धर्म के विस्तार एवं विविधता की खोज अनावश्यक है। आवश्यक है धर्म के तत्त्व की खोज, इसकी अनेकता में एकता की खोज, इसके परम सार की खोज। यह खोज जितनी अनिवार्य एवं पवित्र है, इसकी विधि उतनी ही रहस्यमय और आश्चर्यपूर्ण है। इसे न समझने वाले जीवन की भंवरों की भटकन में भटकते रहते हैं। धर्म को खोजते हुए स्वयं को खो देते हैं। क्योंकि वे धर्म के तत्त्व को नहीं उसके विस्तार एवं विविधता को खोजते हैं।
धर्म के तत्त्व की खोज तो स्वयं की खोज में पूरी होती है। स्वयं का सत्य मिलने पर धर्म अपने-आप ही मिल जाता है। यह तत्त्व शास्त्रों में नहीं है। शास्त्रों में तो जो है, वह केवल संकेत है। धर्म-ग्रन्थों में जो लिखा है, वह तो बस चन्द्रमा की ओर इशारा करती हुई अंगुली भर है। जो इस अंगुली को चन्द्रमा समझने की भूल करता है, वह अंगुली को तो थाम लेता है, पर चन्द्रमा को हमेशा के लिए खो देता है।
शास्त्रों की ही भाँति सम्प्रदाय भी है। धर्म का तत्त्व इन सम्प्रदायों में भी नहीं है। सम्प्रदाय तो संगठन है। ये सुव्यवस्थित रीति से केवल अपने मत का प्रचार करते हैं। बहुत हुआ तो धर्म की ओर रुचि पैदा करते हैं। अधिक से अधिक उसकी ओर उन्मुख कर देते हैं। धर्म का तत्त्व तो निज की अत्यन्त निजता में है। उसके लिए स्वयं के बाहर नहीं, भीतर चलना आवश्यक है।
धर्म का तत्त्व तो स्वयं की श्वाँस-श्वाँस में है। बस उसे उघाड़ने की दृष्टि नहीं है। धर्म का तत्त्व स्वयं के रक्त की प्रत्येक बूँद में है। बस उसे खोजने का साहस और संकल्प नहीं है। धर्म का तत्त्व तो सूर्य की भाँति स्पष्ट है, लेकिन उसे देखने के लिए आँख खोलने की हिम्मत तो जुटानी ही होगी।
धर्म का यही तत्त्व तो अपना सच्चा जीवन है। लेकिन इसकी अनुभूति तभी हो सकेगी, जब हम देह की कब्रों से बाहर निकल सकेंगे। दैहिक आसक्ति एवं भोग-विलास के आकर्षण से छुटकारा पा सकेंगे। यह परम सत्य है कि धर्म की यथार्थता जड़ता में नहीं चैतन्यता में है। इसलिए सोओ नहीं जागो और चलो। परन्तु चलने की दिशा बाहर की ओर नहीं अन्दर की ओर हो। अंतर्गमन ही धर्म के तत्त्व को खोजने और पाने का राजमार्ग है।
जीवन अनन्त प्रवाह है नदी की तीव्र जलधारा के समान। कठिनाइयों-अवरोधों को चीरकर बहना ही इसका धर्म है। यही रीति अपनाकर यह अपने सृजेता के संग पुनः तदाकार-एकाकार हो सकता है। जीवन जहाँ से उद्भव हुआ है उसी उद्गम बिन्दु पर मिल जाना, समर्पित-विसर्जित हो जाना चाहता है। यह इतना सहज-सरल नहीं है, इसलिए तो जीवन को रहस्यमय कहा गया है। इस रहस्य के आवरण में ही इसकी पूर्णता का महाआनन्द छुपा हुआ है। इसे केवल प्रचण्ड पुरुषार्थ द्वारा अर्जित किया जा सकता है।
जीवन एक यात्रा है। इसके अनेक पड़ाव हैं। जन्म-मरण रूपी इन पड़ावों में यह कुछ क्षण विराम लेता है, कुछ विश्राम करता है। बस फिर अगले पड़ाव, अगली मंजिल की ओर बढ़ लेता है। एक पड़ाव के बाद तुरन्त अगले पड़ाव की तैयारी होने लगती है। यूँ इन पड़ावों में मृत्यु भी है और जन्म भी। जन्म के बाद मृत्यु अवश्यंभावी है और मृत्यु के बाद नया जन्म। जीवन इन्हीं के बीच बढ़ता-विकसित होता रहता है। इसी में इसका अस्तित्त्व निर्भर है। इस क्रम में यह अनेक लम्बी-पतली सुरंगों, बीहड़ जंगलों, ऊँची-नीची घाटियों, मनोरम पर्वत-उपत्यिकाओं एवं सुन्दर वन-उपवनों से होकर गुजरता है।
जो जीवन की सुरंगों, जंगलों एवं दलदलों की वीभत्स एवं भीषण कठिनाइयों से घबराता-डरता नहीं तथा वन, उपवन एवं उद्यान के सौंदर्य से रीझकर रुकता नहीं वही श्रेष्ठ जीवन कहलाता है। संत, सिद्ध, महात्माओं का जीवन ऐसा ही होता है। यही जीवन ही वरेण्य होता है जो दिव्य गंगा की जलधारा के समान हिमालय के गर्भ से उत्पन्न होकर समुद्र के आँचल में समाये बगैर चैन नहीं लेता, थमता-रुकता एवं भटकता नहीं है।
जीवन की संरचना बड़ी ही जटिल एवं सूक्ष्म होती है। इसका अनेकों रहस्य अगम एवं अगोचर है। इसका दीखने वाला वर्तमान स्वरूप तो इनका मात्र एक अंश है। यह समुद्र में तैरते उस विशाल हिमखण्ड जैसा है जिसका केवल 10 प्रतिशत भाग ही दृश्यमान है शेष 90 प्रतिशत समुद्र के अन्दर समाया रहता है। हमारे जीवन का वर्तमान स्वरूप भी कुछ ऐसा ही है। इसके सभी अच्छे-बुरे संस्कार विगत जीवन की देन है। मुख्यतया अतीत ही वर्तमान जीवन का आधार है हालाँकि तप के महापुरुषार्थ द्वारा अपने वर्तमान क्षण का सदुपयोग करके इसे गढ़ा और संवारा जा सकता है। यदि हमारे जीवन की बुनियाद सच्चाई एवं ईमानदारी पर टिकी हो तो कोई कारण नहीं कि इसके श्रेष्ठ परिणाम जीवन में न उभरें-उछलें।
दार्शनिक दृष्टि जीवन को एक प्रवाह के रूप में स्वीकारती है। आज का जीवन कल की परछाई है। विगत कल के समस्त गुण-दोषों के बीज वर्तमान जीवन की उर्वर भूमि में पलते-बढ़ते एवं विकसित होते हैं। कल के कर्म आज परिणाम देते हैं। कल हमने जो किया है उन्हीं के भले-बुरे रूपों को इस जीवन में भोगना पड़ता है। आज जो करेंगे अनिवार्य रूप से उसे ही भविष्य में वरण करना पड़ेगा। जीवन की यह कड़वी सच्चाई है। यह एक यथार्थ है जिससे कोई भी मुँह मोड़ नहीं सकता। इसे अपनाना ही पड़ेगा। अतः आवश्यकता है वर्तमान जीवन के हरेक पल को प्रत्येक क्षण को सहेजने-संवारने और गढ़ने की। जीवन बहुमूल्य है। यह सृजेता की दिव्य धरोहर है। स्रष्टा का यह ऐसा बेशकीमती एवं दुर्लभ उपहार है, जिसे पाने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं। जरूरत है तो बस इस श्रेष्ठ मानव जीवन की महानता एवं महत्ता को हृदयंगम करने की, यह वर्तमान जीवन को सद्कर्मों में सुनियोजित करके ही सम्भव है।
जीवन की तमाम सफलताएँ-असफलताएँ, हानि-लाभ इसी बिन्दु पर निर्भर करते हैं। जिसने वर्तमान जीवन को पहचाना, समझा और छककर जीया वह धन्य हो गया। इसमें ऐसा अमृत रस भरा पड़ा है, जो अतीत की सभी कलुष-कालिमा को धो डालता है। इसमें सभी पाप-ताप के कालकूट धुल जाते हैं एवं दिव्यता का भाव उत्पन्न होता है। वर्तमान जीवन के मूल्य को पहचानकर एवं इसके पियूष रस को पीकर डाकू रत्नाकर झूम उठे थे। उनका क्रूर एवं निर्दयी हृदय पिघल गया था। उनके हाथों से खड्ग खिसककर लेखनी उठ गयी थी। वे भावना एवं संवेदना की साकार मूरत बन गये थे। उनका जीवन अतीत के खण्डहर से खड़ा हुआ और सुकोमल भावनाओं की ईंटों से भव्य बना। जहाँ पर सीता माता को आश्रय मिला। लव-कुश जैसे दिव्य बालकों का जन्म हुआ। यही नहीं वे स्वयं विश्ववंद्य महाकवि वाल्मीकि के नाम से विख्यात हुए थे। यह दृढ़ इच्छाशक्ति एवं प्रबल भावनाओं के संग वर्तमान जीवन को पहचान लेने का ही परिणाम था।
जीवन के इसी महान् क्षण को पहचाना था आतंक की प्रतीक प्रतिनिधि अंगुलीमाल ने। भगवान् बुद्ध की मर्मस्पर्शी एवं सजल करुणा तो एक माध्यम बनी थी। जीवन को बदलने एवं परिवर्तित करने का कार्य तो उन्होंने स्वयं ही किया था। कहते हैं सैकड़ों बुद्ध एवं हजारों ईसा मिलकर भी किसी के जीवन को नहीं बदल सकते जब तक कोई स्वयं अपने जीवन को बदलने की दृढ़ इच्छा शक्ति न रखता हो। अंगुलीमाल बदले। उनका पाषाण एवं चट्टान सा हृदय पिघला एवं उसमें से निर्ममता एवं निर्दयता के स्थान पर भावना, संवेदना, दया, करुणा का अजस्र प्रवाह फूट पड़ा था। इससे उनके अतीत जीवन का पाप पंक धुल गया था। और वे उज्ज्वल पुण्य पुरुष बन गये थे। उनके वर्तमान जीवन में असीम धैर्य उत्पन्न हो गया। तभी तो जिसे देखने मात्र से लोग काँपते एवं थरथराने लगते थे, उन्हीं ने सामान्य जनों से पत्थरों की मार झेली, निःशब्द प्रतिक्रियाहीन। क्योंकि वह जानते थे कि जो लोग कर रहे हैं कभी वह स्वयं भी जीवन को न पहचान पाने के कारण करते थे। अब स्वयं को पहचान कर वह स्वयं दुःख-सुख से परे हो गये, पाप-ताप से मुक्त हो गये और करुणावतार भगवान् बुद्ध के कृपा पात्र बन गये।
महाकवि वाल्मीकि एवं अंगुलीमाल ने जीवन के प्रवाह को महत्त्वपूर्ण मोड़ दिया था। मजबूत इरादे से अपने जीवन को नई दिशा दी थी। जीवन में दुर्गुणों के स्थान पर सद्गुणों को सम्मान दिया था। इन्हें अपनाया एवं अंगीकार किया था। सबसे बढ़कर बात यह थी कि उन्होंने अपने वर्तमान जीवन की नौका को आत्मानुसंधान की श्रेष्ठधारा में डाल दिया था। भले ही उनका प्रयास प्रारम्भ में छोटा था परन्तु इसे निभा ले जाने के बाद परिणाम अत्यन्त सुखद हुआ। अच्छे एवं महान् कहे जाने वाले सभी प्रयास पुरुषार्थ प्रारम्भ में छोटे होते हैं। अपने इस लघु रूप के कारण लोगों का उपहास एवं अपमान भी झेलते हैं लेकिन अपनी महान् सामर्थ्य के कारण इसे करने वालों का जीवन धन्य हुए बिना नहीं रहता। वे अपने साथ-साथ असंख्यों को जीवन की दिशाधारा को मोड़ने में सफल होते हैं।
नगण्य एवं नन्हा सा दिखने वाला बीज अंकुरित-विकसित होकर विराट् वृक्ष का रूप धारण करता है। इसमें कितने ही पक्षी-नीड़ बनाकर रहते हैं। जब छोटी सी कली खिलती है तो वातावरण में सुरभित सुमन की मुस्कान बिखर जाती है। भौंरे मण्डराने लगते हैं। लोग आकर्षित होते हैं तथा वह पुष्प देवों एवं दिव्य जनों का अलंकार-आभूषण बनता है। आँखों से न दिखने वाला छोटे से परमाणु के विस्फोट से इतनी असीम एवं प्रचण्ड ऊर्जा निकलती है कि समूचा विश्व क्षण भर में ही राख की ढेरी में बदल सकता है। इसके सदुपयोग से परमाणु भट्टी द्वारा बिजली का निर्माण भी किया जा सकता है, जिससे अनेकों कल कारखाने चलते हैं तथा दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। जीवन के नन्हें-नन्हें क्षणों में भी इसी तरह अपार सामर्थ्य शक्ति छुपी हुई है। चाहे तो इसका सदुपयोग कर लें या दुरुपयोग, यह अपने हाथों में है। जीवन प्रवाह के सदुपयोग से आसानी से महामानव, देवमानव बना जा सकता है। जीवन के हर क्षण का श्रेष्ठ सदुपयोग एवं समुचित सुनियोजन करके व्यक्ति नर से नारायण बन सकता है तथा अपार ऐश्वर्य-वैभव का अधिकारी हो सकता है। श्रेय, सम्मान, पद, प्रतिष्ठ अर्जित कर सकता है। कामना-वासना जन्य इच्छाओं और आकाँक्षाओं से जीवन की गति मंथर एवं अवरुद्ध हो जाती है जबकि प्रेम, दया, सेवा, सहकार जन्य उदात्तवृत्तियों से इसका प्रवाह तीव्र, तीव्रतर एवं तीव्रतम हो जाता है। और इस वर्तमान जीवन में ही अपने ईष्ट-लक्ष्य से मिलन-समर्पण का अनुभव बोध प्राप्त कर सकता है। जीवन का परमात्मा में विसर्जन-विलय ही सच्ची पूर्णता है। और यही जीवन की चरम एवं परम पुरुषार्थ है।
‘अहं ब्रह्मास्मि’ मैं ब्रह्म हूँ। इस अनुभूति में ईश्वर से एकात्मता की गई है, जो मन और बुद्धि से परे अगम, अगोचर है। यह मन के विचार तथा बुद्धि की कल्पनाओं की अवधारणा नहीं बल्कि अनुभूति का विषय है। यह साधनामय जीवन का अनुभव है जो सृष्टि के कण-कण में, पौधों एवं प्राणियों में लहराता-उफनता दृष्टिगोचर होता है। आवश्यकता है उस दृष्टि की जो जगत् में इसकी लीला को देख सके तथा अपने अन्तर में विद्यमान उस परम पुरुष परमात्मा को झाँक सके। समस्त जप, तप, साधना, स्वाध्याय, सेवा का मूल यही है कि स्वयं को परिष्कृत एवं परिमार्जित करे तथा उसके दिव्य स्वरूप का अनुभव प्राप्त करें।
परमात्मा सर्वव्यापी है। सृष्टि का कोई कण उसकी चैतन्य चेतना से वंचित नहीं है। अणु-परमाणुओं में जो गतिविधियाँ सम्पन्न कर रहे हैं, कण-कण में जो ज्ञान की परम एवं चरम अनुभूति भरी हुई है, वह परमात्मा का ही दिव्य स्वरूप है। अगर ऐसा नहीं होता तो प्रह्लाद को बचाने के लिए भगवान नृसिंह रूप धारण कर एक बेजान खम्भे से कैसे अवतरित होते? हवा, पानी, मिट्टी आदि पंच तत्व सब उसी के विभिन्न स्वरूप हैं। और इसलिए तो द्रौपदी की लाज बचाने के लिए भगवान कृष्ण शून्य से प्रकट हुए और उसके वस्त्र को इतना लम्बा कर दिया कि वह किसी भी तरह समाप्त नहीं हो सका। गजराज के आर्त पुकार से सुदर्शन चक्र का आविर्भाव यही कहानी कहता है कि परमात्मा सर्वव्यापी है। वह कभी भी और किसी में भी प्रकट हो सकता है।
सबमें व्याप्त वह ईश्वर है। वह परम सद्वस्तु भिन्न-भिन्न नहीं हो सकती। वह अपने सभी नाम, रूप, गुणों में एक ही है। अतः वैदिक ज्ञान की भाव भूमि में उसे ‘एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति’ के रूप में अलंकृत किया जाता है। इस सत्य का वैदिक ऋषि उद्घोष करते हैं- वही इन्द्र है, वही मित्र है, वही वरुण है, अग्नि वही है, दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान, यम भी वही है और मातरिश्वा के रूप में एक वही जाना जाता है। अनन्त रूपों, गुणों वाला वह ईश्वर अपने अन्तर में ही विद्यमान है। जो इसकी झलक-झाँकी पा लेता है, वही अनन्त ऐश्वर्य एवं वैभव रूपी ब्रह्मांड को जान-समझ लेता है। वेद ने इसी ऐश्वर्य के प्रतीक-प्रतिनिधि परमात्मा को जाना। वैदिक ऋषि इस ऐश्वर्य के प्रतीक-प्रतिनिधि परमात्मा की परमेश्वरी सत्ता को अपनी हृदय गुहा में अवस्थित मानता है। इसे पाने के लिए मंगल आदि ग्रहों पर कहीं यान भेजने की आवश्यकता नहीं बल्कि पुरातत्त्ववेत्ताओं एवं भूगर्भ- शास्त्रियों के समान अपने अन्दर ही उत्खनन एवं गहरी खुदाई करने की जरूरत है। इसलिए कहा जाता है कि खुदा बाहरी खोज से नहीं वरन् अपने अन्दर की खुदाई से ही प्राप्त किया जा सकता है।
अपना अन्तर प्रदेश काम, क्रोध, मोह की मोटी विषाक्त एवं मलिन परतों से आवृत्त है। यहाँ पर कामना का विप्लवी ज्वार उठता है। और कामनाएँ अनन्त हैं जो कभी पूरी नहीं होती। एक पूरी होने से पहले ही घात लगाये बैठी अनेक कामनाएँ उठ खड़ी होती हैं। इसमें बाँधा और व्यवधान आने पर जहरीले सर्प के समान फुँफकारता क्रोध उठ खड़ा होता है। इसकी लपलपाती लपटें इतनी भीषण होती हैं कि सभी को भस्मिभूत कर देना चाहती है। यह स्वयं को भी नहीं छोड़ता। समस्त मनोविकार यहीं से उद्भूत होते हैं और यही इसकी जड़ एवं मूल कारण है। इसी कारण परमात्मा का दिव्य धाम मनुष्य जीवन शान्ति एवं प्रेम के पावन गुणों से वंचित रहता है और इसके बदले लोभ का गहरा दलदल पसरा रहता है। यह तीव्र दुर्गन्धयुक्त होता है और मनुष्य अपना दैवी स्वरूप भूलकर इसी में लोटता रहता है। नश्वर वस्तु का लोभ, पद-प्रतिष्ठ का लोभ और न जाने कितने अन्तहीन लोभ सताते रहते हैं। और फिर अपने ही मोहपाश में जकड़ा यह जीव इतने बंधनों में बंध जाता है कि इसे फिर से चौरासी लाख योनि के चक्र में भ्रमण करना पड़ता है। और वह इसी में बारम्बार भटकता रहता है।
अन्तर प्रदेश की इसी कंटीली-पथरीली बंजर भूमि की खुदाई जरूरी है। खुदाई एक अनिवार्य शर्त है। इस शर्त की पूर्ति के बिना वह नीलमणि ज्योति, वह परमेष्ठी पुरुष भला कैसे दिखाई दे? हाँ खुदाई एवं जुताई का तरीका भिन्न-भिन्न हो सकता है। कोई विश्वामित्र, अगस्त्य के समान तप का हल चलाता है, कोई शंकराचार्य के सदृश ज्ञान का फावड़ा उठाता है, तो कोई स्वामी विवेकानन्द के समान नव्य वेदान्त का कुदाल पकड़ता है। मीराबाई और चैतन्य के प्रबल प्रेम, ध्यानयोगी भगवान् बुद्ध के निष्कम्प ध्यान, महायोगी श्री अरविन्द एवं रमण महर्षि की प्रचण्ड योग साधना जैसे अस्त्र-शस्त्रों एवं साधनों के द्वारा भी अपने अन्तर प्रदेश को परिष्कृत एवं परिमार्जित किया जाता है।
अन्तःकरण की पवित्रता दुर्गुणों को त्यागने से होती है। जब असह्य दुष्प्रवृत्तियों से हृदय का भार हल्का हो जाता है तो प्रभु का प्रकाश बिखरने लगता है। यह ज्योतिर्मय प्रकाश सद्गुणों के रूप में ज्योतित होता है। हृदय में सद्गुणों के बढ़ने से ही उसके दिव्यत्व का अनुभव होता है क्योंकि ईश्वर सद्गुणों का समुच्चय है, श्रेष्ठ आदर्शों का समन्वय है। फिर हृदय के गुहा में परमात्मा का सतत अनुभव होने लगता है। यह पवित्र स्थल प्रभु का डाक बंगला बन जाता है। और ‘तत्त्वमसि’ जो तुम हो वह मैं हूँ, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ मैं ही ब्रह्म हूँ का अलौकिक अनुभव होने लगता है। इस अव्यक्त अनुभव के होते ही, उसका दिव्य दर्शन करते ही दृष्टि व्यापक हो जाती है एवं देखने का नजरिया बदल जाता है। फिर वह सृष्टि के कण-कण में जगत् के घट-घट में और समस्त जड़-चेतन, में एकमात्र वही मचलता-इठलाता दिखाई देता है। और ब्रह्ममय सृष्टि का बोध हो जाता है। इसी विराट् अनुभवबोध को प्राप्त कर ही उपनिषद् का ऋषि कह उठा था- यही ब्रह्म है। विशाल एवं अनन्त ब्रह्मांड में बस उसी की चेतना लहराती दृष्टिगोचर होती है।
इस सत्य को साक्षात्कार करने वाला अनुभव करता है कि आत्मा केवल इन्सान के काय-कलेवर में ही सीमित नहीं है बल्कि सृष्टि के सभी पदार्थों, सूर्य, चन्द्र एवं पार्थिव जगत् में भी एक चेतन तत्त्व व्याप्त है। इस विश्व में व्याप्त वही चेतन आत्मा ब्रह्म है। इसके परे और कुछ नहीं। समूची दुनिया में वही एक सक्रिय तत्त्व है। और फिर भी वह सबसे शान्त और अचल है। प्रकृति की सभी शक्ति में और कण-कण में विद्यमान है। संसार के सारे काम उसकी इच्छा से सम्पादित होते हैं। उसकी इच्छा के बिना पत्ता तक नहीं खड़कता। वही प्राणी मात्र की आत्मा है। जब यह उदात्त दृष्टि प्राप्त हो जाती है तो ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का स्वर उद्घोषित होता है।
इसी विशाल दृष्टिकोण के कारण ही उपनिषद् के ऋषि कहते हैं- तृण से लेकर पर्वत तक, चींटी से हाथी तक हे प्रभु! जब सभी में एक तू ही विद्यमान है तो मैं किसे अपना कहूँ और किसे पराया। न पराये का भेद है और न अपनों का मोह है। सभी में तू ही तू झलकता है। औरों की मुख से मेरे लिये निकलने वाली अपमान, तिरस्कार एवं अपशब्द भी तेरी ही वाणी है और तू ही इसका शमन करने वाला है। इसलिए तो डसने के लिए आ रहे काल सर्प को देख मीरा भयग्रस्त नहीं हुई।
किसी पीड़ित को पीड़ा से कराहते पीड़ित को देख वह भी कराह उठता है। इसी भाव अनुभूति के कारण रामकृष्ण परमहंस ने एक बैलगाड़ी हाँकने वाले को जब बैल को कोड़े मारते देखा तो पीड़ा से कराह उठे। उनकी पीठ पर कोड़े के निशान पड़ गये और उससे रक्त बह निकला। इन्होंने जन सेवा को शिव की आराधना मानकर कहा है हर व्यक्ति, हर जीव परमात्मा है, ऐसा समझकर ही उसकी सेवा करो। और जब यह सेवा हमारे जीवन में आराधना बन जाएगी तो अहंकार विगलित हो जाएगा। अहंकार को गलाने के लिए निष्काम सेवा भाव एकमात्र उपाय है। अहंकारमुक्त पुरुष आकाश पुरुष बन जाता है। और वह वैदिक ऋषि के समान ‘अहं ब्रह्मास्मि’ तथा उपनिषद्कार के सदृश विराट् ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।
अर्हत एकुदान जंगल में रहते थे। वृक्ष-वनस्पतियाँ, पर्वत-झरने यही उनके साथी थे। वन की देव शक्तियाँ वनदेवी-वन देवता उनके आत्मीय सखा थे। उनके जीवन का एक ही सत्य था- ‘बुद्धं शरणं गच्छामि।’ इसी का चिन्तन करते हुए वह ध्यानस्थ हो जाते। इसी सूत्र वाक्य का वह उपदेश करते। अपने इस जीवन मंत्र के अलावा अन्य कोई बात उनको आती ही नहीं थी। हालाँकि इसे कहते हुए उनके जीवन का समाधि सुख छलक उठता था। वह एक अनोखे अहोभाव से भर उठते थे। इस एक वाक्य को बोलते हुए उनकी अन्तर्चेतना में अनेकों अलौकिक रंग निखर उठते थे। पर वह बोलते बस एक ही वाक्य थे- बुद्धं शरणं गच्छामि।
उधर जंगल से जो भी गुजरता उन्हें रोज एक ही उपदेश कहते हुए सुनता। एक ही वाक्य में रोज-रोज भला किसको रस आता। इसलिए कोई उनके पास टिकता न था। अपने वन कुटीर में भिक्षु एकुदान अकेले वक्ता थे, श्रोता भी वही अकेले होते। दूसरा कोई होता भी तो कैसे? किसी भी तरह कोई आ भी जाता तो भाग जाता। रोज वही उपदेश शब्दशः वही। उसमें कभी भेद ही नहीं पड़ता था। शायद उन्हें इसके अलावा और कुछ आता भी नहीं था।
लेकिन वह अपने इस एक जीवन सत्य को जब भी कहते पूरे जंगल में एक अनोखा समाँ छा जाता। वृक्ष-वनस्पतियाँ, पर्वत-निर्झर सभी एक अलौकिक चेतना से तरंगित हो उठते। वन देवी- वन देवता उन्हें साधुवाद देते। सारा जंगल गुँजायमान हो जाता था, साधु! साधु! धन्यवाद! धन्यवाद! एक अनोखी छटा - एक अलौकिक जीवन्तता सब ओर छा जाती।
एक दिन उसी जंगल में पाँच-पाँच सौ शिष्यों के साथ दो त्रिपटकधारी भिक्षु आए। उनके अगाध पाण्डित्य की सब ओर ख्याति थी। अर्हत एकुदान उनके आगमन से बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उन सबका हार्दिक सत्कार किया और बोले, भंते, बहुत अच्छा हुआ जो आप पधारे। मैं तो निपट गंवार हूँ, मुझे कुछ ज्ञान नहीं है। बस एक बात मुझे समझ में आयी है, उसी का रोज उपदेश करता हूँ। और कोई तो सुनता नहीं, बस जंगल के देवता दयावश उसे सुनते हैं, और साधुवाद देते हैं। हालाँकि वे भी उसे सुन-सुनकर थक गए होंगे। यह उनका मुझ बूढ़े पर अनुग्रह ही है कि वे मेरी एक ही बात को बार-बार सुनकर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं।
आप दोनों ही महाज्ञानी हैं। त्रिपटक आपको कण्ठस्थ हैं। आपके ज्ञान की महिमा से आकर्षित होकर ही आप के पाँच-पाँच सौ शिष्य हैं। मुझे कुछ आता ही नहीं है- इसीलिए मेरा एक भी शिष्य नहीं है। भला एक ही उपदेश देना हो तो कोई शिष्य बनेगा ही क्यों? वे त्रिपटकधारी दोनों महापण्डित अर्हत एकुदान की बातें सुनकर एक दूसरे की तरफ अर्थगर्भित दृष्टियों से देखते हुए मुस्कराए। उनकी आँखों में पाण्डित्य का अभिमान छलक रहा था।
उन दोनों ने ही सोचा, यह बेचारा बूढ़ा अकेले रहते-रहते एकदम पागल हो गया है। अकेलेपन के कारण इसे विक्षिप्तता ने घेर लिया है। अन्यथा कोई एक ही उपदेश रोज-रोज देता है? अपनी विक्षिप्तता के कारण ही यह कहता है कि इसका उपदेश जंगल के देवता सुनते हैं, और साधुवाद देते हैं। अरे, कहाँ के देवता। भला देवता भी कहीं किसी का उपदेश सुनने आते हैं। जब हम दोनों जैसे ज्ञानी पण्डितों का उपदेश सुनने के लिए वे आज तक नहीं आए। तब इन मूर्ख की वही एक तोता रटन्त सुनने के लिए भला वे क्या आएँगे। बेचारा, वृद्ध! अपने बुढ़ापे के कारण यह परेशान है। और इसी विक्षिप्तता एवं परेशानी के कारण इसका मन परेशानी से भर गया है। कोई बात नहीं, चलो आज बताएँगे इसको कि उपदेश क्या होता है? कुछ क्षणों में ही उन दोनों महापण्डितों ने इतनी सारी बातें सोच डाली। पर प्रत्यक्ष में उन्होंने एकुदान की आयु का ख्याल करते हुए बड़ी शालीनता से कहा- भन्ते! हम दोनों को ही आपका प्रस्ताव स्वीकार है। मेरे उपदेश से आपको भी यथार्थ का बोध पाने में मदद मिलेगी।
आप दोनों महाज्ञानियों की इस कृपा से कृतार्थ हुआ भन्ते। भिक्षु एकुदान का हृदय कृतज्ञता के भावों से ओत-प्रोत हो गया। उसने बड़े प्रेम और परिश्रम से उनके प्रवचन का इन्तजाम किया। महापण्डितों के बैठने के लिए धर्मासन की व्यवस्था की। आज वह स्वयं को कृतकृत्य मान रहा था कि उसे इतनी पाण्डित्यपूर्ण वाणी सुनने को मिलेगी।
हुआ भी वही। धर्मासन पर बैठकर उन दोनों ने बारी-बारी से उपदेश दिया। वे बड़े पण्डित थे, त्रिपटक के ज्ञाता थे। बुद्ध के सारे वचन उन्हें कण्ठस्थ थे। हमेशा ही वे अपने प्रशंसकों और शिष्यों से घिरे रहते थे। पाँच सौ शिष्यों की मण्डली सदा ही उनकी सेवा के लिए तैयार और तत्पर रहती थी। उन पण्डितों ने एक-एक करके उपदेश दिया। उपदेश से पहले शिष्यों ने उनकी विद्वता एवं प्रभुता का परिचय दिया। यह बताया कि समाज में उनका कितना प्रभाव है। कितने लोग उनकी जय-जयकार करते हैं। कितने देशों का उन्होंने भ्रमण किया है। कितनी उपाधियाँ एवं प्रमाण पत्र उन्हें मिले हैं। राजन्यवर्ग उनका कितना सम्मान करता है।
इस परिचय के बाद शिष्यों ने साज और संगीत के साथ गीत गाया। कुल मिलाकर प्रवचन की प्रस्तुति को प्रभावी बनाने की कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। प्रवचन हुआ, शास्त्र सम्मत, पाण्डित्य से भरपूर, तर्क से प्रतिष्ठित। शिष्यों ने हर्षध्वनि की- साधु! साधु! वृद्ध भिक्षु एकुदान भी परम आनन्दित हुए। उन्होंने भी सराहना की। बस एक बात उन्हें खटक रही थी कि आज वन की देवशक्तियों ने कुछ नहीं कहा। जंगल के देवता कुछ भी नहीं बोले। वन देवी- वन देवता चुप थे सो चुप ही रहे। उन्होंने यह बात पण्डितों को भी कही कि बात क्या है? आज जंगल के देवता चुप क्यों हैं? इनको क्या हो गया? आज ये कहाँ चले गए? ये रोज मेरा उपदेश सुनते हैं तो पूरा जंगल इनके साधुवाद से भर जाता है। और आज ऐसा परम उपदेश हुआ, ऐसा ज्ञान से भरा। फिर भी ये सब मौन हैं, आखिर बात क्या है?
