स्मरण और समर्पण

गुरुदेव के स्मरण में शिष्यों के समर्पण की ऊर्जा समायी है। स्मरण जितना सघन होता है-समर्पण उतना ही तीव्रतर हो जाता है। गुरु पूर्णिमा की पावनता की छुअन ने आज इन दोनों में नव प्राण भर दिए हैं। स्मरण और समर्पण के अनगिनत भक्ति स्पन्दनों से अंतर्मन स्पन्दित है। प्रकाश की पवित्र धाराओं को प्रवाहित करते अपने आराध्य के नेत्र आज भी शिष्यों के अंतर्गगन में दो महासूर्यों की भाँति प्रकाशित हैं।

स्मरण पट पर अंकित है उस छुअन का अहसास, जो गुरुदेव के श्री चरणों में माथा टेकने पर मिलता था। उनकी प्रेरक और ऊर्जावान वाणी, जो शिष्य-समुदाय को सदा नवजीवन देती थी। जिसके श्रवण मात्र से शिष्यों की चेतना में नवीन आयाम खुलते थे। समर्पण की निष्ठ महासुदृढ़ होती थी। कितनी ही बातें, कितनी ही यादें आज शिष्यों की अन्तर्चेतना में भक्ति का भाव समुद्र बनकर उफन रही हैं। आज यदि कोई पूछे कि गुरुदेव कहाँ हैं? तो इसका बड़ा ही अनुभूति पूर्ण उत्तर है- वह अपने शिष्यों के भक्ति से भरे हृदय में हैं।

हमारे प्रभु देहातीत होकर अपने शिष्यों की भाव चेतना में संव्याप्त हो गए हैं। शिष्यों की पुलक में-रुदन में, कसक में-टीस में, भक्ति में-अनुरक्ति में, व्याकुलता में-विह्वलता में, पूजा में-प्रेम में, विरह में-वियोग में वही, एक मात्र वही अभिव्यक्त होते हैं। यह सच है कि उनकी हर याद तड़पाती है, पर यह भी सच है कि वही याद समर्पण की महादृढ़ता भी बनती है। स्मरण और समर्पण दो दिखते हुए भी दो नहीं हैं। जो स्मरण है- वही समर्पण है। जहाँ स्मरण है, वही समर्पण भी है।

गुरु पूर्णिमा की पावनता में यदि स्मरण की तीव्रता बढ़ी है, तो समर्पण की दृढ़ता भी सघन हुई है। गुरुदेव की यादें शिष्यों के मन में आज केवल पुलकन और पूजा के अहसास ही नहीं लिए हैं, इसमें समर्पण की महा निष्ठा भी समायी है। संकल्प की यह महाहुँकार भी है- हे गुरुदेव! तुम्हारे द्वारा गढ़े-सँवारे गए इस जीवन पर अब सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा अधिकार है। हे अन्तर्यामी! हम सदा तुम्हारे लिए, तुम्हारी परा चेतना में विलीन होने के लिए तिल-तिल कर गलते रहेंगे- तिल-तिल कर जलते रहेंगे। तुम्हारा स्मरण-तुम्हें ही समर्पण- हमारा जीवन ध्येय है।


व्यक्तित्व-गठन के छह महत्वपूर्ण चरण

व्यक्तित्व का विघटन युग की सबसे गंभीर समस्या है। अतः हर स्तर पर इसके निदान का मुद्दा मुखर है। मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में इस संदर्भ में उत्कट प्रयास हुए हैं, परिणामस्वरूप व्यक्तित्व के रहस्यमयी आयामों को इसने उद्घाटित किया है; जो फ्रायड के इदं, इगो व सुपरइगो की अवधारणाओं से लेकर मैस्लो के आत्मसिद्धि एवं ‘मेटानीडज’ जैसे सिद्धान्तों तक विस्तृत है। किन्तु व्यक्तित्व के गठन पर इसमें समग्र दृष्टि का सर्वथा अभाव दृष्टिगोचर होता है। इस संदर्भ में भारतीय अध्यात्म का तत्त्वदर्शन एवं योग-मनोविज्ञान का साधना विज्ञान एक समग्र दृष्टि एवं उपचार प्रस्तुत करता है। क्योंकि प्रो. एडगर एस ब्राइटमैन के शब्दों में, यह एक समस्वर, समग्र एवं संगठित जीवन का प्रतिपादन करता है। स्वामी अखिलानन्द ने अपने ग्रंथ ‘मेन्टल हेल्थ एण्ड हिन्दु साइकोलॉजी’ में इस संदर्भ में कुछ सूत्र प्रतिपादित किए हैं जो व्यक्तित्व गठन पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं।

इनके अनुसार सर्वप्रथम आवश्यकता, व्यक्ति की स्वयं के भावों को संगठित करने की इच्छा है। व्यक्ति में अपने बिखरे जीवन को समेटने की, इसे एक सार्थक दिशा में संवारने की उत्कट इच्छा होनी चाहिए। व्यक्तित्व के विकास की तीव्रता इसी इच्छा की प्रचण्डता पर निर्भर करती है। यदि इच्छा तीव्र नहीं है, तो प्रयास भी अस्थिर एवं शिथिल होंगे, अतः वाँछित परिणाम की आशा नहीं की जा सकती। व्यक्तित्व के भाव संगठन में आध्यात्मिक महापुरुषों का संग अतीव लाभदायी होता है। उनका सान्निध्य सहज ही उच्चतर अभीप्सा एवं प्रेरणा को जाग्रत् करता है, किन्तु ऐसे व्यक्तियों का सान्निध्य लाभ सदैव सुलभ नहीं होता। अतः व्यावहारिक समाधान यही है कि ऐसी महान् आध्यात्मिक विभूतियों के सत्साहित्य के स्वाध्याय एवं चिंतन-मनन द्वारा अपने चारों ओर एक उच्चतर वातावरण तैयार किया जाए। क्रमशः यह आदत व्यक्तित्व के भावनात्मक ढाँचे के रूपांतरण में एक महत्त्वपूर्ण कारक बन जाता है।

व्यक्तित्व संगठन में दूसरी आवश्यकता है- जीवन का उच्च दर्शन या ध्येय। इसके बिना बिखराव को रोकने की कोई संभावना नहीं है। इस संदर्भ में बौद्धिक, नैतिक, जातीय या राष्ट्रीय आदर्श भी पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि संकीर्ण व विकृत होने पर ये विध्वंसक शक्ति का रूप ले सकते हैं। फिर सुखवादी दर्शन तो एक सिरे से घातक है। यह भोग और स्वार्थ को ही जीवन का आदर्श घोषित करता है तथा व्यक्तित्व के विखण्डन-बिखराव को ही गति देता है। अंतःजीवन का सर्वोच्च आदर्श, अंतर्निहित दिव्यता का जागरण एवं अभिव्यक्ति ही हो सकता है। यह परमात्मा के दिव्य अंश के रूप में अपनी पहचान की आस्था एवं धारणा पर आधारित है। यही आत्म संयम का यथार्थ आधार प्रस्तुत करता है। वासना व हिंसा की आदिम वृत्तियों और स्वार्थ, भय, ईर्ष्या-दंभ जैसे नकारात्मक भावों का निग्रह इसी आधार पर सधता है। भावनात्मक संगठन के लिए इनका समुचित नियंत्रण आवश्यक होता है। इन्हें न तो एकदम छूट दी जा सकती है और न ही इनका दमन ही समाधान है। व्यक्तित्व के संगठन के लिए जिस भाव स्थिरता एवं संतुलन की आवश्यकता होती है, वह इन दोनों अतियों के बीच, अवाँछनीय भावों के परिष्कार, परिमार्जन द्वारा ही संभव होता है। और जीवन का आध्यात्मिक ध्येय इसे संभव बनाता है।

तीसरा चरण, अपने समस्त भावों को ईश्वर की ओर उन्मुख करना है। ऐसा करते ही हम भावनात्मक बिखराव और स्वार्थपरक वृत्तियों की जड़ों पर प्रहार करते हैं। अपनी भाव प्रकृति एवं अभिरुचि के अनुसार हम ईश्वर को माता, पिता, बन्धु, सखा, स्वामी आदि मानते हुए किसी भी भाव में पावन सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं। और अपनी समस्त क्रियाओं को उसे अर्पित करते हुए इस भाव सम्बन्ध को पुष्ट कर सकते हैं। अपने ईष्ट-आराध्य के प्रति कुछ करने का भाव क्रमशः उसके प्रति अपनी भावनाओं को सघन बनाता है और परिणाम स्वरूप अन्य सभी भाव-संवेगों को संगठित करता है। शनैः-शनैः मानवीय सम्बन्धों और अन्तर्व्यैक्तिक व्यवहार में भी ईश्वर की उपस्थिति का अहसास होने लगता है। इस तरह समस्त क्रियाएँ क्रमशः व्यक्तित्व के भावनात्मक संगठन को सुनिश्चित करती हैं।

यह प्रक्रिया भाव प्रधान व्यक्तियों पर अधिक प्रभावी ढंग से लागू होती है। विविध धर्म के संत-भक्तों के जीवन में इसके चरमोत्कर्ष के दर्शन होते हैं। ईसाई धर्म में सेंट फ्राँसिस, सेंट एंथोनी, सेंट टेरेसा और संत थेरेस आदि इसके उदाहरण हैं। भारत में मीरा, सूर, तुलसी, रामकृष्ण परमहंस आदि इसी के जीवन्त प्रतिमान हैं।

व्यक्तित्व संगठन के चतुर्थ चरण में, व्यक्ति को अपनी प्रत्येक क्रिया में अपनी अंतर्निहित दिव्यता को अभिव्यक्त करने का प्रयास-पुरुषार्थ करना चाहिए। उसे दूसरों में ईश्वर की उपस्थिति को देखने का अभ्यास भी करना चाहिए। जिस भी क्षण अपनी दुर्बलता, अस्थिरता या दूसरों की विध्वंसक क्रिया के कारण निम्न वृत्तियाँ या भावनाएँ भड़क उठे, उसी क्षण उनमें ईश्वर के दर्शन के अभ्यास द्वारा इन विकारों को शान्त करना चाहिए। भगवान् बुद्ध ने ठीक ही कहा है कि क्रोध को क्रोध द्वारा नहीं जीता जा सकता, इसी तरह हिंसा को हिंसा द्वारा नहीं जीता जा सकता। इन्हें तो प्रेम द्वारा ही जीता जा सकता है। व्यक्ति क्रोध और हिंसा को जितना ही व्यक्त करता जाएगा, ये उतना ही बढ़ते जाते हैं। अर्थात् निम्न वृत्तियाँ अपनी अभिव्यक्ति द्वारा बढ़ती हैं। भोग द्वारा वासनाएँ शाँत नहीं होती, वे और भड़क उठती हैं। इन्हें खुली छूट देने का अर्थ है अपने अस्तित्त्व के बिखराव एवं विखण्डन को आमंत्रण देना।

भारतीय मनोविज्ञान के अनुसार, भाव संवेगों को अभिव्यक्ति से पूर्व की स्थिति में अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। योग मनोविज्ञान के जनक महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि, संस्कारों का निग्रह व रूपांतरण होना चाहिए। अभ्यास और वैराग्य द्वारा यह कार्य सम्भव होता है। (पा.यो.सू.- 1/12) राजयोग में स्वामी विवेकानन्द जी इन अचेतन संस्कारों के नियंत्रण पर इतना ही बल देते हैं, जिससे कि उन्हें विध्वंसात्मक से रचनात्मक शक्तियों के रूप में रूपांतरित किया जा सके।

पाँचवा चरण, व्यक्तित्व को बिखराने वाली क्रोध, घृणा तथा अन्य वृत्तियों के प्रतिपक्षी भावों एवं विचारों का विकास है। उच्चतर गुणों का सचेतन विकास मन को प्रशान्त करता है और क्रमशः भाव संवेगों को संगठित करता है। (पा.यो.सू. 1/33) जितना अधिक उच्चतर भावनाएँ और परमार्थ-परायण वृत्तियाँ अभिव्यक्ति होती हैं, उतना ही प्रतिपक्षी वृत्तियाँ क्षीण होती हैं और व्यक्तित्व एक नया रूप एवं आकार लेने लगता है। यही चरित्र का निर्माण है। निम्नवृत्तियों का उच्चतर दिशा में नियोजन इसका केन्द्रिय तत्त्व है। रामकृष्ण परमहंस इस पर जोर देते हुए कहा करते थे- ‘ अपनी निम्न व हेय वृत्तियों को ईश्वर की ओर उन्मुख करो। यदि तुममें कामना और लोभ है तो ईश्वर के प्रेम की कामना करो और उसके पाने का लालच करो।’ इस तरह यह प्रक्रिया, भाव संवेगों को दबाने की बजाय इन्हें नियंत्रित, संचालित और क्रमशः रूपांतरित करती है। यह आधुनिक मनोविज्ञान द्वारा प्रतिपादित उदात्तीकरण (सत्त्लिमेशन) की प्रक्रिया से आगे गहनतम स्तर पर सक्रिय होती है। और इससे भी आगे, यह ध्येय के लिए संघर्षरत साधक को गहन भावनात्मक संतोष देती है।

अगला चरण एकाग्रता का अभ्यास है। ईश्वर का सतत चिन्तन-मनन मन की प्रसुप्त आध्यात्मिक शक्तियों को जगाता है और इस तरह आध्यात्मिक जीवन दर्शन को दैनन्दिन गतिविधियों में अभिव्यक्त होने का अवसर मिलता है। इस अभ्यास द्वारा व्यक्ति की इच्छा शक्ति का विकास होता है। इच्छा शक्ति के अभाव में वह आदर्श को व्यवहार में जीवन्त नहीं कर सकता। यह एक सहज नियम है कि बिखराव से ऊर्जा का क्षय होता है और एक बिन्दु पर केन्द्रित होने पर यह अत्यन्त शक्तिशाली बन जाती है। सामान्यतया मानसिक शक्ति विविध भाव संवेगात्मक वृत्तियों, अभिरुचियों और गतिविधियों में बिखरी रहती है। एकाग्रता का अभ्यास इसे एक बिन्दु पर केन्द्रित करता है, जिससे कि समस्त प्रसुप्त शक्तियाँ अभिव्यक्ति हो उठती हैं। तब व्यक्ति स्वयं में व दूसरों में ईश्वर को देख सकता है और अन्तर्व्यैक्तिक सम्बन्धों में उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। समग्र रूप से संगठित व्यक्ति की इच्छा शक्ति एकीकृत होती है और किसी भी स्थिति में निम्नवृत्तियों को प्रश्रय नहीं देती है। वस्तुतः ऐसा व्यक्ति अपनी मानसिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक शक्तियों का स्वामी होता है।

इस तरह जब उपरोक्त बताए गए छः चरणों के माध्यम से व्यक्तित्व का संगठन हो जाता है, तो व्यक्ति का समूचा जीवन दिव्य शाँति एवं प्रेम की सुवास से महक उठता है। परमार्थ परायणता उसका सहज स्वभाव बन जाती है और उसका अलौकिक स्पर्श कृपापात्र अभीप्सु को इसी दिशा की ओर उन्मुख करता है।


प्रयासों में सहायता मिली (kahani)

काका कालेलकर गाँधी जी के अधिकतम घनिष्ठ थे। उनसे किसी विदेशी ने पूछा, “गाँधी जी का देश के हर वर्ग पर इतना प्रभाव किन किरणों से पड़ा,”

काका ने कहा, “वे अपने साथ संयम की कड़ाई बरतते हैं। जो मन में है, वही वाणी से कहते हैं और अपने क्रिया कलापों को सार्वजनिक हित में लगाए रहते हैं। वे वही कहते हैं, जो करते हैं, इसीलिए वे विश्वभर में असंख्यों के लिए अनुकरणीय हैं।”

महान बनने के ये प्रख्यात सिद्धाँत हैं, जिन्हें गाँधी जी ने अपनाया।




ध्यानं निर्विषयं मनः

ध्यान में किस तरह से सफलता मिले? इस सवाल ने उन्हें काफी उलझन में डाल रखा था। कई महीनों से वह अपनी इस उलझन को सुलझाने की कोशिश कर रहे थे। पर सार्थक समाधान का कोई छोर उन्हें नहीं मिल पा रहा था। अपने प्रश्न कंटक की टीस भरी चुभन उन्हें हर पल सताती रहती थी। हालाँकि इसके अलावा उन्हें अन्य कोई कष्ट न था। उत्तम स्वास्थ्य, उज्ज्वल कीर्ति, धन का अपरिमित भण्डार सभी कुछ उनके पास थे। दूर-दूर तक उनका अपना कारोबार फैला हुआ था। अनेकों निजी जलयान समुद्र पार जाकर उनके आर्थिक साम्राज्य का विस्तार करते रहते थे। उनकी हुण्डियों और हस्ताक्षरों का देश में नहीं विदेशों में भी सम्मान था।

स्वयं सम्राट हर्षवर्धन उन्हें अपने सगे सहोदर की भाँति सम्मान देते थे। जावा, सुमात्रा आदि देशों के राजन्य वर्ग में भी उन्हें प्रतिष्ठ प्राप्त थी। गरीबों व असहाय जनों के बीच उनका नाम किसी देवता के नाम की भाँति था। पर उनकी अपनी स्थिति चम्पक पुष्पों के वन विहार करने के लिए विवश किए गए चञ्चरीक की भाँति थी। श्रेष्ठी विशाखदत्ता, महाश्रेष्ठी विशाखदत्त, नगर श्रेष्ठी विशाखदत्त, ये सभी सम्बोधन उन्हें चुभते थे। उनकी अपनी चाह तो बस साधक विशाखदत्त होने की थी। पर ध्यान के पलों में भी न जाने क्यों उनके मन की चंचलता विराम न लेती थी।

उनकी इस उलझन से परिवार के सदस्य और कर्मचारी भी परिचित हो चुके थे। सभी चाहते थे कि श्रेष्ठी को उनके जीवन की राह मिले, पर कुछ कर पाने में असमर्थ थे। पर एक दिन एक कर्मचारी को सफलता की एक नन्हीं किरण चमकती दिखलाई दी। यह चमक उस समाचार की थी, जो वीतराग सन्त आशुतोष महाराज के कान्यकुत्त्ज (कन्नौज) आने की सूचना दे रही थी। आशुतोष महाराज श्रद्धा, तप, योग, भक्ति एवं निष्काम कर्म के मूर्तिमान रूप थे। जन श्रद्धा उनकी ओर उन्मुख होकर प्रवाहित होती थी। पर वह स्वयं जन-गण को सीय-राममय जानकर लोक कल्याण में निरत रहते थे। वर्षों बाद उनके आगमन के समाचार ने कान्यकुत्त्ज नगर में पवित्र भावनाओं का ज्वार ला दिया। श्रेष्ठी विशाखदत्त ने भी उनके पास जाकर प्रणिपात करते हुए अपने घर आने का निमन्त्रण दिया।

परम सरल आशुतोष महाराज नियत समय पर श्रेष्ठी के निवास पहुँच गए। भोजन आदि के बाद विशाखदत्त ने उनसे विनम्र स्वरों में अपनी उलझन कह सुनायी। अनेकों कोशिशों के बावजूद ध्यान नहीं लगता। चाहें कितनी ही देर आँखें बन्द किए बैठा रहूँ, पर कहीं भी प्रभु की झलक नहीं मिलती? मन में हमेशा उपद्रव मचा रहता है। समझ में नहीं आता कैसे निबटूँ इस उपद्रव से?

श्रेष्ठी की बातों को सुनकर आशुतोष महाराज बिना बोले उठे और श्रेष्ठी का हाथ थाम कर भवन की खिड़की के पास ले गए। इसमें स्वच्छ पारदर्शी काँच लगे हुए थे। इस खिड़की के पार वृक्ष, पक्षी, बादल, सूरज सभी कुछ साफ-साफ नजर आ रहे थे। इस सम्मोहक नजारे को देखने और दिखाने के बाद वह एक दूसरी खिड़की के पास आ खड़े हुए। इसमें बड़ी ही कलात्मकता को उकेरती चाँदी की चमकीली परत लगी थी। यहाँ खड़े होकर आशुतोष महाराज बोले, वत्स विशाखदत्त! चाँदी की चमकीली परत और काँच में कुछ अन्तर नजर आता है।

विशाखदत्त कहने लगे, महाराज! इस चमकीली परत पर सिवाय खुद की शक्ल के और कुछ भी नहीं दिखाई देता है। बाहर की दुनिया तो एकदम सिरे से गायब है। आशुतोष महाराज ने मुस्कराते हुए कहा-जिस चमकीली परत के कारण तुमको सिर्फ अपनी शक्ल दिखाई दे रही है, वही तुम्हारे मन के चारों तरफ भी है। इसलिए अपने ध्यान में तुम जिधर भी देखते हो, केवल अपने मन को ही देखते हो। जब तक तुम्हारे मन पर विषय-वासना की परत है, तब तक परमात्मा तुम्हारे लिए बेमानी है।

थोड़ा ठहर कर आशुतोष महाराज ने श्रेष्ठी की ओर गम्भीर दृष्टि से ताका और कहा, वत्स, महर्षि पतंजलि के आप्त वचन हैं- ‘ध्यानं निर्विषयं मनः’ ध्यान तो मन के विषय-वासना हटने पर ही होता है। पहले तुम विषय-वासना रूपी चाँदी की परत के सामने से हटो। और शीशे जैसे पारदर्शी व स्वच्छ मन से प्रभु का ध्यान करो। तुम्हें उसकी अनुभूति अवश्य मिलेगी।


बुद्धि नहीं, सद्बुद्धि को महत्व मिले

बुद्धि में निर्णायक क्षमता होती है। वह निर्णय करती है कि किस ओर जाना है। परन्तु सत्पथ पर ही बढ़ना है, सत्यानुसंधान करना है इसका निर्णय सद्बुद्धि करती है। केवल बुद्धि भौतिक सफलताओं के अर्जन की कामना करती है। इसकी वैचारिक सीमाएँ पदार्थ जगत् तक ही सीमित होती हैं। आधुनिक विज्ञान के अद्भुत आविष्कार इसी बुद्धि की देन है। बुद्धि के कारण ही विश्व में इतनी साधन-सुविधाएँ संभव हो सकी हैं। इसने समस्त विश्व को घर के एक आँगन में समेट देने का असंभव कार्य कर दिखाया है। सुदूर अंतरिक्ष में टिमटिमाते तारों को तोड़ लाने की कहावत भी कुछ सीमा तक इसने साकार कर दिखायी है। परन्तु बुद्धि ने मानव समाज एवं विश्व का जितना उपकार किया है, उतना ही इसे विनाश के मुँह की ओर भी धकेल दिया है। बुद्धि ने अमृत भी बाँटा है तो हलाहल पिलाने में कोताही नहीं बरती है।

आज का आधुनिक समाज सफलता के लिए बुद्धि को ही एक मात्र साधन ठहराता है और इसका मानदण्ड और मापदण्ड बुद्धि परीक्षण (आई.क्यू.) मानता है। परन्तु अतिबुद्धिमानों के वर्तमान समाज में जितनी मनोवैज्ञानिक विकृतियाँ एवं समस्याएँ पैदा हुई हैं उसे देख मानव मन काँप उठा है, असुरक्षित एवं आतंकित हो गया है। आखिर कहाँ चूक हो गई है। समग्र सफलता पाने की दिशा में कहाँ भटकाव आया है। चुनौती पेश करती इस गंभीर समस्या के समाधान में आधुनिक मनोवैज्ञानिक डेनियल गोलमेन कहते हैं कि बुद्धि के के पथ पर अग्रसर करता है।

विश्लेषणात्मक बुद्धि समस्याओं का समाधान करती है। परन्तु अपने आप में यह अपूर्ण व एकाँगी है। सृजनात्मक बुद्धि में समस्याओं का प्रभावी निदान मिलता है परन्तु समस्या का निदान मिलना ही पर्याप्त नहीं है उसे जीवन में उतारने के लिए व्यावहारिक होना भी आवश्यक एवं अनिवार्य है। अतः उसे व्यवहार कुशल भी होना चाहिए। बुद्धि के इन तीनों अवयवों से ही जीवन विकसित एवं परिपक्व होता है तथा सफलता के शिखर को स्पर्श करता है। स्टर्नबर्ग के अनुसार सफल बुद्धि वाले व्यक्ति अपने अंदर विद्यमान अनन्त सामर्थ्य की संभावना को समझते हैं तथा साथ ही इसे क्रियान्वित करने के लिए अत्यन्त कठिनाइयों से भी परिचित होते हैं। अतः इन कठिनाइयों का निदान पहले से तय कर लेते हैं, जिससे कि हताशा-निराशा की नकारात्मक सोच न पनपने पाये। इनमें विधेयात्मक चिन्तन के साथ-साथ सृजनात्मक दृष्टिकोण भी होता है जो सफलता के लिए एक अपरिहार्य मानदण्ड है।

सफल बुद्धि वाले अपनी राह खुद तलाशते हैं। ये अवसर की प्रतीक्षा नहीं करते और न उस पर निर्भर करते हैं बल्कि स्वयं परिस्थिति को गढ़ते हैं। मानव परिस्थिति का कृतदास नहीं है वरन् अपनी संकल्पित मनःस्थिति से परिस्थिति का सृजनकर्त्ता है। सफल बुद्धि इस तथ्य को भली-भाँति जानती है। सामान्यतः बुद्धि परिस्थिति की विषमता के सामने घुटने टेक देती है और किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाती है। उसे नहीं सूझता कि विषमता में समता का सौंदर्य कैसे निखारा जाय, कटुता को सौम्यता में तथा भयावह रिक्तता को सृजन की समृद्धि में कैसे बदला जाय। सफल बुद्धि इन कलाओं का उपयोग करने में दक्ष एवं प्रवीण होती है। यह समस्याओं को अनियंत्रित होने से पहले ही नियंत्रण में लाने के लिए सजग एवं सतर्क रहती है। ऐसे व्यक्ति रचनात्मकता के पक्षधर होते हैं। कुछ अच्छा करने में विश्वास रखते हैं साथ ही इसको करने के लिए आने वाले अवरोधों का सामना करने के लिए युक्ति एवं योजना बनाते हैं। अतः ऐसी बुद्धि अपने कर्मक्षेत्र में असफलता से निराश नहीं होती बल्कि उसका उचित कारण खोजती है। अपनी असफलता पर खुले मन से मूल्याँकन करती है, चिन्तन करती है। जहाँ भी त्रुटियाँ एवं गल्तियाँ दिखाई देती हैं उसे सदैव दूर करने का प्रयास करती है।

एस. ब्रायन के अनुसार सफल बुद्धि संवेदनात्मक भाव बोध को स्वीकार करती है क्योंकि बुद्धि से भाव शक्ति कहीं गहरी होती है तथा उसकी दक्षता एवं प्रेरणा भी अत्यधिक सशक्त होती है। मनुष्य विचारशील ही नहीं संवेदनशील भी है। बुद्धि सतह से एक ओर जहाँ चिन्तन चेतना फूटती है वहीं दूसरी ओर भावना के धरातल से उदारता, सज्जनता, संयमशीलता एवं शालीनता पनपती, विकसित होती है। अतः एस. ब्रायन की मान्यता है कि बुद्धि के साथ भावना का पुट व्यक्तित्व का गठन करता है। और व्यक्तित्व सर्वांग सुन्दर बनता है।

केवल बुद्धि से मनुष्य क्षुब्ध, चिन्तित, खिन्न, रुष्ट एवं असंतुष्ट रहता है। संवेदना की सरसता ही जिन्दगी को हँसाती, मुस्कुराती, हल्की-फुल्की, सुखी-संतुष्ट बना सकती है। बौद्धिक कुशलता व्यक्ति को कितना ही सफल क्यों न बना दे परन्तु अन्दर के गहरे अभाव एवं उद्विग्न अतृप्ति को मिटा नहीं पाती। इसी कारण भगवान् व्यास जी अनेक तर्कसंगत धार्मिक ग्रन्थों का लेखन करने के बावजूद आन्तरिक शाँति से वंचित थे। नारद जी के सद्परामर्श से भावपूर्ण भागवत पुराण की रचना के पश्चात् ही उन्हें उस भावनात्मक अभाव से महाभाव की प्राप्ति हुई। आज भी बौद्धिक कौशल से सम्पन्न मानवी जीवन इसी अतृप्ति की महाव्यथा से व्यथित है।

इसे केवल भावना की ठण्डी छाँव ही शीतलता प्रदान कर सकती है। इस संदर्भ में स्वामी विवेकानन्द के विचार बड़े ही हृदयस्पर्शी हैं। वे कहते हैं कि मानव जीवन की समस्त समस्याएँ बुद्धि से नहीं हल हो सकती, इसके लिए हृदय की आवश्यकता होगी। बुद्धि के साथ-साथ हृदय को भी पवित्र एवं पावन बनाओ, उसे अधिकाधिक संस्कारित बनाओ। क्योंकि वह हृदय ही है जिसके द्वारा भगवान् स्वयं कार्य करते हैं और बुद्धि द्वारा केवल मनुष्य। विचार शक्ति के साथ भाव शक्ति की भी उतनी ही आवश्यकता है। भाव एवं विचार के इस संयोग-सम्बन्ध को ही सद्बुद्धि कहते हैं, जिसे आधुनिक मनोवैज्ञानिक डेनियल गोलमेन एवं अन्य मनीषी ई. क्यू. के नाम से पुकारते हैं। हालाँकि ई. क्यू. सद्बुद्धि का पर्याय तो नहीं हो सकती परन्तु इसमें सद्बुद्धि की झलक-झाँकी मिलती है।

आज बुद्धि की नहीं सद्बुद्धि की महत्ता एवं विशेषता अधिक है। क्योंकि बुद्धि खण्डन करती है, विरोध एवं विवाद करती है। बुद्धि आलोचना करती है। सद्बुद्धि समालोचना एवं संवाद करती है। बुद्धि की दृष्टि भेद की दृष्टि है। वह सदा भेद व विभाजन को खोजती है जबकि सद्बुद्धि का दृष्टिकोण अभेद है। वह बुद्धि द्वारा विभाजित खाइयों को पाटती है और उसके परे एवं पार पहुँच जाती है। बुद्धि का आधार विश्लेषण है और सद्बुद्धि का आधार संश्लेषण है। बुद्धि सीमाएँ खींचती है, सद्बुद्धि सीमाएँ मिटाती हैं। और जब सभी सीमाएँ मिट जाती हैं तो उस असीम भाव बोध की उपलब्धि होती है। बुद्धि चालाकी करती है और सद्बुद्धि समझदारी करती है। बुद्धि संसार में कुशलता का नाम है तो सद्बुद्धि परमात्मा में कुशलता का पर्याय है। भगवान् बुद्ध का घर परित्याग सद्बुद्धि के अनावरण की महान् घटना है। परन्तु आज एक ऐसी बुद्धि की आवश्यकता है जिसकी गति संसार में उतनी ही हो जितनी की भगवान् में। स्वामी विवेकानन्द जी इसे विवेक बुद्धि कहते हैं जिसमें सर्वांगीण एवं परिपूर्ण व्यक्तित्व का सूत्र समाहित है।

मानव समाज को आज ऐसी सद्बुद्धि की आवश्यकता है जो वैयक्तिक जीवन को परिष्कृत करे एवं समाज को भी विकसित करे। जिससे आँतरिक एवं बाह्य दोनों जीवन पूर्णता प्राप्त करें। चाहे उसे सफल बुद्धि, संवेगात्मक बुद्धि या सद्बुद्धि के नाम से क्यों न जाने। जिसमें विकृति वहीं संस्कृति पनपे तथा विचार के साथ भावना का भी सम्मान हो। इसी सद्बुद्धि से ही मानव एवं विश्व का भाग्य-भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। अतः इस सद्बुद्धि का अर्जन ही युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है।


महामानव बना देता है (kahani)

एक सद्गृहस्थ था, संयम से रहता था और परिवार को सुसंस्कारी बनाने में निरंतर रहता था। नीतिपूर्वक आजीविका कमाता था। बचा हुआ समय और धन परमार्थ में नियोजित करता। वह तपोवन में बसा तो नहीं, पर घर में ही तपोवन बसा दिया। देवता इस धर्मात्मा विरक्त गृहस्थ की योग साधना से बहुत प्रसन्न हुए। इंद्र उसके सम्मुख प्रकट हुए और वर माँगने के लिए कहा।

क्या माँगता, जब असंतोषी ही नहीं तो अभाव किस बात का! हाथ पसारने में हेठी भी तो होती है। स्वाभिमान गंवाकर ही किसी से कुछ पाया जा सकता है। सो उसने ऐसा उपाय खोजा, जिसमें ऋणभार भी न लदे और देवता बुरा भी न मानें।

उसने वर माँगा-उसकी छाया जहाँ भी पड़े, वहाँ कल्याण बरसने लगे। वरदान मिल गया, पर अचंभित देवता ने पूछा, “हाथ रखने पर कल्याण होने पर तो आनंद भी आता, प्रशंसा भी होती और प्रत्युपकार की संभावना रहती। छाया से कल्याण होने पर इन लाभों से वंचित रहना पड़ेगा। फिर ऐसा विचित्र वर क्यों माँगा?”

सद्गृहस्थ ने कहा, “देव! सामने वाले का कल्याण होने पर तो अपना अहंकार पनपेगा और साधना में विघ्न डालेगा। छाया किस पर पड़ी, कौन कितना लाभान्वित हुआ, इसका पता न चलना ही मेरे जैसे विनम्रों के लिए श्रेयस्कर है।”

साधना का यही स्वरूप वरेण्य है। यही क्रमिक प्रगति के पथ पर चलते चलते व्यक्ति को महामानव बना देता है।


अकर्मण्यता - एक विष

गाँव के मन्दिर में साधु महाराज ने डेरा जमा लिया था। सरल, आस्तिक, भोले-भाले गाँव के लोग उस पर अपनी श्रद्धा उड़ेलते थे। ग्रामीण नर-नारियों की यह भाव-श्रद्धा कई रूपों में व्यक्त होती थी। कोई उनके लिए व्यञ्जन-पकवानों की व्यवस्था करता था। कोई उन्हें खीर, मलाई, रबड़ी का भोग अर्पित करता था। कुछ ऐसे भी थे जो महाराज जी के लिए गाँजा-चिलम, सुल्फा का इन्तजाम करते थे। सरल-ग्रामीणों की श्रद्धा के बदले महात्मा जी उन्हें अपने त्याग के किस्से चटपटी शैली में सुनाते थे। इन किस्सों में त्याग की सुगन्ध के स्थान पर अहं भावना की झलक ही ज्यादा दिखाई देती थी।

शाम होते ही उनके आवास पर ग्रामीण लोगों का जमावड़ा लग जाता। ज्यों-ज्यों लोग जुड़ते जाते, त्यों-त्यों उनकी वाणी अधिक प्रदीप्त हो जाती। हर दिन वह एक चीज का बखान करना नहीं भूलते थे, कि आखिर किस तरह से उन्होंने अपनी पैतृक सम्पत्ति को छोड़ दिया। चालीस बीघे जमीन, दो मकान, बैलों की जोड़ी, सोने-चाँदी, लाखों की नकद सम्पत्ति सबका सब उन्होंने छोड़ दिया। अपनी बातों के बीच-बीच में वह अपने इस त्याग का सम्पुट जरूर लगाते। बात-चीत के इस निष्कर्ष में वह बताते कि कर्म हमेशा बन्धन का कारण है। कर्म होता ही अज्ञान के कारण है। जो अज्ञानी है, वही कर्म करते हैं। ज्ञानी जन तो सदा सन्तोष और तृप्ति का सुख अनुभव करते हैं।

गाँव के लोग साधु महाराज की इन बातों को सुनकर उनकी हाँ में हाँ मिलाते थे। जी महाराज! बहुत अच्छा महाराज! एकदम ठीक है महाराज! यही तो त्याग है महाराज! आपने कर्म त्याग दिया, तभी तो आप इतने महान् हैं महाराज! ऐसे ही अनेक कथन सुनकर उन्हें अपनी बातों को कहने के लिए ऊर्जा मिलती थी। साधु महाराज की चटपटी-लच्छेदार बातों ने वृद्धों के साथ युवकों को भी उलझा लिया था। एक वृद्धा विधवा के तीन युवा पुत्र भी उनके उपदेश को सुनने आने लगे थे।

उस दिन भी वह सदा की भाँति उपस्थित जनों से कह रहे थे, कर्म त्याग में ही सच्चा सुख है। जो कछुए की तरह अपने हाथ-पाँवों को सभी कामों से खींचकर अपने में लीन हो जाता है, वही परम सुखी है। उसी को परम शान्ति का अनुभव होता है। उनकी यह उपदेश कथा उन युवकों की माँ के कानों में भी पड़ी। वह उधर से अपने खेत पर जा रही थी। इस अकर्मण्यता के उपदेश ने उसे चौंका दिया। उसके पाँव ठिठक गए। वह तुरन्त उस स्थान पर आ पहुँची, जहाँ यह उपदेश चल रहा था।

वृद्धा विधवा ने पहले तो अपने छोटे लड़के को बुलाया और कहा- जा घड़ा उठा और पानी भर ला। मंझले से कहा- जाकर खेत की निराई कर। और तीसरे से कहा- घर की छत को ठीक करना है, जाकर काम में लग जा। जब उसके तीनों लड़के चले गए तब उसने साधु से कहा, महाराज आपके उपदेशों को सुनकर हमारे कई पड़ोसी वैसा ही आचरण करने लगे हैं। परिणाम यह है कि उनमें से कई अपने आलसीपन के कारण बीमारी से ग्रस्त हैं और ऋण के भार से दबे पड़े हैं। उन्हें शान्ति और सुख मिला या नहीं यह तो वही जाने।

वृद्धा बोलते-बोलते थोड़ी देर रुकी; फिर तीक्ष्ण स्वर में बोली, मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि युवकों को आप अकर्मण्यता का विष न पिलाएँ। क्या आप को यह पता नहीं है कि जीवन के आरम्भ में हमेशा उद्यम की सीख दी जाती है। हे ज्ञानी पुरुष! अच्छा हो कि आप परिश्रमी गाँववासियों को अकर्मण्यता का पाठ पढ़ाने की बजाय उन्हें अक्षर ज्ञान सिखाएँ। उन्हें विवेकवान बनाएँ। क्योंकि जहाँ विवेक और ज्ञान होता है वहाँ शान्ति और सुख अपने आप ही खिंचे चले आते हैं।


रामकृष्ण परमहंस (Kahani)

रामकृष्ण परमहंस ने धर्मोपदेशकों की एक मंडली को उद्बोधित करते हुए कहा, “जिसके पास अपनी पूँजी नहीं, वह दूसरों को क्या बाँटेगा! तुम लोग धर्म के अनुशासन में अपने को बाँधो, ताकि कथनी और करनी के समन्वय से ऐसे प्रवचन कर सको, जिसे लोग सुनें ही नहीं, अपनाएं भी।”


आत्मोत्कर्ष हेतु तपश्चर्या के दो पक्ष

प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए दो कदम एक साथ बढ़ाने होते हैं। पिछला एक पैर जिस जगह पर था, उसे छोड़ना होता है और दूसरा जहाँ था, उसे छोड़कर आगे बढ़ना होता है। यही क्रम दूसरे को भी अपनाना पड़ता है। आगे बढ़ने के लिए पिछला छोड़ना पड़ता है। सामान्य यात्रा क्रम का भी यही नियम है। जीवन लक्ष्य की प्रगति यात्रा में भी यही करना होता है।

आत्मोन्नति की दिशा में अग्रसर होने वाले को भी दो कदम बढ़ाने पड़ते हैं। एक वह जिससे पूर्व संचित कुसंस्कारों का त्याग-परिमार्जन, जो उस समय की परिस्थितियों में भले ही उपयुक्त रहे हों, किन्तु आज मानवी कलेवर की गरिमा के दृष्टि से ओछे जान पड़ते हैं तथा अनावश्यक भी होते हैं। इनके अपनाए जाने पर हानि ही होती है। छोटे बालक के लिए सिलाई गई पोशाक, उसके बड़े होने पर बेकार हो जाती है। भले ही उस समय कितनी ही सुन्दर क्यों न दिखती हो। कोई उसी को पहने रहने का आग्रह करे तो न केवल उसे जग हँसाई का सामना करना पड़ेगा वरन् बुद्धिमान लोग उसे पागल की ही संज्ञा देंगे। इन सबके अतिरिक्त तालमेल बिठाने में भारी अड़चन पड़ेगी। जबरदस्ती करने पर मुसीबत में ही फँसेगा।

सामान्य जीव जन्तु नग्न रहकर निर्द्वन्द्व विचरते हैं। बिना किसी प्रतिबन्ध-अनुशासन के मल-मूत्र त्यागते हैं। किसी रोक-टोक की उन्हें कोई परवाह नहीं। पर यदि ऐसा ही मनुष्य करने लगे। तो न केवल लोग उसे अशोभनीय मानेंगे, अपितु दिमाग की खराबी जान किसी पागलखाने में भरती कराना ही उचित समझेंगे। वह पक्ष उन योनियों में रहा होगा, तब ये प्रवृत्तियाँ उसे सहज और स्वाभाविक लगती थी इसी का अभ्यास भी था। पर अब उसके लिए आग्रह करना, अबुद्धिमत्तापूर्ण ही कहा जाएगा। इसे छोड़े बगैर कोई चारा नहीं।

न केवल पशु और मनुष्य के बीच भारी अन्तर पड़ता है, अपितु मनुष्य की विकसित अविकसित स्थिति के बीच भी ऐसा ही अन्तर हो जाता है। बच्चे जैसा हुड़दंग, स्वेच्छाचार करते हैं वैसी अनुशासनहीनता बड़े होने पर किसी भी प्रकार नहीं चल सकती। बचपन और प्रौढ़ता न केवल आयु के हिसाब से आँकी जाती है, वरन् इसके लिए स्तर को भी एक कसौटी माना जाता है। अनगढ़, कुसंस्कारी, लालची, मोहग्रस्त, निष्ठुर, कृपण, स्वार्थी प्रकृति के व्यक्ति चाहे कितनी ही आयु के क्यों न हो, अविकसित ही माने जाएँगे। ऐसे लोग- ऐसी भूल करते हैं, ऐसी कुचेष्टाएं करते हैं, जिन्हें अनैतिक और अवाँछनीय ही माना जाएगा। ऐसी ही स्थिति में पाप कर्मों का उभार बाहुल्य रहता है। आत्मिक उत्कर्ष की दिशा में बढ़ने वालों का पिछला कदम उस स्थान से हटाना पड़ता है, जहाँ यह पहले जमा हुआ था। इसको परिशोधन या परिवर्तन की संज्ञा दी गई है।

