जीवन विद्या का आलोक केन्द्र

हिमालय की छाँव और गंगा के जलकणों से अभिसिंचित भूमि में ‘देव संस्कृति विश्वविद्यालय’ की स्थापना हो गयी। बड़े ही गर्व और गौरव के साथ उत्तराँचल शासन ने इसे अपनी स्वीकृति दे दी। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव की दिव्य चेतना के संरक्षण में यहाँ विद्या की साधना और अविद्या से मुक्ति के द्वार खुल रहे हैं। देव संस्कृति की अनगिन सम्भावनाएँ अब यहाँ जन्म एवं जीवन पाने की तैयारी में जुटी हैं। प्रखर साधक अपनी साधना की निर्मल दृष्टि से यहाँ बहुत कुछ अद्भुत होता हुआ देख रहे हैं।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय किसी व्यक्ति की कल्पना जन्य निर्मित नहीं, परम पूज्य गुरुदेव के संकल्प की सृष्टि है। इसमें हिमालयवासी ऋषियों एवं देवसत्ताओं के तप और पुण्य का नियोजन है। यह अदृश्य की दिव्य शक्तियों का ऊर्जा-अनुदान केन्द्र है। जो उन्होंने देव संस्कृति के नव्योत्थान के लिए स्थापित किया है। इस सत्य का साक्षी भविष्य स्वयं होगा। सभी इस सच्चाई को अपनी खुली आँखों से निहारेंगे कि अदृश्य चेतना किस तरह अपने प्रचण्ड तप से ऋषित्व को गढ़ती है, देवत्व को निखारती है।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय नर रत्नों की, देव मानवों की, देव संस्कृति के देवदूतों की टकसाल है। आध्यात्मिक साधना के गुह्य एवं गहन प्रयोगों से यहाँ प्रज्ञा एवं मेधा के असंख्य दीप जलाये जाएँगे। पुस्तकों के बोझ को लगातार बढ़ाते रहने के बजाय यहाँ विद्यार्थियों के जीवन को तराशा, निखारा एवं गढ़ा जाएगा। इस विश्वविद्यालय की कोख से अनेकों कपिल, कणाद, भारद्वाज और बृहस्पति जन्म लेंगे। अनेकों गार्गी, घोषा, अपाला यहाँ अपने व्यक्तित्व को प्रकाशित करेंगी।

राष्ट्र और विश्व में साधन सम्पन्न विश्वविद्यालय अनेकों होंगे। पर अपने ढंग का साधना सम्पन्न विश्वविद्यालय यह एक ही होगा। जिनके पास अनेक जन्मों के पुण्यों की संचित निधि है, ऐसे पुण्यवान यहाँ आएँगे और विद्यावान् बनेंगे। गंगा की गोद और हिमालय की छाया में अनुशासन की कठोर तप-साधना से यहाँ उन्हें विचारों के साथ उत्तम संस्कार भी मिलेंगे। इसे पाकर वर्तमान संवरेगा, भविष्य निखरेगा। विद्यार्थियों के साथ उनके कुटुम्ब एवं पीढ़ियाँ, राष्ट्र और विश्व इस विश्वविद्यालय के अनुदानों से अनुगृहीत हुए बिना न रहेंगे।


देव संस्कृति एवं उसके निहितार्थ

देव संस्कृति का सही अर्थ देवभूमि भारत के ऋषियों, सन्तों एवं मनीषियों द्वारा स्थापित जीवन मूल्यों, परम्पराओं एवं प्रयोगों में निहित है। इन्हें अपनाकर मनुष्य सहज ही अपने दैवी एवं दिव्य गुणों को विकसित कर सकता है। यह मनुष्य में देवत्व को उभारने, निखारने एवं विकसित करने का विज्ञान-विधान है। इसे मानव को आमूल-चूल रूपांतरित करके देवता बनाने वाला दिव्य रसायन भी कहा जा सकता है। देव संस्कृति के प्रवर्तक ऋषिगणों का कहना है कि मनुष्य होना हम सबके वर्तमान का सत्य है। लेकिन देवता होना हमारे जीवन का लक्ष्य है। देव संस्कृति के सभी सूत्र, सारी प्रक्रियाएँ, समस्त साधना मनुष्य को इसी ओर तीव्रगामी वेग से बढ़ चलने के लिए प्रेरित करती है। इन संस्कृति सूत्रों के अनुसार देवता वे हैं जो दिव्य हैं, दैवी गुणों से सम्पन्न हैं और वरदान देने में समर्थ हैं। मनुष्य में ये सभी क्षमताएँ बीज रूप में हैं। जो अभी सुप्त एवं अविकसित दशा में हैं। यदि इनका विकास हो सके तो मानव की आकृति तो वही रहेगी, परन्तु प्रकृति से वह देवता हो जाएगा।

देवों को गढ़ने वाली देव संस्कृति भारत देश की देन है। यह इसी देश की माटी में उपजी एवं पनपी है। भारत माता की गोद में पली-बढ़ी है। भारत जननी की अनेकों विशिष्टताओं में यह सर्वोपरि है। अन्य सभी विशेषताएँ इसी की छाया से आच्छादित है। यह राष्ट्र के अस्तित्त्व एवं अस्मिता की पहचान है। यही वह अक्षय पात्र है, जिसके बल पर चिर प्राचीन काल में भारत देश ने समस्त विश्व को तृप्ति दी। इसी के बलबूते भारत ने समस्त विश्व को अनेकों अजस्र अनुदान दिए। इसी की महिमा से देश चक्रवर्ती एवं जगद्गुरु कहाया। देव संस्कृति के सूत्रों को अपनाकर ही भारत देश सम्पदा, समृद्धि एवं वैभव के चरम शिखर पर पहुँचा। इसकी चरम से आकर्षित हुए विदेशियों ने इसे सोने की चिड़िया कहा। यह इतिहास का सच है कि देव संस्कृति के सत्य को अपनाकर ही देश ने सब कुछ पाया। और आज यदि राष्ट्र ने अपना बहुत कुछ गंवा दिया है तो इसका कारण अपने संस्कृति सत्य की विस्मृति ही है। इसके स्मरण एवं जीवन में इसकी स्वीकृति से फिर से गरिमामय वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य की रचना की जा सकती है। भारत माता फिर से अपनी देव सन्तानों की सामर्थ्य के द्वारा विश्व कुटुम्ब को अपने अजस्र-अनुदान बाँट सकती है।

यह सब देव संस्कृति की मूल प्रेरणा में निहित है। जो मनुष्य की इस मौलिक सोच पर आधारित है कि जीवन को परिवर्तित, रूपांतरित एवं विकसित होना ही चाहिए। ऐसा सोचने के कारण भी हैं। जीवन का जो वर्तमान है उसमें सिवाय दुःख, पीड़ा, अशान्ति, संघर्ष और कलह के कुछ भी नहीं है। जीवन की इसी पीड़ा ने जीवन को रूपांतरित करने की प्रेरणा पैदा की है। शायद ही कोई ऐसा क्षण हो जब मनुष्य आनन्द को उपलब्ध हो पाता है। हाँ, आनन्द की आशा लगी रहती है कि कल मिलेगा और आज उसी आशा में दुःख को हम सहते हैं। लेकिन कल जब आता है तो हमें उतना ही दुःख देता है जितना की आज। आशा फिर आगे सरक जाती है। ऐसे जीवन भर आदमी उस सुख की आशा में जीता है और पाता निरन्तर दुःख है। यदा-कदा तो वह इस सुख की आशा के चक्कर में औरों के जीवन में दुःख को बढ़ा देता है। सुख की आशा बनी रहती है और प्रकृति, परिवेश, परिस्थिति दुःख की छटपटाहट से कराहते रहते हैं।

इस दशा में दो बातें सोची जा सकती हैं और सोची भी गयी हैं। पहला तो यह कि जीवन में आनन्द है ही नहीं, आनन्द की खोज ही गलत है। दूसरी बात यह है कि जैसा जीवन आज है, आज जीवन के जो रंग-ढंग हैं, तौर-तरीके, जीने की शैली है, उसमें आनन्द नहीं है। इनमें से जिनकी सोच पहली तरह की है, वे तो घोर नकारात्मक चिन्तन वाले निराशावादी हैं। उनके निराशावाद का गहरे से गहरा अर्थ आत्मघात के अतिरिक्त कुछ नहीं होता है। ऐसे लोग जीवन और उसके स्रष्टा के अनुदानों से सदा ही अपरिचित रहते हैं। जिनकी सोच दूसरी बात पर टिकती है, उन्हें इस सत्य का बोध होता है कि जीवन को परिवर्तित रूपांतरित करने की खोज आवश्यक है।

अब जीवन को परिवर्तित करने के भी दो विकल्प हैं। पहला विकल्प यह है कि जीवन को बाहर से बदल डालें, शायद आनन्द हो जाय। दूसरा विकल्प यह है कि हम बाहरी परिस्थितियों का आकार और आकृति नहीं अपनी आन्तरिक प्रकृति बदलें। जैसे हम हैं, उस होने को बदलें, शायद वहाँ आनन्द हो जाय। इन सभी दिशाओं में मनुष्य ने प्रयास किए हैं। निराशावादियों ने तो जीवन को समझने की चेष्टा ही नहीं की- उसके अर्थ और औचित्य को ही गंवा दिया। जिन्होंने जीवन को बाहर से बदलने की चेष्टा की, उन्होंने भारी सफलताएँ पायीं। अपने जीवन में अनेकों साधन जुटाए, शक्ति भी उपलब्ध की। परन्तु जीवन की आन्तरिक दृष्टि के अभाव में उनकी सारी उपलब्धियाँ उन्हीं के लिए अन्ततः भस्मासुर साबित हुई और हो भी रही हैं।

जिन्होंने अन्तिम विकल्प चुना, उनका प्रयास इन सभी प्रयासों में सबसे सार्थक, समग्र, तर्कपूर्ण एवं वैज्ञानिक सिद्ध हुआ। इस प्रयास को ही देव संस्कृति नाम दिया गया। इसके निष्कर्ष बहुत ही प्रभावी, अर्थपूर्ण और मानवी जीवन में क्रान्ति लाने वाले सिद्ध हुए। इस दिशा में प्रयोग करने वाले महावैज्ञानिक ऋषियों ने घोषणा की कि मनुष्य जीवन आनन्दपूर्ण हो सकता है यदि साधना को पहले और साधनों को बाद में स्थान दिया जाय। जीवन को आनन्द से भरपूर करने के लिए मनुष्य को पहले अपनी प्रकृति में बदलाव लाना होगा। बाद में इससे मिली नवीन जीवन दृष्टि के आधार पर परिस्थितियाँ बदली जा सकती हैं।

देव संस्कृति के सत्य का अनुसरण करने वाले एक नहीं अनेक लोगों के जीवन में असाधारण घटनाएँ घटीं। वे सचमुच ही मनुष्य रूप में देवता बन गए। अध्यात्म ज्ञान से उन्होंने अपनी आन्तरिक शक्तियों का अपरिमित विकास किया। भौतिक विज्ञान में भी उन्होंने आश्चर्यजनक प्रगति की। ज्ञान और विज्ञान की असंख्य एवं अनगिन धाराएँ इस देश की धरती पर प्रवाहित हुई। मनुष्य का देवता बनना यहाँ एक मिथक नहीं रहा, बल्कि सत्य प्रामाणित हुआ। देव संस्कृति के प्रणेता ऋषियों ने प्रायोगिक एवं वैज्ञानिक आधार पर जीवन एवं अस्तित्त्व को सत्-चित्-आनन्द सिद्ध किया। देव संस्कृति के सत्यों एवं सूत्रों का प्रवाह इस देश की धरती पर अविराम प्रवाहित होता रहा है। हाँ इसके वेग की गति अवश्य काल-क्रम के अनुसार परिवर्तित हुई है।

इस देश की धरती पर जन्में असंख्य ऋषियों, सन्तों एवं मनीषियों ने बार-बार, अगणित बार इसमें निहित सत्य और सूत्रों को प्रमाणित करने के लिए अपने जीवन की गवाही दी है। अपनी जीवन साधना से उन्होंने देव संस्कृति के निहितार्थ को प्रकट किया है। उन सबने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ यह बात कही है कि जब एक के बाद एक और इस तरह से अनेक जनों के जीवन में देवत्व अवतरित हो सकता है, आनन्द घटित हो सकता है तो फिर सबके जीवन में क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर जीवन को समझने में हुई भूल के निवारण-निराकरण में है। देव संस्कृति के सूत्रों से मनुष्य की प्रकृति को परिष्कृत करना, संस्कारित करना ही एक मात्र उपाय है। इस उपाय को जब कभी, जिसने भी अपनाया, उसी के जीवन में आनन्द के फूल खिले, खुशियों की सुरभि बिखरी।

देव संस्कृति भारत वर्ष के सभी देव मानवों की साधना का सार है। यह देश की धरती का मौलिक सच है। इसमें अनेकों दैवी विभूतियों के तप की ऊष्मा है, ऊर्जा है, आभा है, प्रकाश है। वैदिक काल से लेकर हर युग में इसकी अभिव्यक्ति अपनी अनूठी रीति से होती रही है। विश्वामित्र, वशिष्ठ, वामदेव, वाल्मीकि, व्यास सभी ने इस सत्य की अनुभूति की। उन्होंने अपने जीवन को रूपांतरित करते हुए देव संस्कृति को जीवन विद्या का पर्याय माना। जीवन जीने की कला के रूप में इसकी व्याख्या की। अपने शिष्यों को इसके शिक्षण के लिए प्रेरित करते हुए कहा- ‘स्व-स्व आचरण शिक्षरेण पृथ्वियाँ सर्वमानवः’ अर्थात् अब तुम जाओ और पृथ्वी के सभी मनुष्यों को अपने निज के आचरण से देव संस्कृति के सत्य को, इसके सूत्रों को समझाओ, बताओ।

देव संस्कृति के विश्वव्यापी विस्तार का यही रहस्य है। देव संस्कृति के आचार्यों ने शब्दों से नहीं, वाणी से नहीं अपने आचरण से जन-जन को इसके सूत्र बताए। उन्होंने बार-बार कहा- मनुष्य जीवन विधाता का दुर्लभ अनुदान है। यह दुःख का नहीं आनन्द का पर्याय है। दुःख तो केवल इस कारण है कि हमसे इसको समझने में भूल हुई है। हम इसे ठीक तरह से समझ नहीं पाए हैं। इसी भूल के कारण हमारे जीवन को समझने में हुई नासमझी है। सच्चाई भी यही है, अगर जगत् में एक भी मनुष्य प्रकाश में खड़ा हो सका, तो फिर हमारा जो अंधेरा है, वह कुछ हमारे ही ओढ़े हुए के कारण है। शायद हम अपना द्वार बन्द किए बैठे हुए हैं घर में। सूरज तो बाहर निकला हुआ है। अगर एक मनुष्य के जीवन में संगीत घट सका है, और हमारे जीवन में नहीं है, तो शायद हमीं बहरे बने बैठे हैं, कान बन्द किए बैठे हैं क्योंकि संगीत है, यह एक मनुष्य के जीवन में घटने से सिद्ध हो जाता है। इसी तरह अगर एक मनुष्य के जीवन में आनन्द के स्वर उठ सकते हैं तो सबके जीवन में इसकी सम्भावना खुल जाती है।

यह सम्भावना हर युग में सम्भव है। ‘सम्भवामि युगे-युगे’ की अपनी शाश्वत प्रतिज्ञा पूरी करने आए परम पूज्य गुरुदेव ने देव संस्कृति के इसी सत्य को अपने जीवन से सिद्ध किया। युग सत्य को प्रकट करने के कारण वह युगऋषि कहाए। आचरण से शिक्षा देने के कारण उन्हें आचार्य कहा गया। देव संस्कृति के ज्ञान (वेद) की साकार मूर्ति होने के कारण वह वेदमूर्ति थे। तप से उन्होंने देव संस्कृति के सत्य की एक निष्ठ साधना की। यही उनके तपोनिष्ठ होने का रहस्य था। श्रीराम की ही भाँति वे मर्यादा पुरुषोत्तम थे। देव संस्कृति की सभी मर्यादाओं की स्थापना के लिए ही उन्होंने अवतार लिया था। ऐसे युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य हम सबके परम पूज्य गुरुदेव ने अपनी साधना से देवमानवों की शृंखला में कुछ नए निष्कर्ष जोड़े। उन्होंने इस युग में देव संस्कृति की आध्यात्मिक चेतना एवं वैज्ञानिक सत्य को एक नयी अभिव्यक्ति दी।

उन्होंने बताया कि देव संस्कृति समग्र जीवन की साधना है। इसमें पदार्थ और चेतना, विज्ञान और अध्यात्म दोनों का समुचित समावेश है। उदाहरण के लिए एक बीज को हम बोते हैं, अंकुर बीज से निकलता है, लेकिन पास में पड़ी बूँदें, गिरा पानी, सूरज की किरणें मौका बनती हैं। वे मौका बनती हैं कि अंकुर निकल सके, हालाँकि अंकुर उनसे नहीं निकलता, अंकुर तो बीज से ही निकलता है। यदि बीज की जगह कंकड़ डाला गया हो, तो अच्छी से अच्छी जमीन, अच्छे से अच्छा पानी, अच्छी चमकदार सूरज की किरणें और कुशल से कुशल माली भी उनमें अंकुर नहीं ला सकेंगे। दूसरी बात भी सच है- श्रेष्ठतम बीज हो, लेकिन अच्छी भूमि न मिले, उसे पत्थर पर डाल दिया गया हो, पानी न मिले, माली के कुशल हाथों का सहयोग न मिले तो अच्छे से अच्छा बीज पत्थर पर पड़ा हुआ, अंधेरे में पानी बिना, सूरज की किरणों के बिना, माली के अभाव में मर जाएगा। उसमें अंकुर नहीं निकलेगा। जिस तरह से बीज के अंकुरण के लिए अनेकों तत्त्वों का समुचित सामञ्जस्य जरूरी है, ठीक उसी तरह से मनुष्य जीवन के रूपांतरण के लिए, उसे आनन्द से ओत-प्रोत करने के लिए ज्ञान और विज्ञान के अनेकों सूत्र आवश्यक हैं। देव संस्कृति इन सभी सूत्रों की सम्मिलित व्यवस्था है। इसके निहितार्थ का साधनात्मक प्रशिक्षण, इसके निष्कर्षों का विश्ववसुधा में वितरण परम पूज्य गुरुदेव का दिव्य स्वप्न था।


द्रष्टा ने देखा एक दिव्य स्वप्न

‘मेरा एक स्वप्न है। और मेरे स्वप्न, दिवा स्वप्न नहीं दिव्य स्वप्न होते हैं।’ यह वाक्य कहते-कहते परम पूज्य गुरुदेव भाव लोक की भावानुभूतियों में खोने लगे। उनके मुख पर एक अलग ढंग की तेजस्विता दप-दप दमकने लगी। मस्तक का चन्द्राकार निशान चमक उठा। गुरुदेव गम्भीर हो गए थे। ऐसा लग रहा था, जैसे वह विशेष सत्य बताना चाहते हों। भविष्य को एक नयी दृष्टि देना चाहते थे। उनकी भावमुद्रा कुछ ऐसी ही थी। सचमुच ही उन पलों में वे अपनी अनुभूतियों के सागर के कुछ अनमोल रत्न बाँटना चाहते थे।

उस दिन भी दोपहर थी। लेकिन यह दोपहर मई महीने की थी। सूर्य भगवान् सब ओर बड़ी उदारता से अपनी धूप लुटा रहे थे। इसकी ऊष्मा के प्रभाव से हवाएँ भी ऊष्ण हो गयी थीं। गर्मी का अहसास सभी को होने लगा था। मौसम के प्रभाव से पैदा हुई तपिश की तपन दोपहर में कुछ ज्यादा बढ़ जाती थी। लेकिन गुरुदेव की सामान्य दिनचर्या भी तपश्चर्या थी। इस पर मौसम का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। न कोई घट-बढ़ और न ही कोई हेर-फेर। सदा ही वह अपने तप में तपते थे।

उनके तप की तपन सूर्य की तपन से कुछ अलग थी। सूर्य की तपन से केवल देह तपती है। बाहरी परिस्थितियों में इसकी अनुभूति होती है। लेकिन गुरुदेव के तप की तपन की अनुभूति मन व प्राण करते थे। सम्पूर्ण अन्तःकरण एवं आन्तरिक प्रकृति व परिस्थिति में इसकी अनुभूति होती थी। उनके संग के कुछ पल भी जीवन में धन्यता लाने वाले थे। जो भी उनसे मिलता, अपनी पात्रता के अनुसार उनसे कुछ न कुछ अवश्य पा लेता। उनके देने का अन्दाज निराला था। वे रोग, शोक, कष्ट, कठिनाई आदि लौकिक समस्याओं का ही निवारण-निराकरण नहीं करते थे, आत्मा की क्यारी में भी बीज बोते थे। अपने तप की ऊर्जा-ऊष्मा से उन्हें उगाते-बढ़ाते थे।

ऐसे तपोमूर्ति गुरुदेव बोल रहे थे- बेटा, इस देश और धरती में जब भी नया जीवन अंकुरित हुआ, विश्वविद्यालयों में हुआ। जब भी नया युग आया, तो उसकी शुरुआत विश्वविद्यालयों से हुई। जब नए मनुष्य गढ़े गए, उन्हें नयी दिशा मिली तो विश्वविद्यालयों से मिली। पर ये विश्वविद्यालय आज के जैसे नहीं थे। उनमें शिक्षा रटाने और पैसा बटोरने की जगह विद्या के वरदान दिए जाते थे। महामानवों देवपुरुषों की पौध तैयार की जाती थी। नालन्दा, तक्षशिला के विश्वविद्यालय ऐसे ही थे।

यहाँ के ऊर्जावान आचार्य और प्राणवान विद्यार्थी मिलकर प्राणऊर्जा का ऐसा प्रवाह पैदा करते थे कि पूरे देश के प्राण लहलहा उठते थे। सारी धरती पर जीवन मूल्यों के वरदान बरस जाते। कहते-कहते गुरुदेव एक पल के लिए रुक गए। पल-क्षण की इस भाव समाधि में शायद वह किसी सत्य को मूर्त होता हुआ देख रहे थे। अपनी दृष्टि पथ में आए इस सत्य को प्रकट करते हुए वह कहने लगे- ऐसे ही एक विश्वविद्यालय की स्थापना मेरा भी स्वप्न है।

सुनने वाले अपने सद्गुरु की सामर्थ्य से परिचित थे। उन्हें मालूम था कि उनके गुरुदेव युगशक्ति गायत्री के सत्य और सिद्धि को पाने वाले युग के विश्वामित्र हैं। उनमें नवसृजन की नयी सृष्टि रचने की सामर्थ्य है। सुनने वाले की सोच की कड़ियाँ गुरुदेव की वाणी से प्रवाहित हो रहे प्राण प्रवाह में विलीन हो गयीं। अब केवल उनके शब्द ही ध्वनित हो रहे थे- यह विश्वविद्यालय ऐसा होगा, जहाँ से कौडिन्य और कुमारजीव जैसे विद्यार्थी निकलेंगे। जो देश की धरती और विश्व वसुन्धरा में देव संस्कृति की संवेदना का विस्तार करेंगे।

यह देव संस्कृति का ऐसा ध्रुव केन्द्र होगा, जहाँ देश के कोने-कोने से ही नहीं विश्व के हर भू-भाग से लोग आएँगे और जानेंगे कि भारतीय संस्कृति क्या है? यहाँ भारतीय संस्कृति और भारतीय विद्याओं के हर पहलू पर अध्ययन होगा, शिक्षण होगा, शोध होगी। अपना यह वाक्य पूरा करते-करते गुरुदेव फिर से चुप हो गए। लेकिन यह चुप्पी बस एक क्षण के लिए रही। दूसरे ही क्षण वह फिर से बोलने लगे-वैसे अभी ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान है। लेकिन यह काफी छोटा है। इसमें इतना बड़ा काम नहीं हो सकता। इतने बड़े काम के लिए तो एक विश्वविद्यालय चाहिए।

देव संस्कृति के व्यापक एवं बहुआयामी अध्ययन, शिक्षण एवं शोध के लिए बना विश्वविद्यालय। अपनी इस भविष्य रचना को जैसे उन्होंने एक पल अपनी दिव्य दृष्टि से निहारा। इसी के साथ उनके अधरों पर हल्की सी एक स्मित रेखा झलकी। उस मुस्कान के प्रकाश में सत्य मुखरित हो उठा। उन्होंने सुनने वालों को टोकते हुए कहा- ‘देव संस्कृति विश्वविद्यालय’ कैसा रहेगा यह नाम। फिर नाम के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए वह कहने लगे- नाम किसी व्यक्ति का हो या केन्द्र का उससे उसके गुण और कार्यों की अभिव्यक्ति हो जानी चाहिए। किसी की पहली झलक उसके नाम से ही मिलती है। हमारे विश्वविद्यालय का नाम कुछ ऐसा हो, जिसे सुनकर ही लोग इसके महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों एवं कार्यों को जान सकें, उसके बारे में सोच सकें।

सुनने वाले गुरुदेव की वाणी को मुग्ध मन से सुन रहे थे। उन्हें यह बात समझ में आ रही थी- कि सद्गुरु की दिव्य दृष्टि भविष्य के जिस विश्वविद्यालय को देख रही है- उसका नाम देव संस्कृति विश्वविद्यालय होगा। और वह ब्रह्मवर्चस का बड़ा और व्यापक रूप होगा। गुरुदेव की योजना शायद अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पायी थी। वह अभी कुछ और कहना चाहते थे। उन्हें अभी कुछ और बताना था। अपने भावों को वाणी देते हुए उन्होंने कहा- बेटा, इस विश्वविद्यालय की स्थापना तक तो हम नहीं रहेंगे। पर तुम लोग इसे स्थापित होते हुए देखोगे। तुम सभी को यह जिम्मेदारी उठानी और निभानी पड़ेगी। इसके लिए तुम लोग अभी से अपनी योग्यता बढ़ाओ।

हम इस विश्वविद्यालय के लिए आचार्य चाहते हैं। जो अपने आचरण और जीवन से शिक्षा दे सकें, ऐसे आचार्य। हमें व्याख्यान देने वाले व्याख्याता नहीं चाहिए। बुद्धि और शब्दों से यदि कुछ बदला जा सकता है तो सारी दुनिया न जाने कब की बदल चुकी होती। जो शब्दों से खिलवाड़ करते हैं, जो नट, बाजीगर की तरह बुद्धि की कुलाँचों के चमत्कार दिखाते हैं। ऐसे आडम्बर करने वालों से हमारा काम चलने वाला नहीं है। हमें तो संकल्पवान आचार्य चाहिए। जो अपनी संस्कृति के लिए, मातृभूमि के लिए, विश्व-मानवता के लिए स्वयं को तिल-तिल करके मिटाने का साहस रखते हों।

देखो, चाणक्य क्या था? तक्षशिला विश्वविद्यालय का आचार्य था। वह कोरा विद्वान और व्याख्यानबाज नहीं था। उसके अन्दर आचरण की निष्ठ थी, संकल्प का बल था। अपने देश और धरती के प्रति अनुराग था। अपनी संस्कृति के लिए समर्पण था, मातृभूमि के लिए मर मिटने की निष्ठ थी। अपने इन्हीं गुणों की ताकत से उसने विदेशी यवनों को खदेड़ा, देश के अत्याचारी और अन्यायी शासकों को धूल-धूसरित करके मिट्टी में मिला दिया। चन्द्रगुप्त जैसे साधारण और गलियों में भटकने वाले बालक को पराक्रमी योद्धा, महानायक और नीतिकुशल सम्राट बना दिया। उसके प्रयासों से एक नए युग की शुरुआत हो गयी।

‘मेरा स्वप्न भी कुछ ऐसा ही है। मैं चाहता हूँ कि ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना हो जिसके आचार्य और विद्यार्थी मिलकर एक नए युग को जन्म दें। भगवान् ने मुझे वचन दिया है कि मेरे स्वप्न कभी अधूरे नहीं रहेंगे। मेरा यह स्वप्न भी पूरा होगा। लेकिन इसे तुम सब को मिलकर पूरा करना है। तुम सब लोग मिलकर कुछ ऐसा करना कि ऋषियों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय की महिमा इसमें प्रकट हो सके।’ गुरुदेव के वचन तो सदा ही मंत्र थे और हैं। आज जो कुछ भी हो रहा है, उसमें उन्हीं के द्वारा उच्चारित मंत्रों का मंत्रार्थ प्रकट हो रहा है।


केन्द्र, जहाँ से पाया संस्कृति−संवेदना ने विश्व विस्तार

ऋषियों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में देव संस्कृति का केन्द्र रहे हैं। यहीं से संस्कृति संवेदना ने अपना विश्व विस्तार पाया है। प्राचीन ग्रन्थों में, इतिहास और पुराणों में इन विश्वविद्यालयों का उल्लेख मिलता है। तब आचार्य एवं शिष्य दोनों ही अपनी संस्कृति एवं जीवन मूल्यों के प्रति समर्पित जीवन जीते थे। ‘सह नौ यशः सह ब्रह्मवर्चसम्’ उनका आदर्श सूत्र था। इस सूत्र के अर्थ के अनुसार वे ऐसे तपोनिष्ठ जीवन को अपनाते थे जो उन दोनों के ब्रह्मतेज एवं यश को बढ़ाने में सहायक हो। ऋषियों की मान्यता थी कि तपस्वी जीवन पद्धति को अपनाकर किया गया अध्ययन विद्या को जन्म देता है। उससे ज्ञान की उपलब्धि होती है। तप के अभाव में किया हुआ अध्ययन शिक्षा बनकर रह जाता है। उससे केवल जानकारियाँ भर मिलती हैं। प्राचीन भारत के विश्वविद्यालय तप और विद्या के केन्द्र थे। इसी की ऊर्जा से संस्कृति को जीवन मिलता था। देवत्व विकसित होता था।

जिन ऋषिगणों ने अपने युग में विश्वविद्यालयों की स्थापना की, उनमें अगस्त्य, कण्व, जाबालि, परशुराम, वाल्मीकि, भरद्वाज, वसिष्ठ, वामदेव, विश्वामित्र, व्यास, शौनक एवं सान्दीपनि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें से महर्षि अगस्त्य का नाम देव संस्कृति के प्रचारक के रूप में बहुत प्रसिद्ध है। वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड एवं महाभारत के वनपर्व के विवरण के अनुसार वे विन्ध्य पर्वत की ऊँचाइयों को पार करके दक्षिण भारत गए। वहाँ उन्होंने देव संस्कृति के सत्यों एवं सूत्रों का प्रचार किया। इसके लिए वे दक्षिण पूर्व के द्वीप-द्वीपान्तरों में भी गए। प्राचीन साहित्य में महर्षि अगस्त्य के द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय से सम्बद्ध केन्द्रों की स्थिति भारत वर्ष के अनेक स्थानों पर बतायी गयी है। ये केन्द्र हिमालय से लेकर दक्षिणी समुद्र तट तक फैले हुए थे।

महर्षि कण्व द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय समूचे भारत देश का गौरव था। इसकी पवित्रता के कारण महाभारत, स्कन्दपुराण एवं अग्निपुराण में इसे तीर्थ, धर्मारण्य एवं तपोभूमि भी कहा गया है। यह अपने समय का सुविख्यात विद्या केन्द्र था। अभिज्ञान−शाकुंतलम् में कण्व के विश्वविद्यालय को मालिनी नदी के तट पर स्थित बताया गया है। आजकल यह स्थान कोटद्वार-हरिद्वार मार्ग पर कोटद्वार से छः मील दूर पश्चिम में समझा जाता है। इतिहासवेत्ता डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी के अनुसार महर्षि कण्व के विश्वविद्यालय में ‘चार वेद, वेदाँग, कर्मकाण्ड, यज्ञ, कल्पसूत्र, शिक्षा, ध्वनि विज्ञान, शब्द विज्ञान, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, आत्म विज्ञान, ब्रह्मोपासना, न्याय, भौतिक विज्ञान, कलाएँ, गणित, द्रव्यगुण, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान आदि विषय पढ़ाए जाते थे।’

प्राचीन साहित्य में महर्षि जाबालि का नाम बहुत प्रसिद्ध है। संस्कृत काव्यकारों ने उनके विश्वविद्यालय का विस्तार से वर्णन किया है। बाण ने कादम्बरी कथा में इसकी स्थिति विन्ध्यारण्य में बतायी है। यहाँ हजारों छात्र विद्याध्ययन करते थे। विज्जिका ने कौमुदी महोत्सव नाटक में इसका उल्लेख किया है। उसके अनुसार दूर देशों के राजकुमारों के लिए यह विश्वविद्यालय आकर्षण का केन्द्र था। भगवान के अवतार के रूप में लोक विख्यात महर्षि परशुराम ने भी विश्वविद्यालय स्थापित किया। संस्कृत कवि राजशेखर के अनुसार उन्होंने महेन्द्र पर्वत पर यह विश्वविद्यालय बनाया। अनेक विद्वान् महेन्द्र पर्वत की स्थिति उड़ीसा में मानते हैं।

प्राचीन भारत देश में विश्वविद्यालय की स्थापना करने वालों में महर्षि वाल्मीकि का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है। वे रामायण के रचयिता एवं आदि कवि माने जाते हैं। प्राचीन साहित्य के अनुसार महर्षि वाल्मीकि का विशेष सम्बन्ध तमसा एवं गंगा नदियों के साथ रहा है। इसलिए उनके विश्वविद्यालय की स्थिति इन दोनों नदियों के तट पर कहीं होनी चाहिए। स्थान के बारे में इतिहासकारों की मतभिन्नता के बावजूद यह सर्वसम्मत सत्य है कि यह विश्वविद्यालय अपने समय में विद्या का महान् केन्द्र था। महाकवि भवभूति के अनुसार यहाँ छात्राएँ भी अध्ययन करती थीं।

गंगा-यमुना के संगम पर महर्षि भरद्वाज ने भी एक विख्यात विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। रामायण के अनुसार यह अपने समय का अति प्रसिद्ध विद्या संस्थान था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी- ‘भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा’ कहकर उनका स्मरण किया है। संस्कृत साहित्य में इससे सम्बद्ध एक केन्द्र का उल्लेख हरिद्वार के समीप भी मिलता है। इस केन्द्र का भार अग्निवेश नाम के आचार्य सम्हालते थे। बाद के समय में इन्होंने ही द्रोण एवं द्रुपद को धनुर्वेद की विद्या सिखायी थी।

इक्ष्वाकुओं के कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ का प्रायः सभी वैदिक एवं पौराणिक साहित्य में उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य के विवरण के अनुसार इन्होंने दो विश्वविद्यालयों की स्थापना की। इनमें से एक अयोध्या में था। इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में हुआ है। महर्षि वसिष्ठ के इन विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ का भी विधान था। महर्षि वाल्मीकि ने इन्हें ‘मेखलीनाँ महासंघाः’ कहकर उल्लेख किया है। इन संघों का राजसभा में भी प्रभाव था। महर्षि वसिष्ठ द्वारा स्थापित दूसरा विश्वविद्यालय हिमालय की तलहटियों में था। महाकवि कालिदास ने अपने ‘रघुवंश’ नामक महाकाव्य में इसका वर्णन किया है।

विश्वविद्यालय की स्थापना करने वालों में महर्षि वामदेव का नाम बहुत प्रसिद्ध है। वामदेव का यह विश्वविद्यालय विन्ध्य पर्वत की मेखलाओं में नर्मदा नदी के उद्गम स्थान पर समीप में ही था। महाकवि दण्डी के दशकुमार चरित के अनुसार राजवाहन आदि कुमारों ने इसी विश्वविद्यालय में शिक्षा पायी थी।

वैदिक परम्परा के ऋषियों में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का नाम अग्रगण्य है। ऋग्वेद के तीसरे मण्डल के ऋषि विश्वामित्र ही हैं। शास्त्रों के विवरण के अनुसार इनका विश्वविद्यालय गंगा-सरयू के संगम पर था। वर्तमान समय में यह स्थान बक्सर कहलाता है। यह पटना से काफी दूर पूर्व में है। पुरातत्त्ववेत्ताओं को यहाँ ऐसे अनेक अवशेष प्राप्त हुए हैं जो महर्षि विश्वामित्र के विश्वविद्यालय की गवाही देते हैं।

वेदों के सम्पादक, महाभारत के रचयिता तथा अठारह पुराणों के संग्रहकर्त्ता महर्षि व्यास ने हस्तिनापुर के निकट विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। इनके विश्वविद्यालय से सम्बद्ध केन्द्र भारत देश में कई स्थानों पर थे। इनकी शिष्य परम्परा में महर्षि शौनक ने नैमिषारण्य में विश्वविद्यालय स्थापित किया था। यहाँ होने वाली अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियाँ बहुत प्रसिद्ध थीं। इनमें धार्मिक, राजनैतिक एवं वैज्ञानिक विचारों पर संवाद होते थे। इस विश्वविद्यालय की विद्या परम्परा ग्यारहवीं शताब्दी तक चलती रही। पश्चिमी विद्वान् बेवर ने अपने शोध-अनुसंधान में इसकी सराहना की है।

प्राचीन विश्वविद्यालयों के संस्थापकों में महर्षि सान्दीपनि का नाम अत्यन्त गरिमापूर्ण है। इन्होंने उज्जयिनी में विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। भगवान् कृष्ण ने यहीं विद्याध्ययन किया था। इन सभी महर्षियों ने प्राक् ऐतिहासिक काल में विश्वविद्यालयों की जो स्थापना की- वह परम्परा ऐतिहासिक काल में भी गतिमान रही। विद्या के ये विश्वविख्यात केन्द्र देव संस्कृति को प्राण ऊर्जा का अनुदान देते रहे।

ऐतिहासिक विश्वविद्यालयों में तक्षशिला विश्वविद्यालय कभी इस देश का महान् विद्या केन्द्र था। वर्तमान में यह स्थान पाकिस्तान के रावलपिण्डी शहर से 30 किलोमीटर दूर स्थित है। पुरातत्त्ववेत्ता सर जान मार्शल ने पुरातात्त्विक उत्खनन से इसके ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन किया। ऐतिहासिक परम्परा के अनुसार भगवान श्रीराम ने अपने भाई भरत के पुत्र तक्ष को इस स्थल का शासक नियुक्त किया था। उन्हीं के नाम से यह नगर तक्षशील नाम से विख्यात हुआ। तक्ष ने अपने समय में ही यहाँ तक्षशील नाम के विश्वविद्यालय की स्थापना की। महाभारत काल में भी तक्षशील विश्वविद्यालय प्रसिद्ध था। महाभारत के आदिपर्व के अनुसार जन्मेजय ने इस स्थान पर यज्ञ किया था। बाद में यह नगर एवं विश्वविद्यालय तक्षशिला नाम से विख्यात हुए। तक्षशिला गन्धार जनपद की राजधानी भी रही। ई. पू. सातवीं शताब्दी में इस विश्वविद्यालय की कीर्ति विश्वव्यापी हो गयी। व्याकरण शास्त्र के प्रणेता आचार्य पाणिनि, राजनीति के महापण्डित चाणक्य, महान् आयुर्वेदाचार्य जीवक यहीं के विद्यार्थी थे।

ऐतिहासिक काल में नालन्दा विश्वविद्यालय का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। इसकी स्थापना सम्राट अशोक ने की थी। इस विश्वविद्यालय की स्थिति पटना से चालीस मील दक्षिण-पश्चिम में थी। चौथी-पांचवीं शताब्दी में गुप्त सम्राटों के समय इसका बहुत अधिक विकास हुआ। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार चौथी शताब्दी में चीनी यात्री फाहियान ने यहाँ की यात्रा की। उसके तीन शताब्दी बाद ह्वनत्साँग ने अपने विवरण में नालन्दा विश्वविद्यालय की कीर्ति का वर्णन किया। उसने स्वयं भी यहाँ पाँच साल रहकर बौद्धधर्म का अध्ययन किया। इत्सिंग के समय (सातवीं शताब्दी के उत्तरार्ध) नालन्दा एक महान् कीर्तिशाली विश्वविद्यालय था। यहाँ विदेशी छात्रों की संख्या बहुत अधिक होती थी।

विद्या केन्द्रों के रूप में वाराणसी का नाम प्रारम्भ से ही श्रद्धा का केन्द्र रहा है। आज भी परम्परागत ब्राह्मण परिवार में यज्ञोपवीत के समय ब्रह्मचारी विद्याध्ययन के लिए काशी जाने की बात कहता है। देव संस्कृति के विस्तार में इस शिव नगरी काशी का स्थान एवं महत्त्व सदा ही अविस्मरणीय एवं प्रातःस्मरणीय है। विद्या केन्द्र के रूप में इतिहासकारों ने विक्रमशील (विक्रमशिला) विश्वविद्यालय की सराहना की है। इसकी स्थापना बंगाल के पालवंशी राजा धर्मपाल ने 8 वीं शताब्दी में की थी। यह विश्वविद्यालय गंगा के तट पर वर्तमान भागलपुर से 24 मील दूर पर स्थित था। पुरातत्त्व विज्ञानी कनिंघम ने उत्तरी मगध के बड़गाँव के निकट इसकी पहचान की है। सभी इतिहासवेत्ता इस बारे में एक मत हैं कि यह विश्वविद्यालय अपने समय में देव संस्कृति का उज्ज्वल दीप था। इसे 1203 ई. में बर्बर आक्रान्ता मुहम्मद-बिन-बख्तियार-खिलजी ने अपने नृशंस करतूत से बुझा दिया। इतिहासवेत्ताओं के अनुसार पालवंश के शासकों ने विक्रमशिला की ही भाँति उड्डयन्तपुर विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। इस विश्वविद्यालय को आदर्श मानकर कई विदेशी शासकों ने भी अपने यहाँ विश्वविद्यालय स्थापित किए। पर बख्तियार खिलजी की नृशंसता ने इसे भी नष्ट कर दिया।

भारत देश के प्राचीन विश्वविद्यालयों में वलभी का नाम बहुत प्रसिद्ध है। इस विश्वविद्यालय की स्थिति भारत वर्ष के पश्चिमी भाग सौराष्ट्र में थी। चीनी यात्री ह्वनत्साँग एवं इत्सिंग ने अपने विवरणों में इस विश्वविद्यालय के बारे में कहा है कि भारत की संस्कृति के सभी आयाम यहाँ प्रकाशित हैं। यहाँ के स्नातक होना ही योग्यता का पर्याय है। इतिहासवेत्ता अलतेकर महोदय ने भी अपने अध्ययन में वलभी को देव संस्कृति का कीर्ति स्तम्भ माना है। बंगाल के पालवंशी राजा रामपाल ने ग्यारहवीं शताब्दी में गंगा और करतोया नदियों के संगम पर जगद्दल विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। इस विश्वविद्यालय ने अपने एक शतक के जीवन में भारत देश को सहस्रों अनुदान दिए।

