एक फूल को मैं प्रेम करता हूँ, इतना प्रेम करता हूँ कि मुझे डर लगता है कि कहीं सूरज की रोशनी में कुम्हला न जाये और मुझे डर लगता है कि कहीं जोर की हवा आये, इसकी पंखुड़ियाँ न गिर जायें और मुझे डर लगता है कि कोई जानवर आ कर इसे चर न जाये और मुझे डर लगता है कि पड़ोसी के बच्चे इसको उखाड़ न लें, तो मैं फूल के पौधे को मय गमले के तिजोरी में बंद करके ताला लगा देता हूँ। प्रेम तो मेरा बहुत है, लेकिन करुणा मेरे पास नहीं है।
मैंने पौधे को बचाने के सब उपाय किये। धूप से बचा लिया, हवा से, जानवरों से। मजबूत तिजोरी खरीदी, इसको भी मेहनत करके बनाया, ताला लगा कर पौधे को बंद कर दिया। लेकिन अब यह पौधा मर जायेगा। मेरा प्रेम इसे बचा नहीं सकेगा। और जल्दी मर जायेगा। हो सकता था बाहर हवाएँ थोड़ी देर लगातीं और पड़ोसी के बच्चे हो सकता था, इतनी जल्दी न भी आते और सूरज की किरणें फूल को इतनी जल्दी न मुर्झा देतीं, लेकिन तिजोरी में बंद पौधा जल्दी ही मर जायेगा। प्रेम तो पूरा था, लेकिन करुणा जरा भी न थी।
जगत् में प्रेम भी रहा है, दया भी रही है, लेकिन करुणा नहीं। करुणा का अनुभव ही नहीं रहा है। और करुणा का अनुभव आये तो ही हम जीवन को बदलेंगे। और करुणा से अगर दया निकले तो वह दया नकारात्मक न रह जायेगी। उसमें अहंकार की तृप्ति न होगी। और करुणा से अगर अहिंसा निकले तो वह निषेधात्मक न रह जायेगी। वह सिर्फ इतना न कहेगी कि दुःख मत दो, वह यह भी कहेगी दुःख मिटाओ भी, दुःख बचाओ भी, दुःख से मुक्त भी करो, सुख भी लाओ। और अगर करुणा से प्रेम निकले तो प्रेम मुक्तिदायी हो जायेगा, बंधनकारी नहीं रह जायेगा।
सद्गुरु का प्रेम ऐसा ही है। इन बासन्ती क्षणों में करुणा की यह महक बह रही है। यह महक है सद्गुरु की करुणा की। शिष्यवत्सल गुरुवर का प्रेम करुणा से आपूरित है। यह हमारी सामान्य मानवीय दोष-दुर्बलताओं से मुक्त है। प्रेम की सम्पूर्ण उर्वरता इसमें मौजूद है। इसमें संघर्ष है तो सृजन भी है। प्रगति व विकास के चहुँमुखी छोर इसमें है। व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास की चमक इसमें है। गुरु स्मरण से मिलने वाला करुणा से आपूरित गुरुप्रेम बसन्त पर्व के इन पावन क्षणों में हम सबको सहज सुलभ है।
आत्मा ने परमात्मा से याचना की, ‘असतों मा सद्गमय’, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, ‘मृत्योर्मा अमृतम् गमय’। ये तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। निर्वस्त्र होते समय द्रौपदी ने अपने को असहाय पाकर भगवान को पुकारा था। गज जब ग्राह के मुख में फँसता ही चला गया, पराक्रम काम न आया और जब जौर भर सूँड़ जल से बाहर रह गई तो उसने भी गुहार मचाई। दोनों को ही समय रहते सहारा मिला। एक की लाज बच गई। दूसरे के प्राण बच गए। जीवात्मा की तात्विक स्थिति भी ऐसी ही है। उसका संकट इनसे किसी भी प्रकार कम नहीं।
मोटे तौर पर मनुष्य खाता, सोता, रोब गाँठता और शान दिखाता है, विलास वैभव का यथास्थिति लाभ उठाता है, किंतु यह सारा सरंजाम शरीर तक ही सीमित है। समय गतिशील है। वह तेजी से बदलता और आगे बढ़ता है। इसके साथ ही उपलब्धियों की अनुभूतियाँ भी भूतकालीन बनती जाती हैं। इसी बीच इच्छाएँ प्रबल हो लेती हैं। पिछली उपलब्धियाँ स्मरण आती रहती हैं और उनसे भी अधिक अच्छी स्थिति पाने की ललक उभरती है, लिप्सा जगती है। पिछले दिनों जो मिला था, अगले दिनों उससे भी अधिक पाने का मनोरथ इस आतुरता से उभरता है कि वर्तमान की स्थिति असंतोष से ही भरी रहती है। जो मिल चुका, वह चला आया। जो इच्छित है, उसके मिलने का कोई निश्चित समय नहीं। इसलिए मृगतृष्णा स्तर की प्यास से हर घड़ी गला सूखता रहता है। संतोष और चैन का अनुभव हो नहीं पाता। न विगत को वापस बुलाया जा सकता है और न आगत कोई निश्चित आश्वासन ही देता है। इस स्थिति में अशाँत उद्वेग के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर इस स्थिति का कारण क्या है? इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाय तो पता चलता है कि जो असत् था, अस्थिर था, नाशवान था, जाने वाला था, उसे चाहा गया, उसे पकड़ा गया। जो स्थिर था, शाश्वत था, सनातन था, सत् चित् आनंद से युक्त था, उसकी उपेक्षा की गई, उसे गौण समझा गया और उस और से नाता तोड़ लिया गया। इसी भूल का परिणाम है कि भीतर और बाहर से सब प्रकार संपन्न होते हुए भी अभावग्रस्तों की तरह, दीन हीनों की तरह उपेक्षणीय जीवन जिया गया।
‘सत्’ स्थिर आत्मा है। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो गुण कर्म स्वभाव में सन्निहित मानवीय गरिमा ही ‘सत्’ है। जो सत् को पकड़ता हे, अपनाता है और धारण करता है, उसका आनंद सुरक्षित रहता है। कस्तूरी का पता चलते ही हिरन ही भाग दौड़ बंद हो जाती है और नाभि से निकलने वाली सुवास से वह हर घड़ी आनंदविभोर रहता है। उसे पश्चात्ताप सिर्फ इस बात का होता है कि जो अपने ही पास था, उसकी जानकारी पहले क्यों नहीं हुई और उसकी तलाश में यत्र तत्र भागता रह कर अपनी शाँति क्यों भंग करता रहा! मानव जीवन से इसकी संगति हू ब हू बैठ जाती है। भीतर से उभरी गरिमा बाह्य जीवन को भी उल्लसित, विकसित, विभूतिवान बना देती है, चिंतन, चरित्र और व्यवहार में ऐसी शालीनता भर देती है, जिसका प्रतिफल दसों दिशाओं में अमृततुल्य अनुदान बरसाता है। आत्मा ने उसी के लिए पुकार की है कि उसे ‘सत्’ की उपलब्धि हो। असत् की ओर आँखें, मूँदकर दौड़ पड़ने की प्रवृत्ति रुके। शाँति का सरोवर सामने रहते हुए सड़न भरी दलदल में घुस पड़ने और चीखने चिल्लाने की आदत पर अंकुश लगे। इतना बन पड़े तो किसी से कुछ माँगना चाहना न पड़े। अपने अंतराल से ही आनंद का ऐसा निर्झर बहे, जो अपने को भी गौरव प्रदान करे और दूसरों का भी हितसाधन करते हुए निहाल बने।
आत्मा की दूसरी पुकार है, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’। हे सर्वशक्तिमान! हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल। जो क्रम अपनाया गया है, वह अंधकार से भटकने के समान है। रात्रि की तमिस्रा में कुछ पता नहीं चलता कि किस दिशा में चल रहे हैं। यथार्थता का बोध न होने से ठोकर खाते और कंटकों की चुभन से मर्माहत होते हैं। कुछ−का−कुछ समझ में आता है, कुछ का कुछ दीख पड़ता है। शरीरगत सुविधाएँ ही लक्ष्य बनी रहती हैं। जड़ का जड़ता के साथ पाला पड़ता है। चेतना का अमृतकुँभ कहाँ रखा है, इसकी प्रतीति ही नहीं होती। वर्तमान और भविष्य अंधकारमय दीखता है। कुबेर का वैभव तो बटोर लिया जाता है, पर वह अंगार बनकर जलाता रहता है। सुख का एहसास उतने पर भी नहीं हो पाता। उत्तम वस्तु भी घातक एवं निकृष्ट बन जाती है। मनुष्य जीवन में भरी हुई विभूतियां यदि सही रूप से पहचानी और प्रयुक्त की गई होती तो उनका लाभ भी मिला होता, पर अंधकार में तो सर्वत्र भय−ही−भय है। मृत्यु का भय, हानि का भय, अपहरण का भय, अपनों से भय, बिरानों से भय। अंधकार का, अज्ञान का ही दूसरा नाम भय है। इसी भय से मुक्ति के लिए अध्यात्म मार्ग में दीक्षित शिष्य गुरु से प्रार्थना करता है, ‘अज्ञानतिमिरान्धस्य, ज्ञानाँजन शलाकया ... ‘ अर्थात् अज्ञानरूपी अंधकार से अंधी आँखों को ज्ञान का अंजन लगाकर खोल दिया जाए। भय चाहे किसी भी प्रकार का हो, वह हमेशा डरावना होता है। डरावनेपन का अनुभव हम रोज ही करते हैं। इस स्थिति में मनः स्थिति इतनी डाँवाडोल हो जाती है। कि आदमी प्राप्त कुछ करना चाहता है, पर कुछ के बदले कुछ हाथ लगता है। अपने पराए, दीखते हैं और पराए अपने। सुँदर आकृतियाँ भी अँधेरे में भूत−प्रेम जैसी कुरूप और भयंकर लगती हैं। डर से जीवन मर−सा गया है। यह अज्ञान−अंधकार की ही करतूत है। प्रकाश भीतर दबा पड़ा है, वह ऊपर से बरसता नहीं। इस विपन्नता से घिरी हुई आत्मा अपने सृजेता से पुकारती है, “अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, ले चल!” भटकाव से निकाल और उस राह पर खड़ा कर, जिसे अपनाकर सफलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचा जा सके। अँधेरे मार्ग में, डरावने मार्ग में, भटकाव भरे मार्ग में विश्राम करना खतरे से खाली नहीं है। अतएव हमें चिर−परिचित पथ पर ले चल, जो सुरक्षित हो और अंतिम सीमा तक पहुँचाता हो। कदाचित् इसी कारण से कवि जयशंकर प्रसाद का मन मुखरित हो उठा हो—
इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्राँति भवन में टिक रहना, किंतु पहुँचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं।
यह उसी आत्मा की आवाज है, जो चीख−चीखकर टेर लगा रही है कि हमें अध्यात्म के प्रकाश−पथ पर ले चलो, भौतिकता की चकाचौंध में न उलझाओ, क्योंकि यह पथ वहाँ तक नहीं जाता, जो जीवन का चरम लक्ष्य है। अध्यात्म का राजमार्ग ही हमें उस चरम बिंदु पर ले जाकर प्रतिष्ठित कर सकता है, जो हमारा प्राप्तव्य है। सचमुच भगवद्प्राप्ति के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। प्रशस्त राजमार्ग का वही चरमोत्कर्ष है, वह इसी बिंदु पर आकर केंद्रीभूत हो जाता है। यही है अंधकार से प्रकाश की ओर गमन।
तीसरी पुकार जीवात्मा की है कि मृत्यु की ओर नहीं, अमृत की ओर ले चल। कुसंस्कारिता के कषाय−कल्मष, संपर्क−क्षेत्र के प्रचलन उस ओर घसीट लिए जा रहे हैं, जिस ओर मरण−ही−मरण है। आत्महनन के उपराँत जो कुछ हस्तगत होता है, उसे मरणधर्मा ही कहा जा सकता है। आकाँक्षाओं की बाढ़ के बहाव में न धैर्य टिक पाता है, न विवेक। जीवन कूड़े−करकट की तरह एक गंदे नाले में बहा जा रहा है। न किनारा ही दीखता है, न ठहराव, न आश्रय।
मनुष्य को जो जीवन मिला है, वह ऐसी अनुपम संपदा के समान है, जो विभूतियों से भरपूर है, पर उनमें से किसी को भी जाग्रत−जीवंत करने का अवसर नहीं मिला। शरीर को, इंद्रियों को विचारणा को, भविष्य को, सभी को बरबाद करने वाली विडंबना ने चेतना पर आधिपत्य जमाया हुआ है। पत्नी से लेकर संतान तक को ऊँचा उठाने की अपेक्षा नीचे गिराने में ही मोह की पूर्ति होती दिखाई पड़ती है। इसे कहते हैं अनगढ़ समझ, जो अमृत बरबाद करती और विष चाटती है।
हे परमात्मन्! अपनी सत्ता का मरण हो रहा है। मौत एक−एक कदम बढ़ती आ रही है और अब−तब में दबोचने ही वाली है। इससे पूर्व हम अपने अंतःकरण को, आनंद को, भविष्य को निरंतर मारते−कुचलते रहें, हे परमप्रभु! इस महामरण से हमें बचा ले और अपनी गोद में बिठाकर अमृत का रसास्वादन करा दें।
भिक्षुओं को दीक्षा दी जा रही थी। उनके नाम, गोत्र, वेश और स्थान बदले जा रहे थे। अभ्यास के परिवर्तन पर जोर दिया जा रहा था। कारण पूछने पर तथागत ने बताया, साँप जिन दिनों केंचुली से लदा रहता है, उन दिनों न उसे दीखता है और न दौड़ने बनता है। केंचुली उतरते ही यह दोनों कठिनाइयाँ चली जाती है। व्यक्ति का कुसंस्कारी ढर्रा ही उसकी आत्मिक प्रगति में सबसे बड़ा व्यवधान है। इसलिए दीक्षा के रूप में मनःस्थिति परिवर्तन के साथ−साथ परिस्थिति और आदत बदलने के लिए भी कहा जा रहा है।
मानव शरीर की संरचना अपने आप में इतनी विलक्षण और विस्मयकारक है कि उसका जितना ही अधिक विश्लेषण किया जाय, उतना ही अधिक यह तथ्य स्पष्ट होता जाता है कि ईश्वर ने इस अद्भुत यन्त्र का निर्माण किसी अति महत्त्वपूर्ण प्रयोजन के लिए ही किया होगा। इस काय कलेवर का सर्वाधिक विलक्षण, इसकी समस्त गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु उसका मस्तिष्क ही है। सारे ज्ञात-विज्ञात विभिन्न क्रिया-कलापों का अधिष्ठाता यही है। एक साथ ही इस स्नायु कोषों के समुच्चय में इतनी अधिक प्रकार की गतिविधियाँ सम्पन्न होती देखी जा सकती है, जो किसी अति महत्त्वपूर्ण प्रशासकीय संस्थान में, विभिन्न समस्याओं का हल निकालने तथा उनका समुचित मार्गदर्शन करने की सुसंचालित प्रक्रिया की तुलना में कहीं अधिक है।
बहु प्रचलित किंवदंती है कि कल्पतरु के नीचे बैठने से समस्त मनोवाँछित आकाँक्षाओं की पूर्ति होती है। ऐसे वृक्ष का अस्तित्त्व इस बाह्य प्रकृति में संदिग्ध ही है। लेकिन एक प्रत्यक्ष कल्प पादप परमसत्ता ने मानव के काय कलेवर रूपी नन्दन कानन में मस्तिष्क के रूप में प्रदान किया है, जिसकी आराधना से वह सभी कुछ प्राप्त हो सकता है, जिसकी हमें कामना है।
शरीर रूपी बाह्य कलेवर तो माँ के गर्भ से जन्म लेता है, पर भले-बुरे व्यक्तियों का, नरपशु, नरपामर, महामानव, देवमानव, अतिमानव का जन्म कहाँ से होता है, यह खोज बीन यदि कोई करना चाहे तो अचेतन, अवचेतन मन की परतों में करना पड़ेगा। इन्हीं रहस्यमय परतों में अच्छे-बुरे व्यक्तित्व जन्म लेते हैं। विचारक, वैज्ञानिक, मनीषी, कलाकार, दार्शनिक साहित्यकार जैसी अनेकानेक विलक्षण प्रतिभाओं का उद्भव केन्द्र मस्तिष्क ही है। इसके गड़बड़ाने से ही मनुष्य मूर्ख, पागल, विक्षिप्त बन जाता है तथा किसी काम का नहीं रहता। शारीरिक दृष्टि से पूर्ण तथा समर्थ रहते हुए भी वह असमर्थों, असहायों जैसा जीवन बिताता है। इस महत्त्वपूर्ण केन्द्र के संतुलित, विकसित और जाग्रत् हो जाने पर अनेकानेक उत्कृष्ट संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं। भौतिक, आत्मिक दोनों ही स्तर की विभूतियाँ करतलगत की जा सकती हैं।
शरीर के विभिन्न तंत्रों व अवयवों पर, उनकी विभिन्न गतिविधियों के संचालन पर, इसका प्रत्यक्ष या परोक्ष नियन्त्रण है। उच्च स्तर की आध्यात्मिक उपलब्धियों को न गिना जाय तो भी इसके दैनन्दिन जीवन के विविध क्रिया-कलाप कम महत्त्वपूर्ण और आश्चर्यजनक नहीं हैं। सोचने, विचारने, सुख-दुःख की अनुभूति करने, विविध उलझन भरी समस्याओं की जटिल गुत्थी सुलझाने में इसकी तत्परता और कुशलता देखते ही बनती है। इसकी विभिन्न विलक्षणताओं के विषय में जो नित्य-नूतन शोध निष्कर्ष सामने आ रहे हैं वे और भी अधिक विस्मयकारक हैं। उनके अनुसार मस्तिष्क में ऐसे सूक्ष्म केन्द्र भी विद्यमान हैं, जो भयंकर शारीरिक-मानसिक पीड़ाओं का निवारण कर सकते हैं। उपेक्षित, मूर्छित स्थिति में पड़े रहने के कारण उनकी सामर्थ्य का परिचय नहीं मिल पाता।
दर्दनाशक, पीड़ा निवारक के रूप में शताब्दियों पूर्व से अफीम, मार्फीन जैसी वस्तुओं का उपयोग नशीली दवाओं के रूप में होता आया है। चिकित्साशास्त्रियों ने अब यह स्वीकार कर लिया है कि इससे लाभ होने की अपेक्षा हानियाँ ही है। विशेषज्ञों का मत है कि दुःख दर्द कष्ट, पीड़ा एक मानसिक अनुभूति है। शरीर के जिस अवयव में दर्द हो रहा है, इसका अर्थ है कि वहाँ पर कुछ ऐसा घटित हो रहा है जो तंत्रिका तंत्र के लिए असहनीय है। दर्द भी दो तरह के हैं, एक क्षणिक दूसरा चिरकालिक। दोनों ही शारीरिक-मानसिक वेदनाओं के रूप में व्यक्ति को पीड़ित करते हैं। चिरकालिक दर्द कष्टकारक होने के साथ ही मनःक्षेत्र को अधिक प्रभावित करता है।
इस स्थिति में मानसिक तनाव बढ़ता है, जो साइजोफेनिया, पैरानाइया जैसी बीमारियों को जन्म देता है। मस्तिष्क के किसी भी भाग में तनिक भी गड़बड़ी होने से समूचा शरीर तथा मनःसंस्थान प्रभावित होता है। प्रायः इन परिस्थितियों में लोग दर्द या तनाव शामक औषधियाँ प्रयोग करते हैं। मार्फीन, एल.एस.डी जैसी नशीली दवाएँ खूब धड़ल्ले से दर्द से मुक्ति पाने अथवा मानसिक गम भुलाने के लिए उपयोग की जाती हैं। इनके उपयोग से संवेदी अंगों की संवेदनात्मक क्षमता में कमी आती है, जिससे दर्द महसूस करने की क्षमता का ह्रास होने लगता है। इसके निरन्तर प्रयोग से शरीर को एक प्रकार की लत पड़ जाती है, जिसे एडीक्शन कहा गया है। जब तक उनका नशा रहता है, व्यक्ति राहत महसूस करता है, पर नशा उतरते ही फिर से छटपटाने लगता है।
चिकित्सा विज्ञानियों का मत है कि मानव मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम में ऐसे स्नायु यौगिक मौजूद है, जो दर्द को कम करने में सक्रिय भूमिका निभा सकने में सक्षम है। लिम्बिक सिस्टम को भावना क्षेत्र का केन्द्र माना गया है। सम्वेदनवाही तंत्रिकाएँ जैसे ही दर्द की अनुभूति लेकर मेरुदण्ड स्थित सुषुम्ना के रीढ़ रज्जु में पहुँचती हैं, लिम्बिक क्षेत्र के एफरेण्ट रिसेप्टरर्स सक्रिय हो उठते हैं तथा इनमें सेकेफैटिन नाम के दो पेप्टाइडस-दर्दशामक की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन दोनों पेण्टापेण्टाइड का स्राव मस्तिष्क से ही होता है। बीटालाइयोट्रामिन को एन् कैफेलिन का अग्रदूत माना गया है। शोध में यह पाया गया है कि पिट्यूटरी ग्रन्थि में अनेकों ऐसे एन्जाइम होते हैं जो बीटा एल.पी.एच को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट देते हैं। इन हारमोनल फ्रैग्मेण्टस को किसी मानव या जानवर में प्रविष्ट करने पर उनमें कायिक एवं व्यावहारिक परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। तनाव की स्थिति में ए.सी.टी.एच नामक हारमोन पिट्यूटरी ग्रन्थि से स्रावित होता है, जो एड्रीनल ग्रन्थि से कार्टिसॉल नामक हारमोन बनाने के लिए उत्प्रेरक का काम करता है। इसी समय एनकैफेलिन और एन्डार्फिन का रक्त में स्तर बढ़ जाता है। फलस्वरूप दर्द के प्रति सम्वेदनात्मक शून्यता जैसी मनःस्थिति बन जाती है। व्यक्ति को कष्टकारक दर्द का भान नहीं होता।
‘इम्यूनोटिस्टो केमिकल’ प्रयोगों से यह मालूम हुआ है कि एनकैफेलिन से भरे न्यूरान्स सेरिब्रोस्पाइनल एक्सिस के विभिन्न स्तर पर विशेषतया दर्द वाले स्थानों पर फैले हुए हैं। एक्यूपंचर चिकित्सा प्रणाली में इसी एनकैफेलिन का उपयोग करके बिना किसी बाह्य संज्ञा शून्यता के बड़े-बड़े आप्रेशन करने में सफलता प्राप्त हुई है।
परामनोविज्ञान पर शोध कर रहे मूर्धन्य विद्वानों का मत है कि ध्यान प्रक्रिया द्वारा मस्तिष्क के भीतर अनेकों प्रकार के रासायनिक परिवर्तन किए जा सकते हैं तथा मस्तिष्कीय क्रिया-कलापों पर नियंत्रण करके एनकैफेलिन, इन्डोजीन्स-दर्द निवारक की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।
मस्तिष्क की विशेषता-विचित्रता का यह एक छोटा सा पक्ष है, जिसकी जानकारी शरीर शास्त्री पा सके हैं। इसकी तुलना में अविज्ञात क्षेत्र कई गुना अधिक है। ये इतने विस्मयकारी तथा विलक्षण सामर्थ्यों से युक्त हैं कि सामान्य व्यक्ति तो इनकी कल्पना भी नहीं कर सकता कि छोटी सी दिखाई देने वाली खोपड़ी इतनी चमत्कारी भी हो सकती है। दैनिक जीवन में होने वाले अनेकानेक क्रिया-कलापों की वह संचालक ही नहीं अपितु रहस्यमयी विविध अतीन्द्रिय क्षमताओं की जन्मस्थली भी है। असन्तुलन की स्थिति में तो सामान्य शारीरिक, मानसिक क्रिया-कलाप भी ठीक तोर से नहीं सम्पन्न हो पाते। सन्तुलन होने पर व्यक्ति अपनी प्रतिभा का सामान्य उपयोग कर पाता है। अधिकाँश भाग प्रसुप्त होने के कारण, इसकी विलक्षणताओं का परिचय नहीं मिल पाता है।
इसकी जाग्रति होने पर किन्हीं किन्हीं में अतीन्द्रिय सामर्थ्य के प्रमाण भी मिलते देखे गए हैं। इच्छा शक्ति, दूरदर्शन, अदृश्यदर्शन आदि की अनेकों प्रमाणिक घटनाएँ इसी तथ्य का उद्घोष करती हैं कि मानवी मस्तिष्क असीम सम्भावनाओं-शक्तियों का भाण्डागार है। उसकी छाँव में बैठ कर यदि सही माने में साधना की जा सके, तो कल्पतरु की उपमा शत-प्रतिशत चरितार्थ हो सकती है। इससे वह सभी कुछ प्राप्त किया जा सकना सम्भव है, जिनकी अपेक्षा उससे की जाती है।
एक बार बारह वर्ष तक लगातार दुर्भिक्ष पड़ा। पृथ्वी पर बढ़ते अनाचार को देखकर, दुरात्माओं को दंड देने के लिए इंद्रदेव ने कुपित होकर वर्षा का अनुदान देना बंद कर दिया। चारों ओर जलाभाव, अन्नाभाव, लूट−खसोट के कारण त्राहि−त्राहि मच गई। मनीषियों ने विचार किया कि तप और त्याग से ही देव−शक्तियों को प्रसन्न किया जा सकता है। इसके लिए नरमेध यज्ञ रचाया गया, ताकि देवताओं को यह आश्वासन दिलाया जा सके कि धरतीवासियों ने उत्कृष्टता व आदर्शवादिता की परंपरा अपनाना आरंभ कर दिया है। हिचकिचाहट यह थी कि पहले कौन करे?
इस सन्नाटे को चीरकर एक व्यक्ति आगे बढ़ा, नाम था शुनःशेष । उसने यज्ञ के अध्वर्यु और ऋत्विजों को संबोधित कर कहा, यज्ञीय बलिदान के लिए सर्वप्रथम मैं स्वयं को प्रस्तुत करता हूँ। उसका आत्मप्रतिवेदन सुनते ही सहस्रों की भीड़ लग गई, जो परहितार्थाय बलि देना चाहते थे। मनुष्यों की बदली मनोवृत्ति का परिचय पाकर आशुतोष शिवजी प्रसन्न हुए और विपुल वर्षा की व्यवस्था अनुदान रूप में कर दी गई।
कामयाबी की राहों की तलाश हर किसी को हर कहीं रहती है। जो जहाँ है, वह वहीं प्रगति, उन्नति और उच्च विकास के मार्ग की खोज करता रहता है। इस खोज-तलाश में कई सफल होते हैं और कई असफल। अनेकों के लिए तो कामयाबी सदा स्वप्न कुसुम बनी रहती है। जिसका अहसास कल्पनाओं और स्वप्नों में तो होता है, पर यथार्थ के धरातल पर न उसकी सुगन्ध मिलती है और न स्पर्श। पल्ले पड़ती है तो सिर्फ हताशा की भटकन, निराशा की थकान एवं असफलता की कुण्ठा। सफल और कामयाब लोगों को देखकर मन इसी चिन्ता में डूबा रहता है कि आखिर इन्होंने किस जादुई शक्ति से अपनी मनचाही कामयाबी हासिल कर ली।
जिन्हें इन्सानी वजूद में गहरी पैठ है, जो मानवीय व्यक्तित्व की बारीकियाँ अच्छी तरह से जानते हैं, उन सबका कहना है कि कामयाबी हासिल करने की जादुई शक्ति सभी में होती है। पर कुछ लोग इसका इस्तेमाल करना जानते हैं और कुछ नहीं। कुछ को अपनी इस जादुई शक्ति का पता होता है तो कुछ को नहीं। इसका नजारा हम अपने आस-पास बड़े आराम से देख सकते हैं। हम और आप कहीं भी किसी आफिस, कारखाने, शिक्षण संस्थान अथवा किसी दूसरी जगहों पर काम करते हों, अपने चारों ओर कुछ सफल और परेशान लोग अक्सर दिख ही जाते हैं। इनमें से एक वे हैं जिन्होंने कामयाबी की राहें तलाश ली हैं और उन पर चल पड़े हैं, और दूसरे वे हैं जो राहों की तलाश में अभी भटक रहे हैं।
मानवीय व्यक्तित्व के गहरे जानकार कॉरनी गोल्डमैन ने इन्सानी जिन्दगी की बारीक छान-बीन करते हुए एक किताब लिखी है ‘हाउ टु फाइन्ड ओन सक्सेज़’ यानि कि अपनी सफलता कैसे पाएँ। इस पुस्तक में उनका कहना है कि सफलता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। भगवान् ने हमको मनुष्य जीवन इसीलिए दिया है कि हम अपनी सफलता हासिल कर सकें। यदि अभी तक हम सफलता से दूर हैं तो इसका कारण केवल इतना भर है कि हमने अपनी आन्तरिक शक्ति और उसकी अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों को जाना नहीं है। गोल्डमैन का कहना है कि इन सफलताओं की राहों को यदि सही ढंग से जान लें और इनका सही इस्तेमाल करने लगें तो सफलता जल्दी ही हमारे कदम चूमने लगेगी।
गोल्डमैन और उनके साथी मनोवैज्ञानिक डेनियल रिचर्ड ने इन तरीकों को कुछ मुख्य बिन्दुओं में स्पष्ट किया है। इनमें से पहला महत्त्वपूर्ण बिन्दु है- नजरिया। डेनियल रिचर्ड का कहना है कि सफलताओं के पीछे श्रम एवं ज्ञान से ज्यादा प्रभाव अपने प्रति और परिस्थितियों के प्रति आपके नजरिये का होता है। यदि आपका नजरिया सकारात्मक है तो आप न केवल अपने लिए बल्कि औरों के लिए एक मधुर वातावरण का निर्माण कर सकेंगे। सकारात्मक नजरिया या विधेयात्मक दृष्टिकोण का मतलब है स्वयं की सामर्थ्य के प्रति विश्वास, हम कर सकेंगे, इस विचार पर गहरी आश्वस्ति। परिस्थितियां कितनी ही संघर्षपूर्ण और विकट क्यों न हों, पर वे इसीलिए हैं ताकि हमारी शक्तियाँ और अधिक निखर सकें। ऐसी सकारात्मक दृष्टि हमारे अन्दर साहस और सृजनशीलता का चुम्बकत्व पैदा करती हैं, जिससे कामयाबी अपने आप ही आकर्षित होने लगती हैं।
इस संदर्भ में दूसरा बिन्दु है- समय का सही उपयोग। गोल्डमैन का कहना है कि यदि आप कामयाबी चाहते हैं तो अपने कार्यों को प्राथमिकताओं के आधार पर वर्गीकृत करके समय के अनुसार करने की कोशिश करें। इस तरह सभी जरूरी कार्य बिना किसी तनाव के बड़े आराम से पूरे हो जाएँगे। इसके लिए बस केवल सही प्लानिंग की जरूरत है। इस बारे में एक कोशिश यह जरूर करते रहना चाहिए कि आज का काम कल पर टालने की जरूरत न पड़े। रोज का काम सही ढंग से पूरा हो जाने पर गहरी आत्मसंतुष्टि मिलेगी और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।
तीसरे बिन्दु के रूप में गोल्डमैन और रिचर्ड ‘परिस्थितियों के’ सही उपयोग की बात कहते हैं। उनका कहना है कि यहीं हमारी मौलिक सूझ-बूझ की परख होती है। उनके अनुसार महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि परिस्थितियाँ कैसी हैं, बल्कि महत्त्वपूर्ण यह है कि हम उनका उपयोग किस तरह से करते हैं। परिस्थितियों का उपयोग करने की सही सूझ-बूझ हो तो परिस्थितियाँ न केवल हमारा उचित सहयोग करती हैं, बल्कि समुचित मार्गदर्शन भी करती हैं। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि सहयोग और मार्गदर्शन के लिए ठीक व्यक्तियों का चुनाव किया जाय और उनके सामने अपनी बात सही तरीके से रखी जाय। ठीक इसी तरीके से स्वयं भी औरों के सहयोग और समुचित मार्गदर्शन के लिए तत्पर रहा जाय।
चतुर्थ बिन्दु जो कामयाबी की सबसे महत्त्वपूर्ण राह है वह है- हमारा व्यक्तित्व। व्यक्तित्व के गुण जैसे पहनावा, रहन-सहन, वार्तालाप का तरीका आदि सफलता पर बहुत ज्यादा प्रभाव डालते हैं। इसी तरह ईमानदारी, विनम्रता, कर्त्तव्यनिष्ठ हमें अपनी कामयाबी की ओर तेजी से ले जाते हैं। ध्यान रहे कि हमारा व्यवहार ही हमारे व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाता है। इसलिए हमें अपने व्यवहार में सद्गुणों की साधना बहुत ही दृढ़ता से करनी चाहिए।
कामयाबी के लिए पाँचवा आवश्यक बिन्दु है- सतत सकारात्मक क्रियाशीलता। कामयाबी पाने की चाहत रखने वालों को गोल्डमैन की सलाह है कि वे अपने आप को सतत क्रियाशील रखें। परन्तु ध्यान रहे कि यह क्रियाशीलता पूरी तरह से सकारात्मक हो। यानि कि इसमें किसी के प्रति भी विरोधी भाव न हो। यानि कि अपने विकास व प्रगति के उद्देश्य तो इसमें निहित हों, परन्तु दूसरों से द्वेष व उनकी हानि की कामना कतई न हो। अहंकार, आलस्य, ईर्ष्या, बहस व बहानेबाजी से अपने को दूर रखकर सतत अपने उद्देश्य के प्रति एकनिष्ठ भाव से क्रियाशील रहा जाय। साथ ही अनुशासनहीनता व गलत व्यवहार जैसे तत्त्व जीवन में प्रवेश न करने पाएँ।
इस सम्बन्ध में छठवाँ और अन्तिम बिन्दु है- सन्तुलन बनाए रखना। इसका अर्थ है जीवन को समग्रता से जीना। यानि की जीवन में व्यक्तिगत कामयाबी महत्त्वपूर्ण है, परन्तु उतना ही महत्त्वपूर्ण अपना घर-परिवार भी है। सफलता के साथ स्वास्थ्य भी महत्त्वपूर्ण है। भौतिक जीवन में उपलब्धियों के साथ आध्यात्मिक एवं आन्तरिक प्रगति भी आवश्यक है। यह सब एक साथ तभी सम्भव है जब हम अपने जीवन में सन्तुलन बनाए रखना सीख जाएँ। जहाँ तक सम्भव हो एक जगह की परेशानियों को दूसरी जगह से दूर रखें। यह भी अनुभव करें कि जीवन के सभी पहलू मूल्यवान एवं महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें से किसी को भी उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए।
जीवन की समग्रता में ही सार्थक कामयाबी है। इस तरह इन बिन्दुओं को जीवन में उचित ढंग से आत्मसात कर लेने से कामयाबी की राहें न केवल प्रकाशित हो जाती है, बल्कि उन पर चलना भी आसान हो जाता है। जरा सोचिए तो सही है न यही वे तौर तरीके जिन्हें पिछले काफी समय से तलाश रहे थे। अब जब मिल गए हैं तो फिर देर किस बात की, तेजी से चल पड़िए कामयाबी की डगर पर। कुछ ही कदमों दूर कामयाबी आपका इन्तजार कर रही है।
गौड़ देश में एक भावनाशील श्रमिक रहता था। जितना कमाता, उतना गुजारे में ही खरच हो जाता। दान−पुण्य के लिए कुछ न बचता। इससे वह दुखी रहने लगा। बिना परमार्थ किए परलोक में कैसे सद्गति मिलेगी। अपनी व्यथा उसने उस क्षेत्र के निवासी एक संत को सुनाई। उनने कहा, इस क्षेत्र में बहुत से तालाब हैं, पर वे समतल हो गए हैं। उनमें गहराई न रहने से पानी भी नहीं टिकता और प्यासे पशु−पक्षी अपनी प्यास बुझाने के लिए दूर−दूर तक जाते हैं। मनुष्यों को भी कम कष्ट नहीं होता। तुम इन तालाबों को जहाँ भी पाओ, वहीं अपना परिवार लेकर रहो और श्रमदान से तालाबों का जीर्णोद्धार करते रहो। जिस प्रकार नए मंदिर बनवाने की अपेक्षा पुरानों का जीर्णोद्धार श्रेष्ठ माना जाता है, बच्चे उत्पन्न करने की अपेक्षा रोगियों को सेवा प्रदान करना श्रेयस्कर हैं, उसी प्रकार तुम श्रमदान के आधार पर तालाबों का जीर्णोद्धार करो और उन्हीं के समीप वृक्ष भी लगाओ। किसान श्रमिक के पास अपनी श्रम−संपदा प्रचुर थी, उसी से वह निर्वाह के अतिरिक्त परमार्थ भी अर्जित करने लग गया और संत के परामर्शानुसार परम श्रेय का अधिकारी बना।
सृष्टि के कण-कण में उसका निवास है। अणु-अणु का मूलाधार वह परमात्म तत्त्व ही है। सब कुछ उसी से बनता और उसी चेतन शक्ति से परिचालित होता है। प्रत्येक पदार्थ एवं प्राणी एक उसी तत्त्व के अंश हैं। व्यक्तिगत जीवन समष्टिगत जीवन सीमित और असीमित के मिथ्या भेद के बावजूद तत्त्वतः एक ही है।
उपनिषदों में परमात्म तत्त्व को ‘सच्चिदानन्द’ के रूप में देखा गया है। उनमें’परमात्मा को सच्चिदानन्द कहा गया है। सत् अर्थात् शाश्वत अजर-अमर और अविनाशी स्वरूप। चित् अर्थात् चेतना। चेतना अर्थात् दिव्य गुणों से सुसज्जित, उच्चस्तरीय आदर्शों-आस्थाओं से युक्त। आनन्द अर्थात् भाव संवेदनाओं, सरसता, मृदुलता से सिक्त। यह सच्चिदानन्द सत्ता, उपास्य के रूप में ईश्वर, निराकार व्यापकता के रूप में देवता, जीवों के अस्तित्व के केन्द्र के रूप में विराजमान अन्तरात्मा तथा सृष्टि के व्यवहार को सुधारने, इसे सौंदर्य मण्डित करने आए अवतार के रूप में अपनी अनुभूति देती है। यह तत्त्व बुद्धि और तर्क से परे होते हुए भी बुद्धि और तर्क युक्त है।’
प्रकृति की समस्त हलचलों का केन्द्रबिन्दु यही एक केन्द्रीय शक्ति है। वही विविध रूप धारण करती तथा संसार को रचती है। सम्पूर्ण सृष्टि में वही संव्याप्त है। इसी कारण इस महाशक्ति को ब्रह्म कहते हैं। ब्रह्म के अतिरिक्त ब्रह्मांड में और कुछ नहीं है। ‘एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति’ की उक्ति इसी तथ्य पर आधारित है। उसके प्रकाश से ही तारे, ग्रह, नक्षत्र, सूर्य सभी प्रकाशित हैं। जीव-जन्तु वनस्पतियों में उसकी चेतन तरंगें ही क्रीडा कल्लोल कर रही हैं।
ब्रह्म एक ऐसी चेतन सत्ता है जिससे संसार का न तो एक कण रिक्त है न एक क्षण। वह ब्रह्म सूर्य रूप में (आत्मा रूप में), तत्त्व रूप में प्रतिभासित होता है और प्रकृति के संयोग से भिन्न शरीरों और वासनाओं वाले जीवों का निर्माण करता है। इस तथ्य को बड़े ही सुन्दर ढंग से कहा जा सकता है-जिस प्रकार एक सूर्य-एक आत्मा के अनन्त जीवन है, जो उस मूल चेतना आद्यशक्ति से प्राण पाते हैं, उसी प्रकार अनेक आत्माएँ ब्रह्म से जीवन और चेतना प्राप्त करती हैं। जिस प्रकार समुद्र, नदी, नद और ताल, पोखरों में एक तत्त्व जल ही सर्वत्र है उसी प्रकार जीव-आत्मा, ब्रह्म में एक ही प्राण तत्त्व का विकास, एक ही मनोदय चेतना प्राप्त कर रही है। अपने जीवन तत्त्व को भाव नदी में बदलकर नदी हो जाती है और नदी समुद्र, उसी प्रकार प्राणों का जीव से आत्मा में आत्मा से ब्रह्म में विकास और उसी में मानसिक चेतना या संकल्प की स्थिरता ही जीव का आत्मा ब्राह्मीभूत होता है।
इस प्रकार ब्रह्म सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है। सर्वव्यापी क्योंकि सभी रूप देश और काल के उसके स्वयं अपने विस्तार में उसकी गति की शक्ति से उत्पन्न उसकी चेतन सत्ता के रूप हैं। सभी वस्तुएँ उसकी चेतना में रहती हैं, और उसके द्वारा बनायी जाती हैं एवं उसी के अधिकार में रहती हैं। वह सर्वज्ञ है। सर्वाधिकारी चेतना ही एक सर्वाधिकारी शक्ति और सर्वसूचक संकल्प है, अतः वह सर्वशक्तिमान है।
ब्रह्म को सृष्टा, नियन्ता, पोषक मानते हुए उसे घट-घट व्यापी सर्वज्ञ समाहित ही माना जा सकता है। अतः परमात्मा निराकार है। साकार रूप के संदर्भ में कहें तो परमात्मा का साकार रूप देखना हो तो इस विश्व की ही परमेश्वर माना जा सकता है। निश्चित रूप से परमात्मा निराकार होने की तरह साकार भी है। इस विश्व में जो कुछ दृश्यमान हो रहा है, उसे परमात्मा ही कहना चाहिए।
परमात्मा को तर्कों से परे एवं तर्क सम्मत भी माना जा सकता है। ईश्वर और उनका सृष्टि प्रवाह अनन्त है। उसकी अनन्तता उसके अमृतत्त्व में समाहित है,क्योंकि मृतत्त्व परिमितता की निशानी है। अथर्ववेद इसी का उद्घोष करते हुए कहता है- ‘भूतं च भाष्यं च सर्व यश्चाद्यितिष्ठति’ अर्थात् ईश्वर तीनों कालों से परे हैं। साथ ही तर्कों से परे भी। सृष्टि की गहराई में उतरने पर स्पष्ट हो जाता है कि उसके कण-कण में नियम और नियंत्रण संव्याप्त है। यहाँ पर सारा सूत्र संचालन इस प्रकार हो रहा है मानो किसी बाजीगर की उंगलियों में बँधे धागे सारी कठपुतलियों को तरह-तरह के नाच नचा रहे हों। कर्त्ता के बिना कोई क्रिया नहीं हो सकती। समग्र सृष्टि का संचालन करने वाला कोटि-कोटि जीवों में चेतना का संचार करने वाला सर्वशक्तिमान नियन्ता एक ही कारीगर है। विश्व के अन्तराल में काम करने वाला इसका शक्ति प्रवाह केवल ज्ञान युक्त ही नहीं न्याय (तर्क) और औचित्य के तथ्यों से भी ओतप्रोत है। सबमें एक ही परमात्मा का वास है। आस्थाओं का विकास जब इस स्तर तक कर लिया जाता है तो व्यक्ति ईश्वर के सामीप्य की आनन्दानुभूति करने योग्य बन जाता है। इस आनन्दानुभूति में अनुभव किया जा सकता है कि- विश्व में रंच मात्र भी स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ ईश्वर न हो। अणु-अणु में उसकी महत्ता व्याप्त हो रही है। अब ईश्वर को आदर्शों का समुच्चय कहा जा सकता है। हम ईश्वर को जिस गज से नापते हैं, वह बहुत छोटा है। ईश्वर का स्वरूप है-महानता। इस विशाल ब्रह्मांड को उसकी छबि के रूप में देखा जा सकता है और इस सुविस्तृत विस्तार के अंतर्गत हो रही ज्ञान और अविज्ञात हलचलों को उस महासागर की तरंगें समझा जा सकती हैं। इसे प्राप्त करने के लिए हमें अपनी संकीर्णता छोड़नी पड़ेगी और उसकी महानता अपनानी पड़ेगी जिसके सहारे उस महान् परमेश्वर को देखा जा सके।