महल बनाने के पूर्व उसकी नींव खोदनी पड़ती है। नींव की गहराई और मजबूती पर ही महल की महत्ता टिकाऊ और मजबूत मानी जाती है। खेत बोने के पहले उसकी जुताई करनी पड़ती है। किसी भी उपकरण को ढालने से पूर्व धातु को गलाना आवश्यक माना जाता है। पकवान, मिष्ठान बनाने के पूर्व उसकी बनी सामग्री को कठिन अग्नि परीक्षा से गुजरना होता है। रोगग्रस्त को स्वस्थ होने के पूर्व कड़ुवी, बेकायदा औषधि पीने, सुई चुभोए जाने, आप्रेशन की टेबल पर लेटने, काँट-छाँट सहने जैसी आफतें सहनी पड़ती हैं। तभी उसका स्वस्थ हो पाना सम्भव बन पड़ता है। इस सबको पहला कदम या पिछला पैर उठाना कहा जा सकता है। विल्वमंगल को काम लोलुप से सन्त बनने के लिए कठोर तप करना पड़ा था। इतिहास के पन्ने ऐसे अनेकानेक व्यक्तियों के जीवन को स्पष्ट करते हैं, जो बहुत समय तक सामान्य से गई बीती स्थिति में रहे। अथवा यों कहें कि निन्दनीय और हेय जीवन जीते रहे। जधाई-मधाई जैसे डाकू, गिरीशचन्द्र घोष जैसे शराबी व्यसनी आदि की स्थिति भी ऐसी ही थी। इसके उपरान्त जब परिवर्तन हुआ तो कुछ से कुछ हो गए। इस विकास को नरपशु से देवमानव बनना भी कहा जा सकता है। ये परिवर्तन एकाएक नहीं हुए। इनके बीच एक मध्य बेला भी रही है। इसमें उन्हें अपने अभ्यस्त कुसंस्कारों से जूझना पड़ा है। साथ ही परिष्कृत जीवन जीने के लिए जिस नियमबद्धता और कठोर अनुशासन की आवश्यकता पड़ती है उसे भी जुटाना पड़ा है।

इन दो मोर्चों पर एक साथ युद्ध करने को ही तपश्चर्या कहते हैं। महान् परिवर्तनों के हर मध्यान्तर का यही स्वरूप रहा है। इसमें असुविधा भी होती है, कष्ट भी होता है। और एक अच्छे-खासे अन्तरंग-बहिरंग विग्रह का सामना करना पड़ता है। जमीन से उत्खनन किए गए धातु खनिजों का परिशोधन परिष्कार कर उनका उपयोगी उपकरणों में परिवर्तन भट्टी की प्रचण्ड ऊष्मा सहन करने तथा अनेकानेक रासायनिक विधियों से गुजरने के बाद ही बन पड़ता है। गर्भस्थ भ्रूण इसके पहले बन्धन से मुक्त हो, स्वच्छंद विचरण करे, उसे प्रसव पीड़ा से गुजरना ही पड़ता है। इसके बिना कोई चारा नहीं।

तपश्चर्या का दूसरा पहलू है, प्रभात के लिए अभ्यास। प्रत्येक दुर्बल यदि सबल बनना चाहे तो उसे व्यायाम शाला में निरन्तर निर्धारित कसरत-व्यायाम करने पड़ते हैं। सर्वविदित है कि अखाड़े की उठा-पटक, गुरु का कठोर अनुशासन कितना कष्टकारी होता है। पर इसके बिना कोई चारा नहीं। आग का ताप सहन कर सामान्य सा पानी ऐसे सशक्त भाप में परिवर्तित होता है जो भारी-भरकम दैत्याकार रेलगाड़ी को मिट्टी के खिलौनों के सदृश कान पकड़े तूफानी वेग से घुमाए फिरता है। मिट्टी की कच्ची ईंटें, भट्ट में लगने के बाद लोहे जैसी पुख्ता और सुन्दर दिखाई देती हैं। यह वह दुस्साहस है जो प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए अपनाना पड़ता है। इसी रीति-नीति को अपनाकर सामान्य जन महामानव बनते रहे हैं। इसके लिए आत्मानुशासन, त्याग बलिदान का मार्ग अपनाना पड़ता है। और लोक कल्याण के लिए परमार्थ परायण बनकर अनेकानेक कष्ट कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस परीक्षा में गुजरे बिना किसी की प्रमाणिकता एवं विशिष्टता परखी भी तो नहीं जा सकती। आदर्शों के लिए कष्ट साध्य जीवन बिताने वाले तपस्वी ही सम्मान पाते हैं। महत्त्वपूर्ण कार्यों का दायित्व उन्हीं को सौंपा जाता है। कष्टों से बचने, मात्र बातों के छप्पर तानकर वरिष्ठता, श्रेष्ठता झटकने की इच्छा करने वाले प्रायः निराश या हताश ही देखे जाते हैं। परखे बिना सिक्के को भी कोई स्वीकार नहीं करता। खोटा दस नए पैसे का सिक्का देने वाले के सिर पर मार दिया जाता है। आदर्शों की बकवास करने वाले, दुनिया भर का भाषण झाड़ने वालों का कोई महत्त्व नहीं है। उनके प्रति जिसकी निष्ठ है, उसकी जाँच पड़ताल का एक ही आधार है कि उच्चस्तरीय उद्देश्य के निमित्त कौन कितनी कठिनाई सहन करने के लिए स्वेच्छा पूर्वक तैयार हुआ है। तप साधना का सिद्धान्त यही है। उसमें प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए आदर्शवादी त्याग बलिदान की माँग पूरी करनी पड़ती है। जीवनचर्या को सिद्धान्तों आदर्शों के सहारे अधिकाधिक पवित्र, प्रखर, परिष्कृत करने का न केवल संकल्प करना पड़ता है, वरन् उसे निष्ठापूर्वक निभाना भी पड़ता है।

सद्गुणों का सम्वर्धन तभी बन पड़ता है, जब दुर्गुणों का उन्मूलन हो। बबूल जैसे काँटेदार वृक्षों के जंगल के बीच आम जैसे फलदार पेड़ तभी उगाए जा सकते हैं जब बबूल का जंगल काटा जाय। आत्मोत्कर्ष के लिए तपस्या के द्विविध पहलू अनिवार्य ही नहीं आवश्यक भी हैं। गीताकार ने भी मन को सुगढ़, उर्ध्वगामी बनाने का एक ही उपाय सुझाया है- अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च रहस्येन अर्थात् निरन्तर अभ्यास और वैराग्य से ही मन उर्ध्वगामी बनता है। इसी प्रकार योगदर्शन के सूत्रकार महर्षि पतंजलि ने कहा है। अभ्यास वैराग्यभ्याँ तान्निरोधः। वैराग्य का तात्पर्य है उखड़ना और अभ्यास का तात्पर्य है रोपना। यही वो दो कदम हैं जिन्हें उठाने से हमारा जीवन सुरम्य उपवन की तरह ऐसा सुगंधित बन सकता है, जिसकी महक से अन्य भी शाँति शीतलता प्राप्त कर सकें।


दोष का भागीदार (kahani)

पत्ता पीला पड़ा और झड़कर नीचे गिर पड़ा। देखने वालों ने उसे पत्ते का दोष और दुर्भाग्य बताया, पर जानने वालों ने जाना कि इस पते को पूरे वृक्ष का परोक्ष समर्थन प्राप्त था। यदि वृक्ष के रसवाही तंतु समर्थ रहे होते तो पत्ते के जोड़ ढीले न पड़ते और वह असमय इस प्रकार अपने परिवार से विमुख होकर धूल न चाट रहा होता। पूरे पेड़ में घुसी विकृति को दोष कौन दे, पत्ते को ही कोस देना पर्याप्त मान लिया गया, यही जग की रीति है। उत्थान पतन के लिए सारा तंत्र श्रेय अथवा दोष का भागीदार होता है।


आवश्यकता है प्रेम के परिष्कार एवं सुख के आध्यात्मीकरण की

हर व्यक्ति सुख की तलाश में है। शायद ही कोई ऐसा हो जो दुःख चाहता है। किन्तु फिर भी कोई विरला ही होता है, जो अपने सुख की चिर-पिपासा को तृप्त कर पाता हो। बाकियों के लिए तो अनश्वर सुख की चाह मात्र एक स्वप्न बन कर रह जाती है और मरुस्थल में पानी की तलाश में मारे-मारे फिरते मृग की तरह अन्तहीन भटकाव ही इनकी नियति बन जाती है। जबकि मानव जीवन के मर्मज्ञ ऋषियों के अनुसार यह स्थिति सुरदुर्लभ मानव जीवन की चरम नियति नहीं है। यह तो उसकी आत्म-पूर्णता की स्थिति से उपलब्ध होने वाली आनन्द, शाँति एवं चरम सुख की अवस्था है। जो न केवल उसका जीवन का चरम ध्येय है, बल्कि ‘अमृत पुत्र’ होने के नाते उसका जन्मसिद्ध अधिकार भी है। यदि मनुष्य अपने इस यथार्थ स्वरूप, लक्ष्य एवं आदर्श के प्रति जागरुक हो उठे तो उसके वर्तमान में बहके भटके कदम सहज ही उस मार्ग पर बढ़ चलें, जो कि उसे क्रमशः तृप्ति, तुष्टि एवं शाँति को देने वाले सच्चे सुख की मंजिल तक पहुँचा दें।

नीतिशास्त्र के अनुसार भी मनुष्य मूलरूप से सुख की ही खोज कर रहा है। इस सुख का अर्थ एवं स्वरूप क्या है और इसको उपलब्ध करने के माध्यम क्या हो सकते हैं, इस संदर्भ में नीति विशारदों के विविध मत हैं। कुछ सम्प्रदायों के अनुसार, हर व्यक्ति को अपने ढंग से खुशी की खोज करनी चाहिए। यह विशुद्धतः अहं केन्द्रित दृष्टिकोण है। अपने सबसे उथले रूप में यह ऐन्द्रिक सुखों पर केन्द्रित रहता है। इसका आदर्श होता है- खाओ, पीओ और मौज उड़ाओ। अपने कुछ अधिक परिष्कृत रूप में यह अहं केन्द्रित सुख, मन की खुशियों पर बल देता है। ज्ञान, कला और विज्ञान आदि की उपलब्धियाँ इसी खोज की परिणति हैं। अपने उच्चतम रूप में अहंवादी प्रसन्नता, व्यक्तित्व के नैतिक और आध्यात्मिक रूपांतरण का रूप लेती है। किन्तु दृष्टिकोण अहंवादी ही रहता है और व्यक्ति का अपना सुख ही लक्ष्य रहता है।

इसके विपरीत सर्वमुक्तिवाद के अनुसार, लक्ष्य मात्र व्यक्ति की प्रसन्नता भर नहीं हो सकता, समाज, समुदाय का हित भी साधित होना चाहिए। विशुद्ध अहंवादी दृष्टि से खुशी का अन्वेषक दूसरे व्यक्ति में वहीं तक मतलब रखता है, जहाँ तक कि वह किसी रूप में अपना उद्देश्य पूर्ण करता हो। जबकि सर्वमुक्तिवाद अधिकाँश लोगों के अधिकाँश सुख का प्रतिपादन करता है। स्वार्थहीन आत्मप्रसादवाद अपनी खुशी की कीमत पर भी दूसरे के सुख में विश्वास करता है। इसके अनुसार आत्म-त्याग उच्चतर स्तर पर आत्म-पूर्णता को सुनिश्चित करता है।

आत्म-त्याग के कृत्य द्वारा व्यक्ति आँतरिक प्रसन्नता को प्राप्त होता है। जब मन शुद्ध हो जाता है तो यह मन की आँतरिक शाँति और प्रकाश को प्रतिबिम्बित करता है। आनन्दमय कोश से उद्भूत यह सुख भी अहं केन्द्रित होता है। क्योंकि यहाँ व्यैक्तिक चेतना दूसरे से अलग अपना अस्तित्त्व अनुभव करती है। जबकि प्रसन्नता का सर्वोच्च स्वरूप, पूर्ण इच्छाहीनता एवं आध्यात्मिक अनुभव की स्थिति में निहित है।

सुख के त्रिविध भेदों का वर्णन करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण इनके क्रमिक सोपानों का वर्णन करते हैं। तामसिक सुख सबसे निम्न श्रेणी का होता है। यह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है। और भोगकाल तथा परिणाम; दोनों में आत्मा को मोहित करने वाला होता है। राजस सुख इससे उच्चतर श्रेणी का होता है। यह विषय और इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है और भोगकाल में अमृत तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम काल में विष के तुल्य होता है। सात्विक सुख उत्तम प्रकार का होता है। इसमें साधक भजन, ध्यान और सेवा आदि के अभ्यास में रमण करता है और दुःखों के अन्त को प्राप्त होता है। यह सुख प्रारम्भ में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है, परन्तु परिणाम में अमृत तुल्य होता है। (गीता- 18/36-39)

अपने उच्चतम रूप में सुख-शाँति बाह्य वस्तुओं से उत्पन्न नहीं होती। यह आत्म-ज्ञान से प्रस्फुटित होती है। आध्यात्मिक अनुभूति को उपलब्ध व्यक्ति इसे परमात्मा से संवाद द्वारा प्राप्त करता है। गीताकार के शब्दों में इसे पाकर व्यक्ति को और कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती और इसमें स्थित व्यक्ति महानतम दुःख से भी विचलित नहीं होता। (गीता- 6/22)। इस सुख शान्ति का स्रोत परमात्मा परमेश्वर स्वयं होते हैं जो कि सभी प्राणियों में निवास करते हैं। इसका साक्षात्कार जीवात्मा को प्रकाशित करता हुआ, सर्वोच्च आनन्द का भागीदार बनाता है।

वास्तव में सुख का स्वरूप हर जीवात्मा की विकास की अवस्था के अनुरूप निर्धारित होता है। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, पशुओं में और पशुतुल्य मनुष्यों में शारीरिक सुख ही सर्वोपरि होता है। शारीरिक धरातल से कुछ ऊपर उठे व्यक्तियों में सुख विचारों के इर्द-गिर्द केन्द्रित होता है। जबकि आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त एवं परमात्म ज्ञान को उपलब्ध ज्ञानी का सुख सर्वोच्च होता है।

तैत्तिरीय उपनिषद् में सुख के विविध स्तरों का बहुत ही सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक विवेचन हुआ है। इसके अनुसार एक युवक का सुख जो श्रेष्ठ शास्त्रों में पारंगत, आशा, संकल्प और शक्ति से भरा हुआ है तथा सारा संसार उसके चरणों में है; यह मानवीय सुख की एक ईकाई है। इससे सौ गुना अधिक सुख गन्धर्वों या अर्द्ध-दिव्य प्राणियों का होता है। इससे सैकड़ों गुणा सुख देवों या उच्चतर दिव्य प्राणियों का होता है। इससे भी सैकड़ों गुणा अधिक सुख देवों के गुरु बृहस्पति का होता है। इससे सौ गुणा अधिक सुख सृष्टि के रचयिता प्रजापति का होता है। परमात्मा ब्रह्म का सुख अनन्त गुना होता है। ब्रह्मज्ञानी इस आनन्द की अनुभूति करते हैं। (तैत्तिरीय उपनिषद्- 2/6)

साँसारिक और स्वर्गीय सभी तरह के सुखों की इच्छा को त्याग करने वाली पूर्णतः प्रकाशित आत्मा ही इस अनन्त आनन्द की भागीदार बनती है। अन्य तो इसका मात्र एक या कुछ अंश ही प्राप्त कर पाते हैं। इस तरह यथार्थ सुख का मर्म इच्छाओं के त्याग में निहित है। इच्छाओं के भोग से प्राप्त क्षणिक सुख में भी इसी सत्य का दर्शन कर सकते हैं। इच्छा की क्षणिक पूर्ति से हम कुछ समय तक इच्छारहित हो जाते हैं और उतनी देर आनन्द के एक अंश की अनुभूति करते हैं। इस तरह आनन्द की गुणवत्ता, मात्रा व अवधि हमारी इच्छाहीनता की गुणवत्ता, मात्रा व अवधि पर निर्भर करती है। रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में- ‘यदि कोई व्यक्ति इच्छाओं से पूरी तरह मुक्त हो सकता हो तो

वह परमहंसत्व की पूर्णतया प्रकाशित एवं स्वतन्त्र अवस्था को प्राप्त हो जाता है, जो कि अनन्त सुख व दिव्य शाँति की दशा है।’

इस तरह मनुष्य जिस सुख-शाँति की तलाश चिरकाल से कर रहा है, वह उसके अन्तर में विद्यमान है। अपनी ही हृदय गुहा में आनन्द का अमृत घट छिपा पड़ा है। नश्वर मानवीय प्रेम में इसी आनन्द की आँशिक अभिव्यक्ति होती है। निस्संदेह रूप से साँसारिक सुख एवं प्रेम उस अनन्त की एक बूँद भर है किन्तु है अपनी विकृत अवस्था में। आवश्यकता इस प्रेम के परिष्कार की है एवं इस सुख के आध्यात्मीकरण की है।

इस तथ्य से अनभिज्ञ आधुनिक मनोविज्ञान के कुछ सम्प्रदाय काम को तथा कुछ अन्य शक्ति की इच्छा को जीवन की मूल प्रेरक शक्ति मानने की भूल कर बैठते हैं। जबकि भारतीय मनोविज्ञान के अनुसार, सभी में आनन्द या उच्चतम सुख की चेतन एवं अवचेतन इच्छा होती है। अज्ञान के कारण, अपने मूलस्वरूप को भूली जीवात्मा, सानन्त अस्तित्त्व में अनन्त सुख व शाँति को खोजने की भूल करती है, किन्तु बुरी तरह विफल होती है। जबकि अनन्त सुख तो अनन्त सत्ता से ही उपलब्ध हो सकता है। यही कुछ उपनिषद् के ऋषियों की घोषणा रही है, कि ‘मात्र अनन्त ही आनन्द है। किसी भी सानन्त में स्थायी सुख नहीं हो सकता। मात्र अनन्त ही सच्चा सुख है। मात्र अनन्त ही परम आनन्द है और इसी की अनुभूति होनी चाहिए।’ (छान्दोग्य उपनिषद्-6/23/1)

इस सर्वोच्च सुख का स्रोत हम सबमें, प्रत्येक में विद्यमान है, किन्तु स्थिति कुछ लालटेन लिए उस किसान जैसी है जो अपने चुल्हे में आग जलाने के लिए पड़ोसी के घर में आग की खोज कर रहा है। इसी तरह वह अग्नि, जिसकी उसे आवश्यकता है, उसके अन्दर विद्यमान है, किन्तु वह उसे भूला हुआ है तथा बाहर कहीं और खोजता फिर रहा है। स्थिति उस कस्तूरी मृग की है, जो कस्तूरी की तलाश में वन-वन मारे फिर रहा है। जबकि उसकी खोज की वस्तु उसकी नाभि में पड़ी है। जिस अनन्त सुख-शाँति की खोज हम यत्नपूर्वक कर रहे हैं, वह हमारे ही हृदय में छिपी पड़ी है। किन्तु हमारी इच्छाएँ और वासनाएँ; काम, क्रोध, लोभ, मोह और ईर्ष्या-द्वेष आदि विकार इसका मार्ग अवरुद्ध किए हुए हैं।

इस स्थिति में व्यक्ति किस मार्ग का अनुसरण करे। व्यावहारिक सुझाव देते हुए भगवान् श्रीकृष्ण का निर्देश है- मन को शुद्ध करो, वासनाओं को शान्त करो, परमात्मा से अपना सम्बन्ध जोड़ो। इस प्रयास में क्रमशः अपने दिव्य स्वरूप का उद्घाटन होगा और सभी में उस दिव्यता की झलक झाँकी मिलने लगेगी। सभी में उस एक परमसत्ता की ज्योति के दर्शन से, उसके पूजन से, उसके ध्यान से , उसकी भक्ति से, उससे संवाद से और उसकी सेवा से, उस परमसुख, शाँति एवं आनन्द की चिर भटकन दूर होगी, जिसकी जीवात्मा खोज कर रही है।


सतत दान देता रहा (kahani)

भयंकर आँधी आने पर वे वृक्ष उखड़ जाते हैं, जो एकाकी होते हैं, भले ही वे कितने ही विशाल क्यों न हों। इसके विपरीत घने उगे हुए पेड़ एक दूसरे के साथ सटकर रहने के कारण उस दबाव को सहज ही सहन कर लेते हैं। अंधड़ उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं पाते।

यह उदाहरण देते हुए भगवान बुद्ध ने अपने प्रवचन में कहा, “परस्पर स्नेह की सघनता मनुष्यों को इसी तरह नष्ट होने से बचाती और विकास का अवसर प्रदान करती है। संघारामों में सघन पारिवारिक स्नेह का अभ्यास इसीलिए कराया जाता है।”

विवेकानंद विदेशी जा रहे थे। वे माता शारदामणि के पास आशीर्वाद लेने पहुँचे। माता जी ने कहा, पहले मेरा काम कर। बाद में आशीर्वाद दूँगी। सामने खुली तलवार पड़ी थी, इशारा करते हुए कहा, उसे उठाकर ला।

विवेकानंद ने माता के हाथ में मूँठ थमा दी और धार वाली नोंक अपने हाथ में रखी।

माता जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा, जो दूसरों की कठिनाई को समझता है और मुसीबत अपने हिस्से में लेता है, उसी पर भगवान का आशीर्वाद बरसता है। तुम्हें भगवान का अनुग्रह सदा मिलता रहेगा।

विवेकानंद जी कहते थे, महानता के ढेरों गुण मुझे परमहंस जी के पारिवारिक वातावरण में सीखने विकसित करने को मिले अन्यथा वे दुर्लभ ही रहते।

एंड्रयू कार्नेगी के पिता एक स्काँटिश जुलाहे थे। माता घर के काम से निपटकर एक धोबी और एक मोची की दुकान पर काम करने जाती थी। तब घर का खरच चलता। माता जब नौकरी पर काम करने जाती, तब उसका पिता उसे इस प्रकार विदा करता, मानो नई दुल्हन हो। दोनों में अगाध प्रेम था। एंड्रयू यह देखता तो उसके ऊपर गहरी छाप पड़ती। उसके पास एक ही कमीज थी। माता उसे रोज धोती और इस्तरी कर देती।

पढ़ने का अधिक सुयोग न बना, किंतु स्कूली संस्कार परिवार में रहते रहते ही आत्मीयता के पड़ गए। तनिक बड़ा होते ही उसने तारघर में हरकारे की नौकरी कर ली। साथ ही तार देने और ग्रहण करने की विधि भी सीखता रहा। परीक्षा में पास हुआ और तारबाबू बन गया। उसके बाद उसने एक जमीन कृषिफार्म हेतु खरीदी। उसमें कृषि के अतिरिक्त एक तेल का कुँआ निकल आया। दूसरे व्यवसायों से भी आमदनी बढ़ी। विवाह के कितने ही प्रस्ताव आए, पर उसने सभी यह कहकर अस्वीकार कर दिए कि अपनी माता के जीवित रहने तक मैं विवाह न कर उसकी सेवा करूंगा। विवाह में समय और मन दो ओर बंट जाएगा। माँ के मरने के बाद 52 वर्ष की आयु में उसने शादी की। शादी देरी से करने पर लोगों के उलाहना देने पर कार्नेगी कहता कि विवाह जिन उद्देश्यों के लिए किया जाता है, उन सभी की पूर्ति मैंने यथासंभव की है। मात्र सहजीवन और कामसेवन ही विवाह का अर्थ नहीं है।

विवाह के बाद भी एकाकी बच्चों के परिवार रूपी संगठनों के लिए एवं साधनहीनों को विद्याध्ययन हेतु वह सतत दान देता रहा। उसने 15 करोड़ डॉलर की राशि इन्हीं कार्यों में खरच की।


इनसान बस अपने को जान ले

बाबा फरीद यात्रा कर रहे थे। सवारी कोई थी नहीं, सो पैदल ही जाना हो रहा था। चलते-चलते दोपहर तप गयी। पलाश के वृक्षों पर फूल अंगारों की तरह चमकने लगे। उनके साथ एक व्यक्ति और था। उसकी जिज्ञासा ने ही उसे बाबा के साथ कर दिया था। बाबा के अनूठे व्यक्तित्व से प्रति पल-प्रति क्षण कुछ न कुछ अनूठा झरता था। इसकी छुअन से पास रहने वाले का अन्तःकरण अपने आप ही आध्यात्मिकता के स्पन्दनों से भर उठता था। बाबा फरीद की वाणी मुखर हो अथवा वे अपने नीरव मौन में डूबे हों, हमेशा ही उनके व्यक्तित्व से आध्यात्मिक फुहारें उठती रहती थीं।

अभी दोनों मौन चले जा रहे थे। रास्ता सुनसान था। बाँसों के घने झुरमुट की छाया बड़ी भली लग रही थी। वातावरण की नीरवता को बेधते हुए एक चिड़िया ने कोई मधुर गीत गाया। चिड़िया को गाते सुनकर बाबा के साथ चल रहे व्यक्ति को भी कुछ कहने की हिम्मत पड़ी। उसने बड़े धीमे स्वर में, थोड़ा सहमते, थोड़ा सकुचाते हुए पूछा, बाबा क्रोध को कैसे जीतें, काम को कैसे जीतें? बाबा के लिए ये सवाल नए नहीं थे। रोज ही लोग उनसे इस तरह की बातें पूछते रहते थे। इन पूछने वालों के मन में प्रायः एक कौतुक का भाव रहता था। पर इस व्यक्ति के चेहरे पर जिज्ञासा की स्पष्ट चमक थी। उसके अन्तःकरण की बेचैनी उसकी आँखों में साफ झलक रही थी।

उस व्यक्ति के अन्तःकरण की बेचैनी ने बाबा को द्रवित कर दिया। उन्होंने बड़े स्नेह से उस व्यक्ति का हाथ पकड़ा और बोले, तुम थक गए होगे। चलो बाँसों के झुरमुट की छाया में थोड़ा विश्राम कर लेते हैं। बाबा के वचनों से उस व्यक्ति के थके मन में किंचित विश्रान्ति मिली। दोनों छाया में बैठ गए। बैठने के बाद बाबा फरीद ने उससे कहा, बेटा! समस्या क्रोध और काम को जीतने की नहीं, उन्हें जानने की है। दरअसल न हम क्रोध को जानते हैं और न काम को जानते हैं। हमारा यह अज्ञान ही हमें बार-बार हराता है।

इन्हें जान लो तो फिर समझो की जीत पक्की है।जब हमारे अन्दर क्रोध प्रबल होता है, काम प्रबल होता है, तब हम नहीं होते हैं। हमें होश ही नहीं होता है। इस बेहोशी में जो कुछ होता है- वह तो एकदम मशीनी है। बिल्कुल यंत्र की भाँति हम किया करते हैं। बाद में जब होश आता है, तब केवल पछतावा बचता है। पर यह सब बेकार होता है। क्योंकि जो पछता रहा है, वह फिर से काम का तूफान, क्रोध की आँधी उठने पर दुबारा सो जाएगा।

बात तो तब बने जब वह फिर से सोये नहीं। होश-चैतन्यता बरकरार रहे। जागृति-सम्यक् स्मृति की भावदशा बनी रहे। ऐसा हो, तभी पता चलता है कि न तो क्रोध है और न काम है। याँत्रिकता टूट जाने पर जीतने-हारने का खेल ही खत्म हो जाता है। दुश्मन होते ही नहीं हैं।

बाबा की इन बातों को वह व्यक्ति धीरज से सुनता रहा और टुकुर-टुकुर बाबा के तेजस्वी मुख को देखता रहा। उसकी इस दृष्टि से बाबा फरीद को लगा, अभी बात ठीक तरह से उसे समझ में आयी नहीं।

बाबा मुस्कराए और बोले- बेटा, इसे तुम एक प्रतीक कथा के सहारे समझने की कोशिश करो। अँधेरे में पड़ी रस्सी साँप जैसी नजर आती है। इसे देखकर कुछ तो भागते हैं, कुछ उससे लड़ने की ठान लेते हैं लेकिन गलती दोनों ही करते हैं। अरे ठीक तरह से देखने पर पता चलता है कि वहाँ साँप तो है ही नहीं। बस जानने की बात है।

इसी तरह इन्सान को बस अपने को जानना ही होता है। अपने में जो भी है- उससे ठीक से परिचित भर होना है। बस फिर तो बिना लड़े ही जीत हासिल हो जाती है। स्व-चित्त के प्रति सम्यक् जागृति ही जीवन में विजय का मंत्र है।


लक्ष्य से भ्रष्ट (kahani)

राहगीर ने पत्थर मारा, आम के वृक्ष से कई पके आम गिरे। राहगीर ने उठाए और खाते हुआ वहाँ से चल दिया।

यह दृश्य देख रहे आसमान ने पूछा, “वृक्ष! मनुष्य प्रतिदिन आते हैं, तुम्हें पत्थर मारते हैं, फिर भी तुम इन्हें फल क्यों देते हो?”

वृक्ष हंसा और बोला, “भाई! मनुष्य अपने लक्ष्य से भ्रष्ट हो जाए तो क्या हमें भी वैसा पागलपन करना चाहिए”


प्रभु! जड़-चेतन में, रोम-रोम में शाँति दीजिए

संसार के कोलाहल एवं अशाँत वातावरण में एक चेष्टा यह दिखाई देती है कि प्रत्येक व्यक्ति शाँति पाने के लिए व्याकुल है, सारे प्रयत्न-पुरुषार्थ इसीलिए किए जा रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि शाँति शाश्वत है, अशाँति तो वाह्य हलचलों की प्रतिक्रिया मात्र है। शाँति का भाव मानव के अंतःकरण में बीजरूप में विद्यमान है। अनंत कोलाहल के मर्मस्थल से भी एक मंत्र ध्वनित हो रहा है, ‘शाँतिः-शाँतिः’। शाँति वह प्रेरक शक्ति है, जो शाँत स्वरूप में समस्त जड़-चेतन में विराजमान है। मनुष्य की अंतरात्मा में स्थित होकर वही सत्ता अपने अस्तित्व की प्रेरणा देती रहती है।

उस शांतिस्वरूप परमात्मा के दर्शन अपने ही अंतःकरण में किस प्रकार किए जाएँ, इसका एक ही उत्तर है-अनंत शाँति का अनुभव शाँत मनःस्थिति द्वारा ही किया जा सकता है। आँतरिक चंचलता का कोलाहल हमें अपनी अंतरात्मा से दूर रखता है। हमारी प्रवृत्तियाँ अनेक दिशाओं में दौड़ती हुई शक्ति को छिन्न-भिन्न किए दे रही हैं। वाह्य भाग-दौड़ के असंयमित कारणों से मन सदा अशाँत बना रहता हैं मन की व्यग्रता से सह एकाग्रता बन ही नहीं पाती कि वृत्तियों को अंतर्मुखी करके उस शांतिस्वरूप आत्मा के दर्शन कर सकें।

सामान्यतः लोग जीवन के ह्रास और शक्ति के अभाव को शाँति समझ लेते हैं, किंतु जीवनविहीन शाँति तो मृत्यु है। शक्तिहीन शाँति तो जड़ता की परिचायक है। गति एवं क्रिया से रहित निश्चेष्ट होना शाँति नहीं है। शाँति तो एक संतुलित मनःस्थिति है, जिसे प्राप्त कर मनुष्य साँसारिक कोलाहल एवं विपन्नताओं में भी निर्लिप्त बना रहता है। जीवन की संपूर्ण शक्ति के स्वरूप में जो विद्यमान है, वही शाँति है। जो सृष्टि के सौंदर्य को प्रकाशित एवं प्रमाणित करने के लिए सचेष्ट है वह शाँति है।

इसे एक सामान्य उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। विशालकाय रेल इंजन चलता है, उसके पहिये घूमते हैं, किंतु इंजन ही चालक नहीं है, वरन् चालक वह है, जो इंजन में बैठा उसे गति दे रहा हैं गतिशील संसार के मध्य अदृश्य रूप में विद्यमान चेतना शांतिस्वरूप है। रेल के डिब्बे में बैठे यात्री तीव्र गति से भयभीत नहीं होते। वे जानते हैं कि इंजन को चलाने एवं नियंत्रित करने वाला बुद्धिमान ड्राइवर बैठा है यह अभय की भावना तभी बनती है, जब यात्री इस बात से परिचित होते हैं कि रेल की भयंकर गति अनियंत्रित नहीं है।

विशाल कारखाने में यदि कोई अनभिज्ञ व्यक्ति पहुँचे तो यही समझेगा कि यहाँ कोई दानवीय काँड हो रहा है। चक्रों की तीव्र ध्वनि, मशीनों की गड़गड़ाहट उसके मन को विक्षुब्ध बना देगी, किंतु जब उसे पता चलता है कि उनको नियंत्रित-संचालित करने वाला कोई विशिष्ट मनुष्य मौजूद है तो वहाँ वह भयरहित होकर शाँति का अनुभव करेगा कारखाने के कोलाहल एवं गति में, परिणाम की सार्थकता में उसे शाँति की प्रतीति होगी।

जगत के प्रचंड शक्ति-वेग एक विभीषिका के रूप में मानव-मन को उद्वेलित कर रहे हैं। रेल की गड़गड़ाहट एवं कारखाने की भयंकर ध्वनि के समान सृष्टि की आवेगजन्य क्रिया-प्रतिक्रियाओं से मनुष्य विक्षुब्ध बना रहता है। इसका मुख्य कारण है-अंतर्दृष्टि का अभाव, मन की उद्विग्नता, जो उसे जगत के मध्य विद्यमान शाँत सत्ता के दिग्दर्शन से वंचित रखती है, फलस्वरूप जीवनपर्यंत मनुष्य साँसारिक अभावों, आघातों से भयभीत होकर विक्षुब्ध बना रहता है। अपने अज्ञान के कारण उस दिव्य सत्ता का अनुभव नहीं कर पाता, जो निर्लिप्त भाव से बैठी संसार को गति प्रदान कर रही है।

वह प्रकृति को चेतना से, प्राण और सौंदर्य से भरपूर बनाकर मंगलमय बना रही है, सृष्टि के, शक्ति के वेग को भी एक कल्याणकारी लक्ष्य की ओर लिए जा रही है, धात्री के समान अनादिकाल से जगत की रक्षा कर रही है, समस्त ग्रह-नक्षत्रों को, जड़ पदार्थों को परस्पर आबद्ध किए सुव्यवस्थित ढंग से संचालित कर रही है, चेतन प्राणियों का पालन-पोषण कर रही है, अनेक स्वरूपों में वह पालन शक्ति के रूप में जगत में विचरण कर रही है। जीवन उसका एक स्वरूप है तो मृत्यु दूसरा सुख-दुःख, हानि-लाभ उसके ही विभिन्न रूप हैं। जीवन व्यापार की समस्त गतिविधियों में कल्याणकारी भाव में शाँति रूप में विराजमान है। यदि ऐसा न होता ता आज संसार में जो सौंदर्य, आकर्षण दिखाई दे रहा है, वह आघातों द्वारा लुप्त हो जाता। मानव-मानव और अन्यान्य प्राणियों के बीच जो संबंध-बंधन आकर्षित कर रहा है, वह समाप्त हो जाता। वह शांतिस्वरूप कल्याणकारी परमात्मा हो जाता। वह शांतिस्वरूप कल्याणकारी परमात्मा ही समस्त संसार की रक्षा कर रहा है।

मन की चंचलता ही उस शांतिस्वरूप के, जो अंतरात्मा में बैठा अपना भाव प्रेषित करता रहता है, सान्निध्य-लाभ से वंचित रखती है। वाह्य संसार में मन शाँति की तलाश में भटकता रहता है। कभी उसे वस्तुओं के आकर्षण में ढूंढ़ता है तो कभी व्यक्तियों में आकर्षणों के ये बंधन उसे और भी आबद्ध करके अशाँत बनाते हैं वस्तुओं, व्यक्तियों से बद्ध होकर मनुष्य अपने आँतरिक स्रोत से दूर हटता चला जाता है। संपूर्ण जीवन मन की भाग-दौड़ चलती रहती तथा मनुष्य को व्यग्र बनाए रहती है। भाग-दौड़ का परिणाम यह होता है कि मनुष्य की शक्ति क्षीण हो जाती है। शक्ति क्षीण होने से अशाँति उसी अनुपात में बढ़ती जाती है। शाँति प्राप्त करने के अविवेकपूर्ण प्रयास के परिणाम के रूप में अशाँति सामने आती है। थकी इंद्रियाँ निश्चेष्ट जीवन की वाह्य स्थिरता को शाँति का स्वरूप मान बैठने की भूल करती है। शक्ति के ह्रास होने पर भी मन की चंचलता उसी प्रकार बनी रहती है, फलस्वरूप मनुष्य अपने जीवन के अंतिम दिनों में और भी अधिक बेचैन बना रहता है तथा अंतरात्मा के अमृतपान से सदा वंचित रहता है।

अंतरात्मा के शाँत स्वरूप के दर्शन शाँत मनःस्थिति द्वारा कर सकना संभव है। इसके लिए मन को नियोजित करना अति आवश्यक है। असंयमित मन सदा चलायमान रहता है। शास्त्रकार इसी कारण इसी मन को निगृहीत करने का निर्देश देते हुए कहते हैं-मन एव मनुष्याणाँ कारणं बन्धमोक्षयोः।

मन बंधन और मुक्ति का कारण है। वाह्य आकर्षणों में आबद्ध मन के कारण ही अशाँति बनी रहती है। अशाँति दूर करने एवं शाँति प्राप्त करने की इच्छा तो हर एक को होती है, किंतु हमारा प्रयास बहिर्मुखी होता है जड़ वस्तुओं कि क्षणिक आकर्षणों में शाँति पा सकता सर्वथा असंभव हैं आंतरिक भाव-प्रेरणा को समझा जा सके तथा मन की घुड़दौड़ को अंतर्मुखी बनाया जा सके तो स्पष्ट होगा कि न केवल अपनी अंतरात्मा में, वरन् सृष्टि में शांतिस्वरूप परमात्मा विद्यमान है। वाह्य कोलाहल एवं सुख-दुःख तो परिवर्तनशील तरंगें हैं। उन तरंगों का प्रेरणास्रोत तो इन हलचलों के प्रभाव से रहित कल्याणकारी परमात्मा है, जो निर्लिप्त भाव से संपूर्ण चराचर में शाँत रूप में स्थित है। मानवीय काया में अंतरात्मा के रूप में वही विराजमान होकर अपने दिव्य गुणों का आभास प्रेरणाओं के रूप में कराता रहता है। उन प्रेरणाओं को समझा जा सके तथा अपनी चेष्टाओं को अंतर्मुखी बनाया जा सके तो जिसकी प्राप्ति के लिए मन सदा व्यग्र बना रहता है, उस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है।

साँसारिक सुख-दुःख एवं अभाव उसे ऐसी स्थिति में पहुँचने पर प्रभावित नहीं कर पाते। सर्वत्र आनंद की, शाँति की निर्झरिणी बहती दिखाई देती है। जगत के कोलाहलों में भी उसे कल्याणकारी भाव के दर्शन होते हैं। मन का भटकाव बंद हो जाता है। अनंत कोलाहल में भी उसे एक ही ध्वनि सुनाई पड़ती है- शाँतिः, शाँतिः,शाँतिः।

यह शाँति सभी के लिए सर्वत्र उपलब्ध है और संभव भी, पर हममें से एकाधिक लोग शायद ही उसे प्राप्त कर पाते हैं। कारण स्पष्ट है-मृगतृष्णाजन्य भटकाव। इससे निवृत्ति पाते ही हमें अक्षय शाँति और दिव्य अनुभूति का एहसास पग-पग पर ऐसे मिलने लगता है, जैसे आए दिन सुख-दुख का अनुभव। इस स्थिति की प्रतीति करने के लिए हमें अंतःकरण के चहुँओर व्याप्त वाह्य जगत के उस आवरण को भेदना पड़ेगा, जो इसकी अनुभूति में बाधक बना हुआ है। ऐसा होते ही हम उस दशा का स्पष्ट साक्षात्कार कर लेंगे,जिसकी स्थिति के बारे में वर्णन करते हुए मंत्र में कहा गया है, ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शाँतिः पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। ....... अर्थात् कण-कण, में, समस्त जड़-चेतन में, रोम-रोम में हम उस अनंत शांति का अनुभव कर लेंगे, जो विश्वात्मा के प्रकाश के रूप में उनमें विद्यमान है। हमारी पदार्थपरक दृष्टि के तिरोहित होते ही और दिव्य भावविकास के साथ ही ऐसा संभव हो सकेगा और हमें आभास होगा, जैसे हम शाँति के अथाह समुद्र में तैर रहे हैं, हिलोरें मार रहे हैं और हमारे चारों ओर एक अजस्र शाँति, शाश्वत शाँति, दिव्य शाँति विद्यमान है।


Quotation

जो व्यक्ति उदारतापूर्वक सबके हित की बात सोचता है, वही मनुष्य लोकसेवी के श्रेय का अधिकारी हो सकता है।


गलत प्रव्रज्या में शरण दुःखदाय है

बसन्त की सुरम्यता प्रकृति में चहुँ ओर छायी थी। रंग-बिरंगे पुष्पों व नव पल्लवों ने मिलकर धरती को देवों के लिए भी आकर्षक बना दिया था। आम्रमञ्जरी पर विहार करते भ्रमर नित नए गीतों की सृष्टि रचाते थे। कोयल का कल कूँजन तो जैसे देव लोकवासियों को धरा आगमन के लिए मुखर निमंत्रण देता था। इस प्राकृतिक आकर्षण में एक अलौकिक तत्त्व भी समाया हुआ था। भगवान् तथागत के पावन संस्पर्श से वैशाली का यह आम्रवन ही नहीं समूचा प्रकृति परिमण्डल आध्यात्मिक आभा से जगमगा उठा था।

