प्रार्थना का संगीत प्रेम की सरगम से सजता है। प्रेम की सजल संवेदनाओं से ही प्रार्थना के स्वर स्फुटित होते हैं। प्रेम के शब्दों को गूँथकर ही प्रार्थना का काव्य रचा जाता है। भावमय भगवान् केवल भावनाओं की सघन पुकारों को सुने बिना नहीं रहते। संवेदनाओं की सजलता ही उन्हें स्पर्श कर पाती है।
सजल संवेदनाओं, सघन भावनाओं एवं प्रेम की प्रतीति को जो अपने जीवन में घोल देते हैं, उनका जीवन सहज ही प्रार्थनामय हो जाता है। सूफी फकीरों में इस बारे में एक घटना बहुप्रचलित है। सूफी फकीर नूरी को उनके कुछ अन्य फकीर साथियों के साथ काफिर होने का आरोप लगाया गया था। इसके लिए इन सबको मृत्युदण्ड भी सुना दिया था।
मृत्युदण्ड की घड़ी में जब जल्लाद फकीर नूरी के एक साथी के पास नंगी तलवार को लहराता हुआ आया, तो नूरी ने उठकर स्वयं को अपने मित्र के स्थान पर पेश किया। ऐसा करते समय नूरी के चेहरे पर गहरी प्रसन्नता और स्वरों में भरपूर नम्रता थी। इस दृश्य को देखकर दर्शक स्तब्ध रह गए। हजारों की भीड़ एक पल को सहम गयी।
अचरज से भरे जल्लाद ने कहा- हे युवक! तलवार ऐसी वस्तु नहीं है, जिससे मिलने के लिए लोग उत्सुक एवं व्याकुल हों और फिर तुम्हारी तो अभी बारी भी नहीं आयी। जल्लाद की इन बातों पर फकीर नूरी मुस्करा उठे। और कहने लगे- मेरे लिए प्रेम ही प्रार्थना है। मैं जानता हूँ कि जीवन, संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु है। लेकिन प्रेम के मुकाबले वह कुछ भी नहीं है। जिसे प्रेम उपलब्ध हो जाता है, उसके लिए सारा जीवन प्रार्थना बन जाता है। और प्रार्थनाशील मनुष्य का कर्त्तव्य है कि जब भी कोई कष्ट आगे आए, तो स्वयं सबसे आगे हो जाओ और जहाँ सुख-सुविधाएँ मिलती हों तो वहाँ पीछे होने की कोशिश करो।
फकीर नूरी की इन बातों ने जता दिया कि प्रार्थना का कोई ढाँचा नहीं होता। वह तो हृदय का सहज अंकुरण है। जैसे पर्वत से झरने बहते हैं, वैसे ही प्रेम पूर्ण व्यक्ति के प्रत्येक कर्म में प्रार्थना की धुन गूँजती है।
मानव जीवन आकस्मिक उत्पत्ति नहीं है। जन्म और मृत्यु संयोग मात्र नहीं है। यह एक क्रमिक विकास की शृंखला है जिसके द्वारा विश्व में व्याप्त परमात्म तत्व अपने प्रयोजन को मानव आत्म चेतना के द्वारा पूर्ण करती है। आत्म चेतना के शाश्वत काल में जीवन और मृत्यु दिवस-रात्रि की तरह घटित होते रहते हैं। ऋग्वेद (10/16/5) में इसी तत्व को स्पष्ट करते हुए कहा गया है।
अवसृण पुनरग्ने पितृहायो यस्य आहुतयिरति स्वधामिः। आपुर्वसान उपवेतु शेषः सं गच्छताँ तन्ना जातवेदाः॥
अर्थात् ‘मृत्यु के उपरान्त जब पंच तत्व अपने-अपने में मिल जाते हैं, तब जीवात्मा बचा रहता है और यह जीवात्मा ही दूसरी देह धारण करता है।’
यही रहस्य है पुनर्जन्म का। इसी रहस्य को जानने के लिए लोग सदियों से प्रयास करते रहे हैं। वास्तव में पुनर्जन्म कोई विश्वास व्यवस्था भर नहीं है अपितु यह एक विशुद्ध विज्ञान है। यह हमारे अतीत और अनागत जीवन की व्याख्या करता है।
पश्चिमी तत्वज्ञ प्लेटो ने पुनर्जन्म की व्याख्या ‘मृत्यु तथा मरण का प्रदीर्घ अहायास’ (ड्ड द्यशठ्ठद्द ह्यह्लह्वस्रब् शद्ध स्रद्गड्डह्लद्ध ड्डठ्ठस्र स्रब्द्बठ्ठद्द) कहकर की है। प्लूटार्क तथा सोलोमन भी पुनर्जन्म पर आस्था रखते थे। पाइथागोरस का विचार था कि साधुता का पालन करने पर आत्मा का जन्म उच्चतर लोकों में होता है। दुष्कृत आत्माएँ निम्न पशु योनि आदि में आती हैं।
मनोविज्ञान की नवीन शाखा परामनोविज्ञान की खोजों द्वारा प्राप्त तथ्यों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर को ही समाप्त कर पाती है। मरने के बाद भी मृत व्यक्ति की आत्मा इस संसार के व्यक्तियों पर अपना प्रभाव डालती रहती है। स्थूल शरीर को ही व्यक्तित्व मानना तथा यह कहना कि स्थूल शरीर के समाप्त होने पर व्यक्तित्व नष्ट हो जाता है, ठीक उसी प्रकार से है जिस प्रकार से यह कहना कि बल्ब के फूट जाने या फ्यूज हो जाने पर बिजली ही नहीं रह गई तथा उस बल्ब के स्थान पर कोई बल्ब ही नहीं जल सकता। प्रो. एस. सी. नारथ्राव कहते हैं कि आत्मा के अमरत्व का निषेध करने वाले पाश्चात्य जड़वादी भी भौतिक शास्त्रार्न्तगत शक्ति तथा अचेतन द्रव्य की अध्यक्षता को मानकर एक तरह से अमरत्व की स्वीकृति ही देते हैं। नारथ्राप के अलावा अन्य आधुनिक वैज्ञानिक भी मृत्यु के बाद भी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारते हैं।
पुलिट्जर पुरस्कार विजेता विलियम सरोपन ने अपनी पुस्तक ‘द ह्यूमन कॉमेडी’ में लिखा है कि हममें से कदाचित ही कोई मृत्यु के विषय में सोचता है। यदि सोचता भी है तो यही कि आगे क्या होता है? किसी के लिए मृत्यु ही सबका अवसान है तो कोई स्वर्ग और नर्क में विश्वास रखता है। कई व्यक्तियों के अनुसार यह जीवन अनेक बीते हुए जन्मों में से एक है और भविष्य में भी यह क्रम चलता रहेगा। विश्व में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो अपनी पूरी शक्ति के साथ सदा जीवित रहना चाहते हैं। विज्ञान ने इस रहस्य को काफी हद तक जानने की कोशिश की है।
क्या कोई मनुष्य तत्काल ही पुनर्जन्म ग्रहण करता है या धीरे-धीरे अथवा बहुत लम्बे समय की अवधि में? क्या दूसरे जीवधारी जैसे पशु आदि मनुष्य शरीरों में पुनर्जन्म लेते हैं? क्या हम सदैव पुनर्जन्म लेते हैं या जन्म-मरण का यह चक्र कहीं समाप्त भी होता है? क्या आत्मा निरन्तर नर्क का दुःख भोगती है या सदा के लिए स्वर्ग के सुखों का उपभोग करती है? क्या भावी पुनर्जन्म पर हमारा अपना वश चल सकता है? इस सम्बन्ध में जितने भी वैज्ञानिक अनुसंधान हुए उसके अनुसार पुनर्जन्म की व्याख्या की जाती रही है।
परन्तु जैसा कि भौतिकी के जनक अलबर्ट आइन्स्टाइन ने स्वीकार किया था कि चेतना का यथेष्ट स्वरूप विवेचन भौतिक घटनाओं के रूप में नहीं किया जा सकता। इस महान् वैज्ञानिक ने कहा था कि विज्ञान के स्वयं सिद्ध विधानों को मानव जीवन पर लागू करने का वर्तमान फैशन न केवल पूरी तरह गलत है अपितु यह ग्लानि योग्य भी है। हालाँकि प्रत्यक्ष को ही प्रमाण माना जाता है परन्तु जब मनुष्य भौतिक इन्द्रियों की पहुँच से पार किसी तत्व को समझने का प्रयास करता है तब ज्ञान के उच्चतम स्रोत के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता।
पुनर्जन्म का सिद्धान्त हमारे अतीत, वर्तमान और अनागत जन्मों से संबंधित सूक्ष्म विधानों की साँगोपाँग व्याख्या करता है। यदि कोई पुनर्जन्म को समझना चाहता है तो उसे ऊर्जा के रूप में चेतना की आधारभूत अवधारणा को उन भौतिक तत्वों से भिन्न और उत्कृष्ट स्वीकार करना पड़ेगा जिससे भौतिक शरीर का निर्माण होता है। आत्म सता के संकल्प एवं कर्म ही प्रत्येक मनुष्य की प्रगति या पतन के आधार बनते हैं। मनुष्य की अपनी इच्छा शक्ति एवं उसके कर्म ही जीवन प्रवाह के नये-नये मोड़ों का कारण बनते हैं। यह इच्छा ही कर्म का स्वरूप गढ़ती है। कर्मफल एवं संस्कार प्रारब्ध का निर्माण करते हैं और प्रारब्ध पुनर्जन्म के स्वरूप का निर्धारण करते हैं। गीताकार इसी तथ्य को व्यक्त करते हुए कहते हैं-
यं यं वापि स्मरन्भाव त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भाव भावितः॥
अर्थात् ‘हे कुन्तीपुत्र! यह मनुष्य अन्त काल में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, उस-उस को प्राप्त होता है परन्तु सदा जिस भाव का चिंतन करता है अन्तकाल में भी प्रायः उसी का स्मरण होता है।’
मानवीय चेतना इतनी उत्कृष्ट एवं परिष्कृत है कि उसका निचली योनि में जाना लगभग असम्भव है। फिर भी यदि कोई मनुष्य अपनी संकल्प शक्ति का भीषण दुरुपयोग करे तो ऐसे जाना स्वाभाविक है। परन्तु मनुष्य योनि में आने तक जीवात्मा इतनी विकसित तो हो ही जाती है कि वह आनन्द प्राप्त के लिए मानवीय सद्गुणों से निरन्तर दूर हटता जाये। जब कभी वह मोह एवं वासना के आवेग में पतन की ओर अग्रसर होता है, उसका अपना अन्तःकरण ही उसे कचोटने लगता है। जिस प्रकार देवत्व का जीवन बहुत कम लोग ही प्राप्त कर पाते हैं उसी प्रकार हीनतर प्रवृत्तियां भी कम ही लोग अपना पाते हैं। अधिकाँश लोग अपनी सामर्थ्य भर ऊपर उठने का प्रयास करते ही हैं।
किसी व्यक्ति के पिछले जन्मों की प्रवृत्तियों एवं संस्कारों का लेखा-जोखा उसकी वर्तमान प्रवृत्तियों गतिविधियों के आधार पर किया जा सकता है। मन, बुद्धि एवं अन्तःकरण की प्रवृत्तियाँ ही अगले जन्म की आधारशिला बनती है। पुनर्जन्म एक शाश्वत व्यक्तित्व के सतत् नये-नये स्वरूप धारण करने की शृंखला मात्र नहीं है। वरन् यह आध्यात्मिक विकास का साधन है। भगवान् के अपरिमित सौंदर्य के नवीन ढंग से अभिव्यक्त करने का माध्यम है।
अमर जीवात्मा मरण-धर्मी शरीर के साथ सम्बन्ध स्थापित करता है। इस जन्म लेने, जीवन धारण करने का एक ही मौलिक प्रयोजन है जीवन और सृष्टि में परमात्म सौंदर्य की परिपूर्ण अभिव्यक्ति। इस निमित्त व्यक्तिगत आत्माएँ विभिन्न रूपों में विकसित होती हैं। यह विकास मानव शरीर की प्राप्ति तक चलता रहता है। परन्तु मानव शरीर भी अन्तिम स्तर नहीं है। अपितु यह भी उच्चतर स्तरों के लिए एक सीढ़ी मात्र है। निम्न से उच्च, पशु से मानव तक की प्रगति सुनिश्चित है। जीवात्मा मानव शरीर को पुनः-पुनः धारण करती है। इस क्रम में शरीर भले ही मानवाकार में बना रहता है, पर निरन्तर भगवत् सौंदर्य की अभिव्यक्ति में वृद्धि होती रहती है और अन्ततः जीवात्मा विकास की पूर्णता अर्थात् परमात्मा से एकत्व मोक्ष की प्राप्त करती है।
स्वाइत्जर ने एक पुस्तक लिखी है-’हम वी से एनीमल्स’ (हम जिन्हें जानवर कहते हैं) उसमें एक संस्मरण इस प्रकार है-”मैं शाम को परिभ्रमण करने जाता। एक झील के किनारे बैठकर जंगली बत्तखों की जल क्रीड़ा देखा करता। पक्षी प्रतिदिन शाम को पाँच बजे जंगल की एक उपत्यिका की ओर उड़ जाते थे। एक दिन एक माली ने उनमें से एक बच्चे के पंख काट दिए। उस दिन नियत समय पर पक्षी उड़े, पर आकाश में चक्कर काटते रहे, पर वे गए नहीं, फिर नीचे उतर आए। कुतूहलवश मैंने जाकर देखा-नन्हे बच्चे के स्नेह ने उन्हें घर जाने नहीं दिया। जब तक उस बच्चे के नए पंख नहीं उग आए, पक्षी समुदाय खूंखार जंगली जानवरों से भरे उस जंगल में जी बना रहा।”
यह मार्मिक उदाहरण देकर उन्होंने समझाया कि पशु-पक्षी तक अपने समुदाय की सेवा के लिए जान तक देने को तैयार रहते हैं फिर मनुष्य अपने समाज की पीड़ा न पहचाने तो मनुष्य की श्रेष्ठता कहाँ रही?
वर्तमान समय में मानव जाति और उसकी सहायता एक विकासात्मक संक्रान्ति से गुजर रही है। इसमें उसकी नियति का चयन छुपा हुआ है। यह भले ही बाहरी रूप में सहायता के भीषण संघर्ष के रूप में दिखाई पड़ रहा हो, परन्तु उसके अन्तर में एक नई संस्कृति और सहायता का सृजन का बीज अंकुरित हो रहा है। यह अकाट्य तथ्य है कि विनाश का मंजर जितना बड़ा और व्यापक होता है सृजन की सम्भावना भी उतनी ही प्रबल होती है। हालाँकि विनाश की गति तीव्र होती है और सृजन की चाल धीमी होती है। परन्तु सृजन स्थायी और दृढ़ कदमों के साथ दस्तक देता है। आज विश्व में एक नई सहायता के आगमन की आहट सुनाई दे रही है जो भविष्य में सम्पूर्ण विश्व को एक जाति, एक भाषा और समाज-परिवार में बदलकर रख देगी और इसकी ध्वजा वाहक होगी भारत की आध्यात्मिक एवं सामाजिक संस्कृति जिसमें संवाद और संघर्ष दोनों की सम्भावना है।
आज सहायता ने अनगिन समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं। जितनी सुलझ सकती थी उससे अधिक समस्याएँ खड़ी हो गई हैं, जिसके समाधान के लिए उसके पास पर्याप्त आधारभूत शक्ति एवं सामर्थ्य नहीं है। सहायता ने दावों और कृत्रिम मूल वृत्तियों का एक जंगल खड़ा कर दिया है जिनमें उलझकर जीवन अपना पथ खो बैठा है और अपने लक्ष्य का उसे कोई आभास नहीं रह गया है। समाज एवं सहायता, द्वन्द्व एवं भ्रम की स्थिति में हैं, जिसका कोई निराकरण एवं समाधान नहीं मिल पा रहा। जो विचार, जो सूत्र प्रस्तावित किये जाते हैं, वे या तो वहीं ठहर जाने की बात करते हैं या फिर पीछे लौटने का सुझाव देते हैं। क्रियान्वित करने का अर्थ है और अधिक भ्रम, ठहराव और हताशा। वैज्ञानिक समाधान सुझाते जाते हैं जिससे अपनाने का तात्पर्य है जीवन और सहायता का मशीनीकरण कर देना। सहायता के समुचित विकास की कोई समग्र दृष्टि कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होती। इतिहास गवाह है इस दृष्टि के अभाव में ही सहायता को संघर्ष की विनाशकारी पीड़ा झेलनी पड़ी है। सहायता के संघर्ष की कहानी बड़ी लम्बी एवं रक्तरंजित है।
मुगल सहायता का भारत में आगमन भारतीय सहायता और संस्कृति के लिए एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। यह सहायता यहाँ बलात् बसने और हिन्दू सहायता को स्वयं में समाहित करने आयी थी। यह सहायता यहाँ पनप तो गयी परन्तु यह शक और हूण के समान न तो यहाँ समा सकी और न हिन्दू सहायता ही इसमें विसर्जित हो पायी। परिणाम स्वरूप मुस्लिम धर्म के आगमन से भारत में संस्कृति की दो धाराएँ बहने लगीं। ये दोनों धाराएँ समानान्तर रूप से चलती हैं। स्थान-स्थान पर वे एक-दूसरे का स्पर्श और आलिंगन भी करती हैं परन्तु वे मिलकर एक नहीं हो पातीं।
मुगलकाल में अकबर एक अपवाद था जिसने मुस्लिम आक्रमण एवं हिंसा की मूल चेतना से हटकर सत्ता की व्यापक साझेदारी एवं समझदारी का उदात्तपूर्ण प्रयास किया था। परन्तु औरंगजेब ने इस सारे प्रयास पर पानी फेर दिया और अकबर का दौर भारत के इस्लामिक सत्ता के चरित्र में अपवाद बनकर रह गया। इसके अपवाद को हटा देने पर इस सहायता का बर्बर एवं हिंसक स्वर उभरकर सामने आता है। गजनबी के उदय के बाद से मुख्य आक्रमण एवं हमले चालू हुए थे। इसके पूर्व सर्वप्रथम सन् 712 में मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला किया था और धर्मांतरण रूपी सहायता के संघर्ष की नींव रख दी थी। बारहवीं शताब्दी के अन्त में मुहम्मद गोरी के महत्त्वाकाँक्षी हमलों ने अन्ततः हिन्दू संस्कृति के महान् ध्वजा वाहक को निर्णायक रूप से पराजित किया और मुस्लिम सहायता की मजबूत नींव उत्तर भारत में रख दी। चौदहवीं शताब्दी के अन्त में तैमूरलंग ने दिल्ली पर भीषण हमला किया। 1526 में बाबर के आक्रमण के पश्चात् भारत में इस्लामिक सत्ता और सहायता का अधिक दृढ़ीकरण एवं विस्तार हुआ।
जब तक भारत में मुगल साम्राज्य एवं सहायता उन्नति के शिखर पर अवस्थित रही, बहुसंख्यक हिन्दू अल्पसंख्यक मुसलमानों की अधीनता में जीते रहे परन्तु इनके पराभव का काल प्रारम्भ होते ही उनमें एक प्रकार की घबराहट एवं भय का भाव जागने लगा। मुसलमानों की राजसत्ता ज्यों-ज्यों हिलती गयी, त्यों-त्यों उनका स्वभाव आवश्यकता से अधिक कोमल एवं नम्र होता गया एवं हिन्दुओं के हृदय का भय भी निकलता गया। इससे इस काल में हिन्दू-मुस्लिम सहायताओं के बीच इतिहास की सर्वाधिक घनिष्ठता बढ़ी। परन्तु यह ज्यादा समय तक स्थिर नहीं रह सकी क्योंकि हिन्दुओं में अपनी संस्कृति के प्रति घोर उपेक्षा तथा मुसलमानों की विलासिता ने दोनों सहायताओं को खोखला कर दिया। इसी बीच पंद्रहवीं शताब्दी से ही यूरोपीय देशों के निशाने पर भारत आ गया।
सिकन्दर के समय (ई.पू. चौथी सदी) यूरोप में भारत एवं भारतीय संस्कृति का नाम काफी प्रसिद्ध था। वहाँ के लोग जानते थे कि भारत धन और ज्ञान दोनों का भण्डार है। इसी प्रसिद्धि ने सिकन्दर को भारत की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी थी और इसी कारण वास्कोडिगामा 1498 ई. में कई अरबी मुसलमान के सहारे भारत पहुँचा। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना 1600 ई. में हुई। अंग्रेज भारत में मुख्यतः व्यापार के लिए आये थे। आरम्भ में राज्य स्थापना अथवा धर्म प्रचार उनका उद्देश्य नहीं था। परन्तु भारत की दयनीय दुरावस्था के कारण वे हमारी सहायता की छाती पर डटे रहे। इसकी सुन्दर विवेचना अमेरिकी दार्शनिक विल डँयुरो के विचारों में झलकती है। वह कहते हैं ‘भारत विजय का काम धर्म और सहायता के सिद्धान्त से नहीं डार्विन और नीत्से के सिद्धान्त से जायज था। जिस जाति और सहायता में अपना शासन स्वयं चलाने की शक्ति नहीं रहती, जो जाति अपने धन-जन का स्वयं विकास नहीं कर सकती और जिस देश का एक प्रान्त दूसरे प्रान्त को तथा एक जाति दूसरी जाति को बराबरी का दर्जा देने को खुद तैयार नहीं होती, वह जाति और देश उन लोगों का गुलाम होकर रहता है, जिन्हें लोभ की बीमारी और शक्तिमत्ता का रोग है।’
इस प्रकार शक्ति-शौर्य हीन भारत में सन् 1857 ई. तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज्य रहा। तब गदर के रूप में भारत माता का पराक्रम अचानक महाक्रान्ति की मशाल के रूप में जाग उठा। यह हिन्दू नवजागरण का काल था जिसके प्रभाव से अन्ततः 1947 में भारत अपने गुलामी की चादर को उतार फेंका। परन्तु अभी भी उस मानसिकता को उतारना शेष है जिसने भारत माता के जन-जन के हृदय में अपनी संस्कृति और सहायता के प्रति त्याग और बलिदान के भाव ढाँक-ढाँप रखा है। क्योंकि ईसाई, मुसलमान तथा अन्य सहायताओं के समान हमारी सहायता-संस्कृति के दिव्य तत्त्व किताबों में कम अपने व्यक्तित्व में, शरीर के हर रक्त बिन्दुओं में समाये तथा घुले हुये हैं। हमारा प्राण हमारा धर्म है। भारत की विशिष्टता धर्म है। इस देश का प्राण धर्म है, भाषा धर्म है तथा भाव धर्म है। हमारा पवित्र भारत वर्ष धर्म और दर्शन की पुण्य भूमि है। यही संन्यास और त्याग की भूमि है तथा यहीं केवल यहीं आदि काल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन का सर्वोत्तम, आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। इसकी सहायता और संस्कृति सनातन एवं कालजयी है।
राष्ट्र निर्माण के प्रथम मंत्रद्रष्ट स्वामी विवेकानन्द उद्घोष करते हैं कि भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान होगा, पर वह जड़ की शक्ति से नहीं, वरन् आत्मा की शक्ति के द्वारा। वह उत्थान, विनाश की ध्वजा लेकर नहीं वरन् शान्ति और प्रेम की ध्वजा से। वह आगे कहते हैं-’फिर से कालचक्र घूमकर आ रहा है, एक बार फिर भारत से वही शक्ति प्रवाह निःसृत हो रहा है जो शीघ्र ही समस्त जगत् को प्लावित कर देगा। एकमात्र भारत के पास ही ऐसा ज्ञानलोक विद्यमान है जिसकी कार्यशक्ति सच्चे धर्म के मर्मस्थल, उच्चतम आध्यात्मिक सत्य के अशेष महिमान्वित उपदेशों में प्रतिष्ठित है। जगत् के इस तत्त्व की शिक्षा प्रदान करने के लिए ही प्रभु ने इस देश की सहायता-संस्कृति को विभिन्न दुःख कष्टों के भीतर भी आज तक जीवित रखा है।’ वह कहते हैं- ‘मैं अपने मानस चक्षु से सारी भारत की उस पूर्णावस्था को देखता हूँ जिसका इस सहायता रूपी विप्लव और संघर्ष से तेजस्वी और अजेय रूप में उत्थान होगा।’
इस तथ्य को अपने शब्दों में अभिव्यक्ति देते हुए राष्ट्र निर्माता महर्षि अरविन्द कहते हैं-’जब हम भारत के अतीत को देखते हैं तब जो हमारा ध्यान आकर्षित करती है, वह है उसकी विलक्षण ऊर्जास्विता, उसके जीवन के आनन्द की असीम शक्ति, उसकी प्रायः कल्पनातीत भरपूर सृजनशीलता। हजारों वर्षों से वस्तुतः और भी लम्बे समय से वह प्रचुरता से और निरन्तरता से खुले हाथों, अनन्त के साथ सृजित करता आ रहा है। गणतंत्रों, राज्यों और साम्राज्यों की, दर्शनों की, सृष्टि मीमाँसाओं की, विज्ञानों की और पंथों की तथा कलाओं की एवं कविताओं की रचना करता आ रहा है। यह हर प्रकार के स्मारकों, राजमहलों और मंदिरों और लोक निर्माणों, समुदायों, समाजों और धार्मिक व्यवस्थाओं को, कानूनों और संहिताओं और अनुष्ठानों को आयोजित करता आ रहा है। यह भौतिक विज्ञानों, मनोविज्ञानों, योग की प्रणालियों, राजनीति और प्रशासन की पद्धतियों, आध्यात्मिक कलाओं, साँसारिक कलाओं, व्यापारों, उद्योगों, ललित हस्तकलाओं को तथा अन्य अनेकों को सृजित और क्रियाशील करता आ रहा है।’
भारत सृजन करता ही जाता है, करता ही जाता और न संतुष्ट होता है और न थकता है, वह उसका अन्त नहीं करना चाहेगा, विश्राम करने के लिए स्थान की आवश्यकता भी नहीं लगती, न आलस्य अथवा खाली पड़े रहने के लिए समय की। भारत के अपने उपनिषदों के स्वर तथा बौद्धों की उक्तियाँ, ईसा मसीह के ओठों पर पुनः गुँजरित हो उठती हैं। अब वह दिव्य स्वर समस्त लोकचेतना के अन्तर में उठने लगा है। यह सभी प्रतिकूलता, पराजय और संघर्ष से भी अजेय विजय के बल के साथ बढ़ेगा और असहायता तथा अवनति से पुनरुद्धार की महान् ज्योति के रूप में ऊपर उठकर अधिक भव्य जीवन के प्रकाश की ओर जायेगा। यही करने के लिए अब भारतीय सहायता फिर से उठ खड़ी हो रही है जैसा वह अपनी आत्मा की अखण्ड शक्ति में सदैव करती आयी है। आइये हम भारत माता की संतानें सहायता की इस महा मशाल को अपने त्याग और बलिदान से थामें जिससे इसकी महाज्योति समस्त विश्व को आलोकित कर सके।
हालैंड समुद्र से निचाई पर बसा हुआ है। पानी भीतर न घुसे, इसलिए उस देश के किनारे पर दीवारें बनी हुई हैं। कभी पानी भीतर आने लगता है तो बड़े-बड़े पंप उसे उलीचने के लिए लगाने पड़ते हैं।
एक दिन रात होते-होते एक लड़का पीटर समुद्र की दीवार पर से निकला, उसने देखा कि दीवार में छेद हो गया है और उससे होकर पानी नगर में तेजी से दौड़ रहा है। स्काउटिंग की शिक्षा प्राप्त अनुशासनप्रिय छात्र ने कोई और उपाय न देखकर अपनी बाँह उस छेद में ठूँसकर बहाव को रोका। सहायता के लिए औरों को पुकारता रहा, पर उस सुनसान में किसी ने उसकी आवाज ही नहीं सुनी। बारह घंटे भयंकर शीत और पानी में डूबा हुआ लड़का मरणासन्न हो गया। सवेरे जब लोग उधर से निकले तो लड़के को इस स्थिति में पानी रोके हुए पड़े देखा। निकालने पर बड़ी कठिनाई से ही उसकी जान बचाई जा सकी। हालैंड को डूबने से बचाने वाले इस साहसी पीटर का नाम हालैंड के इतिहास में अमर है।
एक जंगल में हिरन, कौआ, कछुआ और चूहा रहते थे। विपरीत बुद्धि के कारण परस्पर झगड़ते रहते थे। शिकारी अक्सर उन्हें मारते रहते थे, सो उनका वंश नष्ट हो चला था। एक दिन एक संत ने उन्हें हिल-मिलकर रहने का उपदेश दिया। वे चारों मिल-जुलकर रहने को सहमत हो गए।
एक दिन एक शिकारी आया। दिनभर कोई शिकार न मिलने पर उसने रेंगते हुए कछुए को पकड़ा और जाल में रखकर चलने लगा।
तीनों मित्र असमर्थ तो थे, पर उन्होंने सूझ-बूझ और सहकारिता से काम लिया। हिरन शिकारी के सामने से लँगड़ाते हुए चलने लगा। कौआ उसकी पीठ पर बैठ गया। इस स्थिति का लाभ उठाकर वह आसानी से उसे पकड़ सकता है, यह सोचकर जाल जमीन पर रखकर शिकारी हिरन के पीछे दौड़ा।
इतने में चूहे ने जाल काट दिया और कछुआ भागकर एक झाड़ी में छिप गया। बहुत देर पीछा करने के बाद जब हिरन के कुलांचे भरीं तो निराश शिकारी वापस लौटा तो जाल कटा और कछुए को गायब पाया।
शिकारी को उस क्षेत्र में किसी भूत-प्रेत की उपस्थिति एवं करतूत प्रतीत हुई, सो वह रात्रि में उधर रुके बिना ही भयभीत होकर तत्काल घर लौट पड़ा।
मित्रता और सूझ-बूझ के सहारे मनुष्य कठिनाइयाँ आसानी से पार कर लेता है, जबकि इक्कड़ प्रकृति तथा संतुलन खो बैठने वाले छोटी मुसीबत में भी भारी हानि उठाते हैं।
संसार को दूरदर्शी दार्शनिकों ने दुःखालय की संज्ञा दी है। इस संज्ञा का आधार यही है कि मनुष्य संसार में जन्म लेकर सदा ही किसी-न-किसी प्रकार के दैहिक, दैविक अथवा मानसिक दुःखों से घिरा रहता है। मनुष्य का सारा परिश्रम, पुरुषार्थ एवं प्रयत्न दुखों से बचने का ही एक उपक्रम है, किंतु जीवनभर प्रयत्न करते रहने पर भी मनुष्य का प्रायः छुटकारा नहीं हो पाता और अंत में वह कष्ट-क्लेशों की मानसिक अथवा शारीरिक स्थिति में ही इस संसार को छोड़ जाता है।
अनेक लोग अभावों को ही दुख का कारण मानते हैं। संसार में एक-से-एक बढ़कर साधनसंपन्न व्यक्ति पड़े हैं, किंतु क्या वे सुखी अथवा संतुष्ट होते हैं ? अपने विपुल साधनों के बीच भी वे तरसते-तड़पते और आह-कराह करते नजर आते हैं। जिनको अभाव का दुख नहीं, उन्हें रोग-दोष आदि के शारीरिक दुख से पीड़ित देखा जाता है, जिन्हें शारीरिक दुख नहीं, वे काम, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, ताप, अनुताप, पश्चात्ताप, तृष्णा अथवा एषणाओं के मानसिक दुखों से घिरे पाए जाते हैं। ऐसे भी अनेक लोग हो सकते हैं, जिनको शारीरिक, मानसिक अथवा अभावजन्य दुख न भी हों, तो वे अज्ञान के दुख से पीड़ित पाए जा सकते हैं। यदि कोई सज्जन अथवा साधु पुरुष इन दुखों से न भी दुखी हों, तब भी उनके आस-पास रहने वाले दुष्ट लोग अकारण ही उनके लिए अप्रिय परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकते हैं। कोई दुर्घटना अथवा आधि-व्याधि ही उनके दुख का कारण बन सकती है। प्रकृतिजन्य न जाने ऐसे कितने दुख-क्लेश इस संसार में आते रहते हैं, जिनसे अमीर, गरीब, साधु और खल सभी एकसमान पीड़ित होते हैं और कोई दुख न भी हो तो जन्म, जरा और मृत्यु का दुख ही क्या कम है ?