वे दोनों महापण्डितों ने वृद्ध एकुदान की इन बातों को फिर से उनकी विक्षिप्तता से उपजा पागलपन समझा। उन दोनों ने सोचा एक तो हमने महानगरों में लाखों की भीड़ की जगह यहाँ जंगल में प्रवचन देने की कृपा की। इसके ऊपर इतना बड़ा अहसान किया। पर ये है कि मेरा अनुग्रह मानने के स्थान पर कहता है कि जंगल के देवता नहीं बोले। पर प्रकट में उन दोनों ने यही कहा, भन्ते अच्छा यही है, आप अपना उपदेश करें। हम दोनों को भी सुनने का अवसर मिलेगा। साथ ही जंगल के देवताओं की वाणी भी हमें सुनने को मिल जाएगी। उन्होंने ये बात एक तरह से मजाक में ही कही। उन्होंने सोचा तो यही कि वैसे भी इस बूढ़े गंवार को कुछ आता-जाता नहीं। बस इसकी एक बात सुनकर छुट्टी मिल जाएगी।
साधे-सरल वृद्ध एकुदान ने उन पण्डितों के मजाक को उनका आग्रह समझा। और बड़े ही संकोच से धर्मासन पर चढ़े। फिर बड़ी विनम्रता से उपस्थित जनों को प्रणाम किया। सभी देवशक्तियों की अभ्यर्थना करके अपने आराध्य भगवान् बुद्ध को सिर नवाया। फिर हृदय की गहराइयों से- समूचे मन-प्राण से कहा- ‘बुद्धं शरणं गच्छामि।’ इसी के साथ वे गहरी भाव समाधि में डूब गए। उनके मुख मण्डल पर सम्बोधि की आभा छलकने लगी। उनके अस्तित्त्व का कण-कण रोमाँचित हो उठा। उपस्थित जनों पर भी उनकी इस अनुभूति के अमृत कलश से कुछ बूँदें छलक पड़ी। समूचे जंगल से साधु! साधु! का अपूर्व निनाद गूँज उठा। जैसे वृक्ष-वृक्ष से आवाज उठी। पत्थर-पत्थर से आवाज उठी- जंगल के सारे देवता मुखरित हो उठे। सारा धर्मासन उनके द्वारा की गयी अलौकिक पुष्पवृष्टि से भर उठा।
अब तो दोनों महापण्डित बड़े हैरान हुए। वे सोचने लगे, तो यह बूढ़ा पागल नहीं है। देवता सचमुच में ही हैं। पर क्या देवता पागल हैं? क्योंकि ऐसा कहा क्या इसने, बस एक साधारण सा वाक्य- बुद्ध शरणं गच्छामि। क्या धरा है इसमें? कोई कह सकता है- कभी कह सकता है- कहीं कह सकता है। पण्डितों ने अपने दम्भ में यह भी सोच डाला कि ये देवता जंगल के हैं, जंगली होंगे, नासमझ होंगे। जरूर इन्हें मेरा प्रवचन समझ में नहीं आया होगा। ऐसी ही अनेकों तरह की कल्पना-जल्पना करते वे चले गए।
उन दिनों बुद्ध संघ में यह घटना बड़ी प्रचारित हुई। पर कोई भी इसका ठीक भेद न जान पाया। भगवान के शिष्य महाकाश्यप ने भगवान से यह कथा कही- और इसके भेद को स्पष्ट करने की प्रार्थना की। बुद्ध मुस्कराए- उन्होंने कहा, वत्स महाकाश्यप! एकुदान ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ का मर्म जान चुके हैं। वह क्षीणास्रव हो चुके हैं। महाकाश्यप ने विनम्रता से पूछा- भगवान् क्षीणास्रव होना क्या है? बुद्ध बोले- चार आस्रव होते हैं। पहला है- कामास्रव। इसके क्षीण होने का मतलब है अब कुछ पाने की कामना नहीं रही। सारी चाहतें मिट गयीं। अब नाम, धन, यश, पद या कुछ और पाने की धुन नहीं है। दूसरा आस्रव है- भवास्रव, यानि कि स्वर्ग, मोक्ष या फिर अगले अच्छे जीवन की कामना। इसके क्षीण होने का मतलब है- जीवेषणा गिर गयी। लौकिक ही नहीं अलौकिक चाहतें भी मिट गयीं।
इसे समझाते हुए भगवान तथागत ने कहा- भन्ते, तीसरा आस्रव है- दृष्टस्रव। यानि दृष्टि, शास्त्र एवं सिद्धान्त से आसक्ति। इसके क्षीण होने का अर्थ है, जाति, धर्म, कुल, देश, शास्त्र या सिद्धान्त से मोह टूट जाना। संकुचित दृष्टि का व्यापक हो जाना। और चौथा आस्रव है- अविद्यास्राव- मैं हूँ। इसकी क्षीणता का अर्थ है- मैं पन का गिर जाना। सारी सीमाओं का समाप्त हो जाना, असीम हो जाना।
महाकाश्यप सुन रहे थे, भगवान के वचनों को। भगवान ने आगे हृदयस्पर्शी स्वरों में कहा- भिक्षु एकुदान के ये चारों ही आस्रव क्षीण हो चुके हैं। वे अब क्षीणास्रव हैं। यह कहते-कहते अन्तर्यामी भगवान ने महाकाश्यप की अगली जिज्ञासा जान ली। वह हल्के से हंसे फिर बोले- बुद्धं शरणं गच्छामि। भिक्षु एकुदान के लिए यह वाक्य नहीं अनुभूति है। उन्होंने सचमुच ही बुद्ध की बुद्धत्व की शरण पा ली है। वह बुद्धत्व की धारा में निमग्न हो चुके हैं। उनके लिए यह वाक्य शास्त्र वचन नहीं, समाधि सत्य है। इसके उच्चारण के साथ ही वह बुद्धत्व से एकात्म होते हैं। उनकी अनुभूति के पलों को निहार कर देवता धन्य होते हैं। उन्हें साधुवाद देते हैं।
अपनी बात को समझाते हुए भगवान ने यह धम्म गाथा कही-
न तेन पंडितो होति होति यावता बहु भासति। खेमी अवेरी अभयो पंडितोति यवुच्चति॥
हे भिक्षुओं! बहुत भाषण करने से कोई पंडित नहीं होता। बल्कि जो क्षेमवान, अवैरी और निर्भय होता है, वही पंडित है।
महाकाश्यप सहित सभी भिक्षु शान्त थे। भगवान कह रहे थे- ‘सत्य शास्त्र में नहीं है। सत्य शब्द में भी नहीं है, सत्य तथाकथित बौद्धिक ज्ञान में भी नहीं है, सत्य है अनुभव। और अनुभव शून्य में प्रकट होता है, मौन और आन्तरिक एकान्त में प्रकट होता है। वैसे जीवन्त अनुभव की अभिव्यक्ति पर सारा अस्तित्त्व आच्छादित होता है। ऐसे में देवताओं का प्रसन्न होकर साधुवाद देना स्वाभाविक है।’ ऐसा कहकर भगवान मौन में डूब गए। महाकाश्यप सहित अन्य भिक्षु भगवान के द्वारा कहे गए वचनों का मनन करने की चेष्टा करने लगे।
उन दिनों शिक्षार्थी विद्याशुल्क जमा नहीं करते थे, पर साथ ही इतने कृतघ्न भी नहीं थे कि जिस आश्रम में लंबी अवधि तक रहकर ज्ञान और निर्वाह प्राप्त किया, वे उसका ऋण न चुकाते। लौटने पर छात्र गुरुकुल का स्मरण रखते और अपनी कमाई का अंश नियमित रूप से भेजते। शिक्षासत्र पूर्ण होने पर शिष्य गुरु से उनकी आवश्यकताएँ पूछते और उनकी पूर्ति का संकल्प लेकर वापस लौटते। उस दिन विरजानंद के गुरुकुल से विद्याध्ययन के उपराँत दयानंद चलने लगे, तो चर्चा उस संबंध में हुई कि गुरु आकाँक्षा की एक आवश्यकता की पूर्ति के लिए उन्हें क्या करना है। ब्रह्मचारी दयानंद की प्रतिभा से विरजानंद प्रभावित थे। उनने कहा कि सामान्य लोगों की तरह न जीकर तुम समय के कुप्रभाव को उलटने में लग सको, तो कितना अच्छा हो। शिष्य ने गुरु इच्छा पर अपनी इच्छा निछावर कर दी और उसी दिन संन्यास लेकर समाज-सुधार के कार्यों में, विश्व संस्कृति के उत्थान में निरत हो गए।
संसार की पहेली अबूझ है और इसका रहस्य अगम। इसकी घटनाओं की कड़ियाँ जटिल एवं उलझी हुई प्रतीत होती है। इन कड़ियों में कोई तारतम्य एवं सामंजस्य न दिखाई पड़ने के कारण ही इसे संयोग मानकर संतोष कर लिया जाता है। एक ही दिन, तिथि एवं तारीख का यह संयोग आश्चर्यजनक एवं अद्भुत लगता है। जो भी हो संसार का यह संयोग है बड़ा ही रोचक एवं विचित्र।
संयोगों की यही सृष्टि शास्त्री जी के जीवन में देखने को मिलती है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के जीवन में मंगलवार का दिन ऐसे ही संयोगों से भरा रहा है। यह दिन उनके जीवन के महत्त्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी बना। मंगलवार के दिन ही वे बाल्यावस्था में प्रयाग के संगम में डूबने से बचे थे। अन्ततः यही दिन उनके जीवन का अन्तिम दिन सिद्ध हुआ। ताशकन्द वार्ता के दौरान जब उनकी मृत्यु हुई तो वह दिन भी मंगलवार ही था। इन दो दुःखद घटनाओं के अलावा इस दिन उनके लिए बड़े ही महत्त्वपूर्ण एवं शुभ कार्य भी हुए। उन्होंने देश की प्रधानमंत्री की शपथ इसी दिन ग्रहण की। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने उन्हें मंगलवार को ही ‘भारत रत्न’ के रूप में देश का सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया। इन महत्त्वपूर्ण घटनाओं के अलावा सन् 1947 में उत्तरप्रदेश पार्लियामेण्डरी बोर्ड के मंत्री, 1951 में पुलिस एवं यातायात मंत्री, 1952 में काँग्रेस का महासचिव, 1957 में केन्द्रीय रेलमंत्री, परिवहन मंत्री आदि के प्रतिष्ठित पद उन्होंने मंगलवार के दिन ही ग्रहण किए थे।
लाल बहादुर शास्त्री के लिए मंगलवार का दिन एक अद्भुत संयोग बना। इस दिन उनके जीवन में कई और महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटी। संयोग की ऐसी ही अन्य अनेक कथा गाथाएँ अमेरिकी राष्ट्रपतियों के जीवन एवं शासन से भी सम्बन्धित रही हैं। अमेरिकी इतिहास के 160 वर्षों में एक विचित्र संयोग दृष्टिगोचर होता है। इस अवधि में प्रति बीस वर्ष में अमेरिकी राष्ट्रपति का निधन अपने ही कार्यकाल में हुआ। विलियम हैरीसन, अब्राहम लिंकन, गारफील्ड, हार्डिंग, फ्रेंकलिन रुजवेल्ट तथा जान.एफ. कैनेडी ऐसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति थे जो अपने शासन काल के दौरान मारे गए या उनकी स्वाभाविक मृत्यु अपने ही कार्य काल में हुई। इसी प्रकार 1860, 1900, 1940 में चुने गये सभी राष्ट्रपतियों की अपने कार्यकाल की अवधि में ही मौत हो गई। यह भी एक अजीब संयोग है कि वे सभी राष्ट्रपति अपनी दूसरी बार शासन सँभाल रहे थे। हालाँकि रीगन, जार्जबुश, बिल क्लिंटन आदि इसके कुछ अपवाद भी हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपतियों की यह कथा यहीं समाप्त नहीं हो जाती बल्कि इससे और भी अनेक किम्वदन्तियाँ एवं घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। ऐसी ही संयोगपूर्ण घटना का सामंजस्य जान एफ. कैनेडी और अब्राहम लिंकन के जीवन क्रम में दिखाई देता है। जान विशप ने इन दोनों राष्ट्रपतियों का तुलनात्मक अध्ययन-अनुसंधान करके बड़े ही रोचक तथ्य प्रस्तुत किये हैं। यहाँ तक कि इनके अद्भुत संयोग के कारण इन्हें एक ही आत्मा का विकास क्रम सिद्ध किया है। अर्थात् अब्राहम लिंकन ने ही जान एफ. कैनेडी के रूप में नया शरीर धारण किया था।
जान विशप के अनुसार लिंकन और कैनेडी चालीस वर्ष की आयु में राष्ट्रपति बने। लिंकन ने 1861 में अमेरिका के राष्ट्रपति के पद को सुशोभित किया था और कैनेडी 1961 में राष्ट्रपति ने। लिंकन की प्रथम पत्नी फैशनपरस्त थी और कविता व पेंटिग्स में विशेष रुचि रखती थी। ठीक इसी प्रकार रुचि एवं रुझान कैनेडी की पत्नी में भी थी। लिंकन के चार बच्चे थे, दो मर गए और अन्य दो उनके साथ रहते थे। कैनेडी के भी चार पुत्र हुए, दो भगवान् को प्यारे हो गए और दो जीवित रहे। भोजन में स्पार्श दोनों को प्रिय एवं पसंद था। लिंकन के निजी सचिव का नाम था कैनेडी और कैनेडी के निजी सचिव का नाम लिंकन था। दोनों की आस्था धार्मिकता की ओर थी। लिंकन और कैनेडी दोनों ही विश्व शाँति के प्रबल समर्थक रहे तथा नीग्रो स्वतंत्रता के पक्षधर थे। दोनोँ ही गोली के शिकार हुए और शुक्रवार के दिन उनकी मृत्यु हुई। और विचित्र बात यह है कि जॉनसन नामक उपराष्ट्रपतियों ने दोनों का पद भार संभाला था।
लिंकन और कैनेडी के जीवन की यह घटना दो अलग-अलग समय की अद्भुत पुनरावृत्ति थी। परन्तु एक ही जीवन काल में दो भिन्न व्यक्तियों के बीच यह तारतम्य अत्यन्त आश्चर्य पैदा करता है। ऐसा ही संयोग आयरलैण्ड के क्रुक हैवेन शहर में एक ही मकान में रहने वाले दो दम्पत्तियों की दो संतानों में भी दिखाई पड़ा। इन दो दम्पत्तियों के घर में एक ही दिन कुछ क्षणों के अन्तराल में दो पुत्रों का जन्म हुआ। उनका नाम रखा गया एलेनर गैडी तथा पैट्रिक। दोनों बच्चे बड़े होने पर दो भिन्न-भिन्न स्थानों पर खेलते तथा पढ़ते थे। एक दिन खेल के दौरान एलेनर के पैर में चोट लग गयी। हैरानी की बात थी कि पैट्रिक को भी ठीक इसी स्थान पर चोट का निशान देखा गया जबकि वह एक अलग स्थान पर खेल रहा था। इन दोनों को परीक्षाओं में भी हमेशा एक समान अंक प्राप्त होते थे। दोनों का विवाह भी एक ही दिन एक साथ हुए। उनकी सन्तानें भी एक दिन विशेष को पैदा हुई। एलेनर और पैट्रिक 96 वर्ष की आयु में एक ही दिन एक साथ बीमार हुए और दोनों एक ही साथ परलोक सिधार गए।
अंक, ज्योतिष एवं गणित आदि के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कारक है। पर यह व्यक्ति विशेष के जीवन में भी एक अद्भुत पहेली बनकर आता है। ऐसी ही पहेली जर्मनी के शासक चार्ल्स चौथे के जीवन में परिलक्षित हुई। चार्ल्स चौथे के जीवन में चार का अंक बड़ा ही संयोगपूर्ण रहा है। वे चार रंग की पोशाक को चार बार पहनते थे। चार प्रकार का भोजन चार टेबल पर बैठकर चार बार करते थे। उन्हें चार प्रकार की शराब पीने का शौक था। उनकी बग्घी में चार पहिये थे और चार घोड़े जोते जाते थे। उनके चार आलीशान महल थे। उनमें चार-चार दरवाजे और प्रत्येक महल में चार-चार कमरे, प्रत्येक कमरे में चार-चार ही खिड़कियाँ थीं। चार के इस विचित्र अंक ने उनको अन्त समय तक नहीं छोड़ा। चाल्स चौथे ने मृत्यु के समय चार बार अलविदा कहा और चार बजकर चार मिनट पर ही अपना शरीर छोड़ा। इस समय उनके पास चार डॉक्टर उपस्थित थे।
अद्भुत है यह अंकों की घटना। आयरलैण्ड स्थित डबलिन निवासी एण्टनी क्लैंसी के जीवन में सात की संख्या चमत्कारिक रही है। एलेन वान नामक एक लेखक इस चमत्कार से इतने अभिभूत हो उठे कि उन्होंने ‘इक्रोडिबील कोइंसीडेन्स’ नामक कृति की रचना कर डाली। इस ग्रंथ में उन्होंने क्लैंसी के जीवन का भी उल्लेख किया है जिसे सात संख्या के प्रति अत्यन्त लगाव पैदा हो गया था। इस संदर्भ में क्लैंसी का कहना था कि सप्ताह के सातवें दिन, महीने की सातवीं तारीख, वर्ष के सातवें महीने और इस सदी के सातवें वर्ष में मेरा जन्म हुआ। मैं अपने माता-पिता की सातवीं सन्तान हूँ। यहाँ तक कि मेरे पिता भी अपने अभिभावक के सातवें पुत्र थे। अपनी सातवीं वर्षगाँठ पर सातवीं घुड़दौड़ में मैंने सात नम्बर का घोड़ा चुना और उसका नाम था सातवाँ बहिश्त। मैंने उस घोड़े पर सात शिलिंग लगाये। रेस में भी उसका सातवाँ नम्बर था।
संख्याओं का यह खेल बड़ा विचित्र है एवं इनका संयोग अबूझ। संयोग का यह क्रम साइप्रस के शासक मलरिआस के जीवन में भी अनूठा रहा। उसके जीवन में तेरह के अंग ने अनेकों आश्चर्य पैदा किए। 10 अगस्त 1913 को उनका जन्म हुआ। 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने चर्च में प्रवेश किया। 13 नवम्बर 1946 में उन्होंने प्रीस्ट की दीक्षा ली। 13 जून 1948 में वे विशप बने तथा सिंहासन पर आरुढ़ हुए। 13 मार्च 1951 में यूनान के महाराज ने उनका अभिनन्दन किया। 13 दिसम्बर 1959 को वह राष्ट्रपति चुने गये। इस प्रकार 13 का अंक उनके जीवन में सौभाग्य सूर्य बनकर उदय हुआ था।
डेनबरा कोलराडो के धनाढ्य उद्योगपति शैरमेन के जीवन में भी 13 की संख्या विचित्र संयोगपूर्ण रही। शैरमेन का जन्म 13 तारीख को हुआ। इसी तारीख को उनकी सगाई हुई और विवाह भी सम्पन्न हुआ। जिनसे उनका विवाह हुआ उनका जन्म भी 13 तारीख को ही हुआ था। उनके विवाह में कुल 13 लोग शामिल हुए थे।
13 का यही अंक डॉ. रुद्र के लिए बड़ा दुर्भाग्यशाली सिद्ध हुआ। उत्तरी बर्टन यार्कस के डॉ. रुद्र 13 वर्ष की अल्पायु में गम्भीर रूप से बीमार पड़े। 13 दिन तक मर्मान्तक कष्ट एवं पीड़ा झेलते हुए 13 तारीख को हृदयगति के रुक जाने से उनकी मृत्यु हो गई। उनके परिवार में 13 सदस्य थे। मृत्यु के समय कुल 13 शिलिंग ही उनके खाते में शेष बचे थे। उनके अन्तिम संस्कार के समय भी 13 सदस्य ही उपस्थित थे। डॉ. रुद्र का असली नाम फूवाह था जो कि बाइबिल के 13 वें छन्द में उल्लेख मिलता है। 13 की संख्या उनके लिए इतनी अभिशप्त थी कि उनकी मृत्यु के बाद 13 तार ही शोक-संवेदना के रूप में आये।
फ्राँस के सिंहासन के साथ 14 की संख्या अद्भुत संयोगपूर्ण रही। फ्राँस के प्रथम सम्राट हेनरी 14 मई 1029 को सिंहासन पर आरुढ़ हुए। वहाँ के अन्तिम सम्राट भी हेनरी चौदहवें थे। 14 की संख्या वहाँ के शासकों का परछाई की तरह पीछा करती रही। 14 मई 1610 को हेनरी द्वितीय की हत्या हो गई थी। जिस 14 तारीख को एक को राज्य प्राप्त हुआ उसी को दूसरे राजा की 14 मई पर मृत्यु हो गई। वहाँ के सभी सम्राटों ने 14 मई को ही फ्राँस का राज्य विस्तार किया। हेनरी तृतीय को 14 मई के दिन युद्ध के मोर्चे पर जाना पड़ा। हेनरी चतुर्थ ने आपबारी का संग्राम 14 मार्च 1590 को जीता था। 14 दिसम्बर 1599 को सवाय के ड्यूक ने स्वयं को हेनरी के समक्ष आत्म समर्पण किया। 14 तारीख को ही लार्ड डफिन ने लुई 13वें के रूप में बपतिस्मा ग्रहण किया। हेनरी चतुर्थ के पुत्र लुई 13 वें की मृत्यु 14 मई 1643 को हुई। लुई 15 वें ने कुल 14 वर्ष राज्य किया।
यह संसार अद्भुत आश्चर्यों से भरा पड़ा है। अंकों की यह आँकड़ा क्यों किसी के जीवन में बारम्बार पुनरावृत्ति होती है। यह भी एक पहेली बना है। यह पहेली विश्व विख्यात चित्रकार अल्मटाडमा के जीवन में विचित्र ढंग से दृष्टिगोचर होती है। ये 17 की संख्या से प्रभावित थे। इस संदर्भ में वे कहते हैं- जब मैं 17 वर्ष का था तब 17 तारीख को मैं अपनी प्रिय पत्नी से मिला। मेरे प्रथम मकान का नम्बर 17 था। जब दूसरा मकान बनाया वह भी 17 अगस्त से प्रारम्भ हुआ और उसमें गृह प्रवेश 17 नवम्बर को ही हुआ। चित्रकारी के लिए सेण्ट जौंस वुड में मैंने जो कमरा लिया था वह भी 17 नम्बर का था।
अंकों की यह पहेली प्राकृतिक घटनाओं में भी देखी जा सकती है। ऐसी ही पहेली का सबब बनी रस्टीड जर्मनी के सेण्ट भूलारिच चर्च की एक ऊँची मीनार। इस मीनार पर सन् 1599 से 1783 के मध्य चार बार भयंकर बिजली गिरी। यह मीनार चार बार गिरी और पुनः नये सिरे से इसका चार बार पुनर्निर्माण किया गया। सबसे विचित्र बात तो यह थी कि इस पर चारों बार बिजली गिरने की तारीख 18 अप्रैल ही थी। इसी घटना से मिलता-जुलता रूप जापान में आयी भूकम्प की शृंखला थी। छः भूकम्पों का यह क्रम हरेक बार एक सितम्बर को तबाही मचाने आता रहा। ये तिथियाँ रही- 1 सितम्बर 837, 1 सितम्बर 859, 1 सितम्बर 869, 1 सितम्बर 1185, 1 सितम्बर 1649 एवं 1 सितम्बर 1923।
जीवन और प्रकृति की इन आश्चर्यपूर्ण एवं अद्भुत घटनाओं को भले ही संयोग मान लिया जाता है। परन्तु यह महज एक संयोग नहीं है। इसके पीछे उस नियन्ता का अवश्य ही कोई विधान होगा। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए श्री अरविन्द भी उल्लेख करते हैं कि ‘देअर इज नो क्वाइन्सीडेन्स, एवरीथिंग इज प्रीप्लान्ड’ अर्थात् ईश्वर की सृष्टि चक्र में कहीं कोई संयोग नहीं है, सभी पूर्वनियोजित क्रम से परिचालित है। एकमात्र ईश्वर ही इसका द्रष्टा और स्रष्टा है। अतः मनुष्य जीवन की इस अनोखी और विचित्र पहेली को जानने-समझने के लिए ईश्वर की शरण ही उपाय है। यही वह तत्त्व और सत्य है, जिसे जानने के पश्चात् और कोई भी रहस्य एवं पहेली अबूझ नहीं रह जाती। ईश्वर चिन्तन-स्मरण के माध्यम से ही जीवन में अनेकों पहेलियों एवं संयोग के घटते रहस्य को जाना जा सकता है।
अखण्ड ज्योति का अगला अंक ‘देव संस्कृति विश्वविद्यालय विशेषाँक’ है। इसमें विस्तार से इस स्थापना की अवधारणा एवं अनंत संभावनाओं का वर्णन है। अतिरिक्त प्रतियों के लिए पाठकगण ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ से संपर्क करें।
जिन्हें साधना करने की चाहत है, उन्हें कुछ विशेष ढंग से जीना होता है। आध्यात्मिक जीवन के लिए कोरी चाहत काफी नहीं है। जो अकेली चाहत को रखते हैं, वे केवल अपने कल्पना जाल में उलझे रहते हैं। बाद में उन्हें पछतावा और निराशा के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगता। क्योंकि साधना के लिए तीव्र अभीप्सा के साथ संकल्प एवं श्रम भी आवश्यक है। सत्य की साधना के लिए साधक को चित्त की भूमि वैसे ही तैयार करनी होती है, जैसे फूलों को बोने के लिए पहले भूमि को तैयार किया जाता है। इसके लिए कुछ अनिवार्य सूत्र हैं।
इनमें से प्रथम सूत्र है- वर्तमान में जीना। यदि सचमुच ही साधना के लिए तैयार हैं तो अतीत के ख्यालों एवं भविष्य के ख्वाबों से बाहर आना होगा। जो बीत गया सो बीत गया, जो भविष्य में होना है वह समय पर अपने आप ही हो जाएगा। अतीत और भविष्य की याँत्रिक चिन्तन धारा में बहने वाले अपने वर्तमान को खो देते हैं। वर्तमान का जीवित क्षण उनके हाथों से निकल जाता है। जबकि केवल वही वास्तविक है। न अतीत की कोई सत्ता है और न ही भविष्य की। एक स्मृति है तो दूसरी कल्पना। वास्तविक एवं जीवित क्षण तो केवल वर्तमान है। जिन्हें साधना करनी है, उन्हें स्वयं में इतनी जागृति तो लानी ही होगी कि वे अपने आप को अतीत की स्मृति एवं भविष्य के कल्पनापाश से मुक्त रख सकें। जो जाग्रत् हैं वे ही ऐसा कर सकेंगे। और जो ऐसे करेंगे, वे स्वतः ही जाग्रत् हो जाएँगे।
इस सूत्र की साधना के लिए हर रात्रि ऐसे सोएँ जैसे सारा अतीत छोड़कर सो रहे हैं। सोने से पहले अतीत को भगवत्स्मरण में विसर्जन कर दें। हर रात मरने की अनूठी कला सीखें- मरना अतीत के प्रति। और हर सुबह- नया जन्म लें। सुबह एक नयी सुबह में- एक नए मनुष्य की भाँति उठें। ध्यान रहे जो सोया था, वह न उठे। वह सोया ही रहे। उसे उठने दें जो कि नित नया है, अभिनव है। तत्त्वबोध और आत्मबोध का यह विज्ञान वर्तमान को ऊर्जावान बना देता है। जिसका वर्तमान, जितना अधिक प्राणवान है, वह उतना ही श्रेष्ठ साधक है।वर्तमान में जीने का अभ्यास सतत चौबीस घण्टे प्रारम्भ कर दें। होश में रहें कि कहीं मन फिर से अतीत और भविष्य के झूले में नहीं झूलने लगा। इससे छुटकारा पाने के लिए इसके प्रति जाग्रत् होना ही पर्याप्त है। जाग्रत् होने भर से बेहोशी की गतिविधियाँ अपने आप ही छूट जाती हैं।
इस क्रम में दूसरा सूत्र है- सहजता से जीना। आज हमारा, हम सबका जीवन कृत्रिम और असहज हो गया। मनुष्य पर्याय बन गया कृत्रिमता के आडम्बर का। सदा ही हम अपने ऊपर एक झूठ की चादर ओढ़े रहते हैं। इस आवरण के कारण हमें अपनी वास्तविकता धीरे-धीरे विस्मृत हो जाती है। इस झूठे खोल को- इस झूठी खाल को उतार कर ही हम साधना कर सकते हैं। ठीक वैसे ही साधना करने के लिए हमें अपने मिथ्या चेहरों को उतार कर रखना होगा। क्योंकि अध्यात्म साधना का अर्थ ही स्वयं को जानना और स्वयं को देखना है। अपने अस्तित्व में जो मौलिक है और सहज है, उसे प्रकट होने दें, उसमें जिएँ। जीवन यदि सहज और सरल बनें, तो साधना अपने आप ही विकसित होती है।
इस सूत्र की साधना तभी होगी, जब यह जान लिया जाय, कि असलियत में न कोई अपना पद है, न प्रतिष्ठ और न ही कोई वैशिष्ट्य। ये तो सारी नकाबें हैं, केवल मुखौटे हैं। इन्हें जैसे भी बने जल्दी से हटा देने में ही भला है। हम निपट हम हैं और अतिसाधारण इन्सान हैं। जिसका न कोई नाम है, न कोई प्रतिष्ठ है, न कुल है, न वर्ग है, न जाति है। एक नामहीन व्यक्ति- एक अति साधारण इकाई मात्र- ऐसे हमें जीना है। स्मरण रहे, यही हमारी असलियत भी है। आत्मा और इन्सान के रूप में स्वयं को अनुभव करके ही स्वयं को परमात्मा और भगवान् से जोड़ सकते हैं। जिन्हें साधना करनी है, उन्हें उपाधि को व्याधि समझकर इससे छुटकारा पाना ही होगा।
अध्यात्म-साधना का तीसरा सूत्र है- अकेले जीना। साधना का जीवन अत्यन्त अकेलेपन में, एकाकीपन में जन्म पाता है। पर मनुष्य साधारणतया कभी अकेला नहीं होता है। प्रायः वह हमेशा ही दूसरों से घिरा होता है। भीड़ सदा उसे घेरे रहती है। कोई जरूरी नहीं है कि यह भीड़ बाहर हो, भीड़ तो भीतर भी हो सकती है, प्रायः होती भी भीतर ही है। भीतर भीड़ को इकट्ठी न होने दें। बाहर भी ऐसे जिएँ, जैसे सबके बीच अकेले हैं। सबके रहते हुए भी, सबके बीच जीते हुए भी, किसी से कोई अंतर्संबंध नहीं रखना है।
इस सूत्र की साधना का सार यही है कि भीड़ भरे जीवन में, सम्बन्धों की रेल-पेल में हम उसे भूल गए हैं, जो कि हम स्वयं हैं। हम या तो किसी के मित्र हैं, या तो शत्रु हैं। पिता हैं या फिर पुत्र, पति हैं अथवा पत्नी। इन सम्बन्धों से हम इतना घिरे हुए हैं कि हमारी निजता ही खो गयी है। क्या हमने कभी कल्पना की है कि इन सारे सम्बन्धों से भिन्न हम कौन हैं? यदि नहीं कि तो अब करना है, स्वयं में ढूंढ़कर स्वयं में जीना है। अपने आप को सम्बन्धों के सभी-सभी परतों से भिन्न स्वयं को देखना है। बाहर के सम्बन्ध बाहर ही रहें, उनसे अपनी अन्तरसत्ता को मलीन न होने दें। सम्बन्धों के बिना जो अपने आप में, उसी में जीने का अभ्यास करना है।
इन तीनों सूत्रों के परिणाम बड़े ही चमत्कारी हैं। शब्द नहीं अनुभूति ही इसकी व्याख्या कर सकती है। शब्द तो सिर्फ संकेत कर पाते हैं, वह भी बड़े असमर्थ संकेत। हृदय के द्वार खुल चुके हों, तभी ये संकेत समर्थ बन पाते हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो इन पंक्तियों को नहीं अपने आप को ही पढ़ा जाता रहेगा। स्वयं के भीतर का कोलाहल इतना अधिक घेरे रहता है कि इस घिराव में कुछ भी सम्प्रेषित होने की गुँजाइश नहीं होती। यदि ये तीनों सूत्र जीवन में आ सके तो समूचा अस्तित्त्व सत्य के लिए खुल जाएगा। आन्तरिक मौन में अंतर्मन के द्वार खुल जाएँगे। और तब एक अनूठी समझ पैदा होगी, जिसके द्वारा वही समझा जा सकेगा, जो लिखा गया है। वही सुना जाएगा, जो कहा जा रहा है।
महात्मा ईसा ने कभी कहा था, जिनके पास आँखें हों, वे देखें और जिनके पास कान हों, वे सुनें। क्या जिनसे उन्होंने यह कहा था, उनके पास कान और आँखें नहीं थीं? उनके पास आँख और कान तो जरूर थे, पर आँख और कान का होना ही देखने और सुनने के लिए पर्याप्त नहीं है। कुछ और भी चाहिए। जिसके बिना उनका होना या न होना बराबर है। यह कुछ और वही है- जो इन तीनों सूत्रों की साधना से मिला है। इस कुछ और से विराट् से संवाद की स्थिति बनती है। इस कुछ और के स्पर्श से सद्गुरु के शब्द फिर शब्द नहीं रहते- मंत्र बन जाते हैं। फिर जो कुछ पढ़ा जाता है, सुना जाता है, उसमें छपे हुए कागज का बासीपन नहीं, आत्मा की मोहक सुगन्ध छलकती है।
साधना के ये सूत्र अद्भुत है, इनकी अनुभूति अद्भुत है। बस बात इन्हें अपनाने, आत्मसात करने और अनुभव करने की है। ज्यों-ज्यों इन्हें अपनाया जाएगा, त्यों-त्यों प्रकृति एवं परमात्मा से संवाद के अवसर मिलने लगेगा। हाँ पहले प्रकृति संवाद करेगी। आकाश में टके चाँद-सितारे, वृक्ष, नदी, पर्वत, झरने, पक्षियों का कलरव- इन सभी में से कुछ मीठे बोल उपजेंगे। और फिर यह सब भी मौन में डूब जाएगा। बस फिर परमात्मा का संगीत उपजेगा। सत्-चित्-आनन्द का मधुरगान आत्मा में गूँजने लगेगी। पर यह सब होगा तभी जब संकल्प और श्रम से साधक की अन्तर्चेतना उर्वर बनेगी। जब कागज पर छपे साधना के सूत्र, साधक के जीवन का स्वर बनेंगे।
हमें घर-घर पहुंचा दें - परमपूज्य गुरुदेव
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व्यवस्थापक अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
मनुष्य की जिजीविषा साधारणतया अदम्य मानी जाती है। हम जीवित रहना चाहते हैं और जीवन को प्यार करते है। उसकी सुरक्षा के लिए तरह-तरह के साधन जुटाते है। मरण से सबका भय लगता है। प्राण-संकट की घड़ी आने पर पशु-पक्षी तक सब कुछ कर गुजरने पर उतारू हो जाते है। आत्मरक्षा के प्रयत्नों में सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को संलग्न देखा जा सकता है। इससे प्रतीत होता है। कि न केवल मनुष्य, वरन् हर एक जीवधारी जीवन-संपदा को सुरक्षित रखने के लिए अपनी सूझबूझ और स्थिति के अनुसार हर संभव उपाय करता है। इतने पर भी मनुष्य न जाने क्यों उसे गँवाने और आत्मघात करने पर कटिबद्ध हो जाते है ! इसे उलझन की परिणिता नहीं, मानसिक अस्वस्थता और अस्थिरता का परिणाम माना जाना चाहिए।
जीवन जटिल है। , यह सत्य है। यदि वह एकदम सरल होता, उसमें कष्ट-कठिनाइयाँ और मुसीबतें नहीं होतीं, तो शायद वह उतना सरस, सुँदर और सुखद नहीं रह पाता, जितना कि वह है। एकरसता का बोझ दीर्घकाल तक ढोते रहने से वह इतना उत्साहहीन बन गया होता कि उसे और आगे खींच ले सकने की उमंग शेष न बचती और येन-केन- प्रकारेण व्यक्ति उससे छुटकारा पाने एवं जीवन को त्यागने का विचार करता। इसे मनुष्य का सौभाग्य ही कहना चाहिए कि परमात्मा ने उसके जीवन को सरल नहीं रहने दिया, फलतः जीवन संघर्ष का तत्त्व उसमें आ जुड़ा जिसमें आदमी विभिन्न प्रकार की प्रिय-अप्रिय परिस्थितियाँ का सामना करते हुए चरम लक्ष्य तक पहुँच सके। यह विधान हर मनुष्य के लिए है। प्रत्येक को इसमें से होकर गुजरना पड़ता है, फिर किसी के लिए वहीं परिस्थितियाँ असह्य क्यों हो उठती हैं कि उसे आत्महत्या करनी पड़े! जबकि असंख्य लोग उन्हीं जटिलताओं में संतोषपूर्वक जीते और सुखपूर्वक दिन गुजारने है।
गंभीरतापूर्वक विचार करने से ज्ञात होता है कि यह परिस्थिति नहीं, मनःस्थिति है, जो व्यक्ति को आघात करने की करुणा देती और इस बहुमूल्य जीवन में कुछ कर गुजरने के अवसर को एक झटके में छीन लेती है। अस्वस्थ मनःस्थिति जहाँ कहीं भी होगी, उसका परिणाम आत्महत्या जैसा अवाँछनीय होगा। इस अवाँछनीय का संबंध भौतिकता से भी हैं। देखा गया है कि जो राष्ट्र भौतिक दृष्टि से समृद्ध हैं, वहाँ मानसिक अस्वस्थता, कम विकसित देशों में आत्महत्या का अनुपात भी ज्यादा भी ज्यादा होता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिर्पोट के अनुसार प्रति एक लाख में 45.9 व्यक्ति अमेरिका में, 35.11 व्यक्ति डेनमार्क में, 33.99 व्यक्ति इंग्लैंड में, 33.72 व्यक्ति स्विट्जरलैंड में, 23.35 व्यक्ति फिनलैंड में, 2.73 व्यक्ति स्वीडन में, 19.26 व्यक्ति फ्राँस में, 15.3 व्यक्ति आस्ट्रेलिया में तथा 13.37 व्यक्ति कनाडा में आत्महत्या करते है।
एमाइल डर्कहीम अपनी पुस्तक ‘ली स्यूसाइड’ से लिखते हैं कि बीसवीं सदी में जितनी आत्महत्याएँ हुई है, उतनी संसार में इससे पूर्व नहीं हुई। वे इस बात को स्वीकारते हैं कि आत्महत्या का सीधा संबंध मानवी विकास जैसे-जैसे होता गया, मानवी जटिलताएं भी बढ़ती गई। आज जबकि वह विकास अपने चरम पर हैं, तो उससे जुड़ी हुई समस्याएँ भी उजागर हुई है। उनके अनुसार इन दिनों के सभ्य समाज की सबसे बड़ी कठिनाई मानसिक अस्वस्थता की है। यह अस्वस्थता ही आत्महत्या जैसे कठोर निर्णय का कारण बनती है। वे कहते हैं कि जंगली कबीलों में रहने वाले वनवासी चूँकि सभ्य समाज से दूर रहते हैं, इसलिए उनमें किसी प्रकार के मानसिक रोग नहीं पाए जाते, फलतः आत्मघात जैसे मामले भी उन समुदायों में कभी प्रकाश में नहीं आते।
ऐसी बात नहीं कि साधारण पढ़ा-लिखा और सामान्य स्तर का नागरिक ही अपघात करता है। कई बार विद्वान और ज्ञानवान समझे जाने वाले लोग भी इस कुकृत्य के शिकार हो जाते हैं इनमें विश्वप्रसिद्ध साहित्यकार, संगीतकार से लेकर राजनेता और वैज्ञानिक तक सम्मिलित है।
जर्मन विद्वान् गेटे ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वे आत्महत्या करना चाहते थे, इसलिए एक धारदार चाकू बाजार से खरीद लाएं बहुत दिनों तक वे उसे तकिए के नीचे रखे रहे; पर हिम्मत नहीं जुटा सके। अंततः अपघात का विचार त्याग दिया। वायरन जिन दिनों ‘चाइल्ड हेराल्ड’ के लेखन में व्यस्त थे उन दिनों अक्सर उन पर आत्महत्या की सनक तैयार रहती; पर माँ का प्यार कर वे पैसा न कर सके।
यूनान के महान् दार्शनिक डायोजिनीज अपने हाथों फाँसी लगाकर मरे थे। ‘मृच्छकटिक’ के लेखक शूद्रक आग में जल मरे थे। वे ‘जानकी हरण’ महाकाव्य के रचनाकार सिंहल देश के राजा की मृत्यु का शोक न सह सके और चिंता में जल मरे। चीनी साहित्यकार लाओत्से ने भी अपनी मौत स्वयं बुलाई थी। लैटिन कवि एम्पेदोक्लीज ने ज्वालामुखी में कूदकर आत्मघात किया था। महाकवि चैटररन ने दरिद्रता से पीछा छुड़ाने के लिए विषपान करना उचित समझा। गोर्की ने पेट में पिस्तौल चलाकर उसे विदीर्ण कर डाला। आस्ट्रियाई साहित्यकार स्टीफन ज्विग अपनी मौत का कारण बताते हुए अपने पीछे एक पुर्जा छोड़ गये थे, ‘अब संघर्षों से टकराने की मेरी शक्ति चुक गई हैं अशक्त जीवन का अंत कर लेना मुझे अधिक अच्छा जँचा।’
चित्रकार लाडत्रे ने अस्पताल की चारपाई पर पड़े-पड़े ही स्वयं को गोली मार ली। एक अन्य चित्रकार बानगाँग ने भी अपना अंत ऐसे ही किया। राबर्ट क्लाइव अपने जीवन में तीन बार बच गए। बाद में एक अनजाने व्यक्ति की राइफल की गोली से मारे गए। मूर्द्धन्यों में भी ऐसे कम नहीं है, जिनने तनिक-सी परेशानी से उद्विग्न होकर आत्मघात कर लिया हों। ऐसे लोगों में सेफो, डेमोस्थनीज, ब्रुटस, केसियस, डेमोक्लीज, हनीवाल, बर्टन, आर्थर कोयेसलर जैसे विश्वप्रसिद्ध व्यक्तित्व सम्मिलित हैं।
आत्महत्या के तरीकों में अगणित प्रकार के उपाय अपनाए जाते रहे हैं। इनमें पानी में डूब मरना, ऊंचाई से कूदना, विषपान करना, नस काटकर संपूर्ण रक्त को धीरे-धीरे निकाल देना आदि अधिक प्रचलित हैं। एक दुःख को हलका में करने के लिए दूसरा उससे बड़ा दुख मोल लेना भी एक उपाय सोचा जाता रहा है, यद्यपि वह इच्छित लाभ प्राप्त करने में तनिक भी सहायक नहीं होता। अताई इलाज में एक उपचार यह भी था कि के पेट में दर्द हो, तो लोहे की गरम सलाख से उसकी छाती दाग दी जाएं इससे जलने का कष्ट इतना बढ़ जाता है कि रोगी पेट दर्द की बात भूल जाता है। लगभग इसी स्तर का दुस्साहस यह है कि अमुक चिंता अथवा आपत्ति को अपना लिया जाए।
जिस प्रकार शरीर में अनेक प्रकार के घातक विषाणु प्रवेश करके विविध लक्षणों वाले रोग उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार मनःक्षेत्र में भी इसी तरह की कई विकृतियाँ अपनी जड़े लेती है और परिपूर्ण उन्माद न सही उससे मिलते-जुलते ही विघातक मानसिक रोग उत्पन्न करती है।
डिमेंशिया प्रिकोक्स अर्थात् किशोरावस्था की हिंसात्मक सनक, डिमेंशिया पैरालिटिख अर्थात् आवेश का सामयिक दौरा, मेलनकोलिया अर्थात् अवसादग्रस्तता, न्यूरस्थेनिया अर्थात् स्नायविक असंतुलन जैसी कितनी ही विकृत मनःस्थितियाँ ऐसी हैं जो विवेक को अस्त-व्यस्त करके रख देती है और समयानुसार जो भी उभार आता है, उसी में मस्तिष्क इतनी तीव्र गति से बहता चला जाता है, जिसमें अपने को सँभाल सकना कठिन पड़ता है।
प्राचीनकाल में आत्मघात को धार्मिक प्रशंसा प्रदान करने का भी प्रचलन रहा है। संन्यासियों की स्वाभाविक मृत्यु की अपेक्षा स्वेच्छा मरण की सराहना की गई है। बौद्ध और जैन धर्मों में भी मृत्यु संबंधी ऐसे विधानों का उल्लेख उनके धर्मग्रंथों में मिलता हैं। पाँडवों का स्वर्गारोहण, मंडन मिश्र का तुषाग्नि संदाह, ज्ञानेश्वर की जीवित समाधि, रामतीर्थ की जल समाधि, कुमारिल भट्ट का आत्मघाती प्रायश्चित्त विधान, हाड़ा रानी द्वारा अपना ही शिरोच्छेदन जैसी अनेकानेक घटनाएँ इतिहास के पृष्ठों पर अंकित हैं, जिन्हें सराहा ही जाता है। चित्तौड़ की रानियों का सामूहिक आत्मदाह (जौहर) और सतीप्रथा ऐसे कृत्य हैं, जिन्हें महिमामंडित किया जाता रहा है।
उपर्युक्त घटनाएँ कुछ विशेष परिस्थितियों में किन्हीं विशेष उद्देश्य को लेकर घटित हुई, अतः वह साधारण नहीं, असाधारण कहीं जाएँगी। सबके पीछे तो नहीं; पर कुछ के पीछे ऊँचा आदर्श और महान् उद्देश्य था, इसलिए आत्महत्या जैसी लगने वाली ये घटनाएँ भी तब सराही गई। आज उनकी लकीर पीटना और परंपरा का स्वरूप देना किसी भी प्रकार की समझदारी नहीं कही जाएगी। छोटी-छोटी बातों पर अथवा राजनैतिक माँगों पर मनवाने के लिए आत्मदाह कर लेना, पति के उपरांत पत्नी को जिंदा जलने के लिए विवश करना, जल समाधि लेना सभ्य जन और सभ्य समाज का लक्षण नहीं, अपितु असभ्यता का चिह्न कहना चाहिए। इसके पीछे भारत की मूल संस्कृति नहीं वरन् सामयिक विचार विकृति ही कारणभूत मानी जाएगी।
आत्महत्या को भी दूसरे की हत्या के समान ही गर्हित कर्म माना जाता है। दूसरे देशों में पुराने से इसे बहुत बुरा कहा जाता था और मरने के उपराँत भी यह कृत्य करने वाले की भर्त्सना की जाती थी। यूरोप में उन दिनों आत्महत्या करने वाले के प्रति बहुत अनुदान दृष्टिकोण था। उनकी लाशें सड़कों के आस-पास कूड़े के ढेर में दबा दी जाती और उसके आगे भयंकर आकृतियाँ खड़ी कर दी जाती थीं, ताकि मरने वाले की निंदा हो और जो ऐसा करना चाहते हों, वे हतोत्साहित हों। इस प्रचलन को बदलने में डेविड ह्यम, वाल्टेयर, रूसो जैसे दार्शनिकों ने आवाज उठाई। अंततः उसे समाप्त करवा दिया। इसके पीछे उनका तर्क था कि आदमी को जीने की तरह मरने की भी आजादी होनी चाहिए।
कुरान में दूसरों की हत्या से भी अधिक जघन्य पाप आत्महत्या को बताया है। यहूदी धर्म में इस निंदनीय कर्म को करने वाले के लिए शोक मनाने और उसकी आत्मा की शाँति के लिए प्रार्थना करने का निषेध है। ईसाई धर्म में भी इसे घृणित पातक बताया गया है। 11 वीं सदी में इंग्लैंड में एक कानून बना था, जिसमें आत्महत्या करने वालों की संपत्ति जब्त कर ली जाती थी और उसके शव को किसी ईसाई कब्रिस्तान में धार्मिक विधि से दफनाया नहीं जा सकता था।
आत्महत्या का प्रयत्न करने वालों को रोगी माना जाए या अपराधी? इस प्रश्न पर आज भी मनः शास्त्रियों, मानवविज्ञानियों और विधिवेत्ताओं की दलील है कि यदि हम किसी को दारुण वेदनाओं से मुक्ति नहीं दिला सकते, तो उसे ऐसी मौत मरने का अधिकार होना चाहिए, जिसमें वह पीड़ा झेलने की अपेक्षा राहत पा सके। नृतत्त्ववेत्ता मध्यवर्ती मार्ग अपनाते हुए उन्हें करुणा का पात्र घोषित करते हैं और ‘यूथेनेसिया’ के नाम पर उन पर सहानुभूति प्रकट करते हुए समाज को उनकी समस्याओं को हल करने का सुझाव देते हैं।
शोध-अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि जिन-जिन देशों में आत्मघात की दर उच्च है, वहाँ-वहाँ मद्यपियों की संख्या भी उसी अनुपात में ज्यादा है। अनुसंधानकर्त्ताओं का कहना है कि अमेरिका, स्विट्जरलैंड, स्वीडन, डेनमार्क एवं फ्राँस में विश्व की सर्वाधिक आत्महत्याएँ होती हैं और मद्यपान की लत वहाँ उसी अनुपात में देखी गई है। इससे यह स्पष्ट है कि आत्महत्या का कारण शारीरिक कम, मानसिक अधिक है।
एरिक फ्रॉम अपनी पुस्तक ‘दि सेन सोसायटी’ में एक स्थान पर लिखते हैं कि यूरोप के सबसे अधिक शाँत, समृद्ध और लोकताँत्रिक कहे जाने वाले राष्ट्रों एवं विश्व के सर्वाधिक संपन्न देश अमेरिका की मानसिक स्वस्थता के क्षेत्र में जो वर्तमान अवस्था है, उसे दयनीय ही करना चाहिए। वे लिखते हैं कि इन राष्ट्रों का संपूर्ण सामाजिक, आर्थिक उन्नयन का इतना ही प्रयोजन है कि उनका भौतिक जीवन सुखमय हो, सभी संपत्तिवान हों, स्थित लोकताँत्रिक व्यवस्था हो और वह शाँतिपूर्ण हो। वे कहते हैं कि जिन देशों ने इस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया अथवा जो इसकी प्राप्ति के सन्निकट पहुँच गए, वहाँ मानसिक असंतुलन की गंभीर समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं।
एरिक फ्रॉम के इस निष्कर्ष से स्पष्ट है कि आत्महत्या के मूल में संव्याप्त मानसिक असंतुलन का सबसे प्रमुख कारण समृद्धि है। संभवतः इसी करण से अध्यात्मवादी चिंतन में धनोपार्जन की छूट तो है; पर धन-संग्रह पर रोक लगाई गई है। यदि यह बात सही है कि वर्तमान मानसिक अस्वस्थता की जड़ में संपदा की प्रधान भूमिका है, तो अर्थवेत्ताओं, नृतत्त्वविज्ञानियों और समाजशास्त्रियों को मिल-जुलकर कोई ऐसा हल वर्तमान संदर्भ में ढूँढ़ना चाहिए, जिससे समाज भी संपन्न बना रहे और मनुष्य भी मानसिक दृष्टि से विपन्न नहीं कहलाए।
यह भी एक तथ्य है कि अर्थ के साथ-साथ समाज की अवाँछनीय परिस्थितियाँ भी मनुष्य को विक्षुब्ध करती हैं। स्नेह-सौजन्य का अभाव, नैतिकता का गिरा स्तर, शोषण उत्पीड़न, ठगी, विश्वासघात, बेकारी, हानि, बरबादी जैसे कितने ही कारण मानव को दुःखी बनाते हैं। सामाजिक कुरीतियों के कुचक्र में कितनों को ही पिसना है। इन प्रचलनों को बंद करना सरकार और समाज का काम है। समाज की संरचना ऐसी हो, जिसमें हर व्यक्ति को निर्वाह, प्रगति और सुरक्षा के समुचित साधन प्राप्त हों; कोई किसी के भी साथ अन्याय और अनीति नहीं बरत सके। इसके अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य यह भी होना चाहिए कि स्वास्थ्य-रक्षा और अर्थ-उपार्जन की तरह ही चिंतन तंत्र का सही उपयोग कर सकने की क्षमता भी सर्वसाधारण में उत्पन्न की जाए। इसके लिए मानसिक प्रशिक्षण की एक समर्थ प्रणाली खड़ी की जानी चाहिए। इसके बिना आत्महत्या जैसे व्यापक संकट उत्पन्न करने वाले मनोरोगों का भड़काया हुआ दावानल रोका न जा सकेगा।
जीवन जीने के लिए हम सबको मिला है, मरने के लिए नहीं-यह तथ्य हर स्थिति में याद रखा जाना चाहिए। अनेकानेक योनियों में भटककर मानव योनि में जीव जब आता है, तो इसलिए कि कर्म करते हुए अपनी मुक्ति का पथ प्रशस्त कर ले; किंतु विक्षुब्ध मनः स्थिति में प्रेत-सा जीवन जीते हुए आत्मघाती प्रवृत्ति की ओर उन्मुख होना उसे कदापि शोभा नहीं देता। स्रष्टा के राजकुमार के रूप में मनुष्य को जो पदवी मिली है, उसका तिरस्कार न कर जीवन चुनौती के रूप में, खिलाड़ी की तरह जिया जाए, तो हँसते-हँसते, पुण्य कमाते औरों की सेवा कर संतोष प्राप्त करते हुए यह जीवन जिया जा सकता है, इसमें काई संदेह नहीं।
अमरावती चिन्ता में डूबी थी। सभी राग-रंग अवसाद में बदल गए थे। इन्द्र कहाँ हैं? देवगण एवं महर्षियों को यह प्रश्न उलझन में डाले था। इन्द्र के न होने से पृथ्वी वनस्पति से रहित होने लगी थी, सदा जल से भरे रहने वाले सरोवर सूख गए थे। सारी प्रकृति आक्रान्त हो उठी थी, समूची पृथ्वी में अराजक उपद्रव छा गए थे। इन्द्र के अभाव में इनका निवारण कौन करे। पर इन्द्र तो कहीं दिखते ही न थे। वे त्रिशिरा एवं नमुचि की हत्या के कलंक से विक्षुब्ध होकर कहीं पलायन कर गए थे।
देवगणों ने उन्हें ढूंढ़ने की बहुतेरी कोशिश की, पर सफलता हाथ न लगी। देवों का जीवन इन्द्र के अभाव में अस्त-व्यस्त होने लगा। देवराज का पद खाली नहीं रखा जा सकता। इस सत्य से सभी सहमत थे, पर देवराज के पद पर किसी एक नाम पर सहमति नहीं हो पा रही थी। ‘क्यों न पृथ्वी लोक के चक्रवर्ती सम्राट राजर्षि नहुष को देवराज के पद पर अभिषित किया जाय? एक ऋषि ने अपना सुझाव दिया।’
‘वही जो परम प्रतापी नरेश होने के साथ मंत्रदृष्टा भी हैं। जिन्होंने अनेक सूक्तों की रचना की है। जो पृथ्वी के सबसे शक्तिवान शासक हैं, क्या वही मानवों में श्रेष्ठ नहुष?’