अपनी महानता और व्यापकता में परमेश्वर संवेदनाओं का संगीत बन झरता है, प्रेम का गीत बन गूँजता है, भावनाओं का प्रवाह बन बहता और आनन्द रूप हो अन्तःकरण को रस विभोर करता है। प्रेम परमेश्वर की भावाभिव्यक्ति है। वस्तुतः प्रेम ही परमेश्वर है। प्रेम ही संसार में अकेली अपार्थिव वस्तु है। मनुष्य का सारा दर्शन, सारा काव्य, सारा धर्म एवं सारी संस्कृति इसी एक शब्द से अनुप्रेरित है। व्यष्टि और समष्टि में आत्मा का वह प्रेम प्रकाश ही ईश्वर की मंगलमयी रचना का संदेश दे रहा है। यह प्रेममय परमेश्वर ही सम्पूर्ण जड़ चेतन शक्ति का निर्माण, नियंत्रण, संचालन और व्यवस्था करने वाली चेतना है। अतः परमेश्वर ‘रसो वै सः’ से ओतप्रोत है।
परमेश्वर को सृजेता के रूप में उल्लेख करते हुए कहा जा सकता है- सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने अपनी इच्छा शक्ति से जीवों को उत्पन्न किया। कोई रचना बिना रचनाकार के अस्तित्व नहीं प्राप्त करती। इस संसार में जो कुछ भी दृश्य दिखाई देता है उसके पीछे कुछ न कुछ अदृश्य सूत्र अवश्य समझ पड़ते हैं। सृष्टा की सृजन शक्ति का मूर्त रूप ही सृष्टि है। ‘एकोऽम बहुस्यामः’ के संकल्प ने ही विश्व ब्रह्मांड के सौंदर्य का रूप लिया है। परमात्मा ने सृष्टि बनायी है और बनाकर नियम सूत्रों से इसे बाँध दिया है कि सब कार्य यथावत् चल रहा है। ईश्वर सृष्टि में व्यापक है।
परमात्मा को नियामक सत्ता कहते हैं। इस तथ्य को इस प्रकार शब्द दिया जा सकता है - नियामक के बिना नियम व्यवस्था, प्रशासक के बिना प्रशासन तो चल सकते हैं परन्तु कुछ समय से अधिक नहीं। फिर इतनी बड़ी और व्यवस्थित सृष्टि का प्रशासक, स्वामी और मुखिया न होता तो संसार न जाने कब का विनष्ट हो चुका होता। जड़ में शक्ति हो सकती है, व्यवस्था नहीं। नियम सचेतन सत्ता ही बना सकती है, सो इन तथ्यों के प्रकाश में परमात्मा की महत्ता चरितार्थ हुए बिना नहीं रहती। संसार का हर परमाणु एक निर्धारित नियम पर काम करता है। यदि इसमें रत्ती भर भी अव्यवस्था और अनुशासनहीनता आ जाय तो विराट् ब्रह्मांड एक क्षण भी नहीं टिक पाता।
नियामक सत्ता की विधि व्यवस्था का विश्लेषण करते हुए चार तत्त्वों का उल्लेख होता है। प्रथम है नियम व्यवस्था। पिण्ड से लेकर ब्रह्मांड तक तथा चेतन जगत् में एक नियम व्यवस्था कार्य कर रही है। प्रत्येक जीव चाहे मनुष्य हो अथवा छोटे प्राणी सभी इस व्यवस्था के अंतर्गत ही गतिशील हैं। वृक्ष वनस्पतियों का भी यही क्रम है। न केवल जीव जगत् वरन् अणु से लेकर ब्रह्मांड तक सुव्यवस्थित क्रम में गतिशील हैं।
जिसके द्वारा परमात्मा के अस्तित्व का प्रमाण मिलता है वह है सहयोग। इसी पर ही सृष्टि की व्यवस्था टिकी है। सहयोग की परम्परा जड़-चेतन सभी में देखी जा सकती है। सहयोग की प्रवृत्ति सृष्टि के कण-कण में झलकती है। विशाल ब्रह्मांड तथा पिण्ड सभी के अस्तित्व को सुव्यवस्थित बनाये रखने में सहयोगिता का सिद्धान्त ही कार्य करता है। सहयोगिता पर सृष्टि भी टिकी है।
विशालता तीसरी विशेषता है। भीमकाय पर्वत, अथाह समुद्र, रहस्यों से भरा अनन्त अन्तरिक्ष, असंख्यों ग्रह-नक्षत्र, तारा-पिण्डों को देखकर बुद्धि आश्चर्य चकित हो जाती है। यह तो जड़ जगत् की बात हुई। अदृश्य सूक्ष्म की परतें और भी अद्भुत हैं। स्थूल तो मात्र कलेवर हैं जो कठपुतली के धागे के समान चेतन परतों द्वारा संचालित हैं। जहाँ विराट् का असीम क्षेत्र मानवी मस्तिष्क को हतप्रभ कर रहा है, वहीं सूक्ष्मता की ओर बढ़ने पर शक्ति का लहलहाता हुआ सागर दिखाई पड़ता है। शास्त्रकारों ने परमात्मा के विराट् एवं सूक्ष्म स्वरूप को देखकर कहा-अणोरणीयान्, महतो महीयान्।
अन्तिम है सृष्टि रचना का उद्देश्य। न केवल जड़ प्रकृति बल्कि चेतन प्राणियों के निर्माण में भी सृष्टा का सुनिश्चित प्रयोजन है। नियम-व्यवस्था, सहयोग, विशालता, उद्देश्य इन सिद्धान्तों के पीछे उस अदृश्य सत्ता का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। इसे सृष्टा, नियामक परिवर्तनकर्त्ता एवं सर्वव्यापी परमात्मा के नाम से संबोधन कर सकते हैं।
आद्य बीज शक्ति ईश्वर की अनेक शक्तियाँ हैं। उनका मन है कि देवता किसी की प्रतिकृति नहीं वरन् विशिष्ट गुण या शक्ति के प्रतीक मात्र हैं और वह शक्तियाँ सूक्ष्म जगत् में क्रियाशील हैं। सभी देवता परमात्मा की विभिन्न अलौकिक शक्तियाँ हैं। किसी के भी आश्रय से उस परम प्रभु को प्राप्त करने का विज्ञान था।
वही एक देव सब भूतों में ओतप्रोत होकर सबकी अन्तरात्मा के रूप में सर्वज्ञ व्याप्त हैं। वह इस कर्म शरीर का अध्ययन है। निर्गुण होते हुए भी चेतना शक्ति युक्त है। आत्मा चिंगारी है और परमात्मा ज्वाला। ज्वाला की समस्त संभावनाएँ चिंगारी में विद्यमान है। जीव ईश्वर का अंश है। अंश में अंशी के समस्त गुण पाए जाते हैं।
परमात्मा स्वयं विश्वातीत हैं, विश्वमय हैं, सर्वेश्वर हैं, तब भी वे अपनी प्रकृति को अधिष्ठान बनाकर अपने संकल्प के अधीन रखकर व्यक्ति भावापन्न हो जाते हैं। इसी पर्सोनीफाइड चेतना को अवतार की संज्ञा दी जाती है। अखण्ड खण्डित किस तरह से हुआ? यह प्रश्न व्यर्थ है। परमात्मा सर्वव्यापक, अनन्त और अखण्डित ही हैं। अवतार भी एक निराकार चेतना ही होती है। जब जिस प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं तब उसी का समाधान करने के लिए सूक्ष्म जगत् में एक दिव्य प्रादुर्भूति होती रही है। इस दिव्य चेतना को भगवान् का अवतार कहा जाता है।
‘मानुषी तनुमाश्रितं’ का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा जा सकता है- युगान्तर चेतना से प्रभावित आदर्शवादी व्यक्ति सृजन साधनों में अधिक तत्परतापूर्वक लगे हुए दिखाई दें तो उसे अवतार की प्रेरणा ही मानना चाहिए। अतः अपनी अवतार प्रक्रिया में भी ईश्वर निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ और अखण्डित रहता है।
इस प्रकार ईश्वरानुभूति न तो अन्धश्रद्धा युक्त है और न अज्ञेयवादी। परमात्म तत्त्व न तो पूर्णतया ज्ञान है और न पूर्णतया अज्ञान। परमात्मा का स्वरूप विश्लेषण उपनिषदों के लिए प्रयत्न शील और सदैव निरीक्षण, परीक्षण, तुलना, उत्पत्ति और परिवर्तन तक के लिए सन्नद्ध हैं। उदारता सहिष्णुता की प्रवृत्ति उनकी विशेषता है
ईसा एक नगर में पहुँचे। वे एक ऐसे मुहल्ले में ठहरे, जो दुष्ट−दुराचारियों के लिए कुख्यात था। नगर के प्रतिष्ठित लोग ईसा के दर्शनों को पहुँचे और आश्चर्य से पूछा, भला इतने बड़े नगर में आपको सज्जनों के साथ रहने की जगह न मिली या आपने उनके बीच रहना पसंद न किया? हँसते हुए ईसा से पूछा, वैद्य मरीजों को देखने जाता है या चंगे लोगों को? ईश्वर का पुत्र पीड़ितों और पतितों की सेवा के लिए आया है। उसका स्थान उन्हीं के बीच तो होगा।
बाबा राघवदास उन दिनों गाँव−गाँव घूमकर लोगों को स्वच्छता का महत्त्व बता रहे थे। ग्रामीणों की अस्वच्छता के कारण कितने ही गाँव महामारियों की चपेट में आ गए थे। बाबा राघवदास साथियों के साथ वहाँ पहुँचे। ग्रामीणों से उन्होंने संपर्क करना प्रारंभ कर दिया। उन लोगों को सफाई का महत्त्व बताते और नियमित रूप से उस क्षेत्र में सफाई का कार्य भी स्वयं करते। कभी गलियों में झाड़ू लगाते, तो कभी मैले−कुचैले नौनिहालों को स्नान कराते और गंदे कपड़े धोते।
सप्ताह−दो सप्ताह की कौन कहे, बाबा राघवदास को महीनों निकल गए, पर चिकने घड़ों पर जैसे कोई असर ही नहीं, वहाँ के ग्रामीणों की प्रवृत्ति में कोई खास अंतर दिखाई न दे रहा था। एक दिन एक कार्यकर्त्ता अवसर देखकर उनसे पूछ ही बैठा, “आपको इन व्यक्तियों की सेवा करते महीनों बीत गए, पर कोई परिणाम दिखाई नहीं देता। मुझे तो यहाँ के लोग पूरे गंवार ही दिखाई देते हैं। यह अज्ञानी व्यक्ति अपने स्वभाव को तनिक भी बदलने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।”
बाबा बोल उठे, “बस भई, इतने में घबरा गए। जिस ग्रामीण जनता को हमने अज्ञान के अंधकार में वर्षों भटकाए रखा, उसकी उपेक्षा की, उसकी निःस्वार्थ भाव से सेवा, धैर्यपूर्वक करने पर उनमें स्वच्छता के संस्कार अवश्य पैदा होंगे।” यही हुआ। एक वर्ष के अंदर वे उस तथा आस−पास के सौ गाँवों को अपना कार्यक्षेत्र बनाकर उन्हें सुसंस्कारी बना सकने में सफल हुए।
स्वामी परमानन्द जी महाराज की आँखें भीग गयी। उन्होंने बड़ी कातर दृष्टि से आकाश की ओर निहारा और शिव-शिव कहते हुए दोनों हाथ जोड़ लिए। उनके शिष्य स्वामी कृष्णानन्द पास में ही खड़े थे। उन्होंने महाराज जी को प्रिन्स ऑफ वेल्स के भारत आने की खबर सुनायी थी। साथ ही अंग्रेज सरकार के कुचक्रों-षड़यन्त्रों की कथा भी बतायी। ये सारी बातें बताते हुए कृष्णानन्द जी ने कहा- गुरुदेव! भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस तो अपने फैसले पर अडिग है। उसका निश्चय है कि वह इस सरकारी समारोह का बहिष्कार करेगी। परन्तु गोरी सरकार हिन्दू समाज की आपसी फूट का लाभ उठाकर इस अवसर पर हजारों-हजार की संख्या में अछूत भाइयों को ईसाई बनाने पर तुली हुई है।
अपने शिष्य की इन बातों को सुनकर परमानन्द जी महाराज की भाव-वेदना छलक उठी। वह बड़े विकल स्वरों में बोले-आखिर कब तक ठगा जाता रहेगा हिन्दू समाज। फिर थोड़ा संयत स्वर में उन्होंने कहा- कृष्णानन्द तुम अपने आश्रम की हरिजन पाठशाला के बच्चों को लेकर जाओ। और वहाँ दिल्ली में आयोजन स्थल पर पहुँच कर उनसे वही भजन गवाओ जो अभी पिछले दिनों मैंने उन्हें तैयार करवाया है।
परन्तु गुरुदेव, लोग हमें गद्दार कहेंगे। फिर अंग्रेजों का विरोध करने पर अंग्रेज लोग अपने आश्रम को तहस-नहस कर सकते हैं। इसके अलावा रेवाड़ी से दिल्ली का सफर, खर्च कहाँ से आएगा। ये 1921 ई. के दिन थे। उन दिनों गोरी सरकार का सूर्य प्रचण्डता से चमक रहा था। कृष्णानन्द की ये शंकाएँ गैर वाजिब नहीं थी। लेकिन परमानन्द जी महाराज भी अडिग थे। उन्होंने स्थिर स्वर में कहा- बेटा! यह आश्रम भगवान्, भगवद्भक्ति एवं धर्म के लिए है, अंग्रेजों के लिए नहीं। भगवान् इसे रखना चाहेंगे, रखेंगे, मिटाना चाहेंगे तो मिटा देंगे। तुम बिना डरे वही करो जो मैंने तुमसे कहा है।
अपने गुरु के आदेश को शिरोधार्य करके कृष्णानन्द जी चल पड़े। राह की कठिनाइयों और गोरी सरकार के चापलूसों, जमींदारों, बड़े अफसरों का विरोध सहते हुए बड़ी मुश्किल से आयोजन स्थल तक पहुँच गए। वहाँ हजारों की संख्या में हरिजन परिवार ईसाइयत अपनाने के लिए खड़े किए गए थे। कृष्णानन्द जी और उनके साथ आए हरिजन बच्चों ने खंजरी बजाकर परमानन्द जी महाराज का यह भजन गाना शुरू किया-
धरम मत हारो रे, यह जीवन है दिन चार।
सीधे-सरल शब्द। उतने ही सीधे-सरल सुनने वाले। एक-एक शब्द सुनने वालों के हृदय में समाने लगा-
धरम राज को जाना होगा, सारा हाल सुनाना होगा। फिर पीछे पछताना होगा, कर लो सोच-विचार॥
एक झुर्रीदार चेहरे वाले वृद्ध ने पूछा- ये कौन हैं? और क्या गा रहे हैं। मन में उसे सौम्य स्वरों में कहा गया- ये भगवद्भक्ति आश्रम, रेवाड़ी में पढ़ने वाले अछूतों के बच्चे हैं। और ये गा रहे हैं-
धरम मत छोड़ो रे, जगत में जीना है दिन चार।
वृद्ध व्यक्ति के माथे पर आश्चर्य की लकीरें गहरी हो गयीं। उसने अटकते हुए कहा- ‘अछूतों के बच्चे और इतने साफ-सुथरे। और ये पढ़ते भी हैं।’ दिव्यद्रष्टा परमानन्द जी महाराज इस स्थिति से पहले से ही परिचित थे। इसी कारण उन्होंने कुछ बच्चों के माता-पिता को भी साथ भेज दिया था। वे आगे आकर बोले- हाँ भाई ये हमारे बच्चे हैं। स्वामी जी अपने आश्रम में इन्हें पढ़ाते हैं।
इस पर वह वृद्ध व्यक्ति जो जाति से भंगी था, अपने सभी हरिजन भाइयों से हाथ जोड़कर बोला- भाइयों, मेरी एक बात ध्यान से सुनो, जब हमारे समाज में ऐसे साधु-महात्मा हैं, जो हमारे बच्चों को और हम सबको पढ़ाने-लिखाने, ऊँचा उठाने के लिए तत्पर हैं, तो हमें धरम बदलने की भला क्या पड़ी है। वृद्ध की यह बात एक पल में सबको समझ में आ गयी। गोरी सरकार और पादरियों का सारा षड़यन्त्र धरा का धरा रह गया।
धागे में गाँठ लगी हो, तो वह सुई के छेद में नहीं घुस सकता और उससे सिलाई नहीं हो सकती। मन में स्वार्थ भरी संकीर्णता की गाँठ लगी हो, तो वह ईश्वर में नहीं लग सकता और जीवन लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता।
वेदाँत दर्शन ने संसार को माया बताया और उसको स्वप्न कहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि जो कुछ दीखता है, उसका अस्तित्व ही नहीं अथवा जो सामने हैं, वह झूठ है। वर्तमान स्वरूप एवं स्थिति में वे सत्य भी हैं। यदि ऐसा न होता तो कर्मफल क्यों मिलते? पुण्य और तप−तितिक्षा करने की क्या आवश्यकता होती? कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य में क्या अंतर रह जाता? धर्मकृत्यों की क्या उपयोगिता रह जाती और पापकर्मों से डरने, बचने की क्या आवश्यकता होती?
माया का अर्थ वेदाँत ने उस अर्थ में किया है, जिसमें जो भासित होता हो, वह तत्त्वतः यथार्थ न हो। जगत को इसी स्थिति में, इसी स्तर का माना गया है। वह जैसा कुछ प्रतीत होता है, क्या वह वैसा ही है? इस प्रश्न पर जब गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि संसार में हम जो कुछ इंद्रियों द्वारा देखते हैं, अनुभव करते हैं, वह सब वास्तव में वैसा ही नहीं होता। इंद्रिय छिद्रों के माध्यम से मस्तिष्क में होने वाली अनुभूतियों का नाम ही जानकारी है। यह जानकारी तभी सत्य हो सकती है, जब वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को सही रूप में इंद्रियाँ समझ सकें। यदि वे धोखा खाने लगें तो मस्तिष्क गलत अनुभव करेगा और वस्तुस्थिति उलटी दिखाई पड़ने लगेगी।
नशा पी लेने पर मस्तिष्क और इंद्रियों का संबंध लड़खड़ा जाता है, फलस्वरूप कुछ−का−कुछ अनुभव होता है। शराब के नशे में धुत्त व्यक्ति जैसा कुछ सोचता, समझता, देखता, अनुभव करता है, वह यथार्थता से बहुत भिन्न होता है। अधिक ऊँचे नशे उस उन्मत्तता की स्थिति को और भी अधिक बढ़ा लेते हैं। एल. एस. डी. जैसे नशे तो इतने तीव्र होते हैं कि उनके सेवन के उपरांत ऐसे विचित्र अनुभव मस्तिष्क को होते हैं, जिनकी उपयोगिता के साथ कोई संगति नहीं होती।
साधारणतः दैनिक जीवन में भी ऐसे कितने ही अनुभव होते हैं, जिन्हें यथार्थ नहीं कहा जा सकता। सिनेमा के परदे पर जो दीखता है, सही कहाँ है! एक के बाद एक आने वाला अलग−अलग तसवीरें इतनी तेजी से घूमती हैं कि उस परिवर्तन को आँखें ठीक तरह समझ नहीं पातीं और ऐसा भ्रम होता है, मानो फिल्म में पात्र चल−फिर रहे हों। लाउडस्पीकर से शब्द अलग−अन्यत्र निकलते हैं और परदे पर तसवीर के ओंठ अलग चलते हैं, पर दर्शकों को ऐसा ही आभास होता रहता है, जैसे अभिनेताओं के मुख से ही वार्त्तालाप एवं संगीत निकल रहा है। प्रकाश की विरलता और सघनता भर परदे पर उतरती है, पर उसी से पात्रों एवं दृश्यों का स्वरूप बन जाता है। और मस्तिष्क यह अनुभव करता है। कि यथार्थ में ही वह घटनाक्रम घटित हो रहा है।
सिनेमा के दृश्यक्रम को देखकर आने वाला यह नहीं अनुभव करता कि उसे यांत्रिक जाल−जंजाल से ढाई तीन घंटे उलझा रहना पड़ा है। उसे जो दुःखद, सुखद, रोचक, भयानक अनुभूतियाँ उतने समय होती रही हैं, वे सर्वथा भ्राँत थीं। सिनेमाहॉल में कोई घटनाक्रम नहीं घटा, कोई प्रभावोत्पादक परिस्थिति नहीं बनी, केवल प्रकाश−यंत्र या ध्वनि−यंत्र अपने−अपने ढंग की कुछ हरकतें ही करते रहे। इतने भर से दर्शक अपने सामने अति महत्वपूर्ण घटनाक्रम उपस्थित होने का आभास करते रहे। इतना ही नहीं, उससे हर्षातिरेक एवं अश्रुपात जैसी भाव भरी मनःस्थिति भी बनी रही। इस इंद्रिय भ्रम को ‘माया’ कहा जाता है। मोटी दृष्टि से यह माया सत्य है। यदि सत्य न होती तो फिल्म उद्योग, सिनेमाहॉल, उसमें युक्त हुए यंत्र, दर्शकों की भीड़, उनकी अनुभूति का क्या महत्त्व रह जाता! थोड़ी विवेचनात्मक गहराई से देखा जाता तो यंत्रों की कुशलता और वस्तुस्थिति को समझ न सकने की नेत्र−असमर्थता के आधार पर इस फिल्म दर्शन को मायाचार भी कह सकते हैं। दोनों ही तथ्य अपने−अपने ढंग से सही हैं। संसार चूँकि हमारे सामने खड़ा है, उसके घटनाक्रम को प्रत्यक्ष देखते हैं, इसलिए वह सही है, किंतु गहराई में प्रवेश करने पर वे दैनिक अनुभूतियाँ निताँत भ्रामक सिद्ध होती हैं। ऐसी दशा में उन्हें भ्रम, स्वप्न या माया कहना भी अत्युक्ति नहीं है।
स्पष्ट है, सभी दृश्य पदार्थ एक विशेष प्रकार के परमाणुओं का एक विशेष प्रकार का संयोग मात्र हैं। प्रत्येक परमाणु अत्यंत तीव्र गति से गतिशील हैं। इस प्रकार हर पदार्थ अपनी मूल स्थिति में आश्चर्यजनक तीव्र गति से हरकत कर रहा है, पर खुली आँखें यह सब कुछ देख नहीं पातीं और वस्तुएँ सामने जड़वत् स्थिर खड़ी मालूम पड़ती हैं। ऐसा ही अपनी पृथ्वी के बारे में भी होता हैं। भूमंडल अत्यंत तीव्र गति से (1) अपनी धुरी पर, (2) सूर्य की परिक्रमा के लिए अपनी कक्ष पर, (3) सौरमंडल सहित महासूर्य की परिक्रमा के पथ पर, (4) घूमता हुआ लट्टू जिस प्रकार इधर−उधर लहकता रहता है, उस तरह लहकते रहने के क्रम पर, (5) ब्रह्माँड के फैलते−फूलते जाने की प्रक्रिया के कारण अपने यथार्थ आकाश स्थान को छोड़कर फैलता स्थान पकड़ते जाने की व्यवस्था पर—निरंतर एक साथ पाँच प्रकार की चालें चलता रहता है।
इस उद्धत नृत्य को हत तनिक भी अनुभव नहीं करते और देखते हैं कि जन्म से लेकर मरणकाल तक धरती अपने स्थान पर जड़वत् जहाँ−की−तहाँ पड़ी रही है। आँखों के द्वारा मस्तिष्क को इस संबंध में जो जानकारी दी जाती है और जैसी कुछ मान्यता आमतौर पर बनी रहती है, उसका विश्लेषण किया जाए तो प्रतीत होगा कि हम भ्रम−अज्ञान की स्थिति में पड़े रहते हैं और कुछ−का−कुछ अनुभव करते रहते हैं। यह मायाग्रस्त स्थिति कही जाए तो गलत क्या होगा!
निरभ्र आकाश हमेशा नीला दीखता है, जबकि हम यह भली भाँति जानते हैं कि उस महाशून्य को नीलवर्णी आभा देने के लिए वहाँ कोई महाचितेरा नहीं बैठा है, लेकिन फिर भी आँखें उसे नीला देखती हैं। यह भ्रम नहीं तो और क्या है!
गगनमंडल को मेघ रहित स्थिति में जब रात्रि में निहारते हैं तो अगणित तारे टँगे दिखाई पड़ते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है, मानो वे छोटे−छोटे टिमटिमाते असंख्य प्रकाश−कण हों, पर यथार्थ में ऐसा नहीं है। उनमें से अनेक हमारे सौरमंडल के सूर्य से भी अनेक गुना बड़े प्रकाशपिंड हैं, किंतु प्रत्यक्ष नेत्रों को भासता कुछ और है। वे अपने चाँद से भी छोटे और मंद प्रकाशपुँज दीखते हैं।
जल में सूर्य−चंद्र में प्रतिबिंब पड़ते हैं और लगता है कि पानी में वे प्रकाशपिंड जगमगा रहे हैं। प्रतिबिंब पड़ने से हर लहर पर चंद्रमा नाचता−थिरकता मालूम पड़ता है। रेल में बैठने वाले देखते हैं कि वे, अपने स्थान पर स्थिर बैठे हैं और केवल बाहर तार के खंभे और पेड़ आदि भाग रहे हैं। क्या वे अनुभूतियाँ सत्य हैं?
रात्रि को स्वप्न देखते हैं। उस स्वप्नावस्था में दिखाई पड़ने वाला घटनाक्रम यथार्थ मालूम पड़ता है। देखते समय दुःख−सुख भी होता है। यदि वास्तव में संदेह होता, तो कई बार मुख से कुछ शब्द निकल पड़ना, स्वप्नदोष आदि हो जाने की बात क्यों होती? जागने पर स्पष्ट हो जाता है कि जो सपना देख गया था, उसमें सचाई कुछ भी नहीं थी, केवल कल्पनाओं की उड़ान को निद्रित मस्तिष्क ने यथार्थता अनुभव कर लिया। उतने समय की मूर्च्छित मनःस्थिति अपने को भ्रम−जंजाल में फँसाए रहकर बेसिर−पैर की उड़ानों में उड़ाती रही।
आँखों की तरह ही अन्य इंद्रियों की बात है। वे एक सीमा तक ही वस्तु स्थिति का ज्ञान कराती हैं और जो बताती−जताती हैं, उनमें से अधिकाँश भ्राँत होता है। बुखार आने पर गरमी की ऋतु में शाँत का और शीत की ऋतु में गरमी का अनुभव होता है। मुँह का जायका खराब होने पर हर चीज कड़वी लगती है। जुकाम हो जाने पर चारों ओर बदबू का अनुभव हो है। पीलिया रोग होने पर आँखें पीली हो जाती हैं और हर चीज पीले रंग की दिखाई पड़ती है। क्या ये अनुभूतियाँ सही हैं?
जिस वस्तु का जैसा स्वाद प्रतीत होता है, वह वास्तविक नहीं है। यदि ऐसा होता तो मनुष्य को जो नीम के पत्ते कड़ुए लगते हैं, वे ऊँट को भी वैसा ही क्यों न लगते! वह उन्हें रुचिपूर्वक स्वादिष्ट पदार्थों की तरह क्यों खाता! खाद्य पदार्थों का स्वाद हर प्राणी की जिह्वा से निकलते रहने वाला अलग−अलग स्तर के रसों तथा मुख से निकलते रहने वाला अलग−अलग स्तर के रसों तथा मुख के ज्ञान−तंतुओं की बनावट पर निर्भर होता है। भोजन मुँह में गया, वहाँ के रसों का सम्मिश्रण हुआ और उस मिलाप की जैसी कुछ प्रतिक्रिया मस्तिष्क पर हुई, उसी का नाम स्वाद की अनुभूति है। खाद्य पदार्थ की वास्तविक रासायनिक स्थिति इस स्वाद अनुभूति से सर्वथा भिन्न है। जो कुछ चखने पर अनुभव होता है, वह वास्तविक नहीं है।
शरीरविज्ञानी जानते हैं कि काया का निर्माण अरबों−खरबों कोशिकाओं के सम्मिलन से हुआ है। उनमें से प्रतिक्षण लाखों मरती हैं और नई उपजती हैं। यह क्रम बराबर चलता रहता है और थोड़े ही दिनों में कुछ समय पूर्व वाली समस्त कोशिकाएं मर जाती हैं और उनका स्थान नई ग्रहण कर लेती हैं। इस तरह एक प्रकार से शरीर का बार−बार कायाकल्प होता रहता है। पुरानी वस्तु एक भी नहीं रहती। उसका स्थान नए जीवकोश ग्रहण कर लेते हैं। देह के भीतर एक प्रकार श्मशान जलता रहता है और दूसरी ओर प्रसूतिगृह में प्रजनन की धूम मची रहती है। इतनी बड़ी हलचल का हमें तनिक भी बोध नहीं होता और लगता है देह जैसी−की−तैसी रहती है। जिन इंद्रियों के सहारे हम अपना काम चलाते हैं, उनमें इतना भी दम नहीं होता कि बाहरी वस्तुस्थिति बताना तो दूर, अपने भीतर की इतनी महत्त्वपूर्ण हलचलों का तो आभास दे सकें। ऐसी इंद्रियों के आधार पर यथार्थ जानकारी का दावा कैसे किए जाए। जिस मस्तिष्क को अपने कार्यक्षेत्र शरीर के भीतर होने वाले रोगों में क्या स्थिति बनी हुई है, इतना तक ज्ञान नहीं है और घर की बात को बाहर वालों से पूछना पड़ता है, वैद्य−डॉक्टरों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है, उस मस्तिष्क पर यह भरोसा कैसे किया जाए कि वह इस ज्ञान को वस्तुस्थिति में सही रूप में अवगत करा देगा।
ज्ञान जीवन का प्राण है, पर वह होना यथार्थ स्तर का चाहिए। यदि कुछ−का−कुछ समझा जाए, उलटा देखा और जाना जाए, भ्रम और विपर्यय हमारी जानकारियों का आधार बन जाएँ तो समझना चाहिए कि वह ज्ञान प्रतीत होने वाली चेतना वस्तुतः अज्ञान ही है। उससे जकड़े रहने पर हमें विविधविध त्रास ही उठाने पड़ेंगे, पग−पग पर ठोकरें खानी पड़ेंगी, इसी स्थिति को ‘माया’ कहते हैं। माया कोई बाहरी संकट नहीं, मात्र भीतरी भ्राँति भरी मनः स्थिति भर है। यदि उसे सुधार लिया जाए तो समझना चाहिए कि माया के बंधनों से मुक्ति मिल गई। यह मुक्ति वस्तुतः हर किसी को हस्तगत हो सकती है।
देव मंदिर का पुजारी भगवान की पूजा तो पूरे विधि−विधान से करता, किंतु सुबह−शाम पूजा करने के बाद बचे समय में वह स्वार्थ के वशीभूत हो, ऐसे कर्म करता जिससे भगवान के बनाए अन्य प्राणी दुःख पाते।
उनके अंतःकरण से एक दिन भगवान बोले, अरे मूर्ख सेवा कर, मेरी पूजा करने के बाद सेवा की इच्छा न हो, तो पूजा व्यर्थ है। पुजारी ने कहा, भगवान, मेरा मन तो आपकी पूजा में लगता है। लोगों की सेवा में नहीं। भीतर से आवाज आई, तू पगला है क्या मैं पत्थर की मूर्ति में ही हूँ। इन जीते−जागते प्राणियों में तुझे मेरा रूप नहीं दिखता? पुजारी को सच्चा ज्ञान हुआ कि सेवा ही पूजा की कसौटी है।
राजा जनक अपनी साज−सज्जा के साथ मिथिलापुरी के राज−पथ पर होकर गूजर रहे थे। उनकी सुविधा के लिए सारा रास्ता पथिकों से शून्य बनाने में राज्यकर्मचारी लगे थे। राजा की शोभायात्रा निकल जाने तक यात्रियों को अपने आवश्यक काम छोड़कर जहाँ−तहाँ रुका रहना पड़ रहा था।
अष्टावक्र को हटाया गया तो उनने हटने से इनकार कर दिया और कहा, “प्रजाजनों के आवश्यक कामों को रोककर अपनी सुविधा का प्रबंध करना राजा के लिए उचित नहीं। राजा अनीति करे तो ब्राह्मण का कर्त्तव्य है कि उसे रोके और समझाए। सो आप राज्याधिकारीगण राजा तक मेरा संदेश पहुँचा दें और कहें कि अष्टावक्र ने अनुपयुक्त आदेश मानने से इनकार कर दिया है। वे हटेंगे नहीं और राज−पथ पर ही चलेंगे।”
राज्याधिकारी कुपित हुए और अष्टावक्र को बंदी बनाकर राजा के पास ले पहुँचे। जनक ने सारा किस्सा सुना तो वे बहुत प्रभावित हुए और कहा, “ऐसे निर्भीक ब्राह्मण राष्ट्र की सच्ची संपत्ति हैं। उन्हें दंड नहीं, सम्मान दिया जाना चाहिए।”
राजा जनक ने अष्टावक्र से क्षमा माँगी और कहा, “मूर्खतापूर्ण आज्ञा चाहे राजा की ही क्यों न हो, तिरस्कार के योग्य है। आपकी निर्भीकता ने हमें अपनी गलती−समझने और सुधारने का अवसर दिया। आज से आप राजगुरु रहेंगे और निर्भीकता से सदा−न्याय−पक्ष का समर्थन करते रहने की कृपा करेंगे।” उन्होंने प्रार्थना स्वीकार कर जनहित हेतु राजगुरु का पद स्वीकार कर लिया।
योग की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। यह प्राचीन भारत की बहुमूल्य संपत्ति रही है। समस्त ज्ञान−विज्ञान की धाराएँ इसी परंपरा की परिणाम हैं। योग ऐसी महाशक्तियों का आगार है, जिससे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आदि सभी प्रकार की शक्तियों का विकास होता है तथा सुख शाँति एवं स्वास्थ्य के अन्वेषण में सफलता मिलती है। इसी कारण आज विश्वमानव शाँति एवं स्वास्थ्य की खोज में योग का आश्रय ले रहा है। अतः आज के युग को विज्ञान युग की भाँति ‘योग‘ युग कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
शाब्दिक अर्थों में देखा जाए तो ‘योग‘ शब्द ‘युज्’ धातु से बना है। संस्कृत में दो ‘युज्’ धातुओं का उल्लेख हुआ है। इनमें एक का अर्थ जोड़ना या संयोजित करना, सम्मिलित होना अथवा एक होना है तथा दूसरे का समाधिमनः स्थिरता है अर्थात् सामान्य रूप से योग का अर्थ जीवात्मा तथा परमात्मा का एकीकरण है। मानवीय चेतना का भगवत् चेतना में मिल जाना ही ‘योग‘ है। योग से परब्रह्म के साथ एकात्मता स्थापित करने का अवसर मिलता है। गीता ने समत्व और कर्म की कुशलता को योग कहा है। गीता के अनुसार हमारे जीवन में जो दुःख का संयोग है, उसका वियोग ही योग है अर्थात् दुःख के संयोग का वियोग ही योग है। पतंजलि के अनुसार चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है। पतंजलि की परिभाषाओं में शाब्दिक भेद होने के बावजूद भावार्थ की समानता है, क्योंकि पातंजल योग के अनुसार जब चित्तवृत्तियों का निरोध हो जाता है, तो साधक को प्रकृति और पुरुष का भेदज्ञान हो जाता है। इस ज्ञान से वह समस्त दुःखों से रहित हो जाता है अर्थात् दुःखों से वियोग हो जाता है।
योग का सामान्य अर्थ युक्ति है। इसी अर्थ के अनुसार योगवासिष्ठ में योग शब्द का अर्थ संसार सागर के पार होने की युक्ति बताया गया है। योगी याज्ञवल्क्य ने भी कुछ इसी प्रकार की व्याख्या की है। वे कहते हैं कि जीवात्मा और परमात्मा का समान रूपात्मक संयोग ही योग है। यहाँ पर समान रूपात्मक का अर्थ है कि जीवात्मा परमात्मा के समान होकर उसमें समर्पित हो जाए। जैनाचार्यों के अनुसार जिन−जिन साधनों से आत्मा की सिद्धि और मोक्ष का योग होता है, उन सब साधनों को योग कहते हैं। युगऋषि गुरुदेव योग को जीवन−साधना के रूप में स्वीकार करते हैं।
अपने मूल स्वरूप में योग मुख्यतः तत्त्वानुभूति, मनोनिर्वाण, शाँति एवं आनंदानुभूति का उपाय है। वस्तुतः भारतीय योगी दार्शनिक तत्त्वज्ञान के उपराँत तत्त्वानुभूति के लिए तत्पर व तैयार रहते थे। वे केवल कोरे तत्त्वज्ञान से संतुष्ट नहीं रहते थे, बल्कि उसकी अनुभूति के लिए उपाय और साधन भी जुटाते थे। भारतीय ऋषियों ने ज्ञान की अनुभूति के इस साधन को विज्ञान कहा है। इस प्रकार प्राचीन भारत में ज्ञान और विज्ञान की दो धाराएँ प्रवाहित हुई। इस संदर्भ में आदिगुरु शंकराचार्य ने स्पष्ट किया है कि ज्ञान का तात्पर्य है—शास्त्रों से या आचार्यों से आत्मा आदि पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करना और विज्ञान का अर्थ है—इन ज्ञान पदार्थों का उसी रूप में स्वयं अनुभव करना। इस प्रकार की अनुभूति सदा आनंदमय मानी गई है। ऋषियों ने इसी अनुभूति के लिए योग विज्ञान का आविष्कार किया था। आचार्य शंकर के शब्दों में अनुभवयुक्त ज्ञान ही विज्ञान सहित ज्ञान है। गीता में विज्ञान सहित गुह्यतम ज्ञान को मोक्ष का साधन बताया गया है। वेदाँत परंपरा में योग को स्वानुभूति का प्रमुख साधन माना गया है। इसके अतिरिक्त वैदिक साहित्य में योग शब्द का प्रयोग तत्त्वानुभूति की स्थिति (साध्य) तथा उसके साधन, दोनों अर्थों में किया गया है। इस तरह प्राचीन भारतीय योग−परंपरा का लक्ष्य केवल ज्ञानप्राप्ति का ही नहीं, विज्ञान प्राप्ति का भी है।
प्राचीन साहित्य में सर्वप्रथम ऋग्वेद में ‘योग‘ शब्द मिलता है। इस प्रकार वैदिक काल से ही योग परंपरा आरंभ हो गई थी, जिसे योगमाया नाम से प्रयोग किया गया है। ऋग्वेद में योग सिद्धि के लिए परमात्मा से प्रार्थना की गई है। यहाँ पर योग शब्द कई बार प्रयुक्त होकर जोड़ना या मिलाना अर्थ को रेखाँकित करता है, जो योग की विद्यमानता का ही प्रमाण है। योग द्वारा ज्ञानप्राप्ति के संदर्भ में यजुर्वेद में उल्लेख मिलता है कि हम सभी लोग योग द्वारा समाहित स्थिरचित्त से सर्वोत्पादक परमदेव परमेश्वर के उत्पादित जगत में अपनी शक्ति से उत्पन्न सुख−लाभ के लिए उस परमज्ञान को प्राप्त करें। यजुर्वेद में योगाभ्यास का वर्णन मिलता है। सामवेद के कई मंत्रों में योग का संकेत मिलता है। अथर्ववेद में योग को मुक्ति का साधन माना गया है। योगी पुरुषों की तपस्या की सफलता की कामना की गई है। अथर्ववेद में मोक्ष मार्ग का उपदेश देने का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार वेदों के मंत्रों से स्पष्ट हो जाता है कि वेदों में योग निरूपण, योग के पारिभाषिक शब्दों में क्रमबद्धता का थोड़ा अभाव होने के बावजूद भी उसमें मंत्र वाक्यों, प्राकृतिक वस्तुओं तथा प्रतीकों के आधार पर योग का वर्णन मिलता है। यह अवश्य ही योग के अस्तित्व का सूचक है। ऋषि योगी होते थे। इन अर्थों में देखा जाए तो योग−परंपरा का विकास वैदिक काल में दिखाई देता है, जो कि ऋग्वैदिक काल से भी कहीं अधिक प्राचीन है। योग−परंपरा के बीज अगर भारत के चिरप्राचीन प्राक् ऐतिहासिक युग में न छिपे होते तो इनका प्रस्फुटन एवं पल्लवन प्रारंभिक वैदिक युग में देखने को न मिल पाता।
इतिहासवेत्ता जॉन मार्शल ने सिंधु घाटी सभ्यता के पुरावशेषों में किन्हीं योगी की मूर्ति के मिलने की बात स्वीकारी है। उनके अनुसार इस मूर्ति में विशेष मुद्रा पर त्रिशूल, मुकुट, विन्यास, नग्नता, कायोत्सर्ग मुद्रा, योगचर्या, बैल का चिह्न आदि का समावेश है, जिससे सिद्ध होता है कि वह मूर्ति किसी योगी की ही है। वी0 एन0 लुनियाँ के मतानुसार इस तरह के कुछ अन्य योग−प्रतीक वहाँ पाई गई मुहरों, मुद्राओं में भी देखने को मिले हैं। इन मुहरों का उल्लेख करते हुए लुनियाँ कहते हैं कि चीनी मिट्टी से बनी एक मुहर पर योगासीन व्यक्ति अंकित है। उसके दोनों ओर एक−एक नाग और सामने दो नाग बैठे हुए हैं। डॉ0 राधाकुमुद मुखर्जी की मान्यता है कि सिंधु घाटी सभ्यता में ध्यान अथवा योग के अभ्यास करने वाले व्यक्तियों की सत्ता के पुरातात्त्विक एवं असंदिग्ध प्रमाण दृष्टिगोचर होते हैं। सच तो यह है कि भारत में योग परंपरा का इतिहास जितना पुरातन है, उसका स्वरूप उतना ही विस्मयकारक है। योग−परंपरा का प्रारंभिक स्वरूप प्रतीकात्मक रहा है। इन प्रतीकों की उपनिषद् काल में विधिवत् व्याख्या की गई तथा इसकी साधना का विस्तृत वर्णन किया गया।
उपनिषदों में प्रयुक्त योग शब्द आध्यात्मिकता की ओर संकेत करता है, क्योंकि योग, ध्यान, तप आदि शब्द समाधि के ही अर्थ में प्रयोग हुए हैं। श्वेताश्वेतर उपनिषद् में योग एवं उसकी क्रियाओं का तथा परिणाम का विवेचन किया गया है, जो योग−परंपरा को स्पष्ट करता है। अमृत उपनिषद् में षडंग योग की चर्चा हुई है, जबकि कुछ उपनिषद् योग के नौ अंग मानते हैं। इस प्रकार योग परंपराएँ क्रमशः विकसित होती हुई स्वतंत्र अस्तित्व रखने लगी। सूत्रों, स्मृतियों और महाकाव्यों में इसके इस विकसित रूप का उल्लेख मिलता है। पातंजल योगसूत्र में योग के आठ अंगों का जिक्र मिलता है, जो वर्तमान योग का आधारभूत तत्त्व हैं। पतंजलि ने योग को महनीय स्वरूप प्रदान किया। मनुस्मृति में यम−नियम को गिनाया नहीं गया है, परंतु याज्ञवल्क्य स्मृति में दस यम और दस नियम का उल्लेख मिलता है। रामायण में योग के ही समानार्थक तप शब्द का संकेत मिलता है, जिससे परम लक्ष्य की प्राप्ति संभव है। महाभारत में योग की अक्षय निधि संचित है। इसमें प्रायः योग शब्द का प्रयोग उपाय के रूप में हुआ है।
ऐतिहासिक सत्य है कि योग की उर्वर भूमि भारत देश के चिरअतीत में प्रारंभ की गई। योग− परंपरा की बहती कालसरिता न तो कभी बंद हुई, न कभी मंद पड़ी। उत्तरोत्तर योग−परंपरा के विविध रूपों का विकास होता गया और इसका महत्व भी बढ़ने लगा। बौद्ध और जैन साहित्यों में भी इसकी छाप पड़ने लगी। भगवान बुद्ध के चार आर्य−सत्यों में योग−वर्णित चार व्यूहों− बंधनों का पत्य झिलमिलाने लगा। बौद्ध योग में बोधिसत्व की स्थिति प्राप्त करना परम लक्ष्य बताया गया है। जैन योग एक साधना पद्धति का नाम है। जैन योग अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रहरूपी पाँच व्रतों का वर्णन किया गया है, जिनका पालन करना महाव्रत कहलाता है। इस प्रकार बौद्ध−जैन साहित्य में योग की परंपरा समान रूप से विकसित होती है। शुँग, शक, कुषाण, गुप्त एवं पूर्व मध्ययुग में योग−परंपरा उन्नति के शिखर पर पहुँच गई। अष्टाँगहृदय, अष्टाँगसंग्रह तथा चरम संहिता में योग−सूत्रों की व्याख्या की गई है। इसमें पंचभूत सिद्धाँत का उल्लेख मिलता है। पुराणों में योगविषयक चर्चा विशद रूप में मिलती है। योगशास्त्र के इतिहास की दृष्टि से भागवत पुराण का स्थान औपनिषद् योग तथा पातंजल योग के बीच के काल में है। इसमें ज्ञानयोग, क्रियायोग तथा भक्तियोग, तीनों साधनों का वर्णन मिलता है। अग्नि पुराण में पद्मासन का तथा गरुड़पुराण में स्वस्तिकासन, पद्मासन, असित आदि की गणना है। विष्णु पुराण में प्राणायाम का उल्लेख मिलता है।
