नववर्ष की प्रार्थना

हम सबके परम पूज्य गुरुदेव! हम सबकी समवेत अभीप्साओं के चरम लक्ष्य!! हे सब वरदानों के परमदाता!!! नववर्ष की नयी सुबह का यह प्रथम क्षण आपको समर्पित है। हमारे भविष्य के स्वामी, अन्तर्यामी प्रभु! वर्ष 2003 में हम सबके जीवन को पवित्र, सुन्दर और शुभ बनाकर सार्थक कर दो।

आपकी तपश्चेतना का प्रखर सूर्य, जो नववर्ष के नीलगगन में उदित होकर अपनी प्रभा से धरती पर सुहाने प्रभात की सृष्टि कर रहा है, हममें से प्रत्येक के जीवन में उज्ज्वल भविष्य की सृष्टि भी करे। हे परम प्रेममय प्रभु! इस वर्ष 2003 में जो आपकी आशा करते हैं, वे सच्चे रास्ते से आपको खोजें। जो आपको खोजने में लगे हैं, वे इस वर्ष आपको प्राप्त करें। जो कष्ट भोग रहे हैं और नहीं जानते कि उपाय क्या है, वे इस साल अनुभव करें कि उनकी अन्धकारमय चेतना के ऊपरी कठोर भाग में आपकी शक्ति थोड़ा-थोड़ा प्रवेश कर रही है।

हे गुरुदेव! शान्त भाव से जलने वाली दीपशिखा की भाँति, बिना हिले-डुले सीधे ऊपर उठने वाले सुगन्धित यज्ञ धूम्र की भाँति, जो न तो तर्क-वितर्क करता है, न ही किसी तरह की चिन्ता करता है, पूर्ण रूप से सदा आप पर निर्भर रहें। जिससे हमारे जीवन में आपकी इच्छा पूरी हो, आपकी ज्योति प्रकट हो। आपकी शान्ति चारों ओर फैल जाए और आपका अलौकिक प्रेम हमारे सहित इस सम्पूर्ण जगत् को आच्छादित कर दे।

हे हमारे आराध्य! जब आप चाहेंगे, तभी हम आपको प्राप्त कर पाएँगे, आपके साथ एक हो सकेंगे। बिना किसी भेदभाव के आपमें विलीन हो जाएँगे। बिना किसी अधीरता के इस वर्ष उस शुभ घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम इन क्षणों में आपकी कृपा से यह अनुभव कर रहे हैं कि अबाध रूप से हमारी चेतना आपकी ओर उसी तरह से प्रवाहित हो रही है, जैसे कोई शान्त जलधारा समुद्र की ओर बढ़ती है। हमारे विचारों, हृदयगत भावों और कर्मों के सर्वोच्च स्वामी गुरुदेव! इस नववर्ष में हम सबके अज्ञान को दूर करो, हम सबके अन्तःकरण को प्रकाशित करो, हमारे हृदयों को अपने दिव्य प्रेम से परिपूरित करो। और हम जो आपके हैं, सदा के लिए आपके बन सकें।


इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता −चरित्र−निर्माण

मनुष्य सृष्टि का सबसे विचित्र एवं विलक्षण प्राणी है। उसका विरोधाभासी स्वरूप उच्चतर एवं निम्नतर प्रकृति का अद्भुत समुच्चय है। एक ओर जहाँ उसमें दिव्य सम्भावनाएँ भरी पड़ी हैं, वहीं दूसरी ओर पाशविक प्रवृत्तियों का बाहुल्य भी उसके अस्तित्व का एक कटु सत्य है। इसी आधार पर श्रीअरविन्द ने सामान्य मनुष्य को ‘मेण्टल एनीमल’ भी कहा है। ज्यादातर मनुष्य इसी सत्य को चरितार्थ करते हुए नर-कीटक, नरपशु एवं नर पिशाच स्तर का जीवन जीते हैं। वहीं कुछ समझदार एवं साहसी लोग अपनी प्रसुप्त दिव्यता को जगाने का प्रयास करते हैं और अपने देवस्वरूप को प्राप्त करने में सफल होते हैं। वस्तुतः यह चरित्र निर्माण की वह महान् प्रक्रिया है, जो उसे सृष्टि के अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ, ईश्वर के राजकुमार पद पर प्रतिष्ठित करती है। चरित्र निर्माण की इस प्रक्रिया में जहाँ व्यक्ति निर्माण का मर्म निहित है, वहीं समाज- संसार एवं विश्व के सुधार एवं निर्माण का सत्य भी इसमें विद्यमान है।

आज समाज एवं युग की अन्तहीन समस्याओं का मूल कारण चरित्र निर्माण के महान् कार्य की उपेक्षा ही है। मानव क्षणिक सुख-भोगों एवं क्षुद्र स्वार्थों की अंधी दौड़ में जीवन के इस सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य को भूला बैठा है। अतः बाह्य प्रगति के नये-नये प्रतिमानों को छूते हुए भी वह आन्तरिक अवगति, पतन एवं पराभव की पीड़ा से त्रस्त है, जो गम्भीर मनोरोगों से लेकर कलह, अशान्ति एवं गहन विषाद के रूप में उसके जीवन को दूभर किए हुए हैं। चरित्र निर्माण के अभाव में समाधान के ढेरों प्रयास जीवन के खाई-खंदकों को पाटने के असफल उपचार सिद्ध हो रहे हैं।

‘हाउ टू विल्ड केरेक्टर’ पुस्तक में स्वामी बुद्धानन्द लिखते हैं “आज हमें जिसकी सर्वोपरि आवश्यकता है, वह है- चरित्र निर्माण। इसको पूरा किये बिना हम चाहे जो करें,अस्तित्व के हर स्तर पर हमारी समस्याएँ बढ़ती ही जायेंगी। वैयक्तिक हो या पारिवारिक, राष्ट्रीय हो या अन्तर्राष्ट्रीय हर स्तर पर समस्याओं का अम्बार लगा रहेगा।” साथ ही वे कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि “ आज की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में समस्याओं के समाधान के ढेरों प्रयास करना, किन्तु चरित्र निर्माण के महत्त्वपूर्ण कार्य को उपेक्षित करना मनुष्य की विवेकशीलता एवं जीवन दृष्टि पर गम्भीर प्रश्नचिह्न लगा देता है।”

चरित्र का यूनानी पर्यायवाची शब्द ‘केरेक्टर’ है। इसका अर्थ है- जगत् में अपने अस्तित्व को उत्कीर्ण करना अर्थात् जगत् में अपना अमिट प्रभाव छोड़ना। वस्तुतः चरित्र का यह प्रभाव व्यक्तित्व के सार तत्त्व को प्रतिबिंबित करता है, जो कि इसकी समग्रता से निःसृत होता है। यह दिलो-दिमाग के स्वयं सिद्ध गुणों का वह समुच्चय है, जिसके द्वारा व्यक्ति जीवन के सत्यों एवं शक्तियों को नियंत्रित करता है तथा रचनात्मक ढंग से नियोजित करता है। इस तरह जीवन की पूर्णता के महान् पथ पर आगे बढ़ता है और दूसरों को भी इस कल्याणकारी मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

इस तरह चरित्र शांत एवं ससीम व्यक्ति द्वारा अपनी अनन्तता एवं असीमता को चरितार्थ करने की प्रक्रिया से उद्भूत एक अलौकिक शक्ति है। यह स्वप्रकाशित ज्योति है, जो सूर्य के न रहने पर भी अपने आलोक का वितरण करती रहती है। यह वह अजेय शक्ति है जिसके साथ हारता हुआ योद्धा भी विजयमाला का वरण करता है। चरित्र मनुष्य में जागृत वह दिव्यता है, जिसके समक्ष मूर्खों के अतिरिक्त अन्य सभी का सिर झुक जाता है। चरित्र ही वह सतत् उद्दीप्त उत्प्रेरणा है, जो बड़े से बड़े प्रलोभनों एवं झंझावातों के बीच भी प्रदीप्त रहती है। यही वह अनश्वर एवं अटल आधार है, जहाँ से जीवन के अविनश्वर सत्य का बोध होता है। यह मनुष्य की ऐसी अमूल्य सम्पदा है जिसे कोई चुरा नहीं सकता, लूट नहीं सकता।

चरित्र के साथ व्यक्ति किसी भी तरह के वर्तमान एवं भविष्य का सामना कर सकता है। बिना चरित्र के न तो हमारा कोई सार्थक वर्तमान रहता है और न ही कोई आशापूर्ण भविष्य। वस्तुतः कोई भी राष्ट्र एवं समाज अपने चरित्र से अधिक मजबूत नहीं होता और कोई भी व्यक्ति अपने चरित्र द्वारा प्रदत्त सुरक्षा से अधिक सुरक्षित नहीं होता।

आज जब सच्चे इंसानों का अकाल सा हो गया है, मनुष्य अपने जीवन को निरर्थक एवं असुरक्षित अनुभव कर रहा है तथा राष्ट्र एवं विश्व में हिंसा, अशान्ति तथा अराजकता व्याप्त है। ऐसे में मानव की सबसे निर्णायक आवश्यकता चरित्र निर्माण बन गई है। वस्तुतः यही सच्चे मनुष्य के निर्माण का रसायन ऐसी है।

चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने ठीक ही कहा था कि प्रखर चरित्र के साथ व्यक्ति सच्चा इंसान बन जाता है और सच्चा इंसान ही अपनी समस्याओं का समाधान कर सकता है तथा दूसरों की भी समाधान में मदद कर सकता है। उनके शब्दों में “ जो इंसान सच्चा नहीं है, वह न तो अधिक देर तक गरीबी को झेल सकता है और न ही अमीरी को सम्भाल सकता है। क्योंकि चरित्र के अभाव में गरीबी उसे निष्ठुर बना देती है और अमीरी बर्बर।”

जीवन में चरित्र की आवश्यकता पर बल देते हुए स्वामी विवेकानन्द ने अपने ओजस्वी शब्दों में कहा था-”आवश्यकता चरित्र की है। इच्छा शक्ति के सशक्तिकरण की है। इच्छा शक्ति का सतत् अभ्यास करते जाओ, यह तुम्हें ऊँचा उठायेगी। यह इच्छा सर्वशक्तिमान है। कठिनाइयों की दुर्भेद्य दीवारों को चीरकर आगे बढ़ने की शक्ति चरित्र में ही है।” साथ ही चरित्र के मनोवैज्ञानिक स्वरूप एवं इसके निर्माण के आधारभूत घटकों को स्पष्ट करते हुए स्वामी जी लिखते हैं -”मनुष्य का चरित्र उसकी वृत्तियों का सार है, उसके मन के झुकाव का योग है। हम वही हैं जो हमारे विचारों ने हमें बनाया है। विचार जीवित रहते हैं,वे दूर-दूर तक यात्रा करते हैं। अतः जो तुम सोचते हो, उस पर ध्यान रखो।” प्रत्येक कर्म जो हम करते हैं, प्रत्येक विचार जिसका हम चिंतन करते हैं, चित्त पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। प्रत्येक क्षण हम जो होते हैं, उसका निर्धारण मन के इन प्रभावों द्वारा निर्धारित होता है। प्रत्येक मनुष्य के चरित्र का निर्धारण इन प्रभावों के सार योग से होता है, यदि प्रभाव अच्छे हों तो चरित्र अच्छा होता है और यदि बुरे तो चरित्र बुरा होता है।

इस तरह कोई भी व्यक्ति सद्चिंतन एवं सद्कर्मों द्वारा चरित्र का निर्माण कर सकता है,किन्तु निर्माण के बाद इसे खो भी सकता है। अतः चरित्र को सतत् पोषण की आवश्यकता होती है, जैसे कि जीवित रहने के लिए सतत् श्वाँस की जरूरत होती है। वस्तुतः चरित्र निर्माण का मर्म अनुशासित जीवन में निहित है। संत तिरुवल्लुवर के शब्दों में - ‘अनुशासन जीवन से भी अधिक कीमती है, क्योंकि उसी से मनुष्य जीवन मूल्य प्राप्त करता है। अनुशासन के अभाव में जब हम उच्च आदर्शों एवं मूल्यों के अनुरूप जीवन को संगठित करने में विफल हो जाते हैं तो हम अन्दर से विघटित हो जाते हैं और बाहरी तौर पर समाज से समायोजन कर पाने में विफल हो जाते हैं।’

चरित्र निर्माण में श्रेष्ठ चिंतन का जहाँ अपना महत्त्व है, वहीं श्रेष्ठ आचरण इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। जहाँ चरित्र आचरण का निर्धारण करता है, वहीं श्रेष्ठ आचरण द्वारा चरित्र का गठन होता है। चरित्र निर्माण में नैतिक आचरण की अक्षुण्णता तभी साधित हो सकती है, जब जीवन का लक्ष्य तथा इसकी परिपूर्णता का खाका स्पष्ट हो, क्योंकि तभी अपने जीवन के उच्चतम विश्वासों एवं आस्थाओं को मूल्य निष्ठ की कसौटी पर कसने का साहस एवं उत्साह उभर पाता है।

इस तरह चरित्र निर्माण आत्म निरीक्षण, आत्मशोधन एवं आत्म विकास की महान् प्रक्रिया है,जो श्रेष्ठ चिंतन व आचरण द्वारा पुष्ट होती है तथा इन्हें प्रभावित करती है। यह सतत् श्रेष्ठ व अवाँछनीय तत्त्वों के विभेद की प्रक्रिया है, जिसमें श्रेष्ठ के वरण एवं धारण करने तथा अवाँछनीय तत्त्वों को त्यागने की तत्परता बरती जाती है। अतः यह दैनन्दिन जीवन में नित्य प्रति सद्गुणों को अभ्यास द्वारा आदत में शुमार करने की प्रक्रिया है।

इस तरह अनुशासित जीवन पद्धति द्वारा अनगढ़ मन को अभ्यास द्वारा सुगढ़ बनाया जाता है और क्रमशः अन्तर्निहित दिव्यता के जागरण का मार्ग प्रशस्त होता है तथा निम्न प्रकृति आध्यात्मिक या दिव्य प्रकृति में रूपांतरित होती जाती है। कन्फ्यूशियस के शब्दों में -’ यही सर्वोच्च उपलब्धि है, जब हम अपने-अपने नैतिक अस्तित्व के केन्द्रीय तत्त्व में स्थित हो जाते हैं, जो हमें ब्रह्मांडीय व्यवस्था से जोड़ता है तथा व्यक्ति केन्द्रीय समस्वरता को प्राप्त होता है।

गीताकार के शब्दों में ‘तब व्यक्ति बाह्य विषय वस्तुओं की कामना से मुक्त हो जाता है तथा मन आत्मा में ही स्थिर हो जाता है। यही चरित्र की परिपूर्णता है, जो अनुशासित एवं साधनामय जीवन का चरमोत्कर्ष है।’

यही चरित्र निर्माण की वह महान् प्रक्रिया है, जिसमें इस सुरदुर्लभ मानव जीवन की सार्थकता का मर्म बोध निहित है। यह अपने सुधार द्वारा समाज सुधार एवं विश्व निर्माण की सार्थक प्रक्रिया भी है। इसी को जीवन का एक आदर्श मंत्र घोषित करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं को ‘बी एन्ड मेक’ अर्थात् पहले स्वयं को गढ़ो और फिर दूसरों को इस साँचे में ढालो, का उद्घोष किया था।

महाकाल का संदेश

परमपूज्य गुरुदेव ने जीवन भर जनकल्याण हेतु साहित्य−सृजन किया, उनके तप एवं ज्ञान का निचोड़ उनके साहित्य में है। सभी लोगों तक यह ज्ञानगंगा पहुँचे, इसीलिए ‘पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय’ का प्रकाशन किया गया है। लाखों ने इसे पढ़कर जीवन धन्य बनाया है। हर घर में वाङ्मय की स्थापना होनी चाहिए, परिवार के लिए यह अमूल्य धरोहर एवं विरासत है।

यदि आपको भगवान ने श्री−संपन्नता दी है, तो ज्ञानदान कर पुण्य अर्जित करें। विशिष्ट अवसरों एवं पूर्वजों की स्मृति में पूज्यवर का वाङ्मय विद्यालयों, पुस्तकालयों में स्थापित कराएँ। विवाह, जन्मदिवस एवं अन्य उत्सवों पर अथवा पारितोषिकस्वरूप भी यह साहित्य अमूल्य भेंट सिद्ध होगा। आपका यह ज्ञानदान आने वाली पीढ़ियों तक का सन्मार्ग पर चलाएगा । जो भी इसे पढ़ेगा, धन्य होगा । शास्त्रों में कहा है−

सर्वेषामेव दानानाँ ब्रह्मदानं विशिष्यते। वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाञ्च सर्पिषाम्॥ मनुस्मृति 4/233

जल, अन्न, गौ, पृथ्वी, वस्त्र, तिल, सुवर्ण और घी, इन सबके दानों में से ज्ञान का दान सबसे उत्तम है।

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ज्ञानयज्ञः परन्तम। सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ गीता 4/33

हे परंतप? द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि जितने भी कर्म हैं, वे सब ज्ञान में ही समाप्त होते हैं। ज्ञानदान सर्वोपरि पुण्य है, शुभ कार्य है।


समय की आवश्यकता (Kahani)

अकर्मण्यता के अतिवाद ने भारत को दीन, दयनीय और कायर बनाकर रख दिया था। अत्याचार सहने के वे आदी भी हो गए थे। परिस्थितियों से लाभ उठाकर मध्य एशिया की बर्बर जातियों को आक्रमण करने और नृशंसता बरतने का अवसर मिला और देखते−देखते भारत का बहुत बड़ा भाग दरिद्र तथा पराधीन हो गया।

चाणक्य ने इस अतिवादी दर्शन का डटकर विरोध किया और चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त जैसे अनीति से लड़ने वाले योद्धा तैयार किए। इसके उपराँत बर्बरों ने फिर सिर उठाया, तो मालव के एक छोटे राज्य अधिकारी यशोधर्मा ने वह कमान सँभाली। जनता में साहस भरा। भक्ति से मुक्ति की भ्राँत धारणाओं पर करारा प्रहार किया। उन्हें योद्धा और धर्मोपदेशक का दोहरा उत्तरदायित्व सँभालना पड़ा।

तथ्यों को जिसने भी समझा, उसने यशोधर्मा का पूरा साथ दिया और लगभग वही स्थिति पैदा हो गई, जो चंद्रगुप्त के समय में थी। उसने बर्बरों के हौसले पस्त कर दिए। कितने ही छोटे−बड़े युद्ध उसने लड़े और जीते। सबसे बड़ा कार्य उसने धर्मतंत्र के परिशोधन का किया, जो समय की आवश्यकता को देखते हुए अभीष्ट भी था।


कृत्रिम जीवन त्यागें, सूर्य के प्रकाश की ओर चलें

प्रकाश भी चिकित्सा की एक विधि है। सूर्य किरणों एवं अन्य अनुकूल रश्मियों के माध्यम से किया गया उपचार प्रकाश उपचार कहलाता है। इसे फोटोथेरेपी भी कहा जाता है। जो रोग प्राकृतिक जीवन के अभाव में कृत्रिमता के आँचल में पलते-बढ़ते हैं, ऐसे रोगों को ‘सिजनल एफेक्टिव डिसआर्डर ‘ कहते हैं। फोटोथेरेपी द्वारा इनकी सफल चिकित्सा की जाती हैं। यह चिकित्सा पद्धति व्यक्ति को सूर्य के प्रकाश अर्थात् प्राकृतिक जीवन शैली अपनाने के लिए बल देती है। यही इसका मुख्य आधार है।

मेसाचुसेट्स के डॉ. एनी जेन के अनुसार जबसे मानव प्राकृतिक जीवन से विमुख होकर भौतिकता के कृत्रिम परिवेश में ढलने लगा है, तभी से उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट आयी है। वह विभिन्न प्रकार के रोगों का शिकार होने लगा है क्योंकि आज का आधुनिक जीवन बहुमञ्जिली इमारतों, अल्ट्रा मॉडर्न दफ्तरों तथा वातानुकूलित कारों में सिमट कर रह गया है। आगे वह स्पष्ट करते हैं कि इसमें तथाकथित सामाजिक प्रतिष्ठ तो मिलती है परन्तु जीवन की सहजता समाप्त हो जाती है। व्यक्ति प्रकृति से दूर चला जाता है, उससे कट जाता है। डॉ. जोसेफ ने इस कृत्रिम परिवेश को ‘सिजनल एफेक्टिव डिसआर्डर ‘ नामक रोग का मुख्य कारण माना है। लाइट थेरेपी इस रोग का सफल उपचार है।

सूर्य विज्ञान के प्रणेता विशुद्धानन्द ने सूर्य को प्राणदाता कहा है। हमारा जीवन और पृथ्वी इसी के माध्यम से संचालित एवं नियंत्रित हो रहे हैं। सूर्य अपने प्रकाश के माध्यम से मानव शरीर का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से पोषण करता है। प्रकृति की यह अद्भुत व्यवस्था है, जो किसी अन्य माध्यम से पूर्ण नहीं हो पाती है। सूर्य प्रकाश में प्रकाश की इतनी ही मात्रा होती है जिसे शरीर ग्रहण कर सके। भरी दुपहरी में सूर्य के प्रकाश की तीव्रता 100,000 लक्स होती है। लक्स प्रकाश को मापने की एक इकाई है। जाड़े की दुपहरी में इसकी तीव्रता 10,000 लक्स प्रकाश होती है।

जाड़े की सुबह के अलावा सूर्योदय होते ही हमें 10,000 लक्स प्रकाश मिलने लगता है। इतने ही प्रकाश को ब्राइट लाइट थेरेपी में प्रयोग किया जाता है जिससे तमाम तरह के रोगों को ठीक किया जा सके। अन्वेषणकर्त्ता जान बेस्ट के अनुसार व्यक्ति यदि प्रातःकाल उठकर सूर्य प्रकाश के संपर्क-सान्निध्य में आ सके तो उसे किसी प्रकार की लाइट थेरेपी की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। प्रातःकालीन सूर्य प्रकाश से वह इतनी ऊर्जा ग्रहण कर सकता है जितना कि उसे आवश्यकता है,और इस तरह शरीर की प्राकृतिक रूप से आवश्यकता की पूर्ति होती रहने से वह सदा निरोग एवं स्वस्थ रह सकता है।

एक दफ्तर को अच्छे से प्रकाशित करने के लिए 500 से 1000 लक्स प्रकाश की जरूरत पड़ती है। सामान्यतया घरों में 300 से 500 लक्स प्रकाश होता है। बेडरूम में 100 लक्स प्रकाश का होना ठीक माना जाता है। खिड़कियों के माध्यम से प्रकाश की व्यवस्था की जा सके तो घर के परिवेश को भी प्राकृतिक बनाया जा सकता है। इससे शरीर का जैविक चक्र (बॉडी क्लॉक) एवं मेलेटोनीन हार्मोन का नियंत्रण सामान्य एवं शरीर के अनुकूल बने रहता हैं। कृत्रिम प्रकाश से इसकी अनुकूलता समाप्त हो जाती है और शरीर में रोगों का आक्रमण होने लगता है। इसी कारण रात्रिकालीन ड्यूटी करने वाले धीमी रोशनी में रहने वाले व्यक्तियों में भय, थकान, उदासी, त्वचा सम्बन्धी रोग, अनिद्रा तथा प्रतिरोधी क्षमता में कमी आदि की समस्याएँ पायी जाती हैं। आर्कटिक क्षेत्र में प्रकाश का स्तर 50 लक्स होता है और वहाँ भी इसी तरह की परेशानी देखी गयी है।

होलिस्टिक ऑन लाइन नामक वेबसाइट पर प्रकाशित ‘लाइट थेरेपी’ नामक एक लेख के अनुसार प्राकृतिक प्रकाश की उपयोगिता एवं उपादेयता अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। कृत्रिम प्रकाश में सारी विशेषताएँ नहीं होती हैं। इस शोध लेख के अनुसार घरों, दफ्तरों या अन्य किसी भी स्थान पर पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था करने में एक कठिनाई आ सकती है। क्योंकि जैसे-जैसे प्रकाश की तीव्रता बढ़ती है उसी अनुपात में अल्ट्रावायलेट किरणों के बढ़ने का खतरा भी उत्पन्न हो जाता है। इन किरणों से आँखों में जलन, आँखों की अन्य बीमारी तथा त्वचा कैन्सर जैसे रोग पनपते हैं। अतः लाइट थेरेपी का मुख्य आधार भी सूर्य प्रकाश को माना जाता है। यही मुख्य एवं प्राकृतिक उपचार पद्धति है जो अत्यन्त प्राचीन एवं सफल है। हालाँकि कृत्रिम ब्राइट लाइट थैरेपी एवं अन्य प्रकाश थैरेपी का भी प्रयोग किया जाता है, परन्तु इनमें भी प्रकाश की तीव्रता 10,000 लक्स प्रकाश से आधिक नहीं होती।

सूर्य प्रकाश पर अन्वेषण-अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक एस. फैरो के अनुसार ‘सन लाइट थेरेपी’ (सूर्य प्रकाश उपचार) अत्यन्त प्रभावशाली है। सूर्य रश्मियों की महत्ता को रेखाँकित करते हुए फैरो ने उल्लेख किया है कि इसमें सभी प्रकार की किरणें होती हैं। इसमें इन्फ्रारेड से लेकर अल्ट्रावायलेट किरणें होती हैं तथा आँखों व शरीर के अनुकूल प्रभाव डालती हैं। सूर्य प्रकाश की इस विशेषता को फैरो ने अद्भुत एवं आश्चर्यजनक कहा है। इसी कारण सूर्य प्रकाश को ‘फुल-स्पेक्ट्रम ओरीजनल लाइट’ कहा जाता है।

लाइट थेरेपी में प्रकाश को आँखों के माध्यम से पीनियल ग्लैण्ड्स तक पहुँचाया जाता है, उसे सक्रिय एवं जागृत कराया जाता है। उसी ग्रंथि को थर्ड आई (तीसरा नेत्र) कहा जाता है जिसमें दूर दृष्टि की क्षमता होती है। सिग्रेटो के अनुसार इसे सक्रिय करने के लिए सूर्योदय की सुनहरी किरणों का प्रयोग किया जाता है। डॉ. नेन्सी ने गौघृत के दीपक को भी इसके लिए उपर्युक्त माना है। ये विधियाँ अत्यन्त सफल एवं सुगम हैं। इसके अलावा नाइट लाइट थेरेपी, आप्टिमम् थेरेपी आदि को भी प्रयोग में लाया जाता है।

लाइट थेरेपी से कई प्रकार के रोगों की चिकित्सा की जाती है। यह सेड (सिजनल एफेक्टिव डिसआर्डर) के लिए रामबाण का कार्य करता है। इससे अनिद्रा रोग को भी ठीक होता है। इसके लिए दक्षिण आस्ट्रेलिया में 9 लोगों पर अध्ययन किया गया। इन लोगों को नींद न आने की शिकायत थी। सोने के एक-दो घण्टे के पश्चात् इन्हें नींद नहीं आती थी। इन सभी व्यक्तियों को 2500 लक्स प्रकाश से उपचार किया गया। परिणाम बड़ा ही सुखद रहा। इन्हें अच्छी नींद आने लगी।

स्वस्थ जीवन के लिए 4 से 6 घण्टे की गहरी नींद की आवश्यकता पड़ती है। शराब तथा नींद की गोली लेने वाले व्यक्ति प्रायः ‘डिलेड स्लीप फेस सिण्ड्रोम’ से पीड़ित होते हैं एवं प्रातःकाल में एक-डेढ़ घण्टे ही सो पाते हैं। आमतौर पर यह बीमारी किशोरावस्था में पायी जाती है।

जरथुस्त्र बादशाह गुश्तास्य के दरबार में पहुँचे। उन्हें ईश्वरनिष्ठ जीवन जीने का संदेश दिया। राजा ने कहा, मैं तो सामान्य ज्ञान रखता हूँ, यदि आप हमारे दरबार के विद्वानों का समाधान कर दें, तो मैं आपके निर्देश पूरी तरह मानूँगा।

नेशनल कमीशन ऑफ स्लीप डिसआर्डर रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार इस रोग से पीड़ित पुलिस, अग्नि शामक कर्मचारी, ड्राइवर तथा पायलट अक्सर दुर्घटना के शिकार होते हैं और दुर्घटना का समय भी प्रातःकाल होता है। इन रोगियों के लिए ‘सन लाइट थैरेपी’ अत्यन्त कारगर सिद्ध हुई है। ब्राइट लाइट थैरेपी से भी इन्हें आराम मिला है।

प्रो. हैस्लाक के अनुसार युवाओं का बॉडी क्लॉक जल्दी प्रभावित हो जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक इस प्रभाव से मुक्ति देने के लिए मेलेटेनीन का डोज दिया गया। इससे ऐसे रुग्ण युवाओं को नींद तो आयी पर उनकी कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा। ठीक इसी प्रकार का सर्वेक्षण बेटास्कीवीन, अल्वर्टा तथा कनाडा के कुछ मैनेजमेंट एवं प्रोफेशनल कॉलेजों में किया गया। यहाँ के विद्यार्थियों का फुल स्पेक्ट्रम लाइट से उपचार किया गया। इसमें इनका अनिद्रा रोग ठीक नहीं हुआ, बल्कि इनकी कार्य कुशलता तथा शैक्षणिक उपलब्धियों का स्तर भी बढ़ गया।

किशोरवय की लड़कियों में प्रायः खानपान सम्बन्धी गड़बड़ी पैदा हो जाती है। हालाँकि यह कोई गम्भीर समस्या नहीं है परन्तु यथासमय इसको नहीं सुधारा जाय तो बाद में गम्भीर शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं। इसके लिए सूर्य प्रकाश के संपर्क में आने तथा इसके उपचार का सुझाव दिया जाता है। इसमें सफलता भी मिली है।

महिलाओं में लुपस नामक बीमारी होती है। यह एक प्रकार का आटोइम्यून रोग है,जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर एवं दुर्बल हो जाती है और शरीर में अनेक रोग घर कर जाते हैं। इस रोग का लक्षण है थकान, उतावलापन, जोड़ों में दर्द और किडनी की खराबी। ऐसे रोगियों को सूर्य प्रकाश से परहेज करने का दिशा-निर्देश दिया जाता है। परन्तु आधुनिक शोधकर्त्ताओं ने इसे अस्वीकार कर दिया है। इन्होंने सूर्य प्रकाश से ही VA-1 नामक विशिष्ट अल्ट्रावायलेट किरण को खोज निकाला है, जिससे इस रोग को ठीक करने में अभूतपूर्व सफलता मिली है। महिलाओं की मासिक चक्र सम्बन्धी समस्याओं के लिए लाइट थेरेपी कारगर सिद्ध हुई है।

अमेरिका में प्रति वर्ष 10 से 15 लाख लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं। और इनमें से 30,000 लोग आत्म हत्या कर लेते हैं। ऐसे लोगों पर सूर्य प्रकाश चिकित्सा अत्यन्त प्रभावकारी सिद्ध हुई है।

अतः स्वस्थ, सुखी एवं निरोगी जीवन के लिए हमें सूर्य प्रकाश याने प्रकृति की ओर फिर लौटना होगा। जितना जल्दी हो सके हमें अपनी इस कृत्रिम जीवन को त्यागकर प्रकृति के सुरम्य आँचल में पनाह लेने के लिए तत्पर होना चाहिए। इसी में समाधान है, यही समझदारी है।


विवेकशीलों को पाने में कठिनाई (Kahani)

जरथुस्त्र ने विद्वानों के कठिन−से−कठिन प्रश्नों के समाधान बड़े अच्छे ढंग से किए। वे सभी अत्यंत प्रभावित हुए। शहंशाह ने कहा, ऐसे उत्तर परमात्मज्ञान में संपन्न व्यक्ति ही दे सकता है।

बादशाह ने उन्हें सम्मानित किया और कहा, आप कोई चमत्कार दिखाएँ, हम सब आपके अनुयायी बनेंगे। जरथुस्त्र ने हाथ की पुस्तक दिखाते हुए कहा, यह अवेस्ता (ईश्वरीय ज्ञान) ही सबसे बड़ा चमत्कार है, जो लाखों को नई दृष्टि देता है। इसके अलावा लोगों की आँखों में चकाचौंध पैदा करने वाले किसी चमत्कार के लिए ईश्वरीय धर्म के कोई स्थान नहीं है। बादशाह ने अपनी बालबुद्धि के लिए क्षमा माँगी एवं औचित्य को वरीयता देते हुए जरथुस्त्र को गुरु रूप में स्वीकार किया।

विष्णु भगवान ने अपनी सर्वोत्तम कृति पृथ्वीनिवासी मनुष्यों का हाल−चाल देखने की इच्छा प्रकट की। लक्ष्मी जी ने मना किया और कहा, मनुष्य बड़े धूर्त हो गए हैं। यह समाचार मुझे नारद से मिल चुका है।

लक्ष्मी जी के मना करने पर भी जब विष्णु भगवान पृथ्वी पर जाने लगे, तो लक्ष्मी ने कहा, मनुष्य धूर्त न निकले, तो ही लौटकर आना, नहीं तो उन्हीं के बीच रहना। विष्णु तुनककर चल दिए।

धरतीनिवासी मनुष्यों को जब विष्णु के आगमन का समाचार मिला, तो वे ठट्ठ के ठठ्ठ जमा हो गए। विष्णु द्वारा पूछे गए धर्म−कर्म के पालन का प्रश्न उपेक्षा में डालकर उनसे मनोकामना पूर्ति का आग्रह करने लगे।

विष्णु को उनकी लोभ−लिप्सा पर क्रोध आया। वे उठकर बदरीनाथ पर्वत पर जा छिपे। आगमन का समाचार मिला, तो लोग हजारों की संख्या में वहाँ भी जा पहुँचे। चर्चा चली। यहाँ भी पिछले स्थान की पुनरावृत्ति हुई। लोगों ने विविध मनोकामनाओं की पूर्ति का आग्रह किया।

विष्णु दुखी होकर वहाँ से भी चल पड़े और समुद्र के बीच बसी द्वारिका में आसन जमाया। लोगों ने उन्हें वहाँ भी खोज लिया और वही कामनापूर्ति के लिए पहले जैसी हठ ठानी।

विष्णु अदृश्य हो गए, पर लज्जावश लक्ष्मी जी के पास न गए। असमंजस में पड़े विष्णु से नारद ने कारण पूछा, तो विष्णु ने अपनी पीड़ा सुनाई, यहाँ लोग कर्त्तव्य की अपेक्षा करते हैं और लालच की रट लगाए हैं। कोई ऐसा स्थान बताओ, जहाँ मैं धरती पर शाँतिपूर्वक रह सकूँ।

नारद ने कान में कहा, आप मनुष्यों के हृदय में छिप जाइए। वे बहिर्मुखी हैं। बाहर की आपको ढूंढ़ेंगे, भीतर दृष्टि ही नहीं जाएगी। ढर्रे की चाल चलने वाले आप तक पहुँचेंगे ही नहीं तथा आत्मदर्शी, विवेकशीलों को पाने में कठिनाई भी नहीं होगी।


सत्य छिपा पड़ा है परोक्ष के महासागर में

मानवीय मनःसंस्थान की संरचना ऐसी विचित्र है कि जब कोई संकट की घड़ी आती है, वह अपने प्रियजनों को सूक्ष्म तरंग भेजकर वह सूचित करता है कि कुछ अभूतपूर्व घटित होने वाला है। इस क्रम में समय अथवा दूरी संबंधी कोई व्यवधान उसके आड़े नहीं आता और जहाँ लक्ष्य कर उसे भेजा गया था, वहाँ पहुँचकर वह व्यक्ति को सूचना देता है कि उसके लिए सब कुछ दुरुस्त है, सो बात नहीं।

ऐसी कितनी ही घटनाओं का संकलन रुथ माँटगोमरी ने अपनी पुस्तक ‘इन सर्च ऑफ दि ट्रुथ’ में किया है। ऐसी ही एक घटना का उल्लेख करते हुए वे लिखती हैं कि सन् 1984 की एक रात थी। द्वितीय महायुद्ध चल रहा था। पैसिफिक सागर में तेरहवीं एयरफोर्स बटालियन के कमाँडर जनरल नेथान एफ॰ टूवीनिंग दुर्भाग्यवश युद्ध के दौरान अपने बेड़े से अलग−थलग पड़ गए। वे ‘एसपराइट साँतो’ एयरबेस के लिए अपने चौदह साथियों के साथ रवाना हुए थे, पर बेड़े के मुख्य जहाज से अचानक उनका संपर्क टूट गा। बहुत खोज की गई, पर उनका और उनके साथियों का कुछ भी पता नहीं चला।

जनरल नेथान की पत्नी उस समय अमेरिका में अपने घर में सो रही थी। निद्रा के बीच उसे ऐसा लगा कि उसके पति उसके पास खड़े हों और बेचैनीपूर्वक उसे जगा रहे हों। श्रीमती नेथान ने अपने पति का मुँह और हाथ स्पष्ट देखा। उसने पति के हाथ पकड़ने चाहे, पर तभी सब कुछ ओझल हो गया। उसकी नींद टूट गई। स्वप्न उसने पहले भी देखे थे किंतु स्वप्न विचित्र था। जाग जाने पर भी वह श्रीमती नेथान को इस प्रकार रोमांचित कर रहा था कि उसके शरीर के बाल सिहरकर खड़े हो गए थे।

उसके बाद उसे नींद नहीं आई। पूरी रात जगाकर बिताई सवेरा हो चला था, तभी यकायक टेलीफोन की घंटी बजी।

फोन उसकी एक सहेली का था। उसके पति भी दक्षिणी पैसिफिक सागर पर सैनिक अफसर थे, इसलिए श्रीमती नेथान के हृदय में रात की रोमाँचकारी घटना ने फिर एक बार उत्तेजना उत्पन्न कर दी। उसने जल्दी−जल्दी में पूछा, तो पता चला कि सब कुछ ठीक है, पर सहेली ने साथ में यह भी कहा कि न जाने क्यों आज उसका मन बार−बार उसे ही (श्रीमती नेथान को) याद कर रहा है। उसने कहा कि वह उसके पास जल्द ही आ रही है। इतना कहकर फोन काट दिया।

श्रीमती नेथान सोच ही रही थी कि सहेली को शायद कोई बार कहनी थी, जिसे वह फोन पर नहीं कर सकती, अतएव वह यहाँ आ रही है। सहेली उसके घर आई, पर सामान्य वार्त्तालाप के अतिरिक्त और कोई बात नहीं हुई । श्रीमती नेथान ने इस संदर्भ में उससे पूछा भी, पर उसने इतना ही कहा कि उसे बराबर दो दिनों से उसी का स्मरण आ रहा था, इसलिए वह आई। इसके अतिरिक्त और कोई बात नहीं है। दो दिन रहकर जब उसकी सहेली वापस लौट गई, तब श्रीमती नेथान को सरकारी तौर पर यह जानकारी दी गई उसके पति अपने जहाज के साथ लापता हैं। उनकी खोज की जा रही है। खोज करने वाले अधिकारी नियुक्त कर दिए गए हैं। इस समाचार से उसका मन बड़ा व्यग्र हो उठा और वह चिंतित रहने लगी। रात में ठीक से इस चिंता के कारण सो भी नहीं पाती थी। एक सप्ताह बीता ही था कि सेना की ओर से पुनः उसके पास संदेश आया, जिसमें कहा गया था कि जहाज मिल गया है और श्री नेथान जल्द ही उससे मिलने आ रहे हैं। भेंट होने पर श्रीमती नेथान ने अपने पति को उस रात की घटना बताई । इस पर पति ने कहा कि सचमुच उस रात्रि को वे मुसीबत में पड़ गए थे और उसे (पत्नी को) बहुत याद कर रहे थे। इस विलक्षण सूचना का कारण क्या हो सकता है? इस संबंध में परामनोवैज्ञानिकों का कहना है कि वास्तव में इसका निमित्त वह भावनात्मक संबंध ही है, जिससे वे परस्पर जुड़े हुए थे। पति के व्याकुल होकर पत्नी को याद करने से उनकी मानसिक तरंगों ने अनजाने ही पत्नी के पास पहुँचकर अनहोनी की सूचना दे दी। यह पारस्परिक संदेश आदान−प्रदान का एक अदृश्य स्तर का साधन है, जो स्वतः संपन्न होता रहता है। यह कितने आश्चर्य की बात है कि जिस ऑफिसर ने नेथान की खोज की, वह उसकी पत्नी की सहेली का पति ही था। आखिर उसकी पत्नी को वहाँ जाने के लिए किसने प्रेरित किया? यह सब ऐसे रहस्य हैं, जो मनुष्य को बताते हैं कि जीवन में जो कुछ प्रकट है, वही सत्य नहीं है, वरन् सत्य का सागर अदृश्य में छिपा हुआ है और वह विचित्र संयोगों के मध्य प्रकट हुआ करता है।

अपनी उपर्युक्त पुस्तक में इस घटना का उल्लेख करते हुए रुथ माँटगोमरी लिखती हैं कि युद्धों के समय मानसिक हलचल अचानक प्रखर हो उठती है। उस समय ऐसी अतींद्रिय अनुभूतियाँ होना आश्चर्य की बात नहीं। युद्ध के मैदान में लड़ने वाले सैनिक और उनके सगे−संबंधियों के बीच एक प्रगाढ़ अतींद्रिय संबंध स्थापित हो जाता है, वही इन अतिमानसिक अनुभूतियों का कारण होता है।

द्वितीय विश्वयुद्ध की ही एक अन्य घटना की चर्चा करते हुए वे अपनी उसी पुस्तक में लिखती हैं कि अमेरिका के वी॰ एलेक्सिस जॉनसन, जो पूर्व में चैकोस्लोवाकिया और थाईलैंड के राजदूत रह चुके थे, उन्हें जापान का राजदूत नियुक्त किया गया । वे मुकडेन नगर में रह रहे थे। युद्ध की आशंका से बच्चों को स्वदेश भेज दिया गया था। उनकी पत्नी कैलिफोर्निया के लैगुना बीच में रहती थी।

इस मध्य श्रीमती पेट्रोसिया जॉनसन ने जापान के समाचार जानने के लिए कई बार अपना रेडियो ऑन किया, पर रेडियो ने वहाँ का मीटर पकड़ा ही नहीं। एक दिन पड़ोस की एक स्त्री ने बताया कि उसका रेडियो जापानी प्रसारणों को खूब अच्छी तरह पकड़ता है। तीन महीने तक श्रीमती जॉनसन ने इस ओर कुछ भी ध्यान नहीं दिया। एक दिन अचानक उसे रेडियो सुनने की इच्छा हुई। वह पड़ोसन के घर गई। रेडियो का स्विच घुमाया ही था कि आवाज आई, हम रेडियो स्टेशन मुकडेन से बोल रहे हैं। अब आप एक अमेरिकन ऑफीसर कैदी वी॰ जॉनसन को सुनेंगे।

विस्मयविमूढ़ पेट्रोसिया एकाग्रचित्त बैठ गई। अगले ही क्षण जो आवाज आई, वह उसके ही पति की थी। वे बोल रहे थे मैं वी॰ एलेक्सिस जॉनसन मुकडेन से बोल रहा हूँ। जो भी कैलिफोर्निया, अमेरिका के नागरिक इसे सुनें, कृपया मेरा संदेश मेरी पत्नी पेट्रोसिया जॉनसन या मेरे माता पिता श्री एवं श्रीमती कार्ल टी॰ जॉनसन तक पहुँचा दें और बता दें कि मैं यहाँ कैद में हूँ। स्वस्थ हूँ। खाना अच्छा मिलता और आशा है कि कैदियों की अदला−बदली में शीघ्र ही छूट जाऊँगा। अपनी पत्नी और बच्चों को प्यार भेजता हूँ।