हाँ ...हाँ... वही, मैं उन्हीं के बारे में कह रहा हूँ॥
‘बस फिर तो समस्या का समाधान मिल गया। देवों से इतर मानव के इन्द्र बनने पर देवताओं में आपसी कटुता भी न पनपेगी। राजर्षि नहुष के पराक्रम के प्रभाव से असुरों की रही-सही शक्ति भी नष्ट हो जाएगी।’ देवगण एवं महर्षि दोनों ही इस प्रस्ताव पर एकमत से सहमत से हो गए। सभी ने सर्वसम्मति से देवर्षि नारद को नहुष के पास जाकर उन्हें इस पर सहमत कराने के लिए प्रतिष्ठनपुर भेज दिया।
देवर्षि ने नहुष की राजधानी पहुँचकर उनसे निवेदन किया, हे राजन्! इन्द्र के अदृश्य हो जाने से अमरावती अवसाद में डूबी है, आप स्वर्ग चलकर देवराज इन्द्र का पद सम्भालें। देवर्षि का यह प्रस्ताव सुनकर राजा नहुष को पहले तो अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वह एकबारगी अचकचा गए। उन्हें सूझ ही नहीं पड़ा कि वे क्या कहें- क्या जवाब दें?
देवर्षि नारद और उनके साथ पधारे ऋषिगणों ने फिर से एकबार निवेदन किया, हे सम्राट, समस्त देवों ने प्रसन्नतापूर्वक आपको देवराज मानते हुए स्वर्गलोक लाने की प्रार्थना की है। बिना किसी हिचकिचाहट के आप चलें और स्वर्ग के अधिपति का पद सम्भालें। सभी ऋषिगण आपको अपने तप का एक बड़ा भाग देंगे, जिससे आपकी तेजस्विता इतनी प्रखर होगी कि कोई भी आपके सामने टिक न सकेगा।
अभी तक प्रजापालन एवं तप-साधना में निरत नहुष अनायास ही इस परम दुर्लभ पद का प्रस्ताव पाकर प्रसन्न हो उठे। वे सोचने लगे कि अभी तक केवल सुना था कि तप से सभी कामनाओं की प्राप्ति होती है, लेकिन यह तो सचमुच ही सच हो गया। बिना माँगे ही इन्द्र का पद अपने आप ही चलकर मेरे पास आ गया। सचमुच ही तप की महिमा अपार है। मन ही मन अपनी कल्पनाओं का ताना-बाना बुनते हुए नहुष ने प्रकट में देवर्षि के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। ऋषियों के आग्रह पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी।
अमरावती भी नहुष के आगमन पर प्रसन्नता से छलक उठी। सम्राट नहुष का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था। वह पराक्रमी योद्धा, न्यायशील शासक, महान् मनीषी, दया धर्म के आगार सभी कुछ एक साथ थे। सभी देवों, ऋषियों ने उनके इन्हीं गुणों का सम्मान करते हुए उन्हें इन्द्र पद पर अभिषिक्त किया।
इन्द्र के लुप्त होने की वार्ता समय के साथ धीरे-धीरे विस्मृति के गर्त में विलीन होने लगी। देवगणों सहित अमरावती फिर से राग-रंग से तरंगित होने लगी। वहाँ फिर से हास-विलास और आमोद-प्रमोद की गूँज उठने लगी। नहुष के कुशल शासन में स्वर्ग के भोग फिर से चरम पर जा पहुँचे।
नहुष पराक्रमी थे, नीतिकुशल एवं तपस्वी थे, पर तत्त्ववेत्ता ब्रह्मज्ञानी नहीं थे। तत्त्वज्ञान के अभाव में स्वर्ग के सुख-वैभव के बीच उनका तप मन्द पड़ता गया, तप की ऊर्जा के अभाव में नीति परायणता केवल कुशलता के कौशल तक सिमट गयी। असुरों के आक्रमण शान्त थे, इसलिए पराक्रम की धार भी अब तेज न रही। भोग और वैभव से भरे-पूरे स्वर्ग में केवल वासना की ज्वालाएँ धधकी। कभी महान् तपस्वी एवं राजर्षि कहे जाने वाले नहुष अब केवल एक विलासी सम्राट हो गए।
वह कभी देवोद्यानों में, कभी नन्दन कानन में, कभी हिमालय शिखर पर, कभी मन्दराचल, कभी महेन्द्र और कभी मलय पर्वत, कभी समुद्र तो कभी सरिता में अप्सराओं और देवाँगनाओं से घिरे रहते, उनके साथ अनेकों काम, क्रीड़ाओं में रमे रहते। नाना वाद्यों और सुमधुर गीतों के श्रवण से उनकी हृदयतंत्री निनादित रहती। देवराज के महिमामय पद पर अधिष्ठित उन नहुष की आनन्द-विलास की लीलाओं में स्वयं विश्वावसु, गन्धर्वों और अप्सराओं के समुदाय अभ्यर्थना के लिए उपस्थित रहते थे। ऋतुओं का शृंगार मानो देह धारण कर वहाँ छाया रहता था। स्वर्ग सुख की उद्दाम आनन्द लहरियों में डूबते-उतराते नहुष यदा-कदा सोचते, उन्हें सचमुच ही तप का सुफल मिल रहा है। विलास मलिन उनकी धुँधली दृष्टि यह नहीं देख पा रही थी कि यह तप का सुफल नहीं तप से पतन है। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि इस लगातार के पतन से उनका पूर्व अर्जित तप अब चुक चला है, और अब वे दुर्गति के द्वार पर खड़े हैं।
पर यह सब वे देख पाने में असमर्थ थे। उन्हें तो केवल इन्द्र की पत्नी शची नजर आ रही थी, जो इस समय अपने प्रासाद के बाह्य परिसर में विश्राम कर रही थी। इस सोती सुन्दरी को देखकर उनके मन में वासना के सौ-सौ सर्प फुँफकार उठे। कामासक्त उनके मन-प्राण शची को पाने के लिए विचलित हो उठे। वासना ने नहुष के विवेक को हर लिया। ऐसे विवेकहीन विलासी स्वर्गाधिपति ने शची को अपनी पत्नी बनने के लिए आमंत्रण भेजा।
शची इन्द्र के वियोग में वैसे भी विरह पीड़ित और दुःखी थी। नहुष की इन बातों से वह और अधिक घबरा गयी। बेचारी आँसू बहाती हुई देवगुरु बृहस्पति के पास भागी आयी।
देवी शची को अपने आश्रम में देखकर देवगुरु एक पल के लिए चौंके। पर दूसरे ही पल उन्होंने दिव्य दृष्टि से सब कुछ जान लिया। उन्होंने देख लिया कि कभी महान् तपस्वी एवं पराक्रमी शासक रहा नहुष अब अपने जीवन पथ से भटक चुका है। फिर भी अभी वह महर्षियों द्वारा दिए गए तप के तेज से सुरक्षित है। अपने द्वारा दिए गए तप के तेज को ये महर्षि ही वापस ले सकते हैं। महर्षियों द्वारा स्थापित नहुष उन्हीं परम तेजस्वी दिव्यात्माओं द्वारा ही हटाया जा सकता है।
सारी परिस्थिति का आँकलन-विश्लेषण करके देवगुरु बृहस्पति कुछ पलों के लिए उपाय-समाधान की खोज में विचारमग्न हो गए। कुछ क्षणों बाद उनके चेहरे पर प्रसन्नता का प्रकाश उभरा। उनके होठों पर स्मित की हल्की सी रेखा झलकी। अब उन्होंने हल्के स्वरों में देवी शची से कुछ कहा। इसे सुनकर इन्द्राणी शची पहले तो घबराई, पर देवगुरु बृहस्पति के समझाने से वह मान गयी। उन्हें बृहस्पति-नीति पर विश्वास था। इसके अनेकों चमत्कार वह पहले भी देख चुकी थी।
अमरावती के हित के लिए, देवी शची अपनी और सभी देवगणों की कार्य-सिद्धि के लिए अपना हृदय कठोर बनाकर विलासी नहुष के समीप गयीं। सलज्ज गरिमाभरी उस महादेवी ने अपने मन की भावनाएँ मुख पर लेशमात्र भी प्रकट न होने दीं।
शची को अपने समीप आया हुआ देखकर नहुष आशा और उत्कण्ठा से भर गया। विस्मय भरे स्वर में वह बोला, ‘हे सुन्दरी मुझे स्वीकार करते समय, तुम्हारा जो भी कार्य होगा, उसे मैं सिद्ध करूंगा। तुम्हारा प्रिय करने के लिए मैं तत्पर हूँ। नहुष के इन वचनों से संकुचित शची ने जैसे-तैसे अपने को सम्हालते हुए कहा, जगत्पते, आप मुझे हर तरह से स्वीकार हैं। लेकिन आपको अपने पति के रूप में स्वीकार करने से पूर्व मेरी एक कामना है।
कहो-कहो शीघ्र ही कहो, मैं इसे पूर्ण करने में तनिक भी विलम्ब नहीं करूंगा।’ नहुष के ये वचन उसके तप एवं पुण्य समाप्त हो जाने की घोषणा कर रहे थे।
इन्द्राणी कहने लगीं, ‘देवेश्वर! सभी सप्तर्षि एकत्र होकर शिविका द्वारा आपको वहन करके लाएँ, बस यही मेरी प्रिय कामना है।’ विवेकहीन नहुष शची की बात सुनकर हर्षित हो उठा, ‘सुन्दरी तुमने तो अपूर्व वाहन बताया है। मुझे तुम्हारी बात रुचिकर लगी है। अब तुम प्रसन्न हो जाओ। सभी ऋषि, देवता, गंधर्व, किन्नर मेरे आधीन हैं। मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञा का पालन करूंगा। सम्पूर्ण सप्तर्षि मण्डल और ब्रह्मर्षि मेरी पालकी ढोएँगे।’
नहुष की इस गर्वोक्ति से शची एक क्षण के लिए तो घबराई, लेकिन उसे देवगुरु बृहस्पति की नीति पर विश्वास था। उन्होंने कहा था, देवी शची, ब्रह्मर्षियों से सेवा लेना महापाप है। इस महापाप से नहुष स्वयं विनष्ट हो जाएगा। बृहस्पति के इन्हीं वचनों का स्मरण करके शची अपने भवन में चली गयीं।
इधर विवेकहीन, मद और काम से अन्धे नहुष ने यम-नियम का पालन करने वाले महान तेजस्वी, तपोमूर्ति, ज्ञानमूर्ति, सप्तर्षियों को अपनी पालकी ढोने का आदेश दिया। उसके इस आदेश पर सभी ऋषियों ने एक-दूसरे की ओर देखा, फिर इन्द्र पद की गरिमा का ख्याल करके पालकी उठा ली।
सुन्दर सजी हुई इस पालकी में नहुष आसीन था। निर्मल अन्तःकरण वाले ब्रह्मर्षि पापाचारी नहुष का बोझ ढोते-ढोते पीड़ित हो रहे थे। वह और उतावला हो रहा था और उनसे जल्दी-जल्दी चलने को कह रहा था। महर्षि अगस्त्य पर उसके उतावलेपन का कोई प्रभाव नहीं था। ब्रह्मचिन्तन में निमग्न वह अपनी गति से चल रहे थे। वही सबसे आगे थे। उनकी गति से सबकी गति प्रभावित होना स्वाभाविक था। इस पर उतावले नहुष ने सर्प-सर्प (जल्दी चलो, जल्दी चलो) कहते हुए उनके मस्तक पर अपने पैर से प्रहार किया। इस प्रकार प्रहार करते ही नहुष उसी क्षण तेजहीन-श्रीहीन हो भयाक्रान्त हो गया।
महासमुद्र को भी अपने तपोबल से सुखा देने वाले बह्मर्षि अगस्त्य उसके इस व्यवहार से कुपित हो गए। वह बोले, ब्रह्म के समान दुर्धर्ष तेजस्वी ऋषियों को वाहन बनाकर अपनी पालकी ढुलवाने वाले मूर्ख नहुष, तुम अब इन्द्र पद के योग्य नहीं रह गए। अतः हमारा शाप है कि तुम स्वर्ग से भ्रष्ट होकर पृथ्वी पर सर्प की योनि में जीवन बिताओ। अमित तेजस्वी महर्षि अगस्त्य के अमोघ शाप से भयभीत हो नहुष ने उनके चरणों में गिरकर अपने उद्धार का उपाय पूछा। अब वह मदान्ध और कामान्ध देवलोक का सम्राट नहीं, स्वर्ग से पतित एक सामान्य जीवात्मा था। ऐसा जीवात्मा जो अपने तप एवं पुण्य की सारी पूँजी गवाँ बैठा था।
ब्रह्मर्षि अगत्स्य को उस पर दया आ गयी। वह उस पर कृपा करते हुए बोले- वत्स नहुष तप का सुफल ज्ञान है। तुमने इस सत्य को न जानकर अपने तप के बदले भोग की कामना की, इसीलिए तुम भटके एवं पतित हुए। तपस्वी को ज्ञान की अभीप्सा करनी चाहिए। और ज्ञान हो जाने पर भी तप का मार्ग कभी छोड़ना नहीं चाहिए। अब जाओ अपना प्रायश्चित्त पूरा करो। मेरे आशीष से तुम्हारे जीवन में पुनः तप का मार्ग प्रशस्त होगा। पर अब सदा ही तप का उद्देश्य एवं आदर्श स्मरण रखना।
राजा जनश्रुति को चिड़ियों की भाषा समझने की सामर्थ्य प्राप्त थी। हंसों की जोड़ी बात कर रही थी कि जनश्रुति से बड़े तो मुनि रैक्य हैं, जो सदा परमार्थ में लगे रहते हैं। गाड़ीवन रैक्य के बड़ा कष्ट हुआ! दूसरे दिन उन्होंने उस गाड़ीवन की खोज कराई और बहुत-सा धन, अश्व और आभूषण लेकर मुनि रैक्य के पास गए और बोले- “आपकी कीर्ति सुनकर यहाँ आए हैं, हमें ब्रह्म-विद्या का उपदेश दीजिए। “रैक्य मुनि ने उत्तर दिया- “राजन्! ब्रह्म-विद्या सीखनी हैं, तो अपना अंतरंग पवित्र बनाओ। अहंकार को मिटाकर, श्रद्धा-विश्वास तथा नम्रता को धारण कर ही तुम सच्चा आत्मज्ञान प्राप्त कर सकोगे। “ जनश्रुति को अपनी भूल ज्ञात हुई और वे सिद्धि-संपादन का अह त्यागकर अंदर से स्वयं को महान् बनाने में लग गए।
योग विज्ञान में अंतरंग साधना का प्रथम चरण ‘धारणा’ कहलाता है। धारणा अर्थात् निर्धारित ध्येय में चित्त को एकाग्र करना। यह एकाग्रता अनायास ही नहीं सध जाती। मन के चंचल होने के कारण वह बार-बार विषय-वासनाओं की ओर प्रवृत्त हो जाता है। उसकी इस वृति को निरुद्ध कर मन को ध्येय वस्तु में टिका देना ही ‘धारणा’ है।
साधारण व्यक्ति और साधारण स्थिति में मन देर तक किसी एक वस्तु या विषय पर नहीं टिकता और वह यहाँ-वहाँ नाना प्रकार के भाव, विचार और वस्तु में भटकता रहता है; किंतु जब धारणा शक्ति का उदय होता है, तो मन की एकाग्रता को लंबे समय तक स्थिर रख सकना संभव होता है, यही एकाग्रता बाद में ध्यान में बदलती और अपनी सर्वोच्च भूमिका में ‘समाधि’ कहलाती है। योगदर्शन, विभूतिपाद में महर्षि पतंजलि लिखते हैं-
‘देशबंधश्चित्तस्य धारणा’
अर्थात् वृति मात्र से किसी स्थान विशेष में चित्त की स्थिरता ‘धारणा है। चित्त बाह्य विषयों को वृत्ति मात्र से ग्रहण करता है। ध्यानावस्था में जब प्रत्याहार के द्वारा इंद्रियां अंतर्मुख हो जाती है, तब भी वह अपने ध्येय विषय को वृति मात्र से ही ग्रहण करता है। वह वृति ध्येय के विषय में तदाकार होकर स्थिर रूप से भासने लगती है। अर्थात् स्थिर रूप से उसके स्वरूप को प्रकाशित करने लगती है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जब किसी स्थान विशेष में चित्त की वृति स्थिर हो जाती और तदाकार रूप होकर उसका अनुभव होने लगता है, तो वह ‘धारणा’ कहलाता है। पृथक्-पृथक् उपनिषदों में धारणा का जो स्वरूप बत’ कहलाता है। पृथक्-पृथक् उपनिषदों में धारणा का जो स्वरूप बतलाया गया है, उनमें शब्दों की भिन्नता होते हुए भी भाव की एकरूपता है। जिन उपनिषदों में योग के पंचदशाँग माने गए हैं, वहाँ तेरहवें अंग के रूप में; जहाँ योग के आठ अंग माने गए हैं, वहाँ छठे अंग के रूप में और जहाँ योग के षडंग स्वीकृत किए गए हैं, वहाँ चतुर्थ अंग के रूप में ‘धारणा’ को अंगीकार किया गया है।
त्रिशिखि ब्राह्मणोपनिषद्(2/31) में इसका स्वरूप प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि चित्त का निश्चली भाव होना ही ‘धारणा’ है। शरीरगत पंचमहाभूतों में मनोधारण रूप धारणा भवसागर को पार करने वाली है। दर्शनोपनिषद् (8/1/3) में धारणा का जो स्वरूप बतलाया गया है, उसके अनुसार शरीरगत पंचभूताँश बाह्य पंचभूतों की धारणा करना ही यथार्थ धारणा है। इसी में अन्यत्र (8/7-9) पुरुष अर्थात् आत्मतत्त्व में सच्चिदानंद स्वरूप सर्वशास्ता शिवतत्त्व की धारणा करने का उपदेश दिया गया है,। योगतत्त्वोपनिषद् (84-102) में शरीर के विभिन्न भागों को पृथ्वी, जल, तेज, वायु, एवं आकाश का स्थान बतलाया गया है। इनमें से प्रत्येक स्थान में पंचघटिका पर्यंत क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर एवं शिव की धारणा करने से साधक के उन-उन महाभूतों से भयमुक्त होकर खेचरत्व संपादित कर सुख प्राप्त करने का प्रतिपादन किया गया है। इसी में एक अन्य स्थान(69-72) पर कहा गया है कि पंचज्ञानेंद्रियों के विषय में आत्मा या ब्रह्म की भावना होना ही ‘धारणा’ है। तेजोबिंदूपनिषद् (1/35) के अनुसार मन के विषयों में ब्रह्मभाव की अवस्थिति होना ‘धारणा’ है। मेडलब्राह्मणोपनिषद्(1/1/6) में चैतन्य में चित्त को स्थापित करना ‘धारणा बतलाया गया है। शाँडिल्योपनिषद् (1/9) में आत्मा में मन, दहराकाश में ब्राह्माकाश तथा पंचमहाभूतों में पंचमूर्ति की धारणा का निरूपण किया गया। इस प्रकार विभिन्न उपनिषदों में धारणा का विवेचन एवं प्रतिपादन व्यापक रूप से किए जाने के कारण उसका स्वरूप अधिक स्पष्ट एवं गम्य हो गया है।
धारणा के अभ्यास में ‘देश’ और ‘बंध’- इन तत्त्वों का विशेष महत्व है। देश अर्थात् जिस वस्तु या स्थान पर चित्त को एकाग्र किया जाता है और बंध अर्थात् चित्त को अन्य विषयों से हटाकर एक ही ध्येय विषय पर वृत्तिमात्र से ठहराना-यह ‘बंध’ कहलाता है। स्थान भेद के हिसाब से ‘देश’ दो प्रकार के होते हैं-आँतरिक या आध्यात्मिक देश तथा बाह्य देश। नाभि, हृदय, कपाल,नासिकाग्र, भृकुटी, ब्रह्मरंध्र आदि आध्यात्मिक देश कहलाते हैं जबकि सूर्य चंद्र, ध्रुव, इष्ट की मूर्ति, गुरुसत्ता का चित्र आदि बाह्य देश है। इनमें से किसी एक स्थान या वस्तु पर जब चित्त स्थिर होता है, तो वास्तव में उसे वायु की स्थिरता ही समझनी चाहिए। ऐसा दीर्घकाल तक प्राणायाम आदि का अभ्यास करते रहने से स्वतः हो जाता है। नाभि आदि स्थानों में जब वायु की स्थिरता हो जाती है, तो साधक धीरे-धीरे एकाग्रचित्तता की स्थिति प्राप्त कर लेता है और दृढ़भूमि हो जाता है। इसके बाद अभ्यासी जिस भी स्थान पर वायु का निरोध करना चाहता है, कर लेता है। इस स्थिति में वहाँ पर प्राणापानादि के विकार दूर हो जाते है, फलतः दिव्यशक्ति का उदय होता है।
योगतत्त्वोपनिषद् (73-76) में शरीर के भिन्न-भिन्न केन्द्रों पर संयम करने से उद्भूत होने वाली शक्ति का विस्तार से उल्लेख किया गया है। नाभिचक्र में संयम करने वालों की जठराग्नि में सूक्ष्मता और विशेष बल आ जाता है, जिसका प्रभाव संपूर्ण शरीर पर पड़ता है। जठराग्नि, शरीरगत सभी के पाचन, परिवर्तन और परिवर्द्धन के लिए उत्तरदायी है। वह सभी क्रियाओं, संस्थानों एवं अवयवों की नियंत्रक, पोषक तथा धारक है। वह शरीर के सूक्ष्मतम अणु अंश को अपने तेज और पाकादि क्रिया से प्रभावित करती है। उसमें सूक्ष्मता और विशेष बल संपन्नता आ जाने से संपूर्ण पाचन संस्थान में एक अभूतपूर्व परिवर्तन हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप योगी के शरीर में किसी प्रकार की विकृति या व्याधि उत्पन्न नहीं होती है। उसकी भूख और प्यास नियंत्रित हो जाती है, जिससे कई-कई दिनों तक योगी यदि आहार ग्रहण न करें, तब भी उसके शरीर पर कोई प्रतिकूल नहीं पड़ता है।
जठराग्नि के दिव्य प्रभाव से योगी के शरीर में आद्य रस-धातु का निर्माण तीव्रता से होता है तथा मलमूत्र का निर्माण अल्प मात्रा में निर्गंध संयत रूप में होता है। योगी के शरीर में धातु साम्य रहने से रोगादि विकार उत्पन्न नहीं होते, जिससे अंग-प्रत्यंगों में स्फूर्ति, उत्साह और क्रियाशीलता बनी रहती है।
कपाल में संयम करने अर्थात् धारणा करने पर धी-धृति-स्मृति(बुद्धि-धैर्य-स्मरणशक्ति) अत्यंत सूक्ष्म हो जाती है, जिससे योगी गहनता, सूक्ष्मता, गंभीरतम और दुर्बोध विषयों को ग्रहण, धारण और स्मरण रखने की अपूर्व सामर्थ्य वाला हो जाता है। फिर उसके लिए कोई भी विषय अगम्य नहीं रह जाता।
नासिकाग्र में संयम से ‘दिवय गंध’ और जिह्वा के अग्र भाग में संयम से ‘दिव्य रस’ की अनुभूति होती है। कंठकूप में संयम करने से क्षुधा-तृषा आदि विकार भावों पर नियंत्रण एवं विजय प्राप्त होती है। योगी को वायु के द्वारा ही उत्तमोत्तम रसास्वादन होता रहता है, जिससे उसे भूख-प्यास का अनुभव नहीं होता। हृदय कमल में संयम करने पर योगी स्फटिक मणि की भाँति निर्मल और स्वच्छ हो जाता है। चित्त में स्थिरता एवं प्रसन्नता बनी रहती है। उसका हृदय या मन विकारों में लिप्त नहीं होता । उसमें रज और तम गुण का अभाव हो जाता है तथा एकमात्र शुद्ध सात्विक भाव विद्यमान रहता है। त्वचा पर संयम करने पर शीत-उष्णता का अनुभव नहीं होता। यही कारण है कि योगी बरफीले प्रदेशों में भी किसी प्रकार की कष्ट-कठिनाई का अनुभव नहीं करते और आराम से वहाँ लंबे समय तक बने रहते हैं। ऐसे ही अतिशय गरम क्षेत्रों में भी उन्हें तनिक भी असुविधा महसूस नहीं होती। आँखों में चित्त को स्थिर करने पर साधक में दिव्य दृष्टि का विकास होता है। फिर उसके समक्ष सब कुछ ‘हस्तामलकवत्’ भासने लगता है। कोई व्यक्ति अथवा काल वहाँ आगे और आवृत नहीं रह पाता; वह त्रिकालज्ञ बन जाता है।
इसी प्रकार कर्णेंद्रियों पर धारणा सिद्ध होने से वहाँ दिव्य श्रवणशक्ति का प्रादुर्भाव होता है। सामान्यतः मानवी कर्ण निश्चित सीमा वाली स्थूल ध्वनियों को ही सुनने की सामर्थ्य रखते हैं उस सीमा से आगे और पीछे की स्थूल तरंगें भी उसकी ग्रहण क्षमता से परे होती है। ऐसे में जब साधक उनमें संयम साधता है, तो न सिर्फ संपूर्ण स्थूल ध्वनियाँ कर्णगोचर बनती हैं, वरन् अंतरिक्ष में प्रवाहित होने वाले कितने ही प्रकार के दिव्य नाद एवं दिव्य संदेश श्रव्य बनकर प्रकट होने लगते है। मूर्धा में जब चित्त की एकाग्रता सधती है, तो वहाँ पर दिव्य वाक्शक्ति का आविर्भाव होता है। यह वाक् वाणी का परिष्कृत रूप है। साधारण वाणी की क्षमता साँसारिक कार्यों तक ही सीमित होती है। उससे आदेश-निर्देश के सामान्य क्रियाकलापों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं सधता। कई बार तो सामने वाला उसकी आज्ञा की उपेक्षा तक कर जाता है और वह विवश अपनी असमर्थता को कोसती रह जाती है; किंतु जब वहाँ संयम से वाक्शक्ति का प्रकटीकरण होता है, तो उसमें असाधारण बल आ जाता है; दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता से वह संपन्न बन जाती है। फिर सामने वाला उसके आदेशों की उपेक्षा नहीं कर पाता और कठपुतली की तरह उन्हें मानने एवं पूरा करने के लिए बाध्य हो जाता है। इसके साथ ही उसमें श्राप-वरदान देने की दिव्य शक्ति आ जाती है। इसी प्रकार दिव्य चेष्टा, दिव्य बल, दिव्य गति, दिव्य क्रिया, दिव्य प्रवृत्ति जैसी कितनी ही विभूतियों का विकास भिन्न-भिन्न देह-केन्द्रों पर धारणा साधने से होता है। योगतत्त्वोपनिषद्(103-104) में पाँच प्रकार की धारणा का फल बतलाते हुए कहा गया है कि पंचविध धारणा की सिद्धि से योगी से दृढ़ शरीर वाला एवं मृत्युँजयी हो जाता है।
धारणा अष्टाँग योग का छठा पाद है। उसकी सिद्धि विभिन्न प्रकार की शारीरिक, मानसिक एवं अलौकिक उपलब्धियों का कारण बनती है। जो साधक इनके आकर्षणों में उलझ जाते है, वे चरम लक्ष्य के अपने वास्तविक प्रयोजन को भूलकर दिग्भ्रमित हो जाते है। यही कारण है कि इस पथ के विवेक वान पथिक सदैव इस स्थिति से बचते और एकनिष्ठ भाव से अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ते चलते हैं।
मानवीय शक्तियों से परे, प्रकृति से पार के सच को ढूंढ़ने, जानने और पाने की चाहत चिर पुरातन है। अपना देश भारत हो या फिर दुनिया का कोई दूसरा कोना, हर जगह इसकी झलक मिलती है। यह हर देश का साहित्यिक सत्य है। अपने यहाँ के रामायण, महाभारत सहित वैदिक साहित्य के अलावा पश्चिमी देशों के प्राचीन नाटकों, इतिहास कथाओं, मध्य एवं नव जागरण काल की कविताओं में इसका व्यापक उल्लेख मिलता है। जर्मन साहित्यकार शीलर, विलैण्ड एवं गेटे ने अपने साहित्य में इस पर काफी प्रकाश डालने की कोशिश की। ब्रिटेन के होरेस कालपोल ने अपनी कृति ’केस्टल ऑफ ओट्राण्टो’ में यह तर्क पूर्ण ढंग से स्पष्ट किया, कि शक्ति और सत्य की सीमा मनुष्य और दृश्य प्रकृति तक ही सिमटी नहीं है। यह इससे परे और पार भी है। उन्होंने बताया नेचुरल के साथ ही सुपरनेचुरल का भी अस्तित्त्व है।
मैथ्यू ग्रेगरी लेविस ने ‘द माँक’ में इसके कुछ अलग रूप तलाशे। यही रीति मेरी शेली ने अपनी रचना ‘फ्रेंकस्टीन’ में निभायी। पिछली बीसवीं शताब्दी में ‘सुपर नेचुरल’ के सच का पर्याप्त साहित्यिक विस्तार हुआ। अमेरिका में एडगर ऐलेन पो, वाशिंगटन इर्विंग, नेथेनील हावथोर्न, रूस में पुश्किन, जर्मनी में हाफमेन, पेरिस में नोडियार ने अपने साहित्य में सुपर नेचुरल की रोमाँचक व्याख्याएँ की। अमेरिका में- एच. वी. लोवक्राफ्ट ने अपने जमाने की पूरी पीढ़ी पर इसका जादुई असर छोड़ा। ब्रिटेन में एम.आर. जेम्स ने आत्मा का सच बयान कर सबको अचरज में डाल दिया। इसी तरह आर्थर मेकेन ने अपनी कृति में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान एक सैनिक द्वारा स्वर्ग से परी उतरने की आँखों देखी घटना का रोचक वर्णन करके खासी लोकप्रियता अर्जित की।
सुपर नेचुरल या अतिप्राकृतिक सत्य से सम्बन्धित घटनाओं को, परिकल्पनाओं को अपने साहित्य में उतारने, उकेरने वाले लेखकों में डिकेन्स, किटिंलग, वाल्टर डी ला मरे, हेनरी जेम्स और डी.एच. लारेन्स को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। अमेरिकन लेखक रेड ब्राडबरी ने अपनी कविताओं में इसकी सूक्ष्मता को अंकित करने की कोशिश की। एच.जी. वेल्स ने पहली बार सुपर नेचुरल या अतिप्राकृतिक कथा को विज्ञान कथा का रूप दिया।
सुपर नेचुरल या अतिप्राकृतिक की वास्तविकता क्या है- केवल कथा-कहानी या फिर सृष्टि का अद्भुत किन्तु अनुभूत किया जाने वाला सत्य। यह ऊहापोह सदा रही है और आज के विज्ञान युग में भी है। तर्क और प्रयोग की कसौटी वाले वर्तमान जीवन में एक प्रथा यह भी चल पड़ी है कि ऐसी चीजों को महज अन्धविश्वास कहकर उनकी जमकर हंसी उड़ायी जाय। हालाँकि इस संदर्भ में प्रख्यात् वैज्ञानिक विलियम नेपियर का कथन महत्त्वपूर्ण है, जो उन्होंने अपनी विख्यात कृति ‘द एक्सपेरीमेण्ट्स एण्ड एक्सपीरियेन्सेज़’ में कहा है। उनका कहना है कि ज्ञान व सत्य का विस्तार अनन्त है- जबकि मानवीय शक्ति की, उसके द्वारा अनुभव करने की सीमा है। आधुनिकतम उपकरणों द्वारा इस सीमा को थोड़ा-बहुत बढ़ाया तो जा सकता है, पर इतना अधिक नहीं कि ज्ञान और सत्य के अनन्त विस्तार को समूचे रूप में पाया, परखा और जाना जा सके।
विज्ञानवेत्ता विलियम नेपियर के शब्दों में ज्ञान और सत्य के अनन्त विस्तार का वह असीम अंश जो वैज्ञानिक प्रयोगों और मानवीय बुद्धि की सीमाओं से परे है। वही सुपरनेचुरल या अतिप्राकृतिक है। मानव को अन्तःसंवेदना को यदा-कदा इसकी झलक-झाँकी तो मिल जाती है, पर इसकी तर्क पूर्ण या बुद्धि सम्मत व्याख्या नहीं हो पाती। इसके बावजूद सुपरनेचुरल के सत्य को इसकी सत्ता और शक्ति को नकारा नहीं जा सकता। महान् वैज्ञानिक विलियम स्टैनले जेवाँन्स ने भी अपनी सुविख्यात कृति ‘द प्रिन्सिपल्स ऑफ साइन्स’ में सत्य को कुछ इस ढंग से उद्घाटित किया है। उनके अनुसार कोई भी सच्चा विज्ञान किसी भी सत्य के अस्तित्त्व से सिर्फ इसलिए इन्कार नहीं कर सकता है, क्योंकि वह उसके द्वारा तौला या मापा नहीं जा सका। यह भी तो हो सकता है कि वह सत्य उसकी तौल या माप की वर्तमान सीमाओं से बाहर हो। प्रकृति में ऐसे अनेकों आश्चर्य हैं, अस्तित्त्व के ऐसे अनेकों सत्य हैं, जिन्हें जान पाने में हमारी बुद्धि बौनी और असमर्थ है। पर बुद्धि के बौनेपन से उपजी असमर्थता के कारण इनके आश्चर्यजनक अस्तित्त्व को तो नकारा नहीं जा सकता।
इस वैज्ञानिक सत्य को स्वीकार करके इस युग के कई वैज्ञानिकों ने सुपरनेचुरल के अन्वेषण-अनुसन्धान के प्रयास किए हैं। इस क्रम में विज्ञानवेत्ता स्टीवेंसन, एस.जी.सोल एवं जे.बी. राइन का कार्य सराहनीय है। जे.बी. राइन ने अपनी कृति ‘न्यू फ्रंटियर्स ऑफ माइन्डस’ ने मानव मन और मानवीय शक्तियों से परे और पार नए क्षितिजों को पहचानने और परखने की कोशिश की है। उनकी यह पुस्तक सुपर नेचुरल के सच की वैज्ञानिकता को प्रामाणित करने का प्रयास है। इस कार्य से इस दिशा में अनुसन्धान कार्य के लिए उत्सुक विज्ञानियों को पर्याप्त दिशादर्शन एवं मार्गदर्शन मिलता है।
सुपरनेचुरल के वैज्ञानिक सत्य की व्यापकता के नूतन आयामों को उद्घाटित करने में मनोवैज्ञानिक फ्रायड का योगदान भी सराहनीय है। उन्होंने अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘साइकोलॉजी ऑफ ऑकल्टफिनामिना’ में इसकी सत्ता और सत्य को अपनी स्वीकारोक्ति प्रदान की है। उन्होंने इसे श्वस्क्क (एक्स्ट्रासेन्सरी परसेप्शन) के रूप में स्वीकारा है। ‘साइको एनालिसिस एण्ड टेलीपैथी’ नाम की पुस्तक में भी फ्रायड ने सुपरनेचुरल की सच्चाई का उल्लेख किया है। फ्रायड की ही भाँति सुविख्यात मनोविज्ञानी जुँग ने सुपर नेचुरल के विज्ञान पर अपना विश्वास जताया है। उनका कहना है कि मनुष्य की अन्तः संवेदना विकसित हो तो सुपर नेचुरल एक शब्द नहीं तथ्य और सत्य की अनुभूति के रूप में समझ में आने लगता है।
इन दोनों वैज्ञानिक विभूतियों के अतिरिक्त और भी विज्ञानवेत्ताओं ने इस पर अनुसन्धान करने का प्रयास किया है। इसके अनुसार इसकी अत्याधुनिक खोज का आधार डेप्थ साइकोलॉजी है। कई विशेषज्ञ इसका अध्ययन परा मनोविज्ञानी या पैरा साइकोलॉजी के रूप में करते हैं। आधुनिक फ्रेंच लेखक लुईस पावेल और जक्स बर्गीयर ने अपनी सुविख्यात रचना ‘द डॉन ऑफ मैजिक’ में इसको आधुनिक क्वाँटम सिद्धान्त के अंतर्गत समझाने की कोशिश की है। उनके अनुसार कुछ ऐसे सत्य होते हैं, जिनकी भौतिक ढंग से व्याख्या सम्भव नहीं है। इन्हें केवल मानवी अन्तःचेतना की विकसित शक्तियों से जाँचा, परखा और अनुभव किया जा सकता है।
आधुनिक वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों द्वारा अनुभव की जा रही मानवीय अन्तःचेतना के विकास की यह आवश्यकता भारतीय ऋषियों द्वारा प्रणीत योग विज्ञान से पूरी होती है। योग वह वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिससे मानव की अंतःशक्तियों का सचेतन रूप से सम्पूर्ण विकास सम्भव है। इस विकसित स्थिति में सुपरनेचुरल एक साहित्यिक कल्पना की सृष्टि नहीं, मानव की अनुभूत दृष्टि बन जाती है। मनोवैज्ञानिक कार्लगुस्ताव युँग ने स्वयं भी वर्षों तक ध्यान का अभ्यास करके इसकी प्रामाणिकता को परखा और जाना था। बाद के वर्षों में उन्होंने नोबुल पुरस्कार विजेता भौतिकशास्त्री वुलफाँग पौली के साथ मिलकर कुछ प्रयोग भी सम्पन्न किए। अपने निष्कर्ष में उन्होंने कहा कि आधुनिक भौतिक एवं आधुनिक मनोविज्ञान कई क्षेत्रों में एक दूसरे से सम्बन्धित दिखाई पड़ते हैं। यदि योग विज्ञान की साधनात्मक दृष्टि और इस आधुनिक विज्ञान की व्याख्या पद्धति का संयोग हो सके तो सुपर नेचुरल का वैज्ञानिक सत्य, विज्ञान की एक नवीन शाखा के रूप में जन्म और जीवन ग्रहण कर सकता है। अध्यात्म एवं विज्ञान के इस समन्वय से मानवीय शक्तियों से परे एवं प्रकृति से पार के सच का अनुभव एवं व्याख्या की जा सकती है।
आभामण्डल शारीरिक ऊर्जा का दिव्य विकिरण है। यह ऊर्जा प्राण शक्ति के रूप में शरीर में उफनती-लहराती रहती है। यह जिसमें जितनी मात्रा में होती है वह उतना ही प्रखर एवं प्राणवान होता है, उसका आभामण्डल उतना ही ओजस्वी-तेजस्वी होता है। यूँ तो यह ऊर्जा शरीर के प्रत्येक कोशों से विकरित होती है। परन्तु चेहरे पर यह अत्यधिक घनीभूत होती है। इसलिए प्राण शक्ति से सम्पन्न अवतारी पुरुष, ऋषि, देवता, सन्त, सिद्ध, महात्माओं का चेहरा दिव्य तेज से प्रभापूर्ण होता है। उनका आभामण्डल सूर्य सा तेजस्वी एवं प्रकाशित होता है। इस तथ्य को आधुनिक विज्ञान भी स्वीकारने लगा है।
सिद्ध महात्माओं के चेहरों का आभामण्डल महज एक चित्रकार की तूलिका का काल्पनिक रंग नहीं बल्कि एक यथार्थ है, एक सत्य है। हालाँकि इसे देखने के लिए दिव्य दृष्टि चाहिए एवं अनुभव करने के लिए भाव सम्पन्न हृदय की आवश्यकता है। ऐसा हो तभी इस आभामण्डल को देखा, परखा एवं अनुभव किया जा सकता है। वस्तुतः आभामण्डल और कुछ नहीं प्राण शक्ति एवं ऊर्जा का व्यापक विकिरण है जो जीवनी शक्ति से आप्लावित प्राणी की देह से संश्लिष्ट रहती है। हर व्यक्ति इस शक्ति सामर्थ्य से भरा-पूरा हो सकता है। इसे बढ़ाने के लिए एकमात्र साधन तप-साधना है।
तपोमय जीवन जीने वालों का आभामण्डल बड़ा तेजयुक्त होता है। इसका प्रभाव क्षेत्र उसकी तप की सघनता एवं तीव्रता के अनुरूप व्यापक होता है। इससे न केवल व्यक्ति ही प्रभावित होते हैं बल्कि उनके आसपास का समूचा वातावरण ज्योतिर्मय हो उठता है। योग साधना के नये आयाम को विकसित करने वाले श्री अरविन्द की साधना इतनी प्रखर थी कि कागामारु जहाज द्वारा जापान से पाण्डिचेरी आते समय श्री माँ ने 50 मील की दूरी पर ही इसका अनुभव कर लिया था। इसी के प्रभाव से तपस्वी की तपस्थली एवं साधक का साधना स्थान पुण्य तीर्थ बन जाता है जहाँ पर इन दिव्य शक्तियों का प्रचण्ड प्रवाह बना रहता है। और इसके आसपास आने वाले हर व्यक्ति को उसकी पात्रता के अनुरूप उस अनुदान-वरदान की वृष्टि होती रहती है।
तीर्थों का भी आभामण्डल होता है। इसकी तीव्रता वहाँ पर की गयी तपस्या पर निर्भर करती है। जिस तीर्थ में जितना अधिक तप किया जाता है। उसका आभामण्डल उतना ही ओजस्वी तंत्र सम्पन्न होता है। अगस्त्य एवं श्री अरविन्द की तपस्थली पाण्डिचेरी, रमण महर्षि का अरुणाचलम्, अनेक ऋषियों का आश्रयस्थल गंगा एवं नर्मदा नदी का किनारा इन्हीं विशेषताओँ से युक्त है। इन सबसे सर्वोपरि अनेकों विशेषताओं से युक्त हिमालय का हृदय क्षेत्र है। वहाँ की गयी तपस्याओं से प्रभावित शक्तिशाली आभामण्डल विद्यमान है। प्राचीन ऋषियों के द्वारा इस तप संस्कारित भूमि में अनेक ऋषि-महर्षि वहाँ पर तप करते हुए इसके आभामण्डल में अभिवृद्धि करते रहते हैं। इसी कारण इसे आध्यात्म शक्ति का ध्रुव केन्द्र कहा जाता है।
धरती पर और भी ऐसे अनेक छोटे-बड़े केन्द्र हैं, जहाँ से प्रचण्ड प्राणशक्ति प्रवाहित होती है। इसी तरह अपने शरीर के अन्दर भी कई ऊर्जा केन्द्र हैं। अध्यात्म विज्ञान में यह केन्द्र षटचक्रों के माध्यम से जाने जाते हैं। प्रत्येक चक्र अपने आप में शक्तिशाली ऊर्जा के केन्द्र हैं। इनके आभामण्डल का रंग भी इनके अनुरूप भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता में भी शरीर के ऊर्जा बिन्दुओं के स्थानों का स्पष्ट वर्णन मिलता है। इनके अनुसार पाँव के तलुओं और हथेली से शरीर के सभी ऊर्जा बिन्दु आपस में जुड़े हुए हैं। पाँवों के अंगूठों तथा हाथ की अंगुलियों में ये चैतन्य केन्द्र अधिक शक्तिशाली होते हैं। इसी कारण गुरुजनों एवं संत-महात्माओं के चरणों पर शीश नवाया जाता है।