महात्मा बुद्ध एक राजकुमार थे। उनके जीवन में अभाव का प्रश्न ही नहीं उठता था। वे स्वस्थ, सुँदर और सच्चरित्र भी थे, शारीरिक कष्ट का उन्हें कोई अनुभव नहीं होता था। सावधानीपूर्वक उनकी किसी भी इच्छा की पूर्ति की जाती थी। हर प्रकार से हर दशा में उन्हें पूर्ण प्रसन्न एवं संतुष्ट रखने का प्रयत्न किया जाता था। ऐसी स्थिति में मानसिक दुख का उनके जीवन से कोई संबंध नहीं था। उनकी पत्नी यशोधरा सुँदर, स्वस्थ, पतिव्रता एवं प्रिया थी। उनका पुत्र राहुल मनभावन तथा प्यारा था। तात्पर्य यह कि राजकुमार सिद्धार्थ को अपनी प्रिय एवं अनुकूल परिस्थितियों में शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा आकस्मिक कोई दुख न था। तब भी दुख की अनुभूति से पीड़ित होकर वे अपनी प्रिय परिस्थितियों को छोड़कर संसार का दुख दूर करने का उपाय खोजने के लिए साधू हो गए।
राजकुमार सिद्धार्थ केवल एक बार ही अपनी अनुकूल परिस्थितियों तथा प्रिय वातावरण से निकलकर बाहर फैले हुए संसार में आए और एक रोगी, वृद्ध तथा मुरदे को देखकर अनुभव कर लिया कि यह संसार दुख-दर्दों से भरा हुआ दुखालय है। उनका यह अनुभव सत्य, यथार्थ एवं वास्तविक था। इसने उन्हें इतना कातर कर दिया कि आखिर वे संसार का दुख दूर करने का उपाय खोजते-खोजते राजकुमार सिद्धार्थ से वैरागी बुद्ध बन गए।
वैदिक, औपनिषदिक, दार्शनिक एवं धार्मिक जितना भी आध्यात्मिक और ज्ञान-विज्ञान आदि का जो भी उच्च साहित्य है, वह सब किसी-न-किसी रूप में उन उपायों एवं सिद्धाँतों का ही विस्तार है, जिनके द्वारा मनुष्य दुख से निवृत्त होकर सुख की ओर अग्रसर हो सके। ऋषियों, मुनियों तथा दार्शनिकों से लेकर जो भी तपस्वी, महात्मा एवं मनीषी, चिंतक तथा विद्वान हुए हैं, उन्होंने सारा जीवन मनुष्य के दुख दूर करने और सुख पाने के उपाय खोजने में लगा दिया है। इन पावन प्रयत्नों एवं महान जीवनों को देखते हुए यही मानना पड़ता है कि यह संसार वास्तव में दुखालय ही है और दुख से बचने का प्रयत्न ही मानव जीवन का उपक्रम है।
यह भी माना जा सकता है कि संसार में सुख का भी एक अंश है, जिसका प्रमाण लोगों के हंसने-बोलने, गाने-बजाने, खेलने-कूदने तथा आनंद मानने से मिलता है। लोग हास-विलास तथा भोगपूर्ण जीवन बिताते भी दृष्टिगोचर होते हैं, किंतु ये सारे सुख क्षणभंगुर, अस्थायी, परिवर्तनशील एवं दुख के परिणाम वाले ही हैं। न तो इनमें स्थायित्व ही है और न वास्तविकता ही। सुखों का यह सारा आयोजन भी एक प्रकार से दुख से बचने का उपक्रम ही है। संसार में सुखों की अपेक्षा दुखों का ही बाहुल्य एवं स्थायित्व है।
दुनिया में दुखों का आधिक्य है और मनुष्य को संसार में ही रहना है तो क्या दुखों में उलझ-उलझकर अपना बहुमूल्य जीवन नष्ट कर देना उसका अटल प्रारब्ध है? नहीं, मनुष्य का प्रारब्ध दुख भोगना नहीं है। उसका लक्ष्य दुखों पर विजय प्राप्त करना एवं स्थायी सुख प्राप्त करना ही है। यही मनुष्य का पुरुषार्थ है और उसका श्रेय भी। दुख से पूर्ण होने के कारण जगत को दुखालय मानकर कष्ट एवं क्लेशों के बीच तड़प-तड़पकर मर जाना मनुष्य की लज्जास्पद पराजय है। मनुष्यता की शोभा इसी में है कि दुख से छूटने और सुख प्राप्त करने के लिए अखंड पुरुषार्थ किया जाए। मनुष्य को चाहिए कि वह संसार को परीक्षा स्थल समझे और इस दुख सागर को पार कर सुख-शाँति के सुहावने किनारे पहुँचकर अपने को श्रेय का अधिकारी बनाए।
जहाँ रोग हैं, वहाँ उपचार भी, जहाँ उलझनें हैं, वहाँ उपाय भी हैं। जहाँ चाह है, वहाँ राह भी, जहाँ दुख है, वहाँ उनसे छूटने का मार्ग भी है। आवश्यकता केवल इतनी है कि मनुष्य के हृदय में सच्ची जिज्ञासा हो। वह अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठावान तथा अखंड पुरुषार्थ एवं प्रयत्न करने का साहस रखता हो।
भारतीय मनीषियों ने परोपकारार्थ अपना पूरा जीवन तपकर दुख-निवारण के जो अमोघ उपाय खोज निकाले हैं, वे बड़े ही सरल एवं सुकर हैं। उनका अवलंबन लेकर न जाने कितने लोग इस दुख-सागर से तरे हैं और तरते रहे हैं। उनके द्वारा खोजे हुए दुख-निवारण के उपाय सार्वभौम एवं सर्वमान्य हैं। उन आध्यात्मिक उपायों का अवलंबन किए बिना न तो आज तक कोई दुख से निस्तार पा सका है और न पा सकेगा। इसके विपरीत जो बुद्धिमान उन उपायों को काम में लाता है, वह अवश्य ही दुखों पर विजय पाकर सुख पाता है।
अधिकाँश चिंतकों का मत है कि मनुष्य की विषय-तृष्णा ही सारे दुखों का मूल है। यदि मनुष्य तृष्णा की मरु-मरीचिका में फंसने से अपने को बचा सके तो निश्चय ही दुखों से उसका निस्तार हो जाए। संसार में जो कुछ देखा, उसी को पाने के लिए लालायित हो उठना और पाए हुए से संतुष्ट न होकर अधिकाधिक पाने की इच्छा करना- यही तृष्णा है, जो कभी भी पूरी नहीं होती। पाए हुए में संतुष्ट रहकर यदि अधिकाधिक पाने की अनावश्यक पिपासा को छोड़ दिया जाए तो मनुष्य अवश्य ही अनेक शारीरिक, सामाजिक तथा मानसिक दुखों से बच सकता है।
संसार की प्रत्येक वस्तु नाशवान है, यहाँ तक कि शरीर भी। ऐसा जानकर जो बुद्धिमान उनके प्रति आसक्ति नहीं रखता, वह दुख के विशेष हेतु मोहरूपी कटार से बचा रहता है, अन्यथा इनमें आसक्त व्यक्ति इनके क्षीण, क्षय अथवा नाश-वियोग से क्षण-क्षण में दुखी होता रहेगा। यदि ये वस्तुएं उसके देखते-देखते नष्ट न भी हों, तब भी उनके नष्ट हो जाने अथवा बिछुड़ जाने की शंका सताया करती है। संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर एवं क्षयमान है, ऐसी बुद्धि रखकर जो मनीषी उनसे आत्मिक संबंध न रखकर व्यावहारिक संबंध रखता हुआ अनासक्ति का आचरण करता है, संसार की कोई भी हानि उसे दुखी अथवा विचलित नहीं कर सकती है। दुख असल में वस्तु के विनाश अथवा वियोग से नहीं होता, दुख का कारण वास्तव में उसके प्रति मनुष्य का वह मोह होता है, जिसे वह अज्ञानवश वस्तु से स्थापित कर लेता है।
महात्मा बुद्ध की खोज के अनुसार दुखों की निवृत्ति निर्वाण में है। अपने को राग-द्वेष से मुक्त कर लेना ही निर्वाण है, जिसे थोड़े-से प्रयत्न द्वारा मनुष्य जीवनकाल में ही पा सकता है। बुद्ध प्रतिपादित निर्वाण अवस्था को वैराग्य द्वारा शुद्धाचरण करते हुए, इस नाशशील जगत के चिरंतन सत्यों में विश्वास रखने से, मनुष्य विषयों की विभीषिका और तृष्णाओं की मृग-मरीचिकाओं से सुरक्षित रहकर दुखों से निवृत्त हो सकता है।
साँख्य दर्शनकर आत्मा एवं अनात्मा के बीच अंतर न समझने के अज्ञान को दुखों का कारण बतलाते हैं। उनका कहना है कि मनुष्य जब अज्ञानवश अपने का शरीर मान लेता है, तभी वह दुखों का अनुभव करता है। दुखों का अनुभव करना शरीर का धर्म है। शीत, गरमी, वर्षा, भूख, प्यास, वियोग, बिछोह आदि अप्रिय परिस्थितियाँ शरीर को ही व्यापा करती हैं और वही इनका अनुभव करता है। जब मनुष्य अपनी अनुभूतियों को शरीर तक सीमित कर लेता है अथवा अपने को शरीर मान लेता है तो स्वाभाविक ही है कि शरीर का कष्ट उसे अपना कष्ट लगने लगता है।
मनुष्य वास्तव में शरीर नहीं है। वह अनादि, अनंत, चैतन्य एवं आनंदस्वरूप आत्मा है। उसमें अज्ञान अथवा दुःखानुभूतियों का कोई विकार नहीं है। वह निर्विकार, एकरस चेतन तत्त्व है, जिसको न तो शस्त्र काट सकता है, न पानी गीला कर सकता है, न हवा सुखा सकती है और न आग जला सकती है। वह अपनी ज्योति से स्वयं प्रकाशमान ऐसा शिव एवं शाश्वत दीपक है, जिसको न तो विपरीतताएं प्रभावित कर सकती हैं और न काल बुझा सकता है। आत्मा शरीर, मन, इंद्रियों तथा बुद्धि से भिन्न अविनाशी तत्त्व है, जो कि सदा-सर्वदा स्वयं संतुष्ट एवं आनंदित रहता है। उसे सुख के लिए न तो किसी वस्तु की अपेक्षा है और न किसी भोग की आवश्यकता। वह स्वयं ही आनंदस्वरूप एवं शाश्वत है। मनुष्य अविचल एवं अविनाशी आत्मा है, शरीर नहीं। अब जो व्यक्ति अज्ञानवश अपने इस परमपद आत्मा से भिन्न होकर शरीर को निम्न पद पर उतार लाएगा, वह उसकी विकृतियों से त्रस्त होगा ही।
वेदाँत दर्शन के व्याख्याकार जगद्गुरु शंकर ने दुखों के निवारणों का उपाय मोक्ष बतलाया है। मोक्ष की परिभाषा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है, “इस सत्य ज्ञान की स्थायी अनुभूति ही मोक्षावस्था है कि आत्मा देश से परे, शरीर तथा मन, बुद्धि से विलग स्वभावतः मुक्त, नित्य एवं अविकल्पी है।” ऐसी अनुभूति का साक्षात्कार कर लेने पर मनुष्य का, शरीर अथवा मन विकारों से प्रभावित होना समाप्त हो जाता है।
एक अज्ञात समय से शरीर एवं विश्व के संसर्ग में रहते-रहते मनुष्य अपने सत्यस्वरूप आत्मा को ही नहीं भूल गया, बल्कि जगत के परम कारण परमात्मा को भी भूल गया है। संसर्गजन्य अविद्या के कारण वह परमात्मा के स्थान पर उसकी माया, इस संसार को ही सत्य समझ बैठा है, जहाँ दुख के सिवाय उसे कुछ भी हाथ नहीं लगता।
इस प्रकार मनुष्य यदि अपने सत्यस्वरूप आत्मा में आस्था रखकर संसार में परिव्याप्त कारणभूत परमात्मा को मर्यादापूर्वक भोगते हुए भी उनसे अप्रभावित रहने के अहायास के साथ जीवनयापन करे तो निश्चय ही उसके सारे बंधन कट जाएं और वह अपने जीवनकाल में ही मुक्ति, मोक्ष एवं निर्वाण की चिदानंद स्थिति को पा सकता है।
मिलान के आर्क बिशप पोप पाल उन दिनों आर्थिक तंगी का जीवन जी रहे थे। उन्हीं दिनों अकाल की भी स्थिति थी। एक दिन एक समाजसेवी व्यक्ति उनके पास पहुँचे और बोले, “अभी भी बहुत लोगों तक खाद्य सामग्री पहुँच नहीं पाई, जबकि कोष में एक भी पैसा नहीं बचा।”
पोप पाल ने कहा, “कोष रिक्त हो गया, ऐसा मत कहा, अभी मेरे पास बहुत-सा फर्नीचर व सामान पड़ा है, इन्हें बेचकर काम चलाओ, कल की कल देखेंगे।”
आज का काम भी रुका नहीं, कल आने तक उनकी यह परदुखकातरता दूसरे श्रीमंतों को खींच लाई और सहायता कार्य फिर द्रुत गति से चल पड़ा।
रामकृष्ण परमहंस महान संत थे। उन्हें धन-दौलत से एकदम घृणा थी। वे रुपये-पैसे, सोना-चाँदी को छूते तक न थे। नरेंद्रदत्त को इस पर विश्वास नहीं हुआ। वे सोच भी नहीं सकते थे कि ऐसा भी मनुष्य हो सकता है, जो रुपये-पैसे को छुए भी नहीं। उन्होंने गुरु की परीक्षा लेने का निश्चय किया। रामकृष्ण परमहंस बाहर गए हुए थे तो उन्होंने चुपचाप उनके बिस्तर के नीचे एक रुपया रख दिया। फिर आकर अन्य लोगों के बीच बैठ गए।
रामकृष्ण जी आए और बिस्तर पर बैठ गए। अचानक वह हड़बड़ाकर उठ बैठे। सभी लोग इधर-उधर देखने लगे कि वे इस प्रकार क्यों खड़े हो गए हैं, परंतु उनकी समझ में कुछ न आया। तब रामकृष्ण परमहंस ने बिस्तर हटाया। नीचे एक रुपया पड़ा था। सभी दंग रह गए। उधर नरेंद्रदत्त सिर झुकाए गंभीर मुद्रा में बैठे थे। रामकृष्ण परमहंस उनकी शरारत समझ गए। वे मुस्कुराकर बोले, “नरेंद्र! गुरु की परीक्षा कर रहे थे? ठीक ही है। गुरु धारण करने से पहले गुरु की परीक्षा अवश्य करनी चाहिए।”
कोशल नरेश प्रसेनजित को अपने इस महाबलवान हाथी पर गर्व था। महायुद्धों में उसका पराक्रम देखते ही बनता था। शत्रुओं के झुण्ड के झुण्ड को वह देखते ही देखते साँकलों में बाँध लेता। शत्रुओं को बाँधने की कला में प्रवीण होने के कारण ही महाराज ने उसका नाम बद्धरेक रखा था। उसके बल और पराक्रम की कहानियाँ दूर-दूर तक फैली थीं। कोशल निवासी उसे अपने देश का रत्न मानते थे। अन्य साम्राज्यों के सेनानी भी यह स्वीकारते थे कि युद्ध में ऐसा कुशल हाथी पहले कभी देखा नहीं गया।
अन्य महादेशों के सम्राट उस हाथी को किसी भी कीमत पर खरीदना चाहते थे। वे सब उसे पाने के लिए कुछ भी कीमत चुकाने के लिए तैयार थे। सभी की नजरें उस पर लगी रहती थीं। सचमुच ही वह अपूर्व था। युद्ध में कभी किसी ने उसे भागते नहीं देखा। कितना ही भयानक संघर्ष हो, कितने ही तीर उस पर बरस रहे हों और भाले फेंके जा रहे हों। वह चट्टान की तरह अडिग खड़ा रहता था। उसकी चिंघाड़ कुछ ऐसी थी कि दुश्मनों के दिल बैठ जाते थे। शत्रु सेना में भगदड़ मच जाती थी। उसने अपने मालिक कोशल नरेश की बड़ी सेवा की थी। अनेक युद्धों में उन्हें जिताया था।
लेकिन इन दिनों काल के प्रवाह ने उसे वृद्ध बना दिया था। हालाँकि अभी भी कोशल निवासी उसे बड़े ही सम्मान से देखते थे। बुढ़ापे की दुर्बलता का असर उस महाबलवान हाथी पर स्पष्ट झलकता था। एक दिन जब वह तालाब में नहाने के लिए उतरा, तो पता नहीं कैसे वह तालाब की कीचड़ में फँस गया। कभी किसी समय जो बड़े से बड़े दलदल को एक ही आवेग में चीरता हुआ पार कर लेता था, आज तालाब की कीचड़ से नहीं उबर पा रहा था। उस बद्धरेक हाथी ने अनेकों प्रयास कर डाले, लेकिन उस कीचड़ से वह स्वयं को निकालने में समर्थ न हो सका। महाराज प्रसेनजित के सेवकों ने भी बहुत चेष्टा की, लेकिन कोई खास परिणाम न निकला। सब कुछ असफल हो गया।
अपने परमप्रिय एवं सुप्रसिद्ध हाथी की ऐसी दुर्दशा देख कर सभी लोग दुःखी हो गए। तालाब पर भारी भीड़ इकट्ठी हो गयी। वह हाथी सारे कोशल देश का चहेता था। देश भर में उसे प्यार करने वाले थे। बाल-वृद्ध-वनिताएँ सभी का वह प्यारा था। उसकी आँखों एवं व्यवहार से सदा ही बुद्धिमानी झलकती थी। आज उसकी यह दुर्दशा सभी को असहनीय लग रही थी। महाराज प्रसेनजित ने उसे कीचड़ से निकालने के लिए अनेक महावत भेजे। पर वे भी हार गए। किसी को कोई उपाय नहीं समझ आ रहा था।
ऐसी विकट स्थिति में महाराज प्रसेनजित स्वयं उस तालाब पर जा पहुँचे। उन्हें भी अनेक युद्धों में विजय दिलाने वाले हाथी का यह दुःख सहन नहीं हो रहा था। अपने महाराज को आया हुआ देख राजधानी के प्रायः सारे लोग उस तालाब पर इकट्ठे हो गए। सभी दुःखी थे, परेशान थे, किन्तु किसी को कोई भी उपाय नहीं सूझ रहा था।
ऐसे में स्वयं महाराज प्रसेनजित को ही अपने पुराने महावत की याद आयी। यही महावत बद्धरेक की देखभाल किया करता था। अब वह भी वृद्ध होकर राज्य की सेवा से निवृत्त हो गया था। इन दिनों वह प्रायः हर समय भगवान् तथागत के उपदेशों में डूबा रहता था। उस महावत के लिए भी राजा के मन में भारी सम्मान था। आज अपने परम प्रिय बद्धरेक हो फँसा हुआ देख राजा ने सोचा, शायद ऐसे में वह बूढ़ा महावत ही कुछ कर सके।
महाराज की इस सोच के प्रेरक भगवान् तथागत के वचन ही थे। एक दिन धर्म प्रवचन करते समय भगवान् ने कहा था- बद्धरेक एवं इस महावत का जन्म-जन्म का साथ है। उन्होंने उस बूढ़े महावत को सम्बोधित करते हुए कहा था- तू इस बार ही इस हाथी के साथ नहीं है, पहले भी रहा है। यहाँ सब जीवन जुड़ा हुआ है। फिर इस जीवन तो पूरे समय हाथी के साथ ही रहा था। हाथी उसी के साथ बड़ा हुआ था, उसी के साथ जवान हुआ था और अब उसी के साथ बूढ़ा भी हो गया था। उस महावत ने हाथी को हर हाल में देखा था। शान्ति और युद्ध दोनों में उसकी समझदारी से वह परिचित था। एक तरह से वह हाथी की रग-रग से वाकिफ था। राजा ने इन परिस्थितियों में सोचा शायद वह बूढ़ा महावत ही कुछ कर सके।
महाराज प्रसेनजित की खबर पाते ही वह बूढ़ा महावत हाजिर हो गया। उसने अपने उस प्यारे हाथी को कीचड़ में फँसे देखा। इस दृश्य को देखकर उसके माथे पर बल पड़े, मस्तिष्क में कुछ विद्युत् की भाँति कौंध गया। और फिर वह मुस्कराया। अपनी इस मुस्कराहट के साथ ही उसने महाराज को निवेदन किया कि यहाँ पर संग्राम भेरी बजायी जाय। आज यहाँ युद्ध के सभी वाद्य बजने चाहिए। उस महावत की सलाह पर तुरन्त अमल किया गया। वहाँ तुरन्त संग्राम भेरी बजने लगी। युद्ध के नगाड़ों की आवाज सुनकर जैसे अचानक ही वह बूढ़ा हाथी जवान हो गया और कीचड़ से उठकर किनारे पर आ गया। वह तो जैसे भूल ही गया अपना बुढ़ापा और कमजोरी। उसका सोया हुआ योद्धा जाग उठा और वह चुनौती काम कर गयी। फिर उसे क्षण भर भी देर न लगी।
अब तक किए जा रहे सभी उपायों पर यह संग्राम भेरी भारी पड़ी। बजते हुए युद्ध घोष ने उसका सोया हुआ शौर्य जगा दिया। उसका शिथिल पड़ गया खून फिर से दौड़ने लगा। अपने पराक्रम के स्मरण मात्र से वह ऐसी मस्ती और सरलता-सहजता से बाहर आ गया कि जैसे वहाँ कोई कीचड़ न हो और न वह वहाँ कभी फँसा हो। किनारे पर आकर वह हर्षोन्माद में ऐसे चिंघाड़ा जैसा कि वर्षों से लोगों ने उसकी चिंघाड़ सुनी ही नहीं थी।
भगवान् के बहुत से भिक्षु भी उस बूढ़े महावत के साथ यह दृश्य देखने के लिए तालाब पर पहुँच गये थे। उन्होंने सारी घटना भगवान् को आकर सुनायी। तब भगवान् ने सभी उपस्थित भिक्षुओं से कहा- अरे तुम सब उस अपूर्व हाथी से कुछ सीखो। उसने तो कीचड़ से अपना उद्धार कर लिया, तुम कब तक इस कीचड़ में फँसे रहोगे? और तुम देखते नहीं मैं कब से संग्राम भेरी बजा रहा हूँ। भिक्षुओं! जागो और जगाओ अपने संकल्प को। वह हाथी भी कर सका। अति दुर्बल बूढ़ा हाथी भी कर सका। क्या तुम कुछ भी न करोगे? मनुष्य होकर-सबल होकर, बुद्धिमान होकर क्या तुम कुछ न कर सकोगे?
भगवान् तथागत की यह तेजस्वी वाणी श्रोताओं के मर्म को भेद रही थी- वह कह रहे थे- क्या तुम हाथी से भी गए बीते हो? चुनौती लो उस हाथी से; तुम भी आत्मवान् बनो। एक क्षण में क्रान्ति घट सकती है। बस केवल स्मरण आ जाए, भीतर जो सोया है, जग जाए। फिर न कोई दुर्बलता है, न कोई दीनता। भिक्षुओं, बस अपनी शक्ति पर श्रद्धा चाहिए। त्वरा चाहिए, भिक्षुओं, तेजी चाहिए। एक क्षण में काम हो जाता है। वर्षों का सवाल नहीं है। लेकिन सारी शक्ति एक क्षण में इकट्ठी लग जाए, समग्रता से, पूर्णरूपेण। और इसके बाद उन्होंने यह धम्मगाथा कही-
अप्पमादरत्व होथ स चित्तमनुरक्खथ। दुग्गा उद्धरथत्तानं पंके सत्तोव कुँजरो॥
अर्थात्- अप्रमाद में रत होओ, जागो और अपने चैतन्य की रक्षा करो। इस दुर्गमता से अपना उसी तरह उद्धार करो, जैसे कि उस हाथी ने कीचड़ से अपना उद्धार कर लिया।
श्रमिक पत्थर काटते-काटते थक गया तो सोचने लगा, किसी बड़े मालिक का पल्ला पकड़ लें, ताकि अधिक आय मिले और कम परिश्रम पड़े।
सोचते-सोचते वह पहाड़ पर चढ़ गया और शिखर पर अवस्थित देवी की प्रतिमा से याचना करने लगा। उसने भी बात सुनी नहीं तो सोचा, बड़े देवता की आराधना करें।
बड़ा कौन? तो उसे सूर्य सूझा। सूर्य की आराधना करने लगा। एक दिन बादल आए और सूर्य को अपने आँचल में छिपा दिया। सोचने लगा, सूर्य में बादल बड़ा है। उसने अपना इष्ट बदला और बादल की आराधना करने लगा।
फिर सोचा, बादल तो पहाड़ से टकराते और सिर फोड़कर वहीं समाप्त हो जाते हैं, इसलिए पहाड़ का भजन क्यों न करें।
बाद में सूझा कि पहाड़ को रोज हमीं काटते हैं। अपने आप को सबसे बड़ा क्यों न मानें?
इसके बाद वह सबको छोड़कर अपने आप को सुधारने लगा और कुछ दिन बाद पुरुषार्थ के सहारे उस क्षेत्र के बड़ों में गिना जाने लगा।
मनुष्य संपत्तियों से नहीं, विभूतियों से ही सुखी और समुन्नत हो सकता है। गुण, कर्म, स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाए बिना, कर्तृत्व को आदर्शवादी बनाए बिना आत्मिक उत्कर्ष को प्राप्त कर सकना तो दूर रहा, प्रचुर संपत्ति प्राप्त कर लेने पर भी चैन से नहीं रहा जा सकता। व्यक्ति की अंतःचेतना यदि निकृष्ट स्तर की बनी रहे तो कुबेर जैसा धनी और इंद्र जैसा समर्थ होते हुए भी उसे निरंतर असंतोष एवं विक्षोभ की आग में ही जलते रहना होगा। अस्तु, मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी संपदा, सबसे बड़ी सफलता आत्मिक उत्कर्ष ही है। इस सफलता को प्राप्त कर कोई व्यक्ति बड़ा आदमी भले ही न बन पाए, पर महान तो निश्चित रूप से बन ही जाता है।
यह महानता परलोक के लिए ही उपयोगी नहीं है, इस लोक में भी उपार्जनकर्त्ता को देवोपम स्तर पर ले जाकर रख देती है। भले ही उसके पास भौतिक साधन स्वल्प हों, पर उसके स्थान पर जो आत्मिक कमाई उसके पास संगृहीत रहती है वह क्षणभंगुर संपत्तियों की तुलना में हजारों-लाखों गुना हर्षोल्लास, गौरव-वर्चस्व प्रदान करती है। ऐसा व्यक्ति जहाँ भी रहता है, वहीं स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न करता है। उसके भीतर की सुगंध चंदन वृक्ष की तरह दूर-दूर तक फैलती है और समीपवर्ती झाड़-झंखाड़ों को भी सुगंधयुक्त कर देती है। मनुष्य में देवत्व का उदय कोई कल्पना नहीं है। स्वयं प्रकाशित और समीपवर्ती क्षेत्र को प्रकाशित करने वाला व्यक्ति सच्चे अर्थों में देव है। उसे किसी देवलोक में जाने की अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि जहाँ कहीं भी उसका रहना होता है, वहाँ सहज सी देव-वातावरण बनकर खड़ा होता है। अध्यात्म किसी को स्वर्ग में भेजता नहीं, वरन् साधक को कहीं भी स्वर्ग का सृजन कर लेने की सामर्थ्य प्रदान करता है। अस्तु, हमें अध्यात्म की गरिमा समझनी चाहिए और उसकी उपलब्धि के लिए धन, बल, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि संग्रह करने में भी अधिक ध्यान देना चाहिए। शरीरगत वासनाएं और मनोगत तृष्णाएं अपनी तृप्ति माँगती हैं और उसके लिए हमारा समय, श्रम एवं मनोयोग हथिया लेती हैं। आत्मा की भूख और पुकार की ओर निताँत उपेक्षा बढ़ती जाती है, उसके क्षुधार्त्त रहने से कितनी क्षति उठानी पड़ती है, उसे हम वासना, तृष्णा के गुलाम नर-कीटक देख-समझ ही नहीं पाते। हमारी दृष्टि और दिशा बदली जानी चाहिए।
मनुष्य की दृष्टि और दिशा जिस आधार पर बदलती है, उसी का नाम अध्यात्म है। यों सुख, शाँति, सफलता और समुन्नति के लिए मनुष्य बाहरी प्रयासों में ही उलझा रहता है। वे आवश्यक भी हैं, पर सब कुछ वही नहीं हैं। अध्यात्म मनुष्य का इस वस्तुस्थिति से साक्षात्कार कराता है कि सुख-समुन्नति का केंद्र जो अपने भीतर है, उस केंद्र पर पहुँचकर-आत्मिक उत्कर्ष का मार्ग अपनाकर मनुष्य महानता, देवत्व और ईश्वरीय सामर्थ्य से संबंध-सूत्र जोड़ लेता है, जगा लेता है।
समूचा अध्यात्म देखा जाए तो गायत्री का ही विस्तार है। अध्यात्म दर्शन के आद्यग्रंथ वेद ही कहे जाते हैं और वेदों का मूल गायत्री मंत्र है। गायत्री में वे समस्त तत्त्व निहित हैं, जिन्हें अपनाकर कोई व्यक्ति महान बन सकता है और देवताओं की स्थिति में पहुँच सकता है।
गायत्री के एकमुखी चित्र में दो भुजाएँ चित्रित हैं। ये दोनों भुजाएँ अध्यात्म के दो पक्षों को इंगित करती हैं। अध्यात्म के इन दो पहलुओं को उसकी दो भुजाएँ भी कह सकते हैं और वे दो भुजाएँ हैं- एक योग, दूसरी तप। योग का अर्थ है- अपनी कामनाएँ, लिप्साएँ, तृष्णाएँ, वासनाएँ सब कुछ को ईश्वर रूपी समष्टि में, उत्कृष्ट आदर्शवादिता में जोड़ देना, व्यक्तिवाद को समूहवाद में बदल देना। तृष्णा के अनगढ़ लोहे को संयम, अपरिग्रह की आग में पकाकर बहुमूल्य लौहभस्म बना देना। मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए, उन्हें समाप्त अथवा परिष्कृत करने के लिए अध्यात्म का सहारा लिया जाता है। तृष्णाएँ असीम हैं। एक व्यक्ति की कामनाएँ समस्त देवता मिलकर भी पूरी नहीं कर सकते। संसार में जितनी सामग्री है वह एक व्यक्ति की इच्छाएँ पूरी कर सकने में भी स्वल्प है। आत्मकल्याण की आवश्यकता अनुभव करने वाले का पहला कदम न्यूनतम निर्वाह के साधन मिलने पर संतुष्ट रहना और अपनी बची हुई शक्तियों को सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन में लगाना है। अध्यात्म का प्रतिफल मनोकामनाओं की पूर्ति नहीं, वरन् उस अनावश्यक जंजाल की मनःक्षेत्र से जड़ें कट जाना है। ऐसे ही लोग आप्तकाम कहलाते हैं। उन्हीं को अपनी दिव्यता विकसित करने का, अंतरात्मा को निर्मल बनाने का अवसर मिलता है। ऐसे लोगों को ही अपने भीतर ईश्वर की झाँकी होती है। वे ही अपना और दूसरों का कल्याण कर सकने में समर्थ बनते हैं।
उपर्युक्त पंक्तियों में अध्यात्म की एक धारा योग का उल्लेख हुआ। नाला अपने आप को गंगा में मिलाकर गंगा बनता है। भक्त अपनी समस्त आकाँक्षाएँ ईश्वर के आदेशों में घुलाकार भगवान बनता है। वह ईश्वर को अपनी इच्छानुसार नहीं नचाना चाहता, वरन् उसकी इच्छानुसार नाचना चाहता है। अध्यात्म की दूसरी धारा है ‘तप’। तप का अर्थ है- तपना, कष्ट सहना। कुछ लोग धूप में खड़ा होना, ठंड में नहाना, नंगे बदन, नंगे पाँव रहना, मौन रहना, अन्न-जल ग्रहण न करना आदि शारीरिक कष्ट सहन करने को तप समझते हैं और सोचते हैं, इन बातों से दया-द्रवित होकर ईश्वर हमारे प्रति कृपालु हो जाएंगे। ऐसा सोचना ईश्वर जैसी महान और नियामक सत्ता के संबंध में ओछा दृष्टिकोण अपनाना है। शारीरिक कष्ट सहने वालों से शरीर को हठपूर्वक जलाने वालों से ईश्वर को क्यों और क्या सहानुभूति हो सकती है? तप के नाम पर इन दिनों इसी प्रकार की अंध मान्यताओं का बोलबाला है।
तप का वास्तविक अर्थ है- संसार में संव्याप्त पीड़ा और पतन की निवृत्ति के लिए अपनी सुख-संपदा का बड़े-से-बड़े भाग दे डालना। दूसरों के कष्ट अपने कंधों पर ओढ़ लेना, अपने सुख दूसरों पर बिखेर देना। स्वभावतः दुख बंटाने वाले और सुख बाँटने वाले लोग भौतिक दृष्टि से गरीबों जैसे स्तर पर निर्वाह करते हैं। अमीरी का उपभोग तो केवल वे पाषाणहृदय कर सकते हैं, जिन्हें दूसरों के कष्टों से कोई सहानुभूति नहीं। जब समस्त मानव जाति के लोग हमारे कुटुँबी हैं तो हमारा निर्वाह स्वभावतः अपने भाइयों के स्तर पर होना चाहिए। गरीबी में रहने से न किसी का स्वास्थ्य खराब होता है और न अन्य दिशा में हानि होती है। ऋषि जीवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
यही सच्चा अध्यात्म है- गायत्री का तत्त्वदर्शन है। जिनके मन में इस तरह की उमंगें उठती अनुभव हों और जो इस दिशा में कदम उठाने के लिए यत्नशील हों, उन्हें ही सच्चा अध्यात्मवादी, गायत्री का सच्चा उपासक कहा जा सकता है।
आदर्शों की चर्चा से नहीं, उन्हें जीवन में उतारने से काम चलता है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि अगणित व्यक्तिगत दोष-दुर्गुणों को अलग-थलग करके, एक-एक करके नहीं हटाया जा सकता है। रानी मधुमक्खी जहाँ रहती है, वहाँ पूरा शहद का छत्ता जमा रहता है और अन्य मक्खियों का पूरा झुँड वहाँ जमा रहता है। समस्त दोष-दुर्गुण, लोभ और मोह के इर्द-गिर्द जमा रहते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता की रानी मक्खी जब तक उड़ेगी नहीं, तब तक दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का छत्ता ज्यों-का-त्यों बना रहेगा। विचार किया जाना चाहिए कि पेट और प्रजनन के लिए, वासना और तृष्णा के लिए, सर्वतोभावेन समर्पित हमारा जीवन क्या परमेश्वर के लिए, आदर्शों के लिए नियोजित किया जा सकता है? स्मरण रखा जाना चाहिए कि जितना स्वार्थ पर अंकुश लगाया जा सकेगा, उतना ही परमार्थ बन पड़ेगा। जितना अपने गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार किया जा सकेगा, उतना ही स्व विकसित होगा। आध्यात्मिक आस्थाएँ बढ़ाई जा सकें तो अपने पास इतना वैभव दृष्टिगोचर होगा, जितना कि देवताओं के पास होने की कल्पना की जाती है।
पारसी समाज में पैदा हुए रुस्तम जी अपंग जैसी स्थिति में थे। बड़े होने पर आँखों ने भी जवाब दे दिया। थोड़े बड़े हुए तो आधे शरीर में लंकवा मार गया, तो भी वे हिम्मत न हारे। अंधों की ब्रेललिपि इन दिनों प्राथमिक अवस्था में थी और दोषपूर्ण थी। उसे सुधारने और उसके सहारे पढ़ते रहने का उन्होंने प्रयत्न किया।
उनके प्रयत्नों की हँसी उड़ाई जाती रही, तो भी वे निराश न हुए। भारत के अंधों का संगठन उन्होंने बनाया। राष्ट्र संघ की सहायता से ब्रेललिपि में भी सुधार कराया। भारत सरकार द्वारा अंधों को उद्योगशील बनाने के प्रयत्न में सफलता पाई।
रुस्तम जी की लगन, हिम्मत और सेवा के उपलक्ष्य में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया। जब तक वे जिए, दुर्भाग्य से निरंतर लड़ते रहे।
आचार्य एवं शिष्य के सम्बन्धों की सजल संवेदना देव संस्कृति का परिचय है। इस संवेदना की सघन भावानुभूतियों में ही देव संस्कृति को परिभाषित करने वाले अमिट अक्षर उभरते हैं। उद्गम बिन्दु से लेकर वर्तमान एवं भावी व्यापकता में प्रकट होते संस्कृति सिन्धु में इन्हीं संवेदनाओं की सजल-सरिताओं का मेल छलकता है। आचार्य शिष्य का मिलन ही प्रकारान्तर से संस्कृति सृजन है। वैदिक संहिताओं में मिलने वाले वामदेव-कहोल एवं अगस्त्य आदि महर्षियों के प्रसंग इसी सत्य को प्रमाणित करते हैं। उपनिषद् शब्द का तो भावार्थ ही आचार्य एवं शिष्य की समीपता है। इस समीपता से ही ज्ञान की सार्थकता प्रकट होती है। केनोपनिषद् में शिष्य की जिज्ञासाएँ, प्रश्नोपनिषद् में आचार्य पिप्पलाद एवं सुकेशा आदि शिष्यों के सम्बन्धों की प्रगाढ़ता, तैत्तीरियोपनिषद् में आचार्य वरुण एवं उनके शिष्य भृगु के सम्बन्धों की संवेदना इसी सत्य को मुखर हो प्रकट करती है।
आचार्य एवं शिष्य के सम्बन्ध, इनमें अनुभव होने वाला सजल-संवेदनाओं का स्पर्श और इसकी सघनता में होने वाला संस्कृति सृजन अपने आप में अनेक मनोवैज्ञानिक सत्यों को संजोये है। यदि अपने में गहरी मनोवैज्ञानिक समझ विकसित की जा सके तो ये सभी सत्य एक के बाद एक क्रमवार अपने आप को उजागर कर देते हैं। इस पवित्र सम्बन्ध के बारे में हम सभी इस बात से परिचित हैं कि इनका प्रारम्भ शिष्य के हृदय में पनपने वाली श्रद्धा एवं आचार्य के हृदय में उमगने वाली शिष्य वत्सलता से होता है। ज्यों-ज्यों ये सम्बन्ध प्रगाढ़ होते हैं, त्यों-त्यों इनमें प्रगाढ़ता आती है। शिष्य की श्रद्धा आचार्य द्वारा किए जाने वाले ज्ञानवर्षण के लिए चुम्बक का काम करती है। शास्त्रकारों ने इसकी महिमा का विविध रूपों में बखान किया है। श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय के उन्तालिसवें श्लोक में कहा गया है ‘श्रद्धावाँल्लभतेज्ञानं’ श्रद्धावान ज्ञान का लाभ पाते हैं। महर्षि पतंजलि योग सूत्र के समाधिपाद के 20 वें सूत्र में कहते हैं- ‘श्रद्धावीर्य स्मृति समाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्।’ साधकों का योग श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक सिद्ध होता है।
अनुभवी योगियों ने इस सूत्र के जो भाष्य किए हैं, उनमें उन्होंने इस सत्य को स्वीकारा कि शिष्य एवं साधक की श्रद्धा क्रमिक रूप से उसमें वीर्य अर्थात् प्राणबल एवं तेज के रूप में, स्मृति- यानि कि विलक्षण स्मृति के रूप में, समाधि यानि कि चित्तवृत्तियों की चंचलता के शमन के रूप में एवं प्रज्ञा यानि निर्मल एवं पवित्र बोधशक्ति के रूप में प्रकट होती है। शिष्य की श्रद्धा की इस शक्ति की व्यापकता को स्वीकारते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने ‘भवानी शंकरौवन्दे, श्रद्धाविश्वास रूपिणौ’ कहा है। गोस्वामी जी के अनुसार शिष्य की श्रद्धा उसके हृदय में स्वयं जगन्माता माँ भवानी की भाँति सक्रिय होती है। प्रकारान्तर से श्रद्धा शिष्य के व्यक्तित्व की समस्त सृजन शक्तियों का स्रोत है। इसी रूप में यह आदिशक्ति है।
मनोवैज्ञानिक रूप से इस सत्य को परिभाषित एवं विवेचित करें तो यह कहेंगे कि श्रद्धा हमारी विधेयात्मक भावनाओं का शिखर बिन्दु है। मनोवैज्ञानिक जगत् में जितने भी आधुनिक शोध प्रयास किए गए हैं, उन सभी में इनके महत्त्व को स्वीकारा गया है। मनोवैज्ञानिक आई.एल. बेन्सन ने अपने शोधपत्र ‘साइको न्यूरो इम्यूनोलॉजी एण्ड अस्पेक्ट्स ऑफ पॉजिटिव इमोशन्स’ में इसकी पर्याप्त व्याख्या की है। उनके अनुसार हमारी भावनाएँ जितनी अधिक विधेयात्मक एवं प्रगाढ़ होती हैं, उतनी ही हमारी मानसिक प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। बेन्सन ने इस क्रम में यह भी कहा है कि विधेयात्मक भावनाओं की सघनता व्यक्ति के बोध एवं संज्ञान (परसेप्शन एवं कॉगनीशन) को व्यापक एवं भ्रम मुक्त करती है।
आचार्य एवं शिष्य के सम्बन्धों में यदि विधेयात्मक भावनाओं की सघन व्यापकता है- तो इसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी व्यापक होते हैं। शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में इन दिनों पर्याप्त शोध अनुसंधान हुए हैं। इनमें से कई स्थानों पर आचार्य एवं शिष्य के बीच पनपने वाली सम्बन्ध संवेदना को स्वीकार किया गया है। प्रख्यात् शिक्षा विद् इवान इलिच ने अपने शोध ‘लर्निंग मेमोरी एण्ड इमोशनल ग्रोथ’ में कहा है कि यदि आचार्य एवं शिष्य के बीच सजल संवेदनाएँ बनी रहे तो सीखने एवं स्मरण की प्रक्रिया में असाधारण तीव्रता आती है।
मनोवैज्ञानिक पी.जे. ब्राउन की एक विख्यात पुस्तक है- ‘रिकाँसट्रक्शन ऑफ ह्युमन पर्सनालिटी’। इस पुस्तक में उन्होंने मानवीय व्यक्तित्व के पुनर्गठन के कई अनछुए पहलू उजागर किए हैं। इन्हीं में से एक पहलू आचार्य एवं शिष्य के बीच सम्बन्ध सम्वेदना के बारे में भी है। ब्राउन का कहना है कि आचार्य केवल पाठ्य वस्तु की जानकारी भर नहीं देता, बल्कि उसके व्यक्तित्व के कई पहलू भी शिष्य में सम्प्रेषित होते हैं। उच्चकोटि के व्यक्तित्ववान आचार्यों के सान्निध्य में शिष्यों के व्यक्तित्व स्वयं ही नए सिरे से गढ़ते-बनते एवं ढलते हैं। आचार्य एवं शिष्य के सम्बन्धों की प्रगाढ़ता के अनुरूप ही शिष्यों की अभिवृत्तियाँ एवं अभिप्रेरणाएँ विनिर्मित होती हैं। उनके व्यक्तित्व में अनेकों नए आयाम विकसित होते हैं।
इस मनोवैज्ञानिक सत्य को सहस्रों वर्ष पूर्व महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के साधनपाद के सैंतीसवें सूत्र में व्यक्त करते हुए कहा था- ‘वीतरागविषयं वा चित्तम्।’ यानि कि वीतराग पुरुष को अपने चित्त का विषय बनाने से, उसे अपनी अन्तर्भावनाओं में धारण करने से चित्त स्थिर हो जाता है। शिष्य भी अपने आचारवान आचार्यों को अपनी अन्तर्चेतना में धारण करके स्वयं के व्यक्तित्व को नया रूप देते हैं। उनके नवगठित व्यक्तित्व की विशेषताएँ, उनसे प्रकट होने वाला ज्ञान परस्पर के सम्बन्धों द्वारा निरन्तर विस्तार पाती है। इस विस्तार से संस्कृति का नया विहान प्रकट होता है।
आचार्य एवं शिष्य के सम्बन्धों का परिदृश्य काफी विस्तीर्ण है। जीवन के अनेकों आयाम इसमें प्रकट होते हैं। व्यक्तित्व की उपलब्धियों के साथ सामाजिक एवं साँस्कृतिक संवेदनाएँ इसमें समायी हैं। मनोविज्ञान के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम अनुसंधान इसे सहजता से स्वीकारते भी हैं। भारतीय चिन्तन चेतना को यदि इसमें जोड़ा जा सके तो यह अनुसंधान प्रक्रिया अपनी सम्पूर्णता में अभिव्यक्त हो सकेगी। वैदिक ऋषियों के अनुसार आचार्य एवं शिष्य की भावनाओं का मिलन ही ज्ञान का सृजन है। इसलिए उन्हीं के स्वरों में प्रभु से प्रार्थना है- ‘सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्वषावहै॥’ हे प्रभु! आप हम आचार्य-शिष्य की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन-पोषण करें। हम दोनों को साथ-साथ बल प्रदान करें। हम दोनों की अध्ययन की हुई विद्या तेजस्वी हो। हम दोनों ही कभी भी द्वेष न करें। इसी तरह से परस्पर स्नेह सूत्र से बँधे रहें।
एक बार बैशाली क्षेत्र में दुष्ट-दुराचारियों का उत्पात-आतंक इतना बढ़ा कि उस प्रदेश में भले आदमियों का रहना कठिन हो गया। लोग घर छोड़-छोड़कर अन्यत्र सुरक्षित स्थानों के लिए पलायन करने लगे। इन भागने वालों में ब्राह्मण समुदाय का भी बड़ा वर्ग था। नीति-धर्म की बातें करने के कारण आक्रमण भी उन्हीं पर अधिक होते थे।
वैशाली के ब्राह्मणों ने महर्षि गौतम के आश्रम में चलकर रहना उचित समझा। तपोबल के प्रभाव से वहाँ गाय और सिंह एक घाट पर पानी पीते थे।
वे पहुँचे, आश्रय मिल गया, सुखपूर्वक रहने लगे। बहुत दिन इसी प्रकार बीत गए। उन्हें न कोई कष्ट था, न भय। एक दिन महर्षि नारद उधर से निकले, कुछ समय गौतम के आश्रम में रुकें, इस समुदाय के संरक्षण की नई व्यवस्था देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उदारता की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
ब्राह्मण समुदाय से यह न देखा गया। ईर्ष्या उन्हें बेतरह सताने लगी। उनके आगमन से ही तो गौतम ने इतना श्रेय कमाया। हमने ही उन्हें यश दिलाया, अब हम ही अपना पुरुषार्थ दिखाकर उन्हें नीचा भी दिखाएँगे।
षड्यंत्र रचा गया। रातों-रात मृत गाय आश्रम के आँगन में डाली गई। कुहराम मच गया। यह गौतम ने मारी है, हत्यारा हैं, पापी है, इसका भंडाफोड़ सर्वत्र करेंगे।
गौतम योग-साधना से उठे और यह कुतूहल देखकर अवाक् रह गए। आगंतुकों को विदा करने का निश्चय हुआ। ऋषि बोले, “मूर्द्धन्यजनों की ईर्ष्या अन्यान्यों की अपेक्षा अधिक घातक और व्यापक परिणाम उत्पन्न करती है। आप लोग जहाँ रहते थे, वहाँ चले जाएँ। अपनी ईर्ष्या से जिस क्षेत्र को कलुषित किया था, उसे स्नेह-सौजन्य के सहारे सुधारने का नए सिरे से प्रयत्न करें।” यही हुआ। कलुषित क्षेत्र पुनः पवित्र हो गया।
कम्प्यूटर का आविर्भाव इस युग की एक क्रान्तिकारी घटना रही है, जिसने मानवीय जीवन की कार्यक्षमता में अप्रत्याशित वृद्धि कर मानवीय सहायता को एक नई दिशा दी। पहले जो कार्य घण्टों एवं दिनों में होते थे वे इसके रहते आज मिनटों में होने लगे हैं। इसके बहुआयामी उपयोग के कारण आज कम्प्यूटर मनुष्य का एक अभिन्न सहयोगी के रूप में उभरकर सामने आया है। इसके बिना जीवन की कल्पना मात्र दूभर है। भारत में हालाँकि इसका प्रवेश अधिक पुराना नहीं है, किन्तु तीव्रता से इसमें वृद्धि हो रही है। इस समय लगभग तीन लाख लोग इसका पेशे के बतौर उपयोग कर रहे हैं। जबकि पश्चिम के विकसित देशों में तो यह तादाद भारी-भरकम है। अकेले अमेरिका में लगभग पाँच करोड़ लोग कम्प्यूटर व्यवसाय के रूप में उपयोग कर रहे हैं।
जिस कम्प्यूटर का आविर्भाव मनुष्य के अभिन्न सहयोगी सहचर के रूप में हुआ, अपनी बहुआयामीय उपयोगिता के कारण जो मनुष्य के लिए एक वरदान के रूप में प्रकट हुआ, वही आज अपने घातक दुष्परिणामों के कारण अभिशाप भी सिद्ध हो रहा है। कम्प्यूटर के अत्यधिक उपयोग के कारण उत्पन्न हो रही नाना प्रकार के भयंकर रोग इसकी सूचना दे रहे हैं। अकेले अमेरिका में इसने हजारों लोगों का जीवन पंगु बना दिया है और अधिकाँश लोगों को अपने व्यवसाय एवं नौकरियाँ छोड़ने के लिए विवश कर दिया है। चिकित्सा विज्ञान ने इन रोगों को ‘कम्प्यूटर रिलेटेड डिसिस’ अर्थात् कम्प्यूटर संबन्धित रोग कहा है। कम्प्यूटर के अत्यधिक उपयोग से होने वाले इन रोगों में ‘रोटेटर कफइंज्यूरस’ अर्थात् कन्धों के जकड़ जाने से होने वाला असह्य दर्द, ‘एपिको इलाइटीस’-टेण्डन घिसने से कोहनी एवं बगल के स्नायु में पीड़ा एवं सूजन आना, ‘टेनोसाइनोवाइटीस’ हथेली की माँसपेशियों में सूजन वाली कोशिकाओं पर अधिक दबाव से स्नायुओं का निष्क्रिय बनना और ‘टेंडिनाइटिस’-टेण्डन में सूजन आने से हाथ के स्नायुओं में जलन व दर्द मुख्य हैं। इन रोगों के प्रमुख शिकार चार्टर्ड एकाउन्टेंट, मैनेजमेंट कंसल्टैंट, शेयर दलाल, वकील एवं पत्रकार हुए हैं, जो पूरा दिन कम्प्यूटर की-बोर्ड पर काम करते और स्क्रीन पर नजरें गड़ाये रहते हैं।
कम्प्यूटर से उत्पन्न रोगों की इसी शृंखला में एक घातक रोग है ‘रिपिटेटीव स्ट्रेस इंज्यूरस’(आरएसआई), जो व्यक्ति को अपंगता के अभिशाप से तक ग्रसित कर देता है। यह रोग मुख्यतः प्रतिदिन एक सा काम करने वाले लोगों को होता है, क्योंकि उनके कुछ निश्चित अंगों को अत्यधिक श्रम करना पड़ता है तथा लम्बे समय तक यह स्थिति बन रहने पर उपरोक्त रोग उन अंगों की अपंगता के रूप में प्रकट होता है।
पिछले दिनों अमेरिका की सुप्रतिष्ठित पत्रिका ‘रायटर’ के संपादक ग्राँट मेककुल कम्प्यूटर जनित इस रोग का शिकार हो गये और अब वह अपनी रिपोर्ट कम्प्यूटर पर कभी नहीं भेज सकेंगे। वह अब कार भी नहीं चला सकता, क्योंकि उसके पीड़ा ग्रस्त हाथों में स्टियरिंग व्हील पर सही नियंत्रण रखने की शक्ति नहीं रही। मेककुल को इस रोग का अहसास तब हुआ जब रोज घण्टों कम्प्यूटर की-बोर्ड का उपयोग करने के बाद उसके हाथों में ज्वर पस्त पीड़ा होने लगी। सुबह उठने के साथ ही उसके हाथों में जलन एवं जोड़ों में भयंकर दर्द होता। चिकित्सकों ने जाँच के बाद ‘मेककुल’ को कम्प्यूटर का उपयोग तत्काल रोक देने की सलाह दी। इस तरह आज में मेककुल उस रोग के कारण अपंग से स्थिति में है जो उंगली, हथेली, कलाई तथा कंधों में स्नायुओं तथा माँसपेशियों के अत्यधिक उपयोग से जन्म लेता है।
अकेला मेककुल नहीं, अमेरिका के कारखानों और दफ्तरों में काम करने वाले दो लाख कामगार बाबू इस रोग के शिकार हैं। और हर वर्ष इनकी संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है। यही स्थिति कम्प्यूटर का अत्यधिक उपयोग करने वाले अन्य देशों की है। आरएसआई को घातक प्रभाव किसी एक अंग तक सीमित नहीं है। इसके कारण व्यक्ति की कमर से ऊपर का पूरा हिस्सा कई तरह की तकलीफों को भोगता है। इस रोग का पहला शिकार हथेलियाँ तथा आँखें होती हैं। कम्प्यूटर की-बोर्ड के लगातार उपयोग के बाद उँगलियों में दर्द होने लगता है, एवं कलाइयाँ जवाब देने लगती हैं। उंगलियों के जोड़ों में एक तरह की जलन होने लगती है। कई बार तो हाथों में सूजन तक आ जाती है और उंगलियों की सूक्ष्म रक्त वाहिनियों के कमजोर पड़ जाने से उंगलियों के सिरे सफेद पड़ जाते हैं।
कम्प्यूटर से जुड़े घातक रोगों का अन्य नाम है ‘कार्पेल टनल सिंड्रोम’, जो हथेली में कलाई के समीप वाले भाग की माँसपेशियों में सूजन से शुरू होता है। इस रोग से महीनों और वर्षों तक छुटकारा नहीं मिल पाता। अतः इस रोग के चलते अनेक कर्मचारियों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता है।
यह तथ्य भी सामने आया है कि अधिक मोटे लोगों को कम्प्यूटर रोग होने के आसार अधिक रहते हैं, क्योंकि उसके दोनों हाथ की-बोर्ड तक पहुँचने में कंधों को अंदर की ओर मोड़ देते हैं।
गर्भवती महिलाओं पर भी कम्प्यूटर के दुष्प्रभावों का आँकलन कई प्रकार से होता रहा है। भ्रूण के विकृत होने, उसके नष्ट होने व असहाय संतान के जन्म तक के दुष्प्रभावों को कम्प्यूटर से सम्बन्धित पाया गया है। हालाँकि कम्प्यूटर विशेषज्ञ एवं गायनेकॉलोजिस्ट इस बात पर अधिक बल दे रहे हैं कि कम्प्यूटर के प्रतिकूल प्रभाव के लिए उसके किरणोर्त्सग की बजाये घण्टों तक एक स्थिति में बैठे रहने के कारण होने वाला ‘स्ट्रेस’ अधिक जिम्मेदार है। अनवरत कम्प्यूटर के सामने बैठे रहने से आँखों पर जो जोर पड़ता है, वह अन्ततः मानसिक तनाव में पलट जाता है।
कम्प्यूटर जनित रोगों के कारण जहाँ व्यक्ति का स्वास्थ्य घातक रूप से प्रभावित हो रहा है, वहीं कम्पनियों एवं संस्थानों की कार्यक्षमता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। अमेरिका में ही अनेक कम्पनियों को अपने कर्मचारियों की उत्पादन क्षमता घट जाने से हर वर्ष सात अरब डालर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। साथ ही कम्प्यूटर रोग से पीड़ित कर्मचारियों की चिकित्सा के पीछे भी करोड़ों डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। अनेक कम्पनियों ने आरएसआई पीड़ित कर्मचारियों को कम और हल्के काम वाले विभाग में ‘ट्राँसफर’ कर दिया है। दूसरी ओर अधिकाँश कामगार संगठनों की माँग है कि कम्पनी संचालक अपने कर्मचारियों को अधिक बेहतर की-बोर्ड वाले कम्प्यूटर उपलब्ध कराये तथा दफ्तर के फर्नीचर में सुधारकर कम्प्यूटर आपरेटर को प्रति दो घण्टे पर पंद्रह मिनट का विश्राम दें।
कम्प्यूटर रोग के उपचारार्थ अपने स्तर पर प्रयास चल रहे हैं। ‘लास ऐन्जिल्स टाइम्स’ समाचार पत्र ने अपने कार्यालय में ‘रिपिटँटीव स्ट्रेस इंज्यूटस रूम’ खोला है। कम्प्यूटर या वर्ड प्रोसेसर का उपयोग करने वाले कर्मचारी हाथ में पीड़ा अनुभव करे तो इस कक्ष में जाकर बर्फ लगा सकता है। मरहम लगाकर पीड़ा को कम कर सकता है और पीठ में दर्द अनुभव होने पर थोड़ी देर फोम रबर के गद्दे पर लेटकर संकुचित हुई स्नायुओं को विश्राम दे सकता है।
एक राजा को अपने मंत्री का चुनाव करना था। सभी दरबारी इकट्ठे किए गए।
राजा ने दरबार में एक बोतल बंद करके पानी छिड़क दिया और सभी से पूछा, “यह इत्र कन्नौज से आया है। इसकी सुगंध कैसी है अपनी-अपनी सक्षमता बताओ तो?”