देश के अन्य कुछ स्थान भी विद्या के केन्द्र के रूप में सम्मानित हुए। इनमें मिथिला, बंगाल का नवद्वीप, मैसूर का बेलगाँव, मालवा की धारा नगरी राष्ट्रवासियों की श्रद्धा से अभिसिंचित हुई। यहाँ के विद्या केन्द्रों एवं यहाँ अध्ययन करने वाले छात्रों ने देव संस्कृति एवं देवभूमि भारत को ऊर्जावान बनाया। इन स्थानों के विद्वानों एवं आचार्यों ने, शिष्यों एवं साधकों ने प्राचीन ऋषियों के शाश्वत ज्ञान को सामयिक दृष्टि दी। अपनी विद्या साधना से अनुभूत सत्य के द्वारा राष्ट्रीय जीवन में नव प्राण भरे। विश्वमानवता को अपने ज्ञान से कृतकार्य किया। प्राक् ऐतिहासिक काल के ऋषियों एवं उनके विश्वविद्यालयों तथा ऐतिहासिक काल के विश्वविद्यालयों ने जिस जीवन दृष्टि की खोज की, उसके द्वारा आज भी शिक्षा जगत् में नयी क्राँति सम्भव है। शान्तिकुञ्ज द्वारा ऋषियों की उज्ज्वल परम्परा में स्थापित देव संस्कृति विश्वविद्यालय शिक्षा जगत् में इसी नयी क्रान्ति के लिए कृत संकल्पित है।


ऋषि दृष्टि से होगी यह क्रान्ति

शिक्षा जगत् में एक नयी क्रान्ति ऋषि दृष्टि से ही सम्भव है। ऋषि दृष्टि की अपनी अनूठी विशेषता है। ऋषि उतना ही नहीं देखते, जो हम सबको दिखाई दे रहा है। वे उसे भी देखते हैं, जिसे हमारी आँखें नहीं देख पातीं। वे जीवन की सतही सीमाओं के साथ उसकी गहराइयों में छुपी असीम सम्भावनाएँ भी देखते हैं। अपनी उज्ज्वल दृष्टि से मनुष्य के वर्तमान के अलावा उसके भविष्य को भी निहारते हैं। इसे गढ़ने, संवारने की प्रक्रियाएँ और प्रयोग करते हैं। देव संस्कृति विश्वविद्यालय, युग ऋषि परम पूज्य गुरुदेव की दिव्य दृष्टि की ऐसी ही विशेषता का साकार रूप है। यह वह क्रान्ति भूमि है, जिसमें शिक्षा जगत् में एक नयी क्रान्ति के अनेकों क्रान्तिकारी आयाम जन्म ले रहे हैं।

शिक्षा का वर्तमान जग जाहिर है। इसके बारे में रोज बहुत कुछ कहा जाता है, लिखा जाता है और छापा जाता है। कभी मैकाले ने जो बीज बोए थे, आज उसकी कटीली फसल से समूचा देश लहूलुहान हो रहा है। पर मैकाले से मुकाबला कौन करे? यह सवाल आज के दौर में कुछ उसी तरह से है, जिस तरह से कभी चूहों के झुण्ड में यह सवाल उठा था कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे? नुकसान से सभी परिचित हैं, पर समाधान का साहस कौन करे? महत्त्वाकाँक्षी, किन्तु श्रम, साहस और संकल्प से विहीन बेरोजगारों की बढ़ती भीड़ आज की शिक्षा का वर्तमान है। यह भीड़ मनुष्य जीवन की सभी उज्ज्वल सम्भावनाओं को भुला बैठी है। उसके पास तो बस कुण्ठा, निराशा और हताशा की पर्याय बनी कुछ डिग्रियों, उपाधियों के छोटे-बड़े ढेर बचे हैं।

स्थिति का समाधान क्रान्ति की नयी रोशनी में है। इसी के उजाले में नए जीवन मूल्य दिखाई देंगे। मनुष्य की दशा सुधरेगी और उसे सही दिशा मिलेगी। इस क्रान्ति से ही शिक्षा के परिदृश्य में छाया हुआ कुहासा मिटेगा और उसका विद्या वाला स्वरूप निखरकर सामने आएगा। तभी पता चलेगा कि शिक्षा जीवन की सभी दृश्य एवं अदृश्य शक्तियों का विकास है। तभी जाना जा सकेगा कि विचार और संस्कार से ही व्यक्तित्व गढ़े जाते हैं। इसके बिना पुस्तकीय ज्ञान गर्दन तोड़, कमर तोड़ बोझ के सिवा और कुछ नहीं। शिक्षा जगत् में एक नयी क्रान्ति होने से सूझ-बूझ, सोच-समझ के नए आदर्श प्रकट होंगे। और तभी साहस, संकल्प एवं श्रम की सामर्थ्य से भरे-पूरे प्रचण्ड आत्मबल के धनी मनुष्य का जन्म होगा। रोने-गिड़गिड़ाने वाले, दीन-हीन, सम्मान और स्वाभिमान से विहीन, परमुखापेक्षी मनुष्य कहे जाने वाले प्राणियों की भीड़ छँटेगी।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय का जन्म इसी क्रान्ति को प्रकट करने के लिए हुआ है। युग ऋषि की यह संकल्प सृष्टि, उन्हीं की दृष्टि के अनुरूप शिक्षा को जीवन जीने की कला के रूप में विकसित करने के लिए हुई है। ध्यान रहे जीवन मिलता नहीं, निर्मित करना होता है। इसीलिए मनुष्य को शिक्षा की जरूरत है। शिक्षा का एक ही अर्थ है कि हम जीवन की कला सीख सकें। इस बारे में एक बड़ी मीठी कथा है-

एक घर में बहुत दिनों से एक वीणा रखी थी। उस घर के लोग उस वीणा का उपयोग भूल गए थे। पीढ़ियों पहले कभी उस घर के पूर्वज उस वीणा को बजाते रहे थे। बाद में किसी बाहर वाले के प्रभाव से उस घर के लोगों ने वीणा बजाना बन्द कर दिया। उसी की चाकरी करने लगे। बाहर वाले ने उन्हें वीणा बजाना छुड़ाकर चाकरी करना सिखा दिया था। उसके चले जाने के बाद भी घर के लोगों की आदत नहीं बदली। घर की वीणा कोने में पड़ी, धूल खाती रही। अब तो कभी कोई भूल से बच्चा छलाँग लगाकर उस वीणा को गिरा देता, तो आधी रात में उसके तार झनझना जाते, घर के लोगों की नींद टूट जाती। वह वीणा एक उपद्रव का कारण हो गयी। अन्ततः उस घर के लोगों ने एक दिन तय किया कि वीणा को फेंक दें- जगह घरेती है, कचरा इकट्ठा करती है और शान्ति में बाधा डालती है। उन सबने मिलकर वीणा को घर के बाहर कूड़ेदान में फेंक दिया।

वे लौट नहीं पाए थे कि एक साधु उधर से गुजरा। उसने वह वीणा उठा ली और उसके तारों को छेड़ दिया। फिर तो जैसे उस घर में क्रान्ति हो गयी। सबके सब उस साधु को घेर कर खड़े हो गये, उस रास्ते से और भी जो निकला, ठिठककर खड़ा हो गया। वहाँ भीड़ लग गयी। वह साधु मंत्रमुग्ध होकर वीणा बजा रहा था। जब उन्हें वीणा का स्वर संगीत मालुम पड़ा और जैसे ही उस साधु ने वीणा वादन बन्द किया, कि सब झपट पड़े, बोले, यह वीणा हमारी है, इसे हमें लौटा दो। साधु हंसा, पहले बजाना तो सीख लो, अन्यथा फिर उपद्रव खड़े होंगे। बजाना न आता तो वीणा घर की शान्ति भंग करने लगती है। यदि बजाना आता है तो वीणा घर को शान्तिपूर्ण और संगीतमय बना सकती है।

कथा का सार इतना ही है कि जीवन भी एक वीणा है। जीवन हम सबको मिल जाता है, लेकिन उस जीवन की वीणा को बजाना बहुत कम लोग सीख पाते हैं, प्रायः नहीं ही सीख पाते हैं। इसीलिए इतनी उदासी है, इतना दुःख है, इतनी पीड़ा है। इसीलिए देश और संसार में इतना अंधेरा है, इतनी हिंसा है, इतनी घृणा है। इसीलिए जगत् में इतना युद्ध है, इतना वैमनस्य है, इतनी शत्रुता है। जो संगीत बन सकता था जीवन, वह विसंगीत बन गया है, क्योंकि हम उसे बजाना नहीं जानते हैं।

शिक्षा जगत् में एक नयी क्रान्ति का इतना ही अर्थ है कि समूचा देश, सारा मानवीय जीवन अपनी जीवन वीणा को बजाना सीख ले। आज की शिक्षा, जिसमें अभी भी गुलामी के भद्दे दाग हैं- वह जीवन संगीत की उपेक्षा करना सिखाती है। विद्यार्थियों में प्रथम कक्षा से ही पनपती है, एक दूसरे को गला काटने वाली विचारहीन प्रतियोगिता। इससे जन्मती है अहंकार से भरी आकाँक्षाएँ। जिसकी ये आकाँक्षाएँ पूरी हो जाती है, वह और भी अधिक अहंकार से भर जाता है। जिसकी नहीं पूरी हो पाती, वह और भी अधिक निराशा एवं कुण्ठा के अंधेरों में जा गिरता है। जबकि सबके जीवन में अपनी मौलिकता है, सभी के जीवन पुष्प की अपनी सुगन्ध है। भगवान् ने धरती पर किसी को किसी से तनिक भी न्यून नहीं बनाया है। बस उसे उसके अपने मौलिक विकास के अवसर मिलने चाहिए। फिर तो सभी के जीवन-पुष्प समान रूप से अपनी-अपनी अनूठी सुगन्ध बिखेरने लगेंगे।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में शिक्षा की यही नयी क्रान्ति होने जा रही है। यहाँ आध्यात्मिक दृष्टि से विद्यार्थी की मौलिकत्व को परखकर उसका भरपूर विकास किया जाएगा। मनुष्य जीवन के हर तल पर अपरिमित ऊर्जा समायी है। देह, प्राण, मन, बुद्धि के छोटे-छोटे हिस्से में सम्भावनाओं के महासागर भरे पड़े हैं। बस इनकी सही और सटीक अभिव्यक्ति की कला खोजनी है। नए मनुष्य को गढ़ने वाले जीवन मूल्यों को अर्थ देना है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में यही होने जा रहा है। सम्भव है ऐसी या इससे मिलती, जुलती बातें पहले भी कही गयी हो। पर यहाँ की बात कुछ और ही है। यहाँ कहा नहीं किया जा रहा है। यहाँ केवल शिक्षा जगत् में सार्थक क्रान्ति की तस्वीरें नहीं प्रदर्शित की जा रही हैं। यहाँ तो महाक्रान्ति की ज्वालाएँ जाग उठी हैं, जिसमें व्यर्थ का कूड़ा-कचरा जल रहा है और नयी सार्थकता की चमक पैदा हो रही है।

इस क्रान्ति का मौलिक सूत्र है कि ‘शिक्षा आन्तरिक अंकुरण है, बाहरी आरोपण नहीं।’ यहाँ आने वाले विद्यार्थी पुस्तकीय ज्ञान के बोझ से लदने के बजाय अपने आन्तरिक ज्ञान का विकास करेंगे। उन्हें मानव जीवन की दिव्य शक्तियों का ज्ञान कराया जाएगा। यह ज्ञान होने से उन्हें यह बोध होगा कि जीवन का अर्थ परमुखापेक्षी और परावलम्बी होना नहीं, बल्कि अपने साहस, संकल्प, श्रम एवं मनोयोग के बलबूते सब कुछ कर गुजरने में समर्थ होना है। यह कथ्य-तथ्य है और सत्य भी। जिन्हें इसकी अनुभूति पानी हो वे देव संस्कृति विश्वविद्यालय के परिसर में पधारें और देखें, कैसे यहाँ मैकाले के भूत को भगाया जा रहा है? किस तरह शिक्षा जगत् की एक नयी क्रान्ति साकार रूप ले रही है। इस क्रान्ति के सत्य ने ही विश्वविद्यालय की विश्वदृष्टि को जन्म दिया है। जिसके प्रभाव से यहाँ राष्ट्र और विश्व की अगणित समस्याओं के समाधान खोजे और पाए जा रहे हैं।


विश्व दृष्टि ही उबारेगी आज की संकीर्ण सोच से

विश्व दृष्टि देव संस्कृति विश्वविद्यालय की मौलिक विशेषता है और रहेगी। इसका मतलब दुनिया भर में फैले हुए ज्ञान की सभी किताबों के पन्ने पलटने से कहीं बहुत ज्यादा है। इसमें विश्व जितनी व्यापकता, विशालता एवं विस्तार है। चिन्तन की दृष्टि के इसी उदार भाव से आज के युग प्रश्न हल होंगे। संकीर्ण, सीमाओं से आबद्ध और आग्रहों से जकड़ी हुई सोच किसी भी तरह काम आने वाली नहीं है। आज की दुनिया नयी है, एकदम बदली हुई। लेकिन हमारी सोच वही पुरानी है, अपनी सीमाओं से बंधी, अनेक आग्रहों से लिपटी। दोनों के बीच कोई ताल-मेल नहीं है। और इसी कारण सब ओर समस्याएँ हैं, सवाल हैं, समाधान कहीं भी किसी तरफ नजर नहीं आते।

क्योंकि हम जो उत्तर ढूंढ़ते हैं, वह तो हमारी सोच की ही भाँति पुराना और मरा है। आज दुनिया के सामने बड़ी अजीब घड़ी है, जिन्दा प्रश्न मरे हुए उत्तरों की लाशें ढो रहे हैं। इस बेवजह के वजन से प्रश्नों की बौखलाहट और ज्यादा बढ़ गयी है। वे अधिक क्रुद्ध एवं परेशान होकर ध्वंस मचाने और आतंक फैलाने पर आमादा हो गए हैं। मनीषी हैरान हैं और विचारशील व्यथित, उन्हें सूझ ही नहीं रहा कि आखिर हो क्या गया है? वे सोचते हैं कि आखिर बात क्या है? बात दरअसल यह है कि उनके उत्तर मरे हुए हैं और प्रश्न जीवन्त हैं।

जैसे मरे हुए आदमी और जिन्दा आदमी के बीच कोई बातचीत नहीं हो सकती। ठीक ऐसे ही हमारे समाधानों और हमारी समस्याओं के बीच कोई बातचीत नहीं हो पा रही। एक तरफ समाधानों का ढेर है और एक तरफ समस्याओं का ढेर। लेकिन दोनों के बीच कोई सेतु नहीं है, क्योंकि सेतु हो ही नहीं सकता। मुर्दा और जिन्दा के बीच संवाद की कोई सम्भावना नहीं है। इनके बीच जबरदस्ती संवाद पैदा कराने की कोशिश में जीवन उलझता जा रहा है। इस उलझन से छुटकारा पाने के लिए हमें अपनी बुनियादी भूल समझनी होगी। यह बात अच्छी तरह से जाननी होगी जीवन के प्रवाह में सब का सब बदल चुका है। आज के सवाल एकदम नए और ताजे हैं।

यह सत्य विश्वदृष्टि से ही देखा, जाना और समझा जा सकता है। जिनके पास यह नजर है वे देख रहे हैं कि दुनिया बड़ी तेजी से पुरानी दीवारों को गिरा कर एक होने की कोशिश में है। इस कोशिश में सभ्यताओं, संस्कृतियों की दीवारों में लगातार दरारें आ रही हैं। पहले तो यातायात के साधनों में सुगमता, उस पर से संचार क्रान्ति, इलेक्ट्रानिक युग का अवतरण, टेलीफोन और कम्प्यूटरों का संजाल। भौतिक दूरियों जैसी कोई बात रह ही नहीं गयी। लेकिन इस बदलाव ने अनेकों नए सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे सवाल जो पहले कभी देखे और सुने नहीं गए।

ये सवाल मान्यताओं, रीति रिवाजों एवं परम्पराओं के उलझ जाने से उठ खड़े हुए हैं। इस साँस्कृतिक एवं सामाजिक उलझन के अलावा वैज्ञानिक उलझनें भी है। वैज्ञानिक प्रयोगों के सत्परिणाम हैं तो दुष्परिणाम भी हैं। पर्यावरण का संकट दुनिया को लीलने-निगलने के लिए तैयार खड़ा है। संस्कृतियाँ और सभ्यताएँ ही नहीं धर्म और विज्ञान भी टकरा रहे हैं। बदली हुई स्थितियों में ज्ञान की तीव्रता से विस्फोट हुआ है। दुनिया भर के बच्चों में प्रतिभा एवं बौद्धिक क्षमता पहले की तुलना में आज कई गुना ज्यादा है। अगर इसका समय रहते सही सुनियोजन न किया गया तो इसके भटकने, बहकने और विध्वंसक हो उठने का भारी खतरा है।

ये और ऐसे ही अनेक, अनगिनत सवालों के जवाब पुरानी सोच के सहारे नहीं खोजे जा सकते। इन युग प्रश्नों का हल खोजने के लिए विश्व दृष्टि की आवश्यकता है। क्योंकि इसी से यह सच देखा जा सकता है कि पुरानी पड़ चुकी सभ्यताओं एवं संस्कृतियों के खण्डहरों से विश्व संस्कृति जन्म ले रही है। आज होने वाली सभी क्रान्तियाँ इसके जन्म की शुभ सूचना है। लेकिन इस शुभ सूचना में युग प्रश्नों की आहटें भी हैं। इन्हीं के समाधान से भावी विश्व संस्कृति का ढाँचा तैयार होगा। उसमें प्राणचेतना प्रवाहित होगी। यह सब करने के लिए नए इंसानों को गढ़ने की जरूरत है।

विश्वविद्यालय की विश्व दृष्टि का आदर्श एवं उद्देश्य यही है। यहाँ व्यापक सोच वाले इन्सान गढ़े जाएँगे। ऐसे इन्सान जो पुरानेपन के खोल से बाहर निकलने का साहस जुटा सकें। जिनकी सोच अपनी परम्पराओं, रीति-रिवाजों एवं संकीर्णता के अगणित बन्धनों से मुक्त हो। जो परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देने का साहस कर सकें। ऐसे साहसी व्यक्ति ही विश्व संस्कृति के निर्माता हो सकते हैं। इन्हीं के भरोसे दुनिया अपने सवालों के सही समाधान खोज सकती है। इन नए मनुष्यों में खण्डित दुनिया की उलझनें नहीं, समग्र विश्व की संवेदना स्पन्दित होगी।

कन्फ्यूशियस ने अपनी एक किताब में कुछ ऐसा ही सच बयान किया है। उसने लिखा है कि मेरे पूर्वज कहते थे कि गाँव के पास नदी बहती थी। नदी के उस पार रात को कुत्ते भौंकते थे तो हमें आवाज सुनायी पड़ती थी, लेकिन पता नहीं चलता था कि नदी के पार कौन रहता है? नदी बड़ी थी और नाव खोजी न गयी थी। नदी के पार कोई रहता है, कोई गाँव है, कभी-कभी कुत्तों के भौंकने की आवाज रात के सन्नाटे में सुनायी पड़ती है, लेकिन नाव न थी। उस गाँव की अपनी दुनिया थी, इस गाँव की अपनी दुनिया थी। एक-एक गाँव की अपनी दुनिया थी। एक-एक देश की अपनी दुनिया थी। सारी मनुष्यता जुड़ी न थी। उस खण्डित दुनिया की खण्डित सोच, खण्डित समाधान आज किसी काम के नहीं हैं।

हर युग को अपना विचार पैदा करना होता है, हर युग को अपनी दृष्टि विकसित करनी होती है, जो ऐसा नहीं कर पाते, उनसे युग प्रश्नों की चुनौतियाँ नहीं सम्हलतीं। उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ती है, एक तरफ नए प्रश्नों की मार, दूसरी ओर सड़ी-गली, संकीर्ण सोच की लाशों का भार। इससे उबरने के लिए ही विश्व दृष्टि की जरूरत है। उन नए मनुष्यों को गढ़ने की जरूरत है, जिनमें विश्व दृष्टि की व्यापकता हो। जो जाति, धर्म, संस्कृति की उलझनों को सुलझाने में समर्थ हों। जो जान सकें कि भगवान अगर है तो इस पूरे जगत् में है। हर जगह उसका मन्दिर है, हर जगह उसकी मस्जिद, हर जगह उसके चर्च और गुरुद्वारे हैं। जिसे प्रार्थना करना आता है, वह किसी वृक्ष के नीचे या नदी के तट पर यहाँ तक कि अपने घर की छत पर ही मन्दिर बना सकता है। मन्दिर-मस्जिद या चर्च-गुरुद्वारे के लिए झगड़ा करने की क्या जरूरत है।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय विश्व दृष्टि की ऐसी ही व्यापकता में युग प्रश्नों का समाधान खोजने के लिए संकल्पित और प्रतिबद्ध है। यहाँ दिमाग की कोठरियों में पुस्तकीय ज्ञान को जिस-तिस तरह ठूँसकर, उसमें मजबूत ताला लगा देने वालों की कोई जगह नहीं होगी। यहाँ वे इन्सान जन्म लेंगे, जिनके दिमाग के खिड़की-दरवाजे खुले हों। पुस्तकें जिन्हें प्रेरणा दे, पाबन्दियाँ न लगाएँ। जो विचारशील और विवेकवान् हों, जो प्रश्नों के कारण की जड़ को समझें और उसके समाधान का साहस जुटाएँ। विश्वविद्यालय के सभी क्रियाकलापों, इसके सारे आयामों के पीछे यही विश्व दृष्टि क्रियाशील होगी। यही मूल प्रेरणा यहाँ के समूचे तंत्र को प्रेरित करेगी और इसके माध्यम से प्रवाहित होगी। विश्वविद्यालय का भवन इसकी अभिव्यक्ति का माध्यम बनेगा। यहीं पर युग प्रश्नों का हल ढूंढ़ने वाले नए इन्सान गढ़े जाएँगे।


देव संस्कृति का साधना मंदिर विश्वविद्यालय का भवन

विश्वविद्यालय भवन देव संस्कृति का साधना मन्दिर है। तपस्वी साधकों के लिए तप-साधना की प्रक्रिया एवं प्रणाली के साथ साधना स्थल का भी महत्त्व होता है। इस महत्त्व को ध्यान में रखते हुए ही विश्वविद्यालय भवन का निर्माण व विकास किया जा रहा है। इतिहास के पृष्ठ प्राचीन भारत के तक्षशिला, नालन्दा एवं विक्रमशिला आदि विश्वविद्यालयों की गौरव गाथा सुनाते हैं। इस गौरव गान में इन विश्वविद्यालयों के भवनों के मधुर गीत भी हैं। इस बात का भी उल्लेख है कि प्राचीन विश्वविद्यालयों के भवनों में आचार्यों एवं अन्तेवासी विद्यार्थियों के लिए विद्या-साधना के लिए किस-किस भाँति अनुकूलताएँ थी। इतिहास गवाही देता है कि यहाँ साधना के साधन जुटाए गए थे, लेकिन सुख के साधनों से परहेज बरती गयी थी।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय का भवन इसी ऐतिहासिक सच को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। इस भव्य भवन के वास्तुशिल्पियों, निर्माणकर्त्ता यन्त्रियों की दृष्टि इस बारे में अत्यन्त परिष्कृत है। उन्हें देव संस्कृति के इस साधना मन्दिर में होने वाली भविष्यत् विद्या साधनाओं का पूरा ध्यान है और ज्ञान है। वे अपने कार्य के व्यापक उद्देश्यों से उत्साहित हैं, भाव विभोर हैं। यंत्री होने के बावजूद उनमें याँत्रिकता जरा भी नहीं है। उनमें तो साँस्कृतिक संवेदना छलकती है। वे सभी अपने द्वारा किए जाने वाले कठोर श्रम को तप साधना ही मान रहे हैं। इन सभी की सम्मिलित संवेदना की सजलता एवं सघनता के कारण विश्वविद्यालय भवन कुछ लाख-करोड़ ईंटों के जोड़ से कहीं बहुत अधिक हो गया है।

संस्कृति-साधना के इस मन्दिर के मुख्य परिसर में ही अभी निर्माण कार्य हो रहा है। एक लाख वर्गमीटर से कहीं अधिक क्षेत्रफल में इस मुख्य परिसर का प्रसार है। विश्व विद्यालय भवन के अन्य परिसरों के लिए आस-पास की भूमि क्रय करने की बात चल रही है। पर जहाँ तक निर्माण की बात है, वह अभी इस मुख्य परिसर या मेन कैम्पस में ही केन्द्रित है। इसके कुछ अंश बन चुके हैं, कुछ अभी निर्माणाधीन है। इतिहास विनिर्मित करने वाली इस संरचना को बड़े ही समर्पित, संकल्पित एवं साहसी हाथ गढ़ रहे हैं। उनके इस सृजन कार्य में अतीत की प्रेरणाएँ हैं, वर्तमान की संवेदनाएँ हैं और भविष्य की संकल्पनाएँ हैं। जो एक साथ-एक जुट हो निराकार से साकार हो रही हैं।

इस मुख्य परिसर में जो भवन बन चुके हैं, उनमें से सर्वप्रथम ‘देव संस्कृति विश्वविद्यालय’ का मुख्य भवन है। तीन मंजिला यह भवन 4065 वर्गमीटर में बना हुआ है। इसमें तीस बड़े हॉल हैं। इनमें से 29 ऐसे हैं, जिनमें से कुछ में अभी भी कक्षाएँ चल रही हैं। कुछ में कार्यालय एवं ग्रन्थालय है। इस भवन के भूमिखण्ड में एक हाल बहुत बड़ा है जो बहुउद्देशीय है। निर्मित अंशों में एक विशाल भण्डार गृह है। तीन मंजिला यह भण्डार गृह 1387 वर्गमीटर में फैला हुआ है। इसमें सामान चढ़ाने-उतारने के लिए एक अत्याधुनिक गुड्स लिफ्ट लगी हुई है। विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों में उपयोग आने वाले सामानों को रखने के लिए इसमें अलग-अलग कक्ष है।

निर्माणाधीन भवनों में सबसे मुख्य भवन छात्रावास का है। इसका विस्तार 7035 वर्गमीटर में है। इस भवन में ऐसी 72 डारमिट्री बनायी जा रही है, जिनमें से प्रत्येक में 8 छात्र बड़े आराम से रह सकें। इसके अलावा इसमें दो बड़े हाल और एक रसोई घर है। यह भवन भी तीन मंजिल वाला है। इसके प्रत्येक कक्ष को विद्यार्थियों की विद्या साधना को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। और उसी अनुरूप इसे बनाया जा रहा है। यहाँ रहने वाले विद्यार्थी सब तरह की अनुकूलता में अपना विद्या अध्ययन एवं तप साधना सम्पन्न कर सकेंगे निर्माणाधीन परिसरों में आवासीय परिसर भी है। इस परिसर का विस्तार 8507 वर्गमीटर में है। तीन मंजिल वाले इन भवनों में 129 फ्लैट बनाए जा रहे हैं। इनमें से एक कमरे वाले फ्लैट 48 और दो कमरों वाले फ्लैट 54 है। तीन कमरों वाले फ्लैट की संख्या 18 और चार कमरों वाले फ्लैट 9 हैं। ये सभी आवास विश्वविद्यालय के आचार्यों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए हैं। इन सभी आवासों का निर्माण इस ढंग से किया जा रहा है कि यहाँ रहने वाले सभी लोग सुखपूर्वक अपनी तप साधना करते हुए देव संस्कृति के विस्तार में अपना सहयोग दे सकें।

जिन भवनों का निर्माण अभी प्रस्तावित है, उनमें आयुर्वेद अनुसन्धान केन्द्र मुख्य है। हालाँकि इससे जुड़ी हुई आयुर्वेद फार्मेसी बनायी जा चुकी है। निर्मित हो चुकी आयुर्वेद फार्मेसी का तिमंजिला भवन 1423 वर्गमीटर में बनाया गया है। सामान चढ़ाने-उतारने के लिए इसमें गुड्स लिफ्ट की समुचित व्यवस्था है। इसमें शुद्धिकरण, चूर्णन एवं प्रयोगशाला के अलग-अलग कक्ष हैं। प्रस्तावित आयुर्वेद अनुसन्धान केन्द्र 6044 वर्गमीटर में तीन मंजिल वाला बनेगा। इसमें अनुसन्धान के विभिन्न उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशालाएँ होगी। रोगियों के लिए वार्ड, बाह्य रोगी विभाग, आयुर्वेद प्रदर्शनी एवं आयुर्वेद ग्रन्थालय के कक्ष बनाए जाएँगे। इस भवन में रोगियों एवं चिकित्सा विज्ञानियों के लिए तीन लिफ्ट लगाए जाने की भी व्यवस्था है।

प्रस्तावित भवनों में प्रशासनिक भवन एवं सभागार (प्रेक्षागृह) भी महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें से दो मंजिला प्रशासनिक भवन 1162 वर्गमीटर में बनाया जाएगा। इसमें दूरभाष केन्द्र, स्वागत कक्ष, कम्प्यूटर नेटवर्क, सूचना कक्ष, लेखा एवं मुख्य कार्यालय होगा। सभागार 1159 वर्गमीटर में बनेगा। सभागार का भवन सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त होगा। स्वावलम्बन संकाय के लिए एक विशेष भवन बनाया जाना प्रस्तावित है। इसका नाम स्वावलम्बन भवन होगा। तीन मंजिला यह भवन 2040 वर्गमीटर में बनेगा। इसमें प्रशिक्षण कक्ष, प्रयोगशालाएँ, प्रदर्शनी एवं कार्यशालाएँ होगी। इसी के साथ 1221 वर्गमीटर में पाँच मंजिलों वाला मुख्य ग्रन्थालय भवन का निर्माण भी प्रस्तावित है। इसकी हर मंजिल में प्रत्येक संकाय के स्वतंत्र ग्रन्थालय होंगे। ये सभी पाँचों कक्ष अष्टभुजी बनाए जाएँगे। इन सबके ऊपर साढ़े तीन लाख लीटर की क्षमता वाली पानी की टंकी बनायी जाएगी। और इसके भी ऊपर बेधशाला बनाए जाने का प्रस्ताव है। जिसमें ज्योतिष-गणित का अध्ययन की व्यवस्था होगी। यह ग्रन्थालय भवन पैनोरैमिक लिफ्ट की सुविधा से युक्त होगा।

इसके अलावा इस मुख्य परिसर में 536 वर्गमीटर में भगवान महाकाल का मन्दिर होगा। जिसमें विद्या साधकों के लिए ध्यान कक्ष एवं अर्चना कक्ष होंगे। इसी के पास 358 वर्गमीटर क्षेत्र में यज्ञशाला बनायी जाएगी। इस परिसर में ज्योतिष केन्द्र भी बनेगा। जिसमें प्राचीन ज्योतिष के गणित एवं फलित दोनों ही आयामों पर आधुनिक विज्ञान के परिदृश्य में अनुसंधान किए जाएँगे। इस परिसर में आधुनिकतम सीवेज ट्रीटमेण्ट प्लाण्ट स्थापित करने की भी योजना है। जिसकी क्षमता 3 लाख लीटर होगी। आपातकालीन व्यवस्था के लिए यहाँ अग्निशमन केन्द्र भी होगा। इस परिसर में 2947 वर्गमीटर का पार्किंग स्थल बनाया जाना भी प्रस्तावित है। विश्वविद्यालय के इस मुख्य परिसर के सभी भवनों को जोड़ने के लिए 2.26 किलोमीटर लम्बी सड़क बनायी जाएगी। परिसर का खुला हुआ क्षेत्र जो 70 हजार वर्गमीटर से भी अधिक है, वहाँ हिमालय की दिव्य जड़ी-बूटियों का सुरम्य उद्यान विकसित किया जा रहा है।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के भवन की योजना का विस्तार अति व्यापक है। शान्तिकुञ्ज के समीप हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर बन रहे इस मुख्य परिसर के अलावा विश्वविद्यालय के अन्य परिसर भी होंगे। जहाँ विश्वविद्यालय भवन अपना विस्तार करेगा। विश्वविद्यालय के इसी सुविस्तृत भवन में विश्वविद्यालय की व्यवस्था का संचालन होगा। यहीं से देवसंस्कृति की कलियाँ महकेंगी और किरणें चमकेगी। इस सुगन्ध और प्रकाश से समूचा राष्ट्र एवं समस्त विश्व भर उठेगा।


विराट व्यवस्था तन्त्र एवं उसकी बारीकियां

विश्वविद्यालय की व्यवस्था में भावी सम्भावनाएँ समायी हैं। व्यवस्था का स्थान कहीं भी किसी भी संस्था में महत्त्वपूर्ण होता है। इसके स्वरूप और क्रियाविधि पर संस्थाओं का जीवन निर्भर करता है। इसमें उलट-फेर होने से संस्थाओं के ढाँचे बदल जाते हैं। यह विचारों और आदर्शों को क्रियान्वित करने वाला तन्त्र है। व्यवस्था के माध्यम से ही विचार और आदर्श अभिव्यक्त होते हैं, मूर्त होते हैं और साकार रूप लेते हैं। इसमें छोटी सी गड़बड़ी विचारों एवं आदर्शों को विकृत करने के लिए पर्याप्त है। इसी से संस्था के हर छोटे-बड़े हिस्से को जीवन एवं प्राण मिलते हैं। प्राण पनपते कहीं हों, पर उसके प्रवाह को संस्था की रग-रग में पहुँचाने की जिम्मेदारी व्यवस्था की है। इसमें थोड़ी सी ढिलाई होने पर संस्था के अंग-अवयव सूखने, मुरझाने और मरने लगते हैं।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में इसका महत्त्व और भी अधिक है। क्योंकि यहाँ तथ्य विचारों और आदर्शों की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है। यहाँ तो आदर्श गढ़े जाने हैं। बात सिर्फ विश्वविद्यालय के सुचारु संचालन की नहीं है, यहाँ की व्यवस्था पर जिम्मेदारी कहीं अधिक है। उस पर प्रतिभाओं के अन्वेषण एवं सुनियोजन के साथ उत्पादन और अभिवर्धन का भी भार है। यहाँ की व्यवस्था को देव संस्कृति के सनातन मूल्यों को प्रकट ही नहीं करना है, इन्हें प्रकट करने लायक व्यक्तियों को गढ़ना है। आज के मूल्य विहीन दौर में यह काम आसान नहीं है। जब सब ओर आपा-धापी मची है, व्यवस्था शासन और सत्ता के सुख का पर्याय बनकर रह गयी है, ऐसे में आदर्श और सेवा परायण व्यवस्था का गठन गंगा अवतरण के समान दुःसाध्य कर्म है।

इस भगीरथ श्रम को करने की जिम्मेदारी शान्तिकुञ्ज ने स्वयं उठायी है। शान्तिकुञ्ज के लोक हितकारी क्रियाकलापों से अभिभूत होकर शासन ने भी इसमें सहमति प्रदान की है। सभी की सोच यही है कि यह विश्वविद्यालय अन्य सभी सरकारी विश्वविद्यालयों से अलग ही हटकर हो। इसमें राष्ट्रहित, समाजहित और विश्वहित की ऐसी पौध उगायी जाए, जो अन्य स्थानों पर किन्हीं कारणों वश नहीं उग पाती है। शान्तिकुञ्ज-शासन सहित अपने परिजनों, देशवासियों, प्रवासी भारतीयों एवं विश्व भर के भारत और भारतीय संस्कृति के अनुरागियों की इस अपेक्षा को पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है। तभी उसने देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ इसकी व्यवस्था के संचालन का जिम्मा स्वयं लिया है।

शान्तिकुञ्ज के प्रतिनिधि के रूप में विश्वविद्यालय की व्यवस्था के प्रमुख का दायित्व इस पत्रिका के सम्पादक ने सम्हालने का जिम्मा लिया है। शासन की सहमति व अनुरोध से डॉ. प्रणव पण्ड्या देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति या चान्सलर बनाए गए हैं। सामान्यतया विश्वविद्यालयों में इस पद का भार प्रदेश के महामहिम राज्यपाल सम्हालते हैं। पर यहाँ सब कुछ शान्तिकुञ्ज को सम्हालना एवं चलाना है। शान्तिकुञ्ज की प्रतिष्ठ, गरिमा एवं आदर्शनिष्ठ को परखते हुए इसमें शासन की सहर्ष स्वीकृति एवं सहमति है। कुलाधिपति की अध्यक्षता में उन्हीं के द्वारा विश्वविद्यालय की शासन परिषद या बोर्ड ऑफ गवर्नर्स का गठन किया जाएगा। यह परिषद ही एक विशिष्ट पैनल की अनुशंसा एवं कुलाधिपति की सहमति व निर्देश से विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति करेगी। नियुक्त किए कुलपति भी इस परिषद के सदस्य होंगे। शासन परिषद के अन्य सदस्यों में शान्तिकुञ्ज के श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट द्वारा मनोनीत पाँच प्रतिनिधि तथा कुलाधिपति द्वारा मनोनीत किए गए दो विशेषज्ञ विद्वान् होंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा उत्तराँचल शासन द्वारा नामाँकित एक-एक सदस्य भी इस शासन परिषद के सदस्य होंगे। यह परिषद देव संस्कृति विश्वविद्यालय की नीति-निर्मात्री तथा विशिष्ट अधिकारों से सम्पन्न सर्वोच्च परिषद होगी।

इसके आधीन देव संस्कृति विश्वविद्यालय की प्रबन्ध परिषद का गठन होगा। इस प्रबन्ध परिषद के अध्यक्ष विश्वविद्यालय के कुलपति होंगे। प्रबन्ध परिषद के सदस्यों में शान्तिकुञ्ज के श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट द्वारा मनोनीत पाँच प्रतिनिधियों के साथ, विश्वविद्यालय के दो वरिष्ठ आचार्य, कुलाधिपति द्वारा मनोनीत किए गए विश्वविद्यालय के दो संकायाध्यक्ष (डीन) और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं उत्तराँचल शासन का एक-एक नामाँकित प्रतिनिधि होगा। विश्वविद्यालय के कुल सचिव (रजिस्ट्रार) इस प्रबन्ध परिषद के सचिव होने के साथ इसके सदस्य भी होंगे। यह प्रबन्ध परिषद विश्वविद्यालय की सभी व्यवस्थाओं को प्रत्यक्ष रूप से सम्हालेंगी। और समय-समय पर अपने कार्यों का समस्त ब्यौरा शासन परिषद को देगी और उससे उचित निर्देश प्राप्त करेंगी।

विश्वविद्यालय की व्यवस्था का संचालन करने वाली यही दो प्रमुख परिषदें होंगी। मुख्य रूप से इन्हीं पर व्यवस्था को आदर्शपूर्ण एवं उद्देश्यनिष्ठ बनाए रखने का दायित्व होगा। इनमें से प्रबन्ध परिषद का विश्वविद्यालय के सभी छोटे-बड़े कार्यों में प्रत्यक्ष नियंत्रण होगा। इस प्रबन्ध परिषद का नियंत्रण शासन परिषद करेगी। जिसके प्रमुख कुलाधिपति स्वयं होंगे। बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की सहमति एवं स्वीकृति से प्रबन्ध परिषद विश्वविद्यालय की अन्य समितियों, परिषदों का गठन करेगी। इनमें से दो मुख्य होगी, प्रथम विद्या परिषद एवं द्वितीय वित्त परिषद। इन दोनों के ही अध्यक्ष विश्वविद्यालय के कुलपति होंगे। इनमें से विद्या परिषद अध्ययन-अध्यापन सम्बन्धी कार्यों की नीति-निर्मात्री समिति होगी। वित्त परिषद का कार्य विश्वविद्यालय की वित्तीय आवश्यकताओं एवं कार्यों का नियंत्रण एवं नियमन करना होगा। इसके अलावा भी अन्य छोटी-बड़ी समितियाँ एवं उपसमितियाँ होंगी, जो विश्वविद्यालय की व्यवस्था सम्बन्धी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए गठित की जाएगी।

व्यवस्था का कोई पहलू छोटा हो या बड़ा, किसी भी परिषद की कोई सदस्यता हो, इसमें वही व्यक्ति भागीदार होंगे, जिनके लिए सुविधा नहीं, सेवा महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए चार मानदण्ड निर्धारित किए गए हैं। जिनमें पहला है- विनम्रता। इसका तात्पर्य व्यक्ति के इस गुण से है, जो उसे उत्तेजना, कठिनाई एवं आपत्ति के क्षणों में भी सहनशील बनाता है। उसके अन्दर औरों को सम्मान देने की, दूसरों से मृदु व्यवहार की वृत्ति को विकसित करता है। दूसरा मानदण्ड- प्रामाणिकता है। प्रामाणिकता का मतलब है- धन एवं चरित्र के मामले में ईमानदार रहना। वह व्यक्ति प्रामाणिक है, जिसे लोभ डिगा न पाए, आसक्ति लुभा न पाए। इसका एक अर्थ दृष्टि एवं जीवन की पवित्रता भी है। परिस्थितियाँ कुछ भी हों, पर जीवन में पवित्रता वैसी ही चमकती-दमकती रहे। मन को, जीवन को किसी भी कलुष की कालिमा न छूने पाए।

विश्वविद्यालय की व्यवस्था के सभी सदस्यों के लिए तीसरा अनिवार्य मानदण्ड कर्मनिष्ठ रखा गया है। व्यवस्था के किसी भी स्तर में वे व्यक्ति भागीदार बनाए जाएँगे, जिनके लिए विश्वविद्यालय का कोई भी छोटा-बड़ा काम श्रेष्ठ है। जो अपनी सुविधाओं को भूलकर कभी भी, किसी भी समय विश्वविद्यालय के उद्देश्यों के लिए समर्पित भाव से कर्मरत रहें। यह कर्मनिष्ठ विश्वविद्यालय की केन्द्रीय परिभाषा बनेगी। व्यवस्था के सदस्यों के लिए चौथे अनिवार्य मानदण्ड के रूप में त्यागवृत्ति है। त्याग का अर्थ है- न्यूनतम में जीवन जीने की आदत। इसे कठोर तपस्वी जीवन भी कहा जा सकता है। सुविधाओं के लिए ललचाने और तरसने वाले व्यक्ति ऋषियों के जीवन सन्देश का प्रसार करने में सहायक नहीं हो सकते। संक्षेप में ये चारों ही मानदण्ड ऋषि जीवन के अनुशासन हैं। इन अनुशासनों को प्रसन्न भाव से स्वीकारने वाले व्यक्ति ही विश्वविद्यालय की व्यवस्था के सदस्य होंगे। ऐसे निरहंकार, निराभिमानी, सच्चरित्र, कर्मनिष्ठ एवं ऋषिकल्प जीवन वाले व्यक्ति ही विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की दृष्टि एवं दिशा तय करेंगे।


