वह रात बड़ी भयावह थी। पहाड़ों के ऊपर तूफानी घटाएँ घिर आयीं थीं। बिजली कड़कने लगी। बरसात इतनी हुई कि नाले भर गए और दरिया से जा मिले। दरिया नीचे घाटियों में होता हुआ। तेजी से बहने लगा। उसके तेज बहाव ने हर चीज को आक्रान्त कर दिया। इसी उथल-पुथल में एक चट्टा से एक बहुत बड़ा पत्थर टूट गया। वह कुछ दूर भयभीत सा तंग पहाड़ी सड़क के ऊपर लटका रहा। फिर एक भयानक आवाज के साथ सड़क के बीचों-बीच आ गिरा।
रात बीती, सुबह हुई। आकाश पर चमकीला सूर्य निकला। ओस की बूँदें पेड़ के पत्तों पर जगमगाने लगीं। घास जो दब गयी थी, फिर सिर उठाने लगी। इतने में गाँव से एक छकड़ा प्रकट हुआ। उसे नुकीले सींगों वाले दो काले बैल खींच रहे थे। छकड़े के अन्दर एक आदमी बैठा अपनी धुन में कोई पहाड़ी लोकगीत गा रहा था। वह गाँव का दुकानदार था। जो अपनी दुकान का समान खरीदने शहर जा रहा था। मोड़ पर पहुँचकर, जहाँ बड़ा पत्थर पड़ा हुआ था, उसने छकड़ा रोक लिया। दरअसल पत्थर ने पूरा रास्ता रोक रखा था। बांई ओर दरिया बह रहा था और दांई ओर ऊँची चट्टानें अपना सीना ताने खड़ी थीं।
दुकानदार पहले तो छकड़े में बैठा थोड़ी देर सिर खुजाता रहा। फिर नीचे उतरकर पत्थर के पास गया। पत्थर को हटाने के लिए उसने कई तरकीब अजमाई, पर पत्थर हिला तक नहीं। यह मुझसे नहीं हटेगा। उसने सोचा- किसी ऐसे आदमी की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, जो मुझसे ज्यादा शक्तिशाली हो। यह सोचकर वह धरती पर बैठ गया। उसने एक लकड़ी उठायी और उससे धरती पर फूल-पत्तियाँ बनाने लगा।
थोड़ी देर बाद एक दूसरा छकड़ा वहाँ आ पहुँचा। उस पर जलाने की लकड़ियाँ लदी हुई थी। लकड़ी वाले ने दुकानदार से कहा- अरे भाई, तुमने अपना छकड़ा सड़क के बीचों-बीच क्यों खड़ा कर रखा है? इसे एक तरफ करो, ताकि मैं गुजर सकूँ। मुझे जल्दी है। दुकानदार बोला- तुम्हें जल्दी है, तो पहले यहाँ आकर यह चट्टान हटाओ।
कैसी चट्टान? उसने हैरत में पूछा। यहाँ आओ और देखो। छकड़ों के आगे पड़ी हुई है। लकड़ी वाले नीचे उतरकर पत्थर को देखा और फिर अपनी आस्तीनें समेट कर पत्थर को दाएँ-बाएँ हिलाने की कोशिश करने लगा। पर पत्थर नहीं हिला। यह अपने वश की बात नहीं, वह सिर हिलाता हुआ बोला- हमें किसी शक्तिशाली आदमी की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। वही हमारा रास्ता साफ करेगा।
लकड़ीवाला दुकानदार के पास में जाकर बैठ गया। अभी ज्यादा देर नहीं हुई थी कि एक घोड़ागाड़ी वाला वहाँ आ पहुँचा। वह काफी बूढ़ा था, उसकी कमर झुकी हुई थी। वह काफी बेदर्दी से घोड़े पर चाबुक बरसा रहा था। जब उसे पता चला कि दोनों छकड़े यहाँ क्यों खड़े हुए हैं, तो वह अनाप-शनाप बकता हुआ अपनी गाड़ी से उतरा और थोड़ी देर पत्थर के इर्द-गिर्द चहलकदमी की, फिर चुपचाप उन दोनों के पास बैठ गया।
थोड़ी देर बाद दो छकड़े और आए। उन पर कम्बल और मिट्टी के बरतन लदे हुए थे। उनके मालिकों को बाजार पहुँचने की जल्दी थी। जब उन्हें पता चला कि रास्ता बन्द है तो वे बड़े परेशान हुए। उनमें से एक बड़ा क्रोधी था। वह पत्थर को सजा देने के लिए उस पर चाबुक बरसाने लगा। समय बीतता रहा। दोपहर हो गयी। अब वहाँ एक पूरा काफिला जमा हो चुका था। वह एक के बाद एक अपनी शक्ति परखते रहे, पर उनमें से कोई भी पत्थर को न हिला सका।
इतने में गेरुआ वस्त्र पहने एक संन्यासी उधर से गुजरे। आस-पास के पहाड़ी गाँवों के लोग उन्हें पहचानते थे। सभी ने श्रद्धा सहित उन्हें प्रणाम किया। ये कोई और नहीं विश्ववन्द्य स्वामी विवेकानन्द के गुरुभाई एवं श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी अखंडानंद थे। वह इन दिनों अपनी एकान्त साधना के लिए यहाँ आए हुए थे। जब उन्होंने इन सबको वहाँ खड़े हुए, परेशान देखा, तो बोले- तुम लोग अपनी बुद्धि का उपयोग क्यों नहीं करते।
महाराज, हमें बुद्धि की नहीं शक्ति की आवश्यकता है। उनमें से एक व्यक्ति ने कहा, हम सब पत्थर को हटाने का प्रयत्न कर चुके हैं। पर इसे हटाना तो दूर हम लोग हिला भी नहीं सके।
उसका उत्तर सुनकर अखण्डानन्द जी महाराज थोड़ा हंसे और बोले- अच्छा अब तुम लोग सब मिलकर मेरे साथ आओ। उनकी बात मानकर सब लोग एक साथ आ जुटे। स्वामी जी भी उनके साथ थे। थोड़ी ही देर में पत्थर नीचे लुढ़कता हुआ भयानक आवाज के साथ गहरे खड्ड में गिर गया और टुकड़े-टुकड़े हो गया।
सबने इसे स्वामी जी का चमत्कार माना। उनकी भोली-भाली बातें सुनकर वह हंसने लगे और फिर उन्होंने उन सबसे कहा- यह चमत्कार तो जरूर है, पर मेरा नहीं, तुम सबकी सम्मिलित शक्ति का है। समस्याएँ घर-परिवार की हो या गाँव-समाज की अथवा फिर राष्ट्र एवं विश्व की। सब लोग मिल-जुलकर प्रयास करेंगे, तो सार्थक समाधान मिलने में देर नहीं लगेगी। स्वामी जी की बातें सुनकर लगा कि उनके छकड़ों के गुजरने के लिए ही नहीं जिन्दगी के गुजरने के लिए भी रास्ता साफ हो गया है। उन्हें अब समझ में आ गया था, कि समस्याओं को सुलझाने के लिए जरूरत किसी मसीहा की नहीं, बल्कि सम्मिलित प्रयास की है- एक जुट होकर किए जाने वाले पुरुषार्थ की है।
सत्य की किरण भी पर्याप्त है। ग्रन्थों के अम्बार अपनी लाख कोशिशों के बावजूद जो नहीं कर पाते, सत्य की एक झलक आसानी से वह कर दिखाती है। अंधेरे में उजाला करने के लिए प्रकाश के ऊपर लिखे गए बड़े-बड़े ग्रन्थ किसी काम के नहीं, एक मिट्टी का छोटा सा दीया जलाना ही काफी है।
स्वामी विवेकानन्द की वार्ताओं और व्याख्यानों में एक अपढ़ बूढ़ा निरन्तर देखा जाता था। देखने वालों को हैरानी हुई। उनमें से कइयों ने सोचा कि भला एक अपढ़ गरीब वृद्ध व्यक्ति स्वामी जी की गम्भीर वेदान्त चर्चा को भला क्या समझता होगा। एक ने आखिर में उससे पूछ ही लिया- बाबा, तुम्हारी समझ में कुछ आता भी है या फिर यूँ ही अपना समय बर्बाद करते रहते हो?
उस गरीब वृद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया, वह अद्भुत था। उसने कहा- जो बातें मुझे नहीं समझ में आतीं, अब उनके बारे में मैं क्या बताऊँ। लेकिन एक बात मैं बखूबी समझ गया हूँ और पता नहीं दूसरे लोग उसे समझे भी हैं अथवा नहीं। फिर मैं तो अपढ़-गंवार हूँ, बूढ़ा भी हूँ, मुझे बहुत सारी बातों से प्रयोजन भी क्या? मेरे लिए तो बस वह एक ही बात काफी है। और उस बात ने मेरा सारा जीवन ही बदल दिया है। अब न तो मुझे भय डराता है और न चिन्ताएँ सताती हैं। न तो अतीत की कोई कसक है, न वर्तमान की कोई परेशानी और न ही भविष्य की कोई चिन्ता बची है। बस आनन्द ही आनन्द है।
लोगों की जिज्ञासा बढ़ी- आखिर वह बात है क्या? उस वृद्ध व्यक्ति ने बताया, वह बात है कि मैं भी प्रभु से दूर नहीं हूँ। एक दरिद्र अज्ञानी बूढ़े से भी प्रभु दूर नहीं हैं। प्रभु निकट हैं- निकट ही नहीं स्वयं में हैं- इतने निकट कि हम दोनों बस एक ही हैं। यह छोटा सा सत्य मेरी नजर में आ गया है। और अब मैं नहीं समझता कि इससे भी बड़ा कोई सच हो सकता है।
सच भी यही है, जीवन बहुत तथ्य जानने से नहीं, बल्कि सत्य की एक छोटी सी अनुभूति से ही बदल जाता है। जो बहुत जानने में लगे रहते हैं, वे प्रायः सत्य की उस छोटी सी चिंगारी को गवाँ बैठते हैं, जो प्रकाश और परिवर्तन लाती है। और जिससे जीवन में बोध के नए आयाम खुलते हैं।
‘अध्यात्म’ शब्द बहुप्रचलित एवं बहुप्रचारित है। लेकिन इसके अर्थ में गहनता है, गुह्यता है, रहस्यमयता है। इसे वही जान पाते हैं, जो उच्चतर प्रज्ञा सम्पन्न और कठोर साधना में रत हैं। व्याकरण की दृष्टि से देखें तो आत्मानि-इति विग्रह के द्वारा अव्ययीभाव समास करके ‘अध्यात्मम्’ शब्द की निष्पत्ति होती है। जिसका अर्थ हुआ- आत्मा में स्थित। आत्मन् शब्द की सप्तमी विभक्ति के एक वचन में ‘आत्मनि’ बनता है और अव्यय का ‘इति’ शब्द- ‘अधि’ शब्द के रूप में सामासिक सूत्र में परिवर्तित होता है। इसका स्पष्ट अर्थ होता है- ‘आत्मा में स्थित’। इस तरह ‘अध्यात्म’ शब्द के मूल में आत्मन् शब्द नित्य पुल्लिंग है, जिसका रूप है ‘आत्मा’।
अमरकोष के नानार्थवर्ग में 144वें श्लोक के अनुसार अध्यात्म शब्द का अर्थ सूक्ष्म भी है। यहाँ कहा गया है- ‘सूक्ष्ममध्यात्ममपि’। यह सूक्ष्म शब्द पाणिनि व्याकरणानुसार- ‘सुच पैशून्ये’ धातु से उणादिगण के ‘सूचेः स्मन्’ (सूत्र 4/177) से बनता है। मेदिनी कोष में इसका अर्थ दिया गया है ‘सूक्ष्मं स्यात् कैतवेऽध्यामे’। इस तरह अध्यात्म शब्द सूक्ष्म का पर्यायवाची शब्द है। अतएव इसे रहस्यमय भी कहा जा सकता है। आत्मा और रहस्यमयता अध्यात्म के दोनों ही अर्थ परस्पर घुले-मिले हैं। दोनों ही एक-दूसरे का बोध कराते हैं। और यह बोध व्याकरण के ज्ञान से नहीं तप साधना से ही सम्भव है।
इसके साधन-स्वरूप एवं फल की उच्च स्थिति के कारण ही श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् ने कहा कि ‘अध्यात्म-विद्या विद्यानाँवादः प्रवदतामहम्’ (10/32) अर्थात् विद्याओं में मैं अध्यात्म विद्या हूँ और विवादों में यानि कि शास्त्रार्थ में मैं वाद हूँ। भगवान् का बड़ा गम्भीर एवं सारगर्भित वचन है यह। विद्याएँ चौदह हैं और वाद तीन है। प्रथम ‘जल्पवाद’, द्वितीय ‘वितण्डावाद’ और तृतीय केवल ‘वाद’। जल्पवाद में अपनी युक्ति, अपने तर्क से दूसरे पक्ष का खण्डन करके अपने पक्ष को दृढ़ करना होता है। वितण्डावाद में अपना कोई पक्ष नहीं रखकर केवल दूसरे पक्ष का खण्डन ही खण्डन जबर्दस्ती करना है। और ‘वाद’ में बिना किसी पक्ष के तत्त्व निर्णय परस्पर विचार-विनिमय से किया जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण का कथन बड़ा ही अनुभूतिपूर्ण है। वह स्वयं को विद्याओं में अध्यात्म विद्या और तीन वादों में विशुद्ध ‘वाद’ बताकर दोनों की एकरूपता सिद्ध कर देते हैं। उनकी वाणी का सार यही है कि जितनी भी विद्याएँ हैं, उनमें चरम बिन्दु अध्यात्म विद्या है और वादों में अध्यात्मवाद ही तत्त्वज्ञान को देने वाला है। साथ ही ये दोनों अलग-अलग नहीं, बल्कि एक हैं। अध्यात्मवादी ही अध्यात्मविद्या का सच्चा जिज्ञासु होता है। इसी तरह अध्यात्म विद्या का साधक ही अध्यात्मवाद के सूत्रों और निष्कर्षों को जानने में सफल होता है।
‘अध्यात्म’ शब्द की इस शृंखला में एक शब्द और भी हैं- आध्यात्मिक। हालाँकि इसके साथ ही दो शब्द और भी हैं, जो प्रयोग में एक ही साथ लाए जाते हैं- आधिदैविक एवं आधिभौतिक। वस्तुतः इन तीनों शब्दों का प्रयोग एक ही साथ करने का प्रचलन है- आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक। जिन्हें संक्षेप में दैहिक, दैविक एवं भौतिक भी कहा जाता है। इन तीनों शब्दों में आध्यात्मिक शब्द का विश्लेषण कुछ यूँ है। आत्मानम् अधिकृत्य भवम्- आध्यात्मिकम्। अधि उपसर्ग आत्मन् शब्द इज-इकृ प्रत्यय से आध्यात्मिक शब्द बनता है। इसी तरह देव शब्द जोड़कर आधिदैविक और भूत शब्द जोड़कर आधिभौतिक शब्द बनते हैं। दुःखों के ये तीन ही प्रकार हैं। प्रथम आध्यात्मिक दुःख- शारीरिक रोगों से होने वाले और काम, क्रोध आदि मानसिक विकारों से होने वाले। यक्ष, राक्षस, नवग्रह आदि से मिलने वाली पीड़ा को आधिदैविक दुःख कहते हैं। इसी तरह प्राणियों एवं परिस्थितियों से उपजने वाले दुःखों को आधिभौतिक दुःख कहा जाता है। इन्हें ही संक्षेप में दैहिक, दैविक एवं भौतिक ‘त्रिताप’ कहा जाता है। जिनसे समूची मानव प्रजाति संतप्त और संत्रस्त है।
इस त्रिताप से निवारण के लिए अध्यात्म ज्ञान ही एकमात्र कारगर उपाय है। साँख्य तत्त्व कौमुदी में इस सम्बन्ध में कहा गया है-
दुःखत्रयामिद्यातात् जिज्ञासा तद्वद्यातके हेतौ। दृष्ट साऽयार्थाचेत नैकात्तात्यन्तन्तोऽभावात्॥
अर्थात्- दुःखत्रय-तापत्रय के विनाश के लिए उपाय की जिज्ञासा होती है। यदि दृष्ट उपाय से, जो सामान्य लौकिक उपाय हैं। उनके इनका नाश दिखाई भी पड़े, तो भी वह स्थायी नहीं है। ये सभी लौकिक उपाय अस्थायी और क्षणिक हैं। इनके विनाश के लिए अध्यात्म विद्या का ही आश्रय लेना चाहिए। यही वह असरकारक उपाय है, जिससे सभी दुःख हमेशा-हमेशा के लिए छूट जाते हैं और जीवन आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है।
अध्यात्म और उससे सम्बन्धित शब्दों का विश्लेषण एवं व्याख्या करने के साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि उसका व्यावहारिक स्वरूप क्या है? इसे कैसे और किस तरह पाया और अपनाया जा सकता है। अन्यथा वही बात होगी जैसे कोई व्याकरण का पण्डित मिठाई के तीन शब्दों में उलझा रहे, उनकी व्याख्या-मीमाँसा करता रहे और मिठाई के स्वाद से वंचित हो। क्योंकि मिठाई शब्द के अक्षरों एवं मात्राओं को जोड़ घटाव करना एक बात है और आराम से बैठकर मिठाई खाना और उसकी स्वादानुभूति में निमग्न हो जाना सर्वथा अलग सत्य है। ठीक यही बात अध्यात्म शब्द और उससे होने वाली अनुभूति के विषय में है।
अध्यात्म-अनुभूति की यही प्रक्रिया बताते हुए भगवान् श्रीकृष्ण- श्रीमद्भगवद्गीता में कहते हैं-
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थित प्रज्ञ सादोच्यते॥ (2/55)
सभी कामनाओं-वासनाओं एवं इच्छाओं को त्यागकर ‘आत्मा’ में ही आत्मा द्वारा सन्तुष्ट होना स्थित प्रज्ञ है। यह वाक्य जितना लघु है, भाव उतना ही विराट् है। यहाँ आत्मा का अर्थ अपनी अस्तित्त्व-सत्ता है। जो सदा ही अविचल, शाश्वत और अनश्वर है। ऐसी आत्मा-जो परमात्मा ही है में शरीर स्थित आत्मा जो परमात्मा में ही है, उसमें उसी आत्मज्ञान से तृप्त होना ही अध्यात्म की अनुभूति है। यही जीवन का परम लक्ष्य है।
दर्शनशास्त्रों एवं दार्शनिक ग्रन्थों में इस सत्य को महाकाश एवं घटाकाश के उदाहरण से समझाया गया है। आकाश अनन्त है, शून्य ही आकाश है। एक घड़े के अन्दर का शून्य भी आकाश है। हाँ यह सीमित जरूर लगता है। अब यदि इस घड़े को फोड़ दें तो उसके अन्दर का शून्य कहाँ गया? बस वह महाशून्य में विलीन हो गया। पहले भी दरअसल देखने वालों को भ्रम हो रहा था कि घट में आकाश है। सच तो यह था कि आकाश में घट था। हाँ घट के नष्ट होते ही यह भ्रम टूट गया। इसी तरह सर्वव्यापी परमात्मा में हम सब हैं। अपने अहं के कारण ही अलगाव का भ्रम हो रहा है। इस अहं का घट टूटा कि घटाकाश-महाकाश में विलीन हुआ। यही भगवान् के शब्दों में आत्मा में ही आत्मा से सन्तुष्ट होना है।
इसी ज्ञान को इसी बोध को भगवद्गीता में कहा गया है-
‘अध्यात्मज्ञान नित्यत्वं तत्त्वज्ञानर्थ दर्शनम्’ (13/11)।
अर्थात्- परमात्म तत्त्व के सिवाय संसार की स्वतंत्र सत्ता-अस्तित्व है ही नहीं। इसी का नित्य मनन करने से तत्त्वज्ञान का दर्शन-अनुभव स्वतः स्फूर्त होता है। इसी रहस्य को आगे श्लोक- ‘ज्ञेयं यत् तत प्रवक्ष्यामि-यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते, अनादिमत्परंब्रह्म न सत तन्नासदुच्यते’ (13/12)। अर्थात्- ज्ञेय है, जानने योग्य है उसे मैं (श्रीकृष्ण) विस्तार से कह रहा हूँ- जिसे (अध्यात्मज्ञान को) जानकर मनुष्य अमरता का अनुभव करता है। वह न सत् है, न असत् है। इस परमात्मतत्त्व या अध्यात्मतत्त्व में सत्-असत् शब्दों की वाणी की प्रवृत्ति होती ही नहीं है। इसे समझ लेने पर अमृतत्त्व (मोक्ष) प्राप्त होता है। यही है वह गहनता, गुह्यता और रहस्यमयता, जो ‘अध्यात्म’ शब्द में निहित है।
समुद्र में बहुत पानी था, सो पथिक अधिक लाभ की आशा से उसके तट पर पहुंचा, किंतु अंजलि होठों तक ले जाते ही देखा, वह तो बहुत खारी है। पथिक प्यासा ही लौट गया।
कुछ दूर तक छोटी नदी थी। पिया तो पाया मीठा और ठंडा जल।
बड़े के पास खारी, छोटे के पास मीठा, इस भेद को समझने के लिए उसने बुद्धि दौड़ाई।
नियति ने कहा, “जो बाँटते हैं, उनकी मिठास सराही जाती है। जो समेटते हैं, वे बड़े होने पर भी भर्त्सना सहते हैं।”
श्रावस्ती की शोभा अवर्णनीय थी। नगर द्वार से लेकर गृह द्वार तक हर कहीं प्रकाश लड़ियों के वन्दनवार जगमग कर रहे थे। नगर की प्रत्येक वीथिका महक रही थी। महाराज से लेकर सामान्य जन तक सभी उल्लसित थे। प्रत्येक की दृष्टि नगर श्रेष्ठी विशाखदत्त के भवन की ओर लगी थी। नगर का प्रत्येक पथ आज उसी ओर जाता लगता था। हर कोई उनके भवन में होने वाले समारोह में भागीदार होना चाहता था। मेहमानों के स्वागत की व्यवस्था स्वयं महाराज देख रहे थे। उनकी आँखें द्वार पर एकटक टिकी थी। यदा-कदा उनके चेहरे पर अधीरता की लहरें काँप उठती थीं। उनके अन्तःकरण में एक अनूठी हिल्लोर उठती, जिसे सम्हालते हुए वह पुनः अपने काम में लग जाते।
उन्होंने यही कहते हुए स्वागत व्यवस्था सम्हाली थी कि श्रेष्ठी विशाखदत्त की कन्या स्वयं उनकी भी कन्या है। और कुलकन्या के इस विवाह समारोह में स्वागत व्यवस्था का दायित्व वह स्वयं सम्हालेंगे। पर मन के किसी कोने में यह भाव भी छुपा था कि उन्हें भिक्षु संघ के साथ भगवान् बुद्ध के दर्शन, सत्कार एवं सेवा का सुयोग अनायास ही मिल जाएगा। श्रेष्ठी विशाखदत्त भगवान् तथागत के अनन्य भक्त थे। भगवान् में ही उनके प्राण विराजते थे। उन्होंने अपनी कन्या के विवाह समारोह में भगवान् को विशेष रूप से आमंत्रित किया था। आमंत्रण सुनकर तथागत एक पल को विंहसे और कहने लगे- श्रेष्ठी! मेरे वहाँ जाने पर कहीं राग की अग्नि बुझ न जाय। कहीं सप्तपदी के लिए बढ़ने वाले पग तप के लिए न बढ़ जाएँ?
प्रभु के ये वचन सुनकर श्रेष्ठी ने विनीत भाव से कहा- भगवान् मैं तो सर्वतोभावेन आपकी शरण में हूँ। आपकी कृपा से जो कुछ होगा- मंगलमय ही होगा। मेरी कन्या सौम्यदर्शना आपकी अनुगामिनी है। आपके आशीष स्वरूप कुछ भी होगा, उसके लिए वही श्रेष्ठ होगा। श्रेष्ठी की इन बातों को सुनकर तथागत बोले- तुम्हारा कल्याण हो श्रेष्ठी, हम अवश्य आएँगे। हमारे साथ में हमारा भिक्षु संघ भी होगा। और फिर तो यह खबर पूरे नगर में वायु के झोंके के साथ फैल गयी कि कुल कन्या सौम्यदर्शना के विवाह समारोह में शास्ता स्वयं अपने भिक्षु संघ के साथ पधारेंगे।
शास्ता के आगमन की घड़ी आज ही थी। इन्हीं शुभ क्षणों के लिए समूची श्रावस्ती महीनों से सज रही थी। नगर का प्रत्येक नागरिक तथागत के दर्शनों के लिए उत्साहित था। वैसे भी श्रेष्ठी विशाखदत्त प्रत्येक नगर-जन के प्रिय थे। पर हित के लिए अपने सर्वस्व को न्यौछावर कर देने वाले श्रेष्ठी के प्रति हर नागरिक के मन में श्रद्धा एवं सम्मान का भाव था। महाराज तो उन्हें अपना सहोदर भ्राता मानते थे। राजमहिषी सौम्यदर्शना को अपनी सगी पुत्री की भाँति प्यार करती थी। उसके विवाह समारोह में समूचे नगर की प्राण चेतना विवाह मण्डप में केन्द्रित होना स्वाभाविक थी।
उसी समय किसी ने खबर दी कि शास्ता पधार रहे हैं, साथ में उनका भिक्षु संघ भी है। इस समाचार ने समूचे वातावरण को कुछ विशिष्ट तरंगित और स्पन्दित किया। असंख्य प्राण हुलसे, असंख्य मन श्रद्धा विगलित हो उठे। प्रभु आ रहे हैं, यह सुनकर श्रेष्ठी कन्या सौम्यदर्शना को गहरी आश्वस्ति हुई। उसे भरोसा हुआ, उसके प्राणों की आतुर पुकार अब अवश्य सुनी जाएगी। परन्तु विवाह मण्डप में उसी के साथ बैठे वर महोदय को जैसे इस सबकी कोई खबर ही नहीं थी। वह अपनी ही धुन में कहीं खोए थे। सम्भवतः सौम्यदर्शना की मुखछवि उन्हें बेसुध बनाए दे रही थी।
तभी स्वयं महाराज भगवान् और उनके भिक्षुओं को लेकर विवाह मण्डप में आ गए। शास्ता के तप तेज के सामने मण्डप में फैला कृत्रिम प्रकाश फीका पड़ गया। एक अनूठी आभा वहाँ बिखरने लगी। उनके आने से कुलकन्या सौम्यदर्शना को तो जैसे अपने खोए प्राण मिले। वह पहले भगवान् के चरणों में झुकी, फिर अन्य भिक्षुओं के चरणों में। उसके लिए तो जैसे भगवान् के अलावा अन्य किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का अस्तित्त्व ही न रहा। लेकिन उसका होने वाला पति उसे देखकर नाना प्रकार के काम-सम्बन्धी विचार करता हुआ रागाग्नि में जल रहा था। उसका मन काम-वासना की गहन बदलियों और धुँओं से ढंका था। उसने भगवान् को देखा ही नहीं। न देखा उस विशाल भिक्षुओं के संघ को। उसका मन तो जैसे वहाँ था ही नहीं। वह तो भविष्य में था। उसके भीतर तो सुहागरात चल रही थी। वह अपनी कल्पित सुहाग सेज के अंधेरों में खोया हुआ था। वह इस समय एक अंधे की भाँति था।
भगवान् से उसकी यह विपन्न-दीन दशा देखी न गयी। उन्होंने करुणा विगलित हृदय से उसकी ओर देखा। कुछ अनोखा और अलौकिक था प्रभु की उस अमृतवर्षिणी दृष्टि में। आधे से भी आधे पल में क्या कुछ नहीं घटित हो गया। कुछ यूँ हुआ जैसे घुप-घने और गहन अंधेरों में प्रकाश का महासमुद्र उफन-उमड़ आया हो। सर्वत्र-सब ओर प्रकाश ही प्रकाश सौम्यदर्शना के होने वाले पति कुमार सुयश की अन्तर्चेतना में छा गया। अब अंधेरे का कण भी वहाँ न था। जब अंधेरा ही न रहा, तब भला ऐसे में सपने और कल्पनाएँ कहाँ रहतीं।
वह जैसे अनायास नींद से जागा। कुलकन्या सौम्यदर्शना की मुख छवि अचानक उसके हृदयपट से विलीन हो गयी है। वहाँ तो बोधिज्ञान की प्रकाश धाराएँ उतर रही थीं। किसी भी तरह उसकी कल्पनाएँ टिक न सकीं। वह चौंक कर खड़ा हो गया। और तब उसे भगवान् दिखाई पड़े। और दिखाई पड़ा उसे भगवान् का भिक्षु संघ। और तब दिखाई पड़ा उसे कि अब तक मुझे दिखाई नहीं पड़ रहा था। संसार का धुँआ जहाँ नहीं है, वहीं तो सत्य के दर्शन होते हैं। वासना जहाँ नहीं है, वहीं तो भगवत्ता की प्रतीति होती है। उसे चौकन्ना और विस्मय में डूबा हुआ देखकर भगवान् ने कहा, कुमार! रागाग्नि के समान दूसरी कोई अग्नि नहीं है। वही है नर्क, वही है निद्रा। जागो, प्रिय सुयश! जागो! और जैसे शरीर उठ बैठा है, ऐसे ही तुम भी उत्तिष्ठ हो जाओ। उठो! उठने में ही मनुष्यता की शुरुआत है।
विवाह मण्डप का समूचा वातावरण यकायक परिवर्तित होने लगा। शृंगार की झुलसाने वाली हवा के स्थान पर प्रभु करुणा की बयार वहाँ बहने लगी। भगवान् कह रहे थे-
नत्थि राग समो अग्गि नत्थि दोस समो कलि।
नत्थि खंध समा दुक्खा नत्थि संति परं सुखं॥
शास्ता के इन वचनों को सुनकर श्रेष्ठी विशाखदत्त ने उनसे प्रार्थना की कि भगवान् कृपा करके अपने वचनों का अर्थ स्पष्ट करे। पर आज तो प्रभु जैसे केवल कुमार सुयश से ही बोल रहे थे। वह उसे सम्बोधित करके कहने लगे- भन्ते! ‘नत्थि राग समो अग्नि’ अर्थात् ‘राग के समान आग नहीं’। ‘नत्थि दोस समो कलि’ यानि कि ‘द्वेष के समान मैल नहीं।’ ‘नत्थि खंध समा दुक्खा’ ‘पंच स्कन्धों के समान दुःख नहीं।’
ये पंच स्कन्ध क्या है भगवान्। पहली बार कुमार सुयश ने अपना मुँह खोला। भगवान् की कृपा से उनकी अन्तर्चेतना निर्मल हो चली थी। भगवान् ने भी उन पर अपनी और भी अधिक कृपादृष्टि करते हुए कहा- भन्ते! मनुष्य का व्यक्तित्व बना है दो चीजों से- नाम, रूप। रूप यानि देह, नाम यानि मन। स्थूल देह तो एक है, लेकिन मन के चार रूप हैं- वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान। ऐसे सब मिलाकर पाँच। इन पाँच में जो जीता है- वह समझो कि दुःख में ही जीता है। इन पाँच में जीने का अर्थ है या तो शरीर की आसक्ति में जीना अथवा फिर मन की वासनाओं में जीना। जो इन पंचस्कन्धों में जी रहा है- वह समझो कि दुःख में जी रहा है। इसी के साथ भगवान् ने आगे समझाया- ‘नत्थि संति परं सुखं’ अर्थात् ‘शान्ति से बढ़कर और कोई सुख नहीं है।’
तथागत के इन वचनों के साथ ही कुमार सुयश के मन में शान्ति उतर आयी। उसे भगवान् के वचनों की सार्थकता अनुभव होने लगी। उसने बड़ी कृतज्ञता पूर्ण दृष्टि से प्रभु की ओर देखा। विवाह अब आवश्यक न रहा प्रभु, अब आप मुझे अपनी शरण में ले लें। होने वाले पति की इन बातों को सुनकर कुलकन्या सौम्यदर्शना को जैसे मनवाँछित मिला। वह कहने लगी भगवान्! मैं तो सदा से आपकी करुणा की आकाँक्षी हूँ। श्रेष्ठी विशाखदत्त तो शास्ता के अनुगत थे ही। बस फिर क्या था? मण्डप में विवाह मंत्रों के स्थान पर बुद्धं शरणं गच्छामि! धम्मं शरणं गच्छामि!! संघं शरणं गच्छामि!!! के स्वर गूँजने लगे। समूचा परिवार भगवान् तथागत के धर्म चक्र प्रवर्तन के लिए समर्पित हो गया। वहाँ उपस्थित सभी जन अनुभव कर रहे थे कि सचमुच ही शान्ति से बढ़कर और कोई सुख नहीं है।
जो दीपक की तरह प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी में होगा।
आत्म विश्वास अर्थात् स्वयं पर विश्वास, स्वयं के अस्तित्व पर विश्वास। जो स्वयं पर विश्वास करता है वह ईश्वर पर भी विश्वास करता है। जीवन का रहस्य इसी में समाया है और यही सफलता का मूल मंत्र है। आत्म विश्वास का धनी हर परिस्थितियों में अडिग और अविचल खड़ा रहता है। उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं होता। पुरुषार्थ इसकी अभिव्यक्ति है और साहस इसका परिचय। ऐसे लोग आत्मिक और भौतिक दोनों प्रकार की समृद्धि एवं विभूति से सम्पन्न लोग हैं।
आत्मविश्वास साहस का पर्याय है, जो रग-रग में दौड़ता है। यह अन्तर की पुलकन है, आँखों की चमक तथा अधरों की मुस्कान है। उसे स्वयं पर आस्था होती है एवं अपनी गुप्त शक्तियों पर भरोसा होता है। विश्वास का धनी जानता है कि वह ईश्वर का अविनाशी एवं दिव्य अंश है। उसे स्वयं पर अगाध विश्वास होता है इसलिए वह ईश्वर पर विश्वास करता है। इसी कारण विश्ववंद्य स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- सर्वप्रथम स्वयं पर विश्वास रखो फिर ईश्वर में। जिसे स्वयं में विश्वास नहीं उसे ईश्वर में कभी विश्वास नहीं हो सकता। अतः पहने निज पर विश्वास आवश्यक है।
आत्मविश्वास का आधार हमारा अपना ही अन्तर है। इस तथ्य को प्रतिपादित करते हुए श्री अरविन्द ने कहा है- आत्मविश्वास अन्दर उत्पन्न होने वाली दिव्य वस्तु है। यह ज्ञान और अनुभव पर निर्भर नहीं करता। गोमुख से निकलने वाली पुण्यतोया-पावन गंगा को पहले न तो बहने का अनुभव होता है और न ही प्रवाह पथ पर आने वाले रोड़ों और संकटों का ज्ञान। बस उसके अन्दर उफनती आत्म विश्वास की जलधारा ही है जो उसे गंगा सागर तक बहने के लिए प्रेरित करती है। आत्मविश्वास एक प्रचण्ड प्रवाह है जो निरन्तर बहते हुए ज्ञान एवं अनुभव को प्राप्त करता है। यह वह जादुई अद्भुत शक्ति है जो भीषण विपत्तियों का सामना सरलता से कर लेती है। और इसी कारण सफलता उसके चरण चूमती है।
आत्मविश्वास पथ की विघ्न-बाधाओं को दूर करने का एक महामंत्र है। इसमें कठिनाइयों के विशाल पर्वतों को लाँघ जाने की अपार क्षमता होती है। धरती को फोड़कर निकलने वाला यह प्रखर बीज है। आत्म विश्वास जब अंतर में उमगता है तो शक्ति और सामर्थ्य द्विगुणित हो जाती है। इसी शक्ति और सामर्थ्य के बल पर लक्ष्य भेद किया जाता है। उसे कठिनाइयों से उत्पन्न भय एवं असफलता से उपजी हताशा नहीं सताती। वह कभी निराश नहीं होता। सदैव धैर्य के साथ चरम पुरुषार्थ करता रहता है। भले ही उसे कितनी ही असफलताओं का सामना करना पड़े। असफलताएँ उसे परास्त नहीं कर सकती।
पराजित एवं पराभव उसे सदा घेरे रहते हैं, जिसके अन्दर आत्म विश्वास का अभाव होता है। ऐसे व्यक्ति सफलता से कोसों दूर होते हैं। जो स्वयं पर आश्वस्त नहीं है भला उसे कौन भरोसा दिला सकता है। विश्वासहीन व्यक्ति न तो स्वयं का विकास कर सकता है और न ही दूसरों से सहयोग की अपेक्षा कर सकता है। उसे सदा पराजय का डर एवं आशंका सताती रहती है। एक बार की असफलता से ही वह निराश होकर निष्क्रिय हो जाता है। और प्रयत्न के प्रति हथियार डाल देता है। विश्वास का धनी एक क्या हजार बार की असफलता से भी पराजय स्वीकार नहीं करता। जीवन के अंतिम क्षणों तक वह लड़ता रहता है, भले ही उसे उपलब्धियों का उपहार न मिल सके। ऐसे कर्मवीर भला जीवन भर असफल एवं पराजित कैसे हो सकते हैं?
