दीपावली पर दीये जलाते समय दीये के सच को समझना निहायत जरूरी है। अन्यथा दीपावली की प्रकाशपूर्ण रात्रि के बाद केवल बुझे हुए मिट्टी के दीये हाथों में रह जाएँगे। आकाशीय-अमृत ज्योति खो जाएगी। अन्धेरा फिर से सघन होकर घेर लेगा। जिन्दगी की घुटन और छटपटाहट फिर से तीव्र और घनी हो जाएगी। दीये के सच की अनुभूति को पाए बिना जीवन के अवसाद और अन्धेरे को सदा-सर्वदा के लिए दूर कर पाना कठिन ही नहीं नामुमकिन भी है।
दीये का सच दीये के स्वरूप में है। दीया भले ही मरणशील मिट्टी का हो, परन्तु ज्योति तो अमृतमय आकाश की है। जो धरती का है, वह धरती पर ठहरा है, लेकिन ज्योति तो निरन्तर आकाश की ओर भागी जा रही है। ठीक दीये की ही भाँति मनुष्य की देह भी मिट्टी ही है, किन्तु उसकी आत्मा मिट्टी की नहीं है। वह तो इस मिट्टी के दीये में जलने वाली अमृत ज्योति है। हालाँकि अहंकार के कारण वह इस मिट्टी के देह से ऊपर नहीं उठ पाती है।
मिट्टी के दीये में मनुष्य की जिन्दगी का बुनियादी सच समाया है। ‘अप्प दीपो भव’ कहकर भगवान् बुद्ध ने इसी को उजागर किया है। दीये की माटी अस्तित्त्व की प्रतीक है, तो ज्योति चेतना की। परम चेतना परमात्मा की करुणा ही स्नेह बनकर वाणी की बातों को सिक्त किए रहती है। चैतन्य ही प्रकाश है, जो समूचे अस्तित्त्व को प्रभु की करुणा के सहारे सार्थक करता है।
मिट्टी सब जगह सहज सुलभ और सबकी है। किन्तु ज्योति हर एक की अपनी और निजी है। केवल मिट्टी भर होने से कुछ नहीं होता। इसे कुम्भकार गुरु के चाक पर घूमना पड़ता है। उसके अनुशासन के अवे में तपना पड़ता है। तब जाकर कहीं वह सद्गुरु की कृपा से परमात्मा की स्नेह रूपी करुणा का पात्र बनकर दीये का रूप ले लेती है। ऐसा दीया, जिसमें आत्म ज्योति प्रकाशित होती है। दीपावली पर दीये तो हजारों-लाखों जलाये जाते हैं, पर इस एक दीये के बिना अन्धेरा हटता तो है, पर मिटता नहीं। अच्छा हो कि इस दीपावली में दीये के सच की इस अनुभूति के साथ यह एक दीया और जलाएँ, ताकि इस मिट्टी के देह दीप में आत्मा की ज्योति मुस्करा सके।
आर्ट ऑफ लिविंग या जीने की कला आज एक बहुप्रचारित तथ्य है। इसकी व्याख्या-विवेचना के लिए इन दिनों विश्व भर में नित्य-प्रति अनेकों व्याख्यान-मालाएँ आयोजित होती हैं। दुनिया भर के लेखक एवं प्रकाशक इस विषय पर प्रतिमास बड़ी संख्या में पुस्तकें लिखते और प्रकाशित करते हैं। सामान्य जन में भी इस विषय पर सुनने या पढ़ने की लालसा बढ़ी है। ये सब जीवन के प्रति बढ़ती हुई जिज्ञासा एवं बढ़ रही समझ के शुभ संकेत हैं। आर्ट ऑफ लिविंग के बारे में इन दिनों जो कुछ भी सत्प्रयास हो रहे हैं, वे सभी इस बात पर जोर देते हैं कि जीवन को अनगढ़ या बेतुके ढंग से जीने की बजाय कलात्मक रीति से जिया जाना चाहिए।
इस तत्त्वदर्शन का आधारभूत सत्य मनुष्य जीवन स्वयं है। जो कि अखिल-विश्व ब्रह्मांड को रचने वाले अप्रतिम कलाकार परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति है। प्रभु ने अपनी कला की प्रत्येक सूक्ष्मता एवं समूचे सौंदर्य को इसमें समाहित किया है। तभी तो विश्व के सभी प्रज्ञावानों ने एक स्वर से इस तथ्य का प्रतिपादन किया है कि मनुष्य जीवन से श्रेष्ठ, सुन्दर तथा अनोखी सम्भावनाओं से पूर्ण अन्य कुछ भी नहीं है। ‘न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं किंचन’ के व्यास वचन विभिन्न देशों की विभिन्न भाषाओं में एक लय से गाए गए हैं। इतना ही नहीं धरती के हर भाग में जीवन की श्रेष्ठता, सुन्दरता एवं अपूर्व सम्भावनाओं को प्रकट करने के लिए शोध-अन्वेषण भी होते रहे हैं।
धर्म एवं संस्कृति इन्हीं शोध-अनुसन्धानों का सार निष्कर्ष है। यह जीवन जीने के कलात्मक प्रयासों का प्रमाण है। हिमालय की गहन उपत्यिकाओं में स्वरित हुए वेदमंत्र हो या फिर कुरान की आयतें अथवा बाइबिल के वचन सभी का उद्देश्य जीवन के श्रेष्ठ एवं सुन्दर तत्त्वों के साथ उसकी सम्भावनाओं को प्रकट करना रहा है। प्रत्येक धर्म एवं संस्कृति के विकास का उद्देश्य अपने स्थान-विशेष की परिस्थितियों के अनुरूप जीवन जीने की कला का शिक्षण रहा है। हर एक धर्म के प्रवर्तक एवं उसकी संस्कृति के संवाहक महापुरुषों ने अपना जीवन इसी महत्त्वपूर्ण उद्देश्य के लिए समर्पित किया है। जीवन को कलात्मक रीति से जीना सिखाने के लिए प्रत्येक धर्म में अपनी परिस्थिति एवं परिवेश के अनुरूप कई तरह के प्रयोगों एवं तकनीकों का भी विकास हुआ है। परन्तु धीरे-धीरे यह क्रम शिथिल पड़ता गया। वैज्ञानिक अभिवृत्ति के अभाव में ‘धर्म’ शब्द परम्परा एवं रूढ़ियों का पोषक बनकर रह गया। इसी तरह ‘संस्कृति’ सुसंस्कारिता से पूर्ण परिष्कृत के स्थान पर मात्र कुछ ललित कलाओं तक सिमट कर रह गयी।
ऐसे में पुरातन नव अन्वेषण युग की सामयिक माँग बन गया है। आर्ट ऑफ लिविंग इसी सामयिक माँग की पूर्ति है। इसे धर्म के सनातन तत्त्व का नव जन्म भी कहा जा सकता है। विश्व भर में फैले इसके व्याख्याकार इसे अनेकों तरह से परिभाषित करते हैं। एफ.बी. बेकर के अनुसार- ‘यह जीवन की सम्भावनाओं का जागरण है।’ एम.आर. बारोनी इसे जीवन की अन्तर्निहित शक्तियों के विकास के रूप में परिभाषित करते हैं। एस. कोभान के शब्दों में ‘यह मनःस्थिति की परिस्थिति पर विजय है।’ सी. मारकुस कूपर इसे सफलता के राजमार्ग के रूप में परिभाषित करते हैं। ‘द सेवन हैबिट्स ऑफ हाइली इफेक्टिव पीपुल’ नाम के विख्यात ग्रन्थ के रचनाकार स्टीफेन आर. कोवे इसे जीवन के रूपांतरण के सशक्त पाठ के रूप में निरूपित करते हैं।
इन विविध परिभाषाओं की विविधरूपता के बावजूद इसमें निहित सत्य एक ही है- जीवन की श्रेष्ठता, सुन्दरता के साथ इसकी उच्चतम सम्भावनाओं को प्रकट करना। वेदमन्त्र, उपनिषदों की श्रुतियाँ, षड्दर्शन के विविध सूत्र इसी को पाने के विविध उपाय सुझाते हैं। इन उपायों को यदि कुछ बिन्दुओं में समावेशित या समाहित किया जाय, तो इनमें से प्रथम बिन्दु होगा, अपने जीवन के वर्तमान स्वरूप का साक्षात्कार। सामान्य क्रम में लोग आत्मतत्त्व के साक्षात्कार की बातों को कहते व सुनते हुए मोहक कल्पनाओं में खोये रहते हैं। ऐसे लोगों में बहुसंख्यक अपने जीवन के वर्तमान सत्य से या तो विमुख होते हैं अथवा फिर अनजान होते हैं।
‘अपने जीवन के वर्तमान स्वरूप का साक्षात्कार’ आर्ट ऑफ लिविंग या जीवन जीने की कला का प्रारम्भिक बिन्दु है। इसका अर्थ यह है कि हम जो हैं, जैसे हैं, उसे उसी रूप में जाने, अनुभव करें। अपनी कमियों, कमजोरियों को जानने के साथ अपनी सम्भावनाओं को पहचानें। यह काम आसान दिखता हुआ भी आसान नहीं है। इसके लिए नित्य प्रति नियमित अभ्यास की आवश्यकता है। सामान्य तौर पर हममें से प्रायः सभी एक गहरी आत्मवंचना में जीने के आदी हो गए हैं। हमारे लिए सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह हो गया है कि हम दूसरों की दृष्टि में क्या हैं? जबकि महत्त्वपूर्ण यह है कि हम स्वयं की दृष्टि में क्या हैं? अपने द्वारा अपने को देखना नितान्त आवश्यक है। क्योंकि उसके बाद ही जीवन साधना की किसी वास्तविक दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।
इस क्रम में दूसरा महत्त्वपूर्ण बिन्दु है, संकल्पवान जीवन। जे.डी. फिशर के अनुसार संकल्पवान जीवन के बारे में प्रायः लोग भ्रमित रहते हैं। क्योंकि वे संकल्प को हठ या जिद का पर्याय मान लेते हैं। जबकि संकल्प विवेकपूर्ण चारित्रिक दृढ़ता है। मनीषी फिशर के अनुसार संकल्प का उपयोग दोषों के त्याग एवं गुणों के सम्वर्धन के लिए किया जाना चाहिए। लम्बे समय तक के प्रयासों से अपने आप को जानकर आर्ट ऑफ लिविंग के अभ्यासी को अपनी कमियों-कमजोरियों एवं अपनी उच्चतम सम्भावनाओं की अलग-अलग सूची बना लेना चाहिए। इस सूची का अनुसरण करके प्रति सप्ताह किसी एक कमी कमजोरियों को दूर करने एवं किसी एक सम्भावना को जाग्रत् करने का संकल्प लेना चाहिए।
संकल्पवान जीवन के लिए अनुशासन को फिशर महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार संकल्प एवं अनुशासन एक ही सत्य के दो महत्त्वपूर्ण पहलू हैं। अनुशासित हुए बिना संकल्पवान नहीं बना जा सकता है। इसी तरह संकल्प के बिना अनुशासन का ठीक-ठीक पालन सम्भव नहीं है। जे.डी. फिशर का कहना है। संकल्प एवं अनुशासन के ठीक-ठीक प्रयोग से जीवन की अन्तर्निहित क्षमताएँ जाग्रत् होने लगती हैं। इस तरह अनेकों उच्चतम सम्भावनाओं का अंकुरण एवं पल्लवन होने लगता है।
इस भाव दशा में जीने की कला के अगले बिन्दु का प्रारम्भ होता है। यह बिन्दु है- स्वयं की क्षमताओं का स्वार्थ रहित होकर उच्चतर उद्देश्यों के लिए नियोजन। इसका सही-सही अनुपालन होने पर जीवन का रूपांतरण घटित होता है। क्षुद्रताएँ अपने आप ही व्यापकताओं में बदल जाती है। स्व में विराट् की अनुभूति होती है। ज्यों-ज्यों हम अपनी क्षमताओं को श्रेष्ठ एवं सर्वहित के कार्यों में नियोजित करने लगते हैं। शान्ति एवं सन्तोष की मात्रा भी बढ़ती जाती है। जीवन के सार्थक होने की सच्ची अनुभूति जन्म लेने लगती है। जीने की इसी कलात्मक शैली में जीवन के श्रेष्ठ एवं सुन्दर तत्त्व प्रकट होते हैं। अन्तर्निहित क्षमताएँ एवं सम्भावनाएँ अपने सम्पूर्ण सौंदर्य के साथ अभिव्यक्त होती हैं। परमेश्वर की श्रेष्ठतम कलाकृति मानव जीवन में सर्वोत्तम कलात्मकता प्रकट होती है।
एक साधु की कुटिया थी। एक राहगीर ने पूछा, आपके गाँव के लोग कैसे है? साधु ने उलटकर पूछा, तुम्हारे गाँव के कैसे है? राहगीर ने कहा, बहुत बुरे। साधु ने कहा, हमारे गाँव के और भी बुरे है।
थोड़ी देर में एक और राहगीर आया। उसने भी वही प्रश्न किया। साधु ने उससे भी उलटकर पूछा, तुम्हारे गाँव के कैसे है? राहगीर ने कहा, बहुत अच्छे।
अब साधु का जवाब था; बिल्कुल सज्जन।
कुटिया में बैठे एक आदमी ने साधु से दुहरे उत्तर का कारण पूछा- आपने दो राहगीरों से दो तरह की बातें क्यों कहीं?
साधु ने कहा, अपना दृष्टिकोण ही अन्यत्र दीखता है। इन राहगीरों का जैसा दृष्टिकोण है, गाँव के लोग भी उसी तरह दीखेंगे।
‘ॐ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् होतारं रत्नधातमम्।’ (ऋ .-1/1/1) में अग्नि देव की स्तुति के साथ यज्ञ का जिक्र भारत वर्ष में यज्ञ का प्राचीनतम ऐतिहासिक-साहित्यिक साक्ष्य है। यह इस तथ्य का भी स्पष्ट प्रमाण है कि प्रारम्भिक वैदिक काल के आने तक भारतवासी न केवल यज्ञ की विधा से सुपरिचित हो चुके थे, बल्कि इसका गहन मर्म भी समझ चुके थे। वेदों में सबसे अधिक मंत्रों की संख्या अग्नि एवं यज्ञ के संदर्भ में है, जो इस युग में यज्ञ के चतुर्दिक् विकास एवं लोकप्रियता की परिचायक है। यहाँ यह तथ्य भी उभर कर सामने आता है यज्ञ के बीज भारत में चिर प्राचीन प्रागैतिहासिक युग में छिपे हुए हैं, अन्यथा इनका प्रस्फुटन एवं विकास प्रारम्भिक वैदिक युग में देखने को न मिल पाता।
सिन्धु घाटी की सभ्यता से प्राप्त पुरातात्त्विक अवशेष इस सत्य को पुष्ट करते हैं। कालीबंगा, लोथल, बनवाली एवं राखीगढ़ी के उत्खननों से प्राप्त अग्निवेदियाँ इसका प्रबल प्रमाण है। ये वेदियाँ वस्तुतः मिट्टी के बने गड्ढे थे, जिनमें प्रत्येक का आकार लगभग 75×75 सेंटीमीटर था। कालीबंगा में प्राप्त अग्निवेदियाँ एवं समस्त सामग्री किसी धार्मिक या याज्ञिक अनुष्ठान के संकेत देती हैं। लोथल में आयताकार एवं वृत्ताकार अग्नि वेदियाँ मिली हैं, जिनका उपयोग डॉ. साकलिया के अनुसार मूलतः पारिवारिक अनुष्ठानों के लिए किया जाता था। इसी तरह प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता वाकणकर को लुप्त सरस्वती नदी शोध अभियान के दौरान सरस्वती नदी के किनारे हड़प्पाकालीन स्थलों से अग्निवेदियों के प्रमाण मिले हैं।
इस तरह सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के प्रागैतिहासिक काल में हम यज्ञ के स्पष्ट प्रमाण पाते हैं और यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि भारत के चिरअतीत से प्रारम्भ यज्ञ की विधा, वैदिक युग तक जन जीवन का अभिन्न अंग बन गई थी। इसे वैदिक संस्कृति का मेरुदण्ड भी कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। वस्तुतः यह इसके सामाजिक, साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक जीवन का केन्द्रीय तत्त्व था। वैदिक युग में यज्ञ की महत्ता सर्वोपरि थी, जो व्यक्ति को पावन, पवित्र और कर्मठ बनाता था।
उत्तर वैदिक काल में कर्मकाण्डों एवं यज्ञों का महत्त्व इतना बढ़ गया था कि पुरोहितों ने प्रत्येक कार्य को यज्ञ से जोड़ दिया था। सभी मनुष्यों के लिए याज्ञिक क्रिया को श्रेष्ठ बताया गया। इतना ही नहीं यह अनुभूति भी बनती बनाई गई कि यज्ञ के द्वारा देवता भी वश में हो जाते हैं तथा प्रसन्न होकर मनुष्यों को मनवाँछित वर प्रदान करते हैं। इस प्रकार यज्ञ मनुष्य तथा देवताओं के बीच सम्बन्ध स्थापित करने वाला माध्यम बन गया। क्रमशः यज्ञों की संख्या बढ़ती गई तथा अनेक याज्ञिक प्रथाएँ प्रचलित हो गयीं, यथा- अग्निहोत्र, दर्श और पूर्णभामास्य, अग्निष्टोम, षोडशी, अतिरात्र, पुरुषमेध, पंचमहायज्ञ आदि तत्कालीन समाज में प्रचलित थे तथा गवापान, वाजपेय, राजसूय और अश्वमेध जैसे यज्ञों को सम्पन्न करना प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था।
इनमें अग्निहोत्र प्रातः-सायं दोनों समय किया जाता था, जिसमें दूध, दही और घृत की आहुति दी जाती थी। पापों के क्षय और स्वर्ग की ओर ले जाने वाले इस पुण्यकर्म को सर्वोत्तम नाव के रूप में स्वीकार किया गया। पंचमहायज्ञ प्रत्येक गृहस्थ के लिए अनिवार्य था। इसके अंतर्गत भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ सम्मिलित थे। राजसूय यज्ञ राजाओं द्वारा सम्पन्न किए जाते थे। डॉ. सत्यकेतु के अनुसार, राजसूय यज्ञ किए बिना राजा राजपद पर सिंहासनारूढ़ नहीं हो सकता था। अश्वमेध यज्ञ का आयोजन सार्वभौम राजा ही कर सकता था। उत्तरवैदिक काल में परिक्षीत के वंशज जनमेजय का वर्णन आता है, जिसने आसन्दीवन में अश्वमेध यज्ञ किया था।
उत्तरवैदिक काल तक यज्ञीय कर्मकाण्ड बहुत बृहद् एवं जटिल रूप ले चुका था। ऋग्वेद में जहाँ सात प्रकार के पुरोहितों का उल्लेख है, ब्राह्मण काल तक यह संख्या 17 बन गई थी। साँख्यायन, आश्वलायन, कात्यायन श्रौतसूत्रों में पुरोहितों के विभिन्न रूपों का जो विवरण उपलब्ध होता है वह यज्ञ तथा कर्मकाण्डों की अधिक जटिलता का प्रतीक है। इस दौरान यज्ञ बहुआयामी एवं पर्याप्त विकसित हो गया था। साथ ही यज्ञ का दार्शनिक पक्ष भी बढ़ गया था।
यहाँ तक कि यज्ञीय कर्मकाण्ड के स्थान पर इसके दार्शनिक पक्ष और आध्यात्मिक उत्कर्ष को प्रधानता दी जाने लगी। यह स्वीकार किया गया कि ज्ञान के अभाव में परलोक की प्राप्ति न तो यज्ञ से सम्भव है और न तप से, बल्कि यज्ञ में निहित धार्मिक भावना से ही सम्भव है। अतः ज्ञान की महत्ता सर्वोपरी मानी गयी। आरण्यकों में यज्ञ से सम्बन्धित दार्शनिक विचार और चिंतन को स्थान मिला तथा उसके कर्मकाण्डीय पक्ष को स्थगित किया गया। उपनिषदों में भी ज्ञानपक्ष की ही महत्ता प्रतिपादित की गई।
महाकाव्यों के समय तक वैदिक धर्म का स्वरूप बिलकुल परिवर्तित हो चुका था। पूर्व-वैदिक कालीन कर्मकाण्ड प्रधान तथा उत्तर वैदिक कालीन ज्ञान प्रधान धर्मों का समन्वय करके इस समय एक लोकधर्म का विकास किया गया जो सर्व साधारण के लिए सुलभ था। रामायण और महाभारत में अनेक वैदिक यज्ञों का उल्लेख मिलता है, परंतु यज्ञों में होने वाली हिंसा का विरोध किया गया। यज्ञ को इस समय मुख्यतः चित्त शुद्धि का एक साधन मात्र स्वीकार किया गया। साधारणतः गृहस्थ, पंच-महायज्ञ करता था, जिसमें पितरों, देवों, ब्राह्मणों, अतिथियों और भूतों को संतुष्ट किया जाता था। तत्कालीन युग में अश्वमेध और राजसूय यज्ञ भी प्रचलित थे। राम ने अश्वमेध यज्ञ किया था तथा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ। इस युग में नाग यज्ञ भी हुआ था, जिसे महाराज जनमेजय ने सम्पन्न किया था।
आध्यात्मिक उत्कर्ष के साधन के रूप में संध्या के साथ अग्निहोत्र समाज में प्रचलित थे। प्राचीन ऋषियों की दीर्घायु, यश, बुद्धि और आध्यात्मिक बल इसी के माध्यम से प्राप्त हुए थे। रामायण से विदित होता है कि राम और लक्ष्मण संध्या और अग्निहोत्र दोनों करते थे। युधिष्ठिर भी संध्या और अग्निहोत्र दोनों किया करते थे। इस तरह महाकाव्य काल में यज्ञ परिष्कृत रूप में प्रचलित था व समाज में इसका धार्मिक कृत्य के रूप में महत्त्वपूर्ण स्थान था।
किन्तु कालक्रम में कुछ समय के लिए यज्ञ की यह पावनता क्षीण होती गई व छठी सदी ई. पू. तक यज्ञ कर्मकाण्ड पुनः अंधविश्वास, जटिलता एवं हिंसा के अभिशाप से ग्रस्त हो गया था। फलस्वरूप इनके विरोध में एक बौद्धिक एवं धार्मिक क्रान्ति का सूत्रपात हुआ, जिसका स्वाभाविक परिणाम था- बौद्ध एवं जैन धर्म का उद्भव। इनके प्रसार के कारण वैदिक मान्यताओं को प्रबल आघात लगा, किन्तु चौथी शताब्दी ई. पू. तक मौर्य वंश की स्थापना हुई। इस समय वैदिक यज्ञों का पुनः प्रचार हो रहा था। वैदिक कालीन पौरोहित्य प्रथा की लुप्त प्रतिष्ठ पुनः स्थापित रही थी। अंतर केवल इतना था कि कर्मकाण्ड अब पूर्व की भाँति जटिल नहीं रह गए थे। मैगस्थनीज ने एक स्थान पर लिखा है कि सम्राट (चन्द्रगुप्त) जिन चार अवसरों पर महल से बाहर निकलता था, यज्ञ उनमें से एक था। अर्थशास्त्र में वर्णित राजप्रसाद के निकट बनी यज्ञशाला (इज्यास्थान) से भी तत्कालीन ब्राह्मण धर्म में यज्ञों की महत्ता प्रामाणित होती है।
मौर्योत्तर काल में यज्ञ पुनः अपने उत्कर्ष की ओर अग्रसर होता है। शुँग वंश के प्रथम शासक पुष्पमित्र शुँग ने अपने शासन काल में वैदिक धर्म की मान्यताओं एवं परम्पराओं को पुनः स्थापित किया। कतिपय पुरातात्त्विक साक्ष्य भी उपरोक्त तथ्यों की पुष्टि करते हैं। प्रथम अभिलेख वशिष्क के शासन काल में चौबीसवें वर्ष अंकित मथुरा के निकट इर्शापुर ग्राम से उपलब्ध हुआ है। इसके अनुसार भारद्वाज गोत्र के एक ब्राह्मण रुद्रिल के पुत्र द्रोणिल ने 92 रात्रि तक चलने वाला एक यज्ञ सम्पन्न किया था। एक अन्य यूप स्तंभ लेख में सप्तसोम यज्ञ से संबंधित सात यूपों के निर्माण का उल्लेख है। भूतपूर्व उदयपुर राज्य के भंदासा नामक स्थान से प्राप्त अभिलेख में 60 दिन तक चलने वाले यज्ञ का उल्लेख है। इसी प्रकार भूतपूर्व कोटा राज्य के बड़वा नामक स्थान से प्राप्त अभिलेख में त्रिरात्र यज्ञ सम्पन्न किए जाने का उल्लेख है। इन अभिलेखों से प्रमाणित होता है कि शुँग-सातवाहन काल में वैदिक यज्ञों को संपन्न करने की परम्परा पुनः प्रारम्भ हो गयी थी। पुष्यमित्र शुँग ने स्वयं अपने साम्राज्य को सुस्थिर करने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया था। अयोध्या अभिलेख में पुष्यमित्र को दो अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला (द्विरश्वमेधयाजिनः)कहा गया है। डॉ. आर. भण्डारकर के शब्दों में, वैदिक धर्म के पुनरुत्थान का क्षेत्र पुष्यमित्र को देना चाहिए। इसमें सहयोग एक राजसूय तथा दो अश्वमेध यज्ञ करने वाले गौतमी पुत्र शतकर्णी आदि सातवाहन राजाओं ने भी किया। नयनिका के ननाघाट अभिलेख से ज्ञात होता है, उसी शासक ने अग्न्यावेध, अन्वराम्भनीयं, गवमयानं, अगीरसतीरमं, अप्तोर्यम, अंगीरसमयान, गार्गतीरात्र, छान्दोगयवमान, अत्रीरात्रं, त्रयोदरात्र, दशरात्र आदि यज्ञ भी किए।
इस तरह शुँग एवं सातवाहन शासकों द्वारा किए गए यज्ञ वैदिक धर्म के पुनरुत्थान के सूचक है। यह विकास क्रमशः बढ़ते हुए अपने चरम में गुप्तकाल में दिखाई पड़ता है। हालाँकि गुप्तकाल के उदय से पहले भी भारशिवों ने गंगा के तट पर दशाश्वमेध घाट पर दस अश्वमेध यज्ञ करके वैदिक धर्म को लोकप्रिय बनाया था। किन्तु इसे राजसंरक्षण प्रदान करने व उसे राज्य धर्म बनाने का कार्य गुप्तवंश के लिए ही रह गया था। यह कार्य गुप्त सम्राटों ने बखूबी किया। इस युग में तैंतीस करोड़ देवताओं और उनकी मूर्तियों का उद्भव हो चुका था। 16 संस्कार प्रचलित थे, जिनमें यज्ञ प्रक्रिया अभिन्न रूप से जुड़ी थी। इस युग में समुद्रगुप्त और कुमारगुप्त द्वारा अश्वमेध यज्ञ को सम्पन्न करने के प्रमाण मिलते हैं। समुद्रगुप्त ने दिग्विजय के पश्चात् अश्वमेध यज्ञ किया था। इस यज्ञ की स्मृति में प्रचलित की गई मुद्राओं में एक तरफ यज्ञ स्तम्भ में बंधे घोड़े का चित्र है तथा दूसरी तरफ समुद्र गुप्त की महारानी हाथ में चंवर लिए हुए है तथा अश्वमेध यज्ञ क्रम अंकित है। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा यज्ञ सम्पन्न करने के प्रमाण काशी के दक्षिण में स्थिति नगवा नामक स्थान से उपलब्ध एक घोड़े की मूर्ति है, जिस पर चन्द्रगुप्त लिखा है। इसी तरह अपने पितामह तथा पिता की तरह कुमार गुप्त ने भी अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किया। इसको प्रमाणित करता एक सिक्का मिला है, जिसमें एक ओर घोड़े पर जीन कसी है तथा दूसरी ओर ‘अश्वमेध महेन्द्र’ लिखा है। इस संदर्भ में डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी का यह कथन सही प्रतीत होता है कि गुप्तकाल में वैदिक धर्म, अश्वमेध यज्ञ, वाजपेय अथवा पंच महायज्ञ आदि यज्ञों के सम्पादन द्वारा सुरक्षित था। वाकाटक के शासन में भी यज्ञ प्रचलित थे। हिन्दू धर्म शास्त्रों में निर्दिष्ट कई यज्ञ वाकाटकों ने किए। प्रवर सेन को सातों यज्ञ करने का श्रेय दिया जाता है और कहा जाता है कि उसने चार अश्वमेध यज्ञ किए। हर्षवर्धन के समय भी यज्ञ के प्रचलन का उल्लेख मिलता है, हर्ष चरित्र में यज्ञों का वर्णन आया है तथा उनसे उठते धुएँ का उल्लेख अनेक स्थानों पर प्राप्त होता है। थानेश्वर का उल्लेख करते हुए बाण लिखते हैं कि इसकी दशा दिशाएँ यज्ञों की सहस्रों ज्वालाओं से देदीप्यमान रहती थीं। यह इस समय यज्ञ के व्यापक प्रचलन को स्पष्ट करता है। इसी तरह राष्ट्रकूट शासकों के काल में यज्ञों के प्रचलन का उल्लेख मिलता है। दन्तिदुर्ग ने उज्जयिनी या उज्जैन में ‘हिरण्यगर्भ’ यज्ञ किया।
इस तरह हमें प्राचीन भारत में (प्रारम्भ से लेकर बारहवीं सदी तक) यज्ञों की महान् परम्परा का अविरल प्रवाह गतिमान दृष्टिगोचर होता है, जिसमें कुछ मन्द होने के दौर अवश्य आते हैं, किन्तु यह धारा कभी लुप्त नहीं हुई। बल्कि हर बाह्य अवरोधों एवं आँतरिक विकृतियों से गुजरते हुए यह और परिष्कृत एवं प्रखर रूप में प्रकट हुई। राष्ट्र के सामाजिक एवं साँस्कृतिक जीवन को यज्ञ की महान् प्रक्रिया एवं इसमें अंतर्निहित उदात्त दर्शन ने सतत नूतन भव्यता दी। राष्ट्रीय जीवन का हर काल इसका साक्षी है।
राष्ट्रीय जीवन के उत्कर्ष, उत्थान एवं चतुर्दिक् विकास में संजीवनी शक्ति की तरह काम करने वाली यज्ञ की विधा पर इस युग में स्वामी दयानंद एवं युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव द्वारा नूतन प्रकाश पड़ा है। इसके वैज्ञानिक एवं दार्शनिक स्वरूप को उभारने में व इसे जन-जन के बीच लोकप्रिय बनाने में इनकी भूमिका सराहनीय है। कतिपय भारतीय एवं विदेशी विद्वान् भी इसके वैज्ञानिक एवं चिकित्सीय पक्ष पर अध्ययन कर रहे हैं। किन्तु इसके ऐतिहासिक, साँस्कृतिक एवं पुरातात्त्विक पक्षों को उजागर करता शोधपरक अध्ययन कार्य अभी तक नहीं हुआ है। इस पर विराट् एवं व्यापक शोधकार्य को देव संस्कृति विश्वविद्यालय में किए जाने के प्रयास हो रहे हैं, ताकि प्राचीन भारत के इतिहास एवं संस्कृति के मेरुदण्ड यज्ञ का समग्र स्वरूप विश्वमानव के सामने उजागर हो सके।
फ्राँस और इटली में युद्ध चल रहा था। इटली की एक छोटी नदी थी। गहरी बहुत, चौड़ी कम। ग्रामीणों ने उसे पार करने के लिए खजूर के लट्ठे लगा रखे थे।
फ्राँसीसी फौजें इसी पुल को पार कर इटली के भीतरी क्षेत्रों में प्रवेश करने की योजना बना रही थी। ग्रामीणों को पता चला, तो उनने लट्ठे काटकर नदी में गिरा देने का निश्चय किया। वे कुल्हाड़ी से काटने लगे। खबर फ्राँसीसी फौजों को लगी, तो वे काटना रोकने के लिए गोली चलाने लगी। ग्रामीण बहादुर थे। उनने हार नहीं मानी। काटना जारी रखा। गोलियों से छलनी होकर जब तक काटने वाला नदी में गिर नहीं जाता, जब तक वह रुकता नहीं।
इस प्रकार तीन सौ किसान मौत के घाट उतर गए। जवान सभी समाप्त हो गए। एक बुड्ढा बचा। उसने वहाँ पहुँचकर स्थिति देखी, तो पाया कि पुल के लट्ठे अधिकाँश में कट चुके थे। जुड़ा हुआ स्थान थोड़ा सा ही था। बुड्ढा दौड़ता हुआ गया और उछलकर उस जुड़े हुए स्थान पर कूद पड़ा। झटके से लट्ठा टूटकर नदी में गिर गया, साथ ही बुड्ढा भी बह गया।
गाँव के प्रायः सभी वयस्क इस प्रयास में खप गए, पर पुल टूटने से फ्राँसीसी सेना का हमला रुक गया और आजादी बच गई।
प्रायः सभी ने चौंक कर सारिपुत्र की ओर देखा। भगवान् तथागत की अनुपस्थिति में उन्होंने ही यह समाचार भिक्षु संघ को सुनाया था, कि भिक्षु अंगुलीमाल नहीं रहे। सुनकर पहले तो एक बारगी किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। कोई यकायक यह सोच ही नहीं पाया कि खतरनाक खूँख्वार दस्यु अंगुलीमाल इस तरह मर भी सकता है। पर सत्यवक्ता एवं सत्यद्रष्टा सारिपुत्र की बातों में अविश्वास का कोई कारण भी न था। धीरे-धीरे कुछ क्षणों में भिक्षुओं को विश्वास हुआ। और उनमें से कइयों ने आश्वस्ति की साँस ली। क्योंकि ये अंगुलीमाल के भिक्षु संघ में रहने से स्वयं को असुरक्षित महसूस करते थे। उन्हें लगता था कि हत्यारा अंगुलीमाल पता नहीं कब अपनी आदत दुहरा बैठे। पर भगवान् तथागत के भय से वे कुछ कह नहीं पाते थे। आज इन्होंने जब उसके मरने की खबर सुनी तो इन सबने बड़े चैन की साँस ली।
भिक्षु संघ के कुछ नए सदस्यों ने सारिपुत्र से आग्रह किया कि वह उन्हें अंगुलीमाल के भिक्षु बनने की गाथा सुनाएँ। उनकी यह जिज्ञासा स्वाभाविक थी कि इतना बड़ा हत्यारा अचानक भिक्षु कैसे बन गया। सारिपुत्र उन सभी के मनोभावों को समझते हुए बोले- हाँ अंगुलीमाल हत्यारा था। उसने शपथ ली थी कि एक हजार लोगों को मारकर उनकी अंगुलियों की माला बनाकर पहनूँगा, इसीलिए जन सामान्य ने उसे अंगुलीमाल के नाम से पुकारना शुरू कर दिया। जिस समय भगवान् तथागत उससे मिले, उस समय तक वह नौ सौ निन्यानवे व्यक्तियों को मार चुका था। और हजारवें की प्रतीक्षा कर रहा था। उसके इस अद्भुत प्रण की चर्चा सब ओर थी। तो जिस बीहड़ वन में अंगुलीमाल रहता था, लोगों ने उस ओर जाना ही छोड़ दिया था। यहाँ तक कि उसकी माँ भी उस ओर जाने में घबराती थी। क्योंकि उसे मालूम था कि उसका बेटा अपनी माँ को भी मारकर अपना प्रण पूरा करेगा।
भगवान् उन दिनों कोसल देश के उस भयानक वन के पास ही ठहरे थे। कोसल नरेश प्रसेनजित के काफी आग्रह-अनुरोध के बावजूद उन्होंने राजप्रसाद या राज उद्यान में ठहरना स्वीकार नहीं किया। महाराज प्रसेनजित के साथ उन्होंने जन सामान्य के अनुरोध को भी ठुकरा दिया। यही नहीं एक दिन प्रातः भगवान् उस भयावह वन की ओर जाने वाली डगर पर चल दिए। जिसने उन्हें उस ओर जाते देखा, वही चीख पड़ा, ‘आप उधर न जाएँ भन्ते! वह आदमी बहुत ज्यादा खतरनाक है। वह कतई विचार नहीं करेगा कि आप कौन हैं, उसको तो बस जैसे-तैसे एक आदमी को मारकर एक हजार व्यक्तियों को मारने का अपना प्रण पूरा करना है। जरा सोचिए, जिस ओर जाने में महाराज प्रसेनजित एवं उनकी फौजें घबराती हैं, उस ओर भला आप क्यों जा रहे हैं।’
भगवान् मुस्कराकर बोले, मुझे सारी बातें पता हैं। इसीलिए तो मैं उधर जा रहा हूँ, ताकि उस बेचारे की सुदीर्घ प्रतीक्षा समाप्त हो सके। यह कहते हुए तथागत उस भयावह वन में प्रविष्ट हो गए। उनके पाँवों के आगे बढ़ने से वन में पड़े सूखे पत्ते चरमरा उठे। किसी के आने की आहट पाकर अंगुलीमाल ने अपने फरसे पर धार रखनी शुरू कर दी। हालाँकि अचरज उसे भी था। क्योंकि सालों से उधर कोई आया ही नहीं था। और आज अचानक.....। आखिर यह कौन नासमझ है, जो चारों दिशाओं में फैले उसके प्रण की खबर को जानकर भी इधर मरने के लिए आ रहा है। उसने खड़े होकर थोड़ा गौर से देखा, गैरिक वस्त्र, हाथ में कमण्डलु, तो बेचारा कोई संन्यासी है। आज गया काम से लगता है इसे नागरिकों ने कुछ बताया नहीं।
परन्तु न जाने क्यों जैसे-जैसे भगवान् उसके समीप बढ़ते गए, वैसे-वैसे उसके अन्तःकरण के भाव बदलने लगे। उसमें दया का अंकुरण होने लगा। अपने इस अचानक भाव परिवर्तन पर उसे भारी हैरानी हुई। मन ही मन उसने सोचा, अरे अंगुलीमाल आज अचानक तुझे यह क्या हो रहा है? तू तो अपनी सगी माँ को भी काटने के लिए तत्पर था। फिर इससे तो कोई तेरी जान-पहचान भी नहीं है। लेकिन कुछ घटित हो रहा था। बुद्धत्व की तरंगें, भगवान् तथागत की शान्ति, सुगन्ध से वह घिरने लगा था।
शास्ता जब थोड़ी दूर रह गए तो वह चिल्लाया, अरे पागल संन्यासी। तू किधर बढ़ा चला जा रहा है, देखता नहीं मेरे गले में यह अंगुलियों की माला पड़ी है। मेरा यह चमकदार फरसा तुझे दिखाई नहीं देता? अरे नासमझ मैं अंगुलीमाल हूँ। मेरे प्रण की बात तूने नहीं सूनी। मैं नौ सौ निन्यानवे को मार चुका हूँ। एक को मारना बाकी है। क्यों तू अपनी जान का दुश्मन बना है। भाग जा मूर्ख। मैं तुझे न जाने क्यों एक मौका दे रहा हूँ। अभी भी तेरे पास समय है, तू आगे की ओर चलना छोड़ दे, पीछे लौट जा।
भगवान् हँसे। उनकी खिलखिलाहट से वन प्रान्तर में एक अपूर्ण मधुरिमा बिखर गयी। वह बोले, अरे पागल, तुझे इतना भी नहीं पता कि सालों, साल पहले मैंने चलना बन्द कर दिया है। जब से मेरा मन ठहरा, तब से मेरी जिन्दगी की सारी भाग-दौड़ बन्द हो गयी है। मैं तो स्थिर हूँ, अब तू स्थिर हो। भगवान् के इन बोधपूर्ण वचनों को अंगुलीमाल समझ न सका। अपनी हैरानी में उसने सोचा यह आदमी जरूर पागल है। जो चलते हुए भी कह रहा है कि स्थिर है। जबकि मैं यहाँ स्थिर बैठा हुआ फरसे पर धार रख रहा हूँ, तो मुझसे कह रहा है कि तुम ठहर जाओ। अपनी सोच की कड़ियों को जोड़ते हुए अंगुलीमाल ने मन ही मन कहा- कि यह आदमी कितना ही पागल क्यों न हो, पर इसमें एक दैवी आभा जरूर है।
अभी वह कुछ और सोच पाता कि भगवान् बुद्ध उसके एकदम पास पहुँच गए। अब तक किसी ने भी उसके इस तरह एकदम पास पहुँचने की हिम्मत न की थी। इस विचित्र आदमी की हिम्मत से वह थोड़ा हड़बड़ा गया। अपने को थोड़ा सम्हालते हुए वह बोला, तुम बहुत जिद्दी हो। मुझे शंका हो रही है कि कहीं तुम गौतम बुद्ध तो नहीं हो। क्योंकि जिन लोगों की मैंने हत्याएँ की हैं, उनमें से कई मुझसे यह कह रहे थे कि तुम्हें तो केवल गौतम बुद्ध ही बदल सकते हैं। पर तुम यह भली प्रकार जान लो कि मैं भी कम जिद्दी नहीं हूँ। मेरा भी नाम अंगुलीमाल है। यह अच्छी तरह से जान लो कि आज तुम्हारी जिन्दगी का आखिरी दिन है।
भगवान् सम्यक् सम्बुद्ध उसकी इन बातों पर मुस्कराए और बोले, तू आराम से अपने फरसे पर धार रख ले। तब तक मैं यहीं बैठा हूँ। यह कहते हुए वह एक शिला पर बैठ गए। अंगुलीमाल अपने फरसे पर धार रखने लगा। परन्तु न जाने क्यों, आज उसके हृदय में प्रेम का ज्वार उफन रहा था। उसके अस्तित्त्व से करुणा की तरंगें फूटने लगी थी। उसके अन्तःकरण में दया का अंकुरण होने लगा था। अपनी इस भाव दशा पर वह बड़ा हैरान था। परन्तु उसने अपनी यह हैरानी छिपाते हुए कहा, कि तुम कैसे आदमी हो, आखिर तुम मरने के लिए इतना तत्पर क्यों हो। तुमने आत्महत्या करने की आखिर क्यों सोची है।
उसकी सभी बातों के प्रत्युत्तर में भगवान् के मुख पर बड़ी ही निर्विकार शान्ति थी। उनके अधरों पर एक सौम्य स्मित था। इतनी देर में अंगुलीमाल का धार रखने का काम भी पूरा हो गया। उसने कहा, अरे एक बार फिर सोच ले, अभी भी मैं तुझे जीवन दे सकता हूँ। भगवान् ने उसके इस कथन पर बड़े ही करुणा पूर्ण स्वर में कहा- यही तो मैं तुझे सिखाने आया हूँ पुत्र! मारने में न तो कोई कला है और न ही कोई पुरुषार्थ। यह तो कोई भी कर सकता है वत्स। असली कला तो जीवन देने और जीवन जीने में है। पता नहीं क्या था कि महाकारुणिक बुद्ध के इन वचनों में। अंगुलीमाल फरसा एक ओर फेंककर उनके चरणों में गिर गया। वह दस्यु से भिक्षु हो गया।
और आज जब वह गाँव में भिक्षा माँगने गया- तो गाँव के लोगों ने दरवाजे बन्द कर लिए। लोग अपनी-अपनी छतों पर पत्थर इकट्ठे करके चढ़ गए। और जब वह बीच सड़क पर था तो लोगों ने उसे पत्थर मारे। वह शान्तमना भिक्षु बीच सड़क पर खड़ा रहा, उसकी देह पर लोगों के पत्थर गिरते रहे। उसकी देह के प्रत्येक अंग से लहू की धारें बहती रही। उसके होठों से यह मंत्र ध्वनि निकलती रही- बुद्ध शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि। इन महामंत्रों का गान करते हुए वह धरती पर गिर गया।
खबर मिलते ही शास्ता स्वयं उसके पास गए। आखिरी क्षण थे उसके जीवन के। भगवान् ने उसका सिर अपनी गोद में रखकर पूछा- पुत्र! क्या भाव हैं इस समय तेरे मन में। उसने आँसू भरी आँखों से कहा, भगवन्! आपका ही शिष्य हूँ। आपकी ही बात मानकर मैं ठहर गया हूँ। अब ठहरे हुए का क्या भाव प्रभु! मेरा मन तो जैसे अब रहा ही नहीं भगवान्। वह तो जैसे देखता रहा, एकदम साक्षी की तरह। यही तो आपने समझाया था, पुत्र! तू देखने वाला द्रष्ट है, तू साक्षी है। जैसा आपने बताया, समझाया, मैं वैसा ही हो गया। मेरे मन- अन्तःकरण में किसी के प्रति कोई राग-रोष नहीं। मुझमें कहीं भी कोई द्वेष-क्लेश नहीं। मेरे आराध्य! आप सर्वांतर्यामी हैं। आप ही बताए कि मैं आपका शिष्य एवं अनुरक्त भक्त बन सका या नहीं।
अंगुलीमाल के इन भक्तिपूर्ण वचनों को सुनकर भगवान् के नेत्र भर आए। वह भरे हृदय से बोले, ‘पुत्र! तू ब्राह्मण होकर देह त्याग कर रहा है। तू ब्रह्मज्ञान को उपलब्ध हो गया है। तू अर्हत हो गया पुत्र! तू अरिहन्त हो गया।’ भगवान् के इन वचनों को सुनकर अंगुलीमाल ने उन्हीं की गोद में सिर रखे हुए अपनी देह का त्याग कर दिया।
सारिपुत्र भिक्षुओं को यह कथा सुना रहे थे, तभी भगवान् बुद्ध धीमे कदमों से चलते हुए आ पहुँचे। सभी भिक्षुओं ने उन्हें प्रणाम किया। प्रणाम के अनन्तर उनमें से कुछ भिक्षुओं ने पूछा- भन्ते! भिक्षु अंगुलीमाल मरने के पश्चात कहाँ उत्पन्न होंगे? भिक्षुओं की इस जिज्ञासा के उत्तर में भगवान् ने बड़े ही धीरे स्वर से कहा- भिक्षुओं! मेरा वह पुत्र परिनिवृत्त होकर परिनिर्वाण को उपलब्ध हो गया है। उसकी चेतना जन्म-मरण से पार हो गयी है। अब उसका पुनरागमन नहीं होगा।
आश्चर्यचकित भिक्षुओं ने कहा- इतने मनुष्यों की हत्या करके?