दो माह बाद जॉनसन कैदियों के आदान−प्रदान में छूटकर आ गए। पेट्रोसिया पति से मिलने गई तो वहाँ उसे पति से थोड़े समय के लिए ही मिलने दिया गया, क्योंकि कुछ समय बाद जॉनसन को तुरंत जहाज पर जाना था। पेट्रोसिया को थोड़ी ही देर में घर लौटना पड़ा। उसकी सहेलियाँ उसे घुमाने ले गई, पर अभी वे एक सिनेमा में बैठी ही थीं कि पेट्रोसिया अचानक उठकर बाहर आ गई और अपने घर का फोन मिलाया तो दूसरी ओर से श्री जॉनसन बोले और बताया कि मैं घर पर हूँ, मुझे जहाज में नहीं जाना पड़ा। पेट्रोसिया सिनेमा छोड़कर घर चली आई।

तीन माह तक कभी भी रेडियो सुनने की आवश्यकता अनुभव न करना और ठीक उसी समय जबकि पति संदेश देने वाले हों, रेडियो सुनने की अंतःकरण की तीव्र इच्छा का रहस्य क्या हो सकता है? कौन सी शक्ति थी, जिसने पेट्रोसिया को सिनेमा के समय फोन पर पहुँचने की प्रेरणा दी। जब इन बातों पर विचार करते हैं तो ज्ञात होता है कि कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है अवश्य, जिसने मानवमात्र को एक भावनात्मक संबंध में बाँध रखा है। हम जब तक उसे नहीं जानेंगे, हमारी जन्म−मरण की अनंत यात्रा चलती ही रहेगी। मानव जन्म की सार्थकता उन अविज्ञात रहस्यों को सुविज्ञात बनाने और उस मूल को जानने में है, जो इन रहस्यों की जड़ में हैं और जो समग्र दृश्य−अदृश्य जगत के प्राण हैं।

मनःसंस्थान, हृदय या अंतःकरण, यह आस्था का केंद्र है। भाव−संवेदनाएं यहीं से उठतीं, उभरतीं और अपनों तक प्रसारित होती रहती हैं। अपरिष्कृत स्थिति में जब यह ऐसे करतब कर सकता है तो परिष्कार की दशा में यह कितना दिव्य होता होगा और कैसे आश्चर्यजनक कारनामे करता होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। शुद्ध अंतःकरण भगवद्चेतना का निवासस्थान है। इस भाव−संस्थान को हम जैसे−जैसे निर्मल करते जाएँगे, हमारा दिव्य रूपांतरण होता जाएगा और हमारे लिए इस प्रकार की घटनाएं एकदम साधारण बनती जाएँगी, हम अध्यात्म को जीवन का एक अंग बनाएँगे। सचमुच अध्यात्म बड़ा ही विलक्षण एवं अविज्ञात रहस्यों का भाँडागार अपने अंदर समाए हुए है। हम उसका शोध करने का साहस तो जुटाएँ।


इस युग की महाव्याधि : मानसिक तनाव

तनाव आज जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। बच्चा, बूढ़ा, अमीर-गरीब, बुद्धिजीवी-श्रमशील, पुरुष-स्त्री सभी इससे ग्रसित हैं। अतः आज के युग को यदि तनाव युग कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। तनाव सिद्धान्त के जनक महान् मनोवैज्ञानिक हॉन सालाई के अनुसार आज ऐसे व्यक्ति की कल्पना असम्भव है जो मानसिक तनाव को अनुभव न करता हो, तनाव एक महाव्याधि के रूप में मानव जाति को आतंकित किये है।

तनाव मनुष्य के लिए हानिकारक ही हो ऐसी बात भी नहीं है। यह मनुष्य के विकास एवं प्रगति में कारक तत्त्व रहा है। आपातकालीन परिस्थितियों का सामना करने में मन एवं शरीर को तनाव ही तैयार करता है। ‘ऑवरकमिंग टेन्शन’ के लेखक डॉ. केनेश हेम्वली के अनुसार प्रागैतिहासिक काल का आदिमानव इस तनाव द्वारा ही जंगली पशुओं के हमलों से बचने में समर्थ रहता था। तनाव की स्थिति में शरीर की एड्रीनल ग्रंथि से एड्रीनेलिन नामक हारमोन स्रावित होता है, जो शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाता है व शरीर को बाह्य दबाव सहन करने में सक्षम बनाता है। यदि तनाव न होता तो शायद आज का मनुष्य प्रागैतिहासिक आदि मानव की स्थिति में ही होता।

तनावपूर्ण स्थिति से निपटने की व्यवस्था प्रकृति ने मनुष्य शरीर में दी है। लेकिन बार-बार लम्बे समय तक तनावपूर्ण स्थिति के बने रहने के कारण यह व्यवस्था चरमरा जाती है। क्योंकि इस अवस्था में हारमोन का स्राव अनावश्यक एवं अत्यधिक मात्रा में होता है जो शरीर के विभिन्न अंग- अवयवों पर दुष्प्रभाव डालता है। माँसपेशियों में खिचाव, पेट दर्द, कँधे व पैर में दर्द, दस्त, साँस लेने में तकलीफ, पेशाब व हृदयगति की अनियमितता, थकान, सरदर्द आदि शारीरिक लक्षण दिखाई पड़ते हैं। अधिक गम्भीर होने पर इसके दुष्परिणाम आँत के फोड़े (पेपरिक अल्सर), हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, गठिया, अनिद्रा, कोलाइटिस, कब्ज, स्नायु दुर्बलता, एलर्जी, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी जैसे रोगों के रूप में प्रकट होते हैं।अत्यधिक तनाव शरीर व मन को तोड़-मरोड़ कर रख देता है व शीघ्र ही बुढ़ापे की ओर ले जाता है। यह असामयिक मृत्यु का कारण भी बन सकता है। अब तो मधुमेह, कैंसर, एड्स जैसे गम्भीर रोगों का कारण भी तनाव माना जा रहा है।

तनाव व्यक्ति के स्वास्थ्य के साथ उसकी कार्यक्षमता की तबाही कर देता है। एक अध्ययन के अनुसार तनाव रहित स्थिति में एक व्यक्ति बिना थके 18 घण्टे काम कर सकता है। लेकिन यदि उसे तनावग्रसित स्थिति में काम करना पड़े तो वह 8 घण्टे में ही थक जायेगा।

बढ़ते तनाव के कारण मानसिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या में बाढ़ सी आ गई है। विश्व स्वास्थ्य संघ की रिपोर्ट के अनुसार दो तिहाई मनुष्य जाति किसी न किसी तनाव जनित मानसिक रोग से पीड़ित हैं। पश्चिम के विकसित देशों में स्थिति अधिक गम्भीर है।

तथाकथित प्रगतिशील युग की देन तनाव रूपी महाव्याधि पूर्व में कभी इतने व्यापक एवं गम्भीर रूप में नहीं रही। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं विश्व के मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक जैम्स सी. कॉलमेन के अनुसार “सत्रहवीं शताब्दी पुनर्जागरण व अट्ठारहवीं शताब्दी वैदिक काल की रही। उन्नीसवीं शताब्दी प्रगतिकाल की रही व बीसवीं शताब्दी को चिंताओं का काल (तनाव युग) कहा जा सकता है।”

भोगवादी मूल्यों पर आधारित आज की भौतिकवादी सभ्यता बढ़ते तनाव का प्रमुख कारण है। इसी के कारण असंयमित आचरण जीवन का अविच्छिन्न अंग बन गया है। प्रगति की अंधी दौड़ में मनुष्य मानवीय मर्यादा, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों को तिलाञ्जलि दे चुका है। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्धा, विलासी जीवन, अमर्यादित आचरण , उद्दण्ड व्यवहार एवं विकृत चिंतन दिनचर्या के अंग बन गये हैं। परिणामतः बढ़ती असुरक्षा, हिंसा, ईर्ष्या-द्वेष, भय, चिंता,निराशा, खिन्नता जैसे मानसिक विकार मनुष्य के जीवन में कुहराम मचाए हुए हैं।

“द स्ट्रेस सोल्यूशन” के लेखक लाहले एच. मिलर एवं अल्या डेल स्मिथ के अनुसार तनाव एक जटिल, बहुआयामी एवं वैयक्तिक समस्या है जो व्यक्ति के स्वास्थ्य, कार्यक्षमता एवं धन की तबाही कर देती है। तनाव के रूप में पड़ने वाले दबाव बाह्य परिस्थितियों पर आँतरिक मनःस्थिति के कारण हो सकते हैं। तनाव के वैयक्तिक,पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यवसायिक, वातावरणजन्य कई कारण हो सकते हैं।

तनाव के घातक प्रभावों के कारण इसका उपचार आवश्यक है। इसका पूर्ण उपचार तो शक्य नहीं लेकिन जीवन शैली, कार्यप्रणाली एवं चिंतन पद्धति में आवश्यक सुधार एवं परिवर्तन कर इसे हल्का अवश्य किया जा सकता है। वैसे तनाव से पूर्ण शान्ति सम्भव भी नहीं है और न ही आवश्यक भी है। लाइले एवं अल्मा के अनुसार यह सही है कि तनाव स्वास्थ्य की तबाही कर देता है लेकिन यह आवश्यक भी है। शिशु जन्म, नव अभियान में सफलता, नये शहर में बदलाव आदि चुनौतीपूर्ण एवं रोमाँचक कार्य एवं घटनायें ऐसी हैं जो उतना ही तनाव उत्पन्न करते हैं जितना कि कोई दुर्घटना या विध्वंस की स्थिति का तनाव। इसके बिना तो जीवन नीरस ही हो जाये।

तनाव से राहत के लिए आज तरह-तरह की औषधियाँ इजाद हैं। तनाव से तत्काल मुक्ति के लिए लोग दर्दनिवारक, (टेंक्वलाइजर) औषधियों, यहाँ तक कि शराब एवं अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं। यह सब तनाव रूपी महाव्याधी का समाधान नहीं है। “रिलीज फ्रॉम नर्वस टेन्शन” के मूर्धन्य लेखक डेविड हेरोल्ड फिंक के अनुसार ये शान्तिदायिनी औषधियाँ आपात समय में तात्कालिक राहत दे सकती हैं लेकिन तनावजन्य मनःस्थिति का स्थायी समाधान इनसे नहीं हो सकता। उनके शब्दों में मन की शान्ति का एक ही उपाय है स्वयं से, दूसरे लोगों से व संसार में प्रेम। अपने विचार, समय व ऊर्जा का संयम व सुनियोजन। औषधियों के रूप में किये गये उथले उपचार तो अपनी ध्वंसात्मक प्रकृति के कारण अन्ततः तनाव को बढ़ाने वाले ही सिद्ध होते हैं।

तनाव के स्वरूप व उद्गम स्रोत के अनुरूप इसका उपचार होना चाहिए। यदि तनाव अपनी कार्यशैली में दोष के कारण है तो उसमें आवश्यक हेर-फेर कर सुधारा जा सकता है। यदि कार्य की अधिकता तनाव का कारण हो तो कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर करके इसे निपटाया जा सकता है। यदि कार्य करते-करते मानसिक थकान लगे तो काम को बदलकर शारीरिक श्रम या अन्य मनोरंजन प्रधान कार्य द्वारा इसे बदला जा सकता है। इसमें आत्मीय बन्धुओं से गप-शप या बाहर टहलने आदि का क्रम भी बनाया जा सकता है। सप्ताह अंत में एक दिन किसी निर्जन स्थान पर प्रकृति की गोद में घूम- फिर कर मन को हल्का व तरोताजा कर सकते हैं।

तनाव का कारण दूसरों के साथ अपनी व्यवहार जन्य त्रुटियाँ भी हो सकती हैं। इस संदर्भ में दूसरों का यथोचित सम्मान करें। दूसरों के कार्य में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें। कम बोलें व अधिक सुनें। अपने काम को ईमानदारी व जिम्मेदारी से करें। जिद्दीपन व दुराग्रह को त्याग दें। सबसे सामञ्जस्य बिठाकर सौहार्द्रपूर्ण वातावरण बनाये रखें।

लेखन, पेंटिंग, ड्राईंग, नाचकूद, ड्रामा जैसी कलात्मक अभिव्यक्तियों द्वारा हम तनाव को शानदार ढंग से कम कर सकते हैं। भावनात्मक उद्वेग के क्षणों में कागज पर उतारने से तनाव कम हो जाता है। शोध, अध्ययन में पाया गया है कि ऐसा करने से व्यक्ति के रोग -प्रतिरोधी तत्त्व जैसे ही टी सेल्स और किल्र सेल्स में उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती है। दिनभर की उथल-पुथल तक विस्तृत करने पर यह प्रक्रिया प्रकारान्तर में डायरी

लेखन का रूप ले लेती है जिसकी महत्ता आत्म निरीक्षण व व्यक्तित्व निर्माण के रूप में असंदिग्ध है।

नाचकूद में शरीर के व्यायाम के साथ तनाव से राहत मिलती है। वैज्ञानिकों के अनुसार गुर्दे से बॉर एपिनेफरिन नामक रसायन इसमें सहायक होता है। कलात्मक अभिव्यक्ति द्वारा मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों के बीच सम्बन्धों में मजबूती पायी गयी है जो समस्याओं के समाधान को सरल बनाती है व कठिनाइयों से जूझने की शक्ति बढ़ा लेती है। मनपसंद संगीत भी तनाव से राहत का प्रभावशाली उपाय है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि सूर्यास्त के समय संगीत सुनने से मस्तिष्क से एण्डोरफिन नामक रसायन पदार्थ निकलता है जो रोग प्रतिरोधक संस्थान को मजबूत करता है।

आज मनोविज्ञान में ‘आर्ट थेरेपी’ के अंतर्गत क्रोध अवसाद आदि से ग्रसित व्यक्ति को कागज, केन्वास व कलम-ब्रश थमाकर अपने गुस्से व अवसाद को कागज या केन्वास पर उगलवा कर हल्का तथा शान्त किया जाता है। चिकित्सा विज्ञानी कला अभिव्यक्ति द्वारा स्तन कैंसर ऑपरेशन के बाद विक्षुब्ध एवं तनावग्रसित महिलाओं को राहत दिलवा रहे हैं।

हँसना तनाव की सबसे बड़ी औषधि है। विशेषज्ञों का कहना है कि हँसते समय मस्तिष्क से एण्डोफिन नामक रसायन निस्सृत होता है जो पीड़ा में कमी करता है व प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। जीवन की परेशानियों व कुण्ठाओं से उत्पन्न तनाव को हल्का करने का एक उपाय यह भी है कि अपने हृदय की किसी विश्वसनीय बन्धु के आगे खोलें। इससे मन हल्का हो जायेगा व समस्या का समाधान हो जायेगा। जब हम अपने लिए ही परेशान हों, तब दूसरों के लिए भी कुछ करने की सोचें। इससे हमें असीमित आनन्द मिलेगा।

आहार सम्बन्धी असंयम एवं लापरवाही भी तनाव का एक प्रधान कारण है। अति−आहार के कारण पेट में अपच-कब्ज, शरीर में आलस्य व मस्तिष्क में जड़ता कि शिकायत बनी रहती है। पेट हल्का रहे तो शरीर व मन मस्तिष्क सभी हल्के, स्फूर्तिवान व शान्त रहते हैं।

अपने आहार-विहार, कार्य पद्धति एवं दिनचर्या के व्यवस्थित होने पर भी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों के थपेड़े तनाव पैदा कर देते हैं। इसके लिए आध्यात्मिक उपचार (साधनाओं) द्वारा अंतर्मन को मजबूत बनाया जाये। अध्यात्म दर्शन के समर्थ सम्बल द्वारा जीवन के दृष्टिकोण एवं कार्यपद्धति में हेर-फेर कर जीवन को अधिक रोमाँचकारी व तनावरहित बनाया जा सकता है।


लक्ष्य के प्रति समर्पण (Kahani)

एक नादान चूहे की किसी खरगोश से दोस्ती थी। चूहा खरगोश से कहता, ‘अपने जैसा मुझे भी बना ली।

जब चूहे ने हठ न छोड़ी, तो खरगोश ने उसे गुड़ की चाशनी में स्नान कराया और रुई में लोट जाने की सलाह दी। चूहे की देह पर रुई चिपक गई, वह खरगोश जैसा लगने लगा। एक दिन तो खूब प्रशंसा हुई। दूसरे दिन वर्षा हुई और रुई छूट गई। असलियत खुल जाने पर सभी उसे मूर्ख बताने लगे। सत्य अधिक दिन तक छिपा नहीं रह सकता, वास्तविकता प्रकट होकर ही रहती है।

उन दिनों समूचे क्षेत्र में अनैतिकता और दुष्प्रवृत्तियों की भरमार थी। जिधर नजर उठाकर देखा जाए, अनाचारों का बोलबाला दीखता था। बालक वाल्टेयर जब कामचलाऊ पढ़ाई पढ़ चुके, तो उनके पिता वकालत पढ़ाना चाहते थे, पर उनने निश्चय किया कि उस झूठ बोलने के धंधे में न पड़कर संव्याप्त अनाचारों से लोहा लेंगे और बंदूक से असंख्य गुनी शक्तिशाली लेखनी के योद्धा बनेंगे। उनने अपना निश्चय कार्यान्वित किया। परिवार का कहना न माना।

वाल्टेयर ने 100 अति महत्वपूर्ण लेख और 300 के करीब शोध−निबंध विभिन्न विषयों पर लिखे। जनता में विद्रोह की भावना उमड़ पड़ी और उनके साहित्य का भरपूर स्वागत हुआ, किंतु शासन को अपने निहित स्वार्थों के कारण वे सहन न हुए। जेल, देशनिकाला, आक्रमण, बरबादी आदि से उन्हें हताश करने का प्रयत्न किया गया, पर वे झुके नहीं। उन्हें नास्तिक घोषित किया गया। जब वे मरे तो कोई पादरी संस्कार कराने न आया। एक वीरान जगह में उन्हें गाढ़ दिया गया। शासन ने जिस साहित्य को ढूँढ़−ढूँढ़कर जला दिया था, वह गुपचुप छपता रहा और लोगों द्वारा मनोयोगपूर्वक पढ़ा जाता रहा और छिपी चिनगारी ने दावानल बनकर शासन में क्राँति कर दी।

कब्र खोदकर उनकी अस्थियों का जलूस निकाला गया, जिसमें 3 लाख जनता उपस्थित थी। अस्थियों पर शानदार स्मारक बनाया गया।

दार्शनिक नीत्से ने उन्हें ‘हँसता हुआ सिंह’ कहा। वेले ने कहा, वे युग के सड़े शरीर की चिकित्सा करने आए थे। विक्टर ह्मगो ने कहा, वे अनाचार के विरुद्ध आजीवन लड़ने वाले योद्धा थे। उनकी आत्मनिर्भरता, लक्ष्य के प्रति समर्पण भावना और कर्मठता अद्भुत थी।


अनंत ब्रह्माँड में छिपे पड़े हैं ऊर्जापुँज

अनन्त ब्रह्मांड स्वयं में अगणित आश्चर्य समेटे हुए हैं। इसका एक अद्भुत घटक है ‘ब्लैक होल’ जो न केवल विशेषज्ञ खगोलविदों के लिए जिज्ञासा का विषय बना है बल्कि सामान्य जन के लिए भी रोचकता लिए हुए है। यह ब्रह्मांड में विद्यमान अदृश्य पिण्ड है, जिसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति इतनी सशक्त है कि इसकी पकड़ से कुछ भी नहीं बच सकता। यहाँ तक कि प्रकाश की किरणें भी इससे नहीं बच पाती। अतः यह कोई प्रकाश नहीं देता व नहीं इसे देखा जा सकता। इसका अनुमान इसके चारों ओर खगोलिय पिण्डों में होने वाली प्रतिक्रियाओं से लगाया जाता है।

इस अद्भुत खगोलीय पिण्ड का सर्वप्रथम विचार रॉयल सोसायटी के फैलो, अंग्रेज खगोलविज्ञानी जान माइकल ने 1983 में दिया। माइकल ने सुझाव दिया था कि कृष्ण सितारों का अस्तित्त्व हो सकता है जिनका गुरुत्वाकर्षण बल इतना सशक्त है कि प्रकाश भी उनसे नहीं बच सकता। इनके पश्चात् पियरे लेप्लेस नामक वैज्ञानिक भी सन् 1798 में अपनी गणनाओं के आधार पर इन्हीं निष्कर्षों पर पहुँचा। लेकिन लोगों को इनकी यह अद्भुत परिकल्पना एवं निष्कर्ष हास्यास्पद लगे और 19 वीं सदी में इनकी बातों को भूला देना ही उचित समझा गया। पुनः अल्बर्ट आइन्स्टाइन के सामान्य सापेक्षतावाद सिद्धान्त के प्रकाश में यह परिकल्पना पुनः उभर कर आई। इसके आलोक में ऐसी किसी चीज के अस्तित्त्व होने की बात महसूस की जाने लगी।

इस सिद्धान्त के अनुसार किसी भी वस्तु का गुरुत्व बल अपने परिवेश के दिक्-काल को वक्रता प्रदान करता है। एक विशेष गुरुत्वाकर्षण बल पर समय एकदम विरामवस्था में आ जाता है। सिद्धान्त के अनुसार इस स्थिति में सितारा अपने गुरुत्व के दबाव में आकर माइक्रो सेकेंड के अन्दर दिक्-काल की ‘सिंगुलरिटी’ में अंतःस्फुरित हो जाएगा व आकाश में एक ब्लैक होल रह जाएगा।

कई दशकों तक ब्लैक होल की चर्चा एक कोरी गणितीय उत्सुकता के रूप में रहीं। कोई भी यह सोच नहीं सकता था कि पदार्थ सिमटकर इतनी उग्र स्थिति में आ सकता है जो ब्लैक होल का रूप ले ले। इससे पहले कि ब्लैक होल पुनः व्यंग का विषय बनते साठ के दशक में इसके प्रमाण स्वरूप कुछ-कुछ संकेत मिलने प्रारम्भ हो गए। खगोलविदों ने तारों और सौर मण्डल के सदस्यों के व्यवहार में एक विशेष बिन्दु के इर्द-गिर्द असामान्य व्यवहार को देखा, इस विशेष बिन्दु पर ये पिण्ड अपने निश्चित पथ पर घूमते हुए कुछ विचलित हो जाते थे और उस बिन्दु से गुजर जाने के बाद पुनः अपने सामान्य पथ पर घूमते थे।

सन् 1967 में सुग्राही दूरदर्शी यंत्रों की सहायता से पल्सर तथा न्यूट्रॉन सितारों का पता चला। न्यूट्रॉन सितारे ब्लैक होल बनने से पूर्व की स्थिति है। ब्लैक होल के संबंध में प्रायोगिक रूप से कुछ जानने के लिए नासा ने ‘उहुरु’ नामक प्रथम खगोलिक कृत्रिम उपग्रह बनवाया, जिसे एयरो स्पेस रिसर्च सेन्टर से 12 दिसम्बर 1970 को अंतरिक्ष में छोड़ गया। उहुरु ने अपने रेडियो टेलिस्कोपों से ऐसे 200 तारा स्रोतों का पता लगाया जो एक्स-रे और अवरक्त तरंगें उत्सर्जित करते थे। अध्ययन द्वारा खगोलविदों ने पाया कि लिग्नस एक्स-1 में कोई ब्लैक होल अवश्य है, क्योंकि परीक्षण में इससे वे ही लक्षण पाए गए जो सैद्धान्तिक रूप से ब्लैक होल के लिए पूर्ववत घोषित किए जा चुके थे। इस तरह के ब्लैक होल की उपस्थिति का पता अमेरिकी अंतरिक्ष कार्यक्रम के वैज्ञानिकों ने 1962 में लगा लिया। इस ब्लैक होल का द्रव्यमान सूर्य से 10-15 गुना अधिक था जबकि इसका अर्द्धव्यास मात्र 30-45 किमी. ही था। लिगनस एक्स-1 प्रति सेकेंड इतनी ऊर्जा उत्सर्जित कर रहा था कि इसकी एक सेकेंड की ऊर्जा से सारे विश्व की गाड़ियाँ प्रतिदिन 100 किमी. की गति की दर से 100 अरब वर्षों तक दौड़ सकती हैं।

इसके बाद ब्रह्मांड में ब्लैक होल के कुछ संभावित व कुछ स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। अमेरिका की एस्ट्रानामिकल सोसायटी की बैठक में रमेश नारायण ने ब्लैक होल सम्बन्धी अपने अनुमानित प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने अंतरिक्ष में ऐसी गैस के प्रमाण जुटाए हैं जो अकल्पनीय रूप से गर्म हैं। उक्त गैस का तापमान दस खरब डिग्री सेल्सियस बताया गया है। इतने उच्च ताप का पृथ्वी पर अस्तित्त्व का कोई प्रमाण नहीं है, सूर्य के गर्भ में करोड़ों नाभिकीय विस्फोट एक साथ होते रहते हैं, जिसके कारण इसके गर्भ में तापमान दो करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। भयानक रूप से गर्भ गैस का तापमान सूर्य से 50,000 गुना अधिक है। इसका इतना अधिक तापमान कैसे सम्भव हुआ? इसकी ऊर्जा कहाँ से आ रही है? सैद्धान्तिक रूप से इसका कारण ब्लैक होल बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि उक्त गैस के आसपास कोई ब्लैक होल अवश्य होना चाहिए।

मेसाच्यूट इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के शोधदल ने पाँच ब्लैक होल खोजे, जो पड़ोसी सितारों के पदार्थ को अवशोषित कर रहे थे व जिनके चारों ओर अभिवृद्धि मण्डल विनिर्मित थी। पदार्थ इनमें गिरकर एक्स रे को छोड़ रहा था। इन किरणों से ‘फ्रेम ड्रेगिंग’ का मापन किया गया। दल के प्रधान डॉ. वी लुई के अनुसार ‘अभिवृद्धि डिस्क’ में डाँवाडोल हो रहा पदार्थ फ्रेम ड्रेगिंग का प्रमाण है। पदार्थ का कक्ष तभी लड़खड़ा सकता है जबकि इसके चारों ओर का दिक्काल घसीटा जा रहा हो। यह ब्लैक होल के अस्तित्त्व को प्रमाणित कर देता है।

1994 में हब्बल स्पेस टेलिस्कोप की सहायता से गर्म द्रव्य की एक डिस्क खोजी गई जो मंदाकिनी एम-87 के केन्द्रीय क्षेत्र के इर्द-गिर्द 20 लाख किमी. प्रति घण्टे की गति से घूम रही थी। यह हमारी मंदाकिनी से लगभग 150 लाख पार सेकेंड दूर स्थिति है। इसके केन्द्रिय क्षेत्र में एक किलोपार सेकेंड से भी लम्बा गैस का फव्वारा फूट रहा था। एम-87 के केन्द्र के चारों ओर की अभिवृद्धि डिस्क, एक बृहद् ब्लैक होल के गुरुत्वीय आकर्षण से प्रभावित होने का प्रमाण प्रस्तुत कर रही थी। इसका द्रव्य हमारे सूर्य से 30 अरब गुना अधिक था।

1994 में ही आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय एवं किले विश्वविद्यालय से खगोलविदों ने बी-404 सिग्नी युग्मतारा समुदाय में एक तारकीय ब्लैक होल खोजा। इस युग्मतारे समुदाय के कक्षीय घेरे ने ब्लैक होल का सही-सही प्रमाण दिया। इस द्रव्य सूर्य से 12 गुना अधिक था वह इसके इर्द-गिर्द सूर्य के द्रव्य के 70' द्रव्य का सामान्य सितारा था।

अमेरिका के ओहियो स्टेट विश्वविद्यालय के दो खगोलशास्त्री ब्रेडले पीटरसन एवं करलेण्ड ने 1995 में एन.जी.सी.-5548 नामक आकाशगंगा का अवलोकन करते हुए अनायास ही एक ब्लैक होल को खोज लिया तथा उसे तारे निगलते हुए देखा।

नवम्बर 97 की न्यूजवीक पत्रिका में प्रकाशित लेख के अनुसार हब्बल स्पेस टेलिस्कोप से प्रत्येक मंदाकिनियों के केन्द्र में जहाँ भी देखा गया, एक वृहद ब्लैक होल पाया गया। चूँकि प्रचण्ड गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण प्रकाशन की किरण तक इससे बच नहीं पाती, इसे देखना सम्भव नहीं। मंदाकिनियों के केन्द्र के चारों ओर गैस के उमड़ते बादल-बवण्डरों की गति से ही इसका अनुमान लगाया गया। हब्बल ने यह भी पाया कि ये ब्लैक होल पेटू थे। यदि हर मंदाकिनी के केन्द्र में ब्लैक होल होते हैं तो क्या हमारी आकाशगंगा के केन्द्र में भी है? नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक चार्ल्स टाउंस के अनुसार ने अनेक तरह की विकिरणों के अध्ययन से बताया कि अभी निश्चित तो नहीं कह सकते, लेकिन वहाँ अत्यधिक संघातीत द्रव्य विद्यमान है, जो ब्लैक होल भी हो सकता है।

खगोलविदों के एक अन्य दल ने अपनी मंदाकिनी के बीचो−बीच हमारे सूर्य से लगभग 26 लाख गुना बड़ा एक भीमकाय ब्लैक होल होने का दावा किया है। आकाशगंगा के केन्द्र के समीप 30 लाख किमी. प्रति घण्टा की गति से घूम रहे सितारों की गति सबसे सशक्त प्रमाण प्रस्तुत कर रहा है कि एक वृहद् ब्लैक होल पृथ्वी की मंदाकिनी के केन्द्र पर गुरुत्वीय आश्रय प्रदान कर रहा है। 200 से भी अधिक सितारों के गति का मापन करते हुए मेक्स प्लाँक इन्स्टीट्यूट फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल फिजिक्स, जर्मनी के शोध वैज्ञानिकों ने पाया कि आकाशगंगा के केन्द्र के समीपस्थ सितारे बहुत ही तीव्र गति से चल रहे थे। इनमें कुछ की गति तो 600 मील प्रति सेकेंड तक थी, खगोलविद् एंड्रियास एकार्ट कहते हैं कि सितारों को यह गति सूर्य से 260 लाख गुणा अधिक द्रव्य की वस्तु ही प्रदान कर सकती है और यह आकाशगंगा के केन्द्र में ब्लैक होल का सबसे सशक्त प्रमाण मिला है। सितारों की इस गति की अन्य कोई व्याख्या नहीं हो सकती। अभी तक आकाशगंगा के केन्द्र में ब्लैक होल की उपस्थिति एक विवादास्पद विषय रहा था। आकाशगंगा का केन्द्र सूर्य एवं इसके ग्रहों से 26,000 प्रकाशवर्ष दूर है।

‘कम्पेनियन टू द कोस्मोस’ में जॉन ग्रिबिन लिखते हैं कि हमारी मंदाकिनी में 100 अरब चमकीले सितारे, हजारों लाखों वर्षों से विद्यमान हैं। इनमें 4000 लाख मृत पल्सार (शाँत न्यूट्रॉन सितारे) हैं। अनुमानतः ब्लैक होल इसके एक चौथाई अर्थात् 1000 लाख तो मंदाकिनी में यत्र-तत्र बिखरे हुए होंगे ही। दूसरी मंदाकिनियों में ब्लैक होल की ऐसी ही प्रचुरता हो सकती है।

एक अनुमान के अनुसार जब दो ब्लैक होल अपने आस-पास की द्रव्यराशि को उदरस्थ करते हुए आमने-सामने आ जाते हैं और एक दूसरे को हड़पना चाहते हैं तो तीव्र आकर्षण के परिणाम स्वरूप होने वाले टकराव से इतना ताप उत्पन्न होता है कि दोनों ब्लैक होल ऊर्जा और गैस के रूप में बदल जाते हैं। पुनः तारों एवं निहारिकाओं का निर्माण होता है। इस तरह ऊर्जा एवं पदार्थ के विकास से निर्माण और विनाश की प्रक्रिया चलती रहती है।

ब्लैक होल रूपी विचित्रता के बिन्दु में जहाँ भौतिक नियम टूट जाते हैं, आकाश और काल की सत्ता समाप्त हो जाती है, इसका उल्लेख ऋग्वेदों में भी किया गया है। महर्षि अरविन्द ने आध्यात्मिक दृष्टि से ऋग्वेद को ज्योति का महाकाव्य कहा है। भौतिक सत्ता के संदर्भ में इसे कृष्ण तत्त्व की कामायनी भी कह सकते हैं। इस तत्त्व के द्रष्ट प्रखर मनीषा वाले ऋषि थे। इन्हें सघन अंधकार के गह्वर में लम्बी दूरी को चीरकर देखने वाली आँखें मिली थीं। इसलिए इन्हें दीर्घतमस की संज्ञा दी गई है। उनके तत्त्वदर्शन की स्थापना है कि सारी सृष्टि की रचना ज्योति एवं ऊर्जा के संयोग से होती है और विश्व की सभी प्रकाशमयी आकृतियाँ कालिमा के विराट् शून्य से उत्पन्न होती है।

‘कृष्ण अम्बं महि वर्षः करिकृतः’ उनका कहना है कि जब नीले आकाश में निशा सुन्दरी के काले केश लहराते हैं तब उनसे उजली किरणें फूट पड़ती हैं- ‘तमुगुवः केशिनी संसहिटोमेरा’ ब्रह्मांड उद्भव की कणीय व्याख्या को वैदिक शब्दावली में रजोवाद कहा गया है। रज के दो रूप माने गये हैं- कृष्ण स्वरूप और उज्ज्वल स्वरूप। महर्षि दीर्घतमस की मान्यता है कि भौतिक सत्ता और प्राणिक समष्टि दोनों के अंतरों में कृष्ण तत्त्व के बीच निहित हैं, ‘आकृष्णेन रजसा वर्तमानं निवेशयन अमृतं च मर्त्य च’ इन्हीं बीजों के अंकुरण से संसार की उत्पत्ति होती है। ऋषियों की अंतर्दृष्टि के अनुसार किसी नन्हें से काले बिन्दु में सारा विश्व समाहित रहता है।

आज वैज्ञानिक ब्लैक होल की प्रतिवर्ती घटना के रूप में व्हाइट होल का विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं। चूँकि द्रव्य का विनाश नहीं होता, अधिक से अधिक उसका ऊर्जा में रूपांतरण होता है। खगोलविदों की कल्पना है कि ब्लैक होल में गिरने वाला द्रव्य की एक ऐसी अवस्था में आ सकती है जब महत्तम घनत्व पर पहुँच कर, दिक् काल के किसी अन्य क्षेत्र में हमारे या किसी अन्य विश्व में एक विस्फोट के रूप में प्रकट हो, तो इसे व्हाइट होल की संज्ञा दी जाएगी। दिक् काल के दो क्षेत्र ब्लैक होल यहाँ और व्हाइट होल वहाँ एक सुरंग द्वारा संबद्ध रहते हैं। ब्लैक होल में हड़प होने वाला द्रव्य इसी सुरंग से होकर व्हाइट होल में विस्फोट के रूप में प्रकट होता है।

‘गॉड एण्ड न्यू फिजिक्स’ के चर्चित लेखक पॉल डेविस के अनुसार ब्लैक होल अनंतता की ओर जाने वाले तीव्रगामी मार्ग का प्रतिनिधित्व करता है। इसके गुरुत्त्व की अप्रशाम्य पकड़ असहाय यात्री को ‘सिंगुलेरिटी’ की ओर खींचती है, जहाँ एक माइक्रो सेकेंड बाद वह समय एवं विलुप्ति की अंतिम सीमा पर पहुँचता है। सिंगुलेरिटी अज्ञात लोक के मार्ग की यात्रा का अंत है। यहाँ भौतिक जगत् का अस्तित्त्व समाप्त हो जाता है।


स्वभाव से छूटता ही नहीं (Kahani)

स्वाभिमान, विद्वता, प्रतिभा, उदारता और समर्पण के समन्वय का नाम है−प्रफुल्लचंद्र राय। वे इंग्लैंड से उच्च शिक्षा लेकर लौटे। आते ही अध्यापन और अपने छात्रों को आदर्श बनाने में लग गए। उनका वेतन एक हजार से ऊपर था, पर उसमें से निजी खरच के लिए अस्सी रुपया ही लेते थे। शेष निर्धन छात्रों की सहायता में लगाते थे। उन्होंने विवाह नहीं किया। इससे खरच बढ़ेगा और छात्रों के साथ जितना समय लगाना पड़ता है, उतना न लग सकेगा।

उन्होंने भारतीय औषधि शास्त्र का गहरा अध्ययन करने के उपराँत बंगाल केमिकल्स की स्थापना की। प्रामाणिक औषधियों की माँग चरम सीमा तक हुई और कंपनी अच्छे मुनाफे में चलने लगी। एक बार उनके मैनेजर ने एक दवा नकली बना दी। उनने लाखों का घाटा सहकर उसे गंगा में बहा दिया। उनकी इस न्यायनिष्ठा ने उनकी औषधियों की प्रामाणिकता तो बढ़ा ही दी, विदेशियों की निगाह में भारतीय चरित्र भी ऊँचा उठा।

ऊँटों का एक बड़ा काफिला सौदागरी का माल लादकर सफर पर निकला। मालिकों ने रात बिताने के लिए एक सराय खोजी। मालिकों को चारपाइयाँ मिल गई, पर ऊँटों को तो जमीन पर ही सुस्ताना था।

ऊँटों की रस्सी बाँधने के लिए खूँटियाँ गाढ़ी गई। आदत के मुताबिक जो बँध गए, वे चैन से सुस्ताने लगे। एक खूँटी कम पड़ रही थी। ऊँट कैसे बाँधा जाए, इसके बिना वह बैठने तक को तैयार नहीं हो रहा था।

सराय मालिक समझदार था। उसने सलाह दी, झूठ−मूठ जमीन में खूँटी गाढ़ो और झूठ−मूठ ही उससे रस्सी बाँध दो। ऐसा ही किया गया। तरकीब काम दे गई। ऊँट बैठ गया और सुस्ताने लगा। अब सवेरा होते−होते बड़ी समस्या आई। खूँटी उखाड़ने पर और सब ऊँट तो उठ बैठे, पर वह उठने को राजी न होता था। सराय मालिक ने सलाह दी कि झूठ−मूठ खूँटी उखाड़ो और रस्सी हिलाकर उठाओ। ऊँट उठ बैठा और काफिले के साथ चलने लगा।

काफिले में एक बुजुर्ग थे। उनने ज्ञानचर्चा करते हुए साथियों से कहा, ‘मनुष्यों की आदत भी इस ऊँट जैसी ही है। वे भी ढर्रे के आदी हैं। उन्हें झूठ भी सच और अच्छा लगता है। सच को जानने और समझने की कोशिश ही नहीं करते, इसी कारण जो कुछ भी सरल, सुगम व अभ्यास में आ गया है, वह स्वभाव से छूटता ही नहीं।


इक्कीसवीं सदी के मानव का आहार

सृष्टि दिव्य ऊर्जा से ओतप्रोत है। इसके सारे क्रिया-व्यापार इसी ऊर्जा का ही परिणाम है। ऊर्जा के रूपांतरण के कारण ही सृष्टि के अनेक एवं असंख्य घटकों का निर्माण, विकास एवं विनाश होता रहता है। इस वैदिक सत्य को महान् ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने भी स्वीकार किया है। इस ऊर्जा की मात्रा जिसमें जितनी मात्रा में होती है वह इतना ही प्रखर एवं तेजस्वी होता है। परन्तु प्रखरता एवं तेजस्विता के लिए पात्रता की आवश्यकता होती है, ग्रहणशीलता की जरूरत पड़ती है। और इस ऊर्जा को ग्रहण करने के भिन्न तरीके होते हैं।

सामान्यतः मनुष्य एवं जीव जन्तु आहार के माध्यम से इस ऊर्जा को ग्रहण करते हैं। इन भोज्य पदार्थों में मूल रूप से ब्रह्मांडीय ऊर्जा ही परिव्याप्त रहती है। भोज्य पदार्थ पृथ्वी से इस ऊर्जा को अवशोधित करते हैं और पृथ्वी सूर्य से इसे ग्रहण करती है। समस्त ग्रह नक्षत्र ब्रह्मांडीय ऊर्जा से अपने जीवन यापन के लिए ऊर्जा प्राप्त करते हैं और पुष्ट व प्रखर बनते हैं। ऋषि कहते हैं कि भगवान् के इस ब्रह्मांड में कहीं भी ऊर्जा की कमी नहीं है। सर्वत्र विपुल मात्रा में ऊर्जा का संचरण हो रहा है, आवश्यकता तो केवल इसे अपने अन्दर समा लेने की क्षमता या पात्रता की है।

पंचतत्त्व को अपने वातावरण में धारण करने वाली इस पृथ्वी को रत्नगर्भा एवं उर्वर माना जाता है। परन्तु वर्तमान विज्ञान एवं टेक्नालॉजी के इस युग में इसकी स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो गई है। एबी हेडन के अनुसार आज की पृथ्वी की परिस्थिति बड़ा ही संकटपूर्ण है। और इसका मुख्य कारण है इसके कई तत्त्वों का प्रदूषित हो जाना है। कार्ल सेगन के अनुसार जल में जहर घुल गया है, जमीन बंजर होती जा रही है। वायु विषाक्त हो गयी है तथा आकाशीय जैव विद्युत् तरंगें भी क्षतिग्रस्त होती चली जा रही हैं।

हेडन के अनुसार हमारी पृथ्वी रुग्ण और व्याधिग्रस्त हो गई है। इससे निदान के लिए यह उत्तरी ध्रुव के माध्यम से उतरती ब्रह्मांडीय ऊर्जा से सर्वप्रथम अपने आपको ठीक करती है, स्वयं का कायाकल्प करती है। हेडन अपने आत्मविश्वास के आधार पर कहती हैं कि यह विपन्न अवस्था ज्यादा समय तक रहने वाली नहीं है। उनकी भविष्य दृष्टि कहती है कि आने वाले दिनों में परिस्थितियाँ बदलेंगी और पार्थिव चेतना का विस्तार होगा। इससे धरती फिर से उर्वर होगी। इसके गर्भ से उत्पन्न होने वाले अन्नों में पोषक तत्त्वों की मात्रा में वृद्धि होगी। भोज्य पदार्थ विटामिन, वसा, लवण एवं कार्बोहाइड्रेट से युक्त होंगे। उसमें भरपूर ऊर्जा होगी, जिससे मानव जीवन भी स्वस्थ होगा। हेडन कहती हैं कि इक्कीसवीं सदी में धरती में एक नवीन प्रकार की ऊर्जा प्रवाहित होगी, जो जड़-जमीन, जीव-वनस्पति तथा मनुष्य को भी प्रभावित करेगी। इससे भोज्य पदार्थ भी पोषकयुक्त होंगे और मानव जीवन भी स्वस्थ व सम्पन्न होगा।

इस नूतन एवं दिव्य ऊर्जा का बोध सर्वप्रथम विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकेगा। इन पदार्थों से शरीर को नई स्फूर्ति एवं शक्ति मिलेगी। इससे न केवल शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक स्थिति में ही बदलाव आएगा। बल्कि मनुष्य की प्रकृति में भी परिवर्तन परिलक्षित होगा। इसमें प्रकृति के अनेक नये आयाम प्रकट होंगे तथा चेतना में भी वृद्धि होगी।

