होता है? यह लक्ष्य ही तो साधना की दिशा है। योग साधक का प्राप्तव्य एवं गन्तव्य है। पहले मंजिल का पता, फिर राह की बातें महर्षि की यही नीति है। इसी कारण वह पहले समाधिपाद के सूत्रों का बयान करते हैं, बाद में साधन पाद के सूत्र बताते हैं। अन्य दोनों पादों का क्रम इनके बाद आता है। समाधिपाद के इस तीसरे सूत्र में महायोगी महर्षि बताते हैं, चित्त वृत्ति का निरोध हुआ यानि कि मन का शासन मिटा। और तब साधक-सिद्ध हो जाता है। वह योगी बनता है, द्रष्ट बनता है, साक्षी भाव को उपलब्ध होता है। वह स्वयं में, अपने अस्तित्व के केन्द्र में, अपनी आत्मचेतना में अवस्थित हो जाता है।
यही बुद्धत्व का अनुभव है। योगियों का कैवल्य है। जीवन में समस्त प्रश्नों का समाधान करने वाली समाधि है। ज्ञानियों की चरम दशा है। विभिन्न साधनाओं के नाना पथ इसी एक लक्ष्य की ओर जाते हैं। योगिवर स्वामी विवेकानन्द ने इसी गन्तव्य पर पहुँचकर गाया था-
सूर्य भी नहीं है, ज्योति-सुन्दर शशाँक नहीं, छाया सा यह व्योम में यह विश्व नजर आता है।
मनोआकाश अस्फुट, भासमान विश्व वहाँ, अहंकार स्रोत ही में तिरता डूब जाता है।
धीरे-धीरे छायादल लय में समाया जब धारा निज अहंकार मन्दगति बहाता है।
बन्द वह धारा हुई, शून्य से मिला है शून्य, ‘अवांगमनसगोचरम्’ वह जाने जो ज्ञाता है।
मन के पार यही है बोध की स्थिति। यही है अपने स्वरूप में अवस्थिति। इसी में स्थित होकर साधक द्रष्ट बनता है, योगी बनता है। कर्म और जीवन का, भाव और विचारों का, देह, प्राण, मन, सृष्टि और समष्टि की समस्त हलचलों का साक्षी बनता है।
परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में इस सूत्र का जागरण अपने सद्गुरु से प्रथम मिलन में ही हो गया। वह जन्मों-जन्मों की योग साधना से सिद्ध थे। महात्मा कबीर, समर्थ रामदास, श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप में उन्होंने योग के सभी तत्वों का सम्यक् बोध प्राप्त किया था। इस बार तो उन्हीं की भाषा में- ‘सिर्फ पिसे को पीसना था, कुटे को कूटना था, बने को बनाना था। यानि कि किए हुए का पुनरावलोकन करना था। सद्गुरु की कृपा की किरण उतरी बस एक पल में हो गया।’ अपनी इस अनुभूति को गुरुदेव यदा-कदा हंसते हुए बता देते थे। वह कहते- ‘तुम लोग एक बार यदि बहुत अच्छी तरह से साइकिल चलाना सीख जाओ, तुम्हें खूब ढंग से साइकिल चलाना आ जाए। फिर तुम्हारी साइकिल यदि किसी तरह बदल जाय या बदल दी जाय, तो नई साइकिल में किसी तरह की कठिनाई नहीं आती है। बस थोड़ी देर बाद नयी साइकिल भी पुरानी वाली की तरह अच्छे से चलने लगती है।’
गुरुदेव बताते थे, बस कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ। अपने स्वरूप में स्थिति तो सदा से थी। पिछले जन्मों से थी। इस नए शरीर में भी उसके लिए कोई खास कठिनाई नहीं हुई। लेकिन हम सब साधकगण इसे किस रीति से पाएँ? इसके जवाब में वह एक बात कहा करते थे- सारा परदा मन का है। मन के इस परदे को हटा दो फिर सब कुछ साफ-साफ नजर आने लगता है। द्रष्ट भाव भी वही है, आत्म स्वरूप में स्थिति भी है। बस मन की झिलमिल के कारण नजर नहीं आ पाती। बात पते की है। समझ में भी आती है। लेकिन यह हो कैसे? मन का परदा हटे तो कैसे हटे। महर्षि पतंजलि भी यही कहते हैं कि चित्तवृत्तियों का निरोध हो तो योग सध जाय। योग साधना का सुफल मिल जाय। अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाय। लेकिन सवाल है कि यह सब हो तो कैसे हो?
इस कठिन सवाल का बड़ा आसान सा जवाब गुरुदेव देते थे। वह कहते मैंने अपने मन को अपने मार्गदर्शक का गुलाम बना दिया। तुम अपने मन को अपने सद्गुरु का गुलाम बना दो। उन्हें अर्पित और समर्पित कर दो। तुम ऐसा कर सके- इसकी एक ही कसौटी है कि अब तुम अपने लिए नहीं सोचोगे। न अतीत के लिए परेशान होगे, न वर्तमान के लिए विकल होगे और न ही भविष्य की चिन्ता करोगे। तुम्हारे लिए जो कुछ जरूरी होगा, वह सद्गुरु स्वयं करेंगे। तुम्हें तो बस अपने गुरु का यंत्र बनना है। इस संकल्प के कार्य रूप में परिणत होते ही महर्षि पतंजलि के इस सूत्र का अर्थ प्रकट होने लगता है। चित्त की वृत्तियों का निरोध होने, मन का परदा हटने व स्वरूप में अवस्थित होने का सत्य अपने आप ही उजागर हो जाता है।
इस सूत्र की साधना अन्तर्चेतना में कुछ इस तरह से स्वरित होती है-
महर्षि पतंजलि का सूत्र बना अपने सद्गुरु का स्वर इसका समग्र अर्थ अन्तर्चेतना में तब होता भास्वर जब हमारा मन उसका हर स्पन्दन करता गुरुदेव को समर्पण न बचती कोई कल्पना न कामना, न याचना होती बस एक ही प्रार्थना प्रभु, बनें हम आपके यंत्र समर्पण की वर्णमाला एकमात्र मंत्र इसका सुफल होता जीवन में अविकल आत्म स्वरूप में अवस्थिति तब बनती जीवन स्थिति!
समर्पण हुआ है, इसका मतलब यही है कि अब मन सद्गुरु के चिन्तन एवं उनके कार्यों में संलग्न हो गया। किसी भी तरह के स्वार्थ का मोह छूटा, अहंता के सारे बन्धन टूटे। ऐसे में आत्मस्वरूप में अवस्थिति सहज है। इस भाव दशा में मन रूपांतरित हो जाता है। उसकी दृष्टि एवं दिशा बदल जाती है। समर्पण की इस साधना के द्वारा अपने स्वरूप को जानने, पाने एवं अवस्थित होने में मन अनेकों विघ्न खड़े करता हैं। चित्तवृत्तियों द्वारा खड़े किए गए इन विघ्नों की चर्चा अगली कड़ी में होगी।
(समापन किश्त)
गताँक से आगे−
मित्रों! जहाँ सम्मान होता है, वहाँ सहयोग आता है। महापुरुषों पर सहयोग बरसा, गाँधी जी पर सहयोग बरसा। अरे, मैं तो ये कहता हूँ कि अनेक आदमियों पर सहयोग बरसा है। बाटा एक मोची का नाम है, जिसके माता−पिता का देहाँत हो गया था। बारह तेरह साल का यह लड़का रह गया। कुछ पढ़ा−लिखा भी नहीं था। बाप जो था, पुराने जूतों की मरम्मत करता था। वही काम बेचारा वो भी करने लगा। जो भी आता, यही पूछता कि तुम्हारे पिता जी दिखाई नहीं पड़ते? लड़का कहता कि हमारे पिता जी का स्वर्गवास हो गया, अब आप ही हमारे पिता जी हैं। आपसे रहम तो नहीं माँगते, पर आपसे श्रम माँगते हैं। आप चाहें तो अपने जूतों की मरम्मत हम से करवा लिया कीजिए, उनकी पॉलिश हमसे करवा लिया कीजिए। इससे आपकी सहायता भी हो सकती है और हमारा गुजारा भी हो सकता है। लोगों ने अपने चप्पलों की मरम्मत करवाना शुरू किया। जूतों पर पॉलिश करने को दी। उसने इस वफादारी से मरम्मत की कि लोग बाग−बाग हो गए। सबको लाभ हो गया। उनने औरों से कह दिया कि ऑफिस में किसी को जूतों की पॉलिश करानी हो, तो उस लड़के से कराना। शानदार लड़का है। इतनी तबियत से पॉलिश करता है कि चार दिन तक जूते की पॉलिश खराब नहीं होती। मरम्मत कराना हो, तो उसी से कराना।
सबसे प्रशंसा करनी शुरू कर दी। क्या नाम था? बाटा। कौन−सा बाटा? जिसका आज करोड़ों रुपये का जूते का बिजनेस चलता है। जब लड़का बड़ा हुआ, तो लोगों ने कहा कि बाटा हमारे लिए अच्छे जूते बना सकते हो। हाँ साहब! हम अच्छे जूते बना देंगे, पर पैसा नहीं है हमारे पास, आप पैसा दीजिए, राहत दीजिए। राहत में लोगों ने चमड़ा ला दिया और सामान ला दिया। उसने भी तबियत से अच्छे−अच्छे जूते बना दिए।
सामाजिक जीवन का अध्यात्म
मित्रों! ईमानदारी, वफादारी और जिम्मेदारी तीनों को मिलाकर सामाजिक जीवन में अध्यात्म हो जाता है। अध्यात्म कैसा होता है? अध्यात्म को जीवन में अप्लाइड कैसे करते हैं? अपने विकृत जीवन में संयम के रूप में हम अप्लाइ करते हैं। समाज में हम जिम्मेदारी, वफादारी और ईमानदारी के रूप में प्रयुक्त करते हैं। जीवन में इन तीनों को समाविष्ट कर लेते हैं, तो वह अध्यात्म हो जाता है। नहीं साहब, भजन और माला को अध्यात्म करते हैं। चल....... सब बात में भजन लगा देता है, भजन भी दिमाग का एक खेल है। वह अपने अंतर्मन की एक कसरत है। कसरत कई तरह की होती है। अंतर्चेतना के व्यायाम का एक नाम वह भी है, जिसको आप मंत्र कहते हैं। वह भी अध्यात्म का एक हिस्सा है, लेकिन केवल वही सारा अध्यात्म नहीं हो सकता। वह एक हिस्सा है। मंत्र भी एक हिस्सा है। समस्त अध्यात्म मंत्र नहीं हो सकता है।
मित्रों! बाटा ने जूतों की मरम्मत से उन्हें बनाना शुरू कर दिया और लोगों ने जूता माने बाटा, बाटा माने जूता कहना शुरू कर दिया। उसका व्यापार बढ़ता हुआ चला गया। मैं क्या कहूँ आपसे, करोड़ों रुपये का व्यापार उसने किया। जब में अफ्रीका गया, तो वहाँ भी बाटा की दुकानें देखीं। हरेक देश में बाटा छाया हुआ है। अफ्रीका में बिकता है, हिंदुस्तान में भी बिकता है। मैंने देखा उसकी नेट आमदनी गवर्नमेंट के टैक्स देने के बाद में दो करोड़ के करीब बच जाती है। सहयोग से इस तरह बाटा फैलता हुआ चला गया।
गुरुजी! आप अध्यात्म से अनुदान के विषय में कह रहे थे? बेटा, मैं, कह रहा था कि जब सम्मान आता है, तो सहयोग भी आता है। श्रद्धा आती है। आप क्यों नहीं सुनते? हमें तो कोई जरूरत नहीं है। हमारे सब विरोधी हैं। विरोधी भी बेटे इज्जत करते हैं। क्राँतिकारियों को बेटे अँगरेजों ने फाँसी दे दी थी। उनको फाँसी देने वाले मजिस्ट्रेट ने, उनके जो रिमार्क लिखे हैं, उसे पढ़कर देखिए आप। उन्होंने क्या रिमार्क लिखे हैं? उन्होंने जिस काम के लिए ये गुनाह किए, वो मकसद बहुत ऊँचे थे। इन्होंने गुनाह किए, इसलिए हमारा संविधान, हमारा कानून कहता है कि इन्हें जेल में फाँसी लगनी चाहिए, इसलिए हमने फाँसी लगवा दी, पर फाँसी लगाते हुए हम इनकी इज्जत करते हैं।
सिद्धियों के कई प्रकार− सहयोग एवं अनुदान
मित्रो! आपको इज्जत मिल सकती है। किससे? उस अध्यात्म से, जो हम आपको सिखाने वाले हैं। उससे आपको इज्जत मिलेगी, तो आप देखना आपको सहयोग भी मिलेगा। सहयोग कहाँ से मिलेगा? बेटे, हमको पहले मिली है इज्जत फिर हमको मिली सहायता। सहायता नहीं मिलती, तो हम कहाँ से यह सब काम चला रहे हैं, बताइए? हमारे कितने जीवनदानी मुट्ठी में हैं। ब्रह्मवर्चस एक, ब्रह्मवर्चस में कितने आदमी काम करते हैं? वे क्या हैं? आठ−दस तो वे हैं, जो पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पी.एच.डी. हैं, मेडीकल के एम.बी.बी.एस. हैं, एम.एस. हैं, एम.डी. है। कितने लड़के काम करते हैं। इनको नौकरी देकर तो देखिए। एक−एक व्यक्ति कम−से−कम पंद्रह−पंद्रह सौ रुपये की नौकरी छोड़कर आया है। कितने आदमी हैं? बीस हैं। कितने रुपये लगेंगे? तीस हजार रुपये महीने लगेंगे। पहले नौकरी दीजिए, पीछे काम लेना। यह सब कहाँ से आता है। श्रम के रूप में सहयोग, अकल के रूप में सहयोग, भावनाओं के रूप में सहयोग। आप सहयोग का अर्थ केवल पैसा समझते हैं।
