समाधि का सत्य

साधक समाधि की अभीप्सा करते हैं। लेकिन यह समाधि है क्या? इस सत्य की अनुभूति विरले ही कर पाते हैं। कुछ कहते हैं- बूँद का सागर में मिल जाना समाधि है, तो कोई सागर के बूँद में उतर जाने को समाधि कहते हैं। पर जिन्हें समाधि के सत्य की अनुभूति हुई है, वे बताते हैं- बूँद और सागर दोनों का मिट जाना समाधि है। जहाँ न बूँद है, न सागर है, वहीं समाधि है। जहाँ न एक है, न अनेक है, वहीं समाधि है। जहाँ न सीमा है, न असीम है, वहीं समाधि है।

प्रभु के साथ घुल-मिलकर एक हो जाना समाधि है। सत्य, चैतन्य और शान्ति इसी के नाम हैं। ‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं’ महात्मा कबीर की इस अनुभूति में समाधि के इसी सत्य की अभिव्यक्ति है। ‘मैं’ समाधि में नहीं होता है, बल्कि यूँ कहें कि जब मैं नहीं होता, तब जो कुछ भी होता है, वही समाधि है। और शायद यह ‘मैं’ जो कि मैं नहीं है, वास्तविक मैं है।

दरअसल ‘मैं’ की दो सत्ताएँ हैं- अहं और ब्रह्म। अहं वह है, जो मैं नहीं हूँ, फिर भी हमेशा मैं जैसा प्रतीत होता है। ब्रह्म वह है, जो वास्तव में मैं है, लेकिन जो मैं जैसा एकदम नहीं भासता। आत्मचेतना, शुद्ध चैतन्य ब्रह्म यही अपना असली स्वरूप है। यही समाधि में अनुभव होने वाला सत्य है।

अपने वास्तविक स्वरूप में हम सभी शुद्ध साक्षी, चैतन्य हैं। पर विचारों के चक्रवात में उलझ जाने के कारण यह सच्चाई समझ में नहीं आती। यथार्थ में ‘विचार’ अपने आप में चेतना नहीं है, बल्कि जो विचार को जानता है, देखता है, वही चैतन्य है। विचार विषय है, चेतना विषयी है। जब चेतना अपने को भूल जाती है, अपने को विचारों में खो देती है, तो इसी को प्रसुप्त अवस्था या असमाधि कहते हैं।

इसके विपरीत जब चेतना अपने आप को विचारों के मकड़जाल से मुक्त कर लेती है, तब उसे समाधि का अनुभव होता है। संक्षेप में चेतना की निर्विचार अवस्था ही समाधि है। विचार शून्यता में आत्मचेतना का जागरण सत्य और सत्ता के द्वार खोल देता है। सत्ता अर्थात् विराट् भगवत् चेतना। इसमें जागरण ही तो समाधि सत्य का अनुभव है। इसी को पाने के लिए समस्त जाग्रत् आत्माएँ प्रेरित करती रहती हैं।


भक्ति और ज्ञान एक दूसरे के पूरक

ज्ञान का अर्थ है उत्कृष्ट चिंतन तथा भक्ति का तात्पर्य है संवेदना, भावना। ये दो धाराएँ हैं। ये पक्षी के दो पंख, नाव के दो पतवार तथा नदी के दो तट हैं। जीवन की चैतन्य चेतनता इसी के बीच बहती-प्रवाहित होती है। इन दोनों के समुचित विकास से ही जीवन में परमात्मा का दिव्य प्रकाश प्रकाशित होता है। परमावस्था एवं सिद्धावस्था की प्राप्ति होती है। पूर्णता एवं समग्रता दोनों के मिलन-संगम में सधती है।

ज्ञान भक्ति की शुरुआत है, प्रारम्भ है। और भक्ति ज्ञान की पराकाष्ठा है, अन्तिम सोपान है। ज्ञान उर्वर भूमि तैयार करता है। इसके लिए उस भूमि में जड़ जमाए फैले कुसंस्कार रूपी खरपतवारों को उखाड़ता-फेंकता है तथा उसमें खाद-पानी डालता है। इस तैयार भूमि में भक्ति का बोया गया बीज है। अतः बीज के अंकुरण-अभिवर्द्धन के लिए उर्वर भूमि एवं प्रखर बीज दोनों की आवश्यकता है। दोनों के संयोग से ही विकास की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। चिन्तन प्रखर हो और भावना न हो तो जीवन नीरस एवं शुष्क हो जाता है और विवेक के अभाव में भावना अंधी हो जाती है। जीवन भटक जाता है।

ज्ञान बुद्धि से उपजता है और भक्ति हृदय की गहराई से। ज्ञान से बुद्धि परिष्कृत तो हो जाती है, उसकी साफ-सफाई तो हो जाती है। परन्तु भक्ति के अभाव में पुष्पित, पल्लवित, विकसित नहीं होती। प्रभु के पथ पर, श्रेष्ठ राह पर बढ़ने के लिए उत्पन्न बाधाओं, रोड़ों एवं कठिनाइयों को ज्ञान काटता-मिटाता जाता है लेकिन जो सीढ़ियाँ एवं सोपान है वे केवल भक्ति की सीढ़ी से ही चढ़ी जाती है। अतः ज्ञान व्यर्थ को तोड़ता है, निरर्थक को हटाता है और अनर्थ को मिटाता है। परन्तु इसकी सार्थकता भावना में सधती है, इसकी समग्रता भक्ति में मिलती है।

ज्ञान में प्रखरता एवं ओजस्विता तो है, पर रेगिस्तान के असह्य ताप के समान। इसमें स्वच्छता, पवित्रता तो है पर निर्बीज। विस्तार है, पर न तो कोई ऊँचाई, न कोई गहराई। स्वयं में ज्ञान शुष्क है, नीरस है, एकाकी अकेला है। ठीक इसी प्रकार भक्ति की भावधारा में जीवन विकसित तो होता है, पर एकाँगी, अपूर्ण। भक्ति से जीवन में वृक्ष तो उगेंगे, फूल तो आएँगे, हरियाली भी होगी लेकिन उस हरियाली को बचाने के लिए कोई उपाय न होंगे, कोई सुरक्षा-संरक्षण का कवच न होगा। विवेक सम्मत ज्ञान ही इस हरी-भरी हरियाली की सुरक्षा का दृढ़ आधार है। ज्ञान ही इसे एक मजबूत ढाँचा प्रदान करता है। यह एक ऐसा लौह कवच है जैसे पसलियाँ धड़कते हृदय को ढाँके रहती है। और खोपड़ी मस्तिष्क को ढाँपे रखती है। विवेक-बुद्धि से ही भावना का वृक्ष पनपता-विकसित होता है।

भावनाएँ उर्वर भूमि है, जुताई की गई, खाद-पानी डाली जमीन तैयार है। इसमें बीज तो उगेंगे ही, अंकुर तो फूटेंगे ही। चाहे वह काँटेदार बबूल का हो, कड़वी नीम के हों या छायादार फलदार आम के। भावनाओं में सत्य के बीज उगते हैं और असत्य के भी अंकुरित होते हैं। विश्वास भी पल्लवित होता है और संदेह भी पनप सकता है। प्रेम, दया भी विकसित हो सकती है और घृणा-वैमनस्य भी फन फैला सकता है। अतः इस उर्वर भूमि में केवल सत्य के, श्रद्धा के, आस्था के, निष्ठ के बीज गले एवं अंकुरित हो। इसके लिए आवश्यक है भावनाओं की विवेकसम्मत बुद्धि से रखवाली एवं निगरानी। भावना को इसी पथ का अनुसरण करना होगा।

भावना यदि ज्ञान के मार्ग से न गुजरी हो तो उसका नींव कमजोर होगी। भक्ति रूपी उसका भवन सदा हिलता, डुलता रहेगा। प्रबल झंझावात से तो दूर एक हल्के थपेड़े से भी इसकी टूटने-गिरने-मिटने की आशंका बनी रहेगी। सामान्य क्रम में भक्त तो केवल विश्वास करना जानता है, उसे मात्र श्रद्धा आरोपण करना आता है। वह उन पर भी विश्वास कर लेता है जो उसे सत्पथ पर ले जा रहे हैं। वह उनका भी अनुगामी बन सकता है जो उसे भटका रहे हैं। उसमें संदेह के बीज भी फूट सकते हैं। वह गलत को भी पकड़ लेता है उसी प्रकार जिस तरह ठीक को पकड़ता है। वह सोचता कहाँ है? क्योंकि वह बुद्धि की भाषा का नहीं, हृदय के उद्गार का अनुगामी है। वह केवल हृदय के उठने-गिरने, मद्धम-उच्च स्वर की तीव्रता को पहचानता है। यह ठीक तो है, इसमें इसकी विशेषता एवं महत्ता तो झलकती है पर यह पूर्ण ठीक नहीं है, समग्र नहीं है।

अकेली भावनाएँ मूक होती हैं। और बुद्धि वाचाल होती है। इन दोनों के मिलन से ही चरम संयोग बनता है। इन दोनों के एकाकार में ही परम उपलब्धि घटित होती है। जीवन रूपी महासमर को जीतने के लिए और उस जीत हेतु आवश्यक कला-कौशल प्राप्त करने के लिए इस जोड़ी की अनिवार्य आवश्यकता है। अन्यथा यह संग्राम बहुत भारी पड़ेगा। ज्ञान रूपी अस्त्र-शस्त्र से वार तो किया जा सकता है पर भक्ति की ढाल के बिना अपना बचाव नहीं किया जा सकता। अतः जितना उपयोग विचारों का है, उतनी उपादेयता भावनाओं की है।

इसी कारण विश्वविश्रुत स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- ‘मुझे आचार्य शंकर के समान प्रखर मेधा की आवश्यकता है तो बुद्ध के सदृश करुणा, भावना, संवेदना से ओतप्रोत हृदय की।’ एक पर्याप्त नहीं है, अपूर्ण है। जिसने एक को प्राप्त किया है वह आधा-अधूरा रहा। इसलिए तो समस्त ज्ञान-विज्ञान को जान लेने पर भी देवर्षि नारद के अन्दर एक अतृप्ति रह गयी थी, किसी चीज को पाने की कसक, तड़पन, पीड़ा रह गई थी। और वह व्यथा, वह अतृप्ति तभी मिटी जब उन्होंने भक्ति रूपी सोमरस का पान कर लिया। उनमें ज्ञान के साथ भक्ति का भी उदय हुआ और वे इसी भावधारा में स्पन्दित एवं तरंगित हुए। नारद भक्ति सूत्र इसी का परिणाम है। आचार्य शंकर केवल प्रखर मेधा-प्रज्ञा के ही धनी नहीं थे उनके अन्दर हृदय की विशालता भी थी। वे प्रेम व भक्ति के जीवन्त पुरुष थे। उनके सौंदर्य लहरी में भक्ति की गहन गम्भीरता परिलक्षित होती है। महाकवि दिनकर तभी राष्ट्रकवि के अलंकरण से अलंकृत हो सके जब वे शुष्क विचारों से सजल भावनाओं की ओर उन्मुख हुए।

बुद्धि के मार्ग में दार्शनिकता-तात्त्विकता का जन्म होता है इससे जीवन में तर्क की सूखी रेत भर जाती है। सोचा बहुत है, परन्तु पहुँचा कहीं नहीं। पहुँचा तो तभी जा सकता है जब इसमें भावनाओं का पुट हो, करने का साहस हो। इसी तरह एकाँगी भावना भावुकता बन जाती है। और भावुकता उस ओस की बूँद की तरह है जिसमें आकर्षण है, पर क्षणभंगुर। सूरज की तपन बढ़ते ही यह गल जाती है, भाप बन उड़ जाती है। जीवन में आनन्द तभी बरसेगा, संगीत तभी गूँजेगा जब बुद्धि और भावना का संयोग होता है। इनका संयोग महायोग विनिर्मित करता है। इनके मिलने से महासमन्वय घटित होता है। और जब यह क्रियान्वित होता है, कर्म में उतरता है तो जीवन प्रभुमय हो जाता है।

ज्ञान और भक्ति, विचारणा और भावना के दो पतवारों से जीवन की नाव भवसागर पार लगती है। ये गाड़ी के दो पहिये हैं, जो मंजिल तक, गंतव्य तक पहुँचाने के लिए वाहक बनते हैं। ये नदी के दो तट हैं, दो पाट हैं जिसके बीच से बहना-गुजरना पड़ता है। बहने के लिए दोनों किनारों का सहारा चाहिए। और अन्त में दोनों किनारे छूट जाएँगे, मिट जाएँगे, विलीन हो जाएँगे। न नदी रहेगी, न धारा और न किनारा। सब सागर में जलमय हो जाते हैं। पर प्रभु के द्वार तक पहुँचने के लिए इन दोनों की, विचार और भावना की आवश्यकता है। यही साधना है, जिससे सिद्धि और समाधि जन्मती है। यह घटित तभी होती है जब हमारा चिन्तन उत्कृष्ट हो, भावना परिष्कृत हो। तभी कर्म भी श्रेष्ठ व निष्काम हो सकेंगे। जीवन की सार्थकता, समग्रता भी इसी में है। हम सभी को अपने विचारों, भावों एवं कर्मों से सतत् इसी श्रेष्ठता की ओर अग्रसर होते रहना चाहिए।


स्वच्छंद आचर (Kahani)

सूफी संत शिवली एक दिन लंबी−सी जलती लकड़ी लेकर दौड़े जा रहे थे। लोगों ने पूछा−ऐसा किसलिए?

उन्होंने कहा−जन्नत में आग लगाने जा रहा हूँ, जिसमें लोग खुदा की इबादत करने नहीं, ऐशो−आराम के लालच से जाने के लिए चोर दरवाजा तलाश करते हैं। कर्तव्यों को भूल जाते हैं, स्वच्छंद आचरण करते फिरते हैं।


मन की शाँति पानी हो तो क्षमाशील बनें

क्षमा वीरों का भूषण है, शूरमाओं का अलंकार है और देवताओं का दिव्य लक्षण है। सच्चा वीर व साहसी वही है जो औरों की गल्तियों, त्रुटियों एवं नासमझियों को क्षमा कर देता है। क्षमादान एक उत्कृष्ट साहस एवं अप्रतिम पराक्रम से कम नहीं है। यह भावपूर्ण और विशाल हृदय का परिचय है, जिसके स्पर्श के अब तक कितने ही लोगों का हृदय परिवर्तन हुआ है और वे अपनी जीवन की दशा एवं दिशा को बदलने में समर्थ हुए हैं। क्षमा एक ऐसा दैवीय तत्त्व है जो स्वयं को उपकृत तो करता ही है साथ ही औरों का भी उपकार करता है।

शास्त्र वचनों के अनुसार क्षमा धर्म का लक्षण है। धर्म अर्थात् जिसे हम धारण करते हैं और जिसे धारण कर हम जाने, पहचाने एवं समझे जाते हैं। इस परिभाषा के अनुसार क्षमा से ही हमारे समूचे अस्तित्त्व की पहचान बनती है। इसके बिना न तो हमारा कोई यथार्थ परिचय है और न पहचान। मनुष्य का मनुष्यत्त्व, इंसान की इन्सानियत तभी तक है जब तक कि उसमें क्षमा जैसे गुणों का सुन्दर सम्मिश्रण है। इसी के द्वारा ही मनुष्य की सार्थक व्याख्या होती है। और इसकी ठीक-ठीक परिभाषा की जा सकती है। अन्य शब्दों में क्षमा का तत्त्व ईश्वर की श्रेष्ठ कृति मनुष्य का दिव्य अलंकार है। इसी गुण के कारण ही इसमें नैसर्गिक सौंदर्य की आलोक-आभा झलकती है।

मनुष्य जीवन दैवीय वरदान होने के साथ एक गूढ़ पहेली भी है। इसके पथ गहन खाइयों, खन्दकों एवं दुर्गम जंगलों-सुरंगों से होकर गुजरते हैं, जिसमें कभी गुजरे नहीं, चले नहीं, जाना एवं पहचाना नहीं ऐसे निविड़ पथ पर मनुष्य को चलना-बढ़ना पड़ता है। ऐसे राह पर आकर्षणों की भूल-भुलैया का होना स्वाभाविक है। और सम्भवतः जीवन में गल्तियाँ-त्रुटियाँ इसी वजह से हुआ करती है। इसलिए सामान्य इन्सान को गल्तियों का पुतला भी कह दिया जाता है, जो पग-पग पर गल्तियाँ करता है और ठोकरें खाता है। ऐसे अज्ञानी जन क्षमा के पात्र होते हैं। संवेदनशील हृदयवान व्यक्ति ऐसे लोगों को क्षमा कर देते हैं। वे जीवन की गूढ़ता से परिचित होते हैं, मानवी स्वभाव के मर्मज्ञ होते हैं, इसलिए वे सभी की, सभी प्रकार की त्रुटियों को उदार एवं उदात्त हृदय से माफ करते रहते हैं।

जो दूसरों को क्षमा कर देता है वह ईश्वर का प्रियपात्र बनता है। भगवान् उसकी समस्त कमियों-खामियों एवं दुर्बलताओं को क्षमा कर देता है और अपने अंक में समा लेता है। वह ऐसे अपना लेता है जैसे सन्त तिरुवल्लुवर को अपना लिया था। दक्षिण के यह उदार सन्त जीवन भर सबको क्षमा करते रहे। कई बार खोटे सिक्के के बदले भी वे नये कपड़े दे देते थे। अनेकों बार वे स्वयं ठगा जाते थे पर औरों को नहीं ठगते थे। ठगने वालों को कभी कोई दण्ड नहीं दिया। वे उन्हें अपने सजल हृदय से माफ कर देते थे। इस प्रकार उनके पास नये कपड़े देने के बदले प्राप्त खोटे सिक्कों का एक बड़ा संग्रह हो गया। इन सिक्कों को तो कहीं चलना ही नहीं था। ये तो मात्र संत तिरुवल्लुवर के पास ही चल सकते थे। परिणामतः इसकी एक पोटली बन गई। जीवन के अन्तिम क्षणों में उन्होंने से परमात्मा से कहा- प्रभु! मैंने जीवन भर दूसरों के खोटे सिक्कों को चलाया है, मैं अकिंचन भी एक खोटा सिक्का हूँ। प्रभु! तु मुझे भी चला दे। और परमात्मा ने उन्हें अपना लिया। दूसरों को वे जीवन भर क्षमा करते रहे और वे भी क्षम्य हो गये, परमात्मा द्वारा अपना लिये गये।

क्षमा, उदारता व विशालता का परिचायक है। जिसका हृदय जितना उदार होगा वह उतना ही क्षमाशील होगा। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि क्षमा करने से संकीर्णता घटती है व विशालता बढ़ती है। क्षमा तो एक निष्काम भाव है। जिसे क्षमा दी जाती है उससे न तो कोई अपेक्षा होती है और न उपेक्षा। जहाँ अपेक्षा और उपेक्षा हो वहाँ सहज क्षमा का भाव कहाँ होगा? वहाँ तो अहंकार की मोटी, मैली एवं दुर्गन्धयुक्त चादर होती है। जो उदात्त भावनाओं एवं उत्कृष्ट विचारों को ढंके-ढाँपे रहती है। दंभ और अहंकार से घनीभूत मनोवृत्ति से ग्रसित व्यक्ति कभी किसी को माफ नहीं कर सकता। वह तो लेना जानता है, देना नहीं। वह केवल अपनी गल्तियों के लिए क्षमा की याचना करता है और वह भी विनम्रता के साथ नहीं उद्धतता व उद्दण्डता के साथ। इसके विपरीत क्षमा तो विचारों की बहती हुई एक सरिता है, भावनाओं का झरता हुआ झरना है जो स्वयं बहती है और अपने घाट में आने वाले अनगिनों की प्यास बुझाती चलती है।

इसमें अनायास ही अनेकों सद्गुण लिपटे रहते हैं। इसके अभाव में तो हिटलर और मुसोलिनी ही पैदा हो सकते हैं। परन्तु इसके साथ जीवन का समन्वय संत, सिद्ध, महात्मा की सृष्टि करता है। और ये क्षमा की साक्षात् मूरत होते हैं। इन्हें ही इन्सान की वृत्तियों की गहन समझ होती है। मानवीय भूलों के लिए सदा क्षमा करते रहना इनका सहज स्वभाव होता है। इनका क्षमादान कभी व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि इससे एक नया मानव गढ़ता है। ऐसे ही थे करुणावतार भगवान् बुद्ध। तथागत की क्षमा से दुर्दान्त अंगुलीमाल का जीवन ही बदल गया, उसका सारा अहंकार पल भर में पश्चाताप के आँसू बनकर बह गया और वह सन्त बन गया। शास्ता की क्षमा रूपी सजल धारा से नगरवधु अम्बपाली की सारी अपवित्रता धुल गई वह साधिका बन गई, भिक्षुणी हो गई।

क्षमा एक अनूठा दिव्यास्त्र एवं ब्रह्मास्त्र के समान जिसकी शक्ति इतनी अनोखी होती है कि बिना रक्तपात के, बिना टूट-फूट के ही विजय पताका फहराने लगती है और हृदय साम्राज्य को अधिकार कर लेती है। क्षमापुरुष वशिष्ठ ने इसी का प्रयोग किया था। उन्होंने अपने प्राणहन्ता राजा विश्वरथ पर इसका अमोघ प्रयोग किया। और राजा विश्वरथ जन-जन के हितैषी समस्त विश्व के मित्र विश्वामित्र बन गये। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की क्षमा ने उन्हें भी ब्रह्मर्षि बना दिया। उनके हृदय का अहंकार गल गया और जीवन का समस्त ताप मिट गया और वे स्वयं भी क्षमा के जीवन्त प्रतिमा बन गये।

क्षमाशील को अपने जीवन में एक अपार सन्तोष का अनुभव होता है, जिसे कर्म एवं व्यवहार में उतारकर ही अनुभव किया जा सकता है। इससे आन्तरिक गुणों का विकास एवं अभिवर्द्धन होता है। इस संदर्भ में वैज्ञानिक शोध अनुसन्धान भी हो रहे हैं। इससे भी विदित होता है कि क्षमा शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक शाँति का एक महत्त्वपूर्ण कारक है। यह निष्कर्ष एक सर्वेक्षण पर आधारित है, जिसमें अंतर्गत 1400 लोगों को शामिल किया गया था। पाँच महीने के अध्ययन-अन्वेषण के पश्चात् पता चला कि 45 से 64 साल के लोगों में क्षमा का भाव प्रायः अधिक विकसित रूप में होता है। 65 से अधिक उम्रदराज के लोगों में यह भाव और भी अधिक मात्रा में पाया गया।

इस अध्ययन से यह भी पता चला कि क्षमा करने वाले लोग अपेक्षाकृत अधिक शान्त एवं सहज होते हैं। उनमें शान्ति एवं सन्तोष की भावना सामान्य से अधिक होती है। इसके ठीक विपरीत जो क्षमा में विश्वास नहीं रखते, जो औरों को उनकी त्रुटियों एवं दोषों पर दण्ड देने पर विश्वास रखते हैं उनकी मनःस्थिति अशान्त एवं आक्रामक पायी गयी। यह वृत्ति अधिकतर 18 से 44 वर्ष उम्र के युवाओं में दृष्टिगोचर हुई। इसके निष्कर्ष के परिप्रेक्ष्य में मिशिगन विश्वविद्यालय के डॉ. लारेन और शोधकार्य में संलग्न उनके सहयोगियों का कहना है कि क्षमा से शारीरिक एवं मानसिक लाभ का मिलना अब एक सुनिश्चित वैज्ञानिक तथ्य है। हाँ यह बात भिन्न है कि यह किसे कितनी मात्रा में उपलब्ध हुआ। इतना तो तय है कि क्षमा से आत्मिक सन्तोष मिलता है। यह अनुभव एक निर्विवाद तथ्य है, एक अकाट्य सत्य है। आवश्यकता है इस दैवीय गुण को विकसित करके इसके दिव्य अनुभव को अनुभव करने की।

क्षमाशीलता की भाववृत्ति को अपनाकर हम भी सच्चे साहसी, पराक्रमी एवं उदारचेताओं की श्रेणी में गिने जा सकते हैं। इस व्रत को अपनाकर हम भी सही मानवीय गरिमा से सम्पन्न बन सकते हैं क्योंकि क्षमादान से बड़ा कोई दान नहीं। इसे अपनाकर अपना जीवन भी धन्य हो ऐसा संकल्प सबके अन्दर जागे। हम धन्य हों और दूसरों को धन्य करें।


जीवन शैली से उपजे मनोविकास व उनका समाधान

आधुनिक युग की त्रुटिपूर्ण जीवनशैली के कारण जहाँ शारीरिक रोगों की बाढ़ सी आ गई है। वहीं मानसिक रोगों की संख्या भी निरन्तर बढ़ती जा रही है। राष्ट्रीय मानसिक कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार भारत में इस समय तीन करोड़ मानसिक रोगों से पीड़ित हैं। शारीरिक रोगों के लिए जहाँ व्यापक एवं पर्याप्त चिकित्सीय सुविधाएँ उपलब्ध हैं। मनोरोगियों के साथ इस संदर्भ में यथोचित न्याय नहीं हो पाता। एक तो मन के रोग सूक्ष्म होते हैं, जो सामान्यतः पकड़ में नहीं आते, दूसरे प्रचलित अंधविश्वासों एवं मूढ़मान्यताओं के कारण इनके प्रति सामाजिक रवैया सहानुभूतिपूर्ण नहीं होता। मनोरोगी को उसकी असामान्यता के अनुरूप सनकी, पागल, शेखचिल्ली, शंकालु आदि संबोधनों से उपहासित, लाँछित एवं प्रताड़ित किया जाता है। रोगी नारकीय यंत्रणा से होकर गुजरता है। जब समाज के साथ उसके अपने परिवारजन भी उससे अमानवीय व्यवहार करते हैं तो जीते जी रोगी प्राणान्तक कष्ट से छटपटाता रहता है। साथ ही अपनत्त्व, संवेदना एवं प्यार की एक बूँद के लिए तरसता रहता है।

मनीषियों के इस काम में चिंता मन में उठने वाली एक सामान्य वृत्ति है, जिसमें व्याकुलता, भय एवं व्यग्रता का समावेश रहता है। यह शरीर व मन को चुनौतीपूर्ण स्थिति से निपटने के लिए सचेत व एकाग्र करती है। लेकिन यही चिंता अपने बढ़े हुए रूप में ‘एंग्जायटी’ या दुश्चिंता का रूप ले लेती है व सामान्य जीवन को दुभर कर देती है।

दुश्चिंता का प्रमुख लक्षण अस्वाभाविक एवं निर्मूल चिंता है। मन तनावग्रस्त हो उठता है व बेमतलब शंकाओं से घिर जाता है। मन किसी एक जगह पर एकाग्र नहीं हो पाता। उलझन, बेचैनी, चिड़चिड़ाहट, घबराहट, छोटी-छोटी बातों में गुस्सा, भविष्य को लेकर काल्पनिक चिंताएँ व्यक्तित्व का हिस्सा बनने लगती हैं। दुश्चिंता में दिल की धड़कन तेज हो जाती है। साँस तेजी से चलने लगती है। नब्ज़ गति तेज हो जाती है, ब्लडप्रेशर घटता-बढ़ता रहता है। माँसपेशियों में तनाव, हाथ पैर का कंपन हथेलियों व माथे से पसीना चूने लगता है। जरा सी आहट से नींद चली जाती है। भूख कम हो जाती है। स्त्रियों में मासिक धर्म गड़बड़ा जाता है। रोगी का स्वास्थ्य बिगड़ता जाता है।

चिंता की तरह उदासी भी मन की एक अवस्था है। जीवन के कठिन क्षणों, दुर्घटनाओं व दुःख-कष्टों में व्यक्ति का उदास होना स्वाभाविक है। लेकिन जब जीवन के चारों ओर उदासी का अंधेरा इतना सघन छा जाता है कि जीवन की दिशा, उत्साह व उमंग समाप्त हो जाते हैं व जीवन भारभूत लगने लगता है। व्यक्ति नकारात्मक सोच से ग्रसित हो जाता है। उसे अपना भूत, वर्तमान एवं भविष्य सभी कुछ बेकार सा लगता है, तो यह अवसाद अर्थात् डिप्रेशन रोग का शिकार बन जाता है। अपनी चरमावस्था में रोगी आत्महत्या तक कर सकता है।

नकारात्मक सोच व उदासी के साथ सुस्ती व कमजोरी की शिकायत रहती है। व्यक्ति जल्दी थक जाता है। कब्ज या दस्त की शिकायत रहती है। सर में भारीपन या दर्द की शिकायत रहती है। काम में मन नहीं लगता है। भार में लगातार कमी होती है। अन्य लक्षणों में अकारण घबराना, बातचीत न करने का मन, बिना कारण रोने की इच्छा, नींद न आना, नींद आने पर बुरे-बुरे स्वप्न आना, दिमाग में कंपकंपी व झनझनाहट आदि प्रमुख है। इस दशा में व्यक्ति चाय, कॉफी, सिगरेट व अन्य नशों की अधिक आवश्यकता महसूस करता है।

अवसाद परिस्थितिजन्य कारकों के अतिरिक्त, यह जैव रसायनों के असंतुलन से भी हो सकता है। इसमें मस्तिष्क के जैव रसायन ‘सेरोटॉनिन’ की कमी के कारण व्यक्ति अवसाद में चला जाता है। इसके अतिरिक्त नशीले पदार्थ, शराब, कुछ शारीरिक रोग व कुछ दवाइयाँ भी न्यूरोट्रांसमीटर में कमी लाकर अवसाद पैदा कर लेती है।

न्यूरोट्रांसमीटर सेरोटॉनिन की कमी के कारण जहाँ व्यक्ति अवसाद के घने कुहासे से घिर जाता है। वहीं इसके बढ़ने पर, इसका दूसरा सिरा मैनिया के रूप में परिलक्षित होता है। इसमें रोगी अति उत्साह में आ जाता है व सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। रोगी स्वयं को बहुत शक्तिशाली समझने लगता है। कभी स्वयं को राजा, मंत्री तक मानने लगता है। ऐसा रोगी हर समय काम में लगा रहता है व काम में बहुत जल्दबाजी करता है। रोगी को नींद कम आती है व भूख अधिक लगती है। न्यूरोट्रांसमीटर के उतार-चढ़ाव के अनुरूप रोगी को कभी अवसाद तो कभी अति उत्साह के दौरे पड़ते रहते हैं। मूड की गड़बड़ी के इस विकार को ‘मेनिक डिप्रेसिव साइकोसिस’ का रोग कहते हैं।

मानसिक रोगों में सबसे प्रचलित अवस्था ‘सीजोफ्रेनिया’ रोग की है, जिसे विभक्त मानसिकता भी कहा जाता है। इसमें व्यक्ति का नाता वास्तविकता की दुनिया से टूट जाता है। वह स्वप्न व कल्पना की दुनिया में विचरण करता है। इस रोग के मूल लक्षण ‘इल्यूजन’ व ‘हेल्यूसिनेशंस’ है।

‘इल्यूजन’ में रोगी को तरह-तरह के मिथ्या आभास होने लगते हैं। सामने कुछ है पर रोगी को कुछ और दिखाई देता है। ‘हेल्यूसिनेशंस’ में रोगी को विचित्र अनुभव होते हैं। इसमें उसे तरह-तरह की ध्वनियाँ सुनाई देती हैं, लगता है कि कोई उससे बात कर रहा है या डरा, धमका रहा है। कभी लगता है कि मन में उठने वाले विचारों को कोई ऊँची आवाज में कह रहा है। आँखों के आगे विचित्र दृश्य घूमने लगते हैं। कभी उसे लगता है कि सारी दुनिया उसके खिलाफ है, लोग उसे मारने का प्रयास कर रहे हैं। रोगी के हाव-भाव विसंगत हो जाते हैं। कभी जोरों से हँसने लगते हैं तो कभी रोने, कभी-कभी अलौकिक सुख भी अनुभव करते हैं कि समूचे ब्रह्मांड से एकाकार हो रहे हैं।

काफी हद तक यह अनुवाँशिक रोग है। यह मस्तिष्क में ‘डोपामीन’ जैव रसायन की अधिकता के कारण होता है। बचपन के कटु अनुभव, पारिवारिक व सामाजिक स्थिति में लम्बे बाहरी तनाव के कारण भी इसकी संभावना अधिक रहती है।

हिस्टेरिया (मूर्छावायु) अवचेतन मन की गहराइयों से जुड़ा रोग है। इसमें विक्षिप्त मानसिकता के साथ मूर्छा, लकवा, संज्ञाशून्यता आदि लक्षण भी पाए जाते हैं। इसमें रोगी को अचानक बेहोशी के दौरे पड़ने लगते हैं, शरीर में ऐंठन आ जाती है, हाथ-पैर तुड़ने-मुड़ने लगते हैं, साँस तेजी से चलने लगती है, आवाज एकाएक गुम हो जाती है, सुनना-दिखना बन्द हो जाता है या शरीर के किसी भाग को लकवा मार जाता है। मन का ज्वार शाँत होते ही रोगी इन लक्षणों से मुक्त हो जाता है। ये दौरे बार-बार पड़ते रहते हैं।

इसके कारण के संदर्भ में आज मनःविशेषज्ञों का मानना है कि यह मूलतः अवचेतन मन में चल रहे अंतर्द्वन्द्व, क्लेश, व्यथा एवं दमित भावनाओं का परिणाम है। जब यह आँतरिक संघर्ष एवं भड़ास अपनी अभिव्यक्ति का उचित मार्ग नहीं खोज पाती तो अवचेतन की ये कुँठाएँ और भावनाएँ शरीर के माध्यम से फूट पड़ती है। इससे रोगी भीतरी दबाव से राहत महसूस करता है। साथ ही इसके परिवारजनों का ध्यान उस पर केन्द्रित हो जाता है व उनके सौहार्द्रपूर्ण व्यवहार का पात्र बनता है। परिवारजनों के अतिरिक्त चिकित्सक व अन्य परिजनों की ओर से ही हमदर्दी मिलती है। इससे रोगी के अवचेतन मन को सुख व संतोष मिलता है।

मानसिक रोगों में एक रोग है ऑवसेशन या सनका का। इसके अंतर्गत व्यक्ति के अंदर तरह-तरह की सनकें पनपने लगती हैं। व्यक्ति का मन पूरी तरह संदेह व अनिश्चय से भरा होता है। इसमें रोगी हमेशा एक ही बात सोचता रहता है अतः एक ही क्रिया दुहराता रहता है। बार-बार हाथ धोना, घर से निकलते समय बार-बार ताला ठीक बंद होने की तसल्ली करना, घर में सफाई एवं सुव्यवस्था की स्थिति बनाए रखने की आदत का सनक की हद तक पहुँचना आदि इसमें शामिल है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इसकी जड़ें जीवन के कष्टप्रद अनुभवों में ढूंढ़ी जा सकती है। मन में उन क्षणों की छवि स्मृतिपटल पर गहरी अंकित रहती है। लेकिन मन उन्हें भूला देना चाहता है। इससे घटना तो गौण हो जाती है, पर जुड़ी भावनाएँ शाँत नहीं होती, जो आगे चलकर अवचेतन में ‘ऑवशेसन’ का रूप लेती हैं। इसका जैविक कारण मस्तिष्क में सिरोटानन नामक रसायन की कमी बतायी जाती है। जिसके कारण रोगी के व्यक्तित्व में असंतुलन पैदा हो जाता है।

इसी भाँति भय एक सामान्य एवं स्वाभाविक अनुभूति है। लेकिन कुछ लोगों में अकारण ही किसी वस्तु या स्थिति से भय का आतंक छा जाता है। मनोरोग की स्थिति तक पहुँचे इस भय को ‘फोबिया या विभीति’ कहते हैं। यह कई तरह का होता है। सर्वसाधारण विभीति,

एगोराफोबिया है, जो 60' रोगियों में पाया जाता है। इसमें रोगी के लिए बाजार, गली, कूचों में निकलना कठिन हो जाता है। वह घर में ही कैद होकर रहना चाहता है। क्लौस्ट्रो फोबिया में बंद जगहों को लेकर भय रहता है। लिफ्ट, बस, ट्रेन या सिनेमाघरों जैसी जगहों पर अजीब सी बेचैनी व घुटन महसूस होती है। कुछ अन्य फोबिया है, एंक्रोफोबिया (ऊँचाई का), साइनोफोबिया (कुत्तों का), पायरोफोबिया (अजनबी का), एंथ्रोफोबिया (लोगों का) एक्वाफोबिया (पानी का) जीफायरो फोबिया (पुल का), फोनोफोबिया (ऊँची ध्वनि का), एयरेफोबिया (हवाई उड़ान), एमेक्सोफोबिया (यातायात, वाहन और ड्राइविंग का)।

फोबिया रोगी के हृदय जोरों से धड़कने लगता है। साँस तेजी से चलने लगती है, हाथ-पैर काँपने लगते हैं। मुंह सूख जाता है और भय के मारे पसीना छूटने लगता है। अपने ऊपर वश नहीं रहता, बुद्धि-विवेक पंगु हो जाते हैं। और भय छा जाता है। रोगी ऐसी परिस्थिति, वस्तु या व्यक्ति से अलग होकर ही चैन पाता है।

मनोविशेषज्ञ इसके लिए अवचेतन मन की अहम् भूमिका मानते हैं। अमेरिकी मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. थामस उहड़े के अनुसार इसका कारण कुछ भी हो सकता है, शुरुआत, प्रायः किसी तनाव के कारण होती है। परिवार में किसी तरह का हादसा, गम्भीर बीमारी, किसी प्रियजन की मृत्यु, कोई अप्रिय घटना जैसी तनावजन्य परिस्थितियाँ फोबिया की नींव डाल सकती है। इसके वंशानुगत कारण भी हो सकते हैं।

मानसिक रोगों की सही पहचान न होने के कारण व प्रचलित भ्रान्तियों के कारण मनोरोगी भयंकर त्रासदी से गुजरता है। कई तो सड़कों के किनारे अर्धविक्षिप्त अवस्था में पड़े घोर उपेक्षा, तिरस्कार एवं उपहास के शिकार बनते हैं। सिजोफ्रेनिया, मेनियक डिप्रेशन व मस्तिष्कीय विकार के रोगी को दृष्टि व ध्वनि का भ्रम होता है व उन्हें विचित्र दृश्य एवं ध्वनियाँ सुनाई पड़ती है, जिसे लोग भूत-प्रेत का प्रकोप मान बैठते हैं। उसे उतारने के लिए झाड़-फूँक से लेकर जंजीरों में जकड़कर कमरों में बन्द रखा जाता है। और अमानवीय व्यवहार किया जाता है। इन भ्रान्तियों का प्रचलन जहाँ बहुधा ग्रामीण क्षेत्रों में है, वहीं शहर के भी अधिकाँश लोग इसके शिकार है।

आज मनोरोगों पर व्यापक शोध हो रहा है। वे अंधविश्वास एवं भ्रान्तियों के दायरे से बाहरी आ चुके हैं। इनमें किसी का कारण जैव रसायनों का असंतुलन है तो कुछ अनुवाँशिक कारणों से है। कुछ में पारिवारिक एवं रासायनिक परिवेशगत कारण है, तो कुछ जीवन की विषम परिस्थितियों से उपजी अवचेतन कुण्ठाएँ एवं द्वंद्व। हालाँकि आज इन रोगों की चिकित्सा की व्यवस्था हो रही है। जहाँ सामान्य से लेकर गम्भीर मानसिक रोगों का उपचार किया जाता है। किन्तु मनोरोगियों की बढ़ती संख्या के हिसाब से उपलब्ध सेवा नगण्य सी है। मात्र 10' मनःरोगी ही चिकित्सीय सुविधा का लाभ ले पाते हैं। यह भी अभी शहरों तक ही सीमित है।

इन मनोरोगियों के उपचार में जहाँ मनःविशेषज्ञों एवं चिकित्सकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। वहीं सबसे महत्त्वपूर्ण है, रोगियों के प्रति संवेदना एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार। इसमें परिवारजनों की प्राथमिक भूमिका रहती है कि बहे रोगी की दैनन्दिन आवश्यकताओं से लेकर भावनात्मक पुष्टि का सरंजाम जुटाएँ। रोगी परिवारजनों से उदार एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा करता है, जो उसके उपचार को सरल बना देता है। इस काम में रोगी को छोटे एवं हल्के फुल्के काम दिए जा सकते हैं, छोटी-छोटी बातों में उसकी प्रशंसा करें, कभी आलोचना न करें, किसी तरह का दबाव न डालें, न ही अत्यधिक उपेक्षा करें। धीरे-धीरे उसमें आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता का भाव जाग्रत् करें। उज्ज्वल भविष्य के प्रति प्रोत्साहित करें। रोगी की सीमा व कमजोरियों को समझते हुए उससे असंभव की आशा-अपेक्षा न करें। इस तरह मनोरोग की नारकीय यंत्रणा से गुजर रहे रोगी के उपचार एवं सुधार में परिवारजनों का सहानुभूतिपूर्ण एवं संवेदनशील व्यवहार संजीवनी औषधि का काम करता है, जिसे उपलब्ध करवाना हर विचारशील मनुष्य का पवित्र कर्त्तव्य है।


आत्मसाधना के बिना लोकसाधना नहीं (Kahani)

नरेंद्र संन्यास लेकर विवेकानंद बन चुके थे।  परमहंस ने उन्हें उपासना−साधना कराई, पर समाधि तक ले जाकर रोक लिया, कहा, तुम्हें लोकसेवा का कार्य करना है।

विवेकानंद ने पूछा, लोकसेवा करानी  ही थी, तो इतना समय व्यक्तिगत साधना में क्यों लगवा दिया? उत्तर मिला, आत्मसाधना के बिना लोकसाधना नहीं, जो बना नहीं वह बनाएगा क्या? और जो नया नहीं बनाया तो स्वयं बनने का क्या लाभ।


संत के अपमान की परिणति

कौशाम्बी की श्री-समृद्धि नष्ट प्राय हो चली थी। महाराज बृहस्पतिमित्र तो जैसे अन्तःपुर में कैद होकर रह गए थे। हास-विलास, राग-रंग में डूबे हुए राजा को राज्य का ध्यान नहीं रह गया था। प्रजाजन विस्मृत हो चुके थे। कर्त्तव्य और दायित्व निभाने की उनमें थोड़ी सी भी सुध-बुध बाकी नहीं बची थी। वासनाओं की धधकती अग्नि में उनकी जीवनी शक्ति झुलस रही थी। लेकिन वह और भी उन्मत्त होते जा रहे थे। उन्मत्तता के इस उन्माद में प्राण शक्ति का कब कितना क्षय हुआ? कब उनमें क्षय रोग का घुन लग गया पता ही नहीं चला। उन पर किसी का कोई वश नहीं था। राजवैद्य भी राज हठ के सामने विवश थे। ‘भोगे रोग भयं’ के नीति वचनों से भी महाराज की मोहनिद्रा नहीं खुल पा रही थी।

उस दिन राज प्रासाद की वीथिका में विक्षुब्ध मंत्रीगण परस्पर वार्तालाप कर रहे थे..... बात के सूत्र को जोड़ते हुए एक मंत्री ने कहा- महाराज को तो अब अपने पूर्वजों की कीर्ति का भी भान नहीं रहा। दूसरे मंत्री ने गहरी साँस लेते हुए कहा- महासेनानी पुष्यमित्र ने कितने जतन से कौशाम्बी को संवारा था। उस महाविजेता ने पाटलिपुत्र के स्थान पर इस पुण्य क्षेत्र को अपनी राजधानी बनाया। बड़े अरमानों से सोचा था उन्होंने कि तीर्थराज प्रयाग के सान्निध्य में बसी हुई कौशाम्बी को शासन का केन्द्र बनाने से शासकों पर राजमद हावी नहीं होगा। वे तीर्थ की गरिमा का ध्यान रखते हुए आचरण करेंगे....पर। अपनी बात अधूरी छोड़कर वह चुप हो गया। इस चुप्पी में विषाद की कालिमा और घनी हो गयी।