भगवान् इन दिनों अपने भिक्षु संघ के साथ वैशाली आये हुए थे। वह वैशाली नगर से थोड़ी दूर पर एक आम्रवन में ठहरे हुए थे। वज्जी संघ की राजधानी उन दिनों अपनी समृद्धि, वैभव एवं शोभा के लिए सम्पूर्ण भारत वर्ष में विख्यात थी। भगवान् के चरण रज की छुअन ने इसकी समृद्धि को पावनता के अनुदान दे डाले थे। जिनके भी अन्तःकरण में थोड़ी सी भी आध्यात्मिकता का अंकुर था, उन्हें भगवान् का आगमन प्राण संजीवनी की भाँति लगा। तथागत की भगवत्ता की निर्मल लहरें, जन-जन को पावन बनाने में पूर्ण समर्थ थीं।

प्रभु का सान्निध्य सभी के लिए सब भाँति अलौकिक था। मानव ही नहीं पशु-पक्षी, यहाँ तक जड़ प्रकृति भी अपने में एक अलौकिक परिवर्तन की अनुभूति कर रही थी। जिन्होंने अनुभव किया, उन्होंने कहा कि भगवान् का सुपास पाकर, सूखे वृक्ष पुनः हरे हो गए थे। जो जीवन वीणाएँ सूनी पड़ी थी, उनमें संगीत जाग पड़ा था। जो झरने बन्द हो गए थे, या मन्द पड़ गए थे, वे पुनः वेगपूर्वक बहने लगे। मरुस्थल अपने आप ही मरुद्यान में बदल गए। हालाँकि यह सब देखा उन्होंने ही, जिनके पास अंतर्दृष्टि थी, जो प्रकृति के अन्तराल में सरस धार की भाँति बह रहे परिवर्तनों को देख सकते थे।

भगवान् का दिव्य स्वरूप मात्र चर्म चक्षुओं से समझ में आने वाला न था। बाहर के कानों के सहारे यह परम दिव्य संगीत नहीं सुना जा सकता था। प्रभु के सान्निध्य में प्रकृति जो परमोत्सव मना रही थी, वह तो परमात्म दशा का परम योग था। मात्र समाधि में ही इन स्वरों को सुना जा सकता था। समाधि की भावदशा में ही इस महोत्सव को देखा जा सकता था।

जो इसे देख सकते थे, वे आह्लादित थे। जो सुन सकते थे वे मस्त हो रहे थे। जो आह्लादित थे, जो आनन्द उठा रहे थे, उनके लिए भगवान् के सान्निध्य का स्वर्ग रोज-रोज अपने नए द्वार खोल रहा था। पर सभी के भाग्य में यह महासुख नहीं था। कुछ ऐसे भी थे जिन्हें न कुछ दिखाई पड़ता था, न सुनायी पड़ता था। वे तृषित आए थे और प्रभु चेतना के क्षीर सागर के सामीप्य में भी तृषित ही थे। वे आकर भी नहीं आए थे। उन्हें मिलकर भी नहीं मिला था।

भगवान् आते हैं- हर युग में आते हैं। उनका आगमन अपने भक्तों की भाव चेतना के उन्नयन के लिए होता है। वह अपने प्रेम के सरस सुधा की उन्मुक्त वर्षा करते हैं, पर इसमें भीगते वही हैं, जिन्होंने अपने अस्तित्त्व को प्रभु में विसर्जित कर दिया है। जो अभी भी अपने अहं की चादर ओढ़े हैं, जिन्हें अभी अपनी वासना की कीचड़ धोने में संकोच हो रहा है, वे कोरे के कोरे रह जाते हैं। भिक्षु वज्जीपुत्त इन्हीं अभागों में से एक था। भगवान् के महाबोधि सागर के किनारे पहुँच कर भी वह उनकी भावचेतना से अछूता था। उसकी आँखें देख रही थी, कान सुन रहे थे, पर वह नहीं जो अमृतमय था।

उसके कानों में आम्रवन से दूर वैशाली नगर में चल रहे राग-रंग के स्वर गूँज रहे थे। उसकी आँखें वैशाली की नर्तकियों के चर्म सौंदर्य को देखने के लिए व्याकुल थी। वैशाली में इन दिनों मदनोत्सव की धूम थी। रास रंग की छटा वहाँ बिखरी थी। वासना के अनेक रंग-अनगिनत रूप वैशाली के आँगन में अठखेलियाँ कर रहे थे। युवक-युवतियों का उन्मुक्त विहार विलास क्रीड़ाओं को नित नए आयाम दे रहा था।

भिक्षु वज्जीपुत्त की आँखें इसे देखने के लिए तरस रही थी। उसके कानों को इस विलास संगीत को सुनने की व्याकुलता थी। उसका अन्तःकरण विह्वल था इस रास-रंग में उन्मुक्त होकर भागीदार बनने के लिए।उस रात्रि में तो उसकी यह व्याकुलता-विह्वलता चरम पर जा पहुँची। यह मदनोत्सव की विलास रात्रि थी। फाल्गुन मास का चन्द्रमा जन-मन में अनेकों विचार तरंगें सम्प्रेषित कर रहा था।

भगवान् तथागत के सान्निध्य में होते हुए भी वज्जीपुत्त विकल था। नगर से आती संगीत और नृत्य की स्वर लहरियाँ उसे बेचैन किए थी। वह अभागा भिक्षु भगवान् के पावन संगीत को अभी तक सुन नहीं सका था। उसकी आँखें भगवान् के अन्तस्तल से उठते हुए प्रकाश पुञ्ज को अब तक नहीं देख सकी थी। लेकिन वैशाली नगर में जल रहे दीयों की टिमटिमाहट उसे साफ नजर आ रही थी। राजधानी में हो रहे राग-रंग और उससे आती स्वर लहरियों को वह साफ-सुन रहा था। गाजे-बाजों की इन आवाजों ने उसे उदास कर दिया। वह दुःखी होकर सोचने लगा कि मैं बेकार ही भिक्षु बनकर जीवन गँवा रहा हूँ। सुख तो संसार के विलास में है। देखो तो सही लोग कैसे मजे में हैं। समूची वैशाली आज उत्सव मना रही है? मैं यहाँ पड़े-पड़े केवल दुःखी हो रहा हूँ। संन्यास लेकर मैंने केवल दुःखों को निमंत्रण दे दिया।

भिक्षु की विकृत भावदशा में भला मार कहाँ चूकने वाला था। वह वासना भरी कल्पनाओं के सहारे वज्जीपुत्त के मन में घुस गया। मार ने उसे भरपूर उकसाया, बहुतेरे सब्जबाग दिखाए। अनेकों मोहक सपनों का महल खड़ा किया। मार के बहकावे में आकर वह सोचने लगा, बहुत हो चुका, मैं कल सुबह ही भाग जाऊँगा। संसार ही सत्य है, मैं बेकार ही यहाँ पड़ा हुआ तड़फ रहा हूँ। यहाँ रखा भी क्या है।

लेकिन सुबह वह चुपके से उठ कर भाग पाता, इससे पहले ही भगवान् ने उसे बुलवा लिया। भगवान् के संदेश को पाकर वह चौंक गया। यह पहला मौका था, जब तथागत ने उसे बुलाया था। वह थोड़ा डरा, मन में शंका उठी। मन में यह भी आया कि मैंने तो अपने मन की बात किसी को बतायी नहीं है। शायद उन्होंने ऐसे ही बुलाया होगा।

पर भगवान् ने जब उससे मन की सारी कथा कह सुनायी, तो उसे भरोसा ही न आया। एक-एक बात जो मार ने उसे सुझायी थी, एक-एक स्वप्न जो उसने रात भर देखे थे और उसका भागने का निर्णय भगवान् ने सब कुछ कह सुनाया। भगवान् की करुणा ने उसके मन के मैल को पल भर में धो दिया। मन की निर्मलता को पाते ही उसे अपनी सोच पर भारी पछतावा हुआ। भगवान् के पास वैसे तो वह वर्षों से था, पर आज उसे सच्चा सत्संग मिला। उस दिन उसे भगवान् बुद्ध की वीणा के स्वर सुनायी दिए।

भगवान् ने उससे ये धम्मगाथाएँ कही-

दुप्पबज्जं दुरभिरमं दुरवासा धरः दुखा। दुक्खो समान संवासो दुक्खानुपतितंद्धयू। तस्मा न च अद्धग् सिया न च दुक्खानुपतितो सिया॥ सद्धो सीलेन समन्वो यसोभोग समपितो। यं यं पदे सं भजति तत्य तत्येव पूजितो॥

गलत प्रव्रज्या में रमण करना दुष्कर है। न रहने योग्य घर में रहना दुःखद है। असमान या प्रतिकूल लोगों के साथ रहना दुखद है। इसलिए संसार के मार्ग का पथिक न बने और न दुःखी हो।

श्रद्धा और शील से सम्पन्न तथा यश और भोग से मुक्त पुरुष जहाँ कहीं जाता है, सर्वत्र पूजित होता है।

भगवान् की इन धम्म गाथाओं को आत्मसात कर भिक्षु वज्जीपुत्त के लिए उस दिन संसार झूठ हुआ, परिव्राजक जीवन सत्य हुआ।


कागावा देश का गाँधी (kahani)

जापान के लिए लड़के कागावा ने पढ़ाई के बाद पीड़ितों की सेवा करना लक्ष्य बनाया और वे उसी में लग गए। पिछड़े, बुरी आदतों से ग्रसित बीमार लोगों के मुहल्लों में वे जाते और दिनभर उन्हीं की सेवा में लगे रहते। पेट भरने के लिए उनने दो घंटे का काम तलाश कर लिया। इस सेवा कार्य की चर्चा दूर दूर तक होने लगी। एक विदुषी लड़की को उनका यह कार्य बहुत पसंद आया। वह भी उनके कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करने का तैयार हो गई। विवाह एक शर्त पर हुआ कि वे लोग वासनापूर्ति नहीं, समाज सेवा हेतु मैत्री की खातिर बंधेंगे। उस लड़की ने भी अपना पेट भरने के लिए दो घंटे रोज का काम तलाश लिया। दोनों के मिलकर काम करने से दूना काम होने लगा।

उदार लोग उनके काम में सहायता देने लगे। फलतः कार्यक्षेत्र बहुत बढ़ गया। सरकार ने पूरे जापान में पिछड़े लोगों को सुधारने का काम उन लोगों को सौंपा। कागावा के प्रति जापान में इतनी श्रद्धा बढ़ी कि उन्हें उस देश का गाँधी कहा जाने लगा।


भारत का इतिहास, महाकाल का प्रसाद है - गंगा

भारतीय संस्कृति में गंगा को ममतामयी माँ का दिव्य स्वरूप माना जाता है। यह जल निकासी का माध्यम मात्र नहीं है वरन् संस्कृति का मुख्य आधार रही है। गंगा भारत भूमि की सर्वप्रधान रक्त धमनी है। यह भारत भूमि के कण-कण तथा जन-जन में दिव्यता एवं पवित्रता का अमृत घोलती है। पुण्य सलिला गंगा यहाँ अगाध श्रद्धा और अनन्त अनुराग का माँगलिक एवं आध्यात्मिक प्रतीक है। उसके धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व पर कोटि-कोटि धर्मप्रिय जन आस्था-विश्वास करते हैं। उसके संपर्क-सान्निध्य में शाँति प्राप्त करते हैं और प्रेरणा ग्रहण करते हैं।

गंगा की आध्यात्मिक महत्ता और विशेषता भारतीय धर्मशास्त्रों एवं पुराणों के पन्नों-पन्नों में बिखरी हुई मिलती है। महाभारत में गंगा को पापनाशिनी तथा कलियुग का सबसे महनीय जलतीर्थ माना गया है।

यद्यकार्यशतम् कृत्वाकृतम् गंगाभिषेचनम्। सर्व ततृ तस्य गंगाभो दहत्यग्निरिवेन्धनम्॥

सर्व कृतयुगे पुण्यम् जेतायाँ पुष्करं स्मृतम्। द्वापरेऽपि कुरुक्षेत्रं गंगा कलियुगे स्मृता॥

अर्थात् जैसे अग्नि इंधन को जला देती है। उसी प्रकार सैकड़ों निषिद्ध कर्म करके भी यदि गंगास्नान किया जाय तो उसका जल उन सब पापों को भस्म कर देता है। सतयुग में सभी तीर्थ पुण्यदायक-फलदायक होते हैं। त्रेता में पुष्कर का महत्त्व है। द्वापर में कुरुक्षेत्र विशेष पुण्यदायक है और कलियुग में गंगा की विशेष महिमा है।

देवी भागवत् में भी गंगा को पापों को धोने वाली त्राणकर्त्ती के रूप में उल्लेख किया गया है-

प्रधानाँशस्वरूपा सा गंगा भुवनपावनौ। विष्णुविग्रहहंसभूता द्रवरूपा सनातनी॥ पापिपापेध्यदाहाय ज्वलग्नि स्वरूपिणी। सुखस्पर्शी स्नानपानै निर्वाण पद दायिनी॥ गोलोकस्थान प्रस्थान मुखासोपान रूपिणी।

अर्थात्- विष्णु भगवान् के चरणों से उत्पन्न हुई परम पावनी गंगा तुम्हारा ही द्रव स्वरूप है। वह पतित पावनी गंगा पापियों के पाप नाश करने में अग्नि ज्वाला के सदृश तथा निर्वाण व मोक्ष पद प्रदान करने में समर्थ वह तुम्हारे ही कारण है।

अग्नि पुराण में माता गंगा को सर्वोत्कृष्ट जलतीर्थ घोषित किया गया है-

नास्तिम विष्णु समं ध्येयं तपो नानशनात्परम्। नास्त्यारोग्यसमं धन्यं नास्ति गंगासम सरित्॥

अर्थात्- भगवान् के समान कोई आश्रय नहीं। उपवास के समान तप नहीं। आरोग्य के समान सुख नहीं और गंगा के समान कोई जलतीर्थ नहीं है।

कूर्मपुराण में गंगा की महत्ता को यह कहकर प्रतिपादित किया गया है कि उसकी उपस्थिति मात्र से तपोवन का आभास होता है-

यत्र गंगा महाभागा स देशस्तत्तपोवनम्। सिद्धक्षेत्रन्तु तञ्जेयं गंगातीरं समश्रितम्॥

जहाँ पर महाभागा गंगा है वह देश तपोवन के समान होता है। उसको सिद्ध क्षेत्र जानना चाहिए।

पद्मपुराण के सृष्टिखण्ड के अध्याय 60, 39 और 43 में पुण्योतया गंगा के सम्बन्ध में अनेकों भाव भरे स्तुतिपरक श्लोक मिलते हैं।

गंगोति स्मरणादेव क्षयं याति च पातकम्। कीर्तन नादतिपापानि दर्शनाद्गुरु कल्पषम्॥

गंगाजी के नाम के स्मरण मात्र से पातक, कीर्तन से अतिपातक और दर्शन से महापातक भी नष्ट हो जाते हैं।

पुनाति कीर्तिता पापं द्रष्ट भद्रं प्रयच्छति। अवगाढ़ा च पीला च पुनात्यासप्तमं कुलम्॥

गंगाजी का नाम लेने मात्र से पाप धुल जाते हैं, और दर्शन करने पर सात पीढ़ियों तक को वह पवित्र कर देती है।

अग्निना दह्यते तूलं तृणं शुष्कं क्षणाद् यथा। तथा गंगाजलस्पर्शात् पुँसा पापं दहेत क्षणात्।

जैसे अग्नि का संसर्ग होने से रुई और सूखे तिनके क्षणभर में भस्म हो जाते हैं, व उसी प्रकार गंगा जी अपने जल का स्पर्श होने पर मनुष्यों के सारे पाप एक ही क्षण में दग्ध कर देती है।

तीर्थानाँ तु परं तीर्थ नदीनामुत्तता नदी। मोक्षदा सर्वमृतानाँ महापातकिनामपि॥

गंगा तीर्थों में श्रेष्ठ तीर्थ,नदियों में उत्तम नदी तथा सम्पूर्ण महापातकियों को भी मोक्ष देने वाली है।

न गंगा सदृशे तीर्थ न देवः केशवात्परः। ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः॥

ब्रह्म जी का कथन है कि गंगा के समान तीर्थ, श्री विष्णु से बढ़कर देवता तथा ब्राह्मणों से बढ़कर कोई पूज्य नहीं है।

आयुर्वेद में भी गंगा की महत्ता एवं गरिमा का गान गाया गया है। गंगाजल शारीरिक और मानसिक रोगों का निवारण करने वाला और आरोग्य व मनोबल में अभिवृद्धि करता है।

गंगावारि सुधा समं बहु गुण पुण्यं सदापुष्करं, सर्वव्याधि विनाशनं बलकरं वर्ण्य पवित्र परम्॥

हृद्यंदीपत पाचनं सुरुचिर स्मिषटं सु पश्यं लघु स्वान्तध्वान्त निवारि बुद्धि जननं दोष त्रघघ्नं वरम्॥

गंगा का जल अमृत के तुल्य बहुगुणयुक्त पवित्र, उत्तम, आयुवर्धक, सर्वरोगनाशक, बलवीर्यवर्धक, परम पवित्र, हृदय को हितकर, दीपन पाचन, रुचिकारक, मीठा, उत्तम पथ्य और लघु होम है तथा भीतरी दोषों का नाशक बुद्धिजनक, तीनों दोषों को नाश करने वाले सभी जलों में श्रेष्ठ है। मान्यता है कि औषधि जाह्नवी तोयं वेद्यौ नारायण हरिः। अर्थात् आध्यात्मिक रोगों की दवा गंगाजल है और उन रोगियों के चिकित्सक नारायण हरि परमात्मा हैं। पाप वृत्तियों, कषाय-कल्मषों को आध्यात्मिक विकृतियाँ माना जाता हैं, जिनका उपाय-उपचार गंगा तट पर निवास करते हुए परमात्मा की उपासना-साधना करने से होता है। गंगा तट पर तपस्या-साधना की गति तीव्रगामी हो जाती है।

इन्हीं कारणों से सप्तऋषियों ने अपनी तपस्थली प्रचण्ड तपस्या के लिए दिव्य हिमालय की छाँव तले गंगा की गोद को चुना। भगवान् राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न ने भी इसी दिव्य विशेषता से आकर्षित होकर गंगा किनारे तपस्या की थी। वस्तुतः हर दृष्टि से गंगा की महिमा एवं महत्ता अपरम्पार है। इसके स्नान-सान्निध्य से अन्तःकरण में पवित्रता का संचार होता है। मन को तुष्टि व शाँति मिलती है।

भारत की वंशधारा गंगा की वंशधारा है। भारत की समस्त परम्परा भी गंगा से सिंचित और पालित-पोषित हैं। गंगा की यही सामर्थ्य और शक्ति राष्ट्रीय शक्ति है, जिसके सामने सभी आक्राँताओं को अवश और विवश होना पड़ा है। माँ गंगा की जीवनधारा में शौर्य, समृद्धि और सृजनकारी शक्तियाँ हैं। इसलिए तो मौलाना अल्ताफ हुसैन ‘हाली’ ने अपने प्रसिद्ध काव्य ‘मुसद्दए हाली’ में गंगा की तासीर का बयान करते हुए उल्लेख किया है कि अरब देश से चला वह इस्लाम का बेड़ा, जिसकी पताका समस्त विश्व में लहरा चुकी थी, जिसकी राह में कहीं कोई रोड़ा नहीं बन सका, जो अरब और बलूचिस्तान के बीच की ओमान की खाड़ी में भी नहीं रुका और लाल सागर में भी नहीं झिझका था, जिसने सातों समुद्रों को अपने ढाल के तले ढक लिया था; वह गंगा के घाट में आकर डूब गया। अर्थात् माँ गंगा की पवित्रता और सामर्थ्य के सामने उसकी एक न चली, उसका पतन हो गया। इस सामर्थ्य का उल्लेख विलियम हंटर के 1881 में प्रकाशित बहुचर्चित ग्रंथ ‘द इण्डियन इम्पायर’ में भी मिलता है। जिसमें स्पष्ट किया गया है कि सिकन्दर भी गंगा के किनारे बसे लोगों से टकराने के लिए भयभीत रहता था।

परन्तु इस युग में गंगा की इस दिव्य पावनता को, अन्तःकरण की शीतलता को तथा उसकी अपार सामर्थ्य को अपावन, मलीन तथा प्रदूषित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गया है। मानव का स्वार्थ अपनी ही जननी की कोख मलीन करने, मिटाने को तुला हुआ है। यह स्वार्थ बदलते समय के साथ नये आक्राँता बनकर, नये-नये सर्वनाशी तरीकों से अपना कहर ढा रहा है। परिणामतः गंगोत्री ग्लेशियर से निकलकर गंगासागर में गिरने वाली 2500 किलोमीटर गंगा का लगभग 2300 किलोमीटर लम्बा भाग प्रदूषित है, जिसमें 600 किलोमीटर का निचला हिस्सा तो प्रदूषण के संगीन दौर से गुजर रहा है। स्थिति यह है कि मूर्छित और मृतप्राय जीवन को समय-समय पर जीवन दान देती आ रही माँ भागीरथी का प्रवाह भारतभूमि से विलुप्त होने को है। भागीरथी की प्रचण्ड तपस्या आज प्रदूषण की शैतानी सामर्थ्यों के आगे कुँद पड़ गयी जान पड़ती है। परन्तु तपस्या की यह परम्परा मंद न पड़े इसलिए हमें संकल्पित होना होगा। हमें मुक्त मन से गंगा की सनातन राष्ट्रीय शक्ति और दिव्य आध्यात्मिकता के आलोक में उन सभी कुचक्रों, कुटिलताओं से सामने करने के लिए तत्पर, तैयार एवं सजग रहना होगा।

गंगा को प्रदूषित करने का अर्थ और परिणाम विकास नहीं विकार, संस्कृति नहीं विकृति, प्रकाश नहीं अंधकार, जीवन नहीं मृत्यु, गर्वोज्ज्वल परम्पराओं का नहीं पाप को प्रतिष्ठित और आमंत्रित करना है। गंगा पुरुषार्थ चतुष्टय अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और ज्ञान, कर्म, भक्ति, वैराग्य की प्रेरक विग्रह है। हमारे लिए यह मात्र नदी नहीं माँ का शीतल आँचल है, सदेह, सजीव वात्सल्य है, दैवी अस्तित्व है। हमारा लोक जीवन उसमें पलता, बढ़ता तथा विकसित होता है। और वह माँ की तरह हमारा आश्रय है। गंगा भारतमाता का परिचय है। भारत का इतिहास है, त्रिकाल का प्रतिनिधि है और महाकाल का प्रसाद है। इसकी जलधारा में अपनी संस्कृति अविराम प्रवाहित होती रहती है। माँ गंगा को प्रदूषण मुक्त रखना हमारे लिए परम पुण्य एवं महापुरुषार्थ के समान है। ताकि आध्यात्मिक और साँस्कृतिक प्रतीक माँ गंगा अपने चरम पावनता में गतिमान-वेगमान रहे। इसी में हमारे समस्त भ्रष्टता-कलुषता के पाप धुलेंगे और नूतन साँस्कृतिक मूल्यों का पुनर्जागरण होगा।


बड़ी जिम्मेदारिया (kahani)

एक किसान के चार बेटे थे। उनकी बुद्धिमत्ता जाँचने के लिए बेटों को बुलाकर किसान ने एक-एक मुट्ठी धान दिए और कहा, इनका जो मरजी हो, सो करो।

एक ने उसे छोटी वस्तु समझा और चिड़ियों को फेंक दिया। दूसरा उन्हें उबालकर खा गया। तीसरे ने संभालकर डिब्बे में रख दिया, ताकि कभी पिता जी माँगेंगे तो उन्हें दिखा सकूँ। चौथे ने उन्हें खेत में बो दिया और टोकरा भर धान पिता के सामने लाकर रख दिया।

पिता ने बोने वाले को अधिक समझदार पाया और बड़ी जिम्मेदारियों के काम उसी के सुपुर्द किए।


VigyapanSuchana

देवसंस्कृति का विश्वविद्यालय का शैक्षणिक पत्रक

(अकेडमिक कैलेंडर) सत्र 2003-2004

पाठ्यक्रमों की घोषणा 17 अप्रैल, 200 आवेदन पत्रों का आमंत्रण 1 मई, 2003 अंतिम तिथि (आवेदन पत्र प्राप्त होने की) 3 जून, 2003 प्रवेश हेतु परीक्षा 3 जुलाई, 2003 साक्षात्कार 7, 8, 9 जुलाई, 2003 प्रवेश परीक्षा परिणाम की घोषणा 9 जुलाई, 2003 प्रवेश 10, 11, 12 जुलाई, 2003 ज्ञानदीक्षा समारोह एवं सत्रारंभ 12 जुलाई, 2003 विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस 24 जुलाई, 2003 परीक्षा पूर्व अवकाश (प्रथम, तृतीय सत्र) 1 से 7 दिसंबर, 2003 प्रथम, तृतीय सेमेस्टर परीक्षाएं 8 से 22 दिसंबर, 2003 शीतकालीन अवकाश 23-12-03 से 04-01-04 परीक्षा परिणाम की घोषणा 5 जनवरी, 2004 द्वितीय/चतुर्थ सेमेस्टर का शुभारंभ 5 जनवरी, 2004 परीक्षा पूर्व अवकाश 8 से 16 मई, 2004 द्वितीय/चतुर्थ सेमेस्टर परीक्षाएं 17 से 31 मई, 2004


मिली समय-प्रबंधन की सीख

किशोरवय के इस छात्र की प्रतिभा के सभी कायल थे। विद्यार्थियों के साथ शिक्षकों को भी उसकी मेधा पर पूरा यकीन था। गणित, विज्ञान व इतिहास आदि सभी विषयों पर उसकी समान गति थी। पर साहित्य में उसकी प्रतिभा का निखार कुछ विशेष ही था। उच्च स्तरीय साहित्यिक पुस्तकों का पठन, उनकी समीक्षा-समालोचना उसके प्रिय कार्य थे। उसकी साहित्यिक अभिरुचि में पठन के साथ सृजन भी सम्मिलित था। उसके मौलिक सृजन की प्राञ्जल भाषा, सम्मोहक शब्दावली, अनूठी वाक्य रचना, संतुलित भाव सामान्य जनों को ही नहीं विशेषज्ञों को भी चकित करते थे।

अपनी अनगिन विशेषताओं के साथ उसमें एक छोटा सा दोष भी था। वह समय का पाबन्द नहीं था। अपने किसी कार्य को समय से पूरा करना, समय की गति और लय के साथ उसे निभाना उसके लिए सम्भव नहीं बन पड़ता था। इसके लिए उसे कभी-कभी विद्यालय में चेतावनी भी मिला करती थी। कभी-कभी तो उसे कार्य दिए जाने के साथ ही चेतावनी भी मिल जाती। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था। विद्यालय में कहानी की प्रतियोगिता आयोजित की गयी थी। कहानी लिखने के लिए ठीक एक महीने का समय था। इस प्रतियोगिता की सूचना उसे देते समय साहित्य के अध्यापक ने उसे चेताया था- अर्नेस्ट! तुम साहित्य लेखन में सर्वश्रेष्ठ हो, पर तुम्हें समय का ध्यान रखना है।

जी सर! कहकर वह अपने विचारों में खो गया। उसकी साहित्यिक प्रतिभा को देखते हुए न केवल उसे, बल्कि उसके साथियों एवं अध्यापकों को विश्वास था कि पुरस्कार उसको ही मिलेगा। हालाँकि उसे हैरानी इस बात की थी कि एक कहानी के लिए एक महीने का समय क्यों दिया गया है। कहानी को तो वह दो घण्टे में भी लिख सकता है। अपनी इसी सोच के कारण उसने कहानी प्रतियोगिता पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। प्रतियोगिता के लिए जब एक दिन बाकी रह गया- तब उसने आनन-फानन में एक कहानी लिखी और प्रतियोगिता संयोजक के पास जमा करा दी।

जिस दिन पुरस्कार की घोषणा होनी थी, उस दिन अर्नेस्ट बड़े उल्लास के साथ अपने विद्यालय पहुँचा। परिणाम की घोषणा हुई। लेकिन कहानी लेखन का प्रथम पुरस्कार उसे नहीं किसी और को दिया गया था। इस परिणाम पर सभी को आश्चर्य हुआ। वह स्वयं तो इतना उदास हुआ कि वह फूट-फूट कर रो पड़ा। बड़ी बहन ने उसकी स्थिति भाँप ली। वह भी विद्यालय के इस समारोह में उसके साथ आयी थी। वह बोली, पुरस्कार न मिलने के कारण रो रहा है न? अरे, यह तो होना ही था। तू समय की इस कदर उपेक्षा करेगा तो और क्या होगा? महीने भर का काम कहीं एक दिन में किया जाता है?

फिर वह उसका सिर सहलाते हुए स्नेहपूर्वक बोली, अब रोना छोड़, अगर सचमुच तुझे पराजय की पीड़ा है तो इसे आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी मान ले। भविष्य में कभी भी इस भूल को मत दोहराना। बड़ी बहन की बातों को वह ध्यान से सुन रहा था। वह उसकी ओर प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखते हुए कह रही थी- अच्छा लिखना है, तो अच्छी तरह से पढ़ो, तथ्यों एवं विचारों को संकलित करो। मानवीय जीवन के किसी अछूते, किसी की नजर में न आए हुए मर्म स्पर्शी पहलू को अपने साहित्य-सृजन की आधारभूमि बनाओ। भावों और विचारों को फिर भाषा का सौंदर्य प्रदान करो और जो लिखा है- उसे कम से कम दो बार पढ़ो, उसकी कमियाँ ढूंढ़ो। इसके बाद फिर से उसे लिखो। अपने ही लिखे हुए को कम से कम दो बार अवश्य पढ़ना चाहिए। इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि सारा काम समय की गति व लय के साथ होना चाहिए। ध्यान रहे समय के संगीत में जो अपने कर्मों के गीत को पिरोता है, वही महान् बनता है।

बड़ी बहन के इस सीख ने अर्नेस्ट की आँखें खोल दी। उसने समय के संगीत के साथ अपनी साहित्य साधना का गीत रचा। भविष्य ने उसे विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार अर्नेस्ट हेर्माग्वे के नाम से पहचाना। उसके साहित्य सृजन को नोबुल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


पवित्र, उच्च विचारों से आप्लावित उपनिषदों का ज्ञान

उपनिषद् भारतीय अध्यात्म चिंतन का चरम प्रकाश एवं मुख्य स्रोत हैं। वेद का ज्ञान पक्ष उपनिषद् कहलाता है। वेद के अंतिम भाग में एवं निष्कर्ष रूप से जो उच्च आध्यात्मिक चिंतन, उत्कृष्ट शिक्षा, उदात्त विद्या तथा गूढ़ साधना विद्यमान है, वही उपनिषद् का मुख्य विषय है।

वैदिक शिक्षा कर्मचारी की ओर प्रेरित करती है और वैदिक यज्ञ कर्मकाँड के प्रति प्रेरणा देते हैं दूसरी ओर उपनिषद् कर्मकाँड की उधेड़बुन से मुक्त शाश्वत सत्य का निरूपण एवं यथार्थ का परिचय कराते हैं, जिनके ज्ञान के आलोक से मनुष्य बंधनाक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति करता है। अतः उपनिषद् जीव, जगत एवं जगदीश्वर के संबंधों, समन्वय और उनके चिंतन-मनन पर आधारित ग्रंथ है।

भारतीय आचार्यों ने उपनिषद् की निष्पत्ति ‘षद्लृ’ धातु से की है, जो गति, अवसादन और विशरण अर्थों में प्रयुक्त होती है। उपनि उपसर्गों के साथ ‘षद्लृ’ धातु में क्विप प्रत्यय का योग करने पर उपनिषद् शब्द का निर्माण होता है। अतः जिस विद्या की ज्योतिर्मय ज्योति के संपर्क से अविद्या, अज्ञान का नाश होता है, जो मुमुक्षुओं को ब्रह्म की उपलब्धि करा देती है और जिसके श्रवण मात्र से दुःख, कष्ट एवं समस्याओं की गहन द्वंद्व-दलदल से छुटकारा मिल जाता है, उस आध्यात्मिक विद्या को उपनिषद् कहा जाता है।

मैक्समूलर के अनुसार उपनिषद् का प्रारंभिक अर्थ गुरु के समीप दिव्य उपदेश सुनने के लिए श्रद्धा-आस्थापूर्वक बैठना है। उन्होंने ‘ट्राँसलेशन ऑफ दि उपनिषद्’ में उल्लेख किया है कि संस्कृत भाषा के इतिहास और संस्कृत के अनुसार उपनिषद् का प्रारंभिक तात्पर्य एक ऐसी गोष्ठी से था, जिसमें शिष्य गुरु के चारों ओर आदर और भक्तिपूर्वक एक साथ एकत्रित होते थे। उपनिषद् साहित्य के विद्वान मनीषी ड्यूसन अपने ग्रंथ ‘फिलॉसफी ऑफ दि उपनिषद्’ में स्पष्ट करते है, कि उपनिषद् शब्द का अर्थ रहस्य या रहस्यमय उपदेश है, जो अनेक संदर्भों में प्रयुक्त होता है। ‘सेक्रेड बुम ऑफ दि ईस्ट’ नामक ग्रंथमाला के प्रथम खंड में मैक्समूलर ड्यूसन के इन अर्थों की पुष्टि करते हुए समर्थन करते हैं।

उपनिषदों के महान ज्ञाता एवं भाष्यकार भगवान शंकराचार्य ने उपनिषद् शब्द को ‘सद्’ धातु से लिया है, जिसका अर्थ है, जो नष्ट करता हैं उनके अनुसार जो अज्ञानरूपी भ्रम को तिरोहित करती है, माया के आवरण को तार-तार का सत्यज्ञान के दर्शन से मोक्ष की प्राप्ति में सहायता करती है, वही विद्या उपनिषद् में है। उपनिषद् के आदेशानुसार इस सत्यज्ञान के रहस्य को उचित पात्र के सामने प्रकट करना चाहिए। ज्ञान के इस आलोक को उसे हस्ताँतरित करना चाहिए। ज्ञान के इस आलोक को उसे हस्ताँतरित करना चाहिए। जिसने यम-नियम, संयम-साधना के द्वारा स्वयं को उचित एवं उपयुक्त सत्पात्र के रूप में सिद्ध किया हो।

उपनिषद् की पावन भूमि भारत में औपनिषदिक ऋषियों ने उच्चस्तरीय कल्पनाएँ कीं तथा गहन-गूढ विचार किया। इसी कल्पना व विचार का इस दिव्य धरा पर उपनिषद् के रूप में सर्जन हुआ। अतः प्रारंभिक उपनिषदों की भाषा गद्यात्मक है, जो अत्यंत प्रभावशाली, प्रभावोत्पादक एवं रहस्यमयी है। यह भाषा मन-मस्तिष्क को झंकृत कर देने वाली है तथा इसमें हृदय को प्रफुल्लित करने की सामर्थ्य निहित है। उपनिषदों के हरेक मंत्र का सौंदर्य अनुभवगम्य है तथा अर्थ गरिमामय है। चूँकि उपनिषद् शब्द का प्रयोग साँकेतिक सिद्धांत एवं विशिष्ट उद्देश्य के अर्थों में प्रयुक्त होता था, अतः सत्पात्रों को महनीय गुरु द्वारा इस रहस्य एवं गूढार्थ की दीक्षा जाती थीं इससे धार्मिक एवं आध्यात्मिक जिज्ञासुओं को उपनिषदों के शब्दों और इसकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति शैली में एक अद्भुत आश्चर्य एवं चमत्कार दृष्टिगोचर होने लगा था। परिणामस्वरूप उपनिषदों की रचना संस्कृत के गद्य और पद्य में नवीन प्रचलित स्वरूप में होने लगी और इसके सर्जन के ढंग में अवसान या परिवर्तन नहीं आया, वरन् यह नदी की सतत धारा के रूप में अक्षुण्ण-अक्षय प्रवाहित होती रही।

उपनिषदों का रचनाकाल कभी भी क्यों न हो, वे कालजयी हैं। उनके विचार वर्तमान में भी उतने ही सामयिक हैं और भविष्य के लिए भी उपयोगी हैं। प्रारंभिक उपनिषदों की रचना ईसा से 5डडडडड वर्ष पूर्व की गई थीं नवीन उपनिषदें मुसलिम काल के प्रादुर्भाव के पश्चात भी निर्बाध गति से लिखी जाती रहीं इन उपनिषदों में सबसे प्रमुख और पहली उपनिषदें वे हैं, जिनका भाष्य शंकराचार्य ने किया है ये हैं बृहदारण्यक, छाँदोग्य, ऐतरेय, ईश, केन, कठ प्रश्न, मुँडक एवं माँडूक्यं ड्यूसन का मत है कि कौषीतकि उपनिषद् भी मूल उपनिषदों में से एक है। मैक्समूलर एवं श्रोडर की मान्यतानुसार मैत्रायणी उपनिषद् भी इनमें सम्मिलित हैं, परंतु ड्यूसन इसे परवर्ती मानते हैं बिंटरनीत्ज उपनिषदों को चार कालों में विभाजित करते हैं वे प्रथम काल में बृहदारण्यक, छाँदोग्य तैत्तिरीय, ऐतरेय, कौषीतकि एवं केनोपनिषद् को रखते हैं उनके अनुसार द्वितीय काल में कठ, ईश, श्वेताश्वेतर, मुँडक और महानारायण आते हैं तीसरे काल में प्रश्न, मैत्रायणी एं मांडूक्य उपनिषदें शामिल की गई हैं। शेष उपनिषदें चतुर्थ काल की है। ये सारी उपनिषदें मिलाकर संख्या में लगभग 18 होती हैं।

इन विभिन्न उपनिषदों की विषयवस्तु एवं व्याख्या भिन्न-भिन्न दिखाई देती है। उनमें से कुछ जहाँ आत्मा के एकतत्ववाद के ऊपर विशेष महत्व देती हैं, वहीं दूसरी उपनिषदें योग, तप,शैव एवं वैष्णव दर्शन एवं शरीरशास्त्र के ऊपर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालती हैं इसी कारण इन उपनिषदों को योगोपनिषद् के नाम से विभूषित किया गया है। प्राचीन भारतीय विद्वानों ने उपनिषदों के विभिन्न अर्थ प्रस्तुत किए हैं और अनेक प्रकार से व्याख्या-विश्लेषण दिए हैं ये विवेचन-विश्लेषण एक दूसरे से इतने भिन्न हैं कि उपनिषदों के संबंध में मताँतर पैदा हो गए हैं। वस्तुतः बात ऐसी है नहीं, मूल में शाश्वत सत्य और यथार्थ एक की है, परन्तु इस सत्य की अपने-अपने ढंग से व्याख्या एवं तर्क करने पर ही यह मतभेद दृष्टिगोचर होता है, जो निताँत स्वाभाविक है। सत्य का स्रोत भले ही एक हो, परंतु इसका सुवास अनुभव का विषय है और अनुभव सबका अपना निजी होता है। अंतः इसकी व्याख्या भी उसी ढंग से होगी। इसी कारण तथा गह्वर समुद्र के सदृश गंभीर व समृद्धि है। यह महान एवं दिव्य दर्शन अनेक दर्शनों का उद्गम स्रोत रहा है, ज्ञान की अनंत धाराओं का मूल पावन गोमुख रहा है। ज्ञान की अनेक धाराएँ इनसे विभिन्न दिशाओं में प्रवाहित हुई हैं। इन धाराओं में सबसे उदात्त भावधारा शंकराचार्य के अद्वैतवाद की विचारधारा है, क्योंकि उन्होंने उपनिषदों की अत्यंत विद्वत्तपूर्ण और प्राचीन उपनिषदों के मंतव्य को सर्वांगपूर्ण एवं परिष्कृत रूप से प्रकट किया है। अतः शंकराचार्य के द्वारा की गई व्याख्या द्वारा प्रतिपादित दर्शन को ही मुख्य वेदाँत दर्शन कहकर पुकारा जाता है।

उपनिषद् मानव को मानवता के दिव्य पद से अलंकृत करते हैं, उसे देवत्व की ओर आरोहण करने तथा ब्रह्म के साथ तादात्म्य प्राप्त करने की कुँजी प्रदान करते हैं इसके साथ तादात्म्य प्राप्त करने की कुंजी प्रदान करते हैं। इसके साथ ही वे प्रकृति और जीवन के विभिन्न गूढ रहस्यों को समझाने, सुलझाने और उनमें पूर्णतः समन्वय-संबंध स्थापित करने में उदार सहयोग-सहायता प्रदान करते हैं। इनके अनुसार इस विश्व में ब्रह्म ही एकमात्र लौकिक और पारलौकिक सत्ता है। वही एकमात्र सत्ता है और उसके अलावा और कुछ भी नहीं है। परब्रह्म के रूप में वही असीम, अनंत, निर्गुण और निर्विशेष स्वरूप है, जबकि मनुष्य देह में विद्यमान चैतन्यस्वरूप आत्मा ही उपनिषद् ब्रह्म है। अतः इसके अनुसार आत्मा ही ब्रह्म

का अंशावतार है। उपनिषद् उद्घोष करते हैं कि मनुष्य देह, इंद्रिय एवं मन का संधान मात्र नहीं है, बल्कि वह सुख-दुःख, जन्म-मरण से परे दिव्यस्वरूप है, आत्मस्वरूप है। आत्मभाव से मनुष्य जगत का द्रष्टा भी और दृश्य भी। वह ईश्वर का राजकुमार है। जहाँ-जहाँ ईश्वर की सृष्टि का आलोक व विस्तार, वहीं-वहीं उसकी भी परमगति है, पहुँच है। वह परमात्मा का अंशीभूत आत्मा है। यही जीवन का चरम-परम पुरुषार्थ है। इस परम भावबोध का उद्घोष करने के लिए उपनिषद् के चार महामंत्र है-तत्वमसि(तुम वही हो), अंहं ब्रह्मास्मि(मैं ब्रह्म हूँ), प्रज्ञानं ब्रह्म(आत्मा ही ब्रह्म है), सर्वम् खिलविद्म ब्रह्म(सर्वत्र ब्रह्म ही है)। उपनिषद् के ये चार महावाक्य मानव जाति के लिए महाप्राण, महोयाधि एवं संजीवनी बूटी के समान है, जिन्हें हृदयंगम कर मनुष्य आत्मस्थ हो सकता है। देहभाव से परे सदा आत्मभाव में आनंदपूर्वक विचरण करता रह सकता है।

औपनिषदिक शिक्षा मनुष्य देह को मरणधर्मा मानकर सतत परिवर्तनशील बताती है। मनुष्य आत्मस्वरूप है। अतः संसार के समस्त आकर्षण, साधन, संबंध, बंधन, क्षणिक एवं भ्रम है। अज्ञान ही उसे मोहपाश के प्रबल बंधन में बाँधता है। जीवात्मा इन बंधनों से परे एवं पार है, उसमें अनंत ऊर्जा, असीम शक्ति व सामर्थ्य तथा विपुल शाँति, प्रेम, ज्ञान व आनंद का परम पुँज समाहित है। उपनिषदों में इस जीवात्मा की चार अवस्थाओं का वर्णन मिलता है। जाग्रत अवस्था में जीवात्मा ‘तेजस’ के रूप में जाना जाता है। उसमें यह आँतरिक सूक्ष्म वस्तुओं को समझता व बोध करता है। सुषुप्ति की अवस्था में शुद्ध चित्त के बाह्य एवं आँतरिक वस्तुओं से दूर पहुँच जाता है। तुरीयावस्था में जीवात्मा को ही ‘आत्मा’ कहा जाता है और यही ब्रह्म है। उपनिषदों में इसे उपलब्ध करने के विशद साधना-विधान का उल्लेख मिलता है।

उपनिषद् के अनुसार प्रत्येक आत्मा निर्विवाद रूप से ब्रह्म से सायुज्य संबंध स्थापित कर सकता है। इसके लिए उपनिषद् में श्रवण, मनन और निदिध्यासनरूपी तीन चरणों का उल्लेख मिलता है। मोक्ष की कामना करने वाला गुरु, ग्रंथों तथा महापुरुषों से सदा ब्रह्म के विषय में बारंबार श्रवण करे। इसके विषय में श्रद्धापूर्वक मनन-चिंतन करे, क्योंकि यही ब्रह्म ही एकमात्र मननीय व चिंतनीय है।निदिध्यासन ध्यान का पर्याय है। इस अवस्था में साधक गुरु द्वारा ज्ञान व साधना में लीन हो जाए। उसे संकल्पपूर्वक अपनी समस्त दुर्बलताओं को त्यागकर संयम द्वारा साधना के पथ पर आरुढ़ होना चाहिए। यही उपनिषद् की पावन व दिव्य शिक्षा है, जिसे अपनाकर हम अपने आँतरिक विकास के साथ-साथ नैतिकता तथा उच्च मानवीय मूल्यों का भी संवर्द्धन कर सकते है। इसी कारण शोपेनहॉर ने अपनी भावभरी अभिव्यक्ति में स्पष्ट किया है कि उपनिषद् पवित्र एवं उच्च विचारों से आप्लावित है, सत्य की जिज्ञासा से ओत-प्रोत हैं। सारे विश्व में उपनिषदों के समान कल्याणकारी एवं श्रेयस्कर कोई भी अन्य विद्या नहीं है। इसे अपनाकर मानव ब्रह्म से साक्षात्कार कर सकता है।


प्रभु की भूख (kahani)

विदुर जी ने जब देखा कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन अनीति करना नहीं छोड़ रहे तो सोचा कि इनका सान्निध्य और इनका अन्न मेरी वृत्तियों को भी प्रभावित करेगा, इसलिए वे नगर के बाहर वन में कुटी बनाकर पत्नी सुलभा सहित रहने लगे। जंगल से भाजी तोड़ लेते, उबालकर खा लेते तथा सत्कार्यों में, प्रभु-स्मरण में समय लगाते। श्री कृष्ण जब संधिदूत बनकर गए और वार्त्ता असफल हो गई तो वे धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य आदि सबका आमंत्रण अस्वीकार करके विदुर जी के यहाँ जा पहुँचे। वहाँ भोजन करने की इच्छा प्रकट की। विदुर जी को यह संकोच हुआ कि शाक प्रभु को परोसने पड़ेंगे। पूछा, “आप भूखे भी थे, भोजन का समय भी था और उनका आग्रह भी, फिर आपने वहाँ भोजन क्यों नहीं किया?”

