गंगा-गायत्री

गंगा और गायत्री में भारत माता की चेतना समायी है। ये दोनों ही देव संस्कृति के ज्ञान-विज्ञान की पुण्य धाराएँ हैं। इनमें देवभूमि भारत के पुरातन ऋषियों के महातप का प्रखर परिचय है। सूर्यवंश की पीढ़ियों की तप साधना ‘भगीरथ’ के रूप में अवतरित हुई। और महातपस्वी भगीरथ की महासाधना ने माता गंगा के अवतरण को सम्भव-साकार किया। गंगा की लहरों ने भारत देश की चेतना में नवप्राण भरे।

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के पावन दिन भगवती गंगा के अवतरण के साथ एक दैवी सन्देश भी अवतरित हुआ- भारतवासियों! राष्ट्र निर्माण के लिए पीढ़ियों को बिना थके- बिना रुके अनवरत तपना पड़ता है। अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए किसी अन्य की ओर न निहारो, किसी और से कोई आशा न रखो। स्वयं महातप का संकल्प करो। भगीरथ तप ही उज्ज्वल भविष्य का एक मात्र रास्ता है।

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के इसी पुण्य दिन ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के तप को भी पूर्णता मिली। राजस स्वभाव वाले महाराज विश्वरथ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र बने। आदिशक्ति माता गायत्री उनके अन्तःकरण में अवतरित होकर युगशक्ति के रूप में भारत माता की सम्पूर्ण चेतना में संव्याप्त हो गयीं। मानव की व्यक्तिगत एवं सामूहिक चेतना में सम्भावनाओं के नए द्वार खुले। प्रकृति का परिमार्जन सम्भव है। जीवन बदल सकता है। मानव जाति माता गायत्री के आँचल को थामे तो सही। चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र की साधना से दुर्भाग्य का सौभाग्य में रूपांतरण सहज सम्भव है।

गंगा के जलकणों और गायत्री के मंत्र अक्षरों में भारत और विश्व में बसने वाली सम्पूर्ण मानवता के लिए सन्देश है- पुकार है। तुम कर सकते हो- भगीरथ की तरह, विश्वामित्र की तरह। तुम्हारे तप में देश की समृद्धि है- तुम्हारे तप से ही देश की संस्कृति है। भगीरथ और विश्वामित्र के वंशजों! जागो, उठो और महातप की कठिन साधना के लिए संकल्पित हो जाओ। महातप से ही माँ गंगा की जलधारा निर्मल होगी। महातप से ही माँ गायत्री की साधना वरदायिनी सिद्ध होगी।


चंचल हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्

मनुष्य की उत्पत्ति चाहे जैसे भी हुई हो परन्तु यदि किसी मनुष्य से यह कहा जाय कि तुम्हारे पास मन नहीं है, तो वह इसे स्वीकार नहीं कर सकता। वह मन की परिभाषा भले ही न बता सके, उसकी उत्पत्ति, स्थिति और लय की स्थिति न बता सके, पर यह अवश्य बता सकता है कि उसके पास मन है। वैसे सत्य यही है कि मनुष्य ने मन और बुद्धि के माध्यम से ही पदार्थ पर नियंत्रण स्थापित कर प्रकृति पर विजय प्राप्त की है। आज वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी यह बात प्रमाणित हो चुकी है।

अध्यात्म विज्ञान मन की एकाग्रता एवं उसके उपयोग की विशद् विवेचना करता है। मन का अन्वेषण, विश्लेषण, उपयोग का प्रयास उतना ही पुराना है, जितना कि अध्यात्म। मनुष्य के पास जो मानसिक शक्ति है उसका पूरा-पूरा उपयोग तो दूर रहा, दस प्रतिशत का उपयोग भी वह नहीं कर पाता। मानसिक शक्तियों के शोधकर्त्ता जीजफ बीराइन ने तो यहाँ तक कहा है कि हम जितनी अच्छी तरह परमाणु को जानते हैं, उसका पाँच प्रतिशत भी परमाणु को जानने वाले मन को नहीं जानते।

मनुष्य शब्द का अर्थ ही है मन वाला। सम्पूर्ण जीवन मन से ही संचालित होता है। मन के ही कारण मनुष्य पशु जीवन से ऊपर उठ जाता है और मन के ही कारण वह परमात्म तत्त्व की प्राप्ति से वंचित रहता है। जहाँ पशुता से ऊपर उठने के लिए मननशीलता का होना जरूरी है, वहीं दिव्यता तक, परमात्मा तक पहुँचने के लिए मन का न होना यानि ‘अमनी भावदशा’ का उपलब्ध होना आवश्यक है।

मन स्वभावतः ही चंचल है। मन की इसी वृत्ति का उल्लेख करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से कहते हैं-

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन सधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥

चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढ़म्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥ - गीता, 6/33-34

अर्थात्- हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समभाव से कहा है मन के चंचल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ। यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ।

तब श्री भगवान् कहते हैं-

असंशयं महाबाहो मनो दुनिग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ - गीता, 6/35

अर्थात्- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला होता है। परन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है।

यह अभ्यास और वैराग्य मात्र कुछ औपचारिकताओं का निर्वाह नहीं है, अपितु पूर्णतया अध्यात्म विज्ञान का प्रयोगसिद्ध मनोदैहिक तथा वैयक्तिक- सामाजिक क्रिया-कलाप है। जो शरीर और मन को, मन और आत्मा को तथा आत्मा और परमात्मा को जोड़ता है। यह व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठित होकर वृहद् आदर्श की ओर उन्मुख करता है। ये दो तत्त्व मात्र संकेत नहीं हैं, वरन् उन मनीषियों की स्वअर्जित अनुभूति है, जिन्होंने मात्र शास्त्रज्ञान अर्जित नहीं किया, अपितु प्रयोग और परीक्षण करके मन को देखा और समझा है, उस पर नियंत्रण प्राप्त किया है।

जिस प्रकार सुनार धधकती अग्नि में सोने को तपाता है, फिर ठण्डा करता है, फिर तपाता है। यह सोने का तप ही है, जिसमें तपकर वह शुद्ध होता है, निखरता है, कुँदन बनता है। उसका सारा मैल दूर हो जाता है और एक आभा, एक चमक आ जाती है। मनुष्य को भी मन पर चढ़े अनेक आवरणों को परत-दर-परत उसी प्रकार हटाते चलना चाहिए। परिष्कृत हुआ मन ही परमात्ममय होने की समर्थता प्राप्त कर पाता है।

मन को एकाग्र करने से तात्पर्य दमन से कदापि नहीं है। दमन से तो मन की वृत्तियाँ और भी चंचल हो उठती हैं, क्योंकि यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है कि जिस चीज को जितना दबाने का प्रयास किया जाता है वह उतना ही शक्तिशाली हो जाता है। मन को साँसारिक विषय वासनाओं से धीरे-धीरे परमात्मा की ओर एकाग्र करना चाहिए। परमात्मा के सतत स्मरण से मन निर्मल होता चला जाता है। ऐसा जीवन उस मार्ग से बचता है, जिस पर उसके भटकने की संभावना होती है। परमात्मा का सतत स्मरण कितना महिमावान् है, इसे तो उसका स्मरण करने वाला मन ही जान सकता है।

मन जो कल्पनाएँ करता है यदि वे पूरी होती रहें तो हमारे लिए ही अनेकानेक मुसीबतें खड़ी हो सकती हैं। यह तो प्रकृति की कृपा है कि मन जो इच्छा करता है वह तत्काल नहीं हो जाता। तब तक ऐसा नहीं होता जब तक हम प्रयास नहीं करते। ऐसे में यदि हमारा मन वैसी इच्छा करे जो हमारे लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी कल्याणकारी हो, तो मन के दमन का सवाल ही नहीं उठेगा।

मन का जीवन दीर्घ है, पर आत्मा का जीवन तो असीम और अनन्त है। फिर क्यों न हम महान् विचारों का मनन करें, जिससे आध्यात्मिक विकास त्वरित गति से हो। मन को प्रशिक्षित करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। ज्ञान या विज्ञान के रूप में यही वह लक्ष्य है, जो जीवन को अर्थ देता है। वही ज्ञान वास्तव में मूल्यवान है, जो जीवन को परमात्मा की ओर ले जाता है।

अपने दैनिक जीवन में आध्यात्मिकता को लाना निश्चय ही अत्यन्त कठिन है। विशेष रूप से जब हमारी सम्पूर्ण दिनचर्या शरीर भाव के इर्द-गिर्द घूम रही हो। ऐसे में शरीर को स्वयं से भिन्न किसी अन्य वस्तु के रूप में देखना असम्भव नहीं तो दुष्कर अवश्य है। पर इस दुष्कर कार्य को सरल बनाती है, मन की एकाग्रता। निःसंदेह मन की एकाग्रता से ही हम साधारण से साधारण परिस्थिति एवं क्रिया-कलापों में आध्यात्मिकता की झलक पाने में समर्थ हो सकते हैं।

आध्यात्मिक जीवन का पथ लम्बा अवश्य है, लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कई जीवन आवश्यक हैं, किन्तु मन की गहराई में परमात्मा को बिठाकर कई जीवन के चक्करदार रास्ते से बचा जा सकता है। यही पूर्णता प्राप्ति का राजमार्ग है। पूर्णमदः पूर्णमिदं का यही संदेश है। मन ठीक उसी प्रकार कार्य करता है जैसे कि अग्नि। चाहें तो हम उसका सदुपयोग करें या दुरुपयोग। अपने मन को एकाग्र कर हम उपनिषद् के इस वाक्य को अपने जीवन की अनुभूति में बदल सकते हैं, जिसमें कहा गया है- ‘मनुष्यों! उठो, जागो, और श्रेष्ठत्व प्राप्त करो, जो परमात्मा ने तुम्हारे लिए सुरक्षित कर रखा है।’


दूर, बहुत दूर से प्रवाहित होकर (kahani)

दूर, बहुत दूर से प्रवाहित होकर...


जीवन-साधना के स्वर्णिम सूत्र

जीवन साधना नकद धर्म है। यह नकद सौदा व व्यापार है इसके परिणाम-प्रतिफल के लिए लम्बे समय की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। इसका उपहार हाथो-हाथ मिलता है। इसकी साधना से अन्तर में संचित पशु-प्रवृत्तियों का आवरण कटता-मिटता है तथा व्यक्तित्व निरन्तर उच्चस्तरीय बनता जाता है। उत्कृष्टता और आदर्शवाद की दिव्य उपलब्धियाँ सतत मिलने लगती हैं। नर-पशु के अन्दर नर-देव की झलक-झाँकियाँ झलकने लगती हैं। और इसी के आधार पर उच्चतर कर्म, स्वभाव, चिन्तन और चरित्र विनिर्मित होता है। यही वास्तविक उपार्जन-उपलब्धि है, जिसे परिष्कृत व्यक्तित्व के रूप में जाना-समझा जाता है। यही वह प्रतिभा है जिसे दैवी सम्पदा कहा जाता है।

जीवन की साधना करने का तात्पर्य है, व्यक्तित्व को उत्कृष्ट एवं परिष्कृत करना। यह अनमोल सम्पदा है जो स्व उपार्जित है। इसे स्वयं ही श्रद्धा, व्रतशीलता एवं संयम साधना के सहारे अर्जित करना पड़ता है। इसके लिए किसी से कोई अपेक्षा नहीं की जाती, वरन् यह स्वयं के प्रचण्ड पुरुषार्थ एवं भागीरथी प्रयास के द्वारा प्राप्त की जाती है। यह न तो उत्तराधिकार में मिलती है और न किसी से वरदान-उपहार में उपलब्ध होती है। व्यक्तित्व का निर्माण स्वयं को ही करना पड़ता है। निजी तन्मयता एवं तत्परता का सघन समावेश करके ही इसे हस्तगत किया जा सकता है। इसके लिए अपने अन्दर आवश्यक समर्थता एवं योग्यता उत्पन्न करनी पड़ती है, बीज के समान स्वयं को गलाना पड़ता है, दीपक के समान स्वयं को जलाना पड़ता है।

व्यक्तित्व निर्माण ही जीवन साधना है। जीवन को सार्थक एवं समर्थ बनाने वाली क्षमता अर्जित करने का ही दूसरा नाम व्यक्तित्व निर्माण है। संयमशील, अनुशासित और सुव्यवस्थित क्रिया-कलाप अपनाना जीवन साधना कहा जाता है। जीवन वैभव का श्रेष्ठतम एवं सर्वोत्तम सदुपयोग करना ही जीवन साधना है। व्यक्तित्व को पवित्र, प्रामाणिक, प्रखर बनाने की प्रक्रिया जीवन साधना है। यह साधना अंतरंग जीवन में सुसंस्कारिता का सुवास फैलाती है और बहिरंग जीवन में सभ्यता रूपी शालीन व्यवहार में निखरती है। यूँ तो इस उपलब्धि को प्राप्त करने में वातावरण एवं संपर्क-सान्निध्य भी सहायक होते हैं तो भी मुख्यतया योगदान अपने दृष्टिकोण एवं प्रयास का रहता है। यही सच्ची पात्रता है। ऐसे ही सत्पात्रों को स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, तुष्टि, शाँति जैसी दिव्य विभूतियाँ मिलती हैं और कृतार्थ करती हैं। इनमें सद्भावना, शालीनता, सहृदयता के समस्त लक्षण प्रकट होते हैं जो स्वयं प्रसन्न एवं आनन्दित होते हैं तथा दूसरों की सद्प्रेरणा के केन्द्र बनते हैं। सामान्य स्थिति में रहते हुए भी ऐसे ही लोग महामानव, देवमानव बनते हैं।

आज के अर्थप्रधान आपाधापी वाले आधुनिक युग में इस साधना की सर्वोपरी आवश्यकता है। इन दिनों ऐसे व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति एवं सुदृढ़ चरित्रवानों की आवश्यकता है। जो जीवन के शाश्वत सिद्धान्तों को जन सामान्य में सरल और व्यावहारिक रूप में समझा सके, उपयोगी कर सके। इन्हें अपने प्रयास-पुरुषार्थ की आधारभिति अब ऐसे सशक्त एवं सुबोध आधार पर खड़ी करनी होगी जिसे उपभोक्तावादी, उच्छृंखलतावादी अपसंस्कृति तूफान गिरा न सके, वरन् टकराकर वापस लौटने की अवशता-विवशता अनुभव करे, जो जीवन साधना के सरल, सहज परन्तु स्वर्णिम सूत्रों को स्वयं में उतारे एवं औरों को अपनाने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करे।

जीवन साधना का प्रथम सूत्र है ईश्वर विश्वास। ईश्वर पर आस्था मानवी नैतिकता का मेरुदण्ड है। यही आस्तिकता के रूप में आर्ष साहित्य के पन्नों-पन्नों में बिखरा मिलता है। कर्मफल के विज्ञान विधान का सम्बन्ध भी इसी से है। कर्मफल तत्काल मिलते न देखकर मनुष्य कुमार्गगामी बनता है। वह उच्छृंखल, स्वार्थपरता तथा अनीति के पतन पथ पर बढ़ चलने का दुःसाहस करने लगता है। जबकि ईश्वरीय शासन व्यवस्था की आस्था सन्मार्गगामी बनाती है। आस्तिकता का यह भाव मनुष्य में उपासना, साधना एवं सेवा की वृत्ति को जन्म देता है। जिसे अपनाकर वह अपने कषाय-कल्मषों को नित्य स्वच्छ करता है। और दिव्य अनुदान-वरदान का अधिकारी बनता है। आज परिवार में गायत्री माता का चित्र या अन्य महापुरुषों को ईश्वरीय सत्ता का, मानवीय आदर्शवादिता का प्रतीक मानकर रखना चाहिए जिससे आस्तिकता का वातावरण बना रहे।

आस्तिकता की सजल भावना में ही आत्मविश्वास, आत्मनिष्ठ रूपी आध्यात्मिकता पनपती है। यह अन्तर्यात्रा है, जहाँ अगणित सुप्त शक्तियों को जाग्रत् करने का अवसर मिलता है। यहीं पर आकर बोध होता है कि अपने भाग्य का निर्माता मनुष्य स्वयं है। इस भावबोध के जगते ही मनुष्य अपने गुण, कर्म और स्वभाव की उत्कृष्टता को सर्वोच्च साधना मानकर व्यवहार में उतारने लगता है। शिष्टता, सज्जनता, शालीनता, सहृदयता, उदारता जैसी प्रवृत्तियाँ जीवन के आवश्यक अंग बन जाते हैं। शरीर को भगवान् का मंदिर मानकर उसे सदा स्वच्छ रखा जाता है और लोभ, मोह और वासना-तृष्णा से सदा इसकी रक्षा की जाती है। जीवन में लोकमंगल के लिए बढ़-चढ़कर अनुदान देने की ललक उठती है।

आध्यात्मिकता की इस आन्तरिक वृत्ति के जागरण के साथ ही जीवन में धार्मिकता अर्थात् कर्त्तव्यनिष्ठ उभरती है। धर्म का उदार अर्थ है अपने तथा औरों के प्रति कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना। नैतिक और सामाजिक कर्त्तव्यों को कठोर अनुशासन में बाँधकर रखने से ही धार्मिकता की भावना पनपती है। इससे धनोपार्जन में नीति, न्याय और औचित्य का ध्यान आता है। परिवार को सुगठित, सुविकसित और सुसंस्कृत बनाया जाता है। उनकी आर्थिक सुविधाओं के साथ-साथ सद्गुणों की सम्पदा विकसित करने का प्रयास किया जाता है। बड़ों आदर तथा छोटों को स्नेह देने में तत्परता बरती जाती है। सच्चे अर्थों में यही धार्मिकता है। जो प्रायः परम्पराओं के बंधन से मुक्त होती है।

धार्मिकता के इस धरातल पर ही आत्मोत्कर्ष की कली खिलती है। यही प्रगतिशीलता का पर्याय है। प्रगतिशीलता का तात्पर्य आरोग्य संरक्षण और अर्थ उपार्जन के साथ-साथ अपने ज्ञान, अनुभव एवं दृष्टिकोण का विकास, परिष्कार भी उतना ही आवश्यक है। हमें विचारशील एवं दूरदर्शी होना चाहिए और पूर्वाग्रह दुराग्रह से ऊपर उठकर हर तथ्य की तह तक पहुँचकर यथार्थता को समझने का प्रयास करना चाहिए। हमें सर्वत्र सत्य की तलाश करनी चाहिए और उचित व न्याय संगत निर्णय लेना चाहिए। इसके लिए सत् साहित्य का स्वाध्याय करना चाहिए जो जीवन में नई दिशा दे सके। आत्म समीक्षा के लिए मनन और आत्म निर्माण के लिए चिन्तन अनिवार्य नित्य कर्म माना जाना चाहिए। सही मायने में यही प्रगतिशीलता है, आत्मोत्कर्ष है।

आत्मोत्कर्ष के इस प्रगतिपथ पर संयमशीलता सधती है, इन्द्रिय निग्रह होता है ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ ज्ञानवृद्धि, औचित्य का निर्णय, उत्साह, प्रयत्न, निर्वाह के उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में सहायता, सहयोग के लिए हैं। इनका समुचित उपयोग करने पर ही उस लाभ से लाभान्वित हुआ जा सकता है, जिसके लिए ईश्वर ने उन्हें प्रदान किया है। समझदारी इसमें है कि इन शक्तियों के दुरुपयोग से बचा जाय क्योंकि इसके असंयम में केवल हानि ही है, लाभ कुछ भी नहीं है। इन्द्रिय में स्वाद और कामुकता की विकृतियाँ ही मुख्य हैं, अतः आहार में सात्विकता तथा चिन्तन में उत्कृष्टता से ही इसका निराकरण किया जा सकता है।

संयम के पश्चात् ही समस्वरता आती है अर्थात् मानसिक सन्तुलन प्राप्त होता है। प्रसन्न चेहरा, रचनात्मक चिन्तन करने वाले दूरदर्शी स्वभाव में मानसिक संतुलन के लक्षण प्रकट होते हैं। जो उपलब्ध है उस पर सन्तोष एवं आनन्द अनुभव किया जाय और अधिक प्राप्त करने के लिए एवं आगे बढ़ने के लिए उत्साहपूर्वक प्रयत्नरत रहा जाय। यही सुदृढ़ मानसिक संतुलन है। ऐसी मनःस्थिति वाला आपदाओं विपदाओं में भी दुःख शोक, हताशा, निराशा,उद्विग्नता के दुष्चक्र में नहीं उलझता है। वह हरेक परिस्थितियों को शान्त भाव से स्वीकार करता है। साथ चलने वाले साथी सहयोगियों के छिद्रान्वेषण के बजाय उनके सद्गुण ढूंढ़ना चाहिए तथा उनकी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की जानी चाहिए।

जीवन साधना के अन्य सूत्र हैं पारिवारिकता एवं सामाजिकता का भाव। इसे आत्मविस्तार की प्रक्रिया कह सकते हैं। समाज का विशाल कलेवर परिवार की छोटी-छोटी इकाइयों में बसता है। परिवार लघु समाज एवं छोटा राष्ट्र है। परिवार के प्रत्येक सदस्य को वैयक्तिक कर्त्तव्यों एवं सामाजिक उत्तरदायित्व से परिचित कराया जाना चाहिए। इसी प्रकृति के विकास में ही विश्व नागरिकता के मानव परिवार के सृजन की संभावना सन्निहित है। अतः परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व समझें जाये परन्तु उनके प्रति मोह जाग्रत् न हुआ जाय। दूसरों के साथ वही व्यवहार किया जाये तो हम दूसरों से अपने लिए किए जाने की अपेक्षा करते हैं। हर किसी को सम्मान देने और सद्व्यवहार करने की सत्प्रवृत्ति अपनानी चाहिए। चिन्तन उदार और कर्त्तव्य आदर्शपरक होना चाहिए। हमारा स्वभाव समाज निष्ठ होना चाहिए। व्यक्तिवाद के बदले समूहवाद को प्रश्रय देने से ही सामाजिकता का विकास हो सकता है।

मनुष्य की स्वच्छता और सादगी को ही शालीनता के रूप में निरूपित किया जाता है। स्वच्छता मनुष्य की जागरुकता एवं सुरुचि का परिचायक है। इसमें उसके कलात्मक दृष्टिकोण एवं सौंदर्यप्रियता का प्रमाण मिलता है। उसका विकसित सभ्यता स्तर का पता इस तथ्य से लगता है कि उसका स्वभाव कितना सादगी प्रिय है। सौंदर्य सादगी में झलकता है, सजधज, फैशन की कृत्रिमता और उद्धत प्रदर्शन से शालीनता का स्तर गिरता है। यह सौंदर्य की विकृति है। इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए। इससे समय और श्रम का सन्तुलन सधता है, नियमितता पनपती है। समय और धन का अधिकतम अपव्यय इसी उद्धत प्रदर्शन में चला जाता है। इसे बचाया जाना चाहिए और लोकोपयोगी कार्यों में लगाना चाहिए। कार्यपरायण समय ही सार्थक है। इस सत्प्रवृत्ति के अपनाने से व्यक्ति प्रामाणिक बनता है तथा गाँधीजी के समान जन-जन के हृदय में पूजा जाता है।

सज्जनता, नम्रता, उदारता, सेवा आदि सद्गुणों की प्रशंसा की जाती है। परन्तु प्रखरता, साहस और पराक्रम के बिना यह विशेषताएँ भी अपनी उपयोगिता खो बैठती हैं। अतः हर व्यक्ति को निर्भीक और साहसी होना चाहिए। हर किसी को आत्मविश्वासी होना चाहिए। अपने पुरुषार्थ और साहस पर अगाध आस्था होनी चाहिए। स्वयं के सहारे, स्वयं के साधनों से, स्वयं के संकल्प बल के सहारे अपनी योजनाएँ बनानी चाहिए। दूसरों की सहायता के लिए बैठें नहीं रहना चाहिए। लक्ष्य तक पहुँचने की दृढ़ता और हिम्मत अपने अन्दर उगानी चाहिए। यही जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र हैं जिनसे जीवन सधता है एवं व्यक्ति का परिष्कार परिमार्जन होता है। हम सबको अपने जीवन में इन साधना सूत्रों को अपनाना चाहिए ताकि अपने मानव जन्म की गौरव गरिमा बनी रहे।


एक बार विद्यार्थी कपिल संदेह में (kahani)

एक बार विद्यार्थी कपिल संदेह में...


पहले सच्चे शिष्य बनो

धर्मराज सभी पर एक नजर डालकर धर्मासन पर बैठ गए। उस दिन उनके द्वार पर भारी भीड़ थी। अनेकों जीवात्माएँ अपना फैसला सुनने के लिए उतावली थीं। सभी के अपने-अपने दावे थे। प्रायः सभी को अपने सत्कर्मों का, अपने पुण्यों का भारी गर्व था। हर एक का कहना यही था कि वह स्वर्ग में सबसे पहले प्रवेश का अधिकारी है। चित्रगुप्त इनका हिसाब-किताब अपनी बही में देख रहे थे। और धर्मराज को वास्तविक जानकारी दे रहे थे।

लेकिन इस प्रक्रिया में लगने वाली देर किसी को बर्दाश्त नहीं हो रही थी। कुछ पण्डितों ने चित्रगुप्त पर झल्लाते हुए कहा- यह क्या देर लगा रखी है आपने। आपको विद्वानों का सही ढंग से सम्मान करना भी नहीं आता। हम लोगों के लिए शीघ्र ही स्वर्ग की व्यवस्था की जाय। पण्डितों के इस उग्र तेवर के जवाब में चित्रगुप्त ने संयत स्वर में कहा- महाराज आप लोग थोड़ा ठहरिए। पहले हम आप लोगों के सम्बन्ध में यह पता लगा लें कि जो ज्ञान आपने पाया है, वह शास्त्रों से पाया है या कि स्वयं से। क्योंकि निरे किताबी ज्ञान का यहाँ कोई मूल्य नहीं है।

इतने में एक संन्यासी भीड़ को चीरते हुए- अपने आगे खड़ी जीवात्माओं को धकियाते हुए आगे आ धमके। और कहने लगे- मैंने बहुत उपवास किए हैं, अनेकों कष्ट सहे। वेदान्त के वाक्य रटे हैं। भला मेरे समय में मुझसे बड़ा भला और कौन था? इस पर चित्रगुप्त ने कहा, स्वामी जी, थोड़ा ठहरिए। जरा हम पता लगा लें कि इतनी तपस्या आपने क्यों की? कहीं इसके पीछे आपके अहंकार का कोई सूक्ष्म प्रयोजन तो नहीं था। क्योंकि जहाँ प्रतिष्ठ और सम्मान की लालसा है, वहाँ न कोई त्याग है, और न तप है।

तभी वहाँ जनता के कुछ सेवक आ गए। वे भी स्वर्ग में प्रवेश पाने की जल्दी में थे। चित्रगुप्त ने उनसे कहा- आप लोगों को भी भूल हो गयी है। जो सेवा पुरस्कार माँगती है, वह सेवा नहीं है। फिर भी हम आपके बारे में पता लगा लेते हैं।

तभी चित्रगुप्त की दृष्टि सबसे पीछे अंधेरे में खड़े एक व्यक्ति की ओर गयी। चित्रगुप्त के पूछने पर उसने कहा- महाराज कहाँ मैं और कहाँ स्वर्ग। मैं तो किसी भी तरह से स्वर्ग में प्रवेश का अधिकारी नहीं हूँ। मैंने स्वर्ग के लायक किया ही क्या है? मैं ठहरा एकदम अज्ञानी। मुझे न शास्त्र मालूम है, न संस्कृत आती है। संन्यास मैं जानता नहीं। मेरे पास कुछ था ही नहीं जो मैं उसे छोड़ता। और सेवा की बात, सो मैं कर नहीं पाया।

चित्रगुप्त उसकी बातों को बड़े धीरज से सुन रहे थे। वह कहे जा रहा था- महाराज मैंने तो बस अपने गुरु की बात मानी है। वह जो कहते गए, उसे मैं करता गया। उनसे कुछ ज्यादा जानने-सीखने लायक मेरी बुद्धि ही नहीं थी। जीवन में कुछ बुरे कर्म भी हुए होंगे। हाँ इतना मैं कह सकता हूँ, मेरे मन में अपने गुरुदेव के लिए प्रेम था। पीड़ित मनुष्यों की सेवा के लिए छटपटाहट भी रहती थी। आपके यहाँ इसका कुछ फल मिलता हो, तो मैं नर्क में जाना चाहता हूँ।

पर नर्क क्यों? चित्रगुप्त थोड़ा चौंके, धर्मराज भी अचरज में पड़े। अन्य जीवात्माएँ भी थोड़ा हड़बड़ाई। सभी के मन में उभरी जिज्ञासा का समाधान करते हुए उसने कहा- दरअसल मैं चाहता हूँ कि नरक की यातनाओं से मेरे पापों की सफाई हो जाय। और मैं ऐसी पवित्रता और पात्रता अर्जित कर सकूँ, जिससे कि मेरे गुरु अगले किसी जीवन में मुझे अपना सकें। उनकी दृष्टि में मैं सत्पात्र बन सकूँ।

अबकी धर्मराज स्वयं बोले- तुम सच्चे शिष्य हो। जो शिष्य बन सका है वह समस्त मानवों में धन्य है। स्वर्ग के द्वार सदा तुम्हारे लिए खुले हैं- मोक्ष भी तुम्हें सुलभ है। अपने सद्गुरु की भक्ति से बढ़कर अन्य कोई भी कर्म श्रेष्ठ नहीं है।


Quotation

आत्मचिंतन और आत्मशोधन की साधना ही आत्मा को परमात्मा का पद प्रदान करती है।


चाहिए आचार्य शंकर जैसा मस्तिष्क एवं बुद्ध जैसा हृदय

अध्यात्म क्षेत्र की दो प्रमुख धाराएं हैं-एक का नाम है ज्ञान और दूसरी का भक्ति। दोनों की अपनी महत्ता एवं उपयोगिता है। एक को मस्तिष्क की उपज कहा जा सकता है तो दूसरे को हृदय के भाव-संस्थान से निस्सृत माना जा सकता है। दूसरे अर्थों में ज्ञान को यदि मनुष्य का मस्तिष्क कहा जाए तो भक्ति को हृदय कहा जा सकता है। इन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। मानवी काया में स्थित हृदय एवं मस्तिष्क में से जब कोई एक अंग कार्य करना बंद कर देता है, तो जीवन की सारी कार्यप्रणाली अस्त-व्यस्त हो जाती है। ठीक इसी तरह जब भक्ति या ज्ञान में से किसी एक को अधिक महत्व दिया जाने लगता है और अपने पक्ष को श्रेष्ठतम सिद्ध करने का प्रयास चल पड़ता है, तो प्रायः जीवन में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। अध्यात्म क्षेत्र की महान उपलब्धियों को प्राप्त करने के लिए दोनोँ में संतुलन-समन्वय आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है।

आध्यात्मिक क्षेत्र में समग्र उन्नति के लिए भक्ति और ज्ञान दोनों की अनिवार्य आवश्यकता है। वस्तुतः अपने उच्चस्तरीय आयाम में इन दोनों में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं। अपनी उत्कृष्टतम कृति ‘रामचरितमानस’ के 7/115/13 में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है, ‘भगतिहि ग्यानहि नहिं कुछ भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा॥’ अर्थात् भक्ति और ज्ञान में कोई अंतर नहीं है। दोनोँ मिलकर, संसारजनित दुःख का हरण करते हैं। ज्ञानरहित भक्ति से अथवा भक्तिरहित ज्ञान से भवदुःख का अंत नहीं हो सकता। दोनों के संयोग से ही भौतिक दुःखों का निवारण होता है।

इसे विडंबना ही कहा जाना चाहिए कि बहुत दिनों से अध्यात्म क्षेत्र की इन दोनों अविच्छिन्न धाराओं को परस्पर विरोधी माना जाता रहा है और कहा जाता रहा है कि दोनों में समन्वय नहीं है। एक ओर जहाँ ज्ञानमार्गी दर्शन में विश्वास करता है और तत्वदर्शन ही उसका लक्ष्य होता है। वह तर्क एवं तथ्यों के आधार पर सत्य का अन्वेषण करता तथा प्राप्त तथ्यों के आधार पर सत्य को स्वीकारता है। सृष्टि के रहस्यों को समझने के लिए वह बुद्धि को परिमार्जित करता और चिंतन को प्रखर बनाता है। भावनाओं के उफान में बहना उसे विवेकसम्मत नहीं लगता। हृदय के भाव-उद्गारों की तुलना में वह बुद्धि को अधिक महत्व देता है और चिंतन मनन द्वारा आत्मतत्त्व, परमात्मतत्त्व को जानने का प्रयास करता है।

दूसरी ओर भक्ति मार्ग का साधक भक्तिभावना में ही अपने को तन्मय रखना चाहता है और भाव-संवेदनाओं को ईष्ट प्राप्ति का सशक्त माध्यम मानता है। उपासना, प्रार्थना, अभ्यर्थना के संपूर्ण उपचारों का प्रयोग वह भाव-संवेदनाओं के विकास में करता है। दर्शन के रूखेपन में उसे रस नहीं आता। तर्क एवं बुद्धि को साधनामार्ग का, सत्य प्राप्ति का अवरोध मानने के कारण वह उनका अवलंबन नहीं चाहता। परिणामस्वरूप तत्त्वदर्शन की बौद्धिक गवेषणाओं में वह अपना समय और श्रम नहीं गंवाता। उसकी समस्त चेष्टाएं भाव-समुद्र में इष्ट से भावनात्मक तादात्म्य स्थापित करने और उसी भाव-समुद्र में डूबने रहने में नियोजित रहती हैं।

वस्तुतः यह दोनों ही मान्यताएं एकाँगी, अपूर्ण एवं अतिवादी हैं। मानवी काया में मस्तिष्क भी है और हृदय भी, बुद्धि भी है और भाव-संवेदनाएं भी। दोनोँ परस्पर विरोधी नहीं, पूरक हैं। बुद्धि अपना कार्य करती है और हृदय अपना। अतः महत्ता और उपयोगिता विचारों और भावनाओं दोनों की है। कार्य अलग-अलग दीखते हुए भी दोनों एक-दूसरे से अन्योन्याश्रित रूप से जुड़े हुए हैं। चाहते हुए भी इन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। हृदय की भाव-संवेदनाएं ही अपनी कोमलता द्वारा विचारों को सुनियोजित करती हैं। बुद्धि को प्रज्ञा बनाती हैं। विचार कितने भी सशक्त एवं प्रभावशाली क्यों न हों, जब तक उनमें संवेदनशीलता न जुड़ी हो, कल्याणकारी नहीं हो सकते। भावनाशून्य महान ज्ञानी, तत्त्वदर्शी किसी काम का? उसका ज्ञान तो पुस्तकों, ग्रंथों एवं शास्त्रों जैसा नीरस एवं निष्प्राण होगा।

इसी तरह एकाँगी भावनाएं भी उतनी उपयोगी सिद्ध नहीं होती। विचारों से शून्य भावनाओं के अतिरेक में बहता हुए हृदय भी वैज्ञानिक दृष्टि से हानिकारक है। एक से काम चलता होता तो भावनाओं के केन्द्र हृदय एवं विचारों के केन्द्र मस्तिष्क को परमात्मा एक ही शरीर में क्यों संजोता? यह इस बात का प्रमाण है कि भाव संवेदनाओं के साथ विचारों की भी उतनी ही उपयोगिता एवं महत्ता है। आवश्यकता दोनों में संतुलन एवं समन्वय की है। अध्यात्म का समुचित लाभ दोनों पक्षों को समान रूप से अपनाने से ही मिल पाता है।

अध्यात्म क्षेत्र की महान विभूतियों के जीवन दर्शन का अध्ययन करने पर यह तथ्य भलीभाँति उजागर हो जाता है कि विश्व में जितने भी महान अध्यात्मवादी संत, महात्मा, ऋषि, मनीषी हुए हैं, वे इन दोनों ही विशेषताओं की, करुणा की धाराएं बहती थीं, वहीं विवेक से ज्ञान का प्रवाह फूटता था। ज्ञान एवं भक्ति से, बुद्धि और भावना संपदा से वे समस्त विश्व को सिक्त एवं तृप्त करते थे। परस्पर दोनों धाराएं किस प्रकार मिलकर समग्र अध्यात्म का स्वरूप बन सकती हैं, इसके लिए विश्व के महानतम अध्यात्मवादियों पर दृष्टिपात करना होगा।

विश्व में दर्शन के मूर्द्धन्य तत्त्ववेत्ताओं में आद्य शंकराचार्य का नाम अग्रगण्य है। उनका वेदाँत दर्शन अद्वितीय एवं विश्व के सभी दर्शनों में समग्र एवं श्रेष्ठ हैं। ब्रह्मविद्या का इतना सशक्त प्रतिपादन अन्यत्र दुर्लभ है। अद्वैत वेदाँत की साधना की जिस चरम अवस्था तक वे पहुँचे थे, आज तक विश्व का कोई भी दार्शनिक वहाँ तक नहीं पहुँच पाया है। दर्शन के इतने महान एवं मूर्द्धन्य ज्ञाता होते हुए भी उनका हृदय उदात्त भव-संवेदनाओं से लबालब भरा था। उसमें से भक्ति की तरंगें उद्वेलित होती थीं। ‘सौंदर्यलहरी’ ग्रंथ का सृजन इस भक्तिभाव के प्रस्फुटन का ही परिचायक है। एक ओर जहाँ उन्होंने शुष्क, नीरस परन्तु ज्ञान के अविरल स्रोत वेदाँत का प्रचार किया, वहीं दूसरी ओर उनके हृदय से भक्ति की अविच्छिन्न धारा भी प्रवाहित हुई। ईश्वर की स्तुति करते हुए वे कहते हैं-

श्रद्धाभक्तिध्यान शमः धैर्यत मानैः ज्ञातै शक्यो देव इहैवाशु यः ईशः।

दुर्विज्ञेयो जन्म शतैयश्चापि विनातैः संससार ध्याँत विनाश हरिमीडे।

जो परमेश्वर श्रद्धा, भक्ति, ध्यान, शम आदि साधनों द्वारा प्रयत्न करने वालों के लिए यहीं तत्काल गोचर हो सकता है और उन साधनों के अभाव में सैकड़ों जन्मों में भी गोचर होने वाला नहीं है, उस संसार तिमिरहारी हरि की मैं स्तुति करता हूँ।

विश्वभर में वेदाँत की पताका फहराने वाले स्वामी विवेकानंद का जीवन भक्तिरस से सराबोर था। अपनी प्रखर प्रज्ञा के आधार पर उसने भारतीय संस्कृति को विश्वभर में प्रतिष्ठापित किया। इसके पूर्व विदेशों में भारत मात्र अंधविश्वासों में जकड़ा, धर्म के नाम पर मूर्तिपूजक देश के रूप में समझा जाता था। आदिकाल से मनुष्य जाति को सिक्त करते चले आ रहे भारतीय दर्शन का स्पष्ट स्वरूप उन्होंने विदेशों में रखा। तत्त्ववेत्ता दर्शन के प्रकाँड विद्वान के रूप में उनका एक स्वरूप यह था, तो दूसरा पक्ष भी था माँ काली के समक्ष एक अनन्य भक्त का। काली की प्रतिमा में अपने इष्ट का दर्शन करने वाले, अपनी सत्ता को ही भूल जाने वाले विवेकानंद को भला कौन नहीं कहेगा? एक ओर जहाँ उन्होंने भारतीय तत्त्वज्ञान को विश्व के सम्मुख रखा, वहीं दूसरी ओर भक्ति की महत्ता एवं उपयोगिता का प्रतिपादन किया। उनका कहना था, ‘दर्शन की शुष्कता एवं नीरसता को भक्तिरस से उठने वाली भाव-तरंगें ही दूर कर सकती हैं। मानवी अंतराल को छू सकने में भाव-संवेदनाएं ही समर्थ हो सकती है। अतः दर्शन के साथ भक्तिभावना को भी विकसित करना उतना ही आवश्यक है। साधना-पथ की महान उपलब्धियाँ इन दोनों के समन्वय पर ही अवलंबित हैं।’

प्रख्यात तत्त्ववेत्ता संत इमर्सन ने अपने अगाध ज्ञान से असंख्यों को प्रेरणा एवं प्रकाश दिया। तत्त्ववेत्ता दार्शनिक होते हुए भी उनका जीवनक्रम भक्तिरस की धाराओं में सदा डूबा रहता था। वे कहा करते थे, ‘परमात्मा को वही प्राप्त कर सकते हैं, जो हृदय से पवित्र हैं। करुण हृदय में ही परमात्मा अवतरित होते हैं।’ प्रार्थना, अभ्यर्थना का उनके अनिवार्य दैनिक कृत्यों में समावेश था। इसी तरह सुप्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात का अधिकाँश समय लोगों के दुःख-दर्दों के निवारण में लगता था। वे कहते थे कि मानव सेवा ही मेरी भक्ति है। महान ज्ञानी एवं दार्शनिक होते हुए भी उन्होंने अपने जीवन में भक्ति को सर्वोपरि स्थान दिया। मानव-सेवा प्रकाराँतर से भक्तिभावना का ही प्रतीक थी।

प्रकृति को परमात्मा का स्वरूप मानने वाले कन्फ्यूशियस न केवल तत्त्वज्ञानी थे, वरन् ईश्वरभक्ति में उनकी प्रगाढ़ आस्था थी। प्रकृति के अनुपम सौंदर्य के अवलोकन में ही उनका अधिकाँश समय व्यतीत होता था। वह कहते थे, ‘देखो, प्रकृति के भीतर से परमात्मा झाँक रहा है।’ प्रकृति में भावनाओं द्वारा परमात्मा का दर्शन करना भक्तिभावना की ही पराकाष्ठा है। कन्फ्यूशियस के जीवनक्रम में ज्ञान एवं भक्ति का अद्भुत समन्वय मिलता है। सेंट आगस्टाइन का कथन है, ‘परमात्मा को बुद्धि द्वारा नहीं, पवित्र हृदय द्वारा पाया जा सकता है, इसलिए बुद्धि का प्रयोग भावनाओं को पवित्र बनाने में करना चाहिए, तभी परमात्मा का अवतरण तुम्हारे हृदय में होगा।’ प्रख्यात फ्रेंच संत ज्यॉ पाल सार्त भी भक्ति को ईश्वरप्राप्ति एवं आत्मपरिष्कार का सशक्त साधन मानते थे। अपने समय के प्रकाँड विद्वान माने जाते हैं। उनकी दार्शनिक विचारधारा ने बौद्धिक वर्ग को विशेष रूप से आकर्षित किया था। उनका हृदय भक्ति भावना से ओत-प्रोत था। प्रार्थना में उनकी अगाध श्रद्धा थी।