जीवनदृष्टि से ओतप्रोत विद्याप्रधान पाठ्यक्रम

पाठ्यक्रमों की दृष्टि एवं दिशा से ही विश्वविद्यालय की मौलिक विशेषताएँ जन्म लेंगी। इसी से देव संस्कृति के उद्देश्यों को पाने की राहें बनेंगी। इसी के द्वारा पुरातन ऋषियों की सनातन विरासत को नूतन पीढ़ी को सौंपा जा सकेगा। पाठ्यक्रम अनेकों जगह बनते हैं और अनेक तरह से बनते हैं- इनका बनना महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण है इनकी दृष्टि एवं दिशा। जो पढ़ाया जा रहा है, वह क्या है? और क्यों पढ़ाया जा रहा है? ये क्या और क्यों के प्रश्न चिह्न प्रायः अनुत्तरित रहते हैं। कम से कम विद्यार्थीगण तो इनका जवाब पाने में प्रायः असफल ही रहते हैं। यदि किसी तरह उन्हें जवाब मिलते भी हैं तो गलत-सलत। उदाहरण के लिए क्या के उत्तर में उन्हें कुछ विषयों के नाम रटा दिए जाते हैं। और क्यों के उत्तर में उनके मन तरह-तरह के लालच की लार से भीगे रहते हैं।

क्या यही देश के भविष्य को गढ़ने की उचित विधि है? क्या यही वह विद्या है, जिसकी महिमा ऋषियों ने ‘सा विद्या या विमुक्तये’ कह कर बखानी है। इन सवालों के उत्तर निराशा जनक हैं। निराशा की इस अंधेरी भूल-भुलैया में दृष्टि का प्रकाश एवं दिशा का बोध बनकर रह जाते हैं। बहुतेरी देशी-विदेशी उपाधियाँ बटोरने के बावजूद जिन्दगी में सही सोच और समझ नहीं विकसित हो पाती। पढ़ाई और जीवन दोनों अलग-थलग पड़े रहते हैं। कभी-कभी तो दोनों एक दूसरे से विमुख हो जाते हैं। आपस में विरोधी बन जाते हैं। ये सारी भूले वहाँ से पनपती है, जहाँ से पाठ्यक्रम जन्म लेते हैं।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के संचालक इस सच को जानते हैं। तभी यहाँ पाठ्यक्रमों की दृष्टि एवं दिशा पर बहुत चिन्तन-मन्थन किया गया है। आगे भी यह प्रक्रिया चलती रहेगी। अभी तक के निष्कर्षों के आधार पर यह सोचा गया है कि पाठ्यक्रम मनुष्य जीवन से जुड़े और गुँथे होने चाहिए। पाठ्यक्रम एवं जीवन यदि दोनों एक दूसरे के पर्याय न बन सके, तो पढ़ने वालों में हमेशा ही जीवन दृष्टि का अभाव बना रहेगा। जीवन छोटा नहीं है, इसकी व्यापकता बहुत विस्तृत है। मनुष्य के देह, प्राण, मन तो जीवात्मा की तीन परतें भर हैं। इसके विस्तार में प्रकृति-पदार्थ एवं समाज सभी आते हैं। मोटे तौर पर जीवन के दो विभाजन किए जा सकते हैं, आन्तरिक एवं बाह्य। लेकिन यह विभाजन केवल अध्ययन की सुविधा के लिए है। वैसे तो दोनों ही एक दूसरे को प्रभावित करते हैं और एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं।

जीवन के आन्तरिक दायरे में देह, प्राण, मन एवं आत्मा का स्वरूप एवं इसकी गतिविधियों, विकास व अभिव्यक्ति के अनेक आयाम आते हैं। बाहरी दायरे में प्रकृति, पदार्थ, परिस्थिति, परिवेश की गणना होती है। देश, दुनिया, प्राणि, वनस्पति सब इसी में सिमटे-बंधे हैं। जीवन के दोनों आयाम सचल, सजीव, सचेतन और विकासशील है। इनमें जड़ता कहीं भी नहीं है। समस्त विस्तार के कण-कण में शाश्वत की सामयिक अभिव्यक्ति चलती रहती है। सारी विद्याएँ एवं कलाएँ इसी को जानने के उद्देश्य से जन्मी है। यह दृष्टि स्पष्ट होने पर कोई भी विषय जीवन से विमुख न हो सकेगा। भौतिकी एवं रसायन शास्त्र में भी विद्यार्थी योग विज्ञान की ही भाँति अपने जीवन के अर्थ एवं उद्देश्य को खोज सकेंगे, पा सकेंगे। पाठ्यक्रम का विषय एवं स्वरूप कोई भी हो, पर उसमें जीवन सत्य की स्थापना ही उसे जीवन दृष्टि से सम्पन्न करता है।

इसका मतलब केवल इतना है कि पढ़ने वाले विद्यार्थी कोई भी विषय पढ़े, पर उसके पाठ्यक्रम के द्वारा उन्हें अपने जीवन का स्वरूप, अर्थ एवं उद्देश्य साफ-साफ समझ में आना चाहिए। उन्हें साफ-तौर पर अपने वर्तमान एवं भविष्य में पाठ्यक्रम की उपयोगिता एवं आवश्यकता समझ में आनी चाहिए। पाठ्यक्रम में समझाए जा रहे, बताए जा रहे सच में विद्यार्थियों को अपने जीवन की झलक हर हालत में मिलनी चाहिए। उन्हें पढ़ते समय यह महसूस हो कि जो वे पढ़ रहे हैं, वह किसी भी तरह से बोझ नहीं है। यह तो उन्हीं की अपनी जिन्दगी की अबूझ, अनसुलझी एवं रहस्यमयी पहेलियों के रोचक व रुचिकर समाधान है। पाठ्यक्रमों की यही दृष्टि ही शिक्षा को विद्या का रूप देगी। इसी से जीवन का सत्य और बोध प्रकट होगा।

देव संस्कृति विश्व विद्यालय में जो भी पाठ्यक्रम पढ़ाए जाएँगे, सभी में यही जीवन दृष्टि होगी। जीवन दृष्टि से ओत-प्रोत पाठ्यक्रम का निर्माण दुःसाध्य जरूर है पर असाध्य नहीं। इस कठिन कार्य को इन्हीं दिनों यहाँ सम्भव बनाया जा रहा है। विश्वास किया जाता है कि यहाँ प्रवेश पाने वाले सभी विद्यार्थी विश्वविद्यालय के किसी भी पाठ्यक्रम का चुनाव करके एक समान जीवन दृष्टि हासिल कर सकेंगे। इस दृष्टि के सहारे उन्हें जीवन की राहें साफ नजर आएँगी और अपनी मौलिकता के अनुरूप दिशा का चुनाव कर सकेंगे।

दृष्टि से ही दिशा मिलती है। यह सच जीवन का भी है और विश्वविद्यालय में चलाए जाने वाले पाठ्यक्रमों का भी। विद्यार्थियों की मौलिकता व योग्यता के विकास के लिए सामर्थ्य पाठ्यक्रमों की दिशा से ही मिलती है। मोटे तौर पर दो तरह के व्यक्ति संसार में जन्म लेते हैं। एक वे जिनमें विचार संवेदना है, दूसरे वे जिनमें विश्लेषणात्मक तार्किक प्रतिभा है। मनुष्य के इन मौलिक गुणों के अनुरूप ही पाठ्यक्रमों की दिशा निर्धारित की जानी चाहिए। इस कथन का सार संक्षेप केवल इतना है कि पाठ्यक्रमों की दिशा ऐसी हो कि उसके द्वारा मनुष्य की मौलिकताओं का परिष्कार व विकास हो सके। पाठ्यक्रमों की दिशा से ही विद्यार्थियों की प्रतिभा का परिष्कार व विकास होता है। कमल के बीज को विकसित होने के लिए अलग तरह की कीचड़ वाली पानी से भरी जमीन चाहिए। लेकिन गुलाब के बीज भुरभुरी मिट्टी वाली सूखी क्यारियों में उगते हैं। विद्यार्थी की सभी मौलिक विशेषताओं का विकास पाठ्यक्रमों की दिशा निर्धारण का लक्ष्य होना चाहिए।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के संचालकों ने इस सत्य को ध्यान में रखा है। उन्होंने विद्या परिषद एवं पाठ्यक्रम समितियों का गठन इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए किया है। यहाँ पाठ्यक्रम के स्वरूप व प्रकार कई होंगे, पर उन सभी से विद्यार्थी को जीवन की दिशा मिलेगी। अन्य जगहों पर इसके अभाव की वजह से ही उपाधियों के बोझ से लदे विद्यार्थी निराशा और हताशा के गहरे गड्ढों में जा गिरते हैं। किंम् करोमि? क्व गच्छामि? के उनके सवाल कभी हल नहीं होते। क्या करें? किधर जाएँ? के सवाल सारी पढ़ाई खत्म करने के बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ते। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाने वाले सभी पाठ्यक्रम न तो स्वयं दिशा विहीन होंगे और न ही विद्यार्थियों को दिशा विहीन करेंगे।

विषय कोई भी हो, पर विद्यार्थियों की मौलिक सामर्थ्य के परिष्कार एवं विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही सभी पाठ्यक्रम की दिशा तय होगी। पाठ्यक्रमों की दृष्टि एवं दिशा दोनों के ही द्वारा विद्यार्थी देव संस्कृति के जीवन मूल्यों की अमूल्य निधि प्राप्त करेंगे। प्रतिभावान, क्षमतावान, सामर्थ्यवान, प्रचण्ड आत्मबल से सम्पन्न विद्यार्थियों का निर्माण हो, इस विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों का मकसद है। इनका निर्माण देव संस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा गठित की गई विद्या परिषद एवं पाठ्यक्रम समितियाँ करेंगी।


विद्या विस्तार की धुरी- पाठ्यक्रम निर्मात्री परिषद

विद्या परिषद एवं पाठ्यक्रम समितियाँ देव संस्कृति विश्वविद्यालय की विद्या विस्तार योजनाओं का आधार है। पाठ्यक्रमों के निर्माण का दायित्व इन्हीं पर है। इन्हीं के संचालकों द्वारा दी गयी दृष्टि एवं दिशा के अनुरूप पाठ्यक्रमों का स्वरूप तय करना है। यह जिम्मेदारी महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम अनेक साँचों की तरह है, जिनके अनुरूप विद्यार्थियों की मानसिकता ढलती है। ये साँचे ही उनकी योग्यता को संवारते हैं। इन्हीं के द्वारा उनके जीवन में निखार और सुधार आता है। छात्रों के व्यक्तित्व में बीज रूप में समायी अनेकों सम्भावनाओं को साकार कर पाना पाठ्यक्रमों को ठीक ढंग से पढ़ाकर ही सम्भव है। इसलिए विद्या परिषद एवं पाठ्यक्रम समितियों का स्थान विश्वविद्यालय में महत्त्वपूर्ण है।

पुरातन युग में भी विद्या परिषद का गठन किया जाता था। शास्त्रों एवं इतिहास के पन्नों में कई स्थान पर विद्या परिषद या इस जैसी किसी अन्य समिति का उल्लेख मिलता है। कुछ जगहों पर इसे विद्वत्सभा या विद्वत्परिषद भी कहा गया है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में वर्णित ऋषि विमर्षिणी सभा या तत्त्व विचार परिषद इसी विद्या परिषद के ही पर्याय हैं। अनेक नामों वाली इस समिति का प्रधान गुण एक ही था- पाठ्यक्रमों का स्वरूप तय करना। महर्षि विश्वामित्र, महर्षि कण्व एवं महर्षि भरद्वाज जैसे प्रख्यात् ऋषियों द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों पर विचार एवं निर्णय का अधिकार ऋषि विमर्षिणी सभी का ही था। यही सभा तय करती थी कि किस विषय में क्या और कितना पढ़ाया जाय। इस सभा की अध्यक्षता इन विश्वविद्यालय के कुलपति महर्षि स्वयं करते थे।

ऋषि विमर्षिणी सभा या विद्या परिषद की अध्यक्षता करने वाले कुलपति के बारे में बताते हुए शास्त्र वचन है-

छात्राणाँ दश साहस्रं योऽन्नदानादिपोषणात्। अध्यापयति विप्रर्षिरसौ कुलपतिः स्मृतः॥

अर्थात्- जो दस हजार छात्रों के भोजन आदि द्वारा पोषण करके उनके अध्यापन की व्यवस्था करता है, उस विप्रर्षि को कुलपति कहते हैं।

इस शास्त्र कथन से उन दिनों एक विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या का पता चलता है। साथ ही यह भी पता चलता है कि पाठ्यक्रम निर्मात्री परिषद को कितने छात्रों के जीवन को संवारने की योजना तैयार करनी पड़ती थी।

ऐतिहासिक युग में भी तक्षशिला एवं नालन्दा विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम निर्माण करने वाली परिषद का उल्लेख मिलता है। प्राप्त विवरण के अनुसार आचार्य धर्मज्ञ इस सभा के अध्यक्ष थे। उनके अतिरिक्त आचार्य धृतिसेन, आचार्य शुभदर्शन आदि आचार्यों का इस सभा के सदस्य होने का जिक्र आता है। नालन्दा विश्वविद्यालय में आचार्य शीलभद्र इस विश्वविद्यालय के कुलपति होने के साथ पाठ्यक्रम निर्मात्री परिषद के अध्यक्ष भी थे। इस परिषद के सदस्यों में धर्मपाल, चन्द्रपाल, गुणमति, स्थिरमति, प्रभामित्र, जिनमित्र, ज्ञानचन्द्र और जिनभिक्षु आदि आचार्य मुख्य थे। उस समय के चीनी छात्र इत्सिंग के अनुसार यह परिषद गहन विचार-विमर्श करके पाठ्यक्रमों को तय करती थी। इत्सिंग का कथन है कि इस प्रधान परिषद के अंतर्गत समितियाँ भी थी, जो विषय-प्रवेश के पाठ्यक्रम पर विचार करती थी।

देव संस्कृति की यही प्रक्रिया और परम्परा देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भी अपनायी जा रही है। यहाँ पढ़ाए जाने वाले सभी विषयों के चुने हुए विशेषज्ञ विद्वानों एवं जागरुक विचारशीलों का सम्मिलन विद्या परिषद में होगा। विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों का निर्धारण एवं निर्णय करने वाली यह सर्वोच्च परिषद होगी। इसके आधीन अलग-अलग विषयों के लिए पाठ्यक्रम समितियाँ कार्य करेगी। इनमें से प्रत्येक समिति में विषय से सम्बन्धित दो विशेषज्ञ विद्वानों सहित विभाग के विभागाध्यक्ष एवं उस विभाग के वरिष्ठ आचार्य होंगे। विशेष आमंत्रित सदस्य भी इस पाठ्यक्रम समिति के भागीदार होंगे। सभी विषयों की पाठ्यक्रम समितियाँ अपने कार्य का ब्यौरा विद्या परिषद को देंगी। विद्या परिषद इस पर विचार करके पाठ्यक्रमों को अन्तिम रूप देगी। बाद में विद्या परिषद के अध्यक्ष के रूप में कुलपति इस पर अन्तिम निर्णय के लिए इसे कुलाधिपति के पास ले जाएँगे। उनकी स्वीकृति एवं सहमति के बाद ही पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय में पढ़ाया जा सकेगा।

विद्या परिषद एवं पाठ्यक्रम समितियों के लिए कुछ बिन्दुओं पर विचार करना और उन्हें अपनाना अनिवार्य होगा। 1. पाठ्यक्रम में विषय के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों के साथ उनके व्यावहारिक स्वरूप का होना जरूरी है। 2.पाठ्यक्रम की विषय वस्तु में जीवन के विभिन्न पहलुओं से जुड़ाव इतना स्पष्ट हो कि पढ़ने वाले छात्र को आसानी से इसकी अनुभूति हो सके। प्रत्येक पाठ्यक्रम में देव संस्कृति के तत्त्वों का समावेश अनिवार्य रूप से हो। 3.पाठ्यक्रम में पुरातन ज्ञान के महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं के साथ विषय विशेष के दायरे में हुई आधुनिक शोध अनुसंधान के निष्कर्षों को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाएगा। 4. प्रत्येक विषय में स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षाओं के अनुरूप प्रायोगिक योजनाएँ एवं शोध परियोजनाएँ जुड़ी होंगी। 5. पाठ्यक्रम में हर सत्र में आवश्यक फेर बदल की जाएगी, ताकि विषय से सम्बन्धित नवीन उपयोगी तथ्य जोड़े जा सकें और पुराने अनुपयोगी तत्त्वों को हटाया जा सके। इन कतिपय महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं के अतिरिक्त विश्वविद्यालय की प्रबन्ध परिषद कुलाधिपति एवं शासन परिषद की सहमति से विद्या परिषद एवं पाठ्यक्रम समितियों के लिए एक मार्गदर्शिका तैयार करेगी। ताकि विद्या परिषद एवं पाठ्यक्रम समितियों के सदस्यों के समक्ष देव संस्कृति विश्वविद्यालय की नीतियाँ एवं उद्देश्य और अधिक सुस्पष्ट हो सके।

इस सम्बन्ध में कहना इतना है कि कार्य बहुत अधिक है और समय बहुत कम है। कम समय में पाठ्यक्रमों की सुचारु व्यवस्था की जानी है। जो विचारशील, जागरुक एवं अनुभवी विद्वान् विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों के निर्माण में अपना सहयोग देना चाहें, वे इन पंक्तियों को ही अपने लिए आमंत्रण मानें। कुलाधिपति, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार। इस पते पर पत्र लिखकर ऐसे बड़भागी लोग अपने सहयोग की सूचना दे सकते हैं। इस सूचना में स्वयं की योग्यता एवं वर्तमान स्थिति का पूर्ण विवरण तथा पाठ्यक्रमों के निर्माण के क्षेत्र में अब तक के अनुभव का विवरण अनिवार्य है। यह पत्र मिलने पर सहयोग को स्वीकार करने की सूचना विश्वविद्यालय कार्यालय द्वारा भेजी जाएगी। पाठ्यक्रमों के निर्माण में अपना सहयोग देने वाले ऋषियों के कार्य एवं देव संस्कृति के विस्तार में भागीदार होकर पुण्य और यश दोनों ही प्राप्त करेंगे।

विद्या परिषद सहित सभी पाठ्यक्रम समितियाँ प्रत्येक वर्ष में कम से कम दो बार अवश्य मिलेंगी। उपयोगिता एवं आवश्यकता के अनुसार परिषद या किसी भी समिति की मीटिंग अधिक बार भी हो सकती है। उद्देश्य जल्दी से जल्दी सभी संकायों में संचालित किए जाने वाले विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रमों को अन्तिम रूप देना है। पाठ्यक्रमों के उत्कृष्ट, उच्च स्तरीय होने के साथ रुचिकर, ग्रहण योग्य होना ही इनकी विशेषता होगी। इस विशेषता के द्वारा ही विद्यार्थियों में मौलिक प्रतिभा, प्रायोगिक कुशलता एवं देव संस्कृति के जीवन मूल्यों के प्रति जागृति विकसित हो सकेगी। इन पाठ्यक्रमों के साँचों के द्वारा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व की ढलाई का कार्य विश्वविद्यालय के संकायों में होगा। यही वह उर्वर भूमि है, जहाँ व्यक्ति का बीज गलेगा और व्यक्तित्व के हरे-भरे पल्लवित एवं पुष्पित पौधे जन्मेंगे, जीवन पाएँगे।


देव संस्कृति के ज्योति स्तंभ बनेंगे ये संकाय

विश्वविद्यालय के संकाय देव संस्कृति के ज्योति स्तम्भ हैं। यहीं से ज्ञान-विज्ञान की प्रकाश धाराएं बहेंगी। साँस्कृतिक चेतना यहीं से अपना विस्तार पाएँगी। यहीं से जन्मी ऊर्जा से अनेकों ऊर्जावान बनेंगे। विद्या-विस्तार की योजनाएँ यहीं अपना व्यवस्थित रूप और आकार पाएँगी। देव संस्कृति के उद्देश्य यहीं पर अपनी विशिष्ट पहचान गढ़ेंगे। विश्वविद्यालय की विद्या व्यवस्था संकायों में विभाजित होकर ही ऋषि संस्कृति के हर पहलू को एक नया मौलिक स्वरूप देगी। अध्ययन-अध्यापन की विधि व्यवस्था की सम्पूर्ण संरचना इन्हीं संकायों के साँचों से ही गढ़ी-ढाली जाएगी।

विश्वविद्यालय की विद्या व्यवस्था का संकायों या फैकल्टीज़ में विभाजन नया नहीं है। यह हमारी ऋषि संस्कृति की देन है, पुरातन ऋषियों द्वारा स्थापित की गयी विद्या व्यवस्था की परम्परा है। इतिहासवेत्ता डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी ने अपनी पुस्तक ‘एंशियन्ट इण्डियन एजुकेशन’ में ऐसे कई प्रमाणों का खुलासा किया है। महाभारत आदि पौराणिक ग्रन्थ भी इसका संकेत करते हैं। इस सभी वर्णन-विवरण के अनुसार ऋषियों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों में कुलपति विद्या व्यवस्था को संकायों में विभाजित एवं सुव्यवस्थित करते थे। एक विश्वविद्यालय में प्रायः चार से आठ संकायों का विधान था। इन संकायों का कार्य-भार संकायाध्यक्ष सम्भालते थे। इनकी नियुक्ति का अधिकार कुलपति को था।

प्राचीन ग्रन्थों में संकायों को स्थान की संज्ञा दी गयी है। एक स्थान में ज्ञान की उस विशेष धारा से सम्बन्धित कई विषय पढ़ाएँ जाते थे। इनमें से प्रत्येक विषय को पढ़ाने के लिए कई आचार्य होते थे। प्रत्येक विषय के विभाग की जिम्मेदारी विभागाध्यक्ष सम्भालते थे। और अपने विभागीय कार्यों का ब्योरा संकायाध्यक्ष या स्थानाध्यक्ष को देते थे। इस प्राचीन ऋषि व्यवस्था का उद्देश्य यही है कि विश्वविद्यालय की विद्या-व्यवस्था सुचारु ढंग से चलती रहे। साथ ही ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक पहलू, प्रत्येक आयाम का स्वतन्त्र विकास होता रहे। ज्ञान के प्रत्येक पादप में नयी कलियाँ और कोपलें फूटती रहे। संकायाध्यक्ष अपनी संकाय भूमि में उनके लिए आवश्यक खाद-पानी जुटाते रहते थे।

प्राचीन ऋषियों ने जिन आठ संकायों या स्थानों का विधान बनाया था वे- 1. अग्नि स्थान, 2. ब्रह्म स्थान, 3. विष्णु स्थान, 4. महेन्द्र स्थान, 5. विवस्वत स्थान, 6. सोम स्थान, 7. गरुड़ स्थान एवं 8. कार्तिकेय स्थान थे। इनमें से अग्नि स्थान- में यज्ञ विज्ञान से सम्बन्धित अनेक विषयों का अध्ययन-अध्यापन एवं शोध कार्य सम्पन्न किया जाता था। ब्रह्म स्थान- वैदिक विषयों एवं ब्रह्मविद्या के अध्ययन एवं शोध का संकाय था। विष्णु स्थान में सभी व्यावहारिक विषयों की शिक्षा दी जाती थी। महेन्द्र स्थान- में शस्त्र-अस्त्र सम्बन्धी विषय पढ़ाए जाते थे। विवस्वत स्थान- गणित एवं फलित ज्योतिष एवं तत्सम्बन्धी विषयों के अध्ययन का संकाय था। सोम स्थान- वनस्पति शास्त्र एवं आयुर्वेद से सम्बन्धित विषयों का संकाय था। गरुड़ स्थान- में सभी तरह के वाहनों, परिवहनों एवं तत्सम्बन्धी सड़क-पुल आदि निर्माण के सभी विषयों की शिक्षा दी जाती थी। कार्तिकेय स्थान- में सैनिक संगठन से सम्बन्धित सभी विषयों के अध्ययन की व्यवस्था की गयी थी।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में विद्या व्यवस्था का यही साँस्कृतिक स्वरूप अभिनव ढंग से स्थापित किया गया है। यहाँ की विद्या व्यवस्था की सम्पूर्ण संरचना चार संकायों में विभाजित की गयी है। इन चार संकायों को देव संस्कृति की चतुर्मुखी प्रगति का पर्याय माना जा सकता है। ये देव संस्कृति के भावी विस्तार की चार दिशाएँ हैं। यही ऋषियों के चार साँस्कृतिक पुरुषार्थ हैं। इन्हें संस्कृति साधना के चार अनुबन्ध भी कहा जा सकता है। कथन का सार संक्षेप इतना है कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय के चारों संकाय साँस्कृतिक चेतना के क्रियाशील कीर्तिस्तम्भ के रूप में स्थापित किए गए हैं। इनकी क्रियाशीलता में ही देव संस्कृति का भावी विस्तार निहित है। इन्हीं के द्वारा साँस्कृतिक मूल्यों की प्रयोग-प्रक्रियाएँ पनपेगी। जीवन मूल्यों का विस्तार होगा।

प्रत्येक संकाय के सभी क्रिया-कलापों का दायित्व संकायाध्यक्ष या डीन पर होगा। उसकी नियुक्ति कुलाधिपति से सहमति लेकर कुलपति स्वयं करेंगे। संकायाध्यक्ष या डीन का कार्यक्षेत्र विस्तृत है। उनके आधीन शैक्षिक एवं प्रशासनिक कई गतिविधियाँ होगी। प्रत्येक डीन के अधिकार क्षेत्र में उनके संकाय से सम्बन्धित सभी विभाग होंगे। इन विभागों के सभी विभागाध्यक्ष अपने विभागीय कार्यों का ब्योरा उन्हें देंगे। विभाग के अध्यापन एवं शोध सम्बन्धी कार्यों के लिए विभागाध्यक्ष को आवश्यक निर्देश देना डीन का ही दायित्व है। डीन को अपने संकाय के सभी विभागों का कार्य-ब्यौरा विश्वविद्यालय के कुलपति को समय-समय पर देना होगा। संकायाध्यक्ष या डीन का दायित्व होगा कि उनके संकाय की समस्त गतिविधियाँ उन सभी उद्देश्यों के लिए संकल्पित, समर्पित एवं प्रतिबद्ध रहें, जिनके लिए संकाय की स्थापना की गयी है।

विश्वविद्यालय के चारों संकाय किसी बंधी बंधायी लीक या घिसी-पिटी लकीर पर चलते रहने के लिए नहीं बनाए गए हैं। इनकी उर्वरता में कुछ न कुछ नया-विशेष जन्मता, पनपता एवं विकसित होता रहेगा। संकाय की उर्वर भूमि में नए विषय, नए विभाग एवं इनके नए आयाम अपना अस्तित्त्व पाते रहेंगे। संकाय के उद्देश्यों के व्यापक दायरे में नए विषयों एवं उनके पाठ्यक्रमों की संरचना करना उस संकाय के आचार्यों की जिम्मेदारी है। संकायाध्यक्ष या डीन इस कार्य में उनकी सम्यक् सहायता करते रहेंगे।

प्राचीन समय में चौसठ कलाएँ एवं चौदह विद्याएँ इसी तरह विकसित हुई थीं। बाद में ये विद्याएं चौदह से विकसित होकर चौबीस हो गयीं। ऐतिहासिक युग के नालन्दा विश्वविद्यालय में जिस समय जीवक ने चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन किया, उस समय वहाँ चिकित्सा या स्वास्थ्य संकाय में छोटे-बड़े 140 विभाग एवं उपविभाग थे। नालन्दा के स्वास्थ्य संकाय में स्वास्थ्य से सम्बन्धित अनेकों पाठ्यक्रमों का संचालन होता था। आचार्य गुणमति इस संकाय के संकायाध्यक्ष या आधुनिक भाषा में डीन थे। उनकी कुशल प्रशासनिक क्षमता एवं विद्यानुराग के कारण नालन्दा विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य संकाय ने विश्व व्यापी कीर्ति अर्जित की थी।

यही स्थिति वहाँ के साधना संकाय की थी। वहाँ के कुलपति आचार्य शीलभद्र, साधना संकाय के संकायाध्यक्ष भी थे। वे स्वयं योगशास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे। ऐतिहासिक विवरण के अनुसार चीनी यात्री ह्वनत्साँग ने उन्हीं से योग साधना की शिक्षा पायी थी। इस संकाय में शताधिक विषयों एवं विभागों की गतिविधियाँ संचालित होती थी। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में- 1.साधना संकाय, 2. स्वास्थ्य संकाय, 3. शिक्षा संकाय, 4. स्वावलम्बन संकाय की स्थापना भी साँस्कृतिक चेतना एवं विद्या के बहुआयामी विस्तार के लिए की गयी है। अपने उद्देश्यों के अनुरूप सतत् सृजन, संवर्द्धन, शिक्षण एवं शोध में ही प्रत्येक संकाय की गुणवत्ता एवं अर्थवत्ता समायी है। इनमें से प्रथम स्थान साधना संकाय का है। यही विद्या विस्तार की आधारभूमि है। साधना की नींव पर ही यहाँ विद्या विस्तार का भव्य भवन खड़ा होना है।


ऋषिकल्प जीवन के अभिलाषियों के लिए साधना संकाय

साधना संकाय के पाठ्यक्रमों में देव संस्कृति के प्रणेता ऋषियों के जीवन का प्रकाश है। इनमें उन प्रयोगों, प्रक्रियाओं, सिद्धान्तों एवं व्यावहारिक सूत्रों का समन्वय-सामञ्जस्य है, जो उनकी उपलब्धियों का आधार बने। साधना की विधियाँ प्राचीन भारत के महर्षियों का सर्वोत्कृष्ट अनुसन्धान है। उन्होंने साधना-विज्ञान के द्वारा ही मनुष्य की प्रकृति का परिष्कार एवं विकृति का निवारण-निराकरण करके संस्कृति को जन्म दिया। संस्कृति के सूत्रों को, साधना के सत्य को जानकर ही जाना और सीखा जा सकता है। मनुष्य में देवता के अवतरण की प्रयोगात्मक विधि यही है। मनुष्य मात्र के लिए इसकी वैज्ञानिक उपयोगिता को सिद्ध करने के लिए ही देव संस्कृति विश्वविद्यालय में साधना संकाय की स्थापना की गयी है।

देश की धरती में ध्रुव, नचिकेता आज भी जन्म लेते हैं। जिनमें साधना की लगन एवं प्यास होती है। जो अध्यात्म विद्या को पढ़ना और सीखना चाहते हैं। आध्यात्मिक प्रयोगों में लीन होने के लिए जिनके मन में विकलता जगती है। आज भी भारत जननी की कोख में तप, त्याग और साधना के अंकुर पलते हैं, पर जीवन पाने के पहले ही इनका मरण हो जाता है। समुचित मार्गदर्शन के अभाव में साधना और साधक दोनों ही मुरझा जाते हैं। मानव जीवन की उच्चतर अभीप्साएँ या तो असमय ही कुम्हला जाती हैं, या फिर भौतिकता की भूल-भुलैया में भटक जाती है। मनुष्य में देवत्व के अंकुर तो फूटते हैं, पर उसके विकास के लिए सही खाद-पानी नहीं मिल पाता। दिव्य जीवन जीने की प्यास तो जगती है, पर उसे प्यासे ही दम तोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है।

साधना संकाय के पाठ्यक्रम विवशता के इसी चक्रव्यूह को ध्वस्त करने के लिए है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में साधना संकाय की स्थापना इस संकल्प का उद्घोष है- कि अब अध्यात्म विद्या के जिज्ञासुओं को प्रभावकारी मार्गदर्शन का अभाव न रहेगा। कठोर साधना के अभिलाषियों के लिए आध्यात्मिक साधनाएँ फिर से प्रकाशित की जाएँगी। तप के गुह्य व गहन प्रयोगों में तत्पर होने वालों की अभीप्सा को अब निराश न होना पड़ेगा। साधना संकाय के पाठ्यक्रमों का निर्माण एवं संचालन ऐसे ही संकल्पित अध्यात्म अभिलाषियों के लिए है। इसका उद्देश्य देश व धरती के वातावरण को तप की ऊर्जा से ऊर्जावान बनाना है। हिमालय की गहन कन्दराओं में जो वैभव खोया हुआ है, उसे फिर से प्रकट व प्रकाशित करना है। हिमालय के ऋषियों के सन्देश से धरा को ध्वनित करना है। विश्व भर के विविध धर्मों के मूल तत्त्वों व सत्यों को उजागर करना है। उनमें समभाव, सद्भाव एवं एकता की खोज करनी है। यह बताना है कि सभी धर्मों के संस्थापकों के संदेश का मूल स्वर- संवेदना है। इसी दैवी एवं दिव्य संवेदना से मानव जीवन को आप्लावित करना है।

साधना संकाय के पाठ्यक्रमों की संरचना व सरंजाम के उद्देश्यों को कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं में परिभाषित किया जा सकता है- 1. भारत देश के ऋषियों, सन्तों एवं महापुरुषों द्वारा प्रवर्तित एवं अनुभूत साधना-सिद्धान्तों का ज्ञान, 2. विश्व वसुधा के विभिन्न धर्मों व उनके संस्थापकों, व विश्व भर के अध्यात्मवेत्ताओं के द्वारा बताए गए धार्मिक तत्त्वों व साधना-विधियों का समुचित ज्ञान, 3. प्रायः समस्त साधना विधियों का आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन-अनुसन्धान, 4.कतिपय साधनात्मक प्रयोगों का व्यावहारिक शिक्षण। ये चार बिन्दु मूलतः सैद्धान्तिक है। इनसे पाठ्यक्रमों की थ्योरी भर पता चल पाती है। जिसके कुछ अंश अन्य विश्वविद्यालयों में भी देखने को मिल जाते हैं।

जो सत्य केवल यहाँ और यहीं देखने को मिलेगा, उसकी अभिव्यक्ति करने वाले बिन्दु भिन्न है- 1. साधना संकाय के विद्यार्थियों के संकल्प बल का असाधारण विकास, 2. जीवन की अवाँछनीय आदतों, कुसंस्कारों, कुप्रवृत्तियों की जटिलताओं से छुटकारा, 3. मानव चेतना में समायी सम्भावनाओं का ज्ञान, 4. अतीन्द्रिय सत्य एवं शक्ति का व्यावहारिक प्रशिक्षण। ये चारों बिन्दु महत्त्वपूर्ण हैं। इन्हीं से साधना के अर्थ एवं महत्त्व को समझने की शुरुआत होती है। इसी से वह नींव मजबूत होती है, जिसके ऊपर अध्यात्म विद्या का भव्य मन्दिर गढ़ा जा सकता है, ऋषि प्रणीत उद्देश्य साकार किए जा सकते हैं।

इन सभी उद्देश्यों को चरितार्थ करने वाले पाठ्यक्रमों के स्वरूप व स्तर विद्यार्थियों की आयु व योग्यता के अनुसार भिन्न-भिन्न होंगे। इन्हें सर्टीफिकेट डिप्लोमा, डिग्री, पोस्ट ग्रेजुएट स्तर का अलग-अलग बनाया जाएगा। इन पाठ्यक्रमों के स्तर के अनुरूप ही इनमें विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन, उनमें पारस्परिक समन्वय व एकता स्थापित करने वाले सूत्रों का अन्वेषण, सर्वधर्म समभाव की समरसता स्थापित करने वाले बिन्दुओं का शिक्षण किया जाएगा। साथ ही अध्यात्म विज्ञान के दार्शनिक सत्यों- हठयोग, लययोग, राजयोग, स्वरयोग, प्राणयोग, मंत्र विज्ञान, गायत्री महाविद्या के विभिन्न पहलुओं के अध्ययन एवं शिक्षण की व्यवस्था की जाएगी। इन पाठ्यक्रमों के द्वारा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को नए सिरे से गढ़ने-ढालने की प्रक्रिया पूरी की जा सकेगी।

साधना संकाय के किसी भी पाठ्यक्रम की सीमा कतिपय सिद्धान्तों को रटने और रटाने से कहीं बहुत अधिक है। साधना संकाय में पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले दोनों का ही साधक होना अनिवार्य है। इस संकाय में उन्हीं का स्थान सुनिश्चित होगा जो अध्यात्म विद्या के अनुरागी हैं। जो मानव धर्म व विश्व धर्म की स्थापना करने, सब धर्मों के अनिवार्य तत्त्वों में समायी एकता को समझने के लिए समर्पित हैं। जिनमें तपस्वी जीवन जीने का संकल्प है। जो साधना के कठोर प्रयोगों को अपनाने में सक्षम हैं। ऐसे संकल्पवान, तप-परायण जीवन जीने के अभ्यासी व्यक्तियों के लिए ही आध्यात्मिक अनुशासनों की विधि व्यवस्था में स्वयं को खपा पाना सम्भव है। इस सत्य से परिचित जन ही साधना संकाय के सदस्य हो सकेंगे।

इस संकाय के पाठ्यक्रमों के लिए और भी कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दु अनिवार्य है- 1. धार्मिक सद्भाव व समभाव साधना के लिए उपयुक्त वातावरण, 2. साधना विज्ञान के वैज्ञानिक प्रयोगों की समुचित विधि व्यवस्था, 3. अध्यात्म साधना के अनुरागी आचार्य एवं 4. संकल्पवान एवं आध्यात्मिक अनुशासनों के लिए समर्पित विद्यार्थी। उपर्युक्त चार में से तीन अनिवार्यताओं को जुटाने की विधि व्यवस्था विश्वविद्यालय के संचालकों ने पूरी कर ली है। चौथे क्रम के अनुरूप विद्यार्थियों की बड़ी आतुर प्रतीक्षा है।

इन पंक्तियों के पाठकों को यह बात गहराई से जान लेना चाहिए कि इस संकाय में विद्यार्थी प्रवेश तो सामान्य एवं साधारण जन की ही तरह करेंगे। पर उनकी परिणति सामान्य और साधारण नहीं होगी। यहाँ के पाठ्यक्रमों के साँचे उन्हें कुछ विशेष ही रूप और गुण प्रदान कर देंगे। उनकी आकृति तो वही रहेगी, किन्तु प्रकृति पूरी तरह बदल जाएगी। वे धार्मिक सद्भाव व समभाव को जन्म देंगे। सामान्य मनुष्य के भीतर असामान्य शक्तियाँ किस तरह से अंकुरित एवं पल्लवित होती है, इसके विज्ञान को वे जानेंगे, अनुभव करेंगे। यहाँ पर इन पाठ्यक्रमों का अध्ययन उन्हें ऋषित्व के वरदान देगा। जो विद्यार्थी ऋषिकल्प जीवन के अभिलाषी हों, उन्हें देव संस्कृति विश्वविद्यालय के साधना संकाय से संपर्क करना चाहिए।

ऋषियों का देश भारत ऋषित्व से विहीन क्यों है? इसी कसक, दर्द एवं पीड़ा से विकल होकर साधना संकाय की स्थापना की गई है। यह पीड़ा ही इसमें पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों के निर्माण की प्रेरणा बनी है। देश की धरती में, विश्व वसुधा में फिर से ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, महातेजस्वी महर्षि अगस्त्य के नवीन संस्करण अपनी तप शक्ति से, साधना सामर्थ्य से मानव हृदयों को आलोकित करे, यही इन पाठ्यक्रमों को पढ़ाने का मकसद है। इन पाठ्यक्रमों को पढ़ने वाले श्री रामकृष्ण परमहंस द्वारा बताए गए ‘जतो मत-ताते पथ’ का अर्थ समझ सकेंगे। वे जान सकेंगे कि सब धर्मों का सार एक है। सभी धर्म साधनाओं एवं आध्यात्मिक प्रक्रियाओं का गन्तव्य एक है। युग ऋषि परम पूज्य गुरुदेव की अपरिमित तप ऊर्जा, उनके द्वारा अर्जित की गई विद्याएँ साधना संकाय के पाठ्यक्रमों के माध्यम से ही अभिव्यक्त होंगी। इनसे उपजी प्राण ऊर्जा से स्वास्थ्य संकाय के पाठ्यक्रम जन्म लेंगे। और रुग्ण होते जा रहे मानव समाज को समग्र स्वास्थ्य का बोध कराएँगे।


समग्र एवं सम्पूर्ण स्वास्थ्य पर विज्ञानसम्मत अध्ययन-अध्यापन

स्वास्थ्य संकाय के पाठ्यक्रमों का आधार ऋषियों की मौलिक दृष्टि है। इन सभी पाठ्यक्रमों में भारत देश के तपस्वियों, ज्ञानियों, चिकित्साशास्त्र के आचार्यों के समग्र स्वास्थ्य चिन्तन का आधुनिक विज्ञान के प्रयोगों एवं तकनीकों के साथ समुचित सामञ्जस्य है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने वर्तमान दौर में काफी उन्नति-प्रगति की है। नए अनुसन्धान एवं नए-नए प्रयोगों के अनेकों मानदण्ड स्थापित किए हैं। इसे उपलब्धियाँ भी मिली हैं। फिर भी काफी कुछ बाकी रह गया है। ऐसा बहुत कुछ है जो छूट गया है, जिसे छुआ नहीं जा सका। इसका अभाव हमेशा खटकता है। ऋषि दृष्टि एवं समग्र चिन्तन ऐसे ही अनछुए किन्तु महत्त्वपूर्ण बिन्दु हैं, जिनकी खोज के बिना आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के सारे अनुसन्धान अधूरे हैं।