मित्रों! अगर आपका यही ख्याल है कि सहयोग का अर्थ पैसा होता है, तो चलिए मैं अभी देता हूँ। गाँधी जी पर भी पैसा आया था, दूसरों पर भी पैसा आया था, तीसरों पर भी पैसा आया था। विनोबा पर कितनी जमीन आ गई थी? करोड़ों एकड़ जमीन भूदान में आ गई थी। मैं क्या कहूँ बेटे, कोई इतनी जमीन खरीदता, तो दिवाला निकल जाता। हमने जरा−सी जमीन खरीदी है, डेढ़ लाख लग गया और उन्होंने कितनी खरीदी? करोड़ों रुपये की जमीन खरीदी विनोबा ने, भूदान यज्ञ में सहयोग दिया था। आपको सहयोग मिलता है? कि सी का न नहीं मिलता। धर्मपत्नी का मिलता है? नहीं साहब, उसका भी नहीं मिलता। माता जी का मिलता है? नहीं माता जी का भी नहीं मिलता। पिता जी का? पिता जी का भी नहीं मिलता। किसी का मिला सहयोग? नहीं साहब, सब बड़े चालाक हैं और सब दुनिया बेईमान है। हाँ, आपका कहना बिल्कुल सही हैं। दुनिया तो है ही चालाक, लेकिन हर आदमी के भीतर एक और माद्दा है। कौन−सा वाला? जो दूसरों की सहायता करता है। आप पहले अपना सम्मान प्राप्त कीजिए।
मित्रों! लोग सम्मान नहीं देते, सम्मान लिया जाता है। कैसे? उस अध्यात्म से जो हम आपको सिखाने वाले और समझाने वाले हैं। उससे आप क्या करेंगे? उससे उस अध्यात्म की कीमत पर आप जनता का सम्मान खरीदेंगे। फिर क्या होगा? फिर आप पर सहयोग बरसेगा। ये क्या हो गया? ये सिद्धि नंबर दो है। ये किसी सिद्धि हो गई। ये बाहर की सिद्धि हुई। ईश्वर, जीव और प्रकृति तीन होते हैं। मैं पहले जीव की बात कह रहा था। जीवात्मा के भीतर से हमारे अंतर्मन से जो सिद्धियाँ निकलती हैं, अभी मैं उसका हवाला दे रहा था। अब मैं प्रकृति का हवाला दे रहा हूँ। प्रकृति के साथ समाज जुड़ा हुआ है। बहिरंग से आपको तरह−तरह के सहयोग मिलेंगे, सहायता मिलेगी, तरह−तरह की प्रसन्नताएं मिलेंगी, तरह−तरह के भाव मिलेंगे।
साथियों! जो सिद्धाँत, जो अध्यात्म में सिखाने वाला हूँ और जिसके लिए मैंने आपको बुलाया है, उस अध्यात्म की सफलता पर मेरी उम्मीदें टिकी हुई हैं और जिस सफलता के आधार पर आपका भविष्य टिका हुआ है। आप अगर जंजाल में फँसेंगे, तो मरेंगे। नहीं साहब, मंत्र जपेंगे और पैसा कमाएंगे। यह सब झूठ है। अभी भी यही जालसाजी लिए बैठा है। जादूगरी लिए बैठा है। जादू क्या होता है? मिट्टी में फूँका, हो गया जादू। यही है तेरा अध्यात्म? बाजीगर कहीं का, बाजीगरी सीखने आया है। क्या सिखाएँ? बाजीगरी सिखाइए, मिट्टी में फूँक मारिए और पैसा मँगाइए। गायत्री मंत्र पढ़िए और बेटा पैदा कर दीजिए। हट मूर्ख कहीं का, ये क्या करता रहता है बेअक्ली की बात।
अध्यात्म बेअक्ली का नाम नहीं है। बेअक्ली अलग बात है और अध्यात्म अलग बात है। जिससे आप फायदा उठा सकते हैं, जिसको पाकर हिंदुस्तान शानदार हुआ था और आप भी शानदार हो सकते हैं। वह अध्यात्म अलग है और ये बेअक्ली अलग है। कौन−सी? जो मैं शुरू में ही कह रहा था मनुहार और उपहार की। मनुहार कीजिए और उपहार पाइए। बेटे, ये बच्चों का धंधा है। अगर आप बच्चे हैं, तो मैं नहीं कह सकता और छोटी चीजों तक भी मैं नहीं कह सकता, पर अगर बड़ी चीजों की बात है, तो बड़े लोगों की तरह से आप इजहार करना शुरू कीजिए।
दैवी अनुग्रह : भगवान की सिद्धि
यहाँ तक दो बातें हो गई। एक जीव की शक्ति हो गई और एक प्रकृति की सिद्धि हो गई। एक सिद्धि और बाकी है। वह सिद्धि कौन−सी है? वह सिद्धि भगवान की सिद्धि है तीसरी सिद्धि है। भगवान की सिद्धि किसे कहते हैं? जिसे हम दैवी अनुग्रह कहते हैं। हाँ, दैवी अनुग्रह भी आते हैं। दैवी अनुग्रह हो सकते हैं? हाँ बेटे, दैवी अनुग्रह भी होते हैं। दैवी अनुग्रह भी आदमी को मिलते हैं, परंतु हरेक को नहीं मिलते। गुरु जो माँगेगा, उसे भी नहीं? नहीं बेटा, सबको नहीं मिलते। दैवी अनुग्रह प्राप्त करने की भी शर्त है। कौन−सी शर्त है? अब हम आपको यही समझाने वाले हैं। जिसके लिए हम आपको अब मजबूर करने वाले हैं, जिसके लिए हम दबाव डालने वाले हैं, जिसके लिए हम जोर लगाते हैं, वह है पात्रता का विकास। जिस दिन आपकी पात्रता विकसित हो जाएगी, उस दिन क्या होगा? दैवी अनुग्रह बरसेंगे।
मित्रों! दैवी अनुग्रह बरसते हैं, माँगे नहीं जाते। ये हवा जो है, ऑक्सीजन लेकर आती है। इतने काम की ऑक्सीजन आपको दी जाती है कि मैं क्या कहूँ आपसे। कितने दाम की ऑक्सीजन है? डॉक्टर साहब से पूछिए कि ऑक्सीजन का सिलेंडर कितने का मँगाया था? छह सौ पचास रुपये का। एक आदमी के लिए कब तक एक सिलेंडर चल सकता है? अगर एक आदमी सारे दिन लगाए रखे तो दो तीन दिन में खत्म हो जाएगा। हवा आपकी नाक में ऑक्सीजन की नली लेकर आती है और हर दिन लगभग तीन सौ रुपये की ऑक्सीजन आपको फोकट में दे जाती है। बेटे, आप देवता का अर्थ समझते नहीं है। देवता कहाँ से आते हैं? सूरज की धूप कहाँ से आती है। सूरज की धूप का दाम निकालिए। हमारे यहाँ लाइट जलती है। सौ वॉट का बल्ब जलता है, यह कितनी बिजली कंज्यूम करता है? अपने मीटर को देख लें। हमारे यहाँ जो बिल आता है, हजार रुपये से ज्यादा का आता है। हमारे यहाँ हजार−डेढ़ हजार रुपये की बिजली जलती है। हम देखते हैं कि रात में कितनी देर बिजली जलती है, तो कहते हैं कि भाई बंद करो बत्ती आपने सौ वॉट का बल्ब लगा रखा है, चालीस वॉट का लगाइए, पंद्रह का लगाइए। हम किफायत करते हैं। सूरज कितने हॉर्स पावर का है? कितने कैंडिल का आप समझते हैं सूरज को? वह आपके मकान पर जलता है। आप हीटर जलाते हैं, कितनी बिजली जल जाती है? ढाई रुपये की और ये हीटर कितने रुपये में आता है?
मित्रों! आसमान में लाइट बरसती है, रोशनी बरसती है, ऑक्सीजन बरसती है, जीवन बरसता है, प्राण बरसता है, सौंदर्य बरसता है। पानी की तरह से जाने क्या−क्या बरसता है। सब कुछ बरसता है। यह भगवान बरसता है, आदमी नहीं बरसता। ये सब अनुग्रह भी बिना कीमत के मिलते हैं। सुकरात के पास एक शक्ति थी। उसका नाम उन्होंने डेमँन रखा था। सुकरात उसके ऊपर पूरी तरह से निर्भर रहते थे। डेमँन ऊपर से आता था और सहायता करता था। विक्रमादित्य के बारे में भी मैंने सुना है कि उसके पास भी शक्तियाँ आती थीं और उनकी मदद करती थीं। बेटे, कितने देवता होते हैं, जो आदमी की सहायता करते हैं। वे इतनी सहायता करते हैं कि मैं क्या कहूँ आपसे। उनकी सहायता के मारे आदमी धन्य हो जाता है।
देवता कौन होते हैं? देवता अड़ोसी−पड़ोसी नहीं होते। वे संबंधी भी नहीं होते। देवता उन शक्ति यों का नाम हैं, जो आदमी के ऊपर बरसती हैं और आदमी को धन्य करती हैं। किस−किसके ऊपर देवता बरसे? बेटे, ज्यादा तो नहीं कहता मैं, औरों का हवाला तो नहीं देता, बस अपना हवाला देता हूँ कि हमारे ऊपर कौन बरसता है। सुकरात के तरीके से एक डेमँन हमारे भीतर भी बरसता है और सारा−का−सारा अनुग्रह उसी से काम करता है। कैसा अनुग्रह है? आपको मालूम है उसमें अक्ल का अनुग्रह भी है। अक्ल कहाँ से बरसती है? अक्ल कहाँ से आती है? आप कौन से स्कूल में पढ़े हैं? बेटे, कहीं भी नहीं पढ़े हम। ये जो सारी अक्ल बरसती है, वो आसमान से बरसकर हमारे दिमाग में घुस जाती हैं और पैसा कहाँ में बरसता है? पैसा बेटे, आसमान से बरसता है और हमारी तिजोरी में घुस जाता है। इसमें हम कहते हैं कि ठहरिए अभी तिजोरी बंद है, चाबी नहीं मिल रही है। चाबी नहीं मिल रही है तो क्या हुआ, हम ऐसे ही घुस जाएँगे और पैसा तिजोरी से निकाल लाएँगे।
डेमँन− गुरु−देवता
ये कौन घुसाता है? डेमँन। डेमँन कौन−सा होता है? डेमँन कहते हैं भगवान को। आपके डेमँन का क्या नाम है? अपने गुरु को हम डेमँन कहते हैं। गुरु क्या होता है? अरे बेटे, वह भगवान है। भगवान हमको देता है। हरेक को वह नहीं दे सकता। आपका गुरु हमको दे देगा? नहीं बेटे, आपको नहीं देगा। गुरु जी आप हमको अपने गुरु जी का साक्षात्कार करा दें। हाँ बेटे, हम दर्शन तो आपको करा देंगे, लेकिन उससे क्या फायदा होगा? जैसे ही दर्शन करेंगे, वैसे ही वे पैसा दे देंगे। चल बेहूदा कहीं का, इसीलिए तू दर्शन करेगा। देख मैं कुछ नहीं देता। उदाहरण के लिए बैंक में जाइए और कहिए कि मैनेजर साहब! हाँ, हम आपका दर्शन करेंगे, तो आप दर्शन कीजिए न। हाँ साहब, दर्शन हो गए आपके। अब जाइए आप। नहीं साहब, हम जिस काम से आए थे, जिस मनोकामना को पूरी करने के लिए आए थे, उस मनोकामना का क्या हुआ? हमको पंद्रह हजार रुपये दे दीजिए। आपका बैंक में एकाउंट है? नहीं साहब! बैंक में तो कोई एकाउंट नहीं है, तो फिर किस बात के माँगते हैं। दर्शन की फिलॉसफी नहीं समझते और आ गए दर्शन करने। तो हो गया हमारा दर्शन, जाइए। नहीं साहब, अभी तो दर्शन करने को आए हैं। बेकार की बातें करता है। यही समझता है कि हम देखेंगे और देख करके निहाल हो जाएँगे। देखने से कुछ भी नहीं होगा।
आप स्वर्ग देखेंगे या नरक, चलिए हम लिखा लाते हैं। अच्छा चलिए पहले लक्ष्मी जी के दर्शन करते हैं। स्टेट बैंक में जब नोटों के बंडल आते हैं, तो खुलते हैं और रख जाते हैं देखिए, लक्ष्मी जी के दर्शन कीजिए, ढिकाने जी का दर्शन करेंगे, बस दर्शन ही दिमाग में सवार हो गया है। एक तो वो वहम सवार हो गया था कि मनुहार करेंगे और उपहार पाएँगे। अब एक और वहम आ गया कि दर्शन करेंगे और निहाल हो जाएँगे। बहुत करेंगे दर्शन? दर्शन की फिलॉसफी समझते नहीं और दर्शन के लिए कहते हैं। दर्शन करने का मतलब क्या है जानते हैं आप? गाँधी जी का दर्शन जिन्होंने किया था, उनका नाम था नेहरू। गाँधी जी का दर्शन जिन्होंने किया, उनका नाम था पटेल। गाँधी जी का दर्शन जिन्होंने किया, उनका नाम था अमुक और अमुक। उनका दर्शन तो हमने भी किया था। अच्छा गाँधी जी का दर्शन किया था तो फिर क्या हुआ आपका? अरे साहब। चप्पल खो गई और हमारी जेब कट गई, जब गाँधी का दर्शन करने गए थे। दर्शन करने गए थे या भाड़ में?