भगवान बोले, “चाचाजी, जिस भोजन को करना आपने उचित नहीं समझा, जो आपके गले न उतरा, वह मुझे भी कैसे रुचता! जिसमें आपने स्वाद नहीं पाया, उसमें मुझे स्वाद कैसे मिलता, ऐसा आप कैसे सोच लिए ” विदुर जी भावविह्वल हो गए प्रभु के स्मरण मात्र से हमें जब पदार्थ नहीं, संस्कार प्रिय लगने लगे हैं तो स्वयं प्रभु की भूख पदार्थों से कैसे बुझ सकती है! उन्हें तो भावना चाहिए। उस  विदुर-दंपत्ति के पास कहाँ कमी थी! भाजी के माध्यम से वही दिव्य आदान-प्रदान चला। दोनों धन्य हो गए।


हम अपने भाव में शाँत हो भर जाएं

डूबती साँझ के साथ गेलीली झील में यह नौका भी डूबती-डूबती हो रही थी। झील में तूफान से झील का पानी, पानी में तैर रही नाव ही नहीं, नाव में सवार यात्रियों के कलेजे भी काँप रहे थे। बचाव का कोई उपाय नजर नहीं आ रहा था। माझियों में भी घबड़ाहट थी। तूफान के थपेड़े प्राणों को झकझोर रहे थे। पानी की लहरें नाव के यात्रियों को भिगोती हुई अन्दर भर रही थी। किनारे अभी काफी दूर थे। परेशानी और चिन्ता में सभी सहमे हुए थे- सिवा उस एक के, जो अभी नाव के एक कोने में बड़ी ही निश्चिंतता से सोया हुआ था। उसके मुख पर असीम शान्ति विराज रही थी।

उसके साथियों ने उसे जगाया। इन जगाने वालों की आँखों में आसन्न मृत्यु की छाया थी। मौत का खौफ उन सभी की आँखों में साफ-साफ नजर आ रहा था। उसने जागकर इन सभी से पूछा, आप सभी इतने डरे हुए क्यों है? इतने भयभीत होने की क्या बात है? उसके इस सवाल ने नाव के अन्य यात्रियों को चकित कर दिया। सभी को उसके प्रश्नों पर भारी अचरज हुआ। यकायक किसी से कुछ कहते न बना। उसने दुबारा पूछा, क्या आप सबको अपने आप पर बिल्कुल भी आस्था नहीं है?

सभी को भयावह सन्नाटे में समाया देख कर वह बड़े धीरे से उठा और निश्चिन्त कदमों से नाव के एक किनारे पर गया। नाव पर तूफान आखिरी चोटें कर रहा था। उसने विक्षुब्ध हो गयी झील को देखते हुए कहा, पीस, बी स्टिल- शान्ति, शान्त हो जाओ। उसके कहने का भाव कुछ ऐसा था, जैसे कि तूफान कोई नटखट बच्चा हो। और उसने बड़ी ही आसानी से समझा दिया हो- शान्त हो जाओ।

नाव के यात्रियों ने उसके इस कथन को महज पागलपन से ज्यादा कुछ नहीं समझा। पर आश्चर्य! महाआश्चर्य!! देखते ही देखते तूफान एकदम शान्त हो गया और झील इस तरह शान्त हो गयी, जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो। उस व्यक्ति की बात मान ली गयी। अब तो नाव के सभी लोगों ने उसे घेर लिया, और कहने लगे, आखिर यह चमत्कार कैसे हुआ यीशु।

ईसा मसीह मधुर मुस्कान के साथ बोले, यह बाहर का तूफान तो कुछ भी नहीं है। हम सभी के मन इससे भी कहीं ज्यादा तूफानी अशान्ति से घिरे हैं। हमारे चित्त की झील इस झील से कहीं ज्यादा विक्षुब्ध है। इसमें हमारी जीवन नौका पल-पल डूबती नजर आती है। और हम सब की आँखों में कहीं न कहीं मौत की छाया भी मँडराती रहती है।

ऐसे में क्या यह ठीक नहीं है कि हम अपने आप से पूछें, इतने भयभीत क्यों हो? क्या स्वयं पर हमारी बिल्कुल भी आस्था नहीं है। यदि है तो फिर अपने भीतर की झील पर जाकर कहें- शान्ति, शान्त हो जाओ। थोड़ा ठहर कर ईसा बोले, मैंने ऐसा करके देखा है, और पाया है कि आलस्य का अर्थ है समय की बरबादी। जो समय बरबाद करता है, समझना चाहिए कि वह अपने भाग्य को अपने हाथों फोड़ता है, प्रगति का द्वार अपने हाथों बंद करता है और दुर्गति को आग्रहपूर्वक न्योत बुलाता है।

तूफान शान्त हो जाता है। केवल शान्ति के गहरे भाव में डूबने, समाने की बात है। और शान्ति आ जाती है। अपने भाव में हम अशान्त हैं और अपने भाव में हम शान्त भी हो सकते हैं। इसके लिए किसी कठिन अभ्यास की जरूरत नहीं है। बस सद्भाव ही काफी है।

शान्ति तो हमारी अन्तरात्मा का स्वरूप है। घनी अशान्ति के बीच एक केन्द्र पर हम शान्त हैं। इस केन्द्र पर स्थित हो जाने के बाद हम तूफान के बीच भी शान्त रह सकते हैं। अशान्ति तभी तक है, जब तक हम इस केन्द्र से दूर हैं। इस पर स्थित होकर हम न केवल अपनी आन्तरिक शान्ति खोज सकते हैं, बल्कि बाहर भी मन चाही शान्ति पा सकते हैं।

ईसा मसीह की बातें चकित करने वाली थी, पर उनमें सत्य की गहराई थी। वह कह रहे थे- शान्त होना चाहते हो तो इसी क्षण, अभी और यहीं शान्त हो जाओ। अभ्यास भविष्य में फल लाता है, सद्भाव वर्तमान में ही परिणाम देता है। उनकी इन बातों ने नाव के सभी यात्रियों को अद्भुत शान्ति में निमग्न कर दिया।


Quotation

आलस्य का अर्थ है समय की बरबादी। जो समय बरबाद करता है, समझना चाहिए कि वह अपने भाग्य को अपने हाथों फोड़ता है, प्रगति का द्वार अपने हाथों बंद करता है और दुर्गति को आग्रहपूर्वक न्योत बुलाता है।


आयुर्वेद-5 - प्रदर रोग निवारण हेतु यज्ञोपचार प्रक्रिया

स्त्री रोगों में सर्वाधिक कष्टप्रद प्रदर रोग को माना गया है। अधिसंख्य महिलाएँ इस महाव्याधि से पीड़ित पाई जाती है, जिसके कारण उनका स्वास्थ्य और सौंदर्य, दोनों ही दिन-प्रतिदिन गिरते जाते हैं। समय पर चिकित्सा न होने और रोग पुराना होने पर अनेकानेक व्याधियाँ घेर लेती है और अंततः जानलेवा साबित होती है।

मिथ्या आहार-विहार, अस्वच्छता एवं असंयम के कारण प्रदर रोग उत्पन्न होता है। प्रदर रोग उत्पन्न होने के कारणों का उल्लेख करते हुए आयुर्वेद के चिकित्सा ग्रंथ ‘भावप्रकाश’ के अड़सठवें अध्याय ’स्त्रीरोगाधिकारः’ में कहा गया है-

विरुद्धमद्याध्यशनाद जीर्णाद् गर्भप्रषातादतिमैथुनाच्च। यानाध्वशोकादतिकर्षणाच्च भाराभिघाताच्छयनाद्दिवा॥

विरुद्ध आहार करने से, शराब पीने से, भोजन पर भोजन करने से, अजीर्ण होने से गर्भपात को जाने से अत्यधिक कामसेवन से, घोड़ागाड़ी आदि की अधिक सवारी करने से या इन पर चढ़कर अधिक तेज दौड़ने से, बहुत शोक करने से, अधिक मार्ग चलने से, अधिक उपवास करने से, अधिक भार ढोने से, चोट लगने से तथा दिन में अधिक सोने से महिलाओं को यह कष्टप्रद प्रदर नामक रोग होता है।

चरक संहिता के अनुसार प्रायः उन महिलाओं को प्रदर रोग होता है, जो अत्यधिक उत्तेजक आहार, नमकीन, चरपरे, खट्टे, प्रदाही, चिकने पदार्थ, माँस, मदिरा, खिचड़ी, खीर, दही, सिरका जैसे पदार्थों का सदा या ज्यादा सेवन करती है। वैद्य विनोद में उल्लेख है- मद्यातिपानम् अतिमैथुनगर्भपाताज्जीर्णध्वशोकग योग दिवाति निद्रा। स्त्रीणामसृग्दरो भवतीति..‐। अर्थात् अत्यधिक मद्यपान करने, अत्यंत कामसेवन करने, गर्भपात होने या बार-बार गर्भपात कराने, अजीर्ण-अपच होने, अधिक राह चलने, शोक करने, कृत्रिम विष का योग होने और दिन में अधिक सोने आदि कारणों से महिलाओं को असृग्दर अर्थात् प्रदर रोग होता है।

अन्यान्य आयुर्वेद ग्रंथों में भी प्रदर रोग की उत्पत्ति के संबंध में इसी प्रकार का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार विरुद्ध आहार-विहार, उपवास, दाह उत्पन्न करने वाले एवं उत्तेजक पदार्थ, भारी, कड़वे, अधिक खट्टे, नमकीन पदार्थ, माँसाहार, मद्यपान, बिजौरा आदि प्रदर रोग को बढ़ाते है। अश्लील साहित्य, अश्लील वार्तालाप, उत्तेजक दृश्यावलोकन, अत्यधिक रति, अंगों की अस्वच्छता आदि कितने ही कारण ऐसे हैं, जो इस रोग की अभिवृद्धि करते है।

प्रदर रोग के स्वरूप का निर्धारण करते हुए शास्त्र कहते हैं-रजः प्रदीयते यस्मात्प्रदरस्तेन स्मृतः अर्थात् रज को प्रक्षुब्ध करके दाह उत्पन्न करने वाले रोग को प्रदर कहते हैं। वस्तुतः यह गर्भाशय का रोग है, जिसमें उपयुक्त कारणों से दूषित रज आर्तवकाल या उसके बाद भी अनियमित रूप से अल्प या अत्यधिक मात्रा में स्रवित होता रहता है। इसकी चपेट में प्रायः हर आयु-वर्ग की स्त्रियाँ आ जाती हैं। बारह से बीस तक एवं पच्चीस से तीस वर्ष की अवस्था में यह रोग अधिक होता है। उपचार न होने पर बढ़ती आयु के साथ-साथ यह गंभीर रूप धारण कर लेता है। ऐसी स्थिति में जो शारीरिक कमजोरी, थकान, बेहोशी, रक्ताल्पता, हाथ-पैरों में जलन, दर्द, तंद्रा, भ्रम, व्यथा, संताप, बकवाद, तृष्णा, प्यास, मोह एवं बहुविधि वातव्याधि। कमर दर्द, अंगों का टूटना, शूल जैसी पीड़ा तो इस रोग में आम बात है।

आयुर्वेदशास्त्र के अनुसार प्रदर रोग चार प्रकार का होता है- तं श्लेष्मापित्तानिल सन्निपातैश्चतुष्प्रकारं प्रदरं वदन्ति। अर्थात् यह रोग कफज, पित्तज, वातज एवं सन्निपातज-त्रिदोषज- इस तरह चार प्रकार का होता है।

(1) कफज प्रदर

यह प्रायः भारी एवं गरिष्ठ पदार्थों का अत्यधिक सेवन करने, दूध, मैदा, ठंडा पानी, बासी भोजन, कुपोषण एवं तनाव आदि कारणों से कफ के कुपित होने पर उत्पन्न होता है। इसमें गाढ़ा, श्वेत, किंचित् पीले रंग का एवं चिपचिपा, भारी, चिकना, शीतल तथा श्लेष्ममिश्रित रक्तस्राव प्रायः हर समय होता रहता है, किंतु ऋतुकाल के पूर्व एवं बाद में अधिक मात्रा में होता है। इसे ही ‘श्वेत प्रदर’ कहते हैं। इसमें पीड़ा कम है। रोग पुराना होने पर वमन, अरुचि, श्वास - कास, तलपेद में भार, जंघाओं का भारीपन तथा खिंचाव, दुर्बलता, कब्ज सिरदर्द एवं शिरोभ्रम आदि उपद्रव उठ खड़े होते हैं।

पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान-एलोपैथी में कफज प्रदर को ‘ल्यूकोरिया’ कहते हैं। गर्भाशय की श्लेष्मिक झिल्ली में शोथ उत्पन्न होने या संक्रमण होने के कारण यह रोग उत्पन्न होता है। विवाहित-अविवाहित एवं सभी आयु वर्ग की महिलाओं में यह रोग पाया जाता है।

(2) पित्तज प्रदर

इसे रक्त प्रदर भी कहते हैं। यह रोग अधिकतर उन महिलाओं को होता है, जो नमकीन खट्टे, खारे और गरम पदार्थों का अत्यधिक सेवन करती हैं। इससे पित्त प्रकुपित होता है और गर्भाशय की सूक्ष्म नलिकाओं में रक्त की अधिकता पैदा कर पित्तज या रक्त प्रदर उत्पन्न करता है। इसमें पीला, नीला, काला, लाल, और गरम खून अनियमित रूप से पीड़ा के साथ निकलता रहता है। रक्त प्रदर के कारण रोगिणी की हथेलियों और पैर के तलुवों में जलन, आँखों में जलन, कब्ज, रक्ताल्पता शरीर में पीलापन, दुर्बलता, चक्कर आना, आँखों के आगे अँधेरा छा जाना, अधिक प्यास लगना, कमर दर्द, स्वभाव में चिड़चिड़ापन, बुखार आदि लक्षण प्रकट होते हैं।

पाश्चात्य चिकित्साविज्ञानी पित्तज प्रदर को ‘मेट्रोरेजिया’ और ‘मेनोरेजिया’ नाम से संबोधित करते हैं। ऋतुकाल के प्रथम चार-पाँच दिन में आर्तव स्राव के साथ अधिक रक्त निकलना ‘ मेनोरेजिया’ एवं आर्तवकाल के बाद भी निरंतर या रुक-रुक कर अधिक मात्रा में रक्त का निकलते रहना ‘मेट्रोरेजिया’ कहलाता हैं। वस्तुतः यही रक्त प्रदर है। इसके कई कारण माने जाते हैं, जैसे-गर्भाशय तंत्र का संक्रमण, ट्यूमर या शोथ, गर्भाशय स्थान भ्रंश, रक्तसंवहन तंत्र का दोष, हृदय या गुरदे की बीमारी, ब्रौंकाइटिस, तंत्रिका तंत्र के विकार, अंतःस्रावी ग्रंथियों का अधिक रसस्राव आदि। ‘मेनोरेजिया’ बहुधा अधिक विषय-सेवन से या अधिक गरम जल से स्नान करने से अथवा अधिक मानसिक श्रम करने आदि कारणों से उत्पन्न होता है, जबकि मेट्रोरेजिया गर्भाशय की आँतरिक गड़बड़ियों के कारण उत्पन्न होता है। यह रोग, अधिकतर तीस वर्ष की आयु के बाद होता है।

(3) वातज प्रदर या कष्टार्तव

एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान में इसे ‘डिसमेनोरिया’ कहते हैं। इसमें आर्तवकाल के समय रूखा, कालिमा लिए, हुए लाल, झागदार एवं माँस के धोवन के रंग का थोड़ी-थोड़ी मात्रा में रक्तस्राव होता है। उस समय वायु की प्रबलता के कारण कमर, हृदय, वक्ष, पसली, श्रोणिभाग आदि स्थानों में सुई चुभाने जैसी तीक्ष्ण पीड़ा होती है। दर्द के मारे रोगिणी का बहुत बेचैनी होती हैं और कई बार तो वह बेहोश तक हो जाती है। एनीमिया (रक्ताल्पता), क्लोरेसिस, रिह्यूमेटिक या गाँउटी आर्थ्राइटिस, न्यूरेलजिया, नासिका, विकार, न्यूरेस्थीनिया एवं जननेंद्रियात्मक आदि कई कारणों से डिसमेनोरिया अर्थात् कष्टार्तव उत्पन्न होता हैं गर्भाशय का विकृत विकास एवं रचनात्मक विकार इस रोगोत्पत्ति का प्रमुख कारण है।

(4) त्रिदोषज या सन्निपातज प्रदर

यह वात, पित्त, एवं कफ- तीनों दोषों के प्रकुपित होने से उत्पन्न होता है। इसमें शहद, घी, हरताल के समान रंग वाला, गरम, मज्जा के समान एवं सड़े हुए मुरदे के समान बदबूदार, लिबलिबा, पीला व जला हुआ-सा रक्त हमेशा निकलता है। इसके कारण रोगिणी के शरीर में रक्त की कमी हो जाती है। फलतः दुर्बलता, थकावट, चक्कर आना, मदात्यता, अत्यधिक प्यास, जलन, प्रलात, शरीर में पीलापन, तंद्रा बुखार एवं अनेकानेक वात व्याधियाँ घेर लेती हैं। प्रदर की यह स्थिति अत्यंत कष्टदायक एवं प्राणघातक होती है। अतः समय रहते इन सभी प्रकार के प्रदर रोगों की शीघ्र चिकित्सा की जानी चाहिए, अन्यथा बाद में पश्चात्ताप ही हाथ लगता है।

आयुर्वेद-ग्रंथों में प्रदर रोग के निवारणार्थ विभिन्न प्रकार के उपाय-उपचारों एवं योग-प्रयोगों का विस्तृत वर्णन किया गया है। ये सभी प्रयोग-उपचार अनुभवी एवं निष्णात चिकित्सकों के मार्गदर्शन में किए जाएँ तो अत्यंत लाभकारी सिद्ध होते हैं। यहाँ पर इस संदर्भ में दी जा रही यज्ञोपचार प्रक्रिया सर्वाधिक निरापद, सर्वसुलभ एवं सर्वोपयोगी हैं इसे हर कोई स्वयं एकाकी या सामूहिक रूप से संपन्न कर सकता हैं और स्थायी एवं शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकता है। यहाँ ल्यूकोरिया अर्थात् श्वेत प्रदर एवं मेट्रोरेजिया अर्थात् रक्त प्रदर की यज्ञ चिकित्सा का वर्णन किया जा रहा है।

(1) ल्यूकोरिया अर्थात् श्वेत प्रदर की विशेष हवन सामग्री

इस विशिष्ट हवन सामग्री को निम्नांकित वनौषधियों को मिलाकर बनाया जाता है-

(1) धाय फूल, (2) मोथा, (3) शतावर, (4) अश्वगंधा, (5) गिलोय, (6) एरंडमूल, (7)चिकनी सुपारी, (8) चिरायता, (9) कुश (डाभ), (10) पाढ़ल, (11) अंजीर, (12) कठूमर, (13) गूलर कर छाल या फल, (14) शिवलिंगी के बीज (15)जटामाँसी,(16) अशोक की छाल,(17)उलट कंबल, (18) बिल्वगिरी, (19) श्वेत कमल, (20) कमल केशर,(21) लोध्र, (22) आँवला, (23) हरड़, (24) नाग केशर, (25)श्वेत चंदन, (26) करंज बीज की गिरी,(27) राल,(28) कुड़ा छाल, (29) शीतल चीनी, (30) साल की छाल, (31) कड़वी तूँबी (लौकी) के पत्ते, (32) कपास की जड़ व ग्रोद (कतीरा), (33) जिया पोता,(34) तालमखाना या तुकमलंगा, (35) बबूल की फली, (36) रक्त राहिड़ा, (37) पटसन के फूल,(38) सागवन की छाल,(39) देवदार, (40) पुनर्नवा, (41) सोंठ, (42) मुलहठी (मधुहठी), (43) दारुहलदी, (44) ढाक की छाल एवं गोंद (45) अपामार्ग, (46) काँटा चौलाई की जड़, (48)−किचनार, (50) भिंडी की जड़,(51) माजूफल, (52) सुगंधवाला,(53) पीपल की छाल,(54) काकजंघा एवं (55) अनार के सूखे फल।

उपर्युक्त चीजों को समभाग लेकर कूट-पीसकर जौकुट पाउडर बना लेते हैं। इस जौकुट पाउडर को एक बड़े डिब्बे में रखकर उस पर ‘क्रमाँक-2’ का लेबल लगा देते हैं। श्वेत प्रदर की विशेष हवन सामग्री तैयार होने के पश्चात् पहले से तैयार की गई ‘कॉमन हवन सामग्री क्रमाँक-1’ की बराबर मात्रा मिलाकर सूर्य गायत्री मंत्र से नित्यप्रति कम-से-कम चौबीस आहुतियाँ डालते हैं। ‘कॉमन हवन सामग्री क्रमाँक-1’ को अगर, तगर, चंदन, लाल चंदन, गूगल, जायफल, लौंग, चिरायता, अश्वगंधा, गिलोय एवं देवदार की बराबर मात्रा डालकर जौकुट करके बनाया जाता है। उपर्युक्त वर्णित 55 चीजों में से अधिक-से-अधिक जितनी औषधियाँ उपलब्ध हो सकें, उनसे प्रयोग-उपचार आरंभ कर देना चाहिए। सभी उपलब्ध हों तो अत्युत्तम है

हवन करने के साथ-ही-साथ उपर्युक्त 55 वनौषधियों से निर्मित ‘क्रमाँक-2’ के जौकुट पाउडर में से 50 ग्राम पाउडर लेकर उसका क्वाथ बनाकर नित्य सुबह, शाम रोगिणी को पिलाते रहना चाहिए। क्वाथ बनाते समय उसमें निम्न चीजें और मिला लेनी चाहिए-

(1) खून खराबा (एक तरह की गोंद)-2 रत्ती, (2) सोना गेरू-2 ग्राम, (3) भुनी हुई फूली फिटकरी-2 रत्ती, (4) रसोत-1 ग्राम, (5) मोच रस-1 ग्राम, (6) अतीस-1 रत्ती, (7) चोप-1 रत्ती।

उक्त सभी 55 औषधियों के 50 ग्राम मात्रा के सम्मिश्रित चूर्ण के साथ ही यह सातों चीजें निर्धारित मात्रा में मिलाकर सायंकाल स्टील के एक भगोने में एक लीटर पानी में भिगो देनी चाहिए। सुबह इसे मंद आँच पर चढ़ाकर क्वाथ बनाना चाहिए। चौथाई मात्रा में रहने पर उसे उतारकर ठंडा होने पर बारीक कपड़े से छान लेना चाहिए और आधी मात्रा सुबह एवं आधी मात्रा शाम को रोगी को पिलाते रहना चाहिए।

(2) मेट्रोरेजिया अर्थात् रक्त प्रदर की विशेष हवन सामग्री

रक्त प्रदर में अधिकाँश औषधियाँ श्वेत प्रदर में प्रयुक्त होने वाली ही डाली जाती हैं, किंतु पित्तज प्रकृति होने एवं रक्ताधिक्य की बहुलता के कारण कुछ अन्य महत्वपूर्ण वनौषधियाँ भी डाली जाती हैं। रक्त प्रदर में प्रयुक्त होने वाली विशेष हवन सामग्री में निम्नाँकित चीजें मिलाई जाती हैं-

(1) शिवलिंगी के बीज, (2) उलट कंबल, (3) धाय फूल, (4) अर्जुन छाल, (5) लाल चंदन, (6) श्योनाक, (7) उषवा, (8) अडूसा (वासा), (9) चिरायता, (10) आम की गुठली, (11) जामुन की गिरी, (12) कमल केशर, (13) दूर्बा, (14) नाग केशर, (15) बहुफली, (16) खस, (17) मंजीष्ठ, (18) छोटी इलायची, (19) मीठा कूट, (20) शरपुखा, (21) सेमर के फूल व गोंद (मोचरस), (22) हल्दी, (23) दारुहलदी, (24) माजूफल, (25) लाख, (26) पऽख, (27) बलामूल, (28) कुश की जड़, (29) आँवला, (30) हरड़, (31) सुगंध वाला (32) देवदार, (33) सोंठ, (34) नीम छाल, (35) गुलाब के फूल, (36) लोध्र, (37) अतिबला, (38) शतावर, (39) अश्वगंधा, (40) गिलोय, (41) एरंड मूल, (42) चिकनी सुपारी, (43) अशोक छाल, (44) बिल्वगिरी, (45) मुलहठी, (46) ढाक की छाल व गोंद (कमरकस) (47) अपामार्ग, (48) काँटा चौलाई की जड़, (49) कठूमर, (50) जटामाँसी, (51) पाकर, (52) पुनर्नवा, (53) बादाम, (54) साल की छाल, (55) गुँजामूल एवं (56) छुआरे की गुठली।

उपर्युक्त सभी 56 चीजों में से अधिक-से-अधिक जितनी उपलब्ध हो सकें, उन्हें बराबर मात्रा में लेकर जौकुट पाउडर बना लेना चाहिए और उस पर ‘रक्त प्रदर की विशेष हवन सामग्री क्रमाँक-2’ का लेबल लगाकर अलग डिब्बे में रख लेना चाहिए। हवन करते समय श्वेत प्रदर में वर्णित ‘कॉमन हवन सामग्री क्रमाँक-1’ को भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन करना चाहिए। हवन करने का मंत्र सूर्य गायत्री मंत्र ही रहेगा अर्थात् ‘ ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विऽहे, दिवारकराय श्रीमहि। तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।’

हवन करने के साथ-ही-साथ उक्त 56 चीजों (हवन सामग्री क्रमाँक-2 में वर्णित) के सम्मिलित पाउडर में से 50 ग्राम पाउडर लेकर पूर्व वर्णित क्वाथ की तरह काढ़ा बनाकर नित्यप्रति सुबह-शाम व्याधि पीड़ित महिला को पिलाते रहना चाहिए। क्वाथ बनाते समय उसमें भी खूनखराबी, सोना गेरू, तवे पर फूली हुई फिटकरी, रसोत, मोचरस, अतीस और चोप चीनी का चूर्ण निर्धारित मात्रा में मिला लेना चाहिए। काढ़ा या क्वाथ पीते समय उसमें अगर समभाग में चावल का माँड़ (स्टार्च) मिला लिया जाए तो रोग निवारण के साथ ही शरीर को पोषण भी मिलता है और क्वाथ के औषधीय गुणों में गुणात्मक रूप से अभिवृद्धि होती है।

प्रदर रोग मुख्य रूप से आहार-विहार की गड़बड़ी, असंयम एवं अस्वच्छता के कारण उत्पन्न होता है। अतः उसका निदान भी तदनुरूप ही हो सकता है। आलू, चावल, मधुर द्रव्यों का सर्वथा परित्याग करना, खटाई, नींबू, दही, टमाटर, अचार, ठंडे पेय पदार्थों से बचना, संयमित एवं मर्यादित जीवनचर्या, आँतरिक स्वच्छता आदि का पालन करते हुए यज्ञोपचार प्रक्रिया अपनाई जाए तो आयुर्वेद की इस विधा के माध्यम से सुनिश्चित रूप से आशातीत सफलता मिलती है।


स्वार्थ से ऊपर उठकर पारिवारिक उत्तरदायित्व (kahani)

एक वृद्ध तीर्थयात्रा पर तीन वर्ष के लिए निकला। चारों बेटों को बुलाकर अपनी जमा पूँजी उनके हाथों सौंप दी। कहा, "लौटने पर ले लूँगा। न लौटूँ तो तुम्हारी।" उन चारों को सौ-सौ रुपये सौंप गए।

एक ने उन्हें सुरक्षित रख लिया। दूसरे ने उन्हें ब्याज पर उठा दिया। तीसरे ने रुपयों को शौक-मौज में उड़ाया। चौथे ने उनसे व्यवसाय करना आरंभ कर दिया।

तीन साल बाद बूढ़ा लौटा और धरोहर वापस माँगी। एक ने ज्यों-की-ज्यों लौटा दी। दूसरे ने थोड़ी-सी ब्याज भी सम्मिलित कर दी। तीसरे ने खरच कर देने की कथा सुनाई और मजबूरी बताई। चौथे ने व्यवसाय किया, मूलधन चौगुना करके लौटाया।

उस वृद्ध ने चौथे की सबसे अधिक प्रशंसा की और उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया। इसके बाद उसकी बुद्धिमानी सराही गई, जिसने कम-से-कम ब्याज तो कमाया।

वृद्ध ने सबको समझाते हुए कहा, "रुपये को ब्याज पर चलाने या व्यवसाय में लगाने से वह बढ़ सकता है, यह सबको पता है, परंतु उसके लिए प्रयास-पुरुषार्थ वही कर सकता है, जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर पारिवारिक उत्तरदायित्वों का पालन करना सीखता है। परिवार में रहकर भी यह भाव विकसित न कर सकने से बुद्धि के उपयोग की उमंग भी नहीं उभरती। तुम्हारी यही परीक्षा लेने के लिए मेरी तीर्थयात्रा नियोजित थी।"


समर्पण, विसर्जन, विलय का महापर्व

गुरुपूर्णिमा सद्गुरु के प्रति सर्वस्व समर्पण का महापर्व है। सद्गुरु गोविन्द है। वही सदाशिव और परम शक्ति है। सद्गुरु के मुख में ब्रह्म का वास होता है। उनकी वाणी ब्रह्मवाणी है। उनके वचन महामंत्र हैं। सद्गुरु ही साधना है और अंत में वही साध्य के रूप में प्राप्त होते हैं। सद्गुरु की कृपाशक्ति ही साधक में साधना की शक्ति बनती है। देहधारी मनुष्य जब सद्गुरु की कृपा-छाँह में आता है, तब वह शिष्य बनता है। उस शिष्य में गुरु जब अपने एक अंश को प्रतिष्ठित करते हैं, तब साधक के रूप में उसका नवसृजन होता है। शिष्य काय-कलेवर में सद्गुरु ही साधक के रूप में अवतार लेते हैं।

सद्गुरु स्वयं ब्रह्म हैं। उनके वचनों में ही ब्रह्मविद्या समाई है। इसलिए सन्त कबीरदास ने सद्गुरु को गोविन्द के समान माना है-

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागो पाय। बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय॥

गुरुगीता की भक्ति कथा में गुरु को भगवान् के पद से अलंकृत किया गया है-

गुरुर्ब्रह्म, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरु साक्षात्परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥

गुरुगीता साधक-संजीवनी है। देवेश्वर शिव ने इसमें गुरु को ब्रह्म के रूप में प्रतिपादित किया है। उनके इस संक्षिप्त कथन को किसी बौद्धिक क्षमता से नहीं, भावनाओं की अतल गहराई से ही समझा व अनुभव किया जा सकता है। सद्गुरु की कृपा से शिष्य को दिव्य दृष्टि मिलती है और फिर शिष्य ब्रह्म का दर्शन करने में सक्षम होता है। इस अपूर्व दर्शन में द्रष्ट, दृष्टि और दर्शन सब तदाकार-साकार हो जाते हैं। शिष्य, सद्गुरु एवं ब्रह्मतत्त्व के सभी भेद एवं विभाजन गिर जाते हैं, मिट जाते हैं। अतः सूर्यप्रकाश के समान इस सत्य में स्पष्ट है कि सद्गुरु ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही सद्गुरु के रूप में साकार हुए हैं।

गुरु को ईश्वर के सदृश्य, देवता के सम्मान का भाव अर्वाचीन उपनिषद्काल तथा पुराणों में भी प्राप्त होता है। जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि धर्मों में मातृदेवो भव, पितृ देवों भव, आचार्यदेवो भव कहकर गुरु की महनीय गरिमा को उजागर किया गया है। ताँत्रिक सम्प्रदाय में सर्वाधिक प्रधानता गुरु को दी गई है। मनु स्मृति में गुरु का महत्त्व निरूपण करते हुए तीन प्रकार के गुरुओं के पूजन का निर्देश दिया गया है। इसमें उपाध्याय, अध्यापक और संस्कार कराने वालों को भी गुरु रूप में वरण किया गया है-

लौकिकं वैदिकं वापि तथाऽध्यापक मेव च। आप दीत् यतोज्ञानं तं पूर्व भभिवाद येत्॥

अमर कोष में गुरु के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति इस प्रकार मिलती है-

बृहस्पतिः सूराचार्यों गीष्पतिर्थिषणों गुरुः। जीव आँगिरसौ वाचस्पतिक्षित्रः शिखण्डिजः॥

सन्त साहित्य में भी गुरु की विशेष महत्ता एवं विशेषता दर्शायी गयी है। चुँनाचे एवं गुरु नानक देव जी ने तो गुरु को वेदवत् स्वीकार किया है। वे सद्गुरु की आज्ञा को जीवन में परम, कल्याणमयी और सिद्धिदायक मानते हैं-

गुरुमुखिनादम् गुरुमुखि वेदम् रहिओ समाई। गुरुईसरु गोरखुवर्मा गुरु पारवतीं माई॥

सन्त रज्जब अली भी सद्गुरु की प्राप्ति को प्रभु की असीम एवं अनन्त कृपा का प्रसाद मानते हुए कहते हैं-

जनम् सफल तब का भया चरनौचित्त लाया। रज्जब रामदया करी, दादूगुरु पाया॥

इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मोहम्मद पैगम्बर ने कुरआन-ए-शरीफ में मोमिनों को उपदेश दिया है, कि सद्गुरु के बिना विद्या की प्राप्ति नहीं होती, अतः गुरु का आदर एवं सम्मान का स्थान माता-पिता से भी बढ़कर है। चीन के सन्त शिन-हुआ ने भी गुरु की महिमा एवं गरिमा का गान किया है। उनके अनुसार समस्त विद्याएँ और शास्त्र दीपक के चित्र मात्र हैं। इनमें केवल दीपक बनाने की विधि-विधान का उल्लेख भर है। दीये के चित्र से आलोक नहीं बिखरता, रोशनी नहीं होती। गहन अंधकार में ये कुछ काम नहीं आते। परन्तु सद्गुरु से मिलना जैसे दीप्त दीये की ज्योति से मिलने जैसा है। अतः गुरु के अभाव में समस्त शास्त्र एवं सारी विद्याएँ अर्थहीन हो जाती हैं। ये अर्थवान् तभी होती हैं, जब सद्गुरु की प्राप्ति होती है।

गुरुचरण चरित के मंत्रद्रष्ट महाकवि तुलसी कहते हैं कि सद्गुरु मनुष्य देहधारी होते हुए भी सामान्य मनुष्य नहीं है। वह नर रूप में नारायण है- बंदऊँ गुरु पद, कृपा सिन्धु नर रूप हरि। सद्गुरु परमात्म चेतना का घनीभूत रूप होते हैं। वे जहाँ रहते हैं, उनकी तपश्चेतना का घनीभूत प्रभाव छाया रहता है। उनका निवास शिष्यों के लिए मुक्तिदायिनी काशी है। इस काशी के विश्वनाथ स्वयं गुरु हैं। यह अनुभवगम्य है, जिसे गुरु के प्रति अगाध आस्था एवं गहन श्रद्धा का संचार करके ही अनुभव किया जा सकता है। समर्पण के इस महाभाव में ही शिष्य का शिष्यत्व सधता-निखरता है। प्रगाढ़ गुरुभक्ति से ही गुरु कृपा का अवतरण होता है। जहाँ गुरु और शिष्य तदाकार-साकार हो जाते हैं। गुरु शिष्य का यह सम्बन्ध प्राणों का सम्बन्ध होता है, आत्मिक होता है। शिष्य गुरु के आध्यात्मिक गर्भ में पलता-बढ़ता, विकसित होता है। शिष्य गुरु का मानस पुत्र होता है, जिसमें एकमात्र गुरु का महा अस्तित्त्व लहराता रहता है।

गुरु-शिष्य के बीच प्राणों के इस सम्बन्ध से दिव्य परम्परा का आविर्भाव होता है। शिष्य गुरु के वचन एवं कार्य के निर्वाह में अपना समस्त जीवन विसर्जित कर देता है। इस तरह भगवान् शंकराचार्य के जीवन में गुरु गोविन्दपाद का अवतरण हुआ, जिनके दिव्य आदेश का पालन कर अद्वैतवादी शंकराचार्य जगत् विख्यात हो गये। मत्स्येन्द्रनाथ के सूत्रों को गोरखनाथ ने अपनाकर नाथ सम्प्रदाय को जन्म दिया। कबीर ने गुरु रामानन्द को गुरु वरण किया और एकमात्र मानव धर्म का प्रचार किया। रामानुजाचार्य ने यमुनाचार्य को, पुष्यमित्र ने पतंजलि को, चैतन्य ने माधवेन्द्र को, नारद ने सनत्कुमार को तथा कुमारजीव ने बन्धुदत्त को अपना सर्वस्व न्यौछावर कर शिष्यत्व की उपलब्धि की थी।

गुरु भगवान् के प्रतीक-प्रतिनिधि होते हैं। अतः वे भगवान् के कार्य को संचालित करने के लिए योग्य एवं सत्पात्र शिष्य की तलाश करते हैं। इस क्रम में स्वामी पूर्णानन्द ने विरजानन्द का, विरजानन्द ने दयानन्द का, निवृत्तिनाथ ने ज्ञानदेव का , नरहराचार्य ने तुलसीदास का, विशुद्धानन्द ने गोपीनाथ कविराज का, अनन्त महाप्रभु ने बाबा राघवदास का, जनार्दन पंत ने एकनाथ का, सुधीन्द्र तीर्थ ने राघवेन्द्र का, ब्रह्मन्द्र स्वामी ने बालाजी विश्वनाथ का, वसुगुप्त ने कल्कट का, विद्यारण्य ने हरिहर राय का शिष्य के रूप में चुनाव किया था।

शिष्य के अन्दर शिष्यत्व का भाव पनप गया हो तो सद्गुरु अपने आप ही उसे ढूंढ़ते हुए आ जाते हैं। स्वयं न भी आए तो शिष्य को अपने पास बुला लेते हैं। रामकृष्ण परमहंस विवेकानन्द को इसी तरह मिले थे। रामदास ने शिवाजी की तलाश की थी। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को उसके घर के पास जाकर ढूंढ़ लिया था। इसी प्रकार प्राणनाथ ने छत्रसाल को, कनकदास ने कृष्णदेव राय को, राजाराम शास्त्री ने केशव कर्वे को, माधव गोविन्द रानाडे ने गोखले को, गोखले ने गाँधी को, गाँधी जी ने विनोबा को, अण्णा साहब पटवर्धन ने तिलक को, तिलक ने सावरकर को खोजा था। गणेश शंकर विद्यार्थी आचार्य महावीर प्रसाद की खोज थे और चन्द्रशेखर आजाद रामप्रसाद बिस्मिल के, फिरोजशाह मेहता दादा भाई के, सुब्रह्मण्यम् भारती जी सुब्रह्मण्यम् अय्यर के शिष्य थे। एनी बसेण्ट ब्लावतास्की तथा निवेदिता स्वामी विवेकानन्द की उपलब्धि थी।

शिष्य के इस समर्पण, विसर्जन, विलय में ही शिष्योऽहम्, ‘मैं शिष्य हूँ’ का दिव्य सूत्र गूँजता है। सारे रिश्ते-नाते इस एक सम्बन्ध में विलीन हो जाते हैं। शिष्य ही साधक हो सकता है। और सद्गुरु उसके रोम-रोम, मन, प्राण, जीवन में समाए हुए होते हैं। शिष्य के लिए सद्गुरु ही एकमात्र नियन्ता, सूत्राधार होते हैं। वही संचालक हैं, जीवन में जो कुछ है, सो वही होते हैं। इस प्रकार समर्पण एवं गुरुभक्ति से शिष्य-साधक के जीवन में तप-साधना की समस्त उपलब्धियाँ-सिद्धियाँ सहज रूप में प्राप्त होती जाती हैं। गुरुकृपा से तत्त्वज्ञान, आत्मबोध, ईश्वर कृपा सभी कुछ सुलभ-सहज हो जाती हैं। गुरु पूर्णिमा सद्गुरु की इसी महा कृपा की अनुभूति का महापर्व है।


वृक्ष उद्बोधन से पथिक का समाधान (kahani)

पथिक ने वृक्ष से कहा, “तुम बिना किसी प्रयास के यों फलो-फूलो में और मैं मारा-मारा फिरूं, क्या यह अन्याय नहीं है?’