चिकित्साशास्त्र मानव प्रकृति का ज्ञान, उसमें आयी विकृतियों की पहचान एवं उन विकृतियों के निदान पर आधारित है। इनमें से किसी भी पक्ष या पहलू की जानकारी अधूरी रह जाने पर सब कुछ अधूरा एवं अपूर्ण हो जाता है। आज की स्थिति यही है। चिकित्सा शास्त्र से भूल मानव की प्रकृति को समझने में हुई है। ऋषियों ने मानव प्रकृति के तीन स्तर गिनाए हैं, आधि भौतिक, आधि दैविक एवं आध्यात्मिक। इन तीनों के अनुरूप उन्होंने इनकी विकृतियों के निवारण व निदान के अलग-अलग उपाय बताए-समझाए हैं। ऋषि कथन के अनुरूप मानव प्रकृति के ये तीनों स्तर अलग-अलग होते हुए भी परस्पर घुल-मिले हैं। इसलिए इनमें से किसी एक की भी चिकित्सा करने के लिए बाकी दो के स्वरूप व संरचना का ज्ञान जरूरी है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि इस प्रसंग में अधूरी है। उसे केवल मनुष्य की भौतिक प्रकृति का ही ज्ञान है। चिकित्सा शास्त्री इन्सान को हाड़-माँस का चलता-फिरता पुतला मानकर उसका इलाज करने में जुटे हैं। इन्सानी संवेदनाएँ, भावनाएँ, कल्पनाएँ उनकी समझ से अछूती हैं। मनुष्य की प्राण चेतना एवं उसकी आत्म चेतना के अस्तित्त्व तक से उनको इन्कार है। इस अधूरी सोच की ही परिणति व परिणाम है कि विकृतियों के निदान, विकृतियों के जन्मदाता व जीवनदाता सिद्ध हो रहे हैं। रोग भगाने के उपाय, रोग बुलाने के उपाय साबित हो रहे हैं। इसका कारण शायद रोगों को समझने में हुई भारी भूल है।

आज के चिकित्सा वैज्ञानिक रोगों का कारण विषाणुओं, जीवाणुओं के संक्रमण में खोजते हैं। चोट-चपेट, दुर्घटना आदि के अलावा सारे रोगों का कारण विषाणु-जीवाणु ही माने जाते हैं। पर इन विषाणुओं या जीवाणुओं का संक्रमण किसी एक को ही क्यों, उसी के पड़ोस या घर में रहने वाले दूसरे को क्यों नहीं? इस सवाल के जवाब में अटकलबाजियाँ तो बहुतेरी हैं, पर कोई सटीक जवाब नहीं है। प्राण बल एवं प्राण चेतना की समझ के बिना सटीक जवाब दिए भी नहीं जा सकते हैं। इसी तरह भावना एवं कल्पना क्षेत्र में पनपी ग्रन्थियों से उपजे रोगों के बारे में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को सही समझ नहीं है। जबकि इस समझ को पैदा किए बगैर सम्पूर्ण स्वास्थ्य की उपलब्धि असम्भव है।

पुरातन ऋषियों की मौलिक दृष्टि इसी समझ और इससे उपजे सम्पूर्ण स्वास्थ्य का परिचय, पर्याय थी और है। उन्होंने मनुष्य की प्रकृति को समग्र एवं सही ढंग से समझकर ही चिकित्सा के विधान रचे थे। प्राचीन ग्रन्थों को पढ़ने पर यह सच्चाई आज भी देखी, जानी एवं अनुभव की जा सकती है। इन प्राचीन ग्रन्थों के पन्नों में मनुष्य की आधिभौतिक प्रकृति के लिए औषधीय चिकित्सा, आधि दैविक प्रकृति के लिए मंत्र चिकित्सा और प्राण चिकित्सा एवं आध्यात्मिक प्रकृति के लिए योग चिकित्सा के विज्ञान व विधान का स्पष्ट उल्लेख है। तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला आदि ऐतिहासिक युग के विश्वविद्यालयों में इनके पढ़ाए व सिखाए जाने के भी यत्र-तत्र उल्लेख मिलते हैं।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में स्थापित किए गए स्वास्थ्य संकाय का उद्देश्य मनुष्य का सम्पूर्ण एवं समग्र स्वास्थ्य है। इनके अंतर्गत रोगों की पहचान एवं निदान के साथ रोग रोधी उपायों का भी समावेश है। रोग होने पर उनका निदान करना ठीक है। पर इससे भी कहीं अधिक श्रेष्ठ है रोगों को पनपने न देना, उन्हें होने से रोकना। ‘प्रिवेन्शन इज़ बेटर देन क्योर’ के सूत्र को इस संकाय में पूरी तरह से अपनाए जाने का ध्यान रखा गया है। स्वास्थ्य संकाय के सर्टीफिकेट, डिप्लोमा, डिग्री एवं पोस्ट ग्रेजुएट आदि विभिन्न स्तरों के विविध पाठ्यक्रमों के पीछे सोच एवं चिन्तन यही है।

इन पाठ्यक्रमों में जिन बिन्दुओं पर विशेष रूप से ध्यान रखा गया है, वे निम्न है- 1. मनुष्य प्रकृति के सभी स्तरों के बारे में सम्पूर्ण समझ एवं ज्ञान विकसित करना। 2. मानव प्रकृति के किसी भी स्तर में आयी विकृति के स्वरूप की पहचान के साथ उसके यथार्थ कारण की खोज। 3. विकृति विज्ञान को विकसित करने में इस तथ्य का ध्यान रखना कि यथार्थ कारण हमेशा ही प्रकृति की गहरी परतों में होते हैं। उदाहरण के लिए नवीनतम शोध अनुसन्धानों के अनुरूप प्रायः अस्सी प्रतिशत दैहिक रोगों का कारण मानव मन की ग्रन्थियाँ होती हैं। 4. निदान के उपायों का प्रकृति के उस स्तर के अनुरूप बनाया जाना, जहाँ पर विकृति का यथार्थ कारण है।

इस दृष्टि से स्वास्थ्य संकाय में आयुर्वेद की औषधीय चिकित्सा व अनुसन्धान के पाठ्यक्रमों के अतिरिक्त प्राकृतिक चिकित्सा, प्राण चिकित्सा, सूर्य चिकित्सा, चुम्बक चिकित्सा, रंग चिकित्सा, भौतिक चिकित्सा (फिजियोथेरेपी), मानसिक चिकित्सा, मंत्र चिकित्सा एवं योग चिकित्सा आदि के विभिन्न पाठ्यक्रम चलाए जाएँगे। पाठ्यक्रम के विशेष विषय की विषय वस्तु के अनुरूप इनके सर्टीफिकेट, डिप्लोमा, डिग्री, पोस्ट ग्रेजुएट आदि स्तर तय किए जाएँगे। इन विभिन्न विषयों के अतिरिक्त समग्र स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता पैदा करने वाले, रोगरोधी उपायों का व्यावहारिक ज्ञान देने वाले पाठ्यक्रमों का भी इसमें समुचित समावेश किया जाएगा।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय का स्वास्थ्य संकाय चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन-अध्यापन तक सीमित न रहकर स्वास्थ्य के प्रति जन-जन को जागरुक बनाने वाले अभियान का केन्द्र बनेगा। यहाँ से सम्पूर्ण स्वास्थ्य के जन आन्दोलन को प्रेरणा व प्राण मिलेंगे। यहाँ विशेषज्ञ चिकित्सकों के अलावा मानव स्वास्थ्य के संरक्षकों की नयी पीढ़ी तैयार की जाएगी। ये स्वास्थ्य संरक्षक जन-जन को जीवन देने में अग्रणी भूमिका निभाएँगे। इस संकाय के पाठ्यक्रमों की दृष्टि एवं इनका दायरा व्यापक है। इस ओर जिन विद्यानुरागियों की रुचि है, वे इस सम्बन्ध में पत्र लिखकर संपर्क कर सकते हैं। ये पंक्तियाँ स्वास्थ्य संकाय के उद्देश्यों के अनुरूप बनाए जाने वाले पाठ्यक्रमों के निर्माण हेतु विशेषज्ञों के लिए आमंत्रण सन्देश भी है। ऐसे सेवाभावी उदार हृदय, जन-पीड़ा को समझाने वाले विशेषज्ञ विद्वानों की सदा यहाँ प्रतीक्षा है। ऐसे मनीषियों का सहयोग स्वास्थ्य संकाय के पाठ्यक्रमों को अन्तिम रूप देने में बड़ा सहायक सिद्ध होगा।

स्वास्थ जीवन सभी गुणों, विशेषताओं एवं उपलब्धियों का आधार है। शिक्षा एवं संस्कृति तभी पनपती एवं विकसित हो पाती है, जब मानव जीवन स्वस्थ हो। व्यावहारिक ज्ञान की सभी दिशा धाराओं का उद्गम स्रोत एवं केन्द्र यही है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भी स्वस्थ जीवन की ईंटों को ही शिक्षा संकाय के पाठ्यक्रमों की आधारशिला बनाया गया है। इसी पर देव संस्कृति का ज्ञान मन्दिर गढ़ा जाएगा।


सृजन संवेदना की दिव्यता का शिक्षण देने वाला संकाय

शिक्षा संकाय के पाठ्यक्रमों की धुरी देव संस्कृति है। इसके गहरे अर्थबोध के साथ, इसमें संजोये ज्ञान-विज्ञान एवं देश की धरती व विश्व वसुधा में बसे जन-जन को इसकी पहचान कराने के मकसद से इन पाठ्यक्रमों का ताना-बाना बुना गया है। इसमें ऋषियों के चिन्तन के साथ उनकी प्रयोगवादी परम्परा भी है। इनमें अतीत के चिन्तन के साथ भविष्य का सृजन भी है। सृजन-संवेदना ही तो संस्कृति है। जो सृजन संवेदना से युक्त है, वह सुसंस्कृत है। इसके विपरीत जो कोई भी है, जहाँ भी है, उसके लिए कोई सुसंस्कृत से विपरीत शब्द ही ढूंढ़ना पड़ेगा। क्षमा याचना के साथ उसके व्यक्तित्व को विकृत ही कहना पड़ेगा। उसकी विकृति में सुधार तभी सम्भव है- जब उसका संस्कृति से परिचय हो। सृजन-संवेदना उसमें प्रवाहित हो। सृजन संवेदना की दिव्यता ही तो देव संस्कृति है। यही इस शिक्षा संकाय के पाठ्यक्रमों का केन्द्र बिन्दु है।

इन पाठ्यक्रमों की विषय वस्तु को कुछ बिन्दुओं में समझा जा सकता है- 1. देव संस्कृति का स्वरूप एवं अर्थबोध, 2. इसे अभिव्यक्ति एवं विस्तार देने के लिए देश व विदेश की विभिन्न भाषाएँ, 3. दर्शन, शिक्षा व साहित्य के रूप में इसके ज्ञान को प्रकट करने वाले अनेकों आयाम, 4. ज्योतिष, कर्मकाण्ड समेत इसके विविध वैज्ञानिक पहलू, 5. आधुनिक विज्ञान की कुछ विशेष धाराएँ जो देव संस्कृति के भविष्य को संवारने-निखारने एवं नया मनुष्य को गढ़ने में सहायक हैं।

इन बिन्दुओं के विस्तार में पहला क्रम देव संस्कृति का है। जिसका बोध कराने के लिए इस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। देव संस्कृति प्राचीन भारत के ऋषियों द्वारा समूची मानव जाति को दिया गया सबसे बड़ा अनुदान है। दरअसल यह जीवन का विज्ञान है। जीवन के अर्थ, महत्त्व एवं उपलब्धियों को साकार करने वाली वैज्ञानिक प्रक्रिया है। पर कालक्रम में इसका अर्थ विकृत हो गया है। आज की युवा पीढ़ी संस्कृति का जो अर्थ समझती है, उसमें तो विकृति ही विकृति है, संस्कृति तो कहीं है ही नहीं। इस दुःख भरी विडम्बना को हटाने-मिटाने के लिए विचारशीलों, विवेकवानों को अपने समस्त प्रयास, पुरुषार्थ झोंक देने की जरूरत है। क्योंकि देश के युवा संस्कृति के संस्कृत शब्द से ही नहीं इसका अंग्रेजी पर्याय समझे जाने वाले कल्चर से भी अनभिज्ञ हो गए हैं। यह कल्चर भी तो कल्टीवेशन यानि की सृजन का द्योतक है। परन्तु यह सब अर्थ न जाने कहाँ जा छुपे हैं, जो प्रकट है वह तो अनर्थ ही है। इसे हटाने मिटाने के लिए देव संस्कृति का सत्य समझना अति आवश्यक है। इसी उद्देश्य से देव संस्कृति का स्वरूप एवं अर्थबोध बताने वाले स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं।

दूसरा क्रम भाषाओं का है। इन्हीं से संस्कृति का संचार सम्भव है। भाषा के पहचान के अभाव में देश की धरती भी बटी-बटी लगती है। अपने भी बेगाने लगते हैं। भाषा का परिचय प्रगाढ़ हो तो विश्व वसुधा के विस्तार में अपना कुटुम्ब नजर आता है। पराए देश के लोग अपने कुटुम्बी एवं स्वजन समझ में आते हैं। ऐसी दशा में भाषाओं का ज्ञान अनिवार्य है। इसी अनिवार्यता को पूरी करने के लिए विश्वविद्यालय में भाषाओं पर आधारित प्रमाणपत्र, डिप्लोमा, स्नातक एवं स्नातकोत्तर के अलग-अलग पाठ्यक्रम पढ़ाए जाएँगे। जिन भाषाओं को पढ़ाया जाना निश्चित हुआ है, उनमें भारत की प्रायः सभी भाषाएँ तमिल, तेलगु, मलयालम, उड़िया, बंगला, गुजराती, असमिया आदि हैं। विदेशी भाषाओं में अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच, जर्मन, रशियन, स्पेनिश आदि भाषाओं का ज्ञान कराए जाने की योजना है। देश और विश्व की विविध भाषाओं के माध्यम से साँस्कृतिक संवेदना के संचार और प्रसार के उद्देश्य पूर्ण होंगे।

तीसरा महत्त्वपूर्ण बिन्दु- दर्शन, शिक्षा प्रणाली एवं साहित्य के विविध रूपों का है। ये सभी देव संस्कृति की ज्ञान धाराएँ हैं। प्रायः सभी विश्वविद्यालयों में इनका किसी न किसी रूप में अध्यापन एवं शिक्षण होता है। परम पूज्य गुरुदेव ने इन सभी ज्ञान की धाराओं में अपना प्राण-प्रवाह उड़ेला है। उन्होंने इन सभी आयामों में बहुत कुछ नए का सृजन किया है। उनके इस नवीन सृजन पर आधारित देश भर के विश्वविद्यालयों में अनेकों शोध कार्य हो चुके हैं। और अनेकों अभी हो रहे हैं। यह शोध-सिलसिला सदा जारी रहने वाला है। इन शोध उपलब्धियों एवं गुरुदेव की नवीन दृष्टि के आधार पर तीसरे बिन्दु के दायरे में पाठ्यक्रमों का निर्माण होगा। ये पाठ्यक्रम विश्व दर्शन, विश्व धर्म एवं विश्व साहित्य के उद्देश्यपूर्ण शिक्षण को ध्यान में रखते हुए बनाए जाएँगे। इनमें ऋषियों, मनीषियों, धर्म संस्थापकों की मौलिक दृष्टि के साथ, परम पूज्य गुरुदेव की जीवन दृष्टि का समन्वय सम सामयिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होगा।

चौथे बिन्दु में देव संस्कृति की वैज्ञानिक धाराएँ हैं। इसमें ज्योतिष सहित अनेकों पक्ष हैं। आज के दौर में ये सभी पक्ष वैज्ञानिक प्रयोग और इसके निष्कर्षों से प्राप्त सिद्धान्त न रहकर मूढ़ता को पोषित करने वाली घिसी-पिटी रूढ़ियां बनकर रह गए हैं। इनके माध्यम से लोगों की भावनाओं का शोषण बहुतायत में किया जा रहा है। स्थिति यह बनी है कि आज यह ऋषियों की वैज्ञानिक विरासत दो पाटों में दबकर पिस रही है। एक वे हैं, जो इसे यथास्थिति में स्वीकारने के हिमायती हैं, और दूसरे वे हैं जो इसे कूड़े के ढेर में फेंकने की वकालत करते हैं। गलत दोनों ही हैं। निदान इसके सच को वैज्ञानिक ढंग से परखने, जानने एवं अपनाने में है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में यही किया जाना है। ज्योतिष ही नहीं भारतीय संस्कृति के और भी तंत्र आदि जो वैज्ञानिक पहलू हैं, समय के साथ उन्हें नव जीवन दिया जाएगा। उन्हें इस रूप में प्रतिष्ठित एवं प्रमाणित किया जाएगा कि विज्ञान का थोथा सहारा लेकर इन्हें नकारने वाले खुली आँखों से इनकी वैज्ञानिकता को सौ बार-हजार बार प्रयोगों की कसौटी पर परखने और सत्य को स्वीकारने के लिए विवश हों।

पाँचवाँ बिन्दु- आधुनिक विज्ञान के पाठ्यक्रमों के बारे में है। आधुनिक विज्ञान की पद्धतियों एवं प्रयोगों को समझना युग की माँग है। उज्ज्वल भविष्य के सृजन के लिए प्रतिबद्ध यह विश्वविद्यालय आधुनिक विज्ञान के उपयोगी पाठ्यक्रमों को लागू करने के लिए कटिबद्ध है। मानव मन की वर्तमान विखण्डित दशा को समझने के लिए मनोविज्ञान का अध्ययन जरूरी है। इसके आधुनिकतम सिद्धान्तों को जाँच-परखकर ही उसमें सुधार लाया जा सकता है। यही हाल पर्यावरण जैसे प्राकृतिक संकट का है। इसके वैज्ञानिक अध्ययन के लिए विश्वविद्यालय में नवीन पाठ्यक्रम बनाए जाएँगे। इसी भाँति औषधीय वनस्पतियों के व्यापक अध्ययन के लिए वनस्पतिशास्त्र का ज्ञान जरूरी है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए मेडिसिनल बाँटनी पर स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम बनाए जाएँगे।

विज्ञान के इस परिदृश्य में सामाजिक एवं साँस्कृतिक पहलुओं को भी शामिल किया जाएगा। सामाजिक विघटन एवं विलगाव के बारे में मानव प्रकृति का अध्ययन, उसमें आयी विकृतियों के निदान से सम्बन्धित पाठ्यक्रमों के निर्माण की योजना को महत्त्वपूर्ण माना गया है। यही बात मानव के साँस्कृतिक अस्तित्त्व की पहचान कराने वाले पुरातत्त्व के वैज्ञानिक पहलुओं के बारे में है। नृतत्त्वविज्ञान की अंधकारपूर्ण मान्यताओं के बारे में भी प्रकाश उड़ेलने की आवश्यकता है। कथन का सार इतना ही है कि शिक्षा संकाय के पाठ्यक्रमों के निर्माण में आधुनिक विज्ञान की महत्ता किंचित भी न्यून नहीं मानी गयी है। हाँ इतना अवश्य है कि शिक्षा संकाय की व्यापकता का विस्तार शनैः−शनैः किन्तु ठोस रूप में होगा। इसके विकास की गति के साथ-साथ ही स्वावलम्बन संकाय के पाठ्यक्रमों की नीति का निर्धारण किया जाएगा।


सद्गुणों का समुचित प्रबंधन सिखाएगा स्वावलंबन संकाय

स्वावलम्बन संकाय के पाठ्यक्रम विद्यार्थियों में स्वावलंबन वृत्ति के जागरण एवं विकास के लिए है। देव संस्कृति के युग प्रवर्तक परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि स्वावलम्बन या परावलम्बन मनुष्य की आन्तरिक वृत्तियाँ हैं। जिसमें स्वावलम्बन की वृत्ति पनप चुकी है, वह जीवन के हर क्षेत्र में कुछ कर गुजरने की हिम्मत और हैसियत रखता है। जिन्दगी के कोई काम छोटे हों या बड़े, उन्हें वह खुद करना चाहता है। समुचित सहायता या उपयुक्त मार्गदर्शन न मिलने पर भी वह हाथ पर हाथ धरे बैठा नहीं रहता। अपनी मेहनत और हिम्मत के बल पर ऐसा व्यक्ति अपने लिए राहें बना ही लेता है। स्वावलम्बन की यह वृत्ति सोयी या निष्क्रिय पड़ी रहे तो परावलम्बन ही जीवन की परिभाषा बन जाती है।

हर काम, हर बात में औरों का मुँह तकना परावलम्बन है। अपनी असफलताओं का दोष अपनी अकर्मण्यता को नहीं, परिस्थितियों या किन्हीं व्यक्तियों के माथे मढ़ने का काम परावलम्बी व्यक्ति ही करते हैं। सहायता या मार्गदर्शन का अभाव इन्हीं को सालता है। सोयी हुई, निष्क्रिय पड़ी अन्तर्चेतना के कारण उनमें सही सोच-समझ, सूझ-बूझ, उद्यमिता, श्रमशीलता, साहस, संकल्प जैसे गुण विकसित नहीं हो पाते। और हो भी कैसे? ये सभी गुण तो स्वावलम्बन वृत्ति के परिचय और पर्याय हैं। साधारण तौर पर आम लोग रोजी-रोजगार की सीमा में स्वावलम्बन को कैद करने की कोशिश करते हैं। उनके अनुसार जो रोजगार में लगा हुआ है वह स्वावलम्बी है, और जो बेरोजगार है वह परावलम्बी है। कमोबेश यह बात सही है पर पूरी नहीं। इसमें सच केवल इतना है कि रोजगार में लगे लोगों को मन से या मजबूरी से श्रम एवं सूझ-बूझ का उपयोग करना ही पड़ता है। जबकि बेरोजगारों के लिए ऐसी कोई मजबूरी नहीं है।

लेकिन कभी-कभी अपने आस-पास के जीवन में यह देखने को मिल जाता है कि नौकरी-पेशा, रोजी-रोजगार में लगे हुए लोग भी पूरी तरह से परावलम्बन से पीछा नहीं छुड़ा पाते हैं। श्रम और उद्यमिता पर उनकी आन्तरिक आस्था विकसित नहीं हो पाती। जिन्दगी की कई और अनेक बातों में वे सदा औरों का मुँह ताकते रहते हैं। आलस्य का तमस् उन्हें प्रायः घेरे रहता है। अपनी कमियों-कमजोरियों को अनदेखा करके दूसरों पर सभी छोटे-बड़े दोष मढ़ने की दूषित प्रवृत्ति उन्हें जकड़े रहती है। ऐसे व्यक्ति कहीं भी और कोई भी क्यों न हों, उन्हें पूरी तरह से स्वावलम्बी नहीं कहा जा सकता है।

स्वावलम्बन तो जीवन की शक्तियों एवं सद्गुणों का विकास है। साथ ही विकसित गुणों एवं शक्तियों का उद्देश्य पूर्ण नियोजन है। स्वावलम्बन संकाय के पाठ्यक्रमों के निर्माण में यही सत्य अपनाया जा रहा है। इन पाठ्यक्रमों के उद्देश्य को बताने वाले कतिपय महत्त्वपूर्ण बिन्दु इस तरह समझे या जाने जा सकते हैं- 1. व्यक्तित्व के व्यावहारिक जीवन में उपयोगी सद्गुणों का जागरण एवं विकास। 2. जाग्रत् सद्गुणों का समुचित प्रबन्धन। 3. जीवन की शक्तियों एवं सद्गुणों का उद्देश्यपूर्ण नियोजन। 4. इस नियोजन में स्वहित, जनहित एवं राष्ट्रहित का समुचित समन्वय। यही वे चार मूल बिन्दु हैं, जो स्वावलम्बन संकाय के पाठ्यक्रम की रूपरेखा तय करते हैं।

इनमें से पहला बिन्दु पाठ्यक्रम की रूपरेखा का आधार है। व्यावहारिक जीवन में उपयोगी सद्गुण ही स्वावलम्बन की वृत्ति को जन्म देते हैं। उसे जाग्रत् और विकसित करते हैं। इन गुणों में चार मुख्य हैं- श्रम, संकल्प, साहस एवं सूझ-बूझ। इन गुणों से युक्त व्यक्ति कभी भी परमुखापेक्षी एवं परावलम्बी नहीं हो सकता। इन गुणों के सहयोगी दो अन्य गुण भी हैं, व्यावहारिक सामञ्जस्य एवं उद्यमिता। स्वावलम्बन संकाय के पाठ्यक्रम छात्रों में इन गुणों के जागरण एवं विकास का आधार बनेंगे। क्योंकि यही वे आधारभूत तत्त्व हैं, जिनसे स्वावलम्बन की परिभाषा जन्म लेती है।

दूसरा महत्त्वपूर्ण बिन्दु सद्गुणों का समुचित प्रबन्धन है। सही कहें तो स्वावलम्बन जीवन का प्रबन्ध है। जीवन की समुचित सुव्यवस्था है। गुणवान व्यक्ति भी अगर अपने आन्तरिक एवं बाह्य जीवन में अव्यवस्थित व अस्त-व्यस्त रहे तो उनका सफल और संतुष्ट होना मुश्किल है। स्वावलम्बन संकाय के पाठ्यक्रम के माध्यम से छात्रों और छात्राओं को जीवन प्रबन्धन की व्यावहारिक प्रक्रियाओं एवं प्रयोगों का ज्ञान दिया जाएगा। इस प्रबन्ध के बाद नियोजन की सही रीति-नीति जरूरी है। यही रूपरेखा तीसरा महत्त्वपूर्ण बिन्दु है। नियोजन के कौशल से ही व्यक्ति को सफलताएँ मिलती हैं। दुनिया भर में जो भी सफल व्यक्ति हुए हैं, उनमें यही कौशल प्रकट हुआ है।

चौथे बिन्दु में नियोजन की सार्थक दिशा का ज्ञान है। यह ज्ञान ही देव संस्कृति की विशेषता है। सफलताएँ अनेकों पाते हैं, पर सभी के व्यक्तित्व में आध्यात्मिक विस्तार की झलक नहीं मिलती। देव संस्कृति का दैवी तत्त्व अध्यात्म ही है। यही मनुष्य को देव बनाने वाला रसायन है। इसी को जानने से यह सच्चाई सामने आती है कि यदि जिन्दगी की दिशा सही है तो फिर छोटे कहे जाने वाले कामों की परिणति बड़ी और महान् होती है। जैसा कि रैदास और कबीर के जीवन में दिखाई दिया। चमड़े और कपड़े का साधारण काम करके भी ये दोनों महामानव बन गए। जबकि सिकन्दर दुनिया के अधिकाँश देश जीतकर, विश्वविजेता बनने का स्वाँग भरकर भी अन्त में पछताता हुआ मरा।

इसलिए स्वावलम्बन संकाय के पाठ्यक्रमों की विषय वस्तु इस ढंग से तैयार की जा रही है कि उसकी राष्ट्रीय और सामाजिक उपयोगिता भी हो। चिकित्सालय प्रबन्धन, देवालय प्रबन्धन, ग्राम प्रबन्धन, साँस्कृतिक प्रबन्धन, हैरिटेज मैनेजमेण्ट ऐसे ही कुछ पाठ्य विषयों की कल्पना की गयी है। जिन्हें पढ़कर न केवल स्वावलम्बी होने के अवसर उपलब्ध हो, बल्कि जीवन में कुछ सार्थक कर पाने की गौरवमयी अनुभूति भी हो। इन पाठ्यक्रमों के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि इनका स्वरूप कुछ ऐसा बनाया जाना है, जिसमें विद्यार्थियों के स्वहित के साथ राष्ट्रहित, मानवहित एवं विश्वहित भी निहित हो।

ऐसा करना कठिन जरूर है, पर असम्भव नहीं है। समाज और राष्ट्र के लिए अभी जो किया जा रहा है, वह उचित है। परन्तु इसके और भी अनेकों पहलू हैं, जिन पर अभी किसी का ध्यान नहीं गया, जिनके बारे में सोचा जाना, जिन्हें अविलम्ब किया जाना समय की अनिवार्य जरूरत है। ऐसे ही क्षेत्रों को तलाश कर नए विषय एवं नए पाठ्यक्रम तैयार किए जाने का काम प्रारम्भ हो चुका है। ये सभी पाठ्यक्रम कुछ इस प्रकार बनाए जा रहे हैं, जिन्हें पढ़ने वाले विद्यार्थियों का व्यक्तित्व तो विकसित हो ही, साथ ही उन्हें काम के लिए लम्बा इन्तजार करना न पड़े। पढ़ाई के साथ ही उन्हें कार्य के अवसर सुलभ हों। ये अवसर भी ऐसे हों, जिनमें निज का हित होने के साथ देश और समाज के लिए कुछ अच्छा और सार्थक किया जा सके।

स्वावलम्बन संकाय के पाठ्यक्रमों का निर्माण युग की एक चुनौती है। जिसे देव संस्कृति विश्वविद्यालय के संचालकों ने युग ऋषि परम पूज्य गुरुदेव की कृपा के भरोसे स्वीकार किया है। इसमें सभी कुछ नया गढ़ना और बनाना है। युवा पीढ़ी के लिए नयी राहें तैयार करनी है। इस सम्बन्ध में विचारशीलों के उपयोगी सुझाव एवं सहयोग आमंत्रित है। सहयोग देने के इच्छुक जन देव संस्कृति विश्वविद्यालय के स्वावलम्बन संकाय से संपर्क स्थापित कर सकते हैं। इसके सहित सभी संकायों में क्रियाशीलता गति पकड़ती जा रही है। इनके पाठ्यक्रमों के साथ इन सभी में होने वाले भावी शोध-अनुसन्धान के उद्देश्य एवं प्रक्रियाएँ भी तय की जा रही हैं। आखिर यही तो युग प्रश्न के हल की सार्थक पहल है।


ऋषित्व की प्रगाढ़ अनुभूति की परिचायक शोध साधना

ऋषियों के शोध अनुसन्धान के उद्देश्य एवं प्रक्रिया की मौलिकता ने देव संस्कृति के समस्त आयाम गढ़े हैं। इसमें संजोयी जीवन जीने की कला, मूल्य, आदर्श, सद्गुणों की दैवी सम्पत्ति को विकसित करने का सारा विज्ञान ऋषियों के शोध-अनुसन्धान का ही सुफल है। इस परम्परा और प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की डगर भी यही है। ऋषियों के काम करने के लिए हमें ऋषियों की राह पर चलना होगा। उनकी शोधप्रियता एवं अन्वेषण वृत्ति के साथ उन उद्देश्यों एवं प्रक्रियाओं को भी जानना होगा, जिसकी वजह से देव संस्कृति अस्तित्त्व में आयी। ज्ञान-विज्ञान की असंख्य कल्याणकारी धाराएँ प्रवाहित हुई। भारत देश को जगद्गुरु की गरिमा मिली।

इस सच को भी सभी जानते हैं कि विश्वभर का सारा ज्ञान शोध-अनुसन्धान का परिणाम है। लेकिन इस बात की अनुभूति कम ही लोग कर पाते हैं कि यह कभी कल्याणकारी और कभी विनाशकारी क्यों हो जाता है? इस प्रश्न का हल ज्ञान को जन्म देने वाले शोध अनुसन्धान के उद्देश्य एवं प्रक्रिया में छुपा है। यदि उद्देश्य एवं प्रक्रिया ऋषि संवेदना से युक्त है, तो उपलब्ध ज्ञान सुनिश्चित रूप से कल्याणकारी होगा। और यदि अनुसन्धान के उद्देश्यों व प्रक्रियाओं में ऋषि संवेदना का अभाव है, तो उपलब्ध ज्ञान से अनिष्ट एवं अनर्थ ही जन्म लेंगे। उससे विनाश लीलाएँ ही फैलेंगी। समूची दुनिया में हर रोज यह सच बार-बार जाना और परखा जाता है। इस बात के प्रामाणिक होने में अब कोई कोर-कसर नहीं रह गयी है कि शोध-अनुसन्धान के लिए प्रखर मेधा सम्पन्न मस्तिष्क के साथ उच्चस्तरीय संवेदनाओं से युक्त हृदय की भी जरूरत है।

इन दोनों के सुयोग-संयोग से शोध-अनुसंधान के क्षेत्र में उद्देश्यों व प्रक्रियाओं में उसी मौलिकता को पाया जा सकता है, जो ऋषियों के जीवन में थी। ये मेधावान ऋषि प्रखर तपस्वी थे। उच्चस्तरीय संवेदनाएँ उनमें स्पन्दित होती थी। युग की वेदना उन्हें विकल करती थी। मानव हित एवं विश्वहित की कामना से वे रूखा-सूखा खाकर साधारण जीवन जीते हुए अपनी शोध में तल्लीन रहते थे। उनकी शोध का स्वरूप कुछ भी हो, पर उद्देश्य एक ही था- मानव हित-विश्व हित। इसी के अनगिन प्रश्नों के हल के लिए उन्होंने उपयोगी प्रक्रियाएँ गढ़ी थीं। शोध-अनुसंधान के उद्देश्यों एवं प्रक्रियाओं का यही ऋषिकल्प संयोग देव संस्कृति विश्वविद्यालय में साकार हो रहा है।

ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के सहयोग से यहाँ के शोध कार्य का संयोजन एवं संचालन प्रत्येक संकाय के प्रत्येक विभाग में गठित की गयी शोध-उपाधि-समितियाँ या रिसर्च डिग्री कमेटी (आर.डी.सी) करेगी। प्रत्येक संकाय एवं विभाग में शोध कार्य के विविध स्तर होंगे। इन स्तरों के अनुरूप ही शोधार्थी एम.फिल., पी-एच.डी., डी.लिट् एवं डी.एस.सी. उपाधि के अधिकारी होंगे। इनमें से किसी भी उपाधि को पाने के लिए शोध छात्र एवं शोध छात्रा को अपने शोध उद्देश्य की कड़ी जाँच एवं प्रक्रिया की खरी परख के अनेक स्तरों से गुजरना होगा। उन्हें अपने शोध कार्य की उपयोगिता व उपादेयता को सिद्ध करना होगा।

विश्वविद्यालयों में शोध कार्य के गिरते स्तर से देव संस्कृति विश्वविद्यालय के संचालक परिचित ही नहीं चिन्तित भी हैं। इसीलिए समय की इस चुनौती का सामना करने के लिए यहाँ कई कड़े कदम उठाए गए हैं। शोध कार्य के संचालन हेतु कई विशिष्टताओं को अपनाया गया है। इनमें से सबसे बड़ी विशेषता शोध कार्य के उद्देश्य व शोध विषय के चुनाव के बारे में है। इस बारे में यह निश्चित किया गया है कि राष्ट्रीय व मानवीय जीवन की ज्वलन्त समस्याएँ यहाँ किए जाने वाले शोध अनुसन्धान के उद्देश्यों को निश्चित करेंगी। ऋषियों के ज्ञान एवं भारतीय विद्याओं के विविध पहलुओं के परिप्रेक्ष्य में इनके सार्थक समाधान ढूंढ़े जाएँगे। शोध-अनुसंधान का मकसद केवल बौद्धिक कलाबाजियों एवं कुलाँचों तक सीमित नहीं रहेगा। शोधार्थियों को मानव जीवन की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, साँस्कृतिक, नैतिक, आर्थिक आदि विविध समस्याओं की स्पष्ट और सार्थक अनुभूति करनी होगी। मानवीय वेदना की टीस व कसक की इस अनुभूति से ही शोध के उद्देश्य तय होंगे, शोध के विषय तय होंगे। सार रूप में राष्ट्रीय व मानवीय समस्याओं की अनगिन चुनौतियों को स्वीकार करना और उनके सार्थक समाधान खोज निकालना ही यहाँ के शोध-अनुसंधान का उद्देश्य होगा।

शोध-अनुसन्धान की प्रक्रिया का स्वरूप भी शोध विषय व उद्देश्य के अनुरूप गढ़ा गया है। प्रक्रिया के पहले चरण में शोधार्थी को शोध विषय के चुनाव एवं शोध कार्य की रीति-नीति की जानकारी के लिए विश्वविद्यालय के सम्बद्ध विभाग में आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा। प्रायः देखा यह गया है कि शोध तकनीक का समुचित प्रशिक्षण प्राप्त किए बगैर शोधार्थी अपना काम शुरू कर देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि उनका समूचा शोध कार्य कुछ रद्दी पन्नों का छोटा या बड़ा ढेर बनकर रह जाता है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के किसी भी संकाय के किसी भी विभाग में शोध कार्य के इच्छुक छात्र या छात्रा के लिए शोध विषय के अनुरूप शोध तकनीक का आवश्यक प्रशिक्षण करना अनिवार्य होगा। शोध तकनीक एवं शोध विषय के महत्त्व को दर्शाने वाले कम से कम एक या दो शोध पत्र लिखने के बाद ही शोधार्थी का शोध उपाधि के लिए पंजीकरण हो सकेगा। इस शोध पत्र की जाँच डीन के निर्देशन में विभागाध्यक्ष के आधीन बनी एक विशेष समिति करेगी। इसके सन्तुष्ट होने पर ही शोधार्थी के शोध विषय का पंजीकरण सम्भव होगा।

विषय के पंजीकरण होने के बाद शोध छात्राएँ एवं छात्र अपने निर्देशक के आधीन शोध कार्य प्रारम्भ करेंगे। शोधार्थियों की विश्वविद्यालय के प्रत्येक कार्य दिवस में उपस्थिति अनिवार्य होगी। यहीं रहकर वे अपने प्रायोगिक एवं सैद्धान्तिक कार्य को पूरा करेंगे। निर्देशक की अनुमति से ये शोधार्थी अपने कार्य के लिए किसी विशेष स्थान के लिए जा सकते हैं। अपने शोध कार्य को पूरा करने से पहले शोधार्थी को अपने कार्य से सम्बन्धित कम से कम दो या तीन शोध पत्रों को प्रकाशित करना अनिवार्य होगा। ये शोध पत्र विषय से सम्बन्धित किसी प्रतिष्ठित शोध-पत्रिका में प्रकाशित होने चाहिए।

शोध कार्य पूरा हो चुका, यह शोध विषय के निर्देशक एवं सह निर्देशक प्रमाणित करेंगे। इसके बाद यह शोध प्रबन्ध विश्वविद्यालय के परीक्षा विभाग द्वारा विशेषज्ञों के अनुमोदन से देश या विदेश के किन्हीं दो प्रतिष्ठित विद्वानों के पास जाँच के लिए भेजा जाएगा। ये विद्वान् विषय के विशेषज्ञ होंगे। इनके सन्तुष्ट होने पर विश्वविद्यालय में शोधार्थी की परीक्षा होगी। इस परीक्षा का स्वरूप लिखित एवं मौखिक दोनों ही, शोध उपाधि समिति तय करेगी। परीक्षकों द्वारा शोध प्रबन्ध के प्रकाशन योग्य एवं समस्या के सार्थक समाधान के योग्य पाए जाने पर शोधार्थी अपनी शोध-उपाधि के अधिकारी होंगे।

शोध अनुसन्धान के उद्देश्य एवं प्रक्रिया का यह समूचा विधान शोध कार्य के स्वरूप का सार्थक एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए बनाया गया है। इसका प्रत्येक पहलू छात्र को यह समझाएगा कि शोध किसी उपाधि का अलंकरण भर नहीं है। यह ऋषि जीवन की कठोर तप साधना है। शोध कार्य करने का अर्थ अपने जीवन में ऋषित्व को सिद्ध करना है। इस क्रम में शोध छात्र एवं छात्राओं के सम्मुख एक ही सत्य रखा जाएगा कि जिसने भी अपने शोध-अनुसंधान में ऋषित्व की जितनी प्रेरक एवं प्रगाढ़ अनुभूति की, उसी की उतनी शोध साधना सफल हुई। इस शोध साधना का केन्द्र विश्वविद्यालय का पुस्तकालय होगा। यही पर शोध सत्यों को प्रकट करने वाली उर्वर विचार भूमि एवं संवेदनशील भावभूमि तैयार होगी।


विद्या साधना का दिव्य मंदिर-ग्रंथालय

पुस्तकालय देव संस्कृति विश्वविद्यालय की काय संरचना का मेरुदण्ड है। विश्वविद्यालय की समस्त विद्या योजना की दृढ़ता का आधार यही है। इसे देव संस्कृति के विशालकाय महारत्न भण्डार की संज्ञा दी जा सकती है। जहाँ पुरातन भारत के ज्ञान की सनातन निधि को ढूंढ़ खोज कर इकट्ठा किया गया है। आगे भी यह प्रक्रिया अविराम रूप से जारी रहने वाली है। विश्व के विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, साहित्य एवं दर्शन के बहुमूल्य ग्रन्थों को यहाँ बड़े यत्न से जुटाया गया है। ग्रन्थालय का वैज्ञानिक कोश आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान सम्पदा से भरपूर है। पुरातन और आधुनिक ज्ञान व विज्ञान की असंख्य व अनगिन धाराएँ यहाँ परस्पर मेल-मिलाप करती देखी जा सकती हैं। ज्ञान-विज्ञान की विविध धाराओं के अभूतपूर्व संगम की सृष्टि का सौंदर्य यहाँ झलकता है।

यह पुस्तकालय ऋषि संस्कृति की एक अभूतपूर्व एवं अद्भुत संस्थापना है। ऋषियों द्वारा स्थापित पुरातन काल के विश्वविद्यालयों में पुस्तकालय का अपना एक विशिष्ट स्थान था। यह बात अलग है कि तब इसके स्वरूप में अब से काफी कुछ भिन्नता थी। तब छपायी एवं कागज की आधुनिक सुविधाएँ नहीं थी। ग्रन्थ भोजपत्र एवं ताड़ पत्र पर लिखे जाते थे। लेखन का यह कार्य प्रायः विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा किया जाता था। वही पुस्तकालय के लिए ग्रन्थों की प्रतिलिपियाँ तैयार करते थे। यह परम्परा ऐतिहासिक युग में भी बनी रही।

ऐतिहासिक अभिलेख एवं पुरातात्त्विक प्रमाण इसकी पुष्टि करते हैं। डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी, प्रो. आर.सी. मजूमदार, डॉ. राजबली पाण्डेय, प्रो. ए.एस. अल्तेकर जैसे प्रख्यात् इतिहासवेत्ताओं ने भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति में पुस्तकालयों के महत्त्व को स्वीकारा है। पुरातत्त्ववेत्ता सर जेम्स प्रिंसेप, अलेक्जैंडर कनिंघम, फ्लीट, सर जॉन मार्शल, मार्टीमर व्हीलर एवं प्रो. साँकलिया जैसे पुरातत्त्व-वेत्ताओं ने भारत के साँस्कृतिक ज्ञान-विज्ञान के विकास में पुस्तकालयों के महत्त्व को दर्शाने वाले संकेत दिए हैं।