वातावरण में व्याप्त हो चले सन्नाटे को तोड़ते हुए एक अन्य मंत्री ने कहा- महासेनानी ने अपने वंशजों के लिए यह मर्यादा भी तो स्थापित की थी कि जनहित में तप और शौर्य की साधना उनका आदर्श होगी। मर्यादा की इस अमिट रेख को वे कभी भी पार नहीं करेंगे। महासेनानी ने इस आदर्श को पूरी उम्र भर निभाया। तभी तो उनके तप और शौर्य के तेज से यवनों की आँखें भी चौंधिया गयीं। कौशाम्बी के प्रताप ने उसके श्री और बल का हरण कर लिया। वही कौशाम्बी आज स्वयं तेजहीन होती जा रही है। छोटे-छोटे जनपद भी उसकी ओर धृष्ट दृष्टि डालने लगे हैं। यह सब सहा नहीं जाता। समझ में नहीं आता कर्त्तव्य विमुख महाराज को कौन कर्त्तव्य पथ पर लाए? महर्षि प्रचेतस् ऐसा करने में समर्थ हैं। वे महर्षि पतंजलि की शिष्य परम्परा के अद्भुत योगी हैं। अपेक्षाकृत युवा वयस् के एक मंत्री ने उत्साहपूर्वक कहा।

लेकिन न जाने क्यों उसका यह उत्साहपूर्ण समाधान भी किसी भी उत्साह का संचार न कर सका। सभी मंत्रीगण वैसे ही निरुत्साहित हो चुप रहे। समाधान प्रस्तुत करने वाले से रहा न गया। उसने कहा- आप सब चुप क्यों हैं? क्या आप लोगों को महर्षि प्रचेतस् की ज्ञान शक्ति, तप शक्ति एवं योग शक्ति पर संदेह है? नहीं आयुष्मान् संकेत ऐसा नहीं है। हम सबको तो क्या कौशाम्बी के मूढ़ से मूढ़ नागरिक को भी महर्षि के ज्ञान वैभव और योग वैभव में जरा भी सन्देह नहीं होगा। वे तो हम सभी कौशाम्बी वासियों के आराध्य हैं। उन पूज्यवर के प्रति अश्रद्धा या अविश्वास का भाव हममें से किसी के भी मन में आए, ऐसा सम्भव नहीं है।

तब क्या कारण है आर्य? वय से युवा मंत्री संकेत ने जिज्ञासा प्रकट की। कारण है वत्स! वृद्धवयस् के मंत्री त्रिवृष्ण ने बताना प्रारम्भ किया। सम्भवतः तब तुम काफी छोटे होगे। इसलिए तुम्हें इस कथा का स्मरण नहीं होगा। अन्यथा उन दिनों इस घटनाक्रम ने कौशाम्बी के जन-जन को उद्वेलित व आन्दोलित किया था। यह कहते हुए महामंत्री त्रिवृष्ण अपनी स्मृतियों में खोने लगे।

महाप्रतापी मित्र उपाधि वाले कुल के वंशज हैं अपने महाराज बृहस्पतिमित्र। उनके मन में अनेक महत्त्वाकाँक्षाएँ अपने पिता ब्रह्ममित्र के शासन काल में ही उभरने लगी थीं। वह प्रतीक्षातुर थे कि कब उनका राज्याभिषेक हो और कब वे अपने पराक्रम की पताका पूरे भूमण्डल पर फहराएँ। महत्त्वाकाँक्षा दिनों दिन बलवती होने लगी। पिता ब्रह्ममित्र वृद्ध हो चले थे। उनके जीवन काल में कौशाम्बी में सर्वत्र सुख-शान्ति का साम्राज्य रहा, प्राकृतिक आपदाएँ भी राज्य में उपद्रव न कर पाती थीं। कौशाम्बी की जीवन निरापद वैभव पूर्ण जीवन था। यथा समय अवसर पाकर महाराज ब्रह्ममित्र ने मंत्रियों को बुलाकर कहा- मेरे वानप्रस्थ जीवन का समय आ गया है, अब युवराज बृहस्पतिमित्र का राज्याभिषेक कर देना चाहिए।

महाराज के पुत्र को राजपद पर अभिषिक्त करने में भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी? सभी ने सहर्ष भाव से राजा के अभिमत का अनुमोदन किया। शुभ मुहूर्त देख कर युवराज का अभिषेक हुआ और महाराज वन को चले गए। महाराज ब्रह्ममित्र ने तप-साधना की ओर अपने पाँव बढ़ाए और युवराज को अपना अभीप्सित मिल गया। उन्हें तो इस अवसर की प्रतीक्षा थी ही। यह कथा सुनाते हुए वृद्ध मंत्री त्रिवृष्ण थोड़ा ठहरे। युवा वयस् के मंत्री संकेत की ओर इंगित करके बोले- पुत्र तुम शायद नहीं जानते होगे- कि महाराज बृहस्पतिमित्र एवं महर्षि प्रचेतस् दोनों ही बालसखा हैं। उन्होंने एक ही गुरुकुल में शिक्षा पायी थी। तब के युवराज और आज हमारे महाराज अपनी राजनीतिक आकाँक्षाओं में उलझे रहे। जबकि तपोनिष्ठ महर्षि प्रचेतस् महायोगी हो गए। पर उनकी मित्रता में कोई कसर नहीं थी। महाराज बृहस्पति मित्र ने राजपद पाते ही, महर्षि को अपना पुरोहित बना लिया। महर्षि को भी अपनी जन्मभूमि की सेवा में भारी प्रसन्नता थी।

महर्षि प्रचेतस् की प्रखर मेधा, उनकी नीति कुशलता और महाराज बृहस्पतिमित्र की रणकुशलता एवं अद्भुत शौर्य ने कौशाम्बी के गौरव को असंख्य गुणित कर दिया। इस मणिकाँचन के सुयोग से कौशाम्बी की ख्याति हिमगिरि शिखरों से लेकर समुद्र की अतल गहराइयों तक गूँजने लगी। उन्हीं दिनों मंत्रीगणों ने महाराज को दिग्विजय के लिए सम्मति दी। राजपुरोहित महर्षि प्रचेतस् ने कतिपय सावधानियाँ बताते हुए इसकी मौन स्वीकृति दे दी। महर्षि प्रचेतस् का कहना था कि दिग्विजय शासन को सुव्यवस्थित करने के लिए की जाय, यहाँ तक ठीक है। पर इसका उपयोग औरों की स्वतंत्रता को छीनने, कृषकों की फसलों को नष्ट करने, नागरिकों की सुरक्षा व समृद्धि को तहस-नहस करने में नहीं होना चाहिए। इस महायात्रा के लिए विदा करते हुए महर्षि ने कहा- राजन! दिग्विजय यात्रा के प्रत्येक पग पर आप यह स्मरण रखिएगा कि यह एक यज्ञ अभियान है। इसका उद्देश्य ‘परित्राणाय साधूनाँ-विनाशाय च दुष्कृताम्’ है। इस पुण्य प्रयोजन को कहीं भी किसी स्थिति में क्षति न हो।

महाराज बृहस्पतिमित्र महर्षि के इन वचनों के साथ पुरवासियों की मंगलकामनाओं, पुराँगनाओं के मंजुल गीतों व वयोवृद्ध जनों के मंगल आशीषों को सुनते हुए अपनी यात्रा के लिए चल पड़े। महाराजा की जय-जयकार का स्वर सभी दिशाओं में फैल गया।

चतुरंगिणी सेना के साथ महाराजा ने दिग्विजय यात्रा के लिए प्रयाण किया। असंख्य रथों, घोड़ों हाथियों के साथ अनगिन पैदल सैनिक महाराज बृहस्पतिमित्र की जय-जयकार करते हुए चल रहे थे। सेना का पगध्वनि से धरती क्षण-क्षण काँप उठती थी। मार्ग जनसमूह से घिर जाने के कारण संकरे हो गए। महाराज बृहस्पतिमित्र और उनके पूर्वजों के प्रताप से अभिभूत सीमा पर स्थित राज्यों के अधिपति अनेक उपहार लेकर महाराज के रथ के पास पहुँच जाते थे। जिस-जिस प्रदेश में महाराज का रथ उनकी चतुरंगिणी सेना के साथ गया, वहाँ कौशाम्बी का प्रभुत्व व प्रभाव छाता गया। चतुर्दिक् सुख, शान्ति और सद्भावना की स्थापना के लिए यह दिग्विजय यात्रा है, ऐसा जानते ही राजागण उनकी आधीनता स्वीकार कर लेते। युद्ध करने की स्थिति कम ही स्थानों पर उत्पन्न हुई। जिन्होंने युद्ध किया, वे बुरी तरह से पराजित हुए। महाराज बृहस्पतिमित्र के आदेश से सेनापति ने ऐसे राज्यों व उनके सेनानायकों को युद्ध बन्दी बना लिया।

बृहस्पति मित्र ने अपने विजय रथ पर आरुढ़ होकर उत्तर से पूर्व, दक्षिण से पश्चिम सभी दिशाओं में सफलतापूर्वक यात्रा पूर्ण की। अपने राज्य को चारों ओर से सुरक्षित कर लिया। महाराज बृहस्पतिमित्र एवं महर्षि प्रचेतस् की प्रखर मेधा की सब तरफ सराहना हुई। दिग्विजय यात्रा समाप्त हुई। कौशाम्बी वापस लौटने की घड़ियाँ आ चुकीं। सभी का हर्ष सीमाओं के बन्धन तोड़ रहा था। महाराजा के इस दिग्विजय सन्देश को वायु ने पुष्पों की सुगन्धि की भाँति सर्वत्र फैला दिया। समूची भारत-धरा कौशाम्बी की अपरिमित कीर्ति से आपूरित हो उठी। यात्रा से लौटते समय महाराज ने राजधानी में सन्देश भिजवा दिया था कि वे लौटकर एक अद्भुत महायज्ञ करेंगे। मंत्रीगण यज्ञ की आवश्यक तैयारी करके रखें।

महाराज वापस लौटकर महायज्ञ करेंगे। यह सन्देश सुनते ही प्रजावर्ग में हर्ष की लहर दौड़ गयी। महर्षि प्रचेतस् के मार्गदर्शन में मंत्रियों ने यज्ञ की तैयारी पूर्ण कर ली। सजी-संवरी कौशाम्बी रूपगर्विता नायिका की भाँति उल्लसित हो उठी। राजमार्ग विशाल तोरण द्वारों से सुसज्जित था। मंगल वाद्यों और मंगल गानों से सारा प्राँतर आह्लादित हो गया। समूची कौशाम्बी अपने महाराज के वापस लौटने की प्रतीक्षा में उतावली हो रही थी। उत्साह से भरे मनुष्यों से राजमार्ग, वीथिकाएँ, गवाक्ष खचाखच भर गए थे। भीड़ की अधिकता से रथ की गति रुक-रुक जाती थी। प्रजाजनों के अभिवादन को स्वीकार करते हुए महाराज सीधे यज्ञ स्थल पहुँचे। उनके साथ युद्ध बन्दियों की कतार भी थी। महाराज के संकेत से उन्हें एक-एक करके यज्ञ यूप से बाँध दिया गया।

यज्ञ संचालन के सूत्रधार महर्षि प्रचेतस् महाराज से भावपूर्ण रीति से मिले। उन्हें दिग्विजय यात्रा में सफलता की बधाई दी। मार्ग का हाल-चाल पूछा। और यज्ञ की प्रत्येक तैयारी की उन्हें जानकारी दी। तभी महर्षि की दृष्टि यज्ञयूपों से बाँधे जा रहे युद्ध बंदियों की ओर गयी। उन्होंने पूछा इन्हें क्यों बाँधा जा रहा है महाराज? इनका बलिदान किया जाएगा। हम एक अपूर्व नरमेध करेंगे। बृहस्पतिमित्र ने दर्प के साथ कहा। उत्तर में महर्षि ने शान्त व संयत स्वर में उन्हें बताया कि नरमेध का अर्थ लोकसेवा के लिए उत्कृष्ट विभूतिवान मनुष्यों द्वारा जीवन का अर्पण है। किसी के वध को नरमेध नहीं कहा जाता। महर्षि ने महाराज को बताया कि राजकार्य में किसी भी हिंसा के लिए कोई भी स्थान नहीं है। परन्तु बृहस्पतिमित्र तो विजय दर्प में थे। उन्होंने कुछ भी सुनने, जानने व मानने में कोई रुचि न दिखाई।

लेकिन महर्षि उन्हें धैर्यपूर्वक समझाते हुए बोले- इस तरह निरीह मनुष्यों का वध करने से आपकी दिग्विजय यात्रा अभिशप्त हो जाएगी। दिग्विजय यात्रा को अभिशप्त कहने से महाराज बिफर पड़े, ‘मेरी दिग्विजय यात्रा को अभिशप्त बताने वाले क्षुद्र पुरोहित मैं अभी तुम्हें अपने राज्य से निष्कासित करता हूँ।’ महर्षि ने राजा के इस कथन पर एक पल तीक्ष्ण दृष्टि से देखा, लेकिन दूसरे ही पल वह बिना कुछ बोले चुपचाप वहाँ से चले गए। तब से आज तक वह कौशाम्बी की सीमाओं से बाहर अपनी तप-साधना में निमग्न हैं। इधर उनके नीति-निर्देशन के अभाव में कौशाम्बी श्रीहीन हो रही है और महाराज विलास में डूबे हैं। महामंत्री त्रिवृष्ण ने अपनी स्मृति कथा का उपसंहार किया।

दो पल सभी चुप रहे। इस चुप्पी को तोड़ते हुए युवावय के मंत्री संकेत ने कहा- सन्त के अपमान और अभाव में जो कुछ हो रहा है, उसके अलावा और हो भी क्या सकता है। राजप्रासाद से लेकर साधारण जनता तक में नीति-मर्यादाएँ मिट चुकी हैं। सुख-शान्ति का अवसान हो गया है। चारों ओर अव्यवस्था का बोल-बाला है। विनाश और विपत्ति की आशंकाएँ हर ओर अंकुरित हो रही हैं। बोलते-बोलते मंत्री संकेत थोड़ा रुके फिर कहने लगे- इन परिस्थितियों में हम चुप नहीं बैठ सकते। हम महाराज से बात करेंगे, उन्हें समझाएँगे। और महर्षि को वापस फिर से कौशाम्बी लाएँगे। भले ही इसके लिए हमें अपनी जान से ही हाथ क्यों न धोना पड़े।

उस युवक के उत्साह ने सभी को उत्साह दिया। सारे मंत्रीगण मिलकर महाराज बृहस्पतिमित्र को समझाने के लिए राजप्रासाद गए। विलास ने महाराज के यौवन को हर लिया था। राग-रंग के कुहासे में उनकी तेजस्विता विलीन हो चुकी थी। मंत्रियों ने उन्हें राज्य की जर्जर अवस्था बतायी। साथ ही महर्षि प्रचेतस् को वापस लाने का प्रस्ताव रखा। प्रचेतस् के स्मरण से महाराज भावुक हो गए। सजल भावनाओं में उनके विवेक पर चढ़ी धूल धुल गयी। वह कहने लगे- तुम सबके साथ मैं स्वयं भी चलूँगा। सन्त के अपमान के कारण ही मेरी यह दशा हुई है। मैं अपने अपराध का प्रायश्चित करूंगा। महाराज सहित सभी महर्षि को वापस लौटाने के लिए चल पड़े।

उस युवक के उत्साह ने सभी को उत्साह दिया। सारे मंत्रीगण मिलकर महाराज बृहस्पतिमित्र को समझाने के लिए राजप्रासाद गए। विलास ने महाराज के यौवन को हर लिया था। राग-रंग के कुहासे में उनकी तेजस्विता विलीन हो चुकी थी। मंत्रियों ने उन्हें राज्य की जर्जर अवस्था बतायी। साथ ही महर्षि प्रचेतस् को वापस लाने का प्रस्ताव रखा। प्रचेतस् के स्मरण से महाराज भावुक हो गए। सजल भावनाओं में उनके विवेक पर चढ़ी धूल धुल गयी। वह कहने लगे- तुम सबके साथ मैं स्वयं भी चलूँगा। सन्त के अपमान के कारण ही मेरी यह दशा हुई है। मैं अपने अपराध का प्रायश्चित करूंगा। महाराज सहित सभी महर्षि को वापस लौटाने के लिए चल पड़े।


लोक आराधना का ही प्रभा(Kahani)

मीरा ने सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिए अपनी काव्य प्रतिभा एवं स्वर साधना का उपयोग प्रारंभ कर दिया। राजघराने की परंपरा के विपरीत होने से उनके पति महाराणा ने उनको आभूषणों में सर्प रखकर भेजे, पेय में घातक विष मिलाकर भेजा, पर मीरा पर उनका कोई प्रभाव नहीं हुआ। यह उनकी लोक आराधना का ही प्रभाव था।


निश्चित होगा मिलन भविष्य में धर्म और विज्ञान का

धर्म और विज्ञान दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। सापेक्षितावाद के प्रणेता महान् वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टाइन के इस कथन में धर्म और विज्ञान के महासमन्वय की अनिवार्यता झलकती है। धर्म अर्थात् अंतर्जगत् की यात्रा, ईश्वर के प्रति प्रबल आस्था और विश्वास। विज्ञान यानि ईश्वर द्वारा बनाये गये इस पदार्थ जगत् का अध्ययन-अन्वेषण। दोनों का लक्ष्य सत्य की खोज है। परन्तु एक इसे आन्तरिक जगत् में खोजता है और दूसरा बाह्य जगत् में। सम्पूर्ण एवं समग्र खोज तो दोनों के मिलन-संगम से ही सम्भव है।

धर्म और विज्ञान सिक्के के दो पहलू, गाड़ी के दो पहिये, पक्षी के दो पंख के समान हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्त्व सम्भव कहाँ? परन्तु वर्तमान की ज्वलन्त समस्या एकाँगी खोज-अन्वेषण है। जिसके निष्कर्ष और परिणाम दोनों से ही मानव जाति संत्रस्त एवं परेशान हो उठी है। धर्म और विज्ञान दोनों को अब लगने लगा है कि आपसी संयोग-समन्वय के बिना कोई और रास्ता नहीं, विकल्प नहीं। इसके लिए पदार्थ को ही सर्वस्व मानने वाला हठवादी विज्ञान ने इस ओर अपने कदम बढ़ाये हैं। आधुनिक कास्मोलॉजी (ब्रह्मांड विज्ञान) के अनेक अनुत्तरित एवं अनसुलझे सवालों ने भी विज्ञान को ईश्वर की ओर, धर्म की तरफ मुड़ने के लिए विवश किया है। और तथ्य भी यही है कि पदार्थ जगत् से पार एवं परे हुए बिना कहाँ समग्र सत्य की झलक-झाँकी मिल सकती है।

विज्ञान ने ब्रह्मांड के बारे में इन दिनों काफी गहन शोध-अन्वेषण किया है। इसे अपने ढंग से परिभाषित भी किया है। इसी के तहत इसे प्राकृतिक नियमों का उत्पाद भी कहा, जिसमें न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण एवं आइन्स्टाइन का सापेक्षवाद भी शामिल है। विज्ञान ने नियम एवं सिद्धान्त तो बनाए और ये खूब प्रचारित व प्रसिद्ध भी हुए, पर इससे बात नहीं बनी। क्योंकि पदार्थ और प्रकृति के दायरे में भी बहुत कुछ ऐसा है जो वैज्ञानिक बुद्धि और मेधा को चुनौती देता है और इनकी समझ से परे है। यहाँ तक कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के भौतिकविद् स्टीफन हाकिंग भी स्वयं सशंकित प्रतीत होते हैं। हालाँकि उन्होंने यह दावा किया है कि वे शून्य से ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई, इसका समाधान प्राकृतिक नियमों से खोज निकालेंगे। परन्तु उनके इस दावे में कितनी दृढ़ता है, कितनी सच्चाई है, उन्हीं के द्वारा विरचित ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ में उल्लेख ‘फिर ईश्वर के लिए क्या स्थान होगा’ में झलक जाती है। इस पुस्तक को पढ़ने से यही समझ में आता है कि उन्हें पूर्णरूपेण विश्वास नहीं है कि प्राकृतिक नियमों के द्वारा ईश्वरीय सृष्टि विज्ञान को समझा व जाना जा सकता है।

इस संदर्भ में प्राकृतिक विज्ञान तथा थीयोलॉजी के बर्कले सेन्टर के भौतिकविद् राबर्ट रसल का कहना है कि हाकिंग का ब्रह्मांड विज्ञान ईसाई धर्म का समर्थन करता जान पड़ता है। हाकिंग के ब्रह्मांड विज्ञान में समय का उद्भव एवं विकास ब्रह्मांड के साथ ही हुआ है और इसकी पृष्ठभूमि क्वाण्टम है। क्वाण्टम अर्थात् कण का ऊर्जा में और ऊर्जा का कण में अनवरत परिवर्तन। इस कण-ऊर्जा रूपी क्वाण्टम की आधारभूमि में ऐसा कोई निश्चित क्षण नहीं है, जब समय का आरम्भ एवं जन्म हुआ। सृष्टि संरचना का भी कोई निश्चित क्षण नहीं है। संभवतः इसीलिए विज्ञान किसी महाशक्ति पर विश्वास नहीं कर पाता। परन्तु यह अविश्वास भी नहीं कर पाता है क्योंकि अनेकों ऐसे प्रश्न हैं जो उसकी समझ से परे हैं।

बिग बैंग के पूर्व क्या था इसका द्रष्टा कौन है? इस संदर्भ में कास्मोलॉजी मौन है। परन्तु ऋग्वेद की ऋचाएँ कहती हैं कि इस घटना का एकमात्र द्रष्ट ईश्वर है और वह इस महाविस्फोट के पहले भी था। इस ऋग्वेदोक्त सत्य को स्वीकार किया था पांचवीं शताब्दी के महान् ईसाई सन्त आँगस्टाइन ने। वह कहते हैं कि ईश्वर ने समय को बनाया। वह इससे बंधा-सिमटा नहीं है। वह तो काल को बनाने वाला महाकाल है। वह दिक् एवं काल से परे परम सद्वस्तु है। भौतिकविद् रसल की उक्ति एवं मान्यता में यही सत्य गुँजायमान होता जान पड़ता है। वह यह तो मानते हैं कि समय का आरम्भ ब्रह्मांड के प्रादुर्भाव के साथ हुआ पर इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में ईश्वर की भागीदारी को अस्वीकार नहीं करते।

राबर्ट रसल तो यहाँ तक कहते हैं कि स्टीफन हाकिंग चाहे ईश्वर के प्रति आस्था-विश्वास करें या न करें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मांडीय सिद्धान्त तो ईश्वर निष्ठ को प्रकट कर ही देता है। उनके अनुसार हाकिंग की ईश्वर अस्तित्व के प्रति यह अवधारणा ब्रह्मांडीय विज्ञान में ही नहीं समूचे विज्ञान जगत् में भी नूतन क्रान्ति का परिचायक है। इससे धर्म और विज्ञान को आपस में मिलने एवं मिलकर एक साथ चलने में नया अवसर मिलेगा।

आज की आधुनिक कास्मोलॉजी में कई ऐसे सूत्र हैं, जिसके एक छोर पर तो समस्त वैज्ञानिक अपने अध्ययन-अन्वेषण में क्रियाशील हैं परन्तु उसका अगला छोर किसी अज्ञात दिशा की ओर संकेत करता है, जिसका उन्हें अभी भान एवं ज्ञान नहीं है। इसी कारण उन्हें जितना दिखता है, उससे भी अधिक अनदेखा रह जाता है। जितना अभिव्यक्त होता है, उससे ज्यादा अव्यक्त रह जाता है। इस अगले अनदेखे छोर को ही पूर्वी ऋषि मनीषी धर्म की संज्ञा देते है। जहाँ तक अभी विज्ञान की पहुँच तो नहीं हो सकी है, पर संकेत अवश्य मिलने लगे हैं। इसी कारण ससेक्स विश्वविद्यालय के भौतिकी के प्रोफेसर जॉन वैरो ने उल्लेख किया है कि आज के वैज्ञानिक उस अदृष्ट, अदृश्य ईश्वर की हल्की सी, महीन सी, झीनी सी झाँकी प्राप्त करने लगे हैं।

इसे क्रान्तिकारी एवं अभूतपूर्व परिवर्तन मानते हुए एक जर्मन वैज्ञानिक ने तो यहाँ तक घोषणा कर दी कि समूचे आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान को ईश्वर का विश्वास प्रभावित करने लगा है। अब आज के भौतिकशास्त्री यह भी मानने लगे हैं कि समस्त ब्रह्मांड को एक सिद्धान्त ‘थ्योरी ऑफ एवरीथिंग‘ से जाना समझा एवं परखा जा सकता है। यह तथ्य सच हो या न हो परन्तु इससे यह तो पता चल ही जाता है कि एक ईश्वर है जो समस्त जगत् का नियन्ता एवं नियंत्रणकर्त्ता है। इसे दार्शनिकों ने एकेश्वरीय सिद्धान्त की मान्यता प्रदान की है।

वैज्ञानिकों की ईश्वर आस्था के संदर्भ में प्रसिद्ध पत्रिका नेचर ने पिछले दिनों एक सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि 39.3' वैज्ञानिक एक ऐसे ईश्वर के प्रति आस्था-विश्वास करते हैं जिसकी वे उपासना-आराधना कर सकें। इस आँकड़े से प्रदर्शित होता है कि जड़ जगत् के अध्येता-अध्ययनकर्त्ता भी अब इस जगत् से परे की ओर सोचने-विचारने लगे हैं। सन् 2000 में हुए एक अमेरिकी विज्ञान सम्मेलन में भी इस बात पर बल मिला है कि ब्रह्मांड विज्ञान में ईश्वर को मानने के अनेकों प्रमाण हैं। अनेकों ऐसे अकाट्य तर्क एवं तथ्य हैं जिसे यदि खुले मन से स्वीकारा जाए तो ईश्वर के अस्तित्त्व पर कोई भ्रम नहीं रह जाएगा।

इसी सम्मेलन में एक प्रख्यात् वैज्ञानिक ने अपना उद्गार व्यक्त करते हुए कहा था कि किसी विशिष्ट अर्थ, उद्देश्य, मूल्य एवं तर्क आदि के आधार विज्ञान से नहीं मिल पाते हैं। अतः इसके लिए धर्म की आवश्यकता है, जो हमें इस दिशा में सहयोग करे। प्रसिद्ध खगोलविद् एलन सेण्डेज की मान्यता है कि ब्रह्मांडीय गतिविधियाँ एवं घटनाएँ इतनी जटिल एवं दुरूह है कि उसकी समुचित एवं सन्तोषप्रद व्याख्या आधुनिक विज्ञान नहीं दे सकता है। जीव और जगत् के गम्भीर रहस्य का अनावरण करने में भी यह असमर्थ एवं अक्षम है। इसे तो किसी महाशक्ति के माध्यम से ही समझा एवं अनुभव किया जा सकता है। और इसी की कृपा शक्ति द्वारा ही स्वयं के अन्दर एवं जगत् के भीतर झाँका जा सकता है।

विज्ञान का धर्म की ओर इस झुकाव के बारे में राबर्टरसल कहते हैं कि विज्ञान अब अदृष्ट के प्रति आस्था-विश्वास रूपी धर्म को मानने लगा है। वह अब ईश्वर के अस्तित्त्व को संदेह की निगाहों एवं नजरों से नहीं देखेगा। रसल की मान्यता है कि पहले ‘बिग बैंग थ्योरी’ में ईश्वर का कोई स्थान नहीं था लेकिन अब वैज्ञानिक अनुभव करने लगे हैं कि इस महत् कार्य में ईश्वर का योगदान अवश्य है। क्योंकि ब्रह्मांड का एक सुनिश्चित उद्देश्य है। इस संदर्भ में श्री अरविन्द कहते हैं कि सृष्टि रचना ईश्वर की लीला है। उसने अपनी लीला करने के लिए इस ब्रह्मांड का सृजन किया है। इस कथन को अपने ढंग से समर्थन एवं व्याख्या करते हुए लेसर किरणों के आविष्कारक चार्ल्स टाउस का कहना है कि बिना किसी बाजीगर की बाजीगरी एवं कलाकार की कलाकारी से ऐसे अद्भुत ब्रह्मांड का सृजन अकल्पनीय है। इसमें किसी न किसी महाशक्ति का हाथ जरूर है।

सृष्टि विकास (इवॉल्युशन) में आज वैज्ञानिक ईश्वरीय हाथ देखने लगे हैं। इनकी मान्यता है कि इससे ईश्वर एवं प्रकृति का रहस्य उद्घाटित होगा। पदार्थवादी वैज्ञानिक भी परिकल्पना करने लगे हैं कि ब्रह्मांड का सृजन एवं निर्माण जीवन और चेतना के लिए ही हुआ है। इसी कारण अमेरिकी धर्म और विज्ञान केन्द्र निदेशक मार्क रिचर्डसन कहते हैं कि विज्ञान ईश्वर का प्रत्यक्ष एवं चश्मदीद गवाह बने या न बने, पर वह उसके क्रिया-कलापों का गवाह तो बन ही सकता है। इस सत्य की अनुभूति प्राप्त करने के बाद जैव रसायनविद् आर्थक पीकाँक के जीवन की दिशाधारा ही बदल गई। वह पूर्णतः धर्म की शरण में चले गये और उन्होंने कहा ‘परमात्मा के कारण ही पृथ्वी पर जीवन की इतनी विविधता दृष्टिगोचर होती है।’

वैज्ञानिक अपने अनुसन्धान-अन्वेषण कर लेने के पश्चात् जब निष्कर्ष पर पहुँचने लगते हैं तो उन्हें किसी अदृश्य की झाँकी दिखाई देने लगती है। ऐसे ही वैज्ञानिक थे कार्ल सागा जिन्होंने विज्ञान को अति सहज-सरल एवं प्रामाणिक रूप में लोगों तक पहुँचाने की कोशिश की है। वे भी अपने जीवन के अन्तिम समय में इसी ऊहापोह में थे कि ईश्वर को मानूँ या न मानूँ। उन्होंने अपनी इस उधेड़बुन को अमेरिका की राष्ट्रीय चर्च परिषद् के महासचिव के सामने रखा भी था। महान् वैज्ञानिक न्यूटन के अनुभव भी कुछ ऐसे धार्मिक विचारों से अनुप्राणित थे। उन्होंने कहा था कि ग्रहों की गतिविधियाँ केवल किसी प्राकृतिक कारणों से परिचालित नहीं होती बल्कि इसमें किसी अति बुद्धिमान-मेधावान एजेण्ट का प्रभाव भी दिखाई देता है।

आज के विज्ञान ने अपनी सीमाओं और परिधि से निकलने की घोषणा कर दी है। अब धर्म की बारी है। अब देखना है कि धर्म ‘बाबा वाक्यं प्रमाणम्’ की रीति-नीति को तोड़ पाता है या नहीं। आगे बढ़ने के लिए, पिछले स्थान से पैर उठाता है कि या नहीं। तर्क और प्रयोगों के महत्त्व को स्वीकार कर अपनी एकाँगिता-अपूर्णता को दूर करता है या नहीं? विज्ञान ने इस तथ्य को स्वीकारा और अपनाया है। अब धर्म और अध्यात्म को भी इस प्रकार के साहस और पुरुषार्थ का संचय करने के लिए हिचकिचाहट नहीं करनी चाहिए।

इस सम्बन्ध में विज्ञान की पहल सराहनीय एवं अभिनन्दनीय है। उसने दुराग्रह नहीं अपनाया। सत्य के लिए अपने द्वार खुले रखे हैं। यदि आज कोई बात गलत निकली तो वह अपनी आज सुधारने के लिए तैयार है। उसका कथन है कि हम सत्य की राह के पथिक मात्र हैं। हठ करने की अपेक्षा यह अच्छा है कि जो बात गलत साबित हुई है, उसे समय रहते सुधार-संवार लिया जाय। इस मान्यता से उसकी ईमानदारी साबित होती है। धर्म को भी अपनी उन प्राचीन वैदिक परम्पराओं का अनुसरण करना चाहिए। जिनमें तर्क एवं प्रयोगों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। ऐसा करने पर धार्मिक जगत् अपनी भ्रान्तियों एवं मूढ़ मान्यताओं से छुटकारा पा सकेगा।

इस तरह विज्ञान भी धर्म की भावना, करुणा एवं संवेदना को अपना सके तो विनाश-विध्वंस की ओर बढ़ते उसके कदम मुड़कर पुनः सृजन की ओर चल पड़ेंगे। इन दोनों के मिलन-संगम में ही जीवन के विकास की समग्रता-पूर्णता समाहित है। इसी से आन्तरिक जीवन की प्रसन्नता तथा बाह्य जीवन में सौंदर्य झलक सकेगा।


Quotation

दूसरों के लिए सार्थक एवं स्वयं को आत्मिक प्रगति की दृष्टि से ऊँचा उठाने वाला गरिमा भरा जीवन जीना ही श्रेयस्कर एवं वरणीय है।


भगवान् आपको रोकते है (Kahani)

दक्षिणेश्वर मंदिर की निर्माता रानी रासमणि का जामाता माथुर बाबू ने एक विष्णु मंदिर बनाया और प्रतिमा को बहुमूल्य वस्त्र−आभूषणों से सजाया। कुछ भी दिन भी बीतने ने पाए थे कि चोर सारा जेवर चुरा ले गए। माथुर बाबू उलाहना दे रहे थे कि भगवान आप कैसे हैं जो अपने परिधानों की रक्षा न कर सके।

रामकृष्ण परमहंस ने उनका समाधान किया कि जो धन लोकसेवा में नहीं लग सका, उसका आभूषण बनना और ईर्ष्या का निमित्त कारण बनना तथा चोरों के घर जा पहुँचना स्वाभाविक है। इस प्रवाह को भगवान क्यों रोकें? रोकना होता तो चोरों से पहले भगवान आपको रोकते।


तनाव का सृजनात्मक समाधान

निश्चिंत एवं शान्तिपूर्ण जीवन की चाहत सभी को रहती है। परन्तु कई तरह की कोशिशों के बावजूद विरले ही इसे उपलब्ध कर पाते हैं। ज्यादातर के पल्ले चिन्ता एवं तनावजन्य उलझनें ही पड़ती हैं। उन्हें कुण्ठा, निराशा, हताशा एवं विषाद के बीच उलझते, फँसते हुए ही जिन्दगी गुजारनी पड़ती है। यह स्थिति धरती के किसी एक कोने तक सिमटी न रहकर समूची वसुधा-वसुन्धरा में व्याप्त है। मनुष्य की इस विपन्न भावदशा से चिन्तित विशेषज्ञों एवं वरिष्ठों ने इसी कारण वर्तमान युग को ‘द ऐज़ ऑफ एंग्जायटी’ या दुश्चिन्ता का युग कहा है। हालाँकि उनके अनुसार यह मानव के लिए चुनौतीपूर्ण सुअवसर भी है। जिसे स्वीकार करके अपने अस्तित्त्व की गहराई में प्रवेश किया जा सकता है। और जीवन के अनेकों विकट प्रश्नों के समाधान खोजे एवं पाए जा सकते हैं।

इस सम्बन्ध में प्रख्यात् मनोवैज्ञानिक रोलो में काफी उत्कृष्ट प्रयास किए हैं। साथ ही उन्होंने अपने इन शोध-प्रयोगों को ‘मैज सर्च फॉर हिमसेल्फ’ नाम के ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित भी किया है। इस ग्रन्थ को मानवीय दुश्चिन्ता की समस्या के रहस्यों को अनावृत्त करने वाला महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी कहा जा सकता है। इसमें रोलो में का कहना है कि किसी भी रूप में दुश्चिन्ता की समस्या से पलायन करना या इसे युक्तिसंगत ठहराना इस व्याधि को और अधिक गम्भीर बनाने की कुचेष्टा है। उनके अनुसार इसका साहसपूर्ण सामना करना ही एकमात्र विकल्प है। रोलो में के शब्दों में अनेकों तरह की भ्रान्तियों के कारण सभी इससे बचने और भागने की कोशिश करते रहते हैं। और इसके परिणाम स्वरूप समस्या पहले की बजाय कहीं ज्यादा जटिल एवं जीर्ण होती जाती है।

अपने अनुसन्धान के निष्कर्ष के रूप में रोलो में आज के बढ़ते तनाव एवं व्यापक होती जा रही दुश्चिन्ता का मुख्य कारण जीवन मूल्यों के क्षरण को मानते हैं। उनका कहना है कि इस क्षरण के कारण इन्सान अन्दर ही अन्दर खोखला हो चुका है। जीवन के उच्चतर मूल्यों के अभाव के कारण उसकी आन्तरिक शक्ति क्षीण हो चुकी है। यही वजह है कि सामान्य क्रम में भी आने वाली थोड़ी सी जटिल परिस्थितियाँ उसे चिन्तित और परेशान कर डालती हैं। वह दुश्चिन्ता के भंवर में फँसकर छटपटाने लगता है। मूल्यों को परिभाषित करते हुए रोलो में कहते हैं कि वास्तविक जीवन मूल्य अन्तः प्रेरित होते हैं और ये जिन्दगी के सद्गुणों के रूप में पनपते व विकसित होते हैं। जिन मूल्यों को बाहर से आयातित किया जाता है, वे केवल लोक दिखावा और एक बोझ मात्र बनकर रह जाते हैं। दूसरों को खुश करने के चक्कर में अथवा उनकी नजर में बड़ा बनने की कोशिश में जो दिखावा किया जाता है, उससे आन्तरिक शक्तियों के विकास से कोई लेना देना नहीं है। जबकि जीवन मूल्यों को अपनाने का सीधा परिणाम आन्तरिक शक्तियों एवं अंतर्निहित क्षमताओं की असीम ऊर्जा का विकास हैं।

मानव मन के मर्मज्ञ डॉ. लिण्ड का अनुसन्धान निष्कर्ष है कि आज के संक्रमण युग में लोक दिखावे की प्रवृत्ति में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। अपने एक प्रयोग में उन्होंने अमेरिका, फ्राँस, ब्रिटेन, हालैण्ड एवं जर्मनी के अलग-अलग कार्यक्षेत्रों में लगे लगभग 20,000 पुरुषों एवं महिलाओं का अपने सहयोगियों के साथ परीक्षण किया। डॉ. लिण्ड के अनुसार इस प्रयोगात्मक परीक्षण में यही पाया गया कि ज्यादातर लोगों का यह मानना है कि जब मूल्यों को बाहर से आरोपित करने से, मूल्यनिष्ठ होने का अभिनय करने से लोक सम्मान का लाभ मिल जाता है, तो इन मूल्यों को अन्तःभूमि में रोपित एवं विकसित करने का झंझट कौन उठाए। हालाँकि ऐसी दशा में थोड़ी बहुत देर का झूठा सम्मान भले ही मिल जाए, परन्तु सर्वकालिक रूप से कुण्ठा एवं चिन्ता ही पल्ले पड़ती है। प्रख्यात् दार्शनिक स्पिनोजा के शब्दों में इस तरह की जीवन शैली से न केवल नैतिक जागरुकता बल्कि आन्तरिक शक्ति का विकास अवरुद्ध हो जाता है।

मनीषियों के अनुसार सही स्थिति की जाँच-परख कर लेने पर दुश्चिन्ता एवं तनाव की इस जटिल पहेली का समाधान असम्भव नहीं रहता। हाँ यह कठिन एवं श्रमसाध्य भले ही हो। हर्मन हैंस के शब्दों में यदि हम अपने अस्तित्त्व की गहनतम सच्चाई को जानने व इसकी असीम सुखद सम्भावनाओं को कुण्ठित कर रही दुश्चिन्ता से जूझने के लिए कृतसंकल्पित हैं, तो देर-सबेर इस महाव्याधि से छुटकारा मिलना निश्चित है। पाल टिलिच के अनुसार तनाव एवं चिन्ता का सार्थक समाधान तब तक सम्भव नहीं है- जब तक कि इनका सम्पूर्ण साहस से सामना न किया जाय। अतः अपनी स्थिति को, साहसपूर्ण स्वीकृति को समाधान का शुभारम्भ मान सकते हैं। विलियम ग्रे के शब्दों में, हम जहाँ जिस रूप में खड़े हैं, उसी रूप में स्वयं को पहचानना और स्वीकारना होगा। साथ ही अपनी गहन समझ के आधार पर जीवन मूल्यों के रूप में अपनी आन्तरिक शक्ति के केन्द्र को खोजना होगा। इससे कम में इस समस्या का समाधान सम्भव नहीं है।

इसकी शुरुआत कहाँ से करें? इस सवाल के जवाब में रोलो में का कहना है कि प्राथमिक तौर पर यह शुरुआत अपने शरीर से कर सकते हैं। उनके अनुसार इसके लिए हमें उन गुणों, नियमों एवं मूल्यों को संकल्पपूर्वक अपनाना चाहिए, जो स्वास्थ्य एवं निरोगिता के आधार हैं। इसके बाद हमें अपनी भावनाओं की नए सिरे से खोज करनी चाहिए। इस प्रयास में हम अपनी गहनतम चाहत एवं इच्छाओं को खोज सकते हैं। में के अनुसार भाव व इच्छाओं के बोध का अर्थ इनकी स्वच्छन्द अभिव्यक्ति नहीं है। बल्कि अपने स्व का अपने परिवेश की यथार्थता के अनुरूप स्वस्थ-समायोजन है। यह अपने जीवन का मर्यादापूर्ण एवं जिम्मेदारी भरा निर्वाह है। इसका अगला चरण वे अचेतन मन की खोज-बीन को मानते हैं, जो कि अनिवार्य रूप में उपरोक्त बिन्दुओं से जुड़ा है। इसमें स्वप्नों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। जो न केवल अचेतन के अन्तर्द्वन्द्वों एवं दमित इच्छाओं व भावनाओं के प्रतीक होते हैं, बल्कि इनमें समाधानपरक महत्त्वपूर्ण सूत्र-संकेत भी उपलब्ध होते हैं।

मानव चेतना के कुशल अनुसंधानी रोलो में के अनुसार, इस प्रयास के अनुरूप हम अपने अस्तित्त्व की गहनता में जितना उतरेंगे, उतना ही इसके नित नवीन रहस्यों, सत्यों, तथ्यों एवं आश्चर्यों से परिचित होने लगेंगे। जीवन का गहनतम उद्देश्य एवं लक्ष्य स्पष्ट होने लगेगा। एक नवीन नैतिक संवेदनशीलता एवं जागरुकता का विकास होगा। जो परिवेश एवं परिस्थितियों की जटिल दशा में भी श्रेष्ठतम तत्त्वों को ग्रहण करने में सक्षम होगी। यहाँ व्यक्ति अपने आंतरिक आधार से सक्रिय होने के बावजूद, सामूहिकता से कटा नहीं होगा। वरन् उसके पारस्परिक सम्बन्ध सघन आत्मीयता एवं रचनात्मक दृष्टि पर आधारित होंगे। पॉल टिलिच के शब्दों में यहीं पर व्यक्ति की आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है, जो नैतिक श्रेष्ठता से भी कहीं परे व गहन सत्य के भावों से परिपूर्ण है।

