हवा के एक झोंके ने मिट्टी का दीया बुझा दिया। मिट्टी के दीयों का भरोसा भी क्या? कब टूटे और बिखरकर मिट्टी में मिल गए। उन ज्योतियों का साथ भी कितना, जिन्हें हवाएँ जब-तब बुझा सकती है। ज्योति के बिना जीवन अँधेरों में डूब जाता है। ये अँधेरे सदा ही भयावह होते हैं। जिन्हें अनुभव है, वे जानते हैं कि अँधेरे में प्राण कँप जाते हैं और साँसें लेना भी कठिन हो जाता है।
जीवन ही नहीं जगत् भी अँधेरे से घिरा है। ऐसी कोई भी ज्योति इस जगत् में नहीं है, जो अँधेरे को पूरी तरह मिटा दे। जो भी ज्योतियाँ हैं, उन्हें देर-सबेर हवाओं के झोंके अँधेरों में डुबा देते हैं। ये जलती हैं और बुझ जाती हैं, पर अँधेरे की सघनता जस की तस बनी रहती है। जगत् में फैला हुआ अँधेरा शाश्वत है। जो इस जगत् की ज्योतियों पर भरोसा करते हैं, वे नासमझ हैं, क्योंकि ये ज्योतियाँ सब की सब आखिरकार अँधेरे से हार जाती हैं।
अंधकार से भरे इस जगत् से परे एक और लोक भी है। जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है। इस बाहरी जगत् में प्रकाश क्षणिक और सामयिक है एवं अँधेरा शाश्वत है तो इस आन्तरिक जगत् में अंधकार क्षणिक व सामयिक है और प्रकाश शाश्वत है। अचरज की बात यह है कि यह प्रकाश लोक हमारे बहुत निकट है, क्योंकि अंधकार बाहर है और प्रकाश भीतर।
याद रहे, जब तक अन्तःलोक के आलोक में जागरण नहीं होता, तब तक कोई भी ज्योति अभय नहीं दे पाती। जरूरत इस बात की है कि मिट्टी के मृण्मय दीपों पर भरोसा छोड़ा जाय और चिन्मय ज्योति को खोजा जाय। क्योंकि यही अभय, आनन्द और आलोक का स्रोत है। अँधेरे से घबराहट और आलोक की चाहत यह जताती है कि हमारी वास्तविकता प्रकाश ही है। क्योंकि आलोक ही आलोक के लिए प्यासा हो सकता है। जहाँ से प्रकाश की चाहत पनप ही है, वहीं खोजो, अन्तःलोक का आलोक-चिन्मय ज्योति का स्रोत वहीं छिपा है।
‘पॉजिटिव मेन्टल एटिच्यूड’ अर्थात् आशावादी रुख मनुष्य जीवन की सफलता एवं सार्थकता का सर्वोपरि मापदण्ड है। इसके विपरीत ‘नेगेटिव मेन्टल एटिच्यूड’ अर्थात् जीवन के प्रति निराशावादी रुख, व्यक्ति की विफलता, दीनता, हीनता एवं परतंत्रता का सुनिश्चित आधार है। जीवन के प्रति आशा-उत्साह से भरा रुख स्वयं में एक अद्भुत शक्ति है। जब तक यह आशा मन में जीवित रहती है, व्यक्ति को कोई हरा नहीं सकता। जीवन की बड़ी से बड़ी विपत्ति, चुनौती एवं प्रतिकूलता भी उसे बुझा नहीं सकती। मानव जीवन को यदि एक जहाज की संज्ञा दें, तो आशा उसकी कप्तान है। यह जीवन रूपी बेड़े को देर-सबेर अपनी अभीष्ट मञ्जिल तक पहुँचा ही देती है। जीवन रूपी जहाज में यदि आशा का स्थान निराशा ने ले लिया तो जलयान की मात्रा का संकटमय होना तय है। इसके रहते जलयान यदि मञ्जिल से भटक जाए या सागर तल में ही समाधि ले ले, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।
इस सम्बन्ध में रस्किन ने ठीक ही कहा है कि ‘दिल डूबा तो नौका डूबी। मैं उत्साह भंग के सिवा किसी भी दूसरी बात को नहीं जानता जो अकेली ही मनुष्य को इतनी हानि पहुँचा सकती है’। उत्साह भंग होने से आशाएँ धुँधली पड़ जाती हैं, आकाँक्षाएँ क्षीण होकर नष्ट होने लगती हैं तथा कार्य करने की शक्ति समाप्त हो जाती है। इसीलिए कहा भी गया है कि ‘जब तक साँस तब तक आस।’ जब आशा ही नष्ट हो जाये तो जीवन में रह ही क्या जाता है? सारा उत्साह ही ठण्डा हो जाये तो सब कुछ सूना, सब कुछ फीका, सब कुछ आनन्द हीन हो जाता है। अतः इस स्थिति में मन पूरी तरह से निषेधात्मक बन जाता है और इसकी तमाम गतिविधियाँ ध्वंसात्मक रूप लिए होती हैं जो व्यक्ति की जीवनीशक्ति, विचारशक्ति, भावशक्ति आदि सब कुछ को दूषित कर कार्यशक्ति से लेकर मानवीय सम्बन्धों को नष्ट-भ्रष्ट कर अपने लिए विनाश का सरंजाम खड़े करती है। जबकि जीवन में सुख-शान्ति एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्माण आशावादी मन द्वारा सकारात्मक विचारों के साथ सम्पन्न होता है। ऐसा मन लगाकर परिश्रम, निरन्तर अध्यवसाय तथा अचल निष्ठ के साथ हर अवसर का सदुपयोग करते हुए उन्नति के शिखर की ओर आरोहण करता है।
एस. बी. फुल्लर एक गरीब किसान का लड़का था। पिता की असामयिक मृत्यु ने इसकी निर्धनता को और विपन्न बना दिया था, किन्तु अमूल्य सम्पदा के रूप में उसे असाधारण माँ मिली थी जो सकारात्मक चिंतन की प्रतिमूर्ति थी। श्रमनिष्ठ एवं प्रभु कृपा पर उसका अटूट विश्वास था। उसी की प्रेरणा से बालक फुल्लर ने खच्चर चराने के पेशे को छोड़कर साबुन बेचने का कारोबार शुरू किया। उसकी ईमानदारी एवं लगन के कारण उसका यह व्यापार खूब फला-फूला और उसकी प्रमाणिकता की बदौलत लोगों से भी उसे बहुत प्रशंसा एवं सम्मान मिला। आशावाद का दामन थामे फुल्लर ने अब पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब उसने स्वयं साबुन की फैक्ट्री स्थापित की। क्रमशः लेबेल की कम्पनियाँ, होजियरी और समाचार पत्रों को भी अपने व्यवसाय का अंग बनाता गया और व्यापार के क्षेत्र में चरम शिखर पर प्रतिष्ठित हुआ। यह सब ‘पॉजिटिव मेन्टल एटीच्यूड’ का ही परिणाम था।
प्रख्यात् लेखिका डोरोथी डिक्स, भयंकर गरीबी एवं बीमारी की विषाद भरी संतापक स्थिति से गुजर चुकी है। उनका कहना है ‘मैं अभाव, संघर्ष, दुश्चिंता और नैराश्य के प्रभाव से भली-भाँति परिचित हूँ।’ किन्तु हिम्मत उसका अस्त्र रहा। जिस क्षण उसने आशावादी रुख का महत्त्व समझा, तभी से उसने रोना-धोना और भाग्य को कोसना छोड़ दिया तथा अपना स्वभाव विनोदी बना लिया तथा उम्मीदों के सहारे जीना सीख लिया। इस तरह वह कष्टों को झेलने का साहस बटोर सकी और निषेधात्मक चिंतन के ध्वंसात्मक प्रभावों को दरकिनार कर सकी। इससे उत्पन्न रचनात्मक शक्ति ही उसके लेखन के माध्यम से प्रस्फुटित हुई और उसकी महान् रचनाओं के सृजन का आधार बनीं।
बेसबॉल के प्रसिद्ध खिलाड़ी क्लेम लैबिन की जीवन गाथा भी आशा द्वारा निराशा पर विजय की एक प्रेरक मिसाल है। बचपने में प्रशिक्षण के दौरान लैबिन की दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुली टूट गई थी। चिकित्सा के बाद अंगुली जुड़ तो गई, किन्तु टेढ़ी जुड़ी। उसके एक सफल खिलाड़ी बनने की सारी उम्मीदों पर जैसे पानी फिरता दिखाई दिया। निराश होकर उसने खेलना छोड़ दिया और हताशा के झूले में झूलता रहा। किन्तु उसके शुभचिंतक प्रशिक्षक का प्रोत्साहन उसमें आशा का संचार करता रहा। उसका वाक्य ‘कई बार आशीर्वाद, विषमता का छद्मवेश धारण करके आता है’ जैसे क्लेम के जीवन का गुरु मंत्र बन गया। उसने पुनः खेल का अभ्यास प्रारम्भ किया। उसी अंगुली से उसने गेंद को ऐसा मोड़ देने का हुनर विकसित किया कि वह सफल खिलाड़ी बनने के अपने स्वप्न को साकार कर सके। इस तरह यह तभी सम्भव हो पाया जब क्लेम ने विषम स्थिति में भी कल्याण के भाव को देखा और निराशाजनक विचारों का त्याग करते हुए पूरी लगन और ईमानदारी के साथ अपने स्वप्नों को साकार रूप देने में जुट गया।
इस तरह सकारात्मक चिंतन पद्धति जीवन को खिलाड़ी भाव से देखने का नजरिया देती है। इससे समता का भाव पनपता है। अतः सुख-दुःख, हार-जीत, मान-अपमान जैसे द्वन्द्वों को यह समान रूप से मधुर मुस्कान के साथ स्वागत करने योग्य बनाता है। खुरासान के राजकुमार का एक संस्मरण यहाँ प्रासंगिक है। एक बार राजकुमार लड़ाई के लिए जा रहा था। उसके खाने-पीने तथा सुख-सुविधा का सामान तीन सौ ऊँटों पर लदा था। उसे विजय का पूर्ण भरोसा था, किन्तु युद्ध के मैदान में पासा पलटते देर न लगी और वह खलीफा इस्माइल से हारकर बन्दी बना लिया गया। कारागार में एक दिन राजकुमार ने अपने रसोइये से भोजन माँगा। भोजन के नाम पर माँस का मात्र एक टुकड़ा बचा था। रसोइया उसको उबालने के लिए चढ़ाकर कुछ अन्य भोजन सामग्री की तलाश में चला गया। उसी समय वहाँ एक भूखा कुत्ता आया और बर्तन सहित माँस के टुकड़े को उठा कर ले गया। यह देखकर राजकुमार खिलखिलाकर हँस पड़ा। देखने-सुनने वाले सभी अचंभित थे कि दुःख अभाव की इस स्थिति में भी हँसी का क्या कारण हो सकता है। पूछने पर राजकुमार ने कहा-‘मुझे यह सोचकर हँसी आ रही है कि कल जिस सामान के लिए तीन सौ ऊँटों की आवश्यकता पड़ी, आज एक कुत्ता ही काफी है।’
संकट एवं मुसीबत की घड़ियों में भी सकारात्मक नजरिया ही वह आधारभूमि है जिससे मस्ती एवं खुशमिजाजी के प्रसून खिलते हैं, अन्यथा निराशावादी के लिए तो यह मरणान्तक पीड़ा देने वाले क्षण ही सिद्ध होते हैं। अतः आशावादी रुख की महिमा अपरम्पार है। भगवान् श्रीकृष्ण के शब्दों में -
‘प्रसादः सर्वदुःखानाँ हानिरस्योपजायते। प्रसन्न चेतसोध्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्टते॥’ गीता -2/65
अर्थात् प्रसन्नचित्त रहने से सब दुःख दूर होते हैं और बुद्धि स्थिर होती है। वस्तुतः यह सकारात्मक दृष्टिकोण एवं विधेयात्मक जीवन शैली के दीर्घकालीन अभ्यास की परिणति होती है।
इस तरह विकसित सकारात्मक मानसिक भाव के अंतर्गत विश्वास, साहस, दृढ़ता, आशावादिता, उदारता, दयालुता, सहनशीलता जैसे सद्गुणों का समावेश रहता है। महामानवों का जीवन इनकी जीवन्त अभिव्यक्ति होता है। वे इसी के बल पर अपना मानसिक संतुलन बनाये रखते हैं और निराशा के भाव को पास फटकने नहीं देते। अष्टावक्र आठ जगह से टेढ़े थे। चाणक्य, सुकरात आदि बहुत बदसूरत थे। हर कोई इनकी खिल्ली उड़ाता था। राजा हरिश्चन्द्र, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, गाँधीजी, नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, चितरंजनदास, अरविन्द घोष जैसे सभी महापुरुषों का जीवन कितने कठिन दौर से गुजर इनका जीवन परिस्थितियों के विषम प्रहारों से ओत-प्रोत रहा। उन्हें कितने विरोध का सामना करना पड़ा, किन्तु चिर आशावाद की संजीवनी के बल पर ये इनके सब आघातों को सहर्ष एवं धैर्यपूर्वक झेलते रहे। इनका अदम्य आशा-उत्साह ही इनके साथी-सहचरों में भी नव प्राण का संचार करता था।
वीर शिवाजी के बारे में यह प्रख्यात् है कि युद्धभूमि में उनकी उपस्थिति मात्र से ही उनके सैनिकों में एक नया उत्साह भर जाता था। उन्हें लगता था कि मानो उनकी सहायता के लिए नई कुमुक आ पहुँची हो। शिवाजी ने अनेकों भयंकर युद्ध केवल इसी कारण जीत लिए थे, कि वे पराजय अथवा उत्साहहीनता को जानते ही नहीं थे, पराजय का वे कभी नाम ही नहीं लेते थे। इस अपराजय उत्साह का प्रादुर्भाव अदम्य आशावादी रुख से होता है। इसी के बल पर महाराजा रणजीत सिंह ‘अटक है ही नहीं’ का उद्घोष करते हुए, बाढ़ से उफनती नदी में घोड़े पर सवार होकर, सबसे आगे बढ़े थे। देखते ही देखते पूरी सेना में उत्साह और साहस की लहर दौड़ गई, जो अटक की बाढ़ से अधिक प्रबल थी।
जीवन की समस्त चुनौतियों पर भारी पड़ने वाला यह जीवट वस्तुतः सकारात्मक जीवनशैली से निःसृत होता है। इसी के बल पर व्यक्ति इन सशक्त संकेतों से अपने अंतर्मन को पुष्ट करता रहता है कि ‘तुम समुद्र किनारों में सीना ताने खड़ी उत्तुंग चट्टान के समान हो जो एक सच्चे शूरवीर की भाँति समुद्र की उताल तरंगों का दृढ़तापूर्वक सामना कर रहे हो। संसार के कष्टों में इतनी शक्ति नहीं कि वे तुम्हें हिला सके। तुम मुसीबतों के मध्य महिमान्वित अविचल हिमालय की तरह अडिग हो, अविचल हो, जिस पर साँसारिक कष्टों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। तुम्हीं वह महाशक्ति सम्पन्न जीवट हो, जिसकी महिमा बड़े-बड़े ऊँचे बर्फीले पर्वत कह रहे हैं, जिसकी शक्ति नदियों सहित यह समुद्र वर्णन कर रहा है, ये चारों दिशायें जिसके बाहुतुल्य हैं। तुम्हारी शक्तियों का अन्त नहीं है। वे निस्सीम हैं।’
इसके विपरीत उत्साह की कमी अंतर्मन को निराशावादी संकेतों से दूषित करती रहती है जो जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। यह जीवन की सबसे बुरी स्थिति है, यह उन्नति के पथ की सबसे बड़ी बाधा है। एक विचारक ने ठीक ही लिखा है - ‘निराशा एक प्रकार की कायरता है। जो आदमी कमजोर होता है, वह कठोर परिस्थितियों का सामना नहीं कर पाता। वह एक कायर की तरह युद्ध छोड़कर भाग जाता है। निराशा एक प्रकार की नास्तिकता है, जो व्यक्ति संध्या के डूबते हुए सूरज को देखकर दुःखी होता है और प्रातःकाल के सुनहरी अरुणोदय की आशा नहीं करता, वह नास्तिक है। जो माता के क्रोध को स्थायी समझता है और उसके प्रेम पर विश्वास नहीं करता, वह बालक नास्तिक है और हमें अपनी इस नास्तिकता का, इस निराशावाद का, इस निषेधात्मक रुख का दण्ड रोग, शोक, विपत्ति, संताप, असफलता और अल्पायु के रूप में भोगना पड़ता है’। जबकि हर तरह के दुःख-कष्ट आदि क्षणिक हैं, अल्पकाल में दूर होने वाले हैं और यदि ये कुछ अधिक स्थायी व वृहत्तर हैं तो भी हमारे अन्दर विद्यमान आत्मिक शक्तियों, असीम सम्भावनाओं एवं दैवीय गुणों से श्रेष्ठ एवं महान् नहीं हैं। हमारी अन्तर्निहित क्षमता अनेकों द्वन्द्व के वज्र से भी अधिक दृढ़ एवं सक्षम है। इस स्थिति में विजय, आनन्द, सफलता उन्नति आदि हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैं।
यदि इसका प्रखर बोध अभी नहीं हो पाता है और राह की थकान कुछ भारी है तो भी निराशा की कोई बात नहीं। थके पक्षी को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते कविवर रवींद्र के विचारों की ये पंक्तियाँ विचारणीय हैं-
‘यदि मन्द-मन्द मन्थर गति से चलकर चारों ओर से संध्या बढ़ती आ रही है, दिन का संगीत रुक गया है, संगी-साथी छूटने से जीवन सूना सा मालूम हो रहा है, तेरे अंग-अंग में थकान उभर आयी है, मन में आशंका उभर आयी है, दिग्-दिगन्त अपनी काली चादर ताने सो रहे हैं, तो भी मेरे विहंग! तू अपने पंख बन्द न कर।’
‘यदि तेरे सामने अभी भी लम्बी दूभर रात्रि है, सुदूर अस्ताचल पर सूर्य ऊँघ रहा है, संसार निःश्वास रोक एकान्त स्तब्ध आसन से बैठा हुआ है, दिन का प्रकाश रजनी के धीमे-धीमे पहर गिन रहा है, अंधकार रूपी सागर में चंद्रमा की क्षीण रेखामात्र दिखायी दे रही है, तो भी मेरे विहंग! तू निराश न हो, अपने पंख बन्द मत कर।’
‘समस्त तारागण आकाश में तेरी ही ओर अनिमेष दृष्टि लगाये हुए हैं। नीचे सागर में शत्-शत् लहरें उछल-उछलकर उल्लास का संदेश लिए उद्वेलित हो तेरी ओर दौड़ रहे हैं। वे न जाने कौन वहाँ दूर करुण अनुनय करके ‘आओ! आओ!’ की पुकार कर रहे हैं? सभी ओर तेरा स्वागत है। इस लिए मेरे विहंग! तू अपने पंख अभी बन्द न कर।’
चिर आशा का यह मधुर गान यदि हमारे, जीवन का संगीत बन सके तो पथ की हर कठिनाई, विफलता एवं चुनौती हमारी मञ्जिल की ओर बढ़ने का एक सोपान बनता जायेगी और जीवन नित-नूतन सफलता, सार्थकता एवं उल्लास की सुवास से महकने लगेगा
मेरी रीड अमेरिका से ईसाई मिशन के अंतर्गत भारत में सेवारत् रहने के लिए आई थीं। उन्हें महिला शिक्षा का काम सौंपा गया, पर पिथौरागढ़ प्रवास के समय उन्होंने देखा कि भारत में कोढ़ियों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। न कोई उनसे संपर्क रखता है, न चिकित्सा पर ध्यान देता है। रीड ने अपनी रुचि कोढ़ी सेवा में व्यक्त की। मिशन ने वैसा ही प्रबंध कर दिया। वे उत्तरप्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में दौरा करके कोढ़ियों को एकत्रित करने और उनकी चिकित्सा के साथ उन्हें अध्यापन तथा स्वावलंबन भी सिखाने लगीं। रोगियों को भारी राहत मिली। लोगों ने अनुभव भी किया कि हम अपने देशवासियों के लिए कुछ नहीं कर सकते और विदेशी दया धर्म का मूल समझकर कितना सेवा धर्म निबाहते हैं।
मेरी रीड को कुष्ठप्रधान वातावरण में रहते हुए स्वयं को भी वह व्याधि लग गईं उन्हें अमेरिका वापस बुलाया गया, पर उन्होंने यह कहकर इनकार कर दिया कि मैंने सारा जीवन उद्देश्यों के लिए सौंपा है। उससे पीछे कदम नहीं हटा सकती। वह स्वयं पीड़ित हो गई, पर उस रोग के रोगियों के कल्याण के लिए जो संभव था, आजीवन करती रही।
वैदिक ऋषियों ने अन्तःप्रकृति और बाह्य प्रकृति पर जो बहुमूल्य प्रयोग किये तथा प्रक्रियाएँ विकसित की; तंत्र को उन सब में बेशकीमती ठहराया जा सकता है। तंत्र का उद्गम हम वेदों में खोज सकते हैं। ऋग्वेद का देवी सूक्त, वैदिक ऋषि विश्वामित्र द्वारा किये गये बला-अतिबला सावित्री महा विद्या के प्रयोग इसी के परिचायक हैं। अथर्ववेद के प्रवर्तक महाअथर्वण की परम्परा तो इसका भरा-पूरा भण्डार है।
तंत्र तन् और त्र शब्द से मिलकर बना है। तन का अर्थ चेतना शक्ति से है और त्र का अर्थ स्वतंत्र करना, छोड़ना या बन्धन मुक्त करना। इस तरह मनुष्य के भीतर जो आन्तरिक, अतीन्द्रिय और सुषुप्त शक्ति छिपी हुई है। जिसे वह अपनी बहिर्मुखता के कारण उपयोग नहीं कर पाता है, इस शक्ति को स्वतंत्र या मुक्त करना, इसे जीवन में अनुभव करना तथा उसका उपयोग करना। यही तंत्र साधना का उद्देश्य है।
वेदान्त की तरह तंत्र भी जीव और शिव की एकात्मता का प्रतिपादन करता है। किन्तु वेदान्त की तरह यह जगत् को मिथ्या या माया कहकर नकारता नहीं है, बल्कि इसे शक्ति का क्रियारूप मानता है। यही विश्वव्यापी शक्ति मनुष्य में कुण्डलिनी शक्ति के रूप में सोई रहती है। साधना द्वारा जब इसका जागरण होता है तथा यह क्रमशः विभिन्न चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञाचक्र) का भेदन करती हुई सहस्रार स्थित शिव तत्त्व से मिलती है शिव शक्ति का यह दिव्य मिलन ही जीवन को पूर्णता प्रदान करता है और जीव शिव तुल्य हो जाता है।
वस्तुतः तंत्र एक स्वतंत्र विज्ञान है। प्रकृति की शक्तियों पर काबू पाकर उन्हें अपनी इच्छानुकूल वशवर्ती बनाना इस विद्या का प्रधान कार्य है। तंत्र विज्ञान के द्वारा अपने अन्दर की विद्युत शक्ति को इतना विकसित कर लिया जाता है कि प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं को अपनी इच्छानुसार ढाल सकते हैं। इसी को सिद्धि कहते हैं।
अध्यात्म साहित्य में तंत्र की विशिष्ट स्थिति रही है। तंत्र का उद्देश्य साधक को निम्नगामी प्रवृत्तियों में उलझाना नहीं है, वरन् उसे एक ऐसा सुव्यवस्थित मार्ग सुझाना है जिससे कि वह जीवन में कुछ श्रेष्ठ एवं आदर्शवादी कार्य कर सके। यद्यपि यह सत्य है जिस प्रकार से प्रत्येक उच्च एवं उपयोगी सिद्धान्त और सम्प्रदायों में समय के साथ अनेकों विकार और दोष पैदा हो जाते हैं, उसी प्रकार तंत्र मार्ग भी कई रूपों में विकृत हो गया है तथा साधारण लोगों ने उसे मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन जैसे निकृष्ट एवं दूषित कार्यों का ही पर्याय समझ लिया है। जबकि तंत्र शास्त्रों में इसके मन्तव्य को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि ‘जहाँ भोग है वहाँ मोक्ष नहीं है और जहाँ मोक्ष है, वहाँ भोग नहीं है’ किन्तु जो मनुष्य भगवती महाशक्ति की सेवा में संलग्न है उनको भोग और मोक्ष दोनों ही सहज साध्य हैं। वस्तुतः ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति का जागरण इन शक्तियों को खोजकर कार्य करना, अपने देवत्व को पहचानना और चारों ओर दृष्टि में विशालतर देवत्व का आलिंगन करना ही वह आदेश है जिसे समस्त आगम (तंत्र शास्त्र) घोषित करते हैँ। आत्मिक विज्ञान के सिद्धान्तों को क्रियारूप देना ही वस्तुतः तंत्र शास्त्र का कार्य है। विभिन्न प्रकार की साधनाओं के विधि-विधान का मार्गदर्शन ही इनका मुख्य कार्य है।
तंत्र मार्ग में साधना का निर्धारण शिष्य या साधक की प्रकृति एवं पात्रता के अनुरूप ही होता है। यहाँ साधकों के तीन स्तर हैं-1. पशु शिष्य, 2. वीर शिष्य, 3.दिव्य शिष्य। पशु शिष्य निम्नतम कोटि का साधक होता है। ऐसा शिष्य स्वयं को तथा स्वयं की वासना, इच्छा और आकाँक्षा को जान नहीं पाता, समझ नहीं पाता और अपने आपको समर्पित नहीं कर पाता है। ऐसे शिष्यों के लिए तंत्र मार्ग में भक्ति मार्ग, कर्म मार्ग और उपासना मार्ग बतलाये गये हैं। भक्ति भावना के प्रबल होने से शिष्य के अन्दर पशुत्व विकार शनैः-शनैः हटते हैं। भक्ति मार्ग की नौ अवस्थाओं से गुजरने के बाद पशु शिष्य में आत्मनिवेदन की स्थिति आती है और तब वह वीर भाव को प्राप्त होता है। पशु शिष्य के लिए कर्म मार्ग या सेवा का मार्ग भी है। कठोर श्रम एवं परमार्थ भाव से किये कर्म उसके आलस-प्रमाद एवं संकीर्णता के भाव को कम करने में सहायक होते हैँ। वस्तुतः पशु शिष्य में श्रद्धा, विश्वास और आस्था की कमी होती है तथा वह अपने मन का, अपनी इच्छाओं और वासनाओं का दास होता है। कर्म एवं भक्ति योग के मार्ग द्वारा वह क्रमशः इनसे उबरने लगता है और वीर साधक की श्रेणी में प्रवेश करता है।
वीर शिष्य अपने स्वभाव में घुसे विकार, कामना, वासना और अहंकार की स्थिति को समझकर उनके नकारात्मक तत्त्वों को हटाकर स्वयं में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। वस्तुतः जो साधक स्वयं में परिवर्तन लाने की क्षमता रखता है, वही वीर शिष्य कहलाता है। उसमें आलस-प्रमाद अति अल्प मात्रा में रहते हैँ। उसमें आगे बढ़ने की इच्छा प्रबल रहती है तथा यह इच्छा और उत्साह ही उसे प्रगति पथ पर आगे बढ़ाती है। उसमें जीवन की हर परिस्थिति को मुस्कराते हुए झेलने की क्षमता रहती है। वीर शिष्य ही अपने चरम विकास की अवस्था में दिव्य भाव को प्राप्त होता है।
दिव्य शिष्य तथा गुरु के बीच तादात्म्य भाव रहता है। वह स्वयं को गुरु से भिन्न नहीं मानता, उसमें पूर्ण एकत्व का, अभिन्नता का भाव रहता है। केवल गुरु के प्रति ही नहीं वरन् सम्पूर्ण ब्रह्मांड के समस्त चराचर पदार्थ व प्राणियों के प्रति समभाव रखता है। वह प्रत्येक स्त्री में शक्ति का तथा प्रत्येक पुरुष में शिव का स्वरूप देखता है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान उसके जीवन के अन्तरंग अंग बन जाते हैं। उसके जीवन में ये साधनाएँ अनवरत चलती रहती हैं। ऐसे शिष्य के विचार और व्यवहार, ज्ञान और कर्म में ज्यादा अन्तर नहीं रहता।
ताँत्रिक साधनाओं द्वारा व्यक्तित्व की चार प्रबल अवस्थाओं को नियंत्रित करने का प्रयत्न किया जाता है। चार विकारों के कारण ही साधक या मनुष्य अपने व्यक्तित्व का संतुलन खो बैठता है। ये विकार हैं- आहार, निद्रा, भय और मैथुन। तंत्र की मान्यता है कि मनुष्य कितनी ही साधना या कितना ही प्रयास क्यों न करें, यदि ये चार प्रवृत्तियाँ उसके अन्दर विद्यमान रहती हैं और उनका निराकरण यदि नहीं किया जाये तो उसका पतन कभी भी हो सकता है। तंत्र शास्त्र में इन प्रवृत्तियों को अनुशासित करने के लिए प्रयत्न किया जाता है। तंत्र की समस्त साधनाओं का एक ही उद्देश्य है-मन को वृत्ति रहित बनाना तथा सभी प्रवृत्तियों तथा उपप्रवृत्तियों को ठीक तरीके से, सही प्रकाश में समझने का प्रयास करना और उनका निदान करना। जब तक इन वृत्तियों, उपवृत्तियों या प्रवृत्तियों का निदान नहीं होता, चेतना का क्रमिक विकास और सभी प्रकार की आन्तरिक या आध्यात्मिक उपलब्धियाँ असम्भव हैं।
तंत्र साधना की दीक्षा गुरु अपने शिष्य को, शिष्य की अवस्था और उपलब्धि के स्तर को देखकर प्रदान करता है। जब साधक मन की चार मूल प्रवृत्तियों का सामना करते हुए मनःस्थिति की एक विकसित सीमा तक पहुँच जाता है तब अन्य गुप्त साधनाओं का प्रारम्भ होता है। कुपात्र के लिए इनका सर्वथा निषेध ही रहता है। क्योंकि इनके गुप्त रहस्यों को जन साधारण के लिए प्रकाशित कर देने का अर्थ बालकों के क्रीड़ा-स्थल में बारूद बिखेर देना होगा। जिनमें वे क्रीड़ा, कौतुक करने के उपलक्ष में सर्वनाश का उपहार प्राप्त करेंगे। अतः यह परम्परा अधिकार और अधिकारी के आधार पर एक-दूसरे को सिखाने की रही है।
इसी कारण तंत्र साधना के संदर्भ में भ्राँतियाँ का सघन कुहासा जन मानस के बीच छाया रहा है। जो तत्त्व अलंकारिक विवरण में किसी गुह्य उद्देश्य और रहस्य को छुपाये थे, उनके शब्दशः अर्थ लिए जाने लगे। सबसे अधिक भ्रम पंचमकारों के संदर्भ में हुआ। मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन के रहस्य को न जानकर, इनके यथावत उपयोग में ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ ली गई। जबकि तंत्र शास्त्रों के अनुसार जिस मद्य के प्रयोग का आदेश है वह नशा उत्पन्न करने वाला पदार्थ नहीं है, बल्कि वह दिव्य ज्ञान है, जिससे साधक बाहरी जगत् से नाता तोड़कर आन्तरिक क्षेत्र में प्रवेश करता है। परमात्मा को सर्वस्व अर्पण ही माँस सेवन कहलाता है। मत्स्य का अर्थ, उस स्थिति से है, जब सब तरह के सुख-दुःख एक समान हो जाते हैं। दुर्गुणों के त्याग को मुद्रा कहते हैं। सहस्रार में शिव-शक्ति का कुण्डलिनी के साथ मिलन मैथुन कहलाता है।
पंचमकार की ही भाँति पशुबलि की प्रक्रिया भी रहस्यमयी है। महानिर्वाण तंत्र के अनुसार काम और क्रोध दो पशु हैं। इनकी बलि देकर जप में तन्मय हो जाये। अन्यत्र, इन्द्रिय रूपी पशु का वध करने का आदेश है। इन्हीं भावों को ग्रहण करके अपने देश में महान् तंत्र साधक होते आये हैं। निर्विशेष ब्रह्म के प्रतिपादक आचार्य शंकर शक्ति तत्त्व के रहस्यवेत्ता भी थे, उन्होंने तिब्बत के उरुंगमठ-त्वाँग मठ जाकर अनेकों तंत्र साधना सम्पन्न की थी। उनका ‘सौंदर्य लहरी’ नामक ग्रंथ तंत्र ग्रंथों में अद्वितीय स्थान रखता है। शंकर की ही भाँति नागार्जुन, गोरखनाथ, महेन्द्रनाथ, कीनाराम, वामार वेपा, कमलाकान्त, रामप्रसाद, रामकृष्ण परमहंस तंत्र की गुह्य प्रक्रियाओं में निष्णात थे। परम पूज्य गुरुदेव को श्रेष्ठतम तंत्र साधक माना जा सकता है। उनके द्वारा 1984-86 के दौरान सम्पन्न की गई सावित्री साधना (सूक्ष्मीकरण साधना) तंत्र का उत्कृष्टतम प्रयोग कहा जा सकता है, जिसकी परिणति विश्व राष्ट्र की कुण्डलिनी जागरण के रूप में हुई।
ताँत्रिक आचार्यों के अनुसार, तंत्र की उच्चतर सिद्धि उसे प्राप्त होती है, जिसका गुरुकृपा से सुषुम्ना में प्रवेश हो जाता है और जिसकी कुण्डलिनी शक्ति का जागरण हो जाता है। तंत्र का मत है कि जो साधक इन्द्रियों और प्राणों को रोककर कुल मार्ग में सक्रिय नहीं हो जाता, वह शक्ति की निकृष्ट (निम्न)उपासना का भी अधिकारी नहीं है। मेरुतंत्र के अनुसार, जो परद्रव्य के प्रति अंधा है, परस्त्री के प्रति नपुँसक है, परनिंदा के लिए मूक है और इन्द्रियों को सदा वश में रखता है, ऐसा ब्रह्मपरायण व्यक्ति ही वाममार्गी तंत्र साधना का अधिकारी होता है। यह अधिकार प्राप्त करने के लिए ताँत्रिक सिद्धान्तों का गम्भीर अनुशीलन और साधना मार्ग का निष्ठापूर्ण अनुगमन आवश्यक है।
फलोरेंस नाइटिंगेल का मन आरंभ से ही दीन-दुखियों की सेवा में जीवन लगाने का था, सो उसने नर्स की शिक्षा प्राप्त करने की कोशिश की। पिता को यह अच्छा नहीं लगा और विवाह के लिए जोर देते रहे। अंत में आग्रह नाइटिंगेल का ही माना गया। 33 वर्ष की आयु में उसे आशा मिली। वह क्रीमिया के युद्ध में घायल सैनिकों की सेवा करने युद्ध मोरचे पर चली गई। उसके आगे बढ़ने पर अन्य महिलाएं भी नर्स सेवा में सम्मिलित हुईं। उसके पहुँचते ही अस्पताल में आशातीत सुधार हुआ। पहले जहाँ घायलों में से 1 पीछे 8 मर जाते थे, अब वहाँ हजार पीछे 24 की मृत्यु दर रह गई। युद्ध समाप्त होने पर उसने नर्सों की शिक्षा का एक विद्यालय खोला और सारा जीवन पीड़ितों की सेवा में लगाया।
अबोध बालक की भैरव की प्रतिमा के सम्मुख बलि चढ़ाते हुए एक ताँत्रिक पकड़ा गया। उसे विक्रमादित्य के दरबार में अपराधी की तरह उपस्थित किया गया। परिचय पूछने पर उसने बताया- कुछ वर्ष पूर्व वह वेदपाठी ब्राह्मण था। कुत्साओं के कुचक्र में फंसकर एक के बाद एक बड़े कुकर्म करता गया। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची कि बालहत्या की नृशंसता अपनाने में भी कुछ अखरा नहीं। विक्रमादित्य ने आश्चर्य से पूछा- आपका पतनक्रम किस कारण आरंभ हुआ, किस प्रकार बढ़ा और स्थिति यहाँ तक कैसे पहुँची? इसका विवरण बताएं। अपराधी ब्राह्मण ने लंबी साँस खींचते हुए कहा-राजन्! कभी मैं अपरिग्रही जीवन जीता था। स्वल्प साधनों में सुखपूर्वक निर्वाह करता और ब्रह्मकर्म में रत रहता था। पड़ोसी का विलास-वैभव देखकर मन ललचाया। सोचा ऐसा ही ऐश्वर्य भोगा जाए। संतोष, अपरिग्रह और कर्म में क्या धरा है। दिशा मुड़ी तो हर कदम अधिक बड़े अनाचार की ओर उठता गया।
राजा ने पूछा-उस पतन-क्रम की शृंखला भी बताएं। अपराधी ने एक-एक करके उन आदतों और घटनाओं का वर्णन किया, जिनके कारण दुष्टता का दुस्साहस बढ़ता और प्रचंड होता चला गया था। ब्राह्मण ने कहा- स्वल्प श्रम में अधिक धन कमाने के लिए जुआ खेलना आरंभ किया। जुए के लिए अधिक धन की आवश्यकता पड़ी तो चोरी करने का सिलसिला चल पड़ा। चोरी से मुफ्त का माल मिला तो मदिरा पान और वेश्यागमन पकड़ता चला गया। अनाचारी ताँत्रिकों की शाखा में जाने, उनसे बलि कर्म द्वारा भैरव प्रसन्न करने, अनायास ही बहुत धन पाने की कामना करने का उपाय मुझे भी बहुत रुची। क्रूर कर्मों में निरत रहते-रहते बालवध में भी न दया आई और न आत्मग्लानि हुई। यही है मेरे पतनक्रम की शृंखला, जो चिंगारी की तरह हुई और ईंधन का आश्रय मिलते ही दावानल की तरह बढ़ती चली गई।
अनुभव से सने मीठे बोल सुनने वालों की भावनाओं में घुल रहे थे। श्रावस्ती नगर और आस-पास के गाँवों के लोग अपने आपको धन्य भागी समझ रहे थे। बड़भागी लग रहा था उन्हें अपना मानव जीवन। भगवान् बुद्ध के इन दोनों शिष्यों - सारिपुत्र और मौदगलायन के वचनों की पीयूष वर्षा उनकी अन्तर्चेतना की परतों को एक रहस्यमय रस से भिगो रही थी। तथागत इन दिनों श्रावस्ती में ठहरे थे। भिक्षु संघ के सदस्य सूर्य किरणों की भाँति चहुँ ओर उनकी प्रभा बिखेर रहे थे। भगवान् के आने से श्रावस्ती में जैसे एक आलोक-लोक बस गया था।
भिक्षु संघ के इन सदस्यों में सारिपुत्र और मौदगलायन की भाव दशा अपूर्व थे। ये दोनों भगवान् में सम्पूर्णतया अर्पित थे। भगवान् की भाव चेतना भी उनमें पूर्णतया समाहित थी। सभी नगर जन आस-पास के ग्रामवासी उनकी प्रशंसा कर रहे थे। अपूर्व था रस उनकी वाणी में, अपूर्व था भगवान् के उन दोनों शिष्यों का बोध; अपूर्व थी उनकी समाधि। उनके वचन सभी को जागृति का संदेश देते थे। सोये हुओं को जगाते थे, मृतकों को जीवनदान देते थे। उनके पास बैठना अमृत सरोवर में डुबकी लगाना था। ऐसे में सभी के मनों में प्रशंसा का उफान उमड़ना स्वाभाविक था।
निरन्तर उमड़ रही प्रशंसा की ये फुहारें जहाँ जिज्ञासुओं को सुख पहुँचा रही थी, वहीं लालुदाई को कंटकों की भाँति चुभ रही थी। उसे यह सब असह्य लग रहा था। ईर्ष्या की असह्य जलन से विकल हो वह सोचने लगा, आखिर ऐसा क्या है सारिपुत्र और मौदगलायन में जो उसके पास नहीं है। वह तो इन दोनों से तेज आवाज में बोल सकता है। उसके पास किसी से कम ज्ञान नहीं है। ईर्ष्या की लपटों ने उसके मन को इतना विकल एवं विह्वल बना दिया कि उसे सत्य भावनाएँ दिखाई न पड़ी।
ईर्ष्या की झुलसन से उसके अहंकार का नाग फुफकार उठा। क्रोध की विष धाराएँ बह उठीं। उसने कभी किसी को अपने से बुद्धिमान माना ही न था। यद्यपि वह भगवान् के चरणों में झुका करता था, पर केवल दिखावे के लिए। अपने भीतर तो वह भगवान् को भी स्वयं से श्रेष्ठ नहीं मानता था। उसका अहंकार अति प्रज्वलित अहंकार था। मौका मिलने पर वह प्रकारान्तर से परोक्ष रूप से भगवान् की भी आलोचना-निन्दा करने से नहीं चूकता था। कभी आज भगवान ने ठीक नहीं कहा, कभी कहता-भगवान् को ऐसा नहीं कहना था, कभी कहता- भगवान् होकर ऐसा नहीं कहना चाहिए।
अपने सद्गुरु की निन्दा-आलोचना में रस लेने वाला लालुदाई भला ज्येष्ठ गुरु भ्राताओं की प्रशंसा किस तरह सहन कर पाता। एक दिन वह उस स्थान पर जा पहुँचा जहाँ कई नगर जन सारिपुत्र और मौदगल्लायन की प्रशंसा कर रहे थे। लालुदाई ने इन नगर जनों को तेज आवाज में डाँटा - क्या बेकार की बकवास लगा रखी है तुम लोगों ने? आखिर रखा ही क्या है उन सारिपुत्र और मौदगलायन में? धर्म के वास्तविक तत्त्व से अनजान तुम लोग कंकड़-पत्थरों को हीरे समझ बैठे हो। अरे! परख करनी है तो पारखियों से पूछो। जवाहरात पहचानने हैं तो जौहरियों से पूछो। मुझसे पूछो और प्रशंसा ही करनी है तो मेरे धर्मोपदेश की करो।
लालुदाई की दबंग आवाज, उसका जोर से ऐसा कहना, नगर के लोग तो सकते में आ गए। वे सब सोचने लगे, हो न हो यह लालुदाई कुछ ज्यादा ही श्रेष्ठ समाधिसिद्ध हो। उन सबने उससे धर्मोपदेश की प्रार्थना की। लेकिन वह बार-बार टाल जाता। कभी कहता ठीक समय पर, ठीक ऋतु में बोलूँगा। ज्ञानी कभी और हर किसी को उपदेश नहीं करता। पहली बात तो यह कि सुनने वाले में पात्रता चाहिए। अमृत यूँ ही हर पात्र में नहीं डाला जाता।
ये सभी पते की बातें थीं। लोगों में प्रभाव बढ़ता गया। अपना प्रभाव जमाने के लिए वह यह भी कहता - ज्ञानी मौन रहता है। तुमने पढ़ा नहीं है शास्त्रों में कि जो बोलता है, वह जानता कहाँ है? जो चुप रहता है, वही जानता है। परमज्ञानी क्या बोलते हैं। नगरवासियों में उसकी धाक बढ़ती गयी। सत्य ही उनमें उत्सुकता भी पैदा हो गयी। इस बीच लालुदाई अपना व्याख्यान तैयार करने में लगे थे।
जब व्याख्यान शब्द-शब्द रट गया तो एक दिन धर्मासन पर आसीन हुए। सभी नगर जन, आसपास के ग्रामीण लोग उन्हें सुनने के लिए आये। लालुदाई ने तीन बार बोलने की चेष्टा की, पर अटक-अटक गए। बस सम्बोधन ही निकलता - उपासकों! ...... और वाणी अटक जाती। कई बार खाँसा-खखारा पर कुछ भी न सूझा। पसीना-पसीना हो गए। चौथी बार कोशिश की तो सम्बोधन भी न निकला। सब सूझ-बूझ खो गयी। रटा हुआ याद किया पर याद न आया। हाथ-पाँव काँपने लगे, घिग्घी बँध गयी। अब तो लोगों के सामने पोल खुल गयी।
लालुदाई मंच छोड़कर भागे। सभी नगर जनों ने उनका पीछा किया। सब के सामने यह सच्चाई उजागर हो गयी थी कि यह सारिपुत्र और मौदगलायन की प्रशंसा नहीं सुन सकता। भगवान् तक की आलोचना करता रहता है और खुद को कुछ आता-जाता नहीं है। नगरवासियों के आक्रोश से घबराकर भागते हुए लालुदाई मल-मूत्र के एक गड्ढे में जा गिरे और गन्दगी से लिपट गए। उनकी यह दशा देखकर नगरवासी हँसते हुए अपने घरों को वापस चले गए।
भगवान् के पास जब यह खबर पहुँची तो उन्होंने उपस्थित भिक्षुओं से ये धम्मगाथाएँ कहीं-
असज्झायमला मंता अनुट्ठनभला घरा। मलं वण्णस्स कोसज्जं पमादो रक्खतो मलं॥ ततो मला मलंतरं अविज्जा परमं मलं। एतं मलं पहत्वान निम्मला होथ मिक्खवे॥
अर्थात् - स्वाध्याय न करना मंत्रों का मैल है। झाड़-बुहारन करना घर का मैल है। आलस्य सौंदर्य का मैल है, प्रमाद पहरेदारों का मैल है। इन सब मैलों से भी बढ़कर अविद्या परम मैल है। भिक्षुओं इस मैल को छोड़कर निर्मल बनो।
इन धम्मगाथाओं का अंतःरहस्य बताते हुए भगवान् ने कहा- भिक्षुओं! यह लालुदाई जन्मों-जन्मों से ऐसी ही गन्दगी में गिरता रहा है। भिक्षुओं! अहंकार गन्दगी है, मल है। भिक्षुओं! अल्पज्ञान घातक है। कोरा शब्दज्ञान घातक है, अनुभव शून्य शास्त्र ज्ञान घातक है। इस लालुदाई ने केवल थोड़े से शब्द रट लिए थे, पर अनुभव के बिना कोरे शब्द तो बस बाँधते हैं। इस लालुदाई ने धर्म की कुछ बातें सुनी जरूर थी, पर उसने ठीक से स्वाध्याय नहीं किया। यदि उसने धर्म श्रवण पर ध्यान किया होता तो ऐसी दुर्गति न होती।
तथागत ने गम्भीर होकर कहा - ‘तुम सब उससे सीख लो। आलोचना सरल है-आत्मज्ञान कठिन है। विध्वंस सरल है-सृजन कठिन है। आत्मसृजन तो और भी कठिन है। अहंकार प्रतिस्पर्धा जगाता है। प्रतिस्पर्धा से ईर्ष्या पैदा होती है। ईर्ष्या से द्वेष और शत्रुता निर्मित होती है। ऐसे में अन्तर्बोध जगे भी तो कैसे? इसलिए पर चर्चा, पर निन्दा से बार-बार बचो। दूसरे का विचार ही न करो। समय थोड़ा है, स्वयं को जगा लो, बना लो। अन्यथा बार-बार मल-मूत्र के गड्ढों में गिरोगे। हे भिक्षुओं! तुम्हीं विचार करो- बार-बार गर्भ में गिरना मल-मूत्र के गड्ढे में गिरना नहीं तो और क्या है’?