वृक्ष ने कहा, “इस तरह की ईर्ष्या करने से पहले तुमने सोचा होता कि मैं कितनी सरदी, गर्मी, बरसात और पतझड़ की तपश्चर्या के उपराँत यह सौभाग्य प्राप्त करता हूँ, फलता-फूलता हूँ और इस अनुदान-उपहार को परोपकार में ही लगाता हूँ। तुम तो सब जीवों में श्रेष्ठ, वरिष्ठ मनुष्य हो। तुमसे भी श्रम और पुरुषार्थ की आशा की जाती है।” वृक्ष के उद्बोधन से पथिक का समाधान हो गया ।


गुरु पूर्णिमा (13 जुलाई, 2003)- - विशेष-जनम-जनम के साक्षी व साथी हैं हमारे गुरुदेव

आषाढ़ महीने की हल्की फुहारें अंतर्मन को अनायास ही भिगो रही हैं। नील-गगन पर छाए उमड़ते-घुमड़ते मेघों से झरती बूँदों की ही तरह अंतर्गगन में परम पूज्य गुरुदेव की यादों की मेघमालाएँ छायी हुई हैं। और उनसे अनगिन भाव भरी यादों की झड़ी लगी हुई है। जिस तरह से वृक्ष-वनस्पतियों सहित भीगती धरती की ही तरह अन्तर्चेतना का कोना-कोना भीग रहा है। आषाढ़ की पूर्णिमा यह मुखर सन्देशा लेकर आयी है, मनुष्य के अधूरेपन को, उसकी अतृप्ति को केवल गुरु ही पूर्णता का वरदान देता है। इसलिए आषाढ़ पूर्णिमा- गुरु पूर्णिमा है। गुरु जो करते हैं वह शिष्य की पूर्णता के लिए ही करते हैं। कभी तो वह ऐसा शिष्य की इच्छा को पूर्ण करके करते हैं, तो कभी वह ऐसा शिष्य की चाहत को ठुकरा कर करते हैं।

गुरु पूर्णिमा पर बरसती यादों की झड़ी में गुरुदेव की शिष्य वत्सलता के ऐसे रूप भी हैं। उस दिन भी वह नित्य की भाँति प्रसन्नचित्त लग रहे थे। पूर्णतया खिले हुए अरुण कमल की भाँति उनका मुख मण्डल तप की आभा से दमक रहा था। उनके तेजस्वी नेत्र समूचे वातावरण में आध्यात्मिक प्रकाश बिखेर रहे थे। उनकी ज्योतिर्मय उपस्थिति थी ही कुछ ऐसी जिससे न केवल शान्तिकुञ्ज का प्रत्येक अणु-परमाणु बल्कि उनसे जुड़े हुए प्रत्येक शिष्य व साधक की अन्तर्चेतना ज्योतिष्मान होती थी। उनके द्वारा कहा गया प्रत्येक शब्द शिष्यों के लिए अमृत-बिन्दु था। वे कृपामय अपने प्रत्येक हाव-भाव में, शिष्यों के लिए परम कृपालु थे। उनके सान्निध्य में शिष्यों एवं भक्तों को कल्पतरु के सान्निध्य का अहसास होता था। सभी को विश्वास था कि उनके आराध्य सभी कुछ पूरा करने में समर्थ हैं।

इस विश्वास का खाद-पानी पाकर कई चाहतें भी मन में बरबस अंकुरित हो जाती थी। उस दिन उनके सान्निध्य में एक शिष्य के मन में बरबस यह भाव जागा कि परम समर्थ गुरुदेव क्या कृपा करके उसे जीवन की पूर्णता का वरदान नहीं दे सकते? वही पूर्णता जिसे शास्त्रों ने कैवल्य, निर्वाण, ब्रह्मज्ञान आदि अनेकों नाम दिये हैं। परम पूज्य गुरुदेव अपने पलंग पर बैठे हुए थे। और वह उनके चरणों के पास जमीन पर बिछे एक टाट के टुकड़े पर बैठा हुआ था। इस विचार को कहा कैसे जाय, बड़ी हिचकिचाहट थी उसके मन में। सकुचाहट, संकोच और हिचक के बीच उसकी अभीप्सा छटपटा रही थी। सब कुछ समझने वाले अन्तर्यामी गुरुदेव उसके मन की भाव दशा को समझते हुए मुस्करा रहे थे। आखिर में उन्होंने ही हँसते हुए कहा- जो बोलना चाहता है, उसे बेझिझक बोल डाल।

अपने प्रभु का सम्बल पाकर उसने थोड़ा अटकते हुए कह डाला- गुरुदेव! क्या मुझे आप ब्रह्मज्ञान करा सकते हैं? इस कथन पर गुरुदेव पहले तो जोर से हँसे फिर चुप हो गए। उनकी हँसी से ऐसा लग रहा था- जैसे किसी छोटे बच्चे ने अपने पिता से कोई खिलौना माँग लिया हो या फिर उसने किसी मिठाई की माँग की हो। पर उनकी चुप्पी रहस्यमय थी। इसका भेद पता नहीं चल रहा था। आखिर वह हँसते हुए चुप क्यों हो गए? इसी दशा में पल-क्षण गुजरे। फिर वह कमरे में छायी नीरवता को भंग करते हुए बोले- तू ब्रह्मज्ञान चाहता है। मैं अभी इसी क्षण तुझे ब्रह्मज्ञान करा सकता हूँ। ऐसा करने में मुझे कोई परेशानी नहीं है। मैं इसमें पूरी तरह से समर्थ हूँ।

इतना कहकर वह फिर से ठहर गए। और उनकी आँखों में करुणा छलक आयी। वह करुणा जो माँ की आँखों में अपने कमजोर-दुर्बल शिशु को देखकर उभरती है। इस छलकती करुणा के साथ वह बोले- यदि इसी समय तुझे ब्रह्मज्ञान करा दूँ, तो जानता है तेरा क्या होगा? बेटा! तू विक्षिप्त और पागल होकर नंगा घूमेगा। छोटे-छोटे लड़के तुझे पत्थर मारेंगे। सुनने वाले को यह बात बड़ी अटपटी सी लगी। इसका भेद उसे समझ में न आया। करुणा की घनीभूत मूर्ति गुरुदेव उसे समझाते हुए बोले- बेटा! तू इसे इस तरह से समझ। यदि 220 वोल्ट वाले पतले तार में 11,000 वोल्ट की बिजली गुजार दी जाय, तो जानता है क्या होगा? अपने ही इस सवाल का जवाब देते हुए वह बोले- न केवल वह पतला तार उड़ जाएगा, बल्कि दीवारें तक फट जायगी।

ब्रह्म चेतना 11,000 वोल्ट की प्रचण्ड विद्युत् धारा की तरह है। और सामान्य मनुष्य चेतना 220 वोल्ट की भाँति दुर्बल है। इसलिए ब्रह्मज्ञान पाने के लिए पहले तप करके अपने शरीर और मन को बहुत मजबूत बनाना पड़ता है। इन्हें ऐसा फौलादी बनाना होता है, ताकि ये ब्रह्म चेतना की अनुभूति का प्रबल वेग सहन कर सकें। इसके बिना भारी गड़बड़ हो जायगी। जबरदस्ती ब्रह्मज्ञान कराने के चक्कर में शरीर और मन बिखर जाएँगे। भक्त की चाहत को ठुकराते हुए भी भगवान् के मन में केवल निष्कलुष करुणा का निर्मल स्रोत ही बह रहा था। सदा वरदायी प्रभु वरदान न देकर अपनी कृपा ही बरसा रहे थे।

इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक सत्य घटना का विवरण सुनाया। यह घटना महर्षि अरविन्द और उनके शिष्य दिलीप कुमार राय के बारे में थी। विश्व विख्यात संगीतकार दिलीप राय उन दिनों श्री अरविन्द से दीक्षा पाने के लिए जोर जबरदस्ती करते थे। वह ऐसी दीक्षा चाहते थे, जिसमें श्री अरविन्द दीक्षा के साथ ही उन पर शक्तिपात करें। उनके इस अनुरोध को महर्षि हर बार टाल देते थे। ऐसा कई बार हो गया। निराश दिलीप ने सोचा कि इनसे कुछ काम बनने वाला नहीं है। चलो किसी दूसरे गुरु की शरण में जाएँ। और उन्होंने एक महात्मा की खोज कर ली। ये सन्त पाण्डिचेरी से काफी दूर एक सुनसान स्थान में रहते थे।

दीक्षा की प्रार्थना लेकर जब दिलीप राय उन सन्त के पास पहुँचे। तो वह इस पर बहुत हँसे और कहने लगे- तो तुम हमें श्री अरविन्द से बड़ा योगी समझते हो। अरे वह तुम पर शक्तिपात नहीं कर रहे, यह भी उनकी कृपा है। दिलीप को आश्चर्य हुआ- ये सन्त इन सब बातों को किस तरह से जानते हैं। पर वे महापुरुष कहे जा रहे थे, तुम्हारे पेट में भयानक फोड़ा है। अचानक शक्तिपात से यह फट सकता है, और तुम्हारी मौत हो सकती है। इसलिए तुम्हारे गुरु पहले इस फोड़े को ठीक कर रहे हैं। इसके ठीक हो जाने पर वह तुम्हें शक्तिपात दीक्षा देंगे। अपने इस कथन को पूरा करते हुए उन योगी ने दिलीप से कहा- मालूम है, तुम्हारी ये बातें मुझे कैसे पता चली? अरे अभी तुम्हारे आने से थोड़ी देर पहले सूक्ष्म शरीर से महर्षि अरविन्द स्वयं आए थे। उन्होंने ही मुझे तुम्हारे बारे में सारी बातें बतायी।

उन सन्त की बातें सुनकर दिलीप तो अवाक् रह गये। अपने शिष्य वत्सल गुरु की करुणा को अनुभव कर उनका हृदय भर आया। पर ये बातें तो महर्षि उनसे भी कह सकते थे, फिर कहा क्यों नहीं? यह सवाल जब उन्होंने वापस पहुँच कर श्री अरविन्द से पूछा, तो वह हँसते हुए बोले, यह तू अपने आप से पूछ, क्या तू मेरी बातों पर आसानी से भरोसा कर लेता। दिलीप को लगा, हाँ यह बात भी सही है। निश्चित ही मुझे भरोसा नहीं होता। पर अब भरोसा हो गया। इस भरोसे का परिणाम भी उन्हें मिला निश्चित समय पर श्री अरविन्द ने उनकी इच्छा पूरी की।

यह सत्य कथा सुनाकर गुरुदेव बोले- बेटा! गुरु को अपने हर शिष्य के बारे में सब कुछ मालूम होता है। वह प्रत्येक शिष्य के जन्मों-जन्मों का साक्षी और साथी है। किसके लिए उसे क्या करना है, कब करना है वह बेहतर जानता है। सच्चे शिष्य को अपनी किसी बात के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। उसका काम है सम्पूर्ण रूप से गुरु को समर्पण और उन पर भरोसा। इतना कहकर वह हँसने लगे, तू यही कर। मैं तेरे लिए उपयुक्त समय पर सब कर दूँगा। जितना तू अपने लिए सोचता है, उससे कहीं ज्यादा कर दूँगा। मुझे अपने हर बच्चे का ध्यान है। अपनी बात को बीच में रोककर अपनी देह की ओर इशारा करते हुए बोले- बेटा! मेरा यह शरीर रहे या न रहे, पर मैं अपने प्रत्येक शिष्य को पूर्णता तक पहुँचाऊँगा। समय के अनुरूप सबके लिए सब करूंगा। किसी को भी चिन्तित-परेशान होने की जरूरत नहीं है। गुरुदेव के यह वचन गुरु पूर्णिमा पर प्रत्येक शिष्य के लिए महामंत्र के समान हैं। अपने गुरु के आश्रय में बैठे किसी शिष्य के लिए कोई चिन्ता और भय नहीं है।


श्रम के देवता की आराधना (kahani)

स्वर्ग के देवता धरती पर आए। उनकी कल्पना थी कि मनुष्य गिड़गिड़ाएंगे और अभावों की कहानी कहकर वरदान की याचना करेंगे, पर मनुष्यों में से किसी ने उनकी ओर नजर भी न उठाई। खेतों में लहलहाती फसल देखकर वे फूले न समा रहे थे।

देवता वापस लौटने लगे तो धरती ने उन्हें बुलाकर कहा, मेरे पुत्रों ने श्रम के देवता की आराधना सीख ली है, उन्हें किसी बात का अभाव नहीं रहता।


शिष्य संजीवनी-1 - समर्पित दृढ़ता से आरंभ होती है यह साधना

(हर गुरुपूर्णिमा से सभी साधकों की आत्मिक प्रगति हेतु यह लेखमाला आरंभ की जा रही है)

गुरु पूर्णिमा- शिष्यत्व की साधना का पुण्य पर्व है। शिष्यत्व की यह महासाधना अति कठिन है। लेकिन इसकी पूर्णता पर गुरु कृपा- अजस्र अनुदान बनकर बरसती है। जन सामान्य की सर्वमान्य सोच यही है कि यदि किसी तरह सद्गुरु कृपा हो जाय तो फिर जीवन में कुछ और करना शेष नहीं रह जाता है। यह सोच अपने सारभूत अंशों में सही भी है। सद्गुरु कृपा है ही कुछ ऐसी- इसकी महिमा अनन्त-अपार और अपरिमित है। परन्तु इस कृपा के साथ एक विशिष्ट अनुबन्ध भी जुड़ा हुआ है। यह अनुबन्ध है शिष्यत्व की साधना का। जिसने शिष्यत्व की महाकठिन साधना की है। जो अपने गुरु की प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरा है- वही उनकी कृपा का अधिकारी है। शिष्यत्व का चुम्बकत्व ही सद्गुरु के अनुदानों को अपनी ओर आकर्षित करता है। जिसका शिष्यत्व खरा नहीं है- उसके लिए सद्गुरु के वरदान भी नहीं हैं।

गुरुदेव का संग-सुपास-सान्निध्य मिल जाना, जिस किसी तरह से उनकी निकटता पा लेना, सच्चे शिष्य होने की पहचान नहीं है। हालाँकि इसमें कोई सन्देह नहीं है कि ऐसा हो पाना पिछले जन्मों के किसी विशिष्ट पुण्य बल से ही होता है। परन्तु कई बार ऐसा भी होता है जो गुरु के पास रहे, जिन्हें उनका अति निकटता मिली, वे भी अपने अस्तित्त्व को सद्गुरु की परम चेतना में विसर्जित नहीं कर पाते। और कई बार ऐसा हो भी जाता है। पास रहना या दूर रहना, सद्गुरु के देह रहने पर उनसे जुड़ना या उनके देहातीत होने पर उनके प्रेम में पड़ना कोई विशेष अर्थ नहीं रखते हैं। अर्थवत्ता केवल शिष्यत्व की है। यह जहाँ है, जिधर भी है, जिस काल में है, वहीं गुरुवर के अनुदान-वरदान बरसते चले जाएँगे।

शिष्यत्व की साधना कहाँ से और कैसे प्रारम्भ करें? यह सवाल प्रत्येक गुरु अनुरागी के मन में रह-रहकर स्पन्दित होता है। पिछले कई महीनों से अखण्ड-ज्योति के पाठक गुरु-गीता को श्रद्धा के साथ पढ़ रहे हैं। गुरु तत्त्व की व्यापकता, समर्थता और रहस्यमय आध्यात्मिकता ने उनकी श्रद्धा को और अधिक प्रगाढ़ किया है। उनके हृदय में उफनती-उमड़ती भक्ति और भी अधिक बलवती हो गयी है। लेकिन इस सबके साथ उनके मन में एक जिज्ञासा भी अंकुरित हुई है। यह जिज्ञासा शिष्यत्व के बारे में है। उनकी चाहत है कि हम सच्चे शिष्य कैसे बनें? शिष्यत्व की कठिन साधना करके गुरु प्रेम के सर्वोत्तम अधिकारी कैसे बनें? ऐसी चाहत रखने वाले अनेक परिजनों ने अखण्ड ज्योति के सम्पादक से व्यक्तिगत रूप से मिलकर, उन्हें पत्र लिखकर अपनी भावनाओं से अवगत कराया है।

उनके गुरु प्रेम की छुअन और परम पूज्य गुरुदेव की प्रेरणा से ही अखण्ड ज्योति को यह स्फुरणा मिली है कि शिष्यत्व की कठिन साधना के परम रहस्यमय एवं सदा से गोपनीय रखे गए कुछ विशेष सूत्रों को साधकों के सामने प्रकट किया जाय। अब से शिष्यत्व के साधना सूत्र सद्गुरु प्रेमियों को प्रतिमाह मिलते रहेंगे। जो इनकी साधना करेंगे उन पर देश-काल के सभी बन्धनों से परे सद्गुरु की परम चेतना अजस्र अनुदान बरसाती रहेगी। यह बात केवल वैचारिक उक्ति भर नहीं है। यह महासत्य है, जो युग-युग के, भारतभूमि एवं अन्यान्य देशों के समर्पित शिष्यों की शिष्यत्व साधना का सार है। ध्यान रहे कि ये सूत्र उन्हीं के हैं और जो व्याख्या है वह परम पूज्य गुरुदेव की अन्तःप्रेरणा से प्रकट हुई है। इस सब में यदि किसी का सच्चा स्वत्व है, तो वह गुरु-शिष्य की महान परम्परा का है। महान् गुरुओं की करुणा और समर्पित शिष्यों की साधना के निष्कर्ष हैं- ये सूत्र और उनकी क्रमिक व्याख्या। शिष्यों के लिए संजीवनी औषधि की भाँति होने के कारण- इस धारावाहिक कथा का नाम भी ‘शिष्य संजीवनी’ है।

यदि आप शिष्य हैं- अथवा होने की चाहत रखते हैं- तो यह शिष्य-संजीवनी औषधि आपके लिए है। प्रतिदिन इस पर मनन-चिन्तन करना, इन्हें क्रियान्वित करना आपका परम कर्त्तव्य है। ध्यान रहे यदि आपके अन्तःकरण में गुरु-प्रेम की दीवानगी हिलोरे मार रही है- तो यह साधना पथ आपके लिए है। यह साधना केवल उनके लिए है जिन्हें अपने प्यारे गुरुवर के बिना रहा नहीं जाता। जो अपने अस्तित्त्व को सद्गुरु की चेतना में समर्पित-विसर्जित और विलीन कर देना चाहते हैं। शिष्य संजीवनी की यह महाऔषधि उनके लिए है- जो श्रेष्ठ शिष्यों की अग्रिम कतार में खड़ा होना चाहते हैं। जो बार-बार अनेक बार, अनगिनत बार अपने गुरुवर द्वारा ली जाने वाली कठोरतम परीक्षा में खरे उतरना चाहते हैं। जिनकी एक मात्र चाहत है कि जिएँगे तो गुरुदेव के लिए और मरेंगे तो गुरुदेव के लिए। गुरुवर के लिए जीवन, गुरुवर के लिए मरण, जिनके जीवन का मकसद है। ऐसे शिष्यों के लिए जीवन औषधि है यह शिष्य संजीवनी।

ऐसे मरजीवड़े शिष्यों के लिए शिष्यत्व की कठिन साधना में उतरने के लिए कुछ विशेष बातें माननी जरूरी हैं। गुरु भक्त शिष्यों की महान् परम्परा उनसे कहती है- इससे पहले तुम्हारे नेत्र देख सकें, उन्हें आँसू बहाने की क्षमता से मुक्त हो जाना चाहिए। इसके पहले तुम्हारे कान सुन सकें, उन्हें बहरे हो जाना चाहिए। और इसके पहले तुम सद्गुरुओं की उपस्थिति में बोल सको, तुम्हारी वाणी को चोट पहुँचाने की वृत्ति से मुक्त हो जाना चाहिए। इसके पहले तुम्हारी आत्मा सद्गुरुओं के समक्ष खड़ी हो सके, उसके पाँवों को हृदय के रक्त से धो लेना चाहिए।

महान् शिष्यों के साधनामय जीवन का सार यह कथन बड़ा ही रहस्यमय एवं अतिशय प्रभावी है। इसमें पहली बात बड़ी स्पष्ट है कि कोरी भावुकता, बात-बात में आँसू बहाना गुरु भक्ति का परिचय नहीं है। शिष्यत्व की साधना के लिए पहली जरूरत समर्पित दृढ़ता की है। दृढ़ता से भरी अश्रुविहीन आँखें ही गुरुचेतना को निहार सकती हैं। जहाँ तक कानों की बात है- सो वे गुरु निन्दा और विषय चर्चा के लिए बहरे हों ताकि वे सद्गुरु की परावाणी सुन सकें। और यदि हम यह चाहते हैं कि हमारे स्वर सद्गुरु को स्पर्श करें- तो हमारी वाणी का किसी और को चोट पहुँचाने की प्रवृत्ति से मुक्त होना आवश्यक है। ऊपर कही गयी इन तीनों बातों का मेल बड़ा दुर्लभ है। क्योंकि जब समर्पित भक्ति जगती है, तो उसमें कहीं से, चुपके से कट्टरता, संकीर्णता आकर जहर घोल देती है। और हम अपने विरोधियों के लिए विद्रोही बन जाते हैं।

परन्तु शिष्यत्व की साधना करने के लिए यह पूर्णतया वर्जित है। उनका अन्तःकरण तो गुरु-प्रेम से इस कदर परिपूर्ण होना चाहिए कि उसमें तनिक से भी द्वेष और तनिक सी भी कड़वाहट की कोई गुँजाइश ही न रहे। हमारी भक्ति इतनी अधिक प्रगाढ़ हो कि शिष्यत्व की साधना के लिए बढ़ने वाला हमारा प्रत्येक कदम हमारे अपने हृदय के रक्त से यानि की प्रगाढ़ भावनाओं से धुला हुआ-परम पवित्र हो। यदि हम यह कर सकते हैं तो ही हम शिष्यत्व की साधना के अधिकारी हैं। और ये शिष्य संजीवनी के परम गोपनीय सूत्र हमारे लिए हैं। इन योग्यताओं के साथ ही हम इस राह पर आगे बढ़ सकते हैं। क्योंकि यह राह हठी, उन्मादियों एवं अहंकारियों के लिए नहीं है। साधना का परम रहस्य मार्ग केवल शिष्यों के लिए है। जिनमें समर्पित संकल्प और संकल्पित समर्पण कूट-कूटकर भरा है।

गुरु पूर्णिमा के परम दुर्लभ क्षणों में टटोलिए अपने आप को, करिए स्वयं का आत्मावलोकन, करिए सच्ची समीक्षा स्वयं अपने आपकी। क्या आप तैयार हैं शिष्य बनने के लिए? क्या आपके पास है वह साहस और हौसला जो शिष्यत्व की साधना की कठिन राह पर आपको चला सके? यदि हाँ- तो शिष्य संजीवनी के सूत्रों की शृंखला प्रतिमाह आपको-हमको, हम सभी के साधना पथ पर अपना उजाला बिखेरती रहेगी। प्रथम सूत्र के प्रकट होने पर हम सभी स्वयं को इस महासाधना के लिए तैयार करें।


महाकवि माघ की उदारता (kahani)

महाकवि माघ अपनी उदारता के लिए प्रसिद्ध थे। उन दिनों उनकी आर्थिक स्थिति खराब चल रही थी, फिर भी हृदय की उदारता पहले जैसी ही थी। एक रात उनके घर पर एक याचक आया। उसने बताया कि मुझे अपनी कन्या का विवाह करना है और पास में कुछ भी नहीं है। आपकी ख्याति सुनकर आपके पास आया हूँ। कुछ सहायता मिल जाए तो मेरा काम बन जाए।

कवि माघ का हृदय भर आया। घर की संपत्ति पर दृष्टि डाली। पास में कुछ भी नहीं था। तभी पास ही सो रही पत्नी के शरीर पर दृष्टि गई। धीरे से एक कंगन उतारा और अतिथि को देते हुए बोले, “इस समय अधिक के लिए मैं विवश हूँ। जो कुछ पास में है, उसे ही स्वीकार कीजिए।”

तभी पत्नी की आँख खुली, वस्तुस्थिति को समझा। मंद मुस्कराहट के साथ बोली, “भला विवाह जैसा कार्य एक कंगन में कैसे हो सकेगा। यह दूसरा भी ले जाइए।” और दूसरा कंगन भी उतारकर दे दिया। माघ पत्नी के इस कृत्य पर पुलकित हो उठे।


अंतर्जगत की यात्रा का ज्ञान विज्ञान- - अभ्यास की सफलता हेतु कुछ अनिवार्य शर्तें

अन्तर्यात्रा का विज्ञान महर्षि पतंजलि एवं परम पूज्य गुरुदेव का साधकों से सीधा संवाद है। इसमें महर्षि के सूत्र और युगऋषि के अनुभव का सार है। योग विज्ञान की इन दोनों महाविभूतियों ने इस योग कथा के माध्यम से अपने आध्यात्मिक खजाने को खोल दिया है। उन्होंने बड़ी उदारता बरती है- जो भी योग साधना के गूढ़ तत्त्वों, गहन सत्यों एवं अतिरहस्यमयी प्रक्रियाओं को ले जाना चाहे-ले जाये। जितना ले जाना चाहे उतना ले जाए। उसका मन चाहे तो सबका सब ले जाए। परन्तु ये महर्षिगण इन बेशकीमती खजाने के सदुपयोग के बारे में पूर्ण आश्वस्त हैं। उनका विश्वास है कि इस आध्यात्मिक खजाने की गति और रुचि उन्हीं की होगी- जो साधक हैं। जो साधक नहीं है केवल निरे पाठक हैं वे आकर भी वंचित रहेंगे। उन्हें पढ़कर भी कुछ समझ में नहीं आएगा। क्योंकि इस योग कथा को पढ़ने के लिए तीक्ष्ण बुद्धि और प्रखर मेधा की नहीं जाग्रत आत्मचेतना की जरूरत है।

जिनकी आत्मचेतना में योग साधना की तड़प है, त्वरा है, तृषा है यह योग कथा केवल उन्हीं के लिए है। महर्षि पतंजलि एवं परम पूज्य गुरुदेव का संवाद सिर्फ उन्हीं से है। जो इस संवाद में अपनी भागीदारी चाहते हैं। उन्हें साधक बनना ही होगा। अन्यथा गोस्वामी तुलसी बाबा के शब्दों में उनकी स्थिति कुछ ऐसी होगी-

करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिर आवइ समेत अभिमाना। जो बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निन्दा करि ताहि बुझावा॥

अर्थात्- इस योग कथा के सरोवर में उनसे स्नान और जलपान तो किया नहीं जाता। वह इसके पास जा करके भी खाली हाथ अभिमान सहित लौट जाते हैं। यदि उनसे कोई पूछता है कि यह योग कथा कैसी है, तो वे इसकी अनेक तरह से निन्दा करके उसे समझाते है।

गोस्वामी जी महाराज आगे कहते हैं-

सकल विघ्न व्यापहिं नहि तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहि जेही॥

जो साधक हैं- जिन पर भगवान् की कृपा है, उन्हें कोई विघ्न नहीं सताते हैं। उन्हें इस योग कथा को समझने में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी। उनकी जाग्रत् आत्मचेतना योग के रहस्यों को बड़ी ही आसानी से ग्रहण कर लेगी। ऐसे साधकों को प्रतिमाह बड़ी ही बेसब्री-बेचैनी से अन्तर्यात्रा विज्ञान की पंक्तियों की प्रतीक्षा रहती है।

उन्होंने पिछली कड़ी में अभ्यास क्या है, इसके बारे में पढ़ा था। चित्त की स्थिरता के लिए प्रयास करना अभ्यास है। इस अभ्यास की बड़ी महिमा है। जीवन में सभी कुछ सीखना-जानना इसी के सहारे होता है। इसी के बल-बूते मूढ़, प्रवीण होते हैं। अनगढ़, सुगढ़ बन जाते हैं। विकृति-परिष्कृति व संस्कृति में बदलती है। अभ्यास से जिन्दगी में ऐसे-ऐसे चमत्कार होते हैं, जिन्हें देखकर लोग दाँतों तले अंगुली दबाने के लिए मजबूर होते हैं। इस सच्चाई के बावजूद अनेकों को अभ्यास से शिकायतें भी हैं। उनका कहना है कि इतने सालों से अभ्यास कर रहे हैं, पर मेरे जीवन में वैसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसकी उम्मीद थी। सालों-साल साधना करने के बावजूद, सालों तक गायत्री जपने के बावजूद जिन्दगी में कोई चमत्कारी परिवर्तन नहीं हुए। तब क्या अभ्यास की महिमा गलत है अथवा फिर साधना की विधि में कोई दोष है।

इस जिज्ञासा के समाधान में महर्षि पतंजलि कहते हैं कि न तो अभ्यास की महत्ता में कोई सन्देह है और न ही गायत्री महामंत्र की साधना या कोई योग विधि में कोई दोष है। बात सिर्फ इतनी सी है कि अभ्यास ठीक तरह से किया नहीं गया। अभ्यास किस तरह से किया जाय इसकी चर्चा महर्षि अपने अगले सूत्र में करते हैं-

स तु दीर्घकालनैरर्न्तय सत्काराऽऽसेवितो दृढ़भूमिः॥ - 1/14

शब्दार्थ- तु= परन्तु, सः= वह (अभ्यास), दीर्घकालनैरर्न्तय सत्काराऽऽसेवितः= बहुत काल तक निरन्तर (निरन्तर) और आदरपूर्वक (श्रद्धा-निष्ठ के साथ) साँगोपाँग सेवन किया जाने पर, दृढ़भूमि= दृढ़ अवस्था वाला होता है। यानि कि- बिना किसी व्यवधान के श्रद्धा-भरी निष्ठा के साथ लगातार लम्बे समय तक इसे जारी रखने पर वह दृढ़ अवस्था वाला हो जाता है।

महर्षि पतंजलि के अनुसार अभ्यास की सफलता के लिए चार चीजों का होना जरूरी है, इनमें पहली है- 1. लम्बा समय, दूसरी है 2. निरन्तरता, तीसरी है- 3.भाव भरी श्रद्धा और चौथी है 4. दृढ़ निष्ठ। साधना अभ्यास में यदि ये चार तत्त्व जुड़े हों तो अभ्यास चमत्कारी परिणाम उत्पन्न किए बिना नहीं रहता। जिन्हें अपने अभ्यास के परिणाम से शिकायत है, उन्हें महर्षि के इस कथन के प्रकाश में आत्मावलोकन व आत्मसमीक्षा करनी चाहिए। वे अवश्य ही यह पाएँगे कि उनके जीवन में कहीं न कहीं किसी तत्त्व की कमी है।

अक्सर देखा जाता है कि लोग शुरुआत तो बड़े उत्साह के साथ करते हैं। बड़ी उमंग-उल्लास से अपनी साधना का प्रारम्भ करते हैं। बाद में महीने-दो-महीने, साल दो साल या ज्यादा से ज्यादा पाँच-छः साल में इसे छोड़ बैठते हैं। जो लोग दीर्घकाल तक साधना जारी भी रखते हैं, उनमें प्रायः निरन्तरता का अभाव होता है। होता यह है कि एक महीने मन लगाकर साधना की, बाद में सब कुछ छूट गया। फिर एकाएक मन में उत्साह उमड़ा और दुबारा शुरू हो गए। पर इस बार दो-तीन महीने में थक कर रुक गए। यही सिलसिला जीवन पर्यन्त चलता रहता है। रुक-रुक कर चलना, थक-थक कर रुकना, इस तरह से साधना अभ्यास कभी भी सफल नहीं होता है। साधना की अविराम गति में लय का संगीत होना चाहिए।

जो साधक किसी तरह अपनी साधना में दीर्घकाल और निरन्तरता को बनाए रखते हैं, उनमें भावभरी श्रद्धा एवं अडिग निष्ठ की कमी रह जाती है। बार-बार मन में सन्देह एवं चित्त में व्यग्रता पनपती रहती है। पता नहीं यह साधना सही है भी या नहीं। पता नहीं साधना का पथ दिखाने वाले गुरु ठीक भी हैं या नहीं। पता नहीं मुझे मंजिल मिलेगी भी या नहीं। इस तरह से डगमगाती श्रद्धा और चंचल निष्ठ, साधक और उसकी साधना को कहीं भी नहीं पहुँचने देती। वह प्रत्यक्ष में क्रिया तो करता रहता है पर भाव और विचारों की कमजोरी के कारण उसकी साधना सदा प्राणहीन और बलहीन बनी रहती है।

साधना के अभ्यास में बल और प्राण कैसे आएँ? इसका उत्तर स्वयं परम पूज्य गुरुदेव का अपना जीवन है। चौबीस वर्षों का दीर्घकाल, उसमें सदा बनी रहने वाली तप की निरन्तरता, सद्गुरु और गायत्री मंत्र पर गहन भाव श्रद्धा एवं अविचल अडिग निष्ठ ने ही उन्हें महासाधक और महायोगी होने का गौरव दिलाया। गुरुदेव अपनी चर्चा में कहते थे कि मेरे लिए गायत्री महामंत्र, गायत्री माता और अपनी मार्गदर्शक सत्ता में कभी कोई अन्तर नहीं रहा। गायत्री महामंत्र के 24 अक्षर ही मेरे जीवन सर्वस्व थे और हैं। अपनी अविराम साधना में पल-पल इनमें मैंने अपने प्राण अर्पित किए हैं। यही है आदर्श मानदण्ड साधना के अभ्यास का। बिना थके, बिना रुके, समर्पित भावनाओं के साथ साधना का अभ्यास करते जाना चाहिए।

गायत्री महामंत्र की साधना के सम्बन्ध में गुरुदेव की एक बात और मनन योग्य है। वह कहते थे- गायत्री साधना के चमत्कार अनुभव करने हैं- तो मन को इधर-उधर मत भटकावों, अधिक नहीं तो अनुष्ठान के नियमों का पालन करते हुए 24-24 हजार के अनुष्ठान करते रहो। समर्पित भाव श्रद्धा के साथ की गई निरन्तर, निष्ठापूर्वक और लम्बे समय की साधना के परिणाम में गायत्री महामंत्र तुम्हें सब कुछ दे देगा। इस साधना में भाव श्रद्धा कैसी हो इस बारे में गोस्वामी जी महाराज के वचन है-

पुलक गात हिय सिय रघुबीरु। जीह नाम जप लोचन नीरु॥

भावना से पुलकित शरीर, हृदय में आराध्य की छवि, जिह्वा से मंत्र जप, और नयनों में भाव बिन्दु। महातपस्वी भरत की साधना के प्रसंग में कही गयी चौपाई गायत्री साधकों के लिए भी प्रासंगिक है। साधना के इस अभ्यास की पूर्णता के लिए वैराग्य की भी आवश्यकता है। इसकी व्याख्या महर्षि के अगले सूत्र में है, जिसे साधक अगले महीने पढ़ सकेंगे।


कृति हमेशा के लिए अमर बना गई(kahani)

तुलसीदास पत्नी के प्रति आशक्तिवश आतुर हो उसके नैहर पहुँच गए। विवेक इतना खो बैठे कि उससे छिपकर मिलने का प्रयास किया। धिक्कारते हुए वह कह उठी-

हाड़-माँस की दे हमम, तापर जितनी प्रीति। तिसु आधी जो राम प्रति, अवसि मिटिहिं भवभीति॥

माँस-हड्डियों से बनी इस काया पर तुम्हारी जितनी आशक्ती है, उससे आधी भी यदि राम के प्रति होती तो भव-बंधन से ही छूट जाते। यही बात उनके अंत-करण को छू गई तथा वे वहाँ से चले आए। जीवन को मोड़ लिया। अंतः का बोध हुआ और वे तुलसीदास बन गए। रामचरित्र की लेखनी द्वारा उन्होंने जन-जन तक पहुँचाया और ऐसी समग्र विचार-क्राँति कर सकने में सफल हुए, जिसने सारे विश्व को राम अवतार के माध्यम से आध्यात्मिक शिक्षा दी। उनकी कृति उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए अमर बना गई।


गुरुगीता-12 - शिवभाव से करें नित्य सद्गुरु का ध्यान

गुरुगीता सद्गुरु की महिमा का गायन है। सद्गुरु ही वह परम ज्योति है, जो मानव जीवन के अन्धेरे को दूर करती है। इसी के दिव्य प्रकाश से मानव चेतना प्रकाशित होती है। मानव को महामानव, देवमानव बनाते हुए उसे अयमात्मा ब्रह्म की अनुभूति देने वाले कृपालु सद्गुरु ही है। उन्हें नमन प्रभु को नमन है। गुरु नमन की भाव भरी साधना से जीवन के सभी तत्त्व, सभी सत्य अनायास ही सहज सुलभ हो जाते हैं। नमन-साधना की यह प्रक्रिया सहज-सुलभ होते हुए भी परम-दुर्लभ है। इसमें दुर्लभता उस गुरु तत्त्व के बोध की है, जो गहन-श्रद्धा से ही मिल पाता है। श्रद्धा परिपूर्ण और परिपक्व न हो तो सद्गुरु को सामान्य मानव समझने की भूल होती रहती है। श्रद्धा और समर्पण की सघनता में ही यह रहस्य समझ में आता है कि गुरुदेव मूर्त महेश्वर हैं। गुरु चेतना को नमन ही ब्राह्मी चेतना को नमन है।

पिछली गुरु भक्ति कथा में सद्गुरु के अनुरागी शिष्यों को इसकी अनुभूति कराने की चेष्टा की गई थी। इसमें यह बोध कराया गया था कि गुरुतत्त्व, परमात्म तत्त्व एवं सृष्टि तत्त्व अलग-अलग नहीं हैं। जिस परम सत्य के कारण जगत सत्य भासता है, वह गुरुवर के सिवा अन्य कुछ भी नहीं हैं। जिनके आनन्द से जगत आनन्द से आपूरित होता है- वे सच्चिदानन्द गुरुदेव ही हैं। जिनके प्रेम के कारण सभी में प्रीति की अनुभूति होती है, वे भावमय भगवान् सद्गुरु ही हैं। जिनकी चेतना से विश्व चेतन है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाएँ जिनसे प्रकाशित हैं, सद्गुरु ही वह परम चेतन तत्त्व हैं। जिनके द्वारा ज्ञान मिलने से समस्त भेद दृष्टि समाप्त हो जाती है, वे सदाशिव गुरुदेव ही हैं। उनकी कृपा से ही ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति होती है। ऐसे सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, परम करुणामय सद्गुरु को छोड़कर भला और किसे नमन करें।

गुरु नमन की यह महिमा अनन्त और अपरिमित है। इसका विस्तार असीम है। इसके अगले क्रम को गुरुगीता के महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् महेश्वर जगन्माता भवानी से कहते हैं-

यस्य कारणरुपस्य कार्यरुपेण भाति यत्। कार्यकारणरुपाय तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ 41॥

नानारुपम् इदं सर्वं न केनाप्यस्ति भिन्नता। कार्यकारणता चैव तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ 42॥

यद्ध्रिंकमलद्वंद्वं द्वंद्वतापनिवारकम्। तारकं सर्वदाऽऽपद्म्यः श्रीगुरुं प्रणमाम्यहम्॥ 43॥

शिवे क्रुद्धे गुरुस्राता गुरौ क्रुद्धे शिवो न हि। तस्मार्त्सवप्रयत्नेन श्रीगुरुं शरणं व्रजेत्॥ 44॥

वन्दे गुरुपदद्वन्द्वं वां्मनश्चित्तगोचरम्। श्वेतरक्तप्रभाभिन्नं शिवशक्त्यात्मकं परम्॥ 45॥

