‘माँ’ के स्नेहिल स्मरण से हम सबके मन-प्राण अनोखी पुलक से भर जाते हैं। अनेकों अहसास, अगणित अनुभूतियाँ और असंख्य भावनाएँ अन्तःकरण के आँगन में बरबस बरस पड़ती हैं। यादों के सघन घन बार-बार अर्न्तगगन में उमड़ते हैं और माँ के प्यार का जीवन-जल मुरझाए प्यासे प्राणों पर उड़ेल देते हैं। ऐसा लगता है कि अपनी माँ सुदूर किसी लोक में नहीं, अपने पास है, एकदम पास। उसके आँचल का छोर हमें छू रहा है। उसके आशीषों की छाँव में अपना जीवन सुरक्षित है।
‘माँ’ तुम्हारे सिवा हम बच्चों का और है भी कौन? जब-तब, समय-कुसमय हम सब सिर्फ तुम्हें ही पुकारते हैं। जीवन की हर चोट, हर दुःख-दर्द में हे माँ! हमें केवल तुम्हारी याद आती है। आँसू भरी आँखों और पीड़ा से विकल हमारे जीवन के लिए तुम्हारी याद ही एकमात्र औषधि है। हमें अच्छी तरह से मालूम है कि हमारी कमियों-कमजोरियों, बेवकूफियों, नादानियों को एक तुम्हीं अनदेखा करके हमको अपना सकती हो।
‘माँ’ तुम्हारी क्षमा अपार है। इसकी न तो कोई सीमा है और न ही शर्तबन्दी। क्षमा ही तुम्हारा स्वभाव है। क्षमा तुमसे ऐसे बहती है जैसे फूल से गन्ध बहती है, दीए से रोशनी बहती है। जैसे पहाड़ों से जल उतरता है, मेघों से वर्षा होती है। हे क्षमास्वरूपिणी माँ! सृष्टि के हर स्थूल-सूक्ष्म विधान में प्रत्येक छोटी-बड़ी गलती या अपराध के लिए कोई न कोई सजा निश्चित है। सृजेता के कठोर कर्मफल विधान से सभी बँधे हैं। यहाँ तक कि स्वयं सृजेता भी कर्मफल की हस्तरेखाओं को स्वीकार करता है। परन्तु हे क्षमामयी! तुम्हारी क्षमा शक्ति से जीवन के महापातक भी पल में विनष्ट होते हैं। यह सृष्टि के समस्त विधानों से अनन्त गुना समर्थ है।
‘माँ’ यह एकाक्षरी महामंत्र ही हमारा प्राण है। माँ! माँ!! जपते हुए ही हमारे ऊपर तुम्हारी कृपा किरणों की वृष्टि हुई है। जीवन में अलौकिक अनुभूतियों के अनेकों सुअवसर आए हैं। तुम्हारी लीला-कथा का पुण्य स्मरण भी इन्हीं में से एक है। हे माँ! अब ऐसी कृपा करो कि यह पुण्य कथा तुम्हारे ही अमित प्रभाव से हम सब बच्चों को तुम्हारी अविरल भक्ति का वरदान देते हुए मातृ तत्त्व का बोध करा सके।
मातृतत्त्व जीवन और जगत् की समस्त संवेदनाओं एवं सम्भावनाओं का मूल है। सृजन के सभी संवेदन इसी की उर्वरता में अंकुरित होते हैं। सृष्टि की सारी सम्भावनाएँ यहीं से अपनी अभिव्यक्ति पाती हैं। यही वह परम पूर्णता है, जिसके एक अंश से जगत् का विस्तार हुआ है। इस सत्य को वैदिक ऋषियों ने ‘एकाँशेन स्थिति जगत्’ कहकर परिभाषित किया है। यह सृष्टि की कोख है, जिससे जीवन के विविध रूप जन्में हैं। दार्शनिकों ने इसी को जीवन व जगत् के सभी अनिवार्य तत्त्वों को धारण और पोषण करने वाली मूल-प्रकृति कहा है। यही ऋग्वेद में वर्णित आदिमाता अदिति हैं जो स्वयं अनादि, अखण्ड और अविभाज्य रहते हुए भी सभी लोकों को जन्म और जीवन देती है। अन्त में सब इसी में विलीन हो जाते हैं। विश्व-ब्रह्मांड को संचालित करने वाली आदि शक्ति इसी मातृतत्त्व का ही परिचय एवं पर्याय है।
मातृतत्त्व का बोध समस्त योग साधनाओं की चरम परिणति है। योग के विभिन्न तत्त्व व प्रकार, विधि और अनुशासन इसी परम पूर्णता को जानने व पाने के लिए है। चित्तवृत्ति निरोध से मातृतत्त्व की चित् शक्ति ही प्रकाशित एवं प्रकट होती है। इसी में साधक को अपने स्वरूप का बोध होने के साथ अनेकानेक यौगिक विभूतियों की प्राप्ति होती है। साधकों की साधना व सिद्धि की आधारभूमि यही है। यही योगियों की कुण्डलिनी शक्ति है। जिसके जागरण मात्र से योग साधकों में महाशक्ति की अभिव्यक्ति के अनेकों स्रोत खुल जाते हैं। मातृतत्त्व की कृपा से ही योग साधक सक्षम व समर्थ बनता है। अनेकानेक सिद्धियाँ एवं विभूतियाँ उसका अनुगमन व अनुसरण करती हैं। उसमें कैवल्य की प्रभा प्रकाशित होती है।
अपनी सम्पूर्णता में योगगम्य, ध्यानगम्य एवं ज्ञानगम्य मातृतत्त्व का सामान्य परिचय जीव को जन्मते ही हो जाता है। प्रत्येक प्राणी मातृतत्त्व की सजल भावानुभूतियों में जीवन पाता है। उसकी माँ ही उसके लिए सब कुछ होती है। उसके हृदय से पहली पुकार माँ के लिए उठती है। होठों से पहला शब्द माँ निकलता है। सारे रिश्ते-नाते, सारी सम्बन्ध-संवेदनाएँ मातृतत्त्व के इर्द-गिर्द अपना अस्तित्त्व बुनती हैं। सबके केन्द्र में माँ ही होती है। जो माँ से घनिष्ठ होता है, उसी से घनिष्ठता की अनुभूति होती है। माता के संवेदन विस्तार में जीवन की संवेदनाएँ विस्तार पाती हैं। जन्मकाल में केवल यही एक जीवन सत्य अपनी सम्पूर्ण तीव्रता में समूचे अस्तित्त्व में स्पन्दित होता है। यह समझने में किसी को तनिक सी भी देर नहीं लगेगी कि प्रत्येक शिशु का जीवन मातृमय होता है। मातृतत्त्व ही उसके लिए सुख, सुरक्षा, आनन्द एवं प्रेम का पर्याय है।
परन्तु ये भावानुभूतियाँ स्थायी नहीं रह पाती। जैसे-जैसे जीवन चेतना बहिर्मुखी होती है, ये शनैः शनैः विलीन होती जाती हैं। अहंता के सुदृढ़ होते ही वे सम्बन्ध-संवेदनाएँ दुर्बल होती जाती हैं, जो कभी माता के गर्भ में अपने जीवन को मजबूती से बाँधे हुए थीं। अहंता और बौद्धिकता जीवन को जन्म देने वाली माता से विछोह करा देती है। अंश स्वयं को परम-पूर्ण समझने का दम्भ पाल लेता है। विस्मृति की अचेतनता से जीवन चेतना बुरी तरह घिर जाती है। ‘विद्या समस्तातवदेविभेदा स्त्रिया समस्ता सकला जगत्सु’ अर्थात् ‘हे माता विश्व की सारी विद्याएँ एवं जगत् की सारी स्त्रियाँ तुम्हारा ही स्वरूप हैं।’ का सूत्र खो जाता है। मातृतत्त्व से विलग होकर जीवन अनजान अंधेरों की भटकन में भटकने लगता है।
इस भटकन से उबरने का एक ही उपाय है- मातृतत्त्व के प्रति सच्ची अभीप्सा। जगत् और जीवन को जन्म देने वाली माता के प्रति अविरल अनुराग। यही उस महायोग का प्रारम्भ बिन्दु है, जो जीवन की अपूर्णता को परम पूर्णता की ओर ले जाता है। और अपनी चरम परिणति में उसे पूर्णता का वरदान देता है। वैदिक ऋषियों से लेकर महायोगी श्री अरविन्द ने इसी पथ का अनुसरण किया है। इस पथ पर चलकर ही वे पूर्णता के वरदान से लाभान्वित हुए। ऋग्वेद के अनगिनत मंत्रों के साथ श्री अरविन्द के मंत्र-काव्य सावित्री की अनेकानेक पंक्तियाँ इस समाधि-सत्य की साक्षी हैं। महायोगी श्री अरविन्द ने मंत्र काव्य सावित्री के तीसरे पर्व को- ‘भगवती श्री माता का पर्व’ कहा है। इसमें मातृतत्त्व की बड़ी ही मार्मिक एवं अनुभूतिपूर्ण व्याख्या है।
परम पूज्य गुरुदेव की अनुभूति भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने एक नहीं अनेक स्थानों पर कहा है कि मातृतत्त्व की साधना ही जीवन को संस्कारित एवं परिष्कृत करती है। इसी से जीवन समर्थ एवं शक्तिवान बनता है। इस सम्बन्ध में उन्होंने समय-समय पर कुछ विशेष बातें भी बतायी। उन्होंने कहा कि काल प्रवाह में सामान्य एवं असामान्य क्षण प्रवाहित होते रहते हैं। सामान्य क्षणों में मानव मातृतत्त्व की अभीप्सा करता है। माता की परम पूर्णता का बोध पाने के लिए योग साधना में निरत रहता है। ध्यान व ज्ञान की साधना करके आदिमाता से अपने जीवन की पूर्णता का वरदान पाने की प्रार्थना करता है।
परन्तु असामान्य क्षणों में अपनी कोख से जीवन और जगत् को प्रसव करने वाली माता स्वयं यत्नशील होती है। सृष्टि को सुसंस्कारित करने के लिए वह स्वयं युगशक्ति बनकर अवतरित होती है। वह अपनी भटकी हुई सन्तानों को राह दिखाने के लिए आती है। उसकी दैवी चेतना मानवीय देह से अभिव्यक्त होती है। महादेवी स्वयं मानवी बनकर अपनी असंख्य सन्तानों को लाड़-दुलार करती है। आदिशक्ति, युगशक्ति का रूप धारण कर सत्पथ का प्रवर्तन करती है। जगन्माता किसी संकेत, इंगित अथवा आदेश से नहीं बल्कि स्वयं जीवन के सभी आयामों को जीकर तत्त्व और सत्य का बोध कराती है। अपने बच्चों को अंगुली पकड़कर जीवन जीने की कला सिखाती है।
सृष्टि के इतिहास में ये क्षण बड़े ही महिमामय होते हैं। अनगिनत आकुल क्षणों की पुकार का उत्तर देने के लिए करुणामयी माता अवतार लेने के लिए संकल्पित होती है। बड़ा ही भाग्यवान होता है वह देश, धरा का वह आँचल जिसे आदि जननी अपनी लीलाभूमि के रूप में चुनती है। बड़े ही पुण्यशाली होते हैं वे लोग जो किसी भी रूप में उनके स्वजन एवं परिजन बनते हैं। इन सब से भी कहीं अधिक धन्य वे होते हैं, जो भक्ति से उफनते अपने हृदयों को माता के चरणों में उड़ेलकर मातृतत्त्व का अर्चन-वंदन करते हैं। वे भी कम पुण्यवान नहीं होते, जो दिव्य जननी की लीला कथा का स्मरण-चिन्तन एवं अवगाहन करते हुए उनकी ज्योतिर्मय चेतना से एकात्म होने की साधना करते हैं।
साधना के भावपूर्ण स्वरों का उत्तर देने के लिए ही तो भावमयी माता भगवती अवतार लेती है। इसीलिए तो मातृतत्त्व की विशुद्ध चेतना घनीभूत होकर स्थूल रूप में प्रकट होती है। मानव की जन्म-जन्मान्तर की आध्यात्मिक अभीप्साओं का उत्तर देने के लिए ही मातृतत्त्व की दिव्य-ज्योति जन्म लेती है। उसके प्रकाश से लोकों के बाह्य आवरण ही नहीं जीवों के अन्तःकरण भी प्रकाशित होते हैं। युगशक्ति के अवतरण से हवाओं में अलौकिक सुगन्ध फैलने लगती है। जाग्रत् आत्माएँ अपने अन्तःकरण में बड़े ही अद्भुत स्पन्दनों को अनुभव करती हैं। आदिशक्ति की दिव्य ज्योति के जन्म का महोत्सव मनाने के लिए ऋषि, देवता एवं सिद्धगण सक्रिय होने लगते हैं। सृष्टि की समस्त दिव्य शक्तियों में एक अनोखी सचेतनता व्याप्त हो जाती है। आदिशक्ति की अवतरण बेला में कुछ ऐसा ही होने जा रहा था।
संघर्ष और आँधियों से...
दिव्य ज्योति के जन्म की शुभ घड़ी समीप आने लगी थी। मातृतत्त्व मानवीय रूप और आकार ले रहा था। आदिशक्ति के युगशक्ति के रूप में अवतरण का संकल्प सूक्ष्म जगत् में मुखरित हो चला था। साँवरिया बोहरे समुदाय (आगरा) के पं. जसवन्तराव शर्मा के परिवार में इसके स्पन्दन तीव्रगति से संघनित होने लगे थे। घर के वातावरण में दिव्यता की कुछ अलग सी तरंगें हर क्षण तरंगित होती रहती। एक अलौकिक महक मकान के कोने, चौबारे व आँगन में रह-रहकर सघन हो उठती। परिवार के सभी सदस्यों के मन, अन्तःकरण में उल्लास उमगता रहता। एक अनजानी खुशी हर एक को घेरे थी।
पिछले कुछ महीनों से होने वाले इन परिवर्तनों को सबसे पहले जसवन्तराव ने महसूस किया। जसवन्तराव बड़े ही सीधे-सरल स्वभाव वाले आध्यात्मिक प्रकृति के व्यक्ति थे। उनकी सहधर्मिणी रामप्यारी शर्मा पति के अनुरूप जीवन यापन करने वाली भक्तिमती महिला थी। उनकी कोमलता व सेवा परायणता की घर-परिवार के लोग, स्वजन-सम्बन्धी और कुटुम्बी बड़ाई करते नहीं अघाते थे। आस-पड़ोस की बड़ी-बूढ़ी महिलाएँ बात-बात में उनका उदाहरण दिया करती थीं। जब-तब वे आपस की चर्चाओं में कहा करतीं- देखो, जसवन्तराव की बहू को घर-परिवार और बच्चों को कितनी अच्छी तरह से सम्हालती है। और फिर पूजा-पाठ और जप-तप भी कितना करती है। प्रशंसा के इन स्वरों में यथार्थ की सार्थकता थी।
इस ब्राह्मण दम्पत्ति के पुण्य चरित्र और तप परायणता को देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो ये प्राचीन काल के ‘सुतपा और पृश्नि’ हैं। माता भगवती की उपासना-आराधना दोनों को ही परमप्रिय थी। जसवन्तराव नित्य-नियम से देवी सप्तशती का सम्पूर्ण पाठ किया करते थे। उनका घर-आँगन प्रतिदिन जगन्माता के महिमागान से मुखरित होता था। सप्तशती के सम्पूर्ण पाठ के साथ गायत्री मंत्र एवं नवार्ण मंत्र पर उनकी गहन आस्था थी। ‘ॐ ऐं ह्री क्लीं चामुण्डाय विच्चै’ का जप करते हुए वह भावलीन हो जाते थे। देवी सप्तशती के पाठ के समय प्रायः रोज ही उनकी आँखों से भावबिन्दु झरने लगते। यदा-कदा रामप्यारी अपने पति से उनके इन भावाश्रुओं के बारे में पूछ लेती। प्रश्न के उत्तर में वह गदगद हो कहते, जब मैं पाठ करता हूँ, तब मुझे लगता है कि माँ छोटी बालिका के रूप में मेरे पास बैठी है। मंत्र जप करते समय भी ऐसा ही लगता है। कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि छोटी बालिका के रूप में ‘माँ’ मेरी गोद में आकर बैठ गयी है।
पति की इन बातों को सुनकर रामप्यारी भावमग्न हो जाती। उन्हें इस तरह चुप बैठा हुआ देखकर जसवन्तराव पूछ बैठते- तुम चुप क्यों हो गयी? एक-दो बार पूछने पर वह धीरे से कहती- आजकल मुझे भी बड़े विचित्र सपने आने लगे हैं। अभी एक-दो दिन पहले ही मैंने सपना देखा कि मैं हिमालय पर हूँ। श्वेत-शुभ्र हिम शिखर बड़े ही भव्य लग रहे थे। तभी उन हिम शिखरों पर एक देवी प्रकट हुई। सचमुच ही देवी थी वो। धीरे-धीरे वो छोटी सी लड़की बनकर मेरा हाथ पकड़ कर बोली- माँ मैं तुम्हारे घर आने वाली हूँ। एक सपना तो मैंने आज ही देखा- सपने में छोटी-छोटी आठ लड़कियाँ एक बड़ी प्यारी सी लड़की को अपने साथ लेकर मेरे पास आयीं हैं और मुझसे कह रही हैं, हम सब इसको तुम्हें देने आयीं हैं। आज से तुम ही इसकी माँ हो, साथ ही हमारी माँ भी हो। क्योंकि हम सब तो इसी की अंश हैं।
पत्नी की इन बातों को सुनकर जसवन्तराव कुछ पलों के लिए अन्तर्लीन हो गए। उन्हें पत्नी के गर्भवती होने की बात पता थी। परन्तु ये स्वप्न उन्हें गर्भ की दिव्यता के सूचक लग रहे थे। घर के वातावरण में भी आध्यात्मिक बदलाव के चिह्नों को वे काफी दिनों से अनुभव कर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि उनके जीवन में कोई दिव्य घटना घटित होने वाली है। उन्हें इस तरह सोच में डूबा हुआ देख रामप्यारी बोली- तुम चुप क्यों हो? कुछ कहते क्यों नहीं? पत्नी के इन प्रश्नों से उनके चिन्तन की कड़ियाँ झंकार के साथ बिखर गयीं। वह अपने भावों से उबरते हुए रामप्यारी से बोले- मुझे लगता है इस बार माता भगवती जगदम्बिका स्वयं हम पर, तुम पर, अपने पूरे परिवार पर कृपा करने के लिए अवतीर्ण हो रही हैं।
जसवन्तराव की इन बातों को सुनकर रामप्यारी भाव विह्वल हो गयीं। उनकी आँखें छलक उठीं। उन्होंने मन ही मन आदि माता जगदम्बा को प्रणाम किया और उठ खड़ी हुई। अभी उन्हें घर के काफी काम करने थे। लेकिन आज वह घर के काम को करते हुए महसूस कर रही थीं कि उनके भीतर एक अद्भुत आनन्द धारा मन्दगति से बह रही है। इससे उनका रोम-रोम, अस्तित्त्व का अणु-अणु भीग रहा है। काम करते हुए बीच-बीच में उन्होंने अपने दोनों बेटों दीनदयाल एवं सुनहरी लाल और बेटी ओमवती को भरपूर प्यार किया। शायद वह अपने भीतर उमड़ती-उफनती आनन्द सरिता के प्रवाह को अपने बच्चों में भी उड़ेलना चाहती थीं।
रात को सोते समय दिव्य भावानुभूतियों ने उन्हें फिर घेर लिया। उन्हें लगा कि दिव्य लोकों के देवगण, देवियाँ, सूक्ष्म शरीरधारी ऋषि और सिद्ध जन उनके गर्भ पर पुष्पवृष्टि कर रहे हैं। अब यह किसी एक दिन की बात नहीं नित्य का क्रम हो गया था। गर्भ की अवधि ज्यों-ज्यों पूर्णता की ओर बढ़ रही थी, ये भावानुभूतियाँ भी उत्तरोत्तर सघन होती जा रही थी। उनके प्राणों में पुलक बढ़ती जा रही थी। उनकी निर्मल अन्तर्चेतना और अधिक उज्ज्वल दीप्ति से प्रकाशित होती जा रही थी।
काल चक्र की बढ़ती गति के साथ वह दिव्य मुहूर्त आ गया, जिसे देवों और ऋषियों ने निश्चित किया था, जिसकी प्रतीक्षा जसवन्तराव एवं रामप्यारी को ही नहीं सम्पूर्ण विश्व मानवता को थी। आश्विन कृष्ण चतुर्थी सम्वत् 1982, 20 सितम्बर 1926 ई. की प्रातः 8 बजे के लगभग दिव्य ज्योति ने जन्म ले लिया। पं. जसवन्तराव शर्मा उस समय देवी के नवार्ण मंत्र का जप कर रहे थे। उनके ध्यान में माता की छवि प्रत्यक्ष थी। उनके हृदय की गहराइयों में उपस्थित आदिमाता उन्हें आशीष दे रही थी। तभी उनके कानों में किसी वृद्ध महिला के यह शब्द सुनायी पड़े कि लेडी लायल अस्पताल में ठीक आठ बजे कन्या जन्मी है। लेकिन आश्चर्य, अस्पताल के इस समाचार के साथ उनके हृदय में कुछ और भी गूँज उठा। उन्होंने बड़ी ही स्पष्ट रीति से अपने हृदय में श्री देव्यथर्वशीर्षम् की यह मंत्र ध्वनि सुनी- ‘अहमानन्दानन्दौ। अहं विज्ञानाविज्ञाने। अहं ब्रह्मब्रह्मणी वेदितव्ये। अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि। अहमखिलं जगत्।’ अर्थात्- ‘मैं आनन्द और अनानन्दरूपा हूँ। मैं विज्ञान और अविज्ञानरूपा हूँ। अवश्य जानने योग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी मैं ही हूँ। पञ्चीकृत और अपञ्चीकृत महाभूत भी मैं ही हूँ। यह सारा दृश्य जगत् मैं ही हूँ।’ इस स्पष्ट मंत्र ध्वनि को अपनी अन्तर्चेतना में सुनकर जसवन्तराव को यह साफ हो गया कि आदिमाता ने आगमन के साथ ही उन्हें अपना परिचय दे दिया है। वह आदिमाता को प्रणाम करके पूजा के आसन से उठे और कपड़े बदलकर लेडी लायल अस्पताल की ओर चल पड़े। उन्हें अपने ज्योतिष ज्ञान की भी सार्थकता सिद्ध करनी थी।
स्वतंत्रता संग्राम में जूझते हुए राणाप्रताप ...
पिता का ज्योतिष ज्ञान पुत्री को गोद में लेते ही सार्थक हो गया। उन्होंने कन्या के जन्म मुहूर्त पर मन ही मन विचार किया। होरा, लग्न, ग्रहों की युति और उनकी भावदशा के बारे में गणनाएँ की। और उनके चेहरे पर प्रसन्नता की रेखाएँ झिलमिला उठी। ज्योतिष की गणनाएँ एक के बाद एक उन्हीं तथ्यों की ओर संकेत कर रही थीं, जिनका अहसास उन्हें अपनी ध्यानस्थ चेतना में हुआ था। साधना काल में और ज्योतिष विद्या का गहन अवलोकन करते समय उन्हें बार-बार इस तथ्य की अनुभूति होती थी कि सन् 1926 ई. महान् आध्यात्मिक शक्ति के अवतरण का वर्ष है। परन्तु कैसे और किस तरह? इन प्रश्नों के हल वे नहीं खोज पाते थे।
यद्यपि उनकी साधनात्मक एवं ज्योतिषीय अनुभूतियों का इतिहास साक्षी बन रहा था। इस वर्ष की बसन्त पंचमी को विश्व की महानतम आध्यात्मिक घटना घट चुकी थी। परम पूज्य गुरुदेव (पन्द्रह वर्षीय श्रीराम) ने अपने हिमालयवासी महागुरुदेव के मार्गदर्शन में अखण्ड साधना दीप प्रज्वलित किया था। उनकी चौबीस वर्षीय चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला इसी वर्ष प्रारम्भ हुई थी। इसके अतिरिक्त श्री अरविन्द आश्रम पाण्डिचेरी में महायोगी अरविन्द पूर्णयोग की विशेष सिद्धि को अवतरण करने की सफलता प्राप्त कर रहे थे। इस वर्ष के अन्तिम महीनों में ही अतिमानसिक चेतना धरती पर अवतरित हुई थी। और महायोगी अरविन्द अतिमानसिक चेतना के अवतरण के लिए परिपूर्ण एकान्त में चले गए थे।
लेकिन जिस आध्यात्मिक शक्ति के अवतरण के साक्षी आज जसवन्तराव थे, वह उपरोक्त दोनों ही घटनाओं से कहीं अधिक विशिष्ट थी। क्योंकि इसमें आध्यात्मिक महाशक्ति ने स्वयं ही स्थूल देह धारण करके अवतार लिया था। आदिमाता स्वयं ही अपनी लीलाभूमि में आविर्भूत हुई थी। नीलगगन में सूर्यदेव बड़े ही सुखद आश्चर्य से इस दृश्य को निहार रहे थे। उन्हें अपनी शत-सहस्र किरणों से सद्यः अवतरित जगदम्बा के अर्चन-वन्दन का सौभाग्य प्राप्त हो रहा था। समूचे वातावरण में आज एक स्निग्ध शान्ति, शीतलता और मधुर सुवास व्याप्त हो रही थी। धरती का यह छोटा सा कोना तीर्थभूमि बन गया था। यहाँ एक ही पल में अनेक परिवर्तन घटित हो गए थे।
लेकिन जसवन्तराव की भाव-भूमि अपरिवर्तित थी। वह तो बस सुरभि-भरी कुसुम-कलिका की भाँति कमनीय कान्ति को बिखेरती अपनी कन्या को गोद में लिए बस देखे जा रहे थे। यदि पड़ोस की महिला उन्हें न टोकती तो वे न जाने कब तक यूँ ही खोए रहते। ऐसा क्या है इस लड़की में, जो तब से उसे देखे जा रहे हैं? उसके इस तरह कहने पर उनकी भाव समाधि भंग हुई। और वे बड़े ही हर्षित स्वर में बोले- यह लड़की बहुत ही भागवती है। यह हजारों-हजार लोगों को भर पेट खाना खिलाकर खाएगी। फिर थोड़ी देर में कुछ सोचते हुए कहने लगे- यह तो सभी के भाग्य को बनाने वाली भगवती है।
पड़ोस की महिला को उनकी ये गूढ़ बातें कुछ भी समझ में न आयी। वह तो बस लोक प्रचलन के अनुसार इतना भर जानती थी कि लड़का होना अच्छा होता है और लड़की होना बुरा। उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि जसवन्तराय घर में लड़की होने पर इतना खुश क्यों हो रहे हैं। उनकी बातों में उसे केवल इतना समझ में आया कि उन्होंने अपनी पुत्री का नाम ‘भगवती’ रखा है। उसने कन्या को उनकी गोद से लेकर लेडी लायल अस्पताल के एक कक्ष में विश्राम कर रही माँ के पास लिटा दिया। इस नाम के स्वर कन्या की माँ के कानों में भी पड़े। उन्होंने बड़े ही लाड़ से अपनी बेटी की ओर निहारा। सदा हंसमुख, लीला चंचल उस नन्हीं सी बालिका के सुस्मित नेत्रों में जैसे कोई सम्मोहिनी शक्ति थी। जिसे देखकर वह बरबस सोचने लगी- अहा, कितनी सुन्दर आँखें हैं, मानों देवी के नेत्र हैं। मेरी यह बेटी सचमुच ही माता भगवती है। माता के ममत्व एवं पिता के स्नेहमय लालन में भगवती शशिकला की भाँति दिनों-दिन बढ़ने लगी। स्वजनों के साथ उसका बचपन बीतने लगा।
पास के कुएँ को ..
स्वजनों के साथ बीत रहे बचपन के इन पलों में बड़ी ही मिठास थी। यदा-कदा इनके अनूठेपन के झरोखे से अलौकिकता झाँक उठती। भगवती अपनी माँ के साथ सभी भाई-बहिनों की लाडली थी। रंग-रूप सामान्य होते हुए भी उसमें एक दैवी मोहिनी थी। अड़ोस-पड़ोस के लोग, रिश्ते-नातेदार, सगे-सम्बन्धी सभी इस दैवी सम्मोहन में अनायास बंध जाते थे। वह सभी की प्रिय ‘लाली’ थी। ब्रज क्षेत्र में यह शब्द बहुत प्यारी, लाडली, छोटी बालिकाओं के लिए प्रयुक्त होता है। कथा-किम्वदन्ती तो यह भी है कि इस शब्द को सबसे पहले बरसाने में राधा-रानी को पुकारने के लिए प्रयोग किया गया। वृषभानुनन्दिनी अपने माता-पिता एवं भाई श्रीदामा के साथ सारे बरसाने की ‘लाली’ थी। परम पुरुष की आह्लादिनी शक्ति को सभी प्यार से ‘लाली’ कहकर बुलाते थे।
भगवती को भी यही सम्बोधन मिला था। जन्मदात्री माता रामप्यारी, पिता जसवन्तराव, दोनों भाई दीनदयाल व सुनहरीलाल एवं बड़ी बहिन ओमवती सभी उन्हें ‘लाली’ ही कहते थे। पड़ोसियों की जीभ पर भी यही सम्बोधन लिख गया था। लाली सभी की अपनी थी। सभी का प्यार उस पर बरबस बरसता था। बचपन में जैसे अन्य बच्चे शरारती, चंचल और नटखट होते हैं, वैसा कुछ भी उनमें नहीं था। भोलापन और मासूमियत लिए बड़ी ही गजब की शान्त प्रवृत्ति थी। नन्हें कदमों से जब उन्होंने चलना सीखा और वाणी से बोल मुखरित हुए, तो उन्होंने अपनी माता को अम्मा और पिता को दादा कहना सीख लिया। नन्हें कदमों से धीमे-धीमे चलती हुई अपनी इस प्यारी ‘लाली’ को जसवन्त राव प्रेम विभोर हो गोद में उठा लेते थे। अपनी लाडली की हर इच्छा को वह अपना सौभाग्य मानकर पूरा करते। वह उन्हें अपनी दिव्य अनुभूतियों का साकार रूप लगती।
काल के रथ पर सवार भगवती का बचपन अपने चतुर्दिक् वातावरण में जीवन के मधुर संगीत की सृष्टि करता हुआ आगे बढ़ रहा था। तभी इस मधुरता में अनायास विषाद का रव गूँज उठा। जन्मदात्री माता अपनी प्यारी ‘लाली’ को केवल चार वर्ष की अवस्था में छोड़कर परलोक जा बसी। बीमारी इस दैव की क्रूरता का माध्यम बनी। भगवती के बाल नेत्रों में आँसू छलक उठे। नन्हें से दिल में भावनाओं का ज्वार तड़प उठा। मातृ बिछोह के पल उनके लिए बड़े ही दारुण थे। चार वर्ष की छोटी सी बच्ची के लिए तो माँ ही सब कुछ होती है। वही माँ न रहे तो......? लेकिन सच तो सच था। अपनी माता की याद में उन दिनों वह काफी रोयीं। पर इस करुण दशा में भी उनकी आन्तरिक चेतना जाग्रत्, सक्रिय और सचेतन बनी रही। बड़ी बहिन एवं भाइयों को इस पर बड़ा आश्चर्य होता था कि छोटी सी ‘लाली’ कभी-कभी उन्हें ही समझाने लगती है।
कभी-कभी वह गुमसुम सी चुपचाप पालथी मार कर बैठ जाती। उन्हें इस भावमग्न दशा में बैठे देखकर घर के सदस्यों को अचरज होता। वे सब उनकी अंतर्दशा से अपरिचित थे। उनमें से कोई सोच नहीं पाता था कि यह छोटी सी बच्ची आखिर इस तरह क्यों एकान्त में शान्त होकर बैठी है। एक दिन बड़े भाई दीनदयाल ने उन्हें इस तरह बैठे देखकर पूछ लिया- लाली, तू इस तरह चुपचाप शान्त क्यों बैठी है, बच्चों के साथ खेलती-कूदती क्यों नहीं? तुझे देखकर तो ऐसा लगता है कि तेरे सिर पर सारी दुनिया का भार है? प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बड़े ही शान्त नेत्रों से बड़े भाई की ओर देखा, फिर बड़े ही गम्भीर स्वर में बोली- “हाँ सो तो है। सारी दुनिया का भार मुझ पर नहीं तो और किस पर होगा।” उनकी ये बातें दीनदयाल को कुछ भी समझ में न आयीं। पर उनके शब्दों में यह सत्य तो निहित ही था कि वह बचपन से ही अपने भावी दायित्वों के प्रति जागरुक थी।
इन्हीं वर्षों में दीनदयाल की शादी हो चुकी थी। उनकी पत्नी यानि कि बालिका भगवती की बड़ी भाभी बड़े ही स्नेहशील स्वभाव वाली प्रेमपूर्ण हृदय की महिला थी। उन्होंने अपनी इस ननद की बड़े ही यत्न से सार-संभाल की। बार-बार उनका मन कहता था कि उनकी यह छोटी सी ननद कोई देवी है। उसकी पारदर्शी आँखों में उन्हें पारलौकिक व अलौकिक प्रभा छलकती हुई लगती। जब-तब उनकी यह ननद कुछ ऐसी बातें कह देती थी, जिससे कि उनका यह विश्वास और भी ज्यादा मजबूत हो जाता। ऐसे ही एक बार के घटनाक्रम में उनके पिता जी उन्हें लिवाने के लिए आने वाले थे। पन्द्रह-बीस दिन पहले इस आशय की चिट्ठी भी आयी थी। जिसमें उनके आने की सुनिश्चित तिथि लिखी थी। पर उस तिथि को वह नहीं आ सके। कोई खबर भी नहीं पहुँची।
इससे उनकी चिन्ता बढ़ गयी। उन्होंने किसी से कुछ कहा तो नहीं, पर उदास रहने लगी। घर के कामों, जिम्मेदारियों को निभाते हुए वह हर पल-हर क्षण बेचैन रहती। मन की घबराहट चेहरे पर भी नजर आ जाती। एक दिन भगवती ने उनसे धीरे से पूछ ही लिया- क्या बात है भाभी, आजकल आप इतनी परेशान क्यों हो? उन्होंने जवाब दिया- “कुछ नहीं ‘लाली’ ऐसी कोई बात नहीं।” भगवती ने हल्के से मुस्कराते हुए कहा- बात तो है भाभी, कहो तो बता दूँ। फिर धीरे से गम्भीर स्वर में बोली- आप इसलिए परेशान हो न, क्योंकि आपके पिता नहीं आए। लेकिन आप अब ज्यादा परेशान न हो, वे इसलिए नहीं आ सके क्योंकि उन्हें काफी तेज बुखार आ गया था। चिट्ठी उन्होंने लिखी थी, पर वह समय से पहुँच नहीं सकी। पर आज वह चलने की तैयारी कर रहे हैं। कल यहाँ पहुँच जाएँगे। जहाँ तक चिट्ठी की बात है, वह आज ही आपको मिल जाएगी।
अपनी इस छोटी सी ननद की बातों को सुनकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। क्योंकि उन्होंने तो घर में किसी को भी अपने मन की बातें नहीं बतायी थी। यह आश्चर्य तब और बढ़ गया जब सचमुच ही दिन में डाकिया आकर चिट्ठी पहुँचा गया। चिट्ठी में वही सब बातें लिखी थी, जो उनकी लाली ने उन्हें बतायी थी। दूसरे दिन उनके पिताजी उन्हें लेने के लिए आ गए। पिताजी ने घर-परिवार के, अपने स्वास्थ्य के जो समाचार बताए, वे सब वही थे, जो उनकी यह प्यारी सी ननद पहले ही बता चुकी थी। उन्हें भी अपने श्वसुर की तरह इस बात पर पक्का विश्वास हो गया कि उनकी ननद में सचमुच ही कोई दैवी शक्ति है। उनके हृदय में अपनी इस ननद के लिए प्यार तो पहले से ही था, अब सम्मान और श्रद्धा का भाव भी जाग उठा।
भवगती के मन में अपनी भाभी के लिए विशेष लगाव था। अपनी अवस्था के अनुरूप वह उन्हें घर के छोटे-छोटे कामों में मदद करती। कभी-कभी भाभी और बड़ी बहिन के साथ गुड़िया-गुड्डे के खेल खेलती। यह उनका प्रिय खेल था। गुड़िया-गुड्डे को तैयार करने, उन्हें सजाने-संवारने की जिम्मेदारी भाभी की थी। इसके लिए वह हर हमेशा रंग-बिरंगे कपड़े संजोती रहती थी। ताकि वह अपनी लाली के गुड़िया-गुड्डे को ढंग से सजा-संवार सके। जब-तब गुड्डा बीमार हो जाता। फिर वैद्य जी बुलाए जाते। जड़ी-बूटियाँ घिसी और पीसी जाती। जिन्हें खाकर और पथ्य-परहेज करके गुड्डे महाशय स्वस्थ हो जाते। इसी के साथ बालिका भगवती की हंसी फिर खिलखिला उठती। गुड़िया-गुड्डे का यह खेल उनके बचपन का सच्चा सहचर था। इसमें घर के सभी लोगों को किसी न किसी रूप में उनका सहभागी बनना पड़ता था। कभी गुड़िया की शादी तो कभी गुड्डे की बीमारी, तो कभी उनके लिए नए घर-मकान का इन्तजाम, इस तरह के अनेकों काम और इन्तजाम थे, जो उनके बचपन को क्रीड़ामय एवं उल्लासमय बनाए रखते थे। महाशक्ति की इन लीलाओं में उनकी दिव्य क्रीड़ा भी यदा-कदा उजागर होती रहती थी। खेल-खेल में ही अनेकों दिव्य भाव उमगते-पनपते और सृष्टि के आँगन में बिखर जाते। क्रीड़ामयी शान्त भाव से उन्हें देखती रहती।
हमें घर-घर पहुँचा दें – परम पूज्य गुरुदेव
भगवती की बालक्रीड़ा में उनकी दिव्य भावनाओं की झलक दिखाई देती थी। कई तरह के खेलों में उनका सबसे अधिक प्रिय खेल था- ‘शिव पूजा’। इस खेल को वह दिन भर में कम से कम एक बार अवश्य खेला करती। कभी-कभी तो उनका यह प्रिय खेल दिन में दो से भी ज्यादा बार दुहरा लिया जाता। खेल की शुरुआत भगवान् महादेव के प्रतीक चिह्न बनाने से होती। वह अपनी बहिन ओमवती और बाल सखी सुखमती के साथ मिट्टी के शिव प्रतीक का निर्माण करती। उसकी विधिवत स्थापना करने के बाद पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य एवं बेलपत्री से पूजा का क्रम चलता। यह पूजा बड़ी भक्ति और अनुराग से होती। पूजन के अन्त में सभी को भगवान् शिव के पञ्चाक्षरी मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करना होता।
खेल में सहभागिनी अन्य बालिकाओं का जप तो थोड़ी देर में समाप्त हो जाता। लेकिन भाव समाधि में डूबी भगवती काफी देर तक ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करती रहती। कभी-कभी तो उन्हें यह सब करते हुए घण्टों बीत जाते। साथी बालिकाएँ थकने और ऊबने लगतीं। यदा-कदा तो उनको इसी तरह अकेला छोड़कर चुपचाप चली जातीं। उस दिन या दूसरे दिन जब दुबारा मिलना होता, तो वे पूछतीं कि तुम्हें शिव पूजा करते-करते यह अचानक क्या हो जाता है? जप करने के लिए आँख बन्द करके जो बैठती हो तो बस उठने का नाम ही नहीं लेती। अरे भई, पूजा तो हम लोग भी तुम्हारे साथ करती हैं, पर इस तरह होश-हवास नहीं खोतीं। उत्तर में भगवती के बालमुख पर हल्की सी रहस्यात्मक मुस्कान तैर जाती?
