नव सम्वत्सर के नौ दिन

नव सम्वत्सर अपने अंतस् में अनेकों नवीन सम्भावनाएँ संजोये है। इसके पहले नौ दिनों में इन सम्भावनाओं को उजागर करने का आह्वान है। सम्वत्सर की सुखद सम्भावनाओं को साकार करने वाले संकल्पित साधकों के लिए पुकार है। इन नौ दिनों में समर्थ साधना के वे बीज बोये जा सकते हैं। जिनकी लहलहाती फसलें साधकों के आन्तरिक एवं बाह्य जीवन को समूचे वर्ष समृद्ध बनाये रखें। इन नौ दिनों को नकारने का अर्थ है, नव सम्वत्सर की सम्पूर्ण सम्भावनाओं को नकार देना।

इन नौ दिनों की नौरात्रियाँ भी अपने में साधना के गहरे रहस्यों को समेटे हैं। इनके पल-पल में प्रेरणा भरी पुकार है। जो साधक हैं वे इसे सुने बिना नहीं रह सकते। रणभूमि में रणभेरी बजती रहे और शूरवीर मुँह छुपाये किसी कोने में दुबके बैठे रहें, यह किसी भी तरह से सम्भव नहीं। नव सम्वत्सर के नौ दिन भी साधकों के लिए ऐसी ही चुनौती भरी साधना की रणभेरी बजा रहे हैं। जो साधक हैं, वे इसे सुनकर साधना का महापुरुषार्थ किए बिना नहीं रह पायेंगे।

नव सम्वत्सर के इन नौ दिनों में आदि शक्ति माता गायत्री ने अपनी सन्तानों को शक्ति का अनुदान देने के लिए पुकारा है। महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती उन्हीं की अंशभूता शक्तियाँ हैं। शैलपूत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्रि के नौ रूपों में वही इन नौ दिनों की अधिष्ठात्री शक्ति है। दुर्गा सप्तशती में उन्हीं की कीर्ति का गायन है। शुम्भ-निशुम्भ का दलन करने वाली महिष मर्दिनी माता वेदमाता गायत्री ही है। वही वरदायिनी माता अपनी शक्ति का विशिष्ट अंश देने के लिए इन नौ दिनों में सत्पात्रों और साधकों को खोजती हैं।

ध्यान रहे, माँ की पुकार को हममें से कोई अनसुना न करें। कोई ऐसा बचा न रहे जो नौ दिवसीय साधना अनुष्ठान के लिए संकल्पित न हुआ हो। चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र के चौबीस हजार के अनुष्ठान में ही माता की कृपा झलकती है। उनकी कृपा से सब कुछ सम्भव है। महा असम्भव को अति शीघ्र सम्भव करने वाली वरदायिनी माता गायत्री की सन्तानों में से किसी को नौ दिनों में वंचित नहीं रहना चाहिए। स्वास्थ्य, सफलता, समृद्धि-सिद्धि सभी कुछ नव सम्वत्सर के इन नौ दिनों में समाया है। इसे पाने के लिए हमारा साधनात्मक पुरुषार्थ ठिठका न रहे।


शक्ति -उपासना से ही राष्ट्र समर्थ−सशक्त हो सकेगा

देवभूमि भारत में आदिशक्ति के प्रति आस्था अत्यंत प्राचीन है। भारत में पूर्वपाषाणकाल और नवपाषाणकाल में शक्ति −उपासना के संकेत मिलते हैं। इतिहासविदों के अनुसार नवपाषाणकाल में कृषि−क्राँति के साथ न केवल साँस्कृतिक प्रगति हुई, वरन् समाज में नारियों का स्थान और धर्म में शक्ति −सिद्धाँत का महत्त्व बढ़ा, परंतु काँस्य−काल में सभ्यता के उदय के साथ ही प्राचीन भारत में शक्ति −उपासना को, शक्ति वाद को व्यापक लोकप्रियता मिली। अन्य देशों में भी शक्ति वाद का प्रमाण मिलता है, जो भारत के शक्ति वाद से मिलता प्रतीत होता है। इतिहासकार आर. पी. चंद्रा की मान्यता है कि भारतीय शक्ति−उपासना एवं सामीजनों की अस्तार्त, मिस्रियों की आइसिस और फ्रीगियनों की साइबिल की परिकल्पना में गहरी समानता है।

प्राचीन भारत में शक्ति−उपासना काफी प्रचलित थी। अन्य देशों में भी इसके विभिन्न स्वरूप मिलते हैं। एशिया माइनर तथा भूमध्यसागरीय प्रदेशों में शक्ति की उपासना प्रायः एक पुरुष देवता के साथ की जाती थी। अफ्रीका में हव अपने पुत्र तनित के साथ, मिस्र में आइसिस के रूप में होसस के साथ, फिनीशिया में अस्थारोथ के रूप में तामुज के साथ, एशिया माइनर में साइबिल के रूप में जियस के साथ पूजी जाती थी। इस प्रकार आर्येतर जातियों का समाज मातृसत्तात्मक था, इसलिए उनके धर्म में माता की प्रधानता प्रतिष्ठित हुई।

मजूमदार, डैल्स एवं कैसल आदि इतिहासविद् काँस्यकालीन मातृपूजक ग्राम−संस्कृतियों के उदय को सैंधव−सभ्यता से पूर्व ले जाते हैं। इन्होंने अफगानिस्तान, बलूचिस्तान एवं सिंध आदि में मातृशक्ति की उपासना का प्रमाण ढूँढ़ निकाला है। प्राचीन भारत में मातृदेवी की उपासना के प्राचीनतम पुरातात्त्विक प्रमाण इन्हीं संस्कृतियों से मिले हैं। हड़प्पा में कुछ ऐसी मूर्तियाँ भी उपलब्ध हुई हैं, जिनके पैर नहीं हैं। ये मूर्तियाँ खिलौने नहीं हो सकतीं। सर आरियल स्टाइन ने इन मूर्तियों को बौद्ध तथा यूनानी मूर्तियों के आधार पर ‘पृथ्वीमाता’ की मूर्तियाँ बताया है। मैके के विचार से इन मूर्तियों की उपासना गृहदेवी के रूप में आलों में रखकर की जाती थी। पिगट के शब्दों में ये मूर्तियाँ मातृदेवी की हैं, जो भयानक तथा रौद्र रूप को प्रकट करती हैं। मार्शल ने भी इन्हें पृथ्वीमाता की मूर्ति माना है। मानव पृथ्वी पर ही उत्पन्न होता है और मृत्यु के बाद इसी में समाहित हो जाता है। इस क्रिया ने मनुष्य का ध्यान प्राचीनकाल में ही आकर्षित किया था। इसी कारण प्राक् ऐतिहासिक काल में पृथ्वी की देवी के रूप में उपासना प्रारंभ हुई। इसका प्रमाण मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की मूर्तियों से मिलता है।

शक्ति −उपासना की यह प्रवहमान कालसरिता सैंधव−सभ्यता के पश्चात भी प्रवाहित हुई और वैदिककाल में तो अपने पूरे उफान में बहने लगी। ऋग्वेद में उषा और अदिति देवियों को महत्त्वपूर्ण स्थान मिले हैं। वेदों में बहुवर्णित देवी उषा हैं। ऋग्वेद में उषा के लिए 20 सूक्त मिलते हैं और उनके नाम का 300 बार से अधिक उल्लेख हुआ है। यह ऋग्वैदिक ऋषियों की सर्वाधिक मनोरम कल्पना है। ऋग्वेद की एक और महत्त्वपूर्ण देवी अदिति हैं। ऋग्वेद में लगभग 80 बार इनका उल्लेख मिलता है। इनके अलावा सरस्वती, दिति, वाणी, सत्रि, पृथ्वी, पुरंधि, पृश्नि, सरण्यू, घिषणा, इग, वृहद्दिवा, राका, सिनीवाली, अरण्यानी, श्रद्धा, अनुमति, अरमति, असनीति, निऋति, श्री, आपः, सिंधू, इंद्राणि, वरुणानी, रुद्राणी, आग्नेयी, सूर्या, रोदसी, शची, सीता, दक्षिणा, मही, भारती, उर्वशी, उर्वरा आदि मातृशक्तियों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

उत्तर वैदिककाल में मातृशक्तियों का महत्त्व पहले से बढ़ा हुआ प्राप्त होता है। इस काल में मातृदेवी का पद स्वतंत्र और विशिष्ट होने लगा। सैंधव धर्म में मातृदेवी का पद संभवतः शिव के बराबर था, परंतु इस काल में उसकी उपासना शिव−पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से होने लगी। यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में कुछ इसी प्रकार का संकेत मिलता है। उपनिषदों में शक्ति तत्त्व के दार्शनिक पक्ष का विकास मिलता है। सर्वप्रथम बृहदारण्यक उपनिषद् में शक्ति तत्त्व का द्वैतभाव प्रकाश में आया। अद्वय के अंतर्गत छिपे द्वैतभाव की यह कल्पना शक्ति −तंत्रों में विकसित रूप से उपलब्ध होती है। परवर्तीकाल में शक्त तथा वैष्णव, दोनों ही संप्रदायों ने इस श्रुतिवचन को अंगीकार−स्वीकार किया। श्वेताश्वेतर उपनिषद् में इसी विचार का साँख्यवादी रूप शक्ति −उपासना की महत्ता तथा इसके दार्शनिक स्वरूप की महत्ता के रूप में मिलता है।

शक्ति −उपासना के उदय के इतिहास में सूत्रग्रंथों का महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि शाक्त मत एक स्वतंत्र मत के रूप में इन ग्रंथों के युग में उदित हुआ है। सूत्र−साहित्य में अनेक प्राचीन तथा नवीन देवियों एवं उनकी उपासना का वर्णन हुआ है। सूत्र−साहित्य में सरस्वती का जिक्र है। अंबिका की भी देवी के रूप में विवेचना हुई है। शाँख्यायन गृह्यसूत्र में श्री एवं भद्रकाली का विश्वदेव संबंधी आहुति के प्रसंग में उल्लेख है।

रामायणकाल में शक्ति −उपासना का आविर्भाव भक्ति वाद के साथ−साथ हुआ। उत्तरकाँड में इसका आख्यान मिलता है। कमलासीन देवी के रूप में लक्ष्मी की कल्पना की गई है। रामायण में सिम्हिका देवी का भी उल्लेख मिलता है। इसके एक स्थान पर सीता का चित्रण ‘कालरात्रि’ के रूप में किया गया है। रामायण के समान महाभारत में भी शक्ति −उपासना का घनिष्ठ संबंध शिवोपासना के साथ दिखाई देता है। शिव की अवधारणा के साथ महाभारत में देवी की अवधारणा जुड़ी थी। इसमें शक्ति −उपासना से संबंधित अनेक कथाएँ मिलती हैं और कुछ शाक्त कथाओं का पूर्ण रूप तथा उनके भिन्न−भिन्न संस्करण मिलते हैं, परंतु महाभारतकाल तक शक्ति −उपासना शैव धर्म का एक अंग बन गई थी। एक स्थान पर शिव की सहचरी के रूप में उसको स्पष्ट रूप से शिव की शक्ति कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि इस समय तक उसका शिव की शक्ति अथवा माया माना जाने लगा था, जिसका उपनिषदों में उल्लेख किया गया है। महाभारत के भीष्मपर्व के प्रारंभ में दुर्गा पूजा का वर्णन है। यहाँ पर दुर्गा को सिंहों की सेनानेत्री, कालशक्ति , कपालधारिणी, कौमारी, काली, कपालिनी, कपिला, कृष्णपिंगला, भद्रकाली, महाकाली, चंडी, तारिणी, सौम्या तथा सुँदर रूप वाली, कात्यायनी, कराली, विजया, जया आदि कहा गया है।

महाभारत के शल्यपर्व में मातृकाओं का वर्णन है। इनको शत्रुओं का संहार करने वाली और कुमार कार्तिकेय की अनुचरी बताया गया है। कहा गया है कि इन्होंने तीनों लोकों को व्याप्त कर रखा है। इसके वनपर्व में देवी तीर्थों का उल्लेख किया गया है। इनमें कामाख्या, श्री पर्वत, भीमा देवी का स्थान, कालिका संगम, गौरीशिखर, धूमावती देवी का स्थान, श्री तीर्थ, देवी तीर्थ और मातृ तीर्थ उल्लेखनीय हैं।

शक्ति −उपासना से संबंधित चक्र अथवा मंडलाकार चक्रिकाएँ मथुरा, कौशाँबी, राजघाट, बसाढ़, पटना तथा तक्षशिला आदि अनेक स्थानों से प्राप्त हुई हैं। मौर्यकाल में शक्ति −उपासना का प्रमाण मात्देवी की मूर्तियों से मिलता है। मौर्यकालीन मातृदेवी की मृण्मूर्तियाँ प्रागैतिहासिक मूर्तियों की अपेक्षा अधिक विकसित हैं। मौर्यकालीन मौजूदा नमूनों में दीदारगंज की यक्षिणी सुँदरतम की यक्षिणी सुँदरतम कही जा सकती है। कौशाँबी की शुँगकालीन मृण्मृर्तियों में जो कला सौष्ठव है, वह दर्शनीय है। इन मूर्तियों से प्रमाणित होता है कि मौर्य एवं शुँगकाल में शक्ति −उपासना प्रचलित थी।

कुषाण−काल में शक्ति वाद पर प्रकाश डालने वाली साहित्यिक कृतियों में सर्वप्रथम अश्वघोष के ‘बुद्धचरित’ नामक काव्य में शिव तथा पार्वती का कई बार उल्लेख हुआ है। यहाँ पर पार्वती को स्कंद की माता कहा गया है। उनकी दूसरी कृति ‘सौदरानंद’ में अंबिका शब्द आया है। कुषाणकालीन सिक्कों से शक्ति −उपासना संबंधी अनेक सूचनाएँ मिलती हैं। इस काल में शक्ति −उपासना में नवीन आयामों की प्रतिष्ठा हुई।

गुप्तकालीन साहित्य में शक्ति वाद की लोकप्रियता प्रसिद्ध है। कालिदास की कृतियों में इसका उल्लेख मिलता है। देवी के लोक−प्रचलित रूप का चित्र ‘कुमारसंभव’ और ‘मेघदूत’ नामक काव्यों में मिलता है। कनिंघम के अनुसार गुप्तकाल में सात मातृकाओं की मूर्तियाँ भी मिलती हैं। गुप्तोत्तरकाल में शक्ति −उपासना का स्वरूप सारभाव से पौराणिक ही रहा। गुप्तोत्तरयुगीन मंदिर में भुवनेश्वर 05 स्थित बैताल देउल का मंदिर उल्लेखनीय है। इस मंदिर में स्थित चतुर्भुजी पार्वती, अष्टभुजी महिषमर्दिनी, अर्द्धनारीश्वर तथा अप्सराओं आदि की मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं। खजुराहो में शाक्त संप्रदाय से संबंधित चौंसठ योगिनी मंदिर विशेष महत्त्वपूर्ण है। इस काल में अधिकतर शाक्त मतावलंबी दक्षिणमार्गी हो गए।

साहित्यिक दृष्टि से भारत में महाकाव्यों के उपराँत उन पुराणों का युग आता है, जिनकी रचना स्थूलतः गुप्तकाल एवं गुप्तोत्तरकाल की शताब्दियों में हुई। इनमें शक्ति −उपासना की विभिन्न प्रकृतियों का अधिक विकसित रूप मिलता है। मातृदेवी को लगभग सभी पुराणों में शिव की शक्ति माना गया है। सौर पुराण में देवी−तत्त्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वह शिव की ज्ञानमयी शक्ति है, जिसके द्वारा शिव सृष्टि का निर्माण और संहार करते हैं। शक्ति त्रिगुणात्मिका है। एक अन्य स्थान पर उसे परा अथवा परमशक्ति कहा गया है, जो सर्वत्र व्याप्त है। पुराणकाल में स्वतंत्र शाक्त मत की उपास्य देवी के रूप में शक्ति −उपासना की लोकप्रियता बढ़ी। स्वतंत्र मत के रूप में इस उपास्य देवी का उग्र रूप अधिक उभरा। अपने उग्र रूप में वे महिषासुर, शुँभ, निशुँभ, धूम्रलोचन, रक्त बीज, चंड, मुँड आदि का वध करती है। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण के दुर्गाकाँड में देवी के दोनों सौम्य एवं उग्र रूपों का एकत्व स्पष्ट है। वाराह पुराण में उग्र रूप में देवी के सामान्य नाम चंडिका, काली तथा दुर्गा हैं।

शाक्त मत के विकास की दृष्टि से मार्कंडेय पुराण का देवी माहात्म्य विशेष रूपेण महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय हैं। भंडारकर के अनुसार इस ग्रंथ को शाक्त तक में कुछ वैसा ही स्थान प्राप्त होता है, जैसा वैष्णव मत में श्रीमद्भगवद्गीता को। उसे ‘दुर्गा सप्तशती’ के नाम से जाना जाता है। इसमें वैदिक तथा लौकिक नामों और विशेषणों के द्वारा शक्ति का वर्णन किया गया है। स्वाहा, स्वधा, षट्कार, स्वर, अक्षर, प्रणव की तीन मात्राएँ, चौथी अर्द्धमात्रा, संध्या, सावित्री ये सब देवी के रूप में कहे गए हैं। वही जगती को रचती, पालन करती और संहार करती हैं। वे जगत की उत्पत्ति के समय सृष्टिरूपा, पालनकाल में स्थिति रूपा तथा कल्पाँत के समय संहाररूपा हैं। महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहरूपा और महासुरी उसी महादेवी की संज्ञाएँ हैं। वहीं सौंदर्य की अधिष्ठात्री हैं। पर और अपर से परे हैं और सत्−असत् से पूर्ण हैं।

इन्हीं कारणों से धार्मिक व्रतोत्सवों में भी दुर्गा पूजा, गायत्री, उपासना की नवरात्रि, मनसा पूजा, हरितालिका, काली पूजा, सरस्वती पूजा, दीपावली, षष्ठीपूजा, कुमारी पूजा, तुलसी पूजन, सावित्री पूजन, गौ, गंगा पूजन आदि का प्रचलन प्रारंभ हुआ, जिसमें शक्ति की उपासना की जाती है। हमारे पूर्वज महर्षियों द्वारा सौंपी गई यह ऐतिहासिक व साँस्कृतिक धरोहर आज भी समीचीन एवं महत्वपूर्ण है। शक्ति −उपासना को, इस बहुमूल्य साँस्कृतिक निधि को अपनाकर ही देश समर्थ, सशक्त व शक्ति शाली हो सकता है। आदिशक्ति के प्रति जन−जन के मन में जाग्रत आस्था ही हमें हमारा पुरातन वैभव लौटा सकती है। प्रस्तुत नवरात्रि (चैत्र) पर्व पर इन्हीं संकल्पों के साथ शक्ति की आराधना करें।


शिकार न करने की कसम (kahani)

द्रौपदी के पाँच पुत्रों को सोते द्रोण पुत्र अश्वत्थामा ने मार डाला। पाँडवों के क्रोध का ठिकाना न रहा, वे उसे पकड़कर लाए और द्रौपदी के सामने ही उसका सिर काटना चाहा।

द्रौपदी का विवेक तब तक जाग्रत हो गया। वह बोली, “पुत्र के मरने का माता को कितना दुःख होता है, यह मैं जानती हूँ। उतना ही दुःख तुम्हारे गुरु द्रोणाचार्य की पत्नी को होगा। गुरु ऋण को, गुरुमाता के ऋण को समझो और उसे छोड़ दो।” अश्वत्थामा को छोड़ दिया गया। करुणा की बदले की भावना पर विजय हुई।

एक शिकारी तीर−कमान लेकर शिकार मारने निकला, पर कोई बड़ा जानवर हाथ न लगा। एक छोटा खरगोश भर पकड़ सका तो उसे घोड़े पर लादकर वापस लौट पड़ा।

लौटते समय वह अपने वतन का रास्ता भूल गया, तो उसने पेड़ के नीचे बैठकर चिड़ियाँ चुगा रहे लड़के से पूछा,”क्या तुम मेरे गाँव का रास्ता बता सकते हो?”

लड़के ने कहा,”मैंने दो ही रास्ते सुने हैं, एक दोजख का, जो तुम्हारे जैसे बेरहम लोगों को बिना किसी से पूछे मिल जाता है। दूसरा मेरी तरह नेकी करने का, जो जन्नत की ओर जाता है। तुम्हें जिस पर जाना हो, बिना पूछे चले जाओ।”

शिकारी के मन में बात चुभ गई। उसने खरगोश को नजदीक की झाड़ी में स्वच्छंद घूमने−फिरने के लिए छोड़ दिया और फिर कभी शिकार न करने की कसम खाई।


स्वामी विवेकानंद का युवाओं को सन्देश

आज हम साँस्कृतिक संक्रमण के ऐतिहासिक दौर से गुजर रहे हैं। भौतिकवाद अपनी चरम पराकाष्ठा पर है। संयम, सेवा, तप, त्याग और सादगी जैसे नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के अस्तित्त्व पर गम्भीर प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है। युवा वर्ग में इनके प्रति किसी गम्भीर आस्था का सर्वथा अभाव ही दिखता है। चारों ओर जब सुख, सुविधा, वैभव-विलास एवं स्वार्थ अनाचार का ही वर्चस्व दिखाई देता है, तो संयम, सेवा, त्याग, सहिष्णुता, विनम्रता का आदर्शवादी मार्ग उसे घाटे का ही सौदा लगता है। ऐसे में युवाओं के सामने यह प्रश्न सहज ही खड़ा हो जाता है कि वह आध्यात्मिक बनें तो क्यों? वह क्यों इन्द्रिय सुखों पर अंकुश लगाकर शील संयम का जीवन जीए? वह क्यों अपने स्वार्थ सुखों की कटौती कर सेवा सज्जनता का मार्ग अपनाए? वह क्यों कर नैतिकता के नीति नियमों में बँधकर अपनी स्वतंत्रता का हनन करें? युवा हृदय को उद्वेलित करते ये प्रश्न संतोषपूर्ण समाधान माँगते हैं।

भीषण अन्तर्द्वन्द्व की इस विषादपूर्ण स्थिति में आध्यात्मिक जगत् के जाज्वल्यमान सूर्य स्वामी विवेकानन्द युवाओं को प्रखर दिशाबोध प्रदान करते हैं। उनकी दैदीप्यमान ज्ञानप्रभा के आलोक में युवाओं के दिलो-दिमाग में छाया ज्वलन्त प्रश्नों का यह सघन कुहासा परम दर परत छँटता जाता है और उनकी समस्याओं के समाधान उन्हें सहज ही मिलने लगते हैं।

स्वामी जी सर्वप्रथम युवाओं को उनके यथार्थ स्वरूप का परिचय करवाते हैं। उनकी विराट् आध्यात्मिक पृष्ठभूमि का परिचय देते हुए स्वामी जी ओजस्वी शब्दों में कहते हैं- “हे युवाओं! तुम उस सर्वशक्तिमान की सन्तानें हों। तुम उस अनन्त दिव्य अग्नि की चिंगारियां हो। इस आध्यात्मिक परिचय के साथ ही वे युवाओं का जीवन लक्ष्य स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “Each soul is potentially divine and the goal is to manifest this divinity” अर्थात् हर आत्मा मूल रूप में देवस्वरूप है और लक्ष्य इस दिव्यता को जगाना है। इस तरह मनुष्य के अन्दर की अन्तर्निहित पूर्णता को जाग्रत करने और जीवन के हर क्षेत्र में इसकी अभिव्यक्ति को ही स्वामी जी जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य घोषित करते हैं।

लक्ष्य के एक बार निर्धारित होते ही फिर इसके अनुरूप युवाओं के जीवन का गठन शुरू हो जाता है। स्वामी जी के अनुसार- लक्ष्य के अभाव में हमारी 99 प्रतिशत शक्तियाँ इधर-उधर बिखर कर नष्ट होती रहतीं है। आध्यात्मिक आदर्श के अभाव में हम अपनी अन्तर्निहित दिव्यता एवं पूर्णता को भुलाकर देह-मन तक ही अपना परिचय मान बैठते हैं और हमारे समस्त दुःख, कष्टों और विषाद का मूल कारण यह आत्म विस्मृति ही है। स्वामी जी के शब्दों में -”यह अज्ञान ही सब दुख-बुराइयों की जड़ है। इसी कारण हम स्वयं को पापी, दीन-हीन और दुष्ट-दरिद्र मान बैठे हैं और दूसरों के प्रति भी ऐसी ही धारणाएँ रखते हैं, तथा इसका एकमात्र समाधान अपनी दिव्य प्रकृति एवं आत्मशक्ति का जागरण है। वह जोर देते हुए कहते हैं कि आध्यात्मिक और मात्र आध्यात्मिक ज्ञान ही हमारे दुख मुसीबतों को सदैव के लिए समाप्त कर सकता है।’

इस तरह युवाओं के आध्यात्मिक पथ का निर्देशन करते हुए स्वामी जी कहते हैं कि जब समस्त शक्ति, समस्त समस्याओं के समाधान का स्रोत तुम्हारे अन्दर विद्यमान है, तो फिर सुख भोगों और उपलब्धियों के पीछे यह अन्तहीन भटकाव कैसा? कोल्हू के बैल की तरह न जाने तुम कितने जन्मों से तुम इसी तरह बिना कुछ पाये भटक रहे हो। और इन्द्रिय सुख एवं भोगों की इस अन्धी दौड़ का कोई अन्त भी नहीं। अस्तित्व की पूरी आहुति देने पर भी यह आग संतुष्ट होने वाली नहीं।

युवाओं की इस अन्तहीन भटकन को हृदय की गहराई से अनुभव करते हुए स्वामी जी अपने अमृत वचनों द्वारा थके-हारे संतप्त युवा मन में शक्ति का संचार करते हैं और वे कहते हैं -”मैं जानता हूँ मार्ग बहुत कठिन है, किन्तु यदि तुम्हारे अन्दर आदर्श की अग्नि प्रदीप्त है तो चिंता की कोई बात नहीं। ऐसे में मार्ग की असफलताएँ! इनकी परवाह मत करो। अरे! वे तो स्वाभाविक हैं और वे तो जीवन का सौंदर्य हैं। जीवन के इस संग्राम में धूल-मिट्टी का उड़ना तो स्वाभाविक ही है और जो इस धूल को सहन नहीं कर सकता, वह आगे कैसे बढ़ सकेगा। ये असफलताएँ तो सफलता के मार्ग की अनिवार्य सीढ़ियाँ हैं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि कोई व्यक्ति आदर्श के साथ एक हजार गल्तियाँ करता है तो बिना आदर्श के तो वह पचास हजार गल्तियाँ करेगा। इसलिए जीवन में आदर्श का होना आवश्यक है। अतः जीवन का आदर्श कभी मत छोड़ना। एक जगह तो स्वामी जी यहाँ तक कहते हैं कि गलत रास्ते पर तेजी से बढ़ने की बजाय अच्छे मार्ग पर डटे रहकर खड़े होना भी पर्याप्त है।”

इसी क्रम में स्वामी जी युवाओं को उद्बोधन करते हुए कहते हैं -तुम अपने दोषों एवं गल्तियों के लिए दूसरों को दोष क्यों देते हो? जो तुमने बोया था, वही तो काट रहे हो। इसलिए भाग्य को क्या दोष दें? दूसरों पर दोषारोपण हमें दुर्बल और सिर्फ दुर्बल ही बनाता है। अतः किसी को अपनी दुर्बलता के लिए दोष मत दो। सारी जिम्मेदारी अपने कन्धे पर लो। कहो-”यह जो कष्ट मैं झेल रहा हूँ यह मेरा रचा हुआ है। इसका अर्थ हुआ किस इसे मैं ही नष्ट कर सकता हूँ। जो मैंने खड़ा किया है उसे मैं ही ध्वस्त भी कर सकता हूँ। अतः अपने पैर पर खड़े हो, बहादुर बनो, दृढ़ बनो तथा अपनी सारी जिम्मेदारी अपने कन्धे पर लो। और जानों कि अपने भाग्य के निर्माता तुम स्वयं हो। समस्त शक्तियाँ और सफलताएँ तुम्हारे भीतर हैं। भूत यदि गरिमामय नहीं रहा तो इसकी चिंता मत करो। मरे हुए भूत को भूत के हवाले दफन के लिए छोड़ दो । अनन्त भविष्य तुम्हारे सामने है। और तुम्हें सदैव स्मरण रखना होगा कि प्रत्येक शब्द, प्रत्येक विचार और प्रत्येक कर्म तुम्हारे लिए संग्रहित रहेगा। जैसे बुरे विचार और कर्म खूंखार शेर की भाँति तुम पर झपटने के लिए सदा आतुर रहेंगे, वैसे ही अच्छे विचार और कर्मों की शक्ति भी हजारों देवदूतों के समान तुम्हारी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहेगी।”

इस तरह स्वामी जी युवाओं को अपनी जिम्मेदारी आप लेने का आवाहन करते हैं और इसमें निहित आत्म शक्ति के जागरण का मर्म बोध करवाते हुए उद्बोधन करते हैं- तभी व्यक्ति का श्रेष्ठतम स्वरूप उभर कर आता है, जब वह अपने दायित्व के प्रति पूर्णरूप से जिम्मेदारी का बोध करता है। जब हमारे सामने कोई भूत-प्रेत दोष देने के लिए नहीं है, कोई देवता हमारा बोझ उठाने वाला नहीं है, तब हम स्वयं अकेले ही जिम्मेदार होते हैं, तभी हम अपने श्रेष्ठतम रूप में सामने आते हैं और अपनी सम्भावनाओं के उच्चतम शिखरों की ओर आरोहण करते हैं।

इस तरह स्वामी जी युवाओं में उत्तरदायित्व का बोध जगाकर सहज ही उनके आध्यात्मिक जागरण एवं चरित्र गठन की ठोस पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। यह बोध जहाँ युवाओं को अवाँछनीय विचारों और कर्मों से बचाता है, वहीं उनको श्रेष्ठ चिंतन व आचरण के लिए प्रेरित करता है और अपने भाग्य निर्माता आप होने का एक नया विश्वास जगाता है। इसके साथ ही युवाओं के चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व गठन की आध्यात्मिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

स्वामी जी के शब्दों में- व्यक्ति का चरित्र और कुछ नहीं उसकी आदतों और वृत्तियों का सार भर है। हमारी आदतें और वृत्तियाँ ही चरित्र का स्वरूप निर्धारित करती है। वृत्तियों की श्रेष्ठता और निकृष्टता के अनुरूप ही चरित्र की सबलता और निर्बलता सुनिश्चित होती है। श्रेष्ठ चिंतन और आचरण के सतत अभ्यास द्वारा वृत्तियों का शोधन होता है और चरित्र गठन का कार्य मनोवाँछित दिशा में आगे बढ़ता है।

वास्तव में आध्यात्मिक पूर्णता की अनन्तता एवं असीमता को इस सानन्त एवं ससीम जीवन में मूर्त रूप देने का दुस्साहस भरा प्रयास-पुरुषार्थ ही चरित्र गठन का मर्म है। स्वामी जी के शब्दों में इससे कम में नैतिकता या आदर्श के मार्ग को अपनाना सम्भव भी नहीं है। इससे कम में युवाओं के हृदय को उद्वेलित कर रहे प्रश्नों का यथार्थ समाधान भी सम्भव नहीं है। क्योंकि कोरे उपयोगितावादी आधार (Utilitarian ground) पर किसी तरह की नैतिकता की व्याख्या सम्भव नहीं है। क्योंकि उपयोगितावादी दर्शन मात्र अपने सुख और स्वार्थ को देखता है। इसकी दृष्टि में सेवा, संयम और त्याग का मार्ग प्रत्यक्षतः घाटे का ही सौदा जान पड़ता है। स्वामी जी इस संदर्भ में कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि उपयोगितावादी अर्थात् भोगवादी दर्शन एक ओर तो अनन्त अर्थात् आध्यात्मिक पूर्णता के आदर्श को असम्भव मानता है तथा इसके लिए संघर्ष करने से रोकता है और दूसरी ओर नैतिकता की वकालत करता है। जो स्वामी के शब्दों में सम्भव नहीं है। बिना आध्यात्मिक आदर्श के नैतिक या अच्छा बनना स्वयं में लक्ष्य नहीं हो सकता। मात्र अनन्त की ओर अर्थात् अपनी आध्यात्मिक परिपूर्णता की ओर बढ़ने के जीवन आदर्श के आधार पर ही यथार्थ नैतिकता सम्भव है।

श्रेष्ठ चिंतन व आचरण के रूप में जिस चरित्र गठन का शुभारम्भ होता है, वही चित्तवृत्तियों के शोधन के साथ तप साधना का रूप ले लेता है। वृत्तियों के शोधन के साथ क्रमशः आत्मा में निहित शक्तियों का जागरण शुरू हो जाता है। इस क्रम में संयम, सहिष्णुता, नैतिकता व अन्य नीति-नियम, मार्ग के अनिवार्य सोपान बनते जाते हैं। अब युवाओं को अपने अनुत्तरित प्रश्नों के समाधान सहज ही मिलने लगते हैं। क्षणिक सुख का थोड़ा सा संयम आन्तरिक सशक्तता एवं आनन्द की एक गहरी अनुभूति देता है। स्वार्थ का थोड़ा सा त्याग, अन्दर गहरे संतोष का अनुभव बनता है। इसी क्रम में संयम, सहिष्णुता, उदारता, सेवा आदि सद्गुण जीवन के अभिन्न अंग बनते जाते हैं। जीवन में नैतिक नीति-नियमों का पालन बाह्य दबाव की बजाय अन्दर से स्फूर्त होने लगता है। जीवन के क्रियाकलाप बाहरी अनुशासन की बजाय आत्मानुशासन द्वारा संचालित होने लगते हैं।

अपने अन्दर दिव्यता की हल्की सी झलक भी, युवा हृदय को अन्तर्निहित अपार सम्भावनाओं के प्रति आश्वस्त करती है और इसके साथ ही बाहर दूसरे व्यक्तियों एवं प्राणियों में भी इसकी झलक झाँकी प्रतिभासित होने लगती है। इसी बिन्दु पर स्वामी के अनुसार ‘शिवभावे जीव सेवा’ का रहस्य उद्घाटित होता है। स्वामी जी लिखते हैं कि - “इतनी तपस्या के बाद में इस वास्तविक सच्चाई को समझ पाया हूँ कि ईश्वर ही हर प्राणी में है। जो जीव सेवा करता है, वह ईश्वर सेवा करता है। जो इस प्रकट ईश्वर की सेवा नहीं कर सकते हो, उस अप्रकट ईश्वर की सेवा कैसे कर पाओगे। इसलिए वे कहते हैं कि प्रत्येक पुरुष, स्त्री और सभी प्राणियों को भगवान् के रूप में देखो। इनकी सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।” आज के युवा यदि इन आदर्शों के अनुरूप अपना जीवन गढ़ने के लिए कटिबद्ध हो जायँ तो स्वामी जी के शब्दों में, फिर वे अधिक देर तक अन्धकार में नहीं भटकेंगे। आध्यात्मिक जीवन शैली के सतत् अभ्यास के साथ हमारे अन्तर से आत्म सूर्य का प्रकाश उदित होगा, जो शनैः-शनैः हमारे जीवन के अन्धेरे कोनों को प्रकाशित करेगा। इसी के साथ क्रमशः शक्ति का उद्भव होगा। जो अभी लड़खड़ा रहा है, वह धीरे-धीरे मजबूत होता जायेगा और शीघ्र ही वह दिन आयेगा जब सत्य हमारे दिलो-दिमाग पर इस कदर छा जायेगा कि वह हमारी धमनियों में से प्रवाहित होने लगेगा तथा हमारे जीवन से आचरण की भाषा में छलकने लगेगा।


सुग्रीव का राज्याभिषेक (kahani)

सुग्रीव का राज्याभिषेक हो चुका था। वे श्रीराम के बल की प्रशंसा करते हुए कहने लगे, उन्होंने बालि जैसे बलवान को एक ही बाण से धराशायी कर दिया।

राम बोले, देखने वालों को यही लगा, परंतु बालि के दोषों ने उसको छेद−छेद कर जर्जर बना दिया था, इसीलिए सिद्धाँत के एक ही आक्रमण से वह ढह गया।

धन्वंतरि के विद्यालय में वाग्भट्ट आयुर्वेद पढ़ रहे थे। उनकी पीठ में एक भयंकर फोड़ा निकला। उपचार के लिए एक जड़ी की आवश्यकता पड़ी। गुरुदेव ने उसका नाम बताया, आकृति समझाई और वनप्रदेश में उसे खोजकर लाने के लिए भेजा।

वाग्भट्ट तीन महीने तक ध्यानपूर्वक जड़ी−बूटियाँ खोजते रहे। अनेक प्रकार की देख−समझीं, पर अभीष्ट औषधि मिली नहीं, वे वापस लौट आए।

धन्वंतरि ने विवरण सुना तो ज्ञानवृद्धि और नई खोज पर प्रसन्नता व्यक्त की।

दूसरे दिन छात्र को लेकर वे पड़ोस के खेत में गए और अभीष्ट औषधि उखाड़ लाए। सेवन कराई तो छात्र कुछ ही दिन में अच्छा हो गया। अवसर पाकर वाग्भट्ट ने गुरुदेव से पूछा,”भगवन्! औषधि तो पास में ही खड़ी थी, फिर मुझे इतने कष्टसाध्य प्रयास के लिए क्यों भेजा?”