शरीर, ऊर्जा की तपती भट्टी के समान है। तप के द्वारा यह और भी प्रखर हो सकता है। परन्तु दुर्भाग्य से अन्तहीन कामनाओं, वासनाओं के कुचक्र एवं कुविचारों से इसकी प्रखरता का निरन्तर ह्रास होता रहता है। जबकि विधेयात्मक चिन्तन से इन केन्द्रों को और भी अधिक सक्रिय बनाये रखा जा सकता था। ये केन्द्र धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों प्रकार के होते हैं। एक्यूप्रेशर पद्धति के अनुसार शरीर में एक हजार ऊर्जा बिन्दु है। इनमें 160 केन्द्र ऐसे हैं जिन्हें अधिक शक्तिशाली कहा जा सकता है। सामान्यतः ये केन्द्र सुषुप्त पड़े रहते हैं इन्हें विशिष्ट साधनाओं द्वारा जगाया-उभारा जाता है ओर अनेक प्रकार के लाभ उठाए जा सकते हैं। तिब्बत में ध्यान-समाधि आदि योग पद्धतियों द्वारा शरीर के इन विशिष्ट ऊर्जा केन्द्रों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इससे शरीर तप्त लोहे के समान तप जाता है। ऐसे साधक बर्फीले जल में भिगाया गया वस्त्र ओढ़कर सुखा लेते हैं। ये साधक 40-40 दिन तक निर्वस्त्र होकर बर्फ के गड्ढ में रह जाते हैं। यह तप की ऊर्जा ही है जो शरीर के द्वारा प्रकट होती है। बहन मुक्ताबाई का सन्त ज्ञानेश्वर की नंगी पीठ पर रोटियाँ सेंक लेने की अद्भुत घटना तप से उत्पन्न इसी शारीरिक ऊर्जा की ओर संकेत करती है। यही ऊर्जा साधक एवं तपस्वी के चेहरे एवं शरीर पर तेजोमण्डल बन कर चमकती है।
आधुनिक विज्ञान भी आभामण्डल की इस संघनित ऊर्जा को स्वीकारने लगा है। इस तथ्य की पुष्टि करने के लिए रूसी वैज्ञानिक एडामेको ने एक विशेष मशीन भी बनायी। परीक्षण के लिए इसके चारों ओर विद्युत् बल्ब लगाए गए। इस मशीन की विशेषता शरीर के क्रियाशील ऊर्जा केन्द्रों के प्रति संवेदनशील होना है। जब व्यक्ति को इसके सामने खड़ा किया जाता है तो उसके शरीर में जितने सक्रिय केन्द्र हैं, उस स्थान के बल्ब जलने लग जाते हैं। जो केन्द्र निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं वहाँ बल्ब नहीं जलता है। अतः इस प्रयोग से स्पष्ट होता है कि सक्रिय केन्द्रों से ऊर्जा का सतत प्रवाह बना रहता है जो आभामण्डल की सृष्टि करती है।
इस क्षेत्र में एक अन्य रूसी वैज्ञानिक किरलियन का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने अपने प्रयोग के दौरान कुछ जीवित व्यक्तियों के चित्र खींचें और पाया कि हर व्यक्ति अपनी निजी ऊर्जा किरणों से आवेष्टित है। परन्तु जब इन्होंने मृत व्यक्तियों के चित्र लिया तो पाया कि शव का चित्र तो उभरता है किन्तु उसकी ऊर्जा का वर्तुल गायब है। उसमें आभामण्डल का अभाव होता है। किरलियन ने यह भी देखा कि मरणासन्न व्यक्ति की देह से ऊर्जा क्रमशः घटती है। यह क्रम मृत्यु के पश्चात् तीन दिनों तक चलता है। चौथे दिन से ऊर्जा किरणें शव के आसपास दिखाई नहीं देती।
अब यह वैज्ञानिक सत्य है कि जो व्यक्ति जितना प्राणवान है उसका आभामण्डल उतना ही सशक्त होगा। और वह अपने आसपास के जड़-चेतन सभी वस्तुओं को प्रभावित करेगा। इसी कारण ऐसे व्यक्ति के उस स्थान पर न रहने पर भी उसका सूक्ष्म आभामण्डल मण्डराता रहता है। अलीपुर जेल के एक सेल में एक सामान्य कैदी को जब रखा गया तो वह उन्मादग्रस्त हो उठा क्योंकि कुछ साल पहले उस सेल में श्री अरविन्द अपनी जेल यात्रा के दौरान साधना करते थे। श्री अरविन्द की प्रचण्ड प्राण शक्ति उस सेल के कण-कण में व्याप्त थी जो कैदी के मनःस्थिति से भारी पड़ने के कारण उसे विक्षिप्त करने लगी। यही कारण है कि आज वैज्ञानिक आभामण्डल से व्यक्ति की पहचान की बात सोचने लगे हैं।
यूँ तो यह आभामण्डल हर व्यक्ति में कम या अधिक मात्रा में होता है, परन्तु महान् आत्माओं, दिव्य एवं श्रेष्ठ पुरुषों में यह अत्यधिक सघन एवं तेजस्वी होता है। यह उनके शरीर एवं मस्तक के चारों ओर प्रकाशपुँज के समान दिखाई देता है। इसे ऑरिओल-ज्योतिचक्र कहा जाता है। मस्तक के चारों ओर झलकने वाले इस प्रकाशपुँज को प्रभामण्डल या हैलो कहा जाता है। ध्यान योगी का प्रभामण्डल अत्यन्त तीव्र होता है। जिनका सहस्रार जाग्रत् होता है। उनका प्रभा मण्डल वृत्ताकार तथा सुनहला चमकीला होता है। यह इतना स्थायी होता है कि सामान्य आँखों से भी देखा जा सकता है। भगवान् बुद्ध ऐसे ही ध्यान योगी माने जाते हैं जिनका सहस्रार पूर्णरूपेण जाग्रत् था।
हर व्यक्ति में यह नैसर्गिक गुण है कि वह अपनी अन्तःशक्तियों को जाग्रत् कर अपने आभामण्डल को और व्यापक बनाएँ। मानव से महामानव बनने का यह द्वार सबके लिए समान रूप से खुला हुआ है। आवश्यकता है तो बस इतना कि अपने विचारों एवं भावनाओं को तप की दिशा की ओर मोड़ा जाय।
बैसाख शुक्ल पंचमी (17 मई) राष्ट्र के साँस्कृतिक इतिहास का पुण्य दिवस है। इस शुभ दिन भगवत्पाद आदि शंकराचार्य धराधाम पर अवतरित हुए थे। बैसाख का मास, शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि, रविवार को केरल प्रदेश के कालड़ी ग्राम ने उनकी जन्म स्थली होने का सौभाग्य पाया था। भगवान आदि शंकराचार्य के जन्म का इतिहास बताने वाले अनेकों ग्रन्थ हैं। इतिहास की परम्परा के अनुसार इनमें मत भिन्नता भी है। पर ये सभी एक मत से उनके यशस्वी, तपस्वी और मनस्वी जीवन की गाथा गाते हैं। यह सत्य पूर्णतया स्वीकृत एवं प्रमाणित है कि भगवान शंकराचार्य भारतीय संस्कृति एवं साधना के पर्याय हैं। उन्होंने न केवल अध्यात्म साधना के शिखर पर आरुढ़ होकर एकता के सत्य को जाना, बल्कि बाह्य जीवन में भी राष्ट्र को एकता का महत्त्व बताया। राष्ट्रीय एकता की स्थापना की।
भगवत्पाद आचार्य शंकर की जीवन-गाथा का उल्लेख कूर्म, लिंग, पद्म, सौर, स्कन्द और भविष्योत्तर पुराणों में स्पष्ट या अस्पष्ट रीति से मिलता है। मार्कण्डेय और शिव रहस्य नाम की बृहदाकार संहिताएँ भी आचार्य की यशगाथा सुनाती हैं। इसके अलावा पद्मपाद की विजय डिण्डिम, आचार्य चित्सुख की बृहत्-शंकरविजय, आनन्द गिरि की शंकर विजय, व्यासाचल की शंकर विजय, गोविन्दनाथ की शंकराचार्य चरित, चिद्विलास की शंकर-विजय विलास, राजचूड़ामणि दीक्षित की शंकराभ्युदय, तिरुमल दीक्षित की शंकराभ्युदय, सदानन्द की शंकर दिग्विजय-सार आदि रचनाएँ आचार्य वर के जीवन का यशगान करती हैं।
भगवान् शंकराचार्य का जीवन है ही इतना दिव्य और लोकोत्तर कि उसकी कथा को सही ढंग से कह पाने में सभी भाषाएँ, लिपियाँ एवं इनकी शब्दावली स्वयं को असहाय एवं असमर्थ अनुभव करती हैं। ब्रह्मर्षि शिवगुरु एवं उनकी भार्या माता विशिष्ट के घर में जन्में भगवत्पाद शंकर जन्म से ही शिवत्व की विशिष्टताओं से आपूरित थे। उनके जन्म के समय पण्डितों ने जो जन्मकुण्डली तैयार की उसे देखकर वे स्वयं हतप्रभ रह गए। बालक के जन्म के समय वृषभ लग्न थी। मेष राशि में सूर्य और बुध थे। शुक्र वृषभ में था, और चन्द्रमा, पुनर्वसु नक्षत्र में। शनि तुला में, गुरु वृश्चिक में और मंगल मकर राशि में।
जन्म कुण्डली के अतिरिक्त उनके शरीर के चिह्नों को देखकर ज्योतिषियों ने यह अनुमान लगाया कि यह विलक्षण बालक पैदा हुआ है। इसके मस्तक पर चन्द्रमा जैसी ज्योति खेल रही है। मस्तक के मध्य में शिव की तरह तृतीय नेत्र जैसा चिह्न बना हुआ है। इसके कन्धों पर त्रिशूल विराजमान है। शरीर की कान्ति स्फटिक मणि के समान निखर रही है। ज्योतिषियों ने शास्त्रवचनों का स्मरण किया-
मूर्धनि हिमकर चिह्न, निटिले नयनाँऽकं अंसयोशूलम् वपुषं स्फटिक सवर्णं, प्रज्ञास्तं मेनिरे शुभम्॥
और तब उन्हें कुछ ऐसा लगा मानों स्वयं भगवान् शिव भारत की धरती पर ज्ञान का प्रकाश फैलाने आ गए हैं।
इतिहासवेत्ताओं के अनुसार शंकर के बाल्यकाल में जनता का घोर दारिद्रय, जाति वर्ण का विकट कलह, संघर्षशील राज्यों का देश विनाशक वैमनस्य, मादक द्रव्यों का उत्पात, धर्म के नाम पर स्थान-स्थान पर युद्ध, विदेशियों का नित्य प्रति बढ़ता प्रभाव, मानव मूल्यों का पूर्णतया विघटन, धर्म परिवर्तन के नए प्रश्न पिशाच की भाँति मुख फैलाए समूचा भारत निगलने को तैयार बैठे थे। ऐसे में जब राष्ट्र के वयोवृद्ध घर-परिवार की आसक्तियों एवं चिन्ताओं में जकड़े बंधे थे। युवाजन विलास एवं आमोद प्रमोद को ही जीवन का परिचय मान बैठे थे। आठ वर्षीय बालक शंकर राष्ट्र के सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए उठ खड़े हुए। उनमें तप की ज्वालाएँ थीं, ज्ञान का प्रकाश था और संन्यास का तेज था। इस आठ वर्षीय महाज्ञानी संन्यासी ने एकादश उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे। प्रस्थान त्रयी के इस भाष्य के अलावा उन्होंने विष्णु सहस्रनाम भाष्य, अध्यात्मपटल भाष्य, योग सूत्र भाष्य विवरण आदि अन्य भाष्य भी लिखे। अपरोक्षानुभूति, आत्मबोध, पञ्चीकरण प्रक्रिया, विवेकचूड़ामणि, उपदेशसहस्री आदि अनेकों ग्रन्थों का प्रणयन किया। दक्षिणामूर्ति स्रोत, सौंदर्य लहरी, आनन्द लहरी जैसे रहस्यमयी साधनाओं को बताने वाले अनेकों स्त्रोतों की रचना की।
इस अलौकिक किशोर संन्यासी ने अपने तप और ज्ञान से, आध्यात्मिक शक्तियों की प्रचण्ड सामर्थ्य से सारे देश में ऐसा नव जागरण उत्पन्न किया कि समूचा भारत उनके बाद भी लगभग चार सौ वर्षों तक अपनी स्वतंत्रता और संस्कृति को बचाते हुए विदेशी आक्रमणों से देश को सुरक्षित रख सका। इतिहास की गहनता से अपरिचित जनों के लिए यह सत्य कुछ विचित्र लग सकता है, फिर भी यह सत्य है। शाँकर मठों में प्रचलित बृहच्छंकर विजय के अनुसार शंकर का आविर्भाव काल ई. पूर्व 508 से 476 है। केरलोपत्पत्ति नामक ग्रन्थ के अनुसार यह समय 400 ई., इतिहासकार फ्लीट ने भगवत्पाद शंकर का समय 630 के आस-पास निर्धारित किया है। इतिहास के अनेकों प्रमाण इस कथन को सत्य ठहराते हैं कि भगवत्पाद शंकर ने जो समूचे राष्ट्र में साँस्कृतिक क्रान्ति की, उससे देश 400 सालों तक सुरक्षित रहा।
सभी प्रधान भारतीय एवं अभारतीय अभिलेखों के आधार पर इतिहासवेत्ता आर.सी. मजूमदार लिखते हैं-
कन्नौज नामक महानगरी के महाराज महिपाल को उत्तरभारत का सम्राट स्वीकार करके सभी राजा महाराजा प्रसन्नतापूर्वक देश रक्षा के लिए संगठित होकर जूझने को तैयार हो गए। आचार्य शंकर के प्रयास से दक्षिण भारत के भी सभी धार्मिक नेता और राजन्यवर्ग परस्पर वैमनस्य भूलकर ऐसे सुसंगठित हुए कि विदेशी आक्रमणकारियों को भारत पर आक्रमण करने का साहस ही नहीं हुआ। कहने का तात्पर्य यह है कि उत्तर भारत में महाराज महिपाल और प्रतिहार राजा नागभट्ट, कश्मीर के राजा जयपीड़ की सम्मिलित शक्ति से सिन्ध-भद्रदेश विदेशी शासन से मुक्त हुआ। दक्षिण भारत में विदेशी शासन के जो बादल चेरामन पेरुमल के कारण उमड़ रहे थे, वे राष्ट्रकूट महाराज गोविन्दराज, चालुक्य, चोल, केरल आदि राजाओं के सैन्य झंझावात से देखते-देखते विलीन हो गए।
इन प्रमाणों के आधार पर तत्कालीन भाषाओं का उल्लेख करते हुए प्रो. मजूमदार ने यावनी भाषा को यमन प्रदेश (अरब) की भाषा माना है। इस इतिहास सत्य के सहारे नव जागरण का वह महामंत्र भी स्पष्ट हो जाता है, जो भगवत्पाद आचार्य ने भारत के जन-गण को दिया था। सिन्ध, भ्रद भ्रमण के समय जब आर्त जनता ने भगवान शंकराचार्य से विदेशी सत्ता से स्वतंत्र होने का मार्ग पूछा- ‘महाराज, किं र्स्मतव्यं?’ आचार्य ने उत्तर दिया- ‘हरेर्नाम सदा न यामिनी भाषा।’ अर्थात् हरिनाम का स्मरण करो, न कि अरबों की भाषा। यही नव जागरण का मंत्र था, जो उन दिनों घर-घर में व्याप्त हो गया। यही सूत्र था, विदेशी भाषा, विदेशी संस्कृति के बहिष्कार का और राष्ट्रीयता के जागरण का।
आचार्य के इस नव जागरण का परिणाम था कि सभी धर्मों, सम्प्रदायों एवं वर्गों ने मिलकर उन्हें सर्वज्ञ पीठ पर बिठाया। आचार्य ने देश के उत्तर में बद्रीनाथ का ज्योतिर्मठ, दक्षिण में शृंगेरीमठ, पूर्व में पूरी के गोवर्धन मठ एवं पश्चिम में द्वारका के शारदा मठ की स्थापना करके राष्ट्र की संस्कृति-संवेदना को एक सूत्र में पिरो दिया। आचार्य के तप, त्याग, ज्ञान, श्रम एवं संकल्प से उन दिनों राष्ट्र में जो नव जागृति आयी, उसी सत्य को आज फिर से प्रकट करने की आवश्यकता है। इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रीय नव जागरण ही भगवान् आदि शंकराचार्य के जन्मोत्सव का संदेश है।
साधना का अर्थ जीवन के हर पक्ष में आदर्शवादिता और प्रामाणिकता समावेश है। जो भी इस कसौटी पर खरा उतरता है, उसको स्वर्णकार की तरह सम्मानपूर्वक उचित मूल्य मिलता है, पर पीतल को सोना बनाकर बेचने की फिराक में फिरने वाले को हर कहीं दुत्कारा जाता है।
आहार, आवेग और स्वास्थ्य का परस्पर गहरा संबंध है। संवेग के गड़बड़ाने, घटने या बढ़ने से खुराक प्रभावित होती है। खुराक यदि प्रभावित हुई, तो उसके दो प्रकार के परिणाम सामने आते हैं-दुर्बलता अथवा मोटापा। भोजन की मात्रा कम होने से कमजोरी आती है और ज्यादा होने पर स्थूलता बढ़ती है। स्थिर स्वास्थ्य तभी बना रहा सकता है, जब आवेग नियंत्रित हो।
वैज्ञानिक एमझ्एसझ् गजेनिगा अपनी रचना ‘पैटर्न्स ऑफ इमोशन्स’ में लिखते हैं कि हमारा पूरा शरीरतंत्र और उसकी गतिविधियाँ संवेगों पर आधारित है। उसके अच्छा होने पर शरीर-क्रिया सामान्य बनी रहती है, जबकि इसकी बुरी प्रकृति समस्त प्रणाली को असामान्य स्तर का बना देती है। ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने वाले आचार-व्यवहार से लेकर शरीर में चलने वाले सूक्ष्म आँतरिक क्रियाकलाप भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। भूखे चूँकि सूक्ष्म आभ्यंतरित हलचल की परिणाम है, अतः उस पर भी भावनात्मक उथल-पुथल का स्पष्ट असर दिखलाई पड़ता है। वे कहते है कि अध्ययनों के दौरान यह देखा गया है कि आह्लाद एवं तनाव की स्थिति में आहार की मात्रा बढ़ जाती है, जबकि उदासी और निराशा उसे अस्वाभाविक रूप से घटा देती है।
यह सच है कि बार-बार अधिक मात्रा में अधिक कैलोरी युक्त भोजन लेने से मोटापा बढ़ता है, पर तनाव के दौरान बार-बार भोजन लेने की आवश्यकता आखिर क्यों महसूस होने लगती है? इस संबंध में शरीरशास्त्रियों का कहना है कि इसे आवश्यकता या इच्छा कहने के बजाय शरीर-क्रिया का अंग मानना ज्यादा उपयुक्त होगा। उनके अनुसार शरीर तनावग्रस्त होता है, तो भीतरी प्रणालियाँ उसे मिटाने के लिए अपने ढंग से प्रयास आरंभ कर देती हैं और ऐसे ऐसे रसायनों का निर्माण करने लगती है, जो आँतरिक दबाव को घटा सकें। इस क्रम में भूख उत्तेजित करने वाले रस-स्राव भी पैदा होने लगते हैं। इस स्राव के द्वारा काया तनाव को कम करने का उपक्रम करने लगती है। यही कारण है कि भोजन के मध्य व्यक्ति तनाव से कुछ राहत अनुभव करता है। यह राहत यों तो अस्थायी और अस्थिर होती है; पर जब तक रहती है, व्यक्ति को आरामदायक स्थिति प्रदान किए रहती है।
इसी प्रकार जब कभी कोई बहुत भावनात्मक आघात पहुँचता है, तो एक बार फिर समस्त आँतरिक संस्थानों का व्यतिक्रम हो जाता है और उससे आदमी दूसरे ढंग से प्रभावित होता है। चूँकि तनाव और विषाद में बाह्य लक्षणों के साथ-साथ आँतरिक संरचना में भी फर्क होता है, इसलिए देह-संस्थान उन दोनों के साथ पृथक्-पृथक ढंग से पेश आता है। तनाव में जहाँ भूख उत्तेजित होती है, वहीं अवसाद में वह घटती है। दबाव की स्थिति में यदि क्षुधा बढ़ती है, तो इसका एक ही मतलब है-शिथिलता लाना और काया को अस्वाभाविकता से मुक्त बनाए रखना। चूँकि अवसाद की स्थिति में शरीर प्रायः तनावरहित होता है, अतः भूख बढ़ाकर उसे घटाने-मिटाने का कोई प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इसी कारण ऐसे समय में भीतर तंत्र क्षुधावर्द्धक रस उत्पन्न नहीं करते।
हाल की शोधों में भी इस तथ्य को बल मिला है कि भोजन और आवेग के बीच गहरा लगाव है। शिकागो मेडिकल कालेज के अनुसंधानकर्त्ताओं का कहना है कि डाइटिंग करने वाले लोग सामान्यजनों की तुलना में तनाव, आवेग और उत्तेजना के प्रति अधिक संवेदनशील होते है। उनके अनुसार यदि ऐसे लोग डरावने दृश्य देख लें, तो उनके संवेग में असामान्य ढंग से बढ़ोत्तरी के कारण इस मध्य उनकी आहार की मात्रा में भी आश्चर्यजनक वृद्धि होती देखी गई है। इस स्थिति में मोटापा भी बढ़ने लगता है।
एक प्रयोग के द्वारा इसकी पुष्टि हो गई। अन्वेषणकर्त्ताओं ने इसके लिए 30 महिलाओं का चयन किया। इनमें से 15 स्त्रियाँ ऐसी थी जो डाइटिंग करती थीं। इन सभी को निश्चित संख्या में कुछ सूखे खाद्य पैकेट दिए गए। इसके उपरांत उन्हें ऐसे भयोत्पादक फिल्म ‘हलोबीन’ के कुछ डरावने दृश्य दिखाए गए। आधे घंटे के पश्चात फिल्म की समाप्ति पर जब उनकी खाद्य सामग्री का लेखा-जोखा लिया गया, तो अध्ययनकर्त्ता यह देखकर विस्मय में पड़ गए कि जो महिलाएँ नियमित डाइटिंग करता थीं, उन सबने डाइटिंग नहीं करने वाले ग्रुप से दुगने परिणाम में भोजन उदरस्थ किया था।
उक्त प्रयोग से वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि डरावने दृश्यों से तनावजन्य आवेग में वृद्धि होती है। काया उसे अपने ढंग से सुधारने के क्रम में आँतरिक क्रियाविधि में परिवर्तन लाती है। अंतर के इस बदलाव के कारण भूख बढ़ाने वाले रसों का निर्माण होता है। इससे जठराग्नि की ज्वाला भड़कती है। क्षुधा बढ़ती है, तो बार-बार खाने की आवश्यकता महसूस होती है। यह स्थिति लंबे समय तक बने रहने पर चर्बी में अनावश्यक वृद्धि होने लगती है, जो अवाँछित मोटापे का कारण बनती है। इस वृद्धि के साथ शारीरिक कठिनाइयाँ भी बढ़ने लगती है, जिनसे व्यक्ति तब तक छुटकारा नहीं पा सकता, जब तक इसके पीछे के निमित्त को ठीक न किया जाए। देखा गया है कि भावनात्मक संवेग को लेने पर इस प्रकार की शिकायत देर तब टिकी नहीं रहती। इसलिए विशेषज्ञ इस संबंध में प्रायः यह सलाह देते देखे जाते हैं कि आवेग और उत्तेजना पर यदि अंकुश लगाया जा सका, तो एक सीमा तक मोटापे को नियंत्रित किया जा सकना संभव है।
यों चर्बी बढ़ने के कई अन्य कारण भी हैं; पर सबमें प्रमुख भावनात्मक अव्यवस्था ही है। इससे शरीर प्रणाली की सहज और स्वाभाविक क्रिया प्रभावित होती है और ऐसी कृत्रिमता का उदय होता है, जो संपूर्ण तंत्र को असहज बनाए रखती है। इस दशा में अंग-अवयव अपने निर्धारित रसायनों से हटकर दूसरे प्रकार के निर्माण में जुट जाते है, जो अंततः स्थूलता के लिए जिम्मेदार होते है।
हमारे आवेग-संवेग नियमित-नियंत्रित बने रहें, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम किस परिवेश में रहते हैं और हमारी दिनचर्या क्या है? हम किस प्रकार की पुस्तकें पढ़ते और मनोरंजन के लिए कैसी फिल्में देखते हैं? यदि सब कुछ सहज-स्वाभाविक रहा, तो अचेतन पर उसका अनुकूल असर पड़ता है, जो शरीर तंत्र को सुचारु और स्वस्थ बनाए रखता है।
यह सर्वविदित है कि दृश्य-श्रव्य माध्यमों का मन पर गहरा असर पड़ता है। यह प्रभाव जिस प्रकार का और जितने अंशों में होगा, शरीर के अंग-अवयवों और क्रियाविधि में वैसी ही प्रतिक्रिया परिलक्षित होगी। कोई व्यक्ति यदि नियमित रूप से किसी मनोरम उपवन में घूमता है, जहाँ उसकी मनोदशा उत्फुल्लता से ओतप्रोत बनी रहती है, तो निश्चित रूप से इसका उसके अचेतन पर वाँछनीय और अच्छा असर पड़ेगा। इससे उसकी संवेगात्मक स्थिति संतुलित बनी रहेगी, जो उसके उत्तम स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाए रखेगी। इसके विपरित यदि किसी की आँखों के सामने कोई हत्या हो रही हो, तो इससे उसके अंदर जो विक्षोभ पैदा होगा, वह शरीरतंत्र की संपूर्ण समरसता को इस प्रकार अस्त−व्यस्त बना देगा, जो सरलतापूर्वक सामान्य रूप में न आ सके। यदि उस वातावरण में ऐसी लोमहर्षक घटनाएँ और डरावने दृश्य बराबर दिखलाई पड़ते रहें तो यह स्थिति एक मानसिक अव्यवस्था को जख्म देगी, जो अंततः शारीरिक अस्वस्थता का कारण बनेगी।
पढ़ने-सुनने का भी शरीर-स्वास्थ्य पर ऐसा ही अनुकूल-प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।हम जो कुछ भी पढ़ते-सुनते हैं, हमारा मस्तिष्क उसकी कल्पना साकार रूप में करता चलता है। तदनुरूप उसकी प्रतिक्रिया भी सामने आने लगती है। कथानक यदि सुखद, सुँदर और कल्याणकारी हो तो उससे मन आनंद से भर उठता है वह बार-बार उसे ही याद करना चाहता है। इससे उन संवेगों को पोषण मिलता है, जो स्वास्थ्यकारी हैं। इसके विपरित हिंसक और डरावने कथानकों से रोंगटे खड़े होने लगते हैं। भय, चिंता, विषाद जैसी मन-स्थिति पैदा होने लगती है। इसका असर अधिक होता है। अंदर के गड़बड़ाने से बाहर का लड़खड़ाना, स्वास्थ्य का कमजोर पड़ना स्वाभाविक ही है। यही कारण है कि ऐसे अवाँछनीय पठन-श्रवण को स्वास्थ्य विज्ञान में निषिद्ध ठहराया गया है।
शरीर का मूल मन है। वह यदि असामान्य और अस्वाभाविक स्थिति में उत्तेजनाग्रस्त बना रहा, तो देह तंत्र सहज और स्वस्थ बना न रह सकेगा। संवेगों के घटने-बढ़ने के हिसाब से स्वस्थता भी प्रभावित होगी और उससे आहार की मात्रा भी अछूती न रह सकेगी। इसलिए “एकै साधे सब सधे” की उक्ति को चरितार्थ करते हुए यदि संवेगों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया गया, तो समझना चाहिए कि समग्र स्वास्थ्य की समस्वर स्थिति प्राप्त कर ली गई।
यों तो पलकें आँखों की सुरक्षा के लिए होती है और सेकेंड के दसवें हिस्से से भी यह कम समय में झपकती रहती हैं। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ सब कुछ सहज-स्वाभाविक है। कई बार इनका गिरना-उठना असामान्य रूप से इतना तेज अथवा मंद हो जाता है कि उसमें किसी अस्वाभाविकता की स्पष्ट झलक मिलती है। यह वास्तव में व्यक्ति की उस मनोदशा की परिचायक होती है, जिससे वह उस समय गुजर रहा होता है। दूसरे शब्दों में यह सामने वाले की तात्कालिक मनः स्थिति को परखने का एक दर्पण है।
प्रायः हर एक की पलकें एक नियमित अंतराल से खुलती और बंद होती रहती हैं। यह एक नैसर्गिक क्रिया है। इसमें आँखों की सुरक्षा और सफाई ही प्रमुख होती है; किंतु अनेक बार जब व्यक्ति असाधारण अवस्था से गुजरता होता है, तो इससे उसकी पलकों की गति भी प्रभावित होती है और उसमें तेजी या सुस्ती आ सकती है। उदाहरण के लिए, जब व्यक्ति आवश्यकता से अधिक सावधान या सचेत होता है, तो उसकी पलकें कम झपकती है। रुचिकर विषय अथवा वस्तु को पढ़ते-देखते समय भी यह गति स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है। ऐसे समय इसकी रफ्तार प्रति मिनट लगभग छह होती है; किंतु यदि विषय-वस्तु व्यक्ति की मनपसंद की न हो तो, तो यह क्रिया तीव्र हो सकती है। वार्त्तालाप कर रहे दो व्यक्तियों में से कौन कितना एक दूसरे की बातों में रस ले रहा है- यह उनके पलकों की गिरने-उठने की गति से जाना जा सकता है। जो ऊब या आलस्य महसूस कर रहा होगा, उसकी अत्यधिक गतिवान पलकें यह बता देंगी कि श्रोता को वक्ता एवं उसकी बातों में कोई रुचि न ही है।
इस संबंध में एक प्रयोग बर्लिन यूनिवर्सिटी के दो मनोवैज्ञानिकों ने किया। उन्होंने कतिपय लोगों को संगीत की कुछ उबाऊ धुनें सुनाई। आधे घंटे के इस प्रयोग के दौरान देखा गया कि सामान्य स्थिति में उनकी पलकें जितनी बार झपकती थीं, उसकी आवृत्ति इस बार धुन बदल दी गई। अबकी बार का संगीत सरस और सुरीला था, अतः इसका परिणाम पहले से विपरित प्राप्त हुआ। देखा गया कि इस मध्य श्रोताओं की पलकें असामान्य रूप से कम झपकीं। इस प्रयोग से यह सिद्ध हो गया कि रुचि-अरुचि, पसंद-नापसंद का कितना और कैसा प्रभाव हमारी पलकों पर पड़ता है। इस आधार पर सामने वाले का मनोभाव आसानी से जाना जा सकता है।
शोधों से यह भी ज्ञात हुआ कि कार्य के दौरान बरती गई एकाग्रता एवं तन्मयता का स्पष्ट आभास आँख के खुलने-बंद होने की गति से सरलतापूर्वक हो जाता है। उदाहरण के लिए ,चित्र बनाते समय चित्रकारों की पलकें अपेक्षाकृत कम उठती -गिरती है। यह उसके एकाग्रचित्त का द्योतक है। कवि जब अपनी कल्पना की दुनिया में खोता है, साहित्यकार अपने विचार-प्रवाह में बहता है, कर्मयोगी किसी काम में निष्ठापूर्वक निमग्न होता है, संगीतकार किसी नई धुन की रचना कर रहा होता है, तब भी उनकी पलकों के झपकने की गति कम होती है।
इसके विपरित मानसिक उलझन में पड़े तनावग्रस्त व्यक्ति की पलकें जल्दी-जल्दी उठती-गिरती है। यदि वह परेशान में हो, किंकर्त्तव्यविमूढ़ बना हुआ हो, असमंजस की दुविधाजनक स्थिति में हो तो भी आंखों के खुलने-बंद होने की रफ्तार तीव्र होती है। पलकों का गिरना-उठना यह भी दर्शाता है कि व्यक्ति में कितना आत्मविश्वास है। एक आत्मविश्वासी अपनी बात को प्रकट करते समय अपेक्षाकृत कम पलकें झपकता है, जबकि उस व्यक्ति की, जिसका कथन अनिश्चय युक्त हो अथवा जिसमें दृढ़ता का अभाव हो, उसकी आंखें जल्दी-जल्दी खुलती-बंद होती है। साक्षात्कार के समय इस बात को स्पष्ट रूप से देखा अथवा अनुभव किया जा सकता है। वैसे परीक्षार्थी जिनकी तैयारी अच्छी होती है अथवा आत्मविश्वास के धनी होते है, मौखिक परीक्षा के समय जवाब देते समय परीक्षक के आगे कम आंखें झपकाते हैं, जबकि जिनकी तैयारी ठीक नहीं होती, जिन्हें स्वयं या अपने ऊपर पर भरोसा नहीं क्रिया अधिक तीव्र होती देखी गई है।
पलकें झपकने की गति व्यक्तित्व के दबंगपन को भी अभिव्यक्त करती है। पाया गया है कि झेंपू या संकोची प्रकृति के लोगों में पलक झपकने की रफ्तार अधिक तेज होती है, वहीं दबंग व्यक्तित्व की यह सुनिश्चित पहचान है कि उसकी पलकें किसी भी व्यक्ति के समक्ष प्रति मिनट कम झपकती है। डरपोक स्वभाव वाले लोगों की भी यही निशानी है कि उनमें आँख मुलमुलाने की प्रवृत्ति अधिक तीव्र होती है। कुछ हद तक झूठ और सच की पहचान भी इससे की जा सकती है। झूठ बोलने और सचाई को छिपाने का प्रयास करने वालों में पलक-संचालन की क्रिया ज्यादा तीव्र होती है। दूसरी ओर सत्यवादियों, न्याय के पक्षधरों में इनकी गति मंद होती है। तो उनके पलकों की तीव्र गति उनकी पोल खोल देती है। ऐसा व्यक्ति फिर प्रामाणिक और संशय का भाजन बनना पड़ता हैं। उसके सत्य कथन को भी लोग गंभीरता से नहीं लेते और उस पर अविश्वास का आवरण चढ़ाकर देखते हैं।
सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में प्रशिक्षक और प्रशिक्षार्थी के बीच के संबंध एवं प्रशिक्षार्थी के विषय संबंधी पकड़ को भी उक्त क्रिया एक सीमा तक बोलती - बताती है अध्ययनों के दौरान यह स्पष्ट परिलक्षित हुआ है कि जिस शिक्षार्थी में विषय संबंधी गहराई एवं उसे पकड़ने का माद्दा कम होता है उनकी पलकें अधिक झपकती है। यह भी देखने में आया है कि जब दोनों के बीच खुलापन का अभाव होता है, तब भी विद्यार्थी की आंखें जल्दी-जल्दी खुलती-बंद होती है। इसके विपरीत जब शिक्षक और छात्र के बीच स्नेह-प्रेम का मधुर संबंध और खुलापन होता है, तो अध्ययन करने वाले छात्र की पलकें कम झपकती हैं।
इसके अतिरिक्त तनाव, दबाव और भय जैसी स्थिति में भी पलकों की गति बढ़ जाती है। एक प्रयोग के दौरान लिंवरपूल यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिकों ने बूढ़े और युवाओं के दो दल बनाये और उन्हें जाँचा ‘जाज’ नामक एक अमेरिकी फिल्म के कुछ दृश्य दिखलाए। उक्त फिल्म बहुत ही डरावनी थी। फिल्म देखते समय दोनों समूहों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया, तो पाया गया कि युवाओं में पलकों के गिरने-उठने की गति वृद्धों से अधिक तीव्र थी। स्पष्ट था, वे डरावने दृश्य के कारण ज्यादा तनावजन्य स्थिति से गुजर रहे थे जबकि वृद्धों की परिपक्व मनोभूमि उन्हें इस अप्रिय दशा से काफी हद तक बचा रही थी। यों पलक संचालन की गति उनमें भी असामान्य थी, पर युवा-समूह की तुलना में वह कम थी। इस प्रकार पलकों के गिरने-उठने की गति व्यक्ति के मनोबल को भी दर्शाती और सूचित करती है कि सामने वाला हीन मनोबल का व्यक्ति है या संपन्न मनोबल का।
उपर्युक्त मनोविज्ञान का ध्यान में रखकर ही भाषण का अभ्यास करने वालों को आरंभ में इसका अभ्यास निर्जन निकुंजों अथवा नदी-तटों के पत्थरों एवं पेड़-पौधों को सजीव श्रोता मानकर करने की सलाह दी जाती है। इस आरंभिक अभ्यास से जैसे-जैसे उनका मानस परिपक्व होने लगता है, वैसे-वैसे उनकी झिझक मिटती और पलक संचालन की गति घटती जाती है। फिर भी शुरू-शुरू में उन्हें व्याख्यान देते समय श्रोताओं से सीधे आँख मिलाने की मनाही की जाती है। कुछ इसी प्रकार का निर्देश टी.वी. के समाचार वाचकों को दिया जाता है और कहा जाता है कि समाचार पढ़ते समय किसी प्रकार की उच्चारण संबंधी कोई त्रुटि या सूचना संबंधी गलती हो जाए तो आत्मनियंत्रण न खोएँ, अपने को संयत एवं शांतचित्त बनाए रखकर सदा यह प्रदर्शित करने की कोशिश करें कि वह एकदम सामान्य स्थिति में हैं, अन्यथा अशुद्धि के समय पलकों की बढ़ी-चढ़ी रफ्तार उनकी त्रुटि को और उजागर कर सकती है।
स्मरण रखने और पलकें झपकाने के बीच भी सीधा संबंध देखा गया है। यदि किसी से किसी लंबे-चौड़े शब्द-शृंखला को स्मरण करने के बाद ही वह पलकें गिराए। शोध-अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि शब्द-शृंखला के बाद यदि और अक्षर करने के लिए कहा जाए, तो पलक झपकाने के बीच की अवधि और अधिक बढ़ जाती है।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि पलकों का गिरना-उठना व्यक्तित्व की चुगली करता है। विशेषज्ञ लोग इस आधार पर सामने वाले के बारे में काफी कुछ पता लगा सकते हैं। इसलिए पलकें झपकाने में सावधानी बरती जाए। कहीं ऐसा न हो कि वह हमारी कमी और कमजोरी को दूसरों के आगे प्रकट कर दें।
26 मई को बैसाख पूर्णिमा है। आज से लगभग 2500 वर्ष पहले इसी पुण्य दिन धरती की गोद में महाराज शुद्धोधन के यहाँ राजकुमार सिद्धार्थ ने जन्म लिया था। इसके बाद एक-एक करके कई बैसाख पूर्णिमा आयी और चली गयीं। लेकिन फिर से एक महापुण्यवती बैसाख पूर्णिमा आयी, जब महातपस्वी सिद्धार्थ की अन्तर्चेतना में बुद्ध ने जन्म लिया। इस अनूठे जन्मोत्सव को मनुष्यों के साथ देवों ने भी अलौकिक रीति से मनाया। इस पुण्य घड़ी में सिद्धार्थ सम्यक् सम्बुद्ध बन गए और बैसाख पूर्णिमा बुद्ध पूर्णिमा में रूपांतरित हो गयी।
इस पूर्णिमा से जुड़ी दोनों ही कथाएँ बड़ी ही मीठी और प्यारी हैं। आज से 2500 साल पहले, जिस दिन सिद्धार्थ का जन्म हुआ, समूची कपिलवस्तु में उत्सव की धूम मच गयी। पूरा नगर सज गया। रात भर लोगों ने दिए जलाए, नाचे। उत्सव की घड़ी थी, चिर दिनों की प्रतीक्षा पूरी हुई थी। बड़ी पुरानी अभिलाषा थी पूरे राज्य की। इसलिए राजकुमार को सिद्धार्थ नाम दिया गया। सिद्धार्थ का मतलब होता है, जीवन का अर्थ सिद्ध हो जाना, अभिलाषा का पूरा हो जाना।
पहले ही दिन, जब द्वार पर बैंड बाजे बज रहे थे, शहनाइयाँ गूँज रही थी, फूल बरसाए जा रहे थे, महलों में, चारों तरफ प्रसाद बाँटा जा रहा था। तभी हिमालय से भागते हुए एक वृद्ध तपस्वी महलों के द्वार पर आकर खड़ा हो गया। उसका नाम असिता था। नगर वासियों के साथ स्वयं सम्राट उनका सम्मान करते थे। वह अब तक कभी राजधानी न आए थे। स्वयं सम्राट को भी उनसे मिलने के लिए जाना पड़ता था। आज अचानक उन्हें महलों की ड्योढ़ी पर देखकर सभी चकित थे। सम्राट ने आकर बड़े अचकचाए स्वर में उनसे पूछा- हे महातपस्वी, क्या सेवा करूं आपकी।
असिता ने उनकी दुविधा का निवारण करते हुए कहा, परेशान न हो शुद्धोधन। तुम्हारे घर बेटा पैदा हुआ है, उसके दर्शन को आया हूँ। शुद्धोधन तो समझ ही न पाए। सौभाग्य की घड़ी थी यह कि असिता जैसा महान् वीतरागी उनके बेटे को देखने के लिए आया। वह भागे हुए अन्तःपुर में गए और नवजात शिशु को बाहर लेकर आए। असिता झुके और उन्होंने शिशु के चरणों में सिर रख दिया। और कहते हैं, शिशु ने अपने पाँव उनकी जटाओं में उलझा दिए। असिता पहले तो हंसे, फिर रोने लगे। शुद्धोधन तो हतप्रभ हो गए, वह पूछने लगे, महामुनि आप रोते क्यों हैं?