इसी काल (650−1200 ई0) में योग के क्षेत्र में कुछ आचार्यों ने योग संबंधी अन्य साहित्य की रचना की। वाचस्पति मिश्र ने ‘तत्त्ववैशारदी’ नामक ग्रंथ का प्रणयन किया, जो व्यास भाष्य पर टीका थी। विज्ञानभिक्षु ने ‘योगवार्तिक’ और ‘योगसार संग्रह’ के नाम से दो ग्रंथ लिखे। राघवानंद ने ‘पातंजल रहस्य’ नामक ग्रंथ का सृजन किया। भोज ने ‘राजमार्तंड’ लिखी। भावागणेश ने ‘वृत्ति’ नामक पुस्तक लिखी। रामनंदपति ने ‘मणिप्रभा’ नामक किताब लिखी। अनंतपंडित ने ‘योग चंद्रिका’ तथा सदाशिव सरस्वती ने ‘त्याग सुधाकर’ नामक ग्रंथ का निर्माण किया। नागोभट्ट ने भी इसी क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस काल में बहुत−सी योग संबंधी टीकाएँ लिखी गई।
कतिपय विद्वानों ने योग−परंपरा का केवल साँस्कृतिक दृष्टि से विचार किया है तथा इस कार्य में संलग्न रहे हैं, परंतु अभी भी इस कार्य के कई पहलू अपूर्ण एवं एकाँगी हैं। इन पर विशद−व्यापक एवं विस्तृत शोधपूर्ण कार्य की अपेक्षा एवं अनिवार्यता है, ताकि प्राचीन भारत के इतिहास एवं संस्कृति की प्रेरक−पथप्रदर्शक योग−परंपरा का सर्वांग स्वरूप विश्व दृष्टि के समक्ष उजागर एवं प्रकाशित हो सके। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के योग विभाग में इसके व्यापक अनुसंधान की व्यवस्था बनाई गई है, ताकि योग का समग्र स्वरूप विश्वमानस के समक्ष उजागर हो और योग के द्वारा साँस्कृतिक नवजागरण की संभावना साकार की जा सके।
पाँडव वनभ्रमण कर रहे थे कि उन्हें प्यास लगी। नकुल कुछ दूर पर बने तालाब से पानी लेने गए। तालाब पर यक्ष का आधिपत्य था। वह केवल उसी को जल लेने देता था, जो उसके प्रश्नों का उत्तर दे सकता था। यक्ष ने नकुल से कुछ प्रश्न पूछे, वे उसका उत्तर न दे सके, तो शाप से मूर्च्छित होकर गिर पड़े।
नकुल को न आया देखकर एक−एक करके सब पाँडव वहाँ गए और वे भी उसी प्रकार मूर्च्छित हो गए। अंत में युधिष्ठिर गए और उनने यक्ष का समाधान पूरे संतोष से किया। इस पर यक्ष ने एक भाई को जीवित करा लेने को कहा। युधिष्ठिर ने नकुल को जीवित करने की प्रार्थना की, क्योंकि भीम, अर्जुन तो उनकी संगी माँ के पुत्र थे। माद्री पुत्रों में से एक रहना आवश्यक था, ताकि माद्री को भी कुँती की तरह ही पुत्रवती रहने का सुख मिले। यक्ष तो स्वयं धर्मराज थे एवं परीक्षा हेतु यक्ष रूप में आए थे, उनकी उच्च भावना से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने चारों को जीवित कर दिया।
“मैं तो इतने दिनों से भगवान की भक्ति कर रही हूँ”, एक स्त्री ने संत को बताया, “पर मुझे तो आज तक उन्होंने कभी स्वप्न में भी दर्शन नहीं दिया, आप कहते हैं कि वे आप से कभी अलग ही नहीं होते?” बात यह थी कि वह स्त्री भक्ति तो करती थी, पर अपने परिवार पड़ोसी और संबंधियों के साथ उसका व्यवहार बहुत रूखा एवं अहंकारपूर्ण था। घर वाले भी उसके आचार से दुखी थे।
संत बोले, “आज भगवान से पूछकर बताएँगे, आपसे क्यों नहीं मिलते?” दूसरे दिन स्त्री मिली, तो वह बोले, “भाई भगवान तुम पर नाराज हैं। कह रहे थे—वह हमारे बच्चों से लड़ती, मारती, पीटती और द्वेष रखती है, उससे मिलने का मन नहीं करता।” स्त्री समझ गई। उस दिन से उसने अपना व्यवहार मीठा बना लिया। फलस्वरूप दूसरे लोग उसे इतना प्यार और आदर देने लगे कि वह उस शाँति में ही भगवान की उपस्थिति अनुभव करने लगी।
व्यक्तित्व को यदि परिभाषित करना हो तो हमें कई बातों पर ध्यान देना होगा। सर्वप्रथम यह देखना होगा कि हममें समझदारी किस हद तक है। कार्य के प्रति हमारी लगन और निष्ठा कितनी है। भावनाओं और संवेदनाओं का स्तर क्या है एवं मानवीय गुणों और नैतिक मूल्यों में से कितनों को हम किस परिमाण में धारण किए हुए हैं। मोटेतौर पर समग्र व्यक्तित्व इसी परिधि में आता है और यह बताता है कि सामने वाला आदमी कैसा और किस चरित्र का है।
आधुनिक अध्येताओं और मनीषियों ने व्यक्तित्व निर्धारित करने के चार तत्त्व गिनाए हैं—आई॰ क्यू॰ (इंटेलीजेंस कोशंट या बुद्धिलब्धि), पी॰ क्यू॰ (पैशन कोशंट या धुनलब्धि), ई॰ क्यू॰ (इमोशनल कोशंट या भावनात्मक लब्धि) एवं एस॰ क्यू॰ (स्प्रिचुअल कोशंट या आध्यात्मिक लब्धि) इन लब्धियों के आधार पर ही कोई व्यक्ति बड़ा−छोटा, भला−बुरा कहलाता और सम्मान अपमान का भागी बनता है। जिनमें ये लब्धियाँ जितने अंशों में पाई जाती हैं, उनकी सफलता उन−उन क्षेत्रों में उसी मात्रा में सुनिश्चित समझी जाती है। छोटी लब्धि वाले लोग प्रायः असफल माने जाते हैं और जीवन में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि हस्तगत नहीं कर पाते। इसके विपरीत वे लोग हैं, जिनकी कोशंट (लब्धि) बढ़ी−चढ़ी है। ऐसे आदमी औसत से ऊँचे दरजे के होते हैं और उसी के अनुरूप उन्हें अपने कार्यों के परिणाम मिलते हैं।
आई॰ क्यू॰ व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता की मापक है। साधारण तौर पर किसी के बौद्धिक पैनेपन का अंदाज इसी के द्वारा लगाया जाता है। यह पूर्णतः तर्क पर आधारित होती है और बताती है कि सामने वाला आदमी कितना बुद्धिमान है, पर कई बार यह निर्धारण गलत सिद्ध होता है। संसार में कई व्यक्ति ऐसे भी पाए गए हैं, जिनकी आई॰ क्यू॰ तो अति उच्च थी और जो गणित के कठिन सवालों को बड़ी आसानी से हल कर देते थे, पर जब साधारण कक्षा के गणित के प्रश्न उनके सामने रखे जाते तो बगलें झाँकने लगते। ऐसे में उन्हें सही−सही बुद्धिमान या मूर्ख कहना उचित नहीं। वे एक साथ बुद्धिमान भी थे और मूर्ख भी। मूर्द्धन्यों ने उनकी इस विचित्र स्थिति को ठीक−ठीक अभिव्यक्त करने के लिए नया शब्द गढ़ा और उन्हें ‘ईडियट जीनियस’ का संबोधन दिया। इसके बाद से बुद्धि−मापन के इस तरीके पर अनेक बार सवाल उठाए गए और आपत्ति व्यक्त की गई।
सचाई तो यह है कि औसत आदमी कभी भी सर्वज्ञ होता नहीं। वह किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञ हो सकता है, उसमें उसे विद्वत्ता हासिल हो सकती है, पर दूसरे अन्य क्षेत्रों में उसका ज्ञान साधारण ही होता है और कभी−कभी तो उससे भी कम। ऐसे में बुद्धिलब्धि का उपयोग कर किसी व्यक्ति को विद्वान और अनपढ़ किसान को मूर्ख सिद्ध कर देना उचित न होगा। कृषक को कृषि की बारीकियों के संबंध में जितनी जानकारी होती है, उतनी एक इंजीनियर को नहीं। वह अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ होता है। उसे मूर्ख कैसे कह सकते हैं? बुद्धिलब्धि उसे मूर्ख बताती है, पर यथार्थ में वह ज्ञानवान ही है। यह अंतर्विरोध ही बुद्धिलब्धि पर संदेह व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है। ऐसे कितने ही उदाहरण दिए जा सकते हैं, जो बुद्धिलब्धि को शक के दायरे में ला खड़े करते हों, लेकिन यहाँ उद्देश्य उसकी उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगाना नहीं है। आपत्ति सिर्फ उनके निर्धारण के तरीके को लेकर है। वह यदि सही हो जाए तो बुद्धिलब्धि एक उपयोगी तत्त्व साबित होगा और उससे उस मस्तिष्कीय क्षमता का ठीक−ठीक निर्धारण हो सकेगा, जिसे ‘समझदारी’ कहते हैं। जो जितना समझदार होगा, उसकी बुद्धिलब्धि उतनी अधिक होती है। समझदारी के कारण ही आदमी विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति करता और सम्मान पाता है। सफलता समझदारी की देन है। व्यक्ति में यदि समझदारी का माद्दा कम हो तो हर क्षेत्र में उसको असफलता ही हाथ लगेगी। ‘आई॰ क्यू॰’ हममें यह समझ पैदा करती है कि किस कार्य को किस ढंग से, कब करने में वह उपयोगी और लाभप्रद सिद्ध होगा, इसलिए व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने की दिशा में इसे पहला तत्त्व माना गया है। 20वीं सदी के प्रारंभ में जब यह अवधारणा सामने आई, तो लोगों ने बड़े उत्साह के साथ इसका स्वागत किया, पर इन दिनों वह उत्साह धीरे−धीरे ठंडा पड़ता जा रहा है, क्योंकि अब ज्ञात हुआ है कि आई. क्यू., ई.क्यू. तथा एस. क्यू. का प्रतिशत ऊँचा न हुआ, तो वह आई. क्यू. फिर बहुत उपयोगी सिद्ध न हो सकेगी। अतएव आई. क्यू. के साथ उसके सहयोगी तत्त्वों का होना बहुत जरूरी है।
पी. क्यू. अर्थात् ‘पैशन कोशंट’। इसे ‘धुनलब्धि’ कहते हैं। किसी कार्य के प्रति व्यक्ति में लगन, धुन और निष्ठा कितनी है, यह पी. क्यू. द्वारा निर्धारित होता है। हम कर्त्तव्यनिष्ठ हैं या नहीं और यदि हैं, तो कार्य के प्रति हममें कितना समर्पण है, यह हमें एक जिम्मेदार व्यक्ति सिद्ध करता और ऐसे लोगों की श्रेणी में ला खड़ा करता है, जिन्हें ‘कर्त्तव्यपरायण‘ कहते हैं। कर्त्तव्यपरायणता एक ऐसी विभूति है, जो हमें प्रगति की ओर ले जाती है। अवगति अकर्मठता का नाम है। जो कर्मठ नहीं होगा और कार्य करने में पूर्ण मनोयोग नहीं लगाएगा, उसका हर काम अयोग्य व्यक्तियों के समान होगा, उससे कोई बहुत बड़ी उम्मीद नहीं की जा सकती। उसका जीवन विफल लोगों के सदृश्य होता है। इसके विपरीत लगनशील व्यक्तियों की चतुर्दिक् प्रशंसा होती है। सब उसका सहयोग करते और साथ निभाते हैं। असहयोग तो वहाँ मिलता है, जहाँ कर्त्तव्य के प्रति उपेक्षा बरती जाती है। प्रोफेसर अरिदम चौधरी अपनी पुस्तक ‘काउंट योर चिकेन बिफोर द हैच’ में धनलब्धि की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि यदि कोई यह सोचता है कि उक्त कार्य वह कर सकता है, तो उसको क्रियान्वित करने में उसे तुरंत जुट जाना चाहिए। लक्ष्य के प्रति समर्पण इस बात का सूचक है कि हमने कितनी गंभीरतापूर्वक प्रयत्न किए हैं। जहाँ गंभीर प्रयास होंगे, परिणाम वहीं उत्साहवर्द्धक हो सकते हैं, किंतु कई बार एकनिष्ठ उद्यम के बावजूद भी सफलता कोसों दूर बनी रहती है। वे कहते हैं कि ऐसे व्यक्तियों को असफल नहीं कहा सकता, कारण कि उनने प्राणपण से प्रयास किए हैं। उसमें किसी प्रकार की कोताही नहीं बरती। उदाहरणस्वरूप वे चे गुएवरा और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नाम गिनाते हैं। दोनों ही क्राँतिकारी थे। दोनों ने ही देश को आजाद कराने का सपना सँजोया था। यद्यपि वे लक्ष्य−प्राप्ति में सफल न हो सके, इतने पर भी उनकी गणना सफल व्यक्तित्वों में होती है। उनका पैशन कोशंट अति उच्च था।
पैशन कोशंट के बाद दूसरा पी0 क्यू0 अर्थात् परसेवरेन्स कोशंट आता है। परसेवरेन्स कोशंट अर्थात् बाधाओं के बावजूद सतत प्रयत्नशील रहने का माद्दा। कई व्यक्तियों की आँतरिक संरचना ही ऐसी होती है कि वे निरंतर बाधाओं से टकराते रहते हैं और इस क्रम में टूटते नहीं और चिंतित और उदास होते हैं। उन्हें ऐसे विघ्नों से बल मिलता है एवं पराक्रम बढ़ता है। वे चाहते हैं कि ऐसे तनाव के क्षण बराबर उनके जीवन में आते रहें और वे अपने पुरुषार्थ से उन्हें परास्त करते रहें। उन्हें इन क्षणों में हताशा नहीं, आनंद का अहसास होता है। जिन्हें तनाव में जीने का मजा आ गया है और जो इस कला को जानते हैं, वे ही बता सकते हैं कि उन्हें ऐसे पलों में कितनी ऊर्जा मिलती है और इन अवसरों पर वे कितने ओजस्वी बन जाते हैं।
पी0 क्यू0 अर्थात् जिम्मेदारी। जो जिम्मेदार हैं, कार्य के प्रति उनकी ही अपूर्व निष्ठा हो सकती है। वे यह नहीं देखते कि उन्हें सौंपा गया कार्य सरल है या कठिनाइयों से भरपूर। हर स्थिति और परिस्थिति में अड़चनों को झेलते हुए उन्हें पूरा करने के लिए वे सदा संलग्न होते हैं। जिम्मेदार व्यक्तियों की यह पहचान है कि वे कार्य को कल के लिए नहीं टालते। न ऐसा करते देखे जाते हैं कि अपना दायित्व दूसरों पर डालकर स्वयं मौज मनाएँ। उनकी कर्त्तव्यपरायणता उन्हें कभी सुस्त नहीं होने देती, न प्रमाद बरतने देती है।
ई0 क्यू0 या भावात्मक लब्धि व्यक्तित्व का तीसरा महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, जो हमें बतलाता है कि किसी परिस्थिति में व्यक्ति कैसी प्रतिक्रिया करेगा। यह भली और बुरी दोनों हो सकती हैं, पर उच्च ई0 क्यू0 वाले लोग हमेशा संतुलित प्रतिक्रिया करते हैं। वे कठिन परिस्थितियों में घबराते नहीं, इसलिए ऐसे समय में उनमें खीझ, निराशा, भय, क्रोध जैसे निषेधात्मक तत्त्व नहीं दिखलाई पड़ते।
नब्बे के दशक के मध्य में मूर्द्धन्य तंत्रिका विज्ञानी डेनियल गोलमैन ने इस तत्त्व से संसार को परिचित कराया। उनका कहना है कि यह ई0 क्यू0 ही है, जो है स्वयं की और दूसरों की भावनाओं के प्रति सचेत करती है। इसके अतिरिक्त सुखद और दुःखद परिस्थितियों में दक्ष प्रतिक्रिया की योग्यता प्रदान करती है। उनका ऐसा मानना है कि आई0 क्यू0 के उपयोग के लिए ई0 क्यू0 का सीमित उपयोग ही संभव है। इसे उनने प्रयोगों द्वारा सिद्ध भी कर दिखाया। देखा गया कि मस्तिष्क का जो हिस्सा महसूस करता है, उसे यदि क्षतिग्रस्त कर दिया जाए तो दक्षतापूर्वक चिंतन करने की शक्ति कमजोर पड़ जाती है। यह इस बात का प्रमाण है कि ई0 क्यू0, आई0 क्यू0 को प्रभावित करती है। यह एक आध्यात्मिक उपलब्धि है, जो हर अध्यात्मपथ के सच्चे पथिकों में पाई जाती है। जिसमें यह जितनी उच्च होगी, उसे उतना ही आध्यात्मिक माना जायगा। महापुरुषों की ई0 क्यू0 काफी अधिक होती है। यह हमें अपनी भावनाओं पर काबू पाने की प्रेरणा देती है और बतलाती है कि विपरीत परिस्थितियों में किस प्रकार संयमित रहा जाए। इसे ‘ईमानदारी’ कहना चाहिए। हमारा ईमानदारी का प्रयास की हमें ऊँचा उठाता और आगे बढ़ाता है। भावनाओं को परिष्कृत करने के संदर्भ में यह यदि लागू नहीं हुआ, तो अध्यात्म−पथ का अनुसरण करने के बावजूद भी हम उस दिशा में ठीक−ठाक तिल जितना भी आगे नहीं बढ़ सकेंगे। इसलिए ईमानदारी को न सिर्फ अध्यात्म का वरन् भौतिक जीवन का भी मूल कहा जाना चाहिए। इसमें यदि किसी प्रकार की कमी हुई तो हमारी प्रगति प्रभावित होगी और बाधित भी। ई0 क्यू0 हमें उच्च भावसंपन्न बनाकर सच्चे अर्थों में ईमानदार बनने के लिए प्रेरित करती है।
व्यक्तित्व का अंतिम और उच्चस्तरीय सोपान एस0 क्यृू0 कहलाता है। यह आदमी को आध्यात्मिक बनने की प्रेरणा देता और बुद्धि को चिंतन का एक नया आयाम प्रदान करता है। उच्च आत्मिक लब्धि से युक्त व्यक्ति की सोच सृजनात्मकता से ऐसी ओत−प्रोत होती है कि निषेधात्मक विचारधारा उसका स्पर्श तक नहीं कर पाती। दूसरे शब्दों में, इसी को आध्यात्मिक मनुष्य कहते हैं। अध्यात्म व्यक्ति को खरे सोने की तरह इतना प्रखर और अंतर को ऐसा सुँदर बना देता है, जिसका उपमा अनुपम से दी जा सके। उसका चिंतन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्ट हो जाता है। अंतस् इतना कोमल हो जाता है कि दूसरों की पीड़ा से द्रवित हो उठता है। अहंकार का उसमें नामोनिशान नहीं होता। स्वार्थपरता से हमेशा दूर रहता है। दूसरों के हित में ही अपना हित समझता और अपना अहित करके भी दूसरों का हितसाधन करता है। वह संपत्ति को कुबेर की तरह जोड़ने में विश्वास नहीं करता, उसे लुटाने में आनंद की अनुभूति करता है। उसका एक ही लक्ष्य होता है−सुख बाँटो, दुःख बँटाओ। इससे उसे अंतराल में शाँति और शीतलता का ऐसा अनुभव होता है, मानों साक्षात् गंगा का अवतरण हो गया हो। यह सब उच्च आत्मिक लब्धि से संपन्न व्यक्ति की विशिष्टताएँ हैं।
आत्मिक लब्धि को सर्वप्रथम डाना जोहर और इयान मार्शल ने परिभाषित किया। वे अपनी पुस्तक ‘स्प्रिचुअल इंटेलीजेंस−दि अल्टीमेट इंटेलीजेंस’ में इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए लिखते हैं कि आध्यात्मिक विचारधारा को संचालित करने वाला मस्तिष्क में एक केंद्र होता है। इसका नाम ‘गॉड स्पॉट’ दिया गया, जिसकी खोज प्रख्यात तंत्रिका मनोविज्ञानी माइकल परसिंजर एवं मूर्द्धन्य तंत्रिका शास्त्री वी0 एस0 रामचंद्रन ने नब्बे के दर्शक में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में की। यह केंद्र मस्तिष्क के टेंपोरल लोब्स वाले हिस्से में स्थित होता है। अध्ययन के दौरान जब आध्यात्मिक चर्चाओं में संलग्न व्यक्ति के मस्तिष्क की पॉजीट्रान एमिशन टोपोग्राफी द्वारा स्कैनिंग की गई, तो उक्त भाग प्रकाशित पाया गया, जो सिद्ध करता था कि वह हिस्सा उस मध्य सक्रिय था। इस ‘गॉड स्पॉट’ के द्वारा लेखकद्वय यह तो सिद्ध नहीं कर सके कि भगवान का अस्तित्व है या नहीं, पर वे इस निश्चय पर सुनिश्चित तौर पर पहुँच गए कि मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग उस अंतिम प्रश्न को जानने की दृष्टि से की गई है, जिसकी जिज्ञासा हर दार्शनिक को रहती है कि वह कौन है, कहाँ से आया है और अतंतः कहाँ चला जाएगा।
आत्मिक लब्धि को इन प्रश्नों के उत्तर पाने की दिशा में प्रारंभिक चरण कहा जा सकता है। जिनकी एस. क्यू. ज्यादा होती है, देखा गया है कि उनमें इस प्रकार के गूढ़ प्रश्नों के प्रति उत्कंठा भी अत्यधिक होती है। इन सवालों का वास्तविक हल अध्यात्म ही दे सकता है, इसलिए ऐसे व्यक्ति आध्यात्मिक होते हैं। सच्चे अर्थों में इन्हें ‘बहादुर’ कहेंगे।
समझदारी, जिम्मेदारी, ईमानदारी और बहादुरी के इन चार उपादानों से समग्र और संतुलित व्यक्तित्व बनता है। इन्हें निर्धारित करने वाले चार तत्त्व आई. क्यू., पी. क्यू., ई. क्यू. और एस. क्यू. हैं, जिनमें जितने परिमाण में यह पाए जाएँगे, उन्हें उसी स्तर का व्यक्ति समझा जाएगा।
हमारी इच्छा है कि हमारे बच्चे सच्चे उत्तराधिकारी बनते हुए आदर्शों के क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा करते हुए उज्ज्वल भविष्य समीप लाते दिखाई पड़ें। सारी धरती के भाग्य को जब नए सिरे से लिखे जा रहा हो, तब कंधा मचकाकर उपेक्षा दिखाने वाले निश्चित ही अभागे कहलाए जाएँगे। अपने की अर्जुनों, सुग्रीवों, हनुमानों की श्रेणी में ला खड़ा करो। एक ही बात ध्यान रखो कि युग−परिवर्तन के लिए और अधिक समर्पण! समर्पण!! समर्पण!!! —परमपूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य
भगवान् सूर्य नारायण ने अपना रथ अस्ताचल की ओर मोड़ लिया था। साँझ की सिंदूरी लालिमा से सभी दिशाएँ, तरु-पल्लव एवं समस्त धरा अनुरंजित हो रही थी। झरनों का कल-कल करता जल-प्रवाह भी सिंदूरी रंग का दिखाई दे रहा था। साँझ का सुनहरा संगीत गाते हुए पखेरू अपने-अपने घोसलों की ओर लौटने लगे थे। मयूरों की कूजन-ध्वनि सारे वन-प्रान्तर को एक अपूर्व माधुर्य से भर रही थी।
ऐसे में एक अकेला मुसाफिर ठहरे हुए कदमों के साथ कुछ सोच रहा था। उसके चेहरे पर झलकते स्वेद बिन्दु थकान का संकेत दे रहे थे। पाँवों से सिर तक गर्द-गुबार की हल्की सी परत यह स्पष्ट जता रही थी कि वह काफी दूर से चलकर आ रहा है। उसके इस तरह अचानक ठहरने से ऐसा लग रहा था कि थके हुए पाँव आगे बढ़ चलने के लिए अब तैयार नहीं हैं। थोड़ी देर कुछ यूँ ही सोचने में बिताकर आखिर वह यहीं बैठ गया। कुछ पल के बाद उसने झरने के जल से हाथ-पाँव और मुँह धोया। तीन-चार अंजलि जल पीकर अपनी प्यास बुझायी। इसके बाद वहीं पास में खड़े हरशृंगार के वृक्ष के नीचे पड़े पत्थर पर अपने काँधे में पड़ी हुई चद्दर उतार कर रख दी। और विश्राम करने के लिए लेट गया। लेटते ही उसे गहरी नींद ने घेर लिया।
जब नींद खुली, तब निशिपति की धवल ज्योत्सना समूचे वन प्रदेश में फैल चुकी थी। यह शरद पूर्णिमा की रात्रि थी। ऐसा लग रहा था कि भुवनमोहन की मुरली से सारा ब्रह्मांड विमोहित हो रहा है। नीरव-शान्त वन प्रदेश भी शुभ्र-ज्योत्सना की गोद में सुषुप्ति-सुख की अनुभूति पा रहा था। मुसाफिर की नींद खुलने तक रात का पहला प्रहर बीत चुका था। अब तक उसे भूख भी लग आयी थी। भूख से आतुर हो वह अपने साथ रखा हुआ भोजन करने बैठ गया।
भोजनोपरान्त उसने जल पिया। थोड़े समय के लिए ही सही किन्तु प्रगाढ़ निद्रा ने उसकी थकावट दूर कर दी थी। शरदपूर्णिमा की शुभ्र ज्योत्सना ने उसके मन को भी शुभ्र, ज्योतिर्मान, शान्त, प्रसन्न और प्रफुल्लित बना दिया था। इस समय हरशृंगार की कली-कली खिल उठी थी। उसकी मादक-मधुर एवं सुगन्धित वायु ने मन को आनन्द से भर दिया था। ऐसी शान्त-मधुर एवं सुगन्धित वायु ने मन को आनन्द से भर दिया था। ऐसी शान्त-सुखद और माधुर्य से ओत-प्रोत रात भला और कब मिलेगी? यही सोचकर उसने अपने झोले से एक पोथी निकाली। और पूर्ण शशि की धवल किरणों के उजाले में उसके पृष्ठ पलटे।
इसके एक पृष्ठ पर लिखा था ‘सत्य प्रतिष्ठयाँ क्रिया फलाश्रयत्वम्’ सत्य की प्रतिष्ठ से इच्छित फल प्राप्त होता है। वह महर्षि पतंजलि के इस सूत्र पर विचार करने लगा। उसने जो पोथी अपने झोले से निकाली थी, वह महर्षि पतंजलि प्रणीत योगसूत्र की पोथी थी। इस योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ने योग की प्रायः सभी रहस्यात्मक क्रियाओं और उनकी आश्चर्यजनक उपलब्धियों को सूत्रबद्ध किया है। महर्षि के इस अद्भुत कर्त्तृत्व एवं सत्य की प्रतिष्ठ का सुफल बताने वाले सूत्र पर विचार करते हुए उसे फिर से कब नींद आ गयी, पता ही नहीं चला।
उन दिनों उस पूरे इलाके में पिंडारा कहे जाने वाले ठगों का भारी आतंक था। हर कहीं उनके भयानक उत्पातों से जन-जीवन त्रस्त था। वे राहगीरों को लूटते, शहरों, बाजारों की श्री-सम्पदा छीन लेते, गाँव के गाँव उजाड़ देते। छत्तीसगढ़ प्रदेश की रायपुर रियासत में इन पिंडारों का बहुत ज्यादा जोर था। इन पिंडारों ने यहाँ अपना मुख्य केन्द्र बना रखा था। आस-पास के इलाके में रोज डाके पड़ना-हत्याएँ होना एक सामान्य बात हो गयी थी।
सामान्य जनों के अलावा ये राज्यकोष को भी नहीं बख्शते थे। मुकाबला करने वाले सिपाहियों को ये धराशायी कर देते। इनके आतंक से रायपुर राज्य के सिपाही और अधिकारी भी भयभीत रहते थे। कोई भी सैनिक तथा राज्य अधिकारी खजाने के साथ जाने के लिए तैयार नहीं होता था। ये बातें रायपुर के महाराज को भी पता चली। प्रश्न राज्य की प्रतिष्ठ का था। महाराज की व्यग्रता बढ़ गयी। उन्हें घबराहट होने लगी कि कहीं पिंडारे उनके राज्य पर कब्जा करके ही न बैठ जायं।
पिंडारों की समस्या से छुटकारा पाने के लिए महाराज ने राज्य के सामन्तों, विद्वानों की एक सभा बुलायी। इसमें पड़ोसी राज्यों के भी विशिष्टजनों को आमंत्रित किया गया। सभा में विचार बिन्दु एक ही था कि इन अत्याचारी हत्यारे पिंडारों का दमन किस तरह किया जाय? काफी देर तक विचारों के आदान प्रदान एवं विमर्श के बाद यह निर्णय हुआ कि पहले पिंडारों के निवास स्थान की खोज हो, बाद में राज्य की सेना उन पर आक्रमण करके उन्हें परास्त करे।
पर पिंडारों के निवास की खोज का काम करेगा कौन? हालाँकि इस काम के लिए भारी ईनाम एवं जागीर देने का प्रस्ताव था। किन्तु पिंडारों के आतंक की घबराहट सभी में थी। सो इस काम के लिए किसी की हिम्मत न पड़ी। सभा में सन्नाटा छा गया। काफी देर बाद इस सन्नाटे को चीरते हुए एक युवक उठा। दुबला-पतला शरीर, ललाट पर तिलक और कंठ में रुद्राक्ष की माला। अपने वेश एवं मुखमण्डल की दीप्ति से वह कोई महासाधक लगता था। उसने अपने आसन से दो कदम आगे बढ़कर घोषणा की कि जनहित में यह काम वह स्वयं करेगा। साथ ही उसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि लोकहित के इस काम को उसे कोई ईनाम नहीं चाहिए। उसकी इस घोषणा पर समूची सभा स्तब्ध हो गयी।
सभी को आश्चर्य एवं स्तब्धता में छोड़कर उसने अपनी आज तक की यात्रा पूरी कर ली थी। निद्रा से जगने और संध्या-जप आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर वह अभी हरशृंगार के पेड़ के नीचे बैठा था, तभी राह चलते एक व्यक्ति ने उससे पूछा, ‘भाई तुम कहाँ जा रहे हो?’ उसने उत्तर दिया- ‘पिंडारों के निवास स्थान पर।’ उत्तर देने वाले के चेहरे पर किसी भी तरह का भय-संदेह अथवा संकोच नहीं था। आगन्तुक व्यक्ति एकटक नजर से उसकी ओर देखता ही रह गया।
फिर थोड़ी देर बाद पूछने वाले ने थोड़ा हिचकते हुए कहा, आप ऐसा क्यों कह रहे हो, मैं कोई पिंडारा थोड़े हूँ। मैं भी आपकी तरह एक यात्री हूँ। इधर का इलाका जंगली है। मैंने सोचा यात्रा में आपका साथ हो जाएगा। आप तो हँसी-मजाक करने लगे।
मैं हँसी-मजाक नहीं कर रहा। रही बात मुस्कराने की सो वह मेरी आदत है। सचमुच ही मैं पिंडारों के निवास स्थान की खोज के लिए निकला हूँ। किन्तु अभी तक मुझे इसका कोई पता नहीं चला। मैं तो अभी बैठा-बैठा आदिमाता गायत्री से प्रार्थना कर रहा था कि इस घोर वन में कोई पिंडारा मिल जाय तो कितना अच्छा हो। उस मुसाफिर से गम्भीर दृढ़ता से कहा।
आगन्तुक उसकी बातों से हैरान हो गया। जैसे-तैसे उसने अपने आन्तरिक भावों को छुपाते हुए कहा- ऐसा क्यों कह रहे हैं? कहीं कोई पिंडारा सचमुच में मिल गया तो आपके कपड़े-लत्ते उतरवाकर सामान छीन कर आपको ठिकाने लगाकर चलता बनेगा। उसकी इस बातों पर वह मुसाफिर हँसा और बोला- मुझे डराते हो, शायद तुम नहीं जानते कि आदिशक्ति माता गायत्री मेरी माँ हैं। जो माता की सच्ची सन्तान होने का धर्म निभाते हैं, उन्हें कभी डरने की जरूरत नहीं पड़ती। जहाँ तक समान की बात है, तो मेरे पास अट्ठाइस स्वर्ण मुहरें हैं और ये कपड़े जो पहने हूँ। इन्हें दे देने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है। रही बात मेरी जान लेने की, सो वह तो तभी जाएगी जब माता की इच्छा होगी। मुसाफिर ने अपनी पूरी मस्ती में जवाब दिया।
उत्तर देने वाले की दृढ़ता, निर्भयता और भक्ति-विश्वास ने आगन्तुक को अपने प्रभाव में ले लिया। वह अपना यथार्थ परिचय देने के लिए विवश हो गया और बोला- ब्राह्मण देवता! मैं एक पिंडारा हूँ, बल्कि मैं ही यहाँ के पिंडारों का सरदार हूँ। पर आप मेरे निवास स्थान पर क्यों आना चाहते हैं? इस प्रश्न पर मुसाफिर ने अपने कुर्ते में रखी हुए मोहरें निकाली, साथ ही अपने कपड़े और थैले का सामान उसे सौंपने के लिए तत्पर हो कर बोला- मेरा यह सारा सामान लेकर अब मुझे अपने यहाँ ले चलिए।
आगन्तुक पिंडारा इस सारे दृश्य को देखकर हैरान था। पर महाराज आप हमारे निवास पर जाकर क्या करेंगे? उत्तर में मुसाफिर ने उस पिंडारा सरदार को सारी घटना कह सुनायी। और अपना परिचय बताते हुए कहा- मैं रुद्रदेव नाम का ब्राह्मण हूँ। मैं विगत कई वर्षों से प्रतिवर्ष केवल दुग्ध पर रहकर 24 लाख गायत्री महामंत्र जप का पुरश्चरण कर रहा हूँ। मेरा दृढ़ निश्चय है कि मैं कभी भी किसी भी स्थिति में झूठ नहीं बोलता। इसीलिए हे ठग सरदार मैंने तुम्हें सारी बातें सत्य बता दी है। मैं तुम्हारे निवास पर पहुँचकर तुम्हारे सभी बन्धुओं से यह कहना चाहता हूँ कि तुम लोग मनुष्य जीवन को लज्जित करने वाला यह क्रूर कर्म न करो।
ब्राह्मण के मुख पर सत्य और तप के तेज से पिंडारा सरदार का पाप छटने लगा और क्रूरता गलने लगी। वह ब्राह्मण को अपने साथ घने जंगल में ले गया। वहाँ पर अनेक ठगों और पिंडारों के बीच उस तपस्वी ब्राह्मण ने कई दिन बिताये। इन बिताये गए दिनों में ब्राह्मण के तप ने सभी को अभिभूत कर दिया। ब्राह्मण देवता के सत्य वचन सभी के अन्तःकरण में सूर्य किरणों की भाँति उतर चुके थे।
इन कई दिनों के बाद रायपुर के महाराज मोहनसिंह के दरबार में खुशी की तरंगें उमग रही थी। एक ही सत्य छाया हुआ था कि परम तपस्वी ब्राह्मण रुद्रदेव ने पिंडारों के निवास का पता कर लिया है। तभी महाराज ने सवाल किया- पिंडारों को परास्त करने जो फौज जाएगी उसका नेतृत्व कौन करेगा? इस प्रश्न के उत्तर में एक स्वर उभरा- अब उसकी आवश्यकता नहीं रही महाराज। पिंडारे तो कब के परास्त हो चुके हैं। एक हृष्ट पुष्ट बलवान मनुष्य ने सभा में आकर अपनी सारी सच्चाई बयान करते हुए कहा- इन ब्राह्मण देवता के सत्य और तप ने हम पिंडारों को बिना किसी हथियार के ही परास्त कर दिया है। मैं उनका सरदार अभयसिंह आपके सामने आत्मसमर्पण करता हूँ।
सारी बातें को सुनकर पूरी राजसभा हर्षमग्न हो गयी। महाराज मोहनसिंह ने राज सिंहासन से उतर कर परम तपस्वी ब्राह्मण रुद्रदेव के चरणों में सिर नवाया और पिंडारा सरदार अभयसिंह और उसके साथियों को नए सिरे से जीवन जीने की उचित व्यवस्था करने की घोषणा की। महाराज ने रुद्रदेव से यह भी प्रार्थना की कि हे विप्रवर! आप हमारा गुरुपद स्वीकार कर हमें निरन्तर मार्गदर्शन देते रहिए।
सत्य और तप की इस इतिहास कथा के अवशेष अभी छत्तीसगढ़ में मिलते हैं। छत्तीसगढ़ की वनवासी जातियों में आज भी शपथ लेते समय ‘झूँठ कहूँ तो रुद्रदेव की सौगन्ध’ कहने का रिवाज प्रचलित है। इस अंचल में ऐसी मान्यता है कि रुद्रदेव की झूठी सौगन्ध खाने के बाद झूठ बोलने वाले के घर चोरी या डाका जरूर होता है। सत्य और तप की महिमा आज भी अक्षुण्ण है।
आचार्य अग्निवेश से उनके शिष्य ने पूछा, भगवान, आप बताते हैं कि रोग निवारण अकेला ही काफी नहीं, दुर्बलता मिटाने हेतु स्वास्थ्य−संवर्द्धन भी जरूरी है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मात्र स्वास्थ्य को बढ़ाकर रोग को समूल मिटाया जा सके।
आयुर्वेद के मर्मज्ञ विद्वान आचार्य गंभीर स्वर में बोले, वत्स, किसी भी पोषक तत्त्व की उपयोगिता तभी है, जब विजातीय द्रव्यों को शरीर से हटा दिया गया हो। इसीलिए आयुर्वेद में शोधन को प्राथमिकता और स्वास्थ्य−निर्माण को द्वितीयता दी जाती है। शोधन न किया गया, तो रोग अपनी जड़ जमाए बैठा रहेगा और शेष बाह्योपचार मात्र बनकर रह जाएँगे।
गोपियों ने एक बार बाँसुरी से पूछा, “सुभगे, तुम्हें कृष्ण स्वयं हर समय ओठों से लगाए रहते हैं। हम सब उनकी कृपा पाने के लिए बहुत प्रयत्न करती हैं, परंतु सफल नहीं होती, जबकि तुम बिना प्रयत्न किए ही उनके अधरों पर रहती हो।”
“बिना प्रयत्न किए नहीं गोपियों”, मुरली बोली, “मैंने भी प्रयत्न किया है। जानते हो मुझे मुरली बनने के लिए अपना मूल अस्तित्व ही खो देना पड़ा है।”
गोपियों की तब समझ में आई। बाँसुरी अपने आप में खाली थी। उसमें स्वयं का कोई स्वर नहीं गूँजता था। बजाने वाले के ही स्वर बोलते थे। बाँसुरी को देखकर कोई यह नहीं कह सकता था कि यह कभी बाँस रह चुकी है, क्योंकि न तो उसमें कोई गाँठ थी और न कोई अवरोध।
गोपियों को भगवान कृष्ण का प्यार पाने का अनूठा सूत्र मिल गया।
तंत्र क्या है? इस पर विचार करने से ज्ञात होता है कि इसमें वह शक्ति निहित है, जो अन्य उपायों से हस्तगत तो की जा सकती है, लेकिन वह पूर्णतः सात्विक होती है। तंत्र द्वारा उपार्जित शक्ति तामसिक होती है। जो तम को तक महत्व दे, वह तामसिक है। इस दृष्टि से विचार करने पर तंत्र एक ऐसी साधन−प्रणाली प्रतीत होती है, जिसमें पैशाचिक क्रियाओं द्वारा भौतिक शक्तियों को वशवर्ती कर कार्य की संसिद्धि की जाती है। इस प्रणाली में साधना−विधान की पवित्रता पर उतना जोर नहीं दिया जाता, जितना इस बात पर कि माध्यम कितना सशक्त है। निर्भीकता इसकी सफलता की आवश्यक शर्त है। जो निडर नहीं होते, उन्हें तंत्रशास्त्र के अयोग्य माना जाता है।
वेद को ज्ञान−विज्ञान का आधार माना गया है, इसलिए अंतिम प्रमाण के रूप में वेद की चर्चा होती है, किंतु तंत्रों का आधार वेदों में खोजना निष्फल है। केवल अथर्वण द्वारा रचित ग्रंथों में तंत्र का नहीं, तंत्र के विषयों का, कर्म का विवरण उपलब्ध होता है, अतएव यह निश्चित है कि तंत्र वेदों में नहीं है। इतने पर भी उसके प्रभाव एवं प्रामाणिकता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। सहस्राब्दी से भी अधिक का समय ऐसा रहा है, जिसमें तंत्र का वर्चस्व संपूर्ण भारत में ही नहीं, सुदूर एशिया में व्याप्त था। हाथों में लगाई जाने वाली मेंहदी, आँगन में और द्वारों पर चित्रित की जाने वाली रंगोली और कल्पना, बालक होने पर लगाए जाने वाले स्वस्तिक और डलिया की आकृतियाँ—ये सब तंत्र के प्रतीक हैं। इन आकृतियों का प्रतीकार्थ तंत्र के गुह्यज्ञान से प्रभावित है और मेल रखता है।
स्मृति−संहिता की चौदह विद्याओं में तंत्र का उल्लेख नहीं है। पुराणों में भी यह नहीं है। संभावना इस बात की है कि उस युग का तंत्र का जन्म भले हो चुका हो, पर उसका प्रचार−प्रसार उतना न हुआ हो। वास्तविकता तो यह है कि वेद का विषय ही उपनिषद्, पुराण और तंत्र के रूप में परिवर्तित होता गया। वेदों का समझना जब वेदोत्तर काल में कठिन हो गया तो उनकी व्याख्या के रूप में उपनिषदों की रचना हुई। बाद में उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक भी जब दुरूह लगने लगे तो पुराण उनके सरल संस्करण के रूप में ड्डद्गष्द्बड्ड हुए और पुराणों की सामयिक व्याख्या करने के लिए तंत्र का प्रतिपादन किया गया। शंकराचार्य के नृसिंह तापनीय उपनिषद् के भाष्य में जिन तंत्रों का उल्लेख किया गया है, वे ईसा पूर्व की सातवीं सदी की रचनाएँ हैं। यही है कि प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर तंत्रों का काल−निर्णय।
तंत्र का व्यापक विस्तार ईसा पूर्व से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक बड़े प्रभावशाली रूप में भारत, चीन, तिब्बत, थाईलैंड, मंगोलिया, कंबोडिया आदि देशों में रहा। तंत्र को तिब्बती भाषा में ‘ऋगयुद्’ कहा जाता है। समस्त ऋगयुद् 78 भागों में है, जिनमें 2640 स्वतंत्र ग्रंथ हैं। इनमें कई ग्रंथ भारतीय तंत्र−ग्रंथों के अनुवाद है और कई तिब्बती तपस्वियों द्वारा रचित। मूलतः तंत्र का प्रतिपाद्य विषय एक ही है, अंतर सिर्फ उसके वर्णन, प्रकार और शैली में है। बाराही तंत्र के अनुसार तंत्र के नौ लाख श्लोकों में एक लाख श्लोक भारत के हैं। भारत के बाहर शेष श्लोक इन्हीं के व्याख्या−विस्तार हैं। उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार भारत के बाहर 181 तंत्र−ग्रंथ हैं, जिनमें अधिकाँश अनुपलब्ध हैं। बाराही तंत्र के अनुसार इन ग्रंथों में कुल 157950 श्लोक हैं। तंत्र का वर्ण्य विषय एक होने के कारण भारत के एक लाख श्लोक भारत से बाहर 9 लाख श्लोकों में विकसित हुए और तिब्बत के ऋगयुद् के ढाई हजार ग्रंथों में प्रतिपादित हुए। इसमें कोई संशय नहीं कि भारत के अनुपलब्ध तंत्रों का विषय तिब्बत के ऋगयुदों में अविकल या रूपांतरित रूप में मिल सकता है, किंतु आज इसकी संभावना भी समाप्त हो गई है कि तिब्बत में ऋगयुद् के सारे ग्रंथ मिल जाएँ।