सद्गुरु नमन के इन महामंत्रों में जीवन साधना का सार समाहित है। भगवान् सदाशिव की वाणी शिष्यों को बोध कराती है- कि ब्राह्मी चेतना से एकरूप गुरुदेव इस जगत् का परम कारण होने के साथ ही कारण रूप यह जगत् भी हैं। वे ही महाबीज हैं और वे ही महावट हैं। ऐसे कार्य-कारण रूपी सद्गुरु को नमन है॥41॥ इस संसार में यद्यपि ऊपरी तौर पर सब जगह भेद व भिन्नता दिखाई देती है। परन्तु तात्त्विक दृष्टि से ऐसा नहीं है। इस दृष्टि से तो कार्य-कारण की परमात्म चेतना के रूप में गुरुदेव ही सर्वत्र व्याप्त हैं। ऐसे सर्वव्यापी सद्गुरु को नमन है॥42॥ जिनके दोनों चरण कमल शिष्य के जीवन में आने वाले सभी द्वन्द्वों, सर्व विधि तापों और सब तरह की आपदाओं का निवारण करते हैं। उन श्री गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ॥43॥ भगवान् भोलेनाथ स्वयं कहते हैं कि यदि शिव स्वयं क्रुद्ध हो जाएँ तो भी शिष्य का त्राण करने में सद्गुरु समर्थ हैं। परन्तु यदि गुरुदेव रुष्ट हो गए तो महारुद्र शिव भी उसकी रक्षा नहीं कर सकते। इसलिए सब तरह की कोशिश करके श्री गुरु की शरण में जाना चाहिए॥44॥ श्री गुरु के चरणों की महिमा मन-वाणी, चित्त व इन्द्रिय ज्ञान से परे है। श्वेत-अरुण प्रभा युक्त गुरु चरण कमल परम शिव व परा शक्ति का सहज वास स्थान हैं उनकी मैं बार-बार वन्दना करता हूँ॥45॥

गुरु नमन के इन महामंत्रों के भाव को सही ढंग से वही समझ सकते हैं, जिन्हें इस सत्य की अनुभूति हो चुकी है कि सद्गुरु चेतना एवं ब्राह्मी चेतना सर्वथा एक हैं। अपने गुरुदेव कोई और नहीं स्वयं देहधारी ब्रह्म हैं। इन महामंत्रों की व्याख्या को और अधिक सुस्पष्ट ढंग से समझने के लिए एक सत्य घटना का उल्लेख करना सम्भवतः अधिक उपयुक्त होगा। यह घटना बंगाल के महान् सन्त विजयकृष्ण गोस्वामी एवं उनके शिष्य कुलदानन्द ब्रह्मचारी के सम्बन्ध में है। महात्मा विजयकृष्ण गोस्वामी योग विभूतियों से सम्पन्न सिद्ध योगी थे। उनका सन्त जीवन अनेकों सन्तों व महान् देश भक्तों के लिए प्रेरक रहा है। उनके शिष्यों ने न केवल साधना जीवन में आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ अर्जित की, अपितु कइयों ने राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी निभायी। इन शिष्यों में कुलदानन्द ब्रह्मचारी उनके ऐसे शिष्य थे, जिन्होंने अपने तप और योग साधना से न केवल स्वयं को बल्कि अनेकों के जीवन को प्रकाशित किया।

कुलदानन्द ब्रह्मचारी ने अपनी डायरी में कई रहस्यमय साधना प्रसंग की चर्चा की है। ऐसी एक चर्चा उनके जीवन के उस कालखण्ड की है, जब वह गहरे साधना संघर्ष से गुजर रहे थे। काम वासना का प्रबल वेग उनके अन्तःकरण में रह-रहकर उद्वेग करता था। समझ में नहीं आता क्या करें? कैसे निबटे इस काम रूपी महाअसुर से। हारकर उन्होंने अपनी विकलता गुरुदेव से निवेदित की। अपनी व्यथा कहते हुए वह बिलख-बिलख कर रो पड़े। उनके आँसुओं से महात्मा विजय कृष्ण गोस्वामी के चरण भीग गए। उनकी इस विह्वलता से द्रवित होकर गोस्वामी जी ने उठाकर ढाँढस बंधाया और कहा- पुत्र! तुम रोते क्यों हो? गुरु के रहते उसके शिष्य को असहाय अनुभव करने की कोई जरूरत नहीं है। अपने सद्गुरु के रहते हुए यदि कोई शिष्य विवश अनुभव करता है तो उसके दो ही कारण हो सकते हैं, या तो उसका शिष्यत्व सच्चा नहीं है अथवा उसके गुरु की चेतना अभी भगवान् से एकाकार नहीं हुई है।

अपनी बातों को कहते हुए विजयकृष्ण गोस्वामी उठ कर खड़े हुए और दीवार पर लगी अलमारी से अपनी एक छोटी फोटो कुलदानन्द को थमाई। और बोले- बेटा! तुम शिव भाव से इस फोटो की नित्य पूजा करना। तुम्हें अपने जीवन की आन्तरिक व बाह्य आपदाओं से सुरक्षा मिलेगी। फोटो लेकर कुलदानन्द जी अपने निवास स्थान पर आ गए। और नित्य प्रति गुरुदेव के चित्र का पूजन करते हुए अपनी साधना में विलीन हो गए। साधना काल में ध्यान के पलों में एक दिन उन्हें अंतर्दर्शन हुआ कि सुषुम्ना नाड़ी में अपनी चेतना के एक अंश को प्रविष्ट कर गुरुदेव उनकी चेतना को ऊपर उठा रहे हैं। गुरु कृपा से उसी क्षण उनकी अन्तर्चेतना काम विकार से मुक्त हो गई। वह लिखते हैं कि फिर कभी उन्हें काम का प्रकोप नहीं हुआ।

इन्हीं दिनों उन्हें एक अन्य अनुभव भी हुआ। एक दिन साधना करते समय उनके कमरे की छत गिर पड़ी। जिस ढंग से छत गिरी उस तरह उन्हें दबकर मर जाना चाहिए था। परन्तु आश्चर्यजनक ढंग से जिस स्थान पर बैठे थे, उस स्थान पर छत का मलबा अधर में ही लटका रह गया। गुरु कृपा को अनुभव करते हुए पहले वह उठे, फिर गुरुदेव के चित्र को उठाया, और बाहर आ गए। इसी के साथ पूरी छत भी गिर गयी। साथ ही ध्यान आया उन्हें गुरुदेव का कथन जो उन्होंने फोटो देते हुए कहा था- पुत्र! मेरा यह चित्र तुम्हें आन्तरिक व बाह्य विपत्तियों से बचाएगा। और सचमुच ऐसा ही हुआ। गुरु कृपा से शिष्य को सब कुछ अनायास ही सुलभ हो जाता है। शिष्य वत्सल गुरुदेव के स्वरूप के बोध का यह क्रम अगले अंक में भी जारी रहेगा। तब तक शिष्यगण श्रद्धा भाव से सद्गुरु के नमन की साधना करते रहें।


स्वामी रामतीर्थ (kahani)

अमेरिका की यात्रा के दौरान एक व्यक्ति जहाज में स्वामी रामतीर्थ से ज्ञान-ध्यान की चर्चा कर रहा था। उतरते समय उसने सामान्य शिष्टाचार से पूछा, “आप कहाँ ठहरेंगे? आपके मेजबान का पता क्या है? समय मिला तो आपसे संपर्क का प्रयत्न करूंगा।”

स्वामी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “अमेरिका में मेरा एक ही मित्र है और वह हैं आप।” व्यक्ति चकित रह गया। साथ ही स्वामी जी के आत्मविश्वासपूर्ण सौजन्य से प्रभावित भी कम नहीं हुआ। उसने स्वामी जी को साथ ले लिया। अपने घर रखा और जब तक अमेरिका में ठहरे, तब तक उनके लिए आवश्यक सामग्री जुटाता रहा।


परमवंदनीया माताजी की मातृवाणी - गुरु को वरण करके तो देखिए

(परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण की अवधि में गुरुपूर्णिमा 2/8/75 पर दिया गया प्रवचन )

गायत्री मंत्र हमारे साथ साथ -

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न प्रचोदयात्।

हमारे आत्मीय परिजनों ! आज का यह महान पर्व आत्मबोध का पर्व है, आत्मचिंतन का पर्व है। यह साधारण नहीं, असाधारण है। इसको गुरुपूर्णिमा का पर्व कहा गया है। अर्थात् उसका दिन जिसने कि सारी जिंदगी राह दिखाई। यह आज का पर्व है।यों तो यह व्यासपूर्णिमा भी है। व्यास जी ने अठारह पुराण लिखे थे। इस व्यासपूर्णिमा पर अपने उन्हीं व्यास जी का पूजन किया, लेकिन यह गुरुपूर्णिमा भी है। आज के महान पर्व पर हम उनका चिंतन करते है, जिन गुरुओं के अनुदानों से शिष्यों की झोली भर दी गई। उनको महान बना दिया गया। यह वही महापर्व है।

दोहरी भूमिका

आपको मैं आज की ही एक घटना सुनाती हूँ और यह कह सकती हूँ कि किस तरह अनायास ही वह अंजाम और वह जिम्मेदारी मुझे सौंप दी गई। आज सुबह से ही मैं गहन चिंतन उस जिम्मेदारी की ओर है, जो मुझको सौंपी गई है, लेकिन वह परोक्ष रूप से मेरे ऊपर आ गई है, मेरे कंधों पर आ गई हैं। आज में चिंतन में डूब गई कि अभी तक तो मैं माँ ही थी। इतने दिन तक हर व्यक्ति से यही कहते थे कि आशीर्वाद लेना है तो माताजी के पास जाइए, यज्ञ भस्म ले जाइए। आशीर्वाद माँगना है तो माताजी के पास जाइए और काम करना हैं तो मेरे पास आइए, लेकिन आचार्य जी ने आज जो शब्द कहा है,मैं समझती हूँ, वह शायद पहली बार कहा हैं। उन्होंने हमेशा यही कहा हैं कि जो मैं हूँ, वही माताजी हैं और जो माताजी हैं, वही मैं हूँ। ऊपर हम दो ही जाते है-मैं जाती हूँ और एक लड़का जाता है। आज जब वह प्रणाम करने गया तो उन्होंने यह कहा कि प्रणव ! गुरु तो नीचे बैठा है, तुम उसको प्रणाम करो। खैर, मैंने तो उस लड़के को हँसी में टाल दिया,लेकिन तभी से मैं उसी गहन चिंतन में ऐसी डूब गई हूँ कि अभी तक उसी में हूँ कि क्या मैं यह जिम्मेदारी निभा पाऊंगी।

बेटे! मुझे अंदर से विश्वास तो है कि उन्होंने जो भी निर्देश मुझे सौंपा है, मैंने उसे पूरा किया है और जी जान से पूरा किया है। इसे भी पूरा करूंगी मरते दम तक। मैं कभी यह नहीं कहलवा सकती कि गुरुजी ऐसे थे और माताजी ऐसी हैं। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, हम दोनों एक हैं और एक ही हैं। हम पूरा करके ही दिखाएँगे। बेटे, मेरी तो झोली अनायास ही भर गई, किससे? जिम्मेदारियों से।इनका हम निर्वाह करेंगे। उन्होंने इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है तो इसलिए कि उसके लायक ये कंधे मजबूत भी हैं कि नहीं और नहीं हैं तो उनको मजबूत किया जाए और करना पड़ेगा।यह आवश्यक है।

गुरु के अनुदान

बेटे! आज मैं अपना हवाला दे रही थी। मेरे मन में यह बात रुकी नहीं सो मैंने अपना दिल हलका कर लिया। बेटे! यह जो पर्व है, इसमें अनायास ही अनुदान मिलता है और इतना मिलता है कि सँभाले नहीं सँभलता। मैं किन किनकी बात कहूँ आपसे। मैं रामकृष्ण परमहंस की बात कहना चाहती हूँ आपसे, जिन्होंने कि अपने विवेकानंद की झोली को सर दिया और वह निहाल हो गया। आया था नौकरी माँगने के लिए कि हमको नौकरी चाहिए, लेकिन यह क्या मिल गया! उनका नाम विवेकानंद तो पीछे पड़ा था, पहले वे नरेंद्र थे। रामकृष्ण परमहंस ने अपनी शक्ति को हस्ताँतरित कर दिया, दे दिया और वह महान हो गया। जो कुछ नहीं जानता था, वह सब कुछ जानने लगा। गुरु की शक्ति को वह जान गया और उसे सब कुछ मिल गया। देश में नहीं, विदेशों में, अमेरिका में शून्यवाद के ऊपर कोई बोल नहीं सकता था, वहाँ उसे बोलने के लिए कहा गया। उस धर्म महासभा में लोगों ने कहा कि हिंदुस्तान का यह लड़का क्या बोलेगा! उसका मजाक उड़ाने के लिए बस यों ही उससे कह दिया गया था कि शून्य पर बोलो, देखें आप में कितनी शक्ति है।

विवेकानन्द ने अपने गुरु का स्मरण किया कि गुरुदेव, आज परीक्षा की घड़ी आ गई है, कहीं आपके बच्चे की इज्जत न चली जाए। पीछे से पीठ थपथपा दी गई और कहा गया कि बेटे! तू यह तम समझना कि हमारा गुरु इस दुनिया में नहीं है। हम तेरे पास हैं और तू बोलता चला जा। विवेकानंद ने कमाल कर दिया। उसको जहाँ पंद्रह मिनट या आधा घंटा बोलने को मिला था, वहाँ वह घंटों बोलता चला गया। तालियाँ बजती रहीं, लोग कहते रहे कि अभी और बोलिए। यह सब कहाँ से आ रहा था? यह उस गुरु की कृपा है और उसका अनुदान है। वह चाहे तो सब कुछ बना सकता है। वह किसी की भी झोली खाली नहीं जाने देता। चाहे दूसरों की पीड़ा स्वयं ही क्यों न झेलनी पड़े, वह हँसता हुआ स्वयं झेल जाता है।

कहते हैं कि रामकृष्ण परमहंस को अंतिम दिनों में गले का कैंसर क्यों हुआ था? क्या इसलिए कि वे कोई संयम नहीं रखते थे? नहीं बेटे, ऐसी बात नहीं है। वे तो संत थे। उन्होंने दूसरों के दुःख-कष्टों को, उस जहर को खुद पिया और अपने बच्चों को उससे निकाला अर्थात् अपने शिष्यों की रक्षा की। बच्चों का, लड़कों का संबोधन जहाँ कहीं भी आएगा, वह शिष्यों के लिए आएगा। मुझसे शिष्य शब्द कहा नहीं जाता, इसलिए बार-बार मैं उस शिष्य शब्द को कहना नहीं चाहती हूँ। मेरे मुँह से बेटा, बच्चे और लड़का शब्द ही निकलता है। बच्चे एक-दो नहीं, असंख्य होते हैं, इसलिए अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि गुरु की कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है। गुरु की कृपा क्या होती है, चलिए मैं बताती हूँ। एक चाणक्य थे, जिनका कि एक बार किसी राजा ने अपमान कर दिया। उन्होंने सोचा कि क्या किया जाए? वैसे तो संत किसी से अपमान का बदला नहीं लेता है, लेकिन उन्होंने उसके सामने एक दासीपुत्र को लाकर खड़ा कर दिया। जो, लड़का कुछ नहीं जानता था, उसको खड़ा कर दिया और उसके सिर पर हाथ रख दिया। उन्होंने कहा कि देख मैंने तुझे शक्ति दे दी है और अब मैं तुझे सम्राट बना दूँगा। उसने कहा कि मैं तो जमीन पर पड़ा हूँ! तो एक नाचीज सिपाही हूँ, सम्राट कैसे बन सकता हूँ! तो क्या तुझे मेरे ऊपर विश्वास नहीं है, मैं तुझे सम्राट बनाकर ही रहूँगा। और उन्होंने उसे सम्राट बना दिया।

बेटे! यह होती है गुरु की कृपा और ये होते हैं गुरु के अनुदान। आप तो केवल उस भौतिक चीज को ही देखना चाहते हैं और मैं उसी का हवाला भी दूँगी। अगर कहीं आप उन सूक्ष्म शक्तियों की ओर चले जाएँ, जिन शक्तियों को लेकर व्यक्ति भगवान हो जाता है, हिम्मत वाला हो जाता है और ऐसे-ऐसे कठिन कार्य करता है, जिनकी वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था। इसमें किसका हाथ है? यह गुरु का हाथ है और यह गुरु का अनुदान है, यह उनकी कृपा है, जो भौतिक चीजें भी देता है और आध्यात्मिक भी। वह भौतिक विपदाओं से भी निकालता है और अनायास ही वे उपलब्धियाँ भी उसको देता है, जिनको पाकर वह निहाल हो जाता हैं

छत्रपति और समर्थ

शिवाजी को छत्रपति शिवाजी किसने बनाया था? समर्थ गुरु रामदास ने। उन्होंने उसे भवानी तलवार दे दी थी और तिलक लगाकर कहा था- जा बेटे, तू विजय पाएगा। उसने कहा कि मैं एक नाचीज, नन्हा-सा बालक, कद-काठी का छोटा, जिसके शरीर में जान नहीं, भला मैं कैसे विजय पा पाऊँगा! समर्थ गुरु रामदास ने कहा, बेटे, मैं परदे के पीछे रहूँगा और काम तू करेगा। श्रेय तू लेगा और कृपा मेरी चलेगी। मैं तेरी पीठ थपथपाऊँगा, तेरे पैरों में शक्ति दूँगा और चलेगा तू। चल, संग्राम में विजेता बन। हिम्मत वालों के तरीके से, दिलेरों के तरीके से आगे-आगे चल, बुजदिलों के तरीके से नहीं। अध्यात्म दिलेरों का है, कायरों का नहीं है, भगोड़ों का नहीं है। जो जरा’-जरा सी दिक्कतों को देखकर अपने बढ़े हुए कदम पीछे हटा लेते हैं, वे कौन हैं? भगोड़े हैं। और जो पहाड़ों को चकनाचूर कर देते हैं, वे कौन होते हैं? वे दिलेर होते है, हिम्मत वाले होते है, साहसी होते हैं। जो साहसी होते हैं, वे ही अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं और जो साहसी नहीं होते हैं, बुज़दिल होते हैं, जो कठिनाइयों से डर जाते हैं, वे लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते हैं।

जिन्हें कठिनाइयों ने घेर लिया है या वे स्वयं घिर गए हैं, फँस गए हैं, उनको कोई रास्ता नहीं दिखता। रास्ता दिखाने वाला अगर कहता भी है कि बेटे, इधर से चलिए, यह रास्ता है, लेकिन वह चलता नहीं है तो फिर गुरु किस प्रकार से देगा! बेटे, मिलेगा आपको भी। आज गुरुपर्व है। यहाँ से कोई भी खाली हाथ नहीं जाने वाला है। मैंने तो उसी दिन, जब आप लोग मिले थे, तभी कहा था कि यह वह दरवाजा है, जिससे कभी किसी की झोली आज तक खाली नहीं गई है और यह वायदा है हमारा कि कभी खाली जाएगी भी नहीं, चाहे अपनी झोली में एक नया पैसा ही क्यों न पड़ने वाला हो । हम अपना धर खाली कर देंगे, लेकिन अपनी झोली हम जरूर भरेंगे । हम फिर कमा लेंगे ।अपने लिए हम माँगेंगे नहीं, लेकिन आपके लिए मांगेंगे और हमेशा आपकी झोली भरते रहेंगे । हमारा यह आपसे पूरा वायदा है ।

एहसान नहीं, कर्तव्य

हमारे जितने परिजन यहाँ बैठे हुए है, उनमें से कितने ऐसे हैं जो किन -किन कठिनाइयों में से, जिंदगी और मौत में से निकलकर आए है। क्या वे कह सकते हैं या सोच सकते हैं कि इसके पीछे किसका हाथ हैं, जिसने आपकी उँगली पकड़ी है।और आपने उनका पल्ला पकड़ा है और उन्हीं के हो गए हैं । चलिए , यह उनकी महानता है कि आज तक उन्होंने अपने मुंह से यह नहीं कहा कि मैंने फलाँ व्यक्ति की मदद की है। बेटे, यह उनकी उदारता है जो उनने नहीं कहा, लेकिन आज मैं कहती हूँ कि उनके यहाँ रहते हुए किन-किन संकटों में से लोगों को निकाला गया है, उनको उबारा गया है। वे गुरु हैं और आप बच्चे हैं, आपको मिलना ही चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि आपके ऊपर कोई एहसान किया गया है, नहीं बेटे, आपके ऊपर कोई एहसान नहीं किया गया है। हम इसको अपना फर्ज, अपना कर्त्तव्य और अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और उसमें से आपको निकालने का प्रयास करते हैं और कई बार तो निकाल ही देते हैं। चलिए, मैं आपको एक घटना सुनाती हूँ।

अभी दो महीने हुए, यहाँ एक व्यक्ति आए और उन्होंने यह कहा कि माताजी! आप हमको नहीं जानती और हम आपको नहीं जानते। हाँ बेटे, कई बार लड़के आते हैं और कई-कई साल हो गए उनको आते, फिर भी मैं पूछ बैठती हूँ कि बेटा! तू कहाँ से आया है? तू क्या काम करता है? नाम से तो जानती हूँ लेकिन कई बार चेहरा भूल जाता है। मैंने उससे कहा, हाँ बेटे, ऐसा ही है, तुम बताओ, क्या कहना चाहते हो? उन्होंने कहा कि देखिए, यह चेहरा आज दिखाई पड़ रहा है, यह गुरुजी का और आपका दिया हुआ कैसे हो सकता है! बता तो सही।

उन्होंने कहा कि माताजी, मेरी गाड़ी पर उग्रवादियों ने सत्तर गोलियाँ चलाई, जिनमें मेरे तीन व्यक्ति मारे गए। उनमें मेरा बॉडीगार्ड भी था और चालक था तथा एक और व्यक्ति था, लेकिन मैं बच गया। उस समय मैं यही सोच रहा था कि गुरुजी से मुझे जुड़े हुए अभी थोड़े ही दिन हुए हैं और अभी मैंने उस पवित्र भूमि को आंखों से भी नहीं देखा। अब थोड़े दिन बाद ही उस पवित्र भूमि के दर्शन करने जाऊँगा, जहाँ से मुझे प्रेरणा मिली है। जहाँ से मुझे मार्गदर्शन मिला है और यह सब अनदेखे ही मिला है। उसको मैं प्रणाम करने जाना चाहता था। कहते हैं कि गुरुजी तो नहीं मिलते, तो क्या मुझे माँ भी जीवन में नहीं मिलेगी। बेटे, उसको एकाएक ऐसा महसूस हुआ, जैसे दोनों ओर उसके हम दानों बैठे हैं और सिर पर हाथ रखे हैं।

मैंने कहा कि बेटे, यह तेरा विश्वास है। भगवान ने तुझे बचा लिया, हम तो क्या थे, हम औरों को क्यों न बचा लें जो इतनी जानें जा रही हैं। बेटे! तेरी जान बच गई, भगवान करे, तू दीर्घायु हो, लेकिन बेटे अब तू बच गया है तो ऐसा मत करना कि बीवी और बच्चों के लिए ही अपनी सारी जिंदगी खपा डाले। जिस गुरु ने वहाँ जाकर तुझे बचाया, इतना कष्ट उठाया, जहाँ गोलियों से तुझे भूना जा रहा था, तू मरने वाला था। तब भी तो तू अपने बीबी-बच्चों से अलग होता कि नहीं, तो आज से तू उस समाज का, उस मिशन का बेटा है और तू भाई है,अतः सेवा कर। हाँ माताजी! यही चाहता था। मैंने कहा कि वेदपाल सिंह, पहले तू यह तो बता कि क्या तू मंत्री बनना चाहता है या काँग्रेस का हरियाणा का उपाध्यक्ष या फिर तुझे मुख्यमंत्री की जगह दिला दूँ। मैंने हँसते-हँसते यों ही कह दिया। वह बोला-अरे, नहीं माताजी! मुझे नहीं चाहिए यह, और न ही यह कल्पना करके मैं आया हूँ। मैं तो केवल आशीर्वाद लेने आया हूँ। अपने देश के लिए, अपने राज्य के लिए मेरे विचार पवित्र बने रहें और अगर काई अगर कोई कष्ट-कठिनाई भी आए तो मैं उसे हँसते-हँसते झेल लूँ, बस, यही आशीर्वाद लेने आया हूँ। थोड़े ही दिन से वह जुड़ा हुआ था। जिसने यहाँ देखा भी नहीं था, बेटे! उसे जीवनदान मिल गया।

अनुदान : गुरु का फर्ज

बेटे! अभी मैं अनुदानों की बात सुना रही थी, क्योंकि यह हमारा फर्ज है। एक लड़का और था पंजाब का। शायद पंजाब या चंडीगढ़ का कोई लड़का बैठा भी हो यहाँ पर, तो उसके ऊपर मुकदमे चल रहे थे। उसका ऐसा संगीन मुकदमा था कि शायद वह जेल में पहुँच जाता और जिंदगी भर उसका उससे पीछा नहीं छूटता, क्योंकि उसका ‘बॉस’ भी उसी चक्कर में फँसा हुआ था। एक रात जब वह सोया तो उसे लगा कि मुझे दो बजे जगाया गया है और गुरुजी ने मुझे जगाया है कि चल बेटे, तू उठ, तेरा मुकदमा है और तू सो रहा है। आज तुझे पूजा-प्रार्थना नहीं करनी है क्या? मैं उठ गया। रात देर से सोया था, अतः फिर सो गया। फिर से सो गया तो ढाई बजे मुझे ऐसा मालूम पड़ा कि मैं सोता हुआ ही बैठा दिया गया और जब मैंने आँखें खोलीं तो मुझे प्रत्यक्ष गुरुजी दिखाई पड़े। जब से मैंने दीक्षा ली है, तब से जब मैं किसी भी काम को जाता हूँ तब मैं आप दोनों को प्रणाम किए बगैर घर से कभी नहीं जात। जब मैंने मुड़कर देखा तो वे कह रहे हैं कि यह बता कि यह तेरा जो मुकदमा चल रहा है तो ये जो सज्जन खड़े हैं, क्या इन्हीं की अदालत में है? मैंने निगाह उठाकर देखा तो मुझे महसूस हुआ कि क्रीम कलर की पगड़ी पहने जो एक और सज्जन खड़े हैं, उन्हीं के पास मेरा केस था। मैंने कहा कि हाँ गुरुदेव! इन्हीं के पास है। उन्होंने कहा, तो जा।

जब मेरी आँख खुल गई तो मुझे चैन नहीं पड़ा। नहीं-धोकर मैं पूजा-प्रार्थना में बैठा तो मेरा मन नहीं लगा, तो मैं गाड़ी में चल दिया। रास्ते में मुझे एक व्यक्ति मिला जो वकील था। उसने कहा कि तुम्हारा मुकदमा चल रहा है और मैं तेरा वकील हूँ। मैंने कहा कि मैंने तो आपको वकील रखा ही नहीं है, मेरा तो वकील दूसरा है और मैं निश्चिंत हूँ। मुझे और कोई वकील नहीं चाहिए। जाने कौन है, चोर है, ठग है और चाहता क्या है? मैं यह सोच रहा था कि वह चला गया। जब वह अदालत में पहुँचा तो उसने कहा कि मैं हैरत में रह गया। पहले तो मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं स्वप्न देख रहा हूँ, क्योंकि गुरुजी ने मुझे उठाया है और स्वप्न में ही मुझे दिखाया है, लेकिन अब जो मैं देख रहा हूँ कि वही क्रीम कलर की पगड़ी पहने वह व्यक्ति जज की कुर्सी पर बैठा है, जिसे कि रात में गुरुजी ने दिखाया था। बेटे! मैं तो आपसे इतना ही कहा रही हूँ, लेकिन पिछले दिन एक सज्जन और आए थे, जो उसी के कोई दोस्त थे। उन्होंने कहा कि माताजी! यही नहीं, जिस समय वह जजमेंट दे रहा था तो यह प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता था कि उसके सिर पर दो हाथ गुरुजी ने प्रत्यक्ष रखे हैं। दो हाथ प्रत्यक्ष दिखाई पड़ते थे, लेकिन चेहरा नहीं दिखता था। वह इतना जाहिल, जल्लाद और खूँख्वार जज था कि वह उसे क्यों जीतने देता, लेकिन उसने फटाफट फाइल को देखा और जैसे वह इसी के लिए उस दिन आया है, उस दिन उसने सिर्फ एक ही मुकदमा अपने हाथ में लिया था और उसमें हम विजयी हुए।

बेटे! उस मुकदमें में केवल वही नहीं जीत गया, वरन् उसका बॉस भी जीत गया। इसके बाद उसने जो खर्रा लिखा, रजिस्टर में से कोई चार पन्ने लिखे होंगे। पहले तो मैंने कोई एकाध लाइन पढ़कर उसे रद्दी की टोकरी में डालना चाहा कि तभी एक लाइन काम की दीख गई। मैंने कहा, इसे पढ़ना चाहिए। जज वाली बात को मैं जानती थी, इसलिए कहा कि यह बात ठीक है।

बेटे! मैं यह चमत्कार की बात नहीं बता रही हूँ, मैं तो यह कह रही हूँ कि ये अनुदान मिलते रहे हैं और मिलते रहेंगे। यह गुरुजी की सूक्ष्मीकरण साधना का प्रभाव है और फिर आप तो उनसे जुड़े हुए हैं, बँधे हुए हैं। यदि आपको अनुदान मिलता है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है, मिलना ही चाहिए आपको और मिलेगा भी। इसके साथ-साथ जब बिना माँगे ही हमको मिल रहा है, बिना माँगे ही अनुदानों से हमारी झोली भरी जा रही है, फिर उसकी थोड़ी-सी कीमत हम चुका दें तो क्या हर्ज है! उसकी कीमत आप तो क्या, बेटे, कभी चुकाई ही नहीं जा सकती। और उन अनुदानों की, जो जाने और अनजाने हमको प्राप्त होते रह हैं और हो रहे हैं, उनकी कीमत चुकाइए? नहीं बेटे, हजार जन्म में भी नहीं चुकाई जा सकती। हाँ, कुछ करने के लिए साहस किया जा सकता है। जो अनुदान मिले हैं, उन अनुदानों को यदि पेटी में रख दिया गया तो वे पेटी में बंद रखे रहेंगे। फिर वे किस काम आएंगे! जो अनुदान मिला है, जो जिम्मेदारी मिली है और जो रास्ता दर्शाया गया है, उस पर चलना है। निरंतर आप उस रास्ते पर चलिए। अगर आप चलेंगे तो पाएँगे कि जितना आपको मिला है, उससे और चौगुना, आठ गुना, सौ गुना और लाखों गुना मिल सकता है, लेकिन आपने तो उसको खरच कर दिया है।

अनुदान लगें लोक-मंगल में

बेटे! अनुदान जिस उद्देश्य के लिए दिया गया था, आपने उसी उद्देश्य में किया या नहीं किया? अगर आपने उसमें नहीं किया है तो मैं समझती हूँ कि वह निरर्थक चला गया और यदि लोक-मंगल में लगाया है तो मैं कहती हूँ कि लाखों गुना और करोड़ों गुना मिलने वाला है। बेटे! अपने जीवन में यही हुआ। जो कुछ भी हम बने हैं, उस महान गुरु की सत्ता ने बनाया है। चारों वेदों से लेकर एक सौ आठ उपनिषदों तक, छहों दर्शनों से लेकर अठारह पुराणों तक और आप सबकी सेवा करने तक, आखिर किसने बनाया? गुरु ने बनाया। अपने को सौंप दिया और हम निहाल हो गए। इसी तरीके से यदि आप भी अपने को सौंप पाएँ तो आप और भी ज्यादा निहाल हो सकते है। होंगे तो अभी भी, यह हमारा वायदा है। इस साल जो भी यहां से जाएँगे, आप देख लेना, मैंने कभी कहा तो नहीं है, लेकिन आज मैं हिम्मत करके कह रही हूँ, बेटे, आप सालभर के भीतर देखना कि आपकी पुनः स्थिति क्या है? आप तो भौतिक सफलताएँ चाहते है न, तो वो भी मिलेंगी, लेकिन हम उनको नाचीज समझते है। बेटे, हम जो भी आपको देना चाहते हैं, वह आध्यात्मिक शक्ति देना चाहतें हैं। यही बात मैं कल अपने लड़को से कह रही थी कि बेटे, यहाँ चार दिन के लिए आपको बुलाया गया हैं। आपकी बार विशेष अनुदान, विशेष शक्ति दी जा रही है और आपकी बैटरी चार्ज की जा रही हैं। आपको दिखाई नहीं पड़ रहा है, लेकिन बेटे आपकी बैटरी चार्ज की जा रही हैं, आपको शक्ति दी जा रही है। जो आपको लंबी यात्रा को पूरी कराएगी। आपको लंबी यात्रा पूरी करनी है और सारे जीवन आपको उस पथ पर चलना है।

एक छलाँग भर लगानी हैं

बेटे! आज के दिन हमको चिंतन करना चाहिए कि जिसने सारी जिंदगी हमारे लिए खपा डाली, हमको दे डाली उसके हाथ खाली है। उसके पास कुछ नहीं हैं, सब कुछ दे दिया। अपना खजाना खाली कर दिया। क्या आपको इन अनुदानों का मूल्याँकन किया ? अगर किया जाना है तो एक ही रूप में किया जाना है कि आपको थोड़ी-सी हिम्मत करनी है। एक छलाँग भर लगानी हैं। जैसा कि मैंने कल आपसे निवेदन किया था कि इस साल बेटे आपको हीरा बनना है हीरा कब बनता है? जबकि वह कोयले की खदान से बाहर निकलता है और कारीगर के हाथों में पड़ जाता है। कारीगर उसको तराशता है, अनेक एंगिलों से उसको बनाता है, तब उससे चमक निकलती है। उसी का नाम हीरा है, जो करोड़ों रुपये का होता है और आपकी की क्या कीमत है? अभी आपकी कीमत एक कौड़ी भी नहीं है। आप अभी मर कर जाएँगे और मिट्टी में मिल जाएँगे। जानवर की खाल भी काम आती है, परंतु इनसान की किसी काम में नहीं आती। अभी आपकी हस्ती मिट्टी में मिल जाने वाली है, लेकिन आपने अगर अपने को हीरा बना लिया तो बेटे, ऐसी कोई हस्ती नहीं है जो आपको मिट्टी में मिला दे।

बेटे, हमने जो पथ आपको दिखाया है, अगर आप उस पर चलें तो फिर आप मिट्टी में नहीं मिलेंगे। हम आप के साथ है। फिर आपका मूल्य कौड़ी का नहीं है। आपको ऊपर तो फिर करोड़ों-करोड़ों रुपये निछावर करके फेंक देंगे, वह मूल्य है आपका। हीरे का यही तो मूल्य होता है। एक करोड़ों-करोड़ों- जितने में भी बिकता होगा, जो कुछ भी उसकी कीमत होती होगी। लेकिन इंसान की कीमत कभी आँकी नहीं गई। गाँधी जी का जब देहावसान हुआ तो विदेशी लोगों ने माँग की कि जो इनका जो सर है, वह मिलना चाहिए। वे उस पर रिसर्च करना चाहते थे। ऐसे महामानव, संत और राष्ट्रपिता में खूबी क्या है? हिंदुस्तान वालों ने कह दिया, चल, हम अपने पिता का सर देंगे ? मूल्य लेंगे उसका? हमको नहीं चाहिए उसकी कीमत, चाहे वह अरबों-खरबों रुपये की ही क्यों न हों।

अंतरंग से गुरु को स्वीकार करें

बेटे! इनसान की कीमत बहुत है, यदि उसको सही दिशा मिल जाए और वह सही दिशा में चलने लगे तो। आपको सही दिशा तो मिल गई है, पर उस पर चलना आपका काम हैं कि आप सही में चलेंगे। आपने उस दिशा को स्वीकार किया है कि नहीं किया है या अंतरंग से स्वीकार किया है की नहीं है? आपने अपने गुरु को जीभ से स्वीकार किया है या अंतरंग से स्वीकार किया है? अंतरंग से किया है तो आपके गुरु आपके साथ हैं और हर समय आपके साथ हैं, चाहे वे दिखाई नहीं पड़ते हों। दिखाई नहीं पड़ते हैं क्या हुआ, शक्ल ही तो दिखाई नहीं पड़ती है लेकिन जो सारा-का-सारा विराट रूप है उनका, क्या वह आपको दिखाई नहीं पड़ता? आप इसमें झाँककर क्यों नहीं देखते? क्यों नहीं अपनी माँ की छवी में अपने गुरु को देखते? जब आपके सामने एक मौजूद है तो फिर आपने उसमें गुरु को क्यों नहीं झाँका? आप झाँकिए और उनको अपना काम करने दीजिए। आप बाध्य मत कीजिए। आप यह मत कहिए कि हम अनाथ हो गए हैं, हमको गुरुजी के दर्शन नहीं होते हैं। बेटे, आप अनाथ नहीं हैं और न ही अनाथ हो सकते है। फिर आपके मुख से यह निकल कैसे जाता है?