इंग्लैंड के प्रधानमंत्रियों में चर्चिल का नाम आत्म विश्वास और सूझ बूझ के प्रतिनिधि के रूप में लिया जाता है। उन दिनों जर्मनी इंग्लैंड को हर दृष्टि से बरबाद करने पर तुला था। तत्कालीन प्रधानमंत्री चेंबर लेन हद दरजे तक झुक जाने पर भी हिटलर की दोस्ती प्राप्त न कर सके। तब साहसी और सूझ बूझ वाले व्यक्ति को सत्ता सौंपने की बात सामने आई। इस दृष्टि से चर्चिल को उपयुक्त पाया गया और उन्हें आग्रहपूर्वक सत्ता संभालने के लिए बुलाया गया। वे शारीरिक दृष्टि से वयोवृद्ध हो चुके थे, पर मनोबल में रत्तीभर भी कमी न हुई थी। उन्हें राजनैतिक दांव पेंचों का अनुभव था।
पहले युद्धों में भी उनका जौहर देखा जा चुका था। इस बार भी सत्ता हाथ में लेते ही उन्होंने जनता का पूरी तरह साथ दिया और संभावित विपत्तियों में किसे क्या करता है, इसे योजनाबद्ध रूप से समझाया। छाई हुई घबराहट को हिम्मत और संघर्ष की मनःस्थिति में बदल दिया। अपने साहस और व्यक्तित्व के बल पर वे अपने देश की आड़े समय में भारी सेवा कर सके।
मनुष्य परम सत्ता का साकार रूप है। वह परमात्मा का अंशावतार है। मनुष्य सृष्टि की सर्वोत्कृष्ट एवं महान् कृति है। परब्रह्म का समस्त रहस्य एक उसी में समाहित है। क्योंकि नर ही नारायण के समीप एवं निकट है, मानव ही देवत्व का सच्चा प्रतीक प्रतिनिधि है। वह ‘स्व’ की गहराई में उतरकर ही आत्मदर्शन कर सकता है तथा ‘स्व’ का विस्तार कर गूढ़-गहन सृष्टि के रहस्य को अनावरण भी कर सकता है। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का भी वही एक मात्र अधिकारी है। अतः मानव का लक्ष्य भी महान् है। उसका चरम लक्ष्य है आत्मकल्याण एवं जगत् सेवा का उदार भाव।
मानव सर्वश्रेष्ठ है एवं उसका लक्ष्य भी परम है। मानव श्रेष्ठता का अनुभव करते हुए ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में ईश्वर के पुरुष संज्ञा का प्रयोग किया गया है। तर्कतीर्थ लक्ष्मण शास्त्री के अनुसार मानव की दिव्यता को अभिव्यक्त करने के लिए वेदों को ‘मनुष्य या पुरुष’ शब्द से अधिक उपर्युक्त अन्य कोई शब्द नहीं मिला। श्रीमद्भागवद् में ‘दुर्लभो मानुषो देहा’ कहकर मानव का महिमागान किया गया है। जैन दर्शन में मानव जीवन को शुभ लक्षण बताया गया है। बौद्ध धर्म में भी मानव को देवोपम मानकर मानव शरीर को अति उत्तम कहा गया है। इसके अनुसार मानव रूप प्राप्त होने पर ही सत्य ज्ञान की उपलब्धि हो सकती है। बाइबिल की मान्यता है कि मनुष्य ईश्वर की सबसे प्यारी संतान है। कुरान के अनुसार इंसान अल्लाह का बंदा है तथा उसने इंसान को सर्वश्रेष्ठ ढंग से गढ़ा एवं निर्माण किया है।
आचार्य शंकर ने माना है कि ‘मनुष्यत्वः, मुमुक्षत्वं तथा महापुरुष संश्रय’ इन तीनों में मनुष्यत्व प्रधान एवं प्रमुख है क्योंकि मनुष्य देह की प्राप्ति हुए बिना मुक्ति की अभीप्सा नहीं जागती एवं सद्गुरु का आश्रय नहीं मिलता है। युगद्रष्टा विश्वविश्रुत स्वामी विवेकानन्द के अनुसार मानव जीवन बड़ा श्रेष्ठ है। वह पशुता मानवता और देवत्व का संयोग है। वह कहते हैं कि मनुष्य एक ऐसा असीम वृत्त है जिसकी परिधि कहीं भी नहीं है परन्तु जिसका केन्द्र एक स्थान है और परमेश्वर एक ऐसा असीमवृत्त है, जिसकी परिधि कहीं भी नहीं है परन्तु जिसका केन्द्र सर्वत्र है। वह आगे और भी स्पष्ट करते हुए कहते हैं - यदि मनुष्य अपनी आत्मचेतना को अनन्तगुणी कर ले तो वह ईश्वर रूप बन सकता है और सम्पूर्ण विश्व पर अपना अधिकार चला सकता है। मनुष्य की श्रेष्ठता तभी तक है जब तक वह प्रकृति से ऊपर उठने के लिए संघर्ष करता है। यह प्रचण्ड पुरुषार्थ ही उसकी श्रेष्ठता का प्रतीक है।
महर्षि अरविन्द के अनुसार मनुष्य के अन्दर देवत्व एवं दिव्यत्व दोनों निहित हैं और उसकी अभिवृद्धि करना ही उसका दिव्य लक्ष्य है। इस भाव को शब्द देते हुए वह कहते हैं कि मानव सान्त और अनन्त के अचेतन समागम की पावन भूमि है और उसे इस भौतिक जीवन में ही, इस मानव देह में ही उस अनन्त ब्रह्म की ओर अधिकाधिक विकसित होने का विशेषाधिकार प्राप्त है। वह मानते हैं कि मनुष्य एक असामान्य जीव है। वह अपने वर्ग में भले ही सामान्य जान पड़ता हो परन्तु ऐसा है नहीं। उसकी यह सामान्य अवस्था एक तरह की अल्पकालीन एवं क्षणिक व्यवस्था मात्र है। मानव विकास क्रम की अन्तिम सीमा नहीं है। वह एक संक्रमणकालीन जीव है, जिसमें नये मानव का जन्म होने वाला है, अतिमानव का अवतरण होने वाला है। मनुष्य स्वयं एक विचारशील, सजीव प्रयोगशाला है, जिसके सचेतन सहयोग से प्रकृति देवता को, अतिमानव को, परमदेव को अभिव्यक्त करना चाहती है। मनुष्य को भगवद् प्रदत्त यह दिव्य उपहार एक विशेष कृपा है, भविष्य की अनन्त सम्भावनाओं से भरपूर एक उज्ज्वल आशा है।
अपनी इस दिव्य विशेषताओं एवं विभूतियों के कारण ही मानव को इस जगत् की क्रियाओं का केन्द्र बिन्दु एवं मूल स्रोत माना गया है। कन्फ्यूशियस कहते हैं कि चाहे हम किसी भी दृष्टि से विचार कर लें तो प्रतीत होगा कि मानव ही इस विश्व का मूल सूत्र एवं सार है। भारतीय स्वतंत्रता के महानायक महात्मा गाँधी के अनुसार मानव आत्मस्वरूप है। उसके अन्दर आत्म ज्योति ज्योतित होती रहती है। आवश्यकता तो बस इस दिव्य प्रकाश से प्रकाशित होने की है, लाभान्वित होने की है।
प्रायः सभी चिंतक इस विषय में एकमत हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि प्रक्रिया की विकास प्रक्रिया में मानव ही सर्वोत्तम एवं सर्वश्रेष्ठ है। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए पाश्चात्य विद्वान एस. ई. फ्रास्ट ने अपने ग्रन्थ ‘आइडियास ऑफ द ग्रेट फिलासफर्स’ में मनुष्य को ईश्वर से तनिक ही नीचे माना है। एल्डुअस हक्सले ने भी मानव में ईश्वरीय गुण का निरूपण किया है और यही वह आधार है जहाँ अवतारवाद की भावना प्रादुर्भूत होती है। मानव देह ही भगवद् चेतना के अवतरण को नूतन आधार प्रदान करती है और जिससे मानव चेतना उर्ध्वगामी बनती है। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों के प्रति जन सामान्य की गहन आस्था और श्रद्धा होती है इसी भाव बोध के कारण ही राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर आदि को अवतार के रूप में अपनाया जाता है। इन अवतारी महामानवों ने समाज में अपने उत्कृष्ट चिंतन, दृढ़चरित्र एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार का लोकाचार प्रस्तुत किया है ताकि जन सामान्य ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ की उक्ति को सिद्ध कर सकें। उनके दिखाये हुए पथ का अनुसरण कर सकें और अपने आधार को, मानवीयता को उभार सकें।
मानव को उत्तम कर्मों के प्रति प्रेरित करना ही महामानव अवतारी चेतना का परम लक्ष्य होता है। ये निष्काम भाव से विश्व में सेवा, सहिष्णुता, सद्भाव का प्रचार-प्रसार करते हैं। ये मानव धर्म की स्थापना करते हैं और अनीति व अवाँछनीयता का उन्मूलन करते हैं। मानव धर्म यही है कि मानव मानवीय सत्य को पहचाने, समझे एवं आचरण में उतारें तथा प्राणीमात्र के प्रति सद्भाव बनाये रखे। पारस्परिकता की इस अनुभूति में ही विश्व चेतना का ईश्वरीय सत्य निहित है। आपसी स्नेह, सौहार्द्र, सहयोग एवं आचार-विचार की श्रेष्ठता द्वारा भौतिक मूल्यों के साथ-साथ आध्यात्मिक गुणों का परिवर्धन एवं विकास होता है। मानव का मूल्याँकन इन्हीं दिव्य गुणों तथा उत्कृष्ट कर्मों के आधार पर होता है। इन्हीं कारणों से केनेथे मोर्गन ने स्पष्ट किया है कि बाह्य रूप से रूपाकार की दृष्टि से इंसान एवं ईश्वर भिन्न होते हुए भी तत्त्वरूप में एक एवं ऐक्य ही हैं।
मनुष्य ईश्वर की सुन्दर एवं अनमोल रचना है। उसे बनाने-तराशने में ईश्वर ने अपनी कलाकारिता को चरम सीमा पर पहुँचा दिया है। शारीरिक और बौद्धिक क्षमता के अतिरिक्त एक भावना क्षेत्र भी ईश्वरीय कृति की विशेषता है, जो मानव अन्तःकरण में उत्कृष्टता के सार तत्त्व के रूप में विद्यमान है। इसी को बदौलत वह ईश्वर का ज्येष्ठ-श्रेष्ठ पुत्र युवराज कहलाता है। अर्थात् ईश्वर की अनन्त सीमाओं एवं सत्ताओं में वह विचरण करता है। अतः मनुष्य निःसंदेह इस सृष्टि की सबसे बड़ी विभूति है। विधाता की रचना का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। अव्यवस्थित धरती को सुव्यवस्थित रूप देने का श्रेय उसे ही प्राप्त है। ज्ञान-विज्ञान, भाषा, लिपि, स्वर आदि की जो विशेषताएँ उसे प्राप्त हैं उनसे निःसंदेह उसकी महत्ता ही प्रतिपादित होती है।
मनुष्य में विकास की अनन्त संभावनाएं सन्निहित हैं। उसमें विकास के समस्त स्तर, जड़, प्राण, मन, संवेदना, भावना आदि अत्युत्तम रीति से संजोये हैं। इतना ही नहीं वह अपने सचेतन प्रयास से आत्मा के शीर्ष स्तर तक पहुँच सकता है। परमात्मा से एकाकार-एकीभूत हो सकता है। परन्तु इस दिव्य विशेषता को साकार कर पाना तभी सम्भव है जब मनुष्य अपने आपको ईश्वर का राजकुमार मानकर तदनुरूप अपने क्रियाकलापों का निर्धारण करे। अपनी मानवीय गौरव-गरिमा के अनुकूल कर्म करे। ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उनके अनुशासन को अपने जीवन में उतारने तथा अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानते हुए सबके हित में अपना हित समझने का संकल्प करे। इसी संकल्प से ही मानव लक्ष्य की पूर्ति सम्भव है, जिसे हम सबको अपनाना चाहिए और अपनी श्रेष्ठता का प्रतिपादन करना चाहिए।
दादी मेरी अमेरिका की एक घोर परिश्रमी महिला का नाम है। वह 18 वर्ष की आयु में विधवा हो गई। पढ़ी लिखी न होने पर भी उसने उत्साह से चित्रकला सीखने की ठानी। साधन न होने पर भी प्रकृति के पेड़ पौधे देखकर वह चित्र बनाने लगी। पहले चित्र तो कुछ पैसे में ही बिके, पर उसने उत्साह ठंडा न होने दिया। अच्छे चित्र बनाने लगी और उनके पैसे भी अच्छे मिलने लगे। उत्साह बढ़ा तो चित्रों का स्तर भी बढ़ने लगा और वे संसारभर में प्रसिद्ध हो गए। चित्रों की बिक्री के धन से उसने महिला कल्याण का एक ट्रस्ट बना दिया। वह 1 वर्ष तक जीती रही। तब तक निरंतर चित्र बनाती रही। कई चित्र उसने बनाए, जो कई लाख रुपए के बिके। उसकी जन्मशताब्दी पर अमेरिका के चार जीवित राष्ट्रपतियों ने शुभकामना भेजी। दादी मेरी के चित्र विश्वविख्यात हैं। सतत परिश्रम से प्राप्त उपलब्धि का यह एक अनोखा उदाहरण है।
भारतीय संस्कृति में स्वर्ग की अवधारणा स्पष्ट है। इसे अनेक रूपों में चित्रित किया गया है। इसका एक गुह्य और गहन पक्ष भी है, जो आर्य ऋषियों-द्रष्टाओं ने परिमार्जित, परिष्कृत एवं परिशोधित मनः स्थिति को स्वर्ग की उपमा से अलंकृत किया है। मन के अंधे होने, पशु प्रवृत्तियों के दासत्व को जीवन में नरक के रूप में अनुभव किया जाता है। अतः बुरे कर्मों के दुःखद परिणाम को नरक कहा जाता है तो भले कर्मों की सुखद परिणति को स्वर्ग कहा जाने का विधान है। यह आर्य कथन केवल आलंकारिक सत्य नहीं साधना-जगत का गुह्य रहस्य है, जिसे कोई भी सुपात्र अनुभव कर सकता है।
स्वर्ग में देवताओं का आवास माना जाता है। इसमें भी गहन अर्थ छुपा है। देवता अर्थात् देने की उदात्त वृत्ति। जो सतत देने में आस्था रखता है, जिसके विचार उत्कृष्ट एवं भावना परिष्कृत होती है, वहीं देवता है। ऐसे परिमार्जित व्यक्तित्व के धनी को ही देवता कहा जाता है और ऐसे देवत्व के परिचायक देवता जहाँ होंगे वह भूमि अवश्य ही पावन-पवित्र एवं स्वर्गतुल्य होगी। माना जाता है। हिमालय में देवताओं का वास होता है। कालिदास ने इसे देवतात्मा मानकर भावभरी अभिव्यक्ति की है- ‘अस्त्युत्तरस्याँ दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।
हिमालय के उच्च भौगोलिक परिवेश एवं दिव्य आध्यात्मिक वातावरण के कारण ही इसे स्वर्ग नाम से विभूषित किया है । ऋग्वेद की ऋचाओं में यही दिव्य स्वर उच्चारित होता है- जिस लोक में वैवस्वत मनु राजा राज्य करते हैं, जहाँ मंदाकिनी की कल-कल धारा निनादित होती है, वही स्वर्ग है। ऋग्वेद की इस ऋचा में चार भौगोलिक तथ्यों का स्पष्ट निरूपण मिलता है, जिसके आधार पर हिमालय को ही इस आर्यभूमि का स्वर्ग घोषित किया गया है। सर्वप्रथम इसमें सोम का वर्णन है, जिसका उत्पत्ति स्थान हिमालय का भुँजावन नामक पर्वत है। ऋचा के द्वितीय तथ्य के अनुसार ब्रह्मावर्त हिमालय ही वैवस्वत मनु का राज्य है। उन्होंने जलप्लावन के समय दक्षिणगिरि प्रदेश से उत्तरगिरि की और हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर अपनी नाव बाँधने के लिए सप्तऋषियों को लेकर प्रयाण किया था। मनु का यह ‘मनोरवसर्वण’ नामक सर्वोच्च शरणस्थल उन्हीं के द्वारा प्रशंसित देवनिर्मित देश ब्रह्मावर्त में बदरीनाथ के निकट सरस्वती के तट पर वर्तमान गाँव अनुपास है। इसका पौराणिक नाम मणिभद्रपुर था।
ऋग्वैदिक ऋचा के तीसरे भाग में हिमालय की तलहटी में बसे हरिद्वार को स्वर्ग का द्वार संकेत कहा गया है। केदार खंड में यह और भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित होता है-
गंगाद्वारोत्तरे विप्र स्वर्गभूमि स्मृता बुधैः। अन्यत्र पृथ्वी प्रोक्ता गंगाद्वारोत्तरं बिना॥
इदमेव महाभाग स्वर्गद्वारं स्मृतं बुधैः। यस्य दर्शनमात्रेंण विमुक्तो भवबंधनैः॥
अर्थात् हरिद्वार से नीचे की भूमि सामान्य भूमि, हरिद्वार से ऊपर की भूमि स्वर्गभूमि और हरिद्वार स्पष्टतः स्वर्गद्वार कहा गया है, जिसके दर्शनमात्र से मनुष्य भवबंधनों से मुक्त हो जाता है।
महाभारत में उल्लेख है कि जिस क्षेत्र में गंगाजी अलकनंदा के नाम से पुकारी जाती है, वही स्वर्ग है। आज भी देवप्रयाग के ऊपर गंगाजी अलकनंदा के नाम से जानी जाती है। पाँचों पाँडव के साथ अर्जुन ने वनवास काल में बदरिकाश्रम के गंधमादन पर्वत क्षेत्र के अंतर्गत स्वर्ग में स्वर्गाधिपति इंद्र से दिव्यास्त्र प्राप्त किए थे। पाँडव स्वर्गारोहण के निमित्त भी इसी स्वर्गभूमि की यात्रा कर मुक्ति व मोक्ष के अधिकारी हुए थे। महाराज युधिष्ठिर ने स्वर्ग स्नान कर देवत्व प्राप्त किया था। वह स्वर्ग वर्तमान तिब्बत (त्रिविष्टप) नहीं, वरन् गंधमादन का यही पावन प्रदेश है। ऋग्वैदिक ऋचा के चौथे भाग में उल्लेख है कि जहाँ मंदाकिनी आदि नदियाँ बहती हैं, वहीं वाली मंदाकिनी का भौगोलिक अस्तित्व उसके स्वर्गभूमि होने की वास्तविकता पूर्णतः प्रमाणित करता है।
ऋग्वेद और पुराणों के अनुसार इंद्र, बुधपुत्र और उर्वशी का निवासस्थान गंधमादन और अलकनंदा का तटवर्ती क्षेत्र था। आर्षग्रंथों में इस क्षेत्र को पृथ्वी के स्वर्ग की उपमा दी गई है। पुरुरवा ऐल की राजधानी प्रतिष्ठानपुन (जोशीमठ) थीं। विष्णुपुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है। कालीदास ने अपने प्रसिद्ध नाटक ‘विक्रमोर्वशीयम्’ में गंधमादन पर्वत को पुरुरवा- अर्वशी के क्रीड़ाक्षेत्र के रूप में निरूपित किया है। कालीदास ने ‘मेघदूत’ में कनखल के ऊपरी हिमालय और देवनदी गंगा के इस पुण्य क्षेत्र को स्वर्ग प्राप्ति का सोपान कहा है। अथर्ववेद में भी हिमालय के इस दिव्य क्षेत्र को स्पष्टतः स्वर्ग कहा गया है। इंद्रविद्यावाचस्पति के अनुसार हमारे पास यह मानने के लिए बहुत पुष्ट और पर्याप्त प्रमाण हैं कि हिमालय ही आर्यों का आदि देश था, जिसे स्वर्ग राज्य के रूप में जाना जाता था।
हिमालय इस मर्त्यलोक का दिव्यधाम स्वर्ग क्षेत्र है। जहाँ ऋषियों की तपस्थली भी है, जहाँ पर तप के द्वारा हमारे आर्य ऋषि-मनीषी अपने अंतःकरण का परिष्कार-परिमार्जन करते थे। वे यहाँ पर तप-साधना, ज्ञान आदि श्रेष्ठकर्मों, सद्कर्मों में सदैव निमग्न रहते थे। ऋषियों की इस तप-साधना में ही स्वर्ग का गुप्त रहस्य ढँपा-ढँका है। अनुभवी ही इसके रहस्य को अनावृत्त कर अनुभव कर सकते हैं। मनुष्य जहाँ व्यष्टि है, वहीं विराट भी है। उसकी स्थिति- अवस्था के अनुरूप उसकी चेतना का स्तर होता है और चेतना के उन्हीं स्तरों की, शक्तियों की अनुभूति उसे होती रहती है। शरीर के स्तर पर वह जो साधना-विधान को अपनाता है, उसी के अनुरूप उसे पार्थिव चेतना से एकत्व का आभास होता रहता है। यहीं ‘भू ‘तत्व की अनुभूति होती है। ‘भुवः’तत्व की अनुभूति इसके निम्न और उच्च स्तरों के अनुसार प्रेत, पिशाचों की भयंकरता-विकरालता और यक्ष आदि प्राणिक शक्तियों की सौम्यता के दर्शन के रूप में हो सकती है। दैनंदिन जीवनक्रम में स्वप्न के माध्यम से इसे कुछ-कुछ अनुभव किया जाता है। जागरुकता के अभाव के कारण यह स्पष्ट एवं साफ नहीं हो पता । ‘स्वः’ तत्त्व जिसे मन कहा जाता है। अपनी अपरिमार्जित- अपरिष्कृत स्थिति में पशु प्रवृत्तियों के दासत्व का नर्कवास भुगतता है, वहीं परिशोधित-संस्कारित होने पर उसके समक्ष देवलोक, स्वर्गलोक का राज्य वैभव खुल जाता है और देवी-देवताओं की स्पष्ट अनुभूति होने लगती है।
अतः परिष्कृत मनःस्थिति को स्वर्ग कहा जाता है तथा अंधी कामनाओं, विषय-वासनाओं के दलदल में फँसा मन रौरव नरक के समान होता है। जिनका मन सदैव उत्कृष्ट विचारों से भरा रहता है, सदा सद्चिंतन में निरत रहता है, वह स्वर्ग के अक्षय सौंदर्य एवं आनंद से आप्लावित रहता है। जिनकी मनःस्थिति हेय एवं ओछी है, उन्हें दैन्य-दारिद्र्य, दुःख-दुर्बलता, कुँठा-क्लेश, अवहेलना-अवमानना के पापसमूहों में जकड़े, घिरे रहना पड़ता हैं। नर्कवास के इस गहन काल में अनंत भौतिक संपदाएँ उन्हें मिल भी जाएँ तो उनसे सुख-शान्ति नहीं मिल पाती, उलटे उनकी दूषित प्रवृत्तियों का दारुण विस्फोट होने में बढ़ी हुई संपदा आधार बनती है और उनके व्यक्तित्व के अधिकाधिक क्षय के साथ ही वह संपदा भी क्षयीभूत होती है।
भारतीय मान्यता कर्मफल के आधार पर स्वर्ग-नरक की परिकल्पना करती हैं। दुष्कर्मों की दुखद नियति नरक है और सद्कर्मों का सुखद परिणाम स्वर्ग। पूर्व वैदिक काल में भी यह विचार अस्तित्व में आ गया था। ऋग्वेद के अनुसार याज्ञिक अनुष्ठान रूपी पुण्यकर्मों से उत्तम गति के रूप में स्वर्ग की प्राप्ति होती हैं। अतः कर्मफल विधान से ही पाप-पुण्य तथा स्वर्ग-नरक की प्रक्रिया संचालित होती है। परवर्तीकाल में स्वर्ग-नर्क का दार्शनिक स्वरूप इसी कर्मफल विधान पर विकसित हुआ प्रतीत होता है। उपनिषदों में इस पर और विस्तारपूर्वक उल्लेख मिलता है।
वृहदारण्यक उपनिषद् में स्वर्गरूपी परलोकवाद का विश्लेषण हुआ है। इसमें कहा गया है कि श्रेष्ठ कर्म करके स्वास्थ्य, संपदा पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान आदि प्राप्त किया जा सकता है। इसमें आगे बताया गया है कि पितृलोक में जानें वाले पितरों को इस संसार के आनंद की अपेक्षा सौ गुना आनंद है। पुण्यकर्म से देवता बने हुए लोगों का आनंद गंधर्वलोक से भी शतोगुणी अधिक है। इस प्रकार औपनिषदिक चिंतन में कर्म के अनुसार स्वर्ग-नरक की धारणा का प्रतिपादन मिलता है।
ऋग्वेदकाल में आर्यों ने पापों के परिणामस्वरूप नरकलोक की कल्पना नहीं की थी, परंतु उपनिषद् के चिंतन में यह कल्पना झलकती है। इसमें नरक के विषय में स्वतंत्र दृष्टिकोण नहीं होने के बावजूद इसकी परिकल्पना की गई हैं इसके अनुसार नरकलोक अंधकार से आवृत्त है और वहाँ सुख व आनंद का अभाव है। इस संसार में अविद्यारूपी नरक के उपासक नरकलोक जाते हैं। आत्मघाती पुरुषों के लिए एवं अज्ञानी को भी मृत्यु के पश्चात इस नरकवास की यातना झेलनी पड़ती है। इसके ठीक विपरीत सद्कर्म करने वाले ज्ञानी पुरुष की सद्गति स्वर्गलोक की और होती है।
महाकवि वाल्मीकि ने महाकाव्य रामायण में स्वर्ग एवं नरक दोनों को परलोक के रूप निरूपित किया है। उनके अनुसार शुभकर्मों द्वारा व्यक्ति स्वर्गलोक को तथा पापकर्मों से नरकलोक को पहुँचता है। स्वर्ग−प्राप्ति की अवधारणा ही उसे पापकर्मों से विमुख करती है। अयोध्याकाँड में भगवान राम लक्ष्मण से कहते हैं कि हे लक्ष्मण! यदि मैं कुपित हो जाऊँ तो अपने बाणों द्वारा अकेले ही अयोध्यापुरी तथा समस्त भूमंडल को निष्कंटक बनाकर अपने अधिकार में कर सकता हूँ, परंतु पारलौकिक हितसाधन में बल, पराक्रम कारण नहीं होता है। अतः मैं ऐसा नहीं करूंगा। इस प्रकार रामायण में भी स्वर्ग एवं नरक ऐसे स्थान के रूप में कल्पित हैं, जहाँ व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार पहुँचना होता है।
महाभारत एवं अनेक पुराणशास्त्र में भी स्वर्ग-नरक की विचारधारा कर्मफल की अवधारणा से पूर्णरूपेण प्रभावित है। इनके अनुसार स्वर्ग केवल सुख-ऐश्वर्य का वैभावित है और नरक कुकर्मी को कठोर दंड देने लायक वीभत्स स्थल है। महाभारत में प्रतिपादित है कि स्वर्ग का अर्थ है-नित्य सुख अर्थात् जिस सुख के साथ दुःख के भोग का नाम नरक है, जिस लोक में पापात्मा जीव केवल दुःख-कष्ट ही भोगते है। स्वर्ग प्रकाशमय है और नरक तपोमय।
आलसी, दरिद्र, प्रमादी के लिए प्रगति के समस्त द्वार बंद हो जाते है। पापी, दुष्ट, दुरात्मा, घृणास्पद बनने और स्नेह-सहयोग से वंचित होकर मरघट के प्रेत-पिशाच बने एकाकी घूमते हैं। यह घृणित स्थिति नरक नहीं है तो और क्या है? सेवाभावी, सद्गुणसंपन्न, सज्जन धरती के देवता समझे जाते हैं ओर मरने के बाद भी वंदनीय एवं श्रद्धास्पद बने रहते है।उनकी यश-गाथाएँ अनेकों को प्रेरणा भरा प्रकाश देती रहती हैं। इसे स्वर्ग प्राप्ति न कहें तो और क्या कहें ? मनुष्य को चाहिए कि दुष्कर्म रूपी नरकाग्नि से विरत होकर सतत सद्कर्म रूपी स्वर्गीय आनंद का उपभोग करे। सद्कर्मों में स्वर्ग का अपार ऐश्वर्य-वैभव छुपा पड़ा है। अतः हमें सदा सद्कर्म करते रहना चाहिए।
राजा कुमारपाल प्रजाप्रिय राजा थे। उनके गुरु सदा उच्चकोटि के परामर्श दिया करते थे। उस राज्य में विजयादशमी के दिन देवी पर पशुबलि बड़े धूम-धाम से चढ़ाई जाती थी। उस दिन सैकड़ों पशु काटे जाते थे।
आचार्य ने राजा को इस बलिप्रथा को बंद करने के लिए कहा। राजा ने कहा, प्रजाजन इसके लिए तैयार न होंगे। उन्हें मैं कैसे रुष्ट करूं? गुरु ने प्रजा को समझाने का काम अपने ऊपर लिया।
सजाधजाकर बलि के निमित्त प्रजाजन पशुओं को लाए। गुरुदेव ने उन सबको एकत्रित करके पूछा, देवी तो सबकी माता है। पशुओं की बलि लेकर तो वह रुष्ट होगी।
प्रजाजन ने एक स्वर से कहा, देवी बलि चाहती है और बलि से प्रसन्न भी होती है। यदि ऐसा न होता, तो हम लोग इस प्रथा को क्यों चलाते?
गुरुदेव ने कहा, आप लोगों की कथन की सच्चाई की वास्तविकता अभी परखे लेते हैं। देवी के मंदिर में सभी बलि चढ़ने वाले पशु बंद कर दिए गए। सवेरा होते ही दरवाजा खोला गया और देखा गया कि कितने पशु देवी ने भक्षण किए हैं।
दरवाजा खुलने पर सभी पशु गिने गए। एक भी कम न हुआ। गुरुदेव ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा, देखा आप लोगों ने। देवी ने एक भी पशु नहीं खाया। उन्हें प्यारा पुत्र समझकर छोड़ दिया। फिर आप लोग ही प्राणि-हत्या का पाप क्यों ओढ़ते हैं?
गुरुजी की उक्ति से सभी प्रजाजन संतुष्ट हुए। पशुबलि रुक गई और प्रजाजन रुष्ट भी न होने पाए।
इक्कीसवीं सदी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के नित नए आयामों एवं वरदानों को प्रकट कर रही है। लेकिन इसी के साथ मानवीय चेतना में हो रहे विखण्डन के नए रूप भी अभिशाप बन कर बरस रहे हैं। बढ़ती वैज्ञानिक समृद्धि ने सघन मानसिक सन्ताप का रूप ले लिया है। जिन मनोरोगों के नाम एक दशक पहले किन्हीं विशिष्ट चिकित्साशास्त्र के ग्रन्थों में पढ़े-सुने जाते थे, आज उनकी जकड़ से सामान्य ग्रामीण भी भासित है। इन्सान की इस आन्तरिक टूटन से बाहरी जीवन में भी दरारें पड़ रही हैं। टूटते-बिखरते परिवार, अलगाव, आतंक से सहमा समाज इसी का प्रतिफल है। मानवीय अन्तःप्रकृति के विक्षोभ से बाह्य प्रकृति भी विक्षुब्ध है। भयावह पर्यावरण संकट के पीछे विशेषज्ञ मानवीय चिन्तन को ही दोषी ठहराते हैं।
एक ही बिन्दु से उपजी इन समस्याओं की सृष्टि का विलय भी किसी एक ही बिन्दु पर सम्भव है। ‘बिन्दु से सृष्टि, बिन्दु में विलय’ की यह दार्शनिक उक्ति यहाँ भी खरी और सही है। विश्व के महान् चिन्तकों के अनुसार यह समाधान सूत्र एक ही है, ‘चिन्तन सुधरे तो जीवन संवरे’। जीवन की प्रायः सभी समस्याएँ चिन्तन की विकृति से ही पनपी है। चिन्तन शैली के विकास और सुधार से इस विकृति की परिष्कृति की जा सकती है। दर्शन की दृष्टि मिले तो ही इन्सानी जिन्दगी का अन्धापन दूर हो सकता है। और मनुष्य-व्यक्ति व समाज के रूप में अपनी समस्याओं के सार्थक समाधान पा सकता है।
सृष्टि में मानव उन्मेष काल से दर्शन सार्थक जीवन दृष्टि के रूप में सक्रिय रहा है। वेद से लेकर महर्षि अरविन्द तक, सुकरात से लेकर सार्त्र तक पूर्वी एवं पश्चिमी क्षितिज में युगानुरूप जीवन दृष्टि की खोज और चिन्तन शैली को परिष्कृत करने की यह दार्शनिक साधना होती रही है। हर युग एवं प्रत्येक काल खण्ड में दर्शन के मूल्य और महत्त्व को स्वीकारा गया है। हाँ इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी की चकाचौंध से चुँधियाई आँखों ने दर्शन के मूल्य और महत्त्व की अवमानना की है। वैज्ञानिक क्रियात्मकता के प्रसार में दार्शनिक चिन्तन की गति काफी मन्द हुई है। परिष्कृत चिन्तन विहीन मानवीय क्रिया ने जीवन की दशा और दिशा को संकटों व कंटकों से भर दिया है।
दृष्टि के अभाव में लड़खड़ाते कदम न केवल भटक जाते हैं बल्कि चोटिल भी होते हैं। चिन्तन के अभाव में क्रिया कितना ही विस्तार क्यों न ले ले, पर वह अपना अर्थ और औचित्य सिद्ध नहीं कर पाती। वैज्ञानिक प्रगति की तीव्रता के युग में हो रही दार्शनिक उपेक्षा को देखकर ही विश्व मनीषी बट्रेण्ड रसेल से यह कहे बिना न रहा गया कि हम आज ऐसे युग में जीवन जी रहे हैं, जिसका साधन है मानवीय दक्षता किन्तु साध्य है मानवीय मूर्खता। रसेल के इस कथन का अन्तर्भाव यही है कि मानवीय क्रियात्मकता का विस्तार जितना बढ़ता जाता है- परिष्कृत चिन्तन शैली एवं प्रकाशपूर्ण जीवन दृष्टि की आवश्यकता उतनी ही तीव्र हो जाती है।
यह कथन केवल सामान्य दार्शनिक तर्क भर नहीं है, बल्कि अपने युग का सर्वजन अनुभूत सत्य है। युग की कसौटी पर पूर्णतया खरे इस जीवन सत्य का सार यही है कि इक्कीसवीं सदी में दर्शन का मूल्य और महत्त्व अतीत से असंख्य गुना अधिक है। आज विज्ञान व प्रौद्योगिकी के नित नए आयामों एवं वरदानों की ही भाँति दार्शनिक चिन्तन के भी नए-नए आयामों व नूतन वरदानों को प्रकट होना चाहिए। वैज्ञानिक प्रगति के साथ दार्शनिक प्रगति के कदम मिला कर चलने से ही मानवीय जीवन में समाधान का स्वर संगीत प्रकट होगा। इक्कीसवीं सदी में दर्शन के मूल्य एवं महत्त्व के बल पर ही समस्याओं की सृष्टि, समाधान की सृष्टि में रूपांतरित होगी। परिष्कृत दार्शनिक चिन्तन ही मानवीय क्रिया-कौशल का परिशोधन करने में समर्थ है। एकमात्र दार्शनिक मूल्य ही, वैज्ञानिक समृद्धि से उपजे मानवीय सन्ताप की महाऔषधि है। इसे ग्रहण करके ही इन्सानी जिन्दगी सम्पूर्ण स्वास्थ्य एवं सार्थक समाधान का वरदान पा सकती है।
लुकमान से किसी ने पूछ- “आपने ऐसी तमीज किससे सीखी?” उन्होंने जवाब दिया, “बदतमीजों से। वे जो करते और भोगते हैं, उसका मैंने ध्यान रखा और अपनी आदतों को उस कसौटी पर कसकर सही किया।”
नगरवधू अंबपाली अपनी सुँदरता के लिये उस क्षेत्र में प्रख्यात थी। उसकी एक मुस्कान के लिये संपन्न लोग सब कुछ निछावर करते थे। एक दिन वह भगवान बुद्ध का दर्शन करने जैतवन गई। वहाँ उनका तप-तेज देखकर इतनी प्रभावित हुई कि केश मुड़ाकर भिक्षुणी बन गई। इस परिवर्तित जीवन से उसने दूर-दूर तक धर्मप्रचार करके असंख्यों का कल्याण किया। इतिहास बताता है कि नारी अपने उज्ज्वल प्रखर रूप में नर से भी बढ़कर अनुदान प्रस्तुत करती रही है। भौतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों में उसने वरीयता प्राप्त कर यह प्रमाणित कर दिया है कि अवसर मिलने पर वह क्या नहीं कर सकती।
प्रारंभिक स्तर की साधन वह कहलाती है, जिसमें माँ की छवि के साथ-साथ पूजा- उपकरणों की आवश्यकता होती है। भावनाओं के विकास और अपनी श्रद्धा-निष्ठा को प्रगाढ़ बनाने की दृष्टि से लिए उच्चस्तरीय ध्यान धारणा ही काम में आती हैं इष्ट के चित्र और प्रतिमा के साथ की गई उपासना से पूर्वाभास, सुखद स्वप्नों में भविष्य ज्ञान, माता के दर्शन, अंतः करण से दिव्य भावनाओं की स्फुरणा इस साधना की सफलता के संकेत होते हैं, किंतु आत्मसाक्षात्कार की भूमिका वह होती है, जिसमें सालोक्य, सारूप्य तथा सायुज्य की अनुभूति होती है। यह स्थिति भगवती गायत्री के तेजपुंज में अपने आपको घुलाने, मेल-मिलाप कराने के अभ्यास से प्रारंभ होती है और उस तेज पुँज में समाधिस्थ हो जाने की प्रगाढ़ अवस्था में उसकी परिणति। उस स्तर का साधक अपने आप को सविता के तेजपुँज की स्थिति में अनुभव करता और विराट आत्मा की अनुभूति करता है। इस दृष्टि से तेजपुँज ज्योति अवतरण की साधना का अभ्यास आवश्यक हो जाता है।
इसके लिए चित्र आदि की आवश्यकता नहीं। रात्रि को यदि कभी आँख खुल जाए तो बिस्तर पर पड़े-पड़े भी किया जा सकता है। बैठकर करनी हो तो दीवार, मसंद का सहारा लिया जा सकता है। आरामकुमारी भी काम में लाई जा सकती है। शरीर को शिथिल, मन को एकाग्र करके सुविधा के समय इस साधना करना चाहिए। समय कितना लगाना है, यह अपनी सुविधा एवं परिस्थिति पर निर्भर है, पर जितना भी समय लगाना हो उसे तीन भागो में विभक्त कर लेना चाहिए। एक तिहाई में स्थूलशरीर में ज्योति का अवतरण करना चाहिए। अनुमान से या घड़ी की सहायता से यह समय निर्धारित करना चाहिए।
सूक्ष्म जगत में ईश्वरीय दिव्य प्रकाश की प्रेरणापूर्ण किरणें निरंतर बहती रहती हैं उन्हें श्रद्धा, एकाग्रता और भावनापूर्वक ध्यान करके इस लेख में वर्णित विधि से कोई भी साधक ग्रहण कर सकता है। गायत्री परिवार के लिए इस साधना में संलग्न साधकों के लिए दो-दो घंटे के दो ऐसे समय भी नियुक्त है, जिनमें किन्हीं महान दिव्य शक्तियों द्वारा अपना शक्तिप्रवाह भी जोड़ा जाता है। उस समय ध्यान करने में विशेष आनंद आता है और विशेष प्रभाव पड़ता है। श्रेष्ठतम समय रात्रि को 6 से 8 बजे और प्रातः 3 से 6 बजे का है। शांतिकुंज में यह साधना अभी 1.45 से 2 की अवधि में कराई जाती है।
आरंभ में यह समय एक बार में आधा घंटे से अधिक का नहीं होना चाहिए। धीरे-धीरे समय बढ़ाकर एक घंटे तक का किया जा सकता है। रात्रि के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध में दोनों बार भी साधना की जा सकती है। तब दो बार में कुल मिलाकर एक घंटे तक का यह समय हो सकता है। 24 घंटे में 2 घंटे इसके लिए अधिकतम समय हो सकता है। अधिक तेज के ग्रहण करने में कठिनाई पड़ती है, इसलिए ग्रहण उतना ही करना चाहिए, जितना पचाया जा सके, कम से आरंभ कर धीरे-धीरे समय बढ़ाया जा सकता है। कौन किस समय इस साधना को करे, कितनी देर, किस प्रकार बैठकर करे, यह निर्धारण करना साधक का काम है। अपनी परिस्थितियोँ के अनुसार उसे अपनी व्यवस्था किया जाए, उसे उसी क्रम चलाना चाहिए। समय और स्थिति का एक ही क्रम चलाना किसी भी साधना की सफलता के लिए उचित एवं आवश्यक है।
ज्योति अवतरण साधना इस प्रकार करनी चाहिए-
(1) शरीर का बिल्कुल शिथिल कर देना चाहिए। भावना करनी चाहिए कि अपना मन, शरीर ओर आत्मा पूर्ण शाँत, निश्चिंत एवं प्रसन्न स्थिति में अवस्थित हैं। यह भावना पाँच मिनट करने से चित्त में ध्यान के उपयुक्त शाँति उत्पन्न होने लगती है।
(2) ध्यान कीजिए चारों ओर प्रकाश-पुँज फैला हुआ हो। आगे-पीछे, ऊपर -नीचे सर्वत्र प्रकाश फैल रहा है। भगवती आदिशक्ति की आभा सूर्यमंडल से निकल कर सीधी आप तक चली आ रही है और आप उस प्रकाश के घेरे में चारों ओर से घिरे हुए हैं।
(3)यह प्रकाश किरणें धीरे-धीरे आपके शरीर में, त्वचा छिद्रों में प्रवेश करती हुई प्रत्येक अवयव में घुस रही हैं। हृदय, फेफड़े, आमाशय, आँत, मस्तिष्क, हाथ, पैर आदि अंग पुँज को अपने भीतर धारण करके परिपुष्ट हो रहे हैं। असंयम की वृत्ति जल रही है। पवित्रता की यह ज्योति शरीर के कण-कण का पवित्र बनाने में संलग्न है।
स्थूल शरीर में रक्त-माँस, अस्थि आदि के बने हुए अवयवों के प्रकाशपुँज बनने और उनके परिपुष्ट, पवित्र, स्फूर्तिवान एवं ज्योतिर्मय स्वरूप का ध्यान करने के उपराँत सूक्ष्म शरीर केंद्रित करना चाहिए। सूक्ष्म शरीर का स्थान मस्तिष्क है।
(4) ध्यान करना चाहिए कि मस्तिष्क के भीतर मक्खन जैसे बिखरे हुए गुणों में अगणित प्रकार की मानसिक शक्तियों एवं विचारणाओं के केंद्र छिपे हुए हैं। उन तक आदि शक्ति माता के प्रकाश की धाराएँ बह रही हैं और वे सभी कण उसके द्वारा रत्नकणों की तरह ज्योतिर्मय होकर जगमगाने लगे हैं।
(5) मन में छिपे हुए अज्ञानाँधकार का असंयम, स्वार्थ, मोह, भय और भ्रम-जंजाल का इस प्रकाश के प्रवेश होने से विनाश हो चला और मानसिक संस्थान का कण-कण विवेक, उच्च विचार, संतुलन एवं सुरुचि जैसी विभूतियों से जगमगाने लगा। सविता के तेज रूप गायत्री माता की इस ज्योति द्वारा अपनी मनोभूमि सको महापुरुषों जैसे स्तर की बनाया जा रहा है और हम उस प्रकाश को बड़ी श्रद्धापूर्वक अधिकाधिक मात्रा में मस्तिष्कीय कणों में ग्रहण एवं धारण करते चले जा रहे हैं।
(6) ध्यान करना चाहिए कि आकाश में अनंत प्रकाश की आभा अवतरित होकर अपने हृदय स्थान में अवस्थित आत्मा के अंगुष्ठ मात्र प्रकाशपुँज में प्रवेश कर रही है। उसकी सीमाबद्धता, संकीर्णता और तुच्छता दूर कर उसे अपने सदृश बना रही है। लघु और महान का यह मिलन परस्पर महान आदान-प्रदान के रूप में परिणत हो रहा है।
(7) जीवात्मा का लघु प्रकाश परमात्मा के परम प्रकाश से लिपट रहा है और दीपक पर जलने वाले पतंगे की तरह, यज्ञकुँड में पड़ने वाली आहुति की तरह अपने अस्तित्व को होम रहा है। चकोर की तरह उस प्रकाश पुँज का चंद्रमा मानकर आह्लादित हो रहा है और अनंत आनंद का अनुभव कर रहा है।
(8) इस मिलन के फलस्वरूप अंतःकरण में सद्भावनाओं की हिलोरें उठ रही हैं, आकाँक्षाएँ आदर्श एवं उत्कृष्टता से परिपूर्ण हो चली हैं। ईश्वरीय संदेशों और आदर्शों पर चलने की निष्ठा परिपक्व हो रही हैं। विश्व के कण-कण में परमब्रह्म को ओत-पोत देखकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्‘ की भावना प्रबल हो रही है और सेवा-धर्म अपनाकर ईश्वर-भक्ति के मधुर रसास्वादन की उमंग उठ रही है।
(9) अनंत प्रकाश के आनंदमय समुद्र में स्नान करते हुए आत्मा अपने आपको धन्य एवं कृत-कृत्य हुआ अनुभव कर रही है।
इस संसार में जीवन को सफल बनाने की सबसे बड़ी शक्ति अध्यात्म ही है। उसी के द्वारा मनुष्य अपने को पहचान सकता है और समस्त प्राणियों का एक ही महाशक्ति का अंश समझकर उसके साथ अपनत्व का अनुभव कर सकता है। इस तरह की भावना हमारी शक्ति को अनेक गुना बढ़ा सकती हैं। ‘ज्योति अवतरण’ की साधना से मनुष्य इस सर्वव्यापी आत्मतत्त्व की वास्तविकता का बहुत कुछ अनुभव कर सकता है। यह अनुभूति जितनी प्रगाढ़ होगी, आत्मानुभूति, आत्मसाक्षात्कार और अपनी परमात्मामय होने की भावना उतनी ही सघन होती चली जाएगी।
नगरवधू अंबपाली अपनी सुँदरता के लिए उस क्षेत्र में प्रख्यात थी। उसकी एक मुस्कान के लिए संपन्न लोग सब कुछ निछावर करते थे। एक दिन वह भगवान बुद्ध का दर्शन करने जैतवन गई। वहाँ उनका तप-तेज देखकर इतनी प्रभावित हुई कि केश मुड़ाकर भिक्षुणी बन गई। इस परिवर्तित जीवन से उसने दूर-दूर तक धर्मप्रचार करके असंख्यों का कल्याण किया। इतिहास बताता है कि नारी अपने उज्ज्वल प्रखर रूप में नर से भी बढ़कर अनुदान प्रस्तुत करती रही है। भौतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों में उसने वरीयता प्राप्त कर यह प्रमाणित कर दिया है कि अवसर मिलने पर वह क्या नहीं कर सकती!