वस्तुतः एकाँगी तत्त्वदर्शन या ज्ञान बुद्धि को संतुष्ट तो कर सकता है, पर अंतःकरण को तृप्त नहीं कर सकता। ‘अहम् ब्रह्मास्मि’, ‘सोऽहम्-सच्चिदानंदोऽहम्’, ‘प्रज्ञानम् ब्रह्म’, ‘तत्त्वमसि’ आदि वेदाँत के महावाक्यों को रटते रहने भर से व्यावहारिक जीवन भावनाओं की दृष्टि से शून्य, कठोर, शुष्क एवं नीरस बना रहता है। इसी प्रकार अकेले भक्ति की विह्वलता में, विचारों में डूबे रहने से मात्र समस्याएं ही उत्पन्न होती हैं। विवेक को ताक पर रख देने वाले अंधविश्वास में जकड़े आज के तथाकथित लाखों भक्तों का निरुद्देश्य जीवनक्रम इस सत्य का प्रत्यक्ष उदाहरण है। अगर विवेकयुक्त ज्ञान का, दार्शनिक विचारों का अवलंबन लिया होता तो भक्ति का वास्तविक लक्ष्य अवश्य दृष्टिगोचर हो रहा होता। इस तथ्य से स्वामी विवेकानंद भली भाँति परिचित थे, तभी तो उनसे कहा था, ‘इस युग के लिए आचार्य शंकर जैसे मस्तिष्क एवं भगवान बुद्ध जैसे हृदय की आवश्यकता है।’ जिसने इन दोनों को प्राप्त कर लिया, वस्तुतः वही सच्चा अध्यात्मवादी है। अंतरात्मा की तृप्ति एवं तुष्टि ज्ञान एवं भक्ति के समन्वित साधना से ही संभव है।


रोम-रोम पुलकित (kahani)

प्रचंड अंतर्दाह से एक विराट पिंड खंड-खंड होकर आकाश से टूट पड़ा और अंतरिक्ष में घूमने लगा। एक खंड विधाता से सम्मुख भी जा गिरा।

उन्होंने सोचा, इससे क्रीड़ा की जाए। किन्तु ओह, यह तो अंगार की तरह गरम था। विधाता ने जल में विहार करने के लिए छोड़ दिया। जब निकाला तो पता चला कि उसमें स्पंदन है।

विधाता ने पूछा, क्या तुममें स्पंदन है? हाँ का उत्तर पाकर विधाता ने फिर पूछा, तुम्हारा नाम क्या है? अनाम पिंड ने कहा, मेरा नाम कुछ भी नहीं है। विनोदी विधाता ने उसका नाम वसुधा रखकर कहा, लो तुम्हारा नाम रख दिया। अब प्रसन्न होकर हंसो, खेलो और मंगल मनाओ।

वसुधा ने एक गर्म अच्छवास छोड़कर कहा, निर्माता मेरे अंतर में अनंत दाह भरा है, मैं किस प्रकार हंस सकती हूँ।

विधाता ने उसे हरी-भरी वनस्पति से भर दिया और कहा, अब तो हंसोगी? वसुधा ने फिर उच्छवास छोड़ा, वह भी गरम था। अब विधाता ने उसे एक शिशु प्राणी प्रदान करके कहा, ले यह मानव शिशु तेरी प्रसन्नता का हेतु बनेगा।

मनुष्य वसुधा की गोद में बड़ा हुआ, उसने अपने परिश्रम से माँ वसुधा को सजा दिया। वसुधा का शृंगार देखकर विधाता ने एक दिन पूछा, वसुधे, अब तो तुम्हारी प्रसन्नता का पारावार न होगा। वसुधा ने पुनः उच्छवास छोड़ा, वह भी गरम था। विधाता ने झुँझलाकर कहा, तू कभी सुखी नहीं हो सकती और वे नाराज होकर चले गए।

एक दिन मधुर संगीत से विधाता की नींद टूटी। उन्होंने उठकर देखा, वसुँधरा गा रही थी। विधाता ने उसकी प्रसन्नता का हेतु पूछा। प्रसन्न मन से वसुधा बोल उठी, स्रष्टा, जब मेरे पुत्र निस्स्वार्थ भाव से एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, मिल-जुलकर मेरे वैभव का आनंद उठाते हैं तो उनके इस सहकार को देखकर मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठता है।


एक सद्विप्रा बहूना वदन्ति

ईश्वर ज्ञान की वस्तु नहीं है, इसलिए वैज्ञानिक उस संबंध में कोई निश्चित विचार देने से हिचकिचाते हैं तो भी वह इस बात को मानते हैं कि संसार में एक कोई ऐसी वस्तु अवश्य है, जिससे निकलकर ही वह विविधतापूर्ण संसार आया। निर्माणकर्त्ता और पालनकर्त्ता के रूप में विज्ञान भगवान को नहीं देखता। 17वीं शताब्दी ईश्वर के अस्तित्व की मान्यता का सबसे बुरा युग था, क्योंकि इस शताब्दी के अधिकाँश वैज्ञानिकों ने तो यही माना कि ईश्वर की कल्पना भ्रामक है। जे−बी−एस− हॉल्डेन ने पाश्चात्यों के ईश्वर विश्वास का खंडन करते हुए बताया, ‘जब मैं कोई प्रयोग करने बैठता हूँ, तब मैं विचार करता हूँ कि कोई ईश्वर अथवा देवदूत अपने क्रियाकलापों द्वारा मुझको बाधा नहीं डाल रहा, इसलिए मैं कह सकता हूँ कि ऐसी कोई सत्ता नहीं है, जिसे ईश्वर कहा जा सके।’

मूर्द्धन्य मनोविज्ञानी ए0 हिड्रिच ने भी ऐसी विचारधारा व्यक्त की और संदेह प्रकट किया, ‘ईश्वर का कार्य या दायित्व वस्तुवादी संसार में भी धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है। भौतिकशास्त्र में ईश्वर की आवश्यकता केवल विश्व की उत्पत्ति व्यक्त करने के लिए तो हो भी सकती है। इसके अतिरिक्त उसकी और कोई जरूरत नहीं।’

न्यूटन ने इस स्थिति को न संभाला होता तो संभवतः आज ईश्वर के संबंध में जो थोड़ी-सी मान्यताएं शिक्षित वर्ग में बनी हुई हैं, वह भी समाप्त हो जाती। न्यूटन ने कहा, ‘सृष्टि के उत्पादन में जो एक सिद्धाँत और क्रम है, उसे न तो विज्ञान बिगाड़ सकता है, न ही उस पर शासन और निर्माण थोप सकता है, इसलिए हम एक ऐसी सत्ता से इनकार नहीं कर सकते, जिसको ईश्वर कहा जा सके।’

इस प्रकार विज्ञान भी एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें ईश्वरीय अस्तित्व के संबंध में शंकाएं भी हैं और धारणाएं भी, तथापि सभी बड़े वैज्ञानिकों का विचार ईश्वरवादी रहा है। पिछले दिनों आइंस्टीन सबसे बड़े वैज्ञानिक हुए हैं। उनसे जब इस संबंध में अपनी सम्मति देने को कहा गया तो उन्होंने बताया, ‘संसार के संपूर्ण उच्च वैज्ञानिक कार्यों में अपराध-स्वीकृति, बौद्धिकता और निपुणता का सन्निहित होना यह व्यक्त करता है कि धार्मिक भावनाएं गलत नहीं हैं, इसलिए गहन भावनाओं से घिरे हुए इस विश्वास को हमें मानना ही पड़ेगा कि ईश्वर है और वह एक श्रेष्ठ मस्तिष्क है, जो संसार के अनुभवों में स्वयं व्यक्त होता है।’

गैलीलियो का कथन है, ‘प्रकृति की वृहद् पुस्तकें गणित की भाषा में लिखी हुई हैं। उन्हें कोई बुद्धि ही लिख सकती है, इसलिए हम भगवान को बुद्धि या विचार कह सकते हैं।’ ‘ईश्वर सदैव रेखागणित कर रहा है (गॉड इज आलवेज डूइंग ज्योमेट्री)’ यह मान्यता प्लूटो की है।

संसार में बुराइयों, कष्टों की विद्यमानता कभी-कभी ईश्वर की सत्यता पर शंका उत्पन्न करती है कि किस प्रकार ईश्वर निर्दयता, अन्याय और युद्ध की अनुमति देता है, अन्यथा विश्व के सभी धर्म और महापुरुषों ने ईश्वरीय सत्ता को माना और उसकी सर्वशक्तिप्रियता, करुणाशीलता, सुरक्षाशक्ति पर विश्वास किया है।

महापुरुषों के रूप में ईश्वर की प्रामाणिकता का प्रयत्न भी प्रायः सभी धर्मों में किया गया है। किसी-किसी धर्म में वह पैगंबर या फरिश्ते के रूप में प्रकट होता है, किसी किसी में अवतार के रूप में, पर ईश्वर की सत्यता के बारे में संसार के सभी धर्म एकमत हैं। किसी ने उसे न्यायकारी गुणवाचक से संबोधित किया और किसी ने उसे न्यायकारी गुणवाचक से संबोधित किया और किसी ने उसे धर्म उद्धारक के रूप में, पर उसका पूर्ण वैज्ञानिक विश्लेषण कोई धर्म नहीं कर सका, ऐसा कि जिसमें संसार की संपूर्ण परिस्थितियों में उसे विश्वस्त ठहराया जा सका होता। इसी कारण संसार के सभी धर्म अपनी इस मान्यता पर लड़खड़ाते रहे हैं।

मुसलमानों में से अनेक ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अल्लाह की सत्ता को प्रवंचना कहा है। सलमान रुश्दी ने अपनी पुस्तक ‘सैटनिक वर्सेज’ में कुरान को भगवान नहीं, शैतान की वाणी कहकर ईश्वर या पैगंबर पर अंगुली उठाई है। अनेक कैथोलिकों ने ईसा को भगवान मानने से इनकार किया। प्रोटेस्टेंट मत इसी का परिणाम था। अवतारवाद का झगड़ा हिन्दू धर्म में भी कम नहीं है। सनातन धर्म में भी ढेरों अवतारों को, गुरुओं को ईश्वर के रूप में माना जाता है। जैन तीर्थंकरों के रूप में, तो सिख गुरुओं के रूप में मानते हैं। अनेक प्रकार के ईश्वरों का अस्तित्व ही इस संसार को भ्रमित करता है। प्रत्यक्ष प्रमाणों द्वारा उसे सिद्ध करना वैसे ही कठिन था। जब धर्मों में प्रतिद्वंद्विता दिखाई दी तो तर्कवादी लोगों का उस मान्यता से फिसलना स्वाभाविक ही था।

इस स्थिति में वेदाँत ही एकमात्र ऐसा धर्म है, जिसकी ईश्वरीय व्याख्या को पूर्ण शुद्ध और बुद्धिसंगत कहा जा सकता है। संपूर्ण मीमाँसा पढ़ने के बाद किसी के भी मन में तर्क या संदेह नहीं रह जाता है, क्योंकि व्याख्याएं विज्ञान के आधारभूत सिद्धाँतों को लेकर चली है और उनमें संपूर्ण दार्शनिक एवं लौकिक परिस्थितियों का विवेचन भी आ जाता है।

वेदाँत ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति के लिए सबसे पास से, अपने आपसे चलने को कहता है। हर शरीर की स्थूलता में भी गुण हैं और गुणों को हम अपने शरीर से अधिक महत्त्व देते हैं। आत्मतुष्टि के लिए माता-पिता अपनी प्रिय वस्तुएं अपने बच्चों को दे देते हैं, जबकि उसका उपभोग करने से उन्हें सुख मिल सकता था। शरीर की आकाँक्षा को मन की आकाँक्षा से निम्नतर मानने के साथ ही संसार में दो तत्त्वों की विलगता का स्पष्ट आभास हो जाता है। एक को चेतन और दूसरे को जड़ कहते हैं। जड़ एकदेशीय पदार्थ है और चेतन सर्वव्यापी। यहीं से ईश्वर के सिद्धाँत का तात्त्विक विकास वेदाँत ने प्रारंभ किया है।

ईश्वर साकार है या सशरीर है, यह एक तथ्य नहीं, कल्पना मात्र है। चूँकि मृत्यु का प्रभाव उस पर पड़ता है, जिसके शरीर है एवं जब हम इस विश्वास को पुष्ट कर लेते हैं कि हमारी चेतना का अंत नहीं होता, हम विश्वात्मा या परमात्मा के बिलकुल अनुरूप हैं तो मृत्यु भी इस विचार के सामने शक्ति और सामर्थ्यहीन हो जाती है। यह एक कल्पना मात्र नहीं, वरन् अपनी चेतना का नाश नहीं होता, वह एक अविनाशी तत्त्व है। हम जब स्वप्न की अवस्था में होते हैं, तब भी हमारी क्रियाएं शरीरधारी जैसी ही होती हैं, वैसे ही संवेगों से हम प्रभावित होते रहते हैं, वैसा ही दुःख सुख हमारे अनुभव में आता है, इसलिए उस स्थिति में भी हम जीवन से बंधे होते हैं, ऐसा कहना कोई निराधार कल्पना नहीं है।

दुःख और सुख, इन दोनों से जब हम अपने आपको रहित मानने लगते हैं और इस विश्वास को अंतिम स्थिति तक सिद्ध कर लेते हैं कि हमारे लिए संसार में मोह-माया की भ्राँति कुछ है ही नहीं, न यहाँ कोई अपना है, न हम किसी के हैं, जब चेतना ही अपनी इच्छा से बनाती बिगाड़ती रहती है, तब हमारे सामने उसका तात्त्विक रूप प्रकट होता है और हम अपने आपको मुक्त अनुभव करने लगते हैं।

कठ उपनिषद् में कहा है, हम ब्रह्म हैं और मृत्यु हमारे लिए एक खाद्य है (1/2/25), छाँदोग्य (6/8/7) में उसे ही ‘तत्त्वमसि’ तू वही है, कहा है। वृहदारण्यक कहता है, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ मैं ही ब्रह्म हूँ। ऐतरेय उपनिषद् (3//1/3) के अनुसार शुद्ध ज्ञान ही ब्रह्म है। वृहदारण्यक (4/4/5) ‘अयमात्मा ब्रह्म’ यह आत्मा ही ब्रह्म है एवं इसी उपनिषद् के 4/4/11 मंत्र में कहा है कि यहाँ इस संसार में कुछ भी बहुतायत नहीं है और यथार्थ में संसार के प्राणियों में जो गुण बरतते हैं अर्थात् इच्छाओं, आकाँक्षाओं को यदि निकालकर मानसिक चेतना का विश्लेषण किया जाए तो ऐसा समझ में आ जाता है कि चेतना एक अगाध सिंधु की तरह है और मनुष्य उसमें इच्छाओं की लहरों की तरह है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इच्छाओं और वासनाओं से ग्रस्त मानसिक स्थिति को नहीं कहा गया है। उस सबसे परमपद में विश्व-चेतना तादात्म्य की स्थिति होती है, जिसमें न तो किसी प्रकार का राग होता है और न द्वेष, वह कर्म भी करता है और किसी से आसक्त भी नहीं होता, इसलिए सर्वन्यायकारी है। उसमें व्यक्ति के गुणों का समावेश हो गया है। वे गुण है-प्रेम, दया, करुणा, उदारता पर वहीं वह स्वयं इन गुणों से प्रभावित नहीं होता अर्थात् उनसे अलग नहीं है, शुद्ध चेतन अवस्था में वह इन गुणों की ही संज्ञा मात्र है, भाव मात्र है। इस बात को बर्कले ने भी स्वीकार किया था और कहा था, ‘सारे जगत के पदार्थ मानसिक संवेदना ही हैं।’ माँडूक्यकारिका (2/11) में उसे ही इस रूप में कहा गया है, ‘क एतान्बुद्ध्यते भेदान् को वै तेषाँ विकल्पकः?’ अर्थात् कौन इस भिन्न-भिन्न, विश्व में दिखाई देने वाले पदार्थों का द्रष्टा और कौन इनकी कल्पना करता है?

इसी अवस्था में वेदाँत में मन का तादात्म्य ब्रह्म से कराने का यत्न किया है। शास्त्रों में स्थूल अन्न की सात अवस्थाएं कहीं हैं। अन्न से रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से माँस, माँस से मज्जा, मेद, अस्थि और वीर्य बनता है। वीर्य अन्न की सूक्ष्म अवस्था है और शरीर में व्याप्त है, पर किसी एक स्थान को काटकर उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है। वह मंथन से ही दिखाई देता है। वीर्य ही अंतःकरण चतुष्टय मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के रूप में सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता चला गया है। यह क्रमशः इच्छा, आवेश और भावनाओं की गहराइयाँ हैं, जो अंत में जाकर एक ही विश्वचेतना-अहंकार में ढल जाती हैं।

पैंगल उपनिषद् में इस बात को और स्पष्ट कर दिया है कि चूँकि अहंभाव प्रत्येक क्षुद्र प्राणी में होता है, इसलिए शास्त्र की उक्त मान्यताओं को लेकर ही कोई अपने को ब्रह्म न कहने लगे। बहुत से पाखण्डी और दंभी लोग ऐसा करते भी हैं, इसीलिए वेदाँत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि हृदय को निर्मल करके और अन्नमय ब्रह्म का चिंतन करके यह अनुभव करना चाहिए कि मैं ही सर्वरूप ब्रह्म हूँ, मैं ही परम सुख रूप हूँ। जल में जल डालने से, दूध में दूध डालने और घी में घी मिला देने से वे एकरूप हो जाते हैं। उसी प्रकार परमात्मा के मिल जाने पर उनमें कोई अंतर नहीं रह जाता। जब इस तरह का ज्ञान द्वारा देहाभिमान नष्ट हो जाता है और बुद्धि अखंडाकार हो जाती हैं, कर्मों में कोई आसक्ति नहीं रह जाती, मोह और वासनाएं जलकर नष्ट हो जाती हैं, तभी अद्वैत ब्रह्म की प्राप्ति होती है।

इस स्थिति में मनुष्य पृथ्वी पर ही निवास करता हुआ भी उससे भिन्न रहता है, उसका नियंत्रण भी करता है। उत्पत्ति, रक्षा और विनाश इसी प्रकृति के स्पष्ट गुण हैं, वह अच्छाई और बुराई से परे तत्त्व रूप मात्र है। यह कल्पना और वैज्ञानिक शोध केवल वेदाँत ही संसार को दे सका है। इन तथ्यों का जितना अधिक चिंतन, मनन और धारण किया जाता है, ईश्वरीय सत्ता का बोध उतना ही निर्मल होता चला जाता है। उसके लिए न तो मनुष्य को कहीं अलग जाने की आवश्यकता है और न कुछ और अध्ययन की। गीता के नवें अध्याय में इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए भगवान कृष्ण ने कहा है-

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥4॥ पर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥7॥ मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचाराचरम्। हेतनानेन कौन्तेय जगाद्रिपरिवर्तते॥10॥

हे अर्जुन, मैंने अपने अव्यक्त स्वरूप से इस समग्र जगत को फैलाया अथवा व्याप्त किया है, परन्तु यह आश्चर्य देख कि मुझमें ही सब सृष्टि सन्निहित है, पर मैं उनमें नहीं हूँ। कल्प के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति में आ मिलते हैं और फिर कल्प के आरंभ में मेरी अध्यक्षता में प्रकृति ही सब चराचर सृष्टि को उत्पन्न करती है।

अदृश्य की इतनी अच्छी शोध किसी धर्म में नहीं हुई। यहाँ उसका विकास भी किया गया है। जीव को ही ब्रह्म रूप में शुद्ध करके सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, शुद्ध, चैतन्य, मुक्त, कर्माध्यक्ष, साक्षी, द्रष्टा स्वरूप को प्रमाणित किया गया है।


बूँदों के समान वंशलोचन (kahani)

समुद्र खौलाया जाने लगा तो डरी-सहमी जल की बूँदें विधाता के पास जाकर कहने लगीं, पितामाह! हमें कष्ट क्यों देते हो, हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? विधाता ने बहुतेरा समझाया, बूंदों! तुम आकाश में उड़ोगी, जहाँ बरसोगी, वहीं हरियाली फूटेगी और संसार को प्रसन्नता मिलेगी, पर वह उपदेश बूँदों को अच्छा न लगा। वे लौटीं तो पर विधाता को गालियाँ ही देती रहीं।

समुद्र जल की बूँदों को आकाश में फेंक दिया, फिर वे धरती पर गिरीं और बहते-बहते समुद्र में फिर जा पहुँची, तब उन्हें पता चला कि अरे हम तो व्यर्थ ही डरते रहे, हमारा तो कुछ भी नहीं बिगड़ा। उधर स्वाति नक्षत्र आ गया तो बूँदें एक बार फिर उमड़ी, इस बार उनमें न भय था, न उद्वेग। हंसती-खिलखिलाती बूँदें आकाश से झरने लगीं, कोई बाँस में गिरी तो वंशलोचन बन गई, कोई कदली में गिरी तो कपूर और सीपी के मुख में गिरी तो मोती बन गई।

विधाता विचार कर रहे थे कि मनुष्य भी संकट और साधनाओं से विचलित न होता तो आज वह भी बूँदों के समान वंशलोचन, कपूर और मोती बन गया होता।


श्रद्धा की परिणति

वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ थी। सोच नहीं पा रही थी कि इस समय अपने को कैसे बचाए? उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में विवशता झिलमिला उठी। गौरवर्णीय सुन्दर चेहरा विवर्ण हो गया। शायद कातर अंतर्मन की टीस बरबस ही चेहरे पर छलक गयी। अस्तित्त्व के रोम-रोम में पीड़ा भरी पुकार छाने लगी। हृदय में उफनता प्रभु प्रेम और भी प्रगाढ़ हो गया। भगवान् तथागत के इस भक्तिपूर्ण स्मरण ने उसे थोड़ा धीरज दिया। कहीं गहरे में साहस की संवेदना मद्धम गति से प्रवाहित होने लगी। उसने भरी-भरी आँखों से अपने पति-श्वसुर और सास की ओर देखा। ये तीनों ही एकमत थे। और जबरदस्ती अपने अधिकारों की दुहाई देकर, उसके कर्त्तव्य का पाठ पढ़ाकर उसे विवश कर रहे थे।

यह विवशता उसे सहन नहीं हो पा रही थी। भला ऐसे कामों को वह किस तरह करे, जो किसी भी भाँति उचित नहीं है। पर यह तो उसकी जिन्दगी की रोजाना की आफत थी। हर दिन उसके पति, सास अथवा फिर श्वसुर किसी ढोंगी साधु, या भयानक वेशभूषा वाले किसी ताँत्रिक को ले आते और उसे विवश करते कि वह उनकी सेवा करे। इन साधुओं के ढोंग, ताँत्रिकों की वासना भरी दृष्टि से उसे चिढ़ थी। वह नहीं समझ पाती थी कि आखिर वह क्यों इनकी सेवा करे? क्यों वह अपने देह-मन को इनकी वासना भरे ढोंग के चंगुल में फंसने दे? उसने अपनी ससुराल के सदस्यों को भाँति-भाँति से समझाने की कोशिश की, पर उन पर जैसे कोई असर ही नहीं था।

वे तो सब के सब बस चमत्कारों के मोहपाश में बंधे थे। चमत्कारों में ही उन्हें जीवन की सार्थकता लगती थी। चमत्कार ही उनकी श्रद्धा, भक्ति एवं भावनाओं के केन्द्र बिन्दु थे। वह जब कभी उन्हें भगवान् तथागत और उनके जीवन दर्शन के बारे में बताती- सबके सब मिलकर उसकी हँसी उड़ाते। पर वह कैसे भूल पाती प्रभु को। करुणा के अवतार तथागत तो उसके प्राणों में बसे थे। उसका अपना बचपन भगवान् की गोद में गुजरा था। उसने माँ के दूध के साथ प्रभु का प्रेम भी पिया था। बचपन में जब कभी वह प्रभु से पूछती- भगवान्! मुझे कभी आपसे अलग तो नहीं होना होगा? तथागत मुस्कराते हुए उत्तर देते- पुत्री! बिछुड़ते तो केवल शरीर हैं। भावनाएँ तो सदा ही घुली-मिली रहती हैं। श्रद्धा समय और स्थान की दूरी को पाट देती है। श्रद्धा गहरी हो तो अलगाव सम्भव ही नहीं।

बचपन की ये बातें आज भी उसे पल-पल प्रभु में भिगोती रहती थी। वह भगवान् के परम भक्त श्रेष्ठी अनाथपिण्डक की पुत्री थी। पिता के साथ उसे भगवान् का अन्तरंग सान्निध्य मिला था। भगवान् ने ही उसे चूलसुभद्दा नाम दिया था। भगवान् के रूप में कोहिनूर की चमक देखी थी, अब भला सस्ते काँच के टुकड़ों की तरह ये ढोंगी साधु, तमाशेबाज मदारी उसे किस तरह लुभाते। जिसे भगवान् बुद्ध की गोद मिली हो उसे भला ताँत्रिकों के चमत्कारों का चक्रव्यूह कैसे फँसाता। जिसने परम पवित्रता की सुगन्ध का स्वाद लिया हो, उसे भला दुर्गन्धित वासनाएँ कैसे आकर्षित कर पाती। पर उसकी यह भावदशा ससुराल के लोगों को समझ में न आती थी।

उग्रनगर वासी उग्गत सेठ के पुत्र से उसका विवाह हुआ था। उग्गत सेठ मिथ्यादृष्टि था। वह पाखण्डियों का आदर करता था। धर्म में नहीं चमत्कारों में उसकी श्रद्धा थी। मदारियों, जादूगरों और धूर्तों का उसके घर में भारी सम्मान था। इन तरह-तरह के ढोंगियों के आने पर वह चूलसुभद्दा को उनकी सेवा करने के लिए कहता। वह सम्यक् दृष्टि वाली युवती किसी न किसी तरह इन ढोंगियों की एकान्त सेवा को टाल जाती। लेकिन उसका यह व्यवहार उसके ससुर को बहुत कष्टकर लगता। पति के भी अहंकार को चोट लगती। सास भी उससे परेशान रहती। सारा का सारा परिवार ही पाखंडियों के जाल में था।

आज जब चूलसुभद्दा ने उनके अतिआग्रह के बावजूद काले कपड़े पहने खतरनाक डाकू की तरह दिखने वाले ताँत्रिक की सेवा से मना किया तो वे सबके सब आगबबूला हो उठे। उसके पति ने उसे जोर का धक्का देते हुए कहा- तू सदा हमारे साधुओं का अनादर करती है। सो बुला अपने बुद्ध को और अपने साधुओं को, हम भी तो देखें उन्हें, क्या चमत्कार है उनमें। और देखें क्या ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ हैं।

चूलसुभद्दा ने पति की ऐसी बात सुनकर, जेतवन की ओर प्रणाम करके आँसू भरी आँखों, भक्ति से भरे हृदय के साथ कहा- भंते, कल के लिए पाँच सौ भिक्षुओं के साथ मेरा भोजन स्वीकार करें। मुझे भुला नहीं दिया मेरे आराध्य। मेरी पुकार सुन रहे हैं न भगवन्। मैं हूँ आपकी बेटी चूलसुभद्दा। और फिर उसने तीन मुट्ठी जुही के फूल आकाश की ओर फेंके। पति और उसका सारा परिवार उसके इस पागलपन पर खूब जोर से हँसा। क्योंकि जेतवन वहाँ से कई मील दूर था, जहाँ भगवान् ठहरे थे। लेकिन भगवान् की भक्ति से भरी चूलसुभद्दा तथागत और भिक्षु संघ के स्वागत की तैयारियों में जुट गयी।

जिन क्षणों में चूलसुभद्दा ने भगवान् को पुकारा था, उस समय भगवान् जेतवन में प्रवचन कर रहे थे। वह बोलते-बोलते बीच में रुक गए और कहने लगे- भिक्षुओं, जुही के फूलों की गन्ध आती है न। और उन्होंने उग्रनगर की ओर दृष्टि उठायी। तभी अनाथपिण्डक ने खड़े होकर कहा, भन्ते कल के लिए मेरा भोजन स्वीकार करें। भगवान् ने कहा- गृहपति, मैं कल के लिए पुत्री चूलसुभद्दा का निमंत्रण स्वीकार कर चुका हूँ। उसने जुही की फूलों की सुगन्ध के साथ अभी-अभी आमंत्रण भेजा है। चकित श्रेष्ठी अनाथपिण्डक कहने लगे- भंते! चूलसुभद्दा तो यहाँ से मीलों दूर है, उसने कैसे आपको आमंत्रित किया है? मैं तो उसे यहाँ कहीं भी देख नहीं पा रहा।

भगवान् हँसे और उन्होंने यह धम्मगाथा कही-

दूरे संतो पकासेति हिमवंतो व पब्बता। असंतेत्थ न दिस्संति रत्तिखित्रा यथासरा॥

संत दूर होने पर भी हिमालय पर्वत की भाँति प्रकाशमान होते हैं। और असन्त पास होने पर भी रात में फेंके हुए बाण की भाँति नहीं दिखलाई देते।

अपने इस कथन को और भी स्पष्ट करते हुए भगवान् ने कहा- गृहपति, दूर रहते हुए भी सत्पुरुष सामने खड़े होने के समान प्रकाशित होते हैं। मैं अभी सुभद्दा के सामने ही खड़ा हूँ। श्रद्धा बड़ा सेतु है। वह समय और स्थान की सभी दूरियों को जोड़ने में समर्थ है। वस्तुतः श्रद्धा के आयाम में समय और स्थान का अस्तित्त्व ही नहीं है। अश्रद्धालु पास होकर भी दूर और श्रद्धालु दूर होकर भी पास होते हैं।

अनाथपिण्डक और भिक्षुओं को श्रद्धा की महिमा का बोध कराकर भगवान् भिक्षुओं के साथ उग्रनगर की ओर चल पड़े। निश्चित समय में चूलसुभद्दा के सास-ससुर और पति ने भगवान् तथागत और उनके भिक्षुओं को अपने द्वार पर उपस्थित देखे। भगवान् के दर्शन मात्र से उनकी मलीनता धुल गई। उन्हें साधुता का प्रत्यक्ष बोध हो गया। भगवान् के चरणों पर माथा नवाती चूलसुभद्दा से कहा- पुत्री! तू मुझसे कभी दूर नहीं है। मैं सदा-सदा मेरे पास हूँ। जिसके पास तेरी जैसी श्रद्धा है, उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।


भावना का परिचय (kahani)

वाचस्पति मिश्र भारतीय दर्शन के प्रसिद्ध भाष्यकार हुए हैं। उन्होंने पूर्व मीमाँश को छोड़कर शेष सभी दर्शनों का भाष्य किया है। वे अपने इस पुण्य प्रयास में जुटे थे। इसी बीच उनकी पत्नी ने एक दिन संतान उत्पन्न करने की इच्छा प्रकट की।

वाचस्पति गृहस्थ तो थे, पर दाँपत्य जीवन उन्होंने वासना के लिए नहीं, दो सहयोगियों के सहारे चलने वाले प्रगतिशील जीवनक्रम के लिए अपनाया था। उन्होंने पत्नी से पूछा, ‘संतान उत्पन्न क्यों करना चाहती हो?’

पत्नी ने संकोचपूर्वक कहा, ‘इसलिए कि पीछे नाम रहे।’

वाचस्पति मिश्र उन दिनों वेदाँत दर्शन का भाष्य कर रहे थे। उन्होंने तुरंत उस भाष्य का नाम ‘भामती’ रख दिया। यही नाम उनकी पत्नी का था। उन्होंने पत्नी से कहा, ‘लो तुम्हारा नाम अमर हो गया, अब कार्य प्रसव वेदना और संतान-पालन का झंझट सिर पर लेकर क्या करोगी?’ यह नाम हमेशा तुम्हारी भावना का परिचय देता रहेगा।


विज्ञान का सराहनीय सृजनात्मक योगदान

अनुवाँशिकी विज्ञान एवं जैव विज्ञान दो ऐसी विधाएँ है जिन्होंने मनुष्य- जीव जन्तु, पशु-पक्षी के बारे में ऐसे रहस्यों से पर्दा उठाया है जिसे असंभव नहीं तो अशक्य तो कहा ही जा सकता है। सचेतन जीव जन्तुओं की प्रकृति, उनके क्रियाकलाप, कई पीढ़ियों तक प्रभावित करने एवं अनेक पीढ़ियों के संस्कारों को दोनों ही विधा ने न केवल जाना, समझा अपितु ऐसे तकनीक विकसित किये जिससे उनके प्रजातियों के मूल गुणों को मनोवाँछित रूप में ढाला जा सकता है। पशु पक्षियों के नस्लों में सुधार किया जा सकता है।

अब दोनों ही विधाओं के वैज्ञानिक वनस्पति जगत् एवं पेड़ पौधों पर शोध-परीक्षण कर रहे हैं एवं सफलता भी उन्हें मिल रही है। क्या जंगली एवं जहरीले पौधों को उपयोगी बनाया जा सकता है? क्या रेगिस्तानी, बंजर एवं समुद्र तट के अम्लीय-क्षारीय भूमि को उपजाऊ एवं हरा-भरा बनाया जा सकता है? क्या आम, संतरा, नीबू, नारियल जैसे फल एक वर्ष में ही उपलब्ध हो सकते हैं? जैसे जटिल सवालों का हल उनने प्रस्तुत किया है।

‘द इंटरनेशनल सेन्टर फॉर जेनेटिक इन्जी. एण्ड बायो टेक्नालॉजी इटली’ एवं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली की जेनेटिक इन्जी. एवं बायो टेक्नालॉजी एक नई तकनीकी खोज रहे हैं जिससे भारत ही नहीं विश्व के खाद्य उत्पादन एवं कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व क्राँति हो सके। इटली का इंजीनियरिंग विभाग मुख्यतया औद्योगिक माइक्रोबायोलॉजी के क्षेत्र में ऐसे तकनीकी विकसित कर रहा है जिसके द्वारा ऊर्जा क्षेत्र में नई क्राँति हो सके।

जेनेटिक इंजीनियरिंग एवं बायोटेक्नोलॉजी की नई खोजें बड़े व्यापक क्षेत्र तक फैली हुई है। जो औद्योगिक एवं हरित क्राँति द्वारा चिकित्सा, कृषि जगत्, खाद्य उत्पादन आदि की पुरानी मान्यताओं एवं आविष्कारों को तोड़ रही हैं और वह असम्भव कार्य सम्भव कर दिखा रहा है, जिसके बारे में सोचा भी नहीं गया।

वनस्पति एवं कृषि जगत् में इस आधुनिकतम विज्ञान का सदुपयोग एक ऐसी क्राँति है जिसने तीसरी दुनिया (प्रगतिशील देशों) के खाद्यान्न संकट को एक अंश तक ठीक कर दिया है। फिर भी इसके माध्यम से उत्पन्न हुई हरित क्राँति, खाड़ी देशों की भुखमरी की समस्या को दूर नहीं कर सकी है और न ही समुचित समाधान दे सकी है। फिर भी यह विज्ञान बढ़ती जनसंख्या को खाद्यान्न संकट से मुक्त करने हेतु नित-नवीन योजनाएँ बना रहा है। हालाँकि हरित क्राँति को जिस ढंग से व्यापक होना चाहिए था वह अभी नहीं हो सका है, क्योंकि प्रकृतिगत सीमाओं के कारण वह भी अपनी सांसें गिन रहा है।

जीन (जेनेटिक्स) पर निर्भर बड़े-बड़े फार्म उत्पादन इस बात की साक्षी देते हैं कि थोड़े-साधन एवं सीमित जल से अधिक उत्पादन संभव नहीं, बल्कि इसके लिए उत्कृष्ट स्तर के उर्वरक, रसायन, कीटनाशक एवं पर्याप्त पानी चाहिए। इन कारणों से बड़े-बड़े कृषि फार्म रंग-बिरंगे सुन्दर फूल, बड़े फल, आश्चर्यचकित करने वाले गेहूँ, गन्ने, चावल की किस्में बनाकर गिनीज बुक में अपना नाम तो अंकित कर सकता है लेकिन विश्व स्तर पर खाद्यान्न संकट का सम्पूर्ण समाधान नहीं ढूंढ़ सकता। दूसरी ओर आवश्यकता इस बात की है कि जीन तकनीक ऐसी नवीन खोज करें, जिसके अंतर्गत किसी विशेष क्षेत्र वातावरण में उत्पन्न होने वाले, मनुष्य जीवन के लिए उपयोगी वनस्पतियों, पेड़-पौधे विश्व के किसी भी कोने में कम साधनों एवं लागत मूल्य में व्यापक स्तर पर उत्पादन दे सके। जीन एवं बायो इंजीनियरिंग तकनीक इन दिनों कुछ इसी दिशा में कार्य कर रही है। यह विज्ञान कम्प्यूटर विज्ञान से जुड़कर और प्रभावी हो गया है, जिसके कारण खाद्यान्न, फल-फूल-पौधों की परिसीमाएँ टूट रही हैं।

मनुष्य जाति अपने परिकर के लिए उपयोगी पौधों में से मुट्ठी भर का ही प्रयोग कर पाया है। इसके अतिरिक्त लाखों प्रकार के ऐसे वृक्ष वनस्पति हैं जिसके बारे में न तो वह जान सका है और न ही उसका सदुपयोग कर पाया है। इसके कारण लाखों प्रकार के वनस्पति पेड़-पौधे अनुपयोगी एवं उपेक्षित पड़े हुए हैं। किन्तु नई तकनीक इस क्षेत्र में उन्हें उपयोगी प्रभावी एवं सहज उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है। अखाद्य एवं जहरीले फलों को खाने योग्य एवं पौष्टिक बनाया जा रहा है। रंग एवं स्वाद को दूसरे तरह के फलों जैसा ही सुन्दर और मधुर बनाया जा रहा है। पौधों-वृक्ष वनस्पतियों के बाह्य आकार प्रकार को भी जीन के माध्यम से मनोवाँछित बनाया जा रहा है। इस नई तकनीक के प्रयास सफलता के अंतिम छोर पर है तथा कई क्षेत्रों में असाधारण सफलतायें हस्तगत हो चुकी हैं।

नये शोध निष्कर्ष के अनुसार सभी पेड़-पौधों तथा फसलों को अनुवाँशिकी रोगों-खरपतवार-कीट-पतंगों से बचाने के लिए रोग प्रतिरोधी बनाया जा सकता है। रोग प्रतिरोधी सामर्थ्य किसी भी रोग के एक जीन से एक पौधे में प्रवेश कराने के बाद अनेकों पौधों तक पहुँचाया जा सकता है। एक बार यह संभव होने के बाद कीटनाशक दवाओं, खाद्य उर्वरकों का खर्च पूर्णतः बच जाता है।

ऐसे नवीन पौधों की प्रजाति विकसित की गई है जो रेगिस्तान अथवा समुद्र तटों पर नमयुक्त क्षारीय या अम्लीय एवं शुष्क क्षेत्रों में भी पर्याप्त उत्पादन देता है। इस तरह के पौधे रेगिस्तान एवं बंजर भूमि को भी हरा-भरा बना देते है। इण्टरनेशनल राइस रिसर्च इन्स्टीट्यूट के डायरेक्टर डॉ. एम.एस. पैट्रिक के अनुसार फिलीपिन्स, मनीला, दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व एशिया के 86.5 मिलियन हेक्टेयर भूमि को इस विधा से उपजाऊ बनाया गया है। जो अम्लीय एवं क्षारीय कारणों से बंजर पड़ी हुई थी। इस तरह की योजनाओं से भारत के रेगिस्तानों, समुद्र तटों एवं बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने की योजना को भी क्रियान्वित किया जा रहा है।

कोशिका योग (सेल फ्यूजन) भविष्य के लिए बड़े ही आश्चर्यजनक संभावनाओं को अपने आँचल में समेटे हुए है। दो तरह के प्रजाति वाली कोशिका को जोड़कर ऐसी नई प्रजाति उत्पन्न करना, जो दोनों ही मूल स्वरूप से भिन्न हों। प्रकृतिगत परिसीमाओं से परे शोधकर्त्ता ऐसे एन्जाइम्स का उपयोग कर रहे हैं, जो कठोर सेल की दीवार को तोड़कर पौध सेल में घुल−मिल जाता है। दो विभिन्न प्रजातियों के प्रोटोप्लास्ट (वनस्पति के जीवन आधार तत्त्व) को अब एक बनाया जाता है और जब यह एक सेल के रूप में विकसित होता है तो उसमें दोनों ही प्रजातियों के गुण पूर्णरूप में पाये जाते हैं। जीव-जन्तु, मनुष्य आदि के सम्बन्ध में यह प्रयोग खतरनाक भले ही हो किन्तु वनस्पति जगत् के लिए यह एक वरदान ही है। इसी विधा से अखाद्य एवं जहरीले समझे जाने वाले वृक्ष वनस्पतियों को खाने योग्य उपयोगी बनाया जा रहा है। जंगली पेड़-पौधों में आम, नीबू, संतरा, सेब की फसलें व्यापक स्तर पर उत्पन्न हो रही हैं। ये वृक्ष वनस्पतियाँ विपरित परिस्थितियों में भी भरपूर उत्पादन देती हैं।

नई शोध के अनुसार मक्का, गेहूँ, चावल-बाजरा की ऐसी प्रजातियाँ विकसित की गई हैं जो खुद ही अपनी जड़ों में नाइट्रोजन उर्वरक बनाती हैं, नाइट्रोजन चक्र को संतुलित रखती हैं। इसके लिए बाह्य रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता नहीं होती। नाइट्रोजन उर्वरक भारी उत्पादों का महत्त्वपूर्ण आधार है जो सामान्य वर्ग के किसानों को महंगा पड़ता है। इसीलिए इस नई शोध को व्यापक बनाने की आवश्यकता है। तभी नई विधा का लाभ गरीब एवं प्रगतिशील राष्ट्र को मिल पायेगा।