राजा को खुश करने के लिए सभी दरबारी सुगंधि की भरपूर प्रशंसा करने लगे। अंत में दबी जबान से एक जमादार ने कहा, “सुगंधि तो जरा भी नहीं आती। कारण मेरी नाक खराब होना भी हो सकता है।” राजा ने उस सत्यवक्ता को मंत्री बनाया।
लोमड़ी और खरगोश पास-पास रहते थे। खरगोश घास चरता और खेत को नुकसान न पहुँचाता। किसान भी उसकी इस सज्जनता से परिचित था। सो रहने के लिए एक कोने में जगह दे दी।
एक दिन लोमड़ी उधर से आई और खरगोश से पूछने लगी, “मक्की पक रही है, कही तो पेट भर लूँ?” खरगोश ने कहा, “खेत से पूछ लो। वह कहे, वैसा करना।” लोमड़ी ने आवाज बदलकर खेत की ओर से कहा, “खा लो, खा लो।”
इतने में किसान का पालतू कुत्ता आ गया। वह सब देख और सुन रहा था। उसने आते ही खेत से पूछा, “बताओ तो इस धूर्त लोमड़ी को मजा चखा दूँ?” फिर स्वर बदलकर कहा, “धूर्त लोमड़ी की टाँग तोड़ दो।”
कुत्ते को झपटते देखकर लोमड़ी नौ-दो-ग्यारह हो गई। सज्जनता का व्यवहार छद्मयुक्त होने के कारण आकर्षक तो लगता है, पर उसकी पोल अंततः खुल ही जाती है।
तालमेल जिन्दगी जीने की सबसे गहरी जरूरत है। रिश्तों की गरमाहट, सम्बन्धों की गरिमा तथा विचारों व भावनाओं के स्पर्श में तालमेल पनपता एवं विकसित होता है। मनुष्य जीवन को हवा, पानी और धूप के समान ही इसकी आवश्यकता है। इसके प्रभाव में वैयक्तिक विकास, पारिवारिक शान्ति एवं सामाजिक समृद्धि होती है, परन्तु इसका अभाव अत्यन्त भयावह एवं भीषण होता है। जिस प्रकार भूकम्प भौगोलिक मानचित्र को बदलकर रख देता है ठीक उसी प्रकार तालमेल का अभाव इंसान की आन्तरिक चेतना को, इंसान से इंसान को, परिवार, समाज एवं विश्व-राष्ट्र को खण्डित-विखण्डित एवं विभाजित करके रख देता है। इसका दर्द, पीड़ा और कसक असहनीय होती है। आज हम सभी इसी अभिशाप से अभिशप्त हैं।
भारतीय संस्कृति की सर्वोपरि विशेषता रही है तालमेल एवं सामंजस्य का भाव। इसी विशेषता के कारण ही मात्र अपने देश में संयुक्त परिवार का अस्तित्व चिरकाल से विद्यमान रहा है। हमारे प्राचीन संयुक्त परिवार, हमारे सच्चे तालमेल, एकजुटता तथा संगठन के प्रतीक-पर्याय थे। वहाँ पर सम्बन्धों की सरस संवेदनायें बहती थीं, रिश्तों के संवेदनशील धागे बुनते-मजबूत होते थे, एक अनजाना आनन्द उमड़ता-घुमड़ता रहता था। परन्तु पिछले दो दशकों में संयुक्त परिवार का भव्य भवन, खण्डहरों का अवशेष बनकर अपनी दर्द भरी दास्ता बयान करता नजर आता है। और जो संयुक्त परिवार बच भी गये हैं उन्हें बमुश्किल किसी तरह से निभाया जाता है, मुर्दे की तरह ढोया जाता है। संयुक्त परिवार के टूटने-बिखरने के साथ ही एकल परिवार की बाढ़ सी आ गयी है। परन्तु आज की स्थिति यह है कि एकल परिवार भी खण्डों में खण्डित हो रहे हैं। पति और पत्नी के बीच तालमेल नहीं बन पड़ रहा है, जिसके कारण दर्द भरे तलाक हो रहे हैं। परिणामस्वरूप आज का आदमी बेहद अकेला रह गया है। भीड़ और कोलाहल के बीच व्यक्ति एकदम एकाकी और अन्तर टूटा, सर्वहारा सा रह गया है।
वस्तुतः आधुनिक विज्ञान के महाविकास की महायात्रा के चरम बिन्दु पर खड़े आज के व्यक्ति की सर्वोपरि समस्या है तालमेल का अभाव। तलाक रूपी पश्चिमी परिवार का अछूत एवं संक्रामक रोग हमारे भारतीय परिवार में नग्न नर्तन करता दिखाई दे रहा है। आज की गहन समस्या है पति का पत्नी के साथ न निभ पाना, पिता का पुत्र के साथ मतभेद तथा बेटी का माँ के साथ गहरा वैचारिक मतान्तर। यह समस्या व्यक्ति और परिवार तक ही सीमित व सिमटी नहीं है बल्कि दफ्तर, शिक्षालयों, संस्थाओं, संगठनों तथा समाज-राष्ट्र के हर कोने में पसरी पड़ी है। हम तालमेल करते तो हैं परन्तु मन से नहीं बेमन से, दबाववश, मन मारकर और जबरदस्ती । साथ ही हम सम्बन्धों की शुरुआत करते तो वही गरमाहट से, उत्साह-उमंग से हैं, परन्तु दूर तक निभा नहीं पाते और असफल हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? क्यों हम तालमेल नहीं कर पाते? असफल क्यों होते हैं? असफलता का वह बिन्दु कहाँ है?
इन जटिल, अनुत्तरित एवं हताशा पैदा करने वाले प्रश्नों के जवाब हैं-हर कदम पर खड़ा हमारा घनीभूत अहंकार, हमारी दूषित दृष्टि, हमारी कुत्सित भावना, हमारे दिग्भ्रमित मूल्य एवं मान्यताएँ तथा हमारी कमजोर-दुर्बल मानसिक संरचना। हमारे विचारों और भावनाओं का पैमाना अत्यन्त छोटा एवं क्षुद्र है। इस क्षुद्रता के संग स्थायी तालमेल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। सम्बन्धों के लिए हमारे आदर्श, मूल्य एवं मानदण्ड स्पष्ट एवं सजीव नहीं रह गये हैं। जबकि सच्चे तालमेल के लिए परिष्कृत मूल्य एवं मानदण्ड तथा उदात्त भावनाओं की आवश्यकता है। इसी के अभाव में हमारे सारे सम्बन्ध एवं रिश्ते शीशे के समान दरकते-टूटते हैं और इस टूटन-दरकन में हमें गहरी पीड़ा एवं टीस मिलती है।
सम्बन्ध दो प्रकार के होते हैं-वस्तुपरक और व्यक्तिगत। व्यक्ति का व्यक्ति से सम्बन्ध टिकाऊ होता है। वस्तु से व्यक्ति का सम्बन्ध नहीं होता है, अधिकार होता है। आज हम यही कर रहे हैं, व्यक्ति को वस्तु मानकर उस पर अधिकार का भाव रखते हैं। हम व्यक्ति से वस्तुपरक व्यवहार एवं बर्ताव करते हैं। सही मायने में देखें तो हम व्यक्तियों को वस्तुगत भाव से देखने के आदी एवं अभ्यस्त हो गये हैं। व्यक्ति से व्यक्ति के रूप में अपेक्षाएँ समाप्त हो गई है, उसे वस्तु के रूप में पहचान बनाने के प्रचलन हावी हो गया है। हजारों हजार साल की मानवीय विकास यात्रा के बाद भी हमने व्यक्ति के व्यक्तित्व का आदर एवं सम्मान करना नहीं सीखा है। इसी कारण आज जबकि मानव से अतिमानव की यात्रा प्रारम्भ हो चुकी है, मानव एक सच्चा इंसान बन पाने में असहाय महसूस कर रहा है।
मानव जीवन साधारण नहीं है, उसमें चेतना के उत्कर्ष एवं उसमें विकास की अपार सम्भावनाएँ सन्निहित हैं, दिव्य बीज दबा पड़ा है। वह चैतन्य है, जागृत, जीवन्त, सचेतन एवं सजीव है। हमें इसका सच्चा सम्मान करना चाहिए। जिस प्रकार हमें आदर-सम्मान तथा भावनात्मक बोध होता है उसी प्रकार सबमें यही भाव विद्यमान है। जैसे साँस लेने का अधिकार हममें है, वैसा ही अधिकार औरों का भी है। हमने अपना आदर-सम्मान तो स्वीकारा परन्तु औरों के लिए अमान्य कर दिया एवं नकार दिया। हम भूल गये कि जिनसे हम सम्बन्ध जोड़ रहे हैं, वह भी हमारे समान ही एक इंसान है, उसे भी प्यार एवं सम्मान चाहिए। परन्तु हमने व्यक्ति को वस्तु बना दिया और उससे वस्तुपरक अपेक्षाएँ रख लीं। और इस वस्तुपरक मान्यता को उछाला। आज के आधुनिक टी.वी. चैनल, उसके अत्याधुनिक सीरियल, अखबार तथा ढेर सारे मन को लुभाने वाले विज्ञापन इसी वस्तुपरकता की कहानी का बयान कर रहे हैं।
अतः आज हमारी सम्बन्धों की बुनियाद वस्तुपरक बनकर रह गयी है। हमने अपने सम्बन्धों में गणित का प्रयोग किया है। हमारी सारी श्रद्धा, भावना और विचार अंक गणित के समान जोड़-तोड़ करने वाले अंक बनकर सिमट गये हैं। ऐसे सम्बन्धों की अवधारणा इंसान और इंसानियत दोनों के लिए अपमान है और इस अंध अपेक्षा में मानवीय सम्भावनाओं की अपार क्षमता दफन हो गई है। विकास के बीज में घुन लग गया है। परिणामस्वरूप आदमी गहरी घुटन का शिकार हो गया है, जिससे मानसिक विक्षिप्तता और विकृति पैदा हो गई है। और यही वजह है कि आज बड़े पैमाने पर हिंसा, हत्या, आत्महत्या जैसे आत्मघाती अपराधों की बाढ़ आ गयी है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि बताती है कि यह कुछ नहीं मानवीय नासमझी है, तालमेल का गम्भीर अभाव है।
इन महासमस्याओं से मुक्ति पाने के लिए आवश्यक है सम्बन्धों की सही-सही और ठीक-ठीक समझ। इसकी शुरुआत व्यक्ति को सही ढंग से देखकर उसकी गरिमा का बोध करके ही की जा सकती है। सच्चे तालमेल के लिए हमारा दृष्टिकोण उदात्त तथा भावना निष्कपट होनी चाहिए। सम्बन्धों का निर्वाह किया जा सकता है यदि इसके बीच ‘हाइपर इमोशन’ तथा ‘हाइपो इमोशन’ दोनों को हावी न होने दिया जाय। ‘हाइपर इमोशन’ अर्थात् भावना का अतिरेक, अति अपेक्षा का भाव उत्पन्न करना है जबकि ‘हाइपो इमोशन’ अर्थात् भावना की न्यूनता जो छल और प्रवंचना को जन्म देती है। अतः सम्बन्धों के स्थायित्व के लिए इन दोनों को स्थान नहीं देना चाहिए। भावनात्मक आवेग भी सम्बन्धों को तार-तार कर देता है अतः इससे भी बचना चाहिए।
गीता में भगवान् कृष्ण ने देवता और मनुष्य के बीच दिव्य और दैवीय सम्बन्धों की ओर संकेत किया है। वस्तुतः मनुष्य में अनन्त सम्भावनाओं का महासागर भरा पड़ा है। मानवीय व्यक्तित्व बहुआयामी एवं बहुपक्षीय है। मानवीय व्यक्तित्व में विचार और भावनायें दोनों होती हैं और इनमें बड़े ही संवेदनशील तथा मर्म बिन्दु बिखरे पड़े होते हैं। इन मर्म बिन्दुओं पर मर्मान्तक चोट करने पर मृत्यु का महासंकट खड़ा हो सकता है। संवेदना के तार अति सूक्ष्म एवं कोमल होते हैं। और सम्बन्ध के धरातल में जितनी गहराई होगी सम्बन्ध उतने ही नाजुक होते हैं अतः ऐसे सम्बन्धों में कोई जल्दबाजी, उतावलापन या किसी प्रकार की छेड़खानी करने पर गहरे रिश्ते पल भर में टूट कर बिखर सकते हैं। रिश्तों की बुनियाद भावनाओं के ऊपर बनती-विकसित होती है। यह जितना सुखद है इसकी चुभन उतनी ही कष्टकारक होती है। भावनाओं की चुभन काँच की चुभन से भी ज्यादा पीड़ादायक होती है। इसलिए सम्बन्धों के संवेदनशील बिन्दुओं को स्पर्श किये बिना उन आयामों की तलाश करनी चाहिए, जिससे सम्बन्ध स्थायी और टिकाऊ हो सकें।
इसके लिए आवश्यकता है भावनात्मक परिपक्वता एवं गहरे बोध की। इनके समन्वय से गहरी अंतर्दृष्टि पनपती है। गहन अंतर्दृष्टि कुछ नहीं बल्कि विचारों और व्यवहारों के बीच का अंतर्संबंध है। यह अंतर्दृष्टि हमारे सम्बन्धों के बीच, रिश्तों के मध्य एक तादात्म्य, एक सच्चा तालमेल स्थापित करती है। अंतर्दृष्टि से भावनाओं और व्यवहार में तालमेल बना रहता है। अतः हमें न भावना का अतिरेक करना चाहिए और न ही संवेदनशून्य होना चाहिए। व्यवहार में संवेदना और विचारों को आवश्यकतानुरूप प्रयोग करना चाहिए। हमें समय और परिस्थिति के अनुरूप अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना चाहिए। सम्बन्धों के दीर्घावधि निर्वाह के लिए यह अत्यावश्यक है। इससे सम्बन्धों को भले ही पूर्णता तक नहीं पहुँचाया जा सकता हो परन्तु बहुत दूर तक उनका निर्वाह किया जा सकता है।
भावना का क्षेत्र बड़ा ही कोमल, नाजुक होता है। भावनाओं को बड़ा मुश्किल से जीता जाता है। यूँ ही किसी पर भावनाओं को उड़ेला नहीं जा सकता। यह प्रक्रिया बड़ी लम्बी है अतः इसे दो पल में विनष्ट नहीं कर देना चाहिए। इसके लिए हमें सतत् अपने व्यवहार का पैनी दृष्टि से अवलोकन करते रहना चाहिए। निंदा, घृणा एवं बुरे बर्ताव से सदैव बचे रहना चाहिए। सदैव अच्छा ही अच्छा करते रहना चाहिए। सम्बन्धों के बीच दरार उत्पन्न करने वाली घृणा स्थायी नहीं होती है, यह तो टीस भरी कसक और गहन दर्द का अहसास भर है। दर्द पैदा होता है, क्योंकि तमाम कोशिशों के बावजूद, सम्बन्ध रिश्ते एवं मित्रता निभ नहीं पा रहे हैं। चाहते तो हैं परन्तु असफलता-निराशा हाथ लगती है। और इसी असफलता से उपजती है घृणा एवं द्वेष। अतः बड़े धैयपूर्वक इन कटु एवं तिक्त क्षणों को गुजर जाने देना चाहिए। सम्बन्धों के बीच तालमेल रखने के लिए गहरी सहनशीलता और अपार सहिष्णुता की आवश्यकता होती है। यही दोनों सच्चा तालमेल बनाने के मुख्य और केन्द्रबिन्दु हैं।
तालमेल को निभाने के लिए सदैव अच्छा बर्ताव करते रहना चाहिए। अच्छाई इंसानियत की सर्वोपरि विशेषता व महत्ता है। बुराई के बदले अच्छाई करना हिम्मत और साहस का कार्य है। बुराई के बदले कुछ न कहना बहुत बड़ी विजय है। यह कायरता नहीं शूरवीरों का क्षमादान है, जो एक दिन वैमनस्य के कड़वे अहसास से उबारकर थमेगा। बुराई के प्रति की जा रही हर अच्छाई बुराई करने वाले को शर्मिन्दा करती रहती है। अतः सदा अच्छाई एवं श्रेष्ठ कर्म को जीवन का ध्येय बनाना चाहिए। यही तालमेल का सच्चा आधार है। इस प्रकार सच्चे तालमेल के लिए निम्न गुणों का सतत् अहायास अपेक्षित होता है -
1. भ्रम एवं संदेह रहित बोध, 2. गहन अंतर्दृष्टि, 3. अपेक्षा का अभाव, 4. भावनात्मक परिपक्वता और 5. व्यक्तिगत अंतर्संबंधों की समझ।
इन गुणों का पालन करके ही सच्चे तालमेल का निर्वाह किया जा सकता है जो आज की सबसे बड़ी जरूरत है। इसी से वैयक्तिक उत्कर्ष शान्ति के साथ समाज व राष्ट्र के विकास का आधार प्रशस्त हो सकता है। अतः हम सबको सच्चे तालमेल के साथ ‘संघं शरणं गच्छामि’ के सूत्र को चरितार्थ करना चाहिए।
ब्रह्म देश में अश्वत्थ वृक्ष की जड़ में एक देव सर्प रहता था। एक ब्राह्मण ने उसे पहचान लिया, सो रोज एक कटोरा दूध बाँबी पर रखकर उसकी पूजा करने लगा।
देव सर्प प्रसन्न हुए। वे नित्य दूध पी जाते और बदले में एक स्वर्णमुद्रा उसी कटोरे में रख जाते। ब्राह्मण का धन भी बढ़ने लगा और लालच भी।
ब्राह्मण ने सोचा, सर्प की बाँबी में स्वर्णमुद्राओं का भंडार होगा, सो उसे मारकर एक ही दिन में क्यों न वह सारी राशि प्राप्त कर ली जाए। उसने घात लगाकर सर्प को मार डाला।
खोदने पर बाँबी में कुछ भी न निकला। अति लालच से होने वाली हानि का अनुभव करके ब्राह्मण सिर धुनकर पछताता रहा।
एक संत थे। जो पाते, उसे अपने से अधिक जरूरतमंदों को बाँट देते। इस उदारता से उन्हें कई बार स्वयं भूखा रहना पड़ता।
कई दिन से भोजन न मिला। श्मशान में उन्होंने कुछ आटे के पिंड पड़े देखे और बचा हुआ ईंधन बिखरा पाया। सोचने लगे, इसी से रोटी पकाकर अपना पेट भर लें।
शिव-पार्वती उधर से निकले। पार्वती जी ने भक्त की ऐसी दरिद्रता देखकर भगवान से कहा, “आप भक्तों पर दया क्यों नहीं करते? उनके अभाव दूर क्यों नहीं करते?” शिवजी ने कहा, “भक्तजन अभावग्रस्त, दरिद्र, कंगाल नहीं होते। वे उदारतावश दूसरों को सुखी बनाने के लिए अपना वैभव लुटाते रहते हैं। संदेह हो तो इस संत से भी माँगकर देखो। वह भूखा होने पर भी अपनी रोटियाँ दान कर देगा।”
परीक्षा की बात ठहरी। पार्वती जी वृद्धा का वेश बनाकर पहुँचीं और अपनी तथा पति की भूख बुझाने के लिए रोटी माँगी।
पिंड एकत्रित करके चार रोटियाँ बनाई थीं। संत ने दो रोटियाँ वृद्धा को दे दीं और दो से अपनी उदर-ज्वाला शाँत कर ली, ताकि जीवित रहा जा सके।
शिव-पार्वती ने सच्चे भक्त की निष्ठा देखी और बहुत प्रसन्न हुए। प्रकट होकर वर माँगने के लिए कहने लगे।
भक्त ने कहा, “ऐसा वर दीजिए कि सुपात्र याचक सदा मेरे सामने आते रहें और अपना पेट काटकर भी उन्हें कुछ देने को संतोष-लाभ प्राप्त करता रहूँ।”
पार्वती जी की आँखें छलक आई। बोलीं, “ऐसे भक्त का अभाव दूर करना कठिन है। उदारताजन्य अभाव को वे अपना गौरव जो मानते हैं।”
गायत्री उपासना प्रारंभ करते ही साधक की अंतः प्रक्रिया में तेजी से परिवर्तन प्रारंभ होते हैं। आग पर चढ़े कड़ाहे में, जब तक आँच नहीं लगती, तब तक उसमें भरे जल में कोई हलचल दिखाई नहीं देती, किंतु जैसे-जैसे आग तेज होती है, जल में हलचल, उबलना, खौलना, भाप बनना सब प्रारंभ हो जाता है। साधना की आँच से भी वैसा ही विचारमंथन और आत्मिक जगत में हल-चल प्रारंभ होती है। यह स्थिति तब तक चलती रहती है, जब तक पिछले संस्कारों का परिमार्जन नहीं हो जाता। उसके बाद शनैः-शनैः ऐसे लक्षण प्रकट होने प्रारंभ हो जाते हैं, जिन्हें साधना की सफलता और सिद्धि प्राप्ति के लक्षण कह सकते हैं। यह उपलब्धि चर्चित नहीं होनी चाहिए, अन्यथा साधक का अहंकार बढ़ेगा और वह पथभ्रष्ट होगा, किंतु उन्हें अनुभव कर सफलता के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है। सफलता के लक्षण इस प्रकार हैं-
शरीर में हलकापन और मन में उत्साह होता है।
शरीर में से एक विशेष प्रकार की सुगंध आने लगती है।
त्वचा पर चिकनाई और कोमलता का अंश बढ़ जाता है।
तामसिक आहार-विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्विकता में मन लगता है।
स्वार्थ का कम और परमार्थ का अधिक ध्यान रहता है।
नेत्रों में तेज झलकने लगता है।
किसी व्यक्ति या कार्य के विषय में वह जरा भी विचार करता है तो उसके संबंध में बहुत-सी ऐसी बातें स्वयमेव प्रतिभासित होती हैं, जो परीक्षा करने पर निकलती हैं।
उसका व्यक्तित्व आकर्षक, नेत्रों में चमक, वाणी में बल, चेहरे पर प्रतिभा, गंभीरता तथा स्थिरता होती है, जिससे दूसरों पर अच्छा प्रभा पड़ता है। जो व्यक्ति उसके संपर्क में आते हैं, वे उससे काफी प्रभावित हो जाते हैं तथा उसकी इच्छानुसार आचरण करते हैं।
साधक को अपने अंदर एक दैवी तेज की उपस्थिति प्रतीत होती है। वह अनुभव करता है कि उसके अंतःकरण में कोई नई शक्ति काम कर रही है।
बुरे कामों में उसकी रुचि हट जाती है और भले कामों में मन लगता है। कोई बुराई बन पड़ती है तो उसके लिए उसे बड़ा खेद और पश्चाताप होता है। सुख के समय वैभव में अधिक आनंदित न होना और दुख, कठिनाई तथा आपत्ति में धैर्य खोकर किंकर्तव्यविमूढ़ न होना उसकी विशेषता होती है।
भविष्य में जो घटनाएं घटित होने वाली हैं, उनका उसके मन में पहले से ही आभास होने लगता है। आरंभ में तो कुछ हलका-सा ही अंदाज होता है, पर धीरे-धीरे उसे भविष्य का ज्ञान बिल्कुल सही होने लगता है।
उसके शाप और आशीर्वाद सफल होते हैं। यदि वह अंतरात्मा से दुखी होकर किसी को शाप देता है तो उस व्यक्ति पर विपत्तियां आती हैं और प्रसन्न होकर जिसे वह सच्चे अंतःकरण से आशीर्वाद देता है, उसका मंगल होता है, उसके आशीर्वाद विफल नहीं होते।
वह दूसरों के मनोभावों को चेहरा देखते ही पहचान लेता है। कोई व्यक्ति कितना ही छिपाए, उसके सामने वह भाव छिपते नहीं। वह किसी के भी गुण, दोषों, विचारों तथा आचरणों को पारदर्शी की तरह अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देख सकता है।
वह अपने विचारों को दूसरे के हृदय में प्रविष्ट कर सकता है। दूर रहने वाले मनुष्यों तक बिना तार या पत्र की सहायता के अपना संदेश पहुँचा सकता है।
जहाँ वह रहता है, उसके आस-पास का वातावरण बड़ा शाँत एवं सात्विक रहता है। उसके पास बैठने वालों को, जब तक वे समीप रहते हैं, अपने अंदर एक अद्भुत शाँति, सात्विकता तथा पवित्रता अनुभव होती है।
वह अपनी तपस्या, आयु या शक्ति का एक भाग किसी को दे सकता है और उसके द्वारा दूसरा व्यक्ति बिना प्रयास के ही अधिक लाभान्वित हो सकता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों पर ‘शक्तिपात’ कर सकते हैं।
उसे स्वप्न में, जाग्रति में, ध्यानावस्था में रंग-बिरंगे प्रकाश पुँज, दिव्य ध्वनियाँ, दिव्य प्रकाश एवं दिव्य वाणियाँ सुनाई पड़ती हैं। कोई अलौकिक शक्ति उसके साथ बार-बार छेड़खानी, खिलवाड़ करती हुई सी दिखाई पड़ती है। उसे अनेक प्रकार के ऐसे दिव्य अनुभव होते हैं, जो बिना अलौकिक शक्ति के प्रभाव के साधारणतः नहीं होते।
उपर्युक्त चिह्न तो प्रत्यक्ष प्रकट होते हैं। अप्रत्यक्ष रूप से अणिमा, लघिमा, महिमा आदि योग शास्त्रों में वर्णित अन्य सिद्धियों का भी आभास मिलता है। वह कभी-कभी ऐसे कार्य कर सकने में समर्थ होता है, जो बड़े ही अद्भुत, अलौकिक एवं आश्चर्यजनक होते हैं।
जिस समय सिद्धियों का उत्पादन एवं विकास हो रहा हो, वह समय बड़ा ही नाजुक और बड़ी ही सावधानी का है। जब किशोर अवस्था का अंत और नवयौवन का आरंभ होता है, उस समय वीर्य का शरीर में नवीन उद्भव होता है। इस उद्भवकाल में मन बड़ा उत्साहित, काम-क्रीड़ा का इच्छुक एवं चंचल रहता है। यदि इस मनोदशा पर नियंत्रण न किया जाए तो कच्चे वीर्य का अपव्यय होने लगता है और वह नवयुवक थोड़े ही समय में शक्तिहीन, वीर्यहीन, यौवनहीन, होकर सदा के लिए निकम्मा बन जाता है। साधना में भी सिद्धि का प्रारंभ ऐसी ही अवस्था है, जबकि साधक अपने अंदर एक नवीन आत्मिक चेतना अनुभव करता है और उत्साहित होकर प्रदर्शन द्वारा दूसरों पर अपनी महत्ता की छाप बिठाना चाहता है। यह क्रम यदि चल पड़े तो वह कच्चा वीर्य - प्रारंभिक सिद्धि तत्त्व स्वल्प काल में ही अपव्यय होकर समाप्त हो जाता है और साधक को सदा के लिए छूँछ एवं निकम्मा हो जाना पड़ता है।
संसार में जो भी क्रिया-व्यापार चल रहा है, वह कर्मफल के आधार पर चल रहा है। ईश्वरीय सुनिश्चित नियमों के आधार पर कर्मबंधन में बँधे हुए प्राणी अपना-अपना जीवनक्रम चलाते हैं। प्राणियों की सेवा का सच्चा मार्ग यह है कि उन्हें सत्कर्म में प्रवृत्त किया जाए, आपत्तियों को सहने का साहस दिया जाए। यह आत्मिक सहायता हुई। तात्कालिक कठिनाई को हल करने वाली भौतिक सहायता भी देनी चाहिए। आत्मशक्ति खरच करके कर्त्तव्यहीन व्यक्तियों को संपन्न बनाया जाए तो यह उनको और अधिक निकम्मा बनाना होगा, इसलिए दूसरों की सेवा के लिए सद्गुण और विवेकदान ही श्रेष्ठ है। दान देना हो तो धन आदि जो हो, उसका दान करना चाहिए। दूसरों का वैभव बढ़ाने में आत्मशक्ति का सीधा प्रत्यावर्तन करना अपनी शक्तियों को समाप्त करना है। दूसरों को आश्चर्य में डालना या उन पर अपनी अलौकिक सिद्धि प्रकट करने जैसी तुच्छ बातों में कष्टसाध्य आत्मबल को व्यय करना ऐसा ही है, जैसे कोई मूर्ख होली खेलने का कौतुक करने के लिए अपना रक्त निकालकर उसे उलीचे। यह मूर्खता की हद है। अध्यात्मवादी, दूरदर्शी होते हैं, वे साँसारिक मान-बड़ाई की रत्ती भर भी परवाह नहीं करते।
पर आजकल समाज में इसके विपरीत धारा ही बहती दिखाई पड़ती है। लोगों ने ईश्वर-उपासना, पूजा-पाठ, जप-तप को भी साँसारिक प्रलोभनों का ही साधन बना लिया है। उनका उद्देश्य किसी प्रकार धन प्राप्त करना होता है। ऐसे लोगों को प्रथम तो उपासनाजनित शक्ति ही प्राप्त नहीं होती और किसी कारणवश थोड़ी-बहुत सफलता प्राप्त हो गई तो वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है और आगे के लिए रास्ता बंद हो जाता है। दैवी शक्तियाँ कभी किसी अयोग्य व्यक्ति को ऐसी सामर्थ्य प्रदान नहीं कर सकतीं, जिससे वह दूसरों का अनिष्ट करने लग जाए।
प्रदर्शन की अहंता का स्पर्श करें नहीं और अनिष्ट की बात सोचें नहीं, तब फिर संसार का कल्याण और परमार्थ ही एकमात्र कामना रह जाएगी। ऐसा व्यक्ति ही दूसरों को सन्मार्गगामी बनाता है। गायत्री उपासकों से उसी की अपेक्षा की जाती है।
शल्य विज्ञान के क्षेत्र में अनेकानेक-अनुसंधान-आविष्कार करने वाले जॉन हंटर से किसी ने पूछा, “आपकी इतनी सफलताओं का कारण क्या है?”