बॉडी लैंग्वेज अर्थात् देहभाषा आन्तरिक भाव-विचारों की, देह के हावभाव एवं भाव-भंगिमाओं के रूप में अभिव्यक्ति है। गहरी भावना एवं सजल-संवेदना को प्रकट करने के लिए प्रायः शब्द एवं वाणी मूक एवं अक्षम प्रतीत होते हैं। वैसे में अशाब्दिक सम्प्रेषण का प्रयोग किया जाता है। नवजात शिशु के साथ मातृत्व की वाणी अशाब्दिक होती है। शिशु के हावभाव से ही उसका परिचय होता है। प्रेमभावना की पुलकन शब्दों से नहीं अशाब्दिक सम्प्रेषण से ही अभिव्यक्त होती है। जिसे कहने में शब्द असमर्थ होते हैं, उसे देह भाषा पल भर में समझा देती है। इसके द्वारा व्यक्ति की वृत्ति एवं आचरण का भी सहज रूप से आकलन किया जा सकता है।
बॉडी लैंग्वेज इक्कीसवीं सदी की अनुपम खोज है। हालाँकि इसकी व्याख्या और समझ अत्यन्त पुरातन है। मानवीय विकास के साथ ही देहभाषा का प्रादुर्भाव हुआ परन्तु इसका विधिवत् अध्ययन-अन्वेषण सन् 1960 के दशक से ही आरम्भ हुआ। इसका प्रथम परिचय सन् 1970 में जूलियस फास्ट की देहभाषा पर प्रकाशित एक पुस्तक से हुआ। यह अध्ययन व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिकों द्वारा अशाब्दिक संप्रेषण का आरम्भ था। परन्तु जहाँ तक देहभाषा की सूक्ष्म तकनीक का विषय है, बीसवीं सदी के पूर्व सन् 1872 की सबसे प्रभावी व प्रसिद्ध पुस्तक, चार्ल्स डार्विन कृत ‘द एक्सप्रेस ऑफ द इमोशन्स इन मैन एण्ड एनिमल्स’ में उल्लेख मिलता है। इसमें मुखमुद्रा की भावाभिव्यक्तियों और देहभाषा के आधुनिक अध्ययनों के बीज समाहित हैं। इस क्षेत्र के आधुनिक शोधकर्त्ताओं के लिए यह पथ-प्रदर्शक के समान है।
बॉडी लैंग्वेज के अन्वेषणकर्त्ताओं ने अब तक दस लाख अशाब्दिक संकेतों और लक्षणों की पहचान की है। अल्बर्ट मेहरेबियन ने अपने अध्ययन में स्पष्ट किया है कि किसी संदेश का प्रभाव केवल 7 प्रतिशत शाब्दिक होता है, जबकि वाणी का प्रभाव 38 प्रतिशत होता है। 55 प्रतिशत प्रभाव अशाब्दिक होता है। प्रोफेसर वर्ड व्हिसल ने भी इसकी पुष्टि की है। उनके प्रायोगिक निष्कर्ष से स्पष्ट होता है कि एक व्यक्ति एक दिन में शब्दों के माध्यम से लगभग दस से ग्यारह मिनट तक ही बोलता है। मेहरेवियन के समान इनकी भी मान्यता है कि वार्तालाप में शाब्दिक पहलू 35 प्रतिशत से भी कम होता है और सम्प्रेषण का 65 प्रतिशत से भी ज्यादा भाग अशाब्दिक होता है।
अनुसंधानकर्त्ताओं के अनुसार शाब्दिक माध्यम का प्रयोग सामान्यतः सूचना सम्प्रेषित करने के लिए किया जाता है, जबकि अशाब्दिक माध्यम का प्रयोग व्यक्तिगत भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए किया जाता है। कई अवसरों पर तो इसे शाब्दिक संदेशों के विकल्प के रूप में उपयोग किया जाता है। मुस्कराहट के माध्यम से अनकही बातों को कह दिया जाता है, समझा दिया जाता है। आन्तरिक भावावेगों को बताने के लिए शब्द की कम ही आवश्यकता पड़ती है। इस संदर्भ में महिलाएँ पुरुषों से अधिक अनुभूतिसक्षम होती हैं। उनमें अन्तर्बोध क्षमता भी अधिक होती है। महिलाएँ देहभाषा के क्षेत्र में दक्ष एवं प्रवीण होती हैं। यह अन्तर्बोध उन महिलाओं में अद्भुत होता है जिन्होंने शिशुओं की परवरिश की होती है। प्रारम्भ के कुछ वर्षों में उन्हें बच्चों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए अशाब्दिक माध्यम पर ही पूर्णरूपेण निर्भर रहना पड़ता है। सम्भवतः इन्हीं कारणों से महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती हैं।
देहभाषा जन्मजात, आनुवाँशिक है या अर्जित है यह अनुसंधान का विषय है। इसमें काफी मतान्तर दृष्टिगोचर होते हैं। एक प्रयोग में पाया गया है कि दृष्टिहीन और बधिर व्यक्ति अशाब्दिक संकेतों को ध्वनि या दृष्टि के माध्यम से सीखने में असमर्थ होते हैं। जर्मन भाषाविज्ञानी एब्ल-एवेस्फेल्ट इसे जन्मजात मानते हुए कहते हैं कि बहरे एवं अन्धे बच्चों में मुस्कराहट देखी जा सकती है, जबकि वे इसे कभी देख एवं सीख नहीं पाते। प्राइमेट शिशुओं में चूमने की तात्कालिक क्षमता जन्मजात होती है। एकमेन, फेसन और सोरेन्सन ने जन्मजात मुद्राओं के बारे में डार्विन के कुछ सिद्धान्तों एवं सूत्रों का समर्थन एवं स्वीकार किया है।
मूलभूत सम्प्रेषण विश्व भर में अधिकतर एक सा होता है। खुशी एवं आनन्द की अभिव्यक्ति मुस्कराहट के रूप में होती है। दुःखी व क्रोध की अवस्था में भृकुटियाँ चढ़ जाती हैं, नाक फूल जाती है। सर्वत्र सिर को ऊपर से नीचे की ओर हिलाने का तात्पर्य ‘हाँ’ एवं सकारात्मक होता है। ठीक इसी प्रकार लगभग प्रत्येक संस्कृति में सिर को एक ओर से दूसरी ओर हिलाने का अर्थ ‘नहीं’ एवं नकारात्मक होता है। अधिकतर पुरुष कोट, शर्ट या कुर्ता पहनते समय पहले अपने दायाँ हाथ अन्दर डालते हैं, जबकि ज्यादातर महिलाएँ अपना बायाँ हाथ का प्रयोग करती हैं। कंधा झटकने का मतलब है कि समझायी जा रही बात समझ में नहीं आ रही है।
शाब्दिक भाषा अलग-अलग संस्कृति-सभ्यताओं में भिन्न-भिन्न होती है। इसी तरह अशाब्दिक भाषा के संदर्भ में भी भिन्नता देखी जाती है। सामान्यतः तीन सामान्य हस्त मुद्राओं, अंगूठी मुद्रा, अंगूठा दिखाना और ‘V’ (वी) संकेत के साँस्कृतिक अर्थों में अन्तर होता है। अंगूठी या ‘OK’ मुद्रा उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिका में लोकप्रिय हुई थी। ह्रय़डडडड का अर्थ सभी अंग्रेजी भाषी देशों में एक समान है। हालाँकि इसका अर्थ यूरोप और एशिया में तेजी के साथ प्रचलित हो गया है। परन्तु कुछ विशिष्ट स्थानों पर इसके अर्थों में विभिन्नता पायी गयी है। फ्राँस में इसका अर्थ ‘शून्य’ या ‘कुछ नहीं’ है। जापानवासी इसका आशय ‘धन’ से करते हैं। कुछ भूमध्यसागरीय देशों में यह एक छेद का संकेत है।
ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड में अंगूठे की मुद्रा का आशय सामान्यतः सहयोग (लिफ्ट) लेने के लिए प्रयोग किया जाता है। जब अंगूठे को कोण से ऊपर की ओर झटका दिया जाता है तो यह एक अपमान का संकेत बन जाता है। ग्रीस में इसका मुख्य अर्थ है ‘ठूँस लो’। इटलीवासी एक से पाँच तक गिनते हैं तो वे इस संकेत का प्रयोग ‘एक’ के अर्थ में करते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन व आस्ट्रेलिया में अंगूठा पाँच का प्रतिनिधित्व करता है। अंगूठे का प्रयोग दूसरी मुद्राओं के साथ शक्ति और श्रेष्ठता के संकेत के रूप में किया जाता है। ‘V’ का संकेत समूचे आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड और ब्रिटेन में प्रसिद्ध है। इसका तात्पर्य होता है ‘आपके अन्दर’। दूसरे विश्वयुद्ध में इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने ‘V’ को विजय चिन्ह के रूप में लोकप्रिय बनाया था।
अन्य भाषा के समान देहभाषा में भी शब्द वाक्य और विराम चिन्ह होते हैं। हर मुद्रा एकाकी शब्द के सदृश्य होती है और उसके कई अर्थ होते हैं। मुद्राएँ ‘वाक्यों’ में भी प्रयोग होती हैं और व्यक्ति की आन्तरिक भावनाओं एवं दृष्टिकोण को प्रकट करती हैं। आलोचना की मुख्य मुद्रा है चेहरे पर हाथ रखना, जिसमें तर्जनी गाल के ऊपर की ओर संकेत करती है और दूसरी उंगली मुँह को ढँक लेती है तथा अंगूठा ठुड्डी को सहारा देता है। भौंहों का उठना आश्चर्य की निशानी है। होठों को दांतों से काटने का मतलब, काफी परेशानी का होना है। होंठ से होंठ दबाना असमंजस का सूचक है। आँखें नीची कर मुस्कराना कृतज्ञता एवं सम्मान प्रकट करना है। नाक-भौं सिकोड़ने से यह समझा जा सकता है कि व्यक्ति थकावट अनुभव कर रहा है, या किसी चीज को पसन्द नहीं कर रहा है। बार-बार बाँहों को हिलाना डरने का द्योतक है। उंगलियों को बारम्बार चटकाने का आशय है अधीर होना। पैर पर पैर चढ़ाकर बैठने वाले व्यक्ति नेतृत्व क्षमता से सराबोर होते हैं।
देहभाषा भावनाओं की अभिव्यक्ति में सहायक होती है। अतः इसकी महत्ता एवं विशेषता भी अधिक होती है। गहरी साँत्वना एवं संवेदना व्यक्त करने के लिए शब्द छोटे पड़ जाते हैं। ऐसे में एक अपनत्व भरी मुस्कराहट एवं प्यार भरी छुअन से वह सब कुछ कह दिया जाता है जिसे कह पाने में शब्द नाकाफी होते हैं। इसलिए बॉडी लैंग्वेज के विशेषज्ञ जान कार्ले कहते हैं कि देहभाषा अभिव्यक्ति का सुन्दर व सरल-सहज तरीका है। एक संकेत या भाव हजार शब्दों से भी अधिक ताकतवर एवं भारी होता है। अतः आवश्यकता है भावों को अभिव्यक्त करने के लिए एक भावपूर्ण हृदय एवं प्रेमप्रवण दृष्टिकोण की। हृदय को उदार कर एवं मन को परिष्कृत करके देहभाषा के व्यावहारिक जगत् में प्रवीण हुआ जा सकता है।
अब से एक हजार वर्ष पूर्व बुखारा के सुलतान अब्दुल मंजूर किसी ऐसी बीमारी से ग्रसित हो गए, जिसे चिकित्सकों ने असाध्य घोषित कर दिया था। सुयोग्य चिकित्सक के पुत्र इब्नेसिना ने उनका इलाज किया और अच्छा कर दिया। सुलतान ने मुँहमाँगा इनाम माँगने के लिए कहा तो उन्होंने उनके पुस्तकालय में खुला प्रवेश पाने और नोट करने भर की इजाजत माँग ली। उनका ज्ञान भंडार अथाह होता चला गया। पिता के मरने पर उन्हें परिवार निर्वाह के लिए वापस लौटना पड़ा। सुलतान द्वारा उन्हें पेंशन मिली। वे निश्चिंत होकर दूर-दूर तक के पुस्तकालयों में प्रवेश पाकर अध्ययन करते रहे। इब्नेसिना ने तिब्बी चिकित्सा और दर्शन शास्त्र पर अनेक ग्रंथ लिखे हैं, जिन्हें विद्वानों में मान्यता प्राप्त है।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यत्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अर्थात् आप स्वयं अपना उद्धारक हैं। आप स्वयं विनाश व विकास के कारण हैं। आप ही अपना मित्र हैं और आप ही अपना शत्रु हैं। गीता के इस दिव्य श्लोक में आत्म सम्मान, स्व सम्मान का मंत्र एवं सूत्र छुपा पड़ा है। स्वयं का सम्मान अपने अन्तर्निहित गुणों का सम्मान है। स्व अर्थात् आत्मा अस्तित्व का केन्द्र है। यही मनुष्य की मनुष्यता तथा चेतना का दिव्य स्वरूप है। स्व ही जीवन का परम स्रोत है। स्व के सम्मान से जीवन निखरता एवं विकसित होता है। और इसके विपरीत आत्म अवमानना समस्त आधि-व्याधियों का मूल कारण है।
स्व पर आस्था से ही आन्तरिक प्रतिभा का अभिवर्धन एवं विकास होता है जिसमें लौकिक व अलौकिक, भौतिक व आत्मिक सफलता ढँकी-ढँपी होती है। हम स्वयं को शरीर का जड़-पिण्ड मानकर अपनी आन्तरिक क्षमता एवं सामर्थ्य से अनभिज्ञ होते हैं और निराशा-हताशा के सघन तमस् में पड़े छटपटाते रहते हैं। स्वयं को न पहचानने के कारण ही हम अपने जीवन के सभी द्वार बंद किये मोहपाश के कारागृह में कैदी से पड़े रहते हैं। हम स्वयं को नकारते रहते हैं, जिससे विकास की सम्भावित अनन्त सम्भावनाएँ कुँद पड़ी रहती हैं और हम अपने दुर्भाग्य पर आँसू बहाते रहते हैं।
इसका सर्वमान्य समाधान है स्वयं का सम्मान। अपने ऊपर गहन आस्था एवं दृढ़ विश्वास करने पर ही सफलता का सम्पूर्ण वैभव हस्तगत हो सकता है। ईश्वर के नाम पर आस्था हो या न हो स्व पर प्रगाढ़ विश्वास होना ही चाहिए। वस्तुतः ईश्वर पर अनास्था नास्तिकता नहीं है बल्कि स्व पर अश्रद्धा एवं असम्मान ही सबसे बड़ी नास्तिकता है। स्व का सम्मान आस्तिकता का प्रबल परिचायक है। स्व को उपेक्षित-तिरस्कृत करने वाला समस्त मनोरोगों एवं विकृतियों का दंश झेलता है। ईर्ष्या-द्वेष का दुर्भाव इसी कारण पनपता और विकसित होता है तथा अमृतोपम जीवन को विषमय बना देता है। फिर दूसरों की सफलता से प्रसन्नता नहीं ईर्ष्या होती है और औरों के कष्ट पर हृदय नहीं तरलता-पिघलता है। यह सघन आत्महीनता एवं आत्मप्रवंचना का लक्षण है। इसका एकमात्र निदान है आत्मसम्मान और स्वयं पर विश्वास करने की कला का विकास।
आत्मविश्वासी किसी का मोहताज नहीं होता; बल्कि यह तो एक ऐसा पारस की तरह होता है जिसके स्पर्श मात्र से लोहा स्वर्ण के समान चमक उठता है। जैसे किरणों के रथ पर सवार सूर्य का उदय होते ही अंधकार विनष्ट एवं विलीन हो जाता है ठीक वैसे ही आत्मसम्मान व आत्मविश्वास का भाव जागृत होते ही आन्तरिक दुर्बलता व शक्तिहीनता तिरोहित होने लगती है। और सब कुछ कर गुजरने का नया साहस हिलोरें लेने लगता है। असफलता की महानिशा में सफलता का सतेज पराक्रम जन्मने लगता है। भाग्य और भविष्य को बदल डालने वाले महापुरुषार्थ का आविर्भाव होने लगता है। आत्मविश्वास की महाप्रखरता के सामने असफलता का कोई स्थान नहीं होता। क्योंकि यह विश्वास संघर्षों की भट्टियों में पकता है, कंटकाकीर्ण पथ में निखरता है और केवल अपने लक्ष्य के प्रति ही एकनिष्ठ व समर्पित होता है। इसलिए आत्मसूर्य के महाप्रतीक आत्मद्रष्ट स्वामी विवेकानन्द उद्घोष करते हैं कि अपने ऊपर विश्वास करा, प्रत्येक चीज तुम्हारे कदमों तक स्वयं चल कर आयेगी।
स्व का चिंतन विधेयात्मक चिंतन होता है। स्वयं के द्वारा जिसका चिंतन होगा उसका समग्र एवं सम्पूर्ण विकास अवश्यंभावी है। स्व का चिंतन ही परिष्कृत दृष्टिकोण है। वही वास्तविक सौंदर्य है। सुन्दरता का मापदण्ड शारीरिक नहीं होता। उच्चस्तरीय विचार एवं संवेदनशील हृदय में सच्चा सौंदर्य झलकता है। विश्वास व श्रद्धा के सुमन में ही दिव्य सौंदर्य का सौरभ सुरभित होता है। देखने के दृष्टिकोण पर ही व्यवहार का मर्म आधारित है। जिसे जिस रूप में देखा जाता है उसके साथ उसी दृष्टि से व्यवहार भी किया जाता है। अतः प्रेमपूर्ण व सजल व्यवहार करने के लिए सही नजरिये का होना भी आवश्यक है। जिसका एक मात्र आधार है आत्मसम्मान का भाव।
आत्मा ही आरोग्यता का परमधाम है। आत्मा के महासागर में निरोगिता की लहरें उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं। शरीर तो आत्मा का वाहन मात्र है, जिसके द्वारा वह इस मर्त्यभूमि की यात्रा करती है। सुखद यात्रा के लिए इस वाहन रूपी देह को सम्भाल-सहेज कर रखना पड़ता है। शरीर आत्मा का दिव्य मन्दिर है और आत्म संयम तथा नियमितता द्वारा इसके आरोग्य की रक्षा करनी चाहिए। स्वस्थ एवं निरोगी काया में ही आत्मा की अभिव्यक्त हो सकती है। रुग्ण एवं जर्जर काया में आत्मा का सौंदर्य नहीं निखर सकता। स्वच्छ मन का निवास स्वस्थ शरीर में ही सम्भव है। अतः शरीर को व्यसनों से मुक्त रखना चाहिए एवं सात्त्विकता का भाव अपनाना चाहिए।
देह में रहते हुए भी देहभाव से परे दिव्य व दैवीय भाव अपनाने का सतत अभ्यास करना चाहिए। जीवन की लगभग सभी समस्याएँ देहबोध के कारण उपजती एवं पनपती हैं। हम स्वयं को देह मानकर उसी को सजाने-सँवारने में बहुमूल्य व बेशकीमती जीवन को होम देते हैं और देह के सुख में सुखी एवं दुःख में दुःखी होते हैं। जबकि आत्मा तो सुख-दुःख से परे आनन्दमय सत्ता है। उसमें तो केवल आनन्द ही आनन्द भरा पड़ा है। वह प्रेम से लबालब है, करुणा से सराबोर है। बस देहाभिमान की छिछली परत को उतारने तथा इसके चिर अभ्यास के आवरण को हटाने भर की देरी है। इस अभिमान के हटते-मिटते ही इसी देह में दैवीय अनुभूतियों का अनुभव किया जा सकता है। इससे जीवन आनन्दमय हो जाता है। काया निरोग व स्वस्थ बन जाती है। शरीर द्वारा किया हर कर्म श्रेष्ठता की ओर प्रेरित करता है। दूसरों के प्रति सद्भाव, सहयोग एवं सेवा ही स्वधर्म बन जाता है। दैवीय गुणों से व्यक्तित्व निखर उठता है।
आत्मसम्मान का भाव जाग्रत होते ही जीवन की मुरझायी एवं कुम्हलायी कलियाँ खिल उठती हैं। हम स्वयं को स्वीकारने लगते हैं। जैसे हैं उसी रूप में सहज मस्ती का भाव उमगने लगता है। कष्टों से पलायन की वृति मिटने लगती है और कष्ट झेलने में भी आनन्द आने लगता है। अपनी कमियों एवं खामियों को स्वीकारने लगते हैं। जिससे सद्गुणों को अंकुरित विकसित होने के लिए आधार भूमि तैयार हो जाती है। अचेतन ग्रंथियों में अवरुद्ध जीवन ऊर्जा मुक्त होने लगती है और अन्तर्निहित क्षमताओं के जागरण का क्रम शुरू हो जाता है। इससे प्रतिभा, साहस, आत्मबल जैसी विभूतियाँ प्रस्फुटित होने लगती हैं, जिसको शास्त्रकारों ने ऋद्धियों-सिद्धियों से अलंकृत-विभूषित किया है। स्वयं को सम्मान एवं प्यार देकर ही इन उपलब्धियों का अधिकारी हुआ जा सकता है। इसके लिए दर्पण साधना उपर्युक्त साधन है। दर्पण साधना अर्थात् शीशे के माध्यम से अपने अस्तित्व की गहराई में डूबना व उतरना। इससे हमारे स्व का स्वरूप बोध होने लगता है।
आत्मा समस्त सद्गुणों का दिव्य स्रोत है। आत्मा को सम्मान करने का भाव-बोध पनपते ही ये गुण जीवन में झरने लगते हैं। जीवन सद्गुणों का समुच्चय बन जाता है, भण्डार बन जाता है। पुष्पों में मण्डराने वाले भौरों की भाँति जीवन में आत्मिक विभूतियाँ तथा भौतिक उपलब्धियाँ सघनतर-सघनतम होने लगती हैं। अतः आत्म सम्मान करने के लिए अपने अन्दर अवस्थित सद्गुणों पर आस्था रखनी चाहिए। सद्गुणों का चिंतन करना चाहिए तथा व्यवहार में उतारना चाहिए। ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, नहीं सोचना चाहिए जो सद्गुणों से परे हो, प्रभु की मर्जी के विरुद्ध हो। यही सच्ची आत्मसम्मान की भावना है जिसे अपनाकर, उताकर जीवन को प्रभुमय बनाया जा सकता है, जीवन में भगवद् चेतना को अवतरित किया जा सकता है।
दार्शनिक गुरजिएफ ने अपनी आत्मकथा में माता द्वारा दी गई एक बहुमूल्य संपदा का उल्लेख किया है, जिसके कारण वे अनेक भटकावों से बचे और आनंद भरे अनेकों अवसर पा सके।
लिखा है कि मेरी माता ने मरते समय कहा, “किसी पर क्रोध आए तो उसकी अभिव्यक्ति चौबीस घंटे से पूर्व ने करना।” मैंने वह बात गाँठ बाँध ली और आजीवन उसको निवाहा भी।
ऐसे अनेकों प्रसंग आए, जिनमें मुझे बहुत क्रोध आया था, पर बाद में पता चला था कि तथ्य कम और भ्रम अधिक था। क्रोध के परिणामों पर विचार करने का अवसर मिलते रहने से उसे कार्यान्वित करने की नौबत न आई और जो शत्रु लगते थे, वे आजीवन मित्र बने रहे। माता की यह सीख ही मुझे इस स्थिति तक पहुँचा पाई, यह कहना अतिशयोक्ति न होगी।
शिष्टाचार सुसंस्कारित व्यक्तित्व का मोहक परिचय है। यह उसके आन्तरिक परिष्कार का दिव्य पावन प्रकटीकरण है। पवित्र अन्तर्चेतना बाह्य व्यवहार में शिष्टाचार एवं विनम्रता के रूप में झलकती है। शिष्टाचार का मूल मंत्र है- अपनी नम्रता और दूसरों का सम्मान। इस भाव का धनी ही सभ्य एवं सुसंस्कृत समझा एवं जाना जाता है। इस गुण को अपनाकर जीवन में उत्तरोत्तर विकास किया जा सकता है। दूसरों का स्नेह, सद्भाव एवं सहयोग भी इसी आधार पर हस्तगत होता है। शिष्टता बरतने वाला सम्मानित होता है, अनायास ही अपने विश्वास एवं विनम्र व्यक्तित्व की औरों पर छाप छोड़ता है।
ऋग्वेद की ऋचा में शिष्टाचार का दिव्य सूत्र मिलता है। ‘माँ ज्यायसः शंसमा वृक्षि देवाः।’ अर्थात् हे देवगण! मैं बड़ों की प्रशंसा को कभी न काटूँ, सदैव आदर करूं। इस ऋचा में बड़ों के प्रति श्रद्धा और सम्मान की भावना झलकती है। इस संदर्भ में अथर्ववेद में वर्णित वैदिक ऋषि का कथन बड़ा ही सारगर्भित जान पड़ता है।
“अनुव्रतः पितुः पुत्रो, मात्रा भवन्तु संमनाः। जाया पत्ये मधुमती, वाचं वदतु शान्तिवान्॥”
अर्थात्- पुत्र पिता के श्रेष्ठ व सद्कर्मों और संकल्पों का अनुसरण करे और माँ जैसे पवित्र व कोमल मन वाला बने। पति-पत्नी के लिए, पत्नी-पति के लिए माधुर्ययुक्त तथा शाँतिप्रद वाणी का व्यवहार करे। प्रातःकाल उठने के पश्चात् छोटे बड़ों के चरण स्पर्श करें। बड़े छोटों के प्रणाम के स्नेहासिल स्वर में शुभाशीष या मौन आशीष दें। बराबर वालों को आपस में एक-दूसरे का प्रेमपूर्ण अभिवादन हो। यह सम्मान का भाव ही शिष्टाचार का मूल आधार है।
बौधायन धर्मसूत्र (1/1/5)में शिष्टचार का मानदण्ड एवं मापदण्ड का उल्लेख किया गया है-
शिष्टः खल विगतमत्सरा निरहंकाराः कुम्भीधान्या अलोलुपा दम्भदर्पलोभमोहक्रोध विवर्जिताः।
अर्थात् ईर्ष्या-द्वेष से रहित, अहंकारविहीन, छः माह के उपयोगी सम्पदा के संग्रही, लोलुपता रहित, पाखण्ड, अहंकार, लोभ-मोह और क्रोध से जो विमुख हैं उन्हें पूर्ण शिष्ट कहते हैं।
भास अपने प्रतिमा नाटक में स्पष्ट करते हैं कि शिष्ट और विनयी जनों को क्रोध नहीं सताता। महाकवि कालीदास विनम्रता को महान् अलंकार से अलंकृत करते हैं। शालीन एवं शिष्ट व्यवहार के माध्यम से आन्तरिक गुणों का प्रकटीकरण होता है। पाश्चात्य जगत् के महान् कवि एडीसन ने विनम्रता को शरीर की अन्तरात्मा के रूप में अलंकृत करते हैं। भाव के प्रतीक भगवान् को विनम्र एवं भक्ति भावना से गीतों की अञ्जली अर्पित करने वाले रवींद्रनाथ टैगोर विनम्रता को आध्यात्मिक शक्ति मानते हैं। उनके अनुसार यथार्थ नम्रता एवं शिष्टता सात्विकता के तेज से उज्ज्वल होती है, त्याग और संयम की कठोर शक्ति से दृढ़-प्रतिष्ठित होती है। ‘समस्त’ के साथ अबाध-निर्बाध मिलन होता है और इसलिए वह सत्य भाव से, नित्य रूप से ‘समस्त’ को प्राप्त करती है। वह किसी को दूर नहीं करती और किसी से दूर नहीं होती। वह विच्छिन्न नहीं करती वह आत्म त्याग करती और दूसरों को उदार भाव से आत्मसात् कर लेती है।
विनम्रता एवं शिष्टाचार अन्तःकरण की अभिव्यक्ति है। समाज, देश और परिस्थिति के भेद से इसकी अभिव्यक्ति के तरीकों में भेद हो सकते हैं, परन्तु उनका सर्वमान्य आधार यह है कि दूसरों के प्रति सम्मान, स्वयं की नम्रता तथा माधुर्य का भाव व्यवहार में छलके-झलके। इससे जहाँ एक और आन्तरिक सुगढ़ता प्रकट होती है वहीं दूसरी ओर नैतिकता एवं सामाजिकता की जागरुकता का बोध होता है। शिष्टाचार, संस्कृति एवं सभ्यता की समन्वय स्थली है, क्योंकि यह संस्कृति संवेदना भी है और व्यवहार की सभ्यता भी। भाव प्रवण व्यक्ति कभी भी अशिष्ट और असभ्य नहीं हो सकता है। जिसका हृदय संवेदना की पुलकन से पुलकित है, वह कठोर शब्दों का प्रयोग ही नहीं कर सकता। बल्कि उसके व्यवहार में औरों को शीतल एवं शान्त करने वाली भाव संवेदना की सुरसरि प्रवाहित होती रहती है। निजी रहन-सहन, रुचि-रुझान, आचरण-व्यवहार में भी यह बहुमूल्य भाव भीतर से उभर-उभर कर बाहर आता है और यहाँ ‘औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय’ की चिर परिचित उक्ति सार्थक एवं सफल होती है।
व्यवहार की शिष्टता-शालीनता पर जीवन के विकासक्रम का, उन्नति-अवनति का, प्रसन्नता-खिन्नता, मान-अपमान का बहुत कुछ आधार निर्भर करता है। उद्दण्ड, उच्छृंखल, अशिष्ट एवं अनगढ़ व्यवहार से वैयक्तिक और सामाजिक दोनों का विकास अवरुद्ध हो जाते हैं। कटुभाषी, असंतोष, निराशाजनक एवं खिन्नता उत्पन्न करने वाले व्यवहार की प्रतिक्रिया भी कुछ इसी प्रकार की होती है। ऐसे आचरण करने वालों को बदले में उपेक्षा, असहयोग एवं अपमान जैसी कटुता ही हाथ लगती है। हर परिस्थिति में यह घाटे का सौदा है। जो क्रोध, आवेश और उद्धृत आचरण सबसे पहले स्वयं को क्षति पहुँचाता है और साथ ही दूसरों के स्वाभिमान को कुचलकर विद्रोह एवं बैर-भाव का एक नया संकट खड़ा कर देता है। अशान्ति एवं असंतोष का बीज पड़ जाता है जिसका परिणाम विष बेल के रूप में होता है और पग-पग पर अनर्थ खड़ा करता है। अतः अशिष्टता हर दृष्टि से हानिकारक है। यह अपना स्तर गिराती है, मित्रों को शत्रु बनाती है। जो सहयोगी हैं उन्हें असहयोग करने के लिए प्रेरित करती है।
इसके विपरीत जो शिष्ट, सभ्य एवं उदार व्यवहार में दक्ष एवं प्रवीण होते हैं, वे सहज ही औरों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं और उनसे स्नेह-सहयोग प्राप्त कर लेते हैं। परिणामस्वरूप उनकी प्रगति-उन्नति के सुविधा-साधन अनायास ही उपलब्ध हो जाते हैं। इस प्रकार चाहे व्यक्तिगत जीवन हो, या समाज व्यवस्था प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति, स्थिरता, एवं सुख शान्ति परस्पर स्नेह, सद्भाव के आधार पर अवलम्बित है। अतः इस तथ्य के मर्मज्ञ, मनीषी एवं विद्वानों की मान्यता है कि व्यवहार सदैव विनम्र एवं शालीन होना चाहिए। चारों ओर मधुरता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करना चाहिए तथा दूसरों के साथ वह व्यवहार नहीं करना चाहिए, जो हमें अपने लिए पसन्द नहीं। हर व्यक्ति दूसरों के साथ नम्र व्यवहार करे, जैसा कि वह अपने लिए औरों से चाहता है। इसी तथ्य को शिष्टाचार, सभ्यता एवं नागरिकता के नाम से जाना जाता है। यह मानव का सर्वश्रेष्ठ जीवन मूल्य एवं अनमोल सम्पदा है। जिसमें यह भावना जितनी अधिक होगी वह उतना ही शिष्ट-शालीन एवं सभ्य माना जाता है।
जीवन विद्या का धनी व्यक्ति विनम्र होता है। विद्या को जहाँ विनम्रता की जननी माना गया है, वहीं विद्या प्राप्ति के लिए, व्यक्तित्व निर्माण के लिए विनम्रता का होना अति आवश्यक है। विनम्रता एवं शालीनता के मोल पर ही जीवन विद्या एवं भौतिक शिक्षा का अर्जन-उपार्जन सम्भव है। इसे अपनाकर जीवन को सार्थक एवं सुन्दर बनाया जा सकता है। शिष्ट व विनम्र व्यवहार के लिए कुछ सामान्य नियमों का पालन आवश्यक है,
1. भाषा एवं व्यवहार में शिष्टाचार को अपनाएँ।
2. छोटों को स्नेह दें एवं बड़ों का आदर करें।
3. प्रेम और आदर के साथ दूसरों का सम्मान करें।
4. सकारात्मक विचार को प्रश्रय दें।
5. जीवन शैली में सादगी एवं सज्जनता को अपनाएँ तथा चारों ओर स्वच्छता का पालन करें।
6. बड़ों के अच्छे अनुभव का लाभ उठाएँ।
7. स्वाध्याय एवं सद्चिंतन का क्रम अपनाएँ।
8. साथी-सहयोगियों का मनोबल बढ़ाएँ, सहयोग करें तथा समुचित प्रेमपूर्ण व्यवहार करें।
9. दूसरों की बातों का सम्मान करें।
इन नियमों के अभ्यास से जीवन में वाँछित परिवर्तन सम्भव है। व्यक्तित्व के निर्माण में इनका पालन अत्यावश्यक है। इसी के आधार पर ही शिष्टता, शालीनता एवं विनम्रता जैसे गुणों का अभिवर्धन किया जा सकता है और उसके दिव्य लाभ से लाभान्वित हुआ जा सकता है। भाव संवेदना ही शिष्टाचार का प्राण है और इसे हम सबको अपनाना एवं आत्मसात् करना चाहिए।
सिंधुराज के राज्य में बकमुआर नामक एक भयंकर दस्यु हुआ। उसने युवावस्था के 2 वर्षों में हजारों का कत्ल किया और प्रचुर संपदा लूटी। पकड़े जाने पर उसे मृत्युदंड मिला।
उस समय उसके संबंधी मिलने आए तो उसने अपनी माता से मिलने से इंकार कर दिया। कारण पूछने पर कहा, “बचपन में मैं स्वर्णमुद्रा चुराकर लाया था और वह माता को दी तो उसने मेरी चतुरता को सराहा ही नहीं, प्यार भरा पुरस्कार भी दिया। उस दिन के बाद से बदला जीवन आज इस परिणति रूप में है। उसी माँ के प्रोत्साहन का प्रतिफल है कि मैं इतना नीच बना और मृत्युदंड का भागी हुआ।”
प्राणायाम एक प्रकार से प्राण के आयाम में जाकर किया गया व्यायाम है। इससे समस्त अंग-अवयवों को शक्ति मिलती है। वे स्वस्थ-सबल बनते हैं। इसलिए योगशास्त्रों में स्वास्थ्य-संवर्द्धन के लिए प्राणायाम को एक अति उत्तम उपाय गया है। इसमें स्थूल से लेकर सूक्ष्मशरीर तक को प्रभावित करने की सामर्थ्य है, अतएव इसे आध्यात्मिक उपकारों में सर्वोपरि माना गया है।
प्राणायाम के अनेकों प्रकार हैं। सभी की अपनी-अपनी क्षमता और विशिष्टता है। सभी की अपनी-अपनी क्षमता और विशिष्टता है। सभी में रोग निवारण के अद्वितीय गुण हैं। यदि व्यक्ति अपनी दिनचर्या में इसे सम्मिलित कर ले तो वह आजीवन स्वस्थ बना रह सकता है। आदमी यदि नीरोग नहीं रहेगा तो वह अपनी दैनिक क्रियाकलाप संपन्न कैसे कर सकेगा? ऐसी स्थिति में तो आत्मिक प्रगति उसके लिए दिवास्वप्न बन जाएगी, जबकि प्राणायाम का एक उद्देश्य आत्मोन्नति भी है। वह शरीर-स्वस्थता प्रदान करने के साथ-साथ व्यक्ति को आत्मोत्कर्ष की ओर भी ले चलता है। इसलिए प्राणायाम जीवन का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए।
प्राणायाम के तीन अंग हैं-श्वास लेना, रोकना और छोड़ना। इन तीनों क्रियाओं का योग ही पूर्ण प्राणायाम है। सभी प्राणायाम न्यूनाधिक अंतर के साथ इन्हीं का संयोग हैं।
प्राणायाम के अभ्यास से सर्वप्रथम फेफड़ों को लाभ पहुँचता है। वे लचीले और मजबूत बनते हैं। शरीर में गरमी उत्पन्न होती है, जो स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव डालती है। बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन की प्राप्ति होती है। जितना अधिक ऑक्सीजन शरीर में बाहर निकलेगा।
शारीरिक व्यायाम से शरीर में रासायनिक परिवर्तन होता हैं और तत्वों का विभाजन होता है, फलस्वरूप शक्ति का ह्रास होता है। इस ह्रास की पूर्ति प्राणायाम द्वारा काया में अधिक ऑक्सीजन पहुँचाकर की जाती है। मस्तिष्क एवं नाड़ी संस्थान को भी यह प्रभावित करता है। मस्तिष्क के कार्यों को सुव्यवस्थित करने में इसका महत्वपूर्ण हाथ है। यह संपूर्ण मस्तिष्क के प्रसुप्त केंद्रों को जाग्रत करता और उन्हें शक्ति प्रदान करता है। इसके नियमित अभ्यास से पिट्यूटरी एवं पीनियल ग्रंथियों का भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर विकास होता है।
इससे कान, आँखों, नाक जिव्हा एवं गले की व्याधियाँ भी दूर होती हैं। टान्सिल, बहरापन, अस्पष्ट आवाज, मुँहासे आदि शिकायतें भी प्राणायाम से समाप्त हो जाती हैं। आसन की तरह प्राणायाम में भी रोगों को रोकने एवं उनका उपचार करने के दोनों तरह के गुण मौजूद हैं। यह शरीर में जीवनीशक्ति उत्पन्न करता है, जिससे बीमारियाँ नहीं होती। यदि कोई बीमारी हो जाती है तो विभिन्न प्राणायामों द्वारा उसका उपचार किया जा सकना संभव है।
यह यकृत एवं गुरदे के क्रियाकलापों को भी सुव्यवस्थित करता है, परिणामस्वरूप रक्त परिवहन सुचारु रूप से होने लगता है और ऑक्सीडेशन की क्रिया तेज हो जीती है। इसके अतिरिक्त यह भूख बढ़ाता और आँतों को व्यवस्थित करने का कार्य भी करता है। नाड़ी संस्थान भी इससे अप्रभावित नहीं रहता। यह स्नायु संस्थान को सुव्यवस्थित और मजबूत बनाता है।
यह प्राणायाम के कुछ सामान्य प्रभाव हुए। इसके विशेष प्रभावों के लिए विशेष प्रकार के प्राणायाम करने पड़ते है। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण प्राणायाम दिए जा रहे हैं, जिन्हें अपनाकर कोई भी व्यक्ति लाभान्वित हो सकता है और स्वस्थता अर्जित कर सकता है
सर्वप्रथम प्राणायाम कैसे किया जाए, यह बताना आवश्यक है। यहाँ उसी का उल्लेख किया जा रहा है। पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन में बैठ जाइए। कुछ क्षण तक शाँति से बैठकर अपने को प्राणायाम के लिए तैयार कीजिए। अब दायें हाथ के अंगूठे से दायीं नासिका छिद्र को बंद कीजिए और बायीं से धीरे-धीरे श्वास खींचिए। श्वास प्रवाहपूर्ण हो, उसमें किसी प्रकार के झटके न हों साँस तब तक लीजिए, जब तक फेफड़े वायु से पूर्णरूपेण भर न जाएँ। अब बायीं नासिका के छिद्र को मध्यमा और अनामिका से बंद कीजिए और दाहिनी नासिका छिद्र को खोलकर श्वास छोड़िए। जैसे ही संपूर्ण वायु बाहर निकल जाए, तब उसी से अर्थात् दाहिनी नासिका छिद्र से पूरक कीजिए। बाद में उसे बंद कर बायें श्वास छोड़िए। यह एक आवृत्ति हुई। इसी को 15-20 बार दुहराएं। यह साधारण प्राणायाम हुआ। इससे फेफड़े मजबूत होते हैं और नासिका संबंधी रोग दूर।
इस साधारण प्राणायाम हुआ। इससे फेफड़े मजबूत होते हैं और नासिका संबंधी रोग दूर।
साधारण प्राणायाम का भी भली-भाँति अभ्यास हो जाने के पश्चात विशेष प्राणायामों की बारी आती है। इसमें प्रथम हैं-