बायोटेक्नोलॉजी ने नाइट्रोजन चक्र को नियंत्रित करने वाले सस्ते उर्वरकों का समाधान ढूंढ़ निकाला है। उनने बहुत ही सस्ता नीला-हरा एलगी (पौधा) हारा बायोटेक्नोलॉजी से बायोफर्टीलाइजर बनाकर धान्य उत्पाद को बढ़ाया है। यह बायोफर्टीलाइजर 25 से 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन उर्वरक प्रति हेक्टेयर प्रति फसल में उत्पन्न कर सकता है, जिसके माध्यम से 16 प्रतिशत उत्पादन बढ़ाया गया।

जेनेटिक इंजीनियरिंग की दूसरी महत्त्वपूर्ण खोज है ‘टिशू कल्चर’। इसने वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन किया है। इसके माध्यम से लाखों पौधों के एक कोश को बढ़ने, विकसित होने वाली समय सीमा को कम कर दिया है। जो वनस्पति-पेड़ पौधे 4 से 10 वर्ष में फल-फूल के माध्यम से उत्पादन कर सकते हैं वे इस नई विधा से मात्र एक वर्ष में ही इस योग्य बनने लगे हैं। इससे समय सीमा कम हो गई है। अब नारियल, आम, नीबू, चंदन की लकड़ी, लौंग एवं दूसरी बहुमूल्य जड़ी-बूटियों के लिए लम्बे समय तक प्रतीक्षारत नहीं रहना होगा। अब वह शीघ्र ही उपलब्ध हो जायेगा।

जेनेटिक इंजीनियरिंग एवं बायो तकनीक ने तीसरी दुनिया के लोगों के स्वास्थ्य सुधार के लिए महत्त्वपूर्ण शोध किया है। जिसके कारण 1995-96 में तीन वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार भी दिया गया। एन्टीबायोटिक्स की नई खोजों ने अनेकानेक रोगों से जूझने के लिए अमोघ अस्त्र प्रदान किया है। इस क्षेत्र में इसकी सेवाओं को कैसे नकारा जा सकता है। अब इसका संकल्प दुनिया से भुखमरी एवं खाद्यान्न संकट को दूर करने का है। समुद्र तटीय क्षारीय अम्लीय एवं बंजर भूमि को हरा-भरा बनाने का है। अखाद्य वनस्पतियों, जंगली पेड़-पौधों में स्वादिष्ट एवं मधुर फल उत्पन्न करने का है। इस क्षेत्र में जो सफलता मिली है, उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि अब जेनेटिक इंजीनियरिंग का सार्थक उपयोग हो रहा है। मानव मात्र के कल्याण हेतु इस विधा के प्रतिभाशालियों का ध्यान आकर्षित हुआ है। विज्ञान का ऐसा ही सार्थक उपयोग सदैव सराहा जायेगा।


परमात्मा के युवराज को यह शोभा नहीं देता

आत्महत्या जिन्दगी से चरम हताशा-निराशा की परिणति है। जब मनुष्य अपने जीवन के प्रति समस्त आशा, उत्साह, उमंग को खो देता है तो उसे सर्वत्र दुःखों का दुसह्य दर्द, असह्य पीड़ा, एवं अंतहीन समस्याएँ खड़ी दिखाई देती हैं। उसे कहीं भी कोई सहयोग-सहायता नजर नहीं आते। वह दुःख के पहाड़ तले दब जाता है और इस विषम एवं भयावह परिस्थिति से मुक्ति पाने के लिए आत्महत्या रूपी आत्मघाती कदम उठा बैठता है। अतः आत्महत्या दुःखों से भागने की चरम कायरता है। परन्तु साहसी-पुरुषार्थी हरेक परिस्थितियों से डटकर सामना करता है, वह अंतिम साँसों तक लड़ता रहता है, घुटने नहीं टेकता। क्योंकि उसे पता है कि जिन्दगी फूलों की सेज ही नहीं, दर्द का समुंदर भी है और उसे पार करना होता है।

आखिर इंसान अपने बहुमूल्य जीवन की यूँ ही क्यों तिलाँजलि दे देता है? तमाम आकर्षणों से भरे इस संसार से मुँह क्यों मोड़ लेता है? आखिर क्यों वह मरना चाहता है? मनोवैज्ञानिक अपने-अपने ढंग से आज की इस ज्वलंत समस्या पर विचार करते हैं एवं राय देते हैं। एक योग मनोवैज्ञानिक के अनुसार व्यक्ति आत्महत्या रूपी जघन्य कदम इसलिए उठाता है क्योंकि या तो वह उस संसार में जीना नहीं चाहता, या वह जीने के प्रति प्रबल आकर्षण आकाँक्षा लिए जी नहीं पाता है। प्रथम कोटि का व्यक्ति एक योगी हो सकता है, जिसका कोई साँसारिक इच्छा एवं आकर्षण न हो और संसार से उसका कोई सम्बन्ध न हो। ऐसे लोगों का मन इस संसार के सतरंगी आकर्षणों में रमता नहीं है बल्कि उच्चस्तरीय लोकों में विचरण करता रहता है। ये आत्महत्या नहीं बल्कि स्वेच्छा से शरीर का त्याग करते हैं। यह उच्चस्तरीय यौगिक प्रक्रिया है, विज्ञान-विधान है। यह वर्तमान आधुनिक मनोविज्ञान की समझ से परे है। शरीर धर्म के पूर्ण हो जाने पर ये शरीर को त्याग देते हैं। स्वामी रामतीर्थ का पद्मासन लगाये जलसमाधि लेना ऐसा ही उदाहरण है।

आत्महत्या का वास्तविक अर्थ है अपने शरीर रूपी दिव्य मंदिर में आत्मा का हनन कर देना, उसे मार देना, दफना देना। औपनिषदिक द्रष्टाओं के अनुसार मानव शरीर ही आत्मा की अभिव्यक्ति का सबसे सुन्दर एवं सर्वोत्तम माध्यम है। इस शरीर को बलात् पीड़ा पहुँचाना या इसको नष्ट करना आत्महत्या कहलाती है, क्योंकि इससे अन्तस्थ आत्मा को अनन्त पीड़ा पहुँचती है, उसके विकास का पथ अवरुद्ध हो जाता है। अतः इस दृष्टिकोण से शरीर का विनाश करना ही आत्महत्या नहीं है वरन् शरीर के रहते हुए भी वे समस्त कर्म जिनसे आत्मा की उन्नति नहीं अवनति होती है आत्महत्या के सदृश्य है। आत्मा के इस उच्चस्तरीय विज्ञान को न जानने के कारण ही आज का मनोविज्ञान मन की उधेड़ बुन में फँसा उलझकर रह जाता है और किसी स्थायी समाधान तक नहीं पहुँच पाता है।

आज के मनोविज्ञान का आधार प्रमुखतया पैथोजेनिक अर्थात् रुग्ण या असामान्य मन का अध्ययन है। इससे तो केवल संतप्त मनःस्थिति से उभरे लक्षणों को गिनाया जा सकता है, परन्तु स्वस्थ मनःस्थिति के बारे में ज्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता। आत्महत्या का सम्बन्ध मन की गहराई से है। इससे भी गहरे उतरें तो भावनात्मक धरातल पर उत्पन्न संवेदनात्मक विकृतियाँ उभरती दिखाई देती हैं। जब तक मन एवं भावना की इस अतल गहराइयों का सर्वांग ढंग से अध्ययन, अन्वेषण नहीं होगा, आत्महत्या के यथार्थ कारणों से पर्दा उठना सम्भव नहीं है। योग मनोविज्ञान के द्वारा इस सूक्ष्म एवं गहन कार्य को साकार किया जा सकता है। इससे न केवल आत्महत्या के कारणों का पता लगाया जा सकता है बल्कि इसको रोका भी जा सकता है।

सामान्यतः मनोविज्ञान आत्महत्या के जिन कारणों का अनावरण करता है वह भी महत्त्वपूर्ण है। मनोवैज्ञानिक आत्महत्या के कई कारण सुझाते हैं। उनके अनुसार व्यक्ति किसी घटना विशेष से इतना प्रभावित हो जाता है कि वह एकाएक आत्महत्या कर बैठता है। जीवन संग्राम से लम्बे समय तक लड़ते-जूझते जब उसे लगातार असफलता हाथ लगती है, कहीं भी उसे सफलता की रोशनी दिखाई नहीं देती है। ऐसे में जब वह अपनों से भी सतत उपेक्षा का दंश झेलता है तो अन्ततः वह आत्महत्या को उचित मानता है। व्यक्ति के अहंकार को तीव्र चोट पहुँचने पर भी प्रतिक्रियावश स्वयं को तुरन्त समाप्त कर बैठता है। समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति की प्रतिष्ठ के दाँव पर लगने पर भी ऐसे आत्मघाती प्रयास किये जाते हैं। अकूत सम्पदावानों की सम्पत्ति की भीषण क्षति उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर देती है। अमेरिका में ‘ब्लैक मन्डे’ को कई बिलियनरी, मिलियनरी आत्महत्या कर बैठे, क्योंकि इस दिन उनको करोड़ों, अरबों डालर का नुकसान हुआ था। जिससे उनकी मनःस्थिति डगमगा गई थी।

आज का अर्थप्रधान आपाधापी वाला जीवन केवल अर्थ संचय में ही चरम सुख खोजता है। वह सम्पदा से ही समस्त सुख, शाँति व आनन्द को खरीद लेना चाहता है। और जब यह असम्भव कार्य अंत में दम तोड़ देता है तो स्वयं को सर्वोपरी समझने वाला व्यक्ति असहाय हो आत्महत्या की ओर अग्रसर होता है। आज के चकाचौंध से भरपूर कार्पोरेट सेक्टर का यही हाल है। इण्टरनेट के तमाम साइटों के सर्वेक्षण से पता चलता है कि कार्पोरेट एवं पब्लिक सेक्टर के उच्च पदाधिकारियों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जो गहन चिन्ता का विषय है। यूँ तो इस जीवन से हार मान लेने वालों की कोई विशेष जाति, सम्प्रदाय, वर्ग एवं स्थान से सम्बन्ध नहीं होता है। फिर भी इस आत्महन्ता होड़ में शामिल होने वालों में से अधिकतर 15 से 29 साल के होते हैं। अर्थात् आत्महत्या की यह वृत्ति अधिकतर युवाओं में होती है, जिनकी भावनाओं पर विवेक-बुद्धि का नियंत्रण कम होता है। इसके ठीक विपरीत सर्वेक्षण कार्पोरेट जगत् का है जहाँ बुद्धि के बंजर रेगिस्तान के कंटीले धरातल पर भावना-संवेदना की शीतल ब्यार शुष्क-समाप्त हुई रहती है।

भावनात्मक अभावबोध एवं तीव्र भावुकता दोनों ही आत्महत्या के कारण बनते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में अधिकतर आत्महत्या संवेदनात्मक अभाव के कारण होती पायी गयी हैं, जबकि भारत में इसका मुख्य आधार तीव्र भावुकता बताया जाता है। हालाँकि इसके अन्य अनेक और भी कारण हैं। कुल मिलाकर प्रतिवर्ष हो रही आत्महत्या की दर दिल दहला देने वाली है। पिछले साल के दौरान हमारी जनसंख्या में 24.25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है, वहीं आत्महत्या की दर 37 फीसदी बढ़ी है।

मनुष्य अपने जीवन एवं समाज से सदा-सदा के लिए दूर चला जाता है। इस दूरी में ही उसे मुक्ति की राह दिखती है। विडम्बना यह है कि वह इस दूरी की कीमत अपने ही बहुमूल्य जीवन को चुकाकर पाना चाहता है। वस्तुतः जीवन कष्ट-कठिनाइयों से निखरता है, दुःख-दर्द के ताप से तपकर पकता है और घोर संघर्ष में विजय का उल्लास मानता है। जीवन निराशा के कुहासे में मिट जाने का नाम नहीं है, असफलता के तीव्र आघात में पीस जाने का पर्याय नहीं है। वरन् जीवन जीवन्त आशा-विश्वास का सुखद सत्परिणाम है। जीवन की उच्चस्तरीय आशा, उमंग और उत्साह किसी भी आपदा-विपदा से भारी है। परमात्म ने मानव जीवन में वह सब कुछ भर दिया है, जिसे जाग्रत् कर वह दिव्य अनुदान-वरदान का अधिकारी हो सकता है। उसकी पहुँच सीधे परमात्मा तक है। वह सृष्टि के समस्त वैभव-ऐश्वर्य का पूर्ण अधिकारी है। उसकी सीमाएँ अनन्त हैं। वह सृष्टि का सर्वोच्च सौभाग्यशाली है। बस उसे अपनी महिमा-गरिमा का बोध भर होना है। उसके अपने आत्मविश्वास के जगते ही वह अपने महनीय स्वरूप को पा सकता है कि वह परमात्मा का ज्येष्ठ पुत्र है।

मानव की इस गरिमा के कारण ही फ्रेंकलिन के. लेन ने अपना उद्गार व्यक्त किया था, कि तमाम विसंगतियों के विरुद्ध मानव को अपने पूरे उत्साह से, पूर्ण पुरुषार्थ से देखना ही इस धरती पर सबसे दर्शनीय दृश्य है। मनुष्य ही है जो असंभव को संभव कर सकता है, अकल्पनीय को साकार एवं अमूर्त को मूर्त कर सकता है। आवश्यकता है तो बस अपने सामर्थ्य को भूले हनुमान को जामवंत के दिशा-निर्देश की, उन मोहाँधकार में डूबे अर्जुन को कृष्ण के मार्गदर्शन की। यह सम्बल मिल जाने पर समुद्र छलाँगने, महाभारत जीतने से भी बढ़कर जीवन को सुन्दर ढंग से जीने का पुरुषार्थ किया जा सकता है। आत्महत्या जघन्य एवं घृणित अपराध है जबकि जीवन पुरुषार्थ का पर्याय है और जीवन को गरिमापूर्ण जीना चरम परम पुरुषार्थ है। यही साधना है, यही सत्य है, जिसे हर इंसान को निरपवाद रूप से अपनाकर श्रेष्ठता के पथ पर अग्रसर होना चाहिए। इसी में जीवन की सार्थकता है और यही सार्थक जीवन है।


बुढ़िया चरखा कातने लगी (kahani)

निर्झर की धार में बहते... पेज 21

दिन ढलने लगा। व्यक्ति की परछाई लंबी होने लगी।... पेज 22

महाकवि माघ को अपने पाँडित्य का बड़ा अभिमान था। कभी-कभी उनके आचरण से उसकी झलक भी मिलती रहती थी, पर उनको छोड़ने का किसी को साहस न होता।

एक बार माघ राजा भोज के साथ वन विहार से लौट रहे थे। मार्ग में एक झोपड़ी पड़ती थी। एक वृद्धा उसके पास बैठी चरखा कात रही थी। माघ ने वही अभिमान प्रदर्शित करते हुए पूछा, ‘यह रास्ता कहाँ जाता है?’ वृद्धा ने माघ को पहचान लिया, हंसकर बोली, ‘वत्स! रास्ता कहीं नहीं आता-जाता। उस पर आदमी आया-जाया करते हैं। आप कौन हैं?’ ‘हम यात्री हैं।’ माघ ने संक्षिप्त उत्तर दिया। वृद्धा ने फिर मुसकराते हुए कहा, ‘तात! यात्री तो सूर्य और चंद्रमा दो ही हैं। सच-सच बताओ, आप लोग कौन हैं?’ माघ थोड़ा चिंतित होकर बोले, ‘माँ! हम क्षणभंगुर मनुष्य हैं।’ वृद्धा भी थोड़ा गंभीर होकर बोली, ‘बेटा! यौवन और धन, क्षणभंगुर तो यही दो हैं। पुराण कहते हैं, इन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।’ माघ की चिंता थोड़ी और बढ़ी तो भी उन्होंने उत्तर दे ही डाला, ‘हम राजा हैं।’ उन्होंने सोचा संभवतः इससे वृद्धा डरेगी, पर उसने तत्काल उत्तर दिया, ‘नहीं भाई, आप राजा कैसे हो सकते हैं, शास्त्र ने तो यम और इंद्र दो को ही राजा माना है।’ अपनी हेकड़ी छिपाते हुए माघ ने फिर उत्तर दिया, ‘नहीं माई, हम तो सबको क्षमा करने वाली आत्मा हैं।’ वृद्धा ने बिना रुके उत्तर दिया, ‘पृथ्वी और नारी की क्षमाशीलता की तुलना आप कहाँ कर सकते हैं, आप तो कोई और ही हैं।’

निरुत्तर माघ ने कहा, ‘माँ हम हार गए, अब रास्ता बताओ, पर वृद्धा उन्हें इतनी शीघ्र मुक्त करने वाली नहीं थी फिर बोली, ‘महानुभाव, संसार में हारता वही है जो किसी से कर्ज लेता है या अपना चरित्रबल खो देता है। बस हारने वाले इन्हीं दो कोटि के लोग होते हैं।’ इस बार माघ कुछ न बोले, चुप होकर अपराधी से खड़े रहे। वृद्धा ने कहा, ‘महापंडित! मैं जानती हूँ कि आप माघ हैं, आप महाविद्वान हैं, पर विद्वत्ता की शोभा अहंकार नहीं, विनम्रता है।’ यह कहकर बुढ़िया चरखा कातने लगी और लज्जित माघ आगे चल पड़े।

पेज 24-27 नहीं किया डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड


मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी बदलनी होगी

पैमाने गलत हो, मूल्याँकन की कसौटियाँ विकृत हो तो उसकी परिणति भी वैसी ही होती है। आज समाज में अन्याय, अनीति तथा भ्रष्टाचार की जो कुटिल व्यूह रचना दिखाई पड़ती है, उसका बहुत कुछ उत्तरदायित्व उन गलत मापदंडों पर भी है, जिनके आधार पर मनुष्यों को तोला-नापा जा रहा है, जो उनके व्यक्तित्व के मूल्याँकन की कसौटी बने हुए हैं।

लोगों ने देखा कि कितनी विशाल कोठी है, सोने की तरह दमक रही है। खिड़की, दरवाजे और रोशनदान रंगीन काँच से जुड़े हुए हैं। रेशमी पर्दे झिलमिला रहे हैं। मूनलाइट बल्ब जल रहे हैं। स्टीरियो डेक से गायन-वादन के स्वर गूँज रहे हैं। आँखें चकाचौंध हो गई, कान लालायित हो उठे, मन कह उठा-साक्षात स्वर्ग का निवास है। बड़ा भाग्यवान है इसका मालिक! कितना बड़ा आदमी होगा! लाखों-करोड़ों होंगे इसके पास। अनायास श्रद्धा जागी और उस अनजान धनवान की ओर झुक गई। उसका बड़े आदमी के रूप में मूल्याँकन हो गया। वह चर्चा और प्रतिष्ठा का पात्र बन गया। कोई अवसर आने पर सम्मान आदि के रूप में उसका मूल्य व्यक्त कर दिया जाता है।

धन तो प्रतिष्ठा का विषय रहा है, इसलिए कि यह परिश्रम एवं पुरुषार्थ का साक्षी होता है। प्राचीन समय में जब धन को प्रतिष्ठा के विषयों में स्थान दिया गया था, लोग यह कल्पना तक भी नहीं कर सकते थे कि इसका अर्जन-उपार्जन अनीति के मार्ग से भी किया जा सकता है। अनुचित तथा अनीतियुक्त पैसे और पैसे वाले से लोग ऐसे डरते और घृणा किया करते थे, जैसे विषैले सर्प से। लोग किसी का अन्न खाने, दान या सहायता लेने में हजार प्रकार से सोच-विचार किया करते थे। उसी की सेवा अथवा सहायता स्वीकार की जाती थी, जिसकी कमाई के विषय में यह विश्वास रहता था कि प्रत्यक्ष तो क्या परोक्ष में भी इसका पैसा अन्याय अथवा अनीति से दूषित नहीं हुआ है। यदि इस प्रकार का संदेह भी हो जाता था तो समाज का बच्चा-बच्चा लक्षाधिपति होने पर भी उस धनवान को नीची नजरों से देखा करता था, जिससे उसकी धनाढ्यता ही उसके लिए काल-फाँस की तरह दुःखदायिनी हो जाती थी।

समाज द्वारा इस कठोर मूल्याँकन से अनुशासित तब के धनवान अपने व्यापार एवं व्यवसाय में पराकाष्ठा तक पवित्र एवं सत्यपरायण रहकर विशुद्ध परिश्रम एवं पुरुषार्थ से उस स्थिति तक पहुँचकर प्रतिष्ठा के पात्र बनते थे, साथ ही यह विशुद्धता भी तब तक मान्यता नहीं पाती थी, जब तक उसका पवित्र धन पवित्र एवं पुनीत कामों में व्यय नहीं होता था। इस प्रकार आय-व्यय दोनों की समान पवित्रता से तुलकर ही कोई धनवान धन के आधार पर उसी प्रकार समाज में मान्यता एवं श्रद्धा के भाजन बन पाते थे, जैसे जन-सेवा के अन्य कार्य करके कोई सत्पुरुष।

पहले जहाँ धन की मात्रा का कोई मूल्य नहीं था, मूल्य था उसकी आय-व्यय की रीति-नीति का, वहाँ आज आय-व्यय की रीति-नीति का तो कोई मूल्य रहा नहीं, धन की मात्रा को ही श्रेष्ठत्व का मापदंड मान लिया गया है। स्थिति बिलकुल विपरीत हो गई है, इसलिए उसका प्रभाव एवं परिणाम भी उलटा हो गया है।

लोगों ने कोठी, कार, एयर कंडीशनर, टी.वी. − वी.सी.आर, मोबाइल फोन आदि वैभव विलास और आमोद-प्रमोद की चहल-पहल देखी नहीं कि बड़ा आदमी मान लिया और मान-सम्मान देना शुरू कर दिया। मान-सम्मान जैसी बहुमूल्य चीज और श्रद्धा जो कि त्याग, तपस्या, साधना, सेवा, श्रम और पुरुषार्थ के आधार पर मिलती है, वह इतनी सस्ती और आसानी से मिल सकती है, तब क्या किसी ने भाँग खाई है कि वह प्रतिष्ठापूर्ण जीवन जीने के लिए संयम तथा साधना करता फिरे, सेवा और त्याग का प्रमाण देता घूमेँ क्यों न किसी प्रकार से धन बटोरकर उसे प्राप्त किया जाए? जनता द्वारा धन के प्रभाव में आकर दी जाने वाली इस सस्ती सामाजिक प्रतिष्ठा ने लोकप्रियता के प्यासे लोगों को अंध आर्थिकता में डुबो दिया है।

यही नहीं कि लोग किसी धन-वैभव देखकर ही प्रभावित हो जाते और उसे प्रतिष्ठापूर्ण दृष्टि से देखने लगते हों, बल्कि उसका धन उसके अथवा समाज के किसी हित में आता हो अथवा न आता हो, अब तो यहाँ सब कुछ स्वीकार्य और सम्माननीय है। संप्रति प्रतिष्ठा का स्तर इतना गिर गया है, सम्मान इतना सस्ता हो गया है कि जनसामान्य की दृष्टि से देखते हैं। राग-रंग में डूबा रहना, शराबखोरी और फैशनपरस्ती में लगा रहना, ब्याह-शादियों में धूम-धड़ाका करते रहना, बड़ी-बड़ी दावतों में पैसा पानी की तरह बहाना तक लोगों के लिए सम्मान श्रद्धा का प्रतीक बन गया है। लोग उन्हें उदार, बड़ा आदमी, शाही खर्च कहकर सम्मान करने लगे हैं। जनता की इस सस्ती श्रद्धा और अस्तरीय मापदंड ने भी समाज में मूल्यों का पतन तथा अधिकाधिक धनसंचय बढ़ाने में बहुत कुछ योग दिया है।

हर विचारशील व्यक्ति का नैतिक कर्त्तव्य है कि वह किसी के वैभव-विलास से प्रभावित होकर उसका मूल्याँकन करने से पहले यह अवश्य देख ले कि इस संपत्ति का आधार नीतिपूर्ण रहा है या नहीं? उसके साधन, उपायों तथा युक्तियों की पवित्रता की खोज कर लेना आवश्यक है, जिससे कि गलत कामों के त्रुटिपूर्ण मूल्याँकन का अपराध न हो जाए।

जब यह बात स्पष्ट दिखाई देती है कि अमुक व्यक्ति छल-कपट, छीना-झपटी, चोरबाजारी, मुनाफाखोरी और भ्रष्टाचार को आधार बनाकर कोठी-पर-कोठी बनाए जा रहा है, बैंक बैलेन्स, कारोबार बढ़ाता जा रहा है, तब क्या उसे अधिकार है कि वह हमारी प्रशंसा अथवा सम्मान की भावना को पाए और क्या हमें ही अधिकार है कि हम उसे कुछ दें? यदि हम दोनों में से कोई भी ऐसा करता है तो अनधिकार चेष्टा करता है, समाज में अंधे अर्थवाद को बढ़ावा देकर भ्रष्टाचार फैलाने में सहयोग करता है, जो कि सामाजिक अपराध एवं आध्यात्मिक पाप है।

आज यदि लोग धनाढ्यता का मूल्यांकन करना छोड़कर साधनों और उसके शुचिताप्रधान उपायों पर ध्यान रखने लें तो समाज में पैसे के लिए फैला हुआ भ्रष्टाचार बहुत कुछ कम हो सकता है। अनुचित साधनों के कारण यदि धनिकों का मूल्याँकन कम हो जाए, उनका वह अन्याय उपार्जित वैभव घृणा एवं तिरस्कार का प्रसंग बन जाए तो निश्चय ही लोग आवश्यकता से अधिक धनवान बनने की लिप्सा छोड़कर सम्मान रक्षा के लिए कमाई के उचित एवं उपयुक्त उपाय अपनाने के लिए विवश हो जाएं।

आर्थिक क्षेत्र की ही तरह धार्मिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र में भी जनता के मूल्याँकन की कसौटी खोटी हो गई है। वहाँ अब मापदंड का आधार व्यक्तित्व का खरापन न होकर वक्तृता की चतुरता को माना जाने लगा है। जो वाक्जाल में जनता को जितना उलझा दे, उसे उतना बड़ा महात्मा स्वीकार किया जाता है, किन्तु वास्तविक संतों की सीधी=सच्ची बात की उपेक्षा की जाती है। सादगी और सरलता अब अध्यात्म क्षेत्र के मूल्याँकन का आधार नहीं रहा, यह आज की सबसे बड़ी विडंबना है। सर्वसाधारण संतों को भी अब भौतिकता के रंग में रंगा देखना चाहते हैं और यह भी उनकी परख का एक पैमाना होता है। यह ठीक है कि आज के भौतिक युग में आवागमन का साधन बैलगाड़ी नहीं हो सकता। समय जिस रफ्तार से चल रहा है, उस गति से हमें भी चलना पड़ेगा, अन्यथा हम पर पिछड़ेपन का अभिशाप आ लदेगा। इस दृष्टि से कार, कंप्यूटर आज के आवश्यक साधनों में सम्मिलित हो गए हैं। अतएव इस आधार पर धर्मक्षेत्र में मूल्याँकन नहीं होना चाहिए। देखा यह जाना चाहिए कि किसने व्यक्तित्व को गरिमापूर्ण बनाकर धार्मिकता की वास्तविक श्रद्धा को संजोया है। इससे कम में न तो धर्म का प्राण तो व्यक्तित्व की शालीनता में छुपा हुआ है, व्यवहार की चतुरता और बहिरंग के आडंबर में नहीं। जिसने अंतरंग को जितना परिष्कृत कर लिया, उसे उतना महान माना जाना चाहिए। सज्जनता की यह माँग है। धर्मक्षेत्र में संतत्व का यही चिह्न होना चाहिए और इसी आधार पर व्यक्तित्व की परख भी। किन्तु खेद है कि नासमझ जनता की अंधश्रद्धा, अंधविश्वास और मूल्याँकन की खोटी कसौटी ही हित-अनहित का निर्देशन नहीं करने दे रही।

यह बात बड़ी सीमा तक सत्य मानी जा सकती है कि यदि लोकजीवन में विवेकशीलता उभर सके और मूल्याँकन के विषय में अपनी श्रद्धा एवं प्रतिष्ठा का मापदंड ठीक करके सही कसौटी काम में लाई जाए तो जीवन के व्यापक दायरे में छाया भ्रष्टाचार बहुत हद तक दूर हो सकता है। अर्थ तथा धर्म के क्षेत्र में देखने, परखने और मूल्याँकन करने का सही मापदंड, साधन और सच्ची कसौटी व्यक्तित्व के कथन और आचरण की एकरूपता ही है। जिस दिन लोकमानस इस तथ्य को हृदयंगम कर तटस्थ आचरण पर उतारू हो जाएगा, उसी दिन सुधार-शुभारंभ सुनिश्चित हो जाएगा।


स्रष्टा का यह लीलाजगत सुनियोजित, सुव्यवस्थित है।

समस्त सृष्टि व्यवस्था के पीछे एक अदृश्य शक्ति सतत क्रियाशील है। जड़ पदार्थ से लेकर जीव और मानव सभी इसी शक्ति द्वारा नियंत्रित व नियमित हैं। उसे सुपरमाइंड कहा जा सकता है। जीवों में वही माइंड कहलाता है। कोई जैविक कार्य या सृष्टि व्यवस्था इन दोनों के बिना असंभव है। अति सूक्ष्म और क्वाँटम स्तर पर माइंड और सुपर माइंड (अतिमानस) आपस में संबंधित होते हैं। इसी कारण ब्रह्माँड की गति सुनियोजित एवं क्रमबद्ध है तथा जीवन व्यापार गतिशील है।

वैज्ञानिक ब्रह्माँड की अभूतपूर्व व्यवस्था को देखकर हैरान हो गए, परन्तु इन्हें इसका कोई कारण नजर नहीं आया। अंततः इस संचालन शक्ति को ही सुपरमाइंड कहा गया। ब्रह्मांड की गतिविधि अत्यंत रोचक पर रहस्यमयी है। वैज्ञानिकों ने इसकी परिकल्पना इसके उद्भव से की है। ब्रह्मांड के उद्भव के विषय में अनेकों सिद्धाँत एवं मान्यताएं हैं। कोई इसकी उत्पत्ति बिगबैंग थ्योरी से समझाता है तो कोई इसे हिट डेथ थ्योरी के तहत बताता है। अनेक ब्रह्माँडविद संकुचन की व्याख्या करते हैं। वेदाँत ब्रह्मांड को माया से उद्भूत मानता है। जो भी इन समस्त सिद्धाँतों के पीछे एक कुशल कलाकार की सुन्दर अभिव्यक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। यह अदृश्य कार्यकुशलता सुपरमाइंड की ही है।

भौतिकविदों ने अंततः इस अदृश्य बुद्धि को कहीं-न-कहीं स्वीकार किया है। ब्रिटेन के प्रसिद्ध भौतिकविद् पाल डेविस ने ‘द एक्सीडेंटल यूनीवर्स’ में वर्णन किया है कि ब्रह्मांड में सूक्ष्म परमाणु से विशाल आकाशगंगा तक एक सुव्यवस्था है, एक सुश्रृंखलता है। इस सृष्टि में प्रत्येक पदार्थ आवस में संबंधित है। किसी में भी अलगाव नहीं है। यह सुनियोजित किसी अदृश्य सिद्धाँत का ही परिणाम हो सकता है। हिंज पेजल्स जैसे पदार्थवादी वैज्ञानिक ने अपने शोध ग्रंथ ‘कास्मोलॉजी’ में बताया है, ‘ब्रह्मांड का गुरुत्वाकर्षण एक चमत्कार एवं आश्चर्यजनक है। यह शक्ति एक छोटी-सी सुई से लेकर ग्रह, नक्षत्र, निहारिकाओं तक को नियंत्रित कर सकती है। तारों को चमकते, सूर्य को दहकते एवं पृथ्वी को अपनी ही धुरी पर घूर्णन करते अरबों वर्ष हो गए, परन्तु कहीं कोई व्यतिक्रम नहीं आया है और सबसे अनोखा है ब्रह्मांड में मानवीय विकास। इस सिद्धाँत के पीछे भी ईश्वर की क्रियाशीलता की झाँकी मिलती है।’

ब्रह्माँडीय क्रियाकलापों की और सूक्ष्म ढंग से विवेचना की जाए तो भी यही निष्कर्ष निकलता है। ब्रह्मांडीय प्रसार में फोटॉन कण की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। फोटॉन एक प्रोट्रॉन और न्यूट्रॉन से मिलकर बनता है। हाइड्रोजन के आइसोटोप्स भी एक विशेष तत्व हैं। ये ब्रह्मांड के 74 पदार्थों के निर्माण में काम आते हैं। यह आइसोटोप्स एक प्रोट्रॉन और एक इलेक्ट्रान से विनिर्मित हैं। प्रोट्रॉन को स्थायी कण माना जाता है, जो कि विखंडित होकर एक प्रोट्रॉन, एक न्यूट्रॉन और एक एंटी न्यूट्रॉन कण बनाता है। न्यूट्रॉन प्रोट्रॉन से भारी कण है। इस सूक्ष्म सृष्टि में गजब का आपसी सामंजस्य है।

ब्रह्मांडीय व्यवस्था अपने आप में अनोखी एवं अद्भुत है। यहाँ ही हरेक गतिविधि योजनाबद्ध तरीके से संपन्न होती है। ब्रह्मांड के इस सुनियोजन को प्रदर्शित करने के लिए वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांडीय स्थिराँक की परिकल्पना की है। ये स्थिराँक महत्त्वपूर्ण सूत्र हैं, जिनके माध्यम से वैज्ञानिक ब्रह्मांडीय रहस्यों को अनावरण करने का प्रयास-पुरुषार्थ करते हैं। ये स्थिराँक भिन्न-भिन्न कणों के लिए भिन्न-भिन्न हैं।

शोधरत वैज्ञानिक इन्हीं स्थिराँकों के माध्यम से ब्रह्माँडीय शोध एवं अन्वेषण का कार्य करते हैं। इन स्थिराँकों के अंकीय मूल्य को स्ढ्ढ इकाई कहते हैं। इसी के आधार पर आकाशगंगा एवं निहारिकाओं का पता चलता है। यहाँ तक कि आकाशगंगा के तारों की गणना भी की जा सकती है। एक आकाशगंगा में 1060 तारे होते हैं। जो भी हो, ये स्थिराँक रहस्यमय ब्रह्माँड के सूक्ष्म एवं विराट संरचना के आधार है। इन स्थिराँकों में व्यतिक्रम होने से इस विराट संरचना को जानने-समझने में परेशानी हो सकती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार इस विशाल एवं विराट ब्रह्मांड को संचालित तथा नियमित करने के लिए चार बल क्रियाशील है। ये हैं गुरुत्वाकर्षण बल, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक बल, दुर्बल न्यूक्लियर बल व सुदृढ़ न्यूक्लियर बल। इस जगत की सजीवता इन्हीं बलों पर आधारित है। इन बलों की आपसी प्रतिक्रिया समूचे जगत के अस्तित्व को समाप्त कर सकती है।

नाभिकीय बल (न्यूक्लियर पावर) जड़ जगत के जड़ कहलाने वाले परमाणु पदार्थ के शक्तिशाली परमाणुओं को बाँधे रखते हैं। नाभिक के अन्दर प्रोट्रॉन और न्यूट्रॉन का जो साम्य दिखता है, इसी बल के आधार पर होता है। इसके और परमाणुओं की स्थिरता संभव नहीं है। यह बल नहीं होता तो पदार्थों से परमाणु आसमान में गुब्बारे जैसे उड़ने लगते। अगर ऐसा होता तो ब्रह्मांड का स्थूल स्वरूप ही नहीं बन पाता। सूर्य और तारे नाभिकीय बल के कारण ही जलते हैं। सूर्य के जलने से ही अनंत ऊर्जा निकलती है। यदि नाभिकीय बल नहीं होता तो पृथ्वी का यह सुन्दर व सुरम्य वातावरण कैसे रह पाता।

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक बल इस जगत के समस्त रासायनिक क्रियाओं के लिए जिम्मेदार है। यह बल दो तत्वों को मिलाकर यह नवीन तत्व का सृजन करता है, अन्यथा पानी में नमक एवं शक्कर घुलते ही नहीं। दूध से दही जमना इसी बल के कारण संभव है। कपड़ों की रंग-बिरंगी दुनिया में रंगों का जो रसायन है वह भी इन्हीं बलों पर आधारित है। अर्थात् इलेक्ट्रोमैग्नेटिक बल के कारण ही तमाम तात्त्विक क्रियाएं होती हैं।

शून्य आकाश में घूमते ग्रह, नक्षत्र, तारे गुरुत्वाकर्षण बल का परिणाम है। इस बल के कारण ग्रहण अपने सूर्य का एवं सूर्य आकाशगंगा का चक्कर काटते है। धरती में मनुष्य का चलना-फिरना एवं संतुलन गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से ही बन पड़ता है। अतः ये चार बल समस्त ब्रह्मांड में सक्रिय होकर इसके सुसंगठन का परिचय देते हैं। यह प्रक्रिया महज एक संयोग नहीं है। यह ईश्वर की सुनियोजित व्यवस्था का क्रम है।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक पाल डेविस भी ब्रह्माँडीय व्यवस्था को एक संयोग मानकर संतोष कर लेने के विरुद्ध हैं। हालाँकि पाल डेविस के इस सिद्धाँत को हेंज पेजल्स, स्टीफन जे− गोल्ड आदि वैज्ञानिकों ने समर्थन नहीं किया, परन्तु विख्यात भौतिकविद् राबर्ट ड्यूक ने पाल डेविस का जोरदार समर्थन किया है। ड्यूक ने अपने शोधग्रंथ ‘रिव्यू ऑफ मॉडर्न फिजिक्स’ में इस तथ्य को स्पष्ट किया है कि भौतिक शक्तियाँ अचानक एवं आकस्मिक नहीं होती। ब्रिटिश ब्रह्माँडविद बैंडन कार्टर ने भी इस मत का प्रतिपादन किया है।

‘कास्मोलॉजिकल प्रिंसिपल’ में जान बैरा और फ्रैंक टीपलर ने उल्लेख किया है कि ब्रह्माँड में जीवन सुरक्षित एवं संरक्षित है। अंतः ब्रह्माँड की गतिविधियाँ भी उद्देश्यपूर्ण है। इस सिद्धाँत के समर्थक जोसेफ सिल्क ने अपनी अभिव्यक्ति इस तरह दी है, ‘गुरुत्वाकर्षण बल सभी ग्रह-नक्षत्र एवं आकाशगंगा को नियंत्रित करते हैं। अंत में सिल्क ने कहा कि वातावरण बना भी इसलिए कि इसमें जीवन का विकास हो सके। ह्वीलर भी इस सिद्धाँत को स्वीकारते प्रतीत होते हैं।

सृष्टिकर्त्ता ने सृष्टि बनाई, तभी उसमें जीवन जीवंत हुआ है। इस परिप्रेक्ष्य में आधुनिक अल्बर्ट आइंस्टीन कहे जाने वाले स्टीफन हाकिंग एवं उनके सहयोगी बैरी कालीन ने एंथ्रोपीक सिद्धाँत दिया है। इस सिद्धाँत के अनुसार यह विश्व-ब्रह्माँड आइसोट्रोपिक है, क्योंकि हमारा अस्तित्व है। इस प्रतिपादन से यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्माँड का सृजन सार्थक एवं सोद्देश्य ढंग से हुआ है। अगर ऐसा नहीं होता तो जीवन का अस्तित्व ही संभव नहीं हो पाता। जीवन न हो तो फिर विकास का क्या अर्थ हैं, अंतः इस विराट ब्रह्मांड का संचालक सुपरमाइंड है, जैसे जीवन का नियंत्रणकर्त्ता माइंड।

जीव-जगत में बैक्टीरिया से लेकर अतिविकसित मनुष्य तक सभी का संचालन एवं नियमन ‘माइंड’ द्वारा होता है। हालाँकि एककोशीय जीव में इसे माइंड नहीं कहा जाता, परन्तु कुछ तो ऐसा है जिससे कि वह जीव भी अपने जीवन व्यवसाय को पूर्ण करता है। यहाँ सृष्टिकर्त्ता का स्वरूप और भी सजीव का क्रियाशील दिखाई देता है। मानव स्वयं एक अद्भुत कृति है। मानव शरीर में पचास ट्रिलिथम (50x1012) कोशिकाएं होती हैं। इन विशाल कोशिका समूहों का जीवन-व्यापार कितना अनोखा है? इनका तंत्र कितना सुनियोजित है? मानव विकास की इस यात्रा को क्या एक संयोग कहा जाएगा? मानव जीवन माइंड द्वारा संचालित है। ठीक इसी प्रकार ब्रह्माँड सुपरमाइंड द्वारा नियंत्रित होता है।

सृष्टिकर्त्ता की लीला का साकार रूप यह सृष्टि है। यहाँ सभी सुनियोजित है, इसलिए श्री अरविंद ने कहा है कि इस ब्रह्माँड में संयोग कहीं नहीं है। सभी निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही परिचालित है। अतः माइंड एवं सुपरमाइंड भी उसी ईश्वर की विधि-व्यवस्था है। इस व्यवस्था को समझना और उसके अनुरूप जीवनयापन करना ही जीवन की कला है। इसे जिसने भी सीख लिया, उसी का जीवन उपलब्धियों एवं विभूतियों का अक्षय भंडार बन जाता है।


महाशक्ति गायत्री का धरा-धाम पर अवतरण

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (10 जून, 2003) आदिशक्ति माता गायत्री के अवतरण की पावन तिथि है। युगों पहले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के महातप से माँ गायत्री इसी शुभ तिथि को धरतीवासियों के लिए वरदायिनी हुई थीं। काल प्रवाह में गायत्री की शक्तिधाराएँ विलोप होने लगीं। जनसामान्य महाशक्ति के दिव्य प्रभावों से अनजान होने लगा। ऐसे में युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ने युग विश्वामित्र के रूप में कठोर तप साधना की। और भगवती गायत्री की सभी दिव्य शक्तियों को पुनः प्रकट किया। जन सामान्य को जगन्माता की कृपा, करुणा का ज्ञान कराया। माता के अमित प्रभावों से अपरिचित जन-मन में यह सवाल उठ सकता है कि अगणित मंत्रों, अनेकानेक साधना विधियों के होते हुए गायत्री साधना ही क्यों?