इस हल्की सी हंसी में जो कुछ छुपा होता, उसे साथ खेलने वाली बालिकाएँ कभी न जान पातीं। किसी को भी पता न चलता कि यह पूजा महाशक्ति की अपने आराध्य महाशिव के प्रति आन्तरिक अनुराग की अभिव्यक्ति है। इस पूजा में ‘प्रीति पुरातन लखै न कोई’ वाली बात सार्थक होती। जब कभी उनकी बड़ी भाभी उनसे जरूर पूछ लिया करती, ‘लाली’ तू इतनी पूजा क्यों किया करती है? जब देखो तो भगवान् शिव के चित्र या प्रतीक के सामने आँख बन्द करके बैठी रहती है? भाभी के इन सवालों के जवाब में वह हंस देती और कहती- अरे मैं कोई पूजा थोड़े ही करती हूँ- यह तो बस खेल है। मुझे सब खेलों में यह खेल सबसे ज्यादा पसन्द है। उनकी इस बात की किसी के पास कोई काट न होती। और खेल का सिलसिला इसी तरह से रोज चलता रहता।
इसी सिलसिले में नयापन जोड़ने के लिए वह अपने पिता जसवन्तराव का सहारा लेती। वह उनसे शिव पुराण की कथाओं को सुनाने का आग्रह करती। भगवान् शिव के लीला चरित सुनना उन्हें परमप्रिय था। भगवान् महाकाल के दिव्य चरित का श्रवण उनके मन-प्राण एवं अन्तरात्मा को भारी सुख पहुँचाता था। वह बार-बार इन्हें सुनने का आग्रह-अनुरोध करती। जसवन्तराव भी अपनी लाड़ली को बड़े ही रसपूर्ण ढंग से महाशिव की लीलाएँ सुनाया करते। लेकिन उन्हें यह अहसास कभी न हो पाता कि लीलामयी उनके सामने स्वयं बालरूप में उपस्थित होकर अपने आराध्य, अपने सर्वस्व का चरित सुन रही है। इस आन्तरिक भाव सत्य से सभी अनजान थे। प्रत्यक्ष सत्य बस इतना ही था कि श्रोता एवं वक्ता दोनों भगवान् की लीलाओं को सुनते और कहते हुए भक्ति रस में डूबे रहते।
इन शिव लीलाओं के कोई न कोई अंश अगले दिन की शिव पूजा में जुड़ जाते। कभी तो इसमें शिवरात्रि का प्रसंग जुड़ता, कभी इसमें शिव-विवाह की कथा जुड़ती। इस तरह खेल में नयापन आता। साथ खेलने वाली बालिकाओं का उत्साह भी बढ़ जाता। सभी को खेल के लिए पूरे जोर-शोर से तैयारी करनी पड़ती। उनकी बालसखी सुखमती तो उनकी सहचरी ही नहीं अनुचरी भी थी। उसे वह प्यार से सुखमन बुलाया करती थी। सुखमन वही करती जो उसकी प्राणप्रिय सखी भगवती को प्रिय लगता। भगवती के सान्निध्य में उसका भी शिव-पूजा पर विश्वास जम गया था। शिव-पूजा के प्रत्येक कार्य में उसे भी रस मिलने लगा था।
लेकिन बालिका भगवती को तो इस खेल में कई तरह की दिव्य अनुभूतियाँ भी होने लगी थी। जिनके अर्थ एवं रहस्य अभी पूरी तरह से प्रकट नहीं हो पाते थे। शिव-पूजन करते हुए जब वह भावमग्न होती तो उनकी अन्तर्चेतना में कई तरह के दृश्य उभरते थे। उन्हें ऐसा लगता जैसे कि भगवान् शिव ने एक गौरवर्ण के लम्बे-दुबले युवक का रूप ले लिया है। इस युवक की छवि पहले तो थोड़ी अस्पष्ट होती पर बाद में काफी स्पष्ट हो जाती। यह युवक उन्हें प्रायः एक कोठरी में पूजा वेदी पर प्रज्वलित साधना दीप के सामने ध्यानस्थ नजर आता। उसके मुख मण्डल पर उन्हें अपूर्व तेजस्विता दिखाई देती। यह दृश्य उनके अंतर्मन में बार-बार उभरता।
वह बार-बार इस दृश्य को देखकर अचरज में पड़ जाती। वह सोचती कि शिव-पूजा करते हुए उन्हें यह कैसी विचित्र अनुभूति होती है। जब-तब यह भी मन में आता कि कहीं ऐसा तो नहीं कि भगवान् शिव ने स्वयं अवतार ले लिया है। अपनी सृष्टि में युग प्रत्यावर्तन करने, एक नए युग का प्रवर्तन करने के लिए प्रभु स्वयं आ गए हैं। अपने इस विचार के बारे में वह जब-जब सोचती, उन्हें सच्चाई नजर आती। बार-बार उस महायोगी युवक के रूप में उन्हें भगवान् शिव का स्वरूप प्रत्यक्ष होता। मन ही मन वह उसे शिव-शिव कहते हुए प्रणाम भी कर लेती। पञ्चाक्षरी मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करते हुए जब वह प्रगाढ़ भावदशा में होती, तो उनके मानस पटल पर यह दृश्य प्रत्यक्ष हो जाता।
अपनी अन्तर्चेतना में रोज-रोज उपस्थित होने वाले इस साधनारत युवक का उन्होंने अब नामकरण भी कर दिया। ‘महायोगी शिव’ यही नाम दिया उन्होंने अपनी भाव समाधि में साक्षात्कार होने वाले सत्य का। हालाँकि यह ‘महायोगी शिव’ रोज ही उनकी अन्तर्भावनाओं में प्रत्यक्ष होते, परन्तु अभी तक वह यह नहीं जान पायी थी कि ये कौन हैं? कहाँ हैं और क्या करते हैं? लेकिन जब कभी वह ध्यानरत होती अथवा अपनी शिव-पूजा में भावमग्न होती, तब उनके हृदय में यह तीव्र स्फुरण होता था कि ये ‘महायोगी शिव’ जो कोई भी हों, पर ये हैं भगवान् शिव ही। साथ ही यह भी स्पष्ट होता कि किसी न किसी तरह इनसे उनका अपना भविष्य जुड़ा हुआ है। शायद वह इन्हीं के द्वारा किए जाने वाले किसी कार्य में सहयोग करने के लिए आयी हैं।
खेल-खेल में उन्होंने जो शिव-पूजा शुरू की थी, वह उन्हें दिव्य भावानुभूतियों में डुबोती जा रही थी। उन्हें अपने जीवन और भविष्य के प्रति जागरुक बना रही थी। उनकी बालक्रीड़ा में दिव्यता के तत्त्व सघन हो गए थे। इसी के साथ उनका क्रीड़ामय बचपन किशोरावस्था की ओर बढ़ने लगा था। योग साधना के जो तत्त्व खेल-खेल में अंकुरित हुए थे, वह अब पल्लवित होने लगे थे। उनके हृदय में साधनामय जीवन के लिए अभीप्सा बढ़ने लगी थी। अपने आराध्य से मिलन के लिए पुकार तीव्र होने लगी थी। इस पुकार में भक्ति की सघनता, प्रेम की तरलता एवं अनुराग की सजलता सभी कुछ था। बालिका भगवती एक प्रखर योग साधिका के रूप में रूपांतरित होने लगी थी। अपने प्रभु के प्रति भावभरी पुकार में उनकी योग साधना का स्वर संगीत गूँजने लगा था।
बोधिसत्व एक दिन सुंदर कमल…
शिव-पूजा के खेल में जो भावानुभूतियाँ हुई थी। वे आयु के बढ़ने के साथ सघन और प्रगाढ़ होने लगी। किशोरी भगवती के मन-प्राण व अन्तःकरण में एक पुकार ने जन्म ले लिया। उनके प्राण अपने शिव को पुकारते रहते। रह-रहकर मन ध्यानस्थ चेतना में देखे गए दृश्यों को फिर-फिर निहारने लगता। कई तरह के सवाल अन्तःकरण को कुरेदते रहते। वह सोचा करतीं कि यह महायोगी शिव कौन है, जिसे वह ध्यान में हमेशा देखती है? बार-बार ध्यान करते समय शिव के स्थान पर सुदर्शन व्यक्तित्व वाले इस महायोगी की छवि क्यों प्रकट हो जाती है? क्या सचमुच ही भगवान् शिव ने धरती पर अवतार ले लिया है? ये और ऐसे ही अनेक सवाल उन दिनों उनकी अन्तर्चेतना में अंकुरित हो रहे थे। इन सभी का उत्तर पाने के लिए उन्होंने ध्यान साधना को और अधिक तीव्र करने का निश्चय किया।
इस निश्चय के साथ ही उनमें एक अजीब सा भाव परिवर्तन हो गया। घर के प्रायः सभी सदस्यों ने इसे अनुभव किया। इन दिनों उनकी दिनचर्या बड़ी ही अस्त-व्यस्त हो गयी। लेकिन इस बाह्य अस्त-व्यस्तता में एक आन्तरिक सुव्यवस्था साकार हो रही थी। वह अपनी ध्यान साधना में इतना डूबी रहती कि उन्हें अपने उठने, नहाने, खाने की सुध-बुध ही न रहती। घर के सदस्य उनके इस आन्तरिक परिवर्तन से अनजान थे। बड़ी भाभी जो माँ की तरह उनकी सार-संभाल किया करती थी, उन्हें समझाती रहती। बार-बार कहती, “लाली! तू तो ऐसी न थी। आजकल तुझे क्या हो गया है? कहाँ तो तू सबेरे-सबेरे जल्दी उठकर नहा-धोकर तैयार हो जाती थी, खेलने लगती थी, घर का काम-काज भी करा लेती थी, पर आजकल तो तुझे जैसे अपना ध्यान ही नहीं रह गया है।”
भाभी की इन बातों को वह हँस कर टाल जाती थी। जिस किसी तरह उन्हें बहला-समझा देती। वह जानती थी कि यदि वह बैठकर सुव्यवस्थित तरीके से दिन-रात ध्यान साधना करेगी तो सबके-सब परेशान हो जाएँगे। और वह अपने परिवार के किसी भी सदस्य को परेशान नहीं करना चाहती थी। इसीलिए उन्होंने यह अनूठा तरीका निकाला था। वह दिन-प्रतिदिन ध्यान साधना की गहरी भावदशा में खोती जा रही थी। अनेकों दिव्य अनुभूतियाँ प्रतिक्षण उन्हें घेरे रहती थी। बाहरी तौर पर सब कुछ सामान्य होते हुए भी उनके आन्तरिक जीवन में सभी कुछ असामान्य और अलौकिक हो गया था।
अपनी उन दिनों की बातों की चर्चा किसी विशेष प्रसंग में करते हुए उन्होंने अपनी एक शिष्य-सन्तान को कुछ खास बातें बतायी थी। साधना, तपस्या की बात करते हुए उन्होंने कहा था- “यह सब जितना गोपनीय रहे उतना ही अच्छा। संसार को दिखाकर-जताकर भला क्या लाभ होगा? गुरुजी को लोक शिक्षण करना था, तुम सब को बताना था, सिखाना था इसलिए उन्होंने अपने बारे में कुछ छोटी-मोटी बातें बता दी। उनकी विशेष तपस्या के बारे में अभी भी किसी को कुछ नहीं पता। मेरे बारे में तो खैर कोई कुछ जानता ही नहीं है। जबकि असलियत यह है कि मेरी साधना ग्यारह-बारह साल की उम्र में शुरू हो गयी थी। इसमें कहीं कोई दिखावा न था। बस सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते सब समय ध्यान किया करती थी। देह का तो जैसे कोई होश ही नहीं रह गया था। बड़ी विचित्र स्थिति थी उन दिनों।”
अस्तित्त्व के कण-प्रतिकण में अणु-परमाणु में जो अव्यक्त नाद है, वह उन्हें हर समय सुनायी देता रहता था। कभी तो भेरी बजती, कभी मृदंग, कभी वीणा, कभी शंख ध्वनि होती और कभी सब मिल-जुलकर वाद्यवृन्द से अलौकिक संगीत उपजाते। उनके देह-मन में सर्वत्र अणु-परमाणुओं के विद्युतकणों का नृत्य और घूर्णन चलता रहता। लीलामयी अपने अन्तःकरण में इन अणु-परमाणुओं के सतत वेधन, ध्वंस और नए-नए समुच्चयों से अनन्त पदार्थों की सृष्टि, विकास और समाप्ति के सिलसिले से तदाकार होने लगी। उनकी चित् शक्ति की चैतन्यता में सब कुछ स्पष्ट होने लगा। इन्हीं दिनों उन्होंने अपने जन्म और जीवन के कई रहस्यों का साक्षात्कार किया।
ध्यान की गहनता में उन्होंने अपने साधनामय अतीत की झलकियाँ देखीं। गंगा की लहरों एवं मन्दिर की घण्टियों की गूँज के साथ जो दृश्य उभरे, पहले वे अस्पष्ट थे। बाद में धीरे-धीरे उन्होंने अपने को दक्षिणेश्वर मन्दिर में रामकृष्ण परमहंस के साथ पाया। उन्हें ऐसा लगा, जैसे कि वे परमहंस देव के साथ उनके भक्तों व शिष्यों के साथ घिरी हैं। सभी उन्हें माँ-माँ कहते हुए भक्तिपूर्वक प्रणाम-प्रणिपात कर रहे हैं। इस अद्भुत दृश्यावली में वह कितनी देर खोयी रही, कुछ पता ही न चला।
तभी अचानक उनकी ध्यानस्थ चेतना में दृश्य परिवर्तन हुआ। गंगा की लहरों और मंदिर की घण्टियों की गूँज अभी भी यथावत था। बस अन्य दृश्य बदले। ऐसा लगा जैसे वह बनारस में कहीं हैं। सन्त कबीर के ताने-बाने के साथ उनके जीवन का ताना-बाना बुना हुआ है। वह अक्खड़-फक्कड़ कबीर के साथ हैं। अनेकों सामान्य जन उन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देख रहे हैं। उनकी झोपड़ी के पास सच्चे योगी, गरीब, अनपढ़ सब एक साथ सन्त कबीर से ज्ञान पाने के लिए आए हैं। ध्यान की गहनता में उभरते इन दृश्यों को वह निहारती रही। इस काल शून्यता में काल बोध का कोई प्रश्न ही न था।
लेकिन दृश्य परिवर्तन यहाँ भी थे। चित् शक्ति का लीला विलास यहाँ भी सक्रिय था। ध्यान की इस भावभूमि में उन्हें प्रत्यक्ष हुआ कि जो कबीर थे, वही श्री रामकृष्ण परमहंस रहे और वही अब वह महायोगी हैं, जो उन्हें वर्षों से दिखाई दे रहे हैं। इन्हीं के साथ उनके अपने भविष्य की डोर बंधी है। बीते दो जन्मों का सुपरिचित सान्निध्य उन्हें इस जीवन में भी मिलने वाला है। सन्त कबीर की लीला सहचरी ‘लोई’, श्री रामकृष्ण परमहंस की लीला संगिनी रही ‘सारदा’ वही है। जिस आत्म चेतना ने लोई के रूप में जन्म लिया, जिसने सारदा के रूप में जीवन जिया, उसी ने अब भगवती का नाम-रूप स्वीकार करते देह-धारण की है।
कई वर्षों की तीव्र ध्यान-साधना के बाद उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिल गए। उनकी जीवनचर्या का बाह्य रूप फिर से पूर्ववत सुव्यवस्थित हो गया। घर के सभी सदस्यों को आश्वस्ति मिली। बस उन्हें पहले और अब में सिर्फ एक परिवर्तन नजर आया। अब उनकी लाली प्रातः जल्दी स्नान करके शिव-पूजा के साथ नियमित ध्यान करने लगी है। अपने आराध्य से मिलने की उनकी तीव्र उत्कण्ठा को कोई समझ न पाया। लगातार तीव्र होती जा रही उनकी आन्तरिक पुकार से परिवार के सभी सदस्य अनजान थे। हालाँकि इस बीच घटनाचक्र तेजी से बदल रहे थे। उन दिनों की प्रथा के अनुरूप जसवन्तराव शर्मा को अपनी प्यारी बेटी के विवाह की चिन्ता होने लगी थी। किशोरी भगवती की अन्तर्चेतना में उफनती अलौकिकता के ज्योति सागरों के बीच पुकार के सघन स्वर गूँज रहे थे। आराध्य के चरणों के प्रति उनका अनुराग नित्य प्रति बढ़ता जा रहा था। उनमें आध्यात्मिक प्रेम के बीज अंकुरित होने लगे थे।
महाकाल का संदेश
Copy from July 2002
आराध्य के चरणों में भगवती की प्रीति दृढ़ हो चली थी। उनके हृदय में भक्ति की अन्तर्धारा प्रवाहित होती रहती। ध्यान साधना में अपने विगत जन्मों की कथा स्पष्ट हो जाने के बाद उनमें एक भाव परिवर्तन हो गया था। वह पहले भी शान्त रहा करती थीं। अब यह शान्ति और भी सघन हो गयी थी। इन दिनों वह सर्वथा शान्त-अचंचल रहकर अपने दैनिक क्रिया-कलापों में संलग्न रहती। बड़ी भाभी के घर-गृहस्थी के कामों में सहयोग, रामायण, महाभारत आदि धर्मग्रन्थों का स्वाध्याय, अपनी नियमित ध्यान साधना बस यही उनकी दिनचर्या के अनिवार्य तत्त्व थे। घर में सबसे छोटी होते हुए भी वह परिवार के अन्य सभी सदस्यों की देख-भाल किया करती थी। किसको, कब, क्या और कितनी जरूरत है, इस बात का उन्हें हमेशा ध्यान रहता।
उनके दोनों बड़े भाई दीनदयाल और सुनहरी लाल उनके गुणों से अभिभूत रहते थे। भाभी को तो उन पर नाज था। बड़ी बहिन ओमवती की शादी इस बीच हो चुकी थी। अब उनका घर में यदा-कदा ही आना-जाना हो पाता था। वह अपनी छोटी बहिन को चाहती बहुत थी। इसलिए वह भाभी से, पिताजी से कभी-कभी जिद करती कि लाली को थोड़े दिनों के लिए उनके साथ भेज दे। यहाँ तो कहीं आना-जाना हो नहीं पाता है। इस तरह मन बहल जाएगा। वह भी कुछ दिन और अपनी छोटी बहिन के साथ रह लेंगी। ओमवती की इस जिद पर जैसे-तैसे जसवन्तराव सहमत हो जाते। और भगवती थोड़े दिनों के लिए अपनी बड़ी बहिन की ससुराल हो आती। वहाँ भी उनकी दिनचर्या यथावत बनी रहती। बहिन को घर के कामों में सहयोग देने के साथ वह अपनी ध्यान साधना का क्रम बनाए रखती।
इन दिनों घर-परिवार के लोग उनके लिए सुयोग्य वर की खोज-बीन बड़े जोर-शोर से कर रहे थे। बड़े भाई दीनदयाल और पिता पं. जसवन्तराव के बीच इस सम्बन्ध में काफी चर्चाएँ हुआ करतीं। इस बार जब वह अपनी बड़ी बहिन ओमवती के यहाँ से लौटी तो देखा परिवार के एक बुजुर्ग रिश्तेदार किशनप्रसाद जी आए हुए हैं। यह रिश्ते में पं. जसवन्तराव के मामा लगते थे। वे इस समय किसी वर की चर्चा कर रहे थे। पं. जसवन्तराव एवं उनके बड़े बेटे-दीनदयाल बड़े धीरज और उत्सुकता के साथ उनकी बातें सुन रहे थे। उनकी बातों के कुछ शब्द भगवती के कानों में भी पड़े। वह कह रहे थे- “जसवन्त, मैं तो कहता हूँ कि ऐसा लड़का कहीं भी दुनिया भर में खोजे नहीं मिलेगा। वे लोग आँवलखेड़ा के रहने वाले हैं। आस-पास के गाँवों में उनकी बड़ी जमींदारी है। खानदानी रईस हैं।”
इन बातों के बीच में जसवन्तराव ने टोका, “आपने उन्हें मेरे बारे में सब कुछ सही-सही बता दिया कि नहीं?” प्रश्न के उत्तर में किशन प्रसाद कहने लगे, इसमें छुपाने की बात भी क्या है? मेरी लड़के के बड़े भाई रामप्रसाद से बात हुई। मैंने उनसे कह दिया- कि “जसवन्तराव के पुरखे अहमदपुर (खैर-अलीगढ़) के रहने वाले थे। वहीं उनका अपना घर और खेती थी। परदादा के जमाने में 12 जोत की जमींदारी थी। परिवार का बड़ा नाम था। लेकिन तुम्हारे पिता श्री परसादी लाल शर्मा के जमाने में बात बिगड़ गई। किसानों की खराब हालत के कारण परसादी लाल जी ने लगान लिया नहीं और धीरे-धीरे जमींदारी जाती रही।” किशन प्रसाद की इन बातों को सभी लोग बड़े ध्यान से सुन रहे थे। वह बता रहे थे कि “मैंने रामप्रसाद को यह भी बता दिया कि तुम लोग चार भाई हो- जसवन्त शर्मा, बलवन्त शर्मा, रामदयाल शर्मा और वासुदेव प्रसाद। इन चार भाइयों के बीच एक बहिन है- रामश्री। जो अब अपने घर-परिवार की है।”
किशन प्रसाद की बातों का सिलसिला अपने पूरे वेग में था। अपनी बातों में वे शायद यह भी भूल चुके थे कि सभी लोग लड़के के बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं। दीनदयाल के टोकने पर उन्हें ध्यान आया और उनकी बातों की दिशा बदली। वह कहने लगे- “अरे लड़के के बारे में क्या पूछते हो? पं. रूपकिशोर शर्मा का बेटा है। अब पं. रूपकिशोर के नाम को तो आस-पास के इलाके में सभी जानते हैं। उनके इस सुपुत्र का नाम श्रीराम है। तपस्या, साधना, पढ़ाई-लिखाई सब में अव्वल है। पहले कुछ दिन उसने यहीं आगरा में रहकर सैनिक अखबार में काम किया। आजकल मथुरा में रहकर खुद की पत्रिका निकालते हैं। बस काल देवता ने उनकी पहली पत्नी को उठा लिया। उसके तीन बच्चे हैं- ओमप्रकाश, दयावती और श्रद्धा। पर अपनी लाली तो इतनी गुणी है कि सब कुछ बड़ी आसानी से सम्भाल लेगी।”
किशन प्रसाद की इन बातों की घर में कई दिनों तक चर्चा होती रही। चिन्तन और चर्चा के अनेकों दौर चले। पहली पत्नी के मरने और उसके तीन बच्चों के होने की बात दीनदयाल को थोड़ा खटकी। इस पर उन्होंने अपने पिता पं. जसवन्तराव से काफी देर तक बातें की। बातों के बीच में उन्होंने यह भी पूछा- दादा, यह बताओ कि तुम्हारी ज्योतिष क्या कहती है? उत्तर में जसवन्तराव गम्भीर होकर कहने लगे- देखो, मेरी तो शुरू से मान्यता है कि अपनी लाली देवी का अंश है। इसका विवाह किसी आम व्यक्ति से नहीं निभ सकता। फिर वह चाहे कितना ही बड़ा धनवान क्यों न हो? अपनी लाली के सुयोग्य वर वही है, जो तपोनिष्ठ हो, अध्यात्म विद्या का ज्ञाता हो। मुझे तो यह लड़का सब तरह से लाली के लिए ठीक लगता है। पं. जसवन्तराव की बातें दीनदयाल को भी ठीक लगी। अन्त में पिता-पुत्र दोनों ने मिलकर यह तय किया कि कन्या की भाभी सारी बातें उसे बताकर उसके मन की बात लेने की कोशिश करे। जो कुछ होगा सो लाली की सहमति से होगा।
भाभी ने अपने पति और श्वसुर की आज्ञानुसार अपनी प्यारी ननद से सारी बातों की चर्चा की। वह सारी बातों को बड़े ही शान्त भाव से सुनती रहीं। बातों की समाप्ति पर उन्होंने एक पल के लिए अपनी अन्तर्चेतना को एकाग्र किया। इस एकाग्रता में सत्य उद्भासित हो गया। उन्हें इस बात का अहसास हो गया कि इस समय जिनसे उनके विवाह की चर्चा की जा रही है, उन्हीं के कार्य में सहयोग के लिए उन्होंने देह धारण की है। उनके पिछले जन्मों में पति और मार्गदर्शक रहे उनके आराध्य ही इस बार उनके पति होने जा रहे हैं। अंतर्मन की इन सारी बातों को उन्होंने गोपन ही रखा। प्रत्यक्ष में उन्होंने बस केवल इतना कहा- “भाभी, दादा से कह देना कि मुझे उनकी सारी बातें स्वीकार है। वे जो कुछ करने जा रहे हैं- उसी से मेरे जीवन का कल्याण है।”
लाली की सहमति व स्वीकृति पाकर सारे परिवार में उत्साह का ज्वार उफन उठा। उल्लास की तरंगें घर के कोने-कोने में बिखरने लगीं। वर पक्ष के लोगों की सहमति भी आ गई। मंगल परिणय की तैयारियाँ होने लगीं। फाल्गुन सप्तमी वि.स. 1999, 10 मार्च 1943 का दिन विवाह के लिए निश्चित हुआ। विवाह का दिन तय होने के बाद से पं. जसवन्तराव के मन में खुशियों के साथ एक कसक भी घुल गयी। उन्हें ऐसा लगने लगा जैसे कि जगदम्बा पार्वती ने पीहर छोड़कर भगवान् भोलेनाथ के साथ जा बसने का संकल्प ले लिया हो। अपनी इस कसक को दिल में लिए जसवन्तराव बेटी के विवाह की तैयारी में जुटे रहे। अरेला गाँव के ज्वालाप्रसाद इसमें उनके मुख्य सहयोगी बने। उन्हीं के माध्यम से सारी बातें बनी।
निश्चित तिथि पर विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह में बहुत सादगी थी। दिखावे-प्रदर्शन का तो जैसे कोई नामो-निशान भी न था। यह मनुष्यता के सामने जीवनादर्श को प्रस्तुत करने वाले ऋषियुग्म का मंगल परिणय था। यह तप और श्रद्धा का मिलन था। ज्ञान और भक्ति का अनोखा सायुज्य था। भगवती और श्रीराम इस शुभ घड़ी में अपने आदर्श पथ पर एक साथ चलने के लिए संकल्पित हुए थे। अपने आराध्य के चरणों के सामीप्य में भगवती के जीवन का एक सर्वथा नया आयाम उद्घाटित हुआ था। माँ का मातृत्व अभिव्यक्त हो रहा था। मातृत्व की सजल भावनाएँ अपना स्वरूप व आकार पाने की तैयारी में थीं।
माँ का मातृत्व आँवलखेड़ा में पाँव रखते ही छलक उठा। बारात विदा होकर यहीं आयी थी। पूर्वजों की देहरी, अपने आराध्य की जन्मस्थली व उनकी प्रारम्भिक तपस्थली में वह दुल्हन के रूप में डोली से उतरी थीं। लाल रंग की जरी के काम वाली साड़ी पहने सौभाग्य शृंगार से सजी वह साक्षात् जगदम्बा लग रही थीं। हिमवान की पुत्री पार्वती का पीहर से विदा होकर भगवान् भोलेनाथ के साथ अपनी ससुराल आने का दृश्य उन पलों में साकार हो गया। बाल मण्डली शिव गणों की तरह उन्हें बड़ी श्रद्धा एवं आश्चर्य से देखे जा रही थी। ताई जी (उनकी सास व पूज्य गुरुदेव की माताजी) शुभ शकुनों वाले सारे लोकाचार पूरे करने में लगी थीं। यह क्रम काफी देर तक चलता रहा। एक-एक करके सभी रीति-रिवाज और विधि-विधान पूरे हुए।
इसके बाद एक जगह चटाई पर उन्हें बैठाया गया। बच्चे अभी तक उन्हें घेरे हुए थे। इन बच्चों में अड़ोस-पड़ोस के बच्चों, नजदीकी रिश्तेदारों के बच्चों के साथ दया और ओमप्रकाश भी थे। श्रद्धा तब बहुत छोटी थी। वह इस बाल मण्डली का हिस्सा नहीं थी। अचरज और कौतुक इन बच्चों के मनों को जब-तब कुरेद देता था। इसी के वशीभूत होकर वह थोड़ा-बहुत आपस में धीमे से बतिया लेते थे। तभी दया आगे बढ़ी और पास जाकर खड़ी हो गयी। उन्होंने उसका हाथ पकड़ कर अपने पास बिठा लिया। और बड़े प्यार से उससे बोलीं- मैं तुम्हारी माँ हूँ बेटी, मुझसे संकोच की कोई जरूरत नहीं है।
इस कथन से दया को बड़ी आश्वस्ति मिली। उसने बड़े ही धीमे और लरजते स्वर में कहा- ‘माँ’। इस एक अक्षर ने माता और पुत्री दोनों की अन्तर्भावनाओं को एक रस कर दिया। अपरिमित मिठास उनके जीवन और घर-आँगन में बिखर गयी। माँ के होने का अहसास मन को कितनी आश्वस्ति, सहारा, सम्बल, विश्वास और निश्चिंतता देता है यह दया के मुख मण्डल पर अचानक उभर आयी प्रसन्नता की चमक देखकर सहज ही प्रकट हो रहा था। वह इतनी देर में कई बार अपने मन में माँ-माँ का एकाक्षरी महामंत्र गुनगुना चुकी थी। माँ के प्यार की तरलता ने उसके अन्तःस्तल को भावसिक्त कर दिया था। वह उन्हीं के पास सिमट-सिकुड़कर, चिपटकर बैठ गयी।
दया की इस भावमुद्रा ने ओमप्रकाश को अचरज में डाल दिया। वह सोचने लगे कि उनकी छोटी बहिन अचानक इतनी खुश नजर क्यों आने लगी। आखिर कुछ ही पलों में उस पर क्या जादू हो गया? अपने सोच, विचार में डूबे हुए वह भी हिम्मत करके आगे बढ़े। इस समय उन्होंने नेकर-कमीज पहन रखी थी। कुछ कदमों का फासला तय करके वह पास जाकर खड़े हो गए। इतने में उधर से ताई जी गुजरी। उन्होंने अपने स्वभाव के अनुरूप थोड़ा तेज आवाज में कहा- “खड़ा-खड़ा देख क्या रहा है? चल झुककर अपनी माँ के पैर छू।” ताई जी की आवाज से थोड़ा सहमते हुए ओमप्रकाश ने पाँव छू लिए।
चरण स्पर्श करते ही उन्होंने पूछा- किस कक्षा में पढ़ते हो? ओमप्रकाश ने बड़े हल्के स्वर में इस प्रश्न का उत्तर दिया- मेरा नाम ओमप्रकाश है और मैं कक्षा सात में पढ़ता हूँ। इस प्रश्नोत्तर ने माँ और पुत्र को भाव के कोमल तन्तुओं से जोड़ दिया। अपने प्रथम मिलन की अनुभूतियों को याद कर आज भी ‘ओमप्रकाश’ जी की आँखें भीग जाती है। वह कहते हैं- ‘कुपुत्रो जायते क्वचिदपि कुमाता न भवति’ के कथन को साकार करती हुई माँ अपने इस बेटे पर सदा कृपालु बनी रहीं। अनगिनत गल्तियों को, अक्षम्य शब्दों को उन्होंने हँस कर बिसराया। क्षमामयी ने सारे अपराध पल में क्षमा किए। और सदा ही अपनी स्वभावगत कोमलता-मृदुलता न्यौछावर करती रहीं।
ओमप्रकाश और दया से मिलकर माँ श्रद्धा से मिली। अपनी इस बालिका को उन्होंने भरपूर प्यार दिया। उस पर असीम स्नेह उड़ेला। कुछ ही दिनों में तीनों माँ से घुल-मिल गए। माता ने भी इन्हें अपने हृदय में जगह दी। घर का वातावरण उनके आगमन के कुछ ही दिनों में बदल गया। ऐसा लगने लगा कि जैसे पतझड़ में बसन्त की देवी आ गयी हो। घर के काम-काज, बच्चों के रख-रखाव सभी में एक निखार आ गया। सब तरफ सौंदर्य और सुव्यवस्था नजर आने लगी। इस परिवर्तन ने हर एक के मन-प्राण व अन्तःकरण को छुआ। इस छुअन ने अनेकों सजल भावनाएँ जगाई।
अपने आराध्य की अन्तर्चेतना व अन्तर्भावना से तो पहले ही मिल चुकी थी। दृश्य व प्रत्यक्ष मिलन इन्हीं दिनों हुआ। इस मिलन के हर पल में हर घड़ी में एक अपूर्व अलौकिकता थी। यह किसी सामान्य विवाहित दंपत्ति का मिलन नहीं था। पति-पत्नी के सामान्य साँसारिक मिलन की तरह इसमें स्थूल और लौकिक दृष्टि नहीं थी। यह तो परम पुरुष और माता प्रकृति के मिलन की तरह अद्भुत था। इसमें सर्वेश्वर सदाशिव और भगवती महाशक्ति के मिलन की अलौकिकता थी। नयी सृष्टि के सृजन का बीजारोपण मिलन के इन्हीं पलों में हुआ। ईश्वर चिंतन और चर्चा के बीच वे दोनों जब भी इकट्ठे बैठते, भविष्य की नयी सम्भावनाओं पर चर्चा होती। उनके आराध्य उन्हें नयी भूमिका के लिए तैयार करते।
यह गुरुदेव की तीव्र साधना का काल था। गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला अपने अन्तिम चरण में थी। अखण्ड ज्योति मासिक पत्रिका का प्रकाशन विधिवत प्रारम्भ हो चुका था। आज का विशालकाय गायत्री परिवार तब अखण्ड ज्योति परिवार के रूप में अंकुरित होने लगा था। इसकी उपयुक्त सार-संभार के लिए, सही पालन-पोषण के लिए माँ की आवश्यकता थी। माँ का अर्थ केवल एक-दो सन्तानों को जन्म देने तक सीमित नहीं थीं। जन्म देने भर से कोई माँ नहीं बन जाया करती। माँ तो वही है जो अपनी सन्तानों को श्रेष्ठ संस्कार दे। उनमें अपने प्राणों को उड़ेलकर उनका भाव विकास करे। उन्हें विश्व उद्यान के श्रेष्ठ पुष्पित पादपों के रूप में विकसित करने के लिए जरूरी खाद-पानी की व्यवस्था जुटाए।
यह काम आसान नहीं है। इसके लिए कठोरतम साधना और अध्यात्म उपार्जित आत्मशक्ति की आवश्यकता है। अपनी भावी रीति-नीति के अनुरूप माता भगवती इन दिनों यही करने में जुट गयीं। अपने आराध्य के संसर्ग में अनेकों गुह्यमंत्रों, बीजाक्षरों, योग की गहन प्रक्रियाओं का ज्ञान उन्हें इसी समय हुआ। उनकी अपनी विशिष्ट साधना की शुरुआत ठीक उसी स्थान से हुई, जहाँ कभी तपस्वी प्रवर, श्रीराम ने अखण्ड साधना दीप प्रज्वलित किया था। हालाँकि यहाँ उनका साधना काल बहुत ही थोड़े समय के लिए रहा। अखण्ड ज्योति के प्रकाशन की वजह से परम पूज्य गुरुदेव का मथुरा रहना अनिवार्य था। पहले कुछ अंकों के आगरा से प्रकाशित होने के बाद अब अखण्ड ज्योति मथुरा से प्रकाशित होने लगी थी। साधकों जिज्ञासुओं और आगन्तुकों का आवागमन भी बढ़ने लगा था। मथुरा में पहले लिया गया किराये का मकान भी छोटा पड़ने लगा था। नयी परिस्थितियों के अनुरूप वर्तमान अखण्ड ज्योति संस्थान के मकान को किराए पर लिया गया। और माता भगवती, ताई जी, बच्चों व अपने आराध्य के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान (वर्तमान का घीयामंडी वाला आवास)के आँगन में आकर वास करने लगीं।
तपोभूमि के स्वर्ण जयंती वर्ष में गुरुसत्ता का मूर्ति स्थापना समारोह
अखण्ड ज्योति संस्थान के आँगन में माता भगवती प्रायः सभी की माता जी बन गयीं। पास-पड़ोस के बच्चे ही नहीं, अखण्ड ज्योति कार्यालय में आने-जाने वाले लोग भी उन्हें ‘माताजी’ कहने लगे थे। यहाँ आते ही उन्होंने अनेकों जिम्मेदारियाँ एक साथ सम्भाल लीं। प्रेम, सदाशयता, सहिष्णुता और श्रमशीलता की प्रकाश-रश्मियों का पुञ्ज उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक प्रकाशित करने लगा। यहाँ वह सबसे बाद में सोती और सबसे पहले जगती। उनके जगने का समय तो निश्चित था, पर सोने के समय के बारे में कोई ठिकाना नहीं था। क्योंकि हर दिन इतने तरह के नए-नए काम आ जाते थे, कि सोने में प्रायः देर हो ही जाती। और कुछ नहीं तो समय-कुसमय आने वाले आगन्तुकों के भोजन व्यवस्था में ही विलम्ब हो जाता। देर से सोने के के कारण व स्थिति कुछ भी हो, पर वह रात्रि 3 बजे बड़े ही नियम से जग जाया करती थीं।
जागरण के पश्चात् नित्यकर्म से निवृत्त होकर वह योग साधना के लिए बैठ जातीं। उनकी पूजावेदी पर सदा परम पूज्य गुरुदेव एवं गायत्री माता का चित्र प्रतिष्ठित रहता था। वही उनके जीवन सर्वस्व और आराध्य थे। अपने आराध्य में ही वे जगन्माता गायत्री की अनुभूति करती थीं। इस चित्र का पंचोपचार पूजन करके प्राणायाम की कुछ विशिष्ट प्रक्रियाएँ सम्पन्न करतीं। इसी के साथ गायत्री महामंत्र का जप उनकी अन्तर्चेतना में होने लगता। उनकी कठिन साधना से जाग्रत् एवं चैतन्य गायत्री महामंत्र के प्रत्येक बीजाक्षर का स्फोट उनके अस्तित्त्व के विभिन्न गुह्य केन्द्रों में होता रहता। यह उनके द्वारा किए जाने वाले गायत्री जप की अद्भुत प्रणाली थी। जप के अनन्तर वह ध्यानस्थ हो जातीं। ध्यान की भावदशा में वह अपने महाशक्ति के स्वरूप में परिपूर्णता से निमग्न होतीं। साधना का यह क्रम प्रायः सूर्योदय तक चलता रहता।
इसके बाद घर और कार्यालय के अन्य काम-काज शुरू हो जाते। इन कामों को भी वह किसी भी तरह योग साधना से कम नहीं मानती थीं। वह कहा करती थीं कि काम चाहे छोटा हो या बड़ा, यदि सच्चे भाव से भगवान् को अर्पित करके किया जाय तो वह योग साधना बन जाता है। उससे ध्यान और समाधि की ही तरह योग-विभूतियाँ प्रकट होती हैं। माताजी की इन बातों में कोरा शब्द विस्तार नहीं अनुभूति का सत्य समाया था। अपने कामों के द्वारा वह हर पल-हर क्षण साधना किया करती थीं। उनका कहना था कि स्वार्थ और अहंकार के तत्त्वों की विषाक्तता से प्रायः सभी कर्म कलुषित होते रहते हैं। इनके रहते हुए किसी भी कर्म का योग बनना सम्भव नहीं हो पाता। इनकी जगह यदि अपने आराध्य के प्रति निष्ठ और समर्पण की भावनाएँ कर्म में समाविष्ट हो जाय तो सब-कुछ बदल जाता है। कोई माने या न माने, फिर बर्तन माँजना, झाड़ू-पोछा करने जैसे हीन समझे जाने वाले काम भी ध्यान साधना का रूप ले लेते हैं।