अध्यात्म है साइंस ऑफ सोल
मित्रों! क्या करना पड़ेगा? आपको आध्यात्मिक जीवन में पात्रता का विकास करना होगा। तभी आवाज की प्रतिध्वनि की भाँति भगवान के अनुग्रह बरसते हैं और आदमी अपनी सामर्थ्य से अधिक काम करने में समर्थ हो जाता है। बड़े−से−बड़े काम करने के लिए, अपने लिए और पराये के लिए कुछ करने में वह समर्थ हो जाता है। मेंहदी हम पीसते हैं दूसरों के फायदे के लिए, पर हम स्वयं निहाल हो जाते हैं। ऐसा है अध्यात्म, जो मैं आपको सिखाने वाला था। इस अध्यात्म का बेस बेटे एक ही है। क्या बेस है कि आप अपने व्यक्तित्व को ठीक करें। अपने भीतर वह कशिश पैदा कीजिए। कौन−सी? जिससे जो चीज आप पाना चाहते हैं, पा सकें। इसे क्या कहते हैं? अध्यात्म इसी का नाम है। जो अध्यात्म आपने पढ़ा है, वह अध्यात्म नहीं है। अध्यात्म माँगने की विधा का नाम नहीं है। बाहर से पाने की विधा का नाम नहीं है। अध्यात्म किसे कहते हैं? अध्यात्म कहते हैं, साइंस ऑफ सोल को, सोल की साइंस को। सोल का हम डेवलपमेंट कैसे कर सकते हैं, सोल को परिष्कृत कैसे कर सकते हैं? सोल को हम शानदार कैसे बना सकते हैं, जिससे बाहर की चीजें खिंचती हुई चली जाएँ।
मित्रों! हमारा अपना मैग्नेट सुरक्षित करने की कला का नाम अध्यात्म है। अपना मैग्नेट जब खींचता है, तो ये बाहरी चीजें खिंचती हैं। प्लाँट जब खींचता हैं तो बादल बरसते हैं। बादलों का मैग्नेट नहीं है। पेड़ जब खत्म हो जाते हैं, तो पानी बरसना बंद हो जाता है। पेड़ों का मैग्नेट ही उन्हें खींचता है। खजाने जब पैदा होते हैं, तो इसके अंदर जो लोहा होता है, वो दूर−दूर तक खींचता रहता है और खजाने में अपने पास जमा कर लेता है। मैग्नेट खींचता रहता है। चोर चोरों को खींचते रहते हैं। आपको मालूम है कि एक जुआरी के पास ढेरों जुआरी जमा हो जाते हैं और वेश्याओं के यहाँ भँवरे जमा हो जाते हैं। कहाँ से भँवरे आ जाते हैं? क्यों साहब, आप कहाँ से आए? हम तो साहब बहुत दूर के रहने वाले हैं। आपका ये कौन लगता है? कोई नहीं लगता। क्यों साहब, फिर ये आपके कमरे में क्यों रहते हैं? कशिश ने इन्हें खींच लिया। जुआरी के पास जुआरी, चोरों के पास चोर, लफंगों के पास लफंगे, विद्वानों के पास विद्वान, ज्ञानियों के पास ज्ञानी खिंचे चले आते हैं। ऐसी आदतें या आदमी के भीतर का मैग्नेट जब उछाल मारता है, कशिश उठती है, तो वह समानधर्मी को अपने पास अनायास ही खींच लेता है।
मित्रों! जब आपका मैग्नेट भीतर से बढ़ेगा, तब आप खींचने में समर्थ हो जाएँगे। वे चीजें जिनका अनुभव मुझे व्यक्ति गत रूप से है, वही आपको बता रहा हूँ। हवा में गायब हो जाने का? बेटे, हवा में गायब हो जाने का अनुभव हमको नहीं है और क्या पेशाब से दिया जलाने का अनुभव आपको नहीं है? बेटा, वो भी नहीं है। हमको जब दिया जलाना पड़ा है, तो मोमबत्ती जलाते हैं और तेल जलाते हैं। पेशाब से जला दीजिए। बेटे, हमको नहीं आता कोई करामातें भी नहीं आतीं। करामातों से कोई अध्यात्मवादी नहीं हो जाता। अध्यात्म अपने आप से सबसे कड़ी करामात है। उससे आदमी महान् आत्मा हो जाता है, देवात्मा हो जाता है, ऋषि हो जाता है और नर से नारायण हो जाता है। ये अपने अपने आप में एक विधा है।
व्यक्तित्व का चुँबक
मित्रों! आध्यात्मिक शक्ति यों को आदमी की कशिश खींचती है। किसको खींचती है? जो सिद्धियाँ आप चाहते हैं, उनको कशिश खींचती है। गुलाब का फूल जब खिलता है, तो भँवरों को खींचता है, तितलियों को खींचता है और शहद की मक्खियों को खींचता है। आदमी जब खिलता है, जब देवताओं को खींचता है, भगवान को खींचता है, पड़ोसियों को खींचता है, समाज को खींचता है और अपने अंतरंग में दबी हुई क्षमताओं को खींचता है। सारी−की−सारी चीजें खिंचती हुई आ जाती हैं और आदमी संपन्न हो जाता है, समर्थ हो जाता है। ये किसके ऊपर टिका हुआ है अपना व्यक्तित्व, अपने आपको सुधार लेने के ऊपर। यही है अध्यात्म के सिद्धाँत, जो मैं आपको सिखाने वाला था, पढ़ाने वाला था।
मित्रो! मैं क्या कहने वाला था? ऋषियों की उसी वाणी को दुबारा दोहराने वाला था, जिसमें यह कहा गया था कि आत्मा वा रे ज्ञातव्य ध्यातव्य निदिध्यासतव्यं। अरे मूर्खों, अपने आपको देखो, अपने आपको समझो और अपने आपको ठीक करो। यह क्या है? यह ऋषियों की वाणी है और यह वो अध्यात्म है, जिसमें भगवान ने कहा है कि यदि इंसानों से आप ऊँचा उठना चाहते हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं, खुशी होना चाहते हैं, समृद्ध होना चाहते हैं, संपन्न होना चाहते हैं, तो उसके लिए क्या तरीका हो सकता है? फार्मूला क्या हो सकता है? भगवान ने कहा, उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। अर्थात् अपने आपको उठाइए, अपने आपको गिराइए मत।
मित्रों! गिराता कौन है? इंसान। उठाता कौन है? भगवान। इंसान के भीतर उठाने वाला जो माद्दा है, उसको कहते हैं भगवान। भगवान किसे कहते हैं? आदमी के भीतर एक ऐसी प्रेरणा है, जो आदमी को उठा देती है, वही भगवान है। जो व्यापक भगवान है, उसको तो बेटा कौन कहेगा। वह तो बहुत फैला हुआ है, उसकी तो बात ही मत कीजिए। ब्रह्म तो इतना विस्तृत है, इतना विस्तृत है कि हमारी अक्ल भी काम नहीं करती। हमारे भीतर वह भगवान है, जो हमें उठाता है और भगवान नहीं है। जो गिराता है, उसको बेटे, शैतान कहते हैं। शैतान को रोकिए, भगवान का समर्थन कीजिए और आप स्वयं ऊँचे उठिए।
मित्रों! ये किसने कहा है? गीताकार ने कहा है, उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। अपने आपको उठाओ, अपने आपको गिराओ मत। अपने आपको कौन गिराता है? अरे कोई नहीं गिराता, आप स्वयं अपने को गिराते हो। नहीं साहब, हमको पड़ोसी तंग करता है और बीबी तंग करती है और मुहल्ले वाले तंग करते हैं, बुखार तंग करता है। कोई नहीं तंग करता। आप अपने आपको स्वयं तंग करते हैं। आपका अपने आपको तंग करने का माद्दा ही है, जो आपके सामने आ जाता है। आप अपने आपको ठीक करिए। आप एक मित्र से मित्रता बना लीजिए और एक दुश्मन से आप पीछा छुड़ा लीजिए। अध्यात्म में कौन−सा मित्र है कौन−सा दुश्मन है? आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः अर्थात् आप ही अपने बैरी हैं और आपने ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ा मारा है और आप ही हैरान होते हैं। आप ही उद्धरेत् अर्थात् अपने आपको सही कीजिए, अपने आपको ठीक कीजिए।
अपने आपको बदलें
मित्रों! आप अपने आपको बदल लीजिए, फिर देखिए किस तरह से दुनिया बदल जाती है। सारा−का−सारा वातावरण बदल जाता है। आप अपनी आँखों का चश्मा बदलिए, हरा चश्मा छोड़िए और लाल चश्मा पहनिए, फिर देखिए, सारी दुनिया लाल हो जाएगी। आपके पास जो निगेटिव चिंतन है, अंतर्मुखी जीवन है। स्वार्थ से घिरा हुआ चिंतन आपके ऊपर हावी है, इसको आप ठीक करना शुरू कर लें, फिर मैं आपको यकीन दिलाता हूँ, विश्वास दिलाता हूँ कि आपको तीनों तरह की सहायता मिलेगी। देने के लिए तीनों खड़े हुए हैं, पहला− आपका अंतःकरण, सिद्धियाँ देने के लिए खड़ा है। हमारे भीतर दिव्य शक्तियाँ हैं, दिव्य क्षमताएँ भरी पड़ी हैं और हम आपको उठा सकते हैं। आपके भीतर का वर्चस्व, आपके भीतर का वैभव उठे, तो वह आपको निहाल कर देगा। दूसरा− समाज के लिए आपकी आरती उतारने के लिए खड़े हैं। आप जरा प्रकाशवान तो होइए, फिर देखिए हम आपकी कितने तरीके से सहायता करते हैं। सामाजिक जीवन में लोग कितना सहयोग करते हैं और तीसरे− भगवान का, जीवन देवता का अनुदान−वरदान किस तरीके से आपके ऊपर बरसते हैं। आपके लिए देवता फूलों का विमान लिए बैठे हैं। आप अपने को बदलिए तो सही, ऊँचा तो उठाइए। दैवी अनुदान सतत आप पर बरसते ही रहेंगे। आज की बात समाप्त।
‘सात्विक जीवनम् अमृत फलप्रदम’ यह संस्कृत सुभाषित पुरातन ऋषियों की सुदीर्घ जीवन साधना का निष्कर्ष है। इसे जब भी कोई जहाँ भी चाहे अपने प्रायोगिक जीवन की कसौटी पर सत्यापित कर सकता है। सात्विक जीवन का विस्तार जितना होगा, इसके अमृत फल भी उतने ही व्यापक होंगे। व्यक्ति गत, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में इसके प्रयोगों के अनुरूप व्यक्ति , परिवार एवं समाज इसके सत्परिणामों से धन्य होते हैं। उत्तरप्रदेश में सहारनपुर जनपद के देवबंद कस्बे के उत्तर−पूर्व में बसे मिरगपुर गाँव के लोग सामूहिक रूप से पिछले साढ़े चार सौ वर्षों से इस सचाई को अनुभव कर रहे हैं।
इस गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि करीब साढ़े चार सौ साल पहले एक उच्चकोटि के संत बाबा फकीरा ने गुरु दक्षिणा के रूप में गाँव वालों से कभी भी माँस−मदिरा व तामसिक पदार्थों का सेवन न करने की प्रतिज्ञा कराई थी। तब से यहाँ माँस, शराब व अंडे की बात तो छोड़िए, गाँव का कोई भी वृद्ध, युवक या बालक, स्त्री अथवा पुरुष, यानि कि गाँव का कोई भी रहने वाला बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, सुल्फा, चरस, गाँजा, अफीम तो क्या लहसुन व प्याज तक का सेवन नहीं करता। अपने किसी रिश्तेदार या मित्र की भावभगत में यहाँ धूम्रपान की बात नहीं करता। मिरगपुर गाँव के लोग बाबा फकीरा को दिए गए वचन के अनुसार पीढ़ी−दर−पीढ़ी उसी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए सात्विक जीवन जी रहे हैं। बावा फकीरा में लोगों की अटूट आस्था है। वह पूरे गाँव के देवता हैं। गाँव में होने वाले प्रत्येक शुभ कार्य में चाहे वह व्यक्तिगत हो या सामाजिक, गाँववासी बाबा की कृपा अनुभव करते हैं।
सात्विक खान−पान व रहन−सहन का शरीर, स्वास्थ्य व आचरण पर कितना असर पड़ता है, यह अहसास मिरगपुर वासियों को देखकर अपने आप ही हो जाता है। यहाँ के लोगों की मिलनसारिता, सहयोगी स्वभाव व उनके स्वाभिमानी व्यक्तित्व के सभी कायल हैं। नदी किनारे ऊँचे टीले पर बसा मिरगपुर सात्विक आचार−विचार व आवभगत में अपनी अलग ही छाप छोड़ता है। यहाँ के लोग गोरे−चिट्टे, लंबे कद व स्वस्थ शरीर वाले हैं। साफ सुथरी वेशभूषा के नाते भी इलाके में मिरगपुर के व्यक्ति अलग ही पहचाने जाते हैं। गुर्जर बहुल इस गाँव में सभी जातियों के लोगों का सात्विक खान−पान की सात्विक एकरूपता में मिरगपुर का कोई सानी नहीं है।
अपनी अलग पहचान वाले इस गाँव पर पिछले साढ़े चार सौ वर्षों में बाबा फकीरा की कृपा−छाया है। गाँव के बाहर फकीरा बाबा की समाधि है। इसे सिद्धकुटी कहा जाता है। लोग यहाँ आकर मन्नतें माँगते और अपनी तमन्नाएँ पूरी करते हैं। शिवरात्रि से तीन दिन पहले सिद्धकुटी पर इलाके का मेला लगता है। जितना अनूठा मिरगपुर है, उतना ही अनूठा यहाँ का सिद्धकुटी मेला है। मेले के अवसर पर सभी लोग अपनी रिश्तेदारियों में चिट्ठियाँ भेजकर उन्हें बाकायदा आमंत्रित करते हैं। ससुराल गई लड़कियों व मायके गई बहुओं को इस दिन के लिए खासतौर पर उनके यहाँ जाकर लाया जाता है। आस−पास के शहरी भी इस मेले की आध्यात्मिक उमंगों में सराबोर होने के लिए आते हैं।
इस दिन मिरगपुर का कोई घर ऐसा नहीं होता, जिसमें देशी घी का हलुआ न बनता हो। सुबह से शाम तक गाँव के घर−घर में मेहमानों की दावतें होती हैं। सिद्धकुटी पर भंडारे का इंतजाम किया जाता है। पूरा गाँव अध्यात्मिक रसानुभूति में डूब जाता है। अपनी सात्विक एवं आध्यात्मिक जीवन शैली के बल पर इस गाँव के लोगों ने बहुआयामी विकास किया है। विकास की दृष्टि से शासकीय मानक के अनुसार यह एक आदर्श गाँव है। सुख−समृद्धि एवं सुरक्षा की दृष्टि से इसे श्रेष्ठ मानक के रूप में पहचाना जाता है। सात्विक जीवन से प्राप्त होने वाले सभी अमृत फल यहाँ के निवासियों को सहज सुलभ हैं। इस अमृत फलों की प्राप्ति अन्य लोग भी सात्विक एवं आध्यात्मिक जीवन की रीति−नीति अपनाकर कर सकते हैं।
(गीता के चतुर्थ अध्याय की युगानुकूल व्याख्या− सोलहवीं कड़ी)