इतिहास के पन्ने-पन्ने ऐसे आत्मविश्वासी वीरों की गौरवगाथा से भरे पड़े हैं। जीवन संग्राम में अनेक बार हारकर भी लक्ष्य के प्रति जिनका दृढ़ विश्वास डिगा तक नहीं वही सच्चे विजयी माने जाते हैं। ऐसे शूरमा भीषण संकट एवं कठिनाइयों के बीच भी अडिग खड़े रहते हैं और पराजय-पराभव को स्वीकार नहीं करते। चरम पुरुषार्थ को संघर्ष के दाँव पर लगा देने के बावजूद विजय न पा सकने वाले महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, पोरस जैसे रण बाँकुर आज भी विजयी वीरों के साथ विभूषित होते हैं। हारी तो केवल उनकी परिस्थितियाँ, उनके अगाध विश्वास की दीपशिखा तो सदा निष्कम्प हो जलती रही, एवं उनके प्रयत्न कभी पराजित नहीं हुए। ऐसे उफनता आत्मविश्वास हारकर भी जीत जाता है। और यही सच्ची विजय है।
जब भी आत्मविश्वास उफनता है विजय का द्वार खुल जाता है। फ्राँस की जोन ऑफ आर्क का यह उफनता हुआ विश्वास ही था कि उन्होंने पराजित एवं निष्क्रिय पड़े अपने राष्ट्र की धमनियों में स्वतंत्रता के नवीन प्राण फूँक दिए। भेड़ों की रखवाली करने वाली इस लड़की में जब अंतर का विश्वास फूटा तो वह स्वतंत्रता सेनानियों की सेनापति बन गई। आज का स्वतंत्र एवं समृद्ध फ्राँस जॉन ऑफ आर्क का चिर ऋणी है। स्वतंत्रता की अमर योद्धा लक्ष्मी बाई ने आत्मविश्वास की प्रज्वलित लौ में ही 1857 की भारतीय क्राँति का स्वरूप निखारा। और इसी क्राँति ने निष्क्रिय जनमानस के सुप्त विश्वास को झकझोर कर जगा दिया। ये योद्धा भले ही विजय माला का वरण न कर पाये हों, परन्तु इनकी हार की नींव पर भविष्य में विजय का भव्य भवन खड़ा हुआ। भले ही ये हार गये लेकिन इनका आत्मविश्वास जीता था। यही उनकी विजय है जिसे आत्मविश्वास के धनी कर्मवीरों के अतिरिक्त साधन सम्पन्नता के बल पर साँयोगिक विजय पाने वाले कर्महीन कायर कभी नहीं पा सकते।
कलिंग जैसे दुर्धर्ष राष्ट्र को नेस्तनाबूद कर देने वाले चक्रवर्ती अशोक जीत कर भी हार गये थे। कलिंग का श्मशान बन जाना एक विजय थी परन्तु इसके दारुण चीत्कारों से व्यथित अशोक की आत्मा पराजित हो गयी। सम्राट अशोक ने राष्ट्र को जीता था परन्तु उनका आत्मविश्वास हारा था। पद्मनी का जल जाना, भीम सिंह और गोरा, बादल का जूझ मरना एक सच्ची विजय थी। चन्द्रशेखर आजाद का स्वयं को गोली मार लेना, भगत सिंह का फाँसी के फंदे पर लटक जाना आत्मविश्वास के धनी विजेताओं की एक अमिट गाथा है। जय-पराजय की इन गाथाओं में जीत-हार का मापदण्ड आत्मविश्वास, आदर्श पुरुषार्थ, पराक्रम, साहस, धैर्य एवं प्रयत्न ही रहा है। राज्य, नगर एवं सम्पदा पर अधिकार नहीं।
जिसका विश्वास प्रखर होता है उसे परिस्थितियाँ झुका नहीं पाती। वह इसके आगे घुटना नहीं टेकता। गिन-गिनकर संभलना उसकी नियति होती है। तपस्या के शिखर से कई बार गिरने वाले विश्वामित्र के आत्मविश्वास ने ही अंततः उन्हें पुनः उसी शिखर पर आरुढ़ किया।इस तरह अन्तर में विश्वास का मशाल जलाने वाला हर असफलता से सीख लेता है एवं दूने उत्साह के साथ जुट जाता है। उसके अन्दर साहस का दावानल धधकता रहता है जिसकी लपटों में हताशा-निराशा वाष्प बनकर उड़ जाती है। ऐसे व्यक्ति कभी परास्त नहीं होते। उनकी हार भी जीत के साथ लिखी जाती है। वस्तुतः असफलता एवं हार कुछ नहीं आत्मविश्वास की कमी ही है।
स्वयं पर विश्वास करना अन्ततः ईश्वर में आस्था है। यह विश्वास जितना प्रगाढ़ एवं प्रबल होता जायेगा निर्दिष्ट लक्ष्य उतना ही पास होता जाएगा। लक्ष्य के प्रति आशा एवं विश्वास, कर्म के प्रति निष्ठ एवं लगन को जन्म देता है। जिसे अपने ईष्ट एवं लक्ष्य के प्रति प्रबल विश्वास होता है उसका कर्म पूजा एवं उपासना बन जाता है और पुरुषार्थ साधन। इस पथ पर बढ़ते हुए वह हर कठिनाइयों एवं मुसीबतों को धैर्य के साथ सामना करता है। असफलता की क्रूर ठोकरों से वह व्यथित एवं विचलित नहीं होता। छेनी के नुकीले वार को सहते हुए भी वह अपने अन्दर एक नवीन सृजन की कल्पना संजोये रहता है। उसे विश्वास होता है कि सघन तमिस्रा को चीरकर ऊषा की सुनहली आभा अवश्य मुस्करायेगी। अतः उसका विश्वास दीपक के समान जलता है।
आत्म विश्वासी तथा आत्मनिर्भरता की भावना से ओत-प्रोत व्यक्ति का परिश्रम तथा पुरुषार्थ कभी निष्फल नहीं जाता। ऐसे व्यक्ति एकबार जब अपने लक्ष्य का निर्धारण कर लेते हैं, तो उनके कदमों को नदी-नद, पर्वत-पठार, दलदल, रेगिस्तान कोई रोक नहीं सकते। वे अबाध एवं निर्बाध रूप से बढ़ते चले जाते हैं। यही विश्ववंद्य होते हैं तथा यशस्वी श्रेय के सच्चे अधिकारी होते हैं।
सफलता पाने के लिए अंदर के आत्मविश्वास को जगाना आवश्यक है। यह एक दैवी विभूति है। इसी के द्वारा ही ऋद्धि-सिद्धियों की अपार सम्पदा एवं समृद्धि अर्जित की जा सकती है। भौतिक सफलता का भी यही एकमात्र आधार है। अतः अपने सोये आत्मविश्वास को जगाकर हम भी आत्मिक एवं भौतिक सम्पदा के स्वामी तथा श्रेय-सम्मान के अधिकारी हो सकते हैं। सोये आत्म-विश्वास को जगाना ही सफलता का मूल मंत्र एवं गुप्त रहस्य है।
सच्चाई की खोज करने वाले तथा फकीरी का जीवन जीते हुए सदैव परमात्मा का ध्यान करने वालों को सूफी कहते हैं। यूँ तो सूफी शब्द सूफ या सफ से बना है। जिसका अर्थ है- ऊन। अर्थात् जो ऊनी वस्त्र धारण करता है। वह सूफी कहलाता है। यह प्रतिकात्मक अभिव्यंजना है। मूलतः सूफी सन्त सदा ईश्वर की भक्ति में मस्त रहते थे और औरों को भी उसकी भक्ति में मदहोश रहने की शिक्षा देते थे।
सूफियों की विचारधारा इस्लाम के विजयोन्माद के पश्चात् पनपी एवं विकसित हुई। यह उन्मादी, दिखावटी एवं कट्टर धर्मान्धता के विरुद्ध हुई प्रतिक्रिया की प्रतीक थी। साँसारिकता और भोग विलास में डूबे जनमानस को झकझोर कर उठाने के लिए ही इसने आन्दोलन का स्वरूप लिया। सूफी सन्त भटके हुए मानव को ईश्वर का सन्देश सुनाते थे और सत्पथ पर बढ़ने की प्रेरणा देते थे। यही जीवन का सार है, शेष निस्सार है। फलतः प्राचीन सूफियों का जीवन सरलता और पवित्रता से ओतप्रोत रहता था। पहले उनमें वैराग्य की भावना प्रबल थी अतः वे संसार त्यागी थे बाद में रहस्यवादी बन गये।
सन् 717 में राबिया-अल-बदवियर नाम की महिला सूफी सन्त हुई। उन्होंने प्रेम को दिव्य एवं उच्चस्तरीय बताया। उनके इस सजल एवं प्रबल भगवद् प्रेम के गर्भ से प्रारम्भिक सूफी मत का आविर्भाव हुआ। राबिया के प्रेम में न तो गुनाहों के लिए दैवी दण्ड का स्थान था और न सद्कर्मों के पुण्य की इच्छा आकाँक्षा। वह निष्काम भाव से केवल प्रभु के लिए ही प्रेम करती थी। वह हृदय से पुकारती थी- या अल्लाह यदि मैं दोजख (नरक) के भय से तेरी प्रार्थना करती हूँ, तो मुझे नारकीय अग्नि में जला देना और अगर मैं बहिश्त (स्वर्ग) की कामना से प्रार्थना करती हूँ तो मुझे इस ऐश्वर्य से भी वंचित कर देना। परन्तु अगर मैं एकमात्र तुम्हारे लिए तुम्हारी आराधना करती हूँ तो अपना वह दिव्य पावन रूप मेरी आँखों से कभी-भी ओझल होने मत देना।
सन्त राबिया का भगवद् प्रेम अटूट था। उन्होंने प्रेम के दिव्यरस का स्वाद चखा था, जिससे उनका जीवन प्रेममय हो गया था। ईश्वर प्रेम की यह धारा कभी भी रुकती नहीं है बल्कि यह तो नदी के समान प्रबल वेग से हर रोड़ों को तोड़ते फूट पड़ती है। सूफीमत का यह प्रवाह धुल-नुन-अल मिस्त्री के मारिफत (अध्यात्म) तथा फारसी अबू याजिद के फना (अनन्त में मिलन) सिद्धान्त के माध्यम से अग्रसर हुआ। याजिद ने ‘ज्ञान का सुरापान’ किया था। वह ऐसे प्रथम सूफी थे जिन्होंने स्पष्ट रूप से निर्भीक होकर कहा था परमात्मा कहीं और नहीं है यह अपने ही अन्दर छुपा हुआ है। अपने अन्दर की ओर झाँको, ईमानदार प्रयास करो तो वह अवश्य दिखाई देगा। उनका यही सिद्धान्त सूफियों का रहस्यवाद बना।
याजिद का यह तपःपूत पुरुषार्थ ही था कि उनका फना का सिद्धान्त आगे चलकर सूफी मत का केन्द्र बिन्दु बन गया। सच्चे मन से और भगवान् के लिए किया गया पुरुषार्थ कभी भी निष्फल नहीं होता। बगदाद के अलजुनैद ने इस सिद्धान्त को भटके हुए जनमानस तक पहुँचाने के लिए अपना समस्त जीवन होम दिया। सूफी फकीर अल हजाज ने इसके लिए जो योगदान किया उसे भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने सुप्त जन को गहरे तमस से उठाया और कहा कि संसार मिथ्या है, माया का आवरण मात्र है। एकमात्र अपना सच्चा स्वरूप ही सत्य है। इसी सिद्धान्त को अनल हक्क के रूप में जाना जाता है।
बारहवीं शताब्दी तक सूफी मत एक सशक्त आन्दोलन के रूप में विकसित हो गया। इससे इस्लामी विचारधारा भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी। इसके प्रभाव से प्रभावित होकर इस्लाम के पुनरुद्धारक इमाम-अल-गजाली ने कहा कि अनुभवजन्य सत्य ही ज्ञान है। ज्ञान की यह खोज स्वयं के अनुभूति के आधार पर होती है अतः हर व्यक्ति को अपने अन्दर खोज करनी चाहिए न कि बाहर।
अल गजाली ने अनल हक्क को अपना आदर्श बनाया तथा आत्मा और परमात्मा के नैसर्गिक सम्बन्ध को हृदयंगम किया। वह इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर लोगों को उपदेश दिया करते थे। सूफी फकीर अल-अरबी गजाली के विचारों से अत्यन्त प्रभावित थे। वह पक्के अद्वैतवादी थे। उन्होंने बताया कि सृष्टि में ईश्वर का ही एकमात्र अस्तित्व है। कण-कण में एक उसी की शाश्वत सत्ता भासमान है। कहीं भी भेद नहीं और न ही कहीं अन्तर है। सब एक हैं, एक उसी ईश्वर के विभिन्न रूप हैं। इस प्रकार सूफी परम्परा का विकास चक्र चौदहवीं शताब्दी में ‘वहदत-अल-वुजूद’ अर्थात् आस्तिक अद्वैतवाद के साथ पूर्ण हुआ।
‘वहदत-अल-वुजूद’ का अर्थ है सत्ता मात्र की एकता। केवल बहिर्मुखी दृष्टि हो तो प्रतीत होता है कि यह सृष्टि अनन्त अनेकताओं का परिणाम है। इतनी विभिन्नताओं एवं पृथकताओं के बीच कहीं भी एकता का कोई सूत्र दिखाई नहीं पड़ता। परन्तु सत्य एक है। एक परमात्मा ही इस बहुआयामी एवं बहुरंगी सृष्टि का सृजेता है। यह सृष्टि उसके ‘एकोऽहम बहुस्यामिः’ के संकल्प का परिणाम है। अतः कहीं भी अनेकता नहीं है सभी एक सूत्र से पिरोये हुए हैं। सत्ता मात्र एकता की ही झलक झाँकी है। इस तथ्य को अपने ‘रब’ (आत्मा) की अनुभूति से ही अनुभव किया जा सकता है। इस प्रकार सनातन धर्म का दिव्य अनुभव सूफी मत में भी हुआ देखा जा सकता है। इसी ज्ञान को अरबी में ‘मन अरफ नफ्स; रब्बहू’ कहा जाता है।
सूफी मत में इस्लाम की कट्टरता एवं संकीर्णता का कोई स्थान नहीं है। बल्कि सनातन धर्म की उदारता, सहिष्णुता के के साथ एक ही परमात्म तत्त्व का वेदान्तिक स्वर सुनाई पड़ता है। इससे स्पष्ट होता है कि समस्त धर्म को प्राण प्रदान करने वाले सनातन धर्म ने किसी न किसी रूप में, इसके जन्म में अपना योगदान दिया होगा। भले ही इस तथ्य का स्पष्ट सूत्र आज हमारे हाथ न लगे, परन्तु है यह यथार्थ है। मनीषी मैक्स हाँटर्न इस सत्य के प्रबल समर्थक रहे हैं। हकीकत की इस पृष्ठभूमि को स्वीकार करते हुए आर. ए. निकोलसन ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सूफी मत के फना सिद्धान्त का मूल उद्गम भारतीय विचारधारा ही है। उनके अनुसार यह बौद्ध धर्म के निर्वाण के अत्यन्त सन्निकट है। इन सबमें रोचक बात तो यह है कि इस फना सिद्धान्त के प्रवर्तक याजिद स्वयं स्वीकारते हैं कि उनके गुरु ने उनको तौहीद (ईश्वर एक है) और हक-इक (सत्य) की शिक्षा दी थी जो एक भारतीय थे।
सनातन धर्म की धारा ने सूफी मत को पुष्ट एवं विकसित किया है, ऐसा प्रतीत होता है। इसके विचार भारतीय दर्शन से प्रभावित जान पड़ते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में मनीषी गोल्डजिकरे ने उल्लेख किया है कि सूफियों का तौहीद सिद्धान्त इस्लाम धर्म के प्रतिकूल तथा भारतीय दर्शन पर आधारित है। हो भी क्यों न? भारतीय विचारों का पटल आकाश सा व्यापक एवं विस्तृत है। इसलिए मेरी टी टाइटस ने सूफीमत को इन विचारों के आभामण्डल से आवेष्टित हुए देखकर आश्चर्य प्रकट नहीं किया है। वह अपनी कृति ‘इस्लाम इन इण्डिया एण्ड पाकिस्तान’ में इस सत्य को शब्द देते हुए कहती हैं ‘सूफी सन्तों के अनुभव एवं उनके दार्शनिक सिद्धान्तों में भारतीय दर्शन एवं साधना प्रयोगों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
अबू याजिद के उपदेशों में भी भारतीयता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। वे परमात्मा के लिए ‘वह’ सर्वनाम का प्रयोग करते हैं जो हिन्दुओं द्वारा ब्रह्म के लिए प्रयुक्त ‘तत’ का प्रतिरूप है। ‘तकूनू अन्ता’ वाक्य उपनिषदों के तत्त्वमसि (तुम वही हो) का भाषान्तर प्रतीत होता है जो केवल वेदान्त में प्रयोग हुआ है। ‘अनल हक्क’ के दर्शन में वेदान्त सूत्र ‘अहं ब्रह्मस्मि’ का बोध होता है। इसके प्रतिपादक मन्सूर-अल-हज्जाज अद्वैत मतावलम्बी जान पड़ते हैं। शायद यही कारण है कि उनको काफिर समझा गया और खुदा के अन्य अनेक बन्दों के समान फाँसी में लटका दिया गया। कहते हैं सच्चाई धरती को फोड़ कर निकलती है और अपने लक्ष्य की ओर चलती है। इसी प्रकार यह अद्वैतवाद भी इब्न अली अरबी और अब्दुल करीम की जिली की पद्धति में समाविष्ट कर लिया गया।
सूफी सन्त जिली हिन्दू धर्म से अत्यंत प्रभावित थे। तथा इन्हें इसका अच्छा ज्ञान था। उनके ब्रहिम शब्द में ब्रह्म का झलक झाँकी मिलती है। सूफी परम्परा के एक अन्य सन्त जलालुद्दीन रुमी ने हिन्दुओं के भजन-कीर्तन के समान ‘सम’ अर्थात् भक्तिगान व नृत्य की पावन प्रथा प्रचलित की। उन्होंने लोगों को उपदेश देते हुए कहा कि हृदय देवत्व का दर्पण है। इसे भजन-कीर्तन करके स्वच्छ एवं साफ रखा जा सकता है। वह कहते हैं यह दर्पण जितना स्वच्छ होगा उसी के अनुरूप अपनी अन्तर्चेतना में परमात्मा का प्रतिबिम्ब झलकता है। और ऐसा क्यों न हो, आत्मा है भी परमात्मा का एक अंश।अंत में यह ‘फना’ होकर उसी में विलीन एवं विलय हो जाती है।
सूफी परम्परा की अनेक रहस्यवादी क्रियाएँ भारतीय योग प्रक्रिया के सदृश हैं। पस्य-अनूफस प्राणायाम का प्रतिरूप है। अपने यहाँ जप के लिए माला की आवश्यकता पड़ती है। सूफी मत में ऐसा ही प्रयोग मिलता है। उसमें माला को ‘तसबीह’ और जप को ‘धिक’ की संज्ञा दी गई है। हिन्दू धर्म में भगवद् प्राप्ति का सरल एवं सहज मार्ग-प्रेम मार्ग है। सूफी मत का तो यह मुख्य आधार है। सूफी अपने गुरु या पीर को ईश्वर का साक्षात प्रतिनिधि मानकर उसके दिव्य चरणों में अपना सर्वस्य समर्पण कर देता है। वे अहंकार को गलाने के लिए समर्पण को सर्वश्रेष्ठ माध्यम मानते हैं तथा आत्मज्ञान के दुर्गम मार्ग पर बढ़ते हैं।
सूफी सन्तों ने भारतीय धर्म एवं संस्कृति की सहिष्णुता, उदारता एवं विशालता को सहज ही अपनाया है। इनमें से कुछ सन्त तो इसके उद्गम स्थल भारत देश भी आए। यही नहीं यहाँ की आध्यात्मिक सम्पदा से प्रभावित होकर कइयों ने यहाँ अपना स्थायी निवास बना लिया। यहाँ आने वालों में मन्सूर-अल-हज्जाज सर्वप्रथमसूफी सन्त थे। अल-हुजवीरी तो यहाँ की माटी की सुगंध में पूरी तरह रम गये और उन्होंने यहाँ के विचारों में अपने आप को खो दिया। इसका ही परिणाम था कि उन्होंने ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य फारसी में भारतीय रहस्यवाद पर ‘कश्फ-अल-मजहब’ नामक ग्रंथ की रचना की।
यहाँ के विचारों से ओतप्रोत सूफी सन्तों की उदारवादी विचारधारा से अपने यहाँ के सन्त भी प्रभावित हुए हैं। ऐसे महान् सन्तों में कबीर, गुरुनानक एवं विचारकों में राजा राममोहन राय, रविन्द्रनाथ टैगोर आदि प्रमुख हैं। सूफी सन्तों ने भारत आकर ध्यान और तपस्या की तमाम विधाओं को अपना लिया और आत्मज्ञान प्राप्त कर औरों को भी इस ओर प्रेरित किया। पथ चाहे जो भी हो मंजिल एक है। हमें एक ही मंजिल की ओर जाना है। यही सूफी फकीरों का उपदेश है। उनका कहना है कि जीवन छोटा है, समय कम है। इसलिए अच्छा यही कि विषय और विकारों से पीछा छुड़ाकर ईश्वर में रमे और उससे अपनी एकता अनुभव करें। और इस अनुभूति को मंसूर के शब्दों में सबको बता सकें- अनलहक्।
शबरी के घर भगवान गए और उससे माँग-माँगकर जूठे बेर खाए, यह प्रसंग उन दिनों संतजनों में सर्वत्र चर्चा का विषय बना हुआ था। अशिक्षित नारी, साधना-विधान से अपरिचित रहने पर भी उसे इतना श्रेय क्यों मिला? हम लोग उस श्रेय-सम्मान से वंचित क्यों रहे?
मातंग ऋषि ने चर्चारत भक्तजनों से कहा, “हम लोग संयम और पूजन मात्र में अपनी सद्गति के लिए किए प्रयासों को भक्ति मानते रहे हैं, जबकि भगवान् की दृष्टि में सेवा-साधना की प्रखरता है। शबरी ही है, रात-रात भर जागकर आश्रम से लेकर सरोवर तक कँटीला रास्ता साफ करती रही और सज्जनों का पथ-प्रशस्त करने के लिए अपना अविज्ञात, निरहंकारी भावभरा योगदान प्रस्तुत करती रही।”
भक्तजनों का समाधान हो गया, उन्होंने जाना कि भक्त और भगवान् की दृष्टि में अंतर क्या है।
‘भारत रत्न’ उनके लिए देश की सरकार द्वारा प्रदत्त सम्मान भर नहीं, वरन् उनके महान् व्यक्तित्व का परिचय और पर्याय है। यह सुपरिभाषित सच देश के मिसाइल कार्यक्रमों के पितामह डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम यानि अबुल फकीर जैनुल आबेदीन के बारे में है। देश के सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए उनके महत्त्वपूर्ण योगदान से राष्ट्र का जन-जन परिचित है। अभी हाल में ही राष्ट्र के प्रायः सभी समाचार पत्रों ने प्रमुखता से यह समाचार प्रकाशित किया, कि डॉ. अब्दुल कलाम ने देश के केन्द्रीय मंत्री के समकक्ष सुविधाओं और अधिकारों वाला भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार वाला पद छोड़ दिया है। परन्तु उनके इस पद त्याग के पीछे जो प्रेरक कथा है, उससे शायद ही कोई परिचित हो।
दरअसल पिछले समय जब भारत ने पोखरण परमाणु विस्फोट किया था, उस समय उस पर कई देशों ने कई तरह के प्रतिबन्ध लगाए। प्रतिबन्ध लगाने वाले इन देशों में सबसे प्रमुख देश अमेरिका रहा। उसके इस पक्षपात पूर्ण रवैये से कई भारत भक्तों की भावनाएँ आहत हुई। इन्हीं में से एक भारतीय मूल का एक सोलह वर्षीय किशोर भी है। जो इन दिनों अमेरिका के अटलाँटा शहर में रह रहा है। इस किशोर ने डॉ. कलाम को इन्हीं दिनों एक चिट्ठी लिखी। जिसमें उसने कहा, ‘मैं उस दिन भारत के गीत गाऊँगा, जब वह भी अमेरिका की ही तरह दूसरे देशों पर प्रतिबन्ध लगाने की हैसियत में होगा।’ इस हृदय स्पर्शी एवं भावनाओं से भरे-पूरे पत्र में जो दर्द और चुनौती छिपी थी, उसे डॉ. कलाम ने बखूबी पहचाना।
इसी के साथ उनके मन में एक महान् संकल्प जगा, कि वह देश में प्रतिभावान वैज्ञानिकों की एक नई पीढ़ी तैयार करेंगे। ऐसे वैज्ञानिक जो प्रतिभाशाली होने के साथ ही देश भक्त भी हो और राष्ट्र की गौरव पताका को विश्व गगन में फहरा सके। बस इसी संकल्प के साथ उन्होंने निश्चय किया अपने पद को त्यागने का, सुविधा, साधनों एवं प्रतिष्ठ के मोह को छोड़ने का। उनका यह त्याग यूँ तो असाधारण है, पर उनके व्यक्तित्व की तुलना में अतिसाधारण है।
पिछले दिनों उनकी विदाई समारोह का आयोजन हुआ। इसमें प्रधानमंत्री समेत अनेक मंत्रियों, साँसदों एवं वैज्ञानिकों ने अपनी भागीदारी की। इस अवसर पर डॉ. अब्दुल कलाम ने कहा- मैं अब नयी पीढ़ी की पौध को खाद-पानी देकर विश्व के वैज्ञानिक क्षितिज पर लहलहाने का अवसर प्रदान करने के लिए जुट रहा हूँ। मुझे आज भारत के वैज्ञानिक भविष्य को लेकर आशाओं का ऐसा उछाल दिखाई दे रहा है, जिससे अनेक भाभा, सी.वी. रमन एवं नर्लीकर पैदा हो सकते हैं। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बताया, कि मैं नन्हें वैज्ञानिकों की वैज्ञानिक सोच को आपस में जोड़ने का प्रयास करूंगा।
सचमुच ही समूचे राष्ट्र के लिए सम्माननीय डॉ. अब्दुल कलाम वाणी और शब्दों से नहीं बल्कि अपने कर्मों एवं कर्त्तव्यों से अपना परिचय देने के लिए विख्यात हैं। अग्नि, त्रिशूल और पृथ्वी जैसी मिसाइलें उन्हीं की मेधा का परिचय देती हैं। अब जब वह नई चुनौती को स्वीकार करके अपने कर्त्तव्य क्षेत्र में उतरे हैं, तो यहाँ भी वह पहले जैसी चमक पैदा करेंगे, जो उन्हीं की ही तरह देशभक्त महान् वैज्ञानिकों के रूप में समूचे विश्व को दिखाई देगी। यह इक्कीसवीं सदी में उदय हो रहे उज्ज्वल भविष्य के सूर्य की प्रथम किरण है। जो डॉ. अब्दुल कलाम की राष्ट्र निष्ठ के रूप में दिखाई दे रही है। वह आधुनिक भारत के ऋषि हैं, जो अब अपने जैसे ही अनेक ऋषियों को गढ़ने-निखारने के लिए चल पड़े हैं। अहंकार विहीन प्रतिभा जब अपने चरमोत्कर्ष को छूती है, तो वहाँ ऋषित्व प्रकट होता है। उनमें वही हो रहा है। उनके द्वारा किया जा रहा यह प्रयास, भारत देश के पुनः विश्वगुरु बनने की शुरुआत है।
द्रौपदी के पाँच पुत्रों को सोते समय द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने मार डाला। पाँडवों के क्रोध का ठिकाना न रहा। वे उसे पकड़कर लाए और द्रौपदी के सामने ही उसका सिर काटना चाहते थे।
द्रौपदी का विवेक तब तक जाग्रत् हो गया, बोली, ‘पुत्र के मरने का माता को कितना दुःख होता है, उतना ही दुःख तुम्हारे गुरु द्रोणाचार्य की पत्नी को होगा। गुरु ऋण को, उस माता के ऋण को समझो इसे छोड़ दो।” अश्वत्थामा को छोड़ दिया गया।
शिव का शिवत्व भारतीय कला का आदर्श है। देवाधिदेव महादेव ही भारत देश की संस्कृति एवं साधना के आधार हैं। कला और विद्या के विविध रूप उन्हीं से उपजते हैं। पौराणिक गाथाएँ इस सत्य की बड़ी मोहक प्रस्तुति करती हैं। शिव कल्याण प्रदाता आशुतोष हैं तो महासंहार के अधिष्ठाता महारुद्र भी। वह काल के भी काल महाकाल हैं। उनके अनन्त एवं विराट् स्वरूप के अनेक पहलू भारतीय कला में अनेक ढंग से उभरे एवं संवरे हैं। कलाकारों ने इतिहास के आदिकाल से उन्हें तरह-तरह से चित्रित किया है। यहाँ तक कि उनका सत्य और शिव स्वरूप ही भारतीय कला में सौंदर्य बनकर प्रकट हुआ है।
भारतीय कला में शिव की उपस्थिति हड़प्पा काल से ही देखने को मिलती है। इतिहासकारों ने पुरातात्त्विक साक्ष्यों के बलबूते यह सिद्ध किया है कि सिन्धु घाटी सभ्यता के युग में शिव-पूजा जन-समाज में प्रचलित थी। पुरातत्त्ववेत्ताओं को मोहनजोदड़ो में एक ऐसी मुहर मिली है, जिसमें एक देवता योगी के रूप में उसी तरह आसीन हैं, जिस तरह हम शिव को किसी चित्र में आसन लगाए ध्यानस्थ मुद्रा में देखते हैं। इस देवता के तीन सिर और सींग हैं। चेहरे में रौद्र भाव है। हाथ में कई कड़े और गले में कण्ठाहार है। वे हाथी, चीता, गेंडा और महिष से घिरे हुए हैं। पशुओं से घिरे होने के कारण ही उन्हें पशुओं का स्वामी यानि की पशुपति कहा गया है। दरअसल उनका यह स्वरूप हिन्दू धर्म के उत्तरकालीन शिव से साम्य रखता है। उल्लेखनीय है कि भारतीय कलाकारों ने शिव को यदा-कदा तीन चेहरों में दिखाया है। प्रख्यात् पुरातत्त्ववेत्ता मार्शल ने इस हड़प्पा कालीन देवता को दृढ़तापूर्वक ‘आदिशिव’ माना है। अन्य इतिहासकारों ने भी मार्शल के इस मत को स्वीकार किया है।
शिवभक्तों ने लिंग को शिव का पर्याय माना है। शिव लिंग के रूप में ही सर्वाधिक पूजे जाते हैं। इतिहास में इस सत्य के अनेकों प्रमाण मिलते हैं। कि लिंग पूजा हड़प्पा काल में ही शुरू हो गयी थी। खुदाई के दौरान हड़प्पा से पत्थर के कई लिंग मिले हैं। ऋग्वेद से यह जानकारी मिलती थी कि अनार्यों में लिंग पूजा उन दिनों प्रचलित एवं प्रतिष्ठित थी। सम्भवतः उन दिनों आर्यों में लिंग पूजा का प्रचलन नहीं था। कुछ इसी तरह का विवरण वायु पुराण में भी मिलता है। दक्ष यज्ञ के प्रसंग में मैना एवं दक्ष दोनों ही महादेव की निन्दा करते हुए उन्हें अनार्य देवता ठहराते हैं। दक्ष यज्ञ का यह प्रसंग कुछ संवरे हुए रूप में श्री रामचरित मानस में भी मिलता है।
इतिहासकारों का मानना है कि ईस्वी युग शुरू होने के साथ ही शिव की लिंग रूप की पूजा हिन्दु धर्म में सम्मिलित हो गयी थी। गुप्त काल और इसके बाद इसे पर्याप्त लोकप्रियता मिली। हालाँकि महाभारत के अनुशासन पर्व एवं अन्य पुराणों में लिंग पूजा का उल्लेख है, लेकिन इसका स्पष्ट वर्णन मत्स्य पुराण (गुप्त काल) में मिलता है। इतिहासकार मानते हैं कि मौर्योत्तर काल तक शिव की उपासना उतनी लोकप्रियता नहीं पा सकी थी। बाद में शैव मत को गुप्त, चोल और चालुक्य एवं राष्ट्रकूट शासकों ने खूब संरक्षण प्रदान किया। हालाँकि गुप्त शासक वैष्णव थे, परन्तु उनकी धार्मिक सहिष्णुता की नीति के कारण शैव धर्म का खूब विकास हुआ। और इसका असर कला पर भी पड़ा।
शिव की उपासना-मानवाकृति एवं लिंगाकृति इन दो रूपों में करने का प्रचलन रहा है। प्रारम्भ में शिव के इन रूपों को मन्दिरों के मुख्य गर्भगृह में स्थापित किया जाता था। लेकिन बाद में मन्दिर में सिर्फ लिंग को ही स्थापित करने की प्रथा विकसित हुई। अभी भी शिवपूजा ज्यादातर लिंग रूप में ही होती है। मद्रास के निकट ऐनीगुँटा लिंग कलात्मक कौशल का अद्भुत उदाहरण है। इस लिंग की ऊँचाई पाँच फुट है। लिंग पर द्विबाहु शिव की मूर्ति चित्रित की गई है, जो एक कुबड़े बौने के कन्धे पर खड़े हैं। शिव ने एक हाथ में मेढ़ा और दूसरे हाथ में युद्ध का फरसा थाम रखा है। नागोद में मिली एकलिंग मुखमूर्ति भी उल्लेखनीय है। इस लिंग के ऊपर सिर की आकृति रत्नजटित मुकुट से सजी हुई है।
दूसरी या तीसरी शताब्दी के एक लिंग पर शिव को चतुर्भुज आकृति में दिखाया गया है। शिव के दो हाथ उनकी जटा पर है। मथुरा में एक अन्य पूर्व गुप्तकालीन चतुर्मुख लिंग मिला है। शिव के ये मुख अलग-अलग पट्टियों पर बने हैं। शिव लिंग के ऊपर पाँचवा मुख भी है, जो आसानी से दिखाई नहीं देता। मथुरा में और भी कई शिवलिंग पाए गए हैं। अजमेर संग्रहालय का चतुर्भुज लिंग भी काफी आकर्षक है।
भारतीय कला में शिव का चित्रण सिक्के में भी किया गया है। इंडो सीथियन, इंडोपार्थियन और कुषाण शासकों ने अपने सिक्के में शिव को जगह दी। इन सिक्कों में शिव को मानवीय रूप में चित्रित किया गया है। इनमें शिव को नन्दी बैल के साथ दिखाया गया है। कुषाणकालीन सिक्कों में भगवान् शिव-माता पार्वती के साथ नजर आते हैं। उल्लेखनीय है कि कुषाण शासक बाइमाकेइफिसस शिव का उपासक था।
पुरातत्त्वविदों को मानवाकार रूप में लिंग की कई मूर्तियाँ मिली हैं। सारनाथ संग्रहालय में लोकेश्वर शिव का सिर कलात्मक कौशल का नमूना है। गुप्तकाल में अर्द्धनारीश्वर की मूर्तियाँ भी बनायी गयीं। गुप्तकालीन त्रिमूर्ति-ब्रह्म, विष्णु और महेश के समन्वय को दर्शाती है। इतिहासकारों ने ऐसी मूर्तियों का भी पाया जाना स्वीकारा है, जिनमें शिव और विष्णु साथ-साथ हैं।
अध्यात्मशास्त्रों में शिव को ज्ञान-योग एवं नृत्य का महान् ज्ञाता माना जाता है। कहते हैं शिव ने दक्षिणाभिमुख रूप में यह ज्ञान अपने भक्तों के बीच बाँटा। इसी कारण शिव को महान् ज्ञानी के रूप में चित्रित करने वाली मूर्तियों को ‘दक्षिणामूर्ति’ कहा जाता है। एक ‘दक्षिणामूर्ति’ में शिव एक सार्वभौम शिक्षक प्रतीत होते हैं। उनका एक पाँव जमीन पर है और दूसरा सिंहासन पर। एक हाथ इस प्रकार उठा हुआ है, मानों वह किसी चीज की व्याख्या कर रहे हैं। शिव की ‘संहार मूर्तियाँ’ और ‘अनुग्रह मूर्तियाँ’ भी उल्लेखनीय है। संहारमूर्तियों में शिव को काल, काम, त्रिपुरासुर आदि का संहार करते हुए दिखाया गया है। जबकि अनुग्रह मूर्तियों में उन्हें भक्तों पर कृपा करते हुए दर्शाया गया है।
भारतीय कला में शिव को नटराज अर्थात् नृत्य का सम्राट माना गया है। कहते हैं कि उन्होंने 108 प्रकार के नृत्यों की रचना की। इनमें से ताण्डव नृत्य सबसे ज्यादा चर्चित है। इस ताण्डव नृत्य को दिखाने वाली कई मूर्तियाँ बनी हैं। शिव ने अपने शिष्य तुण्ड को यह नृत्य सिखलाया था। इसीलिए इसका नाम ताण्डव पड़ गया। कलाकारों ने नृत्य मुद्रा में नटराज शिव की मूर्तियाँ गढ़ने में जिस कौशल का परिचय दिया है वह अद्भुत है। खासकर चोलकाल में काँसे की जो मूर्तियाँ बनीं, उन्हें नटराज शिव की श्रेष्ठतम मूर्तियाँ माना गया। कलाकारों ने नटराज शिव की कई तरह की मूर्तियाँ बनायी। कभी उन्हें दो हाथ वाले, तो कभी चार हाथ वाले और कभी बारह हाथ वाले नटराज के रूप में दिखाया गया है। इनमें चार हाथ वाले नटराज की मूर्ति सबसे ज्यादा लोक प्रचलित हुई है। नटराज शिव की ये मूर्तियाँ भारत और विश्व के अनेक संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।
मूर्तियों के अलावा मन्दिरों के रूप में भी शिवतत्त्व भारतीय कला में अभिव्यक्त हुआ। ऐसे शिव मन्दिरों में ऐलोरा का कैलाश मन्दिर, तंजौर का शिव मन्दिर, काँची का कैलाशनाथ मन्दिर, खजुराहो का कण्डारिया महादेव मन्दिर दर्शनीय है। इनमें भी ऐलोरा का कैलाश मन्दिर अद्भुत है।
सातवाहनों के शासनकाल में चट्टानों को काटकर निर्माण की जो कलाशैली विकसित हुई, कैलाश मन्दिर उसकी पराकाष्ठा है। निर्माण कार्य आमतौर पर पहले नींव से शुरू होता है। लेकिन कैलाश मन्दिर का निर्माण कार्य पहले शिखर से शुरू हुआ। इस मन्दिर का प्राँगण 300 फुट लम्बा और 200 फुट चौड़ा है। इसका विमान लगभग 100 फुट ऊँचा है। मन्दिर का परिसर हाथी सिंह जैसे पौराणिक पशुओं पर टिका है। यह मन्दिर रावण द्वारा कैलाश पर्वत के उठाए जाने की कथा पर आधारित है। एक ही चट्टान को काटकर बनाए गए इस मन्दिर में कला की जो विलक्षणता है, उसकी मिसाल पूरे विश्व में कहीं नहीं है। इसे राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने बनवाया था। इतिहासकारों के अनुसार मन्दिर का निर्माण कार्य आठवीं- नौवीं शताब्दी में हुआ। इतिहासकार इस सत्य से सहमत और प्रायः एकमत है कि प्रत्येक युग में शिवतत्त्व की अभिव्यक्ति भारतीय कला में होती रही है। आगे भी इसके विविध रूप- सत्यं शिवं सुन्दरम् का गौरव गान करते रहेंगे।
हर हर महादेव! जय शिव शम्भो!! बम बम भोले!!! की पवित्र गूँज यह जता रही है कि आज शिवरात्रि है। भारत देश का महान् व प्रेरक पर्व। पर्व हमारी साँस्कृतिक चेतना की ज्योति किरणें हैं। इनसे जीवन एवं जगत् में उल्लास, प्रसन्नता, गति, संगति एवं नवप्रेरणा का प्रकाश बिखरता है। हमारी जीवन चेतना जाग्रत् होती है। शिवरात्रि का उद्देश्य भी हमारी चेतना जाग्रत् करना है। देवाधिदेव महादेव की उपासना, व्रत एवं संकल्प के द्वारा आत्मबोध को पाना है। सत्य तो यह है कि इसमें निहित प्रेरणाओं को सभी धार्मिक आस्थाओं वाले किसी न किसी रूप में महत्त्व देते हैं। हाँ उनकी रीति-नीति भले ही स्पष्ट हो या अस्पष्ट। और हो भी क्यों नहीं, जीवन-बोध के बना जीवन का अंधेरा नहीं मिटता।
शिवरात्रि बोधोत्सव है। आत्म चिन्तन एवं आत्म निरीक्षण का सुअवसर है। जीवन में श्रेष्ठ व मंगलकारी व्रतों, संकल्पों तथा विचारों को दुहराने व अपनाने की प्रेरणा देती है शिवरात्रि। आज की भौतिक एवं भोगवादी भागदौड़ की दुनिया में हमारी आत्म चेतना मुर्झाती जा रही है। उसी में चैतन्यता का संचार करने, उसमें निहित सत्य का बोध कराने ही हर साल आती है शिवरात्रि। भारतीय जीवनधारा में आत्मबोध का स्वर सदा से है और सर्वत्र मुखर रहा है। उपनिषदों का उद्घोष है- ‘आत्मनम् विद्धिः’ अर्थात् संसार को जानने के साथ-साथ आत्मा को भी जानो। बिना आत्मज्ञान के मानव जीवन की सच्ची सार्थकता सिद्ध नहीं हो सकती।
आचार्य शंकर ने अपने गहन तप एवं प्रखर आत्म साधना का निष्कर्ष एक ही सूत्र में प्रतिपादित किया है- ‘न ऋते ज्ञानन्मुक्तिः’ यानि कि आत्म ज्ञान एवं सत्य के बोध के बिना मनुष्य बन्धनों से नहीं छूट सकता। बन्धन ही तो जीवन में दुःख के कारण हैं। और ये सभी बन्धन अज्ञान एवं आत्म चिन्तन से आते हैं। जब तक आत्मा कल्याणकारी शिवतत्त्व की ओर प्रवृत्त नहीं होती, तब तक जीवन दुःख, चिन्ता, पीड़ा और अशान्ति से छुटकारा नहीं पा सकता। वेद भी इसी विचार की पुष्टि करता है- ‘नान्यः पन्थाविद्यते अनयाय’ अन्य कोई दूसरा मार्ग नहीं है। मार्ग एक ही है, अपने को जानकर परमेश्वर के सान्निध्य को प्राप्त करना, उसकी शरण में पहुँच जाना और उसकी आज्ञा का पालन करना। उसकी सत्ता को कण-कण और अणु-अणु में अनुभव करना। जीवन को अधर्म, पाप व असत्य से हटाकर सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करना। जीवन में आए हुए दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों के मूल कारण को समझना। उन्हें दूर करने का संकल्प लेना। सोयी हुई आत्मा को जगाने का व्रत लेना। आज 12 मार्च को शिवरात्रि यही कह रही है।
उठो! जागो! अपने जीवन और जगत् को सम्हालो। यह जीवन बड़ा अमूल्य है। इसका अवमूल्यन न करो। प्रकृति परमेश्वर का, शरीर आत्मा का, भौतिकता आध्यात्मिकता का, भोग-योग का समन्वय करके चलो। इसी में जीवन और जगत् में समरसता और समस्वरता आएगी। भारतीय जीवन पद्धति का आधार भी कुछ ऐसा ही है। ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ का सूत्र भी यही बताता है। आज राष्ट्र और विश्व में भौतिकता अतिवाद बनकर रह गयी है। मनुष्य भौतिकवादी, भोगवादी, देहवादी और प्रकृतिवादी बन चुका है। उसी का परिणाम है कि सर्वत्र अशान्ति, कलह, हिंसा, पाप, अधर्म दुःख-दैन्य अपनी चीख पुकार मचाए हुए हैं।
मानवता क्षत-विक्षत और घायल होकर कराह रही है। मनुष्य केवल आकृति से मनुष्य रह गया है। उसकी प्रकृति तो राक्षसी हो चली है। चारों ओर अनैतिकता, आतंक, अराजकता और अनुशासनहीनता का बोल-बाला है। व्यक्ति, परिवार, समाज एवं राष्ट्र हर कहीं दरारें ही दरारें हैं। हर कहीं टूटन और बिखराव है। मानवीय दृष्टि एवं जीवन मूल्य खोजने पर भी नहीं मिल पा रहे हैं। इन सबका मूल और मौलिक कारण यही है कि हमने आत्म पक्ष को भुला दिया है। हम मात्र शारीरिक सुख-साधनों और भौतिक उन्नति को जीवन का चरम लक्ष्य मान बैठे हैं। मदान्ध और स्वार्थान्ध होकर बस दौड़ जा रहे हैं। कहाँ जाना है? कहाँ पहुँचना है? किसी को कुछ पता नहीं।