महान् मनीषी अल्डुअस हक्सले ने इसे ‘वियान्ड गुड एण्ड इविल’ की संज्ञा देते हुए ‘स्प्रिचुअल एलीमेण्ट’ कहा है। उनके अनुसार दरअसल यह व्यक्ति की अन्तःचेतना के उद्भव एवं विकास का तथ्य है। एरिक फ्रॉम ने इसे अन्तर्ध्वनि कहते हुए साहस का आदि स्रोत बताया है। यह अपने आप में समग्रतावादी एवं समन्वयकारी शक्ति भी है। इसी के आधार पर व्यक्ति अपने समूचे अस्तित्त्व को हाथ में लेता है। और इसे एक सुन्दर सुव्यवस्थित सूत्र में पिरोता, सजाता, संवारता हुआ सामञ्जस्यपूर्ण बनाता है। यहाँ वैयक्तिक मौलिकता एवं सार्थकता के साथ अन्तर्वैयक्तिक सम्बन्धों में भी एक नई जीवन्तता, रचनात्मकता, सरसता एवं समरसता का उद्भव होता है। व्यक्ति इस तरह अपने अस्तित्त्व के गहनतम मूल्यों से संपर्क सूत्र में बंधता है। और इसके परिणाम स्वरूप व्यक्तित्व के पुनर्गठन के साथ दुश्चिन्ता की अस्तित्व जन्य व्याधि के निराकरण का पथ प्रशस्त होता है।

हालाँकि यह कार्य इतना सरल एवं सहज नहीं है। बाहरी प्रतिकूलता एवं विषमता से कहीं ज्यादा इसमें आन्तरिक अवरोध ही मूल रूप से बाधा डालते हैं। इसमें अपने वर्तमान सत्य का समग्रता से सामना न कर पाने का पलायनवादी रुख एक प्रमुख अवरोध सिद्ध होता है। रोलो में के शब्दों में वर्तमान की सच्चाई का सामना प्रायः उद्विग्नता पैदा करता है। क्योंकि इसमें निर्णय व जिम्मेदारी के भाव जुड़े होते हैं। जबकि सामान्य मनुष्य अपनी जिन्दगी में प्रायः इन्हीं से बचता फिरता है। इसी कारण उसे प्रायः अतीत की यादों अथवा आगत की कल्पनाओं में जीते हुए देखा जाता है। क्योंकि अतीत की मधुर स्मृतियों व भविष्य के सुखद स्वप्नों में निर्णय व जिम्मेदारी का बोझ नहीं रहता है। जबकि वर्तमान संघर्षशील एवं साहसपूर्ण कर्त्तव्यकर्म का पर्याय है। पलायनवादी प्रवृत्ति से परिस्थितियों के प्रश्न का समाधान नहीं मिलता बल्कि वे और भी बद से बदतर होते जाते हैं। पलायन के प्रयास में किया गया वर्तमान का दुरुपयोग क्रमशः अतीत को ग्लानि एवं पश्चाताप युक्त तथा भविष्य को चिन्ता व आशंकायुक्त बनाता है। जबकि दुश्चिन्ता के मर्म को भेदने के लिए जरूरत वर्तमान की यथार्थता में जीने की है।

रोलो में इस संदर्भ में साहस को एक अनिवार्य तत्त्व मानते हैं, जिसका उनके अनुसार दूसरा कोई विकल्प नहीं है। यह एक आँतरिक गुण है, जिसकी आवश्यकता बाह्य चुनौतियों से जूझने से अधिक अपने आँतरिक स्थिति को संभालने व सुधारने में अधिक पड़ती है। गोल्डस्टेन के शब्दों में यह अस्तित्त्व के झटकों के प्रति सकारात्मक रुख है, जिन्हें अपनी प्रकृति के असली स्वरूप को पाने के लिए झेलना होता है। हर क्षण अपनी पहचान को पाने के लिए, इसको जताने के लिए व अपने नए जन्म की पीड़ा झेलने के लिए इसकी जरूरत होती है। सर्वोपरि, आर्थ मिलर के शब्दों में यह अपने विश्वास के लिए मरने-मिटने की हिम्मत है।

मे के अनुसार इस साहस एवं निष्ठ के अनुरूप ही व्यक्ति उस आँतरिक स्वतन्त्रता का अर्जन करता है, जो कि असीम सम्भावनाओं का द्वार खोलती है। यहीं व्यक्ति अपने पुनर्निर्माण व विकास में अपनी उच्चतम आस्था के अनुरूप जुट जाता है और वह अपने स्वतंत्र विकास में अपने हाथ होने का बोध करता है। ऐसे में व्यक्ति का जीवन पूर्ण जिम्मेदारी से युक्त बन जाता है। दुश्चिन्ता व तनाव में व्यतीत होने वाले उसके क्षण सृजन के क्षण बन जाते हैं। ऐसी दशा में उसे किसी अनुशासन की जरूरत नहीं रह जाती, बल्कि उसका अनुशासित आन्तरिक जीवन विकास की एक सतत सचेतन प्रक्रिया बन जाता है। इस तरह विशेषज्ञों के सतत अनुसंधान का निष्कर्ष यही है कि अपने अस्तित्त्व के गहनतम सत्य, इसकी असीम सम्भावनाओं एवं मूल्यों की खोज का साहसपूर्ण अभियान ही युग की महाव्याधि- दुश्चिंता का सार्थक, सुनिश्चित एवं प्रभावी समाधान है।


दुःख मनाने की अपेक्षा शानदार लंबे जीवन का लाभ (Kahani)

आदि शंकराचार्य बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर छोड़ गए। अंतिम समय उनके सहयोगी भक्त आस−पास थे। वे दुःख प्रकट करने लगे, आप जैसों को जीवन लंबा मिलता तो हम सबका अधिक हित होता।

आचार्य शंकर गंभीर स्वर में बोले, मैं कम उम्र लेकर आया था, पर जीवन तो मैंने लंबा जिया है। सौ वर्ष में जितना कुछ किया जा सकता था, मैंने उससे कम नहीं किया है। तुम सब यही मानकर चलो। कम उम्र में जाने का दुःख मनाने की अपेक्षा शानदार लंबे जीवन का लाभ लोगों तक पहुँचाने का प्रयास करो।

भगवान बुद्ध के पास श्रेष्ठिपुत्र सुमंत और श्रमिक पुत्र तरुण ने एक साथ प्रव्रज्या ली। दोनों भिक्षु ने बतलाया, सुमंत तरुण की अपेक्षा स्वस्थ और अध्ययन की दृष्टि से अधिक आगे है भावना भी उसकी कम नहीं है, परंतु कार्यों की उपलब्धियाँ तरुण की सुमंत से श्रेष्ठ रहती हैं, यही कारण समझ में नहीं आता।

तथागत बोले, सुमंत अभी जंग लगा पुर्जा है, जंग छूटने में समय लगेगा। प्रधान भिक्षु प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते रह गए। भगवान ने स्पष्ट किया, उनका लंबा जीवन आलस्य−प्रमाद में बीता है, इससे मनुष्य मे जंग लग जाता है, ओर वो औजार जैसा हो जाता है। तरुण ऐसा औजार है जिसमें जंग नहीं है। इसीलिए तुरंत फल पा रहा है। सुमंत की पर्याप्त साधना जंग छुड़ाने में लग जाएगी, तब वह ठीक प्रकार से प्रयुक्त हो सकेगा।


सतत पुरुषार्थ से व्यक्तित्व को गढ़ा जा सकता है।

व्यक्तित्व हमारे अन्तर की आत्माभिव्यक्ति है। हम जैसे हैं, यह उसका प्रकटीकरण एवं प्रकाशन है। व्यक्तित्व वह प्रकाशपुँज है जिसका स्रोत हमारे अपने ही अन्दर विद्यमान है। आन्तरिक गुण ही व्यक्तित्व के रूप में प्रकाशित-प्रसारित होते हैं। अन्तःकरण जितना परिष्कृत होगा, भावनाएँ जितनी पावन होंगी तथा विचार जितने उत्कृष्ट होंगे व्यक्तित्व उतना ही प्रखर एवं ज्योतिर्मय होगा। अतः व्यक्तित्व का मापदण्ड फौलादी चरित्र, पैना एवं परिपक्व चिन्तन तथा भावपूर्ण व्यवहार के आधार पर तैयार होता है।

व्यक्ति का प्रखर व्यक्तित्व समाज के जनसंकुल में अलग दिखता है। यह उस प्रकाश स्तम्भ के समान होता है, जो स्वयं तो ज्योतित होता ही है। साथ ही जीवन समुद्र में चलने-बढ़ने वाली नौकाओं एवं जहाजों को अपने मंजिल तक पहुँचाने के लिए दिशा प्रदान करता है। यह एक ऐसी बेशकीमती अशेष सम्पदा है जो बहुतायत में -खर्चने पर भी चुकता, खर्चता एवं शेष नहीं होता है। यह अपनी दशा एवं दिशा का निर्धारण स्वयं करता है। यह स्वयं सत्पथ पर चलता है तथा अन्य अनेकों को इस ओर बढ़ने के लिए प्रेरणास्रोत बनता है।

उत्कृष्ट व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति में असाधारण निर्णय क्षमता होती है। यह अच्छे-बुरे का सत्य-असत्य का श्रेय-प्रेय का भेद जानता है और सदा श्रेष्ठ का ही वरण करता है। इसके लिए वह हर कीमत चुकाने के लिए तैयार रहता है। इसलिए इसकी अपनी अनोखी मौलिकता होती है तथा उम्दा निरालापन होता है। आत्मबल, साहस एवं प्रखरता इसकी मौलिक विशेषता होती है। इसी तरह से विशेषज्ञों के अनुसार व्यक्तित्व उसे कहा जाता है जिसमें स्वतंत्र सत्ता, आत्म योग्यता, प्रभावोत्पादकता, श्रेष्ठता व उत्कृष्ट चरित्र व चिन्तन का समुचित एवं सुन्दर समावेश हो। और इसीलिए उसमें चुम्बकीय आकर्षण होता है, जादुई प्रभाव होता है।

व्यक्तित्व व्यक्ति के गुणों का ऐसा प्रकटीकरण है जो जन्मजात भी होता है और इसे अर्जित भी किया जा सकता है। जन्मजात व्यक्तित्व के धनी तो विरले ही होते हैं, जो जन्म से व्यक्तित्व सम्पन्न होते हैं। ऐसे व्यक्ति अति विलक्षण एवं विशेष प्रतिभा सम्पन्न होते हैं। इनके विचार एवं चिन्तन श्रेष्ठ होते हैं। विचारों में दिव्यत्व की आभा झलकती है। इनका हृदय भावनाओं एवं सम्वेदनाओं का आगार होता है। ये सभी से आत्मीयतापूर्ण व्यवहार का बर्ताव करते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य ऐसे दिव्य व्यक्तित्व के धनी थे, जिन्होंने अपने तपस्वी व्यक्तित्व के बूते जन-जन की सुप्त चेतना को झकझोरा एवं निष्प्राण हृदयों में संवेदना का संचार किया। अपने इसी जन्मजात व्यक्तित्व के कारण ही विश्ववंद्य स्वामी विवेकानन्द, प्रत्येक विचारशील मस्तिष्क में नव्य वेदान्त की स्थापना कर सके। छत्रपति शिवाजी, चन्द्रशेखर आजाद, वीर भगतसिंह ऐसे जन्मजात प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व थे।

व्यक्तित्व के ये गुण जन्म से कम ही को मिलते हैं, अधिकतर तो स्वयं को तप की भट्टी में पकाकर, महान् पुरुषार्थ के द्वारा गढ़कर ही बनाना पड़ता है। वस्तुतः विरलों एवं अपवादों को छोड़कर देखा जाए तो ऐसे अनगिन व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को गढ़ा, संवारा एवं निखारा है। पाँच फुट दो इंच के कृशकाय एवं दुर्बल देह के गाँधी जी ने अपने व्यक्तित्व को गढ़ा था। और इनका व्यक्तित्व इतना प्रखर हुआ कि ब्रिटिश शासन का बड़े से बड़े अधिकारी भी उनके सामने आने से कतराता था, झिझकता था। कोई भी उनकी आँखों में आँख डालकर बात करने में घबड़ाता था। उनके व्यक्तित्व में इतनी उत्कृष्टता थी कि सारा भारत देश ने उनके चरणों में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। यह उनके अर्जित व्यक्तित्व का ही परिणाम था।

रूस के सन्त गुरजिएफ ने स्थायी व्यक्तित्व उसी को माना है जो स्वयं के द्वारा गढ़ा एवं निर्मित किया जाता है। जन्मजात सद्गुण सम्पन्न व्यक्तियों को भी अपने व्यक्तित्व को विकसित करना पड़ा है। क्योंकि यह तो विकास की एक सतत् एवं अनवरत प्रक्रिया है। अन्यथा पुलस्त्य जैसे श्रेष्ठ ऋषिकुल में पैदा होने वाला भी रावण दुष्ट-दुराचारी एवं आततायी न होता। वैसे तो रावण भी जन्मजात व्यक्तित्व सम्पन्न था परन्तु इसके दुरुपयोग से वह अपने दुर्लभ व्यक्तित्व को खो बैठा। वह अपने चरित्र एवं स्वभाव को अपने व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं रख सका और इसका कुपरिणाम सर्वविदित है। अतः स्थायी व्यक्तित्व सतत पुरुषार्थ के द्वारा ही बन पड़ता है।

व्यक्तित्व को गढ़ने एवं बनाने के लिए कई गुणों को विकसित करना पड़ता है। इसके निर्माण कार्य में कई कारक कार्य करते हैं। इसमें से एक है- स्वभाव। व्यक्तित्व निर्माण में यह महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। यही व्यक्ति के आन्तरिक स्वरूप का श्रेष्ठ एवं सच्चा तत्त्व है। स्वभाव से ही कोई प्रिय या अप्रिय बनता है। इसी से श्रेय सम्मान या अपमान तिरस्कार का अच्छा-बुरा उपहार मिलता है। यही प्रशंसा एवं निन्दा का मुख्य कारक बनता है। अच्छे स्वभाव से जहाँ सबका दिल जीता जा सकता है वहीं बुरे स्वभाव से वंचना-लाँछना रूपी कालकूट पीने को मजबूर करता है। स्वभाव न केवल औरों को प्रभावित करता है बल्कि अपनी मानसिक बनावट एवं बुनावट का भी कारण बनता है।

मनोविज्ञानी ऐरिक फ्रॉम के अनुसार जब कोई गहरा मनोभाव या विचार स्वभाव में स्थायी रेखा खिंच देता है, गहरा प्रभाव छोड़ देता है तो उसके स्थायी लक्षण शरीर और उसकी गतिविधियों पर भी दिखाई देने लगते हैं। फ्रेन वॉन के अनुसार हमारा अपना स्वभाव ही है जो अपनी शारीरिक संरचना तथा इसके व्यवहारों में प्रतिबिम्बित होता है। इस संदर्भ में एक सुन्दर घटना है। एक बार एक विशेषज्ञ ने सुकरात को देखकर कहा था कि ये सज्जन विषयी, मूढ़ और आलसी वृत्ति के जान पड़ते हैं। सुनने वाला सुकरात के व्यक्तित्व एवं स्वभाव से नजदीकी से परिचित था अतः उसने इस मन्तव्य को सिरे से नकार दिया। परन्तु पास खड़े सत्य के पुजारी सुकरात ने इस कथन की सत्यता को स्वीकार किया और कहा- ‘यह मेरा जन्मजात स्वभाव का लक्षण है। परन्तु यह भी सत्य है कि इसे मैंने तप एवं ज्ञान रूपी पुरुषार्थ तथा प्रभु की अनन्त कृपा से परिवर्तित कर दिया है, आमूलचूल बदल दिया है।’ अतः सुकरात के उन्नत एवं सुसंस्कारित स्वभाव ने उनके व्यक्तित्व को ढालने एवं बदलने में अनोखा योगदान दिया।

व्यक्तित्व का निखार आता है उसके गुण और चरित्र से। व्यक्ति गुणों से गुणी एवं गणमान्य होता है। गुणों का विकास आत्मसाधना से होता है जबकि चरित्र निर्माण समाजिक आराधना में ही सम्भव है। इन दोनों तत्त्वों के समुचित विकास से ही व्यक्तित्व निखरता है। गुणवान एवं चरित्रवान व्यक्ति भले ही नाम, रूप, जाति, कुल से श्रेष्ठ न हो पर वह इन विशेषताओं के कारण लोकमान्य बनता है, प्रतिष्ठित होता है तथा श्रेय-सम्मान का अधिकारी बनता है। निम्न कुल-जाति की माने जाने वाले मत्स्यगंधा पुत्र व्यास जी ने अपनी प्रचण्ड तपस्या एवं गहन साधना के द्वारा गुण एवं चरित्र का विकास कर अपने व्यक्तित्व को समुज्ज्वल बनाया था। इनका व्यक्तित्व इतना महान् था कि उन्हें कोई उनके जाति-कुल-गोत्र आदि के बारे में नहीं पूछता, बल्कि प्रखर व्यक्तित्व के सामने माथा नवाता है।

व्यक्तित्व ऐसा दिव्य प्रकाश है जिसके मूल में उत्कृष्ट चिन्तन एवं सजल संवेदना होती है, विचारों की आलौकिक आभा इसमें झलकती है। जैसे विचार होंगे वैसा ही व्यक्तित्व होगा। उत्कृष्ट चिन्तन व्यक्तित्व को प्रखर बनाता है। सरस भावनाएँ एवं संवेदनाएँ इसे भावपूर्ण बनाती हैं। जीवन साधना के सूत्रों को अपनाकर ऐसा करने से रूखा, नीरस, शुष्क व्यक्तित्व भी उस सरिता के समान प्रवाहित हो उठता है जिसमें अत्यन्त प्रभावकारी तीव्र जीवनधारा के साथ किनारों को चूमती-छूती लहरों की अटखेलियाँ भी होती हैं।

उदात्त व्यवहार व्यक्तित्व का प्राण है। शेष सभी कारक तो व्यक्तित्व के कलेवर को गढ़ते हैं उसके ढाँचे को खड़ा करते हैं, परन्तु इस ढाँचे का कलेवर में कोई प्राण फूँकता है तो वह है व्यवहार। भावपूर्ण व्यवहार से व्यक्तित्व जीवन्त होता है, उसमें नई-नई कोपलें फूटती हैं और प्रसून खिलते हैं। अतः व्यक्तित्व को प्रखर, ओजस्वी, तेजस्वी बनाने के लिए आवश्यक है चरित्र, चिन्तन एवं व्यवहार में बदलाव एवं परिवर्तन। इसमें श्रेष्ठता एवं उत्कृष्टता का समावेश करके ही उत्कृष्ट व्यक्तित्व से सम्पन्न बना जा सकता है।


बहिरंग नहीं, अंतरंग की सफाई

‘स्वच्छता मनुष्य जीवन का सार है।’ इसलिए हे भिक्षुओं! स्वच्छ रहो, साफ-सुथरे रहो। वर्षों पहले भगवान् तथागत ने जेतवन में भिक्षु संघ को यह उपदेश दिया था। अनेकों भिक्षुओं ने उनके इन वचनों को एक साथ सुना। लेकिन एक साथ सुनने पर भी उन सबके समझने के तरीके अलग-अलग थे। किसे ने समझा कि भगवान ने कहीं गन्दगी देखी होगी, किसी भिक्षु के चीवर को मैला-कुचैला देखा होगा, इसलिए उन्होंने स्वच्छता की बात समझाई है। किसी ने सोचा कि भगवान् अपने प्रवचन में नियमित रूप से कुछ अच्छी बातें बताते हैं, यह सूत्र भी उनके इसी उपक्रम का एक हिस्सा है। भिक्षुओं में कई ऐसे भी थे, जिन्होंने तथागत की बातों को सुनकर सोचने की आवश्यकता ही नहीं समझी। वे पहले की भाँति अपने नियमित कार्यों में लगे रहे।

परन्तु दो भिक्षु ऐसे थे, जिनका समूचा जीवन अपने शास्ता की बातों को सुनकर आमूल-चूल बदल गया। हालाँकि इनमें से एक का बदलाव सभी को साफ-साफ नजर आया। दूसरे के बदलाव से सभी अनजान रहे। उनकी ओर किसी ने थोड़ा सा भी ध्यान देने की कोशिश नहीं की। बल्कि वह पहले से भी ज्यादा अपने साथी भिक्षुओं के लिए अनजान होते गए। धीरे-धीरे भिक्षु संघ के सदस्य उनका नाम भी भूलने लगे। इसके ठीक विपरीत पहले भिक्षु का नाम सभी की जिह्वा पर आ गया। सब ओर उनके नाम की चर्चा होने लगी। भिक्षु समंजनी सबकी चर्चा का विषय बन गए।

स्वच्छता उनकी सनक बन गयी। सफाई का उन्हें पागलपन चढ़ गया। साफ-सुथरे रहने की उन्हें धुन पकड़ गयी। चौबीसों घण्टे वह बस झाड़ू लिए घूमते रहते। इधर जाला दिखाई पड़ गया, उधर कचड़ा दिखाई पड़ गया, बस सफाई ही सफाई। जैसे-तैसे जिस किसी तरह यदि झाड़ू उनके हाथों से छूटी भी तो कपड़े धोने या नहाने के लिए बैठ जाते। दूसरे अन्य भिक्षु उनकी इस आदत पर हँसते-उनका मजाक बनाते, पर समंजनी पर उनमें से किसी बात का कोई असर नहीं था। वह हर हमेशा बस अपनी धुन में जुटे रहते।

संघ के अन्य भिक्षुओं ने उनका नाम भदन्त झाड़ू स्थविर रख दिया। उनको लेकर सभी ने अनेकों कटूक्तियाँ, व्यंग एवं उपहासपूर्ण शब्दावली रच डालीं। पर समंजनी इस सभी से बेअसर रहे। उन पर अपनी व्यंगोक्तियों का किसी भी तरह से कोई भी असर पड़ते न देखकर भिक्षुओं ने एक नया तरीका खोज निकाला। अब से उनसे अपने कक्षों एवं वस्त्रों की सफाई कराने लगे। सारे दिन वे सब उन्हें व्यंगपूर्ण ढंग से पुकारते हुए कहते, अरे भदन्त झाड़ू स्थविर! तनिक मेरे कक्ष की सफाई कर देना, अथवा फिर मेरे चीवर धुल देना। समंजनी बड़े ही निर्विकार भाव से अपने साथियों के सारे काम कर देते। किसी के भी कटु व्यवहार पर उन्हें कोई भी क्षोभ अथवा रोष न था।

अपनी इस दिनचर्या के साथ जीते हुए उन्हें दस वर्ष बीत गए। हाथों में झाड़ू और मन में सफाई की धुन बस यही उनके जीवन का पर्याय बन गयी। सबकी नजरों से उपेक्षित और ओझल हो चले भिक्षु रेवत भी पिछले दस वर्षों से अपनी धुन में लगे थे। सफाई उनका भी ध्येय था, पर बाहरी नहीं आन्तरिक। जब से भगवान् बुद्ध ने स्वच्छता को मनुष्य जीवन का सार बताया था, वह भी जुट गए थे। उनके जीवन का हर पल मन-अन्तःकरण को निर्मल-निर्विकार बनाने के लिए समर्पित हो गया था। इन दस सालों में उनकी इन्द्रियाँ ही नहीं चित्तवृत्तियाँ भी निर्मल हो गयी थीं। वह भगवान् के वचनों की सार्थकता से अवगत हो चले थे। स्वच्छता की शुभ्र ज्योति उनके मुख पर प्रकाशित हो चली थी। एक अवर्णनीय आभा से उनका आनन दीप्त हो चला था।

एक दिन भिक्षु रेवत जब ध्यान से उठकर भगवान् को प्रणाम करने जा रहे थे, तब उन्होंने समंजनी को हाथों में झाड़ू लिए सफाई करते हुए देखा। साथ ही वे कटूक्तियां एवं व्यंगोक्तियाँ भी सुनी जो भिक्षुगण उनके लिए कह रहे थे। रेवत के मन में समंजनी के प्रति अपार करुणा का उद्रेक हो आया। वह सोचने लगे कि समंजनी की प्रज्ञा भले ही अभी प्रकाशित न हुई हो, पर उसकी निष्ठ अविचल है। तभी तो वह बिना किसी के व्यंग एवं कटूक्ति की परवाह किए शास्ता के वचनों का अक्षरशः पालन किए जा रहा है। यदि इसे भगवान् के वचनों का मर्म पता चल सके, तब तो इसका सम्पूर्ण जीवन ही बदल जाएगा।

यही सोचकर रेवत, हाथों में झाड़ू लिए समंजनी के पास जाकर खड़े हो गए और बड़े ही मृदु शब्दों में कहने लगे- आपुस, भिक्षु को सदा बाहर की सफाई ही नहीं करते रहना चाहिए। बाहर की सफाई ठीक है, तो सुबह कर ली, साँझ कर ली, बाकी चौबीस घण्टे यही काम। इस झाड़ू की सफाई से तुम निर्वाण नहीं प्राप्त कर सकोगे। कुछ ध्यान भी करो, कुछ भीतर की सफाई भी करो। कुछ भीतर की झाड़ू भी उठाओ। कभी ध्यान भी किया करो। कभी थोड़ी देर शान्त भी बैठा करो, कभी विश्राम के लिए अपने अन्तस् में जाया करो। अरे कभी अपने भीतर भी तो झांको। भीतर की सफाई ही असली सफाई है। यह कब करोगे? या फिर सारा जीवन ऐसे ही बिता देना है।

रेवत की बातें हृदय से निकली थीं। हृदय से निकली हुई बातें हृदय में चोट करती हैं। आज दस सालों बाद समंजनी के हृदय में चोट लगी। उसे बोध हुआ, होश आया। इतने वर्षों बाद उसे भी हास्यास्पद लगा कि मैं क्या करता रहा। अचानक जैसे नींद टूटी। तन्द्रा की जैसे मोटी पर्त आँखों से गिर गयी। बाहर नहीं जैसे भीतर की आँख अचानक खुल गयी। जैसे सुबह कोई रात का सोया हुआ जागे और सारे सपने खो जाएँ।

दूसरे दिन उन्हें झाड़ू न लगाते देखकर अन्य भिक्षु परेशानी में पड़ गए। किसी को समझ में ही न आ रहा था कि समंजनी और झाड़ू नहीं लगा रहे। थोड़ी बहुत देर तक तो सभी ने कारणों की खोज की। पर ज्यादा देर तक उनसे शान्त न रहा गया। वे सब उनके पास पहुँच गए और कहने लगे- समंजनी स्थविर, आज आपके हाथों में झाड़ू कहाँ गयी? अचानक आपके स्वभाव में यह परिवर्तन कैसा? आप होश में तो हैं, आपकी तबियत तो ठीक है न? कहीं आप कुछ बीमार तो नहीं हो गए। देखो तो आपके इस तरह बैठे रहने से जगह-जगह कितना कूड़ा इकट्ठा हो गया है, कितने सारे मकड़ी के जाले लग गए हैं।

भिक्षुओं के इन व्यंग वचनों पर समंजनी खिलखिलाकर हँस पड़े और बोले- भन्ते, सोते समय मैं ऐसा करता था, लेकिन अब मैं जाग गया हूँ। मेरा प्रमाद छंट गया है। अप्रमाद का अब मुझमें उदय हुआ है। मुझे यह बात समझ में आ गयी है कि बाहर की सफाई सुबह-साँझ करना ही काफी है। शेष समय भीतर की सफाई। ऐसा कहकर समंजनी फिर से ध्यान में लीन हो गए।

आश्चर्यचकित भिक्षुओं ने यह बात जाकर भगवान् बुद्ध को बतायी। बुद्ध ने मुस्कराते हुए कहा- हाँ भिक्षुओं, पहले मेरा वह पुत्र प्रमाद के समय ऐसा करता था। लेकिन अब वह जाग गया है। अब वह प्रमाद से छूटकर अपने व्यर्थ के विक्षिप्त व्यवहार से मुक्त हो गया है। भिक्षुओं को इस तरह समझाते हुए भगवान् ने यह धम्मगाथा कही-

पो च पुब्बे पमज्जित्वा पच्छा सो नप्पमज्जति। सो’ मं लोकं पमासेति अष्भामुत्तो व चंदिमा॥

‘जो पहले प्रमाद करके पीछे प्रमाद नहीं करता, वह मेघ से मुक्त चन्द्रमा की भाँति इस लोक को प्रकाशित करता है।’

भगवान् की इस धम्मगाथा का मर्म भिक्षुओं को शीघ्र ही समंजनी के जीवन में स्पष्ट होने लगा। अपने आन्तरिक जीवन की सफाई में जुटे समंजनी की निर्मल चेतना सचमुच ही मेघों से मुक्त चन्द्रमा की भाँति समूचे भिक्षु संघ को प्रकाशित करने लगी थी।


बुद्धिमानी और मूर्खता (Kahani)

एक पिता के दो लड़के थे। दोनों की समझ परखने के लिए पिता ने दस−दस रुपये दिए और कहा−इनकी ऐसी वस्तु खरीद कर लाओ जो फर्श से छत तक जा पहुँचे।

एक लड़का सड़ा हुआ भूसा खरीद लाया और दूसरा एक बढ़िया लालटेन। लालटेन की रोशनी से घर जगमगा उठा और सड़े भूसे को बाहर फिंकवाने के लिए उल्टा दाम खर्चना पड़ा।

ईश्वर की दी हुई जीवन संपदा के बदले में हम क्या खरीदते हैं, यह स्वयं की बुद्धिमानी और मूर्खता पर निर्भर है।


जब कामनाएँ प्रार्थनाओं में बदल जाती हैं।

कामना गहरी अतृप्ति का परिणाम है। इस अतृप्ति को तृप्ति के लिए अनेकों प्रकार की कामनाएँ जन्म लेती हैं। कामना की सघनता से दुःख उत्पन्न होता है और दुःख की सघनता में कामना और भी गहरी हो जाती है। दुःख के दलदल का कारण कामना के अंकुरण की बहुलता है। यही पल्लवित एवं विकसित होती है। पर कभी-कभी सुख की शीतल छाँव तले भी इसकी बाढ़ आती है। कामनाओं का यह मोह जाल तभी टूटता है जब ज्ञान उदय हो।

कामना जो नहीं है, उसकी प्राप्ति की कल्पना है। यह असत्य की एक भ्रान्ति है। असत्य याने जो कल्पना में दृष्टिगोचर होता तो है पर उसका अस्तित्त्व न तो कल था और न कल होगा। कामना इस असत्य रूपी मृगमरीचिका की ओर अंधी दौड़ है। यह दौड़ती कितनी भी बेतहाशा हो, पर इसका परिणाम कुछ नहीं होता। यह क्षणभंगुरता को पाने की तीव्र ललक है, नश्वरता को उपलब्ध करने की घनी चाहत है। ललक और चाहत इसलिए, क्योंकि उसमें प्रबल एवं क्षणिक आकर्षण है। नश्वरता आकर्षण का ही विपर्यय है। क्योंकि पल भर बाद यह नहीं होगा। कामना इसी आकर्षण से उपजती एवं पनपती है।

यह उस ओस की बूँद के समान है जो पल भर बाद ढुलक जाएगी। पर जब तक है तो इसमें मोती के समान चमक दिखाई देती है। जिन्दगी उसे पाने को दौड़ती है। कामना उस क्षण भर की इठलाती-मदमाती यौवन की माँग है जिसके नशे में मनुष्य अपना सर्वस्व भूल जाना चाहता है। इसे पाने की आशा में सभी कुछ लुटा देता है। हालाँकि इस हेतु सब लुट जाने पर, खो जाने पर भी मिलता कुछ भी नहीं है। कामना है लौकिक ऐश्वर्य की माँग। धन-सम्पदा, पद-प्रतिष्ठ, मान-सम्मान पाने की अपार उत्कण्ठा। जीवन इन्हीं कामनाओं का सपना बुनता है। सपने तो सपने होते हैं, जागे कि टूट गये। ऐसे ही कामनाओं की उधेड़बुन में, ऊहापोह में सभी कुछ टूटता मिटता रहता है पर फिर भी कामना जीवित और जीवन्त बनी रहती है।

गरीब भी कामना करता है, कामना में जीता है। अमीर भी कामना करता है, वह भी कामना में जीता है। गरीब जिसके पास कुछ नहीं है उसे पाने की कामना है, उसे अमीर बनने की कामना है। अमीर, धनवान जिसके पास बहुत कुछ है उसे और पाने की कामना है। गरीब और अमीर दोनों ही आशान्वित हैं। दोनों को पाने की चाहत है क्योंकि जो चाहत है वह तो इहलौकिक है, साँसारिक है, इस चाहत की जैसे-जैसे पूर्ति होती जाती है कामना और भी बढ़ती जाती है। कामना तो आग में घी डालने जैसी है। यह तो एक इंधन है। यह जितनी मात्रा में होगा उतनी मात्रा में अग्नि प्रज्वलित होती रहेगी। उसकी लपटें उतनी तेजी से उठेंगी।

अगर सदा अतृप्ति गहरी हो तो कितने भी सुख साधन, भोग-विलास के सरंजाम जुटा लिया जाए यह अतृप्ति बनी रहेगी, मिटेगी नहीं। यद्यपि व्यक्ति कामना करता है, अपेक्षा रखता है ताकि यह अतृप्ति मिट जाए, परन्तु वह मिटने के बदले और गहरी होती चली जाती है। क्योंकि इसकी तलाश बाहरी नहीं हो सकती, इसकी खोज तो अन्दर ही सम्भव है। फिर भी लोगों की तलाश बाहर जारी है, खोज जारी है। कामनाओं की पल-पल बदलती धूप-छाँव में। सच यही है कि जिसने बाहर कभी भी कोई कामना की उसे असफलता हाथ लगी। और इन सपनों से जो जागा उसे तृप्ति मिली।

जापान के महान् कवि ईशा के जीवन में भी कामनाओं की बदली घहराती रही। संसार के क्रूर आघातों-चोटों से उनकी जीवन की आशा की नाव डूबती-उतराती रही। उनका दाम्पत्य जीवन चलने ही लगा था कि उनकी पत्नी उन्हें सदा के लिए छोड़ चल बसीं। फिर बेटी की मौत के मुँह में समा गयी। जवानी की दहलीज को पार भी न कर पाये थे कि उनके पांचों बच्चे स्वर्ग सिधार गये। वह अकेले रह गये। व्यथा के इन क्षणों में उनका कवि हृदय फूट पड़ा और उन्होंने हाइकू नामक कविता लिखी। उन्होंने लिखा- निश्चित ही जीवन एक ओस का कण है, और मैं पूर्णतया सहमत हूँ कि जीवन ओस का कण है, फिर भी, फिर भी कामनाएँ हैं कि मिटती ही नहीं। यह ‘फिर भी’ ही वह भ्रमित कामना है जो सर्वस्व खो जाने के बाद भी बनी रहता है। मनुष्य सोचता है कि जो कुछ खोया है उसमें कुछ तो मिल ही जाएगा। बुद्धि की पकड़ में आ जाने पर भी भाव से सम्बन्ध नहीं जुड़ता। विचारों में कौंध जाय तो भी सत्य भावना में नहीं झलकता। और कामना अपनी जाल बुनती रहती है, अपने कई रूप संजोती रहती है। परन्तु जब यही कामना उस अन्तर की अतृप्ति को दूर करने के लिए प्रभु को पुकारने लगती है तो वह प्रार्थना बन जाती है। और जब यह प्रार्थना सघन एवं घनीभूत हो क्रियान्वित हो उठती है तो आराधना बन जाती है। मीरा के जीवन में ऐसी ही प्रार्थना की आर्त पुकार उठी थी। उन्होंने भी अपना सर्वस्व खोया था और उन्होंने जीवन की असह्य प्रताड़ना झेली थी। पर इस क्रूर यातना एवं प्रबल तिरस्कार के बदले उन्होंने प्रभु के सिवा और कुछ भी पाने की कोई कामना नहीं थी। किसी से कोई अपेक्षा नहीं की थी। उनमें थी तो बस प्रभु के प्रति प्रबल पुकार, चिर अभीप्सा। इस प्रार्थना के प्रभाव से मीरा की अतृप्ति मिट गई।

जब अतृप्ति मिट जाती है तो कामना नहीं उठती, इच्छाएँ नहीं कसकती। यहाँ पर मौन प्रार्थना छलक उठती है और भजन बन जाती है। मीरा का अन्तर इसी प्रार्थना से भर गया था। भरा ही नहीं छलक गया था और वह नाच उठी थी, प्रभु के लिए गाने लगी थी। चैतन्य के अन्दर भी कामनाओं का उठता गुबार नहीं था प्रार्थना थी, भजन था। और यह ऐसे छलका कि वे नाचने लगे थे। रामकृष्ण परमहंस भी इसी तरह प्रभु प्रेम से छलकते-लबालब भरे संत थे। जिनके पास कामनाओं की आँधी आकर शाँत हो गई थी। गुरु गोविन्दसिंह ने कामनाओं का नहीं भावनाओं का गीत गाया था। इन सभी सन्तों की कामनाएँ प्रार्थनाओं में रूपांतरित हो गयी थी।

कामना जब परिष्कृत एवं पवित्र हो जाती है तो अन्तर की अतृप्ति मिट जाती है। व्यामोह की घटाएँ साफ हो जाती हैं, और अन्तर में सुखद तृप्ति का उदय होता है। सुख का सही अर्थ भी यही है कि जो अन्तर को तृप्त कर दे, शान्त एवं संतुष्ट कर दे। यहाँ पर कामना मिट जाती है, उसकी उफान थम जाता है। परन्तु दुःख की गहन अतृप्ति में अनेकों कामनाएँ जन्म लेती हैं। हालाँकि यह सत्य कम ही लोग जानते हैं कि दुःख का यथार्थ कारण प्रमाद नहीं सुख के क्षणों में अविवेक है।

अविवेक कहीं भी हो, वहीं निष्कामता छा जाती है। सुख एवं साधन से परिपूरित राजपुत्र महावीर, राजकुमार सिद्धार्थ में कामनाएँ मिट गयी थी। जैनों के चौबीस तीर्थंकर राजपुत्र थे, बुद्धों के चौबीस बुद्ध राजकुमार थे। प्रायः

हिन्दुओं के सभी अवतार राजपरिवारों से सम्बन्धित थे। उनमें भी कामनाएँ नहीं थीं। इसका कारण समृद्धि नहीं विवेक था। यही कारण है कि कामनाएँ तो जूता गाँठने वाले रैदास, कपड़ा बुनने वाले कबीरदास और प्रभुमय जीवन निर्वाह करने वाले अनगिन असंख्य संत महात्माओं में भी नहीं थी। क्योंकि अविवेक से ही अभाव और अतृप्ति की पीड़ा सताती है। और कामनाओं की आँधी उठती है।

कामना मिटे कैसे? अतृप्ति तृप्ति में कैसे बदले? यह ज्वलन्त प्रश्न है। ऋषियों-मनीषियों के अनुसार कामनाओं की निरर्थकता एवं व्यर्थता का बोध एवं अनुभव तभी हो सकता है जब अन्दर में ज्ञान का उदय हो। और ज्ञान का प्रादुर्भाव तभी होता है जब उच्चस्तरीय चेतना के लिए सतत अभीप्सा हो। इसी अभीप्सा की अग्नि में समस्त कामनाएँ भस्मीभूत हो जाती हैं, अतृप्ति मर जाती है, दुःख का नाश हो जाता है और प्रभु के दिव्य एवं मधुर स्पर्श का अनुभव होता है। अतः कामनाओं से मुक्ति पाने के लिए प्रभु की अभीप्सा ही एक मात्र विकल्प है। प्रार्थनामय जीवन जीते हुए हमें उस परमात्मा की अभीप्सा करते रहना चाहिए।


Quotation

संसार न माया है, न मिथ्या। वह भगवान का विराट रूप है। उससे अलग होने पर किसी जीवित का निर्वाह नहीं।


वैदिक युग की नारी को इक्कीसवीं सदी में - पुनः प्रतिष्ठित किया जाएगा

किसी भी समाज एवं राष्ट्र की स्थिति को वहाँ की नारियों की दशा को देखकर आँका जा सकता है। पुरातन काल के गौरवमयी सतयुगी समाज का श्रेय नारियों की उच्च स्थिति को दिया जा सकता है। वैदिक ग्रन्थों के अनुशीलन से स्पष्ट होता है कि तब समाज में स्वतंत्रता एवं समानता की भावना ओतप्रोत थी, नारियों को हर स्तर पर सम्मान एवं श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता था। उन्हें पुरुषों के समान अवसर उपलब्ध थे एवं वे भी हर क्षेत्र में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी। गृहकार्यों से लेकर कृषि प्रशासन एवं यज्ञ कर्म से लेकर अध्यात्म साधना तक वे कोई भी क्षेत्र उनके विशिष्ट व्यक्तित्व, प्रतिभा एवं कौशल की छाप से अछूते नहीं थे। अपनी बहुआयामी उपलब्धियों के आधार पर वे अपनी जाति के अन्दर संजीवनी शक्ति का संचार करती थी और अपने समाज व राष्ट्र को सशक्त एवं ऊँचा उठाने में अपना अमूल्य योगदान देती थी। वैदिक वाङ्मय में कहीं पुत्री तो कहीं भगिनी, कहीं पत्नी व कहीं माता के रूप में उसकी भूमिका एवं योगदान का उल्लेख आता है। और कहीं-कहीं वह मंत्रद्रष्ट ऋषिका के रूप में अपना वर्चस्व प्रकट करती है।

वैदिक समाज में पुत्र के समान ही पुत्री को स्नेह-दुलार एवं आदर-सम्मान दिया जाता था। (श. 3/31/2) परिवार में कन्याएँ अपने आदर्श गुणों को विकसित करती हुई प्रायः माता के अनुशासन में रहती थी। माता के साथ वे गृहकार्यों को सीखती थी व उनको सहायता देती थी।(ऋ. 3/55/12) वैदिक कन्याएँ कृषि कार्य में भी पिता के साथ सहयोग करती थी। अपाला को अपने पिता के खेतों में अच्छी फसल के लिए इन्द्र से याचना करते हुए चित्रित किया गया है। (ऋ. 8/81/5-13) ऋग्वेद में कन्या को उच्च स्थान प्राप्त था, जिसका उदाहरण ‘विसूनृता ददृशेदीयते घृतम्’ (ऋ. 1/135/7) अर्थात् जहाँ घृत बहता है, वहाँ हर्ष से प्रफुल्लित कुमारी देखी जाती है। इस तरह कन्याओं का सम्मान होने से वे सन्तुष्ट होकर अनेक समाजिक कार्यों में सहयोग प्रदान करती थी।

वैदिक काल में कन्याओं को शुभ तथा विशेष शक्ति से युक्त माना जाता था। इसकी पुष्टि उजस् को दिव की पुत्री निर्देशित करने से होती है। घर की कन्याएँ सोम सवन में प्रमुख रूप से भाग लेती थी। (ऋ. 9/1/6) ऋग्वेद में सोमसवन के प्रसंग में सवनकर्त्ता की अंगुलियों को ‘याषणः’, ‘स्वसार’ तथा ‘दुहितरः’ आदि शब्दों में निर्दिष्ट किया गया है (ऋ. 9/91, 14/5, 32/2)। जिससे यह प्रतीत होता है कि सोमसवन का कार्य कन्याओं द्वारा ही सम्पन्न होता था। सूर्य की दुहिता (श्रद्धा) को अनश्वर छलनी से बहते हुए सोम को छानने वाली कहा गया है। ऋग्वेद में पुत्र एवं पुत्री के दीर्घायु कामना का भी उल्लेख आता है। (ऋ. 4/31/8)। ऋग्वेद में प्रभूत संख्या में वाणों को धारण करने वाले त्रषुधि की प्रशंसा ‘अनेक पुत्रियों के पिता’ कहकर की गई है। (ऋ. 6/75/5)। अन्यत्र पुत्र को पिता के सत्कार्यों का कर्त्ता और पुत्री को आदर करने योग्य कहा गया है।