उनका यह अनुभव सत्य उनके जीवन में रोज ही प्रकट होता था। झाड़ू-पोछा और बर्तन माँजने जैसे कामों से ही उनके कामकाजी दिन की शुरुआत होती थी। खाना-पकाना भी एक बड़ा काम था। परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त आने वालों की बड़ी संख्या हमेशा घर में बनी रहती। आने वालों की संख्या कोई ठीक-ठीक निश्चित नहीं थी। कभी तो ये पाँच-दस होते, तो कभी तीस-चालीस तक हो जाते। स्थिति जो भी होती, इन सभी के भोजन की उपयुक्त व्यवस्था माताजी को ही अन्नपूर्णा बनकर करनी पड़ती। अपने इस दायित्व को वह बड़े ही उत्साह के साथ निभातीं। भोजन करने वालों को, बनाए गए भोज्य पदार्थों के साथ माँ के प्यार का भी अलौकिक स्वाद मिलता। अथक परिश्रम वाले इस कार्य को करते हुए किसी ने कभी उनको चिड़चिड़ाते या परेशान होते हुए नहीं देखा। स्नेह स्मित बिखेरते हुए वह सदा काम में जुटी रहती थीं।
काम जब बहुत ज्यादा बढ़ गया, तब परम पूज्य गुरुदेव ने घर के कामों के लिए एक सहयोगिनी महिला की व्यवस्था कर दी। यह मथुरा के ही बैरागपुरा मुहल्ले में रहने वाली एक गरीब विधवा थी। जो टूटी-फूटी कोठरी में एक छोटे से बालक के साथ बिना किसी सहारे, बिना किसी आर्थिक स्रोत के दिन काट रही थी। जिस समय उसे रखा गया उस समय उनकी उम्र 20-22 वर्ष रही होगी। लेकिन गरीबी की मार ने उसे असमय बूढ़ा कर दिया था। लम्बे कद की यह साँवली महिला जली लकड़ी सी लगती थी। उसके दुर्बलता के कारण उसके गालों में गड्ढे उभर आये थे, आँखें बैठ गयी थीं। उसका नाम था ‘गुलाबो’। हर बात में उसकी ‘ए जू’ कहने की आदत के कारण अखण्ड ज्योति संस्थान में उसका नाम ही ‘ए जू’ हो गया था। सभी लोग उसे इसी नाम से बुलाने लगे।
‘ए जू’ कुछ ही दिनों में माता जी की प्रिय सहयोगी बन गयी। माताजी द्वारा उसके स्वास्थ्य व खान-पान पर विशेष ध्यान दिए जाने के कारण थोड़े ही दिनों में वह दीन-दुर्बल के स्थान पर स्वस्थ, सुपुष्ट एवं सुन्दर दिखने लगी। गली-गली में मारे-मारे फिरने वाले उसके लड़के को माताजी ने स्कूल में दाखिल कराया। वह और उसका बालक दोनों ही निहाल हो गए। ‘ए जू’ के सहयोग से काम की गति तो बढ़ी पर माताजी की श्रमशीलता में जरा भी कमी नहीं आयी। वह घर के सामान्य काम-काज के अलावा अखण्ड ज्योति कार्यालय के कामों में भी हाथ बंटाया करती थी। परिजनों को भेजी जाने वाली अखण्ड ज्योति पत्रिका के रैपरों में वह टिकट चिपकाती, उन्हें भेजने की व्यवस्था करती।
पाठकों एवं परिजनों के जो पत्र कार्यालय में आते थे, उनके उत्तर लिखने में गुरुदेव की सहायता करना माताजी का प्रिय कार्य था। गुरुदेव के पास बैठकर वह अपने पास पत्रों का ढेर जमा कर लेती। इसके बाद एक-एक पत्र पढ़कर गुरुदेव को सुनाती जातीं और वे उत्तर लिखते जाते। पत्रोत्तर देने का यह कार्य बड़ी ही तीव्र गति से सम्पन्न होता। जितनी देर में माताजी पत्र पढ़तीं, उतनी देर में गुरुदेव उत्तर लिख देते। एक बैठक में कम से कम सौ पत्रों के जवाब देने का कार्य सम्पन्न होता। उन दिनों की याद करके माताजी बाद में बताया करती थीं कि गुरुदेव तो सारे दिन अति व्यस्त रहते थे। उनका रात्रिकाल भी प्रायः साधना और समाधि में गुजरता था। बस पत्र लिखने का ही समय ऐसा था, जब मुझे उनका संग-साथ मिल पाता था। इन्हीं क्षणों में कभी-कदार एक-आध घर-परिवार की बातें हो जातीं।
वैसे सामान्यतया घर-परिवार की बातों की तरफ से उन्होंने गुरुदेव को पूरी तरह से निश्चिन्त कर रखा था। रिश्ते-नातेदार, परिवार-सगे सम्बन्धी सभी की देख-भाल, आव-भगत का जिम्मा वही अकेली निभाती थीं। उनके प्यार भरे बर्ताव से सभी सम्बन्धी एवं कुटुम्बी प्रायः अभिभूत बने रहते थे। अखण्ड ज्योति संस्थान के निवास के इन्हीं प्रारम्भिक वर्षों में वह दो सन्तानों की जननी बनीं। उनकी पवित्र कोख से पहले मृत्युञ्जय शर्मा तथा बाद में शैलबाला का जन्म हुआ। धन्य हैं ये विशिष्ट विभूतियाँ जिन्हें विश्व जननी ने अपनी कोख में रखा। अपने इन बच्चों को उन्होंने घर में सतीश और शैलो बुलाना शुरू किया। पारिवारिक सदस्यों के बीच सदा ही इनका यही नाम रहा। अपने इन बच्चों के भाव विकास के साथ उनकी दैनन्दिन गतिविधियाँ यथावत चलती रही।
उन दिनों उनके काम-काज को देखकर आने-जाने वाले आगन्तुक, सगे-सम्बन्धी परिवार के सदस्य सभी हतप्रभ व हैरान रहते थे। उन्हें यह अचरज होता था कि माताजी इतना काम करती हैं, उन्हें थकान क्यों नहीं लगती है? कई बार तो वे ऐसे काम कर डालतीं, जिन्हें करना कई व्यक्तियों के सामूहिक श्रम से सम्भव होता।
‘ए जू’ यदा-कदा उनके इस तरह दिन-रात काम में लगे रहने के रहस्य के बारे में पूछ लेती थी। उसके सवाल पर कभी-कभी तो वह हंस देतीं और कभी थोड़ा गम्भीर होकर कहतीं- “मन में समर्पण की तीव्रता हो तो वज्र भी फूल हो जाया करता है। मेरे लिए हर काम चाहे वह बर्तन माँजना, झाड़ू लगाना हो या फिर आचार्य जी के पास बैठकर पत्र लिखने में मदद करना, अपने को उनके चरणों में उड़ेलने, समर्पित करने का माध्यम है। मैं जितना ज्यादा काम करती हूँ, मुझे उतना ही ज्यादा लगता है कि मैं अपने आपको उन्हें दे रही हूँ।” इस तरह के अनेक काम-काज के बीच उनके मातृत्व का विस्तार भी तीव्र गति से हो रहा था। उनकी वात्सल्य संवेदना सतत अपना विकास करती जा रही थी।
लल्लेश्वरी कश्मीर की महान् साधिका थीं।
मातृत्व के विस्तार की सजल संवेदना की छुअन से आने-जाने वाले बरबस अभिभूत हो जाते थे। अखण्ड ज्योति संस्थान में आकर उन्हें हमेशा ऐसा लगता, जैसे वे अपनी सगी माँ के पास आए हैं। इनमें से कइयों को माताजी अपनी सगी माँ से कहीं बढ़कर लगती। वे अनुभव करते कि सगी माँ तो फिर भी कभी थकान, परेशानी अथवा कार्यव्यस्तता वश अपने बच्चों को नजर अन्दाज कर देती है, लेकिन माताजी का प्यार कभी कम नहीं पड़ता। सगी माँ बच्चों के बड़े हो जाने पर उन पर उतना ध्यान नहीं देती, पर माताजी के लिए बच्चे सिर्फ बच्चे हैं, वे छोटे हों या बड़े। वे जैसे अपने बच्चों की सार-संभाल के लिए ही अवतरित हुई हैं।
घर-परिवार के दायित्व और कार्यालय के काम-काज की व्यस्तताएँ कितनी भी क्यों न होती, परन्तु माताजी के मातृत्व का आँचल कभी भी छोटा न पड़ता। दिनों-दिन उसका विस्तार व्यापक होता जा रहा था। इन्हीं दिनों उन्होंने ओमप्रकाश एवं दया के जीवन को संवारा। सतीश (मृत्युञ्जय शर्मा) एवं शैलो (शैलबाला) भी बड़े हो रहे थे। उनकी पढ़ाई-लिखाई की देखभाल भी उन्हें ही करनी पड़ती थी। बच्चों में जैसा कि अक्सर होता है, उनमें चंचलता, नटखटपन की बहुलता होती है। उनके इन बच्चों में भी यही बात थी। उनकी शैलो तो खैर सीधी थी, पर सतीश की शरारतें कुछ ज्यादा ही थी। लेकिन बच्चों को मारने-पीटने पर माताजी का विश्वास बिल्कुल भी न था। उनका मानना था कि बच्चों को बिना थके प्यार से समझाते रहना चाहिए। जिस दिन उन्हें औचित्य समझ में आ जाता है, वे शरारत करना छोड़ देते हैं।
हालाँकि यह स्थिति कहने में जितनी आसान और साधारण लगती है, करने में उतनी ही जटिल और परेशानी पैदा करने वाली है। इसमें बड़े धैर्य एवं ममता की जरूरत पड़ती है। और कभी-कभी कठिन पलों से भी गुजरना पड़ता है। माताजी के मातृत्व को भी ऐसे पलों का सामना करना पड़ा। वह मार्च 1951 का समय था। ओमप्रकाश की इण्टर की परीक्षाएँ चल रही थी। अंग्रेजी का दूसरा पेपर सेकेंड मीटिंग में था। वह अपने कमरे में बैठे पढ़ रहे थे। लगभग सुबह के 7.30 बजे होंगे। अब्दुल लतीफ, ट्रेडिल मशीन चला रहा था। माताजी के सम्बन्धियों में से एक ‘चन्दा’ कम्जोज़ कर रहे थे। इतने में सतीश आए, उन्होंने मशीन का बड़ा पहिया देखा। मशीन के चमकीले दाँतों को देखकर उन्हें न जाने क्या समझ में आया, उन्होंने इन दाँतों को पकड़ने के चक्कर में अपना हाथ मशीन में डाल दिया।
भैय्या!!! चन्दा काफी जोर से चिल्लाए। ओमप्रकाश भागे-भागे आए। उन्होंने देखा- सतीश चुप हैं। उठाकर गोद में ले लिया और सिर पर हाथ फेरा। उनको ऐसा लगा कि शायद चोट सिर में लगी है। तभी चन्दा ने लगभग सुबकते हुए कहा- भैय्या! हाथ!! हाथ देखने पर पता चला कि हथेली आधी पलट गयी है, उंगलियाँ लटक रही हैं। इस हृदय विदाकर दृश्य को देखकर उन्होंने ताई जी और माताजी को आवाज दी। दोनों भागी-भागी आयीं। इतनी देर में ओमप्रकाश का नेकर और बनियान दोनों खून से तर हो चुके थे। मथुरा के सिविल सर्जन एस.के. मुखर्जी को दिखाया गया, उन्होंने सलाह दी- आगरा ले जाओ। मुखर्जी साहब ने आशंका भी व्यक्त की, कि कहीं हाथ न काटना पड़ जाए।
परम पूज्य गुरुदेव इसी बीच आ गए थे। उनके साथ रघुनाथ अग्रवाल, श्यामलाल और कंपाउंडर जगदीश के भाई लक्ष्मण भी थे। दवा-पट्टी की जा चुकी थी, इन्जेक्शन भी लग गया था। लेकिन सतीश को बेहोशी आ गयी थी। सभी सोच-विचार में थे, क्या किया जाय? तभी माताजी ने डॉ. मुखर्जी से कहा, डॉ. साहब आप भगवान् पर भरोसा रखकर यहीं जो कुछ कर सकते हों कीजिए। पूज्य गुरुदेव ने भी माताजी के इस कथन में हामी भरी। आप्रेशन किया गया। माताजी धैर्य के साथ आप्रेशन रूम के बाहर खड़ी रहीं। थोड़ी देर बाद आप्रेशन समाप्त हुआ। मरीज को वार्ड में ले जाया गया। काफी दिनों के बाद स्थिति में सुधार आया। इस घटना के चिह्न अभी भी मृत्युञ्जय शर्मा के हाथ पर हैं। इसके बाद उनकी बचपन की शरारतें कितनी कम हुई, यह तो पता नहीं, परन्तु माताजी का ममत्व बढ़ता गया। वह बड़े धीरज के साथ बच्चों के व्यक्तित्व को गढ़ती रहीं।
माताजी के ममत्व के इस दायरे में उन दिनों भी अनगिनत थे। उनके लिए जितने प्यारे सतीश और शैलो थे, उतना ही प्यारा अब्दुल लतीफ था। यह मुसलमान युवक अखण्ड ज्योति संस्थान में मशीन मैन था। पत्रिका की छपाई का काम-काज देखा करता था। अपने परिवार के सदस्यों के साथ माताजी इसके भी खाने की व्यवस्था किया करती थीं। बड़े नियम से वह बीच-बीच में चाय-नाश्ते के लिए पूछ लेतीं। उनका यह व्यवहार कभी-कभी आने वाले सम्बन्धियों को अखर जाता। उनमें से कोई-कोई कभी-कदार कह देते- अब्दुल लतीफ की भोजन की व्यवस्था करना बुरा नहीं है, पर आपको कम से कम उसके बरतन तो अलग रखना चाहिए। आखिर हम लोग ब्राह्मण हैं, कुछ तो आचार-विचार आपको मानना चाहिए। सम्बन्धियों की इस बात के उत्तर में वह कहतीं, आचार-विचार का मतलब छुआछूत नहीं होता। इसका मतलब यह है कि हम अपने विचारों और कार्यों में कितने पवित्र और निर्दोष हैं?
उनकी ये बातें किसी को समझ में नहीं आती। उनके द्वारा काफी-कुछ समझाने के बावजूद सम्बन्धियों के आग्रह यथावत बने रहे। वे अपनी रूढ़िवादी-पुरातन मान्यताओं को उन पर थोपने की कोशिश जब-तब करते रहते। सम्बन्धियों के इस बढ़ते आग्रह पर एक दिन उनके यहाँ काम करने वाली ‘ए जू’ ने भी उन्हें समझाया, आखिर आप सबकी बातें मान क्यों नहीं लेतीं। ठीक ही तो कहते हैं वे सब जो कुछ भी हो, है तो वह मुसलमान ही। उसके लिए बरतन अलग करने में बुराई ही क्या है? ‘ए जू’ की इन बातों ने माताजी को व्यथित कर दिया। वे उठकर दूसरे कमरे में गयीं, जहाँ अभी तक अब्दुल लतीफ के झूठे बर्तन रखे थे। उन्होंने उन बर्तनों को अपने हाथों से उठाया और बर्तन माँजने वाली जगह पर ले आयीं। ‘ए जू’ अभी कुछ और सोच समझ पाती, इसके पहले वह उसे सम्बोधित करते हुए बोलीं- इतने दिन तुम मेरे पास रही, पर तुम मुझे समझ नहीं पायी। अरे मैं सिर्फ माँ हूँ, हिन्दू की भी माँ, मुसलमान की भी माँ। मेरे लिए जैसे ओमप्रकाश और सतीश है, वैसे ही यह अब्दुल लतीफ है।
उनकी इन बातों को सुनकर ‘ए जू’ हतप्रभ रह गयी। उसे थोड़ी देर तक समझ ही न आया कि वह क्या बोले। जब तक वह कुछ बोलती, तब तक तो माताजी ने अब्दुल लतीफ के झूठे बरतन अपने हाथों से धो डाले। ‘ए जू’ को लगा जैसे वह कोई मानवी नहीं देवी हों। थोड़े दिनों के बाद पता नहीं किस तरह इस बात का पता अब्दुल लतीफ को भी लगा। सब कुछ सुनकर उनकी आँखों में आँसू आ गए। उसने आँसुओं से छलकती आँखों के साथ उन्हें हाथ जोड़ कर प्रणाम करते हुए कहा, माँ आप सचमुच में माँ हो। आपका दरजा फरिश्तों से भी ज्यादा बुलन्द है। आप फातिमा बी की तरह मुकद्दस हो। वह हाथ जोड़े ऐसी न कितनी बातें उनके सामने भाव विह्वल स्वर में कहता रहा। जब वह वहाँ से चली गयी, तो उसने उस जगह की धूल अपने सिर माथे पर लगायी। और वहाँ लेटकर प्रणाम किया।
मातृत्व के इस अनन्त विस्तार का परिचय किन्हीं विलक्षण क्षणों में वह स्वयं भी दे देती थीं। एक बार एक प्रखर गायत्री साधक रामसजीवन अखण्ड ज्योति संस्थान आए। पिछले कुछ वर्षों से वह कई कठोर व्रतों का पालन करते हुए गायत्री अनुष्ठान कर रहे थे। अखण्ड ज्योति संस्थान आने पर उन्हें माताजी के द्वारा परोसे हुए खाने को खाने का सौभाग्य मिला। भोजन करते समय माताजी की एक झलक पाकर वह अपनी किन्हीं अनुभूतियों में डूब गए। अचानक न जाने क्यों उनके मुख से निकला- माँ तुम किस तरह माँ हो? इस प्रश्न के उत्तर में माताजी बोलीं- बेटा, माँ इस या उस तरह की नहीं होती। माँ सिर्फ माँ होती है। फिर वह धीमे से बोली- मैं सचमुच की माँ हूँ। बेटा- गुरुदेव की पत्नी के रूप में माँ नहीं। केवल सतीश और शैलो की माँ नहीं। मैं सबकी माँ हूँ, सारे मनुष्यों की माँ, प्राणियों, वनस्पतियों की माँ, इस समस्त सृष्टि की माँ। माताजी के इन वचनों को सुनकर गायत्री के प्रखर साधक रामसजीवन को लगा, जैसे कि आज वह गायत्री के तत्त्व और सत्य का साक्षात्कार कर रहा है। गायत्री माता ठीक उसके सामने खड़ी हैं। बाद में उन्हीं की सक्रिय प्रेरणा से तो गायत्री तपोभूमि का निर्माण हुआ।
भगिनी निवेदिता ने स्वामी विवेकानंद से…
गायत्री तपोभूमि निर्माण की मूल प्रेरणा माताजी के अन्तःकरण में अंकुरित हुई। उन्होंने एक दिन प्रातः ध्यान की भावदशा में देखा कि जगन्माता युगशक्ति गायत्री के रूप में एक मन्दिर में विद्यमान हैं। असंख्य जन माता का पूजन-अर्चन कर रहे हैं। और माता से प्रज्ञा, मेधा व सद्बुद्धि के साथ अपनी कष्ट-कठिनाइयों से मुक्ति का वरदान पा रहे हैं। जगदम्बा के इस मन्दिर की एक और अन्य खास बात माताजी ने अपने ध्यान में अनुभव की। उन्होंने देखा कि यह मन्दिर सामान्य मन्दिरों की तरह केवल पूजा-अर्चा का स्थान भर नहीं है। यहाँ से लोकहित की अनेकों गतिविधियों का संचालन हो रहा है। सद्ज्ञान की अनगिनत धाराएँ यहाँ से ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ का सन्देश प्रसारित करती हुई भुवन व्याप्त हो रही हैं। यहीं से भगवान् महाकाल अपनी युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का सूत्रपात कर रहे हैं। इस अद्भुत अनुभूति में डूबी हुई माताजी उस दिन साधना से थोड़ी देर में उठीं।
साधना से उठने पर अपने नित्य-नियम के अनुरूप उन्होंने घर और अखण्ड ज्योति के कार्यालय के जरूरी काम निबटाए। इसके बाद परिजनों के आए हुए पत्रों को पढ़ने और उनके उत्तर लिखने का क्रम आया। यह काम परम पूज्य गुरुदेव एवं माताजी मिलकर किया करते थे। इसी बीच कुछ बातें भी हो जातीं। उस दिन पत्रों को खोलते हुए माताजी ने अपनी अन्तरानुभूति भी गुरुदेव के सामने खोली। माताजी की सारी बातें सुन लेने के बाद परम पूज्य गुरुदेव ने कहा- आज हमें भी साधना के क्षणों में अपने मार्गदर्शक का कुछ ऐसा ही सन्देश मिला है। इस सन्देश के अनुरूप हमें ऐसा केन्द्र स्थापित करना है, जहाँ देश के विभिन्न भागों से अनेकों साधक आकर सच्ची अध्यात्म साधना कर सकें। उन्हें आध्यात्मिक तत्त्वदर्शन की वास्तविक अनुभूति हो सके। साथ ही उस महत् कार्य का प्रारम्भ हो सके, जिसके लिए हम लोगों को भगवान् ने धरती पर भेजा है।
माताजी और गुरुदेव की बातों का सार तत्त्व एक था। उन्होंने अपनी बातों के अन्त में एक-दूसरे की ओर देखा और काम में लग गए। लेकिन उस दिन से गायत्री तपोभूमि के निर्माण का संकल्प सक्रिय हो गया। इसके लिए उपयुक्त जमीन देखी जाने लगी। घर में उस समय केवल 6 हजार रुपये की पूँजी थी, जिसके आधार पर भूमि खरीदने की बात सोची गयी। उस समय मथुरा में किशोरी रमण कॉलेज के साथ जीर्ण अवस्था में एक गायत्री मन्दिर था। टीले पर स्थित होने के कारण इसे गायत्री टीला भी कहते थे। इसे लेने की बात जानकारों ने सुझायी। पर बात कुछ जमी नहीं। एक तो वह टीला था, उस पर नीचे से कटाव भी बहुत पड़ रहा था। टीले पर ऊपर जाकर जमीन भी बहुत थोड़ी थी। इन्हीं सब कारणों से इस जमीन को छोड़ना पड़ा।
जमीन खरीदने के लिए मण्डी रामदास में भी कई जगह प्रयत्न किए गए, पर कहीं ढंग से बात बनी नहीं। महीनों किए गए इन प्रयत्नों के बेकार जाने पर माताजी ने साधना के क्षणों में उपयुक्त भूमि को तलाशने के प्रयत्न शुरू किए। एक-दो दिन के प्रयास में उन्हें एक भूमि पर प्रकाश पुञ्ज सा उठता दिखा। इसके आध्यात्मिक स्पन्दनों को उन्होंने अपनी अन्तर्चेतना में अनुभव किया। एक दिन गुरुदेव के साथ घूमने जाते समय उन्होंने यह भूमि प्रत्यक्ष में देखी। यह स्थान मथुरा से लगभग 1 किलोमीटर दूर मथुरा-वृन्दावन मार्ग पर था। उस समय यहाँ एक कुआँ, एक हाल और एक बरामदा बना था। यह जगह सड़क के बिल्कुल पास थी। उन क्षणों में गुरुदेव से इसकी चर्चा करने पर वह कहीं गहरे में लीन हो गए। कुछ पलों के बाद अपनी इस तल्लीनता से उबरने पर उन्होंने कहा- “आप एकदम ठीक कहती हैं। यह जगह पहले कभी महर्षि दुर्वासा की तपोभूमि रही है। अभी भी यहाँ उनकी तपस्या के प्रभाव शेष हैं। यह जमीन सब तरह से अपने कार्य के लिए उपयुक्त रहेगी।” कभी बाल्यकाल में वे यहाँ आए भी थे।
इसको खरीदने के लिए उपयुक्त माध्यमों से बात-चीत चलायी गयी। जिसकी जमीन थी, वह व्यक्ति भी आसानी से तैयार हो गया। थोड़े ही दिनों में सारी सरकारी औपचारिकताएँ पूरी करते हुए जमीन की रजिस्ट्री हो गयी। इस तरह भूमि का मसला हल हो गया। परन्तु इसी के साथ एक नयी समस्या खड़ी हो गयी। जमीन खरीदने के बाद अब पास में बिल्कुल भी पैसे न बचे थे। और उस पर कुछ बनवाकर उसे उपयोग में लाने के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। किसी के सामने याचना करना, अपनी आवश्यकताओं को जग-जाहिर करना तपोमूर्ति गुरुदेव के तप के नियमों के विरुद्ध था। यद्यपि उस समय भी उनको जानने-पहचानने वाले, उनके प्रति आस्था, निष्ठ एवं भक्ति रखने वाले कम नहीं थे। बस उनके एक इशारे भर की देर थी और धन की ढेरी कदमों में लग जाती। पर यह बात उनके तपोनिष्ठ जीवन की मर्यादा के विरुद्ध थी। हालाँकि धन की जरूरत तो थी ही।
इस जरूरत को माताजी भी अनुभव कर रही थीं। उन्होंने कुछ सोचा और एक पल भी देर लगाए बिना अपने सारे जेवर और पास का रुपया गुरुदेव के चरणों में रख दिया। बिना कहे, बिना कोई हल्का सा भी संकेत किए, बिना तनिक सा भी जताए माताजी ने मौन भाव से अपना सब कुछ दे डाला। गुरुदेव ने उन्हें एक बार हल्के से टोका भी- आप ऐसा क्यों करती हैं? कहीं न कहीं से धन की कोई व्यवस्था हो ही जाएगी। गुरुदेव की इस बात पर माताजी कुछ बोली नहीं- बस उनकी आँखें भर आयीं। उन्हें इस तरह देखकर गुरुदेव भी कुछ बोल न सके। बस चुपचाप उनकी निधि स्वीकार कर ली। गायत्री तपोभूमि के निर्माण एवं गायत्री परिवार के संगठन के लिए उनका यह अपूर्व अनुदान था।
सामान्यतया नारियों का अपने आभूषणों के प्रति अतिरिक्त मोह देखा जाता है। आयु के किसी भी मोड़ पर उनका यह मोह प्रायः कम होने के बजाय बढ़ता ही है। पहले अपने लिए फिर अपने लिए नहीं तो अपनी किसी बेटी या बहू के लिए वे आभूषणों को बनवाती, गढ़वाती रहती हैं। यह सिलसिला कहीं भी किसी भी समय थमता नहीं। परन्तु माताजी ने नारी प्रकृति की इस सामान्य कमजोरी के उलटे यह अद्भुत कार्य कर दिखाया, वह भी बड़ी ही सहजता से। वे ऐसा इसलिए कर सकीं क्योंकि उन्होंने इस सत्य को गहराई से जान लिया था कि वास्तविक शृंगार शरीर का नहीं व्यक्तित्व का होता है। और व्यक्तित्व का शृंगार सुवर्ण के रत्नजटित आभूषण नहीं, तप और विद्या है। इन्हीं दोनों के सतत् अर्जन से व्यक्तित्व अलंकृत होता है। और यह अलंकरण भी ऐसा होता है कि जिसे देखकर भूतल के सामान्य नर-नारी ही नहीं, ऊर्ध्वलोकों के देव-देवी, ऋषि-महर्षि, सिद्ध जन भी चमत्कृत रह जाते हैं। इस सत्य को पहचानने वाली माताजी ने उस दिन केवल अपने आभूषण ही नहीं दिए बल्कि बहुमूल्य वस्त्रों का भी परित्याग कर दिया। और आन्तरिक ही नहीं बाह्य तपस्या के भी सभी आयामों के परिपालन के लिए संकल्पित हो गयीं।
उन क्षणों में ऐसा लगा जैसे माता सीता ने वनवासी प्रभु राम के साथ चलने के लिए तपस्विनी वेश धारण कर लिया हो। जिन आँखों ने यह दृश्य निहारा वे धन्य हो गयीं। और जो अपने भाव जगत् में अभी इन क्षणों में इस दिव्य दृश्य का साक्षात् कर रहे हैं, उन पर भी माता भगवती और प्रभु श्रीराम की अद्भुत कृपा है। तपोनिरत युगल सरकार का संकल्प मूर्त होने लगा। गायत्री तपोभूमि अपना आकार पाने लगी। इसके ऊर्जाकेन्द्र के रूप में युगशक्ति माता गायत्री का ठीक वैसा ही मन्दिर बना, जैसा कि माताजी ने अपनी ध्यानस्थ स्थिति में अनुभव किया था। युगशक्ति की प्राण प्रतिष्ठ से पूर्व माता जी अपने आराध्य के साथ विशेष साधना में संलग्न रही। इस शुभ घड़ी में 24 तीर्थों की रज, 24 पवित्र स्थानों का जल यहाँ लाया गया। इसके अतिरिक्त और भी कुछ ऐसी दिव्य क्रियाएँ गोपनीय स्तर पर सम्पन्न की गयी, ताकि माता की चेतना इस महामन्दिर में सद्य जाग्रत् रहे। और इस स्थान का अमोघ प्रभाव सभी को दीर्घकाल तक अनुभव होता रहे।
मन्दिर निर्माण के साथ अन्य गतिविधियों के संचालन की व्यवस्था यहाँ की गयी। पवित्र यज्ञशाला में दिव्य अग्नि स्थापित हुई। साधना सत्रों के साथ अनेकों तरह की योजनाएँ यहाँ से संचालित होने लगी। दूर-दूर से लोगों के आने का सिलसिला चल पड़ा। जो भी यहाँ आते थे, उन सबका एक साथ सामूहिक परिचय एक ही था, वे सभी माताजी के बच्चे थे। उन सबके मन अपनी माँ के लिए हुलसते थे। उन सभी के प्राणों में अपनी माँ के लिए पुकार थी। माँ के प्यार का, दुलार का, उनके वात्सल्य का चुम्बक उन्हें यहाँ खींच लाता था। माता भी अपने बच्चों को संस्कार देने के लिए प्रयत्नशील थी। उनका सतत प्रयास यही था कि उनके बच्चों की चेतना उत्तरोत्तर निर्मल, पवित्र एवं परिष्कृत हो। इसके लिए जो भी आवश्यक होता, वह निरन्तर किया करतीं।
अपने बच्चों को संस्कारवान बनाने के लिए माताजी हमेशा प्रयासलीन रहती थीं। गायत्री तपोभूमि व अखण्ड ज्योति संस्थान में रहने वाले, काम करने वाले और आने-जाने वाले सभी उनके बच्चे थे। वह सभी की अपनी सगी माँ थीं। माँ कौन होती है? इसके बारे में उनकी अपनी मौलिक दृष्टि थी। बातचीत में वे कहा करती थीं- ‘जन्म देने वाली जननी होती है। लेकिन जो सन्तान को संस्कार देती है, उसके जीवन को संवारने के लिए हर पल-हर क्षण प्रयत्नशील रहती है, वही माँ है। अपने बच्चों को ऊँचा उठाने के लिए, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए, उनकी आन्तरिक विकास के लिए माँ दिन-रात जुटी रहती है। उत्तम संस्कारों के बीजारोपण से ही मनुष्य का जीवन सही मायने में संवरता है। इसी से माता की मातृत्व साधना की सफलता प्रमाणित होती है। वे कहती थी- बेटा! मैं तुम सब की जननी तो नहीं, पर तुमसे से हर एक को अच्छे संस्कार देने वाली तुम्हारी सच्ची माँ हूँ।’
अपने कथन के अनुरूप वह हर समय इसके लिए कोशिश करती रहती थीं। बात-व्यवहार में, उनके संपर्क के प्रत्येक आयाम में यह सत्य प्रकट होता था। उनके द्वारा कराए जाने वाले भोजन में इसकी सबसे अधिक सघनता रहती थी। परम पूज्य गुरुदेव इस बात को परिजनों से, कार्यकर्त्ताओं से जब-तब बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कह देते थे। वे कहते- “तुम लोग माताजी को साधारण न समझो। वे शक्तिस्वरूपा हैं, महाशक्ति हैं। अपने आध्यात्मिक ऐश्वर्य को छिपाकर बड़े ही सामान्य ढंग से रहा करती हैं। उन्हें पहचानना, उनको सही ढंग से समझ पाना आसान काम नहीं है। वे तुम लोगों के लिए जितना आसानी से कर देती हैं, उतना तो मैं भी नहीं कर सकता। पता नहीं तुम सब इस सच्चाई को कितना समझ पाते हो? पर सत्य यही है कि उनके संपर्क मात्र से पूर्वजन्मों के कषाय-कल्मषों, कलुषित संस्कारों का नाश होता है। व्यक्तित्व में नए दिव्य संस्कारों के बीज रोपित होते हैं।”
इस क्रम में परम पूज्य गुरुदेव और भी बहुत कुछ बताया करते थे। वे कहते- माताजी का भोजन दिखने भर में सादा और साधारण है। लेकिन इसे तुम लोग कभी साधारण समझने की भूल मत करना। इसमें उनकी असाधारण प्राण ऊर्जा समायी रहती है। यह पेट को तृप्त करने के साथ आत्मा तक को तृप्त करने वाला तत्त्व है। तुम लोगों को अनुदान देने के, तुम सबको संस्कारवान बनाने के उनके तरीके बड़े अद्भुत हैं। वे कब, क्या और किस ढंग से करती हैं, इसे सही-सही वे ही जानती हैं। लेकिन यह बात सौ टका सच है कि उनके चौके का भोजन, उनके द्वारा किए जाने वाले शक्ति सम्प्रेषण का, दिव्य संस्कारों के बीजारोपण का सबसे समर्थ माध्यम है। यह उनके द्वारा अपनायी जाने वाली बड़ी ही प्रिय विधि है।
माताजी के चौके में भोजन हजारों-लाखों ने किया होगा। उनके संपर्क में शायद इससे भी अधिक आए होंगे। पर इस उपरोक्त सच को कम ही लोग समझ पाए होंगे। हाँ बुद्धि से न समझ पाने के बावजूद इसकी भावानुभूति जरूर बहुतों ने पायी होगी। कभी-कभी तो यह अनुभूति इतनी प्रगाढ़ होती थी कि अनुभव करने वाला इसे बताए बिना न रह पाता था। इसके बखान से ही उसे सन्तुष्टि और संतृप्ति मिलती थी। ठा. हनुमन्त सिंह हाड़ा की अनुभूति कथा ऐसी ही है। इसे उन्होंने ही गायत्री तपोभूमि के एक शिविर में अपने साथी शिविरार्थियों को सुनाया था। इस प्रसंग को बीते हुए आज चार दशक के लगभग होने जा रहे हैं। पर जिन्होंने उन दिनों इसे सुना, उन्हें आज भी ये बातें यथावत याद हैं।
ठा. हनुमन्त सिंह राजस्थान के बाड़मेर के पास के रहने वाले थे। उनके पुरखे काफी बड़ी जागीर के स्वामी थे। स्वतंत्रता मिलने के बाद जागीरें तो न रहीं, पर उनके ऐश्वर्य में कोई विशेष कमी न आयी थी। ठाकुर साहब में गुण काफी थे, पर उनमें दोष भी कम न थे। ऐश्वर्य व विलासिता जन्य कई दुष्प्रवृत्तियाँ उनके व्यक्तित्व में बुरी तरह समा गयी थी। परिवार के सदस्य, उनकी धर्मपत्नी उनके इन दुर्गुणों, दुष्प्रवृत्तियों से बुरी तरह परेशान थे। पता नहीं किस तरह परिवार के लोगों को ‘अखण्ड ज्योति’ की एक प्रति हाथ लग गयी। इसमें गायत्री तपोभूमि और यहाँ चलने वाले शिविरों के बारे में काफी कुछ छपा था। सारी बातें पढ़कर परिवार के सदस्यों एवं उनकी पत्नी ने सोचा कि ठाकुर साहब को वहाँ ले चला जाय। उन सब लोगों ने ठाकुर साहब से बात की। थोड़ी ना-नुकुर के बाद वे तैयार हो गए।
निश्चित तिथि पर वे सभी मथुरा स्थित गायत्री तपोभूमि पहुँच गए। उन दिनों आने वाले ठहरते तो गायत्री तपोभूमि में थे, पर खाना अखण्ड ज्योति संस्थान में खाते थे। इसी नियम के अनुसार ठाकुर साहब भी अपने परिवार के साथ भोजन हेतु अखण्ड ज्योति संस्थान में गए। माता जी ने स्वयं अपने हाथों से परोस कर उन्हें भोजन कराया। मुर्गा-माँस-शराब के अभ्यस्त ठाकुर साहब हालाँकि इस तरह के साधारण भोजन के आदी न थे। फिर भी न जाने क्यों उन्हें इस भोजन में कुछ अद्भुत स्वाद आया। भोजन करने के बाद वह फिर से तपोभूमि लौट आए। परिवार के सदस्यों के बहुत समझाने पर भी उन्होंने शिविर के किसी भी कार्यक्रम में कोई भाग नहीं लिया। हाँ खाना खाने के लिए अवश्य सबके साथ माताजी के यहाँ पहुँच जाते थे।
ठाकुर साहब के अनुसार “पता नहीं क्या था उस भोजन में? पर कुछ अद्भुत जरूर था। दो-तीन दिन में ही मुझमें एक अद्भुत भाव परिवर्तन हो गया। हर समय आँखों के सामने माताजी की सौम्य मूर्ति उपस्थित रहती। पहले तो गलत विचार, गलत भावनाएँ मन में आती ही नहीं थीं। पर यदि पुरानी आदतों वश आ भी जाती तो मन में बड़ी गहरी शर्मिन्दगी होती। ऐसा लगता कि माता जी सब कुछ देख रही हैं, और मैं कैसी घटिया बातें सोच रहा हूँ। घर वापस पहुँचने के बाद पुरानी बातों की ओर मन बिल्कुल भी न गया। परन्तु मित्र वही थे, उनकी जोर-जबरदस्ती भी वही थी। इसी जोर-जबरदस्ती के कारण उनके साथ जाना पड़ा। बहुत मना करने के बावजूद भी उन्होंने माँस और शराब का सेवन करा ही दिया।”
“इसके बाद ही हालत खराब हो गयी। उल्टी-दस्त का सिलसिला चल पड़ा। जैसे-तैसे घर पहुँचाया गया। लेकिन दिनों-दिन बीमारी बढ़ती गयी। दवा डॉक्टर इलाज सब बेअसर होने लगे।” ठाकुर साहब के अनुसार घर के सभी लोग घबरा गए थे। पर उन्हें खुद एकदम घबराहट न थी। उन्हें हमेशा लगता कि माताजी उनके सिरहाने बैठे उनका सिर सहला रही हैं और कह रही हैं- “बेटा, इसे बीमारी नहीं विरेचन समझ। इस बीमारी के द्वारा तेरे सारे पुराने कुसंस्कार धुल जाएँगे। अब तेरे अन्दर वही रहेगा, जो मैंने भोजन के साथ तुझे दिया है। तू परेशान न होना- सब कुछ बड़ी जल्दी ठीक हो जाएगा।” सचमुच ऐसा ही हुआ। वह थोड़े दिनों में एकदम ठीक हो गए। ठीक होने के बाद उनका जीवन क्रम एकदम बदल गया। पुराने मित्रों का संग-साथ भी छूट गया।