सब तरफ बेहोशी और नशे का आलम है। आत्मा न जाने कब से भूख से बेहोश पड़ी है। हाँ, वह भूखी है। आत्मा भी भोजन माँगती है। वह भी अपने मूल शिव के पास जाना चाहती है। जैसे बालक अपने माता-पिता की गोद में पहुँचकर निर्भय और शान्त हो जाता है, ऐसे ही आत्मा भी परमात्म देव परम शिव की गोद में पहुँचकर भय-ताप से मुक्त हो जाना चाहती है। मनुष्य बाहर की दुनिया में जितनी भाग-दौड़ करता है, उतना ही वह आत्मा के आनन्द से दूर होता जाता है। धन से खरीदा और पाया जा सकता है, वह तो बस देह, इन्द्रिय एवं संसार के सुख-साधन हैं। इसीलिए आज की दुनिया अन्दर से खोखली हो चली है। इस खोखलेपन को भरने के लिए शराब, जुआ, सिनेमा, क्लब, पार्टी की ओर दौड़ तेज हुई है।
मगर वासनाओं की अन्तहीन दौड़ भोगों की प्यास को और भड़काती व बढ़ाती है। मनुष्य जितना अधिक साँसारिक विषय भोगों को पाता और भोगता जाता है, उतनी ही और.......और........और......की प्यास तेज होने लगती है। जीवन मृगतृष्णा और भोग संग्रह की धूप-छाँव बनकर रह जाता है। जीवन के अन्त में पता चलता है, जीवन के बोध के बिना सारी दौड़ बेकार रही। शिवरात्रि हमें, हम सबको यही बताने आयी है कि बहुत खो चुके, बहुत सो चुके, अब और न खोओ, अब और न सोओ। आज संकल्प लो अपने जीवन को पवित्र बनाने का, उसे ऊँचा उठाने का। आज और अभी संकल्प करना होगा, आत्म ज्ञान को जाग्रत् करने का, आचार-विचार को सुधारने का। जो इस शरीर का सत्य और अमूल्य तत्त्व आत्मा है, उसे जानने का।
शिव के सनातन अंश उस आत्मा के निकल जाने पर यह शरीर शव बनकर रह जाता है। आत्मा के रहते हुए ही इस शरीर में गति, सुन्दरता और आकर्षण है। सम्बन्धों में मधुरता है। उस चेतन आत्मा को अपने आराध्य, अपने सर्वस्व शिव से मिलना है। उस शिव रूप परमेश्वर से बिछुड़े हुए इसको न जाने कितने युग बीत गए। कैसी यह विचित्र विडम्बना है कि एक ही मकान में युगों से साथ-साथ रह रहे हैं, लेकिन कभी बात नहीं होती, कभी मुलाकात नहीं होती। इस शरीर रूपी मकान में आत्मा-परमात्मा दोनों का ही वास है। इस शरीर में दोनों ही हैं। किन्तु साथ रहने पर भी, आत्मा अपने प्रिय शिव से बात नहीं कर पाती, मिल नहीं पाती है। क्योंकि मिलने की चाह नहीं है। मिलने के लिए अधीरता व आतुरता नहीं है। दर्द व बेचैनी नहीं है। हो भी कैसे, वह तो अज्ञान व जड़ता के घोर अंधेरों में अपने स्वरूप को भुला चुकी है। अब तो उसे झूठ-प्रपंच व विषय भोग की चर्चा व चिन्तन अच्छा लगने लगा है, अपने शिव से इस आत्मा ने मुख मोड़ लिया है। उसे अब शिव से प्यार नहीं रहा, जरूरत नहीं रही। स्थिति तो यह है कि उसने भगवान् शिव को जीवन से निकाल दिया है।
शिवरात्रि- शिव से मिलने की रात्रि है। जिसमें आत्मा का मंगलकारी शिव से मिलना होता है। इस गहरे मिलन में परस्पर संवाद होता है। बिछुड़ों का योग होता है। फिर नींद कहाँ? पहले आत्मा अपने परम प्रिय शिव से मिलन की तैयारी करती है। साफ स्वच्छ व निर्मल बनती है। सारा दिन इस मिलन की प्रतीक्षा में गुजारती है। कीर्तन, पूजा-पाठ में दिन बिताती है। प्रायश्चित से अपने पापों को धोती है, रोती है। तब कहीं जाकर रात्रि में शिव से मिलन होता है।
यही भाव इस महापर्व की साँस्कृतिक-धार्मिक एवं आध्यात्मिक चेतना है। इसी से जीवन में चैतन्यता का संचार होता है। पर आज यह संचारी भाव कहीं रहा नहीं। पर्व के पीछे जो मूल दृष्टि-चिन्तन व विचार निहित थे और हैं उन्हें हमने खो दिया है और खोते जा रहे हैं। शिवरात्रि में समायी आत्म निर्माण, आत्म-सुधार एवं आत्म-उत्थान की चेतना आज के दिन मच रहे धूम-धाम, उठे रहे शोर-शराबे, भाग-दौड़कर रही भीड़ के जलसे-जुलूस और कोलाहल में कहीं नजर नहीं आ रही। यह शिव के भक्त की नहीं शिव से विभक्त की पहचान है। सच्चा शिवभक्त तो वह है, जिसकी अन्तर्चेतना में आज कल्याणकारी संकल्प के स्वर मुखर हो। जो आज शिव के मिलन के लिए अपने आत्मसुधार का एक नया पग आगे बढ़ाये। जिसमें पाप-अधर्म, बुराई को छोड़ने की ललक, बेचैनी, दर्द, छटपटाहट की कसक तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतम हो उठे। आज शिवरात्रि के पुण्य पर्व पर शिव स्मरण करते हुए परखे अपनी शिव भक्ति को और कुछ ऐसा कर दिखाए कि औघड़दानी महेश्वर अपने वरदान देने के लिए मचल उठे।
जॉन सोवस्की के व्यक्तित्व में अनूठा जादू था। समस्त मानवीय गुण उसके जीवन में अपनी आभा बिखेरते थे। वीरता उसे विरासत में मिली थी, विद्वता एवं विचारशीलता उसने अर्जित की थी। उसका जन्म सन् 1624 में पोलैण्ड के एक प्रतिष्ठित खानदान में हुआ था। यह वही खानदान था, जिसमें कभी एक ऐसा योद्धा पैदा हुआ था, जो रूस के राजा को बन्दी बनाकर वारसा ले आया था। अतः यह स्वाभाविक था कि सोवस्की को वीरता विरासत में मिलती।
सोवस्की जितना बहादुर था, उतना ही अध्ययनप्रिय भी था। प्रचलित साहित्य के अलावा अन्य देशों की ज्ञान सम्पदा भी उसे लुभाती थी। वह कहा करता था कि जो विभिन्न महापुरुषों के चिन्तन के साथ रहते हैं, वे समझो कि उन्हीं के साथ रहते हैं। वह यदा-कदा अपने समवयस्क मित्रों से कहा करता, कि मेरा एक अदृश्य परिवार है। जिज्ञासा करने पर वह स्पष्ट करता कि जिन लोकोत्तर व्यक्तियों के विचारों को मैं पढ़ता हूँ, वे भी मेरे परिवार के सदस्य हैं। मेरे जीवन के अभिन्न अंग हैं। अपने विचारों के रूप में सदा ही मेरे साथ रहते हैं। राह भटकने पर मुझे जीवन का मार्ग दिखाते हैं।
अध्ययनप्रिय सोवस्की सत्संगप्रिय भी था। कैथोलिक साधुओं के प्रति वह अखण्ड श्रद्धा से अभिभूत था। उसकी साधु संगत ने उसे ईश्वर निष्ठ बना दिया था। साधना उसके जीवन का अभिन्न एवं अविभाज्य अंग बन गयी थी। जीवन के सत्य को जानने के लिए वह घण्टों एकान्त में बिताया करता। इस क्रम में उसने अपनी समूची जीवनचर्या को तपश्चर्या बना डाला था। उससे जो भी मिलता, उसके जीवन से प्रभावित हुए बिना न रहता। उसके जीवन में एक ओर सदाशयता, दयालुता एवं करुणा छलकती थी, तो दूसरी ओर उसकी वीरता के प्रचण्ड तेज के सामने दृष्टि ठहर नहीं पाती थी।
वह सत्रहवीं सदी के मध्य का समय था। उन्हीं दिनों एक ऐसी घटना घटी जिसने उसके सुव्यवस्थित जीवन में ज्वार ला दिया। उसकी विचारशीलता उद्वेलित हो उठी और उसकी वीरता की तेज लपटों की चमक ने समूचे यूरोप को प्रकाशित कर दिया। यह वही समय था जब तुर्की के लोग इस्लाम के नाम पर समस्त जन-जीवन को आतंकित करने में जुटे थे। प्रेम और भाई-चारे के धर्म इस्लाम को उन्होंने आतंक एवं बर्बरता का पर्याय बना दिया था। उनके जेहाद के जुनूनी नारे से समूचा यूरोप थर्रा उठा था।
सन् 1672 ई. में तुर्कों ने पोलैण्ड की शासन-सीमा में आने वाले उक्रेन पर हमला कर दिया। यह हमला इतना अचानक एवं भयानक था कि पोलैण्ड वालों से कुछ भी करते न बना। नगर और ग्राम एक साथ चीख उठे। उस समय सोवस्की अपने अध्ययन-चिन्तन एवं साधना में डूबा हुआ था। हालाँकि इन दिनों भी उसके युद्धाभ्यास का सिलसिला यथावत था। और इसी कारण उसे लोग ग्रैंड मार्शल भी कहते थे। ऐसी स्थिति बनने पर सबकी निगाह अपने ग्रैंड मार्शल पर जा टिकी। नगरवासी-ग्रामवासी सभी झुण्ड के झुण्ड उसके पास पहुँचने लगे।
साधक-साधु और वीर सोवस्की करुणा और क्रोध से भर उठा। उसे आश्चर्य हुआ मजहब की इस जुनूनी व्याख्या पर, जो तुर्की के लोग कर रहे थे। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि समूचे विश्व में यदि इस्लाम का प्रचार करना है, तो इसमें तलवार की क्या जरूरत है। भला कैसे कोई उस मजहब को मानने के लिए तैयार होगा, जिसके अनुयायी आतंकवादी और बर्बर हो। जो औरतों को विधवा बनाने, बच्चों को अनाथ करने, मजलूमों को सताने और निर्दोषों को मारने में यकीन रखते हों। वह सोचने लगा कि अरे इस्लाम का ही प्रचार करना है तो प्रेम और भाईचारा फैलाओ। पहले अपने खुद के जीवन में पैगम्बर मोहम्मद की शिक्षाओं को अपनाओ, फिर उन बातों को दूसरे भी मानेंगे। पर दूसरे ही पल उसके दिमाग में आया कि आतंकवादियों को भला मजहब की इन बारीक बातों की समझ कहाँ? वे तो सिर्फ तलवार की धारदार भाषा ही समझते हैं।
अपने इसी सोच-विचार और निश्चय के साथ जान सोवस्की ने आनन-फानन फौजें संगठित की। और तुर्कों का मुकाबला करने के लिए चल पड़ा। तब तक तुर्क उक्रेन पर अधिकार जमा चुके थे। अब तुर्क फौज पोलैण्ड की राजधानी की ओर बढ़ रही थी। सोवस्की ने उसे रास्ते में रोका। घमासान लड़ाई हुई, लेकिन जीत किसी की भी नहीं हुई। न तो तुर्क आगे बढ़कर अपना झण्डा पोलैण्ड की राजधानी में फहरा सके और न सोवस्की उक्रेन को मुक्त करा सका। परन्तु उसके हौसले अडिग थे। उसने घोषणा की- यह युद्ध मानवता के प्रेमियों और आतंकवादी बर्बरता के बीच है। इसे निर्णायक होना ही है। और जब तक आतंकवादियों के हौसले पस्त नहीं हो जाते मैं इसी तरह युद्ध के मैदान में डटा रहूँगा।
दृढ़ प्रतिज्ञ सोवस्की पाँव अड़ाकर उक्रेन की सीमा पर डट गया और समय तथा अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। कभी छुट-पुट तो कभी तेज संघर्ष चलता रहा। ऐसे ही एक वर्ष बीत गया। एक वर्ष बाद उसे मौका मिला। और उसने तुर्कों से उक्रेन को मुक्त करा दिया। तुर्क शान्ति-सन्धि पर हस्ताक्षर करने पर मजबूर हुए। पोलैण्ड में चारों ओर इस मुक्तिदाता की जय-जयकार गूँज उठी। देशवासियों ने इस वीर को अपने सर-आँखों पर बिठा लिया और उसे अपना राजा चुना। शानदार समारोह के साथ उसकी ताजपोशी हुई। अगले दस वर्षों तक सोवस्की शान्तिपूर्वक अपने देश के विकास कार्यों में जुटा रहा। तुर्क भी जैसे-तैसे अपनी सन्धि की शर्तों का पालन करते रहे। हालाँकि उनकी नीति और नियति दोनों ही सुधरी न थी।
सन् 1683 के बसन्त के मौसम की सुबह अचानक यह खबर फैली कि दो लाख की खूँख्वार फौज के साथ तुर्क फिर से समूचे यूरोप में इस्लाम का प्रचार करने चल पड़े हैं। जब तक लोग इस खबर की सच्चाई का पता करें और सावधान हों, तुर्क सैनिक तूफान की तरह बढ़ते हुए यूरोप में घुस आए। गाजर-मूली की तरह लोगों को काटते, घरों को फूँकते, फसलों को रौंदते और जेहादी नारे लगाते हुए तुर्क सैनिक वियाना तक आ धमके। और देखते ही देखते इस्लाम का झण्डा गाड़ दिया। समूचे आस्ट्रिया पर आतंकवादी हुकूमत छाने लगी। रोज नए-नए फतवे और फरमान जारी होने लगे।
उस समय पूरे यूरोप में ईसाई धर्म का बोलबाला था। तुर्क सैनिकों के इस मजहबी उन्माद से पूरा यूरोप और ईसाई जगत् काँप उठा। ईसाई धर्म के सर्वेसर्वा पोप की घबराहट बढ़ गयी। उसकी नींद गायब हो गयी, बेचैनी बढ़ गयी। उसने राजाओं और क्षत्रपों का आह्वान किया- इस्लाम की तलवार का मुकाबला तलवार से करो....., वीर सपूतों आगे आओ और ईसाइयत की रक्षा करो। परन्तु पोप की इस छटपटाहट भरी पुकार सभी ने सुनी-अनसुनी कर दी। कोई भी आगे न आया।
विचारशील सोवस्की की समूची स्थिति पर नजर थी। वह जानता था कि धर्म तो शाश्वत है, इसे भला कौन नष्ट करेगा। इस्लाम बनाम ईसाइयत की बात भी उसे हास्यास्पद लगी। क्योंकि वह जानता था कि जो मौलिक तत्त्व ईसाइयत में है, पैगम्बर मोहम्मद ने भी इस्लाम में उन्हीं मौलिक तत्त्वों का उपदेश अपनी परिस्थितियों के अनुरूप अपनी भाषा में दिया है। उसे मालूम था कि झगड़ते धर्म नहीं बल्कि मनुष्य के अहंकार और दुर्बलताएँ ही आपस में टकराती रहती हैं। परन्तु अभी तो प्रश्न आतंकवादी बर्बरता से मानवता और मानवीय मूल्यों की रक्षा का था। इस प्रश्न के समाधान के लिए सोवस्की ने केवल अठारह हजार जाँबाज सैनिकों की फौज ली। और तुर्कों की विशाल सेना का मुकाबला करने के लिए बढ़ चला। सोवस्की के सामने तुर्क ठहर नहीं सके। उन्हें वियाना से भागना पड़ा। वियाना की यह मुक्ति पूरे यूरोप के लिए मुक्तिदायी संजीवनी साबित हुई। उसी के साथ सोवस्की पूरे यूरोप का वीर शिरोमणि बन गया।
सम्मान और सत्ता के शीर्ष पर पहुँच कर भी सोवस्की की साधुता और साधना यथावत बनी रही। वह सच्चा साधक था। उसके हृदय में सत्य की सच्ची लगन थी। वह अपनी अनुभूति को शब्द देते हुए कहता- धर्म ईसाई हो अथवा इस्लाम या फिर कोई और, वह वस्तुतः प्रेम, त्याग और सेवा के तीन शब्दों में सिमटा है। इन तीन के अलावा जहाँ कोई अन्य विरोधी भाव हैं, वहाँ न तो धर्म रह सकता है और नहीं धार्मिकता पनप सकती है। धर्म साधना के इस सच्चे साधक की मृत्यु भी बड़े ही धार्मिक ढंग से हुई। वह आराम कुर्सी पर निश्चिन्त लेटा हुआ प्रभु से प्रार्थना करने में लीन था। उसकी आँखें दीवार पर लटके ईसा के क्रास पर लगी थी। प्रार्थना में इस तरह लीन सोवस्की की चेतना सदा के लिए अपने प्रभु में लीन हो गयी। आरामकुर्सी पर बस उसका शरीर पड़ा रहा। उस दिन सन् 1696 का ईस्टर था- ईसाइयों का पवित्र दिन।
ईसा के शत्रु उनकी जान के ग्राहक बने हुए थे। शिष्यों ने सलाह दी, हमें येरुशलम छोड़कर कहीं अन्यत्र चल देना चाहिए।
ईसा सहमत नहीं हुए और कह, “सत्य को न तो डरना चाहिए और न भागना। परीक्षा की कसौटी से तो वह और अधिक निखरता है।”
‘बड़ा दानी बनता है तू, चल मुझे अभी इसी क्षण भोजन करा’ - कटु वचन बोलने वाला वह साधु क्रोध की साकार मूर्ति नजर आ रहा था। परन्तु उसके इस स्वभाव के विपरीत महर्षि मुद्गल शान्ति के स्वरूप थे। वह बड़े ही विनम्र स्वर में बोले- आपका स्वागत है तपस्वी श्रेष्ठ। हालाँकि उसका स्वागत करते हुए वह सोच रहे थे कि उनकी कुटिया पर इस तरह कभी कोई क्रोधित होकर नहीं आया। फिर भी ‘अतिथि देव भव’ के इस श्रुति वाक्य का चिन्तन करते हुए वह आगन्तुक साधु के भोजन उपक्रम में व्यस्त होने लगे।
महर्षि मुद्गल यज्ञ-परायण और वीतराग भाव से अपनी घास-फूस की कुटिया में तप कर रहे थे। जितेन्द्रिय एवं परम तपस्वी महर्षि शिलोञ्छवृत्ति से अपना जीवन यापन करते थे। पत्नी, पुत्र एवं पशु-पक्षियों से युक्त अपने कुटीर में वह अभाव एवं संकट विहीन शान्तिपूर्वक रह रहे थे। संसार की विषय-वासना से कोसों दूर रहने वाला उनका परिवार किसानों के खेत-खलिहानों में चला जाया करता था। और जो अन्न-कण इधर-उधर फैले रहते थे, वह उन्हें इकट्ठा कर लेते। इस वृत्ति से वह केवल उतने ही अन्न का संग्रह करते, जितने से वह अपने परिवार समेत केवल पन्द्रह दिनों तक एक समय पेट भर भोजन पा सके। इसमें भी बची अन्न राशि से वह अतिथि सत्कार कर लिया करते। समस्त प्राणि मात्र के प्रति ईर्ष्या व द्वेष भाव से रहित महर्षि शुक्ल पक्ष में दर्श और पौर्णमास यज्ञ का नियमित अनुष्ठान करते थे। उनके इस यज्ञ में देवराज इन्द्र स्वयं साकार रूप में उपस्थित होकर अपना भाग ग्रहण करते और मुनिवर को प्रणाम-प्रणिपात कर धन्य होते।
महर्षि का तपोलीन जीवन इस भाँति चल रहा था। पौर्णमास यज्ञ करने के बाद वह सभी अतिथियों को भोजन कराते, उसके पश्चात् वह स्वयं भोजन करते। उन पर यह भगवत्कृपा ही थी कि एक द्रोण धान से बने अन्नदान के साथ अतिथियों के आगमन के बावजूद वह अन्न घटता नहीं था। उन्हें कभी अभाव का अनुभव नहीं हुआ। वेदज्ञ ब्राह्मणों, अतिथियों, देवों को भोजन कराने के बाद भी उनके छोटे से परिवार के लिए भोजन बचा ही रह जाता। उनके दान-धर्म एवं तप की अक्षय कीर्ति समूचे भूमण्डल में फैल जाने के बावजूद महर्षि की विनम्रता यथावत बनी रही।
यद्यपि उनकी इस अक्षय कीर्ति से देव और ऋषि भी ईर्ष्या से व्याकुल होने लगे थे। सहज क्रोधी ऋषि दुर्वासा भी इस ईर्ष्या की बयार से अछूते न रहे। उन्हें यह सहन नहीं हो पाया, उनके तप के सामने किसी अन्य ऋषि के तप के महात्म्य की चर्चा हो। महर्षि मुद्गल की यशोगाथा से उद्वेलित उत्तेजित ऋषि दुर्वासा ने सोचा, कि देखता हूँ कौन कितना दान-धर्म व्रती है? अभी लेता हूँ जाकर परीक्षा। बेकार का तपस्वी-दानी होने का ढोंग फैला रखा है। देखते हैं कौन-कितना टिक पाता है मेरे सामने।
महर्षि मुद्गल की साधना में विघ्न डालने की आकाँक्षा से सब कुछ छोड़-छाड़ क्रोध में फुंफकारते दुर्वासा अवधूत वेश में चल पड़े थे। और उन्होंने महर्षि मुद्गल की कुटिया के द्वार पर क्रोधित स्वर में भोजन देने का आग्रह किया। उनकी सोच थी, कि अब तो सारे अतिथि जा चुके हैं और इसके पास अन्न होगा नहीं। ऐसे में यह मुझे कहाँ से भोजन करा पाएँगे। एक पल में धराशायी हो जाएगा दानी होने का ढोंग। ऋषि दुर्वासा अपने ही ख्यालों में डूबे थे।
तभी उनके कानों में महर्षि मुद्गल की आवाज पड़ी, आइए ऋषिश्रेष्ठ! भोजन तैयार है। यह कहते हुए महर्षि दुर्वासा के चरणों में झुक गए। क्षण भर में उन्होंने आचमनीय अर्घ्य दिया और पूजन की सामग्री दी। फिर अतिथि व्रती महर्षि ने दुर्वासा को भोजन के लिए बिठाया। यज्ञोपरान्त जो कुछ भोजन सामग्री उन्होंने अपने लिए बचाकर रखी थी, वह उन्हें परोस दी। सारा खाना झटपट खत्म करके क्रोधी दुर्वासा ने आँखें तरेरी, अभी मेरी क्षुधा शान्त नहीं हुई है, और भोजन लाओ। धैर्यवान महर्षि ने उन्हें फिर से भोजन परोसा। दुर्वासा ने अपनी जिद के चलते महर्षि के हिस्से का ही नहीं उनकी पत्नी एवं पुत्र के हिस्से का भी भोजन खा लिया। इतना ही नहीं अपनी थाली के अवशिष्ट-उच्छिष्ट को अपनी देह पर मल लिया। और बड़बड़ाते हुए वापस लौट गए।
अतिथि व्रतधारी महर्षि के मन में दुर्वासा के प्रति गहरी श्रद्धा उमड़ आयी। उन्होंने भाव विभोर होकर सोचा, चलो प्रभु की कृपा से अनुष्ठान पूर्ण हुआ। हालाँकि उन्हें अन्नाहार नहीं मिल सका, पूरे परिवार को भी भूखे रहना पड़ा। परन्तु अतिथि की सन्तुष्टि में महर्षि प्रसन्न और सन्तुष्ट थे। इसी आनन्द से भरे उन्होंने और उनकी पत्नी व पुत्र ने यह पर्व व्रत रखकर ही समाप्त किया।
इसके बाद दूसरा पर्व आया। महर्षि मुद्गल की कुटिया फिर से यज्ञीय वैभव से भर गयी। आज पुनः देवों और वेदज्ञ ब्राह्मणों ने भोजन किया। निर्विघ्न यज्ञ पारायण का क्षण आ पहुँचा। महर्षि अपने परिवार के साथ भोजन के लिए बैठने वाले ही थे कि ऋषि दुर्वासा पुनः पिछली बार की तरह आ धमके। फिर से वही कथा दुहराई गयी। महर्षि के बचे हुए सारे भोजन को खाकर-दुर्वासा डकार लेते हुए चले गए।
परम तपस्वी मुद्गल के मुख पर वेदना के धब्बे अभी भी न आए। निराहार रहकर उन महामनस्वी ने पुनः अन्न के दानों का संग्रह करना प्रारम्भ कर दिया। अनाहार की पीड़ा उन्हें विचलित न कर पायी। उनकी शान्त अन्तर्चेतना में किसी भी तरह की ईर्ष्या, क्रोध या फिर किसी दूसरे विकार की कोई तरंग न उपजी। वह फिर से अपनी शिलोञ्छवृत्ति पालन में निरत हो गए। लेकिन अभी उनमें अधिक अन्न संग्रह की कोई चाह न जगी। हालाँकि प्रत्येक पर्व पर ऋषि दुर्वासा का आगमन यथावत था। वह महर्षि की परीक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे कि देखें कब तक उनका हृदय विचलित नहीं होता है। अपनी इसी प्रतिबद्धता के साथ वह लगातार छः पर्वों तक आते रहे और महर्षि मुद्गल को सपरिवार निराहार रहना पड़ा। किन्तु उनकी साधना भंग न हुई। दुर्वासा ने उन्हें कभी विकारमय न पाया। निर्मल अन्तःकरण वाले महर्षि बड़े ही विनम्र भाव से दुर्वासा का अतिथि सत्कार करते रहे। उनके कटु-तिरस्कार पूर्ण वचनों को भी उन्होंने अतिथि द्वारा लाई गयी भेंट के रूप में ही उत्साहपूर्वक स्वीकार किया।
सहनशीलता से परिपूर्ण, ईश्वर भक्ति से ओत-प्रोत चित्त महान् से महान् आपदाओं पर विजय पा लेता है। ऐसा ही कुछ महर्षि के साथ हुआ। उनके व्यवहार ने क्रोध की साकार मूर्ति दुर्वासा के पाषाण हृदय को भी पिघला दिया। सहिष्णुता की विजय हुई, दुर्वासा दयार्द्र हो उठे। उन्होंने महर्षि से दया भरे वचनों से कहा- महर्षि तुम्हारे समान ईर्ष्या रहित दानी इस धरती पर कोई अन्य नहीं हो सकता। भूख बड़े से बड़े धर्मज्ञानियों के ज्ञान का हरण कर लेती है। उनका धैर्य चुक जाता है। फिर परिश्रम से उपार्जित धन और अन्न का दान कर पाना अति कठिन होता है। किन्तु तुमने यह कठिन कार्य बड़े ही सहज भाव से कर दिखाया है। अपने धैर्य, शुद्ध आचरण एवं श्रेष्ठतम कर्मों से तुमने समस्त पुण्य लोकों को जीत लिया है। अपने श्रेष्ठ तप से तुम स्वर्ग के शाश्वत अधिकारी हो। मेरा आशीर्वाद है, कि तुम सशरीर स्वर्ग जाओगे।
विस्मय से भरे महर्षि मुद्गल दुर्वासा की इस वाणी को सुनते रहे। और सचमुच ही थोड़े ही क्षणों के पश्चात् देवों के प्रभाव से सभी के देखते-देखते कुछ देवदूत विमान सहित वहाँ उपस्थित हो गए। यह दिव्य विमान विलक्षण था। धरती पर देवों के इस अद्भुत विमान को उतरते हुए देख कर सभी चकित थे। देवदूतों ने महर्षि से कहा- हे तपस्वी श्रेष्ठ! आपने अपने कठोर तप से इच्छाधारी इस विमान को प्राप्त कर लिया है। आपने अपने अद्भुत तप और दान से परम गति प्राप्त कर ली है और इसलिए आप इसी शरीर से स्वर्ग में प्रवेश करने के अधिकारी हैं।
किन्तु परम तपस्वी निराभिमानी महर्षि देवदूत के इन वचनों को सुनकर वैसे ही संयत रहे। उन्होंने देवदूत का श्रद्धाभाव भरा स्वागत किया और विनम्र वाणी में पूछा- ‘भद्र, मैं स्वर्ग में रहने वालों की तपस्या, स्वर्ग के सुख और स्वर्ग में रहने से कौन-कौन से दोष होते हैं? इन सबके बारे में ज्ञान प्राप्त करके ही मैं यह निर्णय कर सकूँगा कि स्वर्ग जाऊँ या नहीं? क्योंकि तपस्या की इस कर्मभूमि धरती को मैं स्वर्ग-सुख की लालसा में क्षण भर के निश्चय से नहीं त्याग सकता।’
देवदूत हैरान थे। उन्हें अचरज हो रहा था कि सभी जीव जिस स्वर्ग के एक क्षण भर के सुख को पाने के लिए अनगिन यत्न करते हैं। उसी स्वर्ग का आग्रह पूर्ण निमन्त्रण मिलने पर भी ये महर्षि कोई उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। विवश देवदूतों ने अन्ततः महर्षि का आग्रह स्वीकार करके उन्हें स्वर्ग के बारे में बताना शुरू किया-
हे तपोधन! जिसे स्वर्ग लोक कहा जाता है वह यहाँ से पर्याप्त दूर ऊपर की ओर है। वहाँ तक जाने का समूचा रास्ता अति उत्तम है। हे ऋषिश्रेष्ठ! जिन्होंने उत्तम कोटि की तपस्या नहीं की, जिन्होंने महायज्ञों का आयोजन नहीं किया, जो नास्तिक एवं ईश्वर विमुख हैं, वे इस पुण्य लोक में प्रवेश नहीं पा सकते। हे दिव्यात्मा! आपकी भाँति धर्मात्मा, मन और इन्द्रियों को वश में करने वाले, शान्त, संयमी, दान एवं धर्म में निरत लोग वहाँ प्रवेश पाते हैं। उस स्वर्ग लोक में ही देव, सिद्ध, विश्वदेव, गंधर्व तथा अप्सराओं के अलग-अलग लोक हैं। ये सभी लोक तेजोमय एवं मंगलकारी हैं।
हे तपस्वी श्रेष्ठ मुद्गल! स्वर्ग में भूख, प्यास, ग्लानि, शीत, उष्णता, भय तथा शोक आदि विकारों के लिए कोई स्थान नहीं है। वीभत्स, अशुभ एवं अमंगल की वहाँ छाया तक नहीं है। हे महर्षि! जो अपने सत्कर्मों से स्वर्ग पर विजय पा चुके हैं, वे वहाँ अति सुखपूर्वक निवास करते हैं। सभी तरह की चिन्ताओं, परेशानियों एवं दुःखों से सर्वथा मुक्त होता है उनका जीवन। यहीं अन्य सभी देव लोकों से ऊपर ब्रह्मलोक भी है, जो अत्यन्त तेजोमय एवं मंगलकारी है। इस लोक में अपने शुभकर्मों से शान्तात्मा ऋषि-मुनि जाते हैं। यहीं देवों के आराध्य ऋभुगण रहते हैं। स्वर्ग के देवता भी इन ऋभुगणों की परमगति की कामना करते हैं। यह परमसिद्धि की अवस्था है, जो परम दुर्लभ है। आपने अपने तप और दान से इसे प्राप्त किया है। अब आप वहाँ चलकर इसका उपयोग करें।
विचारमग्न महर्षि ने उस देवदूत को टोकते हुए कहा- भद्र अभी तक आपने स्वर्ग के सुख-संसाधनों का वर्णन किया है, इसके अवगुणों की ओर भी संकेत करें। मुझे यह भी बताएँ कि क्या यहाँ कठोर एवं उग्र तपस्या सम्भव है अथवा नहीं।
महर्षि आपका प्रश्न सर्वथा उचित है। यह सत्य है कि स्वर्ग में दोष भी है। हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! यहाँ केवल जीवात्म अपने श्रेष्ठ कर्मों को भोगता है। यहाँ उसे किसी भी नए कर्म करने का अवकाश नहीं है। अपने पुण्यों को गंवाकर ही कोई स्वर्ग का सुख पाता है। पुण्यों के समाप्त होने पर उसे पुनः धरती पर वापस लौटना पड़ता है। पुण्य क्षीण लोगों के स्वर्ग भ्रष्ट होने पर उनकी चेतना लुप्त होने लगती है। स्वर्ग के सभी लोकों का सबसे बड़ा दोष यही है कि यहाँ कोई हमेशा-हमेशा नहीं रह पाता। स्वर्ग में तप करना सम्भव नहीं है महर्षि। तपोभूमि एवं कर्मभूमि तो यह धरती ही है। और यही स्वर्ग फलभूमि भी है।
देवदूतों की ये बातें सुनकर महर्षि कुछ पलों के लिए अपने गहन विचारों में निमग्न हो गए। और फिर देवदूत को प्रणाम करते हुए उन्होंने विनम्र स्वर में कहा- हे महाभाग! मैं आपको भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ। अब आप सुखपूर्वक लौट जाएँ। मुझे स्वर्ग की कोई कामना नहीं है।
महर्षि के इन वचनों को सुनकर हतप्रभ देवदूतों ने कहा- क्यों ऋषिश्रेष्ठ? मैंने तो आपकी इच्छा के अनुसार स्वर्ग के बारे में सम्पूर्ण विवरण प्रस्तुत किया है। देवदूतों की आशंका को निरस्त करते हुए महर्षि कहने लगे- तुम्हारा कोई दोष नहीं है। परन्तु मैं ऐसी किसी भी जगह नहीं जाना चाहता, जहाँ पर तप करना सम्भव नहीं है। मुझे महान् दोषों से भरे हुए स्वर्ग का एक क्षण भी स्वीकार नहीं है।
विनम्र भाव से देवदूतों को वापस कर महर्षि पुनः कठोर तप करते हुए उस मार्ग पर चल पड़े, जो सनातन और अविनाशी प्रभु का धाम है। जहाँ न शोक है, न पीड़ा और नहीं पतन का भय। जहाँ सत्-चित्-आनन्द की शाश्वत चेतना आलोकित है। समत्व बुद्धि से भरे महर्षि का जीवन और भी अधिक प्रखर तप से प्रकाशित हो उठा। निन्दा-स्तुति में समान महर्षि के लिए स्वर्ग और धूलिकणों में कोई अन्तर न था। अन्ततः तपोनिष्ठ महर्षि ने देवों को भी दुर्लभ ईश्वरभक्ति एवं मोक्ष की परमोच्च अवस्था की प्राप्ति की। उनकी कथा गाथा आज भी सभी लोकों में संव्याप्त होकर इस सत्य का उद्घोष करती है- कि तप ही श्रेष्ठ है! तप ही श्रेष्ठ है!! तप ही श्रेष्ठ है!!! तप से श्रेष्ठ और कहीं कुछ भी नहीं।
परमार्थ मानव जीवन का एक अत्यंत आवश्यक धर्म-कर्त्तव्य है। इसकी उपेक्षा करते रहने से अपनी आध्यात्मिक पूँजी घटती है, आत्मबल नष्ट होता है और अंतर्चेतना दिन-दिन निम्न स्तर की बनती चली जाती है। यही तो पतन है।
-परमपूज्य गुरुदेव
जीवन-मरण के चक्र की स्वसंचालित प्रक्रिया ऐसी है कि व्यक्ति निश्चित अवधि पूरी कर इस संसार-सागर से प्रयाण कर जाता है और उसकी अगली कड़ी के रूप में पुनः जन्म धारण कर उस शृंखला को अक्षुण्ण बनाए रहता है। इस क्रम में अक्सर व्यक्ति अपने पूर्व जन्मों को विस्मृत कर जाता है और वर्तमान जन्म ही उसे प्रथम और अंतिम प्रतीत होता है, पर कई बार उसे पूर्व जन्म की स्मृति हो जाती है, तब पता चलता है कि उसके जीवन में जो असामान्य व्यवहार था, उसके पीछे का रहस्य क्या था।
ऐसी ही नुर्जन्म से संबंधित एक घटना का उल्लेख गोय फ्लेफेयर ने अपनी पुस्तक ‘द फ्लाँइंग कार्ड’ में किया है घटना टीना नामक एक बालिका से संबंधित है। जब वह चार वर्ष की हुई, तो प्रायः अपने माता-पिता के साथ लोहार्व बंदरगाह आने-जाने लगी। वहाँ वह घंटों समुद्र के किनारे बैठी रहती और दूर से आ रहे जहाजों को देखती रहती। उनसे आने-जाने वाले यात्रियों से वह घुल-मिलकर बातें करती, पर जो यात्री या नाविक फ्राँसीसी होते, उनके साथ उसका व्यवहार दूसरों की अपेक्षा भिन्न होता। उनसे वह कुछ अधिक ही अंतरंग हो उठती और घर-परिवार के सदस्यों की तरह उन्मुक्त बातें करने लगती। यह क्रम निरंतर लंबे समय तक चलने के कारण वह आसानी से फ्राँसीसी भाषा सीख गई और भलीभाँति बोलने लगी, पर इस दौरान उसे एक विचित्र अनुभव भी हुआ। जब कोई जर्मन यात्री सामने पड़ता, तो घृणा से वह मुँह फेर लेती। उस ओर देखना तक पसंद नहीं करती। इस तरह का व्यवहार वह क्यों करती है, उसे स्वयं पता नहीं था। जर्मन ीषाडडडडडडडड से उसे वितृष्णा भी थी। अभी वह आयु में बहुत छोटी थी, पर अपने व्यवहार के इस अंतर को अच्छी तरह समझती थी। उसका बाल-मस्तिष्क इसके पीछे के रहस्य को न समझ सका। इसके माता-पिता भी उसके बर्ताव की इस विचित्रता को देख रहे थे, लेकिन किसी प्रत्यक्ष कारण के अभाव में वह गुत्थी नहीं सुलझा पा रहे थे।
एक रात टीना ने बड़ा भयानक स्वप्न देखा। उसने देखा कि युद्ध के मैदान में एक सैनिक रूप में वह भी हिस्सा ले रही है। वह एक झाड़ी के पीछे छिपी हुई है और अपने शत्रुओं पर अंधाधुँध गोली बरसा रही है। इसी मध्य पीछे की झाड़ी में कुछ सरसराहट अनुभव हुई। वह सतर्क हुई और पीछे मुड़कर देखा, तो सामने एक जर्मन सैनिक खड़ा मुस्करा रहा था। अभी वह कुछ समझ पाती कि उस जर्मन ने उस पर गोली चला दी। गोली सीने के पार निकल गईं वह घायल शेरनी की तरह उस पर झपटी और आक्रमण करने का प्रयास किया, किन्तु शत्रु की गोली ने उसके हृदय को बेध डाला था, अस्तु, वह देर तक अपनी कोशिश में सफल नहीं हो सकी और फिर शाँत हो गई। उसके प्राण निकल गए।
इस रोमाँचकारी स्वप्न को देखकर उसकी चीख निकल गई। वह नींद से चौंककर उठ बैठी और स्वप्न के निहितार्थ पर विचार करने लगी। तभी उसे ध्यान आया कि स्वप्न में उसे जहाँ गोली लगी थी, ठीक उसी स्थान पर सामने वक्षस्थल में और पीछे पीठ पर दो काले धब्बे बने हुए है। उन धब्बों को देखने से ऐसा प्रतीत होता था, मानो किसी ने उसे गोली मारी हो और उसके घाव सूखने के बाद दो काले निशान उन धब्बों के रूप में शेष रह गए हो। जब वह शरीर पर विद्यमान इन धब्बों और स्वप्न में देखे गए घटनाक्रम के बीच संगति बिठाने के लिए उस पर बार-बार विचार करने लगी, तो धीरे-धीरे फिल्म पर छाई धूल की परत की तरह उसकी पूर्व जन्म की स्मृति साफ होने लगी। उसे आभास हुआ कि पहले जन्म में वह एक फ्राँसीसी थी। उसकी माता का नाम अंजाला तथा पिता का नाम सेवित्रे था। वह फ्राँस की राजधानी पेरिस की निवासी थी। उसका अपना नाम एलेक्स अमादादो था। इसके अतिरिक्त और भी बहुत सारी जानकारियाँ स्वतः ही हो गई। जब इन सबकी जाँच की गई तो सब सत्य पाए गए। जिस प्रकार ऑडियो-वीडियो टेपों में दृश्य और ध्वनियाँ रिकॉर्ड हो जाती है, उसी प्रकार की मानवी मस्तिष्क की बनावट है। उसमें अनेक जन्मों की अनेकों घटनाएं और जानकारियाँ सुरक्षित और संरक्षित होती है। यदा-कदा यही स्मृतियाँ उभरती और पुनर्जन्म के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत होती रहती है, तब ज्ञात होता है कि हमारा यह प्रथम जन्म नहीं, वरन् जन्म-मरण की लंबी शृंखला की एक कड़ी मात्र है।
सृष्टि के आरंभ से मानव की जिज्ञासा और आत्मरक्षा की उत्कट भावना ने उसे अपने प्रतिपक्षियों और प्रतिद्वंद्वियों के बारे में विशेष ज्ञान की ओर सदैव उत्सुक रख है। इसी ज्ञान-पिपासा ने उस संस्था को जन्म दिया, जिस ‘गुप्तचर्या’ कहते हैं। अंगरेजी में यह विधा स्पाइंग कहलाती है और इसमें संलग्न लोग ‘स्पाई’। यह शब्द संस्कृत के ‘स्पश’ शब्द के समानार्थी है, जिसका अर्थ होता है, देखने वाला और सतत जागरुक। स्पष्ट है, आज की गुप्तचर व्यवस्था प्राचीन भारत की देन है। तब ऐसे कुछ लोग हुआ करते थे जो हर एक की गतिविधियों और क्रियाकलापों पर निरंतर दृष्टि रखते थे। कालाँतर में यही एक व्यवस्थित और संगठित प्रणाली के रूप में विकसित हुआ और उसने गुप्तचर कला को जन्म दिया।
इसका इतिहास अति प्राचीन है। शायद मानव अवतरण के साथ ही इस विधा का भी आविर्भाव हुआ। आदिमानवों ने जब अपने आप को एकाकी और अरक्षित पाया, तो उन्हें आत्मरक्षा के लिए संघर्ष की आवश्यकता महसूस हुई। कदाचित तभी से अपने विरोधी एवं बैरी के बारे में जानकारी अर्जित करना जीवन की एक महत्वपूर्ण अनिवार्यता बन गई। आगे चलकर यह आवश्यकता समाज-व्यवस्था का एक अविच्छिन्न अंग हो गई। राज्य के रूप में राजनीतिक संगठन के जन्म के साथ ही उस संस्था का सुगठित रूप सामने आया और मनुष्य, समाज तथा राष्ट्र के अप्रतिहत विकास एवं समृद्धि के लिए इसका खुलकर प्रयोग होने लगा। ऋग्वेद काल तक यह तंत्र काफी विकसित हो चुका था। इसका प्रमाण वैदिक ऋचाएं देती है-
सहस्रधारेऽव ते समस्वरन् दिवों नाके मधुजिव्हा असश्चतः। अस्य स्पशो न नि मिषंति भूर्णयः पदे पदे पाशिनः संति सेतवः॥ (ऋग्वेद)
अर्थात् “शीघ्र गमन करने वाले, दुष्टों को बाँधने वाले गुप्तचर (स्पश) स्थान-सान पर हैं। उनकी पलकें कभी नहीं झपकतीं। मधुर जिव्हा वाले, किसी से न मिल जाने वाले वे गुप्तचर राष्ट्र के सहस्रों पुरुषों की सुरक्षा करने वाले हैं और विविध व्यवहार के केंद्रों में दुष्टों को उत्तप्त करते हैं।’