शास्त्र रचना करने वाले अनुभवी महर्षियों ने इस प्रश्न के विस्तृत उत्तर प्रस्तुत किए हैं। जिन्होंने भी गायत्री महाशक्ति का आँचल थामा, उन सभी का यही कहना है कि गायत्री महामंत्र मात्र एक मंत्र भर नहीं है। बल्कि इसमें सभी मंत्रों का समावेश है। इसके चौबीस अक्षरों में शक्ति समुद्र समाए हैं। तभी तो ऋषि वाणी कहती है-

गायत्री चैव संसेव्या धर्मकामार्थ मोक्षदा। गायत्र्यास्तु परं नास्ति इह लोके परम च॥

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करने वाली गायत्री का जप करना चाहिए। गायत्री मंत्र से बढ़कर कोई मंत्र इस लोक और परलोक में नहीं है।

इस महामंत्र के चौबीस अक्षरों में चौबीस महान् महर्षियों की तपशक्ति समायी है। जिन महर्षियों की तप-चेतना से गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षर ओत-प्रोत हैं, वे महर्षि हैं-

वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठः शुक्रः कण्वः पराशरः। विश्वामित्रो महातेजाः कपिलः शौनको महान्॥ याज्ञवल्क्यो भरद्वाजो जमदग्निस्तपोनिधिः। गौतमो मुद्ग्लश्चैव वेदव्यासश्च लोमशः॥ अगस्त्यः कौशिको वत्सः पुलस्त्यो माण्डुकस्तथा। दुर्वासास्तपसाँ श्रेष्ठो नारदः कश्यपस्तथा॥ इत्येते ऋषयः प्रोक्ता वर्णानाँ क्रमशो मुने।

वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ, शुक्र, कण्व, पराशर, महातेजस्वी विश्वामित्र, कपिल, महान् शौनक, याज्ञवल्क्य, भारद्वाज, तपोनिधि जमदग्नि, गौतम, मुदग्ल, वेदव्यास, लोमश, अगस्त्य, कौशिक, वत्स, पुलस्त्य, मण्डूक, दुर्वासा, नारद और कश्यप। क्रम से इन ऋषियों की तप शक्ति गायत्री महामंत्र के प्रत्येक वर्ण में समायी है। गायत्री महामंत्र की साधना करने वाला साधक इन चौबीस ऋषियों के महातप का भागीदार बनता है।

चौबीस ऋषियों की ही भाँति गायत्री महामंत्र में चौबीस छन्दों की भी ऊर्जा है। सामान्य क्रम में यही समझा जाता है- गायत्री महामंत्र का छन्द केवल गायत्री है। पर यथार्थता इससे अलग भी है। ऋषि वचन है-

गायत्र्युष्णिगनुष्टप् च बृहती पंक्तिरेव च॥ त्रिष्टभं जगती चैव तथाऽतिजगती मता। शर्क्वयतिशक्वरी च धृतिश्चातिधृतिस्तथा॥ विराट्प्रस्तार पंक्तिश्च कृतिः प्रकृतिराकृतिः। विकृतिः संस्कृतिश्चैवाक्षर पंक्तिस्तथैव च॥ भूर्भुवः स्वरितिच्छन्दस्तथा ज्योतिष्मती स्मृतम्। इत्येतानि च छन्दाँसि कीर्तितानि महामुने॥

गायत्री, उष्णिक, अनुष्टप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टप, जगती, अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, धृति, अतिधृति, विराट, प्रस्तार, पंक्ति, कृति, प्रकृति, आकृति, संस्कृति, अक्षरपंक्ति, भूः, भुवः, स्वः और ज्योतिष्मती; इन चौबीस छन्दों की ऊर्जा गायत्री के चौबीस अक्षरों में समायी है। गायत्री जप करने वाला इन सभी की ऊर्जा के अनुदान का लाभ उठाता है।

गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों में चौबीस देवताओं के वरदान भी संजोये है। महर्षियों की अनुभूत वाणी है-

आग्नेयः प्रथमं प्रोक्तं प्राजापत्यं द्वितीयकम्। तृतीयं च तथा सोम्यमीशानं च चतुर्थकम्॥ सवित्रं पञ्चमं प्रोक्तं षष्ठमादित्य दैवतम्। बार्हस्पत्यं सप्तमं तु मैत्रावरुणमष्टमम्॥ नवमं भगदैवत्यं दशमं चार्यमेश्वरम्। गणेशमेकादशकं त्वाष्ट्रं द्वादशकंस्मृतम्॥ पौष्णं त्रयोदशं प्रोक्तमैद्राग्नं च चतुर्दशम्॥ वायव्यं पञ्चदशकम् वामदेव्यं च षोडशम्। मैत्रावरुणदैवत्यं प्रोक्तं सप्तदशाक्षरम्॥ अष्टदशं वैश्वदेवमनविंशं तु मातृकम्। वैष्णवं विंशतितमं वसुदैवतमीरितम्॥ एकविंशतिसंख्याकं द्वाविंशं रुद्रदैवतम्। त्रयोविंशं च कौबेरमाश्विने तत्त्वसंख्यकम्॥ चतुर्विंशतिवर्णानाँ देवतानाँ च संग्रहः। कथितः परमश्रेष्ठो महापापैकशोधनः॥

प्रथम के अग्नि, दूसरे के प्रजापति, तीसरे के चन्द्रमा, चौथे के ईशान, पाँचवे के सविता, छठे के आदित्य, सातवें के बृहस्पति, आठवें के मित्रावरुण, नवें के भग, दसवें के अर्यमा, ग्यारहवें के गणेश, बारहवें के त्वष्ट्रा, तेरहवें के पूषा, चौदहवें के इन्द्र और अग्नि, पन्द्रहवें के वायु, सोलहवें के वामदेव, सत्रहवें के मैत्रावरुण, अठारहवें के विश्वेदेवा, उन्नीसवें की मातृकाएँ, बीसवें के विष्णु, इक्कीसवें के वसु, बाइसवें के रुद्र, तेइसवें के कुबेर, चौबीस के अश्वनीकुमार- ये चौबीस अक्षरों के देवता हैं। ये सभी परमश्रेष्ठ एवं महापाप के शोधक हैं। गायत्री महामंत्र की साधना करने वाले को इन सभी की साधना का फल एक साथ मिलता है।

गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों में देवियों की चौबीस शक्तियाँ भी समाहित हैं। ऋषि कहते हैं-

वामदेवी प्रिया सत्या विश्वा भद्रा विलासिनी॥ प्रभावती जया शान्ता कान्ता दुर्गा सरस्वती। विद्रुमा च विशालेशा व्यापिनी विमला तथा॥ तमोऽपहारिणी सूक्ष्मा विश्वयोनिर्जयावशा। पद्मालया पराशोभा भद्रा च त्रिपदा स्मृता॥ चतुर्विंशति वर्णानाँ शक्तयः समुद्राहृताः।

वामदेवी, प्रिया, सत्या, विश्वा, भद्रा, विलासिनी, प्रभावती, जया, शान्ता, कान्ता, दुर्गा, सरस्वती, विद्रुमा, विशालेशा, व्यापिनी, विमला, तमोपहारिणी, सूक्ष्मा, विश्वयोनि, जयावशा, पद्मालया, पराशोभा, भद्रा और त्रिपदा ये क्रम से चौबीस अक्षरों की शक्तियाँ हैं। गायत्री साधक इन सभी शक्तियों के वरदानों से स्वयमेव ही लाभान्वित हो जाता है।

गायत्री के चौबीस अक्षरों में सृष्टि के चौबीस रंग भी समावेशित हैं। ऋषि कथन है-

चम्पकातसी पुष्पसन्निभं विद्रुमं तथा। स्फटिकाकारकं चैव पद्मपुष्प समप्रभम्॥ तरुणादित्यसंकाशं शंखकुन्देन्दुसन्निभं। प्रवाल पद्म पत्राभं पद्म राग समप्रभं॥ इन्द्रनीलमणि प्रख्यं मौक्तिकं कुँकमप्रभम्। अञ्जनाभं च रक्तं च वैदूर्यं क्षौद्रसन्निभं॥ हारिद्रकुन्ददुग्धामं रविकान्ति समप्रभम्। शुकपुच्छनिभं तद्वच्छतपत्रनिभं तथा॥ केतकीपुष्प संकाशं मल्लिकाकुसुमप्रभम्। करवीरश्च इत्येते क्रमेणे परिकीर्तिताः॥ वर्णाः प्रोक्ताश्च वर्णानाँ महापापविशोधनाः।

चम्पक तथा अलसी के पुष्प के समान, मूँगे के रंग के समान, स्फटिक के समान, पद्मरागमणि के समान, तरुण सूर्य के समान, शंख, कुन्द, इन्द्र, प्रवाक, पद्म पत्र के समान, पद्मराग के समान, इन्द्र नीलमणि के समान, मोती कुँकुम, अञ्जन के समान, लाल वैडूर्य के समान, शहद के समान, हल्दी, कुन्द, दुग्ध, सूर्यकान्ति, शुकपुच्छ, शतपत्र के समान, केतकी पुष्प के समान, मल्लिका (चमेली) और कनेर के समान- क्रम से ये चौबीस अक्षरों के रंग हैं। ये सभी रंग महापाप को शुद्ध करने वाले हैं। गायत्री साधक अपने अस्तित्त्व में इनका अनुभव कर परमपवित्र हो जात है।

चौबीस रंगों की ही तरह सृष्टि के चौबीस तत्त्व भी गायत्री महामंत्र के अक्षरों में समावेशित हैं। ऋषि बताते हैं-

पृथिव्यापरस्तथा तेजो वायुराकाश एव च॥ गन्धोरसश्च रुपं च शब्दः स्पर्शस्तथैव च। उपस्थं पायुपादं च पाणिवागपि च क्रमात्॥ प्राणं जिह्व च चक्षुश्च त्वक् श्रोतं च ततः परम्। प्राणोऽपानस्तथा व्यानः समानश्च ततः परम्॥ तत्त्वान्येतानि वर्णानाँ क्रमशः कीर्तितानि तु।

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, गन्ध, रस, रूप, शब्द, स्पर्श, उपस्थ, गुदा, चरण, हाथ, वाणी, प्राण (नासिका), जिह्वा, चक्षु, त्वचा, श्रोत्र, प्राण, अपान, व्यान, समान, क्रम से ये सभी वर्णों के तत्त्व हैं।

सृष्टि के चौबीस तत्त्वों की ही तरह परम श्रेष्ठ चौबीस मुद्राओं का सुफल भी गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों में समाया हुआ है। ऋषियों के अनुभूत वचन है-

सुमुखं सम्पुटं चैव विततं विस्तृतं तथा। द्विमुखं त्रिमुखं चैव चतुः पञ्चमुखं तथा॥ षण्मुखाधोमुख चैव व्यापकाञ्जालकं तथा। शकटं यमपाशं च ग्रन्थितं सन्मुखोन्मुखं॥ विलम्बम्मुष्टिकं चैव मत्स्यं कूर्मं वाराहकम्। सिंहाक्रान्तं महाक्रान्तं मुद्गरं पल्लवं तथा॥ त्रिशूलयोनी सुरभिश्चाक्षमालाँ च लिंगकम्। अम्बुजं च महामुद्रास्तूर्यरुपा प्रकीर्तिताः॥ इत्येताः कीर्तिता मुद्रा वर्णानाँ ते महामुने। महापापक्षयकराः कीर्तिदाः कान्तिदाः मुनेः॥

सन्मुख, सम्पुट, वितत, विस्तृत, एकमुख, द्विमुख, त्रिमुख,चतुर्मुख, पञ्चमुख, अधोमुखा, व्यापक, अञ्जली, शकट, यमपाशक, ग्रंथित, सन्मुख, उन्मुख, विलम्ब, मुष्टिक, मत्स्य, कूर्म, वाराह, सिंहाक्रान्त, महाक्रान्त, मुदगर, पल्लव, त्रिशूल, योनि, सुरभि, अक्षमाला, लिंग, अम्बुज, ये चौबीस महामुद्राएँ गायत्री के अक्षरों में समायी हैं। ये सभी महापापनाशिनी, कीर्ति और कान्ति देने वाली हैं।

संक्षेप गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों में सृष्टि की सभी श्रेष्ठ शक्तियाँ समायी हैं। गायत्री की साधना करने वाले को अन्य किसी भी साधना की कोई आवश्यकता नहीं है। हाँ अन्य साधनाएँ जरूर गायत्री साधना के बिना अपूर्ण रहती हैं। इसलिए गायत्री साधना में हम सभी को अपने मन-प्राण-भावनाएँ परिपूर्ण रूप से अर्पित करना चाहिए। गायत्री अवतरण दिवस के पावन क्षण गायत्री साधना के संकल्प दिवस के रूप में मूर्त हो, तभी इस पुण्य तिथि की सार्थकता है। इसी में हमारी सही पहचान है।


साधु अपने रास्ते आगे बढ़ गए (kahani)

शाल्मली का एक वृक्ष था। बहुत बड़ा, ऊंचा भी और चौड़ा भी। पास में छोटे-छोटे झाड़-झंखाड़ भी उगे हुए थे। एक साधु अधर से निकले। दोनों के कुशल समाचार पूछे, वृक्ष से भी और झाड़-झंखाड़ों से भी। दोनों के बीच परस्पर संबंध कैसे हैं? इस बात को भी उसने लगे हाथों पूछ ही लिया। विशाल वृक्ष ने अपने बड़प्पन की विस्तारपूर्वक प्रशंसा की और सौभाग्य सराहा। साथ ही पड़ोसी झाड़ियों का उपहास उड़ाया। झाड़ियाँ क्या कहती? उन्होंने अपनी स्थिति पर संतोष किया और कहा, जिस स्थिति में भी वे हैं, प्रसन्न हैं। बड़े प्राणियों को न सही, छोटों को ही छाया और आश्रय प्रदान करती हैं।

बहुत दिन बाद साधु इसी रास्ते से फिर वापस लौटे। वृक्ष का पता न था और झाड़ियों का विस्तार हो चला था।

पूछा तो पता चला कि एक बार भयंकर तूफान आया था। उसकी चपेट में अनेकों वृक्ष आए और वह शाल्मली भी उसी चक्रवात में धराशायी हो गया। साधु ने दुःख मनाया, साथ ही झाड़ियों से पूछा, आप लोग उस कुचक्र से कैसे बच गई?

झाड़ियों ने कहा, ‘देव! हमें अपनी तुच्छता का ज्ञान था, सो तूफान आते ही सिर झुका लिया, तूफान ऊपर से उतर गया। वृक्ष अकड़ा रहा और अंधड़ से टकराकर धराशायी हो गया।’

अहंता और नम्रता के अंतर पर विचार करते हुए साधु अपने रास्ते आगे बढ़ गए।


अंतः की हूक बनती है प्रार्थना

इस दुनिया में न कोई बड़ा है, न छोटा। सब समान हैं। इतने पर भी ऐसा कहना अनुचित न होगा कि यहाँ पर जो कुछ हो रहा है, वह इतना और ऐसा है, जिसे यदि दिव्यता का अनुपालन और अनुदान न मिला हो तो सब कुछ शुष्क बना रहेगा। यहाँ चर्चा प्रार्थना और उसकी शक्ति की, की जा रही है। प्रार्थना में ऐसा चमत्कार होता है, जिसे देखकर मन यही कहता है कि ‘मन न रंगाए रंगाए जोगी कपरा, दाढ़ी बढ़ाए जोगी बन गए बकरा’ कबीर की यह पंक्ति एप 70 लाख बाबाजियों पर अक्षरशः लागू होती है, जिन्हें तथाकथित आध्यात्मिक कहा जाता है। प्रार्थना ऐसे लोगों को यह सीख देती है कि हमें अंदर को रंगना चाहिए, बाहर के आवरण को नहीं। जिसने इस उपदेश को जीवन में उतार लिया, समझा जाना चाहिए कि वे सहप्रार्थी हैं, प्रार्थना के वास्तविक हकदार हैं।

इस जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे चमत्कार कहें। चमत्कार प्रार्थना से होता अवश्य है वह चमत्कार नहीं है। चमत्कार का दिखावा मात्र है। जो इसे देखना चाहते हैं, वे प्रार्थना का सहारा ले सकते हैं। प्रार्थना में ऐसी अद्भुत शक्ति है, जिसे चमत्कार स्तर का तो कहा जा सकता है, पर चमत्कार नहीं।

प्रार्थना क्या है? आए दिन लोग इसकी तरह-तरह की व्याख्याएं करते रहते हैं, पर वे इतना नहीं जानते कि इसमें इतना कुछ भरा पड़ा है, जिससे कुबेर जितना धन भी प्राप्त किया जा सकता है और ईश्वर जैसी विभूतियाँ भी। यह विभूति आती कहाँ से है? यह विचारणीय प्रश्न है। हमें इस बारे में समझने का पूरा-पूरा अधिकार है कि जो प्रार्थना करते हैं, वे इसे कहाँ से हस्तगत करते हैं? क्यों और कैसे हस्तगत करते हैं? इस प्रश्न की गहराई में जाने पर हम पाते हैं कि ऐसी कितनी ही सिद्धियाँ इस संसार में हैं, जिन्हें साधारण नहीं, असाधारण कहना चाहिए। अधिकतर लोग इन्हें मन की निर्मित मानते हैं, जबकि कुछ इनको भगवान का वरदान। वरदान में इतनी शक्ति होती है कि जो कुछ चाहा गया है और जितना कुछ माँग गया है, वह मिल जाए। न मिलने पर आदमी तरह-तरह की शंकाएं पालता और मन को दुविधा से भर लेता है। इन्हें क्या कहा जाए? इनके लिए किस शब्द का इस्तेमाल किया जाए? यह तो मुश्किल कार्य है, पर इन्हें जो कुछ भी कहा जाएगा, वह उचित ही होगा। सब जानते और मानते हैं कि प्रार्थना के द्वारा ऐसी शक्ति अर्जित की जा सकती है, जिसके सहारे हर कार्य को पूरा किया जा सकता है।

लोग इसे भलीभाँति जानते हैं कि इस जगत में सर्वत्र न्याय नहीं है। जहाँ न्याय नहीं है, वहाँ अन्याय का सहारा लिया जाता है। अन्याय पर न्याय की जीत को ही प्रार्थना कहते हैं। प्रार्थना है क्या? इस पर विचार-मंथन करने पर हमें विदित होता है कि यह ब्रह्माँड की एक ऐसी शक्ति है, जिसे जहाँ भी लगा दिया जाता है, वहीं चमत्कार पैदा हो जाता है। लोग जानते हैं कि इस शब्द में उतनी शक्ति नहीं है, जितनी कि आशा की जाती है, पर जब भक्त के पवित्र अंतःकरण से यह शब्द निकलता है तो वह शब्दबेधी बाण बन जाता है और जिस लक्ष्य से टकराता है, उसे भेदकर निकल जाता है। इसी को कहते हैं, प्रार्थना द्वारा अभीष्ट की पूर्ति।

लोग क्या कहते हैं और क्या करते हैं, इसे सभी लोग भले ही न जान पाएं, पर वह सर्वव्यापी न्यायकारी सत्ता इसे अच्छी तरह जानती और देखती है कि उक्त व्यक्ति सहायता का हकदार है कि नहीं? जो अपात्र है, जिसकी सहायता से उसके अहंकार की पूर्ति होती है, वैसे हृदयों में वे ऐसी पुकार उत्पन्न नहीं होने देते, जिसे प्रार्थना कहते हैं। प्रार्थना की शक्ति शुद्ध अंतःकरण की शक्ति है। जिस हृदय में जितनी शुद्धता होगी, वहाँ की हर पुकार प्रार्थना बन जाएगी। यहाँ कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि हमें प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। हर कोई प्रार्थना कर सकता है, पर केवल शुष्क शब्द को दुहराते भर रहना प्रार्थना नहीं है। वह उच्च अंतःकरण की भाव-संवेदनाओं से सिक्त होनी चाहिए। तभी वह शक्तिशाली बनती और चमत्कार दिखाती है। रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि प्रार्थना शुष्क अंतराल की निर्मिति नहीं, दिव्य अंतःकरण का सृजन है। जहाँ दिव्यता होगी, वहाँ का हर शब्द प्रार्थनामय होगा, इसलिए हर एक को यह सोचना चाहिए कि उसका अंतस् उच्चस्तरीय कैसे बने। जहाँ जितना दिव्य भाव होगा, वहाँ यह सुयोग उतनी ही अच्छी तरह बनेगा। पवित्र अंतःकरण में यह सामर्थ्य है कि वह वहाँ से निस्सृत होने वाले शब्दों को मात्र थोथे शब्द भर न रहने दे और उसमें इतनी शक्ति पैदा कर दे कि वह लक्ष्य से बार-बार टकराकर उसे पूर्ण होने के लिए बाध्य करे। ससीम का असीम बनना इसे ही कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे भक्त का भगवान बनना भी कह सकते हैं। भक्त और भगवान का संगम इसी को तो कहते हैं। भक्त जब टेर लगाता है तो भगवान का सिंहासन डोलने लगता है और दौड़ा वह उसके पास पहुँचता है। तत्काल प्रतिक्रिया होना, यही तो प्रार्थना है।

प्रार्थना निःशब्द भी होती है। निःशब्दता की स्थिति बड़ी ही उच्च होती है। उसमें बार-बार शब्द दुहराने नहीं पड़ते। एक बार उसका भाव आया नहीं कि वह पूरा होने के लिए समुद्यत हो जाता है। ऐसा प्रार्थी लाखों में एक होता है। हृदय में से उसका भाव उठते ही भगवान उसे पूरा करने के लिए मचल उठता है। मचलना जिस भाव से हो, वही ‘प्रार्थना’ है। प्रार्थना के लिए किसी समय विशेष यथा साधन विशेष की जरूरत नहीं। निर्जन बियावान में भी वह पूरी हो जाती है। उसके लिए साधन-सहायता कहाँ से और कैसे आए, यह सोचना भक्त का काम नहीं। भगवान सदा उसके साथ-साथ रहते हैं और उसकी हर इच्छा जो कि प्रार्थनामय होती है, उसे पूरी करने के लिए तैयार रहते हैं। विद्यापति और उदना का उदाहरण यहाँ द्रष्टव्य है।

विद्यापति एक बार कहीं जा रहे थे। गर्मी के दिन थे। जाते-जाते ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ आस-पास मीलों तक कोई घर नहीं था। इलाका एकदम निर्जन। ऐसे समय उन्हें प्यास लगी। उदना तुरंत पानी की खोज में निकल पड़ा और जल्द ही लोटा भरकर ले आया। वह साक्षात भगवान शिव की जटा-जूट से अवतरित गंगाजल था। भेद खुल गया तो उदना ने भक्त से वचन ले लिया कि जिस दिन यह रहस्य दूसरों पर प्रकट हो जाएगा, उस दिन से फिर आगे वह रह नहीं पाएगा, पर भगवान की लीला अपरंपार होती है। एक दिन वह भेद खुला और उदना के रूप में साक्षात शिव अदृश्य हो गए।

इसे कहते हैं भक्त और भगवान की जोड़ी, प्रार्थी और प्रार्थना का युग्म। प्रार्थना जब प्रार्थी के विह्वल अंतःकरण से निकलती है तो वह पूरी हुए बिना नहीं रहती। ऐसे अनेक अवसरों पर देखा जाता है कि आदमी बार-बार इच्छा करता है और वह पूरी हो जाती है। यह प्रार्थना नहीं, संकल्प है। संकल्पबल में भी इतनी शक्ति होती है कि वह अभीष्ट की पूर्ति कर दे। संकल्प और प्रार्थना दोनों दो भिन्न चीजें हैं। संकल्प भी अंतः का उपार्जन है और प्रार्थना भी, पर दोनों में एक मौलिक अंतर है, वह यह कि संकल्प आत्मा का बल है, जबकि प्रार्थना उसकी पुकार। पुकार और बल दो तत्त्व है। एक में दिव्यता है, दीनता है, शालीनता है। दूसरे में सशक्तता है, सबलता है, निर्भीकता है। एक जब कातर पुकार के रूप में निकलती है तो वह पुकार साधारण न रहकर असाधारण शक्तिसंपन्न बन जाती है। दूसरी ओर बल स्वयं में एक शक्ति है। वह जब लक्ष्य को बार-बार सशक्त टक्कर मारता है तो वह मूर्तिमान हो उठता है। दोनों ही विशेषताएं शुद्ध आत्मा की है। पूर्ण शुद्ध आत्मा ही पूर्ण सिद्ध होती है और संकल्प के रूप में, प्रार्थना के रूप में ऐसे चमत्कार दिखाती है, जो साधारण स्थिति और अवस्था में आत्मा नहीं दिखा पाती। अतएव हर मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी मौलिकता को, अपनी दिव्यता को, जो आत्मा का स्वाभाविक गुण है, उसे प्रकट करे। ऐसी स्थिति में उसकी साधारण सोच भी संकल्प और प्रार्थना बनकर उभरेगी और व्यक्ति को असाधारण बना देगी।

प्रार्थना अंतःकरण की पुकार है। बाहरी वेश विन्यास से उसका कोई मतलब नहीं। यह प्रत्येक आत्मा का गुण है, पर बाहरी आडंबर के कारण वह उसको ढक देता है। यह आच्छादन न हो और आत्मा अपनी पूर्ण सरलता और अकृत्रिमता में प्रकट हो तो दिव्यता का यही भाव प्रार्थना बन जाता है। हम स्वाभाविक बनें, निष्कपट बनें तो हम उस हूक को उत्पन्न करने में सफल होते हैं, जिसे प्रार्थना कहते हैं।


रुकूँगा तो इधर-उधर भटकूँगा (kahani)

घोर अंधेरी रात, जब हाथ-को-हाथ नहीं सूझता था। झरना अपने अविरल प्रवाह से कल-कल करता हुआ एकाँत निर्जन विजन में बहता चला जा रहा था। एक पहाड़ी उपत्यिका ने पूछा, ‘निर्झर! तुम्हें थकावट नहीं आती क्या? तनिक रुको, कुछ विश्राम भी तो कर लिया करो।’

झरने से उत्तर दया, ‘बहन! मुझे जिस महासागर से मिलना है, उसकी दूरी अनंत है। रुकूँगा तो इधर-उधर भटकूँगा। चलते रहने से तो वह दूरी कम ही होगी।’


इक्कीसवीं सदी की चिकित्सा पद्धति : आयुर्वेद

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति अत्यंत उन्नत, वैज्ञानिक एवं समृद्ध है। चरक ने आयुर्वेद को शाश्वत एवं सनातन माना है। उनकी मान्यता है कि जब वे जीवन (आयु) का प्रादुर्भाव हुआ, तभी से आयुर्वेद की सत्ता प्रारंभ होती है। सुश्रुत ने तो इसका रचनाकाल सृष्टि से पूर्व बताया है। आयुर्वेद के सृजनकर्त्ता स्वयं सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा ने उल्लेख किया है कि आयुर्वेद सृष्टि से आदिकाल से विद्यमान है। इसे उपवेद भी कहा जाता है। कुछ विद्वान इसे ऋग्वेद का तथा अधिकाँश मनीषी इसे अथर्ववेद का उपवेद मानते हैं। इस वैभिन्यता में भी इसकी चिर पुरातन परंपरा एवं वैज्ञानिकता परिलक्षित होती है, जो आज विश्वव्यापी लोकप्रियता अर्जित कर रही है।

चरक ने इसे अपने अनुभूतिजन्य ज्ञान से प्राप्त किया था। उनके अनुसार, ‘हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम-। मानञ्च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते।’ ‘जिस शास्त्र में हित-अहित, सुख-दुःख, आयु एवं आयु के लिए उपयोगी-अनुपयोगी द्रव्य, गुण-कर्म आदि के प्रमाण एवं लक्षण का विवेचन-विश्लेषण होता है, उसका नाम आयुर्वेद है।’ अतः आयुर्वेद वैयक्तिक जीवन के सभी प्रकार दुःख, कष्ट, क्लेशों की पूर्ण निवृत्ति का शास्त्र है। यह मानव शरीर को कष्ट से मुक्त करता है, क्योंकि इस मर्त्यभूमि में शरीर ही एकमात्र ऐसा दिव्य साधन है, जिससे भौतिक एवं आत्मिक प्रगति प्राप्त की जा सकती है। इस चिकित्सा का मुख्य एवं प्रमुख सिद्धाँत है कि शरीर में जो अनुपयोगी है, उसे दूर करना है तथा जिसका अभाव है, उसकी पूर्ति करना एवं साम्य स्थापित करना।

आयुर्वेद शरीर का कायाकल्प कर देता है। यह न केवल रोगों को दूर करता है, बल्कि शरीर को नैसर्गिक एवं प्राकृतिक स्वास्थ्य प्रदान करता है। इस चिकित्सा पद्धति से शारीरिक स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ मानसिक प्रसन्नता की उपलब्धि होती है। इस उपचार प्रक्रिया में दुष्प्रभाव एवं हानि का भयावह भय नहीं होता। इसी विशेषता एवं महत्ता के कारण आयुर्वेद को अन्य चिकित्सा पद्धतियों से सर्वोपरि एवं सर्वोत्तम ठहराया गया है, क्योंकि यह निरापद है। इसमें कोई आपद नहीं है। अपनी इस शाश्वत एवं अद्भुत उपादेयता की वजह से आयुर्वेद न केवल अपने देश में ही प्रचलित है, बल्कि पाश्चात्य देशों में भी इसकी उपयोगिता एवं लोकप्रियता बढ़ती जा रही है।

आज भारतीय वैदिक स्वास्थ्य प्रणाली आयुर्वेद की स्वीकारोक्ति विश्व स्तर पर बढ़ रही है। इसकी पुष्टि विगत वर्ष अमेरिका और इंग्लैण्ड में दो शासकीय घोषणाओं से होती है। पहली है, पिछले वर्ष इंग्लैण्ड द्वारा ‘काम्पलीमेंट्री एण्ड अल्टरनेटिव मेडिसिन’ (ष्ट्नरु) की श्रेणी में प्रयुक्त चिकित्सा पद्धति को वैज्ञानिकता प्रदान करने के लिए ‘हाउस ऑफ लाडर्स’ समिति का गठन। इस समिति का गठन अपने आप में अद्भुत है, क्योंकि इससे आयुर्वेद के पुरातन स्वरूप को नए वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में प्रयोग किया जाएगा और इसमें कोई संदेह नहीं कि आयुर्वेद में निहित गंभीर वैज्ञानिकता पुनः प्रकट होगी तथा प्राचीनता को नवीनता के आधार पर कसा-परखा जाएगा। इससे पुरातन चिकित्सा नए स्वरूप में प्रकट होगी। दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रयास है- अमेरिका के एक प्रभावशाली आयोग द्वारा भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा को पश्चिमी चिकित्सा पद्धति की तुलना में अधिक कारगर एवं प्रभाव बताना और नए वैज्ञानिक ढंग से इसका प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग करने पर बल देना।

इन प्रयास-पुरुषार्थों से आयुर्वेद का स्वरूप विश्वव्यापी हो सकता है। इसको अपनाने-स्वीकारने के पीछे एक तथ्य और भी है कि आज विश्व मानव समुदाय ऐलोपैथी दवाओं के दुष्प्रभाव से त्रस्त हैं, हैरान-परेशान है। एलोपैथी दवाओं का अभ्यस्त पश्चिमी जगत आज इसी कारण घोर निराशा एवं हताशा से भर गया है, क्योंकि जिस रोग के लिए इन दवाओं का प्रयोग किया जाता है, वह रोग ठीक होना तो दूर, दूसरे अन्य पहचान में न आने वाले रोगों का प्रादुर्भाव हो जाता है। परिणामतः पश्चिमी जनमानस में इन दवाओं के प्रति गहरी अरुचि एवं संदेह का भाव घर करने लगा है। ऐसे में पूर्णतया निरापद चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को अपनाने, प्रयोग-उपयोग करने की प्रक्रिया चल पड़ी है और इसी का प्रभाव-परिणति है कि ब्रिटेन में आयुर्वेद एवं अन्य वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से उपचार करने वाले चिकित्सकों की संख्या 50 हजार है। वर्ष 1999 में इन चिकित्सकों ने 50 लाख से अधिक बीमार लोगों का उपचार किया था। यह रिपोर्ट स्वयं ब्रिटिश संसद की विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी की 67वीं सेलेक्ट कमेटी द्वारा प्रस्तुत की गई है। बी.बी.सी. द्वारा कराए गए एक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन में लोग वैकल्पिक दवा हेतु प्रतिवर्ष 1.6 अरब पौंड खर्च करते हैं। इनमें से 5 करोड़ पौंड आयुर्वेदिक दवा के लिए नियोजित होता है। वहाँ पर विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों के प्रयोगों का प्रचलन बढ़ने लगा है।

ब्रिटेन के समान अमेरिका में भी आयुर्वेद उपचार पद्धतियों के प्रति रुझान व रुचि में अभिवृद्धि हुई है। अमेरिका के स्वास्थ्य मंत्री के नेतृत्व में गठित व्हाइट हाउस के एक आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी चिकित्सा प्रणाली की अपेक्षा पूर्वी स्वास्थ्य प्रणाली ज्यादा उपयोगी व उपादेय सिद्ध हो रही है। आयोग का मानना है कि अधिकाँश अमेरिकी अब ऐलोपैथी की बजाय आयुर्वेद, योग आदि की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। यह आकर्षक अमेरिका में आयुर्वेद की लोकप्रियता को प्रदर्शित करता है और इसी का प्रभाव है कि अमेरिका में सन 1990 से 1997 के बीच कराए गए एक स्वास्थ्य सर्वेक्षण में इस चिकित्सा पद्धति से उपचार कराने वालों की संख्या 33.8 प्रतिशत से बढ़कर 42.1 प्रतिशत हो गई है। विशुद्ध रूप से आयुर्वेदिक उपचार में 2.5 से 12.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसी कारण अमेरिका ने वर्ष 1997 में इस चिकित्सा पद्धति पर 27 अरब डॉलर खर्च किया। अमेरिकी जनमानस में आयुर्वेद के प्रति बढ़ती रुचि, रुझान एवं विश्वास को देखकर ही वहाँ के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने मेडिकल पाठ्यक्रम में आयुर्वेद को शामिल करने का मानस बना लिया है।

आयुर्वेद की इस निरापद एवं उत्कृष्ट चिकित्सा प्रणाली से रूस भी अछूता नहीं है। वहाँ पर भी यह प्रणाली खूब लोकप्रिय हो रही है। इसी वजह से पिछले वर्ष रूसी सरकार ने भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा पंचकर्म को शासकीय मान्यता प्रदान कर दी है। यही नहीं, रूसी प्रशासन एवं सरकार ने भारत सरकार ने आयुर्वेद और पंचकर्म से संबंधित पाठ्य पुस्तकों, साहित्यों आदि को रूसी भाषा में अनूदित प्रकाशित करने का भी अनुरोध आग्रह किया है। इसके अलावा पोलैंड भी भारत सरकार के सहयोग से आयुर्वेद के अनेक पहलुओं पर अनुसंधान-अन्वेषण कर रहा है। वहाँ भी यह उपचार प्रक्रिया विकसित होने लगी है। इस प्रकार कनाडा, जर्मनी, फ्राँस, हाँगकाँग, आस्ट्रेलिया तथा कई अरब देशों में भी आयुर्वेदिक उपचार प्रक्रिया को प्रश्न मिला है।

भारत में उपजी-बढ़ी आयुर्वेदिक उपचार प्रक्रिया की विश्वव्यापी स्वीकृति एवं उपयोग इसके पीछे निहित वैज्ञानिकता एवं समग्रता को मान्यता प्रदान करते हैं। यह पुरातन चिकित्सा पद्धति अपने आप में संपूर्ण एवं समग्र है। इसमें निरोगी काया एवं मानसिक स्वास्थ्य का समग्र विधान भरा पड़ा है। इसी कारण भारत द्वारा अनुभव अहसास की गई इस प्राचीन व पुरातन पद्धति की ओर पश्चिमी जनता भी उन्मुख आकर्षित हो रही है। अतः आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को इक्कीसवीं सदी की चिकित्सा पद्धति की उपाधि से अलंकृत किया जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। ऋषियों द्वारा खोजी गई इस चिकित्सा पद्धति में ही आधुनिक मानव के परिपूर्ण स्वास्थ्य, नीरोगता एवं प्रसन्नता का मर्म छिपा पड़ा है।


दुर्जन मनुष्यों की मनुहार (kahani)

विधाता ने एक बार मनुष्यों की सहायता करने के लिए देवदूत भेजा और कहा, जिसकी जो कामना हो, उसे पूरी कर दिया करें। देवदूत अपने काम में तत्परतापूर्वक लगे रहे। अनुदान असंख्यों ने पाए, पर रोना-कल्पना किसी का बंद न हुआ। संकटों से किसी को मुक्ति न मिली। इस असफलता से मनुष्य, देवदूत और विधाता तीनों ही खिन्न थे। नारद को कारण का पता लगाने भेजा गया। पता चला कि मनुष्य दुर्गुणी हैं। जो पाते हैं, उन्हें अनाचार में लगा देते हैं, फलतः दरिद्रता मिटती नहीं, संकट कटता नहीं।

विधाता ने देवदूत को वापस बुला लिया और निर्देश में नया परिवर्तन किया कि वे मात्र सद्गुणी सदाचारियों की ही सेवा किया करें। अनाचारियों को वरदान न दिया करें। तब से अब तक वही क्रम चल रहा है। देवताओं की सहायता मात्र सज्जनों को ही मिलती है। दुर्जन मनुष्यों की मनुहार अनसुनी होती और निरर्थक चली जाती है।


संक्राँतिकाल में उभरकर आ रहा है आध्यात्मिक समाजवाद

आज विश्व संक्रमण काल से गुजर रहा है। भयंकर उथल-पुथल भरे इस वर्तमान काल के पीछे मानवीय विकास का एक लम्बा इतिहास समाहित है। प्रारम्भिक स्तर में मनुष्य शारीरिक दृष्टि से बलशाली था, परन्तु वह कल्पना एवं विचारणा के क्षेत्र में मंद था। पी लीबर मैन ‘मैन आन ह्यूमन इवाल्यूशन’ में कहते हैं कि इस काल में शारीरिक वीरता ही सर्वश्रेष्ठ गुण था। आवश्यकता भी इसी की थी। मनुष्य को शरीर बल के सहारे ही सिंह व्याघ्र जैसे हिंस्र प्राणियों से लड़ना पड़ता था। इसके पश्चात् मानसिक संकल्पना व भावना का उदय हुआ, जिससे परिवार व्यवस्था पनपी, समाज सुसंगठित हुआ। कालक्रम में बौद्धिक विकास रूपी, एक नये आयाम का विकास हुआ। सभ्यता का नया स्वरूप दिखाई देने लगा। पुरानी मान्यताओं के स्थान पर नए आधार गढ़े गये। भावना के बदले बुद्धि का वर्चस्व हुआ। सब कुछ बदलाव की चरम सीमा तक पहुँच गया। यही है वह संक्रमण काल जिसमें हम जी रहे हैं।

बौद्धिक समाज की यह अवस्था अत्यन्त खतरनाक सिद्ध हो रही है। इस समाज में बुद्धि की कृति एवं विकृति दोनों अवस्थाएँ हैं। एक ओर जहाँ बुद्धि ने चमत्कार किया वहीं उसकी विकृतियों ने समूचे मानवीय समाज को संकट की स्थिति में डाल दिया है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी ठीक ऐसा ही कहा है- आज की सभ्यता पर संकट का बादल गहरा रहा है। सभी तरफ टूटन, विघटन का साम्राज्य दिखाई पड़ रहा है। धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक क्षेत्र में किसी बड़े तूफान का खतरा मण्डरा रहा है। समस्या के समाधान के लिए किसी व्यवस्था के आने के पूर्व ही उसमें दरकन की संभावना निहित होती है।

बीसवीं शताब्दी के समाज का अवलोकन करने पर पता चलता है कि यह रूसो के प्रजातन्त्र, मार्क्स के साम्यवाद और नीत्से के नास्तिकवाद के इर्द-गिर्द घूमता रहा। प्रजातन्त्रवादी आँधी ने राजतंत्र को उखाड़ फेंका। भगवान् बुद्ध के समय लोकतंत्र एवं राजतंत्र का सम्यक् विकास हुआ था। कालान्तर में राजतंत्र का समापन होता चला गया। मुगल, पेशवा आदि इतिहास के पृष्ठो में गुम हो गए। प्रजातंत्र के प्रबल वेग के परिणामस्वरूप दुनिया के अधिकाँश देशों में प्रजातंत्र शासन स्थापित हुए। अपना देश भी पिछले 50 सालों से प्रजातंत्रात्मक शासन पद्धति से चल रहा है। अमेरिका का लोकतंत्र एक मिसाल है। लोकतंत्र का निर्माण मानव समाज को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए विकसित किया गया था। यह आपसी विचार विमर्श, परस्पर सहयोग, सहिष्णुता, उदारता के गुणों से विकसित तथा पल्लवित होता है। आँतरिक लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए संसद, कार्यपालिका, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस, स्वायत्त चुनाव व्यवस्था के बीच सम्बन्ध होना अनिवार्य है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पर ही लोकतंत्र का भविष्य सुरक्षित रहता है। महान् विचारक पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ने लोकतंत्र की सफलता के लिए तीन मनोभावों पर बल दिया है- सहिष्णुता और संयम, अनासक्त भाव तथा कानून के प्रति आदर।

प्रजातंत्र प्रजा के हाथों से निकलकर अवाँछनीय तत्त्वों के पास पहुँच जाने से यह संकटों से घिर गया है। प्रजा के स्थान पर निहित स्वार्थी लोगों ने इसे अपने अधिकार क्षेत्रों में ले लिया है। प्रजा तो मात्र मूकदर्शक बनकर खड़ी रही। इसलिए इसने भी प्रजातंत्र पर अस्वीकृति की मुहर लगा दी। जब प्रजातंत्र पर प्रजा की आस्था एवं विश्वास उठ जाता है तो वह अधिनायकवाद में बदल जाता है। पाकिस्तान जैसे देश इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। अमेरिका, फ्राँस का राष्ट्रपति शासन भी कोई कारगर उपाय नहीं दे पा रहा है। लैटिन अमेरिका, जापान एवं अफ्रीका के कुछ देश भी इसी समस्या से त्रस्त हैं। अपने देश का लोकतंत्र भी मर्यादा और लोकतंत्र की सारी सीमाओं को लाँघ चुका है। इतिहास प्रसिद्ध घोटाले एवं महाभ्रष्टाचार, चुनाव में धाँधली इसी का परिणाम हैं। चुनाव तो होते हैं, परन्तु किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाता। गठजोड़ की राजनीति पनप रही है। आज की राजनीति राजनीति न रहकर कूटनीति बन गई है। दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध हो गया है। राजनीति के लिए भ्रष्टाचार एक मजबूरी बन गई है। ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का पतन होता चला जा रहा है।