‘ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ नहीं’ शीर्षक से विगत मई 2002 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में परिजन विस्तार से पढ़ चुके हैं कि ज्ञान की पूर्णता पर पहुँचा हुआ साधक अपनी श्रद्धा, संयमशीलता एवं तत्परता द्वारा भगवत्प्राप्ति रूपी परम शाँति को प्राप्त होता है। भगवान इन समापन के श्लोकों में ज्ञान के साथ श्रद्धा, आदर्शों में असीम प्यार, श्रेष्ठता को प्राप्त करने की अटूट लगन पर सर्वाधिक जोर देते हैं। वे कहते हैं कि श्रद्धाहीन अज्ञानी संशय से भरा मनुष्य तो परमार्थ पथ से भटक जाता है एवं अंततः उसका नाश होता है। उसे किसी भी काल व लोक में कभी भी सुख−शाँति की उपलब्धियाँ नहीं होतीं। गुरु पर निष्ठा रख उनसे ज्ञान प्राप्त कर जो उपलब्धियाँ मिलती हैं, उन्हें श्रीकृष्ण सर्वोपरि बताते हैं। अज्ञान व अविधा न केवल मनुष्य को अशाँति, दुःख देते हैं, उसकी अधोगति भी करते हैं। विगत कड़ी में ज्ञान व श्रद्धा दोनों शब्दों की विस्तार से व्याख्या की गई थी। जो व्यक्ति श्रद्धावान बनता है, कभी अनावश्यक संदेह नहीं करता, सतत साधनापरायण रहता है तथा चारों संयमों का (इंद्रिय, अर्थ, समय, विचार) पालन करता है, अपने ऊपर अपना नियंत्रण रखता है, उसे निश्चित ही परमात्मसत्ता का, सत्य से साक्षात्कार का अवसर मिलता है, जो मानव जीवन को सार्थक बना देता है।
पहले के तीन श्लोकों में वर्णित युग सत्य को प्रभु श्रीकृष्ण अपने अंतिम दो श्लोकों में कही गई बात द्वारा अधिक प्रभावशाली ढंग से वर्णित कर ‘ज्ञान कर्म संन्यास योग‘ नामक इस महत्त्वपूर्ण अध्याय चार का समापन करते हैं।
योगसन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्। आत्मवन्तंन कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय॥ 4-41
“हे धनंजय, किसने कर्मयोग की विधि द्वारा समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और ज्ञान द्वारा (विवेक के माध्यम से) जिसके सभी संशय नष्ट हो गए हैं, उस आत्मपरायण पुरुष को (वश में किए हुए अंतःकरण वाले को) कर्म बाँधते नहीं हैं।
तस्मादज्ञानसंभूतं ह्नत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः। छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥ 4-42
“इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन, उठ, तू हृदय में स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशय को विवेक−ज्ञानरूपी तलवार द्वारा काटकर समत्वरूपी योग में स्थित हो जा एवं युद्ध के लिए खड़ा हो जा।”
पहले भगवान ने श्रद्धावान को ही ज्ञान मिलता है, यह कहा एवं फिर यह बताया कि अज्ञानी श्रद्धाहीन व्यक्ति जो संशयों से ग्रस्त रहता है, अंततः विनाश को प्राप्त होता है। उसे किसी भी काल में सुख की प्राप्ति नहीं होती। यह एक प्रकार की दुःखद नकारात्मक स्थिति है। ऐसी मनःस्थिति में हमें बहुत से लोग प्रायः सारे समाज के सभी वर्गों में छाए दिखाई देते हैं। उनका एक ही काम है, निरंतर संशय करना। तर्क और श्रद्धा में तर्क को अधिक महत्त्व देना। वे अपने परिकर के सभी व्यक्ति यों की नियत कर्म भावना एवं प्रयोजन पर अविश्वास रहते हैं। वे प्रत्येक व्यक्ति के प्रत्येक शब्द पर बिना किसी विचार के संदेह रखते हैं। भगवान के अनुसार उनके संशय, उनके अज्ञान के कारण, गैरजिम्मेदारी से भरी भ्राँतियों के कारण ही होते हैं। जब व्यक्ति का न तो अपने आप में और न अपने आस−पास के संसार में ही विश्वास होता है, तो उसे इस संसार में कोई महत्त्वपूर्ण उपलब्धि नहीं मिलती। साथ ही परलोक में भी उसे दुर्गति का ही सामना करना पड़ता है। इसे कभी भी किसी भी काल में सुख न मिलने का कारण मात्र यही है कि वह निरंतर शंकाओं से घिरा रहता है। इसीलिए भगवान कहते हैं कि श्रद्धावान पुरुष ही ज्ञान−लाभ प्राप्त करते हैं, अन्य कोई और नहीं।
गीता : एक मानवशास्त्र
गीता वस्तुतः मनोविज्ञान की एक पाठ्यपुस्तिका है। यह एक प्रकार का मानवशास्त्र है, जो वातावरण और परिस्थितियों से बिना प्रभावित हुआ एक श्रेष्ठ कर्मों में निरत कर्मठ जीवन जीने हेतु हम सभी को प्रेरित करने के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निस्सृत हुआ है। हमारा प्रतिनिधित्व यहाँ अर्जुन कर रहा है। वह बड़ा संशय में है और यह अज्ञान से जन्मा है। उसे लगता है कि जीतने को कोई अवसर नहीं है। कहाँ उसकी अपनी सात अक्षौहिणी सेना और कहाँ प्रतिपक्ष की ग्यारह अक्षौहिणी सेना। उसके मन में अपने ही प्रति अविश्वास है कि जीत नहीं पाएंगे। इस आत्मविश्वास के अभाव में जो स्वर उसके मुँह से निकले रहे हैं, वे अज्ञानजनित हैं। लौकिक दृष्टि से विवश अर्जुन देखकर भी एक तथ्य जो नकार रहा है, वह यह कि सब कुछ प्रतिकूल होते हुए भी श्रीकृष्ण उसके साथ हैं। यदि इतना मात्र दृढ़ विश्वास वह कर ले, तो वह सारी ग्लानियों−उदासीनताओं पर विजय प्राप्त कर युद्ध क्षेत्र में पूरे संकल्प बल के साथ खड़ा हो सका है। यहाँ अर्जुन की पग−पग पर परीक्षा है। गीता के हर श्लोक के साथ उसकी ही नहीं हम सब का भी परीक्षा हो रही है कि जीवन संग्राम में हम स्वयं को कितना तैयार रख पाते हैं। कर्मठता, कर्त्तव्यपरायणता बिना श्रद्धाजन्य ज्ञान के नहीं आ सकती और उसके लिए अपनी गुरुसत्ता पर दृढ़ विश्वास उनके दिए ज्ञान को ग्रहण करने के लिए पात्रता का विकास, साधनपरायणता एवं संयमशीलता का कड़ा अभ्यास चाहिए। जो व्यक्ति शुद्ध अंतःकरण वाले हैं, वे तो स्वतः उस ज्ञान को अपने आप ही यथा समय अपनी आत्मा में पा लेते हैं, पर सामान्य पुरुष, जो संशयों में भटकते रहते हैं, तरह−तरह के तर्कों द्वारा सत्य को पाने का प्रयास करते हैं, श्रद्धा उनके अंदर से उपज ही नहीं पाती, वे तो मानो निरंतर भटकते रहते हैं। इस लोक में नाश को प्राप्त होते हैं और फिर इसी प्रकार जन्म−जन्माँतरों पर विभिन्न योनियों में भटकते रहते हैं।
रखें गुरु के ज्ञान पर दृढ़ विश्वास
हम अपनी गुरुसत्ता के वचनों पर यदि दृढ़ विश्वास रखते हैं हमारे मन में उनके निर्धारणों, युगनिर्माण की उनकी भविष्यवाणी तथा घोषणाओं पर विश्वास है, तब हमारी दुर्गति क्यों हो! हमने तो यह मान लिया है कि हम अकेले हैं, हमें ही सब कुछ करना है। औरों के आचरण हमें जल्दी दिख जाते हैं, तो हम संशयों से घिर जाते हैं। हम अपने आपको देखने, अपनी श्रद्धा−संवर्द्धन करने का, ज्ञानप्राप्ति के परम पुरुषार्थ में तत्पर होने का प्रयास नहीं करते, इसीलिए हमारी भी स्थिति वही होती है, जो अर्जुन की हो रही है। ज्ञान, कर्म संन्यास योग का यह अध्याय भगवान की ‘संभवामि युगे−युगे’ के आश्वासन से व उनके द्वारा सूर्य को बताए गए योग की चर्या से आरंभ हुआ था। कर्म, अकर्म, विकर्म की परिभाषा समझते हुए पंडितजनों की व्याख्या तथा यज्ञ के दार्शनिक पक्ष का विवेचन करते हुए ज्ञान कैसे प्राप्त होगा, किसको लाभ होगा व उस ज्ञान की महिमा कितनी बड़ी है, इन सब विवरणों के साथ अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में खड़े होने के उद्बोधन पर समाप्त होने जा रहा है। कैसे−कैसे उतार−चढ़ाव आए हैं, इस अध्याय में, पर यह अध्याय कर्म योग पर आधारित एक महापुरुष के लिए एक संकल्पित अनुष्ठान लिए कार्य कर रहे संगठन के लिए एक निर्देश पुस्तिका हैं। कर्मयोगी को कैसा होना चाहिए, उसके कर्म दिव्य कम बनेंगे तथा बिना श्रद्धा व ज्ञान के कर्मों को दिशा कैसे मिलेगी, इन्हीं सब प्रतिपादनों पर टिका है यह अध्याय, जिसकी पराकाष्ठा पर हम पहुँच चुके हैं। जहाँ बार−बार भगवान कहते हैं कि अर्जुन, तेरे मन में कोई संशय हो, तो निकाल दे। यदि संशय लेकर जिएगा, कर्मयोग के पथ पर आरुढ़ नहीं होगा, तो विनाश को प्राप्त होगा, इसीलिए संशयों में मुक्त होना अनिवार्य है।
भगवान कह रहे हैं, हे धनंजय! आत्मवान् को कर्म नहीं बाँधते, ऐसे व्यक्ति को जिसने विवेक द्वारा अपने समस्त संशयों को नष्ट कर दिया है, ऐसे व्यक्ति को जिसका अंतःकरण उसके वश में है, कर्मों के बंधन में मुक्ति मिलती चली जाती है। (आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय) रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे, जिसे नाचता आ जाए, उसके पाँव गलत नहीं पड़ते, तो जिस आत्म में स्वयं को परमात्मा को अर्पित कर दिया है, जिस दिव्यकर्मी के सभी कर्म परब्रह्म को समर्पित हैं, उससे कभी कोई गलत काम हो ही नहीं सकता। उसके मन में ऐसा कोई भाव भी कभी पैदा नहीं होता। वह कर्म−बंधन से मुक्ति पाकर जीवन्मुक्त हो जाता है। परमपूज्य गुरुदेव कभी मौज में आते थे, तो एक गीत सुनाते थे, ‘मेरे पैरों में घुंघरू बँधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले।’ किसी फिल्म का यह गीत सुनाकर वे कहते थे कि ऐसे व्यक्ति की चाल फिर गलत हो ही नहीं सकती। लय और ताल के साथ ही वह चलेगी। ऐसा व्यक्ति कभी गलती नहीं करता, क्योंकि परमात्मा उसका हर क्षण संचालन करते हैं। वह कर्मयोग में सिद्धि प्राप्त कर चुका है। जो बात परमहंस ने कही है कि नाचना सीखने पर गलत पाँव नहीं पड़ते, वही भाव इस पंक्ति से भी निकलता है कि उपास्य−ईष्ट के अनुशासन में ही फिर कर्मों का संपादन होने लगता है। परमसत्ता के अनुशासन रूपी घुंघरू बँध जाने पर समर्पित साधक फिर वही चाल चलता है, जो कि एक कुशल कर्मयोगी को चलनी चाहिए। पूर्णतः त्रुटिहीन, सर्वांगपूर्ण कौशल से भरी हुई।
क्राँतिकारी गर्जना
भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि यहाँ समस्याओं से भागने को नहीं कहा जाता, अपितु दृढ़तापूर्वक डटे रहने और बुद्धिमत्तापूर्वक अपनी मनःस्थिति से परिस्थिति को नियंत्रित करते हुए कर्म करते रहने हेतु प्रेरित किया जाता है। गीता शुभ शक्तियों के नायक, देवपक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले अर्जुन के प्रति संबोधित है एवं हे भारत! उठो, युद्ध करो, अनीति को जड़ से उखाड़ फेंको, यही योगेश्वर का अंतिम उपदेश है। क्राँतियाँ जब कभी भी होती हैं, तो भगवान का यही आदेश है कि कंदराओं में मत भागो, डटकर मोरचा लो, अनीति से, कुरीति से, वैचारिक प्रदूषण से एवं सतत सम्यक् कर्म करते रहो, यही तुमसे अपेक्षा है।
इकतालीसवें श्लोक में भगवान यही कहते हैं कि जब विषयों व स्वार्थों की कामना से युक्त कर्मों का दिव्य योग भावना द्वारा त्याग कर दिया जाता है, तो अशाँतिदायक वासनाएँ समाप्त होती चली जाती हैं। अध्ययन−मनन द्वारा इससे आँतरिक ज्ञान में वृद्धि होती है, जो गुरु समर्पण से मिलता चला जाता है। वासनामुक्त अंतःकरण में, ऐसे ज्ञान की वृद्धि होती जाती है, जिसके प्रकाश में हमारी बुद्धि पर घने घटाटोप बादलों की तरह छाए संशय निवृत्त हो जाते हैं (ज्ञान संछिन्न संशयम्)। ज्ञान सूर्य मानो उन बादलों को, अज्ञानजन्य भ्राँतियों को अपने प्रकाश से छाँट देता है, नष्ट कर देता है। ऐसा व्यक्ति स्वतः आत्मपरायण हो जाता है (आत्मवन्तं), वह परमचैतन्य अवस्था को प्राप्त हो जाता है। फिर इस लौकिक जगत् और उसकी क्रियाएँ उसे वासनाओं की बेड़ियों में नहीं जकड़ पातीं (न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय)।
ऐसी स्थिति में मनुष्य भीतर योग में स्थित रहकर बाहर सभी बुद्धिमत्तापूर्वक किए जाने वाले कर्मों का संपादन कर लेता है। जैसे माँ का ध्यान घरेलू काम−काज में लगा होते हुए भी पालने में पड़े अपने शिशु की ओर निरंतर लगा रहता है, आकाश में उड़ती चिड़िया घोंसले से दूर होते हुए भी अपने बच्चे का ध्यान बराबर रखती है, हमारी गुरुसत्ता सूक्ष्म रूप से विद्यमान युगनिर्माण के कार्यों का संपादन करते हुए भी, हमारी ओर ध्यान निरंतर ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ के भाव से बनाए रखती है। योगी भी, दिव्यकर्मी भी परमसत्ता से कभी भी विमुख नहीं होते। बहिरंग जगत् में कर्म करते हुए भी वे वस्तुतः अकर्म में लीन रहते हैं। इस तरह कर्म करते रहने से मनुष्य के आँतरिक व्यक्तित्व को जकड़ने वाली नई वासनाएँ उत्पन्न नहीं हो पातीं। ‘कर्म नहीं बाँधते’ शब्द से भगवान का यही आशय है। अज्ञान और उससे जन्मी भ्राँतियों से मुक्ति ही वह राजमार्ग है, जो व्यक्ति को सही अर्थों में कर्मयोगी बनाता है।