समस्त ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक प्रमाण एक स्वर से जिस पुस्तकालय की महिमा गाते हैं, वह नालन्दा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय है। अपने युग में यह महत्त्वपूर्ण पुस्तकालय अति विशाल था। उसके द्वारा हजारों विद्यार्थियों और छात्रों की ज्ञान पिपासा की पूर्ति होती थी। नालन्दा विश्वविद्यालय के इस पुस्तकालय का नाम धर्मगंज था। इसके प्रसार क्षेत्र के व्यापक होने के प्रमाण मिलते हैं। ऐतिहासिक विवरण के अनुसार इस पुस्तकालय में प्रतिलिपि करने की भी सुविधा थी। चीनी विद्यार्थी इत्सिंग ने नालन्दा में रहकर चार सौ संस्कृत पुस्तकों की शुद्ध प्रतिलिपियाँ तैयार की थीं। इनमें लगभग 5 लाख श्लोक थे।

ऐतिहासिक दस्तावेजों एवं पुरातात्त्विक अभिलेखों के अनुसार ‘धर्मगंज’ नाम से विख्यात इस पुस्तकालय के भवन अतिविशाल थे। इन अनेक भवनों में से केवल तीन के नाम इतिहासवेत्ता खोज पाए हैं। ये तीन भवन- रत्नसार, रत्नोदधि और रत्नरञ्जक के नाम से विख्यात थे। इनमें लाखों की संख्या में हस्तलिखित पुस्तकें थीं। इन तीन भवनों में रत्नसागर नौ मंजिलों वाला भवन था और रत्नोदधि सात मंजिलों का। रत्नरञ्जक का आकर्षण इन दोनों से कहीं कम नहीं था।

नालन्दा विश्वविद्यालय के इसी गौरव के अनुरूप देव संस्कृति विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का स्वरूप गढ़ा जा रहा है। विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर में अपना स्वरूप पा रहे पुस्तकालय का एक अलग विशिष्ट भवन होगा। इस पुस्तकालय भवन में पाँच मंजिलें होंगी। इनमें से भूमिखण्ड वाली मंजिल में ज्ञान-विज्ञान का मिला−जुला पुरातन एवं नूतन स्वरूप दर्शाने वाले ग्रन्थ होंगे। शेष चार मंजिलों में से प्रत्येक मंजिल विश्वविद्यालय के चार विशिष्ट संकायों से सम्बन्धित होगी। इनमें से हर एक की व्यवस्था के लिए अलग-अलग प्रभारी नियुक्त होंगे। जो विश्वविद्यालय के मुख्य पुस्तकालयाध्यक्ष के निर्देशन में कार्य करेंगे।

विश्वविद्यालय का यह पुस्तकालय पूर्णतया कम्प्यूटरीकृत एवं सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त होगा। विद्यार्थियों व प्राध्यापकों को पुस्तकों के किन्हीं विशेष अंश की प्रतिलिपि उपलब्ध कराने के लिए यहाँ उच्च क्षमता वाली आधुनिक जीरॉक्स मशीन हर समय उपलब्ध होगी। छात्र एवं आचार्य दोनों ही यहाँ दी जाने वाली इन्टरनेट सुविधा का लाभ अपने अध्ययन के लिए उठा सकेंगे। प्रत्येक विषय में पुस्तकों के साथ आवश्यक सी.डी. रोम यहाँ उपलब्ध होंगे। जिन्हें कम्प्यूटर के माध्यम से देखा व पढ़ा जा सकेगा। साथ ही अनिवार्य समझे जाने वाले अंशों के प्रिन्ट लिए जा सकेंगे।

अत्याधुनिक सुविधाओं एवं ज्ञान की क्षमता वाले इस पुस्तकालय का महत्त्व विश्वविद्यालय के एक संकाय की ही भाँति होगा। जिसका दायित्व मुख्य पुस्तकालयाध्यक्ष संभालेंगे। पुस्तकालय के सभी नियमों-उपनियमों व अनुशासनों को पालन कराने का दायित्व उन्हीं का होगा। नियमों की यह विधि-व्यवस्था कुलपति के निर्देश व मार्गदर्शन में बनेगी। इस बारे में कुलपति के निर्देश ही अन्तिम होंगे। पुस्तकालय की समस्त व्यवस्था में उनकी स्वीकृति एवं सहमति महत्त्वपूर्ण होगी। पुस्तकालय की सारी आवश्यकताओं एवं क्रय की जाने वाली पुस्तकों सहित समस्त साधन सम्पदा का ब्यौरा पुस्तकालयाध्यक्ष समय-समय पर नियमित अन्तराल में कुलपति को देते रहेंगे।

पुस्तकालय के शैक्षणिक अनुशासन के महत्त्वपूर्ण बिन्दु के रूप में विश्वविद्यालय के प्रत्येक विद्यार्थी एवं शोध छात्र की उपस्थिति है। प्रत्येक कार्य दिवस में हर विद्यार्थी एवं शोध छात्र को बनाए गए अनुशासन के अनुसार पुस्तकालय में नियमित रूप से बैठकर पढ़ना होगा। सम्बन्धित प्रभारी इन सभी छात्रों की उपस्थिति अंकित करेंगे। परीक्षा में बैठने के लिए इस उपस्थिति का अनिवार्य रूप से महत्त्व होगा। जो भी छात्र पुस्तकालय के नियमों के अनुशासन में दोषी होंगे, उन्हें परीक्षा से बहिष्कृत किया जा सकेगा। पुस्तकालय की समस्त सुविधाओं का समुचित उपयोग करना विश्वविद्यालय के हर छात्र एवं आचार्य का कर्त्तव्य है। और इन्हें समयानुसार जुटाते रहना और सभी सत्पात्रों को उनकी पात्रता के अनुरूप प्रदान करना पुस्तकालय की व्यवस्था का काम है।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय का यह पुस्तकालय माता हंसवाहिनी भगवती सरस्वती का मन्दिर है। जिसकी साज-सज्जा महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों एवं राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं के द्वारा सदा की जाती रहेगी। पुस्तकालयाध्यक्ष माता सरस्वती के इस भव्य मन्दिर के मुख्य पुजारी होंगे। अन्य पुस्तकालयकर्मी उनके सहयोगी की भूमिका निभाएँगे। इस दिव्य मन्दिर में विद्या साधना करने का भार विश्वविद्यालय के छात्रों-छात्राओं व आचार्यों-आचार्याओं का है। उनकी विद्या साधना ही इसे प्राणवान व ऊर्जावान बनाएगी। इस पुस्तकालय में अन्य विविध ग्रन्थों के साथ देव संस्कृति विश्वविद्यालय के अपने निजी प्रकाशित ग्रन्थ भी होंगे। जिनका प्रकाशन विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग द्वारा होगा। इस विभाग से देव संस्कृति के बहुआयामी स्वरूप के सम सामयिक रूप नियमित व निरन्तर प्रकाशित होते रहेंगे। विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित इन कृतियों का पुस्तकालय में विशेष स्थान होगा।


ऋषि संस्कृति का बहुआयामी स्वरूप दर्शाएगा प्रशासन तंत्र

प्रकाशन विभाग देव संस्कृति विश्वविद्यालय की उज्ज्वल कीर्ति का प्रकाश है। विश्वविद्यालय की विविध हलचलें, क्रियाकलाप, गतिविधियाँ एवं उपलब्धियाँ इसी के द्वारा प्रकाश में आएँगी। ऋषि संस्कृति के बहुआयाम प्रकाशन विभाग से ही प्रकाशित होंगे। इसका कार्य क्षेत्र काफी व्यापक एवं विस्तृत है। इसके उद्देश्यों में यही उदार-विस्तार है। उपलब्धियाँ हो और उनके वितरण की व्यवस्था न बने तो उनका अर्जन अधूरा है। सबका हित और सबका सुख- यही संस्कृति संदेश है। इसी साँस्कृतिक संवेदना के प्रसार के लिए देव संस्कृति विश्वविद्यालय में प्रकाशन विभाग की स्थापना की गयी है। देव संस्कृति के सृजन अभियान को इससे और भी अधिक तीव्र संवेग प्राप्त होगा।

पुरातन काल में ऋषियों ने संस्कृति सूत्रों के अन्वेषण-अनुसन्धान के साथ इनके प्रकाशन और विस्तार की समुचित व्यवस्था की थी। यद्यपि उस समय यह व्यवस्था अपने युग के अनुरूप थी। कागज और छपाई के अभाव में बहुत बड़ी संख्या में पुस्तकों का प्रकाशन तो सम्भव न था। फिर भी संस्कृति के भाव विस्तार के लिए अनेकों कारगर उपाय ढूंढ़े गए थे। विश्वविद्यालयों के आचार्य अपने छात्रों-अन्तेवासियों के साथ भ्रमण के लिए देश के विभिन्न भागों में जाते थे। इस देशाटन से दोहरा लाभ होता है। पहले लाभ के रूप में विद्यार्थियों की ज्ञान वृद्धि होती थी। उन्हें क्षेत्र विशेष की रीति-नीति, वहाँ की भौगोलिक संरचना, ऐतिहासिक उपलब्धियाँ, वैज्ञानिक तथ्य आदि अनगिनत बातों का ज्ञान होता था। इसी के साथ दूसरा लाभ जन सामान्य को होता था। वे विशेष रूप से विश्वविद्यालयों के इन विशेषज्ञ आचार्यों के संपर्क में आते थे। और उनके ज्ञान से लाभान्वित होते थे। जनपद, नगर एवं ग्रामवासियों को इन आचार्यों और छात्रों से अनेक तरह का ज्ञान मिलता था।

वैदिक साहित्य में जल जातुकर्णी नाम के कृषक का उल्लेख मिलता है। जिसने महर्षि कौष्टक एवं उनके अन्तेवासियों से कृषिविद्या के लिए उपयोगी तकनीकी ज्ञान सीखा था। वभ्रु द्वारा महर्षि अत्यंहस से शिल्प एवं जीवनोपयोगी कौशल सीखे जाने का उल्लेख वेदों में मिलता है। इस व्यावहारिक ज्ञान के अलावा आध्यात्मिक ज्ञान तो इस धर्म प्राण देश का जीवन ही था। विश्वविद्यालयों के आचार्य व उनके अन्तेवासी अपने ज्ञान के प्रकाशन से विशेषज्ञों सहित सामान्य जनों को प्रभावकारी ढंग से लाभान्वित करते थे।

ज्ञान प्रकाशन की यह प्रभावशाली परम्परा ऐतिहासिक युग के तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशील एवं उदयन्तपुर आदि विश्वविद्यालयों में थी। प्रायः इन सभी विश्वविद्यालयों में प्रकाशन विभाग थे। तब छपाई की व्यवस्था न होने के कारण इस विभाग में विश्वविद्यालय के आचार्यों द्वारा लिखे गए ग्रन्थों की प्रतिलिपि लेखन का कार्य होता था। विश्वविद्यालय के विद्यार्थीगण इस प्रकाशन कार्य में सम्मिलित होते थे। इन प्रकाशित कृतियों को पहले अन्य विश्वविद्यालयों के प्रतिष्ठित आचार्यों के पास समीक्षा के लिए भेजा जाता था। बाद में उनकी समीक्षा टिप्पणी भी इन ग्रन्थों में जुड़ती थी। ऐसी टिप्पणी वाले ग्रन्थों को छात्रों एवं जिज्ञासुओं के बीच ज्यादा प्रामाणिक माना जाता था।

इतिहास में नालन्दा विश्वविद्यालय के आचार्य ज्ञानचन्द्र के द्वारा लिखे गए ज्योतिषदीप नाम के एक ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है। ऐतिहासिक उल्लेख के अनुसार यह ग्रन्थ बड़े यत्न से प्रकाशित किया गया था। इस ग्रन्थ में अनेक प्रतिष्ठित आचार्यों की समीक्षा के साथ विक्रमशील विश्वविद्यालय के महास्थविर आचार्य दीपंकर की समीक्षा टिप्पणी भी प्रकाशित की गयी थी। आचार्य दीपंकर बौद्ध दर्शन के साथ ज्योतिष एवं तंत्र के भी महान् विद्वान् थे। ऐसे ही अन्य अनेक ग्रन्थों की प्रकाशन कथाएँ इतिहास के पन्नों में ढूंढ़ने से मिल जाती हैं। ये सभी कथाएँ प्राचीन विश्वविद्यालयों में प्रकाशन विभाग के विविध रूपों के बारे में बताती हैं।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय का प्रकाशन विभाग भारत देश के प्राचीन गौरव की अभिनव स्थापना है। प्रकाशन विभाग के कार्यों का नियंत्रण विश्वविद्यालय की प्रकाशन समिति करेगी। इस समिति के दो उपविभाग होंगे। इनमें से पहले उपविभाग का संचालन विशेषज्ञ विद्वानों की एक टीम करेगी। दूसरा उपविभाग प्रकाशन की तकनीकी ज्ञान से जुड़े हुए लोगों का होगा। जो प्रकाशन कार्य और उसकी गुणवत्ता को जाँच-परखकर विश्वविद्यालय के संस्कृति-सृजन को प्रकाशित करेगा।

इस प्रकाशन विभाग पर ही विश्वविद्यालय के मुख पत्र को प्रकाशित करने की जिम्मेदारी होगी। इस मुख पत्र का सम्भावित नाम ‘देव संस्कृति’ है। इसमें विश्वविद्यालय की सामयिक गतिविधियों एवं नीति-निर्धारण की सम्पादकीय के साथ यहाँ के विभिन्न संकायों के आचार्यों एवं छात्रों के शोध आलेख प्रकाशित होंगे। इसमें प्रकाशित कृतियों की प्रामाणिकता अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की होगी। इसका प्रसार भी विश्व व्यापी किए जाने की योजना है। भारतीय संस्कृति एवं भारतीय विद्याओं पर शोध आलेख प्रकाशित करने वाला यह अपने ढंग का मौलिक पत्र होगा। इसका सम्पादन प्रकाशन विभाग के विशेषज्ञों-विद्वानों की समिति करेगी। इस कार्य में अन्य राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मनीषियों व विचारशीलों का भी सहयोग लिया जाएगा।

इसके अलावा प्रकाशन विभाग द्वारा देव संस्कृति के ज्ञान-विज्ञान के विविध पहलुओं को प्रकट करने वाली अन्य मौलिक कृतियाँ प्रकाशित की जाएगी। इनका सृजन विश्वविद्यालय के आचार्यगण करेंगे। शिक्षण के साथ अपने विषय से सम्बन्धित साहित्य का सृजन एवं शोध पत्र लेखन भी आचार्यों का दायित्व होगा। देव संस्कृति में समाए ज्ञान-विज्ञान के सामयिक व वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। यह भगीरथ तप यहाँ के आचार्यों को ही करना है। इसे बिना किए संस्कृति की देव सरिता जन-जन तक न पहुँच सकेगी। हमारे पूर्वजों की महान् आत्माओं को देव संस्कृति की सरिता के ज्ञान जल से ही तृप्ति मिलेगी। इसी से उनका सच्चा तर्पण एवं श्राद्ध होगा।

प्रकाशन विभाग का एक महत्त्वपूर्ण कार्य विश्वविद्यालय के शोध-छात्रों द्वारा लिखे गए शोध-प्रबन्धों का प्रकाशन है। यह पहले ही कहा जा चुका है कि शोध छात्रों को केवल प्रकाशन योग्य शोध प्रबन्धों पर ही शोध उपाधियाँ मिलेंगी। ऐसे उत्कृष्ट शोधकार्यों को विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित किया जाएगा। हालाँकि ऐसा करने से पहले विशेषज्ञों की समिति इनकी गुणवत्ता को कई स्तरों पर परखेगी। इस गुणवत्ता के महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं में शोध प्रबन्ध के मौलिक सृजन के साथ विषय की सामयिक उपयोगिता भी है। इसके अलावा इस कृति से भारतीय संस्कृति एवं भारतीय विद्याओं के किसी पहलू पर इसके द्वारा सार्थक एवं उत्कृष्ट अभिव्यक्ति अनिवार्य है।

इन मौलिक शोध कृतियों का प्रकाशन देव संस्कृति की दिव्यता एवं जीवन्तता को सिद्ध करेगा। प्रकाशन विभाग की उपलब्धियाँ विश्व मानव को भारत देश की सनातन संस्कृति की एक नयी अनुभूति देंगी। सभी जान सकेंगे कि जिस महान् साँस्कृतिक वैभव को उन्होंने जीवाश्म समझ लिया था, दरअसल वह जीवन्त है। अभी भी उसमें प्राण और ऊर्जा है। दुनिया भर के राष्ट्रों एवं मनुष्यों को अभी भी इससे प्राण और जीवन के वरदान मिल सकते हैं। शोध पत्रिका ‘देव संस्कृति’ एवं विभिन्न शोध-प्रबन्धों के अलावा अन्य अनगिनत मौलिक रचनाएँ इस विभाग के द्वारा प्रकाशित की जाएँगी। उच्च स्तरीय विचारों के दिव्य निर्झर के रूप में यह विभाग सतत और अविराम क्रियाशील रहेगा। इस क्रियाशीलता के लिए इसे आवश्यक ज्ञान ऊर्जा विश्वविद्यालय के आचारवान आचार्यों से मिलेगी। उनका तप ही इस विभाग का जीवन होगा।


संस्कृति सृजन में निपुण तपःपूज शिल्पी बनेंगे आचार्य

आचारवान आचार्यगणों का तपस्वी जीवन देव संस्कृति की ऊर्जा का स्रोत है। आचार्यों के तप की प्रखरता इसे प्रखर बनाती है। उनके आचरण के प्राण बल से इसे प्राण मिलते हैं। आचार्यों के जीवन व चरित्र की शुद्धता से ही इसमें दैवी एवं दिव्य तत्त्वों का संचार होता है। सच तो यह है कि देव पुरुष आचार्यों ने ही भारत देश की संस्कृति को देव संस्कृति का स्वरूप दिया है। इसके सभी आदर्श आचार्यगणों ने अपने आचरण से गढ़े हैं। संस्कृति के स्वरूप एवं आचार्यों के जीवन में सब कुछ अनुक्रमानुपाती है। जैसे-जैसे आचार्यों के आचरण का प्राण बल घटता है, वैसे-वैसे संस्कृति अपना जीवन खोती है। आचार्यों के तप परायण न रहने से संस्कृति ऊर्जाहीन हो जाती है। आचार्यों के जीवन से आदर्शों का लोप होने से संस्कृति का अस्तित्त्व विलोप होने लगता है।

आज देश में यदि पुरातन साँस्कृतिक आदर्श विलुप्त हो रहे हैं, तो उसका कारण यही है कि आज केवल आचार्यों के जीवाश्म मिलते हैं। उनके जीवन में कहीं जीवन्तता दिखाई नहीं देती। आज डिग्रियों के भाँति-भाँति के गहनों से अपने को सजाए हुए विद्वान् प्रोफेसर हैं, पर अपने आचरण से विद्यार्थियों के जीवन को गढ़ने वाले आचार्य नहीं हैं। विश्वविद्यालय में जो पढ़ाते हैं, उनके पास पुस्तक में छपे हुए शब्दों का भण्डार है, लेकिन आचरण की अनुभूति नहीं है। बाहर से आकृति तो आचार्य की है, पर आन्तरिक प्रकृति बिल्कुल भी वैसी नहीं है। जब पढ़ाने वालों का जीवन धन के इर्द-गिर्द परिक्रमा कर रहा हो, तब विद्यार्थियों का जीवन भी तो कुछ वैसा ही स्वरूप पाएगा। साँचे ही तो ढाँचों को गढ़ते हैं। आज के ढाँचों को देखकर सहज ही साँचों की कल्पना की जा सकती है। इस स्थिति में यदि कोई बदलाव सम्भव है, तो केवल आचार्यों का आचरण बदलने से। देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना का आधार यही सोच है। यहाँ के संचालकों ने एक देव पुरुष आचार्य के आचरण से असंख्यों को गढ़ते, ढलते, बनते, बदलते, संवरते, सुधरते देखा है। यह कथा कागद की लेखी नहीं, आँखिन की देखी है। युग ऋषि गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ऐसे ही आचार्य थे। जिनके चरणों के सान्निध्य में अनगिनत जीवनों ने देव संस्कृति के सत्य की अनुभूति पायी। सौ प्रतिशत हू-ब-हू उनके जैसा हो पाना न भी सम्भव हो, तो भी उनके द्वारा स्थापित आदर्शों के लिए स्वयं को निछावर तो किया जा सकता है। बढ़-चढ़कर उनकी बनायी-बतायी राहों पर चलते हुए मरा और मिटा तो जा ही सकता है।

इससे कम में देश और धरती का साँस्कृतिक कायाकल्प होगा भी नहीं। ध्यान रहे कि जीवन से ही जीवन बदलते हैं। जलते हुए दीए ही दूसरे दीयों को जलाते हैं। चिंगारी ही फूस और लकड़ी को छू कर ज्वालाओं को जन्म देती है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में ऐसे आचार्यों का आह्वान है, आमंत्रण है, प्रीतिभरा स्नेह आमंत्रण है। उन प्राणवान, तपस्वी आचार्यों को देश और विश्व के साँस्कृतिक नवोन्मेष के लिए बुलाया जा रहा है जो साहसी हैं, संकल्पवान हैं, जिनमें देव संस्कृति के लिए जीने-मरने का दम-खम है। बुलावा है उन्हें, जो शब्दों से नहीं जीवन से बात करते हैं। उनको निमन्त्रण है, जिन्होंने अक्षरों की नहीं आचरण की सामर्थ्य जुटायी है। इन पंक्तियों के माध्यम से उन्हें पुकारा गया है, जिनकी प्रतिभा बिकने के लिए नहीं भारत माता की साँस्कृतिक वेदी पर न्यौछावर होने के लिए है। प्रतिभा के व्यापारियों को नहीं, संस्कृति सृजन में निपुण समर्पित शिल्पियों को बुलाया जा रहा है।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में उनका स्थान सुनिश्चित है, जिनके सामने महर्षि अरविन्द का आदर्श है। जिन्होंने राष्ट्रीय और साँस्कृतिक आदर्श के लिए बड़ौदा कॉलेज की 710 रुपये की नौकरी छोड़कर कलकत्ता में नव स्थापित हुए नेशनल कॉलेज में मात्र 150 रुपये मासिक पर अध्यापन करना स्वीकार किया। इसी तरह जब महामना मदन मोहन मालवीय जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की तो उन्होंने हिन्दी के सुप्रतिष्ठित विद्वान् आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से बी.एच.यू. का हिन्दी विभाग सम्भालने का आग्रह किया। ठीक उसी समय आचार्य शुक्ल को कालाकाँकर के राजा का भी प्रस्ताव मिला। राजा साहब शुक्ल जी को साढ़े तीन हजार रुपये मासिक के साथ अन्य सुविधाएँ भी दे रहे थे। काम भी कुछ खास नहीं था। मालवीय जी के पास उन्हें केवल सवा तीन सौ रुपये देने की क्षमता थी। और काम भी बहुत था। अन्य सुविधाएँ बिल्कुल नहीं थी। पर शुक्ल जी ने मालवीय जी के प्रस्ताव को चुना। उन्होंने कालाकाँकर के राजा साहब को मना करते हुए कहा- राजा साहब, देश और संस्कृति के लिए कुछ कर गुजरने के अवसर जीवन में बार-बार नहीं आते। कालाकाँकर नरेश ने जब उन्हें कुछ और रुपये देने का लालच दिया तो आचार्य शुक्ल बोले- मैं हिन्दी का आचार्य हूँ, कोई व्यवसायी नहीं।

ऐसे एक नहीं अनेक आचार्य इस देश की धरती में हुए हैं। विश्वास किया गया है कि अपनी धरती और अपनी संस्कृति से प्यार करने वाले अभी भी कम नहीं हुए हैं। भले ही उन्हें सही अवसर न मिल पाए हों। अभी भी ऐसी अनेकों प्रतिभाशाली आत्माएँ हैं, जिनके जीवन में देश की मिट्टी महकती है। जिनके हृदय अपने राष्ट्र और अपनी संस्कृति के प्रेम से स्पन्दित होते हैं। जिनके पास बुद्धि के विचार विस्तार के साथ हृदय की भाव विशालता भी है। जो देश और धरती की, राष्ट्र और मनुष्य की वेदना, टीस, कसक, तड़प और छटपटाहट को अनुभव कर सकते हैं। इस अनुभूति को लिए हुए तपस्वी आचार्यगण यहाँ अवश्य आएँगे, ऐसा विश्वास है। यह विश्वविद्यालय उनके लिए एक सौभाग्यपूर्ण सुअवसर है। युद्ध का बिगुल बजते ही वीरों से चुप नहीं बैठा जाता। उनके बाजू फड़कते हैं, और उनमें हथियार चमकने लगते हैं। उनकी रग-रग में प्राण मचल उठते हैं, दुश्मन से लोहा लेने के लिए।

माता भवानी की सन्तानों की ही भाँति माता सरस्वती के पुत्र-पुत्रियों का भी यही हाल है। संस्कृति के नवोन्मेष का उद्घोष हो और वे बैठे रहें, सोए रहें, भला यह कैसे सम्भव है? उनकी सृजन संवेदना उन्हें अधिक देर तक मूकदर्शक नहीं रहने देती। देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना के उद्घोष के साथ ही, असंख्य प्रतिभावानों के हृदय संवेदित हो उठे हैं। उनके हृदयों में संस्कृति सृजन के संवेदन उठना स्वाभाविक भी है। देव संस्कृति के लिए कुछ कर गुजरने के पहले कदम के रूप में उन्हें कुलाधिपति या कुलपति, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शान्तिकुञ्ज हरिद्वार के पते पर पत्र व्यवहार करना चाहिए। इसके बाद ही उन्हें मालूम हो सकेगा कि उन्हें, कब, कैसे, कहाँ और क्या करना है।

देव संस्कृति के आदर्शों के अनुरूप ही यहाँ आचार्यों के तीन स्तर होंगे- सहायक आचार्य, सह आचार्य एवं आचार्य। इन स्तरों का निर्धारण उनकी योग्यता, अनुभव, तप एवं समर्पण के आधार पर किया जाएगा। यह बात जो सब में एक सी होगी, वह है जीवन व चरित्र की शुद्ध, खरी प्रामाणिकता, अपने विषय की विशिष्ट योग्यता, देव संस्कृति के प्रति अनुराग एवं जीवन की तपस्वी रीति-नीति। यूनान के महान् दार्शनिक सुकरात ने आचार्य को परिभाषित करते हुए कहा कि मैं आचार्य उसे कहता हूँ, जो अपने आचरण से अपने विद्यार्थी में एक नयी आत्मा को जन्म दे। सुकरात स्वयं भी ऐसे ही आचार्य थे। उन्होंने अपने अनेकों विद्यार्थियों में यह कर दिखाया।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के आचार्यों में तप की यही तेजस्विता चाहिए। क्योंकि यहाँ केवल विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम रटा-रटाकर परीक्षाएँ नहीं पास करवानी है। और भी बहुत कुछ करना है। देश की धरती और विश्ववसुधा में नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक एवं साँस्कृतिक क्रान्ति की ज्वालाएँ भड़कानी है। जिसके भीतर आग है, वही तो ज्वालाओं को जन्म देगा। बुझे हुए चिराग भला दूसरों में क्या लपटें पैदा करेंगे। आचार्यों के रूप में यहाँ जलते हुए रोशन चिराग चाहिए, जो अपनी ऊष्मा और उजाले से विश्वविद्यालय के विद्यार्थी जीवन में विचार क्रान्ति के लिए प्रतिबद्धता पैदा कर सकें।


दिशावान, तनावमुक्त, व्यक्तित्ववान विद्यार्थी ही होगा मूल केन्द्र में

विश्वविद्यालय का विद्यार्थी जीवन कई अर्थों में अनूठा एवं अनोखा है। यह व्यक्तित्व के समग्र एवं सम्यक् विकास का सार्थक प्रयोग है। देव संस्कृति के सत्यों एवं तत्त्वों को यहाँ प्रकट होना है। विश्वविद्यालय में विद्याभ्यास करने वाले विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को इस ढंग से विकसित किया जाना है कि उनकी सम्पूर्ण मौलिकता उनमें प्रकाशित हो उठे। यह काम आसान नहीं है। घिसी-पिटी लकीरों एवं बंधे-बंधाए ढर्रे पर चलने से यह मुमकिन नहीं। इसके लिए कुछ नए उपाय करने पड़ेंगे, कई नए प्रयोग करने पड़ेंगे। विद्यार्थियों के जीवन को सभी ग्रन्थियों, सारे आन्तरिक बन्धनों से मुक्त करने के लिए अध्यात्म विद्या की आवश्यक वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ अपनायी जाएँगी।

ये प्रयोग और प्रक्रियाएँ आसान नहीं हैं। पर इन्हें किए बिना भी गुजारा नहीं है। इसके बिना विद्यार्थी उस मानसिक बोझ और जटिल बन्धनों से छुटकारा नहीं पा सकते, जिसे वे ढो रहे हैं, जिसमें वे कसे-बंधे हैं। यह काम स्नायविक शल्य-चिकित्सा से भी ज्यादा कठिन है। लेकिन इस कठिन कार्य को यहाँ आसानी से किया जाएगा। क्योंकि देश के युवाओं को यदि जीवन की सही दिशा मिल सकी, तो देश को सही दिशा मिलेगी। आज देश यदि विपत्तिग्रस्त है, तो उसका कारण यही है कि देश के युवा विपत्ति में हैं। वे हारे-थके और दिग्भ्रमित हैं। उन पर भटकन इस कदर हावी है कि हताशा में आत्महत्या तक कर बैठते हैं।

युवाओं की इस विपत्ति को देव संस्कृति विश्वविद्यालय के संचालकों ने समझा है। और उनकी मानसिक ग्रन्थियों को खोलने के लिए आवश्यक आध्यात्मिक उपायों को जुटाने का संकल्प किया है। इस क्रम में सबसे पहली बात है- अहंकार की दौड़ की समाप्ति। सामान्य रीति-नीति यही है कि विद्यार्थियों को विद्यालय जीवन से ही एक गलाकाट प्रतियोगिता में उलझा दिया जाता है। इस प्रतियोगिता में जो उत्तीर्ण होते हैं, वे अहंकार के उन्माद से भर जाते हैं। जो अनुत्तीर्ण होते हैं वे आत्महीनता और हताशा की खाइयों एवं गड्ढों में गिर जाते हैं। कुल मिलाकर अपने जीवन के विकास में दोनों ही असफल रहते हैं। इस प्रतियोगिता की भागम-भाग में अपने जीवन की मौलिकता तो एकदम बिसर जाती है। एक दूसरे को पीछे छोड़ने और आगे निकलने की धुन में अपनी स्वयं की जिन्दगी कब खो गई पता ही नहीं चलता। विद्यालय से विश्वविद्यालय तक की इस अन्धी दौड़ में विद्यार्थी गंवाते ही गंवाते हैं।

स्थिति से निबटने के लिए यहाँ अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को यह बताया जाएगा कि तुम्हारे विकास की राहें तुम में हैं। किसी के पीछे भागकर किसी से अपनी तुलना करके तुम्हें स्वयं को नहीं गंवाना है। परमात्मा ने सबको अपना अंश समान रूप से दिया है। जरूरत उस दिव्यता को उजागर करने की है। यहाँ विद्यार्थियों को यह सिखाया जाएगा कि तुम्हें अपने विकास के लिए पूरे जीवट के साथ जुटना है। तुम्हें भरपूर मेहनत करनी है। जमकर पढ़ना लिखना है, पर किसी से आगे निकलने के लिए नहीं, बल्कि अपने चरम बिन्दु पर पहुँचने के लिए। तुम्हें अपनी चेतना के गौरीशंकर शिखर पर चढ़ना है। किसी से आगे तो उसे गिराकर, धक्का देकर भी निकला जा सकता है। पर अपने शरीर, मन, बुद्धि एवं भावना के विकास के चरम पर पहुँचने के लिए सदा अनवरत प्रयत्न की जरूरत है। किसी से आगे निकलने पर तो यात्रा थम सकती है। क्योंकि लक्ष्य छोटा था, जो पाना था वह मिल चुका। पर अपने चरम तक पहुँचने के लिए तो यात्रा सदा चलती है।

इस रीति-नीति में एक खास बात और भी है। इसमें दूसरों को गिराने में नहीं बल्कि उठाने में प्रसन्नता होती है। क्योंकि दूसरों से खतरा प्रतियोगिता में होता है, आत्म विकास में नहीं। प्रतियोगिता नहीं सहयोग इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थी जीवन की रीति-नीति होगी। उपनिषद् युग के अनुरूप वे सदा ही अपने विकास के चरम तक पहुँचने के लिए तप-निरत रहेंगे। उन्हें बताया जाएगा कि अपना चरम तो ‘अयमात्मा ब्रह्म’ को जानने में है। स्वयं का परम विकास यही है। इस विकास को पाने का सूत्र है- ‘क्चद्ग ड्डठ्ठस्र रुड्डद्मद्ग’ याने कि बनो और बनाओ। यह प्रक्रिया जीवन के हर तल पर चलनी चाहिए। शरीर स्वस्थ और समर्थ हो, प्राणबल प्रचण्ड हो, मन स्वच्छ हो और अन्तरात्मा निर्मल हो। यही तो सही विकास है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय का विद्यार्थी जीवन इसी दिशा में आगे बढ़ेगा।

यहाँ के विद्यार्थियों के लिए विश्वविद्यालय में परामर्श केन्द्र या काउन्सिलिंग सेण्टर खोला जाएगा। इस केन्द्र में मनोवैज्ञानिक, विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ एवं अध्यात्मविद् होंगे। इस केन्द्र की गतिविधियां और उद्देश्य अध्ययन-अध्यापन से भिन्न होंगे। हालाँकि इसका सम्बन्ध विश्वविद्यालय के आचार्यगणों से होगा। यह परामर्श केन्द्र पढ़ाई-लिखाई के रोजमर्रा के विषयों से हटकर विद्यार्थियों की निजी समस्याओं पर विचार करेगा। समस्याएँ किसी भी तरह की हो, विद्यार्थी इस केन्द्र में आकर कह सकेंगे। इस केन्द्र के सदस्य विद्यार्थियों के साथ उनके अभिभावकों से भी कहीं अधिक प्रेम पूर्ण बर्ताव करेंगे। सभी विद्यार्थी बेझिझक, बिना किसी संकोच के उनसे अपनी बात कह सकेंगे।

विद्यार्थियों की समस्याएँ यदि पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी होंगी, तो परामर्श केन्द्र के सदस्य सम्बन्धित विषयों के आचार्यों से मिलकर उनके समाधान निकालेंगे। यदि समस्याएँ निजी और नितान्त व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी हैं, तो संवेदनशील सोच एवं मानव मन की विशेषज्ञता के आधार पर इसके समाधान जुटाए जाएँगे। परामर्श केन्द्र का दायित्व विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की राहें खोजना होगा। विश्वविद्यालय के विद्यार्थी यहाँ के परामर्श केन्द्र से अपने कैरियर सम्बन्धी आवश्यक परामर्श और उचित सहयोग बेझिझक प्राप्त कर सकेंगे।

यहाँ अध्ययन करने वाले विद्यार्थी देव संस्कृति विश्वविद्यालय के अंग-अवयव हैं। और अध्ययन करने के बाद, दीक्षान्त समारोह में अपनी उपाधि प्राप्त कर लेने के बावजूद भी ये सदा विश्वविद्यालय के अंग अवयव बने रहेंगे। यहाँ से पढ़कर निकलने के बाद भी उनकी समस्याओं को सुनने और उन्हें सुलझाने में विश्वविद्यालय का परामर्श केन्द्र उनके सहयोग व परामर्श के लिए तैयार और तत्पर रहेगा। इस सबका उद्देश्य एक ही है, ग्रन्थिमुक्त, अवसादविहीन, कर्मठ, विचारशील, सहयोग कुशल युवा पीढ़ी का निर्माण। यहाँ ऐसे विद्यार्थी जीवन को गढ़ा, निखारा एवं तराशा जाएगा जो स्वयं दिशावान हो और राष्ट्र, समाज व विश्व मानवता को सही उपयुक्त दिशा सुझा सके।

यहाँ का विद्यार्थी जीवन कभी भटकन की भूल-भुलैया में न उलझेगा। उसे यहाँ पर ऐसी जीवनदायिनी आध्यात्मिक औषधियाँ मिलेंगी कि उन्हें अहंकार का ज्वर कभी न सता सकेगा। गलाकाट प्रतियोगिता के स्थान पर आपसी सहयोग इनके जीवन की रीति-नीति होगी। यहाँ पर उनकी बौद्धिक विचारशीलता के साथ भाव प्रवणता को भी जगाया जाएगा। क्योंकि इक्कीसवीं सदी में जन्मने और पनपने वाले उज्ज्वल भविष्य का आधार यही भाव संवेदना ही है। विश्वविद्यालय में उन्हें बतायी गयी प्रक्रियाएँ, सिखाए गए प्रयोग अध्ययन काल के साथ उनके भावी जीवन के लिए भी समर्थ सहायक की भूमिका निभाएँगे। विद्यार्थियों के लिए देव संस्कृति विश्वविद्यालय एक नए संसार की संरचना है। जो अपेक्षाकृत दिव्य है, उत्कृष्ट है, देवत्व से भरपूर है। ऋषियों की भूमि पर बसे इस आलोक-लोक में प्रवेश के लिए विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया से गुजरना अनिवार्य है।


प्रवेश हेतु पात्रता के परीक्षण की कसौटियाँ

विश्वविद्यालय में प्रवेश की प्रक्रिया से गुजरना सभी प्रवेशार्थियों के लिए अनिवार्य है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में अध्ययन के इच्छुक छात्र-छात्राओं को इस कसौटी पर अपने को खरा साबित करना होगा। यह पात्रता के परीक्षण की कसौटी है। इसके द्वारा विद्यार्थी का देव संस्कृति के प्रति अनुराग, अध्ययन के लिए चुने गए विषय के प्रति रुचि, उस विषय का ज्ञान, छात्र या छात्रा की भविष्यत् संकल्पनाएँ आदि सभी बिन्दुओं को जाँचा-परखा जाएगा। यह प्रवेश प्रक्रिया बहुआयामी और व्यापक होगी। इसके मानदण्ड भी अन्य विश्वविद्यालयों से काफी अलग होंगे। यहाँ अध्ययन करने के इच्छुक छात्र या छात्रा के लिए बौद्धिक प्रतिभाशाली या अपने विशेष विषय के ज्ञान में निपुण होना भर पर्याप्त नहीं है। ऋषि संस्कृति के इस विद्या साधना केन्द्र में प्रवेश के लिए उनके समग्र व्यक्तित्व का इसके अनुरूप होना जरूरी है।

प्राचीन काल में भी ऋषिगण अपने यहाँ अध्ययन के लिए आने वाले छात्र-छात्राओं की प्रवेश परीक्षा लिया करते थे। यह प्रक्रिया लिखित-मौखिक होने के साथ प्रयोगात्मक भी होती थी। वैदिक साहित्य की आख्यायिकाओं से पता चलता है कि ऋभु और कल्पक को महर्षियों ने प्रवेश देने से पहले कई तरह की परीक्षाओं से गुजारा। उन्हें अनेकों कसौटियों पर कसा। सत्यकाम जाबाल की मौखिक परीक्षा का प्रसंग तो सर्वविख्यात है। महर्षि गौतम ने उसकी परीक्षा से सन्तुष्ट होकर ही विद्या प्राप्ति का अधिकारी माना। यह प्रवेश परीक्षा जितनी महत्त्वपूर्ण छात्रों के लिए थी, उतनी ही छात्राओं के लिए भी थी। घोषा काक्षीवती, चित्रमहा, गौपायना, अदिति दाक्षायणी जैसी अनगिन छात्राओं के प्रवेश परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के अनेकों प्रसंग मिलते हैं। न केवल प्रवेश प्रक्रिया में बल्कि अपने अध्ययन काल में ये सभी छात्राएँ प्रखर मेधा का परिचय देती रहीं। इनमें से कुछ तो अपने सहपाठी छात्रों से काफी आगे रहीं।

प्रवेश प्रक्रिया की कसौटियाँ ऐतिहासिक युग में भी बनी रही। सुविख्यात इतिहासवेत्ता प्रो. ए.एस. अल्तेकर, डॉ. राजबली पाण्डेय, प्रो. आर.सी. मजूमदार, डॉ. भण्डारकर आदि ने इस सम्बन्ध में काफी प्रमाण जुटाए हैं। पुराविद् अलेक्जैंडर कनिंघम, सर जॉन मार्शल एवं मार्टीमर व्हीलर ने भी कई अभिलेखों के आधार पर इसे प्रमाणित किया है। प्राप्त विवरण के आधार पर यह सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, वलभी, उड्डयन्तपुर आदि सभी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में छात्रों की प्रवेश परीक्षा ली जाती थी। यहाँ प्रवेश किसी जाति भेद के आधार और अधिकार से नहीं विषय और व्यक्तित्व की योग्यता प्रमाणित होने पर मिलता था।

ऐतिहासिक विवरण के अनुसार विक्रमशील विश्वविद्यालय में छः संकाय थे। इनमें से प्रत्येक संकाय एक महाविद्यालय के रूप में विकसित था। इस तरह इस विश्वविद्यालय के परिसर में छः संकाय के छः महाविद्यालय स्थित थे। इनमें प्रवेश के लिए विश्वविद्यालय में छः द्वार थे। इनमें से प्रत्येक द्वार पर एक द्वार पण्डित होता था। वह प्रवेशार्थी की योग्यता की परीक्षा लेकर उनको विश्वविद्यालय के किसी विशेष संकाय में प्रवेश की अनुमति देता था। छात्रावासों की प्रबन्ध व्यवस्था की देखभाल करना भी इन द्वार पण्डितों का कार्य था। ये छः द्वार केन्द्रीय सभागार में थे। इनका एक-एक द्वार एक-एक महाविद्यालय में खुलता था।

प्रो. अल्तेकर द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार राजा चनक (955-963 ई.) के समय में छः द्वार पण्डित इस प्रकार थे-