प्रजातंत्र ने जैसे प्रजा के लिए प्रारम्भिक आकर्षण पैदा किया, ठीक उसी तरह साम्यवाद का भी आरम्भिक उत्साह कम नहीं था। आर्थिक समानता का नारा निर्धन और अभावग्रस्त वर्ग को बहुत आकर्षक लगा। इस लुभावने नारे एवं सुखद स्वप्नों ने समाज में हलचल मचा दी। अनेक देश साम्यवादी बन गए, जो नहीं बन सके वहाँ भी साम्यवाद से प्रभावित लोगों की संख्या कम नहीं रही। एच. सी. चारलेटन ने प्रकट किया है कि यह एक प्रकार का समाज है जो पृथ्वी पर स्वर्गराज्य की स्थापना करेगा। सी जी टामौन ने यहाँ तक बताया कि साम्यवाद इसी की शिक्षाओं का क्रियात्मक प्रकटीकरण है। भारत में इसका प्रवेश 1976 में हुआ। इसके बाद यह सन् 1992 तक विभिन्न रूपों में प्रचलित रहा। इसका सर्वमान्य और प्रचलित अर्थ है उत्पादन और वितरण के साधनों पर लोगों के नाम पर जनता की सरकार का नियंत्रण। समाजवाद के अनुसार पूँजी पर अधिकार व्यक्ति का नहीं वरन् सरकार का होना चाहिए। यह व्यक्तिगत पूँजीवाद का विरोधी है एवं सरकारी पूँजीवाद की स्थापना करना है। सन् 1992 के बाद भारत में आर्थिक उदारीकरण के प्रवेश करने के साथ समाजवाद का संकट गहराने लगा।

साम्यवाद को समता के आदर्श के साथ जोड़ा गया। वस्तुतः साम्यवाद में समता की सोच आधी अधूरी है। आकर्षण का यह जाल सोवियत रूस, चीन एवं वियतनाम एवं यूरोप के कई देशों को अपनी चपेट में ले लिया। समय के प्रवाह में साम्यवाद के दोष उभरकर सामने आये। साम्यवाद ने सर्वप्रथम व्यक्तिगत चेतना को समाप्त कर दिया। व्यक्ति को शासन का मूक बधिर एवं गुलाम होकर जीने के लिए विवश होना पड़ा। कुछ नए सुधार, सुझाव, संशोधन प्रस्तुत करने के बदले बौद्धिक अपंगता का शिकार होना पड़ा। व्यक्ति की मौलिकता एवं स्वतंत्रता के खो जाने से सामान्य जन विद्रोह पर उतारू हो गया। हर साम्यवादी देश इस कट्टरपन के विरुद्ध आवाज उठाने लगा। साम्यवाद का सबसे प्रबल समर्थ देश प्राचीन रूस में साम्यवाद लाने के लिए स्टालिन के सी.आई.डी. ने 50 लाख और एक करोड़ के मध्य राजनैतिक तथा कृषकों का निर्मम हत्या की थी। बाद में सोवियत रूस के प्रशासन ने सबको पदोन्नति का लालच देकर ‘केजीपी’ द्वारा जासूसी का कार्य करवाया गया। पति पत्नी के बीच स्नेह सौहार्द्र की भावना नहीं रही। पता नहीं कौन किसकी जासूसी करने लगे, कौन ‘केजीपी’ का सदस्य हो? ईस्टरमेन के अनुसार निर्दोष व्यक्तियों के खून बहाने का आँकलन करने में स्टालिन एक झील, हिटलर छोटा तालाब और मुसोलिनी एक कुँए के सदृश्य ठहरेंगे।

स्वतंत्रता की चाह में जन विद्रोह ने सर्वप्रथम सोवियत रूस को विखण्डित कर डाला। यह लहर पोलैण्ड, यूगोस्लाविया तथा चीन तक पहुँची। बर्लिन की दीवार ढहने के साथ ही उसकी सारी आशाएँ चकनाचूर हो गई। भले चीन आज सबसे बड़ा साम्यवादी देश है परन्तु इसकी सामाजिक दशा अत्यन्त विस्फोटक है। चीन के तिआनमैन चौक में हुए निहत्थे नवयुवकों का नरसंहार इसकी उबलती चिंगारी है। जिन देशों में अभी भी साम्यवादी शासन या प्रभाव मौजूद है वे भी परिवर्तन की तीव्र माँग करने लगे हैं।

प्रजातंत्र एवं साम्यवाद के पश्चात् पूँजीवाद का आगमन एवं अनुगमन प्रारम्भ हुआ। पूँजीवाद को आर्थिक एकाधिकारवाद भी कहा जा सकता है। पूँजीवाद छल बल कौशल के साथ शोषण का पर्याय है। जब पूँजीवाद अपने देश से बाहर पाँव पसारता है तब वह साम्राज्यवाद का रूप धारण कर लेता है। प्राचीन समय में यह सैनिक आक्रमण के द्वारा प्रारम्भ होता है, जबकि आज की स्थिति में व्यापार से आरम्भ होता है। अपने व्यापार को व्यापक करने के लिए हर प्रकार के हथकण्डे अपनाए जाते हैं। इसका मुख्य आधार होता है कच्चा माल। अंग्रेज भारत से कच्चा माल लेकर ही अपने व्यापार को सारे विश्व तक फैलाने में सक्षम हो सका था।

विश्व में व्यापार के लिए गैट का गठन किया गया। अब इसका स्थान विश्व व्यापार संगठन ने ले लिया है। यह नया संगठन विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के बाद भूमण्डलीय अर्थव्यवस्था का तीसरा स्तम्भ माना जा रहा है। इसमें विश्व के लगभग 125 देशों ने अपनी सहमति प्रदर्शित की है। जिस प्रकार पूँजीवाद व्यक्ति स्वतंत्रता से आरम्भ होकर पूँजीपतियों के एकाधिकार में परिवर्तित होता है उसी प्रकार साम्राज्यवाद भी अंतर्राष्ट्रीय स्वतंत्र व्यापार से आरम्भ होकर शक्तिशाली पूँजीपति राष्ट्र के आधिपत्य में बदल जाता है। वर्तमान समय में एकाधिकार का साम्राज्यवाद अमेरिकी हाथों में कैद हो गया है। विश्व व्यापार संगठन भी अमेरिका की सोची समझी एक रणनीति है। इस नीति के तहत कोई भी देश छोटा हो या बड़ा, विपन्न हो या सम्पन्न अंतर्राष्ट्रीय दबावों और इन दबावों से संचालित आर्थिक, राजनीतिक प्रक्रियाओं से संबंधित होने के लिए विवश है। विकसित देश विकासशील देशों में पूँजी निवेश कर उसके सारे कच्चे माल पर अधिकार करने पर तुले हुए हैं। पेटेंट कानून इसीलिए विनिर्मित किया गया है। अब तो बौद्धिक सम्पदा, और सेवा जैसे पवित्र क्षेत्र का भी व्यापारीकरण कर दिया गया है। इस तरह व्यापारिक संगठन ने उपनिवेशवाद को जन्म दिया है।

पूँजीवाद की स्थिति शुरू से ही अच्छी नहीं रही। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ही 1921 में पूँजीवादी जगत् में औद्योगिक आर्थिक संकट फूट पड़ा। 1929 में पूँजीवाद के इतिहास का सबसे बदतर और अत्यंत विध्वंसकारी विश्व आर्थिक संकट आरम्भ हुआ। पूँजीवाद 1937 में एक नये आर्थिक संकट के भंवर में फँस गया। आर्थिक विकास की असमानता के फलस्वरूप, विश्व अर्थ व्यवस्था की पूँजीवादी पद्धति का संकट अधिक गम्भीर हो गया। जर्मनी, इटली और जापान ने अपनी अर्थ व्यवस्थाओं के सैन्यीकरण का मार्ग अपनाया। इसके परिणाम स्वरूप विश्व को द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में भयावह त्रासदी झेलनी पड़ी। इसके बाद अमेरिका साम्राज्यवाद ने उपनिवेशवाद के नये रूपों के नवउपनिवेशवाद का सहारा लिया तथा अनेक विकासशील देशों को अपने जाल में फँसा लिया। गैट और विश्व व्यापार संगठन इसी का परिणाम हैं। पूँजीवाद अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के आधिपत्य में है। एकाधिकार और शोषण की यह भावना समाज समुदाय के लिए अत्यन्त घातक होती है।

प्रजातंत्र, साम्यवाद और पूँजीवाद की असफलता को देखकर मनीषी पीटर एफ डूकर ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘इज कैपिटैलिज्म कमिंग टू एन एण्ड’ में उल्लेख किया है कि विश्व इस समय अपने इतिहास के अद्भुत मोड़ पर है। साम्यवाद मर चुका है, समाजवाद रास्ते से हट गया है और यही हाल पूँजीवाद का भी है। इन सबके अतिरिक्त एक अन्य प्रचण्ड विचारधारा नीत्से का नास्तिकवाद रहा है। नीत्से ने अपनी विचारधारा में एक आकर्षण घोषणा की- ‘ईश्वर मर गया है। हमने और तुमने मिलकर उसे मार दिया।’ यह घोषणा विपर्ययवादी मनोवृत्ति को बहुत भायी। इस दौरान नीत्से की संगीत की आत्मा से त्रासदी का जन्म, प्रफुल्ल, विवेक, पुण्य पाप से दूर, नीति वाक्यों की वंश परम्परा आदि पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हुई। ईश्वर और आत्मा को अस्वीकार कर देने से उच्छृंखलता और अनैतिकता का बोलबाला बढ़ जाता है। आदर्शवादी ईश्वर के दण्ड से डरता है और अनैतिकता से दूर रहता है। परन्तु नास्तिकवाद इसकी अवहेलना ही करता है।

इससे समाज में धर्म का रहा सहा अस्तित्त्व भी मिटने लगा। धर्म एक ऐसी वस्तु है जो व्यक्ति तथा समाज को बाँधती है। धर्म समाज और जीवन की व्यवस्था और दिशा है। इसे यदि निकाल दिया जाय तो जीवन अव्यवस्थित और दिशाहीन हो जाता है। समाज को बचाने वाली नैतिकता का पाठ धर्म से ही व्यक्ति सीखता है। वह कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे चाहो तो स्वीकार किया, चाहो तो फेंक दिया। धर्म से विलगाव का अर्थ है समाज की पूरी व्यवस्था को अस्त व्यस्त कर देना। परन्तु आज के समाज में धर्म को प्रतिगामी एवं अंधविश्वासी कहना फैशन है। तथाकथित बुद्धिवादी प्रगतिशीलता के जोश में धर्म को अफीम की गोली कहते हैं और उसे प्रगति का अवरोधक ठहराते हैं। वस्तुतः यह धर्म नहीं है जिस पर ऐसा कहा गया। वह धर्म का छल है, बाहरी स्वरूप है। इसी धर्म की ओट में समाज के अत्याचारी और अनाचारी तत्त्वों ने मानवता को अनगिनत बार चोट पहुँचायी है। धर्म के नाम पर जितना शोषण, हिंसा एवं नरसंहार हुआ शायद ही किसी अन्य वजह से हुआ हो।

उपरोक्त विचार धाराओं की विफलता के संदर्भ में परम पूज्य गुरुदेव आध्यात्मिक समाज को ही इनका एकमात्र विकल्प मानते हैं। उनके अनुसार आध्यात्मिक समाज की परिकल्पना आध्यात्मिक रीति-नीति को अपनाकर ही संभव है। इसमें बाह्य अनुशासनों, नीतियों, कानूनों के स्थान पर मनुष्य के सद्गुणों, सत्प्रवृत्तियों सद्भाव को उभारने विकसित करने वाले उपचारों की प्रधानता होगी। पूज्यवर के अनुसार यह व्यवस्था मात्र एक परिकल्पना भी नहीं है, बल्कि आज की आवश्यकता और कल की सुनिश्चित संभावना है।

परम पूज्य गुरुदेव के अनुसार आध्यात्मिक समाजवाद में एकता और समता की भावना प्रबल होगी। इसी की सुखद परिणति ही अगले दिनों विश्व धर्म, विश्व संस्कृति, विश्व भाषा और विश्व राष्ट्र के रूप में दिखाई पड़ेगी। आध्यात्मिक समाज की भावी व्यवस्था ऋषि तंत्र द्वारा संचालित होगी। व्यवस्था क्रम में इसके तीन स्तर होंगे, विचारक, प्रशासक और लोक शिक्षक। इन्हें ही ब्रह्मर्षि, राजर्षि और देवर्षि के रूप में अलंकृत किया जा सकता है। इस समाज में नारी की भूमिका महान् एवं मुख्य होगी। समय-समय पर विभिन्न अतीन्द्रिय द्रष्ट जैसे स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द तथा जीन डीक्सन प्रभृत भविष्यवक्ता ने इस ओर संकेत किया है। महर्षि अरविन्द ने तो आगामी शताब्दी को ‘मदर सेंचुरी’ के नाम से पुकारा है।

आध्यात्मिक समाज की भावी व्यवस्था के पाँच मुख्य आयाम होंगे। इन्हें समाज व्यवस्था, प्रशासन व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, शिक्षा एवं अर्थ व्यवस्था के रूप में अनुभव किया जा सकता है। समाज में गहरी जड़ जमाई मूढ़ मान्यताओं को बदले बिना मानव जीवन का स्वरूप निर्धारण करना संभव नहीं है। इसी के अभाव के कारण सारी क्रान्तियाँ असफल सिद्ध होती जा रही है। इस समाज में प्रज्ञावान व्यक्तियों का वर्चस्व होगा। यही उच्चस्तरीय व्यक्ति ही इस समाज का नेतृत्व कर सकेंगे। आध्यात्मिक समाज में इनका प्रमुख योगदान रहेगा। लोकतन्त्र का विकेन्द्रीकरण होगा। पंचायती राज ही अपना क्रमिक विकास कर विश्व शासन व्यवस्था संभालेगा। परम पूज्य गुरुदेव के अनुसार शासन की गतिविधियाँ सुविधा और सुव्यवस्था के वितरण तक सीमित होनी चाहिए। न्याय की समूची प्रक्रिया का हल परम पूज्य गुरुदेव के शब्दों में ‘मानव मात्र एक समान’ से मिल सकेगा। अर्थ व्यवस्था उत्पादन और वितरण के बीच सामंजस्य की व्यवस्था है। पूँजी पर व्यक्तिगत अधिकार के बदले समाज का अधिकार होना चाहिए। इस समाज में हर व्यक्ति को अपने क्षमता के अनुरूप श्रम एवं आवश्यकता के अनुसार साधन मिलेगा।

परम पूज्य गुरुदेव कहते हैं कि वर्तमान शिक्षा जीविकोपार्जन का साधन मात्र है। अमेरिकन मनीषी इवान इलिच की विख्यात कृति ‘डिस्कूलिंग सोसायटी’ के अनुसार शिक्षा की दुकानों में बन्द शिक्षण क्रिया अपनी परिणति भौतिकवादी प्रदूषण, सामाजिक ध्रुवीकरण और मनोवैज्ञानिक भावना शून्यता में कर रही है। एक खास आयुवर्ग की सीमा में समेटकर शिक्षा का व्यापारीकरण हो गया है। आचार्य श्री इसके लिए शिक्षण का एक नया तन्त्र विकसित करने की आवश्यकता पर जोर देते हैं, जहाँ शिक्षा कैदमुक्त और सार्वभौमिक हो। आध्यात्मिक समाज में स्वच्छ परम्पराएँ विकसित होंगी। इन्हीं की गौरवमयी अभिव्यक्ति से मानव जीवन संचालित होगा। परम्पराओं के इस क्रम में गुरुदेव ने ऋषि परम्परा, संस्कार, पर्व त्यौहार, साधु ब्राह्मण, वानप्रस्थ एवं आश्रम देवालय तथा तीर्थ परम्परा का प्रचलन किया।

उपर्युक्त प्रकार की सामाजिक व्यवस्था एवं परम्परा का आदर्श स्वरूप आचार्य जी की दार्शनिक दृष्टि तक सीमित नहीं है। इस पर उन्होंने शाँतिकुँज आश्रम में सफल वैज्ञानिक प्रयोग भी सम्पन्न किया है। उनके द्वारा स्थापित शाँतिकुँज को आध्यात्मिक समाज के भव्य भवन का छोटा मॉडल कहा जा सकता है। परम पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रतिपादित एवं प्रस्तुत आध्यात्मिक समाजवाद का उपरोक्त स्वरूप ही विश्व समाज की स्थापना कर सकता है।


चरित्र-निर्माण प्रधान शिक्षापद्धति विकसित करनी होगी

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मानव की अंतर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना है। ज्ञान मानव में स्वभाव सिद्ध है, कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, सब अंदर है। सामान्य भाषा में हम जो कहते हैं कि मनुष्य जानता है, यथार्थ में मनस शास्त्र की भाषा में कहा जाना चाहिए कि वह आविष्कार करता है, अनावृत्त या प्रकट करता है। इस ज्ञान से प्रकटीकरण में जो उद्यत हो, वही शिक्षार्थी है। यथार्थ मायने में जो इस प्रक्रिया में सहायक है, उसे ही शिक्षक कहा गया है।

प्राचीन भारत की वैदिक शिक्षा प्रणाली का अध्ययन करने से इन्हीं विचारों की पुष्टि होती है। समय के उलट-फेर एवं विदेशी प्रभाव के कारण सब कुछ उल्टा हो गया है। आज शिक्षा स्वाभाविक विकासक्रम न रहकर विविध जानकारियों के ढेर-के-ढेर समेटने के रूप में हो गई है। इन जानकारियों को मार-पीटकर, डरा-धमकाकर जबरन मस्तिष्क में ठूँस देने को सार्थकता माना जा रहा है। यदि इस सार्थकता के औचित्य पर विचार किया जाए तो उसकी त्रुटियाँ सामने आ जाती है। वस्तुतः कूड़े के ढेर को दिमाग में इकट्ठा कर लेना किसी तरह भी सार्थक नहीं माना जा सकता है। विवेकयुक्त का आश्रय लेकर जीवन-निर्माण, चरित्र-निर्माण तथा मनुष्य-निर्माण में सहायक विचारों को अनुभूत करने की आवश्यकता है।

आज विद्यालयों के वातावरण को देखने से शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों की मनःस्थितियाँ प्रकट हो जाती हैं। इन दोनों के रहन-सहन, बातचीत इस बात को स्पष्ट कर देते हैं कि कोई भी शिक्षा की गरिमा के अनुकूल नहीं।

इस घटिया स्थिति के पैदा होने, उद्देश्यविमुख होने का कारण क्या है? इन कारणों की खोजकर इनका निवारण किस प्रकार किया जाए? उल्टी स्थिति को उलटकर कैसे सीधा किया जाए? इन प्रश्नों पर चिंतन करने से यही स्पष्ट होता है कि धर्म और नैतिकता का अभाव ही इस स्थिति का कारण है। इनके उपयुक्त समावेश से स्थिति फिर सुधर सकती है।

आज शिक्षाशास्त्र के अनेकानेक पंडित इसी बात पर जोर दे रहे हैं। 1882 में नियुक्त हुए हंटर आयोग से लेकर कोठरी आयोग 1964 तक नियुक्त किए जाने वाले सभी आयोगों और समितियों ने शिक्षा संस्थानों में आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा प्रदान किए जाने का समर्थन किया है। हाल में गठित हुए शिक्षा आयोग रिपोर्ट में पृष्ठ 206 पर उल्लेखित किया गया है कि सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक मूल्योँ की शिक्षा के लिए सचेत और संगठित प्रयास किए जाने चाहिए।

नीति और धर्म का किसी भी साँप्रदायिकता से कोई संबंध नहीं। ये तो मानव के व्यक्तित्व को ऊंचा उठाने वाले तत्त्व है, जिनका समावेश पूर्वकाल से रहा है और आज भी अपेक्षित है। ऐतिहासिक कालक्रम की दृष्टि से विचार करने पर यह सुस्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में आश्रमों, मध्य भारत में मुस्लिम मकतबों, मदरसों एवं हिन्दुओं की पाठशालाओं में धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग थी। अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा नीति को धार्मिक और नैतिक शिक्षा से बिलकुल पृथक कर दिया। इसका एकमात्र कारण भारत निवासियों को शारीरिक नहीं, अपितु मानसिक रूप से पूर्णरूपेण अपना गुलाम बनाना था। उन्होंने राज्य द्वारा संचालित विद्यालयों में इस शिक्षा का पूर्ण निषेध करके नीति और धर्म की अवहेलना का अनुसरण किया। स्वतंत्र भारत में मानसिक गुलामी से जकड़े लोगों ने भी उसी नीति को अपनाया।

यदि इस मानसिक गुलामी के लबादे को झटक दिया जाए तो शिक्षा में धर्म और नैतिकता की अनिवार्यता सिद्ध हो जाती है। जिस शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य मानव की समग्र उन्नति करना है, जो उनको सत्यं शिवं सुँदरम् के अधिक-से-अधिक निकट लाने का प्रयास करती है, वह इस कार्य में किसी भी प्रकार नीति और धर्म की अवहेलना नहीं कर सकती।

नीति-धर्म और शिक्षा अपने स्वाभाविक स्वरूप में एक-दूसरे से गूँथे हुए हैं। इनमें से किसी एक को विलग कर देने से उनका स्वरूप स्वाभाविक न रहकर विकृत हो जाता है। सी.ए. बारवेल ने ‘दि न्यू डिक्शनरी ऑफ थॉट्स’ के पेज 405 पर स्पष्ट किया है, ‘कुछ लोग नैतिकता को धर्म से अलग करना चाहते हैं, पर धर्म के आधार के बिना नैतिकता का अंत हो जाएगा।’ इनके आँतरिक संबंधों को स्पष्ट करते हुए प्रो0 ए॰ एन॰ ह्वाइहेड ने लिखा है, ‘शिक्षा का सारतत्व यह है कि वह धार्मिक होती है। जिस प्रकार शिक्षा को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता है, उसी प्रकार शिक्षा को नैतिकता से भी पृथक करना असंभव है।’ हरबर्ट का कथन है, ‘समग्र रूप में नैतिक शिक्षा, शिक्षा से पृथक नहीं है।’

निस्संदेह शिक्षा, धर्म व नैतिकता एक-दूसरे से गुँथे हुए हैं। इन दोनों के अभाव में शिक्षा में विकृत आना स्वाभाविक है। आज छात्रों में व्याप रही चरित्रहीनता, अनुशासनहीनता मर्यादाओं के अभाव का एकमात्र कारण है कि अंग्रेजियत की नकल करके इनको बहिष्कृत कर दिया गया है। धर्म में साँप्रदायिक कट्टरता जैसी कोई बात नहीं है। इसका तत्त्वदर्शन सबके लिए सर्वकाल में समान रूप से उपादेय है।

विश्वविद्यालयों में व्याप्त उच्छृंखलता को दूर करने के संबंध में एक आयोग का गठन हुआ था। उसने अपने प्रतिवेदन में बताया, ‘यदि हम अपनी शिक्षण संस्थाओं में से आध्यात्मिक प्रशिक्षण को निकाल देंगे तो हम अपने संपूर्ण ऐतिहासिक विकास के विरुद्ध कार्य करेंगे।’

धर्म को हेय, रूढ़िवादी ठहराना तथा धर्म निरपेक्षता की आड़ में इसका तिरस्कार करना, किसी भी तरह उपयुक्त नहीं। महात्मा गाँधी ने इस धर्म निरपेक्षता को किंकर्त्तव्यविमूढ़ता से उबारते हुए कहा था, ‘मेरे लिए नैतिकता, सदाचार और धर्म पर्यायवाची शब्द है। नैतिकता के आधारभूत सिद्धाँत सभी धर्मों में समान हैं। इन्हें बालकों को निश्चित रूप से पढ़ाया जाना चाहिए।’

जैसे-जैसे मानसिक गुलामी कम होती ज रही है, वैसे वैसे बुद्धिजीवियों, देश के कर्णधारों को इसका महत्त्व भी समझ में आता जा रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात डा. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित शिक्षा आयोग ने धर्म और नैतिकता को शिक्षा के अभिन्न अंग बनाने पर बल दिया। इसी प्रकार श्री प्रकाश की अध्यक्षता में गठित धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा समिति ने जनवरी 1970 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए बताया, ‘प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक इसका सुरुचिपूर्ण ढंग से समावेश किया जाना चाहिए।’

विभिन्न शिक्षा विशारदों, शिक्षा आयोगों के विचारों तथा प्रतिवेदनों के अनुसार इसका महत्त्व सुस्पष्ट हो जाता है, पर मात्र कागजी स्तर पर होने वाले कार्य इस समस्या का समाधान कर सकें, यह असंभव है। शिक्षक राष्ट्र मंदिर के कुशल शिल्पी हैं। शिक्षार्थी अनगढ़ मिट्टी के समान हैं। विद्यालय इनको मजबूत ईंटों में ढालने वाली टकसाल के समान है। शिक्षा वह विधा है, जिससे इनको ढाला तथा राष्ट्रमंदिर को गढ़ा जाता है।

धर्म और नैतिकता ही वह आग है, जिससे इन कच्ची ईंटों को मजबूती व सौंदर्य प्राप्त हो सकता है अन्यथा इसके अभाव में तो गढ़ाई की सुन्दरता के बाद भी कच्चापन रह जाएगा। शिक्षा एवं विद्या का सार्थक समन्वय इसीलिए जरूरी है।

इस शिल्पकला के लिए शिक्षार्थी-शिक्षक दोनों को ही अपनी भूमिका समझनी होगी, मनःस्थिति को सुयोग्य बनाकर इस निर्माण कार्य में जुट जाना होगा। इसमें जुट पड़ने से ही राष्ट्र निर्माण, जीवन-निर्माण तथा चरित्र-निर्माण के महान कार्य संभव बन पड़ेंगे। इसको कुशलतापूर्वक निभाने में इनमें से किसी को भी पीछे नहीं रहना चाहिए। ऐसा कर पाने से ही फिर उपनिषद् काल के विद्यार्थी की तरह ‘दृढ़निष्ठो बलिष्ठो, यशस्वी भव’ की स्थिति निश्चित रूप से आ सकेगी।


तेजी से बिखेरना (kahani)

कमरे के एक कोने में धूपबत्ती जल रही थी, दूसरे में मोमबत्ती। मोमबत्ती ने तिरस्कार-पूर्वक धूपबत्ती की ओर देखा और कहा, देखती नहीं, मैं कितनी भाग्यवान हूँ, चारों ओर मेरा प्रकाश फैल रहा है। सबकी आँखें मेरी ओर ही रहती हैं।

धूपबत्ती ने कहा, बहिन सो तो ठीक है, पर परीक्षा के कठिन समय में धैर्य और साहस के साथ अपनी जगह अड़ी रह सको, तभी चमक की सार्थकता है। मोमबत्ती ने बात अनसुनी कर दी। हवा का एक तेज झोंका आया। मोमबत्ती मुझ गई, पर धूपबत्ती ने अपनी सुगंध और भी तेजी से बिखेरना शुरू कर दिया।


आयुर्वेद-4 - बंध्यत्व निवारण हेतु यज्ञोपचार प्रक्रिया

विगत कई अंकों से पाठकों की माँग पर यज्ञोपचार प्रक्रिया के सूत्र दिए जा रहे हैं। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा समय-समय पर बताए गए प्रयोगों के आधार पर ही यह लेखमाला प्रकाशित हो रही है। परिजनों को हवन सामग्री की व्यवस्था स्वयं करनी है एवं यह प्रयोग अपने ही स्तर पर विश्वास हो तो करना है। हवन सामग्री शाँतिकुँज में मात्र ‘कॉमन’ वाली बनाई जाती है, विशिष्ट नहीं। इसके लिए खोजबीन हेतु आयुर्वेद उपचार विभाग, शाँतिकुँज फार्मेसी, शाँतिकुँज के नाम से अलग से पत्र देना चाहिए। किसी भी रोगी को लेकर यहाँ नहीं चले आना चाहिए। यह साधना-शिक्षण स्थली मात्र है। संपादक को इस संबंध में लिखे पत्रों के उत्तर न दिए जा सकेंगे। वैसे यज्ञोपचार पूर्णतः निरापद है।

स्त्री रोगों में बंध्यत्व या बाँझपन को तथा पुरुष रोगों में क्लैव्यता को सबसे अधिक दुःखदायी माना जाता है। इसके कारण दाँपत्य जीवन में अनेकानेक कठिनाइयों एवं मानसिक व्यथाओं का सामना करना पड़ता है। यों तो सामान्य बोलचाल की भाषा में बंध्यापन को ही बाँझपन मान लिया जाता है, किन्तु गहराई से देखने पर दोनों में स्पष्ट अंतर दिखाई पड़ता है। बंध्यापन को अंग्रेजी भाषा में ‘इन्फर्टिलिटी’ कहते हैं, जबकि बाँझपन को ‘स्टर्लिटी’ कहते हैं। सामान्य बंध्यत्व रोग गर्भाधान की असफलता के कारण होता है, जबकि बाँझपन पूर्ण बंध्यापन का परिचायक होता है। इसमें महिला के गर्भवती होने की संभावना नहीं रहती, किन्तु बंध्यापन की समुचित चिकित्सा होने पर संतानोत्पत्ति में पूर्ण सफलता मिलती है।

आयुर्वेद शास्त्रों में बंध्यापन के कई प्रकार बताए गए हैं और इसके जन्मजात एवं अन्यान्य कितने ही कारण गिनाए गए हैं। चरक संहिता शरीर स्थान 1/5 में इन कारणों का उल्लेख करते हुए कहा गया है-

योनिप्रदोषान्मनसोऽभितापाच्छुक्रासृगाहारविहारदोषतत्। अकालयोगाद्बलसंक्षयाच्च गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजापि॥

बीस प्रकार के योनि रोगों में से किसी प्रकार के रोग होने से, अंग विशेष के दूषित होने नया विकारग्रस्त होने से, किसी प्रकार के मानसिक आघात होने से, शुक्र या आर्तव के दूषित होने से, समुचित आहार-विहार का सेवन न करने से, अकाल अर्थात् ऋतुकाल के अतिरिक्त समयम गर्भाधान होने से, रोगादि के कारण अथवा अधिक उपवास करने या कुपोषण आदि के कारण, शरीर के निर्बल हो जाने के कारण, एक बार संतान को जन्म दे चुकने वाली अबंध्या स्त्री भी देर से गर्भ धारण करती है। बंध्यापन के कारणों का और अधिक स्पष्टीकरण करते हुए इसी में आगे कहा गया है- विंशतिर्व्यापदो योनेर्निर्दिष्टा रोग सग्रहे। न शुक्रं धारयत्येभिर्दोषेर्योनिरुपद्रुता तस्माद्गर्भे न गृह्वाति स्त्री...॥

आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार बंध्यापन तीन दोषों के कारण होता है- (1) आधिदैविक, (2) आधिभौतिक और (3) आध्यात्मिक दोष। इनमें से अधिकाँश आधिदैविक दोषों का निराकरण यज्ञोपचार प्रक्रिया द्वारा किया जा सकता है, जिसमें गायत्री महामंत्र या महामृत्युँजय का जप-अनुष्ठान भी सम्मिलित है। आधिभौतिक दोषों को दूर करने के लिए आधुनिक चिकित्सा प्रणाली द्वारा आवश्यक जाँच-पड़ताल करके तदनुरूप चिकित्सा उपचार किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर शल्य क्रिया आदि का भी सहारा लिया जाता है। आध्यात्मिक दोषों के अंतर्गत स्वनिर्मित दोष आते हैं, जैसे-मानसिक दोष या मनोविकार, कुँठाएं, अनिच्छा आदि। इन्हें दूर करने के लिए मनोचिकित्सा, जप, तप, ध्यान, ईशनिष्ठा आदि का आश्रय लेना पड़ता है। वैसे देखा जाए तो बंध्यत्व व क्लैव्यता से जुड़े सभी विकारों में ये परमावश्यक उपचार है।

स्त्रियों में बंध्यापन जिन कारणों, दोषों एवं कमियों के कारण होता है, उन्हें ध्यान में रखते हुए तदनुरूप चिकित्सा उपक्रम अपनाया जाता है। प्राचीनकाल से ही आयुर्वेदाचार्यों ने इस संबंध में गहन अध्ययन-अनुसंधान करके कितनी ही निरापद वनौषधियां खोज निकाली है, जिनके एकल या सम्मिलित प्रयोग से संतानहीन दंपत्तियों को सुसंतति की उपलब्धि होती रही है। आयुर्वेद ग्रंथों में इस तरह की कितनी ही वनौषधियों का वर्णन है, जिनको खाने एवं यज्ञीय उपयोग करने से बंध्यात्व रोग से छुटकारा पाया जा सकता है। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में किए गए अब तक के अनुसंधानों से यह सिद्ध हो चुका है कि यज्ञ चिकित्सा द्वारा साठ से सत्तर प्रतिशत तक सफलता पाई जा सकती है। किन्हीं-किन्हीं रोगों में व्यक्ति के शारीरिक दोषों के कारण कभी-कभी असफलताओं का भी सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में यज्ञोपचार एवं औषधियों को दोष नहीं दिया जा सकता। इस तरह के दोषों को दूर करने के लिए आयुर्वेद के आदि शल्य चिकित्सक सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा का भी सहारा लेने का निर्देश किया है।

यज्ञोपचार द्वारा बंध्यापन दूर करने एवं गर्भपुष्टि के लिए इसके विभिन्न कारणों, दोषों एवं वात, पित्त, कफ आदि प्रकृति के अनुसार अलग-अलग वनौषधियां मिलाई और तदनुरूप हवन सामग्री तैयार की जाती है, परन्तु यहाँ पर सामान्य रूप से संतानोत्पत्ति के मार्ग में उत्पन्न हुई रुकावट को दूर करने एवं बंध्यत्व दोष को मिटाने के लिए एक विशेष प्रकार की सर्वसुलभ एवं सर्वोपयोगी हवन सामग्री दी जा रही है, जिसका हवन करने एवं खाने से मनोवाँछित सफलता मिल सकती है।

1. बंध्यापन दूर करने की विशेष हवन सामग्री-

इसमें निम्नलिखित वनौषधियां मिलाई जाती हैं :–

सफेद फूलों वाली छोटी कंटकारी (लक्ष्मणा पंचाँग), (2) जियापोता (पुत्रीजवा) के फल या मूल, (3) शिवलिंगी के बीज, (5) ब्रह्मदंडी पंचाँग, (6) शरपुँखा की जड़, (7) अपराजिता (विष्णुकाँता) पंचाँग, (8) उलट-कंबल, (9) अशोक छाल, (10) लोध्र, (11) देवदार, (12) अश्वगंधा, (13) जीवक, (14) बरगद के अंकुर, (15) चंदन, (16) खस, (17) पद्माख (18) बच, (19) दोनों सारिवा (20) चमेली के फूल (21) बालछड़ (22) कुमुदिनी (23) नागबला (गंगेरन) की छाल या पत्ता (24) नागकेशर (25) जटामाँसी (26) नागरमोथा (27) पीपल के पके फल के बीज (28) गूलर के पके फल (29) पारस पीतल की जड़ या बीज, (30) कौंच (केवाँच) की जड़ या बीज।

उक्त सभी 30 चीजों को बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर जौकुट चूर्ण बना लेते हैं और ‘हवन सामग्री क्र. 2’ का लेवल लगाकर एक बड़े पात्र में रख लेते हैं। इन्हीं तीस चीजों के समग्र पाउडर की कुछ मात्रा को घोट-पीसकर, अधिक बारीक करके कपड़छन कर लिया जाता है और उसे खाने के लिए एक अलग सुरक्षित डिब्बे में रख लिया जाता है। संतानोत्पत्ति की इच्छुक महिला को इसी बारीक पाउडर में से प्रतिदिन सुबह-शाम एक एक चम्मच चूर्ण घी-शक्कर या गोदुग्ध के साथ हवन करने के पश्चात खिलाया जाता है। यह प्रयोग कम से कम तीन माह तक (ऋतुकाल के चौथे दिन के बाद) अपनाना होता है। नित्य हवन करते समय उपयुक्त तैयार ‘हवन सामग्री क्र. 2’ में पहले से तैयार ‘कॉमन हवन सामग्री क्र. 1’ को भी बराबर मात्रा में मिला लेते हैं और तब हवन करते हैं। इसे खाने के लिए उपयोग में नहीं लाते। इस कॉमन हवन सामग्री में निम्नाँकित चीजें समभाग में मिली होती है- अगर, तगर, देवदार, चंदन, लाल चंदन, जायफल, लौंग, गूगल, चिरायता और गिलोय। इसी में गोघृत, शक्कर जौ, और तिल मिलाकर सूर्य गायत्री मंत्र से हवन करते हैं। सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार हैं-

ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यो प्रचोदयात्। अंत में ‘स्वाहा’ शब्द जोड़कर कम-से-कम चौबीस आहुतियाँ नित्य देते हैं। संतति के लिए पीपल या पलाश की समिधा सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होती है। इसी तरह काष्ठ पात्रों में उडुँबर (गूलर) का काष्ठपात्र अधिक लाभकारी होता है।

स्त्रियों में बंध्यत्व रोग की तरह ही पुरुषों में विविध कारणों से उत्पन्न दोष या क्लैव्यता भी संतानोत्पत्ति में एक बहुत बड़ी बाधा होती है। अतः इसके लिए अलग तरह की क्लैव्यतानाशक हवन सामग्री का प्रयोग किया जाता है।

(2) क्लैव्यतानाशक विशिष्ट हवन सामग्री-

इसमें निम्नलिखित चीजें समभाग में मिलाई जाती हैं और उनका जौकुट पाउडर तैयार करके सूर्य गायत्री मंत्र बोलते हुए हवन करते हैं।

(1) गोक्षुर (2) तालमखाना (3) अकरकरा (4) अश्वगंधा (5) शतावर (6) लौंग (7) जायफल (8) कपूर (9) कौंच बीज (10) श्वेत मूसली (11) काली मूसली (12) मुलहठी (13) बला (खिरैटी) (14) वनउड़द (15) कदंब की गोंद (16) कायफल (17) भिलावा गिरी (शोधित)।

हवन करते समय उक्त चीजों से तैयार जौकुट पाउडर में बराबर मात्रा में पूर्व वर्णित ‘कॉमन हवन सामग्री क्र. 1’ को मिला लेते हैं। क्र. 1 से 17 तक की उपर्युक्त वर्णित वनौषधियों को हवन करने के साथ-ही-साथ खाने में भी प्रयुक्त करते हैं। इसके लिए इनके सम्मिलित पाउडर को अधिक बारीक कूट-पीसकर कपड़छन चूर्ण तैयार कर लेते हैँ। इस चूर्ण की एक चम्मच मात्रा सुबह एवं एक चम्मच शाम को दूध के साथ या घी एवं शक्कर के साथ खाते हैं। भिलावा गिरी सदैव शोधन के बाद ही प्रयोग की जाती है। इसे हवन सामग्री में न मिलाकर अलग से भी तीन गिरी की मात्रा में प्रतिदिन अकेले ही खाया जा सकता है। शोधन करने के लिए पके हुए काले भिलावे लेकर एक बोरी में डालते हैं और उसी में इट या खपरे के छोटे छोटे टुकड़े डाल देते हैं। इसके बाद बोरी को उठाकर आधे घंटे तक चारों तरफ उलट-पुलटकर पटकते हैं। इससे भिलावे का विषैला रस इट या खपरे के टुकड़े सोख लेते हैं। इसके उपराँत भिलाव निकालकर अंदर की गिरी निकालते हैं। अंदर सफेद गिरी मिलेगी। इस बात का यहाँ विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि अगर किसी कारणवश हाथ में जलन होने लगे तो नारियल का तेल लगा लें या घी चुपड़ लें। भिलावे के विषैले रस से बचने के लिए गिरी निकालते समय हाथ में कपड़ा लपेट लेना चाहिए। क्लैव्यता मिटाने, आँतरिक दोषों को दूर करने में इस गिरी की विशेष भूमिका होती है।

(3) गर्भपुष्टि की विशेष हवन सामग्री

इसमें निम्नलिखित चीजें मिलाई जाती हैं :-

(1) सौंप (2) कासनी (3) धनिया (4) खस (5) खसखस अर्थात् पोस्त बीज (6) इंद्र जौ मीठा (7) पलाश गोंद (8) मुनक्का (9) गुलाब के फूल (10) ब्रह्मदंडी।

इन सभी दस चीजों को बराबर मात्रा में लेकर जौकुट पाउडर बना लिया जाता है और एक पात्र में ‘गर्भपुष्टि की विशेष हवन सामग्री क्र. 2 का लेवल लगाकर उसमें सुरक्षित रख लिया जाता है। इन्हीं दस चीजों की सम्मिलित मात्रा का कुछ भाग बारीक कूट-पीस करके कपड़छन कर लिया जाता है और उसे नित्य हवन के साथ खाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। खाने के लिए मात्रा एक-एक चम्मच सुबह एवं शाम को गोदुग्ध अथवा घी एवं शक्कर के साथ है। गर्भवती महिलाओं के लिए यह एक विशेष रूप से उपयोगी है। इसको हवन करने और चूर्णरूप में खाने वाली माताओं की संतानें स्वस्थ, सुन्दर,हृष्ट पुष्ट एवं दीर्घजीवी होती है।

हवन करते समय पहले से तैयार की गई ‘कॉमन हवन सामग्री क्र. 1 की बारबर मात्रा को उक्त ‘गर्भपुष्टि की विशेष हवन सामग्री क्र. 2 में मिलाकर तब सूर्य गायत्री मंत्र से हवन करते हैं। यह हवन उपचार पूरे गर्भकाल तक करते रहने से जननी एवं शिशु दोनों के लिए विशेष लाभकारी सिद्ध होता है।