इससे स्पष्ट होता है कि सुव्यवस्था, सुरक्षा ओर प्रगति संबंधी यह तंत्र वैदिक काल में अस्तित्व में आ चुका था। आर्षग्रंथों के अध्ययन से इस बात के पक्के सबूत मिलते है कि उक्त काल में राज्य का स्परुप विकसित हो चुका था। इसलिए उसमें शाँति-सुव्यवस्था के लिए यदि गुप्तचर्या जैसी कोई प्रणाली थी, तो इसमें आश्चर्य नहीं। आर्ष वाङ्मय में वरुण के स्वरूप में जिस आदि सम्राट का वर्णन मिलता है, उससे स्पष्ट परिलक्षित होता है कि समय के साथ-साथ वैदिक राजा ने वरुण के स्वरूप, गुण एवं अधिकारों का ही वरण नहीं किया, अपितु असामाजिक तत्वों की गतिविधियों पर ध्यान रखने और उनको दंडित करने के अधिकार को भी ग्रहण किया। वैदिक संहिताओं में समाज की असुरक्षित स्थिति का विशद वर्णन मिलाता है, जिसके लिए देवकुल से प्रार्थना की गई है कि वे केवल प्राकृतिक प्रकोपों एवं दुर्घटनाओं से ही आर्य समाज की रक्षा न करें, अपितु दस्युओं, अनार्यों एवं अराजक तत्वों से भी सुरक्षा प्रदान करें। पूर्व और उत्तर वैदिक काल में विकसित नगर प्रणाली के साथ-साथ आर्यों को असाँस्कृतिक, अर्द्धसभ्य एवं दुर्दांत जनजातियों से आशंका उत्पन्न हो गई थी। उनके निरंतर दबाव से पारंपरिक समाज विश्रृंखलित हो रहा था। समा, संपत्ति और जीवन के प्रति अपराधों के बढ़ जाने के कारण वैदिक जन भयग्रस्त और अशाँत जीवन व्यतीत करने लगे थे। ऐसी स्थिति में भारतीय मनीषा ने एक ऐसा तंत्र विकसित करने का निर्णय लिया, जो न सिर्फ ऐसे तत्वों से मनुष्यों और समाज की रक्षा कर सके, अपितु उनके उत्कर्ष में भी बहुमूल्य योगदान दे सके। इसके लिए राज्य में विभिन्न स्तर के स्पशों (जासूसों) की नियुक्ति का प्रावधान था। तदनुसार उनके कार्य और अधिकार में भी अन्तर था। कार्यभेद के हिसाब से उनके लिए अलग-अलग पारिभाषिक शब्द गढ़े गए, जिनका उल्लेख महाभारत, रामायण, मनुस्मृति, कामंदक एवं शुक्रनीति, किरातार्जुनीयम, मुद्राराक्षस, उत्तर रामचरित नाटक, मुक्ति कल्पतरु, कौटिल्य अर्थशास्त्र प्रभृति ग्रंथों एवं स्मृति साहित्य में यत्र-तत्र मिला है। गुप्तचर्या के संदर्भ में इनमें जिन शब्दों का प्रयोग हुआ है, वे हैं चर, प्रणिधि, प्रहित, अपसर्प, संचर, पुरुष, गूढ़पुरुष, आण्त, प्रत्यायित, पथिक, उत्पथिक, उपनिषद्, उभयवेतन, कापटिक, उदास्थित, गहपतिक, वैदेहक, पापस, सत्रिन, तीक्ष्ण, रसद, भिक्षुकी, कर्णेजक, सूचक, दात्र, किरात, यमपट्ठिक, अहितुण्डिक, शैंडिक, शौभिक, पाटच्चर, विट, विदूषक, पीठमर्द, वैतालिक,गणक, शकुनिक, भिषग, नैमित्तिक, सूद, अरालिक, संवाहक, जड़ आदि।
पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ ग्रंथ में गुप्तचरों का संदर्भ यह प्रमाणित करता है कि यह संस्था कौटिल्य से पूर्व ही प्रशासन के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी थी। कौटिल्य ने इस बिखरे ज्ञान को सिर्फ सुव्यवस्थित ओर सुसंगठित भर किया है। अतः कौटिल्य को इस कला का प्रवर्तक और प्रतिष्ठापक मानना गलत होगा। यह विधा किसी एक व्यक्ति या युग की खोज नहीं, वरन् अनेक युगों की परिणति है। कौटिल्य ने अपने ‘अर्थशास्त्र’ में उसके बिखरे मोतियों को सूत्रबद्ध भर किया है और प्रस्तुत विषय की पूर्व प्रवहमान अजस्र धारा को एक विकसित एवं परिमार्जित रूप दिया है। इसके प्रभूत प्रमाण परवर्ती शताब्दियों तथा पुराण, भास, कालिदास, माघ, बाणभट्ट और दक्षिण के संगम में साहित्य से भी मिलते है। इस कार्य में कौटिल्य को अपरिमित सफलता मिली। उनके ‘अर्थशास्त्र’ की दूरदृष्टि और समस्याओं की आकलन शक्ति निश्चित रूप से विस्मयकारी है। इसकी प्रायोगिक उपयोगिता और चिरंतन ओर सूक्ष्मतम विधाओं की स्पष्टता अभूतपूर्व हैं जनमत धारा को अपने पक्ष में प्रवाहित करने और मित्र-मंडल में भेद उत्पन्न करने के संबंध में कौटिल्य प्रणीत प्रक्रियाएं आधुनिक गुप्तचर संगठन को दो सहस्र वर्ष से भी अधिक पीछे ले जाती हैं विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा के संबंध में कौटिल्य ने जिन निर्देशक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, वे समग्रता में इतने सफल है कि आज भी हम उनमें कोई सुधार नहीं कर पाए है। इतने पर भी दुःख की बात यह है कि हम उनके इस निर्विवाद ज्ञान और उक्त क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान का सही मूल्यांकन करने में संकोच अनुभव करते हैं, वहीं पाश्चात्य विद्वान चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के एक चीनी संत सुज्जू को गुप्तचर व्यवस्था का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला पहला विद्वान मानते है। ‘हिस्ट्री ऑफ दि चाइनीज सीक्रेट सर्विसेज’ नामक ग्रंथ में ग्रंथकार रिचर्ड डीकन यद्यपि साधिकारिक रूप से यह कह सकने में विफल रहे हैं कि संसार में गुप्तचर्या की औपचारिक व्यवस्था को कब ओर किसने जन्म दिया, फिर भी उनका विश्वास है कि एक बौद्धिक क्रियाकलाप के रूप में इस कला की संपूर्ण व्यवस्था का पहला अध्येता, विश्लेषक, मूल सिद्धाँतों का प्रवर्तक एवं समग्र व्यवस्था के प्रारूप को विकसित कर योजनाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने वाला विद्वान सुज्जू ही है, जिसने ‘पिंग ता’ अर्थात् युद्धकला नामक पुस्तक की रचना की। युद्धकला एवं गुप्तचर सेवाओं के संगठन पर यह प्राचीनतम ग्रंथ है, इस विचार की पुष्टि डेविड वायज एवं टामस रोज ने भी अपनी कृति ‘दि ऐस्पिआनिज एस्टेब्लिशमेंट’ में की है। संभव है उक्त लेखकद्वय और पाश्चात्य विद्वानों को भारतीय आर्ष साहित्य में वर्णित इस ज्ञान का भान न हो, अन्यथा वे इतने अधिकारपूर्ण ढंग से अपने विचार व्यक्त करने से बचते।
मानव सभ्यता के आदि ग्रंथ ऋग्वेद में इस बात के अकाट्य तथ्य उपलब्ध है कि गुप्तचर व्यवस्था आर्य ऋषियों की देन है। उक्त ग्रंथ में इंद्र एवं वरुण द्वारा अपने सर्वव्यापी दूतों अथवा ‘स्पशों’ का उपयोग करने एवं ‘सरमा’ द्वारा अपराधियों की खोज करने का स्पष्ट उल्लेख मिला है। इसके बाद भी इसे सुज्जू जैसे चीनी नीतिशास्त्री की उपलब्धि कहना भूल होगी। सच तो यह है कि दोनों के काल में बहुत अधिक अंतर न होने पर भी गुप्तचर्या संबंधी दोनों की व्याख्या-विवेचना में भारी अंतर है। सुज्जू के ग्रंथ से प्राप्त अल्प सामग्री कौटिल्य जैसे महान राजनीतिक चिंतक द्वारा संपादित, सुव्यवस्थित एवं प्रतिपादित नियमों, सिद्धांतों, मतों और विवेचनाओं के समक्ष कहीं नहीं टिकती। कौटिल्य ने राज्य व्यवस्था, कूटनीति, युद्ध एवं गुप्तचर्या के संबंध में जो कुछ लिखा, वह व्यापक ही नहीं, सर्वकालिक भी है। गुप्तचर्या एवं युद्ध विद्या से संबंधित ऐसा कोई भी पक्ष नहीं है, जो इस कुशल नीतिशास्त्री की पैनी दृष्टि से अछूता रहा हो। आज इस विद्या के संबंध में जो कुछ भी नीति-नियम प्रचलित है, उन्हें कौटिल्य का ही परिवर्द्धित ओर परिवर्तित संस्करण कहना चाहिए। वर्तमान में तो इस क्षेत्र में परिष्कृत यंत्र-उपकरणों का भी सहारा लिया जा रहा है, पर तब केवल बुद्धि-चातुर्य के आधार पर ही सब कुछ संपादित किया जाता था। इसे उस युग की विशिष्टता और वरिष्ठता ही कहनी चाहिए।
गुप्तचर व्यवस्था की मूल अवधारणा शाँति, सुव्यवस्था एवं प्रगति का पोषक तथा पूर्णरूपेण निर्दोष है। इसमें किसी सीधे-सच्चे को दंडित या प्रताड़ित करने का कोई प्रावधान नहीं है। प्राचीन भारत में इस संस्था का गठन दमन-चक्र चलाने या शासक वर्ग के हितों की अभिवृद्धि के लिए नहीं किया गया था, अपितु नैतिक और धार्मिक व्यवस्था के लिए इसका नियोजन किया गया था। तब धर्म का प्रयोग साँप्रदायिक अर्थ में नहीं किया जाता था।, वरन् यह एक पूर्णतः धर्म निरपेक्ष आचार संहिता थी और इसका प्रयोजन लोकहित के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। ‘पिंग ता’ और ‘अर्थशास्त्र’ के दृष्टिकोण में यही मौलिक अंतर है। कौटिल्य द्वारा प्रस्तावित व्यवस्था में राजा की स्थिति को सुदृढ़ करने एवं राज्य की अखंडता बनाए रखने के पीछे उसका चरम लक्ष्य ‘जन कल्याण’ की भावना थी, उबकि सुज्जू प्रणीत सिद्धाँतों में ऐसे किसी भी उच्चादर्श को आधारभूत नहीं माना गया। इसे भारतीय चिंतन और दर्शन की सर्वोपरि विशेषता कहनी चाहिए कि उसमें कोई भी सार्वजनिक व्यवस्था सदैव जनहित के प्रति समर्पित रही है। भारतीय गुप्तचर प्रणाली इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जबकि दूसरे देशों और संस्कृतियों के समक्ष प्रणालियों में ऐसी सोच और भावना का स्पष्ट अभाव झलकता है। पिछले 13 दिसंबर को संसद भवन पर ओर इससे पूर्व जम्मू-कश्मीर विधान सभा में हुए आत्मघाती हमले को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह विदेशी गुप्तचर तंत्र की विध्वंसकारी सोच को ही परिलक्षित करता है। इन दिनों विश्वभर में कई ऐसी गुप्तचर व्यवस्थाएं है, जो अपने जन्मकाल से ही विनाश और जनहानि में संलग्न रही है। वे इस कला की मूल भावना से सर्वथा विपरीत है। इसका वास्तविक उद्देश्य सुरक्षा ओर विकास है। प्रतिद्वंद्वी के प्रगति-रहस्य को जानकर और अपनी उन्नति के संदर्भ में उसके घात-प्रतिघात को विफल कर अपनी विकास यात्रा को निरंतर बनाए रखना ही इस विद्या का निहितार्थ था। आज वह अपने केंद्रीय प्रयोजन से पृथक होकर विनाश के सरंजाम जुटाने में संलग्न है। इससे बड़ा अपमान इसका और क्या हो सकता है? मनु, शुक्र, याज्ञवल्क्य, कामंदक, सोमदेव, कौटिल्य तथा मेधातिथि जैसे आचार्यों और उनके पूर्ववर्ती वैदिक साहित्य ने जब पहली बार इस विद्या का अनुसंधान और प्रकाशन कर विश्व के समक्ष रखा, तो उन्होंने स्वप्न में भी यह कल्पना नहीं की होगी कि बाद में इस कला का दुरुपयोग विनाशलीलाएं रचने और कुचक्र चलाने में किया जाएगा। इसे इसका दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि जो तंत्र मनुष्य और समाज के उत्कर्ष में सहायक हो सकता था, वह अब अपकर्ष की भूमिका में निरत होकर अव्यवस्था और अराजकता के ताने-बाने बुन रहा है।
कोई भी कला स्वयं में न अच्छी होती है, न बुरी। यह तो कर्ता पर निर्भर है कि वह विष को अमृत बन ले या अमृत को घातक कालकूट में परिवर्तित कर दे। यह पूर्णतः उसके चिंतन, व्यवहार और कर्तव्य पर अवलंबित है। असुरता जहाँ कहीं भी रहेगी, वहाँ अस्थिरता और अशाँति ही पैदा करेगी और सदाशयता का गला घोटती रहेगी। इसके विपरीत देवत्व बुराई में भी अच्छाई का संधान कर लेता है। द्रोणाचार्य ने दुर्योधन की परीक्षा के निमित्त जब उसे किसी अच्छे इंसान को ढूंढ़ लाने को कहा, तो लाख कोशिश करने के बावजूद भी उसे कोई अच्छा आदमी न मिला, सब उसे बुरे ही दीखते रहे। फिर युधिष्ठिर से किसी बुरे मनुष्य को तलाश लाने को कहा। वह यत्र-तत्र घूमते रहे, फिर भी उन्हें कोई खराब व्यक्ति न मिला, सब में उन्हें नेक इंसान दिखाई दिया। यह कथानक वास्तव में दो विपरीत चिंतन शैलियों और दृष्टिकोणों को दर्शाता और बताता है कि व्यक्ति की निजी सोच ही किसी वस्तु, व्यक्ति या विधा के भली-बुरी होने के पीछे जिम्मेदारी है। गुप्तचर्या आज इसी दुश्चिंतन के कारण कलंकित हो रही है।
गुप्त रूप से जानकारी प्राप्त करने की पद्धति के कारण ही इसे ‘गुप्तचर्या’ कहते है। यह एक पवित्र संस्था है और इसकी शुचिता को सदा बनाए रखने में ही मनुष्य का कल्याण है। गोपनीय ढंग से प्राप्त किसी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की सूचना को सिर्फ उन्नति-प्रगति के क्षेत्र में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए, अन्यथा यदि इसका प्रयोग घृणा और विद्वेषजन्य प्रतिकार के रूप में हुआ, तो सर्वत्र हानि और हाहाकार की अनुगूँज ही सुनाई पड़ेगी।
जिसकी अंतरात्मा में विश्वमानव की सेवा करने, इस संसार को अधिक सुँदर-सुव्यवस्थित एवं सुखी बनाने की भावनाएं उठती रहती हैं और इस मार्ग में चलने की प्रबल प्रेरणा होती है, वस्तुतः सच्चा परमार्थी और ईश्वर भक्त वही है।
परमपूज्य गुरुदेव
‘शिव’ का अर्थ कल्याण होता है। जो इस देवता के तत्वदर्शन को समझकर उसके आदर्शों को जीवन में उतार लेता है, उसका अमंगल कभी नहीं होता। वह शनैः-शनैः आत्मोन्नति करता हुआ चरम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। महाशिवरात्रि पर्व का वास्तविक उद्देश्य यही है।
प्रतिवर्ष यह पर्व फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है, इसलिए भारतीय शास्त्रों में यह तिथि विशेष महत्व की है। समझा जाता है कि इस अवसर पर कोई उत्तम कार्य करने से उस पर भगवान शिव की दृष्टि पड़ती है, जो करने वाले के लिए कल्याणकारी सिद्ध होती हैं यह मान्यता कितनी सच है, कहना कठिन है, पर जो शिव के, कल्याण के यथार्थ प्रयोजन को लेकर चलते और जन-जीवन को ऊँचा उठाने में निरत रहते है, उन पर उनकी कृपादृष्टि सदैव बनी रहती है। उनके लिए हर दिन शिवरात्रि जैसा होता है।
शिवजी का स्थान हिंदू धर्म में बहुत ऊँचा है। धर्मशास्त्रों और पुराणों में अन्य सब देवताओं का चरित्र-चित्रण करते हुए उनको स्वार्थ के वशीभूत अथवा वैभव तथा अधिकार का अभिलाषी दिखलाया गया है। एक शिवजी ही ऐसे देवता बतलाए गए हैं, जो संपत्ति और वैभव के बजाय त्याग और अकिंचनता का वरण करते है। वे सर्वशक्तिमान है। उन्हीं के इशारे पर संसार में प्रलय का दृश्य उपस्थित होता है और उनका तीसरा नेत्र बड़ी-से बड़ी शक्ति को जलाकर राख करने की क्षमता रखता है। इतने पर भी वे सदा नंगे, भूखे, दीन-हीन, भूत-प्रेतों के साथी बने रहते है। उन्होंने अमृत का त्याग कर गरल को पिया, हाथी और घोड़े को छोड़कर बैल की सवारी स्वीकार की और हीरा-मोती जैसे रत्नों को त्याग कर सर्प को गले लगाया। इस प्रकार शिवजी का स्वरूप हमें इस बात की शिक्षा देता है कि हमें प्रकृति ने यदि विशेष शक्ति या योग्यता प्रदान की है, तो उसका मतलब यह नहीं कि हम स्वार्थी बन जाएं और अपनी शक्ति का उपयोग अपने निजी सुख और भोगों के लिए ही करें। शिवजी का आदर्श बतलाता है कि जिसको जितनी अधिक शक्ति मिली हैं, उसका उत्तरदायित्व भी उतना ही महान् है। ऐसी विशेष सामर्थ्य, जो अन्य साधारण लोगों में दिखाई नहीं पड़ती, परमात्मा के वरदानस्वरूप समझनी चाहिए और उसका उपयोग स्वार्थ-साधना जैसे तुच्छ उद्देश्यों में न कर महानता प्रदर्शित करने वाले कार्यों में करना चाहिए। मानव जीवन की सफलता इसी में है कि हम व्यक्तिगत लाभ का विचार छोड़कर अपनी शक्तियों का उपयोग परोपकार के लिए ही करें।
भगवान शिव का दिगंबर रूप अपरिग्रह का प्रतीक है। संसार में भोग-सामग्रियों का कोई अंत नहीं। वह मनुष्य के ज्यों-ज्यों समीप आती चली जाती है, त्यों-त्यों उनकी लालसा भी बढ़ती जाती है। आज संसार में कलह ओर क्लेश को जो परिदृश्य दिखलाई पड़ रहा है, उसके मूल में परिग्रह की यही कामना अंतर्निहित है। भगवान का उक्त स्वरूप हमें अपरिग्रही बनने और सीमित में संतोष करने की प्रेरणा देता है।
वे बाघाँबरधारी हैं और प्रेत-पिशाच के संग रहते हैं। उनकी यह मनोदशा वैराग्य को दर्शाती है। हम अतिशय मोह-माया न पालें और निर्लिप्त भाव से इस संसार में रहें, यही इसके पीछे का भाव है। व्यक्ति मोहग्रस्त होकर अपने परम लक्ष्य से च्युत हो जाता है। फिर वह संसार और साँसारिकता के पीछे भागने लगता है। हम जगत् में रहें और लोगों की सेवा-सहायता कर उनका कल्याण करें यह उचित है, पर जागतिक प्रपंचों में पड़कर अपना मूल उद्देश्य न भुला बैठें, यही शिवजी की वैराग्य-भावना का निहितार्थ है।
‘गायत्री मंजरी’ में शिव-पार्वती संवाद आता है, जिसमें भगवती पूछती है कि हे देव! आप किस योग की उपासना करते है, जिससे आपको परम सिद्धि प्राप्त हुई है? शिव इस संसार में आदि योगी थे, योग के सभी भेदों को मालूम कर चुके थे। उन्होंने उत्तर दिया, “गायत्री ही वेदमाता है और पृथ्वी की सबसे पहली और सबसे बड़ी शक्ति है। वह संसार की माता है, भूलोक की कामधेनु है। इससे सब कुछ प्राप्त होता है। ज्ञानियों ने योग की सभी क्रियाओं के लिए गायत्री को ही आधार माना है।”
इस प्रकार भगवान शंकर हमें गायत्री योग द्वारा आत्मोत्थान की ओर अग्रसर होने का निर्देश करते हैं इस पर विचार-मंथन करने का उपयुक्त अवसर महाशिवरात्रि पर्व है। वह क्षुद्रता से महानता की ओर ले जाने वाला एक ऐसा तत्वज्ञान है, जिसे अपनाकर हर कोई धन्य अनुभव करता हैं वास्तविक शिव भक्त होने का यही लक्षण और पहचान है।
‘गहना कर्मणोगति’ कर्म की गति को बड़ा ही गूढ़ एवं गहन माना गया है। स्रष्टा की सृष्टि इसी आधार पर संचालित एवं नियंत्रित होती है। योगी, यति, तपस्वी, मनस्वी कर्म के विधान को मानते, स्वीकारते तथा सम्मान करते हैं। कर्म अविनाशी है। इसका बीज कभी नष्ट नहीं होता। सद्कर्म से पुण्य एवं दुष्कर्म से पाप का विधान है। कर्मफल अवश्यंभावी है भले ही इसमें थोड़ा विलम्ब हो। मनीषियों ने निष्काम कर्म सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा है। क्योंकि इसमें पाप और पुण्य का बंधन नहीं होता और यह किसी आसक्ति एवं इच्छा से नहीं किया जाता।
कर्मयोग का पथ बीहड़ जंगल एवं आकर्षक मरुद्यान से होकर गुजरता है। कभी-कभी इसके सूत्र बड़े ही रहस्यमय एवं अबूझ प्रतीत होते हैं। यह रहस्य तब और गहन हो जाता है जब लगन व निष्ठ से श्रेष्ठ कर्म करने के बावजूद असफलता पल्ले पड़ती है। और दुष्कर्मी-दंभी को अपार सफलता मिलती दिखायी देती है। धर्मात्माओं को दुःख, दुष्टात्माओं को सुख आलसी-प्रमादियों को परम सफलता, पुरुषार्थी को घनघोर असफलता, विवेकवानों पर विपत्ति एवं मूर्खों के यहाँ सम्पत्ति, अहंकारी को मान प्रतिष्ठ और सदाचारी को तिरस्कार व अपमान मिलते दृष्टिगोचर होते हैं। कोई विलास एवं वैभवपूर्ण परिस्थितियों में जन्म लेता है। और छल-बल, कुटिलता करते हुए भी सुख एवं ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करता है। तथा कोई चरम पुरुषार्थी होकर भी अभावग्रस्त जिन्दगी जीता है। एवं कष्ट व दुःख उठाता है।
कर्म की इस परिणति को देखकर कर्म की गति के सम्बन्ध में अनगिन प्रश्न उठ खड़े होते हैं। कर्म के सिद्धान्त पर अविश्वास एवं सन्देह होने लगता है। दुराचारी को दुष्कर्म करते हुए भी सफलता मिलती है और सद्कर्म में दुःख, कष्ट एवं यातना झेलनी पड़ती है। इससे मन में आशंकाओं का उठना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में तर्क को समाधान का स्वर नहीं मिलता तथा बुद्धि विचलित हो उठती है। परन्तु यह वास्तविक तथ्य नहीं है। कर्म की सूक्ष्म बारीकियों और पेचीदगियों को न जान पाने के कारण ही यह विडम्बना दिखाई देती है। वस्तुतः व्यतिक्रम कहीं नहीं है, प्रकृति नियम से रहित नहीं है। ईश्वरीय विधान में कहीं कोई अव्यवस्था नहीं है। हाँ, कर्म का विधान दुरूह अवश्य प्रतीत होता है।
कर्म के इस सूक्ष्म रहस्य के ज्ञाता कर्मयोगी विश्ववंद्य स्वामी विवेकानन्द इस संदर्भ में स्पष्ट करते हैं कि बिना फल उत्पन्न किए कोई भी कर्म नष्ट नहीं हो सकता। प्रकृति की कोई भी शक्ति इसे फल उत्पन्न करने से रोक नहीं सकती। यदि बुरा कर्म किया जाएगा तो उसका फल भोगना ही पड़ेगा। विश्व की ऐसी कोई शक्ति नहीं, जो इसे रोक सके। इसी प्रकार यदि सत्कार्य किया जाए तो विश्व की कोई शक्ति नहीं जो उसके शुभ फल को रोक सके। कारण से कार्य होता है, इसे कोई रोक नहीं सकता।
वर्तमान दुःख और कष्ट हमारे अतीत कर्मों के ही फल हैं। कभी पहले हमारे द्वारा किया गया कर्म ही दुःख या सुख बनकर सामने आता है। कर्म तो अविनाशी बीज है। इसे बोये जाने पर इसकी फसल उत्पन्न होगी ही। फसल के पकने पर शीघ्रता या विलम्ब हो सकता है। परन्तु फसल पर सन्देह नहीं किया जा सकता। योगियों एवं तपस्वियों का कर्म तत्क्षण फलदायक होता है। तीर्थ स्थानों पर किया गया कर्म भी जल्दी परिणाम देता है। इसी कारण इन पुण्य स्थानों पर तपस्या आदि श्रेष्ठ कर्म किए जाते हैं।
कर्म के अनुसार परिणाम तय होते हैं। कर्म के इस सुनिश्चित एवं अटल विधान से अवतारी, योगी, सिद्ध, महात्मा भी नहीं बच पाते। विष्णु के रूप में मिले नारद के शाप का परिणाम ही था जो मर्यादा पुरुषोत्तम को चौदह वर्षों तक पत्नी के विरह में वन-वन भटकना पड़ा। कर्मफल का यही सिद्धान्त भगवान् कृष्ण पर भी लागू हुआ, जब उन्हें राम के रूप में छल से किए बालि वध के फलस्वरूप एक शिकारी के बेधक तीर से प्राण गंवाने पड़े। किसी जन्म में धृतराष्ट्र ने चिड़िया के बच्चों की आँखें फोड़ी थी। उस कर्मफल को भोगने के लिए उन्हें अन्धता मिली। हालाँकि इसमें उन्हें एक सौ आठ जन्म लगे।
कर्म का बीज बोना अत्यन्त सरल है परन्तु उसका भार ढोना अत्यन्त दुष्कर होता है। एक बीज हजारों बीज बनकर तैयार होता है। यह चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ता चला जाता है। सन्त, सिद्ध, महात्मा कर्म के इस रहस्य को भली प्रकार जानते-समझते हैं। अतः वे कर्मभार बढ़ाने वाले कर्म नहीं करते। उनकी कष्ट-कठिनाइयाँ अपनी स्वयं की नहीं होती बल्कि जन-कल्याण हेतु औरों के कर्मभार को हल्का करने के लिए इसे वे अपने ऊपर ले लेते हैं। इन्हीं कारणों से उन्हें रोग-शोक जन्य विपत्ति आती है। ईसा का क्रुसारोहण, रामकृष्ण परमहंस के गले का कैंसर आदि अनेक घटनाएँ इसी की परिणति हैं। इसके विपरीत सामान्य व्यक्ति अपनी इच्छाओं, वासनाओं एवं कामनाओं की तृप्ति-तुष्टि के लिए अनेक बुरे कर्म करता रहता है। ऐसे व्यक्ति अपने ही कर्मों का भार ढोते हैं। यही कर्म बंधन जीव को चौरासी लाख योनियों के कुचक्र में घूमने के लिए धकेल देता है।
सद्कर्म से पुण्य प्राप्त होता है। पुण्य से सुख-साधन की सामग्रियाँ जुटती हैं। पुण्य के प्रताप से स्वर्ग मिलता है। मान्यता है कि धरती के सबसे श्रेष्ठ पुण्यवान पुरुष को ही इन्द्र की पदवी प्राप्त होती है। सद्कर्म करके ही वह ऐश्वर्यशाली स्वर्ग का सम्राट इन्द्र बनता है। इसी प्रकार दुष्कर्म से नरक की यातनाएं भोगनी पड़ती हैं। हालाँकि पाप एवं पुण्य दोनों ही कर्म बंधन के कारण होते हैं। एक के करने से पाप और पतन की पीड़ा रुलाती है और अन्य से भोग-विलास की साधन-सुविधाएँ जुटती हैं। इसी कारण स्वामी विवेकानन्द ने पाप को लोहे का साँकल एवं पुण्य को स्वर्ण साँकल कहकर दोनों को ही उतार फेंकने को कहा है।
महर्षि अरविन्द इस तथ्य को स्वीकार करते हैं। इस संदर्भ में वे कहते हैं- बुराई से पीछा छुड़ाना शायद असली कठिनाई नहीं है, क्योंकि से सभी पहचानते हैं। यदि मनुष्य अपने इरादे में जरा भी सच्चा हो, तो वह कभी नहीं ठहरती। कठिन है उस अच्छाई के अहंकार से छूटना, जिसने सत्य के एक क्षुद्र अंश को सदा के लिए ताले में बंद कर लिया है। आगे वे कहते हैं अच्छाई के अहं और बुराई की आसक्ति दोनों से ऊपर उठ जाने में ही सार्थकता है। इस तथ्य को उन्होंने इस प्रकार अलंकारिक रूप में प्रतिपादित किया है- जब मेरे प्रियतम ने मेरा पाप-परिच्छेद उतारा तब मैंने सहर्ष गिरने दिया। फिर उसने मेरे पुण्य परिधान को खींचा पर मैं लज्जित हो गया और घबरा कर मैंने उसे रोकने का प्रयास किया। किन्तु उसने जब बलपूर्वक वह मुझसे छीन ही लिया, तब मैंने देखा कि किस तरह मेरी आत्मा मुझसे छुपी हुई थी।
अतः आवश्यकता है सद्कर्म रूपी पुण्य की अहंता एवं दुष्कर्म रूपी पाप की आसक्ति दोनों से ऊपर उठ जाना। यही कर्मयोग है। इसे गीता का निष्काम कर्म कहा जाता है।
जिसका अर्थ है आसक्ति छोड़कर कर्म करना। इच्छा एवं फल की आकाँक्षा से मुक्त होकर किया गया कर्म योग बन जाता है। यह कर्म साधना बन जाता है और इससे चित्त निर्मल हो जाता है। इस कर्म का संदेश है कि वर्तमान कार्य को अपनी समस्त क्षमता के साथ करना। कर्मयोगी अपने कर्म को गहन विचार और पुण्य भावना के साथ तन्मयतापूर्वक करता है।
वह साँसारिक आकर्षण की क्षण भंगुरता से परिचित होता है। वह इसकी नाशवान गतिशीलता को अच्छी तरह से जानता है। इसीलिए अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए भी वह मोह-ममता में नहीं फंसता। संसार के सुख-दुःख, हानि-लाभ, जन्म-मरण आदि की विरोधाभासी परिस्थितियों से वह व्यथित व विचलित नहीं होता। वह दीपक की लौ के समान निष्कम्प जलता रहता है। वह अपने कर्म में संतुष्ट एवं आनन्दित रहता है। तथा फल की उसे आशा नहीं रहती। फल की आशा ही बंधन का कारण है। इस बन्धन से मुक्ति तभी है, जब हमारे जीवन के सभी छोटे-बड़े कर्म प्रभु तो अर्पित-समर्पित हों।
जिसकी अंतरात्मा में विश्वमानव की सेवा करने, इस संसार को अधिक सुँदर-सुव्यवस्थित एवं सुखी बनाने की भावनाएँ उठती रहती हैं और इस मार्ग पर चलने की प्रबल प्रेरणा होती है, वस्तुतः सच्चा परमार्थी और ईश्वर भक्त वही है। उसी का नाम-जप सार्थक है।
-परमपूज्य गुरुदेव
भ्रातृत्व भावना मानवता का उज्ज्वल एवं दिव्य सत्य है। यह वह सूत्र है जिससे व्यक्ति-व्यक्ति से, परिवार-परिवार से, समाज एवं संसार से जुड़ते-बंधते चले जाते हैं। यही सहयोग, सहकार एवं सेवा का मूलाधार है। इस भाव के सजल स्पर्श से व्यक्ति के अन्दर पुलकन होती है तथा वातावरण में प्रेम एवं सद्भाव की दिव्यता छलकने लगती है। इसके अभाव में वैमनस्य, विघटन, अलगाव एवं अविश्वास का माहौल विनिर्मित होता है तथा सर्वत्र कुविचारों एवं दुर्भावनाओं की विषैली कड़वाहट घुलने लगती है। इसका एकमात्र समाधान है भ्रातृत्व भावना का विकास है।
भाईचारे के उदात्त एवं पावन धरातल पर इस्लाम धर्म का विराट् भवन टिका हुआ है। इस धर्म में कट्टरता एवं क्रूरता का स्थान नहीं है वरन् भ्रातृत्व भावना से ओतप्रोत है। ईसा ने एक दूसरे से प्रेमपूर्वक एवं मित्रतापूर्वक रहते हुए सेवा करने की सीख दी है। गुरुभक्ति का पर्याय सिक्ख धर्म भी ईश्वर के सभी बन्दों के प्रति सहिष्णुता एवं सहानुभूति का संदेश देता है। यह सद्भाव के होने पर ही सम्भव है। सनातन धर्म में भ्रातृत्व भाव को सृष्टि व्यवस्था का मुख्य आधार माना है। राम एवं लक्ष्मण का भ्रातृत्व सर्वविदित है। भरत तो इसकी जीवन्त मिसाल हैं। जिन्होंने अपने अग्रज के खड़ाऊं को चौदह वर्षों तक सिंहासन पर आसीन किया। और स्वयं निर्लेप भाव से अपने कर्त्तव्य का पालन करते रहे।
भाईचारे की यह भावना मन को मन से व हृदय से हृदय को जोड़ती है। परिवार एवं समाज इसी की बुनियाद पर खड़े हैं। परिवार में सरसता एवं सभ्य समाज इसी के परिणाम हैं। जहाँ पर भ्रातृत्व भाव होता है वहाँ सुख शान्ति एवं प्रसन्नता छलकती रहती है। सभी मिल-जुलकर प्रेम पूर्वक रहें, यह उपनिषद् की दिव्य वाणी है। एकाकी जीवन और अलगाव में न सुख है और न शान्ति। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज से दूर एकाकी जीवन नहीं व्यतीत कर सकता। उसको जीवन निर्वाह के लिए समाज के सौहार्द्रपूर्ण वातावरण की आवश्यकता पड़ती है। एकाकी रहना एक दण्ड है। यह हर एक के लिए असह्य एवं कठोर यंत्रणा के समान होता है। अतः समाज में रहने का न्यूनतम मानदण्ड एवं मापदण्ड एक ही है। भ्रातृत्व भावना का होना।
इस गुण को विकसित करने वाला अपने आप ही समाज की एक अभिन्न एवं महत्त्वपूर्ण ईकाई बन जाता है। एकाकीपन की कठोर यातना से बचने के लिए भ्रातृत्व का भाव विकसित करना आवश्यक है। इसके बिना कोई भी जीवन को टूटने एवं बिखरने से बचा नहीं सकता। इस असह्य अलगाव से अच्छा है आपस में हल्का-फुल्का मनमुटाव या कहा सुनी का हो जाना। समूह में रहने के लिए इतना तो झेला ही जा सकता है। यह सामूहिक प्रयोग किसी भी निष्क्रिय जड़ता से तो हजार गुना अच्छा है। यदि मन में श्रेष्ठ विचार हों एवं हृदय में उदात्त भावना हो तो आपस में उठने वाली सभी विसंगतियों एवं समस्याओं से सरलतापूर्वक निजात पायी जा सकती है। हमें हाथ की पाँचों अंगुलियों के समान मिल-जुलकर रहना चाहिए। जिस प्रकार ये अंगुलियाँ हाथ के प्रत्येक कार्य के लिए मिल-जुलकर अपना योगदान देती हैं। उसी तरह हम सभी को विश्व मानव के कल्याण के लिए एकजुट एवं प्रतिबद्ध होना चाहिए।
वस्तुतः हम सब एक हैं। हमारी आन्तरिक प्रकृति एक समान है। सभी में भ्रातृत्व की भावना किसी न किसी रूप में विद्यमान रहती है। हाँ यह किसी में थोड़ा कम और किसी में थोड़ा अधिक हो सकती है। पर सभी इसे विकसित एवं पल्लवित कर स्वयं को, विश्व वसुँधरा को एवं समस्त मानवता को धन्य कर सकते हैं। जरूरत है तो केवल आपसी प्रेम एवं भाईचारे की। भाईचारे का सिद्धान्त है स्वयं के अन्दर दबी पड़ी इंसानियत को जगाना। मनुष्यता के बिना मनुष्य की कल्पना सम्भव नहीं। जैसे सूरज की उष्णता चन्द्रमा की शीतलता, जल की तरलता एवं दीपक का प्रकाश ही सच्ची विशेषता है। उसी प्रकार मनुष्यता मनुष्य का गुण धर्म है। भ्रातृत्व भाव इस गुण का अभिवर्द्धन है।
मनुष्य हरे-भरे वृक्ष की एक टहनी के समान है। इसका अस्तित्व तभी एक है जब तक वृक्ष विद्यमान है।शैशवावस्था माता-पिता के आश्रय में पलती है। किशोरावस्था अध्यापकों के सृजनशील संरक्षण में विकसित होती है। इसी तरह जीवन के हर मोड़ पर किसी न किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। सहयोग-सहकार की यह वृत्ति तभी सम्भव है जब भाई चारे का उदात्त दृष्टिकोण हो।
एक पुष्प की माला नहीं बनती है। इसके लिए अनेक पुष्पों की आवश्यकता होती है। ये आपस में गूँथकर ही माला की कल्पना को साकार करते हैं। माला स्वयं में कुछ नहीं है यह तो क्रमबद्ध एवं शृंखलाबद्ध पुष्पों का सुन्दर सुनियोजन है। उनतीस हजार फुट ऊँचा माउण्ट एवरेस्ट धरती के वैभव का प्रतीक है। परन्तु इसकी यह वैभव एवं महानता उन छोटी बड़ी चोटियों की शृंखला पर आधारित है जो इसके पीछे मजबूत इरादे से दृढ़ता प्रदान करने के लिए खड़ी हैं। एकाकी एवं एकल प्रयास की महत्ता एवं सार्थकता तभी बन पड़ती है जब इसके लिए अनेकों का योगदान होता है। इसी तरह मानवता की एक अटूट शृंखला है जो प्रत्येक मनुष्य के सहयोग-सहकार से विकसित होती है। इसके लिए भाईचारे की अनिवार्य आवश्यकता है अन्यथा इन सबकी कल्पना नहीं की जा सकती।
हम सभी पर्वतमाला के एक छोटे-छोटे शिखर के समान हैं। सभी के त्याग एवं बलिदान से ही मानवता रूपी एक दिव्य एवं भव्य शिखर का निर्माण होता है। इसमें सभी का छोटा-बड़ा योगदान होता है। इनके जुड़ने में अभिनव निर्माण है तथा बिखरने में महाविनाश। निर्माण की इस प्रक्रिया को महास्वार्थ कहा जा सकता है। क्योंकि इसमें सबके कल्याण का भाव है अपना अहं गलता है। आत्म सत्ता संकीर्ण एवं सीमित दायरे को तोड़कर अपना विस्तार करती है ऐसा न हो तो मनुष्य अपनी ही सीमाओं की क्षुद्रता में कटता-पिटता रहता है। भ्रातृत्व का यह भाव महास्वार्थ का पुजारी है। जब व्यक्ति अपनी संकीर्णता के घेरे को तोड़कर बाहर निकलता है, तो वह अपने सुख-दुःख को बाहर भी घटित होते देखता है। ऐसे में उसका मन एवं भावनाएँ द्रवित हो उठती हैं। उसमें संवेदनशीलता एवं सजलता का प्रादुर्भाव होता है। वह दूसरों की हानि में दुःख और लाभ में सुख का अनुभव करता है। औरों में अपना ही भाव छलकने लगता है। परिणामस्वरूप सभी उसके भाई, बंधु, सखा एवं सहचर बन जाते हैं। वह सभी से अपनों जैसा प्रेम पूर्ण बर्ताव करता है।
जब ऐसी पुण्य भावना का उदय हो तो समझा जाना चाहिए कि हम सच्चे अर्थों में भ्रातृत्व भाव के लायक बन सके हैं। ऐसा पावन भाव जब सहयोग के लिए आगे बढ़ता है, तो अनगिन लोग उसका साथ देने आगे आते हैं। भाई-चारा उस दीपक के समान है जो जलते ही असंख्य बुझे दीयों को ज्योतिर्मय कर देता है। बर्फानी हिमालय को गलने की देरी है उसके पिघलते ही गंगा-यमुना जैसी अनेक नदियाँ बहने के लिए खड़ी रहती हैं। ऐसी ही भाई चारे की भावना है। इसकी बयार जब चलने लगता है तो इंसानियत के आसमान में प्रेम के बादल उमड़ने-घुमड़ने लग जाते हैं और सहयोग-सहकार के रूप में बरसे बिना चैन नहीं लेते।
इसके लिए तो बस एक ही संकल्प की जरूरत है कि मैं औरों के प्रति सदैव अच्छे विचार एवं भाव रखूँगा तथा अपनी सामर्थ्य के अनुरूप सहयोग करता रहूँगा। यह संकल्प भ्रातृत्व भाव का मूल मंत्र है। यदि सभी इस मंत्र को अपने जीवन में उतार लें तो सर्वत्र प्रेम एवं सौहार्द्रपूर्ण वातावरण विनिर्मित हो जाएगा। कहीं भी द्वेष, बैर एवं वैमनस्यता पाँव पसार नहीं पाएँगी। सभी ओर शान्ति एवं प्रसन्नता बिखरती दिखायी देगी। भाईचारे के इस भाव को अपनाकर ही हम सब उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित संकल्पना को साकार कर सकेंगे। अतः हम सबको इस भावना का विकास कर स्वयं की उन्नति तथा समाज की प्रगति का पथ प्रशस्त करना चाहिए।
रात की आँधी में बगीचे के खिले फूल जमीन पर गिर पड़े और उसके नीचे दब गए।
कई दिन बाद माली ने इस मिट्टी को बर्तन माँजने के लिए उठाया, तो वह महक रही थी। वह इसका कारण खोजने लगा।
दबे हुए फूलों ने कहा, “हम मिट्टी की गोद में खेले और अपनी खुशबू उसे प्रदान की, पर साथ ही यह भी देखो कि गलने की स्थिति में भी हमने मिट्टी को महकाया है।”
लोग किले के कँगूरे की शोभा देखकर प्रसन्नता व्यक्त कर रहे थे और उसकी सुदृढ़ दीवारों को आश्चर्यजनक निहार रहे थे।
मध्यवर्ती ईंटें मुस्कराईं और अपनी अनगढ़ भाषा में बोलीं, “दर्शकों! तुम उन नींव के पत्थरों की गरिमा क्यों नहीं खोज पाते, जिनकी पीठ पर इस विशाल दुर्ग का ढाँचा खड़ा है और जिन्होंने जान-बूझकर ख्याति से मुँह मोड़ा है।
उन्नीसवीं शताब्दी का अंतिम समय था। ठाकुरदास नामक एक वयोवृद्ध कोलकता में रहता था। उसके परिवार में केवल एक बच्चा और पत्नी थी। इस सीमित परिवार का भरण-पोषण भी ठीक प्रकार से न हो पाता।
नियति ने उन्हें मेदिनीपुर जिले के एक गाँव में ला पटका। वहाँ ठाकुरदास को दो रुपये महावार की नौकरी मिली। कालाँतर में उनका देहाँत हो गया। पत्नी के कंधों पर सारे परिवार का दायित्व आया। इसी तरह कई वर्ष बीत गए।
एक दिन रात के समय बेटे ने अपनी माँ के पैर दबाते हुए पूछा, “माँ! मेरी इच्छा है कि मैं पढ़-लिखकर बहुत बड़ा विद्वान बनूँ और तुम्हारी खूब सेवा करूं।”
कैसी सेवा करेगा?” बेटा पढ़ने लगा था, इसलिए कुछ मन बहलाते हुए प्रोत्साहन के स्वरों में माँ ने पूछा।
“माँ तुमने बड़ी तकलीफ में दिन गुजारे हैं। मैं तुम्हें अच्छा-अच्छा खाना खिलाऊँगा और बढ़िया कपड़े लाऊँगा। हाँ तुम्हारे लिए गहने भी बनवाऊँगा।”
“हाँ बेटा, तू जरूर सेवा करेगा मेरी” माँ बोली, “पर गहने मेरी पसंद के ही बनवाना।”
“कौन से गहने माँ?”