असिता ने कहा, तुम्हारे घर में जो यह बेटा आया है, यह कोई साधारण आत्मा नहीं है, अरे यह तो सब तरह से अलौकिक है। कई सदियाँ बीत जाती है, तब कहीं यह आता है। यह तुम्हारे लिए ही सिद्धार्थ नहीं, यह तो अनन्त-अनन्त लोगों के लिए समूची मनुष्यता के लिए सिद्धार्थ है। अनन्त जनों के जीवन का अर्थ इससे सिद्ध होगा। हंसता हूँ कि इसके दर्शन मिल गए। बहुत प्रसन्न हूँ कि इसने मुझ बूढ़े की जटाओं में अपने पाँव उलझा दिए। मेरे लिए यह परम सौभाग्य का क्षण है। पर रुलाई इसलिए आ रही है कि जब यह कली खिलेगी, फूल बनेगी, जब दसों दिशाओं में इसकी महक उठेगी, तब मैं न रहूँगा। मेरे शरीर छूटने की घड़ी करीब आ गयी है।
महातपस्वी असिता की यह बात बड़ी अनूठी पर सच्ची है। बुद्धत्व का लुभावनापन ही कुछ ऐसा है। उनकी मोहकता है ही कुछ ऐसी। असिता जीवनमुक्त हो गए, पर उन्हें पछतावा होने लगा, कि काश एक जन्म अगर और मिलता तो इस महाबुद्ध के चरणों में बैठने की, इनकी वाणी सुनने की, इनकी सुगन्ध पीने की, इनके बुद्धत्व में डूबने की सुविधा हो जाती। ऐसे अनूठे पल होते हैं, बुद्धत्व के विकसित होने के। महातपस्वी असिता में भी चाहत पैदा हो गयी कि मोक्ष दाँव पर लगता हो लगे, कोई हर्जा नहीं। वह रोने लगे थे उनके पाँवों पर सिर रखकर कि सदा ही चेष्टा कि कब छुटकारा हो इस शरीर से, जीवन के आवागमन से, पर आज पछतावा हो रहा है।
काल प्रवाह में क्षण, दिवस, वर्ष बीते। और एक बैसाख पूर्णिमा को सत्य का, सम्बोधि का, बुद्धत्व का वही चाँद निकला, जिसकी चाँदनी में जीने की चाहत कभी असिता ने की थी। यह पूर्णचन्द्र महातपस्वी शाक्यमुनि सिद्धार्थ के अर्न्तगगन में उदय हुआ। इस बीच अनेकों घटनाएँ काल सरिता में घटकर बह गयीं। शिशु सिद्धार्थ किशोर हुए, युवा हुए, यशोधरा उनकी राजरानी बनीं, राहुल के रूप में उन्हें पुत्र मिला। पर ये तो दृश्य घटनाएँ थी। अदृश्य में भी बहुत कुछ घटा। प्रचण्ड वैराग्य, अनूठा विवेक- जिसकी परिणति महाभिनिष्क्रमण के रूप में हुई। युवराज तपस्वी हो गए। तपस्या से दुर्बल, जर्जर सिद्धार्थ को सुजाता ने खीर खिलायी। और उनकी देह को ही नहीं जीवन चेतना को भी नव जीवन मिला। और वह गौतम बुद्ध हो गए।
गौतम बुद्ध के रूप में वे ऐसे है जैसे हिमाच्छादित हिमालय। जिससे करुणा की अनेकों जलधाराएँ निकलती हैं। जहाँ से महाकरुणा की गंगा बहती है। जो पतितपावनी, कलिमलहारिणी, सर्वपापनाशिनी है। पर्वत तो और भी है हिमाच्छादित पर्वत भी और है। पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे हैं। पूरी मनुष्य जाति में उनके जैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं। उन्होंने जितने हृदयों की वीणा को बसाया है, उतना किसी और ने नहीं। उनके माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोगों ने परम भगवत्ता उपलब्ध की, उतनी किसी और के माध्यम से नहीं।
बुद्ध के बोल अत्यन्त मीठे हैं, उनके वचन बहुत अनूठे हैं। एच.जी. वेल्स ने बुद्ध के सम्बन्ध में एक अद्भुत सच्चाई बयान की। उन्होंने कहा- कि समूची धरती पर उन जैसा ईश्वरीय व्यक्ति और उनकी तरह ईश्वर शून्य व्यक्ति एक साथ पाना कठिन है- सो गॉड लाइफ एण्ड सो गॉड लेस। अगर कोई ईश्वरीय प्रतिभाओं को खोजने निकले तो बुद्ध से ज्यादा ईश्वरीय प्रतिभा भला कहाँ मिलेगी? फिर भी सो गॉडलेस- इतना ईश्वर शून्य। ईश्वर शून्यता का अर्थ ईश्वर विरोधी होना नहीं है। जैसा कि कुछ समझदार समझे जाने वाले नासमझों ने समझ लिया है। इसका मतलब सिर्फ इतना ही है कि उन्होंने इस परम सत्य का उच्चार नहीं किया।
उपनिषद् कहते हैं कि ईश्वर के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन इतना तो कह ही दिया। बुद्ध ने इतना भी नहीं कहा। वे परम उपनिषद् हैं। वह ईश्वर की चर्चा करने वाले केवल नाम मात्र के आस्तिक नहीं हैं। वह तो ईश्वरत्व को उपलब्ध करने वाले महाआस्तिक हैं। अगर परमात्मा के सम्बन्ध में कुछ कहना सम्भव नहीं, तो फिर बुद्ध ने कुछ नहीं कहा। बस चुप रहकर- इशारा किया। पश्चिम में एक बहुत बड़ा दार्शनिक हुआ है- लुडविग पिट्गिंस्टाइन। उसने अपनी बड़ी अनूठी किताब ‘ट्रैफ्टेटस’ में लिखा है कि जिस सम्बन्ध में कुछ कहा न जा सके, उस सम्बन्ध में बिल्कुल चुप रह जाना उचित है। दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड, मस्ट नॉट बी सेड। जो नहीं कहा जा सकता, कहना ही नहीं चाहिए।
अगर विट्गिंस्टाइन ने बुद्ध को देखा होता तो वे अपने कहे हुए सच की अनुभूति कर लेते। अगर विट्गिंस्टाइन की बातों को बुद्ध ने सुना होता तो अवश्य मुस्करा देते। बड़े ही प्यार से वे उसके कथन को अपनी स्वीकृति दे देते। पश्चिम के लोगों ने विट्गिंस्टाइन को समझने में भूल की। यही भूल पूरब के लोगों को हुई, बुद्ध को समझने में। बुद्ध दार्शनिक और विचारक नहीं, वह रुग्ण मनुष्यता के लिए बड़े ही करुणावान वैद्य थे। बहुत लोगों ने मनुष्य के रोग का विश्लेषण किया है। पर इतना करुणापूर्ण होकर और इतने सटीक ढंग से नहीं। बड़े ढंग से लोगों ने बातें कही हैं, बड़े गहरे प्रतीक उपाय में लाए हैं। पर बुद्ध के कहने का ढंग ही कुछ और है, जिसने एक बार सुना, पकड़ा गया। जिसकी ओर एक बार उन्होंने भर नजर देख लिया, फिर वह भटक न पाया। जिसे उनके बुद्धत्व की थोड़ी सी झलक मिल गयी, उसका समूचा जीवन ही रूपांतरित हो गया। ‘अप्प दीपो भव’ यही बुद्ध का अन्तिम वचन है। बुद्ध पूर्णिमा के शुभ क्षणों में इसे इस भाँति भी स्मरण किया जा सकता है-
महाबुद्ध ने मुझसे-तुमसे एक-एक से, हम सबसे सुनो, यह सत्य कहा, अपने दीपक आप बनो तुम तिमिर का व्यूह भेद करना है, कैसा यहाँ विराम शिखा को झंझा में पलना है।
संधिवात एवं संधिशोथ नामक वातव्याधियों की यज्ञ चिकित्सा का वर्णन पिछले अंकों में किया जा चुका है। ये दोनों ही जोड़ों से संबंधित आर्थ्राइटिस रोग है। यहाँ पर इसके तीसरे प्रकार ‘गाउट’ अर्थात् वातरक्त एवं घुटने के शोथ के संबंध में बताया जा रहा है कि किन कारणों से ये उत्पन्न होते हैं और यज्ञोपचार द्वारा इन कष्टकारी व्याधियों से छुटकारा किस तरह से पाया जा सकता है।
वातरक्त को ‘बीमारियों का राजा’ कहा जाता है। सुकुमार प्रकृति के व्यक्तियों एवं संपन्नों को इस व्याधि से सर्वाधिक ग्रस्त पाया जाता है। चालीस-पचास वर्ष की उम्र के पश्चात् इसका आक्रमण महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में ज्यादा देखने को मिलता है। यह बच्चों एवं युवाओं में बहुत कम पाया जाता है। वातशोणित, आढ्यवात, वातबलास, खुडवात आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका मुख्य कारण मद्य-माँस का अत्यधिक सेवन, मिथ्या आहार-विहार, प्रतिकूल जलवायु, व्यायाम एवं परिश्रम का अभाव, मोटापा, शोक, क्रोध, चिंता, तनाव आदि मानसिकता विकार माने जाते हैं। आनुवंशिक कारण भी इसके लिए एक जिम्मेदार कारक माना जाता है। घोड़ा, ऊँट,हाथी आदि की सवारी करने, शीत रुक्षादि कारणों से शरीर की वायु प्रकुपित हो जाती है। और अधिक तीखे चरपरे, गरम खट्टे, चिकने खारे पदार्थ, सूखे मटर, बींस, लोबिया, अदरक, पत्तों एवं बैंगन आदि के शाक अधिक मात्रा में खाने से रक्त दूषित हो जाता है! यही दूषित रक्त प्रकुपित वायु से मिलकर वातरक्त को उत्पन्न करता है। सबसे पहले यह हाथ-पैर में उत्पन्न होता है, पीछे सारे शरीर में फैल जाता है।
आधुनिक चिकित्साविज्ञानी वातरक्त को ‘गाउट’ नाम से संबोधित करते हैं। वृद्धावस्था में उभरने वाली यह एक बहुत ही पीड़ादायक रिह्यूमेटिक बीमारी है, जो चयापचयी प्रक्रिया द्वारा रक्त के दूषित होने से उत्पन्न होती है। रक्त में जब यूरिक एसिड एवं सोडियम यूरेट्स की मात्रा अधिक बढ़ जाती है और शरीर से इनका निष्कासन पूरी तरह नहीं हो पाता, तब ये तत्व जोड़ो के खाली स्थानों में, कोमल ऊतकों में क्रिस्टल के रूप में जमने लगते हैं। इस जमाव के कारण जोड़ों, संधियों, संधिकला आदि में सूजन, लालिमा, दाह, दर्द एवं जकड़न होने लगती है। गाउट का आरंभ मुख्य रूप से छोटी अस्थि-संधियों से तथा विशेष रूप से पैर के अँगूठे की संधि से होता है। जोड़ों में पाये जाने द्रव-साइनोबियल फ्लूइड में यूरिक एसिड के रवे-क्रिसटल जमने लगते हैं, जिससे सूजन आती है और दूषित रासायनिक तत्वों के मुक्त होने से जोड़ो के तुतुओं में शोथ के साथ दर्द उभरने लगता है। आगे चलकर यही तत्व त्वचा के नीचे, गुरदे में जोड़ों के आस-पास भी बनने लगते हैं और संबंधित अंगों को विकार ग्रस्त बना देते हैं। सही समय पर उपचार न होने पर जोड़ खराब हो जाते हैं। और व्यक्ति अपंगता का शिकार हो जाता है। पैर के अंगूठे से आरंभ होने वाला यह रोग धीरे-धीरे एड़ी,घुटने, हथेलियों, उँगलियों तथा कुहनियों तक को अपनी चपेट में ले लेता है।
गाउटी आर्थ्राइटिस अर्थात् वातरक्त या गाँठदार गठिया का आक्रमण प्रायः धीरे-धीरे होता है। इसके लक्षणों को देखकर आसानी से पहचाना जा सकता है। प्रायः प्रारंभ में रोग से प्रभावित व्यक्ति को पसीना ज्यादा आता है, किसी-किसी को बिलकुल नहीं आता। हलके बुखार के साथ अँगूठे अथवा किसी अन्य जोड़ में प्रायः रात्रि के समय तेज दर्द के साथ सूजन उभर आती है। प्रभावित स्थान की त्वचा लाल या जामुनी रंग की हो जाती है। जोड़ को छूना या हिलाना-डुलाना मुश्किल हो जाता है। एक बार आक्रमण होने के बाद सप्ताह-दो सप्ताह बाद रोग या तो स्वयं या उपचार के बाद दब जाता है, किंतु कुछ समय पश्चात् यह दुबारा उभर आता है। दो-चार बार यही क्रम चलता रहता है। और पीछे स्थायी बन जाता है। ऐसी स्थिति में गुरदे खराब हो सकते हैं, घुटने की हड्डियाँ बेकार हो सकती हैं, जोड़ उखड़ सकते हैं। हृदय में सूजन आ सकती है। उल्टी, दस्त जैसे अनेक उपद्रव होने लगते हैं। रोग पुराना हो जाने पर अशक्तता एवं विकलाँगता तथा कुरूपता आ जाती है। पसीने से खटास जैसी गंध, स्वभाव चिड़चिड़ा पेशाब की न्यूनता एवं उसमें यूरिक एसिड तथा यूरेट की बढ़ोत्तरी जैसे लक्षण स्पष्ट परिलक्षित होने लगते हैं।
गाउटी-गठिया या वातरक्त तीन तरह का होता है। पहले प्रकार में वायु और रक्त की विषाक्तता से उत्पन्न गठिया आता है। उससे प्रभावित पैरों में छूने से असह्य पीड़ा, सुई चुभाने, त्वचा फटने जैसी वेदना का अनुभव होता है। शुष्कता, भारीपन, संज्ञाशून्यता जैसी प्रतीति होती है। दूसरे प्रकार के वातरक्त में पित्त और रक्त की विषाक्तता अधिक होने से प्रभावित पैर तीव्र दाह युक्त, अधिक गरम, लाल रंग, शोथ एवं पिलपिलापन लिए होता है। तीसरे में कफ एवं रक्त की अत्यधिक विषाक्तता होने के कारण पैरों में खुजली अधिक होती है। वे सफेद ठंडे सूजन युक्त मोटे तथा कठोर हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त तीनों दोषों से युक्त वातरक्त में सभी दोष। अपने-अपने लक्षण पैरों में प्रकट करते हैं। इन लक्षणों के अलावा भी अन्य अनेक शारीरिक लक्षण प्रकट होते हैं- जैसे शरीर का ताप 11 डिग्री से 12 डिग्री तक बने रहना, तीव्र बुखार, प्यास, जी मिचलाना आदि। रोग की अभिवृद्धि होने पर पैर के अँगूठे की संधियों के अतिरिक्त गुल्फ संधि, जानु संधि, कलाई की संधियाँ भी प्रभावित-संक्रमित हो जाती हैं। समुचित उपचार न होने पर यह रोग पूरे शरीर में फैल जाता है। रोगी पंगुता का शिकार हो जाता है, अँगुलियाँ गठीली एवं टेढ़ी हो जाती हैं।
गाउटी आर्थ्राइटिस अर्थात् वातरक्त को दूर करने के लिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में अनेकों दरद निवारक एवं शोथ नाशक औषधियाँ विद्यमान हैं, किंतु इन्हें प्रयुक्त करने पर रोग-शमन के साथ-साथ इनके साइड इफेक्ट्स भी रोगी को भुगतने पड़ते हैं। यज्ञोपचार में यह दुविधा नहीं रहती। यह सर्वाधिक सुरक्षित-निरापद होने के साथ ही रोग को समूल नष्ट करने में समर्थ है। हर कोई इसे सरलतापूर्वक स्वयं कर सकता है और दूसरों को भी इससे लाभान्वित कर सकता है। वातरक्त की यज्ञोपचार प्रक्रिया इस प्रकार है-
इसमें गाउटी आर्थ्राइटिस की विशेष हवन सामग्री का प्रयोग किया जाता है। इस विशिष्ट हवन सामग्री में निम्नलिखित चीजें समान मात्रा में मिलाई जाती हैं- (1) मंजीठ, (2) हरड़, (3) बहेड़ा, (4) गिलोय, (5) कुटकी, (6) बच, (7) दारु हल्दी, (8) नीम छाल, (9) नागर मोथा, (10) धनिया, (11) सोंठ, (12) भारंगी, (13) कटेरी पंचाँग, (14) मूर्वा, (15) बायबिडंग, (16) बीजसार, (17) चित्रक की छाल, (18) शतावर (19) त्रायमाण, (20) छोटी पिप्पली, (21) वासा पत्र, (22) भाँगरा, (23) देवदार, (24) लाल चंदन, (25) निशोथ, (26) वरुण छाल, (27) बावची, (28) करंज, (29) अतीस, (30) इंद्रायण की जड़, (31) सारिवा, (32) पित्त पापड़ा, (33) कचनार की छाल, (34) बबूल की छाल, (35) शरपुँखा, (36) गुग्गुल, (37) एरंड मूल, (38) गोक्षुर, (39) गोरखमुँडी, (40) निर्गुंडी, (41) रास्ना, (42) चोपचीनी, (43) अरणी, (44) सहजन की छाल, (45) शीशम की छाल।
उपर्युक्त 45 चीजों को बराबर मात्रा में लेकर उनका जौकुट पाउडर बना लेते हैं और इसे विशेष रोग की ‘हवन सामग्री नंबर-(2)’ का लेबल लगाकर एक डिब्बे में सुरक्षित रख लेते हैं। हवन करते समय पहले से तैयार की गई ‘कॉमन हवन सामग्री नंबर-(1)’ की बराबर मात्रा मिलाकर हवन करते हैं। ‘कॉमन हवन सामग्री नंबर-(1)’ को- अगर, तगर, देवदार, लाल चंदन, सफेद चंदन, असगंध, गुग्गुल, लौंग, जायफल, गिलोय आदि चीजें बराबर मात्रा में मिलाकर बनाया जाता है। हवन सूर्य गायत्री मंत्र से किया जाता है। सूर्य गायत्री मंत्र- ‘ऊँ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।’
उक्त मंत्र का उच्चारण करते हुए मंत्र के अंत में ‘स्वाहाः इदं सूर्याय इदं न मम्‘ कहते हुए कम-से-कम चौबीस आहुतियाँ नित्य डालनी चाहिए।
हवन करने के साथ ही उक्त 45 चीजों से निर्मित जौकुट पाउडर की कुछ मात्रा को बारीक पीसकर कपड़-छन करके एक अलग डिब्बे में रख लेना चाहिए। उसमें से छन करके एक अलग डिब्बे में रख लेना चाहिए। उसमें से हर रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच पाउडर शहद के साथ खाते रहना चाहिए। पाउडर खाने में यदि अरुचिकर लगे तो उसे क्वाथ बनाकर भी पिया जा सकता है। क्वाथ बनाने के लिए चार चम्मच पाउडर लेकर आधा लीटर पानी में रात्रि को स्टील के भगोने में भिगो देना चाहिए और सुबह मंद आँच पर उबालकर क्वाथ बना लेना चाहिए। क्वाथ उबलकर जब चौथाई रह जाए तो उसे ठंडा कर बारीक कपड़े से छान लेना चाहिए। इसकी दो मात्रा बनाकर आधी मात्रा सुबह एवं आधी मात्रा शाम को एक चम्मच शहद मिलाकर रोगी को पिलाते रहना चाहिए। यह दोनों क्रम हवन और क्वाथ तब तक चलाते रहना चाहिए जब तक रोग निर्मूल न हो जाए। उपर्युक्त औषधियों में से यदि कुछ उपलब्ध न हों, तो भी जितनी भी मिल सकें उतने से ही यज्ञोपचार आरंभ कर देना चाहिए।
यज्ञचिकित्सा के साथ ही पीड़ित अंग पर वातनाशक तेल की मालिश भी करनी चाहिए। तैल इस प्रकार बनाया जाता है-(1) सरसों तैल-1 मि.ली, (2) तिल तैल-1 मि.ली, (3) एरंड तैल-5 मि.ली, (4) मालकाँगनी के बीज-24 ग्राम, (5) कायफल-12 ग्राम, (6) जायफल-12 ग्राम, (7) शतवार-12 ग्राम, (8) बकायन-12 ग्राम, (9) सोंठ-12 ग्राम, (10) कतीरा-12 ग्राम, (11) अकरकरा-12 ग्राम, (12) करंज-12 ग्राम, (13) नारियल गिरी-12 ग्राम, (14) इलायची-12 ग्राम, (15) लौंग-12 ग्राम, (16) हल्दी-12 ग्राम, (17) समुद्र खार-12 ग्राम, (18) कुचला-12 ग्राम, (19) बादाम-12 ग्राम, (20) कुलंजन-12 ग्राम, (21) समीर-12 ग्राम, (22) काला धतूरा-2 ग्राम, (23) आक-2 ग्राम, (24) भिलावा-2 ग्राम, (25) तंबाकू-2 ग्राम, (26) सहजन-2 ग्राम, (27) मकोय-2 ग्राम, (28) मोम-2 ग्राम, (29) आक के पत्ते, थूहर के पत्ते एवं एरंड के पत्ते- (प्रत्येक पाँच-पाँच) (30) भाँगरा-2 ग्राम।
मोम को छोड़कर उपर्युक्त सभी चीजों को 3 लीटर पानी में डालकर मंद आँच पर क्वाथ बना लेना चाहिए और जब पानी आधा रह जाए तो उसे ठंडा करके छान लेना चाहिए। अब इस छने हुए क्वाथ में तीनों तेल एवं मोम डालकर तब तक मंद आँच पर पकाना चाहिए जब तक सारा पानी जल न जाए। तेल मात्र शेष रहने पर उसे उतारकर ठंडा होने पर छान लेना चाहिए। निरंतर इस तेल की मालिश से गाउटी आर्थ्राइटिस एवं घुटने का शोथ एवं जोड़ों का दर्द बिलकुल ठीक हो जाता है।
-गताँक से आगे
मित्रो! मैं आपको उस अध्यात्म को सिखाना चाहता हूँ, जिसे मेरे गुरु ने मुझे सिखाया और जिसे ऋषियों ने अपने शिष्यों को पढ़ाया। हम उसी शानदार सिद्धाँत पर विश्वास करते हैं और आपको उसी शानदार अध्यात्म को अपनाने की प्रार्थना करते हैं। इसी के लिए हमने सब इंतजाम रचाया है। अगर आप सीख सकते हों, कर सकते हों, तो कर लें, सीख लें। फायदा उठा लें। जो अध्यात्म हम सिखाना चाहते हैं, जिसके लिए हमने आपको इस आध्यात्मिक शिविर में बुलाया है, वह कैसा अध्यात्म है! उसके तीन फायदे हैं। सिद्धियाँ कितनी होती हैं? यह आठ होती हैं, लेकिन ये अष्ट सिद्धियाँ और नौ ऋद्धियाँ मेरी समझ में नहीं आतीं। मेरी समझ में तो तीन सिद्धियाँ आती हैं और ये सुनिश्चित रूप से मिलती हैं। अष्ट सिद्धियों के बारे में तो मैं नहीं कह सकता कि इससे हवा में तैरना आ जाता है। हाँ गुरुजी! सिद्धियों से चमत्कार आते हैं। अष्ट सिद्धियाँ, नव निधियाँ होती हैं। अच्छा तो आपका मतलब हवा में तैरने से है। आप यही कह रहे थे न कि सिद्धियाँ मिल जाएँ। चलिए सिद्धि की एक घटना याद आ गई, उसे ही आपको सुनाता हूँ।
जमीन पर चलें, हवा में नहीं
हसन नाम के एक बड़े सिद्ध पुरुष थे। राबिया नाम की एक संत महिला भी बड़ी सिद्ध थी। दोनों की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। हसन के बारे में राबिया ने तारीफ सुन रखी थी और राबिया की तारीफ हसन ने सुन रखी थी। एक बार हसन ने कहा- चलो हमें ही राबिया के पास जाना चाहिए। हसन राबिया के पास पहुँच गए। राबिया बहुत खुश हुई। उसने कहा- आप आ गए, हमारा भाग्य खुल गया। हम तो कहीं जाते नहीं, आपने कृपा की और हमारे घर आ गए। उन्हें बिठाया, स्वागत-सत्कार किया।
नमाज पढ़ने का वक्त आ गया। हसन ने कहा- राबिया! आज हम साथ-साथ नमाज पढ़ेंगे। नमाज का टाइम हो गया तो पढ़नी ही चाहिए। उन्होंने अपना बिछाने का कपड़ा-जिसको अरबी में ‘मुसल्ला’ कहते हैं, लिया और पानी में फेंक दिया। वह पानी में तैरने लगा। हसन ने कहा कि हम तो पानी पर बैठकर नमाज पढ़ेंगे और चमत्कार दिखाएँगे। राबिया तुम भी आ सकती हो। राबिया समझ गई कि हसन अपनी करामात दिखाना चाहते हैं कि हम पानी पर सवार हो सकते हैं और बिना डूबे बैठ सकते हैं। वे चमत्कार दिखा रहे थे कि देखो हमारे पास कितनी सिद्धियाँ हैं!
राबिया को बहुत दुःख हुआ। राबिया उनके पास तो नहीं गई, पानी के ऊपर मुसल्ला भी नहीं फेंका। उसने अपना मुसल्ला फौरन हवा में फेंक दिया। वह हवा में तैरने लगा। राबिया ने कहा- हसन! पानी में नमाज पढ़ना ठीक नहीं। पानी में मेढक रहते हैं, पेशाब करते हैं। मछलियाँ अंडे देती हैं। इसलिए उसमें हमेशा गंदगी छाई रहती है। इसमें बहकर कूड़ा-कचरा आ जाता है, बादलों की धूल आ जाती है। ये गंदी जगह है। पानी खुदा की नमाज पढ़ने के लिए ठीक नहीं है। आइए हवा में नमाज पढ़ेंगे।
हसन पानी-पानी हो गए। पानी पर तैरने की तो उन्होंने सिद्धि प्राप्त कर ली थी, पर हवा में तैरने की सिद्धि नहीं आई थी। राबिया के सामने जब हसन शर्मिंदा हो गए, तो राबिया ने कहा- हसन आप गलती पर थे और मैं आप से भी ज्यादा गलती पर थी। जो काम एक मेढक और मछली कर सकती है, आप वह काम करने वाले थे और यह दिखाने वाले थे कि हम कोई चमत्कार दिखाने वाले हैं और मैं आपसे भी ज्यादा बेअक्ल थी। मैंने अपना मुसल्ला हवा में फेंक करके यह जाहिर करने की कोशिश की कि जो काम एक मच्छर कर सकता है, एक कीड़ा, एक पतंगा कर सकता है, उस कीड़े, मक्खी वाले काम को मैं करने जा रही थी। मैं आप से भी ज्यादा बेअक्ल थी और आप मुझसे भी ज्यादा बेअक्ल थे। आइए हम लोग जमीन पर मुसल्ला बिछाएँ ओर जमीन पर चलें।
अध्यात्म : एक नकद धर्म
मित्रों! आप जमीन पर चलिए, हवा में तैरना बंद कीजिए। देवलोक जाना बंद कीजिए। सिद्धियों का ख्वाब देखना बंद कीजिए। आप जमीन पर आइए और जमीन पर चलना शुरू कीजिए, ताकि वो अध्यात्म मिल सके जो कि हमारे लिए संभव है, स्वाभाविक है, जो कि हमको मिल सकता है, जिससे आप फायदा उठा सकते हैं। ऐसा अध्यात्म लेने में आपको हर्ज क्या है ! हवाई उड़ान आपको क्या दे सकती है! आपको हवा ही मिलनी चाहिए, इससे आपको क्या फायदा ! मरने के बाद हमको मुक्ति मिलनी चाहिए। मरने के बाद क्यों, यदि इसी जीवन में, इसी जन्म में और अभी स्वर्ग और मुक्ति मिल जाए तो क्या हर्ज है आपको! नहीं साहब! कोई हर्ज नहीं। तो फिर आप क्यों कहते हैं कि भगवान् मरने के बाद मिले। अभी क्यों नहीं मिले ? नहीं साहब! भगवान् तो धर्म लोक में रहता है, बैकुँठ लोक में रहता है। चलिए, हम आपको दूसरा फायदा करा दें और भगवान् से आपको अभी मिला दें तो कोई हर्ज है आपको ? साहब ! वो तो और भी अच्छा है, आप वही क्यों नहीं करते।
मित्रो! आप नकद धर्म को ग्रहण कीजिए और उसकी कीमत चुकाइए। नकद धर्म कैसा होता है ? जो ध्यान हम आपको सिखाना चाहते हैं, उसमें तीन सिद्धियाँ हैं। चौथी सिद्धि तो उसका ब्याज है। मूलधन वह होता है, जिसे बैंक में जमा कर देते हैं। ब्याज क्या होता है ? बेटे, ब्याज वह धन होता है, जो आपके जमापूँजी पर आठ-दस प्रतिशत के हिसाब से अतिरिक्त रूप में मिलता है। अपना रुपया हमारे बैंक में जमा कर जाइए, हम आपको और भी नफा दे देंगे। क्या नफा दे देंगे ? हम आपको ब्याज दे देंगे। ब्याज हमारा रुपया नहीं! हाँ ब्याज आपका तो नहीं है, पर हम आपको दे देंगे। कौन-सी वाली ब्याज है, जो आप चाहते हैं, वह मूलधन नहीं है, ध्यान रखें। अध्यात्म नकद धर्म है, मूलधन है, ऋद्धि-सिद्धियाँ उसकी ब्याज हैं।
साथियों! जिस तरह का अध्यात्म हम आपको सिखाना चाहते हैं, उसके लिए आपको तरीके बताएँगे। उसकी साधना सिखाने का ही हमारा उद्देश्य है। उसके लिए ही आपको बुलाना पड़ता है। आप न सीखें, न समझें तो फिर हम क्या कर सकते हैं! आप पर तो गलतफहमियाँ हावी होती जा रही हैं। इन गलतफहमियों को जब तक न निकालूँ, तब तक वास्तविकता आपको कैसे बताऊँ। आप पर तो यही गलतफहमियां हावी हो रही हैं कि मंत्र जपो, धन आएगा। आपको वहाँ बैठे ही मूलधन चाहिए। अगर आप ऐसे ही उलझे रहेंगे तो मैं आपको सच्चा अध्यात्म कैसे बताऊँगा? नहीं गुरुजी! आप ऐसा मंत्र बताइए जिससे पैसा मिल जाए, बेटा मिल जाए। चलो अभी बता देते हैं। क्या मंत्र है! बस वही है जो बाबा बता गया था और आपसे मोटी दक्षिणा ले गया था। चलो हम भी वही बता देते हैं। क्या है? वही-”ह्नीं श्रीं क्लीं चामुण्डयै बिच्चैः” बेटे, इससे तो बहुत रुपया आया होगा? हाँ गुरुजी! हमने जप किया था। अच्छा तो अभी और झक मार और ‘चामुण्डयै बिच्चैः’ जपता रह। दुष्ट लूट का माल मारने के लिए खड़ा है और कहता है कि मंत्र का चमत्कार दिखाइए।
चमत्कारों की जन्मस्थली अपना आपा
मित्रो! मंत्रों के चमत्कार कहाँ से आते हैं? मंत्रों के चमत्कार आदमी के भीतर से आते हैं। पेड़ जो आपको बाहर खड़ा दिखाई पड़ता है, कहाँ से आता है? पेड़ पर फल, फूल, पत्ते कहाँ से आते हैं? अच्छा, पहले बताइए कि पत्ते कहाँ से आते हैं? पत्ते, साहब! हवा में से भागते हुए आ जाते हैं और डाली से चिपक जाते हैं। अच्छा फूल कहाँ से आते हैं? फूल रात में तारों से ऊपर से गिरते हैं और पेड़ पर चिपक जाते है और ये फल कहाँ से आते हैं? फल, गुरुजी! रात में बादल आते हैं तो बहुत से फल लाते हैं। अच्छा तो फल क्या करते हैं? टप-टप टपक पड़ते हैं और पेड़ पकड़ लेते हैं। कि फल बाहर से आते हैं। अच्छा, ये फूल भी बाहर से आते हैं और पत्ते भी बाहर से आते हैं? हाँ साहब। नहीं बेटे, तेरा यह ख्याल गलत है। तो गुरुजी! आप ही बताइए कि सही बात क्या है? बेटे, पेड़ की जड़े जमीन में होती हैं, जो दिखाई नहीं पड़तीं। ये जड़ें जमीन से रस चूसती हैं और उसे चूसती हैं और उसे चूसने के बाद खाने की तरह ऊपर तने में फेंक देती हैं, डालियों में फेंक देती हैं, पत्तों में फेंक देती हैं, फूलों में फेंक देती हैं और फलों में फेंक देती हैं। यह कहाँ से आता है? बाहर से नहीं भीतर से आता है। बाहर से मतलब-देवताओं से नहीं आता। आप समझते क्यों नहीं? इसी का नाम अध्यात्म है।
अध्यात्म किसे कहते हैं? ‘साइंस ऑफ सोल’ को अध्यात्म कहते हैं। सोल की साइंस में-आत्मा के विज्ञान में हर चीज भीतर से निकलती है। आप बाहर से ही माँगते हैं। देवताओं से माँगते हैं। मनुहार-उपहार, अनुग्रह-उपहार यही आपकी मान्यता है। मनुहार करेंगे, उपहार पाएँगे, यही ख्याल है न आपका? अच्छा बताइए कि बादलों में पानी किसने पैदा किया? नहीं साहब मनुहार करेंगे, उपहार पाएँगे, साष्टाँग दंडवत करेंगे और उपहार पाएँगे, आपको यह सब किसने कहा था? साहब! वो बाबा कह रहा था। पागल है बाबा।
मित्रों! क्या करना चाहिए ? आपको वास्तविकता के नजदीक आना चाहिए। वास्तविकता के फायदे बताने के बाद मैं आपको आध्यात्मिकता के तरीके बताना चाहूँगा कि आपको
क्या करना चाहिए। वास्तविकता के फायदे जानने के बाद यदि आपको काफी मालूम पड़ते हों, तो आप अध्यात्म के नजदीक आइए और अगर ये कम मालूम पड़ते हों तो आप न भी आएँ तो कोई हर्ज नहीं है। हमने तो इससे तीन फायदे उठाए हैं। पहला फायदा यह आता है कि हमारा भीतर वाला हिस्सा-जिसको हम ‘अंतःकरण’ कहते हैं, इतना शुद्ध और पवित्र हो जाता है कि आदमी को हर समय एक वरदान मिलता रहता है, जिसको हम ‘संतोष’ कहते हैं।
अंदर की खुशी एक दिव्य वरदान
मित्रो! खुशियों के तरीके दो हैं। एक खुशी बाहर से आती है-मसलन खाना। खाने के समय कोई जायकेदार चीज मिल जाए तो यह एक बाह्य खुशी है। साहब क्या खाकर आए ? पेड़े खाकर आए, लड्डू खाकर आए, अच्छा ठीक और एक खुशी वो होती है कि आप सिनेमा देखकर आए। ये कौन-सी खुशियाँ हैं? ये चीजें मिलने की वजह से खुशियाँ होती हैं। ये खुशियाँ होती तो हैं, पर थोड़ी देर के लिए ही ठहरती हैं, फिर गायब हो जाती हैं। सिनेमा देखकर आए-गायब, मिठाई खाकर आए, गायब। थोड़ी देर में ही ये सारी खुशियाँ गायब हो जाती हैं। ये टिकाऊ नहीं होतीं। टिकाऊ चीज क्या होती है? जो चीज भीतर से निकलती है, उसका नाम है-’शाँति’। शाँति का ही दूसरा नाम संतोष है। शाँति के बारे में जो आपने सुन रखा है, उस चैन को शाँति नहीं कहते। कोई मुसीबत न आए, हल्ला-गुल्ला न मचे, कोलाहल न हो, इसे शाँति नहीं कहते। नहीं साहब! शाँति उसे भी कहते हैं कि काली कमली लेकर चले जाएँगे और कहीं गुफा में रहेंगे, जहाँ कोई झंझट, घोटाला न हो, कोई बोले-चाले नहीं। हर तरफ शाँति हो। बेटे, ये मान्यता गलत है। यह शाँति की परिभाषा नहीं है। शाँति की प्राथमिक परिभाषा यह है कि आदमी को संतोष रहता है। संतोष किसको रहेगा? संतोष सिर्फ एक आदमी को रहेगा, जिसने अपने जीवन का क्रम ऐसा बना लिया है कि जिससे उसके अंदर अंतर्द्वंद्व क्या है ? अंतर्द्वंद्व बेटे दो साँड़ों की लड़ाई की तरह है । दो साँड़ों की लड़ाई देखी है न आपने ? हाँ गुरुजी! जब दो साँड़ लड़ते हैं तो खेत को, दुकान को बहुत नुकसान पहुँचाते हैं। एक बार तो दो खोमचे वाले बैठे थे और दो साँड़ लड़ते हुए आ गए। फिर क्या हुआ? उन्होंने खोमचे वालों का सामान फैला दिया और मुसाफिरों को धक्के मारे। और क्या हुआ? और गुरुजी! उसने दीवार में टक्कर मारी और धकेल वाले को उछाल दिया। एक दिन हमने खेत में लड़ते हुए साँड़ देखे। वो क्या करते थे? गुरुजी! वे दोनों ऐसे लड़े कि बेचारी गेहूँ की फसल और धान की फसल को चौपट करके धर दिया। लड़ते-लड़ते वे सब चौपट कर गए।
मित्रो! साँड़ कहाँ होते हैं? साँड़ हमारे भीतर रहते हैं। साँड़ कौन होते हैं ? साँड़ हमारे भीतर रहते हैं। साँड़ कौन होते हैं? एक तो वे जिन्हें अवाँछनीयता कहते हैं, अनैतिकता कहते हैं। बेटे, हमारे भीतर एक नैतिक पक्ष है और एक अनैतिक पक्ष है। दोनों के भीतर कोहराम मचता रहता है। दोनों के बीच लड़ाई चलती रहती है ।यह लड़ाई कभी बंद नहीं होती। एक कहता है कि आप मान जाइए, दूसरा कहता है कि आप मान जाइए। दोनों ही नहीं मानते। हमारे भीतर जो शैतान बैठा हुआ है, वो भी नहीं मानता और अंदर बैठे भगवान् से कहते हैं कि आप ही चुप हो जाइए, तो वो भी नहीं मानता। दोनों के भीतर जो कोहराम मचता रहता है, अंतर्द्वंद्व चलता रहता है, इसकी वजह से हमारे भीतर अशाँति पैदा होती है। हर जगह अशाँति, हर जगह नाराजगी, हर जगह असंतोष-हमारे भीतर छाया रहता है।
अध्यात्म से क्या हो जाएगा? इस शिविर में मैं उस अध्यात्म को आपको सिखाने वाला हूँ, जो मुझे मेरे गुरु ने सिखाया है और उसका परिणाम नगद धर्म है। इससे आपको क्या मिलेगा ? इससे आपको भीतर से एक ऐसी चीज मिलेगी, जिसे संतोष कहते हैं। संतोष किसे कहते हैं ? बेटे, संतोष उसे कहते हैं जिसके कारण आदमी मस्ती में झूमता रहता है, खुशी से झूमता रहता है। आदमी की परेशानियाँ दूर हो जाती हैं। न आदमी को टैंऊक्युलाइजर की गोलियाँ खानी पड़ती हैं, न ड्रिंक करना पड़ता है और न सिनेमा जाना पड़ता है। आदमी अपनी जिंदगी शाँति से, चैन से जी लेता है। ऐसी शाँति की जिंदगी जिसमें बहुत गहरी नींद आती है। भगवान बुद्ध पूरे आठ घंटे सोया करते थे। उनकी नींद में एक और विशेषता थी कि जिस भी करवट एक बार हाथ धर कर सो जाते थे, सबेरे उधर ही उठते थे। सोते समय एक बार जिधर पैर रख लिया, सबेरे तक वह वहीं रहेगा, क्योंकि उन्हें बहुत गहरी नींद आती थी। नींद का मजा तो आपने लिया ही नहीं। आपने किसका मजा लिया-रोटी का मजा लिया। कभी आपको असली मजा लेना हो तो-नींद का होता है, उसे लेना। आज इसके बिना आदमी हैरान रहते हैं और कहते हैं कि नींद आती। नींद किसको आएगी? हरेक आदमी को आएगी, जिसका अंतर्द्वंद्व बंद हो जाएगा। जिनके अंदर के साँड़ लड़ना बंद कर देंगे। जो एक रास्ते पर चलेंगे।
क्राँतिकारी अध्यात्म की ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ
मित्रों! अगर आपको यह पसंद हो कि आपको संतोष हो और संतोष की वजह से शाँति मिले तो आपको इस अध्यात्म को अपनाना होगा। इसमें फसल भीतर से उगना शुरू कर देती है, जिसको आप अतींद्रिय क्षमता कहते हैं। अतींद्रिय क्षमता क्या होती है ? दूरदर्शन की क्षमता-दूर देखने की क्षमता, दूर श्रवण की क्षमता। हमारे अंदर टेलीविजन लगे हुए हैं, वायरलैस लगे हुए हैं। इतने सारे वैज्ञानिक उपकरण लगे हुए हैं, वायरलैस लगे हुए हैं। इतने सारे वैज्ञानिक उपकरण लगे हुए हैं, जो साधारण आदमी को नहीं मिल सकते, लेकिन आप को मिल सकते हैं। शर्त केवल यह है कि आपके भीतर जो कोहराम मचा रहता है, उसे आप बंद कर दें।
साथियो! जो अध्यात्म हम आपको सिखाएँगे, उसमें यह कोहराम बंद हो जाएगा। जब अंदर का कोहराम खत्म हो जाएगा, तब हर जगह आपको जिंदगी का जायका, जिंदगी का मजा मिलेगा। जिंदगी का मजा संतोष के ऊपर टिका हुआ है, खुशी के ऊपर टिका हुआ है। आप सारे कार्य खुशी के लिए ही तो करते हैं! खुशी के लिए सिनेमा देखते हैं। खुशी के लिए बच्चों के ब्याह में सम्मिलित होते हैं, लेकिन खुशी का बेहतरीन स्वरूप वो है, जिसको हम संतोष कहते हैं। संतोष अगर आपको मिल सकता है, तब आपके चेहरे पर हर समय खुशी दिखाई पड़ेगी। चेहरे पर आपको क्या मालूम पड़ेगा ? दो बातें मालूम पड़ेंगी-एक तो आपको गहरी नींद आया करेगी और दूसरा आपके चेहरे पर गुलाब के फूल की तरह खुशी दिखाई पड़ेगी। फिर आपकी खीझ, आपकी झल्लाहट, आपकी नाराजगी सब दूर हो जाएगी।
मित्रो! वो अध्यात्म जो हम आपको सिखाने वाले हैं और जिसको हमारे गुरु ने सिखाया है, आपकी जिंदगी में से खीझ खत्म कर सकते हैं। अगर ये सिद्धि आपको मंजूर हो तो आइए हमारे साथ, हम आपको सिखाएँगे। आप उसे सीखिए और कीमत चुकाइए। आदमी का संतोष जो भीतर से निकलता है, प्रतिभा जो भीतर से निकलती है, प्रखरता जो भीतर से निकलती है-सब भीतर से निकलती हैं। ‘भीतर’ से आप क्या समझते है, पर जरा-सा खोद दें तो मिलेगा-पानी। और जरा गहरा खोदें तो पेट्रोल मिलेगा। जहाँ आप बैठे हैं, अगर उस पाँच फुट जगह में मशीन से खुदाई करना शुरू कर दें और जहाँ तक जमीन है वहाँ तक गुड्डे कर डालें, तो उसमें करोड़ों, अरबों, खरबों रुपए की दौलत मिल जाएगी। बेटे, बाहर तो मिट्टी है, पर भीतर संपत्ति है, बहुमूल्य संपदा है।
मित्रों! आदमी के व्यक्तित्व के भीतर जाने क्या-क्या भरा पड़ा है। आदमी के बाहर-यह जो आपको दिखाई पड़ता है, यह रोटी रहता है, टट्टी-पेशाब करता रहता है। यह तो इसका लिफाफा है, जो पैसा कमाता रहता है, सिनेमा देखता रहता है, बच्चे पैदा करता रहता है-यह लिफाफा है। लिफाफा भी होता है और उसमें भी जंजाल बन जाते हैं। कैसे ? अरे भाई ! जैसे हमारे जुएँ पड़ जाते हैं। जुओं के लिए कोई मकान है ? कोई घर-गृहस्थी है ? कोई खेती-बाड़ी है ? कोई भी नहीं है। वे इसी में गुजारा कर लेते हैं। इसी तरह जुएँ के तरीके से आप अपने जीवन का महत्त्व समझते हैं। सिर में से कितने जुँए निकले ? पाँच। ये पाँच जुएँ क्या होते हैं ? ये पाँच बच्चे हैं। जुएँ और बच्चे की बात एक ही होती है-बिल्कुल एक ही बात। बच्चे हमारा बहिरंग जीवन है।
अंतरंग जीवन क्या है ? अंतरंग जीवन को तो आपने कभी देखा भी नहीं। उसे कभी छुआ भी नहीं। अंतरंग जीवन की कभी हवा भी नहीं लगी आपको। अंतरंग जीवन की आपको कभी गंध भी नहीं आई। आपने अंतरंग जीवन का स्वरूप ही नहीं देखा। आदमी के अंतरंग का जो स्वरूप है, अगर उसे आप देख पाते, तो आपकी जिंदगी में मजा आ जाता । अगर आप अपने भीतर वाले को शानदार बना लेते, तो मैं यह कहता हूँ कि आपको दो शक्तियाँ मिलतीं। एक तो आपको गहरी नींद आती। गुरुजी! आपको गहरी नींद आती है? हाँ बेटे, हमको ऐसी गहरी नींद आती है कि हम आठ बजे यहाँ से जाते हैं और बिस्तर पर लेटते ही साढ़े आठ बजे तक गहरी नींद में चले जाते हैं, फिर साढ़े बारह बजे हमारी आँख खुल जाती है और एक बजे तक आधे घंटे में हम नहा-धोकर अपना काम चालू कर देते हैं, भजन-पूजन करते हैं। हम कितने घंटे सोते हैं ? चार घंटे में हमको इतनी गहरी नींद आती है कि चाहे जमीन फट जाए या आसमान टूट जाए, हमें सामान्य घटनाएँ प्रभावित नहीं करतीं।
संतोष धन सबसे बड़ी पूँजी