इस नवीन ऊर्जा का अनुभव सबसे पहले शाक-सब्जियों के द्वारा होगा। उर्वर जमीन से प्राप्त कुछ हरे सब्जियों में तो ऐसी पोषण शक्ति मिल सकेगी, जो कि अब तक के अनुभव से परे होंगी। ये पोषक तत्त्व मनुष्य में नई प्रकार के प्रभाव डालेंगे। सबसे पहला प्रभाव होगा कि मन स्वस्थ, शान्त एवं स्थिर होगा। दूसरे प्रभाव में शरीर अधिक सक्रिय एवं जीवन्त होगा। हिमालय में कुछ ऐसी ही कन्द एवं शाक-सब्जियों का संकेत मिलता है, जिसे खाने के पश्चात् अनेकों प्रकार की दिव्य अनुभूतियों होती हैं। शरीर एवं मन स्वस्थ प्रसन्न रहता है। सम्भव है हेडन की भावी परिकल्पना इस सत्य को सार्थक कर दिखाए।

इन विशुद्ध आहार से चेतना परिष्कृत होगी। इससे जहाँ एक ओर बाह्य व्यक्तित्व में निखार आयेगा, तो दूसरी ओर आन्तरिक पट खुलेंगे। परिष्कृत चेतना की इन अवस्थाओं में स्वप्न सार्थक दिखेंगे। विधेयात्मक मनोवृत्ति के बढ़ने से नकारात्मक सोच घटेगी, तनाव, उदासी आदि कम होंगे। प्रसन्नता, हल्कापन एवं ताजगी का अहसास किया जा सकेगा।

एबी हेडन के अनुसार इस नवीन दिव्य ऊर्जा का धरती में प्रवेश इक्कीसवीं सदी के आगमन के साथ ही हुआ है। इसका संकेत बीसवीं सदी के विदाई के साथ ही मिलने लगा था कि इक्कीसवीं सदी कुछ विशेष लेकर आएगी। वह कहती हैं कि यह मात्र कपोल कल्पना नहीं है बल्कि यथार्थ एवं हकीकत है। इक्कीसवीं सदी में सर्वप्रथम दृश्य जगत् में कई अनोखी घटनाओं के साथ ही आहार का यह ऊर्जा स्रोत अनुपम एवं अद्भुत होगा। चूँकि ये खाद्य पदार्थ ऊर्जा एवं पोषक तत्त्वों से भरे होने के कारण कम मात्रा में भरपेट खाने के समान होंगे। अब ज्यादा खाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

आयुर्वेद की मान्यता को सत्य प्रकट करते हुए हेडन कहती हैं कि इससे व्यक्ति संयमी हो सकता है। कोई व्यक्ति यदि काफी मात्रा में सलाद खाता है तो उसे अब दो या तीन टुकड़ों में पर्याप्त पोषण मिल जाएगा। अतः उसे ज्यादा खाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दो-तीन गिलास दूध के स्थान पर दो-तीन चम्मच से काम चल जाएगा। इसी प्रकार सभी प्रकार के भोजन में यह तथ्य क्रियान्वित होने लगेगा।

दिन में एक-दो रोटी या दो-तीन टुकड़े ब्रेड खाकर उतनी चुस्ती-फुर्ती के साथ मानसिक एवं शारीरिक कार्य किया जा सकता है जितना की कई बार भरपेट भोजन करने के बाद किया जाता है। कुछ विशिष्ट फलों एवं शाक-सब्जियों में वृत्तियों को परिष्कृत करने की क्षमता रखने वाली ऊर्जा विद्यमान होती है। व्यक्ति अपने मनोनुकूल भोज्य पदार्थ खोजेगा और इससे लाभान्वित होगा। कहीं माँसाहारी एवं मसालेदार आहार को प्रश्रय नहीं दिया जाएगा। सभी ओर सात्विक एवं शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता मिलेगी। यही नहीं व्यक्ति अपनी भोजन सम्बन्धी जिन आदतों एवं रुचियों से बंधा हुआ है वह भी इस नई पद्धति से निजात एवं मुक्ति पा सकता है। वह भी एक नये सात्विक आहार की ओर आकर्षित हो सकता है। अतः सारे विश्व में एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति के शंखनाद के सदृश्य एक सात्विक भोजन का प्रचलन बढ़ेगा। इससे संसार में सात्विकता की वृद्धि होगी और सभी ओर खुशहाली और प्रसन्नता दिखाई देगी। सभी इस नयी ऊर्जा से ऊर्जावान, प्रखर एवं तेजस्वी होंगे।


बलिदान से नई प्रेरणा ली (Kahani)

बंदा वैरागी भक्तिकाल में ही जन्मे। बहुत दिन संतों के सत्संग में रहे। साथ ही बाहर से निरंतर आने वाले आक्रमणकारियों का अनाचार भी देखते रहे। वे गंभीरतापूर्वक सोचने लगे− इन दिनों जनता में शौर्य, साहस, पराक्रम और प्रतिरोध की भावना भरी जानी चाहिए। देवताओं की प्रार्थना से सब दुःख दूर हो सकते हैं, इस भ्राँत धारणा को हटाया जाना चाहिए अन्यथा प्रतिरोध के अभाव में आक्रमणकारियों के हौसले बढ़ते ही रहेंगे और वे भारत का जो भाग स्वतंत्र है, उसे भी पैरों तले रौंद डालेंगे।

उनने सोचा, संत लोग बेसमय बेतुकी शहनाई बजा रहे हैं और परोक्ष रूप से आक्राँताओं के प्रतिरोध का रास्ता रोककर आक्राँताओं के ही सहायक बन रहे हैं। बंदा वैरागी ने जितना अधिक विचार किया, उतना ही उन्हें यह तथ्य स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा।

उनने अपनी विचारपद्धति और कार्यशैली बदली। अपने शिष्यों−साथियों को तथ्यों से अवगत कराया और आक्राँताओं के मुँह तोड़ने की तैयारी करने लगे। यद्यपि वे आक्राँताओं द्वारा पकड़े जाने पर मृत्युदंड के भागीदार बने, पर सभी विचारशील ने उन्हें ‘सत्य के लिए शहीद हुआ संत सैनिक’ कहकर सराहा और उनके बलिदान से नई प्रेरणा ली।


बड़ा ही रोचक है ‘माला’ का विज्ञान

‘माला’ शब्द से मंत्र जप का सहज स्फुरण होता है। धर्म कोई भी हो, देश कोई भी हो, जहाँ भी मंत्र जप या प्रभु का नाम स्मरण करने की रीति है, वहाँ माला का प्रचलन जरूर मिलता है। अध्यात्म साधनाओं का विशेषज्ञ देश कहे जाने वाले भारत में इसकी विविधता पर विशेष विचार किया गया है। लिंगपुराण (85/109-111) में प्राप्त विवरण के अनुसार अंगुलियों पर मंत्र जप से एक गुना, पर्व पर जपने से आठ गुना, पुत्रजीव (इंगुदीवृक्ष की तरह का एक वृक्ष) की माला से जपने पर दस गुना, शंख की माला से जपने पर सौगुना फल मिलता है। इसी तरह मूँगे की माला से जप करने पर हजार गुना, मणियों की तथा रत्नों की माला से जप करने पर दस हजार गुना, मोती की माला से जप करने पर लाख गुना जप का सुफल होता है। पद्माक्ष की माला से किया गया जप दस लाख गुना, सुवर्ण की माला से किया गया जप करोड़ गुना, कुश ग्रन्थि से किया गया जप अरब गुना तथा रुद्राक्ष की माला से किया गया जप अनन्त गुना फल देता है।

तंत्रसार ग्रन्थ के अनुसार वैष्णव मंत्रों के जप के लिए तुलसी की माला श्रेष्ठ मानी गयी है। गणेश जी के मंत्र जप के लिए हाथी दाँत की माला का विधान है। त्रिपुर सुन्दरी की मंत्र साधना के लिए रक्तचन्दन अथवा रुद्राक्ष को श्रेष्ठ कहा गया है। कालिका पुराण में अलग-अलग कामनाओं के लिए अलग-अलग तरह की माला की बात कही गयी है। इसके अनुसार कुशग्रन्थि की माला सर्वपाप नाशक, पुत्रजीव की माला पुत्रदायक, मणिमाला सर्वाभिष्टदायक तथा मूँगे की माला विपुल धनदायक है। सनत्कुमार संहिता में माला के सूत्रों से भी फल की विशेषता बतायी गयी है। इस विवरण के अनुसार कपास के सूत से गूँथी गयी माला धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष दायक मानी गयी है। इसमें भी कुमारी कन्या के हाथों काते गए सूत का विशेष महत्त्व होता है। इस प्रयोग में सूत के रंगों का भी महत्त्व है। उजला सूत शान्ति कर्म में, लाला वशीकरण में, पीला अभिचार कर्म में, काला सूत मोक्ष तथा ऐश्वर्यसिद्धि में लाभदायक माना गया है।

शास्त्रकारों के अनुसार माला को गूँथते समय निरन्तर ॐकार का जप करना आवश्यक है। माला गूँथने के बाद स्वच्छन्द-माहेश्वर तंत्र में बताए गए सद्योजात मंत्र- ‘ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः। भवे-भवे नातिभवे भजस्व माँ भवोद्भवाय नमः’ द्वारा पंचगव्य से संस्कार कर चन्दन अगरु एवं पुष्पादि से उसकी पूजा करके गायत्री मंत्र से उसे धूपित करना चाहिए। अन्त में वाराही तन्त्र में कहे गए मंत्र- ‘ॐ माँ माले महामाले सर्वतत्त्व स्वरूपिणी। चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्ये सिद्धिदा भव॥’ से उसमें प्राण प्रतिष्ठ करनी चाहिए। इस तरह संस्कारित एवं प्रतिष्ठित माला से जप करने से जापक को शीघ्र सिद्धि मिलती है।

मन्त्रशास्त्र के विशेषज्ञों के अनुसार मंत्र जप करते हुए माला का गिर पड़ना या टूट जाना अशुभ माना गया है। ऐसी स्थिति में ‘ह्री’ मायाबीज से उसकी पूजा करनी चाहिए। जप समाप्ति के बाद भी उपर्युक्त मंत्र से तथा लाल फूल से पूजा करके उसे गोमुखी में रख देना चाहिए। लिंगपुराण, गौतमीतंत्र एवं तंत्र सार आदि ग्रन्थों में कामना भेद से विभिन्न अंगुलियों के प्रयोग का विधान निर्देशित किया गया है। लिंगपुराण (85/114-116) के अनुसार मंत्र जप में अंगूठा मोक्षदायक, तर्जनी शत्रुनाशक, मध्यमा अंगुली धनदायक तथा अनामिका शान्तिदायक कही गयी है। जपकर्म में कनिष्ठिका अंगुली का प्रयोग किसी भी तरह से निषिद्ध है। इसी तरह अंगूठे के बिना कोई भी सत्कर्म अधूरा माना गया है। मंत्र साधक को अपनी कामना के अनुसार अंगूठे के साथ किसी अन्य अंगुली का इस्तेमाल करना चाहिए। सभी शास्त्रकारों ने प्रायः एक स्वर से माला में 108 दानों की बात कही है।

मालाओं में वैजन्तीमाला की भी बड़ी प्रसिद्धि है। शास्त्र विवरणों के अनुसार भगवान् विष्णु इसे धारण करते हैं- वैजयन्तीं च मालाम् (श्रीमद्भागवत् 10/21/5) इसके अतिरिक्त वनमाला और जयमाला का भी उल्लेख मिलता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार ये तीनों ही एक हैं और कुछ के मत से भिन्न। सत्य जो भी हो, पर इतना अवश्य है कि वैजयन्ती माला में प्रायः पाँच प्रकार की मणियों को गूँथा जाता है। ये पंचमणियाँ पंचमहाभूतों या पाँच तत्त्वों की प्रतीक है। उदाहरण के लिए इन्द्रनीलमणि अथवा नीलम पृथ्वी तत्त्व की प्रतीक है। मोती जलतत्त्व का प्रतीक है। पद्मराग या लालमणि अग्नितत्त्व का प्रतीक है। पुष्पराग मणि वायुतत्त्व का प्रतीक है। वज्रमणि अथवा हीरक आकाशतत्त्व का प्रतीक है।

अन्य देशों और धर्मों में माला का इतना सूक्ष्म व गहन विवेचन भले ही न मिलता हो, परन्तु माला के प्रयोग का विधान अवश्य है। बौद्धों की माला में भी प्रायः 108 दाने ही होते हैं। कहा जाता है कि गौतम बुद्ध के जन्म के समय 108 ज्योतिषी उनका भाग्यफल बतलाने के लिए बुलाए गए थे। माला के 108 दाने उसी के प्रतीक हैं। बर्मा में बुद्ध के पदचिह्न के भी 108 भाग हैं। तिब्बत में बौद्धों का धर्म लेख ‘कहग्यूर’ भी 108 पंक्तियों में लिखा है। चीन का पेकिंग स्थित उज्ज्वल श्वेत मन्दिर भी 108 यूपों से घिरा है। जापान में मृतक-श्राद्ध में 108 दीपक जलाए जाते हैं तथा 108 मुद्राओं का दान किया जाता है। उनके यहाँ सर्वत्र ही 108 का महत्त्व है। कहा जाता है कि गौतम बुद्ध के मरने के समय उनकी चिता की भी 108 प्रदक्षिणाएँ की गयी थीं। अतः माला में भी 108 दाने होते हैं।

बौद्ध धर्म भारत के अलावा बर्मा, लंका, चीन एवं जापान आदि देशों में प्रचलित है। देशों की विविधता के अनुसार उनकी मालाओं में थोड़ा बहुत भेद अवश्य है। भारतीय बौद्धों की माला प्रायः हिन्दुओं के समान होती है। माला पर ये सभी बुद्ध का नाम या ‘मणि पद्मे हुम्’ का जप करते हैं। तिब्बतवासी बौद्ध माला को ‘थेंगवा’ या ‘थेंगनगा’ कहते हैं। लामाओं के लिए इसका पहनना जरूरी है। जापानी बौद्धों की मालाएँ 112 दानों की होती हैं और उनमें दो सुमेरु 56 दानों के बाद होते हैं। जापान में पहले पीपल की लकड़ी की माला बनती थी, क्योंकि यही बोधिवृक्ष है। और इसी के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान हुआ था। लेकिन इन दिनों जापान में पीपल की लकड़ी न मिलने के कारण बेर तथा रुद्राक्ष की मालाएँ ज्यादा बनने लगीं हैं। जापानी कनो, कीतो और गोमा महोत्सवों पर मालाओं की बड़ी प्रतिष्ठ करते हैं।

जैनियों की जप माला में 111 दाने होते हैं। इनमें 108 दानों पर ये ‘णमो अर्हन्ताय’ का जप करते हैं, शेष तीन पर ‘सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित्रेभ्यो नमः’ का जप करते हैं। जैनियों के यहाँ पर दो तरह की मालाओं का प्रयोग होता है। एक को ये लोग गणितियाँ और दूसरी को ये काँचनीया माला कहते हैं। सिक्ख पंथ के लोग अपनी माला में दानों के स्थान पर मुलायम रुई का इस्तेमाल करते हैं। परन्तु यह रुई टिकाऊ नहीं होती है। इसलिए ये लोग विशेष उत्सवों पर लोहे की माला का व्यवहार करते भी देखे जाते हैं।

अरब-ईरान, तुर्की आदि में इस्लाम धर्म की बहुलता है। अपने देश भारत में इस्लाम धर्म को मानने वालों की अच्छी-खासी संख्या है। इस्लाम धर्म में माला को ‘तसबीह’ कहा जाता है। इस तसबीह में 99 दाने होते हैं। इसमें से मुख्य दाना ‘इमाम’ कहलाता है। इनकी माला तीन भागों में बंटी होती है। प्रायः प्रत्येक भाग के दानों का रूप-रंग दूसरा होता है। उसका आकार भी दूसरा होता है और वे अलग-अलग पदार्थों के बने होते हैं। इस्लाम में एक दूसरी तरह की माला का प्रचलन भी देखने को मिलता है। इसमें 99 के स्थान पर 101 दाने होते हैं। इसमें 101 पैगम्बरों का नाम जुटा माना जाता है। डॉ. गेश्चर ने लिखा है कि कहीं-कहीं ये दाने अल्लाह से भी सम्बद्ध माने जाते हैं। पैगम्बरों के नाम का कोई प्रमाणिक आधार नहीं मिलता।

इस्लाम में माला का प्रचार कब से हुआ, इस बारे में कई किम्वदन्तियाँ मिलती हैं। किन्तु एच. थर्स्टन का विचार है कि बौद्धों से ही उन्हें माला का ज्ञान मिला। इस्लाम की कई शाखाएँ हैं और इनमें से प्रत्येक शाखा अपने दानों के विशेष पवित्र होने का दावा करती हैं और अलग-अलग पदार्थों के दाने तैयार करके माला बनाती हैं। वहाबी मुसलमान जो अब्दुल वहाब के अनुयायी हैं, अंगुलियों पर ही गणना करते हैं। लकड़ी की माला का प्रयोग प्रायः सभी करते हैं। मक्के की मिट्टी के दाने बहुत अधिक पवित्र माने जाते हैं। पत्थर, सीसा और गुठलियों के भी दाने होते हैं।

मूँगे और मोती की माला का भी इस्लाम में प्रचलन है। शिया मुसलमान करबला की मिट्टी के दाने बनाते हैं, जहाँ हुसैन को दफनाया गया था। अरब के सुन्नी मुसलमान भारतीय मालाओं का प्रयोग भी करते हैं। मुस्लिम धर्म में ऊँट की हड्डी के दानों की माला का भी प्रचलन है। कभी-कभी वे इन दानों को हुसैन की मृत्यु के उपलक्ष्य में लाल रंग में भी रंग लेते हैं। हसन-हुसैन को जहर देकर मारा गया था। अतः उसका रंग मरने के बाद हरा हो गया था, इसलिए वे कभी-कभी इन दानों को हरे रंग में भी रंग लेते हैं। फकीरों की माला प्रायः विभिन्न रंग के सीसे की गुटियों की होती है। शोधकर्त्ताओं के अनुसार मिश्र में 1000 दानों की माला का उपयोग किया जाता है, यह उपयोग मरण संस्कार के बाद किया जाता है। उस समय कुछ कुरान की आयतें पढ़ने का भी प्रचलन है।

धार्मिक इतिहास के विशेषज्ञ एच. थर्स्टन का मत है कि इसाइयों में माला का प्रचार मुसलमानों से हुआ। हालाँकि कई शोधकर्त्ता इस तथ्य में सन्देह प्रकट करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इसाइयों के रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय में 150 दानों की माला का प्रचलन है। ये माले 15 बड़े दानों से 10 भागों में विभक्त होते हैं। रोमन साधुओं की माला में 100 दाने होते हैं। ये तीन बड़े दानों से 4 भागों में विभक्त होते हैं। यहूदियों में माला का कोई विशेष धार्मिक महत्त्व नहीं है। वे इसे केवल क्रीड़ा या विनोद के लिए पर्व तथा उत्सवों पर धारण करते हैं। इनमें कुछ मालाएँ 32 दानों की और कुछ मालाएँ 99 दानों की होती हैं। इतिहासकारों का मानना है कि इन्होंने इसे तुर्क एवं यूनानवासियों से ग्रहण किया।

इतिहासविद् जेम्स प्रिस्टन का कहना है कि माला का इतिहास बहुत ही गम्भीर होते हुए भी रोचक है। अनेकों ऐतिहासिक तथ्य इस बात के साक्षी हैं कि माला का सम्पूर्ण विज्ञान हिमालय और गंगा की गौरवपूर्ण सम्पदा वाले ऋषियों के देश भारत में विकसित हुआ। यहीं से यह समय-समय पर अन्य देशों के निवासियों ने आँशिक रूप में इसे ग्रहण किया। प्रिस्टन के अनुसार माला का विश्व व्यापी प्रचार कैसे हुआ? अभी यह शोध का विषय है। परन्तु इस विज्ञान के वैज्ञानिक प्रयोगों को बरकरार रखना उनका अनिवार्य कर्त्तव्य है, जो भारत की धरती पर रहते हैं और बसते हैं।


तपस्वी की इच्छा (Kahani)

डॉ. विश्वेश्वरैया भारत के माने हुए इंजीनियर थे। एक गाँव से होकर गुजरे तो वहाँ के अध्यापकों ने स्कूली बच्चों के सामने कुछ भाषण करने को कहा। थोड़ी आनाकानी के पश्चात वे सहमत हो गए और एक छोटा−सा भाषण दे दिया। मार्ग में वे बिना तैयारी का अस्त−व्यस्त भाषण देने की भूल पर दुखी हुए और अगले सप्ताह स्कूल में दुबारा भाषण देने की बात लिखी। अध्यापकगण पत्र पाकर आश्चर्य में थे इतने व्यस्त व्यक्ति दुबारा बिना बुलाए क्यों आ रहे हैं?

आने पर उनने अपना लिखा भाषण पढ़ा और कहा, आप लोग बच्चे हैं, इससे क्या, मुझे अपने भाषण का स्तर नहीं गिराना चाहिए था। अच्छी चीज तैयारी के बाद ही बनती है। मुझे अपनी पिछली भूल का प्रायश्चित्त करने के लिए दुबारा आना पड़ा।

एक तपस्वी किसी धर्मात्मा राजा के महल में पहुँचे। राजा गदगद हो गए और पूछा, आज मेरी इच्छा है कि आपको मुँह माँगा उपहार दूँ। तपस्वी ने कहा, आप ही अपने मन से सबसे अधिक प्रिय वस्तु दे दें, मैं क्या माँगूँ।

राजा ने कहा, अपने राज्य का समर्पण कर दूँ। तपस्वी बोले, वह तो प्रजाजनों का है। आप तो संरक्षक मात्र हैं। राजा ने बात मानी और दूसरी बात कही, महल, सवारी आदि तो मेरे हैं, इन्हें ले लें। तपस्वी हँस पड़े, राजन् आप भूल जाते हैं। यह सब भी प्रजाजनों का है। आपको कार्य की सुविधा के लिए दिया गया है।

अबकी बार राजा ने अपना शरीर दान देने का विचार व्यक्त किया। उसके उत्तर में तपस्वी ने कहा, यह भी आपके बाल−बच्चों का है, इसे कैसे दे पाएँगे। राजा को असमंजस में देखकर तपस्वी ने कहा, आप अपने मन का अहंकार दान कर दें। अहंकार ही सबसे बड़ा बंधन है। राजा दूसरे दिन से अनासक्त योगी की तरह रहने लगा। तपस्वी की इच्छा पूर्ण हो गई।


विज्ञान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि ‘जिनाँम’ की जानकारी

जीन आनुवाँशिक गुणों के वाहक हैं। ये जीवन के निर्देशक एवं नियामक होते हैं। जीन रूपी इस सूक्ष्म कृति में समूचा मानव जीवन छुपा एवं सुप्त रहता है। यह तीन अक्षरों के युग्म होते हैं। आनुवाँशिक निर्देश के कार्यान्वयन का कार्य प्रोटीन द्वारा होता है। एन्जाइम समेत इन रसायनों का निर्धारण जीन करते हैं। वे जीन के निर्देशों का पालन करते हैं तथा कोशिका के काम को क्रियान्वित करते हैं। जीनोम किसी जीव में आनुवाँशिक पदार्थ की समूची व्यवस्था है। मानव जीनोम में तीन अरब डी.एन. ए. होते हैं। डी.एन.ए. जीवन की मौलिक रासायनिक इकाई है।

जीनोम के ज्यामिति शास्त्रियों ने अंतरकोशिकीय रहस्य के रूप में जीवन की परिकल्पना की है। यह स्वप्न लोक जैसे मोहक एवं आकर्षक लगता है। इसके स्वप्न दृष्ट थे- हक्सले। सन् 1932 में प्रकाशित ‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ में आनुवाँशिकी की पटकथा लिखी गई थी। अब प्रजनन तथा अनुकूलता के आधुनिक केन्द्र में जीनोम का पदार्पण हुआ है। इस प्रोजेक्ट की स्थापना 1986 में हुई। सन् 1990 में इसका वास्तविक स्वरूप एवं क्रियान्वयन प्रारम्भ हुआ। सन् 1997 में पूर्ण मानवी जीनोम का प्रकाशन हुआ। अब इसके निर्माण सम्बन्धी खोज में 50 देश सम्मिलित हैं। ये हैं- आस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, डेनमार्क, फ्राँस, जर्मनी, इजराइल, इटली, जापान,कोरिया मैक्सिको, नीदरलैण्ड, रूस, स्वीडन, इंग्लैण्ड और अमेरिका आदि।

मानव जीनोम तीन अरब रासायनिक रेखाओं का तंतु है। डी.एन.ए. समस्त जीवन का बुनियादी निर्माण प्रखण्ड है। इसका रहस्योद्घाटन जून 2000 में हुआ। इस अन्वेषण का श्रेय दो प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी वैज्ञानिक क्रेग वैटर एवं फ्राँसिस कोलिंस को जाता है। इन्होंने मनुष्य का विस्तृत एटलस प्रस्तुत किया है। इसमें वैज्ञानिकों ने उस प्रश्न का समाधान देने का प्रयास किया गया है कि मानव कैसे मानव बना। इस संदर्भ में ब्रिटेन स्थित वंलकम ट्रस्ट के डायरेक्टर माइकल डेक्सटर का कहना है कि यह परिणाम अनुसंधानकर्त्ताओं का धरोहर है।

समस्त प्राणियों में मानव सबसे जटिल जीव है। अत्याधुनिक अन्वेषण रूपी जीनोम के अनुसार मनुष्य में एक लाख से अधिक जीन के तंतु पाये जाते है। अमेरिकी वैज्ञानिक इसकी संख्या 26 से 38 मानते हैं। ब्रिटिश वैज्ञानिक इसे 30 से 40 हजार बताते हैं। जीन की यह संख्या सन् 2000 में प्रकाशित ‘बुक ऑफ लाइफ’ में उल्लेखित जीनों की संख्या की तुलना में एक चौथाई है। परन्तु वर्तमान एटलस में मानव शरीर में 30,000 जीन का जिक्र हुआ है। मानव जीन की यह संख्या चूहे के जीन के लगभग बराबर, मक्खी के जीन से तीस गुना और वैवरीरिया से पाँच गुना अधिक है।

ब्रायन जे. फोर्ड ने अपनी पुस्तक ‘जीन’ में स्पष्ट किया है कि एक मानव डी.एन.ए. में 80 हजार जीन होते हैं। जीन की सम संख्या के अनुसार वेस पेयर निश्चित नहीं होता है। एक जीन में हजारों वेस पेयर हो सकते हैं। एक जीन 12,000 बेस पेयर कोड करता है जिससे 4,00 एमीनो एसीड का निर्माण सम्भव है। हमारे शरीर में एक लाख प्रकार के प्रोटीन होते हैं। जीन एमीनो एसिड के निर्माण हेतु जिम्मेदार है। एक प्रोटीन 20 विभिन्न प्रकार के एमीना एसिड से विनिर्मित होता है। आधुनिकतम शोध के अनुसार मानव डी.एन.ए. संरचना में 3 विलियन रासायनिक बेस होते हैं।

जीनोम जीन के अनावृत्त रहस्यों पर प्रकाश डालता है। यह इनके वास्तविक स्वरूप की भी जानकारी प्रदान करता है। इस प्रोजेक्ट के पूर्व की मान्यता थी कि प्राणी की संरचना की जटिलता बढ़ने के साथ ही डी.एन.ए. की मात्रा बढ़ जाती है। वैज्ञानिक अब भी इसे सही मानते हैं। परन्तु सैलेमेण्डर इसका अपवाद है। यह अत्यन्त छोटा जीव होने के बावजूद इसमें डी.एन.ए. की मात्रा मानव से तीस गुनी अधिक होती है। लिली में 90,000 मिलियन वेस पेयर होते हैं। यह संख्या बैक्टीरिया में 4.7 मिलियन वेस पेयर, यीस्ट में 15 मिलियन, नोमोटोड में 80 मिलियन, चूहा में 3,000 मिलियन, सैलेमेण्डर में 90,000 मिलियन वेस पेयर होते हैं।

कुछ विशिष्ट जीन को छोड़ दिया जाये तो शेष जीन चूहों और मनुष्यों में एक समान होते हैं। सभी मनुष्यों में जेनेटिक पदार्थ की एकरूपता 99-99 प्रतिशत होती है। क्रेग वेण्टर के सहयोगी एवं सलेरा के वरिष्ठ विज्ञानी मणिसुब्रमण्यम् ने इस तथ्य को अद्भुत एवं आश्चर्यजनक माना है। जब विभिन्न नस्लों-काकेशियाई, अफ्रीकी, अमेरिकी और एशियाई के मानव जीनोम अनुक्रम की तुलना की तो प्राप्त निष्कर्ष भी चौंकाने वाले थे। उनके बीच अद्भुत समानतायें थीं। प्रत्येक दस हजार वर्षों के कूट वाचन में एक अश्वेत और एक श्वेत व्यक्ति के बीच केवल एक वर्ष का अन्तर मिला। इसी वजह से मेसम्पुसंट्रस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी सेण्टर फार जीनोम रिसर्च में सिक्वेसिंज सेंटर के सहायक निर्देशक चाड नासबाय कहते है कि जेनेटिक दृष्टिकोण से समस्त मानव एक समान है। यहाँ पर ‘मानव मात्र एक समान-एक पिता की सब सन्तान’ की उक्ति चरितार्थ होती देखी जा सकती है।

जीनोम योजना के अनुसार पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति सम्भवतः एक लाख वर्ष पूर्व हुई। हालाँकि यह अत्यन्त छोटा काल है फिर भी यह मानवी विकास के संदर्भ में यह कई जानकारियाँ प्रस्तुत कर सकता है। ‘बुक ऑफ लाइफ’ में उल्लेख मिलता है कि कुछ विशिष्ट जीन मानव व्यवहार को प्रभावित एवं नियंत्रित करते हैं। पहले-पहल हुए शोध के निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि मानव अपने जीन का गुलाम है। जीन ही मानवी व्यवहारों का आधार हैं। ये ही इस पर नियंत्रित करते हैं। परन्तु आधुनिक शोध परिणाम के अनुसार जीन मनुष्य की कुछ जैविक क्रियाओं को नियमित करते हैं। इससे स्वभाव भी प्रभावित होते हैं। प्रभाव मनुष्य के व्यवहार के लिए वातावरण एक महत्त्वपूर्ण कारक है। मनुष्य का भावनात्मक विकास, शारीरिक गठन एवं उदात्त चिंतन उसके आसपास के वातावरण से तय होते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में डॉ. क्रेग वेण्टर का कहना है कि जीन मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं,इस तथ्य को पुष्ट करने के लिए विशिष्ट जीन का पता नहीं लग पाया है। परन्तु आशा की जा रही है कि इस प्रकार के जीन की खोज कर ली जायेगी।

जीन संरचना के अन्वेषण के क्रम में तितली ही सर्वप्रथम प्राणी है जिसकी अध्ययन किया गया। उसके शरीर में 13 हजार जीन पाये गये। तब वैज्ञानिक मान्यता थी कि मानव शरीर में एक तितली या दूसरे किसी कीट पतंगे की तुलना में कई गुना जीन होंगे। परन्तु आधुनिक अन्वेषण से विदित होता है कि मनुष्य की जीन की संख्या इनमें केवल दो गुना होता है। डॉ. वेण्टर के अनुसार कुछ जीन तो चूहे, बिल्लियों, कुत्तों एवं मनुष्यों में एक समान होते हैं। मानवी क्रोमोसोम में सैकड़ों जीन होते हैं जो बैक्टीरिया द्वारा लाये गये हैं। कुत्ते में 85 प्रतिशत जीन इंसानी जीन के सदृश्य होते हैं। कुत्तों की 380 आनुवाँशिक बीमारियाँ मनुष्यों में भी होती हैं। इनमें से अंधापन और लीवर खराब होना शामिल है। नासबाय के अनुसार चूहे और मनुष्यों में जीन की कार्यशैली में अन्तर है। मनुष्य के जीन चूहों की अपेक्षा अधिक सशक्त व अधिक प्रोटीन का निर्माण करते हैं।

मानवी शरीर की संरचना तैयार हो जाने से चिकित्सा क्षेत्र में तीव्र विकास की संभावना बढ़ी है। इससे बीमारी एवं उनकी चिकित्सा में गुणात्मक परिवर्तन आ सकता है। जीन की पहचान हो जाने से बीमारी का उपचार सहज हो गया है। अब उपचार की प्रक्रिया हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होगी। यह अत्यन्त प्रभावी सिद्ध हो सकता है। मानवी जीनों की समानता के बावजूद रुग्ण जीन की पहचान की जा सकती है। अब तक 40 रुग्ण जीनों का परिचय मिल चुका है।

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व उपलब्धि मिली जब एण्डी नामक विश्व का प्रथम रूपांतरित डी.एन.ए. बन्दर पैदा हुआ। कुछ वैज्ञानिक इसे अल्जीमर्स व कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक मानते हैं तो कुछ इसे मानव जाति के लिए असाधारण क्षण मानते हैं। डॉ. जैरल्ड शैटन खंडा. एन्थोनी चान के दल ने रीसस बन्दरों के अनिषेचित अण्डों में फ्लूरेसेण्ट जैलीफिश में पाये जाने वाले ‘मार्कर जीन’ प्रवेश कराये। इन अण्डों को प्रयोगशाला में निषेचित करके धात्री माता नामक बन्दरिया के गर्भाशय में किया गया। इसके परिणाम स्वरूप जन्मे जीन बानर शिशुओं में से एक का नाम एण्डी रखा गया। इन तीनों बानरों में एकमात्र एण्डी के जेनेटिक ब्लूप्रिण्ट में ही मार्कर जीन का सफलतापूर्वक एकीकरण हो पाया था। यदि एण्डी की सन्तानें होंगी, तो ये मार्कर जीन उनके संतानों में पहुँच जायेंगे।

ओरेगान रिजनल प्रिमेट सेण्टर के डॉ. जैरल्डौटन के अनुसार इस बन्दर का जन्म मानव जाति के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना है। इनका कहना है कि बानरों को अब इस प्रकार रूपांतरित किया जा सकता है जिससे कि वे विभिन्न प्रकार से सम्बन्धित जीन को अपने अन्दर वहन कर सकें। ऐसे बंदरों के औषधि निर्माण सम्बन्धी क्षेत्र में उपयोग किया जा सकता है। इनकी उपयोगिता का कारण है इनका 98 प्रतिशत डी.एन.ए. मानव जीन से सम्बन्धित होना। डॉ. चान ने स्पष्ट किया है कि अब ऐसे जानवरों को जन्म दिया जा सकता है जो इंसानी रोगों का अनुकरण कर सकते हैं। अल्जीमर्स रोग जैसी जेनेटिक स्थितियों वाले बंदरों को जन्म देना संभव है। इन पर इस रोग के उपचार के लिए नई दवाइयों का प्रयोग भी किया जा सकता है।

चिकित्सा विज्ञान क्षेत्र में जैविकीय रूपांतरित चूहों का उपयोग किया जा चुका है। वैज्ञानिक आचार संहिता के जनक ‘दि जेनेटिक रिवोल्युशन’ कृति के लेखक प्रोफेसर पैट्रिक डिक्सन की मान्यता है कि यह प्रयोग अजन्मे शिशुओं में जैविकीय दोषों के निवारण हेतु किया जा सकता है। परन्तु यह बड़ा ही संवेदनशील मामला है क्योंकि इसमें जरा सी भी छेड़खानी अगले एक लाख पीढ़ी को प्रभावित कर सकती है। जीनोम प्रोजेक्ट द्वारा हजारों की संख्या में अस्वस्थ जीन की पहचान की जा सकती है। वर्तमान समय में केवल 483 ऐसे जीनों की जानकारी है। चूँकि मानवी जीनों में काफी समानता होती है परन्तु इनके जेनेटिक कोड में भारी अन्तर होता है। यही वह कारण है जिससे चिकित्सा जगत् में आशातीत सफलता पायी जा सकती है। अतः नवीनतम उपचार बेहद व्यक्तिगत होने की संभावना है। वैज्ञानिक भविष्यवाणी है कि कुछ ही वर्षों में बीमारी के लक्षण दिखने से पूर्व ही इसका पता लगाया जा सकता है।

जीन यदि रुग्ण है तो इसमें परिवर्तन की संभावना बनी रहती है, इसमें सूक्ष्म हलचलें होती हैं। इन्हीं के आधार पर उपर्युक्त उपचार किया जा सकता है। दवाओं के निर्माण के लिए भी यही कारक प्रयुक्त हो सकता है। प्रमुख ब्रिटिश जीव विज्ञानी जेनेट वेनब्रिज के अनुसार वर्तमान में प्रचलित दवायें अनुमानों पर आधारित हैं। जीनोम परियोजना दवा निर्माण में कारगर एवं सफल भूमिका अदा कर सकती है। ग्लैक्सोस्मिथ विलन के उपाध्यक्ष डॉ. क्लाइव डिक्स ने इसे उत्साहवर्धक माना है। बीमारी का पता भी आसानी से लग सकता है। ज्ञान वर्ष के अथक परिश्रम से सिस्टिक फाइब्रोसिस का पता चल पाया। चिकित्सा इतिहास में यह प्रथम रुग्ण जीन था। जीनोम के अंतर्गत कुछ क्षण में ही इस बीमारी की जानकारी मिल जायेगी। अब तक ऐसे 30 जीन का परिक्षण हो चुका है। इसमें से कैंसर, वर्णान्धता और मिर्गी जैसी कुछ सामान्य रोग भी शामिल हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के जीनोम सेंटर के संयोजक और कोलिंस के नेतृत्व वाले अन्तर्राष्ट्रीय संघ में सहकर्मी जेनेटिक विज्ञानी रविंदर कोल के अनुसार जन्म से ही जेनेटिक संरचना के पता लग जाने से इसका उपचार किया जा सकता है एवं बीमारी से बचा जा सकता है। जो बीमारी एक जीन द्वार होती है उसकी प्रक्रिया सरल होती है परन्तु कई जीनों द्वारा उत्पन्न रोग को ठीक करना जटिल होता है। दमा कई जीनों के सम्मिलित प्रभावों का परिणाम है। अतएव दमा को स्वस्थ करने के लिए जिम्मेदार हर जीन के साथ उन समीकरणों के अध्ययन की आवश्यकता है,जिससे वे अन्तः क्रिया करते हैं।

इस प्रकार जीनोम एक उपलब्धि है, जिससे मानव को रोग मुक्त करने में एवं नवीन शोध अन्वेषण करने में सहायक है। जहाँ तक बीमारी से मुक्त होने की बात है, यह मन पर अधिक निर्भर करता है। स्वस्थ दिनचर्या एवं सशक्त मन द्वारा सहज सरल जिन्दगी जिया जाना सम्भव है। जीवन के यही सद्गुण भावी जीवन क्रम को प्रभावित करते हैं। अतः सदैव सद्कर्म एवं सद्चिन्तन करते रहना चाहिए।


दाँव पर लगा दिया (Kahani)

समर्थ गुरु रामदास शिवाजी को स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी होने का श्रेय देना चाहते थे, इसके निमित्त उन्हें कभी खाली न जाने वाली भवानी तलवार भी दुर्गा से दिलवाना चाहते थे, पर अनुदान देने से पूर्व उनकी पात्रता परख लेना आवश्यक था।

समर्थ ने एक दिन अचानक कहा कि उनके पेट में भयंकर शूल उठा है। प्राण बचाने का एक ही उपाय है कि सिंहनी का दूध मिले। गुरुभक्त और साहस के धनी शिवाजी उसे लाने के लिए तत्काल चल पड़े। माँद में सिंहनी बैठी बच्चों को दूध पिला रही थी। शिवाजी ने कहा, माता, आप मेरे उद्देश्य और संकल्प की उत्कृष्टता पर विश्वास करें तो थोड़ा दूध दे दें। सिंहनी ने सहर्ष दूध निकाल लेने दिया । पात्रता की परख हो गई। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी की सफलता के लिए सब कुछ दाँव पर लगा दिया।


आसक्ति अनंत बार मारती है।

भिक्षु तिष्य के मुख पर प्रसन्नता छलक उठी। कभी वह अपने हाथों में पकड़ी हुई मुलायम-कोमल चादर को देखता, तो कभी अपनी बहन सुवर्णा की ओर। सुवर्णा ने कई महीने की कड़ी मेहनत के बाद यह चादर तैयार की थी। इसमें कई रंगों का अनूठा मेल था। कलात्मकता का अद्भुत संगम थी यह चादर। अपने एक हाथ में चादर पकड़े और दूसरे हाथ से उसे बार-बार सहला रहे तिष्य को वर्षा-वास के महीने याद आ गए। भिक्षु संघ के नियमों के अनुसार भिक्षुओं को वर्षा के तीन-चार महीने एक ही स्थान पर रहकर साधना करनी होती थी। वर्षा-वास के बाद भिक्षु जब अपनी प्रव्रज्या हेतु पुनः निकलते तो लोग उन्हें भेंट देते। भेंट भी क्या? थोड़ी सी भेंट लेने की ही उन्हें आज्ञा थी।

शास्ता के आदेश के अनुसार वे केवल तीन वस्त्र ही रख सकते थे, इससे ज्यादा नहीं। यदि कोई चादर भेंट करता, तो पुरानी चादर छोड़नी पड़ती। इसी तरह यदि कोई भिक्षा पात्र भेंट करता तो पुराना भिक्षा पात्र छोड़ना पड़ता। पिछली वर्षा वास के दिनों के बाद भिक्षु तिष्य जब गाँव से चलने लगे, तो उन्हें एक ग्राम निवासी ने एक चादर भेंट की। यह चादर मोटे सूत की थी। मोटे सूत की मोटी सी चादर ऊपर से छूने में काफी खुरदरी। बड़े बेमन से तिष्य ने उसे अपने हाथों में लिया था। भिक्षु संघ के नियमों के अनुसार वह कुछ कह नहीं सकते थे। तथागत ने नियम ही कुछ ऐसे बनाए थे। इन नियमों के अनुसार भिक्षु को आज्ञा नहीं थी कि उसे जो दिया जाय, उसमें वह शिकायत करे, किसी तरह की कोई कमी निकाले।

लेकिन साधना पथ की प्रधान बाधा चतुराई है। यह चतुराई कोई न कोई तरीका निकाल ही लेती है। तिष्य ने भी अपनी चतुराई से चालाकी भरा मार्ग खोज निकाला। उसी गाँव में उसकी बहन सुवर्णा रहती थी। तिष्य को जब यह चादर भेंट की गयी थी, तो पास में वह भी खड़ी थी। सम्भवतः वह अपने भाई को विदा करने आयी थी। भिक्षु तिष्य ने बिना कुछ कहे बड़े ही उदास मन से सुवर्णा के हाथ में वह मोटी चादर थमा दी। वाणी से कुछ न कहने के बावजूद तिष्य के चेहरे की घनी उदासी ने सब कुछ कह दिया था। तिष्य के मनोभावों को एक पल में ही समझकर सुवर्णा ने संकेत से ही उन्हें आश्वासन दिया कि वह थोड़े ही दिनों में उन्हें एक अच्छी सी सुन्दर चादर दे देगी।

इस आश्वासन से तिष्य की उदासी छटने लगी। सुवर्णा उस चादर को लेकर अपने घर आ गयी। उसने पहले तो उस मोटे सूत वाले चादर को तेज चाकू से पतला-पतला चीर दिया। फिर उसे ओखली में कूटा और धुना। बाद में उससे पतले सूत वाली यह सुन्दर-सुकोमल चादर तैयार की। इस बीच भिक्षु तिष्य बड़ी आतुरता से इस चादर की प्रतीक्षा करते रहे। मन ही मन उन्होंने अपनी कामनाओं और कल्पनाओं को न जाने कितनी बार कितनी तरह बुना। ऐसी होगी सुवर्णा द्वारा बनाई गई चादर। अरे नहीं, वह चादर कुछ वैसी होगी। फिर उसे ओढ़कर इस तरह से चलूँगा, उस तरह से चलूँगा।