1. पूर्वीद्वार- आचार्य रत्नाकर शान्ति

2. पश्चिमी द्वार- आचार्य वागीश्वर कीर्ति

3. उत्तरी द्वार- आचार्य नरोप

4. दक्षिणी द्वार- आचार्य प्रज्ञाकर मति

5. प्रथम मध्यद्वार- आचार्य रत्नबज्र

6. द्वितीय मध्यद्वार- आचार्य ज्ञानश्री मित्र

ये सभी आचार्य अपने-अपने संकायों की प्रवेश प्रक्रिया के प्रभारी थे। इनके आधीन दूसरे सहआचार्य एवं सहायक आचार्य कार्य करते थे। जो इन प्रभारी आचार्यों को सहयोग देते थे। ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि प्रवेश प्रक्रिया लिखित मौखिक और प्रायोगिक परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने पर ही पूरी होती थी। इसमें समग्र व्यक्तित्व का आँकलन किया जाता था।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रवेश मानदण्ड भी अपने भारत देश के इन साँस्कृतिक आदर्शों के अनुरूप ही है। यहाँ पर देश-विदेश से आने वाले छात्र और छात्राएँ प्रवेश प्रक्रिया के लिए विविध परीक्षाओं से गुजरेंगे। इन परीक्षाओं में सबसे पहली परीक्षा देव संस्कृति के प्रति अभिरुचि एवं साँस्कृतिक ज्ञान के बारे में होगी। भारत की सनातन संस्कृति के आदर्शों, मूल्यों, प्रयोगों एवं परम्पराओं के बारे में विद्यार्थी का ज्ञान बहुत आवश्यक है। इस प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर अन्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं की जाँच की जाएगी। यह दूसरी परीक्षा अध्ययन विषय से सम्बन्धित होगी। इसमें विषय के प्रति लगाव एवं उसके ज्ञान को परखा जाएगा।

इसके बाद प्रवेशार्थियों का व्यक्तित्व परीक्षण होगा। व्यक्तित्व के समग्र आँकलन के लिए सार्थक और कारगर मनोवैज्ञानिक परीक्षण उपयोग में लाए जाएंगे। इन परीक्षणों से छात्र-छात्राओं के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को जाँचा, परखा और जाना जाएगा। छात्र की जीवन नीति क्या है? उसके जिन्दगी के आदर्श क्या हैं? वह भविष्य में क्या बनने का इच्छुक है? उसकी कल्पनाएँ और मान्यताएँ क्या हैं? आदि सभी सवालों को ढूंढ़कर ही प्रवेशार्थियों का प्रवेश सुनिश्चित किया जाएगा।

विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष एवं आचार्य जब भली भाँति प्रवेशार्थी से सन्तुष्ट होंगे, तभी वह यहाँ अध्ययन का अधिकारी होगा। इसी प्रकार विद्यार्थी को भी विश्वविद्यालय के आदर्शों, उद्देश्यों एवं क्रियाकलापों को जानने का अधिकार है। अच्छा यही है कि प्रवेशार्थी इन्हें भली-भाँति जानकर और जाँच-परखकर ही प्रवेश के लिए आवेदन करें। यह विश्वविद्यालय सचमुच ही विश्वभर का विद्यालय है। इसे देव संस्कृति के अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन केन्द्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ की गतिविधियों के सभी मानदण्ड आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। यहाँ विश्व मानव की सभी समस्याओं के हल विश्वभर के छात्र मिल-जुलकर खोजेंगे।

इन बड़े उद्देश्यों का भार सत्पात्र ही उठा सकेंगे। हल्के मन वाले, शिक्षा को केवल धन कमाने का जरिया समझने वाले, मनोविनोद के लिए या भाँति-भाँति के उपाधियों को बटोरने के लिए पढ़ने वाले छात्रों के लिए यह स्थान नहीं है। ऐसे लोग न सुपात्र हैं और न सत्पात्र। इसलिए उनका प्रवेश भी यहाँ सम्भव नहीं। यहाँ पढ़ने के लिए ज्ञान साधना के प्रति प्रबल अनुराग चाहिए। यहाँ प्रवेश के लिए जरूरी है, स्वयं के व्यक्तित्व को विकसित करने की तीव्रतम चाहत। जो यहाँ प्रवेश चाहते हैं उनमें संस्कृति-साधना के लिए भावभरा समर्पण होना चाहिए। यह सब होने पर ही यहाँ प्रवेश सम्भव है। उत्कृष्ट बीज ही यहाँ की ऋषि भूमि में बोए जाएँगे। उन्हें खाद-पानी जुटाने का हर आवश्यक जतन किया जाएगा। और फिर महान् व्यक्तित्व के पौधों की कतारें यहाँ पनपेगी। जिन्हें बाद में उनके नियति विधान के अनुसार विश्व के विभिन्न भू-भागों में रोपा जाएगा। यहाँ जो होगा वह अक्षरों का नहीं, अनुभूति का विषय है। इससे लाभान्वित होने के लिए पुण्यवान, तप परायण एवं मेधावान प्रवेशार्थी ही चयनित होंगे। उन्हें ही इस विश्वविद्यालय के वातावरण में रहकर विद्या साधना करने का सुयोग सुअवसर मिल पाएगा।


दिव्य वातावरण में नवयुग का संस्कृति सृजन

विश्वविद्यालय का वातावरण पुरातन ऋषियों की सनातन साधना से स्पन्दित है। शान्तिकुञ्ज से आधा किलोमीटर दूर हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर यह विद्या साधना केन्द्र अवस्थित है। प्रकृति की सुरम्यता चारों ओर से इस देव संस्कृति विश्वविद्यालय की भूमि एवं भवन को घेरे है। हिमालय की शिवालिक पर्वतमालाएँ इस पर अपनी सुषमा की अविराम वृष्टि करती हैं। गंगा की लहरों को छूकर आती बयार यहाँ पावनता का संचार करती है। यहाँ के प्राकृतिक परिवेश एवं पर्यावरण को छूकर मन के सारे सन्ताप स्वयं शान्त हो जाते हैं। देवात्मा हिमालय की छाँव के आच्छादन एवं माता गंगा के पावन जल कणों के अभिसिंचन ने यहाँ आध्यात्मिक वातावरण की सृष्टि की है। इसके अद्भुत प्रभावों को यहाँ आने और रहने से ही जाना जा सकता है।

यह वातावरण विद्या साधना की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। वातावरण उपयुक्त और ऊर्जावान हो तो मनुष्य का मानसिक विकास बड़े ही सहज ढंग से हो जाता है। वातावरण और मानव मन के जुड़ाव को आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी स्वीकारने लगे हैं। मानव मन के मर्मज्ञ एडवर्ड ब्यूरिन ने ‘इन्वायरन्मेण्टल इफेक्ट्स ऑन ह्युमेन माइन्ड’ में इस सम्बन्ध में काफी कुछ विचार किया है। वह कहते हैं मनुष्य के मन-मस्तिष्क पर वातावरण के असर पड़े बिना रह नहीं सकते। प्रो. ब्यूरिन का कहना है कि वातावरण शान्त, सुखद हो, तो मन-मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से विकसित होता है। ज्ञान के नए आयाम खुलते हैं। मनुष्य की अन्तर्चेतना में अनेकों उच्च स्तरीय जिज्ञासाएँ और अभिप्साएँ पनपती हैं। वातावरण के कलुषित और कलहपूर्ण होने पर इसके उलटे असर नजर आते हैं। मन अनायास ही कुण्ठित एवं विषादग्रस्त हो जाता है। उसकी सृजन संवेदना मुरझाने लगती है। अध्ययन की अभिवृद्धि कुम्हला जाती है।

प्राचीन काल के महर्षियों ने वातावरण के इसी वैज्ञानिक सत्य को अपने विद्या केन्द्रों की स्थापना में अपनाया था। उन्होंने प्राकृतिक सुरम्यता के मध्य विश्वविद्यालय बनाए थे। महर्षिगण स्वयं भी नगरों की अपेक्षा प्राकृतिक और आध्यात्मिक वातावरण को अधिक पसन्द करते थे। उनका मानना था कि भीड़ भरे कोलाहल एवं विलासपूर्ण जीवन में शिक्षा का वातावरण पवित्र बना नहीं रह सकता। महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान-शाकुन्तलम् में इसी दृष्टि को स्पष्ट किया है। इसमें भारत देश के सुविख्यात कुलपति महर्षि कण्व के शिष्य शाँर्गरव कहते हैं- विद्याभ्यासी मुनिजनों को एकान्त स्थान ही अधिक पसन्द है। भीड़ से भरे हुए स्थान उन्हें ऐसे प्रतीत होते हैं- जैसे वे अग्नि से घिरे हों। शास्त्र वचन भी कुछ ऐसे ही हैं-

उपह्वरे गिरीणाँ संगमे च नदीनाम्। धिया आचार्योऽजयात॥

अर्थात्- पर्वतों के गोदी में और नदियों के संगमों पर बुद्धि सम्पन्न आचार्य होते हैं।

देव संस्कृति के अभ्युदय काल में विद्या केन्द्रों एवं विश्वविद्यालयों का निर्माण ऐसे स्थानों पर किया जाता था, जो प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर हो, जहाँ जल सुलभ हो और जीवन की सुविधाएँ जुटायी जा सकती हो। साथ ही स्थल नगरों से इतनी अधिक दूरी पर भी न हो, जहाँ विद्यार्थी, अभिभावक और अन्य जिज्ञासु जन न पहुँच सकें। इस दृष्टि से नदियों के तटवर्ती प्रदेशों और पर्वतों की तलहटियों को विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान समझा जाता था। यहीं कुलपति एवं आचार्य निवास करते थे। अध्ययन के लिए आने वाले छात्र और छात्राएँ अपनी विद्या साधना और तप परायण जीवन से यहाँ के वातावरण के सौंदर्य में अभिवृद्धि करते थे।

कुलपति महर्षि कण्व की विद्या साधना केन्द्र मालिनी नदी के तट पर स्थित था। ‘एष खलु कण्वस्य कुलपतेरनुमालिनीतीर विश्वविद्यालयों दृश्यते।’ इस स्थान का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास कहते हैं- ‘अपने गुरुजनों के साथ छात्र और छात्राएँ यहाँ सदा से तप परायण होकर विद्या साधना करते हैं। यहाँ सुन्दर वाटिकाएँ हैं। इन पर आने-जाने का मार्ग बनाया गया है।’ यज्ञों की परम्परा तो सदा ही देव संस्कृति का प्राणभूत रही है। महाकवि कालिदास महर्षि कण्व के विद्या केन्द्र में यज्ञ दर्शन कराते हुए कहते हैं- ‘भिन्नो रागः किसलयरुचा-भाज्यधूमोद्गमेन।’ अर्थात्- यज्ञ के धुएँ के निरन्तर उठने से समीपस्थ वृक्षों के किसलयों की लालिमा कुछ अलग हो गयी है।

महर्षि वशिष्ठ ने वातावरण की महिमा से अभिभूत होकर उच्चस्तरीय विद्या साधना के लिए एक और विश्वविद्यालय हिमालय की तलहटी में स्थापित किया था। हालाँकि उनके द्वारा स्थापित एक विश्वविद्यालय पहले से ही अयोध्या में था। उनके हिमालय स्थित विश्वविद्यालय के वातावरण के सौंदर्य का वर्णन करती, महाकाव्य रघुवंश की पंक्तियाँ हैं- गंगप्रपातान्तविरुढ़शष्पं गौरीगुरोर्गह्वरभाविवेश। यहाँ चारों ओर घना मनोरम वन था। इस वन में विविध वनस्पतियाँ थीं और पशु-पक्षी विचरण करते थे। इस वन में प्रपात थे और हिमालय की गुफाएँ थीं।

मौर्य साम्राज्य के महामंत्री आचार्य चाणक्य ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना के साथ एक गौरवपूर्ण विद्या केन्द्र की स्थापना की। इसका वातावरण बहुत ही सुरम्य एवं महान् आचार्य की तप साधना की ऊर्जा से ओत-प्रोत था। महाकवि विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस में इस विश्वविद्यालय के वातावरण को चित्रित किया है। इस चित्रण में कुलपति आचार्य चाणक्य के तप और सादगी का प्रकाश है। ‘शरणभविसमिद्िभिः शुष्यमाणाभिराभिर्विनिमित पटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड़यम’ अर्थात् छात्रों द्वारा वन से लायी हुई समिधाएँ छत पर सूखने के लिए डाली गयी हैं। छत का किनारा कुछ झुका हुआ है। आचार्य के कुटीर की दीवारें पुरानी हैं। विशाल मौर्य साम्राज्य के संस्थापक और समर्थ महामंत्री होते हुए भी कुलपति आचार्य चाणक्य की तप साधना अद्भुत थी। इस तप ने ही उनके विश्वविद्यालय के वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर किया था।

देव संस्कृति के इसी गौरव की स्थापना देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भी हुई है। यहाँ का दृश्य वातावरण जितना सुरम्य है, अदृश्य वातावरण उतना ही सुरभित है। पौराणिक साहित्य में यह स्थान सप्तऋषि क्षेत्र के रूप में वर्णित है। विश्वविद्यालय की भूमि में साधना के अमिट संस्कार हैं। इसे प्रमाणित करने वाले कतिपय महत्त्वपूर्ण चिह्न भवन निर्माण के दौरान मिले हैं। इन संस्कारों को जाग्रत् करने के लिए फिर से तप की प्रक्रिया अपनायी जा रही है। इस तप साधना में विश्वविद्यालय के आचार्यगणों के साथ सभी छात्र एवं छात्राओं को मिलकर भागीदारी निभानी है। गायत्री महामंत्र का जप एवं नियमित यज्ञ से यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा शतगुणित एवं सहस्रगुणित होगी।

यज्ञीय ऊष्मा, तप साधना के प्रकाश में विद्यार्थी एवं आचार्यगण सम्मिलित रूप से यहाँ विद्या वैभव के साथ आत्म वैभव का भी अर्जन करेंगे। इस भूमि का सुरम्य परिवेश प्रकृति ने बनाया है, और यहाँ के आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण पुरातन ऋषियों ने किया है। इस बात की गवाही वेद-पुराण और इतिहास सभी मिलकर देते हैं। अब तो कई पुरातात्त्विक प्रमाण भी इस भूमि के तपोभूमि होने के प्रमाण देने लगे हैं। विदेशी पुराविद् ए. रिचर्ड सहित कई देशी पुराविशेषज्ञों ने शिवालिक के सर्वेक्षण में इसके तपोभूमि एवं यज्ञभूमि होने के प्रमाण पाए हैं। इस दिव्य भूमि में देव संस्कृति विश्वविद्यालय का आविर्भाव पुरातन का नवोन्मेष है। दिव्य वातावरण में नवयुग का संस्कृति सृजन है। यहाँ संचालित हो रही विद्या साधना में अपनी भागीदारी निभाने वाले आचार्यगण एवं छात्र-छात्राएँ यहाँ के वातावरण की दिव्यता को अपने मन, प्राण एवं अन्तःकरण में अनिवार्य रूप से अनुभव करेंगे। वातावरण के अदृश्य किन्तु समर्थ सहयोग से उनकी प्रज्ञा, मेधा एवं आत्मिक क्षमताओं का आश्चर्यजनक विकास होगा। यह कोई काल्पनिक बात नहीं, बल्कि देखा परखा और अनुभव किया जाने वाला सच है। बस इस अनुभूति के लिए अनुशासन की तप साधना चाहिए। जिसे करना विद्यार्थियों के लिए ही नहीं आचार्यों के लिए भी अनिवार्य है।


अनुबंधों-व्रतबंधों की अनुशासन मर्यादाएँ

अनुशासन की तप-साधना देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रत्येक आचार्य एवं छात्र-छात्रा के लिए अनिवार्य कर्त्तव्य है। इसका लक्ष्य सच्चा आत्म स्वामित्व है। जीवन की सामान्य रीति-नीति बड़ी अनगढ़ होती है। अवाँछनीय आदतों और कुसंस्कारों की अनेकों विवशताएँ इसे घेरे रहती हैं। इन मजबूरी में चाहे-अनचाहे ऐसा हो जाता है, जो जीवन के सोचे गए लक्ष्य एवं चुनी हुई दिशा से पूरी तरह से उल्टा है। आवेग और आवेश में ऐसे कृत्य हो तो जाते हैं, परन्तु बाद में विचार और विवेक के जगने पर बड़ी शर्मिन्दगी होती है। अन्तर्चेतना पश्चाताप से पीड़ित होती है। मन में बार-बार सवाल उठता है, ऐसा हुआ ही क्यों? ऐसा किया ही क्यों गया? ऐसे सवाल का एक ही सार्थक हल है- अनुशासन की तप-साधना।

अनुशासन का तप करने वाले को अपने जीवन में कभी पछताना नहीं पड़ता। उसकी जिन्दगी कभी अन्धेरे गड्ढों में नहीं गिरती। उसके जीवन में ठहराव, रुकावट के क्षण नहीं आते। जीवन पथ पर उसे प्रारब्ध या परिस्थितियों के अवरोध तो मिलते हैं, पर अनुशासन के तपस्वी को ये सब मिलकर रोक नहीं पाते। जिसकी अनुशासन में निष्ठ दृढ़ है, उसे पीछे नहीं मुड़ना पड़ता। मुड़-मुड़ कर देखने, पीछे कदम हटाने जैसी स्थितियाँ अनुशासन के व्रती जनों के जीवन में नहीं आ पाती। अनुशासन की तप-साधना से उत्पन्न ऊर्जा उन्हें निरन्तर गतिशील बनाए रखती है। राह में आने वाले पहाड़ जैसे अवरोध इसके प्रभाव से बरबस अपने आप ही हटते और मिटते हैं।

इस बहु प्रचलित, बहु प्रचारित तप साधना के यथार्थ स्वरूप से बहुसंख्यक जन अपरिचित हैं। जिन्हें इससे परिचित होने का विश्वास है, वे भी प्रायः भ्रमित हैं। ऐसे लोग अनुशासन को पराधीनता, परवशता या जबर्दस्ती लादी गयी बेबसी-मजबूरी मानते हैं। लेकिन ये मान्यताएँ वास्तव में भ्रमित चित्त की देन है। दरअसल ऐसा अनुशासन को शासन का पर्याय मानने से होता है, जबकि ऐसा है नहीं। शासन केवल नियन्त्रण या नियमन है। इससे काफी अलग- अनुशासन, आत्म नियंत्रण से आत्म स्वामित्व का विकास है। प्राचीन गृहसूत्रों, धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों में इस बारे में काफी कुछ कहा गया है। देव संस्कृति की परम्परा एवं मर्यादा के अनुसार कुलाधिपति एवं कुलपति आचार्यों को व्रत विधान एवं अनुशासन के सूत्र देते रहे हैं। और आचार्यगणों ने ये सूत्र अन्तेवासी अपने छात्र-छात्राओं को दिए हैं।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में इसी साँस्कृतिक निष्ठ का पालन किया जाएगा। कुलाधिपति एवं कुलपति यहाँ अध्यापन, शोध का मार्गदर्शन एवं शिक्षण करने वाले आचार्यों को अनुशासन के सम्यक् सूत्र देंगे। और आचार्यगण छात्र-छात्राओं के समक्ष इनका जीवन्त आदर्श प्रस्तुत करते हुए उन्हें इनके सत्य का प्रबोध कराएँगे। यहाँ से जुड़ने वाले, अध्ययन-अध्यापन करने वाले प्रत्येक छात्र एवं आचार्य को अनुशासन के सत्य को सीखना, समझना और अपनाना होगा। लेकिन यह ठीक तरह से तभी सम्भव है कि अनुशासन कोई शासन की दण्ड व्यवस्था नहीं बल्कि आत्म विकास के मनोवैज्ञानिक सूत्र है। इन्हें मानने और अपनाने से जहाँ समग्र जीवन में वास्तविक विकास होगा, वहीं इनकी अवहेलना करने से जीवन का पथ से विचलित होना, भटक जाना सुनिश्चित है।

महासागर के विराट् स्वरूप को अपना लक्ष्य मानने वाली गंगा-यमुना जैसी समर्थ नदियाँ भी तटबन्ध को व्रतबन्ध मानकर अग्रसर होती हैं। किनारों का अनुशासन यदि ये न मानें, तो इनका जीवन जल कब का राह में बिखर कर नष्ट हो जाए। जब कभी किसी प्राकृतिक दबाव में यह अनुशासन थोड़े बहुत समय के लिए टूटता है, तो बाढ़ जैसे प्रलयंकारी उपद्रव ही खड़े होते हैं। यह अल्पकालिक अनुशासनहीनता भी विनाश की विभीषिका को ही जन्म देती है। जबकि अनुशासन की महिमा से इनकी राहों में अनगिनत जीव-जन्तु, जमीन-जंगल अपनी प्यास बुझाते हैं। और अनेकों जीवनदायिनी फसलें लहलहाती हैं।

अनुशासन के तप का अर्थ जीवन की शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक सभी तरह की शक्तियों के क्षरण को रोककर, इनका जीवन के सार्थक उद्देश्य के लिए संकल्पनिष्ठ सुनियोजन है। इसमें देव संस्कृति के दैवी एवं दिव्य स्वरूप का परिचय भी निहित है। विश्वविद्यालय के अनुशासन सूत्रों के सृजन का सार यही है। इन सूत्रों में सबसे पहला स्थान चिन्तन के सूत्रों का है। ये निम्न है- 1. अपने चिन्तन को पवित्र एवं निष्कपट बनाए रखेंगे। 2. अपने चिन्तन को सभी तरह के मनोविकारों से रहित करने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। चरित्र के सूत्रों का महत्त्व अधिक है। इनके अनुसार- 1. कर्त्तव्यपालन एवं आत्म नियंत्रण पहला सूत्र है। 2. यहाँ के सभी जन साधना एवं संयम के चारित्रिक आदर्शों का पालन करेंगे। 3. आचार्य एवं विद्यार्थी सभी सामाजिक मर्यादाओं एवं वर्जनाओं का पालन करेंगे।

व्यवहार के सूत्रों में पहली बात यही है कि किसी भी संस्कृति का प्रथम परिचय उसकी वेशभूषा से होता है। इसलिए प्रत्येक आचार्य/आचार्या, छात्र व छात्राएँ भारतीय वेशभूषा धोती-कुर्ता अथवा कुर्ता-पायजामा/ साड़ी-ब्लाउज अथवा सलवार-कुर्ता एवं दुपट्टा धारण करेंगे/करेंगी। 2. विश्वविद्यालय परिसर में किसी भी तरह का नशा (शराब, बीड़ी, सिगरेट, पान, तम्बाकू, गुटका आदि) पूर्णतया वर्जित है। 3. व्यवहार में शिष्टता-शालीनता एवं पारस्परिक सौमनस्य का सभी ध्यान रखेंगे। 4. विश्वविद्यालय की प्रार्थना, सभा एवं यज्ञ आदि कार्यक्रमों में सभी की नियमित भागीदारी अनिवार्य होगी। 5. आचार्य गण अपने शिक्षण सम्बन्धी दायित्वों का एवं विद्यार्थीगण अपने अध्ययन सम्बन्धी दायित्वों का अनिवार्य रूप से पालन करेंगे। 6. छात्र-छात्राओं को विशेष रूप से पुस्तकालय सहित प्रत्येक कक्षा में 75' उपस्थिति अनिवार्य होगी।

आचार्यों को इन अनुशासन सूत्रों का प्रबोध एवं उनकी अनुशासन निष्ठ की परख कुलाधिपति या कुलपति स्वयं अथवा उनके प्रतिनिधि के रूप में उपकुलपति एवं संकायाध्यक्ष (डीन) करेंगे। इनके द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का पालन करना एवं इनके मार्गदर्शन को स्वीकारना सभी आचार्यगणों के लिए अनिवार्य होगा। छात्र-छात्राओं को अनुशासन सूत्र प्रदान करने का कार्य सम्बन्धित आचार्यगण करेंगे। यह कार्य संकायाध्यक्ष (डीन) के नीति-निर्देशन एवं विभागाध्यक्ष के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में होगा। विश्वविद्यालय के आचार्य वर्ग एवं छात्र वर्ग तथा यहाँ के कर्मचारीवृन्द के लिए ये जो भी अनुशासन प्रारम्भिक रूप से दिए जाएँगे, उनमें समय-समय पर बदलाव एवं विकास होता रहेगा। परन्तु इनकी यही मूलभावना यथावत बनी रहेगी।

प्रत्येक की अनुशासन निष्ठ से उसके साधनात्मक साहस की परख होगी। दरअसल यह मानव चेतना में जन्म लेने वाला, आन्दोलित होने वाला रोमाँचक अभियान है। इसलिए महर्षि अरविन्द ने इस अनुशासन निष्ठ को Real Adventure in Human Consciousness (मानव चेतना में किया जाने वाला सच्चा साहस) कहा है। अपने विकसित रूप में यह अभियान अवाँछनीय आदतों एवं कुसंस्कारों के विरुद्ध होता है। संकल्प के धनी अनुशासन निष्ठ, अनेक निम्नगामी आकर्षण से मुक्त होने में सफल होते हैं। और आत्मसत्ता के दिव्य एवं दैवी आकर्षण का ऊर्ध्वगामी वेग प्राप्त करते हैं। इसीलिए अनुशासन निष्ठ को साधक कहा गया है। यह सही मायने में कुलाधिपति एवं आचार्यों के बीच तथा आचार्य एवं छात्रों के बीच विकसित होने वाला साधनात्मक अनुबन्ध है। इन अनुबन्धों एवं व्रतबन्धों की अनुशासन मर्यादाओं को स्वीकार करने वाले आचार्य एवं छात्र-छात्राएँ यहाँ की शिक्षण प्रक्रिया की मौलिकता का सृजन करेंगे।


शिक्षण प्रक्रिया की मौलिकता-अज्ञान का निवारण

शिक्षण प्रक्रिया की मौलिकता छात्र-छात्राओं के समग्र एवं सार्थक विकास के लिए है। इस बारे में प्रचलित रीति-नीति के अधूरे और एकाँगी होने से सभी परिचित व परेशान हैं। शिक्षा मनीषी इवान इलिच ने तो इसकी व्यर्थता से हैरान होकर ‘डिस्कूलिंग सोसाइटी’ तक की कल्पना कर डाली है। अपने चिन्तन में उन्होंने कुछ मौलिक सवाल उठाए हैं- क्या शिक्षा का स्मरण शक्ति के विकास तक सीमित रहना उचित है? ऐसी शिक्षा से क्या फायदा जिससे विद्यार्थी के नैतिक व सामाजिक मूल्य विकसित न हो पाते हों? संकल्प बल से विहीन, उच्च आदर्शों से विमुख व्यक्तियों का सृजन करने वाली शिक्षा की सार्थकता क्या है? इवान इलिच के ऐसे और भी अनेकों सवाल हैं। इन सभी सवालों का सटीक जवाब शिक्षण प्रक्रिया के मौलिक सृजन में है।

विभिन्न विश्वविद्यालयों में जो पढ़ाया जा रहा है, वह बहुत अधिक गलत नहीं है। परन्तु जिस ढंग से पढ़ाया जा रहा है, वह एकदम अर्थहीन है। पाठ्यक्रम जहाँ जो भी बनाए गए हैं, उनमें कई कमियों के बावजूद विषय की जानकारियाँ पर्याप्त है। विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के स्तर पर कक्षावार ये जानकारियाँ रटाई जाती हैं। इस विषय में सम्बन्धित सवाल पूछे जाते हैं। और विद्यार्थी अपनी कक्षा की वैतरणी पार कर जाते हैं। लेकिन पूरी पढ़ाई के दौरान जो सवाल सबसे अहम् थे, वे जस के तस छूट जाते हैं। किसी को भी यह मालूम नहीं हो पाता कि आखिर इस पाठ्यक्रम की विषय वस्तु का हमारे निजी जीवन से क्या जुड़ाव है? यदि इसे न पढ़ते तो क्या हानि थी? और अब पढ़ लिया तो क्या लाभ होंगे? किताबों में छपे हुए काले अक्षर क्या केवल मन-मस्तिष्क पर कालिख पोतने के लिए थे या फिर उनसे कुछ उजली रोशनी जिंदगी में फैलनी थी?

मनोवैज्ञानिक आर.डी. लेंग ने अपने एक शोध पत्र ‘टीचिंगः इट्स मेरिट्स एण्ड डिमेरिट्स’ में इस सम्बन्ध में काफी कुछ कहा है। उनका कहना है कि शिक्षण के वर्तमान स्वरूप को देखकर कि समूची पद्धति अर्थहीन एवं गुणहीन हो गयी है, इससे समाधान की बजाय सवाल जन्म लेते हैं। प्रो. लेंग के अनुसार प्रत्येक शिक्षक को वह चाहे किसी भी विषय का हो, एक कुशल मनोचिकित्सक की भूमिका निभानी चाहिए। ताकि उसका विद्यार्थी अपने व्यक्तित्व की समस्याओं के समाधान खोज सके। अमेरिकन मनोवैज्ञानिक राबर्ट डी पैटरसन भी आर.डी. लेंग के कथन से सहमत हैं। वे भी शिक्षण प्रक्रिया के युगानुकूल मौलिक सृजन को आज के समय का एक अनिवार्य दायित्व मानते हैं।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय इस दायित्व को निभाने के लिए प्रतिबद्ध है। यहाँ की शिक्षण प्रक्रिया सर्वथा मौलिक एवं लीक से हटकर होगी। इसके मौलिक बिन्दुओं में सबसे पहला बिन्दु है- शिक्षक और छात्रों का अनुपात। यहाँ यह अनुपात इतना होगा कि शिक्षक अपने प्रत्येक छात्र की व्यक्तिगत सार-संभाल कर सके। देव संस्कृति के महानतम प्रणेताओं में से एक महर्षि वशिष्ठ का कथन है कि अध्यापन का प्रारम्भ बिन्दु तब होता है जब आचार्य की चेतना अपने छात्र की चेतना का स्पर्श करती है। आचार्य की अन्तर्चेतना का अवरोहण और छात्र की अन्तर्चेतना का आरोहण एवं इन दोनों का सम्मिलन शिक्षण की शुरुआत है। इस सम्मिलन के स्वरूप को कठोपनिषद् के शान्तिपाठ में दर्शाते हुए कहा है- ‘हे भगवन्! आप हम दोनों आचार्य और शिष्य की साथ-साथ रक्षा करें। साथ-साथ हमारा पालन करें। हम दोनों साथ-साथ शक्ति को प्राप्त करें। हम दोनों की अधीत विद्या तेजोमयी हो और हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।’

आचार्य एवं शिष्य की अन्तर्चेतना के सम्मिलन के बाद दूसरा मौलिक बिन्दु अध्ययन की विषय वस्तु के शिक्षण के बारे में है। इस सम्बन्ध में सामान्य परम्परा रटाने, लिखाने या थोड़ा-बहुत समझाने की है। लेकिन यह अपर्याप्त है। इस क्रम में आवश्यक आवश्यकता है कि विद्यार्थी को विषय वस्तु का उसके जीवन से जुड़ाव का बोध कराया जाय। जिसका वह अध्ययन कर रहा है, ज्ञान के उस क्षेत्र की उसके निजी जीवन में एवं मानवीय जीवन में क्या महत्त्व है, इसे समझाया जाय। विद्यार्थियों को यहाँ यह बताना जरूरी होगा कि विषय में वर्णित विभिन्न पाठ्य अनुक्रम जीवन में- कहाँ, क्या और किस तरह महत्त्व रखते हैं। इस विश्वविद्यालय में रटाने और लिखाने की बातें बिल्कुल भी न चलेंगी। आचार्य द्वारा समझायी गयी रीति के अनुसार विद्यार्थी स्वयं पुस्तकालय में ग्रन्थों का अवलोकन करके अपने नोट्स को तैयार करेंगे। इसमें उनकी मौलिक सूझ-बूझ का विकास होगा।

विषय के विभिन्न बिन्दुओं के सैद्धान्तिक ज्ञान के साथ उसके व्यावहारिक ज्ञान के शिक्षण के लिए विभिन्न उपयोगी परियोजनाएं तैयार की जाएँगी। प्रत्येक विषय के आचार्य अपने विषय के अनुरूप इन्हें तैयार करेंगे। कक्षा और विषय के अनुरूप इनमें शोध एवं प्रयोग के विभिन्न स्तर होंगे। इससे विद्यार्थियों में विषय के गहरे व व्यावहारिक ज्ञान का विकास होगा। साथ ही उन्हें कुछ विशेष एवं मौलिक करने की सार्थक अनुभूति होगी। उनकी सृजन क्षमताओं का विकास होगा। कुछ नया करने, नया सोचने की सूझ-बूझ पनपेगी। इस सम्बन्ध में तीसरा बिन्दु पाठ्य विषय से अंतर्संबंधित है। इसके क्रियान्वयन के लिए सभी पाठ्य योजनाओं एवं प्रायोगिक परियोजनाओं को इस ढंग से तैयार किया जाएगा कि उन सब में नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक मूल्य घुले-मिले रहें। विद्यार्थी कोई भी विषय अथवा किसी भी कक्षा में पढ़े किन्तु वह जीवन जीने की कला अनिवार्य रूप से सीखे। उसे अपने नैतिक सामाजिक एवं आध्यात्मिक दायित्वों का भान एवं ज्ञान हो सके। साथ ही उसमें इन्हें निभाने की मौलिक क्षमता का विकास हो सके।

छात्र और छात्राओं में परस्पर सहयोग एवं उल्लासपूर्ण भावों को विकसित करने के लिए उपयोगी खेलों का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा। खेल-कूद की उपयोगिता शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक सन्तुलन एवं एकाग्रता के लिए भी है। इनका प्रशिक्षण विश्वविद्यालय की शिक्षण प्रक्रिया की मौलिकता का अनिवार्य, अविभाज्य एवं महत्त्वपूर्ण बिन्दु होगा। इस क्रम में उन्हीं खेलों का चुनाव किया जाएगा, जो छात्र-छात्राओं में शारीरिक बल एवं स्फूर्ति के साथ मानसिक विकास में भी सहायक हो। विद्यार्थियों में आपस में सहयोग की वृत्ति एवं टीम भावना पनप सके।

समग्र एवं सार्थक विकास के लिए विकसित की गयी शिक्षण प्रक्रिया में शरीर बल व बुद्धि बल के साथ नैतिक, आध्यात्मिक एवं संकल्प बल को विकसित करने वाली योजनाएँ भी शामिल की जाएँगी। यह शिक्षण प्रक्रिया सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण एवं आधारभूत बिन्दु है। इसे व्रताभ्यास का नाम दिया गया है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में अध्ययन करने वाला प्रत्येक विद्यार्थी अपनी कक्षा एवं आयु के अनुरूप प्रत्येक वर्ष कुछ व्रतों का पालन करेगा। वर्ष भर में इनका अभ्यास पूर्ण होने पर अगले वर्ष वह कतिपय नए व्रतों की दीक्षा लेगा।

इन व्रतों को किसी दिन विशेष के उपवास की सीमा तक नहीं समेटा जाना चाहिए। ये व्रत जीवन के आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में होंगे। इनमें उपवास, गायत्री जप, योगाभ्यास आदि कुछ भी नियम-अनुबन्ध हो सकते हैं। इन सबका उद्देश्य जीवन में संकल्प बल का विकास एवं आध्यात्मिक शक्तियों का निखार है। इस व्रताभ्यास का प्रत्येक कक्षा को उत्तीर्ण करने में अनिवार्य योगदान होगा। यही वह विशेषता है, जो यह दर्शाएगी कि छात्र व छात्रा के जीवन में बुद्धिबल के साथ आत्मबल की भी अनिवार्यता है।

शिक्षण प्रक्रिया की मौलिकता की मूल भावना यही है। जो काल क्रम एवं समय के अनुसार अपने विकास के नए आयाम उद्घाटित करेगी। इस प्रक्रिया में भागीदार होने वाले आचार्य हो या विद्यार्थी दोनों का ही जीवन क्रम अनूठा होगा। महर्षि याज्ञवल्क्य के अनुसार यहाँ के आचार्यगण-

यथा घटप्रतिच्छन्ना रत्नराजा महाप्रभाः। अकिञ्चित्करताँ प्राप्ता स्तद्वद्विद्या सर्वशः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति 1.2.12)

विद्यार्थियों के अज्ञान के आवरण को दूर करके ज्ञान के प्रकाश से उसको आलोकित करेंगे। अज्ञान रूपी अन्धकार घट से ही ज्ञान रूपी दीपक आवृत्त रहता है। आचार्य उस आवरण को हटाकर विद्यार्थी को सभी विद्याएँ प्राप्त कराता है।

विद्यावान् आचार्य एवं विद्याभ्यासी विद्यार्थी दोनों ही मिलकर शिक्षण की इस मौलिक प्रक्रिया को प्राण सम्पन्न बनाने के लिए यहाँ होने वाली सेमीनार-संगोष्ठी में भाग लेंगे। इन संगोष्ठियों का आयोजन-उपक्रम प्रत्येक संकाय एवं विभाग द्वारा समय-समय पर किया जाएगा।


ज्ञान की उपलब्धियों का संगोष्टी द्वारा पारस्परिक वितरण

सेमीनार या संगोष्ठी विश्वविद्यालय की विद्या साधना का महिमामय आयाम है। यह देव संस्कृति के प्रणेता ऋषियों की विरासत है। जिसे यहाँ पर युगानुकूल रीति से अपनाया गया है। इस रीति से ज्ञान में समग्रता आती है। उसकी एकाँगिता का विलोप होता है। प्राचीन महर्षियों ने ज्ञान के अर्जन के साथ, उसके आपसी विमर्श को भी आवश्यक बताया है। मानवीय क्षमताएँ और उपलब्धियाँ कितनी भी क्यों न हों, फिर भी उनमें कहीं कुछ कमी, अधूरापन रह ही जाता है। इस अधूरेपन को पूर्णता पारस्परिक विमर्श से मिलती है। संगोष्ठी ज्ञान की यही साझेदारी है। इसे अर्जित ज्ञान की उपलब्धियों का पारस्परिक वितरण भी कहा जा सकता है।

संगोष्ठी या सेमीनार शब्द नए हो सकते हैं, पर इसकी अवधारणा अति प्राचीन है। यह भारत देश की सबसे पुरानी साँस्कृतिक विरासत है। वैदिक साहित्य में ऐसे कई शब्द, ऋचाएँ और आख्यायिकाएँ मिलती हैं, जो इस सत्य को प्रमाणित करती हैं। यह साँस्कृतिक परम्परा ऋषियों द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों में विद्या साधना के लिए तो अनिवार्य थी ही, इसका सामाजिक महत्त्व भी था। समस्याएँ ज्ञान अर्जन के क्षेत्र की हो या फिर समाज की उलझनों को सुलझाने के सवाल हो? इनके समाधान संगोष्ठियों में ढूंढ़े जाने की रीति रही है। वैदिक काल की सभा, समिति, विदथ इसी सत्य को तथ्य के रूप में स्पष्ट करती है। इन सभी का उद्देश्य एक ही था कि सभी मननशील मुनि एवं विचारशील ऋषि मिलकर उपलब्ध ज्ञान की त्रुटियों का निवारण-निराकरण करें। उसे जीवनोपयोगी सार्थकता प्रदान करें।

प्राचीन ऋषियों के विश्वविद्यालयों में होने वाली इन संगोष्ठियों का अनेक स्थानों पर उल्लेख मिलता है। उन दिनों कुलपति महर्षि इसका आयोजन करते थे। संस्कृत ग्रन्थों में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र द्वारा अपने विश्वविद्यालय में भव्य संगोष्ठी कराए जाने का उल्लेख किया गया है। यह आयोजन कौशिकी नदी के तट पर हुआ। इसके आयोजक कुलपति ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए ग्रन्थकार का कथन है- ‘वे मानो चतुर्थ अग्नि, पंचम वेद, गतिशील धर्म और सभी विद्याओं का निदान हैं। उनसे वार्ता करने पर तमोगुण का विनाश होकर अन्तःकरण को शान्ति मिलती है। प्रसन्नचित्त होकर वे जो कुछ करते हैं, वह सत्य हो जाता है। ऐसे परम तेजस्वी ब्रह्मर्षि ने अपने विश्वविद्यालय में विद्या संगोष्ठी का आयोजन किया है, सुनकर समूची धरा के महर्षिगण बरबस पधारे। देवलोकों के देवगण भी आए।’

इस अवसर पर बह्मर्षि ने संगोष्ठी के अर्थ, उद्देश्य एवं स्वरूप को भी सभी ऋषियों के समक्ष स्पष्ट किया। उन्होंने कहा- संगोष्ठी का अर्थ विद्या और ज्ञान का परस्पर विमर्श है। इसके उद्देश्य कई हैं- 1. ज्ञान को समग्र, सार्थक, त्रुटिहीन बनाना, 2. एक ऋषि का दूसरे ऋषि के शोध-अनुसन्धान से लाभान्वित होना, 3. ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में भावी अनुसन्धान की आवश्यकता को समझना एवं दिशा तय करना, 4. ज्ञान की सही व उपयुक्त वितरण प्रणाली को सुनिश्चित करना। इसमें ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने विद्या संगोष्ठी के स्वरूप को निश्चित करने वाले कुछ बिन्दुओं का भी उल्लेख किया- 1. विद्या संगोष्ठी का उच्चतम स्वरूप विश्वविद्यालय में होने वाली शोध संगोष्ठियाँ हैं। इनमें तत्त्वद्रष्टा ऋषि एवं उनके शोध छात्र-छात्राएँ भागीदार होंगे। 2. जन सामान्य के लिए विद्या संगोष्ठियाँ यज्ञों, मेलों, तीर्थ स्थानों में आयोजित होनी चाहिए। 3. इनके लिए कुछ पुण्य तिथियाँ सुनिश्चित रहे, ताकि सभी नागरिक आसानी से इनमें भागीदारी निभा सकें। और विश्वविद्यालयों में होने वाले शोध कार्य से लाभान्वित हो सकें।

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इन निर्धारणों को सभी ऋषियों ने अपनाया। तीर्थराज प्रयाग में स्थित विश्वविद्यालय के कुलपति महर्षि भरद्वाज ने इसके लिए माघ मास को उपयुक्त माना। उन्होंने यह पूरा महीना विद्या संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों के लिए निश्चित किया। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने इसका बड़ा ही कवित्वपूर्ण वर्णन किया है-

माघ मकरगत रवि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥

गोस्वामी जी आगे कहते हैं-

भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिवर मन भावन॥ तहाँ होई मुनि रिषिय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥ मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परस्पर हरि गुन गाहा॥

तुलसी बाबा आगे इस विद्या संगोष्ठी के विषयों को स्पष्ट करते हुए बताते हैं-

ब्रह्म निरुपन धरम बिधि, बरनहिं तत्त्व विभाग। कहहिं भगति भगवन्त कै, संजुत ग्यान विराग॥

यह क्रम प्रति वर्ष के प्रत्येक माघ के सम्पूर्ण महीने चलता रहता-

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज-निज आश्रम जाहीं॥ प्रति संवत अति होई अनन्दा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिवृन्दा॥

गोस्वामी जी महाराज के कथन का सार इतना ही है, कि माघ महीने में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता, तब महर्षि भरद्वाज जी के आश्रम में विद्या संगोष्ठी आयोजित होती है। सभी ऋषि-मुनियों का समाज इसमें भागीदार होता। इसमें ब्रह्मज्ञान की दार्शनिक एवं धर्मनीति की सामाजिक शोध चर्चाएँ होती। पूरे महीने यह क्रम चलता रहता। प्रति वर्ष आनन्द का यह अवसर आता था।