उन्होंने कहा, “मैं पूरी गहराई से यह विचार करता हूँ कि कल्पना और क्षमता की दृष्टि से यह काम संभव और सही है क्या? कल्पनाओं की व्यावहारिकता को, कसौटी पर कसने में कभी उपेक्षा नहीं बरती। जो आज की परिस्थितियों में शक्य है, उसी में हाथ डालने की आदत ने मुझे अनेकों सफलताएँ दिलाई हैं।”
अज्ञात् परलोकवासियों के प्रति प्रबल जिज्ञासा भी वैज्ञानिक खोज एवं अनुसंधान की एक प्रेरक शक्ति रही है। यह जिज्ञासा नई नहीं है बल्कि प्राचीन काल से ही इनके प्रति रोमाँचक कल्पना की जाती रही है। इनके सम्बन्ध में तरह-तरह की कथा-किम्वदंतियां गढ़ी एवं कही जाती रही है। परन्तु जैसे-जैसे ज्ञान-विज्ञान का प्रकाश फैलता गया इस मोहक परिकल्पना में नये-नये पन्ने जुड़ते गये, नित नये आयाम खुलते गये। आज विज्ञान का आधुनिक अन्वेषण यह प्रमाणित करने में जुटा है कि परलोकवासियों के अस्तित्व की कल्पना महज परिकल्पना ही नहीं है वरन् यह एक यथार्थ सच्चाई है। विज्ञान के इस प्रयत्न-पुरुषार्थ में कुछ आशा की किरणें झलकी हैं, कुछ अनजान जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं, अबूझ रहस्य की हल्की सी झलक-झाँकियाँ भी मिली है।
विज्ञान के अन्वेषण का आधार प्रत्यक्ष है अप्रत्यक्ष नहीं। यह प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है। यही इसकी प्रमाणिकता और सर्वोपरि सच्चाई है और इस सच्चाई को चुनौती देती है- परलोकवासियों की अनबूझ हलचलें, रहस्यमयी गतिविधियाँ। परलोकवासी भ्रमण करते-करते कभी किसी उड़न तश्तरी या विचित्र यान से धरती के वायुमण्डल में पहुँच जाते हैं। इस यान एवं इसके यात्रियों के क्रियाकलाप अपनी धरती से अनमेल एवं अनोखे होते हैं और यह घटना इतना प्रत्यक्ष होती है कि इसे वैज्ञानिक नकार भी नहीं सकते। एक बार परलोकवासियों की उड़नतश्तरी का विस्फोट हुआ, जिसके मलबे से निकला एक भी तत्त्व धरती के किसी तत्त्व से मेल नहीं रखता था। आखिर ये तत्त्व हैं क्या? और कहाँ से आये? कौन इसका निर्माता है और इसी कारण इन अनसुलझे रहस्य को सुलझाने में विज्ञान के तमाम अन्वेषण-अनुसंधान निरत हो गये।
परलोकवासियों की चित्र-विचित्र उड़न तश्तरियों का पीछे करने के बावजूद जब कुछ हाथ नहीं लगा तो रेडियो तरंगों के माध्यम से उनसे संपर्क साधने का प्रयास किया गया। अनन्त आकाशगंगा में रेडियो तरंगों के माध्यम से परलोकवासियों की खोज-खबर लगाने की सिलसिला सन् 1960 में अमेरिकी रेडियो खगोल विज्ञान फ्रेंक ड्रेक ने वेस्ट वर्जीनिया के ग्रीन बैंक में प्रारम्भ किया। इस अहायान को ‘आजमा’ कहा गया। इस अहायान से प्रेरित होकर इसके कुछ समय पश्चात् प्रसिद्ध अमेरिकी अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन नासा ने भी इसी उद्देश्य के लिए एक बड़ी परियोजना प्रारम्भ की। इस परियोजना को सेती (स्श्वञ्जढ्ढ) अर्थात् सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरीटोरियल इंटेलीजेंस का नाम दिया गया। सेती अत्याधुनिक कंप्यूटर नेटवर्किंग कार्यक्रम से जुड़ा है।
नासा का सेती परलोकवासियों से संपर्क साधने के लिए सतत् रेडियो तरंगों को प्रक्षेपित करता है। चूँकि परलोक से धरती की दूरी स्थायी नहीं है। यह घटती-बढ़ती रहती है। इससे रेडियो तरंगों की आवृत्ति में भी अन्तर आता है। इस सबको ध्यान में रखकर सेती ने हाइड्रोजन परमाणु की आवृत्ति का चुनाव किया है, क्योंकि ब्रह्मांड में यही तत्त्व सर्वाधिक एवं पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है तथा रेडियो संकेतों के रूप में सर्वाधिक उपयुक्त है। इस अन्वेषण के दौरान अब तक लगभग सैकड़ों अनजानी-अजनबी रेडियो तरंगों को प्राप्त किया जा चुका है। परन्तु इससे परलोकवासियों के किसी रहस्य का उजागर-उद्घाटन नहीं होता है। इसके दो कारण हैं- प्रथम ये सिगनल एक बार प्राप्त होने के पश्चात् दुबारा नहीं मिल सके। इससे संदेह होना है कि ये संकेत परलोकवासियों के हैं या नहीं। दूसरा कारण है इन संकेतों की उपस्थिति अत्यन्त क्षणिक व अल्प समय के लिए रही। इसके बावजूद इस प्रयोग परीक्षण को असफल नहीं कहा जा सकता है।
आशा-निराशा के कुहासे में डूबते-उतरते 15 अगस्त 1966 को आहियो में एक अनजान रेडियो संकेत को दर्ज किया गया। यह संकेत अत्यन्त अनोखा एवं अद्भुत था, जो धनु तारामण्डल के अज्ञात परलोकवासियों द्वारा सम्प्रेषित किया गया था। सिगनल ने वैज्ञानिकों को चकित व हतप्रभ कर दिया था। इसके ‘वाउ सिगनल’ कहा गया। इसके ठीक एक दशक पश्चात् 10 अगस्त 1986 इसी तारामण्डल से एक और सिगनल मिला।
इसे हार्बर्ड में दर्ज किया गया। इसी प्रकार कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक अद्भुत सिगनल प्राप्त करने का दावा किया है। इसी प्रकार कन्या, मीन और सर्पधारी तारामण्डलों से भी रेडियो संकेत प्राप्त हो चुके हैं।
ठोस एवं सटीक संकेत प्राप्त करने के लिए सन् 1974 में अरीसिवो (न्यूटीरिको) स्थित संसार के सबसे बड़े रेडियो टेलिस्कोप से हर्क्युलिस तारामण्डल की ओर एक प्रभावी रेडियो संदेश भेजा गया। इसमें कम्प्यूटर की बाइनरी प्रणाली का उपयोग किया गया। संदेश की पहली लाइन में एक से दस की संख्याएँ हैं। इसके बाद की तीन लाइनों में उन रासायनिक यौगिकों को दर्शाया गया है जो जीवों के लिए आवश्यक है। इसके नीचे डी एन ए अणु की तस्वीर अंकित है। इसके ठीक नीचे मानव आकृति बनी है जिसके दोनों ओर संख्याएँ हैं। दायीं ओर की संख्या मानव की लम्बाई बनाती है और बाई ओर की संख्या धरती पर मानव की आबादी दर्शाती है। अगली लाइन में सूरज और धरती समेत सौरमण्डल के सभी ग्रहों को अंकित किया गया है। सबसे नीचे रेडियो टेलिस्कोप की तस्वीर बनी है जिससे संदेश प्रसारित किया गया है। यूँ तो हर्क्युलिस तारामण्डल हमसे 24,000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है और इससे जवाब आया भी तो सन् 5000 में आयेगा। इस सबके बावजूद वैज्ञानिक परलोकवासियों के किसी संकेत सूत्र के प्रति आशान्वित हैं।
परलोकवासियों से संपर्क साधने के लिए रेडियो संदेशों के अलावा चित्रों व ध्वनियों का भी प्रयोग किया जा रहा है। नासा के अन्तरिक्ष अनुसंधानकर्त्ता समय-समय पर कुछ ऐसे मानवरहित खोजी यान अन्तरिक्ष में भेजते रहते हैं। ये अन्तरिक्ष यान हमारे सौरमण्डल से दूर एवं आगे जाते हैं। इन यानों में चित्र लगाये जाते हैं। इस क्रम में स्पेस भ्रोजा पायोनियर-10-2-11 पर एक ऐसा चित्रपट लगाया गया जिससे परलोक के बुद्धिमान प्राणी हमारी धरती के संदर्भ में जान व समझ सकें। इसमें हाइड्रोजन परमाणु नर-नारी की आकृति, एक अन्तरिक्ष यान का रेखाचित्र और सौरमण्डल अंकित किया गया है। सही दूरी दर्शाने के लिए हाइड्रोजन परमाणु के तरंग दैर्ध्य को इकाई माना गया है। इसी तरह वायेजर-1 और वायेजन-2 नामक स्पेस प्रोब्स में धरती की विभिन्न प्रकार की आवाजों और व्यक्तियों को एक एल.पी. (लाँग प्लेइंग रिकार्ड) में रिकार्ड किया गया है। इसमें विभिन्न भाषाओं में अभिनन्दन-अभिवादन के स्वर भी अंकित हैं। साथ ही धरती की जानकारी देने वाले चित्र भी चित्रित हैं। सम्भव है कोई परलोकवासी इस स्वर को सुने और इस पता के माध्यम से धरतीवासियों से संपर्क साधें।
परलोकवासियों के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि ब्रह्मांड अनन्त है और इसमें हमारी पृथ्वी जैसी अनेकों-असंख्यों ग्रह हो सकते हैं जिसमें हमारी धरती के समान या इससे उन्नत विकसित सहायताएँ हो सकती हैं। धार्मिक मान्यताएँ इसे पुष्ट करती भी हैं। इसके अनुसार विश्व ब्रह्मांड में अनेकों लोक-लोकान्तर हैं और वहाँ पर आवागमन का अपना विशिष्ट विधि-विधान भी हैं। इन गुप्त रहस्यों का अनावरण करके इन लोक-लोकान्तर का आनन्दपूर्वक भ्रमण किया जा सकता है। वैज्ञानिक इन तथ्यों-रहस्यों से तो सहमत नहीं है परन्तु अपने कुछ वैज्ञानिक कारणों के द्वारा वे भी मानने लगे हैं कि इस असीम अनन्त अन्तरिक्ष में धरती जैसी किसी उन्नत एवं विकसित सहायता का अस्तित्व विद्यमान है। इसके लिए वे कई प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
समस्त ब्रह्मांड में प्रकाश, ध्वनि और गंध व्याप्त हैं। परमात्मा की इस सृष्टि में कोई कार्य निष्प्रयोजन नहीं होता है। क्या इस विराट् ब्रह्मांड में इन भौतिक द्रव्यों का प्रयोजन केवल पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य मात्र के लिए है या किसी और लोक में रहने वाले परलोकवासियों के लिए भी उपयोगी है? वैज्ञानिक स्वीकारते हैं कि यदि अन्य लोक के निवासी हैं तो उनके पास इन संवेदनाओं को ग्रहण करने वाली इन्द्रियाँ भी होनी चाहिए। साथ ही इन पर नियंत्रण एवं नियमन करने के लिए मन-मस्तिष्क के साथ संचार तंत्र भी विद्यमान होना चाहिए। इस प्रकार इन तथ्यों से अन्य लोकों के निवासियों की एक शारीरिक संरचना की परिकल्पना उभरती है। इस परिकल्पनाओं के आधार पर अनेकों लेख, वृत्तचित्र, चलचित्र एवं धारावाहिकों का भी निर्माण हो चुका है, जिसमें अन्तरिक्षवासियों की शारीरिक संरचना एवं अन्य क्रियाकलापों पर रोमाँचक कल्पना को दृश्यचित्र में उतारा, उकेरा गया है।
वैज्ञानिक मनुष्य की आँखों एवं कानों की सीमित क्षमता के विपरीत अन्तरिक्षवासियों की आँखों एवं कानों को व्यापक एवं विस्तृत रूप में परिकल्पित करते हैं। इनमें पराबैंगनी किरणों को देखने की सामर्थ्य तथा अल्ट्रा व सुपरसोनिक ध्वनि को सुन सकने की सम्भावना हो सकती है। इसी कारण वे जब धरती पर आते-जाते हैं तो उन्हें जाना-पहचाना नहीं जा सकता है। ब्रह्मांड में लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई के तीन आयामों के अलावा एक चौथा आयाम समय भी है, जिसे देखा नहीं जा सकता। एच.जी. वेल्स ने अपनी ‘टाइम मशीन’ में इसकी विस्तृत विवेचना की है। जिसके अनुसार वर्तमान समय के समान भूत और भविष्य के समय में गति की जा सकती है। वैज्ञानिक मान्यता है कि अन्य लोकों के निवासी बहुआयामी हो सकते हैं और इसी कारण हमारा त्रिआयामी मस्तिष्क उनका पता-परिचय न जान पा रहा है।
परिकल्पनाओं के इस परिदृश्य में वैज्ञानिक अन्तरिक्ष वासियों के अस्तित्व की कल्पना करते हैं तथा इसे स्वीकार करते हैं कि सुदूर आसमान में अवश्य ही कोई सहायता व संस्कृति होगी। धार्मिक मान्यता इसकी जानकारी अपने मन के माध्यम से प्राप्त करती है। इस प्रकार वैज्ञानिक अन्वेषणों के साथ धार्मिक एवं यौगिक प्रक्रियाओं को समन्वित किया जा सके तो इन अदृश्य, अजनबी एवं अनजान लोकों का परिचय प्राप्त किया जा सकता है तथा इन लोकों के निवासियों से संपर्क साधा जा सकता है। अगर यह योग एवं समन्वय सम्भव हो सके तो अनेक अप्रकट एवं अनबूझ रहस्यों को अनावृत्त किया जा सकता है और सम्भव है इसमें लोकान्तर गमन की मानवीय जिज्ञासा पूर्ण हो सके।
एक बार गाँधी जी इलाहाबाद आनंद भवन में ठहरे। सुबह गाँधी जी हाथ-मुँह धो रहे थे और जवाहरलाल जी पास खड़े बातें कर रहे थे। कुल्ला करने के लिए गाँधी जी ने जितना पानी लिया, वह समाप्त हो गया तो उन्हें दूसरी बार फिर पानी लेना पड़ा। गाँधी जी बड़े खिन्न हुए और बात-चीत का सिलसिला टूट गया। जवाहरलाल जी ने कारण पूछा तो उन्होंने कहा, “मैंने पहला पानी अनावश्यक रूप में खरच कर दिया और अब फिर पानी लेना पड़ रहा है। यह मेरा प्रमाद है।”
जवाहरलाल जी हँसते हुए बोले, “यहाँ तो गंगा-यमुना दोनों बहती हैं। रेगिस्तान की तरह पानी कम थोड़े ही है। आप थोड़ा पानी अधिक खरच कर लें तो चिंता की क्या बात है?”
गाँधी जी ने कहा, “गंगा-यमुना मेरे लिए ही तो नहीं बहतीं। प्रकृति में कोई भी चीज कितनी ही उपलब्ध हो, मनुष्य को उसमें से उतनी ही खरच करनी चाहिए, जितनी उसके लिए आवश्यक हो।”
नेपोलियन तब लड़का था। खेलने गया तो भाग-दौड़ में सामने से आती एक लड़की से टकरा गया। लड़की गरीब घर की थी। फल का टोकरा लेकर जा रही थी। टक्कर से टोकरा गिरा और फल गंदगी-कीचड़ में गिर गए।
लड़की रोने लगी। मजूरी भी गई और मालकिन से दंड भी भुगतना पड़ेगा।
झंझट से बचने के लिए पहले तो नेपोलियन का मन आया कि जल्दी से भाग चलें। पीछे उसका मन लड़की की परिस्थिति के बारे में सोचकर पिघल गया। वह लड़की को अपने घर ले गया और गिरे हुए फलों का पैसा चुका देने का वायदा किया।
घर पहुँचने पर नेपोलियन ने सारा किस्सा अपनी माँ को बताया और पैसा लड़की को चुका देने के लिए कहा। माँ कठोर स्वभाव की भी थी और साथ में पैसे की तंगी भी। वह पैसा देने की अपेक्षा शरारत के लिए नेपोलियन की पिटाई करने लगी।
कहने-सुनने के बाद फैसला हुआ कि लड़की को पैसा तो चुका दिया जाएगा, पर डेढ़ महीने तक उसको नाश्ता न मिलेगा। उसी से इसे पेशनी देकर राशि की भरपाई करनी होगी।
नेपोलियन खुशी-खुशी तैयार हो गया। कर्त्तव्य-न्याय निभाने के लिए डेढ़ महीने एक समय भोजन करके ही काम चलाया। ऐसे उदारचेता ही भविष्य में महान बनते हैं।
मन क्या है? शरीर से यह क्यों अभिन्न है? इसकी यदि विवेचना करनी हो तो छाँदोग्योपनिषद् के “अन्नमयं हि सोम्य मनः” (6/6/5) के स्वर में स्वर मिलाते हुए यही कहना पड़ेगा कि यदि एक ही उपादान से दो प्रकार की सृष्टियाँ हो रही हैं तो उन दोनों में किसी-न-किसी प्रकार का संबंध अवश्य है, भले ही स्वरूप भेद के कारण यह तादात्म्य स्थापित न हो पा रहा हो, तो भी इतने से ही उसे अमान्य करने का कोई कारण नहीं। जल से भाप और बरफ दोनों ही बनती हैं। दोनों के आकार और रूप में भारी अंतर है। एक स्थूलता का प्रतिनिधित्व करती है तो दूसरी अपने सूक्ष्म अस्तित्व का बोध कराती है। इतने पर भी दोनों में कोई भेद है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अनुकूल परिस्थिति मिलने पर वाष्प बरफ बन सकती है और बरफ भाप। शरीर और मन के संबंध में विज्ञानवादी विचारधारा भी अब ऐसी ही बनने लगी है और विज्ञानवेत्ता द्वैत से अद्वैत की वैदिक मान्यता की ओर लौटते प्रतीत हो रहे हैं। इस आधार पर वे मनोकायिक रोगों का निदान और उपचार ढूँढ़ पाने में सफल हुए हैं।
इस अभेदता को कुछ अन्य उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है। बीसवीं सदी के प्रारंभ तक पदार्थ और ऊर्जा के बारे में मान्यता थी कि वे दो पृथक वस्तुएं हैं। द्रव्य भी अनाशवान है और ऊर्जा भी अनश्वर है। दोनों नित्य हैं। ऊर्जा द्वारा पदार्थ संचालित होते हैं। इसके अतिरिक्त पदार्थ सत्ता पर ऊर्जा का कोई हस्तक्षेप नहीं।
सबसे पहले इस अवधारणा पर आइन्स्टीन के ऊर्जा सिद्धाँत (म्त्रउबख्) ने आघात किया। उक्त सूत्र ने आघात किया। उक्त सूत्र द्वारा उन्होंने यह सिद्धाँततः सिद्ध कर दिया कि शक्ति और द्रव्य परस्पर परिवर्तनीय हैं। इस प्रकार पदार्थ और ऊर्जा के द्वैतवाद से चलकर अब हम उनके अद्वैतवाद तक पहुँच गए हैं। इससे उत्साहित होकर आधुनिक मनोविज्ञान ने अब एक नई घोषणा की है द्रव्य और मन दो भिन्न पदार्थ नहीं हैं। उसके अनुसार यह एक ही सत्ता की दो अभिव्यक्तियाँ हैं। इस संबंध में अमेरिका के ‘राइस इन्स्टीट्यूट’ में महत्त्वपूर्ण शोधकार्य हुए हैं। उनने अपने अनुसंधान के आधार पर यह सिद्ध कर दिया है कि मनस् तत्त्व और भौतिक तत्त्व दो नहीं, एक हैं। विज्ञानवेत्ता मन और पदार्थ को पहले अलग मानते थे, पर हाल के अन्वेषणों ने अब उन्हें यह स्वीकारने के लिए बाध्य कर दिया कि दोनों एक ही चेतना के दो रूप हैं। ‘न्यू फ्रंटियर्स ऑफ माइंड’ नामक पुस्तक में विद्वान लेखक ने इस संबंध में यह तर्क प्रस्तुत किया है कि यदि ऐसी बात नहीं होती तो मन का पदार्थ पर जो प्रभाव दिखाई पड़ता है, वैसा कुछ देखा-सुना नहीं जाता और पदार्थ सत्ता मन से सर्वथा अप्रभावित बनी रहती, पर व्यवहार में ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता है। मन में यदि कोई संकल्प बार-बार उठता है तो वस्तु को वह इच्छानुसार प्रभावित करने में सफल होता है। छुरी एवं चम्मचों को टेढ़ा कर देना अथवा तोड़ देना जैसे प्रदर्शन वस्तुतः इसी संकल्प बल के करिश्मे हैं। ऐसा क्यों होता है? इसका कारण समझाते हुए ग्रंथकार ने मत व्यक्त किया है कि मन में जब भी कोई संकल्प उठता है तो वह यथावत् चेतना के समुद्र में संचारित हो जाता है और निर्दिष्ट वस्तु जहाँ कहीं भी होती है, उस तक वह निर्विघ्न पहुँच जाता है। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने अनेक प्रयोग किए। उदाहरणार्थ, एक प्रयोग ताश खेलते लोगों के बीच किया। खेलने वालों में से एक व्यक्ति को यह निर्देश दिया गया कि वह अमुक पत्ते को अपने पास आने का बार-बार विचार करें। बाद में जब उसका प्रतिशत निकाला गया तो प्रयोगकर्त्ता यह देखकर हैरान रह गए कि ताश का वह पत्ता सौ में से सत्तर बार उसके पास आया था। शेष तीस मौकों पर वह अन्य खिलाड़ियों के हाथ लगा। इसका अर्थ स्पष्ट था कि विचार का वस्तु पर प्रभाव पड़ता है।
ये सब प्रयोग हमें मन और पदार्थ के बीच की द्वैतता को मिटाकर अद्वैतता की ओर ले जा रहे हैं। पिछले दिनों शरीर और मन की अद्वैतता पर भी काफी अध्ययन-अनुसंधान हुए हैं। चिकित्साशास्त्री अब यह मानने लगे हैं कि बहुत से रोग मन से संबंधित होते हैं। उनका कोई दृश्य भौतिक कारण न होने के बावजूद भी वे अपना अस्तित्व बनाए रहते हैं, क्योंकि वे मानसिक मूल के होते हैं। वे इसे स्वीकारने लगे हैं कि जब कभी मनःक्षेत्र में विप्लव अथवा संघर्ष पैदा होता है तो शरीर पर उसका दुष्प्रभाव व्याधि के रूप में सामने आता है। उदरव्रण (पेप्टिक अल्सर), उच्च रक्तचाप आदि रोगों का अध्ययन कर चिकित्सकों ने इस बात का पता लगाया है कि वे सब मन से संबंधित हैं। अनेक प्रकार की शारीरिक पीड़ाओं को, यहाँ तक कि दाँत और हड्डियों के दर्द तक को उन्होंने मन से संबंधित पाया है। ऐसी स्थिति में उनका मानसिक इलाज ही वास्तविक रोगोपचार साबित हो सकता है, किंतु मानसिक मूल वाले बीमारों के संबंध में यह कहना उचित न होगा कि वे मात्र काल्पनिक व्याधि के शिकार हैं।
यदि किसी की पीड़ा मनःकायिक स्वरूप वाली है तो यह मान लेना कि रोगी केवल काल्पनिक दर्द में जी रहा है, वास्तविक पीड़ा से उसे हो ही नहीं रही है, गलत होगा। शरीरवेत्ताओं की इस संबंध में जो मान्यता है, वह यह है कि निषेधात्मक मानसिक वृत्तियों के कारण स्नायु-संस्थान और शरीर तंत्र विकारग्रस्त होने लगते हैं, जो अंग विशेष में रोग के कारण बनते हैं, ठीक वैसे ही, जैसे जीवाणुओं और विषाणुओं के कारण वे उत्पन्न हुए हों। व्याधि तो हर हालत में सत्य ही होती है। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि शरीर और मन के बीच द्वैत नहीं, अद्वैत की स्थिति है।
तो क्या मनःशास्त्रियों का यह कहना उचित है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए मन को नीरोग रखना पड़ेगा? हाँ, वर्तमान अध्ययन इसी निष्कर्ष पर पहुँचाता है, किंतु वास्तविक तथ्य को हम भूलते जा रहे हैं और उसकी उपेक्षा मूल की जगह पत्ते का उपचार कर रहे हैं। चिकित्सालयों की संख्या दिन-दिन बढ़ती ही जा रही है, पर इस बात की ओर तनिक भी ध्यान नहीं जाता कि काया की तरह मन स्वस्थ रहे। कायिक बीमारियों का उपचार हो, यह अच्छी बात है, पर यह भी कोई कम तथ्यपूर्ण नहीं है कि कई रोगों की जड़ें मन में घुसी रहती हैं, अतः मन को भी सबल-सशक्त बनाने का उपाय किया जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ और भौतिक कारणों, उपचारों पर ही अधिकाधिक ध्यान केंद्रित रखा गया तो फिर इस क्षेत्र में पश्चिमी देशों जैसी स्थिति पैदा होते देर न लगेगी। वहाँ जिस दर से मानसिक विकृतियाँ पैदा हुई हैं, उसी अनुपात में नए-नए कायिक रोग भी उत्पन्न हो रहे हैं, किंतु पश्चिमी चिकित्सक उनका इलाज भौतिक मानकर ही करते रहे, फलतः बीमारियाँ अब नए रूप में, नूतन प्रकार से वहाँ प्रकट हो रही हैं। ऐसी व्याधियों को अँगरेजी में साइकोसोमेटिक डिसीजेज कहते हैं, जो अवसाद (डिप्रेशन) एवं आब्सेसिव कम्पलसिव डिसआर्डर्स आदि के रूप में जानी जाती है।
भौतिकता के साथ-साथ मानसिक व्याधियाँ बढ़ी हैं। पश्चिमी देशों की संपन्नता को देखकर इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है, साथ ही पहाड़ी अंचलों में रहने वाले वनवासियों अथवा अनपढ़ ग्रामीणों को देखकर इस निष्कर्ष पर सरलता से पहुँचा जा सकता है कि किस प्रकार धार्मिक मान्यताओं में जीने वाला व्यक्ति मन से स्वस्थ और शरीर से सबल होता है। अश्रद्धा, अविश्वास, आशंका, भय, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष जैसे अधार्मिक तत्त्वों की बढ़ोत्तरी प्रगतिशीलता के नाम पर व्यक्ति के अंदर ज्यों-ज्यों होती जाती है, वैसे-ही-वैसे इस बात की संभावना बढ़ती जाती है कि वह मानसिक विकृति के करीब पहुँचता चला जा रहा है। इसी तथ्य की स्वीकारोक्ति प्रो ब्राउन ने अपनी पुस्तक ‘साइंस एण्ड इण्डिविजुएलिटी’ में की है। वे लिखते हैं, “यद्यपि वे इसे वैज्ञानिक दृष्टि से नहीं कह रहे हैं, फिर भी यह सत्य है कि जो लोग धार्मिक परंपराओं के अंदर जीते हैं, उनमें मानसिक आधियों की न्यूनता होती है।” इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि धर्मधारणा के अंदर कोई ऐसा निवारक तत्त्व, कोई ऐसी स्वास्थ्यकारी शक्ति है, जिसके द्वारा मानस रोग कम हो जाते हैं। उनका कहना है कि एक वैज्ञानिक के नाते वे बस इतना ही कह सकते हैं, किंतु यदि किसी को यह जानना हो कि धर्म किस प्रकार मन और फिर उसके द्वारा शरीर को प्रभावित करता है तो धार्मिक लोगों को धर्म का अध्ययन और अनुसंधान करना पड़ेगा।
यही कारण है कि पाश्चात्य देशों की तुलना में भारत में अब भी मानसिक रोगियों की संख्या कम है। यह और बात है कि अपना देश भी अब यूरोपीय सहायता से अप्रभावित नहीं रहा, किंतु उस प्रभाव के पीछे भी एक प्रच्छन्न धार्मिकता यहाँ के लोगों में अब भी देखी जा सकती है। कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि यहाँ के प्रगतिशीलों में भी धार्मिकता अब भी न्यूनाधिक मात्रा में दृष्टिगोचर हो जाती है। जहाँ जिस अनुपात में यह होती है, उनका भाव और आस्था क्षेत्र उतना ही मजबूत होता है। इस कारण वे मनोविकारों के उतने ही कम शिकार होते हैं। मन स्वस्थ रहा तो काया भी नीरोग बनी रहती है।
मानस रोगों का एक कारण मनोविज्ञानी आत्मकेंद्रित होना बताते हैं। व्यक्ति जितना आत्मकेंद्रित होगा, उतनी ही मानसिक रोग एवं शारीरिक रोग की संभावना उसमें बढ़ जाएगी। संभवतः इस तथ्य से हमारे प्राचीन ऋषि परिचित रहे होंगे। इसलिए ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुँबकम्‘ जैसे सिद्धाँत वाक्यों के पीछे उनका एक भाव व्यक्ति और समाज को आत्मकेंद्रित होने से बचाना भी रहा होगा, ताकि स्वस्थ शरीर वाले व्यक्ति और समाज की रचना की जा सके।
इस प्रकार मनःकायिक रोगों की उत्पत्ति भी इसी बात को सिद्ध करती हैं कि देह और मन परस्पर अभिन्न हैं। इस तथ्य को जितनी जल्दी समझा जा सकेगा, उतनी ही जल्दी रुग्ण मन के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों से बचा जा सकना और स्वस्थ रहना संभव हो सकेगा।
राजा को दयालु कहलाने और दानवीर की प्रशंसा सुनने की ललक लगी। सो उसने एक दिन ऐसा निश्चय किया कि पक्षी पकड़ने वाले लोग दरबार में आएं और बंदी पक्षियों के मूल्य लेकर उन्हें स्वतंत्र कर दें। राजा की दयालुता का यश फैला। निश्चित दिन पर हजारों पिंजड़े खाली होते और राज्यकोष से उन्हें धन मिलता।
एक मुनि-मनीषी वहाँ पहुँचे। दृश्य देखा तो बहुत दुखी हुए। मुनि ने राजा को समझाया, “आपकी यश-कामना इन निरीह पक्षियों को बहुत महँगी पड़ती है। लालच की पूर्ति के लिए असंख्य नए शिकारी पैदा हो गए हैं और पकड़े जाने के कुचक्र में अगणित पक्षियों को त्रास मिलता है और प्राण जाते हैं। यदि दयालुता का प्रदर्शन नहीं, पालन अभीष्ट है तो आप पक्षी पकड़ने पर प्रतिबंध लगाएँ।”
राजा ने अपनी भूल समझी और दयालुता का प्रदर्शन छोड़कर वह नीति अपनाई, जिससे वस्तुतः दया-धर्म का पालन होता था।
माघ विद्वान भी थे, कवि भी, प्रतिभावान भी। अपनी अद्भुत काव्य-शक्ति के बल पर उन्होंने कमाया भी बहुत। इतने पर भी वे कभी संपन्न न बन सके। जो हाथ आया, वह अभावग्रस्तों, दुखी-दरिद्रों की सहायता के लिए बिखेर दिया।
एक बार उस क्षेत्र में दुर्भिक्ष पड़ा। अपनी संपदा बेचकर वहाँ के दीन-दरिद्रों की अन्न पूर्ति के लिए लगा दिया। मात्र उनका नवरचित काव्य घर में शेष रह गया। सोचने लगे, इसके बदले कुछ पैसा मिल जाए जो उसे भी समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए लगा दिया जाए।
काव्य का मूल्य-महत्त्व कौन समझे? गुणपारखी कहाँ से मिलें? याद आया कि इन दिनों राजा भोज ही ऐसे हैं, उन्हीं के पास चला जाए, पर इतनी दूर जाने के लिए मार्ग-व्यय कहाँ से आए? दूसरा प्रश्न यह सामने था कि भोज उन्हें पहचान लेंगे तो उचित से अधिक मूल्य देने लगेंगे जो उन्हें स्वीकार न था। सोचा गया, पत्नी के साथ चला जाए। ग्रंथ को अपरिचित महिला द्वारा प्रस्तुत किए जाने पर उतना ही मिलेगा जो उचित है।
माघ और उनकी पत्नी पैदल ही चल पड़े। लंबी यात्रा तय करके राजदरबार में पहुँचे। एक अपरिचित महिला द्वारा-काव्य, बेचने या गिरवी रखने की दृष्टि से, प्रस्तुत किया गया। काव्य के कुछ पृष्ठ उलटते ही भोज दंग रह गए। उन्होंने मुक्त हस्त से उसका पुरस्कार दिया।
जो मिला, उसे लेकर माघ और उनकी पत्नी वापस लौटे। मार्ग में फिर वही दुर्भिक्षग्रस्त क्षेत्र मिला। वहीं से बाँटना आरंभ किया गया तो घर पहुँचते-पहुँचते सारी राशि समाप्त हो गई और ठीक वैसी ही अभावग्रस्त स्थिति में वापस लौटे, जैसी कि चलते समय थी। कहते हैं, अन्य क्षुधातों की तरह इस दंपत्ति का भी उसी दुर्भिक्ष के प्रकोप में देहावसान हो गया।
बौद्धिक विकास को आज के युग की सर्वोपरि उपलब्धि मानी जाती है। यह यथार्थ और सत्य भी है, क्योंकि आज के विश्व का सारा परिदृश्य बौद्धिक आविष्कार से चमत्कृत एवं हतप्रभ है, आश्चर्यचकित है। और हो भी क्यों न, आज अत्याधुनिक साधन-सुविधाओं का अन्तहीन अम्बार, विलासिता की चरम-परम चीजें तथा भौतिक जीवन को सुख-साधन से भर देने की जटिल प्रतियोगिता सब इसी की तो देन है। परन्तु इन सबके बीच ही गहरी अतृप्ति एवं तड़प क्यों उठती है? क्यों मन प्यासा का प्यासा रह जाता है? क्यों हृदय की विकलता मिटती नहीं है? बौद्धिकता के पद तले भावनाओं का कुचल-मसलकर मिट जाना ही इसका सार्थक जवाब है। बौद्धिकता के शुष्क आच्छादन में भाव जगत् की गहरी संवेदनशीलता समाप्त हो गयी है। आज का आधुनिक जगत् जितना भौतिकता के क्षेत्र में अग्रसर हुआ है, उतना ही मनोजगत, भावजगत में पिछड़ गया है। गम्भीर मनोरोगों का पनपना, हिंसा-हत्या, आत्महत्या आदि का उन्मादी आवेग भावहीन, शुष्क एवं कोरी बौद्धिकता का ही तो परिणाम है।
बुद्धि इस युग का भौतिक वरदान बनकर अवतरित हुई है तो आत्मिक प्रवंचना के रूप में अट्टहास भी कर रही है। बुद्धि हमें शाप और वरदान दोनों को एक साथ परोस रही है। परन्तु हम उसके वरदान का सदुपयोग तक नहीं कर पा रहे हैं और शाप के दावानल में जल-भस्म कर हाहाकार मचाये हुए हैं। बुद्धि के कटघरे में कैद मन को कहीं भी शान्ति की शीतल छाँव नजर नहीं आती। यह समस्या वैयक्तिक ही नहीं है बल्कि सामाजिक, राष्ट्रीय एवं वैश्विक हो गयी है। बुद्धि के घनघोर घटाटोप में घिरकर हमें प्रकाश का अस्तित्व भी दिखायी नहीं दे रहा है। यह आज के युग की बड़ी गहन और गम्भीर समस्या है। उलझनें उलझती ही जा रही हैं, सुलझने का कहीं कोई नामोनिशान नहीं दिखता। कहाँ जायें? क्या करें? कैसे समाधान दें? सभी प्रश्न महाप्रश्न बनकर अनुत्तरित एवं अशान्त हैं।
पश्चिमी बौद्धिकता का विष ज्वार आज हमारे हरे-भरे समृद्ध समाज एवं परिवार को विषाक्त कर दिया है। हाल ही में दो दशक पूर्व जहाँ प्रसन्नता से प्रसन्न व्यक्ति सुख-शान्तिपूर्वक जीवन जीते थे, आज अवसाद-विषाद रूपी गम्भीर मनोरोग से आक्राँत हो गये हैं। विषाद की यह काली छाया हँसते-मुस्कराते नन्हें-नन्हें बालकों को भी आवृत्त कर चुकी है। इसी कारण प्रत्येक बड़े अस्पतालों में ‘साइकियाट्री’ की शाखा विकसित हो चुकी है। मनोरोगों की बाढ़ आ गयी है। हर कोई, कहीं न कहीं चिंता, तनाव, अवसाद आदि मनोविकृतियों से घिरा हुआ छटपटा रहा है। ये सभी मनोरोग शुष्क एवं कोरी बुद्धि का प्रतिदान है। भावनाओं को कुचलकर उसकी छाती में चढ़कर बुद्धि ने बड़ा भयावह और भीषण दृश्य प्रस्तुत कर दिया है।
बौद्धिक प्रतिभा के धनी तो उससे सर्वाधिक प्रभावित है। तर्क और बुद्धि के शिखर पर चढ़े इन प्रतिभाओं को कहीं भी शान्ति एवं सुकून का आश्रय नहीं मिल पा रहा है। अपनी बौद्धिक योग्यता की चरम सीमा तक में विकसित करने के बावजूद ये अपने आन्तरिक जीवन में सुलगती आग के धुएं से हैरान-परेशान हैं। भावनात्मक अभाव से उपजी इस समस्या और परेशानी का अतिरेक तलाक की दर को दिनों दिन बढ़ा रहा है। व्यक्ति-व्यक्ति में, परिवार, समाज तथा समाज के सभी घटकों में विघटन एवं बिखराव बढ़ गया है। व्यथित मन को शान्ति देने का और ठिकाना नहीं मिल पा रहा है, जिससे आत्महंता नशा ही एक मात्र अवलम्बन बन गया है।
भावनात्मक अभाव बोध से उपजी पथरीली बुद्धि से सजी-सँवरी हताशा महान् प्रतिभाओं को भी नहीं छोड़ी है। यह समस्या आज की नहीं है, अतिपुरातन है। समाज को दिशा प्रदान करने वाले बुद्धिजीवियों की शुष्क बुद्धि स्वयं के लिए भी सर्वनाशी बन जाती है। इसी कारण ये प्रतिभायें जीवन के महाप्रश्न का जवाब खोजने के बदले इसे ही समाप्त-नष्ट करके मुक्ति का उपाय तलाशती हैं। इनमें से प्रमुख हैं-जगत् विख्यात विद्वान गेटे, जिसने अपने जीवन की कुछ उलझनों को न सुलझा पाने के कारण जीवन को ही समाप्त कर देने का ठानी।
इसके लिए उन्होंने एक धारदार एवं कीमती चाकू खरीदा और कई रात तकिये के नीचे छुपाये रखा। जीवन का अन्त कर देने की समस्या को सुलझाने में उनकी बुद्धि प्रबल नहीं हो पायी, जिस कारण उन्होंने चाकू को फेंक दिया। बुद्धि के कुचक्र में फँसकर ऐसा ही असफल एवं आत्मघाती प्रयास वायरन ने अपने ‘चाइल्ड हेरल्ड’ के लेखन के दौरान किया था। विषाद के उन क्षणों में उन्हें अपनी सास की आत्मियता एवं प्रेमभरी शीतल, सुखदायक छुअन ने उबार दिया और अन्ततः भावना के आगे बुद्धि का कुचक्र परास्त हो गया।
भावुकता भावना की ऊपरी कृति है। गहरी भावुकता में जब बुद्धि का कुतर्क शामिल हो जाता है तो ऐसे आत्मघाती कार्य सम्पादित होते हैं। महाकवि चैटरटन ने गरीबी एवं दरिद्रता से पस्त होकर तीक्ष्ण विषपान कर लिया तथा सदा के लिए इस अन्तहीन व्यथा से मुक्ति पाने का पथ खोजा। रूस के प्रसिद्ध उपन्यासकार मैक्सिम गोर्की के जीवन में भयंकर उतार-चढ़ाव आये। बौद्धिक कुशलता भी जब इस विषम परिस्थिति से कोई राह नहीं निकाल सकी तो उन्होंने अपनी जमा पूँजी से एक पिस्तौल खरीदा तथा उसकी गोली से अपने डडडडहाखे पेट को विदीर्ण कर डाला। जीवन के संघर्ष से टकराकर हारे थके यहूदी साहित्यकार स्टीफेन ज्विग ने ऐसे ही सर्वनाशी सूत्रों का सहारा लिया। उन्होंने आत्महत्या करके अपने अशक्त, असमर्थ जीवन का अन्त कर दिया। संसार के महासमर से पराजित होकर एक और कवि का दुःखद अन्त हुआ। लैटिन कवि एम्पेदोक्लीज ने धधकते ज्वालामुखी के गर्भ में कूदकर स्वयं के अस्तित्व को बलात् विनष्ट किया था।
मानसिक कल्पनाओं में प्राण भरकर कैनवास पर उतारने वाला चित्रकार बनागाँग अपने जीवन के वास्तविक रंग से परिचय न प्राप्त कर सके और खुद को गोली मार दी। एक और चित्रकार लाडे अस्पताल में पड़े मौत के पंजों से जूझ न सके और स्वयं को उसी के हवाले कर देना उचित समझा। वे अपने पेट में गोली मारकर मरे। चीनी साहित्यकार लाओत्से ने भी अपनी मौत का वरण स्वयं के बेचैन हाथों से किया था। यूनान के महान् दार्शनिक डायोजिनीस अपने हाथों फाँसी के फंदे पर झूल गये थे।
बुद्धिमान, प्रतिभावान कहे, माने-जाने वाले अनगिनत मूर्धन्यों ने तनिक भी समस्याओं एवं परेशानियों से व्यथित-उद्विग्न होकर जघन्य कृत्य आत्महत्या का पथ अपनाया। राबर्ट क्लाइव ने अपने ही जीवन से घबराकर तीन-तीन बार आत्महत्या का प्रयास किया परन्तु तीनों बार पिस्तौल की गोली ठीक निशाने पर न लगने से बच गये। इसके अलावा सेफो, डेमोस्थनीज, ब्रूटस, केसियस, क्लाइव, डेमोक्लीज, हनीवाल, बर्टन आदि विद्वानों ने भी अपने भवगद् प्रदत्त दुर्लभ जीवन की अविवेकपूर्ण इतिश्री की।
आधुनिक मनोविज्ञानियों की मान्यता है कि कोरी बौद्धिकता एवं गहरी भावुकता से उत्पन्न हताशा-निराशा की चरमसीमा आत्महत्या करने के लिए विवश करती है। क्योंकि इस स्थिति में सर्वत्र असहायपन एवं निराशा दृष्टिगोचर होती है। कहीं कोई अपना नजर नहीं आता और मानसिकता विखण्डित हो जाती है। आत्महत्या जैसे जघन्य कर्म न होने पर भी मानसिक विकृतियाँ पल-पल मृत्यु तुल्य मर्मांतक वेदना देती रहती हैं। मनोवैज्ञानिक इसे आज की भावना विहीन चरम बौद्धिकता का परिणाम मानते हैं। उनके पास समाधान का कोई सर्वांगपूर्ण सूत्र एवं पद्धति नहीं है।
इसका समग्र समाधान मानवीय जीवन के मर्मज्ञ ऋषियों, मनीषियों एवं द्रष्टाओं के पास है। उनके सूत्र हमारे लिए आज भी सार्थक एवं उपयोगी है। वे बुद्धि की शरण में नहीं सद्बुद्धि के समर्पण में, भावुकता के भँवर नहीं भावना की दिव्यता में जीवन को बढ़ने का मर्म समझाते हैं। इन सूत्रों में भौतिकता एवं आध्यात्मिकता दोनों के विकास की समग्र सम्भावनाएँ सन्निहित हैं। अतः इन सम्भावनाओं को साकार करने के लिए ऋषियों ने गायत्री महामंत्र को सर्वोपयोगी सरल एवं समग्र समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है। गायत्री महामंत्र को जीवन में उतारकर ही हम इस युग समस्या से मुक्त हो सकते हैं तथा स्वयं को मनोविकारों से मुक्त करके सद्बुद्धि एवं सद्भावना से सराबोर हो सकते हैं। इसी में समग्र समाधान सन्निहित है। अतः हम सबको अपनी स्थिति के अनुरूप गायत्री महामंत्र को जीवन में उतारना चाहिए अभिव्यक्त होने देना चाहिए।
गंगा किनारे एक साधु तप करते थे। उन्हें पानी पर चलने की सिद्धि मिल गई थी। पर रहने वाला मल्लाह उनका भक्त हो गया।
एक बार नदी में भयंकर बाढ़ आई। मल्लाह ने अपनी झोंपड़ी सहित अपने बच्चों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया, पर बाबाजी की कुटिया बहने लगी और साथ ही वे भी गोते खाने लगे। मल्लाह ने कूदकर उन्हें किसी प्रकार किनारे तक पहुँचाया।
चित्त शाँत होने पर मल्लाह ने साधु से पूछा, “आपको तो जल पर चलने की सिद्धि थी, फिर यह दुर्दशा कैसे हुई?” साधु ने गंभीर स्वर से कहा, “सिद्धियां प्रदर्शन मात्र थीं। इतने प्रचंड प्रवाह को पार करने के लिए तो तैरने की सिद्धि चाहिए। तुम मुझसे बड़े सिद्ध हो।”
सिद्धियों की प्रवंचना नहीं, धर्म-धारणा से ही मनुष्य का कल्याण संभव है।
भारत की सम्पदा का लगभग दो सौ वर्षों तक दोहन करने के उपरान्त अगस्त 1947 में अंग्रेज इस देश से विदा हुए। साम्प्रदायिक वैमनस्य के विष के साथ वे यहाँ भीषण गरीबी भी विरासत में छोड़ गये। अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए अपने शासनकाल में उन्होंने बड़ी चतुराई के साथ जीवन रस को सींचने वाली इस देश की प्राचीन साँस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनैतिक संस्थाओं को यथाशक्ति नष्ट और भ्रष्ट किया और उनके प्रति यहाँ के लोगों के मन में अनास्था उत्पन्न करने का भरसक प्रयास किया। स्वतंत्रता के बाद गुलामी के इस कलंक को मिटाने व अपनी नियति आप निर्धारित करने का महान् कार्य भारत माँ की संतानों पर था। उसने अपनी यह कार्य अपने ढंग से किया भी। उसके प्रयासों के खट्टे-मीठे, कटु एवं तिक्त फल आज हमें दृष्टिगोचर भी हो रहे हैं। भौतिक रूप से कुछ उपलब्धियों को बटोरते हुए भी आँतरिक रूप से विपन्न एवं दरिद्र ही हैं। ऐसा क्यों हुआ है? हमारे प्रयासों की दिशा में कौन सा मौलिक भटकाव रहा है? व कैसे हम राष्ट्रीय विकास की सर्वांगीण रूपरेखा तय कर सकते हैं। यह विचार मंथन आज अनिवार्य एवं अपेक्षित है।
यह एक स्वयंसिद्ध सत्य है कि नदी, पर्वत, वन और मैदान से भी अधिक किसी राष्ट्र का अस्तित्व वहाँ की जनता, वहाँ के स्त्री-पुरुषों पर निर्भर करता है, वे ही यथार्थ में उसकी शक्ति, उसकी सर्वातिशायी, सारवान् सम्पदा होते हैं। समग्र शिक्षा के संस्कार द्वारा इस शक्ति को उपयोगी बनाना, इस सम्पदा को सँवारना, हर काल और हर परिस्थिति में हर शासन का प्रथम और परम कर्त्तव्य होता है। दुर्भाग्यवश स्वतंत्र भारत में इस संदर्भ में अक्षम्य प्रमाद हुआ है। न केवल देश के कर्णधारों ने शिक्षा की उपेक्षा की है, अपितु इसके महत्त्व को भी कभी हृदयंगम नहीं किया।
उल्टा साधनों की कमी की आड़ लेकर हमारे राष्ट्र के नव निर्माताओं ने उपयुक्त शिक्षा के द्वारा व्यक्ति के निर्माण के महत्त्वपूर्ण विषय में अपनी उपेक्षा को ढकने का प्रयास किया है। परिणाम में यह विडम्बना स्पष्ट दिखाई देती है कि स्वाधीनता आन्दोलन के समय में, प्रायः नितान्त साधनविहीन होने पर भी तत्कालीन प्रबुद्ध नेता देशवासियों में व्यापक रूप से त्याग, बलिदान, पारस्परिक सौहार्द्र, सरलता और निर्भीकता जैसे गुण जगा सके, जबकि आज न केवल राष्ट्र के प्रति इन आदर्श भावों का अधिकाँशतः लोप हो गया है, अपितु इनके स्थान पर स्वार्थ, असहिष्णुता, वैमनस्य, भ्रष्टता, अनैतिकता जैसे अवगुणों ने मनुष्यों के हृदयों में गहरी जड़ें जमा ली हैं।
हमारे ही देश में वैदिक काल में जब शिक्षा के क्षेत्र में हमारे साधनों की स्थिति यह थी कि न कागज था, न कलम और न ही किताब; शिक्षा सभी स्त्री-पुरुषों के लिए अनिवार्य थी और निःशुल्क भी। मुख्य बात यह थी कि उस समय के लोग यह जानते और मानते थे कि स्वस्थ और स्वच्छ सामाजिक तथा राष्ट्रीय जीवन तब तक सम्भव ही नहीं है, जब तक प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित न हो। इतना ही नहीं, वे शिक्षा के लक्ष्यों के विषय में भी अत्यन्त स्पष्ट थे। शिष्य के चरित्र का निर्माण करना, विविध विषयों का उसको ज्ञान कराना और उसकी बुद्धि को ऐसा समर्थ बना देना कि वह जीवन में उठने वाले किसी भी प्रश्न के विषय में विवेकपूर्ण विचार कर सके और सही निर्णय ले सके; समवेत रूप से आचार्य के कर्त्तव्य अथवा शिक्षा के लक्ष्य थे। वैदिक काल में शिक्षा के क्षेत्र में पाठ्यक्रम उपयुक्त इन मुख्य प्रयोजनों को सिद्ध करने का आनुषंगिक माध्यम मात्र थे। जबकि आज राष्ट्र शिक्षा के विषय में किसी स्पष्ट दिशा से हीन दिखाई देता है।
शिक्षा जैसे अतिशय महत्त्व के विषय के प्रति स्वतंत्र भारत की कितनी उपेक्षा वृत्ति रही है यह इसी बात से प्रकट है कि आज भी हमारी शिक्षा का ढाँचा भूयसा वही है जिसे दासवृत्ति वाले अंग्रेजी पढ़े-लिखे कर्मचारियों को तैयार करने के प्रयोजन से लार्ड मैकाले की सिफारिश पर अंग्रेजों ने खड़ा किया था। उसमें थोड़ा सा परिवर्तन इस रूप में हुआ है कि आर्थिक विकास के लिए अपरिहार्य प्रतीत होने वाले कतिपय विषयों का प्रशिक्षण देने वाले इंजीनियरिंग कॉलेज, आई.आई.टी., मेडिकल कॉलेज, कृषि कॉलेज, बिजनेस मैनेजमेंट संस्थान जैसी शिक्षा संस्थाओं की वृद्धि हो गई है। स्पष्टतया इन संस्थाओं का उद्देश्य शिक्षार्थियों को केवल तत्तद् विषयों का ज्ञान कराना है। निचले स्तर पर अर्थात् स्कूल के स्तर पर पाठ्यक्रम और शिक्षा व्यवस्था, सामान्य रूप से इन्हीं विशिष्ट विषयों की शिक्षा देने वाली संस्थाओं के लिए पृष्ठभूमि तैयार करने की दृष्टि से नियोजित होते हैं। जो गिने-चुने छात्र स्कूल की शिक्षा पूरी करके इनमें प्रवेश पा लेते हैं उनके लिए लक्ष्मी मंदिर के द्वार खुल जाते हैं, लेकिन जो इनमें प्रवेश से वंचित रह जाते हैं वे खण्डित मनोरथ की कसक हृदय में लिए जीवनभर इधर-उधर भटकते रहते हैं। यह अत्यन्त स्पष्ट है कि शिक्षा की इस व्यवस्था में न तो छात्रों के चरित्र निर्माण का कोई संकल्प है और न ही उसे दैनन्दिन जीवन से जोड़ने और उसे जीवन की चुनौतियों से जूझने के लिए उसे तैयार करने का प्रयत्न। परिणामस्वरूप हमारा कोई-कोई शिक्षित व्यक्ति अपने विशिष्ट विषय का प्रकाण्ड पंडित तो हो सकता है, लेकिन इस बात को कोई भरोसा नहीं कि वह अच्छा मनुष्य या अच्छा नागरिक भी होगा।
स्पष्टतया हमारी शिक्षा व्यवस्था का पूरी तरह व्यवसायीकरण हुआ है। इसका जीवन निर्माण एवं संस्कार से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। इसका एकमात्र उद्देश्य धन एवं अधिक से अधिक धन का उपार्जन भर रह गया है। और लक्ष्मी की एकाकी उपासना, कभी भी, किसी के लिए श्रेयस्कर सिद्ध नहीं हुई है। भारतीय परम्परा में अर्थ एवं काम प्रधान भोगवादी संस्कृति को कभी मानव के लिए कल्याणकारी नहीं माना गया है। जबकि औद्योगीकरण एवं वैज्ञानिक प्रगति से उपजी संस्कृति में इन्हीं तत्त्वों की प्रधानता रही है। इनसे उपजी अद्भुत उपलब्धियाँ एवं भौतिकवादी चकाचौंध आम मानव के लिए दुर्निवार आकर्षण वाली सिद्ध हुई, क्योंकि एक ओर इसने मनुष्य की शक्ति को इतना बढ़ा दिया कि वह यथार्थ ही प्रकृति का स्वामी प्रतीत होने लगा और दूसरी ओर संख्यातीत योग्य वस्तुओं का विपुल उत्पादन कर सामान्यातीत सामान्य व्यक्ति के भी जीवन को पहले की तुलना में अधिक सुविधा सम्पन्न बना दिया।
विविध वस्तुओं का संख्यातीत उत्पादन कर उद्योगों ने यथार्थ में ही मनुष्य के सुख की वृद्धि की है, यह भी शंकनीय है। भोगों में ही सुख की खोज करने वालों राजा ययाति की कथा और गीता के निर्भ्रान्त वचन (2/70)बताते हैं कि कामकामी को कभी सुख-शान्ति नहीं मिल सकती। मनुष्य के लिए कौन सी और कितनी सामग्री आवश्यकता पूर्ति का साधन है अथवा विलास का यह विवेक बनाये रखना ज्ञानी के लिए भी कठिन है, विशेष रूप से तब जब उसको प्राप्त करने के लिए उपेक्षित धनरूप शक्ति स्वायत्त हो। आधुनिक बाजारों और सम्पन्न लोगों के घरों का यदि अवलोकन किया जाये तो यह सरलता से स्पष्ट होगा कि आवश्यक सामग्री की तुलना में विलास सामग्री की ही सर्वत्र बहुलता है। इसी के परिणाम स्वरूप आधुनिक मनुष्य में आडम्बर प्रियता और केवल आसपास के मित्र-परिचितों के साथ अनपेक्षित स्पर्द्धाभाव के कारण नये-नये किन्तु यथार्थ में अनावश्यक पदार्थों को जुटाते रहने की प्रवृत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है।
युक्ति के लिए यदि यह स्वीकार भी कर लिया जाये कि औद्योगिक प्रगति के फलस्वरूप आधुनिक मनुष्य का जीवन भौतिक दृष्टि से अत्यधिक सुखी हो गया है, फिर भी इस तथ्य को नकारना तो बिल्कुल असम्भव है कि उसका आन्तरिक जीवन निपट दारिद्रय से ग्रस्त हो गया है। औद्योगीकरण के बलवत् प्रभाव के कारण यूरोप और अमरीका से दूसरे देशों में फैलने वाली इस नई संस्कृति के स्वभावतः नये मूल्य हैं, नये आदर्श और नये लक्ष्य हैं। सार रूप में इसकी व्याख्या भोग मूलक और व्यक्ति प्रधान संस्कृति के रूप में की जा सकती है। मनुष्य अपने स्वभाव से आज भी एक सामाजिक प्राणी है। लेकिन यह एक विडम्बना है कि व्यक्ति प्रधान यह आधुनिक संस्कृति मनुष्य की त्याग, सहयोग मूलक संघवृत्ति को बढ़ावा देकर उसे एक-दूसरे के साथ भावात्मक रूप से संश्लिष्ट करने वाली परिवार, जाति जैसी सामाजिक संस्थाओं का उन्मूलन कर उद्योग, व्यवसाय, बाजार जैसी आर्थिक संस्थाओं का जाल फैला रही है, जो मनुष्य की संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धामूलक विघटन वृत्ति को बढ़ावा देकर उसमें दूसरे की कीमत पर अपना निजी स्वार्थ सिद्ध करने का कौशल उत्पन्न करके व्यवहार में उसे दूसरों से विश्लिष्ट कर रही है।
इस नई संस्कृति से आक्रान्त भारतीय समाज की आज बड़ी विचित्र दशा है। इसमें एक और सदियों से चले आते हुए पुराने संस्कारों में पली-बढ़ी पुरानी पीढ़ी है, जो यह देखकर हैरान है कि राम, भरत, सीता, सावित्री और सत्यवान जैसे चरित्रों को जन्म देने वाली इस देव भूमि में माता-पिता बोझ, भाई-बहन पैतृक सम्पत्ति को हड़पने वाले षड्यन्त्रकारी, बच्चे अपने जन्मदाताओं के आर्थिक अभ्युदय की बाधा और पति-पत्नी एक दूसरे से छुटकारा पाने के लिए एक-दूसरे के छिकन्वेषणकारी कैसे बन गये? मित्रों की एक-दूसरे के दुःखों को बाँटने वाली अहैतुकी मैत्री कैसे खो गई? केवल कर्त्तव्य भावना से अपने नियोग को पूरा करने की शुचिता कैसे विलुप्त हो गई? परिश्रम और ईमानदारी से कमाई सूखी रोटी का मिठास कैसे नष्ट हो गया? दिन-रात खोज में दौड़ते रहने पर भी भीड़ भरे राज मार्गों और लुभावने पदार्थों से सजे हुए बाजारों में मनुष्य का सुख-चैन कैसे अदृश्य हो गया?