बुद्धावतार के बाद बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ तंत्रों को एक नया क्षेत्र मिला। नया इस अर्थ में कि तंत्र का लक्ष्य अब दूसरे प्रकार से भी सिद्ध होने लगा। तत्त्वतः भारतीय तंत्र के मूल तत्त्व ही बौद्ध−साधना का अंग बने। इस दृष्टि से बुद्ध स्वयं ताँत्रिक थे। बुद्ध की घुँघराले बालों वाली प्रतिमा विशुद्ध रूप से उनके ताँत्रिक स्वरूप की परिकल्पना है। उनके बालों का गुँजलक सहस्रार के अगणित दलों का प्रतीक है। यों बुद्ध के वचनों और बौद्ध शास्त्रों में ब्रह्मचर्य का पूरा महत्त्व है। वे मानते हैं कि मनुष्य का वीर्य ही सब तरह की शक्तियों का आधार है, इसलिए उसे रोकने और ऊर्ध्वरेता बनने में ही निर्वाण का मार्ग प्रशस्त होता है। इतने पर भी सारे आदर्शों को एक ओर रखते हुए वज्रयान वामाचार से भी कई कदम आगे बढ़ गया। इस क्रम में एक समय ऐसा आया, जब संघाराम बौद्ध विहार बन गए थे। यहाँ कहने का आशय यह नहीं है कि बौद्ध साधक लंपट बनकर विषयासक्ति के मोह में पड़ गए थे। यह संभव है कि भौतिक सिद्धियों, साँसारिक मान−सम्मान की लालसा ने उनकी चमत्कारों पर केंद्रित कर दिया था और वे भी ताँत्रिक की भाँति, मंत्र, मद्य, मैथुन और हठयोग को अपनी साधना−विधि में सम्मिलित कर चुके थे। ताँत्रिकों की चक्रपूजा में माँ, बेटी, बहू की नारी प्रतीक के रूप में उपस्थितिमात्र की मान्यता भर है, शिव−संयोग (उनके साथ संभोग) का आदेश नहीं, पर वज्र यानी बौद्ध इसे भी स्वीकृति प्रदान करते हैं। कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि उन दिनों तंत्र का इतना व्यापक प्रचार हुआ कि प्रभाव से सात्विक बौद्ध साधक भी अछूते न रह सके।
तंत्र का विषय इतना विस्तृत है कि उससे मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, विद्वेषण जैसे गर्हित कार्य भी किए जाते हैं और आत्मशुद्धि जैसा कल्याणकारी प्रयोजन भी सिद्ध किया जा सकता है। तंत्र वस्तुतः रेखाओं का समाहार है। यों रेखाएँ अपने आप में निरपेक्ष होती हैं, किंतु उनका संयोजन हमारी अनुभूति और चेतना के केंद्रों को उद्दीप्त करता है। कई बार रेखाओं के संयोजन से बनी आकृति हमें भयभीत कर देती है तो चक्रव्यूह का रेखाचित्र हमें भूलभुलैया में डाल देता है। इसके समानाँतर कई आकृतियाँ हमें प्रसन्न भी कर देती हैं। चित्रों की रंगीन सृष्टि वैसी ही है, जैसी मनुष्य की माँसल काया, किंतु चित्र मूलतः रेखाओं का विस्तार और समायोजन भर होता है।
समायोजन का यह सिद्धाँत तंत्र में भी आदरणीय है, पर तंत्र चित्रकला नहीं है, इसलिए वह मानवीय या प्राकृतिक आकृतियों या दृश्यों को अपना आधार नहीं बनाता। वह एक प्रकार का रेखागणित है, अतएव वह कुछ कोणों, वलयों, त्रिभुजों के प्रतीकों के माध्यम से प्रकृति पर नियंत्रण करता है। इसलिए उन प्रतीकों में भी वही शक्ति आ जाती है, जो शब्द में रहती है। तंत्र में बीज मंत्रों का प्रयोग होता है और प्रयोजन के अनुसार विभिन्न फलकों पर विभिन्न पदार्थों से, विभिन्न लेखनी या उपकरणों द्वारा लिखा जाता है। ये पदार्थ जो तंत्र में काम आते हैं, तंत्र के ही विषय हैं। जिन द्रव्यों को शारीरिक व्याधि की शाँति के लिए आयुर्वेद काम में लाता है, वह उनका स्थूल प्रभाव है और वात, पित्त, कफ के रूप में ज्ञात दोषों पर नियंत्रण करता है। तंत्र के रूप में प्रयोग किए जाने पर ये ही पदार्थ गुणात्मक जगत पर नियंत्रण करते हैं। विष और अमृत के रूप में प्राणहरण और जीवनदान देने वाली औषधियाँ गुण−दोषों के माध्यम से अपना प्रभाव दिखलाती हैं। तंत्र के रूप में प्रयुक्त होने पर यही औषधियाँ गुणात्मक चक्र को और तत्त्वों के अनुपात को प्रभावित करती हैं।
ताँत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसी व्यक्तिगत बुराइयों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है।
इस दृष्टि से तंत्र दुधारी तलवार की तरह व्यवहार करता है। इससे किसी व्यक्ति में इन दोषों को उद्दीप्त एवं उत्तेजित कर उसे दुर्गुणी बनाना सरल हो जाता है। दूसरी ओर इसमें ऐसी ताँत्रिक क्रियाएँ भी हैं, जिनसे व्यक्ति के इन दुर्गुणों को शमित कर उसे सद्गुणी बनाया जा सके। इसलिए यह कहना उचित ही है कि तंत्र स्वयं में बुरा नहीं है। प्रयोक्ता और प्रयोग उसे बुरा बना देते हैं। दुनिया की कोई वस्तु केवल अच्छी या केवल बुरी नहीं होती। वह द्वैत गुण वाली होती है। जहाँ तम होगा, वहाँ प्रकाश की भी सत्ता निश्चित रूप से विद्यमान होगी, अन्यथा उस एकाकी सत्ता का बोध ही नहीं हो सकेगा। यहाँ सब कुछ सापेक्ष है। अंधकार के कारण ही हम प्रकाश को जान समझ पाते हैं। दोष न हो तो मनुष्य को गुण का औचित्य ही समझ में न आएगा। इसलिए तंत्र को अकल्याणकारी कहने वालों को यह समझ लेना चाहिए कि वह भी अद्वैत गुणसंपन्न नहीं है, उसमें भी भले−बुरे के दोनों भाव विद्यमान हैं। जहर केवल मारने का काम करता है, सो बात नहीं है, विषस्य विषमौषधम्’ इस सूत्र के अनुसार वह जीवनदाता भी है। यही बात तंत्र पर लागू होती है। उससे हानि पहुँचाने के साथ−साथ आत्मपरिष्कार का प्रयोजन भी सिद्ध किया जा सकता है, यह बात और है कि सदा से उसका बुरा पक्ष ही प्रकाशित और प्रयुक्त होता रह है। उसके मंगलकारी पहलू की हमेशा उपेक्षा होती रही है। किसी भी विधा के लिए यह बहुत ही निराशाजनक बात है।
तंत्र और ज्योतिष का परस्पर गहन संबंध है। भौतिक शरीर पर ग्रहों से आ रही रश्मियों का क्या प्रभाव पड़ेगा, यह ज्योतिष का विषय है, किंतु यह अध्ययन केवल मनुष्य वर्ग तक ही सीमित नहीं है। किस समय में वारों, ग्रहों, नक्षत्रों की युति में क्या विशेषता होती है, वनस्पति जगत पर इनका क्या प्रभाव पड़ेगा, किस समय में कौन−सा कर्म करना उपयुक्त रहेगा, यह सारा विवरण ज्योतिष देता आया है। तंत्र इन उल्लेखों से लाभ उठाता है। ताँत्रिक प्रयोगों में व्यक्ति के आत्मबल का तो महत्त्व है ही, इसके साथ ही अनुष्ठान−काल में ग्रहों की युतियाँ विशिष्ट हों, नक्षत्र तदनुरूप स्वभाव वाला हो, वार की और तिथि की प्रकृति भी यदि उससे साम्य रखती हो, विशिष्ट ग्रह−युतियों से विशिष्ट प्रकृति की किरणें विकीर्ण हो रही हों, तो इन सबका सम्मिलित प्रभाव अनुष्ठान की सफलता सुनिश्चित करता है। अतएव ताँत्रिक प्रयोगों में ज्योतिष का सदा सम्मान किया जाता और उसका सहारा लिया जाता है।
ज्योतिष काल पर चलता है। हमारे दैनिक जीवन में भी समय का महत्त्व और प्रभाव है। बाहर बजे छूटने वाली ट्रेन, पाँच बजे बंद होने वाले कार्यालय और मध्यरात्रि में मनाया जाने वाला स्वतंत्रता दिवस काल की ही विशेषता है। ठीक बारह बजे गाड़ी में बैठने वाला अपने गंतव्य पर पहुँच जाएगा, उससे इधर−उधर होने वाला नहीं। यही स्थिति ज्योतिषशास्त्र की मर्यादा की है। रविवार पुष्य नक्षत्र में ग्रहण की जाने वाली औषध में कौन−सा गुण है, उस गुण का व्यक्ति के शरीर−मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह बात ज्योतिष के आधार पर ही जानी जाती है। इसलिए ताँत्रिक प्रयोगों का विशद विवेचन और विस्तृत अनुष्ठान विधि ज्योतिष की मर्यादा का सम्मान करते हुए तदनुरूप करने की व्यवस्था देती है। ताँत्रिक अनुष्ठानों में आसान, माला, होम और हवि तथा भोजनादि द्रव्यों का निश्चय ज्योतिषशास्त्र की देन है। साँसारिक पदार्थों पर सूर्य, चंद्र और अग्नितत्त्व का किस अनुपात में प्रभाव पड़ता है, किस द्रव्य में इनके कारण कौन−सा विशेष गुण उत्पन्न होता है, यह ज्योतिष का क्षेत्र है, जिसे तंत्र में पूरी तरह मान्यता दी गई है।
अनुष्ठान एक महत्वपूर्ण ताँत्रिक प्रक्रिया है। यह दक्षिणमार्गी भी होता है, पर यहाँ उल्लेख वाममार्गी साधना का हो रहा है। यह अनुष्ठान जिस तर का हो, उसी तरह की तिथि, नक्षत्र, वार और लग्न का विचार किया जात है, उदाहरणार्थ, अनुष्ठान के लिए मेष लग्न—धन—धान्य का देने वाला, वृष—साधक का विनाश करने वाला, कर्क—सर्वसिद्धिदाता, कन्या—लक्ष्मीप्रदाता, मकर—पुण्यप्रद, कुँभ—समृद्धिकारक, ऐसा समझना चाहिए।
इसी तरह आसन का भी अपना महत्त्व है। ताँत्रिक अनुष्ठानों में बाँस का आसन—व्याधि एवं दरिद्रतादायक, तिनकों का—यशनाशक, पत्रों का—चित्तविक्षेप, काले मृग का—ज्ञान एवं सिद्धि, सिंह का—मोक्ष तथा लक्ष्मीप्रदाता, रेशम—पुष्टिकारक, कंबल—दुःखनाशक, सूती आसन—
सौभाग्यसूचक, व्याघ्र—ज्ञान, काठ का—दुर्भाग्य, पत्थर का—बीमारीदायक, धरती—दुःखानुभवकारक होता है। आसन में प्रयुक्त होने वाले इन पदार्थों का अपना स्वभाव और गुण−धर्म है, जिसमें चंद्र−सूर्य की रश्मियाँ प्रत्यक्ष−परोक्ष रूप में प्रभावशाली कारण के रूप में उपस्थित रहती हैं।
माला भी ताँत्रिक साधना में विशेष महत्त्व रखती है। वह किस द्रव्य की है, यह बात भी साधना की सफलता को प्रभावित करती है। स्फटिक सूर्य का प्रतीक है। मोक्षकामी साधनाओं के लिए यह प्रयुक्त होती है। रक्त चंदन और मूँगे की मालाएं आकर्षण, वशीकरण और श्री−प्राप्ति आदि कामों के लिए उपयोगी मानी गई हैं। रुद्राक्ष की माला पापनाशक भी है और सर्वसिद्धि प्रदाता भी। यही एक ऐसी माला है, जो हर क्षेत्र में हर प्रकृति के कार्य के लिए प्रयोग में आती है। वैष्णवों के लिए भी यह उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी शैवों, मोक्षकामियों और साँसारिक कामना वाले व्यक्तियों के लिए। रुद्राक्ष के मुखों के अनुसार उसे विभिन्न अंगों में धारण करने का निर्देश तंत्रशास्त्र देता है, जो ज्योतिष की दृष्टि से भी सामंजस्य रखता है। नो मुखों वाला बाएँ हाथ में, छह मुखों वाला दाहिने हाथ (भुजा) में तथा चौदह मुख वाला शिखा में धारण करना चाहिए। इनके भिन्न−भिन्न लाभ निम्न हैं—आरोग्यलाभ, सात्विक प्रवृत्ति का उदय, शक्ति आविर्भाव और विघ्ननाश। भिन्न−भिन्न स्थानों में धारण करने योग्य माला की मणियों की संख्या के संबंध में भी शास्त्रीय निर्देश हैं। सत्ताईस मणियों (रुद्राक्ष के) की माला गले के गिर्द, बत्तीस की कंठ प्रदेश में (जिससे झूलकर वह हृदय क्षेत्र का स्पर्श करती रहे। रुद्राक्ष माला से हृदय रोग का नाश होता है।), बाईस मणियों वाली मस्तक में, छह की कान में, बारह की कलाई में, पंद्रह की भुजा में धारण करनी चाहिए। अलग−अलग मुखों वाली माला से अलग−अलग प्रकार की शारीरिक−मानसिक व्याधियों का नाश होता है। कोई स्वस्थ व्यक्ति की पूर्ण मनोयोगपूर्वक साधना−अनुष्ठान कर सकता है। व्याधि उसमें विक्षेप पैदा करती है। अतएव तंत्रशास्त्र रुद्राक्ष माला को धारण करने का निर्देश करता है।
इस प्रकार तंत्र एक पूर्ण विज्ञान है। उसकी भारी प्रक्रियाएँ वैज्ञानिक हैं। यह अपरा प्रकृति को नियंत्रित कर शक्ति का उपार्जन करता है। शक्ति−संग्रह का तरीका यहाँ तामसिक है और सीधे भौतिक परमाणुओं को नियमित कर ऐसा किया जाता है। भौतिक शक्तियों पर नियंत्रण स्थापित करना साधारण बात नहीं, सावधानी और साहस का काम है। उसमें तनिक भी असावधानी हुई नहीं कि प्राण−संकट सामने आ उपस्थित होते हैं। इसलिए यह विधा हर एक के लिए सुलभ नहीं, वह सत्पात्रों के निमित्त ही सुरक्षित है। किसी श्रेष्ठ सद्गुरु के मार्गदर्शन में ही किए जाने योग्य है। सर्वसामान्य के लिए तो सौम्य गायत्री साधना ही सर्वश्रेष्ठ है।
कालूराम ने पुत्र को खेती करने का आदेश दिया। कई दिन बाद पूछा, बेटा! तेरी खेती का क्या हुआ? खूब लहलहा रही है पिताजी, बालक ने उत्तर दिया। मैंने शरीररूपी खेत में सत्कर्म का हल चलाया, उसमें ईश−भजन के बीज बोए, सत्संग की खाद और संतोष के जल से सींचा है, अब क्या है—सर्वत्र आनंद का अन्न उग रहा है। उत्तर सुनकर पिता अवाक् रह गए। धर्म की खेती करने वाला यही बालक आगे चलकर ‘नानक’ हुआ।
हजरत उमर ने एक युद्ध जीता। वहाँ की व्यवस्था सही करने के लिए उनका पहुँचना आवश्यक था। सो वे कुछ साथियों सहित उस यात्रा पर निकल पड़े। तीन आदमियों के पीछे एक ऊँट भी साथ था। दो पीठ पर सवार होते, तीसरा नकेल पकड़कर आगे चलता।
सिलसिला बराबर चलता रहा और वह नगर आ गया, जहाँ उन्हें पहुँचना था। प्रजाजन स्वागत की तैयारी किए बैठे थे। एक सवार ने खुद उतर पड़ने और हजरत को सवार होने के लिए कहा।
जवाब था, हम सबकी हैसियत एक है। नियम−अनुशासन के निभाने में ही हमारी शान है। हजरत ऊँट की नकेल पकड़े हुए ही शहर में घुसे। उनके इस शिष्ट व्यवहार पर सभी प्रजाजन पुलकित हो उठे। उन्हें मिलने वाले अपरिमित सम्मान का यही कारण था। दूसरों के प्रति सद्भाव, सम्मान की प्रतिक्रिया अनेक गुनी फलित होकर मिलती है।
पितामह ब्रह्म को सृष्टि के निर्माण की प्रेरणा−आत्मबल संपादन की स्फुरण हुई और उन्होंने सृष्टि रचकर जीवधारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया−कुछ अर्जित करना हो, तो आत्मदेव की शरण में जाओ और उसी से पाने का प्रयास करो।
ब्रह्माजी कमल के फूल पर बैठे हुए चिंतन में लीन थे। वे सोच रहे थे सृष्टि का निर्माण कैसे करूं। इसी असमंजस में पड़े हुए, ब्रह्मा को एक आकाशवाणी सुनाई दी, जो कह रही थी, तप कर, तप कर। ब्रह्माजी आकाशवाणी को ईश्वरीय आदेश मानकर तप में संलग्न हो गए। उन्होंने लंबे समय एक घोर तप किया और उसी के बल पर उन्हें सृष्टि के निर्माण की क्षमता प्राप्त हुई। पुरुषार्थ और साहस करके ही ब्रह्माजी ने कुछ पाया था। यही मार्ग ब्रह्मा द्वारा रचे गए प्रत्येक प्राणी के लिए है। उद्योगी मनुष्य उन्नति करते एवं सुख पाते हैं और अकर्मण्य व्यक्ति भाग्य को दोष देकर रोते−झींकते जिंदगी पूरी करते हैं।
विचारों का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव का इतिहास। विचार मन से उत्पन्न होता है और इसका सर्वश्रेष्ठ माध्यम है मनुष्य सर्वप्रथम विचार मनुष्य के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ। विचारों की स्थिति मन के उसी धरातल पर होती है जिस धरातल पर नर्वस सिस्टम अवस्थित है। अतः मन को सृजनशील कहा गया है। विचारों का इतिहास भी बड़ा अनोखा है।
पूर्व में विचारों का इतिहास वेदों से प्रारम्भ होकर श्री अरविन्द एवं गाँधी जी तक विकसित हुआ। पश्चिम में होमर, साक्रेटीस से सात्र तक आता दिखाई देता है। विचार परस्पर थाली में खटाई-मिठाई के समान विरोधी लगते हुए भी आपस में पूरी तरह निर्भर हैं। इनमें अटूट सम्बन्ध है। इनके सम्बन्ध को भले ही हम ऊपरी दृष्टि से न समझ पायें, परन्तु सम्बन्ध है अवश्य। मनुष्य और सृष्टि का चिंतन भी इसी प्रकार के सम्बन्धों पर आधारित है। इसका बोध जितना व्यापक होगा उतना ही सुसम्बन्धता खोजा जा सकता है।
सृष्टि की थाल में चाँद, तारे, ग्रह, नक्षत्र की गति, मनुष्य की अन्तःप्रकृति तथा जीवन का पर्यावरण से तारतम्य की खोज ही वह सम्बन्ध है। जिसमें विभिन्न विचार एक दूसरे से गुँथे हुए दिखाई पड़ते हैं। इन समस्त तथ्यों का उल्लेख वेद में मिलता है। इसीलिए वेद को एनसाइक्लोपीडिया अर्थात् विश्वकोष कहा गया है। वेद विद् धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना याने ज्ञान का कोश। वेदों की भाषा अलंकारिक, लाक्षणिक एवं काव्यमय है। काव्य में तमाम बातों को एक साथ रोचक अंदाज में कहने की सुविधा होती है। इस तरह विचारों की यात्रा कविता के रूप में वेदों से आरम्भ हुई। पश्चिम में भी विचारों का उद्भव कविता के माध्यम से होता प्रतीत होता है।
विचारों का सचेतन विकास कैसे हो? इसके लिए आवश्यक है विचार तंत्र का परिष्कृत, उन्नत एवं पवित्र होना। जिस प्रकार दूध के पात्र की पवित्रता के बिना शुद्ध दूध की कल्पना नहीं की जा सकती है, ठीक उसी प्रकार विचार तंत्र के परिष्कृत हुए बगैर विचारों की उत्कृष्टता सम्भव नहीं है। अतः विचारों की श्रेष्ठता के साथ-साथ विचार तंत्र को भी समुन्नत होना चाहिए।
विचारों का संधान किसने किया? इसके प्रत्युत्तर में वैदिक ऋषि समर्थ और सक्षम जान पड़ते हैं। ऋषियों ने ही विचारों का संधान किया। ऋषि उन्हें कहते हैं जो अपने मन के बाह्य एवं अन्तः प्रकृति का बोध प्राप्त कर चुके होते हैं। उन्होंने सर्वांगीण विचारों की खोज की थी, उनकी यह खोज अधूरी नहीं थी, बल्कि समग्र थी। बाह्य प्रकृति का मौलिक विज्ञान एवं अन्तः प्रकृति का अध्यात्म ज्ञान दोनों का ही समुचित तथा समग्र रूप से विकास हुआ था। वैदिक युग को स्वर्णयुग-सतयुग कहने के पीछे तथ्य यही है कि उन दिनों विचारों का पूर्ण विकास हुआ था एवं इसके परिशोधन तथा परिमार्जन की विधि ज्ञात थी।
पश्चिम में सतयुगी तथ्य को नकार दिया जाता है। इसका कारण है कि इनको विचारों की परिशोधन की विधि विदित नहीं थी। वे मात्र विचारों के विकास से ही वाकिफ हैं। जबकि विचारों के सचेतन प्रयास में विचार उन्नत आयामों को स्पर्श करता है। काव्य इसकी सुन्दर अभिव्यक्ति है। काव्य में मानव प्रकृति का सर्वांगीण अनुभव बोध निहित होता है। उन दिनों मानव प्रकृति की सभी दशायें पूर्णतः काव्य में झलकती थीं। अतः प्राचीन वैदिक सूत्रों में सन्निहित ज्ञान विज्ञान के विभिन्न विचारों को देखकर आज का आधुनिक विज्ञान चमत्कृत हो उठता है। इसके ठीक विपरीत पश्चिम में विकास का सचेतन प्रयास नहीं हुआ। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि मनुष्य का विकास एकाकी हो गया, जैसे हाथ मोटा तो पैर पतला, नाक छोटी तो कान बड़ा आदि। इस प्रकार पश्चिम में भावना तो पनपी परन्तु प्रयोग नहीं हो सका।
पश्चिम के एकाँगी विकास को कई रूपों में देखा जा सकता है। इमर्सन और वुड्सवर्थ की कविताएँ कालीदास तथा तुलसीदास से कहीं कम नहीं है। वहाँ की कविताओं में भी जादू भरी कल्पना हैं परन्तु इनमें समग्रता का सम्पूर्ण अभाव है। इसी एकाँगीपन के कारण ही वहाँ पर विचारों के दोनों रूपों भौतिक विज्ञान और आत्मविज्ञान का मिलन नहीं हो सका। पूर्व में समग्रता के होने से यह मिलन बिन्दु से सिंधु की तरह दृष्टिगोचर होता है।
विचारों के विकास की यही कड़ी जुड़े कैसे और इसके क्रमिक विकास को कैसे जाना जाय। इसके लिए यह कहा जा सकता है कि भारतीय सभ्यता में विचारों का क्रमिक विकास तो हुआ है परन्तु इसकी सभ्यता अति प्राचीन होने के कारण यह विकास की कड़ी जुड़ी-गुँथी दिखाई नहीं देती। परन्तु पश्चिमी सभ्यता का इतिहास दो से तीन हजार वर्ष पुराना है। फिर भी यहाँ पर विचारों के विकास का तारतम्य मिलना नजर नहीं आता है। अतः पश्चिम में भौतिक ज्ञान और आत्मविज्ञान दो ध्रुव बनकर ही रह गये।
पूर्व में विचार (ज्ञान) (Knowledge) का स्रोत अन्तःप्रज्ञा थी। यह हमारे बौद्धिक सोच का परिणाम नहीं था। वैदिक विचारधारा संश्लेषित (Synthesis) विश्लेषित (Analysis) नहीं है। परन्तु इसमें विश्लेषणात्मक प्रभाव का भी अभाव नहीं है। ऋग्वैदिक ऋचाओं में आत्मविज्ञान से भौतिक विज्ञान तक का संश्लेषण पाया जा सकता है। यह बड़ा ही अद्भुत तथ्य है। परन्तु कतिपय विज्ञजन इस वैदिक विचारधारा से अपरिचित एवं अनभिज्ञ होने के कारण ही इसमें विश्लेषणात्मक प्रभाव का अभाव मानते हैं। हालाँकि इसे जानने के लिए इसकी अलंकारित भाषा की की तह तक उतरने की आवश्यकता है, तभी इसे समझा जाना सम्भव हो सकता है।
इस प्रकार विचारों का क्रमिक विकास वेदों की ऋचाओं से उपनिषद् तक हुआ। दर्शन ग्रन्थों में यह सूत्र के रूप में सूत्रबद्ध हुआ जो विचार व बुद्धि की पराकाष्ठा को दर्शाता है। षड्दर्शनों में विश्लेषणात्मक विचार दृष्टिगोचर होते हैं। कपिल से पतञ्जलि के बीच काफी अन्तर का कारण भी वैचारिक विकास रहा है। पश्चिम में भी ऐसा ही कुछ देखा जा सकता है। होमर का काव्य व ग्रीक देश की कविता तथा काण्ट के बीच बहुत विविधता तथा विभिन्नता मिलती है।
विचारों की यात्रा भावना से प्रारम्भ होकर बुद्धि तक पहुँची है। भावना वह आधार है जो कल्पना को जन्म देती है। कल्पनाशीलता मन की द्योतक है। मन के अनुरूप ही कल्पना उठती है। इसका पोषण भावना द्वारा होता है। यदि इसमें सहृदयता का समावेश हो तो कल्पना में अभिवृद्धि होती है और निष्ठुरता से इसका ह्रास होता है। भावना की अभिव्यक्ति विचारों के माध्यम से ही होती है। इसी कारण पूर्व के ग्रन्थों में भगवत् अर्चन, प्रकृति वर्णन, शृंगार रस, विमान शास्त्र एवं आयुर्वेद सभी कविताओं में समाहित थे। इसी वजह से पहले काव्य को बहुत सम्मान एवं आदर दिया जाता था। और यही कारण है कि आचार्य शंकर का विवेक चूड़ामणि दर्शन होकर भी काव्य में रचा गया। विचारों के पुञ्ज योगवशिष्ठ का आधार भी काव्य है। अनेकों विज्ञान के ग्रन्थ भी कविता में हैं। पूर्व में विचार व भावना लिए समन्वय का अनोखा संगम है। अलगाव तथा विभेद पश्चिम में ज्यादा है। अतः इनके तारतम्य के लिए गहरे प्रयास की जरूरत है।
विकसित होने के पश्चात् विचारों का स्वरूप तीन रूपों में विभक्त होता है। प्रथम है-भाव से उत्पन्न विचार; दूसरा है- मानव मन के परिशोधन एवं परिमार्जन से उत्पन्न विचार और तीसरा है- बौद्धिक कल्पना, अन्वेषण आदि से उद्भूत विचार।
ऋषियों द्वारा दिया गया संश्लेष्णात्मक विचार पूर्व की अनमोल एवं श्रेष्ठ धरोहर है। मौलिक विचारों के कारण यहाँ सच्चा ज्ञान है। विचार की अभिव्यक्ति भाषा के माध्यम से होता है। भाषा संचार एवं संप्रेषण का काम करती है। इस प्रकार भावना का संसार धर्म के नाम से जाना जाता है। भावना का अगला कदम बुद्धि के माध्यम से दर्शन को उजागर करता है। और इस बुद्धि का क्रियात्मक स्वरूप विज्ञान कहलाता है। विज्ञान प्रायोगिक निष्कर्ष है। पहले इन तीनों में ठीक-ठीक तालमेल था। परन्तु पश्चिम में इनके बीच सामञ्जस्य नहीं हो पाने के कारण वहाँ पर सर्वथा भिन्न दृष्टिकोण मिलता है। धार्मिक विचार रहस्यवाद के अंतर्गत देखे जाते हैं क्योंकि यह भावना से उपजी कल्पना का रूपायन है। पश्चिम में भी बुद्धि रहस्यवाद के रूप में दिखाई देती है पूर्वी सभ्यता के अनुसार बुद्धि से उत्पन्न विचार रहस्य नहीं होता है। यह कल्पना की सतरंगी जाल बुनने की अपेक्षा यथार्थ धरातल में रहना अधिक पसन्द करती है। पाश्चात्य गगन में इमेनुअल काण्ट प्रथम बुद्धिवादी दार्शनिक हुए।
इस प्रकार पश्चिम में धर्म, दर्शन एवं विज्ञान अलग-अलग बन गए। परन्तु पूर्व में इनमें एक अपूर्व समन्वय एवं योग झलकता है। विचारों के इतिहास में ये तीनों विद्याएँ एक साथ एक व्यक्ति में पाया जाना बड़ा ही विरल एवं दुर्लभ है। परन्तु उन विरल पुरुषों में एक नागार्जुन ही ऐसे अद्भुत व्यक्ति हैं, जिन्होंने इन तीनों को एक साथ समेट कर अपने रहस्य का प्रकटीकरण किया। वे धर्म से योगी, दर्शन से शून्यवादी तथा विज्ञान से रसायनविद् थे।
कालान्तर में विचारों के बीच की समन्वय की कड़ी टूट गयी और प्रारम्भ हुआ भीषण विग्रह का दौर। इस विग्रह के अन्दर झाँके तो बड़ा ही भयावह स्वरूप दिखाई देता है। धर्म से करुणा का संदेश फैला तो सही परन्तु जीवन को नकार दिया गया। यह बहुत बड़ी विडम्बना है। जीवन को नकारकर भला करुणा की कौन सी कल्पना साकार हो सकेगी। जब बुद्धि को प्रश्रय मिला तो भावना-संवेदना शुष्क हो गयी। बुद्धि के प्रभुत्व का परिणाम ही संवेदनहीनता है, जिसका ज्वलन्त उदाहरण आज का युग है। विचारों की यह एकाँगिता पूर्व तथा पश्चिम दोनों जगह मानव जाति अभिशप्त सिद्ध हुई संस्कृति का लोप इसी एकाँगिता के कारण हुआ। यही इतिहास का सबसे अधिक क्रूर एवं कलंकित क्षण था।
जब से हम विचारों की समग्रता से कट गये तभी से विकृत युग का प्रारम्भ हुआ। हमारे समस्त अनुसंधान एवं खोज प्रकृति को नकारकर शुरू हुए। इस विकृति के लिए कौन जिम्मेदार है, यह तथ्य भले ही बुद्धि में न समाता हो, पर यह सत्य है कि पलायनवादी दृष्टिकोण हावी हो गया और हम पलायन वादी हो गए।
विकृति के इस वैचारिक युग में विचारों के स्वरूप के पुनरुद्धार का साहस की सामर्थ्य कौन जुटायें? कौन अपने सिंहनाद से विकृति के विकृत नींव को हिलाकर रख दे? कौन है जो संस्कृति के भव्य भवन का निर्माण करे? विचार क्रान्ति अभियान में ही इन प्रश्नों के उत्तर निहित हैं। इसी से समग्र विचारों के प्रतीक विचार क्रान्ति का अवतरण हुआ। यह अवतरण विचारों के इतिहास में अभूतपूर्व क्रान्ति है। यह समूचे जीवन के लिए सुख, शान्ति तथा विकासोन्मुखी विचार है। विचार क्रान्ति अभियान से प्रेरित समग्र विचारों के इस नवनीत में धर्म, दर्शन तथा विज्ञान को समुचित स्थान प्राप्त है। इसमें संतुलन और समग्रता का बोध है। इसे देखकर यह कहा जा सकता है कि संवेदना से उपजा चिंतन भावी मनुष्य का मार्गदर्शन करेगा। विचार क्रान्ति अभियान के तत्त्वों से नए मनुष्य के विचारों के ताने-बाने को बुनेंगे।
सिकंदर विश्वविजेता के मद में चूर था। भारत में उसने संतों की महत्ता व उन्हें प्राप्त सिद्धियों के विषय में खूब सुना था। जहाँ उसका डेरा लगा था, उसके समीप ही एक साधु की झोंपड़ी थी। उनकी ख्याति सुनकर वह वहाँ पहुँचा, चेहरे पर छाई तेजस्विता से प्रभावित हुआ, पर देखा कि उनके पास पहनने को न वस्त्र हैं, न रहने को ठीक स्थान। धन के गर्व में मदमत्त हो सिकंदर बोल उठा, महाराज, आपकी मैं क्या सेवा कर सकता हूँ? संत ने कहा, तू क्या सहायता करेगा, मेरा तो एकमात्र आश्रयदाता परमपिता परमात्मा है। कृपा करनी ही हो, बस इतनी कर कि मेरे लिए धूप छोड़ दे, जिसके मार्ग में तू खड़ा है। संत की निस्पृहता से प्रभावित सिकंदर मौन हो लौट गया।
ऋषि धौम्य ने नवागत शिष्य आरुणि की प्रथम दिन ही कठोर परीक्षा ली। उस दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। गुरु ने शिष्य से कहा, “बेटा आरुणि बारिश में कहीं खेत की मेंड़ टूट न गई हो। सब पानी निकल जाएगा। तुम जाओ और देखो तो जरा, मेंड़ टूट गई हो, तो बाँध आना।”
आरुणि तत्काल उठा। सचमुच खेत की मेंड़ टूट गई थी। पानी का बहाव बहुत तेज था। सब उपाय कर देखे, परंतु मेड़ रुकी नहीं। अब कोई उपाय न देख आरुणि स्वयं उस स्थान पर लेट गया। इस प्रकार पानी के रोके रहने में उसे सफलता मिल गई।
बहुत रात गए तक भी एक वहीं लेटा रहा, आश्रम न लौटा तो ऋषि को चिंता हुई। वे उसे खोजने खेत पर चल दिए। देखा तो छात्र पानी को रोके मेंड़ के पास बेहोश पड़ा है। देखते ही गुरु की आँखें भर आई। उन्होंने शिष्य को कंधे पर उठाया तथा आश्रम की ओर चल दिए।
उपचार—परिचर्या के बाद आरुणि ठीक हुआ तो ऋषि ने अपने तपोबल के प्रभाव से उसे जीवन विद्या में पारंगत बना दिया।
मानव जीवन के लिए मानव स्वयं एक अबूझ पहेली बना हुआ है। आदिकाल से स्वयं को अधिकाधिक जानना उसके समस्त प्रयत्नों का मूलाधार रहा है। वह कौन है? कहाँ से आया है? जीवन का अन्तिम लक्ष्य क्या है? जीवन जीने की श्रेष्ठ कला कौन सी है? ऐसे अनेकों प्रश्न उसे सतत् प्रयत्नशील रहने के लिए प्रेरित करते आये हैं। इन्हीं प्रयत्नों के अंतर्गत अध्यात्म तथा दर्शन का सृजन किया गया। किन्तु वे साधारण बुद्धि के लिए सहज बोधगम्य नहीं है। अतः साहित्य रचा गया ताकि सरल एवं सर्वसुलभ माध्यम से जीवन सत्य का ज्ञान हो सके। साहित्य में आनन्द रस का समावेश उसे रुचिकर भी बना देता है। इस प्रकार समाज में जीवन मूल्यों की स्थापना का श्रेय श्रेष्ठ साहित्य को विशेष रूप से जाता है। लघु कहानियों व आख्यायिकाओं ने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
इतिहास यथार्थ होकर भी भावदृष्टि से असत्य है जबकि कथा साहित्य काल्पनिक होकर भी सत्य है। आदि से अन्त तक इतिहास धोखाधड़ी, हत्या, लूटपाट, अमानवीय घटनाओं का एक ऐसा विवरण है जो मन को आनन्द के स्थान पर वेदना, रोष एवं ग्लानि से भर देता है। ऐसे इतिहास को सुन्दर नहीं कहा जा सकता और जो सुन्दर नहीं, वह सत्य भी नहीं हो सकता। सत्य वही है जो आनन्दमय भी हो और कल्याणकारी भी। मनुष्य ने संसार में जो सत्य, शिवत्व और सुन्दरत्व प्राप्त किया और प्राप्त कर रहा है, वही साहित्य है।
आदिकाल से आख्यायिका साहित्य का एक मुख्य अंग रही है। समय तथा रुचि के अनुसार इसकी शैली अवश्य परिवर्तित होती रही है। प्राचीनकाल में यह कौतुक उत्पन्न करने अथवा आध्यात्मिक विषयों के प्रतिपादन की दृष्टि से लिखी जाती थी। भागवत पुराण तथा उपनिषद् में आध्यायिकाओं के द्वारा आध्यात्मिक रहस्यों को समझाया गया है। जातक कथाओं और बाइबिल में भी आध्यायिकाओं का आश्रय लेकर धार्मिक सूत्रों को जन-जन के लिए सुलभ बनाया गया। इस प्रकार सुरुचिपूर्ण माध्यम से जीवन सत्य को समझाना आसान हो गया।
स्वादिष्ट से स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ का लगातार सेवन नवीनता के अभाव में अरुचिकर लगने लगता है। उसी प्रकार एक ही तरह के काव्य नाटक पढ़ते-पढ़ते आदमी ऊब जाता है। वह कोई नई वस्तु चाहता है जिसकी उत्कृष्टता भले ही अधिक न हो। हमारे यहाँ प्राचीनकाल में साहित्य की जो मर्यादाएँ बाँधी गयी थीं, उनका उल्लंघन वर्जित था; अतएव काव्य, नाटक, कथा किसी में भी हमने प्रगति नहीं की। जबकि पश्चिम में इसी नवीनता की भूख ने साहित्य में क्रान्ति मचा दी। वहाँ शैली में क्रान्तिकारी परिवर्तन तो हुआ पर उनमें जीवन तत्त्वों के समावेश पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया।
शेक्सपियर के नाटक अनुपम है; पर उनमें जीवन की समस्याओं का कोई समाधान नहीं। आज के नाटकों को उद्देश्य कुछ और है, आदर्श कुछ और है, विषय कुछ और है, शैली कुछ और है। कथा साहित्य में भी विकास हुआ। उसकी शैली पूर्ण रूपेण परिवर्तित हो गयी। उपन्यासों तथा आख्यायिकाओं की कला हमने पश्चिम से ही सीखी। ‘अलिफ लैला’ तथा देवकीनन्दन खत्री का उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता’ आदर्श थे। उनमें बहुरूपता थी, वैचित्र्य था, कौतुहल था, प्रेम था पर उनमें जीवन की समस्याएँ न थीं, मनोविज्ञान के रहस्य न थे, अनुभूतियों की इतनी प्रचुरता न थी, जीवन सत्य का स्पष्टीकरण नहीं था।
यूरोप के प्रतिभाशाली महान् लेखकों ने लघु कहानियों-आध्यायिकाओं के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान किया। बालजाक, मोपासाँ, चेखव, टॉलस्टाय, मैक्सिम गोर्की आदि के प्रयासों से छोटी कहानियों ने साहित्य के सभी अंगों पर विजय प्राप्त कर ली। हिन्दी की प्रत्येक पत्रिका में भी आज तीन-चार कहानियाँ मिलना स्वाभाविक है।
लघु कहानियों के इस बढ़ते प्राबल्य का मुख्य कारण मानव जीवन में बढ़ते संघर्ष और व्यस्तता है। जीवन संघर्ष में मनुष्य स्वयं को भी भूल जाता है। मनोरंजन की आवश्यकता स्वास्थ्य की दृष्टि से न होती और बिना किसी तनाव के अट्ठारह घण्टे कार्य करते रहना संभव होता तो मनोरंजन का नाम भी नहीं लिया जाता। लेकिन प्रकृति के समक्ष हम विवश हैं। अतः कम से कम समय में अधिक से अधिक मनोरंजन की चाह बनी रही। जिस उपन्यास को पढ़ने में कई दिन लगते हैं; उसका आनन्द सिनेमाघर अथवा दूरदर्शन-वीडियो पर ढाई-तीन घण्टे की फिल्म देखकर लिया जा सकता है। एक-आध घण्टे के दूरदर्शन धारावाहिक भी अच्छा मनोरंजन कर देते हैं। प्रतिस्पर्धा के इस युग में लघु कहानियाँ ही विज्ञान के अत्याधुनिक मनोरंजन के साधनों से होड़ ले सकती हैं। अतः कहानी ऐसी हो जो कम से कम शब्दों में कही जाय, एक-एक वाक्य, एक-एक शब्द महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली हो, प्रारंभ से अन्त तक पाठक मुग्ध भाव से पढ़ता रहे, कुछ ताजगी हो, कुछ विकास हो और इसके साथ ही कुछ तत्त्व भी हो। तत्त्वहीन कहानी से चाहे मनोरंजन भले हो जाये, मानसिक तृप्ति नहीं होती। यह सच है कि हम कहानियों में उपदेश नहीं चाहते, लेकिन विचारों को उत्तेजित करने के लिए मन के सुन्दर भावों को जागृत करने के लिए, कुछ न कुछ अवश्य चाहते हैं। वही कहानी सफल होती है, जिसमें मनोरंजन और मानसिक तृप्ति में से एक अवश्य उपलब्ध हो।
सबसे अच्छी कहानी वह होती है, जिसका आधार किसी मनोवैज्ञानिक सत्य पर आधारित हो। साधु पिता का अपने कुव्यसनी पुत्र की दशा से दुःखी होना मनोवैज्ञानिक सत्य है। पिता के मनोवेगों को चित्रित करना और तदनुकूल उसके व्यवहारों को प्रदर्शित करना, कहानी को आकर्षक बना सकता है। बुरा व्यक्ति भी बुरा नहीं होता। उसमें कहीं न कहीं देवता अवश्य छिपा होता है, यह मनोवैज्ञानिक सत्य है। उस देवता को खोलकर दिखा देना सफल आख्यायिक का काम है। विपत्ति पर विपत्ति पड़ने से मनुष्य कितना दिलेर हो जाता है, यहाँ तक कि वह बड़े से बड़े संकट का सामना करने के लिए ताल ठोंककर तैयार हो जाता है। उसकी सारी दुर्बलता भाग जाती है। और हृदय के किसी गुप्त स्थान में छिपी शक्तियाँ जागृत होकर ऐसे-ऐसे कारनामे करवा देती हैं जो सामान्य क्रम से कदापि सम्भव न थीं। उन गुप्त शक्तियों का लेखनी से प्रभावशाली प्रकटीकरण एक योग्य कलाकारिता है। एक ही घटना या दुर्घटना भिन्न-भिन्न प्रकृति के मनुष्यों को भिन्न-भिन्न रूप से प्रभावित करती है।
हम कहानी में इसको दिखा सकें तो वह अवश्य आकर्षक होगी। जीवन की विभिन्न समस्याएँ उनमें फँसे व्यक्ति के द्वन्द्व और उनका समाधान कहानी को रोचक बना देता है।
कहानियाँ कुछ घटना प्रधान होती हैं और कुछ चरित्र प्रधान। चरित्र प्रधान कहानियों के द्वारा चरित्र के एक अंग को ही इस प्रकार चित्रित किया जाये कि कहानी का सार शाश्वत सत्य पर आधारित तथा सर्वमान्य हो और उसमें जीवन को प्रभावित करने वाली गहराई हो। चरित्र इतने आकर्षक हों, सजीव हों कि पाठक थोड़े परिचय के बाद ही उससे आत्मीयता अनुभव करें अथवा स्वयं को उसके स्थान पर समझने लगे। ऐसे प्रभावशाली चरित्र-चित्रण से मानव हृदय वास्तविक जीवन चरित्रों से भी अधिक प्रभावित होता है। उन काल्पनिक चरित्रों के दुःख से हम भी दुःखी होते हैं और उनकी प्रसन्नता से हर्षित होते हैं। रूखे-पाषाण हृदयी व्यक्ति की अन्तरात्मा भी कहानी की हृदय विदारक घटनाओं पर रो उठती है। कथा के ऐसे चरित्र मानवीय मस्तिष्क पर अपना विशेष प्रभाव इसलिए डालते हैं क्योंकि उनके और हमारे मन के बीच जड़ता का वह पर्दा नहीं होता जो एक मनुष्य के हृदय को दूसरे मनुष्य के हृदय से दूर करता है।