धन्वंतरि ने कहा, “वत्स! प्रयोजन−लाभ की तुलना में ज्ञान और अनुभव का संपादन अधिक महत्त्वपूर्ण है। तुम इस कारण इतना पुरुषार्थ कर सके, वह लाभ अनायास की उपलब्धि से कहाँ मिल पाता।”


महानिर्वाण की अनुभूति

‘पुण्योगन्धः पृथ्वायाम्’- हवाओं में बिखरती पद्मगन्ध इस आर्षवचन को सार्थक कर रही थी। भगवान् तथागत अपनी गन्धकुटी में बैठे थे। भगवान् की तपःपूत देह ही इस पद्मगन्ध का स्रोत थी। वह जहाँ बैठते, जहाँ भी समाधि लीन होते, वहाँ का सम्पूर्ण वातावरण उनकी दिव्य सुगन्ध से महक उठता था। उनके आवास स्थान के कण-कण में यह दिव्य सुरभि भर जाती थी। यही कारण था कि आश्चर्य विभोर हुए भगवान् के शिष्यों ने उनके आवास स्थान को गन्धकुटी नाम दिया था। तथागत जहाँ भी रहते, वह स्थान गन्धकुटी के नाम से जाना जाता।

एक बार जिज्ञासु जनों का समाधान करते हुए भगवान् ने कहा था- भन्ते! यह देह पृथ्वीतत्त्व प्रधान है। इसका स्वाभाविक गुण पुण्य गन्ध है। परन्तु इसमें आश्रय पाने वाले विचारों के विकारों ने, भावनाओं के प्रदूषण ने, प्राण की दूषित दशा ने इस पुण्य गन्ध को नष्ट कर दिया है। इन दोष-दुर्गुणों से कभी-कभी स्थिति इतनी दूषित हो जाती है कि सुगन्ध बिखेरने का स्वभाव रखने वाली देह से दुर्गन्ध फूटने लगती है। लेकिन तप की प्रचण्डता से, विचार, भावनाओं एवं प्राण की पवित्रता फिर से लौट आती है। और देह पद्मगन्ध का स्रोत बन जाती है।

भगवान् के इन वचनों का मर्म स्वयं भगवान् की उपस्थिति थी। वह जहाँ भी अपने सम्बुद्ध शिष्यों के साथ बैठते, वहीं दिव्य कमल बन अवतरित हो जाता। हवाओं में स्वर्गीय भाव सघन हो जाते। यह सघनता इतनी सक्रिय होती थी कि इसकी छोटी सी छुअन भी प्राणों में पुलकन भर देती। मानव चेतना सहज ही दिव्य भावों को छूने लगती। सामान्य प्राणों में भी दिव्य भाव मचल उठते। भगवान् तथागत की समाधि लीन चेतना के सान्निध्य में सामान्य साधक भी समाधि की ओर उन्मुख होने लगते। जिनकी साधना प्रखर थी, उनके लिए तो भगवान् का स्पर्श निर्वाण के महाद्वार खोलने वाला था।

भगवान् दिव्य भावों के सघन महाभाव थे। आज वह अपनी गन्धकुटी के अन्तःकक्ष में भावलीन दशा में बैठे थे। तभी तीस भिक्षुओं ने आकर उन्हें प्रणाम किया। उनके प्रणाम के उत्तर में तथागत का नेत्र थोड़ा उन्मीलित हुए। अधरों पर हल्की सी स्मित रेखा उभरी। भौहों में रहस्यमय संकेत सघन हुआ। अन्तस् में परावाणी के स्वर उभरे। जिन्हें आगन्तुक भिक्षुओं ने मौन की निरवता में सुना। इन भिक्षुओं को अपने साथ लाने वाले भदन्त आनन्द इस अलौकिक कार्य व्यापार को समझ नहीं पाए।

भगवान् के अनेकों अलौकिक कार्यों के वह साक्षी थे। उनके सान्निध्य में अनेकों आश्चर्यों को उन्होंने सघन होते हुए देखा था। शास्ता के अनगिन दिव्य भावों ने उनके सामने आकार लिया था। स्वर्लोक, महःलोक की दिव्य विभूतियों को उन्होंने भगवान् के सम्मुख साष्टांग होते हुए देखा था। पर आज की कथा तो सर्वथा निराली थी। आज तो जैसे शास्ता इस लोक में उपस्थित होते हुए भी अनुपस्थित थे। आनन्द चकित तो हुए, पर कुछ सोच न पाए। बस प्रत्यक्ष में उन्होंने इतना भर देखा कि उनके साथ आने वाले तीसों भिक्षु भगवान् के सम्मुख अर्धचन्द्राकार घेरे में क्रमवार बैठ गए।

महाभिक्षु आनन्द ने बाहर आकर कक्ष का द्वार बन्द किया। और पहरा देने लगे। पल-क्षण बीते, घड़ी-प्रहर बीते। अब तो दिवस भी बीत चला। पर न तो कक्ष के द्वार खुले और न ही कोई बाहर निकला। आनन्द का धैर्य चुकने लगा। वे बार-बार चिन्तित हो सोच रहे थे, बड़ी देर हो गयी, बड़ी देर हो गयी, अब आखिर और कितनी देर। आखिर ऐसा क्या होने लगा कक्ष में। वार्तालाप की भी तो कोई ध्वनि नहीं है। शास्ता के सेवक का धर्म निभाते हुए उन्होंने यह भी सोचा- आखिर ये भिक्षु और कितना सताएंगे भगवान् को। इन्होंने जितना समय माँगा था, उससे तो दुगुना समय हो गया।

अब तो सारी सीमाएँ पार हो गयीं महाभिक्षु आनन्द के धीरज की। वह उठे। उन्होंने दरवाजे से झाँक कर देखा। देखकर वह बड़े ही हैरान हुए। क्योंकि वहाँ तो भगवान् अकेले बैठे हुए थे। जो तीस भिक्षु उनके साथ यहाँ तक आए थे, उनका कोई भी अता-पता नहीं था। महाहैरान आनन्द को महाआश्चर्य ने घेर लिया। एक बार नहीं कई बार उन्होंने अपनी आँखें मली। पर उन्हें भरोसा न आया। वह सोचने लगे कि आखिर हुआ क्या है? इस कक्ष में दरवाजा तो एक ही है। और उस दरवाजे पर वह स्वयं बैठे हुए हैं। उनके सामने तो कोई भी कहीं नहीं निकला।

थक-हार कर उन्होंने भगवान् से ही इस भेद को पूछने का निश्चय किया। थोड़ी हिचकिचाहट, थोड़े भय और भारी श्रद्धा से सकुचते-सहमते हुए उन्होंने प्रभु से प्रकट रूप में पूछा- भन्ते! कुछ भिक्षु आपसे मिलने आए थे। यह क्या चमत्कार! वे कहाँ हैं? बाहर तो उनमें से कोई निकला नहीं, क्योंकि बाहर द्वार पर मैं बैठा हूँ। निकलने का अन्य कोई द्वार इस कक्ष में है नहीं। इसलिए वे बाहर किसी भी तरह जा नहीं सके। तब आखिर वे गए कहाँ?

आनन्द की इस प्रश्न शृंखला पर बुद्ध विहंसे। फिर बड़ी ही कृपापूर्ण दृष्टि आनन्द पर डालते हुए बोले- वे गए आनन्द, वे चले गए, वे आकाश मार्ग से चले गए पुत्र। चकित आनन्द से संभ्रमित होते हुए कहा, प्रभु आप मुझे इस तरह आश्चर्यों के चक्र में न डालें। भगवान् आप मुझे उलझाएँ मत। पहेलियाँ न बुझाएँ, सीधी-सीधी भाषा में कहें, वे गए कहाँ? क्योंकि मैं द्वार पर बैठा हूँ और पूरा सजग हूँ।

वत्स चकित मत हो, तुम्हें चौंकने की जरूरत नहीं है। आनन्द- वे सबके सब भीतर के आकाश से समाधि में उतर गए। इस अन्तर आकाश में उतरने के लिए किसी और द्वार से जाने की जरूरत नहीं है। भगवान् अपने भिक्षुओं को यह कथा कह रहे थे, तभी कक्ष के द्वार से आकाश में हंस उड़ते हुए दिखाई दिए। उन्हें देखकर भगवान् ने कहा- देखा आनन्द, पुत्र द्वार के बाहर देखो जैसे आकाश में हंस उड़ रहे हैं, ऐसे ही वे भी उड़ गए। आनन्द ने पूछा, तो क्या वे उड़कर हंस हो गए? गए कहाँ? अपनी आध्यात्मिक मुस्कान की सघनता के साथ शास्ता ने कहा- वे परमहंस हो गए, आनन्द।

फिर आश्चर्य से जड़ीभूत हुए आनन्द से यह गाथा कही-

हंसादिच्चपथे यंति आकासे यंति इद्धिया। नीयंति धीरा लोकम्हा जेत्वा मारं सवाहिनी॥

‘हंस सूर्यपथ से जाते हैं। ऋद्धि से योगी भी आकाश में गमन करते हैं। इसी तरह धीर पुरुष सेनासहित मार को पराजित कर लोक से निर्वाण में चले जाते हैं।’

इस धम्मगाथा को सुनने के बाद भी आनन्द की समझ में इसका रहस्य न आया। तब भगवान् ने अपने कथन को और भी स्पष्ट करते हुए कहा- जैसे हंस आकाश में उड़ते हैं, ऐसा एक और आकाश है- अन्तर का आकाश, जहाँ परमहंस उड़ते हैं। जैसे हंस आकाश में उड़ते हैं, दूर की यात्रा करते हैं, ऐसे परमहंस अन्तर के आकाश में उड़ते हैं। वे शैतान की सारी सेना को मारकर, लोक से निर्वाण को चले जाते हैं।

लेकिन भगवान् उन भिक्षुओं के शरीर का क्या हुआ? प्रश्न के उत्तर में भगवान् बोले, वे भिक्षु महायोगी थे आनन्द। जब उनकी अन्तर्चेतनायें महानिर्वाण में लीन होने लगीं, तब उन्होंने योगबल से पंचभूतों की अपनी देहों को योगबल से विघटित कर दिया। योगीजनों के ऐसे क्रियाकलापों पर चकित नहीं होना चाहिए। बस उनकी तपःपूत देहों के अवशेष के रूप में यह सब ओर पद्मगन्ध बिखरी है। इसी में उनके महानिर्वाण की अनुभूति करो।


असंभव को भी संभव (kahani)

जापान का प्रसिद्ध सेनापति नोबुनागा कम सैनिकों व थोड़े साधनों से ही अपने समर्थ विरोधियों के छक्के छुड़ा देने के लिए प्रख्यात था। वह अपने साथियों का मनोबल बढ़ाए रखने की कला में बहुत कुशल था।

एक बार थोड़े सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए उसने एक तरकीब निकाली। देवता के मंदिर में उन्हें लेकर गया और सिक्के उछालकर देवता की इच्छा सिद्ध करने लगा। सिक्के चित पड़ें तो जीत, पट्ट पड़ें तो हार समझी जानी थी।

सिक्के तीन बार उछाले गए। तीनों ही बार चित पड़े। सभी हर्ष से नाचने लगे। तालियाँ बजाते हुए चिल्लाने लगे, जीत, जीत, जीत!

लड़ाई लड़ी गई। चार गुनी अधिक संख्या वाले विपक्ष को उन बहादुरों ने तोड़−मरोड़कर रख दिया और विजय का डंका बजाते हुए वापस लौटे।

अभिनंदन समारोह में नोबुनागा ने उसे सैनिकों की नहीं, उनके मनोबल की विजय बताया और रहस्य खोलते हुए वे सिक्के दिखाए, जो उछाले गए थे। वे इस चतुरता के साथ ढाले गए थे कि दोनों ओर वही मार्का था, जो चित कहा जाता था।

आत्मविश्वास से बड़ी कोई शक्ति नहीं, वह असंभव को भी संभव कर दिखाती है।


प्रेरणा में होता है दुर्धर्ष आत्मबल

प्रेरणा सफलता का दिव्य प्राण है, मूल मंत्र है। सफल व्यक्तियों के जीवन का क्षण-क्षण प्रेरणा के प्रभाव से प्रकाशित होता है। ये प्रेरणा के घनीभूत आलोक होते हैं। जिनके प्रेरणादायी सजल भावनाओं एवं प्रखर विचारों के मर्मस्पर्शी छुअन से न जाने कितने ही अपने जीवन की व जाने कितने अन्यों की दिशाधारा बदल देते हैं। इन प्रेरणाओं के पुण्य प्रवाह की पावनता के सान्निध्य में जीवन के आयाम परिवर्तित हो जाते हैं। अन्तः प्रेरणा एक दिव्य एवं ईश्वरीय संदेश है। वहाँ सद्भाव, सद्ज्ञान एवं सद्विचार की त्रिवेणी बहती है और इसी संगम पर पुण्य प्रेरणा प्रवाह का उदय होता है।

प्रेरणा का यह पुण्य प्रवाह जब जीवन में उमड़ने लगता है तो जीवन की जड़ता, शुष्कता, कठोरता विलीन होने लगती है, घटने-मिटने लगती है। जीवन में आये ठहराव में फिर से हलचल होने लगती है और यह हलचल तीव्रगामी तरंगों में तरंगित होने लगती है। अन्तर संवेदना के स्रोत फूट पड़ते हैं और अनुभूति व सफलता की अदृश्य ऊर्जा प्रकट-प्रत्यक्ष होने लगती है। फिर जीवन संवेदना, भावना एवं करुणा की चैतन्य चेतना की ओर अग्रसर होने लगता है। इसके मूल में प्रेरणा के प्राण ही हिलोरें लेते हैं।

साधु सन्तों के प्रेरणादायी विचारों के प्रभाव से दासी पुत्र नारद के जीवन में नये मार्ग खुले और वे इन्हीं प्रेरणाओं से देवर्षि नारद कहलाये। उन्हीं की प्रेरणा ही प्रह्लाद की भक्ति और जगदम्बा पार्वती की पावन तपस्या में घनीभूत हुई थी। तपस्या के चरम शिखर से बारम्बार गिरने वाले विश्वामित्र की प्रखर अंतःप्रेरणा ही थी जो उन्हें उतने ही बार उठायी और उसे शिखर पर आरुढ़ करती रही। प्रेरणा में प्रबल इच्छाशक्ति जुड़ी रहती है, दुर्धर्ष आत्मबल भरा रहता है। यही साहस और सामर्थ्य के रूप में प्रकट होता है जो कैसी भी विघ्न-बाधाओं, कठिनाइयों और संघर्षों को चुनौती देने में आनन्द व उत्सव मनाता है। और यही प्रेरणा राजा विश्वरथ को ब्रह्मर्षि विश्वामित्र बनाने में सहायक सिद्ध हुई।

प्रेरणा प्रकाश स्रोत है। जो प्रतिकूलता के घने कुहासे को चीरकर आशाओं की सतरंगी आभा बिखेरती है। अभाव के दर्द भरे दलदल में समृद्धि का भव्य भवन खड़ा करती है। और आसक्ति के मलीन-धूमिल आकाश में सामर्थ्य का सूर्य उदय करती है। असफलता के असहाय क्षणों में प्रेरणा ही जीने का सहारा देती है आगे बढ़ने का हौसला देती है। यही है जो जीवन को जीवन्त बना देती है तथा हर विषमताओं में विश्वास का बल भरती है और दुर्गम और असम्भव सा लगने वाला लक्ष्य सहजता-सरलता से मिल जाता है। इसी कारण पतन-पराभव से जर्जर मानसिकता प्रगति-उन्नति की ऊर्जा से ऊर्जान्वित हो जाती है। फिर जीवन में बिखराव रुकता है, भटकाव थमता है व उमंगों के अनगिन बुझे दीप जगमगा उठते हैं।

प्रेरणा की यह उमंग और उत्साह स्वप्रेरित भी होती है। यह मनोजगत की चेतना से उत्पन्न होती है और यह प्रेरणा, प्रकाश पुरुषों के माध्यम से भी प्रवाहित होती है। ऐसे ही प्रेरणा पुरुष थे सुकरात। जिनकी प्रेरणा से प्लेटो ने अपने महनीय गुरु के दर्शन के गूढ़ सूत्रों को दर्शन शास्त्र में परिणित कर दिया। उनके विचारों को सरल-सहज बनाकर सबके समक्ष सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया। उनके पीछे सुकरात की प्रेरणा ही कार्य कर रही थी। दिव्य प्रेरणा के प्रतिनिधि स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा का प्रभाव ही था कि आयरलैण्ड संस्कृति में पली-बढ़ी मार्गरेट नोबुल भारत माता के लिए पूर्णतया समर्पित हो गयी, निवेदित हो गयी। पुण्य भूमि भारत के लिए यह चीर निवेदन ही उन्हें निवेदिता के पद से अलंकृत किया। यही नहीं स्थूल देह में न होने पर भी स्वामी जी अभी भी भावलोक में विश्व कल्याण के लिए तपस्यारत हैं। वहीं से उनके प्रेरणाप्रद विचार अपना आलोक बिखेरते रहते हैं। उनके दिव्य विचारों एवं सजल भावों से उत्प्रेरित होकर अभी भी असंख्य जन उन्हें अपना ईष्ट,आदर्श मानते हैं। वह सब उनके तपोमयी प्रेरणा का ही प्रभाव है।

प्रेरणा हमारे प्रयास-पुरुषार्थ के पीछे छिपी-बैठी असीम शक्ति है। यही हमें अपनी प्रबलता- दिव्यता का पल-पल प्रतिपल अहसास कराती है। यदि हमारा अंतर्मन पावन व पवित्र हो तो इसका अनुभव और भी गहरा हो सकता है। इसी गहराई-गम्भीरता में प्रेरणा का प्राण आत्मा का आवास है। अध्यात्म के तमाम साधन-साधनाएँ इसी गहराई में उतर कर आत्मप्रेरणा से प्रेरित होती हैं। श्रीअरविन्द, महर्षि रमण, रामकृष्ण परमहंस अपने दिव्य पुरुषार्थ-साधना से इस आत्म प्रेरणा से अनुप्राणित हो सके थे। उनका प्रेरणा स्रोत उनके अपने अन्दर में विद्यमान था। वही आत्म प्रेरणा ही उनका सद्गुरु थी।

सामान्य जनों के लिए भी यही सत्य यथार्थ है, परन्तु अपने अन्दर में उठती-उफनती उस प्रेरणा को पाने के लिए ऐसे किसी मार्गदर्शक सत्ता, सद्गुरु की आवश्यकता पड़ती है। यह गहरे उतरने की बात है, प्रेरणा स्रोत से साक्षात्कार करने की बात है, परन्तु अपने दैनिक जीवन में सच्चाई के पथ पर बढ़ने के लिए, प्रगति उन्नति एवं सफलता पाने के लिए किसी सफल एवं सुयोग्य व्यक्ति के विचारों से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। उससे प्रेरणा लेनी चाहिए कि सफलता की राह कितनी ही कठिनाइयों-समस्याओं से घिरकर आगे बढ़ती है। यह डगर कंटकाकीर्ण होने के बावजूद, इसमें बढ़ने वालों को लहूलुहान होने देखने के बावजूद, उस जज्बा और साहस को कमने-थमने नहीं देती। अन्त में इसी पथ पर अन्वेषण के फूल खिलते हैं और सफलता की सुगन्ध फैलती है। यही प्रेरणा ही हमारी सफलता की धरोहर व थाती है।

यही सफलता स्वयं के लिए प्रेरणादायी बन जाती है तथा दूसरों को भी इसी त्याग-बलिदान के पथ की ओर प्रेरित करती है। प्रेरणा ग्रहण करना तथा प्रेरणादायक बनना हमारी सनातन परम्परा है। जिसमें स्नान कर अनगिनत-असंख्यों ने अपनी जिन्दगी की दिशा और दशा बदल दी। आज भी यह स्रोत अक्षुण्ण है । सतत-निरन्तर प्रवाहित है जो आने वाले दिनों में न जाने कितनों के भाग्य व भविष्य को बदल देने की क्षमता रखती है। प्रेरणा प्रगति व विकास की बहती पुण्यतोया पावन धारा है। अतः हमें अपने प्रेरणापुञ्ज से सदैव जुड़े रहना चाहिए। यही हमें उत्साहित-प्रोत्साहित करने का एकमात्र माध्यम है। अगर हम अपने अन्दर इस दिव्य प्रेरणा को विचारों-भावनाओं एवं दैनिक जीवन के हर छोटे-बड़े कार्यों में उतार सकें, तो हम भी किसी और के लिए प्रेरणास्पद आलोक बन सकते हैं। अतः प्रेरणा रूपी इस दिव्य अनुदान से हमें वंचित नहीं होना चाहिए। सदा मन और भावना से जुड़े रहना चाहिए। इसी में जीवन की सफलता है।


क्रोध आया (kahani)

कम्बोज के राजा विंगमिंग अपने राज्य के लिए किसी धर्म−पुरोहित की खोज में थे।

तीर्थाटन करते हुए एक विद्वान राजदरबार में पहुंचे और बोले,”मैं त्रिपिटकाचार्य हूँ। मैंने बौद्ध धर्म का गहन अवगाहन किया है। राज्य−पुरोहित के रिक्त स्थान को भरने की अपने में मैंने क्षमता देखी, सो उस पद को पाने के लिए आपकी सेवा में चला आया।”

राजा ने त्रिपिटकाचार्य का यथोचित सम्मान किया और कहा,”आपने जो पढ़ा है, कृपया उसे एक बार फिर पढ़ें और मनन करें, तब आपको वह पद सौंपने का प्रसंग बनेगा।”

आचार्य को बहुत क्रोध आया। यह उनकी विद्या का मखौल था। तो भी राजा से झगड़ने की अपेक्षा एक वर्ष का समय निकाल देने में उनने बुद्धिमानी समझी।

दूसरे वर्ष फिर वे पहुँचे। राजा ने एक वर्ष के लिए धर्म का और अधिक मनन−चिंतन करने की बात कहकर टाल दिया।

पुरोहित को बहुत खीज आई और वे दरबार में जाने की अपेक्षा तक नदी तट पर एकाँतसेवन की उपासना करने लगे।

राजा टोह लेते रहे। नई कार्यपद्धति की सूचना पाकर वे दरबारियों समेत उन्हें चलने का आग्रह करने पहुँचे।

अबकी बार पुरोहित ने कहा,”अप्प दीपो भव! अर्थात् अपने को दीपक बनाओ, ताकि उपदेश से नहीं, चरित्र से लोग प्रकाश ग्रहण कर सकें।”

राजा ने कहा,”इसी विशेषता वाले सच्चे धर्मोपदेशक होते हैं। आपको उस स्थिति तक पहुँचा देखकर हम सब निमंत्रित करने आए हैं।”


योग विज्ञान सुलझाएगा व्यक्तित्व-विघटन की गुत्थी को

वर्तमान युग में व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया अवरुद्ध सी पड़ गयी है, जिसके कारण मानवीय व्यक्तित्व युग की भोगवादी आँधी में छिन्न-भिन्न हो रहा है। उसके आन्तरिक विघटन की स्थिति बहुत गम्भीर बनी हुई है। समाज एवं वातावरण में व्याप्त आतंक, अराजकता एवं अशान्ति का साया, इसी आन्तरिक टूटन, सड़न, कुढ़न एवं आक्रोश की बाह्य अभिव्यक्ति मात्र है। युद्धोन्माद, आतंकवाद, जातीय एवं साम्प्रदायिक हिंसा, भ्रष्टाचार, नारी उत्पीड़न, बलात्कार, आत्महत्या जैसी गम्भीर सामाजिक समस्याएँ मानवीय व्यक्तित्व के आन्तरिक विखण्डन की ही बाह्य प्रतिकृतियाँ है।

बढ़ते मनोरोगों की आँधी एवं व्यक्तित्व विकारों की बाढ़ युग की गम्भीर समस्या बन गई है। वस्तुतः हम मानवीय चेतना के गम्भीर संकट से गुजर रहे हैं। न्यूरोसिस, साइकोसिस, सिजोफ्रेनिया जैसे बिखराव एवं विखण्डन के परिचायक शब्द आज प्रचलित मुहावरे बन गये हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार 80 से 90 प्रतिशत बीमारियां मानवीय चेतना की आन्तरिक टूटन एवं विघटन का परिणाम है। यही बाहर व्यक्तित्व के बिखराव एवं विघटन के रूप में प्रकट होता है। व्यक्तित्व का गठन आज के मानव के लिए एक केन्द्रीय आवश्यकता ही नहीं प्रमुख समस्या भी बन गई है। स्थिति की गम्भीरता पर प्रकाश डालते हुए मनोविद् इरा प्रोगोफ का कहना है कि “ आधुनिक व्यक्ति में आत्याँतिक रूपांतरण की प्रक्रिया द्वारा ही मानवीय सभ्यता के इस विनाश से हम बच सकते हैं, जो अन्यथा सुनिश्चित है।”

मानवीय चेतना के इस संकट और व्यक्तित्व विघटन के दौर में इनके उपचार के प्रयास न हो रहे हों, ऐसी बात नहीं है। दार्शनिक, धार्मिक एवं वैज्ञानिक हर स्तर पर कुछ न कुछ प्रयास चल रहे हैं, किन्तु इनकी परिसीमाएँ स्पष्ट हैं। दार्शनिक प्रयास प्रमुखतया बौद्धिक ऊहापोह तक सीमित है, इनकी व्यवहारिक उपयोगिता संदिग्ध ही बनी है। दूसरा धार्मिक प्रयासों की सीमा उनकी रूढ़िवादिता, हठधर्मिता, पूर्वाग्रहों एवं अवैज्ञानिकता के कारण एक छोटे दायरे में ही सिमट जाती है। वैज्ञानिक प्रयास जैविक हेर-फेर (जैसे जीन परिवर्तन, क्लोनिंग आदि) तक सीमित होने के कारण अभी सतहों में ही भटक रहे हैं। जबकि मानवीय व्यक्तित्व मात्र जैविक रसायनों का संगठन भर नहीं है, इसकी अपनी मनोवैज्ञानिक एवं उससे उच्चतर आध्यात्मिक सत्ता भी है।

मानसिक स्तर पर व्यक्तित्व के अध्ययन अन्वेषण एवं चिकित्सकीय प्रयासों में मनोविज्ञान की भूमिका निस्संदेह रूप से उल्लेखनीय है। इस संदर्भ में आधुनिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में फ्रायड का उद्भव निस्संदेह रूप से एक युगान्तरीय घटना रही है।

इनकी अचेतन मन की अवधारणा एक क्रान्तिकारी कदम थी, जिसने मानव चेतना की जटिल क्रियाओं एवं उनकी रुग्णता को समझने की एक नई दृष्टि दी। व्यक्तित्व के संदर्भ में इनकी इदम् (ढ्ढस्रद्व), अहम् (श्वद्दश) और परमअहं (स्ह्वश्चद्गह्-द्गद्दश) की अवधारणाओं ने मानवीय चेतना की अतल गहराइयों में प्रवेश करने और इसकी गुत्थियों को सुलझाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। आधुनिक मनोविज्ञान के संदर्भ में मनोविश्लेषण को मनोविज्ञान से निकाल देने पर शेष बहुत कम महत्त्व की बातें रह जाती हैं, किन्तु अपनी नैदानिक भूमिका के बावजूद फ्रायड के सिद्धान्त गम्भीर त्रुटियों से ग्रस्त हैं। लारेंस हाइड के शब्दों में -”इसकी मौलिक त्रुटि तब प्रकट होती है जब विकार ग्रसित व्यक्ति को रुग्णता से सामान्यता की ओर बजाय, उसे और उच्चतर स्तरों तक ले जाना होता है।” मानव व्यक्तित्व के समग्र विकास के संदर्भ में यह एक गम्भीर दोष है कि फ्रायडवादी मनोविज्ञान मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों का दास ठहराता है और उसके आत्म विकास की सम्भावनाओं को अवरुद्ध करता है। यौन स्वच्छन्दता, नियतिवाद और अनैतिकता को प्रश्रय देने के कारण फ्रेंकल इस मत को भ्रामक ही नहीं बल्कि खतरनाक भी मानते हैं।

यहाँ युँग द्वारा प्रतिपादित वैयक्तिकता (Individuation) की धारणा अधिक गम्भीर एवं व्यापक है और व्यक्तित्व को एक सार्थक उद्देश्य की ओर ले जाती है साथ ही यह भारतीय चिंतन के बहुत समीप है, किन्तु मानवीय चेतना की समग्र समझ के प्रति युँग भ्रमित से जान पड़ते हैं। जब वे मानवीय चेतना के विवेक संगत एवं अविवेकी, उच्चतर एवं निम्नतर तत्त्वों को अचेतन में विद्यमान मानते हैं। वे अतिचेतन को अचेतन से अलग चेतना के एक स्वतंत्र रूप में नहीं समझ पाते हैं। परिणामस्वरूप युँग का विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान एक सीमित और नियतिवादी दिशा की ओर बढ़ता प्रतीत होता है और उनके व्यक्तित्व गठन में भी अहं का स्थान केन्द्रित बना रहता है। इस संदर्भ में युँग के शोध का अन्तिम सार स्व (Self) की अवधारणा बहुत संकुचित, प्रतिबन्धित और सापेक्ष है, जिसे अन्तिम स्वीकृति नहीं दी जा सकती। इस तरह फ्रायड से भिन्न युँग व्यक्तित्व गठन के सम्बन्ध में जिस मूल्याधारित एवं नैतिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हैं उसे समग्र नहीं कहा जा सकता। फ्रायड की विचारधारा के संशोधन एवं परिवर्धन के क्रम में विकसित नव्य फ्रायडवादी धाराएँ (एरीकफ्राँम, एरिक्सन, करेनहाँर्नी, सुलीवान आदि) व्यक्तित्व का सामाजिक संदर्भ में विशेष महत्त्व देती हैं और अहं के इर्द-गिर्द केन्द्रित है। यही स्थिति आधुनिक में प्रचलित अन्य धाराओं की है।

मानवीय चेतना एवं व्यक्तित्व के अध्ययन के संदर्भ में मैस्लो द्वारा प्रवर्तित मानवतावाद की विचारधारा यहाँ उल्लेखनीय है। इन्होंने आत्म सिद्धि (Self Actualization) और मेटानीडस (Meta needs) जैसी आवश्यकताओं को मानव प्रकृति से जोड़कर आधुनिक मनोविज्ञान को फ्रायडवादियों और व्यवहारवादियों के याँत्रिक और निराशावादी शिकंजे से उबारकर उच्चतर सम्भावनाओं की ओर प्रवृत्त किया है। मानव प्रकृति के आध्यात्मिक आयाम का रेखाँकन इनकी महत्त्वपूर्ण देन है। किन्तु मैस्लो की आत्मसिद्धि का आदर्श भी अहं की सत्ता पर आधारित है। साथ ही उनके द्वारा अन्तिम दिनों में प्रतिपादित स्व-अतिक्रमण (Self-Transcendence) की आवश्यकता (जिस पर आज का ट्राँस-पर्सनल मनोविज्ञान विकसित हो रहा है) मनुष्य की आध्यात्मिक परिपूर्णता की चाह की ओर संकेत करती है, किन्तु उनका यह मत युँग की तरह ठोस तत्त्वमीमाँसीय या दार्शनिक आधार के अभाव में अभी अधूरा ही है। अपनी तमाम उच्चतर सम्भावनाओं के बावजूद इनका आदर्श मनोजैविक प्रकृति की ही चरम विकसित अवस्था के इर्द-गिर्द परिचालित है। यहाँ साइकोसिन्थेसिस एवं ट्राँसपर्सनल मनोविज्ञान की धाराएँ इस सीमा का अतिक्रमण करती प्रतीत होती हैं, किन्तु अपनी तत्त्व मीमाँसीय त्रुटियों एवं सुस्पष्ट क्रिया पद्धति के अभाव में वे अभी समग्रता से दूर ही हैं।

वस्तुतः व्यक्तित्व विकास के महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर आधुनिक मनोविज्ञान की मौलिक त्रुटि मानवीय चेतना की अधूरी समझ है। इसी कारण व्यक्तित्व उपचार एवं संगठन सम्बन्धी इसके प्रयास एक सीमा तक ही आगे बढ़ पाते हैं और जहाँ प्रश्न इसके आत्याँतिक उपचार एवं समग्र विकास का हो तो वहाँ यह चुप्पी साध लेता है। वस्तुतः यह मानवीय चेतना की समग्र समझ के आधार पर ही सम्भव है। श्रीअरविन्द के शब्दों में- “चेतना को सामान्यतया मन का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि मानव चेतना मात्र मानवीय परिसीमा है, जो चेतना के समस्त स्तरों का प्रतिनिधित्व नहीं करता।”

मानवीय चेतना जल में पड़ी बर्फ शिला की भाँति है। इसका जितना हिस्सा जागते समय वाले क्रियाकलापों के माध्यम से प्रकट होता है, उससे कई गुना अन्दर है। जिन थोड़े लोगों (मनोवैज्ञानिकों) ने आन्तरिक गहराइयों में झाँकने की कोशिश की, वे अन्तराल के किसी कोने की धुँधला और अस्पष्ट झलक ही पा सके। जबकि अन्तराल के किसी कोने को देखकर समूचे के बारे में कोई राय नहीं दी जा सकती। और वर्तमान मनोवैज्ञानिक अध्ययन में इस तरह की भूलें सामान्य बात है। इन्हें भूलें कहें या भ्रम कुछ इस तरह से हैं-

1. मन और आत्मा को एक ही चीज मान लेना,

2. मन को समस्त चेतना के रूप में मान्यता देना,

3. शरीर के चेतनात्मक (आध्यात्मिक) महत्त्व को अस्वीकृत कर देना।

व्यक्तित्व उपचार एवं विकास की समग्रता के संदर्भ में चेतना के आधार (आत्मा) को भुला देना ही आधुनिक मनोविज्ञान की सबसे बड़ी भूल है। इसी भूल के कारण वह अपने लक्ष्य से दूर अन्यत्र पहुँच गया है। अतः चेतना सत्ता (आत्मचेतना) का अध्ययन इसका प्रमुख विषय होना चाहिए। इसी कारण वह मानव प्रकृति का सार तत्त्व समझे बिना अपने अध्ययन, अन्वेषण में लगा है और वह एक ऐसी विषय-वस्तु का अध्ययन करता है, जिसकी सदाशयता से वह अपरिचित है। इस तरह अपनी मनोजैविक परिसीमाओं में सक्रिय आधुनिक मनोविज्ञान, व्यक्तित्व के विकास के सम्बन्ध में एक सीमा तक अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है किन्तु आँशिक रूप से ही सफल हो पाता है। युग के उत्कृष्ट चिंतक स्वामी प्रणवानन्द के शब्दों में - “मनोचिकित्सक अपने मरीजों का मनोकायिक स्तर पर संतुलन भर बिठा सकते हैं। पर इसके आगे उनकी पहुँच नहीं हो पाती।” प्रख्यात् मनोविद् लारेन्स हाइड के शब्दों में -मनोवैज्ञानिक विधियों की अपनी सीमाएँ हैं, जिनके द्वारा व्यक्तित्व के विकारों को एक सीमा तक ही ठीक किया जा सकता है, किन्तु इनका सर्वांगपूर्ण उपचार यहाँ सम्भव नहीं। उनके अनुसार जीवन को आत्म केन्द्रित (स्द्गद्यद्ध-ष्द्गठ्ठह्लह्द्गस्र) बनाये बिना किसी भी तरह व्यक्तित्व तथा जीवन के बिखराव की परिसमाप्ति नहीं हो सकती। वस्तुतः व्यक्तित्व को अखण्डित बना सकना मानसिक स्तर से गहरे जाने पर ही सम्भव है। जहाँ इसको सर्वांगपूर्ण बनाया और समस्त व्यथाओं से छुटकारा पाया जा सकता है, वह आत्मिक सत्ता ही है। जब तक समूचा व्यक्तित्व इस केन्द्र से संचालित नहीं होता, तब तक इसकी समस्याओं के समाधान के लिए किये गये प्रयास वृक्ष की जड़ों को छोड़कर पत्तों को सींचने जैसे ही होंगे। सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान आत्मिक क्षेत्र से ही सम्भव है।

इस तरह योग मनोविज्ञान, सुपरचेतन को व्यक्तित्व का आधार मानते हुए, व्यक्तित्व के समग्र संगठन एवं विकास की ठोस पृष्ठभूमि तैयार करता है। जीवन का उच्च ध्येय, सुस्पष्ट आचार पद्धति एवं अचेतन के परिष्कार की सुव्यवस्थित प्रक्रिया द्वारा यह उस कार्य की प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाता है जो मनोचिकित्सा में अधूरा छूट जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान अहं के गठन के इर्द-गिर्द ही व्यक्तित्व विकास का प्रयास करता है; किन्तु व्यक्तित्व विकास की समग्र दृष्टि से इतना भर पर्याप्त नहीं है। यौगिक दृष्टि से व्यक्तित्व के समग्र विकास के लिए अहं का भी अतिक्रमण करना होगा और आत्मचेतना में प्रतिष्ठित होकर निम्न प्रकृति का रूपांतरण करना होगा। समग्र विकास की दृष्टि से यहाँ अहं ही प्रमुख बाधा है। अहं और स्वार्थ की क्षुद्रता का आत्मा या परमात्मा की विराट् सत्ता में विसर्जन से व्यक्तित्व का गहनतम स्तर पर संगठन होता है और आत्मिक स्तर पर सामंजस्य एवं समायोजन का द्वार खुलता है। स्वामी यतीश्वरानन्द के शब्दों में इस तरह संगठित व्यक्तित्व में अहं की व्यैक्तिक चेतना ब्रह्मांडीय चेतना से लयबद्ध रहती है। और यह संगठित चेतना मन और शरीर को सहज, सक्रिय एवं सामंजस्यपूर्ण ढंग से निर्देशित रखती है। अहं के समग्र गठन के अनुरूप यहाँ आधुनिक मनोविज्ञान एवं मनोविश्लेषण की मूल समस्या का भी समाधान हो जाता है; जो अहं के इर्द-गिर्द व्यक्तित्व के समायोजन पर विचार करती है।