हाँ भिक्षुओं, भगवान् ने कहा, उसने सोए हुए अनेकों पाप किए, परन्तु जगने के पश्चात् अपने पुण्यों से उन्हें नष्ट कर दिया। फिर उसने शून्य भाव में निमग्न होकर निर्वाण को प्राप्त कर लिया। यह कहते हुए भगवान् ने यह गाथा कही-
यस्य पापं कतं कम्मं कुसलेन पिथीयती। सो’ मं लोकं पभासेति अष्मा मुत्तो व चंदिमा॥
‘जिसका किया हुआ पाप उसके बाद में किए हुए पुण्य से ढक जाता है। वह मेघ से मुक्त चन्द्रमा की भाँति इस लोक को प्रकाशित करता है।’
तथागत के वचन को सुनकर भिक्षुगण कहने लगे, भन्ते! अभी तो उसे भिक्षु हुए भी ज्यादा दिन नहीं हुए थे, फिर उसने इतने पुण्य कब कर डाले। बुद्ध एक हल्के से स्मित के साथ बोले, छोटा सा पुण्य कृत्य भी यदि साक्षी भाव की समग्रता से किया जाय, तो सारे पापों को भस्म कर देता है। अंगुलीमाल को न तो भिक्षु हुए ज्यादा दिन हुए और न ही वह ज्यादा दिन जिया। परन्तु जिस समय उसे सभी ग्रामवासी पत्थर मार रहे थे, उस समय वह सभी राग-द्वेष से मुक्त पूर्ण साक्षी भाव में स्थित था। इसी महापुण्य से वह निर्वाण को उपलब्ध हो गया। ‘भिक्षुओं! कर्त्ता होना ही महापाप है, और साक्षी होना ही महापुण्य है।’ बुद्ध के इन अपूर्व वचनों को सुनकर भिक्षुगण इन पर निदिध्यासन करने लगे
कोलकाता हाई कोर्ट के जज स्वर्गीय श्रीगुरुदास बनर्जी वायसराय के साथ कानपुर से कोलकाता के लिए यात्रा कर रहे थे। विश्वविद्यालय कमीशन संबंधी किसी आवश्यक चर्चा के लिए वायसराय ने उन्हें अपने ही डिब्बे में बुला लिया। बातचीत के मध्य भोजन का समय हुआ, तो वायसराय ने उनसे भोजन पाने का अनुरोध किया। बनर्जी साहब ने उत्तर दिया, मैं रेल में कुछ नहीं खाता। थोड़ा-सा गंगाजल रखे हुए हूँ वही पी लेता हूँ।
वायसराय को विश्वास नहीं हुआ। इतना प्रगतिशील व्यक्ति भी धार्मिक मान्यताओं का इतनी कट्टरता के साथ पालन कर सकता है। उन्होंने कहा, तो फिर लड़के को ही भोजन ग्रहण करने के लिए कहिए। बच्चे ने भी इनकार करते हुए कहा, मेरे पास घर की बनी थोड़ी-सी मिठाई है, उसका नाश्ता कर लिया है, अन्य कोई वस्तु ग्रहण कर करूंगा।
वायसराय आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा, आप लोग उपवास कर रहे है, तो मैं भोजन कैसे करूं? बायसराय की आज्ञा से गाड़ी इलाहाबाद में रोक दी गई। वहाँ बनर्जी ने पुत्र सहित त्रिवेणी स्नान किया, फिर गाड़ी आगे बढ़ी। लौटने पर वायसराय को धन्यवाद देते हुए कहा, कुछ खा-पी लेने से किसी की जाति जाती हो, इस संबंध में मेरा कोई तर्क नहीं, पर इन नियमों के पालन से आत्मसंयम और अनुशासन की शिक्षा मिलती है। हमारे धर्म और संस्कृति में जो ऐसी चीजें हैं, उनको मैंने इसीलिए हृदय से स्वीकार किया है।
नदी-तालाब के मीठे जल वाले जलचरों को यदि खारे पानी में, समुद्र में रखा जाए, तो उनका जीना दूभर हो जाएगा। हो सकता है, वे वहाँ जीवित न रह सकें, मर जाएँ या फिर अपना सामान्य स्वभाव त्याग दें और असामान्य व्यवहार करने लगें। यह सिर्फ जलीय जीवों की ही बात नहीं है, मनुष्यों पर भी समान रूप से लागू होती है। कृत्रिम वातावरण मानवी देह के अनुकूल नहीं। इसमें वह अपना स्वाभाविक विकास खो देती है, प्रखरता-क्षमता गँवाती और ह्रास की ओर चल पड़ती है। संपूर्ण अवयवों में ऐसे ही परिणाम परिलक्षित होने लगते है। उनकी कुशलता कुँद पड़ती जाती है, सक्रियता मंद होने लगती है और क्षमता में विशिष्टता का लोप हो जाता है, जबकि प्राकृतिक जीवन में वे अपने सर्वोच्च विकास को अर्जित करते और अद्वितीय बनते देखे जाते है।
मनुष्य एक प्राकृतिक प्राणी है। प्रकृति के सान्निध्य में प्राकृतिक ढंग से रहकर वह अपनी क्षमताओं और योग्यताओं को जितना अधिक संवर्द्धित कर सकता है, उतना अप्राकृतिक जीवन शैली का अपनाकर नहीं। आज खान-पान से लेकर रहन-सहन तक में ऐसे और इतने अस्वाभाविक तरीके अपनाए जा रहे है, जो हमारी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक सामर्थ्य को पंगु बनाते चले जा रहे है। इस ओर यदि तनिक भी ध्यान दिया जा सके और आदमी अपनी दिनचर्या को सहज-सरल बनाए रख सके, तो प्रखरता और प्रतिभा, स्वस्थता और सामर्थ्य प्राप्त कर सकना कठिन नहीं रह जाता।
वनवासी शारीरिक रूप से जैसे सशक्त और मानसिक रूप से जितने सुदृढ़ होते हैं, उतना एक आम शहरी नहीं होता। उनमें प्रतिकूलता से जूझने, कष्ट-कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति के अतिरिक्त शारीरिक सहिष्णुता और मानसिक मनोबल इतना प्रबल होता है कि वैसा विकास नगर के कृत्रिम जीवन शैली में यत्र-तत्र और यदा-कदा ही देखने को मिलता है। इसका कारण क्या है? इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने से यही ज्ञात होता है कि गाँवों से दूर शहरों में जीवन की भाग-दौड़ इतनी तीव्र होती है कि वहाँ हम अपनी नैसर्गिक दिनचर्या बनाए नहीं रख पाते और प्रकृति से दूर चले जाते है। परिणाम कुँठित प्रतिभा के रूप में सामने आता है। जो इस सचाई से अवगत है, उन्हें यह भी विदित होगा कि हमारी अपनी सत्ता में क्षमता और विशिष्टता तो है, पर वह स्वतः विकसित होने में असमर्थ होती है। जब उन्हें किसी ऐसे तत्व का सामीप्य मिलता है, जो किसी प्रकार उन क्षमताओं और योग्यताओं को कुरेदकर उभार सके, तो व्यक्ति असाधारण और अद्भुत बन जाता है, परंतु इस उन्नयन का श्रेय किसी और को नहीं, अपितु उस जीवन प्रणाली को दिया जाना चाहिए, जिसके जीवन में समाविष्ट न रहने पर सब कुछ सामान्य बना रहता है।
रसायन शास्त्र में ‘उत्प्रेरक’ नाम से रसायनों का एक समूह है। जब उन्हें किन्हीं दो रसायनों के साथ मिलाया जाता है, तो वे उनके बीच की प्रतिक्रिया को एकदम तीव्र कर देते है। मानवी जीवन में आदर्श जीवन पद्धति की लगभग ऐसी ही भूमिका है। जिंदगी में सम्मिलित होकर वह व्यक्ति की ऐसी कितनी ही विशेषताओं को मूर्तिमान कर देती है, जो अब तक या तो प्रच्छन्न या साधारण स्थिति में पड़ी हुई थी। इस क्रम में जब धृति, स्मृति और बुद्धि जैसी मस्तिष्कीय क्षमताओं का उदय होता है, तो मनुष्य अद्वितीय बुद्धिमान और ज्ञानवान बन जाता है, किंतु जब धैर्य, साहस और सहिष्णुता जैसे गुण प्रकट होते है, तो वे ‘जीवट’ प्रदान करते है, इसलिए यहाँ प्रयास की तुलना में अभ्यास पर अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि प्रयास-पुरुषार्थ से सामर्थ्य परिवर्द्धित तो की जा सकती है, पर वह किसी विशिष्ट जीवन प्रणाली के अभ्यास द्वारा उपार्जित प्रतिभा की अपेक्षा अधिक श्रमसाध्य होती है। उतना पराक्रम हर कोई कर भी नहीं सकता। ऐसे में प्रकृति की सन्निकटता ही क्षमता-संवर्द्धन का सरल उपाय दीखता है। इसमें दक्षता के साथ-साथ स्वस्थता भी बढ़ती है, इसलिए भी यह अधिक उपयोगी है। जो यह समीपता उपलब्ध कर पाने में असमर्थ है, उन नगर निवासियों के लिए प्राकृतिक जीवनक्रम अपना लेना भर ही पर्याप्त है। जल्दी शयन, प्रातः जागरण, प्रातः भ्रमण, दैनिक यज्ञ, नियमित जप, शुद्ध आचार, सात्विक आहार, श्रेष्ठ चिंतन और परोपकार की वृत्ति- इसे आदर्श जीवनपद्धति कहते है। इसको अपना लेने से भी आवश्यकता की काफी हद तक पूर्ति हो जाती है और वह लाभ प्राप्त हो जाता है, जो प्रकृति के मध्य रहकर प्राप्त किया जा सकता था। खोजने से ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाते है, जो इस बात की पुष्टि करते है कि सरल, सहज और सात्विक जीवन जीने से कौशल और निपुणता बढ़ती है एवं अनेक बार व्यक्ति को अद्भुत बना देती है।
ऐसा ही एक दृष्टाँत काशी का है। वहाँ आर्ष साहित्य के एक उद्भट विद्वान थे पंडित काशीनाथ। देखने में अत्यंत सरल, व्यवहार में विनम्र, पहनावे में सादगी, पर चिंतन में इतनी प्रखरता और विद्वत्ता मानो साक्षात सरस्वती ही रूप बदलकर आ उपस्थित हुई हो। उनकी दिनचर्या बहुत ही नियमित थी। वे प्रातः तीन बजे उठ जाते और दैनिक क्रिया से निवृत्त होकर प्रायः एक घंटे तक उपासना और ध्यान करते। उसके उपराँत भ्रमण के लिए निकल जाते। प्रतिदिन तीन मील की पैदल यात्रा करने के बाद यज्ञ करते, तत्पश्चात् उनका अध्यापन कार्य आरंभ होता, जिसमें वे करीब एक घंटा लगाते। ग्रंथों को पढ़ाते समय उनकी अद्भुत स्मरण शक्ति की झलक मिलती। छात्रों के सम्मुख पुस्तकें खुली रहती। वे उनका पाठ करते जाते और काशीनाथ व्याख्या। कई बार भूलवश शिष्यों से कोई शब्द छूट जाता, तो वे उसे तत्काल पकड़ लेते और बताते कि अमुक शब्द छूट गया है। उन्हें ग्रंथ-के-ग्रंथ कंठस्थ थे। वे व्याकरण और दर्शन के मर्मज्ञ माने जाते थे। ‘अनुभूति प्रकाश’ नामक वेदाँत ग्रंथ पर उनकी एक टीका है। उस टीका सके प्रत्येक श्लोक पर जिस ढंग से उनने उपनिषदों के एक-एक मंत्र को घटित किया है; वह उनके पाँडित्य का प्रमाण है।
जिन दिनों की यह बात है, उन दिनों काशी आज जितनी जनसंकुल नहीं थी। सात्विक वातावरण और शुद्ध पर्यावरण वहाँ चहुँओर व्याप्त था। यत्र-तत्र प्राकृतिक छटा भी विद्यमान थी। ऐसे में काशीनाथ में दया, करुणा और सेवावृत्ति का जो विकास हुआ, वह अप्रतिम था। उनकी सहनशीलता की चर्चा तो सर्वत्र होती ही रहती थी, उसकी एक बानगी यहाँ देखने योग्य है।
एक बार वे ‘अद्वैत सिद्धि’ नामक दर्शन ग्रंथ पढ़ा रहे थे। पढ़ाते-पढ़ाते कहने लगे, “कुछ काटत बा हो।”
“कहाँ महाराज ?”
“पिठिये में। अच्छा काटै दऽ, पाठ चले।”
पाठ समाप्त होने के बाद जब वस्त्र हटाया, तो वहाँ बिच्छू मिला, जो कई डंक मार चुका था। जिसने बर्र के डंक को झेला हो, उसे मालूम है कि बिच्छू का दंश कितना पीड़ादायक होता होगा। वह तो उससे अनेक गुना विषैला होता है। इसके बावजूद भी वे बिलकुल सहज बने रहे। इससे उनकी विलक्षण सहनशीलता का परिचय मिलता है।
ऐसे ही एक अन्य विद्वान थे, रामभवन उपाध्याय। व्याकरण के अद्वितीय पंडित होने के साथ-साथ अनेक शास्त्रों पर भी उन्हें पूर्ण अधिकार था। वे सब उन्हें मुखाग्र थे। स्मृति इतनी कुशाग्र थी कि किसी ग्रंथ के किसी अध्याय से कोई श्लोक बोलकर उससे आगे का श्लोक पूछने पर वे बिना एक क्षण रुके अगला श्लोक बता देते थे।
वे प्रायः रात्रि में दो बजे उठ जाया करते थे। स्नानादि करके संध्यावंदन एवं गायत्री जप करते, फिर हवन करने के उपराँत प्रातःकाल छह बजे क्वींस कॉलेज, काशी अध्यापन के लिए चले जाते। कॉलेज उनके निवास स्थान ‘बड़ी पियरी’ से लगभग तीन किमी. था। वे वहाँ चूडांत व्याकरण के प्राध्यापक थे और पैदल ही आया- जाया करते थे। उनकी चाल इतनी तीव्र थी कि साथ चलने वाला दूसरा व्यक्ति उनके बराबर नहीं चल पाता था।
पंडित जी एक निःस्पृह ब्राह्मण थे। अध्ययन-अध्यापन का कार्य वे प्रायः कर्तव्य-कर्म समझकर करते थे। वेतन पर उनकी दृष्टि कभी नहीं हुई। इसका एक उदाहरण उन दिनों का है, जब वे काशी के दरभंगा संस्कृत पाठशाला में अध्यापन कार्य करते थे। उन्हें वेतन के रूप में पंद्रह रुपये मासिक मिला करते थे, पर उन रुपयों को वे कभी अपने उपयोग में नहीं लाते, उनसे किसी जरूरतमंद की सहायता कर दिया करते थे।
वे एक सरल चित्त इनसान थे। चिंतन और आचरण में आश्चर्यजनक साम्य था। जिस प्रकार उनका चिंतन श्रेष्ठ था, उसी के अनुरूप उनके व्यवहार में सात्विकता और उदात्तता थी। वे शुष्क ज्ञान को निरर्थक बताते और कहते थे कि ज्ञान की गरिमा सद् आचरण में है। जो इसका परिपालन करते और प्रकृति के अनुसार जीवनयापन करते है, उनके प्रतिभाओं की कमी नहीं रहती। वे विकसित होती चली जाती है।
मानव जीवन प्रखरता और प्रतिभा का पुँज है। वह प्रकट हुए बिना रह नहीं सकता, पर अनेक बार अस्वाभाविक जीवनक्रम अपना लेने से वह आच्छादित हो जाता है और अप्रकट स्तर का बना रहता है। यदि उक्त आवरण को हटा लिया जाए, छल-कपट, द्वेष-दुर्भाव से दूर रहा जाए एवं जीवन को एकदम अकृत्रिम बना रहने दिया जाए, तो विशिष्टताएँ स्वयमेव प्रतिभासित होने लगती है और चरम विकास तक जा पहुँचती हैं। जहाँ बीज होगा, वहाँ वृक्ष के पनपने की संभावना निरंतर बनी रहती है। यदि उसे उचित माध्यम मिल जाए, तो वह आवरण फोड़कर बाहर निकल आता है। यह साधारण से असाधारण का प्रकटीकरण हुआ। इसकी संभाव्यता मनुष्य में भी बराबर बनी रहती है, पर हम जीवन शैली के नाम पर, प्रगति और सभ्यता के नाम पर इतनी रुकावटें, खड़ी कर लेते हैं कि जो जीवन प्रवाह सहज ढंग से प्रवाहित हो रहा था, वह बाधित हो जाता है। बाधित और अवरुद्ध जीवन में सब कुछ ठप्प बना रहता है, इसीलिए भारतीय मनीषी प्राकृतिक जीवन की सलाह देते हैं, जिसमें प्रकृति की समीपता के साथ-साथ जीवन की सरलता और स्वाभाविकता भी सम्मिलित हो। ऐसी जिंदगी ही सर्वांगीण विकास के अनुकूल है।
प्रकृति को माँ कहा गया है। माँ अपने बेटे को जितना सहज व सरल जीवन जीते देखना चाहती है, वह बात शायद ही किसी अन्य रिश्ते में पाई जाती हो। मनुष्य को चाहिए कि वह उसके इस मनोभाव को समझे और उसके अनुरूप आचरण करे, कृत्रिमता से दूर रहे और सब कुछ स्वाभाविक ढंग से चलने दें। देवमानव बनने का यह बहुत सरल उपाय है।
महाकाल का संदेश
परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर जनकल्याण हेतु साहित्य सृजन किया, उनके तप एवं ज्ञान का निचोड़ उनके साहित्य में है। सभी लोगों तक यह ज्ञानगंगा पहुँचे इसीलिए ‘पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय का प्रकाशन किया गया है। लाखों ने इसे पढ़कर जीवन धन्य बनाया है। हर घर में वाङ्मय की स्थापना होनी चाहिए परिवार के लिए यह अमूल्य धरोहर एवं विरासत है।
यदि आपको भगवान ने श्री संपन्नता दी है, तो ज्ञानवान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वाङ्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। विवाह, जन्मदिवस, एवं अन्य उत्सवों पर अथवा पारितोषिक स्वरूप भी यह साहित्य अमूल्य भेंट सिद्ध होगा। आपका यह ज्ञानवान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा, धन्य होगा। शास्त्रों में कहा हैं-
सर्वेषामेव दानानाँ ब्रह्मदानं विशिष्यते। वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाज्जनसर्पिषाम्॥ -मनुस्मृति 4/233
जल अन्न, गौ, पृथ्वी, वस्त्र, तिल, सुवर्ण और घी, इन सबके दानों में से ज्ञान का दान सबसे उत्तम है।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञास्त्रानयज्ञः परंतप। सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञानें पारिसमाप्यते॥ -गीता 4/44
हे परंतप! द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि जितने भी कर्म हैं, वे सब ज्ञान में ही समाप्त होते है। ज्ञानदान सर्वोपरि पुण्य है, शुभ कार्य है।
रात्रि की स्याह कालिमा घने बादलों एवं धुँध भरे कोहरे से मिलकर वातावरण को किंचित रहस्यमय बना रही थी। हल्की सी बूँदा-बाँदी और सुनसान निर्जनता इस रहस्यमयता में किसी अनजाने भय की सृष्टि कर रही थी। लगता है इस वातावरण का प्रभाव उस व्यक्ति पर था, जो इस समय घोड़े पर बैठा हुआ इस निर्जन क्षेत्र से गुजर रहा था। रह-रहकर उसके समूचे शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ जाती थी। कह नहीं सकते यह सिहरन ठण्ड के कारण थी अथवा भय के कारण या फिर उस पर ठण्ड और भय का ही मिला-जुला असर था। सत्य जो कुछ भी हो, पर अभी उसे अपने घर पहुँचने की जल्दी थी। इसी कारण वह जब-तब घोड़े को एड़ लगाकर उसे तीव्र गति से दौड़ने के लिए प्रेरित कर रहा था।
अभी उसने इस बार एड़ लगायी ही थी कि उसे ऐसा लगा जैसे घोड़े पर ही उसके पीछे बैठे किसी अनजान व्यक्ति ने उसके कन्धे पर हाथ रखा। इस अप्रत्याशित स्पर्श से तेजी से चौंकते और चिंहुकते हुए उसने सोचा कि भला यह कैसे हो सकता है। घोड़े पर तो वह अकेला बैठा है। यह किस तरह से सम्भव है कि कोई व्यक्ति तीव्र गति से दौड़ रहे घोड़े पर अचानक आकर उसके पीछे बैठ जाए और फिर उसके कन्धे पर हाथ रख दे। घबराहट में वह कुछ ज्यादा सोच नहीं सका। बस देह में कंपकंपी सी छूट गयी और कण्ठ सूखने लगा। स्थिति कुछ ज्यादा बिगड़ती, इससे पहले पीछे से भर्राई हुई सी आवाज आई- परेशान होने की जरूरत नहीं है मि. टेबनर विलिय! आप मुझे अपना दोस्त ही समझें।
पर आप हैं कौन? टेबनर विलियम नाम के उस घुड़सवार ने बड़ी मुश्किल से अटकते हुए गले से पूछा। जवाब देने वाले उस अनजान व्यक्ति ने उसे भरसक दिलासा देते हुए कहा- देखिए आप मुझसे कतई भयभीत न होइए। कभी मेरा नाम हैडक जेम्स था। अब तो बस मैं एक प्रेतात्मा हूँ।
प्र....प्र....प्रे....ता..त्मा! हकलाते हुए टेबनर ने जैसे-तैसे इस एक शब्द को कहा। इसी के साथ ऐसा लगा कि घोड़े की लगाम उसके हाथ से छूट जाएगी। तभी पीछे बैठे हुए हैडक जेम्स ने उसे सावधान करते हुए कहा- डरिए मत मि. विलियम और घोड़े की लगाम ठीक से थामिए। मुझे आप अपना मित्र समझिए। मैं बस आपके पास एक काम की आशा लेकर आया हूँ। क्या काम है आपको मुझसे? विलियम ने अपने आप को थोड़ा सम्हालते हुए कहा। इतनी देर में विलियम को यह बात समझ में आ चुकी थी कि यह हैडक जेम्स नाम का व्यक्ति कभी उसका परिचित हुआ करता था। शायद इसी सोच ने उसे थोड़ी आश्वस्ति दी थी।
तभी उसके कानों में हैडक जेम्स की आवाज सुनायी पड़ी, मित्र! मेरी विधवा पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है और उसका पति धोखाधड़ी से उसे लूट रहा है। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी पत्नी को सलाह दो कि वह इस धोखेबाज व्यक्ति से बचने के लिए अदालत की शरण ले और जल्दी उससे अपना पीछा छुड़ाए। यदि उसने ऐसा नहीं किया तो यह धोखेबाज आदमी उसे पूरी तरह से बर्बाद कर देगा। अपने इस कथन का उपसंहार करते हुए हैडक जेम्स ने बड़े ही करुणार्द्र स्वर में कहा- तुम तो जानते ही हो कि मैं अपने जीवन काल में अपनी पत्नी से कितना प्रेम करता था। उसके प्रति मेरा यह प्रेम मरने के बाद भी कम नहीं हुआ है। इस तरह उसे बर्बाद होते हुए देख मेरी आत्मा बेहद कष्ट अनुभव कर रही है। एक तुम्हीं हो जो मुझे कष्ट से मुक्त कर सकते हो।
इस अजीबोगरीब घटना क्रम ने टेबनर विलियम को बड़ी उलझन में डाल दिया। उसे समझ में ही नहीं आया कि वह क्या करे? उधेड़-बुन के इन क्षणों में बस फादर जैरमी टेरल उसे प्रकाश किरण के रूप में नजर आए। फादर जैरमी के सन्त स्वभाव एवं उनके उच्चस्तरीय मानवीय गणों से वह पिछले काफी समय से न केवल परिचित, बल्कि प्रभावित भी था। उसे लगा कि ऐसे विकट मौके पर वही कोई उचित परामर्श दे सकते हैं। यही सोचकर वह उस अंधेरी काली स्याह रात्रि में घर न जाकर सीधे चर्च गया। और फादर के द्वार पर दस्तक दी।
इतनी घनी रात में, वह भी इस विकट मौसम में दी गयी इस दस्तक ने फादर जैरमी को सोच में डाल दिया। इस विचित्र सी घटना के समय काल चक्र आज की इक्कीसवीं सदी में नहीं बल्कि सत्रहवीं सदी में घूम रहा था। उस समय तक विज्ञान ने अपने चमत्कार दिखाने नहीं शुरू किए थे। विश्व मानचित्र में आज सम्मोहक समझा जाने वाला इंग्लैण्ड का यह शहर लन्दन उस समय विद्युत् के प्रकाश के सामान्य वरदान से भी वंचित था। विलियम की दस्तक के आवाज से जाग्रत् हुए फादर जैरमी ने द्वार खोलने के पहले मोमबत्ती जलाई और द्वार खोल कर धीरे से विलियम की ओर एक नजर देखकर उसे अन्दर आने के लिए कहा।
फादर जैरमी के कक्ष के अन्दर प्रवेश करते ही टेबनर विलियम ने एक साँस में अपनी सारी कथा कह सुनायी। कुछ ही देर पहले घटे घटनाचक्र का ब्योरा देते समय टेबनर के चेहरे पर आश्चर्य, भय एवं बदहवासी के भाव थे। फादर ने उसे सान्त्वना देते हुए कहा, प्रेत उस आत्मा का नाम है, जिसका शरीर तो उससे अलग हो गया है, मगर मन अलग नहीं हुआ है। मन के लिए देह जरूरी है। क्योंकि इसके बिना मन की वासनाओं, चाहतों की पूर्ति सम्भव नहीं है। मन की चाहतें शरीर से ही तो तृप्त होती हैं। शरीर के अभाव में उसकी स्थिति बड़ी कष्टप्रद हो जाती है। यह कहते हुए फादर ने एक क्षण रुककर विलियम की ओर देखा। मोमबत्ती के मद्धम प्रकाश में उसके चेहरे पर भय की कालिमा साफ नजर आ रही थी।
उसकी मानसिक स्थिति को भाँपते हुए फादर जैरमी ने कहा- प्रेम अपने आप में बहुत दुःखी आत्माएँ होती हैं। अब तुम अभी जिस हैडक जेम्स की बात कर रहे हो, वह मरने के बाद भी पत्नी की चिन्ता से पीड़ित है। हो सके तो उसकी मदद करो। जैसा उसने कहा है, वैसा तुम उसकी पत्नी को बता दो। इससे जेम्स की आत्मा को थोड़ा सुकून मिलेगा। और किसी को भी सुकून देना ईश्वर भक्त का कर्त्तव्य है। इसी के साथ फादर ने उससे कुछ और सान्त्वनाजनक बातें कहीं। जिससे उसके मन की बेचैनी शान्त हुई और वह अपने घर की ओर चल पड़ा।
घर पहुँचने के बाद भी उसके काफी दिन ऊहा-पोह में बीते। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे और किस तरह जेम्स की पत्नी से उसके नए पति के बारे में ये बातें कहे। रोज सोच-विचार कर जेम्स की पत्नी से मिलने की सोचता, परन्तु फिर मन हार जाता। इसी तरह मन की कशमकश में छः महीने बीत गए। तब फिर एक दिन हैडक जेम्स की आत्मा ने टेबनर विलियम को आ घेरा और उसे अपना वादा याद दिलाया। विलियम ने एक बार पुनः फादर जैरमी से संपर्क किया। उन्होंने भी यही सलाह दी कि उसे जेम्स की आत्मा को सुकून पहुँचाने वाला यह कार्य करना चाहिए।
अब की बार फादर के मशविरे को मानकर टेबनर विलियम ने जेम्स के युवा पुत्र से सारी बातें साफ-साफ कही। उत्तर में जेम्स के पुत्र ने कहा, मुझे आपकी बातों में सच्चाई की सुगन्ध आ रही है। और उसने अपने पिता की मृतात्मा की सलाह के अनुसार सौतेले पिता डेविस पर मुकदमा कर दिया। इसके प्रत्युत्तर में डेविस ने अदालत से अपील की कि वह निर्दोष है। और उसकी निर्दोषिता का सबसे बड़ा सबूत यह है कि उसके खिलाफ कोई गवाह नहीं है। डेविस के इस कथन के आधार पर अदालत ने यह फरमान जारी किया कि मुकदमा दायर करने वाले पक्ष को अदालत के सामने उपयुक्त साक्ष्य उपस्थित करने होंगे। अन्यथा यह मुकदमा निरस्त माना जाएगा।
इस नयी स्थिति पर टेबनर एक बार फिर घबरा गया। फिर कुछ सोचकर उसने कहा, मैं इस मामले में खुद हैडक जेम्स को बुलाऊंगा। और मुझे पूरा यकीन है कि हैडक निश्चित रूप से इस अदालत में उपस्थित होकर अपनी बात की सत्यता प्रमाणित करेंगे। टेबनर ने जिस आत्मविश्वास से यह बात कही, उससे थोड़ी देर के लिए तो अदालत के जज और जूरी भी हतप्रभ रह गए। वहाँ उपस्थित अन्य जनों को तो चौंकना ही था। सभी को हैरानी थी कि भला एक मृत व्यक्ति किस तरह से अदालत में उपस्थित होकर गवाही देगा। डेविस भी इस स्थिति से सोच में पड़ गया। पर अभी भी वह आश्वस्त था, कि भला कहीं मरे हुए लोग भी गवाही देने के लिए हाजिर होते हैं।
जज के द्वारा निर्धारित की गयी तिथि पर इस अभूतपूर्व एवं विचित्र मुकदमें की कार्यवाही शुरू हुई। सारा शहर इस कार्यवाही को देखने के लिए उमड़ पड़ा। पेशकार की अनुमति से अर्दली ने हैडक जेम्स को गवाही देने के लिए आवाज लगाई। अर्दली द्वारा जेम्स को गवाही के लिए पुकारते ही जैसे समूची अदालत का वातावरण परिवर्तित हो गया। कक्ष में यकायक तेजी से बिजली की की कड़क गज उठी। और जज सहित सभी ने जज की टेबल पर एक धुँधली सी छाया को हाथ का मुक्का मारते हुए सुना और देखा। यह दृश्य एक बार-दो बार नहीं तीन बार दुहराया गया।
इस दृश्य से हतप्रभ और हैरान जज के मुख से अपने आप ही निकल पड़ा, भला इससे ज्यादा प्रमाणिक, भरोसेमन्द और विश्वास योग्य गवाही और क्या हो सकती है? डेविस के खिलाफ हैडक जेम्स की आत्मा की गवाही सबसे पुख्ता प्रमाण है। जज के इस कथन के पश्चात् डेविस ने भी भरी अदालत में अपने जुर्म को मान लिया। उसे अदालत के आदेश के अनुसार मुकदमे में तयशुदा राशि हैडक जेम्स की पत्नी और पुत्र को चुकानी पड़ी। यह विचित्र मुकदमा समूचे इंग्लैण्ड में वर्षों तक चर्चा का विषय बना रहा। फादर जैरमी टेलर की डायरी के पृष्ठो का प्रकाशन आज भी इस आध्यात्मिक सत्य को प्रमाणित करता है कि मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्त्व है।
वस्तुओं का पूरा सदुपयोग करने की आदत डालें!