दूसरी ओर नई पीढ़ी यह सोच-सोचकर हैरान है कि पुराने लोगों को इतनी मोटी बात भी समझ में क्यों नहीं आती कि समाज मूलतः व्यक्ति से ही बनता है। इसलिए व्यक्ति के विकास पर ही अन्ततः समाज का विकास निर्भर करता है। पारिवारिक परिवेश व्यक्ति की स्वतंत्रता में व्यर्थ ही रोका-टोकी करके उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रयत्न में अवरोधक क्यों बनता है? क्यों पाप-पुण्य का ताना-बाना बुनकर एक काल्पनिक परलोक का हौवा उसके सामने खड़ा करने की हठीली कोशिश की जाती है कि वह अपने कौशल से अपने अभ्युदय के लिए सोत्साह उद्यम न कर सके? क्यों अपने अधिकारों के प्रति जागरुकता और संघर्षपरता को संकीर्ण स्वार्थपरायणता माना जाता है? क्यों स्त्री-पुरुष के नैसर्गिक आकर्षण को कृत्रिम मर्यादाओं से बाँधने का कुचेष्टा की जाती है? धरती पर साक्षात् स्वर्ग से उतर आने पर भी मन में मिथ्या आशंकाएँ और विभीषिकाएँ पैदा कर, क्यों उसे ऐश्वर्य भोग से विमुख करने का व्यर्थ प्रयास किया जाता है? क्यों उद्यमशीलता और साहसनिष्ठता को अशान्ति कहकर लाँछित किया जाता है?
स्पष्टतया वर्तमान भारतीय समाज की यह दशा मात्र दो पीढ़ियों में प्रायः दिखाई पड़ने वाले अन्तर के कारण नहीं है, वस्तुतः यह दशा भिन्न-भिन्न जीवन मूल्यों पर आधारित दो संस्कृतियों के टकराव के कारण बनी। लगभग छप्पन वर्षों तक ‘अर्थ’ की उपासना कर लेने के बाद और उसके परिणामों से अच्छी तरह से परिचित हो जाने के बाद अब यह निश्चय करने का समय आ गया है कि स्वतंत्र भारत धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप मनुष्य के सर्वांगीण विकास पर बल देने वाली अपनी समन्वयात्मिका प्राचीन संस्कृति को अपनाये या फिर केवल जीवन के भौतिक पक्ष को ही एकान्त सत्य मानने वाली व्यक्तिवादी पाश्चात्य संस्कृति को अंगीकार करे। अपने प्रति राग और पराये के प्रति द्वेष के भाव को त्यागकर केवल आत्म-कल्याण का अनुसंधान करते हुए, हमें अपनी दिशा निश्चित करनी चाहिए। विश्ववंद्य कविकुलगुरु कालिदास ने एक प्रसंग में कहा है, पुरानी होने से ही हर कोई वस्तु अच्छी नहीं हो जाती और न ही नई होने मात्र से ही कोई बुरी। केवल मूढ़ भेड़चाल को अपनाते हैं, जबकि बुद्धिमान विवेक का आश्रय लेते हुए गुण-दोष की परीक्षा करते हुए स्वयं चुनाव करते हैं। इस संदर्भ में यह भी स्मरणीय है कि जो राष्ट्र केवल अपने समय में वर्तमान में ही जीता है, वह सदा दीन होता है; यथार्थ में समुन्नत वही होता है, जो अपने आपको अतीत की उपलब्धियों तथा भविष्यत् की सम्भावनाओं के साथ जोड़कर रखता है। अपसंस्कृति की माया की एवं आक्रामक चुनौती को शिकस्त देने तथा युग की माँग को पूरा करने हेतु, हमें देव संस्कृति के शाश्वत मूल्यों को पुनः जाग्रत् करना होगा और अपने राष्ट्रीय जीवन में उनको जीवन्त अभिव्यक्ति देनी होगी। इस निमित्त किया गया हमारा अकिंचन सा भी किन्तु ईमानदार प्रयास भारत माता के प्रति सच्ची भावांज्जलि होगी।
ईसा मसीह केपर नाम के नगर में पहुँचे। वे दुष्ट-दुराचारियों के मुहल्ले में ठहरे और वहीं रहना शुरू कर दिया।
नगर के प्रतिष्ठित लोग ईसा के दर्शनों को पहुँचे तो उनने आश्चर्य से पूछा, “भला इतने बड़े शहर में आपको सज्जनों के साथ रहने की जगह न मिली या आपने उनके बीच रहना पसंद नहीं किया?”
हँसते हुए ईसा ने पूछा, “वैद्य मरीजों को देखने जाता है या चंगे लोगों को? ईश्वर का पुत्र पीड़ितों और पतितों की सेवा के लिए आया है। उसका स्थान उन्हीं के बीच तो होगा।”
रामकृष्ण परमहंस के संपर्क से नास्तिक नरेंद्र को ऋषिकल्प स्वामी विवेकानंद बनने का अवसर मिला। परमहंस जी ने उन्हें व्यक्तिगत जीवन न जीकर लोक-कल्याण के लिए जीवन समर्पित करने की प्रेरणा दी और उन्हें सच्चे अर्थों में संत बनाया।
उन दिनों शिक्षित समुदाय विदेशी आक्राँतिओं के संपर्क में आकर नास्तिकतावादी बनाता जा रहा था। विद्यार्थियों पर विशेष रूप से उसका प्रभाव पड़ता था। इन परिस्थितियों में उन्होंने भारतीय धर्म देवसंस्कृति की विशेषता से न केवल देशवासियों को परिचित कराया, वरन् देश-देशाँतरों में परिभ्रमण करके अनेक देशों को प्रभावित किया। उनके झकझोरने से देशी-विदेशी विद्वानों ने, जनसाधारण ने नए सिरे से अध्याय आरंभ किया।
उनकी योजनानुसार देश-देशाँतरों में रामकृष्ण मिशन बने, जिनके द्वारा स्थायी रूप से वहाँ सेवा-साधना और तत्वज्ञान प्रसार का काम होता रहा। वे मात्र उनतालीस वर्ष जिए, पर इतने स्वल्प काल में अपनी लगन और तत्परता के कारण विश्व धर्म-मानव धर्म की इतनी सेवा कर सके, जितनी कि तीन सौ साठ वर्षों में भी संभव नहीं।
(उत्तरार्द्ध)
रतिज रोगों (गुप्त रोग या वेनेरियल डिसिजेज) में ‘गोनोरिया’ अर्थात् पूयमेह या सोजाक की यज्ञ चिकित्सा का वर्णन गत अंक में किया जा चुका है। यहाँ पर सर्वाधिक घातक रोग ‘सिफलिस’ अर्थात् उपदंश का वर्णन किया जा रहा है। आयुर्वेद में इसी को फिरंग, आतशक, उपदंश आदि कहा जाता है। सामान्य बोल-चाल की भाषा में इसे ही ‘गरमी का रोग‘ कहा जाता है। फिरंग रोग को परिभाषित करते हुए भैषज्य रत्नावली नामक प्रमुख आयुर्वेद ग्रंथ में कहा गया है-
फिरडं्गसंज्ञके देशे बाहुल्येनैव यद्भवेत्; तस्मात्फिरड्ंग इत्युक्तों व्याधिर्व्याधिविशारदैः॥
अर्थात् यह रोग गंध से उत्पन्न होने वाला है, अतः इसे गंध रोग भी कहते हैं। यह रोग फिरंग देश (अँगरेज) के मनुष्यों के अंग संसर्ग एवं संक्रमित महिलाओं के साथ प्रसंग करने से उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह एक आगंतुक रोग है और इसमें दोषों का संक्रमण बाद में होता है। फिरंग रोग के भेदों एवं लक्षणों का निरूपण करते हुए कहा गया है कि-
फिरड्ंगस्त्रिविधों ज्ञेयो बाह्यहायन्तरस्तथा। बहिरर्न्तभवष्चापि तेषाँ लिड्ँगनि च ब्रुवे॥
तत्र बाह्यः फिरड्ंगः स्याद्विस्फोटसदृशाल्परुक्। स्फुटितो ब्रणवद्वैद्यैः सुखसाध्योऽपि स स्मृतः॥
सन्धिष्वाहायन्तरः स स्यादामवात इव व्यथाम्। शोथन्च जनयेदेष कष्टसाध्यौ बुधैः स्मृतः॥
अर्थात् यह रोग तीन प्रकार का होता है- (1) बाह्य (2) आभ्यंतर और (3) बहिरंतर्भव अर्थात् बाहर और भीतर, दोनों स्थानों पर होने वाला। इनमें से बाहरी उपदंश विस्फोट के समान होता है, जिसमें पीड़ा कम होती है व्रण के समान फूटता है। यह सहज साध्य होता है। आभ्यंतर फिरंग या उपदंश संधियों में होता है और इसमें आमवात-गठियावात के समान पीड़ा होती है। यह सूजन भी उत्पन्न करता है। इसे कष्टसाध्य माना जाता है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार सिफलिस अर्थात् फिरंग रोग का संक्रमण स्प्रिंग के आकार के स्पाइरोकीट नामक बैक्टीरिया से होता है, जिसे ‘ट्रिपोनिमा पैलिडम’ कहते हैं। सूक्ष्मदर्शी यंत्र से देखने पर ये जीवाणु सर्प के समान टेढ़े-मेढ़े आकार में दिखाई पड़ते हैं। इनका संक्रमण संक्रमित स्त्री से पुरुष में और पुरुष से स्त्री में, संसर्ग के कारण होता है। इसके अतिरिक्त ट्रिपोनिमा पैलिडम से दूषित व्यक्ति के रक्त या प्लाज्मा का ट्राँसफ्यूजन अर्थात् आधान दूसरे व्यक्ति में करने से भी यह रोग उसे लग जाता है। कभी-कभी रोगी के व्रण आदि के स्राव के संपर्क में आने से भी यह बीमारी हो जाती है। कटी-फटी त्वचा के संपर्क से भी इसके जीवाणु शरीर के अंदर पहुँच जाते हैं। वंश-परंपरा से अर्थात् संक्रमित माता-पिता से यह रोग नवजात शिशु में भी हो जाता है, जिसे ‘कन्जेनाइटिल सिफलिस’ कहते हैं।
यों तो उपर्युक्त कई कारणों से उपदंश के जीवाणु मनुष्य के शरीर में प्रवेश करते हैं, परंतु सबसे ज्यादा यह संक्रमण असंयम एवं अमर्यादित यौन व्यवहार के कारण होता है। चार अवस्थाओं में फैलने वाले इसे रोग के लक्षण संक्रमण के 17 से 28 दिन के अंदर ही हार्डशैंकर या व्रण के रूप में परिलक्षित होने लगते हैं। यह रोग की प्रथम अवस्था होती है। इसके बाद रोग धीरे-धीरे बढ़ता है और तीन माह से लेकर दो वर्ष तक इसकी द्वितीयावस्था रहती है। इसमें रोगी के शरीर पर छोटे-छोटे दाने निकलने लगते हैं एवं त्वचा पर जहाँ-तहाँ खराश या तांबे के रंग के चकत्ते-से उभरने लगते हैं। इसके बाद से लेकर बीस से तीस वर्षों तक तृतीयावस्था होती है, जिसमें शरीर के विभिन्न भागों में कष्टदायी गाँठें निकल आती हैं, जिनसे लसलसा स्राव निकलता रहता है। समय पर चिकित्सा-उपचार न कराने से यह रोग अपनी चतुर्थ अवस्था में पहुँच जाता है। इस अवस्था में रोगकारक बैक्टीरिया शरीर के अंदरूनी हिस्से, यथा- अस्थि संस्थान, तंत्रिकातंत्र, मस्तिष्क आदि में प्रवेश कर जाते हैं और अनेकानेक विकृतियाँ पैदा करते हैं। यह सर्वाधिक कष्टदायी अवस्था होती है, जो रोगी को मृत्यु के मुख में धकेल देती है।
स्त्रियों में यह रोग संक्रमित माता से गर्भस्थ शिशु में पहुँच जाता है। ऐसी स्थिति में शिशु की गर्भ में ही मृत्यु हो सकती है और यदि वह जन्म भी लेता है तो कन्जेनाइटिल सिफलिस से ग्रस्त होता है। जैसे-जैसे रोग पुराना होता जाता है, रोगी की त्वचा पर अनेक प्रकार की विकृतियाँ उभरने लगती हैं। तब शरीर का ऐसा एक भी अंग-अवयव या तंत्र नहीं बचता जो विकारग्रस्त दृष्टिगोचर न होता हो। मूत्र-जनन संस्थान से आरंभ होकर यह रोग हृदय एवं रक्तवाही संस्थान से लेकर सुषुम्ना एवं मस्तिष्क सहित समूचे तंत्रिकातंत्र एवं हड्डियों के जोड़ तक को प्रभावित करता है। इसके कारण हृदय संबंधी अनेक बीमारियाँ, न्यूरोसिफलिस जैसे जटिल मस्तिष्कीय रोग, गठिया, पक्षाघात जैसी अनेक व्याधियाँ उत्पन्न होकर रोगी के लिए प्राणघातक बन जाती हैं।
सुश्रुत संहिता के अनुसार उपदंश पाँच प्रकार का होता है- वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज एवं रक्तज। इस संबंध में उल्लेख है- स पंचविधस्त्रिभिर्दोषैः पृथक् समस्तैरसृजा चैकः॥
अर्थात् यह रोग तीन अलग-अलग दोषों अर्थात् वात, पित्त और कफ से तीन प्रकार का दोष मिलने पर त्रिदोषज और पाँचवाँ भेद रक्तविकार से होता है। इससे उत्पन्न विकारों का वर्णन करते हुए सुश्रुत कहते हैं-
“उपदंश रोग पुराना हो जाने पर कृशता-दुर्बलता, बलक्षय, नाक का बैठना- नासाभंग, अग्निमंदता, हड्डियों में सूजन एवं हड्डियों का टेढ़ा होना आदि लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं।”
कभी इस रोग की भयावहता सर्वविदित थी, परंतु आधुनिक चिकित्सा ने पेनिसिलीन, पाम पेनिसिलीन एरिथ्रोमाइसिन तथा और तीव्र स्तर की एण्टीबायोटिक औषधियों के अनुसंधान के साथ ही इस पर काबू पा लिया है। यह रोग अब लाइलाज नहीं रहा फिर भी इन दवाओं के दुष्प्रभाव अत्यधिक हैं। वे जीवनीशक्ति को निचोड़ लेती हैं। इतने पर भी पिछले कुछ वर्षों से बढ़ती यौन स्वच्छंदता के कारण ‘एड्स’ के साथ-साथ उपदंश का संक्रमण भी तीव्रता से फैलने लगा है। लोक लज्जा एवं संकोच के कारण कितने ही लोग नीम-हकीमों के चक्कर में फँसकर अपना पैसा और स्वास्थ्य, दोनों ही गँवा बैठते हैं। ऐसी स्थिति में उनके लिए आशा की किरण एकमात्र आयुर्वेदीय चिकित्सा ही नजर आती है।
आयुर्वेद में उपदंश की रोक-थाम के लिए विष से विष को मारने की युक्ति पर पारद एवं शंखिया प्रभृति तत्त्वों एवं उनके यौगिकों को प्रयुक्त किया जाता है। परंतु इनके सेवनकाल में असावधानी बरतने या औषध-निर्माण में कच्चापन या त्रुटि रहने पर कई बार मुँह पकने से लेकर औषध-विषाक्तता तक के दुष्परिणाम सामने आते हैं। ऐसी स्थिति में यज्ञोपचार-प्रक्रिया का आश्रय लेकर रोग को नियंत्रित किया और उसे समूल नष्ट किया जा सकता है। यज्ञ चिकित्सा से रोग का उन्मूलन तो होता ही है, साथ ही साथ जीवनीशक्ति का अभिवर्द्धन एवं रोग प्रतिरोधी क्षमता का विकास भी होता है। इसमें किसी प्रकार के ‘साइड इफेक्ट्स’ अर्थात् दुष्प्रभाव की आशंका भी नहीं रहती। चिकित्सकीय हवि-ऊर्जा के समीप उपस्थित लोग भी यज्ञीय ऊर्जा की उस जीवनीशक्ति संवर्द्धक प्रक्रिया से अनायास ही लाभान्वित होते रहते हैं। उपदंश रोग में प्रयुक्त होने वाली विशिष्ट हवन सामग्री इस प्रकार है-
(2) सिफलिस (उपदंश) रोग की विशेष हवन सामग्री-
इसमें निम्नलिखित वनौषधियां मिलाई जाती हैं-
(1) पाठा (2) दारुहलदी (3) रसौत (4) चोपचीनी (5) नीम-छाल (6) आक-मूल (7) चित्रक (8) गुलबास (फोर ओ क्लॉक) के पत्ते (9) अपराजिता पंचाँग (10) स्वर्णक्षीरी-मूल (11) शरपुखा (12) सुपारी (13) कत्था या खैर की छाल (14) काले धतूरे की जड़ (15) श्वेत गुड़हल की जड़ (16) चमेली के पत्ते (17) मकोय- पत्ते या पंचाँग (18) शीतल चीनी (कबाव चीनी) (19) अनंतमूल (20) अरणी (अग्निमंथ) (21) कनेर-मूल (22) काँटा चौलाई (23) दूर्बा-मूल (24) मंजीष्ठ (25) चिरायता (26) गिलोय (27) विलायती बबूल (अरिमेद) के पत्ते (28) कटसरैया (29) कड़ुई तोरई के बीज (30) कसौंदी के पत्ते (31) शीशम की छाल (32) लौंग (33) त्रिफला (आँवला, हरड़, बहेड़ा-समभाग) (34) लाल एवं श्वेत चंदन (35) दालचीनी (36) सुरंजन-मीठा (37) खुरासानी अजवायन (38) अजमोद (39) गूगल (40) जायफल (41) जावित्री (42) विजयसार (43) बरगद की जड़ एवं पत्ते (44) अपामार्ग (45) गावजवाँ (46) छिरेंटा (जलजमनी) (47) पर्णबीज (ब्रायोफिलम) (48) भृंगराज (49) इंद्रायण-मूल (50) अकरकरा (51) तालमखाना (52) सौंफ (53) सनाय (54) मुनक्का (55) सारिवा (56) नागरमोथा (57) तुलसी (58) कतीरा (ढाक की गोंद) (59) कालीमिर्च (60) बबूल के फूल।
उपर्युक्त सभी 60 चीजों को बराबर मात्रा में लेकर उनको कूट-पीसकर जौकुट पाउडर बना लिया जाता है। इनमें से जो औषधियाँ तत्काल उपलब्ध न हो सकें तो उन्हें छोड़कर शेष को एकत्र करके उन्हें साफ करके सुखा लेना चाहिए और उनकी हवन सामग्री तैयार करके बिना देरी किए हवन आरंभ कर देना चाहिए। हवन करते समय पहले से तैयार की गई ‘काँमन हवन सामग्री क्रमाँक (1)’ की बराबर मात्रा लेकर ‘उपदंश रोग की विशेष हवन सामग्री क्रमाँक (2)’ में मिला लेते हैं अर्थात् आधी मात्रा में क्रमाँक (1) की व आधी मात्रा क्रमाँक (2) की मिलाकर तब सूर्य गायत्री मंत्र से हवन करते हैं। ‘काँमन हवन सामग्री’ -अगर, तगर, देवदार, लाल चंदन, सफेद चंदन, जायफल, लौंग, गूगल, चिरायता तथा गिलोय को समभाग में मिलाकर बनाई जाती है। चिकित्सकीय हवन सुबह सूर्योदय के समय एवं शाम को सूर्यास्त में दोनों वक्त किया जाए तो अधिक लाभकारी होता है, अन्यथा एक समय तो अवश्य ही करना चाहिए। हवन के लिए पलाश, आम या गूलर की समिधा प्रयुक्त करनी चाहिए। सूर्य गायत्री मंत्र से कम-से-कम चौबीस आहुतियाँ अवश्य डालनी चाहिए। सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार है-
ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विऽहे, दिवाकराय धीमहि, तन्नः सूर्यो प्रचोदयात्।
शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए रोगी को उपर्युक्त विधि से यज्ञोपचार के साथ-साथ क्वाथ का सेवन करना भी आवश्यक है। क्वाथ (काढ़ा) बनाने के लिए ऊपर बताई गई ‘उपदंश रोग की विशेष हवन सामग्री क्रमाँक (2)’ में वर्णित सभी 60 औषधियों को समभाग में लेकर बनाए गए चूर्ण को अधिक कूट-पीसकर जौकुट चूर्ण के रूप में तैयार कर लेते हैं। इस पाउडर की 3 ग्राम मात्रा लेकर स्टील के भगोने में आधा लीटर स्वच्छ जल में रात्रि में भिगो देते हैं और सुबह मंद आँच (सिम बर्नर) पर इसे पकाते हैं। उबलते-उबलते जब काढ़ा चौथाई अंश शेष रह जाता है तो इसे बर्नर पर से उतारकर ठंडा होने पर स्वच्छ कपड़े से छान लेते हैं। तैयार क्वाथ की आधी मात्रा सुबह 9-10 बजे तक एवं शेष आधी मात्रा शाम 4-5 बजे तक पी लेना चाहिए।
सिफलिस या उपदंश गरमी का रोग है। इसे दूर करने के लिए जो औषधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं, अधिकतर वे गरम प्रकृति की होती हैं। अतः जब तक यह चिकित्सा-क्रम चले, तब तक रोगी व्यक्ति को ठंडी चीजें, फ्रिज का पानी, कोल्ड ड्रिंक्स, ठंडे पानी से स्नान आदि से विशेष रूप से परहेज करना चाहिए। इसके अतिरिक्त दिन में सोना, मूत्रवेग रोकना, भारी एवं गरिष्ठ पदार्थ, अन्न या भोजन, स्त्री प्रसंग, अत्यधिक परिश्रम, गुड़, मीठा, लवण, खट्टे एवं अम्लीय पदार्थ जैसे नीबू, अचार, इमली, मद्यपान आदि से सर्वथा बचना चाहिए।
औषधि-सेवनकाल में नमक नहीं खाना चाहिए। यदि नमक के बिना भोजन अच्छा न लगे तो अल्प मात्रा में सेंधा नमक लिया जा सकता है। आहार में गेहूँ, जौ, चने की रोटी, पुराना चावल, हरी शाक-सब्जियाँ, करेला, सहजने की फली, लौकी, कुंदरू, परवल, लौकी, मूँग
आदर्श रहित जीवन बिना पतवार की नाव जैसा है जो कहीं भी और कभी भी डूब सकती है।
दाल, अरहर दाल, अदरक, तिक्त ओर कसैले पदार्थ, घी, गौ दुग्ध, शहद, तिल तैल, गरम पानी, कुएँ का पानी आदि पथ्य हैं।
उपदंश रोग पुराना हो जाने पर अनेकानेक प्रकार की शारीरिक-मानसिक व्याधियों के साथ ही रक्त विकार एवं त्वचा रोग भी उभर आते हैं। ऐसी स्थिति में स्वर्णक्षीरी (सत्यनाशी) रस का प्रयोग बहुत लाभकारी सिद्ध होता है। बिना फूल और फल वाले स्वर्णक्षीरी पौधे का ताजा (पंचाँग का) स्वरस निकाल लेते हैं। इसमें से 3 मि ली स्वरस को 3 मि ली शहद में अच्छी तरह मिलाकर नित्य प्रातः खाली पेट रोगी को पिलाते हैं। तीन-चार दिन में ही रोगी को आराम लगने लगता है। इसका स्वरस अकेले पीने से वमन और विरेचन दोनों होने लगते हैं, अतः शहद के साथ ही रस पीना चाहिए। इससे यह समस्या नहीं रहती।
यज्ञ चिकित्सा के साथ-ही-साथ उपर्युक्त क्वाथ सेवन एवं स्वर्णक्षीरी रस का सेवन उपदंश रोग को समूल नष्ट कर देता है। रोग की चतुर्थ अवस्था तक पहुँचे हुए रोगी भी इस उपचार से स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त कर सकते हैं और आनंदमय जीवन बिता सकते हैं।
शिष्य संजीवनी के प्रत्येक नए सूत्र के साथ यात्रा रहस्यमय होती जाती है। शिष्यत्व निखरता चला जाता है। शिष्य की अन्तर्चेतना का चुम्बकत्व इतना सघन हो जाता है कि उस पर स्वतः ही गुरुकृपा बरसती चली जाती है। गुरुदेव की शक्तियाँ उसमें आप ही समाती चली जाती हैं। कई बार साधकों के मन में जिज्ञासा अंकुरित होती है कि गुरुदेव की कृपा पाने के लिए क्या करें? उनका दिव्य प्रेम हमें किस तरह मिलें? किस भाँति परम पूज्य गुरुदेव की दिव्य शक्तियों के अनुदान से हम अनुग्रहीत हों? इन सारे सवालों का एक ही जवाब है- शिष्यत्व विकसित करें। शिष्य संजीवनी में प्रतिमास बताए जाने वाले सूत्र ही वह विधि है जिसके द्वारा सहज ही साधक में शिष्यत्व का विकास होता है। उसमें अपने सद्गुरु की कृपा शक्ति को ग्रहण-धारण करने की पात्रता पनपती है।
इसमें बताया जा रहा प्रत्येक सूत्र अनुभव सम्मत है। जिसके वचन है, उसने इन सूत्रों के प्रत्येक अक्षर में समाए सच को अनुभव किया है। इसकी प्रक्रिया एवं परम्परा अभी भी गतिमान है। इस सत्य का अनुभव आप आज और अभी कर सकते हैं। जो शिष्य संजीवनी के सूत्रों को आत्मसात करने की कोशिश कर रहे हैं- वे जानते हैं कि प्रतिदिन उनके पाँव अध्यात्म के रहस्यमय लोक की ओर बढ़ रहे हैं। हर नया सूत्र उन्हें नयी गति-नयी ऊर्जा एवं नया प्रकाश दे रहा है।
इस बार के पाँचवे सूत्र में भी सत्य का यही उजाला है। शिष्य संजीवनी का वही गुणकारी रूप है। इसमें कहा गया है- जो तुम्हारे भीतर है, केवल उसी की इच्छा करो। क्योंकि तुम्हारे भीतर समस्त संसार का प्रकाश है। इसी प्रकाश से तुम्हारा साधना पथ प्रकाशित होगा। यदि तुम इसे अपने भीतर नहीं देख सकते, तो कहीं और उसे ढूंढ़ना बेकार है। जो तुमसे परे है, केवल उसी की इच्छा करो। वह तुमसे परे है, इसलिए जब तुम उसे प्राप्त कर लेते हो, तो तुम्हारा अहंकार नष्ट चुका होता है। जो अप्राप्य है, केवल उसी की इच्छा करो। वह अप्राप्य है, क्योंकि पास पहुँचने पर वह बराबर दूर हटता जाता है। तुम प्रकाश में प्रवेश करोगे, किन्तु तुम ज्योति को कभी भी छू न सकोगे।
शिष्य संजीवनी का यह सूत्र बड़ा अटपटा सा है, किन्तु इसमें बड़े ही रहस्यमय सच समाए हैं। और सच कहो तो अध्यात्म सदा से रहस्य ही है। रहस्य का मतलब ही होता है कि जिसे खोजने तो हम निकल सकते हैं, परन्तु जिस दिन हम उसे खोज लेंगे उस दिन हमारा कोई पता ही न होगा। अध्यात्म के अलावा जितनी दूसरी खोजें हैं, वे तथ्य परक हैं। तथ्य और रहस्य में एक भारी फर्क है। और वह भारी फर्क यह है कि तथ्य चाहे जिस किसी चीज से सम्बन्धित हो, सदा ही बुद्धि से नीचे रहता है, लेकिन रहस्य हमेशा ही बुद्धि से ऊपर रहता है। तथ्य की गहराई को जब बुद्धि खोजने जाती है, तो स्वयं खो जाती है। तथ्यों को हम अपनी मुट्ठी में रखने में समर्थ होते हैं, पर रहस्य स्वयं हमें ही अपनी मुट्ठी में रख लेता है।
शिष्य संजीवनी का यह पाँचवा सूत्र कुछ ऐसा ही है। सूत्रकार इस मानवीय स्वभाव से परिचित है कि मनुष्य इच्छा किए बिना रह नहीं सकता। हर पल एक नयी इच्छा-नयी चाहत मन में अंकुरित होती रहती है। इच्छाओं की यह बेतरतीब बाढ़ हमारा सारा जीवन रस चूस लेती है। सूत्रकार कहते हैं कि इसका उलटा भी सम्भव है। यानि कि यदि इच्छा के स्वरूप को बदल दिया जाय, तो इच्छा का यह नया रूप हमारे जीवन रस को चूसने या सोखने की बजाय बढ़ाने वाला सिद्ध हो सकता है। इसके लिए करना इतना भर होगा- कि जो तुम्हारे भीतर है, केवल उसी की इच्छा करो। जबकि हम करते इसके ठीक उल्टा हैं। उसे चाहते हैं- उसे पाने की कोशिश करते हैं, जो बाहर है। ये बाहर की इच्छाएँ किसी भी तरह यदि पूरी हो भी जाती हैं, तो भी परेशानियाँ और अंधेरा ही बढ़ता है।
परन्तु जो भीतर है, उसकी चाहत रखने से प्रकाश बढ़ता है। इसी प्रकाश से साधना का पथ प्रकाशित होता है। भीतर की यह खोज ही जीवन में सार्थकता देती है। इच्छा के सम्बन्ध में सूत्रकार एक दूसरा बिन्दु उठाते हैं- कि जो तुमसे परे हैं, केवल उसकी इच्छा करो। जबकि साधारण तौर पर उसकी इच्छा करते हैं, जिसे हम पा सकते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि आप कभी भी अपने आप से बड़े न हो सकेंगे। लेकिन यदि चाहत कुछ अपने से परे होने की हो, तो यह आपको अपने से भी बड़ा बना देगी। इस इच्छा में विकास है, गति है। इसको पाने की चाहत हमें अपने आप से बड़ा बनाती है। और ध्यान रहे कि आप अपने से बड़े, हम अपने से बड़े तभी हो सकते हैं, जब हम और आप पूरी तरह मिट जाएँ। बाबा कबीर कहते हैं- हेरत-हेरत हे सखी, रह्य कबीर हेराय। यानि कि खोजते-खोजते, चाहत करते-करते कबीर नहीं रहा। और जब कबीर मिट गया- तभी हुआ मिलन। तभी पूरी हुई चाहत।
इच्छा के सम्बन्ध में अगला बिन्दु है कि जो अप्राप्य है केवल उसी की इच्छा करो। आध्यात्मिक जीवन तो परम साहस की माँग करता है। अरे क्या करना ऐसी इच्छा का, जो सहज ही पूरी हो सकती है। जो सहज प्राप्य है, वह इच्छा तो बेकार है, उसकी कोई कीमत नहीं। अप्राप्य वह है जिसे हम और आप कभी भी अपनी मुट्ठी में बाँध नहीं सकते। इस अर्थ में भी वह अप्राप्य है। क्योंकि ज्यों-ज्यों तुम पास पहुँचोगे त्यों-त्यों वह दूर हटता जाएगा। प्रकाश के पास पहुँच कर भी ज्योति दूर रह जाती है। ज्योति से मिलन तो ज्योति बनकर ही होता है। ज्योति में समाकर ज्योति से एकाकार होकर ही ज्योति से मिला जा सकता है।
इस सूत्र के सार को यदि समझे- तो बात इतनी भर है कि साहसपूर्ण इच्छा तो अपने सद्गुरु में समाने की है। गुरुचेतना में विलय ही शिष्य की पहचान है। इसी में शिष्यत्व का खरापन है। सद्गुरु ही प्रकाश स्रोत के रूप में हमारे अन्तःकरण में है। वही परमचेतना के रूप में हमसे परे है। और वही अभी अप्राप्य है। उनकी परम ज्योति को स्वयं को मिटाकर ही छुआ जा सकता है। उनमें समाकर ही जीवन पूर्ण होता है। बार-बार हजार बार बल्कि लाखों बार यह बात दुहराई जा सकती है कि जो शिष्य है, जिन्हें शिष्यत्व प्राप्त हुआ है- उनकी केवल देह बची रह जाती है, बाकी तो उनमें चेतना सद्गुरु की रहती है। गुरुदेव ही शिष्य की देह को आधार बना कर अपनी लीला करते रहते हैं पर ऐसा होता तभी है, जब उपरोक्त सूत्र का सही-सही अनुपालन हो। सूत्रों एवं व्याख्या का क्रम अभी आगे भी है- जिसे साधक अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में पढ़ेंगे।
आक्रमणकारी जर्मनों के विरुद्ध चैक लोग अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए कट-कटकर लड़ रहे थे, तो भी जर्मन की सेना और साधन अधिक होने से उनमें उदासी छाने लगी।
चैक जनरल हैटमैन लड़ाई में बुरी तरह घायल हुआ। मरने से पूर्व उन्होंने अपने साथियों से कहा, “मरने के बाद मेरी चमड़ी उखाड़ ली जाए और उसका ढोल मढ़कर सारी चैक सेना में यह मुनादी कराई जाए कि कोई हिम्मत न हारे, अंततः जीत चैक सेना की ही होगी।”
वैसा ही किया गया। उस ढोल की आवाज सुनकर सेना में दूना उत्साह उपजा और वे इतनी बहादुरी से लड़े कि जर्मनों के पैर उखड़ गए और जीत चैक सेना की ही हुई।
श्रावस्ती में अंगुलिमाल में आत्मसमर्पण किया। संचित समस्त संपदा को धर्मचक्र प्रवर्तक के लिए समर्पित करके प्रायश्चित की किस्त पहले ही चुका दी थी। दूसरी किस्त के रूप में अपना जीवन प्रव्रज्या के लिए समर्पित करना था। परिशोधन के लिए तप-साधना में प्रवेश पाने का आज संस्कार समारोह था।
इस अवसर पर विशेष उत्सव का आयोजन हुआ। साथ ही कई चर्चाएँ चलती रहीं। एक प्रश्न उठा-इतने बड़े पापी को इतनी जल्दी किस कारण मूर्द्धन्य वर्ग में प्रवेश दिया गया? उसकी साधना आरंभ से ही क्यों न चलाई गई? चर्चा तथागत के कानों तक पहुँची। शिष्यों का समाधान करते हुए वे बोले-संकल्पपूर्ति के लिए दृढ़ता अपनाए रहने की साधना का पूर्वार्द्ध अंगुलिमाल पहले ही पूरा कर चुका था। देवता पर प्रतिदिन पाँच उँगलियाँ काटकर न चढ़ा सकने की प्रतिज्ञा टूटते देखकर उसने एक दिन अपने बाएँ हाथ की पाँच उँगलियाँ काटकर चढ़ाई थीं। क्या यह घटना आप सबको मालूम नहीं?