सेमीनार-संगोष्ठी की यह साँस्कृतिक परम्परा ऐतिहासिक युग के तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशील आदि विश्वविद्यालयों में बनी रही। भारतीय इतिहास व संस्कृति के मर्मज्ञ विद्वान् प्रो. ए. एल. बाशम, पी. गार्डनर आदि कई विद्वानों ने अपने शोध कार्यों में इसका उल्लेख किया है। इस सम्बन्ध में एक तिब्बती छात्र रिंछोपा का संस्मरण उल्लेखनीय है। वह सातवीं शताब्दी ई. में नालन्दा विश्वविद्यालय का छात्र था। उसने लिखा है कि बसन्त ऋतु में विश्वविद्यालय में विश्व संगीति (यह विश्व संगीति, विश्व संगोष्ठी का पर्याय है।) आयोजित की गयी। इसके अंतर्गत होने वाली शोध परिचर्चाएँ विभिन्न संकायों एवं विभिन्न विभागों में एक साथ चलीं। इसमें जावा, सुमात्रा, मलयद्वीप, चीन आदि अनेक देशों के 9 हजार आचार्यों एवं 14 हजार छात्रों ने भाग लिया। इसमें से त्रिपिटक संगीति की अध्यक्षता आचार्य मोक्षकर गुप्त ने की। आचार्यों एवं छात्रों सभी के लिए इसके परिणाम अति सुखद रहे। धम्मज्ञान एवं शोध-कार्य के लिए सभी को नयी दिशाएँ मिली।

यही साँस्कृतिक आदर्श देव संस्कृति विश्वविद्यालय में अपनाया गया है। यहाँ नियमित अन्तराल में सेमीनार-संगोष्ठियाँ आयोजित की जाएगी। विभागीय संगोष्ठी, संकाय संगोष्ठी, विश्वविद्यालय संगोष्ठी, राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी आदि इसके विभिन्न स्तर होंगे। इनका आयोजन भी इनके स्तर के अनुरूप साप्ताहिक, मासिक, त्रैमासिक, वार्षिक एवं द्विवार्षिक किया जाएगा। इनमें से विभागीय संगोष्ठियाँ प्रति सप्ताह होगी। संकाय संगोष्ठी एक महीने में एक बार होगी। विश्वविद्यालय संगोष्ठी का समय अन्तराल त्रैमासिक रहेगा। राष्ट्रीय संगोष्ठी प्रति वर्ष एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी-सेमीनार दो सालों में एक बार आयोजित की जाएगी।

इन सभी संगोष्ठियों में विश्वविद्यालय के अध्ययन विषयों, शोध परियोजनाओं, अनुसन्धान प्रयोगों, शिक्षण प्रक्रियाओं आदि से सम्बन्धित विभिन्न बिन्दुओं पर गहन विचार किया जाएगा। इसके माध्यम से नए शोध पत्र एवं नए अनुसन्धान सूत्रों पर प्रकाश पड़ेगा। संगोष्ठियों में प्रस्तुत होने वाली सभी सामग्री को कुशल एवं वैदुष्यपूर्ण सम्पादन के बाद प्रकाशित किया जाएगा। इससे आगे भी आचार्यगण एवं छात्र-छात्राएँ लाभान्वित होते रहेंगे। देव संस्कृति की लोग हितकारी नीतियों के अनुरूप इन संगोष्ठियों के माध्यम से उन प्रक्रियाओं को भी विकसित किया जाएगा, जिनके द्वारा सामान्य जन भी विश्वविद्यालय की ज्ञान उपलब्धियों का समुचित लाभ उठा सकें। आचार्यगण एवं छात्र-छात्राएँ सब मिलकर यह लोक कल्याणकारी कार्य करेंगे। इन संगोष्ठियों के माध्यम से शिक्षण प्रक्रियाओं के उत्तरोत्तर विकास के साथ विद्यार्थियों के मौलिक मूल्याँकन की रीति-नीति भी विकसित होगी। ताकि ज्ञान अर्जन की सार्थकता एवं समग्रता को जाँचा-परखा जा सके।


तप और विद्या के अर्जन की मौलिक मूल्याँकन विधियाँ

मौलिक मूल्याँकन तप और विद्या के अर्जन की कसौटी है। मूल्याँकन के लिए परीक्षाओं का प्रचलन हर कहीं है। प्रायः प्रत्येक विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं को अनिवार्य रूप से इन परीक्षाओं में उपस्थित होना पड़ता है। इनमें से लिखित परीक्षाएँ कुछ प्रश्नों का उत्तर लिखकर दी जाती है। मौखिक परीक्षाओं में कुछ सवालों के जवाब सुनाने पड़ते हैं। इस प्रचलित रीति का दायरा परीक्षार्थी की स्मरण शक्ति को जाँचने-परखने और जानने तक सीमित रहता है। इन अर्थों में प्रचलित परीक्षाएँ विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति का ही मूल्याँकन कर पाती हैं। इसी आधार पर उन्हें तृतीय, द्वितीय या प्रथम श्रेणी का मान लिया जाता है। इस मूल्याँकन में स्मरण शक्ति के अलावा व्यक्तित्व के अन्य अनेक गुण न तो प्रकाशित हो पाते हैं, और न ही उन्हें जानने-जाँचने की जरूरत समझी जाती है।

इस प्रचलन से बहुत अलग देव संस्कृति विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के मूल्याँकन की रीति एकदम मौलिक होगी। यह मूल्याँकन दस में से पाँच सवालों के उत्तर जाँचने तक सीमित न रहेगा। इस मूल्याँकन के लिए आयोजित की जाने वाली परीक्षा को छात्र-छात्राएँ थोड़े से सम्भावित प्रश्नों की गाइड या मार्गदर्शिका को रट कर न पास कर सकेंगे। इसकी तैयारी के लिए उन्हें अपने समूचे व्यक्तित्व को तैयार करना पड़ेगा। उन्हें विद्यावान्, चरित्र निष्ठ एवं तपस्वी होने की साधना करनी पड़ेगी। विषय वस्तु के अध्ययन के साथ उन्हें अनेक व्रतों का अभ्यास करना पड़ेगा। मूल्याँकन की इस मौलिक रीति-नीति से उनके समग्र व्यक्तित्व का मूल्याँकन होगा। विद्यार्थीगण अपनी विषय वस्तु के ज्ञान के साथ देव संस्कृति के आदर्शों को अपने जीवन में कितना उतार पाए? यह परखा जाएगा।

यही हमारी ऋषि परम्परा भी रही है। ऋषि प्रणीत शिक्षा पद्धति में आज जैसी परीक्षा प्रणाली न थी। प्राचीन विश्वविद्यालयों में आचार्य प्रत्येक छात्र की ओर व्यक्तिगत ध्यान देते थे। उसके व्यक्तित्व के सार्थक एवं समग्र विकास के लिए हमेशा सजग रहते थे। उसकी मेधा, प्रतिभा व आत्मबल को बढ़ाने के लिए कई तरह की आध्यात्मिक प्रक्रियाओं का सहारा लेते थे। इस डगर पर सफलता पूर्वक चलने पर छात्रों को प्रोत्साहित किया जाता था। और वे आगे की शिक्षा के लिए योग्य समझे जाते थे। इस रीति का उल्लेख गौतम, बोधायन एवं वशिष्ठ धर्म सूत्र में मिलता है।

महर्षि वशिष्ठ ने छात्रों के मूल्याँकन के लिए एक अन्य उपाय भी सुझाया है। उनका कथन है- ‘आश्रमस्थास्रयो मुख्याः परषित् स्याद् दशावरा’ अर्थात् शिक्षा के पूरा होने पर छात्र-छात्राओं से कहा जाता था कि वे स्थानीय परिषद् के सामने अपने को उपस्थित करें। इस परिषद् में दस सदस्य होते थे। इसके अतिरिक्त बोधायन धर्मसूत्र के अनुसार विद्वान् स्नातकों को राजसभा में विशेष यज्ञों के अवसरों पर उपस्थित होने का निर्देश प्राप्त होता था। यहाँ उनके तप और विद्या की परीक्षा ली जाती थी।

प्राचीन साहित्य में छात्र-छात्राओं के मौलिक मूल्याँकन का अनेकों स्थानों पर उल्लेख है। यह मूल्याँकन राजसभा या विद्वत्परिषद् के विशेषज्ञ करते थे। वे वर्तमान समय के विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं से एकदम अलग थीं। इन प्राचीन परीक्षाओं में विद्यार्थियों को अपने तप व विद्या को प्रमाणित करना पड़ता था। तभी वह समाज में सम्मान व आदर का अधिकारी होता था। वह मेधा व प्रतिभा को समूचे लोक में प्रमाणित करता था।

महाकवि राजशेखर ने काव्य मीमाँसा के दशम अध्याय में लिखा है- ‘विद्या की परीक्षा के लिए राजा ब्रह्मसभाओं का आयोजन करें। इनमें उत्तीर्ण छात्रों-छात्राओं को ब्रह्मज्ञान प्रदान करें तथा पट्टबन्ध धारण करावें। महाकवि के अनुसार उज्जयिनी की ब्रह्मसभा में कालिदास, भारवि, मेंठ आदि की परीक्षा हुई थी। इसी तरह पाटलिपुत्र में उपवर्ष, वर्ष, पाणिनी, पिंगल, व्याडि, वररुचि और पतंजलि की परीक्षा हुई थी।’ इस सत्य को श्लोकबद्ध करते हुए कवि ने कहा है-

अत्रोपर्ववर्षविह पाणिनि पंगलविह व्याडिः। वररुचि पतञ्जली इह परीक्षिताः ख्यातिमुपजग्मुः॥

चरक संहिता के विमान स्थान में आठवें अध्याय में शास्त्र और आचार्य की परीक्षा का विस्तृत वर्णन है। इस मूल्याँकन के अनन्तर ही चिकित्सक को चिकित्सा कार्य को प्राप्त करने का अधिकार होता था।

देव संस्कृति के आदर्शों के अनुरूप मूल्याँकन की यही समग्र एवं मौलिक रीति-नीति यहाँ विश्वविद्यालय में अपनायी जाएगी। छात्रों-छात्राओं की परीक्षा और मूल्याँकन विश्वविद्यालय की परीक्षा समिति द्वारा किया जाएगा। इसके प्रभारी परीक्षा नियंत्रक होंगे। इन्हीं के आधीन परीक्षा समिति सभी परीक्षाओं के आयोजन व मूल्याँकन का कार्य करेगी। सभी विषयों एवं सभी कक्षाओं की परीक्षा के लिए सेमेस्टर सिस्टम को लागू करना तय किया गया है। प्रत्येक सेमेस्टर की अवधि छः महीने होगी। इस तरह प्रत्येक वर्ष में दो सेमेस्टर होंगे।

प्रत्येक सेमेस्टर में कक्षा व विषय के अनुरूप परीक्षाएँ लिखित, मौखिक एवं प्रायोगिक तीनों तरह से होंगी। इनमें से लिखित परीक्षा में विषय के सम्पूर्ण ज्ञान को परखने के लिए आब्जेक्टिव या वस्तुनिष्ठ शैली एवं ज्ञान की विशेषज्ञता को परखने के लिए प्रश्नों का विवरणात्मक शैली अपनायी जाएगी। सेमेस्टर की परीक्षाओं में आचार्यों द्वारा समय-समय पर किए गए आन्तरिक मूल्याँकन के भी अंक जोड़े जाएँगे। आन्तरिक मूल्याँकन के लिए आचार्य अपनी कक्षा के विद्यार्थियों की कभी भी उचित समय पर लिखित या मौखिक परीक्षा ले सकेंगे। यह नियम विश्वविद्यालय के सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू होगा।

पाठ्यवस्तु के मूल्याँकन के अलावा इस बात का भी मूल्याँकन किया जाएगा कि छात्र या छात्रा ने देव संस्कृति के आदर्शों को अपनाने के लिए पूरे शिक्षा सत्र में क्या-क्या प्रयास किए। किन-किन व्रतों का कितनी गहरी निष्ठ व श्रद्धा से पालन किया। इस क्रम में विद्यार्थियों द्वारा समय-समय पर किए अनुष्ठानों व विभिन्न साधनाओं का भी मूल्याँकन किया जाएगा। यह प्रक्रिया प्रत्येक सेमेस्टर में अपनायी जाएगी। कक्षा के अन्तिम सेमेस्टर में सभी नियमित परीक्षाओं के साथ एक ग्राण्ड वाइवा या महामौखिकी का आयोजन होगा। इसमें छात्र या छात्रा से वर्तमान सेमेस्टर की पाठ्यवस्तु के साथ पिछले सभी सेमेस्टरों की पाठ्यवस्तु से सम्बन्धित सवाल पूछे जाएँगे। इस प्रश्नकाल में सम्पूर्ण कक्षा अवधि में अपनाए गए आदर्शों एवं व्रतों का भी मूल्याँकन होगा।

प्रायोगिक परीक्षाएँ पाठ्यवस्तु के अनुरूप होगी। इसके लिए निश्चित किए गए प्रयोगों व परियोजनाओं को छात्र-छात्राएँ पूरा करेंगे। आन्तरिक एवं बाह्य परीक्षक विद्यार्थियों का तत्सम्बन्धी मूल्याँकन करेंगे। प्रायोगिक परीक्षा के साथ भी मौखिक परीक्षा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहेगी। मौखिक परीक्षा का स्वरूप प्रत्येक परीक्षा या सेमेस्टर के अनुरूप भिन्न होगा। इसमें से ग्राण्ड वाइवा या महामौखिकी के स्वरूप में दर्शनीय आकर्षण होगा। इसका आयोजन इस ढंग से किया जाएगा कि छात्र का समस्त व्यक्तित्व व समस्त गुण एक साथ प्रकाशित हो सके। इसमें विश्वविद्यालय के सभी संकाय के आचार्य भागीदार होंगे। और कोई आचार्य छात्र या छात्रा से सवाल पूछ सकेगा। इस परीक्षा के बाद ही छात्र उपाधि पाने का अधिकारी होगा। ऐसे भली प्रकार जाँचे परखे गए छात्रों का व्यक्तित्व विद्या एवं सेवा का संगम होगा। सम्पूर्ण विश्वविद्यालय की गतिविधियों में इसकी झलक होगी।


विद्या एवं सेवा का एक अद्भुत संगम

विद्या एवं सेवा का संगम देव संस्कृति का आदर्श है। ऋषि जीवन की गतिविधियों का आधार यही है। इन दोनों में से किसी को किसी से अलग नहीं किया जा सकता। विद्या और सेवा के ये दोनों ही तत्त्व एक दूसरे से गुँथे हैं, परस्पर घुले-मिले हैं। स्वार्थपरता और अहंता के विष से छुटकारा और भाव संवेदना के अमृतपान को विद्या कहा गया है। शास्त्रकारों ने इसी को ‘विद्यायामृतमश्नुते’ कहकर परिभाषित किया है। भाव संवेदना के अमृत तत्त्व का विकास ही विद्या है। भाव संवेदना के बिना सारी जानकारियाँ एवं समूची पढ़ाई-लिखाई बेकार है। क्योंकि इससे स्वार्थ व अहं की विष बेल ही उपजेगी और बढ़ेगी। अमृत तत्त्व तो विद्या की भाव संवेदना है, जो सेवा से बिछुड़कर रह नहीं सकता। संवेदना बढ़ते ही अनायास सेवा परायणता जीवन में आ जाती है। गिरे को उठाने, उठे को चलाने और पीड़ित को अपनाने के लिए अपने आप ही पाँव आगे बढ़ने लगते हैं।

प्राचीन वैदिक एवं पौराणिक साहित्य में जिन महर्षियों एवं उनके अन्तेवासी विद्यार्थियों की चर्चा पढ़ते हैं, उन्होंने अपने युग की पीड़ा और पतन के निवारण-निराकरण के लिए अपने सर्वस्व की आहुति दी थी। ऋषिगणों के द्वारा स्थापित विद्या केन्द्र उनके द्वारा संचालित विविध सेवा योजनाओं के केन्द्र भी थे। उनके विश्वविद्यालयों में विद्याध्ययन के साथ छात्र-छात्राओं की सेवा-संवेदना को भी विकसित किया जाता था। गुरु और शिष्य मिल-जुलकर परमार्थ के पुण्य कर्मों में अपनी भागीदारी निभाते थे। लोक जीवन में घुसपैठ बनाए पीड़ा और पतन से डटकर मुकाबला करते थे। उनके लिए यह सेवा कार्य कभी भी विद्याभ्यास से अलग नहीं था।

ऐसे अनेक महर्षियों में वामदेव का नाम बहुत प्रसिद्ध है। वैदिक परम्परा में इन्हें प्रख्यात् ऋषि माना जाता है। ये महर्षि वामदेव अपने द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। इनका विश्वविद्यालय विंध्य पर्वत की मेखलाओं में नर्मदा नदी के उद्गम स्थान के समीप ही था। महर्षि वामदेव का यह विद्या केन्द्र अपने युग का सुप्रसिद्ध सेवा केन्द्र भी था। यहाँ महर्षि अध्ययन-अध्यापन के साथ जन सेवा के कार्य भी करते थे। इस सेवा कार्य में उनके शिष्यगण जी-जान लगाकर जुटते थे। महर्षि वामदेव के इन सेवापरायण शिष्यों में अरिष्टनेमि, मधुक, प्रवाहण आदि की चर्चा पौराणिक साहित्य में हुई है।

प्राचीन साहित्य में विद्याभ्यास के साथ जुड़े हुए कई सेवा कार्यों की चर्चा आयी है। इन सेवा योजनाओं में जन चिकित्सा, स्वच्छता, नागरिकों को रोग निवारण के उपायों की जानकारी, ग्रामीणों को कृषि की वैज्ञानिक विधियों का ज्ञान, विविध शिल्प कलाओं की जानकारी आदि मुख्य थी। इनके अलावा महर्षियों का बहुप्रिय सेवा कार्य था, बिना किसी भेदभाव के सभी को जीवन जीने की कला का शिक्षण। यह कार्य वे अपने विद्या केन्द्रों में भी करते थे। और इसके लिए वे स्वयं चलकर नागरिक स्थानों में भी जाते थे। इन सभी कार्यों में सभी शिष्य गण अनिवार्य रूप से भागीदार होते थे।

विभिन्न धर्मसूत्रों, गृह्यसूत्रों व स्मृतियों में कुछ अनिवार्य अवकाश दिनों या अनध्याय की चर्चा हुई है। इनमें से प्रत्येक अवकाश के समय अपने कारण गिनाए गए हैं। इन सभी में प्राकृतिक विपदाओं में होने वाले अनध्याय के कारण को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि ऐसे अवसरों पर विद्याभ्यासी छात्रगण अपने आचार्यों के मार्गदर्शन में प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित जनों की सेवा करें। अनध्याय के इन दिनों की चर्चा करते हुए स्मृतिकारों का कथन है, दिन या रात में धूलि से भरे बवण्डर उत्पन्न होने पर, भूमि के कुहासा छाने पर, आकाश के अत्यधिक लाल होने पर, बिना ऋतु के आकाश में मेघों के छा जाने पर, इतनी अधिक वर्षा के होने पर कि छतें टपकने लगे, बृहस्पति, शुक्र, चन्द्र, सूर्य आदि नक्षत्रों के चारों ओर रंगीन प्रभा मण्डल के दिखाई देने पर, भूकम्प, सूखा-बाढ़ आदि के अवसरों पर विद्या परायण जनों को सेवा परायणता अनिवार्य रूप से अपनाना चाहिए।

वैदिक युग की ही भाँति ऐतिहासिक युग के प्राचीन विश्वविद्यालयों में भी देव संस्कृति का यही आदर्श सुप्रतिष्ठित था। चीनी छात्र इत्सिंग ने नालन्दा विश्वविद्यालय में होने वाले विद्याध्ययन के साथ यहाँ से संचालित होने वाले सेवा कार्यों के महत्त्व को भी दर्शाया है। उसका कहना है कि इस महान् विश्वविद्यालय के द्वारा जन सेवा की अनेकों योजनाएँ संचालित होती थी। इन सेवा योजनाओं को देश में ही नहीं विदेशों में भी क्रियान्वित किया जाता था। विश्वविद्यालय के इन सेवा कार्यों के लिए गुप्तवंश के उत्तरवर्ती राजा बुधगुप्त आदि के साथ बंगाल के पालवंश के राजा समय-समय पर भारी आर्थिक सहायता करते थे। कन्नौज के राजा हर्षवर्धन को नालन्दा विश्वविद्यालय की सेवा योजनाओं में विशेष रुचि थी। उसने अनेकों बार यहाँ की सेवा योजनाओं के लिए आर्थिक अनुदान दिए।

इस कार्य के लिए नालन्दा विश्वविद्यालय को विदेशों से भी सहायता प्राप्त होती थी। दक्षिण-पूर्वी द्वीपों- जावा, बालि, सुमात्रा, मलय आदि देशों के राजाओं ने यहाँ की सेवा योजनाओं के लिए प्रचुर धन अर्पित किया था। जावा, सुमात्रा के राजा बलपुत्रदेव ने यहाँ एक विहार बनवाया था, जहाँ चिकित्सा का कार्य होता था। उसने बंगाल के राजा देवपाल को भी प्रेरित किया कि वह नालन्दा विश्वविद्यालय के सेवा कार्यों के लिए पाँच ग्राम दान में दे। इत्सिंग का कहना है कि ये सारी सहायताएँ नालन्दा विश्वविद्यालय के आचार्यों एवं छात्रों के द्वारा की जाने वाली सेवा साधना की प्रमाणिकता का सुफल थीं। ये सभी सामान्य समय में किए जाने वाले सेवा कार्यों के अतिरिक्त किसी भी राष्ट्रीय या प्राकृतिक आपदा के समय अपनी जान-जोखिम में डालकर भी सेवा योजनाओं को संचालित करते थे। उनकी इन भावनाओं के कारण जन-जन में उनका भारी सम्मान था।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भारत भूमि का यही साँस्कृतिक आदर्श सुप्रतिष्ठित होना है। यहाँ के आचार्यगण एवं छात्र-छात्राएँ विद्या साधना के साथ सेवा साधना भी करेंगे। इन सेवा कार्यों का निर्धारण प्रत्येक संकाय के अनुरूप किया जाएगा। चिकित्सा सेवा एवं स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता के अलावा अन्य कई सामाजिक सेवा की योजनाएँ विश्वविद्यालय के द्वारा चलाई जाएगी। इन सभी में आचार्यों एवं छात्रगणों की भागीदारी अनिवार्य रूप से होगी। सभी सेवा योजनाओं का क्रियान्वयन व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के आदर्शों एवं उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जाएगा।

पीड़ा निवारण के साथ पतन निवारण के लिए भी प्रभावी कार्यक्रमों की रूपरेखा बनायी जाएगी। और इसका असरदार ढंग से क्रियान्वयन होगा। सामान्य समय के सेवा कार्यों के अतिरिक्त राष्ट्रीय व प्राकृतिक आपदाओं के समय यहाँ के आचार्य एवं छात्र बढ़-चढ़ कर अपनी भागीदारी निभाएँगे। इन सेवा कार्यों से विद्यार्थियों से निष्काम कर्म की साधना तो सधेगी ही साथ ही उन्हें अपने सामाजिक दायित्व का भी बोध होगा। वे अनुभव करेंगे कि जिस समाज के वे अंग-अवयव हैं, उसके प्रति उनका महत्त्वपूर्ण दायित्व भी है। सेवा-साधना से विकसित संवेदना उनमें एक अनूठी आत्म जागृति को जन्म देगी। जिससे उनमें सामाजिक कर्त्तव्यों के बोध के साथ देश व धरती से गहरे भावनात्मक लगाव, जुड़ाव की अनुभूति होगी। राष्ट्रीय भावनाएँ विकसित होगी। और यहाँ अध्ययन करने वाले सभी विद्यार्थी मिल-जुलकर विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय धर्म को अपना सकेंगे।


राष्ट्रधर्म की दीक्षा देना प्रथम कर्तव्य

विश्वविद्यालय का राष्ट्रधर्म युवापीढ़ी में राष्ट्रीय संवेदनाओं का जागरण है। उनमें राष्ट्र प्रेम, राष्ट्र सेवा, राष्ट्र जागरण व राष्ट्र भक्ति की भावनाओं का उफान पैदा करना है। उनके हृदयों में वह संवेदनशीलता जगानी है, जो राष्ट्र की पीड़ा, वेदना, कसक और टीस की गहरी अनुभूति कर सके। युवा रक्त को यह बोध कराना है कि सन्तानों का अपनी राष्ट्र माता के प्रति क्या कर्त्तव्य है। अपनी माता से बिछुड़ चले युवाओं को यह याद दिलाना है कि देखो तो सही, माँ तुम्हें कितना प्यार करती है। भारत जननी की गोद की महिमा उसके लाडलों को समझानी है। युवा पीढ़ी को देश की मिट्टी की सोंधी सुगन्ध का गाढ़ा परिचय कराना है। उन्हें राष्ट्र धर्म की दीक्षा देनी है।

यह देव संस्कृति की सनातन परम्परा है। देवभूमि भारत के ऋषिगण सदा से अपने विद्या केन्द्रों में इस राष्ट्र तत्त्व का बोध कराते रहे हैं। अपने छात्र-छात्राओं को राष्ट्र धर्म की दीक्षा देते रहे हैं। ऋषि चिन्तन के स्वरों में हमेशा इस सत्य की गूँज रही है कि देश के जिस बालक, किशोर, युवा अथवा प्रौढ़ के दिलों में राष्ट्रीय-भावनाएँ नहीं धड़कती, वह एक अनाथ है, सिर्फ एक अनाथ। अपनी माँ के स्वरूप से, उसके गौरव से, उसकी उपलब्धियों और विभूतियों से, सबसे बढ़कर माँ के प्रेम से अपरिचित, अनजान व्यक्ति को भला और क्या कहेंगे। माँ से अपरिचित होने का, माँ से बिछुड़ने का दर्द केवल एक मातृहीन ही समझ सकता है। इसी तरह अपनी माता के लिए जान की बाजी लगा देने वाले रणबाँकुरों के दिलों में उफनने वाले गर्व और गौरव की अनुभूति भी कोई मातृभक्त ही कर सकता है।

यह तत्त्व साधारण नहीं है। वैदिक ऋषियों ने अपनी समाधि चेतना में इसे अनुभव किया और सारे देशवासियों से कहा-

भद्रं इच्छन्त ऋषयः सवर्विदः तपो दीक्षाँ उपसेदुः अग्ने। ततो राष्ट्र बलं ओजश्च जातम् तदस्मै देवा उपसं नमन्तु॥ (अथर्व. 19/41/1)

‘आत्मज्ञानी ऋषियों ने जगत् का कल्याण करने की इच्छा से सृष्टि के प्रारम्भ में जो दीक्षा लेकर तप किया, उससे राष्ट्र निर्माण हुआ, राष्ट्रीय बल और ओज भी प्रकट हुआ। इसलिए सब विबुध इस राष्ट्र के सामने नम्र होकर इसकी सेवा करें।’

ऋषियों की महान् तप साधना से प्रकट हुई भारत माता ने ऋग्वेद के ऋषि को उसकी गहन समाधि में अपने दिव्य स्वरूप का परिचय देते हुए कहा, वत्स जान लो,

अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाँ चिकीतुषी प्रथम यज्ञियानाम्। ताँ मा देवा व्यदधुः पुरुन्नाभूरिस्थान्नाँ भूर्यावेशयमन्तीम्॥ (ऋग्वेद 10/10/125)

मैं राष्ट्र की अधीश्वरी, समृद्धियों का संगम, परब्रह्म से अभिन्न तथा सभी देवताओं में प्रधान हूँ। पूरे राष्ट्रीय परिवेश में मैं ही स्थित हूँ। अलग-अलग स्थानों में रहने वाले देवता जो भी करते हैं, वह मुझे जानकर ही करते हैं।

यही है हमारी भारत माता, जिसकी अनन्त शक्तियों से अनजान उसके सुपुत्र और सुपुत्रियों ने उससे मुँह मोड़ लिया है। हर साल अनेकों प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएँ थोड़े से पैसों के लालच में पराए देश भाग जाते हैं। जो किसी कारण नहीं जा पाते, वे अगले साल चले जाने का सपना देखते हैं। आखिर यह सब क्यों? जिस देश की धरती में जन्म लिया, जिसकी मिट्टी में खेलकर बड़े हुए, जिसके अन्न-जल से शरीर का एक-एक कोश बना, उसमें रक्त की बूँदें इकट्ठी हुई, प्राण पले, उससे यूँ ही मुँह मोड़ा जाना कहाँ तक उचित है? और जो यहाँ हैं, उन्हीं को कौन सी परवाह है। वे भी तो धन, पद की दौड़ में भाग रहे हैं। सभी को आगे निकलने की जल्दी है, भले ही इसके लिए कोई भी भ्रष्ट नीति क्यों न अपनानी पड़े।

अपनी सन्तानों की यह दुर्दशा देखकर भारत माता व्याकुल हैं। उनकी विकल कराह संवेदनशील प्राणों में सुनी जा सकती है। बाहर के घुसपैठिये आकर माँ की छाती में रोज नए घाव देते हैं। जो अपने हैं, वे उसके आँचल की सुखद छाँव की अनुभूति करने के बजाय उसे चीर-फाड़कर तार-तार करने के लिए उतारू हैं। आज सब तरफ होड़ मची है- माता की सेवा के लिए नहीं, माँ पर शासन करने के लिए। सभी को गद्दी चाहिए- रौब जमाने के लिए, हुक्म चलाने के लिए, फिर चाहे भारत जननी बिलखती रहे, आँसू बहाती रहे, छटपटाती रहे, तो क्या हुआ? इस हालत का जिम्मेदार कौन है? तो इसका जवाब एक ही है- देश के विचारशील जन, जिन्होंने राष्ट्र के नागरिकों को राष्ट्र धर्म नहीं सिखाया।

युवा पीढ़ी को राष्ट्र धर्म की दीक्षा देने की यह जिम्मेदारी देव संस्कृति विश्वविद्यालय ने ली है। यह उद्घोष है इस सत्य का कि राष्ट्र माता से बिना किसी भौतिक या लौकिक लाभ की इच्छा को मन में जन्म दिए बगैर उसकी सेवा की उमंग में जीने वाले अभी भी हैं। यह महत्संकल्प है देश के लिए जीने और देश के लिए मरने वाली पीढ़ी के निर्माण का। यह साहस है उस संवेदना के विकास का जो साम्प्रदायिक टकरावों में नहीं, जाति या क्षेत्र के बंटवारों में नहीं, राष्ट्र धर्म के राष्ट्र प्रेम के मेल-मिलाप में यकीन रखती है। ये बातें कोरी कल्पना नहीं है। यह वह हकीकत है, जिसके अंकुर इस विश्वविद्यालय की धरती पर फूट चुके हैं। जिसमें अब-नयी-नयी कोपलें निकलने वाली है। जहाँ अनेकों नए कोमल किसलय पनपने वाले हैं। राष्ट्र भक्ति के ढेरों-ढेर सुरभित पुष्प मुस्कराने वाले हैं।

राष्ट्र धर्म देव संस्कृति विश्वविद्यालय की सभी गतिविधियों का केन्द्रीय स्वर है। यहाँ के समस्त क्रियाकलापों में इसकी मधुर सरगम सुनी जा सकेगी। विश्वविद्यालय की समस्त कक्षाओं के सभी विद्यार्थियों को उनकी कक्षा व आयु के अनुरूप, राष्ट्रीय गौरव, राष्ट्रीय मूल्य एवं राष्ट्रीय अस्मिता का ज्ञान कराया जाएगा। यह ज्ञान संवेदना ऐसी होगी कि यहाँ पढ़ने वाले छात्र-छात्राएँ अपने धर्म-मजहब की उच्च शिक्षा से तो अनुप्राणित होंगे, पर उनमें संकीर्णता लेश मात्र भी न होगी। वे सभी राष्ट्र धर्म को मानने वाले राष्ट्र भक्त नागरिक बनेंगे। भारत माता की आराधना उनके जीवन का आदर्श होगी।

इन मूल भावनाओं को व्यावहारिक रूप देने के लिए यहाँ प्रधानतया दो बिन्दु वाली कार्ययोजना अपनायी जाएगी। इसका पहला बिन्दु है- पाठ्यक्रम में राष्ट्र के सार्वभौम स्वरूप व इसके महत्त्वपूर्ण तत्त्वों, सत्यों एवं सूत्रों का समावेश। यह कार्य ऐसा होगा कि सभी जातियों, क्षेत्रों एवं धर्मों से आए विद्यार्थीगण पारस्परिक सौहार्द्र के साथ राष्ट्र का सार्थक परिचय पा सकें। उनमें सच्चे राष्ट्र प्रेम का विकास हो। उनके उज्ज्वल राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण हो। अपने देश व धरती के प्रति उनमें भाव-संवेदना विकसित हो सके। वे जान सकें कि देश पहाड़ों, नदियों, महासागरों से भरे जमीन का टुकड़ा भर नहीं है, यह अपनी माता का विराट् शरीर है। जिसके दूध की लाज निभाना उनके जीवन का अनिवार्य कर्त्तव्य है।

इस क्रम में दूसरे महत्त्वपूर्ण बिन्दु के रूप में कुछ व्यावहारिक परियोजनाओं को विकसित किया जाएगा। इनका स्वरूप राष्ट्रीय सेवा योजनाओं के प्रचलित रूप से कहीं अधिक व्यापक होगा। यह राष्ट्र प्रेम की व्यावहारिक अनुभूति कराने का प्रयास है। इसके माध्यम से विद्यार्थी यह जान सकेंगे कि बिना किसी संकीर्ण भेद-बुद्धि के राष्ट्रीय कर्त्तव्यों का पालन क्या होता है। ये सभी व्यावहारिक परियोजनाएँ छात्र-छात्राओं को यह अनुभूति कराएगी-

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्ष तद्भारतं भारती यत्र सन्तति॥

पृथ्वी का भू-भाग जो समुद्र के उत्तर व हिमालय के दक्षिण में स्थित है, भारत वर्ष कहलाता है तथा उसकी सन्तानों को भारतीय कहते हैं।

यही वह देश है जिसके लिए कहा गया है-

गायन्तिदेवाः किलगीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमि भागे। स्वर्गायवर्गास्पद हेतुभूते भवन्ति भूयः पुरुषा सुरत्वात्॥

‘देवता भी इस पवित्र भूमि भारत के गीत गाते हैं। और देवताओं में भी उन्हें धन्य कहा जाता है, जो स्वर्ग और अपवर्ग के लिए साधनभूत भारतभूमि में उत्पन्न हुए हैं।’ राष्ट्रीय भावनाओं की यह अनुभूति विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर के साथ भविष्य में विकसित होने वाले सभी सम्बद्ध केन्द्रों में भी की जा सकेगी।


संबद्ध केन्द्र बनाएंगे विश्व वसुधा को देव कुटुँब

विश्वविद्यालय से सम्बद्ध केन्द्रों की स्थापना, देव संस्कृति के व्यापक विस्तार की भविष्यत् योजना है। इसका क्रियान्वयन देव संस्कृति विश्वविद्यालय में अध्ययन-अध्यापन व शोध-अनुसंधान आदि शैक्षिक एवं परीक्षा व्यवस्था आदि प्रशासनिक कार्य के सुव्यवस्थित होने के बाद ही किया जाएगा। यह वामन से विराट् होने के लिए रखा जाने वाला अगला पग है। इसे देव संस्कृति के ज्ञान-विज्ञान एवं जीवन नीतियों के शिक्षण को देश व्यापी के साथ विश्व व्यापी बनाने के लिए किया जाने वाला साहसी पुरुषार्थ भी कहा जा सकता है। इस महत् योजना के द्वारा समूची विश्व-वसुधा को देव कुटुम्ब बनाने का प्रयास किया जाएगा। समूची विश्व मानवता को उसके अपने अंचल में देव संस्कृति की दीक्षा देने का पुण्य कार्य किया जाएगा।

अपनी महान् संस्कृति की सनातन परम्परा भी यही है। संस्कृति चक्र प्रवर्तन को राष्ट्र व्यापी एवं विश्व व्यापी बनाने के लिए ऋषिगण एवं उनके सुयोग्य शिष्य अपने विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध विद्या केन्द्रों की स्थापना किया करते थे। इनके संचालन का भार उसी आचार्य कुल के किसी सुयोग्य आचार्य अथवा किसी वरिष्ठ शिष्य को सौंपा जाता था। इन वरिष्ठ शिष्यों को वृद्धतर छात्र कहा जाता था। पहले ये छात्र अपने ही आचार्यकुल में अध्यापन का प्रशिक्षण प्राप्त करते थे। स्वयं को सुयोग्य आचार्य के रूप में विकसित करते थे। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इस तरह का उल्लेख किया गया है। महर्षि आपस्तम्ब का कथन है-

तथा समादिष्टोऽध्यापयति। वृद्धतरे स ब्रह्मचारिणि आचार्यवद् वृत्तिः॥

इस कथन के अनुसार आचार्यों के निरीक्षण एवं संरक्षण में वरिष्ठ छात्र अपने कनिष्ठ छात्रों को पढ़ने में सहायता देते थे। इन छात्रों को वृद्धतर छात्र कहा जाता था। इनका सम्मान आचार्य के समान होता था। ऐसे ही छात्र बाद में सम्बद्ध विद्या केन्द्र में आचार्य का दायित्व निभाते थे।

अपने आचार्यकुल या विश्वविद्यालय से सम्बद्ध ये विद्या केन्द्र देश व धरती के कोने-कोने में आवश्यकतानुसार स्थापित किए जाते थे। इन केन्द्रों के संचालन का भार उस केन्द्र के प्रमुख आचार्य या प्रभारी आचार्य पर होता था। ऐसे सभी केन्द्रों के प्रभारी आचार्य अपने विद्या केन्द्रों में होने वाले शिक्षण शोध व विविध संगोष्ठियों आदि सभी कार्यों का ब्योरा अपने आचार्य कुल के कुलाधिपति या कुलपति को देते थे। कुलाधिपति या कुलपति अथवा उनके निर्देशन में तय की गयी विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्यों की समिति इन विद्या केन्द्रों का समय-समय पर निरीक्षण करती थी। आवश्यक होने पर इन केन्द्रों के प्रभारी बदले भी जाते थे। इन सम्बद्ध केन्द्रों का समस्त स्वामित्व आचार्यकुल या विश्वविद्यालय का होता था।

प्राचीन संस्कृत साहित्य में महर्षि अगस्त्य द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय से सम्बद्ध अनेकों विद्या केन्द्रों का उल्लेख किया गया है। इनकी स्थिति भारत वर्ष के अनेक स्थानों पर बतायी गयी है। ये विद्या केन्द्र हिमालय से लेकर दक्षिण के समुद्र तट तक फैले हुए थे। हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में अगस्त्य मुनि के स्थान की आज भी बहुत प्रसिद्धि है। अपने समय में यह सुप्रतिष्ठित विद्या केन्द्र था। महाकवि भवभूति ने उत्तर रामचरित में कुलाधिपति महर्षि अगस्त्य के एक विद्या केन्द्र की स्थिति गोदावरी के तट पर बतायी हैं। प्राप्त विवरण के अनुसार यह विद्या केन्द्र विशेष रूप से ब्रह्मविद्या के अध्ययन के लिए था। यहाँ साधना संकाय के पाठ्यक्रम संचालित होते थे। यहाँ ब्रह्मविद्या के अध्ययन के लिए छात्र दूर-दूर से आते थे। इतिहासवेत्ता एवं पुराविद् ए. ब्लूमफील्ड और के. रघुनाथ अपने संयुक्त अध्ययन में इस विद्याकेन्द्र की पहचान नासिक से पन्द्रह मील दूर अकोला ग्राम में की है।

महर्षि अगस्त्य के आचार्य कुल से सम्बन्धित एक सुप्रतिष्ठित विद्या केन्द्र वेदपुरी में था। वेदपुरी नाम से जाने जाने वाले इस केन्द्र के नाम से ही इस स्थान का नाम भी वेदपुरी हो गया। वर्तमान में यह स्थान पाण्डिचेरी के नाम से जाना जाता है। महर्षि का यह विद्या केन्द्र ठीक उसी स्थान पर अवस्थित था, जहाँ आज महर्षि अरविन्द का आश्रम स्थित है। अगस्त्य ऋषि का एक विद्या केन्द्र चित्रकूट से थोड़ा आगे था। इसका संचालन उनके सुयोग्य शिष्य महामुनि सुतीक्ष्ण करते थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इनकी चर्चा करते हुए कहा है-

मुनि अगस्ति का सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।

काव्य विवरण के अनुसार जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम भ्राता लक्ष्मण एवं माता सीता के साथ इस महान् विद्या केन्द्र में आए, तो उन्होंने यहाँ के विद्याध्ययन की रीति-नीति से अभिभूत हो विश्वविद्यालय के कुलाधिपति महर्षि अगस्त्य से मिलने की चाहत जताई। प्रभु श्री राम की चाहत को सुनकर मुनिवर सुतीक्ष्ण स्वयं उन्हें मिलाने के लिए अपने संग ले गए। गोस्वामी जी ने इस प्रसंग की भी चर्चा अपनी काव्य कथा में की है।

अपने आचार्य कुल से सम्बद्ध ऐसे विद्या केन्द्रों की स्थापना वशिष्ठ, कण्व, परशुराम, भरद्वाज आदि महर्षियों ने भी की थी। ऐतिहासिक युग के तक्षशिला, उड्डयन्तपुर एवं विक्रमशिला आदि विश्वविद्यालय से सम्बद्ध विद्या केन्द्रों का उल्लेख ऐतिहासिक ग्रन्थों में मिलता है। विक्रमशिला विश्वविद्यालय के विविध क्रियाकलापों का ऐतिहासिक अध्ययन करने वाले प्रो. वी. प्रिंसेप ने अपने शोध ग्रन्थ ‘विक्रमशिला : ए सेण्टर आँव कल्चर एण्ड एजुकेशन’ में इस बारे में काफी कुछ कहा है। उनके अनुसार विक्रमशिला विश्वविद्यालय के कई केन्द्र पूरे देश में थे। ऐसे केन्द्रों का भार इस विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष या डीन स्तर के वरिष्ठ आचार्य सम्भाला करते थे। इसका एक विद्या केन्द्र बंगाल में होने का प्रमाण मिलता है। इन प्रमाणों के अनुसार आचार्य बुद्ध ज्ञानपाद कुछ समय के लिए इस केन्द्र के मुख्य आचार्य रहे। बाद में इनकी नियुक्ति विक्रमशिला विश्वविद्यालय के महास्थविर के रूप में हुई।