(1) समवेत प्राणायाम।
साधारण प्राणायाम के पश्चात इसका अभ्यास करना चाहिए। इसकी संपूर्ण विधि साधारण प्राणायाम की तरह है, केवल पूरक इसमें दोनों नासाछिद्रों से धीरे-धीरे बिना किसी झटके या व्यवधान के प्रवाहपूर्ण तरीके से किया जाता है। अधिक-से-अधिक वायु फेफड़ों में भर जाने के उपराँत 1-3 सेकेंड तक साँस रोकनी होती है, तदुपराँत दोनों नासा छिद्रों से धीर-धीरे बिना झटके से साँस छोड़ते है। पुनः पहले की तरह प्रवाहपूर्ण पूरक और उसके बाद लयपूर्ण रेचक दोनों नासा छिद्रों से बारी-बारी से किया जाता है। इसे 10 से 15 बार दुहराया जाता है।
इस प्राणायाम में थोड़ा परिवर्तन कर दिया जाए और इसमें से अंतः कुँभक को हटा दिया जाए तो जो स्थिति बनेगी उसमें साँस को बिना रोके लगातार लेना और छोड़ना पड़ता है, किंतु साँस लंबी, गहरी, धीरे-धीरे और प्रवाहपूर्ण होनी चाहिए। यह एक अद्भुत प्राणायाम है और उतना ही विलक्षण इसका परिणाम है। अनिद्रा के क्रोनिक रोगियों के लिए यह एक रामबाण औषधि के समान है। इससे पुराने-से-पुराने अनिद्रा रोग दूर हो जाता है और व्यक्ति को गहरी नींद आने लगती है। 2 मिनट से आरंभ करके धीर-धीरे इसे 20 मिनट तक बढ़ाया जा सकता है।
लगभग 15 दिन में इसका परिणाम आना शुरू हो जाता है। जिन्हें नींद आने की साधारण शिकायत है, वे भी इससे लाभ उठा सकते हैं।
(2) भ्रामरी प्राणायाम
इसका अभ्यास रात्रि के एकाँत में तनिक विलंब से या प्रातः के प्रथम प्रहर में किया जाना चाहिए। मन को शाँत कर आसन पर बैठिए। दोनों अँगुलियों से कानों को बंद कर लीजिए। तत्पश्चात धीर-धीरे पूरक कीजिए। फेफड़े साँस से भर जाने के उपराँत एक क्षण के लिए श्वास को रोकिए। इसके बाद भ्रमर गुँजन के समान आवाज निकालते हुए श्वास धीरे-धीरे छोड़िए। यह गुँजन तब तक होता रहे, जब तक श्वास पूरी तरह निकल न जाए। इस स्थिति में मुँह बंद रहना चाहिए और इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि मुँह से साँस न निकले।
जिव्हा भी अविचल हो। ध्यान गुँजन की आवाज पर केंद्रित होना चाहिए। यह आवाज अविरल गति से हो एवं उसमें एकरूपता और अखंडता हो।
यह बहुत सरल प्राणायाम है। प्रथम दिन से ही अच्छी तरह इसका अभ्यास किया जा सकता है। इस प्राणायाम से गले की सब बीमारी धीरे-धीरे दूर हो जाती है। कंठनली मजबूत बनती तथा आवाज सुरीली हो जाती है।
(3) उज्जयी प्राणायाम
आसन में बैठिए और आँखों बंद कर लीजिए। अब दोनों नथुनों से श्वास लेते समय खर्राटे लेने की-सी आवाज गले में उत्पन्न कीजिए, इस बीच मुँह बंद रहे और श्वसन क्रिया केवल नाक से हो। श्वास पूरी तरह ले चुकने के बाद कुछ क्षण तक उसे भीतर रोकिए। ध्वनि प्रवाहपूर्ण और एक जैसी हो, इसका ध्यान रहें इसकी 10 से 12 आवृत्तियां प्रतिदिन की जा सकती हैं।
यह प्राणायाम वैसे लोगों के लिए विशेष लाभप्रद है, जिनके टान्सिल बढ़ जाते हैं, जुकाम जल्दी हो जाता है, जिन्हें इन्फ्लुएंजा एवं ब्रौंकाइटिस की शिकायत हो जाती है। संगीतप्रेमियों के लिए भी यह लाभप्रद है। यदि वे इसका नियमित अभ्यास करें तो उनका गला स्वस्थ एवं सुमधुर हो जाता है। यह उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए भी लाभदायक है। इससे रक्तचाप सामान्य बना रहता है। इसका प्रभाव कान नाक एवं गले की बीमारी पर भी पड़ता है। पेट के रोगों के लिए भी यह उपयोगी है।
(4) शीतली प्राणायाम
इसके अभ्यास के लिए आसन पर बैठिए। इसके बाद दोनों होठों को कौवे की चोंच की तरह बनाकर जिव्हा को उसमें से थोड़ा बाहर निकाल लीजिए। दोनों नथुनों को बंद कर लीजिए। अब धीरे-धीरे मुँह से श्वास खींचिए। यथाशक्ति कुंभक करके दोनों नथुनों से वायु धीरे-धीरे बाहर निकालिए। रेचक करते समय जीभ को अंदर कर लीजिए। प्रतिदिन इसकी 8-10 आवृत्ति करनी चाहिए।
शीतल प्राणायाम में पूर्णता प्राप्ति के पश्चात व्यक्ति भूख-प्यास पर विजय प्राप्त कर सकता है। इससे जुकाम, अपच जैसी शिकायतें दूर हो जाती हैं। इससे शीतलता बढ़ती है।
(5) भस्त्रिका प्राणायाम
आसन पर बैठिए एवं बायीं नासिका से वेगपूर्वक जल्दी-जल्दी दस बार लगातार पूरक-रेचक कीजिए। कुँभक की आवश्यकता नहीं। फिर ग्यारहवीं बार उसी नासिका से लंबा पूरक कीजिए, यथाशक्ति कुँभक करने के उपराँत दाहिने नथुने से धीरे-धीरे श्वास बाहर निकालिए। इसी क्रिया को अब दाहिने नथुने से दुहराइए। यह भस्त्रिका प्राणायाम हुआ। आरंभ में इसे पाँच बार से अधिक नहीं करना चाहिए।
साधारण स्वास्थ्य के व्यक्ति को इसका नियमित अभ्यास करना चाहिए। जिनके फेफड़े कमजोर हों या जो बीमार है, वैसे लोगों को इसे नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम से दमा तथा श्वसन संबंधी दोष दूर होता है, रक्त शुद्ध होता है एवं संपूर्ण शरीर में अधिक मात्रा में रक्त संचालन होता है।
इससे आत्मोत्थान में भी सहायता मिलती है। ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि, रुद्रग्रंथि तीनों का यह भेदन करता है। इसके द्वारा सुषुम्ना में से विहंगम गति ऊर्ध्व प्रदेश की ओर बढ़ती है। इसी से अग्नितत्व प्रदीप्त होता है।
(6) प्लाविनी प्राणायाम
आसन पर बैठिए एवं दोनों भुजाओं को ऊपर की ओर लंबी तथा सीधी रखिए। अब दोनों नथुनों से पूरक कीजिए और सीधा लेट जाइए। लेटते समय दोनों हाथों को समेटकर तकिये की तरह सिर के नीचे लगा लीजिए, कुँभक कीजिए और जब तक कुँभक रहे, तब तक भावना कीजिए- मेरी देह रुई के समान हलकी है। फिर बैठकर पूर्व स्थिति में आ जाइए और धीरे-धीरे नथुनों से वायु बाहर निकाल दीजिए। यह प्लाविनी प्राणायाम है, इससे पाचन क्रिया बढ़ती है। इसके अतिरिक्त ‘हिस्टीरिया’ रोग दूर करने में यह सहायता देता है। इससे आध्यात्मिक लाभ भी मिलता है और ऋषि सिद्धियों का मार्ग प्रशस्त होता है।
(7) केवली प्राणायाम
आसन पर बैठिए। दोनों नथुनों से साँस धीरे-धीरे खींचिए। श्वास खींचते समय मानसिक रूप से ‘सो’ का उच्चारण कीजिए और छोड़ते समय ‘हम’ का। कुँभक की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार मानसिक रूप से ‘सोऽहम्’ शब्द उच्चरित करिए। यह केवली प्राणायाम हुआ। इस प्राणायाम से मन को एकाग्रता की प्राप्ति होती है।
उपर्युक्त प्राणायामों में से कोई यदि अपनी आवश्यकतानुसार प्राणायाम का अभ्यास नियमित रूप से करता रहे तो वह अपना स्वास्थ्य-संरक्षण करने में सफल रहता है। हर एक को इनसे लाभ उठाना चाहिए।
ईसा के परिवार वाले उनसे मिलने गए। वे सत्संग-परामर्श में तल्लीन थे। लोगों ने कहा, घरवालों की ओर ध्यान देंगे क्या? ईसा ने कहा, संसार में मेरा अपना-पराया कोई कुटुँब नहीं है। समस्त संसार को ही मैं अपना परिवार मानता हूँ और अपना हर काम उस विश्व कुटुँब को ध्यान में रखकर करता हूँ। यही आदर्श तुम सब भी अपनाओ।
आँधी का तेज झोंका आया और वृक्ष को जड़ से उखाड़कर नीचे गिरा गया। वृक्ष को धरती पर बड़ा गुस्सा आया। बड़बड़ाते हुए बोला, “आज जो मेरी दुर्गति हुई, उसके लिए तुम ही उत्तरदायी हो। तुमने मेरी खुराक बंद कर दी। एक-दो दिन की बात होती तो मैं सहन भी कर लेता। मैं भूख और प्यास से तड़प-तड़पकर कलेजा ठंडा हो गया।”
वृक्ष की यह जली-कटी बातें सुनकर धरती बड़ी-दुःखी हुई, वह साँत्वना देते हुए बोली, “भला माँ अपने बच्चों की दुर्गति देखकर कभी खुश हो सकती है। मैं तो तुम सभी के लिए अपने अंदर जल तथा अन्य पौष्टिक तत्वों को समेट-समेटकर रखती हूँ। जिस प्रकार तुम जैसे वृक्ष फलों का उपयोग अपने लिए न कर दूसरों को बाँटते रहते हो, वैसे ही एकत्रित खुराक को मैं भी तुम सबके लिए ही रखती हूँ और आवश्यकतानुसार देती रहती हूँ, पर तुम्हारी जड़े, ही खोखली हो गई थी, इसके लिए मैं क्या करती?”
सीढ़ियाँ चढ़नी हों तो एक के बाद एक कदम बढ़ाना पड़ता है और एक-एक सीढ़ी पार करते हुए आगे बढ़ना पड़ता है। कोई यदि छलाँग लगाकर शीर्ष पहुँचना चाहे तो दुर्घटना घटे बिना नहीं रह सकती। यह बात आत्मोत्थान के संदर्भ में भी है। मनुष्य जिस परिवार में, समाज में, राष्ट्र और युग में जीता है, वे उसके लिए आगे बढ़ने, ऊँचा उठने के एक-एक सोपान के समान हैं। इनसे होकर ही आगे बढ़ना पड़ता है। प्रगतिक्रम में इनकी उपेक्षा करते हुए कोई यह सोचे कि वह कोई बजरंगी छलाँग मारकर चरम लक्ष्य तक पहुँच जाएगा तो इसे उसकी प्रवंचना और अध्यात्म विज्ञान की अवमानना ही समझना चाहिए।
बालक जब छोटा होता है तो पहले अक्षर-ज्ञान कराना पड़ता है, तभी वह उस स्थिति में पहुँच पाता है कि पुस्तकें पढ़ सके। फिर जैसे-जैसे उसकी योग्यता बढ़ती जाती है, वैसे ही वैसे एक-एक कक्षा ऊपर उठते हुए वह स्कूल में कॉलेज में पहुँचता और स्नातक एवं स्नातकोत्तर की डिग्रियाँ प्राप्त करता है। यह प्रगति का स्वाभाविक क्रम है। भौतिक सफलता से लेकर आत्मोन्नति तक में इसी सिद्धाँत का अनुसरण करना पड़ता है, तभी वह पद प्राप्त होता है, जिस पर गर्व-गौरव अनुभव किया जा सके। हाथ पर सरसों जमाने जैसी जल्दबाजी तो बाजीगरी में ही देखी जाती है, इसलिए तुर्त-फुर्त का प्रतिफल वहाँ तत्क्षण में समाप्त हो जाता है। अध्यात्म न तो बाजीगरी है और न ऐसा कुछ कहने लायक उपलब्धि की आशा की जा सके। इसमें तो परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के हित से जुड़े निर्धारित मार्ग पर होकर गुजरना पड़ता है और स्वयं को उन कसौटियों में खरा सिद्ध करना पड़ता है, जिसे साधना विज्ञान में आवश्यक अनुबंध के रूप में स्वीकारा गया है। संसारी व्यक्तियों के लिए यह दुनिया ही साधना-भूमि है। इससे बढ़कर अनुकूल स्थान साधना के लिए कोई दूसरा हो नहीं सकता।
इस साधना स्थल में उसे उपासना के प्रथम चरण के रूप में पहले परिवार की प्रारंभिक भूमिका से होकर गुजरना पड़ता है। इसके पूरा होने के उपराँत उसे दूसरी भूमिका-समाज-साधना में प्रवेश करना पड़ता है। इसके पश्चात राष्ट्र-साधना की तीसरी अवस्था आती है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक प्रकार पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योगसिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में योग-साधना की वह समस्त विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, जिसका अधिकारी एक यती ही है। जो संसार छोड़ने और वैरागी बनने की बात करते हैं, उनका वैराग्य भी समाज के बिना अधूरा है। भला साधन-सुविधाहीन वन में वैराग्य की परीक्षा किस भाँति हो सकेगी? यदि कोई ऐसी अभावग्रस्त स्थिति में रह भी रहा हो तो इसे उसकी मजबूरी कहनी चाहिए, वैराग्य नहीं। जो जीवनभर सरोवर में कभी उतरा नहीं, वह बढ़-चढ़कर जल में नहीं डूबने का दंभ करे तो इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है? डूबने, नहीं डूबने की परख तो उसके पानी में प्रवेश करने के बाद ही हो सकती है, बाहर रहकर नहीं। जो दुनिया में रहकर भी निर्लिप्त बना रहता है, वास्तविक वैरागी वही है। जिसने यह अवस्था प्राप्त कर ली है, उसके लिए कंदरा और वन का एकाँत मात्र दिखावा है, उसके लिए कंदरा और वन का एकाँत मात्र दिखावा है। इस आडंबना में वही पड़ते है, जिन्हें बड़प्पन की, मान-सम्मान की चाह होती है, अन्यथा जो सही-सही योग साधना चाहते है, उनके लिए समाज से बढ़कर कोई दूसरी उपयुक्त योगस्थली नहीं है।
महाकवि गेटे ने अपने नाटक ‘फास्ट’ में एक ऐसे चरित्रनायक का वर्णन किया है, जो आत्मज्ञान संग्रह का अभिलाषी है। संसार में रहकर ही वह इसे प्राप्त करना चाहता है, पर कुछ समय पश्चात उसे ऐसा अनुभव होने लगा जैसे इस ज्ञान-संपादन में दुनिया सबसे बड़ी बाधा है। वह इसे छोड़ समाज से बहुत दूर कहीं एकाँत वन-प्राँत में चला जाता है और तपस्या करने लगता है, पर यहाँ भी उसकी एकाग्रता सध नहीं पाई। थक-हारकर वह पुनः समाज में आ जाता है। किंतु अब तक उसकी अधिकाँश आयु चुक गई थी। वह हताश हो जाता है। उसे संतोष था तो मात्र इतना ही कि जीवन के अंतिम समय में उसे बोध हो गया, जिसके न होने के कारण ही वह अब तक संसार के अंदर और बाहर वनों में भटकता रहा।
कुछ ऐसा ही साराँश भारतीय पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास ‘विराट’ में आस्ट्रियाई उपन्यासकार स्टीफन ज्विग ने प्रस्तुत किया है। नायक विराट निष्कर्म योग का पक्षधर है। वह अपने अनुयायियों समेत समाज से दूर चला जाता है, फिर भी अनुभव करता है कि वह पूर्ण निष्कर्म नहीं हो सका। वह वहाँ से और घने जंगल में आ जाता है। यहाँ भी वह बिल्कुल निष्कर्म नहीं हो पाता। यह अहसास होते ही विराट पुनः समाज में आकर निष्कर्म अवस्था त्यागकर कर्ममय जीवन अपना लेता है।
समाज में रहते हुए कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए ऐसा लग सकता है कि साँसारिक उलझनों में पड़कर व्यक्ति अपने लक्ष्य से भटक जाएगा। शायद इसीलिए इनसे बचने के लिए वह दूर चला जाता है। सोचता है, कदाचित इससे लक्ष्यप्राप्ति में शीघ्रता होगी, पर सचाई यह है कि अपने ढंग से वह जितनी जल्दबाजी करता है, ध्येय से उतना ही दूर हटता जाता है, विलंब उतना ही ज्यादा होता है, क्योंकि दायित्वों की उपेक्षा द्वारा आत्मलाभ कराने वाला कोई मार्ग दुनिया में है नहीं। जो रास्ता निर्धारित है, वह मध्यम मार्ग का राजपथ ही हो सकता है। जिसमें आवश्यकता कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए आगे बढ़ना पड़ता है। यहाँ एकदम भौतिकवादी बन जाने में भी हानि है और पलायनवादी बनने में भी घाटा है। नफा तो अतिवाद को त्यागकर ही उठाया जा सकता है।
साँसारिकता में आकंठ डूब जाना जीवन का एक सिरा है तो वैरागी बनकर संसार त्यागना इसका दूसरा छोर। जीवन में इन दोनों का समन्वय करके चलने से ही कुछ कहने लायक सफलता अर्जित की जा सकती है। वस्तु का ग्रहण और विसर्जन बंधन और वैराग्य यह दोनों ही आवश्यक हैं। किसी एक को छोड़कर और दूसरे को अपनाकर सत्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती, वरन् इनका सम्मिलित स्वरूप ही पूर्णता तक ले जाने में सफल हो सकता है। शंकर त्याग की और अन्नपूर्णा भोग की प्रतिमूर्ति हैं, दोनों मिलकर जब परिवार में, समाज में, राष्ट्र व विश्व में एक हो जाते है तो पूर्णता का वास्तविक आनंद-लाभ मिलता है, अन्यथा जहाँ कहीं भी बंधन और मुक्ति में , भोग एवं त्याग में, अनुराग तथा विराग में वैर-विरोध हुआ, वहीं नाना प्रकार की अशांति और असंतोष पैदा होने लगते हैं। इन दिनों के भटकाव का एकमात्र कारण इस संसार-व्यूह को भली भाँति न समझ पाना ही है। इस व्यूह में हमें प्रवेश करना भी आना चाहिए और उससे बाहर निकलना भी।
गड़बड़ी तब पैदा होती है, जब जीवन के किसी एक पक्ष को पूर्ण मान लिया जाता है और उसी एक क्रियाविधि को पूरा करने में सारा जीवन खपा दिया जाता है। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को राज्य रक्षा का उपकरण मान बैठा हो तो वह अपने को सैनिक बना लेगा। यदि किसी को समाजिक समृद्धि का आधार माना गया हो तो हम उसे वणिक बनाने की चेष्टा करेंगे। किसी को जिम्मे शासन-संचालन का भार है तो वह राजनेता से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। कोई नाट्यकार, रंगकर्मी और अभिनेता है तो अपना श्रेय-सौभाग्य वह स्वयं को विदूषक बनाने में ही मानता रहेगा और उसी के गिर्द जीवन भर उसके क्रियाकलाप चलेंगे, पर मनुष्य इतना ही है, सो बात तो नहीं। यथार्थ तो यह है कि मनुष्य न तो केवल सैनिक है, न व्यापारी, न नेता, न अभिनेता। यह तो उसके गुण, अभिरुचि, स्वभाव, संस्कार के हिसाब से विकसित हुआ व्यक्ति का एक हिस्सा है। उसका वास्तविक आपा इन्हें नहीं कहा जा सकता। मूलतः वह ब्रह्म का प्रकाश है। प्रकाश की पूर्णता उद्गम में मिलकर ही हो सकती है, पृथक रहने में नहीं।
साँसारिक लोगों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वे व्यक्तित्व के इन अंग−उपांगों को ही सब कुछ मान बैठते और समस्त ध्यान इन्हीं को निखारने, उभारने, सुधारने, सँवारने में लगा देते हैं, जबकि मूल प्रयोजन अछूता बना रहता है। व्यक्तित्व की प्रखरता भौतिक सफलता के लिए आवश्यक तो है, पर साथ ही इस बात पर भी विचार करते रहना चाहिए कि लौकिक समृद्धि के साथ आत्मिक प्रगति कितनी हुई? हुई या नहीं? समय-समय पर ऐसी समीक्षा के द्वारा ही इस प्रवृत्ति मार्ग में निवृत्ति मार्ग जैसा भावभूमि और अंतःकरण विकसित किए जा सकते हैं। इस दिशा में जितनी और जैसी गति होगी, उसी हिसाब से मनुष्य लक्ष्य के करीब पहुँचता जाएगा।
इस प्रकार का समन्वयात्मक मार्ग वर्तमान समय की ही अनिवार्यता है, सो बात नहीं। प्राचीनकाल में भी इसकी आवश्यकता अनुभव की गई थी। उपनिषदों में यत्र-तत्र इस बात की झलक-झाँकी मिल जाती है। ईशोपनिषद् में स्पष्ट उल्लेख है कि जो केवल अविद्या अर्थात् संसार की ही उपासना करते हैं, वे अंध तमस् में प्रवेश करते हैं और उससे भी अधिक अंधकार में वे प्रवेश करते है, जो केवल ब्रह्मचर्चा में निरत रहते हैं। अन्यत्र कहा गया है-विद्या और अविद्या दोनों को ही जो एकत्र करके जानते हैं, वे अविद्या के द्वारा मृत्यु से उत्तीर्ण होकर विद्या अमृत को प्राप्त करते हैं।
श्रुति कहती है-“एव त्वयि नान्यथेतोअस्ति न कर्म लिप्यते। नरे।” हे नर! कर्म करों। कर्म में लिप्त न होना पड़े, ऐसा कोई पथ इस संसार में नहीं।
स्पष्ट है, प्राचीन समय में कर्म करते हुए, समाज और संसार में रहते हुए ईश्वरप्राप्ति का सर्वसम्मत मार्ग निर्धारित था, पर साथ ही इस बात की भी कड़ी चेतावनी थी कि संसार को साध्य न मान लिया जाए। साध्य तक पहुँचने का यह साधन मात्र है। इसका उपयोग और उपभोग तो हो पर लक्ष्यप्राप्ति के निमित्त। ऐसा आज भी संभव है। यदि ऋषि निर्दिष्ट ‘तेन त्यक्तेन भुज्जीथा’ के आदर्श को अपनाया और जीवन में उतारा जा सके तो इन दिनों के विषमताजन्य विष व्रण को न सिर्फ मिटाया जा सकना संभव है, वरन् स्थिर शाँति और सुव्यवस्था को भी प्रतिष्ठापित करना शक्य है।
ऋषियों ने इसी सुर में सुर मिलाते हुए समाज को कभी बाँधने की चेष्टा की थी। समाज को इन मर्यादाओं में बाँधकर फिर मनुष्य को ब्रह्म उपलब्धि कराने का प्रयास किया था। शरीर को अधम बताकर उसे पीड़ा देना नहीं चाहा, समाज को कलुषित कहकर उसका परित्याग करना नहीं चाहा, जीवन को अनित्य घोषित करके उसकी अवज्ञा करना नहीं सिखाया। उसने सब कुछ को ही ब्रह्म के द्वारा अखंड-परिपूर्ण करना चाहा था, इसके लिए चार आश्रमों की विशिष्ट व्यवस्था थी। प्रथमावस्था में गलाई-ढलाई की क्रिया संपन्न होती, ताकि उसमें भावी व्यक्तित्व की मजबूत इमारत खड़ी की जा सके। द्वितीय चरण में गृहस्थ की जिम्मेदारियों को निबाहते हुए परिवार और समाज की सुव्यवस्था में योगदान करना पड़ता। तृतीय चरण या वानप्रस्थ में द्वितीय भूमिका का ही विराट विस्तार हो जाता और जो कर्त्तव्य पहले घर-परिवार तक सीमित थे, वे अपरिमित हो जाते, उनका कार्यक्षेत्र पूरी पृथ्वी हो जाता। इसी अवस्था में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ की भावना विकसित होती और व्यक्ति समस्त संसार को अपना वृहत्तर परिवार और यहाँ के निवासियों को भगवान की साकार प्रतिमा मानकर उनकी सेवा करता। इस प्रकार विराट ब्रह्म की सेवा करते-करते वह’ जीवनमुक्ति’ की चतुर्थ और अंतिम अवस्था ‘संन्यास’ में अवस्थान करता।
पूर्णता प्राप्ति के यह चार क्रमिक सोपान थे, पर अब जबकि समाज और संसार के साथ-साथ संपूर्ण नीति-नियम-मर्यादाओं की ही अवहेलना करने पर मनुष्य उतारू हो गया है तो देखना यह है कि उसकी मुक्ति किस हद तक कितनी जल्दी हो सकेगी। यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मुक्ति कहीं बाहर नहीं, अपने ही अंदर की एक विशिष्ट अवस्था है। जिसको समाज में रहते हुए ही विकसित करना पड़ता है, तभी जीते-जी उस अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है, जिसे स्वर्ग, सद्गति, शाँति कहकर पुकारा गया है।
एक भक्त भावविभोर होकर प्रार्थना कर रहे थे, मेरे प्रभु, द्वार खोलो, ताकि मैं तुम तक पहुँच सकूँ।
उधर से निकलने वाले दूसरे संत ने कहा, जरा गहरे उतरकर देखो तो, ईश्वर का द्वार क्या कभी किसी के लिए बंद रहा है। अपनी माँ की, परिवारीजनों की सेवा करके देखो। भगवान तुम्हें माँ के आँचल में बैठा मिलेगा।
भक्त को सही दिशा मिली। उपवन छोड़कर वह परिवार के तपोवन में चला गया।
भक्त को सही दिशा मिली। उपवन छोड़कर वह परिवार के तपोवन में चला गया।
गाँधारी राजा धृतराष्ट्र की पत्नी थी। धृतराष्ट्र अंधे थे। रानी ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँधकर पति की तरह ही नेत्रहीन स्थिति में रहना स्वीकार किया।
उनकी यह संयम-साधना तपश्चर्या जैसी ही फलवती हुई। एक बार उन्होंने नेत्र उघारकर दुर्योधन को देखा तो उसका शरीर लौहवत् हो गया। अंत में उन्होंने श्रीकृष्ण को भी शाप दिया था कि “तुम चाहते तो महाभारत टल सकता था। तुम्हारी उपेक्षा से जिस प्रकार मेरा वंश नाश हुआ, उसी प्रकार तुम्हारा वंश भी परस्पर लड़-भिड़कर समाप्त होगा।” कालसत्य है कि यदुवंशी गाँधारी के शाप से लड़-भिड़कर समाप्त हुए थे।
अभिवृद्धि की कामना सभी करते हैं और विस्तार को प्रगति एवं सफलता का चिन्ह मानते हैं। इतने पर भी यह ध्यान रखने योग्य है कि अभिवृद्धि स्वस्थ और संतुलित होनी चाहिए, अन्यथा अनावश्यक फैलाव कई बार उलटी समस्या बन जाता है।
शरीर में चर्बी बढ़ जाने से जो स्थूलता आती है वह आँखों को भले ही संपन्नता का चिन्ह लगे और मोटा व्यक्ति भले ही अपनी समृद्धि की शेखी बघारे, पर वस्तुतः यह बढ़ा हुआ भार हर दृष्टि से असुविधा ही उत्पन्न करता है। सूजन आने से किसी अंग की स्थूलता बढ़ सकती है, पर उससे किसी को कोई सुविधा या प्रसन्नता नहीं हो सकती।
सुविधा-साधनों के लिए मची हुई आतुर भगदड़ के फलस्वरूप संपन्नता बढ़ी है, पर यह नहीं कह जा सकता कि इससे स्वस्थ विकास का कोई उपयोगी आधार खड़ा हो रहा है। प्रगति एवं समृद्धि की प्रशंसा तभी की जा सकती है, जब यह सही साधनों से उपलब्ध हुई हो और उसका उपयोग किन्हीं श्रेष्ठ प्रयोजनों के लिए किया जाता हो। इसके विपरीत यदि अवांछनीय तरीकों से वृद्धि हुई है और बढ़ोत्तरी का उपयोग अनुपयुक्त प्रयोजनों के लिए किया जाना है तो निश्चय ही इस उन्नति की तुलना में वह सामान्य स्थिति ही अच्छी थी, जिसमें असंतुलन उत्पन्न होने की आशंका तो नहीं थीं
उदाहरणार्थ, अपने समय में औसत मनुष्य के बढ़ते हुए मस्तिष्कीय भार को लिया जा सकता है। मस्तिष्क पर चिंताओं का भार बढ़ने की बात यहाँ पर नहीं कही जा रही है, वरन् उस तथ्य का उल्लेख किया जा रहा है, जिसके अनुसार खोपड़ी के भीतर भरे हुए पदार्थ के भार और विस्तार दोनों में ही बढ़ोत्तरी हो रही है। उस अभिवृद्धि के कारण लाभ नहीं हो रहा, अपितु उलटा घाटा सहना पड़ रहा है। यह वृद्धि वैसी ही है जैसी कुसंस्कारी की। उसकी बढ़ी हुई संपदा दुष्ट-दुर्गुणों को बढ़ाने का निमित्त बनती है। हाल ही में ब्रिटिश चिकित्सकों ने परीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला है कि मानव मस्तिष्क का भार निरंतर बढ़ रहा है। लंदन इंस्टीट्यूट ऑफ सायकिएट्री के प्रोफेसर डॉ. कोर्मेलिस एवं डॉ. मिलर ने अपनी शोध द्वारा यह सिद्ध किया है कि मानवी मस्तिष्क की क्षमता का बराबर ह्रास हो रहा है एवं उसी अनुपात में उसका वजन भी बढ़ता जा रहा है।
लंदन के अस्पतालों में मरने वाले 20 वर्ष से 60 वर्ष तक की आयु के 317 स्त्री-पुरुषों के शवों की परीक्षा करके उनने पाया कि सन् 1960 से 1980 के मध्य एक पुरुष के मस्तिष्क का औसत भार 1372 ग्राम से बढ़कर 1424 ग्राम हो गया। इसी अवधि में एक महिला के मस्तिष्क का भार 1242 ग्राम से बढ़कर 1264 ग्राम हो गया। इसी अनुपात में स्नायु रोगों की संख्या एवं आत्महत्या करने वालों की तादात भी बढ़ी। अमेरिका में प्रतिवर्ष 500, व्यक्ति आत्महत्या कर लेते है। भारत में भी आत्महत्या हेतु प्रेरित लोगों की संख्या कम नहीं है।
इन वैज्ञानिकों के अनुसार भार एवं आयतन का सीधा संबंध है। मस्तिष्क के भार के अनुपात में आयतन भी बढ़ा है। इसी कारण कसे स्नायु रोगों का आधिक्य हुआ है। ऐसा लगता है कि भौतिक सुखों की तलाश में मनुष्य के मस्तिष्क पर अधिक बोझा आ गया है। बीसवीं शताब्दी के इस अभिशाप को हम मानसिक अशाँति एवं रोगों की बढ़ती संख्या के रूप में प्रत्यक्ष देखते हैं।
यह देखकर अत्यंत आश्चर्य होता है कि अमेरिका में, जो विश्व का सर्वाधिक उन्नत, आधुनिक एवं संपन्न राष्ट्र है, इतनी अधिक आत्महत्याओं का कारण क्या है? आज से सौ वर्ष पूर्व का मानव अपनी सीमाओं में सुरक्षित था, शाँति पूर्ण जीवन जीता था, उनमें पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता नहीं थी। आज का मानव आक्रामक एवं प्रतिद्वंद्वी है एवं मनोविकारग्रस्त भी। अस्तु, वर्तमान प्रगति मानव मस्तिष्क के लिए बोझ बन गई है। विज्ञान की अतुलनीय उन्नति ने पिछली अनेक शताब्दियों के ज्ञान को समेटकर मानव मस्तिष्क पर लाद दिया है।
शरीर के कार्य करने की अपनी प्रक्रिया है। विभिन्न क्रियाएँ अपनी निर्धारित गति से कार्य करती है। इस गति, लय तथा ताल में आया अंतर संपूर्ण क्रियाओं को गड़बड़ा देता है और क्रियाओं की यह असामान्य अवस्था उसे रोगी बना देती हैं।
प्रतिद्वंद्विता, उत्तेजना तथा उलझावों के कारण मानव मस्तिष्क भावनात्मक धरातल पर कमजोर पड़ गया है। कमजोर मस्तिष्क उसकी निर्णय शक्ति का साथ नहीं दे पाता तो वह मानसिक सुप्तता के लिए दवाओं का सहारा लेता है और यही दवाएँ उसे मृत्यु के निकट पहुँचा देती हैं। विक्षिप्त व्यक्ति समाज के लिए घातक एवं बोझा तथा मृत व्यक्ति के समान होता है।
मस्तिष्क की उत्कृष्टता पर मानवी प्रगति का सारा ढाँचा खड़ा हुआ है। उससे अनेकानेक उपयोगी प्रयोजन सध सकते है, पर यह संभव तभी है, जब उसका मूलभूत ढाँचा अपनी स्वाभाविक एवं संतुलित स्थिति में बना रहे। इस सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि मनुष्य को बहुत वजन डालने वाला काम अत्यधिक मात्रा में न लिया जाए। दिनचर्या में यह गुंजाइश रहनी चाहिए कि हँसने-खेलने, विनोद-उपार्जन एवं शारीरिक श्रम के लिए समुचित समय सुरक्षित रख जाए। अत्यधिक श्रम लेने से मस्तिष्क की वैसी ही दुर्गति होती है, जैसी एक सोने का अंडा देने वाली मुरगी की हुई थी। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखा ही जाना चाहिए कि मनोविकारों की उत्तेजना मनःसंस्थान को बुरी तरह जलाती , झुलसाती और विषाक्त बनाती है। चिंता, भय, निराशा, द्वेष लिप्सा, लालसा जैसे मनोविकारों को जो अनावश्यक दबाव इन दिनों पड़ रहा है, वही इस मस्तिष्कीय भार वृद्धि का प्रधान कारण है। मोटेतौर से हर बढ़ोत्तरी सौभाग्य का चिन्ह मानी जाती है, पर मस्तिष्क भार का बढ़ना प्रत्यक्षतः हानिकारक दुष्परिणाम उत्पन्न कर रहा है।
ठीक यही बात, वर्तमान समृद्धि एवं प्रगति के संबंध में की जा सकती है, जो सुविधा-साधनों के रूप में बढ़ती रही है, पर उसके उपार्जन एवं उपयोगी में नीतिमत्ता का समावेश नहीं हो रहा है। विस्तार का उपयोग तभी है, जब उसके स्तर में न्यूनता न आने पाए।
रबर और स्प्रिंग को खींचने पर वे फैल जाते है, पर यह फैलाव तात्कालिक ही होता है। खिंचाव के हटते ही वे अपने पूर्ववर्ती स्तर और स्थिति में आ जाते हैं, अर्थात् वे हर हालत में उस स्तर को स्वयं में धारण किए रहते हैं। यही दशा सही कही जा सकती है। जो अपने विस्तार के साथ-साथ स्तर को गिराए, वह अवस्था सर्वथा अयोग्य और अस्वीकार्य है।
मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति भी एक प्रकार का स्तर-विस्तार ही है। उसमें आदमी अपनी सीमाबद्ध स्थिति से ऊँचा उठता है और ईर्ष्या-द्वेष एवं कामना, वासना अहंता जैसे दोषों का परित्याग कर जब स्वयं को पूर्ण रूप से निर्मल बनाता है तो यह स्थिति आदरणीय बनती और अनुकरणीय कहलाती है। विस्तार का यही रूप वरेण्य है। जहाँ अभिवृद्धि सिर्फ आडंबर के लिए हो, वहाँ हानि-ही-हानि है। उसे हर प्रकार से अमान्य और हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
अभिवृद्धि उत्कृष्टता का ही दूसरा नाम है। जो विकास निकृष्टता की ओर धलेके और असंतुलन एवं असामंजस्य पैदा करे, वह प्रगति जैसा दिखने वाला अवगति ही है। इससे हर हालत में बचा जाना चाहिए।
एक बाँस का पेड़ था। जंगल में अकेला खड़ा था। पड़ोस में रहने वाले समय-समय पर उसमें से छोटी-बड़ी लकड़ी काट ले जाते थे। एक दिन नारद जी उधर से गुजरे। बाँस गिड़गिड़ाकर बोला, “मुझे बड़ा परिवार होने का आशीर्वाद दीजिए।” मुनि सहज ही भाव से “तथास्तु” कहकर आगे चले गए। थोड़े दिनों में बाँस के अंकुर उपजे और बड़ी सी झाड़ी बन गई। धूप न मिलने से बूढ़ा बाँस सूखने लगा। झाड़ी इतनी बड़ी और कँटीली थी कि उसमें हाथ डालने की किसी की हिम्मत न पड़ती। जरूरत होने पर भी लोग मन मारकर बैठ जाते। घने पत्तों से खिन्न चिड़ियों ने घोंसले तक वहाँ बनाने बंद कर दिए।
एक बार तेज आँधी आई। बाँस आपस में रगड़ने लगे और उनमें आग पैदा हो गई। पूरा समूह जल गया। बाँस को अपनी अज्ञानता पर पछताने का भी मौका न मिला।
क्वाथ या काढ़ा देखने-सुनने में अत्यंत साधारण एवं हल्का-फुल्का-सा योग प्रतीत होता है, किंतु परिणाम की दृष्टि से गहराई से देखने पर उसमें अनुभवी चिकित्सकों की अनुसंधानात्मक बुद्धि की विलक्षणता का परिचय मिलता है। काढ़ा बनाने में जिन घटक द्रव्यों का चुनाव किया गया है, वह रोग की जटिलता एवं रोगी की प्रकृति के अनुरूप चुने गए हैं। कई वर्षों के निरंतर प्रयोग-परीक्षण के उपराँत उन्हें अब जनसाधारण के सम्मुख उद्घाटित किया जा रहा है, ताकि इससे सभी लाभान्वित हो सकें। यहाँ दिए जा रहे सभी योग अनुभूत एवं परीक्षित हैं। पथ्य-परहेज के साथ इनका उपयोग करने पर बीमारियों से छुटकारा पाना सुनिश्चित है।
अखंड ज्योति के विगत अंकों में ‘क्वाथ-चिकित्सा द्वारा जीवन का कायाकल्प’ शीर्षक से ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के जो अनुसंधान-निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए हैं, उनमें क्वाथ निर्माण की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत की जा चुकी है। साथ ही नौ प्रकार के क्वाथ एवं उनकी निर्माण प्रक्रिया विस्तारपूर्वक बताई गई है। इनमें कालमेघ, सरस्वती पंचक, निर्गुंडी क्वाथ, कुटज क्वाथ, अशोक क्वाथ एवं काँचनार क्वाथ सम्मिलित है। यहाँ पर जिन क्वाथों का वर्णन किया जा रहा है, वे वस्तुतः रोग विशेष पर आधारित है। इस क्रम में उन रोगों या व्याधियों को प्रमुखता दी गई है, जो आज के वातावरण में सर्वव्यापी बन गई है और महामारी का रूप धारण करती जा रही है। अधिकाँश व्यक्ति इन रोगों के शिकार पाए जाते है।
यहाँ पर दो क्वाथों का उल्लेख किया जा रहा है-(1) वातरोग नाशक क्वाथ और (2) उच्च रक्तचाप नाशक क्वाथ।
(1) वातरोग नाशक क्वाथ-
इसमें निम्नलिखित औषधियाँ मिलाई जाती हैं-