संशय को काटें, ज्ञान की खड्ग से
जब मनुष्य को वास्तविक आत्मतत्त्व का अनुभव हो गया, जो अहंकार और कामोद्वेगों से ढका हुआ था, तो उसकी समस्त भ्राँतियाँ भी मिट जाती हैं। तब भगवान यह कहकर उपसंहार करते हैं, “हृदयस्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मा संबंधी संशय को ज्ञान की खड्ग से काटकर योग में स्थित हो जा। उठ, हे भारत तू युद्ध के लिए तैयार हो जा।” (बयालीसवाँ अंतिम श्लोक) कितना ओजस्वी उद्बोधन है व कितना मर्मयुक्त ज्ञानोपदेशों से भरा कर्मयोग के प्रतिपादन का समापन है। अगले अध्याय के (पाँचवे) जो कर्म संन्यास योग नाम से प्रसिद्ध है, पूर्व भगवान ने अर्जुन को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है। आत्मा के तात्कालिक और अपरोक्ष अनुभव (अपरोक्षानुभूति) द्वारा उनसे निवृत्त हो जाना ही उचित है। यही संशय हमें अहंभाव में जकड़े रहते हैं और ये अज्ञान से जन्मते हैं। प्रभु कहते हैं इस अज्ञानजनित संशयों को अपरोक्षानुभूति की, विवेक ज्ञान की खड्ग से नष्ट कर दो, काट डालो (तस्मादज्ञानसंभूतं ह्नत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः छित्त्वैनं संशयं बयालीसवाँ श्लोक)। यदि हम प्रभु को निरंतर अपने आस−पास विद्यमान मानकर, निरंतर जागरुक बने रहकर उनके प्रति अपने कर्मों के अर्पण का भाव रखें, तो हम योग में स्थित हो जाते हैं। यज्ञीयभाव के कर्म करने लगते हैं (योगमातिष्ठ)। सारे अध्याय का सार−संक्षेप यहाँ आ गया है।
कि तनी विचित्र बात है। गीता युद्ध क्षेत्र में कही जा रही है। मोहग्रस्त अर्जुन को योगेश्वर कर्मयोग का संदेश दे रहे हैं एवं बार−बार यही कह रहे हैं कि युद्ध कर। हमें लगता है कहाँ योग जैसा उच्चस्तरीय दर्शन एवं कहाँ युद्ध, पर यही तो काव्य के लालित्य की विलक्षणता है। चाहे वह महाभारत का युद्ध क्षेत्र हो, चाहे हमारे अंतर्जगत् का देवासुर संग्राम। हमें सदैव इसी प्रकार के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। चाहे हम लौकिक जीवन जी रहे हों या रैदास की तरह, रैक्य की तरह, सदन कसाई की तरह निर्लिप्त भाव से कर्मयोगी की भाँति जीना चाह रहे हों, हमें इसी उच्चतर कर्मयोग की आवश्यकता होगी। युगनिर्माण का कार्य, नई दुनिया बनाने, नया इंसान बनाने का, ज्ञानयज्ञ वाला विचार क्राँति का महापुरुषार्थ, इसीलिए तो हमारे लिए एक उच्चस्तरीय कर्मयोग बन जाता है। इस प्रक्रिया का कार्यान्वयन करते−करते हमारी चेतना विस्तृत होती है, जागरुकता बढ़ती है, प्रतिकूल परिस्थितियाँ बदलती हैं तथा आत्मविश्वास बढ़ता चल जाता है। हम सभी समस्याओं का सामना श्रद्धा से भरे हृदय−विवेकजन्य ज्ञान तथा त्यागभाव से करने को तैयार हों, तो सफलता मिलती चली जाती है।
उठो भारत! योग का आश्रय लो
उठो भारत! योग का आश्रय लो
पहले भी ऐसा रहा है और ऐसी क्राँतिकारी वेला में ही यह युगगीत लिखी जा रही है। जब यजुर्वेद का “सा प्रथमा संस्कृतिः विश्ववारा” वाला संकल्प पुनः जीवंत होने जा रहा है। सच्चा भारतीय श्रीकृष्ण की परिभाषा के अनुसार वही है, जो साहसपूर्वक ज्ञान के प्रकाश में कर्मपरायण जीवन जीने और परमात्मतत्त्व की अनुभूति पाने हेतु तत्पर रह कर्मयोग में स्थित हो। हम सभी को चिंतन करना चाहिए कि क्या हम इस परिभाषा पर खरे उतरते हैं। हम अपने विश्वासों को व्यवहार में लाने का साहस दिखाने की स्थिति में हैं कि नहीं? हम अपनी निम्नगामी प्रवृत्तियों और विषय−वासनाओं से लड़ने के लिए गतिशील हैं कि नहीं। यदि हैं तो, हम सभी को संबोधन है परमसत्ता का, भगवान श्रीकृष्ण का कि उठो भारत, भारतवासी, देवपुत्रों, अमृतपुत्रों, अपनी गरिमा को पहचानो एवं स्वयं को योग में प्रतिष्ठित करो। बस यहीं एक विलक्षण बिंदु पर इस अध्याय का समापन हो जाता है। (आगामी अंक से पाँचवाँ अध्याय)
यदि भारत को वस्तुतः सुखी रहने की आकाँक्षा हो, यदि कोई इसका ठोस और वास्तविक आधार प्राप्त करना चाहता हो, तो उसे सन्मार्ग ही अपनाना होगा, सद्भावों को धारणा करना होगा, सत्कर्मों को ही करना होगा और यह तभी संभव है जब मनःक्षेत्र में अध्यात्म विचारधारा की सुदृढ़ स्थापना हो।
‘युगद्रष्टा का जीवन दर्शन’ (वाङ्मय खंड-1,8,11) में उद्धृत है, “नारी की पीड़ा, व्यथा-वेदना को समझ सकना, गहराई से अनुभव कर लेना उसी के लिए संभव है, जिसने नारी का हृदय पाया हो।” उन्हीं के शब्दों में कहें तो पुरुष की तरह हमारी आकृति बनाई है, कोई चमड़ी उधेड़कर, फाड़कर देख सके तो भीतर माता का हृदय मिलेगा, जो करुणा, ममता, स्नेह और आत्मीयता से हिमालय की तरह निरंतर गलते रहकर गंगा-यमुना बहाता रहता है। यह कथन इस संदर्भ में है कि हमारी गुरुसत्ता ने जीवनभर आधी जनशक्ति के उद्धार के लिए आवाज उठाई। उसे निरंतर जाग्रत् बनाए रखा एवं सही अर्थों में एक सशक्त नारी जागरण आँदोलन खड़ा कर परमवंदनीया माता जी के हाथ में सौंप दिया। उनने लिखा कि उसे भोग्या, रमणी, कामिनी की स्थिति से निकलकर पुरुष के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर चलना एवं हर क्षेत्र में स्वावलंबी बनने का प्रयास करना चाहिए। लेखनी के हर कोण से वे मातृशक्ति की अर्घ्य करते दिखाई देते हैं। चाहे वह उनका निरंतर अखण्ड ज्योति, युगनिर्माण के लिए किया गया लेखन हो अथवा ‘महिला जाग्रति अभियान’ पत्रिका के लिए लिखे गए उनके मार्गदर्शन हों, सभी तरफ यही करुणा दिखाई देती है। उनके लिखे पत्रों में विशेष रूप से एक मार्गदर्शक शैली भी दृष्टिगोचर होती है, जो पत्र लेखन कला का एक विलक्षण नमूना है।
बदायूँ की कंती शर्मा को 4-12-1951 को एक पत्र में वे लिखते हैं
पुत्री कुँती, आशीर्वाद
तुम्हारा पत्र मिला। पढ़कर बड़ा दुःख हुआ। तुम्हारी जैसी लक्ष्मी महिला को पाकर जिन्हें अपना भाग्य सराहना चाहिए था, वे लोग इस प्रकार तिरस्कार करते हैं, यह उनके भाग्य की हीनता ही है। तुम इसे प्रारब्ध भोग मानकर अपने चित्त को समझा लो।
तुम विद्या पढ़ने में पूरा ध्यान दो। नारी की सबसे बड़ी दुर्बलता यह होती है कि वह परावलंबी होती है। यदि वह स्वावलंबी हो जाए, तो तरह-तरह के तिरस्कार न सहने पड़ें। तुम विद्या पढ़कर स्वावलंबन प्राप्त करो, तभी तुम्हारी रोज की अशाँति का मार्ग मिलेगा।
पत्र स्वयं में बड़ा स्पष्ट है। वे कुँती बहन की इस दुर्दशा के लिए उन पुरुषों, घर के सदस्यों को भाग्यहीन बताते हैं, जिनके घर वह पिता का घर छोड़कर गई है। किसी भी बहू के लिए पिता से भी अधिक ममत्व भरा स्पर्श है एवं मार्गदर्शन है कि उसे क्या करना चाहिए? संभवतः उनकी दो पुत्रियाँ इसका कारण रही हों, जो ससुराल वाले न चाहते हों। वंश चलाने के लिए पत्र की चाह जो बड़ी प्रबल बनी रहती है। अब यह नारी के हाथ की बात तो है नहीं, पर इसी कारण न जाने कितनी नारियाँ त्रास-घुटन से जूझती रहती हैं, सतत पति व सास की प्रताड़ना सहती रहती हैं। बच्चा न हो, तो उसे अपमान झेलना होता है, भले ही दोष पति में ही हो एवं बच्चा हो व लड़की हो, तो भी उसे निरंतर उन्हीं बच्चियों के समक्ष सारी अपमानजनक टिप्पणियाँ सुनकर जीवन काटना पड़ता है।
30-8-54 को श्री सीताराम गुप्ता की पत्नी जिन्हें मुन्नी नाम से संबोधित किया गया है, एक पत्र में वह लिखते हैं
नाम का अंत, बुढ़ापे का सहारा, गृहस्थी की मालिकी इन बातों की आशा लोग संतानों से रखते हैं, पर आज के जमाने में जो संतानें होती हैं, उनसे कोई भी प्रयोजन पूर्ण नहीं होता। माता-पिता को दुःख देना ही उनका काम होता है। तुम अपने आस-पास निगाह पसारकर देख सकती हो। निस्संतान होना, दुखिया होना नहीं है। आज के समय के एक अनेक झंझटों से निवृत्ति का बड़ा उत्तम सौभाग्य है।
निस्संतान इस महिला को कितनी बड़ी दिलासा दी गई है, साथ ही एक नई सोच भी दी गई है। समाज सुधारक स्तर पर जो अपनी युवावस्था से सक्रिय रहे हों। समाज सुधारक स्तर पर जो अपनी युवावस्था से ही सक्रिय रहे हों, उस जमाने के हिसाब से जिनके माध्यम से बड़े क्राँतिकारी कार्य हुए हों, उनने आशीर्वाद की भूल-भुलैया में इस बहन को न रखकर एक तरह से नया निर्णयात्मक दृष्टिकोण विकसित करने को कहा है। कन्या-पुत्र में भेद करना जहाँ एक अवाँछनीय कुरीति है, वहाँ बच्चा न होने पर तिरस्कृत करना भी समाज में एक कुरीति बन गई है। सुपात्रों से संतति के वरदान मिले, ऐसे ढेरों उदाहरण हमने देखे हैं, पर उन्हीं गुरुसत्ता के द्वारा नारी शक्ति को पत्र द्वारा, प्रत्यक्ष द्वारा मार्गदर्शन होते भी देखा है, जिसमें निस्संतान रहकर उनके द्वारा अधिक समाज सेवापरक कार्य संपन्न किया गया।
दैनंति जीवन के कष्टों से लेकर अन्य सभी संतापों में पूज्यवर सतत पितृवत् सलाह देकर अपनी शिष्या को हिम्मत दिया करते थे। ऐसा ही एक मार्गदर्शन इस पत्र में दृष्टिगोचर होता है-
प्रिय पुत्री काँती 30-1-57
आशीर्वाद
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारे भाई और भतीजे का स्वर्गवास होने के समाचार से दुःख हुआ। ईश्वर की इच्छा प्रबल है। उसके आगे मनुष्य का वश नहीं चलता। यह सोचकर ही अब धैर्य, विवेक और संतोष से ही काम लेना चाहिए। तुम बुद्धिमान हो। उन लोगों के परिवार को धैर्य बाँधने और शोक को घटाने के लिए समझाने का प्रयत्न करना।
आज नहीं तो कल, हमारा-तुम्हारा भी यही होना है। सो मनुष्य शरीर को अलभ्य मानकर इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करते रहने का प्रयत्न करना चाहिए।
इस पत्र की भाषा किसी भी पत्राचार करने वाले का मार्गदर्शन करती है। इसमें जो जीवन-दर्शन का शिक्षण दिया गया है, वह कितना उच्चस्तरीय है एवं किसी को भी इन शब्दों से उदात्त बल मिल सकता है। हमारे परमपूज्य गुरुदेव न केवल ऐसी परिस्थितियों में शब्दों से ‘हीलिंग‘ करते थे, परोक्ष रूप में अपनी शक्ति भी भेजते थे। विशेषतः अपनी बेटियों की ऐसी मनःस्थिति में, जबकि उन्हें विछोह की मानसिकता में गुजरना पड़ रहा हो। वे साधना संबंधी मार्गदर्शन भी पुरुष-महिला शिष्याओं को समान रूप में भेजते थे। उन मार्गदर्शन के साथ जो शब्दों को गुँथन रहा करता था, वह इतना विलक्षण होता था कि पढ़कर ऐसा लगता था मानो आसमान छू लें।
28-6-55 को लिखा एक पत्र यहाँ प्रस्तुत है-
प्रिय पुत्री शकुँतला, आशीर्वाद
तुम्हारा पत्र मिला। अपने कुशल पत्र बराबर भेजती रहा करो। तुम हमें अपनी दया बेटी के समान प्रिय हो।
तुम्हारी आत्मा अत्यंत ही पवित्र है। तुम्हारे तप और पुण्य-प्रताप से एक-एक करके जीवन की सब कठिनाईयाँ हल होती चली जा रही हैं। अभी कुछ और बाधाएँ शेष हैं। तुम गायत्री माता का अचित् मजबूती से पकड़े रहोगी, तो वे आपनियाँ और सरल हो जाएँगी।
पत्र की भाषा से छलकती भाव संवेदना उन्हें पहले अपनी बेटी के समकक्ष बिठाती है, फिर उन्हें तप में संलग्न होने की प्रेरणा देती है। पत्र-लेखन की कला का विश्वकोश भी बनाया जाए, तो इतने सुँदर शब्दों का चयन उसमें नहीं मिलेगा।
मिशन से जुड़े परिजन माया वर्मा बहन से परिचित हैं। अब वे इस संसार में नहीं हैं, पर अपनी कृतियों से अमर हो गई हैं। उन्हें समय-समय पर लिखे पत्रों में से एक यहाँ उद्धृत है-
चि. माया, स्नेह 6-10-61
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हें सिरदर्द की व्यथा लग गई है, जिससे बड़ी चिंता है। तुम्हारी इस हँसने-खेलने की आयु में इस तरह की व्यथा का उठ खड़ा होना हमें बहुत कष्टकारक हो रहा है। इसके समाधान का शक्ति भर प्रयत्न करेंगे।
लोक मंगल के लिए समय का जितना अंश लग सके, उसी में सार्थकता है। तुम लेखन तथा अन्य कार्यों में जितना अधिक संभव हो, समय लगाती रहना। इससे तुम्हें बहुत आत्मशाँति मिलेगी। आशा है। परिस्थितियाँ अनुकूल होती चलेंगी।