बापू का उस दिन मौन व्रत था। वे प्रातःकाल आश्रम के बच्चों को साथ लेकर टहलने गए।
रास्ते में एक तीन इंच लंबा सुई का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया। गांधी जी ने एक छोटी लड़की से उसे उठा लेने का इशारा किया।
लड़की ने उठा तो लिया, पर उलट-पुलटकर देखने पर उसे निरर्थक पाया और आगे चलकर फेंक दिया।
शाम को मौन टूटा, तो गांधी जी ने लड़की से वह टुकड़ा माँगा, पर वह तो उसे निरर्थक समझकर फेंक चुकी थी। गांधी जी नाराज हुए और ढूंढ लाने के लिए उसे भेजा।
टुकड़ा मिल गया। उसे साफ करके गांधी जी ने उससे सूत काता और कहा, वस्तुओं का पूरा सदुपयोग करने की आदत सभी को डालनी चाहिए, बरबादी तनिक भी न करें।
कर्मफल का सिद्धांत
चित्रगुप्त अपनी पोथी के पृष्ठों को उलट रहे थे। यमदूतों द्वारा आज दो व्यक्तियों को उनके सम्मुख पेश किया गया था। यमदूतों ने प्रथम व्यक्ति का परिचय कराते हुए कहा, यह नगर सेठ है। धन की कोई कमी इनके यहाँ नहीं। खूब पैसा कमाया है और समाजहित के लिए धर्मशाला, मंदिर, कुआँ और विद्यालय जैसे अनेक निर्माण कार्यों में उसका व्यय किया है। अब दूसरे व्यक्ति की बारी थी। उसे यमदूत ने आगे बढ़ाते हुए कहा, यह व्यक्ति बहुत गरीब है। दो समय का भोजन जुटाना भी इसके लिए मुश्किल है। एक दिन जब ये भोजन कर रहे थे, एक भूखा कुत्ता इनके पास आया। इन्होंने स्वयं भोजन न कर सारी रोटियाँ कुत्ते को दे दी। स्वयं भूखे रहकर दूसरे की क्षुधा शांत की। अब आप ही बतलाइए कि इन दोनों के लिए क्या आज्ञा है? चित्रगुप्त काफी देर तक पोथी के पृष्ठों पर आँखें गड़ाए रहे। उन्होंने बड़ी गंभीरता के साथ कहा— "धनी व्यक्ति को नरक में और निर्धन व्यक्ति को स्वर्ग में भेजा जाए।"
चित्रगुप्त के इस निर्णय को सुनकर यमराज और दोनों आगंतुक भी आश्चर्य में पड़ गए। चित्रगुप्त ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा— "धनी व्यक्ति ने निर्धनों और असहायों का बुरी तरह शोषण किया है। उनकी विवशताओं का दुरुपयोग किया है और उस पैसे से ऐश और आराम का जीवन व्यतीत किया। यदि बचे हुए धन का एक अंश लोकेषणा की पूर्ति हेतु व्यय कर भी दिया, तो उसमें लोकहित का कौन-सा कार्य हुआ? निर्माण कार्यों की पीछे यह भावना कार्य कर रही थी कि लोग मेरी प्रशंसा करें, मेरा यश गाएँ। गरीब ने पसीना बहाकर जो कमाई की, उस रोटी को भी समय आने पर भूखे कुत्ते के लिए छोड़ दी। यह साधन संपन्न होता, तो न जानें कितने अभावग्रस्त लोगों की कितनी सहायता करता? पाप और पुण्य का संबंध मानवीय भावनाओं से हैं, क्रियाओं से नहीं। अतः मेरे द्वारा पूर्व में दिया गया निर्णय ही अंतिम हैं। सबके मन का समाधान हो गया।"
अपवादों को यदि छोड़ दें, तो व्यक्ति में रूपांतरण की जो घटना घटती है, उसके दो ही प्रमुख माध्यम हो सकते हैं- स्वाध्याय और सत्संग। स्वाध्याय से सत्प्रेरणा मिलती है और सत्संग से सद्भावना पुष्ट होती है। जब ये आचरण में उतरती हैं, तो परिवर्तन सामने आता है, एक ऐसा परिवर्तन, जो सतत प्रवहमान रहे, तो मानव को महामानव और समाज को स्वर्ग बना देता है।
उदात्तीकरण का यह सामान्य सिद्धांत हुआ। सिद्धांत और प्रक्रिया दो भिन्न बातें हैं। सिद्धांत संभावना प्रकट करता है और उसे साकार करने की विधि प्रक्रिया है। प्रथम यदि द्वितीय में परिवर्तित न हो सके, तो थ्योरी सही होते हुए भी अभीष्ट की उपलब्धि न हो सकेगी। पुस्तक और प्रवचन हमें रास्ता दिखाते हैं और संभावना व्यक्त करते हैं कि यदि व्यक्ति को अच्छा वातावरण मिले, तो वह उत्कृष्ट बन सकता है। यह सिद्धांत मात्र है। इसे क्रिया रूप में बदले बिना परिवर्तन शक्य नहीं। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, तो रूपांतरण घटित होता है, फलस्वरूप व्यक्ति एवं समाज का अभिनव रूप सामने आता हैं।
इसी आशय का मंतव्य प्रकट करते हुए जे कृष्णमूर्ति कहते है कि श्रवण और अध्ययन आनंददायक तो होते हैं, पर परिवर्तन में इनकी भूमिका गणितीय सवालों को हल करने वाले सूत्रों जितनी ही होती है। सूत्र केवल संकेत मात्र होते हैं। विद्यार्थियों को इनके आधार पर अपनी अक्ल लगानी पड़ती है तभी प्रश्न का सही उत्तर मिल पाता हैं। ऐसे ही स्वाध्याय और सान्निध्य परिवर्तन की अनुकूलता तो उपलब्ध कराते हैं, पर इतना ही पर्याप्त नहीं हैं, अंतस् की हलचल और उथल पुथल भी अभीष्ट आवश्यक है। जहाँ इस प्रकार की क्रियाएँ नहीं होती, वहाँ परिवर्तन की प्रतिक्रिया भी दृष्टिगोचर नहीं होती।
एक उदाहरण से वे और भी अच्छे ढंग से स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति से दिन में अनेक बार अनेक लोग कहते हैं कि तुम बीमार जैसे लग रहे हो, तो शाम होते होते वह निश्चित रूप से अस्वस्थ हो जात है, कारण कि यह वाक्य उसके अंदर उद्दीपन आरंभ कर देता है। क्रिया चल पड़ती है, तो उसकी परिणति अस्वस्थता के रूप में तुरंत सामने आती है। वे लिखते है कि स्वाध्याय और सत्संग की वे अच्छी बातें अप्रभावी सिर्फ इसलिए सिद्ध होती है कि वे अंतराल की गहराई में उतरकर उस बिंदु को नहीं छू पातीं, जो बदलाव उत्पन्न करता है। यदि इस संदर्भ में अध्येता और श्रोता गंभीर बने रहें और पढ़े अथवा सुने हुए प्रसंग के प्रति इतनी संवेदनशीलता उत्पन्न कर सकें कि वे अंदर चलकर सीधे मर्म में आघात करें, तो रूपांतरण तत्क्षण घटित होना आरंभ हो जाएगा।
इसकी प्रक्रिया दो प्रकार से होती हैं- एक तो संदेश के प्रति इतना आकर्षण उत्पन्न किया जाए कि वह अंतस्तल में धँसकर बदलाव पैदा कर दे। इसके दूसरे प्रकार में खिंचाव तो होता है, पर उसका चुँबकत्व उतना प्रबल नहीं होता कि वह अवचेतन में आविर्भूत हो सके। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को चेतन स्तर पर स्वयं प्रयास आरंभ करना पड़ता है। अपनी वासना और तृष्णा को बलपूर्वक दबाना और जो श्रेष्ठ तथा सुँदर है, उसे विकसित करना पड़ता है। इतना कर लेने मात्र से ही व्यक्ति का कायाकल्प हो जात है, उसका भीतरी दैत्य मर जाता है और उसकी जगह देव पैदा होता है। यही क्राँति है। इसे संपादित कर लेने वाला व्यक्ति महान और समाज गुणवान बन जाता है।
विवेकानंद ने एक बार अपने व्याख्यान में कहा था, “युवकों, तुम महान बनना चाहते हो, तो महानता को अपने भीतर घटित होने दो, श्रेष्ठता को अंतःकरण में प्रवेश पाने दो, हृदय कपाट को अनावृत्त रखो, ताकि इस संसार में जो कुछ उदात्त और उच्चस्तरीय है, वह तुममें आत्मसात् हो सके। याद रखो, मात्र शब्दों को श्रवण तंत्र से सुन भर लेने से विशेष कुछ न होगा, जो होगा, वह इतना ही कि तुम कष्ट कठिनाइयों को भूलकर थोड़े समय के लिए शाँति के समुद्र में डूब जाओगे, पर स्वयं शाश्वत शाँति का सागर न बन सकोगे। वह गहराई और गंभीरता पैदा न हो सकेगी, जो ये महासागर अपने में संजोए है। यह मत भूलो कि आने वाली पीढ़ियों के तुम भाग्य विधाता हो, भविष्य निर्माता हो। उज्ज्वल समाज का निर्माण वही कर सकता है। जो आत्मनिर्माण कर चुका हो। अतः इस व्याख्यान को अपने में उतर जाने दो, सिर्फ शब्दों से नहीं, वाक्यों से नहीं, वरन् भावों और क्रियाओं से।”
सचमुच शब्द और संदेश जब तक कार्यरूप में न परिणत हो जाएँ, कर्ता के लिए निरर्थक और निरुद्देश्य हैं। सार्थक वे तभी बनते हैं, जब आचरण में उतरें और दूसरों को अनुकरणीय प्रेरणा दें, अन्यथा बुद्धि विलास मात्र बनकर रह जाएँगे। किसी ने कही कोई अच्छी बात सुनी या पढ़ी तो उसे वह अपनी बुद्धि में, मस्तिष्क में कैद कर लेता हैं और दूसरों को सुनाता रहता है। फिर वह क्रिया न बनकर ज्ञान का, अध्ययन का, श्रवण का, स्मरण का विषय बन जाती हैं। इसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग यही हो सकता है कि उसे हम वाणी बना लेते हैं, जबकि जीवन बनना चाहिए और अच्छाई यदि जीवन न बनी, तो अच्छी बातें पढ़ने सुनने का कोई अर्थ और उद्देश्य नहीं रह जाता, इसलिए मूर्द्धन्य मनीषी गुरजिएफ कहा करते थे कि उत्तम बातों के प्रति अभिरुचि जगाओ, उत्कंठा बढ़ाओ, उन्हें सुनो और सुनाओ, पर कही मत रुक जाओ। इतना पर्याप्त नहीं हैं। यह विचार मात्र है। इससे आगे का चरण अनुभव है। विचार से अनुभव की ओर यात्रा करके ही जानकारी को जीवन बनाया जा सकता है, उसे जिया जा सकता है। जहाँ जानकारी जीवन बन जाती है, वही श्रेष्ठता घटित होती है और रूपांतरण का प्रवर्तन होता है। इन दिनों चूँकि चिंतन से अनुभूति की ओर का प्रयाण मनुष्य में रुका हुआ है, इसलिए प्रत्यक्ष में स्वाध्याय और सत्संग की नियमित दिनचर्या दिखलाई पड़ने पर भी उनकी वह परिणति सामने नहीं आती, जो आनी चाहिए।
दुनिया में अच्छी बातों और विचारों का अभाव है। सो बात नहीं। अभाव है, तो मात्र ग्रहणशील हृदय का सुग्राहक मन यदि आदमी के पास हो, तो बुराई में भी अच्छाई ढूंढ़ी, और आत्मसात की जा सकती है, किंतु जहाँ हृदयंगम करने वाली गहराई ही न हो, वहाँ लाख प्रवचन सुनने और पारायण करने की प्रवृत्ति मनोरंजन जितना उथला प्रयोजन ही पूरा करती है। ऐसी दशा में साधारणजन अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए अनेक प्रकार के बहाने गढ़ते और तर्क देते हैं। कहते है कि प्रभावशाली व्यक्तित्व के अभाव में ही सर्वसाधारण पर उसका प्रभाव नहीं पड़ सका। यह सच है कि उत्कृष्ट व्यक्तित्व का अपना पृथक प्रभाव होता है, पर बात यदि श्रेष्ठ है, तो वह कोई भी कहे, उसे अपनाने में अनख क्यों? इससे क्या फर्क पड़ता है। कि कहने वाला निपट निरक्षर है या कोई ज्ञानी विद्वान। अच्छाई कही से भी मिले, वह ग्रहण योग्य है, पर ऐसा होता नहीं है और इसका संपूर्ण दोष अपनी मनस्विता को न देकर वक्ता की ओर उछाल दिया जाता है। यह कैसी विडंबना है? यह तो ‘नाच न जाने आँगन टेढ़ा’ वाली लोकोक्ति जैसी बात हुई। सचाई तो यह है कि मनस्वी व्यक्ति ही स्वयं को बदल पाने और महानता की ओर ले जाने में सफल होते हैं। शेष अमनस्वी समुदाय के लिए सान्निध्य- श्रवण सुनने और भूलने से बढ़कर और कुछ भी नहीं है। इस प्रकार लंबे समय का उनका ज्ञान ग्रहण बेकार चला जाता है। इससे स्पष्ट है कि ग्रहण करने की अभीप्सा की अनुपस्थिति और ग्राह्य के प्रति उपेक्षा भाव ही वे कारण हैं, जो ज्ञान को व्यवहार में नहीं उतरने देते। जब पशु पक्षियों से शिक्षा ग्रहण कर दत्तात्रेय अनुपलब्ध की उपलब्धि कर सकते हैं, तो मनुष्य द्वार बतलाई गई उत्तम बात को धारण करने में किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए? यह समझ से परे हैं।
विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि यदि लोहे को सोना और सीसे को चाँदी बनाना हो, तो एक ही कार्य करना पड़ेगा, उनकी परमाणु संख्या को परिवर्तित करना पड़ेगा। किसी प्रकार लोहे और सीसे को क्रमशः सोने और चाँदी वाली परमाणु संख्या प्रदान की जा सके, तो उनका रूपांतरण संभव है, पर यह सब कैसे किया जाए? इसकी प्रक्रिया उनके हाथ अभी नहीं लगी है। उनने मात्र अभी सिद्धांत दिया है, किन्तु केवल सिद्धांत से बदलाव संभव नहीं। इसके लिए प्रक्रिया का होना निताँत आवश्यक है। व्यक्तित्व निर्माण में पुस्तकों और प्रवचनों की ऐसी ही भूमिका है। वे मार्गदर्शन भर करते है। उनके आधार पर पुरुषार्थ स्वयं करना पड़ता है। यह प्रक्रिया है। प्रक्रिया यदि अप्रतिहत चल पड़े, तो साधारण से असाधारण बन जाना कठिन नहीं। फिर समाज को स्वर्ग बनते देर न लगेगी।
घर्र.....घरर.......घर्र..... की आवाज के साथ बढ़ता आ रहा भगवान् जगन्नाथ का रथ एक टूटी-फूटी मजार के सामने खीं...खच करके रुक गया। शत सहस्र व्यक्ति प्रभु के उस महारथ को खींच रहे थे। ढोल-मृदंग आदि विभिन्न वाद्ययन्त्रों के साथ भगवन्नाम कीर्तन ध्वनि समूचे वातावरण में गुँजायमान थी। भजन-कीर्तन एवं भगवान् जगन्नाथ की जय-जयकार के साथ बढ़ता हुआ रथ अचानक क्यों रुक गया? किसी को कुछ समझ में न आया। अनेकों ने अनेक तरह के उपाय किए रथ के पहियों-कलपुर्जों सहित मार्ग की पूरी तरह से छान-बीन की। किसी को कहीं भी किसी तरह अवरोध नजर नहीं आया। पुरी के राजा स्वयं रथ की रस्सी थामे थे। उन्होंने भी अनेक जतन कर लिए। पर भगवान् का रथ टस से मस नहीं हुआ। बहिन सुभद्रा एवं भ्राता बलभद्र सहित भगवान् जगन्नाथ न जाने क्यों उस स्थान पर रुके हुए थे।
सर्वेश्वर प्रभु का महारथ अचानक यहाँ क्यों रुक गया है? इस प्रश्न का उत्तर सभी जोर-शोर से खोज रहे थे। कइयों ने कई तरह के कायास लगाए। कुछ भक्तों ने सभी को जोर-जोर से नाम कीर्तन करने की सलाह दी। पर परिणाम कुछ भी न निकला। तभी एक भक्त को जैसे कोई भूली-बिसरी बात याद आयी। उसने पुरी के महाराज के कान में कुछ कहा। महाराज ने भी कुछ क्षण सोचने के बाद सहमति में सिर हिलाया। और उन्होंने महाभक्त सालबेग की जय का घोष किया। महाराज के कण्ठ से उच्चारित इस जय ध्वनि के साथ दूसरे सहस्र कण्ठों से भी भगवद्भक्त सालबेग की जय-जयकार होने लगी। अपने परम प्रिय भक्त की जय-जयकार सुनकर सम्पूर्ण जगत् के स्वामी भगवान् जगन्नाथ की मूर्ति जैसे मुस्कराई। प्रभु की इस लीला पर बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियाँ भी विहंस उठी। इसी के साथ भगवान् का महारथ भी घरर..... घर्र की ध्वनि के साथ गुँडिबा देवी के मन्दिर की ओर अनायास बढ़ चला।
प्रभु के रथ को आगे बढ़ते हुए देख पुरी के महाराज ने सन्तोष की साँस ली। भगवद्भक्तों के मन भी हर्षित हो उठे। साथ ही रथयात्रा के साथ चले रहे भक्तों के बीच महाभक्त सालबेग की चर्चा भी चल पड़ी। सालबेग के परम लोकप्रिय भजनों के कारण उनके नाम से तो उड़ीसा का जन-जन परिचित था। पर उनकी जीवनगाथा से कम ही लोग वाकिफ थे। भक्तों के अनुरोध पर एक वृद्ध पुजारी ने बताना शुरू किया- ‘तब हिन्दुस्तान में मुगल बादशाह जहाँगीर की हुकूमत थी। उसने अपने नाम से मिलते-जुलते नाम वाले जहाँगीर कुरीखान उर्फ लालबेग को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया था। उड़ीसा की सम्पूर्ण क्षेत्र भी बंगाल की सूबेदारी का हिस्सा बन चुका था।’ पुजारी जी बता रहे थे कि हालाँकि उड़ीसा पर उस समय गजपतवंश के राजाओं का शासन था। पर इस वंश के अंतिम नरेश लालबेग की बहादुरी, चतुराई एवं उसकी विशालकाय सेना के सामने ठहर न सके। परिणामस्वरूप उड़ीसा की भागवत् भूमि बंगाल की सूबेदारी में समा गयी।
लालबेग ही उड़ीसा का सारा कर्त्ता-धर्ता बन बैठा। शासक होने के कारण उसका उड़ीसा में आना-जाना लगा रहता था। ऐसे ही एक बार जब लालबेग बंगाल से पुरी जा रहा था तो पुरी के पास दाँड मुकुँदपुर गाँव में उसकी नजर एक विधवा ब्राह्मणी पर पड़ी। वह ब्राह्मणी विधवा अत्यन्त ही रूप एवं सौंदर्य की धनी थी। सत्ता और वासना के मद में चूर लालबेग ने उसे उठवा लिया। बेचारी विधवा उस दुर्दान्त-दुराचारी के सामने क्या करती। लालबेग ने कटक पहुँचकर जबर्दस्ती उससे शादी कर ली। इसी विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से सन् 1608 ईसवी में सालबेग का जन्म हुआ। सालबेग जब 12-13 साल का था, तब लालबेग उसे दिल्ली ले गया। वहीं पर सालबेग को युद्धकला की शिक्षा मिली। युद्धकला में सालबेग अतिनिपुण हो गया। यहाँ तक कि विभिन्न युद्धों में उसके युद्ध-कौशल एवं पराक्रम को देखकर हिन्दुस्तान का शहंशाह भी दंग रह गया। और उसने युवा सालबेग को एक बड़ी सेना का सिपहसालार बना दिया।
सालबेग भी सत्ता एवं यौवन के मद में झूम उठा। परन्तु शायद सर्वगर्वापहारी भगवान् जगन्नाथ उसे अपने पास बुलाना चाहते थे। इसी कारण एक युद्ध में सालबेग के सिर पर ऐसा घाव हो गया, जिसे कोई भी हकीम या जर्राह ठीक न कर सका। न चाहते हुए भी उसे अपनी माँ के पास पुरी लौटना पड़ा। कभी सिपहसालार रहा सालबेग उन दिनों सभी से उपेक्षित था। अपने पुत्र को इस तरह दुःखी, पीड़ित एवं विपन्न देखकर उस ब्राह्मणी ने उससे कहा- पुत्र! यदि तू मेरी बात माने तो मैं कुछ कहूँ। माँ की ममता का अलौकिक स्पर्श पाकर सिसकते हुए सालबेग ने कहा- माँ तू कह तो सही, तू जो कहेगी, मैं वही करूंगा। तब बेटा, तू सारे कपट छोड़कर, सम्पूर्ण विश्वास के साथ भगवान् जगन्नाथ के चरणों का आश्रय ले। वे तेरा सब कष्ट दूर करेंगे।
माँ की बातों पर समूचे मन से विश्वास करके सालबेग प्रभु के विभिन्न नामों का जप करने लगा। प्रभु प्रार्थना एवं नाम-जप में उसके दिन बीतने लगे। इस तरह एक-एक करके बारह दिन बीत गए। जब बारहवाँ दिन बीत गया, तब उसी रात्रि को सालबेग ने देखा कि भगवान् जगन्नाथ उसके सामने बालमुकुन्द वेश में खड़े हैं। और उससे कह रहे हैं- ले सालबेग! ले तू यह विभूति अपने घाव पर लगा ले। तेरे सारे कष्ट अब दूर हो जाएँगे। निद्रा में ही सालबेग ने वह विभूति लेकर अपने मस्तक और शरीर पर लगा ली। सहसा प्रभु की वह मूर्ति अदृश्य हो गयी। साथ ही सालबेग की निद्रा भी टूट गयी।
जागते ही सालबेग अपने को सम्पूर्ण रूप से स्वस्थ पाकर खुशी से चिल्ला उठा- अरे माँ! देख, तेरे करुणामय जगन्नाथ ने मेरा घाव ठीक कर दिया। उन्होंने मेरे सब कष्ट दूर कर दिए। माता भी अपने पुत्र को स्वस्थ देखकर प्रसन्न हो गयी। उसने भक्तिभाव से भगवान् को प्रणाम किया और कहने लगी- बेटा! जगन्नाथ मेरे ही नहीं तेरे भी हैं। अरे, वे तो सारे जगत् के हैं। तू ठीक कहती है माँ, अब से मैं सारा जीवन उन्हीं सर्वेश्वर की सेवा में लगाऊँगा। इसी के बाद सालबेग भगवान् जगन्नाथ की भक्ति में लीन हो गया। चूँकि मन्दिर में उसके लिए प्रवेश वर्जित था। इसलिए वह मन्दिर के बाहर बैठ कर भजन गाने लगा।
उसने उड़िया भाषा में 121 भजनों की माला पिरोकर भगवान् को समर्पित की। उसके ये भजन भक्ति संवेदना से इतने ओत-प्रोत थे, कि देखते-देखते सभी उड़ीसा वासी उसके भजनों को गाने लगे। सालबेग को भगवान् जगन्नाथ के अनन्य भक्तों में गिना जाने लगा। लेकिन फिर भी उस पर मन्दिर में प्रवेश की पाबन्दी बरकरार रही। भगवान् जगन्नाथ के भजन लिखते-गाते एक दिन सालबेग की मौत हो गयी। और जगन्नाथ मन्दिर से गुँडिबा मन्दिर के रास्ते में उसे दफना दिया गया। जब तक वह जीवित था, तब तक वह स्वयं दूर से प्रभु के रथयात्रा को देखा करता था। सुना जाता है कि मरने से पूर्व उसने कहा था कि यदि मेरी भक्ति सच्ची है तो मेरे मरने के बाद भगवान् स्वयं मेरी मजार पर दर्शन देने के लिए रुका करेंगे। और आज भगवान् ने सचमुच ही अपने भक्त की टेक रख ली। पुजारी द्वारा कही गयी यह भक्त गाथा सुनकर पुरी के महाराज भावविह्वल होकर बोल पड़े- भगवान् किसी हिन्दू या मुसलमान के नहीं वे तो भक्तों के होते हैं। इसी तरह धर्म भी किसी जाति विशेष का नहीं, वह तो सबका है, सनातन और शाश्वत है।
इस घटना को सैकड़ों साल बीत चुके हैं। पर तब से लेकर आज तक भक्तवत्सल जगन्नाथ का रथ हर साल अपने मन्दिर से अपनी मौसी गुँडिबा देवी के मन्दिर जाते हुए बीच में सालबेग की मजार पर रुकता है। अब तो इस स्थान पर एक मन्दिर भी बन गया है, जिसे श्रद्धाबलि मन्दिर कहा जाता है। अभी भी यहाँ सालबेग के ये स्वर तरंगित होते हैं-
बाप मो मुगल पुअ, माँ मो ब्राह्मणी एक कुले जन्मिले हिन्दु न खाए पाणी कहे सालबेग, जाति रे जबन श्री रंगा चरणे करछी प्रणाम।
अर्थात्- पिता मेरे मुगल पुत्र, माँ मेरी ब्राह्मणी, ऐसे कुल में पैदा हुआ, जिसका पानी भी हिन्दू नहीं पीते, हीन जाति का यवन सालबेग यह कहता है (और) श्री रंग चरणों में प्रणाम करता है।
सन् 2002 भारतीय संसद का स्वर्ण जयन्ती वर्ष है। हालाँकि यह अलग बात है कि संसद की इस पचासवीं सालगिरह पर स्वयं साँसदों के मन में अपने कर्त्तव्य के प्रति कोई विशेष उत्साह अथवा राष्ट्रबोध नहीं नजर आ रहा है। वे पिछले वर्षों की ही भाँति जोड़-तोड़ के नए-नए दाँव-पेंच ढूंढ़ने में लगे हैं। उनका आचरण भी प्रायः मर्यादा उल्लंघन के नित्य-नवीन मानदण्ड रच रहा है। इस सबके बावजूद इतिहास का सच शाश्वत है। और वह यही है कि 1947 में ब्रिटिश साम्राज्य की समाप्ति के बाद पण्डित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में भारत की अंतरिम सरकार बनी। वर्ष 1950 में देश का राष्ट्रीय संविधान बना और इसके बाद 1952 में पहले आम चुनाव हुए। और इसी वर्ष स्वतन्त्र भारत की पहली संसद का गठन हुआ। जो सन् 2002 में अपनी पचास साल पूरे कर रही है।
आज से पचास साल पहले प्रथम संसद के गठन के समय देश के आम नागरिक की आँखों में अनेकों सपने थे। उसके लिए आजादी अनगिनत आशाओं और अरमानों को लेकर आयी थी। अंग्रेजों की हुकूमत के दौरान दमन के जो दुष्चक्र उसने झेले थे, उससे छुटकारा मिला था। बहुतेरे सुनहरे सपने भारतीय जनता ने अपने दिलों में आजाद भारत और उसकी संसद के भविष्य के बारे में संजोये थे। यह कहते और लिखते हुए पीड़ा तो होती है, पर यह सच है कि इस स्वर्ण जयन्ती वर्ष के आते तक वे सपने टूटने-बिखरने और खोने लगे हैं। भारत की जनता की आँखों में फिर से एक सूनापन व्यापता जा रहा है। समझ में नहीं आ रहा है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है- हमारी संसदीय प्रणाली अथवा फिर वे साँसद, जिन्हें हम ही चुनकर संसद में भेजते हैं?
पचास वर्षों का कालखण्ड यद्यपि एक देश के जीवन में बहुत लम्बा नहीं कहा जा सकता। खास तौर पर तब जबकि वह देश भारत हो, जिसका इतिहास हजारों साल पुराना है। लेकिन समूचा प्रौद्योगिकी के वर्तमान युग में ये पचास साल काफी ज्यादा लगते हैं। भारतीय संसदीय जीवन के इन वर्षों का यदि संक्षेप में हिसाब-किताब किया जाय तो, इसके तीन भाग किए जा सकते हैं। इसमें से पहले भाग के अधिपति पं. नेहरू हैं। 1947 से लेकर 1964 तक जवाहरलाल जी न केवल देश के प्रधानमंत्री रहे, बल्कि भारतीय लोकतंत्र एवं इसकी प्रतीक संसद भी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रही। दूसरे दौर में यदि स्व. लालबहादुर शास्त्री के कार्यकाल की स्वल्प अवधि छोड़ दी जाय तो यह दौर प्रायः काँग्रेसी शासन की सत्ता पर पकड़ का रहा। इसी समय में संसदीय मर्यादाओं और वर्जनाओं के टूटने की शुरुआत हुई। शासन सेवा के लिए नहीं बल्कि सत्ता सुख भोगने के लिए- की संस्कृति इसी दौर में विकसित हुई। तीसरा और अन्तिम कालखण्ड संसद का वर्तमान युग है, जो परस्पर अविश्वसनीयता एवं निराशा का युग है। देश की जनता बहुत कुछ अंशों में अपने साँसदों एवं उनकी गतिविधियों से निराश हो चली है।
पिछले पचास सालों में यह स्थिति क्यों और कैसे आयी? यह एक विचारणीय सवाल है। क्या संसद सदस्यों का संसद के भीतर आचरण असंयत एवं अमर्यादित इसलिए है, क्योंकि उनके लिए कोई आचार संहिता नहीं बनायी गयी थी? लेकिन क्या आचार संहिता बनाने भर से उसका पालन सुनिश्चित हो जाता है? क्या हमारे संसद सदस्यों के आचरण के पीछे कुछ और भी कारण है, जिनके बारे में व्यापक विचार होना ही चाहिए? क्या इस सवाल पर व्यापक चिन्तन, मन्थन होना जरूरी नहीं है कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से हमारे देश में जिस तरह की राजनैतिक संस्कृति विकसित हुई है, उसके रहते क्या संसद और संसदीय संस्थाएँ मजबूत बनी रह सकती हैं? क्या संसद और संसदीय संस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए नए नियम और नयी आचार संहिता को अपने राष्ट्रीय कर्त्तव्य की इतिश्री माना जा सकता है?
इस समय हमारे देश की राजनीति का स्वरूप क्या बन गया है? ऐसे कितने लोग हैं, जिन्होंने देश और समाज के लिए अपने सर्वस्व को न्यौछावर करने की इच्छा से राजनीति में प्रवेश किया है? समाज और देश की सेवा करते हुए मर मिटने की भावना हमारे कितने साँसदों में है? वर्तमान राजनीति के प्रेरक तत्त्व कौन हैं, और इसकी विवशताएँ क्या हैं? किस सामाजिक, बौद्धिक एवं भावनात्मक पृष्ठभूमि के लोग हमारी संसद में चुनकर आते हैं? यही है वे प्रश्न जिन पर विस्तार से विचार करना भारतीय संसद की स्वर्ण जयन्ती पर एक राष्ट्रीय कर्त्तव्य है। क्योंकि इन सवालों पर विचार करने से ही यह जाना जा सकता है कि आज की स्थिति में आशा की कोई किरण फूटने की सम्भावना किस तरह से हो सकती है?
भारतीय संसद की उन जड़ों को छूने की कोशिश की जाय जो जमीन में धंसी हैं, तो पता चलेगा कि भारतीय राजनीति ने उन्नीसवीं सदी में अपनी आँखें खोली। शुरुआती दौर में इसका बहुत कुछ सम्बन्ध समाज-सुधार से भी रहा। इसी दौर में पत्रकारिता भी पनपी। बाद में जब स्वाधीनता आन्दोलन ने जोर पकड़ा, उस समय भी हमारे ज्यादातर नेता अपने जमाने के प्रखर बुद्धिशाली होने के साथ राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत थे। लोकमान्य तिलक हो या गोपालकृष्ण गोखले, अथवा फिर महात्मागाँधी ये सभी राजनैतिक सक्रियता के साथ-साथ बौद्धिक एवं भावनात्मक स्तर पर भी लोगों को काफी आकर्षित, प्रेरित एवं प्रभावित करते थे। उस समय के नेताओं के एक हाथ में राजनीति का झण्डा था, तो दूसरे हाथ में कलम। और इन दोनों हाथों को उनका राष्ट्रप्रेम ऊर्जावान बनाता था। पं. नेहरू स्वयं ही इसके उदाहरण हैं। इसलिए जब भारत की पहली संसद चुनी गयी थी, तो उसमें ऐसे लोगों का बाहुल्य था, जो राष्ट्रीय तप-साधना के महातपस्वी थे। जो राष्ट्रीय सवालों पर अपने-अपने नजरिए से गम्भीरतापूर्ण विचार करते थे। संसद को वे गहन राष्ट्रीय चर्चा का मंच समझते थे। संसद उनके लिए राष्ट्र देवता का मन्दिर था। साथ ही वे अपनी विधायी भूमिका के लिए सम्पूर्ण रूप से सचेत थे।
आज पचास सालों के बाद स्थिति बदली हुई है। आज हमारे ज्यादातर संसद सदस्य अपने संवैधानिक दायित्वों के प्रति उदासीन हैं। स्थिति यह है कि ज्यादातर महत्त्वपूर्ण विधेयक या तो बिना चर्चा के अथवा थोड़ी-बहुत छुटपुट चर्चा के बाद पारित हो जाते हैं। इस तरह की आवश्यक चर्चा को उपेक्षित कर संसद सदस्यों का विश्वास गला फाड़ कर चिल्लाने, अभद्र आचरण करने और सभी मर्यादाओं को तोड़कर अपनी बातों को मनवाने में बढ़ चला है। कभी राष्ट्र देवता का सर्वोच्च मन्दिर कही जाने वाली संसद आज साँसदों की इसी मन-मानी का मंच बनकर रह गयी है। कभी-कभी तो यहाँ के दृश्यों में हिंसात्मक दृश्यों को भी उभरते देखा जाता है।
राष्ट्रीय दूरदर्शन की कृपा से देश की संपूर्ण जनता, यहाँ तक कि विदेशी भी इन दृश्यों के दर्शन का लाभ बड़ी सुगमता से उठाते हैं। दूरदर्शन पर दिखने वाले दृश्यों में दो दृश्य इन पंक्तियों को लिखते समय बड़ी स्पष्टता से मानसिक नेत्रों के सामने उभर रहे हैं। इनमें से एक दृश्य है- भारतीय संसद का। दूरदर्शन पर हो रहे सीधे प्रसारण में जो कुछ दिखाई दिया और देखा गया वह बड़ा ही हास्यास्पद एवं लज्जाजनक था। बिना बारी के बोलना, दूसरों को बोलते समय लगातार टोकना, बेशुमार शोर-शराबा करना। इतना ही नहीं अध्यक्ष के आसन के सामने नारेबाजी करना, और सबसे बढ़कर बाहों को समेटते हुए एक-दूसरे से हाथा-पाई के लिए आगे बढ़ना। दूरदर्शन पर दिखने वाले इस दृश्य को देखकर सिर शर्म से झुक गया। बार-बार मन यही सोचने लगा, कि हमारे देश के साँसदों का आचरण तो स्कूली बच्चों से भी गया बीता है। इन्हें यह भी परवाह नहीं है कि दूरदर्शन के इस प्रसारण को देखने वाले लोग संसद एवं साँसदों के बारे में क्या सोचेंगे?
ये सवाल मन को पता नहीं कितने समय तक कुरेदते रहे? इसी बीच दूरदर्शन पर एक नया दृश्य देखने को मिला। यह दृश्य था स्कूली बच्चों द्वारा संचालित की जाने वाली मॉडल संसद के बारे में। ये किशोर बच्चे संसदीय मॉडल का संचालन कर रहे थे। संसद क्या होती है? भारतीय संविधान की मर्यादाएँ, वर्जनाएँ एवं रीति रिवाज क्या है? सबका सब यहाँ प्रत्यक्ष हो रहा था। सांसदों का गरिमापूर्ण आचरण, शिष्टता-शालीनता, अपने विरोधी के प्रति भी उच्चस्तरीय व्यवहार, सत्ता पक्ष का दायित्व बोध, सभी कुछ यहाँ नजर आ रहा था। इस दृश्य को जिन्होंने भी देखा होगा, वे शायद पहली बार यह सोच और देख पाए होंगे कि संसद की गरिमा क्या होती है? संसदीय आचरण, व्यवहार एवं शब्दावली क्या होती है। स्कूली बच्चों द्वारा संचालित इस मॉडल संसद को देखकर लगा कि काश हमारे साँसद इन बच्चों से ही कुछ सीख पाते? साथ ही मन में यह सोच भी उभरी कि दूरदर्शन पर देखे गए साँसदों के व्यवहार की स्कूली बच्चों से तुलना करना कितना गलत था। क्योंकि ये बच्चे तो उनके अच्छे शिक्षक साबित हो सकते हैं।
बात अटपटी है, पर शालीन प्रतिवेदन यही है कि यह पूरी तरह से सही है। यह अलग बात है कि ऐसा कैसे हुआ इसे समझना निहायत जरूरी है। भारतीय संसद की स्वर्ण जयन्ती वर्ष में इसे जान लेना बहुत आवश्यक है कि संसदीय प्रणाली पश्चिम के देशों में क्यों और कैसे कामयाब हुई? इस सवाल के विश्लेषणात्मक उत्तर में यह जानना होगा कि संसदीय प्रणाली की कामयाबी के तीन महत्त्वपूर्ण स्तम्भ हैं, पहला- जिम्मेदार सत्ता पक्ष, दूसरा है- जिम्मेदार विपक्ष और तीसरा इन दोनों से भी ज्यादा मजबूत और जिम्मेदार नैतिक पक्ष। जो सत्ता और विपक्ष की राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र की नैतिक परम्पराओं का पोषक हो। और सत्ता तथा विपक्ष पर अपना नैतिक प्रभाव बना सके। इसे अपना राष्ट्रीय दुर्भाग्य कहना होगा कि अपने देश की संसदीय प्रणाली में ये तीनों पक्ष कभी भी भली-भाँति सुहृद नहीं रह सके। पं. नेहरू के समय स्थिति थोड़ी बहुत ठीक जरूर थी, पर बाद में सब कुछ ढहता...मिटता एवं बिगड़ता चला गया।
स्थिति यहाँ तक बदतर हुई कि कुछ एक शास्त्री जी जैसे अपवादों को छोड़कर संसद एवं लोकताँत्रिक प्रणाली के तीन नए आधार स्तम्भ विकसित कर लिए। इन नव विकसित स्तम्भों का नाम है- सम्प्रदायवाद, जातिवाद एवं भ्रष्टाचार। प्रायः सभी राजनैतिक पार्टियों ने इन अनैतिक स्तम्भों को सत्ता के शिखर तक पहुँचाने के लिए सीढ़ी के रूप में प्रयोग किया। राष्ट्र की संसदीय प्रणाली में हुए इन नवप्रयोग ने हमारे देश की ‘विविधता में एकता’ की संस्कृति को छिन्न-भिन्न कर दिया। संकीर्ण सम्प्रदायवाद एवं जातिवाद ने भारत की भोली-भाली जनता को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया। भ्रष्टाचार का आलम तो यह है कि बड़ी आसानी से आज सत्ता को ही खरीदा बेचा जा सकता है।
संसद की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर हम चाहे जितने झूठे और ढोंगी दावे करते रहे कि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है। किन्तु इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। जिम्मेदार सत्ता पक्ष, जिम्मेदार विपक्ष एवं मजबूत व जिम्मेदार नैतिक पक्ष के इन तीन आधार स्तम्भों को स्थापित किए बिना संसदीय लोकतन्त्र का ढाँचा बालू की दीवार की तरह है। जिसे कभी भी कोई भी, किसी समय भी ध्वस्त कर सकता है। यह हमारे सामाजिक, राजनैतिक एवं नैतिक चिन्तकों के लिए चुनौती है।
यदि संसदीय लोकतंत्र को बचाए रखना एवं सुदृढ़ बनाना है, तो देश के लिए नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति की व्यापकता ही समाधान है। इन क्रान्तियों में भागीदार होने एवं इन्हें बढ़ावा देने का अर्थ अच्छी वक्तृता देना नहीं है, बल्कि इनके विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी सक्रिय जिम्मेदारी निभाना है। यदि इस तरह की सक्रिय जिम्मेदारी को संसद सदस्यों का अनिवार्य राष्ट्रीय कर्त्तव्य बना दिया जाय तभी राष्ट्र देवता के सर्वोच्च मन्दिर की खोई गरिमा व आभा फिर से लौट सकती है। नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति की उत्साहपूर्ण भागीदारी ही भारतीय संसद की स्वर्ण जयन्ती का सच्चा महोत्सव है। इसमें बिखरते उल्लास में भारतीय संसद के उज्ज्वल एवं सार्थक भविष्य के सपने देखे जा सकते हैं।
महापुरुषों की यही विशेषता रही हैं कि वे स्वयं आजीवन स्वाध्यायशील रहे हैं। आचार्य अत्रे उन दिनों बीमार पड़े थे। फिर भी चारपाई पर सिरहाने, बगल में उन्होंने ढेरों पुस्तकें जमा कर रखी थीं। उस कष्टकर मनःस्थिति में पढ़कर मन को हलका करते थे। एक मित्र मिलने आए और उन्होंने पूर्ण विश्राम की बात कहते हुए पढ़ने से बचने का परामर्श दिया। अत्रे जी ने मुस्कराते हुए कहा, मैं बीमारी की खुराक बना हुआ हूँ, पर मैं भूखा कैसे रहूँ? अपनी खुराक पुस्तकों से हासिल करता हूँ।
इसी प्रकार सभी की अभिरुचि यदि ज्ञानार्जन स्वाध्याय के प्रति जाग उठे, तो उनका व्यक्तित्व भी अपूर्ण न रहे। जो इसमें पिछड़ जाते हैं, वे पछताते हैं।
स्वच्छ दीखने के दो तरीके हैं- अस्वच्छता को ढक देना या उसे साफ कर देना, उसे हटा मिटा देना। आवरण चढ़ाने से अंतर इतना ही आएगा कि निहित गंदगी बाह्य दृष्टि से ओझल बनी रहेगी। इतने पर भी उसकी सत्ता अपने स्थान पर यथावत् रहती और मौका पाते ही, आवरण हटते ही अपना परिचय पूर्ववत् देने लगती है।
मनुष्य की यह आम आकाँक्षा होती है कि वह दूसरों की नजरों में सम्मानित दीखे और सुसंस्कृत कहलाए। इसके लिए एकमात्र तरीका यही है कि व्यक्तित्व का रूपांतरण हो और उसे इतना प्रामाणिक प्रखर और परिष्कृत बनाया जाए कि खुशबू बिखेरने वाले फूलों की ओर जिस प्रकार भौंरे खिंचते चले आते हैं, वैसे ही लोगों की श्रद्धा और सहायता अनायास मिलती चले। यह किंचित कठिन प्रक्रिया है, पर रूपांतरण का और कोई दूसरा तरीका भी नहीं। इन दिनों लोग पुरुषार्थ प्रधान कार्यों से प्रायः बचना चाहते है और किसी ऐसे सरल संस्करण की तलाश में रहते हैं जो आसान हो एवं सुविधाजनक भी, साथ ही देखने में भी ऐसा न लगे, जिससे जल्दी ही उसके असल की नकल होने का अनुमान लगता हो। व्यक्तित्व के संदर्भ में ऐसा उपाय यही हो सकता है कि बुराई पर आकर्षक परदा डाल दिया जाए और सज्जन होने का प्रदर्शन किया जाए। ऐसे में कई बार व्यक्तित्व की पहचान में धोखा हो जाता है और बुरे के अच्छे होने का भ्रम होने लगता है।