(1) रास्ना पत्ती-2 ग्राम (2) वासा 5 ग्राम (3) एरण्डमूल 5 ग्राम (4) देवदार 5 ग्राम (5) नागरमोथा 5 ग्राम (6) पुनर्नवा मूल 5 ग्राम (7) गिलोय 5 ग्राम (8) शतावर 5 ग्राम (9) अमलतास का गूदा 5 ग्राम (10) अतीस 5 ग्राम (11) अश्वगंधा 5 ग्राम (12) गोक्षुर (छोटा) 5 ग्राम (13) विधारा 5 ग्राम (14) सौंफ 5 (15) पियाबाँसा (कटसरैया) 5 ग्राम (16) छोटी कटेलर 5 ग्राम (17) बड़ी कटेली 5 ग्राम (18) धनिया 5 ग्राम (19) छोटी पीपल 5 ग्राम (20) सोंठ 5 ग्राम (21) हरड़ 5 ग्राम (22) चव्य 5 ग्राम (23) बच 5 ग्राम (24) कचूर 5 ग्राम (25) बलामूल 5 ग्राम (26) धमासा 5 ग्राम (27) दशमूल 1 ग्राम (28) बृहत् बात चिंतामणि या योगेन्द्र रस-1 ग्राम (29) बृहत् शूतशेखर रस 1 ग्राम (30) मुक्तापिष्टी 2 ग्राम (31) प्रबाल पिष्टी 4 ग्राम।
वातरोग नाशक क्वाथ बनाने के लिए उपर्युक्त वनौषधियों को क्रमाँक (1) से क्रमाँक (28) तक उनकी निर्धारित मात्रा के अनुसार लेकर कूट-पीसकर उनका जौ-कुट पाउडर बना लेते हैं। उसमें से 5-6 चम्मच (30 ग्राम) पाउडर लेकर राम में स्टील के एक भगोने में आधा लीटर पानी में भिगो देते हैं और सुबह मंद आँच या सिमबर्नर पर उसे चढ़ा देते है। पकते-पकते चौथाई अंश रह जाने पर क्वाथ को चूल्हे से उतारकर ठंडा होने पर साफ-स्वच्छ कपड़े से छान लेते है। क्वाथ तैयार है। इसकी आधी मात्रा सुबह 8 से 10 बजे तक एवं आधी मात्रा शाम 4-5 बजे तक पी लेनी चाहिए।
क्वाथ पीने के साथ ही साथ क्रमाँक (28) से लेकर क्रमाँक (31) तक की चीजों को निर्धारित मात्रा में लेकर एक साथ खरल करके उनकी बराबर 15 पुड़िया बना लेते हैं और एक पुड़िया सुबह एवं एक पुड़िया शाम को शहद के साथ नित्य खिलाते रहते हैं। क्वाथ के साथ इसका सेवन करने से रोगी नित्य खिलाते रहते हैं। क्वाथ के साथ इसका सेवन करने से रोगी व्यक्ति को अधिक लाभ होता है। पुड़िया समाप्त होने पर उसी अनुपात में चारों चीजें लेकर दुबारा खरल करके पुड़िया बनाकर प्रयुक्त करनी चाहिए। प्रायः देख गया है कि साइटिका रोग एवं कटिशूल से पीड़ित व्यक्ति यदि काढ़ा पीने के साथ ही हरसिंगार (पारिजात) की 21 हरी पत्तियों की चटनी बनाकर नित्य लेते रहें तो कुछ ही दिनों में वे रोगमुक्त हो जाते है। कमर के निचले भाग में वात प्रकोप होने पर क्वाथ में कैस्टर ऑयल (एरंडतैल) मिलाकर पिलाना चाहिए अथवा जिन्हें क्वाथ के साथ यह रुचिकर न लगे, उन्हें सायटिका आदि में कैस्टर ऑयल 1 चम्मच से आरंभ कर 5 चम्मच तक बढ़ाकर तब तक देना चाहिए, जब तक कि दस्त न होने लगें। इसे रात को सोते समय गरम दूध या कुनकुने जल में मिलाकर देना चाहिए। पीने में यह सुविधाजनक रहता है।
यह क्वाथ सभी प्रकार के वात रोगों विशेषकर आमवात, वातज विकार, कफज विकार, पक्षाघात, मुँह का लकवा, साइटिका, जाँघों की पीड़ा, कटिशूल-कमर की जकड़न, पसली-छाती की वातज व आमवातज पीड़ा, सर्वाग कंप, अपबाहुक, अपतंत्रका, अस्थिपीड़ा, संधिवात, मज्जावात, मूत्रविकार एवं महिलाओं के रोग डिस्मेनोरिया अर्थात् अनार्तव या कष्टार्त्तव आदि में बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुआ है। वातरोग में आमप्रकोप एवं रक्त में विषवृद्धि भी कारण होते हैं, इसलिए इस क्वाथ में रास्ना के साथ सहायक रूप में दीपन, पाचन, आमशोषक, मूत्रक एवं कफघ्न औषधियाँ मिलाई जाती हैं। रोग की प्रकृति के अनुसार इस क्वाथ में अजमोदादि चूर्ण या सोंठ या पीपल का चूर्ण मिलाकर भी सेवन कराया जाता है।
(2) उच्चरक्तचाप नाशक क्वाथ-
हाई ब्लडप्रेशर अर्थात् उच्च रक्तचाप आज एक आम बीमारी है। खान-पान रहन-सहन, वातावरण सभी ने मिलकर आपाधापी भरे वर्तमान समय में प्रायः अधिकाँश व्यक्तियों को इस महामारी के आगोश में धकेल दिया है। यदि इस पर नियंत्रण न किया जाए तो व्यक्ति ब्रेनस्ट्रोक, हृदयाघात जैसी आकस्मिक प्राणहानि करने या जीवनभर इसका अभिशाप ढोने को विवश होता है। रोग नियंत्रक एलोपैथी दवाओं का निरंतर सेवन तात्कालिक राहत तो पहुँचाता है, किंतु कालाँतर में इसके दुष्प्रभाव भी नजर आने लगते हैं। ऐसी स्थिति में आयुर्वेद की ‘क्वाथ-चिकित्सा’ बहुत कारगर सिद्ध हुई है। इस संदर्भ में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के चिकित्साविज्ञानियों ने जो सूत्र विकसित किए है, उच्चरक्तचाप के रोगियों के लिए वरदान सिद्ध हुए हैं। क्वाथ चिकित्सा ने आशातीत सत्परिणाम प्रस्तुत किए हैं-
उच्चरक्तचाप क्वाथ में निम्नलिखित चीजें मिलाई जाती हैं-
(1) ब्राह्म 100 ग्राम (2) शंखपुष्पी 100 ग्राम (3) जटामाँसी 200 ग्राम (4) विजया 200 ग्राम (5) काली जीरी 200 ग्राम (6) अजमोद 50 ग्राम (7) सर्पगंधा 200 ग्राम (8) काला नमक 50 ग्राम (9) अजवायन 50 ग्राम (10) आकपत्ता (अर्क या मदार) 5 ग्राम (11) अर्जुन 100 ग्राम (12) पुनर्नवा 100 ग्राम (13) सज्जीखार 25 ग्राम (14) मुक्तापिष्टी 1 ग्राम (15) प्रर्बाल पिष्टी 2 ग्राम (16) चाँदी भस्म 1 ग्राम (17) प्रबाल पिष्टी 2 ग्राम (18) शंख भस्म 2 ग्राम (19) नौसादर आधा ग्राम (20) कामदुधा रस 2 ग्राम।
उपयुक्त घटक द्रव्यों में से क्रमाँक (1) से क्रमाँक (13) तक उनको निर्धारित मात्रा में लेकर जौकुट पाउडर बनाकर एक सुरक्षित डिब्बे में रख लेते हैं और प्रतिदिन उसमें से 4-5 चम्मच पाउडर का क्वाथ आधा लीटर पानी में बनाकर रोगी व्यक्ति को पिलाते है। इसके साथ ही क्रमाँक (14) से क्रमाँक (20) तक की चीजों में से मुक्तापिष्टी 1 ग्राम, मुक्ताशक्ति 2 ग्राम, प्रर्बाल पिष्टी 2 ग्राम, भस्म 1 ग्राम, शंख भस्म 2 ग्राम, नौसादर आधा ग्राम एवं कामदुधा रस 2 ग्राम सबको एक साथ खरल करके उसकी बराबर मात्रा की 12 पुड़िया बना लेते हैं। यह मुख्यतः एसीडिटी रोकने की दवा है। अतः इसकी एक पुड़िया एकदम सुबह एवं एक गुड़िया तीन बजे शाम को जल के साथ लेनी चाहिए, क्योंकि प्रायः पेट में अम्लीयता का उफान उसी समय आता है। जल के साथ एक पुड़िया ले लेने से एसीडिटी का प्रकोप शाँत हो जाता है।
क्वाथ पीते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रातःकाल की खुराक भोजन करने के तीन घंटे ले एवं रात्रि में भोजन के दो घंटे भर बाद पुड़िया लें। रात्रि में केवल क्वाथ भर पीना है। उच्चरक्तचाप वालों को भोजनोपराँत ‘महाशंखवटी’ की दो गोलियाँ सुबह एवं शाम को जल के साथ लेते रहने से पाचन तंत्र भी ठीक रहता और पेट में बनने वाली गैस से भी छुटकारा मिलता है। हाई ब्लडप्रेशर के मरीज को शाम का भोजन सदैव आधा पेट ही लेना चाहिए, रात्रि में चावल बिलकुल ही नहीं खाना चाहिए।
कितने ही व्यक्तियों को काढ़ा बनाने व पीने में झंझट महसूस होता है अथवा उन्हें इतना अवकाश या अवसर नहीं मिलता कि यह सब खटपट कर सकें। ऐसी स्थिति में सबसे सरल व निरापद उपाय यह है कि उपर्युक्त सभी बीस द्रव्यों को अच्छी तरह घोट-पीसकर महीन कपड़े से कपड़छन कर बारीक चूर्ण कर लें। घृतकुमारी के गूदे का रस बनाकर इस पाउडर में मिलाकर आटे की तरह गूंथ लें। अच्छी प्रकार से गुँथ जाने पर 1-1 रत्ती की गोली बनाकर उसे सुखा लें। उच्चरक्तचाप नाशक गोली तैयारी है। इसकी एक गोली सुबह एवं एक गोली शाम को जल के साथ लें, भोजनोपराँत महाशंखवटी का सेवन यथावत चलता रहेगा। काढ़ा एवं पुड़िया नहीं लेनी पड़ेगी।
यहाँ इस बात का अवश्य ध्यान रखना होगा कि पुड़िया वाले घटक मिलाकर जो छह दिन की 12 खुराक बनाते हैं, वह समाप्त होती ही अगली खुराक दुबारा बनानी पड़ती है, किंतु गोली बनाते समय यह समस्या नहीं रहती। उसमें सभी घटक द्रव्य अनुपात क्रम में बनाते समय ही बढ़ा लिए जाते है।
शिष्य संजीवनी शिष्यों के लिए प्राणदायिनी औषधि है। इसका प्रत्येक सूत्र केवल उनके लिए है, जिनके हृदय में शिष्य होने की सच्ची चाहत है। जो सद्गुरु के प्रति सर्वस्व समर्पण में अपनी पहचान खोजना चाहते हैं। ध्यान रहे शिष्य का अर्थ है, जो सीखने के लिए राजी है, जो झुकने को तैयार है। जिसके लिए ज्ञान, अहंकार से कहीं ज्यादा मूल्यवान है। जो इस भावदशा में जीता है कि मैं शिष्यत्व की साधना के लिए सब कुछ खोने के लिए तैयार हूँ। मैं अपने आप को भी देने के लिए तैयार हूँ। शिष्यत्व का अर्थ है- एक गहन विनम्रता। शिष्य वही है- जो अपने को झुकाकर, स्वयं के हृदय को पात्र बना लेता है।
आप और हम कितने भी प्यासे क्यों न हों पर बहती हुई जलधारा कभी भी छलाँग लगा कर हमारे हाथों में नहीं आयेगी। इसका मतलब यह नहीं है कि जलधारा हम पर नाराज है। उल्टे वह तो हर क्षण प्रत्येक की प्यास बुझाने के लिए तत्पर है। लेकिन इसके लिए न केवल हमें झुकना होगा, बल्कि झुककर अञ्जलि बनाकर नदी का स्पर्श करना होगा। फिर तो अपने आप ही बहती जलधारा हमारे हाथों में आ जायेगी। तो ये शिष्य संजीवनी के सूत्र उनके लिए है, जो झुकने के लिए तैयार हैं। केवल प्यास पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अञ्जलि बनाकर झुकना भी पड़ेगा।
जिनके मन अन्तःकरण में केवल एक ही भाव अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित होता है कि सद्गुरु के चरणों में मैं मिट जाऊँ तो कोई हर्ज नहीं है, लेकिन जीवन का रहस्य मुझे समझ आ जाये। जो सोचते हैं कि मैं अपने सद्गुरु के चरणों की धूलि भले ही बन जाऊँ, पर उनकी कृपा से यह जान लूँ कि जिन्दगी का असल स्वाद क्या है, अर्थ क्या है? प्रयोजन क्या है? मैं क्यों हूँ और किसलिए हूँ? बस ऐसे ही सजल भाव श्रद्धा वाले शिष्यों के लिए शिष्य संजीवनी की यह सूत्र कथा है। इनमें से प्रत्येक सूत्र नवागत शिष्यों के लिए शिष्य परम्परा की महानतम विभूतियों की ओर से निर्देश वाक्य हैं। इसे सम्पूर्ण रूप से मानना ही शिष्यत्व साधना की गहनता में प्रवेश करना है।
जो इस महासाधना के लिए तैयार हैं, उनके लिए शिष्य संजीवनी का प्रथम सूत्र है- महत्त्वाकांक्षा को दूर करो। क्योंकि शिष्यों के लिए महत्त्वाकांक्षा पहला अभिशाप है। जो कोई अपने साधना पथ पर आगे बढ़ रहा है, उसे यह मोहित करके पथ से विचलित कर देती है। सत्कर्मों एवं पुण्यों को समाप्त करने का यह सबसे सरल साधन है। बुद्धिमान, परम समर्थ एवं महातपस्वी लोग भी इसके जाल में फंस कर बराबर अपनी उच्चतम सम्भावनाओं से स्खलित होते रहते हैं। महत्त्वाकांक्षा कितनी भी सम्मोहक व आकर्षक क्यों न हो, पर इसके फल चखते समय मुँह में राख और धूल बन जाते हैं। मृत्यु और विछोह की ही भाँति इससे भी यही सीख मिलती है कि स्वार्थ के लिए अहं के विस्तार के लिए कार्य करने से परिणाम में केवल निराशा ही मिलती है। महत्त्वाकाँक्षा प्रकारान्तर से साधना का महाविनाश ही है।
यह अनुभव उन सभी का है, जिन्होंने शिष्य की गहनतम व सफलतम साधना की है। महत्त्वाकांक्षा एवं शिष्यत्व का कोई मेल नहीं है। शिष्य बनने के लिए अपने को गलाना, जलाना और मिटाना पड़ता है, ताकि खाली हुआ जा सके। पात्र बना जा सके और इस पात्रता को सद्गुरु के अनुदानों से परिपूर्ण किया जा सके। महत्त्वाकांक्षा इस प्रक्रिया की एकदम विरोधी है। यह कुछ होने की वासना है। अपनी क्षुद्रताओं को पोषित करने का पागलपन है।
महत्त्वाकाँक्षी व्यक्ति सदा ही अपनी क्षुद्रताओं से घिरा रहता है। महत्त्वाकांक्षा में निहित सत्य का यदि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो यही तथ्य उजागर होता है कि जो जितना अधिक आत्महीनता से ग्रस्त है, वह उतना ही इसके पाश में जकड़ जाता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा ही दूसरे के धन, पद, स्वास्थ्य, वैभव को देखकर ललचाता रहता है। उसे हर क्षण यही लगता रहता है कि इसके जैसा बन जाऊँ, उसके जैसा बन जाऊँ। यह भटकन उसे सदा ही आत्मविमुख बनाये रखती है। इस मनोदशा में अपनी सम्भावनाओं को जानने, खोजने, इन्हें साकार करने की सुधि ही नहीं आती।
इसीलिए प्रत्येक सद्गुरु अपने शिष्य को पहला निर्देश यही देता है कि महत्त्वाकांक्षा को दूर करो। छोड़ दो यह ख्याल कि तुम्हें किसी के जैसा होना है। सद्गुरु कहते हैं कि तुम्हें तो सिर्फ एक ही ख्याल होना चाहिए कि तुम्हें परमात्मा ने क्या बनाया है, उसे जानना है। प्रत्येक मनुष्य ईश्वर का सनातन अंश है- इस सत्य को अनुभव करना है। इसके लिए किसी और की फोटो कापी बनने की कोई जरूरत नहीं है। आत्मतत्त्व तो सदा ही अपने अन्दर मौजूद है। इसको बस जान लेना है।
आत्मतत्त्व की अनुभूति के लिए अपने आप को स्वयं के सच्चे स्वरूप को अनुभव करने के लिए कुछ जोड़ना नहीं है। सिर्फ कुछ घटाना है। जो कुसंस्कारों का, दुष्प्रवृत्तियों का कचरा इकट्ठा कर लिया है, उसे गलना भर है। हीरा मौजूद है, कचरे के ढेर में, बस कचरा हटाकर हीरा पहचान लेना है। इसके लिए न तो किसी की नकल करने की जरूरत है और नहीं किसी महत्वाकाँक्षा की जरूरत है।
महत्त्वाकाँक्षा से सिर्फ तुलना दुःख, ईर्ष्या और हिंसा ही जन्म लेते हैं। जितनी ज्यादा महत्त्वाकाँक्षा जिसमें है, वह उतना ही दुःखी और अशान्त रहता है। जर्मन दार्शनिक श्लेगल ने यहाँ तक कह डाला है कि महत्त्वाकाँक्षा भयावह बीमारी है। मनुष्य जाति और मानवीय सभ्यता का जितना ज्यादा नुकसान इस बीमारी के कारण हुआ है, उतना किसी और कारण नहीं हुआ। श्लेगल के अनुसार मानव इस बीमारी से जितना जल्दी दूर जाय उतना ही श्रेयस्कर है। सत्य-साधना जिनके जीवन की साध्य है, उन्हें इस अभिशाप को किसी भी तरह अपने पास नहीं फटकने देना चाहिए।
जिनका जीवन महत्त्वाकाँक्षा से कलंकित है, वे कभी भी शिष्य नहीं हो सकते। जिनकी जिन्दगी महत्त्वाकाँक्षा से अभिशप्त है, उन्हें कभी भी सद्गुरु की शरण नहीं मिल सकती। इसलिए शिष्यत्व की साधना करने वालों के लिए महान् गुरु भक्तों का यही निर्देश है कि छोड़े महत्त्वाकाँक्षा। छोड़े तुलना की प्रवृत्ति। बस एक ही बात की फिक्र करें कि अपने आपको किस विधि से सम्पूर्णतया सद्गुरु को सौंपें? यदि हमारा जीवन महत्त्वाकाँक्षा से रहित है तो कृपालु सद्गुरु इसमें से भगवत् सत्ता को प्रकट कर देंगे। आत्मतत्त्व दिव्यता से जीवन अपने आप ही महक उठेगा। स्वयं ही समस्त दिव्यताएँ अस्तित्व में साकार हो सकेंगी। बस आवश्यकता शिष्य संजीवनी के प्रथम सूत्र को आत्मसात् करने की है। इस प्रथम सूत्र पर मनन ज्यों-ज्यों प्रगाढ़ होगा, त्यों-त्यों हमारी चेतना द्वितीय सूत्र के लिए तैयार हो जायेगी। यह द्वितीय अखण्ड ज्योति के लिए अगले माह के पृष्ठो में स्वयमेव प्रकट होगा। तब तक प्रथम सूत्र की साधना का क्रम बना रहे।
राजकुमार एक चीते का पीछा कर रहे थे। वह चोट खाकर झाड़ियों में जा छिपा था। राजकुमार घोड़े को झाड़ी के इर्द गिर्द घुमा रहे थे, पर छिपे चीते को बाहर निकालने में वे सफल न हो पा रहे थे।
किसान की लड़की यह दृश्य देख रही थी। उसने राजकुमार से कहा, “घोड़ा दौड़ने से हमारा खेत खराब होता है। आप पेड़ की छाया में बैठें। चीते को मारकर मैं लाए देती हूँ।” वह एक मोटा डंडा लेकर झाड़ी में घुस गई और मल्लयुद्ध में चीते को पछाड़ दिया। उसे घसीटते हुए बाहर ले आई और राजकुमार के सामने पटक दिया।
इस पराक्रम पर राजकुमार दंग रह गए। उन्होंने किसान से विनय करके उस लड़की से विवाह कर लिया। प्रख्यात योद्धा हम्मीर उसी लड़की की कोख से पैदा हुआ था। माताओं के अनुरूप संतान का निर्माण होता है।
अन्तर्यात्रा का विज्ञान साधना संदेश है। इसमें परम पूज्य गुरुदेव एवं महर्षि पतंजलि के अनुभव घुले-मिले हैं। इन महायोगियों के अनुभव का स्पर्श सदा ही साधकों को नवस्फूर्ति देता है। जो साधक हैं उन्हें प्रति माह बड़ी आतुरता से इस दैवी संदेश की प्रतीक्षा रहती है, क्योंकि इसे पढ़ने से इन पर मनन-चिंतन करने वे साधना जीवन की अनेकों समस्याओं का समाधान होता है। साधना पथ पर बिखरे हुए अनगिन कंटक अपने आप ही दूर हो जाते हैं। नये-नये साधना रहस्यों का मर्म अंतर्दृष्टि में उजागर होता है। अन्तर्यात्रा की दुरुहता-जटिलता स्वयं ही सुगम हो जाती है। यह अनुभव किसी अकेले एक का नहीं, बल्कि उन अनगिनत साधकों का है, जो दृढ़ निष्ठ होकर संकल्पित एवं समर्पित भाव से साधनारत हैं।
ऐसे निष्ठावान साधक जब-जब अपनी अनुभूतियों को भेजते रहते हैं। शब्दों से छलकती उनकी आध्यात्मिक सम्पदा इस दैवी संदेश की सार्थकता बयान करती है। यह बात अलग है कि इस साधना संदेश का मर्म केवल साधक ही समझ पाते हैं। जो साधक नहीं हैं उनके लिए यह बौद्धिक आयोजन भर है। ऐसे लोगों को इसका शब्द परिचय तो मिलता है, पर इसमें अन्तर्निहित अकूत आध्यात्मिक सम्पदा से वे वंचित रह जाते हैं। इसलिए जो इसके तत्त्व को सत्य को जानना चाहते हैं, उन्हें योग साधना की गहनता में उतरना ही पड़ेगा। ‘जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठि’। कबीर बाबा का यह वचन इस योग कथा के बारे में सम्पूर्ण सार्थक है। इस सार्थकता की अनुभूति साधकों ने पिछली कड़ी में भी की थी। इस कड़ी में यह बताया गया था कि अभ्यास की सही विधि क्या है? अभ्यास की सफलता के लिए- 1. लम्बा समय, 2. निरन्तरता, 3. भाव भरी श्रद्धा एवं 4. दृढ़ निष्ठ; इन चार तत्त्वों का होना जरूरी है। यदि साधना अभ्यास में ये चार तत्त्व बने रहे तो साधना अपना चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत किए बिना नहीं रहती। परन्तु व्यावहारिक जीवन में देखा यह जाता है कि अनेकों प्रयत्नों के बावजूद साधक इन चार तत्त्वों का संग्रह नहीं कर पाते। इन चार में से कभी कोई छूटता है तो कभी कोई रह जाता है। चाहत होने पर भी साधना में संवेग नहीं उत्पन्न हो पाता।
इस समस्या का समाधान महर्षि पतंजलि ने अगले सूत्र में किया है। उनका कहना है कि साधना में संवेग तब तक नहीं आ पायेगा, जब तक साधक वैराग्य से वंचित है। वैराग्य विहीन साधना में पहले तो गति और संवेग उत्पन्न ही नहीं होता, यदि किसी कारण संकल्प की दृढ़ता पर ऐसा हो भी गया तो भी इससे मात्र भौतिक प्रयोजन ही पूरे हो पाते हैं। वैराग्य के बिना कैसी भी और कितनी भी साधना क्यों न की जाय इसे आध्यात्मिक परिणाम नहीं होते। ऐसों को कभी भी आत्म जागृति की अनुभूति नहीं हो पाती। आत्म जागृति एवं आध्यात्मिक सम्पदा की प्राप्ति का एक ही उपाय है-वैराग्य। महर्षि के स्वरों में इस वैराग्य का सूत्र है-
दृष्टनुश्रविक विषय वितृष्णस्य वशीकार संज्ञा वैराग्यम् ॥ 1/15॥
शब्दार्थ - दृष्टनुश्रविक विषय वितृष्णस्य= देखे और सुने गये विषयों में सर्वथा तृष्णा रहित चित्त की; वशीकार संज्ञा = जो वशीकार नामक अवस्था है वह, वैराग्यम् = वैराग्य है।
अर्थात् वैराग्य, निराकाँक्षा की ‘वशीकार संज्ञा’ नामक पहली अवस्था है। ऐन्द्रिक सुखों की तृष्णा में सचेतन प्रयास द्वारा भोगासक्ति की समाप्ति।
महर्षि पतंजलि के अनुसार वैराग्य की दो भाव दशाएँ हैं - 1. साधन वैराग्य, 2. सिद्ध वैराग्य। इन्हें यूँ भी कहा जा सकता है, 1. अपर वैराग्य, 2. पर वैराग्य। इस साधन वैराग्य या अपर वैराग्य को ही वशीकार संज्ञा दी गयी है। इसी का मतलब है देखे और सुने गए विषयों के प्रति वितृष्णा। इनके प्रति भोगासक्ति का न होना। इन विषय भोगों के लिए मन में गहरी निराकाँक्षा। ऐसा होना ही वैराग्य है। इसी से साधना अभ्यास को ऊर्जा मिलती है। प्रकारान्तर से वैराग्य को अभ्यास का ऊर्जा स्रोत भी कहा जा सकता है।
साधकों के मन में प्रायः जिज्ञासा उठती है कि यह वैराग्य सधे कैसे? अभ्यास तो थोड़ा बहुत जैसे-तैसे हो भी जाता है, परन्तु वैराग्य कहीं से भी नहीं पनपता। माला को पकड़े हुए हाथ मनके भले ही खिसकते रहे पर मन काम-काज में बेटी-बेटों में, नाती-पोतों में ही उलझा रहता है। अक्सर देखा यह जाता है कि हर एक की आयु के हिसाब से ये उलझनें अलग-अलग होती हैं। बच्चे अपने साधना अभ्यास के समय कुछ अलग सपने देखते हैं तो किशोर व युवाओं के ख्वाब कुछ और होते हैं। इन सभी में यदि किसी एक तत्त्व की समानता होती है तो वह है सभी में भटकाव। जप करते समय ध्यान करते समय मन यूँ ही भटकता रहता है। रह-रह कर वह इन्द्रिय विषयों, भोग आसक्तियों की कल्पनाओं से घिर जाता है। हममें से किसी के साथ ऐसा होने का मतलब वैराग्य का अभाव है। जो यह कहते हैं कि हमारा जप में ध्यान में मन नहीं लगता तो उन्हें इस सत्य को जान लेना चाहिए कि इसका केवल एक कारण वैराग्य का न होना है।
वैराग्य हो कैसे? परम पूज्य गुरुदेव अपनी व्यक्तिगत चर्चाओं में इस बारे में एक ही बात कहते थे-बेटा! वैराग्य का जन्म विवेक के गर्भ से होता है। अभ्यास तो विवेक के बिना भी हो सकता है, पर वैराग्य कभी भी विवेक के बिना नहीं होता। पहले विवेक होगा तभी वैराग्य सधेगा। विवेक का अर्थ है सही-गलत की ठीक समझ, उचित-अनुचित का सही ज्ञान, नाशवान और अविनाशी तत्त्व का बोध, सत् और असत् की पहचान। ऐसा होने पर ही वैराग्य सधता है। गुरुदेव कहा करते थे कि कोई व्यक्ति जान-बूझकर जहर नहीं खाता, उसी तरह से कोई भी समझदार आदमी कभी भी विषय भोगों में नहीं उलझता।
भगवान् श्री कृष्ण ने भगवद्गीता में साफ तौर पर कहा है- ‘ये हि संर्स्पशजाभोगा दुःख योनव येवते। आद्यन्तपन्तः हि कौन्तेय नतेषु रमेत बुधः॥’ अर्थात् इन्द्रियों के स्पर्श से अनुभव होने वाले जो भी भोग है, वे सबके सब दुःख के स्रोत हैं। ये सभी आदि और अन्त वाले होने के कारण नाशवान हैं। इसलिए विवेकवान लोग इसमें नहीं रमते। यानि कि जो भी विवेकवान है वह हर कीमत पर विषय भोगों से दूर रहेगा। प्रकारान्तर से जहाँ विवेक है वहीं वैराग्य होगा ही। इन दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। सम्भव नहीं है इनमें अलगाव।
भोग चाहे लौकिक हो या अलौकिक सभी निरर्थक है। अर्थपूर्ण केवल आत्मतत्त्व है। अपने सद्गुरु से प्रेम, ईश्वर से प्रेम ही जीवन का सार तत्त्व है। साधना अभ्यास के लिए हमें वैराग्यवान् एवं ईश्वर परायण होना ही पड़ेगा और इसके लिए जरूरी है, साँसारिक दुःखों का बार-बार चिंतन। वैराग्य की सच्ची साधना भगवान् बुद्ध को थी, जिन्होंने सारे राजसी सुखों के बीच रहकर भी यही निष्कर्ष निकाला ‘सब्बं दुक्ख्म्’ - यह सब दुःख ही है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे- वैराग्य साधना है तो भगवान् को पुकारो। उनके शब्दों में काशी की ओर जितना बढ़ो, कलकत्ता उतना ही पीछे छूटता है। यानि कि भगवान् की ओर जितना बढ़ोगे-संसार की आसक्ति उतना ही घटेगी। यह साधन वैराग्य जितना सघन होगा, उतना ही हम डडडडड स द्धवैराग्य की ओर आगे बढ़ेंगे। सिद्ध वैराग्य की व्याख्या महर्षि के अगले सूत्र में है, इसे साधक अगले अंक में पढ़ेंगे।
एक व्यक्ति को कुछ रुपयों की जरूरत थी। साहूकार ने कहा, “तुम संत एकनाथ को क्रुद्ध करके दिखा दो, तो माँगी हुई राशि तुम्हें पुरस्कार रूप में मिल जाएगी।” वह उद्दण्ड संत के पास जा पहुँचा। वे भोजन कर रहे थे। उनकी गोदी में जा चढ़ा। संत ने उसे बाल भगवान समझा और सिर पर हाथ फेरते हुए अपने साथ उसे भी भोजन कराने लगे। यहाँ वह बाजी हार गया तो उसने दूसरी चाल चली। एकनाथ की पत्नी की पीठ पर उनका कंधा पकड़कर लटक गया। धर्मपत्नी ने पीछे को हाथ करके, उसे संभलकर पकड़ लिया और कहा, “मेरा बच्चा भी तो इसी तरह खेलता है। उसे हाथ का सहारा देकर पकड़े रहती हूँ तो तुम्हें उसी तरह क्यों न सँभालूँगी, अपरिचित हो तो क्या?” दोनों चालें बेकार हो जाने पर वह वापस लौटा। कारण मालूम होने पर संत उसके साथ प्रेमवार्ता करते हुए साहूकार के घर तक चले गए और वहाँ पहुँचकर क्रोध का अभिनय करने लगे। शर्त जीतने पर जब रुपये मिल गए तो वे हंसते हुए घर वापस लौट गए।
गुरुगीता में गुरुतत्त्व की अनुभूति समायी है। सद्गुरु भक्तों के लिए सहज-सुलभ यह अनुभूति बुद्धिप्रवणजनों के लिए परम दुर्लभ है। ऐसे लोग अपनी तर्क-बुद्धि से देहधारी गुरुसत्ता को सामान्य मानव समझने की भूल करते रहते हैं। वे सोचते हैं हमारी ही तरह दिखने वाला यह व्यक्ति हमसे इतना अलग और असाधारण किस भांति हो सकता है। जो ठीक हमारी तरह खाता-पीता व सोता है, वह भला किस तरह ईश्वरीय तत्त्व की सघन प्रतिमूर्ति हो सकता है। अनेकों शंकाएँ-कुशंकाएँ उनके मन-अन्तःकरण को घेरे रहती हैं। अनगिनत संदेह-भ्रम उन्हें परेशान करते रहते हैं। मूढ़ताओं का यह कुहासा इतना गहरा होता है कि सूर्य की भाँति प्रकाशित सदगुरु चेतना उन्हें नजर ही नहीं आती। अपनी तर्क प्रवण बुद्धि में उलझकर वे यह भूल जाते हैं कि गुरुदेव तो तर्क से अतीत है। वे महा महेश्वर गुरुदेव बुद्धिगम्य नहीं भावगम्य हैं।
उन भावगम्य भगवान को तर्क से नहीं श्रद्धा से समझा जा सकता है। उन्हें नमन एवं समर्पण से ही इस सत्य का बोध होता है कि वे कौन हैं? गुरु भक्ति कथा की पिछली कड़ी में इसी तत्त्व की अनुभूति कराने की चेष्टा की गई थी। इसमें यह ज्ञान कराया गया था कि गुरुदेव ब्राह्मी चेतना से सर्वथा अभिन्न होने के कारण इन जगत् के परम स्रोत हैं। यह जगत् भी उन्हीं का विराट् रूप है। वे एक साथ महाबीज भी है और महावट् भी। ऊपरी तौर पर हर कहीं-सब कहीं कितना भी भेद क्यों न दिखाई दे, पर गुरुदेव की परम पावन चेतना सभी कुछ अभिन्न और अभेद है। उनके चरण कमलों में आश्रय पाने से शिष्यों के सभी दुःख, द्वन्द्व और तापों का निवारण हो जाता है। उनका प्रभाव और प्रताप कुछ ऐसा है कि महारुद्र यदि क्रुद्ध हो जायँ तो गुरु कृपा से शिष्य का त्राण हो जाता है, परन्तु सद्गुरु के रुष्ट होने से स्वयं महारुद्र भी रक्षा नहीं कर पाते हैं। सद्गुरु चरण युगल शिव-शक्ति का ही रूप हैं। उनकी बार- बार वन्दना करने से शिष्यों का सब भाँति कल्याण होता है।
गुरु नमन की यह महिमा गुरुतत्त्व के विस्तार की ही भाँति असीम और अनन्त है। इसके अगले क्रम को गुरुगीता के महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव -पराम्बा भवानी से कहते हैं-
गुकारं च गुणातीतं रुकारं रुपवर्जितम्। गुणातीत स्वरूपं च यो दद्यात् स गुरुः स्मृतः॥ 46॥
अ-त्रिनेत्रः सर्वसाक्षी अ-चतुबहिरच्युतः। अ-चतुर्वदनो ब्रह्म श्री गुरुः कथितः प्रिये॥47॥
अयं मयाञ्जलिर्बद्धो दयासागरवृद्धये। यद् अनुग्रहतो जन्तुश्र्वित्र संसार मुक्ति माक् ॥ 48॥
श्रीगुरोः परमं रुपं विवेक चक्षुषोऽमृतम्। मन्दभाग्या न पश्यन्ति अन्धाः सूर्योदयं तथा॥ 49॥
श्रीनाथ चरणद्वन्द्वं यस्याँ दिशि विराजते। तस्यै दिशेनमस्कुर्याद् भक्त्या प्रतिदिनं प्रिये॥ 50॥
गुरुतत्त्व की अनुभूति कराने वाले इन महामंत्रों में आध्यात्मिक जीवन का निष्कर्ष प्रकट है। भगवान् महेश्वर की वाणी शिष्यों के समक्ष इस सत्य को उजागर करती है कि गुरुदेव साकार होते हुए भी निराकार हैं। ‘गुरु ‘ शब्द का पहला अक्षर ‘गु’ इस सत्य का बोध कराता है कि त्रिगुणमय कलेवर को धारण करने वाले गुरुदेव सर्वथा गुणातीत है। दूसरे अक्षर ‘रु’ में यह सत्य निहित है कि शिष्यों के लिए रूप वाले होते हुए भी गुरुदेव भगवान् रूपातीत है। यानि कि गुरुवर की चेतना वास्तव में निर्गुण व निराकार है। शिष्य को आत्मा स्वरूप प्रदान करने वाले गुरुदेव की महिमा अनन्त है॥ 46॥ भगवान् सदाशिव के वचन हैं कि तीन आँखों वाले न होने पर भी गुरुदेव साक्षात् शिव हैं। चार भुजाएँ न होने पर भी वे सर्वव्यापी विष्णु हैं। चार मुख न होने पर भी वे सृष्टिकर्त्ता ब्रह्म हैं॥ 47॥ ऐसे दयासागर गुरुदेव को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। उनकी कृपा से ही जीवों को भेद बुद्धि वाले संसार से मुक्ति मिलती है॥ 48॥ श्री सद्गुरु का यह परम रूप उनसे विवेक चक्षु मिलने पर ही दृश्य होता है। तभी उनके अमृत तुल्य रूप का स्पर्श मिलता है। इसके अभाव में जिस तरह अन्धा व्यक्ति सूर्योदय के दृश्य को नहीं देख पाता ॥ 49॥ उन परम स्थायी सद्गुरु के चरणद्वय जिस दिशा में भी विराजते हैं उस दिशा में गुरुगीता में वर्णित यह गुरुतत्त्व बुद्धिगम्य नहीं ध्यानगम्य व भक्तिगम्य है। जिनकी अन्तर्चेतना ने भक्ति का स्वाद चखा है, जो ध्यान की गहराइयों में अन्तर्लीन हुए हैं, उन्हें यह सत्य सहज ही समझ में आ जाता है। इस तथ्य को श्री रामकृष्ण देव के शिष्य लाटू महाराज स्वामी अद्भुतानन्द के उदाहरण से समझा जा सकता है। श्री ठाकुर एवं उनके शिष्य समुदाय की जीवन कथा को पढ़ने वाले सभी जानते हैं कि लाटू महाराज प्रायः अनपढ़ थे। गुरु भक्ति ही उनकी साधना थी। भक्त समुदाय में बहुप्रचलित श्रीरामकृष्ण देव की समाधि लीन फोटो जब बनकर आयी तो श्री ठाकुर ने स्वयं उसे प्रणाम किया। लाटू महाराज बोले-ठाकुर यह क्या, अपनी ही फोटो को प्रणाम। इस पर ठाकुर हँसे और बोले- नहीं रे! मेरा यह प्रणाम इस हाड़-माँस की देह वाले चित्र को नहीं है, यह तो उस परम वन्दनीय गुरुचेतना को प्रणाम है जो इस फोटो की भावमुद्रा से छलक रही है।
श्री ठाकुर के इस कथन ने लाटू महाराज को भक्ति के महाभाव में निमग्न कर दिया। इन क्षणों में उन्हें परमहंस का एक और वाक्य याद आया-‘जे राम जे कृष्ण सेई रामकृष्ण’ अर्थात् जो राम जो कृष्ण वही रामकृष्ण। पर इन सब बातों को अनुभव कैसे किया जाय? इस जिज्ञासा के समाधान में श्री ठाकुर ने कहा-भक्ति से, ध्यान से। इसी से तेरा सब कुछ हो जायेगा। अपने सद्गुरु के वचनों को हृदय में धारण कर। लाटू महाराज गुरुभक्ति को प्रगाढ़ करते हुए ध्यान साधना में जुट गये।
उनकी यह साधना निरन्तर अविराम-तीव्र से तीव्रता एवं तीव्रतम होती गयी। इस साधनावस्था में एक दिन उन्होंने देखा श्री ठाकुर किसी दिव्यलोक में है। बड़ी ही प्रकाश और प्रभापूर्ण उपस्थिति है उनकी। स्वर्ग के देवगण विभिन्न ग्रहों स्वामी रवि, शनि, मंगल आदि उनको स्तुति कर रहे हैं। ध्यान के इन्हीं क्षणों में महाराज ने देखा श्री श्री ठाकुर की पराचेतना ही विष्णु-ब्रह्म एवं शिव में समायी। माँ महाकाली भी उनसे एकाकार है। ध्यान में एक के बाद अनेक दृश्य बदले और लीलामय ठाकुर की दिव्य चेतना के अनेक रूपों का साक्षात्कार होता गया। अपनी इस समाधि में लाटू महाराज कब तक खाये रहे, पता नहीं चला।
समाधि का व्युत्थान होने पर लाटू महाराज पंचवटी से सीधे श्री श्री ठाकुर के कमरे में आये और उन्हें वह सब कह सुनाया जो उन्होंने अनुभव किया था। अपने अनुगत शिष्य की यह अनुभूति सुनकर परमकृपालु परमहंस देव हँसते हुए बोले-अच्छा रे! ऐसा हुआ। तू बड़ा भाग्यवान् है, माँ ने तुझे सब कुछ सच-सच दिखा दिया। जो तूने देखा वह सब ठीक है। फिर थोड़ा गम्भीर होकर उन्होंने कहा- शिष्य के लिए गुरु से भिन्न तीनों लोकों में और कुछ नहीं है। जो इसे जान लेता है, उसे सब अपने आप मिल जाता है। श्री श्री ठाकुर के वचन प्रत्येक शिष्य के लिए महामंत्र है। गुरुभक्त, शिष्यगण श्रद्धा भाव से इसकी साधना करें। अगला अंक गुरु चेतना के अन्य तीन आयामों को उनके सम्मुख प्रकट करेगा।
विधाता ने सृष्टि की रचना के दिनों मनुष्य को अनुदान के रूप में प्रतिभा बाँटी। प्रतिभा के बल पर मनुष्य ने अनेक दिशाओं में उन्नति की और सुख सुविधाओं से भरा पूरा जीवन बिताने लगा। समय ने पलटा खाया, प्रतिभा के पीछे स्वार्थांधता जुड़ गई। फलतः सभी लोभ, पराभव, पतन के गर्त में गिरते चले गए।