आज वह घड़ी भी आ गयी, जब सुवर्णा ने अपनी महीनों की मेहनत से तैयार की गयी चादर उनके हाथों में थमा दी। उनका मन-मयूर नाच उठा। चादर मिलने के बाद उनकी कल्पनाओं ने कई रंग बदले, फिर वह धीरे-धीरे सघन होकर मनोकाश पर छा गयी। कल्पनाओं के सघन घन में अहंकार की दामिनी भी रह-रहकर दमकने लगी। अब भिक्षु तिष्य यह सोच रहे थे कि ऐसा सुन्दर चीवर तो स्वयं भगवान् तथागत के पास भी नहीं है। अब जब कल मैं चादर ओढ़कर निकलूँगा तो सब को पता चलेगा कि भिक्षु संघ में ऐसा सुन्दर चादर मेरे सिवा किसी दूसरे के पास नहीं है।

रात होने को आयी थी। इसलिए उस समय तो वह चादर ओढ़ना बेकार था। तिष्य सोच रहे थे कि यदि इस समय इसे ओढ़ भी ले तो अंधेरे में इसे देखेगा भी कौन? और सारा मजा तो दिखाने में है। यही सब सोचते हुए उन्होंने बड़े जतन से, बड़ा ही लाड़-प्यार करके वह चादर अरगनी पर टाँग दी। और सोने के लिए बिस्तर पर लेट गए। पर ढंग की नींद भी कहाँ थी। नींद में भी उस वस्त्र के सम्बन्ध में तरह-तरह के स्वप्न चलते रहे। कब सुबह हो, कब चादर ओढ़कर सबको दिखाऊँ। यही वासना उनके आस-पास मंडराती रही। उस रात उनकी यह वासना भले ही अपूर्ण रही हो, पर उसी रात उनकी आयु पूर्ण हो गयी। रात में ही उनका देहान्त हो गया। उस चादर के प्रति उनकी तृष्णा इतनी बलवती थी कि तिष्य मर कर चीलर हो गए और उसी चादर में छुप कर बैठ गए।

दूसरे दिन संघ के भिक्षुओं ने उनके मृत शरीर को जलाकर नियमानुसार उस चादर को आपस में बाँटने के लिए उठाया। भगवान् तथागत ने भिक्षु संघ के लिए यह नियम बनाया था कि जब कोई भिक्षु मर जाय तो उसकी वस्तुएँ परस्पर बाँट ली जाय। जिनके पास न हो, उन्हें दे दी जाय। भिक्षुओं द्वारा उस चादर को छूते ही वह चीलर (कपड़े में रहने वाला कीड़ा) तो पागल हो उठा। वह चीलर और कोई नहीं भिक्षु तिष्य का ही नया जन्म था। अरे हमारी वस्तु तुम सब क्यों लूट ले रहे हो, यह कह-कहकर वह इधर-उधर दौड़ने-चिल्लाने लगा।

उस चीलर की इस चीख-पुकार को भगवान् बुद्ध के सिवा और किसी ने भी न सुना। भगवान् ने उसकी यह चीख-पुकार सुनी और वह हँसे। हँसते हुए उन्होंने आनन्द से कहा- कि भिक्षुओं से कह दो कि तिष्य की चादर को वहीं की वहीं रहने दें। सातवें दिन वह चीलर मर गया। चीलर की भला आयु ही कितनी। जब तिष्य ही मर गए तो बेचारा चीलर कितने दिन जिएगा। सातवें दिन चीलर के मरने पर भगवान् ने भिक्षुओं से तिष्य की चादर को आपस में बाँट लेने को कहा।

भगवान् के इस तरह के आदेश से भिक्षु थोड़ा चकित थे। उन्होंने जिज्ञासु भाव से भगवान् से एक सप्ताह पहले रुक जाने और फिर आज अचानक उस चादर को बाँटने की आज्ञा का कारण पूछा। उत्तर में भगवान् ने हँसते हुए भिक्षु तिष्य के चीलर होने और उसके दुबारा मरने की बात कही। अब तो भिक्षुओं का आश्चर्य और भी बढ़ गया। सबके सब भिक्षु सोच में पड़ गए। भला यह कैसा नियति का विधान। भिक्षु तिष्य को मरने के बाद चीलर होना पड़ा।

भिक्षुओं का समाधान करते हुए भगवान् बोले, कामी अनन्त बार मरता है। जितनी कामना, उतनी बार मृत्यु। क्योंकि जितनी बार कामना, उतने ही बार जन्म। जीवात्मा की हर कामना एक जन्म बन जाती है। साथ ही हर कामना एक मृत्यु भी बन जाती है। यह कहते हुए भगवान् ने भिक्षुओं को यह धम्मगाथा सुनायी-

अयसा व मलं समुट्ठितं तदुट्ठय तमेव खादति। एवं अतिघोनचारिनं सानिकम्यानि नयन्ति दुग्गति॥

जैसे लोहे में लगने वाली जंग, उससे उत्पन्न होकर उसी को खाती है, ठीक वैसे ही साधनात्मक अनुशासन का उल्लंघन करने वाले मनुष्य के कर्म उसे दुर्गति को पहुँचाते हैं।

इस धम्म गाथा को सुनकर भिक्षुगण सचेत हो गए। आसक्ति हो या फिर ईर्ष्या, द्वेष से भरी-पूरी अहंता। सभी कुछ साधना पथ के जोखिम हैं। इनसे दूर रहने पर ही साधक का कल्याण है। ऐसा आत्म चिन्तन करते हुए भिक्षुओं ने तथागत को प्रणाम किया और ध्यान के लिए चले गए।


मूर्द्धन्य पहलवानों में गिना गया (Kahani)

यूनेज सेन्डो बचपन से ही बीमार और दुबला था। एक दिन पिता के साथ पहलवानी का दंगल देखने गया। सुडौल पहलवानों को देखकर बच्चे ने पिता से पूछा, कोई ऐसा भी उपाय है क्या, जिसे अपनाकर मैं भी ऐसा ही बन सकूँ ।

पिता ने विस्तारपूर्वक समझाया कि संयम और प्रयास−पुरुषार्थ से कोई भी, कुछ भी उन्नति कर सकता है। स्वास्थ्य सुधारने में भी निजी प्रयास ही काम देते हैं। बाहर की सहायता से बात बनती नहीं। तुम भी वह बल अर्जित कर सकते हो, जो तुम्हें अभीष्ट है।

सेन्डो ने दूसरे दिन से ही स्वास्थ्य सुधार के नियम कड़ाई से पालन करने शुरू कर दिए और उन प्रयासों में तत्परतापूर्वक जुट गया। सुविदित है कि बड़ा होने पर सेन्डो संसार के मूर्द्धन्य पहलवानों में गिना गया।


चेतना को प्रखर बनाने का एक सरल योगाभ्यास

ध्यान की विभिन्न प्रक्रियाओं में एक शक्तिशाली प्रक्रिया ‘चिदाकाश विद्या’ है । यह स्वयं को जानने की ही एक विधा है। इसमें दो शब्द सम्मिलित हैं, ‘चित्त’ और आकाश । चित्त अर्थात् चेतना, जागरुकता और आकाश अर्थात् चेतना, जागरुकता और आकाश अर्थात् स्थान। इस प्रकार चेतना को आकाश की तरह विस्तृत, व्यापक, शुद्ध और गहरा बनाना ही इसका एकमात्र उद्देश्य है। योगवासिष्ठ की प्रबुद्ध लीला ने इसी चिदाकाश में असंख्य ब्रह्माँड देखे थे। शैवगण इसे ही चिदंबर या उमा−हैमवती के नाम से संबोधित करते हैं।

जब हम आँखें बंद करते हैं तो अंदर एक गहन अंधकार दिखाई पड़ता है। बाइबिल में इसे ‘आत्मा की अँधेरी रात’ कहा गया है। यह अंधकारपूर्ण चेतना का प्रकाशन ही चिदाकाश का रूप है। इसे भूताकाश कहते हैं। सर्वसाधारण लोग आमतौर पर अंधकारमय भूताकाश में निवास करते हैं। यह अंधकार का राज्य है। प्रकाश यहाँ का आगंतुक धर्म है। प्रकाश के लिए यहाँ प्रयत्न करना पड़ता है। यही अज्ञान का निदर्शन है। इसीलिए हम हृदयाकाश को अंधकार से आच्छन्न देखते हैं। बंद नेत्रों की स्थिति में यही तमिस्रा के रूप में सामने आता है। साधक को पराक्रमपूर्वक इस तम को पार करना पड़ता है। साधना−अभ्यास से जैसे−जैसे अज्ञान का यह अंधकार छँटता है, उसका स्थान ज्ञान का प्रकाश लेता जाता है। जब अंधकार का पूर्ण विलय हो जाता है तो संपूर्ण आत्मप्रकाश खिल उठता है, हृदयाकाश आलोकमय हो जाता है। यही चित्ताकाश है। चित्ताकाश का आलोकमय परदा जब कभी हट जाता है, तब जिस प्रकार चिदाकाश दिखाई देता है, ठीक उसी प्रकार भूताकाश का अंधकारमय परदा बीच−बीच में हट जाने पर उक्त रंध्रमार्ग में आलोकित चित्ताकाश का दर्शन होता है। चिदाकाश का दर्शन ऊर्ध्व नेत्रों से, चित्ताकाश का दर्शन मध्य नेत्रों से एवं भूताकाश का दर्शन अधोनेत्रों से होता है। प्रथम दर्शन मार्ग ब्रह्मरंध्र है, द्वितीय दर्शन मार्ग भ्रूमध्य स्थित दिव्य चक्षु तथा तृतीय दर्शन मार्ग चर्मचक्षु हैं। भूत शुद्धि के कारण चित्ताकाश में तथा चित्त शुद्धि के कारण चिदाकाश में अधिष्ठान होता है। साधक का अंतिम लक्ष्य हमेशा चिदाकाश ही होता है। चिदाकाश वास्तव में विष्णु के परमपद का प्रतीक है। वह ब्रह्मनिर्वाण अवस्था है। ध्यान के अभ्यास द्वारा ही इसे प्राप्त किया जा सकता है, किंतु इसके साथ−साथ आँतरिक शुद्धि भी आवश्यक है। इसके बिना केवल ध्यान का अभ्यास कोई विशेष उपलब्धि न दे सकता।

चिदाकाश विद्या के अभ्यास से आरंभ में तरह−तरह की अनुभूतियाँ होंगी। साधक को कुहरा, धुआँ, अंधकार, सूर्य, चंद्र, तारा, वायु, अग्नि, चिनगारी, उड़ती चिड़िया, छोटे−छोटे कण आदि अनेक वस्तुएँ क्रमशः दृष्टिगोचर होती हैं। अचेतन और अर्द्धचेतन मन की गहराई में छिपी हुई बातों के आधार पर ये वस्तुएँ दिखाई देती हैं। अभ्यास से धीरे−धीरे ध्यान जब गहरा होने लगता है, तब यह अनुभूति होती है। यह अनुभूति और कुछ नहीं, विचारों की एकाग्रता का ही रूप है, जो विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के रूप में अपने प्रकट और प्रत्यक्ष करती रहती है। चिदाकाश दर्शन आत्मविकास की एक उच्च अवस्था है। अंतः के परिष्कार के साथ साथ साधक जब उस व्यापक आकाश के दर्शन हेतु ध्यान का अभ्यास करता है तो इस क्रम में वह कई आकाशों के आवरणों को भेजते हुए अंत में वहाँ अवस्थान करता है। वह एक अनंत प्रकाशमय व्यापक सत्ता है। उसे कोई शब्दब्रह्म कहता है, कोई पराशक्ति, कोई परमशून्य तो कोई पूर्ण। वह वास्तव में अवस्थाहीन होने पर भी व्यवहारतः अवस्था भेद से विभिन्न आकाश रूप में वर्णित है। मूल में आकाश एक ही है। भूताकाश से भूतावरण हट जाते ही वही चित्ताकाश हो जाता है। चित्ताकाश से गुणावरण हट जाने पर वह चिदाकाश हो जाता है। चिदाकाश निर्मल है, उस पर कोई आवरण नहीं।

हृदयाकाश चिदाकाश का ही नामाँतर है। हृदय संबंधी यह विज्ञान प्राचीनकाल में ‘दहर−विद्या’ के नाम से प्रसिद्ध था, इस कारण हृदयाकाश को दहराकाश भी कहा जाता है। अंतराकाश इसी का दूसरा नाम है। बाहर जैसा विशाल अपरिच्छिन्न आकाश दिखाई देता है, वही, दृष्टि अंतर्मुखी होने पर भीतर भी विशाल अनंत आकाश के रूप में स्फुरण होता रहता है। यह आकाश ‘हृदय’ के नाम से भी जाना जाता है। दृष्टि जब बहिर्मुखी रहती है, तब इंद्रियगोचर जगत जिस आकाश में प्रतिभासमान् होता है, वही बाह्याकाश है। इसी प्रकार दृष्टि अंतर्मुखी होने पर दृश्य−प्रपंच जिस आकाश में परिस्फुरित होता है, वही अंतराकाश या हृदयरूपी आकाश अथवा चिदाकाश है।

इस हृदय आकाश में इष्ट का स्फुरण होता रहता है। जितने दिनों तक चित्त शुद्ध नहीं होता, उतने दिनों तक अंतराकाश तमसाच्छन्न रहता है। चित्तशुद्धि के साथ−साथ अंधकार दूर हो जाता है एवं स्वच्छ प्रकाश रूप में अंतर्दृष्टि के सामने हृदयाकाश उद्भासित होता है। इसके बाद स्वच्छ आकाश में ज्योति का आविर्भाव ही ज्ञान की सूचना देता है। बाहरी आकाश में जिस प्रकार सूर्य उदय होता है, अंतराकाश में उसी प्रकार देवता रूपी सूर्य का आविर्भाव होता है। उस आलोक से तब आकाश आलोकित हो उठता है।

ऊपर जिस अंतराकाश की चर्चा की गई है, उपनिषदों में उसे ‘पुँडरीक’ अथवा ‘कमल’ कहा गया है। जब तक यह कमल प्रस्फुटित नहीं होता, तब तक अंतःकरण अंधकार से आच्छन्न रहता है । जिसे इष्ट देवता का आविर्भाव कहा जाता है, वस्तुतः वही भावों का विकास है। भावों के विकास के साथ−साथ कमल उन्मीलित होता है अर्थात् हृदयाकाश आलोकित होता है। यह हृदयरूपी आकाश अथवा पद्म इष्ट देवता का अर्थात् भगवान का आसन है। गीता के अठारहवें अध्याय में कहा गया है− ईश्वरः सर्वभूतानाँ हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयर्न्सवभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥ 61॥

इससे समझ में आ जाता है कि सभी के हृदय में अंतर्यामी पुरुषरूप में परमात्मा विराजमान हैं। वे उस शून्य आसन में अधिष्ठित रहते हुए अपनी मायाशक्ति द्वारा देह का निरंतर संचालन करते रहते हैं, किंतु अहंकार में आविष्ट जीव अपने अनेक ज्ञान और क्रियाओं पर अभिमान करता है, सोचता है, सब कुछ वही जानता और वही करता है, परंतु वास्तविकता इससे भिन्न है। सचाई यह है कि वह न कुछ जानता है, न करता है। वह द्रष्टा मात्र है। ज्ञान और क्रिया, शक्ति की लीला है। इस मायारूपिणी शक्ति का आश्रय एवं अधिष्ठाता उसके हृदय में स्थित अंतर्यामी पुरुष है। इस सिद्धाँत को स्पष्ट रूप से समझ लेने पर जीव कर्मबंधन से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

चिदाकाश या हृदयाकाश को उपलब्ध करने के अनेक उपाय हैं, पर सबसे सरल तरीका ध्यान का ही है। इस ध्यान−अभ्यास को सुगमता के लिए पाँच चरणों में बाँटा गया है। प्रथम अवस्था उस अंधकार के अवलोकन की है, जिसके अंदर चिदाकाश उस समय बंद हो जाता है, जब नेत्र बंद किए जाते हैं। द्रष्टा की भाँति उसे देखते रहना पड़ता है, मानो मानसिक आँखों के सम्मुख किसी नाटक का प्रदर्शन हो रहा हो।

द्वितीय चरण में अंधकार की जगह विभिन्न रंगों की प्रकाश किरणें दिखलाई पड़ेंगी। लाल, नीला, पीला, सुनहरा या श्वेत, इनमें से कोई एक रंग या इनका सम्मिश्रण दीख सकता है। दृष्टि केवल इन रंगों का खेल देखती रहे, उन्हें समझने का प्रयास न करे। कुछ समय तक यही क्रिया चलने दीजिए। इसके उपराँत तीसरे स्तर पर आइए।

इस स्तर पर चेतना को अँधेरे परदे की ओट से रंगों के खेल के माध्यम से गहराई में जाने दीजिए। उसे गहरी कीजिए। इससे एकाग्रता घनी होती जाएगी। इस स्तर पर मानसिक सक्रियता बढ़ जाती है, अतः द्रष्टा भाव बनाए रखिए। कुछ समय तक इस अभ्यास को जारी रखिए।

चतुर्थ अवस्था में चिदाकाश का पूर्ण निरीक्षण कीजिए। चारों ओर उसका अवलोकन कीजिए। इससे चेतना व्यापक होती जाएगी। ऐसा करते समय अपने कार्य के प्रति जागरुक रहिए। तदुपराँत पंचम श्रेणी में आइए। चिदाकाश के मध्य बिंदु पर अपनी चेतना रखना, यही पंचम अवस्था है। इस अभ्यास के द्वारा चेतना सूक्ष्म होकर अधिक गहराई में पहुँचती है। यहाँ पहुँचते−पहुँचते चित्त की शुद्धि परिपूर्ण हो जाती है और आँतरिक गगनमंडल का आलोक स्पष्ट दीखने लगता है।

चिदाकाश विद्या वास्तव में चेतना को प्रखर बनाने का ही एक अभ्यास है। इस अभ्यास द्वारा चिदाकाश चा दहराकाश की प्राप्ति अध्यात्म की एक उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जाती है। इसका भौतिक महत्व भी कम नहीं है। इससे शारीरिक−मानसिक स्वस्थता सहजता से हस्तगत हो जाती है। इसलिए भी यह एक उपयोगी साधन है। हर एक को इसका अवलंबन और लाभ लेना चाहिए।


प्रार्थना : एक अमोध औषधि

प्रार्थना परमात्मा के प्रति की गयी एक आर्त पुकार है। जब यह पुकार द्रौपदी,मीरा एवं प्रहलाद के समान हृदय से उठती है तो इसका अद्भुत प्रभाव होता है। भावमय भगवान् दौड़ा चला आता है। वह भक्त को कभी निराश नहीं करता। वह उसकी सभी प्रकार की मनोकामना को पूर्ण कर देता है। वह अपने वरदान से भक्त को सराबोर कर देता है। गहन आस्था और प्रबल विश्वास से की गयी प्रार्थना कभी निष्फल नहीं होती। इसका चमत्कारिक परिणाम होता है। इस परिणाम को पदार्थवादी वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं, स्वीकारने लगे हैं।

श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि जब मन और वाणी एक होकर कोई चीज माँगते हैं, तब उस प्रार्थना का फल अवश्य मिलता है। मन और वाणी जब एक होकर प्रभु की गुहार लगाते हैं तो उसका सिंहासन डोल उठता है और प्रभु भक्त की सभी इच्छाओं को पूरा कर देते हैं। इसीलिए तो गाँधी जी ने विश्वास प्रकट करते हुए स्पष्ट किया है कि पवित्र हृदय से निकली हुई प्रार्थना कभी व्यर्थ एवं निष्फल नहीं होती, प्रार्थना के माध्यम से ईश्वरीय प्रेम एवं कृपा की वृष्टि होती है। इंसान अपनी इच्छाओं और आकाँक्षाओं को फलीभूत होते देख सकता है। इसी कारण गाँधी जी ने जीवन में प्रार्थना को अपरिहार्य मानते हुए इसे आत्मा की खुराक कहा है।

प्रार्थना वाणी का वाक्जाल नहीं है, जिह्वा की वाचालता नहीं है, बल्कि प्रार्थना तो विकल हृदय की करुणामयी भाषा है। और जब ऐसी भावना उमड़ने-घुमड़ने लगे तो भला भगवान् कैसे शान्त रह सकता है? कैसे इसे अनसुना कर देगा। चार्ल्स फिलमोर ने इस सत्य को शब्द देते हुए उल्लेख किया है प्रार्थना सदैव सुनी जाती है, उसका उत्तर अवश्य मिलता है और यदि हमें इसका उत्तर न मिले तो समझना चाहिए कि ईश्वर के प्रति अपनी भावना में, प्रार्थना में कहीं कोई भूल हुई है,कोई व्यतिक्रम आया है। हमीं से कोई चूक हुई है,जिसका परिणाम हमें नहीं मिल पा रहा है अन्यथा एक चींटी तक की आवाज को सुनने वाला भगवान् हमारी नहीं सुनेगा, हमें जवाब नहीं देगा, ऐसा सम्भव नहीं है। त्रुटियाँ हमारे अन्दर हैं, भगवान् में नहीं।

प्रार्थना के चमत्कारिक परिणामों से चिकित्सक अन्वेषक एवं वैज्ञानिक भी अभिभूत हैं। प्रार्थना से जीवन की जटिल समस्याएँ हल होती हैं और रोग-शोक ठीक होते हैं। प्रार्थना में प्रबल शक्ति और सामर्थ्य होती है। इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए न्यूयार्क की कोलम्बिया यूनीवर्सिटी ‘स्कूल ऑफ मेडिकल साइन्सेज़’ के डॉ. रोजेरियो ए. लोवो ने एक अध्ययन-अन्वेषण किया है। जर्नल्स ऑफ रिप्रोक्टिव हेल्थ में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। डॉ. लोवो ने दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल के एक अस्पताल में गर्भस्थ शिशुओं के सर्वेक्षण के दौरान पाया कि जिन महिलाओं के लिए प्रार्थना की जाती है और जो स्वयं प्रार्थना करती हैं, उनके बच्चों का व्यवहार अधिक श्रेष्ठ हो जाता है।

प्रार्थना के प्रभाव का यह अध्ययन कृत्रिम गर्भाधारण के लिए आयीं 199 महिलाओं पर किया गया। शोध में सम्मिलित सभी महिलाओं की उम्र, स्थान एवं स्थिति एक जैसे व समान थे। 199 महिलाओं में से 99 महिलाओं के लिए अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया के प्रार्थना समूहों ने प्रार्थना की। प्रत्येक प्रार्थना समूह को गर्भाधान में आयी महिला की एक तस्वीर दी गई, जिसके लिए उसे प्रार्थना करनी थी। प्रार्थना का यह शुभ समाचार न तो उपचार से गुजर रही महिलाओं को दिया गया और न उसके परिचारकों को पता था। इसके पीछे एकमात्र उद्देश्य था कि इस सूचना का प्रभाव महिलाओं के परिणाम पर न पड़े। अध्ययनकत्ताओं को भी इस सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं दी गई।

इस अनुसंधान का परिणाम गर्भवती माताओं और उनके शिशुओं पर अत्यन्त सकारात्मक एवं उत्साहवर्धक था। डॉ. लोवी ने इस अध्ययन के पश्चात् कहा कि यह एक अविश्वनीय लेकिन यथार्थ घटना है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि प्रार्थना एक दिव्य औषधि है, महान् उपचार है। इसे सभी को अपनाना चाहिए।

प्रार्थना समस्त समस्याओं का समाधान है। उससे गम्भीर एवं गम्भीरतर रोगों से भी मुक्ति मिल सकती है। चिकित्सकों ने इसे जानने परखने के लिए डरहम में एक रिसर्च किया है। इसमें 150 रोगियों को लिया गया । ये सभी रोगी हृदय की गम्भीर रोग से पीड़ित थे। इन सभी की एन्जियों पलास्टी होनी थी। चिकित्सकों ने पाया कि उपचार के दौरान जिनके लिए प्रार्थना की गई, आपरेशन के दौरान उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई।

‘अमेरिकन हार्ट जर्नल्स’ में प्रार्थना के इस चमत्कारिक विवरण का विस्तार से उल्लेख हुआ है प्रार्थना के प्रभाव को जानने के लिए डरहम् के ड्यूक यूनीवर्सिटी मेडिकल सेण्टर में 150 रोगियों को चुना गया। इन्हें पाँच समूहों में बाँट दिया गया। इनमें से चार समूहों को सामान्य उपचार के साथ पूरक उपचार दिया गया। एक समूह को गाइडेड इमेजरी, दूसरे को स्ट्रेस रिलेक्सेशन, तीसरे को हीलिंग टच तथा चौथे समूह के लिए प्रार्थना की गई। पाँचवा ग्रुप कण्ट्रोल ग्रुप था अर्थात् इनको न कोई पूरक उपचार दिया गया और न प्रार्थना की गई। शोध के पश्चात् इसका भी निष्कर्ष विधेयात्मक निकला। जिस ग्रुप के लिए प्रार्थना की गई वह अपने सभी समूहों की अपेक्षा अधिक अच्छा था। इस ग्रुप के रोगी जल्दी स्वस्थ हो गये एवं इनका आपरेशन भी सफल हुआ।

इस प्रकार प्रार्थना से शारीरिक एवं मानसिक आधि-व्याधियाँ दूर होती हैं। प्रार्थना के द्वारा आन्तरिक प्रवृत्तियों पर विजय पायी जा सकती है और मन को नियंत्रित किया जा सकता है। निष्काम प्रार्थना से चित्त की शुद्धि होती है, चेतना का परिष्कार होता है एवं विकास होता है। व्यक्ति एक नूतन अनुभूति की प्राप्ति करता है। इसी कारण स्वामी रामतीर्थ ने प्रार्थना को देवत्व की अनुभूति एवं प्राप्ति का सुन्दर माध्यम माना है। प्रार्थना से अन्तर के समस्त कषाय-कल्मष धुल जाते हैं एवं नई चेतना का विकास होता है। अतः सच्चे मन से हृदय की गहराई से हम सबको भगवद् प्रार्थना में सदैव संलग्न रहना चाहिए।


दाह−संस्कार कर दिया (Kahani)

महाराज प्रद्युम्न का स्वर्गवास हो गया। सारा परिवार बहुत दुखी था। उन दिनों आचार्य पुरंध्र को सिद्धपुरुषों में गिना जाता था। समझा जाता था कि वे मृत को भी अपने मंत्रबल से जीवित कर सकते हैं।

पुरंध्र को पालकी में बिठाकर लाया गया। मृत को जिलाने का आग्रह लगा तो बेतुका, पर आतुरों का समाधान करने के लिए उनने सूझ−बूझ से काम लिया और कहा कि यदि मृतात्मा चाहेगी, तो वही वे पुनर्जीवित करने का काम हाथ में लेंगे।

कुटुँबी सहमत हो गए। पुरंध्र ने कहा, राजा ने अभी−अभी वटवृक्ष पर टिड्डे के रूप में जन्म लिया है। राजकुमार अनुरोधपूर्वक उन्हें पकड़ें और लौट चलने के लिए सहमत करें।

वैसा ही किया गया। ज्येष्ठ राजकुमार को लेकर पुरंध्र वटवृक्ष पर पहुँचे और अंगुलिनिर्देश करके एक टिड्डे को दिखाया− वे ही हैं स्वर्गीय सम्राट। राजकुमार टिड्डे को पकड़ने के लिए पेड़ पर चढ़े, पर टिड्डा फुर्तीला था, मनुष्य को समीप आते देखकर छलाँग लगाता, एक से दूसरी डाली पर जा पहुँचा। राजकुमार वहाँ तक पहुँचते, तब तक वह उड़कर अन्यत्र दिखाई पड़ता । इस आँखमिचौनी में सारा दिन गुजर गया, रात्रि हो गई, दीखना बंद हुआ तो राजकुमार निराश होकर वापस लौट आए।

पुरंध्र ने समझाया, राजा ने पुराने शरीर से मोह त्याग दिया है, अब उनका मन टिड्डे के शरीर में रम गया है। आप लोग उनकी इच्छा को समझें और निरर्थक मोह को छोड़ें।

कुटुँबियों का मोह टूटा और मृत शरीर का दाह−संस्कार कर दिया गया।


सादगीपूर्ण जीवनशैली ही शाँति दे सकेगी

वर्तमान समय में मानव अन्तरिक्ष युग में जी रहा है। आज विज्ञान जगत् में होड़ लगी है कि मंगल-बृहस्पति आदि ग्रहों पर स्थाई निवास के लिए बस्तियाँ जल्दी-जल्दी बनाई जाय। मानवी सभ्यता लगभग यन्त्रीकृत हो गई है एवं होती जा रही है। इस यन्त्रीकरण की दौड़ में मानव की स्वयं की हैसियत भी एक यन्त्र की तरह हो गई है। उसने स्वयं को भी महज एक कम्प्यूटर मान लिया है। बस यही कि वह कुछ और अधिक अच्छी श्रेणी का कम्प्यूटर है।

यहाँ न तो विज्ञान को नकारा जा रहा है और न उसको अनुपयोगी ठहराया जा रहा है। साधनों की आवश्यकता उपयोग के लिए है न कि उपभोग के लिए। साधनों का उद्देश्य कोई साध्य होना ही चाहिए। किन्तु यहाँ साधन-सुविधाओं की प्रचुरता में साध्य स्वयं मुख छिपा बैठा है। उसके महत्त्व की बात दूर इसके अस्तित्व से भी इन्कारा जा रहा है।

साधनों का अम्बार जुटा लेना ही पर्याप्त हो ऐसा नहीं है। इनकी प्रचुरता का एकाँगीपन किसी को सुखी नहीं बना सकता। इनके उपयोग की कला भी चाहिए। और इस कला का विकास मानवी अन्तराल के बलबूते की चीज है न कि बाह्य शरीर की। इससे अनभिज्ञ होने के कारण तथा मात्र अपने स्वरूप को शरीर एवं मन एवं बाह्य साधन की परिधि में बाँध लेने के कारण जीवन तनावपूर्ण एवं दुःखदाई होता जा रहा है।

जीवन में तनाव बढ़ने से अनेकानेक मनो-शारीरिक व्याधियाँ भी बढ़ती जा रही हैं। इन बढ़ने वाली व्याधियों में जिनकी प्रचुरता है मनोचिकित्सक उन्हें न्यूरोसिस तथा साइजोफ्रेनिया का नाम देते हैं। दोनों ही आज के मनोविज्ञान की सामान्य चीजें हो गई हैं। न्यूरोसिस का तात्पर्य है अन्तः विखण्डन। इसी तरह साइजोफ्रेनिया ग्रीक धातु साइजो से बना है जिसका तात्पर्य है स्व का विखण्डन। फ्रेन का तात्पर्य हृदय या मन से है, अर्थात् निज के हृदय का विखण्डन।

इन आम होती जा रही बीमारियों से सभी का चिन्तित होना स्वाभाविक ही है। इनके आँकड़ों में नित्य नवीन होने वाली वृद्धि ने सभी को चिन्तित कर दिया है। प्रायः सभी मनोचिकित्सक सोचने पर विवश हो रहे हैं कि इन का मूल कारण क्या है। अधिकाँशतः इस बात पर एक मत हो जाते हैं कि यन्त्रीकरण में मानव का यन्त्र रूप हो जाना एक प्रधान कारण है। डॉ. कारेन हारनी अपनी पुस्तक न्यूरॉटिक पर्सनेलिटी ऑफ ऑवर टाइम्स में इस तथ्य को उद्घाटित करते हुए लिखते हैं- जितना अधिक आज पुरुष एवं स्त्री मनोरोगी होकर जीवन बिता रहे हैं, इस वैज्ञानिक युग के पूर्व कभी नहीं थे। गलती विज्ञान की नहीं स्वयं हमारी अपनी है। हमने मानवी विकास को यन्त्रीकरण का पर्याय मान लिया है।

वस्तुतः मानव मात्र चलती-फिरती हाड़-माँस की मशीन नहीं है। इसके अलावा वह कुछ और भी है। उसका अपना निजी व्यक्तित्व है। व्यक्ति का विकास ही नहीं व्यक्तित्व का विकास भी अपेक्षित है। इसके विकास में निजी सजगता एवं इच्छा के साथ-साथ बाह्य प्राकृतिक एवं सामाजिक तत्त्व काम करते हैं। पाश्चात्य भाषा में व्यक्तित्व के लिए पर्सनेलिटी शब्द बरता जाता है और जिसका व्युत्पत्ति के अनुसार अर्थ है मुख पर पहनने का आवरण। इस तरह पर्सनेलिटी व्यक्ति का आवरण है बाह्य रूप है। भारतीय अध्यात्म विद्या के अनुसार हमारा सामान्य व्यक्तित्व शरीर प्राण व मन की बहिर्मुख संरचना है, जबकि हमारा असली निजीभाव तो हमारी आत्मा है।

प्राच्य विद्या विशारद जानते हैं जीवन आत्मा के लिए है न कि आत्मा जीवन के लिए। जीवन भी एक साधन है। साधन की उपयोगिता साध्य के लिए है। साध्य के बिना साधन का मूल्य घट जाता है।

आज साधनों की बढ़ोतरी और साध्य की हीनता ही जीवन की अस्त-व्यस्तता तथा लक्ष्य विमुखता का प्रत्यक्ष कारण है। यद्यपि साधनों की चमक-दमक का आकर्षण तो है ही। इससे बच पाना असाध्य नहीं तो दुस्साध्य तो अवश्य है। साधनों का अम्बार जुटाते चले जाने के कारण भले ही हम अन्तरिक्ष में रहने के स्वप्न देखना सीख गये हों पर धरती पर सुख-शान्ति पूर्वक कैसे रहा जाय यह हम अभी तक नहीं सीख पाए हैं।

साधन-सुविधाओं का लोभ संवरण न कर पाने का ही परिणाम है गाँव-उजड़ते जा रहे हैं और शहरों का कलेवर विशाल से विशालतर एवं विशालतम होता जा रहा है। तदनुरूप शारीरिक, मानसिक समस्याएँ भी बढ़ रही हैं। इस सम्बन्ध में विकसित कहे जाने वाले देशों की स्थिति और भी दयनीय है।

स्थिति पर विचार करने पर यह सुस्पष्ट हो जाता है। यथार्थ माने में सुख-शान्ति साधन में नहीं साध्य में है। स्वयं को यन्त्र समझ बैठने से नहीं अपितु यन्त्री के लिए यन्त्र का सदुपयोग करने से काम चलेगा।

यह सत्य लोगों की नजर में उजागर भी होता जा रहा है। वे यथार्थता के प्रति जागरुक होते जा रहे हैं। ऐसे ही लोगों में अमेरिका के ‘आर्मेडिपोज़’ है।

इन पढ़े-लिखे लोगों का समुदाय जो शिक्षित ही नहीं विवेकवान भी है, यन्त्रीकरण के रहस्य को समझ चुका है। ये साधनों की चमक-दमक के आवरण के पार की यथार्थता को भाँप चुके हैं। इन लोगों का समुदाय जिसे वह अर्मेन्लो का नाम देते हैं, उपरोक्त तथ्य पर ही आधारित हैं।

उनके अनुसार आज मनुष्य ने अपनी स्वाभाविक चेतना को भी कम्प्यूटर एवं मशीनी मानव के हवाले कर दिया है। वह कभी निहायत भौतिक हो जाता है और कभी निहायत मानवतावादी। यथार्थ में न उसमें करुणा रह गई है न ही मानवता। वह है मात्र सन्देहवादी। उसे जीवन के प्रति भी सन्देह है। इसी कारण नशे जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ तथा मनोरोगों जैसी व्याधियाँ बढ़ती जा रही हैं।

इनका एक ही उपाय है कृत्रिमता एवं यंत्रीकरण से मुक्ति। इनके लिए इन लोगों ने ग्रामीण जीवन जीना शुरू किया है। इनके द्वारा बसाए गए छोटे-छोटे गाँव, भारत के ग्रामों की ही अनुकृति है। उनका सामान्य एवं सीधा-सादा जीवन अमेरिकावासियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। इसी कारण दूरदर्शन एवं पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से उन्हें वहाँ आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

इनका ‘आर्मेडिल’ शब्द भी साँकेतिक है। हिन्दी में इनका तात्पर्य चीटीयोर नामक धातु से है। इस संकेत को प्रयुक्त करने से इनका तात्पर्य यह है कि चीटीयोर की तरह कृत्रिमता से दूर सन्तोष, सादगी से ही रहना। इसमें ही भलाई एवं सम्पूर्णता समाई है।

यह मनःस्थिति उस राष्ट्र के निवासियों की है, जहाँ कृत्रिमता, साधनों के अम्बार की चरम सीमा है। इनकी मनोवृत्ति का आँकलन कर अनुमान लगाया जाना चाहिए कि सुख-शान्ति सुख-भोगों में नहीं वरन् सादगी से रहकर जीवन व्यतीत करने में है।

अपने यहाँ भी आवश्यकता शहरों का विकेन्द्रीकरण करने की है। न कि ग्रामों का केन्द्रीकरण करके शहर बसाने की। इसी में शान्ति, सुख एवं प्रसन्नता का राज है। कृत्रिमता का मोह जितना शीघ्र भंग किया जा सके उतना ही उत्तम है। यंत्रों का उपयोग तो उपादेय है किन्तु स्वयं यंत्रीकृत हो जाना किसी भी मूल्य में श्रेयस्कर नहीं है।

जीवन के वास्तविक मूल्यों को पहचाना जाना चाहिए। इसको पहचानकर प्राकृतिक एवं सादगीपूर्ण रहन-सहन हमें मनोरोगों से पूर्णतया छुटकारा दिलाकर वास्तविक सुख-शान्ति प्रदान कर सकेंगे। साथ ही यह चरम साधन भी उभरकर आ सकेगा, जो इनकी आड़ में छिप गया है। इसकी ओर बढ़कर ही यथार्थ में जीवन का सदुपयोग करना सम्भव बन पड़ेगा।


मुझ पर उसका वश नहीं (Kahani)

संत कबीर अपने शिष्यों से कहा करते कि रोज सवेरे शैतान आकर मुझसे प्रश्न करता है, आज तू क्या खाएगा? मैं जवाब देता हूँ, मिट्टी खाऊँगा। वह पूछता है, क्या पहनेगा? मैं जवाब देता हूँ, मुरदे का कपड़ा। वह फिर पूछता है, रहेगा कहाँ? मैं जवाब देता हूँ, श्मशान में।

मेरे ये उत्तर सुनकर शैतान मुझे अभागा बताकर चल देता है, क्योंकि मैं उन सभी चीजों से अनिच्छा प्रकट करता हूँ, जिनमें वह संसार के प्राणियों को फँसाकर मनुष्य से राक्षस बना देता है। इसी से मुझ पर उसका वश नहीं चलता।


नववर्ष का एक प्रेमोपहार : साधक दैनंदिनी

साधक दैनन्दिनी (डायरी) की योजना नववर्ष पर साधकों के लिए प्रेम भरा उपहार है। नए साल पर साधना पथ पर बढ़ चलने के लिए संकल्पित साधकों के लिए भावभरा मार्गदर्शन संदेश है। उनके उन्नत साधनामय जीवन की सफलता के लिए सच्ची कल्याण कामना है। नववर्ष प्रायः नई दैनन्दिनी की शुरुआत करने के लिए जाना जाता है। बहुसंख्यक जन दैनन्दिनी का उपयोग अपनी जीवनचर्या के कुछ खास बिन्दुओं का स्मरण रखने के लिए कर सकते हैं। कुछ लोग इसका प्रयोग रुपये, पैसे एवं चीज-सामान का हिसाब रखने के लिए करते हैं। पर ये सब सामान्य लोगों की सामान्य बातें हैं। ईश्वरीय दिव्यता को अपने मानवीय जीवन में उतार लाने के लिए संकल्पित साधकों का जीवन किसी भी स्थिति में सामान्य नहीं है। ऐसे संकल्पवान साधक सदा ही विशिष्ट होते हैं। उनकी इस विशिष्टता के अनुरूप उनकी दैनन्दिनी की योजना भी विशिष्ट होनी चाहिए।

इस साधना सत्य को ध्यान में रखते हुए अपने गायत्री परिजनों के लिए साधक दैनन्दिनी की योजना बनायी गयी है। वर्षों से परम पूज्य गुरुदेव द्वारा रचित युग साहित्य से परिचित, प्रेरित एवं प्रभावित हममें से प्रायः सभी मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य की ओर गतिशील हैं। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य सर्व समर्थ भगवान् की अपने जीवन से अभिन्नता को अनुभव करना है। उनके अनन्य प्रेम को प्राप्त करते हुए भागवत् चेतना को अपनी अन्तर्चेतना में अवतरित कर लेना है। वस्तुतः ज्ञान, भक्ति, मुक्ति, मोक्ष सब इसी के अलग-अलग नाम हैं। ‘स्वल्पश्चकालो बहवश्च विघ्नः’ यही जिन्दगी का सच है। जीवन का समय थोड़ा है और बाधा विघ्नों विपदाओं की बाढ़ आयी हुई है।

दौर युग परिवर्तन का है। युगान्तरीय चेतना असुरता को परास्त ही नहीं नेस्तनाबूद करने के लिए कटिबद्ध है। देवशक्तियों का असुरता के साथ घनघोर संग्राम चल रहा है। विध्वंसक आसुरी शक्तियाँ अपने समाप्त होते-होते भी प्रलय काल के दृश्य उपस्थित कर रही हैं। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन का कोई भी क्षेत्र विघ्न-बाधाओं की विपदा से अछूता नहीं है। कालनेमि के कुचक्र हर कहीं कुहराम मचाए हुए हैं। ऐसे आपद-विपद से भरे जीवन में जो मनुष्य जल्दी से जल्दी अपने जीवन लक्ष्य को पहचानकर, उस ओर सावधानी से बढ़ता हुआ अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है, वही बुद्धिमान है। उसी का जन्म सफल है, उसी का जीवन सार्थक है और उसी की साधना श्रेष्ठ है।

याद रहे, यदि अपना यह मनुष्य जीवन यों ही बेकार की बातों में, स्वार्थ एवं अहं की क्षणिक तुष्टि के लिए विद्रूप स्वाँग भरते, ईर्ष्या, द्वेष, प्रपंच के ढोंग रचते यूँ ही बीत गया तो फिर पीछे पछताने के सिवा और कोई उपाय न रह जाएगा। इसलिए हममें से हर एक को आज और अभी, नव वर्ष की शुरुआत के इसी पवित्र क्षण में अपनी स्थिति पर विचार करके अपने साधनात्मक कर्त्तव्य के पालन में जुट जाना चाहिए। तनिक सोचें तो सही, हम सभी भगवान् महाकाल के अंश हैं, महातपस्वी युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ परम पूज्य गुरुदेव की संतानें हैं, क्या क्षुद्रताओं से घिरे रहना हममें से किसी को शोभा देता है।