इस युग में धार्मिक कार्यों में भी बालिकाओं को बालकों के समान अवसर प्राप्त थे। कन्याओं के बालकों की ही भाँति उपनयन संस्कार आदि होते थे और वे संध्यावंदन का विधान नियमित रूप से करती थी। कौषीतकि ब्राह्मण में एक कुमारी गंधर्व गृहीत अग्निहोत्र में पारंगत बतायी गयी है। (कौ.ब्रा.2/9) बालिकाओं के लिए बालकों की ही भाँति शिक्षा ग्रहण करना आवश्यक थी (अथर्व. 11/5/14)। बालिकाएँ ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई विविध विद्याओं में पारंगत होती थी। आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में बृहस्पति भगिनी, भुवना, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, मैना, धारिणी, संमति आदि कन्याओं का उल्लेख आता है। ये सभी ब्रह्मवादिनी थी। ऐसी कन्याओं का भी उल्लेख आता है जिन्होंने तपस्या के बल पर अभीष्ट वर की प्राप्ति की, यथा उमा, धर्मव्रता आदि। यही नहीं गृह में निवास करती हुई कन्याएँ भी गृहस्थिक शिक्षा से अवगत हुआ करती थी।

शिक्षा के साथ ही वे नाना प्रकार के गायन, वादन एवं नृत्य जैसी ललित कलाओं में भी प्रवीण होती थीं। तैत्तिरीय संहिता एवं मैत्रायणी संहिता में कन्याओं की संगीत नृत्य में अभिरुचि का उल्लेख है। शतपथ ब्राह्मण (14/3/1/35) में वर्णन आता है कि स्त्रियाँ सामगान करती थीं तथा उनमें मंत्रों के शुद्धाचारण एवं स्वरों के उचित आरोह व अवरोह की सामर्थ्य होती थी। वे घरेलू शिक्षा के प्रति भी सचेत थी। पितृगृह में कन्याओं को पाक शास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। (तै. स. 5/7) तथा वे अपने व्यक्तित्व को हर दृष्टि से विकसित करती थी।

इस प्रकार सभी कन्याओं को वैदिक काल में उच्च स्थान प्राप्त था। बालकों की तरह शिक्षा ग्रहण करती हुई वे नाना प्रकार की विद्याओं से विभूषित होती थी। पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत लेकर शिक्षा ग्रहण करती हुई युवा होने पर कन्या विवाह करती थी- ‘ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्’ (अथर्व 11/5/19)। पत्नी के रूप में भी स्त्री को उच्च स्थान प्राप्त था। विवाह संस्कार के समय कुलवधु को सम्बोधित करते हुए कहा जाता था। ‘सम्राज्योधि श्वशुरेषु सम्राज्युत देवृषुः, ननान्दुः सम्राज्येधि सम्रज्युत श्वश्रुवाः’(अथर्व. 14/14)। अर्थात्- ‘हे नववधु! तू जिस नवीन घर में जाने लगी है। वहाँ की सम्राज्ञी है। वह राज तेरा है। तेरे श्वसुर, देवर, ननद और सास तुझे सम्राज्ञी समझते हुए तेरे राज में आनंदित रहें।’ वेद में स्त्री को घर की रानी कहा गया है। इसी से उस समय में परिवार के अंदर नारी की ऊँची स्थिति का अनुमान किया जा सकता है।

इस तरह वैदिक काल में किसी भी रूप में स्त्री पुरुष से कम नहीं थी। वे पुरुषों के समतुल्य समझी जाती थीं। यह भाव ‘अर्धांगिनी’ में भली-भाँति व्यक्त हो जाता है। ‘दंपत्ति’ शब्द में स्त्री-पुरुष दोनों के समान रूप से घर का स्वामी होने का भाव निहित है। पत्नी को अन्य कई शब्दों में सम्बोधित किया जाता था। जैसे- जाया, दारा, वासिता आदि, जो कि उसकी उच्चस्थिति को व्यक्त करते हैं। पति स्वयं (शुक्र रूप में) भार्या के गर्भ में प्रवेश करके पुत्र के रूप में जन्म लेता है। इस कारण उसे जाया की संज्ञा दी गयी। ’स्त्री पुरुष का आधा भाग, जब तक जाया प्राप्त नहीं होती, तब तक जीवन अपूर्ण रहता है। जब जाया प्राप्त होती है, तब स्वतः पति ही उसके सहारे उत्पन्न होता है’(वै.ब्रा. 3, 31, 3, 5)।

महाभारत के आदिपर्व 74/31 एवं वन पर्व 12/70 के अनुसार पत्नी सदा आदर की पात्र है, इसलिए उसे ‘दारा’ कहा गया। शतपथ ब्राह्मण (5/2/1/10) के अनुसार- जो पत्नी है वह आत्मा का आधा भाग है। इसलिए जब तक कोई व्यक्ति पत्नी को प्राप्त नहीं करता तब तक संतान प्राप्त नहीं होती। अतएव वह अधूरा रहता है। जब वह पत्नी प्राप्त करता है, तब उसे संतान होती है व वह पूर्ण हो जाता है।

तै. संहिता (6/1/4/5)- में कहा गया है कि पति-पत्नी दाने की दो दालों की भाँति हैं, जिसकी संयुक्त स्थिति ही दोनों को पूर्णतः प्रदान करती है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी मानस में इस कथन का समर्थन किया है। मनु ने भी दोनों में प्रेम की मर्यादा को स्वीकारा है (मनु. 9/101)। सभी शास्त्रकारों ने गृहिणी रहित गृह को अरण्य सदृश कहा गया है। महाभारत शाँतिपर्व 144/61 के अनुसार भार्या सदृश न तो कोई बन्धु है और न ही धर्म संग्रह में अन्य कोई सहायक। ‘गृहिणी गृहमुच्यते’ द्वारा वैदिक युग में नारियों का गृहस्थी में अत्यन्त महत्त्व बताया गया है। नारी वस्तुतः परिवार की केन्द्र बिन्दु मानी जाती थी। परिवार का मंगल, सौभाग्य एवं कल्याण सब कुछ उस पर आधारित था।

मातृरूप में भी वैदिक नारी को पूज्यनीय स्थान प्राप्त था। ‘बन्धु में माता पृथिवी महीयम् (ऋ. 1/164/33) तथा माता भूमि पुत्रोऽह पृथिव्या (अथर्व. 12/1/12) के द्वारा माता रूप में उसकी पग-पग पर स्तुति की गई है, तप, त्याग एवं प्रेम की त्रिवेणी तथा अमृत की खान माता को पिता एवं गुरु से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। ‘गुरुणं चैव सर्वेषाँ माता परमेको गुरुः।’ पुत्रवती स्त्रियों को समाज में विशेष आदर प्राप्त था। (ऋ. 7/8/1/4) विवाह के समय बहू को यही आशीर्वाद दिया जाता था कि सन्तानवती होकर सौ वर्ष तक कुल पर शासन करो। मनुस्मृति (21.45) में गौरव की दृष्टि से माता को पिता से 1000 गुना अधिक माना गया है।

वैदिक जीवन पद्धति में धार्मिक क्षेत्र में नारी को उच्च स्थान प्राप्त था। वैदिक काल में धार्मिक क्रियाओं में यज्ञ को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता था। और पत्नी के अभाव में पति को यज्ञाधिकारी नहीं माना जाता था। ऋग्वेद व अथर्ववेद में नारी के अधिकार एवं कर्त्तव्यों की व्याख्या करते हुए कहा गया है। कि पत्नी के साथ बैठकर पति यज्ञार्थ स्रुवा लेकर यज्ञ करे (ऋ. 1/83/3)। अन्य मंत्रों में भी बताया गया है कि स्त्री प्रतिदिन घी और सामग्री लेकर प्रातः साँय यज्ञ करे। (ऋ. 7/116) शतपथ ब्राह्मण में अकेले पति को स्वर्गलोक की भी आकाँक्षा न करने को कहा गया है। वाजपेय यज्ञ में यज्ञीय यूप के सहारे सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ पति पत्नी से कहता है कि ‘आओ, आओ हम दोनों साथ-साथ स्वर्गारोहण करें’ (श.ब्रा. 5/2/1/10)।

तैत्तिरीय ब्राह्मण (3/7/5) में पति-पत्नी का संयोग सत्कार्य पूर्ति का कारक बताया गया है, जिसके कारण वे यज्ञ की धुरी में युक्त होते हैं। पत्नी शब्द की याषिणी व्युत्पत्ति के अनुसार स्त्री को पत्नी तभी कहा जाता है, जब वह पति के साथ यज्ञ में संयुक्त होती है (अष्टाध्यायी 4/1/33)। ब्रह्माण्ड पुराण में वर्णित है कि ब्रह्म, विष्णु और महेश सपत्नीक देवी की उपासना करते हैं (4/40/93)। वायु पुराण के अनुसार श्राद्ध के अवसर पर अग्नि का आवाहन सपत्नीक करना चाहिए (15/70)। यज्ञ मण्डप में सपत्नीक प्रवेश करना मंगलदायी माना गया है (मत्स्य पुराण 58/21)। मनु स्मृति (5/155) के अनुसार स्त्री का यज्ञ पति के साथ सफल होता है। शतपथ ब्रा. (15/3/1/33) से स्पष्ट होता है कि उद्गाता का कार्य भी पत्नियाँ ही करती थीं।

यज्ञ सम्पादित करने वाली नारियों में विश्ववारा का नाम सर्वप्रथम उल्लेखनीय है। वह प्रातःकाल स्वयं यज्ञ प्रारम्भ कर देती थी। (ऋ. 5/281)। कन्या द्वारा घर में यज्ञ का वर्णन वेद से प्राप्त होता है (ऋ. 8/91/1)। गृहस्थ में अर्धांगिनी के रूप में दैनिक धार्मिक कार्यों में भी नारी को प्रमुख माना जाता था। उसे दया की देवी स्वीकार किया गया है। इसीलिए उपनयन संस्कार के समय बालक घर की स्त्रियों से ही भिक्षा माँगता था (मनु. 2/50)। राम के युवराज पद अभिषेक के समय कौशल्या ने यज्ञ संपादित किया था (रामायण 2/20/15)। बाली के सुग्रीव से युद्ध के लिए जाते समय उसकी पत्नी तारा भी यज्ञ कर रही थी। (रामायण 4/16/18)। पाण्डव जननी माता कुन्ती भी अथर्ववेद की पंडिता थी (महाभारत 3/3/5/20)।

उन दिनों अनेक महिलाएँ अध्यापिकाओं के रूप में शिक्षण देती थीं। इन्हें उपाध्याया कहा जाता था (पतंजलि- 3/822)। पाणिनी (6/2/47) ने भी ‘उपाध्याया’ एवं ‘आचार्या’ पद वाली स्त्रियों पर प्रकाश डाला है। पाणिनी ने महिला-शिक्षणशाला का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार छात्र-छात्राएँ एक साथ शिक्षा ग्रहण करते थे।

बाल्मीकि आश्रम में आत्रेयी लव और कुश के साथ विद्यार्जन करती थी। भरिवासु और देवराट् के साथ कामन्दकी ने गुरुकुल में अध्ययन करने का विवरण प्राचीन ग्रन्थों में प्राप्त होता है।

वृहदारण्यक उपनिषद् से ज्ञात होता है कि उस समय नारियाँ दार्शनिक सभाओं में भाग लेती थीं। यथावसर वे सभाओं में भाषण आदि भी दिया करती थीं। (अथर्व. 14/1/20) इस युग में दो प्रकार की नारियों का उल्लेख आता है, 1. सद्योद्वाहा, 2. ब्रह्मवादिनी। सद्योद्वाहा- वे जो ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करती थीं और आश्रम के महत्त्वपूर्ण नियमों का पालन करती हुई मातृत्त्व के गरिमामय पद को सुशोभित करती थीं।

ब्रह्मवादिनी नारियाँ, आध्यात्मिक चिंतन एवं तपस्या प्रधान जीवन जीती थीं। उपनिषद् काल की मैत्रेयी एवं गार्गी इन स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। मैत्रेयी युग के महानतम तत्त्ववेत्ता याज्ञवल्क्य ऋषि की धर्मपत्नी थी। वृहदारण्यक उपनिषद् (2/4) में याज्ञवल्क्य एवं मैत्रेयी का संवाद आता है, जिससे मैत्रेयी के मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास की उच्चावस्था का ज्ञान होता है। गार्गी के भरी सभा में याज्ञवल्क्य ऋषि को शास्त्रार्थ करने का वर्णन भी उपनिषदों में मिलता है।

यजु. 14/4 में स्त्री को ‘सोमपृष्ट’ कहा गया है। जिसका अर्थ है। वेदमन्त्रों में जिज्ञासा रखने वाली। प्राचीन इतिहास में सुलभा का नाम प्रसिद्ध है। सुलभा का संकल्प था कि जो कोई उसे शास्त्रार्थ में परास्त कर देगा, उसी से विवाह करेगी। सुलभा का यह निश्चय उसके अगाध पाण्डित्य का द्योतक है। वेदों में ऐसी कई ऋषिकाओं का उल्लेख आता है, जिन्होंने अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासा एवं तप-साधनाओं द्वारा मंत्रों का साक्षात्कार किया। वेद के कई मंत्र ‘ऋषिकाओं’ द्वारा खोजे गए हैं।

ब्रह्मवादिनी घोषा ने ऋग्वेद के दशम मण्डल के 39 वें एवं 40 वें सूक्तों का साक्षात्कार किया था। इंद्रदेव की पत्नी इन्द्राणी ने ऋग्वेद के दशम मण्डल के एक सूक्त की रचना की थी। अपाला और रोमशा के साथ सूर्य पुत्री सूर्या ने भी मंत्रों की रचना की थी। कक्षीवान की पत्नी योधा ने अपनी तपस्या से ऋग्वेद के दशम मण्डल के दो सूक्तों के दर्शन किए थे। ऋग्वेद के 151 सूक्त की ऋषिका पुलोम पुत्री शची कही गई है। अपने पति अगत्स्य के साथ लोपामुद्रा ने 179 वें सूक्त का दर्शन किया था। इनके अतिरिक्त श्रद्धा, कामायनी, शची, यमी, सावित्री, विभावटी, अदिति आदि के नाम उल्लेखनीय है, जिन्होंने मंत्रों का साक्षात्कार किया था।

पुरातन युग की नारी सुगृहिणी होने के साथ पति के सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। मनु ने स्पष्ट रूप से स्त्री को राज्य संचालन के योग्य माना है। वेद में भी स्त्री के लिए कई स्थलों पर पुरंधि शब्द का उल्लेख आता है- ‘पुरंनगरं दधातीति पुराँधि’ अर्थात्- जो नगर की रक्षा और पोषण करे। नगरों के प्रबंधन, आँतरिक रक्षा एवं सफाई आदि ये कार्य स्त्रियाँ ही करती थीं। स्त्रियाँ सभा एवं समिति की सदस्याएँ भी चुनी जाती थी। अथर्ववेद में कई स्थान पर इसका संकेत मिलता है (अथर्व. 7/38/4, 12/4/46, 12/3/52)। जिससे स्पष्ट होता है कि वैदिक युग में पुरुषों की भाँति राज्य की सभा व समितियों में स्त्रियाँ भाग ले सकती थीं।

आज साँस्कृतिक पुनरुत्थान की बेला में पुनः उसी स्वर्णिम इतिहास दोहराया जाना है। शान्तिकुञ्ज के तत्त्वावधान में चल रहे विश्वव्यापी विचार क्रान्ति अभियान के अंतर्गत महिलाएँ गायत्री साधना एवं यज्ञ कर रही हैं। अश्वमेध जैसे विराट् यज्ञ में वे ब्रह्मवादिनी की भूमिका निभा चुकी है। धीरे-धीरे वे समाज और जीवन के हर क्षेत्र में पदार्पण कर रही हैं। नारी जागृति की यह लहर वर्तमान 21 वीं सदी में नारी सदी के आदर्श को सार्थक साकार करके ही दम लेगी। ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए।


Quotation

सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धाँत में आस्था रखने वाले अपने दृष्टिकोण, चरित्र, व्यवहार में अधिकाधिक शालीनता भरते और महानता के उच्च पद पर अपनी विशेषता के कारण जा पहुँचते हैं।


शुभ कार्य (Kahani)

महाकाल का संदेश

परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर जनकल्याण हेतु साहित्य सृजन किया, उनके तप एवं ज्ञान का निचोड़ उनके साहित्य में है। सभी लोगों तक यह ज्ञानगंगा पहुँचे, इसीलिए ‘पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय’ का प्रकाशन किया गया है। लाखों ने इसे पढ़कर जीवन धन्य बनाया है। हर घर में वाङ्मय की स्थापना होनी चाहिए, परिवार के लिए यह अमूल्य धरोहर एवं विरासत है।

यदि आपको भगवान ने श्री−संपन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वाङ्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। विवाह, जन्मदिवस एवं अन्य उत्सवों पर अथवा पारितोषिक स्वरूप भी यह साहित्य अमूल्य भेंट सिद्ध होगा। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक को सन्मार्ग पर चलाएगा, जो भी इसे पढ़ेगा, धन्य होगा। शास्त्रों में कहा है−

सर्वेषामेव दानानाँ ब्रह्मदानं विशिष्यते। वार्यन्नगोमहीवासस्तिकाञ्चनसर्पिषाम्॥ मनुस्मृति 4/233

जल, अन्न, गौ, पृथ्वी, वस्त्र, तिल, सुवर्ण और घी, इन सबके दानों में से ज्ञान का दान सबसे उत्तम है।

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंमत। सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ −गीता 4/33

हे परंतप? द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि जितने भी कर्म हैं, वे सब ज्ञान में ही समाप्त होते हैं। ज्ञानदान सर्वोपरि पुण्य है, शुभ कार्य है।


स्वयं को खोकर ही प्राप्ति होगी सत्य की

स्वयं को खोकर ही ‘स्व’ को पाना होता है। जैसे बीज जब अपने को गला देता है, मिटा देता है, तभी उसमें नव−जीवन अंकुरित होता है। वैसे ही ‘मैं’ बीज है, वह आत्मा का बाहरी आवरण और खोल है। इस ‘मैं’ के टूटने और मिटने पर ही अमृत जीवन के अंकुर का जन्म होता है। इस सूत्र को आत्मसात करने की कोशिश करें। पाना है, तो मिटना होता है। मृत्यु के मूल्य पर अमृत मिलता है। बूँद जब स्वयं को सागर में खो देती है, तो वह सागर हो जाती है।

मैं आत्मा हूँ, पर अपने में खोजने पर सिवाय वासना के और कुछ नहीं मिलता। कुछ ऐसा लगता है कि जैसे सारा जीवन ही वासना बन गया है। यह वासना कुछ होने, कुछ पाने की चाहत है। प्रत्येक व्यक्ति कुछ होने, कुछ पाने की दौड़ में है और इस लगातार हो रही दौड़ का कोई अंत नहीं है, क्योंकि जैसे ही ‘जो उपलब्ध होगा’ वह व्यर्थ हो जाएगा और चाहतें पुनः अनुपलब्ध पर टिक जाएँगी। वासना−आकाश क्षितिज की तरह है। इसके जितना ही निकट पहुँचो, वह ठीक उतना ही दूर हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह तो कहीं है ही नहीं। केवल एक प्रतीति, भ्राँति भर है। सत्य नहीं है। मायावी वासनाओं के चाहे कितने ही निकट जाएँ, वह उतनी ही दूर बनी रहती है।

वासनाओं की यह भ्राँति आत्मा का विरोध नहीं, उस पर आवरण है। यह कुहासे और धुएँ की तरह है, जिसमें हमारी सत्ता छिपी है। ‘हम जो नहीं’ उसके लिए दौड़ते−भागते रहते हैं। इसलिए ‘जो हैं’ उससे अनजान रह जाते हैं, उसे देख नहीं पाते हैं। एक क्षण को भी यह होने की दौड़ और वासना की चाहतें न हों, तो जो है वह प्रकट हो जाता है। एक क्षण को भी आकाश में बदलियाँ न हों, तो सूरज चमकने लगता है। इस कुछ होने की भाग−दौड़ का अभाव, स्वयं में, अपने−आप ठहराव ही ध्यान हैं।

ध्यान के इन क्षणों में कितना अचरज होता है, क्योंकि इनमें हम उसे पाते हैं, जो है। इन क्षणों में वह सब मिल जाता है, जिसके लिए चाहतें जगी थी। आत्मा का दर्शन वासना की पूर्ण तृप्ति है। दरअसल वहाँ कोई अभाव ही नहीं है। अभाव तो वासना के विचारों में है। यही अज्ञान है। ज्ञान में विचार नहीं, दर्शन होता है। इसलिए विचार का मार्ग ज्ञान नहीं ले जाता। निर्विचार−चैतन्य ज्ञान का द्वार है।

जो इसे पाते हैं, वे जानते हैं, ज्ञान उपलब्धि नहीं, अनावरण है। वह हममें नित्य उपस्थित है, उसे खोदना है। ज्ञान के जल−स्रोतों पर विचारों के कंकड़−पत्थर जमा हो गए हैं। इन्हें हटते ही चैतन्य की अपरिसीम धारा उपलब्ध हो जाती है। इसके लिए अपने में कुआँ खोदना है। ध्यान की कुदाली से विचारों की पर्तों को अलग करना है। सम्यक् स्मृति, सजग जागरुकता से विचारों को निष्प्राण करना है। तब अनुभव होगा कि विचार जहाँ नहीं है उस निर्धूम चेतना में ज्ञान है। इसके लिए एकाँत में जाने की जरूरत नहीं है, जरूरत है अपने में एकाँत लाने की ।

परिस्थिति नहीं−मनःस्थिति महत्वपूर्ण है। भीड़ बाहर नहीं, भीड़ भीतर है। भीड़ से भागना व्यर्थ है, भीड़ को भीतर से विसर्जित करना सार्थक है। इसलिए एकाँत मत खोजो, एकाँत बनो। निर्जन में मत जाओ, अपने को निर्जन करो। ऐसी अवस्था होने पर ऐसे शाँति, शून्य और एकाँत से देखने पर संसार परमात्मा में परिणत हो जाता है। जो कल तक घेरे हुए थे, आज वे अपने में ही विलीन हो जाते हैं।

किसी ऐसे ही क्षण में उपनिषद् के ऋषि ने कहा होगा−’अहं ब्रह्मास्मि’।

इस भावदशा को पाने के लिए परंपराओं, रूढ़ियों और उधार के विचारों के बोझ से छुटकारा पाना आवश्यक है। पर्वतारोही जितने निर्भार होते हैं, उतने ही ऊँचे पर्वतों पर उनके चरण पहुँच पाते हैं। सत्यारोही भी जितने शून्य होते हैं, जितने निर्भार होते हैं, उतनी ही ऊँचाइयाँ उनका आवास हो पाती हैं। परमात्मा तक, उस अंतिम ऊँचाई तक जिन्हें पहुँचना है, उन्हें उस अंतिम शून्य तक पहुँचना जरूरी है। शून्य की गहराई में पूर्ण ऊँचाई का जन्म होता है। असत्ता में सत्ता के संगीत की उत्पत्ति होती है। तब ज्ञान होता है कि निर्वाण ही ब्रह्मोपलब्धि है।

सत्य अज्ञात है, तो उसे उन विचारों से कैसे जाना जा सकता है, जो कि ज्ञात है। ज्ञात से अज्ञात तक कोई मार्ग नहीं है। हाँ ज्ञात से छलाँग अज्ञात में ले जाती है। विचार हम पर हैं। उन पर हम खड़े हैं। उनसे निर्विचार में कूदना है। शब्दों से मौन में कूद जाना है। यह सोचने से नहीं जागने से होगा। विचारों की चक्रीय गति को देखने से होगा। इसे देखते−देखते अनायास ही किसी क्षण में छलाँग लग जाती है। फिर स्वयं को अतल शून्य में पाते हैं। ज्ञात के किनारों के छूटने भर की देर है, फिर अपनी नौका सहज ही अज्ञात के सागर में अपने पालों को खोल लेती है। फिर तो बस इस आनंद यात्रा में आनंद−ही−आनंद है।

अशाँति से भरी आँखों को शाँति की यह सचाई दिखाई नहीं देती। आँखें चाहे आँसुओं से भरी हों, चाहे मुस्कराहटों से, सत्य नहीं देख पातीं। इसके लिए तो खाली आँख चाहिए। खाली आँखों से सब दिखाई दे जाता है, आत्मा भी और परमात्मा भी । हममें से हर कोई परमात्मा को जानना चाहता है और स्वयं को जानता नहीं। स्वयं से ज्यादा निकट और कोई सत्ता नहीं है। जो वहाँ अज्ञान में है वह किसी भी तल पर ज्ञान में नहीं हो सकता।

ज्ञान की प्रथम ज्योति अंतस् में ही जागती है। वही ज्ञान की प्राची है। वहीं से ज्ञान का सूर्योदय होता है। वहाँ अँधेरा है, तो स्मरण रहे कि सूर्योदय कहीं भी नहीं हो सकता है। परमात्मा को नहीं, स्वयं को जानना होगा। वही ज्योतिकण अंत में सूर्य में परिणत हो जाता है। स्वयं को जानकर ही जाना जाता है कि वहाँ सत्ता तो है, चैतन्य तो है, आनंद तो है, सच्चिदानंद तो है, पर मैं नहीं है। यह अनुभव ही परमात्मा का अनुभव है। मैं युक्त आत्मा जीव है− यही अज्ञान है। मैं मुक्त आत्मा परमात्मा है− यही ज्ञान है।

दसों दिशाओं में आत्मा की खोज में भागने−दौड़ने से कुछ होने वाला नहीं है, क्योंकि दसों दिशाएँ बाहर की ओर जाती हैं। उनसे जो निर्मित है, वही जगत् है, इनमें भागने−दौड़ने वाला निश्चित ही इनसे अलग है, अन्यथा न वह इन्हें जान सकता था और न इनमें गतिमान हो सकता है। इसी पृथक तत्व में स्थिरता है, ध्रुवता है। यह ध्रुव ही अध्रुव को थामे हुए है। अध्रुव जीवन है, ध्रुव आत्मा है। यह आत्मा ग्यारहवीं दिशा है। इसे खोजने कहीं नहीं जाना है। खोजना छोड़कर इसके प्रति जागना होगा। यह दौड़ने से नहीं रुकने से होगा। रुको और देखो, इन दो शब्दों में ही सारा धर्म है, सारी साधना है, सारा योग है।

इसी से ग्यारहवीं दिशा खुज जाती है और बस आँतरिक आकाश में प्रवेश होता है। इस आँतरिक आकाश का नाम ही आत्मा है। इस सत्य से अपरिचित जन अध्यात्म के नाम पर, साधना के नाम पर दौड़ते रहते हैं। गिरते−पड़ते,

हाँफते−काँपते दौड़ते हैं। तब तक यह दौड़−भाग चलती रहती है, जब तक मृत्यु नहीं आ जाती, पर जो सत्य को जान लेते हैं, वे मृत्यु में भी अमृत को पा लेते हैं। सत्य यही है कि स्वयं को खोजें नहीं−स्वयं को खो दें। तभी अध्यात्म के अद्भुत लोक का प्रवेश द्वार आपके लिए खुल जाता है। इसमें प्रवेश पाने के लिए सभी आमंत्रित हैं।

जापान पर आक्रमणकारियों का कब्जा हो गया। उन्होंने श्रमिकों की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए एक चाल चली। दैनिक श्रम का घंटा दिया और सप्ताह छह दिन की बजाय पाँच दिन का कर दिया ।

इस पर श्रमिकों ने घोर विरोध प्रकट किया और कहा−यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर आक्रमण है। हमने श्रम के द्वारा ही इस छोटे से टापू को समर्थ बनाया है। यदि हममें श्रम से जी चुराने की आदत डाली गई, तो प्रस्तुत संकट से हम हजार वर्ष में भी न उबर सकेंगे।


भय है कायरता की प्रतिकृति

अकड़न की बीमारी जब शुरू होती है, तो सारे शरीर को बुरी तरह जकड़ लेती है, अंग सीधे नहीं होते, चलना उठना कठिन हो जाता है, रक्त ठंडा पड़ जाता है और दिमाग सोचना बंद कर देता है, चाहने पर भी शरीर कुछ काम नहीं करता। यह लक्षण अन्य बीमारियों के भी हो सकते हैं, पर सर्वसाधारण में तो इनका प्रकटीकरण ‘भय’ के दौरान ही होता है। सिंह को देखकर हिरन चौकड़ी भरना भूल जाते हैं और किंकर्त्तव्यविमूढ़ की−सी स्थिति में पड़े रहकर बे−मौत मारे जाते हैं। यही दशा मनुष्यों में तब पैदा हो जाती है, जब कोई अप्रत्याशित संकट सामने आ खड़ा होता है, फिर तो उससे कुछ भी सोचते नहीं बन पड़ता, हाथ−पाँव फैलने लगते हैं और जो नहीं घटने चाहिए, वह सब घटित हो जाते हैं। मूर्द्धन्य मनीषी जे. कृष्णमूर्ति अपनी कृति प्रथम और अंतिम मुक्ति में लिखते हैं कि जैसा कि भय के बारे में सोचा और समझा जाता है, वास्तविकता वैसी है नहीं। डर हमेशा ज्ञात के प्रति ही हो। सकता है, अविज्ञात के प्रति भय बनने का कोई कारण नहीं। जहाँ ऐसा प्रतीत होता है, वहाँ समझने में भूल हो जाती है। वे कहते हैं कि आम धारण में मृत्यु को भयकारक माना जाता है, पर वह सच नहीं है, कारण कि साधारण स्थिति में न तो मौत को जाना सकता है, न उसकी अनुभूति की जा सकती है। जिसे देखा नहीं, जिसकी भयंकरता समझी नहीं, भला उससे डर कैसा। त्रास के यथार्थ कारण का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि संकट व्यक्ति को उस विलगाव में दिखलाई पड़ता है, जहाँ वह अपने प्रिय कुटुँबियों, वस्तुओं, संपदाओं, भोगों से स्थायी पृथकता की कल्पना करता है। अलग हो जाने की यही धारणा भय का वास्तविक कारण है।

कोई भूत, जिसके बारे में बालक ने कुछ सुना नहीं, कभी देखा नहीं, वह यदि अचानक उसके सामने प्रकट हो जाए, तो इतना निश्चित है कि वह उसे देखकर भागेगा नहीं, वरन् और प्रसन्न होगा कि एकाँत और सुनसान राह पार करने के लिए एक साथी मिल गया। यह अज्ञानताजन्य निर्भयता है।

दूसरी ओर धर्मभीरु लोग ईश्वर से इसलिए डरते हैं, क्योंकि उन्हें उसकी कर्मफल व्यवस्था और दंड विधान का पता होता है और ऐसा प्रयास करते हैं, जिससे जीवन में कोई अनैतिक कर्म न बन पड़े, जिसका दंड आने वाले समय में, आगामी जीवन में भीषण त्रास की तरह न झेलना पड़े।

इसके विपरीत ऐसे भी लोगों की कमी नहीं, जो भयंकरता का ज्ञान होते हुए भी भयकारक वस्तुओं, प्राणियों, परिस्थितियों से आँखमिचौली खेलते रहते हैं। सपेरे रोज ही काले विषधर नाग पकड़ते हैं। शिकारी शेर, बाघ का शिकार करते ही रहते हैं। उन्हें वे तनिक भी डरावने नहीं लगते, अपितु उन्हें ढूँढ़ने रहते हैं और मिल जाने पर प्रसन्न होते हैं, जब कि अजनबी व्यक्ति को शेर−साँप की तस्वीर देखने और चर्चा सुनने भर से पसीना छूटता है।

संसार में करतबबाजों की चर्चा दुस्साहसियों के रूप में होती है। उनमें ऐसे कार्यों के प्रति सनक स्तर की धुन सवार होती है, जिसे देखकर लोग हैरान हों और चकित रह जाएँ। दो पहाड़ की चोटियों के बीच की खाई को रस्सियों के सहारे पार करने का कौशल दिखाना, दो गगनचुँबी इमारतों को परस्पर बाँधकर रस्सी के सहारे एक−से−दूसरे में जाने का दुस्साहसिक प्रदर्शन करना, उड़ते वायुयान से छलाँग लगाकर पैराटुपिंग का आनंद लेना, इसके अतिरिक्त आइस स्केटिंग माउंटेनियरिंग, ग्लाइडिंग यह सभी खतरनाक खेल हैं, पर तत्संबंधी लोगों के लिए तो यह सामान्य−सी बात है, यह उनका आएदिन का खिलवाड़ है। इनमें उन्हें तनिक भी भय नहीं लगता। नट अपनी विद्या में चाहे जितना कुशल हो, पर रस्सी के ऊपर चलते समय संतुलन बिगड़ जाने और गिर पड़ने का एक ही परिणाम होता है, मौत, किंतु ऐसा करते समय वह बिलकुल भयभीत नहीं दीखता। सर्कस में अनेक प्रकार के प्रदर्शन होते हैं। सब एक−से−एक बढ़कर खतरनाक । इसके बावजूद दुनिया में सर्कस कंपनियों का अब भी अस्तित्व है, वे भयवश बंद नहीं हुई हैं। मौत का कुआँ उसका एक जोखिम भरा प्रदर्शन है। आयोजन के पश्चात् खेल दिखाने वाला व्यक्ति जीवित रहेगा भी यह नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। इतने पर भी सर्कस में यह खेल आयोजित होते ही रहते हैं।

इन सबसे एक ही निष्कर्ष निकलता है कि भय मानसिक होता है और अंतः को मजबूत बनाकर उस पर विजया प्राप्त की जा सकती है। मन यदि सशक्त हो, तो वास्तविक डर भी बौना लगता है। इसके विपरीत मन के कमजोर रहने पर बार−बात पर आशंका होती है, डर महसूस होता है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो अगल−बगल में, अड़ोस−पड़ोस में सर्वत्र उसके विरुद्ध दुरभिसंधियाँ रची जा रही हों, कुचक्र चल रहे हों। लोग अवसर की तलाश में हों कि कब मौका आए और उसे धर दबोचा जाए। इस तरह की मानसिक कुकल्पनाओं से व्यक्ति की आंतरिक संरचना इतनी लड़खड़ा जाती है कि उसे हर वक्त, हर जगह और हर व्यक्ति तथा वस्तु से डर लगने लगता है, उनमें से प्रत्येक में उसे एक प्रच्छन्न भय नजर आने लगता है। इस स्थिति पर यदि जल्द ही काबू नहीं, पाया गया, तो यही भय ‘फोबिया’ का रूप धारण कर आदमी की सुखमय जिंदगी को नरकतुल्य बना देता है। इसे ही कहते हैं−हँसते−खेलते जीवन की शाँति अपने ही हाथों छीन लेना।

भय वस्तुतः कायरता की प्रतिकृति है। भीरु मनुष्य की आँतरिक दुर्बलता इस संसार−दर्पण में विपत्ति बनकर दीखती है। संकट का सामना करने की, उससे उलझने−निपटने की क्षमता अपने में नहीं है, ऐसा मान लेने के बाद ही डर आरंभ होता है। जिसे यह विश्वास है कि कठिन परिस्थितियों का सूझ−बूझ के साथ मुकाबला करेंगे, उन्हें हटाने−मिटाने के लिए जूझेंगे। इसके लिए आवश्यक समझ और बल अपने पास है। मित्र और ईश्वर भी साथ देंगे। इस प्रकार की हिम्मत यदि अपने में मौजूद हो, तो काल्पनिक डरों से छुटकारा मिल जाता है और मन का अधिकाँश बोझ हो जाता है।

विख्यात हंगेरियन मनोवैज्ञानिक फरेंज नैडेस्डी ने अपनी पुस्तक ‘फियर ओर फ्रीडम’ में भय का एक अन्य कारण गिनाते हुए लिखा है कि डर वहीं उत्पन्न होता है, जहाँ एक विशेष प्रकार के ढाँचे में जीने की इच्छा होती है, एक विशेष प्रकार के जीवन की चाह होती है। इस ढाँचे को, चाह को त्याग कर व्यक्ति कुछ समय के लिए भय मुक्त हो सकता है, पर ऐसा तभी है, जब वह इस सत्य को भलीभाँति जान ले कि उक्त आकाँक्षा की भय का कारण है और भय उस आकाँक्षा को मजबूत कर रहा है। वे कहते हैं कि किसी एक ढाँचे को तोड़ देने मात्र से ही कोई पूर्णतः भयमुक्त नहीं हो सकता। इससे इतना ही अंतर पड़ सकता है कि हम एक शैली को छोड़कर किसी दूसरी जीवन शैली में प्रवेश कर जाएँगे। वह दूसरे प्रकार का भय उत्पन्न करेगी। इसे भी यदि तोड़ा गया, तो किसी तीसरी जीवन शैली के हम अधीन हो जाएँगे। वह पुनः अपने तरह का डर पैदा करेगी। तथ्य यह कि इस प्रकार किया गया कोई भी प्रयास, जो ढाँचा तोड़ने की प्रवृत्ति पर आधारित हो, केवल एक दूसरी प्रणाली उत्पन्न करेगा और भय का कारण बनेगा। अंततः वे भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वास्तविक शाँति और भयमुक्ति तभी संभव है, जब मूल निमित्त अपने अंतर को, मन को बलवान बनाया जाए।

अनैतिकता को भी भीरुता का एक कारण माना जाता है। जिसकी अंतरात्मा कलुषित और पाप कर्म से लिप्त है, वह कभी चैन की नींद न सो सकेगा। चोर, डकैत, आततायी, व्यभिचारी, राजद्रोही कभी भी निश्चिंत नहीं होते। उन्हें हमेशा ही अपने करतूतों की पोल खुलने, बदनामी होने, पकड़े जाने का भय बना ही रहता है। वे सदा ही समाज दंड, राजदंड, ईश्वरीय दंड से भयभीत बने रहते हैं। आत्मा पर लदने वाला अनीति का बोझ निरंतर उन्हें कचोटता रहता है। बाहर वाले दंड मिलने में तो देर−सवेर भी हो सकती हैं, पर आत्मदंड तो कुमार्ग पर कदम धरते ही मिलना आरंभ हो जाता है और वह बराबर दुःख देता रहता है।

ब्रिटिश मनः शास्त्री रिचर्ड गार्नेट अपने ग्रंथ ‘साइकोलॉजी ऑफ फियर में लिखते हैं कि शारीरिक कष्ट एक स्नायुगत अनुक्रिया है पर मानसिक कष्ट तब उत्पन्न होता है, जब व्यक्ति का किसी वस्तु से गहनतम तादात्म्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में वस्तु से उसकी निकटता, उसका लगाव शाँति और संतोषदायक होता है, क्योंकि तब वह उस व्यक्ति या वस्तु से भयभीत रहता है, जो उन वस्तुओं को उससे अलग कर सकते हैं। वे कहते हैं कि जब तक मनोवैज्ञानिक कष्ट को रोकते हैं।

मनुष्य की विडंबना यह है कि जिसका वास्तव में भय करना चाहिए, उससे वह निडर स्तर का बना रहता है और जहाँ भय का कोई कारण नहीं, वहाँ डरता रहता है। उसे पाप से डरना चाहिए, कर्मफल से डरना चाहिए, ईश्वरीय न्याय से डरना चाहिए, इनसे वह भयभीत होने की आवश्यकता नहीं समझता। चोरी करते हुए, भोले लोगों को ठगते हुए, छल−प्रपंच रचते हुए, षड्यंत्र अपनाते हुए, चुगली, नशेबाजी, व्यभिचार, बेईमानी, असत्य भाषण, मिथ्या प्रलाप करते हुए कौन डरता है? डरते हैं भूत−पलीतों से, मानसिक कुकल्पनाओं से, प्रतिकूल परिस्थितियों से, कठिनाइयों से, उलझनों से, जबकि सचाई यह है कि इनसे डरने का कोई कारण नहीं। हमें मन में यह विचार दृढ़तापूर्वक धारण कर लेना चाहिए कि जीवन में आने वाली हर प्रिय−अप्रिय स्थिति का डटकर मुकाबला करेंगे और किसी भी परिस्थिति में मन को कमजोर न होने देंगे। यह संकल्प यदि अंतर में दृढ़ हो गया, तो समझना चाहिए कि जीवन की आधी मुसीबतें समाप्त हो गई। फिर भय के कारण जीवन घोर नरक न बनकर स्वर्ग−सुख देने वाला माध्यम साबित होगा।


तू पहले दस कदम तो चल

गाँव के लोग उसे ‘हरिया’ कहकर बुलाते थे। वह एकदम सीधा-सादा, भोला-भाला, सहज, सरल किसान था। गाँव में उसके थोड़े से खेत थे। इन खेतों से ही उसकी गुजर-बसर चलती थी। अपने खेतों में काम करते हुए वह गाँव के पास वाली पहाड़ियों की ओर बड़ी हसरत भरी निगाहों से देखा करता था। उनकी हरियाली से ढंकी चोटियाँ उसे अपने खेतों से ही दिखाई पड़ती थी। बहुत बार उसके मन में उन्हें निकट से जाकर देखने की चाहत अत्यन्त बलवती हो जाती थी। लेकिन कभी एक तो कभी दूसरे कारण से बात टलती चली गयी। वह वहाँ जा नहीं पाया।

पिछली बार तो उसे केवल इसलिए रुकना पड़ा, क्योंकि उसके पाद कंदील नहीं थी। कंदील के बिना वह जाता भी तो कैसे? उन पहाड़ियों पर जाने के लिए रात के अंधेरे में ही निकलता पड़ता था। सूर्य के निकल आने पर पहाड़ की चढ़ाई और भी कठिन हो जाती थी। सूरज की गरमी के कारण पगडण्डियाँ तप जाती थीं। उन पर पाँव धरे नहीं जाते थे। उसके पास तो जूते भी नहीं थे। ऐसे में उसका दिन में जलती हुई पहाड़ी पगडंडियों पर नंगे पाँव चलना और भी मुश्किल था। गाँव के बुजुर्गों से उसने यह भी सुन रखा था कि पहाड़ियों के रास्ते पर प्यास बुझाने के लिए पानी का कोई स्रोत नहीं है। इस रास्ते पर कोई झरना या चश्मा नहीं है, जिससे कि प्यासे मुसाफिर अपनी प्यास बुझा सकें।

कुल-मिलाकर उस ओर दिन का सफर मुश्किल था। दिन में उधर जाने पर अनेकों विघ्न-बाधाएँ थी। रात का सफर ही एक मात्र आसान तरीका था। लेकिन रात में रास्ता तय करने के लिए रोशनी का कोई बन्दोबस्त तो चाहिए ही। बस यही उसकी परेशानी थी। पिछले कई सालों से वह यह बन्दोबस्त नहीं जुटा पाया था। इसमें उसकी गरीबी मुख्य अड़चन थी। उसके पास खेत भी कोई ज्यादा नहीं थे। बस जैसे-तैसे किसी तरह गुजर-बसर चल जाती थी। कभी-कभी तो गाँव के मुखिया का थोड़ा-बहुत कर्ज भी लद जाता। ऐसे में रोशनी के लिए कंदील जुटाना उसके लिए भारी फिजूलखर्ची थी। लेकिन पहाड़ियों की हरी-भरी चोटियाँ उसे जब-तब मौन निमंत्रण भेजती रहती थीं। इन्हें देखकर मन में अनचाहे ही हूक और हुलस उफन पड़ती थी।

अभी इस बार कुछ दिनों पहले जब वह खेतों में काम कर रहा था। उसकी सतृष्ण निगाहें पहाड़ों की चोटियों पर जमी थी। उसे इस तरह पहाड़ों की ओर ललचायी नजरों से निहारते हुए देखकर पास खड़े मुखिया ने पूछ लिया। मुखिया के बहुत पूछने पर उसे थोड़ा रुकते-झिझकते अपने मन की बात कह दी। दयावश गाँव के मुखिया ने उसकी बातें सुनकर उसके लिए एक कंदील की व्यवस्था जुटा दी। कंदील मिल जाने पर पहाड़ों पर जाने की खुशी में वह रात भर सो नहीं सका। रात्रि दो बजे ही वह उठ गया और पहाड़ियों के लिए निकल पड़ा।

लेकिन गाँव के बाहर बने मन्दिर के पास आकर वह ठिठक कर रुक गया। इस मन्दिर में एक युवा साधु रहा करता था। वह भी इस समय अपने सोच-विचार में जग रहा था। हरिया ने उसे अपने मन की चिन्ता और दुविधा बतायी। अमावस की रात का घना-घुप अन्धकार है। उसके पास जो कंदील है, उसका उजाला तो दस कदमों से ज्यादा नहीं होता। जबकि पहाड़ की दस मील चढ़ाई चढ़ना है। दस मील दूर मंजिल और दस कदम उजाला करने वाली कंदील, भला कैसे बात बनेगी? ऐसे घुप-घने अंधेरे में इतनी सी कंदील के प्रकाश को लेकर यात्रा करना कहाँ तक उचित है? यह तो महासागर में जरा की डोंगी लेकर उतरने जैसा काम है?