इस तरह कहा जा सकता है कि जहाँ से आधुनिक मनोविज्ञान की परिसमाप्ति होती है वहीं से अध्यात्म (योग) मनोविज्ञान का प्रारम्भ होता है। और आधुनिक मनोविज्ञान द्वारा जो कार्य अधूरा छूट जाता है, योग मनोविज्ञान अपने आध्यात्मिक तथा परामानसिक आधार पर मनुष्य की समूची प्रकृति को अपने हाथ में लेते हुए उसे अपनी पूर्णता तक ले जाता है। युग के मूर्धन्य मनीषियों का भी यह मानना है कि व्यक्तित्व विघटन के वर्तमान संकट में भारत की यौगिक पद्धति अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। प्रख्यात् मनीषी पी. ए. सोरोकिन अपने गहन अध्ययन, अन्वेषण के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि योग की पद्धति एवं प्रक्रियाओं में आधुनिक मनोविश्लेषण एवं मनःचिकित्सा की लगभग सभी ठोस तकनीकों का समावेश है और इससे भी बढ़कर ये सब आधुनिक प्रक्रियाओं की तुलना में अधिक सूक्ष्म, कम याँत्रिक और विविधता में अधिक समृद्ध हैं। योग और आधुनिक विज्ञान का तुलनात्मक अध्ययन करने वाली प्रख्यात् विदुषी साधिका गेराल्डाइन कोस्लर के शब्दों में - “योग पद्धति मानव जाति के लिए सार्वभौम रूप से सत्य है और इसमें उपलब्ध सामग्री का हम असीम लाभ के साथ जाँच और प्रयोग कर सकते हैं।” साथ ही वह लिखती हैं कि - मेरा दावा है कि योग मानसिक विकास की एक व्यावहारिक विधि है। मैं पूर्णतः आश्वस्त हूँ कि पतञ्जलि का योगसूत्र कुछ ऐसी सूचनाएँ रखता है, जो कि आजकल हमारे सबसे अधिक प्रगतिशील मनःचिकित्सकों में से कुछ खोज रहे हैं।

इस तरह मानवीय चेतना के संकट में विघटित हो रहे व्यक्तित्व के संगठन के लिए और इसमें निहित सम्भावनाओं के विकास हेतु यौगिक चिंतन एवं क्रिया पद्धति की दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक विवेचना युग की एक अनिवार्य आवश्यकता है। इस संदर्भ में भारतीय मनोविज्ञान को लेकर कुछ कार्य हुए हैं, जिनमें जदुनाथ सिन्हा का ‘इण्डियन साइकोलॉजी’, स्वामी अखिलानन्द का ‘मेण्टल हेल्थ एण्ड हिन्दु साइकोलॉजी’, रघुनाथ सफाया का ‘इण्डियन साइकोलॉजी’, डॉ. शान्तिप्रकाश आत्रेय का ‘योग मनोविज्ञान’ आदि कतिपय उदाहरण हैं, लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान के समानान्तर इनकी तुलनात्मक, समीक्षात्मक एवं समन्वयात्मक विवेचना का इनमें सर्वथा अभाव ही दिखता है। मानवीय व्यक्तित्व विकास के संदर्भ में पूर्व एवं पश्चिम की मनोवैज्ञानिक धाराओं के समन्वयात्मक शोध अध्ययन की गहरी जरूरत है। देव संस्कृति विश्व विद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में इस बिन्दु पर होने वाले शोध कार्य इस दिशा में सर्वथा अभिनव प्रयास है।


विश्वविद्यालय का दरजा (kahani)

गुलाब के फूल ऊपर की टहनी पर खिल रहे थे और सड़ा गोबर उसकी जड़ में सिर झुकाए पड़ा था। गुलाब ने अपने सौभाग्य से, सड़े गोबर के दुर्भाग्य की तुलना करते हुए गर्वोक्ति की और व्यंग्य की हँसी हँस दी।

माली उधर से निकला तो उसने यह सब देखा। उससे चुप न रहा गया। गुलाब के काम से मुँह सटाकर बोला, “गुलाब के काम से मुँह सटाकर बोला, “तुम्हें इस स्थिति में पहुँचाने में, इन पिछड़े समझे जाने वालों का कितना योगदान रहा है, तनिक इसे भी समझने का प्रयत्न करो।”

स्वामी श्रद्धानंद ने अपना घर बेचकर उस पैसे से हरिद्वार के पास काँगड़ी गाँव में दस विद्यार्थियों को लेकर एक गुरुकुल चलाया। अध्यापक, पालक, संचालक वे स्वयं ही थे। जिस तत्परता से उनने बच्चों को पढ़ाया तथा विद्यालय चलाया, उसने देखने वालों के मन जीत लिए। ख्याति के साथ−साथ छात्रों की संख्या तथा उदारजनों की सहायता भी बढ़ती गई। एक−एक करके गुरुकुल विकसित होता गया। स्वामी जी के जीवनकाल में ही वह संस्था उन्नति के चरम लक्ष्य तक पहुँच चुकी थी। आज उसे विश्वविद्यालय का दरजा प्राप्त है।

सभी एकमासीय युगशिल्पी सत्र (प्रतिमाह 1 से 21 तारीख) में भाग लेने वाले भाई−बहनों से अनुरोध है कि निम्न प्रारूप के अनुसार ही आवेदन भेजें। अधूरे आवेदन पर स्वीकृति भेजना संभव न हो सकेगा।

आवेदन पत्र

( परिजन यह फार्म हिंदी अथवा जो भाषा आती हो, उसमें स्पष्ट अक्षरों से भरें )

(1) शिविरार्थी का नाम व पूरा पता...............................................................................................

(2) किस महीने के किस सत्र में आना चाहते हैं? यदि उसमें जगह भर चुकी हो तो अगले किस सत्र में आना चाहेंगे? अवश्य लिखें—

.............................................................अथवा....................................................................

(3) स्वयं तथा साथ आने वाले परिजनों का विवरण−

नाम आयु शिक्षा व्यवसाय पहले से किए मिशन की सत्रों का विवरण कौन−सी पत्रिका मँगाते हैं

1. ............................................................ ............................................................

2. ............................................................ ............................................................

(4) मिशन के द्वारा चलाई जा रही गतिविधियों में से क्या−क्या करते रहे हैं?

.........................................................................................................................................

(5) यहाँ के कड़े अनुशासन का भली भाँति पालन करने की प्रतिज्ञा करें।

.................................................................................................................................................

(6) शारीरिक या मानसिक दृष्टि से रोगी न होने का आश्वासन दें।

.......................................................................................................................................

आवेदक के हस्ताक्षर

दिनाँक........................... नाम.......................................

नोट—जो भी शिक्षार्थी साधना सत्र या प्रशिक्षण−सत्र में आना चाहें, वे इस आवेदन फार्म की नकल करके सादे कागज पर भेजें। वाँछित सत्र के लिए दो माह पूर्व ही आवेदन करें।

पत्र−व्यवहार का पता—गायत्री तीर्थ, शाँतिकुँज, हरिद्वार (उत्तराँचल)−249411 फोन—(01334) 260602, 261328, फैक्स—260866


विधेयात्मक विचारों से समर्थ बनाएँ अपना मन

मनुष्य जीवन को सुखी, समृद्ध एवं सफल बनाने के लिए अथक श्रम करता है और इस प्रक्रिया में उसका औजार होता है उसका चेतन मन। जो अपनी विचार व संकल्प शक्ति द्वारा त्वरित उपलब्धियों में विश्वास करता है, किन्तु इसकी शक्ति एवं क्षमता की सीमाएँ हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य यदि चेतन मन के साथ अवचेतन मन का भी सहयोग ले तो वाँछित सफलता अधिक त्वरित, समग्र व सरल रूप से उपलब्ध होगी। चेतन मन और बुद्धि के बाह्य प्रयास जहाँ एक सीमा तक ही अभीष्ट कार्य को सिद्ध करने में सफल हो पाते हैं, वहीं अवचेतन मन की बात दूसरी है। यह समस्त शक्ति का आधार है। एक मनोविद् के अनुसार, इसके अन्दर अद्भुत उत्पादक शक्ति भरी हुई है, जिसके द्वारा कुछ भी कार्य असम्भव नहीं। यह अल्लादीन के जादुई चिराग के समान है, जिसको घिसते ही जादुई जिन्न प्रकट होता है और मनवाँछित इच्छाओं को पूरा करता है। इसमें विश्वासपूर्ण जिन भी विचारों एवं भावों को संप्रेषित किया जाता है, यह उसी अनुरूप, अपनी असीम शक्ति के साथ इनको फलित करने में जुट जाता है, और एक अदृश्य किन्तु समर्थ सेवक की भाँति मालिक की आज्ञा का पालन करता है। इस तरह यदि हम इसका उपयोग करना सीख जायँ तो हम शारीरिक निरोगिता, मानसिक संतुलन से लेकर व्यावसायिक सफलता एवं आत्मलाभ तक के सभी क्षेत्रों में उपलब्धियों के नये आयामों को जोड़ सकते हैं।

हमारे शरीर में अवचेतन मन ही शक्ति का मूल आधार है। इसी के द्वारा शरीर के आन्तरिक अंग-अवयवों को संचालन हो रहा है। शरीर में रक्त परिभ्रमण, फेफड़ों की सक्रियता, पाचन क्रिया, हृदय का आकुँचन-प्रकुँचन आदि सभी कार्य अवचेतन मन के द्वारा ही गतिशील हैं। अवचेतन मन गहन भावनाओं द्वारा पुष्ट संकेतों से प्रभावित होता है और इन्हीं के अनुरूप शरीर पर अद्भुत प्रभाव डालता है। फ्राँस के प्रो. बूल इस संदर्भ में एक उदाहरण द्वारा इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि फ्रांस में एक अपराधी को प्राणदण्ड मिला। जेल में डॉक्टर ने उसकी आँखों पर पट्टी बाँधकर तख्ते पर लिटा दिया और कह दिया कि तुमको नसें काटकर मारा जायेगा। उसकी दोनों भुजाओं में सुइयाँ चुभो दी गई, जिससे कि वह कल्पना कर सके कि नसें काट दी गई हैं और साथ ही भुजाओं पर गर्म पानी की धारा इस तरह छोड़ी गई कि वह भ्रम में आ गया, कि नसों में से गर्म खून निकाला जा रहा है। फिर झूठ ही यह कहना शुरू किया गया कि ‘रक्त बहुत निकल गया, चारों ओर खून ही खून फैला हुआ है।’ यह सुनकर कैदी भाव जगत में लहूलुहान हो गया। और इसका परिणाम इतना भयंकर रहा कि कैदी मृत्यु को प्राप्त हो गया।

इस तरह उदाहरण से स्पष्ट होता है कि हमारे भावों एवं विश्वासों का शरीर पर कितना अद्भुत प्रभाव पड़ता है। ये अवचेतन मन द्वारा यथावत् ग्रहण किये जाते हैं और तुरन्त अपना प्रभाव दिखाते हैं। इसे छाया का भूत और रस्सी का साँप बनाते देर नहीं लगती। यह तो आज्ञाकारी सेवक की भाँति चेतन मन के सबल निर्देशों का अनुकरण करता है।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ. विलियम ब्राउन अवचेतन मन के रहस्यों का उद्घाटन करते हुए लिखते हैं कि ‘मैं एक रात अपनी पाइप पी रहा था। मुझे ऐसा लगा मानो कोई कह रहा हो कि धूम्रपान बुरा है। मैंने सोचा कि मुझे हुक्का पीना छोड़ देना चाहिए। उस रात को मैं देर तक कहता रहा - तम्बाकू हानिकारक है, घृणित है, इससे अनेक बुराइयाँ फैलती है। मैं कल से जरा भी हुक्का नहीं पीऊँगा। तम्बाकू से अब मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। मैं तो निर्विकार और निष्कलंक व्यक्ति हूँ, फिर तम्बाकू जैसे निकम्मे और निरुपयोगी पदार्थ से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता। मैं अवचेतन मन को ऐसे संकेत देकर सो गया। जब प्रातः उठा तो मुझे पाइप पीने की जरा भी इच्छा न हुई। तब से मेरी वह बुरी आदत छूट गयी। अब मैं अवचेतन मन पर संकेतों की पड़ने वाली अद्भुत शक्ति पर विश्वास करने लगा हूँ।’

आज यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि यदि अवचेतन मन में यह विश्वास पैदा हो कि रोग अच्छा हो रहा है तो निश्चय ही रोग ठीक हो जायेगा। इस आधार पर आजकल बहुत से देशों में चिकित्सा कार्य एवं अनुसंधान चल रहे हैं। और बहुत से रोगी इससे आशातीत लाभ ले रहे हैं। फ्राँस में विख्यात मनोवैज्ञानिक एमिल कूए ने इस संदर्भ में गम्भीर शोध कार्य किया है व उनका यह दृढ़ विश्वास है कि ऐसा कोई रोग नहीं, जो इस पद्धति से ठीक न हो सके।

अवचेतन मन आश्चर्यजनक ढंग से कार्य को अंजाम कैसे देता है? एक मनीषी का मानना है कि अवचेतन मन अनन्त मन के संपर्क में रहता है जो कि असीम ज्ञान, असीम शक्ति और असीम आनन्द का भण्डागार है। अवचेतन मन द्वारा हम उस अनन्त मन से अभीष्ट शक्ति, ज्ञान एवं तत्त्व को प्राप्त करते हैं। किन्तु अवचेतन मन कोरे विचारों या छिछली कल्पनाओं से प्रभावित नहीं होता। यह गहन विश्वास द्वारा आवेशित विचारों, भावों एवं संकल्पों को ही ग्रहण करता है और जिस विश्वास को हम इसमें स्थापित करते हैं, उसी अनुरूप यह अभीष्ट फल देने लगता है और जीवन तथा व्यक्तित्व के स्वरूप को गढ़ता है।

एक मनोवैज्ञानिक के अनुसार - ‘हमारा जीवन प्रमुखतया अवचेतन मन द्वारा शासित होता है और सबसे महत्त्वपूर्ण चीज इसमें विधेयात्मक विचारों को भरना है। इसे हम अनवरत सकारात्मक भाव एवं चिंतन द्वारा कर सकते हैं। और यह एक स्थापित मनोवैज्ञानिक सत्य है कि अवचेतन में भेजा गया विचार, स्वतः ही फलित होता है। अतः अपनी सफलता के लिए स्वयं से हम कहें- ‘मुझे स्वयं पर व इस कार्य पर पूर्ण विश्वास है जो मैं कर रहा हूँ। मैं अपना श्रेष्ठतम प्रयास कर रहा हूँ, अतः मैं सफल होकर रहूँगा। ब्रह्मांड की अनन्त शक्ति मेरे साथ है, अतः मुझे किसी भी चीज से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।’ इस तरह के सकारात्मक भाव, विचारों एवं संकल्पों को दिन में कई बार दुहराते हुए अवचेतन मन की शक्ति को सक्रिय कर सकते हैं। प्रख्यात् मनोवैज्ञानिक नेपोलियन हिल के शब्दों में - ‘अपने अवचेतन मन में विधेयात्मक निर्देशों का निरन्तर प्रेषण ही एकमात्र वह पद्धति है जिसके द्वारा अंतर्मन में आत्म श्रद्धा एवं विश्वास को सचेतन रूप से विकसित किया जा सकता है। और अवचेतन मन में अनवरत रूप से संप्रेषित विचार अन्ततः स्वीकृत किया जाता है और क्रिया रूप में परिणत होता है तथा अभीष्ट फल देता है।’

समस्याओं के समाधान में अवचेतन मन कैसे काम करता है? इस संदर्भ में मनोवैज्ञानिकों के अनुसार - ‘इनक्यूवेशन’ अर्थात् परिपाक अवस्था एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। यह चेतन मन द्वारा समस्या के समाधान में किये गये अथक प्रयास के बाद इसे अवचेतन मन के हवाले छोड़ देना है। इसे विश्राँति काल भी कह सकते हैं जब चेतन मन समस्या के प्रति निश्चिंत होकर अन्य कार्यों को करता है और अवचेतन मन के गुह्य क्षेत्र में समस्या का समाधान रहस्यमय ढंग से चलता रहता है और उचित समय पर समाधान उभर कर चेतन मन की सतह पर एक प्रेरणा या स्फुरणा के रूप में उभरता है। वैज्ञानिक आविष्कारों, कलात्मक कृतियों, साहित्यिक रचनाओं एवं मानव की अन्य श्रेष्ठतम उपलब्धियों के मूल में यही रहस्य निहित रहा है।

इस तरह अवचेतन मन की अद्भुत शक्तियों का उपयोग हम जीवन के हर क्षेत्र को सजाने-सँवारने व इसे सर्वांग सुन्दर बनाने में कर सकते हैं।

पुष्ट संकेतों का संप्रेषण सबसे फलदायी ढंग से शरीर व मन की अर्धचेतनावस्था में होता है। इसलिए या तो प्रातः उठते समय जब पूरी नींद टूटती है या रात को लेटते समय जब दोनों आँखें बन्द होने लगती है, इसके लिए सबसे बेहतर समय हैं। इस समय हम व्यक्तित्व का जो भी पक्ष गढ़ना चाहते हैं या जीवन में जो भी अभीष्ट की प्राप्ति चाहते हैं, उसके अनुरूप अवचेतन मन के साथ भावपूर्ण अंतर्संवाद के अभ्यास द्वारा साकार कर सकते हैं।

लेकिन इसकी सफलता के लिए नियमित रूप से किया गया अध्यवसाय पूर्ण प्रयास अनिवार्य है। बार-बार और एक दिन भी नागा किये बिना अवचेतन मन को पुष्ट संकेतों से भरते रहना आवश्यक है। प्रत्येक दिन प्रातः एवं रात्रि के अतिरिक्त दिन भर में मन ही मन यदा-कदा इनकी आवृत्ति करते रहना चाहिए।

विश्वास इस प्रशिक्षण का प्राण है। विश्वास जितना दृढ़ होगा, प्रयास उतना ही फलदायी होगा। अविश्वास इसका महान् शत्रु है क्योंकि अवचेतन मन एक आज्ञाकारी सेवक की भाँति नकारात्मक भावों को भी उतनी ही शक्ति के साथ क्रियान्वित करता है। अतः अवाँछनीय निर्देशों के परिणाम घातक ही होंगे, यह सुनिश्चित है। अतः विश्वास को अभीष्ट सिद्धि का आधा फल मान सकते हैं। ‘यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति’ - जिसकी जैसी भावना होती है, उसकी सिद्धि भी वैसी ही होती है। यह एक सामान्य तथ्य है कि जो जैसे सोचता है, वह वैसा ही बन जाता है। रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि जो स्वयं को पापी-पापी सोचता है, वह पापी ही बन जाता है। और अपने को महात्मा सोचते-सोचते वह महात्मा बन जाता है। जितनी बार हम स्वयं को दुर्बल, दुष्ट या बुरा सोचने की भावना मन में लायेंगे, उतनी ही बार हम अपनी प्रगति के रास्ते में काँटे बोते जाते हैं।

इस तरह अवचेतन मन हमारे हाथ में एक महान् उपकरण है, जिसकी शक्ति, समर्थता एवं आज्ञाकारिता का समुचित सदुपयोग करते हुए हम जीवन में अभीष्ट वरदानों की सृष्टि कर सकते हैं। यह तो कम्प्यूटर की तरह है, जिसमें हम जैसा प्रोग्राम (Input) भरेंगे, वैसा ही वह हमें परिणाम (Output) प्रस्तुत करेगा। हमारा जीवन स्वस्थ एवं सुखी हो, इसके लिए आवश्यक है कि हम स्वस्थ एवं स्वच्छ विचार भावों को ही इसमें संप्रेषित करें। हमारा जीवन सफलता एवं शान्ति से परिपूर्ण बनें इसके लिए अभीष्ट है कि हम श्रेष्ठतम, उदात्ततम एवं दिव्य विचारों से अपने अवचेतन को परिपुष्ट करें और इस तरह जीवन का सर्वांग सुन्दर रूप से गठन करते हुए अपने चरम लक्ष्य की ओर बढ़े।


कोई भेद नहीं करता (kahani)

भगवान महावीर उधर से गुजर रहे थे। रास्ते में किसी एक ग्रामीण ने उनके चरणों पर गिरकर प्रणाम किया। उत्तर में अर्हत ने भी उसके चरणों पर मस्तक टेका।

ग्रामीण सकपका गया। बोला,”आप तपस्या के भंडार हैं, उस विभूति को मैंने नमन किया, पर मैं तो कुछ भी नहीं हूँ, मेरा नमन किसलिए?”

अर्हत ने कहा,”तेरे भीतर जो पवित्र आत्मा है, मैं उसी को देखता हूँ और नमता हूँ। मेरे तप से तुम्हारा सत्य बड़ा है।”

‘कुबेर हो या रंक, जब तक परिश्रम से कमाए धन का एक अंश लोकहित में समर्पित नहीं करता, वह अधर्म खाता है।’ इतने से अक्षर महर्षि अनमीषि के लिए शास्त्र हो गए। उन्होंने पत्नी सहित यह प्रतिज्ञा की कि वे दीन−दुखी को भोजन कराकर भोजन ग्रहण करेंगे।

उन्हें संकल्प निभाते हुए वर्षों बीत गए। तप परीक्षा के बिना खरा सिद्ध हो गया हो, ऐसा कभी हुआ नहीं। एक दिन ऐसा आया कि उनके द्वार तक कोई झाँका भी नहीं। दोनों बहुत दुखी हुए। तभी उन्होंने देखा, वृक्ष के नीचे एक वृद्ध कुष्ठ रोगी पीड़ा से खड़ा काँप रहा है। शरीर में घाव हो जाने से वह कराह रहा है। अनमीषि ने आगे बढ़कर कहा,”भोजन तैयार है, ग्रहण कर कृतार्थ करें।” वृद्ध ने कराहते हुए कहा,”आर्य श्रेष्ठ! मैं आपकी उदारता का अधिकारी नहीं, क्योंकि मैं जाति का चाँडाल हूँ। संभव हो तो घर में कुछ रोटियाँ बची हों, उन्हें यहाँ फेंक जाएँ। उन्हें उठाकर अपना पेट भर लूँगा।” वृद्ध की यह दशा देखकर अनमीषि की करुणा उमड़ पड़ी, आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। वे बोले,”ऐसा न कहें तात! हम जाति के पुजारी नहीं, जीवमात्र में व्याप्त आत्मा के उपासक हैं। आपके अंदर जो चेतन हैं, वही तो परमात्मा है। उसे छोड़कर हम अन्न ग्रहण करने का पाप कैसे कर सकते हैं।

वे उसे सादर अपनी कुटिया पर ले गए। स्नान कराकर, नूतन वस्त्र पहनाए, उसे भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन ग्रहण किया।

जब रात्रि में अनमीषि सोए तो अग्निदेव प्रकट हुए और बोले,”तू ही ईश्वर का सच्चा भक्त है, जो ब्राह्मण, चाँडाल, हाथी व कुत्ते में कोई भेद नहीं करता।”


वैदिक सूत्र पूर्णता देते हैं ‘काल’ के सिद्धाँत को

घड़ी की टिक्-टिक् काल के अनन्त प्रवाह को अपने में अभिव्यक्त करती है कि यह किसी की अपेक्षा किये बगैर अपनी चाल में चलायमान है। यह अपने वर्तमान में बीते कल एवं आने वाले कल दोनों को समाहित किये हुए है। यह घटनाओं को जन्म देता है तथा इसके परे एक पार भी है। यह गतिशील है और गतिहीनता का पर्याय भी है। भाग्य पुरुषार्थ और भविष्य इसी से जुड़े-बँधे हुए हैं। काल को बड़ा बलवान माना गया है।

प्राचीन मान्यता के अनुसार समय का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। अस्तित्वहीनता का यह स्तर औपनिषदिक ऋषियों के चिंतन से उभरा। कठोपनिषद् में उल्लेख मिलता है कि स्वयं को भिन्न एवं अलग समझना ही समय रूपी भ्रम को पैदा करना है। कालद्रष्ट भगवान् शंकराचार्य के अनुसार सत्य शाश्वत एवं सनातन होने के कारण अज्ञात है परन्तु समय ज्ञात होने के कारण असत्य एवं आभास मात्र है। श्रीमद्भगवद्गीता की भी यही मान्यता है कि जो आज है, वह कल भी या और आगे भी रहेगा। अर्थात् जब सब कुछ स्थिर है तो गति पर निर्भर समय कहाँ होगा?

पूर्व के सिद्धान्तों और मान्यताओं को कुछ पश्चिमी वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है। प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री डेविड ने गति को एक भ्रम माना है। अतः इन्होंने समय को भी भ्रम माना है। खगोलीय भौतिकशास्त्री जूलियन बारबारे ने भी इस मान्यता को मान्य किया है। इनके अनुसार दिक् (स्पेस) विराट् शून्य से अभिन्न है। इसी आधार पर वे समय को भी शून्य मानते हैं। विख्यात भौतिकविद् एन. मर्चदा के अनुसार अनादि और अनन्त के वलय पथ पर समय का अस्तित्व व आधार तथ्यहीन है।

समय निश्चित है या अनिश्चित? यह प्रश्न वैज्ञानिक जगत् में उथल-पुथल और ऊहापोह का कारण बन गया है। अपने-अपने शोध निष्कर्षों के आधार पर इनमें दो सिद्धान्त देखने को मिलते हैं। विख्यात वैज्ञानिक लाप्लास समय को निश्चित मानते हैं। इनको कहना है कि वेग और स्थिति दोनों ही हर स्थान पर मापे जा सकते हैं अतः समय निश्चित है। स्टीफन हाकिंग के सहयोगी रोजर पेनरोज का निष्कर्ष बताता है कि समय अनिश्चितता को नहीं मानता। अनिश्चितता तो केवल दिक् (स्थान) की स्थिति के कारण है, जो मात्र आभासित होता है। परन्तु एक स्थान पर समय निश्चित है। ज्योतिष विशारद प्रभुदयाल शास्त्री भी इनके स्वर में स्वर देते हुए कहते हैं कि समय निश्चित है और इसी कारण भविष्य कथन, अंक, गणना आदि सम्भव हो पाता है।

समय को अनिश्चित मानने वालों में महान् वैज्ञानिक मनीषी आइंस्टीन हैं। उनके अनुसार समय सापेक्ष है। हाइज़ेनबर्ग ने माना है कि समय का मापन किसी एक पैमाने से नहीं किया जा सकता है। समय वेग और उसे धारण करने वाले कण पर निर्भर करता है। कण स्वयं में वेग का संचालक नियन्ता नहीं है। उसका वेग तो दिक् की स्थिति पर आश्रित-आधारित है। यह निर्माता समय की अनिश्चितता को सिद्ध करता है। सुप्रसिद्ध खगोलीय कालौरोवेली ने समय को आभासी माना है। वह ब्रह्मांड के सापेक्ष गुजरता-बीतता है परन्तु आभास ऐसा होता है कि ब्रह्मांड बीत रहा है। इन दोनों को आपसी अंतर्संबंध दोनों की ही अनिश्चितता को जन्म देता है। इस संदर्भ में आज के विलक्षण खगोलीय भौतिकशास्त्री स्टीफन हाकिंग का सिद्धान्त है कि समय की अनिश्चितता स्वयं समय है। से कहते हैं वेग समय का सहयोगी है और समय वेग को सिद्ध करता है। वेग का अस्तित्व स्थिरता के कारण है। स्थिरता समय का अवरोधक है और इसलिए इन स्थितियों-परिस्थितियों के कारण ही समय अनिश्चित है।

हांकिंग समय के अस्तित्व को पूर्णरूपेण नकार नहीं पा रहे है और न स्वीकार पा रहे है। वे ब्लैक होल सिंगुलेरिटी में समय को निषिद्ध करने का प्रयास अवश्य करते हैं परन्तु उनका अनुसंधान-अन्वेषण अभी जारी है। वे किसी निश्चित सिद्धान्त पर नहीं पहुँच पाये हैं।वस्तुतः समय के ये दो वैज्ञानिक सिद्धान्त अपने-अपने प्रयोग-परीक्षणों पर आधारित हैं। यदि समय के अस्तित्व को स्वीकार किया जाय तो फिर हमें असीम सत्य को भी सीमित करना पड़ेगा। वैज्ञानिक विश्लेषण से प्रतिपादित होता है कि बिगबैंग से उत्पन्न समय निश्चित व शाश्वत कैसे हो सकता है। जो उत्पन्न हुआ है उसका विनाश भी निश्चित है। इसी कारण ऊर्जा का क्षरण एवं बिंगक्रन्च (ब्रह्मांड संकुचन) के सिद्धान्त को भी अपनाना पड़ा। परन्तु इसके ठीक विपरीत ब्लैकहोल की सिंगुलेरिटी में समय समाप्त हो जाता है, उसके अस्तित्व का लोप हो जाता है, जिसे हाकिंग ने माना है।

वैज्ञानिक समय ने ब्रह्मांड को नश्वर सिद्ध कर दिया। यही नहीं उसने यहाँ तक कहा कि हमारी सारी खोज भी नश्वरता को खोजने के लिए बँधी-सिमटी है। प्रश्न उठता है कि फिर अनश्वर क्या है? क्या है जो नाश नहीं होता है, सदा शाश्वत है? यदि इस संसार में जानने योग्य कुछ नहीं है तो विज्ञान को सत्य का अन्वेषी क्यों माना जाये? तो क्या समय ही ईश्वर है? सत्य है? परन्तु बिगबैंग से उत्पन्न समय शाश्वत कैसे हो सकता है? इसके जवाब में डॉ. जूलियन बारगी कहते हैं कि विज्ञान को समय के भ्रम से मुक्त होकर शाश्वत का अनुसंधान करना चाहिए। तभी उसकी खोज सत्य के पथ पर आरुढ़ हो सकती है। इनके अनुसार गति के साथ समय को जोड़ दिया गया है। इससे हमें ब्रह्मांड गतिमान दिखता है। और इसके आगे हम कुछ भी नहीं सोचना चाहते। जबकि ऐसा है नहीं। फिर सत्य क्या है?

इसे समझने व खोजने के लिए वैज्ञानिक नये-नये शोध में संलग्न हैं। वे समय को ब्रह्मांड की शाश्वत की कसौटी पर कसने का प्रयास कर रहे हैं। उनकी मान्यता है कि ब्रह्मांड अनगिनत दृश्यों के निश्चित आकारों व आकृतियोँ का समूह तो है ही साथ ही वह अनादि भी है और अनन्त भी है। अर्थात् जो कुछ भी है उसके अन्दर है, भीतर है, बाहर कुछ भी नहीं है ब्रह्मांड स्थिर है। गति तो उसका भ्रम मात्र है। और इसी कारण समय जैसी अस्तित्वहीन धारणा जन्म लेने लगती है। जबकि ठीक इसके विपरीत वैज्ञानिक ‘परम समय’ का सिद्धान्त दे रहे हैं। परम समय अर्थात् ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना का समय पर आधारित होना। इसके अनुसार समय ही शाश्वत है जो अन्तहीन अतीत से लेकर अनन्त भविष्य तक सहजता से चलता जायेगा। परन्तु यह सिद्धान्त जूलियन बारबारे को मान्य नहीं है। वे कहते हैं समय का कोई अस्तित्व ही नहीं है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि वर्तमान क्या है। वर्तमान का वह क्षण व घड़ी क्या है जो अगले ही पल अतीत के गर्भ में समा जाती है?

इसके प्रत्युत्तर में भौतिकशास्त्री कार्लो रोवेली कहते हैं कि वास्तव में ब्रह्मांड का अस्तित्व तो है। उसमें बहुत सारे वर्तमान क्षणों की स्थितियों के दृश्यों के रूप में शुरू से ही विद्यमान है। वह कहीं चला नहीं जाता है बल्कि अपने फ्रेम से मौजूद रहता है। जब हम अगले फ्रेम की स्थिति का हिस्सा होते हैं तो ब्रह्मांड में स्थिर पहली स्थिति के दृश्य को गुजरा हुआ अर्थात् अतीत समझने का भ्रम मान लेते हैं। इनका भी तर्क है कि समय को सत्य मान लेने से ब्रह्मांड की सच्चाई की शोध में कठिनाई आ गई है। इसी कारण क्वाण्टम मेकेनिक्स को समझना मुश्किल हो रहा है। क्योंकि समय के कारण ही क्वाण्टम मेकेनिक्स के सूक्ष्म आणविक जगत् को सामान्य आपेक्षिकता के विस्तृत सिद्धान्त पर विराट् ब्रह्मांड का अनुसंधान करने में रोड़े आ रहे हैं।

इन सिद्धान्तों की भूल-भूलैयों में सारे वैज्ञानिक शोध प्रयास में भटक गये मालूम पड़ते हैं। क्योंकि कुछ सिद्धान्त ब्रह्मांड का सब कुछ समय के भीतर ही घटित होता मानते हैं। जबकि आइंस्टीन के अनुसार समय की घड़ी घटनाक्रम के बाहर चल रही है और पदार्थ के एक-दूसरे के सापेक्ष होने के कारण दिखाई देने वाले परिवर्तनों को माप-नाप रही है। ये दोनों ही तथ्य एवं सिद्धान्त न केवल विरोधाभासी हैं बल्कि उलझा देने वाले भी हैं। इस तरह खगोलीय विज्ञान एवं भौतिकशास्त्र में सापेक्षिता और क्वाण्टम के सिद्धान्त ने स्पष्ट रूप से प्रतिपादित कर दिया है इस समृद्ध ब्रह्मांड का विवेचन-विश्लेषण करने के लिए विज्ञान के पास कोई अन्तिम एवं उचित शब्द नहीं है। परेशानी से परेशान हाइज़ेनबर्ग ने कहा है कि सबसे कठिन समस्या है तो अभिव्यक्ति के लिए भाषा की समस्या। यहाँ शब्द शान्त हो जाते हैं, भाषाएँ मौन हो जाती हैं। फिर मुखर क्या है जो इसका समुचित एवं सर्वांगीण समाधान प्रस्तुत करे।

वैदिक द्रष्टाओं एवं ऋषियों के अनुसार दिक् (स्पेस) और काल (समय) विश्वगत चिंतन की आत्माभिव्यक्ति के दो पहलू हैं, पक्ष हैं। रूप और विषयों को इकट्ठा रखने के ब्रह्म का विस्तार दिक् है। समय (काल) भी रूप और विषयों को ले जाते हुए आत्मशक्ति की गति विस्तार के लिए आत्म विस्तृत ब्रह्म है। अतः हमारे वैदिक ऋषियों के इन सूत्रों में आधुनिक विज्ञान के सिद्धान्तों की अपूर्णता पूर्ण होती है। वे कहते हैं कि दिक् और काल (स्पेस एण्ड टाइम) ताने-बाने की तरह आपस में गूँथे हुए हैं। दोनों ही सापेक्ष सत्ताएँ हैं। देश की अवस्था के अनुरूप समय का स्वरूप निखरता है। एक की अवस्था बदलने का मतलब है दूसरे का स्वरूप बदल जाना। उदाहरण के लिए जाग्रत अवस्था में जिस दिक् में निवास करते हैं, समय का परिमाण भी उसी के अनुरूप रहता है। घटनाओं के आपसी सम्बन्धों का बोध भी वैसा ही रहता है। परन्तु स्वप्न में दिक् अपेक्षाकृत सूक्ष्म और विस्तृत हो जाता है और उसी के अनुसार समय की सूक्ष्मता और व्यापकता को पा जाता है। जो घटनाएँ जाग्रत अवस्था में दो दिनों में घटती है, वही स्वप्न में दो घण्टे में अनुभव हो जाता है। चेतना के बदलने, आयामों के अनुरूप यह सूक्ष्मता और विस्तार भी बढ़ता जाता है। अन्ततः दिक् और काल दोनों अनन्तता में स्वयं को विसर्जित और विलय कर देते हैं। फिर यही कहा जा सकता है परम सत्य चेतना के लिए समय एक नित्य वर्तमान है और दिक् एक अविभाज्य आगमन विस्तार।

इन वैदिक सत्य और सूत्रों में आधुनिक विज्ञान के अपूर्ण सिद्धान्तों को न केवल पूर्णता मिलती है बल्कि उनके अनुसंधान अन्वेषण को एक नयी दिशा भी मिलती है। इसमें मानव जीवन के आदर्श, मूल्य एवं सिद्धान्तों को भी नूतन आयाम मिलता है जिससे मानव व समाज दिक्-काल से परे व उस पार परम सत्य को पाने, समझने व साक्षात्कार करने के लिए तत्पर हो सके। इसी में जीवन की समस्त घटनाएँ, भाग्य और भविष्य की दिव्यता समाहित है। परम सत्य ही कालजयी है, शाश्वत है और अनादि अनन्त है। उसी के कारण में जाना ही सभी सिद्धान्तों एवं मान्यताओं का सार है।


लार्ड बायरन के नाम से प्रसिद्ध (kahani)

चीन में एक बौद्ध भिक्षुणी थी। उसने भगवान की एक छोटी स्वर्ण प्रतिमा बनाई। उसी की पूजा−अर्चा में निरत रहती।

एक दिन महाबुद्ध उत्सव हुआ। दूर−दूर की बुद्ध प्रतिमाएँ सज−धजकर लाई गई। उनका सामूहिक पूजा−अर्चा करने का कार्यक्रम बना।

भिक्षुणी पूजा की सामग्री तो लाई, पर वह अपनी ही प्रतिमा की उससे अर्चा करना चाहती थी। धूप, दीप, नैवेद्य समारोह में जलाने पर उसे भय था कि दूसरी प्रतिमाएँ उसकी सुगंध लूट ले जाएँगी। इस हानि से बचने के लिए उसने अपनी धूप का धुआँ एक बाँस की पोंगली द्वारा अपनी प्रतिमा की नाक से सटा दिया।

थोड़ी देर में प्रतिमा का मुँह धुएँ से काला हो गया। दर्शकों को वह कुरूप लगी और पूजने तथा लाने वाले तक की भर्त्सना हुई।

खिन्न भिक्षुणी को समारोह के अधिष्ठाता ने कहा, “संकीर्णता एवं प्रदर्शन−वृत्ति के रहते पूज्य, पुजारी, पूजा का मुँह काला ही हो सकता है। वस्तुतः धर्म का अर्थ है, सदाचरण।”

दोपहर, विद्यालय के विश्राम का समय। एक दुबला−पतला सुँदर−सा लड़का विद्यालय के बाहर निकलकर खाना खाने के लिए अपने घर जा रहा था। रास्ते में उसने देखा, दो लड़के आपस में झगड़ रहे हैं। उनमें एक बलवान था और दूसरा कमजोर। बलवान लड़का कमजोर लड़के को पीट रहा था। उसके हाथ में एक लड़की थी ।

रास्ते चलने वाले लड़के को जोश आ गया। वह तुरंत बलवान लड़के के पास चला गया। उसके भारी शरीर को देख लड़के का साहस उसे टोकने का न हुआ। कुछ क्षण सोचकर उसने बलवान लड़के से पूछा, “क्यों भाई, तुम इसको कितने बेंत लगाना चाहते हो?”