समाचार स्रष्टा तक पहुँचा, वे दुःख हुए। स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने देवदूत भेजे। उन्होंने विपत्तियों का कारण समझाया और फिर स्थिति को सुधारने के लिए मनःस्थिति का बदलने, मार्ग दर्शन करने में कुछ उठा न रखा। लोग आदतों के इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि बदलना तो दूर, उल्टे देवदूतों का उपहास उड़ाने और त्रास देने पर उतारू हो गए। विवश होकर वे वापस चले गए। दुर्गतिग्रस्त मनुष्य की दुर्गति दिन दिन अधिक बढ़ती चली गई। अबकी बार मानवों ने स्वयं विधाता से प्रार्थना की और व्यथा का नया उपाय बताने का अनुरोध किया। विधाता ने इस बार और भी बलिष्ठ देवदूत भेजे, पर यह शर्त सुनाई कि जो अपना सहयोग स्वयं करेंगे, उनकी सहायता की जाएगी, उन्हीं के दुःख दारिद्रय दूर होंगे। वही क्रम अब तक चला आ रहा है, दैवी सहायता उन्हीं को उपलब्ध होती है, जो अपनी सहायता आप करते हैं।
धरती पर छायी हरियाली और आसमान में छायी मेघमालाओं के बीच श्रावणी संस्कार एवं संकल्प बन कर बरस रही है। बारह महीनों के अनुक्रम में श्रावण का महीना कुछ विशेष है। धरती और सूर्य के खगोलीय सम्बन्ध पृथ्वी में पड़ने वाले अंतर्ग्रहीय प्रभाव इस महीने को कई विशेषताओं से अलंकृत करते हैं। श्रावण मास समूची प्रकृति को सम्पूर्ण व समृद्ध बनाता है। बाह्य प्रकृति एवं पर्यावरण इस माह जितने संतुलित एवं समृद्ध होते हैं, उतने अन्य महीनों में कभी नहीं हो पाते। मानव की अन्तःप्रकृति की समृद्धि एवं शृंगार के लिए भी इस महीने का महत्त्व कुछ ज्यादा है। अध्यात्म विद्या के विशेषज्ञों ने इस महीने के लिए अनेक तरह के धर्माचरण अनुष्ठान एवं तपश्चर्या के विधान सुझाए हैं।
अध्यात्म तत्त्व के जिज्ञासुओं के लिए श्रावण मास के पल-प्रति-पल का महत्त्व है। आध्यात्मिक जीवन शैली को अपनाने से इस महीने का हर पल न केवल उन्हें संस्कारित करता है, बल्कि संकल्पवान् बनाता है। ये संस्कार कितने प्रबल हुए, संकल्प शक्ति कितनी विकसित हुई? श्रावणी पर्व में इसी की परीक्षा होती है। श्रावण पूर्णिमा के इसी दिन समूचे वर्ष अपनाए जाने वाले आध्यात्मिक अनुशासनों का संतुलन बिठाया जाता है। महानता के महाशिखर पर चढ़ने के लिए नए महासंकल्प किए जाते हैं। अन्तश्चेतना में शुभ संस्कारों की नयी पौध रोपी जाती है।
संस्कार एवं संकल्प यही दो ऐसे तत्त्व हैं जो व्यक्तित्व में ऋषिता को विकसित करते हैं। इन्हीं के अवलम्बन, आश्रय एवं अनुपालन से व्यक्ति ऋषि बनता है। इन दो तत्त्वों, दो सत्यों एवं दो तथ्यों पर ऋषि जीवन शैली का समूचा ढाँचा खड़ा है। आज के दौर में यदि उत्कृष्ट जीवन शैली का अभाव दिखता है तो इसका कारण एक ही है कि ऋषित्व का लोप हो गया है। बढ़ती हुई मानसिक बीमारियाँ, पर्यावरण संकट, अभाव, असफलता से घिरी हुई जिन्दगी केवल यही बात दर्शाती है कि संस्कारों एवं संकल्प के महत्त्व को लोग भूल गए हैं।
अपनी जिस बेशकीमती धरोहर को भारतवासी भुला बैठे हैं, पश्चिमी दुनिया के लोग उसे ही अपनाकर सफलता व समृद्धि की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं। शक्ति गावेन, हैरी एल्डर, रचनात्मक चेतना की भाव गंगा बहा रहे हैं, उसकी सारी शक्ति का स्रोत संस्कार एवं संकल्प ही है। आर्ट ऑफ लिविंग के नाम से जो कुछ भी वर्तमान विश्व में हो रहा है उसका आधार भी ऋषि चिंतन के कर्त्तव्य सूत्र ही हैं। यह अलग बात है कि हम सब आज खुद ही अपनी धरोहर को विस्तृत कर चुके हैं। विज्ञानवेत्ता, समाजशास्त्री एवं मनोवैज्ञानिक सभी एक स्वर से संस्कार एवं संकल्प के महत्त्व को अनुभव कर रहे हैं। सबका कहना यही है कि मानवीय व्यक्तित्व एवं मानवीय समाज को नए सिरे से गढ़ना-ढालना है तो ऋषिचेतना एवं चिंतन को जागृत करना होगा।
संस्कार हमारे व्यक्तित्व में चमत्कारी परिवर्तन करते हैं। व्यक्तित्व की अनेकों गूढ़ एवं रहस्यमयी शक्तियाँ संस्कारों से जागृत होती हैं। संकल्प इन शक्तियों के सही ढंग से प्रकट होने का माध्यम है। इन्सानी जिन्दगी के किसी भी मोड़ पर यदि उन्हें कर लिया जाये तो जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष में बदल जाता है। जिन्हें बचपन से ऋषि जीवन सूत्रों के अनुरूप गढ़ा-ढाला गया हो, उनके सौभाग्य का तो कहना ही क्या? श्रावणी पर्व इसी सौभाग्य दान का महापर्व है।
यज्ञोपवीत परिवर्तन एवं प्रायश्चित के रूप में हेमाद्रि संकल्प इस पर्व के साथ अभिन्न रूप से जुड़े हैं। इन दोनों कार्यों में संस्कारवान्, व्रतशील एवं संकल्पवान् जीवन का तत्त्व ही संजोया गया है। यदि हमने विगत वर्ष को तप साधना एवं व्रताभ्यास के साथ व्यतीत किया है, तो उसमें इस वर्ष कतिपय नये आयाम विकसित करें। श्रेष्ठता की कक्षा को उत्तीर्ण कर श्रेष्ठतर व श्रेष्ठतम की ओर बढ़ें। यदि संयोग से अभी तक हम ऐसा कुछ भी नहीं कर सके हैं, तो इस वर्ष श्रेष्ठता के लिए संकल्पित हों। अटल विश्वास एवं प्रगाढ़ निष्ठ के साथ ऋषि जीवन की राह पर बढ़ें।
श्रावणी पर्व के साथ संस्कार-संस्कृति की रक्षा के संकल्प के साथ नारी जीवन की महिमा-गरिमा भी अनिवार्य रूप से रहती है। आज के भोगवादी दौर में नारी भी भोग का एक साधन बनकर रह गयी है। दूषित दृष्टि एवं कलुषित भावनाओं ने उसकी महिमा को धूल-धुसरित कर दिया है। उपभोक्तावाद ने उसको एक उत्कर्ष ब्राण्ड बनाकर बाजार में परोस दिया है। संस्कार और संवेदना के स्थान पर रूप और सौंदर्य से उसे परिभाषित किया जाने लगा है। इस विकृति की परिष्कृति का अनिवार्य अनुबन्ध भी श्रावणी पर्व के साथ जुड़ा हुआ है।
रक्षा बन्धन इसी अनुबन्ध की पावन संज्ञा है। युवा नर-नारियों में पनपने वाली दूषित दृष्टि को भाई-बहन के पावन सम्बन्धों से ही निर्मल बनाया जा सकता है। युवाशक्ति की सार्थकता इसी में है कि वह नारी की गरिमा का सम्मान करे। उसके संरक्षण एवं विकास में अपना योगदान दे। बहिनें इसी विश्वास के साथ भाई की कलाई में रक्षा सूत्र बाँधती हैं। स्नेह सूत्र के इसी महीने धागों को अनगिन पवित्र भावनाएँ बँधी और पिरोयी रहती हैं। रक्षा संकल्प के इन धागों ने मातृभूमि में इतिहास के कई अमिट लेख लिखे हैं। महारानी कर्मवती व युगल सम्राट हुमायुँ, राजरानी द्रौपदी एवं योगेश्वर कृष्ण की पवित्र भावनाओं की अनेकों गाथाएँ इतिहास और पुराणों के पन्नों में लिखी हैं।
श्रावणी पर्व के गागर में सम्भावनाओं के सागर समाएँ हैं। इसमें अणु में विभु का, स्वराट् में विराट् का, व्यष्टि में समष्टि का, पिण्ड में ब्रह्मांड का दर्शन किया जा सकता है। आज के युग में इसका महत्त्व अतीत की अपेक्षा अनन्त गुना अधिक है। क्योंकि वैज्ञानिक समृद्धि व तकनीकी विकास के दौर में हताश और हतप्रभ जीवन के लिए ऋषि चिंतन के पुनरावर्तन की जरूरत अधिक है। व्यक्तित्व विकसित हो, समाज संस्कारित हो, पर्यावरण समृद्ध हो, नारी जीवन की पवित्रता व अस्मिता सुरक्षित रहे, ये सारे संदेश श्रावणी पर्व में ध्वनित होते हैं। इस पर्व का मनाने का अर्थ है- इन्हें आत्मसात् करना। ऐसा करके ही हम ऋषि जीवन की द्वार पर सफलता पूर्वक चल सकते हैं।
ग्रीस में किलेंथिस नामक एक बालक एथेंस के तत्ववेत्ता जीनो की पाठशाला में पढ़ता था। किलेंथिस बहुत ही गरीब था। उसके बदन पर पूरा कपड़ा नहीं था, पर पाठशाला में प्रतिदिन जो फीस देनी पड़ती थी, उसे किलेंथिस रोज नियम से दे देता था। पढ़ने में वह इतना तेज था कि दूसरे सब विद्यार्थी उससे ईर्ष्या करते थे। कुछ लोगों ने यह संदेह किया कि किलेंथिस जो दैनिक फीस के पैसे देता है, सो कहीं से चुराकर लाता होगा, क्योंकि उसके पास तो फटे चिथड़े के सिवा और कुछ है नहीं। आखिरकार उन्होंने उसे चोर बताकर पकड़वा दिया। मामला अदालत में गया। किलेंथिस ने निर्भयता के साथ हाकिम से कहा कि मैं बिलकुल निर्दोष हूँ। मुझ पर चोरी का दोष सर्वथा मिथ्या लगाया गया है। मैं अपने इस बयान के समर्थन में दो गवाहियाँ पेश करना चाहता हूँ। गवाह बुलाए गए। पहला गवाह था एक माली। उसने कहा, यह बालक प्रतिदिन मेरे बगीचे में आकर कुएं से पानी खींचता है और इसके लिए इसे कुछ पैसे मजदूरी के दिए जाते है। दूसरी गवाही में एक बुढ़िया आई। उसने कहा, मैं बूढ़ी हूँ। मेरे घर में कोई पीसने वाला नहीं है। यह बालक प्रतिदिन मेरे घर पर आटा पीस जाता है और बदले में अपनी मजदूरी के पैसे ले जाता है।
इस प्रकार शारीरिक परिश्रम करके किलेंथिस कुछ आने प्रतिदिन कमाता और उसी से अपना निर्वाह करता तथा पाठशाला की फीस भी भरता। किलेंथिस की इस नेक कमाई की बात सुनकर हाकिम बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे इतनी सहायता देनी चाही कि जिससे उसको पढ़ने के लिए मजदूरी न करनी पड़े, परंतु उसने सहायता लेना स्वीकार नहीं किया और कहा, “मैं स्वयं परिश्रम करके ही पढ़ना चाहता हूँ। किसी से दान लेने के स्थान पर स्वावलंबी बनकर आगे बढ़ना ही मेरे माँ-बाप ने मुझे सिखाया है।”
बाल्यकाल के जीवन में समाविष्ट ये संस्कार ही व्यक्ति को आगे चलकर महामानव बनाते एवं समुदाय को श्रेष्ठ नागरिक देते है।
15 अगस्त राष्ट्र अर्चन का महापर्व है। आज इस शुभ घड़ी में एक अरब से भी अधिक भारतवासियों की उफनती-उमड़ती भावनाएँ राष्ट्र आराधन के लिए तत्पर हैं। चिर अतीत से भारतभूमि के निवासियों के लिए राष्ट्र उपास्य और ईष्ट रहा है। पश्चिमी दुनिया के लिए ‘नेशन’ या ‘स्टेट’ तकनीकी और आर्थिक इकाई भर है। यही कारण है कि वहाँ सभी ओर स्वार्थपूर्ण स्पर्धा व संघर्ष की ही सृष्टि हुई है। जबकि वैदिक ऋषियों ने राष्ट्र को प्रखर साँस्कृतिक चेतना के रूप में विकसित किया। अथर्ववेद की ऋषिवाणी कहती है-
भद्रं इच्छन्त ऋषयः स्वर्विदः तपो दीक्षाँ उपसेदुः अग्ने। ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातम् तदस्मै देवा उपसं नमन्तु॥ - अथर्व. 19/4/19
आत्मज्ञानी ऋषियों ने जगत् का कल्याण करने की इच्छा से सृष्टि के प्रारम्भ में जो दीक्षा लेकर तप किया उससे राष्ट्र का निर्माण हुआ। राष्ट्रीय बल और ओज प्रकट हुआ।
भारतभूमि के महान् महर्षियों ने यहाँ की प्रकृति प्रदत्त विविधताओं को सहज भाव से स्वीकार किया था। साथ ही उन्होंने मनुष्य के अन्तःकरण में स्थित परिष्कृत चेतना को लक्ष्य करके साँस्कृतिक एकता के भाव भरे सूत्रों को विकसित एवं प्रतिष्ठित करने में सफलता पायी। मानवीय चेतना विज्ञान के मर्मज्ञ ऋषियों ने अनुभव किया था कि केवल भौतिक आधारों पर बनाए गए सम्बन्ध टिकाऊ-चिरंजीवी नहीं हो सकते। प्रधानता यदि भौतिक आधारों को ही दी जाए तो पारस्परिक सम्बन्धों में देर-सबेर स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा, संघर्ष, शोषण आदि का समावेश हो ही जाता है। इसीलिए उन्होंने राष्ट्रीय सहअस्तित्व को कालजयी बनाने के लिए साँस्कृतिक आधारों को प्रधानता दी। साँस्कृतिक सूत्रों को उन्होंने जन-जन के भावनात्मक स्तर तक गहराई में बिठाया।
राष्ट्र का शाब्दिक अर्थ है- रातियों का संगम स्थल। ‘राति’ शब्द देने का पर्यायवाची है। राष्ट्रभूमि और राष्ट्रजनों की यह संयुक्त इकाई राष्ट्र इसलिए कही जाती है, क्योंकि यहाँ सभी राष्ट्र जन अपनी-अपनी देन (समर्पण-त्याग की आहुति) राष्ट्रभूमि के चरणों में अर्पित करते हैं। इसी वजह से उनमें राष्ट्र के लिए सर्वस्व त्याग एवं पूर्ण समर्पण की भावना उद्भूत होती है। राष्ट्रभूमि के प्रति प्रेम, सेवा और त्याग का भाव उनमें राष्ट्र निष्ठ बनकर प्रकट होता है। इस निष्ठ की व्याख्या करते हुए पं. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था- ‘जब एक मानव समुदाय के समक्ष-एक लक्ष्य, एक उद्देश्य और एक आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह राष्ट्र कहलाता है।’
डाँ. सम्पूर्णानन्द के अनुसार जब यह माना जाता है कि राष्ट्र का अर्चन आराधन करना चाहिए तो उसका मतलब यह है कि राष्ट्र निवासियों के सामने एक निश्चित लक्ष्य एवं आदर्श होना चाहिए जिसकी प्राप्ति के लिए वह प्रयत्न करे। इन्हीं कारणों से डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के वचन हैं - जो राष्ट्र जीवन रस से भरा है, वह प्रभावों से डरता नहीं है। वह खुली आँखों से जगत् के समस्त पदार्थों, धर्मों, मतों, काव्यों को, चित्रों को देखता है और उन्हें अपनी विशेष दृष्टि से आलोकित करता है। वह औरों के महत्त्व को आत्मसात् करता है और अपने महत्त्व से सभी को प्रभावित करता है।
राष्ट्र अर्चन का महामंत्र देने वाले स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- राष्ट्र अर्चन से श्रेष्ठता और कुछ भी नहीं। हमारे लिए एक ही श्रेष्ठतम देवता है-राष्ट्रदेवता। इसी की अर्चन-आराधना हमारा जीवन व्रत होना चाहिए। स्वामी जी कहते थे, प्रत्येक राष्ट्र का अपना जीवन व्रत है, जो विभिन्न जाति-समूह की सुश्रृंखल अवस्थिति के लिए विशेष आवश्यक है। और जब तक वह राष्ट्र उस आदर्श को पकड़े रहेगा, तब तक किसी भी तरह उसका विनाश नहीं हो सकता।
15 अगस्त जिनकी जन्मतिथि है, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र आराधन के लिए अर्पित कर दिया, उनके लिए राष्ट्र का महत्त्व कुछ विशेष था। उनके शब्द हैं - ‘राष्ट्र हमारी जन्मभूमि है। यह जमीन का टुकड़ा मात्र नहीं है, न ही एक शाब्दिक नाम है, न मन की कपोल कल्पना है। यह एक विराट् शक्ति है, जो लाखों-लाख लोगों की शक्तियों का समन्वय है। प्रत्येक राष्ट्र मानव जाति के अन्दर विकसित होती हुई आत्मा की ही एक शक्ति है जिस शक्ति तत्त्व का मूर्त रूप है, उसी के सहारे वह जीवित रहता है।’
महर्षि अरविन्द के अनुसार- राष्ट्र एक साँस्कृतिक इकाई है। इसलिए राजनैतिक एकता चाहे न भी रहे तो भी राष्ट्र बना रहता है, कठोर प्रयत्न करता है, कष्ट उठाता है परन्तु नष्ट नहीं होता। श्री अरविन्द आश्रम की श्री माँ के शब्दों में - जैसे महिषासुर मर्दिनी भवानी देवों की सम्मिलित शक्ति है। उसी तरह से अपना राष्ट्र भी है। यह केवल एक भूखण्ड भर नहीं है। यह एक चेतन सत्ता है, स्वर्गादपि गरीयसी है। यह तप, शक्ति एवं संभावनाओं को अपने अन्दर धारण करने में उन्हें बीजों की तरह विकसित करने में समर्थ है।
ऐसे महिमामय राष्ट्र का अर्चन-आराधन कैसे करें? इस जिज्ञासा के समाधान में वेद वचन सम्पूर्ण समर्थ है। ऋषिगणों का कथन है कि राष्ट्र को सात महाशक्तियों ने धारण किया हुआ है। राष्ट्र निवासियों में इनका निरन्तर विकास ही राष्ट्र का अर्चन है। अथर्ववेद की ऋचा में इसका वर्णन कुछ इस भाँति है-
सत्यं बहदतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्मयज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पान्युरं लोके पृथिवी न कृणोतु॥ अथर्व. - 12/11
बृहत् सत्य, बृहत् ऋत, उग्रम (क्षात्र शक्ति), दीक्षा, तप, ब्रह्मशक्ति और यज्ञ इन सात महाशक्तियों के आधार पर ही कोई राष्ट्र खड़ा हो सकता है, स्थिर रह सकता है, आगे बढ़ सकता है और सब प्रकार की उन्नति कर सकता है।
इन सात शक्तियों में से प्रथम शक्ति बृहत् सत्य का अर्थ है- राष्ट्रवासी सदाचरण युक्त सत्यान्वेषी व सत्यव्रती हों। ऋतम् बृहत् का अर्थ है- जीवन एवं प्रकृति के नियमों का बोध। यह बोध राष्ट्र वासियों में अनिवार्य है। ऐसा होने से राष्ट्र की सभी संकटों से रक्षा होती है। तीसरी शक्ति उग्रम या क्षात्र शक्ति है। राष्ट्रवासियों में तेज-बल होना चाहिए। राष्ट्र में शूरवीरों की संख्या बढ़ी-चढ़ी हो। दीक्षा राष्ट्र की चौथी शक्ति है। इसका अर्थ है- राष्ट्रीय संकल्प के प्रति राष्ट्रवासियों की सम्पूर्ण निष्ठ। पाँचवीं शक्ति तप है। राष्ट्रीय उन्नति-प्रगति के लिए असह्य कष्ट वरण ही तप है।
ब्रह्म राष्ट्र की छठवीं शक्ति है। यह राष्ट्र की ज्ञान शक्ति है। राष्ट्र वासियों में ज्ञान-प्रतिभा, विशेषज्ञता का विकास ही इस छठवीं शक्ति का अभिवर्धन है। सातवीं शक्ति यज्ञ है। ‘इदं न मम’ का मंत्र ही राष्ट्र को उन्नत बनाता है। लोक हित-जनहित की कामना ही राष्ट्र में यज्ञीय भाव का विस्तार है। इन सातों महाशक्तियों का निरन्तर अभिवर्धन ही राष्ट्र अर्चन है। स्वाधीनता दिवस के पुण्य क्षणों में राष्ट्रवासी यदि राष्ट्र अर्चन के लिए संकल्पित हो सकें तो ही इस पावन दिन की महिमा अपने सम्पूर्ण रूप में प्रकट हो सकेगी।
नारद जी के परामर्श पर स्वायंभुव मनु अपनी दूसरी पुत्री देवहूति कर्दम ऋषि को अर्पित करने के लिए पहुँचे। कर्दम बोले, मेरी शर्त सुन लें। मुझे कामपत्नी नहीं, धर्मपत्नी चाहिए। दाँपत्य काम विकार के लिए नहीं, काम को मर्यादित करने के लिए होता है। मैं एक सत्पुत्र की प्राप्ति के बाद संन्यास धर्म का पालन करूंगा। आपकी पुत्री को यह स्वीकार हो तो ही संबंध होगा।
मनु जी ने कहा, बेटी, यह तो विवाह के पूर्व ही संन्यास की बात करने लगे, किंतु देवहुति भी कम न थी। बोली, कामाँध होकर संसार-सागर में डूबने के लिए गृहस्थाश्रम नहीं है। मैं भी कोई संयमी-जितेंद्रिय पति ही चाहती हूँ।
विवाह हो गया। दोनों के तपस्वी जीवन के प्रतिफल के रूप में कपिल जी उत्पन्न हुए, जो 24 अवतारों में से एक माने गए।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
माध्यम नहीं, लक्ष्य समझना जरूरी
देवियों, भाइयों!विद्यार्थी बी.ए. पास करते हैं, एम. ए. पास करते हैं, पी-एचडी. करते हैं। किससे लिखते हैं? पार्कर की कलम से लिखते हैं। क्या कलम आवश्यक है? हाँ बहुत आवश्यक है, लेकिन अगर आपका यह ख्याल है कि कलम के माध्यम से आप तुलसीदास बन सकते हैं, कबीरदास बन सकते हैं और एम. ए. पास कर सकते हैं, पी-एचडी. पास कर कसते हैं तो आपका यह ख्याल एकाँगी है और गलत है।जब दोनों का समन्वय होगा तो विश्वास रखिए कि जो लाभ आपको मिलना चाहिए वह जरूर मिलकर रहेगा। किसका समन्वय? कलम का समन्वय, हमारे ज्ञान और विद्या, अध्ययन का समन्वय। ज्ञान हमारे पास में हो, विद्या हमारे पास में हो, अध्ययन हमारे पास में हो और कलम हमारे पास में हो, अध्ययन हमारे पास में हो ओर कलम हमारे पास बढ़िया से-बढ़िया हो तो आप क्या ख्याल करते हैं कि उससे आप वह सब पूरा कर सकते हैं? नहीं, पूरा नहीं कर सकते हैं।
इसी तरह अच्छी साइकिल हमारे पास हो तो हम ज्यादा अच्छा सफर कर सकते हैं, लेकिन साइकिल के साथ-साथ हमारी टाँगों में कूबत भी होनी चाहिए। टांगों में बल नहीं है तो साइकिल चलेगी नहीं। सीढ़ी अच्छी होनी चाहिए, जीना अच्छा होना चाहिए ताकि उसके ऊपर चढ़कर हम छत तक जा पहुँचें, लेकिन जीना काफी नहीं है। टाँगों की ताकत भी आपके पास जीना अच्छा बना हुआ है, सीढ़ियाँ अच्छी बनी हुई हैं तो भी आप छत तक नहीं पहुँच सकते।
मित्रों! माध्यमों की अपने आप में एक बड़ी उपयोगिता है ओर उनकी बड़ी आवश्यकता है। मूर्तियाँ किससे बनती हैं? छैनी-हथौड़े से बनती हैं। अच्छा, एक पत्थर का टुकड़ा हम आपको देंगे ओर छैनी हथौड़ा भी देंगे। आप एक मूर्ति बनाकर लाइए। एक हनुमान जी की मूर्ति बनाकर लाइए। अरे साहब! हमने तो पत्थर में छैनी मारी और वह तो टुकड़े टुकड़े हो गया। हनुमान जी नहीं बने? नहीं साहब हनुमान जी नहीं बन सकते। तो आप छैनी की क्या करामात कह रहे थे? फिर आप हथौड़े की करामात क्या कह रहे थे? हथौड़े ओर छैनी की करामात है जरूर, हम इसे मानते हैं। जितनी भी मूर्तियाँ दुनिया में बनी हैं, वे सारी-की-सारी मूर्तियाँ छैनी और हथौड़े से ही बनी है, लेकिन छैनी और हथौड़े के साथ-साथ उस कलाकार ओर मूर्तिकार के मस्तिष्क ओर हाथों को भी सधा हुआ होना चाहिए। हाथ सधे हुए नहीं है, मस्तिष्क सधा हुआ नहीं है और छैनी हथौड़ी आपके पास है तो आप मूर्ति नहीं बना सकते ।
चित्रकारों ने बढ़िया से-बढ़िया चित्र किस माध्यम से बनाए हैं? ब्रुश के माध्यम से ब्रुश से कैसे बनता है? तस्वीरें बनती हैं, पेंटिंग बनती हैं। अच्छा चलिए, हम आपको एक ब्रुश जैसा भी आप चाहे, मँगा सकते हैं और आप एक पेंटिंग बनाकर दिखाइए, एक तस्वीर बनाकर दिखाइए। नहीं साहब, हमसे नहीं बन सकती। हमने आपको ब्रुश दिया था। ब्रुश तो आपने अच्छा दिया था। ब्रुश सही भी था। बिलकुल सही तस्वीरें बनतीं, यह बात भी सही है। चूँकि हमारे पास खाली ब्रुश था, चित्रकला के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए हम उसमें सफल न हो सके और चित्र नहीं बन सका।
क्रियायोग एवं भावयोग
आध्यात्मिकता के दो भाग, दो हिस्से है। एक हिस्सा वह है, जिसको ‘क्रियायोग‘ कहते हैं और दूसरा हिस्सा वह है, जिसको हम ‘भावयोग‘ कहते हैं। क्रियायोग के माध्यम से हमको भावयोग जाग्रत करना पड़ता है। असल में शक्ति इस शरीर में नहीं है, वस्तुओं में नहीं है धूपबत्तियों में क्या ताकत हो सकती है? वह हवा को ठीक कर सकती है। दीपक में क्या ताकत हो सकती है? वह उजाला कर सकता है? नहीं, दीपक जीवात्मा में कोई बल नहीं दे सकता, क्योंकि वह वस्तु है, पदार्थ है, मैटर है, जड़ है। जड़ चीजें हमको फायदा दे सकती हैं, लेकिन चेतना को कोई लाभ नहीं दे सकती। सूर्य नारायण को जो पानी हम चढ़ाते हैं तो क्या वह हमारी आत्मा को बल दे सकता है? नहीं बेटे, सूर्य नारायण को चढ़ाया हुआ पानी उस जमीन को तो गीली कर सकता है, जहाँ पर आपने पानी फैला दिया था। हमारी आत्मा को बल नहीं दे सकता और क्या सूर्य नारायण तक वह जल पहुँच सकता है? नहीं पहुँच सकता। देख लीजिए आपका चढ़ाया हुआ जल जमीन पर पड़ा हुआ है, सूर्यनारायण तो लाखों मील दूर हैं। कैसे पहुँच सकता है।
फिर आप क्या कह रहे थे? बेकार की बातें बताते हैं आप हमको। नहीं बेटे, हम बेकार की बातें नहीं बताते। हम तो ये बताते हैं कि क्रियायोग के माध्यम से भावयोग का जागरण करने का उद्देश्य पूरा होता है। एक मीडियम होता है और एक लक्ष्य होगा है। एक ‘ऐम’ होता है। दोनों को अगर आप दोनों को मिलाकर नहीं चलेंगे तो वही होगा जो आज एकाँगी क्रियायोग से हो रहा है। एकाँगी ‘क्रियायोग‘ आज बादलों की तरह से, आसमान की तरह से, रावण के चेहरे की तरीके से बढ़ाता हुआ चला जा रहा है और प्राण उसमें से निकलता हुआ चला जा रहा है। इससे हर आदमी को शिकायत करनी पड़ती है कि हमारा अध्यात्म से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता और अध्यात्म से कोई लाभ नहीं होता और अध्यात्म से हमको भगवान नहीं मिलते और अध्यात्म से हमको शाँति नहीं मिलती। अध्यात्म से हमें अमुक नहीं मिलता। बेटे, कुछ नहीं मिलेगा, क्योंकि तेरे पास क्रियायोग है। क्रियायोग का उद्देश्य भावयोग का समर्पण है, अगर यह बात आपकी समझ में आ जाए तो आपके कम से-कम रास्ता जरूर मिल जाएगा।
वास्तविकता को समझें
आप भजन करें तो आपकी मरजी, न करें तो आपकी मरजी, लेकिन मैं यह जरूर चाहता हूँ कि आपको वास्तविकता की जानकारी होनी ही चाहिए। अगर आपको वास्तविकता की जानकारी नहीं है तो आप उसी तरीके से अज्ञान में भटकने वाले लोग है, जैसे कि दूसरे लोग और तीसरे लोग अज्ञान में भटकते हैं। आपकी पूजा-उपासना भी अज्ञान में भटकने के अलावा और कुछ नहीं हो सकती है। अगर आपने यह ख्याल करके रखा है कि इस कर्मकांड के माध्यम से, क्रियायोग के माध्यम से आप लक्ष्य को पूरा कर सकते हैं तो यह लक्ष्य पूर नहीं हो सकता। लक्ष्य कैसे पूरा हो सकता है? लक्ष्य को पूरा कौन करता है? आत्मा को भगवान की शक्तियां कहाँ से मिलती हैं? आत्मा क्या होती है? इस पर विचार करना चाहिए। हमारी चेतना ही परमपिता परमात्मा की चेतना के साथ में मिल सकती है। जड़ के साथ जड़ मिल सकता है, आप यह ध्यान रखिए।
मित्रों! चेतना हमारी जीवात्मा है और वह विचारपरक है, भावपरक है, संवेदनापरक है और भगवान? भगवान भी विचारपरक है, भावपरक है और संवेदनात्मक है। दोनों की भावना और विचारणा जिस दिन मिलेगी, उस दिन आपको भगवान के मिलने का आनंद मिल जाएगा। आपको साक्षात्कार का आनंद मिल जाएगा। युगनिर्माण का साक्षात्कार मिल जाएगा। जब तक आप मैटर को मैटर से पकड़ने की कोशिश करेंगे, उस दिन तक अज्ञान में भटकने वाले लोगों में आपका नाम भी लिखा जा सकता है। अज्ञान में भटकने वाले लोग वह हैं, जो आँखों के द्वारा मिट्टी से बने हुए शरीरों को देखने के बारे में ख्वाब देखते रहते हैं कि भगवान जी का साक्षात्कार होना चाहिए। अच्छा साहब! कैसा भगवान जी का साक्षात्कार चाहते हैं। हम तो ऐसे रामचंद्र जी का साक्षात्कार चाहते हैं, जो तीर-कमान लेकर घूमते रहते हों। अच्छा तो शरीर किस चीज का बना हुआ होगा, जो आप देखना चाहते हो? साहब, शरीर ही है, जो मिट्टी-पानी का बनता है, तो आप मिट्टी-पानी के रामचंद्र जी को देखना चाहते हो? हाँ साहब, मिट्टी-पानी के रामचंद्र जी को देखना चाहते है।
और किसको देखना चाहते हो? तीर-कमान वाले को देखना चाहते हो? तीर-कमान वाले को देखना चाहते हैं। तीर-कमान किसका बनता है? बाँस का तीर-कमान धारण करने वाले, मोर-मुकुट पहनने वाले और हाड़-माँस का शरीर धारण करने वाले भगवान को आप देखना चाहते हैं? आप उन्हें किससे देखना चाहते है? आँख से देखना चाहते है। आँखें किस चीज की बनी हुई है? चमड़े की बनी हुई हैं, माँस की बनी हुई हैं। तो आप माँस से माँस को देखना चाहते है? यही मतलब है न आपका? आप मैटेरियल से मैटेरियल को देखना चाहते हैं। प्रकृति से प्रकृति को देखना चाहते हैं। फिर तो आपको भौतिकवादी कहना चाहिए। यह अध्यात्मवाद नहीं हो सकता।
अध्यात्म का मर्म
अध्यात्मवाद क्या होता है? अध्यात्म उस चीज का नाम है, जिसमें वस्तुओं का प्रयोग तो करते हैं, समर्थ चीजों का प्रयोग तो करते हैं, मसलन पानी का प्रयोग, चावल का प्रयोग, अक्षत का प्रयोग, शक्कर का प्रयोग, घी का प्रयोग, धूप का प्रयोग, दीप का प्रयोग आदि वस्तुओं का प्रयोग करते हैं और साथ-ही-साथ कर्मकाँडों का प्रयोग, क्रिया-कलापों का प्रयोग करते हैं। इसमें शरीर को हिला-डुलाकर काम करते हैं, जैसे माला घुमाना आदि। माला किससे घुमाते है, हाथ से घुमाते है, माला किसकी होती है? लकड़ी की बनी होती है। क्या-क्या चीजें होती हैं, जो हाथ से घुमाई जाती हैं? बेटे, यह सब मैटेरियल है, जो मैटेरियल या भौतिक चीजें है, उनके उपयोग का क्या उद्देश्य होना चाहिए? साहब! भौतिक से तो भौतिक चीजें ही मिलेंगी। हाँ बेटे चरखा कातने से अठन्नी मिल सकती है। माला घुमाने से चवन्नी मिल सकती है। महाराज जी! भगवान की बात कहिए न। नहीं बेटे! भगवान से माला का क्या ताल्लुक हो सकता है? तो फिर आप किसलिए माला कराते हैं? माला इसलिए कराते हैं कि आपकी समझ में आ जाए कि किस तरीके से हम अपनी सारी अकल, सारी शक्ति इस बात में झोंकना चाहते हैं।
मित्रो! आप एक बात समझ लें कि जो भी क्रियायोग है, उसका मकसद केवल मनुष्य की भावना का विकास करना है, भावना का परिष्कार करना है। भावना का विकास और परिष्कार करने में, भावना का शोधन करने में, आपकी संवेदनाओं को जागने में अगर हमारी क्रिया सफल होती है तो हमारी साधना भी सफल होती है। अगर हमारी भावना से वे दूर रहते है, भावना को छू नहीं पाते, केवल भौतिक क्रियाकलाप से भौतिक चीजों की कामना में हम डूबे रहते हैं तो यह खाली भौतिकवाद है। भौतिकवाद के लिए हम अलग हैं और अध्यात्मवाद के लिए अलग। भौतिकवाद कीमत के बदले में कीमत चुकाना चाहता है। आप आठ घंटे काम कीजिए, हम आपको छह रुपये चुका सकते है, आप चार घंटे काम कीजिए, हम आपको तीन रुपये दे सकते है। पदार्थ की कीमत पदार्थ है। आपने कितनी माला जपी, उसके बदले में हम आपको उतने पैसे दे सकते हैं। आप चार रुपये रोज कमाते हैं तो फिर एक घंटा और भजन कीजिए हम आपको अठन्नी देंगे। आप अठन्नी ले जाइए। नहीं साहब! हम शाँति चाहते है, सिद्धि चाहते हैं, मुक्ति चाहते हैं और भगवान का अनुग्रह चाहते हैं बेटे, इसका ताल्लुक भावना से है।
कर्मकाँड नहीं, भावना प्रधान
मित्रों! कर्मकाँड, क्रियाकृत्य आवश्यक हैं और वाँछनीय भी, लेकिन आफत तब आ जाती है जब आप कर्मकाँडों को ही सब कुछ मान बैठते हैं और भावना के संशोधन और परिष्कार की जरूरत नहीं समझते। आपको भावना के संशोधन की जरूरत समझनी चाहिए और कर्मकाँडों के माध्यम समझना चाहिए और उसी के अनुरूप उनका उपयोग करना चाहिए। इसके कितने ही उदाहरण मैंने आपको दिए हैं। उदाहरण के लिए, अच्छी चिट्ठी लिखने के लिए, अच्छा लेख लिखने के लिए आपको कलम की जरूरत है। मैंने किससे कहा कि कलम की जरूरत नहीं है। बिना कलम के हम चिट्ठी नहीं लिख सकते। हमारी कलम जब खराब हो जाएगी तो हम चिट्ठी नहीं लिख सकते। इसी तरह जब हमारी जबान में छाले हो जाएंगे तो हम व्याख्यान नहीं कर सकते। इन मीडियमों की, माध्यमों की हमको बेहद जरूरत है।
आपकी जीभ तो है, लेकिन उसके द्वारा आप ज्ञान का आनंद नहीं बता सकते, जो कि एक विकसित एवं परिष्कृत व्यक्तित्व के द्वारा होना चाहिए। तो गुरुजी, हमें भी व्याख्यान सिखा दीजिए जैसा कि आप देते हैं। बेटे, याद कर ले और तू भी वैसा ही व्याख्यान किया कर। महीने पंद्रह दिन में तुझे अभ्यास हो जाएगा। अगर किसी ने पकड़ लिया और कहा कि अमुक विषय पर बोलिए, तब? तब बेटे कह देना कि मैंने इतनी ही नकल की है। अब मैं कहाँ से बोल सकता हूँ। अरे महाराज, आप अपने जैसा विद्वान बना दीजिए। अरे बेटा, यह ज्ञान की साधना है, अक्षरों की नकल करने से नहीं हो सकता।
इसलिए कर्मकाँडों को बावत आपको एक बात साफ−तौर से समझ लेनी चाहिए। कर्मकाँड बेहद जरूरी और बेहद आवश्यक हैं। कर्मकाँड की जमीन-आसमान जैसी आवश्यकता है, लेकिन कर्मकाँड अधूरा और अपंग है। वह कब अधूरा और अपंग है? जब तक उसका हमारे भावना क्षेत्र पर प्रभाव न पड़े और उसका संशोधन न हो। भाव संवेदनाओं की जाग्रति न हो, भावनाओं में कोई हेर-फेर नहीं हुआ हो। भावना और चिंतन हमारा जहाँ का तहाँ बना रहा तो आप विश्वास रखना, आपको हमेशा शिकायत करनी पड़ेगी कि हमारी पूजा बेकार जा रही है। हमारा भजन बेकार जा रहा है। हमारी उपासना बेकार चली गई, हमारा अनुष्ठान बेकार चला गया। यही एक भूल है, जिसकी चट्टान से टक्कर खाकर बहुत सारे जहाज डूब गए। और संन्यास डूब गए। उपासनाएँ डूब गई और सब कुछ डूब गया। लेकिन जिन्होंने टक्कर खाकर यह समझ लिया कि कर्मकाँड काफी नहीं है, वे भवसागर से पार हो गए। कर्मकाँड आवश्यक तो हैं महत्वपूर्ण तो तो हैं, पर काफी नहीं है। वे एकाँगी और अपूर्ण हैं।
साधना : एक समग्र उपचार
मित्रो! आप यह ध्यान रखें कि दोनों का उसी प्रकार घनिष्ठ संबंध है, जिस प्रकार शरीर और प्राण का है। शरीर और प्राण को मिला देने से ही व्यक्ति जीवंत कहलाते हैं। उसी तरीके से भाव संवेदनाओं के परिष्कार एवं विचारणाओं के परिष्कार के साथ-साथ में जप के, पूजा के और उपासना के क्रियाकृत्य, कर्मकाँड जब मिल जाते हैं तो एक समूची बात बन जाती है। मित्रो! हम एक समूचे आदमी हैं। बोलते हैं, चलते हैं, लेकिन अगर प्राण शरीर में से निकल जाए तो हवा में घूमने वाला प्राण आपके किसी काम का नहीं हो सकता। फिर आप कहें कि गुरुजी! जरा व्याख्यान दीजिए। अरे बेटे, हम तो भूत हैं और भूत कैसे व्याख्यान दे सकते हैं? गुरुजी! हम तो आपके पैर छूना चाहते हैं। बेटे, हम तो हवा में घूम रहे हैं, हमारे पैर कैसे छू सकते है? अच्छा साहब! तो गुरुदीक्षा ही दे दीजिए। अरे भाई! हम मरने के लिए बैठे हैं, अब गुरुदीक्षा का समय चला गया। अब तू कैसे गुरुदीक्षा ले सकता है?