मंदिर के युवा साधु को उसकी ये बातें ठीक लगी। उसने भी हरिया की बातों में हाँ में हाँ मिलायी। उसकी अपनी भी समस्या कुछ ऐसी ही थी। वह स्वयं भी सोच रहा था गुरु द्वारा दिए गए छोटे चौबीस अक्षरों वाले गायत्री मंत्र के सहारे आध्यात्मिक शिखरों की यात्रा किस तरह हो पाएगी। आध्यात्मिक जीवन की अनन्त यात्रा और छोटा सा गायत्री मंत्र, बात कुछ बनती नजर नहीं आती। वह साधु भी उस किसान के साथ चिन्ता में डूब गया। ये दोनों ही चिन्ता में डूबे थे, तभी उन्होंने देखा कि कोई वृद्ध व्यक्ति पहाड़ियों की तरफ से उनकी ओर आ रहा है। उस वृद्ध के हाथ में तो और भी छोटी कंदील है।

हरिया लपक कर उसकी ओर गया और उस वृद्ध को रोककर उसे अपनी दुविधा बतायी। हरिया की सभी बातें सुनकर वह वृद्ध खूब जोर से हंसा। उसकी उजली हंसी से उसकी दूधिया घनी दाढ़ी और भी प्रकाशित हो गयी। हंसते हुए वृद्ध बोला- ‘पागल? तू पहले दस कदम तो चल। जितना दिखता है, उतना तो आगे बढ़। फिर इतना ही और आगे दिखने लगेगा। दस कदम तो बहुत होते हैं। एक कदम भी दिखता हो, तो उसके सहारे सारी भूमि की परिक्रमा की जा सकती है।’ वृद्ध की बातों में उसके अनुभव की झलक थी।

वह वृद्ध हरिया के साथ चलते हुए उस मन्दिर वाले साधु तक पहुँचा। और बिना किसी लाग-लपेट के उससे कहने लगा- आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में तुम्हें इस तरह सोच-विचार में पड़े देखकर में बहुत हैरान होता हूँ। आध्यात्मिक जीवन सोच-विचार से नहीं, बल्कि उसकी सम्पूर्णता में उसकी साधना से ही जाना जाता है। सत्य से साक्षात्कार करने का और कोई मार्ग नहीं है। जागो और जियो! जागो और चलो। आध्यात्मिक सत्य कोई मृत वस्तु नहीं है कि उसे बैठे-बिठाए ही पाया जा सके। वह तो अत्यन्त जीवन्त प्रवाह है। अपनी जीवन साधना की नियमितता में जो सब भाँति मुक्त और निर्बन्ध हो बहता है, वही उसे पाता है।

युवा साधु उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रहा था। उसके निराश मन के अंधेरों में आशा की उजली किरणें बरस रही थीं। वह वृद्ध कह रहे थे- ‘बहुत दूर के सोच-विचार में अक्सर ही निकट को खो दिया जाता है। जबकि निकट ही सत्य है। और निकट में ही वह भी छिपा है, जो दूर है। क्या दूर को पाने के लिए सर्वप्रथम निकट को ही पाना अनिवार्य नहीं है? क्या समस्त भविष्य वर्तमान के क्षण में ही उपस्थित नहीं है? क्या एक छोटे से कदम में ही बड़ी से बड़ी मंजिल का आवास नहीं होता है?’

निकटता के कारण ही युवा साधु ने वृद्ध को अब तक पहचान लिया था। वही उसके दीक्षा गुरु थे। उन्हीं ने उसे गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी। युवा साधु के प्रणाम करते ही वह उसे आशीष देते हुए बोले- गुरु जानते हैं कि शिष्य को कब क्या चाहिए? तुम्हें जो दिया गया है, वही तुम्हारे लिए सर्वश्रेष्ठ है। धैर्यपूर्वक नियमित रूप से गायत्री साधना करो। इसी से तुम अध्यात्म के सभी शिखरों पर भ्रमण कर सकोगे। सोच-विचार नहीं साधना करो। दुविधा में मत पड़ो, यात्रा करो।

हरिया ने अपनी यात्रा शुरू की। उस युवा साधु ने अपनी गायत्री साधना की नियमितता में ध्यान लगाया। कुछ काल के बाद दोनों ही अपने-अपने ढंग से अपने अनुभव के बल पर सबको समझाने लगे- मित्रों! बैठे क्या हो? उठो और चलो। जो सोचता है, वह नहीं; जो चलता है, बस केवल वही पहुँचता है। स्मरण रहे कि इतना विवेक, इतना प्रकाश प्रत्येक के पास है कि उससे कम से कम दस कदम का फासला दिखाई पड़ सके और उतना ही पर्याप्त भी है। गायत्री मंत्र की नियमित साधना की रोशनी परमात्मा तक पहुँचने के लिए पर्याप्त है।


किसी विधा से नहीं होता (Kahani)

एक व्यक्ति अपने तीन बच्चों को किसी विचारशील के पास ले गया और बोला−इसके गुण और भविष्य बताइए। विज्ञ व्यक्ति ने तीनों को दो−दो केले दिए। एक ने छिलके उतारकर सड़क पर फेंक दिए। दूसरे ने कूड़ेदान में डाल दिए। तीसरे ने गाय को खिला दिए। भविष्यवक्ता ने कहा, इनमें से एक मूर्ख, दूसरा समझदार और तीसरा उदारचेता बनेगा।

पिता ने पूछा, आपने कौन−सा गणित लगाकर यह भविष्यवाणी की। विचारक ने कहा, व्यवहार गणित से बढ़कर निर्धारण और किसी विधा से नहीं होता।


साहस और संकल्प का महापर्व : विजयादशमी

शहरों, कस्बों और गाँवों में रावण के पुतलों को जलाने की तैयारियाँ देखकर दशहरा के आगमन का अनुमान होने लगा है। 15 अक्टूबर 2002 को विजयादशमी के मनाए जाने की खबर सभी को लग गयी है। इस दिन बाँसों की खपच्चियों से बने रावण के पुतले बड़ी धूम-धाम से जलेंगे। आतिशबाजियों की आँखों को चौंधिया देने वाली रोशनी होगी, कान फोड़ने वाला भारी शोर होगा और दशहरे की रस्में पूरी हो जाएँगी। दशहरे की सच्चाई क्या केवल इन रस्मों के पूरी होने तक है? अथवा फिर इस महापर्व के साथ कुछ विजय संकल्प भी जुड़े हैं? ये सवाल वैसे ही जलते-सुलगते रह जाएँगे। शायद ही किसी के मन इनका जवाब पाने के लिए विकल-बेचैन हो। अन्यथा ज्यादातर जनों की जिन्दगी दशहरा की रस्में जैसे-तैसे पूरी करके फिर से अपने उसी पुराने ढर्रे पर ढुलकने, लुढ़कने और फिसलने लगेगी।

यही हमारे सामाजिक जीवन की विडम्बनाग्रस्त सच्चाई है। सभी अपनी आपाधापी में परेशान हैं। सब को अपने-अपने स्वार्थ और अपनी अहंता की कारा घेरे है। ऐसे में साँस्कृतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय महत्त्व के बिन्दुओं पर सोचने का जोखिम कौन उठाए? यह हमारा राष्ट्रीय और साँस्कृतिक प्रमाद नहीं तो और क्या है कि हममें से प्रायः सभी अपने पूर्वज ऋषियों-मनीषियों द्वारा बतायी गयी पर्वों की प्रेरणाओं को पूरी तरह भुला बैठे हैं। पर्वों में समायी साँस्कृतिक संवेदना हमारी अपनी जड़ता के कुटिल व्यूह में फँसकर मुरझा गयी है। सत्य को जानने, समझने और अपनाने का साहस और संकल्प शायद हम सभी में चुकता जा रहा है।

जबकि विजयादशमी इसी साहस और संकल्प का महापर्व है। जीवन की इन दो महत्त्वपूर्ण शक्तियों को जाग्रत् करने और उन्हें सही दिशा में नियोजित करने की महान् प्रेरणाएँ इसमें समायी हैं। विजयादशमी के साथ जितनी भी पुराण कथाएँ अथवा लोक परम्पराएँ जुड़ी हुई हैं, सबका सार यही है। इस पर्व से जुड़ी हुई सबसे पुरातन कथा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम की है। यह राम कथा महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के साथ विभिन्न पुराणों एवं क्षेत्रीय, प्रान्तीय भाषाओं के विभिन्न महाकाव्यों में अनेकों तरह से कही गयी है। अलग-अलग महाकवियों ने अपने-अपने ढंग से इसके माध्यम से प्रभु श्री राम के विजय संकल्प को शब्दाँकित किया है। कहते हैं कि वह तिथि भी विजयादशमी थी जब लोकनायक श्री राम ने महर्षियों के आश्रम में ‘निसिचर हीन करौं महि’ का वज्र संकल्प लिया था। और इसके कुछ वर्षों बाद घटनाक्रम में आए अनेकों मोड़ों के बाद वह तिथि भी विजयादशमी ही थी, जब समर्थ प्रभु ने अपने संकल्प को सार्थकता देते हुए रावण का वध किया था।

कुछ लोक कथाओं एवं लोक काव्यों में दिए गए विवरण को यदि हम प्रेरणादायी माने तो भगवती महिषमर्दिनी ने इसी पुण्यतिथि को महिषासुर के आसुरी दर्प का दलन किया था। एक अन्य लोक कवि के अनुसार जगदम्बा ने अपनी विभिन्न शक्तियों के साथ शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक शुम्भ-निशुम्भ की आसुरी सेना के साथ युद्ध किया। और अन्त में नवें-दसवें दिन क्रमशः निशुम्भ और शुम्भ का वध करके देवशक्तियों का त्राण किया। विजयादशमी माता आदिशक्ति की उसी विजय गाथा की प्रतीक है, जिन्हें केवल ग्रन्थों की छानबीन एवं ऐतिहासिक आँकड़ों के आँकलन का खेल पसन्द है। उन्हें हो सकता है कि लोक काव्यों के ये प्रसंग इतिहास-सत्य न लगें। पर जिन्हें जीवन के भाव-सत्य से प्यार है, वे इन प्रसंगों से प्रेरणा लेकर अपनी भक्ति एवं शक्ति की अभिवृद्धि की बात जरूर सोचेंगे।

शक्ति के उपासक क्षत्रियों में पुरातन काल में इस पर्व को बड़ी ही धूम-धाम से मनाने का प्रचलन था। देश का मध्ययुगीन इतिहास भी इसके छुट-पुट प्रमाण देता है। महान् प्रतापी राणा प्रताप के साहस, संकल्प, शौर्य, तेज एवं तप के पीछे विजयादशमी के महापर्व की ही प्रेरणाएँ थी। वह घास की रोटी खाकर, राजा होते हुए फकीरों की सी जिन्दगी जीकर अपने अकेले दम पर साम्राज्यवाद की बर्बरता से जीवन पर्यन्त लोहा लेते रहे। वे न कभी डरे, न कभी झुके और न ही कभी अपने संकल्प से डिगे। महावीर शिवाजी के समर्थ सद्गुरु स्वामी रामदास ने भी अपने प्रिय शिष्य को इसी महापर्व से प्रेरित होने का पाठ पढ़ाया था। विजयादशमी को अपराजेय वीर छत्रपति शिवाजी हमेशा ही साहस और संकल्प के महापर्व के रूप में मनाते थे।

धुँधले और धूमिल होते जा रहे इस प्रेरणादायी महापर्व की परम्परा के कुछ संस्मरण महान् क्रान्तिकारी वीर रामप्रसाद बिस्मिल एवं चन्द्रशेखर आजाद से भी जुड़े हैं। ये क्रान्तिवीर इस पर्व को बड़े ही उत्साहपूर्वक मनाया करते थे। चन्द्रशेखर आजाद का इस सम्बन्ध में कहना था, कि हमारे सभी पर्व-त्यौहारों में जितनी ओजस्विता एवं प्रखरता दशहरा में है, उतनी किसी अन्य पर्व में दिखाई नहीं देती। वह कहा करते थे कि यह तो देशभक्त दीवानों का पर्व है। पं. रामप्रसाद बिस्मिल महान् क्रान्तिकारी होने के साथ अच्छे सुकवि भी थे। उन्होंने इस पर्व की प्रेरणा को दर्शाते हुए कुछ काव्य पंक्तियाँ भी लिखी थीं। जो अब काल प्रवाह में लुप्तप्राय है। परन्तु उनके समसामयिक लोगों ने उनके जो संस्मरण लिपिबद्ध किए हैं- उनमें इसके भावों का समावेश है। इसके अनुसार बिस्मिल जी का कहना था कि विजयादशमी साहस और संकल्प का महापर्व है। परन्तु ध्यान रहे साहस का प्रयोग आतंकवादी बर्बरता के प्रति हो, अपनों के प्रति नहीं। इसी तरह संकल्प देश के लिए मर मिटने का होना चाहिए, अहंता के उन्माद के लिए नहीं।

क्रान्तिवीर बिस्मिल की ये बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी की पहले कभी थी। हमारा साहस और संकल्प आज दिशा भटक गए हैं। हम साहसी तो हैं, पर नवनिर्माण के लिए नहीं, बल्कि तोड़-फोड़ के लिए इसी तरह हम अपने संकल्पों की शक्ति निज की अहंता के उन्माद को फैलाने और साम्प्रदायिक दुर्भाव को बढ़ाने में लगाते हैं। देश की समरसता एवं सौहार्द्र में विष घोलने का काम करते हैं। जबकि साहस और संकल्प की ऊर्जा आतंकवादी बर्बरता के गढ़ का विध्वंस करने में नियोजित करना चाहिए। हमारा समर्थ साहस और वज्र संकल्प उन्हें खण्ड-खण्ड करने में अपनी प्रतिबद्धता दिखाए जो देश की अखण्डता को नष्ट करने में तुले हैं।

इस बार की विजयादशमी हम सबके लिए विजय का संकल्प बनकर आयी है। अच्छा हो कि हम सब मिल-जुलकर इसको इसी रूप में मनाए। हममें से हर एक साहस भरा संकल्प ले अपनी निज की और सामूहिक रूप से समाज की दुष्प्रवृत्तियों को मिटाने का, अनीति और कुरीति के विरुद्ध संघर्ष करने का, आतंक और अलगाव के विरुद्ध जूझने का। हमारे इस संकल्प में ही इस महापर्व की सच्ची सार्थकता है। इस साहसी संकल्प के अनुरूप व्रतशील जीवन जीकर ही हम यह प्रमाणित कर सकेंगे कि हम विजयादशमी को महापर्व का स्वरूप प्रदान करने वाले भगवान् श्री राम के सच्चे भक्त हैं। जगन्माता महिषमर्दिनी की सुयोग्य सन्तानें हैं। इस विजय पर्व पर यदि हम दुष्प्रवृत्तियों का रावण जला सके तो ही समझना चाहिए कि हमने सही ढंग से दशहरा मनाया।


जन्म−जन्मांतरों तक पीछा (Kahani)

एक आम का पेड़ था। फलों में से एक बड़ा डरपोक था। जो पकते गए, वे धरती पर कूढ़ते गए। कितनों को ही मालिक ने तोड़ लिया, पर वह एक पत्तों के झुरमुट में छिपा ही बैठा रहा।

उसकी उद्विग्नता और बढ़ी। साथियों के चले जाने का मोह सताने लगा, फिर भी पेड़ से जकड़े रहने का मोह छूटा नहीं। मन का संशय कीड़ा बना और उसने उसे खाकर सुखा डाला और कुरूप कर दिया। आँधी के एक ही झोंके ने उसे सूखे पत्तों के साथ तोड़कर एक खड्डे में फेंक दिया।

यही कृपणता एक दिन पककर जीवन का अंग, प्रारब्ध, संस्कार बन जाती है और जन्म−जन्मांतरों तक पीछा नहीं छोड़ती।


अध्यात्म विद्या के एक महाप्रयोग का यह अवसर गवाएँ नहीं।

शारदीय नवरात्रि गायत्री साधकों के लिए तप का महापर्व है। 7 अक्टूबर 2002 दिन सोमवार से हो रही इसकी शुरुआत में तप हेतु आह्वान है। संकल्पित साधना के लिए पुकार है। अपने गायत्री परिवार के परिजनों को इस महापर्व का महत्त्व सदा से सुविदित रहा है। ऐसे असंख्य लोग अपने देव परिवार में हैं, जिन्होंने वर्षों पहले अपनी किशोरावस्था या युवावस्था में गायत्री महामंत्र की साधना प्रारम्भ की थी। आज उनके बच्चे अथवा बच्चों के बच्चे बड़ी ही श्रद्धापूर्वक नवरात्रि के दिनों में अपने अनुष्ठान को पूरा करते हैं। परिजनों ने परम पूज्य गुरुदेव से पायी गयी इस अमूल्य साधनात्मक धरोहर को अपनी अगली पीढ़ी के सदस्यों को वसीयत और विरासत के रूप में सौंपा है। यही वह तथ्य है, जिसके कारण गायत्री परिवार का विशालकाय संगठन देश और विश्व के अन्य सभी संगठनों व आन्दोलनों से पूरी तरह भिन्न हैं। जहाँ अन्य संगठन अपनी पूँजी के रूप में धन-बल को अपना सब कुछ मानते हैं, वही गायत्री परिवार के लिए उसकी सम्पूर्ण पूँजी तप-बल है।

कभी पुरा-युग में देवों की तपशक्ति के एक-एक अंश के सम्मिलन से महाशक्ति आविर्भूत हुई थी। और उन्होंने महिषासुर के दमन और दलन का कार्य किया था। आज उसी तरह अपने देव परिवार के प्रत्येक सदस्य के तप-अंश के सम्मिलन से आदिमाता गायत्री युगशक्ति के रूप में अवतरित हुई हैं। माता के इस अवतरण का उद्देश्य ‘मनुष्य में देवत्व का उदय एवं धरती में स्वर्ग का अवतरण’ है। यह महत्कार्य साधन-साध्य नहीं, साधना-साध्य है। दैवी गुणों से सम्पन्न असंख्य तपस्वियों के सम्मिलित तप तेज को ही अपना ब्रह्मत्र बनाकर जगन्माता इस कार्य को पूर्ण करेंगी। परिजनों का तप तेज जिस तीव्रता से बढ़ेगा, विश्व-वसुधा में दैवी सम्भावनाएँ उसी तेजी से साकार होंगी। जो परिजन परम पूज्य गुरुदेव के संग-साथ में रहे हैं, जिन्होंने पूज्यवर का सान्निध्य पाया है, उन्हें यह सत्य भली-भाँति अवगत है कि नवरात्रि के दिनों का तप-साधना के लिए विशेष महत्त्व है।

परम पूज्य गुरुदेव अपनी निजी चर्चाओं और कार्यकर्त्ता संगोष्ठियों में यदा-कदा नवरात्रि के दिनों की महत्ता बताते थे। उनका कहना था कि अपनी धुरी में घूमने वाली धरती सूर्य के चारों ओर भी घूमती है। यही स्थिति अन्य ग्रहों की भी है, वे भी सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण करते हैं। अपने-अपने परिक्रमा पथ पर चलते हुए ये सभी ग्रह किसी न किसी तरह से एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। इस प्रभाव में काल-क्रम में अनुसार विविधता रहती है। इसमें शुभ और अशुभ भावों का मिश्रण रहता है। पृथ्वी की सम्पूर्ण प्रकृति भी इन प्रभावों से अप्रभावित नहीं रह पाती। इन अन्तर्ग्रही प्रभावों के कारण अनेकों तरह की शुभ और अशुभ घटनाएँ धरती के दृश्य व अदृश्य वातावरण में घटित होती है। दिव्यद्रष्ट इस सच्चाई को भली प्रकार अनुभव करते हैं।

अविराम गतिशील कालचक्र और अपने परिक्रमा पथ पर गतिशील विभिन्न ग्रहों के संयोग से उत्पन्न होने वाले प्रभावों का प्राचीन ऋषियों ने बड़ा गहन अध्ययन-अनुसंधान किया था। इनके अधिकतम शुभ प्रभावों से मानवीय अन्तर्चेतना को प्रेरित, प्रभावित एवं रूपांतरित करने के लिए वर्ष में चार बार नवरात्रि पर्वों की विधि-व्यवस्था बनायी थी। इनमें से दो नवरात्रि पर्वों से अपने देश के लोग भली प्रकार सुपरिचित हैं, शेष दो से अब प्रायः अपरिचित हो चले हैं। इन चार नवरात्रियों की चर्चा बड़ी ही स्पष्ट रीति से देवी पुराण में की गयी है-

चैत्रेऽश्विने तथाऽऽषाढ़े माघे कार्यों महोत्सवः। नवरात्रे महाराज पूजा कार्या विशेषतः॥ (देवी पुराण 324/21)

यह तथ्य देवी भागवत के माहात्म्य प्रकरण में भी वर्णित है-

आश्विने मधुमासे वा तपोमासे शुचौ यथा। चतुर्षु नवरात्रेषु विशेषफलदायकम्॥ (देवी भागवत, माहात्म्य 1/31)

सार रूप में उपरोक्त शास्त्र वचन चैत्र, आश्विन, अषाढ़ और माघ महीने में नवरात्रि होने की बात प्रमाणित करते हैं।

इन सभी चारों नवरात्रियों में भी शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्त्व है। इन नौ दिनों में पृथ्वी पर जो अंतर्ग्रही प्रभाव पड़ते हैं, साधना की दृष्टि से वे बड़े ही अद्भुत और असाधारण होते हैं। बंगाल के महान् सन्त लोकनाथ ब्रह्मचारी तो इसके बारे में यहाँ तक कहते थे कि वर्ष भर किए जाने वाले गायत्री के चौबीस लक्ष के महापुरश्चरण का सुफल शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में मात्र 24 हजार के लघु अनुष्ठान से ही मिल जाता है। इन विशेष दिनों में किए जाने वाले इस लघु अनुष्ठान से बड़े ही दुष्कर-दुर्योग अनायास ही कट जाते हैं। और अनेकों शुभ-सुफलों की प्राप्ति होती है। यह सच अनेकों साधकों द्वारा बार-बार आजमाया हुआ है। शास्त्रों में भी इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं।

इनमें से कई प्रमाणों से तो यह भी पता चलता है कि शक्तिपूजा वाले इस पुण्य देश भारत में नव वर्ष का प्रारम्भ ही इसी समय होता था। अभी भी विद्वानों का मानना है कि चान्द्र वर्ष का हमारा महारम्भ शक्तिपूजा से ही होता है। उनका यह भी कहना है कि शरत् पूजा भी हमारी महत्त्वपूर्ण शक्तिपूजा ही है। हिमाचल में आज भी आश्विन के आरम्भ में शरद् वन्दना करते हुए लोग रात-रात भर जागते रहते हैं। देवी सप्तशती में इस पूजा का उल्लेख बड़ी स्पष्ट ढंग से मिलता है-

शरत् काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। तस्याँ ममैतन्माहात्मयं पठितव्यं समाहितैः॥ (देवी सप्तशती 12/12)

शास्त्रकार हों या फिर सन्त-साधक सभी एक स्वर से यही बताते हैं कि शारदीय नवरात्रि विशेष ही नहीं अतिविशेष है। इसलिए अपने परिजनों में से किसी को भी इस सुअवसर से किसी भी स्थिति में चूकना नहीं चाहिए। अपनी सारी व्यस्तताओं और विवशताओं को एक किनारे रखकर इन नौ दिनों में बड़ी ही श्रद्धा भावना के साथ गायत्री महामंत्र का 24,000 का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए। विश्वास किया जाता है कि गायत्री अनुष्ठान के सभी विधि-नियमों से अपने परिजन परिचित होंगे। फिर भी यदि किसी को कोई शंका हो तो गायत्री महाविज्ञान के पृष्ठो से आवश्यक निर्देश प्राप्त किए जा सकते हैं। अखण्ड ज्योति के पुराने अंकों में भी इस तरह की नवरात्रि-साधना सम्बन्धी सामग्री प्रकाशित होती रही है, वहाँ से भी यह जानकारी पायी जा सकती है।

इस सम्बन्ध में सामान्य सत्य यही है कि नवरात्रि की पूर्व सन्ध्या पर अनुष्ठान का संकल्प करके 27 माला प्रति दिन जप किया जाना चाहिए। जप के साथ तप के विशेष अनुबन्ध ही सामान्य साधना को अनुष्ठान का स्वरूप प्रदान करते हैं। यह सत्य अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। तप के क्रम में 1. भूमि या तख्त पर शयन, 2.ब्रह्मचर्य पालन, 3. एक समय का आस्वाद भोजन, 4. वाणी पर अनिवार्य नियंत्रण, सम्भव हो सके तो मौन पालन, 5. किसी से भी अपनी सेवा न लेना सामान्य नियम है। इस विधान को कुछ विशेष ऊर्जावान बनाना हो तो गायत्री महाविज्ञान के प्रथम भाग में बताए गए बारह तप प्रयोगों में भी कुछ को अपनाया जा सकता है। शारदीय नवरात्रि में गायत्री अनुष्ठान का पालन अध्यात्म विद्या का महाप्रयोग है। इसकी सुपरिणति एवं सुपरिणाम सुनिश्चित है। अपने जीवन के इस महाअवसर को खोएँ नहीं। आदि शक्ति माता गायत्री की कृपा अवतरण के लिए यही सुपात्रता, सत्पात्रता की कसौटी है।


VigyapanSuchana

शाँतिकुँज की सत्र−व्यवस्था

शांतिकुंज में प्रतिमाह एक से उन्तीस तारीख में युगशिल्पी सत्र चलते हैं। सातों आँदोलनों को गति देने के लिए परिजनों को इसमें भागीदारी करनी चाहिए। इनके अतिरिक्त 2 माह के परिव्राजक प्रशिक्षण सन्न एवं नौ दिवसीय संजीवन साधना सत्र (अनुष्ठान सहित) भी नियमित पूरे वर्ष चलते हैं। ये 9 से 9, 99, से 96, 29 से 29 तारीखों में चलते हैं। पाँच दिवसीय मौन अंतःऊर्जा जागरण सत्र इस माह नवरात्रि (7 से 15 अक्टूबर) की अवधि छोड़कर 16 अक्टूबर से पुनः उसी क्रम से आरंभ हो जाएँगे एवं वसंत पर्व ( 6 फरवरी 2003) का अवकाश छोड़कर 30 मार्च तक चलते रहेंगे। रचनात्मक प्रशिक्षणों को प्रतिमाह दो सत्रों का सिलसिला यथावत चलता रहेगा। इस वर्ष उत्तराँचल राज्य के एन. जी. ओंज का प्रजनन एवं शिशु स्वास्थ्य का विशेष शिविर प्रतिमाह केंद्र में चल रहा है। नेहरू युवा केंद्र एवं विभिन्न अधिकारियों के व्यक्तित्व परिष्कार प्रशिक्षण भी सतत चलते रहेंगे। सभी में पूर्व अनुमति अनिवार्य है।


मुक्तिदायिनी आद्यशक्ति का सत्य मुखरित हुआ

शारदीय नवरात्रि का प्रारम्भ हो चुका था। इसी के साथ समूची प्रकृति ने हल्की गुलाबी ठण्ड की चादर ओढ़ ली थी। शान्तिकुञ्ज में सदा छाए रहने वाले गायत्री महामंत्र के भाव स्पन्दन इन दिनों कुछ ज्यादा ही सघन और तीव्र हो गए थे। देश-विदेश से नवरात्रि साधना करने के लिए यहाँ आए हजारों साधक-साधिकाएँ साधना की भावलीनता में अपने सद्गुरु के प्राणों की छुअन का अहसास कर रहे थे। साधना की इस अनूठी भावभूमि में सद्गुरु कृपा की अनोखी अमृत वृष्टि हो रही थी। समस्त शिष्यों की अन्तर्चेतना का कण-कण इस कृपा-वर्षा से भीग रहा था, रूपांतरित हो रहा था। समवेत प्राणों की पुकार पर महाप्राण के भावघन सघन हो बरस रहे थे।

शिष्यों पर सतत कृपा करने वाले गुरुदेव उस दिन भी अपने कक्ष में धीमे कदमों से टहल रहे थे। बड़ी आत्मलीन भावदशा थी उनकी। पहली नजर में उन्हें देखकर ऐसा लगा जैसे कि उनकी देह तो इस लोक में देखने वालों की आँखों के सामने हैं, किन्तु चेतना कहीं अलौकिक भावलोक में विहार कर रही है। थोड़ी देर में वह प्रकृतिस्थ हुए और उन्होंने इन जाने वाले कार्यकर्त्ताओं को बड़ी ही स्नेहसिक्त दृष्टि से देखा। उनकी उस दृष्टि में गहन रहस्यमयता के साथ प्यार की प्रभा थी। अपने प्यार की अनुभूति देते हुए वह हल्के से मुस्कराए और बोले- आओ लड़को, बैठो। इसी के साथ वह स्वयं भी कक्ष में रखे हुए तख्तनुमा पलंग पर बैठ गए। बैठने के बाद उन्होंने इन लोगों से अपने-अपने लेख पढ़ने के लिए कहा।

यही इन वर्षों में दोपहर को नित्य चलने वाला उपक्रम था। लेखों का लेखन और वाचन तो बस उनके कृपा-वितरण का एक लघु माध्यम भर था, जिसे उन्होंने अपने बच्चों को अनुगृहीत करने के लिए चुना था। परम पूज्य गुरुदेव के पलंग के पास बिछे टाट के दो टुकड़े पर बैठे हुए कार्यकर्त्ता अपने साथ लाए लेख पढ़ने लगे और वह स्वयं लेट गए। लेटे हुए उन्होंने सिराहने रखी तकिए के नीचे दबी हुई रुमाल निकाली। इस रुमाल के ही पास एक चाभी भी रखी थी। जो सम्भवतः पलंग के पास वाली दीवार में बनी हुई अलमारी की थी। पीले रंग के पेण्ट से पुते हुए किवाड़ों वाली इस अलमारी में एक पीतल का बड़ा सा ताला लटक रहा था।

अलमारी में लटका हुआ पीतल का बड़ा सा ताला और परम पूज्य गुरुदेव के सिराहने तकिया के नीचे रखी हुई चाभी, ये दोनों चीजें नियमित रूप से लेख सुनाने आने वाले एक कार्यकर्त्ता के मन में भारी कौतूहल उत्पन्न करती थी। विगत कई महीनों से वह हर बार इसी तरह से इस ताला-चाभी को देख रहा था। सामान्य क्रम में किसी अलमारी में ताले का लगना और सिराहने तकिया के नीचे उसकी चाभी का होना कोई अचरज की बात नहीं है। ताला-चाभी की इस तरह अथवा इससे थोड़ा बदले हुए रूप में उपस्थिति घर-घर मिलती है। इन पंक्तियों के पाठक सोच सकते हैं, इसमें भला आश्चर्य क्या? पर आश्चर्य था और साथ में कौतूहल भी । वह भी इसलिए कि परम वीतराग, तीनों लोकों के समस्त वैभव को तृणवत् समझने वाले महाज्ञानी पूज्य गुरुदेव की त्यागमय प्रकृति के साथ इन चीजों का कुछ मेल नहीं खा रहा था।

यह कार्यकर्त्ता विगत कई महीनों से यह सोच रहा था, कि भला ऐसी कौन सी धरोहर है, जिसे समस्त ऋद्धि-सिद्धियों के अक्षय भण्डार महायोगी परम पूज्य गुरुदेव इतना सम्हाल कर रखते हैं। महीनों सोच विचार की अपनी उधेड़-बुन में वह इस नतीजे पर पहुँचा था कि गुरुदेव जिसे ताले में रखे वह कोई लौकिक धन-सम्पदा जैसी क्षुद्र वस्तु तो हो नहीं सकती। जरूर कोई आश्चर्यजनक अलौकिक वस्तु होगी। पर यह है क्या? बस इसी प्रश्न के बारे में सोच-सोच कर वह अपने मन को हैरान किया था। आज भी जब गुरुदेव ने तकिये के नीचे से रुमाल निकाली तो उसकी नजरें पास रखी चाभी पर अटक गयी। फिर उसने बड़ी ललचाई हुई नजरों से अलमारी पर लगे हुए ताले की ओर देखा। जब उससे रहा नहीं गया, तो उसने मन ही मन गुरुदेव से प्रार्थना भी कर डाली कि- हे प्रभु! कृपा करके मुझे बता दो कि वह कौन सी आध्यात्मिक वस्तु है, जिसे आपने अपनी इस अलमारी में रखा हुआ है।

अन्तर्यामी गुरुदेव ने तुरन्त ही उसके मन की पुकार सुन ली। उन्होंने लेख सुना रहे उसको टोककर कहा- बेटा! तू अपना यह लेख बाद में सुना देना। पहले मेरा एक काम कर दे। गुरुदेव की इस बात पर उसने बड़ी अप्रत्याशित नजरों से उनकी ओर देखा। इतने में उन्होंने अपनी तकिया के नीचे रखी हुई चाभी निकालकर उसे देते हुए कहा- ऐसा कर तू, मेरी इस अलमारी की सफाई कर डाल। उस चाभी को अपने हाथों में थामते हुए वह कार्यकर्त्ता अपने कृपालु सद्गुरु के प्रति कृतज्ञता से भर गया। इसी के साथ गुरुदेव अपने पलंग से उठकर पास रखे हुए सोफे पर जाकर बैठ गए। उनकी आँखों में असीम शिष्य वत्सलता थी। भावोद्रेक से छलकते हुए हृदय से वह कार्यकर्त्ता भी यही सोच रहा था कि परम दयालु गुरुदेव अपने बच्चों के मनों में उपजने वाली छोटी-छोटी इच्छाओं को भी कितनी सहजता से पूरा कर देते हैं।

चाभी हाथ में लेकर उसने ताला खोलकर अलमारी के कपाट खोले। अलमारी के इस तरह खोलने के बाद आश्चर्य और भी सघन हो गया, क्योंकि इसमें कुछ विशेष था ही नहीं। बस कुल जमा दो चीजें थी, इनमें से एक गुलाबी रंग का प्लास्टिक का छोटा सा डब्बा, जो खाली था और दूसरी चीज के रूप में परम वन्दनीया माताजी की फ्रेम की हुई छोटी फोटो थी। ये दोनों ही चीजें उस तीन खाने वाली अलमारी के निचले खाने में थी। बाकी पूरी अलमारी खाली और साफ थी। उसमें साफ करने जैसा कुछ था ही नहीं। फिर भी उसने थोड़ा-बहुत सफाई का नाटक किया। पर उसके मन में आश्चर्य और कौतूहल पहले से भी ज्यादा सघन हो गए। उसे वन्दनीया माताजी की फोटो का रहस्य समझ में नहीं आया।

उसकी इस परेशानी को समझकर गुरुदेव धीरे से बोले- बेटा! तू अपने परेशान मन को और ज्यादा परेशान न करे। माताजी जैसे तुम लोगों की वन्दनीया और पूज्यनीय हैं। ठीक वैसे ही वे मेरे लिए भी पूज्यनीय और वन्दनीय हैं। वे इस जगत् में आश्चर्यों की भी आश्चर्य, रहस्यों की भी रहस्य और आध्यात्मिक शक्तियों को भी शक्ति प्रदान करने वाली महाशक्ति है। उनकी कृपा और करुणा के बिना कुछ नहीं होता। ऊपर से एकदम साधारण नजर आने वाली माताजी के सम्पूर्ण रहस्य को दो ही लोग ठीक तरह से समझते हैं- एक तो स्वयं भगवान्, दूसरा मैं। उन्हें समझना इतना आसान नहीं है। गुरुदेव की ये बातें सुनने वाले को अचरज में डाल रही थी। साथ ही वह अपने प्रभु के वचनों से अनुगृहीत होते हुए सोच रहा था। कि वह कितना सौभाग्यशाली है, जो उसे रोज वन्दनीया माताजी के चरण स्पर्श का सुअवसर बड़ी आसानी से मिल जाता है।

सोचने वाले के सोच-विचार में एक नई कड़ी जोड़ते हुए गुरुदेव बोले- सच तो यह है बेटा! कि मुझे भी उनसे शक्ति मिलती है। पर यह सत्य इतना गहन है कि तुम इसे अभी समझ नहीं सकते। इसके बाद उस कार्यकर्त्ता की ओर देखते हुए वह बोले- बेटा! तू जो मुक्ति! मुक्ति!! की रट लगाए रहता है, तो यह जान ले कि वही मुक्तिदायिनी है। उन्हीं की कृपा से जीव आत्मतत्त्व को जान पाता है, ब्रह्मतत्त्व में विलीन हो पाता है। गुरुदेव की इन बातों को सुनकर सुनने वाले के मन में देवी सप्तशती का यह महामंत्र स्फुरित हो उठा-

सैषा प्रसन्ना वरदा नृणाँ भवति मुक्तये। साविद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥ (देवी सप्तशती-1/57)

‘वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वरदान देती है। वे ही परा विद्या और मोक्ष की हेतु भूता सनातनी देवी हैं।’ अपने प्रभु के श्रीमुख से इस परम रहस्यमय सत्य को सुनकर उस कार्यकर्त्ता को ऐसा लगा जैसे कि आज शारदीय नवरात्रि का परम सुफल मिल गया। इस अनूठी आराध्य कृपा की अनुभूति के साथ वह मातृ स्मरण में विभोर हो गया।


अंकुश लगाना ही ठीक समझा (Kahani)

सरदार वल्लभ भाई पटेल तब नेता नहीं, वकील थे। एक मुकदमे में बहस कर रहे थे। इसी बीच चपरासी ने एक कागज हाथ में थमाया। पढ़कर वे सन्न रह गए, पर दूसरे ही क्षण बहस आरंभ कर दी और कचहरी समाप्त होने तक काम चालू रखा। बहस बंद हुई, तो सरदार की आँखों से आँसू टपक पड़े। अदालत समेत उपस्थित लोगों ने कारण पूछा, तो पता चला कि चपरासी के जो कागज दिया था, उसमें उनकी पत्नी की मृत्यु का समाचार था।

बहस अधूरी छोड़ने से दोनों पक्षों का तथा अदालत का जो समय खराब होता, उसे देखते हुए सरदार ने अपने पर अंकुश लगाना ही ठीक समझा।


मन की वृत्तियों को निर्मल बना लो

अन्तर्यात्रा का विज्ञान विगत कई महीनों से योग साधकों का पथ-प्रदर्शन कर रहा है। इसमें बताए गए तत्त्वों को आत्मसात करके विश्वभर के असंख्य योग साधकों ने अपनी आत्मचेतना की अन्तर्यात्रा प्रारम्भ की है। और वे अनेकों दिव्य अनुभवों से गुजरे हैं। यही कारण है कि यह ‘योगकथा’ साधक समुदाय में ‘साधक-संजीवनी’ के रूप में विख्यात हो चली है। इसकी पिछली कड़ी में सभी योगानुरागियों ने समाधिपाद के चौथे सूत्र पर चिन्तन, मनन, एवं निदिध्यासन किया था। यह जाना था कि साक्षी होने के अलावा अन्य सभी अवस्थाओं में मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य हो जाता है। अब इससे अगले यानि की पाँचवे सूत्र में महर्षि पतंजलि इस तत्त्व को और अधिक सुस्पष्ट करते हैं। इस सूत्र में वह कहते हैं- ‘वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टक्लिष्टः’ (1/5)। यानि मन की वृत्तियाँ पाँच हैं। वे क्लेश का स्रोत भी हो सकती हैं और अक्लेश का भी।

योगसूत्रकार महर्षि का यह सूत्र पहली नजर में एकदम पहेली सा लगता है। एक बार में ठीक-ठीक समझ में नहीं आता कि मन की पाँचों वृत्तियाँ किस तरह और क्यों अपना रूप बदल लेती हैं? कैसे वे क्लेश यानि की दुःख, पीड़ा की जन्मदात्री बन जाती हैं? और कैसे वे हमें अक्लेश अर्थात् गैर दुःख या पीड़ा विहीन अवस्था में ले जाती है। इन सवालों का जवाब पाने के लिए हम सभी को सत्य की गहन अन्वेषण करना पड़ेगा। तत्त्व की गहराई में प्रवेश करना होगा। तब कहीं जाकर बात को समझने की उम्मीद बंधेगी। यहाँ भी ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ’ के साथ ‘गहरे पानी पैठि’ की शर्त जुड़ी हुई है। इस शर्त को पूरा करके ही महर्षि का मन्तव्य जाना जा सकता है।

लेकिन इस गहरे पानी में पैठने की शुरुआत कहीं किनारे से ही करनी होगी। और यह किनारा है शरीर। जिससे हम सब काफी सुपरिचित हैं। यह परिचय इतना प्रगाढ़ हो चला है कि हममें से कइयों ने यह मान लिया है कि वे शरीर से भिन्न और कुछ हैं ही नहीं। इस दृश्यमान शरीर के मुख्य अवयव भी पाँच हैं, जिन्हें पंच कर्मेन्द्रियाँ भी कहते हैं। इस शरीर से ही जुड़ा एक पाँच का समूह और भी है, जिसे पंच ज्ञानेन्द्रियाँ कहा गया है। इन्हीं पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से हमारी अन्तर्चेतना बाह्य जगत् से सम्बन्ध स्थापित करती है। बाह्य जगत् की अनुभूतियों का आस्वादन प्राप्त करती है। बाह्य जगत् एक सा होने पर भी इसकी अनुभूति का रस और आस्वादन का सुख हर एक का अपना निजी होता है। यह निजीपन मन और उसकी वृत्तियों के ऊपर निर्भर है। ये वृत्तियाँ भी कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों की ही भाँति पाँच हैं।

जहाँ तक मन की बात है, तो परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि मन शरीर से बहुत अलग नहीं है। यह शरीर से काफी कुछ जुड़ा और चिपटा है। शरीर से मन का जुड़ाव इस कदर है कि इसे यदि शरीर का सूक्ष्म हिस्सा कहा जाय तो कोई गलत बात न होगी। यही कारण है शरीर के सुखों-दुःखों से यह सामान्य अवस्था में बुरी तरह प्रभावित होता है। यह भी एक तरह से शरीर ही है, परन्तु योग साधना के बिना इसका अलग अस्तित्त्व अनुभव नहीं हो पाता। हालाँकि योग साधना करने वाले इस सच्चाई को बड़ी आसानी से जान लेते हैं। कि दृश्य शरीर यदि स्थूल शरीर है, तो अपनी शक्तियों एवं सम्भावनाओं के साथ मन सूक्ष्म शरीर है। इसका विकास इस तथ्य पर निर्भर करता है कि मन और उसकी वृत्तियों का किस तरह से उपयोग किया गया?