प्रायः देखा जाता है कि कई बार गर्भवती महिलाओं को जी मिचलाने, चक्कर आने, उल्टी होने आदि से लेकर गर्भस्राव होने तक की अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उपर्युक्त हवनोपचार के साथ वर्णित चूर्ण के स्थान पर गर्भस्थापना के तीसरे-चौथे महीने से निम्नलिखित ‘गर्भरक्षक पौष्टिक चूर्ण’ का सेवन कराना चाहिए। इसमें निम्न चीजें मिलाई जाती हैं-

1. अकरकरा-6 ग्राम 2. जायफल-7 ग्राम 3. जावित्री-7 ग्राम 4. चित्रक-7 ग्राम 5. कपूर कचरी-7 ग्राम 6. धाय के फूल-7 ग्राम 7. तुखमलंगा-7 ग्राम 8. तज-7 ग्राम 9. बड़ी इलायची-7 ग्राम 10. अश्वगंधा-7 ग्राम 11. छोटी पीपल-10 ग्राम, 12. काली मिर्च-10 ग्राम 13. बहमन सुर्ख-10 ग्राम 14. बहमन श्वेत-10 ग्राम 15. दालचीनी-18 ग्राम 16. ढाक (पलाश) के सूखे पत्ते-24 ग्राम 17. सौंठ-27 ग्राम 18. रुमी मस्तगी-27 ग्राम 19. मोती की सीप का चूर्ण (मुक्तिशुक्ति)-12 ग्राम एवं 20. मिश्री-360 ग्राम।

इन सभी 20 चीजों को कूट-पीसकर कपड़छन करके एकसार कर लेना चाहिए और हवन करने के बाद एक-एक चम्मच सुबह-शाम गोदुग्ध के साथ गर्भिणी को खिलाते रहना चाहिए। डायबिटीज से ग्रस्त गर्भिणी को मात्र क्र. 1 से 19 तक की चीजों से बने पाउडर को ही चौथाई चम्मच की मात्रा में दोनों समय देना चाहिए। उसमें मिश्री नहीं मिलानी चाहिए। यह गर्भस्थ शिशु की इंद्रियों को पुष्ट कर उसे स्वस्थ, सुन्दर और गर्भावस्था के समय होने वाले सभी उपद्रवों को शाँत करता है।

प्रायः देखा जाता है कि किन्हीं-किन्हीं परिवारों में मात्र कन्या शिशु ही जन्मती है। अतः जिन्हें बालक की चाहत हो, उन्हें चाहिए कि ‘गर्भपुष्टि की विशेष हवन सामग्री’ से हवन करने के साथ ही इच्छुक महिला को जियापोता के पके हुए चार फल प्रतिदिन अथवा शिवलिंगी के सात बीज और मोरपंखी का एक चंदोवा घोट-पीसकर प्रतिदिन अथवा शिवलिंगी के बीज-10 ग्राम, जियापोता के 21 फल, सफेद फूलों वाली छोटी कंटकारी की जड़ या पंचाँग-10 ग्राम और मोरपंख का चंदोवा-7 नग लेकर सबको अच्छी तरह खरल करके 30 ग्राम पुराने गुड़ के साथ मिलाकर, 21 गोलियाँ बनाकर खिलाएं। इन तीनों में से किसी एक को प्रतिदिन प्रातःकाल खाली पेट बछड़े वाली गाय के दूध के साथ एक-एक मात्रा या एक-एक गोली ऋतुकाल के चौथे दिन के बाद सात दिन तक इन्हें खिलाना चाहिए। इसी तरह अगले माह भी 7-7 दिन तक एक-एक खुराक खिलानी चाहिए। इसको सेवन करने के बाद एक घंटे तक कुछ नहीं खाना चाहिए। उपर्युक्त सभी उपचारों के साथ अत्यंत खट्टे, तीखे, चरपरे, खारे एवं गरम पदार्थों का परहेज करना आवश्यक है। (क्रमश:ः


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी - अभिभावक हैं तो उत्तरदायित्व भी

परमपूज्य गुरुदेव के उद्बोधन के विगत अंक में प्रकाशित अंश का उत्तरार्द्ध

मित्रो! यह ख्याल सही नहीं है कि अमुक जगह, अमुक कॉलेज, अमुक विद्यालय या अमुक स्कूल में भेज देंगे तो हमारे बच्चे योग्य बन जाएंगे और संस्कारवान बन जाएंगे।जब हम बच्चों को स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने के लिए भेजते हैं, विद्यालय में भेजते हैं, उस समय तक उसकी वह उम्र समाप्त हो जाती हैं, उस समय तक उसकी वह उम्र समाप्त हो जाती हैं, जिसमें बच्चे का निर्माण किया जाना संभव है। छोटे छोटे बालक किसी स्कूल में नहीं लिए जा सकते और न माता-पिता के बिना रखे जा सकते हैं। माता-पिता को अपने बालकों से पूरा प्रेम करना चाहिए। जो माता-पिता आपस में प्रेम नहीं रख सकते, वे बच्चों को भी प्रेम नहीं कर सकते। माता-पिता के बीच अनन्य प्रेम होना चाहिए और अनन्य निष्ठा होनी चाहिए। उन दोनों के बीच ऐसा कोई कारण नहीं होना चाहिए जिससे दोनों के बीच में अविश्वास और मनोमालिन्य पैदा हो। व्यभिचारी है तो माता के मन में अविश्वास बना रहेगा, संदेह बना रहेगा, मनोमालिन्य बना रहेगा। खाने-पीने की सुविधाओं के होते हुए भी यह मनोमालिन्य और अविश्वास सतत बना रहेगा और आगे जाकर यही उनके बच्चों पर प्रभाव डालेगा।

मित्रो! माता अपने बच्चे को दूध पिलाती है। इस दूध के साथ में केवल दूध ही नहीं जाता, प्रोटीन ही नहीं जाता, केवल स्टार्च ही नहीं जाता, केवल फैट ही नहीं जाता, वरन् माता के संस्कार भी जाते हैं। उन दिनों में माता के संस्कार और स्वभाव जैसा है, मनःस्थिति जैसी है, उसी तरह का प्रायः बालक बन जाता है।

ठीक इसी प्रकार माता का मन, माता का स्वभाव और माता की मनःस्थिति जैसी होती है, उसी के अनुरूप बच्चा पैदा होता है। अगर धर्मपत्नी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। उसकी मनःस्थिति ऐसी नहीं है कि वह समर्थ और सुयोग्य बच्चा पैदा करने में समर्थ हो तो उसके ऊपर अत्याचार नहीं किया जाना चाहिए। अगर पिता ने उसकी गोदी में जबरदस्ती बच्चा धकेल दिया है और माता की मनःस्थिति ठीक नहीं है, उसकी शारीरिक स्थिति भी ठीक नहीं है तो वह अच्छा बच्चा कैसे पैदा करेगी? स्वस्थ बच्चा कैसे पैदा करेगी? अगर वह शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ बच्चा पैदा भी कर दे तो वह बच्चा मानसिक सृष्टि से स्वस्थ नहीं हो सकता। मानसिक दृष्टि से वह एक बीमार बच्चा ही पैदा होगा। उससे समाज का नुकसान ही होगा।

अतएव न केवल पाँच वर्ष तक, वरन् उससे आगे भी हर माता-पिता को यह ध्यान रखना चाहिए कि स्कूलों और कॉलेजों के ऊपर आज बहुत निर्भर नहीं रहा जा सकता। कोई जमाना था, जब बच्चे वहाँ रहा करते थे, जहाँ उनको शिक्षण के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान, व्यावहारिक कुशलता, जीवन जीने की कला और जीवन जीने की दिशाओं का बहुत सारा शिक्षण मिलता था। वे चौबीसों घंटे वहीं गुरुकुलों में रहा करते थे। उस जमाने में जो गुरु हुआ करते थे और गुरुमाताएं होती थीं, वे उन्हें वैसा ही स्नेह, वैसा ही प्रेम प्रदान करते थे, जैसा कि माता-पिता से मिलता है। उस वातावरण में यह संभव था कि स्कूलों में, गुरुकुलों में बच्चों को भेजने के बाद निश्चिंत हो जाया कि वहाँ का संस्कारवान वातावरण है, सो वह मिलेगा ही।

मित्रो! आज तो सिर्फ थोड़े-से घंटों के लिए दो चार-घंटे के लिए बच्चे स्कूल में पढ़ने जाते हैं। दो-चार घंटे के स्कूल में भी कोई नैतिक शिक्षण होता नहीं, चारित्रिक शिक्षण होता नहीं। व्यक्तित्व के निर्माण करने की कोई बात होता नहीं। व्यक्तित्व के निर्माण करने की कोई बात होती नहीं और न इस प्रकार की कोई व्यवस्था ही वहाँ पर होती है। केवल भूगोल, गणित, इतिहास वगैरह पढ़ा दिए जाते हैं। सो भी एक आदमी नहीं, इसके लिए ढेरों अध्यापक आते हैं। कोई गणित पढ़ा गया, कोई भूगोल पढ़ा गया, कोई इतिहास पढ़ा गया, कोई क्या पढ़ा गया, कोई क्या पढ़ा गया। पैंतालीस-पैंतालीस मिनट का तमाशा दिखा करके नट और कठपुतलियों के तरीके से अध्यापक भाग जाते हैं।

साथियो! उनसे यह आशा करना व्यर्थ है कि ये हमारे बच्चे को कुछ सिखा सकते हैं और पढ़ा सकते हैं। स्कूल और कॉलेज में पढ़ने के बाद हमारा बच्चा सुयोग्य और सुसंस्कारी बन सकता है, यह सोचना मुनासिब नहीं है और यह ख्वाब, यह कल्पना ठीक नहीं है, क्योंकि चार-पाँच घंटे स्कूल में रहने के बाद, चौबीस घंटे में बाकी अठारह घंटे जो बच जाते हैं, उसमें से तो ज्यादातर वक्त बच्चा अपने घर के वातावरण में ही बिताता है। स्कूल में वह गणित, भूगोल पढ़ सकता है, लेकिन स्कूल में वह चरित्र कैसे पड़ेगा? घर के लोग जिस स्वभाव के होंगे, जिस नीयत के होंगे, जिस क्रियाकलाप के होंगे, बच्चा ठीक वैसा ही बन जाएगा।

इसलिए यह आवश्यक है कि अगर किसी को बच्चा उत्पन्न करना है तो बच्चे को उत्पन्न करने के साथ-साथ उसके निर्माण की जिम्मेदारी को भी समझना चाहिए।

इसलिए यह आवश्यक है कि अगर किसी को बच्चा उत्पन्न करना है तो बच्चे को उत्पन्न करने के साथ-साथ उसके निर्माण की जिम्मेदारी को भी समझना चाहिए। मात्र खिलाने-पिलाने की जिम्मेदारी को ही नहीं, कपड़ा पहनाने की जिम्मेदारी को ही नहीं, ब्याह शादी करने की जिम्मेदारी को जिम्मेदारी निभाना नहीं कहते। बच्चे को काम धंधे पर लगाने की जिम्मेदारी को जिम्मेदारी नहीं कहते। वास्तव में अस्सी फीसदी जिम्मेदारी माता-पिता के ऊपर यह है कि वे अपने बालकों को संस्कारवान बनाएं, चरित्रवान बनाएं, सुयोग्य एवं विकसित व्यक्तित्व का बनाएं। यह कार्य कोई किताब खरीद देने से या उसको खुराक खिला देने से या किसी कॉलेज में भरती करा देने से नहीं हो सकता। इसके लिए सारे घर का वातावरण ठीक करना पड़ेगा। खास करके माता-पिता को तो अपनी मनःस्थिति को जरूर ही ठीक करना पड़ेगा।

अगर परिवार में संस्कार डालने की व्यवस्था नहीं है और वह संयुक्त परिवार के अंतर्गत चल रहा है तो परिवार को टुकड़ों में बाँटा जा सकता है और कुसंस्कारी लोगों से संस्कारवान लोगों को अलग रखा जा सकता है। देखने-सुनने में यह बात भद्दी मालूम पड़ती है कि एक ही संयुक्त परिवार के लोग कई हिस्सों में बंटे और कई तरीके से रहें, लेकिन बालकों को जहाँ कुसंस्कारी बनाने की संभावना हो, वहाँ संयुक्त परिवार को छोटे टुकड़ों में बाँट दिया जाए और उनके लिए वातावरण अलग से बना दिया जाए। मैं समझता हूँ कि यह कोई ज्यादा बुराई की बात नहीं है। संयुक्त परिवार वैसे भी ढीले होते चले जा रहे हैं। जिन लोगों के मन एक से नहीं हैं, जिन लोगों के स्वभाव एक से नहीं है, जिन लोगों के कर्म एक से नहीं हैं, प्रेम जिनके बीच नहीं है, विश्वास जिनमें नहीं है, उन्हें नारंगी की फाँक के तरीके से बाहर से जोड़कर किसी तरह से रखा जाए तो उससे क्या बनता है? क्या बिगड़ता है? इससे तो यह अच्छा है कि भले लोग कुसंस्कारी लोगों से अलग रहें और आपस में प्रेमभाव रखें, आपस में सहयोग का भाव रखें, एक दूसरे की सहायता करें, एक दूसरे को आगे बढ़ाएं। इसमें कोई हर्ज की बात नहीं है।

जो भी हो मित्रो! बच्चों को छोटी उम्र से लेकर बड़ी उम्र तक इस तरह की परिस्थितियाँ मिलनी चाहिए, जिसको हम ‘संस्कार’ कहते हैं। खुराक आवश्यक नहीं है, संस्कार आवश्यक है। संस्कार के लिए सारे वातावरण को ही बदलना पड़ेगा। माता-पिता जब आपस में बैठा करें, बातचीत किया करें तो जिस समय तक बच्चा पाँच वर्ष का नहीं हो गया है, उस समय तक दोनों जब भी मिला करें, अश्लील बातें नहीं किया करें। लड़ाई-झगड़े की बात नहीं किया करें। अच्छा यह है कि दोनों मिल करके थोड़ी देर स्वाध्याय किया करें। पिता-माता को ऐसी पुस्तकें पढ़कर सुनाया करे जैसी कि सुभद्रा को सुनाई गई थी, जब अभिमन्यु पेट में था। पिता का यह भी काम है कि पत्नी को अच्छा साहित्य पढ़ने के लिए दे। जहाँ उसका निवास है, वहाँ गंदी तस्वीरें नहीं, एक-से एक अच्छे आदर्श महापुरुषों की तस्वीरें लगाकर रखें। जब कभी भी आँख ऊपर के लिए जाए तो अपनी धर्मपत्नी को उन श्रेष्ठ मनुष्यों का चरित्र और उनका स्वभाव देखने-समझने का ही मौका मिले। धर्मपत्नी को अच्छी पुस्तकें पढ़ने का मौका दिया जाए, अच्छे लोगों की संगति में बैठने का मौका दिया जाए। अच्छे व्याख्यान सुनने और प्रवचन करने की व्यवस्था बनाई जाए।

अगर ये सब बातें संभव नहीं हो तो कम-से-कम इतना तो किया ही जा सकता है कि अपने बच्चे का निर्माण करने के लिए पत्नी की मनोभूमि को बनाया जाए। पत्नी की मनोभूमि को बनाने के लिए बच्चे के पिता को चाहिए कि वह अपने समय में से थोड़ा-सा एक अंश निकाले और अपनी धर्मपत्नी को समझाए। अगर उसे स्वयं समझाना नहीं आता तो जिन लोगों को समझाना आता है, उनकी लिखी हुई पुस्तकें, ग्रंथ या कोई कहानी उसको सुनाया करें, समझाया करें। इतना तो हो ही सकता है। अगर इतना भी कोई पिता नहीं कर सकता तो यह कैसे कहा जाएगा कि वह अपने बच्चे की जिम्मेदारी को अनुभव करता है।

मित्रो! घर के वातावरण में प्रेम की संभावनाएं रहनी चाहिए। जिन बालकों को प्रेम नहीं मिलता, वे क्रूर हो जाते हैं, उजड्ड हो जाते हैं और गंवार हो जाते हैं। आदमी की खुराक रोटी नहीं है, आदमी की खुराक घी नहीं है, आदमी की खुराक प्यार है, मोहब्बत है। छोटा बच्चा जितनी अपेक्षा दूध की करता है, उससे सौ गुनी ज्यादा अपेक्षा वह इस बात की करता है कि उसको पिता का प्यार मिले, माता का प्यार मिले। माता-पिता को अपने बच्चे को पास भी रखना चाहिए। उनके साथ खेलना भी चाहिए। अक्सर पिता ऐसे पाए जाते हैं, जो इस बात का ख्याल नहीं करते कि हमको इन बच्चों के साथ में खेलना चाहिए। इनको खिलाना चाहिए, ताकि हमारे संस्कार और प्रेम का प्रभाव इनको अनुभव होता चला जाए। जो सारे दिन काम-धंधे में लगे रहते हैं। जब छूट करके घर आते हैं तो ताश खेलने में, रेडियो सुनने में और मित्रों से गप-शप लड़ाने में लग जाते हैं। कभी बेचारे बच्चों को यह अनुभव न हो सका कि हमारा पिता कौन है और पिता की मोहब्बत किसे कहते हैं? बस, अच्छा कपड़ा पहना दिया, अच्छी मिठाई खिला दी। अच्छे से समाज में बिठा दिया। ये भी कोई बात है क्या? यह तो शरीर की सेवा हुई।

बच्चों के शरीर की सेवा ही काफी नहीं है, मन की सेवा आवश्यक है। मन की खुराक किसी व्यक्ति की उसकी मोहब्बत होती है। मोहब्बत के द्वारा जिन माता पिता ने अथवा लोगों ने बच्चों का निर्माण किया है, वास्तव में उन्होंने अपने बालकों की बहुत बड़ी सेवा की है। जिन्होंने बच्चों को प्यार दिया नहीं, बच्चों को गोदी में खिलाया नहीं, बच्चों को कहानियाँ सुनाई नहीं, बच्चों को साथ लेकर टहलने गए नहीं और बच्चों के साथ में समय व्यतीत किया नहीं, उन्हें यह समझना चाहिए कि बच्चों के प्रति अपने फर्ज और कर्त्तव्य की जिम्मेदारी उन्होंने पूरी नहीं की।

मित्रो! बच्चों का निर्माण करने के लिए हमको उनके खेलकूद की व्यवस्था करनी चाहिए। उनके पढ़ने की व्यवस्था करनी चाहिए। अच्छे कपड़े की व्यवस्था करनी चाहिए। उनके लिए अच्छी खुराक की व्यवस्था करनी चाहिए। ये सब बातें आवश्यक है। हम रोज पढ़ते हैं और हमको बताई भी जाती हैं, लेकिन उससे भी हजार गुनी महत्त्वपूर्ण बात यह है, जिसकी ओर लोगों का ध्यान नहीं गया कि बच्चों को संस्कारवान बनाने के लिए वातावरण की जरूरत है। मनःस्थिति की जरूरत है। माता-पिता को संस्कारवान होने की जरूरत है। अगर इस ओर ध्यान दिया जाए तो मैं समझता हूँ कि यह शिक्षा इतनी बड़ी है कि हम भावी पीढ़ियों को इतनी अच्छी और सुसंस्कारवान बना सकते हैं, जो पिता के लिए भी संतोषदायक हो, माता के लिए भी आनंददायक हो। घर परिवार के लोगों के लिए भी और हरेक के लिए विभूति और अच्छाई का कारण हो। समाज के लिए भला अनुदान दे सकने वाली हो।

नई पीढ़ियों का निर्माण करना और घर के वातावरण को अच्छा रखना और बुढ़ापे में अपना जीवन शाँति से व्यतीत करना, इस बात के ऊपर टिका हुआ है कि हमने अपने बच्चों से संस्कारवान बनाया कि नहीं? बच्चों को संस्कारवान बनाने के लिए हमको यह प्रयत्न करना चाहिए कि बच्चों को जन्म लेने से पहले से लेकर के जब तक वह कम-से-कम पाँच वर्ष के नहीं हो जाते, उस वक्त तक बहुत अधिक ध्यान रखें। पाँच वर्ष के होने के पश्चात ही घर की परिस्थितियों को, बच्चों की संगति को, बच्चों के वातावरण को और बच्चों के साथियों पर गौर करें और यह देखें कि कहीं हमारा बच्चा कुमार्गगामी तो नहीं हो रहा है। इस तरह का ध्यान अगर रखा जा सके तो बच्चों के निर्माण की दिशा में बहुत महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया, यह माना जा सकता है। आज की बात समाप्त।॥ ॐ शाँति॥


Quotation

परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी और कर्त्तव्यपरायणों के लिए ही सुरक्षित है।

-परमपूज्य गुरुदेव


दोनों ही घृणित (kahani)

ज्ञान और धन दोनों में एक दिन अपनी श्रेष्ठता के प्रतिपादन पर झगड़ा उठ खड़ा हुआ। दोनों अपनी-अपनी महत्ता बताते और एक-दूसरे को छोटा सिद्ध करते थे। अंत में निर्णय के लिए वे दोनों आत्मा के पास पहुँचे।

आत्मा ने कहा, तुम दोनों कारण मात्र हो, इसलिए श्रेष्ठ बात ही तुममें क्या है? सदुपयोग किए जाने पर ही तुम्हारी श्रेष्ठता है, अन्यथा दुरुपयोग होने पर तो तुम दोनों ही घृणित बनकर रह जाते हो।


अंतर्जगत की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान - योग साधना में ‘अभ्यास’ का महत्त्व

योग साधना की डगर कब किस ओर मुड़ती है, प्रस्तुत स्तंभ के माध्यम से साफ-साफ समझा जा सकता है साधकों की राह में आने वाले प्रश्न-कंटकों को हटाने-बीनने की पूरी व्यवस्था इसके उजाले में संभव है। इसकी किरणें साधकों के अंतर्मन के अंधियारे की घुटन और घबराहट को हटाती है। इससे साधकों में अपनी साधना के लिए हिम्मत और हौसला बढ़ता है। इस योग-कथा की पिछली कड़ियाँ तमाम योग साधकों को यही अनूठी सौगात सौंपती रही है। अब तक अनेक साधकों ने अपने अनुभव लिखे हैं। इन अनुभवों से पता चलता है कि यह केवल एक लेखमाला नहीं है, बल्कि साधकों एवं महान गुरुओं के बीच निरंतर चलने वाला रहस्यमय वार्त्तालाप है। महर्षि पतंजलि एवं परमपूज्य गुरुदेव स्वयं इस योग कथा के माध्यम से अगणित साधकों की भावनाओं को सुनते हैं और उन्हें अपनी योग अनुभूतियों के अमृतरस का भागीदार बनाते हैं। इस योग कथा के शब्द तो बस उनकी विचार तरंगों के माध्यम भर है। इससे अधिक और कुछ भी नहीं।

विगत अंक में योग साधकों को निरंतर चुभने वाले विषैले प्रश्न कंटकों की अनूठी शल्य क्रिया थी। अगणित साधकों के मन सदा एक ही सवाल की टीस महसूस करते हैं, क्या करें मन में साधना की चाहत तो बहुत है, पर मन नहीं लगता। मन की चंचलता साधना में टिकने ही नहीं देती। वैसे भले ही मन थोड़ा शाँत बना रहे, परन्तु साधना के आसन पर बैठते ही उसकी भाग-दौड़, बंदर-कूद शुरू हो जाती है। न जाने कहाँ-कहाँ के विचार मन को परेशान करते हैं। कभी-कभी तो बुरे विचारों, बुरी भावनाओं की असंख्य प्रेतछायाएं घेरकर खड़ी हो जाती है। ये इतनी हठीली होती है कि किसी भी तरह हटती ही नहीं। समझ में नहीं आता कि इनसे बचकर कहाँ भागें, कहाँ जाएं? साधकों की इस घबराहट की पीड़ा का महर्षि पतंजलि समाधान बताते हैं, ‘अभ्यास और वैराग्य।’ अभ्यास और वैराग्य जितना गहरा, जितना गाढ़ा होता जाएगा, मन की उलझन, सुलझती जाएगी। मन की परेशानियाँ थमने लगेंगी। चंचलता स्थिरता में बदलने लगेगी, परन्तु इसी विवेचना के साथ योग साधकों का अगला सवाल सामने आया कि आखिर यह अभ्यास क्या है और इसे करें कैसे?

इसके समाधान में महर्षि अगला सूत्र कहते हैं :-

तत्र स्थितौ यत्नौऽभ्यास.॥1/13॥

शब्दार्थ- तत्र - उन दोनों अभ्यास और वैराग्य में से, स्थितौ - चित्त की स्थिति में, यत्नः - यत्न करना, अभ्यासः - अभ्यास है। यानि कि इन दोनों में चित्त की स्थिति में (स्वयं में दृढ़ता से) प्रतिष्ठित होने का प्रयास करना अभ्यास है। अभ्यास की सामान्य महिमा से तो हममें से प्रायः सभी परिचित है। छोटे बच्चों और गाँव के किसानों से लेकर विशिष्टों वरिष्ठों एवं विशेषज्ञों तक इसकी महिमा का गुणगान करते हैं। ग्रामीण जीवन में अभ्यास के बारे में एक कहावत अक्सर सुनी जाती है- ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात है सिल पर परत निसान॥’ अर्थात् अभ्यास करते-करते एकदम जड़मति भी सुविज्ञ-सुजान हो जाते हैं। कुछ उसी तरह से जैसे निरंतर रस्सी की रगड़ से पाषाण पर भी निशान पड़ जाते हैं। मनुष्य की सारी क्षमताएं उसके अभ्यास का ही फल है। यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी अभ्यास के बलबूते ऐसे-ऐसे करतब दिखाने लगते हैं, जिन्हें देखकर दाँतों तले उंगली दबाने का मन करता है।

बाहरी जीवन में, लौकिक जीवन में अभ्यास के ढेरों चमत्कार हम रोज देखते हैं। खुद की निजी जिंदगी में भी अभ्यास के अनेक अनुभवों को हमने जब-तब अनुभव किया है, परन्तु यह अभ्यास आँतरिक जीवन में, आध्यात्मिक जीवन में किस तरह किया जाए में, आँतरिक प्रयास। एक ऐसी होशपूर्ण कोशिश, जिसका मतलब है कि इससे पहले हम बाहर बढ़ें, हमें भीतर बढ़ना चाहिए। पहले हमें अपने केन्द्र में स्थित होने का प्रयास करना चाहिए। पहले हम अपने केन्द्र में स्थित होकर विचार करें और फिर कुछ दूसरा निर्णय करें। यह इतनी बड़ी रूपांतरकारी घटना है कि एक बार जब हम अपने भीतर केंद्रित हो जाते हैं तो सारी बात की अलग दिखाई पड़ने लगती है, सारा-का सारा परिदृश्य ही बदल जाता है।

इस तरह केन्द्र में स्थित होने के लिए क्या करें? इसके जवाब में परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि जप, ध्यान, प्राणायाम आदि योगाभ्यास की सारी प्रक्रियाएं इसीलिए हैं। योग की सभी प्रक्रियाओं का एक ही मतलब है कि आपको अपना परिचय करा दें। आपको अपने में स्थिर कर दें। हालाँकि कभी-कभी यह देखा जाता है कि काफी सालों से जप करने वाले, ध्यान का अभ्यास करने वाले लोगों में भी कोई गुणात्मक मौलिक परिवर्तन नहीं आ पाता। इसकी वजह प्रक्रियाओं का दोष नहीं, बल्कि उनके अभ्यास में खामियाँ हैं। ध्यान रहे योग-प्रक्रियाएं मात्र क्रियात्मक नहीं है, उनमें गहरी विचारणा एवं उच्च भावनाएं भी समावेशित है।

भगवद्गीता में इसके बारे में कहा गया है-

अश्रद्धया हुतं दत्त तप्तस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रिय नो इह॥

‘हे पार्थ, अश्रद्धा से किया गया हवन, दिया गया दान, तपा गया तप और भी जो कुछ आध्यात्मिक क्रिया की गई है, वह सब कुछ असद् है, उसका न कोई परिणाम आध्यात्मिक जीवन में है और न ही इस लौकिक जीवन में।’ इसलिए योगाभ्यास की कोई भी प्रक्रिया हो, उसमें गहरी श्रद्धा और पवित्र विचारणा का समावेश निहायत जरूरी है।

इस संबंध में वृंदावन के संत स्वामी अखंडानंद महाराज का संस्मरण बड़ा ही प्रेरक है। ध्यान रहे कि ये संत परमपूज्य गुरुदेव पर गहरी श्रद्धा करते थे। इनकी एक पुस्तक है, ‘पावन संस्मरण’। इसमें उन्होंने लिखा है कि एक दिन वे ब्रह्ममुहूर्त में बैठकर माला जप रहे थे। उनकी कोशिश यही थी कि ज्यादा-से-ज्यादा मालाएं जप ली जाएं। इस बीच परमहंस जगन्नाथपुरी जी उधर से गुजरे। उन्हें जनसामान्य लोग नेपाली बाबा के नाम से जानते थे। इनका जप देखकर वह बोल पड़े, ‘भला कहीं ऐसे जप किया जाता है।’ उनके वचनों से इनकी आँख खुली। नमस्कार करने पर परमहंस जी ने इन्हें गले लगाया और बोले ‘मंत्र साक्षात भगवान हैं, अपने इष्ट की शब्दमूर्ति है। मंत्र चाहे कोई भी हो, उसे जपने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए। सत्कार के साथ धीरे-गंभीर भाव के साथ मंत्र उच्चारण करना चाहिए। प्रत्येक शब्द का गहराई से उच्चारण करें। इस तरह एक अक्षर से दूसरे अक्षर तक पहुँचने में कुछ समय लगे। जब मन खाली होगा तो उसमें अपने इष्ट का प्रकाश होगा।’

गायत्री महामंत्र को योग साधक अपनी योग साधना का सर्वस्व मानकर अभ्यास करें। मन-ही-मन प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण, साथ ही यह प्रगाढ़ भाव कि इन चौबीस अक्षरों में स्वयं आदिशक्ति जगन्माता अपनी चौबीस शक्यों के साथ समाई है। यह मंत्र स्वयं ही परमशक्ति है। साथ ही साधक को सब कुछ देने में समर्थ है। जप करते समय ही नहीं, जप करने के बाद रह-रहकर साधक के मन में माता का स्मरण होते रहना चाहिए। ध्यान रहे जप के साथ मौन-एकाँत एवं अधिक-से अधिक ब्रह्मचर्य साधक के अभ्यास को दृढ़ करते हैं। यह अभ्यास दृढ़ से दृढ़तर और दृढ़तम कैसे हो, इसके लिए महर्षि पतंजलि वैराग्य का निर्देश देते हैं। वैराग्य क्या है? कैसे किया जाए, इसकी व्याख्या योग साधक अगले माह में पढ़ेंगे।


सिद्धपुरुष हो गए (kahani)

जैन पुराणों में तपस्वी बाहुबली के चरित्र का वर्णन है। उन्होंने इतनी कठोर तपस्या की थी, पर अहंता नहीं छूटी, इसलिए उस साधना से उन्हें शाँति न मिली। महत्त्वाकाँक्षाओं का उन्माद उन पर तब भी चढ़ा रहता था।

उदास बाहुबलि को उनकी बहन ने देखा तो असफलता का कारण ताड़ लिया। उसने आते ही कहा, हाथी की पालकी से नीचे उतरो और समझदारों की तरह जमीन पर चलो।

कथन का मर्म बहन ने समझाया कि अहंता को छोड़ो, आकाँक्षाओं से छुटकारा पाओ, इसके बिना साधना की सफलता नहीं मिल सकेगी।

बाहुबलि ने वैसा ही किया और वे देखते-देखते सिद्धपुरुष हो गए।


गुरुगीता-11 - शंकररूप सद्गुरु को बारंबार नमन

गुरुगीता आध्यात्मविद्या का परमगोपनीय शास्त्र है। हाँ इसे समझने के लिए गहरी तत्त्वदृष्टि चाहिए। यह तत्त्व दृष्टि विकसित हो सके तो पता चलता है कि वैदिक ऋचाएँ जिस सत्य का बोध कराती हैं, उपनिषद् की श्रुतियों में जिसका बखान हुआ है, गुरुगीता में भी वही प्रतिपादित है। अठारह पुराणों में जिन परमेश्वर की लीला का गुणगान है- वही सर्वेश्वर प्रभु शिष्यों के लिए सद्गुरु का रूप धरते हैं। आध्यात्म विद्या के सभी ग्रन्थों-शास्त्रों को पढ़ने का सुफल इतना ही कि अपने कृपालु सद्गुरु के नाम में प्रीति जगे। सन्तों ने इसे कहा भी है-

पढ़िबे को फल गुनब है, गुनिबे को फल ज्ञान। ज्ञान को फल गुरु नाम है, कह श्रुति-सन्त पुराण॥

यानि कि समस्त शास्त्रों को पढ़ने का फल यह है कि उस पर चिन्तन-मनन-निदिध्यासन हो। और इस निदिध्यासन का फल है कि साधक को तत्त्वदृष्टि मिले, उसे ज्ञान हो। तथा ज्ञान का महाफल है कि उसे सद्गुरु के नाम की महिमा का बोध हो। उनके नाम में प्रीति जगे। उन्हें नमन का बोध जगे। यही श्रुति, सन्त और पुराण कहते हैं।

पिछली गुरु-कथा में गुरुभक्त शिष्यों को इसकी अनुभूति कराने की चेष्टा की गयी थी। इसमें बताया गया था कि शिष्य का परम कर्त्तव्य है कि वह अपने सद्गुरु को नमन करें, क्योंकि वही संसार वृक्ष पर आरुढ़ जीव का नरक सागर में गिरने से उद्धार करते हैं। नमन उन श्रीगुरु को जो अपने शिष्य के लिए ब्रह्म, विष्णु, महेश्वर होने के साथ स्वयं परब्रह्म परमेश्वर हैं। शिव रूपी उन सद्गुरु को नमन करना शिष्य का परम कर्त्तव्य है, जो समस्त विद्याओं का उदय स्थान और संसार का आदि कारण हैं और संसार सागर को पार करने के लिए सेतु हैं। वे गुरुदेव भगवान् ही अज्ञान के अन्धकार से अन्धे जीव की आँखों को ज्ञानार्जन की शलाका से खोलते हैं। गुरुवर ही अपने शिष्य के लिए पिता है, माता है, बन्धु हैं और ईष्ट देवता हैं। वे ही उसे संसार के सत्य का बोध कराने वाले हैं। ऐसे परम कृपालु सद्गुरु को शिष्य बार-बार नमन करे और करता रहे।

गुरु महिमा के साथ गुरु नमन की महिमा ही अपरिमित है। इसे गुरुगीता के अगले महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् भोलेनाथ आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

यत्सत्येन जगत्सत्यं यत्प्रकाशेन भाति तत्। यदानन्देन नन्दन्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 36॥

यस्य स्थित्या सत्यमिदं यद्भाति भानुरुपतः। प्रियं पुत्रादि यत्प्रीत्या तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 37॥

येन चेतयते हीदं चित्तं चेतयते न यम्। जाग्रत्स्वप्न सुषुप्त्यादि तस्मै श्री गुरेव नमः॥ 38॥

यस्य ज्ञानादिदं विश्वं न दृश्यं भिन्नमेदतः। सदेकरुपरुपाय तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 39॥

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अनन्यभाव भावाय तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 40॥

सद्गुरु नमन के इन महामंत्रों में गहन तत्त्वचर्चा है। गुरुतत्त्व, परमात्मतत्त्व और प्रकृति या सृष्टि तत्त्व अलग-अलग नहीं है। यह सब एक ही है- भगवान् शिव के वचन शिष्य को समझाते हैं, जिस सत्य के कारण जगत् सत्य दिखाई देता है। अर्थात् जिनकी सत्ता से जगत् की सत्ता प्रकाशित होती है, जिनके आनन्द से जगत् में आनन्द फैलता है, उन सच्चिदानन्द रूपी सद्गुरु को नमन है॥36॥ जिनके सत्य पर अवस्थित होकर यह जगत् सत्य प्रतिभासित होता है, जो सूर्य की भाँति सभी को प्रकाशित करते हैं। जिनके प्रेम के कारण ही पुत्र आदि सभी सम्बन्ध प्रीतिकर लगते हैं, उन सद्गुरु को नमन है॥37॥ जिनकी चेतना से यह सम्पूर्ण जगत् चेतन प्रतीत होता है, हालाँकि सामान्य क्रम में मानव चित्त को इसका बोध नहीं हो पाता। जाग्रत्-स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्था को जो प्रकाशित करते हैं, उन चेतना रूपी सद्गुरु को नमन है॥38॥ जिनके द्वारा ज्ञान मिलने से जगत् की भेद दृष्टि समाप्त हो जाती है। और वह शिव स्वरूप दिखाई देने लगता है। जिनका स्वरूप एकमात्र सत्य का स्वरूप ही है, उन सद्गुरु को नमन है॥39॥ जो कहता है कि मैं ब्रह्म को नहीं जानता वही ज्ञानी है। जो कहता है कि मैं जानता हूँ, वह नहीं जानता। जो स्वयं ही अभेद एवं भावपूर्ण ब्रह्म है उस सद्गुरु को नमन है॥4॥

सद्गुरु नमन के इन महामंत्रों में गहरा तत्त्व विचार है। इनमें वेदान्त का गहन बोध है। इनमें जो कुछ भी गाया है, उसे लौकिक बुद्धि से, कोरे पाण्डित्य से समझ पाना एकदम असम्भव है। इन्हें समझने के लिए शिष्य की श्रद्धा, साधक की आस्था और महातपस्वी की निर्मल चेतना चाहिए। गहरी, परिपक्व व परिष्कृत गुरुभक्ति से इन महामंत्रों का रहस्य मानवीय चेतना में समा सकता है, अन्यथा किसी भी तरह से नहीं। तो सबसे पले इन महामंत्रों को समझने से पहले यह जान लें कि गुरुदेव केवल देह की दृष्टि से ही मनुष्य हैं, अन्यथा उनमें कोई मानवीय भाव नहीं है। उनका शरीर तो मनुष्य का है-परन्तु उसमें विद्यमान चेतना सर्वथा ईश्वरीय है। उनके जीवन के सम्पूर्ण क्रियाकलाप ब्राह्मी चेतना की ही अभिव्यक्ति है। इस सत्य को आत्मसात करने पर ही यह समझना सम्भव होता है कि ब्राह्मी चेतना के गुण, कर्म, स्वभाव ही अपने सद्गुरु के गुण-कर्म-स्वभाव है। जो ब्रह्म है वही सद्गुरु है। बस फर्क है तो इतना कि ब्रह्म निर्गुण-निराकार और निर्विशेष है। और कृपालु सद्गुरु शिष्यों पर कृपा करने के लिए ब्रह्म का सगुण-साकार और सविशेष रूप है। इसमें भी असलियत यह है कि यह फर्क मात्र दिखता है, आभासी, दिखावटी और बनावटी है, असलियत में है नहीं। असलियत में तो गुरुदेव भगवान् साकार दिखते हुए भी निराकार हैं। एक कमरे में रहते हुए भी सर्वव्यापी हैं। अपनी बाहरी उपस्थिति के बावजूद शिष्यों के अन्तःकरण के स्वामी और अन्तर्यामी हैं।

परम कृपालु सद्गुरु की देह में जिस ब्रह्म चेतना का आवास-अधिष्ठान है, वही जगत् का कारण है। उसी के सत्य से जगत् की सत्ता और आनन्द है। उसी से सभी तत्त्व और सत्य प्रकाशित है, वही सारे सम्बन्धों का आधारभूत कारण है। चेतना की सभी अवस्थाएँ सद्गुरु चेतना से ही चैतन्य है। गुरु ही शिव है, वही विश्वरूप है। उनके इस स्वरूप को जानना अति कठिन है। कोरे बुद्धिपरायण लोग भला उनकी महिमा को क्या जाने। जो उनके लौकिक क्रिया कलापों को देखकर समझकर यह कहता है कि मैं जान गया, वह उन्हें बिल्कुल भी नहीं जानता। जो भक्तिपूर्ण हृदय से उन्हें समर्पित हो जाता है, और यह कहता है कि हे प्रभु! मैं अज्ञानी आपको भला क्या जानूँ, वही उन्हें जानने का अधिकारी होता है। वही ब्रह्म है, उन्हें जानकर सब कुछ जान लिया जाता है। उन्हें नमन ही शिव-शक्ति और सृष्टि को नमन है। गुरु नमन के सत्य को जान लेने पर अन्य कुछ भी जानना शेष नहीं रहता। गुरु नमन मंत्रों की शृंखला अभी और भी है, जो क्रमशः अगले अंक में प्रकाशित होगी, तब तक गुरुभक्त साधक गुरु नमक में समाये तत्त्वचिन्तन पर मनन निदिध्यासन का क्रम बनाये रखें।


VigyapanSuchana

विशेष ज्ञातव्य

अभियान साधना को दो वर्ष पूर्व युगसंधि महापुरश्चरण की पूर्णाहुति के बाद आरंभ किया गया था। इसमें एक वर्ष में पाँच लक्ष्य का गायत्री जप पूरा किया जाता है। किसी भी मास की शुक्लपक्ष की एकादशी से आरंभ कर इसे एक वर्ष तक नियमों के साथ संपन्न किया जाता है। नियम बड़े सरल हैं। माह की दोनोँ एकादशियों में उपवास एवं प्रत्येक एकादशी में दिन में 24 गायत्री मालाएं की जाती हैं। दस-दस दिन की तीन नवरात्रियों में प्रतिदिन 24 माला के हिसाब से 24000 का जप। शेष 306 दिनों में दस माला प्रतिदिन तथा प्रति रविवार पाँच माला अतिरिक्त। नवदुर्गाओं, एकादशी व गुरुवार या रविवार के दिन विशेष वर्णनाएं हैं। शेष दिन सामान्य क्रम में रहा जा सकता है। इस वर्ष भी 11 जून गायत्री जयंती के दूसरे दिन से पुनः एकवर्षीय अभियान साधना वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, अपने कष्टों का निवारण करने के लिए आरंभ की जा सकती है। प्रतिदिन न लिख सकें तो रविवार को न्यूनतम चौबीस गायत्री मंत्र भी लिखने का अभ्यास करें। विस्तार हेतु गायत्री महाविज्ञान (संयुक्त) का पृष्ठ 271 देख लें। हमारा अनुरोध है कि जितने अधिक साधक आरंभ कर सकें, वे करें व इसकी सूचना शाँतिकुँज, हरिद्वार को भी दे दें।