मित्रो! मरा हुआ शरीर बेकार है और मरा हुआ प्राण बेकार है। उसी तरह भाव संवेदना के बिना कर्मकाँड-क्रियाकृत्य बेकार हैं। कर्मकाँडों को जीवंत बनाने के लिए भाव संवेदनाओं को जगाने की बेहद आवश्यकता है। हम किसी भूखे-प्यासे, गरीब, दुखियारे के काम आएँ और उसकी सेवा-सहायता करें तो उससे हमारी भाव-संवेदना जाग्रत हो सकती है, परंतु भाव-संवेदना जगाने के लिए कर्मकाँडों की आवश्यकता को भी समझें। नहीं साहब! हम तो बड़े दयालु हैं। अच्छा! आपके अंदर बहुत दया है तो क्या आप किसी के काम आ सकते है? नहीं साहब! हम किसी के काम नहीं आ सकते। हम किसी की सेवा-सहायता नहीं कर सकते। तब फिर आप दयालु कैसे? किस बात के? भाव-संवेदनाएँ भी अपूर्ण है, अगर वे क्रिया कांडों के साथ समन्वित नहीं है। दोनों का समन्वय जरूरी है।
भावनाओं को परिष्कृत करें
मित्रों! अगर हमको दयालु बनना है तो हमें लोगों की सेवा करनी चाहिए,सहायता करनी चाहिए। दुखी आदमी के काम आना चाहिए। उसके प्रति हमारी आँखों में आँसू होने चाहिए। हमारे हृदय में भावनाओं का विकास होना चाहिए। अगर हम अपने भीतर विशालता विकसित करना चाहते हैं। जब हमको ज्ञान इकट्ठा करना है तो किताबों की जरूरत पड़ेगी। ज्ञानवृद्धि के लिए पुस्तकों को पढ़ना आवश्यकता है, लेकिन अगर हमको ज्ञान, बुद्धिं नहीं पढ़ना है हमको नहीं पढ़ना है तो बहुत-सी पुस्तकें लाकर जमा कर लें, उससे कोई लाभ नहीं। देखिए गुरुजी! यह रामायण की किताब, यह भागवत् की किताब, ये वेदों की किताब, चारों वेद हमने आपके यहाँ से मँगाए थे। ये सब रखे हुए हैं। बेटे, बड़ी अच्छी बात है। कोई आएगा तो कह नहीं सकता कि तू वेदपाठी नहीं हो। अच्छा बता, तूने इन्हें पढ़ा है क्या? अरे महाराज जी! पढ़ा-पढ़ा तो क्या, मँगाकर रख लिया है। इससे मेरे घर में बड़ा पुण्य हो जाएगा। नहीं बेटे, इससे क्या पुण्य हो सकता है? ठीक है, तूने हमारी किताब खरीदी। इससे आठ आने हमें मिल गए, तेरी प्रशंसा हो गई। तूने वेदों की पुस्तक मँगा ली, दोनों का उद्देश्य पूरा हो गया। तू अपने घर, हम अपने घर। महाराज जी! तो क्या वेदों का ज्ञान हमें नहीं मिलेगा? नहीं बेटे, कोई ज्ञान नहीं मिलेगा, क्योंकि वेदों को तूने पढ़ा तो है नहीं। (क्रमशः)
हमें घर-घर पहुँचा दें - -परमपूज्य गुरुदेव
परमपूज्य गुरुदेव के मूर्तिमान स्वरूप वाङ्मय को घर-घर पहुँचाने के लिए निष्ठावान परिजनों की आवश्यकता है। जो भाई इस कार्य हेतु अपने को योग्य समझते हो, निम्नलिखित विवरण सहित अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा से संपर्क करें। समयदान की अवधि दो माह की रहेगी। टोलियाँ प्रत्येक माह की 10 तथा 15 तारीख से निकलेगी।
विवरण-नाम-पता, फोन नं. (एस. टी. डी. कोड सहित), शैक्षिक योग्यता, आयु, मिशन से कब जुड़े, मिशन संबंधी योग्यता, आयु मिशन से कब जुड़े, मिशन, मिशन संबंधी योग्यता, पद/व्यवसाय, कब से कब तक का समयदान आदि।
व्यवस्थापक अखण्ड ज्योति संस्थान,
मथुरा
(कम संन्यास-योग नामक गीता के पाँचवें अध्याय की ड़ड़ड़ड़)
विगत अंक की ग्यारहवीं कड़ी में 23, 24 एवं 25वें श्लोक की विस्तार से व्याख्या की गई थी। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति देह के रहते हुए काम-क्रोध के वेग को सहन कर लेते हैं, वे ही अपना व्यक्तित्व सर्वांगपूर्ण बना पाते हैं एवं सही मायने में सुखी नर कहलाने योग्य हैं। मोक्ष मनुष्य को जीवित रहते हुए ही मिल सकता है एवं इसके लिए जितेंद्रित होना जरूरी है। सच्चा सुख परिष्कृत व्यक्ति वाले नर को ही मिलता है। उसके लिए अपनी कामवासना के आवेश तथा क्रोध के आवेश पर नियंत्रण जरूरी है। सयुक्तः स सुखी नरः कहकर योगी को ही योगेश्वर सुखी मानते हैं। वे यह भी कहते हैं कि दमित काम ही क्रोध का कारण बनता है, इसलिए कामबीज का परिष्कार देह रहते ज्ञानबीज में कर लिया जाए, इससे श्रेष्ठ पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) रोकने का और कोई उपाय है नहीं। श्री रामकृष्ण वचनामृत एवं परमपूज्य गुरुदेव के ‘आध्यात्मिक का विज्ञान’ नामक पुस्तकों के उद्धरणों से इस बात की पुष्टि की गई है। आत्मा में मग्न योगी परब्रह्म परमात्मा के साथ एकात्मता स्थापित कर ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होता है, यह बात भी भगवान कह जाती हैं। अपने भीतर अनंत आनंद की अनुभूति करनी हो तो बहिर्मुखी से अंतर्मुखी बनना ही होगा। ऐसे योगी साधक, जिनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, वासना क्षीण हो जाती है, रूप बदल लेती हैं, संशय भी निकल जाते हैं तथा जो जितेंद्रित होते हैं, ये तीनों श्लोक संक्षेप में हमें दिव्यकर्मी, सेवाभावी, समाजशिल्पी बनने का आमंत्रण देते हैं। ऐसे ही प्रकाशस्तंभों की आज सर्वाधिक जरूरत भी है। यहीं विगत विचार शृंखला का समापन किया था।
एक विहंगावलोकन
पाँचवें अध्याय का शुभारंभ कर्मसंन्यास व कर्मयोग संबंधी अर्जुन की जिज्ञासा से हुआ था। कर्मयोग से संन्यास तक की चर्चा करते हुए 24वें श्लोक में हम ज्ञान की पराकाष्ठा कर पहुँच जाते हैं। वे कहते हैं कि पंडितजन-विद्वत्जन संन्यास और कर्मयोग को एकसमान फल देने वाला मानते हैं। श्रेष्ठ दिव्यकर्मी बनने के लिए जितेंद्रिय विशुद्ध अंतःकरण वाला बनकर आसक्ति रहित कर्म करने वाला स्वयं को स्थापित करना होगा। अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञान की प्राप्ति एवं उसी परब्रह्म में स्थित होकर मोक्ष को, अनंत सुख को प्राप्त हो जाता है। अब आगे के श्लोकों में (26वें में) भगवान ब्रह्मवेत्ता, मोक्ष को प्राप्त दिव्यकर्मी को प्राप्त होने वाली उपलब्धियों की, तदुपराँत ध्यानस्थ होकर मुक्त होने तथा अंत में परमात्मतत्व से साक्षात्कार प्राप्त होने की चर्चा कर इस अध्याय का समापन करते हैं।
छब्बीसवाँ श्लोक इस प्रकार है-
कामक्रोधवियुक्कतानाँ यतीनाँ यतचेतसाम्। अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तंते विदितात्मनाम्॥ -5/26
इसका शब्दार्थ करके देखें-
काम-क्रोध आदि विकारों से मुक्त (कामक्रोध-वियुक्तानाँ), संयत चित्त वाले (यतचेतमाम्) आत्मज्ञ (विदितात्मनाम्), यतिगणों को (यतीनाँ) शरीर छोड़ने से पहले एवं बाद में (अभितः) ब्राह्मी स्थिति की अवस्था में निर्वाण की (ब्रह्मनिर्वाणं) प्राप्ति होती है (वर्तते)।
पूरे श्लोक का भावार्थ हुआ-आत्मज्ञानी जिनने काम-क्रोध से मुक्ति पाई है, जिनका चित्त जीता हुआ है, जिनकी इंद्रियाँ और मन नियंत्रण में हैं, ऐसे साधकगण ही इहलोक और परलोक में ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होते हैं अर्थात् शाँत, परब्रह्म परमात्मा से साक्षात्कार करते हैं।
ब्राह्मी स्थिति में मोक्षपद की प्राप्ति
ब्रह्मनिर्वाण की चर्चा योगेश्वर श्रीकृष्ण विगत दो श्लोकों से कर रहे हैं, जिनकी विस्तार से व्याख्या विगत अंक में की जा चुकी है। आत्मस्वरूप ब्रह्म में स्थिर होकर मोक्ष लाभ प्राप्त करना ब्रह्मनिर्वाण कहलाता है। यह एक प्रकार का पद है, जिसे पाने की हर मनुष्य में अभिलाषा होनी चाहिए। ब्राह्मी स्थिति में निर्वाण-मोक्ष की प्राप्ति ही हमारा लक्ष्य हो, यह श्रीकृष्ण चाहते हैं। इसके लिए वे पहले ही बता चुके हैं कि ऐसे व्यक्तियों के सभी पाप (वासनाएँ) नष्ट हो जाने चाहिए, संशयों की निवृत्ति ज्ञान के द्वारा हो जानी चाहिए, इंद्रियाँ उनके अपने वश में होनी चाहिए तथा उन्हें सबके कल्याण के लिए निरंतर निष्काम कर्म में निरत हो जीवन जीना चाहिए। ऐसा होने पर वे इसी जीवन में मोक्ष-लाभ (जीवनमुक्ति, बंधनमुक्ति) प्राप्त करते हैं।
अब इस छब्बीसवें श्लोक में उनका कथन है कि शरीर छोड़ने से पूर्व या बाद में ब्रह्मनिर्वाण पाना है, परब्रह्म परमात्मा से साक्षात्कार करना हो तो कुछ अनिवार्य तप प्रधान शर्तें हैं, जिन्हें पूरा करना ही होगा। ये हैं-
काम, क्रोध आदि विकारों से मुक्ति पा लेना।
संयत चित्त वाला (चित्त पर विजय प्राप्त) होना।
आत्मज्ञ पुरुष होना (आत्मसत्ता की जानकारी, आत्मज्ञान होना)।
ये तीनों शर्तें पूरी करते ही हम यती-योगी की उपाधि पा लेते हैं। तब हमें बंधनों से मुक्ति से कोई रोक नहीं सकता। हो सकता है, वह शरीर रहते मिल जाए, हो सकता है, मृत्यु के बाद मिले, परंतु यह सुनिश्चित है कि हम निश्चित ही परब्रह्म परमात्मा से साक्षात्कार कर शाँति पा सकेंगे, लौकिक कोलाहल से मुक्ति पा सकेंगे और उस अभीष्ट पद को प्राप्त कर सकेंगे, जिसके लिए हमारा जन्म हुआ है।
यती बनने की अनिवार्य शर्त
धीरे-धीरे कर्मयोग के दर्शनपक्ष की चर्चा करके श्रीकृष्ण अब उसके व्यावहारिक पक्ष पर आ रहे हैं और अधीर अर्जुन को इन अंतिम उपसंहार के श्लोकों में कर्मयोग संपन्न करते-करते ध्यानयोग की ओर प्रवृत्त होने का शिक्षण दे रहे हैं। इससे आगे के दो श्लोक उसी ध्यानयोग की भूमिका बनाते हैं एवं छठा अध्याय हमें विस्तार से उस दिशा में ले जाता है, इसलिए वे बार-बार जोर देते हैं कि यतीगणों को (योगीजनों को) जिन्हें ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करना है, पहली जिस बात पर ध्यान देना चाहिए, वह है, वासनाओं को क्षीण बनाकर, उन्हें परिमार्जित कर काम-क्रोधरूपी विकारों से मुक्ति पा लेना। वासनाओं के जीवित रहते योग सधेगा कैसे? ध्यान को कैसे पाएगा? कामबीज को ज्ञानबीज में बदलना अत्यधिक अनिवार्य है। साधनापथ की यह पहली शर्त है। यों तो संभोग से समाधि से लेकर तरह तरह के आधुनिक ‘योगा’ के शॉर्टकट निकल आए हैं, पर उनसे कुछ उपलब्धि नहीं होने वाली। होगी कब? जब अपना मन संयत (यतचेतमसाम्) होगा। चित्त नियंत्रित हो तो कोई भी बहिरंग की उत्तेजना अंदर प्रवेश कर शाँति भंग नहीं कर सकती।
श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं, “शुद्धात्मा निर्लिप्त होते हैं। ईश्वर में विद्या और अविद्या दोनों हैं, पर वे निर्लिप्त हैं। वायु में कभी सुगंध मिलती है और कभी दुर्गंध, परंतु वायु निर्लिप्त है। व्यासदेव यमुना पार कर रहे थे। वहाँ गोपियाँ भी थीं। वे भी पार जाना चाहती थीं, दही, दूध, मक्खन बेचने के लिए। वहाँ नाव न थी। सब सोचने लगे, कैसे पार जाएँ। इसी समय व्यासदेव लगभग सब साफ कर गए। फिर व्यासदेव ने यमुना से कहा, ‘यमुने, अगर मैंने कुछ भी न खाया हो तो तुम्हारा जल दो भागों में बँट जाए। बीच से राह हो जाए और हम लोग निकल जाएँ।’ ऐसा ही हुआ। यमुना के दो भाग हो गए। उस पार जाने की राह बीच से बन गई। इसी रास्ते से गोपियों के साथ व्यासदेव पार हो गए।” समझाते हुए ठाकुर कहते हैं, “मैंने नहीं खाया, इसका अर्थ यही है कि मैं वही शुद्धात्मा हूँ। शुद्धात्मा निर्लिप्त है, प्रकृति के परे है। उसे न भूख है, न प्यास। न जन्म है, न मृत्यू। वह अजर, अमर और सुमेरुवत है। जिसे यह ज्ञान हुआ, ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हुई, वही जीवनमुक्त है। वह ठीक समझता है कि आत्मा अलग है। देह अलग। ईश्वर के दर्शन करने पर देहात्म बुद्धि नहीं रह जाती।”
अशक्ति व तनाव से मुक्ति का एकमेव उपाय
ठाकुर श्री रामकृष्ण की अमृतवाणी से स्पष्ट हो जाता है कि वास्तविकता क्या है। हमें अगर मुक्ति पानी है तो इस स्तर की पात्रता विकसित करनी ही होगी। किसी भी साधक की यह महत्वाकाँक्षा होती है। सारी जिंदगी एक आम आदमी की, विषयों के पीछे भागने में नष्ट हो जाती है, शक्ति क्रमशः नष्ट होती रहती है। असंख्य कामनाओं की तुष्टि ही हम सबके जीवन का एकमेव उद्देश्य बन गया है। शक्ति के नष्ट होने से दुखों की प्राप्ति होती है। घोर मानसिक यातना सहन करनी होती है। तनावमुक्त जीवन जीकर भी व्यक्ति अपनी कामनाओं की पूर्ति का प्रयास करता रहता है। शरीर की शक्ति भी क्रमशः क्षीण होती चली जाती है। अशक्ति उसे धर दबोचती है। आज के हर युवा की यही कहानी है। ऐसा ही युवा योद्धा अर्जुन भी है, परंतु वह योगेश्वर श्रीकृष्णरूपी गुरु को पाकर स्वयं को सौभाग्यशाली भी अनुभव कर रहा है तथा अपने सामने आध्यात्मिक स्तर की दिव्य संभावनाएँ भी साकार होती देख रहा है। गहन ध्यान द्वारा ब्रह्मसाक्षत्कार कैसे किया जा सकता है, यह सब श्रीकृष्ण उसे बता रहे हैं।
ब्रह्मनिर्वाण की चर्चा के तुरंत बाद दो श्लोक ऐसे आते हैं जो हमें ध्यान का स्वरूप बताते हैं। साथ ही वह योगी को मुक्त रहने का उपाय भी सुझाते हैं। यद्यपि यह सब विस्तार से अगले अध्याय ‘आत्मसंयम योग‘ में आया है, पर यहाँ दो श्लोकों द्वारा श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय शिष्य को उसकी एक झलक मात्र दिखा दी है। श्लोक इस प्रकार हैं।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्याँश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥ 5/27-28
अब इनका शब्दार्थ देखें-
बाहरी (बाह्यान्) स्पर्श-शब्दादि विषय-संयोग (स्पर्शान्) मन से बाहर ही रखकर (बहिः कृत्वा) चक्षुओं को (चक्षुः) भ्रुमध्य मार्ग में (भ्रुवो अन्तरे एव) (स्थापयित्वा-स्थापित करके) नाक के भीतर संचरित (नासा-अभ्यन्तरचारिणौ) प्राण और अपान वायु को (प्राणापानौ) समभाव से स्थिर रखकर (समौ कृत्वा), इंद्रिय, मन और बुद्धि को संयत रखकर (यत-इन्द्रिय-मनः-बुद्धि), इच्छा, भय, क्रोध से रहित होकर (विगत इच्छा-भय-क्रोधः), मोक्ष की इच्छा रखने वाले (मोक्षपरायणः) जो (यः) मुनि (मुनि) है, वह सदा मुक्त ही हैं (सः सदा मुक्तः एव)॥ 4/27-28
भावार्थ हुआ-बाहर के विषयभोगों का चिंतन न कर उन्हें मन से बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी मध्य में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके, जिसकी इंद्रियाँ मन और बुद्धि जीती हुई हैं, ऐसा मोक्षपरायण मुनि (सतत परमेश्वर के स्वरूप का मनन करने वाला,) जो इच्छा, भय, क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है।
सूत्र रूप में ध्यान की विधि
ऐसा लगता है कि मोक्ष-जीवनमुक्ति-ब्रह्मनिर्वाण की सैद्धाँतिक व्याख्या करते-करते श्रीकृष्ण एकदम विधि पर क्यों आ गए? कहीं यह विषयाँतर तो नहीं? नहीं ऐसा नहीं है। यह मुक्त होने का उपाय उनने सूत्र रूप में यहां बता दिया है। वे क्रमशः अर्जुन की जिज्ञासा जाग्रत कर रहे हैं, जो छठे अध्याय में उसके मन की वेदना ‘चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्’ के रूप में व्याख्या करके बताया गया है। ये सभी मन को समाधि की ओर ले लाने वाली प्रक्रियाएँ हैं, जिनका लक्ष्य मोक्ष है। संपूर्ण कर्म चैतन्य के त्याग को एवं परब्रह्म में अपनी सत्ता के संपूर्ण अस्तित्व को लय करने को मोक्ष कहते हैं।
ब्रह्मसाक्षात्कार कैसे?
जब साधक अपने मन की इच्छाओं, कामोद्वेगों पर नियंत्रण प्राप्त कर अपना पूरा ध्यान चैतन्य की गहन अवस्थाओं की ओर मोड़ेगा तब ही ब्रह्मसाक्षात्कार कर पाएगा। ध्यान सबसे महत्वपूर्ण तरीका है अपने आपे से अपने अंदर बैठे परब्रह्म से साक्षात्कार करने का। श्रीरामकृष्ण परमहंस कहते हैं, “ मैं और परब्रह्म एक ही हैं, यह जानना ज्ञानी का उद्देश्य होना चाहिए। माया के कारण ही वह यह तत्व नहीं जान पाता।” हर किसी का ध्यान विधिमात्र बताने से नहीं लगेगा। जिसने इंद्रियां, मन, बुद्धि जीत ली हैं, जो इच्छा, भय और क्रोध से रहित है, ऐसा मोक्ष की इच्छा रखने वाला सतत परमात्मा के स्वरूप का मनन करने वाला ही मुक्ति का, ध्यान की सफलता का, परब्रह्म से साक्षात्कार का सही अधिकारी है, परंतु यह श्लोक श्रीकृष्ण का अंतिम वाक्य नहीं है इस अध्याय में। आखिरी बात, परम वचन तो उस महावाक्य के रूप में है, जो अंतिम उनतीसवें श्लोक के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। सारे कर्मयोग का मर्म बताता है तथा पुरुषोत्तम के स्वरूप को स्पष्ट करता है।
भोक्तारं यज्ञतपसाँ सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानाँ ज्ञात्वा माँ शान्तिमृच्छति॥ -5/29
शब्दार्थ को समझे-
(समाहित चित्त योगी) मुझे (माँ) यज्ञ और तपस्या का फलभोक्ता (यज्ञतपसाँ भोक्तारं) समस्त लोकों का महेश्वर (सर्वलोक-महेश्वर) तथा सभी प्राणियों का परम उपकारी, निस्स्वार्थ दयालु (सर्वभूतानाँ सुहृदं) जानकर (ज्ञात्वा) परमशाँति प्राप्त करते हैं (शाँतिं ऋच्छति) अर्थात् जब (ऊपर बताए वर्णनानुसार समाहित चित्त योगी) साधक मुझ श्रीकृष्णरूपी भगवान का सभी यज्ञों और तपों का भोक्ता, समस्त लोकों का महेश्वर तथा सभी प्राणियों का परम मित्र दयालु जान लेता है तब वह परमशाँति रूपी मुक्ति का प्राप्त होता है। (5/29)
सर्वलोक महेश्वरम्
अब जरा इस श्लोक की महिमा समझें। यह श्री गीताजी के माध्यम से श्रीकृष्णरूपी पुरुषोत्तम के मुँह से निकला महावाक्य है। ब्रह्मनिर्वाण रूपी शाँति तभी मिलेगी, जब जीव का विराट पुरुष का ज्ञान भी हो कि वह कैसा है। श्रीकृष्ण पूरी गीता में स्थान-स्थान पर अहं, माम् आदि शब्दों का प्रयोग करते दिखाई देते हैं । वहाँ उनका अभिप्राय उन्हीं भगवान परमेश्वर से है, जो शक्ति और कर्म के स्वामी है, परात्पर पुरुष हैं, पार्थ-सारथी रूप में इस महायुद्ध में अवतरित हुए हुए हैं एवं सभी जीवों के ईश्वर हैं। वे चूँकि सभी यज्ञों और तपों के भोक्ता हैं, इसलिए मुक्ति की इच्छा रखने वाले पुरुष को सब कर्मों का यज्ञीय भाव से तपश्चर्या मानकर करना चाहिए। वे सर्वलोक महेश्वर हैं। वे सबके सुहृद हैं, निस्स्वार्थ दयालु एवं प्रेमी है, इसीलिए वही मुनि कहे जाने योग्य हैं, जो ऐसा ही व्यवहार सभी जीवों से करता है। सब भूतों के कल्याण हेतु, सन्मार्ग की प्रेरणा हेतु ही जिसका जीवन है। ऐसे अक्षर पुरुषोत्तम भगवान के साथ एक होने पर वह मानवमात्र से दिव्य प्रेम कर सकता है।
युगप्रवर्त्तन का कर्मयोग
योगधर्म को युगसाधना समझाने वाला ही सच्चे अर्थों में मुनि है, सच्चा संन्यासी है। परमपूज्य गुरुदेव ने हमें युगप्रवर्त्तन के कार्य में इसी कारण लगाया। स्वयं उनने कठोर साधना की, चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री अनुष्ठान (लगभग साठ करोड़ गायत्री मंत्र जप) संपन्न किए एवं हम सभी को भी न्यूनतम गायत्री साधना से जोड़कर आराधना में, कर्मयोग में प्रवृत्त कर दिया। गीता में भगवान अर्जुन को पहचानते हैं कि उसका धर्म संन्यास नहीं है। कुसमय का कच्चेपन का वैराग्य गड़बड़ी पैदा करता है। कभी वह कहता है कि युद्ध नहीं करूंगा, संन्यास ले लूँगा। श्रीकृष्ण अर्जुन के मन से वैराग्य का भूत भगाने की कोशिश कर रहे है। इसीलिए कर्मयोग की महत्ता समझाते हुए उसे परब्रह्म की सत्ता के प्रति समर्पित हो यज्ञीय भाव से कर्म करने को कह रहे हैं। यही पूज्यवर ने किया। उनने भी हमारे मनों को पढ़ा हमें युगधर्म निभाने को कहा। इस युग में प्रज्ञा अभियान को गति देना, विचार क्राँति अभियान को तीव्र विस्तार देना, यही सबसे बड़ी सेवा है। यही कुरुक्षेत्र का महाभारत है। इसमें लगकर युद्ध में विजयी होना सभी का लक्ष्य हो। इसीलिए जटिल साधनाओं के जंजाल में न उलझाकर परमपूज्य गुरुदेव ने हम सभी को ज्ञानयज्ञ रूपी युगधर्म संपन्न करने को कहा।
इस श्लोक की थोड़ी विस्तार से इसी संदर्भ में व्याख्या एवं पूरे अध्याय का एक सार-निष्कर्ष आगामी अंक में पढ़ेंगे। फिर हम छठे अध्याय की ओर बढ़ेंगे जो कि अंतिम तीन श्लोकों (पाँचवें अध्याय के) का ही विस्तार है।
अमेरिका के राष्ट्रपति एण्ड्रयू जैक्सन की माता को एक जहाज पर नर्स के रूप में विदेश जाना पड़ा। तब जैक्सन चौदह वर्ष के थे। माता ने अपने पुत्र को एक बहुमूल्य संदेश भेजा, जिसमें लिखा था, “जैक्सन, यदि मैं जीवित वापस न लौटूँ तो जिंदगी भर मेरी एक बात याद रखना, इस संसार में हर मनुष्य को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है। आगे बढ़ने के लिए सच्चे दोस्तों की जरूरत पड़ती है और वे उन्हें ही मिल सकते हैं, जो स्वयं ईमानदार हैं।”
उन्होंने जीवनभर अपनी माता के इस अंतिम उपदेश को याद रखा एवं यही उनकी सफलता का मूल मंत्र बन गया।
साधना सहचरी का आगमन
सितंबर 1927 में श्रीराम ने सोलह वर्ष पूरे कर लिए। ननिहाल पक्ष ने (अलीगढ़) में पंडित रूपराम शर्मा की कन्या का सुझाव दिया। नाम था सरस्वती देवी। ताई जी अपने भाई के साथ भावी वधू को देखने तुरंत चल पड़ी, “गोमाता की सेवा कर लेती हो बेटी।” कन्या ने कुछ जवाब नहीं दिया। शील और लज्जा से वह नीचे देखने लगी। रूपराम जी ने जवाब दिया, “ खूब पूछा बहन जी, सरस्वती को गोसेवा के अलावा कुछ और अच्छा नहीं लगता।” घर-परिवार सँभालने और स्वभाव आदि के बारे में ताई जी ने ज्यादा बात नहीं की। उनका मानना था कि कन्याओं को किसी भी वातावरण में ढाला जा सकता है। स्वभाव से वे बुरी नहीं होती। बहुओं को ससुराल के लोग ही परायापन अपनाकर बिगाड़ते हैं।
पं. रूपराम और गाँव के दो-तीन रिश्तेदार आंवलखेड़ा भी आए। उन्होंने श्रीराम को देखा। पैतृक संपदा इतनी ज्यादा थी कि खाने-कमाने की चिंता ही नहीं करनी थी। पूजा पाठ में श्रीराम की प्रवृत्ति और निष्ठा तो उन सबको बहुत पसंद आई। रूपराम जी को पूजा-कक्ष के मंदिर जैसा वातावरण बहुत भाता है। शिव-पार्वती की आराधना प्रतिदिन करती हैं। पाँच वर्ष की थी, तभी से शुरू कर दिया था।” इतना कहकर पंडित रूपराम रुके। श्रीराम और उनकी बालसेना के सदस्यों का सुराजी कार्यक्रमों में हिस्सा लेना उन्हें पसंद नहीं था। आपत्ति की,” काँग्रेसियों के साथ रहना और आँदोलन चलाना थोड़ा जोखिम का काम है, कल को कुछ भी हो सकता हैं। बच्चों क्या करेगी?”
इस आपत्ति की काट निकालते हुए ताई जी ने कहा, “होने को तो कही भी, किसी को भी, कुछ भी हो सकता है। उस हालत में क्या करेंगे? स्वराज आँदोलन में मालवीय जी महाराज तक और गाँधी जी सभी शामिल हैं। आगरा मथुरा के बड़े ठिकानेदार लोग भी आँदोलन में शामिल है। यह तो गर्व करने लायक बात है।” ताई जी की बात सुनकर रूपराम जी का समाधान हुआ।
वाग्दान आदि की रस्म तुरंत संपन्न हो गई विवाह की तिथि भी उसी समय निश्चित कर ली गई। कार्तिक पूर्णिमा के दिन आंवलखेड़ा से बारह व्यक्ति बारात लेकर गए। वहाँ सादगी से विवाह संस्कार संपन्न हुआ। शास्त्रों में जिसे ब्राह्म विवाह कहा जाता है, उस श्रेणी का। दहेज में दो गायें और वर-वधू के लिए दो-दो जोड़े कपड़े दिए गए। बारातियों की आवभगत अच्छी की गई, लेकिन कोई धूम-धड़ाका नहीं हुआ। कोई बड़ा सहभोज भी नहीं हुआ। गाँव में अपने वर्ग-समुदाय के बीस-पच्चीस परिवार थे। उन्हें ही भोजन पर आमंत्रित किया गया। रूपराम जी की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी। शान-शौकत में कोई कमी नहीं रहने देते, लेकिन विवाह तय होते समय ताई जी ने साफ शब्दों में कह दिया था कि इस शुभ अवसर पर फिजूलखरची न की जाए। विवाह सादगी से संपन्न हो।
विवाह के बाद भी तप
आँवलखेड़ा लौटते ही श्रीराम की दिनचर्या पहले की तरह सहज हो गई। विवाह संस्कार और दूसरे रस्म-रिवाज पूरे करने में चार दिन लग गए थे। इस अवधि में निर्धारित जप पूरा नहीं हुआ। चार दिन तक तीन साढ़े तीन घंटा ही बैठ पाए। छूटा हुआ जप पूरा करने के लिए श्रीराम ने तीन दिन कोई और काम नहीं किया। सिर्फ जप ही करते रहे। स्नानादि के अलावा किसी और काम के लिए पूजागृह से भी बाहर नहीं निकले चौथे दिन जप पूरा हो गया तो निश्चित होकर बैठे। पत्नी ने आकर चरण स्पर्श किए। सहधर्मिणी की ओर देखा वधू बनकर घर आने के शुरू दिन से सरस्वती देवी प्रणाम करती थीं। चरण नहीं छू पाती थीं, क्योंकि श्रीराम स्नान, पूजा और बाहर आकर आहार लेकर तुरंत पूजागृह में लौट जाते थे। नववधू उन्हें दूर से ही देखती और प्रणाम कर लेती थी। चौथे दिन उन्हें चरणस्पर्श का अवसर मिला था।
ताई जी भीतर किसी और कक्ष में थीं। श्रीराम ने अपनी सहधर्मिणी से बैठने के लिए वे नीचे जमीन पर बैठ गई। “जमीन पर मत बैठिए”, कहते हुए श्रीराम उठे और पास ही रखा दूसरा आसन बिछा दिया। कहा, “आसन पर बैठिए। “पत्नी संकोच करती हुई आसन पर बैठी। “यहाँ ठीक लग रहा है, कोई असुविधा तो नहीं”, जैसी बातें पूछने के बाद उन्होंने कहना शुरू किया, “तुम विवाह कर आ गई हो, विधि ने हमारे भाग्य में दंपत्ति होना लिखा था, हो गए। लेकिन तुम्हें आगे चलकर बहुत कष्ट उठाने पड़ सकते हैं। हमारे जिम्मे भगवान ने कुछ ऐसे काम सौंपे है कि हम घर गृहस्थी को शायद ठीक से सँभाल न पाएँ। तुम पर भी ध्यान देने से चूक हो जाए। उस स्थिति के लिए अपने मन को तैयार रखना।’
सरस्वती देवी ने कहा, “ये सब बातें विवाह से पहले तय करनी थीं। अब क्या?” इस वाक्य से लगा कि जैसे उलाहना दिया जा रहा हो, लेकिन वैसी बात नहीं थी। उन्होंने कहा, “पिताश्री ने आपके साथ हमें विदा कर दिया तो यह भगवान की ही इच्छा है। भोलेनाथ ने आपके साथ धर्म निभाने का ही आदेश दिया, हम नहीं जानते कि आगे क्या कष्ट या सुख मिलने वाले हैं। अपना धर्म निभाएँ, यह सबसे बड़ी प्रसन्नता है।”
श्रीराम ने पूछा, “क्या है आपका धर्म?” उधर से उत्तर आया, “स्त्री होने के नाते आपके चरणों की सेवा आप तपस्वी हैं, भगवान के प्रिय हैं, यह मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आपके रूप में हमें अपने आराध्य (शिव) ही मिल गए।” पत्नी का मन या आश्वासन पाकर श्रीराम के मन से एक बोझ कम हुआ। वह समझ रहे थे कि पत्नी को यहाँ के परिवेश और मुझ जैसे पति को निभाने में बड़ी भारी अड़चन होगी। वैसा कुछ नहीं था।
ताई जी को आती देख नववधू अपने आसन से उठ गई। भीतर जाकर वे अपना काम देखने लगीं। ताई जी ने कहा, “मायके वाले बहू को लिवाने आ रहे हैं, एक बार तो बिटिया कुछ समय के लिए अपने यहाँ जाती ही है। श्रीराम ने सुनकर कोई जवाब नहीं दिया। वे चुपचाप उठकर बाहर आ गए। अपनी बालसेना के सदस्यों को ढूँढ़ने लगे। कुछ दिन तक संपर्क नहीं रखने से वे सभी यहाँ वहाँ हो गए थे। कोई नया कार्यक्रम नहीं छेड़ा था। पहले तैयार किए पोस्टर ही आस-पास के गाँवों में चिपका रहे थे। एक दूसरे को बताने के क्रम से शाम तक सभी सदस्यों के पास सूचना पहुँच गई
हर बीमार सेवा की अधिकारी
अगले दिन सब लोग इकट्ठा हुए। इस बीच कहाँ क्या विशेष हुआ है? इस बारे में जानकारी का आदान-प्रदान हुआ। आठ दिन में कुछ खास नहीं घटा था। श्रीराम को अचानक ख्याल आया, हुब्बा चाचा के क्या हाल हैं? पिछली खबर उनके बीमार होने की थी। हुब्बा चाचा यादि पटवारी हुब्बालाल। गाँव के लोग उसे पटवारी जी कहकर पुकारते थे। उन दिनों यह पद पुश्तैनी हुआ करता था। पिता अपने पुत्र को पटवारी बनाकर कार्यमुक्त हो जाता था। हुब्बालाल भी विरासत से ही पटवारी बना था, लेकिन आगे इस पद को सँभालने के लिए कोई वारिस नहीं था।
अपने सक्रिय रहने के दिनों में हुब्बालाल ने गाँववालों का जीना मुश्किल कर दिया था। लालच और उत्पीड़न दोनों अवगुण उसकी रग रग में समाए हुए थे। सँभालने वाला कोई नहीं था, फिर भी लालच में आकर उसने गाँव में किसी भी किसान को चैन से नहीं रहने दिया। आए दिन लोगों को नोटिस भिजवाता, आतंक के लिए जमीन की अनावश्यक रूप से माप-जोख करना और माँग पूरी नहीं होने पर तहसील में मनमानी रिपोर्ट भेजकर पुलिस बुलवा लेने जैसे तौर-तरीके अपना रखे थे। कुछ किसान तो उसकी ज्यादतियों के चलते अपनी संपत्ति से हाथ धो बैठे थे। अच्छी संपन्न स्थिति से हाथ धोकर सड़क पर आ जाने वालों की भी कमी नहीं थी। हुब्बालाल बीमार हुआ तो लोगों ने कहा, “भगवान ने उसके कर्मों की सजा दी है।” पटवारी जी के फालिज हो गया था। कुछ दिन तक तो उनके बीमार होने का ही पता नहीं चला। जब पता चला तो लोगों ने कर्मफल की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया।
सेनानायक श्रीराम का कहना था कि गाँव में कोई दुखी-बीमार है, उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है तो गांववालों का जिम्मा बनता है कि उसे सँभाले। परिवार में कोई कितना ही बिगड़ैल हो, तब भी बीमार पड़ने पर घर के लोग उसे सँभालते हैं या नहीं। यह तर्क लेकर वे गाँववालों को समझाने नहीं गए, बल्कि अपने स्वयंसेवकों की ही बारी बाँध दी।
उस दिन स्वयंसेवकों की मीटिंग थी। श्रीराम ने कहा, “पहले जाकर देखकर आते हैं, बाकी बातें बाद में करेंगे” वहाँ जाकर देखा, हुब्बलाल अपनी चारपाई पर पड़ा कातर दृष्टि से दरवाजे की ओर देख रहा था कि कोई आए, कुशलक्षेम पूछे। अपने कर्मों की याद आते ही किसी से अपेक्षा करने का विचार तुरंत हवा हो जाता, फिर भी न जाने क्यों आशा बँधती कि शायद कोई देखने आ ही जाए, दरवाजा खुला ही था। श्रीराम और उनके साथियों को दस्तक देने की जरूरत नहीं पड़ी। हुब्बलाल चारपाई पर पड़ा जैसे इन्हीं लोगों का इंतजार कर रहा था। देखकर आंखों में चमक आ गई। चमक थोड़ी देर ही कायम रही और आँख भर आई। कहने लगा, “मुझे अपने पापों की सजा मिल रही है बच्चों, मैंने न जाने कितने लोगों के घर उजाड़े हैं।”
श्री राम ने कहा, “घबराइए मत लालाजी, सब ठीक हो जाएगा।” लालाजी को समझाकर वे तुरंत देखभाल में जुट गए। घर में सार-सँभाल करने वाला कोई नहीं होने से हालत बहुत बुरी हो गई थीं। शरीर गंदगी से सना पड़ा था। मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। फालिज के कारण हाथ उठ नहीं रहा था, इसलिए वह उन्हें भगा भी नहीं पा रहा था। बच्चों ने नाक पर हाथ रखकर सँभालना चाहा। श्रीराम ने उनसे कहा, “जी को थोड़ा कड़ा करो। एक हाथ से कोई काम होगा क्या ?” बच्चों ने बाल्टी ढूंढ़ी। घर के बाहर जाकर कुएँ से पानी खींचा और पटवारी जी को नहलाया। उनके कपड़े, बिस्तर, कमरा साफ किया। आगरा से कुछ लोगों ने गरीबों और अपाहिजों के लिए बिस्तर व कपड़े आदि भिजवाए थे। श्रीराम सामान लेकर आई टोली के पास गए और हुब्बलाल के लिए भी कपड़े लिए। पटवारी जी की सेवा-टहल की। जब तक वह जीवित रहा, इसी तरह देखभाल चलती रही। हालत ज्यादा बिगड़ने के बाद तो सेवादल का कोई-न-कोई सदस्य वहाँ बना ही रहता था।
हुब्बलाल ज्यादा दिन जीवित नहीं रहा। जितने दिन भी जीवित रहा, बच्चों की सेवा-सुश्रूषा से यह संस्कार लेता रहा कि स्वार्थ के लिए जान-बूझकर किसी का अहित कभी नहीं करना चाहिए। जहाँ तक हो सके, दूसरों की सेवा करनी चाहिए। मरने से पहले पश्चाताप और ग्लानि में डूबे जा रहे हुब्बलाल ने ने श्रीराम को अपने पास बुलाया। बुदबुदाते हुए कहा कि अगला जन्म मिला तो भले ही पशुयोनि में जाऊँ, लेकिन मैं पशु होकर भी सेवा करना चाहूँगा, भगवान भले ही मुझे गधा बना दे।
“नहीं दीवान जी।” श्रीराम ने कहा, “ऐसा क्यों कहते हैं। आप मनुष्य योनि में ही आएंगे। उस जन्म में अपनी सारी गलतियाँ सुधार लेंगे और भगवान का ही काम करेंगे।” हुब्बलाल की आँखें भर आई। गला रुँध गया। अटक-अटककर कहने लगा, “आशीर्वाद देने लायक पुण्य तो नहीं हैं मेरे पास। भूले भटके कोई पुण्य किया हो तो तुम्हें मिल जाए। भगवान से तुम्हारे लिए यही माँगता हूँ कि तुम्हारा यश अमर कर दें।” इसके बाद उसकी आवाज चली गई।
लोकमान्य तिलक का दिया स्वराज्य का नारा गाँव-गाँव गूँजने लगा था। जहाँ भी दस-पंद्रह उत्साही लोग इकट्ठे होते, उसी के बारे में चर्चा करते। आँवलखेड़ा में किशोरों की टोली पहले ही सक्रिय थी। राष्ट्रीय आँदोलन के तेज होने और अंग्रेजों द्वारा उसका दमन करने वाली दोनों तरह की खबरें गाँव में पहुँचती थीं। आँदोलनकारियों का उत्साह लोगों को ज्यादा गदगद नहीं करता था। अँग्रेजों द्वारा दमन की खबरें उनका उल्लास रौंदती हुई उन्हें बुरी तरह डरा देती थीं। जिन परिवारों के बच्चे आँदोलन में छिटपुट हिस्सा ले रहे थे, वे चिंतित थे।
किशोर सुराजियों के लिए चिंता
एक दिन सभी लोग मिलकर बैठे, विचार किया और इस नतीजे पर पहुँचे कि उनके लाड़ले अपने आप कुछ नहीं कर रहे। श्रीराम के कहने-सुनने में आकर या देखा−देखी ही जुलूस, धरना आदि में शामिल होते हैं। जहाँ-तहाँ परचे-पोस्टर चिपकाते हैं। श्रीराम की गतिविधियों पर अंकुश लगाया जाए, बाकी बच्चे अपने आप विभाजित हो जाएँगे। सहमति बनाकर चार-पाँच लोग ताई जी के पास गए। कुशलक्षेम पूछने की औपचारिकता के तुरंत बाद अपने विषय पर आ गए, “ताई जी, फिरंगियों के घोड़े दौड़ रहे हैं। सुराजियों को देखते ही पकड़ लेते हैं और बंद कर देते हैं। कई गाँवों से खबर है कि पकड़े हुए लोगों का पता नहीं चलता।”
यह भयावह चित्रण ताई जी को डराने के लिए नहीं था। उनके पास आए लोग पूरी ईमानदारी से कह रहे थे, “अपने श्रीराम का थोड़ा सँभालकर रखें तो अपने बच्चों की हिफाजत होगी, वरना पता नहीं कब फिरंगी अपने गाँव में धावा बोल दें।”
ताई जी चिंतित हुई। उन्होंने श्रीराम की गतिविधियों पर निगरानी रखने का वचन दिया। गाँव के लोग भी कुछ निश्चिंत होकर चले गए। इसके बाद श्रीराम जब भी घर से बाहर निकलते, ताई जी पूछतीं, “कहाँ जा रहे हो? कब तक वापस लौटोगे?” बताए गए समय पर वापस नहीं लौटते तो पूछताछ करतीं। स्पष्टीकरण माँगतीं। आगे इस तरह से देरी नहीं होगी, यह चेतावनी देती। ताई जी की निगरानी बढ़ जाने से श्रीराम को कोई अंतर नहीं पड़ा क्योंकि वे जो भी उत्तर देते, उससे ताई जी का समाधान हो जाता। वे कहते कि प्रदर्शन में गया था, तो भी ताई जी नहीं डांटतीं और कहते कि सेवा में गया था तो भी कुछ नहीं कहती। उनके लिए उत्तर ही समाधान होता।