अतः कहानियाँ छोटी तथा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और यथार्थ जीवन के स्वाभाविक चित्रण को लक्ष्य मानकर लिखी जायें। उनमें कल्पना का कम और अनुभूतियों का अधिक आधार लिया जाये। इसका अर्थ यह नहीं कि पूर्णतया वास्तविक जीवन चित्रण ही किया जाये। अनुभूतियाँ ही रचनाशील भावना से अनुप्राणित होकर कहानी बन जाती हैं। उसमें कई रसों, कई चरित्रों और कई घटनाओं के स्थान पर केवल एक प्रसंग का, चरित्र की एक झलक का सजीव हृदयस्पर्शी चित्रण हो। लेखन का आधार कोई रोचक दृश्य अथवा स्थूल सौंदर्य न होकर कोई ऐसी प्रेरणा हो जो पाठक की सुन्दर भावनाओं को स्पर्श कर सके। उसमें छिपे देवत्व को झकझोर कर जगा सके। हेरियट स्टो के उपन्यास ‘टॉम काका की कुटिया’ ने सम्पूर्ण अमेरिका के हृदय को मथ डाला था। वर्तमान समय की यही पुकार है कि प्रतिभाशाली भावमयी लेखनी इस दिशा में चल पड़े और पाठकों को मनोरंजन के साथ सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें और संघर्ष में जीवन सत्यों की रक्षा करने की प्रेरणा और शक्ति दे।
संत फ्राँसिस ने एक कोढ़ी को चिकित्सा के लिए धन दिया, वस्त्र दिए व उसकी सफाई आदि कर सेवा−सुश्रूषा की। एक गिरजाघर की मरम्मत के लिए दुकान की कपड़े की गाँठें बेचकर सारा धन दे दिया। उनके पिता को जब यह पता चला, तो उन्हें मारा—पीटा गया व संपदा के उत्तराधिकार से वंचित करने की धमकी भी मिली।
पिता की धमकी सुनते ही वे घर से निकल पड़े, यह कहकर कि आपने आज मुझे एक बहुत बड़े मोह—बंधन से मुक्त कर दिया। ऐसी संपत्ति को मैं दूर से ही प्रणाम करता हूँ। पिता के दिए कपड़े भी वापस कर, उत्तराधिकार में मिल सकने वाली भारी संपदा को लात मारकर वे घर से निकल गए। कालाँतर में ईसाई धर्म के व्यापक विस्तार में उनका कितना बड़ा योगदान रहा, यह सभी जानते हैं। लोकसेवी अपने मार्ग में बाधा बनने वाली संपदा से मोह न रखकर विश्वमानव की सेवा की ही बात विचारते हैं।
एक संत के पास एक छोटी−सी झोंपड़ी मात्र थी, जिसमें वह सो सकते थे। एक दिन जोरों की वर्षा हुई, किसी ने दरवाजा खटखटाते हुए आवाज दी, क्या अंदर जगह है? संत ने कहा, इसमें एक व्यक्ति सो सकता है, लेकिन दो बैठे रह सकते हैं। आप अंदर आ जाइए। उसे अंदर ले लिया गया और वे दोनों बैठ गए। इतने में ही फिर किसी ने कुँडी खटखटाई। जगह है क्या? संत ने जवाब दिया, यहाँ दो आदमी बैठ सकते हैं, किंतु तीन खड़े रह सकते हैं। दरवाजा खोल दिया गया। तीनों ने वह बरसात की रात खड़े होकर काटी। आध्यात्मिक−समाजवाद की यह व्यावहारिक परिभाषा यदि मनुष्य अपना ले, तो संसार कष्टों से मुक्त हो जाए।
जयनगर पर शत्रुओं का आक्रमण हुआ और वहाँ के राजा को स्त्री−बच्चों सहित रात्रि के अंधेरे में भागना पड़ा। दूर पहुँचने पर एक वृक्ष की छाया में बैठकर राजा−रानी विचार करने लगे कि अगले दिनों उदरपूर्ति किस प्रकार होगी। रानी ने सुझाया, आपने जीवन भर बहुत दान−पुण्य किया है, उसी में से थोड़े−से कुशीनगर नरेश को बेचकर धन प्राप्त कर लिया जाए। कुशीनगर का राजा लोगों के पुण्य खरीदने के लिए प्रसिद्ध था।
राजा सहमत हो गए, पर भूखे पेट कुशीनगर तक पहुँच कैसे जाए? रानी को एक उपाय सूझा, वह बोली, ग्रामीणों के घरों में जाकर आटा पीसेंगे और नित्य के खाने में से जो बचेगा, उसे जमा करती जाऊंगी।
राजा उस दिन रोटी सेंक रहे थे। भोजन के पूर्व ही एक भिखारी वहाँ आ पहुँचा। उसने जब क्षुधित मुद्रा में रोटी माँगी तो राजा हतप्रभ रह गए। अगर यह भी दे दिया, तो खाएँगे क्या? खाएँगे नहीं, तो दूसरे राज्य में कैसे पहुँचेंगे? रानी बोली, हम एक दिन और भूखा रह लेंगे, पहली वरीयता इसकी है। रानी की सलाह पर राजा ने सारी रोटियाँ उसे दे दीं व पूरा परिवार आगे चल पड़ा भूखे पेट।
मार्ग−व्यय के लायक आटा हो गया, तो उसे लेकर राजा बनाते−खाते दस दिन में कुशीनगर पहुँचे। राजा को अपना अभिप्राय सुनाया। उत्तर मिला, धर्मकाँटे पर चले जाइए, जो ईमानदारी का कमाया हो, उसे एक पलड़े में रख दीजिए। काँटा आपको उसी आधार पर स्वर्णमुद्राएं दे देगा।
जयनगर राजा ने अपने पुराने पुण्यों का विवरण काँटे के पलड़े में रखा, पर उससे कुछ भी न मिला। उपस्थित पुरोहित ने कहा, आपने परिश्रमपूर्वक जो कमाया और दान किया हो, उसी का विवरण लिखें।
राजा को पिछले दिनों भिखारी को दी हुई रोटियाँ याद आई। उनने उसका ब्यौरा लिखकर तराजू में रखा। दूसरे पलड़े ने उसके बदले सौ स्वर्ण मुद्राएँ गिन दीं।
पुरोहित ने कहा, उसी दान का पुण्यफल होता है, जो ईमानदारी से परिश्रमपूर्वक कमाया गया हो। राजा को दान का सही मर्म ज्ञात हुआ।
स्थविर अनिरुद्ध इन दिनों भगवान् तथागत के साथ कपिलवस्तु आए हुए थे। कपिलवस्तु स्थविर अनिरुद्ध का गृहनगर था। यहाँ की वायु में उनके बचपन की सुगन्ध रची-बसी थी। उनकी किशोरावस्था की उमंगे समायी थी। यहाँ के मृतिकाकणों में उनके जीवन के असंख्य स्मृतिकण बिखरे हुए थे। इस नगरी में पाँव रखते ही उनके मानस पटल पर अनायास ही यादों के अनेकों रंग उभर आए। यादों की असंख्य जलउर्मियाँ उनके मानस सरोवर में तरंगित हुई। शास्ता ने उनकी इस मनोदशा को सहज ही जान लिया। करुणा के अवतार भगवान् की करुणा अपने इस शिष्य पर सहज ही बरस पड़ी।
भगवान् ने करुणा से आपूरित नेत्रों से उनकी ओर ताका। फिर पास में खड़े आनन्द, रेवत एवं तिष्य आदि भिक्षुओं की ओर उन्मुख होकर बोले- भिक्षुओं! कपिलवस्तु बहुत ही सौंदर्यशाली नगर है। इसकी शोभा अनुपम है। तुम सब वत्स अनिरुद्ध के साथ जाकर कपिलवस्तु नगर का भ्रमण कर आओ। भगवान् की इस भक्त वत्सलता ने अनिरुद्ध के अन्तःकरण को भक्ति से संवेदित कर दिया। उसने श्रद्धा विभोर होकर उन्हें प्रणाम किया और भिक्षुओं के साथ नगर भ्रमण के लिए चल पड़े। बढ़ते कदमों के साथ नगर के चतुष्पथ, वीथियाँ एक बार फिर से उनकी स्मृतियों को कुरेदने लगी।
स्मृतियों के संस्पर्श के इस अहसास के साथ वह उस गृहद्वार पर जा पहुँचे जहाँ उनका बचपन गुजरा था। उनके परिवार के स्वजन, पड़ोस के स्नेहीजन उन्हें अपने बीच में इस तरह अचानक पाकर खुशी से फूले न समाए। हर्ष विभोर मन से उन सबने स्थविर अनिरुद्ध का स्वागत किया। बचपन और किशोरावस्था के अनेकों मित्र भी उनसे मिलने आए। इन सबके बीच में अनिरुद्ध की आँखें किसी और को ढूंढ़ रही थी। उन्हें इस तरह किसी को तलाशते देखकर उनकी माँ ने पूछा- किसे ढूंढ़ रहे हो पुत्र? अनिरुद्ध ने बड़े बुझे मन से कहा- रोहिणी नहीं आयी माँ। रोहिणी उनकी सगी बहिन थी। बचपन से युवावस्था में प्रथम पग रखने तक दोनों ने हर पल साथ बिताया था। न जाने कितनी स्नेह-स्मृतियाँ सजी और सँवरी थी मन में। उनके आने की खबर सुनकर रोहिणी का न आना किसी आश्चर्य से कम न था। माँ भी उसके बारे में कुछ नहीं बोली। बस चुप-चाप उठकर बुलाने के लिए चली गयी।
थोड़े समय बाद रोहिणी सामने थी। परन्तु अपना मुँह ढ़ककर आयी थी। स्थविर अनिरुद्ध बड़े चिन्तित हुए। उन्होंने उससे पूछा कि पहले तो तू आयी नहीं। अब आयी भी है तो मुँह ढँक कर आयी है। इसका कारण क्या है? रोहिणी ने कहा, भ्राता! मेरा चेहरा अनायास विकृत हो गया है। सारे चेहरे पर फफोले हो गए हैं। मैं छवि रोग से पीड़ित हूँ। इसलिए पहले मैं लज्जावश नहीं आयी। आपने बुलाया तो आयी हूँ। लेकिन मुँह ढ़ककर आयी हूँ। क्योंकि मेरा मुख अब दिखाने योग्य नहीं रहा।
बहिन की यह स्थिति देखकर अनिरुद्ध को अपने जीवन के विगत वर्ष स्मरण हो आए। जब उसकी बहिन का अप्रतिम सौंदर्य सर्वत्र चर्चा का विषय था। अपनी स्मृतियों में उन्होंने रोहिणी की एक पूर्व झलक देखी, अंग राग से मंडित मुख, शरीर सुगन्ध में सराबोर। उसके अधर बिम्बाफल थे, भृकुटियाँ विजय के संकल्प वाले धनुष सी तनी थीं। आकर्ण आम्र के फाँक सी आँखों में उल्लास के भंवर पड़ा करते थे। चीनाँशुँक जैसे शुभ्र, भृसण कपोलों में कूप बनते और हँसने पर चन्द्रिका की बौछार सी होती रहती। वही रोहिणी आज इस तरह मुँह ढापे, वह अपनी स्मृतियों से उबरते हुए सोच में डूब गए।
फिर अगले ही पल उन्होंने स्वस्थचित्त होकर हँसते हुए कहा, छोड़ इसकी फिकर। भगवान् का आगमन हुआ है। उनके साथ अनेकों भिक्षु गाँव में आए हैं। उनके ठहरने के लिए एक विशाल भवन बनवाना है, तू उस भवन को बनवाने में लग जा। अपने भाई की यह बात रोहिणी के मन में समा गयी। परन्तु उसके पास इतने रुपये नहीं थे। लेकिन उसने अपने सारे गहने, जेवर बेच दिए और भिक्षुओं के लिए भवन बनवाने में लग गयी। वह इस काम में ऐसा रमी कि अपने रोग को भूल ही गयी। और सबसे सुखद आश्चर्य तो तब हुआ जब भवन बनवाते-बनवाते निन्यानवे प्रतिशत रोग अनायास ठीक हो गया। फिर भी संकोचवश भगवान् के दर्शन को न जा पायी।
उसके द्वारा बनवाए भवन में भगवान् अपने भिक्षुओं के संग पधार चुके और वह स्वयं न आ पायी। यह अचरज सभी को था। परन्तु करुणावतार बुद्ध ने बड़े ही प्रेम से उसे बुलवाया। शास्ता के इस तरह बुलाने पर जब वह गयी तो उन्होंने पूछा, कि वह क्यों नहीं आयी? उसने कहा प्रभु, मेरे शरीर में छवि रोग उत्पन्न हो गया था, उसी से लज्जित होकर नहीं आयी। हालाँकि आपके लिए भवन बनवाने के सत्पुण्य से निन्यानवे प्रतिशत ठीक हो गया है, लेकिन एक प्रतिशत अभी भी बाकी है। अपना कुरूप चेहरा आपको कैसे दिखाऊँ? इसीलिए बचती रही। लेकिन जब आपने आदेश देकर बुलवाया है, तो आयी हूँ, क्षमा करें।
भगवान् ने गम्भीर स्वर में कहा, जानती हो पुत्री, यह रोग किस कारण हुआ है? नहीं भन्ते, वह बोली। भगवान् बोले- तेरे क्रोध के कारण। यह अत्यन्त क्रोध का फल है। और इसीलिए देख कि करुणा से अपने आप दूर हो चला है। तुझे अपने रूप का बड़ा अभिमान था। उस अहं के कारण ही तुझे क्रोध होता था। भिक्षुओं के लिए भवन बनवाने में तू भूल गयी अपने को। तेरा अहंभाव विस्मृत हो गया। तू कुछ इस तरह संलग्न हो गयी इस करुणापूर्व कृत्य में कि अहंकार को बचने का कोई स्थान ही न रहा। इसलिए देख तेरा रोग अपने आप ही दूर हो चला है। लेकिन पूरा दूर नहीं हो पाया। क्योंकि तेरा अहंकार छूटा तो है, परन्तु बोधपूर्वक नहीं छूटा है। इसलिए एक प्रतिशत रोग बचा हुआ है।
रोहिणी भगवान् की बातों को सुखद आश्चर्य के साथ सुन रही थी। भगवान् बिना रुके अभी भी कह रहे थे- पुत्री! तूने करुणा की तो लेकिन जान-बूझ कर नहीं की है। मूर्छा में की है। भाई ने कहा है इसलिए की है। तेरे भीतर से सहज स्फूर्त नहीं है। इसलिए एक प्रतिशत बच रहा है। जाग! जो अभी तू करुणा कर रही है, होश से कर। और जो अहंकार तूने काम में भूलकर भुलाया, उसे जानकर विसर्जित कर दे। इस बात को सुनकर रोहिणी अपने में डूब गयी। भगवान् की करुणा की वृष्टि से उसने अपने अस्तित्त्व में अनुभव किया। अपनी भाव समाधि की दशा से जब वह उबरी तो देखा उसका सारा रोग चला गया। तब भगवान् ने पास में खड़े भिक्षुओं से ये गाथाएँ कहीं-
क्रोधं जहे विप्पजहेय्य मानं सञ्मोजनं सब्बमतिक्कमेय्य। तं नामरुपस्मि असज्जमानं अकिञ्चनं नानुपातन्ति दुक्खा॥
यो वे उप्पतितं कोधं रथं मन्तं व धारये। तमहं सारथिं ब्रूमि रस्मिग्गाहो इतरो जनो॥
अक्कोधेन जिने कोधं असाधु साधुना जिने। जिने कदरिषं दानेन सच्चेन अलिकवादिनं॥
सच्चं भणे न कुञ्झेयं दज्जाप्यस्मिम्पि याचितो। एतेह तीहि ठानेहि गच्छे देवान सन्तिके॥
क्रोध को छोड़े, अभिमान को त्याग दे, सारे संयोजनों के पार हो जाय। इस तरह नाम, रूप में आसक्त न होने वाले तथा अकिंचन पुरुष को दुःख नहीं सताते। जो चढ़े हुए क्रोध को भटक गए रथ की भाँति रोक लेता है, उसी को मैं सारथी कहता हूँ। दूसरे तो केवल लगाम थामने वाले हैं। अक्रोध को क्रोध से जीते। असाधु को साधु से जीते। कृपण को दान से जीते और झूठ बोलने वाले को सत्य से जीते। ‘सच बोले, क्रोध न करे। माँगने पर थोड़ा अवश्य दे। इन तीन बातों से मनुष्य देवताओं के पास जाता है।’ भगवान् की इन गाथाओं के श्रवण ने उपस्थित सभी भिक्षुओं को गहरे मनन और निदिध्यासन के लिए बरबस प्रेरित किया।
महारानी अहिल्याबाई अपनी न्याय−निष्ठा के लिए प्रख्यात थीं। महेश्वर में उनकी राजधानी थी। होल्कर राजवंश की इस शूरवीर महिला की न्यायपरायणता पर दृढ़ विश्वास होते हुए भी इंदौर के नागरिकों में महारानी के पुत्र की उद्दंडता−उच्छृंखलता के विरुद्ध शिकायत करने का साहस नहीं था एक दिन जब उनके क्रोध में आकर एक नागरिक की हत्या कर दी तो सारे नागरिक अहिल्याबाई के पास पहुँचे व राजकुमार के अत्याचारों के विरुद्ध फरियाद की। महारानी ने सारे मोह−स्नेह को ताक पर रखकर पुत्र को मृत्युदंड दिया एवं हाथी के पैर से कुचलवाकर उसे मरवा डाला। ऐसे उदाहरण उँगली पर गिनने योग्य मिलते हैं। प्रेरणा का प्रकाश अनीति के अंधकार भरे साम्राज्य में फैलाकर साहस प्रदान करते हैं।
वसन्त प्रकृति एवं मानव मन के संयोग का सुन्दर पर्व है। प्रकृति अपने समस्त शृंगार के साथ वसन्त का अभिनन्दन करती है। सुरभित आम के बौर और कोयल की कूक से वसन्त के आगमन का संदेश प्रसारित होता है। इस संदेश से मानव मन भी पुलकित एवं पल्लवित हो उठता है। वसन्त मन में नव उमंग व हृदय में सजल भाव को जगाता है। नयी आशाओं एवं कामनाओं को जन्म देता है। सम्भवतः इन्हीं सभी कामनाओं को परिष्कृत और उदात्त करने के लिए सरस्वती पूजन की परम्परा प्रचलित हुई है। सचमुच ही वसन्त उमंग उत्साह और उल्लास तथा बुद्धि विद्या एवं ज्ञान के समन्वय का पर्व है।
ऋतुराज वसन्त के आगमन के साथ ही प्रकृति का सुन्दर स्वरूप निखर उठता है। पतझड़ के पश्चात् पेड़ पौधे नई-नई कोपलों, फूलों से आच्छादित हो जाते हैं। धरती सरसों के फूलों की वासन्ती चादर ओढ़कर शृंगार करती है। विभिन्न प्रकार के पुष्पों की मनमोहक छटा के साथ पलाश के रंग तथा कोयल की कूक सर्वत्र छा जाते हैं। वसन्त पुष्पों के माध्यम से प्रसन्नता व आनन्द का उपहार सौंपता है। वसन्त के आगमन के साथ ही प्रकृति सजीव, जीवन्त एवं चैतन्यमय हो उठती है। वसन्ती बयार में प्रकृति का रूप ‘नवगति-नवलय-तालछन्द नव’ से समन्वित हो जाता है। प्रकृति कुसुम कलिकाओं की सुगन्ध से गमक उठती है। आम के बौर वातावरण को सुरभित कर देते हैं। प्रकृति के इस परिवेश में मानव भी उसके साथ थिरक उठता है तदाकार हो जाता है। प्रकृति और मानव का यह आनन्द वसन्तोत्सव के रूप में प्रकट होता है।
वसन्त प्रकृति और मानव मन की उमंग की प्रतीक है। वसन्त की यह मादक तरंग मनुष्य के रग-रग में आह्लाद और उल्लास की नव स्फूर्ति भर देती है। प्रकृति के इस सुन्दर सजे आँगन में मानव नूतन सौंदर्य बोध को अनगिन आकार देता है। इन्हीं सब कारणों से वसंतोत्सव भारत की सर्वाधिक प्राचीन और सशक्त परम्परा रही है। प्राचीन ग्रन्थों व पुराणों में वसन्त का सुन्दर और सजीव वर्णन मिलता है। भविष्य पुराण के अनुसार वसन्त काल की शुक्ल त्रयोदशी में उल्लास के देव काम और सौंदर्य की देवी रति की मूर्ति बनाकर सामूहिक रूप से उनका पूजन किया जाता है। इन मूर्तियों को सिन्दूर से सजाया जाता है। भविष्यपुराण में वसन्त का चैत्रोत्सव के रूप में वर्णन किया गया है। ‘वर्ष क्रिया कौमुदी’ शैवागम के एक कथन को उद्धृत करती हुई कहती है कि चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को मदन महोत्सव मनाया जाता है। इस अवसर पर सभी नये एवं सुन्दर वस्त्र पहनते हैं तथा नृत्य गायन वादन का दौर चलता है। उस काल का वसन्त आज के होलीकोत्सव जैसा प्रतीत होता है। गरुड़ पुराणानुसार वसन्तोत्सव अगहन त्रयोदशी से प्रारम्भ होकर कार्तिक त्रयोदशी को समाप्त होना चाहिए। इस दौरान शिव की विभिन्न मूर्तियों एवं काम व रति के पूजन का विधान है। उत्सव सोल्लास मनाया जाता था।
वात्स्यायन ने अपने ‘सूत्र-ग्रन्थ’ में तथा इसके अनेक टीकाकारों ने वसन्त पर्व का विशद् वर्णन किया है। वसन्त पंचमी के दिन ‘वसन्तावतार’ नामक ऋतु उत्सव मनाया जाता है। भोज ने अपने ग्रन्थ ‘सरस्वती कण्ठाभरण’ में इस उत्सव का बड़े ही सुन्दर ढंग से चित्राँकन किया है। ‘हरिभक्ति विलास’ ग्रन्थ के अनुसार वसन्त पंचमी के दिन वसन्त का उद्भव हुआ। कालिदास ने ऋतु संहार में प्रकृति और मानव सौंदर्य के अनेक पहलुओं का वर्णन किया है। रत्नावली में इसका ‘वसन्तोत्सव एवं मदनोत्सव’ दोनों नामों से उल्लेख हुआ है। उन दिनों सारा गाँव-नगर आमोद-प्रमोदमय हो जाता था। राजपथ केशर मिश्रित अबीर से नहा उठता था। महाकवि भवभूति के मालती माधव में वसन्तोत्सव का शान्त सुन्दर और स्निग्ध चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस दिन मदन की पूजा होती है और सभी लोग अबीर कुँकुम से उत्सव मनाते हैं।
प्राचीन ग्रन्थों में वसन्त ऋतु में मदनोत्सव एवं सुवसन्तक नामक दो महत्त्वपूर्ण उत्सवों का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त उदकश्वेडिका, सहकार मंनिका, पुष्पवचायिका, अम्सूषरवादिका, नवपत्रिका आदि उत्सव भी वसन्त ऋतु में मनाये जाने का संकेत मिलते हैं। मथुरा की शुँग ओर कुषान कला में भी वसन्त का उल्लेख मिलता है। मथुरा के शिल्पियों ने वेदिका स्तम्भों पर वसन्त के नये एवं विभिन्न दृश्यों को चित्रित किया है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी प्राचीन काल में वसन्तोत्सव की लोकप्रियता को सहर्ष स्वीकारते हैं। वसन्तागमन से शीतकालीन जड़ता समाप्त हो जाती है। प्रकृति के रंग में प्रकृतिस्थ होकर मानव भी उल्लसित हो उठता है। मनुष्य के अन्दर का यह उल्लास समाज में आह्लादमय उत्सव के रूप में प्रकट होता है। प्रकृति और मानव परिवर्तन के स्वरूप को स्वीकारते हैं। मन की इसी प्रसन्नता से कलाकार अपनी तूलिका में नया रंग भरता है तो कवि भावनाओं को शब्द में गूँथते हैं। प्रकृति भी चैतन्यमय हो उठती है। प्रकृति की चैतन्यता अशरीरी है परन्तु पंचतत्त्वों से विनिर्मित मनुष्य इसका स्पष्ट अहसास करता है। यह प्रभाव एवं परिवर्तन व्यष्टि से समष्टि तक दृष्टिगोचर होता है। अन्ततः यही परिवर्तन लोकपर्व वसन्तोत्सव के तहत मनाया जाता है।
विज्ञजनों के अनुसार वसन्त प्रकृति और मानव के संवेदनशील सम्बन्धों का साकार रूप है। साहित्य के हर विधा में वसन्त का वर्णन मिलता है। अश्वघोष, कालिदास, माघ और भारवि जैसे प्रख्यात् संस्कृत कवियों से लेकर वर्तमान युग के कवियों का शृंगार है “वसन्त” । ऋतुराज वसन्त के बारे में सुमित्रानन्दन पन्त ने इस तरह अपना उद्गार व्यक्त किया है-
लो चित्रशलय सी पंख खोल, उड़ने को है कुसुमित घाटी, यह है अल्मोड़े का वसन्त, खिल पड़ी निखिल पर्वत घाटी।
पं. रामनरेश त्रिपाठी ने वसन्त के बारे लिखा है-’प्रकृति जब तरंग में आती है तब वह गान करती है उसके गीतों में हृदय का इतिहास इस प्रकार व्याप्त रहता है जैसे प्रेम में आकर्षण, श्रद्धा में विश्वास, और करुणा में कोमलता। प्रकृति के गान में मनुष्य समाज इस प्रकार प्रतिबिम्बित होता है जैसे कविता में कवि और तपस्या में त्याग।’ भक्ति और शृंगार के अद्भुत कवि विद्यापति ने वसन्त को शिशु माना है एवं इसके जन्म का सुन्दर चित्रण किया है- ‘माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को प्रकृति पूर्णगर्भा हुई। नौ माह और पाँच दिन व्यतीत होने पर प्रकृति के आँचल में नवजात वसन्त किलकारी करने लगा। वनस्पतियाँ इसकी सेविका बनीं। सर्वत्र उत्साह और उमंग का वातावरण विनिर्मित हो जाता है। शिशु वसन्त को शीतल वायु से बचाने के लिए मेघों ने छाया कर दी है। धतूरा तुरही बजा रहा है और नागकेशर की कली शंखध्वनि कर रही है। कमल की पंखुड़ियों से मधु लाकर भ्रमर बाल वसन्त को सौंप रहे हैं। कमलनाल को जोड़कर वसन्त के कमर में करधनी पहनायी गयी है।’
नव पल्लवों ने वसन्त की शैय्या तैयार की है और केशर ने उसे बधनखा पहनाया है। कदम्ब ने उसे अपने पुष्पों की माला समर्पित की है तथा मधुकारी लोरियाँ गा रही हैं। अरुण रथ पर आरुढ़ सूर्यदेव जन्मपत्री बना रहे हैं तथा कोयल ने उसका नामकरण वसन्त किया है। दक्षिणी वायु पुष्प पराग लेकर उसके शरीर में उबटन लगा रही है। आम्र मञ्जरियाँ उसे हार पहना रही हैं,मेघ उसके नेत्रों में अंजन लगा रहा है। विद्यापति कहते हैं वसन्त अब तरुण हो गया है। विद्यापति ने तरुण वसन्त की कल्पना इस तरह की है-
देखह माह है मन चितलाय, वसन्त विवाहा कानन धलि आय। मधुकर रमनी मंगल गाय, दुजब कोकिल मंत्र पढ़ाय। करुण मकरंद तथोदक नीर, विधु बरिमानी वीर समीर॥
कबीर ने बीजक में वसन्ती राग को बड़े ही सरस एवं सहज ढंग से गाया है-
जाके बारहमास वसन्त हो, तरके परमारथ बूझे विरला कोय, मैं आपऊँ मेस्तर मिलन तोहि, रितु वसन्त पहिरावहु मोहि।
हरिण केशरी नाम से विख्यात सम्राट हर्षवर्धन ने भी वसन्त का गुणगान किया है। वसन्त को हर कवि ने सहजता से स्वीकारा है और अपनी अभिव्यक्ति दी है। इसे पुष्प समय, पुष्प मास, ऋतुराज, पिकानन्द, कामसखा, फलु, मधु माधव के नामों से भी चित्रित किया गया है। वसन्त की इसी अपूर्व महत्ता के कारण ही गीताकार ने स्वयं को ऋतुओं में श्रेष्ठ वसन्त कहा है।
इस पुण्य पर्व पर सरस्वती पूजन का विधान है। वसन्त के नव परिवेश में मानवीय इच्छा आशाएँ एवं कामनाएँ अंगड़ाई लेती हैं। प्रकृति प्रदत्त इन भावों को परिष्कृत व उदात्त बनाने के लिए ज्ञान की देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है ताकि इन भावों को नूतन दिशा मिल सके। मानव उत्साह और उल्लास के साथ ही आत्मज्योति को प्रज्वलित कर सके। वह तमस से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़कर अमरत्व का दिव्य उपहार प्राप्त कर सके। इसीलिए इस अवसर पर सरस्वती पूजन किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वसन्त ऋतु में ग्रहों का योग भी माँगलिक प्रकाश में अनुगमन करता है व ग्रहों की ग्रीष्म स्थिति के प्रारम्भिक काल के परिचित स्वरूप का आभास कराता है। इसलिए भी सरस्वती पूजन का विधान है।
सरस्वती सरिता एवं कला की वाग्देवी के रूप में साँस्कृतिक आस्था का चिरकाल से सम्बल रही है। सरस्वती एक ओर जहाँ विलुप्त नदी के रूप में जन संस्कृति का प्रतीक है तो दूसरी ओर देश भूमियों में व्याप्त भारती की साँस्कृतिक चेतना का विकास है। सरस्वती पूजन कला संस्कृति के रूप में सदियों से जनमानस की आध्यात्मिक जिज्ञासा की प्यास बुझाती रही है। यह अनेकता में एकता समेटे हुए चिर प्रेरणास्रोत होकर विवेकशील जीवन का आदर्श भी बनी रही है। असंख्य कवि कलाकारों ने देवी सरस्वती की साकार प्रतिमा को सत्यं शिवं सुन्दरम् भाव से भरा है।
ऋग्वेद में सरस्वती को पवित्रता, शुद्धता, समृद्धता और शक्ति की देवी माना गया है तथा इन्द्र और मरुत देवता से सम्बन्धित किया गया है। ऋग्वेद के कई सूत्रों में सरस्वती का सम्बन्ध यज्ञ देवता इडा और भारती से जोड़ा गया है। ऋग्वेद ने सरस्वती को पवित्र नदी के रूप में भी उल्लेख किया है। शतपथ एवं ऐतरेय ब्राह्मण में यह पुण्य सलिला, नदी देवता और वाकदेवता के रूप में दिखाई देती है। शिवपुराण, वायुपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराणों में इन्हें ब्रह्मा की पत्नी रूप में निरूपित किया गया है। इन पुराणों में सरस्वती को अनेक विद्याओं की, कलाओं की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। वैदिक वाङ्मय में सरस्वती का अन्नाती तथा उदकवन्ती के नाम से उल्लेख किया गया है। शिवपुराण में सरस्वती को विराट् विश्व के समान दर्शाया है। वाजसनेयी संहिता को इन्द्र को शक्ति प्रदान करने वाली देवी के रूप अलंकृत किया गया है। दुर्गा सप्तशती के तृतीय चरित्र में महासरस्वती के दिव्य चरित्र का विशद् विवरण प्रस्तुत किया गया है। इस ग्रन्थ के अनुसार महासरस्वती दुर्गा का एक रूप है। सरस्वती सतोगुण का उत्कर्ष है। महाभारत सरस्वती को इस प्रकार कहा है-
दिव्या आपस्तधौषयः श्रद्धा मेधा सरस्वती, अर्थो धर्मश्च कामश्च विद्युतश्चैव पाण्डवः।
पुराणों में देवी सरस्वती का उल्लेख कई प्रकार से मिलता है। कहीं-कहीं सरस्वती को ब्रह्म की पुत्री माना गया है। भागवत् के तृतीय स्कन्ध में इस बात की पुष्टि हुई है। इसके अनुसार इनका जन्म ब्रह्म के मुख से हुआ है। मत्स्यपुराण में उल्लेख मिलता है कि वेदों में ब्रह्म और सरस्वती का अमूर्त निवास है। सरस्वती का नाम सतरूपा भी है जिसके पर्याय वाणी, वाग्देवता, भारती शारदा, नागेश्वरी इत्यादि है। इन्हें शुक्ल वर्णा, श्वेत वस्त्र धारिणी, वीणा वादिनी तथा श्वेत मदुमासना के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों के अनुसार वाल्मीकि, बृहस्पति और भृगु को क्रमशः नारायण, मरीचि तथा ब्रह्म ने सरस्वती मंत्र प्रदान किया था।
सरस्वती की साधना एवं उपासना वसन्त के उल्लास के साथ त्याग तप और आनन्द का परिचायक है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वसन्त के अग्रदूत श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम सरस्वती पूजन कर विधान किया था। इसके अनुसार-
आदौ सरस्वती पूजा श्रीकृष्णेन् विनिर्मितः, यत्प्रसादान्मुति श्रेष्ठो मूर्खो भवति पण्डितः।
श्रीमद्भागवत ने भी कृष्ण के सरस्वती पूजन की बात को स्वीकारा है। कहते हैं तभी से भारतवर्ष में वसन्त पंचमी के दिन सरस्वती पूजन का क्रम चल पड़ा। सरस्वती की उपासना-आराधना वैदिक धर्मावलम्बियों तक ही सीमित नहीं है। जैन मतावलम्बी भी इनकी उपासना करते हैं। बौद्ध धर्म सरस्वती पूजन की मान्यता प्रदान की है। बौद्ध ग्रन्थ साधनमाला के अनुसार सरस्वती अपने भक्तों को ज्ञान और समृद्धि देती है। तिब्बत में सरस्वती को महासरस्वती, वज्रशारदा और वज्रसरस्वती आदि रूपों में देखा जा सकता है। तिब्बत वासी इन्हें वीणासरस्वती तथा चीन निवासी ‘नीलासरस्वती’ के रूप में मानते हैं।
वीणा, पुस्तक, कमल, हंस और जल के समायोजन से संगीत देवी सरस्वती का कला सौंदर्यमय कल्याणी रूप आराध्य बना रहा है। वीणा हस्त स्वर तंत्री और संगीत कला के समृद्ध रूप को स्पष्ट करती है। पुस्तक लोक शास्त्र में संचित अनुभवों का ‘सरस्वती श्रुती महती व धीमताम्’ के रूप में स्मरण दिलाती है। कमल माधुर्य, सौंदर्य और अनासक्तभाव को रूपांतरित करने वाला है। सरोवर का जल हृदय में भाव समुंदर की ओर संकेत करता है। सरोवर में उठने वाली उर्मियाँ लहरें हृदय रूपी भाव सागर में प्रतिपल-प्रतिक्षण उठने वाली उत्साह एवं उमंग को प्रदर्शित करती हैं। जीवन इसी उमंग और भावनाओं के लय से सतत संचरित होता रहे। इन दिव्य भावों के ध्यान से आस्था अपने पवित्र एवं प्रखर स्वरूप को प्राप्त करती है। इस प्रकार सरस्वती की भावभरी प्रतीकोपासना उपासक को नूतन चेतना एवं नवीन भाव से भर देती है। साथ में वातावरण की सूक्ष्म चेतना प्रकृति के कण-कण में तथा मानव के रग-रग में घुलकर वासन्ती उल्लास बिखेरती रहती है।
भारतीय मनीषा ने शृंगार की देवी सरस्वती को साधना से जोड़कर और भी अमूर्त व अवर्णनीय कर दिया है। प्राचीन काल से ज्ञान रूपी यही विचारधारा समस्त जगत् को अपने भावधारा से सिंचित करती रही है परन्तु रचनाकार की स्थूल दृष्टि एवं विकृत भाव के काया को ही सर्वोपरि मान लेने से विसंगतियाँ उत्पन्न हो गई हैं। काया का शृंगार संकीर्ण मन एवं संकुचित भाव में सिमटकर विकृति एवं सड़ांध उत्पन्न करता है। इसे जन-मन के परिष्कार के लिए ज्ञान एवं कला धारा के रूप में सतत प्रवाहमान होते रहना चाहिए। तभी जीवन में चिरन्तन सहजता एवं प्रफुल्लता आ सकती है। सरस्वती पूजन वसन्त के उमंग के साथ त्याग, तप और आनन्द का पर्व है। इस पर्व को साहित्यकार,रचनाकार एवं कवि ने अपनी रचनाओं में विभिन्न ढंग से स्थान दिया है। इन्होंने देवी सरस्वती की ज्ञान एवं कला दोनों रूपों में उपासना अभ्यर्थना की है। सरस्वती ज्ञान के अनन्त आयाम के साथ-साथ कला की सूक्ष्मताओं एवं वाणी की मधुरता में भी समाहित हुई है। पद्मपुराण इसका इस तरह से उल्लेख करता है-
कण्ठे विशुद्धशरणं षोड्शारं पुरोदयाम्। शाम्भवीवाह चक्राख्यं चन्द्रविन्दु विभूषितम्॥
अर्थात् सरस्वती साधना से कण्ठ से सोलह धारा वाले विशुद्ध शाम्भवी चक्र का उदय होता है वह चन्द्र बिन्दु से विभूषित रहता है। इसका तात्पर्य है सोलह स्वरों की आत्मा चन्द्रामृत से दीप्त रहती है। इसी को शिवसंहिता में देदीप्यमान स्वर्ण वर्ष कमल की सोलह पंखुड़ियों के रूप में प्रदर्शित किया गया है। इस चन्द्र पर ध्यान करने से वाणी सिद्ध होती है।
सरस्वती की काव्य साधना भारतीय साहित्य साधना के क्रमिक विकास का प्राण तत्त्व भी रही है। सरस्वती साधना का यही स्वरूप वाल्मीकि का मूल स्वर बना तथा तमिल के कवि कम्ब के रामायण में निखर उठा। महाभारत में व्यासजी ने आराध्य सरस्वती को इस तरह स्मरण किया है-
नारायणं नमस्कृत्यं नरं चैव नरोत्तमं। देवी सरस्वती व्यासं तनो जयमुदीरयते॥
इस तरह देवी सरस्वती का स्वरूप भारतीय संस्कृति में बड़े ही प्रखर और दिव्यता से अंकित हुआ है। एक ओर जहाँ सरस्वती संस्कृति के प्रतिमानों में उतरी है तो वहीं दूसरी ओर भारतीय वैदिक साहित्य से पुराण तथा अन्य धार्मिक साहित्यों में भी उनका स्वरूप दृष्टिगोचर होता है। सरस्वती विद्या और संगीत की सबसे प्राचीन अधिष्ठात्री देवी मानी जाती है। इस तरह वसन्त के इस दिव्य वातावरण में वसन्ती छटा एवं ज्ञान के आलोक का समन्वय एक नवीन एवं अमूर्त भाव का सृजन करना है। साहित्य की दृष्टि से हो या लोक उत्सव के परिप्रेक्ष्य में वसन्त मानवता का महान् संदेशवाहक है। वसन्त में उमंगती और पल्लवित नवीन कामनाओं को ज्ञान और विवेक नई दिशा एवं मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। सरस्वती पूजन अंधकार में उजाले, तमस में सक्रियता तथा शुष्क जीवन में आशा एवं उमंग का संचार करते हुए एक नई दिशा देता है।
अतः वसन्त हर्षोल्लास का पर्व है जिसमें सरस्वती पूजन, बुद्धि, विद्या और ज्ञान के द्वारा भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करता है। विवेक का प्रज्वलन ही इस पर्व का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। वसन्त का पावन दिन ही परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस भी है। इसलिए यह पर्व हमारे लिए और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यह संकल्प का पर्व है, मानवता के लिए मर-मिट जाने का पर्व है,जीवन को प्रकृति के साथ एकाकार कर देने का उत्सव है। वसन्त में जीवन आशा उत्साह उमंग से भरा रहे तथा विद्या और बुद्धि का समुचित सुनियोजन होता रहे तभी इस पर्व की सार्थकता सिद्ध हो सकती है।
कुएँ ने शिकायत करते हुए समुद्र से कहा, “पिता, सभी नदी−नाले आपके घर में जगह पाते हैं। आप प्रेमपूर्वक उन्हें अपने घर में स्थान देते हैं। मुझसे ही पक्षपात क्यों? पिता के लिए तो सभी बेटे−बेटी एक से होते हैं।” समुद्र ने उत्तर दिया, “वत्स! अपने चारों ओर दीवार बनाकर बैठने पर ही तुम्हें जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित रहना पड़ा है। असीम का अनंत प्यार पाने के लिए स्वयं को भी असीम बनना पड़ता है। अपनी सीमाओं का त्याग करके उन्मुक्त रूप से अपने आपको व्यक्त करो अपनी दीवारों को हटा दो। धरती को हरी−भरी, तृप्त करती हुई तुम्हारी धारा जब बंधनमुक्त हो उठेगी, तब तुम सहज ही मुझमें आ समाओगे।”
अदालत में रोते हुए व्यक्ति को देखकर एक सहृदय ने कारण जानना चाहा, तो पता चला कि उसने बहुत पहले अपनी पुत्री के विवाह के लिए कर्ज लिया था। कर्ज समय पर चुका नहीं पाया, तो ब्याज−पर−ब्याज बढ़ता गया और अब तीन सौ रुपये हो गए। ऐसे धनी जो दिया हुआ कर्ज माफ कर दें, बहुत कम होते हैं। वह तो दुगने का कागज दिखाकर हर ढंग से वसूल करने का प्रयास करते हैं। वह कर्जदार तो अवधि बढ़ाने की फरियाद करने आया था। पर अदालत में भी कोई सुनवाई न हुई, क्योंकि मामला बहुत पुराना था। वह रोते हुए घर चला गया। उसकी पत्नी ने बताया कि डिग्री करने वाले कई व्यक्ति आए थे और दरवाजा घेरे काफी देर खड़े रहे। अंत में किसी दयालु व्यक्ति ने कर्ज चुकाकर उन्हें विदा किया। अब समझाते देर न लगी कि जो व्यक्ति अदालत में मुझसे बात कर रहा था, शायद यहाँ आकर उसने मेरा दुःख हलका करने के लिए रुपये चुका दिए हों।
वह व्यक्ति उनका पता लगाते हुए घर पहुँचा और बड़े ही विनम्र शब्दों में कृतज्ञता व्यक्त करने लगा। उन्होंने कहा, भाई, रुपये चुकाए तो मैंने ही हैं, पर कहना किसी से मत, क्योंकि थोड़ा पैसा जेब में होने के कारण यह तो मेरा कर्त्तव्य ही था, जिसे मैंने पूरा किया। यह व्यक्ति थे ईश्वरचंद्र विद्यासागर, जो स्वयं गरीबी में पले थे, किंतु अंत तक उसे भूल नहीं। माँ की सिखावन उन्हें हमेशा याद रही, समर्थ होने के नाते अन्य गरीबों−पिछड़ों के दुःख−कष्ट मिटाने की जिम्मेदारी पूरी लगन से निभाना। उन्होंने कोई भी ऐसा अवसर हाथ से जाने न दिया।
गुरुगीता की भक्ति कथा गुरुभक्तों के लिए अमृत सरोवर है। इसमें अवगाहन से मिलने वाले भक्ति संवेदन गुरुभक्त साधक को सहज ही सद्गुरु कृपा का संस्पर्श करा देते हैं। परम कृपालु सद्गुरु की कृपा साधक के सभी दोष-दुर्मति जन्य विकारों का हरण करके उसे जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति करा देती है। इसी सत्य को दर्शाते हुए गोस्वामी तुलसी बाबा ने एक स्थान पर कहा है-
तुलसी सद्गुरु त्यागि कै, भंजहि जे पामर भूत। अंत फजीहत होहिं गे, गनिका के से पूत॥
जो पामर मनुष्य परम कृपालु सद्गुरु और उनके बताए साधन मार्ग को छोड़ कर तंत्र-मंत्र भूत-प्रेतों में उलझे रहते हैं, उनकी अन्त में भारी फजीहत होती है। वे गणिका पुत्र की भाँति हर कहीं दुत्कारे और फटकारे जाते हैं।
सद्गुरु की कृपा साधक का परम आश्रय है। इस तत्त्व की अनुभूति कैसे और किस तरह हो यही तो गुरुगीता के प्रत्येक मंत्र में उद्घाटित हो रहा है। पिछली कड़ी में भगवान् सदाशिव ने जगन्माता पार्वती को बताया कि गुरु चरणामृत की महिमा अतुलनीय है। गुरु प्रसाद श्रेष्ठतम है। गुरु का सान्निध्य ही पवित्र काशीधाम है। गुरुदेव ही भगवान् विश्वेश्वर हैं। वही तारक ब्रह्म है। अक्षयवट और तीर्थराज प्रयाग भी वही है। भगवान् महादेव एक ही सत्य को बार-बार सुनाते हैं, बताते हैं, समझाते हैं- अन्यत्र कहीं भटको मत, अन्यत्र कहीं उलझो मत, अन्यत्र कहीं अटको मत। उन्हीं की शरण गहो, जिन्होंने तुम्हें मंत्र का दान दिया, जिन्होंने जीवन की राह दिखाई। जो हर पल, हर क्षण अपनी अजस्र कृपा तुम पर बरसाते रहते हैं।