फिर से शिविर में गायत्री तपोभूमि आना हुआ। उन्होंने अपनी कथा विस्तार से सबको सुनायी। उनका बदला हुआ जीवन क्रम, कहे गए सत्य को प्रमाणित कर रहा था। नियमित ब्रह्ममुहूर्त में गायत्री साधना, प्रातः हवन, उनके जीवन के अनिवार्य अंग बन गए थे। माताजी द्वारा दिए गए दिव्य संस्कारों ने उन्हें सम्पूर्ण रूप से बदल दिया था। अपनी अनुभूतियों को सुनाते हुए कहा करते थे- श्रेष्ठ साधकों के लिए मार्गदर्शक परम पूज्य गुरुदेव हैं। वे अवतारी सत्ता हैं। परन्तु हम जैसे निकृष्ट जनों के लिए, अनेक तरह की गन्दगी से लिपटी हुई सन्तानों के लिए तो माताजी ही सब कुछ हैं। उनके बिना भला हम जैसों का कल्याण और कौन करेगा। गुरु-मार्गदर्शक हमेशा साधक की पात्रता देखता है। पर माँ के लिए तो बच्चे हमेशा ही सत्पात्र होते हैं, भले ही वे मल-मूत्र से सने क्यों न हो। माँ को उन्हें गोद में उठाने, संस्कारवान बनाने में तनिक सी भी हिचकिचाहट नहीं होती। हालाँकि इसके लिए उसे अपार प्राण ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। अनेकों कष्ट सहन करने पड़ते हैं। माताजी प्रसन्न भाव से यह सब करती थीं। इसके लिए आवश्यक शक्ति वह अपने आराध्य की साधना संगिनी होकर प्राप्त करती थीं।
बाग में बाजार मठ में माँ…
माताजी सच्चे अर्थों में अपने आराध्य की साधना संगिनी थी। परम पूज्य गुरुदेव उनके लिए गुरु, मार्गदर्शक, ईष्ट, आराध्य सभी कुछ थे। उनका जीवन अपने आराध्य के श्री चरणों में समर्पित सुरभित पुष्प की भाँति था। रोज-मर्रा किए जाने वाले छोटे-बड़े हर क्रिया-कलाप के माध्यम से उनके प्राण अपने आराध्य के महाप्राणों में समाहित होते रहते थे। बाहरी रूप से घर-परिवार, सगे-सम्बन्धियों, अखण्ड ज्योति संस्थान व गायत्री तपोभूमि के अनेकों लौकिक दायित्व निभाते हुए भी उनका आन्तरिक जीवन इस लौकिकता से पूरी तरह से अछूता, एकदम अलौकिक था। साँसारिक कर्त्तव्यों को मनोयोगपूर्वक पूरा करने का सार्थक प्रयास करते हुए भी उनकी आन्तरिक भावनाओं में कहीं भी साँसारिक विषयों की लेशमात्र गन्ध नहीं थी।
अपनी सारे दिन की व्यस्तताओं से घिरी हुई वह स्वयं को मन ही मन रात्रि में की जाने वाली विशिष्ट साधना के लिए तैयार करती थीं। आगन्तुकों के आवागमन, पत्रिका व अन्य साहित्य का प्रकाशन और गायत्री तपोभूमि के अनेकों क्रिया-कलापों की वजह से परम पूज्य गुरुदेव की व्यस्तताएँ बहुत ज्यादा बढ़ गयी थीं। माताजी की भी इसमें बराबर की सहभागिता थी। इसलिए प्रातः सूर्योदय से लेकर रात्रि के प्रथम प्रहर तक कोई भी समय ऐसा नहीं था, जिसमें साधना की जा सके। इसलिए गुरुदेव ने मध्य रात्रि से लेकर प्रातः तक के समय को साधना के लिए सुनिश्चित किया था। दिनभर के क्रिया-कलापों को देखते हुए यही सबसे उपयुक्त समय था। हालाँकि उन्हें सोने के लिए मुश्किल से तीन-चार घण्टे मिल पाते थे। परन्तु माताजी को अर्धरात्रि से कुछ पहले जगकर गुरुदेव के साथ बैठकर साधना करने में इतनी खुशी मिलती थी कि सारे कष्ट उनको नगण्य लगते थे।
वह नियत समय पर जगकर स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा की कोठरी में पहुँच जाती थीं। वहाँ गुरुदेव उनका पहले से इन्तजार कर रहे होते। आसन पर बैठते ही आराध्य की कृपा उन पर अवतरित होने लगती। प्राण संचालन की अनेकों गुह्य क्रियाएँ उनमें होने लगती। गोपनीय बीजमंत्रों के स्फोट से सूक्ष्म चेतना के दिव्य केन्द्रों में शक्ति के सागर उमड़ने लगते। लेकिन ये तो प्रारम्भिक क्षणों की बातें थी, जिनका अनुभव पहले भी उन्हें किन्हीं अंशों में होता रहता था। गुरुदेव के साथ बिताए जाने वाले साधना के ये पल अति विशिष्ट थे। इन पलों में उन्हें उन सब सत्यों का साक्षात्कार होता था, जिसके बारे में शास्त्र केवल संकेत मात्र करते हैं। जिसकी विस्तृत चर्चा विश्व के किसी भी साधना शास्त्र में नहीं मिलती। यथार्थ साधना शास्त्र गम्य होती भी नहीं है। यह तो सर्वथा गुरुगम्य है। इस पर सदा गुरुगत प्राण शिष्यों का ही अधिकार होता आया है। माताजी के अगाध समर्पण एवं परिपूर्ण निवेदन ने ही उन्हें इन सर्वथा गोपनीय योग साधनाओं का अधिकारी बनाया था।
नियमित योग साधना की प्रगाढ़ता और सघनता से उनका सूक्ष्म शरीर अति तेजस्वी एवं प्रचण्ड ऊर्जावान हो गया था। गुरुदेव द्वारा बतायी गयी योग की गुह्य विधियों से वे इसे बड़ी ही आसानी से स्थूल शरीर से पृथक् कर लेती थी। ऐसी दशा में गुरुदेव उनके स्थूल शरीर की रक्षा करते थे। और वह लोक-लोकान्तर में जाकर वहाँ से आवश्यक तत्त्वों का अर्जन कर लेती। शिष्यों-सन्तानों की पुकार का भी प्रत्युत्तर देती। गुरुदेव के सान्निध्य में योग साधना की तीव्रता के कारण उनके सूक्ष्म शरीर की क्रियाशीलता उत्तरोत्तर बढ़ती गयी। कारण शरीर भी प्रभावान और प्रखर होने लगा। उनकी साधना का घनत्व इस कदर बढ़ गया था कि वह प्रत्येक दृष्टि से परम समर्थ हो गयीं थी।
यह स्थिति पहले से काफी अलग थी। इसे जानना-समझना किसी भी तरह से आसान नहीं है। जितना उन्होंने स्वयं विभिन्न प्रसंगों पर संकेत किए, उसके अनुसार अब गुरुदेव को उनके स्थूल शरीर की रक्षा के लिए रुकना नहीं पड़ता था। दिव्य महामंत्रों की कीलक शक्ति और उनकी महत् चेतना का संकल्प स्थूल देह की रक्षा के लिए पर्याप्त था। गुरुदेव तो पहले से ही योग की समस्त उच्चतम साधनाओं में पारंगत थे। अब माताजी भी योग के उच्चतम रहस्यों से अवगत हो गयी। यह स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी कि स्थूल देह से किसी भी साधना की जरूरत नहीं रही। सूक्ष्म शरीर से स्वमेव सारी योग विभूतियों का अर्जन होने लगा। यह विलक्षण स्थिति किन्हीं विरले महायोगियों को ही सुलभ होती है।
इस परिवर्तित भावदशा में भी नियमित साधना के लिए जगने और बैठने का बाहरी क्रम यथावत बना रहा। परन्तु सभी आन्तरिक सत्य बदल गए। वह गुरुदेव के साथ साधना के लिए अभी भी बैठती थीं। परन्तु प्रायः किसी विशेष साधना के लिए नहीं, बल्कि उनके साधनात्मक कार्यों में सहभागी बनने के लिए। ऐसे कार्यों में शिष्यों-भक्तों की पीड़ा और उन पर आए संकटों का निवारण प्रमुख था। इसके लिए वे दोनों ही शिष्यों के पास पहुँच कर उन्हें आश्वासन देते, उनको ढाढ़स बंधाते और अपनी योगशक्ति से उनके कष्टों का पल में निवारण कर देते। सन्तानों की छटपटाती अन्तर्चेतना अपनी महायोगिनी माँ की कृपा को पाकर अपूर्व शान्ति अनुभव करती।
साधना के क्षणों में ही वह जब-तब गुरुदेव के साथ सूक्ष्म शरीर से दिव्य लोकों, दिव्य भूमियों एवं सामान्य मानवदृष्टि से ओझल दिव्य साधना केन्द्रों की यात्रा करतीं। ऐसे प्रसंगों को उन्होंने सम्पूर्ण रूप से प्रायः कभी उजागर नहीं किया। फिर भी यदा-कदा गुरुदेव की महिमा बताने के लिए इसके कुछ अंशों को वह प्रकट कर देती थीं। ऐसे ही एक प्रसंग में उन्होंने बताया- “बेटा! तुम लोग जानते नहीं, गुरुदेव कौन हैं? उन्हें कभी सामान्य तपस्वी, सिद्ध और योगी समझने की भूल मत करना। वे मनुष्य देह में साक्षात् ईश्वर हैं। इस सच्चाई को मैंने स्वयं अपनी आँखों से देखा है। मेरी सूक्ष्म चेतना स्वयं इस सत्य की कई बार साक्षी बनी है। हिमालय के सिद्धगण, दिव्यलोकों के देवता तक उनकी एक झलक पाने के लिए तरसते हैं। जब कभी किसी विशेष अवसर पर वे उन लोगों के सामने होते हैं, तो वे सब उनके चरणों में फूल चढ़ाकर अपने को परम सौभाग्यशाली समझते हैं। इस सच्चाई को मैंने उनके साथ जाकर खुद देखा है।” माताजी की इन बातों को सुनकर सुनने वाले भाव विह्वल हो सोचने लगते- बच्चों को उनके पिता के स्वरूप का बोध भला माँ के सिवा और कौन करा सकता है।
गुरुदेव के दिव्य स्वरूप का मुखर होकर बखान करने वाली माताजी अपने बारे में प्रायः मौन ही रहती थीं। किसी विशेष अवसर पर बहुत हुआ तो इतना कह देती थी, अध्यात्म क्या कहने, बताने की चीज है, यह तो अनुभव का विषय है। चाहे कितनी भी पोथियाँ लिखी व पढ़ी जाय, पर इसकी सच्चाई को साधना की अनुभूतियों में ही जाना जा सकता है। और यह सच्चाई ऐसी है कि कोई जानने वाला इसे कहे भी तो ऐसा लगेगा जैसे किसी रहस्यपूर्ण उपन्यास की कथा सुनायी जा रही है। इसलिए समझदार लोग इन बातों को कहीं कहते नहीं। बहुत हुआ तो इसके तत्त्वदर्शन को बता देते हैं। सार बात भी वही है। इसे समझने पर सब समझ में आ जाता है।
अपनी बातों के क्रम में माताजी बताती कि साधना के प्रसंग जितने गोपनीय रखे जाय उतना ही अच्छा है। चर्चा करने पर साधना का बल घटता है। ऐसा कहते हुए वह कहती- “अब मेरी ही ले लो। मैंने क्या-क्या किया कोई कुछ जानता है क्या? अखण्ड ज्योति संस्थान में आधी रात से पहले उठ जाती थी। प्रायः सारी रात गुरुजी के साथ साधना में बिता देती। लेकिन घर के दूसरे लोगों के जागने से पहले उठ जाती और बाद में उनके उठने पर फिर से स्नान करती। इस स्नान से रात भर की गयी साधना के कारण बढ़ा हुआ ताप शान्त हो जाता। और सभी यही सोचते कि ये तो अभी जगी है और अब इतनी देर से नहा रही है। ज्यादा कुछ पूछने पर मैं भी उनकी हाँ में हाँ मिला देती थी। पर असली बात दूसरी थी। उन दिनों गुरुदेव के साथ मैं पूरी प्रगाढ़ता, तन्मयता एवं तत्परता के साथ साधना किया करती थी। वे बड़े अद्भुत दिन थे। शरीर इस लोक में रहते हुए भी चेतना कहीं और ही रहती थी। मेरा सब कुछ गुरुजी में घुलता मिलता चला जा रहा था।” उनकी इन बातों को सुनते हुए सुनने वालों की भावानुभूतियों में शिव और शक्ति के अन्तर्मिलन का सत्य उजागर होने लगता।
भक्तिमती मीराबाई अपने …
योग साधना की परम प्रगाढ़ता में शिव ओर शक्ति परस्पर अन्तर्लीन हो गए थे। शिव और शक्ति का यह अन्तर्मिलन दो रूपों में प्रकट हुआ था। अपने पहले रूप में महायोगिनी माताजी की अन्तस्थ कुण्डलिनी महाशक्ति परिपूर्ण जागरण के पश्चात् विभिन्न चक्रों का भेदन और प्रस्फुटन करती हुई सहस्रार में स्थित महाशिव से जा मिली थी। योग साधकों के लिए इस अद्भुत एवं दुर्लभ सत्य के घटित होने से माताजी का समूचा अस्तित्त्व योगैश्वर्य का भण्डार बन गया था। योग की उच्चस्तरीय विभूतियाँ एवं सिद्धियाँ उनके व्यक्तित्व के विविध आयामों से अनायास प्रकट होने लगी थीं। शिव और शक्ति के महामिलन का एक दूसरा रूप भी माताजी के जीवन में बड़ा ही स्पष्ट रीति से उजागर हुआ था। जिसकी चर्चा प्रायः किसी योगशास्त्र में नहीं मिलती। इस दूसरे रूप में शिव स्वरूप गुरुदेव की आत्मचेतना शक्ति स्वरूपा माताजी की आत्मचेतना से घुल−मिल कर तदाकार हो गयी थी।
आने-जाने वाले, मिलने-जुलने वाले इस सच्चाई को अनुभव कर अचरज में पड़ जाते। उन्हें यह बात गहराई से महसूस होती कि गुरुदेव एवं माताजी कहने भर के लिए दो हैं, पर वास्तव में उनके भीतर एक ही प्राण प्रवाह, एक ही भाव चेतना क्रियाशील है। इस तरह की अनुभूति लोगों को लगभग रोज ही होती थी। वे आपस में इसकी चर्चा भी करते। एक दूसरे से बताते कि हमने यह बात तो गुरुजी को कही थी, लेकिन माताजी तक कैसे पहुँच गयी? जबकि गुरुजी तो अभी तपोभूमि में ही हैं। अथवा ये बातें तो अखण्ड ज्योति संस्थान में माताजी से कही गयी थीं, तपोभूमि में बैठे हुए गुरुदेव को किस तरह पता चल गयी। उन दिनों तो वहाँ कोई टेलीफोन जैसे माध्यम भी न थे। जिससे कि ये अनुमान लगाए जा सकते कि टेलीफोन द्वारा बात कह दी गयी होगी। बड़े ही तार्किक एवं बुद्धिकुशल लोगों को भी गुरुदेव एवं माताजी की आत्मचेतना के अन्तर्मिलन का सत्य स्वीकारना पड़ता।
कई बार तो कुछ लोग अपने अनुभव को दुहरा तिहरा कर इसकी बाकायदा परीक्षा भी कर डालते। महाराष्ट्र के विष्णु नारायण गोवरीकर इन्हीं में से एक थे। ये गायत्री तपोभूमि के शिविरों में प्रायः आया करते थे। इस बार जब आए तब उनका मन कई तरह की घरेलू समस्याओं से आक्रान्त था। मन को कितना भी समझाने की कोशिश करते, पर बार-बार वह समस्याओं के जाल में जकड़ जाता। शिविर के दूसरे दिन जब वह खाना खाने के लिए अखण्ड ज्योति संस्थान गए, तब उनके मन की स्थिति कुछ ऐसी ही थी। वह अपने को कितना भी सम्हालने की कोशिश करते, पर उद्विग्नता किसी भी तरह मन को छोड़ नहीं रही थी।
इसी उद्विग्न मनःस्थिति में वह खाना-खाने के लिए बैठे। माताजी ने स्वयं अपने हाथों से उन्हें खाना परोसा। खाना परोसते हुए अन्तर्यामी माँ ने उनकी मनोदशा पहचान ली। वह प्यार से बोली- बेटा! अब तुम मेरे पास आ गए हो, तुम्हें परेशान होने की कोई जरूरत नहीं। तुम्हारी परेशानियों से हम लोग निबटेंगे। तुम आराम से खाना खाओ। माताजी के इस कथन का उन पर कोई खास-असर नहीं हुआ। वह वैसे ही अन्यमनस्क भाव से खाना खाते रहे। विष्णु नारायण को इस तरह उदास देखकर माताजी कहने लगीं- मैं जानती हूँ बेटा! इस समय तुम पर भारी मुसीबतें हैं। खेती का मामला-मुकदमा चल रहा है। दुकान इस समय एकदम ठप्प पड़ी है। तुम्हारी पत्नी इस समय काफी बीमार है। बेटी की शादी के लिए कुछ ढंग का बन्दोबस्त नहीं हो पा रहा है। इतनी परेशानियाँ किसी पर एक साथ आ पड़े तो किसी का भी घबरा जाना स्वाभाविक है। पर माँ के पास आकर भी उसके बच्चे चिन्तित रहे, तो माँ के होने का क्या फायदा?
माताजी की इन बातों ने उन्हें अचरज में डाल दिया। सबसे बड़ा अचरज तो उनको इस बात का था कि उन्होंने तो अपनी समस्याएँ किसी को भी नहीं बतायीं। जब से वह यहाँ आए हैं, तब से लेकर इन क्षणों तक उन्होंने किसी से भी अपनी परेशानी की कोई चर्चा नहीं की। फिर भी माताजी को सारी बातें कैसे पता चली? प्रश्न के उत्तर में वे केवल इतना सोच सके कि माताजी केवल गुरुजी की धर्मपत्नी भर नहीं, वे जरूर योगसिद्ध महायोगिनी हैं। यही सोचकर उन्होंने निश्चिंतता से खाना खाया। और हाथ मुँह धोकर माताजी को प्रणाम करके गायत्री तपोभूमि की ओर चल दिए। हाँ इतना अवश्य हुआ कि माताजी को प्रणाम करते हुए उनकी आँखें छलक आयी। पर माँ की वरदायी अभयमुद्रा देखकर उनके मन को गहरी आश्वस्ति थी।
लेकिन अभी जैसे उनके आश्चर्य की शृंखलाओं का अन्त नहीं हुआ था। वह जैसे ही तपोभूमि आए। उन्होंने देखा कि गुरुजी यज्ञशाला के पास टहल रहे हैं। वह उन्हें प्रणाम करने के लिए गए। गुरुदेव को प्रणाम करके विष्णु नारायण जैसे ही खड़े हुए, गुरुदेव ने कहा- बेटा अब परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। जब माताजी ने तुम्हारी सभी समस्याओं का भार अपने ऊपर ले लिया है, तब फिर चिन्ता जैसी कोई बात नहीं है। तुम उन पर विश्वास करना। वह परम समर्थ हैं। उन्होंने कह दिया, तो विश्वास रखना सब कुछ ठीक हो जाएगा। गुरुजी की इन बातों ने विष्णु नारायण को एक बार फिर से हैरत में डाल दिया। वे सोच ही नहीं पाए कि अखण्ड ज्योति संस्थान में माताजी द्वारा कही गयी बातें गुरुजी को कैसे पता चल गयी। उनकी इस हैरानी को दूर करते हुए गुरुजी ने कहा- “अरे बेटा! हम और माताजी कोई दो थोड़े ही हैं। बस केवल बाहर से दिखने के लिए दो हैं। बाकी भीतर से सब कुछ एक है।”
गुरुजी की बातों ने उन्हें और भी चकित कर दिया। उनकी बातों पर भरोसा करने के अलावा और कोई दूसरा उपाय न था। लेकिन मानवीय मन का सन्देह अभी भी किस कोने में छुपा हुआ था। इस सन्देह का निवारण करने के लिए वह शिविर के सारे दिनों में कोई न कोई प्रयास करते रहे। हर बार उनके सन्देह को मुँह की खानी पड़ी। जो गुरुदेव हैं, वही माताजी हैं, जो माताजी हैं, वही गुरुदेव हैं, यही सत्य प्रामाणित हुआ। अपनी इन बातों की चर्चा जब उन्होंने साथ के शिविरार्थियों से की, तो वे सब खुलकर हँस पड़े। हँसी का कारण पूछने पर उनमें से सभी ने कहा, अरे भई! यह भी कोई सोच-विचार की बात है। हम तो पहले से ही जानते हैं कि गुरुजी-माताजी को दो समझना एक बड़ा भ्रम है। वे दोनों एक ही हैं। इन सबकी बातों को सुनकर विष्णु नारायण का सन्देह दूर हुआ। घर वापस पहुँचने पर माताजी के प्रति उनकी श्रद्धा शतगुणित हो गयी। क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि अप्रत्याशित संयोगों से उनकी सभी समस्याएँ एक के बाद एक निबटती चली गयीं।
अपने इस अनुभव को उन्होंने गुरुदेव को लिखे गए पत्र में बयान किया। जिसे उन दिनों कई लोगों ने पढ़ा। विष्णु नारायण गोवरीकर जैसे अनेकों और भी हैं, जिन्होंने माताजी की कृपा को अनुभव करने के साथ इस सच्चाई को जाना कि गुरुजी और माताजी एक ही आत्मचेतना के दो रूप हैं। मध्यप्रदेश के ग्रामीण अंचल की एक महिला भक्त शिवरानी देवी की अनुभूति इस सम्बन्ध में बड़ी प्रगाढ़ थी। अल्प शिक्षित यह महिला भक्त कुछ खास पढ़ी-लिखी न होने पर भी बड़ी साधना परायण थी। ब्रह्म मुहूर्त से लेकर प्रातः तीन घण्टे नियमित साधना करने का उनका बड़ा पक्का नियम था। गायत्री महामंत्र के प्रत्येक अक्षर को वह बड़ी भावपूर्ण रीति से जपती थी। उनके आचार-व्यवहार में भी बड़ी असाधारण पवित्रता थी। जप काल के अलावा दिन के अन्य समय गृहकार्यों को करते हुए भी वह गायत्री मंत्र का मानसिक जप और सूर्यमण्डलस्थ माता गायत्री का ध्यान किया करती थी।
अपनी नियमित साधना में एक दिन उनका मन गहरे ध्यान में लीन हो गया। प्रगाढ़ ध्यान की इसी भावदशा में उन्होंने देखा कि सूर्यमण्डलस्थ माता गायत्री ने माताजी का रूप ले लिया है। निरभ्र अनन्त आकाश में केवल माताजी की तेजोमयी मूर्ति विराजमान है। अखिल ब्रह्मांड के सारे ग्रह-नक्षत्र उन्हीं के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे हैं। धीरे-धीरे सब कुछ उनमें विलीन हो जाता है, यहाँ तक परम पूज्य गुरुदेव की दिव्य मूर्ति भी उन्हीं में समा जाती है। ध्यान से उठने पर भी उनके मन पर यही विचित्र अनुभूति छायी रही। हालाँकि इसका अर्थ उन्हें जरा भी समझ में नहीं आया। काफी दिनों बाद गायत्री तपोभूमि में एक शिविर में पहुँचने पर उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव से इसकी चर्चा की। उत्तर में उन्होंने गम्भीरता से कहा- “बेटी! तुमने ठीक देखा। माताजी अपने सत्य स्वरूप में सृष्टि का अन्तिम रहस्य हैं। सब कुछ उन्हीं से उत्पन्न होता है और उन्हीं में विलीन हो जाता है। वे केवल देह दृष्टि से मेरी पत्नी हैं। आत्मदृष्टि से तो वे मेरी भी माताजी हैं। मैं उनसे बिल्कुल भी अलग नहीं हूँ। उनका ध्यान करने से अपने आप ही समस्त देव शक्तियों सहित मेरा ध्यान हो जाता है।” गुरुदेव के ये गूढ़ आध्यात्मिक वचनों का रहस्य उसे पता नहीं कितना समझ में आया। पर उसको अपने मन की गहराई में महाशक्ति की संचालन सामर्थ्य का अहसास अवश्य हुआ।
पहली बार गुरुदेव जब हिमालय गए थे, तब गायत्री तपोभूमि के क्रिया-कलापों का विस्तार न हुआ था। सारे काम-काज का केन्द्र अखण्ड ज्योति संस्थान था। हर महीने निश्चित समय पर अखण्ड ज्योति के प्रकाशन के अलावा दूसरी कोई विशेष जिम्मेदारी न थी। मिशन का बहुत ज्यादा प्रचार-प्रसार न होने के कारण आगन्तुक जन भी थोड़े ही थे। लेकिन अब दूसरी बार की हिमालय यात्रा की स्थितियाँ एकदम अलग थीं। सन् 1953 में गायत्री तपोभूमि का निर्माण होने और यहाँ शिविरों की नियमित प्रक्रिया चल पड़ने से श्रद्धालुओं एवं जिज्ञासुओं के आवागमन का ताँता लग गया था। वर्ष 1958 के सहस्र कुण्डीय यज्ञ आयोजन ने भी स्थिति को एकदम बदल दिया था। इस यज्ञ आयोजन से देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवी, साधक, राजनेता व विशिष्ट जन गुरुदेव के दैवी स्वरूप से काफी कुछ परिचित हो गए थे। इनमें से किसी न किसी का प्रायः प्रतिदिन आना लगा रहता था।
स्थितियों के इस बहुआयामी परिवर्तन के बाद मिशन में समर्थ संचालक की जरूरत हर पल-हर क्षण थी। गुरुदेव के अभाव में इस गुरुतर दायित्व को निभाने की जिम्मेदारी माताजी पर ही थी। हालाँकि इस बारे में उन दिनों कई कार्यकर्त्ताओं के मनों में काफी आशंकाएँ-कुशंकाएँ थी। वे सब सोच ही नहीं पाते थे कि सीधी-सादी, सरल गृहिणी की भाँति जीवन यापन करने वाली माताजी इतने सारे दायित्व को किस तरह निभाएगी? ये सभी कार्यकर्त्ता माताजी के भावपक्ष से परिचित होने के बावजूद उनकी बुद्धि कुशलता एवं लोक व्यवहार में दक्षता से प्रायः अपरिचित थे। आपस में इनकी चर्चाएँ बड़ी निराशाजनक एवं हताशा भरी होती थीं। कभी तो ये कहते- कि गुरुदेव के जाने के बाद मिशन बिखर जाएगा। कभी कहते- गुरुदेव का इस तरह माताजी के हाथों में सब कुछ छोड़कर हिमालय जाना ठीक नहीं है। सबको खाना खिला देना और बात है, इतने बड़े संगठन को सही तरह से चलाना एकदम अलग बात है। अपनी यात्रा के कुछ पहले इस तरह की चर्चाएँ गुरुदेव के कानों में पड़ी तो वे मुस्कराए। और उन्होंने कहा- शंका-कुशंका करने वाले भला माताजी के बारे में जानते ही क्या हैं? उन्हें क्या मालूम, माताजी कौन हैं? उनकी सामर्थ्य क्या है? अपनी शक्ति-सामर्थ्य के एक अंश से सबको समर्थ बनाने वाली माताजी को मैं अच्छी तरह से जानता हूँ।
माताजी के दिव्य स्वरूप एवं उनकी दैवी क्षमताओं से अच्छी तरह परिचित गुरुदेव ने बड़ी निश्चिन्ततापूर्वक हिमालय के लिए प्रस्थान किया। गुरुदेव के हिमालय चले जाने के बाद माताजी ने मिशन का सारा सूत्र संचालन अपने हाथों में ले लिया। हालाँकि उन दिनों उन पर घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ भी बहुत थीं। बच्चों की पढ़ाई चल रही थी। उनसे किसी विशेष मदद की आशा न थी। अपने अकेले के दम पर ही उन्हें साधना, गृहकार्य, पत्र लेखन, अखण्ड ज्योति पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन, गायत्री तपोभूमि के कार्यों की देखभाल करनी थी। यह ठीक है कि इन सभी कार्यों में सहयोग के लिए कार्यकर्त्ता थे। परन्तु वे सब के सब सहयोगी नहीं थे। माताजी के दैवी स्वरूप के प्रति अनभिज्ञता एवं श्रद्धा-भक्ति के अभाव में इनमें से कुछ की मनःस्थिति बड़ी विपन्न हो गयी थी। अपनी मानसिक विपन्नता के वश हो, ये कभी-कभी उल्टे-सीधे काम भी कर बैठते थे।
अपने आराध्य के प्रति परिपूर्ण निष्ठ के साथ माताजी दिन-रात काम में लगी रहती थीं। घर और मिशन के अनेक तरह के कार्यों के अलावा उन पर कष्ट पीड़ित शिष्यों-भक्तों की आध्यात्मिक शक्ति से सहायता करने की जिम्मेदारी भी थी। वे कब-कब, क्या-क्या करती हैं? इसे उनके पास रहने वाले लोग भी ठीक तरह से समझ न पाते थे। सभी को बस इतना पता चल जाता कि सारे काम, सुचारु ढंग से और सही समय से हो रहे हैं। माताजी के इस दैवी संचालन से वे विपन्न बुद्धि लोग तो बहुत हतप्रभ होते थे, जो सहयोग की आड़ में विरोध और विद्वेष के कुचक्र रचते रहते थे। माताजी उनकी इन षड़यन्त्र भरी गतिविधियों से अनजान न थीं। पर उनका अपनी इन बुद्धिहीन सन्तानों के प्रति भी करुणा भाव था। इन कुपुत्रों के प्रति भी माँ के वात्सल्य में कोई कमी न आयी थी।
एक बार इन्हीं दिनों गायत्री तपोभूमि में कार्यकर्त्ताओं के बीच झगड़ा हो गया। इस व्यर्थ के झगड़े को सुलझाने के लिए माताजी को जाना पड़ा। वे गयीं। सभी लोगों को एक जगह इकट्ठा किया गया। सब के ठीक तरह से बैठ जाने के बाद उन्होंने कहना शुरू किया- “बेटा! मैं तुममें से हर एक को बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ। तुम लोग जो कुछ भी इतने दिनों तक करते रहे हो, उससे मैं अच्छी तरह से परिचित हूँ। मैं इस भीड़ में किसी का नाम लेकर उसे शर्मिन्दा तो नहीं करूंगी। पर तुममें से जिसने जो कुछ किया, उसके कामों का खुलासा कर देती हूँ। उसी से तुम्हें यह अन्दाजा लग जाएगा कि मुझे क्या कुछ मालूम है।” इसी के साथ माताजी ने हर एक कार्यकर्त्ता की गड़बड़ियों को गिनाना शुरू कर दिया। आर्थिक गड़बड़ियों के साथ विद्वेष और विरोध के कुचक्रों का वह एक-एक करके खुलासा करने लगीं। जैसे-जैसे वह बोलती जातीं सुनने वालों का सिर शर्म से झुकता जाता। सब कुछ कह चुकने के बाद उन्होंने कहा- “बेटा! अब तक मैं चुप रही, इसका कारण यह नहीं है कि मुझे कुछ मालूम नहीं था। कारण केवल इतना ही था कि मैं माँ हूँ। और माँ हर हाल में अपने बच्चों को प्यार करती है। फिर वे बच्चे कैसे भी क्यों न हो? रह गयी मिशन की बात, तो इसे भगवान् ने जन्म दिया है। वही इसे बढ़ा रहा है। चाहे जितने लोग जितनी भी तरह से स्वार्थवश या अपनी कुटिलता के कारण इसका विरोध करें, पर इसे तो हर हाल में बढ़ना ही है।”
माताजी की बातों को सुनकर, सुनने वाले अवाक् रह गए। उनमें से जिनकी भावनाएँ अभी पूरी तरह से मरी नहीं थीं, जो किसी कारण बहकावे में आकर भटक गए थे, उन्होंने रोते हुए माताजी के चरणों में गिरकर माफी माँगी। माँ ने भी प्यार से अपने इन अज्ञानी बालकों के सिर पर हाथ फेरकर क्षमा कर दिया। पर कुछ के मन में कलुष अभी बाकी था। उन्होंने पहले तो यह पता करने की कोशिश की कि माताजी को सारी बातें कहाँ से पता चली। जब अपनी इस कोशिश में सब तरह से थक-हार गए तब उन्हें भी माताजी की दिव्य क्षमताओं पर विश्वास करना पड़ा। हालाँकि इसके बावजूद वे अपनी प्रवृत्ति को बदलने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने अपनी कारगुजारियाँ जारी रखीं। पर महाशक्ति की संचालन सामर्थ्य से मिशन की सम्पूर्ण गतिविधियाँ, सुनियोजित एवं सुनियंत्रित रीति से चलती रहीं।
इसी बीच गुरुदेव की हिमालय यात्रा की अवधि भी पूरी हुई। वह निश्चित समय पर वापस आए। उनके आते ही माताजी ने संचालन सूत्र फिर से उनके हाथों में सौंप दिया। अन्तर्यामी गुरुदेव को बिना बताए ही सारी स्थितियाँ पता चल गयी। और उन्होंने दोषी जनों के प्रति कठोर कार्यवाही करने का निश्चय किया। पर यहाँ भी माँ की ममता आड़े आ गयी। उन्होंने गुरुदेव से कहा- अब रहने भी दीजिए, वे जैसे हैं, मेरे बच्चे हैं। जब गुरुदेव ने मिशन के भावी विस्तार का हवाला देकर उन्हें बहुत समझाया, तो वे जैसे-तैसे किसी तरह बहुत दुःखी मन से राजी हुई। पर यहाँ भी उन्होंने अपनी शर्त रख दी। वे बोलीं- कि उन्हें नया जीवन शुरू करने के लिए पर्याप्त धनराशि एवं आप अपने द्वारा लिखे गए मौलिक एवं अनूदित साहित्य के प्रकाशन का अधिकार दें। उनकी इन बातों पर गुरुदेव हँस पड़े और कहने लगे- “आपकी ममता के सामने तो त्रिलोक के स्वामी को भी झुकना पड़ेगा, फिर मेरी क्या मजाल। आप जैसा चाहती हैं, वैसा ही होगा।” सब कुछ माताजी की सहज संवेदनाओं के अनुसार ही हुआ। जिन आत्मदानियों को अलग किया गया, वे अपने हृदय में माताजी के असीम प्यार की अनुभूति लेकर गए। माताजी की दिव्य शक्तियों और गुरुदेव के तपःतेज ने मिशन को फिर से नए प्राण दिए। बीतते वर्षों के साथ महाशक्ति के दिव्य साधना स्थल के रूप में शान्तिकुञ्ज की पृष्ठभूमि बनने लगी।
संत राबिया परम तपस्विनी थीं।...
महाशक्ति के दिव्य साधना स्थल के रूप में शान्तिकुञ्ज के निर्माण की परिकल्पना परम पूज्य गुरुदेव की दूसरी हिमालय यात्रा के समय ही तैयार हो गयी थी। उनकी मार्गदर्शक सत्ता ने इसकी आवश्यकता एवं इस तरह के निर्माण की स्पष्ट रूपरेखा से उन्हें इस विशिष्ट अवधि में अवगत करा दिया था। हिमालय की गहनताओं में युगों से तप कर रहे दिव्य देहधारी ऋषियों की सम्मति भी यही थी। गुरुदेव की यह दूसरी हिमालय यात्रा (1960-61) पहली बार की तुलना में कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण थी। इस बार उन्हें अपने मार्गदर्शक के साथ हिमालय की दिव्य ऋषि सत्ताओं के न केवल दर्शन मिले, बल्कि उनसे चिन्तन परामर्श का विशेष अवसर मिला। विश्व वसुधा के विभिन्न घटनाचक्रों एवं इसकी भावी नियति पर विशेष चर्चा हुई। भारत भूमि के संकटापन्न वर्तमान एवं इसके दीर्घकालिक उज्ज्वल भविष्य का उन्हें दर्शन कराया गया। साथ ही इस सम्बन्ध में उनकी भूमिका निर्धारित की गयी।
इसी समय यह भी निर्धारण किया गया कि आगामी दिनों गुरुदेव की यह भूमिका पूरी तरह से परोक्ष होगी। जीवन के साठ वर्ष पूरा होने के बाद वे हिमालय के ऋषितन्त्र के साथ मिलकर गहन आध्यात्मिक प्रयोग करते हुए धरती के नवीन भाग्य एवं भविष्य के निर्माण हेतु प्रयत्नशील रहेंगे। प्रत्यक्ष दायित्व महाशक्ति के रूप में माताजी स्वयं सम्हालेंगी। इस प्रत्यक्ष दायित्व को पूरी तरह से सम्हालने से ही उनके अवतार कार्य का प्रारम्भ और विस्तार होगा। उनके इस कार्य के लिए मथुरा बहुत अधिक उपयुक्त स्थान नहीं है। महाशक्ति ने अपनी हर अवतार लीला में हिमालय की सुरम्य छाँव एवं गंगा तट को ही तपस्थली के रूप में चुना है। इस बार भी यही ठीक होगा। वह जिस भूमि को अपने दिव्य साधना स्थल के रूप में चुनेंगी, वही स्थान भविष्य में सम्पूर्ण विश्व के लिए ऊर्जा अनुदान का केन्द्र बनेगा। अपने इस निर्धारण में ऋषितन्त्र ने यह भी स्पष्ट किया- इस युग के लिए विधि ने जो युग प्रत्यावर्तन का विधान रचा है, उसमें केन्द्रीय भूमिका महाशक्ति स्वयं निभाएँगी। ऋषिगण एवं दिव्य लोकों की देव शक्तियाँ उनका प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में सहयोग करेंगे।
हिमालय के ऋषितन्त्र के निर्धारण के अनुरूप गुरुदेव ने आवश्यक कार्य योजना बनाते हुए अपनी तपश्चर्या की अवधि पूरी की और उन दिव्य विभूतियों से अनुमति लेकर मथुरा वापस लौटे। आगामी हिमालय यात्रा से पहले उन्हें यहाँ के बहुत सारे काम पूरे करने थे। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ गायत्री तपोभूमि की व्यवस्था को भी चुस्त-दुरुस्त बनाना था। वापसी पर माताजी से वह कुछ ज्यादा विस्तार से बता पाते-इसके पहले ही उन्होंने कह दिया- कि “मुझे आपका और हिमालय में तपस्यालीन पूज्य ऋषियों का प्रत्येक आदेश स्वीकार है।” गुरुदेव जानते थे कि माताजी उनकी अन्तर्चेतना में होने वाली प्रत्येक हलचल एवं स्पन्दन को अपने अन्तःकरण में अनुभव करती रहती हैं। इसलिए बिना बताए माताजी के सब कुछ समझ जाने पर उनको तनिक भी आश्चर्य नहीं हुआ। परन्तु इस पर उन्हें थोड़ा अचरज जरूर हुआ कि वे मथुरा में फैले अपने ममता के धागों को इतनी तेजी समेटने के लिए कैसे तैयार हो गयीं?