किसी अपरिचित लड़के को बीच में पड़ते देख बलवान लड़के का क्रोध तेज हो गया। उसने कठोर दृष्टि से देखते हुए कहा, “क्यों, तुम्हें क्या मतलब?”

“मुझे इससे मतलब है।” राह चलते लड़के ने कहा।

“तुम क्या कर लोगे?” बलवान लड़के ने चेतावनी दी।

“भाई, मैं तुमसे अधिक बलवान तो नहीं हूँ, जो इस कमजोर को बचाने के लिए तुमसे लड़ सकूँ । लेकिन इतना जरूर चाहता हूँ कि इसकी पिटाई में मैं भी भागीदार बन जाऊँ।” दर्शक लड़के ने कहा।

“तुम्हारा मतलब क्या है?” पीटने वाला लड़का इस पहेली का अर्थ न समझ पाया।

“तुम इस कमजोर लड़के के शरीर पर कुल जितने भी बेंत मारना चाहते हो, उसके आधे मेरी पीठ पर लगा दो। इस तरह इसका आधा कष्ट मैं बँटा लूँगा।” दर्शक लड़के ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा।

बलवान लड़का आश्चर्य से देखता रहा और कुछ क्षण बाद उसने चुपचाप अपने हाथ की लकड़ी तोड़कर फेंक दी और मन में पश्चात्ताप करता अपने रास्ते चला गया। पिटने वाले लड़के की मुसीबत टल गई। वह बीच का लड़का जीवन भर इसी तरह सूझ−बूझ से कार्य करता रहा तथा बड़ा होकर अँगरेजी का प्रसिद्ध कवि लार्ड बायरन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।


आदर्श शिक्षक बनाते हैं महामानव

शिक्षा जीवन−निर्माण की कला है। इसका वास्तविक स्वरूप यही है। यद्यपि इस स्वरूप में भौतिकी, रसायन, चिकित्सा, वास्तुकला आदि की विविध जानकारियाँ भी समाविष्ट हैं, पर इनका उद्देश्य जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं का समाधान कर जीवन का निर्माण करना ही है। जीवन−निर्माण की यह विद्या सीखने वाला छात्र है और सिखाने वाला अध्यापक। आदर्श अध्यापक और अनुशासित छात्र का युग्म ही इसको सार्थक−समुन्नत बनाता है।

वर्तमान समय में छात्र और अध्यापक, दोनों के स्तर में गिरावट होने से शिक्षा का स्वरूप भी धूमिल हो गया है। आज अधिकाँश छात्र मात्र इस उद्देश्य से विद्यालय में प्रवेश करते हैं कि किसी प्रकार अच्छी−से−अच्छी नौकरी पाकर विलासितापूर्ण जीवनयापन करें। इसी तरह अध्यापक भी अपने आदर्शों से विमुख होकर अपने गुरुत्वपूर्ण दायित्व को विस्मृत कर बैठे हैं।

इतना ही होता, तो भी खैर थी। स्तर की गिरावट इतनी अधिक है कि हर बुद्धिजीवी का मन चिंताग्रस्त है कि यदि इसी प्रकार चलता रहा तो आगे क्या होगा! अध्यापक आज अपने पवित्र अध्यापन को भुलाकर ट्यूशन आदि नाना प्रकार के संसाधन जुटाकर अधिकाधिक धन कमाने के चक्कर में पड़े हैं। इसी कारण वे कक्षाओं में पढ़ाना, न तो आवश्यक समझते हैं न कि अनिवार्य। उनका उद्देश्य मात्र धन कमाना हो गया है। वह किस तरह मिले, इसी के साधन ढूँढ़ते रहते हैं। वह ट्यूशन जैसा माध्यम हो या प्रयोगात्मक परीक्षा जैसी किसी परीक्षा में अधिक अंक दिलाने का लालच देने जैसा अन्य कोई माध्यम।

अध्यापकों के इसी व्यवहार से छात्रों का भी असंतोष फूट पड़ा है। परिणामस्वरूप हम देख ही रहे हैं कि स्कूल, कॉलेज शिक्षा के पावन मंदिर न रहकर असामाजिकता के अखाड़े बन गए हैं। जहाँ कभी छात्र जेब में पेन लेकर प्रवेश करता था, आज वहीं पेन के साथ चाकू, पिस्तौल भी लाने लगा है। जो छात्र कभी शिक्षकों के चरण स्पर्श करने में अपना गौरव समझते थे, आज वही शिक्षकों का गला पकड़ने में बहादुरी मानते हैं। अनुशासन जैसी चीजें तो मात्र पुस्तकों के पन्नों में छिपकर अपनी जान बचाने की सोचने लगी हैं।

विद्या मंदिरों की पवित्रता, श्रेष्ठता नष्ट करने में किसकी गलती अधिक है, यह तो स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है, पर यह सुनिश्चित है कि दोनों अपनी−अपनी जगह कसूरवार हैं। आज भी कहीं−कहीं ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं, जो प्राचीन गौरव की झलक दिखा देते हैं, पर ऐसे छात्र और और अध्यापक नगण्य ही हैं।

प्राचीनकाल की भारतीय परंपरा में तपस्वी, आदर्शनिष्ठ, अपरिग्रही, ऋषि स्तर के अध्यापक होते थे। वैसे ही अनुशासित, सेवाभावी, अध्यवसाय वाले, स्वाध्यायशील छात्र। शिक्षा भी ऐसे युग्म को पाकर अपने को कृतार्थ समझती थी और अपने सारे−के−सारे रहस्य ऐसे सुपात्रों के समक्ष खोलने में अपने को कृतकृत्य मानती थी।

तपस्वी शिक्षकों में जहाँ शिक्षण−प्रक्रिया का चरम विकास हुआ था, वहीं छात्रों में अध्ययन−प्रक्रिया अपनी चरम सीमा पर थी। विभिन्न विद्याओं, कलाओं में निष्णात छात्र भी अकड़बाजी व गर्व की मदिरा में चूर न होकर विनय के अमृत से सराबोर होते थे। विद्या ददाति विनयम् का सूत्र सर्वत्र परिलक्षित होता था। हड़ताल और मारधाड़ ने तो संभवतः विद्यालयों के शब्दकोश में भी प्रवेश न पाया होगा।

ऐसी परंपरा का निर्वाह भरद्वाज जैसे ऋषि करते थे। उनका गुरुकुल प्रयाग के पावन क्षेत्र में था, जहाँ दस हजार स्वाध्यायशील छात्र विद्या अध्ययन करते थे। उस समय शिक्षा का विकास विद्या स्तर तक हुआ था। ज्ञातव्य है कि शिक्षा का ही सुपरिष्कृत रूप विद्या है। विद्या का लक्ष्य सत्य का अध्ययन करना है, पर आज तो स्थिति दूसरी है। विनोबा ने एक जगह इस संबंध में उल्लेख करते हुए कहा था, “ऋषिकाल में विद्यालय विद्या के आलय अर्थात् आगार होते थे, पर आज के परिवेश में विद्यालय ऐसे हैं, जहाँ विद्या का लय अर्थात् लोप होता है।” विनोबा का यह कथन निश्चित ही आज के वातावरण को देखकर यथार्थ प्रतीत होता है।

शिक्षक की भूमिका इतनी ही नहीं है कि मात्र विषय की जानकारी दे दें, वरन् उनका दायित्व यह भी बनता है कि वह विषय को भली प्रकार हृदयंगम भी करा दें। उनके दायित्व में अभिभावक का दायित्व भी सम्मिलित है। यद्यपि अब आवासीय विद्यालय कम हैं, जबकि पहले इसी स्तर के विद्यालय होते थे। वाल्मीकि रामायण में एक प्रसंग आता है, जब महर्षि विश्वामित्र अपनी शिक्षण−प्रक्रिया के समय राम और लक्ष्मण को प्रोत्साहन देते हुए प्रातः काल जगाते हुए कहते थे, “उत्तिष्ठ नरशार्दूल पूर्वा संध्या प्रवर्तते।” अर्थात् हे पुरुषों में श्रेष्ठ, उठो, पहली संध्या का समय हुआ है। विश्वामित्र जैसे आचारवान और तपस्वी गुरु और राम−लक्ष्मण जैसे विनयी अध्यवसायसंपन्न सुपात्रों को पाकर ही बला और अतिबला विद्याएँ सार्थक हुई।

सेवानिवृत्त वरिष्ठ आई. सी. एस. अधिकारी श्री जगदीश चंद्र माथुर ने अपनी पुस्तक ‘दस सुमन’ में अपने वार्डन तथा विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो.अमरनाथ झा के व्यक्ति त्व तथा आदर्शनिष्ठा पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि वे छात्रों के साथ पुत्रवत् व्यवहार करते थे। आने वाले छात्रों से पहली मुलाकात वे अपने घर बुलाकर ही करते थे। इस पहली मुलाकात के बाद छात्र इतने भावाभिभूत हो जाते थे कि किसी समस्या, कोई उलझन को उनके अपने अनुशासनप्रिय, आदर्शनिष्ठ, कर्त्तव्यपरायण शिक्षक की जाग्रत मूर्ति देखने के साथ ही भावनाशील पिता की प्रतिच्छाया भी देखता था। सचमुच ऐसे ही शिक्षक विद्यार्थियों का निर्माण करने में सक्षम हैं।

डॉ. प्रफुल्लचंद्र राय विश्वप्रसिद्ध रसायनविद् होने के साथ ऐसे ही उत्कृष्ट कोटि के शिक्षक भी थे। उनसे पढ़ने में छात्र अपने सौभाग्य को सराहते थे। वे भी 750 रुपये के वेतन में से अपने लिए मात्र 50 रुपये रखकर बाकी सभी छात्रों के हित के लिए लगाते थे। उनका स्नेह पाकर छात्रों का हृदय गदगद हो जाता था। जिसने एक बार उनका सान्निध्य पाया, बार−बार उनसे मिलने को आतुर रहता था। उद्दंड−से−उद्दंड छात्र उनके प्रेम की मोहिनी से मोहित होकर सारा कलुष त्यागने व अनुशासनबद्ध होने को तैयार हो जाते थे। डॉ.शांतिस्वरूप भटनागर जो सी. एस. आई. आर. के प्रथम निदेशक बने, उन्हीं की देन थे।

श्री अरविंद घोष जो क्राँतिकारी होने के पूर्व बड़ौदा कॉलेज में अँगरेजी और लैटिन के अध्यापक थे, अपनी शिक्षण−कला, निस्पृहता, उदारता, स्नेह आदि गुणों से थोड़े ही समय में छात्रों के मानस−मंदिर में पूरी तरह से प्रतिष्ठित हो गए थे। उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल, भारतीय विद्या भवन के संस्थापक श्री के.एम. मुँशी, जो उस समय उनके छात्र थे, ने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि उनके घर जाने पर उनकी सादगी देखकर मैं दंग रह गया। श्री अरविंद मात्र चटाई पर सोते थे। घर में तड़क−भड़क जैसी कोई चीज नहीं थी। संपत्ति−सजावट के नाम पर मात्र पुस्तकें। ऐसी अभूतपूर्वता देखकर जिज्ञासा करने पर श्री अरविंद ने बताया कि शिक्षक को कठोर संयमी होना चाहिए। जब वह स्वयं अध्ययनशील, त्यागी, निस्पृह, अपरिग्रही बनेगा, तभी अपने छात्र को योग्य और अनुशासन प्रिय होने के साथ देशभक्त बना सकेगा।

ऐसी ही कड़ी में थे डॉ.राधाकृष्णन, जिन्होंने शिक्षक को गरिमा और सादगी का परिचय बनाया। राष्ट्रपति होने के बाद भी वे अपने को शिक्षक ही समझते रहे और 2500 रुपये प्राध्यापक का वेतन लेकर शेष 7500 रुपयों को राष्ट्रीय सुरक्षा कोश में देते रहे। इसी त्यागवृत्ति व आदर्श शिक्षक होने के कारण उनका जन्म−दिवस 5 सितंबर शिक्षक दिवस के साथ अपरिग्रह, आदर्शवादिता के गुणों को अपनाने, विकसित करने की याद मिलता है। शिक्षक और शिक्षण के आदर्श अन्यत्र भले ही लुप्तप्राय हो गए दिखते हों, परंतु देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, शाँतिकुँज में इनकी सुरम्य झलक निहारी जा सकती है। है तो यह प्रारंभिक शैशव अवस्था में, पर इसका लक्ष्य गुरुकुल−आश्रम−आरण्यक के समन्वित संस्करण के रूप में विकसित होना है। निश्चित ही यह होकर रहेगा।


VigyapanSuchana

फार्म−4

(1) प्रकाशन स्थान मथुरा

(2) प्रकाशन अवधि मासिक

(3) मुद्रक का नाम मृत्युँजय शर्मा

क्या भारत का नागरिक है हाँ

पता−जनजागरण प्रेस, वृंदावन मार्ग, मथुरा

(4) प्रकाशक का नाम मृत्युँजय शर्मा

(5) संपादक का नाम डॉ. प्रणव पंड्या

क्या भारत का नागरिक है हाँ

पता−शाँतिकुँज, हरिद्वार

(6) उन व्यक्तियों के नाम व पते−

जो समाचार−पत्र के स्वामी हों

तथा जो समस्त पूँजी के एक

प्रतिशत से अधिक के साझेदार

या हिस्सेदार हों

पता− अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा

मैं मृत्युँजय शर्मा एतद् द्वारा घोषित करता हूँ कि मेरी अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिए गए विवरण सत्य हैं।

दिनाँक 28−2−2003


आखिर यह ‘मूड’ है क्या बला

कई बार व्यक्ति की ऐसी अवस्था हो जाती है, जिसमें काम में मन नहीं लगता, फलतः वह आधा−अधूरा बन पड़ता है। निश्चित कर्त्तव्यों और दायित्वों की उपेक्षा होने लगती है। व्यवहार असामान्य हो जाता है और जिस कार्य की सफलता सुनिश्चित मानी गई थी, उसमें असफलता हाथ लगती है। ऐसा क्यों हुआ? पूछने पर पता चलता है कि ‘मूड’ ठीक नहीं था।

आखिर यह मूड है क्या? मनोविज्ञानी जैजोंक के शब्दों में कहें तो वह मानसिक अवस्था, जिसके अच्छे या बुरे होने पर व्यवहार, क्रिया और परिणाम में तदनुरूप अंतर दिखलाई पड़ने लगे, सामान्य बोल−चाल की भाषा में ‘मूड’ कहलाती है। यों तो यह एक अस्थायी मनोदशा है, पर जब तक रहती है, आदमी को सक्रिय या निष्क्रिय बनाए रहती है। सक्रियता, उत्फुल्लता, स्फूर्ति, उत्साह, उमंग उस मनःस्थिति का नतीजा है, जिसमें वह सामान्य रूप से अच्छी होती है, जबकि बुरी मनःस्थिति में अंतरंग निष्क्रिय, निस्तेज, निराश और निरुत्साह युक्त अवस्था में पड़ा रहता है। इस प्रकार विनोदपूर्ण स्थिति में व्यक्ति यदि दिखाई पड़े तो कहा जा सकता है कि वह अच्छे ‘मूड’ में है, जबकि नैराश्यपूर्ण दशा उसके खराब ‘मूड’ की द्योतक है।

विलियम एन. मोरिस ने अपने ग्रंथ ‘मूड−दि फ्रेम ऑफ माइंड’ में मूड बनाने और बिगाड़ने वाली परिस्थितियों को चार वर्गों में विभाजित किया है। पहली श्रेणी में उन घटनाओं को रखा है, जो हलके विधेयात्मक या निषेधात्मक स्तर की है। दूसरी में संवेगात्मक प्रकरणों को सम्मिलित किया गया है। तीसरी कोटि भूतकालीन आवेगात्मक स्मृतियों की हैं, जबकि चौथे वर्ग में वह निरोध शामिल है, जो आवेग उत्पन्न करने वाले प्रसंगों की भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को रोकता है। मोरिस के अनुसार इन सभी स्थितियों में मनोभाव प्रभावित होता है और घटना के भले−बुरे स्वभाव के अनुसार उसका निर्माण होता है। यहाँ तक संपूर्ण मनोविज्ञान जगत एकमत है, पर मूड निर्माण संबंधी प्रक्रिया में विशेषज्ञों में परस्पर सहमति नहीं हो सकी है।

‘दि साइकोलॉजी ऑफ फीलिंग इमोशन’ नामक रचना में मनोविज्ञानी सी.ए. रुकमिक लिखते हैं कि उत्तेजना पैदा करने वाला उद्दीपन जब समाप्त हो जाता है तो आवेग भी धीरे−धीरे कमजोर पड़ने लगता है। इस निर्बल संवेग की अवस्था को ही वे ‘मूड’ की संज्ञा देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो घनीभूत आवेश की तीव्रता जब समय के साथ छितराती है तो वही ‘मूड’ बन जाती है।

‘हैंडबुक ऑफ सोशल काँग्निशन’ नामक पुस्तक में एलीस एम. आइसेन कुछ भिन्न मत प्रकट करती हैं। उनका मानना है कि उत्तेजना और मूड साथ−साथ उत्पन्न होते और समानाँतर रहकर कार्य करते हैं। दोनों का प्रादुर्भाव एक ही घटना से होता है। वे किसी ऐसी प्रक्रिया से इनकार करती हैं, जो आवेग की निर्बलता के उपराँत ‘मूड’ जैसी स्थिति पैदा करती हो। मूड को वे एक अवशिष्ट अवस्था मानती हैं, एक ऐसी सूक्ष्म अवस्था, जो मनोवेग के आरंभ से पृष्ठभूमि में रहती तो है, पर जब तक स्वयं को अप्रकट स्तर का बनाए रहती है, जब तक आवेश एकदम क्षीण न हो जाए।

मूड संबंधी यह सैद्धाँतिक विवेचन जान लेने के पश्चात हर एक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि वह सदा स्वस्थ मनोदशा में रहे। यदा−कदा कभी गड़बड़ा जाए तो उसे तुरंत पूर्व स्थिति में लाने की कोशिश करनी चाहिए। जिसका मानसिक धरातल जितना लोचपूर्ण होगा, वह उतनी ही जल्दी अपने इस प्रयास में सफल होता प्रतीत होगा। जो जितना शीघ्र सामान्य मनोदशा में लौट आता है, मनोविज्ञान की दृष्टि से उसे उतना ही स्वस्थ मन वाला व्यक्ति कहा जाएगा। महामानवों और महापुरुषों की मानसिक संरचना लगभग ऐसी ही होती है। वे क्रोधित नहीं होते, यह बात नहीं, गुस्सा वे भी करते हैं, पर जिस तीव्रता से वह प्रकट होता है, उसी गति से विलुप्त भी हो जाता है। सामान्य लोगों में यह विशेषता दृष्टिगोचर नहीं होती, इसी कारण से लंबे समय तक वे उससे प्रभावित बने रहते हैं। लगातार खराब मूड में बने रहने के कारण मन फिर उसी का अभ्यस्त हो जाता है और व्यक्ति अवसाद का पुराना रोगी बन जाता है।

मूर्द्धन्य व्यवहारविज्ञानी एल. बुडजिया अपने ग्रंथ ‘डायमेन्शन्स ऑफ मूड’ में लिखते हैं कि आज के कठिन समय में जीवन की जटिलताएँ इतनी बढ़ गई हैं कि व्यक्ति अधिकाँश समय बुरी मनःस्थिति में बना रहता है। गाँवों की विरल आबादी से जैसे−जैसे वह शहरों के जनसंकुल वातावरण के निकट आता है, वैसे−ही−वैसे कठिनाइयाँ बढ़ती जाती हैं। इससे मानस पर उनका दबाव तदनुसार बढ़ता जाता है। प्रकाराँतर से यही दबाव खराब मनोदशा का कारण बनता है। उनका मानना है कि सभ्यता के विकास के साथ−साथ जीवन शनैः−शनैः जटिल होता चला गया। आज से सौ वर्ष पूर्व मानवीय जिंदगी जितनी सरल थी, अब वह वैसी नहीं रही। यही कारण है कि तब लोग खेल और मनोरंजन की तरह जितनी सहजता से तनाव रहित उन्मुक्त जीवन गुजार लेते थे, वैसा आज संभव नहीं। आदिमानवों का जीवन और भी सहज था। उन्हें न भोजन की चिंता थी, न भविष्य की फिक्र। जब भूख लगती, जंगली कंदमूलों एवं जंतुओं के शिकार से अपना पेट भर लेते, नींद आती तो पेड़ तले सो लेते, न घर बनाने की आकाँक्षा, न संपत्ति जोड़ने की अकुलाहट, आज यहाँ, तो कल वहाँ, यही उनकी दिनचर्या थी। जहाँ इतनी सीधी−सादी जिंदगी होगी, वहाँ अंतःकरण प्रफुल्ल क्यों न रहेगा। वे कहते थे कि जटिल जीवन से समस्याएँ बढ़ती हैं और उस बढ़ोत्तरी का असर मन की स्वाभाविकता पर पड़े बिना नहीं रहता।

अशाँत चित्त का दूसरा महत्त्वपूर्ण कारण गिनाते हुए वे लिखते हैं कि महत्त्वाकाँक्षा यों तो प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक है, पर यह अनियंत्रित होने पर दुःख−शोक का कारण बनती है। इन दिनों वह इस कदर बढ़ी−चढ़ी है कि मनुष्य अधिकाधिक दौलत जुटा लेने, यश कमा लेने और वाहवाही लूटने की ही उधेड़बुन में हर घड़ी उलझा दिखाई पड़ता है। जीवन इसके अतिरिक्त भी और कुछ है, उन्हें नहीं मालूम। बस, यही अज्ञानता विपन्न मनोदशा का निमित्त कारण बनती है।

यह सच है कि आदमी का रहन−सहन जितना निर्द्वंद्व एवं निश्छल होगा, उतनी ही अनुकूल उसकी आँतरिक स्थिति होगी। इसके विपरीत जहाँ बनावटीपन, दिखावा, झूठी शान, प्रतिस्पर्द्धा होगी, वहाँ लोगों की मनोदशा उतनी ही असामान्य होती है। एम.टी. मेडनिक और एस.मेहराबियन के सर्वेक्षण से यह बात स्पष्ट हो जाती है। सर्वेक्षणकर्त्ताओं ने आस्ट्रिया के कई शहरों में जाकर इस बात का अध्ययन किया कि शहरी वातावरण का मानवीय मनोभावों पर क्या प्रभाव पड़ता है? प्राप्त परिणाम इस बात का स्पष्ट संकेत था कि भोले−भाले ग्रामीणों की तुलना में स्वभाव से अधिक चतुर−चालाक और कृत्रिमता को अपनाने वाले शहरी लोगों का ‘मूड’ अपेक्षाकृत ज्यादा बदतर होता है। सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ कि नगर निवासियों में से 66 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिनकी सप्ताह में औसतन पाँच से लेकर छह दिन तक मनोभूमि न्यूनाधिक अच्छी नहीं रहती। 31 प्रतिशत व्यक्ति ऐसे पाए गए, जो सप्ताह में तीन से चार दिन तक खराब मूड के शिकार बने रहते। शेष तीन प्रतिशत में एक प्रतिशत से भी कम लोग ऐसे निकले, जो उस अशाँत परिस्थिति में भी स्वयं को स्थिरचित्त रखने में सफल होते पाए गए, जबकि शेष ऐसे थे, जो बहुत कठिन परिस्थितियों में ही इस रुग्णावस्था की गिरफ्त में आए।

मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि जब कभी मनःस्थिति खराब हो जाए तो उसे स्वतः अपनी स्वाभाविक मानसिक प्रक्रिया द्वारा ठीक होने के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए, वरन् उसको सामान्य स्थिति में लाने का प्रयत्न−प्रयास आरंभ कर देना चाहिए। इससे कम समय में ही मनःस्थिति को दुरुस्त किया जा सकता है। मनःशास्त्री कहते हैं कि खराब मूड की स्थिति में मन को किसी−न−किसी आश्रय से अवश्य बाँध देना चाहिए। यह अवलंबन विविध प्रकार के हो सकते हैं। स्वाध्याय, मनोरंजन, प्रकृति का सान्निध्य, एकाँत का परित्याग, बात−चीत, हँसी−मजाक जैसे कितने ही उपक्रम ऐसे हो सकते हैं, जिनमें मन खो जाता है। इससे खराब मूड की अवस्था बदल जाती है और उसका स्थान आनंद, उत्साह, उमंग, सक्रियता जैसे तत्त्व ले लेते हैं। यों गम गलत करने का एक आसान और प्रचलित तरीका आज नशा−सेवन भी है, पर यह तो वैसा ही हुआ, जैसे एक छोटे फोड़े को ठीक करने में क्रम में एक बड़ा और दुःसाध्य घाव पैदा कर लेना। इससे सदा परहेज करना चाहिए। गड्ढे को छलाँगने के प्रयास में कोई कुएँ में जा गिरे तो यह उसकी मूर्खता ही कही जाएगी।

अंतिम उपचार अध्यात्म का है। यदि व्यक्ति भौतिकता में आध्यात्मिकता का समावेश करता चले और जीवन में आवश्यक संयम−नियम का अनुपालन करे, आवश्यकता से अधिक की आकाँक्षा और स्तर से ज्यादा की चाह में प्रवृत्त न रहे तो मूड के खराब होने जैसी किसी भी कठिनाई से बचा जा सकता है। इस दृष्टि से अध्यात्मवादी अधिक लाभ में रहते हैं। वे जितनी निश्चिंततापूर्वक जीवनयापन करते हुए अपने सुनिश्चित लक्ष्य की ओर बढ़ते चलते हैं, उतनी शाँति और संतुष्टि भौतिकता के चकाचौंध में जीने वालों में परिलक्षित नहीं होती। अतएव उत्तम यही है कि वैसा जीवनक्रम अपनाया जाए, जिसमें अवसाद भरी मनःस्थिति में पड़ने की समस्त संभावनाएँ ही निरस्त हो जाएँ। जीवनपद्धति वही अच्छी है, जो हमें शाँति और संतोष प्रदान करे और चरम लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ाती चले।


स्मृति−संवर्द्धन के कुछ मनोवैज्ञानिक उपाय

स्मरणशक्ति ईश्वरप्रदत्त उपहार भी है, इसलिए कई लोगों में यह क्षमता अद्भुत रूप से पाई जाती है। इस संदर्भ में राजा भोज के दरबारी श्रुतिधर की स्मृति विशेष उल्लेखनीय है। वे चौबीस मिनट तक सुने गए किसी भी भाषा के प्रसंग को बिना किसी त्रुटि के तत्काल ज्यों−का−त्यों सुना सकते थे। रूसी पत्रकार सालोमन वेनियामिनोवा की स्मरणशक्ति भी विलक्षण थी। वे सरसरी निगाह से पढ़ी किताबों के पन्नों, टाइम टेबल आदि को आसानी से दोहरा लेते थे। फ्रांस के पूर्व प्रधानमंत्री लियान मेग्वेज की स्मृति तो हैरतअंगेज थी। वे संसद में दिए गए विपक्षी नेताओं के भाषण तथा पिछले दस वर्ष का संपूर्ण बजट आँकड़ों सहित तत्काल सुना सकते थे।

इससे स्पष्ट होता है कि स्मरणशक्ति की सीमा असीमित है, परंतु इसकी एक अत्यंत सीमित क्षमता को ही उपयोग में लाया जाता है। इस क्षेत्र में अनेक अनुसंधान−अन्वेषण हुए हैं और जारी हैं। मानव अपने दैनिक जीवन में इस क्षमता को अत्यंत न्यून मात्रा में ही उपयोग करता है। इस दिशा में कार्य कर रहे विश्वरूप चौधरी ने अपनी पुस्तक ‘डाइनैमिक मेमोरी मेथड्स’ में उल्लेख किया है कि हम जो पढ़ते हैं, उसका मात्र 25 प्रतिशत याद रहता है। जो सुनते हैं, उसका 35 प्रतिशत, जो देखते हैं, उसका 50 प्रतिशत और जो करते हैं, उसके 75 प्रतिशत की ही स्मृति रहती है। इन सभी का योग 95 प्रतिशत है। इसका तात्पर्य है कि प्रकृति ने मनुष्य को अच्छी−खासी स्मरणशक्ति दी है। आवश्यकता है, शाँत मनःस्थिति से इस दिव्य क्षमता का भरपूर उपयोग किया जाए।

आधुनिक न्यूरो साइकोलॉजिस्ट्स की मान्यता है कि मनुष्य सामान्य रूप से मस्तिष्क की तार्किक क्षमताओं वाले बायें गोलार्द्ध का प्रयोग करता है, क्योंकि यहीं से तर्क, विचार एवं गणितीय परिकल्पनाएँ उभरती हैं। वह दाहिने भाग की भावनात्मकता एवं कल्पनाशीलता का उपयोग नहीं कर पाता है। न्यूरो साइकोलॉजिस्ट हेनरी हेकेन के अनुसार यदि मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों का सम्यक् एवं समुचित उपयोग किया जा सके तो स्मरणशक्ति को असीमित विस्तार दिया जा सकता है। सन् 1998 में न्यूरो साइकोलॉजिस्ट राबीन माँरीस द्वारा तैयार किए एक मेमोरी टेस्ट से पता चलता है कि मस्तिष्क का फ्रंटल लोब ही स्मृति को नियमित एवं नियंत्रित करता है। अगर इस लोब की क्रियाशीलता को बढ़ाया जा सके, तो भी स्मरणशक्ति में अभिवृद्धि की जा सकती है।

आज के दौर में स्मरणशक्ति में दिन−प्रतिदिन ह्रास होता जा रहा है। यह समस्या सामान्य हो गई है। आखिर इनसान भूल क्यों जाता है? वह याद क्यों नहीं रख पाता?

इसका कारण स्पष्ट करते हुए मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इच्छा का अभाव, विषय को पूरे मनोयोग से न सुनना−समझना तथा प्रसंग−अरुचि व उपेक्षा का भाव होने से ही याददाश्त में कमी आती है। अतः आवश्यकता है कि जिसे हम याद रखना चाहते हैं, उसमें अपनी इच्छा का समावेश किया जाए और यह तभी संभव है, जब उसमें रुचि उत्पन्न की जाए या अपनी पसंद का कार्य किया जाए। जिस विषय में मन लग जाता है, वह आसानी से याद आ जाता है, परंतु उबाऊ विषय हजार कोशिशों के बावजूद याद नहीं रहता। इसके लिए जरूरी है कि पहले अपने मनपसंद कार्य को किया जाए या पुस्तकों को पढ़ा जाया जाए। धीरे−धीरे जब मन लगने लगेगा तो कठिन विषय के क्षेत्र में भी प्रवेश किया जा सकता है। अनवरत प्रयत्न से अब तक अरुचिकर एवं बोझ लगने वाला विषय भी आसानी से याद होने लगता है।

कथा−कहानियाँ, नाटक, उपन्यास, फिल्म आदि आसानी से याद रहते हैं, क्योंकि इन्हें हम मन लगाकर देखते−पढ़ते हैं। प्रायः विद्यार्थियों के लिए विषयवस्तु भारवत जान पड़ती है। वह इसलिए कि इसमें वे रुचि उत्पन्न नहीं कर पाते, मन नहीं लगाते, उपेक्षा का बरताव करते हैं, परंतु जो मन लगाकर पढ़ते हैं, उनके लिए गंभीर दर्शन एवं जटिल गणित भी कथा−कहानियों जैसे प्रिय लगने लगते हैं। अतः जो भी पढ़ा जाए या किया जाए, मनोयोगपूर्वक किया जाए तो मस्तिष्क में उसका स्मरण दीर्घ अवधि तक बना रह सकता है।

अब प्रश्न उठता हैं कि स्मृति को बढ़ाया कैसे जाए? तरोताजा कैसे रखा जाए? स्मृति−संवर्द्धन के लिए मनोवैज्ञानिक पुनरावृत्ति के सिद्धाँत को सबसे कारगर एवं सफल बताते हैं। क्योंकि तंत्रिका विज्ञानी मानते हैं कि सामान्यतः 50 मिनट से अधिक समय तक पढ़ने या अन्य सूचनाओं का संश्लेषण करने के बाद मस्तिष्क की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है, अतः इस अवधि के बाद पाँच से बारह मिनट तक का विश्राम ले लेना चाहिए। मस्तिष्क द्वारा ग्रहण की गई सूचनाएँ 24 घंटे तक सक्रिय रहती हैं, अतः पहली बार अध्ययन के 24 घंटे के भीतर ही उन्हें पुनः एक बार दोहरा लेना चाहिए। लगभग एक सप्ताह बाद तीसरी बार तथा डेढ़ माह पश्चात चौथी बार याद कर लेने पर वे स्मृतिपटल पर बनी रहती हैं।

अमेरिका के ‘स्कूल ऑफ मेमोरीज एंड कन्सन्ट्रेशन’ के डॉक्टर बूनोफर्स्ट के अनुसार सहजता एवं मनोयोगपूर्वक किया गया कार्य या पढ़ी हुई बातें अधिक समय तक याद रखी जा सकती हैं। मनोविद् वार्टटेल की भी ठीक यही मान्यता है। वे कहते हैं कि जिन तथ्यों को लंबे समय तक याद रखना हो, उनमें गहरी रुचि उत्पन्न करनी चाहिए तथा संकल्पपूर्वक करनी चाहिए। चिंतन−मननपूर्वक याद करने का प्रभाव दीर्घकालिक होता है, अतः स्मृति में रखने के लिए आवश्यक है कि याद करने वाली योग्य और अच्छी बातों को ही मन में रखा जाए और शेष को भुला दिया जाए। इससे मन पर दबाव एवं बोझ नहीं पड़ेगा और वह हलका तथा प्रसन्न रहेगा। ऐसा मन ही स्मरणशक्ति को दीर्घकाल तक बनाए रखता है।


आशाजनक सफलता पाई (kahani)

दक्षिण भारत में जन्मे डॉ.कौस्तुभ परीक्षा पास करने के उपराँत सरकारी क्षय−चिकित्सालय में नियुक्त हुए। उनने जॉर्ज बर्नार्ड शा की वह उक्ति अपने कमरे में टाँग रखी थी कि ‘रोगी को दवा की अपेक्षा डॉक्टर की सहानुभूति की जरूरत होती है।’ उनने रोगियों से ममता भरा व्यवहार किया और इतने से ममता भरा व्यवहार किया और इतने अनुपात में रोगी अच्छे किए, जितने पहले कभी भी न हुए थे।

उनने अपने अस्पताल की एक नर्स से इस शर्त पर विवाह किया कि वे संतानोत्पादन के फेर में न पड़ेंगे और रोगियों को ही अपने बालक मानेंगे। सेवाधर्म में संलग्न रहकर वे पति−पत्नी अत्यंत सुखी−संतुष्ट रहे।

नैपल्स नगर में आवारा लड़कों की भरमार थी। दरिद्र और पिछड़े लोगों के लड़के कुसंग में पड़कर अपने−अपने गिरोह बना लेते थे और चोरी, उठाईगीरी, ठगी के धंधे से अपना गुजारा करते थे। नशेबाजी जैसे अनेक दुर्व्यसन बढ़ जाने से वे अच्छे नागरिकों की तरह पढ़ना एवं आजीविका कमाना पसंद भी नहीं करते थे। यह आवारागर्दी यूरोप के अनेक देशों में बढ़ती जा रही थी। सभ्य नागरिकों को उनके मारे नाकों में दम था।