एक बार श्रीराम ने कुछ दिन के लिए आगरा काँग्रेस कार्यालय जाने की बात कही। माँ ने मना कर दिया। सोचते रहे कि माँ की अवज्ञा कैसे की जाए? करें या न करें? अंतरात्मा ने समाधान सुझाया, माँ यदि मोहवश मना कर रही हो तो भी राष्ट्र की सेवा से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। इस प्रतिबंध की अवहेलना क्षम्य है। इसके बाद उपयुक्त अवसर की ताक में रहे। एक दिन रात को दो बजे उठे। पानी का लोटा भरा और दरबान से कहा कि बाहर जाना है। उसने सोचा, दिशा मैदान जाना होगा। हवेली से बाहर जाने का मन हो रहा होगा। यह सोचकर दरवाजा खोल दिया। बाहर आते ही श्रीराम ने लोटा रखा और आगरा की ओर चल दिए। रातभर चलते रहे। सीधा रास्ता न पकड़कर यहाँ-वहाँ छिपते-छिपाते आगरा पहुँचे। पूछताछ की। पता चला कि काँग्रेस कार्यालय में स्वयंसेवकों की भरती हो रही है। उन्हें आँदोलन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। शिविर भी लगे हाथों शुरू होने वाले हैं। श्रीराम भरती हो गए। उनके साथ शिविर में शामिल हुए आँदोलनकारियों में जगन प्रसाद, गंगासिंह, दद्दू और ऊधमसिंह आदि के नाम भी हैं। इन लोगों ने बढ़-चढ़कर आँदोलन में हिस्सा लिया। पंडित नत्थीलाल शर्मा, रामनारायण शिवहरे और वासुदेव गुप्त भी उसी शिविर में थे।
स्वयं सेवकों के इस शिविर में अनुभवी आँदोलनकारी युवकों को जनसंपर्क करना सिखाते थे। पँम्पलेट तैयार करना, पोस्टर बनाना, सभाएँ करना और आँदोलन का माहौल बनाना शिविर के विषय होते। श्रीराम ने एक सप्ताह के शिविर में ये बातें अच्छी तरह सीखीं। इस बीच आँवलखेड़ा में अपनी माँ के पास उन्होंने सूचना भी भिजवाई कि वे कुशल हैं। प्रशिक्षण लेकर तुरंत वापस आ जाएंगे। यह सूचना शिविर में भरती होते ही व्यवस्था देख रहे एक वरिष्ठ कार्यकर्त्ता से कहकर तुरंत भिजवा दी थी। उधर ताई जी ने खाना-पीना सब छोड़ दिया था। सूचना पाकर वे निश्चिंत हुई।
एक राजा किसी संत के सामने अपनी शेखी बघार रहा था और कह रहा था, राज्यभर का पालन-पोषण करने की मैंने सुँदर व्यवस्था बना रखी है। संत ने उलटकर पूछा, अपने राज्य के पशु-पक्षी, मनुष्यों में सुखी-दुखी, स्वस्थ-रुग्णों की गणना करके बताओ। राजा सकपका गया। संत ने कहा, जब तुम्हें राज्य क्षेत्र में रहने वाले वर्गों की गणना तक नहीं मालूम, तब उनका उपयुक्त प्रबंध कैसे करते होंगे। राजा का गर्व गल गया और वह भगवान द्वारा विश्व-व्यवस्था चलने की बात कहने लगा।
जेन एडम्स के पिता सिनेटर और मिल मालिक थे। एकमात्र पुत्री के लिए उनने यह अपार संपदा सँजोकर रखी थी, पर उनने वह समय श्रेष्ठ पुस्तकों के अध्ययन में लगाया और पिता के मरते ही सारी संपत्ति बेचकर अमेरिका में एक डल हाउस ‘मानव सेवा-संस्थान’ बनाया। यों सस्ता भोजन, सस्ता निवास उसका प्रत्यक्ष कार्यक्रम था। पर इस बहाने जो हजारों व्यक्ति वहाँ आते, उन्हें लोकोपयोगी जीवन जीने की प्रेरणा मिलती। कार्य की महत्ता देखते हुए उनके लाखों सहयोगी बन गए।
उन्होंने महिलाओं, बच्चों, विकलांगों, रोगियों की सेवा-सहायता के लिए अनेकों संस्थाएँ चलाई। अंतर्राष्ट्रीय महिला लीग भी उन्हीं की स्थापना है। नोबुल पुरस्कार उन्हें मिला। वह राशि उन्होंने लीग को ही दान कर दी। एडमस आजीवन ब्रह्मचारिणी रहीं। उन्हें करुणा की मूर्ति, देहधारी देवी माना जाता था।
सतगुरु हम सूँ रीझि करि एक कह्या प्रसंग। बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग॥ (साखी/33)
सद्गुरु मुझ पर प्रसन्न हुए और उन्होंने रहस्य से भरा भगवद्भजन, परमात्मा के ज्ञान की बात; प्रसंगबद्ध कही। इस भक्तिप्रसंग से प्रेम के बादल बरसने लगे और सभी अंग भीग गए। अंग भीगने का अर्थ है-अंतःकरण का प्रेमपूर्ण होना।
श्री कबीरदास जी की साखी के माध्यम से गुरुकथामृत आरंभ करने का मन है। श्रीरामकृष्ण परमहंस की ही तरह परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने अपने भक्ति प्रसंगों से ढेरों व्यक्तियों के अंतःकरण को प्रेमरस से भरा दिया। यह गुरु की ही विशेषता है। वह ज्ञान की सीख भी देता है एवं भक्ति का बीज भी बो देता है। शिष्य के हित में जो भी है, वह सडडडडडड करता है। कभी यह कार्य वह वाणी से करता है, कभी अपनी लेखनी से, कभी मौन अपने स्नेहिल दृष्टिपात से। ऐसी ही हमारी गुरुसत्ता जो सबको इस कलियुग में मुक्ति दिलाने प्रेम से सराबोर कर उनके जीवन को अर्थ दे गई। उनकी दिशाधारा बदल गई।
इस कड़ी में हमने कुछ पत्र पूज्यवर के हाथ से 1941 में लिखे संकलित किए हैं। कितने प्रेम भरे स्पर्श को लेकर, सच्चा मार्गदर्शन सँजोए ये पत्र जन जन के पास पहुँचते थे, यह आज 62 वर्ष बाद सोच-सोचकर रोमाँच हो उठता हैं। 28.2.41 को लिखा पत्र एक अभिन्न मित्र को लिखा गया है, जो उनके शिष्य के रूप में भी विकसित हो रहे थे। पूज्यवर लिखते हैं,”हम मनुष्य हैं। मनुष्य की शक्ति सीमित है। वह परमात्मा की तरह सर्वस्व या पूर्ण ब्रह्म नहीं है। त्रुटियों के कारण ही वह मनुष्य बना हुआ है। पूर्ण नहीं हैं, मनुष्य हैं। मनुष्य में कर्त्तव्य करने की प्रबल शक्ति है। हम अपनी शक्तिभर सच्चे हृदय से तुम्हारे कल्याण का प्रयत्न करते रहेंगे। फिर भी कहीं भूल से हमें ईश्वर के स्थान पर न मान बैठना, अन्यथा किसी दिन हमारे ऊपर अविश्वास भी हो सकता है और हमें मित्र के स्थान पर शत्रु मान सकते हैं। हम लोग भाई-भाई हैं। सच्चे हृदय से एक दूसरे के प्रति अपना कर्त्तव्य पालन करने के ही हम लोग अधिकारी हैं.................। किसी मंत्र में कोई विशेष बात नहीं हैं। सच्चे हृदय की प्रार्थना ही सब कुछ है। चाहे कोई मंत्र जप क्यों न हो।”
तब हमारे गुरुदेव मात्र तीस वर्ष के थे। उनके यह मित्र श्री म. मंगलचंद्र लगभग बीस बाईस वर्ष के। अजमेर निवासी इन सज्जन को, जो उन पर भगवान की तरह विश्वास रखते थे, बड़ा स्पष्ट पूज्यवर लिख रहे हैं कि महामानवों को जिन्हें हम पसंद करते हैं, मनुष्य ही मानें। भावावेश में हम एक नहीं, दस गुरु कर लेते हैं। उनकी बातें, व्यक्तित्व हमें प्रभावित करते हैं। हम उन्हें भगवान मान बैठते हैं। गीता में भगवान को स्वयं सुहृद (एक दयालु साथी) कहा है। हम परखें, अच्छी तरह विश्वास होने पर ही किसी को गुरु मानें। गुरु तो गोविंद से भी बड़ा होता है और हम ऐसे हैं कि कलाकारों को, अभिनय करने वालों को, गलेबाजी के अभ्यास से कथा कहने वालों को भगवान मान बैठते हैं। वे तथाकथित बापू जो कुशलतापूर्वक भगवान के उपदेश कह बैठते हैं, हमारे इष्ट-आराध्य बन जाते हैं। उनके विरुद्ध हम कुछ सुनना भी नहीं चाहते। जब कभी कोई कमी सामाजिक होती है या हमें उनका व्यवहार चुभ जाता है तो हम जमीन पर आ गिरते हैं। पूज्यवर कहते हैं कि हम भूल से भी किसी को ईश्वर न मान बैठें। स्वयं अपनी सत्ता से पूर्णतः परिचित ‘मैं क्या हूँ’ ग्रंथ लिख चुके आचार्यजी अपने शिष्य को भाई कहने के लिए कहते हैं। अगले प्रसंग में वे उन्हें किसी मंत्र से नहीं बाँधते। सबसे पहले प्रार्थना, आकुल हृदय से की गई याचना का मर्म समझाते हैं। यह है सत्परामर्श, जो किसी को भी जीवन का सही मार्ग दिखा सकता है।
इसी तरह वे 21 जून, 1941 को लिखे अपने एक पत्र में अपने एक शुभेच्छु को लिखते हैं, अच्छा हो कि कोई पुस्तक की रचना आरंभ कर दो, क्योंकि यह मनुष्य के पश्चात जीवित रहने वाला उसका उसका अच्छा स्मारक है। साथ ही ऐसा सदावर्त है, जो भूखों को सदा बाँटता रहता है और कभी समाप्त नहीं होता। इस कार्य का परिणाम किसी की भूख-प्यास को शाँत कर देना मात्र नहीं है, वरन् ज्ञानदान देकर मनुष्य को देवता और ईश्वर तक बना देता है। पुस्तक रचना के समान दूसरे धर्मकार्य कम ही देखने में आते हैं।
इस पत्राँश को पढ़ें तो ज्ञात होता है कि किसी के स्वच्छ सकारात्मक चिंतन का नियोजित करने का सबसे सही उपाय है, पुस्तक लिखना। छपी या नहीं छपी, यह इतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना यह कि रचनाधर्मी पुरुषार्थ हुआ कि नहीं। स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर की अवधि में कितना असंभव कार्य किया? कुल मिलाकर छोटी-बड़ी 32 किताबें अपने 1935 से 1990 तक के पचपन वर्ष के सक्रिय जीवनकाल में लिख जाना बहुत बड़ी बात है। आज तक ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता। वे पुस्तक रचना का एक सदावर्त एवं एक धर्मकार्य, पुण्य प्रयोजन की संज्ञा देते हैं। विचारक्राँति अभियान का प्रवर्तक एक ऋषि यही तो लिख सकता है। आत्मीयता की अभिव्यक्ति अपने प्रिय पात्र हुई तो ऐसे ही सत्परामर्श के रूप में।
पुस्तक रचना की ही बात लिखते-लिखते अपने इसी मित्र-अनन्य सहयोगी का परमपूज्य गुरुदेव 15-8-1941 का एक पत्र लिखते हैं। संभवतः उनके यह लिखने पर कि रोगी हैं, कैसे पुस्तक लिख सकते हैं, आदि-आदि। इस पत्र में वे बेबाक शब्दों में लिखते हैं-
जाँस्टन असाध्य रोग से ग्रस्त था। चारपाई से उठ भी नहीं सकता था तो भी दूसरे क्लर्क की सहायता से अपनी पुस्तक लिखवाता था। जब उसे असह्य पीड़ा हो उठी और मृत्यु के बिलकुल निकट जा पहुँचा तो उसने कहा, अभी पाँच रोज मृत्यु से और लड़ूंगा, ताकि मेरी पुस्तक पूरी हो जाए। सचमुच वह पाँच दिन और नहीं मरा और अपनी पुस्तक पूरी करा गया। तुम बीमारी की दशा में भी पर्याप्त स्मारक, योग्यता उपार्जन कर सकते हो और जनता जनार्दन की सेवा में जुट सकते हो। योग्यता नहीं है, इसकी क्या चिंता? आज नहीं तो कल लेती है। कदाचित ईश्वर ने तुम्हें महान साहित्य सेवा के लिए ही अवतीर्ण किया है। योरोप के तीन महाकवियोँ में से दो अंधे थे। महाकवि सूरदास और वर्तमान अंधगायक के.सी.डे नेत्रहीन होते हुए भी नेत्र वालों से अधिक उपयोगी हुए। कदाचित पैर की त्रुटि कोई नवीन दिशा में, तुम्हारा जीवन ढालने के लिए ही हो रही है। प्रभु पर विश्वास करो वत्स, वे तुम्हें पथ प्रदर्शन करेंगे।
पत्र की भाषा पढ़े तो लगता है कि शब्द किसी कविता के छंद की तरह दौड़ते-तरंगित होते चले आ रहे हैं। किसी रोगी को जो पलंग पर हो, सकारात्मक चिंतन देकर उसे स्वस्थ कर उससे कुछ श्रेष्ठ करा लेने का मार्गदर्शन इन पंक्तियों में है। उदाहरणों द्वारा गुरुवर ने समझाने का प्रयास किया है कि इच्छाशक्ति ही सर्वोपरि है। विकलाँगता भी कभी पुरुषार्थपरायणता में बाधक नहीं पड़ेगा। सही मायने में गुरु से बड़ा मित्र,मार्गदर्शक, चिकित्सक और कोई हो नहीं सकता। इस पत्र में जो तीन पृष्ठों का है, आगे पूज्यवर अपनी जीवनकथा लिखे जाने की बात पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते है, जो पढ़ने योग्य है।
हमारी जीवनी? तुम छपाओगे? न। यह तुम्हारे प्रेम का चिह्न है, पर है बिलकुल व्यर्थ। इससे कुछ भी लाभ न होगा। मैं, एक लंबे कद का, गोरा, 11 पौंड भारी, बत्तीस वर्षीय, मल-मूत्र का पुतला। जो ऑक्सीजन खाकर कार्बन थूकता है। जो अन्न को विष्ठा और जल को मूत्र बना देता है। इस शरीर का इतना ही परिचय काफी है। आत्मा? अखंड चैतन्य सत्ता,वही जो तुम हो। ठीक तुम्हारे जैसा। तुम्हारे जैसा। तुम्हारे साथ जुड़ा हुआ। विद्या, ज्ञान, साधन इनमें से हम कितने हैं। तत्वज्ञ न्यूटन मृत्यु के समय बोला, मैंने महान सागर के किनारे खड़े होकर कुछ सीप और घोंघे ढूंढ़ पाए हैं। रत्नों की खान तो आगे है। मैंने तो अध्यात्म जगत की एक झाँकी की है। उससे धँसने वाले तो हमसे बहुत आगे हैं। आदमी का मूल्य पैसे से भी आँका जाता है। इन दिनों रुपयों की गड्डी से आदमी का बड़प्पन तौला जाता है। उस दृष्टि से तराजू के पासंग जितना ही अपना वजन है। फिर आखिर हूँ क्या? प्रेम, उदारता, सहानुभूति और जनकल्याण की भावना से द्रवित एक प्राणी, जो हर घड़ी आपत्तियों से टकराता है और एक महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए आगे बढ़ता है, गिरता है, उठता है, खड़ा होता है और फिर आगे चलता है। विश्वकल्याण की भावनाओं को उगलने वाला एक छोटा स्त्रोत। बस इतना हमारा परिचय काफी है। इसे तुम अपने मन पर छाप लो और अपना मुझे छाप लेने दो। बस यह दो महाकाव्य संसार के लिए पर्याप्त हैं। बाहर छपाने की रत्तीभर भी आवश्यकता नहीं है।
जिस किसी को भी पूज्यवर को जानना हो, समझना हो, वह इस अंश को पढ़ सकता है। मात्र अखण्ड ज्योति नहीं, उनकी अमृतवाणी ही नहीं, उनके ये पत्र बेहद अनमोल हैं। ये सीधे अंतःपटल तक जा पहुँचते हैं और हमें भी आभास करा देते हैं कि हम कौन हैं। बस इस बार इतना ही।
महात्मा ईसा अपने शिष्यों सहित कहीं जा रहे थे। रात्रि में एक जगह ठहरे। देखा गया तो पास में केवल पाँच रोटियाँ थीं, इतने से सबका पेट कैसे भरेगा, यह प्रश्न सामने था। यह समस्या ईसा ने सुनी तो कहा, सारी रोटियाँ एक पात्र में टुकड़े-टुकड़े करके डाल दो। सभी लोग एक-एक टुकड़ा निकाल-निकालकर खाते जाएँ, सबको समान रूप से भोजन मिल जाएगा।
सबने श्रद्धापूर्वक गुरु आज्ञा मानी। सोचा जितना सबके पेट में समान रूप से अन्न पहुँचे, वही ठीक है।
भोजन शुरू हुआ तो सबका पेट भर गया, टुकड़े हाथ में आते गए। शिष्य बोले, यह गुरुदेव का चमत्कार है। ईसा बोले, यह तुम्हारे सद्भाव भरे सहकार का चमत्कार है। तुम स्वार्थ भरी छीना-झपटी करते तो यह संभव न होता। जहाँ सद्भाव भरा पारिवारिक सहकार होता है, वहाँ प्रभु का अयाचित सहयोग मिलता है।
तीर्थसेवन की शास्त्रों में बड़ी महिमा गाई गई है। सौभाग्यशाली ही होते हैं जो तीर्थ चेतना में स्नान कर पाते हैं। गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार एवं गायत्री तपोभूमि मथुरा आज के अपने समय के ऐसे दो तीर्थ हैं, जिनकी उपमा कल्पवृक्ष से दी जा सकती है। जहाँ, जिसकी छाँव में बैठने से मन की सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाएँ अथवा वे दिव्य कामनाओं में बदल जाएँ। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं माता भगवती देवी के तपोमय पुरुषार्थ की एक बानगी है मथुरा की घीयामंडी में स्थापित अखण्ड ज्योति संस्थान, उनकी 1941 से 1971 की तीस वर्षीय अवधि की साक्षी पूजास्थली तथा 1953 से 1971 तक के उनके जीवंत कर्मयोग की साक्षी गायत्री तपोभूमि। मथुरा नगरी सप्तपुरियों में गिनी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है तथा आज भी लाखों तीर्थयात्री वहाँ आते व ब्रजक्षेत्र की परिक्रमा करते हैं, सभी धामों का दर्शन करते हैं।
1971 के बाद के दोनों ही महापुरुषों के जीवन के उत्तरार्द्ध एवं प्रचंड तप-पुरुषार्थ की बानगी देता है शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ, जो हरिद्वार नगरी के रेलवे स्टेशन से मात्र छह किलोमीटर दूरी पर ऋषिकेश-बदरीनाथ मार्ग पर स्थित है, गंगा की सप्तधाराएँ, जिसके अति निकट से बहती हैं, पीछे हिमालय के दिव्य दर्शन होते हैं। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान 1970 के रूप में विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की शोध करने वाली स्थापना एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय (22) हींडडडडडडड पर समीप ही आधे किलोमीटर की परिधि में स्थित है। प्रायः सवा सौ एकड़ में स्थापित यह पूरा विराट तंत्र परमपूज्य गुरुदेव की जाग्रत जीवंत काया के रूप में विराजमान है। प्रतिवर्ष यहाँ लाखों व्यक्ति आते व गायत्री चेतना से अखंड दीपक की ऊर्जा-आभा से लाभान्वित होकर जाते हैं।
मथुरा व हरिद्वार दोनों ही स्थानों पर नियमित सत्र चलते हैं। आज तो तीर्थाटन, पर्यटन मात्र होकर रह गया है, परंतु पूज्यवर ने इसे सही अर्थों में तीर्थसेवन-कल्पवास की उपमा दी। एक विधिवत प्रशिक्षण तंत्र खड़ा करके। हरिद्वार के शांतिकुंज में वर्षभर नियमित सत्र चलते हैं। इनमें पूर्वानुमति लेकर कोई भी भागीदारी कर सकता है एवं अपना जीवन धन्य बना सकता है। यहाँ भी अभी हम परिजनों-पाठकों-जिज्ञासुओं की सुविधा के लिए शांतिकुंज हरिद्वार की सत्र शृंखला का संक्षिप्त परिचय दे रहे है। विस्तार से पत्र लिखकर इसकी मार्गदर्शिका नियमावली मँगाई जा सकती है। यहाँ मुख्यतः दो प्रकार के सत्र चलते है-साधना प्रधान, प्रशिक्षण प्रधान। साधना प्रधान सत्रों में दो प्रकार के सत्र चल रहे है।
(1) नौ दिवसीय संजीवनी साधना सत्र- ये सत्र प्रतिमाह 1 से 9, 11 से 19 एवं 21 से 29 तारीखों में अनवरत चलते हैं। चौबीस हजार गायत्री मंत्र का अनुष्ठान इस अवधि में संपन्न हो जाता है। प्रातः ब्राह्ममुहूर्त (ठंड के दिनों में 4 बजे एवं गरमी में 3.30 बजे) में यहाँ की दिनचर्या आरंभ हो जाती है। प्रातः सायं प्रार्थना-आरती, योग साधना, ध्यान-त्रिकाल संध्या के अलावा दिन में तीन बार प्रवचन-उद्बोधनों से मार्गदर्शन-जीवनसाधना, जीवन जीने की कला के विषयों में दिया जाता है। एक दिन पूर्व आकर संध्या को संकल्प लिया जाता है एवं 9वें दिन विदाई हो जाती है। प्रस्तावित सत्र की तिथि से न्यूनतम दो माह पूर्व आवेदन करना होता है।
(2) अंतःऊर्जा जागरण साधना सत्र- ये पाँच दिवसीय मौन साधना सत्र आश्विन नवरात्रि के समापन से चैत्र नवरात्रि के पूर्व तक प्रतिमाह 1 से 5, 6 से 10, 11 से 15, 16 से 20, 21 से 25 एवं 26 से 30 की तारीखों में चलते हैं। इस वर्ष से सत्र छह अक्टूबर, 23 से आरंभ होकर 2 मार्च, 24 तक चलेंगे। वसंत पंचमी (26 जनवरी, 24) की अवधि वाला सत्र प्रभावित होता है, अतः एक या दो सत्र स्थापित करने होते है। इन सत्रों में भागीदारी हेतु छह माह पूर्व लिखना होता है। इन सत्रों में भागीदारी हेतु छह माह पूर्व लिखना होता है। चूँकि ये पूर्णतः मौन साधना सत्र है, इनमें उन्हीं को स्वीकृति दी जाती है जो पहले − दिवसीय, एकमासीय सत्र कर चुके हों एवं गायत्री परिवार की महत्त्वपूर्ण योजना में भागीदारी कर रहे हों। फार्म भरकर व पासपोर्ट साइज का चित्र भेजने पर ही मात्र साठ व्यक्तियों को एक सत्र में अनुमति दी जाती है।
प्रशिक्षण सत्रों के अंतर्गत कई प्रकार के सत्र है- एकमासीय युगशिल्पी सत्र, परिव्राजक सत्र, नौ दिवसीय रचनात्मक (ग्रामतीर्थ योजना, जलागाम प्रबंध, गो-उत्कर्ष) सत्र, पाँच दिवसीय व्यक्तित्व परिष्कार सत्र, नैतिक प्रशिक्षण सत्र तथा छह दिवसीय आर. सी. एच. स्वस्थ प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य (आर. सी. एच.) के सत्र भी नियमित चलते हैं। विश्वविद्यालय के अंतर्गत कार्यशालाएँ, भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा संगोष्ठियाँ व क्षेत्र के कार्यकर्त्ताओं के संगठन सत्र भी नियमित चलते है। उनके विषय में विस्तार से आगामी अंक में।
आज से लगभग 167 वर्ष पूर्व 1866 ईसवीं में एक महापुरुष भारतवर्ष की धरती पर आया। कामारपुकुर; जिला बाँकुरद्ध बंगाल में जो कलकत्ता से लगभग पैंसठ मील उत्तर पश्चिम में स्थित है, 18 फरवरी 1866 को एक बालक जन्मा, जिसने दिव्य लीलाएँ कर कलकत्ता के दक्षिणेश्वर में स्वयं को स्थापित किया। यों तो लौकिक दृष्टि से यह व्यक्ति माँ काली का पुजारी था, किंतु धीरे-धीरे उसकी ख्याति चारों ओर फैलने लगी। रामकृष्ण परमहंस के नाम से विख्यात इस महापुरुष के चारों ओर छोटे-बड़े ऐसे कई व्यक्ति एकत्र होने लगे, जो ईश्वरप्राप्ति, ब्रह्मसाक्षात्कार में रुचि रखते थे। राष्ट्रवादी मानसिकता वाले भी ढेरों व्यक्ति वहाँ आने लगे, मूल आकर्षण बना उनका साधक व्यक्तित्व, सरल हृदय एवं उनकी अमृतवाणी; जो बाद में श्रीरामकृष्ण वचनामृत नाम से तीन भागों में प्रकाशित हुई। लगभग सोलह व्यक्ति ऐसे थे, जिनने उनके साथ 1880 से 1886 की सोलह अगस्त तक अपने गुरु-मास्टर-ठाकुर की जीवनयात्रा में अद्भुत भागीदारी की। वे उनके मानसपुत्र बनते चले गए।
यही उनके मानसपुत्र ठाकुर के महाप्रयाण के बाद लौकिक जगत छोड़कर संन्यासी बन गए। इनका नेतृत्व किया तेजस्वी युगनायक विवेकानंद ने, जिन्हें प्रकाराँतर से ठाकुर अपनी सारी शक्ति स्थानांतरित कर गए थीं, उनका मार्गदर्शन करती रहीं, ममत्व का विस्तार करती रहीं एवं धीरे-धीरे श्रीरामकृष्ण संघ मिशन का जन्म होने लगा। नरेंद्र दत्त ने ही, जिन्हें ईश्वरप्राप्ति की तीव्र अभीप्सा थी, नेतृत्व की बागडोर अपने हाथ में लेकर अपने से उम्र में बड़े-छोटे-समवय सभी साथियों को उस कठिन समय में सहारा दिया, हिम्मत बंधाई एवं एक ऐसा तंत्र खड़ा कर दिया, जिसने बीसवीं सदी के भारत की आधारशिला रखी। सामूहिक संघबद्ध प्रयास का ऐसा विलक्षण उदाहरण विश्वभर की संस्कृति के इतिहास में देखने को नहीं मिलता, जो इन सोलह एवं और इनके साथ साथ विकसित हुए ठाकुर का स्पर्श पाए अट्ठाइस कुल 44 शिष्यगणों द्वारा संपन्न किया गया।
यदि हम इन सोलह संन्यासियों के जीवन के 1886 से 1900 तक के वाराहनगर मठ प्रवास बेलूर मठ की भूमि तक की यात्रा का वर्णन पढ़ें तो आभास होगा कि कितना कठोर तप उनने पराधीन भारत की संकीर्ण मानसिकता वाली सोच के लोगों के बीच किया होगा। परिव्राजक जीवन, मधुकरी पर निर्वाह, जल उपेक्षा, कठोर साधना, समय-समय पर व्याधियों द्वारा ली जाने वाली शरीर की परीक्षा के बीच ऐसे तपस्वी जन्म लेते चले गए, जिनने श्रीरामकृष्ण संघ एवं स्थान-स्थान पर स्थापित हुए मठों, देश-विदेश में प्रचार की पृष्ठभूमि बनाई। शिकागो की धर्मसभा में स्वामी जी की विख्यात वक्तृता (सितंबर 1893) से लेकर ढेरों विदेशी-भारतीय शिष्यों के उनसे जुड़ने तक भी संघ का हम जो आधारभूत ढाँचा देखते हैं, उसमें साधन कम, द डडडडडडडड साधना ही मूल में है। स्वामी विवेकानंद (नरेंद्र) के साथ के सोलह व्यक्तियों (उन्हें मिलाकर) में पाँच ग्रेजुएट थे, दस ने मात्र औपचारिक शिक्षा प्राप्त की थी एवं एक पूर्णतः अशिक्षित थे। फिर भी सोलह का यह समूह एकजुट हो अपने उस गुरु का, जिनका सान्निध्य उन्हें मिला था, स्वप्न पूरा करने के लिए कठोर तपस्वी जीवन जीने हेतु तत्पर रहा एवं आज के विराट श्रीरामकृष्ण मिशन की नींव का पत्थर बना।
स्वामी विवेकानंद (पूर्व नाम नरेंद्रनाथ दत्त, 12 जनवरी 1863, 4 जुलाई 1912) के अन्य साथी थे-(1) स्वामी ब्रह्मानंद (राखाल घोष 21 जनवरी 1863-1 अप्रैल 1122), (2) स्वामी शिवानंत (तारक-महापुरुष महाराज 16 नवंबर 1854-2 फरवरी डडडडड डडडड; डडडडड स्वामी प्रेमानंद (बाबूराम डडडडड 1861-3 मार्च 1811), (3) स्वामी योगानंद (योगेन-3 मार्च 1861-28 मार्च 1811), (4) स्वामी निरंजनानंद (निरंजन अगस्त 1862-1 मई 1914), (5), स्वामी रामकृष्णनंद ; शशी-13
जुलाई 1863 21 अगस्त डडडडड), (7) स्वामी सारदानंद (शरत-23 दिसंबर 1867), (8) स्वामी तुरीयानंद (हरि-3 जनवरी 1863-21 जुलाई 1121), (1) स्वामी अद्भुतानंद ; लाटू महाराज-185डडडड-24 अप्रैल डडडडड, (1) स्वामी अभेदानंद (काली महाराज-2 अक्टूबर 1866-8 सितंबर 1139), (10) स्वामी त्रिगुणातीतानंद (सारदा-3 जनवरी 1865-1 जनवरी 1115), (13) स्वामी सुबोधानंद (सुबोध-8 नवंबर 1867-2 दिसंबर 1132), (14) स्वामी अखंडानंद (गंगाधर-3 सितंबर 1864-7 फरवरी 1137), (15) स्वामी विज्ञानंद (हरिप्रसन्न 3 अक्टूबर 1868 21 अप्रैल 1138)।
सभी के बारे में यह विवरण इसलिए दिया गया कि आज की इक्कीसवीं सदी की पीढ़ी के लोग जान सकें कि आज से सवा सौ वर्ष पूर्व एक अवतारी चेतना की जो आँधी आई थी, उसने कितनी गहराई तक विभिन्न व्यक्तियों को प्रभावित किया। सभी ने तपश्चर्या भरा जीवन जिया, लौकिक सुख त्यागे तथा अपने गुरु श्रीरामकृष्ण के प्रति परिपूर्ण निष्ठा के साथ जिए। सभी का जीवन समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है। सामान्यतः परिजन स्वामी विवेकानंद के बारे में ही जानते हैं। शेष पंद्रह भी एक स्वर से स्वामी विवेकानंद की अलौकिक शक्ति, प्रचंड पुरुषार्थ एवं विद्वत्ता का लोहा मानते थे व सम्मान भी बड़े गुरु भाई का देते थे। इन सब की जीवन-गाथाएं आज भी लाखों अध्यात्मपथ के पथिकों का मार्गदर्शन करती हैं। सब पर ठाकुर की एवं बाद में श्रीमाँ की अनंत अनुकंपा बरसीं। उनने हृदय से प्यार किया एवं सभी को ऐसे मार्ग प्रशस्त कर दिया, जिस पर चलकर उनने पराधीन भारत में आध्यात्मिक पुनर्जागरण का एक नया अध्याय लिख दिया।
यहाँ एक विशेष बात कहने का हमारा मन है। एक महत्त्वपूर्ण चर्चा श्रीरामकृष्ण वचनामृत के तृतीय खंड में आई है। मास्टर महाशय (श्री महेंद्रनाथ)ने श्रीरामकृष्ण से तत्कालीन समय की सभी परिजनों की चर्चाओं, उनके उपदेशों, उनकी अमृतवाणी तथा उन क्षणों को बड़ी कुशलता से लिपिबद्ध किया है। मूल बंगला में लिखी इस पुस्तक के हिंदी अनुवाद को तैयार करने का श्रेय सुप्रसिद्ध कवि श्री सूर्यकाँत त्रिपाठी ‘निराला’ को जाती है। तीन खंडों में प्रकाशित इस अति महत्त्वपूर्ण ग्रंथ के तीसरे खंड में पृष्ठ 267-268 पर 1 अगस्त 1885 के आस पास की एक चर्चा का प्रसंग आता है, जिसमें ठाकुर श्रीरामकृष्ण के श्रीमुख से निकला है, जो अंतरंग हैं, उनकी मुक्ति न होगी। वायव्य दिशा में एक बार और मुझे देह धारण करना होगा।
अपने आध्यात्मिक अनुभवों की चर्चा करते-करते सहज ही ठाकुर के मुख से एक ऐसी महत्त्वपूर्ण बात निकल गई, जिससे स्पष्ट होता है कि रामकृष्ण मिशन-संघ के बाद एक और तंत्र खड़ा होना था, बीसवीं सदी व इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में जिसे उस कार्य को पूरा करना था। श्रीरामकृष्ण को पुनर्जन्म लेकर उस कार्य को अपनी उन्हीं दिव्यात्माओं के सहयोग से पूरा करना था। श्री अरविंद आए एवं महर्षि रमण आएं। ये दोनों भी युगपरिवर्तन योजना से जूड़े परिजन यदि गंभीरता से अपनी गुरुसत्ता के स्वरूप को इस श्रावणी पर्व की वेला में समझ सकें तो उन्हें ठाकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस की अमृतवाणी सार्थक होती लगेगी। 1985 की अप्रैल की अखण्ड ज्योति में स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने अपना चिवगत अवतार श्रीरामकृष्ण परमहंस के रूप में अपने गुरु के माध्यम से बताया है। जिस वायव्य कोण में जन्म लेने की बात ठाकुर ने कही है, वह भी आगरा मथुरा के बीच में आता हैं। दोनों के जीवन में बड़ी समानता है। एक ने गृहस्थ होते हुए भी संन्यासी जीवन जिया, श्रीमाँ की शक्ति के रूप में पूजा की। दूसरे श्रीराम ने गृहस्थ जीवन परमवंदनीया माताजी के साथ लोकशिक्षण हेतु जिया भी एवं गृहस्थ धर्म में ही मुक्ति का मार्ग बता गए। उनने परिवार निर्माण की अद्भुत क्राँति की, ताकि कलियुग की पराकाष्ठा के इस युग में सद्गृहस्थ एवं श्रेष्ठ वानप्रस्थ तैयार हो सकें। संन्यास ऐसे में सध नहीं सकता, अतः उनने नवसंन्यास परिव्राजक धर्म के निर्वाह की बात की।
श्रीरामकृष्ण परमहंस 1886 में गोलोक धाम चले गए। उनके जाने के बाद स्वामी विवेकानंद एवं बाद में उनके गुरुभाइयों ने इस तंत्र को विश्वव्यापी विस्तार दिया। परमपूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्यजी 1911 में जन्में। एक सक्रिय कर्मयोगी, युगऋषि का जीवन जीकर अपने सामने ढेरों विवेकानंद स्तर की सत्ताओं को विकसित कर गए। अभी उनमें से कइयों को अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना शेष है। स्वामी विवेकानंद जैसे सत्शिष्य-महापुरुष हजारों वर्ष में एक बार जन्म लेते हैं, पर उनका कार्य करने के लिए आज की विषम परिस्थितियों में ढेरों उनके अंश तैयार हैं। आवश्यकता मात्र स्व के स्वरूप पहचानने एवं अपनी आराध्य सत्ता की अनुभूति करने भर की है। न समझ में आए तो तत्कालीन इतिहास पुनः पढ़ लें, प्रेरणा मिलेगी।
प्रस्तुत श्रावणी पर्व हम सभी को जगाने एवं लौकिक मार्ग से हटकर अपने अंदर के ब्रह्मणत्व को जगाने आया है। अपने उद्देश्य को हम कभी भुला न पाएं एवं सतत साधना द्वारा शक्ति का संवर्द्धन कर जनसेवा में स्वयं को लगा दें। परमपूज्य गुरुदेव ने स्वयं लिखा है (अखण्ड ज्योति अगस्त, 1969), “युगनिर्माण योजना एक शंखनाद है, जो संस्कारी व्यक्तियों को जगाने और उन्हें प्रभातकालीन कर्त्तव्यों में जुटने का उद्बोधन कर रहा है।” हम और कुछ नहीं तो उनके शब्दों पर विश्वास कर उनकी जन्म शताब्दी वर्ष ; डडडडड-डडडडड तक ही मात्र 8-9 वर्षों के लिए स्वयं को तपस्वी बना लें, वैसे ही जैसा जीवन हम सभी ने पूर्वजन्म में सौ वर्ष जिया था। इतिहास की पुनरावृत्ति सुनिश्चित ही होगी।
गायत्री परिवार एक सुव्यवस्थित संगठन है, जिसका नेटवर्क सारे देश के अगणित देशों में फैला है। जो बीज एकाकी रूप में 1926 में अखंड दीप प्रज्वल ; वसंत पंचमी से आरंभ होकर इतना विराट वटवृक्ष बन गया, उसकी मूल धुरी है तप, कठोर तप, जीवन साधना एवं आत्मीयता का विस्तार।
शाँतिकुँज सप्तसरोवर क्षेत्र में बहने वाली वात धाराओं, नील गंगा से इतना जल इस अवधि में बहा है, उसने डडडडड से डडडडड के बीस वर्षों में सौ वर्ष का कार्य होते देखा है। वह आध्यात्मिक पुरुषार्थ जिसे इक्कीसवीं सदी में भारत के विश्व नेतृत्व सँभालने, उज्ज्वल भविष्य को लाकर दिखाने का कार्य करना था। वह कार्य पूज्यवर ने एवं परमवंदनीया माताजी ने अपने महाप्रयाण ; क्रमशः 2 जून डडडडड एवं 19 सितंबर डडडडड तक चलाया। एक इतिहास पुनः सौ साल बाद लिखा गया।
कलि की चाल भी बड़ी विलक्षण है। सब कुछ ठाकुर कर रहे हैं, गुरुदेव कर रहे हैं, फिर भी हमें अपने स्तर पर अपने व्यक्तित्व का परिमार्जन परिष्कार, जीवन-साधना में प्रगति का पुरुषार्थ तो स्वयं ही करना है, यह सामान्य ज्ञान तो सभी को है। पूज्यवर कहते रहे कि यह दैवी संकल्पना है, भगवान का मिशन है, स्रष्टा का निर्धारण है। कोई भी युगपरिवर्तन रोक नहीं सकता। तुम लोग काम न भी करो तो असंख्यों उच्चस्तरीय आत्माओं से मैं यह कार्य करा लूँगा, जो प्रतीक्षा सूची में पड़ी हैं, बुलावे का इंतजार कर रही हैं।
अब पूज्यवर के लौकिक लीला संदोह के सिमटने के 13 वर्ष बाद हम सभी को यह सोच-विचार करना चाहिए कि हमारी जीवन-साधना में, आत्मप्रशिक्षण में, कार्यकर्त्ता के रूप में तैयारी में कोई कमी तो नहीं रह गई। यदि है तो पहुँचें गायत्रीतीर्थ एवं पुनः उस कषाय-कल्मष को बुहारकर सक्रियता के साथ गति पकड़ लें। समय बहुत कम रह गया है। अब मात्र 8 से 9 वर्ष का समय बाकी है। नवरात्रि के नौ दिनों की तरह पूज्यवर की जन्मशताब्दी ; डडडडड-डडडडड से पूर्व की अवधि का यह पहला दिन ; पहला वर्ष चल रहा है। यदि हम एक दिन को एक वर्ष मानें। इस अवधि में ढेरों प्रशिक्षक, सक्रिय सहयोगी, समीक्षक, नेतृत्व सँभालने वाले जोनल प्रभारी हमें तैयार कर उन्हें आँदोलन की बागडोर सँभला देनी है। सातों आँदोलन सारे राष्ट्र में एवं सप्तसूत्री कार्यक्रम विदेश में गतिशील हो गए तो डडडडड-डडडडड के बाद का समय अद्भुत-अति विलक्षण-भारतीय संस्कृति के, हिंदुत्व के जागरण का समय होगा। उन सबका श्रेय गायत्री परिवार एवं उसके साथ-साथ इस दिशा में कार्य कर रहें ढेर सारे संगठनों को जाएगा।
शाँतिकुँज-गायत्रीतीर्थ में इस वर्ष के अगस्त-सितंबर एवं नवंबर 23 से बीस जनवरी 24 तक की एक नई रणनीति नौ दिवसीय संगठनात्मक रिफ्रेशर सत्रों की बनाई गई है। क्ष़ेत्रडडडडड में ढेरों ऐसे परिजन हैं जिनमें अनंत सामर्थ्य मौजूद है, प्रतिभाशील हैं एवं प्रचार, प्रशिक्षण, प्रबुद्धों की समस्याएं सुलझाने, युवाशक्ति को मार्गदर्शन देने जैसे कार्य करने की शक्ति उनमें है। कभी-कभी वे संकोच की स्थिति में रहते हैं। हम इतने वरिष्ठ पर समयाभाव के कारण केंद्र कैसे व कब पहुँचें। हमने एक समाधान निकाला है। ऐसे परिजन जो समर्थ हों, कोई भी प्रोजेक्ट लेने की सोचते हैं, परस्पर विचार-विमर्श कर अपनी एक सूची जोनल-सब जोनल स्तर पर बनाकर शाँतिकुँज के नौ दिवसीय सत्र में एक साथ स्वीकृति ले लें। एक जोन के ऐसी रुचि रखने वाले व्यक्ति भी साथ-साथ आ सकते हैं। प्रातः उठने से 12 बजे तक उनका अनुष्ठान साधनापरक रुटीन रहेगा, फिर उसके बाद रात्रि 1 बजे तक उनका सघन रिफ्रेशर प्रशिक्षण चलेगा। आठ दिन में इतनी काम की बातें हो जाएंगी, वे निश्चित ही स्पष्ट कार्ययोजना बनाकर जा सकेंगे। प्रवक्तागण-चिकित्सक-रचनात्मक कार्यों में रुचि रखने वाले अपने-अपने समूह बनाकर आ सकते हैं। यहाँ से जाने के बाद वे कार्यक्षेत्र में जाकर प्रशिक्षण दे सकेंगे। एक सहयोगी हम उन्हें देंगे। आपसी चर्चा करके समूह बनाकर आएं, न्यूनतम 40-45 का ग्रुप हो तो ही ऐसे कोर्स की सार्थकता है। अभी से परिजन परस्पर विचार-विमर्श कर जिस सत्र में आना हो, उसके लिए लिख भेजें। अनुमति मिलते ही सब आ जाएं। हम भी अनुमति पूरे समूह को सोच समझकर ही देंगे। अभी से ताना-बाना बुनें तो ही हम भावी वसंत तक के समय ही हम भावी वसंत तक के समय का सही उपयोग कर सकेंगे।
समय विषम है, डगर कठिन है, जाना भी उस पार है, छोड़ चलो यह रीत पुरानी, राह नई तैयार है।
सोच पुरातन लेकर हमने, जीवन बहुत बिताया, उलझे रहे प्रपंचों में हम, समय अमूल्य गँवाया, शंख बज चुका महाक्राँति का, आगे आना होगा,
अवसर आया है, न चूकना अब हमको इस बार है, छोड़ चलो यह रीत पुरानी, राह नई तैयार है।
कैसा हो संघर्ष, विजय तो सच की होती आई, अंत नहीं परिवर्तित होगा, कितनी बढ़े बुराई, समय नहीं रुक पाता है, गति हमें बढ़ानी होगी,
अभी नहीं तो कभी नहीं, बस युग की यही पुकार है, छोड़ चलो यह रीत पुरानी, राह नई तैयार है।
कुरुक्क्षेत्र का अंत, बिना अर्जुन भी ऐसा होता, नहीं नील-नल होते, फिर भी रावण का वध होता, काम प्रभू का, नाम तुम्हारा होगा, निश्चय जानो,
तुमको यह अनुबंध, युद्ध में, करना अब स्वीकार है, छोड़ चलो यह रीत पुरानी, राह नई तैयार है।
युग की जो हो माँग, वही अध्याय लिखे जाते हैं, युद्धों में नव नियम, नए संग्राम रचे जाते हैं, नए समय की परिभाषा है, रंग बदलना होगा,
ओढ़ चलो चादर वासंती, गुरुवर का त्योहार है, छोड़ चलो यह रीत पुरानी, राह नई तैयार है।
-डॉ. चिन्मय
*समाप्त*