बेटे! आपने गुरुजी के विराट रूप को क्यों नहीं देखा? केवल शक्ल तक ही आप सीमित कैसे रह गए? क्यों नहीं पहचाना विराट स्वरूप को? आपने उन्हें अंतरंग में क्यों नहीं बैठाया? जिसने अंतरंग में बैठा लिया, बेटे, मैं कहूँगी कि वह हमारा लड़का महान है, चाहे वह किसी भी स्थिति में क्यों न हो। मैं उसको पैसे से नहीं तौलती, वरन् उसकी जीवात्मा से तौलती हूँ, क्योंकि जीवात्मा की दृष्टि से ही तो हम उनके गुरु बने हैं और ये मेरे बालक बने। बेटे! मैंने उस रोज कहा था विदाई वाले दिन कि मैं अपने राम की अपने राम की सीता हूँ। चलिए, वे भगवान थे तो मैं एक संत की, ऋषि की पत्नी हूँ। फिर बेटे,तुम्हारे गुरुजी का नाम भी तो श्रीमान है तो फिर मैं कौन हुई, सीता हुई कि नहीं? रहने दे, नाम भगवती है तो क्या मतलब, आखिर पत्नी हूँ उनकी । एक मायने में तो मैं कहती हूँ कि सीता से भी ज्यादा हूँ। वह इस नाते कि सीता के दो बच्चे थे लव और कुश,लेकिन अहा‐‐‐ यह माँ तो कैसी धन्य है! इसका कलेजा तो अपने बच्चों को देखकर और ज्यादा फूल जाता है, जहाँ लाखों-करोड़ों की संख्या में बच्चे है। इसलिए बेटे! तो मैं कहती हूँ कि शायद इस मायने में मैं भगवान की बराबरी नहीं करती, उस मायने में मैं नहीं कहती, लेकिन उस शक्ति की बराबरी जरूर कर रही हूँ कि मैंने दो बच्चों को जन्म नहीं, हजारों-लाखों बच्चों को जन्म दिया है। पिता ने दिया है और माँ ने दिया है। पिता ने दिया है सिद्धाँत से और माँ ने दिया है दुलार से।

सिद्धाँत के साथ दुलार

बेटे! उन्होंने आपको सिद्धाँत दिए हैं, प्रेरणा दी है तो दुलार मैंने भी दिया है। मेरा भी आपने सगी माँ का अधिकार है। आप न समझते हों तो मत समझिए। पर हम तो राम बादशाह हैं। स्वामी रामतीर्थ कहते थे कि ये सारा विश्व हमारा है और ये सारे बाग-बगीचे और जो बैंकें हैं, वे सब हमारी हैं। आपकी हैं,तो क्या आपकी जेब में पैसा हैं? अरे बेटे! ये ख्वाबों की दुनिया है और क्यों न देखा जाए! हमें ऊँचाई की ओर क्यों न देखा जाए! हमें ऊँचाई की ओर ही उठना चाहिए।

बेटे! मैं फिर उसी बात पर आती हूँ कि आज का यह महान पर्व है। आज यह आत्मचिंतन का पर्व है। अभी तक जितने अनुदान आपको मिले हैं और जो मिलने जा रहे हैं, आप उनका चिंतन कीजिए और उस चिंतन में डूब जाइए,सराबोर हो जाइए। आप गुरुजी में मिल जाइए और गुरुजी आप में। आप जब उनमें मिल जाएँगे तो आपको आत्मसाक्षात्कार हो जाएगा। आप जब उनको अपने में मिला लेंगे और उनमें आप मिल जाएँगे तो आपको अनुभव होगा कि गुरुजी हमारे हैं। बेटे! मुझको यह अनुभव होता है। जब मैं पहली बार यहाँ स्टेज पर आई थी तो बैठे नहीं पा रही थी। भीतर-ही-भीतर मेरी अजीब हालत हो रही थी और मुझे स्पष्ट अनुभव हो रहा था कि वे हमारे पास बैठे हैं। वे हमेशा इधर को बैठते थे और मैं उधर को बैठती थी। अभी भी देख लो, दो मसनद लगा रचो हैं। एक उनका लग रहा है और एक मेरा लग रहा है। दोनों के ही लगे हैं। गुरुजी हमेशा हमारे साथ हैं। बेटे, जब कभी मैं कहीं जाती थी तो रिक्शे में सबसे पहले वे मुझे ही बैठाते थे और कहते थे- पहले तुम बैठो, पीछे मैं बैठूँगा और उतरती भी पहले मैं ही थी । आज जब मैं गाड़ी से उतरी तो मुझे लगा कि वे मेरे पीछे उतर रहे हैं। उस समय की जो हालत थी, मैं आपको वर्णन नहीं कर सकती । यह पहला दिन था। यह देखकर बच्चे पानी लेकर भागे आए कि माताजी को क्या हो गया, क्या बात हो गई! बात कुछ नहीं हुई। मैंने अनुभव किया कि हर समय गुरुजी हमारे साथ हैं, पर उस समय वे दिखाई नहीं पड़े, मैं अकेली थी, ऐसा भी नहीं लगा, न मालूम भीतर ऐसा क्या लगा कि मैं भावनात्मक गहराई में डूबती चली गई।

बेटे! आपको उनकी शक्ल न दिखाई पड़ती हो तो क्या हुआ, वे आपने साथ हैं। यह गुरुपूर्णिमा का पर्व और यह संदेश उन्हीं का है। शब्द मेरे हैं, पर भाव प्रेरणा उन्हीं की है। फिर आज उन्होंने कहलवा ही डाला कि दोनों एक हैं। हम दोनों एक ही हो गए। बेटे, आज अनेक शुभकामनाएँ हमारे सभी बच्चों को, जो हमारे यहाँ उपस्थित हैं और जो नहीं हैं, उन सभी के लिए भी हमारी दोनों की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ और आशीर्वाद।


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एक चित्रकार ने एक सुंदर बालक का चित्र बनाया।...page 50


युगागीता- 45 - योगेश्वर का प्रकाश स्तंभ बनने हेतु भावभरा आमंत्रण

(कर्म-संन्यास -योग नामक गीता के पाँचवें अध्याय की रसमयी किस्त)

जो योगी वाह्य विषयों में अनासक्त चित से रहता है एवं सदैव ब्रह्म में ही स्थित रहता है, वह अक्षय आनंदरूपी सुख को प्राप्त होता है, यह चर्चा विगत कड़ी में की गई थी। श्रीकृष्ण कहते है कि तकलीफ यह है कि इस आनंद को व्यक्ति अज्ञानवश बहिरंग साधनों में खोजता है। पूर्णतः आत्मा में ही रमण करने वाले (ब्रह्मयोगयुक्तात्मा - 5/21) साधक भोगवादी जीवन को नकार देते है, क्योंकि वे दुःखों का कारण है। अनासक्ति योग ही आनंद व शाँति का एकमात्र राजमार्ग है, यह विगत अंक में बताया गया था। बाईसवें श्लोक में श्रीकृष्ण एक प्रकार से घोषणा ही कर देते है कि ज्ञानी, प्रज्ञावान मनुष्य क्षणिक विषयानंदों में रमण नहीं करते क्योंकि वे उसका फलितार्थ जानते है। विषयी को ये सभी सुखरूप प्रतीत होते है, पर विवेकवान पुरुष को ये आकर्षित नहीं कर पाते। पर परमपूज्य गुरुदेव ने विषयी को नर-पशु, नर-कीटक कहा है। आज के इक्कीसवीं सदी में जी रहे हर युवक करे श्रीकृष्ण योग के पथ पर चलने का आमंत्रण देते है। उपनिषदों व रामानुजाचार्य के माध्यम से विषयानंद एवं ब्रह्मानंद का तुलनात्मक विवेचन विगत अंक में दिया गया था। न तेषु रमते बुधः के माध्यम से श्रीकृष्ण ने ज्ञानियों की एक महत्वपूर्ण विशेषता की व्याख्या भी की थी । अब आगे के श्लोक व उनकी व्याख्या।

संयुक्तः सुखी नरः

श्री गीता जी का पाँचवे अध्याय का तेईसवाँ श्लोक कहता है-

शक्नोतीहैव यः सोढुँ प्राक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥

इस श्लोक का शब्दशः संधि विग्रहानुसार अर्थ हुआ- जो ज्ञानी पुरुष (यः) देहत्याग के पूर्व अर्थात् देह रहते समय (शरीरविमोक्षणात् प्राक्) इस संसार या शरीर में ही (इह एवं ) काम और क्रोध के वेग को (कामक्रोधोद्भवं वेगं)सहन करने में (सोढुँ) समर्थ होते है (शक्नोति), वे (सः) समाहित चित वाले योगी है। (युक्तः) एवं वही व्यक्ति सुखी हैं (स नरः सुखी)।

भावार्थ करें तो ऐसा बनता है- "जो साधक इस मनुष्य शरीर में , शरीर का नाश होने से पहले ही काम, क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ है, वही पुरुष योगी है (सर्वांगपूर्ण व्यक्तित्व संपन्न है) तथा वही सुखी नर है।"(4/23) ढेरों व्यक्तियों को यह भ्राँति है कि मोक्ष मृत्यु के बाद मिलता है। इस जीवन में ही इस शरीर के रहते ही यदि व्यक्ति काम और क्रोध के वेग को सहन करना सीख ले, स्वयं को साध ले , वही अपना व्यक्तित्व समग्र बना पाता है एवं जीवित रहते हुए मोक्ष को प्राप्त हो पाता है। वही व्यक्ति सच्चे अर्थों में सुखी मनुष्य बन पाता हैं और जीवन का आनंद ले पाता है। जिसे आत्मज्ञान हो गया , वह सर्वव्यापी चैतन्य के वास्तविक स्वरूप के अनंत आनंद का अनुभव ले पाता है।

एक मनोवैज्ञानिक की तरह यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन से वार्तालाप कर रहे हैं। व्यक्तित्व का सर्वांगपूर्ण परिष्कार हर किसी का लक्ष्य होता है। वस्तुतः सारी सिद्धियाँ परिष्कार हर लक्ष्य होता है। वस्तुतः सारी सिद्धियाँ परिष्कृत व्यक्तित्व के ही चारों ओर चक्कर लगाती है। सच्चा सुख भी तभी मिलता है। श्रीकृष्ण इसीलिए कहते है कि मृत्यु आए , उससे पूर्व ही काम क्रोध पर व्यक्ति नियंत्रण प्राप्त कर ले । कामबीज को ज्ञानबीज में बदल डाले। क्रोध और कुछ नहीं, दमित कामवासना के परिष्कार की बात कह रहे हैं और बड़ा जोर देकर कहते हैं कि यदि मृत्यु से पूर्व इन पर नियंत्रण नहीं प्राप्त हुआ तो ये ही वासनाएँ मृत्यु के बाद आत्मसत्ता के साथ विभिन्न योनियों में चक्कर लगवाएँगी ज्ञानी वही है सच्चा सुखी वही है। जो इस जन्म में ही सारी व्यवस्था कर ले आज व्यक्ति यदि बहिर्मुखी है। तो उसका कारण भीतर के काम और क्रोध ही है। एक वेग की तरह आवेश की तरह वे मस्तिष्क पर चढ़ बैठते है इन पर एक सच्चा योगी ही विजय प्राप्त कर पाता है। और अपने व्यक्तित्व को सुसंस्कृत बना पाता है। वही व्यक्ति पूर्ण पुरुष(स युक्तः)बन पाता है। जो व्यक्ति अपने आपको पूर्णतः अनुशासित कर ले श्रीकृष्ण के अनुसार वही पूर्णतः सुखी नर है। (स युक्तः स सुखी नर)।

ठाकुर की कुछ ठोस बातें

रामकृष्ण परमहंस कहते थे देखता हूँ कि सब के सब मटर की दाल के ग्राहक हैं। कामिनी है। और काँचन छोड़ना ही नहीं चाहते। आदमी स्त्रियों के रूप पर मुग्ध हो जाते हैं। रुपये और ऐश्वर्य का लालच करते हैं। परंतु यह नहीं जानते कि ईश्वर का रूपदर्शन करने पर ब्रह्मपद भी तुच्छ हो जाता है। रावण से किसी ने कहा था तुम इतने रूप बदलकर तो सीता के पास जाते हो परंतु श्रीराम का रूप क्यों नहीं धारण करते? रावण ने कहा राम का रूप हृदय में एक बार भी देख लेने पर रंभा और तिलोत्तमा चिता की खाक जान पड़ती है। ब्रह्मपद भी तुच्छ हो जाता है। पराई स्त्री की बात ही दूर रही। ( रामकृष्ण वचनामृत भाग- तृतीय 36-37 )। स्थान-स्थान पर वे कहते है। योग कैसे होता? विषयों के प्रति आसक्ति का एकदम त्याग। किसी भी प्रकार की कामना-वासना नहीं रहनी चाहिए। कामना- वासना रहने पर उसे सकाम भक्ति कहते है। निष्काम भक्ति को अहैतुकी भक्ति कहते तुम प्यार करो न करो फिर भी मैं तुम्हें प्यार करता हूँ इसी का नाम है। अहेतुक प्रेम “पति पर सती का आकर्षण संतान पर माँ का आकर्षण और विषयप्रिय व्यक्ति का साँसारिक विषयों के प्रति आकर्षण ये तीन आकर्षण यदि एक ही साथ हो तो ईश्वर का दर्शन होता है। (रामकृष्ण वचनामृत भाग-द्वितीय पृष्ठ-4)। कितना अद्भुत प्रतिपादन है। ठाकुर के सारी बात अंदर तक उतर जाती है।

काम और कामजनित क्रोध

वास्तव में काम और काम से पैदा हुआ क्रोध यही दो प्रवृत्तियाँ है। जो हमारी अंदर की शाँति को भंग करती है। और एक प्रकार से झूठी तृप्ति की निरर्थक आशा में हमें बहिर्मुखी बनाकर विषयों और कुविचारों के संसार में हमें ढकेल देती है। क्रोध मात्र उस कामना का स्वरूप है। जो सहज रूप में तृप्त नहीं हो पाई है। इन दो विकृतियों से उपजा इच्छाओं का उद्वेग हमारे व्यक्तित्व को क्षत-विक्षत कर उसका स्वरूप बिगाड़ देता है। इसीलिए भगवान कहते है। कि मृत्यु से पूर्व इन पर विजय प्राप्त करो वरना सुख की चाह में अनंतकाल तक भटकते फिरोगे आज चारों ओर जो वातावरण है। जिस तरह का उपभोक्तावादी समाज विकसित हो गया है। केबल-टेलीविजन के माध्यम से घर-घर में साँस्कृतिक प्रदूषण फैलाया जा रहा है। तथा प्रिंट मीडिया भी नंगई को परोसने में पीछे नहीं है। उसमें कामुकता ही संव्याप्त दिखाई देती है। अपरिपक्व मन को बहिर्मुखी मन को वह तुरंत प्रभावित करती हैं। कामेच्छा पूरी न होने पर क्रोध भड़क उठता है। बलात्कार उसी वृत्ति से जन्मते है। सारे समाज का उत्कर्ष करना है। तो हमें इन वृत्तियों के परिष्कार का तंत्र खड़ा करना होगा जनचेतना जगानी होगी आत्मनिरीक्षण एवं विचारसंयम की एक हवा बनानी होगी आत्मनिरीक्षण एवं विचारसंयम की एक हवा बनानी होगी लोक -शिक्षण करना होगा ताकि हम बर्बर समाज की ओर न जाकर सही विकसित आध्यात्मिक दृष्टि से उत्कर्ष को प्राप्त समाज बना सकें

कामबीज से ज्ञानबीज की ओर

परमपूज्य गुरुदेव आध्यात्मिक काम विज्ञान नामक पुस्तक में लिखते कामवासना मनुष्य जीवन की एक अति प्रबल प्रवृत्ति है। उसकी हलचल मस्तिष्क को उद्वेलित करती ही रहती है। फलतः व्यक्ति उस संबंध में कुछ-न-कुछ कहने-सुनने पूछने-बताने पढ़ने-जानने के भी खोज-बीन करता रहता है। उच्चस्तरीय जानकारी न होने से उसे घटिया विकृत और अवाँछनीय सामग्री हाथ लगती है। जिससे आत्मघात करने का पथ ही प्रशस्त होता है। (पृष्ठ 20 ) आगे वे लिखते है। काम का अर्थ विनोद उल्लास की उच्चस्तरीय अभिव्यक्तियाँ जिस परिधि में आती है। उसे आध्यात्मिक काम कहते यह छोटे बालकों से लेकर वृद्धों तक नारी और नर तक एकसमान प्रयुक्त होता है। (पृष्ठ 35 ) परमपूज्य गुरु देव यह अभिमत देते है। कि काम-प्रवृत्तियों का नियंत्रण परिष्कृत अंतः चेतना से संभव है। काम पर नियंत्रण हो गया तो क्रोध स्वतः जाता रहेगा वे बताते है।कि उत्तेजनात्मक चिंतन से जो मस्तिष्कीय विद्युतप्रवाह उमड़ते है। वे ही यौनलिप्सा में मनुष्य को बलात् प्रवृत्त करते है। यह विद्युत धारा घटाई भी जा सकती है। और बढ़ाकर सुनियोजित भी की जा सकती है। इसके लिए अंतः चेतना का बलिष्ठ होना अत्यंत आवश्यक है। जो योगाभ्यास जैसे उपायों से ही संभव है। कामकला को ब्रह्मविद्या के रूप में परिवर्तित कर, रूपांतरण कर उसके वेग पर नियंत्रण संभव है। पूज्यवर के चिंतन के अनुसार अभ्यास और वैराग्य से अनियंत्रित काम प्रवृत्ति का निरोध संभव है। उसे हठपूर्वक नष्ट कर देने की बात नन सोची जाए, वरन् ऐसे प्रयोजन में लगा दिया जाए जिसमें उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति हो।

जहाँ तक क्रोध का प्रश्न है, वह समाज में आज अचेतन में संव्याप्त तनाव के कारण भी फैला है। अपनी वृत्तियों का प्रबंधन कर पाना, अपनी क्षमताओं का पूरा नियोजन न हो पाना तथा भौतिकता प्रधान इस युग में अस्त-व्यस्तताओं का बढ़ते चले जाना ही क्रोध का कारण है। मनुष्य की सहिष्णुता घटी है एवं आक्रामकता बढ़ी है। इस पर नियंत्रण उसे ही प्राप्त करना होगा। विशेषकर युवाशक्ति, नवविवाहित युवा दंपत्तियों के जीवन में यह क्रोध तो विष बनकर आता है और उनकी सभी क्षमताओं को नष्ट कर जाता है। उद्धत अहं भी कभी-कभी क्रोध का रूप लेकर आता है। यदि यही क्रोध अनीति-अभाव के प्रति हो एवं किसी सकारात्मक कार्य में, आँदोलन में किसी को नियोजित करे तो समझ में भी आता है पर जब यही वृत्ति अपने प्रति अधिकाधिक जागरुकता पैदा करनी है, ताकि आदर्श समाज जन्म ले सके।

ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति

अगले श्लोक में श्रीकृष्ण उस योगी साधक की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि जिसने अपने भीतर सुख की प्राप्ति कर ली है, जो आत्मा में ही रमण करता है और आत्मा ही जिसकी ज्योति है, ऐसा योगी ही ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त करके निर्वाण पद को प्राप्त होता है। श्लोक इस प्रकार है-

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥

शब्दार्थ करें तो इस तरह समझ में आता है।

जो (यः) आत्मा में ही सुखी, (अंतःसुखः) आत्मानंद में ही मग्न अर्थात् तन्मय (अंतरारामः) तथा (तथा) जो (यः) अंतर्लोक में ज्ञान से प्रकाशित हैं (अंतःज्योति एवं), वे योगी (सः योगी) ब्रह्मभाव प्राप्त कर (ब्रह्मभूतः) ब्रह्म में निर्वाण (ब्रह्मनिर्वाणं) प्राप्त करते हैं (अधिगच्छति)।

भावार्थ इस प्रकार हुआ-” जो पुरुष अंतरात्मा में ही सुख वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो ड़ड़ड़ड़ आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त साँख्ययोगी शाँत ब्रह्म को प्राप्त होता है।” (5/24)

ब्रह्मभाव प्राप्त कर ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति किस योगी को मिलती है, इसका स्पष्ट चित्रण श्रीकृष्ण करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मात्र काम-क्रोध के वेग को धारण कर नियंत्रण कर लेने से मुक्ति-लाभ नहीं हो जाता। जो अंतर्मुखी हो आत्मानंद में परितृप्त होते हैं एवं जो साधक अपनी व्यष्टि चेतना को समष्टि चेतना में लय कर देते हैं, वे ही आत्मस्वरूप ब्रह्म में स्थिर होकर मोक्ष-लाभ की प्राप्ति कर पाते हैं। लगता तो कुछ जटिल-सा है, पर सरल किया जा सकता है।

ईश्वर को पाना है तो संसार का स्वामी बनना होगा। जब तक हम सुख के लिए अपने आस-पास के संसार पर आश्रित हैं, इस संसार के दास हैं। किसी पदार्थ या व्यक्ति पर हमें निर्भर नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे हमारी निज की स्वतंत्रता छिन जाती है। आत्मज्ञानी, साधक स्तर के योगी, दिव्यकर्मी अपनी आत्मा में ही आनंद की प्राप्ति करते हैं (अंतःसुखः), आत्मा में ही रमण करते हैं (अंतरारमः) तथा आत्मा ही उनकी ज्योति होती (अंतर्ज्योतिः) है। अपने भीतर अनंत आनंद का अनुभव कर जीवन में पूर्ण स्वतंत्रता की अनुभूति करते हैं। (स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतः अधिगच्छति)। ऐसे व्यक्ति सदैव अपने ऊपर आत्मनिर्भर होते हैं और निर्वाणपद के सच्चे अधिकारी भी होते हैं।

जो अंदर से सुखी है, अंतराराम है और अंतःज्योति में ध्यानस्थ है, वही योगी ब्रह्मभूत होकर ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होता है। निर्वाण से यहाँ अर्थ है- परम आत्मस्वरूप में मानव के अहं का लोप होना। वह अब मात्र एक छोटा-सा व्यक्तित्व भर नहीं रह गया है। वह ब्रह्म हो गया है। उसकी चेतना शाश्वत में लीन हो गई है। निर्वाण के बारे में जैसा कि पहले भी कहा गया है, बड़ी भ्राँतियाँ हैं। कई लोग नहीं जानते कि निर्वाण किस अवस्था का नाम है। इसी को समझाने के लिए भगवान पच्चीसवें श्लोक में ब्रह्मनिर्वाण की व्याख्या करते हैं कि यह किन्हें मिलता है।

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकलमषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥

निष्पाप (क्षीणकल्मषाः) संशयों से मुक्त (छिन्नद्वैधा) आत्मा में लीन चित्त वाले (यतात्मानः) सभी प्राणियों के कल्याण साधन में निरत (सर्वभूतहिते रताः) ऋषिगण (ऋषयः) ब्रह्मनिर्वाण पद (ब्रह्मनिर्वाणं) प्राप्त करते है (लभंते) ।

अब भावार्थ हुआ-

जिनके पाप (सभी वासनाएँ) नष्ट हो गए हैं, संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं, इंद्रियाँ जिनकी वंश में है, ऐसे ऋषिगण सबके कल्याण के लिए कर्म करते हुए इसी जीवन में मोक्ष का (शांत ब्रह्म को) प्राप्त होते हैं।

मोक्ष किसे मिलता है

यहाँ सारे लक्षण निष्काम कर्मयोगी के बताए गए हैं-(1) वे आत्मज्ञान संपन्न ऋषि होते हैं (2) पापमुक्त जीवन जीते है। (3) संशयों से परे चलते है। (4) सभी प्राणियों के कल्याण में सतत निरत रहते है। ऐसे ही व्यक्ति ब्रह्मनिर्वाण को, मोक्षपद को ,परमसत्ता को प्राप्त होते हैं, जीवित रहते हुए ही मोक्ष पा लेते हैं।

यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ज्ञान से पापों व संशयों के विनष्ट होने तथा अपने मन पर अपना नियंत्रण स्थापित करके आत्मानंद में मग्न होकर सबके कल्याण हेतु जीवन जीने वालों को ऋषि कहा है। ऐसे ऋषिगण ही जीवित रहते ब्रह्मनिर्वाण को, मोक्ष को प्राप्त होते हैं, यह बात पुनः दोहराई है। सच्चा आत्मज्ञानी भगवान के अनुसार वह है, जिसकी वासनाओं का क्षय हो गया है (क्षीण कल्मषाः)। चूँकि उसने अपने भीतर विद्यमान भावातीत परब्रह्म की सत्ता का अनुभव कर लिया है एवं संशयमुक्त है (छिन्नद्वैधाः), उन्हें विषय-भोगों के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं अनुभव होती, आत्मानंद ही सर्वोपरि होता है, वे स्वाभाविक रूप से आत्मसंयमी हों जाते हैं (यतात्मानः)। ऐसे परमज्ञानी ही सबके कल्याण में सदैव निरत रह निर्वाणपद को प्राप्त होते हैं।

लोकशिक्षक ऋषि

परमपूज्य गुरुदेव के जीवन में हम कुछ ऐसा ही दर्शन करते है। उनकी आत्मकथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ और उन पर लिखी पुस्तकें ‘चेतना की शिखर यात्रा-प्रज्ञावतार हमारे गुरुदेव’ आदि का अध्ययन कर लगता है कि सारा जीवन उनका इसी तरह लोकशिक्षण करते हुए व्यतीत हुआ। मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत् एवं आत्मवत् सर्वभूतेषु की उनकी साधना इसी तरह का जीवन जीते संपन्न हुई । सही अर्थों में ब्राह्मणत्व को जीवन में उतारते हुए सबके कल्याण के लिए सभी कर्म किए। सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त ‘ज्यौं की त्यौं धरि दीनी चदरिया’ की तरह जीवन जीने वाले ऐसे महापुरुष ही ऋषि की पदवी पर शोभित होते हैं। अखिल विश्व गायत्री परिवार जो उनने विनिर्मित किया, एक नमूना है, जो एक ऋषि के परम पुरुषार्थ का प्रतीक है। हम उनके जीवन से गीता के इस पाँचवें अध्याय के बहुत-से पक्षों को सीख सकते है।

ऊपर के, इस कड़ी में वर्णित तीनों श्लोक जिस एक निष्कर्ष पर हमें लातें है, वह है आत्मज्ञान से आत्मजाग्रति । इससे व्यक्ति विश्ववंद्य ऋषि ही नहीं बन जाता, वह स्वयं में परमानंद की, ब्रह्म से तादात्म्य की सतत अनुभूति करता रहता है। वह स्वयं में आत्मनिर्भर होता है तथा विशिष्ट गुणों से युक्त होता हैं, सदैव प्रसन्न रहता है, आंतरिक समत्व का एक विलक्षण उदाहरण होता है। हम सबके लिए 23,24,25 क्रमाँक के श्लोक युगनायक बनने का संदेश लेकर आते है। आज ऐसे ही व्यक्तियों की समाज में सर्वाधिक आवश्यकता है। ये ही प्रकाश-स्तंभ बन सभी का यथोचित मार्गदर्शन कर सकते हैं। इन्हीं का तो आज चारों ओर अकाल है। क्या हम बन सकते है? गीता हमसे प्रश्न पूछती है। इस अध्याय के शेष चार श्लोकों की व्याख्या के साथ इसका समापन आगामी अंक में।

(क्रमशः)


VigyapanSuchana

सूचनार्थ

गायत्रीतीर्थ शाँतिकुँज ,हरिद्वार में आगामी अंतः ऊर्जा सत्र 23-24 की अवधि में अब आश्विन नवरात्रि के समापन से चैत्र नवरात्रि के शुभारंभ तक चलेंगे। विगत वर्ष की तरह इन्हें इस वर्ष अगस्त माह से आरंभ नहीं कर पा रहे। आने वालों की संख्या बढ़ रही है और स्थान कम होता जा रहा है। धर्मशाला , कांप्लेक्स बन जाने के बाद संभवतः ये सत्र व्यवस्थित ढंग से अधिक अवधि तक चल सकेंगे। इस वर्ष ये सत्र 6 अक्टूबर से आरंभ होकर 2 मार्च, 24 तक चलेंगे। बीच में वसंत पर्व के कारण एक या दो सत्र स्थगित करने होंगे।

-व्यवस्थापक शाँतिकुँज


चेतना की शिखर यात्रा-17 - सिद्धि के मार्ग पर संकल्प-1

काशी का अधिवेशन

1924-26 और आस-पास के वे वर्ष भारतीय समाज में मंथन के वर्ष थे। विदेशी दासता से मुक्ति की आकाँक्षा तो समाज में जन्म ले ही रही थी, अपनी ओढ़ी हुई गुलामियों और विकृतियों से छुटकारे के लिए भी सामूहिक चेतना कसमसा रही थी। पिछड़ी और दलित जातियों को न मंदिर जाने का अधिकार था, न पढ़ने-लिखने का। वे सार्वजनिक कुओं से पानी नहीं भर सकते थे। अपने से ऊँची जाति वालों के साथ बैठ नहीं सकते थे, उनके सामने सिर उठाकर चलना दंडनीय अपराध था। भारतीय समाज की दुर्दशा के कारणों की मीमाँसा करते हुए महामना मदनमोहन मालवीय, स्वामी श्रद्धानंद, राजेन्द्र प्रसाद आदि कहने लगे थे कि अछूतों और दलितों को गले लगाएँगे, तभी हिंदू समाज मजबूत होगा। अलग-अलग खानों में बँटा समाज स्वतंत्र नहीं हो सकता। स्वतंत्र हो जाए तो देर तक उसकी रक्षा नहीं कर सकता। महात्मा गाँधी तो इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठा ही रहे थे उनकी प्रतिष्ठा निर्विवाद जन नेता के रूप में बढ़ती जा रही थी। उनकी कही हुई बातों का महत्व था, लेकिन मालवीय जी कुछ अलग तरह से इस सवाल को उठा रहे थे। वे सुधार की आकाँक्षा जगाकर समाज में परिवर्तन लाने की पहल कर रहे थे। पंडितों, विद्वानों और आचार्यों में उन्हें आदर की दृष्टि से देखा जाता था। मालवीय जी स्वयं भी शास्त्र और विद्या की प्राचीन परंपरा से संबद्ध थे। गाँधी जी की बातों में सामाजिक नेता और व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखने वाले महापुरुष की चिंता दिखाई देती थी। मालवीय जी की बातों में इन विशेषताओं के अलावा परंपरा का बल भी था।

सन् 1923 में काशी में हिंदू महासभा का अधिवेशन हुआ। तब यह संगठन भारतीय धर्म की सभी धाराओं और वर्गों का संयुक्त मंच था। मालवीय जी ने इस अधिवेशन की अध्यक्षता की।

मालवीय जी के प्रयत्नों से उसी अधिवेशन में निर्णय लिया गया कि सवर्ण हिंदुओं के समान दलित जातियों को सरकारी और गैरसरकारी स्कूलों में पढ़ने, कुओं से पानी खींचने, तालाबों में नहाने, सभा-सम्मेलनों में दूसरे लोगों के साथ बैठने, सड़कों पर चलने और देवदर्शन करने का अधिकार है। उनके अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए। प्रस्ताव तो पास हो गया, पर उसे लागू करना इतना आसान नहीं था। इसके लिए समाज में उपयुक्त वातावरण बनाना जरूरी था। वह एक अलग लड़ाई थी, लेकिन काशी में सैकड़ों पंडितों, पुरोहितों की उपस्थिति में उनकी सहमति से इस तरह का प्रस्ताव पास करा लेना बड़ी उपलब्धि थी।

सन् 1925 में हुए हिंदू महासभा के अधिवेशन की अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की। यह अधिवेशन बुद्धिजीवियों और काशी की ही तरह कट्टरपंथियों की आधुनिक नगरी कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ। लाला रामप्रसाद ने इस अवसर पर अछूतों और शूद्रों को वेदपाठ करने का अधिकार देने का प्रश्न उठाया। वहाँ बैठे लोगों में इस विषय के उठते ही खलबली मच गई। तनातनी की स्थिति आ गई। मालवीय जी भी वहीं उपस्थित थे। उन्होंने स्थिति को सँभाला और कहा कि ईश्वर का दिया हुआ प्रसाद सबके लिए सुलभ है। वेदों का अध्ययन किसी के लिए निषिद्ध नहीं हैं, पर उसके लिए कठोर तपस्या की आवश्यकता है। यह हर किसी के लिए प्रथम प्रयास में ही संभव नहीं है। गीता भूमंडल में सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। उसका अध्ययन-मनन सबके लिए सुलभ है। उसके द्वारा अल्प प्रयास से ही वेदों का मुख्य तत्व प्राप्त किया जा सकता है।

मालवीय जी ने उस समय उत्पन्न हुई कटुता को किसी तरह शाँत किया। मन से वे भी अस्पृश्यों को दूसरे वर्णों के समाज के अधिकार देने के पक्ष में थे। उनके अनुसार साधना, स्वाध्याय के क्षेत्र में भी छा गए ऊँच-नीच ने हिंदू समाज को बुरी तरह खोखला किया था। कलकत्ता (कोलकाता) अधिवेशन में उपजी कटुता को शाँत करने के बाद वे राष्ट्रीय भावनाओं का प्रचार करते हुए जगह-जगह घूमे। राष्ट्रीय आँदोलन को गति देते हुए वे समाज-सुधार संबंधी कार्यक्रमों को भी गति देते रहे। व्याख्यानों में अछूतोद्धार, स्त्रियों की दशा सुधारने और सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन करने की प्रेरणा रहती। शूद्रों के शास्त्र-अधिकार का मुद्दा भी इन व्याख्यानों का विषय होता। सन् 1927 में उन्होंने एक साहसिक कदम उठाया और प्रयाग में जात-पाँत का विचार किए बिना सभी वर्ण के लोगों को मंत्रदीक्षा दी। उसकी आलोचना हुई, प्रबल विरोध भी हुआ, लेकिन मालवीय जी ने इसकी कोई चिंता नहीं की। वे शाँत, अविचल और दृढ़ता से अपने काम में जुटे रहे। कलकत्ता(कोलकाता), नासिक, पुणे, काशी आदि स्थानों पर भी सामूहिक मंत्रदीक्षा के कार्यक्रम हुए। विरोध और समर्थन-सराहना की मिली-जुली प्रतिक्रिया होती रहती थी।

समाज अनुष्ठान

प्रयाग में सामूहिक दीक्षा देने से कुछ माह पहले मालवीय जी आगरा आए थे। मार्गदर्शक सत्ता से साक्षात्कार और महापुरश्चरण-साधना आरंभ करने के बाद श्रीराम सामाजिक गतिविधियों में भी पहले की तरह ही रुचि लेते थे। मालवीय जी के बारे में उन्हें जब भी कोई सूचना मिलती तो ध्यान से सुनते। पूरी जानकारी जुटाते और सोचने लगते कि उनके समाज अनुष्ठान में किस तरह सहयोग किया जा सकता है। सन् 1926 के वसंत पर्व के बाद उन्होंने अपनी दीक्षा की पिछली गतिविधियों का अवलोकन किया। समाज संस्कार के क्षेत्र में पिछले तीन वर्ष में उनके आस-पास जो कुछ भी घटा था, उसके प्रकाश में अपने लिए कुछ दायित्व चुना।

पता चला कि मालवीय जी आगरा आए हैं तो श्रीराम ने तुरंत वहाँ जाने की ठान ली। दो-तीन दिन में लौट आने की कहकर वक चल दिए। मालवीय जी आगरा में हिंदू सभा के भवन में ठहरे थे। वस्तुतः वह सेठ गिरधर दास का मकान था, जो उन्होंने हिंदू सभा की गतिविधियों को चलाने के लिए दे दिया था। सामाजिक उपयोग में आने के कारण ही उसका नाम हिंदू सभा भवन हो गया था। मालवीय जी ने सभा भवन में ही कार्यकर्त्ताओं को संबोधित किया। कहा कि बौद्ध, जैन और सिख सभी बृहत् हिंदू जाति के अंग है। गाँव-गाँव में सभाएँ स्थापित की जाएँ। अपनी गिरी हुई दशा को उठाने का प्रयत्न करें। जिन्हें हम अछूत कहते है, वे हमारे ही भाई हैं। उनसे प्रेम का व्यवहार करे। उनकी अवस्था सुधारने पर ध्यान दें। उन्हें अपनाएँ। संबोधन में जहाँ-तहाँ पाठशालाएँ और अखाड़े खोलने की प्रेरणा भी दी गई थी। कहा था कि शरीर से भी हमें मजबूत बनना चाहिए। अपने भीतर शक्ति होगी तो बाहरी भीतरी दोनों ही तरह के शत्रुओं से लड़ सकेंगे। बलवान शरीर में ही बलवान आत्मा का निवास होता है। मन को बलवान बनाने के लिए पूजा-पाठ, ध्यान, जप और शास्त्रों का अध्ययन-मनन करें।

मालवीय जी के प्रवचनों में टूटे-फूटे, जीर्ण-शीर्ण हिंदू समाज को फिर से गठित करने पर जोर रहता था। निजी चर्चाओं में भी वे अछूतोद्धार की बात करते थे। सभा भवन में व्याख्यान पूरा होने के बाद वे कार्यकर्त्ताओं से बात करने लगे। किसी ने पूछा, “अछूतोद्धार का आपका विचार क्या राष्ट्रीय आँदोलन से लोगों का ध्यान बँटने लगेगा। फिर हम अपने मूल उद्देश्य को भूल जाएँगे।”

मालवीय जी ने कहा, “मूल उद्देश्य क्या है?” प्रश्नकर्त्ता ने उत्तर दिया, “ स्वतंत्रता।” उन्होंने फिर पूछा,”स्वतंत्रता किसलिए?” प्रश्नकर्त्ता भी जैसे पूरी तैयारी से आया था, ताकि हम दुनिया में सिर ऊँचा उठाकर चल सके। अपने सम्मान की गौरव की रक्षा करें। उसे बढ़ाएँ।” मालवीय जी ने इस उत्तर से प्रश्नकर्त्ता का मानस समझ लिया। उन्होंने बात वही से आगे बढ़ाई, “ सम्मान और गौरव किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरे देश और समाज का आत्मसम्मान है। हमें स्वतंत्रता इसीलिए चाहिए। हमें यह नहीं भूल जाना चाहिए। अपने ही लाखों-करोड़ों भाइयों की गरिमा रौंदते रहने से अपना आत्मसम्मान प्राप्त नहीं हो जाएगा। उनके सम्मान और गरिमा की प्रतिष्ठा करते हुए ही हम पूरे राष्ट्र का गौरव लौटा सकेंगे।”

समन्वय का सूत्र भी उन्होंने ही दिया। कहा, “रोग की अवस्था में सबका विचार रोग को दूर करने का होना चाहिए औषध भोजन नहीं है। स्थायी सुधार सामयिक नहीं है। उनका प्रभाव हमेशा दिखाई देना चाहिए। हम ऐसा कोई भी काम नहीं करें, जिससे राष्ट्रीय आँदोलन में विरोध पैदा होता हो। अछूतों की दशा सुधारने पर ध्यान नहीं देंगे तो उन्हें अपने साथ नहीं जोड़ सकेंगे।

दीक्षागुरु से पुनर्मिलन

सभा में मालवीय जी का व्याख्यान सुनने के बाद श्रीराम इस चर्चा में भी आ गए थे। उन्होंने मालवीय जी को प्रणाम किया और एक तरफ बैठ गए। चर्चा में और लोग भी बैठे थे। ज्यादातर युवा कार्यकर्त्ता थे। हर किसी ने अपना परिचय देने लगे तो एकाध पंक्ति सुनने के बाद ही मालवीय जी को जैसे कुछ याद आया। पंडित रूपकिशोर के साथ वर्षों पहले काशी आए उस बालक और उससे संबंधित घटनाएँ स्मृति में उभर आईं। यह भी याद आ गया कि बालक के होनहार होने का आभास तभी हो गया था और भी बँधी थी कि यह आगे चलकर देश-समाज की कुछ विशिष्ट सेवा करेगा।

वहाँ मौजूद किसी कार्यकर्त्ता ने जिक्र छेड़ दिया कि गाँव की एक बीमार अछूत स्त्री की सेवा करने और इस कारण कुछ समय तक प्रताड़ित रहने का दंड भी यह बालक भुगत चुका है। मालवीय जी ने वह घटना स्वयं श्रीराम के मुँह से सुनी। सेवा के समय मन में क्या भाव उठते रहे, यह भी पूछा और सब कुछ सुनने के बाद श्रीराम की पीठ थपथपाई। कहा, “आगे तुम्हें और भी चुनौतियों का सामना करना है।” इस भेंट में मालवीय जी से सामान्य विषयों के अलावा कोई उल्लेखनीय चर्चा नहीं हुई। समाज-सुधार और राष्ट्रीय आँदोलनों पर चर्चा में ही समय बीत गया। प्रत्यक्ष रूप से कोई महत्त्वपूर्ण चर्चा नहीं हो सकी । वहाँ उपस्थित लोगों, स्वतंत्रता सेनानियों और सामाजिक कार्यकर्त्ताओं में जो बात-चीत हुई, उसे सुनने का मौका मिला। उस बात-चीत से श्रीमान को अपना पक्ष निर्धारित करने में सहायता मिली। उधर लोगों की बात-चीत चल रही थी, इधर वे निश्चित कर रहे थे कि आँवलखेड़ा पहुँचकर क्या करना है।

आँवलखेड़ा पहुँचे तो बालसेना की बैठक बुलाई। अपनी आगरा यात्रा के बारे में बताया। सभी साथियों को घटनाओं के हवाले से बताया कि आगरा में छावनी होते हुए भी लोग कैसी हिम्मत और निडरता से लड़ रहे हैं। छावनी में फौजी रहते हैं। सामान्य स्थिति के लोग फौज वालों से डरते तो हैं, लेकिन युवकों में जोश है। वे मुकाबला करने के लिए तत्पर रहते हैं। रामप्रसाद नामक किशोर ने उत्साह में भरकर कहा, “हम भी तैयार रहते हैं श्रीराम। हम ही किससे डरते हैं। देखा नहीं कि उस मोटे अफसर और काले फौजियों को कैसे खदेड़ा था।”

“वह गाँव की बात थी। छावनी में मुकाबला करना ज्यादा बड़ी बात है।” श्रीराम ने कहा, “हमें उन लोगों से सीखना चाहिए।” रामप्रसाद ने इस उलाहने का प्रतिवाद किया। उसे लगा कि आगरा के युवकों की तुलना में अपने आप को जैसे कम आँका जा रहा है। उसने कहा, “कैसे कहते हैं? आगरा में आपने ही एक मोटे अफसर का सिर नहीं फोड़ दिया था” और सभी रामप्रसाद की भावनाओं से सहमत हुए। घटना सन् 1923 की है। तब श्रीराम बारह वर्ष के थे। आगरा गए हुए थे। वहाँ एक अँगरेज फौजी अफसर को किसी युवती से छेड़-छाड़ करते देखा। उस अँगरेज ने युवती को रोब से अपने पास बुलाया। वह समझदार थी। उसे अंदाजा हो गया कि अँगरेज अफसर की मंशा क्या है। वह अफसर के पास जाने के बजाय तेजी से पग उठाते हुए आगे बढ़ने लगी।

आततायी का सिर फोड़ा

अफसर उसकी तरफ झपटा तो युवती के साथ जा रहे युवक ने पूछा, “क्या बात है?” यह पूछना अफसर की निगाह में अपराध था, जिसका दंड दिया ही जाना चाहिए। युवक की पीठ पर उसने बंदूक का कुँदा मारा और नीचे गिरा दिया। उसे गिरा पड़ा छोड़कर अँगरेज युवती के पीछे दौड़ा। वह डरकर भागी। गोरा उसके पीछे लपका। श्रीराम किसी दुकान पर खड़े देख रहे थे। उनके मन में जबरदस्त आक्रोश उबल रहा था, गोरे अफसर के साथ उन लोगों के प्रति भी, जो यह सब चुपचाप देख रहे थे। देखते-देखते कुछ ही पलों में तय कर लिया कि क्या करना है। दुकान पर दरवाजा रोकने वाला पत्थर उठाया और युवती का पीछा कर रहे अँगरेज अफसर पर ऐसा निशाना साधकर मारा कि चोट से वह लड़खड़ाकर गिर गया। विलाप करता हुआ वह उठा, लेकिन उसके पाँवों में जान नहीं थी। वह लड़खड़ाता चल रहा था। चीखता-चिल्लाता रहा। लोग अब भी मूकदर्शक बने देखते रहे। किसी ने नहीं बताया कि पत्थर किसने फेंका था। वह लोगों को डराता-धमकाता रहा, लेकिन काई कुछ नहीं बोला। युवती इस बीच किसी सुरक्षित स्थान पर छिप चुकी थी। अँगरेज अधिकारी वापस लौट गया था। बालसेना के सदस्यों को यह घटना इसलिए भी याद थी कि इसके बाद ही उन्होंने किशोरों को संगठित करने का विचार किया था।

मालवीय जी से मिलकर लौटने के बाद श्रीराम और सक्रिय होने की योजना बनाने लगे। कुछ कार्यक्रम तय किए। साधना का क्रम अपने ढंग से चल रहा था। उसके लिए चार-पाँच घंटे का अतिरिक्त समय चाहिए था। नींद में कटौती कर समय की पूर्ति की। गोघृत, मठा और जौ की रोटी आदि का प्रबंध माँ कर देती थी। दीपक में घी भरा रहने के लिए भी वही ध्यान देती थी । श्रीराम का विवाह कर देने की उनकी रट जारी रही। वह रट जोर भी पकड़ती रही। गाँव के लड़कों को इकट्ठा कर गोष्ठियाँ करने लगे, घर से बाहर रहने और परचे-पोस्टर बाँटने-चिपकाने लगे तो माँ की लगन और तेज हुई। सगे-संबंधियों में जहाँ-जहाँ भी रिश्ता ढूँढ़ने के लिए कहा था, वहाँ कुछ जगहों से खबरें आने लगीं। माँ ने कहा कि कोई कि काई एक जगह चुनकर बता दो। श्रीराम कुछ देर विचार कर बोले, “अभी जल्दी क्या हैं ? इस उम्र में विवाह करना धर्म-विरुद्ध होगा। “

सहधर्मिणी की तलाश

“गाँव के सभी लड़के चौदह-पंद्रह साल की उम्र तक ब्याह जाते हैं।तुम्हारे संग-साथ के कई लड़कों की शादी हो गई है। तुम भी करो। “माँ ने समझाया। श्रीराम सुनकर चुप रहे। माँ ने फिर दोहराया और जोर देकर दोहराया। श्रीराम ने सोचकर उत्तर दिया, “अभी कुछ समय ठहर जाओ माँ।”

“कितने समय? “ माँ ने पूछा। पुत्र ने कहा, “यही कोई साल भर।”

माँ ने कारण पूछा तो कहने लगे, “मालवीय जी महाराज कहते है कि लड़को की शादी सोलह वर्ष की उम्र से पहले होनी चाहिए। अच्छा तो यही है कि बीस-बाईस साल की उम्र से पहले न हो, लेकिन सोलह की मर्यादा तो निभानी ही चाहिए।”

मालवीय जी महाराज का संदर्भ सुनकर ताई जी चुप हो गई।फिर पूछा, “और कन्या की उम्र कितनी हो? “श्रीराम ने उत्तर दिया, “कम-से-कम बारह वर्ष। हम जानते है कि अखण्ड दीपक की देख-भाल और गोसेवा के लिए आपको बहू की जरूरत है, पर शास्त्र मर्यादा का पालन भी तो होना चाहिए।”

ताईजी को इसके आगे कोई तर्क नहीं सूझा। कुछ सोचकर फिर पूछा, “लड़की तो देखी जा सकती हैं न।” श्रीराम ने कहा, “सो आप जानो। बहू आपको चाहिए।आप देखें और तय करें।” श्रीराम ने विवाह के लिए सोलह वर्ष की उम्र तक ठहरने की बात कही तो इसका कारण था। उन दिनों लड़की उम्र आठ-दस वर्ष की हो जाती तो मान लिया जाता था कि वह पर्याप्त सयानी हो गई है। कुछ घरों, जातियों या गांवों में तो इतनी उम्र तक लड़की की शादी नहीं होना चेता का विषय भी समझा जाता था। फिर जिस उम्र का लड़का भी मिल जाए उसके साथ विवाह कर दिया जाता।लड़के की उम्र दस-बारह साल से बीस-बाईस साल तक कुछ भी हो सकती थी। वैसे लड़को की उम्र भी दस-ग्यारह साल होना काफी था।