युगगीता-44 - ज्ञानीजन क्षणिक सुखों में रमण नहीं करते

(कर्म संन्यास योग नामक गीता के पाँचवें अध्याय की दसवीं किस्त)

आत्मज्ञान द्वारा साधक पापों से मुक्त हो मोक्ष को प्राप्त हो जाता है (ज्ञाननिर्धूत कल्मषाः) यह प्रस्तुति विगत अंक में की गई थी। जब तक मानव को घेरती रहने वाली वासनाएं ज्ञानाग्नि में दग्ध (भस्म) नहीं होगी, तब तक विभिन्न योनियों के चक्कर लगाने ही पड़ेंगे, यह सुनिश्चित है। यह तथ्य श्रीकृष्ण 16, 17वें श्लोक में स्पष्ट करते हैं। आत्मतत्वज्ञ व्यक्ति (पंडित) बन जाने पर दिव्यकर्मी की समदृष्टि विकसित हो जाती है। वह सबके भीतर एक ही समष्टि में संव्याप्त परमात्मचेतना की अनुभूति करने लगता है, चाहे वह विद्या-विनय संपन्न ब्राह्मण हो, गाय जैसा पवित्र प्राणी, हाथी, कुत्ता अथवा चाँडाल। अठारहवाँ श्लोक इस मर्म का परिचय हमें कराता है। आद्यशंकर एवं स्वामी विवेकानंद के उदाहरणों से बताया गया था कि भेदबुद्धि को हमें कैसे मिटाना चाहिए। आगे 19वें व 20वें श्लोक की व्याख्या के साथ यह बताया गया था कि परमात्मा में ब्रह्मभाव से स्थित व्यक्ति सारे संसार के विजेता कहलाते हैं। वे जल्दी ही दिव्यकर्म करते हुए भवबंधनों से मुक्त हो जाते हैं। जीवन-मुक्त होते हुए वे न तो प्रिय को प्राप्त कर प्रसन्न होते हैं, न अप्रिय को प्राप्त कर उद्विग्न होते हैं। ब्रह्म में स्थित (ब्रह्मणि स्थितः) होने के कारण समस्त कुँठाओं, तनाव, संत्रास से वे मुक्त हो जाते हैं। हर व्यक्ति का लक्ष्य ऐसे ही दिव्यकर्मी बनने का होना चाहिए। अब आगे बढ़ते हैं।

अक्षय सुख की प्राप्ति

श्री भगवान का यह प्रतिपादन है कि आत्मज्ञान प्राप्त होते ही व्यक्ति व्यर्थ की मानसिक उलझनों से मुक्त हो जाता है। ऐसे व्यक्ति में दो विशेषताएं विकसित होती हैं- 1. ममत्व भाव, सभी के प्रति एक जैसा भाव, सभी में उसी परमात्मचेतना को संव्याप्त मानना तथा 2. दुःख-सुख की पराकाष्ठा में तनिक भी विचलित न होना। ऐसा व्यक्ति जो जीवन जीता है, वह बिना किसी प्रतिक्रिया का होता है। अगला श्लोक दिव्यकर्मियों के लिए बड़े शुभ संकेत लेकर आता है। कर्म करते हुए बिना फल की आकाँक्षा करते हुए जीवन जीते चलने के सत्परिणाम क्या होते हैं, यह यहां इस अध्याय की पराकाष्ठा में स्पष्ट होने लगता है। श्लोक इस प्रकार हैं-

बाह्मस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। प ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥5/21॥

बाहरी विषयों के स्पर्श से (बाह्यस्पर्शेषु), अनासक्त चित्त (असक्तात्मा), ब्रह्म में ही स्थित, ब्रह्म में संलग्न (ब्रह्मयोगयुक्तात्मा) वह योगी (सः) आत्मा में (आत्मनि) जो नित्य सुख (यत् सुखं) पाता है (विन्दति), वह (सः) अक्षय (अक्षयं) सुख (सुखं) के रूप में प्राप्त होता है (अश्नुते)॥

बाहर के विषयों में आसक्तिरहित अंतःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्विक आनंद है, उसको प्राप्त होता है। तदुपराँत वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा के ध्यानरूप योग में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनंद की अनुभूति करता है। 5/21 और भी भाव रूप में देखें तो भाव हुआ, ‘बाह्य विषयों में अनासक्त चित्त ब्रह्म में संलग्न योगी आत्मा में जो नित्य सुख पाते हैं, वह अक्षय आनंदरूप है।’

यह जो अक्षय आनंद है, हर व्यक्ति का, साधक का इष्ट है, किन्तु हर आदमी बहिरंग साधनों में खोजता है, यही सबसे बड़ी विडंबना है। अतः सबसे पहले बहिरंग के प्रति अनासक्ति का भाव विकसित करना होगा, फिर स्वयं को ब्रह्म से हर पल जोड़े रहना होगा। तद्रूप बनना होगा, तब ही वह कभी समाप्त न होने वाला (अक्षय) आनंद प्राप्त होगा। इस श्लोक में एक शब्द आया है, ‘ब्रह्मयोगयुक्तात्मा’ जिसका मन पूर्णतः आत्मा में ही रमण करे। ऐसा साधक-दिव्यकर्मी भोगवादी जीवन अस्वीकार कर देता है, क्योंकि वही सब प्रकार के दुःखों का मूल है।

अनासक्ति एवं ब्रह्म में स्थिति

अंतः आँतरिक उल्लास, जीवनरूप में ब्रह्म का एक अंश होने का संतोष तथा कभी नष्ट न होने वाला आनंद पाना हो, शाँति प्राप्त करनी हो तो एक ही राजमार्ग पकड़ना होगा, बाहरी विषयों के स्पर्श से अनासक्ति। इसी का उत्तरार्द्ध है स्वयं को ब्रह्म में स्थित करना, ब्रह्मज्ञान लाभ प्राप्त कर उसी में निरंतर रमण करने रहना (ज्ञानं लब्ध्वा पराँ शान्तिम् अचिरेणाधिगच्छति-श्लोक 39, अध्याय 3) आत्मज्ञान को प्राप्त होते ही नित्य सुख की प्राप्ति, शाँति व अक्षय आनंद सुनिश्चित उपलब्धियों के रूप में हस्तगत हो जाते हैं। यह अंदर का आनंद इसकी अनुभूति ही सिद्ध साधन को बहिरंग भौतिकवादी जीवन की उपेक्षा कर उससे ऊपर उठ अध्यात्मवादी जीवन जीने की प्रेरणा देती है। फिर ऐसा व्यक्ति बहिरंग संसार की क्रियाओं के प्रति अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। निंदा से अप्रसन्न नहीं होता एवं यश प्राप्ति से, सम्मान से अति हर्षित नहीं होता। अपना समस्वरता वाला स्वरूप बनाए रखता है। फिर वही ऐसा एक दिव्यकर्मी बन जाता है जो संसार में श्रेष्ठतम कर्म करता चलता है एवं दिव्य शाँति को प्राप्त होता है।

परमहंस देव ठाकुर श्रीरामकृष्ण ने कहा है, ‘सच्चे संन्यासी वही हैं, जिनके मन, प्राण, आत्मा सभी परमात्मा में लीन हो गए हैं। जो कामिनी-कंचन का त्यागी है, वही साधु कहने योग्य है। साधु सदा ईश्वर की चिंता करते हैं। ईश्वर संबंधी बातों के अतिरिक्त अन्य कोई बात नहीं करते और सर्वभूतों में ईश्वर संव्याप्त है, यह मानकर उनकी सेवा करते हैं।’ हम लोग ‘ब्रह्मसत्यंजगन्मिथ्या’ कहते रहते हैं, पर क्या उसे समझ पाते हैं? लोगों ने समझा कि जगत बेकार है इसे किसी भी हालत में नहीं देखना चाहिए। ब्रह्म की सत्य है, यही मानना चाहिए, परन्तु आद्यशंकर ने जब इसकी व्याख्या की तो यह उनका आशय नहीं था। उनका कथन था कि जगत के रूप में भोग करते हुए, साधन-सामग्री के रूप में जगत को पाकर फूले न समाना गलत है। साधन न मिलने पर दुखी हो जाना गलत है। यह एक प्रकार से मिथ्या आचरण है। यदि हम जगत के सही स्वरूप को समझ सकें तो कभी भी दुखी नहीं होंगे।

भर्तृहरि के तीन शतक

भर्तृहरि ने तीन शतक लिखे हैं। नीतिशतक, शृंगारशतक और वैराग्यशतक। पहला शतक उसने तब लिखा जब उनके पिता ने राज्य खो दिया। उस राज्य को कैसे पाया जाए, हूणों से उसे छुड़ाया कैसे जाए और जीतने के लिए कौन-सी नीति अपनाई जाए, यह बना नीतिशतक। रानी पिंगला के प्रेम के प्रेम में डूबे रसिक भर्तृहरि ने लिखा शृंगारशतक। तीसरा तब लिखा जब उसने पिंगला का वास्तविक रूप देखा व उन्हें जीवन से वैराग्य हो गया। शृंगार से वैराग्य का जन्म हुआ। उसने लिखा-

भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयम्। रूपे जराया भयं, वैराग्य मेवाभयम्॥

यह श्लोक जीवन जीने की कला का सूत्र देता है। रोग भोगने से व कुलीन जाति से नीचे गिरने पर भय पैदा होता है। रूपवान हैं तो बुढ़ापे का डर है। वैराग्य है तो किसी प्रकार का भय नहीं होना चाहिए। वैराग्य आ गया तो अभय आ जाता है। यहाँ जीवन का निष्कर्ष निकल आता है। इसीलिए भगवान बार-बार कह रहे हैं कि साँसारिक स्पर्श सुखजन्य भोगों से ऊपर उठकर कर्मयोग में निरत होने में ही भलाई है।

ब्रह्मयोग युक्तात्मा

योगेश्वर श्रीकृष्ण ‘ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः’ (श्लोक 20) से आगे चलकर यहाँ ‘ब्रह्मयोगयुक्तात्मा’ की चर्चा करते हैं और फिर यहाँ से चलकर आगे के नौ श्लोकों में ब्रह्मनिर्वाण और उससे प्राप्त होने वाली शाँति की चर्चा (शाँति निर्वाणपरमाँ) करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा ही व्यक्ति अक्षय सुख का भोग कर सकता है, जिसकी आत्मा ब्रह्म के साथ योग द्वारा कर सकता है, जिसकी आत्मा ब्रह्म के साथ योग द्वारा युक्त है। जो अनासक्ति योग को जीवन में, प्रतिफल आचरण में उतारता हो। अनासक्त होना अत्यधिक आवश्यक है। काम, क्रोध, लोभ, मोह से छुटकारा मिले बिना सच्चा सुख मिल पाना संभव नहीं है। यह सुख और जीवन का समत्व (संतुलित व्यवस्थित जीवन-समत्वं योग उच्यते, इक्वीलिब्रियम इज योगा) मनुष्य को यदि पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) को प्राप्त नहीं होना है, तो इसी जीवन में, इसी काया में रहते हुए भ्राँति है कि पूर्ण मुक्ति शरीर छोड़ने के बाद (काशी करवट या अन्य) प्राप्त होती है।श्री अरविंद इसे ‘निम्न विक्षुब्ध प्रकृति का दासत्व’ कहते हैं। पूर्ण आध्यात्मिक स्वतंत्रता का लाभ और उपभोग गीता का योग जीवन में उतारने पर इसी जगत में, इसी मानव जीवन में, इसी देह के रहते संभव है।

आत्मानंद, निर्वाण के सुख की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए योगेश्वर एक प्रकार से गर्जना करते हुए अपने अगले श्लोक में एक प्रकार से यह उद्घोष कर देते हैं कि इन्द्रिय सुखों का भोग दुःख लाता है एवं यदि मनुष्य बुद्धिमान है, प्रज्ञावान है, (बुधः) आत्मबोध को प्राप्त है तो वह उनमें लिप्त नहीं होगा।

अगला बाईसवाँ श्लोक कहता है-

ये हि संर्स्पशजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥ -5/22

हे अर्जुन (कौंतेय), इन्द्रियों के साथ विषयों के संयोग से उत्पन्न (संस्पर्शजा) जो भोग सुख हैं (ये भोगाः) वह सब (ते) दुःख के ही कारण हैं (दुःखयो नमः एव) और उत्पत्ति विनाशशील अर्थात् एकदम अनित्य है (आद्यन्तवन्तः)। (इसलिए) उन क्षणिक विषयानंदों में (तेषु) ज्ञानी व्यक्ति (बुधः) आकर्षित नहीं होते, उस ओर विचलित नहीं होते (न रमते)।

भावार्थ हुआ-हे कुँतीपुत्र, जो ये इंद्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप में प्रतीत होते हैं तो भी ये दुःख के ही हेतु हैं और आदि अंत वाले अनित्य हैं, इसलिए बुद्धिमान विवेकी ज्ञानी पुरुष उनमें रमण नहीं करता।

विषय सुख-दुःख के हेतु

कितनी बड़ी भ्राँति है कि इंद्रियजन्य भोगों, विषय सुखों को ही मनुष्य सब कुछ मान बैठता है। कुत्ता अपनी प्रिय वस्तु हड्डी चबाता रहता है। उसे और तो कुछ नहीं मिलता। अपने ही दाँतों-मसूड़ों से आने वाले रक्त का वह स्वाद लेता रहता है, यह मान लेता है कि इसी से आ रहा है। स्वयं को जख्मी और कर लेता है। क्या मनुष्य की स्थिति भी ऐसी नहीं है। भोगवादी, उपभोक्ताप्रधान जीवनशैली आज के युग में बहुसंख्य व्यक्ति इसी सुख को, जो उन्हें इंद्रिय विषयों के संयोग से प्राप्त होता है, सभी कुछ आराध्य आनंद की तलाश में अपना सब कुछ खो बैठते हैं। फिर भी यह नहीं समझ पाते कि ये सभी सुख अनित्य हैं, क्षणिक है। इसीलिए उनकी गिनती अज्ञानियों में की जाती है। परमपूज्य गुरुदेव उनकी गिनती नरकीटक, नरपशुओं में करते हैँ, जो मात्र शिश्नोदरपरायण (पेट प्रजनन का) जीवन जीते हैं।

न तेषु रमते बुधः

देखना, सुनना, सूँघना, स्पर्श करना, प्यार करना, सोचना (कपोल कल्पनाएं करते रहना) ये सब-के-सब हमारी ज्ञानेंद्रियों-कर्मेंद्रियों के नित्य व्यापारों की श्रेणी में आते है। हमारी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक उपाधियों के अपने-अपने विषयों के साथ संपर्क के ये परिणाम हैं। विषय, भावनाओं और विचारों का यह संसार निरंतर परिवर्तित होता रहता है। प्रत्येक का आदि भी है, अंत भी। इसीलिए इनसे प्राप्त सुख या आनंद क्षणभंगुर है। इन अनित्य नाशवान क्षणिक सुखों में बुद्धिमान मनुष्य, ज्ञानीजन नहीं उलझते (न तेषु रमते बुधः)।

ज्ञानी उसे कहते हैं, जो एक निराले ही संसार में रहता है। वहाँ उसे अखंड आनंद, शाँति और प्रसन्नता की सतत अनुभूति होती रहती है। वह स्वतंत्र होकर कर्म करता रहता है। हम लोग प्रतिक्रियाओं से अलग नहीं रह पाते, लेकिन वह उनसे परे चलता है, क्योंकि उसे आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है। हम वासनाओं के दास हैं, वह उनसे मुक्त है। यदि हम भी उसके समान बनना चाहते हैं तो हमें अपने स्व का विस्तार कर, अहंता, वासना, तृष्णा के भवबंधनों से पार चलना सीखना होगा।

युवाशक्ति का योगपथ हेतु आह्वान

इक्कीसवीं सदी में जी रहे हर युवक का श्रीकृष्ण इन पंक्तियों के माध्यम से आमंत्रण करते हैं। क्या आज का आधुनिक युवक उपभोक्तावादी सभ्यता के आकर्षण से ऊपर उठकर एक महान यात्रा पर चल पड़ने के लिए तैयार हैं? क्या उसके अंदर इतना साहस है? क्या उसे अपने शक्तिस्रोत की जानकारी है? किशोरावस्था से गुजरकर युवा बनने की दिशा में अग्रसर जीव एक संधिवेला से गुजरता है, जहाँ इन आकर्षणों की दुनिया का उसे भी आमंत्रण मिलता है। धन और सुरा का आधुनिक भोग की सामग्रियों का आकर्षण, चमचमाती कारें, वासनात्मक आकर्षण, रातोरात करोड़पति बनने की ललक, चकाचौंध करने वाली लाइट्स, सत्ता का, लालबत्ती नीली बत्ती का प्रलोभन, भ्रष्टाचार की कमाई से प्राप्त होने वाला सुख यह सभी एक विराट जंगल के समान है, जिनमें से हर युवा को गुजरना होता है। एक पवित्र, दिव्य यात्रा के लिए कुछ सोचने का समय उसके पास है क्या? यह प्रश्न आज की जवानी, कल के नागरिकों के समक्ष है।जो अपना जीवन भोग में खपा चुके, जो उत्तरार्द्ध किसी तरह समय काटकर जी रहे हैं, उनसे तो इतनी ही अपेक्षा की जा सकती है कि वे यथाशीघ्र ज्ञान के मार्ग पर लौटें। वासनात्मक, तृष्णाप्रधान जीवन से जीर्ण शीर्ण इन लोगों से कुछ और अपेक्षा भी नहीं की जा सकती, परन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण युवा अर्जुन से, परमपूज्य गुरुदेव हर उस युवा चिंतन वाले, अभीप्सा रखने वाले अध्यात्म मार्ग के पथिक से अपेक्षा रखते हैं कि क्या वह यह पथ अपनाने का साहस करेगा? अध्यात्म को क्षुरस्य धारा पंथ (छुरे की धार पर चलने वाला मार्ग) कहा गया है। यदि कुछ मुट्ठी पर व्यक्ति भी इस मार्ग पर चलने का साहस करते हैं तो उन्हें आगे आकर भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन करना चाहिए, स्वयं को बुधः पुर लोकनायक की श्रेणी में बिठाना चाहिए। तभी हम इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य एवं भारत को विश्व का जगद्गुरु, महानायक बनने की अपेक्षा रख सकते हैं।

यो वै भूमा तत्सुखम्

हमारे उपनिषद् भी श्री गीता जी के इस बाईसवें श्लोक की हर बात का समर्थन करते प्रतीत होते हैं। छांदोग्योपनिषद् लिखता है, ‘नाल्पे सुखमस्ति, यो वै भूमा तत्सुखम्’ अर्थात् छोटी वस्तुओं में सुख नहीं है। सुखस्वरूप तो भूमा है अर्थात् सर्वत्र संव्याप्त आत्मा। इसी में, सर्वहितार्थाय ही जीकर हमें सुख प्राप्त करना चाहिए। आगे उपनिषद् और लिखता है, ‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कदाचन्’ अर्थात् आनंदस्वरूप ब्रह्म को जानकर योगीगण निर्भय हो जाते हैं। ठाकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस कहते हैं, ‘जब ईश्वरदर्शन होने लगता है तो रमण सुख अर्थात् विषयानंद से कोटि गुना अधिक आनंद मिलता है। आत्मा से ब्रह्म की अभिन्न रूप से अपरोक्ष अनुभूति होने पर निर्विकल्प समाधि में जिस प्रकार के आनंद की अनुभूति होती है, उसका कुछ आभास मात्र ही विषयजन्य सुख में मिलता है, जो कि बाद में दुःख-ही-दुःख छोड़ जाता है।’

चिरस्थायी ब्रह्मानंद पाएं

एक अति कामुक भी ब्रह्मानंद की अनुभूति होने पर कैसे विषयों से दूर हो सकता है, इसका एक उदाहरण श्रीरंगम् (दक्षिण भारत) के एक डाकू के जीवन से मिलता है। रामानुजाचार्य के समय की यह घटना है। इस डाकू का आकर्षण एक वेश्या के प्रति हो गया। वह उस अतिसुन्दर स्त्री के पीछे छाता लेकर चलता। कहीं शरीर धूप में काला न पड़ जाए। सभी उसकी इस प्रवृत्ति को देखकर हंसते, पर उसके क्रूर स्वभाव के कारण कुछ कह न पाते। संयोग से रामानुज उधर से गुजरे। श्रीरंगम् के दर्शन हेतु जा रहे थे। शिष्यों के द्वारा उक्त विवरण सुनकर बोले, ‘भाई, ऐसा नाटक क्यों करते हो? क्यों इस महिला के पीछे दौड़ते हो?’ वह बोला, ‘बड़ी सुन्दर है। मन को अच्छी लगती है।’ संतश्री बोले, ‘यही आनंद तुम्हें और भी ज्यादा अधिक समय तक मिलने लगे तो क्या इसे छोड़ दोगे?’ हाँ में उत्तर सुनकर योगबल से उनसे उस डाकू को श्रीकृष्ण की सुन्दर झाँकी का दर्शन कराया। दोनों ये दर्शन किए। जो आनंद प्राप्त हुआ, वह सहस्रों गुना अधिक था। संतश्री ने आशीर्वाद दिया कि अब इस स्त्री को अपनी पत्नी बना लो और दोनों इसी झाँकी का आनंद लेकर जनसेवा में लग जाओ। ऐसा ही हुआ। श्री रामानुजाचार्य जब स्नान हेतु जाते तो संन्यासियों के कंधों पर हाथ रखकर, किन्तु लौटते तो उस डाकू के कंधे पर हाथ रखकर। कहते ब्रह्मानंद की एक झलक पाकर शुद्ध हो गया है, अन्दर से पवित्र हो गया है। यह घटना उस क्षेत्र में बड़ी प्रख्यात हुई। इसी प्रकार तुलसीदास के मित्र नाभादास भी एक महिला के प्रेम में विक्षिप्त समान थे। श्री वल्लभाचार्य ने प्रेरणा दी, ब्रह्मानंद की अनुभूति कराई, उसके बाद उनके जीवन की दिशा ही बदल गई। हमें भी प्रेरणा लेनी होगी कि हम अज्ञान से ज्ञान की ओर यात्रा करें। क्षणिक आनंद में नहीं, चिरस्थायी आनंद, ब्रह्मानंद हेतु प्रयास करें। हम ‘बुधः’ आत्मबोध को प्राप्त ज्ञानी बनें। यह ध्यान रखें कि पंडितजन, ज्ञानी, विवेकवान व्यक्ति अनित्य दुःखों के हेतु, विषयभोगों के चक्कर में न पड़कर ब्रह्मयोग मुक्तात्मा ही बनते हैं एवं ब्रह्मानंद की प्राप्ति करते हैं। जीवन-मुक्ति के इन्हीं प्रसंगों की चर्चा अगले श्लोकों के साथ अगले अंक में। (क्रमश:)


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अनुरोध

अंग्रेजी की ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका शाँतिकुँज से संपादित होकर अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी मथुरा (उ.प्र.)-281003 से प्रकाशित होना आरंभ हो चुकी है। अभी तक जनवरी-फरवरी तथा मार्च-अप्रैल के दो संस्करण आ चुके। वर्ष में 6 बार निकलने वाली यह द्विमासीय पत्रिका नए प्रबुद्ध पाठकों तक पहुँचाई जानी चाहिए। इसका वार्षिक मूल्य साठ रुपये (विदेश के लिए छह सौ रुपये) है। चंदा अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी, मथुरा भेजें तथा पत्रिका में सुधार-मार्गदर्शन हेतु सुझाव संपादक के नाम हरिद्वार भेजें। अधिकाधिक पत्रिका के पाठक बढ़ें, यही इस गायत्री जयंती पर सभी व्रत लें।


चेतना की शिखर यात्रा-16 - बलिहारी गुरु आपुनो-4

श्रीराम का अपनी सूक्ष्मशरीरधारी हिमालयवासी गुरुसत्ता से पंद्रह वर्ष की आयु में (1926 वसंत पर्व) साक्षात्कार हुआ और उनसे जो भी कुछ अपने शिष्य को बताया, वह तीन किश्तों में पढ़ा जा चुका। अब इस प्रकरण की समापन किश्त।

मार्गदर्शक सत्ता का आदेश

‘जो कबीर था, जो रामदास था और जो रामकृष्ण था, वही तुम हो। यह अंतर्दर्शन थकाने या चमत्कृत करने के लिए नहीं हैं।’ प्रकाश की भाँति ही दिखाई दे रही उस मार्गदर्शक सत्ता के होंठ हिले। उस कंपन से जो निर्देश प्रस्फुटित हो रहे थे, उनमें कोई ध्वनि नहीं थी। परावाणी भी नहीं कह सकते, क्योंकि उसके लिए होठों के कंपन भी आवश्यक नहीं। नाभि या हृदय से उद्धृत पश्यंती स्तर की यह वाणी केवल उसी व्यक्ति को सुनाई देती है, जिसके लिए वह निःसृत होती है। गुरुदेव कह रहे थे, ‘अभी तुम्हारे लिए एक ही प्रेरणा है, इसे निर्देश भी मानें। यह प्रेरणा है-साधना।’

सहज और सामान्य भाव से बैठे श्रीराम के मन में जिज्ञासा उठी। उसे कुतूहल भी कह सकते हैं। मार्गदर्शक सत्ता से प्रथम दृष्टि में ही परिचय इतना प्रगाढ़ हो गया भी मान सकते हैं कि अटपटा प्रश्न पूछने में भी कोई संकोच न हो। साधना में बैठे श्रीराम ने अपनी मार्गदर्शक सत्ता से पूछा, ‘हम तो आपको खोजते हुए नहीं आए थे। आपने हमें क्यों ढूँढ़ा और अचानक साधना का आदेश क्यों दिया? किस तरह की साधना?’ कहते-कहते श्रीराम के अधरों पर एक मुसकान खिल उठी।

मार्गदर्शक सत्ता भी मुस्कराई। घनी और लंबी मूछों के पीछे छिपे होठों पर वह मुसकान साफ दिखाई देती थी। उन्होंने कहा, ‘गुरु की शिष्य को खोजता है। शिष्य गुरु को नहीं। पिछले कई जन्मों की यात्रा तुमने इस शरीर के साथ संपन्न की है। इसके साथ अंगुली पकड़कर चले हो। अब होश संभाला और यात्रा करने की स्थिति में आए तो हमने तुम्हें पकड़ लिया।’ उस दिव्य आभामंडल से जब यह ‘शरीर’ संबोधन सुनाई देता था तो संकेत उस आभामंडल की ओर रही होता था।

‘यह तुम्हारा दिव्य जन्म है। इस जन्म में भी हम तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे, सहायक रहेंगे। तुमसे वह सब कराएंगे, जो युगधर्म की स्थापना के लिए आवश्यक है।’ उस दिव्य आत्मा ने श्रीराम के इस जीवन का क्रम निर्धारण जैसे पहले ही कर रखा था। कहने लगे, ‘ईश्वर को जिनसे जो काम लेना होता है, उसके लिए आवश्यक बल और साधन भी पहले से ही तैयार रखते हैं, लेकिन वे अनायास ही नहीं मिल जाते। उनके लिए साधना का पुरुषार्थ करना ही पड़ता है।’

‘आज से और अभी ने अपने आपको विशिष्ट साधना में सन्नद्ध करो। साधना का एक चरण चौबीस वर्ष तक महापुरश्चरण की शृंखला चलाने के रूप में है। एक वर्ष में गायत्री महामंत्र के चौबीस लाख जप का एक महापुरश्चरण संपन्न करना है। आहार-विहार में संयम ही पर्याप्त नहीं है। उसके लिए तपश्चर्या का अनुशासन भी अपनाया जाना चाहिए। वह अनुशासन नियत कर दिया गया है। जौ के आटे से बनी हुई रोटी और गाय के दूध से बना मठा। शरीर चल जाए, इतना ही आहार लेना है। स्वाद और गंध के साथ आहार में पौष्टिकता पर भी ध्यान नहीं देना है। सौंपे गए कार्यों के लिए जितना स्वास्थ्य और ओज चाहिए, उसकी पूर्ति दिव्य शक्तियाँ करती रहेंगी।’

चल पड़ा कठोर तप

उपासना का जो क्रम निर्धारित हुआ, वह कम-से-कम छह घंटे चलने वाला था। मार्गदर्शक सत्ता ने जिस दिन साधना में नियोजित किया, उस दिन वसंत पंचमी थी। निर्धारित उपासना संपन्न हो चुकी थी। जप निवेदन के बाद विसर्जन और समर्पण का विधान ही शेष रह गया था। श्रीराम ने उस उपचार को स्थगित किया और निर्दिष्ट क्रम के अनुसार आगे का जप आरंभ किया। एक वर्ष में 24 लाख जप का अनुष्ठान संपन्न करने के लिए छियासठ मालाओं का जप (लगभग सात हजार बार गायत्री मंत्र का उच्चारण) आवश्यक है। उस दिन सूर्योदय के बाद करीब पाँच घंटे तक बैठे रहे, साधना करते रहे।

जब कब पूरा हो गया, कुछ पता ही नहीं चला। जप और सविता देवता के ध्यान के समय साधना के संबंध में तरह-तरह की जिज्ञासाएं उठी। उन्हें पूछने के लिए शब्द नहीं तलाशने पड़े। बिना पूछे ही प्रश्न संप्रेषित हो गए और उस दिव्य आत्मा के सान्निध्य में समाधान भी अपने आप होते गए। एक जिज्ञासा थी गुरुदेव कहाँ रहते हैं? उत्तर आया, हिमालय के हृदय देश में। वहाँ सामान्य शरीर से किसी का भी पहुँच पाना संभव नहीं है। स्थूलशरीर की सीमा है। वह सामान्य दुर्गम प्रदेशों में भी नहीं जा सकता। हिमालय का हृदय प्रदेश कहे जाने वाले क्षेत्र में असंभव ही है। सामान्य सूक्ष्मशरीर से पहुँचना भी मुश्किल है।

समाधान के अगले चरण में यह भी स्पष्ट हुआ कि गुरुदेव का स्थूल स्वरूप सैकड़ों वर्ष पुराना है। उसका परिचय और इतिहास लगभग अविज्ञात है। उस शरीर से किए गए काम ही आज उनका परिचय बने हुए हैं। इतिहास की खोजबीन की जा रही है, लेकिन वह अब भी अधूरी है। कुछ प्रमाणों के अनुसार उनका दैहिक स्वरूप साढ़े छह सौ या सात सौ वर्ष पुराना है। कुछ के अनुसार ढाई हजार साल से भी ज्यादा प्राचीन है। अनुष्ठान के पहले दिन, प्रारंभ में ही उत्कंठा जगी कि उस स्वरूप का परिचय प्राप्त किया जाए, लेकिन उत्तर में एक सन्नाटा ही सुनाई दिया। उस सन्नाटे में सिर्फ एक बोध तैर रहा था कि सर्व के अधिपति ईश्वर की सत्ता का जो निर्विकार आनंद है, वही गुरुदेव के परिचय का प्रतीक है। हृदय प्रदेश के जिन साधकों या सिद्धों ने अपनी सूक्ष्म उपस्थिति के प्रमाण दिए थे, उन्होंने गुरुदेव का नाम स्वामी सर्वेश्वरानंद बताया था।

स्थूल की सीमा और आवश्यकता

गुरुदेव जैसे कह रहे थे, स्थूल से एक सीमा तक ही काम किया जा सकता है। वे कितने ही महान और विराट हों, उनसे दिव्य प्रयोजन सिद्ध नहीं होते। दिव्य प्रयोजनों के लिए शरीर को सूक्ष्म स्तर तक ले जाना और सिद्ध करना पड़ता है। कठोर तपश्चर्या का उद्देश्य शरीर को सूक्ष्म स्तर तक ले जाना ही है।

अव्यक्त रूप से ही प्रश्न उठा, स्थूलशरीर की विशेष उपयोगिता नहीं है तो इस शरीर को बचाए क्यों रखा जाए? सीधे सूक्ष्म में ही विलय क्यों नहीं कर दिया जाए, इस प्रश्न का समाधान भी जैसे हृदय प्रदेश से आया, स्थूलशरीर का भी अपना महत्त्व है। यह ठीक है कि स्थूलशरीर की बहुत सी शक्ति तो शरीर की आवश्यकताएं जुटाने में ही लग जाती है। रोग, बीमारी, दुर्बलता और एक अवस्था के बाद आने वाली ‘जरा’ शरीर को ज्यादा काम नहीं करने देती। शरीर की अधिकाँश ऊर्जा इसे संभालने और चलाने में ही खर्च हो जाती है। फिर भी उसका उपयोग है। दिखाई देने वाले काम इस स्थूलशरीर से ही पूरे होते हैं।

जिस क्षेत्र में गुरुदेव का, मार्गदर्शक सत्ता का निवास है, क्या वहाँ जाया जा सकता है? मन में यह प्रश्न उठा ही था कि क्या वहाँ जाया जा सकता है? मन में यह प्रश्न उठा ही था कि तत्क्षण उत्तर आया। तत्क्षण कहना भी गलत होगा, प्रश्न के साथ ही समाधान भी आ गया। चेतना में समय और सीमा तो रह नहीं गई थी, इसलिए यह भी कहा जा सकता है प्रश्न और उत्तर में पहले शायद उत्तर ही आया हो। कहा गया अथवा प्रतीत हुआ, आश्वस्त किया गया कि उचित समय आने पर तुम्हारा परिचय देवात्मा हिमालय से भी कराया जाएगा। इस शरीर और स्वरूप की कठिनाई है, अन्यथा तुम्हें स्मरण होना चाहिए कि वस्तुतः तुम उसी क्षेत्र के निवासी हो। एक विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए यहाँ भेजे गए। लौकिक कार्य संपन्न करने हैं, इसलिए शरीर का थोड़ा आवरण डाल दिया गया है।

हिमालय का यह हृदय प्रदेश कैलाश के पास स्थित है। वह कैलाश नहीं, जिसे लोग नक्शे पर चिह्नित करते हैं। सिद्धजनों का कैलाश सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। संत-महापुरुष गोमुख के आस-पास निवास करते हैं। केदार क्षेत्र में भी उनके लिए उपयुक्त स्थान है। वहाँ रहकर वे सूक्ष्मलोक में जाने की तैयारी करते हैं। सभी लोग नहीं पहुँच पाते। इक्का-दुक्का ही जा पाते हैं। गीता के इस वचन की तरह कि हजारों मनुष्यों में कोई एक ही उसकी प्राप्ति के लिए यत्न करता है। उन यत्न करने वालों में भी एक ही उपलब्ध हो पाता है।

हिमालय का हृदय अध्यात्म चेतना के ध्रुव केन्द्र तक पहुँचने के बारे में भी यही समझना चाहिए। दिया गया साधनाक्रम ठीक से चलने के बाद तुम्हें वहाँ बुलाया जाएगा। चार दिन की अवधि के लिए वहाँ रहना होगा। हम ‘मार्गदर्शक सत्ता’ के रूप में साथ रहेंगे। सूक्ष्मशरीर धारण करने और उससे कहीं भी गति करने, प्रवेश पाने में कोई कठिनाई नहीं होगी। वैसी सुविधा-व्यवस्था बना दी जाएगी। प्रथम प्रयास के बाद तुम्हें अनुभव होगा कि अस्तित्व का सूक्ष्म रूप कितना समर्थ और सक्षम है। दोनों शरीरों का, सत्ता में दोनों रूपों का अनुभव करने के बाद तुम्हें आसानी रहेगी। समझ सकोगे कि ऋषिगण अपने संकल्पों को कैसे पूरा करते हैं। सौंपे गए महत्कार्य को संपन्न करने की क्षमता भी तुम उन ऋषिसत्ताओं के सान्निध्य में जा जाग्रत कर सकोगे।

दो और विशिष्ट दायित्व

पुरश्चरण साधना में नियुक्त किए जाने के दिन दो काम और सौंपे गए। वे थे तो महानुष्ठान के ही क्रम में, लेकिन उनका स्वरूप लौकिक ज्यादा था। प्रकाशपुँज से प्रेरणा आ रही थी, गाँव-समाज में जो भी गलत होता दिखाई दे, उसका विरोध करना है। उसे नहीं होने देना है और ऐसी तैयारी जुटाना है कि आगे भी नहीं हो सके। इसके लिए लोगों को समझा-सिखाकर तैयार करना है।

भगवान भारत को विदेशी दासता से मुक्त कराना चाहते हैं, त्रिगुणमयी माया से तमस् पक्ष को अब पार्श्व में जाना है। भगवान की इच्छा से विश्व में भारत को नई भूमिका निभानी है। आने वाली शताब्दियाँ भारत के गौरव को फिर से प्रतिष्ठित करेंगी। इसके लिए भारत का स्वतंत्र होना आवश्यक है। उन्हीं की प्रेरणा से जनमानस में स्वतंत्रता का उभार आ रहा है। उभार को समर्थ बनाने में तुम भी सहयोगी बनो।

जहाँ आवश्यक हो, वहाँ सक्रिय विरोध किया जाए। साधारण स्थितियों में लोगों को तैयार करने के लिए वाणी और लेखनी का सहारा लिया जाए। भगवान का संदेश पहुँचाने के लिए और भी उपाय हो सकते हैं। उन सबको अपनाया जाए। यह प्रेरणा उभरते समय मन में अन्यथा विचार भी सिर उठाते थे। विचारप्रवाह आगे बढ़ता कि दिव्य प्रेरणा ने उसे रोका। प्रति विचार आने लगे, साँस लेने और चलने की तरह भगवान बंधन मुक्ति की प्रेरणा भी अपने आप उभार सकते हैं, लेकिन उनकी योजना मनुष्य को पुरुषार्थी बनाने की है। जो धर्मयुद्ध अगले दिनों लड़ा जाना है, उसमें सभी को भागीदार बनना है। जरूरी नहीं कि सभी लोग महायोद्धा हो। रीछ-वानरों और गिलहरी जैसे क्षुद्र कहे जाने वाले प्राणियों को भी हिस्सा लेना है। छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी और पक्ष-विपक्ष की सभी भूमिकाएं निश्चित की जा चुकी है। जय-पराजय भी निश्चित हो गई। तुम्हें लोगों तक सिर्फ संदेश पहुँचाना है। यह मत सोचो कि अकेले क्या कर पाओगे? संगी-साथियों का एक विशाल समुदाय तुम्हारी प्रतीक्षा करता हुआ दिखाई देगा। समय के साथ वह फैलता जाएगा, तुम्हें उनका मार्गदर्शन करना है।

स्वतंत्रता आँदोलन में भागीदारी और लोकशिक्षण की योजना ने जैसे अंतिम रूप ग्रहण कर लिया। विचार और संकल्प विकल्प के साथ ध्यान और सन्निधि का प्रवाह पूरी अवधि में ही बहता रहा। चित्त कभी सविता देवता के ध्यान में डूब जाता, कभी लगता कि उनके तेज में अपना आपा खो गया है, सब कुछ जलकर भस्म हो गया है। कुछ पल बाद अपनी स्वतंत्र चेतना का फिर भान होने लगता है, लेकिन वह ज्यादा परिपक्व और समर्थ अनुभव होता। पहले ही तुलना में सुदृढ़। जैसे चेतना का रसायन बदल रहा हो, वह कुछ-की-कुछ होती जा रही हो।

माँ का उलाहना

इस बीच माँ ने पूजा की कोठरी में कई बार झाँका। और दिन तो सूरज का सिंदूरी वर्ण बदलते ही श्रीराम अपनी संध्या कर उठ आते हैं। आज क्या हो गया? संध्या अभी तक संपन्न क्यों नहीं हुई? कहीं पिछले दिनों लगी समाधि जैसी अवस्था में तो नहीं पहुँच गया? उस समय तो श्रीराम के पिता जीवित थे, सब विधि-विधान जानते थे। समाधि से वापस ले आए थे। अब फिर वैसी ही समाधि लगाई तो कौन वापस लाएगा? माँ को तरह-तरह की चिंताएं उठती जा रही थीं। इधर नए साधनाक्रम को आरंभ करते हुए श्रीराम अपनी मार्गदर्शक सत्ता को सामने ही अनुभव कर रहे थे। उनकी उपस्थिति मन, प्राण और चेतना में रमती जा रही थी।

‘आज क्या पूरे दिन ही कोठरी में बैठे रहोगे। जगन्माता को तो विश्राम करने दो श्रीराम।’ गुरुसत्ता के सान्निध्य का वह अध्याय पूरा होने के बाद यथार्थ जगत का पहला अनुभव माँ की यह पुकार थी। कोठरी में कई बार झाँक जाने के बाद उनसे रहा नहीं गया। अपनी समझ से उन्होंने लाड़ले को जगाने की चेष्टा की और श्रीराम ने उठने का उपक्रम किया। माँ अपने दुलारे को उठने की तैयारी करते देख वापस चली गई। वेदी पर रखे दीपक में श्रीराम ने कुछ घी और डाला। अब तक का क्रम था कि पूजा संपन्न होने के बाद दीपक को जलते रहने दिया जाता। घी समाप्त होने के बाद बत्ती पूरी जल जाती और दीपक की लौ हवा में लीन हो जाती। नए सिरे से घी डालने का अर्थ था ज्योति प्रज्वलित रहेगी। गुरुदेव का बताया हुआ विधान व्यवहार में उतर आया था। महापुरश्चरण साधना के साथ अखण्ड ज्योति का भी अवतरण उसी दिन वसंत पंचमी पर संपन्न हुआ। तभी से यह अखण्ड दीपक प्रज्वलित है। क्रमशः आगरा, मथुरा होकर 75 वर्ष की यात्रा कर चुका है। सन 1971 से यह शाँतिकुँज, हरिद्वार में स्थापित है।

श्रीराम ने सामने विराजमान जगन्माता को प्रमाण किया, उस दिन विसर्जन नहीं किया। संध्या गायत्री के सामान्य जप में आवाहन के बाद विसर्जन की प्रक्रिया भी संपन्न की जाती है। महापुरश्चरण में विसर्जन नहीं किया जाता, क्योंकि वह सतत चलते रहते रहने वाला अनुष्ठान है। दैनिक उपासना एक ही दिन में पूरा जाने वाला अध्याय है तो महापुरश्चरण एक विराट ग्रंथ के अखंड पाठ की तरह है, जिसमें कितने ही अध्याय होते हैं। उन सबके अवगाहन में लंबा समय चाहिए। जब तक वह पूरा नहीं हो जाता, देवशक्तियों की अर्चना अभ्यर्थना चलती रही रहती है। उनकी उपस्थिति का सम्मान किया जाता है। अपना आचरण, चिंतन और स्तर उनकी गरिमा के अनुरूप रखने की सावधानी रखी जाती है। प्राणपण से उनका निर्वाह किया जाता है। अखंड दीपक की स्थापना और निरंतरता उस उपस्थिति के स्थूल प्रमाण के रूप में थी।

पूजागृह से बाहर आए तो माँ ने फिर वही उलाहना दिया, ‘गायत्री माता से इतनी देर क्या कहता रहा? उन्हें भी चैन लेने देगा या नहीं?’ कहते-कहते ताईजी के चेहरे पर इठलाता हुआ दुलार छलक आया। उसमें कहीं-न कहीं गर्व और संतोष भी छलक रहा था कि पुत्र अपने पितृपुरुषों की राह पर चलने की तैयारी कर रहा है। उनके हिसाब से पूजा-पाठ की अगली कड़ी पुरोहिताई और कथा वार्ता ही होनी चाहिए। श्रीराम कड़ी पुरोहिताई और कथा-वार्ता ही होनी चाहिए। श्रीराम ने कोई उत्तर नहीं दिया। चुपचाप कुछ सोचते रहे। माँ ने फिर पूछा, ‘क्या कहा गायत्री माता ने? तुमने उनसे इतनी लंबी पूजा करके क्या माँगा?’