तुम शाँत, निश्चित और स्थिर मनोभूमि को लेकर अपने गंतव्य पथ पर बढ़ती रहना। तुम्हें सुखी और समुन्नत बनाने के लिए हम शक्ति भर सहयोग देते रहेंगे। हमारा स्नेह-वात्सल्य और आत्मभाव तुम्हें सदा एवं नित्य मिलता रहेगा।
माया दीदी ने जीवन भर अपने आराध्य की गीता गाई, उनका मार्गदर्शन पाकर अपने कष्ट भुलाती रहीं एवं ढेरों भक्ति व क्राँति के गीत लिखकर दिए तथा मार्गदर्शन को सार्थक बना गई।
अंत में एक और पत्र का एक अंश उद्धृत करने का मन है, जो किसी अज्ञात साधक को उनकी पुत्री के संबंध में लिखा गया था। हमें नहीं ज्ञात वह बच्ची कहाँ है, पर द्रष्टा स्तर की सत्ता ने कुछ देखा एवं उसके पिता को 18-5-55 को कुछ यों लिखा-
यह कन्या मनु की पुत्री इड़ा है। यह आजीवन कुमारी रहेगी। इसके विवाह की चिंता तुम्हें नहीं करनी पड़ेगी। यह तप करके संसार का भारी कल्याण करेगी।
बिना किसी टिप्पणी के हम यही लिखकर लेखनी को विराम देते हैं कि नारी शक्ति को इक्कीसवीं सदी में उच्चतम स्थान पर पहुँचाने को संकल्पित गुरुसत्ता ने निरंतर उनके समग्र उत्कर्ष का प्रयास किया, आँदोलनों को गतिशील करके, मातृ शक्ति को नेतृत्व देकर एवं अपनी संवेदनासिक्त पाती से शब्दों का स्पर्श देकर। ऐसा सर्वांगपूर्ण स्वरूप बिरला ही देखने को मिलता है।
हिमालय हमारा घर
गुफा के द्वार पर पिताश्री ने आवाज लगाई। भीतर से कोई जवाब नहीं आया। गुफा की दीवारों से टकराकर आवाज वापस लौट आई। मशाल जलाकर गुफा के भीतर तलाशने का निश्चय किया गया। करीब बारह मीटर लंबी आड़ी-टेड़ी गुफा के अंदर तक तलाश किया। श्रीराम का ठिकाना नहीं था। हारकर सब लोग वापस लौट आए। घर पर ताई जी ने रो-रोकर बुरा हाल बना लिया था। ढूँढ़-खोज चलती रही। अगला दिन शुरू हुआ। करीब सात बजे ताई जी के मायके सहपऊ (मथुरा) से एक संबंधी आए। उनका नाम रुकमणी प्रसाद था और गाँव के रिश्ते से वे ताई के चाचा लगते थे। वे रात को ही आए थे, लेकिन उस क्षेत्र की रीति के अनुसार बहिन-बेटी के घर नहीं रुका जाता है और न ही अन्न-जल ग्रहण किया जाता है, इसलिए वे गाँव के बाहर एक मंदिर में ही ठहर गए थे।
भतीजी के यहाँ पहुँचे तो कोहराम मचा देखा। कारण मालूम हुआ कि कुलदीपक कल से लापता है। रुकमणी प्रसाद जी को ध्यान आया। रास्ते में उन्हें दस-बारह साल का एक बच्चा दिखाई दिया था। पूछा भी था कि बच्चे कहाँ जा रहे हो, तो उसने सहज भाव से उत्तर दिया था हिमालय। उत्तर सुनकर रुकमणी जी हँस दिए थे। उनके मुँह से बरबस निकल आया था, नटखट कहीं का। उत्तर पर हँसी इसलिए आई थी कि हिमालय आस-पास तो है नहीं। पर्वत के नाम पर लोगों को सिर्फ गोवर्धन की जानकारी है, वह भी कम-से-कम चालीस मील दूर है। आँवलखेड़ा आकर पता चला कि वह बच्चा उसके गाँव की बेटी का ही चिरंजीव है।
रास्ते में श्रीराम के मिलने की सूचना पाकर पिताश्री और घर के कुछ अन्य पुरुष जैसे थे, उसी हालत में चल दिए। रुकमणी जी उनके साथ उस जगह ले पहुँचे, जहाँ श्रीराम रास्ते में मिले थे। उस जगह होने का कोई सवाल ही ही नहीं था। उसी रास्ते पर तीन-चार मील आगे गए। वहाँ एक झील के किनारे बने शिवालय में श्रीराम ध्यानस्थ बैठे दिखाई दिए। देखकर जैसे साँस में साँस आई। पिताश्री ने ध्यान पूरा होने तक प्रतीक्षा की और आसन से उठते ही पुत्र को कसकर भींच लिया। यह क्या तुम्हारे जाने की उम्र है? बिना बताए क्यों चले आए? माता-पिता का जी दुःखाकर भगवान को पाना क्या धर्म है? इस तरह के कितने ही प्रश्न पूछते हुए उन्होंने अपने बेटे के सिर पर गंगा-जमुना बहा दी।
ताई जी का सामना और कठिन था। पिता ने तो रो-धोकर अपने आपको समझा लिया। ताई जी रोते-विलाप करते विक्षिप्त-सी हो गई थीं। बेटे को देखकर जोरों से रुलाई फूट पड़ी। उनके विलाप में श्रीराम के जन्म-समय आने वाले साधु-संन्यासियों, स्वप्नों, भविष्यवाणियों और पूजा-पाठ आदि सभी कुछ लपेट में आ गए। हर किसी को उन्होंने जमकर कोसा, जो उनके हिसाब से श्रीराम में तप और साधना की प्रेरणा के लिए जिम्मेदार था। पुत्र ने माँ को समझाने की कोशिश की, कहा कि साधु-महात्माओं को मत कोसिए। अपने द्वारिकाधीश को मत कोसिए। आपका जी मेरे कारण दुखी हुआ है। आप मुझे कोसिए।
माँ को हुए कष्ट के लिए अपने उत्तरदायी ठहराने के बाद ताई जी का रुदन कुछ थमा। कुछ क्षण वे चुप रहीं। फिर रुँधे हुए कंठ से बोलीं, तुमने मुझे कष्ट दिया है न? अगर मानते, हो तो मुझे एक वचन दो। बालक श्रीराम आगे की बात सुनने के लिए टकटकी लगाकर देखने लगे। ताई जी ने कहा, “मुझे छोड़कर साधु-संन्यासी बनने की बात कभी नहीं सोचोगे। तुम हिमालय की आत्मा हो, तो हो। मेरे जीवित रहने तक सिर्फ श्रीराम हो। मेरे सामने हिमालय में बस जाने की बात कभी मत सोचना। मेरे बाद चाहे जहाँ रहना।” ताई जी जैसे एक-एक वाक्य सोच-समझकर कह रही थीं। श्रीराम ने भी एक-एक शब्द को गौर से सुना और कहा, “हाँ ताई, मैं हमेशा आपके साथ रहूँगा। ब्रजक्षेत्र को छोड़कर भी नहीं जाऊँगा, क्योंकि आपको ठाकुर जी का घर बहुत भाता है न।”
लाड़ले का यह आश्वासन या वचन सुनकर ताई जी तुरंत शाँत हो गई। उनकी शाँति में यह दृढ़ विश्वास भी था कि बेटे ने जो कह दिया है, उसका अक्षरशः पालन करेगा, क्योंकि वह वचन का पक्का है। वह दिन हवेली में उत्सव की तरह मनाया गया। माँ परम आश्वस्त थीं कि उनका दुलारा अब कभी उनसे नहीं बिछुड़ेगा। काम-काज के लिए अथवा किसी और प्रयोजन से प्रवास पर जाना पड़े, वह बात अलग है। वह विछोह की श्रेणी में नहीं आता। ताई जी की आस्था और अपेक्षा पुत्र को अपनी गृहस्थी की, अस्तित्व की छाया में ही रखने की थी। श्रीराम ने उस आस्था के निर्वाह का वचन दे दिया।
हिमालय को अपना घर बताते हुए निकल जाने और वापस लौट आने के बाद शिक्षा-दीक्षा फिर पहले की तरह चलने लगी। अब पिताश्री ने भी ध्यान देना शूर किया। चार-छह महीने में उनकी प्राथमिक शिक्षा पूरी हो जानी थी। सावधानी के तौर पर यह जरूरी समझा गया कि बालक को आगे पढ़ने के लिए गाँव से बाहर नहीं भेजा जाए। पिताश्री भागवत के विद्वान थे ही। उन्होंने ‘लघु सिद्धाँत कौमुदी’ पढ़ाई, फिर ‘मध्य’ और ‘सिद्धाँत कौमुदी’ पढ़ाई। प्राथमिक शिक्षा पूरी होने के बाद और समय मिलने लगा। भागवत, रामायण और महाभारत के बाद, आर्षग्रंथों में भी अच्छी गति होने लगी। पिताश्री को आभास होने लगा था कि उनकी इहलीला पूरी होने वाली है। गुरुजी की पाठशाला छूटने के बाद उन्होंने पुत्र से कह दिया था कि दो साल तक सब कुछ भुलाकर विद्या ग्रहण करो। उनके मन में संभवतः विरासत के रूप में भागवत दे जाने की बात रही होगी। शायद सोचा होगा कि पुत्र भी उनकी ही तरह भागवत का उपदेश करे। इस शास्त्र से आरंभ कराने के पीछे दूसरा कोई आशय रहा हो, तो अनुमान ही लगाया जा सकता हैँ।
विद्या का वितरण
पं. रूपराम की पाठशाला में पढ़ लेने और लिखना बाँचना अच्छी तरह आ जाने के बाद श्रीराम के मन में उसे बाँटने की वृत्ति का उदय हुआ। मालवीय जी से उपवीत लेने के बाद जैसे उन्होंने दूसरे बच्चों को भी जप-ध्यान सिखाना शुरू किया था, उसी तरह लिखना-पढ़ना भी दूसरों को बाँटने की इच्छा उमगने लगी। पिता से शास्त्र और संस्कृत सीखने के बाद थोड़ा-बहुत समय बचता। श्रीराम उस समय में चौपाल पर चले जाते। वहाँ कोई-न-कोई बैठा रहता था। चार-पाँच लोग भी जमा हो जाते, तो उनका समय इधर-उधर की बातों में बीतता। श्रीराम उन्हें कुछ पढ़कर सुनाने के लिए कहते। जिन्हें अक्षर ज्ञान था और थोड़ा बहुत पढ़ना आता था, वे तो सुना देते। जिन्हें पढ़ना नहीं आता वे चुप रह जाते। श्रीराम उनसे कहते, आप पढ़ते क्यों नहीं? नहीं आता है तो सीख लेना चाहिए। आमतौर पर उत्तर होता था कि अब पढ़ने से क्या लाभ? उमर बीत गई है, थोड़ी-बहुत बची है, वह भी कट जाएगी।
निराशा करने वाला यह उत्तर सुनकर शुरू में तो कोई काट नहीं की, लेकिन जब सभी यह जवाब देने लगे, तो एक दिन श्रीराम ने पढ़ाई की चर्चा छेड़े बिना कहा, जिस गुफा में मैं ध्यान करने जाता था, वहाँ खजाना गड़ा हुआ है। खजाने का नाम सुनकर चौपाल पर बैठे लोगों की आँखें चौड़ी हो गई। उन्होंने कहा, बालक की आध्यात्मिक रुचि और साधना स्थिति के बारे में सभी जानते थे, इसलिए किसी ने अविश्वास नहीं किया। न ही उसे हँसी में उड़ाया। पूछा, उस खजाने को निकालने के लिए क्या करना होगा? श्रीराम ने कहा, लेकिन आप उस खजाने का क्या करेंगे? आपकी तो उमर निकल गई है, थोड़ी बहुत बची है, वह भी कट जाएगी।
उन बुजुर्गों को समझ में नहीं आया कि श्रीराम उनको किस बहाने का उत्तर दे रहे हैं। उन्होंने कहा, नहीं-नहीं, खजाने का उपयोग तो किसी भी उम्र में किया जा सकता है। श्रीराम ने कहा, उस धन को पाने के लिए आपको विद्याधन कमाना होगा। आप पढ़ना सीखोगे, तभी उस धन को पाने वाला विधि-विधान समझोगे। यह समझाने के बाद कुछ बुजुर्ग पढ़ने के लिए तैयार हुए। कहते हैं कुछ लोगों ने उसके बाद गुफा में ढूंढ़-खोज की और वहाँ एक चट्टान के नीचे छिपाए हुए स्वर्ण आभूषण निकले। ये आभूषण धाँधू नामक डकैत की लूट भी हो सकते हैं या महज संयोग। बहरहाल अध्यापन के दौरान श्रीराम ने उन बुजुर्गों को कुछ भजन और रामायण की चौपाइयां जरूर सिखा दी थीं।
छपको की सेवा
आँवलखेड़ा अपनी तमाम अच्छाइयों के साथ जी रहा था। बुराइयाँ भी थीं। उनमें सबसे बड़ी बुराई जातिगत ऊँच-नीच या छुआछूत की थी। यह स्थिति बड़ी विचित्र और अबूझ थी कि लोग पिछड़ी जाति के लोगों से नफरत नहीं करते थे। उनके सुख-दुख का ध्यान भी रखते, लेकिन उनसे दूर-दूर रहते थे। ब्याह-शादियों में उन्हें बुलाया जाता था, लेकिन उन्हें अपने समूह में शामिल नहीं किया जाता था। उन्हें अलग पाँत में भोजन कराया, बिठाया जाता, उसी तरह अगवानी की जाती और विदा भी दी जाती। घृणा नहीं होते हुए भी दुरदुराने की यह आदत किसी विकृति का ही परिणाम थी।
कभी किसी को रोग-बीमारी हो जाए, तब भी जीना दूभर हो जात। सन् 1923 की घटना है। आँवलखेड़ा के एक कोने में, जिसे गाँव से बाहर कहना ही ठीक होगा। चार-पाँच झोंपड़ीनुमा घर बने हुए थे। इन घरों में जमादार और डोम जाति के परिवार रहते थे। इस तरफ कोई झाँकता नहीं था। मझली जाति के लोग भी नहीं, जिन्हें स्वर्ण भी उन्हीं की तरह हेय मानते थे। दलित बस्ती की एक स्त्री छपको पंडित जी की हवेली की सफाई करने आया करती थी। बड़ी उम्र के लोग उसे नाम से बुलाते थे और छोटे बच्चे चाची या अम्मा कहते थे। छपको नियमित रूप से दरबार लोगों के घरों में जाती थी। सवर्णों को तब ये लोग दरबार लोगों के घरों में जाती थी। सवर्णों को तब ये लोग दरबार ही कहते थे। हारी-बीमारी में भी वह नहीं चूकती थी। एकाध दिन की नागा हो जाए, तो दरबार लोग हाय-तौबा मचा देते थे। दस बातें सुनाते और ज्यादा हो तो काम छुड़वाने की धमकी देते थे। धमकी और सजा के डर से सरदी, खाँसी और हाड़ बुखार के समय भी छपको की जाति बिरादरी के लोग कभी नागा नहीं करते। किसी की तबियत ज्यादा खराब होती, तो उसकी जगह दूसरा कोई आता।
छपाके को किसी ने बीमार पड़ते नहीं देखा था। उसके मुँह से किसी रे निसरदर की शिकायत भी नहीं सुनी थी। एक दिन छपको हवेली नहीं पहुँची। शाम तक इंतजार किया, वह नहीं आई। अगले दिन भी यही हाल था। वह सफाई के लिए नहीं पहुँची। पास-पड़ोस में पूछा, तो वहाँ भी नहीं गई थी। चार-पाँच दिन बीत गए छपको के परिवार में कोई और नहीं था कि अपनी जगह दूसरे को भेज देती। लोगों ने सोचा कि दूसरा इंतजाम किया जाए। किसी को यह नहीं सूझा कि वह बीमार भी हो सकती है। घर में छपको की जगह किसी और को बुलाने की बात चलने लगी, तो श्रीराम के काम में भी पड़ी। उन्हें लगा कि हो-न-हो, छपको अम्मा की तबियत खराब हो गई हो। उन्हें कोई दवा-दारु देने वाला नहीं है। इसलिए वे नहीं आ पा रही हों। ताई जी से उन्होंने कहा भी कि छपको अम्मा को दवाई देनी चाहिए। ताई जी ने गाँव-घर के रिवाज के अनुसार कह दिया, यहाँ आएगी तब दे देंगे। श्रीराम ने कहा कि वह ठीक होगी, तभी आएगी न। बिना दवा के ठीक कैसे होगी?