हमें इतनी गहरी नींद क्यों आती है ? क्योंकि हमें कोई चिंता नहीं है। आपके शाँतिकुँज की हमें बिल्कुल चिंता नहीं, गायत्री तपोभूमि की हमको बिलकुल चिंता नहीं। आपके युग निर्माण की हमको बिलकुल चिंता नहीं। क्यों ? क्योंकि हम भगवान पर विश्वा करते हैं। आपको चिंता क्यों है ? क्योंकि आप भगवान पर विश्वास नहीं करते । भगवान का नाम लेते हैं, पर भगवान पर विश्वास नहीं करते। हम भगवान पर विश्वास करते हैं और ये समझते हैं कि सारी दुनिया उसी के चक्र पर घूम रही है और हम भी उसी के इशारे पर कठपुतली की तरह काम करते हैं और उसको जो काम करना होगा, वह ठीक हो जाएगा। इसीलिए हमें पूरी नींद आती है और रात को जरा भी असंतोष नहीं होता और चिंता बिलकुल नहीं आती। और क्या रहता है? बेटे! हमारे चेहरे पर मुस्कराहट छाई रहती है।मित्रो! गाँधी जी के चेहरे पर सदैव मुस्कराहट रहती थी, वे जल्दी-जल्दी हँसते रहते थे। वे मजाक भी करते थे। गाँधी जी से एक बार पूछा कि आप तो बार-बार हँसते हैं। उन्होंने कहा- हँसेंगे नहीं तो जिएँगे कैसे। हँसते के ऊपर ही तो हमारी जिंदगी कायम है। जो आदमी हँसते नहीं, वे मनहूस होते हैं। मनहूस माने राक्षस, शैतान-जिसको देखकर बच्चे भाग जाते है। यह कौन आ गया? मनहूस आ गया। मनहूस कैसा होता है? जैसे पापा। पापा किसे कहते हैं? मनहूस को। पाप जब घर में घुसेगा तो सब पर हावी होता चला जाएगा। यह कौन है? मनहूस है, राक्षस है जो हँसना-हँसाना नहीं जानता।
मित्रों ! अगर आपके भीतर कदाचित् अध्यात्म आ गया तो आपके चेहरे से मिठास बरसेगी। आपकी वाणी से रस बरसेगा। आपके व्यवहार में न जाने क्या-क्या शानदार चीजें आएँगी। अध्यात्म उस चीज का नाम है जो आपके भीतर संतोष लाकर के देगा। यह हुई सिद्ध नंबर एक। अगर आपको यह सिद्धि स्वीकार हो तो चलिए फिर हम आपको साधना बताएँगे। गुरुजी ! साधना बताने में तो बहुत टाइम लग जाएगा? नहीं बेटा ये तो मिनटों की बात है। आपरेशन में क्या देर लगती है! दवा खिलाने में क्या देर लगती है! इंजेक्शन तो एक मिनट में लगा देंगे। और क्या करेंगे? खान-पान का परहेज रखते हुए मरीज ठीक हो जाएगा। असली इलाज तो बेटे परहेज है। नहीं साहब !सुई है। सुई में कितनी ताकत है? सुई में तो बेटे जरा भी ताकत नहीं है, पर परहेज में बहुत है।
अच्छा अब आप क्या पढ़ा रहे है। अब बेटे हम परहेज पढ़ा रहे हैं और फिलॉसफी पढ़ा रहे है। और आगे क्या बताएँगे- मंत्र? मंत्र तो कभी भी बता देंगे। मंत्रों में क्या देर लगती है। यह तो सेकेंड का काम है। जब आप कहेंगे, चलते-फिरते तभी बता देंगे। अभी असली बात तो उसकी ‘फिलॉसफी’ सीखिए। बेटे, हम आपको वो अध्यात्म सिखाने के इच्छुक थे, जिसको अगर आप सीखना चाहें तो आपको एक और चीज मिल सकती है। इसको सीखने पर आपको एक और सिद्धि मिलेगी। वो सिद्धि बाहर की होगी। पहली सिद्धि भीतर से मिलेगी और उसका नाम हैं - संतोष। संतोष की वजह से आपका स्वास्थ्य, संतोष की वजह से आपकी खुशी, संतोष की वजह से आपकी जवानी, संतोष की वजह से आपकी दबी हुई अतींद्रिय क्षमताओं का विकास ये सब के सब भीतर से मिलेंगे।
और बाहर से-दुनिया से क्या मिलेगा? दुनिया से भी बेटे आपको एक चीज मिलेगी। दुनिया आपको कैसे देगी? दुनिया कभी आपने देखी है? मोटर साइकिलें जब भागती हैं, तो उसके पीछे-पीछे पत्ते भागते हैं। आपने देखे हैं कि नहीं देखे? पत्तों को कोई बुलाता है क्या? वे अंधाधुँध भागते हुए चल आते हैं। अरे बाबा! तुम कहाँ जा रहे हो? हम तो कहीं नहीं जा रहे, इस दौड़ती हुई मोटर के साथ जा रहे हैं। ये मोटर कौन है, तुम्हारी मौसी है या रिश्तेदार? कोई नहीं है। जब ये मोटर भागती है तो इसकी कशिश हमें खींचती है। रेत के कण, धूल, पत्ते इसके पीछे-पीछे भागते -फिरते रहते हैं। भीतर वाही कशिश और भीतर वाली मैग्नेट जब विकसित होती है तो दुनिया बेटे, आपको एक उपहार देती है और उस उपहार का नाम सम्मान है ‘सम्मान’। बाहर की सिद्धि को पाकर आप सम्मानित व इज्जतदार आदमी बन जाएँगे।
सम्मान बरसेगा
मित्रों! जो अध्यात्म मैं आपको सिखाने वाला हूँ, मालूम नहीं कि आप सीखेंगे कि नहीं और सफल होंगे कि नहीं, लेकिन यदि आपने सीख लिया तो एक चीज और आपको मिलेगी। दुनिया की दृष्टि से आपको सम्मान मिलेगा गुरुजी! वैसे तो सम्मान किसी को भी मिलता नहीं, हाँ चापलूसी जरूर मिलती है। हाँ बेटे, चापलूसी तो खरीदी भी जा सकती है। पैसे दीजिए, चापलूसी खरीद लीजिए। चापलूसी आप कहीं से भी खरीद लीजिए। भाँड़ों से, रंडियों से, चमचों से किसी से भी चापलूसी खरीद लीजिए और अपना फोटो छपवा लीजिए। लेकिन आप जो चाहते हैं, वह सम्मान नहीं है। वह तो चापलूसी है और जब आपकी खरीदने की ताकत कम हो जाएगी, तो ये नाराज हो जाएँगे। अभी रंडी आपको मदिरा पिलाती है, पान खिलाती है और कहती है कि आइए, आप बहुत दिन में आए, लेकिन जब आपके पैसे खत्म हो जाएँगे, ये लात मारेगी और कान उखाड़ देगी।
बेटे जिसे आप इज्जत कहते हैं, वह पैसे से नहीं खरीदी जा सकती है। मैं जिस सम्मान की बात कहता हूँ, वह वो चीज है जो उन लोगों पर बरसती है, जिन्हें हम अध्यात्मवादी कहते हैं। उनके ऊपर सम्मान बरसता है, श्रद्धा बरसती है और उससे जो फायदा होता है, उसे आप नहीं समझ सकते ।
मित्रों! श्रद्धा के साथ, सम्मान के साथ एक और चीज जुड़ी होती है और उसका नाम है-सहायता । श्रद्धा के साथ सहायता जुड़ी होती है। श्रद्धा आपके साथ में आएगी, अगर जन-समाज का सम्मान आपके प्रति होगा, तो आपके प्रति बेटे सहयोग आएगा। नानक के प्रति श्रद्धा थी, अतः लोगों का सहयोग आया। उनका स्वर्ण मंदिर बना हुआ है, जो इसका साक्षी है। बुद्ध के प्रति श्रद्धा पैदा हुई और उनके प्रति लोगों का सम्मान पैदा हुआ। अशोक ने तो कमाल ही कर दिया था। आम्रपाली से लेकर अंगुलिमाल तक कौन-कौन जाने कितने आदमियों का सहयोग इस कदर बरसता था कि मैं आपसे क्या कहूँ? जहाँ सम्मान होगा, वहाँ सहयोग अवश्य बरसेगा
- क्रमशः (समापन अगले अंक में )
अन्तर्यात्रा के विज्ञान की यह तीसरी कड़ी है। योग साधकों ने पिछले अंक में साधना के प्रवेश द्वार के रूप में योग दर्शन के प्रथम पाद के प्रथम सूत्र पर मनन किया। जो अपनी सम्यक् दृष्टि से इस पहले सूत्र का रहस्य जान चुके हैं, उनके लिए महर्षि पतंजलि समाधिपाद के दूसरे सूत्र में योग के सत्य को समझाते हैं। योग के स्वरूप को परिभाषित करते हैं। इसकी व्याख्या करते हैं। क्योंकि जिनकी अन्तर्चेतना में शिष्यत्व जन्म ले चुका है, जो अपने सद्गुरु द्वारा दिए गए अनुशासन को स्वीकारने के लिए कृतसंकल्प हैं। उन्हें योग के स्वरूप को जानना, इसे आत्मसात् करना जरूरी है। योग साधकों की साधना का यह आवश्यक तत्त्व ही महर्षि के इस दूसरे सूत्र के विचार का विषय है।
इस दूसरे सूत्र में महर्षि कहते हैं- योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। यही योग की मूलभूत एवं मौलिक परिभाषा है। इस सूत्र के शब्दों का अर्थ है- योगः= योग, चित्तवृत्तिनिरोधः= चित्त की वृत्तियों को रोकना (है)। लेकिन साधकों की दृष्टि में इस सूत्र का अर्थ है- योग मन की समाप्ति है। परम पूज्य गुरुदेव योग साधना के इस सत्य को समझाते हुए कहा करते थे- ‘साधक का मन मिटे तो उसे योग की सच्चाई समझ में आए।’ महर्षि पतंजलि एवं गुरुदेव दोनों ही खरे वैज्ञानिक हैं, एकदम गणितज्ञ। वे इधर-उधर की बातें करके न अपना समय खराब करते हैं और न ही साधकों का।
उन्होंने पहले भी प्रथम सूत्र में एक वाक्य कहा था- ‘अब योग का अनुशासन’- और बस बात समाप्त। इस एक वाक्य में उन्होंने परख लिया कि साधकों में सच्चाई कितनी है, उनमें खरापन कितना है। यदि वे सच्चे और खरे हैं, योग में उनकी सचमुच में रुचि है- आशा, अभिलाषा के रूप में नहीं, अनुशासन के रूप में, जीवन के रूपांतरण के रूप में, अभी और यहाँ। ऐसे खरे और सच्चे साधकों को वे योग की परिभाषा देते हैं, योग मन की समाप्ति है। मन मिटे तो बात बने।
यही योग की परिभाषा है, सही और सटीक। अलग-अलग आचार्यों ने, शास्त्रों ने योग को कई तरह से परिभाषित किया है। उन्होंने अनेकों परिभाषाएँ ढूंढ़ी और बतायी हैं। कुछ का मत है योग दिव्य सत्ता के साथ मिलन है। इनके अनुसार योग का मतलब ही मिलना, दो का जुड़ना। कई कहते हैं योग का मतलब है अहंकारी का ढह जाना। उनके अनुसार अहंकार बीच में दीवार है, जिस क्षण यह दीवार ढह जाती है, साधक दिव्य सत्ता से जुड़ जाता है। दरअसल यह जुड़ाव तो पहले से ही था बह अहंकार के कारण भेद लगता रहा। ऐसी और भी अनेकों व्याख्याएँ हैं, परिभाषाएँ हैं। जैसे श्रीमद्भगवद्गीता में ‘समत्वं योग उच्यते’ तथा ‘योगः कर्मसुकौशलम्’ कहकर योग को परिभाषित किया गया है।
लेकिन महर्षि पतंजलि इन सभी आचार्यों-शास्त्रकारों से कहीं ज्यादा वैज्ञानिक हैं। वे पत्ते और टहनियाँ नहीं, सीधे जड़ पकड़ते हैं। गीता में बतायी गयी समता एवं कर्मकुशलता मिलेगी कैसे? दिव्य सत्ता से साधक के अस्तित्व का जुड़ाव होगा किस तरह? महर्षि पतंजलि की परिभाषा में इन सभी सवालों का सटीक जवाब है। वे कहते हैं, जब मन का अवसान हो जाएगा, जब मन मिट जाएगा। उनके अनुसार योग अ-मन की दशा है।
पतंजलि की इस बात को गुरुदेव एक नयी वैज्ञानिक अनुभूति देते हैं। वे कहते हैं सारा कुछ मन का जादू, इन्द्रजाल है। यह हटा कि समझो सारा भ्रम मिटा। उनके अनुसार यह शब्द ‘मन’ सब कुछ को अपने में समेट लेता है- अहंकार, इच्छाएँ, कामनाएँ, कल्पनाएँ, आशाएँ, तत्त्वज्ञान और शास्त्र। जहाँ कुछ जो भी सोचा जा सकता है, सोचा जा रहा है, वह मन है। जो भी जाना गया है, जो भी जाना जा सकता है, जो भी जानने लायक समझा जाता है, वह सब का सब मन के दायरे में है। मन की समाप्ति का मतलब है जो जाना है, उसकी समाप्ति और जो जानना है उसकी समाप्ति। यह तो छलाँग है-ज्ञानातीत में। जब मन न रहा, तो जो बचा वह ज्ञानातीत है।
मन के इसी सत्य को गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने अपनी रामायण में गाया है- ‘गो गोचर जहाँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥’ अर्थात् इन्द्रियाँ, इन्द्रियों की पहुँच और जहाँ-जहाँ तक मन जाता है, हे भाई, तुम उस सब को माया जानना, मिथ्या समझना। महर्षि पतंजलि के अनुसार इसी माया का मिटना, मिथ्या का हटना यानि कि मन का समाप्त होना योग है।
मन की परेशानी, मन से परेशानी, साधकों का सबसे अहम् सवाल है, सबसे जरूरी और महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। इस उलझन को सुलझाने के लिए सबसे पहले यह जान लें कि आखिर मन अपने आप में है क्या? यह हमारे भीतर बैठा हुआ क्या कर रहा है, क्या-क्या कर रहा है? आमतौर पर सब यही सोचते रहते हैं कि मन सिर में पड़ी या रखी हुई कोई भौतिक चीज है। पर परम पूज्य गुरुदेव इस बात को नहीं स्वीकारते। वह कहते हैं कि जिसने भी मन को अन्दर से पहचान लिया है, वह ऐसी बातें नहीं स्वीकारेगा। आज-कल का विज्ञान भी ऐसी बातों से इन्कार करता है। गुरुदेव कहते हैं मन एक वृत्ति, क्रियाशीलता है।
अब जैसे कि कोई चलता हुआ आदमी बैठ जाय, तो बैठने पर उसका चलना कहाँ भाग गया। तो बात इतनी सी है कि चलना कोई वस्तु या पदार्थ तो थी नहीं, वह तो एक क्रिया है। इसलिए कोई किसी के बैठने पर यह नहीं पूछा करता कि तुमने अपना चलना कहाँ छुपा कर रख दिया। यदि कोई किसी से ऐसा पूछने लगे, तो सामने वाला जोर से हँस पड़ेगा। वह यही कहेगा कि यह तो क्रिया है। मैं चाहूँ तो फिर से चल सकता हूँ, बार-बार चल सकता हूँ। चाहने पर चलना रोक भी सकता हूँ। बस कुछ इसी तरह मन भी एक तरह का क्रिया-कलाप है। बस मन या ‘माइण्ड’ शब्द से किसी तत्त्व या पदार्थ के होने का भ्रम होता है। यदि इस माइण्ड को माइण्डिग कहा जाय तो सत्य शायद ज्यादा साफ हो जाय। जैसे बोलना टाकिंग है, ठीक वैसे ही सोचना माइण्डिग। यह सक्रियता थमे तो मन का अवसान हो और साधक योगी बने।
योग की इस सच्चाई को बताने के लिए गुरुदेव यदा-कदा एक कथा सुनाया करते थे। वह कहते थे- कि वाराणसी में रहने वाले महान् सन्त तैलंग स्वामी के पास एक किसी बड़ी रियासत के राजा गए। और उन राजा ने तैलंग स्वामी से कहा, महाराज, मेरा मन बहुत बेचैन है, बहुत अशान्त-परेशान है। आप महान् सन्त हैं, मुझे बताएँ कि मैं क्या करूं, जिससे कि मेरा मन शान्त हो जाय।
तैलंग स्वामी वैसे तो बड़े कोमल स्वभाव के थे, पर कभी-कभी उनका रुख बड़ा अक्खड़ हो जाता। उस दिन भी उन्होंने बड़े अक्खड़पने से कहा, कुछ भी मत करो। पहले अपना मन मेरे पास लाओ। उस राजा को कुछ भी समझ में नहीं आया। उसने कहा, महाराज आप क्या कह रहे हैं, मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। तैलंग स्वामी ने उसकी बातों की अनसुनी करके उससे कहा, ऐसा करो, सुबह चार बजे मेरे पास यहाँ कोई नहीं होता, तब आना और अकेले आना। और ध्यान रखना, अपना मन भी अपने साथ लेते आना, भूलना मत।
वह राजा सारी रात सो नहीं पाया। कई बार उसने सोचा कि वह उनके पास नहीं जाएगा। बार-बार वह अपने आप से कहता- इन स्वामी जी को लोग बेकार इतना बड़ा ज्ञानी मानते हैं, यह तो बहकी-बहकी बातें करते हैं। आखिर क्या मतलब है उनका यह कहने से भूलना नहीं, अपना मन भी अपने साथ लेकर आ जाना।
उस राजा को उस रोज ऊहापोह भारी रही। परन्तु चाहकर भी वह उस भेंट को रद्द न कर सके। तैलंग स्वामी थे ही इतने मोहक एवं चुम्बकीय। राजा को रात भर यही लगता रहा कि कोई अद्भुत चुम्बक उन्हें अपनी ओर खींच रहा है। चार बजने से कुछ पहले ही वह बिस्तर से उठ बैठा और कहने लगा, मैं उसके पास जाऊँगा जरूर। वे थोड़ी सी बहकी हुई बातें करते हैं, तो क्या हुआ, पर उनकी आँखें कहती हैं कि उनके पास कुछ अवश्य है।
ऐसे ही सोच-विचार करते हुए वह तैलंग स्वामी के पास पहुँच गया। पहुँचते ही उन्होंने कहा, आ गए तुम, कहाँ है तुम्हारा मन? राजा बोला, आप भी कैसी बातें करते हैं स्वामी जी। मेरा मन भला और कहाँ होगा, वह तो मुझमें ही है।
तैलंग स्वामी बोले, अच्छा तो पहले तो इस बात का निर्णय हो गया, कि तुम्हारा मन तुममें ही है। तो अब दूसरी बात मेरी कही हुई करो, अब आँखें बन्द करके खोजो जरा कि मन कहाँ है। तुम उसे ढूंढ़ लो कि वह कहाँ है, तो फिर उसी क्षण मुझे बता देना। मैं उसे शान्त कर दूँगा।
उस राजा ने तैलंग स्वामी का कहा मानकर आँखें बन्द कर ली और कोशिश करता गया देखने की, और देखने की। जितना ही वह भीतर झाँकता गया, उतना ही उसे होश आता गया कि वहाँ कोई मन नहीं है, बस एक क्रिया मात्र है- सोचने की क्रिया, आशाओं, अभिलाषाओं, कामनाओं, कल्पनाओं की क्रिया। उसे समझ में आ गया कि मन कोई ऐसी चीज नहीं, जिसकी ओर ठीक से इशारा किया जा सके। लेकिन जिस क्षण उसने जाना कि मन कोई वस्तु नहीं, उसी क्षण उसे अपनी खोज का बेतुकापन भी खुलकर प्रकट हो गया। बात साफ हो गयी कि जब मन कुछ है ही नहीं, तो फिर इसके बारे में कुछ किया ही नहीं जा सकता। यदि यह केवल एक क्रिया है तो बस उस क्रिया को क्रियान्वित न करो। यदि वह गति की भाँति चाल है तो मत चलो।
यही सोचकर राजा ने अपनी आँखें खोल दी। तैलंग स्वामी मुस्कराने लगे और बोले आ गयी बात समझ में। अब आगे से जब भी तुम महसूस करो कि तुम अशान्त हो, बस जरा भीतर झाँक लेना। यह झाँकना, यह अवलोकन ही मन की गति को थाम देता है। यदि तुम पूरी उत्कटता से झांको तो तुम्हारी सारी ऊर्जा एक दृष्टि बन जाती है। सामान्य क्रम में वही ऊर्जा गति और सोच-विचार बनी रहती है।
परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे- मनुष्य का अभ्यास, उसकी आदतें अपनी समूची ऊर्जा को सोच-विचार बनाने में लगी रहती है। वह जन्मों-जन्मों से हो सकता है लाखों जन्मों से यही करता रहा है। उसके इस सहयोग से, लगातार ऊर्जा देने से मन की नदी आज बड़े ही वेगपूर्ण ढंग से प्रवाहित हो रही है। अपने अतीत के संवेग के कारण मन भारी वेग और आश्चर्यजनक जादुई समर्थता के साथ बहा जा रहा है। जो योग साधना करना चाहते हैं, उन्हें यह बात भली प्रकार समझ लेनी है।
योग साधना का अर्थ है- अपने को इससे अलग करना। मन की क्रिया से अपने जुड़ाव-लगाव को खत्म करना। यदि मन के साथ, उसकी क्रियाशीलता के साथ अपनी आसक्ति समाप्त हो जाए, तो मन को ऊर्जा मिलना बन्द हो जाती है। फिर तो मन बस थोड़ी देर बहेगा, ऊर्जा के अभाव में स्वयं ही थम जाएगा। जब पिछला संवेग चुक जाएगा, जब पिछली ऊर्जा समाप्त हो जायगी, तब मन अपने आप ही रुक जाएगा। और जब मन रुक जाएगा, तब हम योग साधक से योगी होने की ओर कदम बढ़ाते हैं। तब फिर पतंजलि की परिभाषा, परम पूज्य गुरुदेव के द्वारा कराया गया बोध, हमारी खुद की अपनी अनुभूति बन जाएगा। हम समझ जाएँगे कि ‘मन की समाप्ति योग है।’
दैनिक जीवन में 15 मिनट से 30 मिनट का समय निकाल कर इसकी अनुभूति पायी जा सकती है। नियत समय एवं नियत स्थान के अनुशासन को स्वीकार कर अपने आसन पर स्थिर होकर बैठें। स्वयं की गहराई में टिकें। पहले ही क्षण मन के वेगपूर्ण प्रवाह की, भारी लहरों की अनुभूति होगी। इस प्रवाह, इसकी लहरों से आकर्षित न हों। स्वयं को इससे असम्बद्ध करें। यह अनुभव करें आप अलग हैं, और मन का वेगपूर्ण प्रवाह अलग। जैसे-जैसे यह अनुभव गाढ़ा होगा, मन का वेगपूर्ण प्रवाह थमता जाएगा। लेकिन ध्यान रहे बार-बार मुड़-मुड़ कर यह देखना नहीं है कि मन का वेग थमा या नहीं। क्योंकि ऐसा करने से आप फिर से अपनी ऊर्जा मन को देंगे, और वह फिर से प्रचण्ड हो उठेगा। मन से अलग अपने में स्वयं की स्थिरता जितनी बढ़ेगी, उतनी ही ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ की अनुभूति साकार होती जाएगी। यह अनुभूति कैसी है, यह दृश्य महर्षि पतंजलि के अगले सूत्र और परम पूज्य गुरुदेव के वचनों, अनुभवों के झरोखे से अगले अंक में प्रकट होगा।
सूर्य ने अपना रथ पश्चिम दिशा की ओर मोड़ लिया था। सूर्य के इस तरह पीठ मोड़ते ही आँगन की धूप भी धीरे-धीरे खिसकने और सिमटने लगी थी। गुरुदेव अपने इस आँगन में बिछी हुई फोल्डिंग चारपाई पर बैठे हुए थे। अभी थोड़े ही पलों पूर्व उन्होंने नीचे खबर करवाई थी कि सभी वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं की गोष्ठी लेना है। गुरुदेव द्वारा ली जाने वाली इन गोष्ठियों का अपने समय में बड़ा आकर्षण था। सबसे पहले तो उनका संग सुपास सभी को भाता था। गोस्वामी जी महाराज ने कहा है- ‘एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी ते पुनि आध। तुलसी संगत साधु की हरै कोटि अपराध॥’ अर्थात् साधु पुरुषों का संग-सुपास आधी, चौथाई घड़ी मिलने पर जीवन के करोड़ों पापों-अपराधों का शमन हो जाता है।
परम पूज्य गुरुदेव तो साधु पुरुषों में शिरोमणि, महासिद्ध, तपोमूर्ति और ज्ञान का साक्षात् स्वरूप साकार वेदमूर्ति थे। भगवान् ने भगवद्गीता में कहा है कि विद्याओं में मैं अध्यात्म विद्या हूँ। गुरुदेव तो अध्यात्म विद्या के रूप में स्वयं भगवान् थे। उनका लेशमात्र सान्निध्य भी आत्मा में अपरिमित सुख उपजाने वाला था। उनके द्वारा ली जाने वाली गोष्ठियाँ दरअसल उनकी अहैतुकी कृपा का ही एक रूप थी। जो जब-तब अनायास होती रहती थी। सूक्ष्मीकरण साधना के बाद से गुरुदेव के काम करने में प्रतिपल एक तेजी दिखाई देती थी। शायद वे मिशन के वर्तमान को बड़ी तेजी से भविष्य के लिए गढ़ रहे थे। उनके द्वारा ली जाने वाली ये गोष्ठियाँ उनकी इस प्रक्रिया का एक माध्यम भर थी।
गुरुदेव ने बुलाया है सुनकर शान्तिकुञ्ज के वरिष्ठगण एक-एक करके सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर पहुँच गए। ऊपर वाले आँगन में गुरुदेव की चारपाई के सामने एक बड़ा सा टाट का टुकड़ा बिछा हुआ था। सभी ने पहले गुरुदेव के चरणों में माथा नवाकर भक्ति पूर्ण रीति से प्रणाम किया। फिर सब शान्तभाव से बैठ गए। सबकी जिज्ञासा थी, गुरुजी आज क्या कहेंगे, क्या बतायेंगे। सबकी उत्सुकता तीव्र हो रही थी, गुरुदेव की बातें सुनने की त्वरा बढ़ रही थी।
तभी गुरुदेव, समय एक भी पल गवाँए बिना बोले, लड़कों, मैंने तुम सबको कुछ जरूरी बातें बताने के लिए बुलाया है। गुरुदेव के इस तरह बात शुरू करते ही सबके कान उनके शब्दों पर जा टिके। वह कह रहे थे- बेटा, अपना मिशन जिस बीज से जन्मा है, वह अध्यात्म है। अध्यात्म से ही इसका जन्म हुआ और आध्यात्मिक शक्तियों ने ही इसे पाल-पोष कर बड़ा किया है। अभी यह और भी बढ़ेगा, बहुत बढ़ेगा, बहुत ज्यादा बढ़ेगा। सच तो यह है कि तुम लोग देखोगे कि इसका विस्तार कभी रुकेगा ही नहीं। यह बढ़ता ही रहेगा, बढ़ता ही चला जाएगा।
इसके इस तरह बढ़ने में तुम लोगों का भी योगदान है। तुम सबने भी इसमें अपना खून-पसीना लगाया है। लेकिन बेटा तुम लोगों की मेहनत अगर इसमें दस पैसे है तो बाकी नब्बे पैसे अध्यात्म है। हमने जिन्दगी में जो कुछ भी पाया इसी आध्यात्म के सहारे पाया। अध्यात्म का साधक बनकर पाया। यदि हमने साधना की होती, अध्यात्म के लिए अपना सर्वस्व न लुटाया होता, हम साधक न बने होते, तो फिर आज तुम लोग यह सब जो कुछ भी देख रहे हो, वैसा कुछ भी न होता। न तुम लोग हमें गुरुजी कहते और हम तुम लोगों की नौकरियाँ छुड़ाकर, तुम्हारे घरों से दूर यहाँ तक ला पाए होते। तुम्हारे जीवन में, हमारे जीवन में जो कुछ अचरज घटा है, वह सब अध्यात्म के कारण है। हमारे साधक होने की वजह से है।
अपनी बातें कहते-कहते गुरुदेव रुके। एक पल को उनकी वाणी का अमृत प्रवाह थमा। सुन रहे सारे लोग शान्त, मौन और एकाग्र थे। सबके हृदयों में अपने गुरुदेव के प्रति श्रद्धा सघन से सघनतर सघनतम होती जा रही थी। सभी अपने सद्गुरु के वचनों में निमग्न हो रहे थे। गुरुदेव शायद इस पल उनकी इस एकाग्रता को जाँचने-परखने के लिए रुके थे। सम्भवतः वह यह सच्चाई जान लेना चाहते थे कि अब वह जो गम्भीर बात बताने जा रहे हैं, उसे सुनने के लिए ये लोग तत्पर हैं भी या नहीं। सभी की तत्परता-एकाग्रता एकदम खरी थी।
गुरुदेव की अमृतवाणी का प्रवाह फिर से वेगपूर्ण हो उठा। वह कहने लगे- बेटा, मैं साधक पहले हूँ, बाकी सब बाद में। मेरी जिन्दगी में लिखना, पढ़ना, सेवा, संगठन से सारी बातें बाद में आयीं। सबसे पहले साधना आयी। ये सब जो कुछ भी दिख रहा है, वे फूल-पत्ते हैं। सबकी जड़ तो साधना है। बेटा, मथुरा के अखण्ड ज्योति संस्थान में जो 9&9 की कोठरी है, वहीं पर मैंने सब कुछ देख समझ लिया था। वहीं पर उसी कोठरी में साधना करते हुए मैंने मिशन का आज का वर्तमान और आगे का भविष्य देखा था। अपने साधनाकाल में ध्यान करते हुए मैंने शान्तिकुञ्ज देखा था, तुम सबको देखा था। आगे जो लोग आएँगे, शान्तिकुञ्ज का जो भावी विस्तार होना है, वह भी मैंने उसी छोटी सी कोठरी में ध्यान करते हुए देख लिया था।
मुझसे कुछ छुपा थोड़े ही है। मैं सब जानता हूँ। मिशन में जो कुछ भी आगे होना है, जो घटनाएँ आगे घटेगी, मुझे सबका ज्ञान है। अभी तो मैं हूँ, आगे मैं नहीं रहूँगा, तब काफी उथल-पुथल होगी। कुछ लोग जाएँगे, कुछ नए लोग आएँगे। मैं तो चाहता हूँ कि तुम सब लोग रहो। पर बेटा, समय की तेज हलचलों में टिकने के लिए साधना का बल चाहिए। तुम लोग अपने अन्दर यही बल पैदा करो। एक बात मैं और बताए देता हूँ, तुममें से कोई यह न समझ ले कि उल्टी-सीधी माला टरकाने से साधना हो जाती है। यह न समझना कि बैठे रहकर नाक दबाने का नाम साधना है।
ये सारे कर्मकाण्ड तो साधना का खोल है। इसका प्राण तो पवित्रता और प्रामाणिकता है। अपनी जीवात्मा को धोने से साधना होती है। अपने गुरु की नजर में, अपनी आत्मा के सामने और भगवान के सामने एकदम सौ फीसदी खरा साबित होने का नाम साधना है। तुम लोग यह कर सको, तो करो। रोज अपनी चीर-फाड़ करो, अपनी कमियों-कमजोरियों को ढूंढ़ो और और उन्हें निकाल बाहर करो। जो अपने प्रति जितना कठोर होता है, वह उतना ही अच्छा साधक बन पाता है। अपनी बुराइयों, अपने अहंकार के प्रति घोर निर्ममता का नाम साधना है। यही साधना हमने की है, यही तुमको बता रहे हैं।
साधना का रहस्य समझा रहे गुरुदेव के मुख मण्डल पर तपस्या की प्रखरता एवं प्रभा झलक रही थी। उनके मस्तक पर सदा विद्यमान रहने वाले चन्द्रकार निशान इस समय और अधिक स्पष्ट हो आया था। उनकी वाणी से शब्द नहीं उनका प्राण बरस रहा था। सभी सुनने वाले मौन थे। शायद यह मौन उन्हें अन्दर ही अन्दर कुरेद रहा था। धूप अभी आँगन के काने से चिपकी, सहमी और ठीठकी खड़ी थी। सूर्यदेव अभी तिरोहित नहीं हुए थे। वह भी पश्चिम के दरवाजे पर थोड़ी देर के लिए रुक गए थे। उनकी सभी रश्मियाँ उन्हीं की तरह, उनको घेरे झुण्ड बनाए खड़ी थी। सबके-सब आज के दिन की अन्तिम विदा लेने से पहले इस दृश्य को भली प्रकार निहार लेना चाहते थे। परम पूज्य गुरुदेव की वाणी को सुनने की ललक शायद इन्हें भी थी।
गुरुदेव कह रहे थे, बेटा तुम लोग मेरे लिए कुछ कर सकते हो, तो अपने में पवित्रता और प्रामाणिकता पैदा करो। इस साधना से तुमको हमारा प्यार मिलेगा, भगवान का प्यार मिलेगा। और उन सब ऋषियों-मुनियों, हिमालय वासी देवात्माओं का आशीर्वाद मिलेगा, जिनके तप से यह मिशन चल रहा है। इन शब्दों के साथ गुरुदेव ने उस दिन अपनी वाणी को विराम दे दिया। गोष्ठी के पल बीत गए। पर कुछ ऐसा भी था, जो नहीं बीता न उस दिन और न आज के दिन। वह है साधना का कर्त्तव्य, जो उन्होंने उस दिन बताया था। इसे पूरा करके ही हम उनके अपने हो सकते हैं।
अखण्ड ज्योति के प्रथम अंक की कथा बड़ी प्रेरक है। आज तो इन क्षणों में अपने परिजन इसके 749 वें अंक को अपने हाथों में थामे हुए हैं। उन्हें शायद आज से 62 वर्ष और कुछ महीने पूर्व प्रकाशित हुए इस अंक की ठीक से कल्पना भी नहीं हो पा रही होगी। अपने पाठक-परिजनों में से कई तो ऐसे होंगे, जो तब जन्में भी न होंगे। पर इन पंक्तियों को पढ़ रहे सभी जनों के मनों में जिज्ञासा के भाव एक समान होंगे। उनकी चाहत एक जैसी होगी- अखण्ड ज्योति के इस पहले अंक की कथा को जानने की। सभी के हृदयों में अंकुरित हो रहा यह प्रश्न-पादप एक सा होगा कि जनवरी 1940 में प्रकाशित हुआ अखण्ड ज्योति का यह पहला अंक कैसा था?
जनवरी 1940 से भी काफी पहले अखण्ड ज्योति परम पूज्य गुरुदेव के हृदय में एक दिव्य संदेश की भाँति अवतरित हुई। अपनी साधना में समाधिस्थ गुरुदेव को हिमालय के ऋषियों का यह सन्देश मिला कि “आध्यात्मिक जगत् में भारत माता की बेड़ियाँ टूट चुकी हैं। राष्ट्र की स्वतंत्रता की घोषणा की जा चुकी है। कुछ ही वर्षों में यह सत्य प्रत्यक्ष जगत् में प्रकट हो जाएगा। इसलिए अब तुम्हें नए दायित्व सम्भालने हैं। राजनैतिक क्रान्ति को सही अर्थ तब तक न मिलेगा, जब तक इसमें सामाजिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति एवं बौद्धिक क्रान्ति के स्वर न मुखर होंगे। इन नयी क्रान्तियों के स्वर को मुखर बनाने के लिए एक ऐसी पत्रिका की आवश्यकता है, जिसकी मूल भावना आध्यात्मिक हो। जो देशवासियों और विश्वमानवता की आत्मा को जाग्रत् कर सके। अपने प्रकाश की प्रदीप्ति से उनकी आत्म ज्योति को जगा सके।”
परम पूज्य गुरुदेव को साधना काल में जो सन्देश मिला, जो संकेत प्रकट हुए उन्हीं के आधार पर अखण्ड ज्योति के प्रकाशन की योजना बनी। यह दैवी संकल्प का दिव्य प्राकट्य था। उन दिनों न तो मिशन था और न साधन। सहयोगियों एवं समर्पित कार्यकर्त्ताओं की आज की सी लम्बी कतारें न थी। प्रत्यक्ष में कुछ भी न होते हुए अप्रत्यक्ष में हिमालयवासी ऋषियों का आशीष और आश्वासन था। गुरुदेव की मार्गदर्शक सत्ता का वरद्हस्त था। अपने हृदय में अलौकिक ऊर्जा को संजोये गुरुदेव ने ठीक समय पर अखण्ड ज्योति के पहले अंक को प्रकाशित कर ही दिया।
35 पृष्ठो का यह अंक विषय वस्तु एवं सामग्री की दृष्टि से किंचित भी न्यून न था। इसके छापने की व्यवस्था आगरा शहर के जौहरी बाजार की दौलत मार्केट के न्यू. फाइन आर्ट प्रिटिंग काटेज में बनी। इसके मालिक पं. मधुसूदन शरण शर्मा परम पूज्य गुरुदेव, तब के ‘मत्त जी’ के व्यक्तित्व से परिचित ही नहीं, प्रेरित और प्रभावित भी थे। उन्होंने अखण्ड ज्योति के इस प्रथम अंक के मुद्रण को न केवल ठीक समय पर सम्पन्न किया बल्कि इसकी उत्कृष्टता का भी ध्यान रखा। मुद्रण के साथ इसके प्रकाशन की व्यवस्था भी आगरा से ही बनी। उन दिनों गुरुदेव ने आगरा शहर के फ्रीगंज मुहल्ले में ‘अखण्ड ज्योति’ का कार्यालय खोला हुआ था। यहीं से इसके प्रकाशन एवं वितरण की व्यवस्था बनायी गई।
अखण्ड ज्योति के प्रथम वर्ष के प्रथम अंक की कीमत मात्र दो आने थी। इसका वार्षिक शुल्क मात्र 1.50 रुपये था। 24 आने में पूरे वर्ष भर अखण्ड ज्योति के 35 पृष्ठो में उत्कृष्ट विषय वस्तु को मुद्रित कर पाने एवं प्रकाशित करवाने का बीड़ा गुरुदेव ने उठाया। उनका उद्देश्य था कि कम से कम खर्च में पठनीय और उत्कृष्ट सामग्री जन सामान्य तक पहुँचे। वह अखण्ड ज्योति को केवल विचारशील वर्ग की पत्रिका बनाने में विश्वास नहीं रखते थे। उनका उद्देश्य जन सामान्य को विचारशीलों के समुदाय के रूप में विकसित करना था। इसके सरंजाम उन्होंने इसके प्रथम अंक से जुटाए थे।
साज-सज्जा की दृष्टि से अखण्ड ज्योति अपने पहले अंक से ही आकर्षण का केन्द्र बन गयी। इसके पहले अंक के कवर पेज पर योगिराज भगवान् श्री कृष्ण का चित्र प्रकाशित किया गया। प्रथम अंक के कवर पेज पर छपे हुए इस चित्र में जो संकेत है, उनसे पत्रिका के रीति-नीति ही नहीं गुरुदेव के जीवन को भी अभिव्यक्ति मिलती है। इस चित्र में योगीराज भगवान् श्री कृष्ण युद्धभूमि में खड़े हैं। उनके दाँए हाथ की तर्जनी अंगुली में चक्र गतिशील है। इस चित्र से दो सत्यों का भावबोध होता है- 1. महायोगी अब साधना के एकान्त से समाज के महासमर में आ खड़े हुए हैं। 2. यहाँ केवल उनकी उपस्थिति ही नहीं है, अब उन्होंने कालचक्र की गति को अपने हाथों से नियंत्रित करने का संकल्प कर लिया है।
इन दोनों ही बिन्दुओं से परम पूज्य गुरुदेव के अपने- स्वयं के जीवन की झलक मिलती है। इन्हीं से गुरुदेव का अपना स्वरूप एवं संकल्प प्रकट होता है। यह उद्बोधक चित्र बताता है कि इस युग में प्रभु केवल पार्थसारथी बनकर सन्तुष्ट नहीं हैं। वह इस युग के महासमर में स्वयं महानायक की भूमिका निभाएँगे। कालचक्र की गति को अपने हाथों से, अपनी आत्मा से स्फुरित होने वाले आध्यात्मिक तेज से नियंत्रित करेंगे। इस आकर्षक चित्र की ही भाँति इसकी विषय वस्तु भी आकर्षक है। अखण्ड ज्योति के इस प्रथम अंक में प्रकाशित सामग्री के शीर्षक अग्रलिखित हैं- 1. अखण्ड ज्योति क्यों?, 2. कर्त्तव्य की पुकार, 3. धर्म का सच्चा स्वरूप, 4. मौन एक दैवी रेडियो, 5. धर्म और विज्ञान, 6. मनुष्य का मनोबल, 7. शीर्षासन का महत्त्व, 8. जहाँ चाह - वहाँ राह। इसी के साथ इसके अन्तिम पृष्ठ पर ‘आत्मचिन्ता’ शीर्षक से एक कविता प्रकाशित हुई है।
इस प्रथम अंक का प्रथम लेख परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखा गया सम्पादकीय है। जिसके ऊपर अखण्ड ज्योति एवं उसके संस्थापक की कार्यशैली को स्पष्ट करने वाली दो पंक्तियाँ छपी है। ये पंक्तियाँ हैं-
सुधा बीज बोने से पहले, कालकूट पीना होगा। पहिन मौत का मुकुट विश्वहित मानव को जीना होगा॥
इन पंक्तियों में गुरुदेव का स्वयं अपना जीवन ध्वनित होता है। सचमुच ही वह इसी तरह से जन्मे और जिए। शिवत्व ही उनके जीवन का परिचय और पर्याय रहे। सृष्टि में अमृतबीजों की फसल को बोने के लिए वह सारे जीवन हलाहल विष पीते रहे।
अपने जीवन सत्य की इस काव्यमयी अभिव्यक्ति के साथ उन्होंने अखण्ड ज्योति के आध्यात्मिक सत्य को स्पष्ट करते हुए इस प्रथम अंक में लिखा- ‘आज तक जितने भी मानवता के महान् आचार्य हुए हैं, उन्होंने एक स्वर से चिल्ला-चिल्लाकर कहा है। असली आनन्द, सुख-सन्तोष और शान्ति मनुष्यता की उपासना में है। इस समय जितनी गुत्थियाँ दुनिया के सामने हैं, उनकी जड़ में एक ही कारण है- मनुष्यता का अभाव। राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक, आर्थिक, शारीरिक, कौटुम्बिक, मानसिक जितनी भी उलझनें हैं, उनका पूरी तरह से तब तक निराकरण नहीं हो सकता, जब तक हमारे आचरण पवित्र न हों, जब तक हम सच्चे नागरिक न बनें। सच्चा योगी बनाने का एक ही मार्ग है, और वह है सदाचार। सदाचार और अध्यात्म विद्या को एक ही चीज के दो पहलू कहना चाहिए। ‘अखण्ड ज्योति’ इसी अध्यात्म विद्या की चर्चा करने के लिए अवतीर्ण हुई है।’ (अखण्ड ज्योति, जनवरी, 1940, पृ. 3)।
अखण्ड ज्योति के प्रथम अंक के सम्पादकीय के अंश, गुरुदेव की लेखनी से निःसृत सत्य- किस तरह अखण्ड ज्योति एवं उसके पाठकों का जीवन सत्य बना हुआ है- इससे हम सभी परिचित हैं। इसके अलौकिक प्रकाश में हमारे देव परिवार के सभी सदस्य इसी तरह अपने जीवन सत्य और जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ते रहेंगे, ऐसा विश्वास है। इसके प्रथम अंक से जो जीवन बोध का निर्झरिणी प्रवाहित हुई, वह सदा-सदा यूँ ही प्रवाहित होती रहेगी। बिना तनिक सा भी विराम लिए, अविराम और अखण्ड।
गायत्री जयंती के इन पुण्य पलों में युग शक्ति के प्रेरक प्रवाह से जन-मन अभिसिंचित है। भावनाएँ उन भगीरथ को ढूँढ़ रही है, जिनके महातप से गायत्री की प्रकाश धाराएँ बहीं। महाशक्ति जिनके प्रचंड तप से प्रसन्न होकर इस युग में अवतरित हुई। वेदमाता के उन वरदपुत्र को भावनाएँ विकल हो खोज रही हैं। आज युग के उन तप-सूर्य की यादें उन्हीं की सहस्र रश्मियों की तरह मन-अंतः करण को घेरे हैं। यादों के इस उजाले में वर्ष 1990 की गायत्री जयंती (2 जून) की भावानुभूति प्रकाशित हो उठी है जब एक युग का पटाक्षेप हुआ था। प्रभु साकार से निराकार हो गए थे। भावमय अपने भक्तों की भावनाओं में विलीन हुए थे। उस दिन न जाने कितनी भावनाएँ उमगी थीं, तड़पी थीं, छलकी थीं, बिखरी थीं। इन्हें बटोरने वाले, सँजोने वाले अंतःकरण के स्वामी इन्हीं भावनाओं में ही कहीं अंतर्ध्यान हो गए थे।
सब कुछ प्रभु की पूर्व नियोजित योजना थी। महीनों पहले उन्होंने इसके संकेत दे दिए थे। इसी वर्ष पिछली वसंत में उन्होंने सबको बुलाकर अपने मन की बात कह दी थी। दूर-दूर से अगणित शिष्यों-भक्तों ने आकर उनके चरणों में अपनी व्याकुल भावनाएँ उड़ेली थीं। सार्वजनिक भेंट और मिलन का यहीं अंतिम उपक्रम था। तब से लेकर लगातार सभी के मन में ऊहापोह थी। सब के सब व्याकुल और बेचैन थे। शाँतिकुँज के परिसर में ही नहीं, शाँतिकुँज के बाहर भी सबका यही हाल था। भारी असमंजस था, अनेकों मनों में प्रश्न उठते थे, क्या गुरुदेव सचमुच ही शरीर छोड़ देंगे ! अंतर्मन की गहराइयों से जवाब उठता था- हाँ, पर ऊपर का मोहग्रस्त मन थोड़ा अकुलाकर सोचता, हो सकता है सर्वसमर्थ गुरुदेव अपने भक्तों पर कृपा कर ही दें और अपना देह वसन छोड़े!