जो पहले से साधना कर रहे हैं, वे आगे बढ़ें, जिन्होंने अभी साधना की शुरुआत नहीं की है, वे करें और जल्दी करें। हम सभी ईश्वर प्राप्ति के दिव्य जीवन पथ पर आ जाएँ और इस लक्ष्य को ध्यान में रखकर सावधानी के साथ आगे बढ़ते रहें, इसी उद्देश्य से यह साधक दैनन्दिनी की योजना तैयार की गयी है। इसके अंतर्गत 24 प्रारम्भिक नियम बनाए गए हैं। ये चौबीस नियम गायत्री महामंत्र के चौबीस मंत्राक्षरों की भाँति हैं। अतएव इन नियमों का पालन स्वयं विश्वासपूर्वक करना चाहिए तथा अपने परिचित व प्रियजनों से कराना चाहिए। इस सम्बन्ध में प्रतिदिन इसका समीक्षात्मक ब्योरा लिखा जाय तो और उत्तम है। यदि सम्भव बन पड़े तो अपने कुछ प्रिय जनों का साधक समूह बनाकर उसमें परस्पर यह साधनात्मक समीक्षा सुनाना चाहिए। किसी दिन किसी नियम के टूट जाने पर आवश्यक दण्ड विधान को आग्रहपूर्वक स्वीकार करना चाहिए। शान्तिकुञ्ज आकर-पत्र लिखकर अथवा इस पत्रिका के सम्पादक से भेंट

मुलाकात कर अवसर मिलने पर इस सम्बन्ध में और अधिक उपयोगी परामर्श किया जा सकता है।

साधक दैनन्दिनी की योजना में साधकों के लिए जो चौबीस नियम बनाए गए हैं, उनमें से प्रथम बारह नियम ग्रहण के हैं और बाद के बारह नियम त्याग के हैं। यानि कि पहले बारह नियमों में यह बताया गया है कि क्या हम संकल्पपूर्वक करें? बाद के बारह नियमों में यह बताया गया है कि क्या हम दृढ़तापूर्वक न करें।

ग्रहण के नियम-

1. सर्वत्र भगवत्दृष्टि- जहाँ तक बनें, दिन भर में जिस किसी से व्यवहार करने पड़े, उसे भगवान् का स्वरूप समझना। यह सोचना कि हमारे प्रिय प्रभु ही एक अंश से हमसे मिलने आए हैं।

2. ईश्वर स्मरण-सद्गुरु स्मरण- प्रत्येक आधे घण्टे पर ईश्वर का एवं अपने सद्गुरु का (नाम, रूप, लीला, गुण आदि का) स्मरण करना और स्मरण आने पर न भूलने का प्रयास करना।

3. सूर्योदय पूर्व जागरण- बीमारी आदि कोई विषमता या किसी आपदा के अलावा प्रत्येक स्थिति में सूर्य उदय होने से पहले उठ जाना।

4. प्रातः स्मरण और प्रणाम- प्रातःकाल उठते ही माता गायत्री, परम पूज्य गुरुदेव का स्मरण करना और पृथ्वी माता को प्रणाम करने के बाद अपने गुरुजनों को प्रणाम करना। यदि अपने माता-पिता आदि गुरुजन दूर हों, तो उन्हें मन ही मन प्रणाम करना।

5. नियमित गायत्री साधना- गायत्री की दैनिक साधना विधि के अनुसार नियमित गायत्री साधना करते हुए नित्य प्रति कम से कम एक माला गायत्री मंत्र का जप करना। गायत्री साधकों को रविवार या गुरुवार कम से कम एक समय का उपवास अवश्य करना चाहिए।

6. गीता एवं युग साहित्य का अध्ययन- प्रतिदिन भगवद्गीता के कम से कम दस श्लोकों का एवं परम पूज्य गुरुदेव रचित साहित्य के किसी अंश में से कम से कम एक पैराग्राफ का अर्थ चिन्तन करते हुए अध्ययन करें। इस क्रम में साधकगण गुरुदेव के साधना परक साहित्य का चुनाव करें।

7. निष्काम सेवा व स्वाध्याय- पूरे दिन कम से कम एक काम ऐसा जरूर करें, जिसमें अपना तनिक भी स्वार्थ एवं थोड़ी सी भी अहं भावना न हो। जैसे विनम्र भाव से कहीं सफाई आदि की जाय, अथवा किसी बीमार आदि की सेवा की जाय। यदि किसी दिन कोई ऐसा अवसर न मिले, तो किसी के कल्याण के लिए भगवान् से भाव भरी प्रार्थना की जाय। यह भी सेवा का ही एक रूप है।

स्वाध्याय के क्रम में अखण्ड ज्योति पत्रिका के किसी लेख को विचार पूर्वक पढ़ा जाय, अथवा किसी श्रेष्ठ विचारपूर्ण साहित्य को पढ़ा जाय। और उस पर कुछ पंक्तियों में समीक्षात्मक नोट लिखा जाय। इस तरह के स्वाध्याय क्रम से मौलिक सृजन चेतना जाग्रत् होती है।

8. आत्मबोध-तत्त्वबोध- प्रातः जागरण के तुरन्त बाद भगवान् का स्मरण करते हुए यह सोचना कि प्रभु कृपा से हमें यह एक दिन का जीवन मिला है। इसके सार्थक उपयोग के लिए संकल्पित होना। इसी तरह रात्रि सोते समय दिन भर के कामों की समीक्षा करते यह चिन्तन करते हुए सोना कि हमारा समूचा अस्तित्त्व प्रभु में समर्पित-विसर्जित एवं विलीन हो रहा है। प्रत्येक दिन अपने नए जीवन का एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव करना ही आत्मबोध-तत्त्वबोध की साधना का सार है।

9. कर्त्तव्यपालन- सामान्य जनों के लिए घर में, कार्यालय में, विद्यार्थियों के लिए अपने पठन-पाठन से सम्बन्धित जो भी कर्त्तव्य हों उसे पूरे संकल्प एवं मनोयोग पूर्वक करना। कर्त्तव्य के प्रति कर्मठभाव ही साधना जीवन की कसौटी है।

10. स्वच्छता-सुव्यवस्था- बाह्य जीवन एवं आँतरिक जीवन में स्वच्छता एवं सुव्यवस्था के लिए सदा-सचेष्ट रहना। स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित जीवन शैली ही साधकों की पहचान है।

11. नियमित ध्यान- कम से कम पन्द्रह मिनट नियमित ध्यान करना। ध्यान के पन्द्रह मिनट कभी भी निकाले जाएँ पर इसका समय निश्चित होना चाहिए। भले ही यह रात्रि को सोते समय हो।

12. नियम पालन निरीक्षण- प्रतिदिन सायंकाल कुछ समय इस बात की जाँच में लगाना कि दैनन्दिनी के नियमों का किस तरह पालन हुआ। किसी भी भूल के लिए आवश्यक प्रायश्चित्त करना। कल भूल न हो इस बात का दृढ़ संकल्प करना।

त्याग के नियम-

1. दूसरे के अहित का त्याग- जान-बूझकर कभी किसी का अहित न करना।

2. असत्य भावना का त्याग- षड़यन्त्र, कुचक्र जैसी असत्य भावनाओं से दूर रहना, जान-बूझकर किसी के लिए हानिकर असत्य न बोलना।

3. दूषित दृष्टि का त्याग- पुरुष महिलाओं के प्रति, महिलाएँ पुरुषों के प्रति वासना भरी दृष्टि से न देखें। पवित्र दृष्टि-पवित्र भावना ही साधक का लक्षण है।

4. परिग्रह का त्याग- जान-बूझकर किसी का हक न लेना। अपने पास भी अनिवार्य आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना।

5. क्रोध का त्याग- उत्तम तो यही है कि मन में क्रोध न आए। परन्तु यदि कभी मन में क्रोध आ जाए तो किसी भी तरह उसकी क्रिया बाहर न हो।

6. फैशन का त्याग- फैशन के अतिरेक से बचना। स्वच्छता एवं सादगी से रहा जाय। बनाव-शृंगार के झूठेपन से बचा जाय।

7. अशील विनोद का त्याग- गंदी हंसी-मजाक न करना।

8. ईर्ष्या-द्वेष का त्याग- किसी भी स्थिति में न तो किसी से द्वेष-दुर्भाव रखना और न ही किसी से ईर्ष्या करना। दूसरों की प्रगति-उन्नति एवं प्राप्ति में प्रसन्नता अनुभव करना।

9. परनिन्दा का त्याग- जान-बूझकर किसी की चुगली-निन्दा न करना।

10. मादक वस्तु व व्यसन का त्याग- तम्बाकू, सिगरेट, बीड़ी-भाँग, गाँजा, चरस, शराब आदि का सेवन न करना। जुआ आदि किसी भी व्यसन से बचना दूर रहना।

11. अभक्ष्य खान-पान का त्याग- माँस-मछली-अण्डा आदि अभक्ष्य वस्तुओं का सेवन न करना। लहसुन-प्याज का भी सेवन न करना।

12. समय नष्ट करने की प्रवृत्ति का त्याग- ताश, चौपड़ आदि में समय न गँवाना। जहाँ तक हो सके व्यर्थ की बातें न करना।

साधक यदि इन चौबीस नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करते रहेंगे तो उनके जीवन में शुभ परिवर्तन होना अनिवार्य है। इन नियमों के साथ की गयी थोड़ी सी गायत्री साधना महान् फलदायी होगी, ऐसा बार-बार अनुभव किया गया है।

नियम उल्लंघन होने पर प्रायश्चित्त विधान- इन उपरोक्त नियमों के पालन में किसी भी दिन कोई भूल होने पर साधकगण प्रत्येक भूल के लिए एक समय का उपवास अथवा गायत्री महामंत्र की एक माला का जप प्रायश्चित स्वरूप अवश्य करें।

साधक दैनन्दिनी के प्रकाशित होने तक किसी कापी अथवा रजिस्टर में उपरोक्त क्रम के अनुसार दैनन्दिनी बना ली जाय। और नव वर्ष के प्रथम दिन से ही इन नियमों का दृढ़ता पूर्वक पालन शुरू कर दिया जाय। नियमों का पालन कैसा हो रहा है, बीच-बीच में इसकी सूचना पत्र द्वारा शान्तिकुञ्ज भेजी जा सकती है। इन नियमों के पालन में जितनी दृढ़ता होती जाएगी, अन्तर्चेतना उतनी ही प्रकाशित होने लगेगी। विषय भोगों से अपने आप ही मन हट कर भगवान् में लगने लगेगा।

श्रेष्ठ साधकों एवं सन्तों ने भगवान् और भोगों में मूलभूत सात अन्तर बताए हैं। सन्तों का कहना है-

1. भगवान् को पाने के लिए अपनी इच्छा का तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतम हो जाना पर्याप्त है, जबकि भोगों की प्राप्ति हमारी इच्छा से नहीं कर्मों से होती है।

2. भगवान् एक बार मिलने पर कभी भी नहीं बिछुड़ते, जबकि भोग मिलकर कभी बिछुड़े बिना नहीं रहते।

3. भगवान् जब मिलते हैं, सदा ही पूरे मिलते हैं। जबकि भोग जब भी मिलते हैं, सदा ही अधूरे मिलते हैं।

4. भगवान् को पाने की इच्छा अन्तःकरण में जगते ही पापों का नाश होने लगता है। जबकि भोगों के पाने की चाहत जगते ही पाप होने शुरू हो जाते हैं।

5. भगवान् को पाने की साधना में हम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते हैं, त्यों-त्यों मन में शान्ति भरती जाती है। जबकि भोगों को पाने की कोशिश में मन अशान्त और विक्षिप्त होता चला जाता है।

6. भगवान् की याद करते हुए जीने वाला सदा सुख-शान्तिपूर्वक देह का त्याग करता है, जबकि भोगों की चिन्ता एवं चिन्तन में लगा हुआ व्यक्ति हमेशा ही अशान्ति एवं दुःखों से पीड़ित होकर मरता है।

7. भगवान् की याद करते हुए शरीर छोड़ने वाला सदा ही अपने आराध्य प्रभु के पास जाता है। जबकि भोगों को याद करते हुए शरीर छोड़ने वाला निश्चय ही नरकों एवं निम्न योनियों में जाता है।

सन्त सदा ही ये सच्चाई अपने जीवन में अनुभव करते रहे हैं। साधना पथ ही श्रेष्ठतम जीवन पथ है। परम पूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन का सार निष्कर्ष इसी एक वाक्य में कहा है। फिर भला हम सब इस श्रेष्ठतम जीवन मार्ग से क्यों चूकें। हम विचारशील हैं, विवेकवान हैं, इसके परख की कसौटी एक ही है कि हम साधक दैनन्दिनी की इस योजना में कितने उत्साह, निष्ठ एवं श्रद्धा से भागीदार बनते हैं। इस योजना में ही अखण्ड ज्योति एवं शान्तिकुञ्ज की ओर से साधकों के लिए नववर्ष की मंगलकामनाएँ निहित हैं। इसी में परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीया माताजी की दिव्य प्रेरणा एवं मंगलमय आशीष समाया है। साधक दैनन्दिनी के इन चौबीस नियमों को आपने किस तरह धारण-ग्रहण किया, इसकी सूचना शान्तिकुञ्ज हरिद्वार के पते पर अवश्य दें। ध्यान रहे ये चौबीस नियम ही चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र की साधना की सफलता के लिए आपका मार्ग प्रशस्त करेंगे।


जीवन ही बदल दिया (Kahani)

एक चोर किसी सुनसान सड़क से गुजर रहा था। उससे आगे थोड़े फासले पर एक पथिक भी चला जा रहा था। तभी पीछे से दनदनाती हुई एक कार आई। पथिक बहरा था, हॉर्न की आवाज वह सुन सुन न सका और कार की चपेट में आ गया। भावी आशंका जान चालक गाड़ी सहित भाग गया। चोर भागा−भागा वहाँ पहुँचा तो देखा कि कुछ रुपये बिखरे पड़े हैं। पास पड़ी थैली को टटोला तो उसमें ढेर सारे नोट दिखाई पड़े। उसका मन−मयूर नाच उठा। जल्दी−जल्दी उसने नोट बटोरे और भागने को हुआ कि तभी राहगीर की करुण कराह उभरी। वह दर्द से बुरी तरह छटपटा रहा था। चोर के दिल के किसी कोने में छिपा देवता पथिक की तड़फड़ाहट सहन नहीं कर पा रहा था, किंतु दूसरे ही क्षण उसका दैत्य जागा, कुसंस्कार प्रबल हुए और वह भागने को उद्यत हुआ, मगर मानवीय करुणा तत्क्षण सक्रिय हुई, उसे रोका, विवेक ने समझाया। वह आगे बढ़कर पथिक को कंधों पर उठाकर घर ले आया, उसका उपचार कराकर फिर विदा किया।

इस मानवीय कर्त्तव्य−पालन से उसे जो आत्मसंतोष मिला, वह बड़ी−से बड़ी सफलता और सुखोपभोग से भी नहीं मिला था, इस अनुभूति ने उसका जीवन ही बदल दिया।


मानवाधिकार अध्यात्म की मान्यताओं से ही स्थापित होगा

मानव का सर्वप्रथम अधिकार है मानवीयता एवं स्वतंत्रता। वह स्वतंत्र अभिव्यक्ति एवं विचार चाहता है। मानव एवं मानव समाज का विकास इसी पर आधारित है। विकास की समस्त सम्भावनायें स्वतंत्रता में ही सन्निहित होती हैं। दासता एवं बन्धन उसे कुण्ठित एवं परमुखापेक्षी बना देते हैं। मानव की स्वार्थ लिप्सा एवं अहंकार मानवाधिकार को अनन्तकाल तक हनन करता रहा है। कबीलाशाही आदि व्यवस्था से लेकर राजशाही, सामन्तशाही, साम्राज्यशाही तथा आधुनिक साम्यवाद एवं लोकतंत्रवाद तक वह लहूलुहान होता रहा है। मानवाधिकार के लिए खूनी संघर्ष भी हुआ। नये-नये कानून एवं आधुनिक व्यवस्थायें भी बनीं परन्तु मानव मानवता का अधिकारी नहीं हो सका। सम्भवतः इसके आधुनिक नीति निर्माता मानव प्रकृति के विज्ञ नहीं थे। इसका समाधान आर्य ऋषियों के पास विद्यमान है।

छः लाख वर्ष पूर्व आदिमानव ने जब गुफाओं से निकलकर बस्तियाँ बनाकर रहना सीखा तो वह पाषाण युग से बढ़कर कृषि अथवा धातुयुग में प्रवेश कर चुका था। धातु के हथियारों की खोज ने उसे एक वंशीय व्यवस्था से कबीलाशाही युग में पदार्पण कराया। दिनों-दिन समाज बढ़ने लगा। उस समय या कबीले की जिम्मेदारी किसी व्यक्ति को सौंपा जाने लगा। इस तरह आदि मानव के कबीले में एक सरदार की नियुक्ति की प्रथा चल पड़ी। सरदार अपने कबीले की सुरक्षा हेतु हथियारबन्द सैनिक या प्रहरी तैनात करने लगे।

समाज में सरदार और सैनिक ये दोनों मिलकर शक्ति का केन्द्र बनते चले गये। गाँव की सीमाओं की सुरक्षा करने वाले ये सैनिक अवसर पाते ही आसपास की दूसरी बस्तियों पर आक्रमण कर देते। यहाँ से लूट का सिलसिला प्रारम्भ हुआ। लूट के उस सामान का बँटवारा सरदार करता था। इस प्रकार सरदार और सैनिक अधिक से अधिक शक्तिशाली और सम्पन्न होते चले गये। उपजाऊ भू-भागों पर भी आक्रमण होने लगे। भूमि का साझा अधिकार टूटकर शक्तिशाली वर्ग तक पहुँचने लगा। शक्तिशाली वर्गों ने अधिक उपजाऊ भू-भाग हथिया लिये तथा दुर्बल वर्गों को बंजर जमीन की ओर धकेल दिया गया। समानता मूलक आदि समाज बलशाली और दुर्बल वर्गों के बीच विभक्त हो गया। कृषियुग में पहुँचकर मानव समाज को बहुत सी वस्तुओं की आवश्यकता महसूस होने लगी। कृषियुग की कबीलाशाही व्यवस्था में इन सामग्री का निर्माण करने वाले कारीगर बनने लगे। कृषि के लिए हल, परिवहन हेतु नाव एवं गाड़ी तथा भोजन के लिए विभिन्न बर्तनों का निर्माण हुआ। धीरे-धीरे कारीगर वर्ग पेशेवर समुदायों में और फिर निम्न स्तर की जातियों में परिवर्तित कर दिये गये। इनके अधिकार क्षेत्र में केवल श्रम ही आया इसका उपभोग नहीं। सम्पन्न वर्ग इनका मनचाहा शोषण करने लगे एवं इनके अधिकारों को सीमित कर दिया गया। मानवाधिकार के हनन की प्रक्रिया का यह प्रारम्भ था। कृषियुग में प्रवेश से पूर्व सभी व्यक्ति मिलकर काम करते थे। सबका समान अधिकार था। कबीला प्रथा में यह समानता छिन्न-भिन्न हो गई। जिससे समाज में शोषण एवं शोषित वर्ग पैदा हो गए। एक वर्ग सम्पन्न होता गया तो दूसरा उतना ही कमजोर।

कबीलाशाही युग का आदमी अपने ही व्यक्तियों के अधिकारों का शोषण करने लगा। शक्तिशाली वर्ग अपने से कमजोर वर्ग के अधिकारों का हनन करके अनुचित लाभ उठाने की प्रवृत्ति से जुड़ता चला गया। इस तरह आरम्भिक मानव समाज की समानता धीरे-धीरे खण्डित हो गई। ईसा से दो सौ वर्ष तक रोम में दासों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो गई थी। इसी कारण इन्हें विदेशों में बेचने का प्रचलन चल पड़ा। इटली में भी इनकी संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हो गई थी। रोम के कापुआ नगर में एक बहुत बड़ा बन्दीगृह था। वहाँ पर उग्र दासों को बन्धक बनाकर रखा जाता था। अमानवीय अत्याचार के विरुद्ध फूट-विद्रोह बड़ा भयंकर एवं विकराल होता है। ठीक ऐसे ही यहाँ भी दासों ने स्वामियों के क्रूर अत्याचारों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। स्पेन और बाल्कन प्रायद्वीप भी इसकी चपेट में आ गये। दास और रोमन सैनिकों का यह संघर्ष छः माह से भी अधिक समय तक चला। ऐसी अनेक लड़ाइयां हुई। परन्तु चालाक स्वामियों के विरुद्ध सीधे-साधे दासों के संघर्ष में स्वामी ही विजेता होते थे। नवाबों और जागीरदारों से लेकर राजाओं तक ने अपने अधीन ऐसे कर्मचारी नियुक्त किये जो सामाजिक व्यवस्था के नाम पर प्रजा को लूटने एवं शोषण करते थे। राजशाही के बाद सामन्तशाही की स्थापना हुई जिसमें युद्धों के द्वारा अन्य देशों को जीतकर अपने क्षेत्रों में मिला लिया जाता था। मानव इतिहास कुछ और अग्रसर हुआ तो संसार साम्राज्यवादी युग में प्रवेश किया। यह साम्राज्यवादी चाहे मुस्लिम हो अथवा ईसाई साम्राज्य इसने भी पराजित जनता की स्वतंत्रता तथा मानवीय अधिकारों का नग्न शोषण किया। इसके पश्चात् लोकताँत्रिक व्यवस्था ने अपने पंख फैला दिये। साम्यवाद भी युगों तक सर उठाये रहा। परन्तु मानवीय अधिकारों की सिसकियाँ बन्द नहीं हुई। आज का बन्धुआ पुरानी दास प्रथा का ही नवीन संस्करण है। बीसवीं सदी के तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले अंग्रेजों ने भारत के अलावा भी विश्व के अनेक देशों में मानवाधिकारों का खुला खेला है।

इसके पश्चात् राज्यसत्ता का अस्तित्त्व सामने आया। श्री अरविन्द के अनुसार राज्य एक ऐसी सत्ता है, जो बहुत अधिक सशक्त होने के कारण आन्तरिक दुविधाओं या बाह्य प्रतिबन्धों द्वारा कम से कम पीड़ित होती है। इसकी आत्मा या तो होती ही नहीं या फिर केवल प्रारम्भिक अवस्था में होती है। यह एक सैनिक, राजनैतिक और आर्थिक शक्ति है। यदि यह एक बौद्धिक और नैतिक सत्ता हो भी तो वह केवल एक थोड़े और अविकसित अंश में ही होगी। इसी कारण प्रायः राज्य सत्ता के द्वारा जनता का शोषण होता रहा है। श्री अरविन्द आगे कहते हैं-व्यक्ति राज्य की ही आत्म अभिव्यक्ति है। इसके द्वारा राज्य अपने अंगभूत व्यक्तियों की स्वतंत्र इच्छा, स्वतंत्र प्रक्रिया, शक्ति, प्रतिष्ठ और आत्म ख्यायन को अपने अधीन करने का विशेष रूप से प्रयत्न करता है। कालान्तर में यही स्वतंत्र एवं नैसर्गिक अधिकार मानवाधिकार के श्रेणी में आए। जब-जब राज्य अपने सदस्य व्यक्तियों से बढ़कर दावा किया है, संघर्ष हुआ है। प्रजा अपने अधिकारों के लिए लड़ाइयां लड़ी है। प्राचीन भारत में कंस, जरासंध, शिशुपाल आदि आततायी राजाओं के विरुद्ध विद्रोह को भी तत्कालीन समाज व्यवस्था ने उचित ठहराया। यूरोप में मानवाधिकार के संघर्ष का इतिहास बहुत पुराना है। यह मध्य युग तक बहुत उग्र हो उठा था। मैकियाबली प्रभृत विद्वानों ने प्रचलित मानवीय अधिकारों एवं मानवीय स्वतंत्रता के आन्दोलन को शिखर पर पहुँचाया।

नैसर्गिक न्याय पर आधारित अधिकार की परिकल्पना विश्वव्यापी रही है। भारत की सिंधु घाटी सभ्यता, पूर्वी एशिया की चीनी सभ्यता, दक्षिण पश्चिम में एशिया में दजला-फरात के मैदानों, मिस्र की नीलघाटी की सभ्यता तथा ग्रीस एवं रोम आदि सभ्यताओं में मूलरूप से मानव की स्वतंत्रता एवं मौलिक अधिकार की व्यवस्था है। हालाँकि यह अधिकार स्वार्थ लिप्सा के कारण दबा दिया गया। प्रारम्भ में राज्य को ईश्वरीय सत्ता का प्रतीक माना जाता था। कालान्तर में ईश्वरीय न्याय का स्थान मानवीय संवेदना और सचेतनता के निश्चित विधान ने ले लिया। अरस्तु तथा सन्त टॉम्स एक्विनाँस के अनुसार मनुष्य पूर्णता को प्राप्त कर सकता है। उसके अन्दर विकास की समस्त सम्भावनायें सन्निहित हैं। यदि इन सम्भावनाओं को अवरुद्ध न किया जाय तो निश्चित रूप से वह सर्वोच्च उपलब्धि हासिल कर सकता है। प्रत्येक मनुष्य का विकास मौलिक एवं स्वतंत्र ढंग से होता है। ह्यगो ग्रोसियस ने भी इसी विधान का समर्थन किया और प्रतिपादित किया कि यह विधान विश्व में व्याप्त सचेतनता का प्रतिबिम्ब है। यह नैतिक रूप से आधार रूप एवं आवश्यक भी है। 16 वीं एवं 17 वीं शताब्दी में मानवाधिकार का यह स्वर मानव को उसकी मौलिक स्वतंत्रता देने हेतु व्यापक प्रयास एवं उद्यम था।

गोसियस के नैसर्गिक विधान के सिद्धान्त को जर्मन विद्वान सेयुअल पपेनफोर्ड ने भी स्वीकार किया। इनके मतानुसार प्रत्येक मनुष्य में शान्ति पूर्वक जीवन की कल्पना होती है और इसलिए ही व्यक्ति अपने व्यक्तिगत अधिकारों के साथ-साथ शान्तिपूर्वक सामाजिकता में भी विश्वास एवं आस्था जताता है। पपेनफोर्ड का कहना है कि मनुष्य को अपने अधिकारों का उपयोग किसी की मौलिकता एवं स्वतंत्रता के हनन हेतु नहीं करना चाहिए। उन्होंने इसके लिए कुछ नियमों का उल्लेख किया है जैसे शारीरिक शोषण न करना, महिलाओं का सम्मान एवं सम्पत्ति का सदुपयोग आदि। मानवाधिकार की यह मान्यता विकसित होकर टॉमस हाब्स, स्पिनोजा, जॉन लॉक के विभिन्न सिद्धान्तों में प्रतिपादित हुई। इसी के आधार पर मानवीय अधिकारों की मान्यता का जन्म हुआ। इसी कारण मानव एवं समाज शान्तिपूर्ण एवं समृद्ध था।

प्रारम्भिक अवस्था में मानवाधिकार का उल्लेख महाभारत तथा बाल्मीकि रामायण में मिलता है। इसी की विशद् व्याख्या यूरोप में दृष्टिगोचर होती है। महाभारत के पश्चात् प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव इतना रहा कि जिसके परिणामों ने मानवीय संवेदना को झकझोर कर रख दिया। मनुष्य की वह उफनती संवेदना ही थी जिसने दुःखी व पीड़ित मानवता के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करके उसके अधिकारों को सुनिश्चित किया। आरम्भ में नैतिकता, सभ्य समाज की उदारता, जागरुक जन की विचारशीलता के कारण ही मानवाधिकार को मान्यता मिल सकी। इस तरह इसका विकास हुआ।

सर्वप्रथम मेग्नाकार्टा में कहा गया है कि किसी भी स्वतंत्र व्यक्ति के अधिकारों का हनन किया जा सकता है और न ही उसे किसी प्रकार दण्डित ही किया जा सकता है। इस उद्घोषणा के बाद अन्य कई अवधारणायें जन्म लीं। फ्राँस की क्रान्ति के पूर्व इंग्लैण्ड में सन् 1689 में बिल ऑफ राइट्स में मानवीय मूल्यों एवं समानता पर बल दिया गया। हेवियस कार्पस एक्ट भी न्याय व्यवस्था से सम्बन्धित मानवाधिकारों की स्थापना के महत्त्वपूर्ण सोपान रहा है। सन् 1776 में उत्तरी अमेरिका में हुए स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात् अमेरिका में मनुष्य मात्र के सम्माननीय जीवन हेतु मानवाधिकार का प्रस्ताव रखा गया। इसका प्रभाव यूरोप पर भी पड़ा। इस सम्बन्ध में जेम्स विल्सन का विचार है कि मानव के लिए प्राप्त अधिकार सार्वभौमिक मानवीय चेतना का प्रतिबिम्ब है जो सामान्य शाश्वत स्वतः स्पष्ट सिद्धान्तों पर आधारित है। फ्राँस क्रान्ति में मनुष्य के प्राकृतिक एवं हस्तान्तरणीय अधिकार पर जोर दिया गया। इस प्रकार प्राचीन काल के दैवीय विधान के मूलभूत अधिकार मध्यकाल तक आते-आते सम्पूर्ण मानवीय चेतना के प्रतिबिम्ब के रूप में उभरकर सामने आए।

26 जून 1945 के संयुक्त राष्ट्र की घोषणा ने मानवाधिकार को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ दिया। इसके अनुसार सभी देशों ने मानवीय गरिमा, समानता एवं विश्वबन्धुत्व की दिशा में एकजुट होकर कार्य करने का संकल्प लिया। 10 दिसम्बर 1948 में इसकी अंतर्राष्ट्रीय घोषणा हुई। जिसकी प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्वतंत्रता, न्याय एवं शान्ति की कल्पना विश्व मानव परिवार को प्राप्त मानवीय गरिमा, समान अनुल्लंघनीय अधिकार एवं समानता की स्वीकृति की आधारशिला है।

मानवाधिकारों के इतने प्रयासों के बावजूद मानव को मानवीय अधिकार प्राप्त नहीं हो सका। इसका कारण स्पष्ट करते हुए श्री अरविन्द का कहना है कि बौद्धिक युग में मनुष्य की आन्तरिक सत्ता को नहीं वरन् प्राणिक और भौतिक मन को प्रभावित करने के लिए बाधित किया गया है। उसने राजनैतिक और सामाजिक संस्थाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन उत्पन्न करने तथा मानव जाति के सामान्य मन के भावों और विचारों में एक ऐसा संशोधन लाने तक ही अपना प्रयत्न सीमित कर दिया है। जो इन संस्थाओं को व्यवहारिक रूप दे दें। इसने जाति की आत्मा की अपेक्षा कहीं अधिक मनुष्य जीवन के यंत्र और बाह्य मन पर कार्य किया है। इसने राजनैतिक, सामाजिक और वैध स्वाधीनता और समानता तथा संगठन की पारस्परिक सहायता को स्थापित करने के लिए अत्यधिक परिश्रम किया है।

श्री अरविन्द आगे कहते हैं- स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृभावना आत्मा की तीन दिव्यताएं हैं, ये वस्तुतः समाज के बाह्य यंत्र-विन्यास द्वारा अथवा मनुष्य के द्वारा जब तक कि वह केवल वैयक्तिक और सामाजिक अहंभाव में निवास करता है चहितार्थ नहीं हो सकते। जब अहंभाव स्वाधीनता की माँग करता है उसका परिणाम प्रतियोगिता पूर्ण व्यक्तिवाद होता है। जब उसका आग्रह समानता पर होता है तो पहले वह संघर्षशील बन उठता है। जो समाज स्वाधीनता को अपना आदर्श मानकर उसे प्राप्त करना चाहता है वह समानता को प्राप्त करने में असमर्थ होता है और जिसका लक्ष्य समानता है उसे स्वाधीनता का त्याग करना पड़ेगा।

स्वतंत्रता, समानता और एकता आत्मा के सनातन गुण हैं। इसी गुण एवं अधिकार के द्वारा ही मानव मानवता का पूर्ण अधिकारी हो सकता है। जिसका हनन कभी कोई नहीं कर सकता है। यही सच्चा मानवाधिकार है।


उलटे पैर लौट गए (Kahani)

पाटलिपुत्र की नगरवधू कोशा का रूप−लावण्य उन दिनों अद्वितीय था। उसकी एक मुसकान पर बड़े−बड़े श्रीमंत सब कुछ लुटाने को तैयार रहते थे।

एक दिन शाल्वन बुद्ध पीठ के मठाधीश वसंत गुप्त उधर से निकले, तो कोशा पर उनकी नजर पड़ी। सोए कुसंस्कार जागे और वे उसी संत वेश में नगरवधू के प्राँगण में जा पहुँचे। कोशा का अनुमान था कि वे भिक्षाटन के लिए आए होंगे, सो उनका सत्कार करते हुए भिक्षा देने के लिए सेविका को संकेत कर दिया, पर उनका अभिप्राय तो कुछ और ही था। वे प्रणय निवेदन कर रहे थे।

कोशा ने तिरस्कार करना तो ठीक न समझा, पर शर्त लगा दी कि इतनी रत्नराशि वे प्रस्तुत कर सकें, तो ही उनकी मनोकामना पूर्ण हो सकेगी। वसंत गुप्त चल दिए और जिन संपन्नों से उनका परिचय था, उन सभी से संग्रह करके उतनी संपदा जुटा ली। लंबे डग भरते हुए आए और वह राशि कोशा के चरणों पर रख दी। कोशा ने उन रत्नों से अपने पैर रगड़−रगड़कर घिसे और उन्हें नाली में फेंक दिया। कहने लगी, देव आपका वेश और तप मेरे मलिन शरीर से श्रेष्ठ है। उसका उपार्जन इसी प्रकार नाली में चला जाएगा, जैसे कि यह रत्नराशि इस गंदी नाली में बह गई। कोशा का उद्बोधन उनके हृदय को चीरकर घुस गया। विवेक जागा, तो वे उसे गुरुभाव से प्रणाम करते हुए अपने शील का बचाव करते उलटे पैर लौट गए।


सारे तीरथ गुरु में बसते

मखमली धूप की छुअन हर एक में सुखद अहसास जगा रही थी। अक्टूबर का महीना लग जाने के कारण सूर्य का ताप और तेज सह्य हो गया था। ऐसे में सूर्य रश्मियों का स्पर्श पाने के लिए मन-प्राण में अनायास आतुरता सी जगने लगी थी। अलसाई चेतना में सूर्य का यह संस्पर्श एक अनोखी जागृति जुटा रहा था। ठीक परम पूज्य गुरुदेव के संग-सुपास और सान्निध्य की भाँति। जिनके पास पहुँचते ही मुरझाया-अलासाया-कुम्हलाया मन चैतन्य हो उठता। अन्तःकरण में अनूठी मुस्कान उमंग उठती। प्राणों में नवजीवन पल्लवित हो उठता। ऐसे अवसर सप्ताह में कई बार मिलते थे। और हर बार जीवन में नयी उमंगे तरंगित होती। हर्ष, उत्साह और उछाह का ज्वर उमड़ता। नवप्रकाश, नयी चेतना, नवल जागृति की असंख्य नूतन किरणों की छुअन का अहसास होता।

गुरुदेव जब भी मिलते उनकी एक नयी भावमुद्रा होती। उनके इर्द-गिर्द का वातावरण प्राणदायी विचारों और तपश्चेतना के सघन स्पंदनों से स्पन्दित रहता। वह सदा ही अपने पास आने वालों की मनोभूमि में कुछ अनूठे बीजों को बोते रहते। ये बीज उग सकें, इनमें नव अंकुर फूटे इसके लिए वे इन्हें अपने प्राणों से सींचा करते। इस कार्य में उनका धैर्य और श्रम देखते ही बनता था। कभी-कभी तो उनके पास अपने वालों की मनोभूमि-मरुभूमि की भाँति होती थी। एकदम शुष्क-नीरस और अनुपजाऊ। फिर भी गुरुदेव अपने तप-प्राणों से इसका सिंचन कर इसे रूपांतरित करने की कोशिश करते। ऐसा करने में उन्हें सफलता भी मिलती और वह भी शत-प्रतिशत।

उनकी बातें हमेशा ही दिल को छूने वाली होती। सदा ही इनमें प्रगाढ़ प्रेम की सुगन्ध होती। लेकिन इनमें एक इन्द्रधनुषी रंगत भी रहती थी। जिसे देखा तो जा सकता था, पर छुआ नहीं जा सकता था। क्योंकि इनका आभास तो हमारी इस दुनिया में होता था, पर इनकी वास्तविक उपस्थिति किसी और ही लोक में होती। पढ़ने वालों को यह कथा भले ही कितनी ही आश्चर्यजनक लगे, किन्तु इसके सत्य होने में जरा सा भी सन्देह नहीं। उनसे मिलने पर यह अनुभूति प्रायः हर बार होती थी।

उस दिन भी यही सत्य सम्मुख था। यह अक्टूबर 1988 की दोपहर थी। सरल-निश्छल-मनोहारी मुस्कान बिखेरते गुरुदेव अपने बिस्तर पर बैठे थे। वही ऊपर का कक्ष, जिसकी एक झलक पाने के लिए आज अनगिनत श्रद्धालुजन लालायित रहते हैं। उन दिनों यही कक्ष हम सबके आराध्य गुरुदेव का आवास था। यही उनके लेखन एवं साधना की स्थली थी। यह कक्ष अपने आप में असंख्य गुह्य एवं गहन आध्यात्मिक प्रयोगों की इतिहास कथा समेटे है। इसे आज भी पढ़ा जा सकता है, पर केवल तपोन्मीलित दृष्टि से। अनुभूतियों के अक्षर केवल अनुभूतियों में ही बाँचे जा सकते हैं। अनुभूतियों की इन असंख्य कड़ियों में एक कड़ी अनायास ही उस दिन भी जुड़ी। परम पूज्य गुरुदेव के चरणों में प्रणाम करने के साथ में लोग उनके ही बिस्तर के पास बिछे हुए टाट पर बैठ गए। गुरुदेव ने एक-एक करके सभी के हाल-चाल पूछे। फिर सदा की भाँति उनके सामने लेख पढ़ने का क्रम शुरू हो गया। कभी वह बीच में रोक कर अपनी टिप्पणी कर देते, कभी मौन बने रहते। और कभी तो वह यूँ खो जाते जैसे किसी अन्य लोक में विचरण करने लगे हों। लेख पढ़ने और सुनाने का यह सिलसिला खत्म हो जाने के बाद उनमें से एक ने गुरुदेव से घर जाने की अनुमति माँगी।

इस अनुमति माँगने पर गुरुदेव थोड़ा हंसे और बोले क्या करेगा घर जाकर। अनुमति माँगने वाले थोड़ा हिचकते हुए कहा- जी! माँ की आँख का आप्रेशन करवाना है। इस जवाब पर उन्होंने मीठी झिड़की देते हुए कहा- आप्रेशन में तुझे जाने की क्या जरूरत है? तू कोई सर्जन है क्या? उसकी व्यवस्था तो मैं यहीं से कर दूँगा। सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा। तुझे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। गुरुदेव ने जिस तरह से भरोसा दिलासा, उसमें अब आगे कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं रह गयी। पर अभी वास्तविक बात बाकी थी, जिसे अन्तर्यामी गुरुदेव भाँप गए थे।

अनुमति माँगने वाले ने यही असली बात धीरे से बतायी- गुरुजी! दरअसल घूमने जाने का मन है। इस बात का भी उन्होंने तुरन्त सटीक जवाब दे डाला, अरे तो इसमें क्या परेशानी है। जा गंगाजी घूम आ। गंगा में सब कुछ है पानी है और पत्थर भी। जो भी घूमने वाली जगहें हैं वहाँ और है भी क्या? या तो पानी है, या फिर पत्थर है। पत्थर-पानी, पानी-पत्थर, इसको उन्होंने तीन-चार बार कहा और हंस पड़े। बड़ी ही मधुर अलौकिकता से भरपूर थी उनकी यह हंसी। इस हंसी में मीठे परिहास के साथ तत्त्वज्ञान भी निहित था। घूमने लायक जितने भी तीर्थ स्थान है, वहाँ पानी और पत्थर के सिवा और है भी क्या?

गुरुजी की इस बात से घूमने की आज्ञा चाहने वाले के चेहरे पर बड़ी लाचारी छा गयी। बड़ी बेबसी में उसने कहा- मुझे तो ट्रेन में बैठकर घूमना है। बस आप तो आज्ञा दे दीजिए। इस बात का भी गुरुदेव के पास बड़ा ही सटीक जवाब था। वह बोले- तो इसमें क्या परेशानी है, तू ऐसा कर, माताजी से पैसे ले ले और हरिद्वार स्टेशन से टिकट खरीद, फिर ट्रेन में बैठकर ऋषिकेश चला जा। तेरा ट्रेन में बैठना और घूमना दोनों हो जाएगा। अब भला इसके आगे और क्या कहा जाय?

फिर भी आज्ञा माँगने वाले ने जैसे-तैसे हिम्मत करके एक बार फिर कहा- गुरुजी! दरअसल मुझे तीर्थ करने हैं, थोड़ा घूम-फिर लेंगे, आप आज्ञा दे दीजिए न। ये शब्द उस कितनी बेबसी और लाचारी में कहे गए, इसे शायद कोई दूसरा न जान पाएगा। गुरुदेव इस पर बोले- तो बेटा तू भटकना चाहता है। क्या मिलेगा तुझे इस भटकने में। फिर वह थोड़ा गम्भीर हुए और बोले- देख तू भटक मत मैं इस खाट पर बैठा हूँ, तू एक काम कर, मेरे आस-पास सात चक्कर लगा ले। मेरी सात परिक्रमा करने से धरती-आकाश सब की सात परिक्रमा हो जाएगी। सारे देवी-देवता, सभी तीर्थ मुझमें समाए हैं, मुझसे अलग कुछ भी नहीं। तेरा काम तो मेरी परिक्रमा करने से चल जाएगा।

गुरुदेव की इन रहस्यमयी, तत्त्वज्ञान से परिपूर्ण बातों को सुनकर अनुमति माँगने वाले का हठ जाता रहा। वह तो बस अपने गुरुदेव के दिव्य स्वरूप के चिन्तन में खो गया। उसे लगा कि स्वयं अन्तर्यामी सर्वव्यापी परमेश्वर सामने बैठे अपने दिव्य स्वरूप का बोध करा रहे हों। उसे कुछ सूझा नहीं, उनके चरणों में माथा रखने के सिवा। मन अन्तःकरण में यह प्रार्थना के स्वर फूट पड़े-

सर्वरुपमयो गुरोः सर्वंगुरोमयं जगत्। अतोऽहं विश्वरुपाँ ताँ नमामि गुरुवरम्॥

गुरुदेव सर्वरूपमय हैं, तथा सम्पूर्ण जगत् गुरुमय है। इसलिए मैं उन विश्वरूपी गुरुदेव को प्रणाम करता हूँ।


धार्मिकता का भ्रम (Kahani)

पालतू तोते को किसी ने पिंजरे समेत एक संत के आश्रम में पहुँचा दिया। संत ने उसे मोक्ष का मार्ग बताया और नया वाक्य याद कराया, पिंजरा छोड़ो, ऊँचे उड़ो। तोते ने ये शब्द रट लिए। एक दिन पिंजरा खुला रह गया। तोता खिड़की से बाहर सिर चमकाता और रटे हुए शब्दों को बोलता−पिंजरा छोड़ो, ऊँचे उड़ो।

आश्रमवासी इस कुतूहल को देख रहे थे। द्वार खुला है, उड़ने में कोई रोक नहीं, मंत्र भी याद है, फिर यह उड़ता क्यों नहीं? अपितु भीड़ को देखकर पिंजरे के कोने में क्यों जा छिपता है?