मानवीय व्यक्तित्व के तीन पक्ष हैं भावना, विचारणा और व्यवहार। इनमें से व्यवहार शारीरिक प्रवृत्ति है, जबकि विचरण मानसिक। इन दोनों का संबंध स्नायु तंत्र से है, किंतु भाव संस्कार का संबंध स्नायु संस्थान से नहीं होता, वह चेतना का विषय है। अतएव उसको परिष्कृत करने की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि जब ईर्ष्या, राग, द्वेष, घृणा आदि संवेगात्मक तत्वों के नियंत्रण की बात आती है तो शरीर विज्ञानी और मनोविज्ञानी एक प्रकार से असहाय महसूस करने लगते हैं और यह बता पाने में असमर्थ साबित होते हैं कि शरीर मन के किन हिस्सों द्वारा किस प्रकार इनका संचालन उत्पादन होता है। अब तक मन के संबंध में काफी शोधें मनोविज्ञान क्षेत्र में हो चुकी हैं और मस्तिष्क के बारे में भी अगणित अनुसंधान शरीरशास्त्री कर चुके एवं कर रहे हैं, पर इन दोनों विधाओं के विशेषज्ञ यह सुनिश्चित कर पाने में एक प्रकार से विफल ही रहे हैं कि आखिर मन मस्तिष्क में से कहाँ किस अंग में ठीक-ठीक इनकी अवस्थिति है? जबकि अध्यात्मवेत्ता इनका अवस्थान स्थान भी बताते और उन्हें प्रभावित करने की पद्धति भी सुझाते हैं। कहते हैं, इनका उदात्तीकरण हो जाए, तो हर किसी के लिए ईर्ष्या को उत्फुल्लता में, राग को विराग में, द्वेष को सहयोग में और घृणा को प्रेम में बदल पाना संभव हो जाएगा। इसका तात्पर्य यह हुआ कि नियंत्रण की प्रणाली स्थूलशरीर के ज्ञान-तंतुओं की क्रियाओं तक ही सीमित है। इसके आगे जो कुछ होता है, वह प्राकृतिक और संस्कारगत हैं एवं चेतना से संबद्ध है। इसका उदात्तीकरण अथवा शोधन ही हो सकता है, रूपांतरण का इसके लिए अन्य कोई दूसरा तरीका नहीं। इस प्रकार नियंत्रण और रूपांतरण बदलाव की ये दो पद्धतियाँ हैं। हम इन दोनों को भलीभाँति समझें और एक से स्थान पर दूसरे को प्रयुक्त न करें। दोनों की अपनी अपनी सीमाएँ हैं। नियंत्रण के क्षेत्र में शोधन को न लाएँ और शोधन की जगह नियंत्रण का प्रयोग न करें। यह यदि सही सही संपन्न हुआ, तो फिर शोधन के उपराँत नियंत्रण की आवश्यकता नहीं रह जाएगी, इतना सुनिश्चित है।
देखा गया है कि व्यक्ति व्यावहारिक जीवन में स्वयं का बदलना चाहता हैं, बुराइयों को छोड़ना चाहता है, वासनाओं को त्यागना चाहता हैं, आदतों को परिवर्तित करना चाहता हैं, किन्तु लाख कोशिशों के बावजूद उसे असफलता ही साथ लगती है, तात्कालिक सफलता तो यदा कदा मिल भी जाती है, पर वह चिरस्थायी नहीं होती। कारण की तलाश करने पर यही ज्ञात होता है कि जो प्रयास किए गए, वह कायिक अथवा मानसिक स्तर के थे। इस स्तर पर मात्र नियंत्रण ही संभव है, रूपांतरण नहीं। जहाँ नियंत्रण होगा, वहाँ उसके उभरने भड़कने की संभावना भी बनी रहेगी। ऐसी स्थिति में दुष्प्रवृत्तियों को बार बार सिर उठाने का अवसर मिलता है, इसलिए सुधार संशोधन संबंधी नियंत्रण की पद्धति अपूर्ण एवं अधूरी है। इसकी तुलना में यदि उदात्तीकरण को अपनाया गया, तो इससे संपूर्ण एवं चिरकालिक रूपांतरण होता तथा समस्या का स्थायी समाधान मिलता। कारण कि हमारी अधिकाँश प्रवृत्तियों का संबंध संस्कार चेतना से है। जब इसका परिमार्जन किया जाता है, तो उससे संबंधित समस्त चेष्टाओं का उदात्तीकरण हो जाता है। शरीर विज्ञान और मनोविज्ञान इतनी गहराई में उतरकर वास्तविक निमित्त को नहीं समझ पाने के कारण ही बार-बार विफल रहते देखे जाते है।
काम वासना के बारे में शरीरशास्त्र की दृष्टि बड़ी उथली है। शरीरवेत्ता स्खलन को रोक लेना ही सर्वोपरि मानते और उतने से ही ब्रह्मचर्य की अखंडता स्वीकार कर लेते है। मनःशास्त्री उस पर दमन के द्वारा विजय प्राप्त करने की बात कहते है, ज्ञातव्य है कि कुचलने का यह तरीका हर जगह सफल नहीं होता। ‘काम’ स्वयं में एक प्रचंड ऊर्जा है। शक्तिशाली ऊर्जा को बहुत समय तक दमित नियंत्रित नहीं किया जा सकता। यदि किया गया, तो ऐसी विस्फोटक स्थिति पैदा होगी, जो व्यक्ति को सनकी, उन्मादी, पागल स्तर का बना देगी, इसलिए उस ऊर्जा का रूपांतरण होना चाहिए। यह रूपांतरण किस प्रकार का कैसा हो? मनोवेत्ता यह बता पाने से असफल रहे, जबकि अध्यात्मवेत्ताओं के पास इसका सुनिश्चित उत्तर है। उनका कहना है कि यदि इस वासना के आवेग को सात्विक भावना में ईश्वरीय अनुराग में बदल दिया गया, तो फिर ‘काम’ के सताने का सवाल नहीं होगा। इसके अतिरिक्त मनोविज्ञानियों के ‘काम दमन’ का प्रतिवाद करते हुए वे कहते है कि इस रीति से मन प्रत्यक्ष न सही, परोक्ष रूप से बराबर उस ओर ही लगा रहता है। जिसका अनवरत स्मरण हो रहा हो, उस ओर से मन भला कैसे हट सकता है। निश्चय ही इस नियंत्रण के माध्यम से काम विकार का उद्दीपन ही होता रहता है। इस सूक्ष्म शास्त्र को न समझ पाने के कारण ही मनोविज्ञान का यह सूत्र कारगर न हो सका। अध्यात्म में इसकी दिशा को मोड़कर ईश्वरोन्मुख कर दिया जाता है, इसलिए सामान्यजन में जो ऊर्जा काम विकार उत्पन्न करने में खरच होती रहती है, वही शक्ति भगवद्परायण भक्ति में स्वतः ही रूपांतरित होकर उच्चस्तरीय बन जाती है। अतएव वहाँ वासना के सताने की बात तो दूर, उसकी स्मृति तक नहीं उभरती। यही वास्तविक रूपांतरण है।
उदात्तीकरण और नियंत्रण के बीच उपर्युक्त अंतर और उनकी सीमाओं को समझ लेने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि शारीरिक स्तर पर जो हमारी चेष्टाएँ और क्रियाएँ होती है तथा मानसिक स्तर पर जैसा हमारा चिंतन होता है, वे सब केवल उन्हीं उन्हीं स्तरों की परिणतियाँ है, सो बात नहीं। उनका न्यूनाधिक लगाव भाव संस्थान की संस्कार-चेतना से भी होता है, इसलिए मानवीय चेष्टाओं को शुद्ध करने की जहाँ बात आती है वहाँ उसके चित्तगत संस्कारों को भी ध्यान में रखना होगा, क्योंकि मनुष्य 74 लाख योनियों की लंबी यात्रा के उपराँत यह शरीर धारण करता है, इसलिए चित्त में उनके भी सूक्ष्म संस्कार मानवीय अंतराल में जमे रहते है, वैसी ही उनमें प्रवृत्तियों दिखाई पड़ती है। इस आधार पर व्यक्तित्व भेद की व्याख्या भी अत्यंत सरल हो जाती है और यह बताया जा सकना शक्य हो जाता है कि यदि किसी में क्रोध किसी में घृणा, किसी में प्रेम तत्व प्रबल है, तो ऐसा क्यों है? मनोविज्ञान की इस संबंध में जो व्याख्याएँ है, वह अत्याधिक दुरूह है और अधूरी भी, कारण कि व्यवहार की व्याख्या वहाँ परिस्थिति के आधार पर की जाती है।
यदि किसी व्यक्ति में घृणा की अधिकता है, तो इस बारे में उसका कहना है कि चूँकि उसे ऐसे किसी वातावरण में रहना पड़ा हो, जहाँ तिरस्कार, अपमान, घृणा बड़े पैमाने पर मिला हो अथवा बचपन में माता पिता, भाई बहन से फटकार मिलती रही हो तो इसका परिणाम उसमें घृणा की उत्पत्ति के रूप में सामने आ सकता है, प्रेम, भय, क्रोध जैसी मानवीय प्रवृत्तियों की व्याख्या इसी प्रकार करते और कहते है कि परिस्थिति और समाज से वह जैसा कुछ सीखता है, वैसा ही बनता और विकसित होता चला जाता है। चूँकि व्यक्ति को समाज में पग पग पर इन मनोवैज्ञानिक तत्वों से पाला पड़ता है, अतः उसमें ये सभी तत्व विकसित हो जाते है। इसके आगे उसके पास और कोई समाधान नहीं, किन्तु मानवीय व्यवहार इतना सरल कहाँ! वह इतनी जटिलताओं से भरा हुआ है कि केवल परिस्थिति के आधार पर उसकी न तो व्याख्या हो सकती है, न हल हो सकता है यदि उसे हम क्रमशः व्यवहार जगत् से विचार जगत्, विचार जगत् से भाव और संस्कार जगत् तक ले जाएँ और चिंतन करे कि ऐसा व्यवहार हुआ, तो इसका कारण क्या है? तो अंततः हम संस्कार चेतना के उस मूल बिंदु पर पहुंचेंगे जहाँ आकार मानवी आचरण को एक परिभाषा, सर्वांगपूर्ण व्याख्या तथा सर्वांगीण समाधान मिल जाता है। जब व्यवहार का उद्गम ज्ञात हो जाए, तो आदतों को मोड़ना मरोड़ना सरल हो जाता है।
वस्तुतः हम जो कुछ भीतर है, वही बार अभिव्यक्त करते रहते है। हमारी संस्कार चेतना शुद्ध अथवा मलिन जैसी भी होती है आदतों के द्वारा, आचरण के द्वारा वह उन्हीं रूपों में प्रकट और प्रत्यक्ष होती रहती है। इसी से स्वभाव का निर्माण होता है। प्रकृति यदि हेय और निम्नस्तरीय है, तो इसके लिए भी अंतराल की वह भूमि ही जिम्मेदार है जिसे ‘अंतःकरण’ कहते है और वह यदि उच्चस्तरीय है, तो उसका भी निमित्त वही है। अंतर सिर्फ इतना है कि एक में वह भूमि कुसंस्कारयुक्त और मलिन होती है, जबकि दूसरी स्थिति में वह एकदम निर्मल और संस्कार संपन्न होती है। व्यक्तित्व का सारा ढाँचा इसी से निर्मित है। अतः व्यक्तित्व को बदलने के लिए, उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए हमें उसी संस्थान को परिमार्जित और परिष्कृत बनाना होगा इसके लिए एकमात्र उपचार अध्यात्मिक ही है जप, तप, व्रत उपवास, ध्यान, प्राणायाम, आसन, बध, मुद्रा आदि कुछ ऐसे साधन है, जिनका यदि नियमित अभ्यास किया जाता रहे, तो यह उस अपरिष्कृत आँतरिक भूमि पर सुनिश्चित असर डालते और गंदगी को आवृत्त करने की तुलना में निकाल बाहर करते है। रूपांतरण और उदात्तीकरण का यही एकमात्र आधार है। व्यक्तित्वसंपन्न इसी के द्वारा बना जा सकता है। अपनाया इसे ही जाना चाहिए।
पिता नौकरी करते थे। उन्हें तीन रुपये मासिक वेतन मिलता था। परिवार बड़ा होने से तीन रुपये में मासिक खरच चलाना मुश्किल था। ऐसी विपन्न स्थिति में बालक ईश्वरचंद्र की पढ़ाई का प्रबंध कैसे हो? पिता की छाती भर आती थी पुत्र की पढ़ने की उमंग और और अपनी विवशता देखकर।
अपने पिता की विवशता देखकर पढ़ाई के लिए ईश्वरचंद्र ने रास्ता निकाल ही लिया। उसने गाँव के उन लड़को को मित्र बनाया, जो पढ़ने जाते थे। उनकी पुस्तकों के सहारे उसने अक्षर ज्ञान कर लिया। एक दिन कोयले से जमीन पर लिखकर अपने पिता को दिखलाया। ईश्वरचंद्र की विद्या के प्रति लगन देखकर पिता बेतंगी का जीवन जीते हुए भी उसे गाँव की पाठशाला में भरती करा दिया। गाँव के स्कूल की सभी परीक्षाएँ ईश्वर ने प्रथम श्रेणी में पास की। आगे की पढ़ाई प्रारंभ करने में आर्थिक विवशता आड़े आ रही थी। ईश्वरचंद्र ने स्वयं अपनी राह बनाई और आगे पढ़ने के लिए माता-पिता से केवल आशीर्वाद भर माँगा। उसने कहा, आप मुझे किसी विद्यालय में भरती भर करा दें। फिर मैं आपसे किसी प्रकार का खरचा नहीं माँगूँगा।
तदनुसार पिता ने ईश्वरचंद्र को कोलकाता के एक संस्कृत विद्यालय में भरती करा दिया। विद्यालय में ईश्वरचंद्र ने सेवा, लगन और परिश्रम, प्रतिभा के बल पर शिक्षकों को प्रसन्न कर लिया। उनकी फीस माफ हो गई। पुस्तकों के लिए अपने साथियों के साझीदार हो गए और पढ़ाई से बचे समय में मजदूरी कर गुजारे का प्रबंध करने लगे। इस अभावग्रस्तता में ईश्वरचंद्र ने इतना परिश्रम किया कि उन्नीस वर्ष की आयु में पहुँचते-पहुँचते उन्होंने व्याकरण, साहित्य, स्मृति तथा वेदशास्त्र में निपुणता प्राप्त कर ली। यही युवक आगे चलकर ‘ईश्वरचंद्र विद्यासागर’ के नाम से विख्यात हुआ।
हर साल दीपावली पर भारत माता एक नए प्रकाश पुञ्ज के अवतरण की प्रतीक्षा करती है। ऐसा प्रकाश पुञ्ज जो उसकी सौ करोड़ सन्तानों के घर-आँगन के साथ उनके मन-आँगन में भी उजियारा फैला सके। हर साल की तरह यह प्रतीक्षा इस बार भी 4 नवम्बर 2002, सोमवार की साँझ को फुलझड़ियों की जलती-बुझती रोशनी और दीयों की टिमटिमाहट के बीच रहेगी। पाँच-सात हजार साल से चले आ रहे ज्योति पर्व पर देश की दीवारें तो जगमगा जाती हैं। पर माटी के सभी पुतलों (आज का इन्सान) को माटी के ये दीप अभी तक पूरी तरह से आलोकित नहीं कर पाए। इस बारे में प्रश्न चिह्न कई हैं, जिन्हें अपने उत्तरों की प्रतीक्षा है।
अपनी 360 तिथियों, 12 संक्रान्तियों तथा 7 वारों के योग से हजारों व्रतों, पर्वों और उत्सवों के सजीव संग्रहालय भारत देश में यह ज्योति पर्व कुछ खास ही है। इसकी खासियत को देखकर एक पश्चिमी चिन्तक ग्रेगरी बैटसन ने यहाँ तक कह दिया कि ‘भारत का साँस्कृतिक इतिहास पुस्तकों के पृष्ठो में नहीं बल्कि दीपावली के दीयों की रोशनी में लिखा है।’ जब यह रोशनी सम्भवतः पहली बार जली थी, तब इसकी प्रखर आभा कुछ विशेष ही थी। परन्तु बीते कुछ सालों से यह धीमी, फीकी और मद्धम होती जा रही है। पुराण कथा कहती है कि दीवाली के दीये पहली बार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के स्वागत में जले थे। तब इन मिट्टी के दीयों में उनके शौर्य का तेज प्रकाशित हुआ था। वही शौर्य जिसके प्रभाव और प्रताप से रावणी अनाचार और आतंक का अन्धकार मिटा था। वही महाशौर्य जिसके बलबूते प्रभु श्रीराम ने ‘निसिचर हीन करौं महि’ का अपना लोक विश्रुत प्रण पूर्ण किया था।
रावण के आतंक पर श्रीराम की विजय मात्र एक पुराण कथा नहीं, बल्कि भारत देश की जीवित, अमर और अमिट इतिहास है। यह महातपस्वी श्रीराम की रावण की विलासी जीवन शैली पर विजय थी। यह लोकनायक श्रीराम की आतंक के महाखलनायक रावण पर विजय थी। राम की रावण पर विजय के बाद उनके अयोध्या आगमन पर वहाँ के नागरिकों ने दीपावली को आलोक पर्व के रूप में मनाया। तभी से यह दीपोत्सव राष्ट्र के विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है। हालाँकि इसके प्रतीक और परम्परा के सारे ताम-झाम एवं सरंजाम के बावजूद इसकी अर्थवत्ता एवं सार्थकता कहीं खो गयी है। ऐसा लगता है कि भारत देश के किसी लोकनायक एवं राष्ट्रनायक में विजय की भावना, साहस एवं उत्साह ही नहीं बचा है। अत्याचार, अनाचार, व्यभिचार एवं भ्रष्टाचार हर रोज, हर कहीं प्रायः सभी को चुनौती देते घूमते-फिरते हैं। उनकी नाक में नकेल डालने का साहस किसी में नहीं है। आतंक के अंधेरे की दहशत से समूचे राष्ट्र की आम-जनता थर-थर काँप रही है। उसे कोई राम ढूंढ़े नहीं मिल रहा है।
बात आतंकवाद तक ही थमी हुई नहीं है। इस राष्ट्रव्यापी अन्धेरे के आयाम अनेकों हैं। आजादी का छंटवा दशक लग जाने के बाद भी देश के वास्तविक विकास की दशा कुछ खास सुधर नहीं पायी है। हाँ सुधार के बदलते हुए आँकड़े जरूर गिनाए जाते हैं। असलियत यही है कि अपना देश हरित क्रान्ति एवं श्वेत क्रान्ति के युग में प्रविष्ट होकर आज जहाँ पर पहुँच गया है, वहाँ आम आदमी के हिस्से में केवल महंगाई और अभाव ही आया है। गरीब और अमीर आदमी के रिश्तों में खटास कुछ ज्यादा ही बढ़ी है। राष्ट्रीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस इक्कीसवीं सदी में भी गरीबी का जीवन जीने के लिए मजबूर है। सच्चाई यही है कि देश के आम आदमी अंधेरे का भारी-भरकम बोझ ढोते हुए अपनी जिन्दगी की यात्रा कर रहा है। राष्ट्रव्यापी सूखे के इस विषम काल में बाहर की थोड़ी देर की रोशनी उसके अन्दर के घर को कैसे आलोकित कर सकती है? आज के लोकनायकों एवं राष्ट्रनायकों के हृदय प्रदेश जब तक ज्योतित नहीं होंगे, तब तक यह ज्योति पर्व यूँ ही प्रश्नों के कटघरे में खड़ा रहेगा। फुलझड़ियों की रंग-बिरंगी चिंगारियां केवल आम आदमी का दिल जलाने का काम करेंगी।
इस पावन पर्व पर माता लक्ष्मी एवं विघ्नविनाशक गणेश के पूजन का विधान है। वेद-पुराण एवं शास्त्रों में इस पूजन की अनेकों रीतियाँ भी मिलती हैं। जिसमें से कुछ का पालन भी हर साल होता है। लेकिन इस प्रक्रिया में कहीं कोई त्रुटि जरूर है। अन्यथा अपने राष्ट्र से विजय, समृद्धि एवं सद्बुद्धि यूँ न रूठ जाती। कमी शायद पूजन करने वालों में है, उनका धन तो काला है ही, उनके दिल भी काले हैं। ऐसों का पूजन भला माता लक्ष्मी कैसे स्वीकार करें। राष्ट्रीय विघ्नों को जन्म देने वालों से भला विघ्ननाशक गणेश किस तरह से प्रसन्न हों। भगवती लक्ष्मी एवं भगवान् गणेश तो तभी प्रसन्न हो सकते हैं, जब काले धन के ढेर पर बैठे काले चेहरे वाले धनिक नहीं, बल्कि आम-आदमी निर्मल आस्था के साथ उन्हें समवेत भाव से पूजें, समवेत स्वरों में पुकारें।
इसे अपना राष्ट्रीय दुर्भाग्य ही कहेंगे कि आज दीपपर्व की ज्योति प्रायः काले धन की कालिख में कैद होकर रह गयी है। और यह कालाधन-महंगाई का मौसेरा भाई है। ये दोनों मिलकर कंगाली एवं गरीबी की राह बनाते हैं। इसलिए जीवन के तिमिर मार्गों से गुजरते हुए आम लोगों को ज्योति पर्व कितना रोशन कर सकता है? यह बड़ा ही कंटीला और रहस्यमय प्रश्न है। इसका सही समाधान केवल वैचारिक क्रान्ति में ही है। विचार क्रान्ति के दीप ही इस अन्ध व्यवस्था को चुनौती दे सकते हैं। शान्तिकुञ्ज के संस्थापकों ने अपने जीवन काल में इसी विचार क्रान्ति को जन्म दिया था। और उन्होंने अपने तप तेज से विचार क्रान्ति के अनेकों दीप जलाए थे। इन दीपों से ज्योति लेकर थोड़े से प्रयास-पुरुषार्थ से न केवल अपने घर-आँगन बल्कि अपने गाँव-शहर को भी जगमगाया जा सकता है।
इसके लिए हमें आज ठीक उसी तरह की हिम्मत करनी होगी, जैसी कि आजादी के समय हमारे पुरखों ने की थी। आजादी के पहले गुलामी का अंधेरा था। इस गुलामी के अंधेरे के खिलाफ देश का हर छोटा-बड़ा आदमी जैसे बन रहा था, लड़ रहा था। आजादी की लड़ाई देश के आम आदमी की लड़ाई बन गयी थी। सभी के सामने यह स्पष्ट था कि किससे लड़ने है, किस पर प्रहार करना है? इस महासंघर्ष का सुखद परिणाम भी हमें मिला। यदि आज के दौर में फिर से कुछ वैसा ही सुखद परिणाम पाना है तो फिर से कुछ वैसा ही संघर्षशील होना पड़ेगा। फिर से एक लड़ाई लड़नी पड़ेगी- देश भर में फैले हुए अंधेरे से लड़ाई। अंधेरे को फैलाने वाली शक्तियों से लड़ाई।
यह ठीक है कि गरीबी, बेकारी, भ्रष्टाचार, अनाचार एवं आतंक हद से ज्यादा बढ़ चुका है। पर हमारे राष्ट्र में प्रबल पुरुषार्थ के बीज अभी भी है, भले ही ये इन दिनों सोए हुए हों। इन्हें अंकुरण के लिए केवल थोड़े से खाद-पानी की जरूरत है। और जरूरत है विचार क्रान्ति के ऐसे प्रकाश पुञ्ज की जो टिमटिमाकर बुझ न जाए, बल्कि आलोकित रहे। विचार क्रान्ति के थोड़े से दीपों में ही इस राष्ट्र की समस्त आशा संजोयी है। एक दीप से दूसरा दीप जलेगा और देश के घर-आँगन ही नहीं खेत, खलिहान, गाँव-शहर और प्रान्त सबके सब जगमगाने लगेंगे। इस प्रयास के बिना यह उल्लास एवं आलोक पर्व प्रश्नों के कटघरे में ही खड़ा रहेगा। क्योंकि मिट्टी के दीये केवल थोड़ी देर के लिए घर-आँगन को ही रोशन कर पाते हैं। मन-आँगन में उजियारा फैलाने के लिए तो विचार क्रान्ति के ही दीप चाहिए। धनतेरस से लेकर यम द्वितीया तक के पर्वों से बना यह महापर्व भी सार्थक होगा जब हम अपने अन्दर के अन्धकार को साफ कर उसे अकलुष बनाएँ। साथ ही यह समझें कि शील से प्राप्त लक्ष्मी ही देवभूमि भारत और यहाँ की देवसंस्कृति को अभिप्रेत है। अत्याचारों से बनी सोने की लंका नहीं। इस सार्थक समझ के बिना इस महापर्व की माँगलिक भावना सदा ही प्रश्नचिह्नित बनी रहेगी
अभिमन्यु चक्रव्यूह में अकेला ही घिरा पड़ा था, सब दिशाएँ शत्रुओं से अवरुद्ध थी। ऐसी दशा में भी अर्जुन पुत्र ने समय की महती आवश्यकता और न्याय -नीति को विजयी बनाने की ललक में वह सब कुछ किया, जो उसके बलबूते था। इस संदर्भ में उसे प्राण गँवाने पड़े, पर इतिहासकार अनंतकाल तक उसके यशगान की विजय दुँदुभि बजाते रहेंगे।
सम्राट समुद्रगुप्त पिछले कई दिनों से चिन्ता में डूबे हुए थे। दरबारी और सामन्तगण अनेकों प्रयत्नों के बावजूद उनकी चिन्ता का कारण नहीं खोज पा रहे थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि अब भला सम्राट की चिन्ता का कारण क्या हो सकता है? उत्तरापथ के साथ दक्षिणापथ के भी सभी राजाओं को जीता जा चुका है। सम्राट की महाकीर्ति का गौरवगान करने वाले प्रयाग के स्तम्भ अभिलेख की स्थापना हो चुकी है। समस्त दिशाओं में यह सत्य गूँज चुका है कि सम्राट समुद्रगुप्त समूची भारत मेदिनी के महानतम सम्राट हैं। मनीषी और विद्वान् उनके शासन को भारत का स्वर्णयुग कहते नहीं थकते। अपनी भुवन विख्यात समस्त उपलब्धियों के बावजूद सम्राट चिन्तित हैं, कारण कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
हालाँकि कारण न समझ में आने के बावजूद सम्राट इन दिनों चिन्ता में आकण्ठ डूबे हुए थे। दरअसल चिन्ताएँ जब डुबाती है तो पूरा ही डुबाती है। क्योंकि एक चिन्ता जिस द्वार-दरवाजे से भीतर प्रवेश करती है, ठीक उसी द्वार से और भी चिन्ताएँ न चाहने पर भी प्रवेश कर जाती है। जो द्वार एक को मार्ग देता है, वह अनजाने में ही अनेकों को मार्ग दे देता है। इसीलिए हमेशा ही चिन्ताओं की भीड़ आती है। कभी कोई एक अकेली चिन्ता से नहीं मिला करता।
चिन्ताओं के इस परिदृश्य में यह आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि सम्राट प्रायः ही चिन्ता में डूबे रहते हैं। जबकि वास्तविक रूप से सम्राट तो केवल वे ही हैं, जो चिन्ता से छुटकारा पा गए हैं। चिन्ता की दासता इतनी विस्तृत है कि एक साम्राज्य की शक्ति भी उसे पोंछ नहीं पाती। शायद यही कारण है कि साम्राज्यों की शक्ति भी चिन्ता की सेवा में तत्पर हो जाती है।
यही यथार्थ सम्राट समुद्रगुप्त को पिछले कई दिनों से बुरी तरह से साल रहा था। वह सोच रहे थे कि मनुष्य सम्राट होना चाहता है, शक्ति और स्वतंत्रता के लिए। किन्तु साम्राज्य मिलने पर उसे पता यही चलता है कि सम्राट से ज्यादा अशक्त, परतन्त्र और पराजित व्यक्ति कोई दूसरा नहीं है। क्योंकि दूसरों को दास बनाने वाला व्यक्ति अन्ततः खुद ही दासानुदास हो जाता है। सच्चाई यही है कि हम जिसे बाँधते हैं, उससे हम खुद भी बंध जाते हैं। अपनी स्वतंत्रता के लिए दूसरों की दासता से मुक्ति ही नहीं, दूसरों को दास बनाने की वृत्ति से भी मुक्ति जरूरी है।
सम्राट भी स्वयं को आजकल बहुत ही बंधा हुआ महसूस कर रहे थे। उन्हें अपने दिग्विजय अभियानों की आसारता अनुभव हो रही थी। वह इस सत्य की अनुभूति कर रहे थे कि जीतने तो वह स्वर्ग को निकले थे, लेकिन जीतने पर केवल नर्क का सिंहासन हाथ लगा है। शायद यथार्थ यही है कि अहंकार जो कुछ भी जीतता है, वह आखिरकार नर्क ही साबित होता है। अहंकार की तो औकात ही नहीं है कि वह स्वर्ग को जीत सके- क्योंकि स्वर्ग तो वहीं सम्भव है, जहाँ अहंकार ही नहीं है।
सम्राट अब इस स्वयं जीते हुए नर्क से छुटकारा पाना चाहते थे। लेकिन स्वर्ग को पाना कठिन, गंवाना सरल है, जबकि नरक को हासिल करना सरल और गंवाना कठिन है। समुद्रगुप्त में अब अपनी चिन्ताओं से मुक्त होने के लिए भारी छटपटाहट थी। नर्क के सिंहासन पर बैठे रहना भला किसे सुहाता है। लेकिन जो सिंहासन पर बैठे रहना चाहते हैं, उन्हें नर्क के सिंहासन पर बैठना ही पड़ता है। सत्य तो यही है कि स्वर्ग में कोई सिंहासन ही नहीं है। नर्क के सिंहासन ही दूर से स्वर्ग के सिंहासन नजर आते हैं। रात-दिन, सोते-जागते समुद्रगुप्त को इसी सत्य की अनुभूति हो रही थी। वह अपनी चिन्ताओं से जूझ रहे थे।
लेकिन चिन्ताएँ तो चिन्ताएँ हैं, एक किसी तरह से जाती है तो हजार नयी आ धमकती हैं। सम्राट समुद्रगुप्त भी चिन्ताओं से छुटकारा पाने के साथ चक्रवर्ती सम्राट होने का सुख भी उठाना चाहते थे। पहले कभी उन्होंने सोचा था कि शायद चक्रवर्ती सम्राट होकर चिन्ताओं से छुटकारा मिल जाए। परन्तु ऐसे निष्कर्ष निकालकर मनुष्य अपनी मूढ़ता ही प्रमाणित करता है। सम्राट को रोज नए राज्य चाहिए थे, और वह उन्हें मिल भी गए। विगत कुछ सालों पहले वह सोचा करते थे कि साँझ का अस्त होता सूरज उनकी साम्राज्य सीमा को वहाँ न पावे जहाँ उसने सुबह उगते समय पाया था। उन्होंने चाँदी की रातों में सोने के सपने देखने की कल्पनाएँ की थी। उनकी ये कल्पनाएँ साकार भी हुई। और तब उन्होंने जाना कि जीवन के लिए ऐसी रातें और ऐसे सपने बहुत घातक हैं। क्योंकि चाँदी की रातें-आत्मा को अँधेरे में डुबाती हैं और सोने के सपने प्राणों में जहर घोलते हैं। महत्त्वाकांक्षा की मदिरा से आयी बेहोशी को शायद मौत ही तोड़ पाती है।
सम्राट के जीवन में अब साँझ उतरने लगी थी। जीवन दिवस उतार पर था। मौत के संदेश और संकेत उन्हें सुनायी और दिखाई पड़ने लगे थे। बड़ी मुश्किल आन पड़ी थी- शक्ति रोज कम हो रही थी, चिन्ताएँ रोज बढ़ रही थी। उनके प्राण बड़ी विपन्न दशा में थे। क्या किया जाय, जीवन की रीति यही है कि मनुष्य यौवन में जो बीज बोता है, उसकी फसल उसे काटनी ही पड़ती है। विष के बीज बोते समय नहीं, फसल काटते समय कष्ट देते हैं। बीज में ही जो दुःखों को देख लेते हैं, फिर वे बोने की गलती नहीं करते। बीज से तो छुटकारा पाना सम्भव है, लेकिन बोने के बाद तो फसल काटनी ही पड़ती है। फिर बच निकलने का कोई उपाय नहीं है।
सम्राट समुद्रगुप्त भी इस समय अपनी ही बोयी फसलों के बीच खड़े थे। ऐसे में क्या करें उन्हें समझ में नहीं आ रहा था। एक दिन वह अपनी चिन्ताओं से पीछा छुड़ाने के लिए वन की ओर चल पड़े। हालाँकि चिन्ता को छोड़कर भागना चिता छोड़कर भागने से भी कठिन है। क्योंकि चिता बाहर और चिन्ता भीतर है। भीतर के किसी तत्त्व से छुटकारा तो स्वयं को आमूल-चूल बदलने पर ही सम्भव है। लेकिन इस समय तो सम्राट अपने सबसे प्रिय श्वेत-श्याम कर्ण अश्व पर बैठे भागे जा रहे थे।
तभी अचानक उनके कानों में बंसी की सुरीली धुन पड़ी। इसमें कुछ ऐसा था कि उनकी गति थम गयी। बरबस ही उन्होंने अश्व को बंसी की धुन की दिशा में मोड़ लिया। कुछ दूर जाने पर उन्होंने देखा कि पहाड़ी झरने के पास, वृक्षों के झुरमुट के तले, एक युवा चरवाहा नृत्य करता हुआ बंसी बजा रहा था। पास में ही उसकी भेड़े बैठी थी। बड़ा ही सुरम्य दृश्य था यह। इसे निहारते हुए सम्राट उससे बोले- तू तो ऐसा आनन्दित है जैसे तुझे कोई साम्राज्य मिल गया हो? जवाब में वह युवक हँसता हुआ बोला, अरे भाई, तू दुआकर कि भगवान् मुझे कोई साम्राज्य न दे। क्योंकि सम्राट तो मैं अभी हूँ। साम्राज्य मिलने पर भी क्या कोई सम्राट रह पाता है?
उसकी बातों ने सम्राट समुद्रगुप्त को हैरान कर दिया। समुद्रगुप्त की हैरानी भाँप कर वह युवक कहने लगा- सम्पत्ति से नहीं स्वतन्त्रता से व्यक्ति सम्राट होता है। और सिवाय स्वतंत्रता के मेरे पास और कोई सम्पदा नहीं है। मैं सोचता हूँ, भला मेरे पास ऐसी कौन सी मौलिक वस्तु नहीं है, जो सम्राट के पास है। प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य को निहारने के लिए मेरे पास आँखें हैं। परमात्मा के स्वरूप के बारे में चिन्तन करने के लिए मेरे पास मन है। प्रभु भक्ति करने के लिए मेरे पास निर्मल हृदय है। सूरज जितनी रोशनी मुझे देता है, उतनी ही वह सम्राट को देता है। चाँद भी मुझ पर अपनी उतनी ही चाँदनी बरसाता है, जितनी की सम्राट पर। प्रकृति के आँगन में खिले खूबसूरत फूलों की सुगन्ध भी मुझे सम्राट से कम नहीं मिलती। फिर सम्राट के पास ऐसा क्या है, जो मेरे पास नहीं है?
हाँ मेरे पास कुछ बेकार की चीजें जरूर नहीं है। जिन्हें बेचारा सम्राट ढोता रहता है। मेरे पास नहीं हैं, चिन्ताएँ और मैं ये चाहता भी नहीं हूँ। पर इनके बदले मेरे पास ऐसा बहुत कुछ है, जो सम्राट के पास नहीं। जैसे मेरे पास है- मेरी स्वतंत्रता, मेरा आनन्द, मेरा प्रभु प्रेम। सम्राट समुद्रगुप्त ने उस युवक की बातें सुनकर कहा, ‘प्यारे युवक! तुम यथार्थ कहते हो। अपने गाँव में जाकर सबसे कहना कि स्वयं सम्राट समुद्रगुप्त भी तेरे इस सत्य से पूर्णतया सहमत हैं।’
किसी को कुछ, किसी को कुछ देने के लिए लोग भगवान की निंदा कर रहे थे और उसे पक्षपाती ठहरा रहे थे। सुन रहे थे कोई दार्शनिक। वे लोगों को साथ लेकर खेतों पर गए। एक में गुलाब बोया था, दूसरे में तंबाकू। एक से सुगंध उठा रही थी, दूसरे से बदबू। दार्शनिक ने कहा, जमीन बहुत बुरी है। किसी को क्या, किसी को क्या देती है। इसका पक्षपात देखो। लोग बोले, नहीं, यह धरती का पक्षपात नहीं, बोने वालों के कृत्यों का फल है। हँसते हुए ज्ञानवान ने कहा, भगवान की यह सृष्टि एक प्रकार का खेत है। उसमें परिस्थितियों का जो जैसा बीज बोता है, वह वैसा ही काटता हैं।
भावनाएँ ही मनुष्य को ऊँचा उठाती और नीचा गिराती हैं। हम अपने विकास के आरंभिक दिनों में भावनात्मक उन्नति कर चरमोत्कर्ष पर पहुँच थे, पर अब उसी का दिन-दिन ह्रास होने के कारण नीचे गिरते जा रहे हैं। पूर्व का हमारा भावनात्मक आरोहण अब अवरोहण बन चुका है। संवेदना की दृष्टि से हम एक दम निम्न बिंदु पर पहुँच चुके हैं। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है।
व्यक्ति के भावक्षेत्र के परिष्कार के साथ-साथ जैसे-जैसे उसका प्रसार-विस्तार होता है, उसमें तदनुरूप सेवा सहयोग की वृत्ति भी बढ़ती जाती है। अंतः करण जब भाव- संवेदना से लबालब भर जाता है, तो वह मानव को महामानव बना देती है, किंतु इसका आरंभिक अभ्यास परिवार में ही करना पड़ता हैं। परिवार के सुख-दुख को अपना सुख दुख और उसके किसी सदस्य की कष्ट कठिनाई को अपनी कष्ट कठिनाई मान लेना, इसे सेवा सहायता की दिशा में उठाया गया प्रथम चरण कहा जा सकता है और भाव विस्तार की पहली अभिव्यक्ति।
नृतत्त्ववेत्ताओं का कहना है कि यदि मनुष्य की उच्चस्तरीय भावना का इतना विकास न हुआ होता, तो आज उसका अस्तित्व सुरक्षित न रह पाता और संघर्षरत स्थिति में कबका समाप्त हो गया होता। कारण कि मानव की आरंभिक स्थिति और जंगली जंतुओं के स्तर में कोई बहुत भारी अंतर रहा होगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता। आज जो बड़ा अंतर दिखलाई पड़ रहा है, वह तो क्रमिक प्रगति और परिष्कृत भाव-चेतना का परिणाम है। जब आज की विकसित बुद्धि की स्थिति में भी मानव संघर्षशीलता से बाज नहीं आता और तनिक-से हक की होड़ में मरने-मारने पर उतारू हो जाता है, तो आरंभ की अविकसित अवस्था में वह कैसा खूँखार रहा होगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। आए दिन तब छोटे-छोटे कुनबों में युद्ध और मार-काट मचते होंगे तथा रक्त की नदियाँ बहती होंगी। समय बीतने के साथ-साथ रोज-रोज की लड़ाइयों से उकताकर वे किसी ऐसी युक्ति की तलाश के लिए विवश हुए होगे, जो उन्हें कुछ शाँति दे सके, अनावश्यक संघर्ष से बचा सके और कुछ ऐसा हस्तगत करा सके, जिससे पारिवारिक कटुता में कमी आए। मानव विज्ञानी मानते है कि इसका सबसे उत्तम उपाय उन्हें यही प्रतीत हुआ होगा कि दूसरे की कठिनाइयों में दुःख और दर्द में सहानुभूति प्रदर्शित की जाए, सहयोग दिया जाए और स्वयं पर विपत्ति आने पर उनकी मदद ली जाए।
नृतत्वशास्त्रियों के अनुसार मनुष्य में संवेदना-विकास का यह प्रथम सोपान था। इससे स्वतंत्र परिवारों का परस्पर मिलन-समागम संभव हुआ और धीरे-धीरे यही समुदाय का रूप धारण करता चला गया। ऐसे अलग-अलग समुदायों की अपनी-अपनी विशिष्टताएँ और पहचान थी। जब उन्हें एक-दूसरे के बारे में पता चला, तो वे पारस्परिक आदान-प्रदान द्वार अपनी-अपनी विशेषज्ञता का लाभ एक-दूसरे को देने पर सहमत हो गए। समाज-निर्माण का यह आदिम स्वरूप था। कालाँतर में इसी से वर्तमान समाज का जन्म हुआ। जब समाज का पूर्ण विकास हुआ, तो मानव ने विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग की नीति अपनाई। परिवार के बाहर भी सेवा-सहकार घनिष्ठ होने लगे। संवेदना और सहानुभूति की परिधि बढ़ी, तो पहले का संकुचित परिवार और बड़ा बना और फिर धीरे-धीरे विकास करते हुए वह एक वृहत्तर परिवार बन गया। यों संरचना और संगठन की दृष्टि से था तो वह समाज ही, पर आचरण और व्यवहार की दृष्टि से, आत्मीयता और अनुराग की दृष्टि से उसे एक वृहद् परिवार की कहना समीचीन होगा, एक ऐसा परिवार, जिसमें उसकी समग्र उन्नति के लिए सभी का संपूर्ण विकास अभीष्ट था। कार्लमार्क्स के शब्दों में कहे, तो इसे ‘वन फॉर ऑल एंड फॉर वन’ की नीति का विकास कहना चाहिए। भावनाओं की दृष्टि से आदमी की यह और उन्नत स्थित थी।
फिर राष्ट्र और विश्व राष्ट्र का विकास हुआ। भूभाग की दृष्टि से सभी की अपनी अपनी सीमाएँ तो थीं, पर सबके भावक्षेत्र ऐसी सीमाओं से सर्वथा मुक्त थे। यही वह काल था, जब ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ एवं ‘वसुधैव कुटुँबकम्’ के सूत्र-सिद्धांत दिए गए। यह प्रतिपान सिद्धांत मात्र बनकर नहीं रह गए, वरन् आचार-व्यवहार में दूध पानी की तरह घुले-मिले थे। आँतरिक उत्कर्ष की दृष्टि से मनुष्य का यह चरम विकास था, जिसमें भाव-संवेदनाएँ अपना अधिकतम विस्तार प्राप्त कर चुकी थी। इसी भाव-उत्कृष्टता के कारण युगों में इसे सर्वश्रेष्ठ ‘सतयुग‘ कहा गया। फिर धीरे धीरे इसकी उदात्तता घटती गई। भाव-विस्तार में कमी आई और शनैः-शनैः उसमें अनुदात्त तत्वों के समावेश से उसका स्तर क्रमशः गिरता गया।
हम सर्वोच्च स्थिति से लगातार नीचे गिरते गए। आत्मीयता की हमारी परिधि संकीर्ण होने लगी और घटते-घटते इतनी घट गई कि अनाचार से भरा मध्यकाल का सामंतवादी युग आ पहुँचा। साम्राज्य विस्तार के इस काल में आक्रामकता का इतना विस्तार हुआ कि अपने और परायेपन का भेद घृणित रूप धारण करने लगा। यही से ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का पृष्ठपोषण करने वाली लूट-खसोट की नीति का उद्भव हुआ। साम्राज्यवादी शासक विस्तारवादी ललक की पूर्ति के लिए आक्रमण-प्रत्याक्रमण के घात प्रतिघात में निरत रहने लगे। नीति-अनीति का विचार छोड़ जिन्हें जो सूझता, वही करते और जो हाथ लगता, उसी को बड़ी मछली की तरह निगल जाते। फिर अगले शिकार के लिए आगे बढ़ते। इस क्रम में भारत को अनेक विदेशी आक्राँताओं के आक्रमण और उत्पीड़न झेलने पड़े। भारतीय राजे-महाराजे भी स्वयं इस प्रवृत्ति से अछूते न रह सके। उनमें भी इस बात की प्रतिस्पर्द्धा छिड़ी रहती कि किस प्रकार दूसरे की संपन्नता हड़पकर अपनी विपन्नता घटाई और सामर्थ्य बढ़ाई जाए। यह राजतंत्र का जमाना था।