मोह के कमजोर तंतुओं से भला भगवंत योजनाएँ कब बंधी हैं! विराट् भी भला कहीं क्षुद्र बंधनों में बंधा करता है!! गायत्री जयंती से एक दिन पहले रात में, यानि कि 1 जून 1990 की रात में किसी कार्यकर्त्ता ने स्वप्न देखा कि हिमाच्छादित हिमालय के श्वेत हिमशिखरों पर सूर्य उदय हो रहा है। प्रातः के इस सूर्य की स्वर्णिम किरणों से बरसते सुवर्ण से सारा हिमालय स्वर्णिम आभा से भर जाता है, तभी अचानक परमपूज्य गुरुदेव हिमालय पर नजर आते हैं, एकदम स्वस्थ-प्रसन्न । उसकी तेजस्विता की प्रदीप्ति कुछ अधिक ही प्रखर दिखाई देती है। आकाश में चमक रहे सूर्यमंडल में माता गायत्री की कमलासन पर बैठी दिव्य मूर्ति झलकने लगती है। एक अपूर्व मुस्कान है माँ के चेहरे पर। वह कोई संकेत करती हैं। और परमपूज्य गुरुदेव सूर्य की किरणों के साथ ऊपर उठते हुए माता गायत्री के पास पहुँच जाते हैं। थोड़ी देर तक गुरुदेव की दिव्य छवि माता के हृदय में हलकी-सी दिखती है। फिर वेदमाता गायत्री एवं गुरुदेव सूर्यमंडल में समा जाते हैं। सूर्य किरणों से उनकी चेतना झरती रहती है।
देखने वाले का यह स्वप्न कुछ ही क्षणों में सुबह की दिनचर्या में विलीन हो गया। उसी दिन ब्रह्मवर्चस् के एक कार्यकर्त्ता भाई के संबंधी की शादी थी। वंदनीया माताजी ने दो-एक दिन पहले से ही निर्देश दिया था कि शादी सुबह ही निबटा ली जाए। सामान्य क्रम में शाँतिकुँज में यज्ञमंडप में शादियाँ दस बजे प्रारंभ होती हैं, लेकिन उस दिन के लिए के लिए माताजी का आदेश कुछ अलग था। गायत्री जयंती के दिन यह शादी काफी सुबह संपन्न हुई। अन्य कार्यक्रम भी यथावत् संपन्न हो रहे थे। वंदनीया माताजी प्रवचन करने के लिए प्रवचन मंच पर पधारी थीं। प्रवचन से पहले संगीत प्रस्तुत करने वाले कार्यकर्त्ता जगन्माता गायत्री की महिमा का भक्तिगान कर रहे थे-’माँ तेरे चरणों में हम शीश झुकाते हैं,’ गीत की कड़ियाँ समाप्त हुई। माताजी की भावमुद्रा में हलके से परिवर्तन झलके। ऐसा लगा कि एक पल के लिए वह अपनी अंतर्चेतना के किसी गहरे अहसास में खो गई, लेकिन दूसरे ही पल उनकी वाणी से जीवन-सुधा छलकने लगी।
प्रवचन के बाद प्रणाम का क्रम चलना था। माँ अपने आसन पर अपने बच्चों को ढेर सारा प्यार और आशीष बाँटने के लिए बैठ गई। प्रणाम की पंक्ति चल रही थी, माताजी स्थिर बैठी थीं। उनके सामने अस्तित्व से वात्सल्य-संवेदना झर रही थी।
प्रणाम समाप्त होने के कुछ ही क्षणों बाद शाँतिकुँज एवं ब्रह्मवर्चस् का कण-कण, यहाँ निवास करने वाले सभी कार्यकर्त्ताओं का तन-मन-जीवन बिलख उठा। अब सभी को बता दिया गया था कि गुरुदेव ने देह छोड़ दी है। अगणित शिष्य संतानों एवं भक्तों के प्रिय प्रभु अब देहातीत हो गए हैं। काल के अनुरोध पर भगवान महाकाल ने अपनी लोक-लीला का संवरण कर लिया है। जिसने भी, जहाँ पर यह खबर सुनी, वह वहीं पर अवाक् खड़ा रह गया। एक पल के लिए हर कोई निःशब्द, निस्पंद हो गया। सबका जीवन-रस जैसे निचुड़ गया। थके पाँव उठते ही न थे, लेकिन उन्हें उठना तो था ही। असह्य वेदना से भीगे जन परमपूज्य गुरुदेव के अंतिम दर्शनों के लिए चल पड़े।
शाँतिकुँज के कंप्यूटर कक्ष के ऊपर जो बड़े हॉल के रूप में परमवंदनीय माताजी का कक्ष है, वहीं पर गुरुदेव का पार्थिव शरीर रखा गया था। महायोगी की महत् चेतना का दिव्य आवास रही, उनकी देह आज चेतनाशून्य थी। पास बैठी हुई वंदनीया माताजी एवं परिवार के सभी स्वजन वेदना से विकल और व्याकुल थे। माताजी की अंतर्चेतना को तो प्रातः प्रवचन में ही गुरुदेव के देह छोड़ने की बाते पता थी तब से लेकर अब तक वह अपने कर्तव्यों में लीन थीं। सजल श्रद्धा की सजलता जैसे हिमवत् हो गई थी, अब वह महावियोग के ताप से पिघल रही थी। अंतिम प्रणाम भी समाप्त हो गया, परंतु कुछ लोग अभी हॉल में रुके थे। प्रणाम करके नीचे उतर रहे एक कार्यकर्ता को एक वरिष्ठ भाई ने ही इशारे से रोक लिया। परमपूज्य गुरुदेव की पार्थिव देह को उठाते समय माताजी ने उसे बुलाया एवं भीगे स्वरों में कहा ,"बेटा! तू भी कंधा लगा ले।" माँ के इन स्वरों को सुनकर उसका रोम-रोम कह उठा ,"धन्य हो माँ! वेदना की इस विकल घड़ी में भी तुम्हें अपने सभी बच्चों की भावनाओं का ध्यान है।"
सजल श्रद्धा एवं प्रखर प्रज्ञा के पास आज जहाँ चबूतरा बना है, तब वहाँ खाली जगह थी। वहीं चिता के महायज्ञ की वेदिका सजाई गई थी। ठीक सामने स्वागत कक्ष के पास माताजी तख्त पर बिछाए गए आसन पर बैठी थीं। पास ही परिवार के अन्य सभी सदस्य खड़े थे। आस-पास कार्यकर्त्ताओं की भारी भीड़ थी। सभी की वाणी मौन थी, पर हृदय मुखर थे। हर आँख अश्रु का निर्झर बनी हुई थी। आसमान पर भगवान् सूर्य इस दृश्य के साक्षी बने हुए थे। कण-कण में बिखरी माता गायत्री की समस्त चैतन्यता उसी दिन उसी स्थल पर सघनित हो गई थी। भगवान सविता देव एवं उनकी अभिन्न शक्ति माता गायत्री की उपस्थिति में गायत्री जयंती के दिन यज्ञपुरुष गुरुदेव अपने जीवन की अंतिम आहुति दे रहे थे। यह उनके जीवन-यज्ञ की पूर्णाहुति थी।
आज वह अपने शरीर को ‘इदं न मम् ‘ कहते हुए यज्ञवेदी में अर्पित कर चुके थे। यज्ञ ज्वालाएँ धधकीं। अग्निदेव अपने समूचे तेज के साथ प्रकट हुए। वातावरण में अनेकों की अनेक सिसकियाँ एक साथ मंद रव के साथ विलीन हुईं। समूचे परिवार का कण-कण और भी अधिक करुणार्द्र हो गया, सभी विह्वल खड़े थे। परमतपस्वी गुरुदेव का तेज अग्नि और सूर्य से मिल रहा था। सूर्य की सहस्रों रश्मियों से उनकी चेतना के स्वर झर रहे थे। कुछ ऐसा लग रहा था, जैसे वह स्वयं कह रहें हों, "तुम सब परेशान न हो, मैं कहीं भी गया नहीं हूँ, यहीं पर हूँ और यहीं पर रहूँगा। मैंने तो केवल पुरानी पड़ गई देह को छोड़ा है, मेरी चेतना तो यहीं पर है। वह युगों-युगों तक यहीं रहकर यहाँ रहने वालों को, यहाँ आने वालों को प्रेरणा व प्रकाश देती रहेगी। मैं तो बस साकार से निराकार हुआ हूँ, पहचान सको तो मुझे शाँतिकुँज के क्रियाकलापों में पहचानो! ढूँढ़ो!" वर्ष 1990 की गायत्री जयंती में साकार से निराकार हुए प्रभु के इन स्वरों की सार्थकता इस गायत्री जयंती की पुण्य वेला में प्रकट हो रही है। हम सबको उन्हें शाँतिकुँज रूपी उनके विराट् शरीर की गतिविधियों में पाना है और स्वयं को इनके विस्तार के लिए अर्पित कर देना है।
ज्ञातव्य
देव संस्कृति विश्वविद्यालय में दो कोर्स इस वर्ष से प्रारंभ किए जा रहे हैं। पहला योग में पोस्ट ग्रेजुएशन, डिप्लोमा एवं सार्टीफिकेट तथा दूसरा साइको आयुर्वेद में पी. जी. की डिग्री । यह साइकिएट्री की तरह आयुर्वेद एवं मानस शास्त्र में विशेषज्ञता देगी। यह उपाधि एम.एस.सी. के नाम से दी जाएगी। इस पत्रिका के प्राप्त होने तक प्रॉस्पेक्टस तैयार होने एवं जून माह के तीसरे सप्ताह में एंट्रेंस टेस्ट की संभावना है। इच्छुक आवेदक कुलपति, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शाँतिकुँज हरिद्वार से संपर्क करें।
(गीता के चतुर्थ अध्याय की युगानुकूल व्याख्या पंद्रहवीं कड़ी)
‘ज्ञान की नौका से भवसागर को पार करें,,’ शीर्षक से विगत अंक में चौथे अध्याय के पैंतीसवें, छत्तीसवें श्लोकों के द्वारा ज्ञान से पापों को नष्ट करने एवं ज्ञानी बन जाने पर भवबंधन से मुक्त हो जाने की महिमा को जाना था। श्रीकृष्ण का कहना है कि इस ज्ञान को पाकर मोह से मुक्ति मिलेगी ,फिर सर्वत्र परमात्मतत्व ही संव्याप्त दिखाई देगा। मोह के संकीर्ण बंधन ही व्यक्ति को भवबंधन में उलझाते हैं। जब अपने अंदर और सर्वत्र परमात्मसत्ता ही व्याप्त नजर आती है तो फिर व्यक्ति वसुधा को एक कुटुँब मानकर विश्व-उद्यान को सींचने में लग जाता है। भगवान इतना स्पष्ट आश्वासन गीता में पहली बार देते हैं कि पापी से भी अधिक पापी यदि इस ज्ञान का आश्रय ले ले तो वह पाप समुद्र में तर जाएगा। जहाँ ज्ञान की बात श्रीकृष्ण कहते हैं, वे उस विद्या की बात कह रहे हैं जो अमरत्व प्रदान करती है, मुक्ति की ओर ले जाती हैं । आज की भोगवादी बहिर्मुखी जीवनपद्धति में ज्ञान की खोज कम हो गई, विज्ञान के सुख-साधनों की ज्यादा। इसी कारण तृष्णा बढ़ रही है, लिप्सा बढ़ रही है एवं व्यक्ति पाप कर्मों में लिप्त नजर आता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण बड़े स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को जलाकर राख कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि संपूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है (श्लोक 37) । अब इसकी और विशद व्याख्या व आगे के श्लोकों का मर्म पढ़ें।
‘ज्ञान में कर्मों का संन्यास ‘जिस योग का अभीष्ट ध्येय हो , उस चौथे अध्याय की पराकाष्ठा पर हम पहुँचते हैं, जब भगवान हमें बताते हैं कि इस संसार में ज्ञान से ज्यादा पवित्र कुछ भी नहीं। अंतिम पाँच श्लोक वह राजमार्ग प्रशस्त करते हैं जो किसी भी साधक की जीवन-यात्रा बन सकता है। ज्ञान की परिपूर्णता पर पहुँचा हुआ साधक अंततः क्या प्राप्त करता है, क्या उसकी परिणति होती है, यह हम इन तीनों श्लोकों में पाते हैं।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥4/38
"इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र निःसंदेह कुछ भी नहीं हैं। योग के द्वारा संसिद्धि को प्राप्त (शुद्ध अंतः करण वाला) मनुष्य उस ज्ञान को अपने आप ही यथा समय अपनी आत्मा में पा लेता है।"
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा पराँ शातिमचिरेणाधिगच्छति ॥4/39
"जो श्रद्धावान है, तत्पर-साधनपरायण है तथा जितेंद्रिय (परिपूर्ण संयमशील) हैं, वह मनुष्य ही ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञानप्राप्ति के बाद वह अविलंब ही तत्काल भगवत्प्राप्ति रूपी परमशाँति को प्राप्त हो जाता है।"
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥ 4/40
"श्रद्धाहीन अज्ञानी (विवेकरहित) तथा संशययुक्त मनुष्य परमार्थ पथ से भ्रष्ट हो जाता है,उसका नाश हो जाता है। ऐसे संशयशील व्यक्ति के लिए न तो यह लोक है और न परलोक ही और उसे कहीं भी किसी भी किसी भी काल में सुख की प्राप्ति नहीं होती ।"
ज्ञान की परिणति अंतः की शुद्धता
भगवान बड़ा स्पष्ट कह रहे हैं कि इस संसार में सर्वाधिक पवित्र कुछ है तो वह ज्ञान ही है। यह ज्ञान अंतःकरण को शुद्ध कर देता है। गुरु के उपदेश से जो ज्ञान मिलता है, उससे मनुष्य स्वतः शुद्ध होता चला जाता हैं। ‘कालेनात्मनि’ शब्द का अर्थ है-अपने आप समय आने पर। हमें निरंतर स्वयं को गुरुचेतना से ओतप्रोत रखना चाहिए, क्योंकि यही ज्ञान पवित्रतम का संदेश अपने आचरण से देते रहे। भगवान यहाँ यही कह रहे हैं कि ज्ञान ज्यों-ज्यों कर्मयोग में सिद्ध पुरुष के अंदर प्रविष्ट होने लगता है, उसे स्वयं यह अनुभूति होने लगती है (आत्मनि विन्दति) ब्रह्मज्ञान एक अति दुर्लभ वस्तु है ठाकुर श्री रामकृष्ण देव ने एक स्थान पर कहा है,
“नित्य वस्तु में पहुँचने का नाम ब्रह्मज्ञान है। यह बहुत कठिन है। एकदम विषय-बुद्धि न छूटने से वैसी अवस्था नहीं आती। इसके लिए तपस्या चाहिए। शास्त्र के श्लोक कंठस्थ करने से कुछ नहीं होगा। सिद्धि-सिद्धि करने मात्र से नशा नहीं होगा। सिद्धि तो खानी चाहिए। उसकी अनुभूति कण-कण में होनी चाहिए”
परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं, “ ज्ञान को सत्शक्ति कहा गया है। मनुष्य की सच्ची संपत्ति कहा गया है संसार में हर वस्तु काल पाकर नष्ट हो जाती है। धन नष्ट हो जाता है, तन जर्जर हो जाता है, साथी और सहयोगी छूट जाते हैं। केवल ज्ञान ही एक ऐसा अक्षय तत्व है जो कहीं भी, किसी भी अवस्था में और किसी भी काल में मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता।”
(आत्मोत्कर्ष का आधार -ज्ञान, वाङ्मय खंड-58 पृष्ठ 10.12)। वस्तुतः मुक्ति का साधन है ज्ञान। इसे पा लिया तो इसी जीवन में मुक्ति मिल गई, ऐसे समझना चाहिए। एक बार ज्ञान का रसास्वादन करने पर मनुष्य उसी प्रकार तृप्त हो जाता है, जिस प्रकार कोई प्यासा सुँदर-स्वच्छ जलाशय को पाकर प्रसन्न हो जाता है। मनुष्य का जीवन पाकर भी जिसने ज्ञान की कुछ बूंदें भी इकट्ठी न की हों, उसने तो मानो इस रत्न को मिट्टी के मोल खो दिया।
स्वयं को देह मत मानो, और गहरे जाओ
ज्ञान पवित्रतम है, आनंद का करण है एवं मुक्ति का आधार है। अज्ञान अथवा अविद्या को तो घोर अशाँति का कारण माना गया है। जब संसार की साधारण बातों में अज्ञान हमें घोर दुःख देता है, तब जीवन आत्मा और परमात्मा के विषय में संव्याप्त अज्ञान कितना भयंकर हो सकता है इसकी तो कल्पना भर ही की जा सकती है। परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि सबसे बड़ा अज्ञान है अपने को देह मात्र मानकर चलना। ऐसे व्यक्ति अपनी इंद्रियों को विषयों में तृप्त करने में लगे रहकर अपनी आत्मा का नाश किया करते हैं।
आत्मज्ञान जब मनुष्य अपने अंदर पाने लगता है तो सबसे पहले उपलब्धि होती है- अंतः करण की शुद्धि। यह कार्य स्वतः होने लगता है। पवित्रता का स्पर्श मात्र ही व्यक्ति को अंदर से शुद्ध बनाने लगता है।फिर वह उस आत्मज्ञान की अनुभूति अपने अंदर ही करने लगता है। योग द्वारा यह संसिद्धि उसे स्वतः ही प्राप्त होने लगती है।सकाम कर्मों की वासनाएँ भस्म होने लगती हैं, शुद्ध आत्मा के प्रकाश में सब स्पष्ट दिखाई देने लगता है एवं फिर वही श्री कृष्ण जो अभी चौंतीसवें श्लोक में ज्ञान को पाने का उपाय तत्वदर्शी ज्ञानी के पास जाकर उनकी सेवा-दीक्षा लेने के माध्यम से बता रहे थे। (ज्ञानिनः तत्वदर्शिनः) कहने लगते हैं कि वास्तविक ज्ञान तो हे अर्जुन! हमें अपने अंदर से ही मिलता है। अर्थात् यह ज्ञान उस साधक में दिव्यकर्मी में संवर्द्धित होता रहता है। ज्यों-ज्यों वह निष्काम भाव में, समता में और भगवद् भक्ति में बढ़ता जाता है, त्यों-त्यों ज्ञान की गहराई में भी प्रविष्ट होता चला जाता है। परंतु यह ज्ञान मिल कैसे? और उसकी अनुभूति हृदय की अंतरतम गहराइयों से कैसे हो? इसके लिए श्री कृष्ण अगला सूत्र देते हैं।
वे कहते हैं कि यह ज्ञान श्रद्धावान को ही प्राप्त होता है। बुद्धिमान को नहीं। जो ज्ञान मनुष्य अपनी बुद्धि से बटोरता है। वह तो इंद्रियों व तर्कशक्तियों द्वारा परिश्रम करके बाहर से इकट्ठा किया जाता है। यह तो शिक्षा है, जानकारियाँ हैं। जो ज्ञान आत्मा में पाया जाता है वही विद्या है। यह विद्या-अमरत्व का ज्ञान श्रद्धा से ही प्राप्त होता है। यह कहा जाए कि जैसे ही ज्ञान की प्राप्ति होती है, वह तुच्छ अहंकार को बाहर निकाल फेंकता है- मटियामेट कर देता है, व्यक्ति को श्रद्धाभाव से भर देता है, तो काई अत्युक्ति नहीं होगी। कोई अकारण नहीं कि चर्चा श्रीकृष्ण ज्ञान में कर्मों का संन्यास-अर्पण नामक योग की अंतिम कुछ शिक्षाओं में साररूप में कह रहे हैं। इससे कम में आत्मा की अपरोक्ष अनुभूति हम अपने भीतर नहीं कर पाएँगे।
श्रद्धावान लभते ज्ञानं
उनतालीसवें श्लोक द्वारा भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान प्राप्ति की कुछ अनिवार्य शर्तें सामने रखते हैं। वे कहते हैं, ज्ञान की प्राप्ति उसी साधक हो होती है जो श्रद्धावान है तत्पर है, साधनपरायण है तथा संयतेंद्रिय है। परमतत्व की खोज की ओर प्रेरित करती है श्रद्धा। बौद्धिक ज्ञान को निजी अनुभव में परिणत करने तथा आत्मज्ञान द्वारा उसी की पुष्टि की प्रक्रिया श्रद्धा का जागरण करती है। विनोबा कहते हैं, “अनुभव तर्कातीत है। श्रद्धा अनुभव के आधार पर रहने वाली, पर उससे भी परे की वस्तु है।”(विचार पोथी, 20)। आखिर श्रद्धा की परिभाषा क्या है? पं. रामचंद्र शुक्ल कहते हैं, “ किसी मनुष्य में जनसाधारण से विशेष गुण तथा शक्ति का विकास देख उसके संबंध में जो एक स्थायी आनंदपद्धति हृदय में स्थापित की जाती है,उसे श्रद्धा कहते हैं। श्रद्धा महत्त्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार भी है।” (चिंतामणि भाग-1)। महात्मा गाँधी कहते हैं- श्रद्धा और बुद्धि के क्षेत्र भिन्न-भिन्न हैं। श्रद्धा से अंत ज्ञान-आत्मज्ञान की वृद्धि होती है, इसलिए अंत शुद्धि तो होती ही है। बुद्धि से सृष्टि के ज्ञान-बाहृा की वृद्धि होती है, परंतु उसका अंत-शुद्धि के साथ कार्य-कारण जैसा संबंध भी नहीं रहता । अत्यंत बुद्धिमान लोग भी अत्यंत चरित्र-भ्रष्ट पाए जाते हैं। मगर श्रद्धा के साथ चरित्रशून्यता का होना असंभव है” (संपूर्ण गाँधी वाङ्मय खंड-41,पृष्ठ 82)।
श्रद्धा के विषय में परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं- “अध्यात्म क्षेत्र में श्रद्धा की शक्ति ही सर्वोपरि है। साधना से सिद्धि का मूलभूत आधार श्रद्धा है।मनुष्य का व्यक्तित्व जिसमें संस्कारों का (आदतों का) गहरा पुट रहता है, वस्तुतः श्रद्धा की परिपक्वता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।” आगे वे कहते हैं-” साधना का विशालकाय कलेवर इसलिए खड़ा किया गया है कि उन लौह श्रृंखलाओं में जड़कर श्रद्धा-विश्वासरूपी महोदैत्य को उपयोगी प्रयोजन उत्पन्न कर सकने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। श्रद्धा से व्यक्तित्व का निर्धारण होता है। आत्मा का सबसे विश्वस्त और घनिष्ठ सचिव श्रद्धा ही है।” (पं. श्रीराम आचार्य वाङ्मय, उपासना-समर्पण योग- खंड 3, पृष्ठ 3.32,33)। कितनी सुँदर व्याख्या श्रद्धा की हुई है और हमें बड़ा स्पष्ट मार्ग भी देती है कि श्रद्धावान कैसे बनें? कैसे श्रद्धा से ज्ञान की प्राप्ति करें।
सुत्तानिपात (1/4/2) कहता है-”श्रद्धा बींज तपोवृट्ठि” अर्थात् श्रद्धा बीज है, तप वर्षा है तथा “सद्धाय तरती ओधं” अर्थात् मनुष्य श्रद्धा से संसार प्रवाह को पार कर जाता है। (1/10/2 सुत्तनिपता)। ऐतरेय ब्राह्मण (7/10) कहता है - श्रद्धा पत्नी है और सत्य यजमान। श्रद्धा और सत्य का यह अत्यंत उत्तम जोड़ा है। श्रद्धा और सत्य के जोड़े से मनुष्य स्वर्ग को जीत लेता है। “ऋग्वेद कहता है- “श्रद्धा हृदय याकूत्या, श्रद्धया विंदते वसु” (10/151/14) अर्थात्” सब लोग हृदय के दृढ़ संकल्प से श्रद्धा की उपासना करते हैं, क्योंकि श्रद्धा से ही ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।” गीतकार ने भी इसी श्रद्धा शब्द की 17वें अध्याय में ‘सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत” कहकर की है।
श्रद्धा ही नहीं, तत्परता व संयम भी
इस तरह श्रद्धा का महत्व समझ लेने पर जाना जा सकता है कि श्रद्धावान को ही सच्चा आत्मज्ञान क्यों मिलता है। श्रद्धा के साथ श्रीकृष्ण दो बातें और बताते है, तत्पर होना तथा जितेंद्रिय संयमी होना। परमतत्व की खोज के लिए तत्परता-साधनपरायणता जरूरी है। एकनिष्ठ भाव से साधनाशाली होना अनिवार्य है। हो सकता है श्रद्धा एवं भक्तिभाव से ध्यान-साधना के क्षेत्र में अधिकतम आँतरिक जागरुकता मिल भी जाए, पर यदि इंद्रियाँ भलीभाँति नियंत्रित नहीं है, तो न केवल एकाग्रता छिन्न-भिन्न हो जाती है, हम उस शाँति को प्राप्त नहीं कर पाते जो आत्मज्ञान की सर्वोच्च उपलब्धि है। देखा जाए तो इंद्रियों का स्वभाव ही बहिर्मुख होना है। वे बार-बार विषयों की ओर हमारा ध्यान खींचती हैं। इसीलिए जब तक हम इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त नहीं करते, तब तक शाँति प्रदान नहीं कर सकती।
ज्ञान को प्राप्त होने का साधन है- श्रद्धा, गुरु के प्रति-शास्त्रवचनों के प्रति अटूट निष्ठा, आदर्शों से असीम प्यार एवं साधना में गति होने, इंद्रिय संयम अर्थ संयम-समय संयम एवं विचार संयम साध लेने पर सर्वोच्च स्तर की उपलब्धि हमें मिलती है-वह है शाँति (पराँ शाँतिम्)। सारी विकलताओं से मुक्ति, तनाव से मुक्ति, दुःखों से छुटकारा हमें मिल जाता है। संक्षोभ ही हमें विकल-रोगी बनाते हैं। यदि संत्रास मन से समाप्त हो जाएँ तो हम सभी आधि-व्याधियों से मुक्ति पा सकते हैं। आज सारा संसार इसी की तलाश में तो है। यह शाँतिमय है, चैन की नींद कहाँ किसी को आती है। सारा जीवन परिग्रह में बीत गया, तृष्णा-ललक को पूरा करने में बीत गया, उसी कारण असंयमी बने तथा जीवनी शक्ति के स्रोतों को खोलकर कर दिया। मन सदैव शंकाग्रस्त बना रहा, बुद्धि ने प्रगति के क्षेत्र में चरम शिखर को छू लिया, पर श्रद्धा गति हो नहीं पाई एवं यही कारण है कि सर्वत्र आज अशाँति है, तनाव है आतंक का साम्राज्य है।
कोई समाधान है, तो गीताकार ही बनाते हैं, श्रद्धावान बने, साधनाशील बने तथा अपने ऊपर अपना नियंत्रण स्थापित करें। इससे हम आदर्शों के,सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय परमपिता परमात्मा के ज्ञान से ओत प्रोत हो सकेंगे एवं यही ज्ञान मिलने पर अविलंब हमें भगवत्प्राप्ति होगी, जो परम शाँति की ओर हमें ले जाएगी।
अश्रद्धावान का तो सुनिश्चित है सर्वनाश
शास्त्र-ज्ञानरहित अज्ञानी,गुरु और वेदाँतरूपी तत्वदर्शन के वाक्यों में अश्रद्धा रखने वाला तथा संदेहशाली व्यक्ति नष्ट हो जाता है, कभी ब्रह्मज्ञान को प्राप्त नहीं होता। यह बात चालीसवें श्लोक में एक उद्घोषणा के रूप में श्रीकृष्ण कहते हैं। आत्मज्ञानहीन जीवन श्रीकृष्ण की दृष्टि में मृत्युतुल्य और निरानंद हैं वह यह भी कहते हैं कि ऐसे अविश्वासी और निरानंद है। वह यह भी कहते हैं कि ऐसे अविश्वासी के लिए न तो इस लोक में सुख है और नहीं परलोक में ही सुख है। इस सीमा तक कह जाते हैं कि उसके लिए न तो यह संसार है, न अगला ही और सुख की प्राप्ति की तो आशा ही नहीं करनी चाहिए। कितनी आश्चर्य की बात है कि पशुओं को किसी प्रकार का संशय नहीं होता, पर बुद्धिसंपन्न मनुष्य सदैव-अधिकाँश समय संशयी होता है। संशय वहीं उठते हैं, जहाँ अभी स्पष्ट और सुनिश्चित ज्ञान का उदय न हुआ हो। इस संशयों से आखिर बाहर कौन निकाले? गुरुजन, शास्त्र, जाग्रत् महापुरुषों के प्रवचन स्वाध्याय ये सभी साधन हैं, जो किसी भी साधक के हृदय की श्रद्धा को बढ़ा सकते हैं। बुद्धि द्वारा ग्रहण ज्ञान हृदय द्वारा आत्मसात किया जाए और यह भी तभी संभव हैं, जब साधक ध्यान में शाँतभाव से मनन करने में रुचि रखे। अध्ययन-मनन द्वारा एकत्र ज्ञान व्यवहार में लाने पर उसके प्रति निरंतर श्रद्धा बढ़ती रहने पर सारे संशयों से निवृत्ति मिल जाती है।
जो बिना प्रश्नचिह्न लगाए गुरु के ज्ञान को ग्रहण करता चलता है, यह मानता है कि उनके पास दिव्य दृष्टि है, तो उसका प्रगति का पथ प्रशस्त होता चलता है। परम पूज्य गुरुदेव अपने जीवनकाल का मंच का अंतिम उद्बोधन देने 1983 के वसंत पर्व पर आए थे। और तब उन्होंने कहा था कि तुम्हारे पास दूरबीन हो, तो मैं तुम्हें दिखा देना चाहता हूँ कि सूक्ष्म जगत् में परिवर्तन हो चुका है। युग -निर्माण का कार्य आरंभ हो चुका है। तुम चाहो तो श्रेय ले लो। बस 14-15 वर्ष निरंतर कार्य करते रहने भर की आवश्यकता है, फिर बदला जमाना तुम्हें दिखाई देने लगेगा। यदि हमें गुरु के वचनों पर दृढ़ विश्वास है, हमारी श्रद्धा है, किसी भी प्रकार का संशय नहीं है, तो हम उनकी शक्ति को अपने अंदर धारण कर वास्तव में अगले दिनों परिवर्तन का निमित्त कारण बनेंगे, हम भी यह देखेंगे, जमाना भी देखेगा, पर यदि हमें ही विश्वास न हो, हम ग्रहणशील न बन पाए हों तो हमारा विनाश-आत्मिक दृष्टि से अवगति, अधोगति सुनिश्चित है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं, गुरु के वचन प्रतीत न जेंहि, सपनेहुँ सुख सिधि सुलभ न तेहिं। अर्थात् जिसे गुरु के वचनों पर विश्वास ही नहीं है, उसे प्रत्यक्ष तो क्या, स्वप्न जगत् में भी सुख नहीं मिलता। वह अकारण दुःख पाता, निरंतर कष्ट भोगता रहता है। कितने ही उदाहरण- नमूने हैं हमारे समक्ष, जिनको गुरु के वचनों पर विश्वास न रहा, वे गुरुद्रोही बने एवं अंततः कष्ट को प्राप्त हुए। कई ऐसे हैं जो स्वार्थसिद्धि के लिए गुरु की बैसाखी के लिए खड़े हैं, पर स्वयं अपने अंदर झाँके, तो पाते हैं कि उन्हें स्वयं गुरु के वचनों पर विश्वास नहीं है। सिख धर्म पूरा गुरु के वचनों पर गहन विश्वास पर टिका है। यदि आज का युगधर्म निभना है, तो वह युगपुरुष-हमारे अपने गुरु के वचनों पर विश्वास-गहरी श्रद्धा टिकाने पर ही संभव हो सकेगा। अखण्ड ज्योति मई 1970 में पूज्यवर ने लिखी” सद्भावनाओं का चक्रवर्ती सार्वभौम साम्राज्य जिस युगावतारी-निष्कलंक भगवान द्वारा होने वाला है, वह और काई नहीं, विशुद्ध रूप में अपना युगनिर्माण आँदोलन ही है।” (पृष्ठ 6) इसके बाद भी संशयात्मा हैं, तो विनाश सुनिश्चित है। इस व अंतिम दो श्लोक की विस्तार से व्याख्या जुलाई अंक में।
(जुलाई अंक में इस अध्याय की समापन किश्त)
शिक्षा तो हर कोई-स्कूल कॉलेजों में पा लेता है, पर विद्या तो पूर्व जन्म के संस्कारी, इस जन्म के अध्यवसाय एवं गुरुजनों के शुभाशीष से ही मिल पाती है। शिक्षा जानकारी देती हैं, डिग्रीधारी बना देती है, पर विद्या तो जीवन की कला सिखाती है, रोजमर्रा की परिस्थितियों का व्यावहारिक ज्ञान कराती है। हमें दैनंदिन जीवन की परिस्थितियों से बिना चिंतन गड़बड़ाए किस तरह मोरचा लेना है, यह विद्या अर्जन से ही संभव हो पाता है। विद्या शब्द को ज्ञान भी कह दिया जाए, तो कोई अत्युक्ति न होगी। हमारे शास्त्र कहते हैं, बिन गुरु ज्ञान नहीं, अर्थात् गुरु के माध्यम से ही विद्या, जीवन कला शिक्षण मिलता है।
हमारी गुरुसत्ता पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने सही अर्थों में ‘स्व आचरण शिक्षरेण पृथिव्याँ सर्वमानवः की उक्ति को सार्थक किया। जीवन भर शिक्षण दिया, साधकों को-परिजनों को जीवन कला सिखाई । यह कार्य उनने पत्रों से भी किया। अखण्ड ज्योति पत्रिका से भी तथा ढेरों कार्यकर्त्ताओं को सामने बिठाकर भी किया। यदि सही अर्थों में उन्हें आचार्य-युगाचार्य-संस्कृतिपुरुष कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। क्योंकि जो भी माध्यम मिले, वे उनसे जीवनभर शिक्षण देते रहे, लोगों को योग्य बनाते रहे। उनके लिखे पत्रों को आज भी वर्षों पूर्व के पत्र, जो उनके द्वारा लिखे गए, हम सभी के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हैं। विभिन्न विषयों के बारे में हमें बताते हैं कि हमारी सोच उन पर क्या होनी चाहिए। एक ऐसा ही विशद रूप में लिखा पत्र इस अंक में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह पत्र 17-1-1−4−डडडडडडडडडडडड को श्री सुमंत कुमार मिश्र (रायपुर) को लिखा गया था। जो जवाब लिखे गए, उन्हें दो खंडों में बाँटकर प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि क्या संभावित प्रश्न था एवं उसकी व्यावहारिक व्याख्या गुरुवर के मन में क्या थी, इसे भी समझ सकें।
हमारे आत्मस्वरूप 17/9/49
आपका पत्र मिला। हमारे प्रति आत्मीयता है, उसके लिए हम विशेष रूप से कृतज्ञ हैं,। आपके प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं-
(1) प्रेम विवाह उचित है, परंतु वह प्रेम वासनाजन्य नहीं,गुण साम्य के आकर्षण से उत्पन्न हुआ होना चाहिए।
(2) आधुनिक शिक्षा प्रणाली समय, स्वास्थ्य और धन का अपव्यय करती है, परंतु उसे तभी त्यागना चाहिए, जब उसके स्थानल पर अधिक उपयोगी शिक्षाक्रम सामने हो। स्कूली शिक्षा छोड़ बैठना और अन्य किसी भी प्रकार कि शिक्षण व्यवस्था का प्रबंध न होना इस अव्यवस्था से स्कूली शिक्षा की अच्छी।
(3) आज की स्थिति में कोई विरले ही मनस्वी अखण्ड ब्रह्मचर्य पालन कर सकते हैं, इसलिए सर्वसाधारण के लिए गृहस्थ जीवन ही उचित मार्ग है।
(4) प्राचीनता का मोह और आधुनिकता का विरोध या आधुनिकता का मोह और प्राचीनता का विरोध, ये दोनों ही बातें हठधर्मी है। जो उचित, है, विवेक- संगत है, वही ग्रहण करना चाहिए करना चाहिए। पोशाक, वाहन,अस्त्र के बारे में भी यही बात है।
आत्मीयता के नाते पूछे गए प्रश्नों पर किसी प्रकार की अन्यमनस्कता न दर्शाते हुए आचार्य श्री अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं एवं बिंदुवार एक-एक प्रश्न का समाधान भी देते हैं। 1949 में ‘प्रेम विवाह’ पर एक आध्यात्मिक स्तर के मार्गदर्शक द्वारा सहमति व्यक्त करना हमें परमपूज्य गुरुदेव के प्रगतिशील चिंतन का परिचय देता है, पर वे बड़ा स्पष्ट कर देते हैं कि वह ‘कामज’ नहीं होना चाहिए, वासनाजन्य नहीं होना चाहिए। जब तक गुणों के आधार पर परस्पर एकरूपता स्थापित न हो, तब तक प्रेम विवाह असफल होते रहेंगे। विगत 43 वर्षों में दुनिया कहाँ-से-कहाँ पहुँच गई, आधुनिकीकरण के दौर में हम रह रहे हैं, पर तथ्य अपने स्थान पर हैं कि परिवार संस्था का कल्याण तभी है, जब गाड़ी के दोनों पहिये गुणों-कर्म-स्वभाव के परिष्कार पर, एक धुरी पर चलने को तैयार हों। आज भी यह शिक्षा उतनी ही उपयोगी है। शिक्षा व विद्या के सार्थक समन्वय पर, नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा पर हम आज विचार कर रहे हैं, पर आज की मैकाले प्रधान शिक्षा 1949 में ही प्रबुद्धजनों के लिए निरुपयोगी सिद्ध होने लगी थी। आचार्य श्री अनौपचारिक शिक्षा को महत्त्व देते हैं एवं बताते हैं कि जब तक उस स्तर की स्थापनाएँ नहीं होतीं, प्रयोग व्यापक स्तर पर नहीं होते, तब तक स्कूली शिक्षा पर रोक लगाने से क्या लाभ!