संस्कृति चक्र प्रवर्तन की यही युगान्तरकारी प्रक्रिया देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भी अपनायी जाएगी। उत्तराँचल प्रदेश के महामहिम राज्यपाल ने अपने अध्यादेश के अध्याय दो के अंतर्गत बिन्दु 3.5 में स्पष्ट कहा है- ‘देव संस्कृति विश्वविद्यालय का मुख्यालय शान्तिकुञ्ज हरिद्वार, उत्तराँचल में स्थित होगा और वह अपनी अधिकारिता के अन्दर ऐसी अन्य जगहों पर भी अपने निवेश स्थापित कर सकती है।’ ये स्थापित निवेश ही विश्वविद्यालय से सम्बद्ध केन्द्र होंगे। इनका स्वरूप ष्टशठ्ठह्यह्लद्बह्लह्वद्बठ्ठह्ल ष्टशद्यद्यद्गद्दद्ग या घटक महाविद्यालय के रूप में होगा। देश एवं विश्व में जहाँ कहीं भी अपने देव परिवार के परिजन इस तरह की क्षेत्रीय आवश्यकता को अनुभव करेंगे, उनके अनुरोध पर विचार किया जाएगा।

इन सम्बद्ध केन्द्रों का सम्पूर्ण संचालन एवं नियंत्रण देव संस्कृति विश्वविद्यालय स्वयं करेगा। स्थानीय परिजन इसमें सक्रिय सहयोगी की भूमिका निभाएँगे। सम्बद्ध केन्द्रों के रूप में सभी घटक महाविद्यालयों के क्रियाकलाप देव संस्कृति विश्वविद्यालयों की घोषित योजनाओं के अनुरूप ही चलेंगे। इन महाविद्यालयों से क्षेत्र की स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति होगी। बाद में यहाँ अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राएँ अपने उच्चतर शोध आदि अध्ययन के लिए विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश लेंगे। अभी तक सोचा यही गया है कि स्नातक स्तर तक के अध्ययन की व्यवस्था इन घटक महाविद्यालयों में हो, शेष उच्चतर अध्ययन व शोध छात्र-छात्राएँ विश्वविद्यालय में सम्पन्न करें। हालाँकि इस नीति पर विशद् विचार इन महाविद्यालयों के देश व विदेश में खोले जाने के बाद ही किया जाएगा।

घटक महाविद्यालयों या Constituint Colleges के अतिरिक्त विश्वविद्यालय में डिस्टेन्स एजुकेशन सिस्टम अथवा दूरस्थ शिक्षा पद्धति की भी व्यवस्था की जाएगी। इसके लिए पत्राचार पाठ्यक्रम प्रमुख उपयोगी साधन होगा। यद्यपि विभिन्न विषयों में पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से पढ़ने वालों के लिए भी घटक महाविद्यालयों या विश्वविद्यालय में कुछ समय का आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करना अनिवार्य होगा। परीक्षा की नीति विषयों के अनुरूप सभी के लिए समान होगी। सभी छात्र-छात्राएँ चाहे वे सम्बद्ध केन्द्रों में पढ़े या विश्वविद्यालय में उनके लिए आदर्श व उद्देश्य, नियम, नीतियाँ, अनुशासन व्यवस्था सब कुछ एक जैसी ही होगी। सबके सब देव संस्कृति की नीतियों व मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध होंगे। और अपने अध्ययनकाल के बाद देव संस्कृति के देवदूत की भूमिका निभाने के लिए अग्रसर होंगे।


नवयुग को जीवन देने वाले संस्कृति दूत यहाँ गढ़े जायेंगे

देव संस्कृति के देवदूत का जीवन, विश्वविद्यालय की विद्या साधना का सुफल है। यहाँ आकर अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राओं की गुरु दक्षिणा है। यही उनसे अपेक्षा है। विद्यार्थीगण इस ऋषिभूमि में विद्याभ्यास करके यदि स्वयं को देव संस्कृति के देवदूत के रूप में गढ़ सकें, तो समझा जाएगा कि उनका विद्याध्ययन सफल हुआ। उन्होंने आचार्य कुल को, विश्वविद्यालय को अपनी भावभरी श्रद्धा अर्पित कर दी। इस युग के महानतम आचार्य युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव के दिव्य स्वप्न को सच्चे अर्थों में साकार किया। उस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सहायक और सहयोगी हुए, जिसके लिए विश्वविद्यालय का समूचा तंत्र विकसित किया गया है।

ऋषियों की रीति-नीति यही है। ऋषि परम्परा का आदर्श, उद्देश्य एवं लक्ष्य यही है। विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के जीवन के भविष्यत् को सुस्पष्ट करने वाले ऋषि मंत्र के स्वर भी यही है-

विश्वविद्यालयाधीतस्य तपविद्याः सुसम्पन्नः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षरेन् पृथ्व्याँ सर्वमानवः॥

अर्थात्- विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले, तप और विद्या से सुसम्पन्न व्यक्ति अपने-अपने चरित्र से पृथ्वी के सभी मनुष्यों को शिक्षा देंगे।

तप और विद्या से भरा-पूरा ऐसा उज्ज्वल चरित्र ही व्यक्ति को देव संस्कृति का देवदूत बनाता है। इन देवदूतों को संस्कृति के सत्य एवं सूत्र समझाने के लिए किसी वाणी विलास या बौद्धिक चमत्कारों की जरूरत नहीं पड़ती। उनका मौन जीवन ही मुखर होकर सब कुछ समझा देता है। उनकी जिन्दगी के उजाले से संपर्क में आने वालों के मन-बुद्धि ही नहीं, अन्तरात्मा तक सुप्रकाशित हो जाती है। इस विश्वविद्यालय से पढ़कर निकलने वाले छात्र-छात्राओं का जीवन कुछ ऐसा ही प्रकाशपूर्ण होगा, कुछ ऐसी ही आशाएँ और अपेक्षाएँ संजोयी गयी है। ऐसे ही संकल्प किए गए हैं।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही कुछ सवाल उठे हैं, कुछ उठाए गए हैं और कुछ उठाए जा रहे हैं। इन सभी सवालों के धागे इस बात से लिपटे हैं कि यहाँ अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों की रोजी-रोटी का क्या होगा? उनके भविष्य का स्वरूप क्या बनेगा? इन सवालों के जवाब में यही कहना है कि इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य ही भविष्य को गढ़ना है। यहाँ पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के जीवन एवं भविष्य को इतनी सुघड़ रीति से गढ़ा-संवारा जाएगा कि वे अपने और अपने परिवार के, देश, समाज व संसार के भविष्य को गढ़ और संवार सकें। अपनी परिष्कृत प्रतिभा से स्वयं दिशावान बनें और अपने आसपास के परिकर को भी सही एवं सार्थक दिशा दें।

इसके साथ ही इस प्रसंग में एक सच्चाई समझ लेना जरूरी है। यहाँ पर मल्टी नेशनल कम्पनियों में लाखों रुपये लेकर चाकरी करने वालों की कतार नहीं खड़ी की जाएगी। ऊँचे ओहदों पर जा बैठने वाले रिश्वतखोर अफसर भी यहाँ नहीं बनाए जाएँगे। केवल और केवल जिनका मकसद धन कमाना है, जो वैभव और विलास की जिन्दगी के सपने देखते हैं, ऐसे व्यक्ति यहाँ के लिए अपात्र है, कुपात्र है। किसी भी रूप में उनका यहाँ पर कोई स्थान नहीं है। यह विश्वविद्यालय महामानव बनाने की टकसाल है। यहाँ आदर्शनिष्ठ व्यक्ति ही अध्यापन करेंगे, और ऐसे ही आदर्श परायण देश-धर्म एवं संस्कृति के लिए जीने वाले यहाँ पर अध्ययन करेंगे।

जैसे भी बन पड़े, वैसे पैसा कमाने या किसी तिकड़म से ऊँचा ओहदा हथियाने वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है। जो स्वार्थलिप्सा और अहंकार के उन्माद को पूरा करने के लिए जब भी चाहे नीतियों व आदर्शों को भुला देते हैं, ऐसे लोगों के लिए यहाँ के कपाट बन्द हैं। यह तो ऋषियों की तपोभूमि है। यह तपस्थली उनके लिए है, जो देश, धर्म, संस्कृति व विश्वमानवता के लिए जीना चाहते हैं। इन पंक्तियों के माध्यम से उन्हें विश्वास दिलाया जा रहा है कि उनका भविष्य अति उज्ज्वल है। यहाँ पर सभी संकायों के सारे विषयों के पाठ्यक्रमों के माध्यम से जीवन के विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञ तैयार किए जाएँगे। उन प्रतिभावानों को रोजगार की कमी न रहेगी। यहाँ के प्रतिभाशाली विद्यार्थी पत्रकार, साहित्यकार, आचार्य, चिकित्साशास्त्री, मनोवैज्ञानिक, वैज्ञानिक, विभिन्न प्रकार के प्रबन्धन में विशेषज्ञ, तकनीकी ज्ञान में कुशल, दार्शनिक, अध्यात्मवेत्ता, कवि व लेखक, मनीषी, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् जैसी अनेकानेक ज्ञान धाराओं में वे निपुण होंगे। पर उनका जीवन व चरित्र देव संस्कृति के देवदूत का होगा। वे जहाँ भी रहेंगे, जो भी काम करेंगे, वहाँ पर देश, समाज व विश्व को अपनी विशेषज्ञता का लाभ देते हुए देव संस्कृति के देवदूत की भूमिका का निर्वाह करेंगे।

इस विश्वविद्यालय में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, महामना मदन मोहन मालवीय, देशबन्धु चितरंजन दास, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द के आदर्शों पर चलने वालों की नयी पीढ़ी तैयार करनी है। ऐसे महामानवों को जन्म देना है, जो इक्कीसवीं सदी में नवयुग को जीवन दे सकें। अपने प्राणों के प्रकाश से उज्ज्वल भविष्य को प्रकाशित कर सकें। यहाँ नवयुग के सृजन शिल्पियों के साथ कौडिन्य, कुमारजीव, बोधिधर्म जैसे संस्कृति के प्रसार करने वाले संस्कृति दूतों को भी गढ़ा जाना है। जो देश व विदेश में अपने जीवन व चरित्र से देव संस्कृति का सन्देश प्रसारित कर सकें। प्राचीनकाल के ऋषियुग में धौम्य, शौनक, सूत आदि ऋषियों ने यही किया था। ऐतिहासिक युग के तक्षशिला, नालन्दा आदि विश्वविद्यालयों में यही पुण्य परम्परा थी।

प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रख्यात् विद्वान् प्रो. ए.एस. अल्तेकर, प्रो. आर. सी. मजूमदार एवं विलियम जोन्स ने अपने शोध कार्यों में ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख किया है। इन घटनाओं से ऐतिहासिक युग के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के छात्रों के उज्ज्वल जीवन का पता चलता है। यह सच्चाई उजागर होती है कि ये सभी छात्र अध्ययन काल के बाद इस बात की प्रतिज्ञा करते थे कि वे अपने जीवन व कार्यों से देव संस्कृति के देवदूत होने का दायित्व निभाएँगे। इस दायित्व में उनके सभी सामाजिक, साँस्कृतिक, राष्ट्रीय व मानवीय दायित्व शामिल होते थे।

इस बारे में विक्रमशिला विश्वविद्यालय में आने वाले एक तिब्बती भिक्षु नागात्शे का संस्मरण उपलब्ध हुआ है। उसको तिब्बत के राजा ने अपने यहाँ इस विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों को लाने के लिए भेजा था, जो राज्य में महत्त्वपूर्ण दायित्वों का निर्वाह कर सकें। साँस्कृतिक ज्ञान का विस्तार कर सकें। भिक्षु नागात्शे विश्वविद्यालय में दीक्षान्त के सुअवसर पर उपस्थित हुआ। उस समय कुलपति आचार्य अतिश केन्द्रीय सभागार में सभी छात्रों को सम्बोधित कर रहे थे। अपने सम्बोधन में वे बता रहे थे कि अध्ययन पूरा करके घर वापिस लौट रहे छात्रों से विश्वविद्यालय की क्या अपेक्षाएँ हैं। नागात्शे ने अपने संस्मरण में इस सम्बोधन के कुछ बिन्दुओं का उल्लेख किया है।

उसके अनुसार आचार्य अतिश ने विद्यार्थियों से कहा- 1. आप सब अपने जीवन पर्यन्त इस विश्वविद्यालय के तप और विद्या की गौरवपूर्ण परम्परा का निर्वाह करेंगे। विद्यार्थी जीवन के बाद भी तप से लगाव व विद्या के अनुराग को छोड़ेंगे नहीं। 2. राष्ट्र सबसे महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्र के आह्वान पर बड़े से बड़ा बलिदान करने से हिचकेंगे नहीं। 3. अपने द्वारा अर्जित ज्ञान से राष्ट्र, समाज व विश्व मानवता की सतत् सेवा करेंगे। 4. इस तरह का जीवन जिएँगे कि उनके संपर्क में आने वाले लोग अपने आप ही विश्वविद्यालय के आदर्शों को सीख सकें। 5. प्रत्येक छात्र सारे जीवन भर विश्वविद्यालय के विशेष दूत होने का दायित्व निभाएगा। और इस अनुभूति को प्रगाढ़ बनाए रखेगा कि वह सदा ही इस विश्वविद्यालय का एक अविभाज्य अंग है।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं से भी यही साँस्कृतिक अपेक्षाएँ है। देव संस्कृति को सदा ही उन्हें अपने जीवन में रक्त व प्राण की तरह प्रवाहित बनाए रखना है। यहाँ अध्ययन करके घर वापस लौटने वाले छात्र व छात्रा को यह तथ्य कभी भी विस्मृत नहीं होने देना है कि वे ऋषि चेतना के संवाहक हैं। युग ऋषि परम पूज्य गुरुदेव के प्रतिनिधि हैं। उनके तपस्वी जीवन व साँस्कृतिक चेतना के उत्तराधिकारी हैं। दीक्षान्त समारोह के बाद अपने जीवन की सामाजिक चुनौतियों को स्वीकार करने वाला प्रत्येक विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय का क्रियाशील कीर्तिस्तम्भ होगा। विद्यार्थियों के जीवन में आदर्श निष्ठ की सफलता पर ही विश्वविद्यालय के समूचे तंत्र की सफलता टिकी है। अपने देव परिवार के सारे परिजन इस पुण्य प्रयोजन में भागीदार होंगे।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के स्वरूप व उसकी विभिन्न गतिविधियों की चर्चा पिछले पृष्ठो पर की जा चुकी है। देव परिवार के परिजनों की इस पुण्य प्रयोजन में भागीदारी अनिवार्य है। राष्ट्र, समाज व विश्व के साँस्कृतिक नवोन्मेष के लिए यह समूचा तंत्र खड़ा किया गया है। इसके सभी संकायों एवं सारे पाठ्यक्रमों का लक्ष्य एक यही है। दरअसल ये सारे भगीरथ प्रयत्न युगान्तर प्रस्तुत करने वाली चेतना की ज्ञान गंगा का अवतरण करने के लिए किए जा रहे हैं। यह ज्ञान का महायज्ञ सतयुग की कल्पना को साकार करने वाले नवयुग को धरती पर उतारने के लिए है। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र द्वारा रची गयी नयी सृष्टि की ही भाँति युगऋषि की तप शक्ति के सहारे किया जा रहा नवयुग के नवसृजन का यह कार्य पूरा होकर ही रहेगा। युग शक्ति वेदमाता की समर्थ शक्ति एवं भगवान महाकाल के संकल्प की सफलता में कोई सन्देह नहीं है।

इस विद्या केन्द्र में अपने नाम के अनुरूप ही गुणवत्ता है। ‘देव संस्कृति’ इसलिए- क्योंकि इसमें ऋषियों की साधना से उपजे वे मूल्य और प्रक्रियाएँ हैं, जो मनुष्य को देव बनाने, सुसंस्कृत करने में समर्थ हैं। ‘विश्व’ इसलिए कि इसका लक्ष्य कोई सीमित वर्ग या क्षेत्र नहीं, वरन् समस्त विश्व वसुधा है। ‘विद्यालय’ इसलिए की शिक्षा की स्वल्प उपलब्धि केवल भौतिक प्रगति का द्वार खोलती है, व्यक्तित्व का परिष्कार तो विद्या साधना पर टिका है। यह केन्द्र विद्या की गरिमा को समझाने और जनमानस में उसकी प्राण प्रतिष्ठ करने में निरत रहेगा। इन प्रयत्नों के इस केन्द्र को सच्चे अर्थों में ‘आलय’ कहा जा सकेगा। विश्वविद्यालय के नाम से कितने ही परीक्षा संस्थान और कॉलेजों का समन्वय सम्बन्धित किया जाता है, पर शब्द के अर्थ को सार्थक करने वाले विद्यापीठ कहीं भी दिखाई नहीं देते।

देव संस्कृति को सुविकसित, सुविस्तृत बनाने वाली इस लुप्तप्राय पुण्य परम्परा के पुनर्जागरण का यह अभिनव प्रयास है। इसे युग को बदल देने वाली युगान्तर चेतना का समर्थ केन्द्र भी कहा जा सकता है। देश, समाज व विश्व मानवता को आज जैसी विपन्न स्थिति में भला कब तक पड़े रहने दिया जाय? यह विश्वविद्यालय उसे मानवी गरिमा के उच्च शिखर पर पहुँचा कर ही चैन लेगा। ‘करो या मरो’ यहाँ के प्रत्येक आचार्य, इससे जुड़े प्रबन्ध कर्मी व अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राओं का निश्चय है। इस संकल्प को पूरा करने वाले कुछ कदम उठाए जा चुके हैं, कुछ उठाए जा रहे हैं और कुछ उठाए जाने हैं। जो हो रहा है वह शुभारम्भ श्री गणेश है, जो होने वाला है वह अति विस्तृत- अकल्पनीय है। आज के प्रयासों का प्रत्यक्ष स्वरूप नगण्य है, पर भावी सम्भावनाओं की यदि कोई कल्पना की जा सके तो वे हिमालय से भी ऊँची है और समुद्र से भी गहरी है। इस महासाहस को आज की परिस्थितियों में अद्भुत और अनुपम कहना थोड़ा सा भी गलत नहीं है।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय की सभी गतिविधियों को द्रुतगति से अग्रगामी बनाया जाय, इसके लिए अपने परिजनों का समर्थ सहयोग अनिवार्य है। इसके प्रभावकारी परिणाम हो, इसे व्यापकता व विस्तार मिले, इसके लिए अन्यमनस्क मनःस्थिति व मन्थर गति से काम चलने वाला नहीं है। वरन् आपत्तिकालीन संकट का सामना करने के लिए जिस प्रकार युद्ध स्तरीय दुस्साहस किए जाते हैं, वैसे ही किए जाने हैं। विश्वविद्यालय का वर्तमान स्वरूप गायत्रीकुञ्ज के परिसर में सीमित है। पर भविष्य में उसके केन्द्रों का विस्तार देश और विदेशों में होना है। बालक आज खिलौना जैसा लगता जरूर है, पर भविष्य में उसके प्रौढ़-वयस्क और परिपुष्ट लौह पुरुष के रूप में विकसित होने की पूरी पक्की तैयारी है। यह संस्था इतने छोटे रूप में सीमित न रहेगी, जितनी कि अभी शुरुआत में है। इसके विद्या केन्द्र समस्त राष्ट्र व समूचे विश्व में फैलेंगे। इसका अन्तर्राष्ट्रीय विस्तार होगा।

इसे ऐसा महाविस्तार देने के लिए कोई एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों का समूह पर्याप्त नहीं है। इसके लिए तो अपने देव परिवार के प्रत्येक परिजन को तन-मन-धन से जुटना होगा। ज्ञानयज्ञ के लिए इस प्रज्वलित हो चुके हवन कुण्ड में अपने समय व सम्पदा की आहुति देनी होगी। प्रेरणाएँ व योजनाएँ भले ही शान्तिकुञ्ज में अवतरित होती रही हों, पर उन्हें मूर्तिमान, अग्रगामी व फलवती बनाने में सदा ही अपने इसी परिवार की श्रद्धा, भक्ति, श्रम एवं मनोयोग लगा है। साधनों की आवश्यकता जब-जब पड़ी है, तो उसकी सारी पूर्ति अपने ही परिवार के सदस्यों ने पेट काटकर की है।

कहा उन्हीं से जा रहा है, जो इस समय इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं। वे ही हमारे अपने हैं। उन्हीं पर इस विश्वविद्यालय का दारोमदार है। उन पर ही यहाँ की सारी योजनाओं को पूरा करने की जिम्मेदारी है। धन के बिना सारे काम ठप्प पड़े हों और भावनाशील चुप बैठे रहें, यह कैसे हो सकता है। सवाल विश्वविद्यालय की भविष्यत् योजनाओं को पूरा करने का है। इसके लिए धन चाहिए। अब उसके लिए मात्र सहयोग करके, स्वेच्छा सहयोग के लिए प्रतीक्षा करने में काम चलता दिखाई नहीं देता। अब इस स्तर के अनुदानों को अधिक त्याग और साहस का समावेश करने के लिए आग्रह करना पड़ेगा। क्योंकि साधनों के अभाव में काम की गति में अवरोध उत्पन्न हो रहा है। योजनाएँ बड़ी हैं, इन्हें पूरा करने के लिए बहुत कुछ करना बाकी है।

विश्वविद्यालय को अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करना है। यहाँ देश व विदेश से जो छात्र-छात्राएँ पढ़ने आएँगे, उनके लिए भोजन-आवास की व्यवस्था करनी है। पढ़ाने वाले सुयोग्य आचार्यों के निवास व निर्वाह की व्यवस्था करनी पड़ेगी। इस भारी-भरकम व्यवस्था के लिए अनगिनत कर्मचारियों को जुटाना पड़ेगा। व्यक्तियों के लिए नियोजित किए जाने वाले साधन, सुविधाओं के अलावा अन्य कार्यों की भी अपनी जरूरतें हैं। अनुसन्धान के लिए हर विषय के अनुरूप प्रयोगशालाएँ चाहिए। इसके लिए आवश्यक उपकरण देश व विदेश से मंगाने पड़ेंगे। इन सभी आवश्यक उपकरणों की महंगाई की अलग से चर्चा करना आवश्यक नहीं है। समझदारों के लिए संकेत ही काफी होते हैं। शोध और अन्य कार्यों के लिए अनगिनत आधुनिकतम तकनीक वाले कंप्यूटरों के संजाल की आवश्यकता स्वयं सिद्ध है।

इस सबके अतिरिक्त पुस्तकालय के खर्चे काफी-बढ़े-चढ़े हैं। शोध के लिए संदर्भ ग्रन्थ, पाठ्य विषयों के लिए पुस्तकें कहीं से भी जुटायी जाए, जुटानी ही पड़ेगी। इन सबसे भी कहीं महंगी दरें हैं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं की। जिन्हें जिस किसी तरह पूरा किए बिना चलने वाला नहीं है। सभी विभागों, सभी विषयों में आवश्यकताएँ एक नहीं अनेक हैं। इन्हें कैसे भी पूरा किया जाय, पूरा करना ही पड़ेगा। साधनों के अभाव में अभी यह समूची प्रक्रिया अटक-अटक कर चल पाती है। एक आवश्यकता जैसे-तैसे पूरी होती है, तो दूसरी अटकी पड़ी रह जाती है। समझ में नहीं आता कि कैसे क्या किया जाए?

कार्य का विस्तार जिस भी दिशा में बढ़ता है- उसी दिशा में धन की, साधन की माँग भी उठ खड़ी होती है। ऊपर की पंक्तियों में तो थोड़े से संकेत किए गए हैं, जिनके लिए पैसा चाहिए। लक्ष्य इतना ही नहीं इससे भी कहीं बढ़ा-चढ़ा है। जिसे कार्य रूप में परिणत करने के लिए अनेकानेक शाखा-प्रशाखाएँ सामने आएँगी और वे न जाने क्या-क्या माँग खड़ी करेंगी। अभी तो हाथ में लिए काम ही असहाय स्थिति पड़े हुए, साधनों की माँग कर रहे हैं। भविष्य में यह माँग घटेगी नहीं, बढ़ेगी ही। इसकी पूर्ति के लिए अपने परिवार को ही सहयोग के लिए आना पड़ेगा।

अपने परिजन स्वयं तो सहयोग करें ही। पुण्यवान श्रीमन्त वर्ग को भी इस संस्कृति सेवा के लिए प्रेरित करें। महामना मदन मोहन मालवीय ने द्वार-द्वार जाकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए धन जुटाया था। यही रीति अब हम सबको अपनाना पड़ेगा। अपने गुरु के कार्य के लिए इस पुरुषार्थ हेतु जुटना होगा। विश्वास किया जा रहा है कि पुण्यवान धनिकों के पास संस्कृति संवेदना भी होती है। भले ही आजकल यह थोड़ी सुप्त पड़ गयी हो। हम सबको मिलकर उनकी इस संवेदनशीलता को जगाना होगा। आशा की गयी है कि धनी-मानी लोगों में भामाशाह और जमनालाल बजाज निकलेंगे ही। धन के साथ संवेदना जाग्रत् हो तो देश, धरती, समाज, संस्कृति का दर्द भी होगा। मातृभूमि व धरती माता की छटपटाहट भरी पीड़ा मन को सताएगी, दिल को रुलाएगी। अपने परिवार के सदस्यों से स्वयं संवेदनशील होने और इस पुण्य प्रयोजन के लिए श्रीमन्त वर्ग की संवेदना को जाग्रत् करने की अपेक्षा की गई है। इसके लिए उनकी ओर टकटकी लगाकर देखा जा रहा है।

सरकार से एक नया पैसा सहयोग लेने की बात कभी सोची ही नहीं गयी। जो लोग इन दिनों सरकार का सूत्र संचालन कर रहे हैं, वे अपनी ही कठिनाइयों, परेशानियों से उबर लें यही बहुत है। आर्थिक, सुरक्षात्मक, अपराध नियंत्रण जैसी न जाने कितनी समस्याएँ उनके आगे अपना मुँह पसारे खड़ी है, वे उन्हीं से ठीक ढंग से निबट लें यही बहुत है। राज्याश्रय में रहना लोकसेवी ऋषियों को शोभा भी नहीं देता। ऋषियों के जीवन का भगवान पर ही निर्भर रहना ठीक है। देश व विश्व के सभी भावनाशील परिजनों व पुण्यवान श्रीमन्तों को उसी का स्वरूप माना गया है।

घुमा-फिरा कर आशा का केन्द्र अपने गायत्री परिवार के परिजनों के साथ ऐसे पुण्यात्मा जन ही हैं। अखण्ड ज्योति को इस समय थामे हुए हाथों से ही प्रकाश के दान की अपेक्षा की गई है। इन पंक्तियों के सभी पाठक चाहे वे कोई भी क्यों न हों, अपने अपनत्व के घेरे में हैं। सारी आशाएँ उन्हीं पर टिकी हैं। उन्हीं से अधिक त्याग करने की, ज्यादा उदारता बरतने की बात कही जा रही है। जिनमें कसक और टीस को समझ सकने लायक संवेदना है, उन्हीं को समझाया जा रहा है। निष्ठुरता ने तो भला कब किसकी सुनी है? संवेदनशील समझदारों से यह उम्मीद जतायी गयी है कि वे अपने आवश्यक कामों को कुछ समय के लिए रोककर भी इस पुण्य प्रयोजन में अनिवार्य रूप से भागीदार बनें।

जिनकी स्थिति गुजारे से आगे बढ़कर कुछ बचत करने लायक है, वे उस सौभाग्य का श्रेष्ठतम उपयोग करके अपने को सच्चे अर्थों में भाग्यवान् बना सकते हैं। चक्कवेण, बाजिश्रवा आदि के अगणित उदाहरण भारतीय संस्कृति के आकाश में उज्ज्वल नक्षत्र की भाँति चमक रहे हैं। वे अति आवश्यक खर्च में से जो कुछ बचाते थे, उसे समय-समय पर सर्वमेध यज्ञ के रूप में पूरी तरह से खाली कर देते थे। शिवि, हरिश्चन्द्र, मुद्गल के प्रसंग भी ऐसे ही हैं। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर अपने अच्छे वेतन का एक चौथाई अंश ही खर्च में लाते थे और तीन चौथाई विद्यादान के लिए समर्पित करते थे। इन परम्पराओं को कथा वार्ता की रोचक चर्चा का विषय बनाकर हवा में नहीं उड़ा देना चाहिए, वरन् कोशिश यह होनी चाहिए कि उन्हें जीवित भी रखा जा सके। धर्म का बखान ही नहीं होना चाहिए, उसे कर्म में स्थान भी मिलना चाहिए।

कंजूसी-कृपणता की वृत्ति यदि उदारता में नहीं बदल सकी तो फिर अध्यात्म के आदर्शवाद का सारा ढाँचा मात्र विडम्बना बनकर रह जाएगा। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के द्वारा जिस तत्त्वदर्शन को हम सब विश्वव्यापी बनाना चाहते हैं, उसके उदाहरण हमें अपनों में से ही प्रस्तुत करने पड़ेंगे। वस्तुतः वह कार्यरूप में परिणत हुई आदर्शवादिता ही विश्वविद्यालय की जीवन ऊर्जा बनेगी। परिजनों की प्राण चेतना ही यहाँ से प्रेरणा बनकर लोगों को प्रभावित कर सकेगी। उपदेशों में नहीं उदाहरणों में दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति होती है। युग की नयी सृष्टि के लिए संकल्पित विश्वामित्र को आज फिर से हरिश्चंद्र चाहिए। जो विश्व के साँस्कृतिक नवोन्मेष के लिए अपने व अपने परिवार की साधन सम्पदा लुटा सके।

महान् आदर्शों की पूर्ति के लिए किया गया तप, त्याग, सर्वस्व दान व आत्म बलिदान ही वह आधार है, जिसके सहारे विश्वविद्यालय के आदर्श व उद्देश्य पूरे हो सकते हैं। इस विश्वविद्यालय की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने परिवार के परिजनों की ओर बड़ी आशा भरी नजरों से निहारा जा रहा है। अब बारी उनके आगे बढ़ने की और कुछ कर गुजरने की है। जो अपने धन और साधन से इस महत्कार्य में भागीदार होंगे, भगवान् महाकाल उन्हें अपने सहायक होने का गौरव प्रदान करेंगे। देव संस्कृति के आकाश में उनकी उज्ज्वल आभा सदा-सदा प्रकाशित रहेगी।

गायत्री जयंती के इन पुण्य पलों में युग शक्ति के प्रेरक प्रवाह से जन-मन अभिसिंचित है। भावनाएँ उन भगीरथ को ढूंढ़ रही हैं, जिनके महातप से गायत्री की प्रकाश धाराएँ बहीं। महाशक्ति जिनके प्रचण्ड तप से प्रसन्न होकर इस युग में अवतरित हुई। वेदमाता के उन वरदपुत्र को भावनाएँ विकल हो खोज रहीं हैं। आज युग के उन तप सूर्य की यादें उन्हीं की सहस्र रश्मियों की तरह मन-अन्तःकरण को घेरे हैं। यादों के इस उजाले में वर्ष 1990 की गायत्री जयंती की भावानुभूति प्रकाशित हो उठी है। जब एक युग का पटाक्षेप हुआ था। प्रभु साकार से निराकार हो गए थे। भावमय भगवान अपने भक्तों की भावनाओं में विलीन हुए थे। उस दिन न जाने कितनी भावनाएँ उमगी थीं, तड़पी थीं, छलकी थीं, बिखरी थीं। इन्हें बटोरने वाले, संजोने वाले अन्तःकरण के स्वामी इन्हीं भावनाओं में ही कहीं अन्तर्ध्यान हो गए थे।

सब कुछ प्रभु की पूर्व नियोजित योजना थी। महीनों पहले उन्होंने इसके संकेत दे दिए थे। इसी वर्ष पिछली बसन्त में उन्होंने सब को बुलाकर अपने मन की बात कह दी थी। दूर-दूर से अनगिनत शिष्यों-भक्तों ने आकर उनके चरणों में अपनी व्याकुल भावनाएँ उड़ेली थी। सार्वजनिक भेंट और मिलन का यही अन्तिम उपक्रम था। तब से लेकर लगातार सभी के मनो में ऊहा-पोह थी। सब के सब व्याकुल और बेचैन थे। शान्तिकुञ्ज के परिसर में ही नहीं, शान्तिकुञ्ज से बाहर भी सबका यही हाल था। भारी असमंजस था, अनेकों मनों में प्रश्न उठते थे, क्या गुरुदेव सचमुच ही शरीर छोड़ देंगे? अंतर्मन की गहराइयों से जवाब उठता था- हाँ। पर ऊपर का मोहग्रस्त मन थोड़ा अकुलाकर सोचता, हो सकता है सर्वसमर्थ गुरुदेव अपने भक्तों पर कृपा कर ही दें और अपना देह वसन न छोड़ें।

लेकिन मोह के कमजोर तन्तुओं से भला भगवत्योजनाएँ कब बंधी हैं? विराट् भी भला कहीं छुद्र बंधनों में बंधा करता है। गायत्री जयंती से एक दिन पहले रात में, यानि कि 1 जून 1990 की रात में किसी ने स्वप्न देखा कि हिमाच्छादित हिमालय के श्वेत हिमशिखरों पर सूर्य उदय हो रहा है। प्रातः के इस सूर्य की स्वर्णिम किरणों से बरसते सुवर्ण से सारा हिमालय स्वर्णिम आभा से भर जाता है। तभी अचानक परम पूज्य गुरुदेव हिमालय पर नजर आते हैं, एकदम स्वस्थ प्रसन्न। उनकी तेजस्विता की प्रदीप्ति कुछ अधिक ही प्रखर दिखाई देती है। आकाश में चमक रहे सूर्यमण्डल में माता गायत्री की कमलासन पर बैठी दिव्य मूर्ति झलकने लगती है। एक अपूर्व मुस्कान है माँ के चेहरे पर। वह कोई संकेत करती हैं और परम पूज्य गुरुदेव सूर्य की किरणों के साथ ऊपर उठते हुए माता गायत्री के पास पहुँच जाते हैं। थोड़ी देर तक गुरुदेव की दिव्य छवि माता के हृदय में हल्की सी दिखती है। फिर वेदमाता गायत्री एवं गुरुदेव सूर्यमण्डल में समा जाते हैं। सूर्य किरणों से उनकी चेतना झरती रहती है।

देखने वाले का यह स्वप्न सुबह की दिनचर्या में विलीन हो गया। उसी दिन ब्रह्मवर्चस् के एक कार्यकर्त्ता कृष्णकान्त तिवारी के भाई अजय तिवारी की शादी थी। वन्दनीया माताजी ने दो-एक दिन पहले से ही निर्देश दिया था कि शादी सुबह-सुबह ही निबटा ली जाय। सामान्य क्रम में शान्तिकुञ्ज के यज्ञमण्डप में शादियाँ दस बजे प्रारम्भ होती हैं। लेकिन उस दिन के लिए माताजी का आदेश कुछ अलग था। गायत्री जयंती के दिन यह शादी काफी सुबह सम्पन्न हुई। अन्य कार्यक्रम भी यथावत सम्पन्न हो रहे थे। वन्दनीया माता जी प्रवचन करने के लिए प्रवचन मंच पर पधारी थी। प्रवचन से पहले संगीत प्रस्तुत करने वाले कार्यकर्त्ता जगन्माता गायत्री की महिमा का भक्ति गान कर रहे थे- ‘माँ तेरे चरणों में हम शीश झुकाते हैं’, गीत की कड़ियाँ समाप्त हुई। माता जी की भावमुद्रा में हल्के से परिवर्तन झलके। ऐसा लगा कि एक पल के लिए वह अपनी अन्तर्चेतना के किसी गहरे अहसास में खो गयीं। लेकिन दूसरे ही पल उनकी वाणी से जीवन सुधा छलकने लगी।

प्रवचन के बाद प्रणाम का क्रम चलना था। माँ अपने आसन पर अपने बच्चों को ढेर सारा प्यार और आशीष बाँटने के लिए बैठ गयीं। प्रणाम की पंक्ति चल रही थी, माता जी स्थिर बैठी थी। उनके समूचे अस्तित्त्व से वात्सल्य-संवेदना झर रही थी। प्रणाम की पंक्ति में प्रणाम करते हुए उन्होंने एक कार्यकर्त्ता से कहा- ‘बेटा! खाना खा लेना।’ उसके ‘जी माता जी!’ कहने पर वह बोलीं- ‘जी माताजी नहीं? तू खाना जल्दी अभी तुरन्त खा लेना, यह मेरा आदेश है।’ सुनने वाला फिर से ‘जी’ कहकर थोड़ा अचकचाया, वह सोच में पड़ गया कि आज माता जी जल्दी और तुरन्त खाने के लिए क्यों कह रही हैं। पर वह माँ के आदेश को शिरोधार्य कर नीचे उतर गया।

प्रणाम समाप्त होने के कुछ ही क्षणों बाद शान्तिकुञ्ज एवं ब्रह्मवर्चस का कण-कण, यहाँ निवास करने वाले सभी कार्यकर्त्ताओं का तन-मन-जीवन बिलख उठा। अब सभी को बता दिया गया था कि गुरुदेव ने देह छोड़ दी है। अनगिन शिष्य सन्तानों एवं भक्तों के प्रिय प्रभु अब देहातीत हो गए हैं। काल के अनुरोध पर भगवान् महाकाल ने अपनी लोक-लीला का संवरण कर लिया है। जिसने भी, जहाँ पर यह खबर सुनी, वह वहीं पर अवाक् खड़ा रह गया। एक पल के लिए हर कोई निःशब्द, निस्पन्द हो गया। सब का जीवन रस जैसे निचुड़ गया। थके पाँव उठते ही न थे। लेकिन उन्हें उठना तो था ही। असह्य वेदना से भीगे जन परम पूज्य गुरुदेव के अन्तिम दर्शनों के लिए चल पड़े।

शान्तिकुञ्ज के कम्प्यूटर कक्ष के ऊपर जो बड़ा हाल है, वहीं पर गुरुदेव का पार्थिव शरीर रखा गया था। महायोगी की महत् चेतना का दिव्य आवास रही, उनकी देह आज चेतना शून्य थी। पास बैठी हुई वन्दनीया माताजी एवं उनके परिवार के सभी स्वजन वेदना से विकल और व्याकुल थे। माताजी की अन्तर्चेतना को तो प्रातः प्रवचन में ही गुरुदेव के देह छोड़ने की बात पता थी। तब से लेकर अब तक वह अपने कर्त्तव्यों में लीन थीं। सजल श्रद्धा की सजलता जैसे हिमवत् हो गयी थी। पर अब वह महावियोग के ताप से पिघल रही थी। अन्तिम प्रणाम भी समाप्त हो गया। परन्तु कुछ लोग अभी हॉल में रुके थे। प्रणाम करके नीचे उतर रहे एक कार्यकर्त्ता को तो माता जी ने ही इशारे से रोक लिया था। परम पूज्य गुरुदेव की पार्थिव देह को उठाते समय माता जी ने उससे भीगे स्वरों में कहा- बेटा! तू भी कन्धा लगा ले। माँ के इन स्वरों को सुनकर उसका रोम-रोम कह उठा- धन्य हो माँ! वेदना के इस विकल घड़ी में भी तुम्हें अपने बच्चों की भावनाओं का ध्यान है।

सजल श्रद्धा एवं प्रखर प्रज्ञा के पास आज जहाँ चबूतरा बना है, तब वहाँ खाली जगह थी। वहीं चिता के महायज्ञ की वेदिका सजायी गयी थी। ठीक सामने स्वागत कक्ष के पास माता जी तख्त पर बिछाए गए आसन पर बैठी थीं। पास ही उनके परिवार के अन्य सभी सदस्य खड़े थे। आस-पास कार्यकर्त्ताओं की भारी भीड़ थी। सभी की वाणी मौन थी, पर हृदय मुखर थे। हर आँख अश्रु का निर्झर बनी हुई थी। आसमान पर भगवान् सूर्य इस दृश्य के साक्षी बने हुए थे। कण-कण में बिखरी माता गायत्री की समस्त चेतनता उस दिन उसी स्थल पर सघनित हो गयी थी। भगवान सविता देव एवं उनकी अभिन्न शक्ति माता गायत्री की उपस्थिति में गायत्री जयंती के दिन यज्ञ पुरुष गुरुदेव अपने जीवन की अन्तिम आहुति दे रहे थे। यह उनके जीवन यज्ञ की पूर्णाहुति थी।

आज वह अपने शरीर को भी इदं न मम् कहते हुए यज्ञवेदी में अर्पित कर चुके थे। यज्ञ ज्वालाएँ धधकी। अग्निदेव अपने समूचे तेज के साथ प्रकट हुए। वातावरण में अनेकों की अनेक सिसकियाँ एक साथ मन्द्र रव के साथ विलीन हुई। समूचे परिसर का कण-कण और भी अधिक करुणार्द्र हो गया, सभी विह्वल खड़े थे। परम तपस्वी गुरुदेव का तेज अग्नि और सूर्य से मिल रहा था। सूर्य की सहस्रों रश्मियों से उनकी चेतना के स्वर झर रहे थे। कुछ ऐसा लग रहा था कि जैसे वह स्वयं कह रहे हों- तुम सब परेशान न हो, मैं कहीं भी गया नहीं हूँ, यहीं पर हूँ और यहीं पर रहूँगा। मैंने तो केवल पुरानी पड़ गयी देह को छोड़ा है, मेरी चेतना तो यहीं पर है। वह युगों-युगों तक यहीं रहकर यहाँ रहने वालों को- यहाँ आने वालों को प्रेरणा व प्रकाश देती रहेगी। मैं तो बस साकार से निराकार हुआ हूँ, पहचान सको तो मुझे शान्तिकुञ्ज के क्रियाकलापों में पहचानो। ढूंढ़ सको तो मुझे अपने हृदय की भावनाओं में ढूंढ़ो। वर्ष 1990 की गायत्री जयंती में साकार से निराकार हुए प्रभु के इन स्वरों की सार्थकता इस गायत्री जयंती की पुण्य बेला में प्रकट हो रही है। हम सबको उन्हें शान्तिकुञ्ज की गतिविधियों में पाना है, और स्वयं को इनके विस्तार के लिए अर्पित करना है।

*समाप्त*