पादरी बोरेली का ध्यान इन लड़कों की ओर गया। उनने इनके सुधार का बीड़ा उठाया। सूखे उपदेशों को वे सुनने तक को तैयार न होते थे। अस्तु, बोरेली ने उनमें घुल−मिलकर रहने तथा मित्रता गाँठने का उपाय अपनाया। पादरी नई उम्र के और ठिगने कद के थे, इसलिए उन्हें घुल−मिल जाने में अधिक कठिनाई नहीं हुई।

पादरी ने एक टूटा हुआ पुराना मकान किराये पर लिया। ऐसे लड़कों का न तो कहीं आश्रय था और न खाने−पीने का ठिकाना। बोरेली के इस घर में रात्रि को रहने की, शाम को ताजा खाना पकाकर खाने की सुविधा हुई तो सैकड़ों लड़के उस आवारा−आश्रम में आने लगे। यही अवसर था, जिसमें उन्हें पढ़ाने, कमाने, खाने तथा कुटेव छोड़ने के लिए सहमत किया जा सका और इस योजना के अनुसार हजारों को सभ्य तथा स्वावलंबी बनाया जा सका। पादरी−समुदाय ने अन्य स्थानों में भी यह योजना चलाई और बिगड़ों को सुधारने में आशाजनक सफलता पाई।


भय एक पाप है, इससे बचो

भय मानव जीवन का एक आधारभूत भाव है। शरीर एवं अस्तित्त्व की रक्षा के रूप में इसकी अनिवार्यता एवं उपयोगिता स्पष्ट है, किन्तु अपने बढ़े हुए एवं अतिरंजित रूप में यह गम्भीर त्रास का कारण बनता है। सामान्य सा भय पलते-बढ़ते दुर्भीति (फोबिया) का रूप ले लेता है और व्यक्ति के सामान्य जीवन को दुभर बना देता है।

इससे ग्रसित व्यक्ति भय उत्पादक परिस्थिति की उपस्थिति की सम्भावना मात्र से ही अत्यन्त सशंकित एवं आतंकित हो उठता है और वह उस परिस्थिति से बचने की चेष्टा करता है तथा परिस्थिति के उपस्थित हो जाने पर असंगत रूप से भय व्यक्त करता है। ऐसी स्थिति में वह प्रायः दूसरों पर आश्रित रहने तथा असहायपन की भावना रखता है। इस तरह भय का दानव, मनुष्य को सशंकित, आतंकित, दीन-हीन और पराश्रित जीवन जीने के लिए बाध्य करता है।

यह भय न केवल जीवन की सामान्य क्रियाओं एवं कार्य करने की क्षमता में बाधा डालता है, बल्कि अपने उग्र रूप में व्यक्ति की सोचने विचारने की क्षमता को कुन्द कर देता है और व्यक्ति के व्यवहार को असामान्य रूप से प्रभावित कर जीवन व्यापार को विफल बना देता है। यह व्यक्ति को हताशा, निराशा एवं कुण्ठा में जीने के लिए विवश करता है।

मनोवैज्ञानिक कोमरेन के अनुसार - ‘भय अतर्किक होते हैं, किन्तु निराधार नहीं।’ वास्तव में रोगी के मन में कोई न कोई स्थिति, जिसकी जानकारी सामान्य तौर पर उसे नहीं होती, उसे अत्यन्त भयग्रस्त बनाये रखती है। व्यक्ति इनकी अतार्किकता को समझते हुए भी अपने व्यवहार को बदल नहीं पाता। किसी भी तरह का तर्क, सान्त्वना तथा प्रस्तुत किये गये अन्य प्रमाण, कि भय निराधार है, व्यक्ति को भय से मुक्ति नहीं दिला पाते। भयजन्य वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति, व्यक्ति में चिन्ता का कारण बनती है। चिन्ता का स्वरूप सामान्य बेचैनी से लेकर उग्र दौरे का रूप ले सकता है।

अतार्किक एवं अतिरंजित भय की कष्टप्रद अनुभूति के अतिरिक्त भय तरह-तरह के शारीरिक रोगों का भी कारण बनता है। सर दर्द, सर चकराना, पेट खराबी, पीठ दर्द आदि कष्ट सामान्यता इससे पैदा होते हैं। भय जहाँ असंख्य लोगों को जीवन के आनन्द व सुख से वंचित कर देता है, वहीं शरीर के प्रत्येक अंग की क्रिया पर अपना दुष्प्रभाव डालता है। यह रक्त को दूषित कर देता है। श्वाँस क्रिया में विकृति पैदा कर देता है। यह हमारे समस्त शरीर को विष पूर्ण बना देता है, हमारी शक्ति को घटाता है और हमारी सामर्थ्य को क्षीण कर देता है। वस्तुतः भय शरीर की क्रिया के लिए विष का काम करता है। यह कुछ अंगों की गति को मन्द कर देता है। इस तरह भय की उपस्थिति में शरीर के अंग अपनी क्रिया को भलीभाँति नहीं कर पाते और यदि भय तीव्र हो व दीर्घ काल तक बना रहे तो यह शरीर के अंगों को गम्भीर रूप से क्षति पहुँचा कर उन्हें बेकार कर सकता है। भीषण भय के अवाँछित प्रभाव से सभी परिचित हैं कि किस तरह यह हमारी तबीयत को खराब करता है और हम तुरन्त अस्वस्थ हो जाते हैं।

भय का अवाँछनीय प्रभाव शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी गम्भीर रूप से प्रभावित करता है और यह शारीरिक

निरोगिता का एक भारी शत्रु है। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि भय से जितने लोग मरते हैं उतने रोगों या युद्ध से भी नहीं मरते। भय रोगों का सहायक एवं सक्रिय मित्र सिद्ध होता है। बहुत से रोगियों को इस कारण मृत्यु का शिकार होना पड़ा, क्योंकि उन्होंने निरोग होने की आशा छोड़ दी थी। भय और कार्य का पछतावा, ये दोनों बातें शरीर का घाव भरने की प्रक्रिया में बाधक होते है। सर्जन जानते हैं कि घावों को भरने में कितना समय लगता है, किन्तु जब रोगी भयग्रस्त होता है, तब वे यह बताने में असमर्थ हो जाते हैं कि घाव कितने दिनों में भरेगा।

इस तरह भय का दानव, जीवन की समस्त सुख-शान्ति, स्वास्थ्य-निरोगिता एवं प्रगति-उन्नति को मनुष्य से छीन लेता है और मनुष्य को अनेक तरह से दुःख और त्रास देता है। भय के कारण हमें बाहर परिस्थितियों, व्यक्ति या वस्तु में दीखते हैं, किन्तु यथार्थ में कारण भीतर मन में होता है। मनोविशेषज्ञों के अनुसार भय, कमजोर मन की उपज होता है। भय कायर मन की प्रतिकृति होता है। भीरु मनुष्य की आन्तरिक दुर्बलता इस समाज संसार के दर्पण में विपत्ति बनकर प्रतिबिम्बित होती है। संकट का सामना करने की, उससे उलझने निपटने की क्षमता हममें नहीं है, ऐसा मान लेने के बाद ही भय आरम्भ होता है। हेलेन क्रेम के शब्दों में भय, व्यक्ति की अपनी अध्यात्मिक, चारित्रिक अथवा शारीरिक दुर्बलता की स्वीकृति है। दूसरे शब्दों में यह आत्मा, मन या शरीर की हार है। भय का अर्थ है-इच्छा के अनुसार कार्य करने की अशक्ति या असमर्थता। जब हम भय से ग्रस्त होते हैं, तब हम भय को अपने ऊपर अधिकार करने देते हैं।

वास्तव में भय की अपने में कुछ भी शक्ति नहीं होती, इसे हम अपनी शक्ति देकर बल देते हैं। यदि हम इसे अपने से प्रबल न मानते तो इसके पास अपनी तनिक भी शक्ति नहीं थी कि यह हमारे ऊपर भूत की तरह सवार हो जाता। हम जिन वस्तुओं, घटनाओं, बातों या व्यक्तियों से डरते हैं, उन्हें हम शक्ति देते हैं। हम जिस बात की चिन्ता करते हैं, उससे हमारी चिन्ता ही सबल होती है। हम किसी दुर्घटना की आशंका करके उसे प्रबल बनाते हैं। कुछ अनहोनी या दुर्भाग्यपूर्ण घटना का विश्वास ही हमारे लिए दुर्भाग्य लेकर आता है। यही कारण है कि जो लोग असफलता से भयभीत होते हैं, वे असफल ही हो जाते हैं। और यह प्रकृति का नियम है कि जिस वस्तु से हम डरते हैं, उसे हम अपनी ओर आकर्षित करते हैं। वस्तुतः भय का अतिरंजित रूप सामान्यता हमारे दीर्घकालीन प्रश्रय का परिणाम होता है, जिसके अंतर्गत हम भय जन्य परिस्थितियों से पलायन में अपनी सुरक्षा व शान्ति की खोज कर रहे होते हैं।

‘मेनेज यूअर माइण्ड’ के मनोविद् जी. बटलर एवं टी. होप के अनुसार जितनी बार हम भय से बचने का प्रयास करते हैं, उतनी ही बार यह और पुष्ट होता है और हमारे आत्मविश्वास की जड़ों को दुर्बल बनाता है। जीवन की विषम एवं चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से बचाव का यह रुख क्रमशः पलायन का एक ऐसा मनोवैज्ञानिक कुचक्र तैयार करता है, जो कैंसर की तरह जीवन के हर क्षेत्र में प्रसारित होकर, व्यक्ति को शारीरिक एवं मानसिक रूप से कुण्ठित एवं पंगु बना देता है।

भय कारक स्थिति से बचाव के विविध तरीकों का जिक्र करते हुए ये मनोविशेषज्ञ कहते हैं-एक तो हम सामान्य रूप में प्रत्यक्षतः उस स्थिति से बचते हैं और हमें यह बोध रहता है कि हम भय से भाग रहे हैं। दूसरा अप्रत्यक्ष तरीका है जिसमें हमें अपने पलायन का बोध नहीं रहता। किन्तु भय के उपचार हेतु इन सूक्ष्म तरीकों का बोध होना जरूरी है। ये तरीके हैं- (1) काम को टालते जाने की दीर्घसूत्रता, (2) चुनौतीपूर्ण कार्य को स्वीकार न करना, (3) विश्वसनीय व्यक्ति के समक्ष भी अपने भय को व्यक्त न करना, (4) अन्य कार्यों में व्यस्त रहना ताकि भयजनक समस्या पर विचार का मौका ही न मिले, (5) दूसरों की आड़ में, सुरक्षा में या आश्रय में रहना आदि। इस तरह की विविध युक्तियाँ भय से बचाए रखती हैं, और तत्कालिक राहत देती हैं किन्तु भय का भूत और बलशाली होता जाता है।

जबकि भय से मुक्ति का एक मात्र तरीका उसका साहसपूर्ण सामना है। प्रख्यात् हंगेरियन मनोवैज्ञानिक फेरेंज नैडेस्डी, अपनी पुस्तक ‘फीयर आर फ्रीडम’ में लिखते हैं कि वास्तविक शान्ति और भयमुक्ति तभी सम्भव है जब इसके निमित्त कारण अपने मन को बलवान बनाया जाय। वटलर एवं होप के अनुसार यह कार्य सुविचारित रणनीति एवं योजना के तहत क्रियान्वित किया जाये तो ही भय के अनिष्टकारी प्रभाव से हम सदैव के लिए निजात पा सकते हैं। जबकि सीधा-सीधा सामना, अवाँछनीय परिणाम ला सकता है। भय के दैत्य से सीधी टकराहट गम्भीर प्रतिक्रिया को जन्म दे सकती है जो हमारे मनोबल को तोड़कर हताशा-निराशा की स्थिति में पटक सकती है। अतः क्रमशः बढ़ती कठिनाई की सीढ़ी चढ़ते हुए ही इस भय का सफल सामना एवं समाधान वाँछनीय है।

इसकी शुरुआत हम भय की थोड़ी सी उद्विग्न करने वाली स्थिति से कर सकते हैं। तब तक इसमें रहने का अभ्यास करें, जब तक कि बेहतर अनुभव न करें। तदुपरांत भय उत्पन्न करने वाली और कठिन परिस्थिति में अपना अभ्यास दोहराएँ। इस तरह क्रमशः सफलता की नई सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भय के भूत को काबू में किया जा सकता है। इसके लिए नियमित रूप से हर दिन का अभ्यास अनिवार्य है। नियमित अभ्यास के परिणाम स्वरूप ही सफलता सुनिश्चित होगी। यदि किसी कारण वश ऐसी परिस्थिति उपलब्ध न हो सके तो एकान्त में भी भय उत्पादक स्थिति की कल्पना द्वारा अनुभूति करते हुए, कल्पना में ही इसका अभ्यास कर सकते हैं। ‘विजुअलाइजेशन’ की यह तकनीक स्वयं में एक सबल साधन है। वास्तव में भय से मुक्ति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य इससे पलायन की दुरभिसंधि से उत्पन्न कुचक्र को तोड़ना है। इसके लिए बचाव के सामान्य एवं सूक्ष्म तौर तरीकों की समीक्षा करते रहना आवश्यक है।

इस दौरान नकारात्मक भावों से सावधान रहना बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अवचेतन मन इनको सीधा ग्रहण करता है और भय को और बल देता है। मैं कर सकता हूँ का भाव यदि पुष्ट रूप से संप्रेषित हो सके तो मन में भय से मुक्ति का मार्ग बहुत सरल हो जायेगा। इस तरह के पुष्ट संकेतों के साथ छोटे-छोटे सफल प्रयास आत्मविश्वास को सबल बनायेंगे। मैं नहीं कर सकता हूँ , के पलायनवादी भाव की जगह मैं इसे कैसे कर सकता हूँ, का विचार भय को जड़ से उखाड़ फेंकने में कारगर सिद्ध होता है। इसी के साथ भय से मुक्ति पाने की बेहतर रणनीति एवं योजना अनुसरित होती है।

इस तरह भय का भूत जो हमारे स्वभाव में बैठा है, हमारे आत्मविश्वास की शक्ति को पंगु बनाये हुए है, हमारी तमाम शक्तियों, क्षमताओं एवं सम्भावनाओं को नकारा बनाए हुए है, इसका जड़मूलोच्छेदन जीवन की सार्थकता, सफलता एवं पूर्ण विकास के लिए तत्काल अपेक्षित है। यदि हम भय के भूत को पोषण करने वाली बचाव एवं पलायन की आन्तरिक दुरभिसंधियों को समझने के लिए व भय का सामना करने के लिए कृतसंकल्पित हो जायँ, तो समझ सकते हैं कि भय से मुक्ति की आधी लड़ाई हमने जीत ली। शेष कार्य अध्यवसायपूर्वक किये जाने वाले सतत् प्रयास-पुरुषार्थ द्वारा सुनिश्चित होगा।


नियोजित कर दिया जाए (kahani)

आँख और कान की विशेषता और गरिमा बताने के लिए किसी जिज्ञासु ने विचारक से पूछा।

मनीषी ने उत्तर दिया, “आँखें केवल सामने का देखती हैं, जबकि कान विगत−आगत और वर्तमान को सुनने−समझने में सहायता करते हैं।”

सुँदर दीखने वाली आँखों की तुलना में कुरूप कानों की महिमा अधिक है। जो लोग सौंदर्य को, बहिरंग की सज्जा को ही महत्त्व देते हैं, उनके लिए यह जानना जरूरी है कि महत्ता कर्तृत्व की है।

बगदाद के खलीफा ने अपना दैनिक वेतन तीन रुपया रोज रखा था। कोई त्योहार आया तो बेगम ने कहा, “वेतन नहीं बढ़ा सकते तो राज्यकोष से दस रुपया उधार ले लो। उसे धीरे−धीरे चुकाते रहेंगे।”

खलीफा ने कहा, “मौत का क्या ठिकाना? कल ही आ गई तो लिया हुआ कर्ज कौन चुकाएगा? अभी समाज में जी रहे हैं, कर्ज तो चढ़ा ही है, पहले उससे तो मुक्त हों।” कर्ज लेने से उन्होंने स्पष्ट इनकार कर दिया तो बेगम ने दैनिक वेतन में से ही कुछ बचाकर त्योहार मनाया।

ब्रह्मसंध्या कर आचार्य उठे ही थे कि आत्मदेव ने उनके चरण पकड़ लिए। वह दीन शब्दों में बोला, “आचार्य प्रवर! एक संतान की इच्छा से आपके पास आया हूँ।”

आचार्य ने कहा,”आत्मदेव! संतान से सुख की आशा करना व्यर्थ है। मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार सुख−दुःख पाता है। पूर्वजन्म की कृपणता का पाप ही तुम्हारे लिए सौभाग्य विमुख बना है।” आत्मदेव की समझ में नहीं आया, उसने कहा,”महात्मन्! या तो आज आपसे पुत्र लेकर लौटूँगा या आत्मदाह करूंगा।”

आचार्य ने हँसकर कहा,”तुम्हारे लिए किसी और का पुण्य छीनना पड़ेगा। पुत्र तो तुम्हारे भाग्य में है नहीं, परंतु तुम्हारी इच्छा परमात्मा पूर्ण करें, लो, यह फल अपनी भार्या को खिला देना। वह एक वर्ष तक निताँत पवित्र रहकर नित्य कुछ दान करे।’

आत्मदेव महर्षि के रहस्यमय वचन सुनकर कुछ समय न सका तथा वह फल अपनी पत्नी धुँधली को देकर सारी बातें समझा दीं। धुँधली ने सोचा, पवित्रता मुझसे बन न पड़ेगी, अपनी संपत्ति और को क्यों दान करूं। उसने वह फल गाय को खिला दिया और समय पर अपनी बहन का पुत्र गोद लेकर घोषणा कर दी कि उसके पुत्ररत्न हुआ है। पुत्र का नाम धुँधकारी रखा गया। कालाँतर में वह बहुत दुराचारी निकला। धुँधकारी ने अपने पिता की सारी संपत्ति माँस, मदिरा और वेश्यावृत्ति में नष्ट कर दी।

संतान लाभ की कामना हेतु आतुर व्यक्ति विवेक खो बैठता है। इससे तो अच्छा है कि समस्त विश्व को अपना परिवार मानकर उसके समग्र विकास में स्वयं को नियोजित कर दिया जाए।


सद्ज्ञान−सद्भाव का प्रतीक ‘स्वास्तिक’

ॐ स्वस्ति नऽइन्द्रो वृद्धश्रवाः, स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्ताक्ष्योऽअरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

यजुर्वेद के इस कल्याण कारी एवं मंगलकारी शुभकामना, स्वस्तिवाचन में स्वस्तिक का निहितार्थ छुपा-छिपा है। हर मंगल एवं शुभ कार्य में इसका भाव भरा वाचन किया जाता है, जिसे स्वस्तिवाचन कहा जाता है। स्वस्तिक संस्कृत के स्वस्ति शब्द से विनिर्मित है। स्व और अस्ति से बने स्वस्ति का अर्थ है-कल्याण। यह मानव, समाज एवं विश्व के कल्याण की भावना का प्रतीक है। ‘वसोमम’ - मेरा कल्याण करो का भी यह पावन प्रतीक है। इसे शुभकामना, शुभभावना, कुशलक्षेम, आशीर्वाद, पुण्य, पाप-प्रक्षालन तथा दान स्वीकार करने के रूप में भी प्रयोग-उपयोग किया जाता है।

स्वस्तिक अति प्राचीन पुण्य प्रतीक है, जिसमें अतिगूढ़ अर्थ एवं निगूढ़ रहस्य छुपा-छिपा है। इसके अनेकानेक अर्थ हैं। हलायुध कोश में इसे ‘चतुर्विंशतिचिन्हार्न्तगतचिन्हविशेषः’ कहा गया है। अर्थात् संस्कृति के चौबीस चिन्हों में से यह एक विशेष एवं दिव्य चिन्ह है। हलायुध कोश में इसका तात्पर्य चतुष्पथ याने चौराह से भी लिया गया है। गणपति के गँ बीजाक्षर का चिन्ह भी स्वस्ति जैसा प्रतीत होता है। इसके रूप एवं समूचे मंत्र का स्वरूप स्वस्तिक का आकार ग्रहण करता है। अतः यह चतुष्टय का चिन्ह भी है जो प्राचीन तथा अर्वाचीन मान्यता के अनुसार सूर्य-मण्डल के चारों ओर चार विद्युत केन्द्र के समान लगता है। इसके पूर्व दिशा में वृद्धश्रवा इन्द्र, दक्षिण में बृहस्पति इन्द्र, पश्चिम में पूषा विश्ववेदा इन्द्र तथा उत्तर दिशा में अरिष्टनेमि इन्द्र अवस्थित हैं।

वाल्मीकि रामायण में भी स्वस्तिक का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार साँप के फन के ऊपर स्थित नीली रेखा भी स्वस्तिक का पर्याय है। तंत्रालोक में आचार्य अभिनव गुप्त ने इसे इस तरह स्पष्ट किया है-

पृथक्पृथक्तत्त्रियं सूक्ष्ममित्यभिशब्द्यते। षड्जं करोमि मधुरं वादयामि ब्रुवे वचः।

अर्थात्- नादब्रह्म से अक्षर तथा वर्णमाला बनी, मातृका की उत्पत्ति हुई। नाद से ही पश्यन्ती, मध्यमा तथा बैखरी वाणी उत्पन्न हुई। तदुपरान्त उनके भी स्थूल तथा सूक्ष्म दो भाग बने। इस प्रकार नाद सृष्टि के छह रूप हो गये। इन्हीं छः रूपों पंक्तियों में स्वस्तिक का रहस्य छिपा है। अतः स्वस्तिक को समूचे नाद ब्रह्म तथा सृष्टि का प्रतीक एवं पर्याय माना जा सकता है।

बैखरी वाणी को विश्लेषण करने पर पता चलता है कि यह स्वर तथा व्यंजन दोनों में विभक्त है। स्वर छः होते हैं। इन्हीं को सूर्य की छः रश्मियों ‘षड्देवतात्मकं सूर्यरश्मित्वम्’ के रूप में देखा जाता है। और इन्हीं छः रश्मियों को स्वस्तिक कहा जाता है। स्वस्तिक को रचना के आधार पर देखा जाये तो यह अबाहु तथा सुबाहु नामक दो स्वस्तिक के रूप में परिलक्षित होता है। अबाहु स्वस्तिक वामावर्त तथा सुबाहु स्वस्तिक दक्षिणावर्त होता है। इस लिए सुबाहु स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना जाता है। क्योंकि सूर्य सदैव उत्तरी गोलार्द्ध में पूर्व से निकलकर दक्षिण पश्चिम होता हुआ उत्तर में पहुँचता है और प्रत्येक सुबह फिर पूर्व से उदय होता है। अतः सूर्य की चार दिशाओं में स्वस्तिक की चार भुजाओं का बोध होता है।

प्राचीन भारत में स्वस्तिक के चित्रण अंकन का दिग्दर्शन प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्रों में होता है। इससे स्पष्ट होती है कि पूर्ण या सुबाहु स्वस्तिक का विकास-विस्तार मूलतः अबाहु से हुआ है। शैल चित्रों में स्वस्तिक का प्रमाण पूजा- प्रसंगों के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से भी किया गया है। इसके पुरातात्त्विक प्रमाण सिंघनपुर-रायगढ़ क्षेत्र, बनिया बेरी पंचमढ़ी क्षेत्र, चम्बल क्षेत्र तथा सागर-भोपाल क्षेत्र में स्थित गुफाओं से मिलते हैं, जिनमें सुबाहु और अबाहु स्वस्तिक का अंकन हुआ है। सिंधु सभ्यता की मुहरों-सिक्कों में स्वस्तिक के दक्षिणावर्त रूप के साथ ही वामावर्त रूप भी मिलता है। उन दिनों दोनों ही प्रकार के स्वस्तिक को शुभ एवं मंगलमय माना जाता था। परन्तु आज दक्षिणावर्त स्वस्तिक ही पुण्य कार्यों में प्रयुक्त होता है तथा तंत्र व यंत्र आदि में वामावर्त स्वस्तिक का प्रयोग किया जाता है।

भारतीय दर्शन के अनुसार स्वस्तिक की चार रेखाओं को चार वेद, चार पुरुषार्थ, चार वर्ण, चार आश्रम, चार लोक तथा चार देवों अर्थात् ब्रह्म, विष्णु, महेश तथा गणेश से तुलना की गयी है। प्रतीकात्मक विचार के इन सूत्रों में स्वस्तिक चतुर्दल कमल का सूचक भी माना गया है। अतः यह गणपति देव का निवास स्थान भी है। इसी तथ्य को मूर्धन्य मनीषी पं. रामचन्द्र शास्त्री ने भी स्वीकार किया है। इन्होंने भी कमल को स्वस्तिक का ही पर्याय माना है। इसलिए कमल का प्रतीक भी स्वस्तिक हो गया और इसे भी मंगल व पुण्य कर्म में प्रयुक्त किया जाने लगा। कुछ विद्वान कमलापति भगवान् विष्णु के वक्षस्थल पर विद्यमान कौस्तुभमणि को स्वस्तिकार माना है।

श्रीमती मरे ने ‘सिम्बोलिज्म ऑफ द ईस्ट एण्ड वेस्ट’ नामक ग्रन्थ में प्रतिपादित किया है कि वैदिक प्रतीकों में गहन गम्भीर एवं गूढ़ अर्थ निहित हैं। यही प्रतीक संसार के विभिन्न धर्मों में भिन्न-भिन्न ढंग से परिलक्षित-प्रकट होता है तथा देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप इसके स्वरूप में रूपांतर एवं परिवर्तन हुआ। अतः स्वस्तिक प्रतीक की गति-प्रगति का अत्यन्त समृद्ध इतिहास व परम्परा है।

जैनधर्म में स्वस्तिक उनके सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के प्रतीक चिन्ह के रूप में लोकप्रिय है। जैन अनुयायी स्वस्तिक की चार भुजाओं को सम्भावित पुनर्जन्मों के स्थल-स्थानों के रूप में मानते हैं। ये स्थल हैं- वनस्पति या प्राणिजगत्, पृथ्वी, जीवात्मा एवं नर्क। बौद्ध मठों में भी स्वस्तिक का अंकन मिलता है। जार्ज वर्डउड ने बौद्धों के धर्म चक्र को, यूनानी क्रास को तथा स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना है। उनके अनुसार यह अत्यन्त प्राचीनतम प्रतीक है, जिसमें गहन अर्थ निहित है। तिब्बत के लामाओं के निवास स्थान तथा मन्दिरों में स्वस्तिक की आकृति बनी हुई मिलती है।

इस संदर्भ में अगाध संस्कृत प्रेमी तथा पश्चिमी ऋषि प्रो. मैक्समूलर का एक पत्र बड़ा उपयोगी एवं प्रासंगिक है। उन्होंने डॉ. श्लोमन को लिखे एक पत्र में बड़े युक्तिपूर्ण ढंग से स्पष्ट किया है कि इटली के हर कोने में, मिलन, रोम, पाम्पिया, स्काटलैण्ड के नारफाक नगर, हंगरी, युनान, चीन आदि हर देश-नगर में स्वस्तिक पाया जाता है। मैक्समूलर ने ई. थामस के इस अनुसंधान-अन्वेषण को भी उचित एवं उपर्युक्त ठहराया है, जिसमें थामस ने स्वस्तिक को गतिशील सूर्य का प्रतीक माना है।


VigyapanSuchana

युगाधिपति महाकाल की स्थापना

प्रज्ञेश्वर महादेव एक माह की यात्रा के बाद गोदावरी तट नासिक (त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग) से गंगा तट के सप्तसरोवर क्षेत्र शाँतिकुँज में आ विराज गए हैं। इनकी विधिवत् प्राणप्रतिष्ठा महाकाल देवालय में प्रायः बीस हजार परिजनों की उपस्थिति में 1 मार्च (महाशिवरात्रि) को कर दी गई है। इस पूरे कार्यक्रम का विस्तृत विवरण आप अगले माह पढ़ेंगे।

उन्होंने कहा है कि सूर्य के रथ के पहिये में बुनी धूरियाँ भी इस प्रतीक के पर्याय हैं। मैक्समूलर ने पर्सी गार्डनर की खोज को भी सही माना है। उनके अनुसार यूनानी नगर मेसोम्ब्रिया में प्राप्त कुछ सिक्कों पर अंकित चिन्हों में स्वस्तिक का बोध होता है।मैक्समूलर के मतानुसार स्वस्तिक अनेक रूपों में अनेक देशों में प्रचलित था तथा इसका निरन्तर उपयोग होता था। सैकड़ों वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड में स्वस्तिक का प्रयोग हुआ था। फिर डेन्मार्क, नार्वे, स्वीडन आदि देशों में इसकी आकृति बदलती गयी, परिवर्तित होती गयी। ईसाई गिरजाघरों में स्वस्तिक का प्रचलन था। वहाँ पर यह स्वस्तिक का उल्टा रूप मिलता है जो भारतीय स्वस्तिक दायें से बायें के ठीक विपरीत बायें से दायें चलता है। हिटलर ने इसी उल्टे प्रतीक को मान्यता दे रखी थी। स्वीडन में स्वस्तिक क्रास के रूप में मिलता है जिसके चारों ओर गोलाई बनी हुई है। स्वस्तिक के इस पुरातन स्वरूप से क्रीट, ट्राय, ससा आदि अनेक भूमध्य सागरीय देशों के लोग भी परिचित थे। पुरातात्त्विक साक्ष्यों के अनुसार बेबीलोनिया और मेसोपोटामिया में स्वस्तिक का अंकन ई होता था। मेसोपोटामिया में तो स्वस्तिक सिक्कों का लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध चिन्ह था। स्वस्तिक को बीजनटाइन कला में गामाडियन क्रास के नाम से जाना जाता है, परिचय मिलता है। इसका कारण था कि ग्रीक अक्षर गामा की आकृति व स्वरूप के समान थी। दक्षिण और मध्य अमेरिका की माया संस्कृति तथा उत्तरी अमेरिका की नवाजोसों संस्कृति में भी स्वस्तिक का प्रतिपादन मिलता है।

डी.ए. मैकेंजी के मतानुसार यह प्रतीक चिन्ह विभिन्न रूप में विभिन्न अर्थों में प्रयोग होता है। उनका मानना है कि इसे प्रजनन प्रतीक, उर्वरता प्रतीक, पुरातन व्यापारिक चिन्ह, अलंकरण-अभिप्राय, अग्नि, विद्युत, वज्र, जल आदि का साँकेतिक स्वरूप, ज्योतिष प्रतीक, उड़ते हुए पक्षी आदि अन्यान्य रूपों में माना गया है। एक अन्य प्रसिद्ध पाश्चात्य मनीषी ने बड़े ही उदारता पूर्वक स्वीकार किया है कि ऋषियों एवं विद्वानों के आर्यस्थल वैदिक भारत में जिस मंगलदायक एवं शुभसूचक स्वस्तिक की कल्पना की गयी थी, वही अन्यान्य रूपों में विश्व की अन्य सभ्यताओं द्वारा अपना ली गयी है, मान्यता प्रदान की गयी है। उनके विचार से ऋषि संस्कृति में ऐसे दिव्य, उदात्त एवं समग्र प्रतीकों का होना सम्भव है जिसका प्रवाह संस्कृति के समान चिरन्तन, शाश्वत और सनातन है। अतः स्वस्तिक रूपी इसी संकेत में सद्भावना का सजल भाव ही नहीं है वरन् सद्ज्ञान व सद्विचार का सम्पुट भी लगा हुआ है।

स्वस्तिक अपने अन्दर न जाने कितने गूढ़ भावों और विचार सूत्रों को संजोये पिरोये हुए है। इन भावों और विचारों के मूल में झाँकने पर हरेक व्यक्ति, समाज, राष्ट्र व सम्पूर्ण विश्व के लिए परम कल्याणकारी भावना ही अन्तर्निहित हुई प्रतीत होती है। इसमें वैयक्तिक विकास व विस्तार के साथ ही समाज की प्रगति एवं विश्व कल्याण की अनन्त सम्भावनाएँ सन्निहित हैं। आवश्यकता है एक ऐसी दृष्टि की जो इसे साक्षात्कार कर सके और सहज-सरल रूपों में इस प्रतीक की शुभ भावना को अभिव्यक्त कर सके। यदि हम अपने जीवन में इस प्रतीक को उतार सकें, इससे हम जुड़ सकें तो हमारा जीवन भी कल्याणकारी हो जायेगा। और हमारे जीवन से सद्कर्म एवं सद्भावों की सुगन्ध बिखर जायेगी। अतः इस मंगलमय प्रतीक को हमें अपने जीवन का अंग बनाना चाहिए। जिससे हमारे विचार व भाव मंगलमय एवं कल्याणकारी बन सके।


सहायक भूमिका (kahani)

यरवदा जेल में गाँधी जी भी थे और सरदार पटेल भी। पटेल नीम की दातुन लाने लगे। गाँधी जी ने कहा, “रोज लाने की जरूरत नहीं है। इस्तेमाल किया हुआ भाग काटते रहने से एक ही दातुन कई दिन चल जाएगी।”

पटेल ने कहा, “यहाँ नीम पर टहनियाँ बहुत हैं।” गाँधी जी ने कहा, “लेकिन हम उनका या किसी वस्तु का दुरुपयोग तो नहीं कर सकते।”

ब्रह्मचारी शाकुँतल गुरु आज्ञा से अनुभव−संपादन के लिए कई वर्ष तक भूमंडल के विभिन्न भागों में भ्रमण करते रहे। निर्धारित अवधि पूरी होने पर आश्रम में पहुँचे। कुलपति महर्षि मुद्गल जी को प्रणाम किया। अपनी यात्रा का विवरण सुनाया, स्नेह पाया।

समय पाकर शाकुँतल ने कहा,”गुरुदेव! मैंने एक आश्चर्य देखा। पृथ्वी पर रहने वाले, वृक्षों पर निवास करने वाले, जलचर तथा नभचर, सभी प्राणियों को नीरोग जीवन जीते देखा। उन्हें कहीं चोट लग जाए, घायल हो जाएं, यह और बात हैं, परंतु जुकाम, खाँसी, ज्वर जैसे सामान्य रोग भी उन्हें नहीं होते। श्वास, हृदय रोग, राजयक्ष्मा जैसे रोगों का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता।”

गुरुदेव मुस्कराए और बोले,”क्या मनुष्य के साथ रहने वाले पालतू पशु−पक्षियों को भी रोग होते नहीं देखा?”