यदि बात दुरुपयोग तक सीमित रही है, मानसिक शक्तियाँ केवल इन्द्रिय भोगों में खपती रही हैं। केवल क्षुद्र स्वार्थ के साधन जुटाए जाते रहे हैं। खोखले अहंकार की प्रतिष्ठ को ही जीवन का सार सर्वस्व समझा गया है। तो फिर मन की पाँचों वृत्तियाँ जीवन में क्लेश का स्रोत साबित होने लगती है। यदि बात इसके उलट है, दिशा मन के सदुपयोग की है मन को योग साधना में लीन किया गया है तो मन की यही पाँचों वृत्तियों अक्लेश का स्रोत सिद्ध होती है। मन की पञ्चवृत्तियाँ जिन्दगी में क्लेश की बाढ़ किस तरह लाती है, इसका अनुभव हममें से प्रायः सभी को है। परन्तु इनका अक्लेश के स्रोत के रूप में सिद्ध होना परम पूज्य गुरुदेव द्वारा बताए गए जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्रों से ही सम्भव है।

गुरुदेव कहा करते थे कि वृत्तियों का खेल समझ में न आये तो सब कुछ किया-धरा बेकार चला जाता है। सारा जोग-जाप व्यर्थ हो जाता है। तपस्या साधना रावण, कुम्भकर्ण, हिरण्यकश्यपु एवं हिरण्याक्ष ने भी कम नहीं की थी। इनकी घोर तपस्या के किस्सों से पुराणों के पन्ने भरे पड़े हैं। पुराण कथाएँ कहती हैं कि इनकी तपस्या से मजबूर होकर स्वयं विधाता इन्हें वरदान देने के लिए विवश हुए। परन्तु वृत्तियों के शोधन के अभाव में समस्त तप की परिणति अन्ततः क्लेश का ही स्रोत साबित हुई। अपनी तमाम उम्र ये वासनाओं की अतृप्ति की आग में जलते-झुलसते रहे। इन्हें जो कुछ भी मिला, इन्होंने जो भी अर्जित किया, उसने इनकी अतृप्ति की पीड़ा को और अधिक चरम तक पहुँचा दिया।

इसके विपरीत उदाहरण भी हैं। सन्त कबीर और महात्मा रैदास के पास साधारण जीवन यापन के साधन भी मुश्किल से थे। बड़ी मुश्किल से इनकी गुजर-बसर चलती थी। इनके जीवन का ज्यादातर भाग कपड़ा बुनने और जूता गाँठने में चला जाता था। इनमें से किसी ने अद्भुत एवं रोमाँचकारी तपस्या भी नहीं की। परन्तु एक काम अपनी हर श्वास के साथ किया। आने-जाने वाली हर श्वास के साथ मन और उसकी वृत्तियों के शोधन में लगे रहे। अपनी प्रगाढ़ भगवद्भक्ति से अपनी प्रत्येक मानसिक वृत्ति को परिष्कृत कर डाला। इसकी परिणति भी इनके जीवन में अति सुखद हुई। सभी पाँचों वृत्तियों इनके जीवन में अक्लेश का, आनन्द का स्रोत बन गयी। वृत्तियों की निर्मलता की इसी अनुभूति को पाकर महात्मा कबीर गा उठे थे- ‘कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर। पाछे-पाछे हरि फिरैं कहत कबीर-कबीर॥’

वृत्तियों की दुर्गन्ध मिटाने वाली, इन्हें शोधित, सुरभित एवं सुगंधित करने वाली बयार विराट् से आती है। यह बयार हमारे अपने जीवन में आए इसके लिए हमें स्वार्थ एवं अहं के दोनों कपाट खोलने पड़ेंगे। आनन्द तो समस्त सृष्टि में, विराट् ब्रह्मांड में सर्वत्र बिखरा पड़ा है। यह उमड़-घुमड़कर हमारे भीतर आने के लिए आतुर है। बस हमीं अपने कपाट बन्द किए बैठे हैं। इस बात को हम कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि सुबह होने पर भी यदि हम अपने कमरे की खिड़कियाँ, दरवाजे न खोलें तो सूर्य की किरणें चाहकर भी हमारे कक्ष में घुस न पाएँगी। जबकि खिड़कियाँ खोलते ही हजारों-हजार किरणें एक साथ आकर कक्ष को उजाले से भर देती हैं। खिड़की खोलने से पहले भी सूर्य यथावत था। यदि वह वहाँ नहीं होता तो भला किरणें कहाँ से आती। बस खिड़कियों के अवरोध के अवरोधक हटते ही अँधेरा उजाले में रूपांतरित हो गया।

कुछ ऐसा ही रूपांतरण वृत्तियों का भी होता है। स्वार्थ और अहं के कपाट खुले, वासना की तृप्ति की जगह भक्ति की अनुरक्ति में लगा कि वृत्तियाँ बदलने लगती हैं। जो पहले कभी केवल दुःखों को, पीड़ा को, सन्ताप को, अतृप्ति को जन्म देती थीं, वही अब आनन्द की, तृप्ति की, सुखों की उफनती बाढ़ की जन्मदात्री बन जाती हैं। ये मानसिक वृत्तियाँ कौन-कौन है? इनमें से किसका किस तरह रूपांतरण होता है, यह अगले सूत्र की विषय वस्तु है। जो इस योगकथा की अगली कड़ी में परिभाषित और प्रकाशित होगी।


यह नहीं देखता (Kahani)

चंद्रमा समुद्र से बोला, सारी नदियों का पानी आप अपने ही पेट में जमा करते हैं। ऐसी तृष्णा भी किस काम की?

समुद्र ने कहा, जिनके पास अनावश्यक पानी है उनसे लेकर बादलों द्वारा सर्वत्र न पहुँचाऊँ, तो सृष्टि का क्रम कैसे चले? यदि सब एकत्र ही करते रहेंगे तो औरों को  कैसे मिलेगा? मैं तो अपना कर्त्तव्य निभाता हूँ। अन्य क्या करते हैं, यह नहीं देखता।


गुरुगाता−3 - सद्गुरु की प्राप्ति ही आत्मसाक्षात्कार

गुरुगीता बोधिवृक्ष है। इसकी छाँव तले होने वाली सद्गुरु कृपा की अनुभूति साधक को सम्यक् सम्बुद्ध बनाती है। इसकी पिछली कड़ी (अगस्त 2002) में गुरुतत्त्व के प्रति जिज्ञासु साधकों ने पढ़ा कि गुरु के अभाव में समस्त शास्त्र एवं सारी विद्याएँ अर्थहीन हो जाती हैं। परमगुरु भगवान् शिव के ये वचन बड़े अनूठे हैं। इनको आत्मसात करने के लिए गहन श्रद्धा एवं प्रखर विवेक की जरूरत है। श्रद्धा एवं विवेक के संयोग से ही यह तत्त्व समझ में आता है कि समस्त शास्त्र सारगर्भित है और सारी विद्याएँ अर्थवान् हैं, पर तभी जब सद्गुरु कृपा करके इनका सम्यक् बोध कराएँ। सद्गुरु के न होने पर शास्त्र केवल वाक्जाल और वितण्डावाद का साधन बनकर रह जाते हैं। इन्हें पढ़ने और रटने वाले अहंकार से छुटकारा पाने की जगह ज्ञानी होने के झूठे अहं के ज्वर से पीड़ित होते रहते हैं। यही स्थिति विद्याओं की है। गुरु सान्निध्य के अभाव में कल्याणकारी विद्याएँ भी अकल्याणकारी बन जाती हैं। यह ऐसा अनुभव सिद्ध सत्य है, जिसे अनेकों बार अनेकों ने अनुभव किया है।

गुरु महिमा की इस कथा को आगे बढ़ाते हुए भगवान् सदाशिव, आदि माता पार्वती से कहते हैं-

यज्ञो व्रतं तपो दानं जपस्तीर्थं तथैव च। गुरुतत्त्वमविज्ञाय मूढ़ास्ते चरते जन॥ 8॥

यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ आदि सारी प्रक्रियाओं को करने वाले लोग भी गुरुतत्त्व के बोध के अभाव में मूढ़ की तरह विचरते रहते हैं।

गुरुओं के भी गुरु परम गुरु भगवान् सदाशिव के इन वचनों का केन्द्रीय तत्त्व यही है कि गुरुतत्त्व की अनुभूति पाए बिना जिन्दगी की मूढ़ता किसी भी दशा में दूर नहीं होती। और मूढ़ता की इस भावदशा में किए गए उच्चकर्म भी अपना सार्थक सत्परिणाम नहीं दे पाते हैं। यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ ये सभी श्रेष्ठ कर्म हैं। परन्तु सद्गुरु के अभाव में इनकी श्रेष्ठता भी क्षुद्रता एवं संकीर्णता का रूप ले लेती है। इन्हें करने वाले इन उच्च कर्मों की श्रेष्ठता को, अपने स्वार्थ, अहंकार एवं मतवाद की संकीर्णता से ढाँप देते हैं। उदाहरण के लिए जो यज्ञकर्म ‘इदं न मम्’ का भाव प्रवर्तक है- वह गुरुज्ञान के अभाव में प्रायः कामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। इसी तरह व्रत के पालन का तात्पर्य व्रतशील जीवन से है। परन्तु साधारणतया लोग विभिन्न व्रतों को अपनी मनोकामनाओं की तृप्ति का साधन बना लेते हैं। ठीक यही स्थिति तप, दान, जप और तीर्थ की है।

इस स्थिति से उबरने का उपाय सुझाते हुए भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं-

गुरुर्बुद्धयात्मनो नान्यत् सत्यं सत्यं न संशयः। तल्लाभार्थं प्रयत्नस्तु कर्तव्यों हि मनीषिभिः॥ 9॥

प्रबुद्ध आत्मा एवं सद्गुरु एक ही है, भिन्न नहीं है। यह सत्य है- सत्य है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इसलिए मननशील मनीषियों को इसकी प्राप्ति हेतु ही सभी श्रेष्ठ कर्तव्य कर्म करना चाहिए।

भगवान् महादेव के इन वचन में ऊपर कहे हुए वचन की पूर्णता है। साधकों के मन में इस मंत्र के पहले वाले मंत्र को पढ़कर यह शंका जन्म ले सकती है कि जब गुरुज्ञान के अभाव में यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ आदि कर्म केवल मूढ़ता के द्योतक बने रहते हैं। तो फिर यदि सद्गुरु का सान्निध्य अभी प्राप्त न हो, तो इन्हें किया जाय अथवा नहीं। साधकों की यह शंका मात्र कोरी शंका नहीं है, परन्तु जिज्ञासु अंतर्मन की जिज्ञासा भी है। महादेव भगवती पार्वती को इस मंत्र में इसी जिज्ञासा का समाधान सुझाते हैं। परम गुरु कहते हैं, हे देवि! जो मननशील मनीषी हैं, वे शीघ्र ही इस गूढ़ रहस्य को समझ जाते हैं कि अपनी जाग्रत् आत्मा ही सद्गुरु है अथवा गुरुदेव भगवान् ही अपनी जाग्रत् आत्मा है। इस कथन में सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला शब्द ‘मनीषी’ है। मनीषी सब नहीं होते। ये बड़े ही विशेष प्रकार के साधना परायण व्यक्ति होते हैं। इनका विश्वास जीवन की याँत्रिक गतिविधियों में फँसकर सब कुछ गवाँ देने में नहीं होता। इनकी अन्तर्चेतना रोजी-रोटी कमाने तक सिमटी नहीं रहती। ये अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों के साथ जीवन के सार तत्त्व के बारे में सतत मनन करते रहते हैं।

ऐसे मननशील मनीषियों को शीघ्र ही इस यथार्थता का अहसास हो जाता है कि सद्गुरु की कृपाशक्ति से ही आत्मचेतना में जागृति आती है। और जब आत्म चेतना जाग्रत् होती है, तो यह सत्य अनुभूति का रूप ले लेता है कि सद्गुरुदेव की कृपाचेतना ही अपनी आत्मचेतना है। इन दोनों में कोई भिन्नता नहीं है। इसलिए गहन अर्थ में सद्गुरु के सत्य स्वरूप का साक्षात्कार ही आत्म साक्षात्कार है। सद्गुरु की प्राप्ति ही आत्मप्राप्ति है। मनुष्य जीवन का केन्द्रीय उद्देश्य एवं आधार भी यही है। इसलिए जो भी कर्तव्य कर्म किए जाएँ वे सभी इसी उद्देश्य एवं अभीप्सा के साथ हो। यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप एवं तीर्थ इन सभी श्रेष्ठ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए। परन्तु इन कर्मों के पवित्र अनुष्ठान के साथ सद्गुरु की प्राप्ति का संकल्प अवश्यमेव जुड़ा हुआ हो। इस संकल्प के जुड़ने मात्र से से ये सभी कर्म श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम होते चले जाएँगे। और इनके अनुष्ठान में तत्पर व्यक्ति की अन्तर्चेतना मूढ़ता से ज्ञानदाता सद्गुरुदेव की ओर यात्रा कर सकेगी।

भगवान् महादेव गुरुगीता के अगले मंत्र में स्पष्ट करते हुए कहते हैं- इस तरह के संकल्प के साथ किए गए पवित्र कर्मों के अनुष्ठान गूढ़ विद्या है।

गूढ़विद्या जगन्माया देहेन्वाज्ञान सम्भवा। उदयः यत्प्रकाशेन गुरुशब्देन कथ्यते॥ 10॥

माया से आवृत्त जगत् और अज्ञान से उत्पन्न शरीर के लिए यह गूढ़विद्या है। जिसके प्रकाशित होने से सत्यज्ञान का उदय होता है। इसी तत्त्व को ‘गुरु’ संज्ञा दी गयी है।

सद्गुरु प्राप्ति की अभीप्सा के संकल्प को भगवान् सदाशिव गूढ़विद्या इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह तत्त्व साधारणतया किसी की समझ में नहीं आता। कामनाओं और वासनाओं के अँधेरे से घिरे लोग ‘गुरु’ शब्द का महत्त्व ही नहीं समझ पाते। ‘गुरु’ में पहला अक्षर ‘गु’ अंधकार का वाचक है। और ‘रु’ प्रकाश का वाचक है। इस तरह गुरु वह तत्त्व है जो अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करके ज्ञानरूपी तेज का प्रकाश करता है। ऐसे सद्गुरु के लिए लगन,उनको पाने के लिए गहरी चाहत, उनके चरणों में अपने सर्वस्व समर्पण के लिए आतुरता में ही इस मनुष्य जीवन की सार्थकता है।

हालाँकि यह कार्य आसान नहीं है। आसान न होने का पहला कारण है कि यह समस्त जगत् अपने वास्तविक रूप में है तो ब्रह्ममय, किन्तु इस पर माया का छद्म आवरण है। इस दुनिया में प्रायः सभी लोग इसी कारण मेरा-तेरा करने में लगे हुए हैं। गुरु प्राप्ति की लगन में अगली बाधा है शरीर। यहाँ शरीर का अर्थ केवल देह मात्र से नहीं है। बल्कि इसके अर्थ में दैहिक कष्ट और दैहिक वासना भी शामिल है। जो मनुष्य की आत्म चेतना को अपने से कसे-जकड़े रहती है। इन बाधाओं और अवरोधों को परे हटाकर जो सद्गुरु की प्राप्ति के लिए संकल्पित होते हैं, वे धन्य हैं, वे कृतार्थ और कृतकृत्य होते हैं, जो सद्गुरु के चरणों में भक्तिपूर्वक अपने को न्यौछावर करने के लिए आगे बढ़ते हैं। क्योंकि गुरुचरणों की महिमा अपार है। इस महिमा की कथा गाथा अगले अंक में प्रकाशित होगी। गुरुचरणों का ध्यान करते हुए गुरुभक्त साधक तब तक इसकी प्रतीक्षा करें।


अधिक श्रेयस्कर लगा (Kahani)

राजा दिलीप उन दिनों गुरु वशिष्ठ के आश्रम में रह रहे थे। उन्हें आश्रम की गौ चराने का काम सौंपा गया। वे उस छोटे काम को भी बड़ा मानते और तत्परतापूर्वक सौंपी जिम्मेदारी निबाहते।

एक दिन एक सिंह ने गुरु की नंदिनी गाय को दबोच लिया। राजा के धनुष−बाण काम नहीं आए। अब क्या किया जाए? गुरु की सौंपी जिम्मेदारी कैसे निभे? दिलीप ने अपने आपको सिंह के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया, ताकि वह गाय को छोड़कर उन्हें खा ले। उठाए उत्तरदायित्वों को न निभाने का कलंक ओढ़ने की अपेक्षा उन्हें अपना शरीर देना अधिक श्रेयस्कर लगा।


अमृतवाणी - नारी अपनी गरिमा को जाने और आगे बढ़े

(परमवंदनीया माता जी का 1984 का एक महत्वपूर्ण उद्बोधन)

गायत्री मंत्र हमारे साथ−साथ−

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

प्रज्ञापुत्रों, बेटियों और प्रज्ञा परिजनों? शिवाजी के पिताजी मुस्लिम शासन के एक वेतनभोगी कर्मचारी थे। यह उनकी माता जीजाबाई के संस्कार ही थे, जिनने शिवाजी को महान बनाया । हमीरदेव के पिता में सभी सामंतवादी कुसंस्कार थे, पर उन्हें ऐतिहासिक व्यक्तित्व मिला, इसमें उनकी माँ की भूमिका प्रमुख थी। जगद्गुरु शंकराचार्य संन्यासी पीछे बने, पहले उनकी मनोभूमि के आध्यात्मीकरण की शिक्षा माता के अंक में ही पूरी हुई थी। विश्व विजेता नेपोलियन के पिता साधारण सिपाही थे। उनके अंतःकरण में अजेय संकल्प शक्ति का बीज उनकी माँ ने आरोपित किया था। यह तो माताओं की बात हुई।

पुरुष के निर्माण में नारी का योगदान सहधर्मिणी−धर्मपत्नी स्वरूप उससे कम गरिमायुक्त नहीं है। एक पुलिस कोतवाल के बिगड़े हुए बेटे मुँशीराम, जिन्हें छोटी उम्र से ही जुआ, शराब आदि दुर्गुण विरासत में मिले थे, किंतु अपने पवित्र साहचर्य से आर्य समाज के मूर्द्धन्य मनीषी के रूप में ढालने वाली उनकी पत्नी ही थी। सरदार चूड़ावत को कौन जानता, यदि उनकी सहधर्मिणी हाडारानी ने राष्ट्र, जाति एवं संस्कृति के लिए मर मिटने का प्राण न फूँ का होता। दुर्गा भाभी की पवित्र प्रेरणाओं ने सरदार भगतसिंह को इतिहासपुरुष बना दिया और वीर बहन उत्तरा ने शंख जैसे कायर भाई को महान योद्धा बनने का पथ प्रशस्त किया । ये उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि पारिवारिक जीवन में पुरुष और नारी दोनों की समानता होते हुए भी मुख्य भूमिका किसकी है? यह तय करना हो तो ध्यान स्त्री पर अपने आप केंद्रित हो जाता है, क्योंकि अंतरंग व्यवस्था से लेकर पारिवारिक जीवन में संवेदना, करुणा और ममता की मूलस्रोत वही है। इन्हीं गुणों के कारण परिवार का प्रत्येक सदस्य उसके निकट का हो जाता है और प्रभावित होता है।

नारी का स्थान गरिमापूर्ण

इससे स्पष्ट है कि यदि किसी परिवार की सुख−शाँति और समुन्नति का अनुमान लगाना हो तो सर्वप्रथम उस परिवार में स्त्रियों की स्थिति का मूल्याँकन करना अनिवार्य हो जाएगा। स्त्रियाँ अगर अनपढ़, अनगढ़ और असभ्य हों तो उनके बालकों से कोई भी शिष्ट−सुसंस्कृत व्यवहार करने की आशा नहीं कर सकता। इसीलिए प्राचीनकाल से ही हमारे देश में नारी को सद्गृहिणी के रूप में प्रतिष्ठा मिल सकी थी और उसके स्वरूप को स्थिर बनाए रखने के लिए शिक्षा, सुसंस्कारिता और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वरिष्ठता प्रदान की गई थी। सीताराम, गौरीशंकर, लक्ष्मीनारायण, राधेश्याम आदि शब्द नारी जाति की सजीव गरिमा का ही उद्घोष करते हैं। प्रत्येक नाम से पहले देवियों का नाम जोड़कर ही देवता का नाम स्मरण किया जाता है। माता, पुत्री, बहन, भाभी, चाची, दादी आदि रिश्ते नारी की गरिमा का ही अर्थबोध कराते हैं। ये अपने−अपने स्तर से प्रभावित करते हैं। इसलिए एक का भी कुसंस्कारी, अशिक्षित−अनपढ़ और विग्रहप्रिय होना सारे कुटुँब की शाँति व्यवस्था को डुबो देता है।

परिवार संस्था को सर्वजनीन सुख−शाँति के शाश्वत आधार के रूप में खड़ा करना है, तो उसके प्रमुख घटक नारी को सभ्य, सुशिक्षित और सुसंस्कारवान बनाने की प्रक्रिया का शुभारंभ करना सर्वोत्तम उपाय सूझ पड़ता है। इस प्रमुख तथ्य को हमारे ऋषि−मनीषियों ने सभ्यता के आरंभिक दिनों में जान लिया था। एक समय था जब नारी जाति की विशेषता को पूरी तरह समझा गया था। जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं, इस एक वाक्य से भारत के अतीत की झलक मिल जाती है। हमारे देश के तैंतीस कोटि नागरिकों को यदि देवता के सम्मानास्पद विशेषण से संबोधित किया गया, तो स्पष्ट है कि यहाँ नारी समाज को बहुत सम्मान मिला होगा। कौशल्या, सुमित्रा, सुनीति और सीता जैसी सुगृहिणियों, गार्गी मैत्रेयी, घोषा, इला, विश्ववारा, अपाला, अरुंधती जैसी ब्रह्मवादिनी ऋषिकाएँ और समराँगण में बैरियों के दाँत खट्टे करने वाली कैकेयी, सुभद्रा जैसी वीराँगनाएँ इन्हीं देवियों की देन हैं।

प्रगतिशील चिंतन वाली भारतीय नारी

बेटे, रूढ़िवादी एवं अंधविश्वासी हेय चिंतन प्राचीन भारत में कभी स्थान नहीं पर सका था। पारिवारिक उत्तरदायित्व से लेकर शिक्षा, संस्कृति, समाज तथा शासन कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं रहा जिसमें भारतीय नारी का योगदान पुरुषों से कम रहा हो। वाचस्पति ने व्याकरण शास्त्र लिखा। उसकी प्रमुख श्रेयाधिकारी उनकी पत्नी भामती थी। याज्ञवल्क्य जैसे प्रकाँड पंडित को विदुषी गार्गी के पाँडित्य का लोहा मानना पड़ा था। ब्रह्माजी ने एक बार बड़ा यज्ञ आयोजित किया था। उसके आचार्य का पद मनु महाराज को सँभालना था। मनु अस्वस्थ हो गए। प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि इस यज्ञ का संचालन कौन करें? उस समय सारे विद्वानों ने एक स्वर से मनु की पुत्री इला को प्रमुख आचार्य घोषित किया। उन्हीं ने इतना बड़ा यज्ञ संपन्न कराया।

ऋषि कण्व के आश्रम में पली और पढ़ी शकुंतला ने न केवल भरत जैसे प्रतापी बालक को जन्म दिया, अपितु कठिन समय में भी परावलंबन स्वीकार नहीं किया। जंगल में रही तब भी अपनी आजीविका और बालक भरत की शिक्षा−दीक्षा का भार स्वयं उठाया और वापस लौटी तो राजा दुष्यंत का सारा राजकाज वहीं सँभालती रही। एक ओर नारी यह वर्चस्य प्रधान जीवन तो दूसरी ओर आज की धार्मिक प्रतिगामिता, जिसने नारी जीवन को अछूत की श्रेणी में ला पटका। उसके आत्मविकास के सारे अधिकार छीन लिए। इस स्थिति से नारी को उबारे बिना अब भावी पीढ़ी का निर्माण संभव नहीं हैं

मध्य युग : कलंक और पतन का युग

मध्य युग भारतीय नारी के अपमान और पतन का इतिहास है। अशिक्षा, बाल−विवाह, पर्दाप्रथा, दहेज आदि जैसे अंधविश्वासजनित बंधनों ने उसे इस तरह जकड़ा है कि इन दिनों उसकी स्थिति अर्द्धमूर्च्छित और मृतक जैसी हो रही है। स्वतंत्रता के सैंतीस वर्ष बाद भी नारी के स्तर में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया। शिक्षा के क्षेत्र में थोड़ी प्रगति देखने को मिली तो अवश्य, पर उसी अनुपात से दहेज की माँग बढ़ जाने की समस्या ने उनके भविष्य पर जबरदस्त प्रश्नचिह्न लगा दिया कि बच्चियों को ऊँची शिक्षा दिलाई जाए अथवा नहीं? भारतीय समाज की प्रगति में यह प्रश्न अहं महत्व रखता है। उसे सुलझाया न गया तो परिवार नारकीय यंत्रणाओं के दिन गुजारते रहेंगे। विग्रह, कुसंस्कारिता, पराभव का अभिशाप आगे आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। चिंतन और चरित्र की उत्कृष्ट धरोहरों से विमुख उद्दंड, आवारा और सब तरह से हेय कर्मों में लिप्त संतानें यहाँ के समुदाय में जन्में−पनपें, तो कोई आश्चर्य नहीं समझा जाना चाहिए।

भावनाओं की दृष्टि से भारतीय नारी का स्थान आज भी सारे संसार से ऊँचा है। इस संदर्भ में लाला लाजपत राय की आत्मकथा का वह अंश याद आ जाता है। घर की महिलाएँ मंगल करवाचौथ का व्रत कर रही थीं। उनके नन्हें नाती ने प्रश्न किया, बाबा आज दादी−मम्मी ने भोजन क्यों नहीं किया? लालाजी ने बताया कि वे व्रत कर रही हैं। बच्चे के मुँह से फिर आपने और पापा जी ने ऐसा क्यों नहीं किया? उत्तर में लालाजी ने सुदूर अतीत का स्मरण कराते हुए कहा, बेटा, भारतीय नारी में श्रेष्ठता के संस्कार जन्मजात होते हैं, इसलिए पुरुषों को आशंका नहीं रहती कि उन्हें खराब पत्नी मिलेगी। हर पुरुष चरित्रनिष्ठ और सदाचारी होगा, इसमें संदेह है। महिलाएँ इसीलिए व्रत−उपवास करती हैं, ताकि अच्छा ही घर मिले।

आज परिवार−निर्माण के महान उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए नारी की योग्यता, शारीरिक और मानसिक क्षमता विकसित करने की आवश्यकता है। परदे में रहने, चक्की−चूल्हे और बच्चे पैदा करने के अत्यधिक दबाव में रहने से महिलाओं का शारीरिक स्वास्थ्य तो चौपट हुआ ही है, साथ ही कुंठाग्रस्त मस्तिष्क भी किसी काम का नहीं रह गया।

फिर श्रेष्ठ संतति की आशा कैसे की जा सकती है? ऐसी स्थिति में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, सुसंस्कारिता के प्रबल समर्थन द्वारा ही अपंगता के इस कलंक को छुड़ाया जा सकता है। हमारी प्रत्येक भावनाशील बेटी जीवन की इन अभिन्न चार आवश्यकताओं की पूर्ति में जुट पड़े तो देखते−ही−देखते परिवार का एक अच्छा स्वरूप उभरकर सामने आएगा, फिर उससे समृद्धि भी सच्चे अर्थों में प्राप्त हो सकेगी।

परंपराएँ बदलें, कुरीतियाँ मिटें

अब छोटी अल्पवयस्क बच्चियों के शादी−विवाह का समाज में औचित्य नहीं रहा। विदेशी आक्राँताओं से शील−धर्म की रक्षा हेतु कभी मध्यकाल में वह परंपरा पनपी थी। तब ग्यारह वर्ष की कन्याओं के विवाह को तत्कालीन धर्माचार्यों ने भी मान्यता प्रदान की थी। संकट की घड़ी में लिया गया निर्णय हमेशा के लिए पत्थर की लीक बन जाए, यह शोभनीय नहीं है और ने ऐसी अनुमति शास्त्र देते हैं बाल−विवाहों के दुष्परिणाम कितने घातक निकलते हैं, इसका खुला दस्तावेज मद्रास की लेडी डॉक्टर मिस मेयो की पुस्तक नरभक्षी बकासुर है। इसे पढ़ लेने से बात पूरी तरह से समझ में आ जाती है। भले ही यह परंपरा कभी श्रेष्ठ ठहराई गई हो , पर आज उसे त्याग देना ही धर्म के सर्वथा अनुकूल बात होगी। नारी जीवन की यह करुणाजनक स्थिति अपने ऋषि वंशजों से पूछती है कि क्या सचमुच हमारे पितामह इतने निर्भय रहे होंगे?

कन्या को करुणा और वात्सल्य की स्नेहमूर्ति समझने वाले भारतीय समाज ने समय−समय पर इन घातक कुप्रथाओं का स्वयं परिशोधन किया है। ऋषि दयानंद जैसे विचारकों ने बार−बार इस ओर ध्यान आकृष्ट किया, किंतु पोंगापंथी अंध श्रद्धालु, समाज को विवेकशीलता की देहरी तक पहुँचने दें, तब तो कुछ बात बने। इसका स्पष्ट निर्देश स्मृति में मनु महाराज ने किया था। हमें खेद है कि उसी बुद्धिजीवी मनीषी परंपरा के धर्माचार्य मध्ययुग की अंधचलन की ही लकीर पीट रहे हैं। इससे न देश का भला होगा, न राष्ट्र का, न जाति का और संस्कृति का। आज देश स्वाधीन है। जनसंख्या का अत्याधिक दबाव भी है, अतएव अल्पवयस्क बालकों के विवाह का कोई औचित्य नहीं बैठता।

एक बार दमयंती अकेली जंगल में भटक गई तब एक बहेलिये से आत्मरक्षा के लिए उन्हें शरीर बल का ही सहारा लेना पड़ा था। हमीर देव की माता तब अविवाहित थीं। एक राजकुमार उन्हें रस्सी फेंककर पटकना चाह रहा था। तब उनने रस्सी जोर से खींची तो राजकुमार धरती पर आ पड़ा और उसने अपनी हार मान ली और हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करने लगा। हमारी बच्चियों का स्वस्थ, सुशिक्षित होना इस दृष्टि से आवश्यक है और स्वस्थ संतति की दृष्टि से भी। लड़कियों को सबल और समर्थ बनाने की दृष्टि से खेलकूद, व्यायाम आदि पर भी उतना ही महत्व दिया जाए जितना कि लड़कों पर। एक की भी उपेक्षा समूचे समाज की दुर्गति का कारण बनेगी।

वास्तविक सौंदर्य कौन−सा

सफाई भी स्वास्थ्य का ही अंग है। इस बात को तो हमारी बेटियाँ भी समझें। बनावटी फैशन−परस्ती, जेवरों और शृंगार प्रसाधनों में सिवाय बर्बादी की और कुछ भी नहीं। इन सबसे स्वास्थ्य तो चौपट होता ही है, घर की अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सौंदर्य के लिए स्वास्थ्य और स्वच्छता ये दो उपादान पर्याप्त हैं। वेषभूषा साधारण हो, पर स्वच्छ हो तो वह बनावटी शृंगार की अपेक्षा अधिक उत्तम होगी। इससे अनेक दुर्घटनाओं से बचाव का लाभ हो अनायास ही मिल जाता है, साथ ही गृहस्थ जीवन की गाड़ी सुभीते से आगे बढ़ती है। अश्लील आचरण की रोकथाम पुरुष करे अथवा न करे, पर इससे उत्पीड़ित नारी को अब विलंब नहीं करना चाहिए। वह स्वयं आगे बढ़ेगी, तो पुरुष भी प्रेरणा पाएँगे। सभ्यता एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ेगी।

शिक्षा नारी जीवन के उत्कर्ष की दूसरी बड़ी आवश्यकता है। जरूरी नहीं कि वह स्कूली और आधुनिक ही हो। विचारशील होने के लिए जिस शिक्षा की आवश्यकता होती है, वह स्कूल की पुस्तकों से पूरी हो भी नहीं पाएगी। आजकल तो उसमें भ्रमित करने वाले अंश अधिक है। शिक्षा का अर्थ है−मानवीय गरिमा का बोध। प्रारंभिक ज्ञान तो विद्यालय में कराया जा सकता है, पर उच्चशिक्षा के लिए विद्यालय आवश्यक नहीं। उसके लिए जीवन को ऊँचा उठाने वाले साहित्य की नारियों को भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी किसी पुरुष को । इसके लिए उपयुक्त व्यवस्था अभिभावकों को करनी चाहिए। इसको पूरा करने के लिए सत्साहित्य की रचना की और प्रसार की ओर हमारा ध्यान हमेशा बना रहा है। अनपढ़ और प्रौढ़ महिलाओं की शिक्षा की देखभाल करना प्रत्येक गृहस्थ का आवश्यक कर्तव्य है। अपने साथी और सहयोगियों का बौद्धिक स्तर बढ़ाने में रुचि लेना नारी जीवन और समाज की बहुत बड़ी सेवा है। परिवार को ऊँचा उठाने, बालकों की अधिक अच्छी देखभाल−ये दो लाभ इस सेवा−साधना से हाथोंहाथ प्राप्त हो सकते हैं। इसमें महिलाएँ भी पीछे न रहें। शिक्षित महिलाएँ तो अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं। कमला हास्पेट, शिवदेवी शास्त्री जैसी समाजसेवी देवियाँ अपने प्रज्ञा परिवार के बीच से निकलें और अनपढ़ महिलाओं को साक्षर बनाने के लिए थोड़ा−सा समय निकालें, तो यह अपने तरीके की एक महान सेवा होगी। जन समर्थन जन सहयोगी की कमी उन्हें नहीं पड़ेगी

संस्कार सर्वोपरि

सुसंस्कारिता का महत्व शिक्षा से भी बढ़ा−चढ़ा है। माँ के संस्कार अच्छे हों और शैक्षणिक योग्यता कम भी हो तो काम आसानी से चल सकता है। प्राचीनकाल में भारतीय परिवारों में षोडश संस्कारों की, बलिवैश्व की तथा कथा−कहानियों की परंपरा पूरे उभार पर थी। पहली रोटी गो−ग्रास की बच्चों में परमार्थ भावना का बीजारोपण करती है। बलिवैश्व से देवत्व के प्रति समर्पण का पाठ पढ़ाया जाता है। षोडश संस्कार बाल मनोविज्ञान का अति उच्चस्तरीय निर्धारण कहा जा सकता है। सड़क के हर मोड़ पर, चौराहे पर दिशा−निर्देश के बोर्ड लगे होते हैं, ताकि यात्रियों और वाहनों को निर्धारित दिशा की राह पकड़ने में सुविधा हो। संस्कारों को भी इसी तरह का उच्चकोटि का मार्गदर्शक समझना चाहिए, बल्कि इससे अनेक गुना श्रेष्ठ।

मनुष्य जीवन के प्रत्येक नाजुक मोड़ पर विद्या का प्रकाश मिलता है। बालक का ध्यान विचारों की ओर मोड़ने के लिए चूड़ाकर्म, शिक्षा के महत्व को बतलाने के लिए समझ विकसित होते ही विद्यारंभ, किशोरावस्था के भटकावों से बचाने के लिए व्रतबंधन अर्थात् यज्ञोपवीत संस्कार, पारिवारिक वातावरण में कितने उपयोगी थे, इसे आज भी स्पष्ट देखा जा सकता है। यह कार्य घर की महिलाओं के जिम्मे ही रहे हैं। जीवन के मूल उद्देश्य की ओर सतत जागरुक रखने वाली इन श्रद्धासिक्त परंपराओं को पोषण देना ही चाहिए। परिवार का हर घटक चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, थोड़ी−सी भी सावधानी बरते तो आशा की किरणों को झलकते देर नहीं लगेगी।

नारी जीवन का पतन यथार्थ में परावलंबन से हुआ। पुरुष कमाई करता है, इसलिए वह वरिष्ठ है और स्त्री उसकी आश्रिता। इस मान्यता ने नारी जाति का बहुत अहित किया है। स्त्री की भावनामूलक बनावट और कोमल काया के कारण किसी समय उपार्जन जैसा कठोर कार्य पुरुषों ने अपने कंधों पर उठाया था और गृह व्यवस्था नारी को सौंपी थी। पीछे मूल आदर्श तो तिरोहित हो गया और परंपरा ने नारी जीवन को लूला−लँगड़ा कर दिया। नारी को दासी मानने, उसे प्रताड़ित करने और दहेज जैसी विकृतियों की जड़ भी यहीं से फैली। पहले तो विधवा हो जाने या पति द्वारा परित्यक्त कर देने के बाद भी पिता−भाई अथवा परिवार का कोई समझदार व्यक्ति उन्हें पूरे सम्मान के साथ अपने साथ रखकर जीवन निर्वाह को कठिन होने से बचा लेता था, पर आज जब पारिवारिक परिवेश में स्वार्थपरायणता−संकीर्णता ने अड्डा जमा लिया है, तब स्त्रियों का स्वावलंबन की ओर झुकना बहुत आवश्यक हो गया है। जहाँ इससे नारी जीवन से आत्महीनता की ग्रंथियां टूटेंगी वहीं के संकट के समय अपनी गृहस्थी का बोझ सँभालने के लिए परमुखापेक्षी नहीं बनेंगी।

नारीशक्ति का चतुर्मुखी विकास हो

श्रेष्ठ स्वाभिमानी संतति और सुखी परिवार के लिए नारी जीवन का यह चतुर्मुखी विकास आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। इसे प्रत्येक प्रज्ञा परिजन, प्रत्येक भारतीय को गंभीरतापूर्वक अनुभव करना चाहिए। इसके लिए आवश्यक कदम उठाने से किसी को भी हिचकिचाना नहीं चाहिए। इसमें किसी प्रकार की कोई भी धार्मिक मान्यता आड़े नहीं आएगी। जो लोग नारी को लाँछित करते हैं, उन्हें धार्मिक अधिकारों से प्रतिबंधित ठहराते हैं, उन्हें सर्वप्रथम अपने प्राचीनकाल के ग्रंथों को जलाना होगा, ताकि उनके इस अधिकार का समर्थन करने वाले साक्ष्य शेष न रहें। पति की उदासीनता सहन न करने पर अपाला ने उच्चस्तरीय साधनाएँ संपन्न की। तभी वे मंत्रद्रष्टा ऋषि हो पाई। रामवंश के यथार्थ इतिहास को बाल्मीकि ने अपनी रामायण में लिखा है। जब सीताजी का अपहरण हो गया, और भगवान राम उन्हें खोजने चले तो उन्होंने लक्ष्मण से कहा, सायंकाल हो रहा है। सीताजी को जलाशय के किनारे संध्यावंदन बहुत प्रिया है। चलो उन्हें नदी किनारे ढूंढ़ें। ये उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि नारी का आत्मिक स्तर पुरुष से कतई कम नहीं।

इस तथ्य की खोज हिंदू धर्म के प्राण महामना मदन मोहन मालवीय ने स्वयं कराई थी। उन्होंने विद्वानों की एक मोटी नियुक्त की थी। जिसने यह निष्कर्ष दिया था कि स्त्रियों को धार्मिक अधिकार पुरुषों से कम नहीं। तभी से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में कन्याओं को वेद पढ़ाए जाने लगे। इतना होने पर भी यदि नारी जीवन के अपावन, आश्रित होने की मान्यता पनपती रही, तो इस देश की महानता को फिर से विकसित कर सकना कभी भी संभव न होगा। जो हमें प्राचीनकाल से प्राप्त हुई थी । ॐ शाँति


स्वावलंबन की महत्ता (Kahani)

इंग्लैंड गए एक भारतीय के पास बिस्तर असवाब ज्यादा था। वह कुली को आवाज लगा रहे थे।

एक सज्जन ने उनकी कठिनाई को समझा और असवाब बग्घी पर लदवा दिया। उन सज्जन ने कुली की मजूरी पूछी, तो उनने अपना परिचय देते हुए कहा, वे वहाँ की बैंक के मैनेजर हैं। आपकी कठिनाई देखकर अपनी गाड़ी एक ओर खड़ी करके सहायता के लिए आए हैं। मजूरी आप से क्या वसूल की जा सकती है? इतना कहकर वे अपने काम पर चल दिए। भारतीय सज्जन ने ब्रिटिश समाज में दृढ़ता से जमे बैठे सुसंस्कारों की झलक एवं स्वावलंबन की महत्ता को उस दिन सही अर्थों में समझा।


युगगीता−36 - साँख्या (संन्यास) और कर्मयोग दोनों एक ही हैं, अलग−अलग नहीं

(कर्म−संन्यासयोग नामक गीता के पाँचवें अध्याय की द्वितीय किश्त)

विगत अगस्त अंक में पाँचवें अध्याय की भूमिका में प्रवेश के साथ−साथ अर्जुन की जिज्ञासा से शुभारंभ किया गया था, जिसमें वह पूछता है−कर्मों का त्याग यानि संन्यास एवं कर्मयोग दोनों की ही योगेश्वर प्रशंसा कर रहे हैं, परंतु भ्रमित अर्जुन नहीं समझ पा रहा कि कौन−सा मार्ग श्रेष्ठ है। वह दोनों को परस्पर विरोधी मान रहा है। भगवान का आशय है, कर्मों में अहंकार का त्याग, कर्मफल के उपभोग के प्रति चाह का त्याग, कर्त्ता के भाव का त्याग। यह मार्मिक तत्वदर्शन अर्जुन की समझ के बाहर का है, किंतु भगवान उसे अपने उत्तर से दुविधा से बाहर निकालते हैं। वे अपने उत्तर में कहते हैं कि कर्मों का त्याग (कर्मसंन्यास) और कर्मयोग (कर्मों का संपादन) दोनों ही मोक्ष की ओर ले जाते हैं, किंतु फिर भी सुगमता की दृष्टि से कर्मयोग अधिक व्यावहारिक है एवं सब इसे कर सकते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में परमपूज्य गुरुदेव के अखण्ड−ज्योति के अप्रैल 1983 के अंक का हवाला देकर पाठकों को आज के दूषित कर्मों से भरे युग में देवमानवों को−प्रज्ञा परिजनों के लिए करने योग्य कर्मों की चर्चा भी की गई थी। योगेश्वर की वाणी एवं गुरुसत्ता की लेखनी दोनों में एकरूपता दिखाई देती है। तमस से ऊपर उठकर आज की परिस्थितियों के अनुरूप कर्मयोग कैसे जीवन में उतरे, वैराग्य−संन्यास के नाम पर छाई विडंबना कैसे मिटे, इसी प्रसंग पर समापन कर दिया गया था। अब द्वितीय श्लोक की व्याख्या और विस्तार से व आगे का प्रसंग इस अंक में पढ़ें।