इस कृपा के धारण व ग्रहण की विधि बताते हुए भगवान् सदाशिव माता पार्वती से कहते हैं-
गुरुमूर्तिं स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत्। गुरोराज्ञाँ प्रकुर्वीत गुरोरन्यत्र भावयेत्॥18॥
गुरुवक्त्रस्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः। गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात् कुलस्त्री स्वपतेर्यथा॥19॥
स्वाश्रयं च स्वजातिं च स्वकीर्तिं पुष्टिवर्धनम्। एतर्त्सवं परित्यज्यं गुरोन्यत्र भावयेत्॥20॥
सद्गुरु कृपा से अपने जीवन में भौतिक, आध्यात्मिक, लौकिक-अलौकिक समस्त विभूतियों को पाने की चाहत रखने वाले साधक को सदा ही गुरुदेव की छवि का स्मरण करना चाहिए। उनके नाम का प्रति पल, प्रति क्षण जप करना चाहिए। साथ ही गुरु आज्ञा का जीवन की सभी विपरीतताओं के बावजूद सम्पूर्ण निष्ठ से पालन करना चाहिए। अपने जीवन में कल्याण कामना करने वाले साधक को गुरुदेव के अतिरिक्त अन्य कोई भावना नहीं रखनी चाहिए॥18॥ गुरु के मुख में ब्रह्म का वास है। इस कारण उनके मुख से बोले हुए शब्द ब्रह्म वाक्य ही हैं। गुरु कृपा प्रसाद से ही ब्रह्म की प्राप्ति होती है। परम पतिव्रता स्त्री जिस तरह से सदा ही अपने पति का ध्यान करती है। ठीक उसी तरह अध्यात्म तत्त्व के अभीप्सु साधक को अपने गुरु का ध्यान करना चाहिए॥19॥ साधक में इस ध्यान की प्रगाढ़ता कुछ इस कदर होनी चाहिए कि उसे अपना आश्रम, अपनी जाति, अपनी कीर्ति का पोषण, वर्धन, सभी कुछ भूल जाय। गुरु के अलावा अन्य कोई भावना उसे न व्यापे॥20॥
इन महामंत्रों का मनन और इनका आचरण साधकों के लिए राजमार्ग है। साधना का यह पथ बड़ा ही सरल, सुगम और निरापद है। श्री रामकृष्ण परमहंस देव के अनेक शिष्य थे। उनमें से कई बहुत पढ़े-लिखे, विद्वान और तपस्वी थे। स्वामी विवेकानन्द जी महाराज की अलौकिक प्रतिभा से तो समूची दुनिया चमत्कृत रह गयी। इन शिष्यों में एक लाटू महाराज भी थे। निरे अपढ़-गंवार, विद्या-बुद्धि का कोई चमत्कार उनमें नहीं था। बस हृदय में भक्ति थी। न वे शास्त्र चर्चा के गाम्भीर्य में डूब सकते थे और न ही किसी से शास्त्रार्थ कर सकते थे। पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान तो उन्हें छू भी नहीं गया था। अपनी इस स्थिति पर विचार कर उन्होंने परमहंस देव से कहा- ठाकुर! मेरा कैसे होगा? श्री श्री ठाकुर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा- तेरे लिए मैं हूँ न। बस मेरा नाम स्मरण करने से मेरा ध्यान करने से सब कुछ हो जाएगा।
तब से लाटू महाराज का नियम बन गया- अपने गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस का नाम स्मरण, उन्हीं का ध्यान और उनकी सेवा। ठाकुर की आज्ञा ही उनके लिए सर्वस्व हो गयी। यह सब करते हुए उनके जीवन में आश्चर्यजनक आध्यात्मिक परिवर्तन हुए। अनेकों दैवी घटनाएँ एवं चमत्कारों ने उनकी साधना को धन्य किया। उनके अद्भुत आध्यात्मिक जीवन और योग शक्तियों के अद्भुत विकास को देखकर स्वामी विवेकानन्द ने उन्हें अद्भुतानन्द नाम दिया। श्री रामकृष्ण संघ में वह इसी नाम से विख्यात हुए। स्वामी विवेकानन्द उनके बारे में कहा करते थे- लाटू ठाकुर का चमत्कार है। वह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि गुरु स्मरण, गुरुसेवा और गुरु की आज्ञापालन से सब कुछ सम्भव हो सकता है। जो जन्म-जन्मान्तरों के तप से सम्भव नहीं, वह सद्गुरु कृपा से सहज ही साकार हो जाता है।
सद्गुरु के मुख में ब्रह्म का वास होता है। उनकी वाणी ब्रह्म वाणी है। उनके द्वारा बोले गए वचन ब्रह्म वाक्य हैं। महान् दार्शनिक योगी भगवान् शंकराचार्य ने कहा है- मंत्र वही नहीं है, जो वेद और तन्त्र ग्रन्थों में लिखे हैं। मंत्र वे भी हैं जिन्हें गुरु कहते हैं। सद्गुरु के वचन महामंत्र हैं। इनके अनुसार साधना करने वाला जीवन के परम लक्ष्य को पाए बिना नहीं रहता। पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और कर्म की सम्पूर्ण निष्ठ को नियोजित करके गुरुदेव भगवान् का ध्यान करना चाहिए। भावना हो या चिन्तन अथवा फिर क्रिया सभी कुछ सम्मिलित रूप से एक ही दिशा में- सद्गुरु के चरणों की ओर प्रवाहित होना चाहिए।
ध्यान रहे इस महासाधना में अपना कोई बड़प्पन आड़े न आए। अपना कोई क्षुद्र स्वार्थ इसमें बाधा न बने। श्री रामकृष्णदेव कभी-कभी हँसते हुए अपने भक्तों से कहते थे- कुछ ऐसे हैं, जिनके मन में तो भगवान् के प्रति और गुरु के प्रति भक्ति है, परन्तु उन्हें लाज लगती है, शर्म आती है कि लोग क्या कहेंगे? आश्रम एवं कुल की झूठी मर्यादा, अपनी जाति का अभिमान, यश-प्रतिष्ठ का लोभ उन्हें गुरु की सेवा करने में बाधा बनता है। परमहंस देव जब यह कह रहे थे तो उनके एक भक्त शिष्य मास्टर महाशय ने पूछा, तो फिर मार्ग क्या है? इन सबको छोड़ दो, त्यागो इन्हें, तिनके की तरह। सद्गुरु की आज्ञापालन में जो भी बाधाएँ साधने आएँ, उनसे मुँह मोड़ने में कभी कोई संकोच नहीं करना चाहिए।
स्वामी विवेकानन्द महाराज कहा करते थे- तुम अपने से पूछो- कोऽहम्? मैं कौन हूँ? देखो तुम्हें क्या उत्तर मिलता है। हो सकता है तुम्हें उत्तर मिले मैं पुत्र हूँ, पिता हूँ, पति हूँ, अथवा पत्नी हूँ, माँ हूँ, पुत्री हूँ। ऐसे उत्तर मिलने पर और गहराई में उतरो- गुरुचरणों में और ज्यादा स्नेह बढ़ाओ। फिर तुम्हें एक और सिर्फ एक उत्तर मिलेगा- ‘शिष्योऽहम्’ मैं शिष्य हूँ। सारे रिश्ते-नाते इस एक सम्बन्ध में विलीन हो जाएँगे। ध्यान रहे जो शिष्य है, वही साधक हो सकता है। उसी में जीवन की समस्त सम्भावनाएँ साकार हो सकती हैं। और जो सच्चा शिष्य है- उसके सभी कर्त्तव्य अपने गुरु के लिए हैं। ऐसे कर्त्तव्यनिष्ठ शिष्य को सद्गुरु कृपा किस रूप में फलती है, इसका बोध भगवान् भोलेनाथ ने गुरुगीता के अगले मंत्रों में कराया है। यह अगले अंक की पाठ्य सामग्री बनेगी। तब तक साधकगण गुरुमूर्ति का ध्यान करते हुए उपर्युक्त मंत्रों पर निदिध्यासन करें।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर अभाव और निर्धनता के बीच पढ़ते−पढ़ते 50 रुपये मासिक के नौकर हो गए। उनकी सफलता पर उनके अनेक संबंधी उन्हें आशीर्वाद देने पहुँचे, बोले, “भगवान की दया से तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो गए। आप आराम से रहो और चैन का जीवन बिताओ।” ईश्वरचंद्र जी के नेत्र भर आए, बोले, “आपने यह आशीर्वाद दिया था अभिशाप? जिस अध्यवसाय के बल पर मैं उस भीषण परिस्थिति से निकलकर आया उसे ही त्यागकर मुझे अकर्मण्य बनने की सलाह दे रहे हैं। आपको तो कहना चाहिए था कि जिस गरीबी और अभाव का कष्ट तुमने स्वतः अनुभव किया है, परिस्थितियाँ बदलते ही उसे भुला मत देना। अपने श्रम और सामर्थ्य से अभावग्रस्तों के अवरुद्ध मार्ग माफ करना, जिन्हें जीवन का कुछ आभास ही नहीं, वह उपेक्षा बरतें, ऐश में भूले रहें, तो भूले रहें, मैं कैसे यह अपराध कर सकता हूँ।” तथ्य बतलाते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में इस सिद्धाँत का पूर्ण तत्परता से निर्वाह किया। अगणित अभावग्रस्तों के लिए प्रत्यक्ष−अप्रत्यक्ष रूप में देवदूत की तरह आगे आते रहे। सच्चे अर्थों में उन्होंने परमार्थी जीवन जिया।
अन्तर्यात्रा विज्ञान की कड़ियाँ योग साधकों को उनकी साधना से जोड़ रही हैं। इन कड़ियों के द्वारा साधक अपनी साधना से जुड़ते हैं, गूँथते हैं। एक कड़ी के बाद एक नयी कड़ी उनमें योग साधना का नया आयाम उद्घाटित करती है। यही कारण है कि अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रति साधकों की अभिरुचि-अभीप्सा का रूप ले चुकी है। इसके पठन-चिंतन, मनन व निदिध्यासन को भी उन्होंने अपनी साधना का एक अनिवार्य व अविभाज्य अंग मान लिया है। इस अपूर्व साधना ने उनके जीवन में कई अलौकिक अनुभूतियों व उपलब्धियों के द्वार भी खोले हैं। साधना पथ के इन प्रगति द्वारों का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। योग कथा की विगत कड़ी में आगत कड़ी कुछ यूँ जुड़ती रहेगी जैसे भक्त व भगवान् की भावनाएँ जुड़ती हैं, शिष्य और गुरु के हृदय जुड़ते हैं।
योग कथा की ऐसी ही विगत कड़ी में साधक जनों ने पंचवृत्तियों में से दूसरी वृत्ति विपर्यय के बारे में पढ़ा था। महर्षि पतञ्जलि ने साधकों को प्रबोध किया कि विपर्यय एक मिथ्या ज्ञान है। इसे असत् ज्ञान भी कहते हैं। हम किसी वस्तु व्यक्ति या विचार के बारे में जो झूठी धारणाएँ इकट्ठा करते हैं, वही हमारा विपर्यय है। यह और कुछ नहीं बस अपने चित्त की भ्रमित स्थिति है। अब अगले यानि कि समाधिपाद के नवें सूत्र में योग सूत्रकार महर्षि तीसरी वृत्ति का खुलासा करते हुए कहते हैं-
‘शब्द ज्ञानानुयाती वस्तु शून्यो विकल्पः’॥1/9॥
अर्थात् शब्दों के जोड़ से हर एक का परिचय है। हम सभी अपने जीवन के क्षणों को कल्पनाओं से संवारते रहते हैं। कई बार ये कल्पनाएँ हमारे अतीत से जुड़ी होती हैं और कई बार हम इन कल्पनाओं के धागों से अपने भविष्य का ताना-बाना बुनते हैं। हम में से बहुसंख्यक कल्पना करने के इतने आदी हो चुके हैं कि मन ठहरने का नाम ही नहीं लेता। किसी भी कार्य से उबरते ही कल्पनाओं के हिंडोले में झूलने लगता है। भाँति-भाँति की कल्पनाएँ, रंग-बिरंगी और बहुरंगी कल्पनाएँ, कभी-कभी तो विद्रूप और भयावह कल्पनाएँ चाहे-अनचाहे हमारे मन को घेरे रहती हैं। कभी हम इनकी सम्मोहकता में खो जाते हैं, तो कभी इनकी भयावहता के समक्ष हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। स्थिति यहाँ तक है कि कल्पना रस हमारा जीवन रस बन चुका है।
कल्पना रस में डूबे और विभोर रहने के बावजूद हमने इसे ठीक तरह से पहचाना नहीं है। परम पूज्य गुरुदेव इस सम्बन्ध में कहा करते थे- कल्पनाएँ सदा ही कोरी और खोखली नहीं होती, इन्हें ऊर्जा व शक्ति के स्रोत के रूप में भी अनुभव किया जा सकता है। जो योगी ऐसा कर पाते हैं, वे ही सही ढंग से मन की विकल्प वृत्ति का सदुपयोग करना जानते हैं। कैसे किया जाय यह सदुपयोग? इस प्रश्न का पहला बिन्दु है कि कल्पना में निहित शक्ति को उसकी सम्भावनाओं को पहचानिये। यह समस्त सृष्टि ब्रह्म की कल्पना ही तो है हम सब उसके सनातन अंश हैं। ऐसी स्थिति में हमारी कल्पनाओं में भी सम्भावनाओं के अनन्त बीज छुपे हैं।
कल्पना में समायी शक्ति की सम्भावनाओं पर विश्वास करने के बाद दूसरा बिन्दु है - कल्पनाओं की दिशा। गुरुदेव का कहना था हमें सदा ही विधेयात्मक कल्पनाएँ करनी चाहिए। क्योंकि निषेधात्मक कल्पनाएँ हमारी अन्तः ऊर्जा को नष्ट करती हैं। जबकि विधेयात्मक कल्पनाएँ हमारे अन्तः करण को विशद् ब्रह्मांड की ऊर्जा धाराओं से जोड़ती हैं। उसे ऊर्जावान् और शक्ति सम्पन्न बनाती है। इस तकनीक का तीसरा बिन्दु है - कल्पनाओं को अपनी अभिरुचि के अनुसार अन्तः भावनाओं अथवा विवेकपूर्ण विचार से जोड़ना। इस प्रक्रिया के परिणाम बड़े ही सुखद और आश्चर्यजनक होते हैं। अन्तः भावनाओं से सँयुक्त होकर कल्पना कला को जन्म देती है। जबकि विवेकपूर्ण विचार से जुड़कर कल्पना शोध की सृष्टि करती है।
काव्य कला सहित विश्व-वसुधा की समस्त कलाएँ प्रायः इसी रीति से जन्मी, पनपी एवं विकसित हुई हैं। विश्व को चमत्कृत कर देने वाली शोध सृष्टि भी कल्पनाओं के तर्क पूर्ण विवेकयुक्त विचार से सम्बद्ध होने से हुई है। अन्तः भावनाओं एवं तर्कपूर्ण विचार से कल्पना के जुड़ने से इन दोनों के अलावा एक अन्य सुखद परिणति भी होती है। और वह परिणति है- जीवन जीने की कला का विकास। जीवन में एक अपूर्व कलात्मकता,लयबद्धता का सुखद जन्म। इस सत्य से प्रायः बहुत कम लोग परिचित हो पाते हैं। लेकिन जो परिचित हो जाते हैं-उनका जीवन सुमधुर काव्य की भाँति सुरीला, संगीत की तरह लययुक्त एवं नवीन शोध की भाँति आश्चर्यजनक उपलब्धियों का भण्डार हो जाता है।
उचित कल्पना का संस्पर्श पाकर जीवन बड़े ही आश्चर्य रीति से बदल जाता है। यह बदलाव ऐसा होता है जैसे कि पारस लोहे के काले-कलूटे टुकड़े को छूकर सुगन्धित स्वर्ण बना दिया हो। कहानी एमिली जेन की है। जो पहले अपने बचपन में कूड़ा-करकट बीनती थी। बाद में विश्व विख्यात अभिनेत्री बन गयी। उसकी जीवन कथा-‘वन्डर ऑप वर्डस’ के लेखक जेम्स एलविन का कहना है कि एमिली जब छोटी थी एक दिन वह कूड़ा-करकट से कुछ बीन रही थी। बीनती-बीनती वह थक गयी। साथ कुछ लड़के-लड़कियाँ और भी थे। मनोरंजन के लिए सब मिलकर नाचने लगे। तभी वहाँ से अनविन रोजर्ट का गुजरना हुआ।
रोजर्ट ने बच्चों के बीच नृत्य करती हुई एमिली को देखा। उसे संकेत से पास बुलाया और धीरे से कहा प्यारी बच्ची! तुम अद्वितीय हो, सौंदर्य और कला का अपूर्व मिश्रण तुममें है। तुम चाहो तो क्या नहीं कर सकती? सचमुच ही मैं कुछ भी कर सकती हूँ- एमिली ने पूछा। हाँ तुम कुछ भी कर सकती हो। इस एक कल्पना ने अन्तः भावनाओं एवं तर्कपूर्ण विवेक युक्त विचारों से मिलकर एमिली को नया जन्म दिया, वह एमिली जो कला की देवी मानी जाने लगी। तभी तो परम पूज्य गुरुदेव कहते थे- कल्पना को ख्याली पुलाव मत बनाओ। उसे अपनी शक्ति समझो। अपना ऊर्जा स्रोत बनाओ।
कल्पनाओं को यूँ भटकने देना, यूँ ही बहकने देना और उस बहाव में स्वयं भी भटकने व बहने लगना न केवल कल्पना शक्ति की बर्बादी है, बल्कि इससे जीवन भी बर्बाद होता है। ऐसे में विकल्प की यह वृत्ति क्लेश उत्पादक बन जाती है। लेकिन इसका सदुपयोग होने से यह क्लेश निवारक बन जाती है। बस सब कुछ हम साधकों पर है कि उसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाते हैं या फिर उसे बाधक बने रहने देते हैं। हमारी योग साधना के खरे होने की कसौटी इसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाने में है। इस विकल्प वृत्ति की साधना यदि बहिर्मुखी हो तो हमें साँसारिक उपलब्धियों के वरदान देती है और यदि इसे अन्तर्मुखी करलें, कल्पना हमारी धारणा का स्वरूप ले ले तो हमें यौगिक विभूतियों के वरदान देती है। यह सब कैसे और किस तरह होगा इसका विवरण अगली कड़ी की विषय वस्तु बनेगी। इसमें चौथी वृत्ति ‘स्मृति’ में समायी शक्ति का उद्घाटन किया जायेगा। योग साधक इस अगली कड़ी की प्रतीक्षा साधनारत रहते हुए करें।
एक धार्मिक मुमुक्षु ने अपनी सारी धन−दौलत लोकोपयोगी कार्यों में लगाकर संयम का जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया। अब तो उनके सत्कार्यों की सर्वत्र चर्चा होने लगी। जनता के कुछ प्रतिनिधियों ने उस मुमुक्षु के पास उपस्थिति होकर निवेदन किया, “आपका त्याग प्रशंसनीय है। आपकी सेवाओं से समाज ऋणी है, हम सब सार्वजनिक रूप से आपका अभिनंदन कर दानवीर तथा मानव−रत्न के अलंकरणों से विभूषित करना चाहते हैं। कृपया हम सबकी इस प्रार्थना को स्वीकार कीजिए।” मुमुक्षु ने मुसकराते हुए कहा, “मैंने कोई त्याग नहीं किया है, वरन् लाभ लिया है। बैंक में रुपये जमा करना त्याग नहीं, वरन् ब्याज का लाभ है। ग्राहक को वस्तु देकर दुकानदार किसी प्रकार के त्याग का परिचय नहीं देता, बह तो बदले में उसकी कीमत लेकर लाभ कमाता है। समुद्र के किनारे खड़े हुए व्यक्ति को जब मोती दिखाई दें, तो उन्हें समेटकर कौन झोली न भरना चाहेगा? उस समय यदि उसकी झोली में शंख और सीपियाँ होंगी, तो उन्हें खाली कर मूल्यवान वस्तुएँ भरना क्या त्याग की वृत्ति का परिचायक है? उसी प्रकार क्रोध, लोभ, मोह आदि को छोड़कर अपने स्वभाव में अहिंसा, परोपकार और क्षमा जैसे सद्गुणों को त्याग देना, त्याग नहीं वरन् एक प्रकार का लाभ है। मैंने तो कोई त्याग नहीं किया है, वासनाओं से छुटकारा पाकर त्याग का लाभ ही प्राप्त किया है।” इतना सुनकर जनता के प्रतिनिधियों की और कुछ कहने का साहस नहीं हुआ और नतमस्तक होकर चले गए।
यदि वे लक्षण हैं, जो व्यक्ति को देवमानव−ऋषिपद से सुशोभित करते हैं। ऐसों के पद चिह्नों पर चलकर ही अन्य व्यक्ति श्रेष्ठता को प्राप्त होती हैं।
मित्रो! हमने अपने मन का भगवान बना लिया है। हमारे मन का भगवान आपने हमारी पूजा की कोठरी में देखा होगा। माता जो ध्यान करती हैं, वह गायत्री माता का ध्यान करती हैं। हम जो ध्यान करते हैं—अपने गुरु का ध्यान करते हैं। चौबीस घंटे हमको एक ही दिखाई पड़ता है। हमारे आत्मोत्थान का श्रेय जब खुलता है, तो हमको वही दाढ़ी दिखाई पड़ती है, वही चमक दिखाई पड़ती है, बड़ी−बड़ी तेजस्वी आँखें दिखाई पड़ती हैं, लंबे वाले बाल दिखाई पड़ता है, जो न कभी खाता है, न कभी पीता है। हमेशा उसका सूक्ष्म शरीर की काम करता रहता है। मैंने तो उसी को भगवान भी मान लिया है। गायत्री माता को भी वही मान लिया है। मेरे मन की एकाग्रता उन पर जम गई है।
ध्यान की सही विधि
मित्रो! एकाग्रता जमने की वजह से क्या हो रहता है? वे मेरे समीप ही दिखाई पड़ते रहते हैं। मुझे अब यह अनुभव नहीं होता कि हम अपनी कोठरी में अकेले रहते हैं या दो रहते हैं। मुझे यह लगता है कि हम दो रहते हैं और एक साथ में रहते हैं। अब मुझे बिलकुल ऐसा लगता है कि राम−लक्ष्मण कभी रहे होंगे, अर्जुन और कृष्ण कभी रहे होंगे। उसी राह में अपने आप को यह अनुभव करता हूँ कि हम दो आदमी साथ−साथ रहते हैं साथ−साथ चलते हैं और साथ−साथ खाते है। देवी काली के साथ जैसे रामकृष्ण परमहंस खाते थे, बेटे, अपने भगवान के साथ में हम भी ऐसे ही खाते रहते हैं। आपने हमें देखा ही कहाँ है! देखना है तो बेटे, हमारी आँख से देखना। तो क्या आप आँख से देखते है? हाँ बेटे, आँख से ही देखते हैं और देखते रहते हैं। आप भी ऐसा ध्यान कर सकते हैं।
यदि इस तरह का ध्यान आपकी समझ में न आता हो, मन लगता हो, तो आप यह समझना कि गुरु के प्रति आपकी श्रद्धा और विश्वास नहीं है। हाँ, अगर सचमुच श्रद्धा और विश्वास नहीं है तो आप ध्यान मत करना। अगर आपके अंदर श्रद्धा−विश्वास है तो आप ऐसे भी ध्यान कर सकते हैं कि हम गुरुजी के पास बैठे हुए हैं, उनकी गोदी में बैठे हुए हैं। वे हमको प्यार करते हैं, हमको सलाह देते हैं। थोड़े दिन आप ऐसे ही ध्यान करना। थोड़े दिनों के बाद हमारे और आपके अंतरंग मिलने लगेंगे, तो फिर आप देखना, आदान−प्रदान का सिलसिला, शुरू हो जाएगा। आपकी बातें हम तक आती हैं और हमारी बातें आप तक जाती हैं, यदि आप और हम वास्तव में मिलना शुरू कर दें तब। लेकिन अगर हमारी शक्लें ही मिलती रहेंगी, तो बात नहीं बनेगी। हमें भावना को भी मिलाना है, हृदय को भी मिलाना है और मस्तिष्क को भी मिलाना है। इस तरह अगर हम भीतर से मिले तो फिर देखना हमारा और आपका आदान−प्रदान अपने आप चालू हो जाएगा।
ध्यान बंद करने से क्या होगा?
साथियों! आप लोग कहते हैं कि संत का मिलना मुश्किल है, गुरु का मिलना मुश्किल है, भगवान का मिलना मुश्किल है। नहीं बेटे, यह कोई मुश्किल नहीं है? केवल ध्यान करना मुश्किल है। ध्यान कैसे करेंगे? अगर ध्यान न कर सके तो क्या हो जाएगा? देख बेटे, तुझे मैं थोड़े से नाम बताता हूँ, जो ध्यान न कर सके, लेकिन किसी तरह से भगवान की कृपा प्राप्त कर ली थी, पर उसको हजम करने की ताकत किसी ने नहीं प्राप्त की थी, इसलिए उनको नुकसान हो गया था। वे कौन−कौन व्यक्ति थे? बेटे, उनमें से एक का नाम रावण था। रावण ने बहुत तप किए थे और तप करने की वजह से शंकर जी को प्रसन्न कर लिया था और किसी तरह से उसने वरदान भी पा लिया था। वरदान और आशीर्वाद पाने के पश्चात रावण को कुछ मिला? नहीं, वह घाटे में रहा और उसका नुकसान ही हुआ।
किसी को बुखार आता है, किसी की मृत्यु होती है, पर रावण की मृत्यु? रावण ने ऐसी भयंकर मृत्यु देखी, जैसी किसी और ने नहीं देखी। उसने अपनी औरतों को जलते देखा, अपने बच्चों को जलते देखा, नाती− पोतों को जलते देखा। ऐसा भयंकर दृश्य कहीं देखा है आपने? मरे हुए व्यक्तियों को तो देखा है कि मरने के बाद उन्हें जला दिया गया, पर जिंदा बेटों को, जिंदा बेटियों को, जिंदा पोतियों को, जिंदा पोतों को जलते हुए क्या किसी ने देखा है? नहीं, महाराज जी! अगर ऐसा दृश्य हम देखेंगे तो हमारा कलेजा फट जाएगा। हाँ बेटे, परंतु एक का कलेजा फटा है। किसका? रावण का। रावण अगर कोई तपस्वी न होता, वह कोई दुकानदार होता। बेटे, उसने हजामत बनाने की कोई दुकान खोल ली होती, चाय की दुकान खोल लेता, उसका ‘रावण रेस्टोरेंट’ होता, तो खूब मजे में लोग आते, चाय पीते। मजे में ‘रावण टी स्टॉल’, ‘टी कॉर्नर’, कॉफी कॉर्नर’ चल रहा होता। वह अपना घर बना लेता और बैंक में हजार−दो हजार रुपये जमा कर लेता। अपने बाल−बच्चों को पुलिस में नौकरी करवा देता और इन्कमटैक्स में ऑफीसर बना देता। फिर न रावण की बीबी मरती, न बच्चे मरते, कोई भी नहीं मरता।
मित्रो! रावण ने भजन तो किया, लेकिन बेचारे को हजम करने की शक्ति न मिल सकी। वह तपता रहा और जैसे ही शक्ति आई कि बीबी लाऊँगा, पैसा लाऊँगा, मकान बनाऊँगा आदि मनसूबे पूरे करने लगा। उस अभागे से यह नहीं बन पड़ा कि हमारे पिता लोमश ऋषि, जैसे जीवन जीते थे, वैसे जिएँ। जिस भी काम में वह लग गया, उसका सफाया हो गया। वह कुछ नहीं कर पाया। कुँभकर्ण भी कुछ नहीं कर पाया। कुँभकर्ण ने अपनी वाणी को शुद्ध नहीं किया और अशुद्ध वाणी से ही जप करता रहा। जब सरस्वती सामने आकर खड़ी हो गईं और बोलीं कि वरदान माँग, तो उसने कहा कि छह महीने सोता रहूँ और एक दिन जगता रहूँ। क्यों क्या बात थी कि ‘छह महीने जागूँ और एक दिन सोऊँ’ का वरदान न माँग सका? अक्ल खराब थी उसकी। उसके मुँह से निकल गया। अगर वह नेपोलियन एक दिन भी नहीं सोता था और जब सोने का वक्त आता तो घोड़े को पेड़ के नीचे खड़ा किया और झट से सो गया, आराम किया और फिर घोड़े को लेकर चल दिया। वह मजे से अपना काम कर लेता था। कुँभकर्ण से तो नेपोलियन अच्छा था। वह न भजन करता, न पूजा करता, दिन में भी काम करता और रात में भी काम करता। कुँभकर्ण का क्या हुआ? बेटे, उसकी मिट्टी पलीद हो गई। क्या फायदा कर लिया उसने? कुछ नहीं कर सका।
मित्रो! इसी तरह हिरण्याक्ष से लेकर हिरण्यकशिपु तक, कंस से लेकर जरासंध तक और मारीचि से लेकर सुबाहु तक, सब−के−सब तपस्वी थे और सब−के−सब भजन करने वाले थे, पूजा करने वाले थे। लेकिन वे अपना आत्मशोधन न कर सके। आत्मशोधन के अभाव में भगवान की कृपा तो मिली, यह तो मैं नहीं कहता कि कृपा नहीं मिलती पर आदमी इससे फायदा नहीं उठा सकता, हाँ, इससे अपना नुकसान जरूर कर सकता है।
हमारी साधकों को गारंटी
इस शिविर में बुलाकर मैं आपको निमंत्रण देता हूँ कि आप ब्रह्मवर्चस की साधना में आने की तैयारी करें। जिस शक्ति की आप तलाश करते हैं, उसको कोई ऐसा देने वाला तो हो, जो आपको दे सके। बेटे, हम गारंटी देते हैं कि वह शक्ति हम आपको दिलाएँगे। महाराज जी! रामकृष्ण परमहंस जैसे गुरु हो और हम उसके पैर पड़ जाएँ, तो जिस तरह से विवेकानंद में उनकी सारी शक्ति आ गई थी, ऐसा ही गुरु हमको मिल जाए और हमको विवेकानंद बना दे, तो बहुत अच्छा हो। अच्छा बेटे, तेरे लिए तो हम कहीं से भी ऐसा गुरु ढूँढ़कर ला देंगे और वह तुझे शक्ति दे देगा, लेकिन पहले तुझे एक काम करना पड़ेगा, तुझे विवेकानंद बनना पड़ेगा। नहीं महाराज जी! पहले मैं अपना फोटो अखबार में छपाने को तैयार हूँ। अमेरिका के लिए मुझको हवाई जहाज का टिकट मिल जाएगा, मैं घूम भी नहीं जाऊँगा और ‘स्पीच’ भी दे आऊँगा। नहीं बेटे, स्पीच देने की बात तो पीछे की है, पहले तुझे विवेकानन्द बनना पड़ेगा।
मित्रो! कैसा विवेकानंद बनना पड़ेगा? अमेरिका में विवेकानंद जिसके यहाँ ठहरे थे, वहाँ एक महिला थी, जो उनसे मजाक करने लगी, दिल्लगी करने लगी। थोड़े दिन उसने साधुजी के साथ कुछ दिल्लगीबाजी शुरू कर दी। अमेरिका में कुछ ऐसा रिवाज ही है। विवेकानंद के गुरु जी ने कहा, अहा.. ! तो ये बात है। उनने लाल−लाल आँखें तरेरीं और कहा कि ठहर जा, तुझे अभी बताता हूँ। क्या तुझे इसीलिए शक्ति दी है? रामकृष्ण परमहंस की आँखों ने वहाँ से देखा और कहा कि स्वयं के लिए, अपने लिए, विलासिता के लिए मेरी शक्ति से लोगों को प्रभावित और चमत्कृत करेगा? उसके द्वारा जो लोगों में श्रद्धा उत्पन्न होगी, तो तू उससे अपने लिए लाभ उठाएगा? अच्छा, ठहर, अभी तुझे बताता हूँ। यह दृश्य देख विवेकानंद वहीं अमेरिका में काँपने लगे। उन्होंने अपने आप को धुना और अपने आप को पीटा। केवल धुना और पीटा ही नहीं, वरन् अपने मन को धोया। उन्होंने अपने मन को समझाया कि अरे मूर्ख! तू समझता ही नहीं कि तू क्या करने जा रहा था।
स्वयं को वैसा बनाओ तो
साथियो! विवेकानंद को उस समय और तो कुछ समझ में नहीं आया था, जब गुरु ने आँखें निकालीं। उन्होंने देखा कि सामने जोर का स्टोव जल रहा है। वे खाना अपने आप पकाते थे। उनका स्टोव के ऊपर रखा तवा जल रहा था। वे जलते हुए तवे के ऊपर बैठ गए। इससे उनके दोनों पुट्ठे जल गए। जब जल गए, तब उस पर से उठे। उन्होंने अपने मन से कहा कि अब तू समझा कि नहीं समझा? आग छूते हैं तो छाले पड़ते हैं कि नहीं पड़ते? हाँ साहब! पड़ते हैं। तो तू उसे छू रहा है, जो आग से भी प्रचंड है। इससे छाले नहीं पड़ेंगे क्या? विवेकानंद गुरु का संकेत समझ गए। इसके बाद महीने भर पड़े रहे, घर पर ही विश्राम करते रहे। एक महीने बाद उन्होंने अपना काम शुरू किया। एक बार वे बोले, महाराज जी! आप कुँडली जगा देंगे? रामकृष्ण परमहंस ने जगा दी। तो गुरुजी, आप भी हमारी कुँडली जगा देंगे? हाँ बेटे, हम जगा देंगे। इसके लिए तो हम व्याकुल हैं। जिस तरह गाय के थनों में दूध फटा पड़ता है और वह उसे अपने बछड़े को पिलाने के लिए व्याकुल रहती है, ठीक वही हाल हमारा है। गाय का दूध फटा पड़ता है तो साहब! हमको पिला दीजिए। बेटे, यही तो हम तो तलाश करते रहते हैं, लेकिन गाय तो अपने बच्चे को ही पिलाती है, कुत्ते के बच्चे को नहीं पिला सकती। गाय गाय के बच्चे को अपना दूध पिला सकती है। अतः आप पहले गाय का बच्चा बनने की कोशिश करें।
साथियो! हमने इस ब्रह्मवर्चस शिविर में आपको इसलिए बुलाया कि आप जो कर्मकाँड करते हैं, जो उपासना करते हैं, पूजा करते हैं, भजन करते हैं, हनुमान चालीसा पढ़ते हैं, जो भी पढ़ते हैं, उसमें एक काम तो यह करें कि उसमें अपने विचारों का समन्वय करें। जितने समय तक आपका जप चलता रहे, उतने समय तक प्रत्येक क्रिया के साथ−साथ, जप के साथ−साथ में जो भावनाएँ जुड़ी हुई हैं, विचारणाएँ जुड़ी हुई हैं, उसमें अपने मस्तिष्क को पूरी तरीके से लगाए रखें। दूसरा विचार उसमें न आने दें। दूसरे विचारों को रोकिए मत, उसकी दिशा बदल दीजिए, जप में लगा दीजिए। वह अपने आप रुक जाएगा।
एक महात्मा ने अपने एक शिष्य से कह दिया कि भजन करते समय तू बंदर का ध्यान मत करना। जैसे ही वह ध्यान करने बैठता, मन में यही विचार आने लगता कि बंदर आ जाएगा। परेशान शिष्य जब महात्मा जी के पास गया तो उन्होंने कहा कि हमने तुझे गलत बता दिया था, अब हम तुझे ठीक बताते हैं। अब से जब भी तू ध्यान किया करे तो गाय का ध्यान किया कर, ‘गऊ माता बैठी है, गऊ माता का ध्यान करता रहेगा, तब तक बंदर नहीं आएगा। तो गुरुजी! मन को भागने से रोक दें। बेटे, मन भागने से नहीं रुकेगा। मन को नहीं भागने दूँगा, मन भाग जाएगा, तो रोक लूँगा, मन को पकड़ लूँगा। मन को मार डालूँगा। बेटे, ऐसा करेगा तो मन भागेगा ही। तो क्या करूं? मन को एक काम में लगा दे। किस काम में लगाऊँ? बेटे, हमारे चिंतन के साथ में भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। हवन में हम आपको भावना बताते हैं, जप में हम भावना बताते हैं, उपासना में हम भावना बताते हैं, देवपूजन में हम भावना बताते हैं। उसके साथ मन को जोड़ दे।
पहले हमारे विचारों को पढ़िए
मित्रो! आपने हमारी किताबें पढ़ी नहीं हैं, ध्यान से पढ़िए। आप तो वही छोटी−सी बात पूछते हैं कि लक्ष्मी कमाने के लिए ‘श्री’ बीज मंत्र तीन बार लगाने हैं या पाँच बार लगाने हैं। आप तो केवल यही पूछते हैं जिससे लक्ष्मी फटाफट चली आए और यह नहीं पूछते कि उपासना के साथ−साथ में जितने भी कर्मकाँड हैं, उन कर्मकाँडों के साथ में जो शिक्षाएं भरी पड़ी हैं, प्रेरणाएं भरी पड़ी हैं, दिशाएँ भरी पड़ी हैं, उनको बता दीजिए। बेटे, हमने किताबों में बेशक छापा है, हमने पैंतालीस मिनट की जो उपासना बताई थी, उसका एक विशेषाँक निकाला था। उस विशेषाँक में हरेक को बताया था कि जब आप जप किया करें, तो ये वाला जप किया करें। पूजा−उपासना के संबंध में अभी भी वह हमारी किताब है, उसे तो कोई खरीदता नहीं है और यह कहता है कि महाराज जी! वह किताब बताइए जिससे लक्ष्मी आने लगे। ठीक है बेटे, वह पच्चीस पैसे की आती है, खरीद ले जा। हाँ महाराज जी! वह चार−पाँच कापी खरीद ले जाऊँगा। खरीद ले जा बेटे, सबको लक्ष्मी जा जाएगी। उस विधि वाली किताब को तो लोग खरीद लेते हैं, पर उसे कोई नहीं खरीदता। कौन सी को? उपासना वाली को, जिसमें यह बताया गया है कि उपासना के समय कर्मकाँडों के साथ−साथ किस तरह से हमारे विचारों का चिंतन चलना चाहिए।
चिंतन की आवश्यकता के बाद तीसरा जो चरण आता है, वह है हमारी भावनाओं का। भावना किसे कहते हैं? भावना उस उमंग को कहते हैं, जो क्रिया बिना चैन नहीं लेती, किए बिना चैन नहीं लेने देती। वे कल्पनाएं जो आपके दिमाग में आती रहती हैं कि हम जप करेंगे, संत बनेंगे, महात्मा बनेंगे, ज्ञानी बनेंगे, ब्रह्मचारी बनेंगे और नित्य प्रार्थना करते हैं, ‘हे प्रभु आनंददाता! ज्ञान हमें दीजिए। शीघ्र सारे दुर्गुण छोड़ना तो नहीं है? नहीं महाराज जी! छोड़ने−छोड़ने का चक्कर नहीं है। मैं तो केवल गीत गाता रहता हूँ। अरे! तो गीत से क्या बनेगा अभागे।
मित्रो! क्या करना चाहिए? विचारों के साथ−साथ में हमारे अंदर भावना समावेश होना चाहिए। भावना का अर्थ यह है कि इसके अंदर तड़पन पैदा हो, ऐसी उमंग पैदा हो कि हम इसे किए बिना रह नहीं सकें। आप जो भी क्रिया−कृत्य करें, कर्मकाँड करें, उसके साथ चिंतन भी करें कि हम दीपक की तरह से जिएँगे, हम अपना आत्मशोधन करेंगे। जप करेंगे, नैवेद्य चढ़ाएँगे, इस तरह के जो भी कृत्य हों, इन क्रियाओं के साथ−साथ में विचारो का समन्वय हो। विचारों के समन्वय के पश्चात जब आपके विचार जमने लगें, तो आप यह कोशिश कीजिए कि इसके साथ में भाव अर्थात् उमंगे भी उमगें। हम यही करेंगे, बस यही करेंगे’ का संकल्प जाग्रत हो कि हम श्रेष्ठता से असीम श्रद्धा करेंगे। श्रेष्ठता से असीम श्रद्धा प्यारी चीज नहीं है। हमको श्रेष्ठता से असीम और कोई प्यारा नहीं है। भगवान से ज्यादा ओर कोई प्यारा नहीं। हमको। अनुशासन से ज्यादा प्यारा और कोई नहीं है। हम सबको नाराज कर सकते हैं, पर इसको नहीं करेंगे।
उमंगे भीतर से जन्में
मित्रो! अगर ये उमंगे हमारे भीतर से पैदा हों, तो हमारे जीवन में क्रिया की विशिष्टता आ जाए। कर्मकाँड के साथ में जुड़े हुए विचार, विचारों के साथ जुड़ी हुई भावनाएँ, भावनाओं से ओत−प्रोत, रसविभोर, हमारा जीवन आनंद से सराबोर हो जाए, तो उसका परिणाम हमारे जीवन में संत के रूप में सामने आएगा। इस तरह फिर आप देखिए कि संत बनते हैं कि नहीं बनते? फिर देखिए कि आप ऋषि बनते हैं कि नहीं बनते? फिर देखिए कि आपको भगवान का अनुग्रह प्राप्त होता है कि नहीं? ये सभी चीजें आपको प्राप्त होती चली जाती हैं। शर्त यही है कि आप अपने आप को, अपने जीवन को, अपनी विचारणाओं को, अपने चिंतन को, अपने लक्ष्य को, अपने आदर्श को इस लायक बनाने की कोशिश करें, जैसे कि संत के होने चाहिए। जैसे कि उपासना करने वाले के होने चाहिए। अगर आप थोड़े−बहुत कदम उठाने के लिए तैयार हैं, तो यह आपको सौभाग्य है। लोग तो तलाश करते फिरते हैं कि कोई ऐसी शक्ति हमें मिले, जो इस विषय में पारंगत हो। बेटे, हम अपनी बात तो नहीं कहते, किंतु हमारे गुरु पारंगत हैं। आप भी कह सकते हैं कि वे पारंगत हैं। उनकी हम जमानत दे सकते हैं और कह सकते हैं कि आपकी सहायता हम कर सकते हैं।
महाराज जी! आप अपने गुरु जी के दर्शन करा दीजिए। अब की बार गुरु जी, आप हिमालय पर चलें तो मुझे भी ले चलना। हाँ बेटे, ले चलेंगे, इसमें क्या दिक्कत है! तो फिर गुरु जी की कृपा मिलेगी? नहीं बेटे! कृपा क्यों नहीं मिल सकती? फिर क्या फायदा करेंगे? बेटे, तू पहले विचार कर ले, कृपा का वायदा मैं नहीं कर सकता। मैं तुझे ले चल सकता हूँ, दिखा भी लाऊँगा, पर दिखाने के साथ−साथ यों कहिए कि कोई वरदान−आशीर्वाद देंगे या नहीं, नहीं देंगे तुझे। क्यों? इसलिए नहीं देंगे कि तू वरदान को हजम नहीं कर सकता। वरदान को हजम करने के लायक तेरी स्थिति नहीं है। बेटे, अगर हम वरदान को हजम करने लायक स्थिति पैदा कर लें, तो घर बैठे अनुदान हमें मिल सकते हैं। हमारे गुरु का हम पर अनुग्रह है। वे हिमालय पर रहते हैं, जहाँ जाकर हम लेकर आते हैं, लेकिन आपको तो यहाँ बैठे मिल सकता है। ब्रह्मवर्चस को आरण्यक हमने इसीलिए बनाया है कि वे व्यक्ति उपासना करने के लिए यहाँ आएँ, जिन्होंने सारी जिंदगी भर उपासना की है, पर प्राप्त कुछ नहीं हुआ, पर अब थोड़े समय में प्राप्त कर सकते हैं।
मित्रो! रामकृष्ण परमहंस ने जो जन्म−जन्माँतरों तक की उपासना की और प्राप्त किया, उसको विवेकानंद ने थोड़े दिनों में प्राप्त कर लिया। आप भी थोड़ी देर में प्राप्त कर सकते हैं, जो हमने मुद्दतों से पाया। गाय ने चौबीस घंटे घास खाकर के और उसको हजम करके जो दूध पेट में जमा किया है, उसको आप पाँच मिनट में पी सकते हैं। आपका सौभाग्य है। आप बच्चे हैं, दूध पी लीजिए, गाय ने उसे चौबीस घंटे में तैयार किया है, बेचारी दिन भर घूमती रही और घास खाती रही है, तब दूध जमा किया है उसने। आप उसे पी लीजिए, यह आपका सौभाग्य है। आप दूध पी सकते हैं, लेकिन आपको इतना तो करना ही पड़ेगा कि गाय का दूध पीने के लिए आपको गाय के बच्चे के समतुल्य होना पड़ेगा।