हँसते आश्रमवासियों के कुतूहल का समाधान करते हुए संत ने कहा, हममें से भी तो अनेक ऐसी ही तोतारटंत करने वाले हैं। भक्ति का द्वार खुला होने पर भी बंधन से निकलने का प्रयास नहीं करते, उलटे धार्मिकता का भ्रम फैलाते रहते हैं।


गुरुगीता -6 - साक्षात् भगवान विश्वनाथ होते हैं सद्गुरु

गुरुगीता के महामंत्रों में साधना का परम रहस्य है। इसे जानने वाला जीवन की सारी भटकन से क्षण में ही उबर जाता है। जब समर्थ सद्गुरु के चरणों का आश्रय सुलभ हो, तब भला और कहीं भटकने से क्या फायदा? दयामय गुरुदेव के चरणों की महिमा की कथा पिछली कड़ी में कहीं गयी थी। इस पिछली कड़ी में भगवान् महादेव ने माता पार्वती को बताया कि सद्गुरु के चरणों का जल से किस तरह से साधक को यौगिक ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। किस तरह उसमें ज्ञान-वैराग्य आदि गुणों का विकास होता है। शिष्य के अंतर्मन में ज्यों-ज्यों गुरु भक्ति प्रगाढ़ होती है, त्यों-त्यों उसका अन्तःकरण ज्ञान के प्रकाश से भरता जाता है। ‘गुरुकृपा ही केवलम्’ शिष्य के साधनामय जीवन का एक मात्र सत्य है।

इसे समझाते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव जगदम्बा पार्वती से आगे कहते हैं-

गुरोः पादोदकं पीत्वा गुरोरुच्छिष्टभोजनम्। गुरुमुर्तेः सदा ध्यानं गुरुमन्त्रं सदा जपेत्॥15॥

काशीक्षेत्रं तन्निवासो जाह्नवी चरणोदकम्। गुरुःविश्वेश्वरः साक्षात् तारकं ब्रह्मनिश्चितम्॥16॥

गुरोः पादोदकं यत्तु गयाऽसौ सोऽक्षयोवटः। तीर्थराज प्रयागश्च गुरुमूर्त्यै नमोनमः॥17॥

गुरु भक्त साधक की समर्थ साधना का सार इतना ही है कि वह गुरु चरणों के जल (चरणामृत) को पिए। गुरु को पहले भोज्य पदार्थों को समर्पित कर बाद में स्वयं उन्हें प्रसाद रूप में ग्रहण करे॥15॥ गुरु का निवास ही मुक्तिदायिनी काशी है। उनका चरणोदक ही इस काशीधाम को आध्यात्मिक ऊर्जा से भरने वाला गंगाजल है। गुरुदेव ही भगवान् विश्वनाथ है। वही साक्षात् तारक ब्रह्म है॥16॥ गुरुदेव का चरणोदक गया तीर्थ है। वह स्वयं अक्षयवट एवं तीर्थराज प्रयाग है। ऐसे सद्गुरु भगवान् को प्रणाम करना, नमन करना ही साधक के जीवन का सार सर्वस्व है॥17॥

इन मंत्रों के भाव गहन हैं, पर इनकी साधना अति सुगम और महाफलदायी है। जब सर्वदेव देवीमय कृपालु सद्गुरु का सान्निध्य हमें सुलभ है, तब अन्यत्र क्यों भटका जाय? गुरुदेव का चरणोदक महाप्रभावशाली है। यह सामान्य जल नहीं है। इसमें तो उनकी तप चेतना घुली रहती है। गुरुदेव जब स्थूल कलेवर में नहीं हैं, तब ऐसी स्थिति में जल पात्र में उनके चरणों की भावना करते हुए चरणोदक तैयार किया जा सकता है। इसका पान साधक के हृदय में भक्ति को प्रगाढ़ करता है। इसी तरह साधक का भोजन भी गुरुदेव का प्रसाद होना चाहिए। स्वयं भोजन करने से पहले गुरुदेव को भोग लगाए। मन ही मन सभी भोज्य पदार्थों को उन्हें अर्पित करे। प्रगाढ़ता से भावना करे कि कृपालु गुरुदेव हमारे द्वारा अर्पित पदार्थों को ग्रहण कर रहे हैं। बाद में उस भोजन को उनका प्रसाद समझ कर ग्रहण करे।

मनुष्य शरीर में होने पर भी सद्गुरु कभी भी सामान्य मनुष्य नहीं होते। वह तो परमात्म चेतना का घनीभूत रूप है। उनका निवास शिष्यों के लिए मुक्तिदायिनी काशी है। इस कथन में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है। क्योंकि सद्गुरु जहाँ रहते हैं, वहाँ उनकी तपश्चेतना का घनीभूत प्रभाव छाया रहता है। न जाने कितने देवी-देवता, ऋषि-महर्षि सिद्धजन उनसे मिलने के लिए आते हैं। उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा भी उस क्षेत्र में घुलती रहती है। इस समस्त ऊर्जा की आध्यात्मिक प्रतिक्रिया अपने आप ही वहाँ रहने वालों पर पड़ती रहती है। जिनका हृदय अपने गुरु के प्रति भक्ति से भरा है। जो गुरुदेव की चेतना के प्रति ग्रहणशील है, ऐसे भक्त साधकों का मोक्ष निश्चित है। गुरुधाम में निवास काशीवास से किसी भी तरह से कम नहीं है।

श्रद्धालुजनों में काशीवास के प्रति गहरी आस्था है। लोग वृद्धावस्था में घर-परिवार के मोह को छोड़कर काशी जाकर रहा करते थे। क्योंकि शास्त्र-पुराण सभी एक स्वर से कहते ही कि काशीवास करने से काशी में जाकर शरीर छोड़ने से फिर से जीवन भवबन्धनों में नहीं पड़ता। भगवान् भोलेनाथ उसे मुक्ति प्रदान करते हैं। वही सभी जनों के मुक्तिदाता कृपालु भोलेनाथ माता पार्वती से गुरुगीता में कहते हैं कि गुरुधाम किसी भी तरह से काशी से कम नहीं है। गुरु जहाँ भी रहते हैं, वहीं काशी है। इस काशी के विश्वनाथ स्वयं गुरु है। वही साक्षात् तारक ब्रह्म का स्वरूप है। उनकी कृपा से शिष्य को अनायास और अप्रयास ही मुक्ति लाभ होता है। गुरुचरणों का जल ही इस काशी में गंगा की जलधारा है। जिसका एक कण भी जीवों को त्रिविध तापों से छुटकारा देता है।

भगवान् सदाशिव इस प्रकरण को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि गुरुदेव का चरणोदक काशी तीर्थ तो है ही, गयातीर्थ भी है। सनातन धर्म को मानने वाले सभी जन गया की महिमा से परिचित हैं। गया वह पवित्र क्षेत्र है, जहाँ प्रेतात्माओं को मुक्ति मिलती है। पुराणों में कथा है कि भगवान् विष्णु ने यहाँ पर गयासुर का वध किया था। असुर होने के बावजूद गयासुर के मन में भगवान् के प्रति भक्ति भी थी। इस भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उससे वरदान माँगने के लिए कहा। तब गयासुर ने सृष्टि के पालनहार विष्णु से यह वर माँगा कि प्रभु यहाँ जो भी अपने पितरों का श्राद्ध करे, अथवा प्रेतयोनि में किसी भी आत्मा के लिए कोई यहाँ श्राद्ध संकल्प करे, तो उस पितर और प्रेत आत्माओं की मुक्ति हो जाए।

गुरुचरणों और चरण जल का प्रभाव भी कुछ ऐसा ही है। गुरुचरण केवल गुरुभक्त शिष्य के लिए ही कल्याणकारी नहीं है। बल्कि उनके लिए भी कल्याणकारी है, जिनके कल्याण की कामना उस शिष्य के मन में उठती है। अपने गुरु का सच्चा शिष्य जिस किसी के लिए भी कल्याण की प्रार्थना करेगा, उसका कल्याण हुए बिना नहीं रहेगा। गुरुदेव के चरणों का सान्निध्य अक्षय वट एवं तीर्थराज प्रयाग की भाँति है, जहाँ की गयी थोड़ी सी भी साधना अनन्त गुना फलवती हो जाती है। यहाँ थोड़े से भी शुभकर्म अपरिमित एवं असीम फलदायी होते हैं। ऐसे कृपालु गुरुदेव के चरणों में साधक-शिष्यों का बार-बार नमन कल्याणकारी है।

कृपालु गुरुदेव की महिमा का अथ-इति से रहित अनन्त स्वरूप भगवान् भोलेनाथ के सिवा और कौन जान सकता है। सद्गुरु का स्मरण-चिन्तन ही शिष्य के लिए महासाधना है। जिससे जीवन में सभी सुफल अनायास ही मिल जाते हैं। इस कथा की अगली कड़ी अखण्ड ज्योति के अगले अंक की विषयवस्तु होगी। तब तक साधकगण गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करते हुए गुरुमंत्र की साधना में संलग्न रहें।


मिथ्या धारणाओं का आवरण हटे, तो योग सधे -

राजा रघु के दरबार में एक प्रश्न चल रहा था कि राज्यकोष का उपयोग किन प्रयोजनों के लिए किया जाए?

एक पक्ष था−सैन्य शक्ति बढ़ाई जाए ताकि न केवल सुरक्षा वरन् क्षेत्र−विस्तार की योजना भी आगे बढ़े। इसमें जो खरच पड़ेगा, वह पराजित देशों से नए लाभ मिलने पर सहज पूरा हो सकेगा।

दूसरा पक्ष था−प्रजाजनों का स्तर उठाने में राज्यकोष खाली कर दिया जाए। सुखी, संतुष्ट, साहसी और भावनाशील नागरिकों में से प्रत्येक एक दुर्ग होता है। उन्हें जीतना किसी शत्रु के लिए संभव नहीं। इस प्रकार युद्ध−विजय से क्षेत्र जीतने की अपेक्षा मैत्री का विस्तार कहीं अधिक लाभदायक है। उससे स्वेच्छया सहयोग और अपनत्व की ऐसी उपलब्धियाँ प्राप्त होती है, जिनके कारण छोटा देश भी चक्रवर्ती स्तर का बन सकता है।

दोनों पक्षों को तर्क चलते रहे। निदान राजा ने निर्णय दिया। युद्ध पीढ़ियों से लड़े जाते रहे हैं। उनके कडुए, मीठे परिणाम भी स्मृतिपटल पर अंकित हैं। अबकी बार युद्ध−प्रयोजनों की उपेक्षा करके लोक−मंगल की परिणति को परखा जाए और समस्त संपत्ति जनकल्याण की योजनाओं में खरच कर दी जाए।

वैसा ही किया गया। धीरे−धीरे प्रजाजन हर दृष्टि से समुन्नत हो गए। पड़ोसी राज्यों को समाचार मिले तो उनके हौसले टूट गए। आक्रमण की चर्चाएँ समाप्त हो गई। सुख−शाँति के समाचार पाकर अन्य देशों के समर्थ लोग वहाँ आकर बसने लगे। बंजर भूमि सोना उगलने लगी और उत्साही प्रजाजनों ने अपने देश को ऐसा बना दिया, जिसके कारण अयोध्या क्षेत्र में सतयुग दृष्टिगोचर होने लगा।

अन्तर्यात्रा विज्ञान की योगकथा की पिछली कड़ी में पञ्चवृत्तियों में पहली वृत्ति के बारे में हम सबने पढ़ा था। महर्षि पतञ्जलि ने बताया ‘यह पहली वृत्ति प्रमाण है। प्रमाण का मतलब है ठीक-ठीक ज्ञान यानि की सम्यक् ज्ञान। यदि योग साधक में प्रमाणवृत्ति सक्रिय है। तो उसे ठीक-ठीक ज्ञान जरूर मिलेगा। ज्ञान की यही प्रमाणिकता योग साधक की साधना को भी प्रमाणित करेगी और उसे प्रमाणिक बना देगी। महर्षि ने इस सूत्र में प्रमाणवृत्ति के स्रोत भी बताए। उनके अनुसार प्रमाणवृत्ति के तीन स्रोत हैं- पहली प्रत्यक्ष बोध, दूसरा है- अनुमान और तीसरा स्रोत है- योगसिद्ध आप्त पुरुषों के वचन। इनसे कैसे और किस तरह ठीक-ठीक ज्ञान होता है, यह कथा पिछली कड़ी में बतायी गयी थी।’

अब इस कड़ी में दूसरी वृत्ति की योगकथा है। अगले यानि की समाधिपाद के आठवें सूत्र में महर्षि ने इस दूसरी वृत्ति का खुलासा किया है। वह कहते हैं- ‘विपर्ययो मिथ्या ज्ञानमतद्रूप प्रतिष्ठिम्’॥1/8॥ यानि कि विपर्यय एक मिथ्या ज्ञान है, जो विषय से उस तरह मेल नहीं खाती जैसा वह है। शास्त्रकारों ने विपर्यय को असत् ज्ञान कहा है। यानि कि किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार के बारे में झूठी धारणा है। इसे चित्त की भ्रमित स्थिति भी कह सकते है। मजे की बात यह है कि ऐसी स्थिति हममें से किसी एक की नहीं है, बल्कि प्रायः हम सबकी है। जीवन के किसी न किसी कोने में हम सभी भ्रमित हैं। सच यही है कि हम तथ्य को जाने, सत्य को अनुभव करें, उसके पहले ही उस विषय या वस्तु के बारे में ‘अनगिन धारणाएँ’ बना लेते हैं।

कई बार तो ये धारणाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। उस धारणा से सम्बन्धित असत् ज्ञान को जिस-किसी तरह निभाया जाता है। परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि व्यक्ति अकेला नहीं, परिवार और समाज भी असत् ज्ञान कि विपर्यय के भारी बोझ से लदे हैं। उसे ढोए जा रहे हैं। इसे बारे में वह एक बड़ी रोचक कथा सुनाते थे। यह कथा प्रसंग एक ग्रामीण परिवार का था। इस परिवार में एक परम्परा थी कि शादी-विवाह के समय परिवार के लोग एक बिल्ली को पकड़कर एक टोकरी के नीचे ढक देते। शादी-विवाह का आयोजन चलता रहता। इसमें कई दिन बीत जाते। तब तक प्रायः बिल्ली मर जाती। बाद में उसे फेंक दिया जाता। ग्रामीण परिवार में यह प्रथा सालों से नहीं पीढ़ियों से चल रही थी। कभी किसी ने इस प्रथा से जुड़ी धारणा के बारे में खोज-बीन करने की कोशिश नहीं की।

उस परिवार के लोगों का ध्यान ज्यादातर इस बात पर टिका रहता था कि घर में जब भी कोई शादी हो, तब एक बिल्ली को टोकरी के नीचे रख देना है। फिर जब सारा आयोजन समाप्त हो जाय तो उस मरी हुई बिल्ली को कहीं फेंक देना है। परिवार की नयी पीढ़ी के लोग जिसने भी इस प्रथा के औचित्य को जानने की कोशिश की उसे झिड़क दिया गया। घर के बड़े-बूढ़ों ने उन्हें धमकाया, घर से बाहर निकाल देने की धमकी दी। और कहा कि बुजुर्गों की बातों पर सवाल उठाते हो। बस इतना जान लो कि शादी के समय ऐसा करना शुभ होता है। बिल्ली को मार देने से भला शुभ का क्या सम्बन्ध है? इस सवाल का उत्तर किसी ने भी न दिया।

लेकिन परिवार के एक नवयुवक से रहा न गया। उसने बात की जड़ में जाने की ठान ली। उसने परिवार की पुरानी डायरियों को पलटा। गाँव के बड़े-बुजुर्गों से बात की। अंत में उसे सच्चाई का पता चला। सच्चाई यह थी कि सालों पहले पुरानी पीढ़ी में एक लड़की की शादी थी। सभी लोग शादी के काम में जुटे थे। घर में पालतू बिल्ली थी, जो इधर-उधर दौड़कर जब-तब चीज-सामानों को गिरा रही थी। गृहस्वामिनी उसके इस व्यवहार से परेशान हो गयी। अन्त में उसने उस बिल्ली को एक टोकरी के नीचे ढक दिया। काम-काज की व्यस्तता में वह उसे भूल गयी। शादी के बाद जब याद आयी, तो उसे टोकरी से निकाला, लेकिन तब तक बिल्ली मर चुकी थी। बड़े ही दुःखी मन से उसे बिल्ली को फेंकना पड़ा। इस सत्य ज्ञान को जानते ही असत् ज्ञान अपने आप ही खत्म हो गया। उस घर के लोगों को जब इस सच्चाई का पता चला तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ।

गुरुदेव कहते थे समाज और परिवार परम्पराओं, रूढ़ियों के नाम पर ऐसे असत् ज्ञान का विपर्यय का बोझ ढोए जा रहे हैं। समाज ही क्यों व्यक्ति के रूप में हमारी अपनी जीवन शैली भी विपर्यय से घिरी है। अनगिनत मिथ्या धारणाएँ हमें घेरे हैं। इनके कारण हमारी जीवन ऊर्जा बरबाद हो रही है। रस्सी को साँप समझकर हम डरे हुए हैं। रेगिस्तान की तपती रेत में पानी के भ्रम से भ्रमित होकर लोभ के कारण भाग रहे हैं। कहीं हमें भय सता रहा है, तो कहीं लोभ। जबकि दोनों ही औचित्यहीन हैं। मिथ्या धारणाओं से ग्रसित मन जो प्रक्षेपित करता है, उसी को सच समझ लेते हैं। हमारे पूर्वाग्रह, दुराग्रह से भरी हुई धारणाएँ हमारी जानने की शक्ति को ढके हुए हैं।

साधक वही है, जिसकी निगाहों में ताजगी हो। जो क्षण प्रतिक्षण मन-अन्तःकरण पर जमने वाली धूल-मिट्टी को हटाता रहे। अतीत के हर पल को मिटने दे और सच्चा सत्यान्वेषी हो। परम पूज्य गुरुदेव के अनुसार विपर्यय है तो मिथ्या ज्ञान। सामान्यतया इसे साधना के लिए बाधा ही समझा जाता है। पर यदि साधक समझदार हो तो इसे भी अपनी साधना बना सकता है। भ्रम में समझदारी पैदा हो जाय। भ्रमित करने वाली वस्तु, विषय या विचार के प्रति जागृति हो जाय, तो भ्रम अपने आप ही टूट जाते हैं।

साधकों ने यदि गुरुदेव की पुस्तक ‘मैं क्या हूँ?’ पढ़ी होगी तो इस तत्त्व को और गहराई से समझ सकते हैं। यदि किसी ने यह पुस्तक अब तक न पढ़ी हो, तो उसे अवश्य पढ़ना चाहिए। क्योंकि प्रकारान्तर से इसमें विपर्यय को साधना विधि बनाने की तकनीक है। और वह साधनाविधि विपर्यय के प्रति सचेत होना, जागरुक होना। उसे परत-दर-परत उद्घाटित करना मैं क्या हूँ? इस गहन जिज्ञासा के साथ ही विपर्यय की परतें उघड़ने लगती हैं। इस क्रम में पहले अपने को देह मानने का असत् ज्ञान टूटता है। फिर टूटता है अपने को प्राण मानने का परिचय। इसके बाद मन की मान्यता समाप्त होती है। फिर बुद्धि का तर्कजाल भी समाप्त होता है। अन्त में निदिध्यासन का यह क्रम भाव समाधि का स्वरूप लेता है। और पता चलता है- आत्मा का परिचय। होता ‘अयमात्मा ब्रह्म’ का प्रगाढ़ बोध। जीवन के सारे विपर्यय समाप्त होते हैं। असत् का अंधेरा मिटकर सत् का प्रकाश होता है।

यह सब होता है विपर्यय के सत्य और तत्त्व को सही तरह से जानने पर। क्षण-प्रतिक्षण अपने ऊपर से मिथ्या धारणाओं के आवरण को हटाने पर। इस तरह क्लिष्ट कही जाने वाली विपर्ययवृत्ति भी अक्लिष्ट हो सकती है। बस इसके लिए साधकों में समझदारी भरी साधना होना चाहिए। उन्हें बस अपने जीवन शैली और जीवन तत्त्व दोनों ही आयामों में छाई हुई विपर्यय घटाओं के प्रति जागरुक होना पड़ेगा। तो आज और अभी से प्रारम्भ करने अपनी यह जागरुकता की ध्यान साधना। इसके बाद आपके सामने योग कथा की अगली कड़ी का प्रस्तुतीकरण होगा। जिसमें महर्षि पतंजलि विकल्पवृत्ति के बारे में बताएँगे। इसका स्वरूप और महत्त्व जानने के लिए अखण्ड ज्योति के अगले अंक की प्रतीक्षा करें। परन्तु यह प्रतीक्षा भी साधकों के अनुरूप साधनामय होनी चाहिए।


संसार की आवश्यकता (Kahani)

रावण का पराभव हुआ और विभीषण का राज्याभिषेक। राजा विभीषण भगवान राम के समक्ष कर्त्तव्यपालन संबंधी निर्देश प्राप्त करने की जिज्ञासा से खड़े हुए।

भगवान राम बोले, अपने बड़े भाई पंडितराज रावण के ज्ञान−विज्ञान का रक्षण और विकास करना, पर अपना चिंतनक्रम हमारे भक्तों जैसा आदर्शनिष्ठ तथा व्यवस्थित रखना।

विभीषण ने जानना चाहा कि रावण से चिंतन स्तर का क्या भूल हुई, तो करुणानिधि बोले, उसने सत् पुरुषों का व्यवस्थित चिंतन छोड़ दिया, लोलुपों का अस्त−व्यस्त क्रम अपनाया, इसलिए अपने ज्ञान का ठोस लाभ समाज को न दे सका। आदर्शनिष्ठ चिंतन छोड़कर, संकीर्ण स्वार्थगत चिंतन ने उसे हीन कर्मों में लगा दिया और दुर्गति करा दी। उसकी रुचि के और संसार की आवश्यकता के ढेरों श्रेष्ठ कार्य प्रतीक्षा में ही रखे रह गए।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी - ध्यान क्यों करें? कैसे करें?−3

दीपक की तरह जलें, प्रेरणा दें

मैं आपको दीपक का उदाहरण देकर समझा रहा था कि दीपक आप जलाएँ। दीपक जलाने के साथ−साथ और दीपक जलाने के बाद आप यह ध्यान रखें कि भगवान की भक्ति का एक मूलभूत सिद्धाँत यह भी है कि आदमी को जलना पड़ता है, गलना पड़ता है। यह भगवान का भक्त जो है, वह बरगद के पेड़ की तरह से बड़ा तो हो जाता है यह हमने माना, लेकिन बरगद के पेड़ की तरह से बड़ा होने से पहले बीज को गलना पड़ता है। बड़ा होने से पहले आदमी को भी गलना तो पड़ेगा। महाराज जी मैं तो वृक्ष की तरह से बड़ा हो जाऊँगा? हाँ बेटे, जरूर हो जाएगा, लेकिन गलना तो पड़ेगा। नहीं, मैं गलना तो नहीं चाहता। जो कुछ भी हो मैं, तो मालदार बनना चाहता हूँ, मोटा बनना चाहता हूँ। बेटा मोटा तो तू नहीं बन सकता, तेरी औलाद बन सकती है। बेटे, जो प्रेरणाएँ मैं आपको दे रहा हूँ, ये आपके मस्तिष्क में गूँजती रहें, गूँजती रहें। दीपक आप जलाते चले जाएँ और यह विचार करते चले जाएँ कि हमारी एक छटाँक जैसी हैसियत और औकात है। हमारे भीतर जो स्नेह चिकनाई लबालब भरी हुई है, उसके द्वारा हम अपने आपको जलाते हैं और जलकर रोशनी पैदा करते हैं, दिशाएँ देते हैं। रोशनी कैसे पैदा करते हैं? जैसे प्रकाश−स्तंभ बीच समुद्र में जलते रहते हैं और जल करके निकलने वाले राहगीरों को, चलने वाली नावों को रास्ता बताते रहते हैं। आप उधर से मत जाइए, इधर से जाइए । स्वयं रात में प्रकाशस्तंभ (लाइट हाउस) जलते रहते हैं। सितारे ऊपर रात में जलते रहते हैं और हम निकलने वालों को रास्ता बताते रहते हैं−आप इधर से चले जाइए, आप उधर से चले जाइए। सितारे जी आपको क्या फायदा है? हमको यह फायदा है कि आपको ठोकर नहीं लगे, आप अपने रास्ते पर चले जाएँ, इसीलिए हम रात भर जलते रहते हैं। कौन जलता रहता है? तारे जलते रहते हैं और छोटे बच्चे उनको दुआएँ देते रहते हैं। थैंक्यू। ट्विंकिल−ट्विंकिल लिटिल स्टार, हाऊ ह्वाई वंडर यू आर......?

आसमान पर चमकने वाले सितारे चमकी चमको, तुम ऊपर चमकते रहो। तुम्हारी तरह हमें भी रास्ता मिलता रहे। आप पहले आसमान के सितारों की तरह जलो। गाँधी जी ने जब राजा हरिश्चंद्र का ड्रामा देखा, तो यह निश्चय किया कि हम भी इनके तरीके से सत्य पर चलेंगे। हम भी ऐसी शानदार जिंदगी जिएँगे।

बेटा, दीपक जलाने से मतलब यह है कि हम जलें और दूसरों को भी जलने के लिए प्रोत्साहित करें। हम अपनी जिंदगी में रोशनी पैदा करें, शानदार जिंदगी ही जिएँ और उतनी रोशनी दूसरों को भी दें, यही सिद्धाँत बनाएँ। ये भाव दीपक जलाते समय होने चाहिए। नहीं साहब, दीपक जलाने से भगवान जी प्रसन्न हो जाते हैं। आप से हुए होंगे, मेरे खयाल से प्रसन्न नहीं हो सकते। नहीं महाराज जी, दीपक जलाने से भगवान जी बहुत प्रसन्न हो जाते हैं, पर असली गाय के घी से प्रसन्न होते हैं और नकली घी से प्रसन्न नहीं होते। अच्छा पर मेरा ऐसा खयाल है कि हमारी जिंदगी दीपक की तरह जलने वाली हो तो भगवान भी हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाते हैं।

कब बरसेगा दैवी अनुग्रह

मित्रो, भगवान हमारे नजदीक हैं। भगवान का अनुग्रह हमारे पास है। जो फल भक्ति के लिखे हुए हैं, वे सब आपको मिलते चले जाएँगे। एकोंएक फल मैं आपको निश्चित दिला सकता हूँ और इस बारे में मैं आपको विश्वास दिला सकता हूँ, इसकी गारंटी हमारे पास है। आप जिस देवता की कृपा की कहें, उसी देवता की कृपा करा दूँ, लेकिन शर्त यह है कि अपना जीवन गंदा नहीं हो। नहीं साहब, जीवन तो हमारा गंदा ही रहेगा। नहीं बेटे, जीवन गंदा रहेगा तो देवता भी कृपा नहीं करेंगे।

मित्रो भगवान को जल से स्नान कराने से मतलब चेतना को स्नान कराने से है। नहीं महाराज जी, चेतना को तो मैं स्नान बाद में कराऊँगा, पहले पानी से अपने शरीर को नहलाऊँगा। बेटे, कैसे करा लेगा, बता तो सही, शरीर से क्या काम हो जाता है? महाराज जी मैं तो ऐसे ही नहा लेता हूँ। नहा लेता है तो तू एक बात बता कि तेरी चमड़ी के खोल में क्या क्या भरा हुआ है? माँस भरा हुआ पड़ा है। अच्छा तो तू यह बता कि पूजा की कोठरी में माँस तो नहीं ले जाता? नहीं महाराज जी, पूजा की कोठरी में माँस तो नहीं ने जाता। और हड्डी भी नहीं ले जाता। मुँह से जब भजन करता है तो पहले तू कुल्ला कर लेता है न? हाँ महाराज जी, कुल्ला कर लेता हूँ। मुँह में गंदी चीज तो नहीं रखता? नहीं महाराज जी, नहीं रखता । ऐसा तो नहीं होता कि तेरे मुँह से माँस−वास भरा रहता हो और तू जप करता रहता हो? नहीं महाराज जी, मुँह में माँस भरा रहेगा तो मैं जप कैसे करूंगा। ऐसा तो नहीं कि सूखी हड्डी मुँह से भरे रहता हो और राम नाम लेता हो। ऐसी गलती मत करना कहीं। यदि इस तरह जप किया तो भगवान जी नाराज हो जाएँगे। नहीं महाराज जी, ऐसा तो नहीं करता। बाहर की नहीं, भीतर की सफाई

मित्रो, जहाँ कहीं भी शास्त्रों में स्नान का वर्णन है, वहाँ शरीर के धोने का सिद्धाँत नहीं है। शरीर के धोने का मतलब इच्छाओं, भावनाओं, विचारणाओं की सफाई से है। जो केवल अपने शरीर को खुशबूदार बनाते रहते हैं और शरीर को कितनी ही बार धोते रहते हैं। सारे दिन कोई क्रीम लगाता रहता है, कोई सुपर लक्स से नहाता है, कोई बढ़िया से बढ़िया साबुन से नहाता रहता है। नहाने के बारे में तो उन लोगों को देखो, जो अपने शरीर को तो धोते रहते हैं, परंतु भीतर से कैसे−कैसे धंधे करते हैं। किस किस तरह से पैसा कमाते रहते हैं, इसमें भिक्षा भी शामिल है। बेटे, अगर हम भीतर की भी सफाई रोज करें तो भगवान भी प्रसन्न होगा और अपना आपा भी। शरीर कम धोया, कोई बात नहीं। बेटे, तू समझता क्यों नहीं, स्नान करना एक सिद्धाँत है कि हमारा मन और हमारी चेतना का परिष्कार होना चाहिए। देव−पूजन से भी हमारा मतलब यही है।

मित्रो, जप करने से क्या मतलब है? जप करने से हमारा मतलब देव−पूजन से है। इसमें देव−पूजन के साथ आत्मशोधन की दो क्रियाएँ जुड़ी हुई हैं। यह दूसरा वाला चरण है जप का और तीसरा वाला चरण है ध्यान का जप और ध्यान को हम मिला देते हैं। दोनों को मिला देने से एक प्रक्रिया बनती है, नहीं तो जप अधूरा रह जाएगा। आपका जप अधूरा है, अगर आप ध्यान नहीं कर रहे होंगे। जप करने पर लोगों की शिकायत होती है कि मन भागता रहता है । बेटे, मन न भागे, इसीलिए हम जप के साथ साथ में दो ध्यान भी बताते रहते हैं। अक्सर हम एक साकार ध्यान बताते रहते हैं और दूसरा निराकार ध्यान।

साकार ध्यान का स्वरूप

बेटे, साकार ध्यान यह है कि माँ गायत्री की कृपा हमारे ऊपर बरसती है, उसका अनुग्रह हमारे ऊपर बरसता है। गायत्री माता क्या है? गायत्री माता वह है कि जिसमें हम जवान स्त्री को माता के रूप में देखना शुरू करते हैं। जो सद्बुद्धि की देवी है, जो सद्विवेक की देवी है। सद्विचारणाओं की देवी का नाम गायत्री है। गायत्री देवी है महाराज जी हाँ देवी है। तो आपको खूब सामान दे जाती है? हाँ बेटे, पहले देवी कभी कभी आती थी, पर अब हमें यह खयाल आया कि देवी है भी कि नहीं, सो हमने अपने गुरु का ध्यान शुरू कर दिया है। गुरु का ध्यान? हाँ बेटे, हम अपने गुरु का ध्यान करते हैं। गुरु को हमने देखा है। उनके बारे में हमको विश्वास है। गायत्री माता के बारे में तो हमको यह विश्वास हो गया है कि जो शक्ल हमने बना रखी है, यह शक्ल हमारी कल्पित है। यह कल्पना है? हाँ, ये कल्पना है, सिद्धाँतों की, आदर्शों की। यह आदर्श है। कौन−सा आदर्श? जिसमें हम जवान औरत को जिस भावना से और दृष्टि से देखते हैं वह, हम माँ की तरह से देखते हैं। उस भावना का नाम ही गायत्री है।

मित्रो, कोई जवान औरत हमको दिखाई पड़े और आँखों में यह भाव आए कि यह हमारी माँ है, तो समझिए कि आपको गायत्री आ गई। जैसे शिवाजी की आँखों में एक जवान मुसलमान महिला को देखकर यह भाव आया कि काश यह हमारी माँ होती तो अच्छा होता। अर्जुन भी एक बार देवलोक में गए। देवलोक में अर्जुन को क्या−क्या उपहार मिलने चाहिए थे? इसकी परीक्षा लेने के लिए उन्होंने क्या किया? उन्होंने यह किया कि उपहार पीछे देंगे, पहले देखें कि यह इस लायक भी है या नहीं। उन्होंने स्वर्ग की सबसे सुँदर एक महिला उर्वशी को उसके पास भेजा। उर्वशी जब उसके पास गई तो यह कहने लगी कि अर्जुन, देवताओं ने हमको तुम्हारे पास भेजा है। हम तुम से प्रार्थना करने और कहने आई हैं कि तुम्हारे जैसा बच्चा हमको चाहिए। वह समझ गया कि इसका मतलब क्या है। अर्जुन ने कहा−अच्छा, आपको मेरे जैसा बच्चा चाहिए, पर आप जिस तरीके से चाहती हैं, उस तरीके से बच्चा न हुआ, कन्या हो जाए तब? और फिर मेरे जैसा न होकर पंगु हो जाए, काना हो जाए तब? आप मेरे जैसा ही चाहती हैं न, तो मैं एक ही हूँ। भगवान ने जितने भी जानवर बनाए, सब एक ही बनाए, दूसरा नहीं बनाया।

एक पेड़ भी एक जैसा ही बनाया, दूसरा वैसा पेड़ ही नहीं बनाया । एक पत्ता किसी पेड़ का जैसा है, दूसरा वैसा पत्ता दुनिया में नहीं बनाया। वह हर चीज अलग बनाता है, दूसरी तो बनाता ही नहीं है। मैं भी जैसा बनाया गया हूँ, मैं तो एक ही हूँ, दूसरा तो भगवान बनाने वाला नहीं है। इसलिए मेरे जैसा तो मैं एक ही हूँ और आपकी प्रार्थना मैं स्वीकार करता हूँ। आपके आदेश को मानता हूँ। अतः आज से मैं आपका बेटा होता हूँ। अच्छा आइए माताजी, यह टीका मस्तक पर लगाइए और फिर आज से मैं आपका बेटा हूँ और आप हमारी माँ हैं।

सिद्धाँत जीवन में उतरें

यह क्या है? बेटे, यह बुद्धि है, एक विचारणा है, एक संकल्प है, एक सिद्धाँत है। अगर ये सिद्धाँत हमारे और आपके मन में आएँ तो आप गायत्री के निश्चित रूप से उपासक हैं। यह विवेक आपके भीतर है, तो आप गायत्री के उपासक हैं। हमने इसके शिक्षण के लिए कलेवर बनाकर रखा है− हंस, जिस पर गायत्री सवार रहती है। गायत्री हरेक पर सवार नहीं होती। क्यों महाराज जी? हमारे पास घोड़ा है, घोड़े पर ले आएँ? नहीं बेटे, घोड़े पर भी नहीं आएगी। तो महाराज जी, हम गायत्री माता को बुलाने के लिए रिक्शा लेकर चले जाएँ? रिक्शे पर बिठाकर ले आएँ, रिक्शे पर तो आ ही जाएँगी। नहीं बेटे, रिक्शे पर भी नहीं आएँगी। गायत्री माता को लाना हो तो बेटे, हंस के सिवाय और किसी पर नहीं आ सकती। महाराज जी, हंस तो बेकार होता है, किसी और सवारी पर नहीं आ सकतीं? घोड़ा कहें तो घोड़ा ला दूँ, हाथी कहें तो हाथी ला दूँ? घोड़े−हाथी पर तो वे कतई नहीं बैठतीं। वे हंस पर ही बैठती हैं। हंस से क्या मतलब है? हंस से मतलब है वह व्यक्ति, जो धुला हुआ हो। जिसने अपने कपड़ों को धोकर साफ −सुथरा बनाया हो। हंस से मतलब है वह व्यक्ति, जिसको कि मोती खाने की आदत हो, जो कीड़े−मकोड़े नहीं खाता हो । हंस से मतलब है वह व्यक्ति जो दूध और पानी को अलग−अलग करना जानता हो। महाराज जी, ऐसा हंस कौन−सा होता है? कोई नहीं होता, बेटे, हम और आप हो सकते हैं।

दोस्तों हंस एक अलंकार है। जैसा हंस हमने कल्पना कर रखा है, उसे दूध और पानी कहाँ से मिलेगा? दूध−पानी को वह कैसे अलग कर सकता है। यह तो अलंकार है। यह हंस जो कि गायत्री माता का वाहन है, ऐसा हमको भक्त बनना चाहिए अर्थात् हमारा जीवन ऐसा बनना चाहिए, जैसा कि हंस का होता है। तभी गायत्री माता हमारे कंधे पर सवार होंगी, हमारी पीठ पर सवार होंगी, हमारे सिर पर सवार होंगी। हमारे ऊपर उनकी छत्रछाया बनी रहेगी। क्या मतलब है? बेटे, इसका मतलब यह है कि हमको ध्यान करना चाहिए? किसका? साकार गायत्री माता का। गायत्री माता हमको स्नेह देती हैं। भगवान को जब हम माता के भाव से मानते हैं तो क्या देते हैं भगवान हमको? स्नेह देते हैं, हमको करुणा देते हैं, हमको दयालुता देते हैं और हमको श्रद्धा देते हैं।

निराकार ध्यान ऐसे करें

मित्रो, दूसरा वाला ध्यान हम सविता का कराते हैं, जिसको हम निराकार ध्यान कहते हैं। वह हमारे अंदर शक्ति देता है। महाराज जी हम सविता का शुरू में ध्यान करें? नहीं बेटे, शुरू में मत करना, पहले माता का ध्यान करना, बाद में सविता का ध्यान करना। सविता क्या देता है? सविता बेटे, सारा सामान देता है। क्या−क्या सामान देता है? पिता क्या देता है? पिता बेटे की पढ़ाई के लिए फीस देता है, अपनी कमाई का मकान देता है और तेरी औरत को जेवर बनाकर देता है। कहीं तेरी नौकरी के लिए सिफारिश के लिए जाता है। बेटे, बाप के पास माल है और अम्मा के पास माल नहीं है। तो अम्मा के पास क्या है? बेटे, उसके पास प्यार है, दुलार है। तुम्हें छाती से वही लगाए रहेगी,

दूध वही पिलाएगी। तू जब गंदगी कर लेगा तो धोएगी भी वही, प्यार भी वही देगी। और बाप? बाप के पास टट्टी कर लेता है, तो कहता है, अजी ले जाओ जी इसे, इसकी टट्टी धोओ, हमारे कोट को भी धो देना और कपड़े भी धो देना। अरे तो आप धो देते? नहीं साहब, यह हमारा काम नहीं है। बेटे, बाप कहता है कि अपने बच्चे को ले जाओ यहाँ से और इसकी

सफाई करो और कुरता भी ले जाओ, देखो जी, यह सब गंदा कर दिया, दूसरा कुरता लाओ। बच्चे पर भी झल्ला रहा है, उसकी माँ पर भी झल्ला रहा है और खुद पर भी झल्ला रहा है।

कौन झल्ला रहा है? बाप। बाप कौन है? सविता−हमारा पिता। एक आँख प्यार की और एक आँख सुधार की । प्यार की आँख गायत्री माता के पास है और सुधार की आँख सविता के पास है। स्नेह, जिसकी हमको प्रारंभिक आवश्यकता है, गायत्री माता से मिलता है और शक्ति हमें सविता से मिलती है। दोनों की उपासनाओं की जरूरत है। ध्यान करते समय आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि अगर आप प्रारंभिक उपासक हों, तो आपको गायत्री माता का ध्यान करना चाहिए। ध्यान करना चाहिए कि सद्बुद्धि रूपी माता, सद्विवेक की माता, सद्ज्ञान रूपी माता, करुणा रूपी माता, प्रेम रूपी माता अपना अमृत−सा दूध हमको पिला देती है। उस दूध को पीकर हमारी नसें और हमारी नाड़ियाँ शुद्ध−पवित्र होती हुई चली जाती हैं। हम स्नेह से भर रहे हैं, करुणा से भर रहे हैं, भावना से भर रहे हैं, कोमलता से भर रहे हैं। हमारा जो दुष्ट मन है, उसके अंदर कोमलता तो पैदा होनी ही चाहिए, सरसता तो पैदा होनी ही चाहिए, श्रद्धा तो पैदा होनी ही चाहिए। मित्रो, हमारी प्रारंभिक आवश्यकता है सौम्यता की, करुणा की। अभी हमारा संबंध सब जगह से निष्ठुरता से भरा हुआ पड़ा है। जब इसमें दयालुता आ जाए, श्रद्धा आ जाए तो फिर हम यह कहने के अधिकारी हैं कि भगवान हमको शक्ति दीजिए। अगर शक्ति आपको आ गई। कब? जब तक कि आप शुद्ध−पवित्र नहीं हुए, तो आपकी हानि हो जाएगी। आपका नुकसान हो जाएगा। दुर्वासा ऋषि ने अपने क्रोध का समापन नहीं किया था और उपासना करने लगे तो उनके क्रोध की वृद्धि हो गई। विश्वामित्र जब तक अपने आप को संशोधित करने की पूरी प्रक्रिया नहीं कर सके थे और तपस्या करने लगे। उस तप में, भजन में लगने का परिणाम यह हुआ कि उनकी कामवासना ज्यादा लगने का उद्दीप्त हो गई। उसके फलस्वरूप फिर क्या हुआ? बेटे उनके यहाँ अप्सरा से एक लड़की पैदा हुई थी, तुझे मालूम नहीं है। विश्वामित्र ऋषि के पास एक मेनका नामक अप्सरा आई थी। उसने चक्कर चलाकर विश्वामित्र से विवाह कर लिया था। महाराज जी, ऐसा हो सकता है? हाँ बेटे, ऐसा हो सकता है, इसीलिए शक्ति को प्राप्त करने से पहले पवित्रता−संशोधन की जरूरत है। संशोधन आप प्राप्त कर लें तब, तब आपको सविता का ध्यान करना चाहिए।

शक्ति की साधना

सविता का ध्यान कराने के लिए हम आपको थोड़ी−सी बानगी बताते हैं, चाशनी बताते हैं, थोड़ी−सी जानकारी देते हैं। सविता का ध्यान कैसे कराया जाएगा, इसका सैंपल हम बताते हैं। कैसे कराया जाएगा, कराइए तो साहब बेटे, हम ब्रह्मवर्चस् की साधना कराएँगे। इसे कराने से पहले हम आपको प्रारंभिक प्रशिक्षण देते हैं। यह पी॰ एम॰ टी॰ का कोर्स है। कौन−सा? यह जो अभी हम कराते हैं। अभी हम आपको प्रारंभिक शिक्षा इसलिए दे रहे हैं कि क्या आप अपना संशोधन कर सकते हैं? क्या आपके लिए ऐसा संभव है? क्या आप अपना चिंतन और अपने विचार बदल सकेंगे? यदि हाँ, तो हम आपको शक्ति दिलाएँगे। ब्रह्मवर्चस् साधना में हम आपको शक्ति देने के लिए बुलाते हैं, पर आपके लिए शर्त यही है कि आप अपने वर्तमान जीवन का स्वयं ही संशोधन कर लें, क्योंकि तभी जो शक्ति आएगी, वह आप के जीवन के लिए लाभदायक हो सकती है। आपका भला कर सकती है अन्यथा यदि शक्ति आई, तो आपका पेट फट जाएगा। आप उस शक्ति को सहन नहीं कर सकेंगे।

मित्रो, शक्ति को प्राप्त कर लेना मुश्किल नहीं है शक्ति को हजम करना, जब्ज करना मुश्किल है। घी में बेटे, बड़ी ताकत होती है। घी प्राप्त करना कोई मुश्किल नहीं है। पच्चीस रुपये यदि तेरे पास हों, तो मुझे दे, मैं तेरे लिए एक किलो घी लाकर दे दूँगा । फिर तो महाराज जी, मैं खा लूँ? खा ले बेटे, तेरे चेहरे पर चमक आ जाएगी, तू मोटा हो जाएगा। अच्छा लाइए, एक किलो का डिब्बा है, मैं तो आज खा जाता हूँ। हजम नहीं होगा बेटे। हजम न होने से तुझे तेरा घी नुकसान करेगा, तेरे पैसे भी जाएँगे, तुझे दस्त हो जाएँगे और तुझे उल्टी भी हो जाएगी। शक्ति प्राप्त करना और भगवान का अनुग्रह प्राप्त करना मुश्किल नहीं है। नहीं महाराज जी, बड़ा मुश्किल है। नहीं बेटे, कोई मुश्किल नहीं है। मुश्किल है तो चल, मैं तेरे साथ आता हूँ। मेरा गुरु मेरी सहायता करता है। क्या सहायता करता है?