“मुझे तीन गहनों की बड़ी चाह है।” माँ ने बताया। “पहला गहना तो यह है कि इस गाँव में कोई अच्छा स्कूल नहीं है। तुम एक स्कूल बनवाया। दवाखाना भी खुलवाना और तीसरा गहना यह है कि गरीब बच्चों के रहने, खाने तथा शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था करना।”
बेटे ने भवाभिभूत होकर माँ के चरणों में सिर रख दिया और तभी से उसे कुछ ऐसी धुन सवार हुई कि उसे अपनी माँ के इन तीन गहनों का सदैव ध्यान रहा। वह बराबर स्कूल, औषधालय तथा सहायता केन्द्र खोलता चला गया।
आगे चलकर स्त्री शिक्षा तथा विधवा के गहने भी अपनी माँ को चढ़ाए। यह महामानव और कोई पं. ईश्वरचंद्र विद्यासागर ही थे।
शीतल सुगन्ध से बौराया पवन मन्द-मन्द बहने लगा है। और सारी सृष्टि पुलकित होकर उल्लास, नई उमंग और उत्साह में झूम उठी है। नगर में, गाँव-गाँव में, डगर-डगर पर मस्ती की धूम मचाता हुआ रंगों की पिचकारी लिए अलबेला फागुन निकल पड़ा है आज होली खेलने। कहीं ऊषा दिन के माथे पर रोली लगा रही है, तो कहीं आकाश में सन्ध्या निशा के ऊपर गुलाल और सितारे बरसा रही है। बड़ी मधुर और प्रेम-सौहार्द्र की भावनाओं की प्रतीक है होली। रंगों की सतरंगी दुनिया के बीच मानवता की अनूठी झलक दिखाई देती है इस दिन। भारत की इस सम्मोहक परम्परा को अन्य देशों ने भी अपने-अपने ढंग से सहेजने को कोशिश की है। इसके नाम भी अलग-अलग देशों में अलग-अलग हो गए हैं। परन्तु उल्लास की मूल भावना एक समान है।
प्राचीन रोम में ‘साटर ने लिया’ के नाम से होली की ही भाँति एक उत्सव मनाया जाता था। उन दिनों यह उत्सव अप्रैल माह में पूरे सात दिनों तक मनाया जाता था। इस दौरान दासियों को भी काफी छूट मिल जाती थी। वे इन दिनों आपस में हंसी-मजाक तो करती ही थी, अपने स्वामियों की भी हंसी उड़ाने में संकोच नहीं करती थीं। वे अपने में से ही किसी को नकली स्वामी के रूप में चुनती और उससे मूर्खतापूर्ण आज्ञाएँ जारी करवाती थीं।
आज भी रोम में ‘रेडिका’ नाम से एक त्यौहार मई में मनाया जाता है। इसमें किसी ऊँचे स्थान पर काफी लकड़ियाँ इकट्ठी कर ली जाती हैं और उन्हें जलाया जाता है। इसके बाद लोग झूम-झूम कर नाचते-गाते हैं एवं खुशियाँ मनाते हैं। इस अवसर पर आतिशबाजी के खेल भी खेले जाते हैं। इटली वासियों की मान्यता के अनुसार यह समस्त कार्य अन्न की देवी फ्लोरा को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।
पश्चिमी दर्शन के पितामह कहे जाने वाले सुकरात की जन्म भूमि यूनान में भी लगभग इसी प्रकार का समारोह ‘मे पोल’ नाम के उत्सव में होता है। यहाँ पर भी लकड़ियाँ इकट्ठी की जाती हैं और उन्हें जलाया जाता है। इसके बाद लोग झूम-झूम कर नाचते-गाते हैं। इस अवसर पर उनकी मस्ती देखते ही बनती है। यहाँ पर यह उत्सव यूनानी देवता ‘टायनोसियस’ की पूजा के अवसर पर आयोजित होता है।
कुछ इसी तरह का उत्सव मनाने की परम्परा जर्मनी में भी है। यहाँ के रैनलैण्ड नाम के स्थान पर होली जैसा त्यौहार एक नहीं पूरे सात दिनों तक मनाया जाता है। इस समय लोग अटपटी पोशाक पहनते हैं और अटपटा व्यवहार करते हैं। कोई भी किसी तरह के बिना किसी लिहाज के मजाक कर लेता है। बच्चे-बूढ़े सभी एक-दूसरे से मजाक करते हैं। इन दिनों किसी तरह के भेद-भाव की कोई गुँजाइश नहीं रह जाती। इस दौरान की गई मजाक का कोई भी व्यक्ति बुरा नहीं मानता।
बेल्जियम में भी कुछ स्थानों पर होली जैसा ही उत्सव मनाने का रिवाज है। इस हंसी-खुशी से भरे त्यौहार में पुराने जूते जलाए जाते हैं। और सब लोग आपस में मिलकर हंसी-मजाक करते हैं। जो व्यक्ति इस उत्सव में शामिल नहीं होते, उनका मुँह रंगकर उन्हें गधा बनाया जाता है और उनका जुलूस निकाला जाता है। इस अवसर पर कोई किसी की कही गई बातों का बुरा नहीं मानता। बस चारों ओर ठहाकों की गूँज ही सुनाई देती है।
अमेरिका में होली जैसे ही एक मस्ती से भरे त्यौहार का नाम है- होबो। इस त्यौहार के अवसर पर एक बड़ी सभा का आयोजन होता है, जिसमें लोग तरह-तरह की वेशभूषा पहनकर आते हैं। इस समय कसी भी औपचारिकता पर ध्यान नहीं दिया जाता। मस्ती में झूमते हुए लोग पागलों जैसा व्यवहार करने लगते हैं। वेस्टइंडीज में तो लोग होली को होली की ही भाँति मनाते हैं। इस अवसर पर यहाँ तीन दिनों की छुट्टी होती है। और उस अवधि में लोग धूम-धाम से त्यौहार मनाते हैं।
पोलैण्ड में होली के ही समान ‘अर्सीना’ नाम का त्यौहार मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग एक दूसरे पर रंग डालते हैं। और एक-दूसरे के गले मिलते हैं। पुरानी शत्रुता भूलकर नए सिरे से मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने के लिए यह श्रेष्ठ उत्सव माना जाता है। चैकोस्लोवाकिया में ‘बलिया कनौसे’ नाम से एक त्यौहार बिल्कुल होली के ढंग से ही मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग आपस में एक-दूसरे पर रंग डालते हैं और नाचते-गाते हैं।
अफ्रीका महाद्वीप के कुछ देशों में ‘ओमेना बोंगा’ नाम से जो उत्सव मनाया जाता है, उसमें हमारे देश की होली के समान ही एक जंगली देवता को जलाया जाता है। इस देवता को ‘प्रिन बोंगा’ कहते हैं। इसे जलाकर नाच-गा कर नई फसल के स्वागत में खुशियाँ मनाते हैं। मिश्र में भी कुछ होली की ही तरह नई फसल के स्वागत में आनन्द मनाते हैं। इस आनन्द से ओत-प्रोत त्यौहार का नाम ‘फालिका’ है। इस अवसर पर पारम्परिक हंसी-मजाक के अतिरिक्त एक अत्यन्त आकर्षक नृत्य एवं नाटक भी प्रस्तुत किया जाता है।
सूर्योदय के देश जापान में भी होली के रंग की छटा निखरती है। वहाँ यह त्यौहार नयी फसल के स्वागत के रूप में मनाया जाता है। मार्च के महीने में मनाए जाने वाले इस त्यौहार में जापान निवासी उत्साह से भाग लेते हैं। और अपने नाच-गाने एवं आमोद-प्रमोद से वातावरण को बड़ा आकर्षक और मादक बना देते हैं। इस अवसर पर खूब हंसी-मजाक भी होते हैं।
श्रीलंका में तो होली का त्यौहार बिल्कुल अपने देश की ही तरह मनाया जाता है। वहाँ बिल्कुल ठीक अपनी होली की ही भाँति रंग-गुलाल और पिचकारियाँ सजती हैं। हवा में अबीर उड़ता है। लोग सब गम और गिले-शिकवे भूलकर परस्पर गले मिलते हैं। अपनी मित्रता एवं हंसी-खुशी का यह त्यौहार श्रीलंका में अपनी गरिमा बनाए हुए है।
थाईलैण्ड में इस त्यौहार को ‘साँग्क्रान’ कहते हैं। इस अवसर पर थाईलैण्ड के निवासी मठों में जाकर वहाँ भिक्षुओं को दान देते हैं। और आपस में एक-दूसरे पर सुगन्धित जल छिड़कते हैं। इस पर्व पर वृद्ध व्यक्तियों को सुगन्धित जल से नहला कर नए वस्त्र देने की परम्परा है। परस्पर के हंसी-मजाक, चुहल-चुटकुले इस त्यौहार को एकदम होली की भाँति संवार देते हैं।
अपने पड़ोसी देश बर्मा में होली के त्यौहार को ‘तिजान’ नाम से जाना जाता है। यहाँ पर भारत देश के समान ही पानी के बड़े-बड़े ड्रम भर लिए जाते हैं और उनमें लोग रंग तथा सुगन्ध घोल कर एक-दूसरे पर डालते हैं। मारीशस में तो होली का त्यौहार भारत के समान ही मनाया जाता है। वहाँ पर इसकी तैयारी 15 दिन पहले से ही शुरू हो जाती है। ये पन्द्रह दिन चारों ओर हंसी-ठहाकों की मधुर गूँज खनकती रहती है।
हंसी की यह खनक अपने देश में हो या फिर देश की सीमाओं के पार एक सी है, एकदम एक है। विश्व में बिखरी हंसी की यह छटा देखकर यही कहा जा सकता है कि होली एक है हाँ उसके रंग अवश्य अनेक है। ये रंग चमकते-दमकते रहे- इसके लिए हमें और हम सबको इसका ध्यान रखना होगा- कि कहीं हम अपने किसी व्यवहार से इन्हें बदरंग न कर दें। इस साँस्कृतिक त्यौहार की गरिमा जीवन की गरिमा में है। इस त्यौहार पर मन को तो हुलसना ही है, उसे हुलसना भी चाहिए, पर प्रकृति के संग-संग। उसे हर तरह की विकृति से नाता तुड़ाकर प्रकृति में- प्रकृति के रंगों में रमना चाहिए। तब वह होली के अवसर पर कुछ इस तरह से गुनगुना उठेगा-
लाल-लाल टेसू फूल रहे फागुन संग होली के रंग-रंगे, छटा-छिटकाए है वहाँ मधुकाज आए बैठे मधुकर पुँज मलय पवन उपवन वन छाए हैं हंसी-ठिठोली करै बूढे ओ बारे सब, देखि-देखि इन्है कवित्त बनि आयो है।
प्रेम स्वयं सृजन है। वह जहाँ उत्पन्न होता है, वहाँ देवत्व उत्पन्न करता है और जिस पर उसे प्रयुक्त किया जाता है वह समर्थ बनता है। शर्त इतनी ही है कि प्रेम सच्चे अर्थों में प्रेम होना चाहिए।
-परमपूज्य गुरुदेव
होली आयी रे! आज होली के दिन यह मस्ती भरी गूँज बाहर चारों ओर है। लेकिन यदि अन्तर्चेतना में भक्ति जाग्रत् हो गयी हो तो अपने हृदय की ब्रजभूमि में भी इसे हर पल अनुभव किया जा सकता है। इसकी अनूठी मस्ती में डूबा जा सकता है। बड़ा मधुर साम्य है, भक्त के जीवन और होली के त्यौहार में। भक्त के जीवन में भी पहले उठती है तप की ऊँची और चमकती ज्वालाएँ। एक पर एक अनगिनत कष्ट आते ही चले जाते हैं। घर-परिवार और समाज के लोग उसे भगवान् की ओर बढ़ते हुए देखकर तरह-तरह की बाधाएँ खड़ी करते हैं। अपने अंतर्मन के कुसंस्कार, जन्म-जन्मांतर के दुष्कर्म, वासनाएँ भी अवरोधों की झड़ी लगा देती है। पर ज्यों-ज्यों अवरोध बढ़ते हैं, त्यों-त्यों भक्त की प्यास बढ़ती है। उसके तप में चमक आती है।
तप की इस प्रचण्ड अग्नि में वासनाओं की होलिका जलती है। कभी न भरने का दावा करने वाली, अपने को अमिट समझने वाली वासनाएँ जल कर राख हो जाती हैं। भक्त की पुकार के सामने अवरोध टिकती नहीं। यह पुकार ही तो भक्त का तप है। अपने प्यारे प्रभु को भक्त पुकारता है। जीवन की हर कठिनाई-वासना के हर भयावह रूप के सामने, कुसंस्कारों के हर बहकावे पर भक्त को एक ही समाधान सूझता है, कि वह अपने आराध्य को पुकार ले। उसकी जिह्वा नहीं, प्राण पुकारते हैं। वह कहता है- प्रभु हम आना चाहें तुम तक तो हम आ भी कैसे सकेंगे? हमारे पाँव बहुत छोटे हैं। तुम ही चले आओ, हे सर्व-समर्थ मेरे आराध्य! इस तरह भक्त अपनी प्यास को, अपनी पुकार को उभारता है। उसकी यह पुकार, उसकी प्यास सघन होती जाती है। एक उत्पन्न अग्नि बन जाती है, विकल प्राणों से उपजी तप की अग्नि।
तप की इस प्रचण्ड अग्नि में वासनाओं की होलिका जलती है, जलकर राख होती है। कुसंस्कारों का घास-फूस, जन्म-जन्मान्तरों का कूड़ा-कचरा जलकर भस्म हो जाता है। रूपांतरित हो जाता है जीवन। नवधा भक्ति की नवरंगी फुहारें उसके हृदय में उठने-उफनने लगती हैं। भक्ति के रंगों की सम्मोहक छटा उसके जीवन में छा जाती है। भक्त को अपने आराध्य की कृपा से एक नयी दृष्टि मिलती है। और उसे होलिकोत्सव के नजारे नजर आने लगते हैं। उसे महसूस होता है- कि होली का त्यौहार वह अकेला नहीं समूची प्रकृति उसके साथ मना रही है।
प्रकृति के समस्त विस्तार में उत्सव ही उत्सव है। नाद ही नाद है। सब तरह के साज बज रहे हैं। पक्षियों में, पहाड़ों में, वृक्षों में, सागरों में- सब तरह बहुत-बहुत ढंगों और रूपों में परमात्मा होली खेल रहा है। कितने रंग फेंकता है, कितनी गुलाल बिखेरता है। लेकिन इस अनूठे उत्सव को पाते वही हैं, मनाते वही हैं, जो भक्ति के रस में पगे हैं, जो अपने तप की ज्वालाओं में वासनाओं की होलिका को जला चुके हैं। होलिका दहन के बाद ही तो होली का त्योहार मनाने का विधान है।
भक्त प्रह्लाद ने भी ऐसे ही होली मनायी थी। उनके जीवन में संकट आते गए, वह डरे नहीं इन संकटों से, कष्टों से। बस पुकारते रहे अपने प्रभु को। उनकी पुकार तीव्र होती गयी। उनके प्राणों की प्यास सघन होती गयी। वासनाएँ, कामनाएँ सब एक साथ मिलकर, एक जुट होकर उन्हें जलाने आयीं। उन्हें अपनी अमरता का अभिमान था। उन्हें इस बात का दम्भ था कि वे अमिट हैं, शाश्वत हैं। वासनाओं की होलिका को इस बात का गुमान था कि वे तो स्वयं मानव की देह को जलाती हैं- राख करती हैं, भला उन्हें कौन जला सकेगा। होलिका ने भक्त प्रह्लाद को भी सामान्य मनुष्य समझ लिया था। उसे नहीं मालुम था कि भक्त की मानव देह में स्वयं अविनाशी नारायण रहते हैं। भक्त के प्राणों में तप की ज्वालाएँ दहकती हैं। भला ऐसे सच्चे भक्त को कहीं वासना की होलिका जला सकती है। होलिका को स्वयं जलना पड़ा। वह जली और जलकर राख हो गयी। भक्ति का उत्सव मनाते हुए प्रह्लाद नृत्य करने लगे। उनके प्राणों में गीत उठे- अहो भाव के, कृतज्ञता के।
कुछ ऐसी ही होली खेली मीरा ने अपने कान्हा के संग। लेकिन होली का फाग गाने के पहले मीरा को तपना पड़ा। बड़ा कठोर तप किया भक्तिमती मीरा ने।अनगिन अवरोध आए उसके सामने- कभी साँप का पिटारा, तो कभी विषय का प्याला। न जाने कितने षडयन्त्र, कुचक्र उसने सहे, झेले। पर वह डिगी नहीं, पुकारती रही, अपने साँवरे को। विरह की मारी- बन-बन डोलती रही। वह विरह ही तो भक्त का तप है। सभी जानते हैं, गरमी के बाद वर्षा होती है। ग्रीष्म के बाद आकाश में बादल छाते हैं, मेघ घिरते हैं। ये मेघ ग्रीष्म के बाद इसलिए घिरते हैं क्योंकि घने ताप के कारण, जलते हुए सूरज के कारण, वायु विरल हो जाती हैं। वायु में शून्य पैदा हो जाता है। और शून्यता में प्रबल आकर्षण है। शून्य खींच लेता है, बादल भागे चले आते हैं।
ऐसी ही घटना भक्त के अन्तरतम में घटती है। भक्त की प्यास जब प्रज्वलित हो जाती है, प्राण जब प्रभु की आकाँक्षा-अभीप्सा से आतुर-आकुल हो उठते हैं, विरह की अग्नि जब जलती है, तो भीतर एक शून्य पैदा होता है। और भगवान् भक्त से मिलने के लिए भागे- दौड़े चले आते हैं। मीरा के साथ भी यही हुआ। पहले तो मीरा के जीवन में तप की ज्वालाएँ जली। वासना की होलिका राख हुई। फिर फाग की मस्ती छाई। मीरा के प्राणों में गीत गूँजे। होली के गीत, फाग के गीत, अपने कान्हा से मिलने के गीत। हृदय की व्रजभूमि में साँवरे के संग रचाए जा रहे रास के गीत।
मीरा के ये गीत अनूठे हैं। ये गीत कविता की तरह नहीं लिखे गए हैं। ये पैदा हुए हैं। हृदय में खेली जा रही होली की किसी धुन में, नाचते-नाचते अनायास...। मीरा के द्वारा गाया गया होली का फाग मीरा की ही भाँति अनोखा है। उनकी कविता तो ऐसी है, जैसे कोई राह पर चले और पाँवों के निशान धूल में बन जाएँ। इनका कोई प्रयोजन नहीं था, इनके लिए कोई चेष्टा नहीं की गयी थी। सब कुछ अनायास हो गया। मीरा तो बस अपने कन्हैया के संग नाची थी। वह नाचती चली। ये पगचिह्न बन गए। इन पगचिह्नों में अगर कोई प्रेम से उतरे, तो उसे मीरा के पाँव नहीं, मीरा के पैरों के भीतर जो नाच रहा है, उसकी भी भनक मिलेगी।
मीरा ने जो फाग गाया है, उसमें मीरा के ही शब्द नहीं, मीरा के हृदय में जो विराजमान हो गया है उसका स्वर भी लिपटा है। यह फाग तो मीरा ने तब गाया था, जब वह अपने हृदय की व्रजभूमि में अपने कन्हैया के साथ नाची थी। ये गीत तब पनपे थे, जब कान्हा ने अपनी शाश्वत सखी मीरा के ऊपर भक्ति के नवरंगों से भरी हुई पिचकारी मारी थी। और मीरा ने अपने साँवरे पर श्रद्धा एवं प्रेम का गुलाल उड़ेला था। आज होली के अवसर पर तनिक डूब लें मीरा की मस्ती में- थोड़ा गुनगुना लें मीरा के साथ-
होली खेलत है गिरधारी।
मुरली चंग बजत डफ न्यारो, संग जुवति ब्रजनारी। चंदर केसर छिड़कत मोहन, अपने हाथ बिहारी।
भरि-भरि मूठि गुलाल लाल चहुं देत सवन पै डारी। छैल-छबीले नवल कान्ह, संग स्यामा प्राणन प्यारी। गावत चार घमार राग तंह दै दै कल करतारी। फाग जु खेलत रसिक साँवरो बाढ्यो ब्रज रस भारी। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, मोहन लाल बिहारी।
ये स्वर कहीं बाहर नहीं, हृदय की ब्रजभूमि में गूँजे हैं। इनकी अनुभूति भी वहीं हो सकती है। पर यह अनुभूति होती तभी जब हृदय में भक्ति की प्यास जगे, प्राणों में तप की ज्वालाएँ चमके, वासना की होलिका राख हो। और तब अपनी अन्तर्चेतना में होलिकोत्सव की जो अनुभूति होगी, वह किसी खास दिन के लिए वरन् देश-काल से परे शाश्वत होगी।
नाम-जप कर लेने का मात्र से परमार्थ प्रयोजन सिद्ध हो जाएगा, यह सोचते रहना, सस्ते नुस्खों से मन बहलाते रहना उचित नहीं। हमें यथार्थवादी होना पड़ेगा। जीवन-साधना के प्रधान अंग परमार्थ को अपनाना पड़ेगा। परम स्वार्थ का स्वरूप आत्मनिर्माण है, जिसमें लोकमंगल के लिए सेवाधर्म अपनाना, अपनी परोपकार परायण सेवा प्रवृत्ति का परिचय देना निताँत आवश्यक है।
-परमपूज्य गुरुदेव
(13-4-79 को दिया गया उद्बोधन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
देवियों, भाइयों! अनुग्रह और मनुहार, इन दोनों का आपस में संबंध तो है और ये क्रम चलता भी है। इसको हम शाश्वत सिद्धाँत महसूस कर सकते हैं मनुहार, खुशामदें, मिन्नतें, प्रार्थनाएं, आप इन्हें कीजिए, इनकी भी आवश्यकता हैं। यह क्रम भी इस दुनिया में चलता तो है। मैं यह तो नहीं कहता कि यह क्रम चलता नहीं है, पर क्या अनुग्रह मिलते भी हैं? हाँ, अनुग्रह भी मिलते रहते हैं। अनेक आदमी जीवित हैं, अपंग भी इसी पर जीवित हैं, दुर्बल भी इसी पर जीवित हैं और सिद्धाँत भी अनुग्रह के ऊपर जिंदा है। अनुग्रह दुनिया में से खत्म हो चला? नहीं बेटे! खत्म होने की बात नहीं कहता, पर मैं यह कहता हूँ कि सिद्धाँत और इसके आधार पर कोई लम्बी योजना नहीं बन सकती और कोई महत्वपूर्ण कार्य इसके आधार पर सिद्ध नहीं हो सकता।
मित्रों! अगर आप कहें कि अनुग्रह के आधार पर कृपा कीजिए, हमारी सहायता कीजिए, हमको ये दीजिए। लेकिन क्या ये चलेगा? चल तो सकता है, पर वहाँ तक शोभा नहीं देता, जहाँ तक आदमी स्वयं में समर्थ हो। जैसे बच्चा, बच्चा क्या करता है? बच्चा स्वयं में असमर्थ होता है, कुछ कमा नहीं सकता। इसलिए कुछ कमा सकने की स्थिति में न होने की वजह से, असमर्थ होने की वजह से माँ-बाप उसकी सहायता करते है। बच्चे को रोटी देनी चाहिए, कपड़े देने चाहिए, सहायता देनी चाहिए। बच्चे की मनःस्थिति माँगने की होती है, क्योंकि वह विकसित नहीं है।
बालक जैसी मनःस्थिति
अविकसित जितने भी प्राणि है, खासतौर से मनुष्य, उनकी पहचान एक है। क्या पहचान है? ये पहचान है कि वे माँगते रहते है। माँगता हो तो आप क्या कहेंगे उसको? चाहे उम्र का भी हो जाए तो भी क्या कहेंगे? तो मैं उसको बच्चा कहूँगा। बच्चा बड़ी उम्र का? हाँ बड़ी उम्र के भी बच्चे होते है। मनःस्थिति की दृष्टि से वे सब आदमी बच्चे हैं जो अपने पुरुषार्थ के ऊपर निर्भर नहीं है, दूसरों से माँगकर अपना काम चलाने के इच्छुक है। इसी से वे अपना गुजरा करते है। ये भौतिक दृष्टि से, भावनात्मक दृष्टि से बालक हैं। बालकों को मिलता है? हाँ बालकों को भी मिलता है। बालकों को क्या-क्या मिलता है बताइए जरा? बालकों को रबड़ की गुड़िया मिलती है और क्या मिलता है? गुब्बारा मिलता है और क्या मिलता है? लेमनचूस मिलता है और क्या मिलता है? टॉफी मिलती है और क्या मिलता है, झुनझुना मिलता है। नहीं साहब! बड़ी चीज बताइए। बेटे! बड़ी चीजें नहीं मिलती। माँ-बाप बच्चों को प्यार करते हैं? बहुत प्यार करते है, लेकिन कीमती चीजें? कीमती चीजें आपको नहीं मिल सकती, क्योंकि आप बच्चे है।
मित्रों! बच्चों को कभी कीमती चीजें नहीं मिलती है। उनका मनोविनोद करने के लिए खेल-खिलौने, उनका मन रखने के लिए तबियत बहलाने के लिए उनको जो कुछ चीजें दी जा सकती है, वे टिकाऊ नहीं होती। तो क्या बड़ों को भी मिलती है? हाँ बड़ों को भी मिलती है। बड़ों को कब मिलती हैं? बड़ों को तब मिलती हैं जब वे मुसीबत में फंसे हुए होते है। जैसे मान लीजिए कि वे दुर्घटनाग्रस्त हो गये हों, अकाल से पीड़ित हो गए हो, कोई दूसरी मुसीबतें आ गई हो, रेलवे में ऐक्सीडेंट हो गया हो। साहब! मुसीबत में हमारी सहायता कीजिए। हम जरूर सहायता करेंगे आपकी, लेकिन कब तक? सवाल यह है कि कब तक सहायता करेंगे, हमेशा, जिंदगी भर? नहीं बेटे, जिंदगी भर नहीं कर सकते।
अच्छा तो कब तक करेंगे? सिर्फ उस समय तक करेंगे, जब तक अपने पैरों पर आप खड़े नहीं हो जाते, बस। बाद में? बाद में नहीं करेंगे। अगर आप कहेंगे कि हम मुसीबत में फंसे हुए हैं और सारी जिंदगी भर के लिए आप हमारा ठेका ले लीजिए, तो मुश्किल है। साहब! हम पाकिस्तान से आए हैं, तो आप हमारा गुजारा कीजिए? हम तो शरणार्थी है। ठीक है आप शरणार्थी हैं, तो हम थोड़े दिन आपकी सहायता करेंगे। इंसान को इंसान की सहायता करनी चाहिए, पर आप इसे सिद्धाँत बनाकर नहीं चल सकते। सिद्धाँत मत बनाइए। सिद्धांत बना देंगे तो मुश्किल हो जाएगा।
मित्रों! बच्चा जब बड़ा हो जाता है तब माँ-बाप की त्योरियाँ बदलती देखी हैं कि नहीं आपने? वे कहते हैं कि तुझे शर्म नहीं आती है, पच्चीस साल का हो गया है, मूँछें निकल आई हैं, कमाई के लायक हो गया है। पच्चीस साल में बी.ए. पास करा दिया है, एम.ए. पास करा दिया। अब कमा कर ला। नहीं पिताजी पैंट बनवा दीजिए, नहीं पिताजी सिनेमा देखने के लिए पैसे दे दीजिए, नहीं पिताजी ये दे दीजिए। सबके माता-पिता दे भी देते हैं, पर आपने देखा नहीं! देते समय उनका चेहरा कैसे बदल जाता है, तेवर कैसे बदल जाते है। क्यों बदल जाते है? इसलिए कि ये अपने आप में कमाने लायक हो गया है। इसको अब हमारी मदद करनी चाहिए थी, जबकि ये उलटा हम से ही माँगता है। ये स्थिति किसकी कह रहा हूँ मैं? बच्चों की कह रहा हूँ। उन व्यक्तियों की कह रहा हूँ जो अनुग्रह के ऊपर और मनुहार के ऊपर जिंदा रहना चाहते है।
मनुहार पर नहीं पात्रता के विकास पर टिकें
मित्रों! मनुहार किसे कहते है? खुशामद को कहते हैं। खुशामद भी एक सिद्धाँत है। बिना माँगे किसी को क्या पता चलेगा कि आपको क्या जरूरत है? क्या आप जरूरत की बात नहीं कहेंगे? आप जरूरत की बात कहेंगे तो चीजें मिल जाएंगी? हाँ चीजें तो मिल जाएँगी, लेकिन नुकसान हो जाएगा। क्या नुकसान हो जाएगा? जैसे ही चीज मिलेगी उससे ज्यादा कीमती चीज हाथ से चली जाएगी। क्या चला जाएगा? आपका स्वाभिमान चला जाएगा। आप किसी से बिना कीमती चुकाए, अहसान में कोई चीज ले लेते हैं, तो आपका सिर नीचे झुक जाएगा। आप नीचे हो जाएंगे और आप दूसरे दरजे के व्यक्ति हो जाएंगे और आपको दूसरे के आगे आंखें नीची करनी पड़ेगी। अगर आप कृतज्ञ हैं तो तुरंत अपनी कृतज्ञता का इजहार कीजिए। “थैंक्यू बैरी मच’ कहिए। आपने हमको पानी पिला दिया, आपने हमको बतला दिया, अहसान है।
आदमी दूसरों की सहायता पाकर के लाभ तो उठा सकता है, लेकिन दबता है। दबाना? हाँ दबना। जहाँ तक मनुष्य के आध्यात्मिक स्तर का सवाल है, दबना आदमी के खराब है। आदमी को दूसरों के अहसान से नहीं दबना चाहिए। दूसरों की दूसरी चीजों से दबना चाहिए जैसे प्यार से दब सकते है तो दबिए आप। दूसरों से प्यार करते है। माँ का आपसे प्यार है। माँ हम आपके बहुत अहसानमंद है। लेकिन आप पैसे के संबंध में और रोटी के संबंध में मत दबिए। रोटी भगवान ने आपको नहीं दी है? आप इज्जत वाले हैं, स्वाभिमानी हैं। आपसे कोई कहे खाना खा लें, हाँ साहब खाना खाकर आ रहे हैं। नहीं साहब रोटी खा लीजिए। नहीं खाई हो, शायद आपके घर में आजकल रोटी की तंगी हो, तो भी आपको कहना चाहिए कि नहीं साहब! कोई दिक्कत की बात नहीं है। भगवान की कृपा है। रोटी तो देर-सबेर मिल ही जाती है, फिर आपके यहाँ क्यों खाएंगे? अच्छा जब न हो तो आप हमारे यहाँ खाइए। आपकी बड़ी कृपा है, आपने पूछ लिया यही क्या कम है। आप खा लीजिए। आपको रोटी नहीं खानी चाहिए। ठीक है कोई आपका ऐसा निजी दोस्त है, जिगरी दोस्त है, जो आपके यहाँ खा जाता है और आप उसके यहाँ खा लेते है। उसकी बात नहीं कहता हूँ मैं, पर ऐसे सामान्य नियम की बात कहता हूँ कि आपको दूसरों की सहायता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
किसकी बात कह रहे हैं? लौकिक जीवन की। बेटे, सिद्धाँत तो वहीं है। आज आप लौकिक जीवन में इसे व्यवस्थित कर लीजिए अथवा पारलौकिक जीवन में व्यवस्थित कर लीजिए। नहीं साहब! आध्यात्मिकता में तो माँगना-ही माँगना है। बेटे, माँगना नहीं है आध्यात्मिकता में, किसने कहा था आपसे? नहीं साहब, आध्यात्म में सारी प्रार्थना-ही-प्रार्थना भरी है। प्रार्थना का मतलब यह नहीं है, जो आपने समझा है कि आप माँगेंगे और मिलेगा। “माँगेंगे और मिलेगा” का सिद्धाँत, ये शायद आध्यात्मिकता की व्याख्या करने में बहुत गलती हो गई। यही कारण है कि आदमी आज स्वाभिमानी और स्वावलंबी कम होते जा रहे है। आध्यात्मिकता ने कितना फायदा किया है वर्तमान में, यह मैं नहीं जानता, पर रूहानी दृष्टि से आज की आध्यात्मिकता ने आदमी का नुकसान किया है। क्या नुकसान किया है? आदमी को परावलंबी बना दिया है। परावलंबन माने दूसरों की तरफ मुँह ताकने वाला, दूसरों से अपेक्षाएं करने वाला, दूसरों से आशाएं रखने वाला। किसके लिए? अपनी जिंदगी की नाव ढोने के लिए। इससे आपको दूसरों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है। इससे आपको क्या मिल गया? क्या मिला मैं नहीं जानता, लेकिन सबसे कीमती चीज जो आपकी ‘शर्म’ थी वह आपने गंवा दी।
इस संबंध में मुझे एक घटना याद आ गई। क्या घटना याद आ गई? एक बार संत इमरसन के पास एक आदमी आया। वह हट्टा-कट्टा था, जवान था। माँगने लगा, तो उनसे कुछ कहते तो नहीं बना, पर उन्होंने क्या किया कि एक कपड़ा उठाकर अपना मुँह ढक लिया। दूसरों ने कहा साहब आपको देना है तो दे दीजिए, नहीं देना तो इसे मना कर दीजिए। कपड़े से मुँह ढक लिया, ये क्या करते हैं आप? उन्होंने कहा, “मुझे देने में ऐतराज नहीं है, पर इस आदमी को देखने का मेरा मन नहीं। क्यों? क्योंकि इस आदमी ने इंसान की इज्जत को गंवा दिया। हट्टा-कट्टा होते हुए भी, जवान आदमी होते हुए भी, अपने हाथ-पैर से, अपने पुरुषार्थ से अपना गुजारा करने में समर्थ होते हुए भी यह यहाँ हाथ पसारने आया है। इंसानियत को कलंकित कर दिया इसने। इसीलिए मुँह ढक लिया मैंने।”
मित्रों! न जाने किसलिए, न जाने क्यों, न जाने कैसे हो गया कि आध्यात्मिकता का स्वरूप आज ऐसा बना दिया गया कि इनसे माँगना चाहिए। किससे माँगना चाहिए? देवता से माँगना चाहिए। देवता को तो देना चाहिए। “दानत् वा सा देवता।” देवताओं को सहायता करनी चाहिए। नहीं साहब, देवता से तो माँगना चाहिए। अच्छा बेटे और किससे माँगना चाहिए? संत पुरुषों से माँगना चाहिए, दिव्य पुरुषों से माँगना चाहिए, अमुक से माँगना चाहिए। नहीं बेटे! संत पुरुषों की सेवा करनी चाहिए, सिद्ध पुरुषों की सहायता करनी चाहिए। आपको मालूम है कि मंदिर में जाने का एक नियम है। मंदिर में आप जाएं तो फल-फूल लेकर के जाए। नहीं गुरुजी! हम तो ऐसे ही दर्शन करेंगे। नहीं बेटे! ऐसे दर्शन नहीं करना, देवता नाराज हो जाएंगे। यह प्राचीनकाल की परंपरा है, आज की तो मैं नहीं कर सकता। कहीं भी आप किसी देवमंदिर में जाएं तो पत्र-पुष्प लेकर जाना, फल लेकर के जाना, कुछ-न-कुछ लेकर के जाना और चढ़ाना, तब नमस्कार करना। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि आप कुछ देकर आइए। आप लेकर के आएंगे? लेकर नहीं बेटे, देकर के आना। यह परंपरा आध्यात्मिकता की परंपरा है।
हमें देना आना चाहिए
जिस देव−परिवार में हम शामिल होते हैं, उस देव−परिवार में शामिल होने का मतलब है कि हमारे भीतर देवत्व का विकास होना चाहिए। देवत्व का विकास किस तरीके से होता है? देवत्व का विकास इस मायने में होता है कि आदमी दिल से उदार हो जाता है। उदार होकर आदमी यह सीखता है कि हमें देना आना चाहिए। किसको देना चाहिए? सबको देना चाहिए, अपने शरीर को देना चाहिए ताकि यह धन्य हो जाए और अपने दिमाग को देना चाहिए ताकि यह शाँत हो जाए। हमारा मस्तिष्क बहुत अशाँत रहता है, बहुत परेशान रहता है। दिमाग को कुछ ऐसी चीज देनी चाहिए।, जिससे यह शाँत रह सके, खुश रह सके। और क्या करना चाहिए? आपको अपने शरीर को देना चाहिए। शरीर को क्या देना चाहिए? शरीर बेचारा मुसीबत में फंसा हुआ है, रोज-रोज बीमार पड़ जाता है, रोज-रोज कमजोर हो जाता है, इसे कुछ देना चाहिए। इस शरीर के आप देवता हैं न? हाँ, देवता हैं तो आप दीजिए कुछ इसको। नहीं साहब, हम क्या कर सकते है? आप सब कुछ कर सकते हैं। आप मुसीबत में फंसी हुई अपनी देह को निश्चित रूप से बीमारियों से छुट्टी दिला सकते है। निजात दिला सकते है।
बीमारियों से आप कैसे सहायता कर सकते हैं? चंदगीराम पहलवान को टी.बी की शिकायत थी। बाईस साल की उम्र में उसको टी.बी. इस कदर हो गई थी की फेफड़े में से खून आने लगा था और मरने के दिन नजदीक थे। किसी ने उनको यह सलाह दी कि हमीमों का इलाज कराने के साथ आप अपना इलाज स्वयं करिए। पहला इलाज क्या है? अपनी जीभ के ऊपर और अपनी इंद्रियों के ऊपर, आदतों के ऊपर कंट्रोल कीजिए। उन्होंने अपनी आदतों पर कंट्रोल करना शुरू कर दिया। वर्जिश की और बीमारी से छुटकारा पा लिया।
साथियों! जीभ जो आसमान से पाताल तक जाती है और आपकी पिटाई कराती है। आपकी पिटाई किसने कराई है बताना जरा? आपको पिटाई जीभ ने कराई। यह तो उल्टा-सीधा कहकर ड़ड़ड़ड़ मुँह में घुस जाती है और जूते आपके सिर पर पड़ते है। जहाँ जाते हैं वहीं जूते पड़ जाते है। किस-किस के पड़े? आपकी बीबी के पड़े, बीबी के पड़े? बीबी ने जूते-चप्पल तो नहीं मारे, पर आपके साथ ऐसा व्यवहार किया जो जूते से भी ज्यादा था। जीभ पर काबू नहीं है आपको। अल्लम-गल्लम बकते रहते है। मोहब्बत करना आता नहीं, शऊर है नहीं, तमीज है नहीं कि इंसान के साथ किन शब्दों में बात करें। इंसान की इज्जत की रखवाली करने के बाद में आदमी से सहानुभूति किस आधार पर माँगनी चाहिए, आपको मालूम ही नहीं। हावी होते जाते है। जूते पड़ेंगे आपके, अभी और पड़ेंगे।
मित्रों! जीभ ने क्या कर दिया? जीभ ने आपकी सेहत खराब कर दी। सेहत को खराब करने की जिम्मेदारी ऐ आदमी की है। जिसने आपकी अच्छी-खासी तंदुरुस्ती को तबाह कर डाला है। ये कौन है? इसका नाम है जीभ। हकीम लुकमान सही कहते थे कि आदमी अपने मरने के लिए और दफन होने के लिए जो कब्र खोदता है, वह अपनी जीभ की नोक से खोदता है। यह सच है? हाँ यह बिल्कुल सच है कि आदमी अपनी जीभ की नोंक से अपनी कब्र खोदता है। आपने जो खाया है, जरा उसकी लिस्ट लाइए। क्या खाया है? आपने जहर खाया है और वो चीज खाई हैं , जो आपको नहीं खानी चाहिए थी। आपने जिस तरीके से खाई है, उस तरीके से नहीं खानी चाहिए। थी। आपने चीजों को नहीं खाया है, वरन् चीजों ने आपको खा लिया। अब आप क्या शिकायत करते है? आपने बदतमीज़ी से और बेहूदगी से चीजों को खाया है। अब बेहूदे तरीके से खाने की वजह से ये बेहूदी चीजें आपका सफाया करती है। यह कौन करती है? जीभ करती है।
मित्रों! अब आप क्या करते है? आप सेहत की एक तरीके से सहायता कर सकते है। देव−परिवार में आकर, आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने के बाद में आपके लिए हम एक नीति तय कर देंगे। किसके लिए? जो भी हमारे नजदीक हैं उसके लिए। किस को देंगे? आप शरीर को दीजिए। आपका नजदीक घर, आपका सेवक, आपका स्वामिभक्त कुत्ता है- आपका शरीर, जो चौबीस घंटे आपके साथ रहता है। आपको उस पर दया नहीं आती, आपको करुण नहीं आती। आप इसको दे सकते है। अगर दे सके तो चंदगीराम पहलवान की तरह से आप टी.बी. की बीमारी तक से निजात पा सकते हैं। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आप सेहत पा सकते हैं, बशर्ते आप पहले जीभ पर काबू पाइए, जीभ पर अंकुश रखिए, डंडे लगाइए ऐसी जीभ पर जिसने आपको खा लिया। अगर आप जीभ पर काबू पा सकते हैं और इंद्रियों पर काबू पा सकते है तो चंदगीराम पहलवान के तरीके से आप अपनी सेहत फिर पा सकते है। निश्चित रूप से? हाँ निश्चित रूप से।
सेहत देवता व हकीम नहीं दे सकते
मित्रों! सेहत कौन दे सकता है, देवता? देवता नहीं दे सकता। हकीम जी? हकीम भी नहीं दे सकते। क्या साहब! हकीम जी के पास तो बहुत अच्छी-अच्छी दवाएं है। बेटा बेकार की दवाएं है। एक दिन हकीम जी से पूछा था कि क्यों साहब! आपके पास तो बहुत सारी दवाएं हैं। क्या-क्या दवाएं बेचते है? हम तो टॉनिक बेचते है। अहा और क्या बेचते है? सब बीमारी की दवा बेचते हैं अच्छा तो आप अपने खानदान वालों को खिलाकर दिखाइए। बीबी को क्या तकलीफ हो रही है? बीबी की साँस चल रही है। क्यों साहब! इनको आपने पहलवानी की दवा नहीं दी। पहलवानी की दवा क्या होती है? पहलवानी की प्रोटीनाँल, प्रोटिनेक्स, हाँरलिक्स और विटामिन बी कांप्लेक्स, टामिन बी-12 आदि पच्चीसों दवाइयाँ है। इनको खाकर पहलवान हो जाएंगे। आपने इन बच्चों को नहीं खिलाया? अरे साहब सबको खिलाते है, किंतु हम जानते है कि ये बिल्कुल बेकार की चीजें है।
आप तो कह रहे हैं कि इसमें इतनी ताकत है, इसमें इतनी प्रोटीन है, इसमें इतने विटामिन है। इसमें उतनी अधिक चीजें है, तो फिर आप बच्चों को क्यों नहीं खिला देते? आप तो गरीब हैं न ही? गरीब तो नहीं हैं गुरुजी। इसमें कुछ तो है ही। ये तो प्रोटीन युक्त प्रोटीन्यूल हैं दूध में मिलाकर खाते हैं और प्रोटीन मिल जाता है। ये भुना हुआ सोयाबीन का आटा है। विटामिन बी कांप्लेक्स क्या है? यह कुछ भी नहीं है, गेहूं का छिलका है। छिलकों को पानी में भिगोकर जो मसाला निकल जाता है, उसी को बना लेते है। गेहूँ का छिलका जो गायों को फेंक देते है, भैंस को डाल देते हैं? हाँ साहब वही छिलका हैं तो क्या ये सब फ्राड हैं? किनका फ्राड है? दवाफरोशों का फ्राड है, जो लोगों को सब्जबाग दिखा करके ये चीजें बेचते रहते है और कहते है हम आपकी सेहत अच्छी कर देंगे, आपको तंदुरुस्त बना देंगे। अगर तंदुरुस्त बना देते तो एक भी हकीम की घरवाली कमजोर न पाई जाती।
अच्छा, हकीम जी, आप अपनी बीबी को पेश करिए हमारे सामने। अच्छा तो यही है, आपकी धर्मपत्नी। इनकी सेहत अच्छी होती, पर इनकी तो मिट्टी पलीद हो रही है। दवाई भी खिलाते है। क्या दवाई खिलाएंगे, ये तो बहकाने की दवाई हैं? हाँ बेटा! ठीक है आपका कहना। दवा वाले अपना गुजारा कर रहे है, कैमिस्ट अपना गुजारा कर रहे है, कंपाउंडर अपना गुजारा कर रहे है। लेकिन अच्छी सेहत पानी है तो कौन दे सकता है? आप दे सकते है, आपके अलावा और कोई नहीं दे सकता। आपके अलावा कोई मरीज नहीं है और न आपके अलावा दुनिया के परदे पर आपके लिए कोई हकीम है। दूसरों के लिए तो हो भी सकते हैं? अगर आप ये निश्चय कर लें कि हमको इस शरीर को देना है। क्या देना है? इस शरीर को ख्याति देनी है, यश देना है, अजर-अमर बनाना है। लोगों की निगाहों में इज्जतदार बनाना है, जिससे कि आपकी फोटो देखकर लोग आँखें नीची कर लिया करें। यह सब आप दे सकते है। कब? अगर आप देने की आदत सीख लें तब।
मित्रों! अगर आप देने की आदत सीख लें तब? आप अपने दिमाग को ऐसी चीजें दे सकते हैं कि आपका दिमाग कहे कि हमको लंबी जिंदगी जीने का मौका इन्होंने दिया। किसको? दिमाग को। दिमाग क्या है? दिमाग बेटे वो है जो हमारे भीतरी और बाहरी जिंदगी के ऊपर पूरी तरह कंट्रोल करता है। दिमाग को अपने गरम कर डाला हैं। दिमाग बेशक जलता रहता है। कैसे जलता रहता है? जैसे श्मशान जलता रहता है और उस श्मशान में भूत और पिशाच जलते रहते है। इस तरह से हमारा बेहतरीन कंप्यूटर जलता रहता है। चिंताओं की वजह से, फिक्र की वजह से, द्वेष की वजह से, ईर्ष्या की वजह से, अमुक की वजह से। क्यों साहब! ये बात सही है, आवश्यक है? नहीं बेटे! जरूरी नहीं हैं कि इन वजहों से ही आपका मस्तिष्क जलता रहता हैं। ये चीजें कतई जरूरी नहीं हैं।