स्वं−स्वं आचरेण शिक्षरेण

दूसरे श्लोक का सार यह है कि कर्मयोग एवं कर्मसंन्यास, यद्यपि ये दोनों ही मोक्ष की ओर ही ले जाते हैं एवं दोनों ही श्रेष्ठ हैं, फिर भी इन दोनों में कर्मों का संपादन (कर्मयोग) अधिक महत्व वाला, व्यावहारिक एवं हम सबके लिए करने योग्य है। जब भी संन्यास की बात की जाती है, तो कर्मभाव से अर्थात् हमारे भीतर जड़ जमाकर बैठे अहंभाव के त्याग की अपेक्षा हमसे की जाती है। व्यावहारिक धरातल पर शिक्षण दे रहे योगेश्वर श्रीकृष्ण एक आदमी के लिए भी एवं विशिष्टता की पराकाष्ठा पर चलने वालों के लिए भी यही सूत्र देते हैं कि कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्मों का संपादन श्रेष्ठ है तयोस्तु कर्मन्नया−सात्कर्मयोगो विशिष्यते। हम ऐसे दिव्यकर्मी बने कि हमारे कर्म ही औरों के लिए शिक्षण बन सकें। स्वामी तुरीयानंदजी (रामकृष्ण मिशन) कहा करते थे, लिव एन एक्जेम्पलरी लाइफ अपना जीवन उदाहरण की तरह जियो। अपने कर्मों से, आचरण से औरों को शिक्षण दे सको जो कि हमारी संस्कृति का आदि सत्य है, स्वं−स्वं चरित्रं शिक्षंते (स्वं−स्वं आचरेण शिक्षरेण) पृथिव्याँ सर्वमानवाः कुछ ऐसी बात इस श्लोक से हमें ज्ञात होती है। जो भगवा को पसंद हो वही हमें भी पसंद होना चाहिए। यदि भगवान कर्मयोगी बनाना चाहते हैं मानव मात्र को, तो वही हम सबकी नियति होनी चाहिए। आज का कर्मयोग युगधर्म है−मानव मात्र में छाए आस्था−संकट का निवारण, इसके लिए छाई दुर्मति को मिटाने के लिए एक विराट स्तर पर ज्ञानयज्ञ−विद्याविस्तार। हर व्यक्ति का चिंतन, सोचने का तरीका सही हो, अहर्निश यही हमारा पुरुषार्थ चले, चिंतन चले एवं कर्म भी उसी दिशा में नियोजित हों। युगधर्म की बात आती है, तो गोरखनाथ जी का एक दृष्टाँत बताने का मन करता है।

समूह मन का जागरण

गुरु गोरखनाथ का जब उदय हुआ तो उनका नाम था अघोरवज्र। अघोर से गोरखनाथ पैदा हुए एवं चूँकि वे वज्रयानी संप्रदाय के थे, वे अघोरवज्र भी कहलाते थे। उनके एक साथी थे फेरुकवज्र। मुहम्मद गौरी की सेना ने आक्रमण किया एवं वह स्तर से दक्षिण तक सब कुछ तहस−नहस करती हुई, देवालयों को तोड़ती हुई सोमनाथ व उड़ीसा के कोणार्क मंदिर तक पहुँच गई । आक्रमण इस स्तर पर प्रचंड था एवं हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा पिछड़े वर्ग की उपेक्षा इतनी अधिक थी कि उसके विधर्मीकरण आँदोलन में कई व्यक्ति धर्म बदलकर मुस्लिम बनते चले गए। इसमें एक काला पहाड़ की कहानी सभी जानते हैं, जो कि घृणा से जन्मा था एवं जिसने हजारों हिंदुओं को मुस्लिम बनाकर बर्बरता से मारा। उस समय जब योग और तंत्र की शक्ति में महारत रखने वाले ढेरों वज्रयानी गोरक्षनाथ, फेरुकव्रज मौजूद थे, ये घटनाएँ घटीं। तत्कालीन राजा तंत्र के टोटकों से प्रभावित हो यही समझे बैठे थे कि यही लोग मोरचा ले लेंगे, हमें लड़ने की जरूरत भी नहीं होगी। सेनाओं की छुट्टी कर दी गई थी। यही मान लिया गया कि ताँत्रिकों के, योगियों के बल पर ही यवन−शक−हूणों से जूझ लिया जाएगा। जब गजनवी आकर रौंद कर चला गया, तो गोरखनाथ ने अपने से आयु व अनुभव में बड़े फेरुकवज्र से पूछा, आपका तप कहाँ चला गया? ज्ञान का क्या हुआ? क्यों नहीं जूझ पाए आप? तब फेरुकवज्र बोले, योग और तंत्र की अपनी सीमा है। ऐसे विपत्ति के समय में आवश्यकता आत्मबलसंपन्न व्यक्तियों की, विजय की कामना रखने वालों की एवं कर्मयोगियों की होती है। गजनी के सैनिकों में गजब का आत्म−विश्वास था, विजय की कामना थी। जब कर्मयोगी जिजीविषा संपन्न व्यक्ति एक साथ होते हैं, तो समूह मन का निर्माण करते हैं। इस समूह मन के सामने तंत्र और योग एक तरफ रखा रह गया और उनकी दुर्दांत इच्छाशक्ति काम करती चली गई। आगे जब भी जमाना बदलेगा, तो वह समूह मन के जागरण से ही बदलेगा॥

कर्मयोग ही आज का युगधर्म

समूह मन का जागरण ही है, आज का युगधर्म। परमपूज्य गुरुदेव ने इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य का न केवल नारा दिया उसके लिए सुनियोजित कार्यक्रम भी दिया । उसके लिए सभी गायत्री परिजनों को कर्मयोगी भी बना दिया। कहा−परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ है। इस समय का युगधर्म विचारक्राँति, समाज−सेवा है। इसके साथ−साथ उनने सामूहिक साधना द्वारा समूह मन के जागरण की प्रक्रिया को जीवनभर गति दी। उनने कहा कि जो इसमें जुटेगा, वह भारत को महानायक होते देखेगा। गोरखनाथ से भी फेरुकवज्र ने यह बात इसी तरह कही, भारतवर्ष का उद्धार तंत्र साधना या संन्यास से नहीं, गुफा में बैठकर नहीं, समवेत मनों की शक्ति के जागरण से ही हो पाएगा। ऐसा समय निश्चित ही आएगा, तत्पश्चात् गोरक्षनाथ ने नाथ योगियों की एक सेना खड़ी की एवं उन्हें एक विशिष्ट कार्य सौंपा। जहाँ भी भवनों का आक्रमण होने की संभावना रहती थी, वहाँ यह सेना पहले से ही पहुँच जाती थी एवं बाकायदा मोर्चा लेती थी। वे जाकर सभी को एकत्र करते एवं बताते थे कि युगधर्म क्या है? इस समय तलवार हाथ में लेकर लड़ना एवं विधर्मियों को मार गिराना ही युगधर्म है। अमृताशन की परंपरा को भी गोरक्षनाथ ने ही सबसे पहले आरंभ किया था। कहा था कि यही इस जमाने का आहार है। इसी को खाकर, योग साधकर, संयमी जीवन अपनाकर सभी को सैनिक बनना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव ने भी अमृताशन (खिचड़ी) को युग सैनिकों के लिए एकमात्र आहार बताया। भगवान भी यहाँ गीता के दूसरे श्लोक में यही कह रहे हैं कि संन्यास लेकर वैराग्य की स्थिति (जो कि अर्जुन के मन में आ रहा है) की तुलना में कर्मयोग ही सर्वश्रेष्ठ है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण क्यों कहते हैं कि हमें कर्मयोगी ही होना चाहिए? वे हमें तीसरे श्लोक में संन्यासी की विशिष्टताओं एवं अहं के मिट जाने वाली प्रक्रिया की ओर संकेत करते हुए कहते हैं−

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न कांक्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बंधात्प्रमुच्यते॥ 3-5

हे अर्जुन उसी कर्मयोगी को संन्यासी जानो जो किसी से न द्वेष करता है और न राग ही रखता है, क्योंकि ऐसा राग−द्वेष करता है और राग ही रखता है, क्योंकि ऐसा राग−दोषों के द्वंद्वों से रहित व्यक्ति तो सहज रूप में ही संसार बंधनों से मुक्त हो जाता है।

योन द्वेष्टि न काँक्षति

संन्यासी राग−द्वेष से परे होता है। उसका अपना प्रिय कोई भी नहीं होता है, फिर भी सभी उसी के अपने आत्मीय होते हैं। वह व्यक्ति विशेष से जाति−धर्म−संबंध (रिश्तेदारी), लिंग आदि के आधार पर न प्रीति रखता है, न उनसे घृणा करता है। घोषणा करने की जरूरत नहीं है कि अब हमने गैरिक वस्त्र पहन लिए हैं, हमने संन्यास ले लिया है। संन्यास आचरण में दिखाई देना चाहिए। संन्यास अपने कुल−नाम−वंश को भूलकर गुरु की परंपरा से जुड़ जाता है और सारा समाज उसका कार्यक्षेत्र हो जाता है। जिसके हृदय से अहंभाव पूरी तरह दूर हो गया हो, उसे ही संन्यासी मानना चाहिए। (ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी), जिसे न राग है किसी से, न द्वेष ही (यो न द्वेष्टि न कांक्षति)। यदि किसी प्रकार की वासना होगी ही नहीं तो राग−द्वेष क्यों पनपेंगे। आगे भगवान कहते हैं कि जिसने द्वंद्वों से पीछा छुड़ा लिया, वह सहज भाव से ही बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है (निर्द्वद्वो हि महाबाहो सुखं बंधात्प्रमुच्यते)। द्वंद्व ही तो हैं, जो हमें बंधनों में फँसाते रहते हैं, यह मेरा है, यह मेरा पद, मेरी उपलब्धि मेरे स्वयं के ही कारण है, यह घृणित है, मेरे कथनानुसार नहीं चलता, मेरे मार्ग में बाधक है, इस प्रकार का चिंतन व्यक्ति को द्वंद्वों में उलझाकर बंधनों में जकड़ लेता है। इन द्वंद्वों से मनोविकार एवं फिर प्रज्ञापराध पनपता है। व्यक्ति बाहर स्वस्थ, किंतु वस्तुतः रोगी बन जाता है। परमपूज्य गुरुदेव ने उसे वास्तविक रोगी एवं आस्था−संकट से ग्रस्त बताया है। यह भी उन्होंने कहा कि आज बहुसंख्य व्यक्ति इसी विडंबना में उलझे हैं, अधिक पाने की आकाँक्षा, राग की अधिकता, कामनाओं का महत्वाकाँक्षाओं में बदलना एवं बाधक तत्वों को हटाने के लिए द्वेष का जन्म लेना, फिर इन द्वंद्वों में उलझकर एक मायावी मृगतृष्णा में फँसकर जीवन गंवाते चलना यह नर समुदाय की एक नियति−सी बन गई है। समाधान वे भी एक ही बताते हैं, विचारों में परिवर्तन, राग−द्वेष से मुक्ति, द्वंद्वों से परे चलकर जीवनमुक्ति−बंधनमुक्ति। वासना, तृष्णा, अहंता के त्रिविध विकारों से छुटकारा संन्यासी की वास्तविक मनःस्थिति में जाए बिना होगा नहीं। इसके लिए संन्यासी वेश की नहीं, संन्यास की मनःस्थिति की जरूरत है।

श्रीअरविंद गीताप्रबंध में कहते हैं, अहंकारी समझता है कि मैं ही वास्तविक आत्मा हूँ और इस तरह कर्म करता है मानो कर्म का वास्तविक केंद्र वही है और सब कुछ मानो उसी के लिए है और यहीं वह दृष्टिकोण और नियोजन की भूल करता है। यह सोचना गलत नहीं है कि हमारे अंदर, हमारी प्रकृति के इस कर्म में कोई चीज या पुरुष ऐसा है, जो हमारी प्रकृति के कर्म का वास्तविक केंद्र है और सब कुछ उसी के लिए है, परंतु वह केंद्र अहंकार नहीं बल्कि हृदिदेश स्थित निगूढ़ ईश्वर (हृदिदेशे अर्जुन तिष्ठति 61-18 गीता) परमपिता परमात्मा है और वही वह दिव्य पुरुष है, जो अहंकार से पृथक् सत्ता का एक अंश है।

हम सबके भीतर वासनाओं द्वारा नियंत्रित, उसी के द्वारा निर्देशित ताल पर नृत्य करती हुई बुद्धि हमारे राग−द्वेष का भरण−पोषण करती है और फिर यही क्रिया रूप को भी जन्म देती है, किंतु जिसने बुद्धि को द्वंद्वों से मुक्त कर लिया, वह जीवन के बंधनों से मुक्त हो जाता है। फिर वह ऐषणाओं, उद्वेगों, कामुकता के ज्वारों से मुक्त हो जाता है। यह स्थिति अचानक नहीं आती। न ही प्रत्येक संन्यासी को सहज ही प्राप्त हो जाती है। इसीलिए श्रीकृष्ण का अग्रह है कि कर्म−संन्यास की तुलना में कर्मयोग करते−करते इसे प्राप्त करना और अधिक व्यावहारिक एवं सरल है। निष्ठा के साथ यज्ञीय भाव से कर्म करते रहने वाले दिव्यकर्मी (जैसा कि चौथे अध्याय में विस्तार से बताया गया) अपने जीवन की दैनंदिन वासनाओं का क्षय और अहंता पर विजय का महती कार्य संपन्न कर लेते हैं। अब कर्म−संन्यास और कर्मयोग को कोई पृथक् मानने की भूल न कर बैठे, इसके लिए भगवान चौथे श्लोक में एक सूत्र देते हैं−

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदंति न पंडिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।

बालक की तरह आचरण करने वाले मूर्ख जन साँख्ययोग (ज्ञान द्वारा कर्म−संन्यास) और कर्मों के संपादन (कर्मयोग) को पृथक−पृथक फल देने वाला मानते हैं, किंतु पंडितजन (बुद्धिमान−समझदार) जानते हैं कि दोनों में से एक का भी पूरी तरह अनुसरण करने वाला दोनों के फल को प्राप्त कर परमात्मा से साक्षात्कार करने की स्थिति में आ जाता है।

बालबुद्धि बनाम पंडित बुद्धि

भगवान का मत है कि जो साँख्ययोग और कर्मयोग को अलग−अलग समझता है, वह बालक है। बालक के समान मूर्खतापूर्ण आचरण करने वाला है। पंडित अर्थात् विद्वत्जन जो समझदार हैं, जिन्होंने ज्ञान को भली भाँति आत्मसात कर लिया है, जानते हैं कि दोनों एक समान ही फल देने वाले हैं। इसलिए किसी एक को भलीभाँति जीवन में उतारकर आगे बढ़ते रहने में ही समझदारी है। यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण के शब्दों में तीखा व्यंग्य भी है एवं थोड़ा−सा रोष भी। श्रीकृष्ण दोनों योगों में विवाद पैदा करने वालों की हँसी उड़ाते हैं वह यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि ज्ञान द्वारा कर्म−संन्यास एवं कर्मों के संपादन दोनों में कोई अंतर नहीं है। ये अविभाज्य हैं, परस्पर विरोधी नहीं हैं। जैसे विज्ञान और अध्यात्म एक−दूसरे के पूरक हैं, ऐसे ही ये दोनों ही सिद्धाँत साथ चलने वाले हैं, अलग−अलग नहीं हैं।

पंडित शब्द का यहाँ गीताकार ने प्रयोग किया है, तो इन अर्थों में कि उसने न केवल शास्त्रों का गहन अध्ययन−मनन किया है, वह अहं के परित्याग (संन्यास) और कामनाओं के त्याग (सच्चा कर्मयोगी) में कोई भेद नहीं करता। पढ़ा−लिखा होते हुए भी, बाहर से पंडित समान वेश धारण किए, ढेरों डिग्री लिए व्यक्ति यदि दोनों योगों को अलग−अलग बताता है तो फिर उसे ज्ञानी नहीं बालक ही मानना चाहिए, बुद्धिमान नहीं, मूर्ख ही जानना चाहिए। ऐसी अपरिपक्व बुद्धि वाली जनता हम से अनजान नहीं है। हमारे चारों ओर ही ऐसे ढेरों व्यक्ति हमें मिल जाएँगे, जो संन्यास का न कोई मर्म जानते हैं, न निजी जीवन में उसे उतारते हैं, हाँ बाहर से मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, संन्यासी का चोला अवश्य पहने हुए हैं। स्वयं छलावे में जी रहे हैं, औरों को भी इसी मृगतृष्णा में उलझाने की कोशिश कर रहे हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण ने कहा सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पंडिताः। बालाः अर्थात् बालबुद्धि वाले पंडित अर्थात् विद्वान−ज्ञानी ‘एनलाइटण्ड मैन’।

कर्त्ताभाव−भोक्ताभाव

इसी बात को इस तरह भी समझा जा सकता है कि कर्ता के भाव का त्याग साँख्या मार्ग है एवं भोक्ता के भाव का त्याग कर्मयोग का मार्ग है। जो किसी एक को भी पूरी तरह जीवन में उतार लेता है वह इन दोनों का ही फल प्राप्त कर लेता है।

(एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोः विन्दते फलम्), यह कहकर श्रीकृष्ण अर्जुन को पूरी तरह से मौन कर देते हैं, जो अभी भी द्वंद्व की स्थिति से गुजर रहा है। उनका स्पष्ट मत है कि भोक्ताभाव का त्याग योगी को, साधना पथ के पथिक को लौकिक जीवन की वासनाओं का क्षय करने में मदद करता है। जैसे−जैसे वासनाएँ मिटती चली जाती हैं, मन शाँत होता चला जाता है। मन की शाँति किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जरूरी है। ऐसी मनःस्थिति में स्थित व्यक्ति अपने ध्यान द्वारा चैतन्य की आत्मानुभूति कर लेता है। जब अपने आप की कर्त्ताभाव मिट जाता है, तो संन्यास की स्थिति में जाकर मनुष्य परम आनंद को प्राप्त होता है।

कहाँ है वह आनंद, जो कर्त्ताभाव व भोक्ताभाव का त्याग करने वाले एक संन्यासी में होना चाहिए। कहीं दिखाई पड़ता है? परमपूज्य गुरुदेव इसी विडंबना पर अक्सर चर्चा करते हुए कहते थे कि धर्म के नाम पर पलायनवाद को जन्म देने वाले राष्ट्र के साठ लाख बाबाजी यदि कर्मयोगी बने होते तो राष्ट्र का उद्धार हो गया होता। धर्मतंत्र राजतंत्र पर निर्भर नहीं होता, उसका दिशादर्शक होता है। यदि एक−एक बाबाजी आठ−आठ व्यक्तियों को साक्षर व संस्कारवान बना देते तो स्वतंत्रता के बाद इन पचपन वर्षों में देश कहाँ−का−कहाँ पहुँच गया होता। इसीलिए परमपूज्य गुरुदेव ने नवसंन्यास, इस युग का आपार्द्धम परिव्रज्या सबसे अधिक महत्वपूर्ण बताया एवं परिपक्व, पर उत्तरदायित्वों से मुक्त वानप्रस्थियों से यह आवश्यकता पूरी करने को कहा। हम यह नहीं कहते कि 100 प्रतिशत संन्यासी ऐसे हैं। कुछ प्रतिशत तो वास्तव में प्राणवान−प्रज्ञावान−कर्मयोगी हैं, पर शेष मठाधीश बने भोग कर रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं हैं। कर्मयोग और साँख्या की यह चर्चा अगले अंक में और विस्तार से क्रमशः

जार्जिया के पिछड़े प्रदेश में हेरी कार्ल्डवेल को पादरी बनाकर भेजा गया। यों उन पर उत्तरदायित्व बाइबिल की शिक्षा का प्रचार और महाप्रभु ईसा के प्रति भक्तिभाव पैदा करना था, पर उन्होंने जार्जिया क्षेत्र का पर्यवेक्षण करके देखा कि वहाँ स्वार्थपरता और रूढ़िवादिता हद दर्जे की थी। उसे हटाए या घटाए बिना बाइबिल के मंत्र सुने या सुनाए भर जा सकते थे, पर उन्हें जीवन में उतारा नहीं जा सकता था।

कार्ल्डवेल ने अपनी विवेक−बुद्धि से काम लिया। बाइबिल प्रचार के साथ−साथ नागरिकता के प्राथमिक कर्तव्यों और विवेक की कसौटी हर प्रसंग में प्रयुक्त करने की बात कही। फलस्वरूप उस क्षेत्र में ईसाई धर्मानुयायी कहे जाने वाले लोग तो बहुत नहीं बने, पर मानवी कर्तव्य और उत्तरदायित्वों को जानने तथा अपनाने की मनोवृत्ति असंख्यों में पैदा हो गई। विचारशीलों ने उन्हें सच्चा धर्मोपदेशक कहा ।


गुरुकथामृत−36 - साधना की धुरी पर संगठन बनाने का शिक्षण

इस संगठन−सशक्तीकरण वर्ष में हम सारे भारत व विश्वभर में फैले अखिल विश्व गायत्री परिवार के सुगठन, सुव्यवस्थित कार्यपद्धति के निर्धारण पर चिंतन कर रहे हैं।

अपनी यात्रा के 75 वर्ष पूरे कर 76वें वर्ष के उत्तरार्द्ध में चल रहा यह संगठन जब भी कभी संगठनात्मक क्रिया−पद्धति के लिए मार्गदर्शन चाहेगा, तो उसे उन्हीं सूत्रों की ओर लौटना होगा, जो हमारी गुरुसत्ता ने निर्धारित किए थे। समय−समय पर उनका दिशाबोध याद आता है एवं स्मरण पटल पर आ जाते हैं वे पत्र, जो वे परमवंदनीय माताजी को अपने शक्तिपीठ उद्घाटन प्रवास पर प्रतिदिन, कभी−कभी तो एक दिन में 2 या 3 अपनी व्यस्त दिनचर्या के बीच लिखते थे। जो प्रवास पर चले हैं, बाहर के क्षेत्रों के कार्यक्रमों में गए हैं, वे जानते हैं कि कितनी अस्तव्यस्तताओं से भरा यह समय होता है। न सोने का निश्चित समय, न विश्राम की अवधि। प्रायः दो−तीन घंटे ही सोने को मिल पाता है व शेष गाड़ी में चलते−चलते किसी तरह थकान मिटाने का प्रयास किया जाता है। जहाँ साक्षात् गुरुसत्ता स्वयं साधना स्वर्ण जयंती वर्ष संपन्न कर चुके इस मिशन के सूत्रधार के रूप में प्रवास पर निकली हो, वहाँ तो भीड़ का उमड़ना स्वाभाविक ही था।

ऐसी ही कुछ प्रवास की घड़ियों में शाँतिकुँज के कार्यकर्त्ताओं को उनके माध्यम से किसी भी संगठन की कार्यकर्त्ता शक्ति को संबोधित ये पत्र एक प्रकार से एक प्रशिक्षण−पाठ्यक्रम की भूमिका निभाते हैं। कितनी चिंता परमपूज्य गुरुदेव को बाहर मीलों दूर रहते हुए भी केंद्र की, सक्रिय रचनात्मक गतिविधियों की एवं विभिन्न योजनाओं की रहती थी, उसके साक्षी हैं ये पत्र। इन दिनों शाँतिकुँज में ऊर्जा जागरण सत्र चल रहे हैं, जिनमें 5-5 दिन की मौन साधना की जाती है। ये यथार्थतः पाँच दिवसीय प्राण प्रत्यावर्तन साधना के ही संशोधित संस्करणों के रूप में हैं। फर्क इतना ही है, उस समय परमपूज्य गुरुदेव परमवंदनीय माताजी का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन साधकों को उपलब्ध था, अब सूक्ष्म संरक्षण एवं दिशा निर्देश उपलब्ध होते हैं। जितनी गहराई से चिंतन करके पूज्यवर ने इन सत्रों का प्रावधान बनाया था, लगभग उसी स्तर पर 1980−81 में आरंभ किए गए चाँद्रायण साधना सत्रों के विषय में भी सोचा था। परमपूज्य गुरुदेव इसी विषय पर अपने गुजरात प्रवास में महुआ से 5-11-81 को एक पत्र में परमवंदनीया माताजी को लिखते हैं−

चि. भगवती आशीर्वाद

हर दिन चिट्ठी लिखने का सिलसिला अभी नहीं बैठा है। एक−दो दिन में बैठ जाएगा। हमारा भावनगर से लिखा प− मिला होगा। स्वास्थ्य ठीक है। कार्यक्रम सफलता पूर्वक चल रहे हैं।

चाँद्रायण सत्र एकदम नए हैं। साथ ही अत्यधिक महत्वपूर्ण, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक एवं दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाले भी। इनका स्वरूप वैसा ही रहे जैसा कि सोचा और छाया गया है। सभी कार्यकर्त्ता उन्हें मिलजुलकर वैसा ही बनाएँ। संख्या थोड़ी हो तो हर्ज नहीं। स्तर उपेक्षा भरा एवं अस्त−व्यस्त नहीं रहना चाहिए। इस ओर अधिक ध्यान देने, अधिक कल्पना करने और अधिक तत्परता नियोजित करने की आवश्यकता है। सब लोग वैसा ही करेंगे भी, ऐसी आशा है। सब को आशीर्वाद − श्रीराम शर्मा

क्षेत्रीय दौरों पर होते हुए भी यह पत्र पूज्यवर की चांद्रायण साधना सत्रों के क्रियान्वयन संबंधी व्यग्रता को बताता है। वे वहाँ भी यही चिंतन कर रहे थे कि कैसे इनका स्तर ऊँचा हो, कैसे अधिकाधिक व्यक्ति गुणात्मक दृष्टि से अच्छे इसमें भागीदारी करें। वे कहते हैं कि यह सत्र दूरगामी परिणामों को जन्म देंगे। इनसे साधक स्तर के लोकसेवी कार्यकर्त्ता निकलेंगे। अगर अन्यमनस्कता के साथ वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं ने इस शिक्षण को लिया तो वह परिणाम नहीं मिलेंगे

जो अपेक्षित हैं। चैतन्यता−जागरुकता एवं दूरदर्शी विवेकशील के साथ दिया गया परामर्श इस पत्र को विशिष्ट बना देता है एवं हमें इस मिशन रूपी वटवृक्ष की धुरी साधना के बहुआयामी पक्षों पर चिंतन करने को विवश करता है। आज भी हम साधना की धुरी पर ही संगठन के सशक्त होने की बात कह रहे हैं। ऐसी स्थिति में आगे के पत्र भी हमारा इसी इसी प्रकार मार्गदर्शन करते दिखाई देते हैं। ये बताते हैं कि सूक्ष्म से जानने की सामर्थ्य होते हुए भी हमारी गुरुसत्ता प्रत्यक्ष में मात्र शिक्षण हेतु किस तरह अपनी भावनाएँ प्रेषित करती थी। अमरेली से लिखे 6-11-81 के (पिछले पत्र के मात्र एक दिन बाद) पत्र में वे लिखते हैं−

कार्यकर्त्ता सत्र में इन दिनों कितने छात्र हैं? चाँद्रायण में आने वालों के कितने आवेदन आए? कितने पहुँचे और दोनों सत्रों के नए निर्धारणों के अनुरूप ढालने में कितनी दिलचस्पी ली गई? कितनी तत्परता बरती गई? यही जानने को मन रहता है। आशा है कि कहीं−न−कहीं विवरण पत्र मिल ही जाएगा, सब लोग अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और निबाहेंगे, तो एक भी काम अधूरा न रहेगा, ऐसा विश्वास है।

पत्र की भाषा, उसमें व्यक्त की गई जिज्ञासा एवं पूछे गए प्रश्न बताते हैं कि परमपूज्य गुरुदेव कितना अधिक व्यग्र थे स्तर बढ़ाने के लिए। वे चाहते थे कि हर कसौटी पर कसकर पूरी दिलचस्पी लेकर साधना सत्रों के नए निर्धारण लागू कर दिए जाएँ। सभी जिम्मेदारी से अपना−अपना कार्य (शिक्षण−व्यवस्था संबंधी) करते रहें तो वह उद्देश्य पूरा हो जाएगा जिसके लिए साधकों को बुलाया गया है। मिनी चाँद्रायण के छोटे सत्रों के साथ−साथ ये चाँद्रायण सत्र पूरे एक माह (28 दिन) के थे। इनमें दिनचर्या, आहार नियोजन से लेकर साधना की विशिष्टता सभी बड़े महत्वपूर्ण पक्ष थे। उन्हीं दिनों गुरुसत्ता के निर्देश पर एक पुस्तक भी लिखी गई थी, आँतरिक कायाकल्प का सुनिश्चित विधान। परमपूज्य गुरुदेव चाहते थे कि ये चाँद्रायण तप−साधना वाले सत्र साधकों को प्रायश्चित, क्षतिपूर्ति तथा आँतरिक परिशोधन द्वारा परिपूर्ण कायाकल्प का अवसर दें। इसीलिए वे अपने लंबे प्रवास पर समुचित मार्गदर्शन क्षेत्र से बैठकर कर रहे थे। प्रत्येक पत्र पर नंबर अंकित रहता था। उस प्रवास का यह कौन क्रमाँक है, यह भी उसमें होता था, ताकि सभी को स्मृति रहे कि कौन−कौन से पत्रों पर कितना अमल हो गया। उपर्युक्त दोनों पत्र क्रमशः 2 व 3 नंबर के थे।

अगला पत्र आदित्याना (पोरबंदर) से 8-11-81 को लिखा गया, जिसका क्रमाँक 5 था, वे लिखते हैं।

चाँद्रायण में आदमी कम आएँ या अधिक उसका स्तर ऊँचा होना चाहिए। शिक्षण, संपर्क, व्यवस्था के अतिरिक्त हम लोगों की पूरी दिलचस्पी उसमें होनी चाहिए। छोटा सत्र होने से हम लोगों के अभ्यास की सुविधा रहेगी। इन्हें क्वालिटी का बना सकें, तो ही भविष्य में जनता आकर्षित होगी। लकीर पीटने से बेचारे चले तो जाएँगे, पर वे न स्वयं लाभ उठा सकेंगे, न हमारी योजना कल्पना पूरी करने में सहायता करेंगे। इस तथ्य को ध्यान में रखना।

उस पत्र में भी भाषा वही है। स्वयं समझा जा सकता है कि विशिष्ट सत्र शृंखला पर उनका कितना ध्यान था। वे एक बात लिखते हैं, जो कि ध्यान देने योग्य है दिलचस्पी। जब तक किसी कार्य में दिलचस्पी, अपनापन नहीं जोड़ा जाएगा, उसमें वह कौशल−सौंदर्य नहीं दिखाई देगा। दूसरा शब्द है लकीर पीटना। किसी तरह येन−केन−प्रकारेण सत्र निपटा दिया जैसा कि आम संगठनों में होता है, तो यही होगा कि साधकों का समय नष्ट होगा व आयोजकों की योजना टायँ−टायँ फिस्स हो जाएगी। साधना से जुड़े परिजनों के लिए एक सशक्त मार्गदर्शन है।

इसके पश्चात् हम पूज्यवर के क्रमाँक 9 के डीसा से लिखे 12-11-81 के पत्र पर परिजन−पाठकों का ध्यान केंद्रित करना चाहेंगे। वे प्रारंभिक जाँच−पड़ताल के बाद लिखते हैं−

हरिद्वार ही हर गतिविधि का स्तर अब हर दृष्टि से ऊँचा उठा देना चाहिए। वस्तुतः व्यवस्था, कार्यपद्धति एवं कार्यकर्त्ताओं की सतर्कता जैसी बातों का नए सिरे से पर्यवेक्षण और परिवर्तन करना पड़ेगा। हम इन दिनों इन्हीं बातों पर बारीकी से तथा विस्तार से विचार करते रहते हैं। जो सोचा है, उसे लौटने पर ही बताएँगे। संक्षिप्त पत्र में उतना लिख सकना संभव नहीं। तुम लोग अपने सोचने के क्रम में उपर्युक्त परिवर्तन के समावेश के लिए गुँजाइश बनाना अभी से आरंभ करना। घटिया स्वरूप बनाए रहने पर, घटिया लोगों के साथ, घटिया स्तर की सिरफोड़ी ही जीवनभर करनी होगी और अंततः हमारे सारे प्रयत्न घटिया होते−होते बेमौत मर जाएंगे, अस्तु परिवर्तन जरूरी है। वह कैसे हो, कितना हो, इस विषय पर लौटने पर ही चर्चा संभव हो सकेगी। बड़े कदम उठाने की तैयारी रखनी चाहिए। साथ ही बड़ी जिम्मेदारी उठाने की भी। इसके लिए हर जिम्मेदार कार्यकर्त्ता की मनोभूमि तैयार करनी चाहिए।

उपर्युक्त पंक्तियाँ अभी पाठकों के चिंतन−मनन हेतु प्रस्तुत कर दी गई हैं। अब इनकी समीक्षा व क्यों व किन परिस्थितियों में यह सब लिखा गया, इसके आगे का उनका मार्गदर्शन क्या रहा, यह अगले अंक में पढ़ सकेंगे। अभी इतना ही।

क्रमशः

----***----


चेतना की शिखर यात्रा−8 - भागवत भूमि का सेवन (2)

(विगत अगस्त अंक से आगे)

पाखंड खंडिनी पताका

गुरु से शिक्षा ग्रहण कर स्वामी दयानंद भ्रमण करते हुए हरिद्वार के कुँभ में गए। प्रवास में वे जगह−जगह लोगों से वैदिक धर्म की चर्चा करते। उसके मर्म को समझकर प्रथा−परंपराओं के पालन की बात करते । कुँभ में जाने का उद्देश्य यह था कि वहाँ हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे होते हैं। गाँव−गाँव घूमने पर सौ−पचास लोगों से ही संपर्क हो पाता। कुँभ में सैकड़ों व्यक्तियों से एक साथ भेंट हो जाती। हरिद्वार पहुँचकर स्वामी दयानंद ने एक छोटा−सा शिविर लगाया और बाहर एक झंडे पर पाखंड खंडिनी पताका लिखकर गाड़ दिया। उस पताका ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। स्वामी जी शिविर के बाहर खड़े होकर मूर्तिपूजा, श्राद्ध, अवतार, पुराण, कर्मकाँड आदि के नाम पर चलने वाले ढकोसलों की पोलपट्टी खोलने लगे। जाति−पाँति, छुआछूत, बाल−विवाह, सती प्रथा और वैवाहिक कुरीतियों, अंधविश्वासों के बारे में भी वे बोलने लगे। उसकी बातों में नयापन था और वे तर्कसंगत भी थीं। लोगों के गले उतरने लगीं। उनका विरोध भी हुआ और समर्थन भी मिला।

कुँभ और बाद की यात्राओं में मिले समर्थकों को लेकर स्वामी जी ने आर्यसमाज नामक संगठन की नींव रखी। उन्होंने आजीवन यात्राएँ की। राजाओं और सामंतों से लेकर पंडितों, विद्वानों तक हर वर्ग के लोगों से मिले। पिताश्री ने श्रीराम को विस्तार से बताते हुए यह जानकारी भी दी कि स्वामी दयानंद के खिलाफ हमेशा षड्यंत्र रचे जाते थे। उनकी मृत्यु भी एक षड्यंत्र में ही हुई। जोधपुर में कुछ लोगों ने मिलकर उनके रसोइये को अपनी तरफ मिलाया और उसके हाथों स्वामी जी को विष दिला दिया। स्वामी जी ने विष की दारुण पीड़ा झेली और उसी से उनकी मृत्यु हो गई। मरते−मरते भी उन्होंने रसोइये को अपने पास से भगा दिया। उन्हें डर था कि लोगों को पता चलेगा, तो रसोइये को जिंदा नहीं छोड़ेंगे। स्वामी जी ने उसे क्षमा कर दिया और उसके भाग जाने की व्यवस्था की।

श्रीराम यह वृत्ताँत बड़े ध्यान से सुन रहे थे। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। पिताश्री से मथुरा के अन्यान्य स्थानों का विवरण और कथाएँ सुनते हुए वापस लौट आए। ननिहाल और मथुरा होते हुए संपन्न हुई इस यात्रा ने पिता के सान्निध्य में एक संस्कार दिया। वह संस्कार भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रति एक दृष्टिकोण के रूप में था। नियति ने उनके लिए जो दायित्व चुन रखा था, उसके लिए बाहर से किसी विशेष सहयोग की आवश्यकता नहीं थी लेकिन शुक्रदेव जैसी मुक्त आप्तकाम आत्मा को भी अपने पिता वेदव्यास से भागवत कथा सुननी पड़ी थी।

सूक्ष्म जगत् का संकेत

जिस हवेली में श्रीराम रहते थे, उसमें तीन चाचा, उनकी संतानें और भाई−बहन भी निवास करते थे। बीस−पच्चीस लोगों का भरा−पूरा परिवार था। चाचाओं की ससुराल पक्ष के लोग भी आते−जाते रहते थे। बुआ−भतीजों और दूसरे रिश्तेदारों के आने−जाने से चहल पहल बनी रहती थी। हँसी−खुशी का माहौल होता। पिताश्री के रहने तक गाँव और पास−पड़ोस की बस्तियों से आए लोगों से बैठक भरी रहती थी। सहपऊ से भागवत सप्ताह से लौटने के बाद पिताश्री को एक दिन सीने में दबाव महसूस हुआ। अच्छी तरह बैठे बात कर रहे थे कि दबाव और पीड़ा से दोहरे होकर लेट गए। उनके मुँह से नमः भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण हुआ और बोली बंद हो गई। घर में कोहराम मच गया। हँसी−खुशी का माहौल चिंता में बदल गया और लोग अपनी तरह से पंडित जी की सार−सँभाल करने लगे। यह घटना दिन में ही घटी थी। चिकित्सा सहायता तुरंत उपलब्ध हो गई और कुछ देर में होश आ गया। तीन−चार दिन बाद वे सामान्य दिखाई देने लगे।

पिताश्री स्वस्थ तो हो गए, लेकिन वैद्यों ने उन्हें अब सावधान रहने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि हृदय रोग का आक्रमण हुआ है। सँभलकर रहना चाहिए। यात्रा आदि से बचें, काम का बोझ कम लें और जहाँ तक हो सके, लोगों से मिलना−जुलना भी सीमित कर दें। पिताश्री ने सबकी सलाह सुनी। काम−काज का दबाव और मिलना−जुलना तो क्या कम किया, भजन−पूजन में ज्यादा समय देने लगे। कारण कथा−वार्ताओं में हिस्सा लेना थोड़ा कम हो गया।

श्रीराम पिताश्री की बीमारी और उसके बाद उनमें आए बदलावों को बड़ी बारीकी से देख रहे थे। रोग−बीमारी का शिकार होते हुए उन्होंने दूसरे लोगों को भी देखा था, लेकिन वे इलाज के बाद ठीक हो जाते थे और रोजमर्रा का जीवनक्रम अपना लेते । हमेशा की तरह सहज होने में उन्हें जरा भी देर नहीं लगती। खान−पान सहन−व्यवहार और दिनभर के काम−काज पहले की तरह चलने लगते। बीमारी के कारण कोई कमजोरी आती तो उसका प्रभाव दिनचर्या में शिथिलता के रूप में दिखाई देता, लेकिन ऐसा नहीं होता था कि स्वभाव और प्रवृत्तियाँ ही बदल जाएँ।

पिताश्री का संवरण

पिताश्री शुद्ध−सात्विक स्वभाव के थे, फिर भी उनमें विलक्षण परिवर्तन आया। उनके काम−काज से ऐसा लगता जैसे कुछ समेटने में लगे हुए हों। यात्रा का समय आने पर व्यक्ति जैसे अपना सामान समेटने और उस अवधि के काम निपटाने की जल्दी मचाने लगता है, उसी तरह की आतुरता पिताजी के व्यवहार में दिखाई देने लगी। उन दिनों वे बच्चों की ब्याह−शादी, छोटे भाई−बहनों की जरूरतों और अभ्यागतों की जिज्ञासाओं का समाधान करने में ज्यादा समय लगाने लगे।

संवत् 1961 (सन् 1923) का आषाढ़ शुरू होने को था। पिताश्री ने पुत्र श्रीराम को एक दिन बुलाया और कहा−कम−से−कम नौ दिन तक मेरे पास दो घंटा रोज बैठो और जो मैं कहता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो। पिता की आज्ञा शिरोधार्य होनी ही थी। जिस दिन से पिताश्री ने अपने पास बैठने के लिए कहा था, उसके एक दिन पहले क्षौरकर्म कराया। पुत्र से कहा कि अगले सात दिन तक व्रत−नियम से रहना है। दिन में एक समय भोजन और एक समय फलाहार करते हुए एकाशन व्रत की व्यवस्था दी। पिता−पुत्र दोनों के लिए जमीन पर बिस्तर बिछाकर सोने की व्यवस्था की गई।

अगले दिन सुबह पिताश्री ने भागवत की कथा सुनाना आरंभ किया। यह सिर्फ श्रीराम के लिए एक शिक्षण सत्र था और लोगों को भाग लेने के लिए आमंत्रित नहीं किया गया। भागवत का कथा−भाग और सिद्धाँत पक्ष इस प्रकार कहना शुरू किया कि उस दिन का विश्राम स्थल दो घंटे पूरे होने तक आ जाए। भागवत सुनाने का उद्देश्य पिताश्री ही भलीभाँति जाते होंगे। इस विषय में उन्होंने अपने चिरंजीव को भी नहीं बताया। संभवतः भागवत शास्त्र के मूल भाव जीवन और जगत् के सत्य से परिचित कराना हो?