आप गाय के बच्चे के समतुल्य होते हैं कि नहीं, अगर होते हैं, तो विश्वास रखिए, आपको वह सब कुछ मिलेगा, जो एक साधक को मिलना चाहिए। इस शिविर के साथ हमने ब्रह्मवर्चस की साधना को भी जोड़कर रखा है इसमें कुँडलिनी−जागरण भी शामिल है, पंचकोशों का अनावरण भी शामिल है। इसमें भगवान का साक्षात्कार भी शामिल है। इसमें मनुष्य के भी विद्यमान आत्मतत्व का ज्ञान होना भी शामिल है। इसके द्वारा आपके समीपवर्ती वातावरण में स्वर्गीय परिस्थितियों का पैदा होना भी शामिल है। ये सारी−की−सारी विभूतियाँ, विशेषताएँ जो बताई गई थीं, वे सारी−की−सारी सिद्धियाँ आपका स्वागत करती हैं और आपको बुलाती हैं और आपसे प्रार्थना करती हैं कि आप चाहें तो हमें स्वीकार कर सकते हैं। आपको प्रार्थना करने की जरूरत नहीं है। देवता आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमको स्वीकार कीजिए, लेकिन आपको उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। वह इस रूप में चुकानी पड़ेगी कि आप अपना जीवन परिष्कृत करें। श्रेष्ठ दृष्टिकोण, ऊँचा चिंतन, आदर्श जीवन का स्वरूप बनाएँ। अगर इतना आप बना लें, तो आपको वे सिद्धियाँ और वे चमत्कार, वे ऋद्धियाँ, जिनकी बावत ऋषियों ने बहुत सारे माहात्म्य बताए और वर्णन किए हैं और जिनके लिए आपको मैंने पहले दिन बताए थे और आज अंतिम दिन भी बताता हूँ कि वे सारी−की−सारी सिद्धियाँ और चमत्कार प्राचीनकाल के लोगों के तरीके से आज भी सुरक्षित हैं। लेकिन इसके साथ शर्त है, बिन शर्त नहीं मिलेगा।
बिना शर्त अनुदान नहीं
महाराज जी! बिना शर्त के दिलाइए। नहीं बेटे, बिना शर्त के नहीं मिलेगा। बिना शर्त के हमें कलेक्टर बना दीजिए। नहीं बेटे, बिना शर्त के नहीं बन सकता। कलेक्टर बनने से पहले तुझे ग्रेजुएट होना चाहिए। ग्रेजुएट होने के साथ−साथ में तुझे आई॰ सी॰ एस॰ पास करना चाहिए। तब फिर तुझे कलेक्टर बनवा दूँगा। नहीं महाराज जी! पहले ही बनवा दीजिए, चाहे जैसी भी हो। आप तो इंदिरा गाँधी को बहुत जानते हैं, मोरार जी देसाई आपके मिलने वालों में से हैं, आप हमको तो कलेक्टर बनवा ही दीजिए। अरे! कुछ पास भी है क्या? हाँ, पाँचवें दरजे तक पढ़ा हूँ। तो फिर कलेक्टर कैसे बनवा दूँ। अरे! आपकी तो जान−पहचान है। ऐसे ही तीर−तुक्का मारता है। अरे भाई, तुक्का मारा जाता है कहीं? नहीं साहब! भगवान जी के यहाँ ऐसे ही तुक्का मारो कि हमारा सब काम हो जाएगा। नहीं बेटे, ऐसा तो नहीं हो सकता।
मित्रो! इसके लिए हमको पात्रता का विकास करना चाहिए। पात्रता का विकास करने के लिए मेरे गुरु ने मुझ पर दबाव डाला, तब मैंने अपनी पात्रता का विकास किया। पात्रता का विकास जिस कदर होता चला गया, उसी कदर मुझे देवता का, भगवान का, ऋषियों का अनुग्रह मिलता चला गया। आपके लिए भी वहीं रास्ता है, जो मैंने आपको पहले दिन बताया था कि हमको गायत्री उपासना करते हुए जो चमत्कार और सिद्धियाँ मिली, उसके आधार पर रहस्य को क्यों छिपाया जाए? यह रहस्य बताकर मैं अपनी बात समाप्त करूंगा। आपको मैं फिर यह कहता हूँ कि उपासना से लाभ उठाने के लिए अटूट श्रद्धा का होना निताँत आवश्यक है। श्रद्धा अर्थात् भगवान के आदेशों पर चलने के लिए विश्वास। जैसे कि मैंने आपको एक किसान का किस्सा बताया था कि किस तरह वह अन्य किसानों को तारता चला गया। भगवान पर उसका अटूट विश्वास था। भगवान पर विश्वास के आधार पर यदि आप श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए, आदर्शवादी जीवन जीने के लिए तैयार होते हैं, तो आप अपनी नाव उस पार तो ले जाएँगे ही, अन्य असंख्यों को भी तार देंगे, अपनी नाव पर बिठाकर ले जाएँगे।
तीन का त्रिवेणी संगम
साथियो! अगर आप ऐसा जीवन जी सकते हों तो हमारी राय है कि श्रद्धा एक, चरित्र दो और ऊँचा उद्देश्य तीन, इन तीनों की त्रिवेणी आप मिलाइए। आप तप कीजिए, किसी ऊँचे उद्देश्य के लिए। भगवान से माँगिए, किसी ऊँचे काम के लिए। देखिए फिर मिलता है कि नहीं मिलता? एक बच्चा जब अपने बाप से रुपये माँगता है कि पिताजी पाँच रुपये दे दीजिए। बाप कहता है क्यों? किसलिए? बच्चा कहता है कि सिनेमा देखने जाना है। पिताजी कहते हैं कि तू रोज−रोज पाँच रुपये ले जाता है और सब सिनेमा में खरच कर देता है। भूखों मरेगा और भीख माँगेगा। सौ गाली देता है। दूसरी ओर एक बेटा कहता है कि पिताजी, अमुक चीज मंदी हो गई है। मंदी चीज को खरीद लेने से उम्मीद हैं कि दो महीने के बाद हमको इसमें से मुनाफा हो जाएगा। हाँ बेटे, ठीक है, खरीद ले। पिता जी, पंद्रह हजार रुपये हों, तो हम माल खरीद लेंगे और बीस हजार रुपये में बेच देंगे। अच्छा बेटे, तो अब क्या करना चाहिए? पिताजी, पंद्रह हजार रुपये का इंतजाम करना चाहिए। अच्छा बेटा, देख अभी करता हूँ। देख तिजोरी में कितने रुपये हैं। नौ हजार हैं और देख ऐसा कर कि अपनी माँ के जेवर ले जा और छह हजार में गिरवी रख दे। कम पड़ेगा तो देख मैं अपने रिश्तेदार को चिट्ठी लिख दूँगा कि तुम मेरी जिम्मेदारी पर दो हजार रुपये दे दो। पंद्रह दिन के अंदर भेज दूँगा।
मित्रो! उसके लिए वह कर्ज माँगता है। अपनी औरत के जेवर बेच देता है। नौ हजार रुपये तिजोरी में रखे हैं, उन्हें निकालकर देता है। हजार रुपये छिपाकर रखे थे, वह भी दे देता है। सब खजाने खोल देता है बाप। क्यों देता है बाप उस बेटे को? इसलिए देता है कि वह किसी ऐसे काम के लिए खरच करना चाहता है कि जिससे बाप की इज्जत, बाप की शान बढ़े। जिस घर में वह रहता है, सबके लिए फायदा होता होता हो, इसलिए वह देता है। फिर बच्चे को पाँच रुपये देने से क्यों इनकार कर रहा था? इसलिए कि वह अपने लिए माँगता है, अय्याशी के लिए माँगता है, बेकार की बातों के लिए माँगता है। इसलिए बाप इनकार करता था। भगवान भी इसीलिए इनकार करता है अनुदान देने से कि आप अपने लिए माँगते हैं। आप ऊँचे उद्देश्य के लिए भजन कीजिए, चरित्रवान बनिए, श्रद्धा से अपना अंतःकरण परिपूर्ण कीजिए। भजन की मात्रा कम हो या ज्यादा, इससे कुछ बनता नहीं है। आप थोड़ा भजन कल लें, वह भी काफी हो सकता है।
श्रद्धा ही है धुरी
मित्रो! आप एकाध घंटा भजन कर लें, तो भी पर्याप्त है। महात्मा गाँधी आधा घंटा भजन करते थे। बिनोवा आधा घंटे भजन करते थे। इन लोगों के थोड़े− थोड़े भजन होते थे। थोड़े भजन में भी चमत्कार हो सकते हैं। शर्त यह है कि आप उसमें खाद−पानी देने और निराई करने का क्रम निरंतर जारी रखें। इसका अर्थ यह होता है कि श्रद्धा का समावेश, चरित्रवान होना और ऊँचे उद्देश्य के लिए उपासनाएँ करना अपने लिए नहीं। अगर आप ये तीन काम कर सकते हों, तो ऋषियों की परंपरा से लेकर हमारी परंपरा तक, सब में एक ही बात चली आई कि भगवान का अनुग्रह आपको मिलेगा, भगवान का प्यार आपको मिलेगा, अगर आपने लोभ और मोह पर अंकुश रखना सीख लिया। आपको यदि लोभ और मोह से ही प्यार है, तो फिर दोनों चीजें आपको नहीं मिल सकतीं। अगर आप एक चीज लेंगे, तो दूसरी आ जाएगी। प्रकाश की ओर चलेंगे, तो छाया पीछे आ जाएगी। छाया की ओर चलेंगे, तो प्रकाश भी नहीं रहेगा और छाया भी नहीं रहेगी।
मित्रो! हम प्रकाश की ओर चलें, तो छाया हमारे साथ−साथ चलती है। छाया को हजारों बार फेंका, हजारों बार धिक्कारा, टेढ़ी आँखें दिखाई, फिर भी वह आ गई। इससे मना करो तो कहती है कि हम फिर भी आएँगे। अतः आप प्रकाश की ओर चलिए, छाया पीछे−पीछे आएगी। छाया की ओर चलेंगे, तो छाया भी आगे−आगे भागेगी। फिर आप प्रकाश को भी गँवा बैठेंगे। बेटे यही है सिद्धाँत। जिसके आधार पर मैंने सारे जीवन में उन्हें दिमाग में उतारकर व्यवहार में लाता रहा। उसका परिणाम है, जो आज आप देखते हैं कि अपनी भी मैंने नाव पार लगा दी और अपनी नाव में बैठाकर असंख्यों को पार लगा दिया। आप भी अपनी नाव पार लगा सकते हैं और असंख्यों को उस पर बैठाकर पार लगा सकते हैं, लेकिन शर्त यही है कि आपका अध्यात्म सही हो। सही अध्यात्म कैसा होता है, इसी का परिचय मैंने आपको इस शिविर में दिया। मुझे आशा है कि आप इस पर विचार करेंगे और उसी के अनुरूप अपने जीवन को ढाले की कोशिश करेंगे। अगर आप ऐसा कर सके तो मैं आपको विश्वास दिला हूँ और आश्वासन देता हूँ कि आपकी साधना वैसी ही सफल होकर रहेगी, आपका ध्यान निश्चित ही लगेगा, जैसा कि हमारे साथ हुआ। आज की बात समाप्त। ॥ ॐ शाँतिः॥
संत पुँडरीक को पता चला कि किसी कारण पाटलिपुत्र के दो श्रेष्ठियों में कुछ आपसी मनोबल मालिन्य पैदा हो गया है। दोनों उनके शिष्य थे। लोगों ने कहा, “उन्हें समझाकर पुनः एकता स्थापित करा दें।” संत बोले, “समझाने से काम न चलेगा, उनमें सद्भाव पैदा करना पड़ेगा।”
संत ने किसी से कुछ न कहा, दोनों आते, उनके पास बैठे रहते। कभी−कभी संत दोनों को एक साथ काम बतला देते। दोनों करते। आश्रम की स्वच्छता में, आगंतुकों को भोजन कराने में, पूजन की व्यवस्था करने में वे ऐसी स्थिति पैदा करते कि दोनों श्रेष्ठियों को सहयोगपूर्वक काम करना पड़ता । गुरु के प्रति श्रद्धाभाव के कारण दोनों पूरे मनोयोग से कार्य करते। सहयोग लेते−देते, एक−दूसरे के कार्य के प्रति सम्मान का भाव पैदा हुआ, सद्भाव बढ़ा और बिना किसी के कुछ कहे उनका मनोमालिन्य दूर हो गया।
कर्म-संन्यास-योग नामक गीता के पाँचवें अध्याय की छठी किश्त
विगत अंक में आपने पढ़ा कि साधकों के कर्म ब्रह्म को अर्पित होने चाहिए। योगेश्वर श्रीकृष्ण दसवें श्लोक में कहते हैं, जो ऐसा करता है एवं बिना किसी आसक्ति के (संडडडड त्यक्त्वा) कर्म करता है, वह जल में कमलपत्र की भाँति पाप में लिप्त नहीं होता। अभिमान (अहं) छोड़कर कर्म करना कठिन अवश्य है, पर असंभव नहीं। इस लौकिक दुनिया में, दैनंदिन जीवन में जीते हुए न जाने कितने कषाय−कल्मषों से हमारी आत्मा ढक जाती है, उन्हें हटाने के लिए व पापी रूपी कीचड़ में पाँव जमाकर कमल की तरह खिलते रहने के लिए ऐसा कर्मयोगी बनना अनिवार्य है। आगे ग्यारहवें श्लोक में वे कहते हैं कि आसक्ति को त्यागकर केवल इंद्रिय, मन, बुद्धि और शरीर से दिव्यकर्मी अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं। प्रभु अर्पित कर्मों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इनसे वासनाएँ स्वयं क्षय होती चली जाती हैं एवं स्वतः अंतःकरण की शुद्धि होती चली जाती है। साथ ही अनंत शाँति साधक को उपलब्ध होने लगती है। आसक्ति से मुक्त जीवन हेतु कुछ उदाहरण दिए गए थे। बालगंगाधर तिलक, परमपूज्य गुरुदेव, योगिराज श्री अरविंद, इन तीन के जीवन प्रसंग दिए गए थे। ‘परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ हैं’ के पूज्यवर के उद्धरण के माध्यम से लोकहित परायण जीवन जीने की भावना बताई गई थी। अब आगे चलते हैं।
कर्मयोगी बनाम सकामकर्मी
बारहवें श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं—
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शाँतिमाक्षोति नैष्ठिकीम्। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तों निबध्यते॥ (5/12)
प्रत्येक पंक्ति का अर्थ स्पष्ट है अर्थात् कर्मयोगी (युक्तः) कर्मों के फल का त्याग करके आत्मनिष्ठा से उपजी भगवत् प्राप्तिरूप शाँति को प्राप्त होता है, किंतु सकाम कर्म करने वाला व्यक्ति फल में आसक्ति के कारण बंधनों को प्राप्त होता है।
जो यज्ञभाव से सेवा कर रहा है—इसे प्रभु की पूजा ही मानकर सारे समाज व संसार की देखभाल कर रहा है, पीड़ा−पतन और पराभव से भरे समाज में उसे उठाने का काम कर रहा है, वह श्रीकृष्ण के अनुसार भगवत् प्राप्तिरूप शाँति को प्राप्त होगा। ऐसी शाँति जिससे एहसास हो, मानों साक्षात् परमात्मा मिल गए हों। युक्तः (योगी) कर्मफल त्यागकर (कर्मफलं त्यक्त्वा) कर्म करता है, भविष्य के प्रति कभी असुरक्षा का भाव मन में नहीं रखता। इस भाव से कर्म करते चलने से उसकी वासनाओं का भी क्रमिक क्षय होता चलता है। वह अंदर से तृप्ति−तुष्टि−शाँति की अनुभूति करता है, किंतु वह, जिसके समक्ष कोई आदर्श नहीं, जरा भी समर्पण भाव नहीं (अयुक्तः), वह सदैव अपनी अहं के निन्दित भावनाओं में ही मग्न रहता है। संकीर्ण स्वार्थपरता के कीचड़ में फँसकर वह जीवन को मनावमय, अशांतिमय कर लेता है। वह सदैव भविष्य के लिए चिंतित होता रहता व अंततः बंधनों में लिप्त हो जाता है। (कामकारेण फले सक्तों निबध्यते)। यहाँ सकाम कर्म करने वाले को गीतकार ने अयुक्तः शब्द की संज्ञा देकर उसे कामकारेण एवं फले सक्तों (फल की आसक्ति वाला) शब्दों से जोड़कर बंधनों में, बेड़ियों में जकड़ा बताया है।
दिव्यकर्मियों की रीति−नीति
परमपूज्य गुरुदेव दिव्यकर्मियों के विषय में लिखते हैं, “साधु−ब्राह्मणों के देव−समुदाय से पूछना पड़ेगा कि वे व्यक्तिगत सुविधाओं में कटौती करके सत्प्रवृत्ति−संवर्द्धन की सेवा−साधना के लिए क्यों अपने को समर्पित करते हैं। ऋषियों की परंपरा इतनी कम नहीं थी कि वे विलासियों की तरह साधन−सामग्री उपार्जित नहीं कर सकते थे। फिर क्यों उनने गरीबों जैसा बाना पहना? इसका उत्तर भी उसी समाधान के साथ जुड़ा है, जिसमें खाने की तुलना में खिलाने के जायके को अत्यधिक स्वादिष्ट पाया जाता है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर, भामाशाह, माँधाता, अशोक, हर्षवर्धन आदि से पूछा जाना चाहिए कि उनने अपनी संपदा विलास के लिए उत्तराधिकारियों के लिए जकड़कर क्यों नहीं रखी। बुद्ध और गाँधी से पूछा जाना चाहिए कि वे अपने बुद्धिकौशल से वैभव खरीदने की समझदारी में क्यों अछूते रह गए।” (प्रज्ञा अभियान नव0/दिस. 1972) इसी प्रकरण में वे आगे सेवा के विषय में लिखते हैं कि ‘भज’ धातु से बना है—भज सेवायाम्। सेवा किसकी? तो वे कहते हैं, “आदर्शों की। आदर्शों का समुच्चय ही भगवान है। दुःखों का तत्काल संकट निवारण करने के लिए कुछ साधन−सहायता की भी आवश्यकता पड़ती है, पर किसी का स्थायी दुःख मिटाना हो, तो उसे अपने पैरों पर खड़ा करना होगा और इसका एकमात्र आधार आदर्शों के प्रति उसे निष्ठावान बनाना होगा। इस प्रकार दुखी को सुखी और सुखी को सुसंस्कृत बनाने का आत्यंतिक आधार एक ही शेष रहता है, आदर्शों को आत्मसात करना।”
आज तो मनुष्य आस्था−संकट से आक्राँत है एवं इसी कारण भ्राँतियों और विकृतियों के जाल−जंजाल में अधिकाधिक जकड़ता चला जा रहा है। संकीर्ण स्वार्थपरता ही उस पर उन्मादी आवेश की तरह, विषैली, शराब की तरह अपना आधिपत्य जमाती चली जा रही है। ऐसे में बंधनों में फँसकर अशाँति को प्राप्त होना, विक्षुब्ध होकर रोगी बनना स्वाभाविक है। आज उन्हीं की बाढ़ है। प्रत्येक दूरदर्शी−विवेकवान का यही कर्त्तव्य है कि वह लोकमानस के परिष्कार रूपी यज्ञकर्म पर अपना ध्यान केंद्रित करे और उसके लिए जितना भी कुछ बन पड़े, वह प्रस्तुत करे। यही सारा सार इस बारहवें श्लोक से निकलता है। युगऋषि का चिंतन हमें इसी ओर सतत ले जाता है।
नवद्वारे पुरे देही
सभी क्रियाओं को यज्ञभाव से करते चलने से कामनाएँ स्वतः समाप्त होती चली जाती हैं। मन स्वच्छ हो जाता है और ध्यानस्थ शाँति का अनुभव करने लगता है। दिव्य−दृष्टि प्राप्त हो जाती है एवं ‘सर्वभूतात्मभूतात्मा’ परमात्मा के चारों ओर दर्शन होने लगते हैं। आगे श्रीकृष्ण कहते हैं—
सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥ (5/13)
जिसका अंतःकरण उसके वश में है, ऐसा संयमी व्यक्ति सब कर्मों में कर्त्ता का भाव त्याग करके नवद्वारों वाले शरीररूपी नगर में न कुछ करते हुए, न कराते हुए आनंदपूर्वक रहता है। उसका मन सदैव सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में ही स्थित रहता है।
कितना सुँदर एवं विज्ञानसम्मत प्रतिपादन है योगेश्वर का। ‘वंशी’ अर्थात् जिसने अपने को संयत कर लिया है, अपने विवेक द्वारा (मनसा) यह अनुभव करने लगता है कि किन्हीं भी कर्मों में उसका कोई कर्त्ताभाव नहीं है (सन्न्यस्य) एवं वह नवद्वारों वाली नगरी में (इस सुरदुर्लभ मनुष्य तन में) सुखपूर्वक रहता है (आस्ते सुखं)
हमारा शरीर एक ‘पुर’ है, एक नगरी है। इसमें शुद्ध अहंभाव प्रासाद रूप में राजमहल की तरह प्रतिष्ठित है। एक मुख, नासिकाओं के दो छिद्र, दो कान, दो नेत्र, एक गुदा और एक मूत्रेंद्रिय, सब मिलकर हर मनुष्य तन में नौ द्वार हैं। ये सभी भली भाँति सुरक्षित हैं एवं अपनी सक्रियता से शरीररूपी इस नगरी को भी सुरक्षित बनाए रखते हैं। रात्रि में सहज रूप में ये द्वार स्वतः बंद हो जाते हैं। इस नगरी में परमपिता परमात्मा न कुछ करते हुए और न कुछ कराते हुए (नैव कुर्वन्न कारयन्) विद्यमान रहता है। उस प्रभु में स्थित ‘वंशी’ विवेकवान साधक का मन सदैव आनंद की अनुभूति कराता रहता है। जो व्यक्ति अंतर्मुखी हो गया, उसने अपने देवालयरूपी शरीर को प्रभु का उपकरण बनाकर अपनी विशृंखलित होती रहने वाली शक्तियों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। फिर वह ध्यान की उस भावातीत स्थिति में पहुँच गया, जहाँ आत्मा के रूप में वह स्वयं ही चैतन्य रूप में विद्यमान है।
महर्षि रमण एवं पूज्यवर
अष्टदल कमल−षट्चक्रों एवं नवद्वारों वाली यह देह परमात्मा की शक्तियों के प्रवाहित होते रहने का एक माध्यम बन जाती है। हम ऐसे में न कुछ करते−न−कराते हुए भी सदैव ध्यानस्थ बने रहते हैं। रमण महर्षि इसका एक आदर्श उदाहरण हैं। तिरुवन्नमलाई की अपनी तपःस्थली में सारा जीवन बिताने वाले तपस्वी रमण महर्षि उन गिने−चुने योगियों में से हैं, जिनके तप ने सूक्ष्म जगत को प्रचंड झंझावातों में अनुप्राणित कर भारत की आजादी का वातावरण बनाया। उनके ब्रह्मतेज ने सारे हिंदुस्तान ही नहीं, विश्वभर को प्रभावित किया। कहीं नहीं गए, कोई प्रवचन नहीं किया, कोई विश्वयात्रा नहीं को, पर बड़े−बड़ वैज्ञानिक उनके समक्ष आते चले गए। हाइजेनबर्ग जैसे वैज्ञानिक और कार्लजुँग जैसे मनोवैज्ञानिक उनके पास आए। मौन उनके तप में सहभागी बन वे पश्चिम के लिए ऐसे महत्त्वपूर्ण सूत्र लेकर गए, जिनके आधार पर आज के दर्शन व मनोविज्ञान की नींव पड़ी। सरदार पटेल को प्रेरणा मिली एवं बाबू राजेंद्रप्रसाद जी को उनने भेजा रमण महर्षि के पास, यह जानने के लिए महर्षि स्वतंत्रता संग्राम हेतु क्या कर रहे हैं। अपने मितभाषिता द्वारा उनने बताया कि तुम अपना काम करो, हम अपना काम कर रहे हैं। हम अपने आप में अपनी नवद्वारों वाली नगरी में बैठे वह सब काम कर रहे हैं, जो तपः पूत वातावरण बनाने हेतु जरूरी है। तपश्चर्या में, मौन में बड़ी शक्ति है। तुम उस कर्मयोग में लगे रहो, हम अपना कर्म करते रहेंगे। (जो दीखने में प्रायः अकर्म ही होता है)। ब्रह्मतेज की प्रभा से दूर−दूर तक का वातावरण प्रभावित होता है। परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना भी इसी स्तर की थी। उनके एक से डेढ़ वर्ष चार हिमालय प्रवास जिन घड़ियों में हुए, वे संकट भरी थीं, पर उनके सोद्देश्य तप एवं नवद्वारों वाली उनकी देह परमात्मा की अनंत शक्तियों के झरने का माध्यम बन गई। प्रतिकूलताएँ अनुकूलताओं में बदलती चली गई।
ऐसे संत जहाँ कहीं भी होते हैं, उनके उपर्युक्त श्लोक में वर्णित स्वभाव के अनुसार, स्वयं के कर्त्ताभाव के त्याग के कारण उनसे सर्वोत्तम कार्य स्वतः फूट पड़ते हैं। चाहे उनका नाम विवेकानंद हो, दयानंद हो, श्रीअरविंद हो, गाँधी हो या विनोबा हो। यही नहीं, आध्यात्मिक के साथ−साथ वैज्ञानिक राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्र में भी सफलताएँ हस्तगत होने लगती हैं। ढेरों साहसिक समाज− सुधार के कार्य होने लगते हैं। कहीं ज्योतिबा फुले जाग उठते हैं, तो कहीं महर्षि कर्वे एवं बाबा साहब आमटे। इस सफलता का आधार है, इन देवालयरूपी देहधारी संतों द्वारा स्वयं को ‘सन्यस्य ’ (कर्त्ताभाव रहित जीवन) की स्थिति में ले आना। आज के आधुनिक विज्ञान की महत्वपूर्ण देनें चेतना के इस विस्फोट के कारण ही हमें हस्तगत हुई हैं। आज यदि ऐसे भाव वाले ढेरों युवक युगनिर्माण का स्वप्न लेकर खड़े हो जाएँ, तो समाज बदलते देर न लगे।
युवाओं का आह्वान
जितना अनुकूल इसके लिए आज वातावरण है, उतना पहले कभी नहीं रहा। अहंकार रहित, स्वार्थ रहित काम करने वाले प्रशिक्षित युवा यदि समाज आज तैयार कर सका, तो विश्व का पुनर्निर्माण संभव है। गीता बार−बार इसी बात पर जोर देती हैं वह कहती हैं कि इसमें बताई जीवनपद्धति को व्यवहार में लाओ, अपनी शक्तियों को विस्तरित करो, अपनी बल−सामर्थ्य बढ़ाओ। समाज के जीवन−मूल्यों में एक नई क्राँति ला दो। अखिल विश्व गायत्री परिवार का इसके संस्थापक की सूक्ष्म−कारणसत्ता के माध्यम से आह्वान है ताकि ऐसा तबका आए और वह बुढ़ाती पीढ़ी को एक सबक सिखाए। युवा मानसिकता एवं सन्न्यस्य भाव के साथ कर्मठता चाहिए, फिर ऐसे चरित्रनिष्ठ क्राँति लाकर ही रहेंगे। श्रीकृष्ण भी युवा अर्जुन को एक प्रकार से उसकी देह में छिपी अनंत सामर्थ्य का परिचय कराके उसे बार−बार झकझोर रहे हैं।’ सर्वकर्माणि सन्न्यस्य’ बार−बार उसी का उद्घोष कर रहा है।
जब गीता बार−बार अहंभाव और उस पर केंद्रित कामनाओं को छोड़कर सेवा−साधना की ओर प्रेरित करती है, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या इस उच्च स्तर पर सभी प्राणी पहुँच सकते हैं। जब स्रष्टा ने ‘एकोऽहं बहुस्यामि’ का व्रत लिया, तो उनकी भी कल्पना रही होगी कि जीव अपना सहज कर्म करता रहे एवं सृष्टि को बढ़ाता रहे। किसी के भी मन में परस्पर विरोधाभास की बात आ सकती है। कहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस सृष्टि का संवर्द्धन करो, कहीं संन्यास (तथाकथित आज का प्रपंच भरा) की आलोचना करते हैं एवं बार−बार आसक्ति को त्यागने, सभी कामनाओं को छोड़कर मात्र सेवाधर्म में नियोजित करते हैं। तो फिर क्या मानव को अपना संतानोत्पादन से लेकर महत्त्वाकांक्षाओं द्वारा आगे बढ़ने की कामना का लक्ष्य छोड़ देना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए भगवान हमें अगले श्लोकों की ओर ले जाते हैं। त्रिगुणातीत सृष्टि के क्रीड़ा−कल्लोल की झलक दिखाते हैं। अगला चौदहवाँ श्लोक देखना होगा−
न कतृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥ (5/14)
परमेश्वर न तो जनसामान्य के कर्त्तापन की, न कर्मों की और न ही कर्मफल के संयोग की ही रचना करते हैं। यह कर्मफल संयोग का कारण नहीं है, वस्तुतः यह तो प्रकृति ही है, जो कार्य करती है, स्वभावतः ही सब हो रहा है।
स्वभावस्तु प्रवर्तते
जरा अर्थ पर ध्यान देना होगा। परमात्मसत्ता हमारे अंदर अहंभाव, कामोद्वेग, विभिन्न प्रकार की वासनाएँ पैदा नहीं करती। हमारे कर्म जिन प्राकृतिक इच्छाओं के वशीभूत होते हैं, उनका नियंता, कर्त्ता−धर्त्ता परमेश्वर नहीं है। हमारी मशीन रूपी कार या कंप्यूटर में यदि ईंधन है, पॉवर है, ये चलते हैं तो इनका कारण परमात्मा सुनिश्चित है, पर इसे कैसे चलाया जाए, कहाँ जाया जाए, किस दिशा में जाया जाए, यह काम परमात्मा का नहीं है। श्रीकृष्ण का यह प्रतिपादन बड़ा गूढ़ है व इसे हमें भली भाँति समझना होगा। पंखा अपने आप नहीं घूमता। जब तक विद्युतशक्ति आर्मेचर में प्रवाहित नहीं होगी, वह चल नहीं पाता। बिजली पंखे की स्वामी है। इसी तरह आत्मसत्ता हमारे यंत्रों की स्वामी होनी चाहिए। जगदीश्वर—वह परमपिता परमात्मा ही हम सबके भीतर की शक्तियों का स्वामी है, किंतु जैसा श्लोक कहता है कि यह जगदीश्वर न तो कर्त्ताभाव का, न कर्म का सृजनकर्त्ता है और कर्मफल संयोग का वह निमित्त है। यह तो मानवी प्रकृति ही है, जो कार्य करती है और सतत मनुष्य को विभिन्न कामों में उलझाए रखती है।
मुक्ति का पथ
हमसे कोई अच्छा कार्य हो जाए, तो हम स्वयं को श्रेय दे देते हैं, जबकि वह जगदीश्वर की कृपा से सचेतन इस जीव द्वारा प्रकृति पर आरुढ़ होकर संपन्न हुआ है। जब कोई गलत−अनैतिक कार्य हो जाए, तो हम विधि का विधान या किसी और पर दोषारोपण कर देते हैं। वस्तुतः अनंत चैतन्य में विराजमान वह प्रभुसत्ता हमारे कार्यों में निरपेक्ष है। अपनी बुरी आदतों व व्यसनों आदि के लिए भी हम स्वयं को निर्दोष मानते हैं, जबकि कर्त्ता हम स्वयं हैं। सही बात तो यह है कि पूर्व जन्म के अर्जित हमारे कर्म−संस्कार ही वर्तमान जन्म में प्रारब्ध रूप से प्रकट हुए हैं। ये संस्कार कर्मबीज हैं और प्रकृति की तरह ये भी त्रिगुणमय सत, रज, तम गुणों से युक्त हैं। समर्पण योग से, गुरु की कृपा से एवं तपश्चर्यादि ज्ञान के संचय से इन प्रारब्धों को काफी सीमा तक काटा जा सकता है, पर इसके लिए अपना नियंत्रण प्रभु के हाथों सौंपना होगा, जो चेतना के स्फुल्लिंग की तरह हमारे अंदर एवं निखिल ब्रह्माँड में संव्याप्त है। हर व्यक्ति अपने कर्मों के अनुरूप ही शरीर धारण करके अपने संस्कारों की दिशा अनुसार कार्य करता है, कर्म करता चला जाता है। कर्मों का क्षरण होते रहने से अपने स्वरूप का ज्ञान होता चला जाता है, जो अंततः हमें मुक्ति की ओर ले जाता है। यह हमारे ऊपर है कि हम अविद्या रूपी प्रकृति से निर्देश लें कि अपने अंदर बैठे भगवान से।
देश−विदेश के पंडितों का एक शास्त्रार्थ हुआ। रा ज्ञानसेन इसी बहाने विद्वानों का सत्कार करते थे। उस शास्त्रार्थ समारोह में विद्वान भारवि विजेता घोषित किए गए। उपस्थित विद्वानों ने उनका नेतृत्व स्वीकार किया।
विजेता का सम्मान प्रदर्शित करने के लिए राजा ने उन्हें हाथी पर बिठाया और स्वयं वँवर ढुलाते हुए उनके घर तक ले गए। भारवि जब इस सम्मान के साथ घर पहुँचे, तो उनके माता−पिता की खुशी का ठिकाना न रहा।
घर लौटकर सर्वप्रथम उनने अपनी माता को प्रणाम किया। पिता की ओर उपेक्षा भरा अभिवादन भर कर दिया।
माता को यह अखरा। झिड़ककर साष्टाँग दंडवत् के लिए संकेत किया, सो उनने उसका भी निर्वाह कर दिया। पिता ने सूखे मुँह से चिरंजीव भर कह दिया। बात समाप्त हो गई, पर माता और पिता दोनों ही खिन्न थे। उन्हें वैसी प्रसन्नता न थी, जैसी कि होनी चाहिए थी। गुरुकुल से लौटे हुए छात्र जिस शिष्टाचार से पिता का अभिवादन करते थे और पिता जिस प्रकार छाती से लगाकर पुत्र के प्रति आत्मीयता भरा आशीर्वाद प्रदान करते थे, उसका सर्वथा अभाव था। राजा द्वारा हाथी पर बिठाकर चँवर ढुलाते हुए घर तक लाने का अहंकार जो था भारवि को। इसमें उसने शिष्टाचार को, विनम्रता को भुला दिया था, मात्र चिह्न−पूजा भर की।
पिता की मुखमुद्रा पर खिन्नता देखकर भारवि माता के पास कारण पूछने गए। माता ने बताया, “विजयी होने पर लौटने के पीछे, तुम्हारे पिता की कितनी साधना थी, यह तो तुम भूल ही गए। शास्त्रार्थ के दसों दिन उन्होंने जल लेकर सफलता के लिए उपवास किया और इससे पूर्व पढ़ाने में कितना श्रम किया, इसका तो तुम्हें स्मरण ही नहीं रहा। विजय की अहंता तुम्हारे चेहरे पर झलकती है और अभिवादन में चिह्न−पूजा भर का शिष्टाचार था।” उनने कहा, “वत्स, तुम्हारी विजय के पीछे पिता की साधना है, उसे विस्मरण मत करो। विद्वत्ता की विजय के पीछे शिष्य की विजयशीलता का विस्मरण नहीं होना चाहिए।”
भारवि को अपनी भूल प्रतीत हुई। विद्वत्ता का अहंकार गल गया और एक शिष्य एवं पुत्र का जो विजय होना चाहिए, वह उदय हुआ।
श्रीराम में जागा रोष
1919-20 के बाद का वह दौर शुरू हो चुका था, जब महात्मा गाँधी के नेतृत्व में देश असहयोग आँदोलन छेड़ चुका था। आँदोलन का उद्देश्य तब भारत की संपूर्ण आजादी तो नहीं था, वह कुछ संवैधानिक सुधारों के लिए था, ताकि भारत के कुछ लोग भी राज−काज में हिस्सा ले सकें। महात्मा गाँधी भारत की आत्मा की आवाज बन चुके थे और उनकी प्रतिष्ठा निर्द्वंद्व नेता के रूप में हो गई थी। 1919 में जलियावाला बाग हत्याकाँड के बाद उन्होंने भारत में ब्रिटिश राज को ‘शैतान’ की संज्ञा दी थी और लोगों से अपील की कि वे अदालतों, स्कूलों, कॉलेजों का बहिष्कार करें। सरकारी नौकरी कर रहे लोग अपने पदों से इस्तीफा दें और सरकार से पूरी तरह असहयोग करें। उसी वर्ष 30 मार्च और 16 अप्रैल को देशभर में हड़ताल हुई। हड़ताल के दिन सभी शहरों का जीवन ठप हो गया, व्यापार बंद रहा और अँगरेज अफसर असहाय−से देखते रहे। इस हड़ताल ने ‘असहयोग‘ के हथियार की शक्ति पूरी तरह प्रकट कर दी थी।
असहयोग का दौर आगे बढ़ा और उग्र रूप धारण करने लगा। असहयोगियों के प्रति सरकार ने भी कड़ा रुख अपनाया। हजारों लोगों को पकड़कर जेल में ठूँस दिया। दमनचक्र निष्ठुरतापूर्वक चला। उस निष्ठुरता के आगे लोग भी चुप नहीं रह सके और कई जगह हिंसा भड़क उठी। हिंसा का यह विस्फोट महात्मागाँधी को अच्छा नहीं लगा। वे आँदोलनकारियों से अंत तक अहिंसक रहने की अपेक्षा करते थे। उनका विश्वास था कि हिंसा को अपनाते ही परमात्मा हमारा साथ छोड़ देगा। अहिंसा का हर कीमत पर पालन किया, तो जनता में जनार्दन जाग उठेगा। असहयोग आँदोलन उनकी आशा−अपेक्षा के अनुरूप नहीं चला तो उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की। कहा कि लोगों को अहिंसा के लिए तैयार किए बिना असहयोग आँदोलन छेड़ना हिमालय जैसी भूल थी। इस भूल को सुधारने के लिए उन्होंने आँदोलन वापस ले लिया।
जिस आँदोलन के द्वारा महात्मा गाँधी ने एक वर्ष में ‘स्वराज’ लाने का वायदा किया था, वह पूरा नहीं हो सका। वह स्वराज 1942 के पूर्ण स्वतंत्रता या अँगरेजों को भारत से बाहर जाने की माँग करने जैसी भावना तक नहीं पहुँचा था। ‘स्वराज’ की माँग तब चलाने में भारत के लोगों की भागीदारी वापस ले लिया, लेकिन लोग उसे विफल मानते थे। कुछ हद तक यह सही भी था। उसने लोगों के मन से सरकारी दमन, ब्रिटिश तोपों और संगीनों का, अँगरेजी हुकूमत की जेलों का डर निकाल दिया। यह भय निकलने के बाद अँगरेज को भी शायद लगने लगा कि भारत से उन्हें एक दिन जाना होगा। लोगों की भावनाओं को कुचलने के लिए उनका चमनचक्र तेज होने लगा। लोगों में प्रतिकार की भावनाएँ भी बलवती हो गई।
अँगरेजों के विरुद्ध बढ़ते जा रहे रोष ने युवाओं, किशोरों और स्त्रियों को भी प्रभावित किया। आँवलखेड़ा गाँव के किशोरों में यह रोष श्रीराम के मन में सबसे पहले दिखाई दिया। मथुरा−वृंदावन की यात्रा से लौटते हुए उन्हें पता चला कि गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया है। गाँधी जी की गिरफ्तारी के खिलाफ रैलियाँ निकलने लगीं। श्रीराम मथुरा−वृंदावन की मधुर और पवित्र यादों को कुछ देर के लिए स्थगित कर प्रभातफेरियों की व्यवस्था में हाथ बँटाने लगे। रैली में शामिल होने के लिए गाँव के बड़े−बुजुर्गों ने रोका कि बच्चे हो, पता नहीं कब कोई पुलिस कार्रवाई हो जाए और तुम धर लिए जाओ, पर श्रीराम ने कहा कि देश के प्रति हम बच्चों का भी कुछ कर्त्तव्य है। आप हमें आशीर्वाद दीजिए कि हम अपना कर्त्तव्य भली भाँति पूरा कर सकें।
कुछ दिन बाद खबर आई कि गाँधी जी को छह माह की सजा सुनाई गई है। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला था। जिस सभा में यह खबर दी गई, उसमें श्रीराम भी मौजूद थे। उनके मुँह से निकला, हम लोगों पर भी मुकदमा चलाया जाए। पापियों के शासन का नाश हो। दस−ग्यारह वर्ष के किशोर की इन भावनाओं ने वहाँ उपस्थित बड़े−बुजुर्गों को अभिभूत कर दिया। उन्होंने सहमति जताई। उसी सभा में श्रीराम ने घोषित किया कि वे बालसेना बनाएँगे और अँगरेजी राज के खिलाफ कुछ−न−कुछ करते रहेंगे।
बालसेना का गठन
अपने हम उम्र आठ−दस बच्चों को उन्होंने एक महीने में तैयार कर लिया और बच्चों की रैली निकालने लगे। प्रभात फेरी के बाद सभी बच्चे गाँव के बाहर बने हनुमान मंदिर में चले जाते। बजरंगबली की प्रतिमा को प्रणाम कर व्यायाम में लग जाते। गाँव के युवा स्वराजी चरण भैया की नसीहतें बच्चों ने पकड़ ली थीं कि स्वराज की लड़ाई जीतने के लिए शरीर मजबूत होना चाहिए। शरीर कच्चा रहा तो अँगरेजों या उसके पुलिसियों का एक डंडा भी सहन नहीं होगा। मार पड़ते ही बिछ जाएँगे, इसलिए जरूरी है कि शरीर में शक्ति पैदा हो। बच्चों को ‘स्वराज’ की लड़ाई के लिए तैयारी करते देख चरण भैया और गाँव के कुछ और लोगों ने मंदिर के प्राँगण में ही दूध, नाश्ते का इंतजाम किया। नाश्ते में भिगोए हुए चने और गुड़ दिया जाता।
छोटे स्वराजियों के इस दल ने समय−समय पर कई करतब दिखाए। बालसेना ने उन मोरचों पर हल्ला बोलना शुरू किया। जहाँ किसी पर ज्यादती होती थी। आगरा में छावनी थी, अँगरेजी फौजें पड़ी रहती थीं। शासकों से ज्यादा सैनिकों को गुमान था। वे जब−तब लोगों पर अत्याचार करते, उन्हें अपनी मनमरजी के अनुसार चलाते और बेगार लेते थे। मनोरंजन के लिए लोगों से उल्टी−सीधी हरकतें भी कराते थे। सामान्य लोग इन ज्यादतियों के डर से छावनी के पास भी नहीं फटकते। फौजी सड़क के किनारे खासकर गोरी चमड़ी वाले फौजी अफसर हों तो लोग उन्हें देखते ही छिप जाते थे। इन अफसरों की ज्यादतियों के किस्से आसपास के गाँवों में भी पहुँचते। आँवलखेड़ा में भी भूत−प्रेम की कहानियों की तरह फौजियों से संबंधित घटनाएँ कही−सुनी जातीं। श्रीराम की बनाई बालसेना में भी इन घटनाओं की चर्चा होती। हर चर्चा−प्रसंग के बाद संकल्प लिया जाता कि किसी फिरंगी या काले फौजी को अत्याचार करते देखा तो सहन नहीं करेंगे। उसे रोकेंगे, नहीं रोक पाए तो जवाबी हमला या बदला लेने अथवा रोष जताने जैसी कार्रवाई करेंगे। चुपचाप तो नहीं बैठेंगे।
फिरंगी फौजियों से मुकाबला
बालसैनिकों के संकल्प की परीक्षा की घड़ी भी जल्दी आ गई। फौजी लोग गाँव−गँवई में कम ही जाते थे। उस दिन एक अँगरेज अफसर पाँच−सात सिपाहियों के साथ आँवलखेड़ा की तरफ निकल आया। अफसर और सिपाहियों के आने की खबर पहले आ गई। बालसेना के सदस्य तुरंत मिले और आनन−फानन में योजना बना ली गई कि फौजियों ने कोई ज्यादती की तो मुकाबला कैसे किया जाय। इस संकल्प के साथ गाँव की सीमा पर जाकर बैठ गए। वे तैयारी के साथ गाँव के बाहर पहुँचे थे। फौजी लोग कब आएँगे, इसकी पक्की सूचना नहीं थी, इसीलिए सुबह से ही मोरचा सँभाल लिया।
साढ़े बारह−एक बजे के आस−पास दूर धूल उठती−उड़ती दिखाई दी। इस तरह की धूल घोड़ों की टाप पड़ने से ही उठती है। श्रीराम ने साथियों को इशारा किया। फौजी हैं तो पिछले गाँव में जरूर उपद्रव मचाकर आ रहे होंगे। उन्हें गाँव में घुसने नहीं देना है। बालसैनिकों ने एक दूसरे को देखते और इशारे करते हुए संकल्प दोहराया। थैली में रखे हुए पत्थर और गुलेल सँभाली। दूसरे साथियों ने जेब में रखी पिसी हुई मिर्च की पुड़िया पर हाथ रखा। यह सब करते हुए उनका आत्मविश्वास दृढ़ हो रहा था। फौजियों की टुकड़ी पास आई तो श्रीराम निकलकर सड़क पर आए।