क्यों साहब! इन परिस्थितियों में हर कोई जलेगा? नहीं, इन परिस्थितियों में हम आपको ढेरों आदमी बता देते हैं, जो आप से भी गई बीती परिस्थितियों में थे, लेकिन प्रसन्न थे, हंस सकते थे। कैसे? दिमाग पर कंट्रोल रखते थे। जिस मशीन से जिंदगी की हर चीज का कम निकालना है, उसी को आप असंतुलित कर देते है। फिर बताइए कैसे काम चलाएंगे? समस्याओं को कैसे हल करेंगे? जो चीज आपके काम की थी दिमाग, उसको तो आपने गरम कर डाला, जला डाला। आप चाहें तो अपने दिमाग पर रहम कर सकते है। दिमाग पर क्यों? आप चाहें तो उसे जलन से बचा सकते हैं, जो चौबीस घंटे जलता रहता है। रहम अगर हो तो आप अपने घर में जलते हुए जानवरों को निकाल सकते है। अगर आपको रहम नहीं हो तो कहेंगे कि मरने दीजिए। रहम हो तो दूसरों के ऊपर भी दया कर सकते हैं अगर आपके भीतर रहम है तो फिर भीतर वह ताकत है, शक्ति है, जिससे निश्चित रूप से आप अपने दिमाग को राहत दे सकते है। यह बेहतरीन कंप्यूटर है और यह करोड़ों रुपये कीमत का कंप्यूटर है।
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मित्रों! आपने इसे गरम कर दिया। मशीन को ज्यादा गरम करने से तो हर चीज जल जाती हैं पानी की मोटर जल जाती है, गाड़ी की मोटर जल जाती हैं। ज्यादा गरम कर देंगे, टेंप्रेचर बढ़ा देंगे तो वे जल जाएंगी। आपने अपने दिमाग को जला दया और जली हुई मोटर जिस तरीके से खड़बड़-खड़बड़ करती है और धुआँ देती है, आपका दिमाग भी उसी तरह से हर वक्त धुआँ देता रहता है। आप अगर चाहते है तो आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करके देवत्व ग्रहण करते और अपने दिमाग पर रहम कर सकते थे। आप चाहते तो अपने शरीर पर रहम कर सकते थे। इसका फल जरूर मिलता, सैकड़ों में मिलता। फल? हाँ बेटे फल, अध्यात्म नकद धर्म है। आप सही तरीके से इसका इस्तेमाल तो कीजिए। आप सही तरीका ही नहीं जानते हैं, तो मैं क्या करूंगा। आपने एक ही चीज सीख रखी है, मनुहार और अनुग्रह। उसके सामने नाक रगड़ेंगे, इसके सामने मिन्नतें करेंगे, सब गोरखधंधा है। यही आध्यात्मिकता तो बताई गई है न आपको, बताइए नाक रगड़ना, मिन्नतें करना, मनुहार करना और अनुग्रह पाना।
मित्रों! आपका भगवत् भजन क्या है, आपकी संतोषी माँ की पूजा क्या है, आपका हनुमान चालीसा क्या है बताइए जरा? सारी-की-सारी धुरी का जब हम पोस्टमार्टम करते है, विश्लेषण करते हैं तो आज का अध्यात्म, पुरातन नहीं, पूरी तरह से इसी जंजाल में फंसा हुआ मिलता है। इसमें दो ही चीजें दिखाई पड़ती है, एक मिन्नतें दिखाई पड़ती है, मनुहार दिखाई पड़ती है और दूसरा इस मिन्नत-मनुहार के बदले में अनुग्रह पाने की इच्छा मालूम पड़ती है। ये कहाँ तक सही है, बेटे मालूम नहीं, पर मैं जानता हूँ कि यह कहीं भी शोभा देने लायक नहीं है। आप इस आधार पर कोई बड़ी चीज नहीं पा सकेंगे।
कैसे बड़ी चीज नहीं प्राप्त कर सकेंगे? जैसे एक सेठ जी थे। उनके यहाँ एक पच्चीस-छब्बीस साल का लड़का आया। उसने कहा, कुछ काम-धंधा नहीं है हमारे यहाँ और आज रोटी भी नहीं मिली, सेठ जी हमारी कुछ सहायता कीजिए। मुनीम जी, देखना इसकी कुछ सहायता कर देना। मुनीम जी ने एक रुपया दिया और कहा लो भाई बाजार से रोटी खा लेना। साहब एक रुपये में रोटी कैसे मिलेगी? आप तो जानते ही हैं कि आजकल तीन रुपये में थाली मिली है। ऐ रुपये में पेट नहीं भरेगा। अच्छा मुनीम जी इनको कुछ और दे दीजिए। तो फिर क्या दे दें? दो रुपये दे दो। अच्छा दो रुपये ले। भगवान करे आपका कल्याण हो। सेठ जी बड़े उदार है, मुनीम जी बड़े उदार हैं, यह कहते वह चला गया। क्या ले गया? दो रुपया। कितनी बार कहा, कितना दीन बना, धन्यवाद कहा, तब जाकर के सेठ जी की कृपा से, मुनीम जी की सिफारिश से दो रुपये ले कर गया और अपना पेट भर लिया।
मित्रों! थोड़ी देर में एक और लड़का आया। उसकी भी उम्र वही पच्चीस-छब्बीस साल थी, शक्ल-सूरत में भी बिल्कुल वैसा ही मिलता-जुलता था। जब वह आया तो मुनीम जी उठकर खड़े हो गए, सेठ जी भी उठकर खड़े हो गए। सेठ जी ने कहा, आइए खैरियत तो हैं? बहुत दिन में आना हुआ। आइए, बैठिए साहब! सेठ जी ने अपना काम बंद कर दिया और नौकर से बोले, तू अखबार ला, पंखा ला, चाय जल्दी ला, मिठाई ला। दो-तीन दिन तक ऐसी खुशामद की, ऐसी इज्जत की कि क्या कहने? जब विदा हुए तब तरह-तरह के उपहार दिए, पेंट-सूट दिया, किराये के लिए सौ रुपये दिए। टिकट लाकर दिया। घर से गाड़ी में स्टेशन तक पहुँचाने के लिए गए। वह बार-बार कहता रहा कि आप क्यों कष्ट उठाते है? हमें इनकी क्या जरूरत है, रहने दीजिए। हम तो आपके बच्चे है। नहीं साहब! ये सब तो आपको लेकर जाना पड़ेगा। वही सेठ और वही मुनीम जोर दे रहे थे, दबाव डाल रहे थे कि नहीं साहब लेना ही पड़ेगा।
बेटे! लड़के दोनों ही थे; एक मिन्नतें कर रहा था, खुशामदें कर रहा था, तब दोनों की सिफारिशों में दो रुपये लेकर गया था और पीछे आशीर्वाद देकर गया था, लेकिन दूसरे को जो चीजें मिलीं। साहब ये क्या फर्क है? सेठ जी वही हैं, लड़के वही हैं। दोनों बाहर के थे, पर दोनों में फर्क था। क्या फर्क था? ये लड़का जो पीछे आया था, सेठ जी का जँवाई था। जँवाई क्या होता है? जँवाई उसे कहते है जिसके साथ लड़की की शादी कर देते हैं। तो आपने इसको क्यों दिया? इसलिए दिया जिससे ये हमारी बेटी की सहायता करे। इसकी कमाई के ऊपर हमारी बेटी की जिंदगी निर्भर है। इससे प्यार मिलता है, इसकी संपदा का वह फायदा उठाएगी। अच्छा तो आपने बेटी के पक्ष में इसकी सहायता की है। आप बिल्कुल सच कहते है। यह है तो एक लोकाचार, परंतु सही बात यह है कि सहायता प्राप्त करने की वजह से हमने इसको दिया है।
ये क्या कह रहे थे भिखारी और जँवाई की बात? हाँ बेटे, आपसे मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आप शुरू से देखिए कि जिनसे आप मिन्नतें करते हैं, जिनसे आप कुछ पाना चाहते हैं, उनके दरवाजे पर आप भिखारी होकर जाते हैं कि जँवाई होकर। जमाता के लिए जँवाई शब्द बड़ा खराब है, पर आप मुझे कहने दीजिए। जब कोई और अच्छा शब्द मिल जाएगा तो मैं उसको इस्तेमाल करूंगा, अभी तो मेरे पास और कोई शब्द नहीं है। हाँ तो आप क्या चाहते है? बेशकीमती चीजें पाने के लिए, अच्छी चीजें पाने के लिए, इज्जत पाने के लिए आपको क्या करना चाहिए? आपको जँवाई बनना चाहिए। किनका जँवाई बनना चाहिए? भगवान जी और किसका? साईं बाबा का और किसका आचार्य जी का। हरेक का जँवाई बनाना चाहिए। चल बदमाश कहीं का, दरिद्र और भिखमंगे पहले अपनी हैसियत को ऊँची उठा। अपनी हैसियत को ऊँचा उठाए बिना, ऊँची चीजें-कीमती चीजें न कभी मिली हैं और न मिलने वाली हैं। (क्रमशः)
बुद्धिवाद कितना ही उपयोगी क्यों न हो उसकी गरिमा हृदयवाद से ऊँची नहीं हो सकती। जहाँ विशुद्ध जड़ प्रयोजनों की बात है, वहाँ एकाकी बुद्धि को भी मान्यता दी जा सकती है, पर जब प्रश्न जीवित चेतना मनुष्य की समस्या पर विचार करना हो तब हृदयवाद को मान्यता देने से काम चलेगा।
जिसका अपनापन जितना संकुचित है, वह आत्मिक दृष्टि से उतना ही छोटा है।
-परमपूज्य गुरुदेव
जो परमार्थ में जीन है, तन-मन धन से परोपकार एवं परहित में निरत है, वही सज्जन है, वही सत्पुरुष है और वही धनवान है।
-परमपूज्य गुरुदेव
महानता के उपासकों को बड़प्पन की अभिलाषा को नियंत्रित ही रखकर चलना होता है।
-परमपूज्य गुरुदेव
परम पूज्य गुरुदेव एवं महर्षि पतंजलि में अद्भुत साम्य है। अध्यात्म जगत् में इन दोनों की उपस्थिति अत्यन्त विरल है। ये दोनों ही अध्यात्म के शिखर पुरुष हैं, परन्तु वैज्ञानिक हैं। वे प्रबुद्ध हैं बुद्ध, कृष्ण, महावीर एवं नानक की भाँति लेकिन इन सबसे पूरी तरह से अलग एवं मौलिक हैं। बुद्ध, कृष्ण, महावीर एवं नानक- इनमें से किसी की दृष्टि वैज्ञानिक नहीं है निश्चित रूप से ये सब महान् धर्म प्रवर्तक हैं, इन्होंने मानव मन और इसकी संरचना को बिल्कुल बदल दिया है, लेकिन उनकी पहुँच, उनका तरीका वैज्ञानिक नहीं है।
जबकि महर्षि पतंजलि एवं वेदमूर्ति गुरुदेव अध्यात्मवेत्ताओं की दुनिया के आइंस्टीन है। वे अद्भुत घटना हैं। वे बड़ी सरलता से आइंस्टीन, बोर, मैक्स प्लैंक या हाइज़ेनबर्ग की श्रेणी में खड़े हो सकते हैं। उनकी अभिवृत्ति और दृष्टि ठीक वही है, जो एकदम विशुद्ध वैज्ञानिक मन की होती है। कृष्ण कवि हैं, कवित्व पतंजलि एवं गुरुदेव में भी है। किन्तु इनका कवित्व कृष्ण की भाँति बरबस उमड़ता व बिखरता नहीं बल्कि वैज्ञानिक प्रयोगों में लीन हो जाता है। पतंजलि एवं गुरुदेव वैसे रहस्यवादी भी नहीं हैं, जैसे कि कबीर है। ये दोनों ही बुनियादी तौर पर वैज्ञानिक हैं, जो नियमों की भाषा में सोचते विचारते हैं। अपने निष्कर्षों को रहस्यमय संकेतों के स्वर में नहीं वैज्ञानिक सूत्रों के रूप में प्रकट करते हैं।
अद्भुत है इन दोनों महापुरुषों का विज्ञान। ये दोनों गहन वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं, परन्तु उनकी प्रयोगशाला पदार्थ जगत् में नहीं, अपितु चेतना जगत् में है। वे अंतर्जगत के वैज्ञानिक हैं। और इस ढंग से वे बहुत ही विरल एवं विलक्षण हैं। क्योंकि जो लोग अन्तर्चेतना में प्रवेश करते हैं, वे प्रायः कवि हो जाते हैं। और जो बाह्य जगत् में प्रवेश करते हैं, वे अक्सर हमेशा वैज्ञानिक होते हैं। परन्तु यहाँ यह नियम उलट-पुलट गया है। ये दोनों इस प्रकृति सत्य से परे और पार चले गए हैं।
इस तरह से तपोमूर्ति गुरुदेव एवं महर्षि पतंजलि विधाता के, विश्व उद्यान के अति दुर्लभ पुष्प हैं। उनके पास वैज्ञानिक मस्तिष्क है, लेकिन उनकी यात्रा भीतरी है। उन्होंने अनेकों प्रयोग किए हैं। परन्तु उनके सारे प्रयोग पदार्थ जगत् में नहीं चेतना जगत् में किए गए हैं। उन्होंने मनुष्य के अंतस् जगत् के निरपेक्ष नियमों का निगमन करके सत्य और मानवीय मन की चरम कार्य प्रणाली के विस्तार का अन्वेषण और प्रतिपादन किया है। इनका अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि वे गणित के फार्मूले जैसी सटीक बात कहते हैं। यदि उनकी बात मानी जाय, जैसे वे कहते हैं, वैसा किया जाय तो परिणाम निकलेगा ही। उनकी बातों में वैसा ही सुनिश्चय है- जैसा कि दो और दो का चार होना सुनिश्चित है।
इसके लिए किसी आस्था की कोई जरूरत नहीं है। बस करो और जानो। प्रयोगों में डूबो और पाओ। यहाँ सब कुछ असंदिग्ध है, सुस्पष्ट है। किसी भी तरह के भ्रम एवं सन्देह की कोई गुँजाइश नहीं है। यह कुछ ऐसा है जिसे करके ही जाना जा सकता है। इसलिए यह बार-बार कहा जा सकता है कि महर्षि पतंजलि एवं परम पूज्य गुरुदेव अद्भुत हैं। महर्षि पतंजलि ने अपने सैकड़ों-सैकड़ों प्रयोग करके उनके निष्कर्षों को सूत्रबद्ध किया। इन सूत्रों के सहारे जब भी कोई चाहे प्रयोग को दुहरा सकता है और उन्हीं निष्कर्षों को पुनः पा सकता है। इसी तरह परम पूज्य गुरुदेव ने चेतना जगत् में असंख्य प्रयोग किए और अपने निष्कर्षों को प्रकाशित-प्रतिपादित किया। वे यहीं तक रुके नहीं, बल्कि इससे एक कदम और आगे जाकर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान का निर्माण किया। अध्यात्म के वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए एक अद्भुत प्रयोगशाला बनायी। मानव चेतना के वैज्ञानिक अनुसन्धान के लिए क्रियाविधि निर्देशित की।
इस दृष्टि से ये दोनों ही बेजोड़ हैं। उन जैसा होने की सम्भावना भी नहीं है। क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना और आन्तरिक जगत् में प्रवेश करना करीब-करीब असम्भव सम्भावना है। वे अपने प्रयोगों के बारे में, प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्ष के बारे में एक गणितज्ञ, एक तर्कशास्त्रज्ञ, एक महावैज्ञानिक की भाँति सत्यों को स्पष्ट करते हैं। लेकिन वे हैं कबीर और हेराक्लाइट्स की भाँति रहस्यदर्शी। किसी रहस्यदर्शी का वैज्ञानिक होना अति विरल है।रहस्यदर्शी तो कवि होता है, कबीर की तरह, नानक की तरह। दरअसल परम आनन्द का, चरम ज्ञान का जो जगत् है, वह इतना सुन्दर-इतना भव्य है कि बरबस ही कविता उपजती है। उस अवस्था की सुन्दरता ऐसी है, उसका मंगल आशीष ऐसा है, उसका परम आनन्द ऐसा है कि सहज ही चेतना लयबद्ध हो जाती है। अपने आप ही छन्द बनते और काव्य प्रस्फुटित होता है।
लेकिन महर्षि पतंजलि एवं परम पूज्य गुरुदेव अध्यात्म चेतना के इस शिखर पर पहुँच कर भी इसके सम्मोहन से बंधते नहीं। इसके सौंदर्य के जादू को स्वयं पर हावी नहीं होने देते। हालाँकि यह बहुत कठिन है। ऐसी अवस्था में आज तक कोई भी स्वयं को रोक नहीं सका। बुद्ध, दादू, रज्जब सबके सब काव्यमय हो गए। यह अवस्था ही कुछ ऐसी ही है। जब उसकी अपार भव्यता और उसका परम सौंदर्य अपनी अन्तर्चेतना में फूटता है, तो बरबस अपना समूचा अस्तित्त्व नाच उठता है। यह अवस्था उस प्रेमी की होती है, जो सारी सृष्टि के ही प्रेम में पड़ गया है। परन्तु पतंजलि एवं गुरुदेव दोनों ही ऐसी अवस्था पाने के बावजूद काव्य का प्रयोग नहीं करते। वे सौंदर्य की नहीं सूत्रों की भाषा में बात करते हैं। वे ऐसा कुछ भी कहने का प्रयास नहीं करते, जिसे शब्दों में कहा न जा सके। उनमें लोक कल्याण की गहरी भावना है, मानव के प्रति अगाध प्रेम है। पर इसे वे काव्य में नहीं क्रिया में व्यक्त करते हैं।
वे साधना की, अनुशासन की नींव बनाते हैं। यह नींव सबके लिए है। यदि कोई उस नींव पर चल पड़े तो उस शिखर पर निश्चित रूप से पहुँच जाएगा, जो अभी दिखता नहीं, सबसे परे है। उनके द्वारा कहा गया एक भी शब्द व्यर्थ नहीं है। अपनी अन्तर्यात्रा पर चलने के लिए उनके एक-एक शब्द को समझने की कोशिश करनी होगी। यह अति कठिन है, क्योंकि उनकी शब्दावली तर्क की, विवेचन की है। हालाँकि उनका संकेत प्रेम की ओर, मस्ती की ओर, परमात्मा की ओर है। उनकी शब्दावली उस व्यक्ति की है, जो वैज्ञानिक प्रयोगों में संलग्न है। हालाँकि उनकी प्रयोगशाला अन्तर्चेतना की है, आन्तरिक अस्तित्त्व की है।
अतः उनके सूत्रों-निष्कर्षों में इस अनुभूति के साथ निमग्न होना होगा कि यह परम काव्य का गणित है।यह विरोधाभास तो है, पर यह सूत्रों को तनिक भी नहीं छू सका है। क्योंकि ये महावैज्ञानिक अपने कथन में बड़ी ही तर्क संगत पृष्ठभूमि बनाए रखते हैं। वे विच्छेदन करते हैं, विश्लेषण करते हैं, पर उनका मकसद संश्लेषण है। वे केवल संश्लेषण के लिए विश्लेषण करते हैं। उनकी अनुभूति में डूबने के लिए यह हमेशा ध्यान रखना होगा कि वे हमें वैज्ञानिक मार्ग से परम सत्य तक पहुँचाना चाहते हैं। वे बुद्धि से बातें करते हैं, पर उनका उद्देश्य उनका लक्ष्य हृदय ही है। वे हमें तर्क के द्वारा तर्क के पार ले जाना चाहते हैं।
महर्षि पतंजलि एवं तपोमूर्ति गुरुदेव दोनों ही हमें धीरे-धीरे, कदम-दर-कदम बड़े ही धीरज के साथ, हमारी उंगली पकड़ कर चेतना के शिखरों की ओर ले जाते हैं। वे प्रत्येक कदम की महिमा समझाते हैं, उसकी फलश्रुति बतलाते हैं। ऐसा करने में जो बाधाएँ आएगी उनसे सचेत करते हैं, उनके निराकरण के उपाय सुझाते हैं। वे हमें अपने अनुशासन में बाँधते हैं, पर उनका अनुशासन माँ के मातृत्व की तरह बड़ी प्यारी और मधुर है। इन पंक्तियोँ के पाठकों से एक बड़ा ही निजी सवाल है कि क्या आप इस अनुशासन को स्वीकारने के लिए तैयार हैं? यदि जवाब हाँ में है तो फिर समेटने-सहेजने के लिए तैयार हो जाइए महर्षि पतंजलि के सूत्रों-निष्कर्षों की व्याख्या परम पूज्य गुरुदेव के प्रयोगों एवं अनुभवों के परिप्रेक्ष्य में।
अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर इन महर्षियों के अनुभवों को बाँटने व अनुभूतियों को देने का सिलसिला अब से प्रतिमास चलेगा और चलता रहेगा। इस क्रम में महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों की व्याख्या होगी, ठीक उस भाँति जैसा कि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे, बताते थे। यह व्याख्या शास्त्रीय एवं सिद्धान्तीय नहीं पूज्यवर की जीवन साधना के अनुरूप होगी। उनके अनुभवों एवं संस्मरणों के प्रकाश में होगी। यह होगा दोनों महर्षियों का मिलन अपने शिष्यों के साथ, साधकों के साथ। अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर साथ-साथ प्रतिमास प्रकट होते रहेंगे, अपने अनुभवों को बाँटने और जिज्ञासाओं का समाधान करने। और साधकों को उनके साधना प्रयोगों में अग्रसर करने के लिए। आप सब-हम सब रहें इसके लिए प्रतिमास साधनारत। यह साधना ही प्रतीक्षा होगी। और प्रतीक्षा ही पात्रता बनेगी।
जाड़े की ठण्डी हवा दोपहर की धूप में घुलकर थोड़ी कुनकुनी हो गयी थी। बड़ा ही सुखद स्पर्श लग रहा था इस हवा का। उस दिन धूप की छुअन भी काफी नर्म, मुलायम और मखमली लग रही थी। परम पूज्य गुरुदेव अपने ऊपर वाले कमरे से सटे हुए आँगन में टहल रहे थे। इस आँगन के बीचो-बीच उनकी चारपाई पड़ी हुई थी। इस चारपाई का कुछ हिस्सा धूप में था तो कुछ छाया में। आँगन के दूसरे कोने पर एक टाट का टुकड़ा बिछा हुआ था। जिस पर दो छोटी-छोटी चौकियाँ रखीं थी। और इन पर कुछ कागज-किताबें बिखरी हुई थी। दो लोग बैठे हुए यहाँ कुछ पढ़ने-लिखने का काम कर रहे थे। शायद किन्हीं नयी पुस्तकों के प्रकाशन का सरंजाम जुटाया जा रहा था।
टहलते हुए गुरुदेव बीच-बीच में इन काम कर रहे लोगों को कुछ निर्देश दे देते। उनकी भावमुद्रा में एक त्वरा थी, तीव्रता थी। सम्भवतः वह चाहते थे कि जो दैवी विचार प्रवाह उनकी अन्तर्चेतना में अविरल भाव से अवतरित होता है, वह शीघ्र से शीघ्र बहुसंख्यक जनों तक पहुँचने लगे और पहुँचता रहे। अपने विचार चक्र प्रवर्तन को तीव्रतम वेग देने के लिए सतत प्रयासरत रहते थे वह। नए लोगों के लिए लेखन का प्रशिक्षण, सम्पादन की व्यवस्था और स्वयं नित्य-प्रति अनवरत और अविरल लेखन विचार चक्र प्रवर्तन को ही तीव्र से तीव्रतर एवं तीव्रतम करने के लिए ही थे। हालाँकि इस सबके बीच उनकी दिव्य मुस्कान, उन्मुक्त हंसी समूचे वातावरण में अमृत घोलती रहती। और काम करने वालों की थकान दूर करती रहती।
उस दिन टहलते हुए गुरुदेव कुछ पलों के लिए थमे और फिर अपनी चारपाई पर जाकर बैठ गए। अब उनके हाथों में अखबार था, जिसे उन्होंने थोड़ा उलटा-पलटा। ऐसा करते हुए उनकी भावमुद्रा यत्किंचित् परिवर्तित हुई। उनका गौरवर्णीय मुखमण्डल धूप के कारण थोड़ा लाल हो रहा था। उनकी गम्भीर भावमुद्रा इस लालिमा से मिलकर और अधिक तेजस्वी हो गयी। उन क्षणों में ऐसा लगने लगा मानों स्वयं सूर्य देव दुनिया को एक नयी सुबह का सन्देश देने के लिए शरीर धारण करके धरती पर उतर आए हों। एक क्षण के लिए चारपाई पर बैठे हुए गुरुदेव फिर से खड़े हो गए। और हल्के पाँवों से चलते हुए वह आँगन के कोने के पास आ गए, जहाँ टाट पर बैठे हुए दो लोग काम कर रहे थे।
उनमें से एक को सम्बोधित करते हुए बोले- लड़के, देख बेटा आज के अखबार में निकला है ओजोन परत फट रही है, इससे ग्लेशियर पिघल जाएँगे और दुनिया डूब जाएगी, खत्म हो जाएगी। इसमें पर्यावरण के खतरे से चिन्तित वैज्ञानिकों की बातें छपी हैं कि दुनिया को अब कोई नहीं बचा सकता। कुछ ज्योतिषी भी विश्वयुद्ध की संभावनाएं बताकर, ग्रहों के जोड़-तोड़ की गणित लगाकर कह रहे हैं कि दुनिया अब बचने वाली नहीं है। अखबार में उस दिन छपे हुए वैज्ञानिकों एवं ज्योतिष विज्ञानियों के भविष्य कथन का सार बताकर गुरुदेव निर्देश देते हुए बोले- ऐसा कर इस पर तू एक लेख लिख दे कि तमाम खतरों के बावजूद ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। दुनिया बचेगी, रहेगी। आज छाया हुआ अंधेरा मिटेगा और दुनिया बड़े ही शानदार ढंग से उज्ज्वल भविष्य का सवेरा देखेगी।
जिसे यह निर्देश दिया जा रहा था, वह उनकी बातों को बड़े ही मौन भाव से सुनता रहा। जब वह अपनी बात पूरी कर चुके, तो वह अपनी अज्ञानमिश्रित आशंकाओं को उनके सामने रखता हुआ बोला, गुरुजी, ये बातें तो वैज्ञानिक एवं ज्योतिषी कह रहे हैं, क्या वे पूरी तरह से गलत हैं। पूछने वाले के अज्ञान पर वह हंस पड़े। बड़ी ही निश्छल एवं निर्दोष हंसी का झरना फूट पड़ा। इसके निर्मल प्रवाह में उनकी गम्भीरता पता नहीं कहाँ और कब बह गयी। अब वह हंसी के मूड में थे। ऐसे में वह मजाक करते हुए बोले- क्या तू यह कहना चाहता है कि मैं वैज्ञानिकों और ज्योतिषी नहीं हूँ। तब भला इनकी बातें मुझे कैसे समझ में आएँगी? फिर दूसरे ही पल उनकी हंसी में हल्का सा विराम लगा और वह कहने लगे- चल अच्छा तुझे आज सच्ची बात बता ही देता हूँ।
वह कुछ विशेष बताने जा रहे हैं, यह सोचकर सुनने वाला कानों से नहीं प्राणों से सुनने की कोशिश करने लगा। वह कह रहे थे- बेटा, ये वैज्ञानिक भी सही हैं और ज्योतिषी भी ठीक कह रहे हैं। दोनों ही अपने विज्ञान और अपनी विद्या के अनुसार सच्चाई बताने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इन दोनों से ऊपर भी कुछ है। और वह इतना समर्थ एवं सक्षम है, जो सम्भावित घटना क्रमों को मोड़ने-मरोड़ने की ताकत रखता है।
बात को आगे बढ़ाते हुए वह बोले- हिमालय के गुप्त और दिव्य क्षेत्रों में कुछ विशेष लोग रहते हैं। ये महान् तपस्वी और अद्भुत शक्तिशाली हैं। तुम लोग इनकी शक्ति का अन्दाजा भी नहीं लगा सकते। इनका भगवान् से सीधा संपर्क है। उन्हीं की इच्छा के अनुसार ये उनके विश्व उद्यान को सजाते संवारते रहते हैं। सम्भावित विपदाओं को हटाते-भगाते और अच्छी परिस्थितियों को जन्म देते हैं। बेटा, भगवान् का और इन महान् आत्माओं का निश्चय है कि दुनिया अभी नष्ट नहीं होगी। आज के सम्भावित खतरे कितने ही सच क्यों न हो, पर ये मिटेंगे। अंधेरा उजाले में बदलेगा।
धीमे कदमों से चल रहे गुरुदेव थोड़ा ठिठके। परन्तु उनके इस तरह रुकने से उनकी वाणी का प्रवाह नहीं रुका। वह बोल रहे थे- तुम लोग देखते हो कि दो देश झगड़ा करने के लिए आमने-सामने आ जाते हैं। ऐसा लगता है कि अब सब कुछ समाप्त हो जाएगा। पर अचानक ठीक समय में परिस्थितियाँ नया मोड़ ले लेती हैं और सब कुछ बदल जाता है। हिमालयवासी ये महान् आत्माएँ ही ऐसा करती हैं। उनके तप से ही परिस्थितियों में ऐसे आश्चर्यजनक और अद्भुत मोड़ आते हैं। फिर बड़ी ही सहज रीति से, पर थोड़ा धीमे स्वर में अपनी बातों में एक नया वाक्य जोड़ते हुए बोले- मैं उनके सतत संपर्क में रहता हूँ, उन्हीं का काम करता हूँ और उन्हीं में से एक हूँ। इसलिए मुझे सब कुछ पता है।
सुनने वाले का हृदय श्रद्धा और भक्ति से उफन उठा। वह सोचने लगा- कितनी अनन्त और असीम है उनके सद्गुरु की महिमा। कितना सौभाग्यशाली है वह, जो उनका इस तरह दर्शन कर पा रहा है, उनकी वाणी सुन रहा है। वह अपने सौभाग्य की सराहना में मन ही मन लीन था और उसका सौभाग्य आज उस पर अपनी अजस्र कृपावृष्टि करने में जुटा था। गुरुदेव उसके मन के किसी कोने में छुपे हुए भावों को पहचानते हुए और उसके मन के उलझे हुए धागों को सुलझाते हुए कह रहे थे- तू यही सोच रहा है न, कि इतने समर्थ ऋषिगण दुनिया को एकदम से ठीक क्यों नहीं कर देते?
सचमुच ही यही प्रश्न था उसका, जिसका कि वह जवाब दे रहे थे- समस्त सृष्टि एक विधि-व्यवस्था के तहत चलती है, जिसे कर्मफल विधान कहते हैं। मनुष्य ने कर्म तो ऐसे कर रखे हैं कि दुनिया में अनगिन बार प्रलय हो। वैज्ञानिक और ज्योतिषी संकेत भी कुछ ऐसे ही कर रहे हैं। पर नहीं, भगवान् की कृपा, हम सब का तप ऐसा होने नहीं देगा। बस विपदाओं की चिह्न पूजा भर होगी। इतने भर से काम चला लिया जाएगा। हाँ इतना जरूर है कि दुनिया में सुख-शान्ति स्थायी रहे, आने वाला उज्ज्वल भविष्य टिकाऊ रहे, इसके लिए इन्सान को, समाज को, देश को और समूची दुनिया को अपनी जीवन शैली बदलनी होगी।
गुरुदेव गम्भीर हो गए और थोड़ा चिन्तामग्न भी। वह कह रहे थे- यही सब बताने, यही सब सिखाने तो मैं संसार में आया हूँ। नहीं तो क्या जरूरत पड़ी थी मुझे यहाँ आने की। जितनी जल्दी आदमी इस सच्चाई को समझ जाए, उतना ही अच्छा। उनकी इस गम्भीरता में उनकी करुणा अजस्र भाव से झर रही थी। उनकी बातें सुनने वाले को लग रहा था जैसे करुणामय परमेश्वर ही उसके सद्गुरु का स्वरूप धारण करके समूचे विश्व को उज्ज्वल भविष्य का वरदान देने के लिए आए हैं। ज्ञानियों का सच कुछ भी हो, पर उसके हृदय का सच इतना ही था- सद्गुरु की महिमा अनन्त, अनन्त उसका विस्तार।
एक बार स्कूल इंस्पेक्टर मुआयने के लिए आए। गाँधी जी की कक्षा की परीक्षा हो रहा था। उसमें पाँच शब्दों की स्पेलिंग लिखने को दी गई। गाँधी जी ने उसमें से एक गलत लिख दी। कक्षा अध्यापक ने इशारा किया, आगे वाले विद्यार्थी की नकल कर लो, पर गाँधी जी ने नकल नहीं की।
परीक्षा में सब उत्तीर्ण हुए, केवल गाँधी जी अनुत्तीर्ण रहे। इंस्पेक्टर चला गया, तो मास्टर ने गाँधी जी को डाँट लगाई। गाँधी जी ने उत्तर दिया, “मास्टर साहब! दूसरे की नकल करके पास होने की अपेक्षा, अपनी बुद्धि से अनुत्तीर्ण होना अच्छा। झूठी सफलता के लिए अपनी आत्मा की सचाई को बेचकर आत्महीनता का दुःख उठाना मेरे लिए संभव नहीं।” गाँधी जी के इस कथन पर अध्यापक उनकी अल्पायु में नैतिकता की अडिग आस्था के लिए आश्चर्यचकित रह गए।
अखण्ड ज्योति परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जीवन की ज्योति है। उनकी गहन आध्यात्मिक साधनाओं के गर्भ से यह जन्मी है। और उन्हीं के तप का अमृतपान कर इसका विकास हुआ है। वर्ष 1926 ई. की बसन्त पंचमी को हिमालय वासी परमगुरु के दिव्य सान्निध्य में जो अखण्ड दीप जला, उसकी ज्योति दो स्थानों पर एक साथ प्रकट हुई और अखण्ड बनी। अखण्ड दीप की अखण्ड ज्योति का एक प्राकट्य गुरुदेव की पूजा स्थली पर हुआ। जिसके सान्निध्य में 24 लक्ष के 24 गायत्री महामंत्र के महापुरश्चरणों की शृंखलाएँ चलीं। इसी के साथ अखण्ड ज्योति की लौ से अपने सत्शिष्य की आत्म ज्योति को जलाया, जगाया एवं प्रकाशित किया।
अखण्ड ज्योति के ये दोनों दृश्य एवं अदृश्य रूप लगातार 14 वर्षों तक अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को सघन करते रहे। अनेकों दिव्य प्रेरणाएँ इन्हें स्पर्श करती रहीं। अनगिन दिव्य आत्माओं का इन्हें संरक्षण मिलता रहा। 14 वर्षों की यह अवधि गहन तप की अवधि थी। इस अवधि में अनेकों दिव्य अनुभवों-अनुभूतियों की सृष्टि हुई। अविराम साधना के इसी काल में एक दैवी निर्देश का अवतरण हुआ। यह दिव्य निर्देश अखण्ड दीप की अखण्ड ज्योति के सान्निध्य में ध्यानस्थ, साधनारत गुरुदेव की आत्मा में प्रकाशित हो रही अखण्ड ज्योति में अवतरित हुआ। यह अद्भुत निर्देश था- अखण्ड ज्योति के दृश्य एवं अदृश्य इन दोनों रूपों से भिन्न एक तीसरे स्वरूप को प्रकाशित करना था। ऐसा स्वरूप जिसमें पहले के दोनों रूपों की आभा, ऊर्जा एवं प्रकाश समाया हो।
वर्ष 1940 ई. की बसन्त पंचमी को अखण्ड ज्योति का यह अद्भुत स्वरूप अक्षरों एवं शब्दों के रूप में प्रथम बार प्रकाशित हुआ। इसका प्रकाशन परम पूज्य गुरुदेव के लिए एक कठोर साधना से कम न था। अनेकों तप अनुबन्ध इससे जुड़े थे। पहला अनुबन्ध यही कम कठोर न था कि उन दिनों की आर्थिक विपन्नता की स्थिति में बिना किसी धनपति के सहयोग के इसे प्रकाशित करना था। दूसरे अनुबन्ध की कठोरता भी अद्भुत थी। चौबीस महापुरश्चरणों की शृंखला जारी रखते हुए इसका लेखन, संकलन, सम्पादन स्वयं करना था। तीसरे अनुबन्ध के रूप में सब कुछ के साथ स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी करते हुए इसके वितरण की व्यवस्था करनी थी। और चौथे अनुबन्ध के रूप में अखण्ड ज्योति के सदस्यों के साथ भावनात्मक भागीदारी निभानी थी। अपने निजी परिवार के सदस्यों की तरह उनके सुख-दुःख में बराबर की भागीदारी करनी थी। उन्हें आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी देना था।
अखण्ड ज्योति के प्रकाशन के दैवी निर्देश के साथ उपरोक्त सारे कठोर अनुबन्ध जुड़े थे। जिस समय, जिस स्थिति की यह बात है, उस समय इसे सबने असम्भव माना था। और आज भी कोई इसे असम्भव ही कहेगा। परन्तु परम दिव्य गुरुसत्ता को अपने शिष्य की साधना पर विश्वास था। और शिष्य को अपने सद्गुरु की कृपा पर भरोसा था। साधना तीव्र, कठोर एवं एकनिष्ठ हो तो कृपा अवतरित हुए बिना नहीं रहती। इसी तरह सद्गुरु की कृपा हो तो साधना विकसित हुए बिना नहीं रहती। यहाँ पर साधना और कृपा दोनों ही एक दूसरे के सहयोगी थे। और फिर अध्यात्म तो है ही असम्भव को सम्भव करने का विज्ञान। सचमुच ही असम्भव, सम्भव हुआ और अखण्ड ज्योति प्रकाशित होने लगी।
इसकी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के साथ इसका स्वरूप भी आध्यात्मिक था, है और आगे भी रहेगा। जिज्ञासुजनों की जिज्ञासा रही है कि ऐसी उच्चस्तरीय पत्रिका के विविध विषयों पर समसामयिक सन्दर्भों के साथ अनगिन लेखों का प्रतिमास लेखन भला किस तरह होता रहा है। फिर इसमें बाहर के विद्वानों, मनीषियों के लेख क्यों नहीं प्रकाशित किए जाते। जिज्ञासा जितनी समुचित है, उसका उत्तर भी उतना ही सटीक है। परम पू. गुरुदेव ज्ञान के अगाध एवं अथाह सागर थे। उनका ज्ञान बौद्धिक होने के साथ अतीन्द्रिय एवं अतिमानसिक भी था। अखण्ड ज्योति के लेखन के लिए वह नियमित अध्ययन के साथ अपनी अन्तःप्रज्ञा एवं दिव्यदृष्टि का भी प्रयोग करते थे। उनकी अपरिमित आध्यात्मिक शक्तियों के कारण विविध विषयों पर लेख लिखना हंसी खेल जैसा था। जहाँ तक बात बाहरी विद्वानों के लेखों को न स्वीकारने की है, तो इसके पीछे भी एक रहस्य है। और वह यह कि इस आध्यात्मिक पत्रिका के लेखन के लिए विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है, आध्यात्मिक साधनाओं में निमग्न होना भी अनिवार्य है।
परम पूज्य गुरुदेव स्वयं गहन साधनाओं के साथ लेखन कार्य करते थे। और जब वह नहीं हैं तो सम्पादक की लेखनी उनके दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही चलती है। आज भी लिखने वाला केवल यंत्र की भूमिका निभाता है। इस लेखक कहे जाने वाले, सम्पादक कहे जाने वाले यंत्र के नियंत्रक एवं नियामक आज भी वही होते हैं। अखण्ड ज्योति के सुदीर्घ भविष्य के लिए नीति वह स्वयं ही तैयार करके गए हैं। जिन विषयों पर लिखा जा रहा है अथवा भविष्य में लिखा जाना है, उसके संकेत उन्होंने स्वयं ही अपने शरीर को छोड़ने से पूर्व लिखवाए थे, बताए थे। इस सबके अलावा उनके हाथों से स्वयं लिखा हुआ अप्रकाशित साहित्य अभी भी प्रचुर मात्रा में है। जो अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर प्रतिमास प्रकाशित होता है। सम्पादक की लेखनी तो इसमें गुरुदेव के निर्देशों के अनुसार केवल समीचीन सन्दर्भों को जोड़ इसे सजाती संवारती और सामयिक अभिव्यक्ति देती है। यही वह कारण है, जिसकी वजह से अखण्ड ज्योति में आज भी बाहर के लेख न तो आमंत्रित किए जाते हैं और न ही स्वीकारे जाते हैं।
अपने प्रारम्भ की शुभ घड़ी से लेकर आज तक अखण्ड ज्योति के दृश्य स्वरूप का संचालन, संरक्षण अनगिनत दिव्य शक्तियाँ करती रही हैं। इसके प्रकाशन, सम्पादन, लेखन के अनेकों रहस्यमय पहलू हैं, इसमें निहित परम पूज्य गुरुदेव के अनेकों जीवन प्रसंग हैं, जिन्हें आश्चर्यजनक कहा जा सकता है। इस आश्चर्यजनक किन्तु सत्य को उजागर करना, उद्घाटित करना, प्रकाशित करना शोधकर्त्ताओं का कार्य है। अखण्ड ज्योति का प्रकाश गुरुदेव की आध्यात्मिक चेतना से उपजता है। उन्हीं की आध्यात्मिक सामर्थ्य इसे ऊर्जावान बनाती है। शोध-अनुसंधान की प्रवृत्ति रखने वाले वरिष्ठ एवं विशेषज्ञ प्रारम्भ से ही इसे अपनी शोध का विषय बनाने के इच्छुक रहे हैं।
अभी पिछले दिनों हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. भगवान देव पाण्डेय ने इस दिशा में अपना महत्त्वपूर्ण पग बढ़ाया है। डॉ. भगवान देव पाण्डेय गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं। उनके अनुसार अखण्ड ज्योति के आध्यात्मिक एवं साहित्यिक पहलुओं को उजागर करना आज की सामयिक आवश्यकता है। आज जबकि हिन्दी पत्रकारिता एक खोखला व्यवसाय बनकर रह गई है। ऐसे में अखण्ड ज्योति किस तरह से अपना आध्यात्मिक प्रकाश फैला रही है, यह एक शोध का विषय है। इस शोध से अनेकों ऐसे पहलू प्रकट होंगे, जो हिन्दी पत्रकारिता की दशा को सुधारने और उसकी दिशा को सही करने में अपना सार्थक योगदान देंगे।
‘हिन्दी की आध्यात्मिक पत्रकारिता में अखण्ड ज्योति’, यही वह शोध है, जिस पर डॉ. भगवान देव पाण्डेय अपने निर्देशन में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के सहयोग से शोध कार्य कर रहे हैं। इस शोध कार्य के महत्त्वपूर्ण बिन्दु निम्न है- 1. विषय प्रवर्तन, 2. अखण्ड ज्योति की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि, 3. अखण्ड ज्योति का प्रकाशन, 4. अखण्ड ज्योति के सम्पादक, 5. अखण्ड ज्योति की विषय वस्तु, 6. अखण्ड ज्योति में साहित्य शिल्प, 7. अखण्ड ज्योति का सम्पादन वैशिष्ट्य एवं 8. उपसंहार। अपनी ही एक परिजन अंजली सिंह इस कार्य को कर रही है। अखण्ड ज्योति का प्रत्येक आयाम हिन्दी साहित्य एवं शोध जगत् के लिए आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है। हो भी क्यों नहीं, सत्य एवं संवेदना इसके प्रत्येक शब्द से झर-झर झरती है। देश-विदेश के असंख्य पाठक एवं परिजन इससे प्रेरणा पाते हैं। अब तो यह शोध सत्य भी है कि अखण्ड ज्योति को पढ़ना परम पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक चेतना में निमग्न होना है। और उन अनुभूतियों में अनायास भागीदार होना है, जो गुरुदेव ने अपनी दीर्घावधि साधना में पायी। इसको स्वयं पढ़ने और अधिकाधिक लोगों को पढ़ाने से बड़ी न तो कोई जनसेवा है और न ही आध्यात्मिक साधना।
एक कथा है कि धन्वंतरि एक बार पक्षी बनकर काशी वाग्भट्ट को उपदेश देने आए थे। जब उन्होंने पूछा-”कोऽरुक?” स्वस्थ कौन रहता है? तो पक्षी रूप में धन्वंतरि बोले-”मितुभुक, ऋतुभुक, हितुभुक, अर्थात् कम, ऋतु के अनुकूल और उपयोगी भोजन करने वाला स्वस्थ रहता है।”
(गीता के चतुर्थ अध्याय की युगानुकूल व्याख्या-तेरहवीं कड़ी)