हालाँकि वे अच्छी तरह से जानते थे कि माताजी महाशक्ति हैं। उनमें ममता की शक्ति है तो दृढ़ता की शक्ति भी है। वह भावस्वरूपा हैं, तो संकल्पमयी भी हैं। शक्ति के जितने भी स्वरूप हैं, सब उनकी आत्मचेतना में समाहित हैं। जीवन के विविध रूप उन शक्तिमयी का स्पर्श पाकर अपने आप ही शक्ति स्रोत में बदल जाते हैं। ममतामयी की अगाध ममता में दुर्बलता का कोई नामो-निशान नहीं है। न वे स्वयं कभी दुर्बल होती हैं और न ही अपने बच्चों को दुर्बल होते हुए देखना चाहती हैं। माताजी के इस स्वरूप-सत्य से सुपरिचित गुरुदेव ने नयी दिशा में सोचना शुरू कर दिया। उनकी दैवी योजना को पूरा करने के लिए देव शक्तियाँ स्वयं उपयुक्त पात्रों को जुटाने लगी थीं। चार-पाँच वर्षों में ही गायत्री तपोभूमि को सम्हालने व भली प्रकार चलाने के लिए पं. लीलापत शर्मा, वीरेश्वर उपाध्याय, द्वारका प्रसाद चैतन्य आदि समर्पित व सुपात्र कार्यकर्त्ताओं की टीम आ जुटी। इन सभी लोगों के लिए गुरुदेव व माताजी आराध्य थे। उनकी प्रत्येक इच्छा हर रूप में उन्हें स्वीकार थी। विदाई सम्मेलन का विराट व्यवस्था तंत्र भी इन सबने संभाल लिया। यह 17 से 20 जून 1971 में होना था।
यहाँ की भावी व्यवस्था का ढर्रा बैठ जाने के बावजूद अभी भविष्य के कार्य के लिए उपयुक्त स्थान को क्रय करना बाकी था। यद्यपि ध्यानस्थ भावदशा में गुरुदेव एवं माताजी दोनों ने ही देवभूमि हरिद्वार में स्थित विशिष्ट स्थान को पहचान लिया था। उन दोनों ने यह भी जान लिया था कि हजारों वर्षों पूर्व इसी दिव्य भूमि में कहीं देवमाता गायत्री युगशक्ति के रूप में तपोनिरत महर्षि विश्वामित्र के अन्तःकरण में अवतरित हुई। माता गायत्री के इस अवतरण ने ही महर्षि विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि बनाया था। इस दिव्य स्थल पर उन्होंने पुञ्जीभूत आध्यात्मिक आलोक को उफनते-उमड़ते और फैलते हुए देखा था। परन्तु ध्यान की प्रगाढ़ता में अनेकानेक आध्यात्मिक अनुभूतियों को स्फुरित करने वाली यह जगह हरिद्वार में ठीक-ठीक कहाँ है? यह जानना अभी बाकी था।
इसे जानने के लिए गुरुदेव ने अपनी यात्रा की तैयारी की। माताजी के अनुरोध पर वह वह अपने बड़े पुत्र ओमप्रकाश से गुड़गाँव में मिलते हुए गाजियाबाद आए। यहाँ उनके बड़े जामाता रामेश्वर उपाध्याय रहते थे। उपाध्याय जी ने अपने देवतुल्य श्वसुर को आते हुए देखकर उनका आगे बढ़कर स्वागत किया। उस समय उनके हाथों में एक छोटा बिस्तर और लोहे की सन्दूकची थी। गुरुदेव ने अपनी सन्दूकची खोलकर उन्हें माताजी द्वारा भेजी हुई कुछ छोटी-मोटी चीजें सौंपी। और आगे के कार्यक्रम के बारे में बातें की। सारी बातों को सुनकर उपाध्याय जी उनके साथ हो लिए। शाम की ट्रेन से दोनों ने हरिद्वार के लिए प्रस्थान किया। हरिद्वार पहुँचकर ये दोनों लोग हर की पौड़ी और भीमगोड़ा के बीच गंगा के सामने वाली धर्मशाला में ठहरे। बाद में उन्होंने अनेक एजेन्टों से मिलकर कई जगहों को देखा।
इन जगहों को देख लेने के बाद गुरुदेव ने इन लोगों से सप्त सरोवर के पास कोई जमीन बताने के लिए कहा। उनकी इस बात पर पहले तो इन एजेन्टों ने हरिद्वार शहर से इतनी दूर की जमीन के बारे में काफी परेशानियाँ बतायीं। बाद में दबाव देने पर वे उन्हें लेकर सप्तसरोवर के पास पहुँचे। सप्तसरोवर से थोड़ी दूर चलने पर गुरुदेव ने उस स्थान को पहचान लिया, जिसे उन्होंने माताजी के साथ अपनी साधना की प्रगाढ़ दशा में अनुभव किया था। यद्यपि जमीन की दृष्टि से यह जगह ठीक नहीं थी। यह भूमि काफी दलदली थी। एक छोटा पहाड़ी झरना भी इसके बीच में बह रहा था। जब उन्होंने इस जमीन को पसन्द किया, तो जमीन बिकवाने वाला एजेण्ट उनका मुँह देखता रह गया। उसने काफी कुछ उन्हें समझाने की कोशिश की। पर गुरुदेव ने उसकी कोई बात ध्यान देकर नहीं सुनी। क्योंकि वह उस समय भी अपनी दिव्य दृष्टि से इस भूमि में सघनता से छाए हुए आध्यात्मिक प्रकाश को देख रहे थे। उन्होंने एजेण्ट से केवल इतना कहा- “कि हमें यही जमीन लेनी है, आप इसके लिए उपयुक्त व्यवस्था करें।”
उनके इस तरह से जोर देने पर निश्चित समय जुलाई 1968 में यहाँ की डेढ़ एकड़ जमीन 19 हजार रुपये में खरीद की गयी। यहीं पर बाद में महाशक्ति की दिव्य साधना स्थली गायत्री तीर्थ को अवतरित होना था। जमीन खरीदने के थोड़े समय बाद यहाँ पर प्रारम्भिक निर्माण कार्य शुरू हो गया। गुरुदेव बीच-बीच में आकर यहाँ की व्यवस्था देख जाते थे। साथ ही वे माताजी के साथ मथुरा की व्यवस्थाओं को भी अन्तिम रूप दे रहे थे। घर-परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ भी इसी समय निबटायी जानी थी। इस क्रम में उन्होंने सबसे पहले पुत्र सतीश (मृत्युँजय शर्मा) की शादी की। उन्हें “अखण्ड ज्योति संस्थान” का भार क्रमशः सौंपना आरम्भ कर दिया। बहू निर्मल ने आकर माताजी के गृहकार्य में सहयोग देना शुरू कर दिया। माताजी उसे घर की सारी जिम्मेदारियाँ सौंपने लगीं। समस्त व्यवस्थाओं व जिम्मेदारियों के अन्तिम चरण में पुत्री शैलो (शैलबाला) के लिए उन्होंने सुयोग्य, संस्कारवान वर की खोज कर ली। इस खोज के पीछे गुरुदेव-माताजी की गहन भविष्य दृष्टि थी। नियति के लेख में माताजी की पुत्री की शादी और उनके शान्तिकुञ्ज के प्रारम्भिक दिनों की शुरुआत लगभग एक ही समय होना लिखा था। शायद इसके पीछे महाशक्ति का स्वसंकल्प भी क्रियाशील था
सन् 1960 में प्राचीन भारत के ...
शान्तिकुञ्ज के प्रारम्भिक दिनों की शुरुआत के कुछ समय पहले ममतामयी माताजी के मातृत्व को बड़ी कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा। परीक्षा के ये पल उफनती-उमड़ती, विकल-विह्वल भावनाओं से घिरे थे। मथुरा छोड़ते समय गुरुदेव ने विदाई समारोह का आयोजन किया था, ताकि परिजन उनके तीसरी बार हिमालय जाने से पूर्व मिल सकें। अपने मन की कह सकें और उनकी सुन सकें। यह हिमालय यात्रा पिछली सभी यात्राओं की तुलना में असाधारण थी। इसमें यह निश्चित नहीं था कि गुरुदेव वापस लौटेंगे अथवा अपनी मार्गदर्शक सत्ता की आज्ञानुसार वहीं उनके पास रहकर विश्वकल्याण के लिए तप करेंगे। जिन्हें सदा अपना अंग अवयव माना, अपने प्राणों के अनुदान देकर जिन्हें पाला, उनसे विदाई गुरुदेव के लिए हृदय विदारक थी। अपने हृदय की इस व्यथा को वह पिछले साल-डेढ़ साल से अखण्ड ज्योति के पृष्ठो में लिखकर परिजनों को अवगत भी कराते रहे थे।
परन्तु भावमयी माताजी सब कुछ सहकर भी मौन थीं। जबकि उनके हृदय की व्यथा गुरुदेव से असंख्य एवं अनन्तगुना गहरी थी। सबसे पहले तो वे माँ थीं। जिनके दिल में उमड़ने वाली भावनाएँ शायद समुद्र से गहरी और आकाश से भी ज्यादा व्यापक थीं। जिनका सम्पूर्ण अस्तित्त्व करुण कोमल संवेदनाओं का ही घनीभूत पुञ्ज था, उन भावमयी जगदम्बा को इन दिनों एक के बाद एक अनेक भावनात्मक आघात झेलने पड़ रहे थे। सबसे पहले तो उन्हें अपनी कोख से जायी लाडली बेटी शैलो (शैलबाला) की विदाई करनी थी। जिसकी शादी इस व्यापक विदाई समारोह का एक हिस्सा बन गयी थी। गायत्री जयन्ती (3 जून, 1971) को हुई यह शादी उनके लिए पुलकन और अश्रुओं से भरी थी। पुलकन इसलिए थी, क्योंकि वह अपनी बेटी के ससुराल के प्रत्येक सदस्य के गुणों के बारे में सुपरिचित एवं निश्चिन्त थीं। उन्हें यह भी मालूम था कि उनके जामाता डॉ. प्रणव पण्ड्या एक सुयोग्य पात्र हैं। उनमें समस्त दैवी सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। उनके सान्निध्य में उनकी पुत्री सब तरह से सुखी रहेगी, अपने जीवन की पूर्णता प्राप्त करेगी, यह भी उन्हें भली प्रकार पता था। लेकिन साथ ही उन्हें यह भी मालूम था कि उनकी लाडली बेटी जब ससुराल से पहली बार विदा होकर मायके वापस लौटेगी, तब वह उसके स्वागत के लिए यहाँ न होंगी। तब वह गंगा की गोद और हिमालय की छाया में बनी दिव्य साधना स्थली-शान्तिकुञ्ज में एकान्त तप कर रही होंगी।
बात केवल बेटी से अलग होने तक सीमित न थी। विदा उन्हें बेटे और बहू से भी होना था। जिन पर कच्ची उम्र में अखण्ड ज्योति संस्थान का गुरुतर भार सौंपकर वे जा रही थीं। बेटे सतीश (मृत्युञ्जय) को उस समय तक काम का कोई खास अनुभव न हुआ था। बहू निर्मल भी अभी घर की सारी बातों पर प्रायः उन्हीं पर निर्भर थी। उनकी अम्मा जी (माताजी) ही उनके लिए सब कुछ थीं। परन्तु माँ को अपने इन बच्चों से अलग होना ही था। विदा तो उन्हें अपनी उस छोटी सी सुपौत्री गुड़िया से भी लेनी थी, जो अभी मुश्किल से साल-डेढ़ साल की हुई थी। जिसने हाल ही में जैसे-तैसे नन्हें कदमों से चलना सीखा था। जो बड़ी मुश्किल से अटक-अटक कर उन्हें अम्मा जी कह पाती थी। जिसके लिए उनकी गोद ही उसका सारा घर-संसार था। जिसे यदि वे थोड़ी देर के लिए भी अपने से अलग करतीं, तो वह बिलख उठती। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें आँसुओं का झरना बन जाती। भावमयी माताजी को स्वयं बिलखते हुए इन सभी बिलखते हुए अपने बच्चों से अलग होना था।
जिन्दगी की अनगिनत पीड़ाओं को बड़ी आसानी से हंसकर सहने वाली माताजी को उनकी विकल भावनाएँ इन दिनों विह्वल किए हुए थी। अपने साथ रहने वाले बच्चों के अलावा विश्व जननी के वे बच्चे भी थे, जो हर पल उन्हें माताजी-माताजी कहते हुए थकते न थे। सुख में, दुःख में, संकट में, विपन्नता में जिन्हें केवल अपनी माँ को पुकारना आता था। जिन्हें इस भरे-पूरे संसार में केवल अपनी माँ पर भरोसा था। उन सब बच्चों में ज्यादातर इस समय उन्हें विदाई देने आए हुए थे। उन सभी की आँखें भीगी और भरी थीं। इनमें उम्र का भेद भले ही हो, पर भावनाओं का कोई भेद न था। उनमें से शायद हर एक की भावनाएँ व्याकुल होकर यही कह रही थीं कि “पिता हमें छोड़कर महातप के लिए हिमालय जा रहे हैं, हम बच्चों के लिए तुम्हीं रुक जाओ माँ।” बोल कोई कुछ नहीं रहा था, पर सभी रो रहे थे, बिलख रहे थे। सब के मन-प्राण में महा हाहाकार मचा हुआ था। अपनी असंख्य सन्तानों की इस हालत से जगदम्बा विह्वल, व्याकुल और विकल थीं। अपनी प्राण प्रिय सन्तानों को इस तरह हिचकियों के हिचकोले खाते हुए देख कोई सामान्य माँ भी शान्त नहीं रह सकती। फिर वे तो भावमयी भगवती थीं। बच्चे ही उनके लिए उनका जीवन थे। वेदना की गहरी टीस को अपने में समेटे असंख्य हृदय अपनी माँ को उनकी एकान्त साधना के लिए विदा दे रहे थे। सभी को मालूम था कि वे हरिद्वार में रहेंगी। बहुत जरूरत पड़ने पर उनसे संपर्क हो सकता है। परन्तु उस समय हरिद्वार में मथुरा जैसी सुगमता तो न थी।
बिछोह के इस करुण उद्रेक में एक महाविछोह और भी था। विदाई की इस महाघड़ी में जब सभी विदा ले रहे थे, विदा दे रहे थे, उन्हें भी अपने आराध्य को विदा देना था। यह ठीक था कि उनकी विदाई मथुरा में न होकर हरिद्वार में शान्तिकुञ्ज आकर होनी थी। गुरुदेव को सभी से विदा लेकर उनके साथ शान्तिकुञ्ज तक जाना था। यही हुआ। उमड़ते, छलकते, बिखरते और सर्वव्यापी बनते अश्रुओं के बीच गुरुदेव और माताजी की लाडली सुपुत्री शैलो अपने सौभाग्य सिन्दूर डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं ससुराल के सदस्यों के साथ विदा हुई। अपनी उमड़ती हुई व्याकुलता के महातूफान के बवण्डर भरे चक्रवात के साथ एक-एक करके सारे परिजन भी विदा हुए। गायत्री तपोभूमि के कार्यकर्त्ताओं को तो पं. लीलापत शर्मा के मार्गदर्शन में वहीं रहकर महातपस्वी भरत की भाँति कर्त्तव्य साधना करनी थी। उनकी भावनाएँ कितनी भी छटपटाई हों, पर मर्यादा प्रभु श्रीराम एवं माता भगवती के साथ चलने की इजाजत नहीं दे रही थी। प्रभु का अनुशासन शिरोधार्य करके वे सब वहीं कर्म निरत हो गए।
गुरुदेव के साथ ममतामयी माँ ने शान्तिकुञ्ज के लिए प्रस्थान किया। साथ में वर्षों की तप-साधना से सिद्ध अखण्ड दीपक को सम्हाले हुए दो-तीन कार्यकर्त्ता थे। यह यात्रा भी समाप्त हुई। शान्तिकुञ्ज में गुरुदेव कुछ दिन रहे भी। पर आखिर में माताजी को उन्हें तप के लिए हिमालय की ओर विदा करना ही था। घर-परिवार के सदस्य, स्वजन-परिजन, एक-एक करके नहीं एक साथ सब छूटे। और जिनके लिए, जिनके एक इंगित से सभी को बिना पल की देर लगाए सब कुछ छोड़ दिया, आज वही उनको छोड़कर सुदूर हिमालय की गहनताओं में तप करने के लिए जा रहे थे। यह विछोह बड़ा करुण था। विदाई के ये पल बड़े ही वेदनामय थे। पर इस करुण वेदना को हर हाल में सहना ही था। विश्वहित में अपने आराध्य की विदाई के इस महाविष को शान्त भाव से पी जाने के अलावा और कोई चारा न था।
एक दिन प्रातः गुरुदेव हिमालय चले गए। जिस समय वह गए उस समय माताजी को छोड़कर प्रायः अन्य सभी लोग सोए हुए थे। जगने पर माताजी ने सबको सम्हाला, दिलासा दिया, सान्त्वना दी। माताजी की आश्वस्ति पाकर सब अपने-अपने घर चले गए। केवल वही दो-तीन लोग बचे, जिन्हें विश्व जननी माताजी के साथ रहकर उनकी सेवा का सौभाग्य मिला था। उन्हीं के साथ माताजी अपने आराध्य का चिन्तन करते हुए शान्तिकुञ्ज में अपने प्रारम्भिक दिनों को गुजारने लगीं। उस समय का शान्तिकुञ्ज आज की तरह विस्तृत व्यापक न था। बस यही दो-तीन कमरे बने थे। जहाँ आज अखण्ड दीप स्थापित है।पानी के लिए एक कुआँ था। एक गाय थी, जिसके घी से परम पूज्य गुरुदेव की साधना से सिद्ध ज्योति दृश्य और अदृश्य को प्रकाशित करती थी। शान्तिकुञ्ज का समूचा वातावरण पुराणों में वर्णित प्राचीन तपस्वी ऋषियों के आश्रम की भाँति था। तब यहाँ किसी का आना-जाना प्रायः नहीं ही होता था। बस माँ की साधना ही यहाँ की समस्त गतिविधियों का केन्द्र थी। उनकी इस साधना से ही समूचे गायत्री परिवार को प्राण व प्रकाश मिलता था।
आनंदमयी माँ न तो पढ़ी-लिखी थीं और …
परम पूज्य गुरुदेव के हिमालय प्रस्थान के बाद माताजी के सम्पूर्ण जीवन में तप की सघनता छा गयी। इस तप की ऊर्जा के स्पन्दनों से शान्तिकुञ्ज का कण-कण अलौकिक दिव्यता से उद्भासित हो गया। भगवान् महाशिव की भाँति गुरुदेव हिमालय की गहनताओं में अपनी आत्मचेतना के कैलाश शिखर पर तपोलीन थे। शान्तिकुञ्ज की दिव्य भूमि में भगवती आदिशक्ति की भाँति माताजी अपनी अंशभूता शक्तियों के साथ साधना लीन थीं। धन्य हैं वे लोग जिन्होंने उन दिनों कुछ क्षणों के लिए ही सही, शान्तिकुञ्ज में आकर अथवा रहकर माताजी को निहारा, उनके साथ कुछ पल अथवा दिन बिताए। बड़भागी वे भी हैं जो अपनी भावनाओं की गहराइयों में इन पलों में उस अलौकिकता का साक्षात्कार कर रहे हैं।
सचमुच ही वह सब अलौकिक था, आज के दिनों में तो लगभग अकल्पनीय। तब शान्तिकुञ्ज के आस-पास कहीं भी मनुष्यों की भीड़ और वाहनों, मोटर गाड़ियों का जमघट नहीं दिखाई देता था। सब ओर एक गहरी आध्यात्मिक शान्ति पसरी रहती थी। शान्तिकुञ्ज के अन्दर भी आज जैसे भवनों का विस्तार और कार्यकर्त्ताओं की भारी संख्या जैसी कोई चीज न थी। बस मुश्किल से तीन कार्यकर्त्ता थे। शारदा एवं रुक्मिणी नाम की दो महिलाएँ भोजन आदि में सहयोग देने के लिए थी। इस शुरुआती दौर में माताजी के साथ रहने वाली छः बालिकाएँ भी थीं। जिनकी संख्या बाद में बढ़कर बारह हो गयी थी। इनकी पवित्रता, सरलता और गायत्री साधना के प्रति इनके समर्पित भाव को देखकर ऐसा लगता था जैसे माताजी ने स्वयं अपनी प्राणशक्ति को विभाजित कर ये कौमारी स्वरूप बना रखे हैं। इन बालिकाओं के पठन-पाठन, खान-पान, सार-संभाल आदि की सारी व्यवस्था वे स्वयं करती थीं। ये बालिकाएँ उनके निर्देशन में अपने दैनिक काम-काज के अलावा अखण्ड दीप की सिद्ध ज्योति के सान्निध्य में साधना करती थीं।
तीन-चार कमरों वाला यह शान्तिकुञ्ज एक नजर में ही प्राचीन ऋषियों का तपोवन लगता था। मन को सहज ही भाने वाली हरियाली, हरे-भरे कुञ्जों की छाया, कुछ थोड़े से ही सही पर फलदार और छायादार पेड़ सब मिलकर यहाँ के वातावरण में बड़े ही निर्मल सौंदर्य की सृष्टि करते थे। शोर जैसी कोई चीज यहाँ थी ही नहीं। आवाजों के नाम पर या तो कभी माताजी के सान्निध्य में रहने वाली बालिकाओं की हल्की सी मृदु-मन्द हंसी बिखर जाती, अथवा फिर जब-तब गाय रंभा देती। लेकिन ये सब भी वातावरण की शान्ति में मधुरता ही घोलते थे। तब दिन में भी सुनायी देने वाली माँ गंगा के प्रवाह की कल-कल ध्वनि आश्रम के वातावरण को स्वर्गीय संगीत से मधुमय बनाती थी। आगन्तुक प्रायः नहीं थे। यदा-कदा महीनों में कोई एक-आध व्यक्ति आ जाय तो बहुत। आश्रम में माताजी व यहाँ के थोड़े से निवासियों के लिए रोजमर्रा की चीजों जैसे सब्जी-तरकारी आदि की व्यवस्था कार्यकर्त्ता हरिद्वार शहर अथवा ज्वालापुर जाकर करते थे। यह जाना भी प्रायः पैदल ही होता था। हाँ कभी-कभी थोड़ी-बहुत दूर के लिए बस सुलभ हो जाती थी।
माताजी की दिनचर्या में तप साधना के अलावा अपने परिजनों के पत्रों के उत्तर देना, अखण्ड ज्योति पत्रिका के सम्पादन की व्यवस्था करना, सभी के भोजन का समुचित रूप से इन्तजाम करना शामिल था। इन सभी कामों के साथ वे अपने साथ रहने वाली बालिकाओं के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था भी जुटाती थी, जिससे कि उनको अपने घर का अथवा माता-पिता का अभाव न खले। इस व्यवस्था में उन्हें कुछ-कुछ नयी विशेष चीजें अपने हाथों से बनाकर खिलाना आदि शामिल था। इन सब दैनिक कार्यों में माताजी पर्याप्त व्यस्त रहती थीं। उनकी इस व्यस्तता को देखकर आस-पास रहने वाले यह समझ ही न पाते थे कि वे साधना कब करती हैं? करती हैं भी कि नहीं? और यदि करती हैं तो क्या करती हैं? हालाँकि अन्तःकरण को कुरेदने वाले इन सवालों की भ्रान्ति में पड़ने वाले लोग भी उनकी आध्यात्मिक शक्ति व सिद्धियों से अवगत थे। फिर भी अपनी ऊहापोह भरी भ्रान्ति में वे सत्य को समझने में असमर्थ थे।
एक दिन ऐसे ही एक व्यक्ति ने, जो अभी भी जीवित हैं, परन्तु जिन्हें अपना नाम उजागर करने में संकोच है- बड़ी ही हिचकिचाहट के साथ माताजी से पूछ लिया- “माताजी आप तो स्वयं सिद्धिदात्री हैं, फिर आपको साधना करने की आवश्यकता क्या है?” इस सवाल के बाद थोड़ा डरते-डरते उन्होंने यह भी पूछा- कि “आप अपनी साधना कब करती हैं, कुछ पता ही नहीं चलता।” अन्तर्यामी माताजी उसकी इन बातों पर पहले तो मुस्कराई, फिर हल्की से हंस दीं। फिर थोड़ा सा रुककर बोलीं- क्या करेगा यह सब जानकर। पर उसे बड़ा मायूस और उदास देखकर वह समझाने लगीं- देख बेटा! तू इन चीजों को अभी ठीक से समझ नहीं सकता। तेरी आँखें अभी बड़ी कमजोर हैं, वे हमारी साधना को देख नहीं सकती। फिर भी तू जिद करता है, तो चल थोड़ा बहुत बताए देती हूँ।
देख, ये लड़कियाँ और मैं मिलकर साधना करती हैं। इन लड़कियों की साधना स्थूल है और मेरी सूक्ष्म। मैं जो कुछ भी करती हूँ वह सूक्ष्म शरीर से, सूक्ष्मलोक में करती हूँ। साधारण लोगों को दिखाई न देने और समझ में न आने पर भी इस तरह से ब्रह्मांड में बिखरे-फैले शक्ति प्रवाहों में से अनन्त शक्ति का अर्जन होता है। यह सूक्ष्म शरीर की ऐसी साधना है जिसकी चर्चा साधना की किसी किताब में नहीं है। लेकिन इस तरह से किए जाने वाले शक्ति अर्जन की सार्थकता तभी है, जब उसके अवतरण के लिए उचित आधारभूमि हो। इस आधारभूमि का निर्माण इन लड़कियों द्वारा मेरी देख-रेख में किए जाते गायत्री पुरश्चरणों की शृंखला से हो रहा है, तुझे समझ में ये सब बातें कितनी आएँगी, पता नहीं। पर इतना जान ले कि यहाँ इन दिनों अद्भुत हो रहा है। इस पवित्र भूमि की पात्रता का विस्तार करके इसे आध्यात्मिक ऊर्जा का भण्डारगृह बनाया जा रहा है। इसका उपयोग आगे चलकर होगा।
अपनी बातों को समझाती हुई माताजी थोड़ा रुकीं, फिर कहने लगीं- तूने एक बात और पूछी थी- माताजी आपको साधना की आवश्यकता क्या है? तो बेटा! साधना मेरे लिए आवश्यकता नहीं, मेरा स्वभाव है। इसकी आवश्यकता मुझे नहीं तुम सब बच्चों को है। अब बच्चे तो बच्चे ठहरे, जाने-अनजाने उनसे न जाने कितने पाप-ताप हो जाते हैं। और जब उनके परिणाम सामने आते हैं तो कहते हैं- माताजी बचाओ। अब बच्चे कैसे भी हों, धूल-मिट्टी, मल-मूत्र से सने हो या साफ-सुथरे हों, मेरे लिए तो बच्चे ही हैं। मैं उनकी माँ हूँ। वे जैसे भी हैं- मुझे बहुत प्यारे हैं। अपने इन बच्चों को आफत-मुसीबत से बचाने के लिए मुझे बहुत कुछ करना पड़ता है। गलती बच्चे करते हैं, प्रायश्चित उसकी माँ होने के कारण मुझे करना पड़ता है। इसी के चलते निरन्तर साधना करती रहनी पड़ती है।
सुनने वाले की आँखें माताजी की बातों को सुनकर भर आयीं। वह उनके वात्सल्य के अनन्त विस्तार को देखकर हतप्रभ था। माताजी अपने भावों में डूबी कहे जा रही थीं- बेटा! मैं तो इस जमीन का, यहाँ के आस-पास की बहुतेरी जमीन का कायापलट करने में लगी हुई हूँ। जहाँ तक मेरे संकल्प का विस्तार है वह जमीन आध्यात्मिक ऊर्जा का अक्षय कोष बन जाएगी। आगे चलकर यहाँ गायत्री तीर्थ का विस्तार होगा। यहाँ से बहुत बड़े-बड़े काम होंगे। उस समय देखने वाले लोग हैरान होंगे कि ये शान्तिकुञ्ज के सारे काम अपने आप कैसे हो जाते हैं। शान्तिकुञ्ज जो काम अपने हाथ में लेता है- वह बस अपने आप होता चला जाता है। पर दरअसल यह अपने आप नहीं, उस आध्यात्मिक ऊर्जा के एक अंश से होगा, जिसे मैं आज जमाकर रही हूँ। यहाँ जो लोग आएँगे और भावभरी श्रद्धा के साथ यहाँ रहकर साधना करेंगे, अनायास उनके प्राण प्रत्यावर्तित हो जाएँगे। आगे के दिनों में यहाँ आने वाले श्रद्धावान साधक अपने प्रत्यावर्तित प्राणों को अनुभव करेंगे। अपनी साधना की रहस्य कथा के इन कुछ अंशों को उजागर करती हुए माताजी अचानक उठ खड़ी हुई। शायद उन्हें अपने भविष्यत् कार्यों को गति देनी थी।
श्रीरामकृष्ण परमहंस के गले में कैंसर हो गया था।...
प्रत्यावर्तित हो रहे प्राणों से माताजी और गुरुदेव के बीच भाव सन्देशों का आदान-प्रदान होता रहता था। शुभ्र-धवल हिमशिखरों वाले हिमालय की गहनताओं में तपोलीन गुरुदेव और हरिद्वार की दिव्य साधना स्थली- शान्तिकुञ्ज में साधनालीन माताजी एक दूसरे की परिस्थिति एवं भावदशा को अपने हृदय की गहराइयों में सतत अनुभव करते थे। दोनों के कर्त्तव्य कठोर थे, दोनों की साधना दुर्धर्ष थी। माताजी, गायत्री परिवार के अपने बच्चों को प्यार-दुलार देने, उनकी कष्ट-कठिनाइयों में भागीदार होने के साथ शान्तिकुञ्ज के भविष्यत् के लिए आध्यात्मिक-ऊर्जा का अक्षय कोष जुटाने में जुटी थीं। गुरुदेव इन दिनों उन आसुरी शक्तियों को प्रचण्ड टक्कर देने में जुटे थे, जो पड़ोसी देश की कुटिल गतिविधियों का बाना पहनकर अपने देश पर चढ़ आयीं थीं।
सन् 1971 की सर्दियों की शुरुआत देश पर काफी भारी पड़ रही थी। फौजें सरहदों पर अलग-अलग मोर्चों में दुश्मन से जूझ रही थीं। पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे अमानवीय अत्याचारों के कारण पलायन कर भारत भागे आ रहे शरणार्थियों की समुचित सहायता करने के लिए देश के बहादुर सिपाही प्रतिबद्ध थे। समूचे राष्ट्र के लिए यह बड़ा कठिन दौर था। समस्याओं के इस जटिल चक्रव्यूह के अनेक चक्र थे। राष्ट्र के कर्णधारों को कूटनीतिक मोर्चे पर घेरने की कोशिश हो रही थी। आज दुनिया का सबसे शक्तिशाली कहा जाने वाला देश उन दिनों दुश्मन को हर तरह से सहायता पहुँचाने में जुटा था। यहाँ तक कि उसका सर्वशक्तिमान समझा जाने वाला सातवाँ बेड़ा भी बढ़ा चला आ रहा था। छोटे-बड़े जो भी उस समय युद्ध की खबरों को सुनते थे, आपस में यही पूछते और सोचते थे, अब क्या होगा?
लेकिन अचानक घटनाचक्रों में कुछ ऐसे चमत्कारी परिवर्तन हुए कि बाजी एकदम पलट गयी। नया इतिहास ही नहीं नया भूगोल भी रचा गया। दुनिया के इतिहास में शायद पहली बार तिरानवे हजार हथियारबन्द सेना ने अपने जनरल के साथ घुटने टेक कर आत्मसमर्पण किया। विश्व के नक्शे में नयी लकीरें खिंची, भूगोल में एक नए देश के मानचित्र ने आकार लिया। भारत ने विजय दिवस मनाया और बाँग्लादेश ने अपना जन्म दिवस मनाया। देश के कर्णधारों से लेकर सामान्य नागरिक तक ने अनुभव किया कि यह तो सब कुछ चमत्कार जैसा हो गया। कैसे लौटा सातवाँ बेड़ा? कैसे किया दुश्मन की इतनी बड़ी फौज ने आत्म समर्पण? इन सवालों का जवाब सामान्य बुद्धि खोजने में असमर्थ थी। बस सभी ने यही कहा कि यह तो भारत की आध्यात्मिक-दिव्य शक्तियों का चमत्कार है।
जिन दिनों यह सब हुआ, उन्हीं दिनों एक परिजन डॉ. अमल कुमार दत्ता जो अब शान्तिकुञ्ज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता हैं और अब ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में रहते हैं, माताजी से मिलने आए। मिलने पर उन्होंने माताजी से कहा- माताजी आपने सुना- भारत ने युद्ध जीत लिया। उत्तर में माताजी बड़े धीरे से बोलीं- हाँ बेटा! सुन भी लिया और देख भी लिया। परिजन को थोड़ा अचरज हुआ कि यह सुनना तो ठीक है, पर देखने का क्या मतलब है? उन्होंने माताजी से सारी बात का खुलासा करने की जिद की। उनकी इस जिद पर वह कहने लगीं, “अभी जो यह लड़ाई हुई, वह दो तरह से लड़ी गयी। एक तो अपनी फौजों ने मोर्चे पर जाँबाजी दिखाई। फौजों की इस बहादुरी की जितनी सराहना की जाय कम है। लेकिन इस लड़ाई में हिमालय की ऋषि सत्ताओं ने भी जबरदस्त और प्रचण्ड रूप से हिस्सा लिया। इसमें गुरुदेव की मुख्य भूमिका रही। उन्होंने अपनी तप शक्ति से दुश्मन की षड्यंत्रकारी योजनाओं को तार-तार करके रख दिया। मैंने यह सब प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखा।”
उन दिनों के अनेक संस्मरणों में एक संस्मरण और है, जिसे बाद में माताजी ने स्वयं अपने मुख से बताया। इस संस्मरण से ममतामयी माँ का वात्सल्य प्रकट होता है। उन्होंने बातचीत के क्रम में अपनी यादों को कुरेदते हुए कहा- “जब गुरुजी 1971 में हिमालय गये थे, तब उम्मीद यही थी कि अब वे शायद न लौटें। बाँग्लादेश वाली लड़ाई के बाद उनकी योजना भी कुछ ऐसी ही थी। पर इधर सारे लोग परेशान थे, गुरुजी कब लौटेंगे? जो भी चिट्ठी लिखता वह यही सवाल करता, गुरुजी कब वापस आएँगे, हम सब से कब मिलेंगे। बच्चों की इस विकलता ने मुझे बड़ा बेचैन और विकल कर दिया। अपने कष्ट की तो मुझे कभी चिंता नहीं होती है, फिर वह चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो। पर अपने बालकों के कष्ट मुझसे सहे नहीं जाते। उन्हें दुःखी-परेशान होते मैं नहीं देख सकती। आखिर माँ हूँ न। बच्चों की इस परेशानी के कारण मेरी बेचैनी इतनी बढ़ गयी कि गुरुजी से प्रार्थना करते हुए मेरी चीख निकल गयी। इस चीख के कारण कुछ लोगों ने समझ लिया- कि माताजी बीमार हैं। हालाँकि गुरुजी ने सही बात समझी और वे वापस आ गए। उन्होंने मेरी प्रार्थना को स्वीकार करके अपनी योजना परिवर्तित कर ली।”
वापस आने के बाद गुरुदेव सबसे पहले सुदूर वास करने वाले प्रवासी परिजनों की पुकार का उत्तर देने के लिए अफ्रीका गए। सन् 1972 में गुरुदेव ने अपनी यह यात्रा पानी वाले जहाज से सम्पन्न की। उनका यह प्रवास ऊपरी तौर पर साधारण रहने पर भी आन्तरिक रूप से कई असाधारण अनुभूतियों से भरा रहा। वहाँ से लौटने पर उन्होंने सन् 1973 में पाँच दिवसीय प्राण प्रत्यावर्तन सत्र आयोजित किए। शान्तिकुञ्ज में आयोजित होने वाले ये सबसे पहले साधना सत्र थे। इनमें देश भर के परिजनों ने भाग लिया। और अपने प्राणों के प्रत्यावर्तन की अनुभूति प्राप्त की। इन परिजनों में से अनेक आज शान्तिकुञ्ज और ब्रह्मवर्चस में वरिष्ठ कार्यकर्त्ता हैं। जो शान्तिकुञ्ज आकर नहीं भी रह सके, वे भी अपने-अपने क्षेत्र में जी-जान से मिशन की गतिविधियों में जुटे हैं।
प्राणों का यह प्रत्यावर्तन सब तरह से अनूठा था। इसमें पाँच दिनों के एकान्तवास में साधकगण गुरुदेव द्वारा बतायी गयी कई तरह की सरल किन्तु प्रभावकारी साधनाओं को करते थे। इन साधनाओं का उद्देश्य साधकों के प्राणों को उच्चस्तरीय आध्यात्मिक तत्त्वों के लिए ग्रहणशील बनाना था, ताकि वे गुरुदेव के महाप्राणों के किसी लघु अंश को ग्रहण व धारण करने में समर्थ हो सकें। साधना की इस अवधि में प्रत्येक साधक को गुरुदेव के संग-सुपास व चर्चा-परामर्श का भरपूर मौका मिलता था। इस साधना में साधकों को भोजन व औषधि कल्क के माध्यम से माताजी की प्राण-सुधा पीने को मिलती थी। वे अपने बच्चों को इन्हीं माध्यमों से अपने तप का महत्त्वपूर्ण अंश देकर अनुग्रहीत करती थीं।
इन प्रत्यावर्तन शिविरों से लेकर लगभग एक दशक की अवधि तक शान्तिकुञ्ज में अनेक तरह के साधना सत्रों का आयोजन-संचालन हुआ। इनमें भागीदारी करने वाले देश भर के हजारों साधकों ने परम पूज्य गुरुदेव के साथ माताजी की तपशक्ति और योग विभूतियों का साक्षात्कार किया। ये सभी सर्वसिद्धिदात्री माँ द्वारा दिए गए विविध विधि अनुदानों से लाभान्वित हुए। यह अवधि शान्तिकुञ्ज के स्वर्णिम कालों में से एक थी। इसी अवधि में 1978 में माताजी को सहयोग देने के लिए शैल दीदी एवं डॉ. प्रणव पण्ड्या का आगमन हुआ। अध्यात्म के वैज्ञानिक आयाम को प्रतिष्ठित करने के लिए ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना हुई। इसी के साथ आदिशक्ति जगदम्बा को युगशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए परम पूज्य गुरुदेव ने एक नया अभियान छेड़ा। यह इस सत्य का उद्घोष था कि युग निर्माण मिशन की सूत्र संचालिका आदिशक्ति स्वयं हैं। इस अभियान को गति देने के लिए गुरुदेव ने स्वयं देश भर की यात्राएँ कीं। पहले चरण में सम्पूर्ण देश के चुने हुए पवित्र तीर्थ स्थानों पर चौबीस शक्तिपीठ स्थापित हुए। बाद में इनकी संख्या बढ़ती गयी। गुरुदेव के इस प्रवास काल में माताजी ने मिशन और शान्तिकुञ्ज की सूत्र संचालिका होने का दायित्व सम्भाला।
एक गुरु के दो शिष्य थे...