फिर लोकतंत्र का प्रादुर्भाव हुआ, किंतु हमारा भावनात्मक पतन अब भी नहीं रुका। हम और नीचे गिरे। समय के साथ-साथ यह गिरावट बढ़ती गई और आज स्थिति यह है कि समाज पर स्वार्थांधता हावी है। इस सीमा तक कि उस ललक को पूरा करने के लिए वह किसी भी हद को पार कर जाने में जरा भी संकोच नहीं करती। जब व्यक्ति की उद्दाम लिप्सा पराकाष्ठा लाँघकर कुत्सित बनती है और अपना आतंक जमाने और वर्चस्व स्थापित करने के लिए दूसरों के न्यायोचित अधिकारों को भी छीनने से नहीं हिचकती है, तो सदा इन दिनों जैसी हो स्थिति पैदा होती है। आज आतंकवाद और उग्रवाद जिस कदर सर्वत्र सिर उठा रहे है और निरीहों निरपराधों के प्राणहरण कर रहे है, उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि हमारा अंतःकरण पाषाणवत् कठोर हो चुका है, संवेदना सूख चुकी है और हम पशुवत् व्यवहार करने लगे है। भर्तृहरि ने ऐसे ही लोगों को मानवों की सबसे निचली और चौथी कोटि में रखा है। उन्हें कोई विशेष नाम तो नहीं दिया, सिर्फ यह कहकर छोड़ दिया, ‘ते के न जानीमहे।’
अब प्रश्न यह है कि मानवीय उत्कर्ष की यह दुरवस्था आखिर क्यों उत्पन्न हुई और क्यों मनुष्य का अधःपतन हुआ? उत्तर जेम्स डिल्लेट फ्रीमैन अपनी रचना ‘दि हिलटॉप हर्ट’ में देते है। वे कहते है, परिवर्तन संसार की नियति है। यहाँ का हर पदार्थ परिवर्तनशील है। मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं। उसमें भी परिवर्तन जारी है। सदा एक जैसी स्थिति में बना वह भी नहीं रह सकता। यह सच है कि कभी वह उत्कर्ष की ऊँचाइयों का स्पर्श कर रहा था, तो आज अपकर्ष की खाई में पड़ा हुआ है, पर यह अवस्था भी देर तक टिकने वाली नहीं। उसका उत्थान सुनिश्चित है, पर यह उन्नयन अब मानसिक धरातल पर ही संपन्न होगा। वे कहते है कि आदमी का शारीरिक विकास पूर्ण हो चुका है। अब आगे उसके मानसिक विकास की संभावना ही शेष है, इसी दिशा में उसे बाकी प्रगति करनी है।
दूसरे शब्दों में कहे, तो यह मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति यात्रा होगी। उसने जड़ पदार्थों की भौतिक उन्नति पूरी कर ली। अब उसे चेतनात्मक उत्थान संपन्न करना होगा। यह उत्कर्ष और कुछ नहीं, आत्मपरिष्कार का ही दूसरा नाम है। बोलचाल की भाषा में इसे ही उच्चस्तरीय भावनाओं का विकास कहते है। संपूर्ण अध्यात्म तत्वज्ञान इस उदात्त अवस्था को ही करतलगत करने की एक विधा है।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् (ऋग्वेद-3/62/10)। चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र की ऋग्वेद में उपस्थिति भारत वर्ष में सूर्य उपासना का प्राचीनतम ऐतिहासिक-साहित्यिक साक्ष्य है। यह इस सत्य का स्पष्ट प्रमाण है कि प्रारम्भिक वैदिक युग के आते तक भारतवासी सूर्य उपासना से न केवल सुपरिचित हो चुके थे, बल्कि उसका गहन मर्म भी समझ चुके थे।
ऋग्वेद में गायत्री महामंत्र के अलावा सूर्य देवता से सम्बन्धित पाँच अन्य सूक्त भी मिलते हैं। यही नहीं अन्य देवताओं के सूक्तों में भी सूर्य के लिए प्रयुक्त मंत्रों की संख्या इक्कीस है। इतना ही नहीं ऋग्वेद में सूर्य की सविता, पूषा, विष्णु, मित्र, भग, विवस्वान्, अर्यमन, अज एक पद, वृषाकपि, केशिन एवं विश्वानर आदि विविध रूपों में की गयी स्तुति यह दर्शाती है कि भारत वर्ष में सूर्य उपासना ऋग्वैदिक काल से भी कहीं अधिक प्राचीन है। क्योंकि सूर्य उपासना के बीज अगर भारत के चिर प्राचीन प्राक् ऐतिहासिक युग में न छिपे होते तो इनका प्रस्फुटन एवं पल्लवन प्रारम्भिक वैदिक युग में देखने को न मिल पाता।
इतिहासवेत्ता ई. मैके ने सिन्धुघाटी की सभ्यता के पुरावशेषों में भारतीयों द्वारा मान्य सौर प्रतीक ‘स्वास्तिक’ के मिलने की बात स्वीकारी है। उनके अनुसार इस तरह के कुछ अन्य सौर प्रतीक वहाँ पायी गई मुहरों में भी देखने को मिले हैं। सच तो यह है कि भारत में सूर्योपासना का इतिहास जितना प्राचीन है, उसका स्वरूप उतना ही रोचक है। सूर्योपासना का प्रारम्भिक स्वरूप प्रतीकात्मक रहा है। इस प्रारम्भिक युग में सूर्य का प्रतीकत्त्व चक्र कमल आदि से व्यक्त किया जाता था। इन प्रतीकों को विधिवत् मूर्ति की तरह प्रतिष्ठित किया जाता था। काफी बाद में भगवान् सूर्य की मानव मूर्ति स्थापित करने की प्रथा चली।
यह इतिहास सत्य है कि भारत देश के चिर अतीत में प्रारम्भ की गयी सूर्य उपासना की प्रवाहमान् कालसरिता न तो कभी बन्द हुई और न कभी मन्द पड़ी। बल्कि उत्तरोत्तर सूर्य उपासना का सामाजिक, साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व बढ़ता गया। महाभारत काल में इसका प्रचलन काफी बढ़ गया था। कुषाण काल में तो सूर्य उपासना का प्रचलन ही नहीं था, वरन् कुषाण सम्राट स्वयं भी सूर्योपासक थे। इतिहासवेत्ताओं के अनुसार कनिष्क (78 ई.) के पूर्वज शिव तथा सूर्य के उपासक थे। इसके पश्चात् तीसरी शताब्दी ई. के गुप्त सम्राटों के समय में भी सूर्य, विष्णु तथा शिव की उपासना का उल्लेख मिलता है। कुमार गुप्त (414-55 ई.) के समय में विष्णु, शिव एवं सूर्य की उपासना विशेष रूप से की जाती थी।
स्कन्दगुप्त (455-67) के समय में तो बुलन्दशहर जिले के इन्द्रपुर नामक स्थान पर दो क्षत्रियों ने एक सूर्य मन्दिर भी बनवाया। भारतीय इतिहास के विशेषज्ञों का मानना है कि गुप्त सम्राटों के काल तक सूर्य उपासना भारतवासियों की आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक बन गयी थी। उनके समय में मालवा के मन्दसौर नामक स्थान में, ग्वालियर में, इन्दौर में तथा बघेलखण्ड के आठमक नामक स्थान में निर्मित चार श्रेष्ठ सूर्य मन्दिरों का उल्लेख प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त उनके समय में बनी हुई सूर्य देव की कुछ मूर्तियाँ बंगाल में भी मिलती हैं।
भारत वर्ष में सूर्योपासना का यह क्रम बाद में भी जारी रहा। और सातवीं ईसवी में सूर्योपासना अपनी चरम सीमा पर पहुँच गयी। सम्राट हर्षवर्धन के पिता तथा उनके कुछ और पूर्वज न केवल सूर्योपासक थे, अपितु आदित्यभक्त भी थे। हर्ष के पिता के विषय में महाकवि बाण ने अपने ‘हर्षचरित’ में लिखा है कि वे स्वभाव से सूर्यभक्त थे तथा प्रतिदिन सूर्योदय के समय स्नान करके ‘आदित्यहृदय’ स्तोत्र का कई बार जप किया करते थे। हर्षचरित के अतिरिक्त अन्य कई प्रमाणों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है कि उन दिनों भारत वर्ष में सूर्य उपासना काफी व्यापक थी। इतिहास विशेषज्ञ इस सत्य को प्रमाणित करते हैं कि हर्ष के समय में प्रयाग में तीन दिन का अधिवेशन हुआ था। इस अधिवेशन में पहले दिन बुद्ध की मूर्ति प्रतिष्ठित की गयी। बाद में क्रमशः दूसरे और तीसरे दिन सूर्य तथा शिव की पूजा की गयी।
सूर्योपासना का यह चरमोत्कर्ष हर्ष के समय तक ही नहीं सीमित रहा, अपितु बाद में भी परम्परा गतिमान रही। डॉ. भगवतशरण उपाध्याय के अनुसार हर्ष के पश्चात् ललितादित्य मुक्तापीड़ (724-760 ई.) नामक राजा सूर्य का अनन्य भक्त हुआ। उसने सूर्य के ‘मार्तण्ड-मन्दिर’ का निर्माण करवाया। इस मन्दिर के खण्डहरों से प्रतीत होता है कि यह मन्दिर अपने समय में काफी विशाल रहा होगा। प्रतिहार सम्राटों के समय भी सूर्य-पूजा का विशेष प्रचलन था। प्रतिहारों के बाद राजस्थान के चौहान नरेशों, उत्तरप्रदेश के गाहड़वाल नरेशों तथा मध्यप्रदेश के चन्देल शासकों ने भी अपनी सूर्यभक्ति की अभिव्यक्ति करते हुई कई सूर्य मन्दिर बनाए। उड़ीसा के गंगयुगीन वंश के प्रतापी शासक नरसिंह वर्मन का बनवाया हुआ विश्व प्रसिद्ध कोणार्क मन्दिर उनके साथ समूची भारतीय सूर्य उपासना का प्रतीक बन गया।
भारत वर्ष के प्राचीन इतिहास के काल क्रम में (प्रारम्भ से लेकर 12वीं शताब्दी) अविरल रूप से व्याप्त सूर्य उपासना ने देश को न केवल आध्यात्मिक रूप से बल्कि साँस्कृतिक रूप से भव्यता प्रदान की। वैदिक वाङ्मय के साथ सूत्र, स्मृति ग्रन्थ एवं रामायण-महाभारत महाकाव्य इसकी साक्षी देते हैं। ब्रह्मांड पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण आदि अनेकों महापुराण एवं भविष्य पुराण व साम्बपुराण आदि विविध उपपुराण इस ऐतिहासिक सत्य की साहित्यिक साक्षी हैं। महापुराणों व उपपुराणों के अतिरिक्त महाकवि कालीदास, बाणभट्ट, भवभूति, मयूर, भट्ट, नारायण, श्री हर्ष आदि कवियों ने सूर्य स्तुति से अपनी काव्य साधना को सफल बनाया है।
सूर्य देवता एवं सूर्य उपासना के स्वरूप पर यद्यपि शौनक, यास्क, सायण आदि प्राचीन आचार्यों तथा बर्गेन, हिले ब्रॉन्ट, आलेनबर्ग, ब्लूमफील्ड, ग्रिसवोल्ड, कीथ, स्वामी दयानन्द, श्रीअरविन्द, पं. सातवलेकर, स्वयं परम पूज्य गुरुदेव आदि पाश्चात्य एवं प्राच्य विद्वानों ने साहित्यिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विचार किया है। वी.सी. श्रीवास्तव आदि इतिहास के कतिपय विशेषज्ञों ने प्राचीन भारत की सूर्योपासना पर ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक दृष्टि से कार्य किया है। परन्तु अभी भी इस कार्य के कई पहलू अधूरे एवं अपूर्ण हैं। इन पर विशद् एवं व्यापक शोध कार्य की अपेक्षा एवं अनिवार्यता है। ताकि प्राचीन भारत के इतिहास व संस्कृति के प्रेरक प्रकाशपुञ्ज भगवान् सूर्य की उपासना का सर्वांग स्वरूप विश्व दृष्टि के समक्ष उजागर हो सके। गायत्री महामन्त्र के उपास्य देव भगवान् सविता के स्वरूप और महत्त्व पर व्यापक शोध करने के लिए देव संस्कृति विश्वविद्यालय में एक विस्तृत शोध योजना बनायी गयी है। इसकी सुपरिणति के रूप में देव संस्कृति के प्रेरक प्रकाश पुञ्ज भगवान् सूर्य के अलौकिक तेज से समग्र संस्कृति प्रभामय हो सकेगी।
मेधा और प्रतिभा का उपयोग लोककल्याण में होना चाहिए, यह सिद्धाँत जैसे ही महापंडित कुमारजीव के हृदय में घुसा, वैसे ही वे धर्म प्रचार के लिए परिभ्रमण करने चल पड़े।
कुमारजीव चीन चले गए। वहाँ उनने और साथी बनाए और बौद्ध ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद कर डाला, साथ ही भ्रमण करके प्रचार करने लगे। उनके प्रयत्न से स्थिति ऐसी बन गई थी, मानो बौद्ध धर्म का केंद्र भारत न होकर चीन ही हो। बौद्धमठों का निर्माण, धर्मशास्त्रों का अनुवाद तथा प्रचारकों की एक बड़ी सेना का गठन करने के साथ-साथ लाखों शिष्य बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए। इस सफलता में प्रधानतया कुमारजीव की ही प्रमुख भूमिका थी। इस पुण्यकार्य से कुमारजीव स्वयं तो इतिहास में एक वंद्य पुरुष बन ही गए, अन्य सामान्यजनों के लिए एक प्रकाश स्तंभ के रूप में कीर्ति पा गए।
गुरुगीता के महामन्त्र साधना जीवन के महासूत्र हैं। इन्हें अपनाकर, इनकी साधना करके साधक का अध्यात्म राज्य में प्रवेश सुनिश्चित है। पर ध्यान रहे गुरुगीता के इन महामन्त्रों की साधना करने का मतलब कतिपय क्रियाओं अथवा कर्मकाण्डों को कर लेना भर नहीं है। इनकी साधना करने का अर्थ है उस भावदशा में अपनी सम्पूर्णता एवं समग्रता से जीना, जिसका कि ये महामन्त्र बोध कराते हैं। पिछली कड़ी में गुरुभक्त साधकों ने गुरुतत्त्व के बारे में पढ़ा था। परम गुरु भगवान् सदाशिव के उन वचनों को आत्मसात् किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि गुरुतत्त्व ही साधक के जीवन का सार सर्वस्व है। इसके अभाव में यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ अपना अर्थ खो देते हैं। यही नहीं अपनी प्रबुद्ध आत्मा और सद्गुरु भिन्न नहीं है। ये दोनों एक ही हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इस तत्त्व के सत्य को जानने से ही साधक के जीवन में सत्य ज्ञान का उदय होता है।
गुरुतत्त्व की इस कथा को आगे बढ़ाते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-
सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात्। देहीब्रह्मभवेद् यस्मात् त्वत् कृपार्थं वदामि ते॥ 1॥
सद्गुरु के चरणों की सेवा से साधक सारे पापों से मुक्त होकर विशुद्धात्मा हो जाता है। (भगवान् शिव, माता पार्वती से कहते हैं, यही नहीं देवि!) मैं तुम्हें कृपापूर्वक बता रहा हूँ, देहधारी जीव ब्रह्मभाव को उपलब्ध हो जाता है।
गुरुचरणों की महिमा के बारे में कहे गए, भगवान् महादेव के ये वचन साधकों के जीवन का सम्पूर्ण सत्य है। समस्त सृष्टि का आध्यात्मिक इतिहास साक्षी है। कि अनेकों बार इस महामन्त्र में निहित सत्य को अपने साधना जीवन में खरा प्रमाणित किया है। महान साधकों ने दुर्लभतम ब्रह्मतत्त्व का बोध इस महामन्त्र की साधना से पाया है। ऐसी सैकड़ों, हजारों और लाखों घटनाओं में हम यहाँ केवल एक घटना की चर्चा कर रहे हैं। इसकी चर्चा विश्वविख्यात महान् योगी स्वामी योगानन्द ने योगी कथामृत में भी की है।
सद्गुरु के चरणों की महिमा बोध कराने वाली यह अनुभूति कथा महान गुरु योगिराजाधिराज श्री श्यामाचरण लाहिड़ी और उनके विभूतिवान शिष्य स्वामी प्रणवानन्द के बारे हैं। स्वामी प्रणवानन्द ने स्वयं अपने मुख से अपनी इस अनुभूति को योगानन्द को सुनाया था। उन्होंने उनसे कहा- गुरु की कृपा कितनी अमूल्य होती है, वह सुनो। मैं उन दिनों नित्य रात्रि को आठ घण्टे ध्यान किया करता था। उस समय मेरा समूचा दिन अपने रेलवे कार्यालय में बीत जाता था। वहाँ मुझे अपने क्लर्क होने का दायित्व निभाना पड़ता था। उन दिनों मेरे लिए यह ड्यूटी बड़ी थकाऊ और उबाऊ थी। फिर भी मैं बड़े ही मनोयोग पूर्वक हर रात को ध्यान करता था। प्रत्येक रात्रि को आठ घण्टे की अविराम साधना मेरी जीवनचर्या का अनिवार्य और अविभाज्य अंग बन गयी।
इसके अद्भुत परिणाम भी मेरे जीवन में आए। विराट् आध्यात्मिक अनुभूति से मेरी समूची अन्तर्चेतना उद्भासित हो उठी। परन्तु अभी भी उस अखण्ड सच्चिदानन्द और मेरे बीच एक झीना परदा हमेशा बना रहता था। यहाँ तक कि अतिमानवी निष्ठ के साथ साधना करने के बावजूद भी मैं ब्रह्मतत्त्व से एकाकार नहीं हो सका। इस बारे में किए गए मेरे सारे प्रयास पुरुषार्थ, निष्फल गए। तभी मुझे ध्यान आया कि साधक के लिए सद्गुरु चरणों की कृपा ही परमपूर्णता का परिचय पर्याय बनती है। यही सोचकर एक दिन सायंकाल मैंने लाहिड़ी महाशय के चरणों का आश्रय ग्रहण किया। उनके आशीष की आकाँक्षा के साथ मेरी प्रार्थना चलती रही, ‘गुरुदेव, मेरी ईश्वर में समा जाने की आकाँक्षा इतनी तीव्र वेदना का रूप धारण कर चुकी है कि उस परम प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन किए बिना मैं अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता।’
लाहिड़ी महाशय हल्के से मुस्कराए और बोले, भला इसमें मैं क्या कर सकता हूँ। तुम और गहराई से ध्यान करो। मैंने उनके चरण पकड़कर बड़े ही करुण भाव से पुकार की, हे मेरे प्रभु, मेरे स्वामी, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आप इस भौतिक कलेवर में मेरे सम्मुख विद्यमान हैं। अब मेरी प्रार्थना को स्वीकारें, और मुझे आशीर्वाद दें कि मैं आपका आपके अनन्त रूप में दर्शन कर सकूँ। प्रसन्न भाव से शिष्य वत्सल परम सद्गुरु लाहिड़ी महाशय ने अपना हाथ आशीर्वाद मुद्रा में उठाते हुए कहा, जाओ वत्स, अब तुम जाओ और ध्यान करो। मैंने तुम्हारी प्रार्थना परम पिता परमेश्वर परब्रह्म तक पहुँचा दी है।
अपरिमित आनन्द और उल्लास से भरकर मैं घर लौटा। नित्य की ही भाँति उस रात्रि भी मैं ध्यान के लिए बैठा। बस फर्क थोड़ा था आज सद्गुरु के चरण मेरी ध्यानस्थ चेतना का केन्द्र थे। वे चरण कब अनन्त विराट् परब्रह्म बन गए पता ही नहीं चला। बस उसी रात मैंने जीवन की चिरप्रतीक्षित परमसिद्धि प्राप्त कर ली। उस दिन से माया का कोई भी परदा उस परमानन्दमय जगत् स्रष्टा की छवि को मेरे नेत्रों से ओझल नहीं कर सका है। यह कहते हुए स्वामी प्रणवानन्द का मुखमण्डल प्रसन्नता से दमक उठा। स्वामी योगानन्द लिखते हैं कि गुरु महिमा की यह कथा सुनकर मेरा भय भी नष्ट हो गया।
योगानन्द द्वारा कही गयी यह योगकथा गुरुचरणों की महिमा को प्रकट करती है। गुरुचरण ही अपने तात्त्विक रूप में परब्रह्म का स्वरूप है। लेकिन इसे जाना और समझा तभी जा सकता है- जब साधक अपनी गुरुभक्ति की साधना के शिखर पर आरुढ़ हो गया है। एक सन्त कवि ने इस तथ्य को एक पंक्ति में कहने की कोशिश की है- ‘श्री गुरुचरणों में नेह। साधन और सिद्धि है येह।’ अर्थात् गुरुचरणों में अनुराग साधना भी है और सिद्धि भी। साधना के रूप में इसका प्रारम्भ होता है, तो इसके तात्त्विक स्वरूप के दर्शन में इसकी सिद्धि की चरम परिणति होते हैं। हममें से अनेक गुरुपद अनुरागी यह जानना चाहेंगे की इस साधना की शुरुआत कैसे करें? तो इसका सरल उत्तर है कि गुरुचरणों के भाव भरे ध्यान से। भाव भरे ध्यान का मतलब इस अटल विश्वास से है कि सद्गुरु का स्थूल रूप ही और कुछ नहीं परब्रह्म का ही घनीभूत प्राकट्य है।
वही भक्तवत्सल भगवान् हमारे कल्याण के लिए शिष्यवत्सल गुरुदेव के रूप में प्रकट हुए हैं। बिना किसी शर्त के, बिना किसी माँग के, बिना किसी अधिकार के, स्वयं को उनके श्री चरणों में न्यौछावर कर देना ही गुरुचरणों की सच्ची सेवा है। इससे हमारे जन्म-जन्मान्तर के सारे पाप धुल जाते हैं और आत्मा का विशुद्ध स्वरूप निखरने लगता है। साथ ही अन्तर्चेतना में अयमात्मा ब्रह्म की अनुभूति प्रकट और प्रत्यक्ष हो जाती है। इस कथन में तर्कपूर्ण कल्पना का जाल नहीं, बल्कि असंख्य साधकों की साधनात्मक अनुभूति संजोयी है। सद्गुरु के चरणों का प्रभाव एवं प्रताप ही ऐसा है। इसकी महिमा कथा का और अधिक विस्तार गुरुगीता की अगली कड़ी की विषयवस्तु बनेगी। इसकी प्रतीक्षा करते हुए साधकगण गुरुचरणों का ध्यान करें।
राजा हर्षवर्धन स्थानेश्वर के शासक थे। उन्हें विवशता में आक्रांताओं से जूझना और परास्त करने का कदम भी उठाना पड़ा, पर वस्तुतः उनकी संपदा, क्षमता और कल्पना धर्मोत्कर्ष में निरंतर लगी रही। हर पाँचवें वर्ष वे समस्त संप्रदायों के धर्मावलंबियों को एकत्रित करते, जिससे फूट-फिसाद छोड़कर मिल-जुलकर धर्म भावनाओं को आगे बड़ा सकना संभव हो सके। तक्षशिला विश्वविद्यालय में इस की व्यवस्था विशेष रूप से उन्होंने इसीलिए की थी।
उनके राज्य की आजीविका भी धर्म कार्यों में ही लगती थी। उन दिनों प्रगतिशील बौद्ध धर्म ही माना जा रहा था। उनने समय के अनुरूप विवेक और आदर्श को महत्व देते हुए बौद्ध धर्म का ही परिपोषण किया एवं अपना सब कुछ धर्म-धारणा के परिपोषण हेतु, मूढ मान्यताओं के निवारण हेतु प्रचार−कार्य में नियोजित कर दिया।
अन्तर्यात्रा का विज्ञान अब योग साधकों के लिए उनकी साधना का संगी-साथी और सच्चा सहचर बन चुका है। साधक-समुदाय में अनेकों ऐसे हैं, जो प्रत्येक महीने प्रकाशित होने वाली इसकी हर कड़ी को दिन में कम से कम एक बार जरूर पढ़ते हैं। उस पर गहराई से चिन्तन, मनन एवं निदिध्यासन करते हैं। साथ ही भाव भरी प्रतीक्षा करते हैं अगले महीने प्रकाशित होने वाली कड़ी की। जिससे कि योग साधना एवं तत्त्वदर्शन के एक नए आयाम में प्रवेश हो सके। जीवन की अनूठी अन्तर्यात्रा में एक कदम और आगे बढ़ा जा सके। साधकों की इन भावनाओं से हम सुपरिचित हैं। इन पंक्तियों के माध्यम से उनसे यह भाव-भरा अनुरोध है कि आप सब आगे भी अपने पत्रों के माध्यम से इसी तरह अपनी साधनात्मक प्रगति से हमें अवगत कराते रहें। पिछली कड़ी में आप सबने समाधिपाद के पाँचवे सूत्र पर निदिध्यासन किया था। यह जाना था कि मन की पाँचों वृत्तियाँ किस तरह से क्लेश और अक्लेश का स्रोत बन जाती हैं।
इससे अगले यानि की छठे सूत्र में महर्षि पतंजलि इस तत्त्व को और भी अधिक सुस्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि ये पाँचों वृत्तियाँ कौन-कौन सी हैं? इनका क्या नाम है? इस सूत्र में वह कहते हैं- ‘प्रमाणविपर्यय विकल्पनिद्रास्मृतयः’ (1/6)। यानि कि ये वृत्तियाँ हैं- प्रमाण (सम्यक् ज्ञान), विपर्यय (मिथ्याज्ञान), विकल्प (कल्पना), निद्रा और स्मृति। ये पाँचों वृत्तियाँ मन की पाँच सम्भावनाएँ हैं, मन के पाँच रहस्य हैं। इन्हें जान-समझ लेने पर समूचे मन को जान-समझ लिया जाता है। इन पाँच वृत्तियों को मन की पाँच शक्तियाँ भी कहा जा सकता है।, जिनके सही सदुपयोग से जीवन सहस्रदल कमल की भाँति पुष्पित एवं सुरभित हो उठता है। इस बारे में परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि जीवन को समझना है तो मन को समझना होगा। और मन को समझने के लिए मन की पाँचों वृत्तियों को जान लेना बहुत जरूरी है। तो शुरुआत पहली वृत्ति से करते हैं। यह पहली वृत्ति है ‘प्रमाण’ यानि कि सम्यक् ज्ञान। ‘प्रमाण’ संस्कृत भाषा का बहुत गहरा शब्द है। इसकी गहराई इस कदर है कि किसी भी अन्य भाषा में इसका एकदम सही अनुवाद सम्भव नहीं। यह जो सम्यक् ज्ञान कहा गया, वह ‘प्रमाण’ का सही अर्थ नहीं बल्कि अर्थ की हल्की सी छाया भर है। दरअसल प्रमाण मूल शब्द ‘प्रमा’ से आया है। इसका भावार्थ है- सत्य-अनुभव। इस प्रमा का करण यानि की प्रमाण। सार संक्षेप में प्रमाण को यथार्थ अनुभव सा सत्य अनुभव करने की शक्ति कहा जा सकता है।
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि यह शक्ति मन में है। परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि प्रमाण हमारे मन की वह उच्चतम क्षमता है, जो सामान्य क्रम में अविकसित अथवा अल्प विकसित या अर्धविकसित दशा में होती है। यदि यह क्षमता ठीक तरह से विकसित या जाग्रत् हो जाए तो फिर जो कुछ भी जाना जाय सत्य होता है। साधारण तौर पर प्रायः मन की यह शक्ति अविकसित ही रह जाती है। इसका प्रयोग हो ही नहीं पाता। मन की इस शक्ति को समझने के लिए पूज्य गुरुदेव एक उदाहरण दिया करते थे। वह कहते थे- ‘मान लो तुम जिस घर में रहते हो, उस घर में बिजली-बत्ती तो है, पर उसके स्विच का तुम्हें पता नहीं। एकदम घनघोर-घुप अन्धेरा वहाँ छाया रहता है। अब तुम्हें रहना उसी घर में है, और स्विच के बारे में तुम्हें पता नहीं है। तो क्या स्थिति होगी? बस जैसे-तैसे टटोल कर काम चलाना पड़ेगा। कई बाई ठोकरें लगेंगी। यह भी हो सकता है कि कई बार सिर फूटे और पैर टूटे। इस अंधेरे के कारण न जाने कितनी मुश्किलें खड़ी होंगी।’
अब यदि किसी तरह प्रयास, प्रयत्न से अथवा गुरु कृपा या भगवत्कृपा से बिजली का स्विच मिल जाय। यही नहीं वह स्विच ऑन हो जाय और घर के कोने-कोने में रोशनी बिखर जाय। हर ओर उजियारा फैल जाय, तो एक पल में सारी परेशानियाँ, सारी मुश्किलें समाप्त हो जाएँगी। फिर सब कुछ साफ-साफ नजर आएगा। सत्य प्रश्न या जिज्ञासा की विषय वस्तु न बनकर जीवन का अनुभव हो जाएगा। बस यही है प्रमाणवृत्ति। इसके विकसित होने का मतलब है कि हाथ में स्विच आ गया। कहीं किसी तरह की कोई भटकन नहीं। किसी से कुछ पूछने की भी जरूरत नहीं। किसी तरह के भ्रम अथवा सन्देह की भी कोई गुँजाइश नहीं।
बुद्ध, महावीर, श्री रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण या फिर स्वयं परम पूज्य गुरुदेव उनमें इस प्रमाणवृत्ति की स्वाभाविक जागृति थी। गुरुदेव अपने जीवन काल में हजारों जगह गए। और वहाँ लाखों लोगों से मिले। लोगों से मिलने का यह सिलसिला तब भी चलता रहा, जब उन्होंने कहीं भी आना-जाना बन्द कर दिया। जहाँ कोई जो भी मिला, गुरुदेव ने उसके प्रश्नों का बड़ी सहजता से समाधान कर दिया। कई बार तो पूछने वाले ने संकोचवश प्रश्न पूछा भी नहीं, और गुरुदेव ने उसके सवाल का सही जवाब दे दिया। उनके प्रवचनों में यह बात रोज ही देखी जाती थी। उस समय जिस किसी व्यक्ति की जो भी जिज्ञासा, शंका या प्रश्न होते, गुरुदेव उसी का समाधान करते। उनके प्रवचनों में एक साथ अनेकों के समाधान का सिलसिला चलता रहता था।
किसी के पूछने पर वह हँस देते। और कहते- अरे भाई! तुम सोचते हो, टटोलते हो, उलझते हो और मैं सब कुछ साफ-साफ देखता हूँ। मुझे तुम्हारा प्रश्न भी दिखाई देता है, उत्तर भी। मुझे तो तुम्हारे वे अजन्मे सवाल भी दिखाई देते हैं। जो कल जन्म लेंगे। साथ ही वे समाधान भी नजर आते हैं, जिनकी तुम्हें कल जरूरत होगी। यह होती है प्रमाण वृत्ति। इसके विकास का मतलब है सहज बोध की प्राप्ति। फिर उधार के विचारों की, किसी तरह के तर्कजाल की, बौद्धिक जोड़-तोड़ की कोई जरूरत नहीं। गुरुदेव कहते थे कि गायत्री महामंत्र की भावभरी साधना से मन की यह शक्ति अपने आप ही कुछ वर्षों में जाग जाती है। साथ ही इस शक्ति के जागरण में अवरोध उत्पन्न करने वाली शक्ति समूल नष्ट हो जाती है।
यह अवरोधक शक्ति मन की दूसरी वृत्ति है, जिसका नाम है विपर्यय। विपर्यय का मतलब है, मिथ्या ज्ञान। मिथ्या ज्ञान का मतलब है कि है कुछ पर दिखता है कुछ। है रस्सी, पर नजर आ रहा है साँप। प्रायः जीवन में यह स्थिति बेहोशी भरे अंधकार के कारण पनपती है। जैसे शराबी, भंगेड़ी, नशा गाढ़ा होने पर कुछ अजीबोगरीब अनुभूतियाँ करते हैं। वैसे ही इन्द्रिय लालसाओं, मानसिक वासनाओं एवं कामनाओं के ज्वार में भी इस मिथ्या ज्ञान की बाढ़ आती है। सारी उम्र कभी न खत्म होने पर भटकन की पर्याय बन जाती है। ध्यान रहे इस विपर्यय की समाप्ति ही प्रमाण का जागरण है। योग साधकों को अपने प्रयासों की दिशा इसी प्रमाण वृत्ति के जागरण की ओर मोड़नी होगी। लालसाओं, वासनाओं एवं कामनाओं का नशा उतरते ही मन की विपर्यय का अवसान हो जाता है।
तीसरी वृत्ति विकल्प अथवा कल्पना है। यह मन की बड़ी अद्भुत शक्ति है। सामान्य जन इस शक्ति का दुरुपयोग करते हुए प्रायः ख्याली पुलाव पकाते रहते हैं। लेकिन जिन्हें इस शक्ति का थोड़ा-बहुत सदुपयोग करना आ जाता है, वे कवि या कलाकार बन जाते हैं। इस विकल्प वृत्ति का उत्कृष्ट उपयोग ही उनकी कला की उत्कृष्टता की पहचान बनता है। गुरुदेव कहते थे विकल्प वृत्ति या कल्पना साधारण चीज नहीं है। यह योगियों, साधकों एवं मनस्वियों की चेतना शक्ति का माध्यम बनती है। इसके माध्यम से उनके प्राण प्रवाहित होते हैं। पश्चिम में एक मनोवैज्ञानिक हुए हैं- ‘कुए’। उसने अपने अनगिनत प्रयोगों से कल्पना शक्ति के चमत्कार को साबित कर दिखाया। उसने इस शक्ति का प्रयोग बड़े कठिन एवं जटिल रोगों से ग्रसित लोगों पर किया। अपने प्रयोगों में उसने इन रोगियों से कहा- ‘तुम अपने मन में प्रगाढ़ कल्पना करो कि मैं स्वस्थ हो रहा हूँ। अपना हर पल-हर क्षण इसी कल्पना में बिताओ।’ इस प्रयोग से कुए ने लाखों असाध्य रोगियों को ठीक किया।
अब तो पश्चिम में फेथ हीलिंग की एक समूची प्रक्रिया ही चल पड़ी है। यह और कुछ नहीं कल्पना शक्ति की प्रगाढ़ता से होने वाले परिणामों की चमत्कारी विधि है। इसकी महत्ता को न समझ करके हम इस बेशकीमती शक्ति का भारी दुरुपयोग करते हैं। परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे- कल्पना का सर्वश्रेष्ठ उपयोग शाश्वत अनन्तता की अनुभूति में है। विश्व चिन्तन ने मनुष्य जाति को जो सर्वश्रेष्ठ कल्पनाएँ दी हैं, उनमें श्रेष्ठतम कल्पनाएँ उपनिषदों में है। इनमें से किसी एक को भी अपनाकर हम अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं। सोऽहम्, अहं ब्रह्मास्मि जैसे श्रेष्ठतम महत्त्वाकाँक्षाओं को जीवन में धारण कर कल्पना शक्ति की सहायता से उस परम तत्त्व की अनुभूति पायी जा सकती है।
मन की चौथी वृत्ति निद्रा है। निद्रा मन की अद्भुत जीवनदायिनी शक्ति है। चिकित्साशास्त्री हमें बताते हैं कि नैसर्गिक निद्रा शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बहुत अनिवार्य है। वैसा इसका अध्यात्मिक पक्ष भी है। हालाँकि इससे विरले साधक ही परिचित हो पाते हैं। सामान्य लोग तो नैसर्गिक निद्रा का भी आनन्द नहीं उठा पाते। क्योंकि निद्रा मन की समग्र निर्विषय अवस्था है। कोई क्रिया, कोई चेष्टा मन में नहीं है, ऐसी अवस्था। जिसमें मन को सम्पूर्ण विश्रान्ति है। यह बड़ी सुन्दर, सुमधुर एवं जीवनदायिनी अवस्था है। पर इसका लाभ कम ही लोग उठा पाते हैं। अधिकाँश तो स्वप्नों के मकड़जाल में उलझते रहते हैं। वे निद्रा के आनन्दमय संगीत से हमेशा वंचित रहते हैं।
जबकि योग साधक आचार्य शंकर के शब्दों में ‘निद्रा समाधिस्थितिः’ का आनन्द उठाते हैं। क्योंकि मन की समग्र निर्विषय अवस्था में यदि जागरुक हुआ जा सके तो समाधि फलित हो जाती है। सचमुच ही निद्रा में सब कुछ वैसा ही होता है जैसा कि समाधि में होता है। बस जागरुकता नहीं होती। आन्तरिक जागरुकता सध जाने पर भी शरीर सोया रहता है, मन विश्रान्ति में रहता है, और आन्तरिक चेतना पूर्णतया जाग्रत् होती है। परम पूज्य गुरुदेव की निद्रा ऐसी ही होती थी। सामान्य साधक इसमें धीरे-धीरे उतर सकते हैं। इस भावदशा में उतरने पर निद्रा समाधि का आनन्दोल्लास बन जाती है।
मन की पांचवीं एवं अन्तिम वृत्ति है- स्मृति। इस शक्ति का भी जीवन में प्रायः दुरुपयोग ही होता है। यदि जो घटना जैसे घटी है, उसे ठीक तरह से याद रखकर उसकी सच्चाई को जाना जाय तो एक अनूठी ध्यान साधना जन्म लेती है। पर हममें से प्रायः किसी के जीवन में ऐसा हो नहीं पाता। हमारा अपना जीवन तो बस स्मृतियों का एक बड़ा गोदाम भर है। जिसमें अगणित स्मृतियाँ यूँ ही बेतरतीब पड़ी हुई हैं। कौन स्मृति कहाँ किस स्मृति में जा मिली है। कोई ठिकाना नहीं है। स्मृतियों की यह गड़बड़ जब तब हमारे सपनों में उलझती रहती है। ध्यान साधना ही वह उपाय है, जिससे कि स्मृति को योग साधना का रूप दिया जा सकता है। भगवान् बुद्ध ने इसीलिए ध्यान को ‘सम्यक् स्मृति’ भी कहा है। इस साधना से अपने अतीत को अपने विगत जन्मों को जानकर एक नए साधनामय जीवन की सृष्टि की जा सकती है।
साधनामय जीवन के लिए मन की ये पाँचों वृत्तियाँ महत्त्वपूर्ण है। महर्षि पतंजलि ने अपने इस छठे सूत्र में केवल इनके नाम भर बताए हैं। इसमें प्रत्येक का समग्र परिचय उन्होंने समाधिपाद के अगले सूत्रों में दिया है। इस क्रम में उन्होंने प्रत्येक वृत्ति के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए एक-एक सूत्र की रचना की है। इन सूत्रों की व्याख्या से ही उन रहस्यों का उद्घाटन हो सकेगा, जो साधकों की अन्तर्यात्रा के लिए अनिवार्य है। इस क्रम में अखण्ड ज्योति के अगले अंक में प्रमाणवृत्ति के स्वरूप एवं साधना को स्पष्ट किया जाएगा। तब तक साधकगण इन पाँचों वृत्तियों के सामान्य परिचय के सत्य को अपनी अंतर्चेतना में आत्मसात करें।
बुँदेलखंड के एक साधारण जैन परिवार में जन्मे गणेश प्रसाद वर्णी शिक्षा प्राप्त करने के उपराँत परिव्राजक जीवन व्यतीत करने लगे। यों उनका समुदाय पूजा-पाठ को ही सब कुछ मानता था, पर वर्णी जी ने देश की स्थिति का सूक्ष्म अन्वेषण करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि इन दिनों शिक्षा प्रचार ही सबसे बड़ा धर्म-कर्म है।
उन्होंने सागर में दिगंबर जैन विद्यालय की स्थापना की, पर पीछे वे अपना यति स्वरूप यथावत बनाए रहते हुए भी जनसाधारण में शिक्षा प्रचार करने लगे। उनके प्रयत्न से कितने ही यति परिव्राजकों ने अध्यापन कार्य सँभाला और गाँव-गाँव विद्यालयों की स्थापना करने में जुट गए।
अंधविश्वासी व्यक्ति यति को मोक्ष प्रयासों से कुछ हटकर काम करते देखकर नास्तिक तक कह बैठते थे, पर उनके विवेक ने जो उचित समझा, उसी पर जीवनभर डटे रहे। वे कभी भी तथाकथित धर्माचार्यों के आक्षेपों, उपालंभों से विचलित नहीं हुए। अंततः उनके प्रयासों को जन प्रशस्ति मिली। लोगों ने धर्म का सही अर्थ समझा।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय में साधना संकाय के अंतर्गत ‘धर्म विज्ञान केन्द्र’ की विधिवत स्थापना हो गयी। इस धर्म विज्ञान केन्द्र या सेण्टर ऑफ थियोलॉजी का उद्देश्य धर्म के मर्म को बताने वाले विभिन्न तत्त्वों, सत्यों, सूत्रों एवं व्यावहारिक क्रियाओं की गहन शोध एवं व्यापक शिक्षण व प्रसार है। आज के दौर में यह विचित्र एवं आश्चर्यपूर्ण विडम्बना है कि भ्रान्तियों से मुक्ति दिलाने वाला धर्म स्वयं ही भ्रान्तियों के महाघटाटोप से बुरी तरह से घिर गया है। धार्मिक संवेदना साम्प्रदायिक कट्टरता के विष दंशों से छटपटाती हुई मूर्छित प्राय है। धर्म के नाम पर केवल कुछ रीति रिवाजों, रूढ़ियों, मान्यताओं एवं परम्पराओं को निभाने का प्रचलन है। भले ही वर्तमान युग में उनकी कोई सामयिक उपयोगिता, आवश्यकता एवं औचित्य हो अथवा फिर न हो। धर्म को मात्र लकीर पीटे जाने की प्रथा मान लिए जाने के कारण आज इसे विश्व भर के बुद्धिजीवियों, मनीषियों व वैज्ञानिकों की घोर उपेक्षा सहनी पड़ रही है। इसके औचित्य पर नित्य नए प्रश्न चिह्न लग रहे हैं।
युग की आवश्यकता