‘यज्ञ बिना यह लोक नहीं तो परलोक कैसा?’ शीर्षक से विगत अंक की व्याख्या में “नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः” की व्याख्या की गई थी, जो कि चौथे अध्याय के इकतीसवें श्लोक में उद्धृत किया गया है। इसी कड़ी में युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में एक नेवले की कथा द्वारा ‘महायज्ञ’ की चर्चा भी की गई थी। भगवान् कहते हैं कि यज्ञावशिष्ट परमपुण्यदायी है, यह ‘प्रसाद’ तृप्ति देता है, तुष्टि देता है, वासनाओं का क्षय करके जीवन को शाँति से भर देता है। अंतिम परिणति ऐसे निष्काम यज्ञ की चैतन्य सत्ता से एकाकार होने के रूप में होती है। सभी प्रकार के यज्ञों की व्याख्या के बाद पराकाष्ठा पर पहुँचते ही श्रीकृष्ण कह उठते हैं कि इन यज्ञों को कर्म से जानना चाहिए। (कर्मजान्विद्धि)। कर्म से अर्थात् मन, इंद्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा उत्पन्न। आगे वे यह भी कह जाते हैं कि परमात्मा कर्मादि से परे है। ऐसा जान लेने पर कोई भी दिव्यकर्मी साँसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है (श्लोक 32, अध्याय 4)। भगवान् यज्ञ के दर्शन का यहाँ सार बता जाते हैं। इसके बाद के तैंतीसवें श्लोक की व्याख्या के साथ ज्ञान के महात्म्य को इस अंक में पढ़ें।
द्रव्ययज्ञ से श्रेष्ठ ज्ञानयज्ञ
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञानयज्ञः परंतप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते। -4/33
“ हे परंतप अर्जन ! द्रव्यमययज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है तथा यावन्मात्र संपूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।”
भगवान का कहना है कि सारे यज्ञों में ज्ञानयज्ञ सर्वश्रेष्ठ है। भगवान का स्पष्ट मत है कि सारे कर्म इसी ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं। अज्ञान से मुक्ति ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है, सारे कर्मों का कर्म है। जीवनभर अज्ञान से चिपटे रहे, बंधनमुक्त हो नहीं पाए, तो यह जीवन निष्प्रयोजन ही रहा। देवयज्ञ-नृयज्ञ-दानयज्ञ आदि से स्वर्ग आदि फल की प्राप्ति मात्र हो सकती है, परंतु आत्मज्ञान बिना मोक्ष प्राप्त नहीं होता। इसीलिए दैवयज्ञ-द्रव्यमययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ बताया गया है।
ज्ञान ही ऐसी निधि है जो आत्मा के साथ जन्म-जन्माँतरों तक यात्रा करती है। परमपूज्य गुरुदेव ने लेखनी और वाणी दोनों से ज्ञानयज्ञ संपन्न किया एवं लाखों निष्ठावान् प्रज्ञा परिजनों से करवाया। उनका ज्ञानयज्ञ विचारक्राँति का लक्ष्य लिए हुए था, जिसकी अंतिम परिणति होनी है युग परिवर्तन में। शाँतिकुँज हरिद्वार, गायत्री तपोभूमि मथुरा से लेकर सारे भारत व विश्व में फैले प्रायः चार हजार से अधिक प्रज्ञासंस्थानों-प्रज्ञामंडलों, स्वाध्याय मंडलों, साधना प्रशिक्षण केंद्रों तक यही ज्ञानयज्ञ संपन्न होता दिखाई देता है। स्वामी विवेकानंद पत्रावली में से एक पत्र जो उनके द्वारा उनके एक शिष्य को लिखा गया, स्पष्ट होता है कि ज्ञानयज्ञ क्या है? वे अपने एक शिष्य को जिन्हें वह अध्यापक महोदय संबोधन देते है, लिखते हैं, “मैं विचारचक्र का प्रवर्तन कर रहा हूँ, ताकि अच्छे-अच्छे विचार घर-घर पहुँचें। मेरे जीवन की यही महत्त्वाकांक्षा हैं।” यही ज्ञान यज्ञ है, जो स्वामी जी ने जीवन भर किया। लाखों गुलाम भारतीयों के मन में विधेयात्मक उल्लास जगाकर उन्हें अमृतपुत्र संबोधन देकर उन्होंने सभी को उनकी बात सुनने-पढ़ने-समझने के लिए प्रेरित कर दिया, आज सौ वर्ष बाद भी वे कर रहे हैं।
परमपूज्य गुरुदेव ने झोला पुस्तकालय हमारे परिजनों से चलवाया, ज्ञानरथ को गति दी, विद्या मंदिर बनवाए तथा विद्याविस्तार पटलों की स्थापना की गति दी। प्रायः 23 से अधिक छोटी-बड़ी किताबें लिख डाली, जो एक महापुरुष का एक जन्म से संपन्न किया गया सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। आज तक इसके समकक्ष कोई उदाहरण नहीं मिलता। लक्ष्य एक ही रहा सभी ज्ञान पाएँ, विचारों के पतन को रोकें, आत्मपर्यवेक्षण कर आत्मिक प्रगति के सोपानों पर चढ़ें। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को भी वे ज्ञान चेतना की, उनकी प्राणचेतना की संवाहिका कह गए हैं। फरवरी 1970 की अखण्ड ज्योति में वे लिखते हैं-
“चिंतन की दिशा बदलना ही युगपरिवर्तन है। यदि चिंतन की धारा उत्कृष्टता की ओर मुड़ जाए, तो व्यक्ति संत, सज्जन, महान, विचारवान, विद्वान एवं परमार्थपरायण बनकर देवत्व की भूमिका संपादन कर सकता है। हमारा ज्ञानयज्ञ इसी प्रयोजन के लिए है।” (पृष्ठ 65)
ज्ञान के विस्तार से विचारक्राँति
व्यक्तित्व का परिष्कार, मानव में देवत्व का उदय ज्ञानयज्ञ की ही परिणति है। यह ज्ञानयज्ञ कैसे होगा? घर-घर ज्ञान चेतना के विस्तार से, श्रेष्ठ साहित्य को जन-जन तक पहुँचाकर। यह कार्य समयदान के बिना नहीं हो सकता। जनसेवा हेतु परिजन समय निकलें, इसके लिए जीवनभर वे लिखते रहे एवं लाखों समयदानियों की फौज खड़ी कर गए। द्रव्यमययज्ञ की तुलना में ज्ञानयज्ञ सर्वोपरि है, यह भगवान कृष्ण जब कहते हैं तब उनका आशय होता है, साधनों की तुलना में साधना, आत्मनिर्माण, लोकनिर्माण, समय का लोकसेवा में नियोजन जरूरी है। साधनदान अंशदान भी जरूरी है, पर सबसे बड़ा है समयदान, जो आज का युगधर्म भी है। ज्ञानयज्ञ पतन निवारण की सेवा है एवं उसके लिए चाहिए लोकहितार्थाय, समयदान-परिव्रज्या धर्म का पालन, ताकि जनमानस का परिष्कार हो सके।
परमपूज्य गुरुदेव क्राँतिधर्मी साहित्य के अंतर्गत लिखी अपनी पुस्तक ‘समयदान ही युगधर्म (1)’ में कहते हैं, “महान् मनीषियों की साधना ‘समय’ की तपशिला पर बैठकर ही संभव हुई है। उन्होंने जो सोचा, जो सृजा है उसके पीछे उनकी तन्मयता भरी साधना ही रही है। वैज्ञानिकों, आविष्कारों ने अपना मानस और समय प्रमुखतापूर्वक निर्धारित लक्ष्य पर केंद्रित किया होता तो सफलता की आशा कहाँ बन पड़ती? लोकसेवियों ने अपना समयदान के सहारे एक-से-एक बड़े कार्य संपन्न कर दिखाए हैं।” इस समय का उपयोग ज्ञान के विस्तार में लगें, यहीं उनका जीवनभर लक्ष्य रहा। वे सितंबर 1969 की अखण्ड ज्योति में लिखते हैं, “जपात्मक और होमात्मक यज्ञ के स्तर का ही हम दूसरा धर्मानुष्ठान “ज्ञानयज्ञ’ चलाते रहे हैं। हमारा जीवनक्रम इन दो पहियों पर ही लुढ़कता आ रहा है। उपासना और साधना यही दो आत्मिक प्रगति के आधार है। साधना का प्रकरण ज्ञानयज्ञ से संबंधित है। यह स्वाध्याय से आरंभ होकर सद्ज्ञान प्रसार के लिए किए जाने वाले प्रबल प्रयत्नों तक फैलता है..... ज्ञान ही है जो पशु को मनुष्य, मनुष्य को देवता और देवता को भगवान बनाने में समर्थ होता है। ज्ञान से ही प्रसुप्त मनुष्यता जागती है और वही आत्मा को अज्ञान के अंधकार में भटकने से उबारकर कल्याणकारी प्रकाश की और उन्मुख करता है।” (पृष्ठ 59)।
भौतिक क्षेत्र की सफलता भी ज्ञान के संपादन पर निर्भर
प्रस्तुत श्लोक (33) के मर्म की और अच्छी तरह समझने का प्रयास करें, तो गीताकार द्वारा कहा गया यह कथन स्पष्ट समझ में आता है कि भौतिक-लौकिक क्षेत्र में सफलता-संपदा प्राप्त करने के लिए जो भी सहकारी प्रयास-पुरुषार्थ चाहिए (जिसे हम द्रव्ययज्ञ भी कह सकते है), उसकी सफलता की कुँजी एक ही है, पूरे मनोयोग से एक लक्ष्य पर केंद्रित होकर अंतःप्रेरणा से कार्य करना व उसके प्रति समर्पण की तीव्रता निरंतर बढ़ाते चलना। इसे हम ज्ञानयज्ञ कह सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अंतःकरण की भावनात्मक स्तर पर तथा मन की बौद्धिक स्तर पर तैयारी, किसी भी शारीरिक क्रिया से अधिक महत्त्व रखती है व ऐसा कार्य जब भी किया जाता है, उसकी परिणति अति पावन होती है। भगवान यह भी कहते हैं कि सभी कर्म (जो व्यक्तित्व कामनाओं से प्रेरित होकर किए जा रहे हैं) अंततः समाप्त ज्ञान में ही होते हैं। (सर्व कर्मखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते) अर्थात् ज्ञान के उद्भव के साथ ही वैयक्तिक स्वार्थ समाप्त हो जाते हैं और पारमार्थिक कार्य होने लगते हैं। यह ज्ञान किस चीज का परमसत्ता का, अपने अस्तित्व का व जीवन के उद्देश्य का।
गीता का यह ज्ञान जिसकी चर्चा की गई है, मात्र मन की बौद्धिक क्रिया नहीं है। गीता का ज्ञान है, सत्यस्वरूप। श्री अरविंद इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए ऋग्वेद का उद्धरण देते हैं। वे कहते हैं यह सत्य, यह सूर्य वही है, जो हमारे अज्ञान-अंधकार के भीतर छिपा पड़ा है और जिसके बारे में ऋग्वेद कहता है, “तत्सत्यं सूर्य तमसि क्षियन्तम।” चूँकि हम प्राकृतिक अज्ञान के कारण विमूढ़ हुए रहते हैं और यह अज्ञान हमारे अंदर कूटस्थ ब्रह्म के स्नातक आत्मज्ञान को हमसे छिपाए रहता है, हम इस सूर्य की आलौकिक आभा को, अक्षरब्रह्म के शाश्वत-सनातन रूप की, ज्ञान के प्रकाशमयस्वरूप को समझ नहीं पते। परंतु जो इस ज्ञान का अनुसंधान लगातार अनवरत करते रहते हैं, उन्हें इसकी प्राप्ति होती है। निम्नगामी जीवन के द्वंद्वों से घिरे आत्मत्व का ज्ञान को सूर्य परमसत्ता के प्रकाश से प्रकाशित कर (आदित्यवत् प्रकाशयति पत्परम्) उसकी लक्ष्य को बोध करा देता है और यहीं उसके सभी कर्म वैयक्तिक न होकर, ज्ञान में समाकर समष्टि के हितार्थाय होने लगते हैं।” (गीता प्रबंध)
शिक्षा व विद्या में अंतर
ज्ञान शब्द हमारे शस्त्र ग्रंथों में इसी परम आत्मज्ञान के अर्थ के रूप में प्रयुक्त हुआ हैं। ज्ञान वह ज्योति है जिसके द्वारा हम सत्य को जान पाते हैं, उस में स्वयं को स्थापित कर पाते हैं, यह वह चीज नहीं, जिससे हमारी जानकारी बढ़ती हो, हमारी बौद्धिक संपत्ति अर्जित होती हो। यह भौतिक विज्ञान, मनोविज्ञान या जागतिक ज्ञान नहीं है। यह सभी तो ‘शिक्षा’ की परिधि में आते है। इन जानकारियों से मदद अवश्य मिलती है, पर हमारी आँतरिक प्रगति अंतःसत्ता के विकास हेतु तो विद्या की, विशुद्ध ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है। यह यौगिक ज्ञान है, जिससे हम परमात्मा, आत्मा, भगवान को जान पाते हैं। शिक्षा की समस्त विधाएँ सच्चे ज्ञान की सहायक भर होती है, पर्यायवाची नहीं वास्तविक ज्ञान वहीं है, जो मन के लिए अगोचर है, मन जिसका मात्र आभास ही पा सकता है, वह तो और भी गहरे आत्मा में विराजमान होता है।
इसीलिए उपनिषद्कार कहता है-
विद्याँ चाविद्याँ च यस्तद्वेदोभ्यँ सह। अविद्यत्य मृत्युँ तीत्वाँ विद्ययामृतमश्नुते॥ 11/ईशवास्योपरिषद्
“विद्या और अविद्या (विद्या और शिक्षा) दोनों को एक साथ जानो। इनमें से अविद्या द्वारा मृत्यु को पार करके विद्या द्वारा अमरत्व की प्राप्ति की जा सकती है।”
अब प्रश्न यह उठता है कि यह ज्ञान कैसे किया किया जाए, क्योंकि परमसत्ता को, परमसत्य का यह ज्ञान (ज्ञान) हममें से प्रत्येक के लिए अत्यंत महत्व का है। यह ज्ञान केवल ऐसा गुरु ही दे सकता है, जो आचार्य की तरह जीवन जी रहा हो, स्वयं उस ज्ञान को आचरण में उतार रहा हो। यदि शिष्य भाव से इस गुरु के साथ ताल−मेल स्थापित कर हम ज्ञानचक्षु जगा सकें व जान सकें कि वह कैसे इस नित्य परिवर्तनशील संसार में रहता है, अनुभव करता है, कर्म करता है, तो हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है। गीताकार कहता है, पहले इस ज्ञान को प्राप्त करने हेतु तत्त्वदर्शी ज्ञानियों से दीक्षा लेनी होगी। उनसे नहीं जो तत्त्वज्ञान को वेवल बुद्धि से जानते हैं, बल्कि उन ज्ञानियों से जिनने इसके मूल सत्य को प्रत्यक्ष देखा है, (ज्ञानिनः तत्त्वदर्शिनः)। यह बात श्रीकृष्ण अगले श्लोक (34वें) में कहते हैं।
तद्धिद्धि प्राणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेंक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ -4/34
“उस ज्ञान की तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ उनकी भलीभाँति दंडवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्मतत्त्व को भलीभाँति जानने वाली ज्ञानी-महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश देंगे।”
गुरु बिन ज्ञान नहीं रे, नहीं रे
योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार ज्ञानप्राप्ति का राजमार्ग यह हैं। वह अर्जुन से कहते है कि यह ज्ञान वहाँ मिलेगा जहाँ ज्ञानाग्नि जल रही होगी। कबीरदास जी कह गए हैं, “पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का पढ़े सा पंडित होय।” कबीरदास जी की भाषा में यदि हम समझ सकें तो पढ़े-लिखे, शिक्षित, विद्वान पंडित नहीं हैं, बल्कि वे है जिनने वैसा जीवन जिया है, आत्मीयता प्रेम को जीवन में आत्मसात किया है। हर श्वास में जिनने परमात्मा को जिया है। कबीर अनपढ़ थे, रज्ज्ब-रैदास अनपढ़ थे, पर इन लोगों ने वह जीवन जिया है, जिसकी ओर संकेत श्रीकृष्ण कर गए है। अंतर्ज्ञान अक्षरज्ञान का मोहताज नहीं हैं। जिस ज्ञान की अग्नि में सभी कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं, इस ज्ञान को पाना है, तो उन परमात्मा के गुणों से युक्त आचार्यों, गुरुजनों के पास जाकर उन्हें तत्त्वरूप में समझना चाहिए, अपना अहं भूलकर उन्हें दंडवत् प्रणाम कर, अपने कपट के भाव को एक तरफ रखकर जिज्ञासा प्रकट कर ज्ञान की चाह रखनी चाहिए। कई लोग ज्ञान की परीक्षा लेने, महात्माओं के प्रति आदरभाव न रख कपट भाव से प्रश्न पूछने जाते हैं। इनसे इस भाव से नहीं, निष्कपट भाव से, सेवा भाव से जाने से, ज्ञान की जिज्ञासा प्रकट करने से निश्चित ही वह ज्ञान उपलब्ध होगा जो आत्मसत्ता को सूर्यवत् प्रकाशित करेगा। सेवा करने का मतलब हाथ-पाँव दबाना नहीं, शरीर की मालिश करना नहीं, अपितु उनके द्वारा निर्दिष्ट कार्यों को आगे बढ़ाकर उनके निर्देशानुसार अपना जीवन समर्पित करने से है। ज्ञान इससे कम में किसी महापुरुष से, उनके सद्ग्रंथों से प्राप्त नहीं होगा। यदि हम सुपात्र हैं तो हमें निश्चित ही वह ज्ञान मिलेगा। पात्रता के विकास के अनुसार ही हमें परखा जाता है विद्वत्जनों द्वारा। जब वे हमारी जिज्ञासा का उत्तर दे तो हमारी अभीप्सा बढ़नी चाहिए और अधिक बढ़ जानी चाहिए भगवान को पाने की इच्छा। उसी अनुपात में हमारी विनम्रतापूर्वक की गई सेवा निष्ठा और बढ़नी चाहिए।
गुरुजनों ने भाँति-भाँति की परीक्षाएँ ली हैं अपने शिष्यों को ज्ञान देने के पूर्व। शिवाजी की परीक्षा ली गई समर्थ रामदास द्वारा सिंहनी का दूध मँगाकर। अपनी योगमाया से रची हुई सिंहनी का दूध उन्होंने माँगा और शिवाजी उसे लेकर आए सुपात्र बनकर सेवा भाव से, तब ही वे भवानी तलवार को पाने के, गुरु का अनुग्रह प्राप्त करने के अधिकारी बन सके। गुर्जिएफ अपने शिष्यों को गाली देते थे। खूब डाँट लगाते थे। एक शिष्य आँस्पेंस्की उन्हीं में से निकला जो सहन करते हुए उनसे सेवाभाव से सब कुछ प्राप्त कर सका। महर्षि दयानंद जी को विरजानंद जी चिमटे से मारते थे, बड़ी कड़ाई से पेश आते, तभी एक प्रखर योद्धा पाखंड खंडिनी पताका फहराने वाला आर्य समाज का संस्थापक जन्मा। स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु का अतिशय प्रेम पाया, पर सारी शक्ति को धारण करने के बाद जो जीवन जिया उसने शरीर को सुखा डाला। 1886-87 में शक्तिपात पाने वाला यह युवा संन्यासी मात्र पंद्रह वर्ष ओर जी सका। चैन से कभी सो न सका, गुरु के कार्यों को विश्वभर में पहुँचाकर अत्यल्प आयु में कष्ट सहता हुआ शरीर छोड़कर चला गया। पात्रता विकसित करने के लिए सब कुछ झोंक देना पड़ता है, तब गुरु, विद्वान, आचार्य, पंडितगण भी अपने को खाली कर देते है।
बड़ी विलक्षण बात है। गीताकार यहाँ इस चौंतीसवें श्लोक में कहते हैं कि यह ज्ञान तो उनसे मिलेगा जिनके इसके मूल सत्य को प्रत्यक्ष देखा है, (ज्ञानिनः तत्त्वदर्शनः) परंतु इसी के चार श्लोक बाद अड़तीसवें में कह जाते हैं, “योग के द्वारा संसिद्धि को प्राप्त मनुष्य उसको अपने आप ही यथासमय अपनी आत्मा में पाता है (तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेन आत्मनि विन्दति)।” तो फिर सत्य क्या है? दोनों- यह ज्ञान शिष्य भाव से प्रयास करने वाले हर उस मनुष्य में संवर्द्धित होता रहता है और ज्यों-ज्यों वह निष्काम भाव से समता-भगवद्भक्ति में गहराई बढ़ाता जाता है, त्यों-त्यों ज्ञान भी बढ़ता जाता है। इसी ज्ञान के विषय में और भी अधिक विस्तार से चर्चा-पापों का नाश करने वाली उसकी भूमिका सहित पैंतीसवें व अगले श्लोकों की व्याख्या के साथ अगले अंक में। क्रमशः
सत्यवादी हरिश्चंद्र का नाटक देखा और मोहनदास के अंतः तक सत्य प्रतिष्ठापित हो गया। मनोरंजन के लिए तो कइयों ने उसे देखा होगा व अभिनय करने वालों ने भी उसे कई बार दोहराया होगा, पर ऐसे प्रसंग जब अंदर तक प्रवेश करते हैं तभी व्यक्ति को श्रेय पथ की और अग्रगामी बनाते हैं। मोहनदास ने सत्य का आश्रय लेकर ही महात्मा गाँधी का पद पाया, यह सर्वविदित है।
दो बीज धरती की गोद में आ पड़े। मिट्टी ने उन्हें ढक दिया। दोनों रातभर सुख की नींद साए। प्रातःकाल दोनों जगे तो एक के अंकुर फूट गए, वह ऊपर उठने लगा। यह देख छोटा बीज बोला, भैया ऊपर मत जाना, वहाँ बहुत भय है, लोग तुझे रौंद डालेंगे, मार डालेंगे। बीज सब सुनता रहा और चुपचाप ऊपर उठता रहा। धीरे-धीरे धरती की परत पार कर ऊपर निकला आया और बाहर का सौंदर्य देखकर मुस्कराने लगा। सूर्य देवता ने धूप स्नान कराया और पवन देव ने पंखा ढुलाया, वर्षा आई और शीतल जल पिला गई, किसान आया और चक्कर लगाकर चला गया। बीज बढ़ता ही गया। झूमता, लहलहाता, फूलता और फलता हुआ एक दिन परिपक्व अवस्था तक जा पहुँचा। जब वह इस संसार से विदा हुआ तो अपने जैसे असंख्य बीज छोड़कर हँसता और आत्म-संतोष अनुभव करता विदा हो गया।
मिट्टी के अंदर दबा बीज देखकर पछता रहा था भय और संकीर्णता के कारण में जहाँ था वहीं पड़ा रहा और मेरा भाई असंख्य गुना समृद्धि पा गया।
संत कबीर अपने विलक्षण काव्य में लिख गए हैं-
इस घट अंतर बाग-बगीचे, इसी में सिरजनहारा। इस घट अंतर सात समंदर, इसी में नौलख तारा। इस घट अंतर पारस मोती, इसी में परखन हारा। इस घट अंतर अनहद गरजै, इसी में उठत फुहारा। कहत कबीर सुना भाई साधों, इसी में साईं हमारा॥
मानवी काया को विराट् का एक घटक बताते हुए कितनी सुँदरता से प्रशंसा की गई है कि अंतः का यह विराट् तो प्रत्येक के भीतर है। यह उसका अपना निजी है। इस भीतर को जो पा ले, वह सदा मस्त आनंद में रहेगा। हीरे को प्राप्त करने वाला कबीर सभी को अंतर्मुखी होने को कहता है। इस कबीर को जीवन में जीने वाले हमारे सद्गुरु आराध्य परमपूज्य गुरुदेव भी हर साधक को यही बताते थे एवं साधारण से असाधारण बनाने के राजमार्ग की कुँजी उनके हाथ में थमा देते थे। अपनी लेखनी व वाणी से यही ज्ञानयज्ञ उन्होंने जीवन भर किया। परिणाम एक विराट् संगठन के रूप में सारे विश्व में फैले गायत्री परिवार के रूप में हमें दिखाई देता है।
पूज्यवर की लेखनी की साधना का एक महत्त्वपूर्ण आयाम रहा है, पत्रों से मार्गदर्शन। जीवन का कोई भी क्षेत्र हो, उसे स्पर्श करते हुए व्यक्ति को आत्मबोध करना कि उस व्यक्ति का, शिष्य का कर्त्तव्य क्या है। 27/7/6161 को पं. बैजनाथ जी सौनकिया को लिखा एक पत्र यहाँ दे रहे हैं--
“आप अपनी उपासना और आत्मिक प्रगति पर सबसे अधिक ध्यान दें। जितनी ही आत्मबल बढ़ेगा उतनी ही शक्ति मिलेगी और उतना ही प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा। इसलिए हमें अपनी ओर ही अधिक ध्यान देना है।”
आगे वे लिखते हैं-
“आपकी आत्मा ऋषि आत्मा है। उसकी छटपटाहट जीवनलक्ष्य को पूर्ण करने के लिए ही है। सो उसे अतृप्त न रहने दिया जाएगा।”
पत्र की भाषा से स्पष्ट है कि आत्मिक प्रगति ही एकमात्र लक्ष्य किसी साधक का होना चाहिए। आत्मबल संवर्द्धन जिस परिणाम में होता चला जाएगा, उतना ही साधना का आनंद भी आएगा एवं प्रभावोत्पादक सामर्थ्य- व्यक्तित्व में आभा व तेज बढ़ने लगेगा। इससे दूसरे प्रभावित होंगे एवं इस मार्ग पर अग्रसर होने की इच्छा उन्हें भी होने लगेगी। यही तो मानव मात्र का जीवनोद्देश्य है। हर गुरु यही चाहेगा कि उसका शिष्य-मानसपुत्र अपने अंदर सोई आत्मा को पहचाने व अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने तक रुके नहीं।
जिस साधक का, गायत्री महाशक्ति को समर्पित अवतारी चेतना का क्षण-क्षण साधना में बीता हो, वह यही तो परामर्श सभी को देगा। वह स्वयं भी अपने जीवन में ऐसे क्षण लाता है जब तप की पूँजी को बटोरा जा सके। परमपूज्य गुरुदेव ने ऐसा चार बार किया, जब वे एक से डेढ़ वर्ष की अवधि के लिए अपने गुरु का मार्गदर्शन पाकर तप हेतु, उनसे साक्षात्कार हेतु हिमालय गए। इसके अतिरिक्त सूक्ष्मीकरण की साधना भी उनने की, जिसमें पाँच वीरभद्रों के उत्पादन का पुरुषार्थ संपन्न हुआ। सन् 6 के दशक में उनका हिमालय-प्रवास एक और विशिष्ट उद्देश्य के लिए था, आर्षग्रंथों का अनुवाद-सरलीकरण, साथ-साथ कठोर तप एवं ‘युगनिर्माण योजना’ व उसके आधारभूत ढांचे को खड़ा करने के लिए एकाँत में चिंतन। एक पत्र जो सप्तर्षि आश्रम हरिद्वार से 31/5/61 को लिखा गया, इसी प्रवास की साक्षी देता हैं वे बशेशरनाथ जी (दिल्ली) को लिखते हैं-
“हमारे आत्मस्वरूप
एक वर्ष बाद यह पत्र लिख रहे हैं। 5 महीने गंगोत्री, 5 महीने उत्तरकाशी तथा 2 महीने यहाँ रहकर यह वर्ष पूरा किया। इस एक वर्ष में आत्मबल-संग्रह करने का जो अवसर मिला, उससे संतोष हैं।”
अपने किसी ऐसे शिष्य को जिसे वह हर दूसरे दिन पत्र लिखते थे, एक वर्ष बाद पुनः याद किया एवं एक वर्ष का संक्षिप्त लेखा-जोखा भी उसे दिया। इस एक वर्ष के तप को वह आत्मबल-संग्रह के लिए किया जाने वाला पुरुषार्थ बताते हैं। प्रथम पत्र में दूसरों के लिए जो प्रेरणा है, दूसरे पत्र में स्वयं द्वारा भी उसे किया जा रहा है, यह संदेश है। यह पत्र पत्रलेखक के सरल अंतःकरण का भी द्योतक है। यह भी बताता है कि गुरुसत्ता किसी को नहीं भूलती, नहीं तो हिमालय यात्रा के एकवर्षीय साधना अनुष्ठान के तुरंत बाद एक साधारण गृहस्थ कार्यकर्त्ता को यह बताने की क्या आवश्यकता?
समय समय पर वे अपने शिष्यों को आश्वासन भी देते हैं और संरक्षण भी। वह पत्र जो परिजन भूले नहीं होंगे जिसमें उन्होंने लिखा है कि उड़ती चिड़िया जिस तरह अपने घोंसले, अंडों बच्चों का ध्यान रखती है, ठीक उसी तरह हम भी सबका ध्यान रखेंगे, भले ही एक वर्ष तक सबके बीच रह न पाएँ, आँखों से ओझल हों कुछ ऐसा ही आश्वासन नीचे वाले पत्र में मिलता है। 16/9/65 के लिखे इस पत्र में वे एक साधक को लिखते हैं-
“चि. आनंद और बेटी रतन के परिवार की हम स्वयं रक्षा करेंगे। चौकीदार की तरह उनके घर पहरा देंगे और छाता बनकर उन पर छाया करते रहेंगे। इन दोनों बच्चों के परिवार में से किसी का भी बाल-बाँका न होगा। आप पूर्ण निश्चित रहें। बच्चों को भी हमारे आश्वासन की सूचना दे दें, ताकि वे निर्भय और निश्चित रहें।”
पत्र की भाषा बताती है कि गुरु शिष्य का योग-क्षेम बहन करता है। उसका पायलट-बॉडीगार्ड-सुरक्षाकर्मी बनकर साथ चलता है। यह आश्वासन यदि शिष्य की समझ में आ जाए, तो दूना जोश भर जाता है एवं बिना किसी असुरक्षा के भाव के वह काम में लगा रहता है। ऐसे एक नहीं हजारों-लाखों परिवारों को गुरुसत्ता ने जीवित रहते भी सुरक्षा छत्र प्रदान किया एवं सूक्ष्म-कारणशरीर से अब भी सतत कर रहे हैं। आवश्यकता मात्र अटूट निष्ठा एवं निजी साधनात्मक पुरुषार्थ की है। यदि वह निरंतर चलता रहे तो कार्य सफल होंगे ही।
कितनी ही बार अपना अपनत्व प्रदर्शित करते हुए अपनी दैनंदिन जीवन की बात भी लिख देते थे व उनसे मार्गदर्शन की अपेक्षा रखते थे। वे घर-गृहस्थी चलाने जैसे सामान्य प्रसंगों के संबंध में भी होती थी। पूज्यवर एक ऐसे ही पत्र के संबंध में उत्तर देते हुए एक सज्जन को 10/2/46 को एक पत्र में लिखते हैं-
“हमारे आत्मस्वरूप
आपका पत्र मिला। ध्यानपूर्वक पढ़ा और वृक्ष जाना। एक सद्गृहस्थ के पास इतना पैसा होना आवश्यक है कि बच्चों की शिक्षा, विवाह, रोग एवं किसी आकस्मिक दुर्घटना के आने पर चिंतित न होना पड़े। गृहस्थ का उत्तरदायित्व सिर पर लेने के साथ आर्थिक सुव्यवस्था का उत्तरदायित्व अपने आप सिर पर आ जाता है। पत्नी की प्रेरणा अनुचित एवं अपेक्षणीय नहीं है।
जितनी तनख्वाह आपको मिलती है, यदि उसमें भी किफायत करेंगे तो आप लोगों के स्वास्थ्य नष्ट होंगे। 40) से कम में भला आप लोग किस प्रकार गुजर कर सकते हैं। उसमें बचाने का प्रयत्न न करें। हाँ, आर्थिक सुव्यवस्था के लिए कोई व्यापार सोचें, क्योंकि व्यापार के अतिरिक्त और किसी उपाय से आर्थिक सुधार नहीं हो सकता। आपके पास संभवतः पूँजी भी छोटी ही होगी। छोटी पूँजी से कोई दुकान ही की जा सकती है। स्थान अच्छा मिल जाए तो धंधा अच्छा चल जाने में संदेह नहीं है।”
पत्र से स्पष्ट है कि पत्रलेखक ने अपनी लौकिक समस्याओं का समाधान मित्रवत् गुरुसत्ता से पूछा है। उन्होंने भी तात्कालिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पूर्णतः लौकिक समाधान दिया है। किसी चमत्कार या आशीर्वाद के घटने की बात नहीं की है। पत्नी की दी गई प्रेरणा का भी हवाला दिया है, लिखा है कि उसकी उपेक्षा न करें, दैनंदिन कार्य में उसका सत्परामर्श भी लें। यह वह समय था जब द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था। परामर्श उनने उसी के अनुरूप व्यापार का दिया। फलीभूत हुआ एवं गाड़ी पटरी पर आकर कुछ ही वर्षों में तेजी से दौड़ने लगी।
एक अंतिम पत्र एक राजनीति में सक्रिय परिजन को लिखा यहाँ दे रहे हैं। उनका परामर्श पढ़ें व अपने लिए भी दिया गया मार्गदर्शन इसे मानें। यदि सभी लोकनेतृत्व के क्षेत्र में बहने वाले इससे प्रेरणा लेंगे तो यह पत्र उद्धृत करना सार्थक होगा। 6/10/63 को लिखे इस पत्र में (नाम ज्ञात नहीं) वे लिखते हैं-
“आप अब तक राजनैतिक सेवाकार्य करते रहे हैं। अब नैतिक और धार्मिक क्षेत्र में भी इसी उत्साह से काम करें तो इससे आपका और मानवजाति का अधिक कल्याण होगा।”
पात्र पाने वाले के लिए विशिष्ट संकेत है कि नैतिक और धार्मिक क्षेत्र में उत्साह से कार्य किए जाने की आवश्यकता है। आज सत्ता का मद अच्छों-अच्छों को राजनीति की और खींच रहा है, तब गुरुसत्ता का परामर्श यह कहता है कि विभूतिवान प्रबुद्ध वर्ग के लोकनायक धर्मतंत्र सँभालें, तो आत्मकल्याण भी होगा लोककल्याण भी होगा।
उपर्युक्त पत्र एक संगठन-साधक के रूप में हमारी गुरुसत्ता के बहुआयामी व्यक्तित्व के परिचायक हैं एवं हम सबके लिए प्रेरणा श्रोत भी।
सांसारिक सुख जीवन को सरस एवं सर्वांगपूर्ण बनाए रखने की दृष्टि से उपयोगी हो सकते हैं, किंतु इनको ही जीवन-लक्ष्य मान लेना आत्मकल्याण के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है।
-परमपूज्य गुरुदेव
(परमपूज्य गुरुदेव : एक असमाप्त जीवन गाथा)
यमुना से गंगा तक
अक्टूबर 1915 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी एक्ट पास होने के चार महीने बाद माघ शुक्ल प्रतिपदा को विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। संवत् 1972 (सन् 1916) की उस तिथि को वायसराय लार्ड हार्डिंग्ज ने शिलान्यास किया। बंगाल के गवर्नर, तीन प्राँतों के उपराज्यपाल, बारह महाराजा और कई विद्वान, जमींदार, साहूकार आदि इस अवसर पर उपस्थित थे। यह विश्वविद्यालय एनी बीसेंट के स्थापित सेंट्रल हिंदू कॉलेज का ही विकसित रूप था। संकल्प करीब पाँच साल पहले लिया गया था। इसके लिए एनी बींसेंट महामना मदनमोहन मालवीय, दरभंगा के महाराज रामेश्वर सिंह ने मिलकर काम शुरू कर दिया था। निश्चय किया गया कि बैंक के पचास लाख रुपये जमा हो जाएँ और एक करोड़ रुपये इकट्ठे होने की स्थिति बन जाए तो विश्वविद्यालय की विधिवत् स्थापना हो।
सरकार और कुछ राजा-महाराजा मिलकर भी इतना संचय कर सकते थे, लेकिन महामना मालवीय जी ने समर्थ लोगों के सहयोग के साथ जनसाधारण से दान लेने का प्रस्ताव भी रखा। सामान्य आय की स्थिति के लोगों से चंदा जुटाने का उद्देश्य उनसे आत्मीयता जोड़ना भी था। समर्थ लोगों के विपुल सहयोग के साथ छोटे-छोटे अंशदानों से मार्च 1913 तक इक्कीस लाख रुपये जमा हुए। पचास लाख की अभिलाषिता राशि जुटाने में दो साल और लगे। इतने संचय में बीकानेर, जोधपुर और कश्मीर रियासतों से मिलें वार्षिक अनुदान भी शामिल थे। जनसहयोग जुटाने के लिए पूरे देश के विद्वानों, नेताओं, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं और पुरोहितों, उपदेशकों से भी अपील की गई थी। सभी वर्गों के सैकड़ों लोग जुटे और दिन-रात लगे रहे। पाँच वर्ष की अवधि में लक्ष्य का आधे से ज्यादा भाग इकट्ठा हो गया। अंशदान में मुट्ठी अनाज से लेकर एक पैसा, आधार पैसा और आने-दो आने जितनी छोटी रकम भी थी।
व्रज क्षेत्र में जो गिने-चुने लोग काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे थे, उनमें पंडित रूपकिशोर शर्मा का नाम अन्यतम है। आगरा के पास आँवलखेड़ा गाँव में बसे पंडित रूपकिशोर शर्मा भागवत् के उद्भट विद्वान थे। दूर-दूर वे कथा और धर्मोपदेश करने जाते थे। महामना मदनमोहन मालवीय उनकी व्याख्यान शैली से बहुत प्रभावित थे। कुछ समय तक यों दोनों एक ही गुरुकुल में रहे थे, लेकिन दोनों के स्नेह-संबंधों का आधार भागवत् प्रेम ही था। भागवद् कथा के समय श्रोताओं से सनातन धर्म के लिए सहयोग जुटाने की सीख मालवीय जी ने ही दी थी। लोगों से छोटी-छोटी राशि इकट्ठी करना निश्चित होने के बाद मालवीय जी ने उन्हें कम-से-कम ग्यारह हजार रुपये जुटाने के लिए कहा था। पंडित रूपकिशोर ने अलग-अलग समय पर यह रकम पहुँचाई। किश्तों में भेजी गई इस राशि में भागवत कथा कराने वाले यजमानों का योगदान भी समाहित है। कितनी रकम कहाँ से भेजी गई, इसका पूरा हिसाब नहीं है। एक बड़ा हिस्सा गुप्तदान के रूप में भेजा गया था। पंडित जी के वंशज इस बारे में बताया करते थे।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एक पुरोधा होने के नाते उद्घाटन के समय पंडित रूपकिशोर शर्मा भी पहुँचे। व्रज क्षेत्र के कुछ पुरोहित विद्वान भी उनके साथ थे। कुछ स्वजन-संबंधी और परिवार के लोग काशी की यात्रा करने के उद्देश्य से चल पड़े थे। परिवार के साथ ही करीब साढ़े पाँच साल का एक शिशु भी था। शिलान्यास और स्थापना समारोह में पंडित जी अपने दो सहयोगियों को लेकर व्यवस्था का काम देखते रहे। दूसरे लोग काशी में देवदर्शन और गंगा स्नान, अनुष्ठान आदि कृत्यों में व्यस्त हो गए।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय का स्थापना समारोह कई दिन तक चला। विश्वविद्यालय का उद्देश्य विद्यार्थियों को आधुनिक विषय पढ़ाने के साथ सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के मूल तत्व समझाना भी था। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी अधिनियम में ही व्यवस्था थी कि विश्वविद्यालय में हिंदू धर्म-विज्ञान की उच्चस्तरीय शिक्षा का प्रबंध होगा। यहाँ सभी जाति संप्रदाय के छात्र पढ़ सकेंगे। विशेष बात यह थी कि विश्वविद्यालय के प्रबंध और संचालन में हिंदू धर्म मानने वाले को ही दायित्व सौंपने की व्यवस्था की गई। प्रबंध समिति में गैर सरकारी सदस्यों का बाहुल्य होने की व्यवस्था भी अधिनियम में की गई। विश्वविद्यालय का जो स्वरूप उभर रहा था, वह पूरी तरह सनातन धर्म के अनुरूप था।
आलोचकों ने इसे आरंभ से ही पोंगापंथी, साँप्रदायिक और अनुदार आदि कहना शुरू कर दिया था। कुछ लोगों ने विश्वविद्यालय के नाम से ‘हिंदू’ शब्द हटाने के लिए दबाव डालने की कोशिश की। आँदोलन तो हाल तक भी चलते रहे हैं। उन दबावों की आरंभ से ही परवाह नहीं की गई। बाद में महात्मा गाँधी ने भी हिंदू शब्द हटाने की माँग करने वालों को गलत ठहराया था। जिस नाम से वह आज प्रसिद्ध है, उसी का समर्थन किया था।
दीक्षागुरु का अपने शिष्य से मिलन
विश्वविद्यालय का स्वरूप हिंदू धर्म-विज्ञान की उच्चस्तरीय अभिव्यक्ति देने के लिए गठित किया गया था। स्वाभाविक है कि स्थापना समारोह में यज्ञ-याग, प्रवचन, कथा आदि के कार्यक्रम भी रखे जाते। आँवलखेड़ा से गए पंडित रूपकिशोर जी को भी इन कार्यक्रमों का आँशिक दायित्व सौंपा गया। यज्ञ-याग और अन्य धर्म-अनुष्ठानों के लिए आए पुरोहितों को ठहराने, उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखने और नगर-भ्रमण कराने के काम में वे लगे हुए थे। उस अवधि में उन्हें अपने परिजनों की सुध भी नहीं रही। कौन कहाँ ठहरा है, क्या खा रहा है, कहाँ विश्राम कर रहा है, आदि की चिंता करना तो दूर रहा, उन्हें उनका ध्यान भी नहीं रहता था।
समारोह शुरू हुए पाँच दिन बीते होंगे। वसंत पंचमी का दिन था। विद्या की देवी सरस्वती के अवतरण के दिन व्याख्यान, गोष्ठी, अधिकारियों की बैठक आदि नियत क्रम के अनुसार चलते रहे। सरस्वती पूरा उस दिन का विशेष आयोजन था। आम के पत्तों और बौरों से वेदी सजाई गई। साठ-सत्तर विद्यार्थी और अध्यापक वेदी के सामने बैठे। वेदी के सामने ही यज्ञकुँड स्थापित किया गया। मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ आरंभ हुआ। मालवीय जी कर्मकाँडों का संचालन कर रहे थे। इन बच्चों में पंडित रूपकिशोर जी के पुत्र श्रीराम भी थे। उम्र पाँच-छह वर्ष के बीच रही होगी। सामान्यतः यह बालक माँ और परिवार के लोगों के साथ रहता था। उस दिन पंडित जी कुछ सोचकर वहाँ ले आए थे। सरस्वती पूजा में भाग लेने के अलावा कुछ समय मालवीय जी का सान्निध्य-लाभ कराना भी शायद उद्देश्य रहा हो।
पर्व -उत्सव की प्रक्रिया अपने ढंग से चलती रही। छात्र जब मंत्रों का उच्चारण करते या दोहराते तो वातावरण और भी मनोरम हो उठता था। बच्चे ही थे। कहीं-कहीं उच्चारण में दोष आ जाता था, लेकिन उस और ज्यादा लोगों ने ध्यान नहीं दिया। उपस्थित पंडितों और अध्यापकों ने उनका उत्साह बढ़ाना ही श्रेयस्कर समझा। इन बच्चों में सबसे छोटी उम्र के बालक श्रीराम थे। वह जब मंत्रपाठ करते तो मालवीय जी की दृष्टि उनकी और पड़ जाती। इतने छोटे बालक को मंत्रोच्चार करते देख वे अपलक निहारते रह जाते। पर्व देवता का पूजन संपन्न होने और प्रसाद-वितरण के बाद मालवीय जी उस बालक के पास आये। स्नेह से सिर पर हाथ फेरा।
निकट आते ही बालक श्रीराम ने उनके चरणों में प्रणाम कर लिया था। दुलारते हुए मालवीय जी ने पूछा, “तुम्हारे पिता कहाँ हैं, वत्स?” बालक श्रीराम कुछ बोलते, इससे पहले ही पंडित रूपकिशोर जी सामने आ गए। मालवीय जी के सामने विनम्र भाव से खड़े हो गए और कहने लगे, “यह आपका ही स्नेह और वात्सल्य है महामना।” मालवीय जी ने बालक के बारे में दो-चार बातें और पूछी। उसे गौर से कुछ देर देखते रहे और पूछा, “उपनयन हो गया है क्या?” पंडित जी ने कहा, “अभी प्रतीक्षित है। आपके हाथों संपन्न हो तो अहो भाग्य!”