सूत्र संचालिका के रूप में माताजी यद्यपि अपने शान्तिकुञ्ज आगमन के समय से ही क्रियाशील थीं। लेकिन गुरुदेव के हिमालय से वापस लौटने के बाद उन्होंने फिर से अपने आप को परोक्ष भूमिका में समेट लिया था। ऐसा करने के पीछे किसी तरह के अयोग्यताजन्य कारण नहीं थे। बल्कि वे श्रेय व यश-कामना विहीन, अपने गुरु-मार्गदर्शक और आराध्य के प्रति पूर्णतया समर्पित साधिका का आदर्श प्रस्तुत करना चाहती थीं। वे स्वयं जीकर अपने बच्चों को बताना चाहती थीं, सिखाना चाहती थीं कि शिष्यत्व क्या होता है? शिष्य कैसा होता है? साधना में समर्पण का क्या महत्त्व है? सर्वेश्वरी माँ के अतिरिक्त भला और कौन अपने बच्चों के लिए ऐसा त्यागमय, कष्टमय एवं आदर्शपूर्ण जीवन जिएगा। अध्यात्म-साधकों के लिए माताजी की यह जीवन शैली कितनी ही आदर्शनिष्ठ क्यों न हो, पर मिशन को उनके कुशल नेतृत्व की आवश्यकता थी। गुरुदेव की हिमालय से वापसी इसी शर्त पर हुई थी कि वे पूर्ण एकान्त में सतत उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयोगों में संलग्न रहेंगे।
इसी के चलते गुरुदेव समय-समय पर माताजी को अकेले शान्तिकुञ्ज ही नहीं सम्पूर्ण मिशन के सूत्र-संचालन के लिए प्रशिक्षित एवं प्रोत्साहित करते रहते थे। शक्तिपीठों में आदिशक्ति की प्राण प्रतिष्ठ के लिए जब वह प्रवास पर गए, तब उनका यह आग्रह काफी बढ़ गया। प्रवास के दौरान, वह माताजी को प्रतिदिन एक पत्र लिखकर अपने कार्यों का ब्योरा भेजा करते थे। डाक व्यवस्था में गड़बड़ी के कारण पहले के पत्र पीछे और पीछे के पत्र पहले पहुँच सकते हैं, यह सोचकर वह प्रत्येक पत्र में पत्र संख्या लिखना नहीं भूलते थे। प्रतिदिन लिखे जाने वाले ये पत्र अभी भी शान्तिकुञ्ज में सुरक्षित हैं। इन सभी पत्रों में यदि किसी एक सार तत्त्व की खोज की जाय तो वह यही है कि गुरुदेव- माताजी को मिशन के प्रत्यक्ष सूत्र संचालन हेतु तैयार कर रहे थे। इन पत्रों की भाषा और शैली से बार-बार यही सत्य ध्वनित होता है कि माताजी सूत्र संचालन का कार्यभार अपने समर्थ हाथों में लें।
शक्तिपीठों का प्रवास कार्यक्रम समाप्त होने के कुछ ही समय बाद गुरुदेव पर असुरता ने हमला कर दिया। यह घटना सन् 1984 के प्रारम्भ की है। आसुरी शक्तियों ने अपने नीच गुणों के अनुरूप एक व्यक्ति को माध्यम बनाकर गुरुदेव पर आक्रमण किया। उस समय शान्तिकुञ्ज में कल्प साधना सत्र चल रहे थे। शिविर में भागीदार होने आए सभी परिजन अपने साधनात्मक कार्यक्रमों में व्यस्त थे। उन दिनों गुरुदेव सभी के लिए प्रायः सभी समय सर्वसुलभ भी हुआ करते थे। इसी का लाभ उठाकर वह दुष्ट व्यक्ति ऊपर गया और उसने उन पर प्राणघातक हमला किया। हालाँकि गुरुदेव के समर्थ प्रतिरोध के कारण उसे बहुत ज्यादा सफलता न मिली और वह डर कर भाग निकला। एक तरह से करुणामूर्ति गुरुदेव ने स्वयं ही उस कायर और डरपोक को भाग जाने का अवसर दिया। लेकिन इस घटना से एक बात तो साफ हो गयी कि माध्यम कोई भी हो किन्तु आसुरी शक्तियों का इतना साहस तो बढ़ ही गया है कि वे देव शक्तियों के केन्द्र शान्तिकुञ्ज में घुसकर देव शक्तियों के महानायक गुरुदेव पर हमला करने की हिम्मत जुटा सकती है।
यह एक चुनौती थी, जिसे गुरुदेव ने प्रसन्न भाव से स्वीकार किया। और वे असुरता को समर्थ ढंग से उत्तर देने के लिए सूक्ष्मीकरण साधना में चले गए। परिपूर्ण एकान्त में चलने वाली इस साधना का मकसद विश्व-वसुधा पर छाते जा रहे आसुरी आतंक को निरस्त करना था। साथ ही तीसरे विश्वयुद्ध की उन भयावह सम्भावनाओं को समाप्त करना था जिसकी भविष्यवाणी एक अरसे से दुनिया भर के सभी भविष्यवक्ता करते चले आ रहे थे। सन् 1984 की रामनवमी को इस तरह योजनाबद्ध रीति से गुरुदेव के एकान्त में चले जाने के बाद मिशन के सूत्र संचालन का सारा दायित्व माताजी पर आ गया। इस दायित्व के साथ एक अन्य गुरुतर दायित्व भी उन पर था। वह गुरुदेव द्वारा की जाने वाली अत्यन्त दुष्कर एवं दुरूह सूक्ष्मीकरण साधना में वह उनकी समर्थ सहयोगिनी भी थीं। गुरुदेव इन दिनों जिस सूक्ष्मीकरण साधना को कर रहे थे वह योग और तंत्र का मिला−जुला अत्यन्त उच्चस्तरीय और गोपनीय प्रयोग था।
इस कार्य के लिए गुरुदेव को चौथी बार हिमालय यात्रा करनी पड़ी। लेकिन इस बार की यात्रा उन्होंने सूक्ष्म शरीर से की। इस दौरान माताजी ने अपनी समर्थ साधना शक्ति से गुरुदेव के स्थूल शरीर की आसुरी प्रकोपों से रक्षा की। इस हिमालय यात्रा में गुरुदेव को उनके द्वारा की जाने वाली अलौकिक साधना का विधि-विधान बताया गया। विश्वहित में इसके अत्यन्त प्रभावकारी परिणाम बताने के साथ साधना के लिए आवश्यक सावधानियाँ भी गिनायी गयीं। यह भी कहा गया कि साधना काल में आसुरी शक्तियाँ तरह-तरह से उपद्रव मचाने में, हर तरह के विघ्न पहुँचाने में कोई कसर नहीं उठा रखेंगी। इन विघ्नों और उपद्रवों के अलावा स्वयं की सूक्ष्म चेतना को पाँच समर्थ स्वरूप प्रदान करने की इस प्रक्रिया में अस्तित्व में इतने तरह के शक्ति विस्फोट होंगे कि कभी भी स्थूल देह छूटने का खतरा बना रहेगा। ऐसी स्थिति में स्थूल देह की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए किसी समर्थ शक्ति का स्थूल रूप से दिव्य संरक्षण जरूरी है। यह कार्य केवल और केवल माताजी कर सकती हैं। शक्ति स्वरूपा माताजी परम समर्थ और सभी के लिए, यहाँ तक कि हम सब हिमालयवासी ऋषिगणों के लिए भी परम वन्दनीया हैं। उन्हीं के संरक्षण में यह साधना सफल हो सकती है।
मार्गदर्शक सत्ता एवं हिमालयवासी ऋषि सत्ताओं के सम्मिलित निर्देशन के अनुरूप परम पूज्य गुरुदेव ने अपनी सूक्ष्मीकरण साधना का कार्यक्रम बनाया। परम वन्दनीया माताजी पर दोहरी जिम्मेदारी आ पड़ी। रात्रि में गुरुदेव की साधना में समर्थ सहयोग करते हुए, पूरे दिन उन्हें मिशन के सभी काम-काज की देखभाल करनी थी, सभी तरह की व्यवस्था के लिए मार्गदर्शन देना था। छोटे-बड़े सभी लोगों की प्रत्येक बात को ध्यान से सुनकर निर्णय देना था। क्षेत्र में कार्यरत कार्यकर्त्ताओं की समस्याओं के हल निकालने थे। इन सारे कामों के साथ कष्ट और पीड़ा में पड़े अपने उन बच्चों का भी ध्यान रखना था- जो अपनी प्यारी माँ के अलावा और कुछ जानते ही नहीं। जब-तब किसी भी छोटी-मोटी आफत-मुसीबत आने पर माँ-माँ चिल्लाने लगते हैं। उन्हें उनकी भी देखभाल करनी थी, जो गुरुदेव से भाँति-भाँति की आशाएँ लगाए रहते हैं। इन नादानों को तो यह पता भी नहीं था कि गुरुदेव इस समय गहन साधना में हैं और इस समय उनकी एकाग्रता में व्यवधान डालना किसी भी तरह से ठीक नहीं है।
परम समर्थ और परम वन्दनीया माताजी ने एक साथ ये सारी जिम्मेदारियाँ निभायी और बड़ी खूबसूरती से निभायी। सदा एकान्त में रहने वाली माताजी को जब लोगों ने 1984 में पहली बार टोलियों की विदाई के समय प्रवचन मंच पर बोलते हुए सुना तो वे हतप्रभ रह गए। अविरल प्रवाहित हो रही वाणी एवं अद्भुत व भावपूर्ण शब्द संयोजन से अभिव्यक्त होती उनकी आध्यात्मिक शक्तिधारा ने सभी को विस्मय-विमुग्ध तथा उल्लास से सराबोर कर दिया। सभी के मन परम वन्दनीया माताजी की जय ध्वनि करते हुए नाच उठे। इसी समय एक दूसरी सच्चाई और भी उजागर हुई। क्षेत्र से आने वाले कार्यकर्त्ता जब माताजी से इस दौरान मिले तो अन्तर्यामी माँ ने खुलकर उन्हें अपनी योगशक्ति का परिचय दिया। पहले वे सदा अपने को गोपन रखती थीं। किसी के कोई समस्या बताने पर वे प्रायः यह कहती थीं कि बेटा! तुम गुरुदेव से मिल लो। उन्हें अपनी सारी बातें बता दो, मैं भी उनसे तुम्हारी बात कह दूँगी।
लेकिन इस बार तो सभी को स्थिति एकदम बदली हुई लगी। मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने अनुभव किया कि उनकी अपनी माँ ने सारा सूत्र संचालन अपने हाथों में ले लिया है। और माँ जब सूत्र संचालिका होती है तो वह कोई प्रशासिका एवं व्यवस्थापिका नहीं होती। वह तो व्यवस्था और प्रशासन के माध्यम से भी दोनों हाथों से अपने मातृत्व को, अपने वात्सल्य को लुटाती है। परम वन्दनीया माताजी तो मिशन की व्यवस्था एवं प्रशासन की सामान्य लौकिक शक्तियों के साथ अपनी उच्चस्तरीय आध्यात्मिक शक्तियों को लुटाने लगी थीं। सभी पर उनके आशीष बरसने लगे थे। सर्वेश्वरी अपनी समस्त संतानों पर अतिशय कृपालु हो उठी थीं। समस्त सूत्र संचालन में उनका मातृभाव छा गया था। वे अपने आँचल से आशीषों की वृष्टि कर रही थीं।
अरविंद आश्रम में श्रीमाँ साधकों की...
माताजी के आशीषों की वर्षा परम पूज्य गुरुदेव के एकान्त साधना में चले जाने के बाद अतिशय सघन हो गयी थी। सन् 1984 की रामनवमी से गुरुदेव का सर्वसामान्य से मिलना बन्द हो गया था। इस विशिष्ट साधना काल में उन्होंने प्रायः दो ही लोगों को अपने आस-पास रहने व निरन्तर मिलने-जुलने की अनुमति दी थी। इनमें से प्रथम स्वयं वन्दनीया माताजी थी, जो उनसे सर्वथा अभिन्न थीं, जिनके प्राण गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना में घुल रहे थे, जो साधना करते समय गुरुदेव के स्थूल शरीर को अपनी दिव्य शक्तियों से सुरक्षित व संरक्षित करती थीं। दूसरे व्यक्ति के रूप में डॉ. प्रणव पण्ड्या थे। जो उन दिनों गुरुदेव के प्रधान सेवक, निजी सचिव व उनके लेखन कार्य में एकमात्र सहयोगी का धर्म निभाते थे। इस गुरुतर सेवा धर्म में प्रतिपल उनके मन-प्राण तल्लीन रहते थे। ‘सब ते सेवक धरम कठोरा’- कहे जाने वाले सेवाधर्म को उनके हृदय में छलकने वाली भक्ति संवेदना ने एकदम आसान कर दिया था। सूक्ष्मीकरण साधना के समय वह प्रायः दिन के सारे समय गुरुदेव के पास ही रहा करते थे।
दिन को इस समय वन्दनीया माताजी अपने बच्चों को प्यार-दुलार बाँटती थीं। उन पर अपने आशीष बरसाती थीं। गुरुदेव के एकान्त में चले जाने के कारण शान्तिकुञ्ज, ब्रह्मवर्चस एवं गायत्री तपोभूमि में रहने वाले कार्यकर्त्ता ही नहीं देश भर में रहने वाले गायत्री परिजन मन मसोस कर रह गए थे। गुरुदेव से मिलना नहीं होता- इस बात का दुःख सभी को था। शुरुआत के दिनों में एक गहन अवसाद ने सबको घेर लिया था। लेकिन माताजी के प्यार भरे आशीषों ने सबकी हंसी फिर से लौटा दी। प्रायः हमेशा अपने को परोक्ष में रखने वाली सर्वेश्वरी माँ इन दिनों अपनी सन्तानों के दुःख को हरने, उन्हें सुखों से सराबोर करने में लगी हुई थीं। इस समय की अनेक घटनाएँ व संस्मरण शान्तिकुञ्ज व युग निर्माण मिशन के इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठो पर टँकी है। आज भी जिनका स्मरण कर मन माँ के प्यार से विगलित हो उठता है। हृदय उनके प्रति श्रद्धा से विभोर हो जाता है।
उन दिनों माताजी से मिलाने वालों व उनसे मिलने वालों को आज भी वे यादें भाव-विह्वल करती रहती हैं। ऐसी ही कुछ यादें इस समय भावनाओं की स्याही में भीगने के लिए आतुर हैं। इनमें से एक याद उन परिजन की है, जो इस समय राजस्थान प्रान्त के बाराँ जनपद में वरिष्ठ चिकित्साधिकारी हैं। गुरुदेव के सूक्ष्मीकरण में जाने के बाद ये अपने परिवार के साथ शान्तिकुञ्ज आए। इनके मन के किसी कोने में टीस थी कि इस बार गुरुदेव से मिलना नहीं हो पाएगा। अपने मन की ऊहा-पोह को लिए जब वह माताजी के पास पहुँचे तो उन्हें पहली हैरानी तो यही हुई कि माताजी ने उन्हें उनका नाम लेकर पुकारते हुए कहा- फूलसिंह, बेटा! कब आया तू? फिर पत्नी-बच्चों में से एक-एक का नाम लेते हुए उन्होंने सभी का हाल पूछा। यात्रा कैसी रही यह पूछा। डॉ. फूलसिंह यादव को माताजी की इन बातों से हैरानी इस बात की हुई कि वे पहले कभी उनसे घनिष्ठता से मिले ही नहीं हैं। पहले के समय में तो उनका गुरुदेव से ही मिलना होता रहा है। आज माताजी की बातों ने उन्हें चकित कर दिया।
वे कुछ और ज्यादा सोच पाते कि माताजी बोल पड़ीं- क्या सोच रहा है? माँ को अपने बच्चों की पहचान थोड़े ही करानी पड़ती है। और हाँ गुरुजी नहीं मिलते तो क्या हुआ मुझे तेरे प्रमोशन का ध्यान है। तू किसी बात की फिकर न कर। मैं तेरा प्रमोशन कराऊँगी। अन्तर्यामी माँ की बातों को सुनकर डॉ. फूलसिंह की आँखें भर आयीं। वह प्रणाम करके नीचे उतरे और यही सोचते रहे- माताजी अपनी पहचान न कराएँ तो भला उन्हें कौन पहचान सकता है। गुरुजी कृपालु हैं, पर माताजी तो उनसे हजार गुना ज्यादा कृपालु हैं। यह ठीक है कि दया के सागर गुरुदेव माँगने पर कभी निराश नहीं करते, परन्तु माताजी तो बिना माँगे ही सब कुछ दे डालती हैं। और देकर भी यही सोचती हैं कि बच्चे को कुछ कम दिया। माँ की कृपा और प्यार का कोई अन्त नहीं। आज भी डॉ. फूलसिंह के मन को माताजी की यादें भिगोती हैं। और वे केवल इतना कह पाते हैं कि जो माँ शक्तिपीठ में प्रतिष्ठित हैं, वही माँ अपने बच्चों पर कृपा करने के लिए अवतरित हुई थीं।
ऐसी यादें एक नहीं असंख्य और अनन्त है। माताजी से परिजनों को मिलाने वाले शिवप्रसाद मिश्रा आदि कार्यकर्त्तागण रोज ही उन्हें आशीषों की वर्षा करते हुए देखते थे। मिलने वाले परिजन के बिना कहे माताजी उसकी समस्या कह डालतीं और उसके सार्थक समाधान का विश्वास दिलातीं। दुःसाध्य-असाध्य बीमारियाँ, घर-परिवार की जटिल उलझनें, सालों से लम्बित पड़े मुकदमे, बेटी की शादी और भी ऐसी न जाने कितने तरह की समस्याएँ माताजी अपनी तपशक्ति से पल में हर कर देतीं। उनके पास लोग रोते हुए आते और हँसते हुए जाते। यह प्रभाव क्षणिक नहीं दीर्घकालीन होता। जब ये लोग अपने घर पहुँचते तो उन्हें अपनी परिस्थितियाँ बदली हुई लगती। इस बदलाव की सूचना वे चिट्ठियों से देते और कभी-कभी तो खुशी में स्वयं ही भागे हुए चले आते। और आकर कहते-माताजी आपकी कृपा से सब कुछ एकदम ठीक हो गया। उत्तर में वह कहतीं- हाँ बेटा, सो तो ठीक है, पर तू अपनी एक बात में सुधार कर ले। माँ अपने बच्चों पर कृपा नहीं करती- उन्हें प्यार करती है। वह जो कुछ भी करती है, बच्चों के प्रति प्यार से विवश होकर करती है।
प्रेममयी माँ के इस प्यार का कोई अन्त नहीं था। चाहे शान्तिकुञ्ज-ब्रह्मवर्चस में रहने वाले लोग हों या फिर बाहर से आने वाले, सब पर उनका प्यार निरन्तर बरसता रहता था। अपने बच्चों को उनकी पसन्दीदा चीजें बनाकर खिलाना उनका बड़ा ही मनपसन्द कार्य था। वे किसी के भी बिना बताए यह बराबर ध्यान रखती थीं कि किसको बेसन का हलुआ पसन्द है, किसे गाजर का हलुआ अच्छा लगता है। तिल के लड्डू, करेले की सब्जी, चने की दाल और भी ऐसी न जाने कितनी तरह की चीजों का वह प्रत्येक की पसन्द के अनुसार ध्यान रखती थीं। बिना किसी पूर्व सूचना के वह जब-तब कोई चीज स्वयं बना लेतीं या फिर साथ में रहने वाली लड़कियों से बनवा लेतीं। आगंतुक परिजन जब उनसे मिलने के लिए आते, तो वे उन्हें अपने सामने बिठाकर बड़े ही प्यार से खिलातीं। खाने वालों को हैरानी भी होती कि माताजी को कैसे पता कि मुझे यह चीज सबसे ज्यादा पसन्द है, और मैं आज आने वाला हूँ। पर यह हैरानी ज्यादा देर तक नहीं टिकती। क्योंकि लगातार के अनुभवों ने उन्हें विश्वास दिला दिया था कि उनकी माँ अन्तर्यामी होने के साथ योग की दिव्य विभूतियों से सम्पन्न हैं।
सारे दिन सन्तानों पर प्यार और आशीष लुटाने के बाद माताजी शाम होते-होते गुरुदेव के पास ऊपर चली जातीं। वहाँ वह उनके साथ सूक्ष्मीकरण के उच्चस्तरीय प्रयोगों में भागीदार होतीं। गुरुदेव के द्वारा सम्पन्न की जाने वाली विश्वकुण्डलिनी के जागरण व पाँच वीरभद्रों के निर्माण जैसी क्रियाएँ माताजी की दिव्य शक्तियों के संरक्षण में चल रहीं थी। इस साधना के उपरान्त बाहर निकलने पर गुरुदेव ने इस विशिष्ट समय की चर्चा करते हुए एक बात-चीत में कहा था- “तुम्हीं लोगों को माताजी के आशीष नहीं मिलते, उनके आशीष हमें भी मिले हैं।” फिर वह हँसते हुए बोले- “माताजी, माँ के पेट से, माताजी होकर ही पैदा हुई हैं।” वह एक साथ सभी की माँ हैं। कुछ देर ठहर कर अपने शरीर की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा- यह शरीर अब तक उन्हीं की देख-भाल के बल पर टिका हुआ है। मेरे जीवन के सारे जटिल प्रयोग उनके मातृत्व के संरक्षण के बल पर ही सम्भव हुए हैं। सूक्ष्मीकरण की सफलता भी उन्हीं के दिव्य संरक्षण का नतीजा है। साधना काल में वे अगर अपनी दिव्य शक्तियों से सतत मेरी रखवाली न कर रही होती, तो कौन जाने यह शरीर रहता भी या नहीं।’ गुरुदेव की इस सूक्ष्मीकरण साधना के बाद बीतते वर्षों के साथ अनेकों घटनाचक्र तेजी से बदले। और वह समय भी आया जब शिव-महाशक्ति में समाने की तैयारी करने लगे।
साधु के दर्शनार्थ गाँव की भीड़…
सूक्ष्मीकरण साधना के बाद से ही परम पूज्य गुरुदेव शान्तिकुञ्ज सहित सम्पूर्ण युग निर्माण मिशन को सर्वथा नए आयाम में पहुँचाने में जुटे थे। इसके लिए उन्होंने अपने लेखन, साधना आदि नियमित कार्यों के साथ कार्यकर्त्ताओं को तरह-तरह से प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया था। सारे दिन एक के बाद एक गोष्ठियाँ चलती रहती। इन गोष्ठियों में वह भविष्य में होने वाले कार्यों का खुलासा करते, नयी योजनाएँ बनाते व समझाते। यह भी बताते कि उनके न रहने पर मिशन का किस तरह से विस्तार होगा और यह कैसे व किस ढंग से चलेगा। सारे कामों को करते हुए वह इन दिनों नयी-नयी पुस्तकों के रूप में क्रान्तिधर्मी साहित्य का भी सृजन कर रहे थे। इस भाव स्पर्शी साहित्य का सृजन, उनके नियमित लेखन से अलग था। इन वर्षों में गुरुदेव की समस्त गतिविधियाँ तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतम हो चली थीं। इस उत्तरोत्तर बढ़ती हुई तीव्रता को देखकर भक्ति-संवेदना से स्पन्दित हृदयों को सहज ही अनुमान लगने लगा था कि भगवान् शिव अपनी लोक लीला का संवरण करते हुए महासमाधि में लीन होने की तैयारी कर रहे हैं।
शक्ति स्वरूपा माताजी गुरुदेव के शिव संकल्प से अवगत थीं। उन्हें भली प्रकार मालूम था कि सत्य के मूर्तिमान स्वरूप गुरुदेव के संकल्प व योजनाएँ कभी मिथ्या नहीं हो सकते। वह स्वयं भी उनकी योजनाओं के प्रति पूर्णतया समर्पित थीं। फिर भी उन्हें इतना कठिन श्रम करते हुए देखकर उनका मातृहृदय विकल हो उठता था। एक दिन इसी तरह गुरुदेव सुबह का लेखन एवं उसके बाद कार्यकर्त्ताओं की गोष्ठियाँ लेने के बाद दोपहर में फिर से लिखने बैठ गए। लगातार विभिन्न कार्यों के साथ लेखन करते हुए उनकी आँखें लाल हो गयीं। शरीर के कष्ट तो सभी को होते हैं, फिर वह चाहे अवतारी सत्ता ही क्यों न हो? उस दिन अत्यधिक एवं लगातार लेखन करने के कारण गुरुदेव की आँखें एकदम लाल दिखने लगी थीं। इसके बावजूद वे देहबोध से रहित, परमहंस महायोगी की तरह शाम तक यथावत लेखन करते रहे। शाम को जब माताजी अपने दिन के सारे कामों को निबटाकर नीचे से ऊपर पहुँची तो उन्होंने गुरुदेव की इस दशा को देखा तो वह विह्वल हो गयीं।
भाव बिन्दुओं से भरी हुई आँखों के साथ उन्होंने गुरुदेव के सारे कागज समेट कर एक साथ एक जगह रखे। उन्हें अपने हाथों से एक गिलास पानी पिलाया। और उनसे पूछने लगीं- आप इतना ज्यादा श्रम क्यों करते हैं? इस प्रश्न के उत्तर में गुरुदेव कुछ देर तो चुप रहे, फिर थोड़ा मुस्कराते हुए बोले- “दरअसल हम अपने जाने के पहले मिशन की गाड़ी को खूब जोर का धक्का लगा देना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि यह धक्का इतनी जोर से लगे कि मिशन सैकड़ों सालों तक आराम से चलता रहे। इसमें कोई भी बाधा-व्यतिरेक न आए। अपने लड़के केवल इसमें बैठकर स्टियरिंग सम्हाले रहें। उन्हें कुछ खास न करना पड़े। सब कुछ अपने ही आप इत्मीनान से होता चला जाय।” उस दिन की इस बात से माताजी को नहीं गुरुदेव के अन्य निकटस्थ जनों को यह स्पष्ट आभास हो गया कि उनके भावमय भगवान् अपनी लोक लीला को पूरी तरह से समेट लेने के लिए संकल्पित हैं।
इस सत्य से अवगत माताजी इन दिनों मिशन के सामान्य काम-काज के साथ अपने घर-परिवार की भी जिम्मेदारियाँ निबटाने के लिए प्रयत्नशील थीं। उनकी सुपौत्री गुड़िया (मन्दाकिनी) बड़ी हो चुकी थी। उसके लिए वह सुयोग्य वर की तलाश कर रही थीं। गुड़िया (मन्दाकिनी) एवं चीनू (चिन्मय) ये दोनों बच्चे अपने छुटपन से माताजी के साथ रहे थे। इन्होंने प्रायः अपना सारा बचपन माताजी की गोद में और गुरुदेव के आस-पास खेलकर बिताया था। गुड़िया उनके शान्तिकुञ्ज आगमन के कुछ ही समय बाद मथुरा से उनके पास आ गयी थी। और चीनू का आना शैल दीदी एवं डॉ. साहब के साथ ही हुआ था। उन्होंने स्वयं के साथ अपने शिशु को भी माताजी एवं गुरुदेव को सौंप दिया था। इन बच्चों की सारी परवरिश माताजी की वात्सल्य छाया में ही हुई। इन्हें पाल-पोस कर बड़ा करने व इन्हें संस्कारवान बनाने का दायित्व उन्होंने स्वयं निभाया। बड़े होने पर गुड़िया के लिए वर की तलाश भी उन्होंने की। डॉ. साहब ने स्नेहशील अभिभावक की भाँति इस कार्य में माताजी का हाथ बंटाया। अन्ततः वर्ष 1989 की माघ पूर्णिमा (20 फरवरी) के दिन गुड़िया (मन्दाकिनी) सादगीपूर्ण किन्तु भावप्रवण वातावरण में माताजी के गले लगकर अपनी ससुराल के लिए विदा हुई।
इसके बाद वर्ष 1989 के शेष महीनों में गुरुदेव के कार्यों की तीव्रता यथावत बनी रही। इस वर्ष के अन्त-अन्त तक प्रायः सम्पूर्ण क्रान्तिधर्मी साहित्य प्रकाश में आ गया। इन दिनों वह बात-चीत के क्रम में यह जता दिया करते थे कि वह सूक्ष्म जगत् के परिशोधन के लिए अब पूरी तरह से सूक्ष्म लोक में डेरा जमाएँगे। ऐसे ही वर्ष 1989 के अन्तिम महीनों में एक दिन वह अपने बिस्तर पर लेटे हुए थे। लेटे हुए बात-चीत के क्रम में उन्होंने कहा- “जैसे लोग अपना कुर्ता उतारते हैं, वैसे ही मैं यह स्थूल शरीर उतार कर फेंक दूँगा।” यह जिज्ञासा करने पर कि इसके बाद फिर वह कहाँ रहेंगे? उत्तर में उन्होंने कहा- “और कहाँ? सारा काम करते हुए मैं एक अंश से माताजी के भीतर रहूँगा।” उनकी इन रहस्यमयी बातों में एक रहस्यपूर्ण सत्य था।
सन् 1990 की बसन्त पंचमी के अवसर पर परम पूज्य गुरुदेव ने एक पत्रक लिखा ‘बसन्त पंचमी के अवसर पर महाकाल का सन्देश’। इस पत्रक में उन्होंने अपनी भावी क्रियाकलापों को स्पष्ट किया था। अपनी इसी योजना के अनुरूप वह बसन्त पंचमी के दिन ही प्रणाम के बाद से पुनः परिपूर्ण एकान्त में चले गए। अब वह अधिक दिन स्थूल देह में नहीं रहेंगे, यह अहसास प्रायः सभी संवेदनशील हृदयों को हो चला था। सभी विकल किन्तु विवश थे। भावमयी माताजी का समर्पण अडिग था। गुरुदेव के भौतिक जीवन के प्रति भी अविरल एवं असीम अनुराग के होते हुए भी वह उनके संकल्प के प्रति समर्पित थीं। अपने आराध्य की इच्छा ही उनकी अपनी इच्छा थी। अपनी असह्य आन्तरिक विकलता को किसी तरह दबाए हुए वह दैनिक काम-काज में संलग्न रहती थीं।
अप्रैल महीने के अन्तिम दिनों में उन्होंने शान्तिकुञ्ज की गोष्ठी के बाद ब्रह्मवर्चस के कार्यकर्त्ताओं की गोष्ठी ली। इस गोष्ठी में उन्होंने गुरुदेव द्वारा किए गए स्थूल देह त्याग के शिव संकल्प को संकेतों में पर स्पष्ट रीति से समझाया। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि गुरुदेव ने उनसे यह भी कहा है-”कि मेरे देह त्याग देने के बाद तुम सौभाग्य-सिन्दूर का त्याग न करना।” माताजी ने यह बताते हुए स्पष्ट किया कि गुरुदेव ने मुझसे यह कहा है कि तुम ठीक उसी तरह से अपने सौभाग्य-सिन्दूर को धारण किए रहना जैसा कि पिछली बार तुमने शारदामणि के रूप में किया था। उसी तरह लड़कों की देख-भाल करती रहना। कुछ ही सालों में ये लड़के सक्षम हो जाएँगे, तब तुम भी देह का झंझट उतार फेंकना। माताजी की इन बातों को सुनकर सुनने वालों के दिल बिलख उठे। बैठे हुए लोगों में से कोई कुछ बोला नहीं। बस एक गहरी चुप्पी छायी रही।
वह दिन बीता और उसके बात कई दिन बीते। अपने द्वारा निश्चित की गयी तिथि एवं निर्धारित किए गए समय के अनुसार गायत्री जयन्ती 2 जून, 1990 को प्रातः 8 बजे के लगभग गुरुदेव ने शरीर छोड़ दिया। उनकी अन्तर्चेतना महाशक्ति में समा गयी। माताजी उस समय उन्हीं के द्वारा दिए गए आदेश के अनुसार प्रवचन मंच पर थीं। सम्पूर्ण सत्य से अवगत होते हुए भी उन्होंने दिन के सभी कार्य पूर्णतः संतुलित रहकर निर्धारित क्रम के अनुसार पूरे किए। शाम को सूर्य अस्त होने से पहले महायोगी गुरुदेव की तपःपूत देह उनके जीवन यज्ञ की पूर्णाहुति के रूप में अग्नि को समर्पित हुई। देह के भस्म होने के साथ अग्नि का तेज और ताप, पूज्य गुरुदेव के परम तेज के साथ वन्दनीया माताजी में समा गया। वह अविचल भाव वे अपने प्रभु से हुए बाह्य वियोग को सहते हुए महातप के लिए प्रवृत्त हुई।
गौरी माँ श्रीरामकृष्ण देव की शिष्या थीं।
अब तक जो कुछ भी तपश्चर्या व योग साधना की गयी थी, वह सब अपने प्रभु के आदेश व उन्हीं के सान्निध्य में हुई थी। बीच में जो वियोग के पल आए थे, वे सीमित थे। विश्वास था कि प्रभु गए हैं तो आएँगे भी। उनके आने की अवधि प्रायः निश्चित थी। अपने आराध्य के सान्निध्य में अथवा उनके लौट आने की आशा में सहा गया महाकष्ट भी वन्दनीया माताजी के लिए आनन्ददायी था। महाकंटकों को भी उन्होंने सुकोमल पुष्पों की भाँति समझा था। असह्य वेदना भी परम पूज्य गुरुदेव के सान्निध्य में घुलकर उनके लिए आह्लादकारी बनती गयी थी। पिछले जीवन की लम्बी अवधि में उन्होंने बहुत कुछ सहा था। जीवन में कई तरह के संकटों को सहते हुए उन्होंने कठोर तप-साधनाएँ की थीं। उनकी सहनशक्ति इतनी आगाध और असीम थी कि गुरुदेव उन्हें ‘सर्वसहा’ कहने लगे थे। वह कहा करते थे- कि माताजी सर्व कष्ट सहिष्णु हैं। वे सब कष्टों-संकटों को बड़ी आसानी से हँसते-हँसते सह जाती हैं। उन सर्वसहा को भी बाह्य वियोग का यह महातप असह्य लग रहा था।
लेकिन इस असह्य को भी वह हँस कर सह रही थीं। उन्हें स्वयं को सम्हालने के साथ, अपनी अनगिनत शिष्य-सन्तानों को सम्हालना था। प्रेममूर्ति गुरुदेव के न रहने का दुःख सभी को था। सबके मन भीगे हुए और भारी थे। इनमें से कई तो ऐसे थे, जिनकी आँखों से महीनों आँसुओं की झड़ियाँ लगी रहीं। उनकी भावुकता इन्हें हर पल भिगोती थी। इन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि अब कैसे जिएँ? आज इन बातों में हो सकता है, किसी को विचित्रता या अतिशयोक्ति लगे। पर जिन्होंने गुरुदेव को देखा है, उन्हें छुआ है, उनके प्रेम को पिया है, उनके सान्निध्य में दो-चार घड़ी बितायी है, उन सभी को इन बातों में सच और केवल सच के अलावा अन्य किसी तत्त्व की प्रतीति न होगी। जब सामान्य जनों की यह स्थिति थी, तो भावमयी माताजी की विह्वलता व विकलता की कल्पना करना सामान्य जन-मन के लिए पूरी तरह से अकल्पनीय है। अपनी इस असीम वेदना को सहती हुई वे उन दिनों भी नियमित प्रणाम में बैठ रही थीं। उनके मिलने-जुलने का क्रम भी पहले की ही तरह निश्चित व नियमित था। अपने बच्चों के लिए उनका प्यार-दुलार व उन पर आशीषों की अजस्र वर्षा अब पहले से भी ज्यादा बढ़ गयी थी।
लगातार विस्तार करते हुए, मिशन की अगणित जिम्मेदारियों को निभाते हुए विश्व जननी, विश्व कल्याण के लिए अहर्निश तप कर रही थीं। बीच-बीच में वह अपने भावुक और नादान बच्चों को भी धीरज देती थीं। उन्हें दुलराती व पुचकारती थीं। पिता के न होने पर माँ का अपनी सन्तानों के प्रति प्रेम और भी ज्यादा सघन और सजल हो गया था। इन्हें प्यार करते हुए वह जब-तब अपना उदाहरण देते हुए यह भी समझाती थी- कि देखो सहा कैसे जाता है? सहिष्णुता क्या होती है और यह जीवन के लिए कितनी आवश्यक है। वे बताती कि उच्चस्तरीय जीवन के उद्देश्यों के लिए कष्ट सहने का दूसरा नाम ही तपश्चर्या है। जो सहिष्णु है वही तपस्वी हो सकता है। जो सच्चा तपस्वी है, सहिष्णुता अपने आप ही उसका स्वभाव बन जाएगी। इन दिनों कभी-कभी तो वह यह भी कहती थी- जिसने सहन करने की कला जान ली, समझो उसने जीवन जीना सीख लिया। उनकी इन बातों में उनके निजी जीवन की अनुभूति घुली थी।
अपनी अनुभूति का अमृत पिलाने के लिए माताजी कभी-कभी उन कार्यकर्त्ताओं को अपने पास थोड़े समय के लिए बुला लेती थी, जो इन दिनों बड़े विकल और बेचैन थे। ऐसे ही एक कार्यकर्त्ता को उन्होंने गुरुदेव के न रहने के दो महीने बाद अपने पास बुलाया। यह इन दो महीनों में ठीक से सो न पाया था। उसके जीवन के दैनिक काम-काज बिखर गए थे। गुरुदेव का अभाव उसके लिए असह्य था। अब क्या होगा? कौन करेगा उसकी जिन्दगी की सार-संभाल, जैसे प्रश्न कंटक उसे बुरी तरह से चुभ रहे थे। विकल वेदना से भरे इन दिनों में उसने एक रात अर्धनिद्रा में स्वप्न में देखा- कि वह लेटा हुआ है और वन्दनीया माताजी अपनी गोद में उसका सिर रखे हैं। वह अपने हाथों को बड़े ही प्रेमपूर्ण ढंग से उसके सिर पर सहलाते हुए कह रही हैं- परेशान न हो, मौका मिलने पर मैं तुझे अपने पास बुलाऊँगी। स्वप्न के ये पल इतने ही थे, परन्तु ये न जाने कैसे जादू भरे थे कि स्वप्न देखने वाले को दो महीनों में शायद पहली बार ठीक से नींद आयी। स्वप्न बीतने पर भी उसकी अनुभूति यथावत रही।
एक दिन दोपहर को वन्दनीया माताजी ने सचमुच उसे अपने पास बुला लिया। इस बुलावे पर उसे तब अचरज हुआ- जब उन्होंने स्वप्न की भाषा यथावत कह सुनायी। अपनी बातों के क्रम में वह कहने लगीं- बेटा! अपने बच्चों को दिलासा देने के लिए माँ उनके पास नहीं जाएगी तो और भला कौन जाएगा? फिर बोली- प्रेम बहुत बड़ी चीज है। लेकिन उससे भी बड़ी एक और चीज है- कर्त्तव्य। जिससे हम प्यार करते हैं, जिसके प्रति हमारी गहरी श्रद्धा है, उसके आदेश को मानकर, उससे हुए वियोग की पीड़ा को सहते हुए यदि हम उसके द्वारा बताए गए कर्त्तव्य का सतत पालन करते हैं, तो यह महातप है। ऐसा महातपस्वी किसी भी पीड़ा, कष्ट, परेशानी, दुनिया के लोगों की दुनियादारी भरी बातों से किसी भी तरह विचलित नहीं होता। क्षुद्र बुद्धि के उलाहने उसे जरा भी डिगा नहीं पाते। माताजी की इन बातों में उनके महातप की व्याख्या थी।
इन बातों के क्रम में उन्होंने बताया- गुरुदेव सामान्य व्यक्ति की तरह मरे नहीं हैं। उन्हें अपने विशेष काम के लिए शरीर छोड़कर जाना पड़ा है। वह अभी भी परमवीर महानायक की भाँति अपने मोर्चे पर कुशलता से डटे हैं। विनाशकारी आसुरी शक्तियों को वह कड़ी टक्कर दे रहे हैं। हम सबको पवित्र जीवन जीते हुए, उनके प्रति परिपूर्ण श्रद्धा व समर्पण रखते हुए अपने कर्त्तव्य को निभाना है। यही हम लोगों की तपस्या है। उनकी इन बातों को सुनते हुए, सुनने वाले की आँखों के सामने वह दृश्य प्रत्यक्ष हो गया- जब वन्दनीया माताजी ने परम पूज्य गुरुदेव के पार्थिव शरीर को अन्तिम प्रणाम करते हुए अपने महातप का संकल्प लिया था। बड़े ही भावपूर्ण क्षण थे ये। माता जी के कमरे के बगल वाले हॉल में गुरुदेव के पार्थिव शरीर को उठाने की तैयारी हो रही थी। एक पल पहले बिलख रही माताजी के मुखमण्डल पर यकायक दृढ़ता की अनोखी दीप्ति छा गयी। वह धीमे कदमों से उठीं। उन्होंने गुरुदेव के माथे पर तिलक लगाया और चरणों में प्रणाम करते हुए धीमे किन्तु दृढ़ शब्दों में कहा- “हे प्रभु! मैं अपनी अन्तिम साँस तक सभी कुछ सहकर आपके काम को करती रहूँगी। आपके आदेश का पालन करूंगी।”
माताजी की बातों में आज भी वही दृढ़ता थी। उनकी वाणी ने सुनने वालों को सचेत किया। वह अपनी भावनाओं से उबरा। माताजी उसे समझा रही थीं- भक्ति कोरी भावुकता नहीं है। यह रोते-बिलखते रहकर अकर्मण्य बनकर पड़े रहने का नाम नहीं है। भक्ति अपने भगवान् के आदेश पर तिल-तिल गलते हुए, क्षण-क्षण जलते हुए, सब कुछ सहते हुए मर मिटने का नाम है। ऐसी भक्ति सर्वसमर्थ भगवान् को भी विवश और विकल बना देती है। इस भक्ति से बड़ा और कोई महातप नहीं। इससे अपरिमित एवं अपार शक्ति स्फुरित होती है। भक्तिमयी माँ अपनी सन्तान के समक्ष स्वयं के आदर्श को प्रस्तुत कर रही थी। सर्वेश्वरी का यह कथन उन्हीं के अनुरूप था। इससे महाशक्ति की महिमा प्रकट हो रही थी।
वानप्रस्थ ग्रहण करने के बाद महाराजा दिलीप पत्नी...