सर्वश्रेष्ठ ध्यान : गुरु का ध्यान

मित्रो, सवेरे के वक्त जब मैं यहाँ आता हूँ तो उससे पहले अपने गुरु के सम्मुख बैठा रहता हूँ। हम दोनों के बीच ऐसे सूत्र स्थापित हो गए हैं कि शरीर तो उनका न जाने कहाँ रहता है और हमारा शरीर यहाँ रहता है, फिर भी हम आपस में बैठे हुए दी व्यक्तियों की तरह से बात करते रहते हैं। परामर्श करते रहते हैं, सलाह−मशविरा करते रहते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। हमको क्या दिक्कत आ जाती है और क्या परेशानी आ जाती है और उसका क्या हल हो सकता है? बहुत−सी बातों के लिए आपस में जैसे दो मित्र बैठकर बात कर लेते हैं, वैसे ही हम दोनों कर लेते हैं। तो महाराज जी, हमको भी यह लाभ मिल सकता है? बेटे, यह लाभ तो मैं तुझे दिला सकता हूँ, पर पहले तू अपना कर्त्तव्य पालन कर और न करे तो ना सही, मैं तो कर सकता हूँ।

मित्रो, प्रातःकाल चार से पाँच बजे का वक्त अपने बच्चों के लिए, परिजनों के लिए मेरा हमेशा के लिए सुरक्षित है। चार से पाँच बजे के वक्त में जब कभी आपको आवश्यकता पड़े, जरूरत पड़े, गुरुजी से कोई बात पूछनी है, परामर्श करना है या कोई सलाह लेनी है या कोई शक्ति की जरूरत है या कोई सहायता की जरूरत है, तो उस वक्त चुपचाप उठकर बैठ जाना। गुरुजी, स्नान कर लूँ? नहीं बेटे, कर सके तो कर ले, नहीं तो स्नान किए बिना ही बैठ जाना । बैठ करके यह ध्यान करना, जैसे मैं अपने गुरु का ध्यान करता हूँ। ध्यान करता हूँ कि मैं अपने गुरु की गोदी में बैठा हुआ हूँ। वे मेरे सिर पर हाथ फेरते जाते हैं, तो मुझे बड़ा मजा आता है। गायत्री माता के बारे में तो यह भी ध्यान आता है कि यह हमारी कल्पना की हुई एक मूर्ति है। ऐसा ध्यान आ जाता है, तब मेरा मन डाँवाडोल हो जाता है। अब ऐसा होने लगा है, पहले मेरे मन में ऐसा नहीं होता था। इसलिए अपने गुरु को, जिनको मैंने देखा है, जिनको जाना है, जिनके ऊपर मेरा विश्वास है, जिनको मैं भगवान मानता हूँ और मैं उन्हीं का दास हूँ, उनके बारे में ऐसा संदेह नहीं उत्पन्न होता है, संकल्प−विकल्प उत्पन्न नहीं होते। शक्ल भी किसी की मुझे नहीं बनानी पड़ती।

मित्रो, जिन गुरुजी को मैंने जाना है, देखा है, परखा है। जिनकी अपार कृपा का भार मेरे ऊपर है, जिनसे मैं लड़ाई भी लड़ सकता हूँ, तो उन्हें क्यों न मानूँ भगवान। जब मुझे कल्पना ही करना पड़ी तो श्रीकृष्ण की कल्पना, शेषशायी भगवान की कल्पना की। लेकिन फिर देखा कि हमारे यहाँ जो श्रीकृष्ण का फोटो टँगा हुआ है, तो उसमें किसी का मुँह लंबा है, किसी की नाक चौड़ी है। क्यों साहब, श्रीकृष्ण भगवान की नाक लंबी थी या चौड़ी थी? नहीं बेटे, हमें नहीं मालूम। देखिए, आप ही बताइए कि चौड़ी नाक वाले कृष्ण हैं या ये हलकी नाक वाले कृष्ण हैं। बेटे, ये तो तसवीर बनाने वालों ने बनाए हैं। असली कृष्ण कैसे थे, नहीं मालूम। असली कृष्ण ऐसे भी हो सकते हैं, जैसा तू है। महाराज जी, वे तो बहुत ही खूबसूरत थे। शायद वे खूबसूरत भी हो सकते हैं और कुरूप भी हो सकते हैं। असली कृष्ण कैसे थे, हमें नहीं मालूम। यह फोटो हमने बनाया है। यदि हम ही फोटो बना सकते हैं तो हम अपने मन का क्यों न बना लें। (समापन किश्त अगले अंक में)


क्राँतिकारी बनाने में (Kahani)

शंभूनाथ अपने पिता के इकलौते बेटे थे। उनने क्राँतिकारी दल में जाने की जब अपने पिता से आज्ञा माँगी तो उनने इतना ही कहा कि समझ−सोचकर कदम बढ़ाना। खतरों को पहले से ही ध्यान में रखो। उनके लायक हिम्मत हो, तो ही जाना। बीच में से लौटकर हँसी मत कराना। साथ ही उनने कहा, बाहर से पैसा लेने से पहले घर में जो कुछ है, उसे खत्म कर लो, ताकि कोई यह न कहे कि अपना बचाए फिरते हैं और दूसरों पर हाथ पसारते हैं। घर में जो पूँजी थी, पिता ने वह खुशी−खुशी दे दी। जब बिलकुल खाली हाथ हो गए, तब पार्टी के काम के लिए दूसरे तरीकों से धन प्राप्त करने लगे।

शंभूनाथ पर कई मुकदमे चले। हाईकोर्ट ने उन्हें आजीवन कैद की सजा दी। जेल में नि बंदियों से उनका संपर्क रहा, उन्हें भी क्राँतिकारी बनाने में वे लगे रहे।


युगगीता−39 - कर्मयोग की परमसिद्धि−अंकःशुद्धि

(कर्म−संन्यास−योग नामक गीता के पाँचवें अध्याय की पाँचवीं )

युगगीता की पिछली कड़ी में पाठकों ने पढ़ा है कि योगेश्वर एक चिकित्सक−शिक्षक की तरह अपने प्रिय शिष्य अर्जुन का बड़ी कुशलता से उपचार कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि कर्मयोग न करने वाले के लिए तो संन्यास दुःख का ही कारण बनता है। वे बिना अहंभाव के, बिना किसी प्रकार की कामना के जीवन जीने की कला का अर्जुन को शिक्षण देते हैं एवं अपने उद्बोधन में सातवें श्लोक के माध्यम से उसे सच्चे योगी के लक्षण भी बता देते हैं। ये तीन लक्षण हैं−हर श्वास में योगमय जीवन जीते हुए अपनी बुद्धि−अंतःकरण को शुद्ध करते चलना (योगयुक्तो विशुद्धात्मा), अपने मन−इंद्रियों को अपने वश में करना (विजितात्मा जितेन्द्रियः) तथा सभी जीवों में वही परमात्मा समाया हुआ है, सतत यही अनुभूति करना (सर्वभूतात्मभूतात्मा) । ऐसा जीवन जीने वाले के कर्म बंधन का कारण नहीं बनते, ऐसा श्रीकृष्ण का स्पष्ट मत है (कुर्वन्नपि न लिप्यते)। आगे योगेश्वर कहते हैं कि ऐसा आत्मज्ञ व्यक्ति पंच ज्ञानेंद्रियों− कर्मेंद्रियों के द्वारा विभिन्न कर्म करता हुआ भी यही मानता है कि वह निर्लिप्त है एवं इंद्रियों का सारा व्यापार स्वतः चल रहा है। द्रष्टा स्तर के दिव्यकर्मी की मान्यता यह हो जाती है कि मैं कुछ भी नहीं करता (नैव किंचित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्−आठवाँ श्लोक)। तो फिर वह कर्त्ताभाव से मुक्त हो जाता है। वह जागरुकता की इस अवस्था में यह देखता और अनुभव करता है कि इंद्रियाँ ही विषयों में विचरण करती है (इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्− नवाँ श्लोक)। यह साधना की उच्चतम स्थिति है। अब आगे दसवें श्लोक से इस माह का स्वाध्याय आरंभ करते हैं।

कर्म ब्रह्म को अर्पित हों

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।

जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह जल में कमलपत्र की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता । (5/10)

अहंकार के भाव से मुक्त व्यक्ति जब अपनी आसक्ति को भी त्याग देता है तो वह ऐसी उच्चतम स्थिति में पहुँच जाता है कि वह जो भी कर्म करता है, मानो परमात्मा उन्हें स्वयं कर रहे हैं, ऐसा प्रतीत होता है। ऐसा व्यक्ति दिव्यकर्मी होता है एवं ब्रह्म में कर्मफल को सौंपकर और कर्त्तृत्वाभिमान को छोड़कर सारे कर्म करता है। श्री रामकृष्ण परमहंस नरेंद्र को लक्ष्य करके कहते हैं, ब्रह्म कैसा है, जानता है? जैसे वायु। दुर्गंध−सुगंध वायु के साथ आ रही है, किंतु वायु निर्लिप्त है। इसी तरह ब्रह्म भी निर्लिप्त है। भला−बुरा जीव के लिए है, सत्−असत् जीव के लिए है, ब्रह्म का इससे कुछ भी नाता नहीं। दीपक के सामने कोई भागवत पढ़ता है, कोई जुआ खेलता है, किंतु दीपक निर्लिप्त है। दुःख, पाप, अशाँति सभी जीव के लिए हैं, ब्रह्म तो निर्लिप्त है। इस निर्लिप्त आनंदस्वरूप ब्रह्म के साथ निज को अभिन्न मानना ही यथार्थ ज्ञान मोक्षत्व की प्राप्ति है। आगे वे कहते हैं, किंतु इस ब्रह्म में समर्पण बड़ा ही कठिन काम है। अहं को परमात्मा में विलीन कर देना अर्थात् मैं करता हूँ, ऐसी बुद्धि को छोड़कर कर्म को करना अज्ञानी ‘मैं करता हूँ’ ऐसी समझकर अपने कर्म को अहं के ऊपर स्थापित करता है और परोक्ष ज्ञानी अहं अभिमान छोड़कर फल सहित कर्म को ब्रह्म में स्थापित या अर्पित करते हैं। (श्रीमद्भगवद्गीता−स्वामी अपूर्वानंद ही रामकृष्ण शिवानंद आश्रम, बारासात, पं॰ बंगाल)।

अहंभाव से परे अक्षरपुरुष

मनुष्य ब्रह्म में समर्पण तब ही कर पाएगा, जब वह त्रिगुणातीत होगा। गुणों ने उसे अपना गुलाम बना रखा है। कभी हमें तमोगुण जड़ता में धर दबोचता है, कभी हमें रजोगुण की आँधी उड़ा ले जाती है और कभी सत्वगुण का आँशिक प्रकाश उसे बाँधकर रख लेता है। मनुष्य को इसी कारण सुख −दुःख, हर्ष−शोक, काम−क्रोध, आसक्ति−जुगुप्सा अपने वश में करते रहते हैं, उसे जरा भी स्वतंत्रता नहीं है। श्री अरविंद कहते हैं कि मुक्त होने के लिए मनुष्य को प्रकृति के कर्म से पीछे हटकर अक्षरपुरुष की स्थिति में आ जाना होगा। तभी वह त्रिगुणातीत होगा। त्रिगुणातीत अर्थात् स्वार्थपूर्ण अहंभाव से परे हो जाना। ऐसा व्यक्ति समाज का एक योगनिष्ठ कर्त्तव्यपरायण सेवक होता है तथा जीवन में संपादित उसकी सभी क्रियाएँ उत्साह एवं दिव्य प्रयोजन के साथ होती हैं। कर्मों में कुशलता और सौंदर्य के दर्शन होते हैं।

अहंकार रहित दृष्टिकोण ही हमारे भीतर बैठे सच्चिदानंद रूपी परमात्मा को−श्रेष्ठतम तत्व को अनावृत करता है। हम अपनी अपूर्णताओं से ऊपर उठकर जीवन के सभी कार्यों को अति सुँदर ढंग से संपादित करने लगते हैं। ऐसा व्यक्ति जब आसक्ति को त्यागकर (संगं त्यक्त्वा) , ब्रह्मार्पणपूर्वक (ब्रह्मण्याधाय) अपने कर्म करता है (कर्मणि करोति यः) तो वह ऐसा दिव्यकर्मी व्यक्ति बन जाता है, जिसने कर्त्ताभाव−अहंकार का समर्पण कर दिया हो। फिर वह कर्म करते हुए भी नई वासनाओं से नहीं बँधता और न ही पाप से लिपायमान ही होता है (लिप्यते न स पापेन) और ऐसी स्थिति में जल में रहने वाले कमलपत्र के समान जगत में अपनी स्थिति बनाए रखता है (पद् मपत्र−मिवाम्भसा) । काव्य की दृष्टि से अति सुँदर, विलक्षण स्तर के इस श्लोक में जो उपमा दी गई है, वह हमें गीता जी के दर्शन का वास्तविक रसास्वादन कराती है हम जल में कमल के समान रहें। कमल पंकज कहलाता है, पंक अर्थात् कीचड़ से जन्मा−कमल। वह न कीचड़ से लिप्त होता है, न जल से । वह तो बस कमल ही होता है, जिसकी तुलना विष्णु भगवान के नेत्रों से की गई है, जो शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है। गीता का अध्यात्म हमें शिक्षण देता है कि हम उच्चस्तरीय चैतन्य में व्याप्त सत्ता के प्रति अपने अहंकार को समर्पित कर और आसक्ति को छोड़ कर्त्तव्य कर्मों का संपादन करें। निर्लिप्त भाव से हम यदि कर्म करेंगे तो नईकडडडड वासनाओं से नहीं बँधेंगे, न ही पाप हमें बंधनों में उलझाएँगे (लिप्यते न स पापेन) लौकिक दुनिया जो पुत्रेषणा, वित्तेषणा, लोकेषणा से भरी पड़ी है, उसमें भी हम उनमें लिप्त न होकर कमल के पत्ते के समान बने रहेंगे। किंतु क्या यह संभव है? अहंकार रहित भाव में फिर व्यक्ति कर्म कैसे कर पाएगा? उत्पन्न नई वासनाएँ कहीं उसके व्यक्तित्व को जकड़ तो नहीं लेंगी? क्या वह कर्मों से अपने बंधनों को मुक्त कर सकता है? श्रीकृष्ण कहते हैं कि हाँ, यह संभव है एवं इसके लिए वे ग्यारहवें श्लोक में संकेत देते हैं−

कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥

कर्मयोगी (दिव्यकर्मी योगिनः) आसक्ति को त्याग करके केवल इंद्रिय, मन बुद्धि और शरीर से भी अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं। (5/11) यज्ञीय भाव से किए गए कर्म पूर्ण समर्पण भावपूर्वक संपन्न होते हैं। ऐसे दिव्यकर्मी अपने आप को कर्म और उसके फल द्वारा लिप्त न होने देकर (उनसे आसक्त न हो, प्रभावित न होकर−संगं त्यक्त्वा) अपने मन, बुद्धि, ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों से मात्र प्रभु अर्पित होकर कर्म करते हैं (कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि) । वे समाज की, संसार की सेवा हेतु जीते है एवं यह दिव्यकर्म वे अपनी अंतःशुद्धि के लिए करते हैं (योगिनः कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वात्म शुद्धये) कितना स्पष्ट निर्देश है। ज्यादा व्याख्या की जरूरत भी नहीं ।

संगं त्यक्त्वा

आसक्ति से मुक्ति −निवृत्ति की बात ‘संगं त्यक्त्वा’ के माध्यम से बार−बार गीता में आई है। यह दसवें एवं ग्यारहवें श्लोक में लगातार आई है। अहंकार और अहंकेंद्रित कामनाएँ दोनों ही मिलकर आसक्ति को परिभाषित करती हैं। इस भीतर बैठे दानव से जूझकर उससे मुक्ति पा लेना दिव्यकर्मी का एक बहुत महत्वपूर्ण कर्म होता है। इसके लिए वह अलग से कोई उपासना या कर्म नहीं करता। वह यह कर्म सहज रूप में करता हुआ अपनी वर्तमान वासनाओं का क्षय कर लेता है। संसार में संव्याप्त परमात्मसत्ता की सेवा करते करते वह मन, बुद्धि, इंद्रियों को शाँत व स्थिर कर लेता है और उस भावावस्था में पहुँच जाता है, जहाँ वह ध्यानस्थ हो जाता है, उसके हृदय की शुद्धि हो जाती है एवं इस शुद्ध अंतःकरण के साथ उसे अनंत शाँति की उपलब्धि है, जो निष्काम कर्म करते−करते एक दिव्यकर्मी लोकसेवी को प्राप्त होती है।

तिलक का जीवन

ऐसे कर्मयोगी, जो आसक्ति को त्यागकर जनहितार्थाय अपने कर्म करते रहते हैं, जनसामान्य को अपने आचरण से शिक्षण भी देते हैं एवं बड़ा आदर्श जीवन जीते हैं। लोकमान्य तिलक ‘केसरी’ और ‘मराठा’ समाचारपत्रों का संपादन करते थे। दोनों समाचारपत्रों की सारा राष्ट्र प्रतीक्षा करता था, क्योंकि उनमें जन−जन के लिए संदेश छिपा होता था। आजादी के आँदोलन को आगे बढ़ाने में इन दोनों ही समाचारपत्रों की बड़ी भूमिका थी। और दिन की तरह वे अपने समाचारपत्र का संपादन कर उसे अंतिम रूप दे रहे थे कि खबर आई−आपके बेटे की मृत्यु हो गई है। पत्नी परेशान हैं। तुरंत चले आएँ। आसक्ति से पूर्णतः मुक्त तिलक ने संदेशवाहक से कहा, बेटा, हमारे बेटे का मरना हमारा व्यक्तिगत दुःख है, किंतु ‘केसरी’ का इंतजार तो सारे देश को है। वह हमारा लोककर्म है। तुम शवयात्रा की व्यवस्था करो, हम संपादन करके अभी आते हैं। यदि यह कार्य रुक गया तो अखबार निकल नहीं पाएगा एवं लाखों व्यक्ति निराश होंगे। इन व्यक्तियों की उम्मीदों को हमारे चिंतन ने जिंदा रखा है, इसलिए हम इसे छोड़ नहीं सकते। संपादन में तिलक ऐसे लीन हुए कि समय अधिक हो गया। जब तक वे पहुँचे, बेटे को अग्नि दी जा चुकी थी। मरे हुए बेटे को वे देख तक नहीं पाए। ऐसे आदमी को कोई निष्ठुर भी कह सकता है, परंतु अपनी व्यक्तिगत वेदना सहकर भी जो लोक शिक्षण हेतु कर्म में रत रहे, वही सच्चा कर्मयोगी है। यहाँ ऐसे ही कर्मयोगी की ओर संकेत किया गया है, जो अपनी वेदना को व्यक्तिगत न मान राष्ट्रधर्म में निरत रहा। ग्यारहवाँ श्लोक जिस कर्मयोगी की ओर संकेत करता है उसका सर्वोच्च आदर्श बालगंगाधर तिलक हैं।

परमपूज्य गुरुदेव पं॰ श्रीराम शर्मा जी

परमपूज्य गुरुदेव की मातुश्री का देहाँत हो गया। 1971 के प्रारंभिक महीनों का प्रसंग था। 3-4 माह में ही उन्हें अपने घोषित प्रवास पर हिमालय चले जाना था। वे स्वयं विलासपुर में दौरे पर थे। उन दिनों उनके बड़े सघन दौरे राष्ट्र के कोने−कोने में चल रहे थे। टेलीफोन करने की कोशिश की गई, तार गया एवं तब तक के लिए एक वरिष्ठ प्रतिनिधि को केंद्र से भेजा गया, ताकि वे तुरंत लौट आएँ। पूज्यवर की माता को सभी प्यार से ताई कहते थे। उनने कहा कि जब तक हम पहुँचेंगे−आएँगे, तब तक हमारे लाखों कार्यकर्त्ता कार्यक्रम न हो पाने के कारण प्रतीक्षा में रहेंगे, निराश हो जाएँगे। अग्नि उनके आने की प्रतीक्षा के बाद प्रज्वलित कर दी गई। बाकी लोगों ने, पारिवारिक जनों ने यह काम पूरा किया। गुरुदेव अपना दौरा पूरा कर दस−बारह दिन बाद लौटे। आकर फिर शेष उत्तर कर्म पूरे किए। वंदनीय माताजी ने अपने अंदर की वेदना उन तक पहुँचाने का प्रयास किया कि लोक−व्यवहार की दृष्टि से उनको आ जाना चाहिए था। गुरुवर का कहना था कि लोक−मंगल के लिए, लोक−शिक्षण के लिए लोकसेवी जीता है। हमारे न आने से कोई फर्क भी नहीं पड़ा व क्षेत्र के कार्यकर्त्ताओं को निराशा भी नहीं हुई। कोई इसे निष्ठुरता कह सकता है, माँ के प्रति असम्मान भी कह सकता है, परंतु यह दिव्यकर्मी, लोकसेवी के कर्मयोग की पराकाष्ठा है, जिसे ग्यारहवें श्लोक में योगेश्वर ने ‘संगं त्यक्त्वा’ कहकर परिभाषित किया है। ऐसे व्यक्ति स्थितप्रज्ञ स्तर के महामानव होते हैं एवं जल में पड़े कमल के पत्ते के समान निर्लिप्त जीवन जीते हैं।

योगीराज श्री अरविंद

श्री अरविंद सात सौ पचास रुपये की नौकरी छोड़कर मात्र पिचहत्तर रुपये मासिक में नेशनल कॉलेज के प्राचार्य बने। उस जमाने का बड़ौदा महाराज के सचिव स्तर पर सात सौ पचास रुपये का वेतन आज के हिसाब से एक−डेढ़ लाख रुपये प्रतिमाह बनता है, किंतु उनने लोकहित के लिए कम वेतन में नेशनल कॉलेज में प्रशिक्षण देना अनिवार्य माना। इसके साथ−साथ वे ‘वंदेमातरम्’ का संपादन भी करते थे। उन्हीं दिनों उनकी शादी हुई थी। शादी के बाद पत्नी की कुशलक्षेम पूछकर वे अपने कक्ष में आकर लिखने बैठ गए। कम−से−कम उस रात तो वे अपनी पत्नी के साथ बैठकर बिताते । व्यावहारिक तो यही था। घोष बाबू की पत्नी उनकी देख−रेख करती थीं, क्योंकि उन्हें स्वयं की अधिक सुध तो रहती थी नहीं। वे मकान मालकिन भी थीं, आयु में बड़ी भी। उनने दो मालाएँ बनाई एवं कहा कि आप अपनी कलम हमें दीजिए। आज की रात आप चुपचाप जाइए व पत्नी के पास रहिए। दो मालाएँ हमने आपके लिए बनाई हैं। एक माला स्वयं पहन लीजिए, एक माला अपनी पत्नी को पहनाइए। आप इतने संकोची हैं कि अपनी पत्नी से भी माला पहनेंगे नहीं। रात भर बैठकर उनसे बात कीजिए। फिर कल आकर जो लिखना है, वह कार्य कीजिएगा।

श्री अरविंद अपनी पत्नी मृणालिनी देवी के पास चले गए। रात्रि ढाई बजे घोष बाबू की पत्नी की नींद खुली हो उनने देखा कि श्री अरविंद के कक्ष की बत्ती जल रही है और वे अंदर बैठे यथावत् लिख रहे हैं। श्रीमती घोष बाहर ताला लगाकर भी आई थीं, किंतु ये तो संभवतः गए ही नहीं। उनने पूछा तो श्री अरविंद बोले, हमने आपकी सारी बातें मान लीं, पत्नी को माला पहनाई, उससे बातें कीं। जब सारी बाते समाप्त हो गई तो वह भी चुप, हम भी चुप। हमने उससे पूछा कि हम संपादन कर लें तो वह स्वीकृति देकर सो गई। हम लौट आए। देखा बाहर ताला लगा है। क्राँतिकारी−उग्रवादी होने के नाते हमें छलाँग लगाना तो आता है। हम अंदर आ गए। देखा तो आपने हमारे कमरे में ताला लगा रखा है। हमने खिड़की देखी, आधी खुली थी। एक धक्का मारा तो वह भी खुल गई । बिना आपकी नींद को खराब किए हम अंदर आ गए व अपना कार्य करने लगे। आपकी बात भी मान ली एवं आपको जगाया भी नहीं। सारा देश ‘वंदेमातरम्’ की प्रतीक्षा कर रहा है। यदि हम न लिखते, तो कल ‘वंदेमातरम्’ प्रकाशित नहीं होगा। हमारी पत्नी तो एक दिन इंतजार भी कर लेगी। यह घटना श्री नीरोदवरण (जो आज भी श्री अरविंद आश्रम में हैं) के द्वारा ‘मृणालिनी देवी’ नाम से लिखी पुस्तक में उद्धृत है। व्यक्तिगत कार्य कितना ही बड़ा क्यों न हो, स्वयं का विवाह या उसकी प्रथम रात्रि ही क्यों न हो एक तरफ एवं देशहित एक तरफ । यह कर्मयोगी की राग से, आसक्ति से निवृत्ति है एवं लोक−शिक्षण हेतु कर्म के प्रति समर्पण की पराकाष्ठा है। परमपूज्य गुरुदेव अक्सर चर्चा में तिलक एवं श्री अरविंद के इन प्रसंगों को उद्धृत करके कहते थे कि आसक्ति से इस तरह की निवृत्ति किए बिना उच्चस्तरीय लोकसेवी बनना संभव नहीं है।

लोकसेवी की सिद्धि का मर्म

ग्यारहवें श्लोक की धुरी है, योगिनः कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वा−दिव्य कर्मयोगी आसक्ति को त्यागकर सतत कर्म करते रहते हैं। ये कर्म उनके व्यक्तित्व से झरने वाली परमात्मसत्ता की चेतना द्वारा सहज ही होते रहते हैं। वे न किसी कर्म से आसक्त होते हैं, न उसके फल से। हमें इससे क्या मिलेगा, इसकी चिंता उन्हें नहीं होती। पर सहज ही ये कर्म करते−करते एक फलश्रुति, उपलब्धि, दैवी अनुदान उन्हें प्राप्त हो जाते हैं। ये हैं इंद्रिय, मन, बुद्धि और शरीर से किए गए इन कर्मों से मिलने वाली अंतःकरण की शुद्धि (आत्मशुद्धये) यह सबसे उत्कृष्ट उपलब्धि है और यह कर्मयोग की सिद्धि है। इसके प्राप्त होते ही हमें परमशाँति मिलती है, परमात्मसत्ता से तन्मयता मिलती है एवं हम ध्यान की पराकाष्ठा पर पहुँच जाते हैं।

ढेर सारी साधनाएँ, दुनिया भर के प्रपंच रचकर भी जो नहीं मिल सकता, वह अपने मन, बुद्धि, ज्ञानेंद्रियों, कर्मेंद्रियों से प्रभु अर्पित होकर कर्म करने से मिल जाता है। संसाररूपी परमात्मा के इस बगीचे को समुन्नत, सुँदर, व्यवस्थित बनाना ही हमारा कर्त्तव्य है। हम निज की तो सोचें, पर उसमें आसक्ति न हों, उसके लिए परेशान न हों। जो प्रभु की सेवा करता है, दरिद्रनारायण की सेवा करता है, प्रभु उसका ध्यान रखते हैं। परमपूज्य गुरुदेव कहते थे, ‘परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ है। लोकहित की वेदिका में हम कुछ पुष्प अपने कार्यों से समर्पित कर सकें, इससे बड़ा पुण्य कोई नहीं, इससे बड़ा स्वार्थ कोई नहीं। संकीर्ण स्वार्थपरता की तुलना में

लोकहित के लिए जीते हुए कर्म करना, बिना किसी आसक्ति के निर्लिप्त भाव से जीना यदि हमें आ जाए, तो हम ऋद्धि−सिद्धियों के राजमार्ग पर चल सकते हैं। पर न जाने क्यों हमें अंदर की उस शाँति की तुलना में, जो औरों के हित जीने में मिलती है, निरासक्त −मुक्त जीवन जीने से मिलती है, अशाँति में,तनावों−उद्वेगों में जीना ही पसंद है। इसीलिए तो हमारे कर्म भी उसी तरह के होते हैं एवं बंधनों में फंसकर जीना ही हमारी फिर नियति बन जाती है। इस अंदर की शाँति, कर्मयोग की परमसिद्धि की चर्चा अगले श्लोक के साथ अगले अंक में। (क्रमशः)


स्वावलंबी बनाने में लगाऊँगा (Kahani)

भारत को स्वतंत्रता हस्तांतरित करने के लिए इंग्लैंड से एक प्रतिनिधिमंडल आया, तो गाँधी जी को अहिंसा के अस्त्र से जीतते देखकर, मंडल के बहुत−से विदेशी पत्रकार आए और गाँधी जी से मिलने पहुँचे।

एक पत्रकार ने पूछा कि यदि आपको एक दिन का डिक्टेटर बना दिया जाए, तो क्या कार्यक्रम अपनाएँगे? उनने कहा, पहले तो मेरे लिए ऐसा निरंकुश बनना ही संभव नहीं। यदि बन भी गया, तो उस सामर्थ्य को गंदी बस्तियाँ साफ करने में एवं पिछड़ों को ऊँचा उठाने, स्वावलंबी बनाने में लगाऊँगा।


अंकुर आने लगे−2

प्रणाम है बच्चा

यमुना पार करने के लिए नाव चलती थी। श्रीराम उन संत का पता पूछते−तलाशते किनारे तक पहुँचे। नाव से नदी पर की और संत के मचान तक पहुंचे। दोपहर का समय था। संत मचान पर बैठे थे। नीचे चार−पाँच लोग खड़े थे। उनने दो सौ मीटर से ही श्रीराम को देख लिया और स्नेह से पुकारा−आओ ऋषिकुमार, तुम्हारा इंतजार था बच्चा। बाबा की पुकार सुन श्रीराम ने पीछे मुड़कर देखा। उन्हें लगा कि शायद किसी और को बुला रहे हैं। फिर वही पुकार−हम तुम्हें ही कह रहे बालक श्रीराम। नाम सुनकर संशय दूर हो गया। आगे बढ़ने में अभी तक जो झिझक थी, वह दूर हो गई। वे स्वाभाविक गति से कदम बढ़ाते हुए सीधे मचान के पास पहुँचे और बाबा को प्रणाम किया।

उन्होंने दोनों हाथ उठाए और कहा, तुम्हें भी प्रणाम है बच्चा। यह सुनकर वहाँ खड़े दूसरे लोग चौंककर देखने लगे। वहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को बाबा प्रणाम का उत्तर आशीर्वाद है बच्चा या ‘सुखी रहो बच्चा’ कहकर देते थे। यहाँ बाहर−तेरह साल के किशोर को प्रणाम का उत्तर प्रणाम से दे रहे हैं।

बाबा ने कुछ समय के बाद जो कहा, उससे उन लोगों का विस्मय थोड़ा छँटा। बाबा ने कहा, तुम्हारे आने की खबर लग गई थी बच्चा। उन दैवी आत्माओं से ही आभास हुआ कि तुम आ रहे हो। बहुत प्रसन्नता हुई।

श्रीराम चुपचाप सुनते रहे, गायत्री मंत्र का पाठ करो बच्चा कहकर बाबा खुद गायत्री मंत्र पढ़ने लगे। वे वैष्णव संत थे और सभी श्रद्धालुओं से द्वादश अक्षर मंत्र ‘ॐ नमः भगवते वासुदेव’ का उच्चारण कराते थे। बाबा ने गायत्री मंत्र का पाठ करने के बाद कहा, तुम सावित्री सिद्ध हो बच्चा । तुम्हें बड़े काम करने हैं। हिमालय की आत्माएँ हैं न बच्चा, वहाँ बड़े योगी−मुनि रहते हैं। वहाँ की गुफाओं में वास करते हैं। पता नहीं कितने सौ सालों से वहाँ तप कर रहे हैं। उनका आशीर्वाद तुम्हें मिला है। वे आत्माएँ तुम्हारा बहुत सहयोग करेंगी। बाबा इससे आगे बहुत कुछ कहते रहे। उनके प्रवचन में हिमालय के रहस्य और सिद्ध लोक की साँकेतिक जानकारी थी। बाबा का भाषा ज्ञान कमजोर था। वे सधुक्कड़ी हिंदी बोलते थे। शब्दों के अनुसार अर्थ से उनका मंतव्य समझने की कोशिश करें, तो शायद भ्रमित हो जाएँ। उनके भाव को ही समझा जा सकता था।

आयु का रहस्य

श्रीराम ने पूछा, बाबा, आपके बारे में कई बातें सुनने को मिलती हैं। उनका क्या रहस्य है? बाबा ने कहा, भगवान की इस दुनिया से बड़ा कोई चमत्कार नहीं है। हम नहीं जानते बच्चा कि लोग हमारे बारे में क्या कहते हैं? यहाँ आने वाले सभी भक्तों के लिए हम दुआ मनाते हैं। फलवती हो जाए तो ईश्वर की कृपा है, नहीं हो तो उसकी मरजी। उसकी मरजी के बिना कुछ नहीं होता बच्चा। फिर उन्होंने अपनी आयु के बारे में कहा, शरीर मरणधर्मा है। इसकी उम्र क्या पूछना। गंगा−यमुना के बीच जिस गाँव में इस शरीर का जन्म हुआ, वहाँ लोग तिथि−तारीख लिखकर नहीं रखते थे। वहाँ के लोग पढ़े−लिखे नहीं है बच्चा, इसीलिए पता नहीं शरीर कितने बरस का हुआ। स्पष्ट हुआ कि इस उत्तर के कारण ही लोग बाबा की आयु के संबंध में अनुमान लगाते थे। वह अनुमान स्वाभाविक से ज्यादा ही रहता होगा। फिर कहने लगे, तुम्हारी उम्र के थे, तभी घर छोड़ दिया। नर्मदा के किनारे काफी समय रहे। द्वारका, रामेश्वर,पुरी और बदरीनाथ जी गए, और तीर्थों में भी गए। फिर गंगा मइया का किनारा चुन लिया। माँ ने कहा तो कभी यमुना मइया के तट पर चले आए। अब घूमना−फिरना बंद। बाबा इसके बाद थोड़ा रुके लेकिन तुम्हारे लिए विधि ने और ही विधान रचा है। तुम्हारे गुरुदेव समय पर तुम्हें सब कुछ बताएँगे। श्रीराम ने यह पूछना जरूरी नहीं समझा कि गुरुदेव से हमारी भेंट कब होगी? वे बाबा के उपदेश या संकेत सुनकर उसी शाम लौट आए।

महारास का मर्म

रात वृंदावन में रुके। वहाँ की एक बगीची के बारे में सुन रखा था कि राधा और कृष्ण वहाँ नित्य रास करते हैं। रास के समय वे सशरीर विश्राम भी करते हैं। उस समय बगीची में कोई नहीं जाता। अगर कोई चला जाए तो अनर्थ हो जाता है। श्रीराम को राधा और कृष्ण के नित्य रास की चर्चा पर कोई आपत्ति नहीं थी। मन में रह−रहकर शंका उठती कि बगीची में कोई रह जाए और राधा−कृष्ण के दर्शन कर ले तो अनर्थ क्यों हो जाता है? भगवान के दर्शन जिसे हो जाएँ, उसका तो कल्याण हो जाना चाहिए। किशोर मन ने इस शंका का निवारण करने की ठानी। बगीची की ओर जाते हुए एक वैष्णव साधु गोपालदास मिले। उनसे राधा−कृष्ण के नित्य विहार की बात पूछी। साधु गोपालदास ने कहा, नित्य विहार तो चल ही रहा है। यह जगत उसका ही तो है। वृंदावन के कण−कण में वही नाच रहा है। पूरा विश्व उसी का नर्तन है। यहाँ वह ज्यादा प्रत्यक्ष है, क्योंकि साधकों का चित्त यहाँ ज्यादा ग्रहणशील हो जाता है। साधु की बातें अटपटी लग रही थीं। श्रीराम ने बीच में ही रोककर पूछा, ‘क्या सचमुच बगीची में रात को राधा−कृष्ण सशरीर आते हैं?

साधु हँसा। श्रीराम ने फिर पूछा, अगर वे भगवान हैं, तो उनके दर्शन से अनर्थ क्यों हो जाता हैं? इतना कहते ही साधु ने मंदिर की सीढ़ियों की ओर इशारा किया और कहा, श्रीकृष्ण वह जा रहें हैं, देखो। उनके साथ राधा रानी भी हैं। श्रीराम ने सीढ़ियों की ओर देखा। श्याम वर्ण श्रीकृष्ण और गौराँग श्री राधा मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं। वे पलटकर साधु तथा उनकी ओर भी देख रहे थे। कुछ क्षण के लिए आस पास के लोग, दुकानें, मकान, गलियाँ और वहाँ हो रही चहल पहल आदि सभी कुछ का लोप हो गया। राधा और कृष्ण के विग्रह ही रह गए। कुछ क्षण के लिए सुध बुध जाती रही। भावसमाधि की अवस्था आ गई। फिर सब कुछ सामान्य था। सामने साधु गोपालदास ने कहा, इस तरह के दृश्य अपने भीतर बैठे भगवान के ही बाहर आने वाले रूप हैं। साधना के प्रगाढ़ होते ही इस तरह की अनुभूति होने लगती है, लेकिन यहीं नहीं ठहरना है। साधना निरंतर जारी रहनी चाहिए।

साधु ने ही स्पष्ट किया, भगवान का दर्शन किसी भी प्रकार अनिष्टकारी नहीं होता। जिस बगीची में राधा कृष्ण के आने और रास रचाने की बात कही जाती है, उसमें सत्य कम, प्रमाद ज्यादा है। इस तरह बगीची की महिमा गाई जाती है। उस बहाने लोगों से पैसा ऐंठा जाता है। अनिष्ट की आशंका फैलाने से लोग आतंकित होते हैं और दिन में वहाँ जाकर चढ़ावा चढ़ाते हैं। सचाई परखना हो तो एक रात उस बगीची में घुसकर देखो। साधु गोपालदास ने रहस्य खोल दिया। स्वयं ही अनुभव करने के लिए भी कहा। श्रीराम उस बगीची की तरफ बढ़ गए।

शाम ढलने से थोड़ी देर पहले बगीची में गए। द्वार बंद होने से पहले पंडों ने बगीची की छान−बीन की तो एक झाड़ी की ओट में छिप गए। लगा कि अब कोई नहीं है। झाड़ी की ओट से निकलकर उस मंदिरनुमा कमरे के पास तक गए, जहाँ राधा−कृष्ण के विश्राम करने की बात प्रचारित थी। उस कमरे से करीब बीस फीट दूर एक झाड़ी के सहारे बैठ गए। झाड़ी के सहारे बैठ गए। कमरे का द्वार खुला हुआ था। शाम ढलने लगी। रात का दूसरा पहर शुरू हुआ। वातावरण बहुत शाँत था। झाड़ियों में छिपे पक्षियों और जीवों की आवाजें आना बंद होने लगी थीं। इक्का−दुक्का किसी बंदर की चिंचियाहट सुनाई देती थी तथा झींगुरों की झायँ झायँ के अलावा और कोई आवाज नहीं आती थी। रात धीरे धीरे गहराने लगी। आधी रात से ज्यादा वक्त बीत गया। श्रीराम टकटकी बाँधे उस कमरे की ओर देख रहे थे। कब कोई आए। इंतजार करते हुए वे थकने से लगे। आँखों में नींद भरने लगी। उसे दूर भगाने के लिए बगीची में ही बनी कुइयाँ के पास गए और जगत पर पड़ी बाल्टी से थोड़ा पानी खींचा। हाथ−मुँह धोए। वापस उसी झाड़ी के पास आकर बैठ गए। पानी खींचने और हाथ−मुँह धोने में थोड़ी आवाज हुई। इसके तुरंत बाद बगीची के बाहर कीर्तन की आवाज सुनाई देने लगी। थोड़ी देर में कीर्तन थमा। बगीचे के भीतर इस बीच घुँघरुओं की आवाज आई। छमछप की गूँज ऐसी लहराई जैसे कोई नाच रहा हो। कुछ देर यह आवाज गूँजती रही, फिर अपने आप थम गई। इसके बाद बगीची के बाहर एक बार फिर कीर्तन होने लगा। थोड़ी देर चलते रहने के बाद कीर्तन फिर थम गया। सुबह पाँच बजे तक बगीची में कभी वंशी की धुन गूँजती, कभी तबले और हारमोनियम का संगीत सुनाई देता। तीन बार उस कमरे के पास रोशनी भी दिखाई दी। वह रोशनी किसी दीपक के जलने से हो रही थी। दीपक जलाता हुआ व्यक्ति भी दिखाई दिया। पाँच सात मिनट जलकर दीपक इस तरह बुझ गया, जैसे किसी ने फूँक मार दी हो।

रात्रि के घटनाक्रम

तड़के पाँच बजे दो व्यक्ति कमरे के पास दिखाई दिए। वे अंदर गए और थोड़ी देर बाद वापस चले गए। इसके कुछ देर बार ही बगीची के बाहर आरती−वंदना सुनाई देने लगी। आरती पूरी होने के बाद लोग आने लगे। आठ−दस लोगों के जत्थे में श्रीराम भी शामिल हो गए और उस कमरे तक गए। उस जत्थे के लोग कमरे में जाकर गदगद थे। बिस्तर की चादर पर सलवटें पड़ी हुई थीं, जैसे कोई वहाँ सोया हो। तेल की शीशी उठाकर देखा, ढक्कन खुला हुआ था।

एक ने कहा−शाम को जितना तेल रखा था, उससे कम हो गया है। दूसरे ने कहा−और देखो सिंदूर की डिबिया भी खुली है। राधारानी ने अपना सिंगार किया होगा। तीसरे ने कहा−अरे, भगवान अपना पीताँबर भूल गए। इस तरह आश्चर्य बढ़ा। ये लोग पिछली शाम को ही उस कमरे में होकर गए थे। तब सब कुछ ठीक था। चादर साफ थी, सिंदूर की डिबिया ठीक से लगी हुई थी, तेल की शीशी पूरी भरी हुई थी। अब की हालत देखकर स्पष्ट लग रहा था कि किसी ने अपने केश सँवारे हैं। पिछली शाम दर्शन करने के बाद ये लोग बगीची के बाहर ही ठहरे थे। इस वक्त सुबह के पहले दर्शनार्थी थे।