इस स्थिति से जूझना और उबरना युग की आवश्यकता है। और इसे पूरा करने का उपाय एक ही है कि धर्म के स्वरूप एवं उपयोगिता पर आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में गहन शोध-अनुसंधान हो। अनुसंधान प्रविधि से जाँचे-परखे और खरे पाए गए निष्कर्षों के आधार पर धर्म शिक्षण व प्रसार की व्यापक व्यवस्था बनायी जाय। इसके लिए आयु, योग्यता एवं जीवन की वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप विभिन्न स्तर के पाठ्यक्रम तैयार किए जाएँ। उदार, भावनाशील, विचारवान एवं धर्मतत्त्व के प्रति गहन रुचि रखने वाले विद्यार्थियों का चयन हो। तदनुरूप अध्यापन के लिए सुयोग्य ऋषिकल्प जीवन जीने वाले आचार्य हों। जिन्हें यह अनुभूति हो कि धर्म का सही अर्थ मानव मात्र के प्रति प्रेम एवं मनुष्य में अन्तर्निहित दैवी संवेदनाओं एवं सम्भावनाओं का विकास है। साथ ही ऐसा वातावरण हो जहाँ महर्षियों की तप ऊर्जा का प्रखर तेज एवं सघन धार्मिक भावनाएँ सदा ही उमड़ती-उफनती रहें।
असंभव को सम्भव करने वाला पुरुषार्थ
कहा जा सकता है कि पाश्चात्य संस्कृति की भौतिकतावादी बाढ़ से ग्रसित जीवन में यह सब एकदम असम्भव है। ऐसा करना तूफानी चक्रवातों में दीप जलाने जैसा है। परिस्थितियों की यह सच्चाई कितनी ही दारुण क्यों न हो, पर शान्तिकुञ्ज के संचालन एवं निर्देशन में काम कर रहे देव संस्कृति विश्वविद्यालय का उद्देश्यनिष्ठ संकल्पवान साहस भी कुछ कम नहीं। विश्वविद्यालय की एकजुट समर्पित टीम ने युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव की वरद्छाया में प्रचण्ड तूफानों में महादीप प्रज्ज्वलन का साहस करते हुए असम्भव को सम्भव करने वाला पुरुषार्थ पूरा कर दिखाया है। इन कुछ ही महीनों में धर्म विज्ञान केन्द्र की स्थापना के साथ, इसके संचालन के लिए जरूरी सभी आवश्यकताओं को अनिवार्यता मान कर पूरा कर लिया गया है। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में वर्षों से चल रही शोध प्रक्रिया के निष्कर्षों को ही पाठ्यक्रम का आधार बनाया गया है। सर्टिफिकेट, पी.जी डिप्लोमा, ग्रेजुएट एवं पोस्ट ग्रेजुएट आदि विविध स्तरीय पाठ्यक्रमों का निर्माण धर्म के तत्त्व का गहन ज्ञान रखने वाले मेधा सम्पन्न मनीषी कर रहे हैं। इनमें त्रैमासिक सर्टीफिकेट पाठ्यक्रम तैयार भी हो चुका है।
इन पाठ्यक्रमों का अध्यापन करने के लिए ऋषिकल्प आचार्यों की सेवाएँ भी दैवी कृपा ने जुटा दी है। रही बात वातावरण की सो युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव की तपश्चेतना एवं उनकी दिव्य तपस्थली शान्तिकुञ्ज के संरक्षण ने देव संस्कृति विश्वविद्यालय को स्वाभाविक रूप से दिव्य वातावरण प्रदान किया है। देवात्मा हिमालय की सुरम्य छाँव एवं माता गंगा की लहरों के आँचल में बसे देव संस्कृति विश्वविद्यालय में धार्मिक चेतना सदा-सर्वदा अविराम तरंगित होती रहती है। इतिहास के जानकर एवं पुरातत्त्व विशेषज्ञ यहाँ पुरातन महर्षियों की धर्म साधना की बात मुक्त कण्ठ से स्वीकारते हैं। पौराणिक कथाओं के अनेकानेक प्रसंग भी इस सत्य की साक्षी देते हैं। तपश्चेतना एवं धर्म भावना की अदृश्य तरंगों से किस तरह यहाँ का दृश्य जीवन हिलोरे लेता रहता है, इसे केवल अनुभूति से जाना जा सकता है। इस सुयोग, सौभाग्य से लाभान्वित होने वाले लोकसेवी एवं धर्मप्राण विद्यार्थी भी स्वाभाविक रूप से आ जुटे हैं। इन सभी विद्यार्थियों की एक ही आशा और एक ही अरमान है कि वे अपने जीवन में धर्म के मर्म को साकार कर लें और दूसरों को उसका सुगम बोध करा सकें।
धर्म विज्ञान केन्द्र के उद्देश्यों का बिन्दुवार स्पष्टीकरण
धर्ममय जीवन के लिए समस्त सुयोग, सौभाग्य, साधन और साधना को अपने में समेट लेने वाले धर्मविज्ञान केन्द्र के उद्देश्यों का बिन्दुवार स्पष्टीकरण कुछ इस तरह से किया जा सकता है-
1. साम्प्रदायिक कट्टरता को मिटाकर धार्मिक सद्भाव का जागरण।
2. सर्वधर्म समभाव व विश्वधर्म समभाव का विकास।
3. विभिन्न धर्मों की एकता को सिद्ध करने वाले सत्यों का शोध-अनुसन्धान।
4. धर्म के शाश्वत व सनातन तत्त्व की शोध में सहायक विभिन्न साधनात्मक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अनुसंधान।
5. विभिन्न धर्मों के वैयक्तिक एवं सामाजिक पहलुओं पर दार्शनिक एवं वैज्ञानिक अनुसन्धान।
6. सनातन धर्म सहित अन्यान्य धर्मों के प्रवर्तकों एवं महापुरुषों के आदर्शों का शिक्षण।
7. मानव में दैवी संवेदनाओं, दैवी भावनाओं व दैवी सामर्थ्यों का विकास।
8. सर्वधर्म समभाव की धार्मिक सहिष्णुता को आधार बनाकर धर्म प्रचारकों, धर्म विशारदों, धर्म विचारकों एवं धर्म विशेषज्ञों की नयी पीढ़ी का निर्माण।
भावभरी शुरुआत
इन उद्देश्यों की पूर्ति के क्रम में एक भावभरी शुरुआत प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम के रूप में की गयी है। तथा इसमें प्रवेश हेतु योग्यता इंटर मीडिएट अथवा हाई स्कूल के साथ दो वर्षों का लोकसेवा अनुभव है। पाठ्यक्रम की अवधि त्रैमासिक है। इस पाठ्यक्रम के निर्माण एवं शिक्षण में कुछ निम्न तत्त्वों का विशेष ध्यान रखा गया है-
1. सनातन धर्म सहित अन्यान्य धर्मों के मूलमत, तत्त्वों एवं सूत्रों की आवश्यक जानकारी।
2. उपासना-साधना एवं आराधना जैसे जीवन सूत्रों पर आस्था। उन्हें जीवन में अपनाते हुए सीखने, सिखाने की प्रारम्भिक दक्षता।
3. किसी देवालय में श्रेष्ठ पुरोहित की भूमिका निभाने में सक्षम।
4. ब्राह्मण जीवन- सादा जीवन एवं उच्च आचार विचार का नैष्ठिक साधक।
5. देवालय के रख-रखाव एवं पूजन क्रम को सम्भालने की क्षमता,
6. जन संपर्क की मर्यादाओं के अनुपालन के साथ संपर्क बढ़ाने में कुशलता।
7. धर्मतंत्र से लोकशिक्षण, कीर्तन, सत्संग, विभिन्न संस्कारों को सम्पन्न कराने व बाल संस्कार शाला जैसे कार्यों हेतु आवश्यक योग्यता का विकास।
भावी सम्भावनाएँ
प्रमाण पत्र के त्रैमासिक पाठ्यक्रम के अतिरिक्त धर्म विज्ञान केन्द्र की भावी सम्भावनाएँ भी अनेकों हैं। इन भावी संभावनाओं में प्रथम- एक वर्षीय पी.जी. डिप्लोमा पाठ्यक्रम का प्रारम्भ है। इसके माध्यम से प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम में अर्जित की गयी विशेषताओं को और अधिक उन्नत स्तर का बनाया जाएगा। पी.जी. डिप्लोमा में प्रवेश लेने वाले छात्र किसी पीठ, आश्रम या संस्थान में साधनात्मक वातावरण बनाने व पूरे क्षेत्र को अनुप्राणित करने, सहयोग जुटाने व सामान्य प्रशिक्षण चलाने में सक्षम होंगे। इस डिप्लोमा पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु योग्यता स्नातक स्तर है। पी.जी. डिप्लोमा के अलावा पोस्ट ग्रेजुएट स्तर का एक और पाठ्यक्रम धर्म विज्ञान केन्द्र के अगले सत्र में शुरू किए जाने की सम्भावना है। इस पाठ्यक्रम के द्वारा छात्र-छात्राएँ धर्म विज्ञान में विशेषज्ञ स्तर की निपुणता अर्जित कर सकेंगे। इसके माध्यम से उन्हें भारतीय संस्कृति के अंतर्गत आने वाली विभिन्न परम्परागत साधना विधियों का सम्यक् बोध कराया जाएगा। साथ ही उनमें विश्व के किसी भी क्षेत्र या धर्म, सम्प्रदाय के प्रति निष्ठ रखने वाले प्रबुद्ध जनों को जीवन साधना के प्रति आस्थावान बनाने की क्षमता विकसित की जा सकेगी। वे स्वयं भी उपासना, साधना व आराधना के क्षेत्र में अच्छी प्रगति कर सकेंगे। और उनमें साधकों की जिज्ञासाओं एवं समस्याओं के समाधान की सम्यक् सामर्थ्य का विकास हो सकेगा।
शोध परियोजनाएँ
इन सुखद सम्भावनाओं के अतिरिक्त धर्म विज्ञान केन्द्र में महत्त्वपूर्ण शोध परियोजनाओं को भी तैयार किया जा रहा है। यह शोध कार्य सनातन धर्म के साथ अन्य सभी धर्मों की साधना प्रणालियों एवं नैतिक अनुशासनों की उपयोगिता पर किया जाएगा। इस क्रम में मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से साधना व नैतिक अनुशासनों के विधेयात्मक प्रगतिशील पक्षों का प्रतिपादन किया जा सकेगा। इसमें भागीदार होने वाले शोधछात्र अपने में शोध के अनुरूप प्रायोगिक प्रतिफल उत्पन्न करने का विश्वास और कौशल भी विकसित करने में समर्थ हो सकेंगे। धर्म विज्ञान केन्द्र में इन दिनों तैयार की जा रही शोध योजनाओं में धर्म के अत्यन्त गूढ़ तत्त्वों की रहस्यमयता की वैज्ञानिकता को प्रकट करने का प्रयास किया जा रहा है।
सहयोग हेतु आमंत्रण
संक्षेप में देव संस्कृति विश्वविद्यालय में नव स्थापित धर्म विज्ञान केन्द्र धर्म जगत् एवं धर्मावलम्बियों की सुखद एवं उज्ज्वल आशाओं का प्रतीक है। यहाँ की गतिविधियाँ एवं क्रियाकलाप जाति-क्षेत्र की, सम्प्रदाय की सारी संकीर्ण सीमाओं से मुक्त है। भारत के किसी भी कोने सहित विश्व के किसी भी भू-भाग में रहने वाले और किसी भी धर्म में अपना विश्वास रखने वाले लोग यहाँ के अध्ययन एवं शोध कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी निभा सकते हैं। यहाँ पर आमन्त्रण उन आस्थावानों को भी है, जो अपनी धार्मिक भावनाओं की उज्ज्वल परिणति का साक्षात्कार करना चाहते हैं। देश और विश्व के प्रत्येक धर्म प्रवण नागरिक का भावनात्मक एवं आर्थिक सहयोग इस नव स्थापित धर्म विज्ञान केन्द्र के विकास-विस्तार के लिए आमंत्रित है। इस सम्बन्ध में किसी आवश्यक जानकारी के लिए कुलाधिपति, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार अथवा कुलपति, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार के पते पर पत्र लिखकर संपर्क किया जा सकता है।
संक्षेप में देव संस्कृति विश्वविद्यालय में नव स्थापित धर्म विज्ञान केन्द्र धर्म जगत् एवं धर्मावलम्बियों की सुखद एवं उज्ज्वल आशाओं का प्रतीक है। यहाँ की गतिविधियाँ एवं क्रियाकलाप जाति-क्षेत्र की, सम्प्रदाय की सारी संकीर्ण सीमाओं से मुक्त है। भारत के किसी भी कोने सहित विश्व के किसी भी भू-भाग में रहने वाले और किसी भी धर्म में अपना विश्वास रखने वाले लोग यहाँ के अध्ययन एवं शोध कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी निभा सकते हैं। यहाँ पर आमन्त्रण उन आस्थावानों को भी है, जो अपनी धार्मिक भावनाओं की उज्ज्वल परिणति का साक्षात्कार करना चाहते हैं। देश और विश्व के प्रत्येक धर्म प्रवण नागरिक का भावनात्मक एवं आर्थिक सहयोग इस नव स्थापित धर्म विज्ञान केन्द्र के विकास-विस्तार के लिए आमंत्रित है। इस सम्बन्ध में किसी आवश्यक जानकारी के लिए कुलाधिपति, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार अथवा कुलपति, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार के पते पर पत्र लिखकर संपर्क किया जा सकता है।
एक साधु तीर्थयात्रा पर निकले। मार्ग व्यय के लिए किसी सेठ से कुछ माँगा, तो उसने कुछ दिया तो नहीं, पर अपना एक काम सौंप दिया। एक बड़ा दर्पण हाथ में थमाते हुए कहा, प्रवासकाल में जो सबसे बड़ा मूर्ख आपको मिले, उसे दे देना। संत बिना रुष्ट हुए उसका काम कर देने का वचन देकर दर्पण साथ ले गए। बहुत दिन बाद वापस लौटे, तो सेठ को बीमार पड़े पाया। संग्रहीत धन से वे न अपना इलाज करा पाए और न किसी सत्कर्म में लगा पाए। मरणासन्न स्थिति में संबंधी, कुटुँबी उनका धन-माल उठा-उठाकर ले जा रहे थे। सेठ जी को मृत्यु और लूट का दुहरा कष्ट हो रहा था। साधु ने सारी स्थिति समझी और दर्पण उन्हीं को वापस लौटा दिया। कहा, आप ही इस बीच सबसे बड़े मूर्ख मिले, जिसने कमाया तो बहुत, पर सदुपयोग करने का विचार तक नहीं उठा।
कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए भारत के माने हुए इंजीनियर बनने में सफल हुए विश्वेश्वरैया ने अपनी आत्मकथा में उन सिद्धाँतों पर प्रकाश डाला है, जिनके कारण वे प्रगति पथ पर अग्रसर हो सके। पुस्तक का नाम है, मेमायर्स ऑल माई वर्किंग लाइफ।
वे लिखते है- मैंने चार सिद्धाँतों को आदि से अंत तक अपनाए रखा। जो मेरी ही तरह सफल जीवन जीना चाहते है, उन्हें उन्हीं का स्मरण दिलाना चाहता हूँ और अनुरोध करता हूँ कि इन्हें मेरी ही तरह अपनाएँ। वे सिद्धाँत इस प्रकार है-
1. लगन से काम करो। मेहनत से जी न चुराओ। आराम कड़ी मेहनत के उपराँत ही अच्छा लगता है।
2. निर्धारित कामों का समय नियत करो। समय पर काम करने की आदत डालने से काम अधिक भी होता है और अच्छा भी।
3. यह सोचते रहो कि आज की अपेक्षा कल किस तरह अधिक अच्छा काम हो। जो सीख चुके हो, उससे अधिक सीखने का प्रयत्न करो। सोचो, योजना बनाओ, गुण-दोषों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के उपराँत काम में हाथ डालो।
4. अहंकारी न बनो। नम्रता का स्वभाव बनाओ। साथियों के साथ मिल-जुलकर काम करने की आदत डालो।
इसके विपरीत येन-केन-प्रकारेण सफलता पा लेने वालों को तो एक दिन अपमान, असंतोष और असफलता का ही मुँह देखना पड़ता है।
जून, 1977 में गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज में दिया उद्बोधन (पूर्वार्द्ध)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो, क्रिया और विचार इन दोनों बातों का समन्वय अगर आप कर डाले, तो चमत्कार पैदा हो जाएगा। बया नाम का एक पक्षी होता है। जब वह अपना घोंसला बनाता है, तो कैसी तबियत से बनाता है, कैसे मन से बनाता है कि छोटे-छोटे तिनकों का एक-एक चुनकर के लाता है। उन्हें गूँथकर ऐसा बढ़िया घोंसला बना देता है कि क्या मजाल है कि अंडा हवा के झोंके से तबाह हो जाए? क्या मजाल है कि कौआ उसमें झपट्टा मार दे? उसमें उसके बच्चे मौज साथ बैठे देखते रहते है। कोई आदमी सड़क पर से जब निकलता है, तो उस घोंसले को देखता रह जाता है कि यह बया का घोंसला है। कितना शानदार घोंसला है। हर जगह से उसकी प्रशंसा होती है। बया स्वयं प्रसन्न रहती है और देखने वालों की तो तबियत बाग-बाग हो जाती है।
मित्रो, क्या विशेषता है बया में? कोई विशेषता नहीं है। बेटे, मन लगाकर कोई भी काम करो, तो शानदार होता है। मन लगाकर काम नहीं किया जाए, तो बेटे उसका सत्यानाश हो जाता है। एक पक्षी का नाम है- कबूतर। कबूतर बया की तुलना में चार-पाँच गुना बड़ा होता है। इतना बड़ा होता है, पर घोंसला कैसे बनाता है? बया का घोंसला जरा आप देखना और कबूतर का भी घोंसला देखना। वह बड़ी-बड़ी लकड़ी बीनकर ले आता है और एक इधर रख दी, एक उधर रख दी और एक किधर को रख लेता है और उसमें ही अपने अंडे देने लगता है। उस पर ही बैठा रहता है। हवा का झोंका आता है, बस घोंसला गिरता है नीचे और कबूतर गिरता है ऊपर। अंडे फूटकर अलग हो जाते है, बच्चे मरकर जहन्नुम चले जाते है। उसकी सारी-की-सारी व्यवस्था गड़बड़ा जाती है और देखने वाले कहते है कि यह कबूतर बेअकल है, कैसा बेवकूफ है।
काम में मन लगाइए
बेटे, मैं क्या कहता हूँ? यह कहता हूँ कि अपने सामान्य जीवन के सारे क्रियाकलाप, चाहे वे बहिरंग जीवन के हों या अंतरंग जीवन के, मामूली काम के लिए भी अगर आपने काम में तबियत नहीं लगाई, आपने मन नहीं लगाया, जब काम बड़ा फूहड़, कुरूप, बेसिलसिले का, बेहूदा, बेढंगा हो जाएगा। अगर किसी काम में मन लगा दिया जाए, तो उसमें एक चमत्कार दिखाई पड़ेगा, जादू दिखाई पड़ेगा। मन लगाकर किए हुए काम और बिना मन लगाए किए हुए कामों में जमीन-आसमान का फरक होता है। स्पष्ट दिखाई देता है कि यह मन लगाकर किया गया है या नहीं। यह मशीन हमारे सामने रखी है। इसमें दो तार हैं, एक निगेटिव कहलाता है। और एक पॉजिटिव कहलाता है। इन्हें ठंडे और गरम तार भी कहते हैं। दोनों मिल जाते है तो करंट चालू हो जाता है और अगर दोनों को अलग कर देते है, तो एक तार बेकार सा हो जाता है, दूसरा भी बेकार पड़ा हुआ है, कुछ काम आता नहीं। शरीर को हम अलग कर दें और मन को हम अलग कर दे, दोनों का हम समन्वय न करे, तो हमारे जो भी काम होगे बेसिलसिले के और बेहूदे होंगे।
मित्रो, एक काम है भजन। भजन के संबंध में भी यही बात है। बिना मन से किया हुआ भजन और मन से किए हुए भजन में जमीन-आसमान का फरक होता है। बिना मन से किया हुआ भजन ऐसा है, जिसमें केवल जबान की नोंक की लपालपी और हाथों की उँगलियों की नोंक की हेराफेरी की क्रिया भर होती रहती है। चावल यहाँ रख दिया, नमस्कारं करोमि, जैसी क्रियाएँ, दीपक इधर का उधर किया, आरती उतार दी, यह कर दिया, वह कर दिया। हाथों की हेराफेरी, वस्तुओं की उलटा पलटी और जीभ की लपालपी, बस भजन हो गया। अच्छा तो हो गया अनुष्ठान, हो गई साधना? नहीं बेटे, कुछ नहीं हुआ। यह तो केवल शारीरिक क्रिया हुई है। शरीर की क्रियाओं का जो फल मिलना चाहिए बस वही मिलता है। इससे ज्यादा कुछ और फल नहीं मिल सकता।
मन क्यों भाग जाता है
मित्रों, अगर साधना का चमत्कार आपको देखने का मन हो और साधना से सिद्धि की जो बात बताई गई है, वह करना हो तो आपको पहला काम क्या करना पड़ेगा? आपको सबसे पहले अपने काम में मन लगाना पड़ेगा। कोई भी काम हो, जिसमें भजन भी शामिल है, मन लगाकर करना पड़ेगा। भजन के साथ में मन लगाना चाहिए। मन लगाने से क्या मतलब है? मन लगाने से मतलब यह है कि मन भागना नहीं चाहिए और उपासना में लगना चाहिए। महाराज जी, यही तो हमको शिकायत है। क्या शिकायत है? मन भाग जाता है, अच्छा तो आपका यह शिकायत है। चलिए हम बताते है, फिर मन भाग जाए तो आप हमसे कहना। अब क्या करे? बेटे, मन को किसी काम में लगाया जाए। मन की बनावट ऐसी है कि जब कोई काम नहीं होगा तो मन भाग जाएगा। जब मन के भागने की आप शिकायत करते हैं, तो मैं हमेशा उसका उत्तर यह देता हूँ कि शायद आपने मन को किसी काम में नहीं लगाया। मन को काम में नहीं लगाया जाएगा तो मन भागेगा ही। घोड़े को आप काम में लगा दीजिए ताँगे में लगा दीजिए, सवारी में चला दीजिए, कहीं भी लगा दीजिए तो घोड़ा काम में लगा रहेगा, घोड़े को आप खोल दीजिए, उसके गले में से रस्सी खोल दीजिए फिर देखिए घोड़ा भागेगा ही। फिर आप कहेंगे कि साहब हमारा घोड़ा भाग गया। बैल को आप खाली छोड़ दीजिए, वह भाग जाएगा।
मित्रों, उपासना के समय भी हम अकसर अपने मन को खाली छोड़ देते है, छुट्टल छोड़ देते हैं। उसको कोई काम सौंपते नहीं, कोई जिम्मेदारी सौंपते नहीं, इसीलिए मन भाग जाता है। मन भागेगा नहीं तो क्या करेगा? नहीं साहब! मन भागना नहीं चाहिए। बेटे, मन भागेगा नहीं तो क्या करेगा? भागना तो उसकी आदत है। उसकी तो बनावट ही ऐसी है, उसकी संरचना ही ऐसी है, उसकी इलेक्ट्रॉनिक संरचना ही ऐसे ढंग से की गई है कि उसको भागना चाहिए। भागना तो उसका स्वाभाविक गुण है। अगर वह भागेगा नहीं तो आदमी या तो सिद्धपुरुष हो जाएगा, समाधि में चला जाएगा या फिर पागल हो जाएगा। दो में से एक काम हो जाएगा। मन को तो भागना ही चाहिए। भागना उसका स्वाभाविक गुण है इसलिए उसका कोई कसूर नहीं है। मन का भागना बंद कीजिए। नहीं बेटे, यह नहीं हो सकता।
मन का भागना बंद करने के क्या तरीके है? यह मैं कल आपको समझा रहा था कि उपासना में क्रिया के साथ-साथ मन को भी लगाइए। मन कैसे लगाएँ? बेटे, मैं यही तो समझा रहा था। प्रत्येक क्रिया के साथ क्या संकेत जुड़े हुए हैं, क्या शिक्षण भरा हुआ है, उस पर गौर कीजिए। साथ ही यह भी गौर कीजिए कि किस काम के लिए यह किया जा रहा है। जिस काम के लिए सभी किया जा रहा है, क्रियाएँ जो भी की जा रही है, उनका उद्देश्य क्या है? आम लोगों ने क्रियाओं को यह समझ रखा है कि कोई ऐसी बात नहीं है। कुछ लोगों का यह भी ख्याल है कि क्रियाओं को देखकर भगवान भी प्रसन्न हो जाते है। क्या कर रहे है? बच्चों जैसी उलटी पुलटी हरकतें करते हैं। मम्मी हम यह घर बना रहे हैं। हाँ, बहुत खूब बेटे, अच्छा है घर बनाओ। भगवान जी! हमारे बच्चे को गायत्री मंत्र आता है। कैसा गायत्री मंत्र आता है? “ऊँ भूँ भूँ भूवः”। अच्छा तो तू भी ऐसे ही भूँ भूँ कर लेता है। भगवान जी, वैसे तो समझते है कि आदमी जबान से क्या क्या बकवास कर लेता है। अब चलिए मैं आपके मंत्रों को बकवाद कहता हूँ। जीभ की नोंक से आप क्या वक वक मचाते रहते हैं। उससे भगवान प्रसन्न नहीं होता है। तो क्या केवल हाथों की उलटा पुलटी और जीभ की नोंक की हेराफेरी से भगवान प्रसन्न नहीं होता है? हाँ बेटे, नहीं होता है। तो किससे प्रसन्न होता है? आपके मन से, हृदय से और भावनाओं से।
चेतना व चिंतन का मेल हो
मित्रों, आपका जो वास्तविक अस्तित्व है, जो हाथ नहीं आता है, वह पदार्थ नहीं है, चावल और धूपबत्ती नहीं है, जीभ की नोंक नहीं है। आपका जो वास्तविक अस्तित्व है, जिसके द्वारा भजन किया जाना चाहिए, वह है आपका चिंतन। चेतना चिंतन से ताल्लुक रखती है। चेतना का स्रोत है- चिंतन। चिंतन को कहाँ लगाएँ? सीधी-सी बात है- चिंतन कहाँ लग रहा है यह आप देखें। आप कही लग रहे हो, जीभ कही लग रही हो, वस्तुएँ कही भी रखी हों, माला कहीं भी चल रही हो, पर बेटे, आप यह बताइए कि आपका चिंतन कहाँ लग रहा है? गुरुजी! चिंतन तो भागता रहता है। तो बेटे, भजन कहाँ हो रहा है? चिंतन को लगाने का उद्देश्य यह है कि जिस काम के लिए जो क्रियाएँ कराई जा रही हैं आप उस इशारे पर आ जाइए कि उस इशारे के साथ में आपको क्या चिंतन करना चाहिए?
बेटे, हम सबेरे आत्मध्यान कराते हैं। आत्मध्यान कराने के साथ-साथ सजेशन देते हैं, निर्देश देते हैं। इसका क्या मतलब है? निर्देश से मतलब है कि जिस समय हम जो बात कहें, वैसे ही आपका विचार चलना चाहिए। जो हम कहें वैसी कल्पना कीजिए। हमने कहा, सप्तऋषियों का तपस्थान, आप ध्यान कीजिए कि सात ऋषि बैठे हुए हैं। बड़ा घना जंगल है और सातों ऋषि समाधि लगाए हुए बैठे हुए हैं। यह पुनीत स्थान जहाँ उनके शरीर पेड़ों की सघन छाया में है। आप इस तरह की कल्पना कीजिए, मन स्थिर हो जाएगा। बेटे, आपका मन भाग जाए, तो हमसे कहना। हम जो बताते हैं उसमें आपको ध्यान लगाना चाहिए, फिर देखिए कैसे मन भाग जाएगा। सबेरे हम आपको जो सजेशन देते हैं, उसके हिसाब से आप अपने चिंतन को और अपने विचार करने की श्रेणी को उसी पर स्थापित कीजिए, केंद्रित कीजिए। हमने आपसे कहा- प्रातःकाल का स्वर्णिम सूर्योदय। आप विचार कीजिए कि प्रातःकाल का लाल रँगा सूरज, सबेरे निकलता हुआ बड़ा वाला सूरज, पूरब से निकला, थोड़ा निकला, अभी थोड़ा और बढ़ा, अभी और बढ़ा और पूरा सूरज निकल आया। क्या मतलब है? बेटे, हमने आपसे कहा कि अपने मन को हमारी कही हुई बात पर लगा दें, फिर आपका मन उस काम पर लग जाएगा, तो भागने का सवाल ही नहीं है। यदि काम पर नहीं लगा, तब तो भागेगा ही।
इसलिए क्या करना चाहिए? प्रत्येक क्रिया के लिए जो कर्मकाँड बनाए गए हैं, वे श्रेष्ठ काम के लिए बनाए गए हैं। कर्मकाँड करते समय आपका ध्यान इस क्रिया पर जाए, जो बोलकर तो नहीं बताई गई है, पर क्रिया के माध्यम से बता दी गई है। कल हमने आपको बताया था कि आचमन से हमारी वाणी का परिष्कार होता है। कल जब आप आचमन करे तो यह ध्यान करे, यह विचार करे कि हमारी वाणी का संशोधन हो रहा है। वाणी को हम धो रहे हैं, वाणी को हम साबुन लगा रहे है। वाणी को पत्थर पर पीट रहे हैं, वाणी की ढलाई कर रहे हैं। वाणी पर पानी डाल रहे हैं। जैसे बच्चा गंदा हो जाता है। टट्टी कर आता है, तो उसके ऊपर बाल्टी से पानी डालते हैं, उसे धोते हैं, नहलाते हैं, उसको साफ करते हैं। आप यह विचार कीजिए कि हमारी वाणी जो अभक्ष खाने की वजह से, अवाँछनीय वार्त्तालाप करने की वजह से गंदी हो गई है, इसको हम धोते है और साफ करते है। जैसे धोबी धोबीघाट पर कपड़े ले जाकर पत्थर पर रगड़ता है। आप कल्पना कीजिए कि अपनी जीभ को धोबी की तरह से हम घाट पर ले जाते है और पत्थर पर रगड़कर धोते हैं। पानी का जो हमने आचमन कर लिया, उसके सहारे हम अपनी जीभ को दे पिटाई-दे पिटाई, दे डंडा-दे डंडा और उसका सारा-का-सारा कचूमर निकाल देते है। फिर देखिए कि वह गंदी रहेगी कि साफ होगी? साफ होगी।
साधना ऐसे जीवंत होगी
गुरुजी! और क्या बताएँगे? बता तो रहे है। बेटे, प्रत्येक क्रिया के साथ में चिंतन दिया हुआ है। ऋषियों ने जितने भी कर्मकाँड बनाए है। उनके साथ में चिंतन दिया है। चिंतन के साथ-साथ क्रिया को मिला देंगे, तो मन और क्रिया का समावेश हो जाएगा। यह दो चीजें शामिल हो जाएंगी- विचारणा और क्रिया तो चमत्कार हो जाएगा। विचारणा और क्रिया को मिला देने से हमारा शरीर और मन जिस तरीके से दोनों एक बन जाते है, वैसे ही आपकी साधना जीवंत हो जाएगी। प्रत्येक क्रिया के साथ हम पाँच उपासनाएँ बताते है। पाँच उपासनाओं का मोटा-मोटा स्वरूप हमने पत्रिकाओं में भी छापा दिया था और पिछले साल भी हमने स्वर्ण जयंती साधना भी सिखाई थी। गुरुजी! हम स्वर्ण जयंती साधना वर्ष की साधना करते हैं और भजन भी पैंतालीस मिनट करते हैं। भजन तो करता है बेटा, पर तू एक बात तो बता तो बता कि उस कर्मकाँड के साथ-साथ जो विचार हैं, उनको भी करता है कि नहीं।
नहीं महाराज जी! मैं तो लगा रहता हूँ, बस माला पूरी कर लेता हूँ। माला पूरी कर लेता है तो तेरे लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। तेरे लिए बहुत आशीर्वाद, परंतु बेटा जब माला करता है, तो उसके साथ-साथ विचारों को भी लाता है कि नहीं? महाराज जी, विचार तो मेरे भागते रहते हैं। तो बेटा, भगवान की उपासना तेरी अधूरी है। तेरी उपासना का जो परिणाम मिलना चाहिए था, उससे जिस वातावरण का परिशोधन होना चाहिए था, उस वातावरण का परिशोधन हुआ क्या? जिस उद्देश्य से हमने प्रेरणा दी थी, शक्ति दी थी और दीक्षा दी थी, शिक्षा दी थी। न हमारा उद्देश्य पूरा हुआ न तेरा हुआ और न ही भगवान का। तीनों में से एक का भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ इसलिए क्रिया के साथ-साथ में विचारणा का समावेश करने की शिक्षा मैं हमेशा देता रहा हूँ और देता रहूँगा।
मित्रों, कल मैंने आत्मशोधन की प्रक्रिया आपको बताई थी कि गायत्री पंचमुखी भी है। पाँच कोशों में उसके पाँच मुख है। गायत्री उपासना पाँच चरणों में बँटी हुई है। पहला कृत्य है- आत्मशोधन की क्रिया। आत्मसंशोधन की क्रिया जिसमें हम पाँच कृत्य कराते है। 1. पवित्रीकरण कराते हैं, 2. आचमन कराते हैं, 3. शिखा बंधन कराते हैं, 4. प्राणायाम कराते हैं, 5. न्यास कराते हैं। इन पाँच क्रियाओं का एक उद्देश्य है कि हम अपने पाँचों कोशों को, पाँचों तत्वों को, पाँचों प्राणों को शुद्ध बनाते है। उपासना में पहला काम है सफाई करना। हमारे दिमाग में एक बात आनी चाहिए कि हमको भगवान के चरणों में जाने के लिए नहा-धोकर जाना चाहिए। स्वच्छ और पवित्र होकर जाना चाहिए। हमारे जीवन की क्रियाएँ पवित्र होनी चाहिए। हमारा चिंतन पवित्र होना चाहिए। हमारे साधन पवित्र होने चाहिए और हमारे जीवन की गतिविधियाँ पवित्र होनी चाहिए। अगर हम पवित्रता का पहला उद्देश्य पूरा कर लेते है, तो समझना चाहिए कि पाँच मुख वाली गायत्री की हमारी उपासना सफल हुई।
सर्वप्रथम, जीवन का परिष्कार
गायत्री के पंचकोश जागरण करने की प्रक्रिया में गुरु जी आपने तो ब्रह्मचर्य की बात कही थी। बेटे, हम बताते है कि ब्रह्मचर्य तेरे लिए यही से शुरू होता है। औरों के लिए, बड़ों के लिए हम कुँडलिनी बता देंगे, पर तेरे लिए कुँडलिनी जगाना बेकार है। तेरे लिए तो यही से शुरू होता है। तू यह बता कि तूने अपने जीवन का परिष्कार कर लिया कि नहीं, तभी बेटे बात बनेगी अन्यथा नहीं? हमारे गुरु ने हमें बार-बार बुलाया है। बार-बार बुलाने की शृंखला उन्होंने उस समय से प्रारंभ की जिस समय कि हमारे चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण पूरे हो गए। जब उन्होंने यह देख लिया कि इसने अपना मन, अपना शरीर और अपनी जिह्वा का संशोधन करके इस लायक बना लिया कि हमारी गोदी में आ सकता है, तब उन्होंने अपनी लंबी वाली भुजाएँ फैलाई और कहा, अब तो तुझको मेरे पास आना चाहिए। मैंने कहा, पहले क्यों नहीं बुलाया था आपने? मुझे चौबीस साल हो गए, जब तो मैं जवान ही था। उन्होंने कहा, तब तक तू संशोधित नहीं हो सका था। मैंने देखा था कि तेरी सफाई में कमी थी, तेरी शुद्धता में कमी थी। तेरी शारीरिक और मानसिक शुद्धता का जो स्तर होना चाहिए, उसमें मैंने कमी पाई, इसलिए मैंने सोचा कि अभी और निखार लूँ, अभी और तेरे कपड़ों की धुलाई कर लूँ। अब तेरी चड्डी भी धूल गई, तेरा मन भी धुल गया, तेरा सब धुल गया, अब मेरा मन आता है कि तुझे गोदी में लूँ। अपने पिता से मैं लिपटता हुआ चला गया, उनका दूध पीता हुआ चला गया, उनकी शक्ति-सामर्थ्य को प्राप्त करता हुआ चला गया।
मित्रों, संशोधन का यह काम आवश्यक है, उपासना से भी ज्यादा, भजन से भी ज्यादा। कर्मकाँड से भी ज्यादा आवश्यक है। अति आवश्यक है कि आप भी अपना आत्मसंशोधन कर ले, तो बात बने। लोहा तब तक कच्चा रहता है, तब तक उसकी कोई चीज नहीं बन सकती। हमने भिलाई और टाटानगर में कच्चा लोहा देखा। कच्चा लोहा वैगन में भरकर आता था। कच्चा लोहा कहाँ से आता है? साहब! जरा लोहा दिखाना। यह ऐसा लोहा जैसे मिट्टी मिला हो। यह लोहा है। यह कैसा लोहा है? साहब! यही लोहा है। अरे बाबा! यह कैसा लोहा है, यह तो कुछ और ही है। नहीं बाबा! यही लोहा है मिट्टी मिला कच्चा लोहा। बेटे, कैसा लोहा था- मिट्टी थी, भारी-भारी पत्थर थे। तो अब इससे लोहा कैसे निकलेगा? देखिए अब तमाशा दिखाते है कि इसमें क्या-क्या होता है। कच्चा लोहा लिया और तुरंत लेने के बाद उसको भट्टी में डाल दिया, गरम किया, पकाया। पकाने के बाद में मिट्टी अलग होती चली गई और लोहा अलग होता चला गया। एक बार सफाई हो गई। दुबारा लोहे को फिर से भट्टी में डाल दिया, उसमें जो कच्चाई थी, कमजोरी थी, फिर उसमें से साफ हो गई। आगे भी फिर यही प्रक्रिया दोहराई गई। ऐसा होते-होते आखिर में सफाई की प्रक्रिया जब चलती चली जाती है, तो स्टेनलेस स्टील बनती जाती है। स्टेनलेस स्टील कैसी होती है? बेटे, ऐसी होती है, चाँदी जैसी। लोहे में और चाँदी में फर्क नहीं होता है? नहीं साहब! लोहा काला रहता है। नहीं साहब! काला नहीं होता सफेद होता है। लोहा मैला होता है, जंग लग जाती है। नहीं साहब! लोहे को जंग नहीं लगती। स्टेनलेस स्टील को देखिए, इसको जंग नहीं लगती है। तो क्या कच्चा लोहा स्टेनलेस लोहा हो सकता है? हाँ हो सकता है। कब जब लोहे को परिशोधित करते हुए, संशोधित करते हुए चले जाएँ।
सबसे बड़ा योगाभ्यास
मित्रो, वास्तव में जीवन जीने की विधि भी यही थी। पर हाय रे भगवान न जाने लोगों ने क्या कर दिया लोगों ने क्या व्याख्या कर दी। उपासना को, साधना को लोगों ने जादू मान लिया। अध्यात्म को मनोकामना पूरा करने का जादू मान लिया। यह जादू नहीं है, यह जीवन जीने की कला है। जीवन का संशोधित करने की विधि है। आपका जीवन इतना बड़ा जीवन है कि इस पर हम देवताओं को निछावर करते है, भगवान को हम इस पर निछावर कर सकते है। भगवान से बड़ा है जीवन। वह साक्षात् भगवान है। इस जीवन का परिष्कृत करना अपने आप में सबसे बड़ा योगाभ्यास है। उसे साधना कहिए, उसे तप कहिए, उसे भजन कहिए- इन सबका उद्देश्य भगवान का रिझाना नहीं है, भगवान की खुशामद करना नहीं है, भगवान को फुसलाना नहीं है, भगवान को बहकाना नहीं है। भगवान के आगे तरह-तरह के जाल बिछाना नहीं है। भगवान की उपासना का उद्देश्य एक तो यह है कि हम अपने आपको परिशोधित करते चले जाएँ। अपने आपका परिशोधन करते हुए चले जाएँगे, तो फिर देखेंगे कि क्या कमाल होता है। देखें क्या मजा आता है। देखिए आपके पास कैसे सब चमत्कार आते है। मैं आपसे यही कहने वाला था कि आप अपनी वाणी को संशोधित कर लीजिए, फिर आप अपनी जुबान से कहिए कि तेरा भला हो जाए, आशीर्वाद हो जाए और तेरा कल्याण हो जाए। फिर देखना क्या होता है और क्या नहीं होता है। कैसी-कैसी चीजें उड़ती हुई चली आती हैं।
आप अपनी आँखों को संशोधित कर लीजिए फिर देखिए, कैसे चमत्कार होता है। आँखों का संशोधित कैसे करे? आँखों का संशोधित ऐसे करे जैसे गाँधारी ने की थीं गाँधारी ने कैसे किया था? गाँधारी ने आँखों को संशोधित करने के लिए अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली थी। पट्टी बाँधने का मतलब यह है कि दूसरों की, व्यक्तियों की, नर और नारियों की जो मान्यताएँ है, उससे आप प्रभावित न हो। गाँधारी ने तो अपनी आँखों में पट्टी इसलिए बाँध ली थी कि उसका जो अंधा पति था, उससे उसकी शादी हुई थी, इसलिए उसने अपनी आँखों में पट्टी बाँध ली थी कि मेरा मर्द एक ही है, दूसरा कोई मर्द है ही नहीं। आँखों का संशोधन करने के पश्चात् न कोई जप किया, न तप किया और न कोई पूजा की, न कोई अनुष्ठान किया, न कोई ध्यान किया। गाँधारी ने आँखों में जो पट्टी बाँधी थी, उसका मतलब आपको समझ लेना चाहिए। पट्टी बाँधने का मतलब यह नहीं है कि अपने आप से पट्टी बाँधे। क्यों साहब, सूरदास जी ने अपनी आँखें फोड़ ली थी या फूट गई थी और हम भी फोड़ लें तो क्या भगवान दिखाई पड़ेंगे? बेटे, यह गलती तो मत कर लेना। आंखें फोड़ने से मतलब है कि हमारी जो कमीनी आंखें, दुष्ट आंखें हैं, जो नारी को, मातृशक्ति को विषय वासना के रूप में देखती हैं, तो उन्हें हम फोड़ दें अर्थात् बदल दें। फिर देखना आँखों का चमत्कार कैसे होता है।
गुरुजी, सिद्धियों का दूसरा तरीका बताइए? क्या तरीका बताएँ। कोई ऐसा मंत्र बताइए कि जिससे काली हमारे काबू में आ जाए, देवी हमारे काबू में आ जाए, फलानी हमारे काबू में आ जाए। धूर्त, देवी तेरे काबू में आ जाएगी, तो तेरा कचूमर निकाल देगी। कैसे? वैसे ही जैसे एक बार शुँभ ने अपने दूत से संदेश भेजा, कहा कि देवी तू हमारे काबू में आ जा। काबू से क्या मतलब है। तू हमारी बीबी बन जा। किससे कहने लगा था? चंडी से कि हमारे कहने में चल हमारे या हमारे भाई निशुँभ की सेवा में आ जा। देवी ने कहा, अच्छा आप हमें बीबी बनाना चाहते हैं? हाँ, आप हम पर हुकुम चलाना चाहते हैं? हाँ, आप हमें गुलाम बनाना चाहते हैं? देवी ने कहा, हम आपकी नौकरानी बन सकती हैं और गुलामी भी कर सकती हैं, पर हमने एक प्रतिज्ञा कर रखी है। आपको हमारी एक शर्त माननी पड़ेगी। बोले- क्या?