मालवीय जी के चेहरे पर स्मिति की रेखा खिंच गई। उनकी सफेद मूँछों के पीछे खिले हुए होंठ स्पष्ट प्रतिभासित हो रहे थे। जैसे कह रहे थे कि पंडित जी आपने मेरे मन की बात अपने मुंह से कह दी। मालवीय जी ने कहा कि मैं मंत्रदीक्षा दूँगा। संकल्प लिया जा चुका है, इसलिए दीक्षित माना जा सकता है। अभी क्रिया संपन्न नहीं हुई, संकल्प हुआ है, इसलिए दीक्षा का आरंभ हुआ मानिए। उपयुक्त समय पर दीक्षा भी संपन्न हो जाएगी। वह उपर्युक्त समय कुछ वर्ष बाद आया। उस दिन परिसर में कार्यक्रम भी थे। एनी बीसेंट का व्याख्यान होना था। मैसूर (अब कर्नाटक) के महाराज कृष्णराज वादियार, डॉ. सुँदरलाल आदि अभिजात्य जनों के साथ भी महामना का अलग-अलग विमर्श चलना था।
स्थापना समारोह विश्वविद्यालय की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण था ही और भी कई घटनाएं थीं, जिन्होंने इतिहास में नए मोड़ लाने वाला आयोजना बना दिया। सनातन धर्म और संस्कृति के नए अनिमेष के साथ विद्या, धन, कला, शक्ति, साधना और शौर्य की सात धाराओं वाली गंगा जैसे वहाँ प्रवाहित हो उठी थी। महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीयता की भावनाओं से ओत-प्रोत भाषण वहीं दिया था, जिसमें प्रतिभाओं को ललकारा गया था। उन्हें अपने कर्त्तव्य से विमुख बताते हुए गाँधी जी ने राजा-महाराजाओं और श्रीमंतों की कड़ी आलोचना कर दी थी।
व्याख्यान में राजा-महाराजा भी उपस्थित थे। गाँधी जी की आलोचना से वे उत्तेजित हो उठे। उन्होंने कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया और उठकर चले गए। विरोध में उठकर जाने वालों में एनी बीसेंट भी थीं। मदनमोहन मालवीय उस आयोजन में शाँत बैठे रहे। उन्होंने लोगों के उठकर जाने की परवाह नहीं की। किसी भी तरह का दबाव माने बिना, सत्य को स्वीकार करने और उसके साथ खड़ा होने के और भी कई प्रसंग हैं, जो उन दिनों घटे और उनके संस्कार वातावरण में घुले-मिले और वहाँ आए लोगों के चित्त में जाने-अनजाने छाए।
महामना के सहयोगी पंडित जी
मालवीय जी के सहयोगियों में आँवलखेड़ा (आगरा) के पंडित रूपकिशोर आदर से याद किया जाने वाला नाम था। राजनीति, शिक्षा, समाज-सुधार और सेवा-कार्यों में निरत रहते हुए भगवत् के कथा प्रसंगों और तत्त्वदर्शन की विवेचना मालवीय जी का प्रिय धर्म-अनुष्ठान था। पंडित रूपकिशोर जी अपने क्षेत्र में भागवत व्यास के रूप में श्रद्धा की दृष्टि से देखे जाते थे। पंडित रूपकिशोर अपने आपको महामना का विनम्र शिष्य और अनुयायी ही कहते थे। उनका क्षेत्र भी अपेक्षाकृत छोटा था, लेकिन ब्रजमंडल में वे मालवीय जी की कथा शैली के प्रतिनिधि प्रवक्ता कहे जाते थे। उस क्षेत्र के राजा-रजवाड़ों में पंडित जी का बहुत मान-सम्मान था।
कथा-उपदेश वाणी की कला नहीं है। अपनी बात कहने का ढंग आना चाहिए। उसका प्रभाव पड़ता है, लेकिन जो कहा जा रहा है, उसके पीछे आस्था का बल भी होना चाहिए। यह बल उपदेशों को पहले अपने जीवन में उतारने से आता है, जो भागवत करुणा और भक्ति का शास्त्र है, वह प्रेत-पिशाचों को भी कषाय-कल्मषों से मुक्त करता है। धुँघकारी प्रेत की कथा भागवत कथा के समय माहात्म्य प्रसंग में हर बार सुनाई जाती है। करुणा और भक्ति के तत्त्व पंडित जी के जीवन में पूरी आभा के साथ प्रकट हुए थे। उनके संपर्क में आकर बहुत लोगों ने अपनी बुराइयाँ छोड़ी। छोटे-मोटे दोष-विकारों से मुँह मोड़ने की सैकड़ों घटनाएँ है। एक अवसर ऐसा भी आया जब पंडित जी के निवास से कुछ दूर जंगल में रहने वाले धाँधू नामक डकैत ने लूटमार करना छोड़ दिया। इलाके में उसका आतंक था। उसका अपना कोई गिरोह नहीं था, लेकिन वह खुद बहुत बलवान था। उसमें 25-30 लोगों से जूझने की सामर्थ्य थी।
पंडित जी कथा कहने के लिए जा रहे थे कि रास्ते में धाँधू से मुलाकात हो गई। कहने लगा-आप ब्राह्मण देवता हैं, आपका अनादर तो नहीं करूंगा, लेकिन मैं दस्यु हूँ। लूटना छोड़ दूँ तो अपना और आश्रितों का निर्वाह कैसे करूंगा? इसलिए आपके साथ बलप्रयोग नहीं करूंगा। सिर्फ यही चाहूँगा कि आपके पास जो कुछ भी है, वह चुपचाप रख दें।
धाँधू ने पूरे वेग से कहा था। सामान्य मनःस्थिति का व्यक्ति धाँधू के दमखम, बुलंद आवाज और डपट से काँपने लगता। पंडित जी पर उसके डरावने व्यक्तित्व का कोई असर नहीं हुआ। जिस निश्चित भाव से वे जा रहे थे, उसी निर्द्वंद्व भाव से खड़े हो गए और धाँधू को निहारने लगे। अपनी धमकी का कोई असर होता न देख डाकू अचरज में पड़ गया। उसने कहा, पंडित जी मैंने जो कहा, वह आपने सुन लिया है न। पंडित जी ने कहा- सुन लिया है, पर मैं अभी तुम्हें कानी कौड़ी भी नहीं दूँगा। अगर कथा सुनने चलते हो तो वचन देता हूँ कि वहाँ जो भी दान-दक्षिणा आएगी सब तुम्हें सौंप दूँगा। धाँधू की आँखें चौड़ी हो गईं। पहले अचरज से बड़ा अचरज सामने आ गया था।
दोनों में कुछ देर संवाद हुआ। पता नहीं पंडित जी की किस बात का असर हुआ कि धाँधू कथा सुनने के लिए राजी हो गया। वह साथ चल पड़ा। भागवत सप्ताह की पूरी अवधि में उसने ध्यान से कथा सुनी, पुराने संस्कार बीच-बीच में जोर मारते। वह लोगों को डराने-धमकाने लगता, लेकिन यह देर तक नहीं चला। भागवत सप्ताह पूरा होने के बाद पंडित जी ने दान-दक्षिणा समेटकर धाँधू के हाथ में सौंपी। रुपये, पैसे, आभूषण और मेवों आदि से गठरी बँध गई थी। डाकू ने गठरी उठाई, सिर पर रखी और कह उठा-आदेश करें प्रभु जी किधर चलना है। पंडित जी ने कहा- जहाँ तुम ले जाना चाहते हो ले जाओ, मैंने अपना वचन पूरा कर दिया। घाँधू ने गठरी उतारकर एक तरफ रखी और पंडित जी के चरणों में लोट गया। जोर-जोर से रोते हुए वह कहा रहा था- मुझे राह मिल गई भगवन् क्षमा करें। मैं मेहनत और ईमानदारी की कमाई ही खाऊँगा। उसी से परिवार का गुजारा चलाऊँगा। अनुमय-विनय कर वह बोझ पंडित जी के घर तक छोड़ने गया। जिसने भी देखा उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह धाँधु डाकू है। (क्रमशः)
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की भूमि एवं भवन उत्तरांचल प्राँत के देहरादून जनपद में हरिद्वार से सात किलोमीटर दूर हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर शाँतिकुँज से आधा किलोमीटर दूरी पर स्थित है। दिसंबर 21 के तृतीय सप्ताह में शाँतिकुँज के आवेदन पर उत्तराँचल कैबिनेट के निर्णय लिया गया कि अपने में अद्वितीय भारतवर्ष के पहले उस विश्वविद्यालय को ‘डीम्ड यूनिवर्सिटी’ के रूप में स्थापित करने हेतु एक अधिनियम बनाकर अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा इसे संचालित किया जाए। अपने पाठ्यक्रम भी यह विश्वविद्यालय स्वयं बनाएगा एवं आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी होगा, किसी प्रकार की आर्थिक सहायता राज्य या केंद्र सरकार से नहीं लेगा। महामहिम राज्यपाल उत्तराँचल के हस्ताक्षर एवं गजट अनुज्ञापन के साथ ही अब देवसंस्कृति विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गया है। इस वर्ष शेष भवनों के निर्माण के बाद आगामी वर्ष से इसके विधिवत् प्रारंभ होने की संभावना है। तब तक महाविद्यालय जो विगत वर्ष आरंभ किया गया था, चलता रहेगा।
परमपूज्य गुरुदेव के सपनों के इस विश्वविद्यालय का भूमिपूजन वीतराग स्वामी कल्याणदेव जी की उपस्थिति में निवृश्रमान शंकराचार्य (भानपीठाध्यक्ष), स्वामी श्री सत्यमित्रानंद जी, परमार्थ निकेतन के प्रमुख मुनि श्री चिदानंदजी तथा प्रभुप्रेमी संघ (अंबाला) के प्रमुख जूनापीठाधीश्वर स्वामी श्री अवधेशानंदजी गिरी महाराज सहित प्रायः पचास हजार परिजनों द्वारा 23 मई 2000 को किया गया था। अपनी इस त्रैवर्षीय यात्रा में इस परिसर में प्रायः बारह करोड़ रुपये का निर्माण हो चुका है एवं एक चौबीस कक्षों वाला भाषा-धर्म विद्यालय भवन, एक फार्मेसी व प्रायः डेढ़ सौ आवास बनकर तैयार है।
विश्वविद्यालय की स्थापना जीवन विद्या के आलोक केंद्र के रूप में की जा रही है। ऋषि-मुनियों की तप-साधना द्वारा संस्कारित उत्तराँचल की इस देवभूमि की अपनी विशिष्ट साँस्कृतिक पृष्ठभूमि रही है। गंगा की गोद व हिमालय की छाया में स्थित गायत्रीतीर्थ रूपी तपोभूमि समूचे विश्व के लिए दिव्य आलोक एवं प्रेरणा का केंद्र रही है। न केवल उत्तराँचल रूपी पर्वतीय प्राँत के ग्रामीण अंचल की सभी समस्याओं को वरन् सारे भारत व विश्व की आज की नैतिक मूल्यों के संकट से पैदा हुई परिस्थितियों को स्पर्श करते हुए इसके विविध कार्यक्रम राष्ट्र के साँस्कृतिक उत्थान, सामाजिक नवोन्मेष एवं आर्थिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
भारत की अतीतकालीन गौरव मात्र धर्म-दर्शन और अध्यात्म के सूत्र सिद्धाँतों पर आधारित नहीं था, बल्कि वान की विभिन्न धाराओं द्वारा पुष्ट भी था। याज्ञवल्क्य का यज्ञ विज्ञान, विश्वामित्र की गायत्री महाविद्या, पतंजलि का योग विज्ञान, गोरखनाथ का हठयोग, धन्वंतरि-चरक का आयुर्वेद, सुश्रुत की शल्यचिकित्सा कणाद का अणु विज्ञान, आर्यभट्ट-वाराहमिहिर का ज्योतिर्विज्ञान, तंत्रविज्ञान, अंकगणित आदि तपःपूत ऋषियों द्वारा अपनी कठोर साधना द्वारा गढ़े गए थे। ये सभी विद्याएं जीवन जीने की पर्याय-अध्यात्म विद्या की विभिन्न धाराएं थी। आज ये सभी विद्याएं लुप्तप्राय हैं शरीर रुग्ण, मन अशाँत, परिवार विखंडित, समाज विक्षुब्ध, विज्ञान घातक, राजनीति भ्रष्ट, देश आतंकित, धर्म जंजाल और शिक्षा आज अनुपयुक्त भार बनकर रह गए है। जीवन विद्याओं की उपेक्षा से ही यह स्थिति पैदा हुई है।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय इन विद्याओं के पुनरुज्जीवन एवं वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण के साथ सामयिक उपयोगिता प्रमाणित करने का कार्य करने जा रहा है। इसके अंतर्गत चार संकायों-साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन के अंतर्गत प्रारंभिक दौर में भारतीय संस्कृति प्रधान विद्याएं जो ली जा रही है वे हैं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद, सर्वधर्म समभाव, देवालय प्रबंधन, नैतिक एवं मूल्यपरक शिक्षा, शिक्षालय प्रबंधन एवं शिक्षकों का प्रशिक्षण, आयुर्वेद, योगविज्ञान, मंत्रविज्ञान, यज्ञविज्ञान, ज्योतिर्विज्ञान, औषधालय प्रबंधन, स्वास्यि संरक्षण प्रशिक्षण, ग्राम प्रबंधन, स्वदेशी स्वावलंबन पर आधारित अर्थप्रबंधन तथा गोविज्ञान।
प्रयास यह किया जाएगा कि यहाँ से प्रशिक्षित स्नातक, परास्नातक या शोधकर्ता आत्मावलंबी बन सकें एवं देवसंस्कृति के भारत के कोने-कोने एवं विश्वभर में विस्तार हेतु सक्षम बन सकें। यहाँ शोध-अनुसंधान की आधुनिकतम स्थापनाएं की जा रही है। जो विश्व में अभूतपूर्व स्तर की एक स्थान पर शोध में सहायक बनेंगी। भारतीय अध्यात्म को एवं जीवनमुक्त बनाने वाली विद्या को यहाँ सीखकर जो भी छात्र जाएंगे, वे अपनी शिक्षा को सही मायने में सार्थक बनाएंगे। भारत की व विश्वभर की सभी भाषाओं एवं धर्मों का (थियॉलाजी) प्रशिक्षण यहाँ दिया जाएगा तथा विदेशियों एवं संस्कृति पिपासु प्रवासी भारतीयों की, जिनकी संख्या प्रायः पाँच करोड़ है, शिक्षण की भी यहाँ व्यवस्था होगी। जन-जन की अपेक्षा के अनुरूप नालंदा-तक्षशिला स्तर का यह संस्कृति शिक्षण केन्द्र बन सके, इसके लिए सभी भावनाशीलों का भावभरा आह्वान है।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय विधिवत् अनुमोदित
उत्तराँचल सरकार की कैबिनेट ने एक सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय में हरिद्वार के शाँतिकुँज द्वारा देहरादून (हरिपुर कलाँ) में गायत्री कुँज में बनाए जा रहे देवसंस्कृति विश्वविद्यालय को विधिवत् मान्यता दे दी हैं साधुवाद के योग्य यह कार्य एक विशेष अधिनियम बनाकर किया गया है, जिस पर महामहिम राज्यपाल महोदय ने हस्ताक्षर किए है। यह विश्वविद्यालय पूर्णतः स्वायत्तशासी होगा, आर्थिक सहायता हेतु शासन से कोई भी मदद न लेगा एवं संस्थापक सत्ता के कार्यों को जन-जन तक पहुँचाने देवसंस्कृति के निर्धारणों को विद्या-विस्तार के माध्यम से लोकव्यापी बनाने का कार्य करेगा। नए वर्ष की वेला में एक जनवरी को उत्तराँचल के मुख्यमंत्री सत्यमित्रानंद जी द्वारा धर्मतंत्र के प्रतीक के रूप एक-एक दीप जलाकर उत्तराँचल व भारत के कोने-कोने से आए परिजनोँ के बीच इस स्थापना के विषय में विस्तार से जानकारी दी गई। विश्वविद्यालय के विषय में विशेष इसी अंक में पढ़ें।
शांतिकुंज के साहित्य विस्तारपटल अब स्थान-स्थान पर
पिछले दिनों उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में शाँतिकुँज साहित्य विस्तारपटल की स्थापना की गई। इंदिरानगर के सेक्टर 9/189 स्थित गायत्री ज्ञान मंदिर में इसका विधिवत शुभारंभ किया गया। लखनऊ, कानपुर, फैजाबाद, देवीपाटन (गोंडा), इलाहाबाद, बरेली तथा झाँसी के सात मंडल इस विस्तारपटल का लाभ ले सकेंगे। अब सारे भारत में इनकी संख्या चौदह हो गई है। पहले से ही नागपुर, वाराणसी , मुजफ्फरपुर, टाटानगर, गया, बुलंदशहर, शिवपुरी, राजसमंद, देवरिया, इंदौर, कोटा, विलासपुर, भीलवाड़ा में ये सक्रिय है। मिशन का सारा साहित्य, अखण्ड ज्योति सहित सभी पत्रिकाएं तथा आँडियों-वीडियो कैसेट्स, वनौषधियाँ, प्रज्ञापेय अब केंद्र के अतिरिक्त यहाँ से भी मंगाए जा सकते है। इनका उद्देश्य है-ज्ञानयज्ञ-विचारक्राँति का आलोक विश्वव्यापी बनाना।
जयति जय गौ माता एवं सद्ज्ञान वंदना कैसेट का विमोचन
गायत्री तपोभूमि मथुरा के तत्वावधान में लिखी गई गौ संरक्षण, गौमाता की महिमा का प्रतिपादन करने वाली पुस्तक ‘जयति जय गौ माता’ का विमोचन सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने शास्त्री भवन नई दिल्ली में किया। श्रीमती स्वराज एवं सूचना प्रसारण राज्यमंत्री श्री रमेश बैस ने ‘सद्ज्ञान वंदना’ नामक ऑडियो कैसेट माला को भी लोकार्पित किया। दोनों ही गायत्री तपोभूमि मथुरा से प्राप्त किए जा सकते हैं।
तिरूपति अश्वमेध का अनुयाज प्रारंभ
अब दिसंबर के अंतिम सप्ताह में संपन्न हुए तिरूपति अश्वमेध महायज्ञ का अनुयाज दक्षिण के चारों प्राँतों में आरंभ कर दिया गया हैं। विगत दिनों तेलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़ प्रशिक्षण में जिन भाई-बहिनों ने भागीदारी की थी, उन्हीं के पुरुषार्थ से उन्हीं की भाषा में बात कर हम दक्षिण में प्रवेश कर सके। अब 241 कुँडी अश्वमेध महायज्ञ की ऊर्जा को दक्षिण भारत के 241 स्थानों पर दीपयज्ञ-संगठनात्मक आयोजनों के माध्यम से पहुँचाने की स्थिति बन रही हैं इसमें प्रमुखता स्थानीय भाषा में प्रकाशित साहित्य एवं बाद में मासिक पत्रिका के प्रकाशन के साथ-साथ चारों प्राँतों में एक-एक केंद्र के रूप में हैदराबाद स्थापित हो चुका हैं केंद्र का कार्यालय भी संजीव रेड्डी नगर में है। अब शाँतिकुँज के मार्गदर्शन में 18 केंद्र पूरे आँध्रप्रदेश में स्थापित किए जाने हैं, जहाँ स्वाध्याय संगठन एवं रचनात्मक आँदोलनों को गति दी जा सके। इसी तरह तमिलनाडु का केन्द्र चैन्नई में स्थापित किया जा चुका हैं यहाँ भी प्रकाशन केंद्र , एक गुरुकुल, गौशाला एवं ध्यानकक्ष बनाने का प्रस्ताव आया है। इसी तरह तिरुअनंतपुरम् एवं बैंगलोर में भी प्राँतीय केंद्र बनाने की प्रक्रिया चल रही है। चारों प्राँतों के केंद्र शाँतिकुँज हरिद्वार के मार्गदर्शन में कार्य करेंगे। इसके लिए एक ‘दक्षिण भारत प्रकोष्ठ’ की स्थापना शाँतिकुँज में कर दी गई है।
उत्तराँचल के विकास हेतु एक विशेष गोष्ठी
श्री पूर्णानंद पैन्युली एवं वीरेश्वर उपाध्याय जी की अध्यक्षता में देहरादून में संपन्न एक विशेष संगोष्ठी में उत्तराँचल के प्रबुद्ध नागरिकों ने भागीदारी की। इसमें मुख्य पहल कुमायूँ विश्वविद्यालय के उपकुलपति (भूतपूर्व) श्री वी.के. जोशी एवं पूर्व स्वास्थ्य सचिव भारत सरकार श्री जे.सी. पंत द्वारा की गई। सभी प्रतिभागी प्रदेश के विकास की किसी-न-किसी श्रेष्ठ कार्य योजना से जुड़े थे व जिनके अंदर कुछ करने की तड़प भी थी। देव हियुनिधि (देवात्मा हिमालय युवा अभियान निधि) ‘ध्यान’ नामक एक ट्रस्ट युवाओं को प्रेरित-प्रशिक्षित करने के लिए गठित करने का इसमें निर्णय लिया गया। सभी स्वयंसेवी संगठन एकजुट होकर एक आचार्य कुल (विनोबा भावे की संकल्पना पर) की स्थापना करेंगे, यह भी निश्चित किया गया।
नारी जागरण सम्मेलनों-प्रज्ञापुराण कथा के शृंखलाबद्ध कार्यक्रमों की नई शृंखला आरंभ
मार्च के प्रारंभ से ही अब तीन माह तक चलने वाली श्रृंखलाओं में नारी जागरण सम्मेलन तथा प्रज्ञापुराण कथा के शृंखलाबद्ध कार्यक्रमों को क्षेत्र की माँग को देखते हुए आरंभ कर दिया गया है। इस बीच केंद्र के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के क्षेत्रीय-संगठनात्मक दौरों का क्रम भी आरंभ हो चुका है, जिसमें सभी जाग्रत-विकसित एवं नए विकसित हो रहे क्षेत्रों में इस संगठन-सशक्तीकरण वर्ष में सघन गोष्ठियों, शंका-समाधान आदि का क्रम रखा गया है।
वसुधैव कुटुम्बकम् का छोटा सा मॉडल होगी यह स्थापना
आज जिन समस्याओं से हम घिरे पड़े हैं, वे जानी-पहचानी है। समाधान भी प्रायः सभी विचारवानों को विदित है। बार-बार आप्तवचनों के माध्यम से उन पर अधिक ध्यान देने के लिए इसलिए कहा जाता है जिस हलके ढंग से इन तथ्यों पर विचार किया जाता रहता है, वह पर्याप्त नहीं। ढर्रे का आवरण उठाकर वास्तविकता को देखा जाना चाहिए। यही तत्त्वदर्शन या ईश्वरदर्शन है। इसी को आत्मसाक्षात्कार या ब्रह्मनिर्वाण कहा गया है। ढर्रे का अभ्यास ही भवबंधन है। माया जिसे कहा गया है, वह अवास्तविकता की खुमारी है। इसे हटाया एवं यह तथ्य अपनाया जा सके कि क्या किया जाना है तो समझना चाहिए कि जीवन-मुक्ति के मार्ग का अवरोध मिट गया।
प्रस्तुत भूमा जीवन विद्या के आलोक केंद्र देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ उस कार्य में खपने वाली प्राणवान जागृतात्माओं की भूमिका के संदर्भ में दी जा रही हैं। यह पारंपरिक विश्वविद्यालय नहीं, तीर्थ, आरण्यक और गुरुकुल का समन्वित संस्करण स्थापित किया जा रहा है। भाव−संपन्नों को दिशाधारा दे सकने योग्य वातावरण बनाने, जीवन विद्या के प्रशिक्षण का केन्द्र स्थापित करने तथा ‘वसुधैव कुटुँबकम्‘ का एक छोटा मॉडल स्थापित करने की दृष्टि से यह स्थापना की जा रही है। जहाँ प्रशिक्षण देने वाले अपने आचरण से शिक्षण पहले देंगे, वाणी व अन्य दृश्य-श्रव्य साधनों से बाद में, ऐसी कुछ विलक्षण संरचना है यह। निश्चित ही पढ़ने वाले तो बाद में आएंगे, पढ़ाने वाले, यहाँ निवास करने वाले, सभी तरह के कामों में स्वयंसेवक की तरह खपने वालों में यदि न्यूनाधिक भी कमी रही तो वह प्रारंभिक निर्धारण को, मूलभूत योजना को ही समाप्त कर देगी।
मनुष्य-जीवन ईश्वर का बहुमूल्य वरदान है। इसे इनाम नहीं, अमानत माना जाना चाहिए। भवबंधनों के कुचक्रों से निवृत्ति, पूर्णता की प्राप्ति जैसी महान् सफलताएँ इस एक ही तथ्य पर निर्भर हैं कि यथार्थता को हृदयंगम किया या नहीं? कहने-सुनने को तो आदर्शवादी बकवासें आए दिन कान्फ्रैन्स, वर्कशॉप, गोष्ठियों, प्रवचनों, कथाओं, नेताओं के भाषणों के रूप में चलती रहती हैं, पर वस्तुतः उनमें कोई सार नहीं। अध्यात्म का लाभ एवं चमत्कार मात्र उन्हीं को मिलता है, जो इसे कल्पनालोक की उड़ान न मानकर जीवन-दर्शन के रूप में मान्यता देते हैं, तदनुरूप ही दिशाधारा का निर्धारण करते हैं।
हम युगसंधि की ब्रह्मवेला में से गुजर रहे हैं। कुछ ही वर्षों में युगपरिवर्तन का सरंजाम पूर्णता पर पहुँचने को है। ऐसे में जागृतात्माओं का आत्मचिंतन जीवनदर्शन की यथार्थता के साथ जुड़ सके तो ही काम चलेगा। थोड़ी दूरदर्शिता और थोड़ी साहसिकता अपनाने पर उन तथाकथित परिस्थितियों का स्वरूप ही बदल जाता है, जो लक्ष्यपथ पर चल सकने की असमर्थता-विवशता बनकर सामने आती रहती है। मकड़ी अपना जाला आप बुनती है और उसमें फँसकर छटपटाती और जिस-तिस को दोष देती है, किंतु जब अपना चिंतन उलटती है तो अपने बुने जाले के धागे को समेटती-निगलती चली जाती है। निविड़ दीखने वाले बंधन देखते-देखते साँझ के रंगीन बादलों की तरह अदृश्य होने लगते हैं।
मानव-जीवन की गरिमा का समुचित उपयोग विश्वउद्यान को सुरम्य बनाने में योगदान देकर इस दुर्लभ सुअवसर को सार्थक बनाने में ही है। पेट-प्रजनन तक सीमित रहना अन्यान्य प्राणियों को शोभा देता है, मनुष्य को नहीं। मनुष्य तो स्रष्टा का युवराज है। उसे इतना मिला है कि अपनी विशेषताओं के सहारे तनिक-सा श्रम, मनोयोग लगाकर चुटकी बजाते वह उपार्जित कर सकता है और शेष विभूतियों से आत्मकल्याण और लोककल्याण जैसे उच्च उद्देश्यों की पूर्ति कर सकता है।
यदि विलासी लिप्सा और संग्रह की तृष्णा को हलका किया जा सके, तो औसत भारतीय जैसा नैतिक निर्वाह आसानी से उपार्जित हो सकता है। यदि परिवार को बढ़ाने की मूर्खता न की जाए, जो अब तक का है, उसे स्वावलंबी-सुसंस्कारी बनाना भर कर्त्तव्य माना जाए तो उस परिपोषण के लिए सामान्य प्रयास से ही काम चल सकता है। बोझिल जीवन तो उनका होता है, जो अमीरी के सपने देखते और उत्तराधिकारियों को वैभव से लादने की ललक सँजोए रहते हैं। बोझ इस दुष्ट−चिंतन भर का है। न किसी के लिए पेट भारी पड़ता है और न परिवार। बोझिल तो वह मूर्खता है, जो लिप्सा-तृष्णा के रूप में जोंक की तरह शिराओं में दाँत गड़ाए खून चूसती रहती है।
जीवन का ऐसा सुनियोजन करने का जो अवसर अब परिजनों को, प्रबुद्धों को, भावनाशील जागृतात्माओं को देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में कार्य करने के गौरव भरे क्षणों के रूप में उपलब्ध होने जा रहा है, उसमें इन सभी बातों को ध्यान में रखा जाना है। अपनी सारी शक्ति चुक जाए एवं नस-नाड़ियाँ क्षीण-जर्जर हो जाएँ तब “कुछ नहीं तो यही सही” के क्रम में कोई यहाँ आने का मन बना रहा हो तो उसे हम स्पष्ट बता देना चाहेंगे कि यहाँ वृद्धाश्रम नहीं स्थापित होने जा रहा। हाँ, जो जीवन की मध्यावस्था में हैं, कुछ कर गुजरने की उत्कंठा उनमें है, राष्ट्र, संस्कृति के लिए खपने की कोशिश जिनके अन्दर है, उन्हें अब अपने उत्तरकाल के लिए अपनी प्रतिभा के नियोजन हेतु इस अवसर को न गँवाने की सलाह जरूर दी जाएगी। न यहाँ आकर्षक वेतनमान है, न रहने के लिए बड़े-बड़े बँगले पर जो भी कुछ है वह मन को शाँति, संतोष, उल्लास देने वाला तथा औसत भारतीय के जीवन में निर्वाह कर दिखाने वाला है। जिन्हें संग्रह-भोग-विलास, आज के अमीरी के साधनों की ललक हो, उनके लिए यह विश्वविद्यालय नहीं है। जो संस्कृति के लिए कुछ कर गुजरना चाहते हों, स्वयं भी अपने जीवन में जीकर ऋषिकालीन स्वर्णिम भारत का संस्करण दर्शाने की इच्छा रखते हों, उनका यहाँ स्वागत है। जहाँ डेढ़ सौ करोड़ रुपयों की राशि से निर्माण होने जा रहा हो, जिसकी व्यवस्था बनाए रखने में प्रतिवर्ष प्रायः उसकी पाँच से दस प्रतिशत राशि लगने की संभावना हो, फिर भी किसी प्रकार की फीस न ली जाने का फैसला लिया गया हो तो यही माना जाना चाहिए कि इसका संचालन ऋषिसत्ताओं के हाथ में है। वे ही सारी व्यवस्था बनाएँगे, पर संचालन तंत्र के आचरण-व्यवहार, किफायती जीवनशैली को सतत देखते रहेंगे। यह तभी संभव होगा जब मात्र कुलपति, उपकुलपति या संचालन मंडल ही नहीं, सभी विधाओं के प्रमुख व कार्य करने वाले शिक्षक, पढ़ने वाले छात्र ऋषिकालीन आश्रमों, नालंदा-तक्षशिला के गौरवमय अतीत को ध्यान में रखें। इतना विश्वास दिलाया जा रहा है कि जो भी कुछ होने जा रहा है, वह अपने आप में अद्भुत-विस्मयकारी एवं भारत को महानायक, विश्व का सिरमौर बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाला दैवी पुरुषार्थ है। इसमें भागीदारी, समयदान, अंश या साधन किसी के लिए भी घाटे का सौदा नहीं होने जा रहा।
आज से सौ एक वर्ष पूर्व काँगड़ी गाँव में गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। आज वह शताब्दी वर्ष मनाकर अपने शीर्ष पर है। स्वामी श्रद्धानंद जी की मूलभूत स्थापना की आज क्या स्थिति है, क्या उनके स्वप्न पूरे हो सके, यह तर्क का विषय को सकता है, पर पब्लिक स्कूल संस्कृति की भीड़ में एक लैपपोस्ट के रूप में प्रकाश-अवतरण करने वाले केंद्र के रूप में वह आज भी देखा जाता है। यह उत्तराँचल ही नहीं, पूरे राष्ट्र का गौरव है। यहाँ से निकले स्नातक-विद्यावाचस्पति में सारे विश्व में मिले हैं एवं वे साँस्कृतिक गौरव-गरिमा का यथासंभव विस्तार कर रहे हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय आज किस स्थिति में है, इस विवाद में न पड़कर मूलभूत स्थापना के पुरुषार्थ को, लक्ष्य को एवं प्रतिकूलताओं-गुलामी के माहौल में एक स्वाभिमानी ऋषि महामना के त्याग व तप को कभी नहीं भुलाया जा सकता। काश इन दो संस्थाओं को वैसे उत्तराधिकारी भी मिले होते तो परंपरागत विश्वविद्यालयों की विकृतियाँ इनमें न आतीं। हमारा कार्य तो इन दो मूलभूत विश्वविद्यालय रूपी स्थापनाओं को आगे बढ़ाना , आगे इनसे सहयोग करके इन्हें भी गति देने का है। काशी विद्यापीठ एवं प्रेम महाविद्यालय ने अपने जमाने में भारत के लिए मर-मिटने वाले राष्ट्रभक्तों के निर्माण का दायित्व खूब सँभाला था। यदि शिक्षण संस्था प्राणवानों-जाग्रत जीवनदानियों के द्वारा चलती है एवं साथ-ही-साथ उत्तराधिकारियों के निर्माण का कार्य भी चलता रहता है, तो कहीं-कोई अड़चन उसके कई शतकों तक चलने में आनी नहीं चाहिए। इसीलिए परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने भवनों के निर्माण से अधिक छोटे-मध्यम वर्ग के, किंतु भावनासंपन्न समयदानी-जीवनदानी कार्यकर्त्ताओं के मनों को बनाने पर सर्वाधिक ध्यान दिया। यदि यह कार्य अनवरत चलता रहे तो संस्थाएँ चलती रहती हैं एवं आगे बढ़ती रहती हैं।
यहाँ हमें परमपूज्य गुरुदेव द्वारा दिए गए उद्बोधन (1 जून 1980) से कुछ उद्धृत करने का मन है।यह उद्बोधन गायत्री विद्यापीठ गुरुकुल के शुभारंभ-अवसर पर उद्घाटन समारोह में बालकों, शिक्षकों के संस्कार से पूर्व दिया गया था। पूज्यवर कहते है, “भारतीय संस्कृति का शिक्षण करने वाला एक विश्वविद्यालय स्तर का तंत्र हम खड़ा करेंगे। कब करेंगे? आप देखिएगा, हम हो न हो, पर बीज बो रहे हैं। हमारे उत्तराधिकारी आने वाले दस-पंद्रह वर्षों में यह समग्र तंत्र तैयार कर देंगे। आपको इस संबंध में आशावादी होना चाहिए।” आगे वे कहते हैं, “आज हमें आई. ए. एस. की नहीं समाज को सुधारने वाले लोकसेवियों की जरूरत है। समाज को शानदार मनुष्यों की जरूरत हैं। स्वस्थ चिंतन करने वाले युवा रक्त की जरूरत है। इसीलिए स्कूलों-कॉलेजों की शिक्षण पद्धति में व्यापक क्राँति पैदा करने के लिए यहीं से वातावरण बनाते है।” (गुरुवार की धरोहर-भाग 2, पृष्ठ 80)
परिजन ध्यान दें। पूज्यवर के इस उद्बोधन में हममें से अधिकाँश थे, पर कभी सोचा भी न था कि उनका बोला ब्रह्मवाक्य इस तरह साकार होता चला जाएगा। जिन्हें विश्वास था, वे प्रतीक्षारत थे। जो काम की धकापेल में भूल गए थे, उन्हें ऋषिचेतना ने प्रेरित किया, उलाहना दिया, बेचैन कर दिया और अंततः इस निर्माण का एक ढाँचा थोड़ा विलंब से ही सही (पूज्यवर ने दस-पंद्रह वर्ष कहा था) आँवलखेड़ा की पूर्णाहुति 1995 के बाद बना, लगभग तीस एकड़ भूमि क्रय की गई एवं फिर 1999 में उन प्राणवान परिजनों के मध्य, संतों की उपस्थिति में भूमिपूजन (23 मई) हुआ। निर्माण आरंभ हुआ और क्रमशः एक महाविद्यालय सन् 21 में आरंभ कर दिया गया। सन् 2001 आते-आते दिसंबर के मध्य में एक अध्यादेश द्वारा उत्तराँचल सरकार ने इसे डीम्ड यूनिवर्सिटी का पद दे दिया। निर्माण अभी भी चालू है। प्रायः पंद्रह करोड़ रुपये खरच हो चुके, अभी इससे दस गुना और खर्च होना है। दो वर्षों में यह क्रमशः पूरा हो जाएगा। सारे भारत व विश्वभर के प्राणवानों-विद्वत्जनों, भावनाशीलों पर दृष्टि डाली जा रही है कि इस शुभारंभ के लिए कहाँ से व्यक्ति, कार्यकर्त्ता आएंगे। जीवन विद्या का प्रशिक्षण देना, संस्कृति के विज्ञानसम्मत पुनर्जीवन, शोध-अध्ययन का ढाँचा खड़ा करना कोई आसान कार्य नहीं। आज जब चिंतकों-मनीषियों, भावनाशील समर्पितों का अभाव चारों ओर दिखाई देता है, हमें ऋषिसत्ता पर विश्वास है। निश्चित ही प्रगतिशील चिंतन करने वाले दूरदर्शी इस आपत्तिकाल में कहीं-न-कहीं होंगे। वे आएँगे और गुरुकुल विद्यापीठ को एक आदर्श विद्यालय, इंटर कॉलेज, महाविद्यालय एवं हमारे अभी के महाविद्यालय को विश्वविद्यालय बनाने हेतु खप जाएँगे। सारे भारत के चार हजार शक्तिपीठों, प्रज्ञासंस्थानों में से हमने लगभग पाँच सौ चिह्नित कर लिए हैं, जिन्हें महाविद्यालय के रूप में विकसित किया जाएगा व इस विश्वविद्यालय से संबद्ध किया जाएगा। संस्कार देने वाली अनौपचारिक, किंतु सर्वांगपूर्ण शोधप्रधान, पर स्वावलंबी बना देने वाली, मात्र डिग्रीधारी नहीं, शिक्षण प्रक्रिया भी यहाँ से एक वर्ष में आरंभ हो जाएगी। ब्राह्मणोचित जीवन जीने वालों को एक ही सलाह दी जा रही है कि बेटों को बैरिस्टर बनाने और लड़की को कुबेर के घर भेजने का नशा हलका कर लें और औसत नागरिक की तरह निर्वाह कर अपना जीवन धन्य बनाने, अपनी संतानों को भी यहीं इसी विश्वविद्यालय का स्नातक बनाने में गौरव का अनुभव करें।
किसी के मन में यह संदेह हो कि कार्य तो आदर्श है, पर धन की पूर्ति बिना तो कार्य रुकेगा। यह स्पष्ट को जाना चाहिए कि आदर्शवाद को अपनाने वाले कभी घाटे में नहीं रहते। जिस प्रेरक शक्ति ने आज तक इस संस्था को पोषण दिया है, इसकी दैनंदिन आवश्यकता की पूर्ति की है, वही सत्ता श्रीमंतों को जगाएगी, उनके अधिकाधिक अंशदान दिलवाएगी, उन्हें प्रेरित करेगी कि वे समय नहीं दे सकते तो अपनी समृद्धि का एक अंश युगधर्म निर्वाह हेतु दें। लाखों भावनाशील परिजन अभी से अपनी कमाई का एक दिन का हिस्सा इस पुण्य प्रयोजन के लिए निकालने में लग गए हैं। प्रसन्नता का विषय है कि आयकर विभाग के प्रमुख तंत्र ने इस निमित्त दिए गए अनुदान पर सौ प्रतिशत छूट देने पर विचार किया है एवं पूरी संभावना है कि यह सारी प्रक्रिया अगला अंक आने तक पूरी हो जाए। गुरुवर कहा करते थे कि आसमान फाड़कर भी वह कार्य होकर रहेगा। किसी को भी इसमें संदेह नहीं करना चाहिए।
युगसंधि की पुनीत वेला में आपाद् धर्म से मुँह न मोड़कर, ऐसे विशेष समय को, जब देवता भी मनुष्यों से याचना करते हैं, पहचानकर सौभाग्यशाली आएँगे एवं युग के नवनिर्माण हेतु की जा रही इस स्थापना के नींव के पत्थर बनेंगे, यही आशा-अपेक्षा है।
युग संगीत अब बंगाली भाषा में भी उपलब्ध है। सभी परिवारी इसे बँगला भाषी कैसेट्स शाँतिकुँज एवं विस्तार पटल पर उपलब्ध हैं।
(1) अंतः के स्वर (भक्ति गीत) (2) अर्घ (गुरुदेव के प्रति) (3) आवाहन (प्रेरणा गीत)
शांतिकुंज, हरिद्वार
रुद्र का अभिषेक आओ! फिर करें। मुँडमाला में समर्पित सिर करें॥
सिरफिरों के सिर उतारे जा रहे अब। उन्हें काटे और छाँटे जा रहे अब। हम सिपाही विचारों की क्राँति के। श्रेष्ठ चिंतन को, नुकीला शर करें॥
आज बौद्धिक क्राँति ही बस चाहिए। सद्विचारों भरा तरकश चाहिए॥ चलो! जनमानस जगाने के लिए। प्रयासों में क्राँति का स्वर करें॥
अशिव से हैं ग्रसित व्यक्ति, समाज सब। कर सकेंगे मुक्त अब तो सदा शिव॥ सप्तक्राँति का बजाकर अब बिगुल। सृजन-सैनिक, तीव्र-क्राँति स्वर करें॥
हो सामाजिक क्राँति, नैतिक क्राँति से। मुक्ति दुर्व्यसनों कुरुढि, भ्राँति से॥ सदाचारी, मोरचों पर आ डटें। दुराचारी, गोल खुद विस्तार करें॥
तभी सार्थक हो कि शिव की साधना। लोकमंगल-साध्य की आराधना। लोकमंगल के लिए शिव-साधना। लोकसेवी समर्पित होकर करें॥
-मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’
*समाप्त*