बटुक ने कहा,”हाँ, उन्हें बीमार होते देखा है, परंतु वे सामान्य रोगों से ही ग्रस्त होते हैं और मनुष्य की अपेक्षा जल्दी आरोग्य−लाभ कर लेते हैं।”

गुरुदेव ने समझाया, “वत्स! मनुष्य को यह दंड प्राकृतिक नियमों के उल्लंघन के कारण मिलता है। अन्य जीवों में प्रकृति का उल्लंघन करने जितनी समझ या नासमझी नहीं है, इसलिए वे नीरोग हैं, पर रोग का संकेत मिलते ही सहज वृत्ति से प्रेरित उस मर्यादा में आ जाते हैं और जल्दी आरोग्य−लाभ करते हैं।

“हे तात! चिकित्सालय और कुशल चिकित्सकों की संख्या कितनी भी बढ़ जाए, जब तक मनुष्य संयम से, मर्यादा से दूर रहेगा, उसे रोगों से मुक्ति नहीं मिलेगी, इसलिए संयम की प्रेरणा जन−जन को देकर ही उन्हें रोग और दुःखों से बचाया जा सकता है। चिकित्सा−व्यवस्था केवल सहायक भूमिका निभा सकती हैं।


रामनाम एक कलपरु

रामनवमी के पुण्य पर्व पर हृदय में रामनाम की धुन बजने लगी है। प्रभु राम का वही नाम जिसका गुणगान बाबा तुलसी ने ‘रामचरित’ में किया है। बड़ी महिमा बखानी है उन्होंने राम के नाम की। अनेकों चमत्कार गिनाये हैं उन्होंने रामनाम के। इस पवित्र प्रभु नाम का स्मरण करते ही सारे कार्य अपने ही आप सिद्ध हो जाते हैं। रामनाम के सहारे बहरे सुनने लगते हैं, गूँगे बोलने लगते हैं और लूले-लँगड़े-अपाहिज दुर्गम पर्वत शिखरों पर चढ़ जाते हैं। महा असम्भव को सहज सम्भव करने वाला है यह राम का नाम। गोसाँई बाबा के इस कथन में केवल शास्त्र वचनों की पुनरुक्ति भर नहीं है, बल्कि उनका अपना अनुभव भी समाया है। वह कहते हैं-

नाम राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँगते तुलसी तुलसीदासु॥

कलियुग में राम का नाम मनचाहा फल देने वाला कल्पतरु है। सब तरह के कल्याण का घर है। जिसके स्मरण भर से भाँग की तरह से निकृष्ट तुलसीदास तुलसी की तरह पवित्र और पूजनीय हो गया।

रामनाम की महिमा यूँ तो हर युग में है। पर कलियुग में तो कुछ विशेष ही है। जप-तप, योग-जुगत के सारे पराक्रम रामनाम में समाये हैं। प्रभु श्रीराम जैसा दाता कभी कोई दूसरा नहीं। उन्होंने गिद्ध जटायु, आदिवासी स्त्री शबरी को वह सब दे डाला, जो योग साधना करने वाले ऋषि-मुनि जन्मों-जन्मों में नहीं पाते। अमिट और अपार है प्रभु राम के नाम का प्रभाव। इसी के प्रभाव से तो वनवासी बाल्मीकि महर्षि हो गये। अपने गोसाँई बाबा तुलसीदास को भी कौन पहचान पाता राम के नाम बिना। रामनाम की कथा ने ही तो उन्हें महाकवि के साथ जन कवि बना दिया। वह युगातीत और कालजयी हो गये। राम नाम की ही भाँति तुलसी का नाम भी मृत्युञ्जय बन गया है।

राम नाम की यह चमत्कारी शक्ति पिछली सदी में एक बार फिर से प्रकट हुई। गाँधी बाबा के हृदय में भी अपने गोसाँई बाबा की ही भाँति रामधुन बजी। राम नाम के अमोघ अस्त्र के सहारे गाँधी बाबा ने भारत की करोड़ों निःशस्त्र जनता को महापराक्रमी और अजेय समझे जाने वाले अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा कर दिया। अनगिन जातियों, अनेक धर्मों-संस्कृतियों, असंख्य भाषाओं-बोलियों में बँटी हुई, एक-दूसरे से अलग-थलग रहने वाली इस देश की जनता गाँधी की रामधुन पर मंत्रमुग्ध हो गयी। गाँधी बाबा के आदेश पर मिटने के लिए संकल्पित हो गयी। सारे संसार ने बड़े ही अचरज से इस चमत्कार को घटित होते हुए देखा। जिन अंग्रेजों के राज्य में कभी सूरज अस्त नहीं होता था, उसे गाँधी बाबा ने बिना किसी तोप-बन्दूक के यूँ ही खदेड़ दिया। यह महाआश्चर्य राम के नाम की उसी महिमा से साकार हुआ, जिसकी चर्चा गोसाँई बाबा ने रामचरित मानस में की है।

राम के नाम में अनेकों रहस्य हैं, असंख्य चमत्कार हैं। जो इससे ठीक तरह से परिचित नहीं हैं वे यही कहते हैं कि रहस्य यही है आखिर गाँधी बापू को ऐसी हैरतअंगेज लोकप्रियता कहाँ से मिली? उनकी लोकप्रियता से हैरान फ्राँस के यशस्वी लेखक रोमाँ रोलाँ ने कहा था कि गाँधी जी के पास कोई अलौकिक शक्ति जरूर है। उनकी इसी जादुई ताकत से करोड़ों भारतीय पल भर में सम्मोहित हो जाते हैं। जब वे अनशन पर बैठते हैं तो असंख्य भारतवासी खाना छोड़ देते हैं। जब वे मौन होते हैं तो अनगिनत भारतीय बोलना छोड़ देते हैं। जब वे चलते हैं तो करोड़ों भारतवासी उनके पीछे चल पड़ते हैं। जब वे जेल जाते हैं तो अंग्रेजों के जेल खानों में कैदियों को रखने के लिए तिल भर भी जगह नहीं बचती। गाँधी बाबा की इस लोकप्रियता से हैरान रोमाँ रोलाँ ने लिखा है- जरूर उन्होंने कोई महामंत्र सिद्ध किया था। जिसके बल पर वह अपराजेय ब्रिटिश साम्राज्य को पराजित कर भारतीय स्वाधीनता के नये युग की शुरुआत कर सके।

वह चमत्कारी महामंत्र प्रभु राम का वही नाम था, जिसका बखान और गुणगान तुलसी बाबा ने अपनी रामायण में किया है। राम के नाम के साथ राष्ट्रपिता ने राम के राज्य का भी स्वप्न देखा था। पश्चिमी विज्ञान और आधुनिकता के मोहपाश में जकड़े हुए कतिपय लोगों को भले ही बापू का यह स्वप्न अवैज्ञानिक और पुरातन लगे, पर इतिहास-सत्य इसकी प्रमाणिकता की बेबाक गवाही देता है। अठारहवीं सदी में हुई फ्राँस की क्रान्ति के किस्से जिन्होंने पढ़े हैं, जिनने 1917 में हुई रूसी क्रान्ति की लाल किताब पढ़ी है, वे जानते हैं, ये दोनों ही आज अपनी खुशबू लेकर बासी हो चुके हैं। लेकिन रामराज्य के आदर्श में अभी भी ताजगी है। इसमें शाश्वतता और चिरन्तरता है। ध्यान रहे प्रभु राम और उनका नाम किसी एक धर्म विशेष अथवा जाति विशेष की धरोहर नहीं है। जो उनको किसी जाति अथवा धर्म की धरोहर मानता है, उसके लिए न तो प्रभु राम वरदायी रह जाते हैं और न उनका नाम फलदायी होता है। भीलनी शबरी के जूठे बेर खाने वाले, बूढ़े गिद्ध जटायु का अन्तिम संस्कार अपने हाथों करने वाले राम तो सबके हैं। उनकी कथा-गाथा केवल इस उपमहाद्वीप के समुदायों और सम्प्रदायों तक ही सीमित नहीं है। इंडोनेशिया, बाली, जावा, सुमात्रा, म्यामार तक इसकी संवेदन सरिता प्रवाहित है। राम भारत देश की महा संस्कृति के महानायक हैं। उनकी महागाथा आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, दलितों, गिरिजनों के बीच तो है ही, दक्षिण के शैव और मातृपूजक भी इसकी संवेदना का संस्पर्श पाते हैं। उत्तर पूर्व के नगा, मेघ और मैतेइये भी राम के नाम से अपरिचित नहीं हैं। राम की कथा के अनेक रूप हैं, अनेकों रंगों में ढली है रामनाम की भावना। अपने गोसाँई बाबा ने तो कहा भी है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी। क्षेत्र, वर्ग, सम्प्रदाय के हिसाब से लोकचेतना ने राम की अपनी मूरत बनायी। पर मूल भावना कभी अलग-अलग नहीं रही। यह ठीक है कि राम तुलसी के भी थे और सूफी सन्त जायसी के भी। जिन्होंने भारत के इतिहास को गहराई से पढ़ा है, वे यह सच्चाई भी जानते हैं कि राम की छबि तो बाबर के बेटे हुमायुँ के सिक्कों पर भी अंकित थी। लोक चेतना के शिखर पुरुष राम के सामने अकबर और उसका दीन-ए-इलाही भी सिज्दा करता था।

‘सबके राम-सबमें राम’ इसी भाव से विभोर होकर बापू ने राम और उनके नाम को भारतवासियों के संगठन का सूत्र बनाया था। पश्चिमी दर्शन की दकियानूसी सोच से अलग ‘रामराज्य’ का शुद्ध स्वदेशी मॉडल नयी पीढ़ी के सामने रखा था। बापू के राम राज्य के राम हिन्दुओं के भी उतने ही थे, मुसलमानों के भी उतने ही। सिक्खों और ईसाइयों का भी उन पर उतना ही हक था। राम और उनका नाम भारत की लोक चेतना और उसकी एकात्मता का प्रतीक था। हम यहाँ इन पंक्तियों में आश्चर्यजनक किन्तु सत्य तथ्य का उल्लेख करना चाहते हैं। वह आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि भारतीय लोक चेतना में सर्वव्यापी राम की हिन्दुओं के चारों धामों में कहीं केन्द्रीय उपस्थिति नहीं है। सम्भवतः यह इसलिए कि जन-जन में बसे राम और उनके नाम को सीमाओं में सिमटना नहीं भाया। जो लोग राम और उनके नाम को जाति-धर्म, वर्ग एवं क्षेत्र में समेटने की कोशिश में लगे हैं, वे कभी राम के नहीं हो सकते और राम कभी उनके नहीं हो सकते।

राम तो भारतीय लोक चेतना में प्रवाहित होने वाली अन्तर्धारा है। जो निर्गुण-निराकार रूप में सतत् भारत के जनमानस में बहती रहती है। दुष्टों के विनाश और साधु जनों के कल्याण के लिए युग-युग में उसका सगुण प्राकट्य होता है। दशरथ के घर में जन्म लेने वाले राम, साँस्कृतिक अभ्युत्थान का संकल्प लेने वाले श्रीराम के रूप में हमारे अपने युग में जन्मते हैं। मनुष्य रूप में हम सबके बीच विचरने वाले प्रभु भक्तों के हृदय में भी अवतार लेते हैं। बस हमारे अपने हृदय में राम नाम की सच्ची धुन तो बजे। फिर सुर-नर हितकारी और उनके नाम के चमत्कारों की शृंखला प्रारम्भ होने की देर नहीं।


नैतिक कर्त्तव्य (kahani)

बेंजामिन फ्रेंकलिन ने एक अखबार निकाला और उसके कारण आर्थिक कठिनाई में पड़कर उसने अपने एक मित्र से बीस डॉलर लिए। जब उसकी स्थिति ठीक हो गई तो वह मित्र को वह रकम लौटाने गया। मित्र ने कहा, “वह रकम तो मैंने आपको सहायता में दी थी।” फ्रेंकलिन ने कहा, ‘सो ठीक है, पर जब मैं लौटाने की स्थिति में हूँ तो आपकी सहायता का ऋणी क्यों बनूँ?” झगड़े का अंत इस प्रकार हुआ—मित्र ने वे रुपये फ्रेंकलिन के पास इस उद्देश्य से जमा किए कि कोई जरूरतमंद उधार माँगे, तब इन्हें उसी शर्त पर दे दें कि वह भी स्थिति ठीक होने पर उन रुपयों को अपने पास जमा रखेगा और फिर किसी जरूरतमंद को इसी प्रकार, इसी शर्त पर दे देगा। कहते हैं कि अमेरिका में वे 20 डॉलर आज भी किसी−न−किसी जरूरतमंद के पास इसी उद्देश्य से घूम रहे हैं। आवश्यकता के समय दूसरों से सहायता ली जा सकती हैं, पर यह ध्यान रखना चाहिए कि समय होते ही वह सहायता किसी अन्य जरूरतमंद को लौटा दी जाए। सहायता के साथ जो दानवृत्ति जुड़ी हुई हैं, वह दोहरा कर्ज हैं। उसका चुकाना एक विशिष्ट नैतिक कर्त्तव्य है।


नवरात्रि पर्व संदर्भ - संकल्पित साधना का महापर्व : चैत्र नवरात्रि

चैत्र नवरात्रि संकल्प साधना का श्रेष्ठ व सर्वोत्तम मुहूर्त है। यह साधना का महापर्व है, संकल्पित साधना के लिए दिव्य पुकार है। साधना हेतु यह समय असामान्य और असाधारण है। यूँ तो साधना कभी भी और किसी भी समय की जा सकती है परन्तु श्रेष्ठतम मुहूर्त में विशेष विधि-विधान तथा उचित रीति-नीति से सम्पन्न की जाने वाली साधना के प्रभाव परिणाम अत्यन्त व्यापक और अद्भुत होते हैं। ऐसी साधना से हठीली वृत्तियों एवं चट्टानी प्रारब्ध के असह्य ताप घटते-मिटते हैं और जीवन में पवित्रता-दिव्यता का नवोदय होता है, उत्साह और उमंग का अवतरण होता है। यह साधना विज्ञान के तत्त्वज्ञ महान साधकों-महर्षियों का अनुभूत सत्य है। यह शास्त्र सम्मत भी है, जिसके प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं। बशर्ते कि साधना के अनुशासनों एवं नियमों का उचित ढंग से पालन किया गया हो।

साधना विज्ञान के मर्मज्ञ महर्षियों-ऋषियों ने नवरात्रि के इस मुहूर्त को दिव्यता एवं देवत्व के अभिवर्धन के लिए अनुकूल माना है। वे कालचक्र की अनवरत गतिशीलता से भलीभाँति परिचित थे। उन्होंने ग्रहों, नक्षत्रों आदि के संयोग-वियोग से उत्पन्न होने वाले प्रभावों का गम्भीर व गहन अध्ययन-अनुसंधान किया था। और वे इस तथ्य को अच्छी तरह से जानते थे कि इनके अधिकतम शुभ प्रभावों से मानवीय अन्तर्चेतना को कैसे प्रेरित-रूपांतरित किया जा सकता है। इसी सूक्ष्म व गम्भीर विज्ञान को जानने वाले हमारे प्राचीन वैज्ञानिक ऋषियों ने वर्ष में चार बार नवरात्रि पर्वों की विधि-व्यवस्था बनाई थी। इनमें से दो नवरात्रि से हम परिचित एवं विदित हैं। और इन्हीं दो में से एक चैत्र नवरात्रि है जिसकी महत्ता और विशेषता से परम पूज्य गुरुदेव की सभी सन्तानें वाकिफ हैं।

हर वर्ष के समान इस वर्ष भी चैत्र नवरात्रि की यह शुभ व पावन घड़ी हमारे उपस्थित हुई है। सदा की तरह इस बार भी हम लोग इस साधना से संकल्पित होने जा रहे हैं। अपने जीवन में साधना की सुदीर्घ प्रक्रिया और परम्परा को प्रारम्भ करने जा रहे हैं। और इन पुण्य पावन दिनों में प्रयुक्त साधना के स्वरूप से भी हम सभी भलीभाँति परिचित हैं। परन्तु इस संकल्प साधना का प्रभाव हमारे जीवन में दिखता क्यों नहीं है? क्यों इसका दिव्य प्रभाव हमारे चिंतन, चरित्र और व्यवहार के लिए अनभिज्ञ और अनजान सा बनकर रह जाता है? क्यों यह हमारे मन में सृजनशील विचार और हृदय में भाव प्रवण-पुलकन नहीं प्रदान कर पाता? इन अनगिन और ज्वलन्त प्रश्नों का जवाब एक ही है कि हमने साधना के कलेवर को अपनाया परन्तु इसकी प्राण चेतना तपस्या को भुला दिया और प्राणहीन कलेवर में आकर्षण कितना ही क्यों न हो परन्तु प्रभाव कुछ भी नहीं होगा।

संकल्प साधना में तप संजीवनी औषधि के समान है। तप के महावज्र से ही जीवन के दुर्बोध रहस्य को जाना समझा जा सकता है। महातप की दुर्धर्ष एवं प्रचण्ड ऊर्जा से हम वैयक्तिक एवं वैश्विक दुर्योग को तहस-नहस कर सकते हैं। तप की इस सूर्य के सदृश्य सतेज सच्चाई को महातपस्वी अगस्त्य ने पहचाना था। नई सृष्टि के सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के जीवन का हर पल-हर क्षण महातप से तपा था। आज भी ठीक उसी तरह तापस तप का मुहूर्त तपोमूर्ति गुरुदेव की हम सन्तानों के समक्ष प्रस्तुत हुआ है। चैत्र नवरात्रि ने अपने तपस्वी परिजनों से कुछ नयी, अनोखी एवं विशेष उम्मीदें बाँधी हैं। उनके सम्मिलित तप के महास्त्रडडडड से ‘मनुष्य में देवत्व के उदय एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण’ की सम्भावना साकार होने वाली है।

यह सम्भावना तभी साकार होगी, जब तप-साधना प्रखर एवं प्रचण्ड होगी, जब उसमें सम्यक् उपासना के साथ साधना और आराधना के कठोर अनुशासन जुड़े हों। उपासना-साधना के इस क्रम का भक्तिभाव और पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्वाह करना होता है। मंत्र तभी फलित होते हैं। इसके प्रभाव एवं परिणाम नियम-अनुशासन के अनुपालन में सन्निहित होते हैं। अतः चैत्र नवरात्रि के इस असाधारण समय में इन अनुशासनों का पालन करना चाहिए जिनसे मंत्र की सिद्धि होती है।

क्षीराहारी फलाशी वा शाकाशी वा हविष्यभुक्। भिक्षाशी वा जपेद्यत्तकृच्छ्र चान्द्रसमं भवेत्॥

अर्थात् दूध पीने वाला, फल खाने वाला, शाक खाने वाला, हविष्यान्न खाने वाला या भिक्षा खाने वाला यदि जप करे तो वह कृच्छ्र के समान होता है याने कि फिर उसे जप करने में पूर्ण कृच्छ्र करने की आवश्यकता नहीं होती है।

लवणं क्षारमम्लं गृञ्जनादि निषेधितम्। ताम्बूलं च द्विभुक्तिश्च दुष्टवासः प्रमत्तता॥

अर्थात् साधनावधि में नमक, खार, खटाई, प्याज आदि निषिद्ध भोजन, पान, दो बार का भोजन तथा कुसंग और प्रमाद आदि त्याग देना चाहिए।

इस पुण्य घड़ी में किसे अपनाना चाहिए कि साधना का प्रभाव परिलक्षित हो। इस संदर्भ में निम्न तथ्य ध्यान देने योग्य हैं-

भूशय्या ब्रह्मचारित्वं मौनचर्य्या तथैव च। नित्यं त्रिषवणं स्नानं क्षौरकर्म विवर्जनम्॥ नित्य पूजा नित्यदानमानन्द-स्तुति-कीर्त्तनम्। नैमित्तिकार्चनं चैव विश्वासो गुरुदेवयोः॥ जप-निष्ठ द्वादशैते धर्माः स्युर्मन्त्रसिद्धिदाः।

अर्थात् पृथ्वी शयन, ब्रह्मचर्य व्रत, मौन, त्रिकाल संध्या, स्नान, बाल न बनवाना, नित्य पूजन, दान, स्तुति, कीर्तन, नैमित्तिक अर्चन, गुरु एवं देवता का विश्वास तथा जप में निष्ठ-ये बारह मंत्र सिद्ध करने वाले के लिए आवश्यक एवं उपयोगी कार्य हैं।

आरम्भदिनमारभ्य समाप्तिदिवसावधि। नन्यूनं नातिरिक्तं च जपं कुर्याद् दिने-दिने॥ नरैन्तर्येण कुर्वीत न स्ववृत्तौ च लिंपमेत्। प्रातरारभ्य विधिवज्जपेन्मध्यंदिनावधि॥ मनः संहरणं शौचं ध्यानं मंत्रार्थचिंतनम्।

अर्थात् साधना के प्रारम्भिक दिन से लेकर अन्तिम दिन तक एक सा, एक ही संख्या में जप करें, न कम करें न अधिक। निरन्तर ऐसा करते ही रहें, क्रम एवं व्यवस्था बनाये रखे, अपनी वृत्तियों के फेर में लिप्त न हो जायँ। प्रातः से लेकर मध्याह्न तक विधिवत् जप करते रहें। मन से पवित्र रहें और साधना काल में सदा मंत्र के अर्थ का चिंतन करते रहें। साधना और तप के ये सभी सूत्र मिलकर साधक को उच्चस्तरीय चेतना की ओर आरोहित करते हैं।

नवरात्रि के साधनाकाल में इन्हें अपनाने धारण करने वालों को साधनात्मक उपलब्धियाँ है। साधना के अन्तिम दिन साधक को भावपूर्ण पूर्णाहुति के रूप में हवन की पुण्य प्रक्रिया को पूर्ण करना चाहिए। इसके साथ यह भाव भी सन्निहित होना चाहिए कि गायत्री परिवार के सभी तपस्वी परिजनों की सम्मिलित तपऊर्जा से वैयक्तिक एवं वैश्विक आपदा-विपदाएँ विनष्ट हो रही हैं और माँ गायत्री की कृपा से उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ मूर्त रूप ले रही हैं। चैत्र नवरात्रि के इस विशेष साधना और तप के सुविकसित तप प्रयोग से दिव्य व पावन परिणाम अवश्य ही उत्पन्न होंगे और इनकी परिणति सुखद व आश्चर्यकारी होगी।


नागरिक कर्त्तव्यों की प्रारंभिक शिक्षा (kahani)

इंग्लैंड के प्रख्यात पत्र ‘ग्लासेस्टर टाइम्स’ के संपादक और प्रकाशक एबर्ट रेक्स एक दिन किसी काम से सूटी आले मुहल्ले से होकर गुजर रहे थे। उसे गंदी बस्ती कहा जाता था। माँ−बाप जहाँ−तहाँ मजदूरी करने चले जाते और बच्चे आवारा फिरते। उन्हें शिष्टाचार का तनिक भी ज्ञान न था।

रेक्स जब उधर से निकले तो आवारा लड़कों ने उन पर कीचड़ फेंकना शुरू किया और सारे कपड़े गंदगी से सराबोर कर दिए। लड़कों पर समझाने का कोई असर नहीं हुआ। माँ−बाप वहाँ थे नहीं।

रेक्स पर इस घटना का बड़ा प्रभाव पड़ा। उनने लंदन और समीपवर्ती इलाकों का सर्वे किया। साथ ही यह भी पाया कि संपन्न लोगों में भी शिष्टाचार एवं नागरिक कर्त्तव्यों के प्रति रुचि बहुत कम है। इस सबने उन्हें कुछ करने के लिए प्रेरित किया।

रेक्स ने अपनी पत्रिका द्वारा भी शिष्टाचार का प्रसार किया। पुस्तिकाएँ भी लिखीं और मुहल्ले−मुहल्ले रविवारीय कक्षाएँ लगाने का प्रयत्न किया। आरंभ में तो इसे निरर्थक ठहराया जाता रहा, पर पीछे उस प्रयास की उपयोगिता समझी गई। पाँच वर्ष की अवधि में ऐसे एक हजार स्कूल खुले और उनमें एक लाख से अधिक शिक्षार्थियों ने नागरिक कर्त्तव्यों की प्रारंभिक शिक्षा पाई।


आयुर्वेद—2 - क्वाथ−चिकित्सा द्वारा जीवन का कायाकल्प

(उत्तरार्द्ध)

पिछले अंक में कालमेघ क्वाथ, वासा क्वाथ, निर्गुंडी क्वाथ एवं कुटज क्वाथ का वर्णन किया जा चुका है। यह पाया गया है कि एलोपैथी दवाओं के साथ−साथ क्वाथ−चिकित्सा अपनाने पर एलोपैथी से होने वाले ‘साइड इफेक्ट्स’ अर्थात् उनके दुष्प्रभाव कम हो जाते हैं। उदाहरण के लिए एंटीबायोटिक दवाइयाँ देने के पश्चात महीनों तक रोगी व्यक्ति को कमजोरी बनी रहती है, जबकि एंटीबायोटिक के साथ उसी के अनुकूल क्वाथ चिकित्सा देने पर दुर्बलता लंबे समय तक नहीं रह पाती और व्यक्ति जल्दी स्वस्थ हो जाता है। जहाँ रोगों की तीव्रता हो या रोग पर नियंत्रण पाने में कठिनाई हो रही हो, वहाँ प्रारंभ में एलोपैथी का सहारा लिया जा सकता है, किंतु बाद में क्वाथ−चिकित्सा से रोग को पूरी तरह से निर्मूल किया जा सकता है। जिन्होंने पहले लंबे समय तक एलोपैथी दवाइयों का सेवन किया है, उन्हें भी बाद में पथ्य−परहेज रखते हुए माह−दो माह तक क्वाथ−चिकित्सा का अनिवार्य रूप से सेवन करना चाहिए। इससे एलोपैथी से होने वाले नुकसान की भरपाई प्राकृतिक ढंग से सहज रूप से में हो जाती है।

यहाँ पर जिन क्वाथों की चर्चा की जा रही है, उनमें सम्मिलित हैं−(5) अश्वगंधा क्वाथ, (6) सरस्वती पंचक क्वाथ, (7) त्रिफला क्वाथ, (8) अशोक क्वाथ एवं (9) काँचनार क्वाथ। इन क्वाथों से संबंधित घटक औषधियाँ एवं उनकी निर्धारित मात्रा इस प्रकार है—

(5) अश्वगंधा क्वाथ

अश्वगंधा—1/2 चम्मच, मुलहठी—1 चम्मच, विदारीकंद—2 चम्मच, विधारा—1 चम्मच, गोक्षरु—1 चम्मच, नागरमोथा—1 चम्मच, दशमूल—1/2 चम्मच, शतावर—1 चम्मच।

अश्वगंधा क्वाथ एक सर्वोत्तम टॉनिक है। यह शक्ति वर्द्धक है, साथ−ही−साथ सभी प्रकार की शारीरिक−मानसिक कमजोरियों को दूर कर सेवनकर्त्ता को हरदम तरोताजा बनाए रखता है।

(6) सरस्वती पंचक क्वाथ

इसमें निम्नलिखित पाँच चीजें संभाग में मिलाई जाती हैं—

ब्राह्मी—1 चम्मच, शंखपुष्पी—1 चम्मच, मीठी बच—1 चम्मच, गोरखमुँडी—1 चम्मच, शतावर—1 चम्मच।

यह क्वाथ बुद्धिवर्द्धक, प्रतिभा संवर्द्धक है। विद्यार्थियों, शिक्षकों, लेखकों एवं बुद्धिजीवियों के लिए बहुत ही उपयोगी है। साथ−ही साथ सिरदर्द, तनाव, उदासी, उत्तेजना, पागलपन, अनिद्रा, हिस्टीरिया आदि मस्तिष्क संबंधी समस्त रोगों पर लाभकारी है। इस क्वाथ का सेवन हृदय की धड़कन को सामान्य बनाता है। सरस्वती पंचक का यह योग परमपूज्य गुरुदेव द्वारा बनाया गया था, जो कई दशकों से सेवनकर्त्ताओं को लाभान्वित कर रहा है। बच्चों के लिए 1 चम्मच सुबह एवं 1 चम्मच शाम तथा बड़ों के लिए 20−20 मिलीलीटर सुबह−शाम देने का विधान है। सरस्वती पंचक को पाउडर के रूप में भी लिया जा सकता है। बच्चों के लिए 1/4 चम्मच (चौथाई चम्मच) तथा बड़ों के लिए 1 चम्मच पाउडर दूध, शहद या घी−शक्कर के साथ सुबह−शाम को देना चाहिए।

(7) त्रिफला क्वाथ

इसमें निम्नलिखित चीजें मिलाई जाती हैं—

हरड़—(1) चम्मच, बहेड़ा—1 चम्मच, सनाय पत्ती—2 चम्मच, अमलतास का गुदा—1 चम्मच।

देखा जाए है कि ठंडे प्रदेशों, विशेषकर हिमालय की तराई में रहने वालों को त्रिफला क्वाथ में आँवले का प्रयोग करने पर, विशेषकर कच्चे आँवले से जोड़ों का दर्द, आर्थ्रराइटिस एवं गले की खराश बढ़ती है। अतः त्रिफला के प्रमुख घटक आँवला के स्थान पर अमलतास का गूदा डालने पर यह प्रभाव नहीं होता और जोड़ों का दर्द, आर्थ्रराइटिस आदि की समस्या भी नहीं रहती। गरमी वाले प्राँतों के लोग त्रिफला क्वाथ में 1 चम्मच के हिसाब से पका हुआ आँवला मिला सकते हैं। कब्ज एवं उदर रोगों के लिए त्रिफला क्वाथ बहुत ही उपयोगी है। आवश्यकता पड़ने पर अमलतास एवं सनाय पत्ती की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।

(8) अशोक क्वाथ

इसमें निम्नाँकित चीजें मिलाई जाती हैं—

अशोक—1 चम्मच, लोध्र—1 चम्मच, अश्वगंधा—1/2 चम्मच, नागरमोथा—1 चम्मच, शतावर—1/2 चम्मच, मुलहठी—1 चम्मच, नीम छाल—1/2 चम्मच, उलट कंबल—1 चम्मच, गिलोय—1 चम्मच, पद्माख—1 चम्मच, खूनखराबा—2 रत्ती (एक रत्ती = 100 मिलीग्राम)

अशोक क्वाथ स्त्री रोगों, विशेषकर प्रदर आदि रोगों में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है।

(9) काँचनार क्वाथ

इसमें निम्नलिखित चीजें मिलाई जाती हैं—

काँचनार छाल—2 चम्मच, शरपुँखा—1 चम्मच, गिलोय—2 चम्मच, पुनर्नवा—1 चम्मच, भारंगी—1 चम्मच, अशोक—1 चम्मच, अर्जुन—1 चम्मच, वरुण—1 चम्मच, अश्वगंधा—1/2 चम्मच, सारिवा—1 चम्मच, शतावर—1 चम्मच, कायफल—1 चम्मच।

हाइपोथाइरॉइडिज्म एवं गलगंड में यह क्वाथ विशेष रूप से लाभकारी है। कुपोषण अथवा एलोपैथी दवाओं के दुष्प्रभाव से कई बार गले में स्थित अंतःस्रावी थाइराइड ग्लैंड प्रभावित हो जाती है और थाइरॉक्सिन एवं ट्राइ−आयडोथाइरोनीन नामक हार्मोनों का स्राव पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पाता। इसके कारण हाइपो थाइरॉइडिज्म एवं गलगंड जैसी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। हाइपो थारॉइडिज्म की अधिकतर शिकार प्रायः महिलाएँ होती हैं। इसके कारण गले की सूजन, शारीरिक शोथ, मोटापा, आलस्य, सुस्ती जैसी कितनी ही शारीरिक−मानसिक बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में पथ्य−परहेज के साथ काँचनार क्वाथ का निरंतर नियमित रूप से सेवन करते रहने से न केवल उक्त परेशानियों से छुटकारा मिलता है, वरन् हाइपो थारॉइडिज्म को भी निर्मूल किया जा सकता है, जो अन्यान्य चिकित्सा पद्धतियों से संभव नहीं हो पाता है।

क्वाथ बनाने की विधि

क्वाथ बनाने की सबसे सरल विधि यह है कि सबसे पहले क्वाथ में जितनी दवाइयाँ डालनी हैं, उनको साफ−स्वच्छ करके कूट−पीसकर उनका अलग−अलग जौकुट (मोटा) पाउडर बना लिया जाए। तदुपराँत उन्हें उपर्युक्त निर्धारित मात्रा में लेकर सबको मिलाकर एकसार कर लिया जाए और एक डिब्बे में क्वाथ का नाम लिखकर सुरक्षित रख लिया जाए। जब क्वाथ बनाना हो तो निर्धारित क्वाथ के घटकों के सामने अंकित मात्रा को जोड़कर उतने चम्मच जौकुट पाउडर लेकर उन्हें लगभग पौन लीटर से एक लीटर जल में भिगो दिया जाए। यों तो सामान्य नियम यह है कि क्वाथ की मात्रा यदि 10 ग्राम है तो उसको लगभग 300 मिलीलीटर शेष रह जाए तब छानकर पानी (क्वाथ) पी लेना चाहिए।

जब भी क्वाथ बनाना हो तो दवाओं के सम्मिलित जौकुट पाउडर को निर्धारित मात्रा में लेकर उसे 16 गुने जल में या उपर्युक्त नियमानुसार जल में स्टील के एक स्वच्छ भगोने में भिगो देना चाहिए। आयुर्वेदानुसार वयस्कों के लिए जौकुट पाउडर या चूर्ण चार तोला अर्थात् 48 ग्राम एवं अवयस्कों के लिए 24 ग्राम निर्धारित है, किंतु कुशल एवं अनुभवी चिकित्सक उसमें दोष−बल के अनुसार घट−बढ़ कर लेते हैं। क्वाथ बनाने का सबसे सरल एवं उत्तम तरीका यही है कि इसे रात्रि में भिगो दिया जाए और सुबह मंद आँच पर उबाला जाए। सुविधानुसार इसे सुबह भिगोया और दोपहर में उबाला या दोपहर में भिगोकर शाम को उबाला जा सकता है। काढ़े को उबालने से पहले उसे कम−से−कम 8−10 घंटे पहले भिगोकर रखने से वह अधिक गुणकारी हो जाता है। क्वाथ सदैव मंद आँच पर ही बनाना चाहिए।

क्वाथ या काढ़ा जहाँ तक हो सके, सदैव ताजा बनाकर ही पीना चाहिए। सुबह का बनाया हुआ क्वाथ शाम को एवं शाम का बनाया हुआ सुबह को लिया जा सकता है। गर्मियों में अधिक समय तक क्वाथ रखा रहने से प्रायः वह खट्टा हो जाता है, अतः इस तरह के क्वाथ को नहीं पीना चाहिए। इसी तरह जला हुआ, काला, नीला, लाल, झागदार, कच्चा एवं दुर्गंधयुक्त क्वाथ भी नहीं पीना चाहिए। यह विषतुल्य माना जाता है। औषधियों की मौलिक गंध से युक्त एवं सुँदर रंग वाला काढ़ा ही पीना चाहिए। यह अमृत के समान गुणकारी होता है।

क्वाथ सेवन का सर्वोत्तम समय आहार रस के पाक हो चुकने के बाद अर्थात् भोजन पचने के बाद का है। क्वाथ का स्वाद कड़वा होने पर उसमें शहद या मीठा मिलाकर भी पी सकते हैं, किंतु बिना मीठे के क्वाथ पीना अत्यंत लाभप्रद होता है। कभी−कभी रोगानुसार क्वाथ में कोई द्रव या प्रक्षेप विशेष मिलाने के लिए कहा जाता है, जैसे जीरा, हींग, सेंधा नमक, जवाखार, गूगल, सोंठ, पीपर, कालीमिर्च या त्रिकटु, शिलाजीत आदि। अतः इन्हें क्वाथ में पीते समय 1 से 4 ग्राम की मात्रा में मिलाकर तब पीना चाहिए। इसी तरह दूध, घी, तेल, गोमूत्र, गुड़ आदि क्वाथ में डालना हो तो 10-12 ग्राम तक की मात्रा में इन्हें मिलाकर तब पीना चाहिए। प्रक्षेप वाली इन चीजों को क्वाथ में पहले से मिलाकर नहीं रखा जाता और न ही उबालते समय डाला जाता है। क्वाथ में शहद मिलाना हो तो कफ प्रधान रोगों में क्वाथ का चौथाई भाग, पित्त प्रधान रोगों में आठवाँ भाग एवं वात प्रधान रोगों में सोलहवाँ भाग मिलाना चाहिए। खाँड़ या मिसरी मिलाना हो तो वात प्रधान रोगों में चौथाई भाग, पित्त प्रधान रोगों में आठवाँ भाग एवं कफ प्रधान रोगों में सोलहवाँ भाग डालनी चाहिए।

एक बार तैयार किए हुए क्वाथ को ठंडा होने के पश्चात दुबारा उसे गरम करके नहीं पीना चाहिए। कहा गया है, शृतशीतं पुनस्तप्तं तोयं विषसमं भवेत्। निर्य्यूहोऽपि तथाशीतः पुनस्तप्तो विषोपमः॥ अर्थात् एक बार उबालने के पश्चात शीतल किया हुआ जल दुबारा गरम करने पर विषतुल्य हो जाता है। इसी प्रकार निर्य्यूह अर्थात् क्वाथ ठंडा होने के बाद दुबारा गरम करके पीने से विष के समान हो जाता है। काढ़ा पीने के पश्चात एक घंटे तक पानी नहीं पीना चाहिए। नियमित रूप से पथ्य−परहेज के साथ क्वाथ−चिकित्सा अपनाने से हर कोई स्वास्थ्य−लाभ प्राप्त कर सकता है और कायाकल्प जैसा स्फूर्ति भरे जीवन का आनंद उठा सकता है।


अन्तर्यात्रा का विज्ञान – 12

प्रभु के साथ अपना सिमरन नित्य कीजिए

अन्तर्यात्रा विज्ञान की एक के बाद एक जुड़ती हुई नयी कड़ियाँ साधकों की अन्तश्चेतना को भी अपने साथ जोड़ती हैं। जो साधक हैं, जिनमें साधना के लिए तीव्र लगन और गहरा समर्पण है, वही इस योगकथा के सत्य को समझने के लिए सुपात्र हैं। महर्षि पतंजलि केवल सुपात्रों और सत्पात्रों को ही जिन्दगी के रहस्य एवं विभूतियाँ सौंपने के इच्छुक हैं। जो सत्पात्र नहीं हैं, जिनकी साधना नियमित और सघन नहीं है, वे इस अन्तर्यात्रा विज्ञान के शब्दों को तो हथिया सकते हैं, पर इनका सत्य उनसे सदा दूर रहेगा। एक महान् वैज्ञानिक की भाँति महर्षि पतंजलि ने अपने अन्तर्यात्रा विज्ञान में ऐसी व्यवस्था कर रखी है। जो अनाधिकारी हैं, वे सदा वंचित रहेंगे। अन्तर्यात्रा विज्ञान का सत्य एक ही है, अधिकारी बनें और प्राप्त करें।

कैसे? इस लघु प्रश्न का उत्तर ही बड़े क्रमिक ढंग से आप तक प्रतिमास पहुँचता है। इस योगकथा की प्रत्येक कड़ी पर चिन्तन व आचरण आपको श्रेष्ठतम अधिकारी बनाने के लिए है। अपने जीवन को रूपांतरित करके आप वह पा सकते हैं, जो महर्षि पतंजलि आपको सौंपने के लिए इच्छुक हैं, परम पूज्य गुरुदेव ने जिसे खास आपको देने के लिए सम्हाल कर रखा हुआ है। महर्षि कहते हैं कि वृत्तियों के फेर में हमारा जीवन भले ही कितना ही क्लिष्ट क्यों न हो, पर यह योग विधि से अक्लिष्ट या सुखकर हो सकता है। इसी क्रम में पिछली कड़ियों में वृत्तियों की विशद् विवेचना होती रही है। चार वृत्तियों को क्रमिक रूप से सुखकर बनाने के सन्देश के बाद अब महर्षि पांचवीं और अन्तिम वृत्ति के रहस्य को उजागर करते हैं।

‘अनुभूतविषया सम्प्रमोषः स्मृतिः’॥ 1/11॥

शब्दार्थ- अनुभूत= अनुभव किए हुए, जाने हुए; विषय= (किसी) विषय का; असम्प्रमोषः = जो खोया हुआ न हो- यानि कि चित्त में संग्रहित हो, उसका ज्ञान होना; स्मृतिः= स्मृति है। संक्षेप में किन्तु स्पष्ट स्वरों में- स्मृति पिछले अनुभवों को स्मरण करना है।

मन की इस पांचवीं वृत्ति के रूप में स्मृति की शक्ति का थोड़ा-बहुत अनुभव हममें से प्रायः सभी को है। बच्चों से लेकर वृद्धजनों तक सभी अपनी-अपनी स्मृति का उपयोग करते रहते हैं। विद्यार्थियों के लिए तो यह स्मृति क्षमता वरदान ही है। इसी आधार पर उन्हें श्रेष्ठता का गौरव मिलता है। स्मृति के निरन्तर और अविराम उपयोग के बावजूद इसके गहन रहस्यों के बारे में बहुसंख्यक जन अनजान ही हैं। ज्यादातर लोगों के लिए तो बस यह स्मृति कभी दुःख देती है, तो कभी सुख। कभी वे इस वृत्ति के क्लिष्ट रूप का अनुभव करते हैं, तो कभी अक्लिष्ट रूप का अहसास करते हैं। यादों के झोंके कभी तो उन्हें रुला जाते हैं, तो कभी अचानक इनका स्पर्श उन्हें हंसा देता है। स्मृति के इन्हीं रूपों एवं पर्यायों से हम परिचित हैं। पर क्या सत्य इतना ही है?