यो माँ जयति संग्रामे यो में दर्पं व्यपोहति। यो में प्रतिबलो लोके स में भर्ता भविष्यति॥
मैं तुझे अपना पति बनाने को तैयार हूँ और मैं तेरी पत्नी बनने को तैयार हूँ, लेकिन शर्त तो पूरी कर। कैसे पूरी करूं? ‘यो माँ जयति संग्रामे’ जो मुझको संग्राम में जीतेगा। आ जा मुझसे लड़, इतना पराक्रम, इतना पौरुष, इतना साहस दिखा। जितना साहस मुझ में है, इतना ही पराक्रम-पौरुष दिखा और यह कार्य ‘यो में प्रतिबलो लोके स में भर्ता भविष्यति’ संसार में जो मेरे समान बलवान होगा। जो मुझे संग्राम में पराजित कर देगा, हरा देगा, वही मेरा स्वामी होगा। मैं उसी की पत्नी बनूँगी, वरना नहीं बनूँगी। उसने कहा, मैं लड़ने को तैयार नहीं हूँ। तब देवी ने कहा, अब मैं तरी अकल ठीक कर दूँगी।
मित्रो, देवी को आप क्या बनाना चाहते है? देवी को औरत बनाना चाहते हैं, आप देवी के पति बनना चाहते हैं न। कौन बनना चाहता है? पति बनना चाहता है या भक्त बनना चाहता है? यह क्या कह रहा है गंदे मुँह से। बेटे, देवी हमारी माँ है। माँ हुकुम देती है और बच्चे को उसका पालन करना पड़ता है। पति का मतलब यह है कि पति हुकुम देता है अपनी बीबी को, खाना बना देना, थोड़ा काम कर हमारे पैर दबा आकर यही कह रहे थे न कि देवी जी को हमारा हुकुम मानना पड़ेगा, हमारा कहना मानना पड़ेगा। सब पर हुकुम चलाते हैं, गुरु जी को हमारा हुकुम मानना पड़ेगा। देवता को, भगवान को हमारा हुकुम मानना पड़ेगा। क्यों? हमने धूपबत्ती जला दी, आपके ऊपर हमने माला पहना दी। आप हुकुम चला रहे थे हमारे ऊपर? हाँ साहब, हम तो हुकुम चलाएँगे आपके ऊपर, हम तो चेला हैं। बड़ा आया चेला।
अपने मन को भगवान के साथ जोड़ दें
बेटे, आपको क्या करना पड़ेगा? आपको अपने मन को भगवान के साथ देवता के साथ जोड़ देना पड़ेगा। कल हमने आपको बताया था कि परिशोधन की प्रक्रिया के साथ सारे-के-सारे विचार उसमें जुड़े हुए हैं। किसमें? जो हम कर्मकाँड कराते हैं उसके साथ कर्मकाँडों का जादू इतना ही है कि प्रत्येक कर्मकाँड के साथ में शिक्षा भरी पड़ी है। वे सारी-की-सारी शिक्षाएँ आपके हृदयों में गूँजती रहें, दिमागों में चलती रहें। आपके चिंतन और विचारों की धारा वही बहती रहे, तो मैं समझूँगा कि आपने विचारों का और क्रिया का समन्वय कर दिया। (क्रमशः)
सूचना
अंतःऊर्जा जागरण सत्र के लिए स्वीकृति प्राप्त साधक ध्यान दें। शाँतिकुँज, हरिद्वार से स्वीकृति पत्र प्राप्त होते ही सहमति पत्र अवश्य भेज दें, अन्यथा आपका स्थान दूसरे को दे दिया जाएगा। साधना निर्देशिका का ठीक से अध्ययन एवं सभी साधनाओं का एक बार अच्छी तरह अभ्यास भी कर लें। अन्यथा साक्षात्कार में अयोग्य पाए जाने पर सत्र लाभ से वंचित रहना पड़ सकता है।
शरीर से रुग्ण और अति दुर्बल गोर्की, पर दुर्भाग्य; एक के बाद दूसरा आता गया। नाना-नानी के यहाँ पालन-पोषण हुआ। माता उसे इसी स्थिति में छोड़कर दूसरा विवाह करके अन्यत्र चली गई। मामा का दुर्व्यवहार बढ़ता चला, तो उसने 12 वर्ष की आयु से स्वावलंबी होने की बात सोची।
एक स्टीमर पर बरतन माँजने का ऐसा काम मिल गया, जिससे किसी प्रकार पेट भर जाता। दो वर्ष बाद उन्हें रसोई बनाने का काम मिल गया। साथियों में से कुछ कृपालुओं की सहायता से उन्हें वर्णमाला सीखने और पढ़ने-लिखने का अवसर मिला।
उन दिनों रूसी क्राँति की हवा चल रही थी। गोर्की ने निजी रूप से पढ़ाई जारी रखी और क्राँति में भाग लिया। टॉलस्टाय उनसे बहुत प्रभावित थे। लेखन कार्य आरंभ किया, तो उसमें भी वे ऊँची श्रेणी पर पहुँचे। आज लेखकों की दुनिया में गोर्की का नाम मूर्द्धन्य श्रेणी में गिना जाता है।
भाग्य ने जिसे पग-पग पर ठुकराया, परिस्थितियाँ जिसके प्रतिकूल रहीं, ऐसा व्यक्ति विश्वविद्यालय बन गया। इससे उसके पुरुषार्थ को ही सराहा जा सकता है।
युगगीता की विगत कड़ी में बताया गया था कि साँख्य (संन्यास) और कर्मयोग दोनों एक ही हैं, अलग-अलग नहीं। ‘साँख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदंति न पंडिताः’ के गीता में इस अध्याय के चौथे श्लोक के पूर्वार्द्ध के उद्धरण के साथ वह बताने का प्रयास किया गया था कि समझदार लोग, ज्ञानी व्यक्ति साँख्य व योग दोनों को एक-सा फल देने वाला ही मानते हैं, जबकि अज्ञानी, नासमझ व्यक्ति संन्यास व कर्मयोग को भ्रांतिवश अगल-अलग मान लेते हैं। आज के युगधर्म को ही कर्मयोग का पर्याय बताते हुए यह कहा गया था कि यही हम सबके लिए किया जाना वाला कर्तव्य है। भगवान कृष्ण तीसरे श्लोक में कह चुके हैं कि उसी कर्मयोगी को संन्यासी मानना चाहिए, जो न किसी से द्वेष करता है, न राग रखता है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति तो सहज ही बंधनमुक्त हो जाता है। जो इन द्वंद्वों में उलझ जाता है, वह न केवल मनोरोगी बनता है, बंधनों में बँधकर अपनी आध्यात्मिक प्रगति को भी अवरुद्ध कर लेता है। राग द्वेष से मुक्त होना ही संन्यासी मनःस्थिति में प्रवेश करना है। चौथे श्लोक में पंडितों (ज्ञानीजनों- विद्यावानों) एवं बालक की तरह आचरण करने वाले मूर्ख नासमझों के बीच का अंतर योगेश्वर बताते हैं कि जो दोनों को समान फल देने वाला मानकर एक में भी पूरी तरह से निमग्न होकर उसे जीवन में उतार लेता है, वह दोनों का ही फल प्राप्त कर लेता है। (एकमपि स्थितः सम्यक् उभयोः विन्दते फलम) कर्त्ताभाव का मिट जाना ही संन्यास की स्थिति में मनुष्य को प्रविष्ट करा देता है। आज वेश के नाम पर छाई विडंबना व संन्यास वंश की दुर्गति का जिक्र विगत अंक में किया गया। अब आगे बढ़ते हैं।
योग साधन है, साँख्य लक्ष्य
श्री भगवान इस तथ्य को स्थापित करने जा रहे है कि योग साधन है एवं साँख्य (संन्यास की मनःस्थिति) हम सबके लिए लक्ष्य। भोक्ताभाव को हम त्यागें एवं कर्त्ताभाव में प्रवेश करे। भोक्ताभाव को त्यागने के लिए राग-द्वेष से मुक्त हो, मन को तनावरहित बनाएँ, ग्रंथिमुक्त बनाएँ। आसक्ति त्यागें व जिनको हम अपने कर्मों को संपादित करने में बाधक मानते है, उन सभी गतिविधियों से बचें। अहं का त्याग होते ही हमें अंदर विद्यमान ज्योतिर्मान आत्मा की अनुभूति होने लगती है, जो हमें चिरस्थायी शाँति प्रदान करती है। इस प्रकार क्रम हुआ- कर्मयोग, कर्मों में शुचिता, दत्तचित्त होकर निरासक्त भाव से कर्म करना और फिर अपने इस योग की अंतिम परिणति साँख्य में, कर्म संन्यास में करके स्वयं को संन्यासी की मनःस्थिति में ले जाकर परमशाँति-उल्लास व ईश्वरानुभूति की पराकाष्ठा पर ले जाना। कितना सुँदर आध्यात्मिक प्रगति का राजमार्ग योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे है। जीवन जीने की शैली का ज्ञान करा रहे है, एवं उसे मुक्ति के पथ की ओर प्रशस्त कर रहे है। अपनी इस बात को कि किसी भी एक मार्ग का अनुसरण करने से साधक को इष्ट की सिद्धि हो जाएगी, अहंभाव से मुक्ति मिल जाएगी, वे अगले पाँचवें श्लोक में और भी अच्छी तरह स्पष्ट करते हुए कहते है-
यत्साड्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साड्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥ 5/5
ज्ञानयोगी जिस परम पद को प्राप्त करते है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है, इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग (साँख्य) और कर्मयोग के संपादन को एक ही देखता है, उनका फल एक ही मानता है, वही यथार्थ देखता है।
यः पश्यति स पश्यति,
चौथे श्लोक की पुष्टि बड़े सुँदर ढंग से यहाँ की गई है। ज्ञान व कर्म एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखे जाने चाहिए, यह भगवान का मत है। दोनों का ही समापन अहंभाव के विसर्जन में होता है। अहंभाव जाते ही भोक्ताभाव समाप्त हो जाता है और इसी के साथ कर्त्ता का भाव भी तिरोहित हो जाता है। इसी के तुरंत बाद साधक को अपने भीतरी आनंद में अभिवृद्धि की अनुभूति होने लगती है और उसे इन दोनों कथनों का महत्व स्वतः ही दिखाई देने लगता है, ‘यः पश्यति स पश्यति।’ जो यह जानता है कि जो पद साँख्य योगी को प्राप्त होता है (यत्साँख्यते प्राप्यते स्थानं), कर्मयोगी भी वहाँ अपने कर्म का संपादन करते-करते यथासमय पहुँच जाते है (तद्योगैरपि गम्यते) वही वास्तव में द्रष्टा है, मनीषी है, ज्ञानी है।
कर्मयोग की महिमा भगवान द्वितीय अध्याय से ही गाते चल आ रहे हैं। वे उसे संन्यास के समकक्ष ठहराते हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस निष्काम कर्मयोग के संबंध में स्पष्ट कहते हैं, “ईश्वर के साथ किसी तरह से जुड़कर कर्म करते हुए जीना, यही कर्मयोग है। दो मार्ग हैं- कर्मयोग और मनोयोग। जो लोग आश्रम में हैं, उनका योग कर्म के द्वारा होता है- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। संन्यास लोग काम्यकर्म छोड़ दें, किंतु नित्यकर्म कामनाशून्य होकर करें। दंड धारण, भिक्षाटन, तीर्थयात्रा पूजा जप आदि कर्म बिना किसी कामना के करते हुए योग की संसिद्धि को प्राप्त हों।” बड़ा ही स्पष्ट निर्देश है एवं पूरे श्लोक की समुचित व्याख्या भी है। भगवान स्पष्ट कर रहे है कि कर्म के द्वारा ईश्वर के साथ संयोग ही कर्मयोग है। जिस कर्म में भगवान से संबंध स्थापित नहीं होता, वह मात्र कर्म है, कर्मयोग नहीं।
गृहस्थ योगी
श्यामाचरण लाहिड़ी का एक प्रसंग है। वे एक क्लर्क मात्र थे, किंतु उच्चस्तरीय सिद्धि प्राप्त योगी थे। वे प्रसिद्ध संन्यासी-सिद्ध योगी तैलंग स्वामी के पास मिलने आए, तो तैलंग स्वामी खड़े होकर उनको सम्मानास्पद स्थान देकर मिले। तैलंग स्वामी एक अवधूत थे, दिगंबर थे एवं बड़े सिद्ध स्तर के संन्यासियों में उनकी गिनती होती थी। बहुत बड़ा उनका संप्रदाय था, ढेरों शिष्य थे। शिष्यों ने यह दृश्य देखा, तो पूछ बैठे कि आप किसी धोती-कुरताधारी को क्यों खड़े होकर मिले और उन्हें आपने नमन किया, तो तैलंग स्वामी बोले, “जिस कार्य के लिए मुझे लंगोटी पहनकर वर्षों तप करना पड़ा, कठोर साधनाएँ करनी पड़ी, उसे इसने कर्मयोग करते-करते धोती-कुरता पहने ही प्राप्त कर लिया है। इसने कर्मयोग से ही उस कौशल की, सर्वोच्च पद की सिद्धि हासिल कर ली, जिसके लिए संन्यासी वर्षों तप करते रहते है। कठोर तप-तितिक्षा के मार्ग से गुजरते है।” यह उदाहरण बताता है कि साधना से सिद्धि का यह दो नामों वाला एक ही मार्ग है। कोई भी किसी भी एक का अनुसरण कर ले, तो वह परम लक्ष्य का पा लेगा। वह द्रष्टा (यः पश्यति स पश्यति) बन जाएगा।
योगीराज श्यामाचरण जी लाहिड़ी के कई प्रसंग परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से हिमालय के प्रसंगों में, साधना संबंधी गुह्य विवेचनाओं में एवं सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘एक योगी की आत्मकथा’ (एन ऑटोबायोग्राफी ऑफ योगी- स्वा. योगानंद परमहंस) में पढ़ने को मिलते है। रानीखेत (उत्तराँचल) के आगे दुर्गम हिमालय के ऊपरी क्षेत्र में वे मात्र संकल्प से सूक्ष्मशरीर से पहुँच जाते थे एवं ढेरों व्यक्तियों को उनने योग के मार्ग पर प्रशस्त किया था। उनने कर्म को कौशलपूर्वक संपन्न कर अपने अंदर वह शक्ति जाग्रत् कर ली, जो किसी को सब कुछ छोड़कर मिलती है। परमपूज्य गुरुदेव लिखते है कि मनः स्थिति योगी की होनी चाहिए, बहिरंग कैसा भी हो, अंतरंग परिष्कृत होना चाहिए।
नाग महाशय
श्री रामकृष्ण परमहंस के दो शिष्य थे, एक नाग महाशय (डॉ. दुर्गाचरण नाग) जो गृहस्थ थे एवं दूसरे स्वामी विवेकानंद जो संन्यासी थे। नाग महाशय गृहस्थ में भी संन्यासी का जीवन जीते थे। स्वयं स्वामी विवेकानंद जो कि माता के दबावों-परिजनों के आग्रहों के बाद भी जन्म से ही संन्यासी रहे, संन्यास की स्थिति में ही एक आदर्श जीवन जीकर, संक्षिप्त-सा जीवन जीकर गए, अंत तक नाग महाशय को सबसे बड़ा संन्यासी-योगी मानते रहे। वे कहते थे कि नाग महाशय डॉक्टर भी है, इलाज भी करते है, गृहस्थ भी है, पर उससे भी ऊपर सबसे बड़े योगी है। उनकी जो उपलब्धियाँ है, वे बिरले संन्यासी ही प्राप्त कर पाते है, ऐसा उनका मत था। इससे स्पष्ट होता है कि लक्ष्य प्राप्ति में कोई संदेह नहीं होना चाहिए। कर्म कैसे किए जाएँ बस यही समझ लेना जरूरी है। कैसे उनमें ‘परफेक्शन’ लाया जाए यही मर्म समझ में आ जाए तो सिद्धि सुनिश्चित है।
हम स्वयं कई स्थानों पर आज के इस कलियुग में देखते है कि लोगों में गौरिक वस्त्रधारी संन्यासीजनों के प्रति बड़ा ‘क्रेज’ है। इस हद तक पागलपन है कि वे कर्म को गौण समझकर वेश को ही सब कुछ मान उनके जीवन को न देखकर उनसे सिद्धि की आकाँक्षा रखने लगते है। कुछ प्राप्ति के प्रलोभन में ‘स्वामी जी’ के स्पर्श की वस्तु, उनके पाँव की धोवन, उनके हाथ से स्पर्श किया कोई भी पदार्थ स्वीकारने में झिझकने नहीं। स्वयं कुछ कर्म या पुरुषार्थ करना नहीं चाहते। वे किसी चमत्कार की अपेक्षा रखते है। ‘जो स्वयं बहुत निर्बल हो, औरों को वह क्या देगा’ की काव्यपंक्ति के अनुसार वक्तृता की कला में माहिर मात्र संन्यासी वेशधारी व्यक्ति जो निज के जीवन की दुर्बलताओं को नहीं मिटा पाया, औरों को क्या कुछ दे सकेगा, यह सोचना चाहिए। कर्मयोग को तुलाधार वैश्य की तरह, रैक्व की तरह, सदन कसाई की तरह हम ऐसा प्रखर बनाएँ, भगवद् भक्ति इतनी प्रगाढ़ स्तर की बना ले तो स्वतः हम साँख्य-संन्यास से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ पा सकते है।
क्या हो हमारा आदर्श
परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर एक संन्यासी की मनःस्थिति में रहकर प्रचंड पुरुषार्थ किया, एक सद्गृहस्थ का जीवन जिया व औरों के लिए एक मार्गदर्शक जीवन जीकर वे पथ प्रशस्त कर गए। वे कहते थे कि वास्तव में यदि हम युग साधना करते है, तो जो कर्म हम करते है- उनमें पूरी ईमानदारी बरतें। कर्मयोग का आदर्श किसी भी सार्वजनिक-राष्ट्रोत्थान को समर्पित संस्था का क्या होना चाहिए? इस पर पूज्यवर कहते थे, हमारा आदर्श लोकमान्य तिलक होना चाहिए, शहीद भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस होना चाहिए। जो इस तरह युगधर्म का पालन करता है, तो वह व्यापारी हो अथवा अधिकारी पूरी तरह साँख्या में प्रतिष्ठित हो अपने लक्ष्य की सिद्धि तक पहुँच जाता है। स्वार्थ और अहं को त्यागकर अपना सर्वस्व राष्ट्र व समाज के लिए निछावर करने वाला व्यक्ति महामानव पद पाता है। जो युग की चुनौती को स्वीकार करे और अपने-पराये का मान रखकर कर्म करे, तो वह आत्मिक प्रगति स्वयं करता चला जाता है।
परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि जो यह देखता है कि कौन मेरा है, कौन पराया तो वह राग-द्वेष से ग्रसित हो जाता है। राग आया, मोह आया तो फिर परिग्रह आ जाता है, फिर कर्म दूषित होने लगते है। जिन्हें सब अपने दिखाई देते है, वे अपनी, अपने रिश्तेदारों की मोह वाली जिंदगी नहीं जीते। परमार्थपरायण जीवन जीते है, लोकहितार्थाय अपना समग्र पुरुषार्थ करते है। आत्मकल्याण व लोककल्याण का जिसमें सच्चा समन्वय है, वह कर्मयोग का मार्ग ही है, जिसकी विशद् चर्चा भगवान पाँचवे के बाद अब छठे श्लोक में करने जा रहे है।
सर्त्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥
हे अर्जुन, कर्मों के संपादन के बिना कर्मों का त्याग (संन्यास) संभव नहीं है, अर्थात् मन, इंद्रिय और शरीर द्वारा होने वाले संपूर्ण कर्मों में कर्त्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है। योग के आचरण से शुद्ध हुआ भगवत्स्वरूप को मनन करते रहने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।
पहले कर्मयोग का अनुष्ठान करें
कर्मयोग एवं साँख्ययोग अविभाज्य है, एक-दूसरे के पूरक है, तब भी योगेश्वर बार-बार एक ही बाम कह रहे है- विशुद्ध रूप से यज्ञीय भाव से नियत कर्मों का संपादन करो। सीधे साँख्य मार्ग पर जाने की तुलना में यह मार्ग श्रेयस्कर है एवं श्रीकृष्ण द्वारा अनुमोदित है। इस श्लोक में वे कहते है कि पहले कर्मों का संपादन करो, आसक्ति छोड़कर करो, तब तुम्हारे अंदर वह शुचिता जन्म लेगी, जिससे तुम ध्यानयोगी बन सको, ताकि परमात्मा की प्राप्ति का लाभ प्राप्त कर सको, इसीलिए वे कहते हैं कि निष्काम कर्म के अनुष्ठान के बिना संन्यास दुःख प्राप्ति का मार्ग बनकर रह जाता है (संन्यासस्तु दुःखमाप्तुम् अयोगनः)। जो दुःख दे, कष्ट दे, प्रचंड द्वंद्वों-झंझावातों में उलझा दे, वह मार्ग अपनाया ही क्यों जाए। आगे वे कहते है, योगयुक्त - निष्काम कर्मयोगी मुनिजन (ज्ञानी-साँख्ययोगी-मौन संन्यासी-मनन करने वाले ध्यानयोगी) ‘न चिरेण’ अर्थात् शीघ्र ही ‘ब्रह्म अधिगच्छति’ अर्थात् ब्रह्मपद को प्राप्त करते है।
प्रस्तुत श्लोक बड़ी मार्मिक व्याख्या करता है आज के हर जिज्ञासु के लिए, अध्यात्मपथ के पथिक के लिए। जो भोक्ताभाव के त्याग का अभ्यास न कर पाए। उसके लिए तो कर्त्ताभाव का त्याग अत्यधिक कठिन है, इसलिए निष्काम कर्मयोगी बन भीतर की वासनाओं का क्षय करते हुए विवेक-बुद्धि को सतत परिष्कृत कर जीना चाहिए। जब तक आँतरिक गड़बड़ी ठीक नहीं होगी, बाहर का संन्यास किस काम का? आँतरिक गड़बड़ी ठीक करने के लिए यथाशक्ति कर्मयोग का संपादन, लक्ष्य के प्रति समर्पण, साँस्कृतिक उत्थान के लिए निज का नियोजन होना चाहिए। यही सच्चा योगानुशासन है एवं योगयुक्त एक संगठित व्यक्तित्व बनाने की कार्यशाला है। ऐसा करते-करते साधक ध्यान मार्ग में प्रवेश करने का अधिकार पा लेता है एवं अनंत ब्रह्म से साक्षात्कार का पूर्ण आनंदमय अनुभव प्राप्त करता है।
यह संन्यास किस काम का
भगवान स्पष्ट कहते है कि कर्मयोग का दीर्घकाल तक अभ्यास किए बिना (अयोगतः) व्यक्ति के लिए संन्यास दुःख देने वाला ही सिद्ध होगा। लक्ष्य के प्रति समर्पित भाव से जीना, यज्ञीय भाव से कर्म करते रहना हर मनुष्य के लिए बताया गया भगवान का एक अनुशासन है। एक नरपशु तो संकीर्ण स्वार्थपरता का, वासना पूर्ति का जीवन जीता है, किंतु पूर्णतः विकसित मानव, ध्यानयोग में अधिष्ठित कर्मयोगी अपने दिव्य स्वरूप को पहचान कर दिव्य कर्मों में ही लीन हो जीवन जीता है। इस तरह योग की महिमा सर्वोपरि है, फिर संन्यास की बात आती है। यह सरल व श्रेयस्कर मार्ग है। योग के बिना संन्यास की कल्पना भी कैसे की जाए? कर्मयोग इस प्रकार पहले, फिर संन्यास की बात। परमपूज्य गुरुदेव यही कहा करते थे कि यदि छप्पन लाख बाबाजी लोगों ने कर्मयोग अपना लिया होता, तो विगत पचास वर्षों में देश कहाँ का कहाँ पहुँच गया होता। सभी ऐसे होते है यह बात नहीं, पर अधिकाँश ऐसे है जो मजबूरी में, आवश्यकतावश, किसी लालच के कारण, बिना किसी उद्देश्य या लक्ष्य के इस वेश को धारण कर उसे बदनाम करने पर तुले है, जबकि यह स्थान समाज का शीर्ष-सर्वोपरि कहा जाता रहा है एवं देश ही नहीं, विश्व के मार्गदर्शक संत इस परंपरा से निकलते रहे है, चाहे हम उन्हें संत ज्ञानेश्वर के रूप में जाने, एकनाथ या निवृत्तिनाथ के रूप में अथवा समर्थ गुरु रामदास, महर्षि दयानंद एवं स्वामी विवेकानंद के रूप में।
हमें एक संन्यासी महाराजश्री के आश्रम में एक उपाधि-पुरस्कार हेतु आमंत्रित किया गया। वहाँ पर उनके जन्मदिवस व भंडारे के उपलक्ष्य में आयोजित अवसर पर ढेर सारे बाबाजी पहुँच गए। सभी गाँजा पीकर, सुलफे की चिलम चढ़ाकर नारे लगा रहे थे कि उन्हें और पैसे दिए जाएँ। महाराज जी ने प्रत्येक को एक सौ रुपये देने का क्रम बनाया था, पर तथाकथित संन्यासी वेशधारी बाबाजी लोगों की नारेबाजी चालू थीं कि हमें 51 रुपये चाहिए। वे किसी तरह उनके बीच से निकलकर आए, तो बोले, मैं महाभूतों की पंचायत में से किसी तरह निकलकर आया हूँ, क्योंकि मुझे तो इन्हीं के बीच रहना है, वैराग्य धर्म का पालन करना है। इन्हें साथ लेकर चलना ही होगा। हमने कहा कि जो अकर्मण्य है, नशा करते है एवं नारेबाजी करते है, उन्हें साथ लेकर चलने से क्या लाभ? ये तो भिक्षुक मात्र हैं। हमारे गुरुदेव ने तो हमें सद्गृहस्थों की फौज के बीच बिठा दिया है, जो पूर्णतः कर्मयोगी हैं। आपको नहीं लगता कि आपको क्राँति करनी चाहिए। इनमें मुक्ति पानी चाहिए, इस संन्यास धर्म का उद्धार करना चाहिए। स्वामी जी का कहना था कि यह तो शिवजी की बारात है। हमें इनको साथ लेकर चलना ही होगा। इनसे कोई परिवर्तन की अपेक्षा तो हम नहीं रखते।
जब हमारी गाड़ी स्वामी जी के आश्रम से निकल रही थी, तो वे विशुद्ध रूप से वे गालियाँ दे रहे थे, जो सभ्य समाज में सुनना भी पाप है। कह रहे थे अपने मेजबान से कि सब इन्हीं को दे दो, इन्हीं पर लुटा दो, हमें मत दो, हम देख लेंगे तुम्हें। हमें यह दृश्य देखकर स्वामी जी की दयनीय स्थिति अनुभव कर बड़ा दुःख हुआ एवं मन में विचार भी आया कि यह किन विडंबनाओं में उलझ गए आज के तथाकथित बैरागी-संन्यासी। परमपूज्य गुरुदेव की बात याद आई कि इस युग का नवसंन्यास परिव्राजक धर्म है। गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए देव परिवार का निर्माण करो, अपने वासनाओं को क्षय करते हुए समाज की सेवा करो, यही आज का युगधर्म है। सारा गायत्री परिवार इसी कार्य में लगा है एवं सच्चे कर्मयोगी की तरह कार्य कर आँतरिक सुख की अनुभूति करता है। आज के संन्यास की यह दुर्गति योगेश्वर श्रीकृष्ण के छठे श्लोक में बताई गई बात के अनुपालन न करने से हुई है, वह है पहले कर्मयोग, फिर संन्यास। (क्रमशः)।
‘साधना की धुरी पर संगठन बनाने का शिक्षण’ शीर्षक से इस धारावाहिक शृंखला की पिछली कड़ी (अक्टूबर-2002) में परमपूज्य गुरुदेव के परमवंदनीया माताजी को लिखे पत्रों के माध्यम से कई ऐसे तथ्य प्रस्तुत किए गए थे, जो अभी तक आम कार्यकर्त्ताओं, परिजनों-पाठकों की जानकारी में नहीं रहे है। उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए गुरुसत्ता की प्रव्रज्या अवधि में लिखे पत्रों से कुछ और सीखने का प्रयास करते है। ये पत्र वस्तुतः हम सभी के लिए वे मार्गदर्शक सूत्र प्रदान करते है, जिनसे किसी संगठन को सुव्यवस्थित ढंग से खड़ा किया जाता है। बीज बोने के बाद पानी दिया जाता है, अंकुरित होने की प्रतीक्षा की जाती है, निराई-गुड़ाई से खरपतवार निकाले जाते है एवं फिर उस पौधे की चारों ओर से सुरक्षा कर दी जाती है। निरंतर पानी देने, खाद की व्यवस्था का तंत्र बना दिया जाता है। तब जाकर वह गुरुत्वाकर्षण के विपरीत जमीन फाड़ता हुआ बाहर निकलता है व देखते-देखते एक वटवृक्ष का आकार ले लेता है, जिसकी छाया में असंख्यों को आश्रय मिलता है। यह पुरुषार्थ, जो बीच बोने से वृक्ष के खड़े होने तक किया गया, एक परिपूर्ण साधना है। संगठन भी इसी तरह खड़े खोते है। उनमें भी सब तरह की सतर्कता रखनी होती है एवं एक-एक पक्ष पर गहराई से चिंतन कर उसकी देखभाल करने वालों का एक तंत्र खड़ा किया जाता है। गायत्री परिवार ऐसा ही एक वटवृक्ष है, जो परमपूज्य गुरुदेव के तप एवं वंदनीया माताजी के सजल स्नेह भरे सिंचन से खड़ा हो आज करोड़ों के लिए मार्गदर्शन बना हुआ है।
चाँद्रायण सत्र व साधना द्वारा देवमानवों के निर्माण संबंधी गुरुवर की व्यग्रता उनके क्षेत्र से भेजे पात्रों द्वारा हम पिछली कड़ी में जान चुके है। यहाँ अहमदाबाद से 25-11-71 का लिखा एक पत्र प्रस्तुत है, जिसमें पूज्यवर ने ‘ध्यान-धारणा’ के विषय में लिखा है। क्षेत्र में परिभ्रमण करते हुए भी उनका ध्यान सतत अपनी आगे की रणनीति को बनाने व शिविरों की क्वालिटी सुधारने की ओर रहता था। पत्र पढ़े।
चि. भगवती आशीर्वाद,
कल अंजार-भुज-गाँधीधाम के तीन प्रोग्राम पूरे करके हम आज प्रातः यहाँ लौट आए। आज रात तक पाँच प्रोग्राम पूरे करेंगे। दो रातें रेल में निकली। ढर्रा अपने ढंग से चल रहा है। गाड़ी रुकी नहीं। हमारे पत्र मिल रहे होगे। शायद एकाध दिन में तुम्हारा और कोई पत्र मिले। घर के समाचार जानने की इच्छा रहती है।
इधर जहाँ भी गुँजाइश थी, सभी जगह ध्यान-धारणा का कार्यक्रम था। बड़ा प्रभावशाली और आकर्षक लगा। मन है कि तीनों ध्यानों का एक संयुक्त रूप और बनाया जाए, जिससे एक ही ध्यान में तीनों का समावेश हो। एक पुस्तक में तीनों ध्यान छप रहे है। उसमें इतनी गुँजाइश छोड़ना कि चार पृष्ठ का एक चौथा संयुक्त ध्यान भी दिया जा सके।
पत्र सरल-सा है, पर ध्यान-धारणा के प्रयोगों के आधार पर चिंतन उभरता है कि यह प्रयोग जो समूह मन के जागरण की प्रक्रिया है, अब और विस्तार ले। इसी मार्गदर्शन के अनुसार ‘ब्रह्मवर्चस की पंचाग्नि विद्या’ पुस्तक में वह ध्यान दिया गया, जिससे ढेरों साधकों ने अपनी आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त किया एवं आज वही संयुक्त ध्यान परमपूज्य गुरुदेव के स्वर में नित्य प्रातः 4-30 से 5 तक शाँतिकुँज में संपन्न कराया जाता है।
मात्र ध्यान ही नहीं, हर उस गतिविधि से जो आज शाँतिकुँज में अथवा शाँतिकुँज द्वारा क्षेत्रों में सम्पन्न हो रही है। पूज्यवर का मानसिक जुड़ाव इस सीमा तक था कि प्रतिदिन के पत्रों में उनका उल्लेख होता था। साथ ही शाँतिकुँज में चल रहे निर्माण कार्य की प्रगति का दिग्दर्शन भी वे वहीं बैठे-बैठे करते रहते थे। एक पत्र लाँजी (बैतूल) से लिखा 19-12-81 का प्रस्तुत है
वसंत पंचमी पर अबकी बार प्रज्ञा पुराण और फार्मेसी का उद्घाटन होना चाहिए। सावित्री ब्लॉक पूरा बन जाए और गैरेज बने तो ठीक है। उसमें कर्मकाँड परंपरा का नया उद्घाटन हो, तो एक साथ तीन उद्घाटन हो जाएँगे, इसलिए उन वर्गों से संबंधित सभी चीजें तैयारी करने का प्रयत्न करना चाहिए। सीमेंट हो तो सावित्री ब्लॉक तथा फैक्टरी-शेड सभी तैयार करा लेना चाहिए। पुस्तक छप सके, इसके लिए पूरा-पूरा प्रयत्न इन दिनों किया जाए।
प्रज्ञापुराण, फार्मेसी, सावित्री ब्लॉक व हॉल का निर्माण, कर्मकाँड द्वारा धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया का शुभारंभ, यह 1982 की बसंत से आरंभ करने का पूज्यवर का मन था। वे सभी व्यवस्था बनाकर आए थे, पर संगठन वही होता है, जो व्यस्त होते हुए भी हर कार्य पर दृष्टि रखता है एवं बार बार सभी संबंधित व्यक्तियों का ध्यान खींचता रहता है। आज क्षेत्र में प्रज्ञापुराण कथाओं के आयोजन भारी भीड़ खींच रहे है। जनमानस को प्रचलित कथाकारों के बीच एक नई दिशा मिली है। उसके चारों खंड उन्हीं दिनों पूरे होने जा रहे थे। फार्मेसी तब आरंभ की जा रही थी, आज उसकी एक बड़ी बिल्डिंग गायत्री कुँज-विश्वविद्यालय परिसर में बन चुकी है एवं बड़े स्तर पर उत्पादन कार्य चल रहा है। अगले वर्ष के अंत तक वनौषधि विज्ञान, आयुर्वेद, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति पर शोध का एक नया भवन बनकर खड़ा हो जाएगा। इतना विस्तार होते हुए भी आधार वही छोटी फार्मेसी होगी, जिस पर यात्रा के दौरान भी गुरुवार का ध्यान बना ही हुआ था व प्रगति के लिए वही से वे प्रेरित कर रहे थे। सावित्री ब्लॉक कार्यकर्त्ताओं के रहने के लिए बनाया जा रहा था। आज उसके पीछे की भूमि भी लेने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। सावित्री ब्लॉक की तरह ही करीब छह और भवन बनकर तैयार है, जिनमें प्रायः 1200 से अधिक कार्यकर्त्ता-समयदानी रहते है, पर हम कैसे भूले, उस मार्गदर्शक को, जो हम सभी को क्षेत्र से अनवरत मिलता रहा।
21-12-81 को राजनाँदगाँव (छ.ग.) से लिखे पत्र में पूज्यवर लिखते है-
प्रज्ञापुराण छपने में देर हो, तो हर अध्याय का नंबर 1/1, 2/1, 3/1 क्रम से चालू कराया जा सकता है और कई प्रेस में एक साथ छपा सकता है। नंबर पेज संबंधी कठिनाई इस प्रकार हल हो सकती है।
प्रज्ञा पुराण-आयोजन-डाक-दोनों चौके, फार्मेसी, सावित्री ब्लॉक, कथा-कीर्तन आदि जो क्रम प्रमुख थे, उन्हें समेटना चाहिए। जयपुर-अंबाला वीरेश्वर हो आए होंगे।
सबसे नित्य परामर्श मार्गदर्शन का क्रम चालू रखना। अपने स्वास्थ्य का विशेष रूप से ध्यान रखना। अपनी लड़कियों को उचित समाधान स्नेहपूर्वक देती रहती होगी।
सबको आशीर्वाद
श्रीराम शर्मा
पत्र में ध्यान देने योग्य बात है, प्रज्ञागुण की छपाई संबंधी मार्गदर्शन तथा अंत में सबसे नित्य परामर्श-मार्गदर्शन करते रहने की सलाह। परमपूज्य गुरुदेव जिस तरह सभी वरिष्ठ या विभागीय कार्यकर्त्ताओं को लेकर बैठते थे व विचार-विमर्श करते थे, उसी प्रकार परमवंदनीया माताजी का भी क्रम रहता था। अपनी अनुपस्थिति में वह क्रम चलता रहे, इसी पर उनका जोर था। वस्तुतः यह परामर्श-मार्गदर्शन ही कार्यकर्त्ताओं के समूह नेतृत्व के उभार हेतु एक अनिवार्य प्रक्रिया है। इसी के अभाव में बहुत-से संगठन टूट जाते है, शिखर पुरुष के जाते ही छिन्न-भिन्न हो जाते है, परंतु पूज्यवर ने यह लोकताँत्रिक प्रणाली अपने साथ जीवन भर रखी एवं वही सलाह परमवंदनीया माताजी को भी क्षेत्र से देते रहे।
एक पत्र 27-12-81 का जगदलपुर से लिखा दिया जा रहा है, जो स्वयं में बड़ा स्पष्ट है-
हमारे सभी पत्रों को सामने रखकर परामर्शों की एक शृंखला बनाते रहना चाहिए। सबको साथ रखकर सोचने पर कोई कार्यपद्धति क्रमबद्ध रूप से बन सकती है। सभी को बुलाकर परामर्श करते रहने का सिलसिला जारी रखना चाहिए।
जो बात 21-12 के पत्र में लिखी थी, उसी को 27-12 के पत्र में दुहराया है एवं और भी स्पष्ट रूप में लिखा है। सभी पत्रों को सामने रख वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं से परामर्श व सुझावों के आधार पर कार्यपद्धति का निर्धारण, हमें लगता है कि इससे श्रेष्ठ और क्या कार्यकर्त्ता मार्गदर्शिका हो सकती है। आज परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी के महाप्रयाण के बाद जो विराट् रूप मिशन का बना है, उसके मूल में यही मार्गदर्शन है। सूक्ष्म रूप में विद्यमान गुरुसत्ता तो सतत यह बताती रहती है, पर ‘मैनेजमेंट’ विधा के विशेषज्ञ जानते है कि ‘ग्रुप डिसकशन’ कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यदि यह समय-समय पर होता रहे, तो न कहीं संवादहीनता या असमंजस की स्थिति रहेगी, न कोई महत्वपूर्ण कार्य रुकेगा।
समापन 26-12-81 को सुकमा (बस्तर) से लिखे एक पत्र से कर रहे हैं, जिसमें वे अपनी आगे की रणनीति के बारे में संकेत करते है।
निकट भविष्य में हमारे बिना ही हर कार्यकर्त्ता को अपने पैरों खड़ा होगा। यह तथ्य डराने के लिए नहीं। उनकी मजबूती निखारने के लिए बताते रहना चाहिए। मिशन तो चलेगा, पर उसमें गुरुजी-माताजी की भूमिका जो अब है, कुछ ही दिन बाद वह न रहेगी। इस आधार पर ही सभी को अपना भविष्य निर्धारण करना चाहिए।
कोई भी पिता- अभिभावक अपनी संतानों को इसी तरह मजबूत बनाता है। अपने सामने उन्हें तैयार कर देता है। भवन व संगठन तो बहुत बनते है, पर वहाँ व्यक्ति-प्राणवान कार्यकर्त्ताओं का अभाव रहता है। गुरुसत्ता ने जीवनभर यही पुरुषार्थ किया, प्रवास पर रहते हुए भी कि उनके उत्तराधिकारी सशक्त बने, जिम्मेदार बने।
सर्पदंश की चेतावनी
ध्यान में बैठने से पहले वे शिवालय जाते थे। वहाँ दर्शन कर आम पेड़ के नीचे बैठे ही थे कि यह अनुभूति हुई। दर्शन कर नीचे उतर रहे हैं। मन में भाव आया कि आसन का स्थान अभी चौबीस-पच्चीस पग दूर है। वस्तुस्थिति तो आसन पर बैठने की है, लेकिन मन का लय होने के बाद मानस पटल पर वह दृश्य चल रहा है। शिवालय के नीचे उतरते हुए पाँव के नीचे किसी कोमल वस्तु का आभास हुआ। देखा तो एक सर्प दब गया है। क्षणभर में ही कुपित सर्प ने अपना मुंह घुमाया और पाँव पर डस लिया। इस घटना से हतप्रभ श्रीराम कुछ समझे, इससे पहले सांप ने पहले पिंडली में और फिर कमर के नीचे डसा।
कहीं सुन रखा था कि साँप सिर्फ एक बार ही डसता है। साथी ने रोका तो श्रीराम ने कहा लेकिन यह अनुभव हो रहा था। ध्यान में बैठे-बैठे ही लग रहा था। दंश के बाद शरीर गिर गया। पता नहीं क्या क्या उपचार किया गया। वह सब दिखाई दे रहा था। इस तरह दीख रहा था जैसे किसी दूसरे व्यक्ति को यह सब हो रहा है। सर्प विष चढ़ने लगा, तो नींद के तेज झोंके आने लगे। आस-पास बैठे लोग मुंह पर पानी के छोटे मार रहे थे। वैद्य जी आ गए। उन्होंने कुछ औषधियां मँगाई। तब तक माँत्रिक भी आ गया। वह मंत्र पढ़ते हुए थाली बजाने लगा। थाली की आवाज लयात्मक थी। उसके संगीत में मन डूबने-उतराने लगा। माँत्रिक थाली पीटने के साथ मंत्र भी पढ़ता जा रहा था। वैद्य जी की मंगाई औषधि आ जाने के बाद काढ़ा तैयार किया गया। काढ़ा पिया, उससे आराम मिलने के बजाय पीड़ा और बढ़ गई। लगा जैसे जगह-जगह साँप डस रहे है। उनके दांतों की तीखी चुभन, जलन अनुभव होती है, फिर कुछ देर के लिए वह जगह सुन्न हो जाती है और कुछ ही पलों बाद चुभन फिर तीक्ष्ण हो जाती है।
प्राण कब छूट गए? कुछ पता ही न चला। होश आया तो देखा कि जटा जूटधारी एक सौम्य संन्यासी अपना शरीर नदी से खींचकर बाहर ला रहे थे। मृत जानकर परिवार के लोगों ने शरीर को शायद नदी में प्रवाहित कर दिया था। सर्पदंश से मृत्यु को प्राप्त हुए व्यक्ति का शव जलाया नहीं जाता। उसके भौतिक कारण जो भी हों, आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार सर्प काल का प्रतीक है। जिसे काल ने स्वयं ही चुन लिया हो, उसके शरीर या अस्तित्व में ऐसा कुछ नहीं बचता, जिसे विसर्जित किया जाए। उन संन्यासी ने श्रीराम के शरीर को नदी से खींचकर बाहर निकाला और जमीन पर लिटाया। अचेत काया के पास बैठकर संन्यासी ने कुछ देर ध्यान लगाया। उन संन्यासी की सौम्य मूर्ति को पास बैठा अनुभव करते हुए चेतना धीरे-धीरे लौटने लगी। उन्होंने स्नेह से थपथपाया और कहा, “उठो घर जाओ। माता-पिता परेशान हो रहे होंगे।”
संन्यासी का यह आदेश सुनकर उठने का उपक्रम किया, तो अगला संदेश यह आया, अब दोबारा यहाँ मत आना। घर में बैठकर ही ध्यान लगाना। पूछना चाहा था कि महात्मा आप कौन हैं? लेकिन डर के मारे पूछ नहीं सका। संन्यासी ने शायद मन की बात समझ ली, बिना पूछे ही उत्तर दे दिया, “हम इस चराचर जगत् से मुक्ति का मार्ग खोज रहे एक साधक हैं बच्चा। कोई सिद्ध-महात्मा मत समझना। एक साधारण संन्यासी भर हैं।”
अब कहने का साहस हुआ। इच्छा उभरी और तुरंत निवेदन भी कर दिया, “आप हमारा मार्गदर्शन कीजिए न पूज्यवर।” संन्यासी ने कहा, “नहीं, हम स्वयं पथिक हैं, लेकिन तुम्हारी मार्गदर्शक सत्ता तुम पर बराबर दृष्टि लगाए हुए है। उपयुक्त अवसर आने पर वह तुम्हारे पास पहुँचेगी। यह मत पूछना कि कब? हम सिर्फ यही कह सकते हैं कि जल्दी ही। आश्वस्त रहना और किसी को अपना गुरु बनाने की जल्दबाजी मत करना।”
संन्यासी आगे कुछ और भी कह रहे थे। क्या कहा, यह याद नहीं रहा। अंत में सिर्फ इतना ही सुनाई दिया कि उठ, अब जा और आँख खुली, तो सामने पिता को विचित्र स्थिति में विलाप करते हुए देखा। उठकर उन्हें प्रणाम किया। बाद में जो हुआ, वह सभी को मालूम है।
पिता ने समझा कि यह घटना भागवत कथा सुनाने के कारण हुई। मोह माया के कारण थोड़ी देर तक तरह-तरह के संकल्प-विकल्प मन में उठते रहे। फिर कहा, प्रभु को जो स्वीकार है, वही होगा। श्रीराम के लिए ईश्वर ने कुछ नियत कर रखा है, तो हम लोगों में से कोई भी क्या कर सकता है? संतोष करना चाहिए। कुछ देर मन को ढाढ़स बँधाते, फिर वापस पुत्र मोह में डूब जाते। यद्यपि वे अच्छी तरह जानते थे कि उनका पुत्र माता-पिता को छोड़कर कहीं जाने वाला नहीं है, लेकिन यह मोह भी तो बड़ा विलक्षण भाव है। मन को कहीं स्थिर तो नहीं ही होने देता, उसे बाँधकर हिलाता डुलाता भी रहता है।
पंडित जी ने उसी क्षण निश्चय कर लिया कि वे पुत्र को भागवत कथा नहीं सुनाएँगे, साधु-संतों और वैरागियों के बारे में नहीं बताएँगे, उन्हें पास फटकने भी नहीं देंगे। इस निश्चय के बाद पिताश्री ने भागवत शास्त्र का विसर्जन करने की ठानी। जब भी कोई उपदेशक कथा-प्रवचन से विराम लेना चाहता है, तो पूर्णाहुति का आयोजन करता है, यह परंपरा अब लुप्तप्राय है, लेकिन जिन्होंने गुरु से दीक्षा लेकर शास्त्र का उपदेश किया, वे इस मर्यादा को जानते हैं। शरीर से अशक्त होने पर, वृद्धावस्था में, वैराग्य होने पर, परिव्राजक संन्यासी बन जाने के बाद कई शास्त्री कथा आयोजन से भी मुक्ति पा लेते हैं। शरीर इस योग्य नहीं रहता अथवा कथा आयोजकों के लिए आवश्यक ताम-झाम नहीं जुटता, इसलिए वे साधनों और विधियों का त्याग कर देते हैं।
पिताश्री ने वंश-परंपरा में असमय संन्यास का उदय होते देख भागवत की पोथी का विसर्जन करना चाहा। उसके लिए इक्कीस ब्राह्मण बुलाए, यज्ञ आयोजित किया और पूर्णाहुति के रूप में भागवत शास्त्र वासुदेव मंदिर में स्थापित कर दिया। जिस दिन मंदिर में शास्त्र की स्थापना की और भगवान से निवेदन किया कि अब शास्त्र प्रवचन से विराम लेते है, उसी दिन बल्कि उस निवेदन के बाद ही पिताश्री की वाणी ने भी विराम ले लिया। उनका बोलना बंद हो गया। लोगों ने कहा कि पंडित जी की वाचा भगवद् गुणगान के लिए ही खुली थी। कथा से विराम लिया, तो स्वर भी चले गए।