बाल विवाह के इस प्रचलन ने लड़के-लड़कियों को जवान होने से पहले ही बूढ़ा बना देने की स्थितियाँ बना रखी थीं। मालवीय जी ने हिंदू समाज के शक्तिशाली और संगठित बनाने का अभियान छेड़ा तो बालविवाहों पर भी ध्यान दिया। अछूतोद्धार, शुद्धि-प्रथा और स्त्रियों के सम्मान का तीन सूत्रीय कार्यक्रम चलाते हुए वे बालविवाह को हतोत्साहित करने के लिए भी कहने-सुनने लगे। अगस्त, सन् 1823 में काशी और जनवरी, 1823 में प्रयाग में अधिवेशनों के समय मालवीय जी ने विद्वत् परिषदें बुलाकर समाज-सुधार पर विद्वानों, आचार्यों की राय ली। इस बात पर आम सहमति बनी की लड़की का बारह वर्ष और लड़के का सोलह वर्ष की उम्र से पहले विवाह न किया जाए। यदि कन्या की आयु सोलह और लड़के की आयु बीस वर्ष हो तो और अच्छा।

उस समय के प्रचलन में वर-वधू के लिए न्यूनतम आयु का यह निर्धारण भी बड़ा कदम था।समाज में इससे बवाल मच सकता था। पंडितों ने विरोध किया भी सही।

यद्यपि न्यूनतम आयु का यह निर्धारण तुरंत अपना नहीं लिया गया। इक्का-दुक्का लोग ही मालवीय जी के निर्देशों का पालन करते। आंवलखेड़ा में इस मर्यादा का सबसे पहले निर्वाह करने वाले श्रीराम थे। उन्होंने माँ से साफ कह दिया कि कन्या जो भी चुनी जाए, उसकी आयु बारह वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए। वे यद्यपि चार वर्ष और ठहरना चाहते थे, लेकिन पूजागृह में अखंड दीपक की देख-भाल माँ ही कर सकती थी या पत्नी। माँ को दिन में और भी काम होते थे। भरे-पूरे परिवार को सँभालने में ही सारा समय बीत जाता था। यह दायित्व पत्नी के जिम्मे सौंपना उचित लगा। गोसेवा करने और दूध से घी-मठा आदि तैयार कर पूजा-प्रयोजनों के लिए रखने का काम भी उन्हीं के हाथों अच्छी तरह संपन्न हो सकता था। श्रीराम ने विवाह की अनुमति इसलिए दी कि धर्मपत्नी साधना-सहचरी बने, इसलिए नहीं कि गृहस्थी बसाना या सामान्य लोगों की तरह वंश चलाना है। (क्रमशः)


Quotation

हम सदाचारी, परमार्थी और सेवाभावी तो है और कर्मों में अपनी इन भावनाओं को मूर्तिमान भी करते हैं, किंतु यदि स्वभाव से क्रोधी,कठोर अथवा निर्बल है तो इन सद्गुणों और सत्कर्मों का कोई मूल्य नहीं।

-परमपूज्य गुरुदेव


गुरुकथामृत-54 - सदगुरु के सदकै करूं, दिल अपनी का साछ

गुरुपूर्णिमा पर गुरुसत्ता के बहुआयामी रूपों का चिंतन सहज ही होने लगता है। कितने विलक्षण व निराले रूप हैं। उनके। हर क्षेत्र में तरह-तरह का मार्गदर्शन उनका हमारे लिए उपलब्ध है। सत्तर खंडों का वाङ्मय तो उपलब्ध है ही, उनके हाथ से लिखी, उनकी हस्तलिपि में उपलब्ध चिट्ठियाँ भी कम नहीं हैं। व्यक्तिगत जीवन की सभी परेशानियों से लेकर समष्टिगत सभी तरह की गतिविधियों में, जिनमें मनुष्य उलझता रहता है, उनका मार्गदर्शन हम हस्तगत कर सकते हैं। उनने स्वयं के लिए कभी कुछ नहीं चाहा। जीवनभर एक ब्राह्मण की तरह, सही अर्थों में जुलाहे कबीर की तरह जीवन जीते रहे, पर सभी को सब तरह की बातें बताते चले गए। किसी को समृद्धि की राह दिखाई तो किसी को राजनीति का क-ख-ग सिखाया। किसी को समाज का दर्द समझाकर समाज के लिए कुछ करने हेतु प्रेरित किया तो किसी को मन की व्यथा बताकर उसे जीवनभर के लिए अपना सब कुछ अर्पित कर देने हेतु टीस दे दी। जहाँ तक उनका प्रश्न है, वे तो कबीर की इन साखियों की कसौटी पर सही उतरते हैं-

खाँड़ चिरौंजी मन नहिं भावे, साई तेरा टुकड़ा कबूल। साल दुसाला मन नहिं भावै, साई तेरी गुदरी कबूल॥

जीवन किसी से कुछ नहीं माँगा, अपना अंतरंग उसके समक्ष खोलकर रख दिया एवं जिससे प्यार बढ़ाया उसको फिर उँगली पकड़कर चलना भी सिखाया। सबसे विलक्षण बात है-उनका तत्कालीन समाज में इतना प्रगतिशील चिंतन, जो आज कहीं दीखता नहीं। सुधारक स्तर पर वे आगे बढ़कर कार्य करते दिखाई देते हैं एवं सही मायने में युग निर्माण योजना के सूत्रधार बने दिखाई देते हैं। समय-समय पर दिए पत्रों में वे 6-3-65 को लिखते हैं-

विवाहों के नाम पर होने वाले अनाचार, हिंदू जाति के लिए कलंक हैं। इस संबंध में हमें बड़ी जलन रहती है। सो कुछ करने के लिए हाथ पैरों फेंक भी रहे हैं। आप चि पुष्पा के लिए रूढ़िवादी लोगों से बचने का प्रयत्न करें, ताकि फतेहपुर वालों जैसी जड़ता से दुबारा पाला न पड़े। इस संबंध में हमें कुछ अधिक प्रयत्न करना होगा। जून में एक सम्मेलन इसी उद्देश्य के लिए हम बुला भी रहे हैं। हो सके तो आप आने का प्रयत्न करें, ताकि कुछ ठोस कदम उठाने की पहल की जा सकें।

हिंदू जाति के नेग, दहेज, लड़की वाले पर तरह-तरह की आँतें, इन सबसे गुरुदेव चिंतित हैं एवं वे कुछ क्राँतिकारी कदम उठाने की बात कहते हैं। उठाए भी गए। प्रगतिशील जातीय सम्मेलनों के माध्यम से अगणित आदर्श विवाह संपन्न कराए गए। प्रायः डेढ़ लाख से अधिक आदर्श परिणय गायत्री परिवार द्वारा अब तक कराए जा चुके हैं। क्या यह अपने आप में परिवार-निर्माण की एक क्राँति नहीं है? आने वाले दिनों समाजशास्त्री जब इस पक्ष का शोध करेंगे तो अगणित उपलब्धियाँ पाएँगे।

हमारे पत्र पाने वाले सज्जन दुविधा में थे। बच्ची के लिए लड़का तलाश कर रहे थे। पूछा, आगे पढ़ाएँ कि नहीं। ज्यादा पढ़-लिख गई तो लड़का कहाँ से मिलेगा! सहशिक्षा हुई तो और आफत। पूज्यवर उन्हें समाधान देते है, “एम एससी कराने में कोई हर्ज नहीं। सहशिक्षा ऐसा भूत नहीं है, जैसा कि लोगों ने समझ रखा है। यदि एम एससी की आवश्यकता अनुभव करें तो उसे इसलिए नहीं रोकना चाहिए कि सहशिक्षा खराब है।”

यह पत्र 28-66 को शिष्डडडड को लिख गया था। आज भी यह 18-11 वर्ष की बच्ची के लिए वर ढूंढ़ने वालों के लिए मार्गदर्शक है। बड़े चिंतित नजर आते हैं परिजन अपने बच्चों के लिए- क्या होगा, कैसे होगा, कहाँ से वर मिलेगा! परमपूज्य गुरुदेव तो इतने क्राँतिकारी चिंतन वाले थे कि वे गायत्री परिवार के उनसे जुड़े हर परिजन को एक ही जाति-ब्राह्मण कुल का मानते थे एवं इस सिद्धाँत के पोषक थे कि गायत्री परिवार के परिजनों को आपस में एक−दूसरे के बिना जन्म-जाति देखे, संस्कारों के आधार पर विवाह संबंध स्थापित करने चाहिए। हम ही ठिठक गए। हम कहाँ क्राँतिकारी हो पाए? यदि दस प्रतिशत भी उनकी मान ली होती तो आज अविवाहित कन्याओं की समस्याएँ इस तरह मुँहबाये खड़ी दिखाई नहीं देतीं।

राजनीति पर भी पूज्यवर के विचार पढ़ने योग्य है, विशेषकर आज की परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य में। वैसे तो हम उनका चिंतन आजादी के बाद का भी इस लेख शृंखला के अंतर्गत दे चुके हैं, पर स्पष्ट चिंतन वाले गुरुदेव 1-2-67 को एक सज्जन को बेबाक शब्दों में लिखते है, “राजनीति आजकल बहुत महत्व एवं वर्चस्व प्राप्त कर चुकी है। उसमें समाज के निर्माण एवं विकास की एक बहुत बड़ी क्षमता सन्निहित हो गई है। इसलिए उसकी दिशा के सही-गलत होने का प्रभाव भी बहुत पड़ता है। आप लोग राजनीति को सही दिशा में अग्रसर करने के लिए जो प्रयास कर रहें है, उसमें सफलता मिले, इसकी प्रार्थना करते रहते हैं।

यही नहीं एक सज्जन को वे चेतावनी भी दे देते हैं व उनका कर्त्तव्य क्या है, स्पष्ट यह लिख भी देते हैं। मसला वही राजनीति का है। पत्र 6-7-57 का लिखा हुआ है।

“हमारे आत्मस्वरूप,

पत्र मिला। भोपाल में आपकी इन दिनों चल रहीं गतिविधियों के बारे में आवश्यक जानकारी प्राप्त हुई। वहाँ यदि उपयोगिता है तो ही ठहरना चाहिए। केवल हाथ उठाने और ऊँघते हुए दूसरों की बकवास सुनते रहने के लिए वक्त बरबाद करना बेकार है। इसकी अपेक्षा तो अपने क्षेत्र में कुछ काम करना ही ठीक है।”

कितनी सटीक बेबाक समीक्षा है 1957 की विधानसभाओं की। वही तो सब अभी भी चला आ रहा है। विधायिका से लेकर संसद तक सब यथावत् है। प्रजा के विकास के कार्य या उन पर चर्चा कहाँ चल रही है। दूरदर्शन पर देख लीजिए, किसी महत्वपूर्ण चर्चा में चालीस से अधिक साँसद मौजूद नहीं। जो हैं, वे मानसिक रूप से वहाँ कितने हैं, यह भी विचारणीय है। इसे पूज्यवर वक्त बरबाद करना कहते हैं एवं अपने क्षेत्र में जनजाग्रति के कार्य चलाने की प्रेरणा देते हैं पूज्यवर गुरुदेव की अक्टूबर 1970 में लिखी प्रेरक संपादकीय पंक्तियाँ ‘हम राजनीति में भाग क्यों नहीं लेते’ उन सभी पाठकों को अवश्य पढ़नी चाहिए, जिनमें यदा-कदा राजनीति के मैदान में कूद पड़ने चाहिए, जिनमें यदा-कदा राजनीति के मैदान में कूद पड़ने का भूत जागता रहता है एवं वे हाथ-पैर मारने लगते हैं।

अंत में एक पत्र और। इन्हीं सज्जन को 11-5-57 को पूर्व में लिखे पत्र से कुछ पूर्व गुरुसत्ता ने कुछ और प्रेरणा दी थी। यदि वह हृदयंगम कर ली गई होती तो शायद उनके जीवन की दिशा कुछ और होती। तकलीफ तो यह है न कि हम करते अपने मन की हैं और इसी के लिए सतत गुरुजनों से आशीष माँगते रहते हैं। पूज्यवर लिखते हैं-

“जन सेवामय जीवन ही सच्चा जीवन है। आप आर्थिक गुत्थी को सुलझाकर निर्वाह योग्य आजीविका का कुछ प्रबंध कर लें तो वकालत को छोड़ ही देना चाहिए। सेवापथ पर चलते हुए मनुष्य गरीब रहता है, रहना भी चाहिए। जिनमें संतोष है, वे ही अंत तक निभ पाते हैं। आप सेवामार्ग पर बढ़े। साथ ही सेवक के उपयुक्त गुणों को भी दिन-दिन अधिक मात्रा में उत्पन्न करते चलें।

आप सम्मेलन के अवसर पर मथुरा आ ही रहे हैं। विभिन्न विषयों पर यहाँ आवश्यक बातें कर लेंगे। आपकी अंतरात्मा जिस दिशा में चलनी चाहिए, उस मार्ग में आने वाली संभावित कठिनाइयों को सरल बनाने के लिए हम बराबर प्रयत्न करते रहेंगे। आप चिंता न करें। माता की गोद में अपने को सौंपकर आप भी निश्चिंत रह सकते हैं। मानवता की सेवा करने के लिए, आप आवश्यक तपश्चर्या के लिए, अपने को तैयार कर रहे हैं। यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता होती है।”

पाठक ध्यान से सभी पत्र पढ़ें एवं गुरुपर्व पर गुरुसत्ता के मार्गदर्शन के मर्म को समझें। समाज-निमार्ण से लेकर राजनीति तक के हार पहलू पर, विवाह संस्था से जुड़े दायित्वों से लेकर जनसेवा के बहुआयामी स्वरूपों पर उनका चिंतन पठनीय है। हम सभी साधक स्तर के शिष्य हैं तो इन पंक्तियों में अपने लिए उपयोगी मार्गदर्शन पा सकते है। हमारी गुरुसत्ता सही मायने में कबीर समान थी। उनका जीवन व अपनी गुरुसत्ता का जीवन बहुत साम्य रखता है। यदि हम अपना समर्पण और अधिक सशक्त और मजबूत करना चाहते है तो कबीर साहब की एक साखी से कुछ प्रेरणा ले सकते है एवं इन वचनों को दोहरा सकते हैं-

सदगुरु के सदकै करुँ, दिल अपनी का साछ। कलियुग हमस्यूँ लड़ि पड्या, मुहकम मेरा बाछ॥

सदकै अर्थात् निछावर, साछ माने साक्षी, मुहकम अर्थात् दृढ़ एवं बाछ अर्थात् आकाँक्षा। अर्थ हुआ, “मैं सच्चे हृदय से सद्गुरु के प्रति अपने को निछावर करता है। सद्गुरु की कृपा और उनके प्रति मेरा समर्पण देख कलियुग (विषय-वासनाएँ) मुझसे लड़ने लगा। मैं दृढ़ इच्छा वाला हूँ। मुझे कोई विचलित नहीं कर सकता। कोई उनसे अलग नहीं कर सकता।


VigyapanSuchana

एक निवेदन

जुलाई माह में लगभग सभी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षण प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। इसके साथ एक महत्वपूर्ण प्रयास माध्यामिक, उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में संस्कृति मंडलों की स्थापना, उनके छोटे प्रशिक्षण सत्र आयोजित करने के रूप में आरंभ किया जा सकता है। महाविद्यालय, विश्वविद्यालय स्तर पर सत्रारंभ के समय ‘ज्ञानदीक्षा’ एवं पाठ्यक्रम में राष्ट्रगौरव एवं मानवी मूल्यों के विषय के समावेश के रूप में संपन्न किए जा सकते हैं। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय यह पहल विगत वर्ष कर चुका है। अभी से प्रयास किया जाए तो तदनुसार वातावरण सारे शिक्षातंत्र में बन सकता है। विद्यार्थी ही भविष्य के हमारे नागरिक हैं इन्हें आदर्शों से अनुप्राणित करने पर ही युग निर्माण संभव हो सकेगा। विस्तार हेतु परिजन 16 मई, 23 का पाक्षिक पढ़ लें।


केंद्र के समाचार-विश्वव्यापी हलचलें- - क्या हो रहा है इन दिनों गायत्री परिवार में

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में नया सत्र आरंभ

एक वर्ष पूरा कर अपना विश्वविद्यालय अब इस जुलाई की बारह तारीख से 23-24 के नए वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस वर्ष से कुल नौ पाठ्यक्रम आरंभ किए जा रहे हैं। कुछ नए हैं। ज्ञानदीक्षा संस्कार 12 जुलाई को होगा एवं हर वर्ष अब 24 जुलाई का दिन विश्वविद्यालय के स्थापना-दिवस के रूप में मनाया जाएगा। विश्वविद्यालय में नवीनतम निर्माण गायत्री टावर्स व हॉसटल के रूप में हो चुके हैं छात्रावास में कुल 475 छात्र-छात्राओं के रहने-भोजन की संपूर्ण व्यवस्था बना दी गई है।

विश्वयात्रा पर सात दल विभिन्न राष्ट्रों में अलख जगाने पहुँचे

श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के एक महत्वपूर्ण निर्धारण के अनुसार इस वर्ष सारे विश्व के सभी महत्वपूर्ण देशों का दौरा करने के लिए सात दल मई-जून में रवाना हो गए। पहला दल आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी आदि देशों में अलख जगाने अप्रैल के तृतीय सप्ताह में पहुँच गया। तीन सदस्यीय दल ने न्यूजीलैंड व फिजी के विभिन्न नगरों में आयोजन संपन्न किए। दूसरा दल दो भाइयों की निगरानी में चार राष्ट्रों की ग्लोबल परिक्रमा पर गया, ताकि युवाशक्ति के लिए एक रणनीति बनाई जा सके। प्रवासी भारतीयों, उनके बच्चों तथा विभिन्न वर्गों में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की पैठ की जा सके। जून के प्रथम सप्ताह में तीन दल क्रमशः उत्तर-पूरब उत्तरी तथा पश्चिमी अमेरिका एवं कनाडा प्रवास हेतु पहुँच चुके हैं। अगस्त के प्रथम सप्ताह में एक चार दिवसीय सम्मेलन में सारे अमेरिका व कनाडा के युवा इसमें भाग लेंगे। एक दल यूनाइटेड किंगडम (इंग्लैंड) तथा एक दल यूरोप के लिए रवाना हुआ है। एक और दल दक्षिणी अफ्रीका, तंज़ानिया केन्या, यूगाँडा, मॉरीशस तथा जाँबिया के प्रवास पर रवाना हुआ है। तभी दल तीन सदस्यीय हैं एवं चार माह वहाँ रहकर गुरुचेतना का विस्तार करेंगे।

आदिवासी वर्ग में एक विशिष्ट चेतना का जागरण

मध्यप्रदेश के सेंधवा जिले के सालीटाँडा गाँव में एक आदर्शवाद आदिवासी डेमन्या भाई डावर के सत्प्रयासों से लगभग ढाई लाख लोगों ने नशे एवं माँसाहार का परित्याग किया। इन डेमन्या भाई के विषय में परिजन पढ़ चुके हैं दिसंबर, 22 के अंक में। इस संकल्प की पूर्णाहुति के रूप में इनने शाँतिकुँज प्रमुख को अपने क्षेत्र में 18 कुँडी यज्ञ में 13,14,15, 16 अप्रैल की तिथियों में आमंत्रित किया। बड़ा विराट समागम रहा। देखने योग्य दृश्य था। निमाड़ की पहाड़ियों में सूखे से घिरे क्षेत्र के बीच एक नखलिस्तान बसा था। प्रायः डेढ़ लाख आदिवासी भाई, निमाड़-मालवावासी उसमें शरीक हुए। सभी को बड़ी विलक्षण, अनुभूतियाँ हुई। इतना भारी समुदाय, फिर भी इंदौर, उज्जैन, भोपाल, बड़वानीच, खरगोन के कार्यकर्त्ताओं द्वारा सारी व्यवस्थाएँ सँभाल ली गई। संस्थाप्रमुख ने जामलीस्थित गायत्रीधाम को भी देखा व संस्थाप्रमुख ने जामली स्थित गायत्रीधान को भी देखा संस्कारघानी ग्राम घेगाँव होकर वे इंदौर होकर वापस आ गए।

उड़ीसा में जाग्रति मंथन

मई के द्वितीय सप्ताह में अपने नौ दिवसीय दौरे द्वारा शाँतिकुँज प्रतिनिधियों ने संबलपुर, भुवनेश्वर, राउरकेला, रायगड़ा क्षेत्र का गहन मंथन किया। प्रकाशन, संपादन तथा युगशक्ति गायत्री (उड़िया) के क्षेत्रीय विस्तार की चर्चाएँ हुई। इसके दूरगामी परिणाम होंगे।

टाटानगर में विराट आयोजन

टाटानगर वह पावन क्षेत्र है, जहाँ पूज्यवर की चरणरज कई बार पड़ी एवं जहाँ अंतिम पाँच 18 कुँडी यज्ञों में से एक आयोजित हुआ था (1970-71)। विगत दिनों वहाँ पूरे झारखंड व साथ लगे बंगाल, उड़ीसा व बिहार का एक विराट सम्मेलन (28 से 31 मार्च) 18 कुँडी गायत्री महायज्ञ कार्यकर्त्ता गोष्ठी सहित आयोजित हुआ। प्रबुद्ध वर्ग की गोष्ठियाँ बड़ी सफल रहीं।

छत्तीसगढ़ को मिली संजीवनी

25 अप्रैल से 1 मई की तारीखों में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के आँरग, तोरला, सिलीदीह क्षेत्र में प्राण प्रतिष्ठाओं सहित आदर्श ग्राम तीर्थों की स्थापनाएँ हुई। आवँवरी(चारामा) आश्रम को केंद्र के अधीन लेकर इसे पूरे छत्तीसगढ़-उड़ीसा का केंद्र बनाने का निर्णय लिया गया। फरसगाँव (बस्तर) में आयोजित सम्मेलन में पूरे मध्य व दक्षिण छत्तीसगढ़ का एक विराट कार्यकर्त्ता सम्मेलन हुआ। जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी वर्ग ने भाग लिया। लंजौड़ा ऋषि विद्यालय की तर्ज पर वैसे ही ऋषि विद्यालय खोलने का निर्णय लिया गया। राजनाँदगाँव में एक देवसंस्कृति महाविद्यालय की स्थापना की गई। कुल मिलाकर पूरे प्रदेश को यह दौरा एक नूतन संजीवनी दे गया।


अपनों से अपनी बात - कलातंत्र को परिष्कृत कर अब नई दिशा देनी है।

परमपूज्य गुरुदेव ने मई, 1970 की अखण्ड ज्योति में लिखा है कि अगले दिनों गायत्री परिवार महान प्रयोजनों के लिए भावना की शक्ति से एकत्र धन-संपदा का नियोजन करेगा। वे लिखते हैं, “(1) अगले दिनों हमें एक महान क्राँतिकारी शिक्षा योजना का शिलान्यास, संगठन और प्रसारण करना है, उसके लिए विश्वविद्यालय स्तर का एक समर्थ तंत्र खड़ा करना है। (2) कला की कामुक एवं विनाशोन्मुख प्रवृत्तियों को मोड़कर उसे एक नई दिशा देनी है। साहित्य, संगीत, काव्य, चित्र, अभिनय आदि कला के सभी पक्षों का परिष्कार कर उसे विनाश के चंगुल से विमुक्त कर विकास में नियोजित करना है। फिल्म उद्योग को भी नई दिशा दी जानी है। (3) हिन्दु समाज में जिस प्रकार धर्ममंच के माध्यम से हम क्राँतिकारी परिवर्तन कर रहे हैं, उसी प्रकार अन्य धर्मों के लिए ‘उद्देश्य एक पर स्वरूप अनेक’ का प्रयोग करना है। (4) अनीति और अनाचार, मूढ़ता और मूर्खता तथा कुरीतियों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष-मोरचे खोलने हैं, जिनमें विवाहोत्सव से लेकर अपराधी मनोवृत्ति तक हर मोरचे पर शाँति सैनिकों द्वारा जूझना है। इसलिए विरोध, सहयोग, सत्याग्रह से लेकर घेराव तक के हर अस्त्र को काम में लाया जाना है।”

चार मोरचों पर लड़ने वाली इस चतुरंगिणी सेना की चर्चा करते हुए पूज्यवर आगे लिखते हैं, “एक नया युद्ध हम लड़ेंगे। परशुराम की तरह लोक-मानस में जमी हुई अवाँछनीयता को विचार अस्त्रों से काटेंगे। सिर काटने का मतलब विचार बदलना भी है। परशुराम की पुनरावृत्ति हम करेंगे। इस युग का सबसे बड़ा और अंतिम युद्ध हमारा ही होगा, जिसमें भारत एक देश न होगा, महाभारत बनेगा और उसका दार्शनिक साम्राज्य विश्व के कोने-कोने में पहुँचेगा। निष्कलंक अवतार यही है। सद्भावनाओं के चक्रवर्ती सार्वभौम साम्राज्य जिस युग अवतारी, निष्कलंक भगवान द्वारा होने वाला है, वह और कोई नहीं, विशुद्ध रूप में अपना युग निर्माण आँदोलन ही है।”

कलातंत्र का परिष्कार

परमपूज्य गुरुदेव की इस चतुरंगिणी सेना के चार मोरचों में से प्रथम की चर्चा विगत अंक में हो चुकी। इस अंक में हम दूसरे कलापक्ष को ले रहे हैं। पूज्यवर लिखते हैं कि हमें नए कलाकार उत्पन्न करने चाहिए। ऐसे चित्रकार, जो मनुष्य की कोमल भावनाओं को उभारने वाली सात्विकता एवं उदात्त अभिव्यंजना मूर्तिमान कर सकें, युग निर्माण की सेना में भरती होने चाहिए। ऐसे चित्र

विष परोसने वाला तंत्र अमृत संजीवनी भी देगा

प्रकाशक और फिल्म निर्माता चाहिए, जो नारी को कुत्सित, घृणित, विषाक्त, अश्लील रूप में प्रस्तुत न करने की शपथ लें और केवल सुरुचि जगाने वाली तस्वीरें ही प्रस्तुत करें। वे ही युग की आवश्यकता को पूर्ण कर सकेंगे।

वे आगे यह भी कहते हैं कि हमें ऐसे साहित्यकार और कवि चाहिए, जिनकी लेखनी सृजनात्मक हो। कल्पना ने कसम खाई हो कि पशुता को उभारने और मनुष्यता को गिराने के लिए कलम से एक अक्षर भी न लिखने देगी। यदि सामाजिक और मानसिक गुलामी के बंधनों में बँधी अनैतिकता की अभ्यस्त आज की कुत्सित विचारणा के प्रति केवल विद्रोह के स्वर गाए जाएँ, लेखनी द्वारा आग उगली जा सकती है। नए युग का निर्माण ईंट-चूने से नहीं, लोकचिंतन की दिशा बदलने से ही होगा यह कार्य लेखक, कवि और प्रकाशक की त्रिमूर्ति ही करेगी। पुस्तक प्रकाशकों का संघ कसम खाए कि हम लोग जनमानस को विकृत करने वाला, अंधविश्वास, अनाचार एवं कुत्सा भड़काने वाला साहित्य नहीं छापेंगे। पुस्तक विक्रेताओं की पंचायत यह फैसला करे कि गोमाँस की तरह पतनोन्मुख साहित्य बेचकर भ्रष्ट कमाई करने की अपेक्षा भूखे सो जाना या घास बेचकर पेट भरना अच्छा समझेंगे। साहित्य सृजन, प्रकाशन और विक्रय की गंगा-यमुना सरस्वती यदि लोक-मंगल की दृष्टि अपना लें तो उस तीर्थराज में स्नान करके अपना कोढ़ी समाज कायाकल्प करने में समर्थ हो सकता है।

कितने ओजस्वी स्वर हैं। चित्रकारों, कलाकारों, लेखनी के धनी तथा प्रकाशकों के लिए चुनौती भरे हैं। यदि यह वर्ग सँभल जाए तो समाज में छाया सांस्कृतिक प्रदूषण दूर किया जा सकता है। नारी को भोग्य, रमणी का स्वरूप इनने ही तो दिया है। यदि इनकी दिशा सही हो जाए एवं सत्साहित्य, सही कला जन-जन तक पहुँचने लगे तो एक क्राँति ही हो जाए। परमपूज्य गुरुदेव उन्हीं हिला देने वाले स्वरों में गायन, वादन, अभिनय से जुड़ी संस्थाओं से भी कहते है।

गायन, वादन एवं अभिनय

तीनों ही शक्ति संस्थाएँ सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा का रूप धारण करके जनमानस में नंदन वन का सृजन कर सकती हैं। आज गायन, वादन, अभिनय, तीनों ने कामुकता, अश्लीलता, शृंगार और वासना उभारने में अपने को केंद्रिय करके रखा है। यदि यह एक सीमा तक उचित भी हो, तो भी वह अनीति की सीमा में हजारों-लाखों किमी. आगे जा चुका है। (पाठक ध्यान दे, यह सब पूज्यवर ने जुलाई, 1970 में कहा है, जबकि टेलीविजन, सीरियल्स, चित्रहारों केवल टीवी आदि का जन-जन में प्रवेश नहीं हुआ था। उसके बाद तो तैंतीस वर्ष में हालत क्या-से-क्या हुई है, तभी जानते है।) जो सुनाई और दिखाई पड़ता है, उसमें कामुकता भड़काने वाले तत्वों के अतिरिक्त और कुछ शेष ही नहीं है-जो गाता है कामुक, जो बजाता है कामुक, जो लिखा है कामुक जनमानस की पशुता को उभारकर सस्ती वाहवाही और दौलत हड़प लेने की हवस इस क्षेत्र में आकाश-पाताल छूने की होड़ में लगी है। अब इस अंधी दौड़ पर प्रतिबंध लगना चाहिए। गाए जाने के लिए शृंगार के अतिरिक्त अन्य रस भी शेष है। वे एक कोने में पड़े सड़ रहे है। अब उन्हें भी सहारा मिलना चाहिए। शृंगार को कुछ समय पूर्ण विश्राम लेने दिया जाए।

आगे वे लिखते हैं कि अपना देश हजार वर्ष की गुलामी में एक-से-एक बड़े और गहरे घाव सहता चला आ रहा है। अब उसे ऐसे दीपक राग सुनाए जोन चाहिए। जिससे बुझे हुए अंतःकरण ज्योतिर्मय हो उठें अब ऐसे मेघ मल्हार गाए जाने चाहिए। जिससे मानवीय आदर्शों की मेघमालाएँ उभरें और अपनी घनघोर वर्षा से इस तप्त-तृषित भूमि भूमि पर सर्वत्र हरियाली उगा दें। अभिनय केवल दिशा दे। कर्त्तव्य-पथ से विमुख हो रहे चिंतन को सृजन का नया मार्ग मिले और बौद्धिक पराधीनता के बंधनों से जकड़ी हुई विचारणा को विवेक के उन्मुक्त आकाश में विचरण करने की संभावना बढ़ चले। फिल्म उद्योग में लगी पूँजी और प्रतिभाएँ यदि पशुता भड़काकर जेब भरने की दुरभिसंधि से बाज न आएँ तो उनकी प्रतिद्वंद्विता में नया मोरचा खड़ा किया जा सकता है। प्रगतिशील फिल्म उद्योग को जन्म दिया जाए, इसके लिए अब ठीक समय आ गया। नए कलाकार उत्पन्न किए जाएँ। सभी कुछ स्वयंसेवक स्तर पर हो। पूँजीपति आगे न आएँ तो सहकारिता के आधार पर उस उद्योग का सृजन किया जाए। चलते-फिरते सिनेमा खुलें और देहाती क्षेत्रों में लागत खर्च निकालकर मनोरंजन के साथ-साथ सृजन को दिशा प्रदान करें। नाटकों, रास मंडलियों को सामयिक स्तर पर नया रूप दिया जाए।

आज की स्थिति और नूतन चिंतन

निश्चित ही लोक-मंगल हमारी गुरुसत्ता का लक्ष्य रहा व वे जीवनभर इसके लिए प्रयास करते रहे। 1970 में दिए गए उनके उपर्युक्त चिंतन के बाद कितना परिवर्तन आया, इससे सब वाकिफ है॥ विगत तैंतीस वर्ष में वह बदलाव आया है, जो विगत डेढ़ सौ वर्षों में भी नहीं आया था। वीडियो, डिजिटल टेक्नोलॉजी, उपग्रह-प्रसारण, ढेर सारे चैनल्स का प्राकट्य एवं घर-घर में उस प्रसारण का पहुँचना विज्ञान के आविष्कार ने सरल बना दिया है। जिस प्रसारण से सकारात्मक चिंतन मिलना था, उसने अब स्वयं को मात्र मनोरंजन तक, विषय सेवन, उपभोग में ढेर सारे चैनल्स उपलब्ध हैं। कारगिल युद्ध ऐसा था, जिसका एक प्रकार से युद्ध संवाददाताओं ने सजीव प्रसारण किया हो, ऐसा कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। ईराक पर अमेरिका के आक्रमण को भी अभी चैनल्स ने सजीव दिखाया। कुछ भी गोपनीय नहीं रह गई है। इस खुले प्रजातंत्र में हर क्षण हर व्यक्ति तक वह पहुँच रहा है, जिसका संभवतः वह सुपात्र नहीं है। विभिन्न चैनल्स ने जिस हिंदी को जन्म दिया है, वह हिंदी व इंग्लिश का समन्वय हिंग्लिश कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी।

समाचार, फिल्में चौबीस घंटे, अश्लीलता से भरे नाच-गाने चौबीस घंटे। यदि यही सब आम आदमी को मिलता रहा तो नई पीढ़ी का मानसिक, भावनात्मक विकास क्या होगा, सोचा जा सकता है। परमपूज्य गुरुदेव ने जिस चुनौती का वर्णन कलाक्षेत्र के विषय में किया है, वह अब दो सौ गुनी अधिक जिम्मेदारी के साथ आ खड़ी हुई है। चैनल्स ने धर्मक्षेत्र में भी प्रवेश कर लिया है। चार चैनल्स चौबीस घंटे धर्म के जिस स्वरूप को प्रदर्शित कर रहे हैं, उससे लगता है कि सभी को परिष्कृत धर्म का सही स्वरूप पढ़ाने हेतु जबरदस्ती प्रेरित करना होगा। हर कोई आकर हर किसी विषय पर अनगढ़ ढंग से प्रवचन-कथा कर रहे हैं या नाच-गाकर वह स्वरूप दिखा रहे हैं, जिसे देखने के बाद आज की युवा पीढ़ी धर्म का कभी नाम भी नहीं लेगी।

प्रतिभाएँ कला के साथ विज्ञान का रचनात्मक नियोजन करें

अब सारी जिम्मेदारी आज के उस प्रतिभाशाली वर्ग पर है, जो विज्ञान के इन आविष्कारों का रचनात्मक नियोजन कर सके। साथ ही कंप्यूटर्स (पावर पॉईंट), स्लाइड प्रोजेर्क्टस के द्वारा लोक-शिक्षण, मल्टीमीडिया से वह सब दिखाना जो पहले विभिन्न साधनों द्वारा दिखाया जाता था तथा श्रेष्ठ धारावाहिकों का प्रचलन जिनमें दाँपत्य जीवन के निर्माण की बात हो तथा युवाशक्ति का मार्गदर्शन हो। साक्षरता-विस्तार, पर्यावरण के प्रति जागरुकता, स्वास्थ्य-संवर्द्धन, योग-चिकित्सा, ध्यान का व्यावहारिक पक्ष, स्वच्छता, ग्रामों का आपदा प्रबंधन तथा स्वावलंबन की सफलता की कहानियाँ भी प्रचलित की जा सकती हैं। इन सबके लिए कम्प्यूटर, सस्ते स्लाइड प्रोजेक्टर, टेप रिकॉर्डर्स, ओवरहेड प्रोजेर्क्टस (व्भ्च् डडडडडड ), टीवी स्क्रीन, वीसीडी प्लेयर्स तथा केबल नेटवर्क का आश्रय लिया जाता है। लोक कलाओं को जिंदा करने तथा उनके आकर्षण को यथावत् बनाए रखने का भी प्रयास होना चाहिए। सारा विश्व बाजारवाद से हटकर हाट-गाँव की संस्कृति की ओर लौट रहा है। हम चाहें तो युगगायन, लोककला, लोकनृत्य व नुक्कड़ नाटकों , आँचलिक प्रहसनों के द्वारा पर्यटन को भी बढ़ावा दे सकते हैं तथा इनसे जुड़े कलाकारों को भरण-पोषण भी दिला सकते हैं। आज भी लोग सत्साहित्य की चाह रखते हैं। स्थान-स्थान पर उनकी साहित्य प्रदर्शनी लगें तो देखते-देखते लोगों की रुचि बदली जा सकती है। कवि सम्मेलन भी आयोजित हों, मुशायरे भी, परंतु उनका स्वरूप सौम्य, सात्विक हो। पुरातन गायन पद्धतियाँ, वाद्ययंत्र फिर नए रूप में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। जिस रुचि के साथ आज की पीढ़ी पॉप या जॉज पर थिरकती है, पुनः इन धुनों को आत्मसात कर सकेगी, इस पर विश्वास किया जा सकता है।

एक छोटा प्रयास व भावी संभावनाएँ

शाँतिकुँज, हरिद्वार ने ‘युग प्रवाह’ पाक्षिक वीडियो पत्रिका (अब तक 34 संस्करण निकल चुके) द्वारा एक अभिनव शुरुआत की है। यह देशभर के अपने कार्यकर्ताओं द्वारा लगभग छह से आठ करोड़ लोगों को नियमित दिखाई जा रही है। इसमें आज की परिस्थितियों को जोड़कर जिज्ञासाओं के समाधान से लेकर सार्थक सफलता की कथाओं से भरे समाचार भी होते हैं, युगगायन भी तथा लोकरंजन का विधेयात्मक स्वरूप भी। इसकी लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ी है। आध्यात्मिक स्तर पर नवजागरण आया है एवं शाँतिकुँज से अपेक्षाएँ भी बढ़ी हैं। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, मास कम्युनिकेशन, जर्नलिज्म की विधाएँ आरंभ की जा रही हैं।

आगे चलकर ‘गायत्री महाविद्या’ पर एक चलचित्र तथा ‘युग निर्माण’ पर एक धारावाहिक शृंखला बनाने का मन है। इससे जन-जन को सप्तसूत्री आँदोलनों में-युग के नवनिर्माण की प्रक्रिया में भागीदारी करने का अवसर मिलेगा। इसके साथ-साथ प्रदर्शनी के माध्यम से लोक-शिक्षण का माध्यम जो रहा है, उसे अपने चार हजार से अधिक केंद्रों के द्वारा और अधिक व्यापक बनाने का मन है। छपी हुई प्रदर्शनियों द्वारा बाजार-हाट, मेलों तथा सुदूर ग्रामों तक उनकी भाषा में संदेश पहुँचाया जा सकता है। चैनलों की भीड़ में खड़े होने की न हमें जरूरत है, न आर्थिक दृष्टि से इस योग्य हम हैं। जब उपभोक्तावादी विज्ञापन-प्रधान समाज के साथ नहीं चल रहे तो उनकी तरफ मुँह ताककर चैनल का तंत्र कैसे खड़ा किया जाए। अपना परिवार स्वयं में इतना बड़ा है कि वह जनचेतना जगाकर लोगों की, चलचित्र व धारावाहिक निर्माताओं की रुचि को बदल सकता है। आदर्शवादी निर्माण हेतु प्रेरित कर सकता है। हमें कलातंत्र को व्यवस्थित ढंग से आगामी दो वर्ष में एक नर्द दिशा देनी है। इस क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं को शाँतिकुँज के तंत्र से जोड़ना है। कोई कारण नहीं कि प्रयास किया जाए तो अधोगामी प्रवाह को ऊर्ध्वगामी न बनाया जा सके। पूज्यवर ने जो चुनौती दी है, वह हम सब के लिए है, हमीं को पूरी करनी है एवं इस सकारात्मक माध्यम से युग निर्माण योजना के लक्ष्य को निश्चित ही पूरा करना है।


शिष्य की अभिव्यक्ति


शिष्य की अभिव्यक्ति (kavita)

जितना तुमने दिया, न उतना सारा जग हमको दे पाया, जब-जब एक बूँद जल माँगा, तब तुमने बादल बरसाया।

जग ने दिए तनाव भरे दिन, रातों में भीषण अँधियारे, तुमने लौकिक और अलौकिक काटे सारे कष्ट हमारे, हमने केवल किया समर्पण, तुमने अपने शीश चढ़ाया। जितना तुमने दिया, न उतना सारा जग हमको दे पाया।

जब हम थे असहाय, दे दिया तुमने सबल सहारा हमको, हम शापित थे, तुमने अपनी चरण-धूलि से तारा हमको, ऐसा प्राण-प्रवाह भर दिया, अब तो अंग-अंग उमगाया। जितना तुमने दिया, न उतना सारा जग हमको दे पाया।

इस सूखे मरुथल में तुमने ऐसी संवेदना बहाई, पल-पल लगने लगी, हमें तो अपनी-सी, हर पीर पराई, ऐसी कृपा करी, जो मन का हर कोना-कोना सरसाया। जितना तुमने दिया, न उतना सारा जग हमको दे पाया।

हमको दिया मनोबल ऐसा, जो चट्टानों से टकराए, हमें तपाया इतना, जिससे जग में हम कुँदन कहलाए, जो था भार, व्यर्थ-सा जीवन, तुमने उसको धन्य बनाया। जितना तुमने दिया, न उतना सारा जग हमको दे पाया।

अब तक किया अनुग्रह तुमने, अब कर्त्तव्य निभाएंगे हम, ऋण का भार शीश पर अपने, कभी न लेकर जाएँगे हम, काम तुम्हारा ही करना है, पग न रहेगा अब अलसाया। जितना तुमने दिया, न उतना सारा जग हमको दे पाया।

-शचीन्द्र भटनागर

*समाप्त*