श्रीराम ने उनका आश्चर्य और इस बीच हुई घटनाओं को देखकर अच्छी तरह अनुभव कर लिया कि बगीची में राधा−कृष्ण का विहार एक आयोजित नाटक था। बीच बीच में गूँजने वाला संगीत, आवाजें, रोशनी और उस कमरे के आस−पास दिखाई दिए लोग, यह प्रभाव उत्पन्न करने के लिए ही थे कि बगीची में राधा और कृष्ण आए हैं। सुबह पाँच बजे उन्हीं लोगों ने कमरे का नक्शा बदला और बाहर ठहरे यजमानों को जताया कि भगवान सचमुच आए थे। यजमानों ने मंदिर में चाँदी के सिक्के चढ़ाए और पेडों के भोग। भंडारे के लिए अलग से दक्षिणा दी।

साधु गोपालदास की बात याद आई कि भगवान सब जगह हैं। जहाँ याद करो, तन्मयता से पुकारो, वहीं प्रकट हो जाते हैं। नहीं पुकारो, तो सामने आ जाने पर भी पहचान में नहीं आते। पूरे घटनाक्रम को श्रीराम ने शाँतिपूर्वक देखा और कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किए बिना बगीची से बाहर आ गए। पंडों ने समझा कि यह बालक भी यजमानों के साथ ही आया होगा। उन्हें क्या पता कि उनकी आयोजित नाटकीय दिव्य लीला का सच उसने अपनी आँखों से देख लिया है।

हुआ भविष्यत् का दर्शन

वृंदावन की यात्रा पूरी हुई। मथुरा में एक दिन के लिए उस बगीची में रुके, जहाँ काठिया बाबा से भेंट हुई थी। उस विग्रह के सामने कुछ देर पालथी लगाकर बैठे, जिसे गायत्री का बताया गया था। मन में हिलोरें आने लगीं। लगा जैसे कुछ संकेत मिल रहे हैं, निर्देश आ रहे हैं। समय भागा जा रहा है। वे बड़े हो रहे हैं। बीस पच्चीस−तीस−चालीस साल की उम्र पार कर गए । अपने आप को चालीस की अवस्था का अनुभव करते हुए लग रहा है कि वे इसी स्थान पर हैं। यहाँ बहुत से लोग साधना कर रहें हैं, आरती हो रही है, यज्ञ−हवन हो रहा है। लोग आ रहे हैं। जा रहे हैं। यह प्रतीति कुछ देर बनी रही, फिर तिरोहित हो गई (बाद में इसी स्थान पर 1953 में गायत्री तपोभूमि की स्थापना हुई।) संध्या संपन्न कर अगली सुबह द्वारिकाधीश के दर्शन करते हुए आगरा के लिए रवाना हो गए। चलते समय ताई जी के लिए प्रसाद लेने की बात भी याद रही। आँवलखेड़ा वापस लौटे तो माँ वह दरवाजे पर खड़ी मिलीं। चिरंजीव ने आकर पाँव छुए और माँ ने आशीर्वाद दिया। कहा कि मेरा लाल अब होशियार हो गया। अब बच्चा नहीं रहा। जिम्मेदारी उठाने लायक हो गया। मेरी अपनी चिंता ठाकुर जी ने दूर कर दी।

आँवलखेड़ा लौट आने के बाद जीवन का क्रम सामान्य ढंग से चलने लगा। खेती−बाड़ी, पुश्तैनी व्यवसाय और यजमानों का आना−जाना पहले की तरह फिर शुरू हो गया। पिताश्री का अभाव सभी को खलता था। घर के लोगों ने सलाह दी कि श्रीराम को भी उसी काम से लगाया जाए, उठती उम्र है, किशोर कंठ से मधुर आवाज निकलेगी। अभी से शुरू करें, तो युवावस्था तक सिद्ध हो जाएँगे। मुँह से अमृतवाणी रूप में कथा होने लगेगी। जो भी स्वजन संबंधी आते, ही सलाह देते । माँ की भी मूक सहमति होती, लेकिन श्रीराम का मन व्यासपीठ पर बैठने के लिए कभी राजी नहीं हुआ। वहाँ पर सुझाव टिकता नहीं था। (क्रमशः)


गुरुकथामृत−39 - मेरे हृदयेश्वर−गुरुदेव भगवान−2

धर्मचक्र (यदुरामपुर) जिला छपरा, बिहार निवासी श्री रामचंद्र सिंह एक विनम्र सेवक के रूप में अपनी आराध्य सत्ता परमपूज्य गुरुदेव के साथ वर्षों रहे। उन्हें उन प्रारंभिक शिष्यों में से एक कहे जाने का श्रेय प्राप्त है, जिन्हें परमपूज्य गुरुदेव ने परमवंदनीय माताजी के पास सेवा हेतु शाँतिकुँज में नियुक्त किया। शाँतिकुँज की शैशव अवस्था में जब स्वयं पूज्यवर हिमालय प्रस्थान कर चुके थे, उन्हें इस छोटे से आश्रम की गौशाला सहित परमवंदनीय स्नेहसलिला माता जी के चरणों में भी बैठने का सौभाग्य मिला। वे अब हमारे बीच नहीं हैं। उनकी अपने हृदयेश्वर−श्री गुरुदेव भगवान के संबंध में अनुभूतियाँ गुरुकथामृत के रूप में दो कड़ियों में प्रस्तुत की जा रही हैं।

सन् 1958 के सहस्र कुँडी यज्ञ में धर्मचक (जो मरे गाँव से एक मील दूर स्थित है) के श्री रमेशचंद्र शुक्ल गए थे। उनको मैं बचपन से एक धार्मिक व्यक्ति के रूप में जानता था। या से लौटकर आए, तो मेरे लिए प्रसाद रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका लाए। मैं उसे पढ़ने लगा। नियमित प्रति माह पत्रिका आने लगी। पता लगा कि उन्हीं दिनों जून माह (1959) श्री शुक्ल जी का मथुरा जाने का योग बन रहा है। मेरे भतीजे जलेसर के अस्वस्थ होते हुए भी मन में आकाँक्षा जगी कि उनके साथ जाकर अपने आराध्य का दर्शन करूं, जिन्हें मन−ही−मन मैं गुरु के में स्वीकार कर चुका था। प्रथम दर्शन आठ जुलाई, 1959 को घीयामंडी, मथुरा के घर में हुए। पूछा, कहाँ से आए? मैंने स्थान बताया व कहा कि बच्चे के अस्वस्थ होते हुए भी आपके पास दौड़ा चला आया हूँ। तुरंत आश्वस्त करते हुए गुरुदेव बोले कि तुम आए नहीं हो, हमने तुम्हें बुलाया है। चिंता मत करो। भतीजा स्वस्थ हो गया है। मेरी उनके साथ हिमालय चलने की इच्छा पर गुरुदेव बोले कि वह कार्य हमारे अकेले का है। तुम्हें आगामी दस वर्ष तक पूरे भारतवर्ष में यज्ञों का आयोजन करना है। खूब भ्रमण करना है। हम तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे। अभी डेढ़ वर्ष हम हिमालय अज्ञातवास पर रहेंगे। 1962 की अष्टग्रही की भविष्यवाणी से परेशान मत होना। वह तो नए युग का संदेश लेकर आ रही है। महाविनाश या प्रलय जैसा कुछ नहीं होगा। हम उनका आदेश सिर−माथे रख चले आए।

अक्टूबर, 1961 में आरा (बिहार) में पाँच कुँडी गायत्री यज्ञ में गुरुदेव आने वाले थे। मैं भी अपने गाँव से बावन व्यक्तियों को लेकर आरा चार दिन के लिए यज्ञ में गया। जिस कमरे में गुरुदेव ठहरे थे, वहाँ उनने मुझे अकेले बुलवाया। जैसे ही दर्शन हुए, चेहरा नहीं मात्र वहाँ सूर्य जैसा प्रकाशपुँज व विराट आभामंडल दिखाई दिया। मुझे लगा, मेरे गुरु साक्षात् भगवान हैं व मैं सौभाग्यशाली हूँ, जो उनका दर्शन मुझे हुआ है। उनने तीन माह बाद होने वाली चाँद्रायण व्रत शृंखला हेतु बुलाया। मैं वह सन्न करके आया। मुझे प्रतिवर्ष गायत्री तपोभूमि आते रहने का आदेश मिला। गुरुदेव भगवान के आदेश पर ही मैं पैसा कमाने हेतु आसाम गया। यह सुयोग सहज ही बन गया तो मैंने भी संकल्प लिया कि मैं कम−से कम 108 ‘अखण्ड ज्योति’ के सदस्य अपने काम के साथ−साथ बनाऊँगा। 1964 के मार्च में मैं आसाम चला गया था। दुमदुमा के एक भाई ने हमसे चर्चा में कहा, हम चार भाई हैं। बँटवारा होने की नौबत आ गई है। सारा परिवार बिखर जाएगा। आप कुछ कराइए। मैंने कहा कि किसी ब्राह्मण से घर में गायत्री यज्ञ कराइए, सब ठीक हो जाएगा। राजकुमार जी बोले, आपको तो आता है, आप ही यज्ञ संपन्न कराया। एक व्यक्ति को अखण्ड ज्योति का ग्राहक बनाने हेतु बिठा दिया। पूर्णाहुति हुई। कुमारी कन्याओं का भोजन हुआ उसी यज्ञ में 108 परिजन अखण्ड ज्योति के ग्राहक बन गए। मेरा संकल्प पूरा हो गया। मैं स्वयं देखकर गदगद था कि कितना शानदार यज्ञ रहा, जबकि मात्र पाँच कुँडीय आयोजन था एवं मेरे जैसा अनगढ़ किताब पढ़ पढ़कर उसे करा रहा था। जिस परिवार में यज्ञ कराया, उसका अटल विश्वास गुरुदेव एवं यज्ञ पिता गायत्री माता पर बैठ गया, क्योंकि इसके बाद उनमें समझौता हो गया । पूरा परिवार एक हो गया व सबके काम बाँट दिए गए। सारा परिवार गुरुदेव भगवान के दर्शन करके आया।

मैं आसाम से बिहार वापस 1966 में आ गया। घर के लिए ठीक ठाक व्यवस्था को गई थी। इसी बीच पता चला कि 24 से 26 दिसंबर , 1967 की तारीखों में मेरे गुरुदेव मस्तीचक आ रहे हैं। मस्तीचक में पं॰ रमेशचंद्र जी शुक्ल के यहाँ पंच कुँडी यज्ञ का आयोजन था। मैंने अपनी आँखों से देखा कि दो स्त्रियों ने दर्शन के समय उनसे प्रार्थना की कि विवाह को 8-10 वर्ष हो गए हैं, संतान नहीं हुई । उन्हें यज्ञ की परिक्रमा करते रहने का आदेश हुआ। दोनों स्त्रियों को दस माह बाद पुत्ररत्नों की प्राप्ति हुई। इसी यज्ञ में पूज्यवर ने मुझे बुलाकर कहा, रामचंद्र, तुम्हारे गाँव व घर चलेंगे। मैं स्तब्ध। कैसे उस छोटी झोंपड़ी में बिठाऊँगा, पर गुरुदेव आए। गुरुदेव के लिए एक इंजीनियर की जीप की व्यवस्था की । हम धर्मचक आ गए। कुटिया के द्वार पर गुरुदेव भगवान की आरती−पूजन किया। कुछ देर बाद वे बोले कि कोई सार्वजनिक स्थान गाँव में हो, वहाँ ले चलो। गाँव के किनारे एक देवी का मंदिर था, पास में खुली जमीन थी। वहाँ पहुँचने पर एक स्थान उन्हें पसंद आया। उनने सात ईंटें और पूजन की सामग्री मँगवाई। अपने हाथों से भूमिपूजन किया। खुदाई करवाकर ईंट रखकर शिलान्यास किया व उपस्थित समुदाय से कहा, यह भूमि हमने अपने तप से असाधारण बना दी है। आगे चलकर यहाँ एक गायत्री मंदिर बनेगा। प्राणिमात्र का कल्याण होगा। दूर से लोग आएँगे, प्रकाश पाकर जाएँगे। गाँव वाले मंदिर बनाएँ, हम इसकी प्राण प्रतिष्ठा करेंगे। इतना कहकर भगवान श्री मस्तीचक वापस लौट गए। कालाँतर में पूर्णिया से बक्सर जाते हुए 1971 में इस मंदिर में गायत्री माता की प्राण प्रतिष्ठा हुई। वह भी बड़ा अलौकिक प्रसंग है, उसकी चर्चा बाद में।

मुझे 1 जून, 1967 को मथुरा में एक पंद्रह दिवसीय सन्न में आने का निर्देश मिला। अंतिम दिन अकेले में बुलाकर तपोभूमि यज्ञशाला के सामने खड़े होकर बोले, रामचंद्र, अब युगनिर्माण विद्यालय आरंभ होने जा रहा है। तुम बाल बच्चों को लेकर यहाँ आ जाओ। यहीं उन्हें पढ़ाएँगे−लिखाएँगे, छाछ रोटी साथ खाएँगे। भगवान का मान करेंगे। मैं गाँव लौट गया। अक्टूबर, 1967 में टाटानगर में एक बड़ा विशाल यज्ञ था। वहाँ से लौटते हुए गुरुदेव भगवान पटना सिटी के डॉ॰ माथुर के यहाँ रुके। 10 अक्टूबर की प्रातः उनके दर्शन हेतु अपने गाँव−क्षेत्र से पचास व्यक्तियों को लेकर पहुँचा। तुरंत गुरुवर बोले, ‘तुम अभी तक मथुरा नहीं पहुँचे। मैंने करबद्ध निवेदन किया कि आपने ही हमारे गाँव में शिलान्यास किया है मंदिर बनना आरंभ हो जाए, तो मैं आ जाऊँगा। भगवान श्री बोले, मंदिर गाँव वाले बनाएँगे। मूर्ति की व्यवस्था भी हो जाएगी । तुम तो हमारा मंदिर बनाने मथुरा चलो। अंततः 1 फरवरी 1968 को अपनी पत्नी तथा पुत्री सहित मैं मथुरा श्रीचरणों में पहुँच गया।

1968 कह गुरुपूर्णिमा पर पूजन निपटने के बाद गुरुदेव माता जी हरिद्वार के सप्त सरोवर में बनने वाले आश्रम की चर्चा कर रहे थे। अचानक भगवान श्री बोले, रामचंद्र, तुम हरिद्वार चलो। वहाँ निर्माण कार्य में मदद करना। बाद में माताजी की सेवा करना। हमने आज्ञा शिरोधार्य कर ली। फिर उसी दिन से प्रतिदिन एक नर्सरी ले जाकर उनने हमारा बागवानी का शिक्षण आरंभ कर दिया। सातवें दिन बगीचे का सामान−फावड़ा, खुरपी, गेंती, कुछ प्रकार के पौधे व बीज, ओढ़ने बिछाने का सामान लेकर 8 अगस्त, 1968 को मुझे लेकर उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ भविष्य का शाँतिकुँज बनना था।

श्रावण मास के उस पवित्र दिन रात्रि तो सप्तर्षि आश्रम की एक कुटिया में ठहरे। फिर अगले दिन उस भूमि पर ले गए। चारों तरफ घनघोर जंगल था । जमीन पर एक फीट पानी बह रहा था। पड़ोस में एक माताजी का (विद्योत्तमायति) मकान था। उसी में एक ब्रह्मचारी रहते थे। उनसे एक अस्थायी टिनशेड 12 8 फीट का लिया व मेरे रहने की अस्थायी व्यवस्था बना दी। मैंने एक छोटी−सी कोठरी दिन भर में बना ली। वहीं कोने में भोजन बनाने की व्यवस्था भी कर ली। एक चारपाई ले आया, थोड़ी−सी ईंटें। मिट्टी के तेल की चिमनी जलाई । मैंने दाल−चावल बनाए थे। वे खाकर वहीं सो गए। मैं ईंटों के बिछौने पर उनके पाँव दबाकर सो गया। सवेरे नींद खुली तो देखा कि गुरुदेव तो दैनंदिन कृत्यों से निवृत्त होकर प्लास्टिक का कोट सिर पर ढके, नेकर−बनियान पहने फावड़े से पानी निकलने का रास्ता बना रहे हैं एवं पानी लगातार बरस रहा है। मैं जल्दी से फरिगडडडड होकर आया। गुरुदेव बोले, मैंने गड्ढे खोद दिए हैं, तुम इन्हें गहरा करके नर्सरी से लाए पौधे लगाते चलो।

मैंने आज्ञा का पालन किया। आठ दिन यही क्रम चलता रहा। इस बीच गुरुदेव की पूजा देखी, उनका कर्मयोगी स्वरूप देखा व खूब हंसी खुशी में, सीमित साधनों में जीवन जीने का उनका क्रम देखा। पौधे लगा दिए गये। अस्थायी सड़क बन गई। कहाँ माताजी का कमरा बनेगा, यह सब तय करके वे हमें यहीं रुकने का आदेश देकर चले गए। वह दिन 1968 की आठ अगस्त का था, जब भगवान श्री पहली रात्रि इसी भूमि पर अपने अस्थायी आवास में बहते पानी के बीच सोए। वस्तुतः यही शाँतिकुँज का जन्मदिवस भी है, क्योंकि इसी के बाद विधि−व्यवस्थापूर्वक सारे कार्य आरंभ होते गए एवं क्रमशः निर्माण हेतु गुरुदेव के आने का क्रम बनता चला गया।

सप्तर्षि आश्रम द्वारा भगवान श्री के पत्र हर चार दिन में आ जाते थे, जिनमें निर्देश रहा करते थे। कुएँ की खुदाई व कमरों के निर्माण हेतु वे जनवरी, 1969 में वसंतपंचमी के पूर्व पुनः पधारे। साथ में चार आना प्रतिदिन की दर से किराये पर खड़खड़ी से एक साइकिल लेकर भी आए। ताँगे उन दिनों बड़े महँगे थे। एक बार का आना−जाना बारह−पंद्रह रुपये खरच कर देता था। गुरुदेव ने हमसे कहा कि तुम हमें साइकिल पर बिठाकर खुद चला सकते हो। हमने हाँ कहा, तो उनने कहा बिठाकर चलाकर दिखाओ संतुष्ट होने पर एक ही साइकिल पर हम दोनों बैठकर अच्छूमल के ईंट के भट्टे पर पहुँचे। साठ हजार रुपये से हजार के हिसाब से 60,000 ईंट खरीदीं। नकद पैसे दिए व ईंटें पहुँचाने के लिए कहा। सेठ बोला, मैं अपनी गाड़ी से आपको आश्रम पहुँचा देता हूँ। गुरुदेव ने स्पष्ट मना कर दिया व कहा कि हम साइकिल से ही वापस जाएँगे। प्रभु की सादगी−सरलता देखकर हम हतप्रभ थे। जिनके संकल्पमात्र से लाखों के निर्माण हम स्वयं देखकर आए थे, वे हमें निमित्त बनाकर हम जैसे ही बनकर सारा कार्य कर रहे थे। हमने कहा भी, तो बोले, रामचंद्र, यह तप है। तप की नींव पर जब शाँतिकुँज खड़ा होगा, तो हजारों वर्ष तक जन−जन को प्रकाश देता रहेगा। अतः तुम बस वही करते जाओ, जो हम कह रहे हैं।

सीमेंट आने वाला था। मैं भोजन बना रहा था। देखा कि धोती घुटनों के ऊपर चढ़ाकर गुरुदेव स्वयं ईंटें बिछा रहे हैं। मैं भागा उन्हें रोकने, तो वे बोले, उधर सब्जी जल जाएगी। तुम उसे सँभालो। मैं सीमेंट को भीगने से बचाने के लिए ईंटें बिछाकर एक चबूतरा बना चुके थे। सीमेंट लाने वाले मजदूरों और मैंने वह सीमेंट व्यवस्थापूर्वक चबूतरे पर जमा दिया। निर्माण−कार्य शुरू हो गया। गुरुदेव के निर्देशानुसार तीन कोठरियाँ शुरू में बननी थीं। मैं उनके बताए अनुसार कार्य में लग गया। गुरुदेव दौरे पर मथुरा होते हुए निकल गए। अप्रैल, 1969 में वे पुनः आए। नवरात्रि अनुष्ठान भी यहीं रहकर किया व भविष्य के निर्माण कार्य की सारी रूपरेखा बना ली। कोई इंजीनियर नहीं, कोई आर्किटेक्ट नहीं। बस, हम दोनों व थोड़े से मजदूर। 1970 में जयपुर के श्री बिहारीलाल जी आए। निर्माण संबंधी मार्गदर्शन उनसे मिलते रहे। इसी बीच पत्र आया कि हम माता जी को उनकी भविष्य की कर्मभूमि दिखाने ला रहे हैं, तुम स्टेशन पर हमें मिलना। रेल के डिब्बे से तौलिया फहराते गुरुदेव माता जी उतरे। साथ में टिन की एक पेटी। एक ताँगा किया गया। हम आगे बैठे। माताजी−गुरुदेव पीछे। सबसे पहले दक्ष प्रजापति गए। दोनों ने वहाँ घंटे भर पूजन किया। फिर रास्ते में सब दिखाते हुए माताजी व मेरे गुरुदेव भगवान हँसते हँसते हुए शाँतिकुँज पहुँचे। यहाँ मात्र तीन कमरे ही बने थे, पर शिव−शक्ति के युगल यहीं विराजमान हुए । हम तीनों दिन भर निर्माण−कार्य देखते। शाम को गंगाजी के तट पर बैठते। सवेरे दोनों की साधना चलती। माताजी के हाथ की बनी रोटी हम खाते। कैसे आनंद भरे क्षण थे वे सोच−सोचकर रोमाँच हो जाता है। (समापन किश्त अगले अंक में)


खिले कमल जैसा (Kahani)

कहते हैं कि आरंभ में चंद्रमा बहुत सुँदर था। हर घड़ी हँसता रहता । चेहरा खिले कमल जैसा सुँदर लगता।

कुछ दिन बाद वह उदास रहने और खीजने लगा। अतएव कलाएँ घटने लगीं। चेहरा मुरझाया और सिकुड़ा−सा क्षीण होने लगा। दिन बीतते गए, अमावस्या आते−आते वह काला−कुरूप हो गया। कलाएँ समाप्त हो गई और अँधेरी कोठरी में दिन काटने लगा। ब्रह्माजी इस दुर्दशा को देखकर बोले, मूर्ख हँसना−मुस्कराना फिर आरंभ कर, उसके बिना किसी की जिंदगी पार नहीं होती। खीजने से तो बेमौत मरेगा। चंद्रमा ने अपनी भूल सुधारी, उसने प्रसन्नता बिखेरना आरंभ किया और बढ़ते−बढ़ते पूर्णिमा को फिर खिले कमल जैसा हो गया।


अपनों से अपनी बात−1 - हमको है विश्वास कि धरती बाँझ नहीं इस देश की

‘अखण्ड ज्योति परिवार’ ही विश्वविद्यालय निर्माण कर दिखा सकता है

ऐसा एक विश्वविद्यालय देश में होना ही चाहिए, जो सच्चे मनुष्य, बड़े मनुष्य, महान, मनुष्य, सर्वांगपूर्ण मनुष्य बनाने की आवश्यकता पूर्ण कर सके।

ये विचार आज के नहीं हैं, आज से प्रायः चालीस वर्ष पूर्व परमपूज्य गुरुदेव पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा अपनी पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ (मार्च, 1964) के माध्यम से व्यक्त किए गए थे। उनके मन में बड़ी पीड़ा थी कि राष्ट्र को आजादी मिलने के सत्रह वर्ष बाद भी शिक्षापद्धति वही मैकाले की है। शिक्षा में विद्या का कहीं नाम नहीं है। जहाँ आजाद भारत की शिक्षापद्धति बुनियादी स्तर की, संजीवनी विद्या समान होनी थी, वहाँ वही परंपरागत बाबू, क्लर्क, ऑफीसर बनाने वाला तंत्र जमा बैठा है। वे कहते थे, यह मान्यता सही नहीं है कि जिसके पास धन−ऐश्वर्य को अधिक होगा, वह सुखी रहेगा, वरन् सच यह है कि जिसे जिंदगी जीना आता होगा, वह स्वल्प साधनों में भी आदर्श, आनंद और उल्लास के साथ रह सकेगा। (पृष्ठ 59, मार्च 1964)

आगे पूज्यवर लिखते हैं, युगनिर्माण का महाअभियान आरंभ करते हुए हमें संजीवनी विद्या की सर्वांगपूर्ण शिक्षा व्यवस्था का प्रबंध भी करना ही पड़ेगा। .....हमारे मस्तिष्क में एक ऐसे विश्वविद्यालय की कल्पना है, जिसमें मानव जीवन की प्रत्येक कठिनाई को हल करने और हर परिस्थिति में व्यक्ति को अपने ढंग से आगे बढ़ने के लिए जो भी मार्गदर्शन आवश्यक हो, वह सब सिखाया जा सके। बिगड़े हुए स्वास्थ्य को कैसे सुधारा जाए और सुधरे हुए स्वास्थ्य को कैसे बढ़ाया जाए, इस संबंध में परिपूर्ण जानकारी कराई जाए। मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए चिंता, भय, निराशा, शोक, आवेश, उत्तेजना ईर्ष्या, कुढ़न, अहंकार आदि कुविचारों से बचने की मनोवैज्ञानिक विधियाँ बताई जाएँ। मानसिक दुर्गुणों का सरलतापूर्वक समाधान हो सके तथा स्वभाव में मधुरता, सहनशीलता, नम्रता, सज्जनता का समावेश कैसे हो और आशा, उत्साह, साहस, धैर्य, दूरदर्शिता, उदारता, संयम, नियमितता जैसे श्रेष्ठ गुण कैसे अभ्यास में आएँ, इसकी क्रियात्मक साधना कराके शिक्षार्थी को इस योग्य बनाया जाए कि उसे मनस्वी एवं श्रेष्ठ पुरुषों की श्रेणी में गिना जा सके। (पृष्ठ 60, मार्च, 1964) परमपूज्य गुरुदेव द्रष्टा थे, महामनीषी थे एवं युगप्रवर्तक भी। उन्हें अनुमान था कि संस्कार घटिया बने रहे, मात्र जानकारी प्राप्त करने का तंत्र बना रहा एवं चिन्हपूजा के नाम पर सरस्वती के मंदिर खड़े कर दिए गए, तो राष्ट्र समर्थ और सशक्त नागरिक नहीं खड़े कर सकेगा। जीवन विद्या पर इसी कारण उनका ध्यान विशेष था। इसे वे स्वावलंबन प्रधान एवं अनौपचारिक स्तर की बनाना चाहते थे। ग्रामोत्कर्ष नहीं हुआ, तो शहरीकरण की दौड़ बढ़ती जाएगी, यह भविष्यवाणी उनने तब ही कर ही थी। आज हम सभी विज्ञान की निरंकुश प्रगति, उपभोगवादी जीन दृष्टि एवं शहरीकरण के दुष्परिणाम भुगत रहे हैं। पढ़े-लिखे ब्रह्मराक्षस विश्वविद्यालयों से निकल रहे हैं, जो आज के जातिवाद से ग्रसित राजनीति के वातावरण में अति महत्वाकाँक्षी, उद्धत, उद्दंड एवं अपराधी बनते चले जा रहे हैं। इसीलिए पूज्यवर ने उसी लेख में लिखा, ‘संजीवनी विद्या का शिक्षण देने वाला एक सर्वांगपूर्ण विश्वविद्यालय अपना ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ ही चला सकता है। भावनापूर्ण परिजन यदि चाहेंगे, तो यह शिक्षणपद्धति एक स्थान से आरंभ होकर देशव्यापी होकर युगनिर्माण के उपयुक्त वातावरण उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध होगी (पृष्ठ 63)

उनकी इस बात को अमली जामा 2002 में पहनाया जा सका, जब ‘देवसंस्कृति विश्वविद्यालय’ के एक स्वायत्तशासी तंत्र के रूप में उत्तराँचल विधानसभा के माननीय सदस्यों ने दलों−संप्रदाय−जातिभेद से परे एकमत से एक प्रस्ताव पारित कर बनने हेतु स्वीकृति दे दी। पूर्णतः स्वपोषित यह विश्वविद्यालय न शासन से धन लेगा, न विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) से किसी प्रकार की वित्तीय सहायता लेगा। इसी शर्त के आधार पर श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के परमपूज्य गुरुदेव द्वारा नियुक्त ट्रस्टीगणों ने इसे बनने की स्वीकृति दी एवं विधिवत् यह जून, 2002 से कार्य करना आरंभ कर चुका है। योग एवं चिकित्सीय (आयुर्वेद) मनोविज्ञान के दो विभाग स्वास्थ्य संकाय के अंतर्गत खोले गए है एवं इनमें दो सौ से अधिक छात्र छात्राएँ प्रशिक्षण ले रहे हैं। त्रिमासीय प्रमाणपत्र का एक बैच तो प्रशिक्षण लेकर चला भी गया। पूर्णतः आवासीय यह तंत्र है। सेवाभावी शिक्षकगण अपने समयदान से इसका पोषण करते हैं। वस्तुतः देवमानव बनाने का तंत्र इस स्थापना के साथ अब आरंभ हो गया है।

अब इसी जनवरी 2003 से धर्मविज्ञान (थियोलॉजी) का छहमासीय सर्टिफिकेट प्रशिक्षण यहाँ से आरंभ हो गया है, जिसमें विज्ञान और अध्यात्म की धुरी पर उस धर्म विज्ञान का प्रशिक्षण दिया जाना है, जिसके अभाव में मनुष्य भटकता दिखाई दे रहा है। देवालय प्रबंधन से लेकर सर्वांगपूर्ण जानकारी धर्मशास्त्रों की देने वाला यहां प्रशिक्षण समय की बहुत बड़ी आवश्यकता पूरी करने जा रहा है। परमपूज्य गुरुदेव ने ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका की इसे विषयवस्तु बनाया और जन−जन तक इसे लोकप्रिय बनाया। आज संप्रदायवाद से ग्रसित आस्था संकट से पीड़ित जनसमुदाय को वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का यह प्रशिक्षण ही कुछ राहत दे सकेगा। इसी उद्देश्य से प्रज्ञापरिषद् की प्रत्येक जनपद में स्थापना की जा रही है, ताकि जनचेतना इस महत्वपूर्ण उद्देश्य के प्रति बढ़े एवं प्रतिभाओं−बुद्धिजीवियों की भागीदारी हो।

विश्वविद्यालय की वर्तमान भूमि लगभग चार करोड़ तीस लाख रुपये में आज से चार वर्ष पूर्व क्रय की गई थी। अभी इससे गुनी अधिक भूमि क्रय करनी है। लगभग पंद्रह करोड़ रुपये इस परिसर की लागत होगी, जो विश्वविद्यालय भूमि से लगा हुआ है। उसके हस्तगत होने पर ही विश्वविद्यालय अपने चरम लक्ष्य को पहुँच सकेगा। पूर्णतः आवासीय इस परिसर में आयुर्वेद एवं वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के शोध अनुसंधान−शिक्षण हेतु ॐ के आधार का पाँच मंजिला भवन बनना आरंभ हो रहा है, जिसके साथ ध्यान एवं मंत्र विज्ञान अनुसंधान केंद्र तथा ज्योतिर्विज्ञान अनुसंधान केंद्र भी बनाया जाएगा। एक विराट छह मंजिला संस्कृति खंड बनाया जा रहा है, जिसके ऊपर एक आधुनिक वेधशाला होगी। पूरे प्रोजेक्ट का विवरण जनसामान्य के लिए इस प्रकार है−−भूमि 430 लाख (ले ली गई) एवं 1550 लाख (लिया जाना है), भवन निर्माण पुस्तकालय 100 लाख, फर्नीचर आदि 780 लाख, विद्युत आदि 500 लाख एवं कार्पस 6000 लाख। इस तरह यह लगभग एक सौ छियासठ करोड़ की विराट योजना है।

भारत सरकार ने गायत्री परिवार के पावन उद्देश्यों से प्रभावित होकर अगस्त, 2002 में श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट शाँतिकुँज, हरिद्वार को (जो कि इस विश्वविद्यालय की संस्थापिका संस्था है) आयकर की धारा 35 ए॰ सी॰ के अंतर्गत सौ प्रतिशत आयकर छूट का नोटिफिकेशन दिनाँक 28.8.02 को एस॰ ओ॰ 0914 (ई) के माध्यम से जारी किया है। इस धारा के अंतर्गत दिए जाने वाले दान की राशि को दानदाता की करयोग्य आय में से सौ प्रतिशत घटाया जाएगा अर्थात् उक्त राशि को करदाता की करयोग्य आय में जोड़ा नहीं जाएगा। भावनाशील दानदाताओं के लिए कर में राहत, शासन के प्रति जवाबदेही की पूर्ति एवं पुण्यार्जन का इससे सुँदर मौका और क्या हो सकता है।

हमें विश्वास है कि परिजन इस महान कार्य के लिए उदारतापूर्वक दान देंगे, क्योंकि भारतीय संस्कृति को विश्वसंस्कृति बनाने की, भारत को पुनः जगद्गुरु बनाने की धुरी बनने जा रहा है यह तंत्र। ऋषि−परंपराओं का पुनर्जीवन एवं प्राच्य विद्याओं का पुनर्जागरण करेगा यह विश्वविद्यालय। राजा महेंद्रप्रताप, महामना मालवीय जी, स्वामी श्रद्धानंद जी की पावन परंपराओं को जीवंत करेगा यह विश्वविद्यालय। देवमानवों के निर्माण की टकसाल बनने के साथ आज वैश्विक स्तर पर छाई समस्याओं का समाधान देगा यह विश्वविद्यालय। वनौषधियों को विलुप्त होने से बचाकर उनकी वैज्ञानिकता प्रमाणित कर राष्ट्र को सर्वांगपूर्ण स्वास्थ्य एवं समृद्धि की ओर ले जाएगा यह विश्वविद्यालय। हमारा भारतवर्ष भामाशाहों, बिड़ला, टाटा, बजाज जैसे धनकुबेरों सहित गिलहरियों (श्रीराम के समय) तथा ग्वाल−बालों (श्रीकृष्ण के समय) एवं सुप्रियाओं (बुद्ध के समय) का देश है। ऐसे में वेतनभोगी कर्मचारियों (धारा 80 जीजीए) को भी उस छूट का लाभ प्राप्त होगा, जो वे दान प्राप्त करेंगे। यदि हमारे गुरुदेव की इच्छानुसार हमारा ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ ही इसे खड़ा करना चाहे तो पचास पैसा प्रतिदिन के हिसाब से मासिक या वार्षिक स्तर पर अनुग्रह राशि भेजकर यह पावन पुण्य अर्जित कर सकता है। यदि इस पत्रिका के साढ़े छह लाख पाठकों ने यह राशि भेजना आरंभ किया, तो हमें वर्ष भर में 3.25 लाख 365 रुपये (लगभग 12 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष) मिलना आरंभ हो जाएँगे। दस वर्ष तक यह क्रम चले तो इतने मात्र से हमारा लक्ष्य पूरा हो जाएगा। आशा ही नहीं, विश्वास है कि यह दैवी प्रयोजन पूरा होकर ही रहेगा।


अपनों से अपनी बात−2 - संकल्पों को पकाएँ, सक्रियता की दौड़ में आगे आएँ

यह संकल्पों को पकाने का वर्ष है। सभी जानते हैं कि यह संगठन सशक्तीकरण का, उत्तरार्द्ध का दूसरा वर्ष है, जो आगामी वसंत से आरंभ होकर 2004 के वसंत तक चलेगा। साथ ही जून, 2002 से आरंभ हो गए गायत्री तपोभूमि के स्वर्णजयंती वर्ष का छहमासीय उत्तरार्द्ध भी इस माह से आरंभ हो गया। हम सभी ने गायत्री तपोभूमि की पावन रज में यमुनातट पर शरदपूर्णिमा (20, 21, 22 अक्टूबर, 02) की तारीखों में कुछ पावन संकल्प लिए थे। उन्हें याद कर गुरुसत्ता के चरणों में कुछ उपलब्धियाँ पुष्परूप में अर्पित करने की यही वेला है। छह फरवरी, 2003 को वसंतपर्व की पावन वेला में हमें इन सभी संकल्पों को याद कर अमली जामा पहनाना है। तब तक सभी को शाँतिकुँज, हरिद्वार एवं गायत्री तपोभूमि, मथुरा से सुनियोजित दिशाधारा वाले पत्र भी मिल चुके होंगे, जो प्राप्त व्यक्तिगत एवं सामूहिक संकल्प−पत्रों का अध्ययन करने के बाद लिखे गए हैं

युगनिर्माण संकल्प द्वारा ही

संकल्प पर ही सृष्टि टिकी है। सिरजनहार ने यह सारा संसार ‘एकोऽहं बहुस्यामि’ के अपने संकल्प के आधार पर ही बनाया है। हमें भी उसी की एक छोटी इकाई अंशधर सत्ता होने के नाते वही दायित्व मिला है। युग का नवनिर्माण एक से अनेक हुए बिना संभव नहीं। यह कार्य परमपूज्य गुरुदेव के बताए मार्गदर्शन के अनुसार अपनी जीवनसाधना को प्रखर करते रहने से निश्चित ही पूरा हो सकता है। हमें करना मात्र इतना ही है कि हमारे इष्ट की उपासना एवं जीवनदेवता की साधना को हम अपनी समष्टि की आराधना द्वारा पकाएँ। अपनी उपासना स्वार्थप्रधान न हो। परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ मान सारे समाज−राष्ट्र के उत्थान की, मूल्यों के उत्थान की, गायत्री चेतना के विस्तार की बात हम सोचें। तब ही युगनिर्माण योजना अपने लक्ष्य पर पहुँच सकेगी।

महाकाल की रथयात्रा

इस वर्ष मकर संक्राँति (14.1.2003) से एक अभूतपूर्व महाकाल की रथयात्रा ज्योतिर्लिंग त्र्यंबकेश्वर की गौतमी गंगा गोदावरी की सिंहस्थ नगरी नासिक से निकलने जा रही है। मालेगाँव, धुले, शिरपूर (महाराष्ट्र) जिले से होकर यह 18.1 को सेंधवा से मध्यप्रदेश में प्रवेश करेगी। मानपुर, इंदौर, उज्जैन, देवास, शाजापुर,राजगढ़ कुँभराज, गुना, शिवपुरी, झाँसी, दतिया, डबरा, ग्वालियर, मुरैना होती हुई यह 10.2.03 को राजस्थान में धौलपुर जिले में प्रवेश करेगी। 11.2 से 14.2 यह आँवलखेड़ा गुरुग्राम में रहेगी तथा 14.2 से 17.2 तक चैतन्य तीर्थ मथुरा में विराजमान रहेगी। अभी यहाँ से मेरठ, मुजफ्फर नगर होकर इसके 26.02 को शाँतिकुँज तक पहुँचने का रूट बनना शेष है। कुछ परिजन चाहते हैं यह दिल्ली−राजधानी होकर निकले एवं कुछ इसे अलीगढ़, बुलंदशहर से होकर लाना चाहते हैं। परिपत्र एवं पत्र द्वारा सभी को स्पष्ट तिथियों की जानकारी मिलेगी। श्री के॰ सी॰ पाँडे नासिक के गारगोटी परिवार द्वारा प्रदत्त 750 किलोग्राम का विशाल शिवलिंग 1 मार्च महाशिवरात्रि के दिन विश्वविद्यालय के केंद्र में प्रतिष्ठित होगा। वहाँ महाकाल का बड़ा सुँदर मंदिर इन दिनों बनाया जा रहा है। उसी दिन प्रातः इसकी प्राण−प्रतिष्ठा होगी। रथयात्रा जहाँ रुकेगी, वहाँ सभी इसका दर्शन कर सकेंगे। एक प्रदर्शनी एवं उद्बोधन (केंद्रीयदल) द्वारा सभी इस यात्रा के उद्देश्यों को जान पाएँगे एवं जनचेतना जागेगी। दक्षिण व उत्तर का, गोदावरी व गंगा का संगम होगा। क्षेत्रीय परिजनों को ही इसकी जिम्मेदारी सौंपी जा रही है।

प्रज्ञापरिषद् की स्थापना व ब्रह्मवर्चस की रजत जयंती

2004 का वर्ष एक विलक्षण संयोग लेकर आ रहा है यह ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की स्थापना (1971) का रजत जयंती वर्ष है। इस वर्ष सारे देश में प्रबुद्ध वर्गों के सम्मेलन स्थान−स्थान पर किए जाएँगे। इस बीच केंद्र में प्रज्ञापरिषद् की स्थापना की जा रही है। इसका संविधान बनाया जा रहा है। यह मूलतः इंटलेक्चुअल फोरम होगा, जो वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की धुरी पर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के मार्गदर्शन में कार्य करेगा। जनपद स्तर पर यह स्थापना अपने सात जोनल केंद्रों द्वारा शाँतिकुँज से संचालित होती रहेगी एवं इसमें शिक्षक, छात्र, चिकित्सक, व्यापारी, तकनीकी विशेषज्ञ सभी जुड़ते चले जाएँगे। इसका प्रारूप बनाया जा रहा है। प्रारंभिक चिंतन विगत नवंबर माह में विश्वविद्यालय में संपन्न एक सेमीनार में किया जा चुका है, जो नागपुर के वैज्ञानिकों के माध्यम से संपन्न हुई थी। एक वर्ष (2003) हमारे पास तैयारी का है।

शक्तिपीठों की रजतजयंती का वर्ष

2005 के वसंत से 2006 के वसंत एक हम शक्तिपीठों की स्थापना की रजतजयंती का वर्ष मनाएँगे। अभी इसका विस्तृत प्रारूप बनना शेष है। तब तक जोनल मंथन द्वारा सभी शक्तिपीठ व्यवस्थित ढंग से तंत्र से जुड़ चुके होंगे। आगामी तीन वर्ष अत्यधिक सक्रियता से भरे पड़े हैं। हम सभी को अभी से इनमें भागीदारी करने के लिए स्वयं को तैयार कर लेना चाहिए।


संगठन सूत्र


आत्म अनुशासित (Kavita)

संगठन मजबूत होते हैं तभी। आत्म अनुशासित घटक हों जब सभी॥

आत्म अनुशासन ‘अहं’ का त्याग है, अहं ही तो द्वेष है व राग है।

समर्पित हो यदि अहं ‘सिद्धाँत’ को, संगठन को आँच न आए कभी॥

संगठन मजबूत होते हैं तभी॥

‘महत्वाकाँक्षा’ अहं को पालती, वही तो है राग−द्वेष उछालती।

मारतीं जब जोर स्वार्थी वृत्तियाँ, संगठन भी चरमरा जाते तभी॥

आत्म अनुशासित घटक होना सभी॥

संगठन समभाव का परिवार है, और समरसता सहज आधार है।

उभरती जब व्यक्तिगत दुर्भावना, संगठन की ध्वस्त हो जाती छबी।

आत्म अनुशासित घटक होना सभी॥

संगठन के लिए सब अर्पित रहें, और सिद्धाँतों को समर्पित रहें।

हर घटक उत्सर्ग हो सिद्धाँत पर, संगठन को शक्ति मिलती है जभी॥

संगठन मजबूत होते हैं तभी॥

संगठन का लक्ष्य जब सर्वार्थ हो, किसलिए बाधक किसी का स्वार्थ हो।

‘लोकसेवी’ संगठन को तोड़ने का, नहीं लेगा भूलकर अपयश कभी॥

संगठन मजबूत होते हैं तभी॥

व्यवस्था न नीति कुछ ऐसे चले, आत्म अनुशासन को प्रोत्साहन मिले।

प्यार और सुधार की इस नीति से, संगठन विगठित नहीं होते कभी॥

संगठन मजबूत होते हैं कभी॥

संगठन का हर घटक ‘साधक’ बने, संगठन का फिर नहीं बाधक बने।

जिस घटक में आत्म अनुशासन न हो, उस घटक में साधना की है कमी।

संगठन मजबूत होते हैं तभी॥ आत्म अनुशासित घटक हों जब सभी॥

−मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’

*समाप्त*