शान्तिकुञ्ज, ब्रह्मवर्चस व गायत्री तपोभूमि के कार्यकर्त्ता एवं गायत्री परिवार के परिजन तो पहले से ही अपनी माँ की महिमामयी शक्ति से सुपरिचित थे। किन्तु आशंकाएँ औरों को थीं। अनेकों बाहरी लोग शंकाओं-कुशंकाओं से घिरे थे। वे सोचते थे कि अब मिशन का संचालन कैसे और किस तरह से होगा? ऐसी बातें लोगों के टूटे-दरके मन से रिस-रिस कर हवाओं के साथ घुलकर वन्दनीया माताजी के पास भी आतीं। पर इन सबका उन पर कभी कोई असर नहीं हुआ। वह तो ब्रह्मदीप यज्ञ समाप्त होते ही अपने आराध्य के चरणों में भावभरी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने की तैयारियों में जुट गयीं थीं। इसे उन्होंने व्यापक समारोह का स्वरूप देने का निश्चय किया था। ताकि उनके साथ, उनकी सभी सन्तानें अपने प्रभु को अपनी भाव श्रद्धा समर्पित कर सकें।
ब्रह्मदीप यज्ञों का निश्चय परम पूज्य गुरुदेव ने स्वयं 28 अप्रैल 1990 को स्वयं किया था। अपने एकान्तवास के बावजूद उन्होंने इस दिन कुछ निकटवर्ती कार्यकर्त्ताओं की गोष्ठी बुलाकर यह तय किया था कि 7-8 जून को ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर भोपाल, कोरबा, मुजफ्फरपुर, अहमदाबाद, लखनऊ एवं जयपुर में ये यज्ञ आयोजित किए जाएँ। अनुशासित परिजन अपने सद्गुरु के आदेश को शिरोधार्य करके 2 जून, 1990 को उनके महाप्रयाण का समाचार मिलने के बावजूद सौंपे गए कार्य को पूरा करने के लिए जुटे रहे। सभी की भावनाएँ कसमसायी, छटपटायी, तड़फड़ाई तो बहुत, परन्तु गुरुदेव का आदेश सर्वोपरि था। किसी ने भी इसका पालन करने में कोई कोताही नहीं बरती। हालाँकि हर एक के मन में यह बात थी कि वह शान्तिकुञ्ज जाकर अपने प्रभु को श्रद्धाञ्जलि अर्पित करे। उन्हें अपने भाव-सुमन चढ़ाए।
अपने बच्चों के इन मनोभावों से माताजी परिचित थी। उन्हें अपनी सन्तानों की वेदना का ज्ञान था। इसी वजह से उन्होंने संकल्प श्रद्धाञ्जलि समारोह के आयोजन की घोषणा की थी। इसकी तैयारियाँ बहुत चुनौती भरी थीं। जून के पन्द्रह दिन और जुलाई, अगस्त एवं सितम्बर महीने ही थे। इसमें भी ज्यादातर समय वर्षाकाल का था। उतनी ही अवधि में कुम्भ जैसे आयोजन की पूरी तैयारी करनी थी। कुम्भ के लिए प्रशासन अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ एक साल तैयारी करता है। लेकिन यहाँ सब कुछ बिना किसी सरकारी सहायता के किया जाना था। अपनी माँ के एक इशारे पर उसकी सन्तानें क्या कुछ कर सकती हैं, इसका एक अनूठा उदाहरण पूरे उत्तर भारत की जनता को सन् 1990 में देखने को मिला। शिक्षक, किसान, न्यायाधीश, चिकित्सक, इंजीनियर, आई.ए.एस. अधिकारी सभी इस मिशन से जुड़े हैं। इनमें से 20 हजार से अधिक स्वयंसेवक के रूप में 15 सितम्बर से ही आ गए थे। आते ही ये बिना किसी पद या शिक्षा, जाति या वर्ण के पूर्वाग्रह के सब के सब एक जुट होकर कार्यक्रम में लग गए।
ई.पी. टेण्ट, शामियाने, जल-बिजली आदि की व्यवस्था, ऊबड़-खाबड़ स्थानों की सफाई, विशाल भोजन भट्ठियों का निर्माण आदि सभी काम इन्हीं सबने मिल-जुल कर पूरे किए। इन सारे कामों का दायरा काफी व्यापक परिक्षेत्र में फैला हुआ था। पूरे हरिद्वार नगर की पन्द्रह मील की लम्बाई व आठ मील चौड़ाई में कनखल से मोतीचूर तक चौबीस नगरों को बसाने की व्यवस्था की गयी। जब यह सभी काम चल रहा था तो वन्दनीया माताजी स्वयं पूरे क्षेत्र में गयी। एक-एक जगह पर वह मोटर-वाहन से उतरीं, काम कर रहे लोगों का उत्साहवर्धन किया। काम करने वाले कार्यकर्त्ता भी उन्हें अपने समीप पाकर आनन्दित हो गए। माताजी का इस तरह इन सभी जगहों पर जाना एक दिन बड़े ही अचानक ढंग से हुआ था। इसके बारे में पूछने पर पहले तो वह बोलीं- कि बच्चे काम कर रहे हैं, मैं चली जाऊँगी तो उनका उत्साहवर्धन होगा।
जब उनसे पूछा गया कि क्या सिर्फ बात इतनी सी है, तो वह कुछ सोचते हुए कहने लगीं, देखो जिन जगहों पर बच्चे काम कर रहे हैं, वहाँ कई भयानक विषधर हैं, जो अगर काट लें तो आदमी पानी भी न माँग सके। मैं उन्हें वहाँ से हटाने गयी थी। मैंने इन विषैले जीवों से कह दिया है कि तुम लोग यहाँ से चले जाओ, अभी यहाँ पर काम हो रहा है। बहुत सारे लोग यहाँ आएँगे। ऐसे में तुम सबका यहाँ रहना ठीक नहीं है। उन सबको यह बात समझ में आ गयी है, अब वे चले जाएँगे। पूछने वाले को शायद माताजी की बातें ठीक से समझ में नहीं आयीं, वह बोला- माताजी इन विषैले जीवों को मारा भी तो जा सकता है। यह बात सुनते ही उनका स्वर काफी तीखा हो गया- क्यों मारा जा सकता है? क्या बिगाड़ा है तुम लोगों का उन्होंने? एक तो तुम लोग उनकी रहने की जगहों को तहस-नहस किए दे रहे हो, ऊपर से उन्हें मारोगे भी। क्या वे सब मेरी सन्तान नहीं हैं? माताजी की इन बातों ने सुनने वाले को झकझोर दिया। वह यह सोचने पर विवश हो गया कि माताजी मनुष्यों की ही नहीं, प्राणि-वनस्पतियों, पशु-पक्षियों सभी की माँ हैं। तभी तो उनकी बातों को वे सब समझते हैं और वह सभी की बातों को समझती हैं।
ऐसी ममतामयी माँ के ममत्व से भीगे हुए सहस्र-सहस्र जन श्रद्धाञ्जलि समारोह की तैयारियों में जुटे थे। इन तैयारियों के प्रत्येक चरण से उनकी महिमा प्रकट हो रही थी। हालाँकि कुछ शंकालु जन अभी भी यही सोच रहे थे कि जितने व्यापक स्तर पर तैयारियाँ की गयी हैं-क्या उतने लोग आएँगे भी। इन लोगों का सोचना कई अर्थों में सही भी था। क्योंकि उस समय अयोध्या प्रकरण व मण्डल आयोग की प्रतिक्रिया स्वरूप देशव्यापी आन्दोलन भड़का हुआ था। बसें, ट्रेनें, यहाँ तक कि फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ तक जलाई जा रहीं थी। सड़कों एवं प्लेटफार्मों पर एक अजीब सूनापन छाया हुआ था। परन्तु महाशक्ति की महिमा ने ऐसे में भी अपना कमाल दिखाया। श्रद्धाञ्जलि समारोह में जितने व्यक्तियों को आना था, सभी आए। इन लाखों-लाख लोगों को आने में मार्ग में न कोई उपद्रव आड़े आया और न कोई जन-धन की हानि हुई। जिन लोगों ने एक अक्टूबर से 4 अक्टूबर तक सभी कार्यक्रमों में नियमित रूप से भाग लिया, उनकी संख्या 5 लाख से ज्यादा रही। एक लाख से ज्यादा वे लोग थे, जो रोज आते-जाते रहे। सारा हरिद्वार पीले वस्त्र पहने, पीत दुपट्टधारी स्त्री-पुरुषों से पट गया।
नगर व प्रान्त के पत्रकारगण, दूरदर्शन व आकाशवाणी के प्रतिनिधि सभी समारोह की व्यवस्था को देखकर चकित थे। उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम सत्यनारायण रेड्डी भी इस कार्यक्रम में आए थे। उन्होंने सब कुछ देखकर अपनी मुखर अभिव्यक्ति दी- कि यह सभी कुछ दैवी एवं दिव्य है। शरद् पूर्णिमा की सायं यह दिव्यता और अधिक दीप्त हो उठी। शाम 6.30 बजे दीपयज्ञ आरम्भ होने से पूर्व पूरा विशाल सभागार खचाखच भर गया। विराट् सवालक्ष दीपों का महायज्ञ प्रारम्भ हुआ। ‘यन्मण्डलम् दीप्तिकरं विशालम्’ की धुन के बीच सब दीप जल उठे। यह दृश्य देखते ही बनता था। शरद् पूर्णिमा की रात थी, परन्तु पूर्णिमा का चाँद भी छोटे-छोटे दीपों की समन्वित आभा-ऊर्जा के सामने मद्धम लग रहा था। महाशक्ति की महिमा इन अगणित दीपों की कोटि-कोटि ज्योति किरणों से प्रकट हो रही थी।
4 अक्टूबर 1990 को जब विदाई की बेला आयी, तब सभी के हृदय भरे और भीगे थे। उनकी महाशक्ति के अनेकों चमत्कार इन दिनों देखने को मिले। इनमें से एक चमत्कार यह भी था कि लाखों लोगों के नित्य भोजन करने के बावजूद शान्तिकुञ्ज के अन्न भण्डार यथावत परिपूर्ण रहे। कहीं कोई कमी नहीं आयी। पता नहीं अन्नपूर्णा ने कैसे और किस तरह यह चमत्कार कर दिया था। अपनी माँ से विदा लेते हुए सभी परिजन अनुभव कर रहे थे कि माताजी उनकी अपनी माँ होने के साथ समूचे राष्ट्र की माता है। वे राष्ट्र की प्राणदायिनी शक्ति हैं।
बूँद समुद्र के अथाह जल में घुलने लगी…
मातृसत्ता में राष्ट्रीय संवेदना की सघनता की अनुभूति पहले भी सभी को समय-समय पर होती रहती थी। परन्तु श्रद्धाञ्जलि समारोह के बाद से राष्ट्र के लिए उनके प्राणों की विकलता कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी। वे बार-बार सोचती रहतीं कि ऐसा कौन सा अनुष्ठान सम्पन्न किया जाय, जिससे राष्ट्र के प्राणों को नव स्फूर्ति प्राप्त हो, देश की संस्कृति संवेदना अपना व्यापक विस्तार कर सके। अपने निकटस्थ जनों से चर्चा में भी उन दिनों उनका यही चिन्तन मुखरित होता था। मिशन के सारे काम-काज के ताने-बाने को सुलझाती-बुनती हुई माताजी इसी राष्ट्र चिन्ता में लीन रहती थी। इन चिन्तन और चर्चा में काफी समय बीता। शान्तिकुञ्ज के क्रिया-कलापों में कई नयी कड़ियाँ भी इसी दौरान जुड़ीं। परम वन्दनीया माताजी की देख-रेख व उनके सूत्र-संचालन में पहले से सुचारु व्यवस्था और भी अधिक गतिशील हुई।
इसी समय उन्होंने हिमालय-यात्रा की योजना बनायी। यह योजना प्रायः यकायक ही बनी। माताजी हिमालय जाएँगी, यह सोचकर निकटस्थ जनों को थोड़ा भय भी हुआ। वे सोच रहे थे कि कहीं ऐसा तो नहीं कि माताजी हिमालय में ही रहने का मन बना लें। कइयों को यह भी शंका हुई कि कहीं वह हिमालय के हिमशिखरों के बीच महासमाधि तो नहीं लेना चाहतीं। क्योंकि वैसे भी गुरुदेव के अभाव में उनका मन संसार में किसी भी तरह नहीं टिक पा रहा था। अन्तर्यामी माँ से अपने बच्चों के मन की यह ऊहा-पोह छुपी न रही। उन्होंने हँसते हुए कहा- यह ठीक है कि गुरुजी के बिना यह देह रखना मेरे लिए काफी कठिन है। पर मुझे अपने बच्चे भी कम प्यारे नहीं हैं। मैं तुम लोगों के लिए अभी कुछ दिनों रहूँगी और यहीं शान्तिकुञ्ज में ही रहूँगी। जहाँ तक हिमालय जाने की बात है, तो वहाँ जाने का कारण कुछ और है। ये बातें तुम सबको मेरे वहाँ से लौटने पर पता चलेंगी।
सबको इस तरह अपनी वापसी के बारे में निश्चिन्त कर वह हिमालय में गंगोत्री के लिए चल पड़ी। उनके साथ शैलदीदी, डॉ. प्रणव पण्ड्या, चिन्मय एवं कुछ अन्य पारिवारिक सदस्य थे। दो-चार दूसरे सौभाग्यशालीजनों को भी उनके साथ इस यात्रा में जाने का सुयोग मिला। हिमशिखरों के मध्य पहुँचकर माताजी के भावों में एक अनोखा परिवर्तन झलकने लगा। उन्हें देखने वालों को ऐसा लगा जैसे कि कोई कन्या अपने पीहर आयी है। जैसे कि वह अपने आप नहीं पिता हिमवान् के बुलावे पर यहाँ आयी हैं। उनके दीप्त मुख मण्डल पर आनन्द की रेखाएँ सघन हो गयीं। कई स्थानों पर वह रुकीं और ध्यानस्थ हो गयीं। गंगोत्री के पास भगीरथ शिला पर तो वह काफी देर ध्यानमग्न बैठी रहीं। यहाँ पर जब वह ध्यान से उठीं, तो उनके चेहरे पर कुछ विशेष पाने की प्रसन्नता की प्रदीप्ति थी। यहीं से उन्होंने अपनी यात्रा को विराम दिया और शान्तिकुञ्ज वापस लौट आयीं।
वापस लौटने पर उन्होंने एक भव्य शपथ समारोह में राष्ट्र व्यापी अश्वमेध महायज्ञों की घोषणा की। यह घोषणा करते समय उन्होंने बताया कि हिमालय ने उन्हें यही सन्देश दिया है। हिमालय में निवास करने वाली दिव्य शक्तियों का यही आग्रह है कि राष्ट्र को समर्थ एवं सशक्त बनाने वाले अश्वमेध महायज्ञ का महानुष्ठान किया जाय। इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि इन महायज्ञों में वह स्वयं जाएँगी। उनके आने की बात सुनकर परिजनों का उत्साह आकाश चूमने लगा। सभी अपने क्षेत्र में इस महायज्ञ को आयोजित करने के लिए उतावले थे। परन्तु यह सौभाग्य कुछ विशेष स्थानों को ही मिला। माताजी ने अपनी देख-रेख में इस महायज्ञ का कर्मकाण्ड तैयार करवाया। परिजनों को इसकी विस्तृत जानकारी देने के लिए अखण्ड ज्योति के सम्पादक ने एवं श्री वीरेश्वर उपाध्याय ने मिलकर अखण्ड ज्योति का एक सम्पूर्ण विशेषाँक (नवम्बर 1992) तैयार किया। क्षेत्रों में इन आयोजनों की व्यापक विधि-व्यवस्था की गयी। ये सभी कार्य वन्दनीया माताजी के निर्देशन में पूरे हुए।
इसी के साथ परम वन्दनीया माताजी ने जयपुर के प्रथम अश्वमेध के लिए अपनी यात्रा प्रारम्भ की। उनका यह क्रम भिलाई (म.प्र.), गुना (म.प्र.) भुवनेश्वर (उड़ीसा), लखनऊ (उ.प्र.) बड़ौदा (गुजरात), भोपाल (म.प्र.), नागपुर (महाराष्ट्र), ब्रह्मपुर (उड़ीसा), कोरबा (म.प्र.), पटना (बिहार), कुरुक्षेत्र (हरियाणा), एवं चित्रकूट आदि स्थानों में होने वाले अश्वमेध महायज्ञों में जारी रहा। इन सभी स्थानों की यात्रा के लिए विभिन्न राज्य सरकारों ने उनके लिए सरकारी वायुयान की व्यवस्था की। उन्हें राजकीय अतिथि का सम्मान दिया। दिग्विजय सिंह, लालू प्रसाद यादव, बीजू पटनायक, चिमन भाई पटेल आदि कई राज्यों के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों ने उनके वात्सल्य से स्वयं को अनुग्रहीत अनुभव किया। मध्य प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल मो. शफी कुरैशी, उ.प्र. के तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा एवं वर्तमान प्रधानमंत्री एवं उस समय प्रतिपक्ष के नेता के रूप में अटल बिहारी बाजपेई आदि अनेकों विशिष्ट व्यक्तियों ने इन अश्वमेध कार्यक्रमों में उपस्थित होकर अनुभव किया कि माताजी का हृदय समूचे राष्ट्र के प्रति वात्सल्य से भरा हुआ है।
माताजी की अश्वमेध यात्रा की अनुभूतियाँ एवं यादें इतनी अधिक हैं, कि उन पर अलग से कई खण्डों में एक समूची ग्रन्थावली प्रकाशित की जा सकती है। वह जहाँ भी गयी, वहाँ व्यस्त कार्यक्रमों एवं थोड़े समय के बावजूद सभी से मिलीं। अति विशिष्ट जनों से लेकर अति साधारण जन तक सभी उनसे मिलकर धन्य हुए। इस अतिव्यस्तता में भी वे अपने भावुक बच्चों को नहीं भूलीं। उनके आग्रह-अनुरोध पर वे उनके घरों में गयीं। समूचे देश में ऐसे कई घर हैं, जो उनकी चरण धूलि से तीर्थ स्थान बन गए। जहाँ पर वह बैठीं, उन स्थानों को कई लोगों ने अपनी उपासना स्थली बना लिया। ऐसे व्यक्तियों ने बाद के दिनों में अनेकों दिव्य अनुभूतियाँ पायीं। उनकी अन्तर्चेतना में एक अलौकिक आलोक का अवतरण हुआ।
वह जहाँ भी गयी, वहाँ उन्होंने अनेकों अनुदान बिखेरे। कई स्थानों पर स्वयं उन्हें भी अनेकों यादों ने घेर लिया। ऐसा लगा जैसे कि वह पहले किसी अन्य रूप में यहाँ आयी हैं। चित्रकूट में सभी ने इस सत्य को प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखा। चित्रकूट अश्वमेध के समय वह शारीरिक रूप से काफी कुछ अशक्त थीं। इस शारीरिक अशक्तता के बावजूद वह उन सभी स्थानों पर गयी, जहाँ प्रभु श्रीराम, माता सीता एवं भाई लक्ष्मण के साथ गए थे। जहाँ उन्होंने अनेकों ऋषि-मुनियों का संग लाभ लिया था। माताजी इन सभी स्थानों पर आग्रहपूर्वक गयीं। कामदगिरि, स्फटिक शिला, गुप्त गोदावरी आदि सभी स्थानों की यात्रा उन्होंने बड़े भाव भरे मन से की। इन जगहों को उन्होंने कुछ इस तरह से देखा, जैसे वह यहीं कहीं अपने राम को देख रही हों। स्फटिक शिला पर वह थोड़ी देर बैठीं भी। यहाँ बैठने पर बोलीं, देखो तो सही समय बदलने के साथ कितना कुछ बदल गया है। त्रेता युग में कुछ और था, अब कुछ और है।
सुनने वाले कुछ समझे, कुछ नहीं समझे। ज्यादा पूछने पर वह हल्के से मुस्करा भर दीं। अपने बच्चों को खुशियाँ देते, राष्ट्र के प्राणों में नवस्फूर्ति का संचार करते हुए उनकी यह यात्रा चल रही थी। उन्हें इस तरह यात्रा करते हुए देख कर विदेशों में बसे परिजनों के मन में यह लालसा सघन हो गयी कि उनकी माँ उनके पास भी आ जाएँ। उनके घर भी विश्वजननी की चरण धूलि से तीर्थ भूमि बन सके। अपने विदेशी बच्चों के इस आग्रह-अनुरोध को वह ठुकरा न सकीं। सभी के प्रबल प्रेम के कारण विश्वमाता ने विश्वयात्रा के लिए हामी भर दी। उनकी इस हाँ से अनगिनत हृदय पुलकित-प्रफुल्लित हो उठे।
सुज्ञाता ने खीर दी, …
विश्वमाता विश्वभर में फैले अपने बच्चों को प्यार-दुलार देने की तैयारियाँ करने लगीं। वैसे तो अकेला विश्व क्या अनन्त-अनन्त ब्रह्मांड उनके जाने-पहचाने थे। सूक्ष्म शरीर से उन्होंने अनेकों रहस्यमय यात्राएँ की थीं। बच्चों की प्रेम भरी पुकार पर दुनिया के किसी भी कोने में पहुँचना उनका स्वभाव था। कभी स्वप्नों के माध्यम से तो कभी ध्यान की भावदशा में वह अपनी सन्तानों के हृदय को अनोखी तृप्ति दिया करती थीं। हालाँकि यह सब वह सूक्ष्म शरीर से करती थीं। स्थूल देह से उन्होंने कभी कोई विदेश यात्रा न की थी। ऐसा करने की उनकी अपनी कोई चाहत भी न थी। प्रवासी परिजनों की बहुतेरी जिद के बाद उन्होंने इस विश्वयात्रा का मन बनाया था। इस यात्रा के बारे में उन्होंने हामी भरते हुए कहा- ‘मेरा मन तो नहीं है, पर बच्चे परेशान हैं, इसलिए सोचती हूँ एक बार जाकर उनसे मिल ही हूँ। उनका मन रह जाएगा।’
उनके इस तरह हाँ करने के बाद पासपोर्ट-वीज़ा आदि की विभिन्न सरकारी औपचारिकताएँ पूरी हुई। विदेशों में कार्यक्रम की तिथियाँ निश्चित हुई। इस क्रम में पहला अश्वमेध महायज्ञ इंग्लैण्ड के लेस्टर नामक स्थान में 8 से 11 जुलाई 1993 में आयोजित किया गया। 3 से 6 मई 1993 को भुवनेश्वर अश्वमेध का कार्यक्रम था। उसके बाद एक-डेढ़ महीने माताजी शान्तिकुञ्ज में रहीं। बाद में निर्धारित तिथि पर उन्होंने इंग्लैण्ड के लिए प्रस्थान किया। इंग्लैण्ड के परिजनों के लिए उनका पहुँचना स्वप्नों के सच होने जैसा था। उनकी उपासना की अनुभूति प्रत्यक्ष हो रही थी। बड़ी संख्या में वे सब उन्हें लेने के लिए हवाई अड्डे पहुँचे। वन्दनीया माताजी के जयघोष और परिजनों की श्रद्धा से भीगे नेत्रों ने हवाई अड्डे के कर्मचारियों को भी श्रद्धा से भिगो दिया।
अनेकों साधु-सन्त भारत से इंग्लैण्ड गए थे। उनका भरपूर सम्मान भी हुआ, उन पर फूल-मालाओं की बौछार और जय-जयकार की गुँजार भी बहुत देखी गयी थी। पर किसी के लिए प्यार के सघन-घन इतनी तीव्रता से नहीं उमड़े थे। किसी के लिए इतनी आँखें नहीं भीगी थी। हवाई अड्डे के कर्मचारियों ने इस फर्क को बड़ा साफ-साफ अनुभव किया। उन्होंने परिजनों से जिज्ञासा की- ये कौन हैं? उन्हें उत्तर मिला- हम सबकी माँ आयी हैं। पता नहीं इस उत्तर से उनमें से किसको क्या समझ में आया? लेकिन उनमें से अनेकों ने ‘शी इज़ डिवाइन मदर’ कहते हुए माताजी के चरण स्पर्श किए। माता जी ने भी उन्हें जी भर कर आशीष दिए। उनके लिए तो सभी उनके बच्चे थे। जो भी माँ! माँ!! कहते हुए उनके पास दौड़ा चला आए, वही उनका सबसे ज्यादा लाड़ला था।
लेस्टर का कार्यक्रम निर्धारित समय पर विशिष्ट विधि विधान से शुरू हुआ। श्री कीथवाज़, लार्ड मेयर एवं श्री जान मूडी आदि इस कार्यक्रम के विशिष्ट अभ्यागत बने। वहाँ की सरकार व समाज में उच्च प्रतिष्ठ प्राप्त ये विशिष्ट जन माताजी की ममता का स्पर्श पाकर अनुग्रहीत हुए। इंग्लैण्ड में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त श्री लक्ष्मीमल सिंघवी भी सपत्नीक इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। अश्वमेध महायज्ञ के लिए निश्चित किए गए विधि-विधान के साथ ही माताजी ने वहाँ के लोगों को दीक्षा दीं। यह दीक्षा कार्यक्रम कई अर्थों में अनूठा था। इसमें भागीदार होने वालों के मन-प्राण अनेकों विलक्षण अनुभूतियों से भर गए। इसमें से अनेकों ने मन्त्राक्षरों को सुनहले अक्षरों में अपने भीतर अवतरित होते हुए देखा। कुछ ने गायत्री माता की एक झलक पायी। कइयों के सालों पुराने असाध्य रोग दीक्षा लेते ही जड़ से चले गए। उन्होंने इस सत्य को अनुभव किया कि विश्वमाता ने उनके समस्त पापों-तापों को हर लिया है।
शैलदीदी एवं डॉ. प्रणव पण्ड्या इस कार्यक्रम में माताजी के साथ ही थे। उन्होंने जब उनसे दीक्षा लेने वाले परिजनों की इन विलक्षण अनुभूतियों की चर्चा की तो पहले वे कुछ देर मौन रहीं। फिर कहने लगीं- ये बच्चे हमसे दूर रहते हैं। जल्दी-जल्दी भागकर ये शान्तिकुञ्ज भी नहीं पहुँच सकते। इसलिए इनका विशेष ध्यान तो रखना ही पड़ेगा। अब जब मैं खुद चलकर इनके पास आयी हूँ, तो इन्हें खाली हाथ थोड़े ही रहने दूँगी। इन सबको कष्ट-कठिनाइयों से छुटकारा पाते, हँसते-खिलखिलाते देखकर मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कि मेरी यात्रा सफल हो गयी।
इंग्लैण्ड की इन अनोखी अनुभूतियों को सुनकर टोरण्टो (कनाडा) के परिजन भी उत्साहित हो उठे। उन्होंने पहले से ही 23 से 25 जुलाई 1993 की तिथियाँ अपने यहाँ के लिए निश्चित कर रखी थी। वन्दनीया माताजी शैल दीदी एवं डॉ. साहब के साथ ठीक समय पर पहुँच गयीं। इन सबके पहुँचने के कुछ दिनों पहले से यहाँ भारी वर्षा हो रही थी। आयोजकों के साथ सभी कार्यकर्त्ता घबराए हुए थे कि सब कुछ कैसे और किस तरह से सम्पन्न और सफल होगा। अपनी घबराहट में उन्होंने शान्तिकुञ्ज कई फोन भी किए थे। फोन पर हुई बातचीत में माताजी ने उन्हें आश्वस्त किया था, तुम लोग परेशान न हो, मैं आ रही हूँ, मेरे वहाँ आते ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। सचमुच ऐसा ही हुआ। लगातार कई दिनों से हो रही भारी वर्षा थम गयी। इस कार्यक्रम में आण्टेरियो कनाडा की तत्कालीन प्रधानमंत्री कैम्पबेल और उनके मंत्री मण्डलीय सहयोगियों ने भारी सहयोग दिया। आयोजन में सक्रिय गायत्री परिजनों के साथ अन्य संगठनों के लोगों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। इन सभी भागीदारों ने माताजी की तपशक्ति के अनेकों चमत्कारों की अपने जीवन में प्रत्यक्ष अनुभूति पायी।
कनाडा से वापसी के बाद वन्दनीया माताजी ने 19 से 22 अगस्त 1993 को अमेरिका के लॉसएँजेल्स शहर में होने वाले अश्वमेध महायज्ञ के लिए प्रस्थान किया। आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं शैल दीदी के साथ हुई उनकी यह यात्रा पिछली विदेश यात्राओं की तुलना में और भी ज्यादा उत्साहवर्धक रही। पश्चिमी तटीय अमेरिका के परिजन माताजी को अपने बीच में देखने के लिए अति उत्साहित थे। उन्होंने जी-जान से जुटकर 1008 कुण्डीय इस महायज्ञ का आयोजन किया था। अमेरिका के किसी शहर में उन दिनों इतना बृहत् यज्ञायोजन करना सरल नहीं था। श्री कालीचरण शर्मा के नेतृत्व में गए दल ने यों तो सारा पुरुषार्थ किया, पर सभी के हृदय अपनी माँ के प्रति इतनी गहन श्रद्धा से भरे थे कि इस आयोजन के कठिन काम सभी के लिए सरल होते चले गए। माताजी के पहुँचते ही वहाँ के सम्पूर्ण वातावरण में दिव्यता छा गयी। सभी कार्यक्रम उनके दैवी संरक्षण में भली प्रकार सम्पन्न होते गए।
यज्ञस्थल में दीक्षा के लिए लगभग 30,000 लोग उपस्थित हुए। सभी ने सुन रखा था कि दीक्षा देते समय माताजी अपनी सन्तानों की अनेकों कष्ट-कठिनाइयाँ हर लेती हैं। साथ ही उन्हें अनेकों तरह की आध्यात्मिक अनुभूतियाँ प्रदान करती हैं। उस दिन यह सब सुनी हुई बातें प्रत्यक्ष हुई। अनेकों लोगों ने अनेकों तरह से माताजी के अनुदान-वरदान पाए। माताजी के मुख से उच्चरित गायत्री मंत्र ने सचमुच ही उनके प्राणों को त्राण देने का कार्य किया। अमेरिका के अनेकों मूलनिवासी भी इस कार्यक्रम में भागीदार हुए। हिन्दी भाषा से अनजान होते हुए भी उन्होंने अपने हृदय में माताजी के भाव भरे उद्बोधन को आत्मसात किया। इन सभी कार्यक्रमों में अनेकों अनुदान बरसाने वाली माँ सतत अपनी सन्तानों की पीड़ा का विषपान करती जा रही थीं।
प्राचीन परंपराओं की तुलना में...
सन्तानों की पीड़ा के लगातार विषपान से वन्दनीया माताजी का स्वास्थ्य जर्जर होता गया। उनकी देह निरन्तर व्याधिग्रस्त होती गयी। यहाँ तक कि 16 से 20 अप्रैल 1994 को चित्रकूट में होने वाले अश्वमेध आयोजन में वह जाने की स्थिति में नहीं थीं। तब तक स्वास्थ्य काफी बिगड़ चुका था। काफी ऊहापोह था कि जाएँ अथवा न जाएँ। उनकी तबीयत को देखते हुए निकटस्थ जन भी यही सुझा रहे थे कि माताजी ऐसे में आपको पूरी तरह से विश्राम करना चाहिए। काफी देर वह सबकी बातें सुनती रहीं, फिर बोलीं- तबियत तो खैर जैसी है, वैसी है। पर इस बार मैं जाऊँगी। इसी बहाने फिर से चित्रकूट देखना हो जाएगा। इसके बाद कौन जाने, मेरा कहीं जाना हो या न हो। उनकी इन बातों के बाद किसी की कुछ ज्यादा कहने की हिम्मत नहीं पड़ी। यात्रा की तैयारियाँ होने लगीं। निर्धारित समय पर उन्होंने जॉली ग्राँट हवाई अड्डे से म.प्र. सरकार द्वारा भेजे गए विमान से प्रस्थान किया।
चित्रकूट पहुँचकर वह जैसे देह के सभी कष्टों से अनजान हो गयीं। कुछ यूँ जैसे कि उनकी देह उनकी न होकर किसी और की हो। इस यात्रा में उनके साथ शैलदीदी, आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या, इनके सुपुत्र चिन्मय और माताजी की मानस पुत्री दुर्गा दीदी थीं। इन सभी को वन्दनीया माताजी की सभी शारीरिक पीड़ाओं का ज्ञान था। इन सबमें से किसी को उस समय अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो पा रहा था कि कोई इस तरह अपनी दैहिक पीड़ाओं से मुँह मोड़ सकता है। स्थितप्रज्ञ की भावदशा की बातें गीता में बहुतों ने पढ़ी-सुनी होंगी, पर उस समय माताजी को देखकर सभी को इस सत्य की अनुभूति हो रही थी। इसी देहातीत दशा में उन्होंने चित्रकूट अश्वमेध के सभी कार्यक्रम पूरे किए। हजारों श्रद्धालुओं को दीक्षा देकर उनकी मुक्ति का मार्ग खोला। असंख्यों पर अपने आशीषों की वर्षा की।
उन्हें इस तरह कृपा वर्षा करते हुए देखकर लग रहा था कि समस्त प्राणियों के भवरोग का हरण करने वाली कृपालु जननी से स्वयं ही देह को रोग मुक्त कर लिया है। सबके आग्रह करने पर उन्होंने उत्साहपूर्वक तीर्थभूमि चित्रकूट के विभिन्न स्थलों पर जाने का कार्यक्रम बनाया। कामदगिरि, स्फटिकशिला आदि जगहों पर वह कुछ पलों के लिए भावसमाधि में डूबी रहीं। गुप्त गोदावरी के बाहर जब उनकी कार रुकी, तो वहीं कहीं पास से दस-बारह साल की एक छोटी सी लड़की भागी-भागी आयी। उसके हाथों में थोड़े से जंगली फल और कुछ खुले हुए पैसे थे। जब माताजी कार से उतरीं तो ठीक उसके सामने खड़ी हो गयी। साथ के लोग उसे हटा पाते, इससे पहले वह कहने लगी, आप शान्तिकुञ्ज वाली माताजी हो न। मैंने काफी दिनों से सुन रखा है कि- शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से माताजी आने वाली हैं। बालिका की इन भोली बातों के उत्तर में माताजी बोलीं- हाँ बेटी! मैं वही हूँ।
माताजी के इस कथन पर वह बालिका पुलकित हो उठी और कहने लगी- आपको मालूम है मैंने दो दिनों पहले एक सपना देखा था कि सीता मैया फिर से चित्रकूट आयी हैं। जगने पर मैंने सोचा कि यदि शान्तिकुञ्ज वाली माताजी हमारी सीता मैया हैं, तो वे जरूर यहाँ गुप्त गोदावरी आएँगी। और देखो आप आ गयीं। बालिका की इस बाल श्रद्धा पर माताजी भाव विगलित हो गयीं। उस बालिका की यह प्यार भरी भेंट स्वीकार करने के साथ उन्होंने उसके सिर पर अपना हाथ फेरा और वह चली गयी। माताजी अपने परिकर के साथ गुप्त गोदावरी की गुफा में गयीं। इसी के साथ उनका यह भ्रमण समाप्त हुआ। भव्य दीपयज्ञ के बाद में आयोजन स्थल से विदा लेकर वह शान्तिकुञ्ज आ गयीं।
शान्तिकुञ्ज आने पर उनकी बीमारी फिर से यथावत हो गयी। निकटस्थजन डॉ. प्रणव पण्ड्या के निर्देशन में उनकी सेवा में जुट गए। विशेषज्ञ चिकित्सकों की भी सहायता ली गयी। सभी के आग्रह-अनुरोध पर उन्होंने चिकित्सालय में भी भरती होना स्वीकार किया। इस क्रम में पहले वह कुछ दिन आगरा में रहीं, बाद में कुछ दिनों तक दिल्ली में भरती रहीं। चिकित्सक जो कर सकते थे, कर रहे थे। चिकित्सा विज्ञान में जो आधुनिकतम तकनीकें थीं उन्हें प्रयोग में लाया जा रहा था। पर उनकी बीमारी भी अनोखी थी। एक के बाद दूसरी नयी बीमारी की परत खुल जाती थी। वह सभी को प्रयत्न करते, परेशान होते हुए देख रही थीं। शैलदीदी के साथ उनके सुपुत्र मृत्युञ्जय शर्मा भी प्राण-प्रण से अपनी जन्मदात्री माँ की सेवा में जुटे थे। सभी के सारे प्रयत्न निष्फल जा रहे थे। काफी दिन बीत चुकने पर उन्होंने एक दिन कहा- देखा तुम लोग बहुत परेशान हो चुके, अब मुझे शान्तिकुञ्ज ले चलो। जो सेवा करना है, वहीं चलकर करते रहना।
उन्हें देखकर सभी यह अनुभव कर रहे थे कि महामाया अपनी योगमाया समेट रही हैं। उनका आदेश मानकर सभी लोग उन्हें लेकर शान्तिकुञ्ज आ गए। वह प्रसन्न भाव से असह्य कष्ट सहे जा रही थीं। ‘यस्मिन स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते’ का गीता वाक्य उन दिनों उनके जीवन में पूरी तरह से चरितार्थ हो रहा था। आत्म चेतना में स्थित होने पर देह एक छिलके से ज्यादा कुछ नहीं रह जाती। इस बीच उन्हें एक-दो आप्रेशनों से भी गुजरना पड़ा था, उनके घाव अभी भरे नहीं थे। पर वह जैसे इन सब से परे थीं। इच्छामयी ने स्वयं की इच्छा से अपनी असंख्य सन्तानों का कष्ट अपने ऊपर ले लिया था। वह बच्चों की पीड़ा को अपने ऊपर लेकर प्रसन्न थीं। देह के असह्य कष्ट उनके अन्तःकरण को किसी भी तरह से छू नहीं पा रहे थे।
बीमारी के इन दिनों में सभी अपने-अपने ढंग से सेवा करने में जुटे थे। रिश्ते-नातेदारों का आवागमन जारी था। शान्तिकुञ्ज, गायत्री तपोभूमि के कार्यकर्त्ता, आदरणीय पं. लीलापत जी आदि गायत्री परिवार के परिजन आदिमाता से अपनी माँ के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कर रहे थे। ये बड़े ही विशिष्ट क्षण थे। इन क्षणों में माताजी के दौहित्र चिन्मय एवं उनकी छोटी सुपौत्री मृणालिनी को उनके विशेष सान्निध्य का मौका मिला। छोटी-मोटी सभी सेवाओं को करते हुए ये बच्चे देर रात तक उनके पास बैठे रहते थे। कभी-कभी उनसे पूछते भी- अम्मा जी, आप कब ठीक होंगी। उत्तर में वह हँस देतीं और अब क्या ठीक होना- अब तो चला-चली की बेला है। इस तरह की बातें सुनकर ये लोग उदास हो जाते, उन्हें समझ में नहीं आता कि वे क्या कहें और क्या करें? जिन्होंने अनगिनत लोगों को अपनी योगशक्ति से असाध्य और जटिल रोगों से मुक्त किया था, आज वही रोग शैय्या पर लेटी हुई थीं।
बातों के क्रम में एक रात्रि को चिन्मय ने माताजी से पूछा- अम्मा जी, आपने तो बहुत सारे लोगों के कष्टों को अपने ऊपर लिया है, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कोई आपका कष्ट अपने ऊपर ले ले। उत्तर में वह इस तरह मुस्कराने लगीं- जैसे कि किसी ने बहुत ही बचकानी बात उनसे कह दी हो। थोड़ी देर रुक कर वह धीरे से बोलीं- अपनी सन्तानों के कष्ट माँ अपने ऊपर लेती है। माता के कष्ट को भला बच्चे क्यों अपने ऊपर लेने लगे। और कोई ऐसा करना भी चाहे तो क्या मैं उसे करने दूँगी। मेरे जीवित रहते मेरी सन्तानें कष्ट उठाएँ- यह किसी भी तरह सम्भव नहीं हो सकता। असह्य एवं असीमित पीड़ा के इन क्षणों में उनकी वात्सल्यता पहले की तुलना में और भी बढ़ गयी थी। जो पास में थे उन्हें तो वह दुलार करती ही थीं। जो पास में नहीं थे, उनके बारे में भी वह पूछताछ करती रहती थीं। उनका हाल-समाचार लेती रहती थीं। वात्सल्य का वितरण करती भावमयी माँ ने अपनी इस बीमारी को एक विशिष्ट योग साधना बना लिया था। इस साधना को करते हुए उनके प्राण अपने आराध्य में महामिलन के लिए महाप्रयाण करने की तैयारी में लगे थे।
पेड़ की ऊँची डाली पर लटके नारियल…
वन्दनीया माताजी के मन में अपनी असंख्य सन्तानों के प्रति गहरी आकुलता थी। वे जानती थी कि उनके इस तरह चले जाने से उनके बच्चे बिलख उठेंगे। पर किया क्या जाय? देह छोड़ने की भी अनिवार्यता थी। परम पूज्य गुरुदेव के संकेत उन्हें बार-बार मिल रहे थे। इन संकेतों में एक ही स्वर निहित था- ‘सब लड़के अब परिपक्व हो चले हैं, उन्हें अब अपने पाँवों पर खड़े होने देना चाहिए। अब आपको स्थूल कलेवर छोड़कर यहाँ सूक्ष्म जगत् में आकर तप करना चाहिए। विश्व कल्याण के लिए यह ज्यादा अनिवार्य है।’ गुरुदेव के इन साँकेतिक स्वरों को माताजी पिछले कई महीनों से लगातार अनुभव कर रही थीं। उनका स्वयं का मन-अन्तःकरण भी गुरुदेव के लिए हमेशा विकल रहता था। पर उनकी यह निजी विकलता सदा ही उनके सहज मातृत्व से ढंक जाती थी। उनका मातृभाव अन्य सभी भावों पर छा जाता था।
इन पंक्तियों को लिखते समय यह अच्छी तरह याद आ रहा है कि श्रद्धाञ्जलि समारोह के बाद वर्ष 1991 के मई महीने में माताजी ब्रह्मवर्चस आयीं थीं। दोपहर के बाद का समय होगा। ब्रह्मवर्चस में बनी हुई यज्ञशाला के सामने छाया आ गयी थी। वहीं पर उन्होंने कुर्सी डलवाइ और वह बैठीं। यहाँ रहने वाले सभी कार्यकर्त्ता भाई-बहिन उनके इर्द-गिर्द खड़े हो गए। उन्होंने एक-एक करके सभी का हाल-चाल पूछा। फिर बातों-बातों में बोलीं मैंने तो श्रद्धाञ्जलि समारोह के बाद ही चले जाने का मन बना लिया था। सोचा था- जिन्हें अपनी हर साँस अर्पण की, उनके चले जाने के बाद मेरा एक ही कर्त्तव्य कार्य शेष बचता है कि उन्हें अपनी ओर से, तुम सबकी ओर से श्रद्धाञ्जलि दे दूँ। इसके बाद वहीं चली जाऊँ जहाँ वे स्वयं हैं। पर प्रणव नहीं माने- कहने लगे माताजी अभी तो हम लोग गुरुदेव के न रहने की पीड़ा से ही नहीं उबर पाए हैं, आप भी चली जाएँगी तो हम सबके क्या हाल होंगे। हमें भी लगा कि ये ठीक ही कह रहे हैं। इसलिए सोच लिया है कि तुम सब लोगों के लिए मैं अभी तीन-सवा तीन साल और रहूँगी।
सन्तानों की जिस चिन्ता के कारण उन्होंने इन वर्षों में अपनी देह को टिकाए रखा, वह चिन्ता उन्हें देह छोड़ने से पहले भी थी। उनके सामने कभी भी सवाल यह नहीं था कि मिशन किस तरह से चलेगा? क्योंकि यह सच्चाई वे अच्छी तरह से जानतीं थीं और इसे वह सभी को समय-समय पर बताया करती थी कि इस मिशन को चलाने वाला भगवान् है। यह भगवान् के संकल्प के अनुसार अपने आप चलता रहेगा और ठीक तरह से चलता रहेगा। वह कहा करती थीं- कि बेटा! इसकी जड़ों में गुरुजी की इतनी ज्यादा तप ऊर्जा लगी है, यह कभी भी किसी भी स्थिति में बिगड़ेगा नहीं। हाँ इसे थोड़ा सा भी बिगाड़ने की कोशिश करने वाले जरूर बिगड़ जाएँगे। वे चाहती यह थीं कि जिस प्यार की डोर में उन्होंने जीवन भर समूचे गायत्री परिवार को बाँधकर रखा, वह डोर वैसी ही मजबूत बनी रहे।
इसी कारण उन्होंने महाप्रयाण से कुछ दिनों पहले शान्तिकुञ्ज के सभी वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं को एक-एक करके बुलाया। उनकी निजी जिन्दगी की बातें पूछीं, उन्हें दिलासा दिया। और फिर यह कर्त्तव्य याद दिलाया कि देखो, तुम लोग बड़े हो, तुम्हारे छोटे भाई-बहिन कोई गलती करे तो उन्हें समझाओ, थोड़ा बहुत डाँटो भी, पर उन्हें अपने गले से लगाकर रखो। उन्हें किसी भी तरह प्यार की कमी महसूस न होने दो। किसी को यह न लगे कि हम तो अपने माँ-बाप को छोड़कर, अपने घर को छोड़कर आ गए। अब यहाँ हमारा कोई अपना नहीं।
इस तरह सबको समझाने-बुझाने के बाद उन्होंने एक बात अपने बारे में कही। वह बोली- ‘मैंने मनुष्य देह जरूर धारण की है, पर तुम लोग मुझे केवल मनुष्य न समझना। देखो गंगाजी के पानी में चाँद की परछाई देखकर छोटी-छोटी मछलियाँ आनन्द से उसके इर्द-गिर्द उछल-कूद कर खेलने लगती हैं, सोचती हैं, यह हमीं में से एक है। पर सुबह जब चाँद डूब जाता है, तो उनकी पहले जैसी दशा हो जाती है। उछल-कूद के बाद शिथिलता आ जाती है। वे सब कुछ भी नहीं समझ पातीं।’ इन शब्दों में माताजी ने सभी को संकेत में अपना स्वरूप बोध कराया। ताकि जो लोग लम्बे समय तक उनके साथ रहे, वे समझ सकें कि वह कौन हैं? सभी को इस तरह समझाकर वह मौन हो गयीं। साथ ही उन्होंने कतिपय विशिष्ट यौगिक क्रियाओं के द्वारा अपनी आत्मचेतना को देह से हटाना शुरू कर दिया। इसी के साथ क्रमिक रूप से उनका देह बोध शून्य होने लगा।
बीतते पलों के साथ वह घड़ी भी आ गयी, जिसे उन्होंने अपने प्रभु से महामिलन के लिए निश्चित किया था। भाद्रपद पूर्णिमा, 19 सितम्बर, 1994 को प्रातः सभी को उनके मुख मण्डल पर एक अनोखा भावान्तर नजर आया। जिस कक्ष में वह लेटी हुई थीं, वहाँ का वातावरण पिछले दिनों की तुलना में एकदम बदला हुआ नजर आया। दिव्य सूक्ष्म स्पन्दन वहाँ सघन हो उठे। ऐसा लगने लगा कि सभी देव शक्तियाँ उनके इर्द-गिर्द उपस्थित हो गयी हैं। बिना किसी कृत्रिम साधन के वहाँ एक दिव्य सुरभि फैल गयी। इसे सभी उपस्थित लोगों ने अनुभव किया। अपने गहन मौन में लीन माताजी प्रातः से ही ध्यानस्थ थीं। मुखमण्डल पर प्रदीप्त आभा से, कुछ को यह भी लग रहा था कि माताजी आज पहले से कहीं ज्यादा स्वस्थ हैं। एक अर्थ में यह सोचना सही भी था, क्योंकि अन्य दिनों की तुलना में वह आज पहले से ज्यादा अपने स्व में स्थित हो गयी थीं।
वातावरण में सब ओर सर्वत्र एक गहन नीरवता हिलोरे ले रही थी। सब लोग यंत्र के समान काम-काज किए जा रहे थे। किसी को कुछ सूझ-नहीं पड़ रहा था। ध्यानस्थ माताजी मूर्तिमयी प्रशान्ति के रूप में विराज रही थीं। उनके मुख मण्डल पर एक अनिर्वचनीय शान्ति और आनन्द की दीप्ति खेल रही थी। महाकाली मानो महाकाल के ध्यान में मग्न हो रही थीं। इन पलों में साक्षी हुए लोग अपूर्व सौभाग्यशाली थे। सौभाग्य का कुछ अंश उन्हें भी मिला था, जो पिछले कुछ महीनों से हर दिन अपनी आत्म चेतना को एकाग्र करके अपनी प्यारी माँ को अपना भक्तिपूर्ण प्रणाम निवेदित करते थे। माँ के चले जाने के अहसास को अनुभव कर जिनकी सिसकियाँ थमती नहीं थीं। इन क्षणों में भी उनकी ध्यानस्थ चेतना माँ के चरणों में अपनी भावांज्जलि अर्पित कर रही थी।
पूर्वाह्न 11-40 पर ध्यानस्थ जनों के ध्यान में एक दृश्य बड़ी ही स्पष्ट रीति से उभरा। इस अद्भुत अनुभूति में उन्होंने अनुभव किया कि परम पूज्य गुरुदेव अपनी लीला संगिनी को अमर धाम में लेने के लिए आए हैं। अनेकों देवशक्तियाँ, सूक्ष्मलोक के ऋषिगण उन्हें घेरे हुए हैं। सभी की दृष्टि माताजी पर टिकी है। क्षण बीते, 11-50 पर माताजी की स्थूल देह हल्के से कम्पित हुई और माता आदिशक्ति अपने परम पुरुष पुरुषोत्तम के साथ विराजमान हो गयी। हृदय-हृदय में वेदना की रागिनी बज उठी। समूचे कक्ष में निष्कम्प-स्तब्धता उतर आयी। इस स्तब्धता ने भी बड़ी अनोखी रीति से इस सत्य का संचार कर दिया कि माता भगवती महाकाली भगवान् महाकाल से महामिलन के लिए महाप्रयाण कर चुकी हैं। उनकी तपःपूत देह के अन्तिम दर्शन के लिए शिष्यों-भक्तों व सन्तानों की भीड़ लग गयी। लगभग 24 घण्टे तक अन्तिम दर्शन का सिलसिला चलता रहा। अगले दिन यानि कि 20 सितंबर 1994 को महाशक्ति की आवास बनी उनकी स्थूल देह चिता अग्नि के तेज में विलीन हो गयी। नित्य प्रति अपने बच्चों को दर्शन देने वाली माता अब ध्यानगम्य हो गयीं। हाँ बच्चों को दिए गए माँ के आश्वासन के स्वरों की गूँज अभी भी थी।
मरुतदेव क्रुद्ध होकर बोले...