संकल्प पूर्ण करने के साहसी प्रकाराँतर से अध्यात्म का पूर्वार्द्ध कर चुके होते हैं। अंगुलिमाल की इसी विशेषता से उसे मूर्द्धन्य वर्ग में लिया गया है।
अन्तर्यात्रा का विज्ञान अन्तर्यात्रा के पथिकों के लिए प्रकाश का स्रोत है। इसके पथ प्रदर्शन में अनगिनत योग साधक अपने साधना मार्ग में नित्य प्रति प्रगति कर रहे हैं। इनमें से कुछ भावप्रवण साधक ऐसे भी हैं, जो महर्षि पतञ्जलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव का सूक्ष्म सहचर्य भी अनुभव कर रहे हैं। सच में श्रद्धा सेतु है। हृदय में श्रद्धा प्रगाढ़ हो तो देश एवं काल की दूरियाँ भी सिमट जाती हैं। लोक-लोकान्तर के सत्य पलक झपकते ही भाव चक्षुओं के सामने आ विराजते हैं। दिव्य लोकों में तपोलीन ऋषि सत्तायें भी हृदयाकाश में प्रत्यक्ष होकर मार्गदर्शन देती हैं। यह उद्गार मात्र एक काल्पनिक विचार भर नहीं, एक जीवन्त अनुभूति है। जो इन क्षणों में भी किसी को हो रही है। यह एक ऐसा प्रखर स्वर है, जिसमें अनगिनत साधकों के समवेत स्वर समाये हैं।
जो साधनारत हैं उन सभी का यही कहना और मानना है कि अन्तर्यात्रा के विज्ञान की प्रत्येक कड़ी जीवन साधना में एक नया अनुभव बनकर प्रकट होती है। अनुभूतियों एवं साक्षात्कार के नये झरोखे अन्तर्चेतना में खुलते हैं। पिछली कड़ी में असम्प्रज्ञात समाधि पर चिंतन किया गया है। महर्षि के अनुसार यह सम्प्रज्ञात समाधि का अगला कदम है। सम्प्रज्ञात समाधि में जहाँ चेतन मन अपनी शुद्धतम भावदशा में होता है। वहीं असम्प्रज्ञात समाधि में इसका सहज विलय हो जाता है। यानि कि असम्प्रज्ञात समाधि में सारी मानसिक क्रिया की समाप्ति होती है और मन केवल अप्रकट संस्कारों को धारण किये रहता है। यह असम्प्रज्ञात समाधि किसे उपलब्ध होती है? इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए महर्षि कहते हैं-
भवप्रत्ययो विदेह प्रकृति लयानाम् ॥ 1/19॥
शब्दार्थ - विदेह प्रकृति लयानाम् = विदेह एवं प्रकृतिलय योगियों का (उपर्युक्त योग); भवप्रत्ययः = भव प्रत्यय (जन्म होने से ही सहज प्राप्त) कहलाता है।
अर्थात् - विदेहियों और प्रकृतिलयों को असम्प्रज्ञात समाधि सहज ही उपलब्ध होती है। क्योंकि अपने पिछले जन्म में उन्होंने अपने शरीरों के साथ तादात्म्य बनाना समाप्त कर दिया था। वे फिर से जन्म लेते हैं क्योंकि इच्छा के बीज बने रहते हैं।
विदेह एवं प्रकृतिलय बड़े ही सौंदर्यपूर्ण शब्द हैं। इनमें आध्यात्मिक भावों का अवर्णनीय सौंदर्य समाया है। इनमें से विदेह का अर्थ है-जो जान लेता है कि अब वह देह नहीं है। यह अनूठी स्थिति उसे असम्प्रज्ञात समाधि के बाद ही उपलब्ध होती है। असम्प्रज्ञात समाधि की विभूतियाँ तो उसे पिछले जन्म में ही प्राप्त हो चुकी। इस जन्म में तो वह प्रारम्भ से ही असम्प्रज्ञात का वैभव धारण किये हुए जन्मता है। उसे जीवन की शुरुआत से ही इस सत्य का सम्पूर्ण बोध होता है कि वह देह नहीं है। देह तो उसने सिर्फ इसलिए धारण की है कि पिछले कर्मों का हिसाब-किताब बराबर करना है। पिछले कर्म बीजों को नष्ट करना है। कर्मों का सारा खाता बराबर करना है। ऐसे विदेह योगियों का जन्म तो बस समाप्त हो रहे हिसाबों से बना होता है। हजारों जन्म, अनगिन सम्बन्ध, बहुत सारे उलझाव और वादे, हर चीज को समाप्त करना है।
प्रकृतिलय की अवस्था और भी उत्कृष्ट है। प्रकृतिलय योगी का देह से नाता टूटने के साथ प्रकृति के साथ भी तादात्म्य नहीं रहता। ऐसे योग साधकों के लिए न तो देह का कुछ महत्त्व और न ही संसार का। इनके लिए न कोई अभिव्यक्ति और न ही संसार है। ऐसे योगी बस एक बार जन्म लेते हैं। उनके इस जन्म का कारण बस इतना होता है कि उन्हें अपने वचन पूरे करने हैं, बहुत सारे कर्म गिरा देने हैं। सारा पिछला बेबाक करना है। वे तो बस देते हैं, चुकाते हैं-माँगते नहीं-चुकाते हैं। प्रकृतिलय योगियों की कोई भी चाहत नहीं होती। उन्हें भला चाहत कैसे हो सकती है, वे तो बस अपने दिये हुए वचनों को निभाने आते हैं। अपने किन्हीं कर्म बीजों को नष्ट करने के लिए देह धारण करते हैं।
परम पू. गुरुदेव ऐसे महान् योगियों में महर्षि रमण का नाम लेते हैं। गुरुदेव के अनुसार महर्षि को बचपन से ही प्रकृतिलय अवस्था प्राप्त हुई। देह से उनका तादात्म्य तो जैसे था ही नहीं। किशोरावस्था के लगभग जब उन्हें मृत्यु का अनुभव हुआ, तब तो उनकी दशा नितान्त भिन्न हो गयी। ऐसी भावदशा उन्हें उपलब्ध हुई कि न तो दैहिक तादात्म्य रहा और न ही प्रकृति तथा संसार का कोई नाता बचा। सत्तरह वर्ष की अवस्था में ही वह तिरुवलामल्लाई तप लिए के आ गये। उनके तप का प्रारम्भ इस जिज्ञासा से हुआ कि मैं कौन हूँ? क्यों देह नहीं हूँ, प्रकृति भी नहीं हूँ, यह सत्य उन्हें सदा से प्रत्यक्ष था। अब तो बस यात्रा को आगे बढ़ाना था। सो उन्होंने प्रयत्नपूर्वक यात्रा आगे बढ़ाई। सहज ही आत्मबोध हुआ, साथ ही कर्मबीज भी समयानुसार नष्ट होते गये। महर्षि रमण के तप के प्रभाव से समूचा देश भी प्रभावित एवं प्रकाशित हुआ।
विदेह एवं प्रकृतिलय अवस्था प्राप्त महायोगियों का जीवन कई अर्थों में विलक्षण व अद्भुत होता है। इस सम्बन्ध में भगवान् बुद्ध के जीवन की एक घटना बड़ी ही भाव भरी है। निर्वाण के अनुभव के बाद भी भगवान् तथागत मौन थे। मगध सम्राट के साथ अन्य कई राज्यों के नरेश उनसे प्रार्थना कर चुके थे कि वे कुछ बोलने की कृपा करें। निर्वाण के परम अनुभव के बारे में बतायें। परन्तु भगवान् हर बार यह कहकर टाल जाते कि अभी ठीक समय नहीं आया। एक दिन अचानक तथागत ने घोषणा की कि वह पंचशाल गाँव में अपना पहला प्रवचन करेंगे। सम्राटों के आग्रह को अस्वीकार कर एक सामान्य गाँव में प्रवचन। और इस गाँव में वैसे भी कुछ ही झोपड़ियाँ थी। तथागत की घोषणा से गाँव के लोग तो जैसे उद्वेलित हो गये।
हर्ष एवं आश्चर्य से उद्वेलित-उत्तेजित गाँव के लोगों के बीच भगवान् बुद्ध प्रवचन हेतु पहुँच गये। सभी तैयारियाँ जैसे-तैसे पूरी की गयी। परन्तु भगवान् को जैसे अभी भी किसी की प्रतीक्षा थी। तभी एक हरिजन युवती आयी और बुद्ध ने प्रवचन प्रारम्भ किया। प्रवचन की समाप्ति के बाद लोग पूछने लगे-क्या आप इसी युवती का इन्तजार कर रहे थे, बुद्ध मुस्कराये और बोले-हाँ मुझे इसी की प्रतीक्षा थी। मैंने इसे पिछले जन्मों की यात्रा में वचन दिया था कि महाबोधि का प्रथम अनुभव मैं सर्वप्रथम इसे बताऊँगा। बस वह वचन पूरा करना था। सो आज पूरा हुआ। ‘असम्प्रज्ञात को उपलब्ध’ व्यक्ति इसी भावदशा में जीता है, यह भावदशा जन्मान्तर की साधना के अलावा प्रयत्नपूर्वक भी इस जीवन में पायी जा सकती है। इसी की व्याख्या में महर्षि पतञ्जलि का अगला सूत्र है। जिसकी चर्चा सभी योग साधक ‘अखण्ड ज्योति’ के अगले अंक में पढ़ेंगे।
उन दिनों कटक में जोरों को हैजा फैला था। उसका प्रकोप मुसलमानों की गरीब बस्ती डडिया बाजार में था। व्यक्ति कीड़े-मकोड़ों की भाँति मर रहे थे। सुभाषचंद्र बोस की अध्यक्षता में एक सेवादल संगठित हुआ। लोग बीमारों के पास जाते, उन्हें दवाइयाँ, पथ्य देकर अन्य सदस्यों को बीमारी से सुरक्षा के नियम बताकर उन्हें ढाढ़स बँधाते थे। हैदर खाँ बेहद गुँडा प्रकृति का था, उसी मुहल्ले में रहता था। उसने दल के सदस्यों को धमकाया तथा मुहल्ले में इस बात का प्रचार किया कि यह सेवादल बाबू पाँडे के व्यक्तियों का है, क्योंकि उस मुहल्ले में वकील रहते हैं। वकीलों के कारण मुझे जेल काटनी पड़ी। इसलिए ये सब मेरे शत्रु हैं।
एक दिन हैदर के बड़े लड़के को रोग ने अपने पंजों में दबोच लिया। हैदर को कोई भी डॉक्टर उपलब्ध न हो सका, क्योंकि सभी डॉक्टर रोगियों की सेवा में व्यस्त थे।
संध्या समय जब हैदर निराश होकर अपने मकान पर गया तो उसने देखा कि सेवादल के व्यक्ति उसके लड़के की सेवा-सुश्रूषा करने तथा दवा देने में व्यस्त हैं। उसने सेवादल के नवयुवकों से कहा, आप मेरे घर क्यों आए? स्वयंसेवकों ने कहा, यह हमारा भाई है, यदि हम न आते तो यह दुनिया से कूच कर जाता। हमारी शत्रुता आपसे हो सकती है, इस बेगुनाह लड़के की जिंदगी से नहीं।
हैदर का सारा कलुष इन शब्दों से घुलकर आँखों में आ गया। उसने युवक से रो-रोकर कहा, मेरे बच्चे मुझे क्षमा करो।
गुरुगीता के प्रत्येक महामंत्र में अपरिमित आध्यात्मिक ऊर्जा समायी है। वे धन्य हैं, अति बड़भागी हैं, जो इनका गायन करते हैं। जिनका मन इन महामंत्रों की साधना करने में अनुरक्त हुआ है। क्योंकि ऐसे अपूर्व साधकों को सहज ही सद्गुरु प्रेम की उपलब्धि होगी। और यह सद्गुरु प्रेम अध्यात्म जगत् का परम दुर्लभ तत्त्व है। जिसके हृदय में निष्कपट सद्गुरु प्रेम है, उसे सब कुछ अपने आप ही सुलभ हो जाता है। उसे किसी भी अन्य साधन एवं साधना की जरूरत नहीं रहती। समस्त साधनाओं के सुफल स्वयं ही उसकी अन्तर्चेतना में आ विराजते हैं। सद्गुरु ही आध्यात्मिक जीवन का सार निष्कर्ष है। सही साधना है, वही परम सिद्धि है और उन्हीं की कृपा से उनके ही मार्गदर्शन में साधकगण अपनी साधना को निर्विघ्न पूर्ण कर पाते हैं। तभी तो कहा गया है-’साधना-सिद्धि गुरुवर पद नेहू’।
गुरुनेह की भाव कथा में रमे हुए शिष्यों ने इस गुरु प्रेम कथा को पिछली कड़ी में भगवान् सदाशिव के इन वचनों को पढ़ा था कि गुरुदेव की चरण धूलि का एक छोटा सा कण सेतु बन्ध की भाँति है। जिसके सहारे इस महाभवसागर को सरलता से पार किया जा सकता है। गुरुदेव की उपासना करने में तल्लीन रहना प्रत्येक शिष्य का कर्त्तृत्व है, क्योंकि उनके अनुग्रह से महान् अज्ञान का नाश होता है। गुरुदेव भगवान् सभी तरह की अभीष्ट सिद्धि देने वाले हैं। उन्हें नमन करना शिष्यों का परम धर्म है। इसका थोड़ा सा भी पालन संसार के महाभय से त्राण करने वाला है। सभी तरह की पीड़ायें गुरु कृपा से स्वयं ही शान्त हो जाती हैं।
गुरु प्रेम की इस साधना महिमा के अगले क्रम को प्रकट करते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव जगन्माता भवानी से कहते हैं-
पादाब्जं सर्वसंसार दावानल विनाशकम्। ब्रह्मरन्ध्रे सिताम्भोजमध्यस्थं चन्द्रमण्डले॥ 57॥
अकथादित्रिरेखाब्जे सहस्रदलमण्डले। हंसापार्श्वत्रिकोणे च स्मरेत्तन्मध्यगं गुरुम् ॥ 58॥
गुरुदेव की करुणा की व्याख्या करने वाले इन महामंत्रों में साधना के गहरे रहस्य संजोये हैं। इन रहस्यों को गुरुभक्त साधकों के अन्तःकरण में संप्रेषित करते हुए भगवान् भोले नाथ के वचन हैं- गुरुदेव के चरण कमल संसार के सभी दावानलों का विनाश करने वाले हैं। गुरुभक्त साधकों को उन सद्गुरु का ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिए॥ 57॥ यह ध्यान चन्द्रमण्डल के अन्दर श्वेत कमल के बीच में सहस्रदलमण्डल पर अकथ आदि तीन रेखाओं से बने हंस वर्ण युक्त त्रिकोण में करना चाहिए॥ 58॥
सद्गुरु के ध्यान की यह सर्वोच्च विधि है। यह ध्यान जीवन को शिवस्वरूप प्रदान करने वाला है। अत्यन्त प्रभावशाली एवं परम गोपनीय, अतिदुर्लभ एवं समस्त आध्यात्मिक विभूतियों को प्रकट करने वाला है। ध्यान की इस रहस्यमयी विधि का प्रयोग श्री रामकृष्ण परमहंस देव के शिष्य दुर्गाचरण नाग किया करते थे। श्री श्री रामकृष्ण ने उनकी पात्रता पर विश्वास करके यह विधि प्रदान की थी। जिनकी सन्त साहित्य में रुचि है, उनके लिए दुर्गाचरण नाग का नाम अपरिचित नहीं है। श्री रामकृष्ण के शिष्यों में उन्हें नाग महाशय के नाम से जाना जाता था। गृहस्थ होने के बावजूद उनका जीवन संन्यासियों से भी ज्यादा कठोर एवं तप−परायण था। उनके कठोर तपश्चरण के अनेकों कथानक सन्त साहित्य में पढ़े और जाने जाते हैं।
नाग महाशय का सारा दिन गरीबों एवं दुःखी जनों की चिकित्सा सेवा में बीतता था। चिकित्सक होते हुए भी उनके लिए चिकित्सा कभी भी व्यवसाय नहीं बनी,बल्कि उन्होंने सदा ही उसे सेवा कार्य समझा। अपने इस सेवा कार्य में जिसे वे नारायण सेवा कहा करते थे। कभी-कभी तो घर का सामान और रुपये भी दे आते थे। दिन भर की इस सेवा के बावजूद नाग महाशय की प्रायः सम्पूर्ण रुचि जप-ध्यान में बीतती थी। उनकी साधना इतनी उग्र एवं कठोर थी कि सामान्य निद्रा की उन्हें कोई विशेष जरूरत नहीं रह गयी थी। अमावस के दिन उपवास रखकर गंगा के किनारे जप करते-करते वह भाव समाधि में लीन हो जाते थे। कभी-कभी तो यह समाधि दशा इतनी प्रगाढ़ होती कि नदी का ज्वार उन्हें बहा ले जाता। बाद में इन्हें तैरकर वापस आना पड़ता।
ऐसे महान् साधक नाग महाशय के लिए उनके गुरु श्री रामकृष्ण ही सर्वस्व थे। साधना के उच्च शिखरों पर आरुढ़ नाग महाशय की पात्रता-पवित्रता एवं साधना की कई बार परीक्षाएँ लेकर उन्हें सहस्रदल कमल में ध्यान करने की यह विधि सुझाई थी। ध्यान का यह दुर्लभ प्रयोग बताते समय श्री रामकृष्ण ने अपनी ओर इशारा करते हुए पूछा था-तुम इसे क्या समझते हो? नाग महाशय ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया-यह मुझसे मत कहलाइये ठाकुर। आपकी कृपा से मैं समझ गया हूँ कि आप वही हैं। इस पर परमहंस देव ने कहा-तब ठीक है। तुम सच्चे अधिकारी हो। तुम इसे कर सकते हो। ऐसा कहते हुए श्री ठाकुर को समाधि लग गयी। समाधि की इसी भावदशा में नाग महाशय के वक्षस्थल पर उनके पैर पड़ गये। इस स्पर्श मात्र से नाग महाशय को एक दिव्य अनुभूति हुई, जिसमें उनके अन्तःकरण में सहस्रदल कमल में सद्गुरु के ध्यान का स्वरूप प्रकट हो गया। साथ ही उन्हें सर्वत्र दिव्य ज्योति के दर्शन भी हुए।
इस अनुभूति के बाद उन्होंने श्री श्री ठाकुर द्वारा निर्दिष्ट की गयी ध्यान की विधि का प्रयोग करना शुरू किया। यहाँ पर हम इन पंक्तियों के पाठकों को यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि सहस्रदल कमल में ध्यान की यह विधि सर्वसाधारण के लिए उचित नहीं है। जिसके आज्ञाचक्र एवं अनाहत चक्र का ठीक-ठीक विकास हो चुका होता है, उन्हीं के लिए यह दुर्लभ साधना उचित बतायी गयी है। सहस्रदल कमल पर गुरुगीता के इन महामंत्रों के अनुरूप ध्यान की परमहंस अवस्था को सिद्धों का ध्यान कहा गया है। यही कारण है कि यहाँ उसका सम्पूर्ण रहस्य नहीं बताया जा रहा। नाग महाशय की उच्च अवस्था देखकर ही श्री श्री रामकृष्ण ने उन्हें यह दुर्लभ प्रयोग बताया था।
इस ध्यान प्रयोग से नाग महाशय में असीमित योग ऐश्वर्य प्रकट हुआ। उन्होंने अपने गुरुदेव के साकार और निराकार स्वरूप के दर्शन किये। माँ गंगा स्वयं ही उनके आँगन में प्रकट हुई। अनेक देवदुर्लभ चमत्कार नाग महाशय के जीवन में प्रकट हुए। संक्षेप में इस ध्यान विधि से परम असम्भव भी सम्भव बन पड़ता है। हाँ इसे निर्दिष्ट करने का अधिकार केवल सद्गुरु को है। जिन्हें भी यह विधि गुरुदेव ने बतायी है वे आज आध्यात्मिक जीवन के परम आनन्द में विभोर हैं। गुरुदेव की कृपादृष्टि ऐसी ही सर्वफलदायिनी है। इसकी महिमा का विशद् वर्णन गुरुभक्त साधक अगले अंक में पढ़ सकेंगे।
बेंजामिन फ्रैंकलिन ने अपने मित्र की मेज पर बीस डॉलर की सोने की गिन्नी रखते हुए कहा, आपने बिगड़े समय में मेरी जो सहायता की थी, उसके लिए मैं आभारी हूँ। मैं अपने प्रारंभिक दिनों में एक मुद्रणालय में समाचारपत्र छापने का काम करता था। उस समय अचानक बीमार पड़ जाने के कारण मैं आपसे बीस डॉलर ले गया था। अब उस समाचारपत्र का संपादन और प्रकाशन मेरे ही द्वारा होता है। ग्राहकों की संख्या भी बढ़ गई है। अतः अब इस स्थिति में हूँ कि आपके द्वारा उधार प्राप्त धनराशि आसानी से वापस कर दूँ।
धनी व्यक्ति को अब याद आया कि उसने वास्तव में सहायता की थी, पर उसकी कहीं लिखा-पढ़ी न थी। उसने कहा, हाँ! मुझे ध्यान आया, पर लौटाने की बात तय नहीं हुई थी। आप उस समय परेशानी में थे। आपने कहा तो मैंने आपकी सहायता कर दी। यह तो मानव का सहज धर्म है कि आपत्तिग्रस्त व्यक्ति की यथाशक्ति सहायता करे। इस सिक्के को आप अपने पास ही रखो। कभी कोई व्यक्ति आपके पास आएगा, जिसे धन की वैसी ही आवश्यकता होगी, जैसी एक दिन आपको थी, ऐसी स्थिति में आप उसकी सहायता करना।
यदि वह आपकी तरह ईमानदार होगा तो आर्थिक स्थिति सुधर जाने पर धनराशि वापस करने आएगा। उस समय आप यही कहना कि उस गिन्नी को यह अपने पास रखे, जब कोई जरूरतमंद व्यक्ति आए तो उसकी सहायता हेतु दे दे।
यही हुआ। फ्रैंकलिन वह गिन्नी अपने साथ ले गया और उसने दूसरे व्यक्ति को दे दी। अब तक वे बीस डॉलर अमेरिका में किसी-न-किसी की आवश्यकता को पूर्ण करते घूम रहे हैं। वे जिस किसी के पास जाते हैं, उसका अपना भला तो होता है, दूसरों को भी सौजन्य की अद्भुत प्रेरणा मिलती है।
(गताँक से आगे)
आप ऐसा शोध मत करिए
मित्रो! अगर आप कल को यह कहेंगे कि भगवान बड़े दयालु थे, देवी बड़ी दयालु थीं और हमने अगरबत्ती जला दी, नारियल चढ़ा दिया तो देवी प्रसन्न हो गईं और हमारे पास रुपयों का बंडल लेकर आ गईं। अगर आपका यह ख्याल सही है तो बेटे, हम भी यही करेंगे और लोगों से भी यही कहेंगे कि आपने एक बहुत बड़ा आविष्कार कर लिया। बहुत से लोगों ने भी आविष्कार किए हैं, किसी ने बिजली का आविष्कार किया है, किसी ने रेडियो का आविष्कार किया, किसी ने अमुक का आविष्कार किया। आपको भी मैं आविष्कारक मानूँगा, अगर आप यह साबित करेंगे कि भगवान को धूपबत्ती खिलाकर फुसलाया जा सकता है और फुसलाने के बाद में मनमरजी के काम निकाले जा सकते हैं। अगर आपका यह प्रयोग सफल हो जाए तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी कि आपने एक बड़ा भारी एवं क्राँतिकारी आविष्कार कर लिया।
मित्रो! तब मैं हर आदमी से यही कहूँगा कि आपको अपना व्यक्तित्व विकसित करने की कोई जरूरत नहीं है। किसी आदमी को पुरुषार्थ करने की जरूरत नहीं है। किसी आदमी को जीवन संशोधन करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इन महाशय जी ने नया आविष्कार करके यह दिखा दिया है कि धूपबत्ती से, देवी का पाठ करने से देवी-देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है और मनमरजी की मनोकामना पूरी कराई जा सकती है। फिर मैं सब लोगों से कहूँगा कि आप लोग गलत थे। इतनी मेहनत आपने बेकार कर डाली। आपने जो किताब पढ़ाई, गलत पढ़ाई। आपने पुरुषार्थ बेकार किया। आपको इन महाशय जी का कहना मानना चाहिए था और आपको हनुमान चालीसा पढ़ना चाहिए था, धूपबत्ती जलानी चाहिए थी और अपना उल्लू सीधा कर लेना चाहिए था। फिर मैं आज तक की हर परंपरा को बदल देने के लिए कहूँगा। हर आदमी जो सोचता है, गलत सोचता है और ये महाशय जी सही सोचते हैं। ये नए आविष्कारक हैं। बेटे, मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि आप वास्तविकता के नजदीक आइए। अगर आप वास्तविकता के नजदीक नहीं आएँगे तो बेकार परेशान होंगे और अपना समय खराब करेंगे।
तप रहा है सफलताओं के मूल में
मित्रो! तपश्चर्या का महत्त्व आपको मैं बता चुका हूँ। भौतिक प्रगति की दिशा में आपका बढ़ने का वास्तव में मन हो तो आपको तपस्वी जीवन जीने की तैयारी करनी चाहिए। भगवान बुद्ध ने तपस्या की वजह से सारे-के-सारे विश्व में नई क्राँति की और उसकी काया पलट दी। उस गंदे जमाने को ठीक कर दिया था। वे कौन से आविष्कार थे, जो उन्होंने किए थे? वे थे उनके चीवरधारी भिक्षु, परिव्राजक। परिव्राजक कौन होते हैं- घुमक्कड़? नहीं बेटे! तो लोहे की गाड़ी वाले होते होंगे, जो गाड़ी लिए इस गाँव से उस गाँव घूमते-फिरते हैं? हाँ, ये भी परिव्राजक हैं, पर वो परिव्राजक अलग तरह के थे। भगवान बुद्ध ने सबसे पहला शिक्षण अपने परिव्राजकों को यह दिया था कि आपको तपश्चर्या करनी चाहिए। उनका हर शिष्य पहला शिक्षण तपश्चर्या का लेता था, देवी-देवता का पाठ करने का नहीं। तपश्चर्या का क्या पाठ करते थे वे? उनके हर परिव्राजक पर खान-पान के संबंध में, रहन-सहन के संबंध में, कपड़े पहनने के संबंध में, उपवास करने के संबंध में, सारे-के-सारे इतने कठोर नियम उन पर लागू होते थे कि वे अपने बुद्ध विहारों में तपस्वी जीवन जीने के बाद जब बाहर निकलते थे और जहाँ कहीं भी जाते थे, क्राँति करते हुए चले जाते थे।
हिंदुस्तान से निकलने के बाद में वे परिव्राजक समूची एशिया में छा गए। रेगिस्तानों को पार करते हुए, तिब्बत के पठार और चट्टानों को पार करते हुए वे चीन जा पहुंचे। चीन में भारत से गए कुमारजीव से लेकर अनेक विद्वान ऐसे हुए हैं, जिन्होंने बौद्ध धर्म को दूर-दूर तक फैलाया। अशोक से लेकर हर्षवर्धन तक ने जनता और शासन दोनों को एक बना दिया। बौद्ध धर्म को सबसे अधिक दूर-दूर तक फैलाने में इन्होंने अपनी सारी शक्ति झोंक दी थी। असल में आपको बौद्ध देश देखना हो तो आपको आज से तीस साल पहले के चाइना में जाना होगा। अब तो तीस साल से वहाँ कम्युनिज्म आ गया है, पर तीस साल पहले वहाँ असली बौद्ध थे। चीन हिंदुस्तान से भी बड़ा है। तब वहाँ एक करोड़ आबादी थी। सारे-के-सारा हिस्सा तब बौद्ध धर्म में दीक्षित था। न केवल चाइना, वरन् मंचूरिया, मंगोलिया, जापान, कोरिया आदि सारे देश एवं कंबोडिया से लेकर जावा, सुमात्रा तक, इंडोनेशिया से लेकर मलेशिया तक सारे-के-सारे द्वीप यहाँ से लेकर वहाँ तक पूरे में बौद्ध धर्म फैला हुआ था। न केवल पूरा एशिया, वरन् यूरोप के बहुत सारे हिस्सों व अन्य देशों में बौद्ध धर्म फैला हुआ था। अमेरिका में तो अभी पता नहीं चला है कि कभी वहाँ बौद्ध धर्म था। वहाँ तो मय सहायता का पता चला है, लेकिन इसके अतिरिक्त सारे एशिया एवं विश्व में बौद्ध धर्म छा गया था।
अक्षुण्ण कीर्ति मिलती है तपस्वी को
मित्रो! यह क्या बात थी? यह थी कीर्ति, जो व्यक्तित्व की चमक से पैदा होती है। यह धर्म-प्रचारकों का व्यक्तित्व ही है, जिन्होंने अपनी गरिमा को बढ़ाने के साथ-साथ में अपने धर्म अर्थात् जिस मिशन को लेकर वे चले थे, उसे जादू के तरीके से और तूफान के तरीके से, आग के तरीके से आगे बढ़ाते चले गए। सफलता उनके चरण चूमती चली गई। सफलता उनके ही चरण चूमती है, जो तपश्चर्या के सिद्धाँत पर विश्वास करते हैं। जो तपश्चर्या के सिद्धाँत पर विश्वास नहीं करते, जिनको अपनी जबान पर काबू नहीं है, खाने पर काबू नहीं है, इंद्रियों पर काबू नहीं है, लोभ पर काबू नहीं है, मोह पर काबू नहीं है और ऊपर से कहते हैं कि हमको भगवान के दर्शन करा दीजिए, अमुक सिद्धि दिलवा दीजिए, वे परले सिरे के धूर्त हैं। जो हराम का पाना चाहते हैं, सफलता ऐसे आदमियों से बहुत दूर भागती है।
मित्रो! क्या करना पड़ेगा? हमको अपना जीवन तपस्वी जीवन में ढालने के लिए तैयार करना होगा। यह कठिन चीज है, अतः ज्यादा कीमत चाहिए। यह न तो सस्ती चीज है और न सस्ते में मिल सकती है। इसके परिणाम बड़े मूल्यवान हैं। इसलिए मूल्यवान वस्तुओं का मूल्य चुकाने के लिए तैयार हो जाइए। आपके बचपन से मैं आपको यही सिखाता चला आया हूँ कि ब्रह्मवर्चस् का सिद्धाँत क्या है? ब्रह्मवर्चस् अर्थात् ब्रह्मतेजस् आप प्राप्त करना चाहते हैं तो आप तपस्वी बनिए। तैयारी कीजिए। धीरे-धीरे जैसे-जैसे ब्रह्मवर्चस् आपको बर्दाश्त होता जाएगा, वैसे-वैसे आपको अधिक तपस्वी बनाने के लिए हम प्रयत्न करेंगे। आपको हमने आरंभ से कराया है और आगे भी कराएँगे। क्या कराएँगे? दधीचि की हड्डियों में से जैसे आग निकलती थी, बिजली निकलती थी, वैसे ही आपकी आँखों में से आग, आँखों में से बिजली, आपकी वाणी में से बिजली, आपके चेहरे में से बिजली निकालेंगे। आपको तपा-तपाकर चलता-फिरता बिजलीघर बनाएँगे। तपाने से बन सकती है? हाँ बेटे, बन सकती है। आपको तपस्वी जीवन की शिक्षा दी जाएगी।
‘योगा’ नहीं योग
साथियो! अभी एक और हिस्सा रह गया था, उसको बताना चाहता हैं। उसका नाम है-’योग।’ योग किसे कहते हैं? योग कहते हैं- परमात्मा से जुड़ने को। आज का ‘योगा’ अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग होता है। अगर योगा देखना है तो आप यूरोप में चले जाइए। मैं यूरोप घूमकर आया हूँ। मैंने जगह-जगह योगा देखा। हमने देखा कि वहाँ योगा कैसे होता है। यों मालूम पड़ता है कि वहाँ योगा का कोई ताऊ, भतीजा या चाचा, मामा होगा। योगा तो है नहीं, हाँ, कोई उसका रिश्तेदार होगा। आपको रात को वहाँ का योगा देखना हो तो उनका मेडिटेशन देखिए। यह बीसवीं शताब्दी का चमत्कार है। बीसवीं शताब्दी योगा पर कैसे हावी हो गई है, आप वहाँ जाकर देखिए कि शराब पिए धुत पड़े हुए लोग क्या कर रहे हैं? मेडिटेशन कर रहे हैं। भला मेडिटेशन ऐसा होता है कि आप नशा कीजिए, एकाँत में रहिए, हिप्पी बनकर इकट्ठे होते चले जाइए और दुनिया भर की सब बदमाशी कीजिए और योगा करते चलिए। किसी जमाने में हमने बाजीगरों का खेल देखा था, जादूगरों का खेल भी देखा था, लेकिन इस जमाने में पढ़े-लिखे लोगों में नए किस्म की जादूगरी चालू हो गई है और इसका नाम हो गया है-’योगा’ कुछ सेंटरों में समाधियाँ लगवाते हैं। वे कहते हैं- देखिए, हम अभी आपके सेंटरों में समाधि लगवा देते हैं। आपको कोई पुरुषार्थ करने की जरूरत नहीं है। देखिए, अभी हम आपके ऊपर जादू करते हैं और आपकी समाधि लगवाते हैं, आपका ध्यान लगवाते हैं, मेडिटेशन करवाते हैं।
मित्रो! सब जगह यही धूर्तता जहाँ-तहाँ सारे संसार में फैली हुई है। इस अनाचार को देखकर मालूम पड़ता था, मानो योग की जीवात्मा ही खत्म हो गई। यही ढकोसला सब जग न खड़ा हो जाए, यह आशंका बनी रहती है। अब योगा में क्या होता है? आसन होता है। नाक में रस्सी डाल लेंगे, भीतर तक ले जाएंगे और फिर बाहर निकाल लेंगे। क्यों साहब! योगा तो भगवान से मिलने को कहते हैं। क्या इससे भी भगवान मिल जाएगा? हाँ साहब! अच्छा तो जब भगवान मिल जाए तो हमें भी दिखाना।
बेटे! योगा वह हो सकता है जिसमें हमारा मन, हमारा चिंतन आदर्शवादिता के साथ जोड़ा जाता है। यह थिंकिंग है, विचारणा है। क्रियायोग का जितना भी संबंध है, वह तपश्चर्या से है। कौन-सी? जो हम शरीर के द्वारा करते हैं। शरीर के सारे-के-सारे अंगों की जितनी भी क्रियाएँ हैं, वे सब तपश्चर्या में आती हैं। जप, यह भी उसी में आता है। यह शरीर की क्रिया है। प्राण भी शरीर में आता है, क्योंकि यह शरीर की क्रिया है। शरीर के द्वारा जो भी क्रिया की जाती है, वह योग में नहीं आती, तप में आती है। योग चीज अलग है।
चिंतन का परिष्कार है योग
योग किसे कहते हैं? बेटे, हमारा चिंतन, हमारी विचारणा-इसको परिष्कृत करना और हमारा क्रियापक्ष, इसका परिशोधन करना-इसका नाम योग है। चिंतन, चरित्र और व्यवहार को परिशोधित करने का नाम योग है। ये सारी-की-सारी क्रियाएँ हमारी विचारणा से संबंधित हैं। आपके लिए कोई योग शब्द का इस्तेमाल करे तो आप समझना कि इसका सारे-का-सारा दबाव, सारे-का-सारा शिक्षण, सारी-की-सारी गतिविधियाँ केवल हमारे चिंतन को परिष्कृत करने तक शायद सीमित हैं। अंतरंग को परिष्कृत करने तक सीमित हैं। योग में क्या आता है? ध्यान आता है। ध्यान की असंख्य प्रक्रियाएँ आती हैं। ध्यान की असंख्य प्रक्रियाओं में से प्रत्येक को हम कर्मयोग कह सकते हैं। आपने राजयोग का नाम सुना होगा। राजयोग के चार हिस्से शरीर से संबंधित हैं। ये हैं यम, नियम, आसन और प्राणायाम। ये चार शरीर की तपश्चर्या से संबंधित हैं कि शरीर को कैसे स्वस्थ रखना चाहिए। प्राणवायु को हमें कैसे ठीक रखना चाहिए। आहार और विहार के नियमों का हमको कैसे पालन करना चाहिए। ये चार पक्ष तपश्चर्या के हैं। इसको हम तप कह सकते हैं। योग के अन्य चार पक्ष कौन से हैं? प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। बेटे, ये हमारे चिंतन के ऊपर निर्भर हैं। हमारा चिंतन किधर चलना चाहिए? चिंतन को कहाँ लगाना चाहिए? अस्त-व्यस्त चिंतन की रोक-थाम हमें कैसे करनी चाहिए? चिंतन का परिष्कार हमको कैसे करना चाहिए? चिंतन को हमें कहाँ तक ले जाना चाहिए और अपने चिंतन को हमें भगवान में विलय कैसे कर देना चाहिए? ये सारी-की-सारी चिंतनपरक कसरत योग कहलाती है। यह योग आपको सीखना चाहिए। इस योग के सिद्धाँत मैं आपको बताऊँगा। क्रिया तो वही है? जो आपको हम यहाँ कराते हैं। क्रियाओं को फिर किसी दिन बता दूँगा। सायंकाल को हम जो आपको ध्यान कराते हैं, उस ध्यान के पीछे योग के कौन-कौन से सिद्धाँत जुड़े हुए हैं, यह हम किसी दिन आपको समझा देंगे। यहाँ जो क्रियायें हम आपको कराते हैं- व्यायाम से लेकर आसन कराने तक, जप कराने से लेकर तप कराने तक। उसमें से तप का अंश कौन-सा है और योग का कौन-सा तथा यहाँ के बताए हुए शिक्षण को आगे चलकर कैसे बढ़ाना पड़ेगा, यह सब हम आगे चलकर बताएँगे। अभी तो हम उसका मूलभाव समझा रहे हैं और यह बता रहे हैं कि ध्यान क्या है?
ध्यान के दो भाग
मित्रो! ध्यान को हम दो हिस्सों में बाँट देते हैं। एक हिस्सा वह है जो हमारे चिंतन के बिखराव को रोकता है, विचलन को रोकता है। इसको हम क्या कहते हैं? इसका नाम है- एकाग्रता। एकाग्रता किसे कहते हैं? जिसे आप बार-बार कहते हैं कि हमारे मन का निग्रह कीजिए, वस्तुतः वह योग का पहला वाला हिस्सा है। हमारा मन जो चारों ओर भाग-दौड़ करता है, भगदड़ मचाता है, बेसिलसिले चलता है, व्यर्थ की बातों में चलता रहता है, इसको एक सिरे पर ले आना, एक क्रम में ले आना-इसका एकाग्रता वाला भाग है। मन का एक और भाग वह है, जिसे हम काम पर लगा देते हैं, किसी लक्ष्य पर लगा देते हैं। मन का यह दूसरा वाला हिस्सा है। बंदूक में क्या होता है? बंदूक में दो भाग होते हैं। एक का काम यह होता है कि बारूद को और गोली को दोनों चीजों को कारतूस में बंद करके छोटे से दायरे में कैद कर देते हैं। कैद न करें तो? कैद न करें तो बेटे, बारूद चारों तरफ फैल जाएगी और यदि उसे जला दें तो भक से जलकर खत्म हो जाएगी। बारूद के लिए यह पहला काम करना पड़ता है-एकाग्रता का। कारतूस में एकाग्रता अर्थात् बंदूक की लंबी नली में कारतूस और बारूद को एकाग्र करके यह देखते हैं कि यह बहुत देर तक एकाग्रता की दिशा में चले।
अगर बंदूक की नली छोटी हो तब? तब मुश्किल पड़ जाएगी। लंबी नली की विशेषता यह है कि यह गोली को दूर तक फेंक सकती है। पिस्तौल दूर तक नहीं फेंक सकती। इसके लिए उसकी नली लंबी होनी चाहिए। लंबी नली में कारतूस बहुत दूर तक एकाग्र एक दिशा में चला जाता है, इसलिए बहुत दूर तक फेंक सकती है। पिस्तौल ऐसा नहीं कर सकती। पिस्तौल सामने मार सकती है, लंबी दूरी तक गोली नहीं फेंक सकती। उसमें लंबे फेंक कर मारने की गुँजाइश नहीं है। नली लंबी है ही नहीं तो लंबे तक कैसे मार कर सकती है? अतः ध्यान का पहला वाला हिस्सा है- एकाग्रता, जिसको लोगों ने ‘मेडिटेशन’ नाम दिया हुआ है। यह पहला वाला हिस्सा है।
ध्यान योग का दूसरा वाला हिस्सा है- लक्ष्यवेध। अर्थात् हमारा चिंतन किसी लक्ष्य विशेष में लगाया जाए। लक्ष्य विशेष से क्या मतलब है? लक्ष्य विशेष का मतलब यह है कि बंदूक कहाँ चलाई जाएगी और कहाँ मारी जाएगी? इसका निशाना कहाँ लगेगा? कोई निशाना भी तो होना चाहिए। नहीं साहब! निशाने की क्या आवश्यकता, हम तो यों ही हवा में चलाएंगे। तो निशाना नहीं लगाएगा, हवा में बारूद बेकार करता रहेगा? मित्रो! जब कहीं निशाना लगाते हैं, तब उसको कहते हैं- लक्ष्य। ध्यान के दो हिस्से हैं। एक तो हमारा लक्ष्य है कि इसको कहाँ लगाएँ। दूसरा है -निग्रह। यदि मन का निग्रह हम नहीं कर सकेंगे, मन का फैलाव और बिखराव निग्रहित नहीं कर सकेंगे तो हमारे भीतर मनःशक्ति का विकास नहीं हो सकेगा। हमारा मन सामर्थ्यवान नहीं बन सकेगा और सदैव कमजोर ही बना रहेगा।
एकाग्रता की परख
साथियो! हमारा मस्तिष्क, हमारा चिंतन, जो हमेशा बिखराव में व्यस्त रहता है, उसको सी उद्देश्यपूर्ण काम में व्यस्त होना चाहिए, तभी इसमें ताकत आती है और आदमी के खुद के भविष्य का निर्माण होता है। मुझे एक घटना याद आ गई। राजा द्रुपद की बेटी थी द्रौपदी, जो बहुत खूबसूरत और योग्य थी। उसके पिता ने निश्चय किया कि इस लड़की का ब्याह हम किसी ऐसे आदमी से करेंगे, जिसका भविष्य उज्ज्वल हो। कितने भविष्यवक्ता आए, पंडित आए। उन्होंने कहा कि हमें आपकी बात पर विश्वास नहीं है। पहले आप अपना भविष्य बताइए, तब हम आपकी भविष्यवाणी मानेंगे। आपको भविष्य में कब मरना हैं, बताइए? हमें मालूम नहीं, तो फिर आप हमारा मरना कैसे बता सकते हैं? उन्होंने भविष्य बताने वाले सब पंडित वापस कर दिए। तब समझदारों, विद्वानों ने कहा कि फिर यह बताइए कि किस आदमी का भविष्य अच्छा है? इसका सबूत क्या है?