श्रीराम चुपचाप उस टोले की ओर चल दिए, जहाँ छुपाके अम्मा रहती थी। कूड़े-कचरे और गंदगी के ढेर पार करते और बदबूदार सड़ी नालियाँ लाँघते-फाँदते हुए छपको की झोपड़ी के सामने पहुँच गए। चार-पाँच घरों में सही ठिकाना मालूम करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। दरवाजे पर पहुँचकर पुकारा। अंदर से कोई आवाज नहीं आई, तो दरवाजे के नाम पर लगी हुई घास-फूस की आड़ हटाकर झाँका। छपको अम्मा बेसुध-सी चटाई पर पड़ी थी। पाँवों की आहट सुनकर उसने आँखें खोलीं। श्रीराम को देखकर हड़बड़ा उठी। बैठने की कोशिश करने लगी, लेकिन बैठ नहीं पाई।
उठने की कोशिश में वापस गिरते हुए छपको ने कहा, यहाँ क्यों आए हो? घर पर पता चलेगा, तो मार पड़ेगी। श्रीराम ने कुछ नहीं सुना। हाथ लगाकर देखा, शरीर बुरी तरह तप रहा था। बुखार है, हथेली और जीभ वगैरह देखते हैं। हथेली में घाव था। उससे बदबू आ रही थी और पीब बह रहा था। शायद घाव सड़ने लगा था और इसी की वजह से बुखार भी आ रहा था।
चिंता मत करो, मैं दवा लेकर आता हूँ। श्रीराम ने कहा और छपको अम्मा कुछ कहे, उसे सुने से पहले ही झोपड़ी के बाहर। दवाखाना वहाँ से काफी दूर था। झोपड़ी से बाहर निकलकर पहले तो पड़ोसी से पानी लिया और अम्मा को पिलाया। फिर दौड़कर वापस चले गए और मरहम-पट्टी का सामान लेकर कुछ ही मिनटों में वापस हो गए। साफ धुले हुए कपड़े की पट्टी बनाई, जाने कहाँ से लाल दवा और मरहम का जुगाड़ कर लिया। मरहम-पट्टी की और काढ़ा बनाकर पिलाया, ताकि बुखार कुछ कम हो जाए। छपको अम्मा की आँखें डबडबा आई। दवा से ज्यादा सेवा और सहानुभूति ने काम किया। उन्हें नींद आने लगी। फिर आने की बात कहकर श्रीराम वापस चले गए।
अगले दिन के उपचार का क्या प्रबंध करना है? इस उधेड़बुन में रमते हुए श्रीराम हवेली में आ गए। देखा बाहर द्वार पर ही चाचा खड़े हुए हैं। कलश से जल निकाला और दोनों हाथों में भरकर तीन बार श्रीराम पर छिड़का। फिर दरवाजे के बाहर ही नहाने के लिए कहा। कपड़े वहीं लाकर पहले से रखे हुए थे। नहाने के बाद वे कपड़े पहने और पुराने पहने हुए कपड़े वहीं छोड़ दिए। शुद्धिकरण की यह कार्रवाई पूरी होने के बाद श्रीराम अंदर आए। उन्होंने कोई सवाल नहीं किया। यही कहा कि गंगाजल के साथ कुछ और जोड़ी कपड़ों का इंतजाम कर लेना। आगे कई दिन तक छपको अम्मा के यहाँ जाना है। पश्चाताप और क्षमा माँगने या सफाई देने की जगह पर ये वचन सुनकर घर के लोग हैरत में पड़ गए। श्रीराम ने अगली बात यह कही कि जब तक अम्मा का घाव ठीक नहीं हो जाता, रोज जाऊँगा। उत्तर में उलाहना या व्यंग्य नहीं था। निश्चय की झलक दिखाई दे रही थी। इस जवाब पर खासी डाँट पड़ी। उस दिन उपवास रखने के लिए कहा गया।
डाँट, दंड और दबाव से अप्रभावित श्रीराम अगले दिन भूखे ही छपको की सेवा करने गए। मरहम-पट्टी कर दवा लेकर वापस लौटे, तो हवेली के बाहर ही ठिठक गए। ताई जी ने देखा। उनका मन रो रहा था, लेकिन प्रचलन के विपरीत जाने का साहस भी नहीं कर पा रही थीं।
अछूत सेवा के अनोखे प्रायश्चित का निर्वाह करते हुए ताई जी ने श्रीराम के लिए निर्धारित मिट्टी के बरतन में रोटियाँ और दाल-सब्जी रख दी। भोजन देखकर श्रीराम ने दो रोटी और दाल-सब्जी ली और टोले की तरफ बढ़ गए। वहाँ छपको को जगाकर रोटी खिलाई। अपने हाथ से भोजन कराते हुए श्रीराम और छपको दोनों ही आनंद-विभोर थे। छपको को खाना-खिलाकर-सुलाकर श्रीराम वापस लौटे। घर पर जिस कोठरी में उनके लिए प्रबंध था, उसी में बैठकर भोजन किया। दिनभर घर से बाहर नहीं निकले। बाहर निकलने पर कोई लाभ नहीं था। गाँव भर में खबर फैल गई थी कि श्रीराम टोले में जाते हैं, छपको की मरहम-पट्टी करते हैं। उन्हें अस्पृश्यता दोष लग गया है, इसलिए किसी को उनका संसर्ग नहीं करना चाहिए। गाँव वालों ने अपने बच्चों को श्रीराम के साथ खेलने से सख्त मना कर दिया था।
सात-आठ दिन की मरहम-पट्टी और उपचार के बाद छपको का घाव सूख गया। बुखार भी नहीं रहा। वह अपने हाथ से खाना बनाने लगी, तब श्रीराम ने टोले में जाना बंद किया। इस बीच अलवर में भागवत कथा संपन्न कर पिताश्री घर लौट आए थे। देहरी पर पाँव रखते ही उन्होंने श्रीराम को बाहरी कोठरी में जमीन पर चटाई बिछाते सोते हुए देखा। तुरंत पूछा कि क्या हुआ? यहाँ, क्यों? छोटे भाई देवलाल ने पूरा घटनाक्रम सुना दिया। उन्हें आशा थी कि शौचाचार का इतनी कड़ाई से पालन हुआ देख बड़े भइया प्रसन्न होंगे। आज तक आँवलखेड़ा और आस-पास के गाँव में किसी ने भी टोले में जाकर अपना धर्म नहीं बिगाड़ा था। ऐसी स्थितियाँ ही नहीं बनीं थीं कि कोई निर्णय लेना पड़े। अपने यहाँ स्थिति बनी और छोटे भाई ने अपने भतीजे के लिए दृढ़ व्यवस्था दे दी। धर्माधिकारी का दायित्व अच्छी तरह निभा लेने के लिए सराहना भी होगी।
प्रायश्चित या पुरस्कार
हुआ उलटा ही। पंडित जी ने कहा, देवलाल तुमने यह क्या किया? भागवत परिवार में किसी को सेवा−शुश्रूषा के लिए प्रायश्चित करना पड़े, यह धर्म विरुद्ध है। उन्होंने श्रीराम की पीठ थपथपाई और कहा, पुत्र तुमने भागवत धर्म के मर्म को पा लिया है। इस बीच आस-पास के लोग भी हवेली में आ गए थे। वे पंडित जी को प्रणाम करने आए थे, लेकिन देवलाल को उलाहना मिलते देख ठहर गए थे। पंडित जी कह रहे थे, तुमने सुना है न संत एकनाथ ने गंगोत्री से लाया गंगाजल रामेश्वरम् में भगवान शिव पर न चढ़ाकर एक गधे को पिला दिया था और भगवान ने उसे अभिषेक के रूप में ग्रहण कर लिया था। जीवन परमात्मा की देन है। उसकी रक्षा से बड़ा कोई धर्म नहीं है।
कुछ देर चुप रहकर वे फिर बोले, लेकिन तुम्हारा भी दोष नहीं है। समाज की मान्यताएँ ही गड़बड़ हैं। बहुत दिन तक यह सब नहीं चलने वाला। बदलेगा। धीरे-धीरे सब बदलेगा। फिर पुत्र की ओर देखकर उन्होंने कहा, तुम्हारा भी एक पुरश्चरण हो गया समझो। प्रसन्न रहो।
पिताश्री की व्यवस्था ने श्रीराम का उत्साह बढ़ा दिया। कोठरी से निकलकर वे सीधे टोले की ओर गए और वहाँ छपको अम्मा को पुकारा। सुबह ही तो यह ब्राह्मण कुमार ‘अब नहीं आऊँगा’ कहकर गया था। अब क्यों आ गया है? छपको को गाँव वालों का डर भी सता रहा था। अभी तक झोंपड़ी में पड़ी उपचार करा रही थी। श्रीराम के आने पर गाँव में क्या प्रतिक्रिया है, इसका भान नहीं था। गाँव में जाना शुरू करेगी, तब पता नहीं क्या होगा। चिंता में डूबी जा रही थी कि श्रीराम की पुकार ने फिर झिंझोड़ दिया। पहला विचार यही उठा कि गाँव वालों के किसी फैसले की सूचना लेकर आए होंगे। शायद आगाह करने के लिए। वह किसी विचार पर स्थिर होती, इससे पहले ही ब्राह्मण कुमार ‘अम्मा-अम्मा’ कहते भीतर उपस्थित थे। वाणी में उल्लास गूँज रहा था और चेहरे पर गर्व जैसे कोई बड़ी सफलता प्राप्त कर ली हो।
ब्राह्मण देवता आप यहाँ न आया करो। अब मैं ठीक हूँ। आपको यहाँ आते देख लोग मुझे गाँव में घुसने नहीं देंगे। छपको ने श्रीराम के उल्लास और गर्व को नहीं पहचान सकने या पहचानकर भी ध्यान न दे पाने के कारण कहा। ब्राह्मण कुमार शायद उसकी स्थिति को समझ गए थे। उन्होंने कहा, “आप चिंता न करें अम्मा। चाचा ने जो प्रायश्चित बताया था, पिता जी ने उसे मना कर दिया है। मुझे आशीर्वाद दिया है कि आपकी सेवा कर मैंने अच्छा काम किया।”
छपको को अपने कानों पर सहसा विश्वास नहीं हुआ श्रीराम ने जोर देकर कहा, “सच कह रहा हूँ।” सुनकर अम्मा के चेहरे पर संतोष, निश्चिंतता और खुशी की मिली-जुली चमक फैल गई। अपने भावों को व्यक्त करते हुए उसने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए, जैसे आशीर्वाद दे रही हों। श्रीराम ने कहा, अब किसी तरह का संकोच मत करना, अच्छा। इतना कहकर वे हवेली की ओर चल दिए। (क्रमशः)
संगठन-सशक्तीकरण का जोन वर्गीकरण का महापुरुषार्थ
विश्व में जब भी महत्वपूर्ण स्तर के सुधार-संशोधन के कार्यक्रम चले हैं, युग समस्याओं का समाधान खोजा गया है, तो वह संगठनात्मक पुरुषार्थ द्वारा ही संपन्न हुआ है। संगठन की शक्ति अपार होती है, जिसके साथ संघ बल होता है, उसके पीछे अन्य बल उसी प्रकार फिरते हैं, जैसे सूर्य के आस-पास नवग्रह परिक्रमा लगाते हैं। गायत्री परिवार रूपी संगठन इसीलिए अपना एक स्थान राष्ट्रीय स्तर पर रखता है, सभी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बना हुआ है, आशावाद का प्रतीक है एवं इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष सभी को स्पष्ट सुनाई देता है। प्रस्तुत वर्ष संगठन-सशक्तीकरण वर्ष है। यह प्रक्रिया साधना की धुरी पर चलते हुए एक लंबी 75 वर्ष की यात्रा पूरी करने के बाद की जा रही है। निश्चित ही इस पुरुषार्थ में साधना प्रधान हैं, इसीलिए इसके सशक्त होने की संभावनाएँ सुनिश्चित दिखाई देती है।
परमपूज्य गुरुदेव ने ‘अखिल विश्व गायत्री परिवार’ रूपी इस संगठन को आत्मीयता-संवेदना-महत्व की धुरी पर खड़ा किया है एवं एक ही संपदा इसके लिए प्रयुक्त की है। यह संपदा है भावनाशीलों का समयदान। गुरुसत्ता के तप ने प्रमुख भूमिका निभाई। उनने अपने भागीरथी तप के साथ लाखों साधकों का तप जोड़ दिया एवं देखते-देखते साँस्कृतिक नवोन्मेष को संकल्पित, लोकमानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन की योजना वाली एक जन मेदिनी खड़ी होती चली गई। परमपूज्य गुरुदेव का संगठनात्मक मार्गदर्शन एवं परमवंदनीया माता जी का आत्मीयता भरा स्पर्श पाकर यह संगठन विराटतर होता चला गया। इसके द्वारा देव संस्कृति दिग्विजय के आश्वमेधिक, वाजपेय स्तर के महापुरुषार्थ संपन्न हुए। दो विराट् महापूर्णाहुतियाँ युगसंधि महापुरश्चरण हेतु आँवलखेड़ा (1995) एवं हरिद्वार (2000) में संपन्न हुई, जिनमें लाखों भावनाशीलों की भागीदारी रही।
अब इस वर्ष की गुरु पूर्णिमा की वेला में हम संगठन के सशक्तीकरण की मध्य वेला से गुजर रहे हैं। इसे करने के लिए हमने प्रखर साधना वर्ष, महापूर्णाहुति वर्ष एवं हीरक जयंती वर्ष जैसी तीन अनुष्ठान विगत तीन वर्षों में किए है। अब सारे भारत व विश्व का संगठनात्मक एकीकरण इस वर्ष करने जा रहे हैं, जो दो वर्ष की अवधि में पूरा हो जाएगा। इस प्रक्रिया के अंतर्गत विकसित,अर्द्ध विकसित एवं अविकसित क्षेत्र को मिलाकर पूरे भारत को छह जानों में बाँटा गया है, ताकि एक विराट् मंथन इन छह क्षेत्रों में केंद्र के मार्गदर्शन तंत्र द्वारा समयदानियों की फौज के माध्यम से संभव हो सके। यह छह जोन इस आधार पर बाँटे गए हैं कि प्रत्येक में कुछ विकसित-समर्थ समयदानियों से भरे क्षेत्र हों, शक्तिपीठें हों या केंद्र के तंत्र हों। विकसित क्षेत्र से समयदानियों की आपूर्ति होती रहे एवं उनके केंद्र-शक्तिपीठें प्रशिक्षण शिविरों की, छावनियों की भूमिका निभाती रहें। यह छह जोन इस प्रकार हैं-