इस महाप्रश्न का उत्तर हमारी अपनी अन्तश्चेतना की गहराइयों में है। जिसकी अनुभूतियों से हम अभी तक अछूते हैं। सामान्य क्रम में हम स्मृतिः का अर्थ वही यादें समझते हैं, जो बचपन से लेकर अब तक हमारे साथ जुड़ी हैं। लेकिन यादों का यह क्रम यहीं तक सीमित तो नहीं है। इसके दायरे में वह सब भी है, जो इस जीवन के पार और परे है। इसमें वे अनुभव भी आते हैं, जो हमें विगत जन्मों में भी हुए हैं। उनकी यादें भी तो हमारे अपने ही चित्त में संग्रहीत है। भले ही काल क्रम में ये थोड़ा धुँधली पड़ गयी हों। इन्हें पार करते हुए यदि हम अपने अस्तित्त्व के केन्द्र में झाँके तो एक मूल्यवान स्मृति और भी है- और वह हमारे अपने ही स्वरूप का अनुभव। हमारा वह स्वरूप जिसके लिए बाबा तुलसीदास ने कहा है- ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखराशी॥’ इस मौलिक अनुभव की स्मृति तो जैसे एकदम ही लुप्त हो गयी है। इस स्मृति पर न जाने कितनी स्मृतियों ने धुँधले आवरण डाल दिए हैं।

लेकिन यह हुआ कैसे? गीता माता कहती है कि इसकी एक लम्बी कड़ी है। ‘संगात् संजायते कामः, कामात् क्रोधोऽभिजायते। क्रोधात् भवति संमोहः, संमोहात् स्मृति विभ्रमः॥’ यानि कि विषयों के संग से उनकी कामना, फिर कामना से क्रोध, फिर क्रोध से सम्मोह और इस सम्मोह से स्मृति भ्रम। यह क्रम यहीं नहीं खत्म होता। आगे की कड़ियाँ और भी हैं- ‘स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।’ अर्थात्- स्मृति भ्रंश से बुद्धि का नाश और बुद्धि के नाश से स्वयं का नाश। आज के इन क्षणों में हमारी अपनी क्या दशा है, यह हम बड़ी अच्छी तरह से जान सकते हैं।

इस स्थिति से उबरने का उपाय क्या है? इस सवाल के जवाब में परम पूज्य गुरुदेव कहते हैं- उपाय एक ही है- उलटे को उलटकर सीधा करना। अर्थात् आत्मनाश की स्थिति से बचने के लिए पहले हमें आत्मउद्धार का संकल्प लेना होगा। फिर बुद्धिनाश की स्थिति को उलटने के लिए महाप्रज्ञा माता गायत्री का आँचल थामना होगा। वही हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर ले जा सकती है। इसके पश्चात् स्मृति विभ्रम दूर होना शुरू होता है। यानि कि तब हमें गायत्री साधना के बीच में अपने स्वरूप की हल्की झलकियाँ मिलती हैं। लेकिन सम्मोह का जाल अभी भी बना रहता है। यह तब टूटता है, जब क्लिष्ट स्मृति यानि जीवन के ईर्ष्या, द्वेष, बैरभाव या विषयानुभूति की यादों को अपने पास न फटकने दें। इनके स्थान पर याद करें सत्पुरुषों के संग को, अपने सद्गुरु के संग और उनके वचनों को। इससे न केवल सम्मोह नष्ट होता है, बल्कि क्रोध भी नष्ट होता है। विषयों की कामना भी जाती रहती है। फिर उनके संग की चाहत भी नहीं पैदा होती।

उलटे को उलटकर सीधा करने का पूरा क्रम यही है। यह क्रम पूर्ण होते ही अन्तश्चेतना में शुद्ध सत्त्व का उदय होता है। इस शुद्ध सत्त्व का परिणाम है- ध्रुवा स्मृतिः। अर्थात् अपने और परम चेतना के शाश्वत सम्बन्धों की दृढ़ भावानुभूति। इस सत्य को प्रकट करते हुए उपनिषदों का कथन है- ‘शुद्ध सत्त्व ध्रुवाःस्मृतिः’ स्मृति की साधना का सार यही है कि हम ईर्ष्या, बैरभाव, विषयभोगों से जुड़ी हुई यादों को हटाकर-भगाकर बार-बार अपनी आत्मचेतना को पवित्र करने वाली यादों को दुहराएँ।

सन्तों ने इसी को सुमिरन कहा है। सुमिरन यानि की प्रभु की याद, अपने आत्म स्वरूप का बार-बार चिन्तन। यही स्मृति का सार्थक उपयोग है। मानव चेतना के रहस्य इसी से उजागर होते हैं। अपने स्मृति विभ्रम के कारण हम भूल चुके हैं कि आखिर हम कौन हैं? हमारा अपना ही परिचय हमसे खो गया है। स्वयं की याद का ही विलोप हो गया है। हाँ दूसरों की भली-बुरी न जाने कितनी ही यादों को हम ढोते फिरते हैं। परम पूज्य गुरुदेव ने इस सम्बन्ध में बड़ी ही मार्मिक पुस्तक लिखी है- ‘मैं कौन हूँ?’ इस पुस्तक में उन सभी विधियों का समावेश है- जिससे हम अपनी खोयी स्मृतियों को पा सकते हैं। इसके साधना सूत्र बड़े ही प्रभावकारी हैं। स्मृति के रहस्य के जिज्ञासु साधकों के लिए यह पुस्तक नित्य पठनीय है। ध्यान रहे- हमारे दैनिक जीवन के सारे दुःखों के मूल में एक मात्र सत्य यही है कि हमने अपनी स्मृति को कष्टकारक बना लिया है। स्थिति को उलटने के लिए हमें इसे ही सुखकारक बनाना होगा। मन की समस्त वृत्तियाँ मन की शक्तियाँ कैसे बनेंगी, चंचल मन किस तरह से सधेगा, इसकी चर्चा महर्षि के अगले सूत्र का सत्य है, जिसे योग साधक अगले क्रम में पढ़ेंगे।


संकल्प लिया (kahani)

राजा के दरबार में एक वृद्ध पहुँचा और बोला, “भगवन्! मैं आपका मौसेरा भाई हूँ। कभी आपकी तरह मैं भी था। 32 नौकर थे, एक−एक करके चले गए। दो मित्र थे, वे भी साथ चलने से कतराने लगे। दो भाई हैं, सो बड़ी मुश्किल से थोड़ा−बहुत काम करते हैं। पत्नी भी उलटे−सीधे जवाब देती है। मेरी मुसीबत देखते हुए यदि आप कुछ सहायता कर सकें तो कर दें।”

राजा ने उसका आदर किया और रुपयों की एक थैली थमा दी। सभासदों ने साश्चर्य कहा, “यह दरिद्री आपका मौसेरा भाई कैसे हो सकता है!”

राजा ने कहा, “इसने मुझे मेरे कर्त्तव्यों का ज्ञान कराया है। इसके मुँह में मेरी ही तरह 32 दाँत थे, सो भी उखड़ गए। दो पैर मित्र थे, सो डगमगा गए। दो भाई हाथ हैं, जो अशक्त होने के कारण थोड़ा−बहुत ही काम करते हैं। बुद्धि इसकी पत्नी थी, सो वह भी अब सठिया गई है, कुछ−का−कुछ जवाब देती है। मेरी माँ अमीरी और उसकी गरीबी है। ये दोनों बहनें हैं, इसलिए हम दोनों मौसेरे भाई हैं। वृद्ध का कहना गलत नहीं है।”

इन संकेतों में राजा ने स्वयं के लिए एक संदेश पाया और अपना शेष समय सत्कार्यों में, प्रजाजनों के कल्याण हेतु नियोजित करने का संकल्प लिया।


गुरुगीता - 10 - सब कुछ गुरु को अर्पित हो

गुरुगीता के महामंत्र साधनापथ के प्रदीप हैं। इनसे निःसृत होने वाली ज्योति किरणें साधकों को भटकन और उलझन से बचाती है। वैदिक ऋषिगण, अनुभवी महासाधक सभी एक स्वर से कहते हैं कि साधनापथ महादुर्गम है। इस पर निरन्तर चलते रहना महाकठिन है। फिर चलते रहकर लक्ष्य को पा लेना गुरु कृपा के बिना नितान्त असम्भव है। उपनिषद् की श्रुतियों में साधकों के लिए ऐसे ही चेतावनी भरे वचन हैं। कठोपनिषद् की श्रुति कहती है- ‘क्षुरस्य धारा निशिता दुरव्यया दुर्गमं पथस्तत कवयोः वदन्ति’ अर्थात्- यह साधना पथ छुरे की धार की भाँति अति दुष्कर है। यह पथ अति दुर्गम है, ऐसा अनुभवी कवियों (ऋषियों) का कहना है। गुरुकृपा ही इस दुर्गम पथ को सुगम बनाती है। गुरु करुणा का सम्बल पाकर ही शिष्य इस पर चलने में सफल होता है। सद्गुरु के स्नेह सिंचन से ही साधक की साधना पूर्ण होती है।

सद्गुरु के स्नेह सिंचन की कतिपय विधियों का उल्लेख गुरुगीता की पिछली कड़ी में किया गया था। इसमें बताया गया था कि शिष्य को यह तथ्य जान लेना चाहिए कि सद्गुरु का चिन्तन स्वयं आराध्य का ही चिन्तन है। इसलिए कल्याण की कामना को करने वाला साधक इसे अवश्य करे। तीनों लोकों में निवास करने वाले सभी इस सत्य को कहते हैं कि गुरुमुख में ही ब्रह्मविद्या स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है। गुरु ही अज्ञान के अन्धकार को हटाने वाले प्रकाश स्रोत हैं। शास्त्र वचनों से भी यही सिद्ध होता है कि गुरुकृपा से ही माया की भ्रान्ति नष्ट होती है। गुरु से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है।

गुरुभक्ति की इस तत्त्व कथा में नयी कड़ी जोड़ते हुए भगवान् सदाशिव माता पार्वती को समझाते हैं-

ध्रुवं तेषाँ च सर्वेषाँ नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्। आसनं शयनं वस्त्रं भूषणं वाहनादिकम्॥26॥

साधकेन प्रदातव्यं गुरुसन्तोषकारकम्। गुरोराराधनं कार्यं स्वजीवित्वं निवेदयेत्॥27॥

कर्मणा मनसा वाचा नित्यमाराधयेद् गुरुम्। दीर्घदण्डम् नमस्कृत्य निर्लज्जोगुरुसन्निधौ॥28॥

शरीरमिन्द्रियं प्राणान् सद्गुरुभ्यो निवेदयेत्। आत्मदारादिकं सर्वं सद्गुरुभ्यो निवेदयेत्॥29॥

कृमिकीट भस्मविष्ट-दुर्गन्धिमलमूत्रकम्। श्लेष्मरक्तं त्वचामाँसं वञ्चयेन्न वरानने॥30॥

हे श्रेष्ठमुख वाली देवी पार्वती! शिष्य को यह सत्य भली भाँति जान लेना चाहिए कि यह ध्रुव (अटल) है कि गुरु से श्रेष्ठ अन्य कोई भी तत्त्व नहीं है। ऐसे लोक कल्याण में निरत परम कृपालु गुरु के कार्य के लिए आसन, वस्त्र, आभूषण, वाहन आदि देते रहना शिष्य का कर्त्तव्य है। साधक द्वारा इस तरह लोक कल्याणकारी कार्यों में सहयोग से सद्गुरु को सन्तोष होता है। भगवान् शिव का कथन है कि गुरु के कार्य के लिए साधक को अपनी जीविका को भी अर्पण करना चाहिए॥26-27॥ कर्म, मन और वचन से नित्य गुरु आराधना करना ही शिष्य का कर्त्तव्य है। गुरु के कार्य में तनिक सी भी लज्जा करने की जरूरत नहीं है। गुरु को साष्टांग नमस्कार करना चाहिए॥28॥ शिष्य का शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण सभी कुछ गुरु कार्य के लिए अर्पित होना चाहिए। यहाँ तक कि अपने साथ पत्नी आदि परिवार के सदस्यों को गुरु कार्य में अर्पण कर देना चाहिए॥29॥ भगवान् सदाशिव कहते हैं कि हे पार्वती! यह अपना शरीर कृमि, कीट, भस्म, विष्ठा, मल-मूत्र, त्वचा, माँस आदि का ही तो ढेर है। यह यदि गुरु कार्य के लिए अर्पित हो जाय तो इससे श्रेष्ठ भला और क्या हो सकता है॥30॥

इन महामंत्रों का प्रत्येक अक्षर साधक के साधना पथ का प्रदीप है। इससे निकलने वाली प्रत्येक किरण के प्रकाश में साधक का साधनामय जीवन उज्ज्वल होता है। गुरु तत्त्व जितना श्रेष्ठ है, उतना ही श्रेष्ठ गुरु का कार्य है। तात्त्विक दृष्टि से दोनों एक ही है। श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी शिवानन्द जी महाराज कहते थे- ‘डिवोशन टू संघ इज़ डिवोशन टू ठाकुर’ यानि कि मिशन-मठ के संगठन के प्रति भक्ति ठाकुर के प्रति भक्ति है। सद्गुरु का कार्य सद्गुरु की चेतना का ही विस्तार है। जो शिष्य अपने सद्गुरु के कार्य के प्रति समर्पित है, यथार्थ में वही सद्गुरु के प्रति समर्पित है। जो सद्गुरु के कार्य के लिए अपने समय, श्रम एवं धन का नियोजन करते हैं, वही अपने गुरु की सच्ची आराधना करते हैं।

सद्गुरु की आराधना के लिए गुरु कार्य हेतु अपने साधन एवं समय का एक महत्त्वपूर्ण अंश लगाना चाहिए। गुरु कार्य छोटा हो या बड़ा उसे करने में किसी भी तरह की लज्जा नहीं होनी चाहिए। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि लोगों को जिन कार्यों के लिए लज्जित होना चाहिए, उन्हें करने में वे लज्जित नहीं होते। बड़े मजे से झूठ, छल, कपट करते हैं, धोखाधड़ी करते हैं। इन कार्यों में उन्हें लज्जा नहीं आती है। पर गुरु की आज्ञा का पालन करने में वे शर्माते हैं। सद्गुरु का कार्य जो भी है, उसे भक्तिपूर्ण रीति से करना चाहिए। इसके लिए लज्जा का त्याग करने में भी कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

कर्म ही नहीं मन और वाणी से भी गुरु आराधना करनी चाहिए। बार-बार और हमेशा ही यह सत्य ध्यान में रखना चाहिए कि गुरु आराधना गुरु की शरीर सेवा तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक दायरे में सद्गुरु के विचारों का प्रसार व उनके अभियान को गति देने के लिए प्राण-पण से प्रयास करना भी शामिल है। इस हेतु न केवल स्वयं का जीवन अर्पण करना चाहिए। बल्कि अपनी पत्नी एवं परिवार के अन्य सदस्यों को लगाना चाहिए। अपनी यह देह पंचमहाभूतों के विकार के सिवा भला और है ही क्या? इस देह की सार्थकता सद्गुरु के कार्य के प्रति समर्पित होने में ही है।

स्वामी विवेकानन्द महाराज के दो शिष्य थे स्वामी कल्याणानन्द और स्वामी निश्चयानन्द। एक दिन स्वामी जी ने इन दोनों को अपने पास बुलाया और कहा- देखा हरिद्वार में साधुओं की सेवा की कोई व्यवस्था नहीं है। उन दिनों आज से करीब सौ वर्ष पूर्व हरिद्वार का समूचा क्षेत्र महाअरण्य था। साधु हों या फिर तीर्थयात्री इन सभी को सामान्य औषधि एवं चिकित्सा के अभाव में अनेकों कष्ट उठाने पड़ते थे। कई बार तो इन्हें मरना भी पड़ता था। स्वामी जी ने अपने इन दोनों शिष्यों को इनकी सेवा का आदेश दिया। इन दोनों साधन विहीन साधुओं के पास अपने सद्गुरु के आदेश के सिवा और कोई भी सम्पत्ति न थी। जब स्वामी कल्याणानन्द एवं स्वामी निश्चयानन्द स्वामी जी को प्रणाम करके चलने लगे, तो उन्होंने कहा- अब तुम दोनों इधर लौटकर फिर कभी न आना। बंगाल को भूल जाना। आदेश अतिकठिन था। परन्तु शिष्य भी सद्गुरु को सम्पूर्ण रीति से समर्पित थे।

बेलूड़ मठ से चलकर ये दोनों ही हरिद्वार आए। उन्होंने कनखल में अपनी झोपड़ियाँ बनाई। और जुट गए सेवा कार्यों में। दिन भर बीमार साधुओं एवं तीर्थ यात्रियों की सेवा और रात भर अपने सद्गुरु का ध्यान। कार्य चलता रहा, वर्ष बीतते रहे। इस बीच स्वामी जी ने इच्छामृत्यु का वरण किया। परन्तु सद्गुरु आदेश के व्रती ये दोनों गुरु के अन्तिम दर्शन में भी नहीं गए। गुरु कार्य के लिए उन्होंने अनेकों अपमान झेले, तिरस्कार सहे। पर सब कुछ उनके लिए गुरु कृपा ही थी। लगातार 35 सालों तक उनका यह सेवा कार्य चलता रहा। उनके कार्यों का स्मारक आज भी कनखल क्षेत्र में श्री रामकृष्ण सेवाश्रम के रूप में स्थित है। सद्गुरु के कार्य के प्रति निष्ठापूर्ण समर्पण ने उन्हें अध्यात्म के शिखरों तक पहुँचा दिया। इन दोनों के लिए स्वामी जी ने स्वयं अपने मुख से कहा था- हमारे ये बच्चे परमहंसत्व प्राप्त कर धन्य हो जाएँगे। गुरुकृपा से यही हुआ भी। ऐसे कृपालु सद्गुरु को शत-सहस्र-कोटिश नमन! गुरु नमन की भावभरी प्रक्रिया गुरुभक्त अगले अंक में पढ़ेंगे


Quotation

हॉलैंड समुद्र से निचाई पर बसा हुआ है। पानी भीतर न घुसे, इसलिए उस देश के किनारों पर दीवारें बनी हुई हैं। कभी पानी भीतर आने लगता है तो बड़े−बड़े पंप उसे उलीचने के लिए लगाने पड़ते हैं।

एक दिन रात होते−होते एक लड़का पीटर समुद्र की दीवार पर से निकला। उसने देखा कि दीवार में छेद हो गया है और उससे होकर पानी नगर में तेजी से बह रहा है। स्काउटिंग की शिक्षा प्राप्त अनुशासन प्रिया छात्र ने कोई और उपाय न देखकर अपनी बाँह उस छेद में ठूँसकर बहाव को रोका। सहायता के लिए औरों को पुकारता रहा, पर उस सुनसान में किसी ने उसकी आवाज ही नहीं सुनी। बारह घंटे भयंकर शीत और पानी में डूबा हुआ लड़का मरणासन्न हो गया। सवेरे जब लोग उधर से निकले तो लड़के को इस स्थिति में पानी को रोके हुए पड़े देखा। निकालने पर बड़ी कठिनाई से ही उसकी जान बचाई जा सकी। हॉलैंड को डूबने से बचाने वाले इस व्यक्ति पीटर का नाम हॉलैंड के इतिहास में अमर है।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी - मानव में देवत्व ऐसे उभरेगा

(कल्प साधना सत्र)

गायत्री मंत्र हमारे साथ−साथ,

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

मित्रो! कल आपको जीवनमुक्ति के बारे में बता रहा था कि आप जीवनमुक्त होकर जिएँ। बंधनों से छूट जाएँ। बच्चा माँ के पेट में बँधा रहता है, बाहर आ जाता है तो कितना खुश! कैदी जेलखाने से छूट जाता है तो कितना खुश हो जाता है और पक्षी पिंजरे में से छूट जाता है, तब कितना खुश होता है! मुक्ति का आनंद ऋषियों ने बताया है कि यह आदमी की जिंदगी का सबसे बड़ा आनंद है। व्यक्ति यदि मुक्ति का स्वच्छंद जीवन जी सकता हो, स्वाधीनता का अनुभव कर सकता हो तो क्या कहने का! पूर्व में मैंने आपको लोभ−मोह और अहंकार के बारे में ये कहा था कि आपके छाती से लगा रखा है, जिनको मित्र बना रखा है, जिनके सहारे आपने जिंदगी गुजारने का फैसला कर रखा है। आप इन तीनों का तिरस्कार कीजिए, इनके चंगुल से छूट जाइए।

मित्र! आज आपको एक नई बात बताते हैं कि आपको स्वर्ग का जीवन जीना चाहिए। आप निश्चित रूप से स्वर्ग का जीवन जी सकते हैं। स्वर्ग का जीवन जीने में आपको कोई दिक्कत नहीं है। मित्रो! स्वर्ग और नरक आपका बनाया हुआ है। स्वर्ग आप बना सकते और बिगाड़ भी सकते हैं। आपके एक हाथ में स्वर्ग है और एक हाथ में नरक है। आप चाहें तो स्वर्ग का द्वार खोल सकते हैं, सामने देख सकते हैं और मजा उड़ा सकते हैं। अगर आपकी इच्छा है कि नरक का जीवन जिएँगे तो आप इच्छा से या अनिच्छा से नरक का इस्तेमाल कीजिए और नरक में फँस जाइए। यह आपकी मरजी की बात है। भगवान ने हर आदमी को स्वाधीन बनाया है और इस योग्य बनाया है कि वह स्वर्ग और नरक में से जिस किसी को वरण करना चाहे तो खुशी से कर सकता है।

स्वर्ग का जीवन कैसे?

मित्रो! क्या करना चाहिए? आपको एक काम करना पड़ेगा। क्या? इस दुनिया में सबसे बड़ी दिक्कत यह पड़ती है कि आदमी बहुत सारी इच्छाएँ लिए हुए बैठा रहता है। अगर उसकी इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं तब वह दुखी होता है। आदमी को जिंदगी में साठ फीसदी दुःख इस बात का है कि उसने तरह−तरह की कल्पनाएँ कर रखी हैं। तरह−तरह की कामनाएँ कर रखी हैं। इन कल्पनाओं और कामनाओं के पूरा न होने पर वह हैरान होता है, दुखी होता है। आदमी को शारीरिक दुःख तो कभी−कभी होते हैं, परंतु मानसिक दुःख बहुत हैं। खाने−पीने को नहीं मिले तो शारीरिक दुःख, हारी−बीमारी हो जाए तो शारीरिक दुःख—बस, और क्या दुःख है, बताइए? कोई दुःख नहीं है। खाने−पीने की कमी है क्या? कुछ कमी नहीं है। अगर आदमी भले आदमी के तरीके से रहे तो बीमारी भी नहीं आएँ। बीमारी आएगी तो वैसे कदाचित ही कभी आएगी, जिसमें आदमी बेचैन हो जाता है। कोई बवासीर हो गया, कोई खाँसी−जुकाम हो गया—ये सब तो चलते रहते हैं। ये सब इतने बड़े दुःख नहीं हैं।

आदमी का एक ही दुःख है कि उसने बड़ी−बड़ी कल्पनाएँ, बड़े−बड़े मनोरथ और बड़ी−बड़ी भौतिक महत्त्वाकाँक्षाएँ बनी रखी हैं और वे पूरी नहीं हो पातीं। क्या इनका पूरा होना जरूरी है? बिलकुल जरूरी नहीं है, क्योंकि ये दुनिया, ये परिस्थितियाँ केवल आपके लिए थोड़े ही बनी है! आप अनुकूल परिस्थितियों से ही तो मनोकामना पूरी कर सकेंगे। दूसरे आदमी सहयोग देंगे, तभी तो बात बनेगी। वातावरण आपके अनुकूल बने, यह कोई गारंटी नहीं है। परिस्थितियाँ आपके अनुकूल बन जाएँ, कोई गारंटी नहीं है। फिर आपकी मनोकामना पूरी हो जाए, कोई जरूरी है? मनोकामना पूरी नहीं हो पाती, इसलिए आदमी आमतौर से दुखी रहते हैं।

इच्छाएँ पीछे रखिए

मित्रो! तब क्या करना चाहिए? आप स्वर्ग−सा जीवन जीने के लिए मनोकामना को पीछे हटा लीजिए और यह मत सोचिए कि क्या परिणाम मिलेगा। आप अपने मन को एक केंद्र पर केंद्रित कर लीजिए और फिर आप यह सोचिए कि हमारे फर्ज और कर्त्तव्य जो हैं, उन्हें हम पूरा करते हैं कि नहीं करते हैं। आप फर्ज और कर्त्तव्यों को गौर कीजिए कि इनका पालन किया कि नहीं किया। अपनी खुशी को आप इसी पर केंद्रित कर लीजिए। अगर हमने अपने कर्त्तव्यों का पालन किया तो खुश! अपने बच्चों को सुसंस्कारित करने के लिए प्रयत्न किया तो खुश! हमको अपने माँ−बाप के प्रति जो कर्त्तव्य पूरा करना चाहिए था, वह पूरा किया तो खुश। आप खुशी क्यों नहीं ले सकते? आप अपनी मुट्ठी में खुशी क्यों नहीं रखते, दूसरों के हाथ में क्यों बेच देते हैं? आपका बेटा यदि सुपात्र बनेगा और आपका आज्ञाकारी बनेगा, तब आप खुश होंगे। न हुआ तब? तब तो आपने अपनी खुशी दूसरों के हाथ में गिरवी रख दी न? आपकी बीबी हँसी−खुशी से रहेगी और आपकी आज्ञा का पालन करेगी, आपकी मरजी से चलेगी तो आप खुश! और नहीं चली तब? तब आपने बेच दी न अपनी खुशी! नाराजगी में फिर रहे हैं न तब? परिस्थितियों के गुलाम मत होइए। अपनी मनःस्थिति पर केंद्रित हो जाइए। केंद्रित हो करके सारे संसार भर में सिर्फ एक खुशी का अपना केंद्र बना लीजिए कि हमको अपने फर्ज और कर्त्तव्य पालन करने हैं।

मित्रो! फर्ज और कर्त्तव्य पालन करने का अगर आपका मन होगा, मरजी होगी, तब फिर क्या होगा? फिर आपको मजा आ जाएगा। और क्या होगा? बहुत कुछ हो जाएगा। फिर आपको अपने फर्ज से कोई रोक नहीं सकता। आप अपने मित्रों के प्रति कर्त्तव्य को निभाएँ। इसमें कोई रोकता है क्या? मित्र आपके प्रति बदला चुकाएँगे कि नहीं, यह बात सोचेंगे तो गड़बड़ हो जाएगी। आप यह उम्मीद मत कीजिए कि आपके मित्र बदला चुकाएँगे। आप यह उम्मीद मत कीजिए कि बच्चे हमारा कहना मानेंगे। आप यह उम्मीद मत कीजिए कि हमारी स्त्री हमारे आज्ञानुसार चलेगी। आप यह उम्मीद मत कीजिए कि जैसे हमने ख्वाब सँजो रखे हैं, उसी तरीके से हमारे सपने पूरे हो जाएँगे। न, ऐसा मत कीजिए।

सच्चा कर्मयोग

तब क्या करें? आप सब ओर से अपने आप को समेटकर जा बात आपके हाथ में है, जो आपकी मुट्ठी में है, उस पर केंद्रित हो जाइए। परिस्थितियाँ आपके हाथ में नहीं है। दूसरे लोग आपके साथ में क्या सलूक करेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। अपनी खुशी को आप उन बातों में मत मयस्सर कीजिए, नहीं तो दुखी रहेंगे आप। सुखी होने का एक ही तरीका है कि हम अपने कर्त्तव्य और फर्ज कहाँ तक पूरा कर सकते हैं। ये हमने पूरे किए हैं कि नहीं। बस, इतने से ही बात खत्म हो गई। इसे ही ‘कर्मयोग‘ कहते हैं।

अगर आप कर्मयोगी बन जाएँ और ड्यूटी एवं फर्ज को पर्याप्त मान लें और यह देखें कि हमने अपनी ड्यूटी ठीक तरीके से अंजाम दी, इसलिए हमको खुश होने का हक है, हमको संतोष करने को हक है। अगर आप यह बात मान लें कि आप देखेंगे कि आपने खुशी का केंद्रबिंदु बदल दिया और तब आपको चौबीसों घंटे मुस्कराते रहने का, हँसते रहने और प्रसन्न रहने का पूरा अवसर मिल जाएगा। आपको कर्मयोगी होना ही चाहिए। आपको अच्छी−से−अच्छी उम्मीदें करनी चाहिए और बुरी−से−बुरी बात के लिए तैयार रहना चाहिए। यह कोई जरूरी नहीं है कि जो आप चाहते हैं, वही हो जाएगा। अगर उलटा हो गया तब? उलटा भी होता रहता है। आपको मालूम नहीं है पंजाबियों का, पाकिस्तान से जब पंजाब का बँटवारा हुआ था तो वहाँ बेचारे कितने मालदार आदमी थे। एक सप्ताह के भीतर ही परिस्थितियाँ उलट गई थीं। किसी का बच्चा मर गया, किसी का धन छिन गया, किसी का क्या हो गया! वे भागकर इधर आ गए। फिर ये परिस्थितियाँ आपके लिए नहीं आ सकतीं क्या? आपके लिए भी हो सकती हैं।

हर स्थिति के लिए रहें तैयार

इसलिए मित्रो! आप अच्छी−से−अच्छी उम्मीद कीजिए। अपने भविष्य के लिए सुनहले सपने देखिए कि हमको अच्छा भविष्य बनाना है। लेकिन साथ−साथ में आप इसके लिए भी तैयार रहिए कि ठीक इसके उलटा हो जाए, तब क्या होगा? तब हम उसके लिए भी तैयार हैं। आप अपनी लड़की की शादी अच्छे−से−अच्छे घर में कीजिए। अच्छा घर भी ढूँढ़िए और यह उम्मीद कीजिए कि आपकी लड़की का गृहस्थ−जीवन अब अच्छा व्यतीत होगा। लेकिन इसके लिए भी तैयार रहिए कि आपने जिस लड़की की शादी की है, लड़का नकारा निकल गया तब? चोर निकल गया तब? दुष्ट निकल गया तब? तब उसके लिए भी तैयार रहिए। लड़की को भी पहले से इस बात के लिए आगाह रखिए कि यह भी हो सकता है कि उस घर में तुम्हारा सम्मान न हो। तुम्हारी जिंदगी आसानी से कट जाए, ऐसे सपने भी दिखाइए, लेकिन यह तैयारी भी रखिए कि ऐसा भी हो सकता है कि उसी घर की परिस्थितियाँ ऐसी विकट हो जाएँ, ऐसे दकियानूस लोग हों, ऐसे चोर−चाँडाल हों कि सब हैरान कर डालें। अतः इसके लिए भी तैयार रहिए। मुकाबले के लिए तैयार रहिए। उस स्थिति में क्या करेंगे, यह भी कल्पना कीजिए। कहने का अर्थ यह है कि भविष्य के बारे में न केवल सुनहले सपने देखिए, वरन् बुरी−से−बुरी बात के लिए तैयार भी रहिए। आप अगर यह सब मान लेते हैं तो मैं आपको कर्मयोगी कहूँगा। तब आपको जीवन में मजा आ जाएगा। आपकी खुशी का यह हुआ प्वाइंट नंबर एक।

मित्रो! खुशी का एक और दूसरा वाला प्वाइंट है, जिसको हम स्वर्ग कहते हैं। कर्मयोगी को मैं स्वर्ग में निवास करने वाला कहता हूँ। जिसको अपने फर्ज की बात याद रहती है, मैं उसे स्वर्ग का निवासी देवता कहता हूँ। देवता का एक और लक्षण है। क्या लक्षण है? देवता अकेले नहीं खाते। वे मिल−बाँटकर खाते हैं। अगर आपके पास कोई चीज है तो आप मिल−बाँटकर खाइए। ज्ञान आपके पास है तो उसका फायदा औरों को मिलने दीजिए। आपके पास पैसा है तो मिल−बाँटकर खाइए। आपके पास स्वास्थ्य है तो दूसरों को लाभ पहुँचाइए। हर एक को फायदा उठाने दीजिए। अपनी संपदा को मिल−बाँटकर खाइए। दूसरों की मुसीबतों को बँटा लीजिए। देवता यही काम करते हैं। देवता देखे हैं ने आपने? देवता के अंदर यही गुण होता है। देवता को हम पुकारते हैं कि हे भगवान! हमारी सहायता कीजिए। गणेश जी! हमको बुद्धि दीजिए। लक्ष्मी जी! हमको पैसा दीजिए। उनका स्वभाव है कि वे देते रहते हैं।

देते रहने का क्या मतलब है? देते रहने का मतलब यह है कि अगर पास कोई चीज है तो वे लोगों को बाँटते रहते हैं और लोगों की मुसीबतों में हिस्सा बँटाते रहते हैं। हमको बुखार आ गया, हम बीमार हैं। हे हनुमान जी! हमारे बुखार को दूर कर दीजिए। करते हैं कि नहीं करते, यह बात अलग है, पर आपकी मान्यता तो यही है न कि वे आपके दुखों में हिस्सा बँटाएँगे। आपकी मुसीबतों को दूर करेंगे। आपकी कठिनाइयों को दूर कर देंगे। अगर उनके पास ज्ञान है, विद्या है, बुद्धि है तो वे आपको देंगे। देवता इन्हीं दो वजहों से तो देवता हैं कि वे आपकी मुसीबतों में हिस्सा बँटाते हैं और उनके पास कोई वैभव है तो वे आसानी से बाँट देते हैं।

देवता बनिए

मित्रो! उस आदमी का नाम देवता है, जो अपनी सुविधाओं और संपदाओं को मिल−बाँटकर खाता है। मिल−बाँटकर खाने का मजा देखा है आपने? इक्कड़....., जो अकेला ही खाता रहता है, पाप खाता रहता है। अकेला ही संचय करता रहता है, वह आदमी पाप संचय करता रहता है। जो अकेले की खुशी चाहता है, वह आदमी पाप संचय करता है। इसीलिए हमारे यहाँ ‘परिवार’ की , ‘लार्जर फैमिली’ की प्रणाली है, जिसमें सब मिल−बाँटकर खाएँगे। मिल−जुलकर रहेंगे, हिल−मिलकर खाएँगे। कमाने वाला स्वयं थोड़े ही खाता है। सब मिल−बाँटकर खाते हैं। कोई बच्चा है, कोई बीमार है, कोई बुड्ढा है, किंतु सब हिल−मिलकर रहते और मिल−बाँटकर खाते हैं। यह पारिवारिक वृत्ति है, जिसमें ‘वसुधैव कुटुँबकम्’ की मान्यता जुड़ी हुई है।

‘वसुधैव कुटुँबकम्’ की मान्यता क्या है? ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ क्या है? एक ही है—आप दूसरों की मुसीबतों में हिस्सेदार हो जाइए और अपनी सुविधाओं को बाँट दीजिए—हो गया ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और हो गया ‘वसुधैव कुटुँबकम्।’ सारे सिद्धाँतों का निर्वाह इसी तरीके से होता है। इसलिए आपकी कार्यपद्धति और आपके चिंतन में ये बातें जुड़ी रहनी चाहिए कि हम किस तरीके से मिल−बाँटकर खाएँगे और दूसरों की मुसीबतों में किस तरीके से हाथ बँटाएँगे। इसीलिए आपको अपना संकीर्ण ‘स्व’—जो अभी आपने ‘कूपमंडूक’ के तरीके से सीमित कर रखा है, फिर आप उसको विशाल बना देंगे। आप सबके हो जाएँगे और सब आपके हो जाएँगे। तब आप देवता हो जाएँगे और आपको स्वर्ग में रहना आ जाएगा।

साथियो! अगर आप यह स्वर्ग नहीं खरीद सकते और आपने सीमा−बंधन बना रखा है—आप अपना ही खाना, अपना ही पहनना, अपना ही पैसा, अपना ही बेटा, अपना ही यश, अपना ही नाम चाहते रहेंगे और आपको, नरक में रहने वाले को जो यातनाएँ भुगतनी पड़ती हैं, मानसिक दृष्टि से वे सारी यातनाएँ भुगतनी पड़ेंगी। ठीक है कि शारीरिक दृष्टि से यह भी हो सकता है कि आप कुछ खाने−पीने का सामान इकट्ठा कर लें, कुछ पैसा इकट्ठा कर लें, लेकिन आप दुखी ही रहेंगे।