भागवत का मूल भाव क्या है? विषय परिस्थितियों में भी धर्म का साधन। अपने अभ्युदय और निःश्रेयस के लिए निष्ठापूर्वक प्रयत्न करना और प्रभु समर्पित जीवन जीना। भागवत कथा का आरंभ पृथ्वी पर कलियुग के अर्थात् विषय परिस्थितियों, जटिलताओं और आत्मिक उन्नति में बाधाओं के आधिपत्य से होता है। परीक्षित इन स्थितियों का शमन करने निकलते हैं, तो कलियुग भी क्षमा माँगने लगता है। भागवत शास्त्र के अनुसार कलियुग अशुभ और विपर्यय का नाम है। परीक्षित उसका निग्रह करने लगते हैं, तो वह पृथ्वी को मुक्त करने के लिए तैयार हो जाता है, लेकिन अपने लिए आश्रय भी माँगता है। परीक्षित कलि को पहले चार और फिर पाँच स्थानों पर रहने की छूट देते हैं। इन पाँच स्थानों में पहले चार असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता में वास करने के लिए कहते हैं। अनुनय करने पर पाँचवाँ स्थान रजस भी छोड़ देते हैं। रजस अर्थात् लोभ, दिखावा, अकड़, संकीर्ण भाव। जहाँ भी ये विकृतियाँ होगी, वहीं कलि के दुष्प्रभाव अर्थात् शोक−संताप होंगे।

संतापों से बचने का उपाय? भागवत का एक ही संदेह है−प्रभु समर्पित जीवन। और सब उपाय समस्याओं को उलझाते और विपदाओं को सघन की बनाते हैं। शृंगी ऋषि के शाम से परीक्षित का जीवन एक सप्ताह भर शेष रह गया, तो वे चिंतित नहीं हुए, क्योंकि वे प्रभु समर्पित जीवन जी रहे थे, इसलिए उन्होंने शेष दिनों के श्रेष्ठतम उपयोग की योजना बनाई। स्थितियाँ और संयोग ऐसे बने कि सातों दिन अध्यात्म चर्चा में व्यतीत हुए। कथा पूरी होने के बाद उन्होंने मृत्यु का अतिथि की तरह स्वागत किया और उत्सव की तरह उसे अपनाया।

सप्ताह भर के सान्निध्य में पिता−पुत्र ने कथा प्रसंगों का आस्वाद लिया। उनके माध्यम से अध्यात्म और तत्वज्ञान की चर्चा की । ज्ञान, कर्म और भक्ति के सागर में निमज्जित हुए। भागवत का एकादश स्कंध शुद्ध तत्वज्ञान का प्रतिपादन करता है। मुक्ति या निःश्रेयस की प्राप्ति के विविध उपायों की विवेचना करते हुए इस स्कंध में भगवान वेदव्यास ने ललित ललाम भाषा का उपयोग किया है। तत्वज्ञान की चर्चा प्रायः गूढ़−गंभीर हो जाती है। वह पंडित प्रवर लोगों के लिए ही बोधगम्य होती है। जैसे वेदाँत, योग, साँख्य, मीमाँसा आदि शास्त्र। इन शास्त्रों में दार्शनिक सिद्धाँतों का प्रतिपादन गणित के सूत्रों की तरह किया गया। भागवत कथा के एकादश स्कंध में सभी दार्शनिक मतों को काव्य में निरूपित कर दिया है।

तुम भगवान के हुए

कथा सुनने के दिनों में भी एकाँत में जाने और ध्यान में लीन रहने का क्रम जारी था। अंतिम दिन की कथा सुनाने के बाद एक विचित्र घटना घटी। पिता कहानी कहने या पाठ पढ़ाने की तरह ही भागवत कह रहे थे। अनुष्ठान की तरह विधि−विधान की आवश्यकता नहीं समझी गई थी, इसलिए पूर्णाहुति के दिन यज्ञयाग या भोग का कार्यक्रम नहीं रखा गया। कथा सुनने के बाद पुत्र ने पिताश्री से पूछा−श्रवण के बाद दक्षिणी दी जाती है। मैं आपको क्या भेंट करूं? पिता अपने लाड़ले का मुँह देखते रह गए। श्रीराम ने फिर वही प्रश्न किया। पंडित जी ने बेटे की बाँहें पकड़कर खींच लिया और सीने से लगा लिया। इस बार भी कुछ नहीं बोले। तीसरी बार फिर वही प्रश्न किया तो उत्तर आया, अपने आपको भेंट कर दो। श्रीराम ने कहा कि वह तो मैं आपका हूँ ही। आपका आशय यदि अपने आपको भगवान के लिए भेंट चढ़ा देने से है, तो उसके लिए संकल्प ग्रहण कराइए ।

पिताश्री ने हाथ में जल लेकर संकल्प कराया। फिर कहा−अब तुम भगवान के हुए । आशीर्वाद लेने के बाद श्रीराम हमेशा की तरह एकाँत में चले गए। गुफा वाली घटना के बाद वे जंगल में नहीं जाते थे, लेकिन कहाँ जाते हैं, यह भी माँ के सिवाय किसी को पता नहीं था। उस दिन एकाँत में गए तो घंटों बीत गए। शाम होने लगी फिर भी वापस नहीं आए। माँ को चिंता होने लगी । उन्होंने पंडित जी से पूछा कि बेटे को कहाँ भेज दिया है, अभी तक नहीं आया। पिता भी चिंतित हुए। हिमालय जाने वाली घटना याद आ गई। परेशान होकर वे बोले−कहीं चला तो नहीं गया। माँ को भी आशंका हुई। फिर अपने आपको ढाढ़स बँधाते हुए बोली−गौरी बाग के शिवालय में एक बार दिखवा लीजिए। कहीं वहाँ भक्ति में न रमा हो। गौरी बाग गाँव से एक डेढ़ मील छोटा−सा बगीचा था। वहाँ आम, अमरूद और नीम के कुछ पेड़ थे। बारहों महीने सन्नाटा रहता था। सोमवार, पूनम या शिवरात्रि के दिन लोग शिवालय में आते थे। बाकी समय सन्नाटा रहता था। इसी जगह श्रीराम ने अपना ठिकाना बना रखा था।

गहन ध्यान समाधि

पिता खुद दौड़े चले गए। साथ में दो−तीन व्यक्ति और थे । वहाँ जाकर देखा श्रीराम एक पड़े के नीचे पालथी मारकर ध्यान मुद्रा में बैठे हैं पंडित जी ने उन्हें पुकारा। कोई उत्तर नहीं आया, श्रीराम निश्चल बैठे ही रहे। उन्होंने दूसरी, तीसरी, चौथी बार पुकारा, फिर भी कोई असर नहीं हुआ तो हाथ पकड़कर हिलाने की कोशिश की। थोड़ा−सा धक्का लगते ही श्रीराम आगे की ओर सिर के बल लुढ़क गए। ध्यान के समय गोदी में रखे हाथ हिलाने−डुलाने के कारण प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गए थे। लुढ़कते हुए उनकी स्थिति ऐसी थी जैसे सिर से प्रणाम करने के लिए आगे की ओर झुके हो और माथा टेक दिए हों। लुढ़कने के बाद वे उसी स्थिति में पड़े रहे। पंडित जी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी।

उन्होंने बेटा−बेटा कहा और नाम लेकर दसियों बार पुकारा, हिलाने−डुलाने की कोशिश की, पकड़कर बिठाना चाहा, लेकिन शरीर निढाल ही रहा। अनहोनी−अनिष्ट आशंका से घिरकर उन्होंने नथुनों के पास अँगुली रखकर देखा, नब्ज़ टटोली और हृदय की धड़कन देखी। जीवन के लक्षण हैं या नहीं? फिर भी निष्कर्ष पर पहुँचने की स्थिति ही नहीं आई और पिता के मुँह से जोर की चीख निकल गई। साथ आए लोगों के चेहरों का रंग उड़ गया।

चीख का शायद कुछ भान हुआ कि श्रीराम की ध्यान समाधि खुली। वे अपने आप उठकर बैठकर और अपने आपको सँभालने से पहले पिताश्री का अभिवादन किया। पुत्र के प्रणाम से पंडित जी आश्वस्त हुए कि उनका बेटा सकुशल है। कहने लगे, मैं तो डर ही गया था कि तुम चले गए। श्रीराम ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया। घर आकर पिता ने फिर वही बात दोहराई और भगवान को धन्यवाद देने लगे तो बोले कि आप उन्हें क्यों धन्यवाद देते हैं। आप मुझे भगवान को सौंप चुके हैं आशीर्वाद दीजिए कि मैं अब उन्हीं का काम करूं। ताई जी वहीं उपस्थित थीं। उन्हें ये बातें अच्छी नहीं लग रही थीं। पति से कहने लगी थीं आपने श्रीराम को पता नहीं क्या−क्या पढ़ा−सिखा दिया है। मुझे इससे बहुत डर लगता है।

उस अनुभव के बारे में श्रीराम ने कुछ दिन बाद अपने साथियों को बताया । अपने आपको भगवान के लिए अर्पित कर देने के बाद लगा कि मन अपूर्व शाँति आ गई हैं। ध्यान में बैठे तो संसार जैसे तिरोहित हो गया। अपने आसपास कुछ है ही नहीं । कितनी देर ध्यान में बैठना हुआ, इसका स्पष्ट आभास नहीं है, लेकिन उस अवधि में एक अद्भुत प्रसंग घटा। वह प्रसंग आँतरिक अनुभूति थी, कोई स्वप्न था अथवा दिव्य दर्शन। इस बारे में श्रीराम ने कुछ नहीं कहा। अनुभूति एक घटना की तरह थी जो प्रत्यक्ष होती लग रही थी। जिस समय यह हुई, तब भी यह आभास भी नहीं था कि ध्यान हो रहा है।


अपनों से अपनी बात−1 - गायत्री तपोभूमि के स्वर्ण जयंती वर्ष की एक महत्वपूर्ण स्थापना

सारा भारत की तपोभूमि बने, यही एकमेव संकल्प

गायत्री तपोभूमि मथुरा के अखिल विश्व गायत्री परिवार रूपी विराट शरीर में वही स्थान है, जो हृदय का होता है। परमपूज्य गुरुदेव 1941 में मथुरा आए, 1952 में चौबीस महापुरश्चरणों की समाप्ति पर उन्होंने अपनी साधना स्थली का चयन इसी स्थान के रूप में गीता जयंती पर किया। 1953 की गायत्री जयंती पर गायत्री तपोभूमि के छोटे से परिसर में गायत्री जयंती पर गायत्री तपोभूमि के छोटे से परिसर में गायत्री महाशक्ति के विग्रह को स्थापना हुई। इसके साथ ही यहाँ एक 108 कुँडीय यज्ञ भी संपन्न हुआ, जिसमें परमपूज्य गुरुदेव ने अपने साधना गुरु श्री सर्वेश्वरानंद जी महाराज के निर्देशानुसार चौबीस महापुरश्चरणों (प्रत्येक चौबीस लक्ष के) की पूर्णाहुति भी संपन्न की। तीन वर्ष बाद यहीं पर नरमेध यज्ञ संपन्न हुआ तथा 1958 में 1008 कुँडी वाजपेय स्तर के गायत्री महायज्ञ के संपन्न होने के साथ गायत्री परिवार का एक विराट संगठन साधना की धुरी पर बनकर खड़ा हो गया।

साक्षी है अखण्ड अग्नि में भारत व विदेश के अनेकानेक साधकों के संकल्पों की, उनकी भावपरक आहुतियों की। यह अखण्ड अग्नि त्रियुनी नारायण (केदार क्षेत्र हिमालय) से लाई गई थी। शिव−पार्वती विवाह के समय से सतत प्रज्वलित यह दिव्याग्नि कितना महत्व रखती है, यह शब्दों में लिखा नहीं जा सकता।

1941 से 1971 तक, हिमालय के लिए विदाई लेने से पूर्व तीस वर्ष तक ही एक लंबी अवधि परमपूज्य गुरुदेव द्वारा पावन तीर्थनगरी मथुरा में एक कर्मभूमि के रूप में व्यतीत हुई है। इसमें भी 1952 से 1971 तक का प्रायः बीस वर्षों का समय गायत्री तपोभूमि के साथ उनकी हर श्वास के साथ बीता है। लगभग इतना ही समय (1971 से 1990) वे शाँतिकुँज हरिद्वार भी रहे। इस प्रकार उनकी जीवन यात्रा एक सुनियोजित क्रम में बँटी नजर आती है।

तपःस्थली का विशेष स्थान−परमवंदनीय माता जी ने इसी स्थान से एक साधिका, सर्वप्रथम शिष्या के रूप में इस संगठन का प्रथम सदस्य बनने का सौभाग्य अर्जित किया एवं बाद में उन्होंने अखण्ड ज्योति संस्थान में अखण्ड−ज्योति पत्रिका के संपादन के साथ−साथ इस विराट परिवार के सहसंरक्षक की भूमिका भी निबाही। यों तो ऋषियुग्म का निवास अखण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी, मथुरा (1941 से अब तक इस पत्रिका का प्रकाशन केंद्र) ही था, पर नित्य दोनों गायत्री तपोभूमि आते थे एवं नियमित चलने वाले सत्रों में साधकों का मार्गदर्शन करते थे। इस प्रकार गुरुसत्ता की चरणरज से यह सारा क्षेत्र, उसका कण−कण ऊर्जावान बना हुआ है। गायत्री महाविज्ञान से लेकर वेद−पुराण−उपनिषद्−स्मृति−योगवासिष्ठ−तंत्र महाविज्ञान आदि ग्रंथों का भाष्य−लेखन−मुद्रण यहीं पर हुआ है। यही वह पावन भूमि है, जहाँ युगनिर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रमों तथा नवयुग के घोषणा पत्र के रूप में सत्संकल्प (18 सूत्री कार्यक्रम) का प्रचार−प्रचार पूज्यवर के हिमालय से लौटकर आने के बाद किया गया। गायत्री मंदिर के सामने स्थित यज्ञशाला

स्थापना की स्वर्ण जयंती का वर्ष

अब इस प्राणवान स्थापना के, गायत्री तपोभूमि कि निर्माण के पचास वर्ष इस वर्ष पूरे होने को आ रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण स्थापना का स्वर्ण जयंती वर्ष हैं, जिसे गायत्री जयंती 2002 से गायत्री जयंती 2003 (10 जून) तक पूरे भारतवर्ष में सोल्लास मनाया जा रहा है। परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी के बाद जिन गिने−चुने तपस्वियों का इस पावन तपोभूमि को विस्तार देने में योगदान रहा, उनमें श्रद्धेय पं. लीलापत शर्मा का नाम हमेशा याद किया जाएगा। 1912 में भरतपुर जिले में जन्में पंडित जी पूरी तरह 1967 में मथुरा आ गए थे एवं उन्हें वहाँ के व्यवस्थापक का कार्यभार पूज्यवर द्वारा सौंपा गया था। 1971 में ऋषियुग्म परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माता जी के हरिद्वार आगमन के साथ ही पंडित जी ने गुरुसत्ता की पादुकाएँ गायत्री माता के मंदिर के दोनों ओर रख, उनके चित्र स्थापित कर आज विगत 32 वर्षों में जो रूप व आकार तपोभूमि को दिया है, वह सभी को विदित है। जैसी कि भगवत् सत्ता की इच्छा थी, 2002 की मई तक 90 वर्ष की एक पुण्य−परमार्थ भरी जिंदगी जीकर पंडित जी को 14 मई को प्रातः गुरुसत्ता ने अपने पास बुला लिया। हर श्वास में गुरुसत्ता को ही जीने वाले पंडित जी का जीवन भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार की तरह एक समर्पित प्रभुभक्त का रहा। उनकी ही इच्छानुसार गायत्री तपोभूमि में गायत्री मंदिर के दोनों ओर उनकी आराध्य सत्ता की मूर्तियां स्थापित की जा रही हैं। अपने नवंबर 2001 के गुजरात प्रवास के पूर्व वे स्वयं, सतीश जी (श्री मृत्युँजय शर्मा) को लेकर जयपुर दो बार गए एवं मूर्तियों के निर्माण का मार्गदर्शन करके आए। समय−समय पर प्रतिनिधिगण कार्य की प्रगति देखते रहे। अब वे मूर्तियाँ बनकर तैयार हैं एवं जैसी कि श्रद्धेय पंडित जी की हार्दिक इच्छा थी, उनकी स्थापना इस स्वर्ण जयंती वर्ष में गायत्री तपोभूमि में की जा रही है। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी की साढ़े तीन फीट ऊँची बैठी प्रतिमा आद्यशक्ति गायत्री के दायीं ओर एवं परमवंदनीय माता भगवती देवी की तीन फीट बैठी प्रतिमा बायीं ओर प्रतिष्ठित होगी। एक छोटे−से समारोह व कर्मकाँड के साथ यह स्थापना शरदपूर्णिमा 21 अक्टूबर की प्रातः कर दी जाएगी। चूँकि सूक्ष्म व कारण में स्थित, माँ गायत्री में विलीन एवं निखिल ब्रह्माँड में संव्याप्त गुरुसत्ता हमारे आसपास ही विद्यमान है, इसलिए प्राण प्रतिष्ठा जैसा कोई कर्मकाँड नहीं किया जा रहा है।

मूर्ति स्थापना कार्यक्रम व महत्वपूर्ण निर्देश

परमपूज्य गुरुदेव के सदैव यही निर्देश रहे कि उनकी सत्ता सजल−श्रद्धा प्रखर−प्रज्ञा के रूप में, देवात्मा हिमालय व स्मृति उपवन के रूप में, अखण्ड दीपक की जाज्वल्यमान ज्योति के रूप में तथा उनके द्वारा लिखे गए विचारों के रूप में, उनके साहित्य में ही सदा मौजूद रहेगी। इसीलिए किसी को भी यह नहीं करना चाहिए कि अनुकरण कर हम भी ऐसी मूर्तियों की स्थापना अपने यहाँ करें। इससे गुरुसत्ता के निर्देशों की अवमानना होगी तथा उनके ज्ञानयज्ञ अभियान में बाधा पड़ेगी। जिस कार्य को प्राथमिकता पर किया जाना है एवं युगपरिवर्तन हेतु जिसकी सर्वोपरि आवश्यकता है, उसमें व्यवधान आएगा। इस स्वर्ण जयंती वर्ष में इसीलिए हर परिजन से यही कहा जा रहा है कि वे साधकों की संख्या बढ़ाएँ। मंत्र लेखन अभियान को गति दें, पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या में अभिवृद्धि करें तथा मिशन की सप्त क्राँति योजना को पूर्णता तक पहुँचाएँ। गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं शाँतिकुँज हरिद्वार द्वारा घोषित सातों आँदोलनों की एक सम्मिलित कार्य योजना संगठनात्मक स्तर पर सक्रिय करने के लिए एक संपादकीय में इसी अंक में अगले पृष्ठों पर दी गई है।

कार्यक्रम से जुड़े अनुबंध

शरदपूर्णिमा का कार्यक्रम 20, 21, 22 अक्टूबर की ढाई दिन की अवधि में संपन्न होगा, पर यह है उन्हीं के लिए जो न्यूनतम निम्नलिखित शर्तों को पूरा करते हों।

(1) जो गायत्री महामंत्र लेखन अभियान को तीव्र गति दे सकें। कम−से−कम सौ मंत्रलेखन पुस्तिकाएँ प्रतिमाह, इस प्रकार गायत्री जयंती 2003 एक हजार पुस्तिकाएँ विभिन्न परिजनों से लिखवा सकें, उन्हें विराट तप में भागीदार बना सकें। सभी भाषाओं में ये पुस्तिकाएँ उपलब्ध हैं।

(2) जो अपनी चारों पत्रिकाओं−मासिक अखण्ड−ज्योति हिंदी, बंगला व अँग्रेजी, युग निर्माण योजना, युगशक्ति गायत्री (गुजराती एवं विभिन्न भाषाओं में) तथा प्रज्ञा अभियान पाक्षिक के न्यूनतम पचास पाठक और बढ़ा सकने की स्थिति में हों। आज की स्थिति से यह और अधिक का संकल्प होना चाहिए।

(3) जो साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, कुरीति−उन्मूलन, नशा निवारण, पर्यावरण संवर्द्धन तथा नारी जागरण में से किन्हीं दो को पूर्ण गति दे सकें। सुनियोजित कार्यपद्धति अपनाकर उसे ऐसी गति दें कि उस क्षेत्र में वह एक ख्यातिप्राप्त आँदोलन बन जाए।

(4) जो न्यूनतम तीन माह का क्षेत्र या केंद्र में शाँतिकुँज में मार्गदर्शनानुसार समय दे सकते हों, उसका नियोजन शपथपूर्वक कर सकने की स्थिति में हों।

जो भी उपर्युक्त शर्तों का पालन कर सकते हों, ऐसे गिने−चुने शपथ लेने वाले प्राणवानों को स्वर्ण जयंती समारोह के मूर्ति स्थापना कार्यक्रम में आमंत्रित किया जा रहा है, उनकी कुछ संख्या 10 से 15 हजार की आँकी जा रही है, क्योंकि शर्तें बड़ी कड़ी हैं एवं उनका परिपालन अनिवार्य माना जा रहा है। कार्यक्रम 20 अक्टूबर की प्रातः अखण्ड जप से आरंभ होगा। मध्याह्न में शोभायात्रा निकलेगी, तत्पश्चात एक कार्यकर्त्ता गोष्ठी। अगले दिन प्रातः मूर्ति स्थापना के साथ यज्ञ चलता रहेगा, दर्शन सब कर सकेंगे। दिन में गोष्ठी के उपराँत शाम को एक विराट दीपयज्ञ में शपथ ली जाएगी कि आगामी आठ माह में क्या−क्या करना है। अगले दिन प्रातः पूर्णाहुति कर कार्यकर्त्ता क्षेत्र में लौट जाएँगे। जो नहीं आएँगे वे अपने स्थान पर शक्तिपीठों−प्रज्ञामंडलों में शरदपूर्णिमा का संकल्प दीपयज्ञ संपन्न करेंगे। स्वर्ण जयंती वर्ष सालभर चलने वाला अतः दर्शनार्थी वर्ष में कभी भी आकर दर्शन लाभ ले सकते हैं। ये तीन दिन तो उन्हीं के लिए हैं, जो शपथ लेने आ रहे हैं। आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि इस एक वर्ष में हम गायत्री तपोभूमि की तप−ऊर्जा को समस्त भारत भूमि में बिखेरने में सफल हो सकेंगे।


अपनों से अपनी बात−2 - संगठन−सशक्तीकरण वर्ष में आंदोलनों को गति दी जाए

हम एक आदर्श आधार रख सकें−सही प्रयास हो

प्रस्तुत वर्ष एक विशिष्ट वर्ष हैं। प्रखर−साधना महापूर्णाहुति एवं फिर हीरक जयंती वर्ष मनाने के बाद साधना की धुरी पर संगठन को सशक्त बनाने के लिए इस वर्ष ही नहीं, 2004 की जनवरी तक हम संकल्पित हैं। गुरुसत्ता की इच्छा है कि इस अवधि में सारा गायत्री परिवार विधिवत संगठित हो जाए, प्रत्येक की अपनी कार्यविधि निर्धारित हो एवं हमारी अधिकाधिक शक्ति समूह साधना में नियोजित हो। सुसंगठित हो समाज की सेवा में लगना हम सबकी नियति भी है, समय की आवश्यकता भी। मात्र भावनाओं के दुर्भिक्ष में जी रहे संकीर्ण स्वार्थी ही इस सेवा−साधना से दूर रह सकते हैं। परमपूज्य गुरुदेव इस संबंध में लिखते हैं, भजन का अर्थ है सेवा। सेवा किस की? इसका उत्तर एक ही हो सकता है−आदर्शों की आदर्शों का समुच्चय की भगवान है। दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन के लिए ही भगवान समय−समय पर अवतार लेते हैं ईश्वर की अनुकंपा किस पर कितनी हो रही है, इसकी परख प्रक्रिया एक ही है कि उसे उन्मूलन से सात आँदोलन आज से चार वर्ष पूर्व दिए गए। इनमें से कई भिन्न−भिन्न रूपों में चल भी रहे थे। गायत्री तपोभूमि द्वारा प्रायः पाँच वर्ष पूर्व आस्तिकता संवर्द्धन, स्वास्थ संवर्द्धन, नारी जागरण, व्यसन मुक्ति, कुरीति उन्मूलन, विवाहोन्माद प्रतिरोध तथा दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन ये सात कार्यक्रम दिए गए हैं। पूर्व घोषित इन कार्यक्रमों में शिक्षा, स्वावलंबन और पर्यावरण तपोभूमि के आँदोलनों में नहीं थे, किंतु जून 2002 की युगनिर्माण योजना में पृष्ठ 21−22 पर इन तीन आँदोलनों को जोड़ लेने की बात भी प्रकाशित की गई। वैसे भी गौ संवर्द्धन, ग्रामोद्योग, हरीतिमा संवर्द्धन परोक्ष रूप से तपोभूमि द्वारा पूर्व से ही चलाए जा रहे थे। शिक्षा आँदोलन के अंतर्गत एक युगनिर्माण विद्यालय तपोभूमि में 1967 से सतत चल रहा है, जो एक वर्ष का रोजगार प्रधान अनौपचारिक पाठ्यक्रम आधार बनाता है। इसी तरह शाँतिकुँज के कुरीति उन्मूलन कार्यक्रम में दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन, कुरीति उन्मूलन (तपोभूमि) तथा विवाहोन्माद प्रतिरोध आ जाते हैं। सत्प्रवृत्ति सेवाधर्म अपनाने के लिए कितनी ललक उठी, कितनी लगन लगी। (प्रज्ञा अभियान नव. दिस. − 1982) निश्चित ही किसी के भी मन में आ सकता है कि इससे हमें क्या मिलेगा। आत्मिक प्रगति, मन की शाँति एवं भव−बंधनों से मुक्ति सेवा−साधना से, सद्गुरु के बताए कार्यों में लगने से स्वयं होते चले जाते हैं। युगधर्म यही है कि भ्राँतियों और विकृतियों के दलदल में फंसे लोकमानस को उबारा जाए। इसी निमित्त युगनिर्माण योजना मथुरा द्वारा सप्तक्राँतियाँ एवं शाँतिकुँज हरिद्वार द्वारा सप्त आँदोलन जन−जन को दिए गए।

प्रकाराँतर से दोनों एक ही हैं। शब्दों का हेर−फेर हो सकता है, पर अब दोनों का एकीकरण कर जन−जन के लिए उन्हें सब और सरल बना दिया गया है। इस संगठन−सशक्तीकरण वर्ष एवं गायत्री तपोभूमि के स्वर्ग जयंती वर्ष में हम सभी का प्रयास होना चाहिए कि ये सातों आँदोलन जन−जन में विस्तार पा जाएँ एवं इनके माध्यम से धर्मतंत्र द्वारा समाज के नवनिर्माण की प्रक्रिया सहज ही मूर्तरूप लेती चली जाए। शाँतिकुँज द्वारा साधना, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वावलंबन, पर्यावरण, महिला जागरण, व्यसनमुक्ति, कुरीति संवर्द्धन, कुरीति उन्मूलन, व्यसन मुक्ति का उत्तरार्द्ध है। आस्तिकता संवर्द्धन प्रकाराँतर से शाँतिकुँज का साधना आँदोलन है।

इस तरह पूरे भारत में (संख्या भले ही न्यूनाधिक हो) एक स्वर से अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा जिन आँदोलनों को गति दी जा रही है, वे इस प्रकार हैं−

साधना आँदोलन−आस्तिकता संवर्द्धन

सबके लिए सुगम साधना ताकि सबके उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना की जा सके। उपासना की गहराई बढ़ एवं हमारी प्रार्थना−उपासना जीवन−साधना की ओर उन्मुख हो। इसके लिए उपलब्ध है, सबके लिए सुलभ उपासना−साधना पुस्तिका। इसका संशोधित−संवर्द्धित संस्करण शांतिकुंज, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं सभी तीस साहित्य विस्तार पटलों पर उपलब्ध हैं।

स्वास्थ्य आँदोलन

स्वास्थ्य संवर्द्धन कार्यक्रम जिसके अंतर्गत जन−जन को स्वस्थ रहने के नियम, सर्वसुलभ योग−व्यायामों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। साथ ही जड़ी−बूटी चिकित्सा के प्रयोगात्मक सूत्र भी बताए जा रहे हैं। इस पर आगामी वर्ष से विश्वविद्यालय में कोर्स आरंभ होने जा रहे हैं। सब तक चिकित्सा सुविधाएँ पहुँचाने के लिए ग्रामतीर्थ योजना के अंतर्गत चिकित्सा कैंप लगाए जाने के निर्देश दिए जा रहे हैं। सहयोगी पुस्तकें हैं, प्रज्ञा−अभियान का योग−व्यायाम, जड़ी−बूटी संदर्शिका, मसाला वाटा, स्वास्थ्य विषयक तपोभूमि द्वारा प्रकाशित छोटी−छोटी पुस्तिकाएँ।

शिक्षा आँदोलन

इसके अंतर्गत विद्यालयों महाविद्यालयों में विचारक्राँति विस्तार, बाल संस्कारशालाएँ, कामकाजी विद्यालय, भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा, युगनिर्माण योजना का पत्राचार पाठ्यक्रम तथा देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के बहुमुखी पाठ्यक्रम आते हैं। अगले दिनों इसके डिस्टेंट सेंटर्स सारे भारत में खुलने की संभावनाएँ हैं। सहयोगी पुस्तकें हैं, तपोभूमि की छोटी कई पुस्तिकाएँ, संस्कृति मंडलों की स्थापना, छात्रों में नैतिक विकास की कार्य योजना, शिक्षक संदर्शिका,नैतिक शिक्षा (दो भागों में)।

स्वावलंबन आँदोलन

गाँवों नगरीय इकाइयों को साँस्कृतिक−आर्थिक स्वावलंबन की ओर बढ़ाना। युवाशक्ति को बेरोजगारी से मुक्ति दिलाकर उन्हें गाँवों में ही रहने को प्रेरित करना। स्वावलंबी बनाने को हर वर्ग के लिए व्यावहारिक कार्ययोजना देना। ग्रामतीर्थ योजना, गौ केंद्रित कृषि एवं अर्थव्यवस्था पर जोर देना, इनके प्रशिक्षण चलाना। सहयोगी पुस्तकें हैं, ग्रामोत्थान की ओर, आर्थिक स्वावलंबन, केंचुआ−खाद संदर्शिका, राष्ट्र के अर्थतंत्र का मेरुदंड गौशाला, जयति जय गौ माता (पुस्तक व कैसेट), पंचगव्य चिकित्सा।

व्यसन मुक्ति एवं कुरीति उन्मूलन

समाज में छाई सभी कुरीतियों−विवाहोन्माद−दहेज−नेग के दिखावे जैसी प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम समझाकर उनके खिलाफ आँदोलन। साथ ही व्यसनों के खिलाफ संघर्ष, सामाजिक चेतना जगाना, रैली एवं श्रेष्ठ विकल्प प्रदान करना। व्यसनों कुरीतियों से बचाकर सृजन में लगाने की वृत्ति पैदा करना। इसी सीरिज में तपोभूमि द्वारा छोटी−छोटी कई पुस्तिकाएँ निकाली गई हैं। वाटिका (जयपुर) शक्तिपीठ द्वारा एक बड़ी विस्तृत मार्गदर्शिका प्रकाशित की गई है। नशा निवारण पर तीन नई पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।

पर्यावरण आँदोलन

औद्योगीकरण प्रदूषण से हानियों के प्रति जनजाग्रति लाकर प्रकृति के प्रकोप से बचने की, हरीतिमा संवर्द्धन की रीति−नीति देना। कचरा निस्तारण की विधियाँ प्रचलित करना तथा पर्यावरण वाहिनियाँ बनाकर उनके द्वारा आँदोलन चलाया जाना। तुलसी आरोपण से लेकर जड़ी−बूटी की पौदों व वृक्षों का आरोपण, स्मृति उपवन की शृंखलाएं बनाना इसी में आता है। इस विषय में संबंधित ढेरों पुस्तक−पुस्तिकाएँ उपलब्ध हैं।

महिला जागरण

आँदोलन के रूप में नारी को अधिकार दिलाए जाने, अपना सृजनशील स्वरूप निखारने हेतु प्रेरित करना तथा स्थान−स्थान पर महिला मंडल बनाकर उनके द्वारा शिक्षा−स्वावलंबन−सुरक्षा−संस्कार के चतुर्मुखी कार्यक्रमों को गति देना। इसी धुरी पर शाँतिकुँज के मार्गदर्शन में ब्रह्मवादिनी बहनों के कार्यक्रम चल रहे हैं। अगले दिनों नारीशक्ति के केंद्रीय व क्षेत्रीय प्रशिक्षण भी आयोजित होंगे। संदर्भ पुस्तिकाएँ ढेरों उपलब्ध हैं।

इस प्रकार इन सात आँदोलनों को सक्रिय बनाने के लिए हर परिजन से कहा जा रहा है। संगठन सशक्त तभी होगा जब वह समाज में अपनी प्रामाणिकता इन सात क्राँतिकारी आँदोलनों द्वारा सिद्ध कर सके। इसी निमित्त कार्ययोजना बनाने व सारे भारत का एक सुव्यवस्थित−संगठित स्वरूप बनाने के लिए छह जोन बनाए गए, जिनमें से पश्चिमोत्तर (पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, हिमाचल, दिल्ली, पं. उत्तर प्रदेश व उत्तराँचल), पूर्वोत्तर (आसाम, पं. बंगाल, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, सिक्किम, भूटान व पूर्वी नेपाल, उत्तरी झारखंड, पूर्वी बिहार) तथा दक्षिण भारत (दक्षिणी म. प्र., छत्तीसगढ़. उड़ीसा, महाराष्ट्र आँध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं केरल) के दौरे पूरे हो चुके, वहाँ का केंद्रीय व क्षेत्रीय संगठनात्मक ढाँचा, आँदोलनों का स्वरूप तय हो चुका। अब नेपाल व तराई के, उ. प्र. व बिहार के जिले, राजस्थान व गुजरात तथा केंद्रीय जोन (दक्षिणी बिहार, दक्षिण झारखंड, उत्तरी छत्तीसगढ़, म. प्र. के शेष जिले, उत्तर−प्रदेश के शेष जिले) का दौरा इन दो माहों में पूरा होकर दिसंबर 2002 तक एक सघन मंथन सारे राष्ट्र में हो चुका होगा।

इस संगठन वर्ष में एक और विधा स्थापित करने का मन बना है। वह है प्रत्येक जिले या सक्रिय जोन में प्रबुद्ध वर्ग की प्रज्ञा परिषद् की स्थापना का। इस विशिष्ट वर्ष में यदि हम शिक्षक−चिकित्सक−अधिकारीगणों सहित सभी गणमान्य नागरिकों को रोटरी लायंस, भारत विकास परिषद् की तरह एक परिषद में बाँध सके एवं उन्हें सुनियोजित कार्यक्रम दे सके तो यह विभूतियों का श्रेष्ठतम सदुपयोग होगा। उस संबंध में विस्तार से परिजन आगे तीनों पत्रिकाओं में पढ़ेंगे। तपोभूमि का स्वर्ण जयंती वर्ष कुछ विशिष्ट उपलब्धियाँ लेकर आए, शपथ समारोह में मिशन को सक्रियता के उफान तक ले जाने वाले प्राणवान सक्रिय परिजन ही आएँ तथा सभी घटकों को साधना और भी निखरे, यही मंगलकामनाएँ हमारी हैं।


केंद्र के समाचार−विश्वव्यापी हलचलें

संगठनात्मक दौरों से सघन मंथन

विगत मई माह से ही आरंभ हुए छह जोन्स के संगठनात्मक दौरों से पश्चिमोत्तर, पूर्वोत्तर, दक्षिण भारत एवं राजस्थान−गुजरात क्षेत्र में कार्यकर्त्ताओं में एक नया उत्साह जागा है एवं उन्हें कार्ययोजना मिली है, कार्य करने का सही मार्गदर्शन मिला है। पूरे गुजरात का एक दौरा तो फरवरी−मार्च में जोनों की घोषणा के पूर्व हो चुका था, पर राजस्थान के पुष्कर क्षेत्र तथा पूर्वोत्तर के झारखंड सहित पश्चिम बंगाल का दौरा भी मई−जून माह में हुआ। साथ ही पूरे हरियाणा−पंजाब हिमालय, पं. उत्तर प्रदेश, दिल्ली व जम्मू क्षेत्र का दौरा भी सफलतापूर्वक संपन्न हो चुका है। दक्षिण भारत में छत्तीसगढ़ उड़ीसा, महाराष्ट्र का एक बड़ा व्यापक दौरा हो चुका है। दूसरे चरण में चारों प्राँतों का दौरा अगस्त माह में संपन्न हुआ। अब प्रत्येक जोन के चार−चार केंद्रीय व छह−छह क्षेत्रीय प्रभारी गणों की नियुक्ति एवं सभी की वर्कशॉप संपन्न हो रही है। ऐसा लक्ष्य है कि इस वर्ष दिसंबर तक पूरे पूर्वांचल का, अरुणाचल तक एवं नेपाल−तराई से लेकर कन्याकुमारी तक का मंथन हो जाए एवं हम यह आकलन कर सकें कि हमारी शक्ति वस्तुतः कितनी है।

चंडीगढ़ एक्सपो एक दिशानिर्देश स्थापित कर गया

24,25,26 मई को चंडीगढ़ में संपन्न कार्यकर्त्ता महासम्मेलन तथा विराट साइंटिफिक स्प्रिचुअल्टी एक्सपो (वैज्ञानिक अध्यात्मवाद प्रदर्शनी व वर्कशॉप) हमारे महानगरों के लिए एक दिव्यदर्शक कीर्तिमान स्थापित कर गया। 26 मई को मौसम बिगड़ने से कार्यक्रम अवश्य प्रभावित हुआ किंतु दो दिन तक चंडीगढ़ ही नहीं आप−पास के पंजाब, हरियाणा, हिमाचल के नगरों से आए स्कूल−कॉलेज के छात्रों, शिक्षक−शिक्षिकाओं ने सप्तसूत्री आँदोलन का जो दृश्य देखा उससे वे विशेष छाप लेकर गए। यहाँ वर्कशॉप व सेमीनार भी संपन्न हुई तथा तीव्र गर्मी के बावजूद प्रबुद्ध वर्ग के भागीदारी की। अब ऐसी वर्कशॉप की माँग बड़ौदा, अहमदाबाद, मुँबई, भोपाल व लखनऊ जैसे महानगरों से भी आ रही है।

मारीशस, यू. के. व साउथ अफ्रीका में केंद्रीय प्रतिनिधि

मारीशस गए शाँतिकुँज दल के कार्यक्रमों ने पूरे राष्ट्र को गायत्रीमय बना दिया । प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि वहाँ के भारत में उच्चायुक्त श्री दानी सिव शाँतिकुँज आए व यहाँ के कार्यक्रमों में भाग लेकर संस्था प्रमुख को अगले वर्ष गायत्री पर ही एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में मारीशस आमंत्रित किया। बेल्जियम में मारीशस के हाई कमिश्नर श्री सत्यवान गणेशी भी जुलाई के अंतिम सप्ताह में शाँतिकुँज सपत्नीक आए व उन्होंने यहाँ वैदिक पद्धति से विवाह दिवस मनाया। इंग्लैंड में गए डा. दत्ता व शाँतिभाई पटेल के दल ने पूरे यूरोप के दस देशों में एवं इंग्लैंड में स्थान−स्थान पर गायत्री महाशक्ति के विस्तार का अभियान सक्रिय कर दिया है। युवाशक्ति की भागीदारी अधिकाधिक हो रही है, यह प्रसन्नता का विषय है। डरबन, केपटाउन व जोहान्सबर्ग में कार्यक्रम करने एक दल अगस्त के प्रथम सप्ताह में रवाना हो गया। पूरे दक्षिणी व मध्य अफ्रीका का एक महासम्मेलन सितंबर के द्वितीय सप्ताह में आयोजित किया गया है।

गायत्री जयंती व गुरुपूर्णिमा पर्व सोल्लास संपन्न

इस वर्ष के ये दोनों ही पर्व ऐतिहासिक रहे हैं। दोनों में ही बीस हजार से अधिक परिजनों की उपस्थिति एवं विश्वविद्यालय शोध संस्थान व शाँतिकुँज आश्रम का पूरा परिसर खचाखच भरा होने के बावजूद किसी को तनिक भी असुविधा न हुई। सभी ने उल्लासपूर्वक इन पर्वों में भागीदारी की । अपनी अभियान साधना की पूर्णाहुति भी की एवं आगामी वर्ष की साधना के लिए नए संकल्प लिए। दोनों ही पर्व मिशन के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ गए हैं।

विश्वविद्यालय का विलक्षण समारोह

गुरुपर्व से एक दिन पूर्व देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में प्रवेश लिए हुए छात्र−छात्राओं व शिक्षकों का एक अद्भुत दीक्षारंभ समारोह संपन्न हुआ। तैत्तिरीय उपनिषद् के अनुसार वर्णित प्रतिज्ञाएँ छात्रों ने भी लीं एवं शिक्षकों ने भी लीं। पूर्णतः पुरातन गुरुकुल पद्धति पर आधारित इस आयोजन में विद्वान वक्ताओं के वक्तव्य भी हुए। उत्तरीयधारी गुरुजन व छात्र−छात्राएँ एक विलक्षण छटा दर्शा रहे थे। योग व मनोविज्ञान में 25 जुलाई से सत्र आरंभ हो गया है। अब इस क्रम को सभी विश्वविद्यालय में दुहराया जा सके ,इसका प्रयास जारी है,ताकि दीक्षाँत ही नहीं, दीक्षारंभ भी सभी स्थानों पर आयोजित होने लगें।

बैंगलोर में योग महाविद्यापीठम् का शुभारंभ

स्वामी विवेकानंद केंद्र बैंगलोर के प्रशाँति कुटीरम् स्थित 110 एकड़ में फैले क्षेत्र में डीम्ड यूनीवर्सिटी के रूप में विवेकानंद महाविद्यापीठम् का विधिवत शुभारंभ श्री वेकैयानायडू, श्री मुरली मनोहर जोशी, डॉ. नागेन्द्र बैंगलोर विश्वविद्यालय के कुलपति एवं देवसंस्कृति विद्यालय के कुलाधिपति की उपस्थिति में 14, 15, 16 जून को संपन्न हुआ। केंद्र के अनुरोध पर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति ने बैंगलोर के इस योग विश्वविद्यालय के अध्यक्ष (चान्सलर) का भी पद स्वीकार कर लिया है। दोनों विश्वविद्यालय के परस्पर आदान−प्रदान का क्रम भी विधिवत बैठ गया है।


संगठन की साधना


संगठन की साधना (Kavita)

दृढ़ संगठन मिशन का, मिलकर सँवारना है, अभ्यास बस इसी का, नवरात्रि साधना है।

प्राचीर इस भवन की है ठोस नींव वाली, हर ईंट तप−तितिक्षा से है गई निकाली, फिर भी कहीं दिखें यदि दीवार में दरों, हम सावधान होकर पहले उसे सुधारें,

बिखराव दूर करके, सबको दुलारना है। अभ्यास बस इसी का, नवरात्रि−साधना है।

हर कार्य है सरल, जब अनुकूल हो हवाएँ, जो लक्ष्य चाहते हैं, आगे कदम बढ़ाएँ, जो इस समय जगेगा, सबको जगाएगा जो, अनुदान दिव्य अनगिन, स्वयमेव पाएगा वो,

अब स्वार्थ−क्षुद्रता को बिलकुल बिसारना है, अभ्यास बस इसी का, नवरात्रि−साधना है।

हम संगठित रहेंगे तो शक्तिवान होंगे, उज्ज्वल भविष्यत् के हम शाश्वत प्रमाण होंगे, दुर्जन न देख हमको साहस जुटा सकेंगे, आतंक−भय न अपने सिर भी उठा सकेंगे,

यह शाँतभाव होकर हमको विचारना है, अभ्यास बस इसी का, नवरात्रि−साधना है

व्यक्तित्व में स्वयं के हम आत्मबल जगाएँ दुर्भाव को मिटाकर, सद्भावना बढ़ाएँ, परिवार के लिए भी हम कुछ समय निकालें, दायित्व राष्ट्रहित के, कल के लिए न टालें,

यह भाव हर हृदय में हरदम उभारना है, अभ्यास बस इसी का, नवरात्रि−साधना है।

हर लक्ष्य प्राप्ति का दृढ़ आधार साधना है, उत्कृष्टता−नियंत्रित व्यवहार साधना है, नवरात्रि−साधना के साधक सभी बने हम, पल भर नहीं प्रगति में बाधक कभी बनें हम

उत्कृष्ट भाव−चिंतन ही धर्म−धारणा है। अभ्यास बस इसी का, नवरात्रि−साधना है।

−शचीन्द्र भटनागर

*समाप्त*