(1) हैदराबाद-नागपुर जोन- इस जोन के अंतर्गत महाराष्ट्र (34 जिले), आँध्रप्रदेश (23 जिले), तमिलनाडु (24 जिले), कर्नाटक (20 जिले), केरल (14 जिले), उड़ीसा (29 जिले), छत्तीसगढ़ के दस जिले एवं मध्यप्रदेश के दक्षिणी भाग के छह जिले शामिल किए गए हैं। कुल मिलाकर 160 जिलों वाला यह जोन सर्वाधिक बड़ा व विराटतम है। इसमें उड़ीसा, छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश के दक्षिणी जिले, महाराज के विकसित क्षेत्र के उत्तरी व मध्य भाग के जिले, मुँबई क्षेत्र तथा आँध्र का नवविकसित क्षेत्र प्रशिक्षण केंद्रों की व समयदानियों की आपूर्ति की महती भूमिका निभाएँगे। जहाँ विशन विगत कई वर्षों से सक्रिय है, वहाँ अब प्रशिक्षण व क्षेत्रीय समयदानी दो स्तरों के कार्यकर्ताओं के निर्माण व सुनियोजन का तंत्र खड़ा किया जाना है। इससे हम सुदूर दक्षिण तक पहुँच सकेंगे एवं 2005 में कन्याकुमारी में एक वृहत् स्तर का कार्यक्रम संपन्न कर सकेंगे। इस पूरे जोन के वर्तमान में दो केंद्र नागपुर एवं हैदराबाद बनाए गए हैं, बाद में इनके 8-10 उपकेंद्र भी बनाए जा सकते हैं।
(2) टाटानगर-सिलिगुड़ी जोन- यह जोन भी काफी बड़ा है। इसमें कुल 105 जिले हैं। उत्तर-पूर्व के सारे क्षेत्र सहित प्रायः दस प्राँत एवं भूटान-नेपाल राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व भी यह करता है। इसमें झारखंड के 18 जिले, पश्चिमी बंगाल के 17 जिले, आसाम के 25 जिले, अरुणाचल प्रदेश के 13 जिले, मणिपुर के 8 जिले, मिजोरम के 2, नागालैंड के 7, त्रिपुरा के 3, मेघालय के 5, सिक्किम के 4 तथा भूटान के 7 जिलों सहित बिहार के पूर्वी भाग के 4 जिले सम्मिलित किए गए हैं, साथ में नेपाल के पूर्वी भाग के 2 जिले भी लिए गए हैं। झारखंड के टाटानगर क्षेत्र एवं पश्चिमी बंगाल के सिलिगुड़ी को इस योजना का प्रशिक्षण केंद्र-छावनी बनाया गया है। बिहार व झारखंड के जाग्रत् क्षेत्रों तथा पं. बंगाल के कोलकाता (दक्षिणी भाग) व सिलिगुड़ी (उत्तरी भाग) से समयदानियों की आपूर्ति की जाएगी। बाद में तिनसुकिया, जीरो, गुवाहाटी, अगरतला तथा ग्रामीण बंगाल में उपकेंद्र बनाए जा सकते हैं।
(3) शाँतिकुँज-मोहाली (चंडीगढ़) जोन- यह उतरी-पश्चिमी सीमा से जुड़ा बड़ा व्यापक क्षेत्र है। इसमें भी लगभग 84 जिले आते हैं। यह क्षेत्र जहाँ उत्तराँचल की हिमालय से लगी सीमाओं को छूता है, वहाँ दिल्ली व पश्चिमी उत्तरप्रदेश के सात जिलों को भी अपने घेरे में लिए है वह पाकिस्तान से लगी पूरी सीमा तक फैला है। इसमें उत्तराँचल के 13 जिले, जम्मू-कश्मीर के 14 जिले, पंजाब के 14, हरियाणा के 11, हिमाचल के 12 तथा राजस्थान के हनुमानगढ़-श्रीगंगानगर सहित 2 जिले एवं दिल्ली (पूरे राज्य सहित) पश्चिमी उत्तरप्रदेश के 7 जिले हैं। शाँतिकुँज एवं मोहाली शक्तिपीठ (चंडीगढ़) को अभी इनका केंद्र बनाया गया है। बाद में कुरुक्षेत्र, नोयडा, जम्मू शिमला, धर्मशाला, हल्दूचौड़ आदि में इनके उपकेंद्र खोले जाएँगे।
(4) चित्रकूट-आँवलखेड़ा जोन यह मध्य भारतवर्ष का वह क्षेत्र है, जहाँ मिशन बड़े व्यापक रूप में फैला हुआ है, किंतु ग्राम-ग्राम तक पहुँचने के लिए एक व्यापक पुरुषार्थ रचनात्मक स्तर पर अनिवार्य है। इसमें कुल 112 जिले हैं, पर इसमें अधिकाँश विकसित क्षेत्र है। इसमें उत्तरप्रदेश के 51 जिले (तराई व पश्चिमी छोड़कर), मध्यप्रदेश के 35 जिले (दक्षिणी व पश्चिमी छोड़कर), बिहार के 20 जिले (पटना सहित गंगा के दक्षिणी भाग के) तथा छत्तीसगढ़ के 6 जिले (उत्तरी भाग) शामिल किए गए हैं। अभी चित्रकूट एवं आँवलखेड़ा को इनका केंद्र बनाया गया है, किंतु बाद में पटना, कोरबा, भोपाल, गुना, जबलपुर आदि को उपकेंद्र बनाया जा सकेगा।
(5) बस्ती-मुजफ्फरपुर जोन- इसमें नेपाल के सभी 64 जिले, उत्तरप्रदेश के तराई क्षेत्र के 11 जिले तथा उत्तरी बिहार के पाँच जिले इस प्रकार कुल 80 जिले लिए गए हैं तथा बस्ती (उ.प्र.) एवं मुजफ्फरपुर (बिहार) को जोनल केंद्र बनाया गया है। बाद में सहरसा, गोरखपुर अयोध्या, बहराइच को भी उपकेंद्रों के रूप में विकसित किया जा सकेगा।
(6) अहमदाबाद-गाँधीधाम-पुष्कर जोन- यह भी बड़ा सघन व मिशन के प्रभाव की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहाँ काफी कार्य किया जा चुका है। इसमें राजस्थान क्षेत्र है, जहाँ काफी कार्य किया जा चुका है। इसमें राजस्थान के 29 जिले एवं गुजरात के 25 जिलों सहित दक्षिण पश्चिमी मध्यप्रदेश के 6 जिले लिए गए हैं। इनके तीन केंद्र क्षेत्र की विराटता व सघनता को देखकर बनाए गए है। अहमदाबाद (क्राँतिकुँज), गाँधीधाम (कच्छ) एवं पुष्कर (अजमेर)। बाद में मेहसाणा, अमरेली, सूरत, चुरु, जोधपुर, राजसमंद तथा कोटा भी उपकेंद्र बनाया जा सकेगा। इसमें दक्षिणी-पश्चिमी म.प्र. के 6 जिलों के तथा गुजरात-राजस्थान के सक्रिय क्षेत्रों के प्राणवान कार्यकर्ता रिसोर्स पर्संस बनेंगे व सारे क्षेत्र का संगठनात्मक मंथन किया जाएगा। इस पूरे जोन में 60 जिले हैं।
रणनीति यह है कि गाँव-तहसील व जिला स्तर पर एक प्रामाणिक तंत्र बने, जो जोन व शाँतिकुँज से सीधा संबंध रखे। शाँतिकुँज के वरिष्ठ कार्यकर्ता इस प्रारंभिक निर्धारण (मार्च अंतिम सप्ताह) के बाद एक वर्कशॉप करके क्षेत्रों के मंथन प्रधान दौरे हेतु निकल गए हैं। वे रणनीति बनाकर लाएँगे व स्थापित किए जाने वाले केंद्रों की सभी व्यवस्थाओं की समीक्षा करेंगे। बाद में इनके साथ बारह-बारह केंद्रीय सहनायक स्तर के प्रतिनिधि तीन-चार माह के लिए इन केंद्रों पर बैठेंगे एवं अपने साथ बारह (न्यूनतम) 4 माह के क्षेत्रीय समयदानियों को लेकर सारे क्षेत्र का मंथन कर प्रशिक्षण सत्रों में भागीदारी करेंगे। शक्तिपीठ, रचनात्मक ट्रस्ट, जिला समन्वय समिति, प्रज्ञा मंडल, महिला मंडल में पारस्परिक समन्वय स्थापित हो तथा एक सशक्त संगठन का स्वरूप प्रत्येक क्षेत्र में बने, यह महापुरुषार्थ मिशन को विराट्-व्यापक एवं सुव्यवस्थित बनाएगा, ताकि हम गुरुसत्ता के चरणों में हीरकमाल भेंट कर सकें।
विश्वविद्यालय विधेयक विधानसभा में पारित
देव संस्कृति विश्वविद्यालय को उत्तराँचल शासन द्वारा एक स्वायत्तशासी संस्था के रूप में एक अधिनियम बनाकर 22-1-2002 को महामहिम राज्यपाल उत्तराँचल श्री सुरजीत सिंह बरनाला द्वारा मान्यता दी गई थी। यह निर्णय भाजपा शासन वाली सरकार का था। मिशन राजनीति के किसी भी पक्ष से अप्रभावित रहकर समाज-संस्कृति की सेवा में लगा है, इसका प्रमाण तक मिला, जब 22-3-2002 को नव निर्वाचित काँग्रेस बहुल सरकार ने सत्तर चुने हुए जनप्रतिनिधियों के बीच इसे रखा एवं सभी ने एकमत से हर्षध्वनि के साथ ऐसे पावन कार्य को सहमति दे विधेयक के रूप में परिणत कर दिया। राज्य व केंद्रीय सरकार से किसी भी तरह के अनुदान न लेने को संकल्पित यह स्थापना शाँतिकुँज के समीप गायत्री कुँज परिसर (जिला देहरादून) में की गई है। कुलपिता के सूक्ष्म संरक्षण में इसके कुलाधिपति डॉ.प्रणव पंड्या एवं कुलपति डॉ.एस.पी. मिश्रा मनोनीत हुए हैं। जुलाई 2002 से यहाँ साइको आयुर्वेदिक विज्ञान में एम.एस.-सी. तथा योग में एम.ए., एम.एस.-सी., डिप्लोमा व सर्टीफिकेट के प्रवेश होकर विश्वविद्यालय विधिवत आरंभ होगा। इसका ब्रोशन शाँतिकुँज में उपलब्ध है।
अब अंतःऊर्जा जागरण सत्र 1 अगस्त से होंगे
विगत नवरात्रि (13-4-2002) के पूर्व तक पाँच दिवसीय अंतःऊर्जा जागरण सत्रों की शृंखला निरंतर चलती रही। इसे नवरात्रि से नवरात्रि में ही चलाने का प्रारंभिक निर्धारण था, परंतु माँग अत्यधिक होने व कई आवेदन होने के कारण मई की 1 से 5 व 6 से 10 में 30-30 साधकों के लिए अतिरिक्त सत्र किए गए। अब 16 अक्टूबर के स्थान पर इसे 1 अगस्त से आरंभ किया जा रहा है, ताकि नवरात्रि अवकाश (5-10-2002 से 15-10-2002) छोड़कर इसे अनवरत 2003 की नवरात्रि तक चलाया जा सके। अतिरिक्त तेरह सत्रों से प्रायः सात सौ से अधिक व्यक्ति लाभान्वित होंगे।
नई दिल्ली में गायत्री चेतना केंद्र का निर्माण आरंभ
नोयडा (नई दिल्ली) में सेक्टर 12, क्वार्टर नं. 2 में प्रस्तावित ‘गायत्री चेतना केंद्र’ का निर्माणकार्य आरंभ होकर गति पकड़ चुका है। विगत दिनों 24 मार्च को केंद्रीय प्रतिनिधियों ने पूरी दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र की एक गोष्ठी नोयडा में संबोधित की। इसमें सभी ने तन, मन धन से सहयोग कर दिल्ली-राजधानी स्तर के इस भव्य निर्माण हेतु अपने संकल्प घोषित किए। इस पर प्रायः दो करोड़ की लागत आने की संभावना है।
मारीशस-दक्षिणी अफ्रीका व महाद्वीप तथा यू.के. यूरोप के लिए केंद्रीय दल रवाना
संगठनात्मक मंथन व केंद्र स्थापना दौरों के लिए दो दल भिन्न-भिन्न दिशाओं में अप्रैल माह में प्रस्थान कर गए। प्रथम सप्ताह में श्री शाँति लाल पटेल एवं प्रज्ञेश्वरदास के दल ने लंदन के लिए प्रस्थान किया, जहाँ वे लेस्टर में स्थापित गायत्री की प्रक्रिया को गति देंगे। चौथे सप्ताह में श्री विश्वप्रकाश त्रिपाठी के नेतृत्व में एक चार सदस्यीय दल मारीशस रवाना हुआ। यही दल दक्षिणी अफ्रीका, बोत्सवाना, तंजानिया, केन्या, युगाँडा, जाँबिया आदि देशों का भी दौरा करेगा। ज्ञातव्य है कि मारीशस, जोहान्सबर्ग व लेस्टर तीनों ही स्थानों पर शाँतिकुँज के शक्तिपीठ स्तर के केंद्र स्थापित हैं।
कनाडा के उच्चायुक्त शाँतिकुँज प्राँगण में
विगत दिनों कनाडा के उच्चायुक्त पीटर सूदरलैंड अपने हरिद्वार प्रवास के दौरान शाँतिकुँज आए। पूरा आश्रम, शोध केंद्र एवं विश्वविद्यालय परिसर उनने देखा एवं भावविभोर होकर वे गए। सूदरलैंड दंपत्ति ने अखण्ड दीपक के दर्शन कर गुरुसत्ता का प्रतिनिधियों से मुलाकात भी की।
मुन्स्यारी (पिथौरागढ़) एवं तालेश्वर (रानीखेत) में शाँतिकुँज के साधना-स्वावलंबन केंद्र
पिथौरागढ़ (उत्तराँचल) के नेपाल-तिब्बत की सीमा से लगे मुन्स्यारी क्षेत्र में केंद्र के मार्गदर्शन में ध्यान केंद्र एवं स्वावलंबन प्रशिक्षण स्थली के निर्माण का कार्य आरंभ हो गया है। लगभग आठ हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित यह केंद्र पंचचूली हिमालय शिखरों के सामने स्थित है। यहाँ ध्यान हेतु कुटी एवं उस क्षेत्र के जनजाति वर्ग हेतु एक कुटीर उद्योग प्रशिक्षण तंत्र खुलेगा। इसी तरह रानीखेत जिले के तालेश्वर महादेव (5600 फीट) में भी केंद्र की निर्माणात्मक प्रक्रिया आरंभ हो गई है।
‘गुरुपूर्णिमा’ पर्व नहीं है, केवल गुरु-गुणगान का। यह है पावन-पर्व समर्पण का, शिष्यत्व प्रमाण का॥
विश्वमित्र, वसिष्ठ न रीझे थे केवल गुणगान से। चाणक्य, रामदास भी रीझे थे शिष्यत्व-प्रमाण से॥ गुरुता सिर्फ वरण करती है, जीवट वाले प्राण का। ‘गुरुपूर्णिमा’ पर्व नहीं है, केवल गुरु-गुणगान का॥
शिष्य समर्पण जब करता है, बला-अतिबला मिलती है। गुरु के संकल्पों को पूरा कर जाने में जुटती है॥ गुरु का दरद बना करता है, दरद शिष्य के प्राण का। ‘गुरुपूर्णिमा’ पर्व नहीं हैं, केवल गुरुञ-गुणगान का॥
फिर न सूझता स्वार्थ शिष्य को, दिखाता गुरु-संकल्प ही। पथ से नहीं डिगा पाता है, फिर तो कोई विकल्प भी॥ शक्ति स्त्रोत झरता रहता है, गुरु के भी अनुदान का। ‘गुरुपूर्णिमा’ पर्व नहीं है, केवल गुरु -गुणगान का॥
गुरुवर का संकल्प, सुनिश्चित नवयुग का निर्माण है। पीड़ा, पतन, ग्रसित जगती का, त्रय तापों से त्राण है॥ ‘गुरुपूर्णिमा’ संकल्प पर्व है, जन-जन के कल्याण का। ‘गुरुपूर्णिमा’ पर्व नहीं है, केवल गुरु-गुणगान का॥
-मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’
*समाप्त*