खिलाड़ी की जिंदगी

क्या करना चाहिए? तब आपको एक और काम करना चाहिए। कौन सा? आपको खिलाड़ी की जिंदगी जीनी चाहिए। आप खिलाड़ी की जिंदगी जिएँ। खिलाड़ी हारते भी रहते हैं, जीतते भी रहते हैं। वे टीम बनाकर खेलते हैं। हार गए तो क्या, जीत गए तो क्या! जिस तरह लोग ताश−पत्ता खेलते रहते हैं, बादशाह कट गया, बेगम कट गई, गुलाम कट गया—सब कट गए, परंतु खेलने वाले के चेहरे पर कोई शिकन ही नहीं। उसी तरह आप अपने चेहरे पर शिकन मत आने दें। चिंताओं की और मुसीबतों की कल्पनाएँ करके, संदेह करके, भविष्य की आशंकाएँ करके हर समय आपका दिल धड़कता रहता है। आप निश्चिंत रहिए, निर्द्वंद्व रहिए, मुस्कराते रहिए। आप हँसते और मुस्कराते रहेंगे और निश्चिंत रहेंगे, तब आप एक खिलाड़ी के तरीके से जिंदगी जिएँगे, तब फिर मैं आपको देवता कहूँगा।

मित्रो! यह संसार एक नाटक है, आप इसके एक पात्र हैं। दुनिया में आपको एक नाटक अदा करना है। आप नाटक के तरीके से, एक नट के तरीके से तमाशा कीजिए। लोगों को मनोरंजन करने दीजिए, लेकिन आप निश्चिंत होकर राजा जनक के तरीके से अपनी मनः स्थिति को बनाए रखिए। फिर मैं आपको स्वर्ग में निवास करने वाला कहूँगा। भूत का चिंतन मत करिए। पिछली जो घटनाएँ हो गई, तो ठीक है, आपने कुछ अच्छे काम कर लिए, पर बार−बार उनकी प्रशंसा करने की जरूरत क्या है? अगर किसी ने आपके साथ कोई बुराई कर ली या किसी ने दुःख भुगत लिए तो बार−बार कहने की जरूरत क्या है? भूत सो भूत, गया सो गया। आप भूत पर विचार मत कीजिए। भूत से आप अनुभव तो इकट्ठा कर सकते हैं, लेकिन चिंता भविष्य की कीजिए कि हमको करना क्या है? अगर यह सोचते रहेंगे तो मजा आ जाएगा।

जवान आदमी बनिए

बुड्ढे आदमी भूतकाल का वर्णन करते हैं। बच्चे भविष्य की बात सोचते हैं, लेकिन जवान आदमी वर्तमान की बात सोचते रहते हैं। आपको वर्तमान याद करना चाहिए कि आज का दिन आप किस तरीके से बेहतरीन बना सकते हैं। अगर यह विचार आपके जी में आ जाए तो मैं आपसे यह कहूँगा कि आप स्वर्ग में निवास करने वाले आदमी हैं। भविष्य की क्यों अनावश्यक कल्पनाएँ आप करेंगे? योजनाएँ बना लीजिए, इसमें कोई हर्ज नहीं, लेकिन ‘महत्त्वाकाँक्षा’ बात अलग हैं, योजना की बात अलग है। आपको एम. ए. करना है तो आप स्कीम बनाइए। नहीं साहब! एम. ए. नहीं हुए तो मर जाएँगे, नाक कट जाएगी, बात बिगड़ जाएगी। क्या बात बिगड़ जाएगी? दुनिया में ऐसे भी हैं, ज्यादा पढ़े नहीं हैं। आप मैट्रिक पास रहेंगे तो क्या आफत आ जाएगी? नहीं साहब! हमारा ये हो जाएगा, हमारा वह हो जाएगा। आप अगर ऐसे ही विचार करते रहेंगे तो मैं आपको नरकगामी कहूँगा।

मित्रो! स्वर्ग में रहने वाले अपने वर्तमान का ध्यान करते हैं, भविष्य की तैयारी करते हैं। भूतकाल को भूल जाते हैं और खिलाड़ी की तरह जिंदगी जीते हैं। आप अपने जीवन के तौर−तरीके में ऐसा मौलिक परिवर्तन करके जाइए यहाँ से। और क्या काम करें? आप एक और काम कीजिए कि लोगों की कमियों को, बुराइयों को हटाने की बात सोचें। मित्रो! यह दुनिया बड़ी खराब है और बड़ी जलील है। इसमें अच्छाई भी हैं और भगवान का रूप भी है। यह तो मैं नहीं कहता कि इसमें भगवान का रूप नहीं है। पर इसमें कमियाँ कम हैं क्या? बुराइयाँ कम हैं क्या? एक−से−एक दुष्ट और एक−से−एक बेईमान दुनिया में भरे पड़े हैं। तो फिर क्या करें? दुष्टों के प्रति द्वेष? नहीं बेटे, द्वेष करके आप ही जल जाएँगे। तो फिर ईर्ष्या? ईर्ष्या से भी आप जल जाएँगे। प्रतिशोध? प्रतिशोध से भी आप जल जाएँगे। इससे आप सामने वाले का जितना नुकसान करेंगे, उससे ज्यादा अपना नुकसान कर लेंगे। एक तो दूसरे आदमी ने आपको नुकसान पहुँचाया—नुकसान नंबर एक और एक आपने फिर नई बीमारी और शुरू कर ली। डाह की, ईर्ष्या की, प्रतिशोध की, घृणा की—इन सारी चीजों को आप बनाए रखेंगे तो फिर आप कैसे जिएँगे, बताइए न? तब फिर आप बाहर से भी पिसेंगे और भीतर से भी पिसेंगे। तो फिर आप मरेंगे कि नहीं? आप ऐसा मत कीजिए।

आप क्या करें? बुराइयों को बरदाश्त करें? नहीं, यह तो मैं नहीं कहता कि आप बुराइयों को बरदाश्त करें। आप बुराइयों से संघर्ष कीजिए, लेकिन संघर्ष करने का दूसरा तरीका है। कौन सा? वह तरीका है, जो डॉक्टर अख़्तियार करता है। किसके लिए? मरीज के लिए। मरीज के रोगों को मार डालने के लिए वह हरचंद कोशिश करता है कि रोग बचने न पाए, विषाणु बचने न पाए। रक्त का प्रदूषण बचने न पाए, किंतु रोगी को नुकसान न होने पाए। आप रोगी को नुकसान पहुँचाए बिना उसकी बुराइयों को दूर करने के लिए बराबर जद्दोजहद कीजिए। जब आप किसी व्यक्ति विशेष को हानि पहुँचाने की बात सोचते हैं तो वह द्वेष हो जाता है और जब आप उसके दोषों को, दुर्गुणों को, कमियों को हटाने की बात सोचते हैं तब? तब फिर कोई दिक्कत नहीं पड़ती। आप ऐसा कीजिए न! ऐसा करेंगे, तब आप देखेंगे कि आप स्वर्ग में रहने वाले देवताओं की बिरादरी में शामिल हो गए।

अपने पर निर्भर हों :− साथियों! आपको एक और काम करना चाहिए, आपको आत्मनिर्भर होना चाहिए। आप अपने ऊपर डिपेंड कीजिए—अपने ऊपर निर्भर रहिए। क्या करें? बाहर के आदमियों से मत उम्मीदें कीजिए, मत विश्वास कीजिए और मत अविश्वास कीजिए। आप यह मानकर चलिए कि यह भी आदमी है। आदमी सो आदमी, अतः अपने ऊपर निर्भर रहिए। आप यह मानकर चलिए कि उन्नति करेंगे तो हमीं करेंगे। किसी आदमी से आप यह आशा लगाए बैठे हैं कि वह आपकी सहायता करेगा तो वह क्यों आपकी सहायता करेगा? ‘आस बिरानी जो करे, जीवत ही मर जाए।’ यह देहात की कहावत है। यह ठीक है कि वक्त मिल जाएगा तो सहायता मिल भी सकती है और नहीं भी मिल सकती है, पर जो भी आप कदम उठाएँ, अपने पैरों को मजबूत करके उठाएँ। उम्मीद यह करें कि यह काम हमको करना है और हम ही करेंगे। अगर आपका यह आत्मविश्वास है, तब? तब फिर आपको आत्मनिर्भर व्यक्ति कहा जाएगा और आपको देवता कहा जाएगा।

देवता आत्मविश्वासी होते हैं और आत्मनिर्भर होते हैं। वे किसी पर डिपेंड नहीं। सूरज किसी पर डिपेंड नहीं करता कि हमको कोई अर्घ चढ़ाएगा कि नहीं चढ़ाएगा। हवा किसी पर डिपेंड नहीं करती, किसी की अपेक्षा नहीं करती। चंद्रमा किसी की अपेक्षा नहीं करता। जमीन किसी की अपेक्षा नहीं करती। आप भी किसी की अपेक्षा मत कीजिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप सहयोगी जीवन न जिएँ। परस्पर मिलना−जुलना न करें, पर आप अगर यह उम्मीद बनाए रहेंगे कि अमुक आदमी यह करेगा तो फिर बड़ी मुश्किल हो जाएगी। जैसे आप परिस्थिति के बारे में यह अनुमान लगाए थे कि परिस्थिति हमारे अनुकूल हो जाएगी और नहीं हुई, तब? तब आप झल्लाते हैं, रोते और खीजते हैं। इसी तरह अगर किसी व्यक्ति ने आपके साथ में एहसान न किया हो, तब? बदला न चुकाया हो, तब? सहायता न की, तब? तब फिर आप झल्लाएँगे कि नहीं झल्लाएँगे? मत झल्लाइए, कोशिश कीजिए, शायद दूसरों को सहयोग मिल जाए। जिस सीमा तक सहयोग मिल जाए, उस सीमा तक ठीक है और अगर नहीं मिल पाता तो न सही। अगर आप यह मानकर चलेंगे तो आपकी खीझ, जो कि मनुष्य के जीवन का बहुत बड़ा दुःख है, बहुत बड़ा संकट है, उस खीझ से आप बच जाएँगे। आप खीझ से बचिए। खीझ से बचने में क्या दिक्कत है? आप अपना दृष्टिकोण बदल दीजिए न। अगर दृष्टिकोण बदल देते हैं तो मैं आपको स्वर्ग का रहने वाला कहूँगा।

दृष्टिकोण बदलिए

विधेयात्मक चिंतन क्या है? यह वह चिंतन है, जिससे कि आदमी देवता बन जाते हैं। हम क्या बनाएँगे, क्या बिगाड़ेंगे, यह विचार ही मत कीजिए। अमुक को क्या नुकसान पहुँचाएँगे, यह मत सोचिए। जो खराब आदमी है, उसको हम अच्छा बनाएँगे, सज्जन बनाएँगे, यह क्यों नहीं सोचते आप? यह आदमी खराब है, इसको हम मार डालेंगे, इसकी हत्या कर डालेंगे, यह क्यों सोचते हैं, यह मत सोचिए। आप अपना दृष्टिकोण बदलिए। आपको जो कुछ भी मिला हुआ है, वह कम नहीं है, बहुत मिला हुआ है। आपके प्रसन्न होने के लिए, हँसने और हँसाने के लिए—यह क्या कम है कि आपको इनसानी जिंदगी मिली हुई है। आप देखिए न, दूसरे जानवरों को देखिए न, दूसरे जानवरों को देखिए, कीड़े−मकोड़ों को देखिए, पशु−पक्षियों को देखिए—ये कैसी घिनौनी और कैसी जिंदगी व्यतीत करते हैं। फिर आप क्यों ऐसी जिंदगी जिएँगे?

मित्रो! भगवान ने तो आपको राजकुमार बनाया है न। आपको बुद्धि दी है न। आपको वाणी दी है न। आपको हाथ−पाँव दिए हैं न। आपकी शादी हो गई है न। आप तो घर में रहते हैं न। आपकी तो जीविका है और पहली तारीख को तनख्वाह मिल जाती है। आप रोटी खा लेते हैं न। लेकिन दूसरे जानवरों को देखिए। उन बेचारों की न कोई तनख्वाह है, न कोई नौकरी है, न कोई कपड़ा है, न कोई बोलने का ढंग है। इन सबकी तुलना में आपको कितना अधिक मिला हुआ है। आप उस पर खुशी नहीं मना सकते? आप प्रसन्न नहीं हो सकते? आपके चेहरे पर मुस्कराहट नहीं आ सकती कि जो हमारी वर्तमान परिस्थितियाँ है, उनमें हमको प्रसन्न रहने का हक है। आप तो हमेशा अभावों को सोचते रहते हैं। अभावों को सोचने को अर्थ है—नरक। अभावों को ध्यान में नहीं रखना चाहिए। उनको दूर नहीं करना चाहिए, यह तो मैं नहीं कहता हूँ। आप अगर अपने को हमेशा अभावग्रस्त, दरिद्र और कंगाल मानकर बैठे रहेंगे तो आप दरिद्र और कंगाल ही रह जाएँगे। आप अपने आप को मत दरिद्र मानिए और मत कंगाल मानिए।

दीजिए, दीजिए

मित्रो! आप यह मानकर चलिए कि आप देवता हैं। अगर आप देवता हो गए तो आप देने में समर्थ हैं। आपके पास देने को बहुत है। आपके पास अपने गुजारे के लिए भी बहुत है और देने के लिए भी बहुत है। नहीं साहब! हमारे पास पैसा बहुत कम है। तो पैसा कौन माँग रहा है आपसे? पैसा देकर आप आदमी का क्या भला करेंगे? आप दूसरों को प्यार दीजिए। लोगों की आत्माएँ किस कदर प्यार के बिना तड़पती रहती हैं। आप दूसरों को सम्मान दीजिए न। देखिए, सम्मान की कितनी प्यासी है दुनिया। आप लोगों को प्रोत्साहन दीजिए न। देखिए, आपका प्रोत्साहन पाकर छोटे −छोटे आदमी क्या से क्या बन सकते हैं! देने के लिए कुछ कम है क्या? आप अपना पसीना दे दीजिए, अपनी मेहनत दे दीजिए। आप लोगों के लिए सहानुभूति दे दीजिए। देने के लिए आपके पास कुछ भी कम नहीं है।

साथियों! आपके पास अगर देने की मनोवृत्ति हो तो आप कुछ भी दे सकते हैं। रोटी है तो उसमें से भी रोटी काटकर दे सकते हैं। ठीक है, आप अगर चार रोटी खाते हैं तो तीन रोटी खाइए, एक रोटी गरीबों के लिए बचा दीजिए। उनका हिस्सा बाँटकर दे दीजिए, फिर देखिए, वह एक रोटी, जो आपने अपनी रोटी में से बचत कर ली थी, आपके लिए कितना देवत्व लेकर के आती है। कितनी खुशी लेकर के आती है और कितनी शाँति लेकर के आती है! आप कटौती कर लीजिए। कटौती करके आप दूसरों को देने की तैयारी कर लीजिए, आपको और अधिक जरूर मिल जाएगा। एक दिन उपवास कर लीजिए और उपवास करने के बाद में जो उस दिन का अनाज बच गया, उस दिन की जो दाल बच गई, उसको आप किसी ऐसे दुखियारे के घर पहुँचा दीजिए, जिसकी उसको जरूरत है। फिर आप देखेंगे कि किस कदर से आपको शाँति मिलती है और किस तरीके से आप प्रसन्नता के नजदीक चले जाते हैं! देवता के यही गुण हैं।

रसो वै सः

मित्रो! देवता उदार होते हैं, देवता विशाल हृदय होते हैं। देवता संकीर्ण नहीं होते। देवताओं के मन में हर समय देने की इच्छा बनी रहती है कि किसके लिए क्या दे पाएँ। प्यार देना सिखाता है। सेवा उसी का नाम है। इसका नाम प्यार है। भगवान का नाम प्यार है। रसो वै सः भगवान का नाम रस है। भगवान का नाम प्यार है। प्यार, आप अपने भीतर पैदा कीजिए न। जिस दिन आप अपने भीतर प्यार पैदा करेंगे, उस दिन आपके मन में ऐसी उमंग और एक ऐसी हिलोर उत्पन्न होगी कि हमको कैसे दूसरों की सहायता करनी चाहिए? कैसे हम दूसरों की मदद करें? जब आप दूसरों की सहायता करने के लिए अमादा होंगे तो आपको अपने में से कटौती करनी पड़ेगी। तब फिर आपको साधु और ब्राह्मण का जीवन जीना पड़ेगा।

साधु और ब्राह्मण किसे कहते हैं? किफायतदार को साधु−ब्राह्मण कहते हैं। मितव्ययी को, अपरिग्रही को एवं सर्वसंतोषी को साधु−ब्राह्मण कहते हैं। आप ब्राह्मण बनिए, साधु बनिए। आप भूदेव बनिए, पृथ्वी के देवताओं में अपने नाम को लगा लीजिए। आप संत बनिए। संतों को भी भगवान कहते हैं, देवता कहते हैं। संत किसे कहते हैं? परोपकारी को कहते हैं, लोकहित में लगे हुए आदमियों को कहते हैं। समाज के लिए विसर्जित और समर्पित लोगों को कहते हैं। सत्प्रवृत्तियों में अपने आप को खपा देने वालों को संत कहते हैं। आप संत और ब्राह्मण के रूप में अगर जिएँ तो मजा आ जाएगा।

यहाँ से देवता बनकर जाइए

मित्रो! आप कैसे देवता हो सकते हैं? इसके लिए आपको संघर्ष करना पड़ेगा। मछली उलटी दिशा में चलिए। जमाने का बहाव किधर है, इस पर आप ध्यान मत दीजिए। आप संकल्प और निश्चय कीजिए कि हम सिर्फ आदर्शों की तरफ चलेंगे, ऊँचाइयों की ओर चलेंगे। आप मस्ती में रहिए और दूसरों को मस्ती से रहने दीजिए। आप खुशी से रहिए और दूसरों को खुशी से रहने दीजिए। आप जिएँ और दूसरों को जीने दीजिए। मिल−जुलकर रहिए, मिल−बाँटकर खाइए। हँसते रहिए और हँसाते रहिए। अपने फर्ज और कर्त्तव्यों के प्रति जागरुक रहिए। अगर आप इतना कर सकते हों तो आप देख लेना, आप देवता हो जाएँगे और देवत्व का सारे का सारा उदय आपके इसी जीवन में हो जाएगा। जैसी कि हम अपेक्षा करते हैं। आप इस शिविर में आए हैं, बहुत अच्छा, पर आप यहाँ से देवता बन करके जाइए। अब देवता बनना और राक्षस बनना बिलकुल आपके हाथ की बात है। आप चाहें तो हम आपको देवता बना सकते हैं और आप देवता बन सकते हैं। उम्मीद यही है कि आप ऐसा ही करेंगे। आज की बात समाप्त।

॥ॐ शाँति॥


अपनों से अपनी बात - देवसंस्कृति विस्तार हेतु ज्ञानघट स्थापना का नया विराट प्रयोग

युगयज्ञ में चाहिए हविष्य, समिधा और आज्यः

“साधारण समय और विशेष समय में, साधारण व्यक्ति और विशिष्ट अंतर होता है। साधारण की चाल धीमी होती है और विशिष्ट की तत्काल निर्णय करने से लेकर कदम उठाने तक की प्रक्रिया के रूप में संपन्न होती है। धीरे−धीरे सोचते−विचारते, अनुकूल अवसर ढूँढ़ते, साथियों से सलाह−मशविरा करने में ढेरों समय लग जाता है और जो उत्कृष्टता का पक्षधर उत्साह उठा था, वह समय बीतते−बीतते ठंडा ही नहीं, समाप्त भी हो जाता है। असंख्यों की आदर्शवादी योजनाएँ, इसी प्रकार मटियामेट हुई हैं। इसके विपरीत असाधारण व्यक्ति समय को पहचानने में अपनी तीखी सूझ−बूझ का परिचय देते हैं। बिजली की तरह चमकते और तलवार की तरह टूट पड़ते हैं। असमंजस उनके आड़े नहीं आता। व्यापारी जैसा हानि−लाभ का हिसाब−किताब लगाने और ब्याज−बट्टे की फैलावट जोड़ने−घटाने की उन्हें फुरसत नहीं मिलती। करना तो करना, न करना तो न करना की नीति ही उदीयमान साहसियों को अपनानी पड़ी है। जब किसी उच्चस्तरीय साहस का प्रश्न उपस्थित हो तो ईसा की वह उक्ति स्मरण कर लेनी चाहिए, जिसमें वे कहते थे—यदि देने का मन आए तो बायें हाथ की वस्तु उसी स्थिति में दे डालो, उसे दाहिने हाथ तक पहुँचाने का प्रयत्न न करो। ऐसा न हो कि इस थोड़ी−सी ही देर में शैतान बहका दे और तेरे देने के इरादे को बदल दे।” (अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1982, पृ.सं. 58)

उपर्युक्त बात इस संदर्भ में लिखी गई कि आज भी बीस वर्ष बाद वैसा ही समय है। हमें पहचानना होगा कि हम असाधारण हैं, विशिष्ट हैं एवं हमारे दायित्व भी विशेष हैं। यदि हम समय को पहचानते हैं तो हमें बिना ननु−नच किए युग के नवनिर्माण की प्रक्रिया से, जिसे युग निर्माण योजना युगऋषि ने नाम दिया है, पूरी तरह जुड़कर अब कुछ विशिष्ट कर दिखाना चाहिए। इन दिनों गलाई−ढलाई का दैवीय उपक्रम चल रहा है, संधिकाल का भी यह अति विशिष्ट समय है। हम में से कई ऐसे हैं, जो योजना समझते हैं एवं यह भी मानते हैं कि इसी पर दुनिया का भविष्य टिका है। यदि देवसंस्कृति जाग्रत−जीवंत रही, इसके निर्धारण विश्वव्यापी हो सके, तो ही आसुरी व दैवी सत्ताओं के संघर्ष में दैवी पक्ष विजयी होगा। देवसंस्कृति के विस्तार के निमित्त ही शाँतिकुँज−गायत्री तीर्थ के सभी क्रियाकलाप इन दिनों नियोजित हैं। इन दिनों दैवी अनुदान पाना है तो स्वयं को खाली करना होगा। नवसृजन के लिए अंशदान−समयदान बढ़−चढ़कर निकालना होगा।

सुदामा को बगल में दबी चावल की पोटली भगवान को देनी पड़ी थी, तभी वे पोरबंदर के विशाल गुरुकुल के प्रधान आचार्य बने थे। कर्ण ने मुँह में लगे सोने के दाँत तक उखाड़ कर दे दिए थे। तब वे योगेश्वर के कृपापात्र बने थे। राजा बलि और हरिश्चंद्र को अपने राजपाट से हाथ धोना पड़ा था। शबरी को अपने बेरों की टोकरी खाली करनी पड़ी थी। गोपियों का दधि−मक्खन कितनी बार छिनता रहा। दरिद्र विदुर की पत्नी घर में कुछ न होने पर भगवान को बथुए का साग और केले के छिलके खिलाती रहीं। जिनके पास अर्थ−साधन नहीं थे, उन केवट, वानरों, रीछों ने अपना श्रम समर्पित किया था। इस प्रसंग में गिलहरी जैसे क्षुद्र प्राणी भी पीछे नहीं रहे।

सौ बातों की एक बात कि किसी ने भावनाशील को आज के आस्था−संकट के समय में महीने में अट्ठाईस या उनतीस दिन की कमाई से गुजारा करने में किसी भी प्रकार की कठिनाई नहीं होनी चाहिए। एक या दो दिन की आजीविका देवसंस्कृति विस्तार जैसे पुण्य−परमार्थ में लगा सकना किसी के लिए भी भारभूत नहीं होना चाहिए। इतना न सही तो यह तो किया जा सकता है कि अपनी कमाई में से पचास पैसा (आठ आना) रोज न्यूनतम इसी कार्य के लिए निकाला जाए और उसे प्रतिमाह इकट्ठे सीधे शाँतिकुँज भेज दिया जाए। यदि हमारे लाखों परिजन इसमें लग गए तो यह कार्य देखते−देखते पूरा हो सकता है।

इसी उद्देश्य से गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज ने विशेष रूप से देवसंस्कृति विस्तार के निमित्त विशेष ज्ञानघटों के निर्माण व भारत तथा विश्वव्यापी विस्तार देने का मन बनाया है। इन ज्ञानघटों से प्राप्त राशि का उपयोग विशेष रूप से एक ही प्रयोजन देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की महत्त्वाकाँक्षी योजना को मूर्तरूप देने में किया जाएगा। बड़े−बड़े अनुदानों से यदि ऐसे कार्य होते तो युग निर्माण टाटा व बिड़ला द्वारा ही हो जाता। लाखों भावनाशीलों का बूँद बूँद नियमित अंशदान जब सतत प्राप्त होगा तो उसे 200 करोड़ की योजना वाले विश्वविद्यालय में लगाने पर शुचितापूर्ण उद्देश्यों की भी पूर्ति होगी तथा परमपूज्य गुरुदेव के द्वारा बताए गए निर्देशों का भी परिपालन होगा।

यह ज्ञानघट योजना विशेष रूप से देवसंस्कृति विस्तार के लिए ही है। इसके लिए ज्ञानघट भी विशेष बनाए गए हैं तथा उनका बहिरंग कलेवर भी पहले के ज्ञानघटों से अलग है। पहले से चल रहे ज्ञानघट यथावत् चलते रहेंगे। उनसे प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञा मंडलों, साहित्य विस्तार की पूर्ति आदि का कार्य चलता रहेगा। किंतु महाशिवरात्रि 2003 से आरंभ किए जा रहे इस अभियान के ये विशेष ज्ञानघट तो एक ही उद्देश्य के लिए होंगे—देवसंस्कृति का विश्वव्यापी विस्तार। ये ज्ञानघट उन सब घरों में स्थापित किए जा सकते हैं, जो अभी नए हैं, मिशन से अपरिचित हैं, परंतु उद्देश्य बताए जाने पर उत्साह दिखा रहे हैं या इस प्रयोजन से जुड़ना चाह रहे हैं। प्रयास किया जाए तो ये ज्ञानघट देखते−देखते प्रबुद्ध वर्ग—भावनाशीलों, विभूतिवानों, हमारी अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना, युग शक्ति गायत्री पत्रिका के पाठकों के परिचितों के घर स्थापित हो सकते हैं। इस विशिष्ट ज्ञानघट की लागत भी बड़ी कम मात्र दस रुपये ही रखी गई है। प्रतिमाह इस राशि के संग्रह एवं भेजने के लिए एक तंत्र खड़ा करना होगा, जो कि आसानी से किया जा सकता है। यदि हमारी पत्रिकाओं के कुल बारह लाख ग्राहक व उनसे जुड़े इतने ही हितैषी पाठक इस योजना को नियमित लागू कर दें तो इनके द्वारा लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपये की राशि हमें एक माह में तथा लगभग बयालीस करोड़ रुपये की राशि एक वर्ष में प्राप्त हो सकती है। यदि यह क्रम साढ़े चार−पाँच वर्ष भी चल गया तो हमारा देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का पूरा प्रोजेक्ट इसी से पूरा हो सकता है।

सहज ही अनुमान नहीं होता कि इतना कुछ इस छोटी−सी बूँद बूँद से सरोवर भरने की प्रक्रिया से हो सकता है। यह अकल्पनीय−सा लगता है, पर सचाई है। एक−एक भावनाशील का अंश उसमें लगेगा, तो सब यह समझेंगे कि यह विश्वविद्यालय मेरा है, हमारा है। इसमें एक नहीं, कई ईंटें हमारी ही लगी है। इसमें पढ़ने वाले विद्यार्थी हमारे अपने हैं। जब पूरा विस्तार हो जाएगा एवं एक वर्ष में छह से दस हजार विद्यार्थी यहाँ से कार्यक्षेत्र में कार्यकर्त्ता के रूप में निकलेंगे तो फिर भान होगा कि इस अंशदान की कीमत क्या है!

परमपूज्य गुरुदेव ने अंशदान से ही मिशन को खड़ा किया है। वे आसनसोल जेल में थे। वहीं से उनने यह सूत्र महामना मदनमोहन मालवीय जी (उनके दीक्षा गुरु) से लिया था कि किसी भी संगठन में अपनत्व पैदा करना हो तो उसे मुट्ठी फंड से खड़ा करना चाहिए। बड़े−बड़े दान लेने में मना नहीं करना चाहिए, पर यदि हर कार्यकर्त्ता की भागीदारी रही तो संगठन सदैव चिरस्थायी रहेगा और उसके आधार सुदृढ़ होंगे। समयदान व अंशदान इस मिशन रूपी भवन की ईंट व सीमेंट है। इन्हीं से इतना बड़ा संगठन खड़ा हुआ। मालवीय जी ने अपनी बात तत्कालीन काँग्रेस से कही थी। वे तो ऐसा नहीं कर पाए व स्वतंत्रता के बाद तो उसका स्वरूप ही बदल गया। सत्तामद छा गया। यदि सही मायने में बात समझी गई होती हो वर्तमान राजनीति का स्वरूप आज कुछ और ही होता।

दान में दिए गए धन की शुचिता एवं संगतिकरण की भावना दोनों ही उस द्रव्य से सिंचित वटवृक्ष की जड़ों को मजबूत बनाते हैं। आज हम यदि कहीं खड़े हैं एवं बिना किसी सरकारी अनुदान के, बड़े−बड़े दान देने वाले संगठनों की ओर मुँह ताके, अपना कार्य करते चले जा रहे हैं तो उसका एकमेव कारण है—लक्ष्य की सुनिश्चितता एवं जन−जन की भावनाशीलता पर दृढ़ विश्वास।

यहाँ किसी भी तरह अधिक−से−अधिक श्रम कर, जनसंपर्क कर, जन−जन से धन−संग्रह करने वालों की अवमानना नहीं की जा रही। यह कार्य तो चलते रहना चाहिए। जहाँ भी जिस किसी के पास भी परमार्थपरायणता का भाव है, उदारचेता जैसी अंतःकरण की स्थिति है एवं अपने साधनों की कटौती कर देने का भाव है, वे अधिक भी दे सकते हैं। सभी जानते हैं कि ‘श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट’ को अति प्रमाणित मानकर केंद्रीय सरकार ने धारा 35 ए.सी. के अंतर्गत 100 प्रतिशत आयकर छूट दी है। यदि कोई व्यक्ति एक लाख रुपये दान देता है तो उसकी कर योग्य आय में से प्रायः छत्तीस हजार रुपये की छूट उसे मिल जाती है। इसी प्रकार सरकारी, गैर−सरकारी अधिकारी, वेतनभोगी कर्मी भी धारा 80 जी.जी.ए. के अंतर्गत अपनी राशि भेजकर प्रमाण−पत्र प्राप्त कर अपनी कर राशि का समुचित उपयोग धर्मार्थ कार्यों में कर सकते हैं। एक दिन की कमाई या एक दिन का वेतन अभी भी कई परिजन नियमित रूप से भेजते हैं। यदि यह क्रम निरंतर चले, अधिक लोगों द्वारा चले तो रुके कार्य तीव्र गति से हाथ में लिए जा सकते हैं।

सभी जानते हैं, फिर भी बता देना अनिवार्य है कि अब तक चौबीस करोड़ रुपये का निर्माण−कार्य हो चुका है। दो सौ छात्रों व पचास व्यक्तियों के स्टाफ से प्रायः छह फैकल्टीज वाला विश्वविद्यालय इस जून में अपना एक वर्ष पूरा कर लेगा। नालंदा−तक्षशिला वाला विराट रूप देने के लिए अधिक प्राध्यापकों−आचार्यों की भरती करनी होगी तथा पूर्णतः आवासीय बनाने के लिए छह हजार विद्यार्थियों की व्यवस्था बनानी होगी। धर्म−विज्ञान एक ऐसा संकाय है जिसमें शुरुआत तो मात्र पचास छात्रों से हुई है, पर यह अलग भवन व समग्र तंत्र की अपेक्षा रखता है, जो दो−तीन वर्ष में पूरी करनी ही होगी। चिकित्सा−क्षेत्र में वैकल्पिक एवं पूरक चिकित्सा पद्धतियों पर शोध−अनुसंधान एवं औषध−निर्माण, स्वास्थ्य संरक्षकों के प्रशिक्षकों के तंत्र का निर्माण भी रुका पड़ा है। इससे हमारा आयुर्वेद शिखर एवं सारे विश्व में पहुँच सकेगा। इस कार्य में भी प्रायः तीस करोड़ की लागत का अंदाज है, जिसमें उपकरण आदि सभी सम्मिलित हैं।

पाठकों को मात्र एक झलक भर दी गई है। कभी भी समय निकालकर इस तंत्र को आकर देखा−समझा जा सकता है कि नवरत्नों की टकसाल किस तरह से यह विशिष्ट भूमिका निभा रही है। नई पीढ़ी के कार्यकर्त्ताओं की तैयार हो रही है, जो पूरी तरह अनौपचारिक शिक्षा, स्वावलंबनप्रधान, संस्कृति मूल्य आधारित शिक्षण−प्रणाली के माध्यम से विकसित हो रही है। ‘न भूतो न भविष्यति’ जैसा तंत्र हमारी गुरुसत्ता के सपनों को सार्थक करता खड़ा हो रहा है। ज्ञानघट योजना तो अणुव्रत की तरह छोटी शुरुआत वाली है, युग परिवर्तन की इस संधिबेला में जो भी कुछ विलक्षण चरितार्थ होने जा रहा है, वह राष्ट्र का साँस्कृतिक नवोन्मेष ही नहीं करेगा, उसे जगद्गुरु की पदवी पर बिठाकर रहेगा। तेजी से होने जा रहे इन परिवर्तनों की पृष्ठभूमि समझने के लिए आवश्यक है कि हम उसकी अग्रगामी वस्तुस्थिति को आद्योपाँत समझें और अपने संपर्क−क्षेत्र को उसे साँगोपाँग रूप से समझाने की रणनीति अपनाएँ। इस ज्ञानघट स्थापना अभियान को जन−जन तक पहुँचाएँ।


VigyapanSuchana

विशेष ज्ञातव्य :− गायत्री तपोभूमि, मथुरा में विगत बसंत पर्व (6 फरवरी) से नौ दिवसीय अनुष्ठान सत्र शृंखला आरंभ हो गई है। इसमें प्रायः सौ से डेढ़ सौ व्यक्ति एक बार में भागीदारी कर सकते हैं। स्वर्ण जयंती वर्ष के क्रम में आरंभ किए गए इस अभियान में सत्र की तारीखें प्रतिमाह 6 से 14, 16 से 24 तथा 26 से 4 रखी गई हैं। महीनों में घट−बढ़ होने के कारण तीसरा सत्र चलेगा 26 से ही, समाप्त नवें दिन होगा। बीच का एक दिन अवकाश रखा गया है। परिजन गायत्री तपोभूमि, मथुरा से संपर्क कर लें एवं अपना स्थान आरक्षित होने की स्वीकृति मिलते ही तैयारी करें। इसमें 24000 गायत्री मंत्र जप का अनुष्ठान रखा गया है। दिन में एक प्रवचन व दो गोष्ठियों का क्रम भी साथ रहेगा। शाँतिकुँज, हरिद्वार के 1 से 9, 11 से 12 तथा 21 से 29 की तारीखों में चलने वाले सत्रों के समानाँतर ये सत्र सतत चलते रहेंगे।


महाकाल−वंदना


महाकाल−वंदना (kavita)

महाकाल, हे महादेव, जय−जय प्रभु त्रिपुरारी। शंभु, सदाशिव, आशुतोष जय भोले भंडारी॥ हर−हर महादेव, जय−जय महादेव॥

सिर पर ज्ञान−गंगा की धारा का हे! प्रभु संचार करो। बालचंद्र की शाँति−काँति दे इस जग पर उपकार करो॥ नीलकंठ, जग का विकार हरने की शक्ति हमें दे दो। महादेव, देवत्व विमल हम सब के जीवन में भर दो॥ नए सृजन का घोष करो हे! शिव डमरूधारी॥ शंभु...... ॥

अशिव तत्त्व उन्मत्त हो रहा, प्रभु उसका उपचार करो। टूटे अशिव, बढ़े शिव ऐसा शिवताँडव साकार करो॥ काम, क्रोध, मद आदि पुरों में अशिव वृत्तियाँ रहती हैं।, उनके अत्याचारों से दुःख सारी दुनिया सहती है। इन त्रिपुरों को नष्ट करो प्रभु हे! त्रिशूल धारी॥ शंभु....॥

आदिशक्ति को प्रेरित कर प्रभु भक्तों को सशक्त कर दो। कार्तिकेय को आगे कर हम सब में सत्साहस भर दो॥ गणपति जी जन−जन के अंदर सद्विवेक संचार करें। आतंकी असुरों का अब तो वीरभद्र उपचार करें॥ नए सृजन का यज्ञ रचाओ हे! जग हितकारी॥ शंभु........॥

नाथ आपके पास देवता, प्रेत सभी सुख पाते हैं। चूहा, नाग, मयूर, सिंह, वृष सहज साथ रह जाते हैं॥ तुमने सबको प्यार सहित शुभ जीवन का आलोक दिया। सबको सच्ची राह दिखाई, भटकावों को रोक दिया॥ हम सबको यह कला सिखा दो हे! शिव उपकारी ॥ शंभु......॥

ब्रह्मवर्चस

*समाप्त*