आज तो परिस्थितियाँ और भी खराब है। सांस्कृतिक प्रदूषण, कई चैनेल्स वाले टी. वी., केबल नेटवर्क ने अश्लीलता को घर-घर पहुँचा दिया है।लेकिन तब जबकि टेलीविजन भारत में प्रविष्ट भी नहीं हुआ था, सिनेमा जगत् भी प्रारंभिक दौर में था, पूज्यवर लिखते हैं कि बजाय ब्रह्मचर्य बनने के गृहस्थ बनना ही ठीक है, तो जेल में आजीवन रहने वाला भी प्रत्यक्ष में साध लेता है, पर मानसिक स्तर पर कहाँ संयम हो पाता है। पूज्यवर विचार-संयम पर सर्वाधिक जोर देते थे, इसीलिए वे विवाह-संस्था को उचित माध्यम मानते थे, जहाँ व्यक्ति सीमित ब्रह्मचर्य के पालन से एक संस्था गुण-संस्कारों से भरी खड़ी कर सकता है। कठोर व्रतधारी ही एकाकी रह पाते हैं एवं वे उनकी नजर में 1159 में भी बड़े विरले ही थे। एकाकी अविवाहित यदि असंयमी हुआ, तो समाज के लिए और भी नुकसानदायक हो सकता है, यह पूज्यवर का चिंतन था। आजादी के बाद का वह दौर आधुनिकता की बयार लिए आया था। यह एक प्रतिद्वंद्विता से भरी उपभोक्तावादी होड़ तो 1990 के बाद आँधी के रूप में बढ़ी, पर उस समय भी धीरे-धीरे आधुनिकता जीवन शैली पर अतिक्रमण करने लगी थी।
साधक का प्रश्न हल करते हुए वे लिखते हैं कि ऐसे में अतिवादिता ठीक नहीं है। प्राचीनता से मोह या उसका विरोध दोनों ही अनुचित हैं। इसी तरह आधुनिकता से लगाव व उसकी मुखालफत भी गलत है। जो भी ठीक है, विवेकसम्मत हैं, परिस्थितियों के अनुरूप उसे जीवन में स्थान देना चाहिए।
पत्र में आगे पूज्यवर लिखते है।-’
(5) ताँत्रिक सिद्धांतों और उसके अद्भुत परिणामों पर हमारी श्रद्धा है, परंतु आजकल इन आधारों पर ठगी ही प्रधान रूप से होती है। इसलिए वास्तविकता की परीक्षा कर लेनी चाहिए। सिद्धाँततः से बातें ठीक है।
(6) जीव ईश्वर का अंश है। यह एक प्रामाणिक भारतीय मान्यता है। इस स्थिति का साक्षात्कार तभी होता है, जब कुविचारों, कुसंस्कारों और कुकर्मों से मनुष्य सर्वथा मुक्ति अवस्था में हम निर्विकार ईश्वर हो जाते हैं, जब तक वह अवस्था प्राप्त नहीं, तब तक हम सब जीव हैं।जीवन अपूर्ण एवं त्रुटिसंपन्न होते हैं। ईश्वर पूर्ण एवं दोषरहित है।
(7) यह ठीक है कि बूढ़े लोग युवकों की अपेक्षा अधिक अनुदार, संकीर्ण और स्वार्थी होते है। वे अपने बालकों को इसी दृष्टिकोण से सलाह देते हैं, पर कई बार युवकों की योजनाएँ और कल्पनाएँ भी ऊँची उड़ान और अव्यावहारिकता से भरी होती हैं। ऐसी दशा में उन्हें किसी अनुभवशील, दूरदर्शी, मानव विज्ञान के ज्ञाता एवं व्यवहारिक आध्यात्मिकता के जानकर व्यक्ति से अपनी समस्याओं को सुलझवाते रहना चाहिए। प्रायः अपरिपक्व आयु के युवक ऐसी योजना अपना बैठते है, जो आगे चलकर उन्हें दुःख देती है, इसलिए जोश और होश दोनों का समन्वय होना चाहिए।
(8) चाचा जी का स्वर्गवास का समाचार पढ़कर दुःख हुआ।प्रभु उनकी दिवंगत आत्मा को सद्गति दे और उनके कुटुँबियों को धैर्य प्रदान करे। दूसरों की मृत्यु देखकर हमें अपनी मृत्यु का स्मरण करना चाहिए।
(9) राख पर बनी लकीरों के आधार पर पुनर्जन्म की योनि का अनुमान लगाना अंधविश्वास मात्र है। इसमें कुछ तथ्य नहीं ।
शेष दया।
विनीत श्रीराम शर्मा आचार्य
पत्र में दिए गए बिंदुओं पर परिजन ध्यान दें। तंत्र पर पूरी श्रद्धा बताते हुए भी वे अपने प्रिय शिष्य को ठगी से सावधान करना चाहते हैं। पूज्यवर के अनुसार तंत्र एक विज्ञान है, विधिसम्मत शास्त्र है, पर तभी जब उसके साथ सही व्यक्ति जुड़े हों सिद्धाँततः तंत्र को वे नकारते नहीं, पर उसके दुरुपयोग के प्रति सचेत भी करते हैं। जीवो ब्रह्नौवनापरः की वेदांत दर्शन की उक्ति से पूरी सहमति दिखाते हुए भी आचार्य श्री भवबंधनों से मुक्ति के आध्यात्मिक पुरुषार्थ को पहले प्रधानता देते हैं। यदि विचार-संस्कार व कर्म ही गलत हों, तो जीव, ब्रह्म कैसे बन सकता है? विचार ही संस्कार बनाते हैं व तदनुरूप ही मनुष्य कर्म करता है।सबसे पहले हम उन भवबंधनों से जो वासना, तृष्णा, अहंता के रूप में हमारी नित्य परीक्षा लेते रहते है, मुक्त हों तो हम त्रुटिरहित ईश्वर के समकक्ष बन सकते हैं। स्वामी विवेकानंद के ‘ ईच सोल पोटेंशियली डिवाइन’ वाली उक्ति से वे अपनी सहमति साधक की जिज्ञासा के उत्तर में व्यक्त करते हैं।
बूढ़े बनाम युवा का विवाद युगों-युगों से चला आ रहा है। हमने बाल यों ही नहीं सफेद किए है; वृद्धजन गहरे भी होते हैं व सरल भी, पर पूज्यवर अपने युवा साधक की मनःसंतुष्टि के लिए, अनुदारता-संकीर्णता- स्वार्थपरायणता पर सहमति जताते हुए भी युवाओं को काल्पनिक उड़ान के खिलाड़ी बताते है। सभी वृद्धों को एक ही तराजू से न तौलकर समस्याओं के समाधान हेतु अनुभवी-दूरदर्शी-मानव मनोविज्ञान के ज्ञाता को महत्व देने की बात भी करते हैं, चाहे वह युवा हो या वृद्ध। जोश एवं होश, उत्साह एवं धैर्य दोनों का युग्म हर किसी के जीवन को सफल बना सकता है, यह भी बताते हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि से इस प्रश्न का उत्तर कितना गहरा है, इसे हर कोई समझ सकता है।
श्री सुमंत जी के चाचाजी के स्वर्गवास पर सहानुभूति, मृतात्मा के लिए प्रार्थना के साथ वे एक संदेश देते हैं कि हमें नित्य अपनी मृत्यु का स्मरण करते रहना चाहिए। श्मशान-वैराग्य तो अनेकों को होता है, पर वह क्षणिक ही होता है। यदि हम हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत के सिद्धाँत को याद रखे, तो देखते-देखते हमारी दृष्टि बदल सकती है। अंत में वे सुमंत जी के द्वारा व्यक्त एक जिज्ञासा को कि मृत्यु के बाद जब अस्थि बटोरने गए, तो राख पर निशान से लगा कि इस विशेष योनि में जन्म उनका होगा, बिल्कुल निराधार ठहराया है। विज्ञानसम्मत आज के युग में भी ऐसी न जाने कितनी मान्यताएँ हैं, किंतु ऋषि तुरंत नकार देता है व कहता है कि यह कोरा अंधविश्वास है।
यह पत्र एक जिज्ञासा-समाधान है एवं एक मार्गदर्शक लेख भी। मात्र एक ही पत्र इतनी सारी जानकारी देता है, शंकाओं का समाधान करता है कि व्यावहारिक दृष्टि से यह एक व्याख्यान की भूमिका भी निभाता है- जीवन व्यापार के हर क्षेत्र में हमारा दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए। कैसी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे- सूक्ष्मदर्शी-दूरदर्शी हमारे पूज्य गुरुदेव, जिनने अपनी लेखनी से जन-जन का मार्गदर्शन किया, लोकशिक्षण किया।
सत्यं परं धीमहि
भागवत् पंडित जी का परम प्रिय शास्त्र था। कथा-प्रवचनों के अलावा सामान्य समय में वे भी इसी की चर्चा करते रहते। घर पर विद्वानों का जमावड़ा रहता। छोटे-मोटे प्रसंगों में वे भी वे भागवत् के श्लोक सुना देते और हर तरह की समस्याओं का समाधान निकाल लेते। जिन दिनों बाहर रहते, उन दिनों भी लोग उन्हें ढूंढ़ते-पूछते हवेली आ जाते थे। जब वे घर पर होते, तब तो कहना ही क्या ? ताई जी उस समय तीन साल के श्रीराम को पिता के सुपुर्द कर देतीं। वे लोगों की बात सुनते, उनका हल बताते या सामान्य विषयों पर चर्चा करते, तो श्रीराम बैठक में ही होते। बाल-सुलभ क्रीड़ाओं में मगन रहते या चुप बैठकर वहाँ उपस्थित लोगों की बातें सुनते। तीन-चार साल के बच्चे के लिए शास्त्र चर्चा, तत्त्वदर्शन और भक्ति-ज्ञान-वैराग्य की बातें समझना शायद कठिन हों! वह उन चर्चाओं से बने वातावरण के संस्कारों से निश्चित ही समृद्ध था। कह सकते हैं कि नए संस्कारों की आवश्यकता नहीं रहीं होगी, लेकिन उस वातावरण ने संस्कारों को उभारने में सहायता तो की ही।
महापुराण में भागवत् माहात्म्य प्रसंग और एकादश स्कंध के विषयों पर पिता जब भी चर्चा छेड़ते, तो तीन-चार के श्रीराम चुपचाप बैठ जाते। उनके मुंह की ओर टकटकी बाँधे देखते रहते। ताई जी बताती थीं नारद जी और भक्ति के संवाद की चर्चा सुनकर उनका श्रीराम उदास हो जाता था। इस प्रसंग में यमुना तट पर भक्ति दुःखी और क्लांत होकर बैठी है।पास ही दो बूढ़े व्यक्ति बेहोश पड़े है।उन्हें होश में लाने के कोशिश करती हुई स्त्री किसी सहायक के आने की प्रतिक्षा करती हुई आस-पास देखती रहती है। कुछ स्त्रियाँ उसे धीरज बँधा रही है। नारद जी संयोग से पहुँचते है और युवती से अपना परिचय देने के लिए कहते हैं।
वह स्त्री कहती है, मेरा नाम भक्ति है।ज्ञान और वैराग्य दोनों मेरे पुत्र हैं। काल के प्रवाह से ये वृद्ध हो गए है। आस-पास जो स्त्रियाँ है, वे गंगा-यमुना आदि नदियाँ हैं, जो मेरी सेवा कर रही हैं ।फिर भी दुःख दूर नहीं हो रहा है क्षीण होने के कारण भक्ति ने यह बताया कि पाखंडियों ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया उनके छल, कपट और दुराचारों से भक्ति रुग्ण और दैन्य तो कम हुआ, लेकिन दोनें पुत्रों की जरा भी दूर नहीं हुई। यह कहते हुए भक्ति को भागवत् का उपदेश देते हैं।
भक्ति को विलाप करते सुन चार साल के बालक के आँसू बहने लगे, तो पिताश्री ने प्रसंग आगे बढ़ाया। भागवत् सुनकर भक्ति का उद्धार हुआ। उसके दोनों पुत्र स्वस्थ-सहज और स्वाभाविक अवस्था में पहुँच गए। इसी प्रसंग में पिताश्री कहते थे कि भागवत् शास्त्र सभी शास्त्रों का सार है। इन दिनों हम लोग जिस सनातन धर्म का पालन करते हैं, वह इसी शास्त्रों से आया है। ज्ञान, विद्या, आचार, अवतार, भक्ति, कर्म, मंत्र, योग, साधना, इतिहास, पुराण आदि भागवत् में ही समाहित हैं। पिताश्री की मुख-मुद्रा देखकर बालक श्रीराम भी आश्वस्त हो जाता। उठकर वह खेलने-कूदने लगता।
‘ग’ से गायत्री
हवेली में होने वाली चर्चा और वहाँ के परिवेश ने बालक श्रीराम की शिक्षा का आरंभ किया। विधिवत् विद्यारंभ चार साल बीतने के बाद हुआ। पंडित जी चाहते तो अपने सान्निध्य में ही वेद-शास्त्र सब पढ़ा सकते थे, लेकिन उनका मानना था कि शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरु का संसर्ग प्राप्त होना ही चाहिए।उस छोटे-से गाँव में एक अध्यापक थे पंडित रूपराम। वे अपने घर पर ही विद्यालय चलाते थे। पंडित जी ने श्रीराम को उनके सुपुर्द किया। ताई जी बताया करती थीं कि पूजा-पाठ के बाद गुरुजी ने तख्ती थमाई। पट्टी सफेद रंग की थी और लकड़ी से बनी हुई थी। उन दिनों स्लेट और खड़िया का चलन नहीं था। अलग-ज्ञान कराया जाता था। पंडित रूपराम पानी में गेरू के बाद पहला अक्षर अभ्यास कराते। तख्ती और गेरू की पूजा होने के बाद पहला अक्षर सिखाने लगें। सरकंडे की कलम को घुले हुए गेरू में डुबोया और श्रीराम के हाथ में दिया गया। फिर हाथ पकड़कर तख्ती पर पहला अक्षर लिखवाते कहा ‘ग’ श्रीराम ने भी तुरंत अनुकरण किया और गुरु जी उस अक्षर की पहचान बताने के लिए आगे कुछ बोलें, उससे पहले श्रीराम ने कहा, ग-गायत्री का। गुरु जी को इसकी कल्पना श्री नहीं कि छात्र बिना बताए ही अक्षर की पहचान बताए ही अक्षर की पहचान बता उठेगा। पहचान भी ढंग से।
वे ‘ग‘ अक्षर की पहचान ‘गणेश’ शब्द के कराते थे। उनकी मान्यता थी कि ‘ग‘ से ‘गणेश’ का बोध कराने पर छात्र की बुद्धि संस्कारित होती है। गणेश बुद्धि के अधिष्ठाता देव हैं, इसलिए भी यह अच्छा श्रीगणेश है। बिना बताए गायत्री से आरंभ करने पर गुरुजी ही नहीं, वहाँ उपस्थित दूसरे लोग भी चमत्कृत हुए। बाद में गुरुजी ने पूछा, श्रीराम तुम्हें किसने बताया कि ‘ग‘ माने गायत्री’। विद्यार्थी ने कहा कि किसी ने भी नहीं। हवेली में सुना है।पिता जी भी इसी की कथा भागवत् सप्ताह में कहते हैं। गुरु पंडित रूपराम के साथ पं. रूपकिशोर भी गदगद हो उठे। दोनों ने बालक के सिर पर हाथ फेरा और स्नेह से सूँघा।
उन दिनों अभिभावक अपने बच्चे को गुरु के पास रखना ही श्रेयस्कर समझते थे। छात्र गुरु के पास जितना ज्यादा रहेगा, उतना ज्यादा सीखेगा। पंडित रूपराम की पाठशाला में पंद्रह-बीस छात्र रहते थे। आस-पास के गाँवों से आए बच्चे भी थे। पढ़ाई के लिए आने वाले छात्रों की संख्या इससे दो-ढाई गुना थी। इतने छात्र तो प्रायः दिन-रात रहते ही थे। कुछ विद्यार्थी आते-जाते भी रहते , जैसे किसी दिन वहीं सो गए, तो कभी अपने घर चले गए। गुरु जी सभी छात्रों से स्नेहिल व्यवहार रखते। उनके पढ़ने, खाने, पीने, सोने, बैठने और बातचीत करने में अनुशासन दिखाई देता था, लेकिन यह अनुशासन लादा हुआ नहीं था। स्नेह और मधुर दुलार से छात्र के भीतर जगाया हुआ था। उदाहरण के लिए पाठशाला या गुरुगृह में ही सोने वाले बच्चों को गुरु जी सुबह खुद जगाते थे। बच्चे थके-माँदे नहीं हों, तो भी देर तक नींद आती है। अभ्यास नहीं होने के कारण बिना सोए भी बिस्तर पर पड़े रहने में मजा आता है। सुबह जल्दी उठने की आदत डालने के लिए गुरु जी खुद उन बच्चों के पास जाते। उन्हें स्नेह से पुकारते, उठाते, उषःपान कराते और नहा धोकर पढ़ने के लिए बिठा देते।
गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु
बालक श्रीराम का सोना-जागना अपनी हवेली में ही रहा। सुबह सात बजे वह बिना नागा पाठशाला पहुंच जाते और देर शाम तक वहीं पढ़ते रहते। पढ़ाई पूरी होने के बाद वापस अपने घर आ जाते। पाँच-छह साल यह क्रम चला होगा कि पिताजी के साथ काशी की यात्रा आरंभ हुई। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के समय निश्चित हुआ कि श्रीराम को यज्ञोपवीत दीक्षा मालवीय जी स्वयं देंगे। उस निर्धारण को ध्यान में रखते हुए सात-आठ वर्ष की आयु में पिता ने चिरंजीव का उपनयन नहीं कराया था। काशी जाने पर मालवीय जी के निवास पर ही सादे समारोह में यज्ञोपवीत संपन्न हो गया। संस्कार के समय मालवीय जी ने गायत्री को सर्व वेदमय और ब्रह्मस्वरूप होने के जो उपदेश दिए थे, वे रास्ते में हर क्षण कानों में गूंजते रहे। दस-बारह साल के बालक के लिए ये उपदेश गूढ भी थे और सहज ग्राह्य भी । ग्रहण कर लिए जाए, तो पूरे जीवन की दिशाधारा तय हो जाती है।
अपनी समझ के अनुसार बालक श्रीराम ने पिताश्री से उपदेशों के बारे में कई जिज्ञासाएं की। गायत्री को ब्राह्मण की कामधेनु क्यों कहा है? ब्राह्मण कौन है, किसे गायत्री सिद्ध होती है? अगर ब्राह्मण को गायत्री सिद्ध होती है, तो इस जाति के लोग दीन-हीन क्यों होते हैं? गायत्री को किसने शाप दिया? उस शाप का विमोचन कैसे किया जाए, आदि प्रश्नों का समाधान रास्ते में ही होगा । गुरुदेव के बाद में पिताजी से मिले सभी समाधानों का समय-समय पर उल्लेख किया है। वह विवेचन गायत्री साधना के मर्म को स्पष्टतः उद्घाटित करता है। यहाँ इतना ही कि यज्ञोपवीत के बाद बालक श्रीराम ने संध्या गायत्री जप आरंभ कर दिया।यह बात मन अच्छी तरह बैठ गई थी कि संध्या-गायत्री नहीं करने से यज्ञोपवीत भंग हो जाता है। व्यक्ति को व्रात्यसंज्ञक अर्थात् पतित कहा जाने लगता है और यज्ञोपवीत संस्कार के समय हुआ उसका दूसरा जन्म या मनुष्य जीवन स्थगित हो जाता है। वह अपने आपको द्विज कहने का अधिकार खो देता है।
वाराणसी से लौटने के बाद बालक श्रीराम ने अपने लिए हवेली में एक कमरा निश्चित कर लिया। वहाँ वे जप-ध्यान करते। संध्यावंदन के लिए खुले में जाते। यह खुलापन घर की छत पर होता या गाँव के बाहर बने शिवालय में। अपने खेत में वटवृक्ष के नीचे भी वे संध्यावंदन के लिए जाते थे। पुत्र को जप-ध्यान में इतना तन्मय देखकर पिताश्री बहुत प्रसन्न होते थे। वे कहते श्रीराम अपना ब्राह्मण होना सार्थक करेगा। अपने आपको ही नहीं, पूरे कुल को और गायत्री उपासकों को धन्य बनाएगा। पिताश्री ‘जब’ ब्राह्मण’ कहते थे, तो उनका आशय इस नाम के किसी कुल या जाति में जन्म लेने वाले व्यक्ति से नहीं था। सीधे-सादे शब्दों में वे कहते थे, जिसका आचार शुद्ध हो, वही ब्राह्मण है। जो ब्रह्म को जानने और पाने के लिए अपने आपको तपा रहा हो, वह ब्राह्मण है।
घर में छत पर ‘मंदिर में’ वट वृक्ष के नीचे और खुले आकाश तले बालक श्रीराम का जप-ध्यान चलता। सुबह पाँच के लगभग वे उठ जाते और स्नान आदि से निवृत्त होकर संध्या-वंदन के लिए बैठ जाते। प्राची में सूर्योदय की लालिमा फैलने तक संध्यावंदन और गायत्री ज पके साथ सविता देवता के स्वर्णिम प्रकाश का ध्यान होता। संध्या के सभी कृत्य’ अनेन संध्योपासनेन कर्मणा श्री परमेश्वरःप्रीयताँ न मन । ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु’ के पाठ के बाद संपन्न हो जाता । इस पाठ के साथ जप-साधना का पुण्य परमात्मा को ही समर्पित कर बालक श्रीराम वापस लौट आते। सात बजे पंडित रूपराम की पाठशाला में पहुँच जाते। वहाँ शिक्षा के साथ आचार आदि के अभ्यास होता। शाम के समय भी सूर्यास्त होने के ठीक पहले सायंकालीन संध्या शुरू हो जाती। तारे दिखाई देने तक वह संध्या कर्म भी परब्रह्म को समर्पित हो जाता। यह सिलसिला चार-पाँच साल चला।
शास्त्रीय मान्यता है कि नियमपूर्वक नियत समय पर विधि-विधान से किया गया गायत्री जप तेजी से आध्यात्मिक ऊँचाइयों की ओर ले जाता है। विधि-विधान का तात्पर्य अपनी साधना में श्रद्धा-विश्वास का समावेश है। जो किया जा रहा है, जो समझाया गया है, उसमें प्रत्यक्ष की तरह विश्वास कहा गया है कि गायत्री कामधेनु है, तो उसी रूप में मान लिया। यक संदेह नहीं उठा कि यह सिर्फ महत्व बताने के लिए ही है। सच्चाई शायद कुछ और हो। शास्त्र गुरु और साधना में श्रद्धा सिद्धि के मार्ग पर ले जाती है।
साधना का खेल
बालक श्रीराम प्रातः-सायं संध्या और गायत्री जप के साथ दिन में भी ध्यान का अभ्यास करते! गुरु जी की पाठशाला में यह उनका प्रिय खेल था। अध्ययन से अवकाश मिलता, तो वे ध्यान-जप के लिए बैठ जाते। दूसरे छात्र खेलते रहते। कुछ सहपाठियों ने भी उनके खेल में रुची दिखाई। दो-चार साथी मिल जाने पर नया खेल खिलाड़ी पालथी मारकर बैठ जाते। उनसे कहा जाता आँखें बंद कर देखने की कोशिश करो। उस जगह देखो जहाँ दोनों भौहें मिलती है। देखते हुए अनुभव करो कि वहाँ सूर्य चमक रहा है। पता नहीं कितने छात्रों ने इस खेल को समझा। बहरहाल वे चुपचाप बैठे रहते। पूछने पर कहते कि बड़ा मजा आ रहा है। खेल के अगले चरण में गायत्री , हिमालय, गंगा, यमुना, सरस्वती, सिद्ध, संत और इसी तरह की चर्चा चल पड़ती। इन चर्चाओं में कोई तारतम्य नहीं होता। आठ-दस वाक्यों में ज्यादा संगति भी नहीं बैठती,लेकिन आधा-पौने घंटे तक खेल चलता रहता। कुछ दिन बाद वे चार पाँच शाखाओं को लेकर जंगल भी जाने लगे। घनी छाया वाले पेड़ के नीचे बैठकर खेल चलता।
एक बार श्रीराम अकेले ही गए और तीसरे पहर लौटे। पाठशाला का समय था। गुरु जी ने समझा कि छात्र किसी काम से घर गया होगा।घरवालों ने समझा कि पाठशाला में ही होगा। इसलिए उन्हें खोजा नहीं। जिन छात्रों को ‘साधना-साधन’ खेल में रस आने लगा था, वे ढूँढ़ते रहे। तीसरे पहर उनके खेल का लीडर प्रकट हुआ तो पूछा कहाँ गए थे। श्रीराम ने उत्तर दिया, एक गुफा मिल गई थी। वहाँ काई नहीं आता। आराम से बैठकर ध्यान किया जा सकता है। अगले दिन वे साथियों को लेकर गुफा के पास गए। साथी किसी तरह गुफा तक चले तो गए, लेकिन भीतर जाने का साहस नहीं हुआ। डर लगा। श्रीराम अंदर घुस गए। दूसरे लड़कों से न अंदर जाते बना और न ही वापस लौटने की हिम्मत हुई। अपने लीडर के वापस आने तक बाहर ही खड़े रहे।
घंटे-डेढ़ घंटे बाद श्रीराम वापस आए, तो छात्रों ने उलाहना दिया। कहा कि इस खेल में अब आगे से शामिल नहीं होंगे। श्रीराम ने छात्रों के साथ छोड़ देने की परवाह नहीं की। समय मिलते ही घंटे-आधा घंटे के लिए अकेले ही निकल जाना और गुफा में ध्यान लगाना जारी रखा। बीच-बीच में कक्षा से गायब हो जाने पर गुरु जी का ध्यान भी गया। उन्होंने श्रीराम से सीधे न पूछकर छात्रों से ही पूछ डाला। गोपालदास नामक छात्र ने बता दिया । गुरु जी ने कहा, तुम उसके घर जाकर यह बात कह देना। इस तरह ताई जी को गुफा में जाने की बात पता लग गई। उन्होंने श्रीराम को बुलाकर डाँटा। कहा कि शेर-चीते की गुफा होगी, किसी दिन तुम्हें देख लेगा, तो फाड़कर खा जाएगा। माँ की डाँट सुनकर श्रीराम ने मौन हामी भर दी कि वे अब नहीं जाएँगे। हामी भरते ही माँ ने पुत्र को हृदय से लगा लिया।
इसके बाद कोई दिन ऐसा नहीं बीता था कि स्कूल नहीं गए हों। हारी-बीमारी की बात अलग है, अन्यथा पाठशाला नियमित जाना होता था। बिना नागा और बिना देर किए अपनी कक्षा में पहुँच जाते। जिस किसी दिन नहीं आना होता था, उस दिन हवेली से सूचना पहुँच जाती थी कि आज श्रीराम अमुक कारण से विद्यालय नहीं आएँगे। एक दिन न सूचना पहुँची और नहीं श्रीराम आए।पंडित रूपराम ने सोचा किसी कारण सूचना नहीं भिजवाई जा सकी होगी। उन्होंने गौर नहीं किया। उसी दिन शाम को हवेली से संदेश आया कि श्रीराम अभी तक घर नहीं पहुँचे है। क्या कक्षाएँ देर तक चल रही है?
गुरुजी के सामने अब उजागर हुआ कि उनका छात्र पाठशाला के लिए निकला तो था, लेकिन कहीं और चला गया है। पहली आशंका यही हुई कि ध्यान वाली गुफा में बैठा हो, जहाँ महीनों पहले कुछ सहपाठियों के साथ जाया करते थे। ताई जी ने कहा, श्रीराम ने मना कर दिया था,इसलिए वहाँ जाने का सवाल ही नहीं उठता। फिर भी एक बार गुफा में तलाशने के लिए कुछ लोग निकले। अष्टमी या नवमी की रात थी। चंद्रमा की मद्धिम चाँदनी में रास्ता देखा जा सकता था फिर भी जरूरत पड़ने पर मशाल जलाने का इंतजार कर लिया।
अब हमारे अपने गायत्री परिवार के स्वामित्व वाले देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना हो चुकी। यह हर गायत्री परिजन का है, हर भावनाशाली का है, जिसे साँस्कृतिक मूल्यों के आधार पर इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य के, वह भी शीघ्र ही एक दशक में आगमन में जरा भी संदेह नहीं है। निश्चित ही युगपरिवर्तनकारी शिक्षण पद्धति एवं महामानवों को गढ़ने वाला तंत्र वह आधारशिला रखेगा, जिससे लोकसेवी कार्यकर्ता ढलते चले जाएं स्वयं अपने पैरों पर खड़े हो सकें एवं अपने पैरों पर खड़े हो सकें एवं अपने भारतवर्ष को पुनः बृहत्तर भारत, एक समर्थ विश्वनायक राष्ट्र बनाकर ही छोड़े। स्वदेशी-स्वावलंबन- सुसंस्कारिता पर आधारित यह तंत्र निश्चित हो इसके संस्थापक सूक्ष्म- कारण रूप में सदा से ही प्रेरणा-मार्गदर्शन प्रदान करने वाले हमारे गुरुदेव द्रष्टा थे। वे दिव्य संभावनाएँ देखते थे। और अपनी परोक्ष में झाँकने की क्षमता के आधार पर ही उन्होंने वर्षों पूर्व भविष्य बता दिया था। 1926 में अखण्ड दीप प्रज्वलन से लेकर 1958 में एक विराट् वाजपेय स्तर के 1008 कुंडी गायत्री महायज्ञ द्वारा मथुरा से गायत्री परिवार के निर्माण तक वे ‘ एकोऽहं बहुस्यामि’ की उक्ति के अनुसार बहुगुणित होते चले गए। अपने द्वितीय एकवर्षीय हिमालय प्रवास से लौटते ही उनके स्वर तीखे होने लगे। युगनिर्माण योजना का सूत्रपात उन्होंने किया एवं नवयुग का संविधान रचा। पंचकोशी साधना का पत्राचार पाठ्यक्रम ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से एवं कुछ साधकों की धुरी पर क्राँतिकारी परिवर्तन कैसे आएगा। इस पर ‘महाकाल और उसकी युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ नामक लेखमाला उन्होंने जून - अक्टूबर 1967 में लिखी। फिर पुस्तक रूप में उसकी प्रस्तुति 1968 में की। यह एक प्रकार से नवजागरण का शंखनाद था। भारत को राजनैतिक आजादी तो मिल गई थी, पर साँस्कृतिक नवजागरण ने, जिसके लिए विगत ढाई सौ वर्षों से महामानव इसी धरती पर जन्म ले रहे थे। तीव्र गति युगनिर्माण योजना के सक्रिय रूप लेने पर ही पकड़ी।आज का देव संस्कृति विश्वविद्यालय एवं उसका भावी विश्वव्यापी तंत्र उस प्रक्रिया की पूर्णाहुति की वेला में ही उभरकर सामने आया है।
जून 1990 में परमपूज्य गुरुदेव ने ‘युगपरिवर्तनकारी शिक्षा और उसकी रूपरेखा’ शीर्षक से अपना संपादकीय- अपनों से अपनी बात में लिखा। इसमें वे लिखते हैं “ व्यक्ति और समाज का भावनात्मक कायाकल्प करने के लिए हमें रचनात्मक और संघर्षात्मक मोरचे खोलने पड़ेंगे । रचनात्मक कार्यों में शिक्षा और कला दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें विनाश की दिशा में मोड़कर विकास के लिए प्रयुक्त किया जाना है। हमें एक समानाँतर शिक्षातंत्र खड़ा करना है।
उद्देश्य गुरुसत्ता के समक्ष स्पष्ट था। वे चाहते थे कि जीवन जीने की कला और समाज के समग्र पुनरुत्थान की प्रक्रिया इस प्रशिक्षण की आधारशिला बने। इसके लिए शुरुआत उन्होंने ‘युगनिर्माण विद्यालय’ के रूप में गायत्री तपोभूमि में 1967 में कर दी थी। यह एक छोटा-सा शुभारंभ था,जहाँ एक वर्ष की अनौपचारिक संस्कार प्रधान शिक्षा दी जाती थी, पर वे इतने मात्र से संतुष्ट नहीं थे। वे इसी लेख में लिखते हैं, ‘एक सुव्यवस्थित योजना हमारे दिमाग में है। इन दिनों उसकी झाँकी भर करा रहे हैं। क्योंकि इस विदाई वर्ष में और कुछ करने के लिए नहीं कहेंगे अन्यथा लोगों का ध्यान बँटेगा और संगठन सशक्त मजबूत बनाने की बात से उचटकर ‘जड़ खींचना छोड़ पत्ते सींचे’ वाली कहावत चरितार्थ करने लगेंगे। अगले वर्ष एक ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना करेंगे। जो उसे अभाव की पूर्ति करेगा। जो सरकार नहीं कर सकी।”
किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि यह स्थापना कब व कहाँ हुई। हम परिजनों को बताना चाहेंगे कि यही स्थापना शाँतिकुँज सप्तसरोवर हरिद्वार में 1971 की जून में हुई। जब उन्होंने परमवंदनीया माताजी को विधिवत् मथुरा से हरिद्वार स्थानांतरित कर एक छोटे से आरण्यक में लगातार बिठा दिया एवं स्वयं एक वर्ष का तप संपन्न कर आए। पृष्ठभूमि से सारा मार्गदर्शन करने लगे। प्राण प्रत्यावर्तन, जीवन साधना, नारी जागरण, लेखन, रामायण शिक्षण, वानप्रस्थ प्रशिक्षण आदि सूत्रों का संचालन कर वे धीरे-धीरे उस प्रक्रिया को स्थापित करने लगे। जिसे शाँतिकुँज में स्थापित होने वाले देव संस्कृति विश्वविद्यालय का आधार बनाना था।
परमवंदनीया माताजी का कठोर तप, साथ में देवकन्याओं द्वारा अखण्ड दीप के समक्ष किया गया जप क्रमशः फलित हुआ। विस्तार लेते जा रहे गायत्री तीर्थ रूप कल्पवृक्ष के साये में सभी महान ऋषियों की परंपरा का बीजारोपण विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की एक अद्वितीय प्रयोगशाला का निर्माण इसी विश्वविद्यालय के इतिहास की प्रारंभिक कड़ी बने। इतना सब न होता, धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की अगणित प्रवृत्तियों का तथा उनके निमित्त क्षेत्रीय स्तर पर गायत्री शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण का कार्य नहीं चल रहा होता, तो क्या यह देव संस्कृति विश्वविद्यालय खड़ा हो पाता । सूक्ष्मीकरण की कठोर तप साधन देवदक्षिणा महा अभियान राष्ट्रीय एकता महासम्मेलनों तथा देव संस्कृति दिग्विजय के महापुरुषार्थों द्वारा ग्राम-ग्राम रज जलवंदन समारोहों, संस्कार महोत्सवों के माध्यम से तो मानो धरित्री के कण-कण को संस्कारित कर दिया गया। यह कर्म मात्र भारतवर्ष में नहीं, विश्वभर में संपन्न हुए एकवंतब जाकर 1999 की वह पावन बेला आई, जब ऋषि-परंपरा के अनुकूल ही विश्ववंद्य संतों की पावन पुण्य उपस्थिति में प्राणवान परिजनों द्वारा 23 मई को गायत्री कुँज में भूमिपूजन कर वह आधारशिला रख दी गई। जहाँ आप आम्र वृक्षों के कुँजों के बीच भव्य इमारतें खड़ी होते देख रहे हैं।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय का मूलभूत आधार कितना सशक्त है एवं यह 1926 में प्रज्वलित अखंड दीपक की ही ऊर्जा से तपकर बना है इसे स्पष्ट देख व समझा जा सकता है। विधिवत घोषित यह तंत्र भले ही अब इस वर्ष सामने आया हो, पर सर्वधर्म सभा, जाति विहीन समाज एवं संस्कारवान् देवमानवों के संगठन की धुरी पर स्थापित नींव पर ही इसे खड़ा होना था। नया व्यक्ति नया समाज-नया युग विनिर्मित करने की प्रक्रिया वर्षों पूर्व आरंभ हो गई, उसकी अंतिम परिणतिस्वरूप यह तंत्र अब विनिर्मित होने जा रहा है। भावनाशील परिजन ही अपने बूँद-बूँद अंशदान से इसे खड़ा करेंगे, इसलिए न शासन से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता लेकर स्वयं को शर्तों से बाँधा गया है। न यू.जी.सी. का अनुदान लिया गया है। सुयोग्य छात्रों के लिए एक निःशुल्क तंत्र के रूप में खड़ा करने का दुस्साहस जरूर किया गया है। डेढ़ सौ करोड़ रुपये के इस तंत्र का शुभारंभ पूज्यवर के उसी आश्वासन के आधार पर किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ कार्यों की प्रामाणिकता देख स्वयं देवता व्यक्ति के अंदर अवतरित हो जाते हैं फिर ढेरों श्रीमंत-भामाशाह खड़े होकर श्रेय लेते चले जाते हैं। स्वर्ग से देवता फूल बरसाते हैं यह उक्ति फिर चरितार्थ होने लगती है। परमपूज्य का मत है कि ‘विवेकशीलता और उपयोगिता रहित धर्मशिक्षण शक्ति का अपव्यय ही नहीं हानिकारक भी है। स्कूली शिक्षा भी सामान्य जानकारियाँ देने के कारण अपूर्ण है। धर्मतंत्र के माध्यम से क्राँतिकारी शिक्षण पद्धति चल सकती है, क्योंकि वह भावनात्मक नवनिर्माण करती है। हमें यह स्पष्ट मस्तिष्क लेकर चलना चाहिए कि परखे हुए अध्यापकों द्वारा व्यक्ति और समाज का सर्वांगपूर्ण विकास प्रस्तुत कर सकने में समर्थ शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए और उसे प्राप्त करने वाले मस्तिष्क में यह तथ्य स्पष्ट रहना चाहिए कि नौकरी के लिए नहीं प्रतिभा संवर्द्धन के लिए पढ़ा जा रहा है। (संपादकीय- जून 1970,अखण्ड ज्योति पृष्ठ 57-58)
उपर्युक्त प्रवाह के अंतर्गत ही आज से आठ वर्ष पूर्व भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा आरंभ हुई, जिसमें भागीदारी करने वालों की संख्या इस वर्ष पूरे भारत में तेईस लाख पहुँच गई। महापूर्णाहुति वर्ष में कामकाजी विद्यालयों एवं अन्य सभी विद्यालयों-’महाविद्यालय में एक लोकसेवी कार्यकर्त्ता के रूप में प्रशिक्षित होने के लिए चुना जाएगा।
प्रतिभावानों को प्रशिक्षण भी प्रतिभाएँ ही करेंगी, पाठ्य सामग्री का निर्माण भी अनुभवी प्रतिभाएं ही करेंगी। इस प्रतिभाओं को पूज्यवर ने ‘अंधड़’ नाम दिया है जो जब गतिशील होती है तो परिवर्तन की आँधी लाकर दिखा देती है। अपनी व्यक्तिगत अर्थ आकांक्षाओं को, अहं की विकृत महत्वकांक्षाओं को कुचलकर जो एक ओर कर दे और सादगी की साधुता सच्चे मन स्वीकार कर इस विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण-लेखन हेतु उपलब्ध हो सकें, इसके लिए एक व्यापक गहन मंथन चल रहा है एवं समाज तंत्र में से मणि मुक्तक खोजे जा रहे है। इस संगठन -सशक्तिकरण वर्ष में ताल्लुका-जनपद स्तर पर जो पुनर्गठन किया जा है, उसका मूल उद्देश्य भी यही है। प्रतिभाशाली तंत्र द्वारा इस अध्यात्मिक प्रधान तंत्र का सुसंचालन। युगनिर्माण योजना एक छोटी चिनगारी के रूप में आरंभ हुई थी। पर इसे अगले दिनों विशालकाय दावानल का रूप धारण करना है, ताकि समाज का कूड़ा-करवट जलकर भस्म हो जाए। इस संगठन सशक्तिकरण वर्ष में यह होना ही है, क्योंकि यही पुरुषार्थ साँस्कृतिक नवोन्मेष को गति देगा। प्रतिभाओं को विश्वविद्यालय के प्राँगण में लाकर बिठाएगा।
समाचार
भावभरे वातावरण में वसंत पर्व संपन्न-संगठन को साधना की धुरी पर खड़ा कर उसे व्यवस्थित, विशिष्ट एवं सशक्त बनाने के संकल्प के साथ इस वर्ष का मिशन का वार्षिक पर्व वसंत पंचमी हर्षोल्लास संपन्न हुआ। ‘भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा’ की वार्षिक सेमीनार भी 15, 13 फरवरी में आयोजित होने से सभी क्षेत्रों के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता भी इसमें उपस्थित थे। इस वसंत को जो कि परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्मदिवस (17.2.22) भी था, हीरक जयंती की महापूर्णाहुति एवं संगठन-सशक्तीकरण वर्ष के शुभारंभ के रूप में मनाया गया । जनपद व जोन स्तर पर पूरा मिशन अब व्यवस्थित ढंग से सक्रिय हो जाए, इसी धुरी पर पर्व उद्बोधन भी दिया गया एवं परिपत्र भी सभी को दिया गया । प्रातः ध्वजारोहण के साथ गुरुसत्ता को समर्पित दो प्रस्तुतियों ने वासंती उल्लास का परिचय दिया। सभी परिजन पर्व पूजन के साथ संकल्पित होकर गए।
चेतना की शिखर यात्रा का विमोचन
इस वसंत पर्व (17-2-2002) पर परमपूज्य गुरुदेव की जीवनयात्रा पर डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं ज्योतिर्मय द्वारा लिखी पुस्तक ‘चेतना की शिखर यात्रा’ (परमपूज्य गुरुदेवः ऐ असमाप्त जीवनगाथा) के प्रथम खंड का विमोचन भी संपन्न हुआ । कथानक शैली में लिखी इस पुस्तक में अब तक अप्रकाशित मर्मस्पर्शी संस्मरण हैं। इसमें 1900 से लेकर 1947 तक का जीवनवृत्त है । द्वितीय खंड गायत्री जयंती (20-6-2002) तक छपकर आने की संभावना है । 408 पृष्ठ वाली जिल्ददार इस पुस्तक की कीमत 116/- है एवं यह शाँतिकुँज से डिस्काँउट के साथ रु. 80/- में उपलब्ध है।
देव संस्कृति ज्ञान परीक्षा सन् 2002 की परीक्षा-तिथियाँ घोषित
भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का नाम अब बदलकर देव संस्कृति ज्ञान परीक्षा हो गया है एवं अब यह क्रमशः देव संस्कृति विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय का अंग होने जा रही है । इस वर्ष की परीक्षा तिथियाँ इस प्रकार हैं-उ.प्र., उत्तराँचल, म.प्र., राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली, उड़ीसा, बंगाल-19 अक्टूबर 2002, बिहार एवं झारखंड-23 नवंबर 2002, महाराष्ट्र- 12 अक्टूबर 2002, हरियाणा,पंजाब,चंडीगढ़, जम्मू एवं हिमाचल-28 सितंबर 2002 एवं गुजरात - 20 अक्टूबर 2002। विगत वर्ष 23 लाख विद्यार्थी बैठे थे। इस वर्ष अनुमान संख्या दुगनी होने का है। परीक्षा-सामग्री जून के तृतीय सप्ताह तक केंद्र द्वारा हर जोन तक पहुँचा दी जाएगी।
छत्तीसगढ़ का गहन मंथन एवं एक महासंकल्प-पिछले दिनों फरवरी के द्वितीय सप्ताह में राजनाँदगाँव, खरियाट रोड (उड़ीसा) एवं रायपुर में हुए छत्तीसगढ़ के सोलह तथा उड़ीसा, महाराष्ट्र, म.प्र. के आठ जिलों के महासम्मेलनों में एक वृहद योजना बनाई गई। इसके अंतर्गत पूरे राज्य को चार जोनों में बाँटा गया एवं आगामी दो वर्षों में इससे लगे तीनों प्राँतों के आठ जिलों को मिलाकर एक गहन मंथन तथा जिला व जोनल समन्वय समितियों की स्थापना का एक ढाँचा विनिर्मित किया गया। बस्तर से लेकर सरगुजा एवं गोंदिया से लेकर कोरापुर तक के सभी जनपदों के परिजन इसमें उपस्थित थे। एक समृद्ध-सशक्त विराट् छत्तीसगढ़ जिसमें मिशन हर घर तक पहुँच जाए, ऐसा लक्ष्य रखा गया है।
गुवाहाटी का पूर्वोत्तर समृद्धिकरण महायज्ञ
जजफील्ड गुवाहाटी में 15 से 18 मार्च की तारीखों में पूरे पूर्वोत्तर के आठ प्राँत (आसाम,बंगाल सहित छह सिस्टर स्टेट्स) एवं नेपाल,भूटान,सिक्किम का एक भव्य आयोजन संपन्न हुआ । लक्ष्य था कि भारतीय संस्कृति शाश्वत रूप में इस सारे क्षेत्र में संव्याप्त हो, भारत की अखंडता अक्षुण्ण बनी रहे तथा सभी याजकों के संकल्प इस निमित्त हों कि वे इस क्षेत्र की समृद्धि,संस्कारीकरण एवं राष्ट्रनिष्ठा बढ़ाने में अपना पूरा योगदान देंगे। 251 कुँडी यह महायज्ञ पूरी भव्यता के साथ संपन्न हुआ।
स्वदेशी आरोग्य मेले में शाँतिकुँज की भागीदारी
नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में 7 से 12 फरवरी तक आयोजित स्वदेशी आरोग्य मेले में शाँतिकुँज ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की। इस मेले में आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, यज्ञ चिकित्सा, गौ चिकित्सा व स्वदेशी स्वावलंबन पर शाँतिकुँज ने अपनी प्रदर्शनी लगाई थी तथा प्रतिदिन आसन-ध्यान, प्रज्ञायोग का व्यावहारिक शिक्षण भी दिया। यहाँ निःशुल्क चिकित्सा परामर्श भी दिया गया। ‘स्वस्थ भारत-समर्थ भारत’ पर आयोजित एक कार्यशाला में केंद्रीय प्रतिनिधि ने भाग लिया एवं पैनेल डिस्कशन में गुरुसत्ता के विचार रखे। एक मल्टीमीडिया प्रोजेक्टर द्वारा ‘बदलते युग में जीवनशैली क्या हो?’बदलते युग में जीवनशैली क्या हो?’ इस विषय पर प्रस्तुति दी गई। प्रज्ञापेय सभी के लिए प्रदर्शनी में उपलब्ध कराया गया था। वैश्वीकरण के दौर से गुजर रही दिल्ली महानगरी ने इस पेय के स्वाद को चखा व अपनी प्रज्ञा-संवर्द्धन हेतु नागरिक अपने साथ प्रज्ञा पेय के पैकेट्स लेकर गए।
तूफानी मौसम में जो तूफानी चाल दिखाएगा, युग उसके गुण गाएगा ।
धीरे चलने वाला तेज हवाओं में घिर जाता है, अलग-थलग जो रहता है वह पथ पर ही गिर जाता है। एक तरफ गहरी खाई है, उससे कदम बचाने हैं, और दूसरी ओर फिसलने हैं, भरपूर ढलानें है, सबके साथ संगठित होकर जो भी कदम बढ़ाएगा, युग उसके गुण गाएगा।
इस पीढ़ी को गीत सुनाओ मत केवल मादकता के, बहकाओ मत उसे दिखाकर सपने तुम भावुकता के, ऐसे गीत रचो जो जाग्रत् कर दें दसों दिशाओं को, झकझोरे युवकों के पूरे चिंतन और क्रियाओं को, जो प्रमाद को हटा, मनुज में नूतन प्राण जगाएगा, युग उसके गुण गाएगा।
कला न वह सच्ची होती जो दुर्भावना जगाती है, जो हिंसा-अत्याचारों के लिए हमें उकसाती है, कला तुम्हारी ऐसी हो जिससे पावनता झरती हो, हृदयों में जो सत्कर्मों के लिए प्रेरणा भरती हो, जो सद्भावों की सुहावनी शीतल धार बहाएगा, युग उसके गुण गाएगा ।
सावधान हो जाओ, मेरी कोटि-कोटि संतानों तुम, महाकाल का चक्र चल रहा है, उसको पहचानो तुम, उसकी प्रखर दृष्टि से कोई व्यक्ति नहीं छिप सकता है, कोई साथ चले न चले, पर कार्य न उसका रुकता है, जो उसका सहयोगी होगा, श्रेय वही तो पाएगा, युग उसके गुण गाएगा ।
ओ मेरे आत्मीय परिजनों! जिन्हें मनुजता प्यारी है, बलिदानों के लिए उन्हीं की यह दुनिया आभारी है, तुमने त्याग-तितिक्षा-तप का जो आदर्श दिखाया है, नई भोर का उसने ही नूतन इतिहास बनाया है, हर सहयोग तुम्हारा युग का शिलालेख बन जाएगा, युग उसके गुण गाएगा।
-शचींद्र भटनागर
*समाप्त*