पिताश्री का महाप्रयाण
यज्ञ संपन्न होने की रात को ही पंडित जी की हालत बिगड़ी। बोली बंद होने के बाद उनका चलना-फिरना भी बंद हो गया। वे बिस्तर पर ही पड़े रहने लगे। इशारों से बात करते और होठों में कंपन होता रहता, जैसे द्वादश अक्षय मंत्र का जप कर रहे हों। अगले दिन उन्होंने भोजन लेने से मना कर दिया। स्वजनों ने आग्रह किया, तो इशारे से कहने लगे कि अब वक्त आ गया है। भोजन के द्वारा शरीर की जबरदस्ती आगे नहीं खीचना है।
दो एक दिन में ही पंडित जी के बीमार होने और देह त्याग का संकल्प लेने की सूचना स्वजन संबंधियों में फैल गई। वे कुशल-क्षेम जानने के लिए आने लगे। घर में लोगों की भीड़ रहने लगी। पंडित जी सबको देखते, हाथ जोड़कर उनका अभिवादन करते। कुछ कहते तो नहीं बनता था, लेकिन चेहरे के भाव जैसे कहते थे कि जाने अनजाने अब तक जो भी गलतियाँ हुई हों, अपने किसी व्यवहार से दुःख हुआ हो, तो उसके लिए क्षमा माँगता हूं। भावों की इस अभिव्यक्ति के बाद आगंतुक भी अभिवादन का उत्तर देते, तो पंडित जी का चेहरा जैसे खिल उठता। शुक्ल पक्ष की दशमी का उदय होते ही पंडित जी ने अपने बड़े और दुलारे पुत्र श्रीराम को बुलाया। संकेत से ही कहा कि उठाकर बिठा दे। उन्हें बिठाया गया। पंडित जी ने फिर अपने आप पालथी लगाई। आसन लगाया, दोनों हाथ गोद में रखे, आंखें बंद की और कुछ पल निश्चय बैठे रहे। पाँच-सात मिनट तक ध्यान मुद्रा में बैठे रहने के बाद उनके मुँह से ‘नमो भगवते वासुदेवाय’ का मंत्र निकला।
पुत्र से उन्होंने कहा कि मूल भागवत का पाठ करें। श्रीराम ने मूल चार श्लोकों का पाठ शुरू किया, ‘अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च्......॥’ पाठ के बाद वहाँ उपस्थित लोगों के समझाने के लिए अर्थ भी सुनाया, “भगवान कहते है कि सृष्टि के आदि में केवल मैं ही था। सत्, असत्, स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण प्रकृति भी नहीं थी। सृष्टि के पश्चात् भी मैं ही हूँ। वह विश्व जो दृष्टिगोचर हो रहा है, वह भी मैं ही हूँ। प्रलय में जो शेष रहता है, वह भी मैं ही हूँ। यह ब्रह्म का स्वरूप कहा गया है। आत्मा में असत्, दुर्बलता और दुःख की जो प्रतीति होती है, सत्-चित् और आनंद आदि की प्रतीति नहीं होती, उसे भी मेरी (भगवान की) ही माया जानो।”
‘पंच महाभूत जिस तरह छोटे-बड़े सभी जीवों में प्रविष्ट होते है और कारण रूप से पृथक रहने के कारण अप्रविष्ट भी है, वैसे ही मूल भौतिक पदार्थों में मेरा प्रवेश है और नहीं भी है। आत्मतत्व के जिज्ञासु पुरुष को जानना चाहिए कि अन्वय और व्यतिरेक से जो सब जगह और सर्वदा रहे, वही आत्मा है। अन्वय का अर्थ है- कार्य के कारण का संबंध और व्यतिरेक का अर्थ है-संबंध का अभाव।’ अर्थ और भाव पूरा होते होते तक पंडित जी ने शरीर से व्यतिरेक कर लिया। उनकी आत्मचेतना विराट् चेतना में लीन हो गई। जो पद्मासन लगाकर वे बैठे थे, उसके बारे में शास्त्रों ने कहा है कि साधक अपने इष्ट में ही लय होता है। पंडित जी की अवस्था उस समय सड़सठ वर्ष थी। उनके जाते ही घर में रोना-धोना मच गया, लेकिन श्रीराम गंभीर थे, जैसे कुछ सोच रहे हो या समझने की चेष्टा में हो।
यह पला अवसर था जब श्रीराम ने शरीर और आत्मा का संबंध विच्छेद होते देखा हो। रोना धोना मचने लगते ही श्रीराम पिता के पास आसन लगाकर बैठ गए। उसी तरह जिस तरह पंडित जी बैठे थे। ताई जी ने बेटे को इस तरह बैठते देखा तो वे जोर से रो उठी। उन्हें न जाने क्यों लगा कि पुत्र भी पिता का अनुकरण कर रहा है, उन्हें छोड़कर जा रहा है। वे वैधव्य को स्वीकार करने वाली प्रतीकात्मक क्रियाएँ संपन्न करने के स्थान पर पुत्र को झिंझोड़ने लगी। श्रीराम फिर भी अविचल बैठे रहे। ताई जी को घर के लोगों ने समझाया। बाकी क्रियाएँ संपन्न करने के लिए कहा। घरवालों के हिसाब से श्रीराम अपनी सहज वृत्ति के अनुसार मृत्यु की इस घटना को अपने ढंग से समझ रहे थे। करीब बीस मिनट तक अविचल ध्यान मुद्रा में बैठे रहकर श्रीराम अपने आप उठा गए और परिवार के लोगों के साथ पिताजी के पार्थिव शरीर की विदाई में जुट गए।
अंत्येष्टि और मरणोत्तर संस्कार के बाद परिजनों में विचार चला कि पिताजी की विरासत को कौन सँभाले। जमीन जायदाद की जिम्मेदारी से श्रीराम ने अपने आपको तुरंत यह कहते हुए अलग कर लिया कि वे सिर्फ पिता की भागवत परंपरा का पालन करेंगे। स्वयं को भगवान के लिए ही रखेंगे और उन्हें ही अपना बनाएँगे। स्वजनों ने यह सुना और समझ लिया कि मृत्यु के पूर्व पंडित जी ने सात दिन तक जो कथा सुनाई थी, उसी का प्रभाव है। जिम्मेदारियाँ सिर पर आएँगी तो सब सँभल जाएगा। परिवार की वर्तमान पीढ़ी में सबसे बड़े ज्योतिप्रसाद के सिर पर पगड़ी बँधी। रिवाज के अनुसार दूसरे लोगों को भी उनका दायभाग मिला। श्रीराम अंत तक यही कहते रहे कि वे घर-गृहस्थी और जमीन जायदाद सँभालने के लिए नहीं हैं। हमें अपने धर्म कर्त्तव्य का पालन करना है।
कुछ घटनाएँ
पिता के नहीं रहने के बाद श्रीराम अपने आपको अकेला अनुभव करने लगे। घर के और सदस्य भी थे, लेकिन उनका रुचि खाने कमाने की विद्याओं में ज्यादा थी। खेती बाड़ी, व्यापार और लगान वसूली के अलावा वे कोर्ट कचहरी के कामों में भी व्यस्त रहते। उन सदस्यों की ज्योतिष, आयुर्वेद प्रशासन और समाज सेवा के क्षेत्र में अच्छी पैठ थी। योग, ध्यान, अध्यात्म आदि में श्रीराम की ही विशेष र्सत थी।
बचपन और किशोरावस्था की अनेक घटनाएँ है, जिनमें श्रीराम अत्यंत सहृदय और सहज ही विश्वास करने वाले गुणों से ओत प्रोत दिखाई देते है। गाँव में माताएँ बच्चों को दूध पिलाते ही मक्खन खिलाने पर विशेष ध्यान देती है। एक दिन श्रीराम ने गाय को दुहे जाते हुए देखा। छूटने से पहले बछड़े को गाय के पास ले जाते हैं। वह थनों में दूध उतारती है। फिर अपने उपयोग के लिए दूध दुहने लगते हैं। श्रीराम जब गाय को दुहे जाते देख रहे थे, तो बछड़े को हटाया गया। बछड़ा गाय की ओर देखता, वापस जाने की कोशिश करता और मचलता रहा। गाय भी अपने वत्स की ओर टुकुर टुकुर देखती रही। गाय और बछड़े का यह संबंध विछोह और विवशता देखकर श्रीराम दुखी हुए। वे अंदर गए और ताई जी से कहा कि आज के बाद दूध नहीं पिएँगे।
ताई जी ने और घर के लोगों ने समझाने की कोशिश की, दूध पीने से ताकत आती है, शरीर बलवान बनता है, रोगों से लड़ने की सामर्थ्य आती है। श्रीराम के पास सबका एक ही उत्तर था- बछड़े के मुँह का आहार लेकर अपना शरीर मजबूत नहीं बनाना। महीनों तक समझाने का क्रम चलता रहा। आखिर में समाधान यह निकला कि बछड़ा दूध पीते-पीते तृप्त हो जाए और अपने आप गाय से दूर चला जाए, तभी दूध दुहा जाए। वही दूध पीएँगे। इस शर्त पर दुहा गया दूध बहुत कम होता था, लेकिन पशुओं की आवश्यकता को ध्यान में रखना ज्यादा जरूरी समझा गया।
एक घटना गाँव के बाजार में ताला खरीदने की है। घर का काम नौकर चाकर कर दिया करते थे, लेकिन माँ ने सोचा कि बच्चे को घर परिवार और दुनियादारी का अभ्यास होना चाहिए। घर में रखी संदूक का ताला खराब हो गया था। दो तीन पाई में नया ताला मिल जाता। माँ ने पैसे देकर बाहर भेजा। दुकानदार ने ताले की कीमत तीन पैसे बताई। माँ ने जो कीमत बताई उससे यह चार पाँच गुना ज्यादा थी। श्रीराम ने कहा कि आप ज्यादा पैसे ले रहे हैं। दुकानदार ने कहा- वास्तविक कीमत यही है। कही भी पूछकर देख लो। इससे कम में मिल जाए तो......। दुकानदार अपनी बात पूरी करता, इसके पहले ही श्रीराम ने तीन पैसे निकाले और ताला यह कहते हुए उठा लिया कि बस-बस रहने दो। मुझे असल कीमत मालूम है, लेकिन आपको उतने ही पैसे दे रहा हूँ, जितने आपने बताए। आप पर भरोसा है।
घर में ताई जी ने छोटी-सी नसीहत दी और बात आई गई हो गई। इस घटना के बाद श्रीराम उस दुकान के सामने से कई बार निकले होंगे, लेकिन कभी नजर उठाकर देखा नहीं। दुकानदार जरूर उन्हें आते जाते देखता। जब भी देखता, उसे ख्याल आता कि श्रीराम अब रुके, तब रुके। दस बारह दिन तक कुछ नहीं हुआ। एक दिन दुकानदार ने श्रीराम को पुकारकर बुलाया और कहा, “मुझे पछतावा हो रहा है। मैंने तुमसे ज्यादा पैसे ले लिए। मेरे मन में उस समय पता नहीं कैसे लोभ इतना हावी हो गया कि वास्तविक कीमत से चार गुना ज्यादा पैसे ले लिए। ज्यादा लिए हुए पैसे अपने पास रख लो और मुझे माफ कर दो।”
श्रीराम यह सब चुपचाप सुनते रहे। दुकानदार ने पैसे वापस कर दिए और फिर भी पछताता रहा, तो बोले, “चाचा इसमें पछताने की क्या बात है? मैंने आपकी बात तब भी मान ली थी और अब भी मुझे कोई शिकायत नहीं है।” किशोर जीवन की यह घटना किसी पर भी अविश्वास नहीं करने की प्रवृत्ति दर्शाती है। इस आदत के कारण उन्हें आगे कई बार नुकसान भी उठाना पड़ा, लेकिन वे यही कहते कि विश्वास ही परिवर्तन लाता है। अविश्वास और संदेह से बुराई बढ़ती ही है, दूरियाँ भी।
परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के उत्तरार्द्ध की एक महत्वपूर्ण स्थापना है- गायत्री तीर्थ-शांतिकुंज हरिद्वार। उत्तराँचल राज्य के मुख्य द्वार पर गंगा की गोद, हिमालय की छाया में स्थित यह पावन आश्रम अब तक लाखों व्यक्तियों के जीवन में आलोक का संचार कर चुका है। अगणित व्यक्ति जीवन-साधना में प्रवीण-पारगत होकर यहाँ से गए है। तप यहाँ के कण-कण में संव्याप्त है। प्रतिदिन चौबीस लख का गायत्री जप यहाँ संपन्न होता है, साथ ही यज्ञाग्नि से निकलते धूम्र से सारा वातावरण सुवासित रहता है। युगऋषि की जीवन यात्रा के अंतिम बीस वर्ष (क्क्स्त्रक् से क्क्क्) यहीं बीते है। हमारी मातृसत्ता-शक्तिस्वरूपा माता भगवती देवी शर्मा ने क्क्स्त्रक् से क्क्क्ब् तक के चौबीस वर्ष का अत्यंत महत्वपूर्ण समय यही तप में नियोजित किया एवं इस अवधि में यहाँ की सभी गतिविधियाँ का संचालन भी किया। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय ऐसी दो विलक्षण स्थापनाएँ है, जो शाँतिकुँज की गरिमा को कई गुना बढ़ाती है। ऐसे स्थान पर आना व कुछ दिन यहाँ के वातावरण में रहना भी अति दुर्लभ सुयोग माना जाना चाहिए।
ऐसे ही सुयोग के लिए यहाँ वर्षभर सत्र चलते रहते है, जिनमें साधक, प्रशिक्षण लेने वाले व्यक्ति आते रहते है और लाभान्वित होकर जाते है। प्रायः साठ एकड़ भूमि में फैली यह स्थापना निरंतर क्रियाशील रहती है, चाहे अत्यधिक शीत हो या तेज गरमी या वर्षा का मौसम हो। जब से यह आश्रम आरंभ हुआ, तब से ही बहुविधि सत्र शृंखला से अगणित व्यक्ति लाभान्वित होकर गए है एवं उन्हीं में से कई बाद में यहाँ के समयदानी या स्थायी कार्यकर्त्ता बन गए है। समाज को समर्पित लोकसेवियों की टकसाल इस सत्र शिक्षण परंपरा को नाम दिया जाए, तो कोई अत्युक्ति न होगी।
यहाँ के नियमित सत्र इस प्रकार है-
(1) संजीवनी साधना सत्र-
ये नौ दिवसीय होते है। प्रत्येक माह 1 से 1, 11 से 11 एवं 21 से 21 की तारीखों में चलते है। इनमें पूरी अवधि में चौबीस हजार गायत्री मंत्र जप का एक अनुष्ठान कराया जाता है, जो विदाई से पूर्व संपन्न हो जाता है। इसका संकल्प पूर्व संध्या को कराया जाता है, इसीलिए इन सत्रों में एक दिन पूर्व आना होता है। सत्र समाप्ति के बाद उसी दिन मध्याह्न तक स्थान खाली कर देना होता है। इन सत्रों में प्रतिदिन प्रातः निष्णात मनीषियों द्वारा अध्यात्म के विभिन्न विषयों पर प्रेरक उद्बोधक होता है। प्रातः जल्दी उठना होता है। सर्दियों में प्रातः चार बजे, गर्मियों से साढ़े तीन बजे। उठकर गायत्री मंदिर में प्रार्थना में भाग ले उषापान कर स्नान आदि के बाद सभी आरती में भाग लेते है। उसके बाद परमपूज्य गुरुदेव की वाणी में ध्यान कराया जाता है। तत्पश्चात् यज्ञशाला में यज्ञ एवं अखंड दीपक तथा गुरुसत्ता की चरणपादुकाओं के प्रणाम का क्रम आरंभ हो जाता है। उद्बोधन प्रातः 7 से 10.30 तत्पश्चात् भोजन एवं विश्राम का क्रम होता है।
मध्याह्न में पुनः गोष्ठी संपन्न होती है, जो साधकों को उपासना के उत्तरार्द्ध आराधना-समाजसेवा के विभिन्न दायित्वों से परिचित कराती है एवं संकल्पित कराती है। इस अवधि में एक दिन शाँतिकुँज-ब्रह्मवर्चस-देवसंस्कृति विश्वविद्यालय दिग्दर्शन हेतु मध्याह्न के बाद खाली रखा जाता है। प्रज्ञापुराण का शिक्षण एक दिन उसका प्रदर्शनात्मक प्रवचन से हो जाता है। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य परिचर्चा एवं ग्राम्य विकास पर किन्हीं दो दिनों में गोष्ठी भी ली जाती है, जो साधकों को नई दिशाएँ देती देती है। इन नौ दिवसों को माँ के गर्भ में रहकर बिताए गए नौ माह की अवधि की तरह माना जाना चाहिए। अंतिम दिन विदाई के समय लोग आँखों में अश्रु लिए रवाना होते है। उन्हें लगता है, मानों उनका आँतरिक कायाकल्प हो गया है। ये सत्र सभी शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ, अनुशासन पालन का आश्वासन देने वाले एवं साधना में रुचि रखकर पूर्व अनुमति लेकर आने वाले हर साधक के लिए खुले है। न्यूनतम दो से तीन माह पूर्व शिविर विभाग, शाँतिकुँज हरिद्वार को अपना प्रतिवेदन भेज देना चाहिए। अनुमति आने पर ही आरक्षण कराना चाहिए।
(2) एकमासीय युगशिल्पी सत्र-
ये सत्र प्रतिमाह वर्षभर 1 से 21 तारीखों में चलते हैं। पहले सत्र की तरह एक दिन पूर्व आना होता है व संकल्प गोष्ठी में भागीदार करनी होती है। इन सत्रों की विशेषता यह है कि इनमें संगीत, संभाषण, कर्मकाँड एवं स्वावलंबन प्रधान ग्रामोद्योगों का प्रशिक्षण एक माह में इतना करा दिया जाता है कि प्रशिक्षित कार्यकर्त्ता भाई या बहन अपने बूते अपना संगठन चला सके, अपने पैरों पर खड़े हो सके। इन्हें भी उसी दिनचर्या का पालन करना होता है, जो संजीवनी साधना सत्रों में बताई गई है। प्रतिदिन प्रज्ञायोग प्रातःकाल संपन्न कराया जाता है, जो युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रणीत सूर्य नमस्कार एवं विभिन्न आसनों का सम्मिश्रण है। एक बार सीख लेने पर यह पंद्रह मिनट की प्रक्रिया शरीर को सतत स्वस्थ एवं मन को प्रसन्न बनाए रखती है। ढपली वादन की सामूहिक संगीत की कक्षाएँ भी इनमें ली जाती है। बौद्धिक उद्बोधन प्रतिदिन चलते है। वनौषधि चिकित्सा, प्रज्ञापुराण कथावाचन के साथ एक आदर्श स्वयंसेवक बनाने वाली श्रमदान एवं भोजन व्यवस्था, आश्रम की सुरक्षा व्यवस्था में भागीदारी भी इस प्रशिक्षण का एक हिस्सा है।
इस एकमासीय सत्र के साधकों को बेकरी, अगरबत्ती निर्माण, स्क्रीन प्रिंटिंग, प्लास्टिक मोल्डिंग, लेमीनेशन, बागवानी, फर संरक्षण, गो विज्ञान पर आधारित उद्योगों तथा रचनात्मक आँदोलनों से जुड़े सभी प्रशिक्षण दिए जाते है। इन सभी साधक भाई-बहनों का ब्रह्मवर्चस में दो बार स्वास्थ्य परीक्षण होता है, जिसमें आहार, उपासना, श्रम-साधना के परिणामों का विश्लेषण किया जाता है। परामर्श के आधार पर परिजन स्वास्थ्य संवर्द्धन हेतु वनौषधि सेवन व बताई साधना को जीवन में उतार सकते है। सभी साधकों का अपनी-अपनी टोली के साथ संस्था प्रमुख के साथ फोटोसेशन भी होता है। अंतिम दिन एक सुँदर प्रमाण पत्र दिया जाता है। पूर्व अनुमति लेकर आने वाले स्वस्थ साधकों के लिए ये सत्र वर्षभर खुले है।
(3) परिव्राजक प्रशिक्षण
यह वरिष्ठ स्तर का युगशिल्पी प्रशिक्षण है, जिसमें समयदान दे सकने वाले कार्यकर्त्ताओं का एक माह की युगशिल्पी साधना के बाद एक माह और सघन प्रशिक्षण दिया जाता है। ये दो मास के होते है, जो प्रतिमास की एक तारीख को आरंभ होकर दूसरे माह की 21 तारीख का समाप्त होते है। प्रशिक्षित साधक समयदानियों को विशेष जिम्मेदारी देकर प्रज्ञापीठों-शक्तिपीठों एवं जाग्रत् केंद्रों में कार्य करने हेतु तीन से छह माह के लिए भेजा जाता है। अब इन्हीं सत्रों का और भी वरिष्ठ स्तर का प्रशिक्षण धर्म विज्ञान केंद्र देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में आरंभ हो गया है, जिसमें त्रैमासिक डिप्लोमा का शिक्षण भी दिया जाएगा व विश्वविद्यालय का प्रमाणपत्र भी उन्हें मिलेगा। सभी धर्मों की मूल विधाओं में प्रवीण-पारंगत होकर ये साधक कहीं भी देवालय प्रबंधक की भूमिका निभा सकेंगे।
(4) स्वावलंबन (ग्राम्य विकास) प्रधान सत्र
ये विशेष सत्र प्रतिमाह 1 से 17 तथा 21 तारीख से आगामी माह की छह तारीख तक चलते है। इनमें विशिष्टतः ग्रामतीर्थ योजना, आपदा प्रबंधन, उद्यान विकास, जड़ी-बूटी रोपण व खेती तथा गो विज्ञान पर आधारित स्वावलंबन की सभी विधाओं का गहराई से प्रशिक्षण दिया जाता है। वर्ष में कुल 12 में सत्र चलते है, जो ग्राम प्रबंधन में व्यक्ति को निष्णात बना देते है। इसके लिए न्यूनतम योग्यता ग्रामोत्थान में रुचि, तकनीकी शिक्षा का न्यूनतम ज्ञान तथा एक मास का युगशिल्पी प्रशिक्षण कर लेना माना जाता है।
(5) त्रैमासिक संगीत प्रशिक्षण सत्र
ये सत्र प्रतिमाह की 1 से आरंभ होकर तीसरे माह की 21 तक चलते है। इनमें सभी अनुशासन युगशिल्पी सत्रों जैसे ही होते है। प्रज्ञायोग के अतिरिक्त ढपली का 4 घंटा प्रतिदिन, हारमोनियम व तबले का 2 घंटा प्रतिदिन एवं समूहगान का 1 घंटा प्रतिदिन शिक्षण में दिया जाता है। कर्मकाँड व बौद्धिक कक्षाएँ भी चलती है।
(6) अंतःऊर्जा जागरण सत्र
पाँच दिवसीय ये सत्र प्रतिमाह 1 से 5, 6 से 10, 11 से 15, 16 से 20, 21 से 24 व 26 से 30 तारीखों में होते है। इनमें हर साधक को निर्धारित अनुशासन के अंतर्गत पाँच दिन मौन एक कक्ष में रहना होता है, जिससे वे मात्र एक बार ही बाहर निकलते है। यज्ञ संपन्न करने एवं कल्प सेवन के साथ अखंड दीप के दर्शन करने। पूर्व से अनुमति प्राप्त साधक सहमति पत्र लेकर एक दिन पूर्व पाँच बजे तक आ जाते है। शाम को उनकी संकल्प गोष्ठी 2.30 से 7.30 निर्धारित कक्ष में होती है। 65 कक्षों वाला एक भवन जिसमें कक्ष के साथ ही प्रसाधन-स्नान की सुविधा है एवं प्रत्येक में स्पीकर्स लगे है, इन साधकों के लिए सुरक्षित है। यह विशिष्टतः उच्चस्तरीय साधना करने वालों के लिए निर्धारित किए गए है। कुछ आवश्यकता हो तो घंटी बजा देने पर सहायक आ जाते हैं व स्लिप में लिखे निर्देशानुसार व्यवस्था कर देते है। दिनभर में दस प्रकार की साधनाएँ ऑडियो सिस्टम से निर्देशानुसार कराई जाती है। निताँत मौन रहकर की जाने वाले ये साधनाएँ अतिफलदायिनी है, पर साधक की मनःस्थिति-स्वास्थ्य-पूर्व के सत्रों का विवरण जानकर ही उन्हें अनुमति दी जाती है। ये सभी आम व्यक्तियों के लिए नहीं है। अंतिम दिन निर्देशों के अनुसार लिए संकल्पों को संस्था प्रमुख के सम्मुख प्रस्तुत कर गायत्री मंत्र उच्चारण के साथ मौन तोड़ा जाता है व 11 बजे से पूर्व अपना कक्ष खाली कर देना होता है।
(7) व्यक्तित्व परिष्कार प्रशिक्षण एवं विविध सत्र
समय-समय पर विभिन्न सरकारी-गैर सरकारी संगठनों के कार्यकर्त्ताओं के, स्काउटिंग से लेकर लोकसेवा से जुड़े संगठनों के ये सत्र वर्षभर चलते रहते है। ये तीन से पाँच दिन के होते है। इसके अतिरिक्त एक से दो दिवसीय अतिथि सत्र, गरमी के मौसम में पाँच दिवसीय सत्र, श्राद्ध-तर्पण हेतु आए व्यक्तियों के एक दिवसीय सत्र भी वर्षभर चलते है। कहना न होगा कि ऐसा तीर्थ मिलना दुर्लभ है, जहाँ इतने प्रकार के प्रशिक्षणों का क्रम नियमित चलता है। वर्ष में एक बार सभी परिजनों-पाठको को इनके लिए समय निकालना ही चाहिए।
शपथ समारोह (21 अक्टूबर) के माध्यम से संगठन एक नए मोरचे पर
परमपूज्य गुरुदेव को वेदमूर्ति तपोनिष्ठ कहा जाता है वेद भगवान के साकार विग्रह ज्ञान के धनी जिनकी जीवनभर की साधना सद्ज्ञान विस्तार रही ऐसे वेदमूर्ति हमारे गुरुदेव हैं। उनके द्वारा लिखा ज्ञान तीन हजार से भी अधिक पुस्तक पुस्तिकाओं द्वारा जन जन तक पहुँचा व चूँकि वह उनके आचरण में उतरकर करोड़ों को प्रभावित करता चला गया इसलिए वे आचार्य कहलाए। गीताकार ने ज्ञान को पवित्रतम बनाया है वे कहा है कि मनुष्य के लिए यही सबसे दुर्लभ विभूति है ज्ञान श्रद्धावान, संयमी और कर्मठ हर क्षण लोकसेवा हेतु तत्पर साधक को ही मिलता है, इसलिए वेदमूर्ति उपाधि हर दृष्टि से हमारे इष्ट आराध्य के लिए उपयुक्त बैठती है व हम सबको उसी मार्ग पर चलकर उनका अंग अवयव बनने हेतु प्रेरित करती है।
तप ही वह पूँजी है, जो व्यक्ति को महान आध्यात्मिक, विभूति संपन्न बनाती है। तप में प्रमाद न किया जाए, श्रुति ऐसा कहती है। तपस्वी ब्राह्मणोचित जीवन ही एक चिरस्थायी समाजसेवी संगठन का मूल आधार बनता है। तप ही अंतर्निहित विभूतियों को निखारता है व्यक्ति को लघु से विराट बना देता है तप में निरत तप ‘जिनके कण कण में संव्याप्त रहा, ऐसी हमारी गुरुसत्ता है, इसलिए उन्हें तपोनिष्ठ तप में स्थित, आजीवन कठोर तप में संलग्न देखा गया। अब वही तप हम सभी का मार्गदर्शन कर रहा है। चौबीस चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री अनुष्ठान, आठ हजार गायत्री मंत्र उच्चारण प्रतिदिन बिना किसी विराम के एवं आहार की कठोर तपश्चर्या उनकी जीवन निधि है जिसने गायत्री परिवार जैसे युग परिवर्तनकारी संगठन को खड़ा किया।
जहाँ ‘ज्ञान’ के प्रतीक के रूप में उनकी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका है, जो अखण्ड ज्योति संस्थान से प्रकाशित होती है, वहाँ तप’ के प्रतीक के रूप में उनके द्वार प्रज्वलित अखंड अग्नि (गायत्री तपोभूमि की यज्ञशाला) एवं अखंड दीपक ‘शाँतिकुँज में विद्यमान 1926 से सतत प्रज्वलित है। अखण्ड ज्योति संस्थान उनकी ज्ञान साधना का साक्षी रहा वह केंद्र है, जो आज भी मथुरा जाने वालों को दर्शन करने पर सतत उस सूक्ष्मसत्ता से साक्षात्कार कराता रहता है गुरुसत्ता के ज्ञानशरीर के रूप में सत्तर खंडों में प्रकाशित वाङ्मय है, जो उनके द्वारा लिखा गया जीवनभर का पुरुषार्थ है। हर समस्या का समाधान है एक संजीवनी है। गायत्री तपोभूमि 1951 से 11971 तक बीस वर्ष की अवधि, में गुरुसत्ता द्वारा जिए गए तपस्वी जीवन की साक्षी है। जो संघर्ष आचार्य श्री ने गायत्री महाशक्ति को स्थापित करने के लिए किया, वह उन दिनों की परिस्थितियों को देखते हुए एक मानवीय स्तर पर असंभव है, माने ज्ञाने योग्य कहा जाएगा, परंतु उनने किया एवं वह भी तप की शक्ति के बलबूते किया। आहार का संयम, इंद्रियों का संयम विचारों का संयम और समय का संयम। ऐसा न होता, तो मात्र 4 41 वर्ष की वय वाले आचार्य श्री महामंडलेश्वरों तथा कथित धर्मध्वजाधारी गुरुजनों से मोरचा न ले पाते।
उनका वही तप जो आंवलखेड़ा से आरंभ हो आगरा से यात्रा कर मथुरा तक पहुँचा, हिमालय से तरोताजा होता हुआ, बार बार शक्ति पाता हुआ 1971 में शाँतिकुँज आया व 1972 से 1901डडडडड तक के उनके सप्तर्षियों को तपोभूमि इस पावन क्षेत्र में विराजमान हो गया। यहाँ उनने ऐसी लीला रचाई कि जो कार्य उनने चौबीस वर्ष में किया था वह परमवंदनीया माताजी व उनके संरक्षण में पल बक रही देवकन्याओं द्वारा मात्र चार वर्ष में संपन्न कर लिया गया एक और पूँजी जमा हो गई, जिसने नारी जागरण अभियान की नींव रखी। प्रायः चौबीस लक्ष का दैनिक जप नियमित 1975 के स्वर्ण जयंती साधना वर्ष से चलने लगा एवं गायत्री तीर्थ एक सिद्धपीठ एक कल्पवृक्ष बन गया। हिमालय की प्रतिमा बनी, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान बना एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय विनिर्मित होने लगा। यह तप आगे क्या खेल दिखाएगा, यह तो विधाता ही ज्ञान पर इसका महिमा अपरंपार है।
यह वर्ष इसी तप को याद करने का वर्ष है जो ज्ञान के रूप में प्रकट हो विचार क्राँति अभियान को जन्म देता हुआ चला आया है। मिशन का ज्ञानयज्ञ अभियान इसी तप की पूँजी से निकला है। वेदमूर्ति तपोनिष्ठ गुरुदेव के जीवन का पर्याय बन गया ज्ञान एवं तप बीज रूप में सारे भारत में बिखरता चला गया। उसी से पैदा हुए नर्सरी के पौधे परमवंदनीय माताजी की स्नेह संवेदना-सजल श्रद्धा से सिंचित-पोषित हो आज स्थान-स्थान पर तपती हुई धूप में अगणित व्यक्तियों को छाया, फल, वनौषधियों का लाभ दे रहे है।
गायत्री तपोभूमि का स्वर्ण जयंती वर्ष वेदमूर्ति तपोनिष्ठ को याद कर उनकी इन दोनों विभूतियों को जीवन में उतारने का वर्ष है। यदि 1952-53 में स्थापित गायत्री तपोभूमि के रूप में गुरुसत्ता के संकल्प को सारे भारत व विश्व में फैलाना है, तो इससे सही समय व संदेश क्या हो सकता है। शरदपूर्णिमा की पावन वेला में जहाँ गायत्री तपोभूमि में चुने हुए संकल्पित साधक एकत्रित हुए हों, वहाँ जिए जाने वाले शपथ और संकल्प निश्चित ही ऐसे रहे होंगे जैसी कि उसके अधिष्ठाता-संस्थापक आचार्यजी ने अपेक्षा की होगी। यह वेला है ही ऐसी कि जिसमें न केवल अनुदान बरसे होंगे, प्राणवानों के संकल्प मचल-मचलकर उफन आए होंगे।
यह पत्रिका नवंबर माह की है, पर जब तक यह परिजनों तक पहुँचेगी, वे या तो शपथ समारोह की तैयारी कर रहे होंगे अथवा पहुँच चुके होंगे। शपथ समारोह व मूर्ति स्थापना कार्यक्रम 2, 21, 22 अक्टूबर का है। इसमें 21 अक्टूबर शरदपूर्णिमा का दिन सबसे विशेष है। इसी दिन मूर्ति स्थापना के बाद वह संकल्प लिया जाना है, जिसके माध्यम से युगऋषि के युगनिर्माण के संकल्प में सभी अपने पुरुषार्थ की भावभरी आहुति डालेंगे। बारह वर्ष पूर्व ऐसी ही शरद पूर्णिमा के पावन अवसर का प्रायः बीस लाख भावनाशील प्राणवानों ने अपनी गुरुसत्ता में महाप्रयाण के ठीक चार माह बाद एक संकल्प श्रद्धांजलि समारोह में एक शपथ ली थी कि वे ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल बुझने न देंगे, सदा जलाए रखेंगे। इसके लिए वे ईंधन जुटाएँगे, आवश्यकता होगी तो स्वयं की भी आहुति देंगे। समयदान-अंशदान का अनुपात अपनी सामर्थ्य व भावना के अनुसार और अधिक बढ़ाएंगे।
बारह वर्ष बीत गए। अब वह पावन वेला फिर आई है। इस बीच देवसंस्कृति दिग्विजय का प्रचंड पुरुषार्थ संपन्न हो चुका, आश्वमेधिक पराक्रम तथा संस्कार महोत्सवों की शृंखलाएं संपन्न हो चुकीं। युगऋषि का वाङ्मय प्रकाशित हुआ एवं ज्ञानचेतना को झकझोरने वाली छोटी-छोटी पुस्तिकाएँ प्रकाशित हुई, जो लाखों व्यक्तियों तक पहुँची। गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान के ज्ञान प्रधान तथा शाँतिकुँज हरिद्वार के श्रद्धा व कर्म प्रधान कार्य ने मिशन को चहुँमुखी विस्तार दिया है। अब इस साधना-संगठन-सशक्तीकरण वर्ष में विशिष्टों को उभारने की वेला आई है। अपनी जीवन-साधना को और प्रभावी बनाकर नवसृजन के लिए उपयुक्त व्यक्तियों के निर्माण की अवधि है यह। साधना तंत्र के विस्तार के लिए गायत्री महामंत्र लेखन अभियान को गति दी गई है, तो साथ ही गायत्री साधना को सभी भाषा-भाषियों में पहुँचाने व साधना की गहराई बढ़ाने पर भी जोर दिया जाना है।
वैयक्तिक साधना जब जीवनसाधना बनकर समूह में सक्रिय हो जाती है, तो संगठन का सशक्त आधार खड़ा होने लगता है। अब एक देव परिवार के सृजनशील संगठन के रूप में खड़े होने की वेला में और अधिक पुरुषार्थ की आवश्यकता है, ताकि न केवल जड़े मजबूत हो, पूरा तंत्र सशक्त व प्रामाणिक बने। इसीलिए व्यक्तित्वों की पहचान, उन विभूतियों का सार्थक सुनियोजन, इस पर अधिक जोर इस शपथ समारोह में दिया जाना चाहिए।
संयुक्त प्रयास से देवमानवों का यह संगठन किस क्षेत्र में कौन-कौन से आँदोलन चलाएगा, क्या लक्ष्य निर्धारित किए गए है व किस तरह की रणनीति बना ली गई है, यह अब सुनिश्चित हो जाना चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों में एक या अधिक विभिन्न तरह के आँदोलन (सप्तक्राँतियाँ-सप्तआँदोलन) एक साथ चलाए जा सकते है।
हम इस शपथ समारोह में यह भी शपथ ले कि व्यक्ति-निर्माण से युगनिर्माण तक की यात्रा करने वाले इस मिशन के हम अंग-अवयवों ने अपने जीवन में तप-साधना कितनी बढ़ाई। तप से अर्थ है- ब्राह्मणोचित जीवन एवं बचत का सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन में नियोजन। परमपूज्य गुरुदेव का सूत्र है- सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपना समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे। विभूतियों में समय व धन के अलावा प्रभाव-ज्ञान-पुरुषार्थ भी है। हमें इनके सुनियोजन का एक तंत्र खड़ा करना है।
शपथ समारोह मथुरा में भी हो रहा है एवं शरद पूर्णिमा के दिन दीपयज्ञ के रूप में हर शाखा, मंडल, शक्तिपीठ एवं संगठन की इकाई में भी। इस प्रकार पूरी भारतभूमि शरद पूर्णिमा के दिन एक सामूहिक साधना कर रही होगी। संकल्प पत्र इस अवसर पर अपने नाम, उम्र, पद, पते, मिशन की पृष्ठभूमि के साथ क्षेत्रीय स्तर पर एवं केंद्रीय स्तर पर अपनी शक्ति के नियोजन का भरा जाना है। भरकर इनकी दो प्रतियाँ बनाई जाएँ। एक गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं एक शाँतिकुँज हरिद्वार भेजे। शपथ का अनुयाज ही, जो शरद पूर्णिमा से गायत्री जयंती 23 तक चलेगा, नैष्ठिक रूप से संपन्न होकर वेदमूर्ति की स्थापना की स्वर्णजयंती की सार्थकता प्रमाणित करेगा।
प्रस्तुत समाचार स्तंभ ‘अखण्ड ज्योति’ के पाठकों के लिए इस कारण आरंभ किया गया कि केंद्र व सारी जगती में कहाँ क्या घट रहा है, इसकी जानकारी उन्हें मिल सके। चूँकि सभी परिजन-पाठक पाक्षिक ‘प्रज्ञा अभियान’ नहीं मँगाते, समाचार उन्हें मिल नहीं पाते, इसलिए यह स्तंभ आरंभ किया गया। यह पत्रिका तीन माह पूर्व छपने चली जाती है, इसमें समाचार तब के ही होते है, जो पढ़ते समय पुराने लगते है। ताजे व नित्य−नवीन समाचार हेतु पाठक यदि ‘पाक्षिक’ प्रज्ञा अभियान मँगाने लगे (वार्षिक चंदा 20 रुपये), तो वे इस विराट् तंत्र की विधि-व्यवस्था व नई-नई स्थापनाओं की नियमित जानकारी ले सकेंगे। इस अनुरोध के साथ इस अंक के समाचार प्रस्तुत हैं।
दक्षिण का सघन मंथन कन्याकुमारी की तैयारी
दक्षिण भारत के चार प्रांतों के लिए कार्यकर्त्ताओं समयदानियों को योजनाबद्ध ढंग से शिक्षण देने हेतु एक दौरा दक्षिण म. प्र., छत्तीसगढ़ व उड़ीसा का तथा दूसरा नागपुर केंद्र सहित सारे महाराष्ट्र का जुलाई बीस तक संपन्न हो चुका था। अब तीसरा प्रवासक्रम दस कार्यकर्त्ताओं के विभिन्न दिशाओं में भेजे दलों के द्वारा आरंभ हुआ है, जिसमें आँध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम, विजयवाडा, तिरूपति व हैदराबाद तमिलनाडु के चैन्नई, मदुराई, कन्याकुमारी, कोयंबटूर सहित केरल के तिरुअनतपुरम, त्रिचूर एवं कर्नाटक के बैंगलोर, मैंगलोर, मैसूर एवं बेलगाम में कार्यकर्त्ताओं की गोष्ठियाँ आयोजित की गई है। लक्ष्य है कन्याकुमारी में 25 की दिसंबर या 26 की जनवरी से एक विराट् आश्वमेधिक आयोजन एवं तब तक पूरे दक्षिण भारत का संगठनात्मक मंथन। विशाखापट्टनम, विजयवाडा, हैदराबाद, तिरूपति, चैन्नई में कार्यालय स्थापित हो गए है। शेष सभी केंद्रों में क्षेत्रीय (जोनल) उपकेंद्र बनाना इस दौरे का मूल प्रयोजन है।
जोहान्सबर्ग में विराट् आयोजन
दक्षिण अफ्रीका के सबसे बड़े शहर जोहान्सबर्ग में सितंबर में संपन्न ‘अर्थ सम्मिट’ (पृथ्वी सम्मेलन’ के तुरंत बाद गायत्री आश्रम लेनेशिया के कार्यकर्त्ताओं ने मखवासी, डरबन एवं प्रिटोरिया में बड़े आयोजनों का क्रम रखा था, जिसकी तैयारी के लिए एक दल अगस्त के प्रथम सप्ताह में ही जा चुका था। बाद में देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति इस पत्रिका के संपादक भी पहुँचे एवं उनने भावनाशील परिजनों के एक विराट् समुदाय को इस नवीन स्थापना की जानकारी दी। समग्र अफ्रीका से कार्यकर्त्ताओं का वहाँ मिलन समारोह हुआ व संगठनात्मक चर्चाएँ भी हुई। 17 कुँडी महायज्ञ में भाग लेकर हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए।
विश्वविद्यालय में खुलते प्रगति के नए आयाम
धर्म विज्ञान केंद्र की स्थापना के साथ साधना संकाय में एक विशिष्ट प्रशिक्षण देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में आरंभ हो चुका है। अब यहाँ धर्मशास्त्र की सभी विधाओं का, पौरोहित्य-ज्योतिर्विज्ञान का भी शिक्षणक्रम चलेगा। इसके साथ ही बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट, अर्थ समिति एवं बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग भी सितंबर माह में सम्पन्न हो गई। प्रगति संतोषजनक है। छात्र-छात्राएँ, शिक्षक व सारे सदस्य कार्य करने में एक विलक्षण आनंद की अनुभूति करते है। विश्वविद्यालय चूँकि आवासीय है सारे सदस्य एक परिवार की तरह शाँतिकुँज की ही दिनचर्या अपनाकर अपना दैनंदिन कार्य कर रहे है।
सीसवाली-कोटा में एक महाकुँभ
परमपूज्य गुरुदेव ने नरमेध यज्ञ की तैयारी के दौरान जिस क्षेत्र का सर्वाधिक प्रवास किया था, वह था राजस्थान का हाडौती क्षेत्र उसमें भी कोटा व बाराँ वाला क्षेत्र। कोटा से लगभग 7 किमी. दूर सीसवाली स्थित है। शाँतिकुँज के नैष्ठिक कार्यकर्त्ता श्री रामेश्वर नैनीवाल जी ने ग्राम-ग्राम संपर्क कर अगस्त के द्वितीय सप्ताह में एक विराट् आयोजन अपने गाँव सीसवाली में रखा जिसमें 17 कुँडी महायज्ञ, कार्यकर्त्ता महासम्मेलन, गोशाला की स्थापना तथा देवसंस्कृति विद्यालय का भूमिपूजन रखा गया था, शाँतिकुँज से श्रीमती शैलबाला पंड्या एवं डॉ. प्रणव पंड्या भी 11 अगस्त को एक दिन के प्रवास पर पहुँचे। सारे समारोहों में भाग लिया विराट् जनमेदिनी को संबोधित किया एवं लौटते हुए कोटा शक्तिपीठ में नवनिर्मित बहुउद्देशीय हॉल का उद्घाटन किया कार्यकर्त्ता गाँव गाँव से आए थे एवं दृश्य महाकुँभ की तरह था।
आपदा प्रबंधवाहिनी का पुरुषार्थ
उत्तराँचल प्रांत में विगत भूकंप (गुजरात 26, 1, 1) के बाद केंद्र में एक आपदा प्रबंधवाहिनी का निर्माण किया, जिसमें एक फायर ब्रिगेड, एक चलता फिरता अस्पताल, एक जेनरेटर सहित चलने वाला वाहन पानी की टंकी वाला वाहन एवं दो एंबुलेंस है। पिछले दिनों टिहरी जनपद (उत्तराँचल) के बूढ़ा केदार क्षेत्र में बादल फटने पर यह वाहिनी सूचना मिलते ही घटना के चौबीस घंटे के अंदर पहुँच गई। क्षेत्र दुर्गम था, पर साधनों को ले जाने की सुगमता इस वाहिनी के साथ गए राहत दल के कारण भलीभाँति हो गई चिकित्सकों का दल व राहत सामग्री के पहुँचते ही भुक्तभोगियों को लगा कि मानो देवता आ गए हों। तब तक शासन स्तर पर कोई भी सामग्री नहीं पहुँच पाई थी। अपना कार्य सम्पन्न कर आगे का कार्य शासन को सौंपकर पर वाहिनी पाँचवें दिन लौट आई। गायत्री परिवार हर ऐसी आपदा में कर्त्तव्य निभाने को संकल्पित है।
दीपावली पर्व पर घर-घर ऐसे दीप जलाएँ हम, भीतर-बाहर का अँधियारा, मिलकर आज मिटाएँ हम।
हम मन में अँधियार, कि चिंतन भटका है, बौराया है, प्रगति देखकर औरों की हर व्यक्ति बहुत ललचाया है, निज अभाव का नहीं, दूसरों के सुख का दुःख ज्यादा है, व्यक्ति पड़ोसी की ही दुर्गति करने पर आमादा है।
इन भूले-भटको को फिर से सही मार्ग पर लाएँ हम, भीतर-बाहर का अँधियारा, मिलकर आज मिटाएँ हम।
कहीं अंधविश्वास, कहीं अज्ञान तिमिर बन छाया है, अहंकारवश मनुज विद्वत्ता पाकर भी भरमाया है, कहीं जगमगाहट में भी तो फैले घने अँधेरे है, वर के पिता विवाहों में बन जाते स्वयं लुटेरे है।
सबकी दृष्टि खुले, ऐसा उज्ज्वल प्रकाश फैलाएँ हम, भीतर-बार का अँधियारा, मिलकर आज मिटाएँ हम।
घने अँधेरे ने भ्रम फैलाया है धर्म स्थानों में, कहीं नहीं है किरण द्वार पर, आँगन में, दालानों में, प्रीति नहीं, नफरत पलती मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों में, मानवता के शत्रु शरण पाते इनकी दीवारों में।
सच्चा मर्म धर्म का, इन सबको जाकर समझाएँ हम। भीतर-बाहर का अँधियारा मिलकर आज मिटाएँ हम।
दीपक का है प्राण स्नेह, यह स्नेह न कम होने देंगे, छोटे-से दीपक की गरिमा कभी न हम खोने देंगे, हम है स्नेह-सिंधु के वासी, स्नेह बाँटने आए हम, कोई कंठ न तरसे प्यासा, स्नेह-कलश है लाए हम।
मात्र शब्द से नहीं, आचरण से यह बात बताएँ हम, भीतर-बाहर का अँधियारा, मिलकर आज मिटाएँ हम।
जलें दीप से दीप, रोशनी ऐसी हो परिवारों में, तिमिराच्छन्न मनों में भी फिर आए क्राँति विचारों में, तज अधर्म, अध्यात्म-मार्ग पर हम सहर्ष चलना सीखे, नवयुग के अनुरूप नए साँचे में खुद ढलना सीखे।
अब तक हुई भूल जो हमसे, उसे न फिर दुहराएँ हम, भीतर-बाहर का अँधियारा, मिलकर आज मिटाएँ हम।
-शचींद्र भटनागर
----***----
*समाप्त*