गुरु द्रोणाचार्य ने एक बात बताई कि राजन्! किस आदमी का भविष्य अच्छा है या बुरा है, यह जानने का एक ही तरीका है उस आदमी की अक्ल एक काम पर एकाग्र होती है या नहीं। जिस आदमी की अक्ल बंदर के तरीके से इस डाली से उस डाली पर उचक-मचक करती होगी। ऐसा करेंगे तो यह होगा, वह होगा, न कोई निश्चय है, न कोई संकल्प है, न कोई श्रद्धा है, न कोई इच्छा है, न कोई धारणा है। इसके यहाँ, उसके वहाँ, यहाँ सत्संग, वहाँ अमुक का सत्संग, यह भी शामिल, वह भी शामिल। सब एक-एक जायके खाता रहता है। 32 चीजों का जायकेदार चूरन खाता रहता है। आज इसके यहाँ चलूँगा, कल उसके यहाँ चलूँगा। एक निश्चय नहीं है, जीवन में कोई लक्ष्य नहीं है। जायके तो जीवन में बहुत मिल जाएंगे, पर ऐसी स्थिति में सफलता कहीं नहीं मिलेगी। द्रोणाचार्य ने कहा कि केवल वही आदमी सफल हो सकता है, जो दृढ़ निश्चय वाला हो और जिसका मन एकाग्र हो। एकाग्र मन वाले आदमी का भविष्य अच्छा है, साँसारिक दृष्टि से भी और आध्यात्मिक दृष्टि से भी।
एकाग्रता की परख करने के लिए लकड़ी की एक मछली मंगाई गई। उसे ऊँचाई पर रखे एक चक्र पर घुमाया गया। उसके नीचे तेल का कड़ाह रखा गया और यह कहा गया कि ऊपर की ओर कोई मत देखिए, केवल कड़ाह में देखकर ऊपर तीर चलाइए। मछली की आँख में जो कोई तीर मार देगा, उससे ही द्रौपदी का ब्याह किया जाएगा। बहुत से राजकुमार स्वयंवर में आए। द्रोणाचार्य ने कहा- भाई साहब! तीर चलाने से पहले आप हमारे पास आइए और यह बताइए कि मछली का क्या-क्या आपको दिखाई पड़ता है। किसी ने कहा कि हमको मछली की मूँछ दिखाई पड़ती है, किसी ने कहा-हमको पूँछ दिखाई पड़ती है। इस तरह के लोगों को वे हटाते गए और जब अर्जुन की बारी आयी तो उन्होंने पूछा, “बेटे! तुझे क्या दिखाई पड़ता है?” अर्जुन ने कहा, “हमें केवल मछली की आँख दिखाई पड़ती है।” “अच्छा बताओ, मछली की पलक, मछली का सिर आदि कुछ दिखाई पड़ता है?” उसने कहा, “नहीं, केवल आँख की पुतली दिखाई पड़ती है।” राजा ने हुक्म दिया कि बस यही लड़का निशाना साध सकता है। स्वयंवर की तैयारी की गई। लड़की को तैयार किया। बाजे बजने लगे। अर्जुन ने अपना धनुष उठाया, प्रत्यंचा चढ़ाई और झट से तीर लक्ष्य पर छोड़ दिया। तीर ठीक आँख की पुतली में जा लगा। उसको वरमाला पहना दी गई।
मित्रो! मैं क्या कह रहा हूँ एकाग्रता की बात, जिसका आपको ज्ञान नहीं है। एकाग्रता का न आपने अभी मूल्य समझा, न कभी महत्त्व समझा और न यह जाना कि एकाग्रता के सिद्धाँत का परिपालन करने के लिए क्या करना चाहिए। आप तो हर चीज के लिए कहते हैं कि मम्मी! यह चीज दिला। तो हम क्या करें? तो गुरुजी, आप आशीर्वाद दे दीजिए। आशीर्वाद से नहीं बेटा! तप से, एकाग्रता से जीवन में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ मिलती हैं।
(क्रमशः)
मार्गशीर्ष शुक्ल-एकादशी 4 दिसम्बर गुरुवार गीता जयन्ती का पुण्य पर्व है। इन्हीं पावन क्षणों में जहाँ महायोगेश्वर भगवान् श्री कृष्ण के श्रीमुख से भगवद्गीता का प्राकट्य हुआ था। साक्षात् भगवान् की वाणी होने के कारण श्रीमद्भगवद्गीता साधकों के लिए कल्पतरु की भाँति है। यह सर्वशास्त्रमयी एवं सर्वार्थ साधिका है। इसका प्रत्येक श्लोक महामंत्र है। इसके विधिपूर्वक अनुष्ठान से अनुष्ठानकर्त्ता की प्रत्येक लौकिक एवं आध्यात्मिक मनोकामना की पूर्ति होती है। इसमें किंचित भी सन्देह नहीं है कि श्रद्धा एवं विधिपूर्वक सम्पूर्ण भगवद्गीता अथवा इसके किसी मंत्र का अनुष्ठान करने पर अभीष्ट फल प्राप्त होता है।
गीता के महत्त्व को इसी सत्य से अनुभव किया जा सकता है कि समस्त शास्त्रों की उत्पत्ति वेदों से हुई है, वेदों का प्राकट्य ब्रह्मा जी के मुख से हुआ है, लेकिन वे स्वयं भगवान् के नाभिकमल से उत्पन्न हुए हैं। इस तरह से शास्त्रों और भगवान् के बीच कुछ दूरी होने से थोड़ा व्यवधान आ गया है। परन्तु गीता के सम्बन्ध में ऐसी कोई बात नहीं है। यह तो स्वयं साक्षात् श्री हरि की अमृतवाणी है। अतएव इसे समस्त शास्त्रों से, यहाँ तक कि वेदों से भी बढ़कर कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।
महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के भीष्मपर्व में बड़ी ही स्पष्ट रीति से कहा है-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥ (महाभारत भीष्मपर्व 44-1)
अर्थात्- गीता का भली प्रकार गायन करना परम कर्तव्य है। इसके रहते अन्य किसी शास्त्र के विस्तार की क्या जरूरत है। क्योंकि यह गीता तो स्वयं भगवान् पद्मनाभ श्रीहरि के मुखकमल से निकली है।
वाराह पुराण में भगवान् स्वयं कहते हैं-
गीताश्रयऽहं तिष्णमि गीता में चोत्तमं गृहम्। गीताज्ञानमुयाश्रित्य त्रींल्लोकान पालयाम्यहम्॥
अर्थात्- मैं गीता के आश्रय में रहता हूँ। गीता मेरा उत्तम गृह है। गीता के ज्ञान का सहारा लेकर ही मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ।
इन सभी शास्त्रवचनों की तत्त्वकथा यही है कि गीता श्री भगवान् का परम रहस्यमय आदेश है। इसका पालन करने वाला अपने जीवन में सभी लौकिक एवं आध्यात्मिक विभूतियों को सहज ही पा लेता है। सभी प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं वर्तमान युग के सन्तों-सिद्धों मनीषियों का मत है कि श्री मद्भगवद्गीता भगवान् की शब्दमूर्ति है। इसके प्रत्येक श्लोक में चमत्कारी मंत्र सामर्थ्य है। जिन्होंने भी इसकी सुदीर्घ साधना की है, उन सभी का यही अनुभव है कि दुर्गा सप्तशती की ही भाँति इस आध्यात्मिक सप्तशती के सविधि प्रयोग से मनोवाँछित फल प्राप्त होता है।
इन पंक्तियों के पाठक इस सत्य को स्वयं अनुभव कर सकते हैं, कि उनकी साँसारिक समस्याओं का निस्तारण एवं आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान करने में गीता माता सर्वसमर्थ हैं। यूँ तो गीता का प्रत्येक श्लोक महामंत्र है और उनका लौकिक एवं परमार्थिक कामनाओं की दृष्टि से उनका विशेष अनुष्ठान किया जा सकता है। परन्तु इस मंत्रमहार्णव के चौथे, नवें, ग्यारहवें, बारहवें, तेरहवें और पन्द्रहवें अध्यायों का कुछ विशेष ही महत्त्व है। इनमें से किसी एक अध्याय के पाठ-प्रयोग से साधकगण लाभान्वित हो सकते हैं।
अनुष्ठान विधि के क्रम में सृष्टि, स्थिति व संहार का क्रम प्रचलित है। इनमें से प्रत्येक पाठ का अपना खास ढंग है। और तदानुसार उसका फल भी विशेष है। चालीस दिनों तक नित्य नियमित संहार क्रम से तीन पाठ करने से बड़े से बड़ा संकट दूर होता है। संहार क्रम में अठारहवें अध्याय से प्रारम्भ करके प्रथम अध्याय तक क्रमशः उलटे क्रम में पाठ किया जाता है। दरिद्रता निवारण के लिए गीता का अनुष्ठान स्थिति क्रम में करना चाहिए। इस क्रम में छठे अध्याय से प्रारम्भ करके अठारहवें अध्याय तक, फिर पाँचवे अध्याय से पहले अध्याय तक पाठ किया जाता है। चालीस दिनों तक इस तरह से तीन पाठ नियमित करने से समस्त आर्थिक संकट दूर होते हैं। पारिवारिक सुख-शान्ति एवं विवाह या सन्तान की कामना के लिए सृष्टि क्रम का विधान है। इसमें प्रथम अध्याय से शुरू करके अठारहवें अध्याय पर पाठ का समापन किया जाता है। अनुष्ठान का क्रम चालीस दिनों तक नियमित तीन पाठ का है।
इन पाठ विधियों का प्रयोग आध्यात्मिक दृष्टि से भी किया जा सकता है। आध्यात्मिक भावना एवं प्रभु विश्वास के साथ संहारक्रम से पाठ करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। स्थिति क्रम से पाठ साधक में भक्ति भाव को जन्म देता है। सृष्टि क्रम से पाठ करने पर साधक के अन्तःकरण में कर्मयोगी होने का बल अंकुरित होता है। इन पाठ्यक्रमों के अलावा गीता के कतिपय श्लोकों के जप एवं सम्पुटित पाठ का भी विधान है। श्लोकों की यह प्रयोग विधि काफी विस्तृत है। स्थानाभाव के कारण सभी प्रयोगों का एक साथ उल्लेख करना यहाँ सम्भव नहीं है। बस कुछ ही महत्त्वपूर्ण प्रयोगों की यहाँ चर्चा की जा रही है। यदि पाठकों का विशेष आग्रह हुआ तो भविष्य में आगामी अंकों में इन प्रयोगों का विस्तार किया जा सकेगा।
गुरु कृपा एवं स्वप्नादेश के लिए गीता के दूसरे अध्याय के सातवें श्लोक- ‘कार्यण्यदोषो पहत स्वभावः...’ के जप का विधान है। चालीस दिनों में इस सम्पूर्ण श्लोक का सवा लाख जप किया जाना चाहिए। इतना जप यदि परिस्थितिवश न सम्भव हो तो किसी भी एकादशी से रात्रि में सोते समय पवित्र भावदशा में इस श्लोक का निरन्तर एक माला जप करते रहना चाहिए। यह प्रयोग अनुभूत है। ऐसा करने से निश्चित ही गुरुकृपा प्राप्त होती है। साथ ही स्वप्न में विकट समस्या का समाधान मिलता है। इस श्लोक का सम्पुट लगाकर भगवद्गीता का पाठ विधान भी है।
शरणागति एवं पापक्षय के लिए गीता के अठारहवें अध्याय के 66 वें श्लोक ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रजं’ का चालीस दिवसीय सवा लाख का अनुष्ठान करने से महापातक नष्ट होते हैं एवं भगवद्भक्ति की प्राप्ति होती है। यदि इस सम्पूर्ण श्लोक के लगातार पाँच अनुष्ठान किए जाएँ तो पिछले जन्मों के सभी संचित पापों का शमन होता है व पुण्यों की प्राप्ति होती है। इस श्लोक का सम्पुट लगाकर गीता के 151 पाठ करने से समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।
श्री मद्भगवद्गीता के पाठ के साथ गायत्री महामंत्र के प्रयोग का विधान भी है। गायत्री महामंत्र के सम्पुट के साथ गीता पाठ करने से महा असम्भव कार्य भी सम्भव होते हैं। विधाता के लिखे कुअंकडडडड मिटते हैं। इसे जो भी साधक चाहे अनुभव कर सकते हैं। अनुभव से बड़ा प्रमाण भला और क्या होगा। सम्पुट कैसे लगाएँ इसके लिए शास्त्र वचन है- ‘मन्त्रमादौ पुनश्लोकमन्ते मन्त्रं पुनः पठेत्। पुनर्मन्त्रं पुनः श्लोकं क्रयोऽयमुदये शुभः।’ अर्थात् श्लोक के आदि एवं अन्त में सम्पुट का मन्त्र लगाना चाहिए। यानि कि श्री भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक के आदि एवं अन्त में गायत्री महामंत्र अथवा जिस भी श्लोक मंत्र का सम्पुट करना हो, लगाना चाहिए। इसी के साथ इस विशेष पाठ की अवधि में अनुष्ठान के सभी विधि नियमों का पालन करना चाहिए। ऐसा करने से भी श्रीमद्भगवद्गीता के साधक के जीवन में आश्चर्यजनक अनुभूतियाँ एवं चमत्कार घटित होते हैं। इसमें किसी को तनिक सा भी संशय नहीं करना चाहिए।
महत्वपूर्ण सूचना
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(‘आत्मसंयमयोग‘ नामक श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय की युगानुकूल व्याख्या-तृतीय किस्त)
विगत दो अंकों में इस अध्याय के प्रथम चार श्लोकों की व्याख्या विस्तार के साथ प्रस्तुत की गई। प्रथम दोनों का मूल मर्म था-मनुष्य संकल्पों से, कामना-आकाँक्षाओं से मुक्त हो। हम कहीं भी अपना ‘मैं’ पन, निजी आकाँक्षा-इच्छा न जोड़ें। संकल्पों का त्याग करने वाला ही योगी बन सकता है। संकल्पों से कर्म-वासना एवं इससे भावी जीवन के संस्कार तय होते हैं। बिड़ला परिवार के उदाहरण से इसे समझाया गया था। तीसरे व चौथे श्लोक में कहा गया था कि प्रभु-समर्पित कर्म करने वाला ही योगपथ पर आरुढ़ हो सकता है। इसके साथ-साथ उसे विषयभोगों व कर्मफल में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। ऐसा होने पर ही वह एकाग्रता साध सकता है। मन की शाँति कैसे मिले, कैसे व्यक्ति योग के पथ पर आगे बढ़े, यह मार्गदर्शन श्रीकृष्ण आगे देने वाले हैं, पर उससे पूर्व वे घोड़े पर चढ़ने की तरह योगपथ पर सवारी करने का पूर्वाभ्यास युद्धक्षेत्र में अर्जुन को करा रहे हैं। भोगवादी जीवन नहीं, आसक्ति से मुक्त-निर्लिप्त भाव से जिया गया जीवन ही किसी को योगारुढ़ कर सकता है। इतना होते ही दिव्यकर्मी मनुष्य का मन शाँत हो जाता है। जरा-सी भी वासना साधक के मन में नहीं होनी चाहिए, यह श्री रामकृष्ण की वाणी से बताया गया। अब आगे की व्याख्या-
एक ही राजमार्ग
योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्पष्ट मत है कि योगारुढ़ होकर मन को प्रभु में तल्लीन कर ध्यानस्थ हुआ जाए तो मन की शाँति मिल सकती है। ऐसी स्थिति में पहुँचा साधक फिर प्रभु-समर्पित दिव्य कर्म ही करता है। उससे जाने-अनजाने भी कोई गलत काम नहीं हो पाता। निष्काम कर्म ही ब्राह्मी स्थिति तक किसी साधक को पहुँचा पाते हैं। कर्मयोग-ध्यानयोग का एक अनूठा संश्लेषित प्रयोग अध्याय छह के तीसरे व चौथे श्लोक में वासुदेव बताते हैं। वे कहते हैं कि आध्यात्मिक पुरुषार्थ यदि व्यक्ति को करना हो तो उसे योग पर सवारी करना अर्थात् योगस्थ होकर कर्म करना, मन पर नियंत्रण स्थापित कर उसकी शक्ति को पहचानना तथा उसे समस्त वासनाओं की ओर से शाँत कर लेना सीखना चाहिए। जिसने यह सीख लिया, उसका जीवन सुख-भोग-भटकावों के बीच भी कभी अस्त-व्यस्त नहीं होगा, वह निर्लिप्त भाव से एक दिव्यकर्मी बन अपने जीवनपथ पर यात्रा को और सरल बना सकेगा।
अब यह जानना जरूरी है कि सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारुढ़ कब बनता है, कब उसे वह उच्चस्तरीय एकाग्रता मिल पाती है, जहाँ वह (आत्मा) परमात्मा से एकाकार हो सके? क्या कोई मदद बाहर से आती है या स्वयं ही पुरुषार्थ करना पड़ता है? यदि स्वयं ही करना होता है तो किस स्तर पर उसे सक्रिय होना चाहिए? क्या मन इतना शक्तिशाली है कि वह सारे आकर्षणों से विरत होकर आत्मसत्ता को सच्चा साक्षात्कार करा सके? इन्हीं का उत्तर अगले श्लोक में आया है-
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ -श्लोक 5, अध्याय 6
पहले शब्दार्थ देखते हैं-
विवेकयुक्त मन के द्वारा (आत्मना) जीवत्वाभिमानी बुद्धि को (आत्मानं) उन्नत करें (उद्धरेत्), बुद्धि को- आत्मसत्ता को (आत्मानं) नीचे न उतरने दें (गिरने न दें) (न अवसादयेत्) क्योंकि (हि) शुद्ध मन ही (आत्मा एव) जीवत्व अभिमानी बुद्धि का (आत्मनः) उपकार करने वाला मित्र है (बन्धुः), मन ही (आत्मा एव) जीवात्मा का (आत्मनः) शत्रु है (रिपुः)।
भावार्थ इस प्रकार हुआ-
“मनुष्य को अपने आप को स्वयं अपने द्वारा ही ऊँचा उठाना चाहिए और अपने आप को अधोगति में नहीं डालना चाहिए, क्योंकि यह मनुष्य (आत्मा) आप ही तो अपना मित्र है और वास्तव में यही आत्मा आप ही अपना शत्रु है।”
अपनी सहायता स्वयं करो
यहाँ युद्धक्षेत्र में खड़े अर्जुन के लिए गीतोपनिषद् का एक ही संदेश है, जो योगेश्वर के श्रीमुख से निस्सृत हुआ है- “अपनी सहायता स्वयं करो।” जो अपनी सहायता करता है, परमात्मा सहित सभी दैवी शक्तियाँ आकर उसकी मदद करती हैं। “दैव-दैव आलसी पुकारा” - एक जानी-मानी उक्ति है। भाग्य की शरण में, दैवी सहायता के लिए याचना-गुहार लगाने वालों को आलसी-प्रमादी-दीर्घसूत्री कहा जाता है। अतः सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि मनुष्य को स्वयं अपनी ही मदद करने के लिए आगे आना चाहिए। मनोविज्ञान की यह महत्वपूर्ण स्थापना है कि जितने भी सफलता के शिखर पर पहुँचे हैं या पहुँचते हैं, वे सदैव अपनी आत्मशक्ति का आश्रय लेकर, उसे सशक्त बनाकर ही पहुँचे हैं।
साँसारिक मानव होने के कारण हम जब कभी भी किन्हीं कठिनाइयों में फँस जाते हैं, उनमें से अपने को उबारने के लिए हम सामान्यतः दूसरों की ओर निहारते हैं। लगता है कि इन्हीं मित्रों, हमारे सहयोगी-साथियों में से हमें कोई मदद कर देगा। अपनी ओर हम देखते भी नहीं। लौकिक जीवन में यह तथ्य ठीक भी है कि दूसरों की हमने कभी सहायता की है, हमारी सहायता वे करेंगे। किंतु आँतरिक जीवन में ऐसा नहीं है। हमारी आँतरिक व्यवस्था में हमारे अलावा, हमारे आत्मबल के अलावा और कोई शक्ति हमारी मदद नहीं कर सकती। आत्मविकास के लिए हर व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से स्वयं निज का पुरुषार्थ ही करना होगा, यह एक स्पष्ट सूत्र इस अति प्रसिद्ध श्लोक में दिया गया है।
हमारे निकट का एक ही संबंधी हमारा मन
इस शीर्षक से परमपूज्य गुरुदेव ने 1967-68 के दिनों में एक पुस्तक भी लिखी है- उद्धरेत् आत्मनाऽत्मानं। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं- “मन हमारा सबसे निकट का संबंधी है। पत्नी, बच्चे, भाई, मित्र, पड़ोसी तो दूर, वह शरीर से भी अधिक समीप रहने वाला हमारा स्वजन है। शरीर से तो सोते समय संबंध ढीले हो जाते हैं, मरने पर साथ छूट जाता है, पर मन तो जन्म-जन्माँतरों का साथी है और जब तक अपना अस्तित्व रहेगा, तब तक उसका साथ भी छूटने वाला नहीं है। मन मुख्य और शरीर गौण है। ........... मन की समझदारी से शरीर की अस्त-व्यस्तता दूर हो सकती है। शरीर परिपुष्ट होने से मनोविकार दूर नहीं किए जा सकते। शरीर की सामर्थ्य तुच्छ है, मन की महान। मन शासन शरीर पर ही नहीं, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर है। उत्थान-पतन का वही सूत्रधार है। निंदा और प्रशंसा उसी की गतिविधियों की होती है। किसी को संत, ऋषि, देवदूत और महापुरुष बना देना, यह मन की सज्जनता का ही परिणाम है।” (वाङ्मय क्र- 22 ‘चेतन, अचेतन और सुपरचेतन मन’ 1.53)
मनुष्य जो सोचता है, वही बोलता है। जो बोलता है, सो करता है। जो करता है, सो बनता है। जो बनता है, सो ही पा लेता है।
“हम स्वयं अपना उद्धार करें” यह संदेश सीधा है- किसी भी साधक के लिए, योगारुढ़ हो ध्यानयोग में प्रविष्ट होने के इच्छुक दिव्यकर्मी के लिए, गीता के मार्ग पर चलकर मन की शाँति पाने वाले किसी भी मानव के लिए। यदि हम इंद्रिय-भोगों की ओर खिंचते नहीं चले जाते, हम जितेंद्रिय हैं, ऊँचे उद्देश्यों में, उच्चस्तरीय प्रयोजनों में रुचि रखते हैं तो हम अपने निज के, अपने मन के मित्र हैं। उसको ऊँचा उठने में हम मदद कर रहे हैं और यदि हम भोग-ऐश्वर्य के प्रवाह में खिंच जाते हैं, हम स्वयं को बिखेर देते हैं, उच्छृंखल विचारों में बहते चले जाते हैं, मनोबल कमजोर होने से कोई भी कार्य हाथ में नहीं ले पाते तो हम अपने मन के शत्रु हैं। हमारा आपा ही हमारा बंधु है और अपना आपा ही हमारा दुश्मन है। जिस दिन हम मन को मित्र बनाकर उसे जीत लेते हैं तो फिर हम अध्यात्म-क्षेत्र के साथ लौकिक जगत में भी एक सफल मानव बनते चले जाते हैं।
शुद्ध मन- शुद्ध अहं की शक्ति
इस श्लोक में आत्मानं, आत्मना शब्द बार-बार आया है और कहीं उसका अर्थ है विवेकयुक्त मन और कहीं है जीवत्वाभिमानी बुद्धि और कहीं शुद्ध आत्मसत्ता। आत्मसत्ता और मन की एक ही शब्द से व्याख्या करके गीताकार ने अपने काव्य-कौशल का परिचय दिया है। जब हम कहते हैं कि शुद्ध मन ही हमारी बुद्धि की उन्नति करने वाला, आत्मसत्ता को ऊँचा उठाने वाला है तो हमारा आशय है कि ऐसा मन ही मुक्ति में सहायक होता है। विषयासक्त मन तो अवसादग्रस्त, गिरा हुआ मन है। वह तो जीवात्मा के लिए शत्रु की भूमिका निभाता है और पतन का कारण बनता है।
योगशास्त्र कहते हैं- तदा दृष्टुः स्वरूपे अवस्थानम् अर्थात् चित्तवृत्तियों के शाँत हो जाने पर द्रष्टा पुरुष अपने स्वरूप में स्थिर हो जाते हैं, अवस्थित रहते हैं। मन को जब भी विषयादि भोगों से हटाकर आत्मनिष्ठ किया, तभी निज की सच्चिदानंदघनरूपी आत्मसत्ता में अवस्थिति होगी। जीव का मन माया से ढके होने के कारण नर-पशु, नर-कीटक, नर-पामर, नर-पिशाच स्तर के व्यक्तियों को अपना आत्मस्वरूप स्पष्ट दिखाई नहीं देता, जबकि देवमानव स्तर के व्यक्ति उस आवरण को हटाकर मन को अपना मित्र बनाकर उसकी अपार सामर्थ्य से जीवन्मुक्ति का लाभ उठा लेते हैं।
फिर बंधन क्या है? विषयासक्त मन ही जीवात्मा के बंधन का कारण है। सदैव उसी चिंतन में रत रहने वाला, अपनी कल्पनाओं का जगत वैसा ही बनाने वाला व्यक्ति कभी मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाता। शुद्ध मन ही मोक्ष का कारण है। मन एवं मनुष्याणाँ कारणं बंधमोक्षयोः इसी संदर्भ में कहा गया है- मनुष्य का मन ही उसके बंधन और मुक्ति का कारण है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं, “मन आसक्तिरहित होने से ही भगवान का (परिष्कृत आत्मसत्ता का) दर्शन होता है। शुद्ध मन से जो वाक्य निकलता है, वही भगवान की वाणी है। शुद्ध मन और शुद्ध बुद्धि आत्मा के समान है, क्योंकि उनके अतिरिक्त और कोई शुद्ध पदार्थ इस धरती पर नहीं है।” आगे वे कहते हैं, “शुद्ध मन ही जीवात्मा को ब्रह्माभिमुखी करता है और संसार-सागर से उसका उद्धार करता है। दूसरी ओर वासना में आसक्त मन जीव को नरक में गिराता है। वासनायुक्त जीव, वासनामुक्त शिव।”
सारा खेल मनःशक्ति का
सारी बात स्पष्ट है। मन ही मन को गिराता है, मन ही मन को उठाता है। सारा खेल संसार में इसी मनःशक्ति का चल रहा है। मन को सशक्त बनाकर प्रतिकूलताओं में भी हम अपना अस्तित्व बनाए रख सकते हैं, स्वस्थ बने रह सकते हैं एवं उल्लास भरा जीवन बिता सकते हैं। इसी मन के दुर्बल पड़ने पर हम जीवित रहते हुए नारकीय वेदना की अनुभूति भी कर सकते हैं एवं घोर निराशा की स्थिति में जीते हुए आत्मघात करने की भी सोचने लगे हैं। समर्थ, शिवा, वाल्टेयर, नेपोलियन, गैरीबाल्डी, जोन ऑफ आर्क, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी विवेकानंद, वीर भगत सिंह, गाँधी आदि वे नाम हैं, जिनने मन की इसी शक्ति का आश्रय ले स्वयं को ऊँचा उठाया और अन्य अनेकों के लिए पथ प्रशस्त किया। “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।” इसी आधार पर कहा जाता है। धरती पर स्वर्ग जैसी उत्कृष्ट परिस्थितियाँ विनिर्मित करनी हों तो मन को ऊँचा उठाना होगा, मानवों में देवत्व का समावेश करना होगा, विधेयात्मक चिंतन ढेरों व्यक्तियों का बनाना होगा।
“पॉजिटिव मेण्टल एटीच्यूड” (पीएमए) विधेयात्मक मनःस्थिति की चर्चा करते हुए अगणित मनःचिकित्सक, अध्यात्मवादी चिंतक लोगों की मानसिकता में परिवर्तन कर उन्हें प्रगति के मार्ग पर बढ़ाते रहे हैं। आँतरिक व बहिरंग दोनों ही जगत की सिद्धि का एक ही राजमार्ग है- मनःशक्ति का सार्थक सुनियोजन। ढेरों ईसाई पादरी
मनोबल ही जीवन है। वही सफलता और प्रसन्नता का उद्गम है। मन की दुर्बलता ही रोग, दुख और मौत बनकर आगे आती है।
इसी एक विषय पर अपने उद्बोधन से समूह में आत्मविश्वास जाग्रत करा उनसे धर्मसम्मत परोपकार के अगणित कार्य संपन्न करा लेते हैं। नारमन विंसेंट पील, नेपोलियन हिल जैसे लेखकों ने इस विषय पर अगणित पुस्तकें लिखी हैं एवं ढेरों अवसादग्रस्त लोगों को नई राह दिखाई है।
शिक्षा नहीं, भीतर से उबारने वाली विद्या जरूरी
शिक्षा की, अध्यापकों की जरूरत को हम सभी समझते हैं व यह मानते हैं कि इनकी अनगढ़ को सुगढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका है। मन के लिए ज्ञानप्राप्ति हेतु अनुकूल वातावरण विनिर्मित करने में पुस्तकों-अध्यापकों-शोधशालाओं-भाषणों-वर्कशॉप-सेमीनार, सभी की उपयोगिता है। उससे कोई इनकार नहीं कर सकता, किंतु यदि उनसे मनःशक्ति का संवर्द्धन होता तो सभी शिक्षित-भाषण सुनने वाले, सशक्त मनोबल वाले एवं सफल उद्यमी, शिक्षित या उच्च प्रतिष्ठित व्यक्ति होते। आत्मविकास की जब बात आती है तो यह बहिरंग की शिक्षा अधूरी रह जाती है, यदि हमने अपने भीतर से इसके लिए स्वतंत्र रूप से प्रयास नहीं किया। बाह्य साधन हमें नूतन विचार दे सकते हैं, परंतु अंतिम लक्ष्य तो आत्मपरिवर्तन ही है। इसकी प्राप्ति मनुष्य को ही निज का आध्यात्मिक पुरुषार्थ संपन्न करने पर होती है। इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं- अपने आप ही अपने आप को ऊँचा उठाओ (उद्धरेदात्मात्मानं)।
श्रीकृष्ण बार-बार अर्जुन को जीवन के चिरपुरातन ढर्रे, सोच को बदलने हेतु चेतावनी देते हैं। वे जानते हैं कि हमारी आदतें, स्वभाव, कामोद्वेग, वासनाएँ, ईर्ष्या, द्वेष हमें बार-बार प्रभावित करेंगे। इनसे बचने और आत्मा को अपयश की ओर ले जाने वाली, पुनः फिसलन की ओर ढकेलने वाली प्रवृत्ति के विरुद्ध वे चेतावनी देते हैं। कहते हैं, अपने आप को नीचे नहीं गिरने देना चाहिए (नात्मानमवसादयेत्)। ऐसे पतनों से सावधानीपूर्वक-प्रयासपूर्वक अपने आपको बचाना चाहिए। पुरानी आदतें बड़ी कठिनाई से छूटती हैं, इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह नवीन लक्ष्य को, जो विधेयात्मक है, दृढ़ता से पकड़े रहे, पीछे फिसलने से इनकार कर दे। पर्याप्त लंबे समय तक ऊँचाई पर टिका रहने वाला मनुष्य फिर गिरता नहीं, पतन के मार्ग पर उसके फिसलने के अवसर कम हो जाते हैं।
जीवन जीने की कला के महत्वपूर्ण सूत्र
अंतःसिद्धि का यह उपदेश प्रभु का हम सबके लिए है। गीताचार्य हमें अपनी साँस्कृतिक उन्नति के इस मार्ग में आत्मानुशासन का पाठ पढ़ाते हैं और संकेत करते हैं कि तुम्हारी अपनी आत्मा (शुद्ध अहंकार) ही तुम्हारी सच्ची मित्र है (आत्मैवहयात्मनो बंधुः) और तुम्हारी अपनी आत्मा (शुद्ध अहंकार) ही तुम्हारी शत्रु है (आत्मैव रिपुरात्मनः)। जीवन-दर्शन के इन सूत्रों को जिसने समझ लिया, उसे जीवन जीना आ गया। वह सच्चा दिव्यकर्मी, एक सफल जीवन जीने की कला का पारंगत बन गया। उसे प्रगति का एक आत्मावलंबन प्रधान पथ मिल गया। अब वह बाहरी परिस्थितियों, वातावरण पर निर्भर न रह आत्मजगत के स्तर पर पुरुषार्थ कर सकता है, क्योंकि उसे उसकी सत्ता पर, अनंत संभावनाओं पर विश्वास हो गया है।
मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है- यह आत्मिकी का, अध्यात्म का मूल मर्म है। जो इस सूत्र पर विश्वास रखता है, वह संसार में कहीं भी रहते हुए अपनी आत्मशक्ति के सहारे अपने लिए अनुकूल वातावरण-परिस्थितियाँ बना लेगा। संत इमर्सन कहते थे, “तुम मुझे नरक में भी भेज दो, मैं अपनी आत्मशक्ति द्वारा वहाँ भी अपने लिए स्वर्ग बना लूँगा।” सारा तत्वदर्शन एक ही धुरी पर टिका है- आत्मावलंबन। हम हैं कि वातावरण का, परिस्थितियों का ही रोना रोते रहते हैं। गीताचार्य हमें बार-बार कह रहे हैं कि बाह्य अवस्थाओं, वातावरण, परिस्थितियों पर अपनी निर्भरता को समाप्त करो। चाहे वे कैसे भी क्यों न हो, बड़े आकर्षक नजर आते हों, वे न तो हमारे सच्चे मित्र हो सकते हैं और न सच्चे शत्रु ही। आत्मविश्वास के चार सोपान-आत्मावलोकन, आत्मसमीक्षा, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण (आत्मविकास) में एकमात्र मित्र हमारा अपना आपा ही है, जो हमारे सबसे निकट है। हम स्वयं ही अपने मित्र अथवा शत्रु हैं। कोई भी दूसरा न तो हमारी सहायता कर सकता है, न ही हमें किसी तरह का नुकसान पहुँचा सकता है।
परिस्थिति नहीं, मनःस्थिति प्रधान है
आज का भोगवादी विज्ञान कहता है, उपभोक्तावादी पाश्चात्य चिंतन कहता है- परिस्थितियाँ ठीक कर दो, मन स्वतः ठीक हो जाएगा। चाहे कितनी ही भौतिक जगत की सुविधाएं हों, चाहे वातावरण कितना ही हमारे अनुकूल साधन हमें जुटकर दे दे, यदि हमारी मनःस्थिति कमजोर है तो वे हमारा कुछ भी लाभ न कर सकेंगे। उलटे हमें अपयश की ओर, वासनात्मक जीवन की ओर, बिगड़ती आदतों से परावलंबन की ओर धकेल देंगे। भोगवादी मानसिकता, अनुकूल सुविधाओं की बहुलता में क्यों इतने मनोरोग पनप रहे हैं? क्यों मन अशाँत है? क्या कारण है कि आत्मघात की दर बढ़ती जा रही है? अवसाद (डिप्रेशन) की मनःस्थिति वाले रोगियों की संख्या क्यों बढ़ती जा रही है? असंतोष और उद्विग्नता, संक्षोभ-विक्षोभ, मानसिक तनाव इतना बढ़ोतरी पर क्यों है? इन सबका एक ही उत्तर है- आत्मावलंबन छोड़कर परावलंबन का पल्ला पकड़ लेना। परिस्थितियों की विवशता का रोना रोना तथा अपनी आत्मशक्ति को अधोगति की ओर डाल देना। जब तक आत्मिक जगत से पुरुषार्थ का पहला कदम नहीं बढ़ेगा, सफलता का राजमार्ग हमसे उतना ही दूर होता चला जाएगा। भगवान उन्हीं की मदद करते हैं, जो अपनी मदद स्वयं करते हैं। हमें अपने प्रचंड मनोबल एवं अनंत शक्तिसंपन्न आत्मसत्ता पर भरोसा रख उसी का आश्रय लेना चाहिए, यही पूरे इस पाँचवें श्लोक का सार-संक्षेप है। (क्रमशः)
तपोवन की ओर
जोशीमठ वापस आने में जितना समय लगा, वही थोड़ा अनुभव हुआ। शायद इसलिए भी कि यात्रा वापसी की थी। रास्ता एक बार देख लिया था, इसलिए कुतूहल और रोमाँच नहीं हो रहा था। उसके बाद तो समय जैसे हवा की तरह उड़ने लगा। जोशीमठ में शंकर गुफा के पास दो बुजुर्ग संन्यासी मिले। दोनों की आयु में दस-पंद्रह वर्ष का अंतर था। लगभग साठ वर्ष की अवस्था वाले स्वामी निर्मलानंद और उनसे उम्र में छोटे स्वामी गंभीरानंद। दोनों गुरु-शिष्य थे। उनसे बड़ी सहजता और शीघ्रता से परिचय हो गया। साथ बनने में भी देर नहीं लगी। करीब दस मिनट में ही गोमुख तक साथ चलने की बात तय हो गई। निर्धारण इस तरह हुआ, जैसे पहले से सब कुछ तय था।
जिस ऋतु में यह यात्रा हो रही थी, उसमें मौसम ठंडा ही रहता है। मौसम से ज्यादा रास्ते की कठिनाइयाँ विकट थीं। भविष्यबदरी से आगे झील पर जिस तपस्वी ने गोमुख का संदेश दिया था, उसकी बातें मन में गूँज रही थीं। उस तपस्वी को देखकर श्रीराम के मन में यह आशा भी जगी थी कि वे रास्ते में सिद्ध-योगियों से भेंट होगी। पहाड़ियों और गाँवों से होते हुए संन्यासियों के साथ जिस रास्ते पर चल रहे थे, उसमें जगह-जगह गुफाएँ थीं। लगता था कि अब इस गुफा से कोई सिद्ध-महात्मा निकल आएँगे। वह गुफा पीछे छूट जाती तो थोड़ी निराशा होती। वे फिर आगे बढ़ते और अगली गुफा आने तक प्रतीक्षा करते, लेकिन अगली गुफा आने पर फिर वही निराशा।
एक स्थिति ऐसी आई कि सिद्ध योगियों के मिलने की आशा ही छोड़ दी। दोनों साथियों के साथ बातचीत करते हुए आराम से रास्ता कट गया। बीच में चट्टियों पर छोटी-मोटी दुकानें मिल जातीं। तीनों लोग वहाँ कुछ देर गपशप सुस्ता लेते। दुकानों पर बैठे पहाड़ी लोगों से कुछ देर गपशप भी हो जाती। वे आटा, दाल, चावल जैसी उपयोग की चीजों के साथ चना, गुड़, सत्तू, आलू, माचिस आदि भी रखते थे। लोग अपनी आवश्यकता के अनुसार ये चीजें खरीदते। वहीं बनाने-खाने की व्यवस्था भी दुकानों पर होती थी। सामान खरीदने पर खाना बनाने, पकाने और खाने के बरतन बिना किराया लिए ही ये लोग दे देते।
चट्टियों से ज्यादा वास्ता नहीं पड़ा। रास्ते में कुछ गाँव पड़े। उनमें आबादी बहुत कम थी। जो थोड़ी-बहुत थी, उसमें भी महिलाओं का प्रतिशत ज्यादा था। पुरुष रोजी-रोटी कमाने के लिए मैदान में उतर गए थे। यद्यपि साथ था, फिर भी सुनसान रास्ते पर डर लगता था, जहाँ-तहाँ जंगली जानवर और हिंस्र पशु दिखाई दे जाते। बीस-बाईस घंटे के रास्ते में पंद्रह बार शेर, तेंदुए, चीते और भालुओं से आमना-सामना हुआ। कुछ मोड़ों पर छोटे आकार के शेर भी दिखाई दिए। आजकल तो इस इलाके में उस प्रकार के शेर नहीं मिलते। जंगली जानवरों की खाल व्यापार करने वाले लोगों न उनका खात्मा कर दिया, लेकिन 1926-27 में इस तरह के शेर बड़ी संख्या में थे।
विजय की संभावना निश्चित होने पर तो कायर भी लड़ सकते हैं। वीर वे हैं, जो पराजय की आशंका रहने पर भी दृढ़तापूर्वक लड़ते हैं।
गोमुख तक का जो रास्ता उन दिनों तीन दिन में तय होता था, वह एक दिन में ही पार कर लिया। गोमुख-गंगोत्री से लगभग 2 किमी दूर है, लेकिन वहाँ भी अनजाने, पथरीले रास्तों से होकर जाना हुआ। दोनों संन्यासी गोमुख पहुँचकर अलग हो गए। पिछले पच्चीस साल से इसी क्षेत्र में रहते थे। उन्हें सीधे, आसान और लंबे रास्तों के साथ कम समय में तय हो जाने वाले छोटे रास्तों की भी अच्छी जानकारी थी। उत्तराखंड के इस क्षेत्र का चप्पा-चप्पा उनका देखा हुआ था। छोटे रास्ते बेहद कठिन हैं, लेकिन पैदल यात्रा करने वाले लोग उन्हें ही चुनते हैं। जिनके शरीर में सामर्थ्य है, वे तो हर हाल में इन रास्तों से मंजिल तक पहुँचना चाहते हैं।