टुकड़ी में शामिल हिंदुस्तानी सिपाही ने रास्ते में खड़े श्रीराम से पूछा, “यहाँ क्या कर रहे हो?” उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। दोबारा कड़ककर पूछा। फिर भी कुछ नहीं बोले। यह ढीठता सिपाही को पसंद नहीं आई। वह घोड़े से नीचे उतरा और श्रीराम की तरफ थप्पड़ उठाकर बढ़ने लगा। पास पहुँचकर मारने का मुद्रा में आता कि श्रीराम ने दन्न से जेब में रखी पुड़िया खोली और फौजी की तरफ उठाकर जोर से फूँक मार दी। सिपाही ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इस तरह की हरकत हो जाएगी। आँखों में मिर्च घुस जाने से वह बिलबिला उठा। इस आक्रमण के अगले ही पल पेड़ों की ओट से गुलेल चलने लगी। पत्थरों के कुछ टुकड़े भी उछले और सिपाहियों पर पड़े। अँगरेज अफसर कुछ समझे इससे पहले उसके टोप पर भी लकड़ी का एक बड़ा टुकड़ा आकर लगा। आघात झेल न पाने के कारण टोप नीचे गिर पड़ा। वह गालियाँ बकने लगा। समझ में किसी को नहीं आ रहा था कि हमला कहाँ से हो रहा है।
आठ−दस मिनट तक यह हमला चलता रहा और फिर जैसे सब शाँत हो गया। इस हमले से सिपाहियों का पारा चढ़ गया। उन्होंने इसे गाँववालों की कारिस्तानी माना और सभी को सबक सिखाने की गरज से बस्ती में घुसे। उन्हें देखकर बस्ती के लोग घरों में छिपने लगे कि फिरंगी अफसर दहाड़ा, “जिन लोगों ने शरारत की है, वे बाहर आ जाएँ, वरना पूरे गाँव को सजा मिलेगी।” घरों में छिपे लोगों की कँपकँपी छूट गई। “शरारती लोगों को बाहर निकालो।” फौजी अफसर ने फिर चेतावनी दी।
इस बार चरण भैया बाहर निकल आए। उन्होंने पूछा, “क्या हुआ कर्नल साहब, आपके साथ क्या शरारत की?” कर्नल ने कहा, “उस लड़के को सामने लाओ, जिसने सिपाही की आँखों में मिर्च झोंकी और वे लोग भी हाजिर हों, जिन्होंने पत्थर दनदनाए। कौन सुराजी लोग थे, हम भी तो देखें?” चन्ना भैया ने कहा, “गाँव में तो किसी की हिम्मत नहीं पड़ती। जरूर डकैत सुराजी होगा। उसी के दल में एक लड़का है। मिर्च झोंकने और पत्थरों से हमला करने का तरीका वही अपनाता है।”
“कहाँ रहता है डकैत सुराजी?” उसी अफसर ने टूटी−फूटी हिंदी में फिर पूछा, तो चरण भैया का टका−सा जवाब था, “दस्यु का कोई पता−ठिकाना होता है साहब! अच्छा हुआ आप लोग सामने पड़ गए, वरना वह गाँव में घुस आता और यहाँ तबाही मचाता, लेकिन उसने आपको भी तो हैरान कर दिया।” यहाँ अपनी हेठी होते देख अफसर ने बात का रुख मोड़ा, “नहीं, हम लोगों को खास परेशान नहीं किया। दोबारा वह डकैत इधर आए तो छावनी में खबर भेजना। हम उसे ठीक कर देंगे।”
सिपाहियों की वह टुकड़ी इसके बाद गाँव में बिना रुके वापस चली गई। चरण भैया को पता था कि किसने पत्थर बरसाए हैं और मिर्च का पाउडर किन−किन की जेब में था। बालसेना के हमले की योजना उन्हीं की देख−रेख में बनी थी। इसमें जोखिम थी, लेकिन योजना पर अमल नहीं होता, तो भी गाँव में कहर बरपा होता ही। इस कामयाब हमले या प्रतिकार से बालसेना का हौसला बढ़ा। फिरंगी सिपाहियों की टुकड़ी वापस जाने के बाद बालसेना के सदस्य देर तक खो−खो करते हँसते रहे। यद्यपि कुछ लोगों को उनकी शरारत का पता चला तो पहले उन्होंने थोड़ी नाराजगी जताई, फिर बच्चों की हिम्मत और निष्ठा को समझते हुए धीरे से खुद भी हँस दिए।
गाँधी जी के असहयोग के साथी
बालसेना के इन सदस्यों ने खेती में काम करने वाले मजदूरों पर देशी मालिकों की ज्यादती के खिलाफ भी मोरचा खोला। मुख्य उद्देश्य स्वराज की लड़ाई में हाथ बँटाना था। स्वराज के मायने क्या होते हैं या फिरंगीराज का क्या मतलब है, इन सवालों की गहराई में जाने की किसी ने जरूरत नहीं समझी। जिस बात ने बालसेना के सदस्यों को आवेश से भर दिया, वह गाँधी जी की गिरफ्तारी थी। गाँधी जी उनके लिए सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े हुए एक व्यक्ति का नाम था। एक ऐसा नाम, जो न किसी का मुकाबला करता था और न ही बदले की बात सोचता था। उस ज्यादती के सामने नहीं झुकने या ज्यादती करने वालों से हरसंभव असहयोग करने का नाम ही गाँधी था।
श्रीराम के नेतृत्व में बालसेना ने उन मालिकों के साथ असहयोग का एक विलक्षण प्रयोग किया। वे उन मालिकों के डंडे छिपा देते और बैल खोल देते थे, जो अपने मजदूरों पर अत्याचार करते थे। उनका मानना था कि जो काम बँधुआ मजदूरों को करना चाहिए, वे हम लोग करें, क्योंकि बँधुआ इस तरह की हिम्मत जुटा नहीं पाते थे। श्रीराम, उनकी टुकड़ी के चरण भैया, सोराजी और मोहन लाल मजदूरों को सिखाने की कोशिश करते। उनसे संपर्क साधते, बात−चीत छेड़ते और समझाते कि उनकी भलाई मार खाने में नहीं, अत्याचार का मुकाबला करने में है। इसी तरह उनकी आत्मा मजबूत होगी। कुछ मजदूर तो इन शिक्षाओं से प्रेरित होकर काम भी छोड़ गए। उन लोगों ने नए बसेरों में नई जिंदगी शुरू की। (क्रमशः)
सरिता भाग रही थी सागर से मिलने के लिए। मार्ग में रेगिस्तान का बीहड़ पड़ता था। मरुस्थल की रेत सरिता को सोखे डाल रही थी। थोड़ी दूर जाकर वह मात्र गीली रेत हो गई। सपना टूटकर चकनाचूर हो गया। उद्गम स्रोत से वह जल लेकर पुनः तीव्र वेग से चल पड़ी, पर फिर उसकी वैसी ही दुर्गति हुई। ऐसा अनेक बार हुआ झुँझलाकर , निराश होकर उसने रेत से पूछा, “क्या सागर से मिलने का मेरा सपना कभी पूरा नहीं होगा?” रेत ने कहा, “मरुस्थल को पार करके जाना, तो संभव नहीं है, पर तू अपनी संपदा बादलों को सौंप दे। वे तुझे सागर तक पहुँचा देंगे।” अपने अस्तित्व को मिटाकर अद्भुत समर्पण का उससे साहस बन नहीं पा रहा था, पर रेत का परामर्श उसे सारगर्भित जान पड़ा। श्रद्धा ने समर्पण की प्रेरणा दी। बादलों पर बूँदों के रूप में सवार होकर वह अपने प्रियतम सागर में जा मिली।
सच्चा समर्पण हो तो भक्त का भगवान से मिलन कठिन नहीं होता, नदी की तरह सुगम बन जाता है।
(समापन किस्त)
श्री रामचंद्र सिंह (धर्मचक्र, जिला छपरा, बिहार निवासी) की अनुभूतियों की दूसरी कड़ी इसमें दी जा रही है। इसमें शाँतिकुँज के शुभारंभ के समय के वे प्रसंग हैं, जो अति महत्त्वपूर्ण हैं। इससे एक सेवक की भक्ति एवं गुरुसत्ता की अलौकिक विभूति का परिचय मिलता है। यह आत्मकथा उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत है।
मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि सन् 1968 से 1972 तक सतत सारे भारतवर्ष के कार्यक्रम में भ्रमण करते हुए भी किस तरह परमपूज्य गुरुदेव शाँतिकुँज आने का समय निकाल लेते थे। मेरे कार्य संबंधी मार्गदर्शन हेतु वे क्षेत्र में जहाँ भी होते, वहाँ से मुझे पत्र भेजते रहते थे। हर पत्र में स्पष्ट निर्देश होता था कि अमुक तारीख को वे किस स्थान पर होंगे, अमुक पते पर निर्माण− कार्य की प्रगति की सूचना भेजने के निर्देश मिल जाते थे। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह होती थी कि हर पत्र के नीचे लिखा होता था, अपने पड़ोसियों से अच्छे संबंध बनाकर रखना।
एक बार गुरुदेव आए तो मैंने बताया कि इन दिनों महात्मा आनंद स्वामी आए हुए हैं। गुरुदेव भगवान मुझे साथ लेकर उनसे मिलने गए। खूब चर्चा व सत्संग, परस्पर विनोद आदि का क्रम चलता रहा। दो महापुरुषों के मिलन व पारस्परिक चर्चा के गहन प्रसंग आज भी मस्तिष्कपटल पर हैं। इस तरह और भी कोई महात्मा आते तो उनसे मिलने जाना होता था। मैं भी साथ रहता था।
परमपूज्य गुरुदेव जिससे भी मिलते, अपनी सज्जनता, सद्व्यवहार व विनम्रता की छाप उस पर छोड़ते थे। प्रारंभिक दिनों में जब नीचे के कमरे बिहारीलाल जी की देख−रेख में बन गए तो उनमें बिजली लेने की बात आई। गुरुदेव मुझे साथ लेकर कैलाशनगर के ठेकेदार के पास गए। उसे अभिवादन किया। वह 22 वर्ष का एक युवा था। बातचीत से इतना प्रभावित हुआ कि स्वयं मुझे साथ लेकर रुड़की अगले दिन गया, लाइन मंजूर हो गई व शाँतिकुँज में पहली बार बिजली आ गई। सन् 1970 की बात है। कैसा भी कठिन कार्य क्यों न हो, बिना किसी व्यवधान के वह आसानी से संपन्न हो जाता था। भगवान श्री के अगस्त 1968 में इस भूमि पर पदार्पण होते ही ज्वालापुर से सप्तसरोवर तक एक सिटी बस आरंभ हो गई थी। यह उनकी कृपा ही थी कि इससे इस क्षेत्र को अत्यधिक राहत मिली थी। इससे पूर्व आवागमन के साधन साइकिल या रिक्शा−ताँगा इत्यादि ही थे। सितंबर, 1969 से पूर्व हमें गंगाजल के लिए काफी दूर दो−ढाई किमी0 की दूरी पार कर जाना होता था। इसी माह गंगा में बाढ़ आई। सप्तसरोवर क्षेत्र में बड़े समीप से एक धारा बहने लगी। बाद में सरकार ने बाँध बना दिया व बड़े व्यवस्थित घाट बन गए। यह मानों उनकी अहैतुकी कृपा ही थी कि साक्षात् गंगा समीप से बहने लगी व बाद में सप्तसरोवर की मुख्य धारा यह बन गई। वैसे वे शाँतिकुँज को भी गंगा में बसा कहते थे। जब भी खुदाई होती, शालिग्राम समान पत्थर निकलते। यहाँ पानी मात्र डेढ़ फीट गहराई पर ही उपलब्ध था एवं गंगा जितना ही मीठा व बढ़िया जल था।
1972 में परमपूज्य गुरुदेव का बिहार का अंतिम यज्ञ कार्यक्रम (विदाई से पूर्व) ‘अखण्ड ज्योति) में प्रकाशित हुआ। मैंने अपने गाँव के लिए भी निवेदन किया था, पर उसका कहीं उल्लेख नहीं था। अपने छोटे−से गाँव में प्रयत्न−परिश्रम करके मेरी अनुपस्थिति में भी गाँव वालों ने मंदिर का निर्माण कर ही लिया था। पूर्णिमा से बक्सर के बीच मेरा गाँव यदुरामपुर (धर्मचक) पड़ता था। घंटाभर रुककर मेरे भगवान मेरे मंदिर में भी अपने करकमलों से प्राण−प्रतिष्ठा करे देते, यही मेरा मन बार−बार कह रहा था। मैं हरिद्वार से चलकर तुलसीपुर, गोंडा, जहाँ कार्यक्रम संपन्न हो रहा था, पहुँचा। पूज्यश्री ने हरिद्वार के समाचार पूछे, निर्माण−कार्य की गति पूछी एवं अकस्मात् आने की वजह जानी। मेरा निवेदन सुनते ही भगवान बोले, “रामचंद्र, अखण्ड ज्योति में क्या छपा है, उसे अलग रख दो। तुम्हारे गाँव की प्राण−प्रतिष्ठा हेतु हमने पहले ही तीन दिन का कार्यक्रम दे दिया है। तुम तीन वर्षों से हमारे सपने को पूरा करने में लगे हो। शाँतिकुँज की आधारशिला रख रहे हो।
क्या हम तुम्हारे लिए तीन दिन भी नहीं देंगे! तुम्हारे गाँव ही रहेंगे। तुम यज्ञ की चिंता मत करना। यज्ञ की तैयारी के लिए हमने रमेशचंद्र शुक्ला को पहले ही भेज दिया है। मूर्ति भी जयपुर से मँगवा ली है। अब तुम वापस जाओ।” मैं भावविभोर हो सब कुछ सुनता रहा। उनके श्रीचरणों को अपने अश्रुओं से धोकर मैं तत्काल वापस शाँतिकुँज आया। कार्य का फेर बनाया एवं यज्ञ की तिथि से दस दिन पूर्व अपने गाँव पहुँच गया।
गाँव में मेरा घर कच्चा खपरैल का बना है। उसमें शौचालय भी नहीं था। दूर खेत में जाना पड़ता था। गाँव के एक व्यक्ति ने पक्का मकान बनवाया था, जिसमें 7-9 कमरे, शौचालय व स्नानघर भगवान के ठहरने की व्यवस्था की। भगवान पधारे। भोजन हेतु मैं उन्हें अपने घर ले गया, उनने भोजन किया, कुछ देर विश्राम किया, फिर मंदिर आकर विधिवत् मूर्ति की प्राण−प्रतिष्ठा की। हजारों की भीड़ जमा हो गई। आस−पास के गाँवों के भी हजारों व्यक्ति मौजूद थे। सबने शाँतिपूर्वक प्रवचन सुना।
प्रवचन समापन के बाद रात्रि में गुरुदेव बोले, यदि तुम्हारे परिवार को कोई असुविधा न हो, तो रात्रि में हम तुम्हारे यहाँ ही सोना चाहते हैं। मैंने विनय−निवेदन किया कि प्रभु, कच्चा मकान है। शौचालय, स्नानघर की भी व्यवस्था नहीं है, इसलिए आपके विश्राम हेतु हम सबने मिलकर पक्के मकान में व्यवस्था की है, ताकि आपको कोई असुविधा न हो। गुरुदेव फिर भी न माने। रमेशचंद्र शुक्ला जी से कहा, उठाओ बिस्तर व चलो रामचंद्र के यहाँ। तुम यहाँ सोना, हम वहाँ रहेंगे। गुरुदेव श्री मेरे घर, मेरी कुटिया में पधारे। चारपाई पर बिस्तर लगा था। उनके श्रीचरण खटिया से बाहर निकल रहे थे। सुबह लगभग साढ़े तीन बजे लालटेन लेकर शौच हेतु खेत में गए। आकर आँगन में गरम पानी से स्नान किया। फिर दरवाजा बंद करके अपनी पूजा−उपासना में लग गए। सवेरे छह बजे परिवार के सभी सदस्यों को बुलाकर उनके दुःख−दर्द का हाल पूछा। सभी को आशीर्वाद प्रदान किया।
यह कार्यक्रम 24, 25, 26 जनवरी, 1972 को संपन्न हुआ। बिहार प्राँतभर के प्रायः पंद्रह हजार गायत्री परिजनों ने इस आयोजन में भागीदारी की। हजारों व्यक्तियों की पीड़ा−दुःख निवारण किया, जो मैंने अपनी आँखों से देखा। तीसरे दिन पूर्णाहुति के बाद गुरुदेवश्री ने अपने कर−कमलों से कुछ जगह छोड़कर एक कन्या विद्यालय का शिलान्यास किया और मेरी लड़की उर्मिला से कहा कि जैसे राजस्थान में श्री हीरालाल शास्त्री ने पेड़ की छाया में पाँच लड़कियों से पढ़ाना आरंभ किया था, वैसे ही यह विद्यालय तुम्हें ही चलाना है। हम जो भी कार्य आरंभ करते हैं, वह विशाल बन जाता है। ऋषियों की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती। मेरी लड़की उर्मिला सात वर्ष तक शाँतिकुँज में वंदनीया माताजी के प्रशिक्षण में रही। पाँच लड़कियों से उसने उस ग्रामीण संकुल में पढ़ाना आरंभ किया। आज इस स्कूल में, जिसका नाम ‘श्रीराम कन्या विद्यालय’ रखा गया है, लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा लड़कियाँ पढ़ती हैं। तीन शिक्षिकाएँ स्थायी रूप से कार्यरत हैं। बाद में 18 अप्रैल, 1982 को गाँव में एक दीपयज्ञ हुआ और एक कन्या महाविद्यालय बनाने का संकल्प लिया गया। परमवंदनीय माताजी ने संस्कारित शिलाएँ महाविद्यालय भवन के निर्माण हेतु आशीर्वादस्वरूप भेजीं।
परमपूज्य गुरुदेव के मेरे गाँव आगमन, वह भी तब, जबकि विदाई की पूर्व वेला में उनका एक−एक दिन बड़ा महत्वपूर्ण था एवं तीन दिन वहाँ निवास ने मुझे कृतकृत्य कर दिया। मेरे प्रति कितना प्रेम है, इसका एहसास करा दिया। एक प्रकार से ऋण से भी लाद दिया।
जैसे ही मैंने विदाई समारोह (16 से 20 जून, 1972) के समाचार सुने, मेरा भी मन करने लगा कि मैं भी इसमें सम्मिलित होऊँ। मैंने भी आने संबंधी पत्र लिखा। तत्काल उत्तर आया कि हनुमान ने भगवान राम के पहुँचने से पूर्व लंका में सारी व्यवस्था बना दी थी। तुम्हें वहाँ की सारी व्यवस्था हमारे आगमन के पूर्व करनी है, ताकि हमारे हिमालय प्रस्थान के बाद माताजी को कोई असुविधा न हो। पत्र पाकर कर्त्तव्य−बोध हुआ। मैं जी−जान से सारी तैयारियाँ करने में जुट गया। भगवान श्री का पत्र आया कि प्रयास करना कि हमारे आने से पूर्व टेलीफोन लग जाए। टेलीफोन इंस्पेक्टर का ऑफिस ऋषिकेश था। संयोग से वह ‘अखण्ड ज्योति’ पढ़ता था। तत्काल शाँतिकुँज आया। सर्वे किया व एक नियम शुल्क जमा कराने को कहा। काम शुरू हो गया व ऋषियुग्म के आने के पूर्व ही फोन लग गया। इसे मैं उनकी अनुकंपा ही मानता हूँ कि सारी व्यवस्था हो गई, नहीं तो मैं अल्पशिक्षित यह सब कैसे कर पाता।
गुरुदेवश्री 20 जून को शाम आठ बजे माताजी व अखण्ड दीपक के साथ आए एवं दस दिन बाद सबको सोता छोड़ अज्ञातवास के लिए विदा हो गए। एक साल बाद वे हिमालय से लौटे। आते ही युगतीर्थ का विस्तार, कन्या प्रशिक्षण, प्राण− प्रत्यावर्तन, विदेशयात्रा एवं विभिन्न शिविरों के क्रम में लग गए। हिमालय से लौटकर उनने मत्स्यावतार का रूप धारण कर लिया। शाँतिकुँज, गायत्रीनगर, ब्रह्मवर्चस् बने एवं फिर हजारों शक्तिपीठ बनते चले गए। सभी इस लीला को जानते है, पर इस अवधि में मेरे साथ कुछ अलौकिक घटा। मैं ऐसी घटनाओं का साक्षी बना, जो बड़ी विलक्षण थीं।
मेरे एक मित्र दमा से पीड़ित थे। उनके बारे में बताया तो गुरुदेवश्री ने कहा, तुम उन्हें पत्र लिखों कि वे तुलसी का काढ़ा पिएँ। वैसे संभावना यही है कि तुम्हारा पत्र उनको मिले, इसके पूर्व ही वे ठीक हो जाएँ। ऐसा ही हुआ। बाद में हमारे मित्र रामउदार सिंह शाँतिकुँज आए, बोले, स्वप्न में गुरुदेव के दर्शन हुए। उनने छाती पर हाथ फेरकर कहा, तुम्हारी दवा ‘अखण्ड ज्योति’ है। उसे नित्य पढ़ते रहो। उसी दिन से सुधार आरंभ हो गया। अब हम पूर्णतः स्वस्थ हैं। 1976-77 की बात है। पटना से एक इंजीनियर बाबू श्री सत्यतन सिंह जी आए। उनने मुझसे कहा, सीढ़ियों के पास जो शौचालय-कमरा बना है, उसमें निर्माण संबंधी दोष है, जिसमें सुधार जरूरी है। मैंने गुरुदेव भगवान को यह बात बताई। इंजीनियर साहब को बुलाकर उनने चर्चा की। शिविर के बाद उनसे रुकने व नुक्स ठीक करने को कहा। मजदूर लगाकर दुरुस्ती करवा दी गई। इंजीनियर साहब बोले, मेरा पाँच वर्ष का पोता था। बिच्छू के डंक से उसकी तत्काल मृत्यु हो गई। मेरी पत्नी तथा सभी परिवारीजन इससे दुखी है। तीन लड़कियाँ है, पर लड़का एक ही था। गुरुदेव ने कहा कि यदि बच्चे की आत्मा ने कहीं और जन्म न लिया होगा तो उसी को आपके घर में लौटा देंगे।
इंजीनियर साहब का परिवार लौट गया। वे यहीं रह गए, निर्माण -कार्य देखते रहे। ठीक दस माह बाद पटना से इंजीनियर साहब का पत्र आया कि उसी शक्ल-सूरत का लड़का हुआ है। इंजीनियर साहब ने गुरुदेव के चरण पकड़ लिए। कुछ दिनों बाद परिवार के सभी सदस्य नन्हें शिशु को लेकर आए व आशीर्वाद दिलाकर ले गए। मैं कितना लिखूँ, कितना कहूँ। गुरुदेव भगवान एवं शक्ति का अवतार माताजी के मैंने इतने चमत्कार देखे हैं कि एक पूरा ग्रंथ बन सकता है। सब घटनाओं का मैं स्वयं साक्षी हूँ। यह जानता हूँ कि पात्रता के आधार पर अनुदान बँटता था, फिर वे उस व्यक्ति से काम भी गायत्री के प्रचार-प्रसार का करा लेते थे। ऐसी गुरुसत्ता से मैं जुड़ा, इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ।
संगीतकार गाल्फर्ड के पास उसकी एक शिष्या अपने मन की व्यथा कहने गई कि वह कुरूप होगे के कारण संगीत मंच पर जाते ही यह सोचने लगती है कि दूसरी आकर्षक लड़कियों की तुलना में उसे दर्शक नापसंद करेंगे और हँसी उड़ाएंगे। यह विचार आते ही वह सकपका जाती है और गाने की जो तैयारी घर से करके ले जाती है, वह सब गड़बड़ा जाती है। घर पर वह मधुर गाती है, इतना मधुर, जिसकी हर कोई प्रशंसा करे, पर मंच पर जाते ही न जाने उसे क्या हो जाता है कि हक्का-बक्का होकर वह अपनी सारी प्रतिभा गँवा बैठती है। गाल्फर्ड से उसे एक बड़े शीशे के सामने खड़े होकर अपनी छवि देखते हुए गाने की सलाह दी और कहा, वस्तुतः वह कुरूप नहीं, जैसी कि उसकी मान्यता है। फिर स्वर की मधुरता और कुरूपता का कोई विशेष संबंध नहीं है जब वह भाव-विभोर होकर गाता है, तब उसका आकर्षण बहुत बढ़ जाता है और उसमें कुरूपता की बात कोई सोच भी नहीं सकता। व अपने मन में से हीनता की भावना को निकाल दे। सुँदरता के अभाव को ही न सोचती रहे, वरन् स्वर की मधुरता और भाव विभोर होने की मुद्रा से उत्पन्न आकर्षण पर विचार करे और अपना आत्मविश्वास जगाए।
लड़की ने यही किया और आरंभिक दिनों में जो सदा सकपकाई हुई रहती थी और कुछ आयोजनों में जाने के बाद एक प्रकार से हताश ही हो गई थी, अब क्या साहस और उत्साह इकट्ठा करने पर उसने बहुत प्रगति की और फ्राँस की प्रख्यात गायिका मेरी बुडनाल्ड के नाम से विख्यात हुई।
वासंती उल्लास हमारी सक्रियता बढ़ाए, कुहासे को मिटाए
इस वर्ष छह फरवरी को वसंत पर्व है। इस पत्रिका के पहुँचने तक चारों ओर वासंतीय उल्लास भरा वातावरण छा रहा होगा। अपने अखिल विश्व गायत्री परिवार का यह सबसे बड़ा त्योहार है। परमपूज्य गुरुदेव का यह आध्यात्मिक जन्मदिवस (बोध दिवस) भी है। इसी से हमारे नववर्ष की शुरुआत होती है। 1926 का वसंत पर्व परमपूज्य गुरुदेव के जीवन में उनके सूक्ष्मशरीरधारी गुरु से साक्षात्कार का दिवस था। 18 जनवरी, 1926 वह ऐतिहासिक तारीख है, जहाँ से जमाने को बदलने का संकल्प उभरा एवं वह जन−जन तक फैलता चला गया। आज दस करोड़ उत्साही प्राणवान परिजन उसके साक्षी हैं।
वसंत हेमंत की ठिठुरन के पलायन एवं सुखद उमंगों का संचार करने वाली हलकी सी गरमाहट के स्पंदनों के आगमन का प्रतीक पर्व भी है। ठंडक में चारों ओर घना कुहासा छा जाता है, कहीं पाला गिरता है, कहीं लोग दुबके हाथ सेंकते दिखाई देते हैं। थोड़ी−सी तेज सूरज की धूप भी सुखद लगती है। जैसे जैसे बसंत () आता है, वह प्रकृति पर भी छा जाता है, सूक्ष्म जगत पर भी, प्राणी जगत पर भी एवं जन जन के मन में नूतन उत्साह हिलोरें लेने लगता है। वसंत कड़कड़ाती ठंडक को तो भगाता ही है, उस कुहासे को भी मिटाता है, जो चारों और संव्याप्त नजर आता था। आज दृश्य कुहासे के बारे में नहीं कहता, जो जन-जन के चिंतन पर छाता चला जा रहा है। बाहर का वसंत आ भी जाए व अपने मन-मस्तिष्क पर छाया अंदर का कुहासा यथावत् रहे, भ्राँतियाँ वैसी की वैसी ही बनी रहें, तो क्या लाभ! इसीलिए इस वसंत पर्व पर यह संकल्प भी लेना है कि गुरुसत्ता की तरह अपने अंदर से भी वासंती उल्लास उमंग भरी सक्रियता फूट-फूटकर निकलेगी। हर परिजन स्वयं को और अधिक सक्रिय एवं स्फूर्तिवान बनाएँगे। आशावादी चिंतन लेकर कुछ नया कर दिखाने हेतु तत्पर होंगे।
वसंत पर्व ज्ञान की देवी भगवती सरस्वती का जन्मदिवस भी है। सृष्टि के आदिकाल में मनुष्य को इसी शुभ अवसर पर विद्या बुद्धि का, ज्ञान संवेदना का अनुदान प्राप्त हुआ था। मनुष्य अन्य प्राणियों से भिन्न है। उसे सोद्देश्य चिंतन का वरदान मिला है। इस धरती पर जो शोभा-सौंदर्य भरा व्यवस्था−क्रम चल रहा है, उसमें मानवी बुद्धि-वैभव का योगदान कुछ कम नहीं है। विश्व-वसुधा की शोभा-गरिमा में भगवती सरस्वती के ही अनुग्रह ने चार चाँद लगाए है। मनुष्य को सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में जो गौरव मिला है, उसके पीछे भगवती वीणा-पाणि की अनुकंपा ही झाँक रही है।
ज्ञान के अवतरण ने ही इस वसंत पर्व नामक त्योहार को अतिपावन बना दिया। नरपशु में विभूतिवान मानव का उदय जिस माँ सरस्वती के अनुग्रह से हुआ, वह निश्चित ही बड़ा सौभाग्य भरा दिन है ज्ञान ही वह निधि है, जो मानव के साथ जन्म-जन्माँतरों तक की यात्रा करती है। शेष सब यहीं रह जाता है। सृष्टि के आदि में अनगढ़ मनुष्य इसी ज्ञान (विद्या) के आधार पर बुद्धि को और कला के आधार पर भावनाओं को समुन्नत बनाने हेतु तत्पर हुआ था। अब तक वही क्रम निरंतर क्रमिक विधि-व्यवस्था के साथ बढ़ता चला आ रहा है। इन चेतनात्मक उपलब्धियों के बिना मनुष्य न तो कुछ बन सकता था और न भविष्य में कुछ बन सकता है। वसंत पर्व को इसीलिए विशिष्ट गौरव के साथ मनाया जाता है। संपत्तिवान दीपावली को, शक्तिवान विजयादशमी को, विनोदी होली को, तपस्वी श्रावणी को एवं छात्र-शिष्य गुरुपूर्णिमा को अधिक मान देते है, पर जिन्हें विद्या और कला की गरिमा का ज्ञान है, वे सभी सरस्वती पूजन को इनसे भी बड़ा महत्त्व देते है। विज्ञ-समाज में इसे प्रमुखता इसीलिए दी गई है।
अपने मिशन का जन्मदिन भी होने के कारण युगनिर्माण परिवार के लिए यह दुहरी प्रेरणा का पर्व हो गया है। हम इस सभी संजीवनी विद्या, जीवन कला के उपासक−आराधक हैं, साथ ही प्रबुद्ध वर्ग की उस श्रेणी में आते हैं, जिसमें विवेकबुद्धि और सद्भाव−संवेदनाओं को सर्वोपरि माना जाता है। उपयुक्त अवसर पर उपयुक्त कार्य करने के निर्णय जिस आधार पर किए जाते हैं, उसी आधार पर युगपरिवर्तन का ब्राह्ममुहूर्त भी किसी उपयुक्त घड़ी में ही किया जाना उपयुक्त माना जाना चाहिए। युगसंध्या का मंगलाचरण यदि वसंत पर्व को हुआ तो इसे सुवर्ण−सुयोग ही कहा जाना चाहिए।
इसी दिन से पंद्रह वर्ष की आयु में परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी चौबीस वर्षों में संपन्न होने वाली उग्र गायत्री तपश्चर्या आरंभ की। एकनिष्ठ भाव से वे समग्र श्रद्धा नियोजित कर उसी प्रकार तत्पर रहे, जिस प्रकार कि गंगावतरण का लक्ष्य लेकर भगीरथ ने कठोर तप−साधना की अग्नि में प्रवेश किया। प्रायः सत्ताईस वर्ष में यह कठोर साधना, जिसमें चौबीस−चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण किए गए, संपन्न हुई। तीन वर्ष अतिरिक्त इसलिए लगे कि बीच में उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लेना पड़ा। जप−तप तो वहाँ भी चलता रहा, पर नियमानुसार एक आसन पर बैठे जप को पूर्ण मानकर उनने तीन वर्ष अतिरिक्त साधना की। यह प्रयास सोने को अग्नि में तपाकर निर्मल और तेजस्वी बनाने जैसा ही था। इसी के आधार पर उन्हें महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ, प्रतिभाएँ, विभूतियाँ एवं ऋद्धि−सिद्धियां प्राप्त हो सकीं। युगपरिवर्तन की प्रचंड धाराएँ इसी आधार पर द्रुतगति से प्रवाहित हो सकीं।
ज्ञान के अवतरण के इस पावन वसंत पर्व पर हमेशा पूज्यवर अपनी आगामी एक वर्ष की योजनाएँ बनाते रहे हैं। इस दिन वे अपने ऊपर ही नहीं, सभी उनको मानने वाले साधकों पर दिव्य प्रेरणा की प्रकाश किरणों का अवतरण होना स्वीकार करते रहे हैं। यह एक प्रकार से हर युगनिर्माण मिशन के सदस्य के उसका एक अंग होने के नाते अपनी दिव्य चेतना की स्फुरणा का भी जन्मदिन बन जाता है। इस दृष्टि से वसंत पर्व मनाना अपने उज्ज्वल भविष्य की संभावना का ही एक प्रकार से वार्षिक अभिनंदन−अभिवंदन है। इस अवसर पर हमें अपनी मुख्य अभिव्यक्तियों को अवरुद्ध न कर उन्हें ऊँचा उठाने व आगे बढ़ाने के लिए उत्साह भरे प्रयास अधिकाधिक करने चाहिए। सीप की तरह यदि हम तनिक भी मुँह खोल सके तो इन दिनों झर रही अनुदानों रूपी स्वाति बूँदें अगणित मात्रा में उसमें गिर सकती हैं व कई मोती गर्भ में आ सकते हैं।
साधना−संगठन−सशक्तीकरण का यह उत्तरार्द्ध वाला वर्ष तो है ही, विद्या−विस्तार का भी वर्ष है यह। इस पावन दिन हम सभी आत्मचिंतन करें कि कितनी कुछ ‘साधना’ अपनी विगत एक वर्ष में जीवन में निखर पाई। हमारी उपासना जो वैयक्तिक हुआ करती थी, क्या जीवनसाधना में बदली एवं यदि बदली तो क्या हमने व औरों ने उसकी अनुभूति की? यही जीवनसाधना जब सामूहिक स्तर पर होती है एवं विराट् ब्राह्मीसत्ता की सेवा−साधना में नियोजित होती है तो आराधना बन जाती है। संगठन इसी आधार पर सशक्त एवं परिणाम देने वाले बनते चले जाते हैं।
2003 का यह पूरा वर्ष हमारी जीवनसाधना को और अधिक निखारने एवं संगठन को सशक्त बनाने हेतु नियोजित होना चाहिए। गंगा निरंतर बहती रहती है। सृष्टि के सारे क्रियाकलाप चलते रहते हैं। रुटीन तो स्वतः ही निभता चला जाता है। नौकरी करने वाले, व्यवसाय करने वाले पहले की तरह इस वर्ष भी उसी कार्य को करेंगे व पदोन्नति, अधिक धनराशि या व्यवसाय में सफलता की कामना करेंगे। पर हम सभी, संभव है हममें से कई नौकरी−पेशा व व्यवसायी भी हों, सबसे अलग हैं। हमें यह चिंतन करना है कि क्या हम साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण, कुरीति उन्मूलन, व्यसन मुक्ति तथा नारी जागरण अभियान रूपी सप्त आँदोलनों की दिशा में क्या कुछ गति पकड़ पाए? यदि नहीं, तो हमें किन्हीं भी दो आँदोलनों को इस वर्ष प्रमुखता देकर साधना की धुरी पर गतिशील कर देना है। 2004 के वसंत पर्व पर जब हम आत्मावलोकन करें तो अमुक दो आँदोलनों में स्वयं की गति परिपूर्ण, संतोषदायी मानें। फिर इसी तरह 2004 के पूरे वर्ष व 2005 के पूरे वर्ष में हम दो−दो आँदोलन हाथ में लेकर सप्ताँदोलनों को पूर्णता तक पहुँचा सकते हैं।
संगठन की दृष्टि से पूरे भारत को सात जोनों में बाँटा गया है। पश्चिमोत्तर, पूर्वोत्तर, तराई क्षेत्र एवं नेपाल राष्ट्र, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, दक्षिण भारत (चारों प्राँत + महाराष्ट्र) एवं मध्य जोन। इनके सघन दौरे व मंथन का प्रथम दौर समाप्त हो गया है। अब प्रत्येक जोन के मुख्यालयों पर, उपकेंद्रों पर केंद्र के प्रतिनिधिगणों व क्षेत्र के समयदानियों के बैठने का क्रम आरंभ होने जा रहा है। यहाँ प्रशिक्षण का क्रम चलेगा, जिसमें संगठन−सशक्तीकरण कार्यशालाएँ चलेंगी। ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स (शिक्षकों का प्रशिक्षण) यहीं होगा। समयदान का क्षेत्रीय नियोजन भी यहीं होगा। आज के वैज्ञानिक युग की तकनीकी का लाभ, लेकर सभी जोनल केंद्रों व केंद्र के बीच सीधे कंप्यूटर, इंटरनेट, सेटेलाइट लिंक से जुड़ने की व्यवस्था बनेगी, ताकि संगठन सुचारु रूप से चल सके व समय पर युगानुकूल मार्गदर्शन किया जा सके।
प्रस्तुत वसंत इन सभी निर्धारणों के साथ−साथ परमपूज्य गुरुदेव के साहित्य, उनकी प्राणचेतना की संवाहक पत्रिकाओं (अखण्ड ज्योति हिंदी व अन्य भाषाएँ, युगनिर्माण योजना, युगशक्ति गायत्री, प्रज्ञा पाक्षिक) को जन−जन तक पहुँचाने के संकल्प को भी लेकर आया है। जितना अधिक युगसाहित्य घर−परिवारों तक, विद्यालयों व अन्य संगठनों के बीच पहुँचेगा, उतना ही मिशन का विस्तार होगा। प्रस्तुत वसंत आत्मबोध एवं आत्मोत्कर्ष के लिए अधिक गहन चिंतन−मनन, अपने स्तर पर अपने यहाँ छोटा दीपयज्ञपरक आयोजन, संगठन−सशक्तीकरण की दिशा में आत्ममंथन एवं विद्याविस्तार के निमित्त हमारे सुनिश्चित संकल्प, इन चारों को पूरा करने के निमित्त मनाया जाए, तो ही हमारी गुरुसत्ता के प्रति समर्पण की सार्थकता है।
अंग्रेजी की ‘अखण्ड ज्योति’ इस वसंत से आरंभ
इंग्लिश भाषा में बड़े दिनों से स्तरीय ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका की माँग थी। अब इसे शाँतिकुँज हरिद्वार से संपादित कर ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा से इसी वर्ष द्वैमासिक (बायमंथली) पत्रिका के रूप में इस वसंत से आरंभ किया जा रहा है। प्रारंभ में इसे फरवरी, अप्रैल, जून, अगस्त, अक्टूबर व दिसंबर इस तरह छह अंकों के रूप में प्रतिवर्ष निकाला जाएगा। परिपूर्ण व्यवस्था बन जाने पर यह मासिक आवृत्ति के रूप में भी निकल सकेगी। इसका चंदा साठ रुपये वार्षिक भारत में एवं 600 रुपये प्रतिवर्ष विदेश में रखा गया है। बावन ग्लेज पृष्ठो में सुँदर गेटअप के साथ यह पंद्रह दिन पूर्व मिल जाए, ऐसी व्यवस्था की जा रही है। मुख्य संपादक अखण्ड ज्योति ‘हिंदी’ के संपादक डॉक्टर प्रणव पंड्या ही रहेंगे, संपादक श्री शंभूदास जी होंगे। लेख संबंधी जिज्ञासाएँ शाँतिकुँज, हरिद्वार लिख भेजें। चंदा अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा भेजे। वहीं से पत्रिका प्रकाशित होगी। चंदे संबंधी सारा पत्राचार मथुरा से ही करें।
महाकाल रथयात्रा
मकरसंक्रांति (14.1.2003) से आरंभ हुई महाकाल की रथयात्रा अब बदले रूट के अनुसार निर्धारित समय से पूर्व ही 13.2.03 की सायं हरिद्वार पहुँचेगी। इसकी प्राण—प्रतिष्ठा 1 मार्च महाशिवरात्रि के दिन प्रातः देवसंस्कृति विश्वविद्यालय परिसर में की जाएगी। हर स्थान पर प्रातः ध्यान−प्रार्थना−पूजन आदि के बाद यज्ञ होगा। फिर अपनी यात्रा पर यह आगे चल देगी। शाम को प्रदर्शनी अवलोकन, महाकाल पूजन एवं उसके बाद संगीत के साथ उद्बोधन होगा। रात्रि को रथयात्रा वहीं रुकेंगी। हर स्थान पर यह रुटीन होगा। प्रायः पाँच वाहन इस रथयात्रा के साथ चल रहे हैं। इसका बदला हुआ रूट इस प्रकार है—नासिक (14.1.03), चाँदबड़, धुले, शिरपुर, सेंधवा, धामनोद, इंदौर, उज्जैन, देवास, शाजापुर, राजगढ़, कुँभराज, गुना, शिवपुरी, झाँसी, डबरा, ग्वालियर, मुरैना, धौलपुर, आगरा, आँवलखेड़ा, मथुरा, फरीदाबाद, नोयडा, गाजियाबाद, मोदीनगर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, हरिद्वार। इंदौर, उज्जैन, आगरा एवं मथुरा यात्रा दो दिन रुकेगी। शेष स्थान पर एक दिन । परिजन अपने−अपने स्थानों पर इस यात्रा का प्रसन्नतापूर्वक स्वागत करें।
भावी अंतःजागरण सत्र
अंतः ऊर्जा जागरण सत्र अभी फरवरी व मार्च, 2003 के दो महा में और संपन्न होंगे। फरवरी माह में बदली तारीखों में से सत्र होंगे, क्योंकि प्रथम सप्ताह में वसंत पर्व आ रहा है। फरवरी, 2003 के सत्र इस प्रकार हैं—1 से 13, 14 से 18, 19 से 23 तथा 24 से 28। इस प्रकार फरवरी में कुछ चार सत्र हैं। मार्च, 2003 में 1 से 5, 6 से 10, 11 से 15, 16 से 20, 21 से 25 तथा 26 से 30 की तारीखों में कुल छह सत्र संपन्न होंगे। इसके तुरंत बाद नवरात्रि हैं। इसके बाद के सत्र अभी निर्धारित होते हैं। ग्रीष्मावकाश के कारण ये सत्र अब अगस्त से ही आरंभ होंगे। आवेदकों को प्रत्येक सत्र के एक दिन पूर्व दोपहर 13 बजे तक पहुँच जाना चाहिए। अनुशासन आदि समझकर अपनी साधना विधि की सारी सामग्री लेकर उन्हें अपने आवंटित कक्ष में संध्या से पूर्व ही पहुँचना होता है। वे ही आवेदक आएँ, जिन्हें स्वीकृति यहाँ से मिल चुकी हो। साधना काल के नियम बहुत कड़े हैं। प्रत्येक साधक को पाँच दिन तक एक ही साधना कक्ष में अकेले मौन रहकर निर्धारित साधना करनी होती है। अतः जिन्हें साधना का अनुभव हो व शरीर मन से स्वस्थ हों, वे ही आवेदन करें। नियमावली पत्र भेजकर या किन्हीं के हाथों मँगवा लें। एक बार सत्र संपन्न कर चुके परिजन दोबारा आवेदन न करें।
गुरुवर! ऐसी शक्ति हमें दो, सच्चे शिष्य कहाएँ हम, नवयुग के इस नए सृजन में, सहयोगी बन जाएं हम।
हमने किया प्रचार अभी तक, नगर−गाँव−गलियारों में, यज्ञ और गायत्री पहुँचे, घर−आँगन−चौबारों में, यह था पहला चरण, बंदिनी माँ पहुँची संतानों तक, ऐसी दो सामर्थ्य कि पहुँचें हम अगले सोपानों तक,
महाकाल के महाकार्य के उपयोगी बन जाएँ हम। गुरुवर! ऐसी शक्ति हमें दो, सच्चे शिष्य कहाएँ हम।
ऐसी देना दृष्टि, न पल भर लक्ष्य आँख से ओझल हो, हर सूखी धरती पर झरता भावों का गंगाजल हो, ऐसी देना शक्ति कि साहस कभी नहीं चुकने पाए, देख विघ्न−अवरोध, पाँव की गति न कभी रुकने पाए,
कहीं सघन−शीतल अमराई देख, नहीं ललचाएँ हम। गुरुवर! ऐसी शक्ति हमें दो, सच्चे शिष्य कहाएँ हम।
ऐसा भरना भाव कि जग का मन कृतज्ञ बनता जाए, सारा जीवन बने साधना, कर्म यज्ञ बनता जाए, हम पदार्थ की आहुति से, सुख की आहुति देना सीखें, हम समाज के अगणित मनकों में हीरे जैसे दीखें,
प्रभु की अनुकंपा से सागर पर पत्थर तैराएँ हम। गुरुवर! ऐसी शक्ति हमें दो, सच्चे शिष्य कहाएँ हम।
गायत्री की शरणागति से कायाकल्प हमारा हो, मन का मंगलमय विचार अब, दृढ़ संकल्प हमारा हो, रोम−रोम में, मन−प्राणों में उसका तेज झलकता हो, वह चरित्र−चिंतन में बनकर स्वर्णिम सूर्य दमकता हो,
उसका सही स्वरूप मनुजता को साक्षात् दिखाएँ हम। गुरुवर! ऐसी शक्ति हमें दो, सच्चे शिष्य कहाएँ हम।
—शचीन्द्र भटनागर
*समाप्त*