माँ ने कहा था कि वे देह न रहने पर भी दूर न होंगी। उनके बेटे-बेटियाँ उन्हें पुकारते ही अपनी माँ के आँचल की छाया और छुअन को महसूस करेंगे। भावमयी जगदम्बा की पराचेतना की ही भाँति उनके आश्वासन भी शाश्वत, अमर और अमिट हैं। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक अवसरों पर अनेकों बातें कहीं थीं। जिनमें कुछ तो नितान्त, निजी और व्यक्तिगत हैं। लेकिन इनमें बहुत कुछ ऐसी है जो सार्वकालिक और सार्वभौम होने के साथ सबके लिए है। उनके प्रेम से छलकते इन स्वरों में हममें से हर एक के जीवन के लिए समाधान है। उनकी बातों को दुहराने और याद करने से पता चलता है कि हम सबको उन्होंने यूँ ही बिना किसी सहारे के नहीं छोड़ा। उनका प्यार-दुलार, ममता और सबसे बढ़कर उनकी समर्थशक्ति हम सबके साथ है। यहाँ तक कि वे स्वयं भी हमारे आस-पास ही हैं। इस सच्चाई को अनुभव करने के लिए हमें बस अपने दिल की गहराइयों से ‘माँ’ कहकर पुकारना होगा। यह एक अक्षर सृष्टि बीज है, मंत्रराज और महामंत्र है। इसे उन्होंने हम सबके लिए स्वयं जाग्रत् और चैतन्य किया है।
न जाने कितनी बार उन्होंने अपने श्रीमुख से कहा है- मैं कभी अपने बेटे-बेटियों को छोड़कर जाने वाली थोड़े ही हूँ। देह सबकी छूटती है, मेरी भी छूटेगी। देह का तो धर्म ही है पैदा होकर नष्ट होना, सो यह तो नष्ट होगी ही। पर इससे क्या मैं तो जैसी की तैसी बनी रहूँगी। तुममें से जब कभी कोई माँ! माँ!! कहकर बुलाएगा, तो मैं दौड़ी-भागी चली आऊँगी। अपनी बातों को समझाते हुए वह कहती थीं- अभी भी तुम लोग मुझे बुलाते हो तो मैं आती हूँ कि नहीं। तुम्हारे बुलाने पर मैं ही आती हूँ देह तो यहीं शान्तिकुञ्ज में पड़ी रहती है। अपनी देह की ओर इशारा करते हुए वह बताती- “यह देह है तो क्या? नहीं है तो क्या? इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। इसलिए तुममें से किसी को कभी भी इस बात की चिन्ता करने की कतई जरूरत नहीं है कि माताजी आज हैं, कल नहीं रहेंगी। अरे- माताजी आज हैं और हमेशा रहेंगी। माताजी तब भी थी जब यह देह नहीं थी, और माताजी तब भी रहेंगी जब यह देह नहीं रहेगी। जब हमारे बच्चे हमको बुलाएँगे, मैं भागकर आऊँगी।”
यह बुलाना कैसा होता है? माताजी! एक भक्त ने उनसे एक अवसर पर पूछा। इस बात को सुनकर वह हँसने लगीं और बोलीं- अपनी माँ को बुलाने के लिए कोई विधि-विधान भी होता है क्या? अरे बेटा? माँ तो अपने उस बच्चे की भी सारी बातें समझ लेती है, जो अभी बोलना भी नहीं जानता। तुमने देखा नहीं छोटे बच्चे जो बोलना भी जानते बस अपनी माँ की याद कर बिलख उठते हैं। उन्हें माँ को पुकारने का यही तरीका मालूम है। उनकी इस पुकार को कोई और समझे या न समझे पर माता समझती है। उनके इस तरह पुकारते ही, वह झटपट अपने हाथ के सारे काम छोड़कर दौड़ी आती है और बच्चे को गोद में उठा लेती है। अपने हृदय का सारा प्यार उस पर उड़ेल देती है। इन बातों को कहते हुए वह हँसकर बोलीं- ‘अरे बेटा! माता तो अपने उन बच्चों की बातों को भी समझ लेती है- जो गूँगे हैं, जो कभी बोल ही नहीं सकते। माँ को बुलाने के लिए कुछ और नहीं, बस दिल की तड़प चाहिए, भाव विह्वलता चाहिए। माँ और बच्चों का रिश्ता ही कुछ ऐसा होता है बेटा!
अपनी सन्तानों पर हर पल प्राण न्यौछावर करने वाली माताजी अपने बारे में प्रायः चुप ही रहती थीं। कोई बात होने पर वह यही कहती- अच्छा बेटा! हम गुरुजी से कह देंगे। अथवा फिर यह कहा करती कि गायत्री माता से प्रार्थना करेंगे। लेकिन किन्हीं विरल क्षणों में अपने स्वरूप को खुलकर प्रकट भी कर देती थीं। ऐसा करने में सामने वाले की पात्रता कम उनकी कृपा ज्यादा होती थी। एक दिन ऐसा ही हुआ, यह बात सन् 1992 के अन्तिम दिनों की है। उस दिन दोपहर में मिलने वाले कुछ कम थे, सो वह जल्दी ही फुरसत पा गयी थीं। सबसे अन्त में एक कार्यकर्त्ता गया। कोई और था नहीं सो उसे बैठा लिया। वह भी माताजी के साथ कुछ क्षणों का संग लाभ पाकर खुश हो गया। खुशी के इन क्षणों में उसने अपने मन की बात पूछते हुए कहा- माताजी! मैंने अपनी पूजा स्थली पर कभी भी गायत्री माता की फोटो नहीं रखी। बस गुरुजी का और आपका चित्र लगा रखा है। आप दोनों में ही मैं सूर्य और गायत्री की, महाकाल और महाकाली की कल्पना करता हूँ। क्या यह ठीक है?
उत्तर में पहले तो वह चुप रही फिर बोलीं- तत्त्व की दृष्टि से समझ तो तेरी इस कल्पना में सच्चाई है। मुझे यदि केवल देह की दृष्टि से सोचो तो गायत्री माता और मुझमें फर्क है। पर यदि तत्त्व और सत्य की दृष्टि से सोचो तो कोई फर्क नहीं है। हालाँकि इस बात की अनुभूति के लिए गहरी साधना चाहिए। तू साधना करता रह- धीरे-धीरे तुझे सारी बातें समझ में आ जाएँगी। जो गुरुजी हैं- वही मैं हूँ। जो मैं हूँ वहीं गायत्री है। माताजी का यह कथन सुनकर सुनने वाला भाव विह्वल हो गया। काफी देर तो उसे सूझा ही नहीं, कि वह और क्या कहे? फिर धीरे से उसने पूछा- माताजी आपकी कृपा से अनगिनत लोगों के लौकिक कष्टों का निवारण होता है, पर क्या आपकी कृपा से जीव को मुक्ति भी मिलती है? इस सवाल को सुनकर वह जैसे आत्मलीन हो गयी और कहने लगीं- सब कुछ मेरी ही कृपा से होता है- संकट निवारण, स्वर्ग, मोक्ष सब कुछ मेरी ही कृपा से सम्भव है।
महाशक्ति के इन वचनों को ध्यान से सुनने के बाद भी पूछने वाले ने अपनी शंका के निवारण के लिए एक प्रश्न और किया- माताजी वेदान्त आदि शास्त्रों में लिखा है कि ज्ञान होने पर मोक्ष मिलता है। उत्तर में वह बोलीं- पर वह ज्ञान क्या मेरी कृपा के बगैर होता है? जब किसी जीव पर मेरी कृपा होती है- तभी ज्ञान होता है। फिर कहने लगीं- कभी तूने चण्डी पाठ नहीं किया है, पढ़ लेना उसमें लिखा है-
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणाँ भवति मुक्तये। सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥ संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ (देवी सप्तशती 1/57-58)
वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या संसार बन्धन और मोक्ष की हेतु भूता सनातनी देवी और सम्पूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं।
देवी सप्तशती का हवाला देते हुए उस दिन माताजी ने अपने स्वरूप को अपने मुखारविंद से प्रकट कर दिया। उनके वचन सुनने वाले के कानों में अमृत घोल रहे थे। उसने बहुत हिम्मत जुटाकर एक अन्तिम प्रश्न किया- माताजी देवी सप्तशती माँ आदिशक्ति की चरित्रकथा है। इसे पढ़ने को एक उत्कट साधना माना जाता है। लाखों लोग प्रतिदिन इसका पाठ कर अपना मनोवाँछित पाते हैं। इसी तरह क्या आपके बच्चे आपकी जीवनकथा के पाठ को साधना के रूप में कर सकते हैं। हाँ बेटा! क्यों नहीं? फिर कुछ सोचते हुए वह बोलीं- “समय आने पर यह गाथा अपने आप प्रकट हो जाएगी। इसे पढ़ने वाले, इसके माध्यम से मेरा स्वरूप का चिन्तन करने वाले अपनी मानसिक चेतना को मेरी पराचेतना से बड़ी आसानी से जोड़ पाएँगे। मुझे पुकारने के लिए यह भी एक तरीका है। असली चीज मुझे पुकारना है। वह मेरी जीवन कथा के माध्यम से हो तो और ठीक है। कोई सिर्फ माँ! माँ!! कहकर बुलाए तो भी ठीक है।”
माताजी कहा करती थीं- ‘कैसे भी हो हम उन्हें पुकारना सीख जाएँ। वह कहा करती थीं- बच्चों, जीवन है तो परेशानियाँ भी आएँगी, संकट, मुसीबतें भी खड़ी होंगी। पर तुम लोग इससे घबराना नहीं। संकट कितने भी बड़े और विकराल हों, हमेशा याद रखना कि मेरी एक माँ है, जो हमेशा मेरे पीछे खड़ी है।’ माँ के इस आश्वासन के बाद भी क्या कोई हमारे लिए चिन्ता का कारण बचता है? उनका यह आश्वासन उनके लिए है जो उनसे कभी भी किन्हीं क्षणों में मिले हैं। और साथ ही उनके लिए भी है, जो उनसे कभी भी नहीं मिले। क्योंकि वह कहती थीं- मैं अपने उन बच्चों से भी परिचित हूँ, जो मेरी देह के न रहने पर यहाँ शान्तिकुञ्ज आएँगे। उनके प्रति मेरा प्यार उनसे कहीं ज्यादा होगा, जो मुझसे मिल चुके हैं। जो मेरे बाद में आएँगे, उन्हें मैं अपनी स्नेह छाया से पूरी तरह सुरक्षित-संरक्षित रखूँगी। जब वे मुझे याद करेंगे, तो मैं उन्हें उनका अभीष्ट प्रदान करूंगी। ऐसी करुणामयी माँ के प्रति भी उनकी नादान सन्तानों ने जाने-अनजाने कुछ भूलें की हैं, आज वे सब उन क्षमामयी के चरणों में क्षमा की याचना करते हैं।
आचार्य महीधर आत्मज्ञान की इच्छा से...
हमें क्षमा कर दो माँ! बड़ी गहरी आत्म पीड़ा और सघन अन्तर्वेदना से घिरे हम आपसे यह याचना कर रहे हैं। आज आप स्थूल रूप से हमारे बीच नहीं हैं। पर आपके साथ बिताए गए हर पल का कोमल अहसास हृदय में जस का तस है। आपकी हर याद की छुअन मन में अनगिन अनुभूतियों का रस घोलती है। कभी-कभी तो स्वयं को देखकर स्वयं पर विश्वास ही नहीं होता। भरोसा ही नहीं आता कि क्या ये हाथ वही है, जिन्होंने सर्वेश्वरी माँ के श्रीचरणों को छुआ है? क्या यह वही सिर है, जो अपनी महाशक्ति माँ के चरणों में झुका है? जिस पर माता ने अपने कृपालु वरद्हस्त रखे हैं। यह कथा किसी एक की नहीं है, आपके अनगिनत बच्चों की है, जो अपने अर्न्तगगन में उमड़ती-घुमड़ती और मूसलाधार बरसती आपकी यादों की झड़ी में भीग रहे हैं। जिन्हें याद आता है आपसे मिलना, आपसे बातें करना और आपके हाथों से कुछ खाने-पीने की चीजें पाना।
हे माता! आपकी यादों के कई रूप हैं, और सभी अनूठे हैं, अनोखे हैं। हममें से कइयों को गुरुदेव विभिन्न कामों के सिलसिले में बुलाते थे। हम सबको अपने ही आलस एवं प्रमाद के कारण जब-तब डाँट-फटकार भी पड़ती थी। पर सीढ़ियों से उतरते ही जब हम सब आपके कमरे में प्रवेश करते, तो आप हँसकर हम सभी से कहतीं- लगता है, तुम लोगों को आज कुछ ज्यादा ही डाँट पड़ गयी। चलो खैर कोई बात नहीं, अभी तो तुम लोग यह थोड़ा खा-पी लो। ऐसे एक नहीं अनेक अवसरों की यादें हमारे मनों में घुली हैं। आपके प्यार-दुलार के अनेकों रूप मन के आँगन में अपनी दिव्य आभा फैला रहे हैं। जहाँ तक आपकी डाँट-फटकार की बात है, तो वह प्रायः होती ही नहीं थी। यदि होती भी तो बहुत कम अवसरों पर। ऐसे अवसरों पर जितना आप डाँटती, उससे ज्यादा हम सबकी मान-मनुहार करतीं। हमें यह समझातीं कि आपकी इस डाँट में हम सबका कितना भला छुपा है। इतना ही नहीं डाँटने के बाद अवश्य ही अपने सामने बिठाकर कुछ खिलाती-पिलाती।
हे भावमयी! हम आपके भाव भरे मातृत्व की कैसे? क्या? और कितनी चर्चा करें? इसकी कथा तो असीम अनन्त है। हम जैसे अज्ञानी बालक तो क्या? दिव्य लोकों के देवगण भी इसे पूरी तरह से कहने में अक्षम हैं। इन क्षणों में हम सब तो बस यह महसूस कर रहे हैं कि हमने आपके कोमल हृदय को जाने-अनजाने अनेकों तरह से दुःखी किया है, चोट पहुँचायी है। आप कितना कुछ सहकर हमारी जिदों व हठों को पूरा करती रहीं और हम इसे अपना सौभाग्य मानकर इतराते रहे। हमने उस समय यह सोचने की तनिक-सी भी जहमत नहीं उठाई कि इससे आपको कितना कष्ट होता होगा। सच में माँ! आज हम अपने किए पर शर्मिंदा हैं। हमको उन पलों की अच्छी तरह से याद है, जब हमने अपने अज्ञानी बाल स्वभाव के कारण आप से लड़-झगड़ लिया। पर आश्चर्य! बदले में आपने हमें डाँटने-डपटने की बजाय भरपूर प्यार दिया। झगड़ा भी हमीं ने किया और रूठे भी हमीं, पर आप सदा ही हम पर सदय और कृपालु बनी रहीं। कभी भी भूल से भी हममें से किसी पर कभी भी कुपित नहीं हुई। क्योंकि इस सत्य को आप ही जानती थीं कि आपके कुपित होने पर तीनों लोकों में कोई भी हमारा शरणदाता न होगा। कहीं भी हमको ठिकाना न मिलेगा।
कर्म से, वाणी से और चिन्तन से हम सबके अपराध कई हैं। और इनमें से हर एक अक्षम्य हैं। हमें यह अच्छी तरह से मालूम है कि क्रूर कर्म में प्रवीण काल देवता, निष्ठुरता में निष्णात विधि का विधान हमारे किसी भी अपराध के थोड़े से अंश को भी क्षमा न करेगा। परन्तु हमारी इनसे कोई आशा भी नहीं है। हम सबकी प्रत्येक आशा का केन्द्र बिन्दु तो आप हैं। अब तक हमने अपनी हर चाहत को पूरा करने के लिए सिर्फ-सिर्फ माँ! माँ!! कहना सीखा है। आज फिर से वही माँ! माँ!! कहते हुए आपसे अपने किए हुए कृत्यों के लिए, अपने समस्त अपराधों के लिए क्षमा की याचना कर रहे हैं। अपने द्वार पर आए सभी याचकों की झोली भरने वाली माता, आज हम बच्चों की झोली अपनी क्षमा से भर दो। आपकी क्षमाशक्ति ही हम सबकी जीवन नौका को पार लगा सकती है। हम सबको भवसागर से पार उतार सकती है।
हे माता? यदि हममें से किसी के द्वारा कोई ऐसा अपराध बन पड़ा है, जो किसी भी तरह से क्षमा करने लायक नहीं है तो उसके लिए आप स्वयं ही दण्ड विधान तय करना। हमको काल के क्रूर हाथों में अथवा विधाता के निष्ठुर विधान-पाश के हवाले मत करना। हमें कुछ भी सजा देना माँ, पर अपने से दूर मत करना। हम आपके चरणों के सान्निध्य से कभी भी किसी भी हाल में दूर नहीं होना चाहते। आपकी कृपा छाँव में हम सारे कष्ट प्रसन्नतापूर्वक सह लेंगे। मुँह से कभी कोई उफ तक न निकलेगी। होठों पर कभी कोई शिकायत न आएगी। आपके बिना, आपसे थोड़ा भी दूर होकर हमें इस समस्त विश्व-ब्रह्मांड का कोई भी बड़े से बड़ा श्रेय-सौभाग्य नहीं चाहिए। इन तुच्छ साँसारिक धन-वैभव, यश-प्रतिष्ठ, पद-सम्मान की बात कौन कहे माता हमें आपसे दूर होकर देवराज इन्द्र और सृष्टिकर्त्ता ब्रह्म का पद भी नहीं चाहिए। दण्ड हो या पुरस्कार- हमारा समस्त संसार आपके श्री चरणों में सिमटा हुआ है। हमारे मन व बुद्धि आपके सिवा अन्य कुछ भी सोचने-समझने और जानने में असमर्थ है।
पहले जब आप स्थूल देह में थीं, तब हम बच्चे रूठा करते थे और आप हमें मनाया करती थीं। आज आप जब सूक्ष्म हैं, तो हमारा शंकालु मन यह सोचने लगता है कि कहीं हमारी माँ हमसे रूठ तो नहीं गयीं। हालाँकि हम यह जानते हैं कि भौतिक जीवन की अनेकों रस्सियों में कसा-बंधा यह मन आपकी सूक्ष्म चेतना का स्पर्श करने में असमर्थ है। फिर भी अपने इर्द-गिर्द आपकी ढूंढ़-खोज में हमेशा जुटा रहता है। आपके जीवन काल में इसे आपको रोज-रोज देखते रहने की आदत जो पड़ गयी है। इसको अभी तक यह ठीक से समझ में नहीं आ पाया कि अपने बच्चों पर प्राण न्यौछावर करने वाली माँ अचानक सूक्ष्म में क्यों जा बैठी? कहीं ऐसा उन्होंने हम सबसे रूठकर तो नहीं किया। पर हृदय की उफनती भावनाओं में विश्वास के यही स्वर उमड़ते हैं कि वात्सल्यमयी माता कभी भी अपनी सन्तानों से रूठ नहीं सकती। वह जरूर अपने किसी विशेष प्रयोजनवश हमारी स्थूल आँखों से ओझल हुई है।
इस विश्वास को तब बल मिलता है जब स्वप्नों में आपकी दिव्य झलक मिलती है। वही हँसती-मुस्कराती, प्रसन्नता की प्रदीप्ति से ओत-प्रोत दिव्य भावमूर्ति। वही चिर-परिचित वात्सल्य का भावभरा अन्दाज। वही स्नेहमय आश्वासन, वही प्रेम छलकाते शब्द। जगने पर लगता है कि अरे माँ तो अपने एकदम आस-पास है। बस वह तो केवल चर्मचक्षुओं से ओझल हुई है। उसकी सूक्ष्म चेतना तो विराट-विस्तार लिए आँचल की तरह हम सब पर एक साथ छाया कर रही है। संकट में, आपत्ति में, मुसीबत-परेशानी में जब कभी प्राण पुकारते हैं। सर्वशक्तिमयी अपनी समस्त शक्तियों के साथ आकर उपस्थित हो जाती है। माता के स्मरण मात्र से क्रूर काल के बढ़ते कदम भी पीछे वापस होने के लिए मजबूर हो जाते हैं। सच है माँ महाकाली के शिशुओं के सामने बेचारा काल करेगा भी तो क्या? उसके लिए तो जगदम्बा की एक हुँकार ही पर्याप्त है। इस सत्य का अनुभव हम बच्चों ने अपने इस छोटे से जीवन में अनेकों बार किया है।
सारी कामनाओं को पूरा करने वाली हे कामेश्वरी माँ! आपने हम बच्चों की प्रत्येक इच्छा की पूर्ति की है। हममें से जिसने जो चाहा, उसे आपने वही दिया है। आपके वरदानों को नित्यप्रति अपने जीवन में अनुभव करने वाले हम सभी जनों को यह अनुभूति जन्य विश्वास हो चला है कि जैसे हमारे लिए अब कुछ भी पाना असम्भव नहीं रहा। हम जो भी इच्छा करेंगे, हमारी माँ हमें वही दे देगी। अपने इसी विश्वास के बल पर हे माता! हम आपसे सिर्फ एक अन्तिम याचना कर रहे हैं कि हमें अब किसी और की नहीं बस आपकी और सिर्फ आपकी चाहत है। हम केवल और केवल आपको चाहते हैं। आपके सिवा अब हमें और कुछ भी नहीं चाहिए। हमारे बिलखते हुए हृदय और आँसू भरी आँखों पर दृष्टि डालकर अब हमें अपनी गोद में उठा लो। संसार के भीषण अरण्य में भटकते हुए हे माता! अब हमारा तन-मन पूरी तरह से तार-तार हो गया है। वेदना से जीवन का अणु-अणु व्यथित है। हे वात्सल्यमयी! ऐसे में सिर्फ आपकी गोद ही हमें त्राण दे सकती है। हे भावमयी भगवती! हम अतीत और आगत के अपने समस्त अपराधों के लिए आपसे क्षमा प्रार्थना करते हुए बस अपने लिए आपकी गोद की याचना करते हैं। साथ ही जीवन की शेष साँसों को पूरी तरह आप पर न्यौछावर करने का संकल्प लेते हैं।
रामकृष्ण परमहंस की माता वृद्धावस्था में...
गतांक से आगे
प्रस्तुत मातृवाणी अगस्त 2002....
माँ! हम सब सन्तानों का संकल्प हमारी भावनाओं का सजल उद्रेक है। जो आपकी यादों के सघन होते ही बरबस उमड़ पड़ा है। हम सबको यह तन-मन-जीवन देने वाली आप ही हैं। हममें से हर एक के जीवन में यदि कहीं कोई उपलब्धियाँ नजर आती हैं, तो वे सबकी सब आपके आशीषों का ही सुफल है। आपके द्वारा पाए गए अनुदानों को थोड़े बहुत अंशों में आप पर न्यौछावर करने में कुछ खास बड़ाई नहीं है। इस सच्चाई को हम सभी जानते हैं। पर आपकी सेवा करने की चाहत मन-अन्तःकरण में इतनी बलवती हो उठी है कि आपके लिए संकल्पित होने से अपने-आपको किसी भी तरह से रोक नहीं पा रहे। हालाँकि यह संकल्प आपकी कुछ विशेष सेवा करने में तो क्या आपका थोड़ा बहुत ऋण चुकाने में भी अक्षम है। फिर भी ऐसा करने में आपके बालक होने का जो अहसास मिलता है, उसमें हमारे हृदय को प्रगाढ़ आनन्द की अनुभूति मिलती है। इस अनुभूति की व्याख्या कर पाने में विश्व की सभी भाषाओं के शब्दकोश मिलकर भी अक्षम हैं।
इस छोटे से जीवन में जो कुछ देखा-सुना है, उसमें से कुछ दृश्यों ने मन को बड़ी गहराई तक छुआ है। ऐसा ही एक दृश्य उभरता है कि एक ग्रामीण अंचल में एक माता चौके में खाना पका रही है। उसके इर्द-गिर्द खेलते हुए छोटे-छोटे बच्चे मनों में अपनी माँ को खुश करने की चाहत संजोये हैं। उनकी माँ जानती है कि उसके ये बच्चे इतने छोटे हैं कि कोई विशेष काम नहीं कर सकते। फिर भी उनका मन रखने के लिए वह उनसे कभी चिमटा-सड़सी, कटोरी-गिलास जैसा कोई छोटा-मोटा बर्तन माँग लेती है। और कभी कोई दूसरी छोटी सी चीज इधर से उधर रखने को कहती है। बच्चों के ऐसे करने में माता के श्रम में कोई खास अन्तर नहीं पड़ता। उसे जो और जितना करना है, वह उतना ही करती है। कभी-कभी तो उल्टे बच्चों की उलट-पुलट से उसके कई काम और बढ़ जाते हैं। परन्तु अपनी माता के प्रति उमड़ते हुए प्यार को छलकाते हुए छोटे बच्चे जब अपने नन्हें कदमों से चलकर छोटे-छोटे हाथों से कोई हल्की-फुल्की चीज माँ को सौंपते हैं, तो उनकी उस खुशी का वर्णन करना किसी भी लेखक या कवि के बूते का नहीं होता। बच्चों की यह खुशी देखकर माता भी परम प्रसन्न हो उठती है।
बस माँ! हम सब के संकल्प में समायी भावना भी कुछ ऐसी है। जिस मिशन को स्वयं आप महाशक्ति विश्वमाता संचालित कर रही हैं, उसमें भला कब? कहाँ? क्या? और कैसे कोई कमी पड़ेगी। जिसकी जड़ों में युगावतार परम पूज्य गुरुदेव ने अपने अनन्त तप की समूची ऊर्जा उड़ेल रखी हैं, उसके विकास में भला क्यों किसी तरह के व्यवधान आएँगे? माता भगवती महाकाली और पिता भगवान् महाकाल के संरक्षण में सुरक्षित-संरक्षित इस मिशन को वक्र दृष्टि से देखने की हिम्मत सामान्य मनुष्य तो क्या शनि, राहू, केतु जैसी वक्री और क्रूर कही जाने वाली शक्तियाँ भी नहीं कर सकती। इस समस्त सच्चाई को जानते हुए भी हम सब तो बस अपनी आकुल-व्याकुल भावनाओं को आपको अर्पित करना चाहते हैं।
हममें से हर एक को याद है कि आप अपने जीवन काल में कहा करती थीं कि यह समूचा मिशन आपका और परम पूज्य गुरुदेव का शरीर है। आपने कहा था कि जब हम लोग (आप और गुरुदेव) न रहेंगे तो इस मिशन के व्यापक विस्तार में हमें देखा और अनुभव किया जा सकता है। हम सबके सम्मिलित संकल्पों में यही अनुभूति निहित है। आपके जीवन काल में हममें से अनेकों को आपके निकट रहने का अवसर नहीं मिला है। हममें से बहुतेरे चाहकर भी आपकी कोई निजी सेवा नहीं कर पाए हैं। बस उसी कमी को हम सब इस दैवी मिशन की सेवा करके पूरा करना चाहते हैं। इसके लिए हम सब जो धन, श्रम एवं मनोयोग लगाएँगे, उससे हमें आपकी निजी सेवा करने का सुख मिलेगा। अपने विगलित हृदयों से हम सब याचना करते हैं- करुणामयी माँ! हमारी इन सेवाओं को इसी रूप में स्वीकार करिएगा।
आपके हम सब पुत्र-पुत्रियों में कितनी योग्यता है, मालूम नहीं। पर हमारी इतनी योग्यता तो सुनिश्चित है ही कि हम सब जो हैं, जैसे हैं, आपके और केवल आपके हैं। हम सबके सम्मिलित संकल्प इसी मूल भावना की भूमि पर अंकुरित हुए हैं। हममें से हर एक को पता है कि आप सर्वान्तर्यामी हैं। हमारे हृदयों की प्रेरक शक्ति हैं। बिना कुछ भी कहे, बताए या जताए आप सभी कुछ जानने में, अनुभव करने में समर्थ हैं। फिर भी आपकी भावनाओं की तृप्ति के लिए आपको साक्षी मानकर, आपके सामने हम सब निम्न सत्यों के परिपालन हेतु संकल्पित होते हैं-
1. हम सब सदा से आपके हैं और मन-वाणी, कर्म और सम्पूर्ण अन्तःकरण से सदा ही आपके बनें रहेंगे।
2. हे दिव्य जननी! हम सब आपके दिव्य बालक-बालिकाएँ बनने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। अपने मन-वचन और कर्म से ऐसा कोई काम न होने देंगे जो आपकी आन-बान और शान के अनुकूल न हो।
3. आप हमारी माँ हैं और हम सब आपकी सन्तानें। हम अपना पारस्परिक जीवन इन्हीं भावनाओं के अनुरूप जियेंगे। किसी के प्रति भी कोई कलुषित विचार अथवा ईर्ष्या-द्वेष को स्थान न देंगे। यदि किसी से भूलवश कोई गलती हो भी गयी तो भी उसे आपका स्मरण करते हुए प्रीति भाव से क्षमा करेंगे।
4.इस सम्पूर्ण मिशन को आपके दिव्य शरीर के रूप में अनुभव करेंगे। इसके प्रति सदा ही पुण्य भाव रखते हुए अपने धन-श्रम एवं प्रतिभा को यथाशक्ति अर्पित करते रहेंगे।
बस माता! हमारे ये चार संकल्प हम सबके पुरुषार्थ चतुष्टय के प्रतीक हैं। इस चतुर्विध पुरुषार्थ का एकमात्र उद्देश्य आपके कृपापूर्ण सान्निध्य को पाना है। एक बार एक कार्यकर्त्ता के यह पूछने पर कि माताजी क्या आप हमसे पूरी तरह से परिचित हैं? उत्तर में आपने हँसते हुए कहा था-बेटा! मैं तेरी रग-रग से वाकिफ हूँ। मैं यह भी जानती हूँ कि तू पैदा होने के पहले कहाँ-किस स्थिति में था। आगे अभी क्या-क्या नादानियाँ और शैतानियाँ करेगा और फिर इस शरीर के बाद कहाँ जाएगा? इस पर उसने तपाक से पूछा-कहाँ जाऊँगा माताजी? ‘और कहाँ जाएगा? घूम-फिरकर मेरे ही पास-मेरी ही गोद में तो आएगा।’ इसके बाद कुछ देर चुप रहकर आप बोली थीं कि “इस मिशन से जुड़े हुए तुम सब लोगों को मैंने ही जन्म दिया है। अपनी ओर इंगित करते हुए आपने बताया था कि इस स्थूल देह की तो सीमा है इसीलिए मैंने तुम सब लोगों को अलग-अलग घरों में पैदा किया है, पर तुम सबकी असली माँ मैं ही हूँ।”
“जैसे-जैसे तुम लोग बड़े होते जाते हो मैं तुम्हें अपने पास बुला लेती हूँ। अभी तुम लोग आए हो आगे मेरे और बेटे-बेटियाँ आयेंगे। तुम लोगों ने मुझे इस रूप में देख लिया, हो सकता है वे लोग न देख पाएँ। पर इससे क्या उन सबकी माँ भी तो मैं ही हूँ। मैंने ही सबको जन्म दिया है और अन्त में सभी को मेरे ही पास आना है। मेरी ही गोद में, मेरे ही दिव्य धाम में।” हे माता! आपकी वाणी के अनुरूप हमारे सभी संकल्पों का लक्ष्य भी यही है। हम जब तक जीवित रहे, इस मिशन को आपका दिव्य स्वरूप मानकर इसकी सेवा करते रहे और जब हमारी देह पंचतत्त्वों में विलीन हो तो हमारी अन्तर्चेतना आपमें विलीन हो जाए। बिना किसी भटकाव के आपकी ओर बढ़ते रहे-चलते रहे-चलते रहे, हमें ऐसी शक्ति-भक्ति और प्रगाढ़ अनुरक्ति दो हे माँ! अन्त में आपके पावन स्मरण के साथ आपको कोटि-कोटि नमन और अपना आन्तरिक समर्पण।
ॐ श्री भगवतीदेर्व्यपणमस्तु!
माँ ने कहा, बच्चों अब तुम समझदार...
मनुजता विकल है, लुटी जा रही है,