चारों ओर खतरा-ही-खतरा
गोमुख से आगे सिर्फ बर्फ की वादियाँ ही हैं। चारों तरफ धवल तुषार आच्छादित हैं। बर्फीले पठार वाले इस क्षेत्र में पग-पग पर चुनौतियाँ हैं। इतने ज्यादा खाई-खड्ड हैं कि थोड़ा भी फिसले तो उनमें गिर जाने का खतरा रहता है। गोमुख से आगे का यह रास्ता मात्र ब् किमी है, लेकिन पग-पग पर इतने जोखिम हैं कि प्रतिक्षण सजग-सतर्क रहना पड़ता है। बरफ की चादर उलटकर प्रकृति जगह-जगह पत्थर और मिट्टी भूर-भूर कर गिराती रहती है।
4 किमी का यह रास्ता तय करते हुए श्रीराम को कई बार पिछले दो दिन याद आए। वे रास्ते भी कम खतरनाक नहीं थे, लेकिन बर्फीली, उसके नीचे छिपे मौत के खड्ड और कुएँ जहाँ-तहाँ नहीं थे। मुख्य खतरा हिंस्र पशुओं से ही था। उनसे आमना-सामना होने पर मौत सामने खड़ी दिखाई देती थी, लेकिन वे जानवर भी मनुष्यों से डरते थे। जहाँ रात बितानी पड़ी, वहाँ आस-पास काले साँप रेंगते और मोटे अजगर फुफकार मारते दिखाई दिए थे। गोह, रीछ, तेंदुए और हाथी आदि जानवरों से भी सामना हुआ था। तपोवन के बरफीले पठार में उन मुकाबलों की याद आ गई, लेकिन यह पठार ज्यादा कँपा देने वाला था। इक्का-दुक्का संन्यासी वहाँ दिखाई दिए। उन्होंने मार्ग के कुछ किस्से सुनाए, अगर उन पर ध्यान लगाया जाए तो और रोंगटे खड़े करने वाले थे।
इन रोमाँचक स्मृतियों और विवरणों से बाहर निकल कर श्रीराम ने जहाँ-तहाँ दिखाई देने वाले रंगीन पत्थरों और पहाड़ी फूलों को निहारना शुरू किया। चारों ओर फैले उज्ज्वल धवल तुषार में ये रंगीन पत्थर और फूल प्रकृति का इंद्रधनुषी शृंगार कर रहे थे। तभी श्रीराम को वहाँ फैले खाई-खड्डों की याद आई। दोनों अनुभूतियों के संगम ने बोध जगाया कि जीवन का आनंद मृत्यु के स्मरण से ही है। उसकी विभीषिका याद रहे तो हम वर्तमान को ही समग्रता से जीने लगते हैं। जो क्षण सामने प्रस्तुत है, उसे भली भाँति साधने लगते हैं और वह सत्य के साथ आनंद की अनुभूति भी करा देता है। इस अनुभूति के साथ यह भी स्मरण आया कि पिछले तीन-चार दिनों में किसी भी समय गरम कपड़े पहनने की आवश्यकता नहीं हुई।
सरदी ने नहीं सताया, यह स्मरण आते ही मन ने कहा- मुँह, आँख, कान, नाक आदि खुले रहते हैं, उन्हें सरदी नहीं लगती तो बाकी देह को सरदी क्यों लगनी चाहिए। पहाड़ों में लोग बिना गरम कपड़ों के ही रह लेते हैं। उन्हें ठंड नहीं लगती। जोशीमठ से गोमुख तक आते हुए स्वामी निर्मलानंद की बातें याद हो आईं। उन्होंने कहा था, पहाड़ ऊपर ठंडे रहते हैं, लेकिन उनमें जो गुफाएँ होती हैं, वे गरम रहती हैं। लाँगड़ा, मार्चा आदि शाकों की पत्तियाँ कच्ची भी खाई जा सकती हैं। उनसे गरमी मिलती है। भोजपत्र के तने पर उठी हुई गाँठों को उबाल लिया जाए तो ऐसा पेय बन जाता है कि फिर जाड़ा नहीं लगता। पेट में घुटने और सिर लगाकर उकड़ूं बैठ जाने पर भी ठंड नहीं लगती। अकेले विषम परिस्थितियों और जंगली जानवरों, प्राकृतिक खतरों का सामना करते संपन्न हुई यात्रा कुछ भिन्न परिस्थितियों में और भी रोमाँच भर रही थी।
उस पठार में एक संन्यासी स्वामी तत्त्वबोधानंद से भेंट हुई। उन्होंने एक छोटी-सी कुटिया बना रखी थी, लेकिन उसमें कम ही रहते थे। ज्यादा समय तुषार आच्छादित तपोवन में ही रहते। खुले में शरीर पर एक वस्त्र लिपटा होता। कुटिया का उपयोग यदा-कदा आने वालों के लिए होता। कभी कोई आ जाता और सरदी से ठिठुरने लगता तो उसे ठहरा देते। यात्री एकाध दिन रुककर वापस हो जाता। इस एक उपयोग के अलावा कुटिया खाली ही पड़ी रहती। तपोवन जहाँ से आरंभ होता है वहाँ कोई आश्रम, आवास, मंदिर या तीर्थ नहीं है।
नंदनवन में प्रवेश
तपोवन से कुछ आगे बढ़ने पर नंदनवन आरंभ होता है। बहुसंख्य यात्री उन दिनों यहाँ तक नहीं आते थे। बरफ और कभी किसी टुकड़े पर एकाध वनस्पति के अलावा दूर-दूर तक कुछ नहीं दिखाई देता। यात्रा अथवा दर्शन का वहाँ कोई आकर्षण नहीं है, इसलिए लोग तपोवन से ही वापस लौट जाते हैं। निन्यानवे प्रतिशत यात्रियों की यात्रा गोमुख पर ही समाप्त हो जाती है। नंदनवन इस अर्थ में सर्वथा निर्जन, नीरस और आकर्षण से रहित है। श्रीराम को यहाँ आने का आदेश नहीं हुआ होता तो वे भी इस ओर मुँह नहीं करते। यह नंदनवन पठार से कुछ किलोमीटर आगे है। वहाँ और भी विकट स्थितियाँ हैं। बरफ की इतनी पतली चादर जगह-जगह बिछी होती है कि सँभल-सँभलकर धीरे-धीरे कदम रखने होते हैं। स्वामी तत्त्वबोधानंद ने बता दिया था, एक पग आगे बढ़ाओ तो बर्फीली सतह पर धीरे से कदम रखना। इतने धीरे कि जैसे फूल रख रहे हो। पाँव टिकाने से पहले भी यही सावधानी रखना। छड़ी का उपयोग भी कर सकते हो, लेकिन अकेले छड़ी के भरोसे ही मत रहना। शरीर का पूरा वजन उठाते हुए पाँव ठीक से टिक न जाए, तब तक अगला कदम न उठाना। जगह-जगह पानी के गड्ढों से भी इसी तरह बचा जा सकता है।
एक फूलों की घाटी जोशीमठ से आगे धाँधरिया के पास भूइंदर उपत्यिका में भी है। इसे नंदनकानन कहा जाता है। प्रसिद्ध नाम फूलों की घाटी ही है। त्रेतायुग में लक्ष्मण ने यहीं तपस्या की थी। लोगों का मानना है कि फूलों की घाटी परशुराम ने तैयार की थी। सीता स्वयंवर के समय भगवान राम की आज्ञा मिलने पर वे इसी क्षेत्र में आ बसे थे और ब्राह्मण धर्म त्याग कर क्षत्रियों का संहार करने के लिए उन्होंने शस्त्र उठाया था, लेकिन उन्हें लगा कि यह ब्राह्मणत्व की मर्यादा का उल्लंघन हुआ है। मन में हो रही ग्लानि या पापबोध से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने भगवान से मार्ग पूछा। भगवान ने उन्हें हिमालय क्षेत्र को पुष्प-पादपों से आच्छादित करने का मार्ग बताया। विष्णु के अंशावतार भगवान परशुराम ने इसी क्षेत्र में तप किया और सैकड़ों प्रकार के फूल-पौधे लगाए। पाँच किलोमीटर लंबे और दो किलोमीटर चौड़े उस क्षेत्र में आज भी सात सौ प्रकार के पुष्प-पादप हैं। दुनिया के किसी कोने में इतने विविध फूल-पौधे और वनस्पतियाँ नहीं हैं।
श्रीराम जिस नंदनवन में पहुँचे, वह फूलों की घाटी के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र से अलग है। वहाँ किसी का आसानी से प्रवेश नहीं हो सकता। आसानी से प्रवेश नहीं हो सकता। आसानी क्या, बहुत कष्ट उठाकर, दुस्साहस से भी नहीं जाया जा सकता। स्वामी तत्त्वबोधानंद ने जो सावधानी बताई थी, श्रीराम ने उसका पूरा ध्यान रखा। फिर भी कुछ स्थानों पर कठिनाई आई। पाँव ठीक से जमाने पर भी गहराई में धँसता प्रतीत हुआ। फिर अगले ही क्षण लगा कि जैसे कोई बाँह पकड़कर सँभाल रहा है।
पुनः हुआ साक्षात्कार
सँभलते-सँभलते दो-ढाई किलोमीटर आगे निकले होंगे कि एक टीला दिखाई दिया। उस पर बरफ का आवरण बेधकर कुछ वनस्पतियाँ उगी हुई थीं। देखकर आश्चर्य हुआ। बरफानी माहौल में हरियाली कहाँ से प्रगट हुई। फिर अपने आप समाधान भी आया कि प्रकृति का चमत्कार होगा। हो सकता है, सब सहज-स्वाभाविक हो, प्रक्रिया-विधि समझ नहीं आती है, इसलिए चमत्कार लग रहा हो। उन वनस्पतियों की ओर ध्यान लगा ही था कि ठंडी बयार का एक झोंका आया। उस झोंके में भीनी-भीनी महक भी व्याप्त थी। गंध के पहचानने की कोशिश की। ठीक वैसी ही महक थी, जैसी आँवलखेड़ा में वसंत पंचमी पर पूजा की कोठरी में अनुभव की थी।
सुगंध की पहचान होते ही वनस्पतियों की ओर से निगाह फेरी। उस दिशा में देखा, जहाँ से सुगंध आ रही थी। कुछ कदम दूर अपने उसी परिचित रूप में दिगंबर अवस्था में गुरुदेव खड़े थे। उन्हें देखकर हर्ष का स्रोत फूट पड़ा। मुखमंडल पुलकित हो उठा। उन्हें प्रणाम करने के लिए झुके। दिगंबर योगी के हाथ भी आशीर्वाद की मुद्रा में ऊपर उठे। बरफ की तरह श्वेत धवल दाढ़ी और मूछों के पीछे छिपे ओठों पर मुस्कान उभर आई। आँखों में दीप्त दिखाई दे रही चमक श्रीराम का अभिवादन करती प्रतीत हो रही थी। उन्होंने मुँह से कुछ नहीं कहा। रास्ते में हुई कठिनाइयों के बारे में भी कुछ नहीं पूछा। कुशल-क्षेम की कोई औपचारिकता नहीं बरती। अपने पीछे आने का संकेत भर किया और चल दिए।
श्रीराम अपनी मार्गदर्शक सत्ता का अनुगमन करते हुए कदम बढ़ाने लगें। उनके चित्त में अब सावधानी से चलने का विचार नहीं रहा था। वे निश्चित भाव से अपनी मार्गदर्शक सत्ता के पीछे चल रहे थे। गुरुदेव उस टीले की ओर ही जा रहे थे, जिसे देखकर श्रीराम के मन में विस्मय का भाव आया था, लेकिन वे उस टीले के ऊपर नहीं चढ़े। बरफ के भीतर बनी एक खोह में घुस गए। गुरुदेव के पीछे खोह में जाते हुए क्षणभर के लिए विचार आया कि ऊपर छाई हुई बरफ धसककर गिर जाए तो क्या होगा ? यहीं जीवित समाधि लग जाएगी। अपने ही इस विचार पर तत्क्षण हँसी भी आई। वे हँसे ही थे कि गुरुदेव ने कहा-जीवित समाधि लगने का लाभ भी तो है। तुम भी सूक्ष्म देहधारी हो जाओगे और सिद्धों के इस कानून में वास करोगे। (क्रमशः)
आवश्यक सूचना
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भाग बिना नहीं पाइए प्रेम प्रीति की भक्त। बिना प्रेम नहिं भक्ति कछु, भक्ति पर्यो सब जक्त ।। (सत्य कबीर की साखी )
श्री कबीरदास जी कहते हैं कि भक्ति भाग्य की चीज है, प्रेम प्रीति का विषय है, बिना प्रेम के भक्ति संभव नहीं है। एक निर्गुण कवि, समाजसुधारक कबीरदास जी जो कहते थे, “दास कबीर ने जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीन्हि चदरिया”-अपनी विविधतापूर्ण शैली में सदैव गुरुभक्ति-ईश्वरभक्ति की बात कहते रहे। ‘एक म्यान में दो तलवार नहीं रखी जा सकती’, से लेकर न जाने कितनी उक्तियाँ उनके द्वारा कही गई। वे लिखते हैं, “धन्य हैं वे गुरु, जो सचमुच उस भ्रमरी के समान हैं, जो निरंतर ध्यान का अभ्यास कराकर कीट को भी भ्रमरी (तितली) बना देती है। कीड़ा भ्रमरी हो गया, नई पाँखें फूट आई, नया रंग छा गया, नई शक्ति स्फुरित हुई। गुरु ने जाति नहीं देखी, कुल नहीं विचारा एवं अपने आप में मिला लिया।” यह शैली कबीरदास जी की शिक्षणपद्धति में सतत देखने में आती है। वे गुरुभक्ति की महिमा गाते-गाते नहीं थकते।
परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के दृष्टाँतों को उनकी पत्रावली के माध्यम से जब हम परिजनों के समक्ष रखते हैं तो उसके मूल में यही भाव रहता है कि अधिक-से-अधिक परिजन गुरुसत्ता के बहुआयामी पक्षों से परिचित हो सकें। आज जब वे स्थूल शरीर से नहीं हैं, सूक्ष्म व कारण रूप में ऋषियुग्म की सत्ता अपने सारे क्रिया-कलाप वैसी ही सक्रियता से कर रही है तो हम भी सभी को आश्वस्त करना चाहते हैं कि यदि मन का विश्वास प्रबल है तो आज भी वे हमें सूक्ष्म संरक्षण दे सकते हैं, हमारे कष्टों को हरने में सक्षम हैं व ढेरों चमत्कार दिखा सकते हैं। सब कुछ हमारी पात्रता एवं अटूट श्रद्धा पर निर्भर करता है। जहाँ कुतर्क जागा, संदेह पैदा हुआ, वहीं बात बिगड़ जाती है। गुरुकथामृत की इस पचासवीं कड़ी में कुछ ऐसे प्रसंग पूज्यवर की लेखनी से लिखे पत्रों के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं, जो उनके विराट रूप की झाँकी हमें दिखाते हैं। इन पत्रों से निश्चित ही सभी का विश्वास और प्रगाढ़ होगा।
21 अप्रैल, 1955 को लिखे एक पत्र में एक प्रिय शिष्य को वे लिखते हैं- विवाह में उत्पन्न किए जाने वाले सब उपद्रवों के प्रति आपको सावधान कर दिया है। साथ ही हम स्वयं भी पूरा मन और समय लगाकर विवाह की शाँति हेतु सुरक्षापूर्वक लगे रहेंगे। इन दिनों हमारा बिना सोए, बिना अन्न-जल ग्रहण किए अखण्ड सुरक्षा उपचार जारी रहेगा। बारात विदा होते ही आप पूर्ण सुरक्षा और शाँतिपूर्वक सब कार्य हो जाने पर हमें तार दे दें, ताकि अपना उपचार समाप्त कर दें। बारात आने पर भी तार दे दें।
इतनी अधिक चिंता अपने प्रिय शिष्य की, उसके परिवार की सुरक्षा की। यद्यपि उनके स्तर की सत्ता सब कुछ जानती रही, फिर भी लौकिक दृष्टि से लिखना कि सब कार्य शाँतिपूर्वक होने पर तार दे दें, यह बताता है कि वे कितने व्यवहारकुशल भी थे। बिना सोए, बिना अन्न-जल ग्रहण किए सुरक्षा-उपचार एक अखंड समय विशेष में यह कार्य वही कर सकता है, जो किसी को अपनी आत्मीय, बहुत ही नजदीक की सत्ता समझे। परमपूज्य गुरुदेव ने एक नहीं, लाखों-करोड़ों को इस स्तर तक अपनी नजदीकी आत्मीयता का पोषण दिया और उसी का परिणाम है यह विराट गायत्री परिवार।
एक और पत्र लेते हैं। यह पत्र 22/3/64 को गामड़ी गुजरात के एक परिजन को लिखा गया था। वे लिखते हैं-पत्र मिला। कुशल समाचार पढ़कर प्रसन्नता हुई। बच्चा गायत्री माता के विशेष प्रसाद स्वरूप आपको प्राप्त हुआ है। यह वही बालक है, जो पहले चला गया था। माता ने आपकी श्रद्धा-भक्ति के अनुरूप ही आपको लौटाया है। बड़ा होने पर प्रत्येक बात में यह पहले गुजरे हुए बालक जैसा ही दिखाई देगा।
पत्र अपने आप में स्पष्ट है। अपने प्रिय शिष्य को गायत्री उपासना के माध्यम से उसी बालक को वापस लौटाया गया है, जो अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ था। गायत्री “सर्वकामधुक्” समस्त कामनाओं की पूर्ति कराने वाली शक्ति है-सब कुछ इसके माध्यम से संभव है, पर उसके लिए स्वयं की साधना व पात्रता भी चाहिए तथा एक समर्थ गुरु का अवलंबन भी। गायत्री का सिद्ध महापुरुष भी हर किसी को यह नहीं दे देता, न ही सृष्टि के विधान में वह कोई हस्तक्षेप करना चाहता है, परन्तु जहाँ शिष्य का हित हो, शिष्य स्वयं पूरा समर्पण भाव रख वह सब कुछ करने को तैयार हो, जो गुरु कह रहे हैं, तब समर्थ गुरु अपने अनन्य प्रेम के कारण उसके लिए ऐसा भी कर देते हैं। लिखा भी है पूज्यवर ने-”माता ने आपकी श्रद्धा-भक्ति के अनुरूप ही आपको लौटाया है।” यही समझना जरूरी है। परमपूज्य गुरुदेव ने स्वयं श्रेय न लेकर सारा श्रेय माता गायत्री को एवं अपने शिष्य की श्रद्धा-भक्ति को दिया है। ऐसा कितनों को मिला, कितनों ने ही उनसे इतना कुछ पाया, पर देने की बारी आई तो वे दे पाए क्या ? यह विचारणीय है।
दिगौड़ा टीकमगढ़ के एक परिजन को पूज्यवर ने अपने 30/10/65 के पत्र में लिखा-बच्चे के स्वर्गवास का समाचार पढ़कर हमें भी आपकी ही तरह आघात लगा। आपका परिवार हमें अपने निजी परिवार जैसा ही प्रिय है। स्वर्गीय आत्मा फिर आप लोगों के घर अवतरित हो, ऐसा प्रयत्न कर रहे हैं।
ठीक वैसा ही पत्र है, जैसा ऊपर दिया गया है। यहाँ भी वही आश्वासन है। अपने प्रिय शिष्य के मानसिक दुःख और आघात से विचलित गुरु उसे आश्वस्त करते हैं एवं एक वर्ष बाद ही उसे पुनः पुत्ररत्न देते हैं, जो आगे चलकर गुरु कार्य कर सके। यह आश्वासन कौन दे सकता है ? जिसे सामने वाले से अत्यधिक स्नेह हो, स्वयं में सृष्टि के नियमों में हस्तक्षेप करने की शक्ति हो। विश्वामित्र स्तर की नूतन सृष्टि का सृजेता होने जैसे महामानव की पात्रता वाले सद्गुरु ही ऐसा कर सकते हैं। 20/1/67 का विलासपुर (छ ग) के एक परिजन को लिखा ऐसा ही एक पत्र है-तुम्हारा बच्चा चला गया, इसका दुःख है। इस आत्मा को फिर तुम्हारी गोदी में बुला देने का प्रयत्न करेंगे।
ये सभी एक तरह के पत्र सद्गुरु की सामर्थ्य के, उनके अनन्य प्रेम के, उनकी गायत्री सिद्धि के द्योतक हैं। हम तनिक भी उनकी सत्ता पर विश्वास रख सकें तो हम भी सुपात्र बन बहुत कुछ पा सकते हैं।
गुरु सहारा देता है, सतत संरक्षण देता है। सद्गुरु का सिर पर हाथ है तो फिर कोई भी बाल बाँका नहीं कर सकता, यह विश्वास मन में आ जाता है। आत्मबल बढ़ जाता है। फिर निर्भय-निश्चिंत होकर शिष्य अपना पुरुषार्थ अपने से ज्यादा गुरुकार्यों के लिए करने को तैयार हो जाता है। एक पत्र 27/4/1968 का है, जो दिल्ली के एक परिजन को लिखा गया है-
हम कहीं भी रहें। तुम लोगों का पूरा स्मरण सदा रखते हैं। बच्चे की समस्या जटिल है, पर उसे हमने अपने जिम्मे ले लिया है। उसे टल गई समझें।
पत्र में स्पष्ट आश्वासन है। यह भी संकेत है कि शरीर कहीं भी हो, उनका मन, अंतःकरण सदा अपने शिष्यों के साथ है। इतना-सा भी किसी के पास सहारा हो तो वह असंभव दीख पड़ने वाले कार्य भी करके दिखा देता है। ऐसा हुआ, तब ही तो यह विराट परिवार बड़ा हुआ। वास्तव में ऐसे पत्रों के पीछे छिपे मर्म को यदि कोई समझ ले तो वह इस परिवार की, विराट संगठन की जड़ों की मजबूती का कारण समझ सकता है। आत्मीयता की, पारिवारिकता की धुरी पर ही कोई संगठन खड़ा हो सकता है। ऐसे संगठन ही स्थायी व भगवत्कर्म के लिए समर्पित कार्य करने वाले होते हैं।
अब अंत में एक पत्र और। साधक की जिज्ञासा स्वप्नों को लेकर है। उसका जवाब जरा देख लें। पत्र 28/1/70 का है।
शुभ स्वप्नों में उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ हैं। आपके आत्मिक तथा भौतिक जीवन को गतिशील बनाए रखने के लिए हम शक्तिभर प्रयत्न करेंगे। आपकी आत्मा पहले भी बहुत ऊँची रही है। बीच में ही कुछ मलीनता आ गई थी। जिनका भुगतान इन दिनों हो रहा है। आप जल्दी ही वर्तमान बंधनों से मुक्त हो लेंगे। हमारे तप का एक अंश आपको मिलेगा और आप हमारी नाव पर चढ़कर इस भवसागर को आसानी से पार कर लेंगे।
गुरु की नाव पर बैठकर कोई भी शिष्य पार हो सकता है। वह हमारा पिछला-वर्तमान-भविष्य सब कुछ जानता है। वही हमें बंधनों से मुक्त करा सकता है। गुरु के तप का एक अंश उसके लिए सुरक्षित है, क्योंकि पात्रता वह सिद्ध कर चुका है एवं अपने उज्ज्वल भविष्य के परिचायक शुभ स्वप्नों का समाधान खोज रहा है। यह एक खुला निमंत्रण है, हर किसी को। जिसे भवसागर को पार करना हो, वह सद्गुरु की नाव में बैठ जाए उनका अनंत प्रेम भी पाएगा और बंधनमुक्ति भी। इतना स्पष्ट निमंत्रण होते हुए भी हम सकुचा क्यों जाते हैं?
जनवरी 2004 का अंक विशेषाँक
अगला अंक ‘जीवन साधना विशेषाँक’ होगा। अन्य नियमित स्तंभ इसमें नहीं होंगे। ‘आर्ट ऑफ लिविंग‘ जिसकी परिभाषा पूज्यवर ने सबसे पहले की, आज विविध रूपों में कमाई का साधन बनी दिखाई पड़ती है। वस्तुतः जीवन साधना क्या है? कैसे हम इस जीवनरूपी प्रत्यक्ष देवता को साधें, इस नकद धर्म को कैसे भुनाएँ, जीवनशैली किस तरह व्यवस्थित करें, उस पर विशेषज्ञ लेखनी से पूज्यवर का चिंतन जनवरी 24 की ‘अखण्ड ज्योति’ में पढ़ें। अधिक-से-अधिक नए व्यक्ति पढ़ सकें, इसलिए अभी से इन्हें जोड़ें।
परमपूज्य गुरुदेव क्राँतिधर्मी साहित्य की एक अति महत्वपूर्ण पुस्तक ‘नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी’ में लिखते हैं- “बीज बोने का समय थोड़ा ही होता है। वृक्ष का अस्तित्व लंबे समय तक स्थिर रहता है, सन 1990 से लेकर 2000 तक के दस वर्ष जोतने, बोने, उगाने, खाद-पानी डालने और रखवाली करने के हैं। इक्कीसवीं सदी से वातावरण बदल जाएगा, साथ ही परिस्थितियों में भी भारी हेर-फेर होगा। इन सभी के विस्तार में एक शताब्दी ही लग जाएगी- सन 2000 से 2099 तक। उस बीच इतने बड़े परिवर्तन बन पड़ेंगे, जिन्हें देखकर जनसाधारण आश्चर्य में पड़ जाएंगे। सन् 1900 में जो परिस्थितियों थीं, वे तेजी से बदलीं और क्या से क्या हो गया, यह प्रत्येक सूक्ष्मदर्शी जानता है। अगले दिन इतने आश्चर्यजनक परिवर्तनों से भरे होंगे, जिन्हें देखकर प्रज्ञावानों को यही विदित होगा कि युग बदल गया, अनुभव होगा कि मनुष्य का शरीर तो पहले जैसा ही है, किंतु उसका मानस, चिंतन व दृष्टिकोण असाधारण रूप से बदल गया और समय लगभग ऐसा आ गया, जिसे सतयुग की वापसी कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी।” (पृष्ठ 25-26)
हमारी अपनी तैयारी कितनी है, जरा विचारें
तूफानी प्रवाह आ रहा है
यही है युग- परिवर्तन की-युग के नवनिर्माण की पृष्ठभूमि। आज के असुरता के विनाशकारी ताँडव से भरे दृश्यों को देखकर सहज ही किसी को लगता होगा कि ऐसे में युग कैसे बदलेगा? परिस्थितियाँ कैसे बदल जाएँगी? देखते-ही-देखते अनुकूलताएँ कैसे आ जाएँगी? भारत किस तरह व कब एक समर्थ राष्ट्र-सारे विश्व का सिरमौर एक शक्तिशाली राष्ट्र बनकर खड़ा होगा? ये प्रश्न स्वाभाविक हैं और हर किसी के मन में ये आते हैं। उन्हीं के लिए पूज्यवर लिखते हैं, “प्राचीनकाल में समय की गति धीमी थी, परिवर्तन क्रमिक गति से होते थे, पर अब की बार प्रवाह तूफानी गति से आया है और दो हजार वर्षों में होने वाला कार्य मात्र एक सौ वर्ष में पूरा होने जा रहा है। नई शताब्दी नए परिवर्तन लेकर तेजी से आ रही है।” (उपर्युक्त- पृष्ठ 26)
इसके पहले भी कई बार पूज्यवर कह चुके हैं कि दो हजार वर्षों की गुलामी-परावलंबन से उपजा कचरा तुरंत साफ हो जाए, संभव नहीं। परंतु यह कार्य 2000 से आरंभ हो जाएगा और दस वर्ष के भीतर ही जनसामान्य युग-परिवर्तन के चिह्न देखने लगेगा। हम इक्कीसवीं सदी के तीन वर्ष इस माह पूरे कर रहे हैं। दिसंबर, 2003 के तुरंत बाद हम चौथे वर्ष में प्रवेश कर जाएँगे। विगत तीन वर्षों की उपलब्धियों पर हम दृष्टि डालें तो प्रतीत होगा कि विध्वंस की तुला में सृजन तेजी से हुआ है, देवमानवों का उत्पादन बढ़ा है, जनसामान्य अति अल्प अवधि में अध्यात्म तंत्र की ओर उन्मुख हुआ है एवं ढेरों रचनात्मक कार्य एक साथ कई जगह चल पड़े हैं। 2003 के सूर्यास्त के समय हम काफी उम्मीदों के साथ 2004 के अरुणोदय का स्वागत करने जा रहे हैं। हमें आशा करनी चाहिए कि आने वाला वर्ष और भी नई सुखद संभावनाएं लेकर आएगा।
महाप्रज्ञा का अवतरण होना ही है
परमपूज्य गुरुदेव इसी पुस्तिका में लिखते हैं, “समय बदल रहा है। रात्रि का पलायन और प्रभात का उदय हो रहा है। उसका निमित्त कारण एक ही बनने जा रहा है कि लोग अपने को बदलेंगे। स्वभाव में परिवर्तन करेंगे। गिरने और गिराने के स्थान पर उठने और उठाने की रीति-नीति अपनाएँगे और पतन के स्थान पर उत्थान का मार्ग ग्रहण करेंगे। यही नवयुग है, सतयुग है, जो अब निकट से निकटतम आता जा रहा है।” (पृष्ठ 32) कितनी स्पष्ट घोषणा है और हम हैं कि निराशावादी- पलायनवादी तथाकथित ब्रह्मज्ञानी बनकर समाधान यहाँ-वहाँ खोजने जा रहे हैं। समस्याएँ सुलझेंगी लोकमानस के परिष्कार से, महाप्रज्ञा के मानवमात्र में अवतरण से, पुण्य-परमार्थ और धर्म-धारणा में लाखों-करोड़ों देवमानवों के नियोजन से। हमारी सारी गतिविधियाँ, युगचेतना विस्तार, विराट यज्ञायोजनों की शृंखला, सम्मेलनों के आयोजन, बौद्धिक सभाएँ, विश्वस्तर पर व्यापक जनसंपर्क, भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का दिग्-दिगंत तक प्रायः सभी भाषाओं में विस्तार तथा देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का बढ़ता व्यापक स्वरूप इसके परिचायक हैं। एक ऐसी नई युवा पीढ़ी युगनायकों की, महामानवों की खड़ी होने जा रही है जो आगामी दो दशकों में अपने क्रिया-कलापों से सभी को अचंभित कर देगी।
परमपूज्य गुरुदेव इसीलिए इस पुस्तिका में लिखते हैं, “नवयुग का आगमन-अवतरण निकट है। उसे स्रष्टा किसके माध्यम से पूरा करने जा रहे हैं, यह जानना हो तो समझना चाहिए कि युग अवतरण का श्रेय उन्हीं को उपहार स्वरूप भगवान दे रहे हैं, जो उनके काम में लगे हैं। ऐसे लोगों को ही बड़भागी और सच्चा भगवद्भक्त मानना चाहिए।” (पृष्ठ 32)
हम सभी को अपनी-अपनी भूमिका तय कर लेनी है। अगले दिनों युग के नवनिर्माण में, लोकमानस के परिष्कार में हमारी क्या भूमिका होगी, यह हमें ही तय करना होगा। देवमानव अपने उपार्जन से न्यूनतम अपने लिए खरच करते हैं और शेष को परमार्थ-प्रयोजनों में लगा देते हैं। ऐसे देवमानवों का अधिकाधिक उत्पादन-प्रशिक्षण-नियोजन हमें अगले दिनों करना है। कार्यक्षेत्र पूरा भारत ही नहीं, विश्व-वसुधा होगी। मानव शरीर में प्रतिभावान देवदूत प्रकट होने जा रहे हैं। पूज्यवर के अनुसार इनकी पहचान एक ही होगी- वे अपने समय का अधिकाँश भाग प्रभु की प्रेरणा के लिए लगाएँगे।
एक महत्वपूर्ण वर्ष में प्रवेश
आगामी वर्ष ‘ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान’ के रूप में ‘विज्ञान और अध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादन हेतु स्थापित एक तंत्र’ की रजत जयंती का वर्ष है। 1979 में यह स्थापना हुई थी। गत पच्चीस वर्षों में इसके तत्वाधान में ढेरों कार्य हुए हैं। शोध के नए आयाम स्थापित हुए हैं। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की अब सभी चर्चा करने लगे हैं। अब देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ-साथ दोनों की समन्वित कार्यशैली से और भी महत्वपूर्ण कीर्तिमान भरे कार्य सामने आने जा रहे हैं। कट्टरवाद-उपभोक्तावाद-खुले बाजार की बात करने वाले वैश्वीकरण के समर्थक तंत्र ने कितनी हानि पहुँचाई है, यह सभी जानते हैं। समाधान एक ही है- विज्ञानसम्मत अध्यात्म का जीवन में समावेश। अपने अंतः में प्रसुप्त पड़े वर्चस् का योग-साधना द्वारा जागरण, प्रतिभा का समाज के उन्नयन में नियोजन तथा युवाशक्ति द्वारा रचनात्मक अभियानों को गति दिया जाना। इन सभी कार्यों को अगले वर्ष वरीयता दी जाएगी और इस अभियान को भारतव्यापी बनाना होगा। युग निर्माण सत्संकल्प के अठारह सूत्र सतयुगी समाज के आधार पर बनेंगे। विभूतिवान-प्रतिभाशाली स्वयं इनका जन-जन तक प्रचार करते देखे जाएँगे। इन्हीं में चिंतन को क्रिया में बदलने की शक्ति होती है। ये साक्षात् सजीव प्राणशक्ति होते हैं। बड़े कार्य में ही करेंगे, यह भवितव्यता आगामी वर्ष साकार होती दिखाई देगी।
क्षेत्रीय संगठन की सुव्यवस्थित रीति-नीति
संगठन-सशक्तीकरण की प्रक्रिया सारे देश में गतिशील हो चुकी है। सात जोनल एवं चौदह उपजोनल केंद्र सक्रिय हो चुके हैं। शाँतिकुँज के केंद्रीय प्रतिनिधि इन कार्यालयों में जाकर बैठने लगे हैं। अब यह एक विराट गायत्री परिवार रूपी संगठन का एक सुव्यवस्थित रूप बनकर सामने आ रहा है। अब हर कार्य के लिए क्षेत्र के कार्यकर्त्ता केंद्र का मुँह नहीं देखेंगे। जोनल केंद्र इनकी आवश्यकता को पूरा कर रहे हैं व आगे और दक्षता के साथ संपन्न करेंगे। अब हर यूनिट अपना कार्यक्षेत्र सँभालने लगे और सातों आँदोलनों की योजनाओं को गति देने लगे, यह एक बहुत बड़ी आवश्यकता है। पत्रिकाओं के पाठक अब बढ़ने ही चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव का लिखा साहित्य संजीवनी समान है। अपने साहित्य विस्तार पटलों, शक्तिपीठों, ज्ञान केंद्रों, जोनल कार्यालयों के द्वारा पूज्यवर का साहित्य जन-जन तक पहुंचना चाहिए। इस जनजागरण के ज्ञानयज्ञ से ही वह पुरुषार्थ संपन्न होगा, जो प्रतिभाओं को मलाई की तरह तैराकर समाज रूपी दुग्धसागर में ऊपर ले आएगा। ये प्रतिभाएँ ही नवसृजन के कार्यों में लगेंगी।
मिशन का-अखिल विश्व गायत्री परिवार का कार्यक्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें हर व्यक्ति के लिए कार्य करने की अनंत संभावनाएँ हैं। न्यूनतम साधन वाले, पर भावना की दृष्टि से प्रबल व्यक्तियों से लेकर साधन-संपन्नों, हर व्यक्ति के लिए स्वयं के समयदान-अंशदान नियोजित करने हेतु एक बड़ा व्यापक क्षेत्र है। शिक्षा से लेकर कृषि, ग्रामीण स्वावलंबन से लेकर स्वास्थ्य-संवर्द्धन तथा युग-साधना विस्तार (देवालय प्रबंधन) से लेकर पर्यावरण के प्रति जागरुकता का संवर्द्धन, नशा-निवारण, कुरीति-उन्मूलन जैसे ढेरों कार्य हमारे सामने हैं। इनमें भागीदारी करने हेतु हमारे क्षेत्र के संगठित समूहों, समन्वय समितियों, प्रज्ञामंडलों, ट्रस्टों से जुड़ी समितियाँ, सभी को प्रतिभाओं से भावभरा आह्वान करना चाहिए। ऐसे सदुद्देश्य व सुनिश्चित कार्यप्रणाली सामने होते हुए ढेरों व्यक्ति सामने आएँगे और विभिन्न आँदोलनों को अपने हाथ में ले लेंगे। अपने परिवार, अखण्ड ज्योति पाठकों के समुदाय में भी ढेरों ऐसे हो सकते हैं, जो अभी उस भूमिका में न उतर पाए हों। उनके लिए भी, प्रशिक्षित हो इस नवनिर्माण के महायज्ञ में भागीदारी हेतु भावभरा आमंत्रण है।
क्या हैं हम तैयार
‘महाकाल’ की तैयारी में हमारी अपनी तैयारी कितनी है, उसका मूल्याँकन करने का सही समय आ गया है। अब शाँत बैठकर भजन करने का नहीं, समाजदेवता-राष्ट्रदेवता की आराधना हेतु स्वयं को नियोजित करने का समय आ गया है। भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है। हम आगे बढ़कर श्रेय ले लें, अपनी भूमिका निभा लें। समय चूक जाने पर तो पछतावा ही शेष रहता है।
नवयुग पंचाँग अब उपलब्ध
सन् 24 का नवयुग पंचाँग (संवत् 260-261) अक्टूबर माह में ही प्रकाशित हो चुका है। इसे सौजन्य से भी छपाकार अपने कार्यक्षेत्र-व्यापारी समूहों में वितरित किया जा सकता है। मिशन की समग्र जानकारी वाला यह कैलेंडर हर परिजन-पाठक ही नहीं, उनसे परिचित सभी परिजनों के घर में शोभायमान होना चाहिए। प्रति कैलेण्डर मूल्य 15/ रुपये है। अधिक संख्या में मँगाने वालों को कमीशन मिलेगा। शाँतिकुँज हरिद्वार से यह उपलब्ध है।
पारस्परिक चर्चा के दौरान मंत्री ने राजा से कहा, “यदि अवसर मिले तो कोई चालाकी से चूकता नहीं। अवसर मिलते ही लोग धूर्तता का अवलंबन लेते हैं।”
राजा ने कहा, “इसका अर्थ यह हुआ कि संसार में भलमनसाहत है ही नहीं।” मंत्री ने कहा, है तो, पर उसे जीवित या सुरक्षित तभी रखा जो सकता है, जब सामाजिक नियंत्रण व रोकथाम का समुचित प्रबंध हो। छूट मिले तो कदाचित् ही कोई बेईमानी से चूके।”
बात राजा के गले न उतरी। मंत्री ने ताड़ लिया और अपनी बात का प्रमाण देने के लिए एक उपाय किया।
प्रजा में घोषणा कराई गई कि किसी राज-काज के लिए हजार मन दूध की आवश्यकता पड़ेगी। सभी प्रजाजन रात्रि के समय खुले पार्क में रखे हुए कड़ाहों में अपने-अपने हिस्से का एक-एक लोटा दूध डाल जाएँ।
रात्रि के समय पार्क में बड़े-बड़े कड़ाह रख दिए गए। चौकीदारी का कोई प्रबंध नहीं किया गया। स्थिति का पता कानों-कान सभी को लग गया। रात्रि का समय और चौकीदारी का न होना, इन दो कारणों का लाभ उठाकर प्रजाजनों ने दूध के स्थान पर पानी डालना आरंभ कर दिया। इतने लोटे दूध होगा तो हमारे एक लोटे पानी का किसी को पता भी न चलेगा। सभी ने एक ही तरह सोचा और अपने हिस्से के दूध के बदले पानी डाला।
दूसरे दिन मंत्री राजा को दूध के कड़ाह दिखाने ले गए। सभी पानी से भरे हुए थे। दूध का नाम तक न था।
राजा ने उस दिन समझा कि समाजतंत्र में नीतिनिष्ठा को जीवित बनाए रखने के लिए सामाजिक अनुशासन की कितनी आवश्यकता है।
दिशा दिखाई दिव्य गुरु ने हमने भी तो ठानी है। विकसित कर अपनी प्रतिभा को राहें नई बनानी है॥1॥
सूख गए संवेदन के स्वर निष्ठुरता अपनाई है, भावों की संकीर्ण वृति ने भीषण आग लगाई है, भेद मिटा दो आज यहाँ से अपने और विराने का, सबके हित संकल्पों का है वक्त आज दोहराने का, अंतर का उल्लास जगाकर ममता मधुर जगानी है॥2॥
काम बड़ा है आज सामने नवयुग के निर्माण का, गीध गिलहरी वानर भालू के जैसे अभियान का, जो भी अपनी बने भूमिका उसका आज निभाना है, श्रेष्ठ कार्य के लिए समर्पण का जौहर दिखलाना है, युगों-युगों में मिले सुअवसर बाजी नहीं गंवानी है॥3॥
दृष्टि दोष ने छीन लिया है दिल दिमाग का बड़ा सकून, अवाँछनीयता जोंक की तरह चूस रही काया का खून, सबसे पहले निज सुधार की शपथ हमें है खानी, फिर परिवार समाज देश के लिए बने बलिदानी, हर कुरीति से लड़ना है हर शंका दूर भगानी है॥4॥
सूक्ष्मलोक से गुरुवर द्वारा मिलता प्रखर प्रकाश है, विकट समस्या के निदान का चलता सतत प्रयास है, एक अनोखी नई कहानी का सुपात्र बन जाना है, अपने सत्कर्मों से ही धरती को स्वर्ग बनाना है, अब अनुग्रहीत अनुदानों की बही धार तूफानी है॥5॥
-शोभाराम शशाँक