‘कुछ नहीं माँगा’ श्रीराम ने कहा, ‘संध्या करते समय हमारे गुरुदेव प्रकट हो गए थे। उन्होंने आगे का रास्ता बताया कि क्या करना है? उनके बताए रास्ते पर चलना है।’

‘क्या रास्ता बताया उन्होंने? कहीं तू मुझे दिया वचन तो तोड़ने नहीं जा रहा। तेरे गुरुदेव ने क्या संन्यासी बनने के लिए कहा है?’ ताई जी अधीर हो उठीं। श्रीराम ने उन्हें धीरज बंधाया, ‘नहीं माँ, नहीं। गुरुदेव ने आपके पास रहकर ही साधना करने के लिए कहा है। पाँच-छह घंटे रोज प्रतिदिन जप-ध्यान करूंगा। गुरुदेव ने कहा है कि चौबीस साल तक साधना करनी है। गाय के दूध से बनी छाछ और जौ की रोटी का आहार लेना है। पूजा की कोठरी में वह जो दीपक जल रहा है न, उसे अखंड ही रखना है। दीपक में घी हमेशा भरा रहे।’

अखंड दीप प्रज्वलन की घोषणा

‘चौबीस साल क्या पूरे जीवन साधना करता रहा। मुझे क्या फर्क पड़ता है? मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूँ कि तुम मेरे पास बने रहो। मुझसे दूर कभी न जाना।’ ताई जी ने आश्वस्त करते हुए कहा। फिर कुछ देर सोचती रहीं। अपने आप में डूबे रहकर ही वे अचानक पुलक उठी। मन में कोई स्फुरणा जगी थी शायद। श्रीराम को पुकारा और उसी पुलक के साथ कहने लगीं, ‘दीपक अखंड रखना है। उसका घी कब तक चलता है, कब नया घी भरना है। यह ध्यान रखने के लिए पूरे समय की निगरानी चाहिए। मैं नहीं कर सकूँगी, यह निगरानी।’

श्रीराम ताई जी की बात गौर से सुन रहे थे और उनके चेहरे पर छाई पुलक भी निहार रहे थे। ताई जी कुछ पल रुकी, ‘अब तुम शादी लायक भी हो गए हो। ब्याह कर लो। घर में बहू आ जाएगी तो वह अखंड दीपक का भी ध्यान रखेगी। मुझे भी सहारा होगा।’

श्रीराम ने कुछ नहीं कहा। उनके मौन को माँ ने स्वीकृति माना। वे कुछ कहते तो अपने अधिकार का उपयोग करने की बात भी मन ही-मन तय कर रखी थी, लेकिन वह स्थिति नहीं आई। उसी दिन ताई जी ने अपने सगे-संबंधियों को उपयुक्त कन्या बताने के लिए कहना शुरू कर दिया। ताई जी क्या कर रही है, इस बात से सर्वथा असंतृप्त रहते हुए श्रीराम आगे की व्यवस्थाओं के बारे में सोचने लगे। माँ से बातचीत के बाद वे बाड़े में गए और एक कपिला गाये को सेवा के लिए चुन लिया। इस चुनाव में कपिला गाय के दूध से बने घी और मठे का ही उपयोग करने का निश्चय भी था।

कपिला गाय का गोबर इकट्ठा किया। उससे पूजा-कक्ष को लीपा। माँ ने देखा तो कुछ नहीं कहा। और दिनों में श्रीराम कोई काम अपने हाथ से करते तो रोक लेती थीं। आज चार-पाँच घंटे की पूजा के बाद गुरुदेव के मिलने और चौबीस वर्षों की साधना का व्रत लेने की बात ने कोई हस्तक्षेप करने से रोक दिया। जानती थीं कि श्रीराम के हाथ से लेकर पूजाकक्ष को संभालने की कोशिश करेंगी तो वह पुत्र राजी नहीं होगा। दो तीन बार रुककर देखा, किसी तरह के सहयोग की माँग उठने की आस में ठिठकी भी रहीं। लेकिन श्रीराम पूजाकक्ष की व्यवस्था में इस तन्मयता से जुटे रहे, जैसे समाधि लग गई हो। कौन आ रहा है और कौन जा रहा है, क्या कर रहा है? उन्हें कोई सुध नहीं थी।

दीपक को अखंड रखने का संकल्प करने के बाद बाती की प्रतिष्ठा एक बड़े दीये में कर दी गई थी। उस दिन पूरे समय ध्यान रखा। अभ्यास के बाद बहुत ज्यादा चिंता नहीं करनी पड़ी। वसंत की उस शाम भी श्रीराम ने और दिन की अपेक्षा संध्या पूजा में ज्यादा समय लगाया। करीब दो घंटे तक जप में बैठे रहे। वह सुबह और शाम उनके अपने जीवन में ही नहीं, जगत के इतिहास में भी एक नया पन्ना लिख गई।


गुरुकथामृत - 44 - सिवसक्ति के जनमौं नाँहि, तबै जोग हम सीखा

अखण्ड ज्योति पत्रिका वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के माध्यम से परिष्कृत अध्यात्म का रूप लिए प्रबुद्ध वर्ग को प्रभावित करती हुई निरंतर प्रकाशित होती रही है। यह प्राण−प्रवाह यों तो गायत्री महाशक्ति के तत्वज्ञान एवं राष्ट्र सहित युग के नवनिर्माण हेतु सतत प्रवाहित होता था, परन्तु पूज्यवर इतने से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें सतत यही लगता था कि युवाशक्ति, पढ़ा-लिखा, विज्ञान पढ़ा तबका कैसे मिशन से जुड़ेगा? इसी क्रम में उसने 1967-68 में अपने लेखन को 180 डिग्री का मोड़ देते हुए अखण्ड ज्योति पत्रिका में एक लिखा, जिसमें अभिव्यक्त विचारों का सार-संक्षेप था, ‘हम अपने पाठकों के माध्यम से पढ़ना चाहते हैं। कुँडलिनी, मानवी संरचना आदि के विषय में जो वैज्ञानिक तथ्य जिनके पास हों, वे पुस्तकों से निकालकर हमें भेजें। इस संबंध में एक प्रकोष्ठ यहाँ बनाया गया है। प्रयास रहेगा कि विज्ञान और अध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों से संबंधित ठोस सामग्री हम जन-जन तक पहुँच सकें।’

यह आमंत्रण कइयों तक पहुँचा। कुछ ने पत्राचार किया, कुछ गुरुवर से उनके प्रवास के दौरान मिले, कुछ मथुरा तपोभूमि में मिलने पहुँचे। क्रमशः वह संकलन होता चला गया एवं क्रमशः उसके निष्कर्ष पत्रिका में प्रकाशित होने लगे। परमपूज्य गुरुदेव ने तो बड़े विनम्र भाव से लिखा था कि हम पढ़ना सीखना चाहते हैं, परन्तु जिसने इन लेखों को पढ़ा, उन्हें लगा कि जैसे आचार्यश्री सब कुछ जानते थे और भी गहरा वैज्ञानिक, दार्शनिक ज्ञान उन्हें है और वही लेखन में उभरा है। लोगों को स्वयं में उन लेखों से एक शिक्षण मिला। जहाँ वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की यह आधारशिला, पठन-पाठन एवं ज्ञानयज्ञ की पृष्ठभूमि बनी, वहाँ से ढूंढ़-तलाश कर कुछ पत्र इस लेख में दे रहे हैं ताकि पता चले कि पूज्यवर किस सीमा तक इस प्रक्रिया में डूब गए थे, न जाने कितनों को ज्ञानगंगा का स्नान करा चुके थे।

चार अक्टूबर, 1969 का एक पत्र हैं, अगले वर्ष के लिए हमें कुँडलिनी तथा दूसरे विषयों की लेखमालाएं कुछ अधिक तैयारी के साथ आरंभ करनी हैं। सो 3-4 महीने अंग्रेजी में जो कुछ अपने काम का है, उसमें से हाथ की पुस्तकों का साराँश निकाल लेना है। इस दृष्टि से पढ़ने का काम बहुत तेजी से करना और जो साहित्य हाथ में है, उसे ढूंढ़ डालना आवश्यक है। इसके लिए समुचित व्यवस्था भी बना ली है।

तुम्हारे पास यहाँ की जो पुस्तकें हैं, उन सबको लौटा देना। 3-4 महीने में यह सभी खाली हो जाएंगी। तब तुम्हें जो उपयोगी प्रतीत हों, उन्हें मंगा लेना। तब तक तुम अपने कॉलेज से मस्तिष्क, नर्वसिस्टम, मनोविज्ञान, प्राणविद्या की पुस्तकें लाइब्रेरी से लेकर अपना उपयोगी ज्ञान संग्रह करती रहना।

षट्चक्रों के संबंध में तुम्हारी बड़ी पुस्तक ‘चक्राज्’ है, सो वहाँ यदि इन दिनों उसका उपयोग नहीं हो रहा हो तो राय साहब से प्राप्त कर 3-4 महीने के लिए भेज देना।

यह पत्र जिस साधिका को संबोधित है, वे पिछले दिनों साठ वर्ष पूरे कर भोपाल के एक प्रतिष्ठित महाविद्यालय से रिटायर हुई है। राय साहब उनके पिता थे। निर्मला राय उनका नाम है। अध्यात्म और विज्ञान के समन्वयात्मक प्रतिपादनों के संग्रह में उनका बड़ा योगदान रहा है। निश्चित रूप से सतत गुरुसत्ता से प्राप्त प्रेरणाओं ने ही उनसे यह कार्य कराया कि क्रमशः 1970 के बाद की अखण्ड ज्योति तर्क, तथ्य, प्रमाणों के साथ प्रस्तुत होने लगी। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना (1971) इसी पृष्ठभूमि पर हुई है। उन्हीं को संबोधित एक पत्र और है, जो पूज्यवर की अपने शोध-साधनों पर मजबूत पकड़ को प्रमाणित करता है। 10-1-61 को यह पत्र महासमुद्र (छत्तीसगढ़) से प्रवास के दौरान लिखा गया था।

तुम कुँडलिनी का वह अंश इकट्ठा कर लो, जिसका सीधा शरीर विज्ञान से संबंध है। जिसमें साधारण सिद्धाँतवाद है उसे दूसरों के लिए रखा जा सकता है। हमने दो आदमी मथुरा में नियुक्त किए हैं। वे दोनों आर्ट के हैं। रु.न. होने से वे सिद्धाँत संबंधी बातें आसानी से ढूंढ़ सकेंगे। तुम्हारा विषय साइंस है, सो अच्छा यही है कि तुम केवल साइंस अपने हाथ में लो। अधिकाँश पुस्तकें साइंस की ही हैं। जीव विज्ञान से लेकर अन्य सभी विषय अध्यात्म का प्रतिपादन करते हैं। तुम्हारे लिए साइंस का अति व्यापक क्षेत्र पड़ा है। तीन-चौथाई साहित्य तो इसी विषय का है, जो अपने विषयों का प्रतिपादन करता है।

कुँडलिनी में जो भी शरीर-रचना अथवा मनोविज्ञान से संबंधित है, उसे तुम इस महीने ढूंढ़ने की कोशिश करना।

पत्र की भाषा पढ़कर लगता है कि मानो कोई पाठ्यक्रम बनाया जा रहा हो। एक विद्यार्थी अपनी थीसिस के लिए किसी से मदद माँग रहा हो, किन्तु वास्तविकता यह नहीं है। वास्तविक तथ्य यह है कि परमपूज्य गुरुदेव हर विधा में निष्णात थे, किन्तु हर व्यक्ति को जीवनभर एक विद्यार्थी रहना चाहिए, इस तथ्य को लौकिक दृष्टि से उसने प्रमाणित किया। कई बार तो तथ्य लिखकर आते, उसके पूर्व पूज्यवर उन्हीं तथ्यों को उद्धृत कर लिख चुके होते। मॉलीक्यूलर बायोलॉजी, अणुविज्ञान एवं जैव भौतिकी पर गहन विश्लेषणात्मक प्रतिपादनपरक लेख हमने स्वयं देखे हैं, जो मौलिक चिंतन के आधार पर लिखे गए हैं। वस्तुतः पूज्यवर पढ़ने वाले, स्वाध्याय करने वाले के मन-मस्तिष्क को पढ़ लेते थे, अपने निज के गहन अध्ययन व विलक्षण स्मृति को आधार बनाकर लिखते थे। वही आज हमारे समक्ष विराट वाङ्मय के रूप में उपलब्ध है। साधनाजन्य यह उपलब्धि ऐसी है, जिस पर गहन शोध जरूरी है। संत चाहे पढ़े हों, अनपढ़ हों, वे अंतर में इस ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं, जो वर्षों तक पढ़ने वाला नहीं प्राप्त कर पाता।

श्री कबीरदास कहते हैं-

ब्रह्मा नहिं जब टोपी दीन्हा, बिस्नु नहीं जब टीका। सिवसक्ति के जनमौं नाहीं, तबै जोग हम सीखा॥

क्या इससे हमें आभास नहीं होता कि हमारी गुरुसत्ता कौन थी।


Quotation

मनुष्य की सबसे बड़ी प्रार्थना यह है कि वह असत्य से सत्य की ओर बढ़े, अंधेरे से उजाले की दिशा में अग्रसर हो, मृत्यु से अमृतत्व की तरफ पग बढ़ाए।


अपनों से अपनी बात-1 - समाज का नवनिर्माण शिक्षा एवं कला में सुधार से होगा

संस्कृति ज्ञान विस्तार हेतु शाँतिकुँज द्वारा किया जा रहा पुरुषार्थ

व्यक्ति और समाज का भावनात्मक कायाकल्प दो ही माध्यमों से संभव है, शिक्षा और कला। विडंबना यह है कि आज स्वतंत्रता के बाद के भारत में दोनों ही माध्यम उपेक्षा के गर्त में चले गए हैं। न शिक्षा के क्षेत्र में कोई बदलाव आया, न ही कला क्षेत्र ने समाज का कोई रचनात्मक शिक्षण किया। शिक्षा, जो हमें मैकाले के षडयंत्र के तहत उत्तराधिकार में मिली थी, काले अंगरेज तैयार करती रही एवं ‘बाबू संस्कृति’ का पोषण होता रहा। चूँकि यह मूल्यविहीन मात्र जानकारी पर आधारित शिक्षा थी, पढ़े-लिखे लोग तो तैयार होते चले गए, परन्तु राष्ट्र निर्माण में सहयोगी सृजनशिल्पी नहीं विनिर्मित हो सके। शिक्षा के मन्दिर विश्वविद्यालय, महाविद्यालय राजनीति के अखाड़े बन गए। छात्रों को माध्यम बनाकर भ्रष्ट नेताओं ने अपने-अपने मंच खड़े कर लिए। बेरोजगारों की एक फौज खड़ी होती चली गई एवं जो विशिष्ट प्रतिभावान थे, वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के षडयंत्र का शिकार होकर अथवा अपनी महत्त्वाकाँक्षा व राष्ट्र की अराजकतापूर्ण स्थिति के दृष्टिगत प्रतिभा-पलायन कर दूसरे देशों को लाभ देने लगे। उच्च शिक्षा पूरी तरह से अभिजात्य वर्ग तक सीमित होकर रह गई एवं सत्ता का मद हमारी युवा पीढ़ी को भी अपनी चपेट में लेता चला गया।

दूषित कला-जगत

कला जो किसी भी राष्ट्र की संस्कृति का मेरुदंड होती है, विगत तीस वर्षों में तेजी से प्रदूषित हुई है। जब से रंगीन परदे वाला टेलीविजन व फिल्मों का जमाना आया, लोककलाएं लुप्त होती चली गई। इनका स्थान फिल्मी गीतों, फूहड़, नृत्यों, अश्लील प्रदर्शनों ने ले लिया। हमारे घर के अन्दर तक केबल नेटवर्क के माध्यम से पहुँचने वाला नग्नता का यह जहर इतनी बेशर्मी से प्रवेश कर गया कि कोई विरोध तक न कर पाया। हिंसा व अश्लीलता परोसी जाने लगी। जीवन मूल्य गौण हो गए तथा पारिवारिक मूल्यों में दरकन आने लगी। परिवार संस्था टूटने लगी। घर-घर में कलह-अपसंस्कृति का प्रदूषण, परिग्रह, तृष्णा से उपजा संक्षोभ व मानसिक तनाव फैल गया। उपभोक्तावादी संस्कृति ने कला को बाजारवाद फैलाने वाला माध्यम बना दिया। मातृ उपासक, शक्ति उपासक यह देश भोग्या कामिनी नारी को चाहने लगा एवं फैशन अपने पूरे कुरुपतम स्वरूप में जन-जन में प्रवेश कर गया।

समझा जाना चाहिए कि जिस राष्ट्र की शिक्षा व कला परावलंबी-दूषित होंगी, वहाँ साँस्कृतिक उत्थान लगभग रुक सा जाएगा। नैतिक मूल्यों का पतन तेजी से होगा। दुहाई सब देंगे, पर कुछ कर नहीं पाएंगे, क्योंकि ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाले तथाकथित समाज के मार्गदर्शकों में इनसे जूझने का साहस नहीं है। पुरातन काल में असुर-राक्षस चित्र विचित्र आकृति के होते थे। आज वे असंस्कृति के रूप में भिन्न-भिन्न वेशों में हमारे बीच में है। हम उनसे नित्य हो रहे नुकसान को पहचान भी नहीं पा रहे हैं।

दो अभिनव प्रयास

अखिल विश्व गायत्री परिवार ने एक मोर्चा हाथ में लिया है, राष्ट्र की मूलाधार, ज्ञान गंगोत्री भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित किया जाए एवं शिक्षा तथा कला को प्रदूषण मुक्त कर इन्हीं माध्यमों से जनमानस को प्रशिक्षित किया जाए। एक-एक दिन की देर राष्ट्र के भावी नागरिकों को हमसे छीन रही है। हमें अब शीघ्रातिशीघ्र इस प्रक्रिया को जन-जन में गतिशील करना होगा, ताकि मीठे विष से वे परिचित हों, उस हानि से बच सकें जो सार भारतीय समुदाय को भुगतनी पड़ सकती है। इस कार्य हेतु भारतीय संस्कृति की जानकारी कराने वाले एक राष्ट्र एवं अब विश्वव्यापी भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का 1994 में शुभारंभ किया गया तथा 2002 में एक विराट तंत्र शाँतिकुँज परिसर में देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के नाम से स्थापित किया गया। शिक्षा के क्षेत्र में इन दोनों ही स्थापनाओं की अल्पावधि में जो उपलब्धियाँ हैं, उन्हें देखकर भविष्य आशावादी लगता है। कला के क्षेत्र में एक ‘युगप्रवाह’ नामक पाक्षिक वीडियो पत्रिका आरंभ की गई, जो अब उस नेटवर्क को विश्वव्यापी बनाकर विभिन्न चैनेल्स को माध्यम बनाकर साँस्कृतिक प्रदूषण से लड़ने का मन बना लिया गया है। लोकरंजन से लोकमंगल हो, यह गुरुसत्ता का निर्देश मानकर नुक्कड़ नाटकों, एक्शन साँग्स, ढपली गीतों, सफलता की कहानियों से जुड़े जीवंत समाचारों, प्रेरणा प्रधान गीत एवं कथाओं को माध्यम बनाकर धर्मतंत्र से लोक-शिक्षण का महत्त्वपूर्ण दायित्व हाथ में लिया गया है। परिजन-पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया से लगता है, यह कार्य बढ़ता ही चला जाएगा एवं देखते-देखते बदलाव लाकर रहेगा। आज का धर्मतंत्र विकृत स्थिति में हैं। इसे भी परिष्कृत करने एवं इसके वैज्ञानिक प्रस्तुतिकरण की अत्यधिक आवश्यकता है। युवावर्ग को लक्ष्य मानकर उनके लिए प्रेरक कार्यक्रम बनाए जा रहे हैं, इनका एक विराट तंत्र खड़ा किया जा रहा है।

मूल्य प्रधान का तंत्र

सबसे बड़ी चुनौती है शिक्षा क्षेत्र में। इसे अनौपचारिक, स्वावलंबन प्रधान बनाना जरूरी है। साथ ही उसे मूल्यों पर आधारित विद्या और शिक्षा के सार्थक समन्वय के साथ प्रस्तुत किए जाने की अनिवार्यता अनुभव की जा रही है। इसी के अभाव में परमपूज्य गुरुदेव के अनुसार ब्रह्मराक्षस पैदा होते जा रहे हैं। अब सरकारी पद कहीं रहे नहीं। निजी क्षेत्र में कंप्यूटर क्राँति एवं उपनिवेशवादी उपभोक्तावाद के चलते व्यापक छंटनी अभियान चल रहा है। वहाँ भी अब आई.टी. हों या बी.टी. कहीं भी अवसर व्यक्ति को मिलने वाले नहीं हैं, इसीलिए गायत्री परिवार ने स्वदेशी स्वावलंबन पर आधारित रोजगार तंत्र पर आधारित मूल्य प्रधान शिक्षा व्यवस्था का व्यापक ताना-बाना बुना है।

भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा

वर्ष में मात्र एक बार संपन्न होने वाली इस ज्ञान परीक्षा ने तेजी से मत्स्यावतार का रूप लिया है। 1994 में भोपाल (म.प्र.) में मात्र 4900 बच्चों से यह परीक्षा आरंभ हुई। धीरे-धीरे यह व्यापक होती चली गई एवं इस वर्ष (2002-2003) में इस परीक्षा में पूरे भारत में बत्तीस लाख छात्र-छात्राओं ने भागीदारी की है। मात्र नौ वर्ष में जो यह परिणाम सामने आया है, उससे ज्ञात हुआ है कि बच्चों, किशोरों में अपनी संस्कृति के प्रति कितना झुकाव है। यदि प्रस्तुतीकरण सही हो व ईमानदारी से परिश्रम किया गया हो तो क्या नहीं हो सकता।

भारतीय संस्कृति किशोरों में मानवीय मूल्यों को उभारती-निखारती व उन्हें विकसित करती है। मनुष्य को आमूल-चूल बदलने का यह दिव्य रसायन है, पारस है। मनुष्य मात्र में छिपी अनंत संभावनाओं को उजागर करना एवं उन्हें जाग्रत कर मनुष्य को देवमानव बनाना इसका प्रधान लक्ष्य है। यह संस्कृति हमारे यहाँ परिवार संस्थाओं में घूँटी में पिलाई जाती थी तथा गुरुकुल आश्रम इसका पोषण करके विद्या का, जो अमरत्व की ओर ले जाती हैं, बंधनों से मुक्त कराती है, शिक्षण किशोरावस्था की संधिवेला में दिया जाता था। यह विनम्रता लाती थी, संस्कार व चरित्रनिष्ठा पैदा करती थी तथा किशोरों को आत्मविश्वास से लबालब रखती थी। व्यसनों से हमारी युवाशक्ति मुक्त रहती थी। राष्ट्र गौरव की अनुभूति तथा परिष्कृत भावनाओं के साथ सब जीते थे। प्रखर विचार शक्ति वाले ऐसे प्राणवान ही तैंतीस कोटि देवता कहलाते थे। उन्हें कर्त्तव्य बोध भी था, जिससे उनका व्यक्तित्व सर्वांगपूर्ण विकसित होता था। आज यह सब नहीं हो रहा है तो उसका कारण संस्कृति की उपेक्षा है।

भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा उसी दिशा में आरंभ किया गया एक अणुव्रतरूपी प्रयास है। इससे जुड़े छात्रों में न केवल आध्यात्मिक जिज्ञासाएं पैदा हुई हैं, वे मानवी मूल्यों का विकास कर पाने में सक्षम हो पाए हैं। उनकी साँस्कृतिक चेतना व राष्ट्रबोध जाग्रत हुए हैं। जीवन जीने की कला के शिक्षण के प्रति उनकी अभिरुचि बढ़ी है। वे स्वयं को एक श्रेष्ठ नागरिक बनाने की दिशा में गतिशील हो रहे हैं। इस परीक्षा का मुख्यालय, संचालन केन्द्र शाँतिकुँज, हरिद्वार है। परीक्षा प्रायः अक्टूबर-नवंबर में आयोजित की जाती है। छात्र-छात्राओं को बड़े परिश्रम से तैयार की गई शिक्षण सामग्री उपलब्ध करा दी जाती है। परीक्षा शुल्क (पाठ्यपुस्तक, प्रश्न बैंक मूल्य सहित) मात्र दस रुपया प्रति छात्र/छात्रा लिया जाता है। इसी राशि से तहसील, जिला व राज्य स्तर पर सूची में आने वाले छात्र/छात्रों के पुरस्कारों की भी व्यवस्था हो जाती है। जोन के जिस जिले में सबसे अधिक छात्र-छात्राएं प्रतिभागिता करते हैं, उस जिले की इकाई को एक शील्ड भी दी जाती है। प्रत्येक जोन में प्रायः 5-6 जिले होते हैं जिनमें छठी, सातवीं, आठवीं (माध्यमिक) तथा नवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं (उच्चतर माध्यामिक) स्तर के विद्यार्थीगण परीक्षा में बैठते हैं। शिक्षाविद् माध्यम की भूमिका गायत्री परिवार के परिजन एवं प्रबुद्ध वर्ग के लोग ही उठाते हैं। ये ही आयोजन करते हैं, प्रेरणा देते हैं एवं ये ही परिणाम निकालने में भूमिका निभाते हैं। सारा कार्य स्वैच्छिक स्तर पर समयदान के आधार पर चलता है। मूलतः हिन्दी भाषा में इसका आयोजन होता है, पर विगत वर्षों से इसे मराठी, गुजराती, तेलुगु एवं अंग्रेजी में भी संपन्न किया ज रहा है। अब भारत की प्रायः सभी मुख्य भाषाओं में भारतीय संस्कृति को जन-जन तक पहुँचाने का मन बन रहा है।

संस्कृति मंडल

संस्कृति मंडल परीक्षा के उपराँत संस्कृति में रुचि रखने वाले प्रावीण्य सूची में आने वाले छात्र स्थापित करते हैं। 5 छात्र-छात्राओं का यह मंडल वर्ष भर साँस्कृतिक गतिविधियों का एक कैलेंडर बनाता है। शाँतिकुँज से जुड़कर ज्ञानयज्ञ में भागीदारी करता है। रुचि रचने वालों को शाँतिकुँज की विचारक्राँति अभियान प्रक्रिया से जोड़ता है। नेतृत्व की क्षमता विकसित हो, ऐसे शिविर तथा योग व्यक्तित्व विकास की वर्कशॉप्स आयोजित करता है। इस वर्ष प्रायः तीस हजार विद्यालयों के माध्यम से बत्तीस लाख छात्र-छात्राओं ने भागीदारी की। इस तरह तीस हजार संस्कृति मंडल एवं इनके द्वारा डेढ़ लाख छात्र-छात्राओं को इनसे अनुप्राणित होना था। इस कार्य को आगामी परीक्षा होने तक गति दी जा रही है। इस तंत्र को पुनर्जीवित किया जा रहा है। सारा केन्द्रीय संचालन देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय द्वारा होता है।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय

प्रत्यक्ष में तो एक छोटी सी शुरुआत है, पर इसने विगत एक वर्ष में शिक्षा क्षेत्र में अभिनव मूल्य-कीर्तिमान स्थापित किए हैं। अभी तक यहाँ योग, मनोविज्ञान एवं धर्म विज्ञान का ही शिक्षण दिया जा रहा था। अब एम.ए. (भारतीय संस्कृति), एम.ए. (संगीत-गायन, संगीत-वादन) की शिक्षा भी जून से आरंभ की जा रही है। एकवर्षीय पी.जी. डिप्लोमा योग विज्ञान, इंग्लिश प्रोफीशिएन्सी, क्लीनिकल साइकोलॉजी एवं पत्रकारिता में आरंभ किया जा रहा है। सार्टीफिकेट कोर्स (छह मासीय) ग्राम प्रबंधन, दृश्य संचार, योग विज्ञान, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति, धर्म विज्ञान एवं अंग्रेजी भाषा का आरंभ हो चुका है या हो रहा है। प्रमाणपत्र के लिए शिक्षा 10/2 अनिवार्य है। शेष के लिए बी.ए. या बी.एस-सी. की शिक्षा जरूरी है। आवेदन पत्र कुलसचिव के नाम 100 रुपये का बैंक ड्राफ्ट भेजकर मंगवा सकते हैं। उन्हें तीन जून तक भरकर जमा कर सकते हैं। प्रवेश परीक्षा 3 जुलाई को प्रस्तावित है। 24 जुलाई के ज्ञानदीक्षा समारोह से अगले सत्र का शुभारंभ हो जाएगा।

यह माना जाना चाहिए कि यह निताँत अनौपचारिक स्तर का पर पूर्णतः मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय है। जन-जन के बूँद-बूँद अंशदान सहयोग से खड़े इस विश्वविद्यालय से निकला छात्र सृजन-शिल्पी होगा जो अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा। अभी इस तंत्र का जब क्षेत्रों में विस्तार होगा, एक्सटेंशन सेंटर खुलेंगे तो क्षेत्र में फैले 200 से अधिक विद्यालय, विद्याभारती के ढेरों शिक्षक, एकल विद्यालयों का समग्र तंत्र, गायत्री तपोभूमि का स्वावलंबन विद्यालय तंत्र एवं पाँच सौ से अधिक जाग्रत जीवंत शक्तिपीठों से, जिनकी कि शिशुकाल से ग्रेजुएशन तक महाविद्यालय खड़ा करने की पात्रता है, जुड़कर शीघ्र ही एक विराट व्यापक तंत्र खड़ा हो जाएगा। 2008 तक यह सारा विकसित स्वरूप सही अर्थों में यूनीवर्स की यूनिवर्सिटी, निखिल ब्रह्माँड के भरद्वाज ऋषि के विश्वविद्यालयीन, नालंदा, तक्षशिला, वल्लभी, विक्रमशिला विश्वविद्यालयीन तंत्र के रूप में दृष्टिगोचर होगा। शिक्षा और विद्या के इस सार्थक समन्वय से ही भारत के 2020 तक विश्व के महानायक बनने की आशा रखी जा सकती है। (कला संस्कृति संबंधी चिंतन आगामी अंकों में)


VigyapanSuchana

सभी पाठकों-परिजनों से

इस वर्ष 10 जून मंगलवार के दिन गंगा दशहरा, गायत्री जयंती का पावन पर्व है। अखिल विश्व गायत्री परिवार के लिए यह बड़ा महत्त्वपूर्ण पर्व है। हमारी आराध्य सत्ता परमपूज्य गुरुदेव के स्थूलशरीर से महाप्रयाण की भी यही तिथि है। उनके प्रति अंतः की श्रद्धाँजलि देते हुए नूतन संकल्प लेते हुए सभी परिजन पाठक, शाखाएं प्रज्ञामंडल, स 3-स 4 समूह, शक्तिपीठ तथा अन्य संबंधित संस्थाएं इसे मनाएं। अपने यहाँ संपन्न समारोह जपप्रधान आयोजन की सूचना केन्द्र को भी भेजें।


अपनों से अपनी बात-2 - आद्यशक्ति गायत्री का अवतरण पर्व उल्लास के साथ मनाएं

हमारा जीवन साधनामय बने, नए संकल्प हम लें

युगशक्ति गायत्री के, ज्ञानगंगा के धरती पर प्रकटीकरण महापर्व है-गायत्री जयंती,गंगा दशहरा। गायत्री महाशक्ति का तत्त्वज्ञान ही नवयुग का आधार बनने जा रहा है, यह अब सुनिश्चित है। अनगढ़ों को, अनार्यों को, दस्युओं को सुगढ़, आर्य एवं देवता बनाकर विश्वामित्र ने कभी नूतन सृष्टि का सृजन किया था। इस युग में इसकी पुनरावृत्ति होने जा रही है, जब चारों ओर अरुणोदय की लाली दिखाई दे रही हैं। गायत्री मंत्र के स्वर कानों से टकरा रहे हैं एवं अंतरिक्ष में उसका सतत गुँजन सभी श्रवण कर रहे हैं। गायत्री महाशक्ति को ऋतुँभरा-प्रज्ञा भी कहा जाता है। ऋतुँभरा वह जिसमें विवेक और श्रद्धा का संगम हो। विवेक तर्क, तथ्य, प्रमाण सहित विवेचना करने वाली दूरदर्शिता का नाम है। श्रद्धा उस आस्था का नाम है, जो उत्कृष्ट आदर्शवादिता से अत्यधिक प्यार करती है और उस स्तर के चिंतन से युक्त, भावभरे रसास्वादन की हमें अनुभूति कराती है। पत्थर में से भगवान प्रकट कर देने वाली श्रद्धा आदर्शों के प्रति गहन निष्ठा का नाम हैं। विवेक-श्रद्धा से युक्त ही युगशक्ति गायत्री है।

ऋतंभरा प्रज्ञा की उमंगभरी हलचलें जब सारी धरित्री पर दृष्टिगोचर होने लगें, अंतःकरण की सदाशयता एवं प्रखर प्रज्ञा के रूप में परिलक्षित होने लगे तो यह मानना चाहिए कि नवयुग आ गया। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने जीवनभर पुरुषार्थ कर उस महाशक्ति को जनसुलभ बना दिया, जो कभी नर-ब्राह्मणों तक सीमित थी। मानवमात्र एक समान है, पर नारी-स्त्री जाति के लिए वर्जित कर दिया गया था। ब्राह्मण जाति ही श्रेष्ठ है, उसे ही इस महामंत्र का जप करना चाहिए, यह भ्राँति ऐसी फैला दी गई कि प्रायः दो हजार वर्ष के अंधकार युग से भारतभूमि सहित विश्ववसुधा को गुजरना पड़ा। ब्राह्मण जन्म से नहीं, आदमी अपने संस्कारों व कर्म से होता है, यह बात भुला दी गई। यह मंत्र शापित है, कीलित है, बिना शाप-विमोचन या उत्कीलन के इसका जप नहीं किया जा सकता, ऐसी भ्राँतियाँ शास्त्रों का हवाला देकर कही जाती रहीं। जनमानस अज्ञान में डूबा रहा।

विगत सदी के प्रारंभिक दशक में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद एक महाशक्ति धरती पर जन्मी-हमारी आराध्यसत्ता परमपूज्य गुरुदेव के रूप में पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का जनम आश्विन कृष्ण त्रयोदशी की पावन बेला में वि. संवत्सर 18 में आगरा (उ.प्र.) के आँवलखेड़ा गाँव में हुआ। उसने कठोर गहन तपश्चर्या द्वारा अपनी सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता से साक्षात्कार कर एवं पारस रूपी हिमालय का स्पर्श कर स्वयं को सोना बना लिया। अपने आस-पास मधुमक्खी के छत्ते की तरह अपने तप एवं अनन्य स्नेह से एक परिवार खड़ा कर लिया, जिसे गायत्री परिवार कहते हैं। 1911 से 1990 तक की जीवनावधि में जो भी कार्य उसने किया, वह सारा माँ गायत्री को समर्पित था, उनके ज्ञान प्रवाह को जन-जन तक पहुँचाने के निमित्त था। उनका जीवन यज्ञीय रहा एवं उसने भारतीय संस्कृति के दोनों अभिभावकों को पुनर्जीवित कर भारतभूमि ही नहीं, विश्व-वसुधा के कोने-कोने तक इस प्रवाह को पहुँचाया। समर्पण इस स्तर का कि उसने स्वेच्छा से अपनी महासमाधि हेतु भी 1990 की गायत्री जयंती (2 जून, 1990) को चुना। उसी दिन स्थूलशरीर से उसने मुक्त हो स्वयं को सूक्ष्म व कारण में विलीन कर दिया।

इस वर्ष गायत्री जयंती का पावन पर्व 10 जून मंगलवार को पड़ रहा है। सभी परिजन, गायत्री परिवार की शाखाएं, गायत्री शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ एवं प्रज्ञामंडल इसे मनाएंगे ही। इस दिन गायत्री मंत्र के अखंड जप (एक दिन पूर्व से) उस दिन प्रातः तक) का क्रम हर स्थान पर चलना चाहिए। जिससे जितना बन पड़े, उसे वहाँ बैठना चाहिए। सामूहिक साधना का अपना महत्त्व है। यदि वह न बन पड़े तो अपनी गुरुसत्ता को सूर्य के मध्य स्थित मानकर उनका ध्यान करते हुए कम-से-कम एक घंटा जप अपने-अपने घरों में अवश्य करना चाहिए।

यह गायत्री साधना का चमत्कार ही है कि इतना विशाल गायत्री परिवार खड़ा होता चला गया। हम सब जुड़े साधना के सूत्रों से ही हैं। साधना का यह बीज सतत अंकुरित-पल्लवित होता रहे, यह भाव मन में रख इस महामंत्र का अर्थ मन में धारण कर उन्हीं सद्गुणों का ध्यान करना चाहिए, जो उदीयमान सविता देवता के विषय में बताए गए हैं। वे सुखस्वरूप हैं, प्राणस्वरूप हैं, दुःखनाशक है, श्रेष्ठ हैं, तेजस्वी-पापनाशक तेज के रूप में है। उनके देवस्वरूप इस तेज को हम सोखते चले जा रहे हैं, अपने जीवन में इन्हीं सभी श्रेष्ठ वृत्तियों को धारण करते चले जा रहे हैं। इससे हमारी बुद्धि सद्पथ पर स्वतः ही जा रही है। हम भूलकर भी गलत चिंतन नहीं कर सकते। दुर्मित हम पर हावी न हो। हे परमात्मा, हे सदगुरु, हमें श्रेष्ठ चिंतन से, विचारों से ओत-प्रोत रखना, यह भावभरी प्रार्थना की जा सके तो कोई कारण नहीं कि इसके सत्परिणाम हमें न मिलें।

विकल्प रूप में एक ध्यान मातृशक्ति, भावमयी संवेदना की प्रतीक गायत्री माता के सौंदर्य का, सत्यं-शिवं-सुन्दरम् वाले स्वरूप का किया जा सकता है। भाव यह किया जाए कि हम माँ की गोद में बैठे हैं। उनका स्नेहभरा स्पर्श हमारे मस्तक पर हम अनुभव कर रहे हैं। उनकी कृपा भरी छाँव में हम पर कोई संकट आ ही नहीं सकता। उन्हीं की शक्ति हममें कुँडलिनी, प्राणशक्ति, प्राणाग्नि के रूप में विद्यमान है। हर नर-नारी में जाति, वर्ण, ऊंच-नीच भेद से परे, भाषा-प्राँत राष्ट्र वंश के भेद से ऊपर यह शक्ति हम सभी में है। जिस दिन यह विलुप्त हो जाएगी, हम शव रूप में बदल जाएंगे। हमारी यह प्राणशक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़े, हमारा तेज हमें लोकनेतृत्व करने की शक्ति दे, यह भाव ध्यान में सतत चलना चाहिए।

गायत्री जयंती का पर्व अभियान साधना के संकल्प लेने से पावन बेला भी है। अगले दिन एकादशी से प्रतिदिन दस माला, प्रति रविवार पंद्रह माला एवं प्रत्येक एकादशी को चौबीस माला करते चलने, तीनों नवरात्रियों वासंतेय (चैत्री), ज्येष्ठीय, आश्विन में 24,000 का जप करने से वर्षभर में पाँच लाख का जप हो जाता है। यह एक जमापूँजी के रूप में होता है। यदि पाँच वर्ष भी नियम चल गया तो 24 लक्ष न्यूनतम का एक महापुरश्चरण संपन्न हो जाता है। नियम भी सामान्य ही हैं। मात्र वर्षभर की चौबीस एकादशियों एवं बावन गुरुवार को आँशिक व्रत व ब्रह्मचर्यादि नियमों का पालन करना है। नवरात्रि के तीन दिन तो वैसे भी नियम के साथ संपन्न होते हैं। मनुष्य तन मिला है तो इसे अपना सौभाग्य मानना चाहिए कि हमें ऐसे सदगुरु मिले एवं हम बड़भागी हैं कि युगशक्ति गायत्री की अनुकंपा हम पर बरसी। हम युगपरिवर्तन अपनी इन्हीं आँखें से देखने से देखने जा रहे हैं। ऐसे संधिकाल की बेला को युगों के मिलन की नवरात्रि कहते हैं। अब से लेकर 2011-12 तक का समय कुछ ऐसा ही है। दुर्बुद्धि हम पर हावी हो जाए, इससे पूर्व ही रक्षाकवच हम धारण कर लें, इसी में कल्याण हैं। सभी परिजनों से अनुरोध है कि 2003 की एकादशी 11 जून से आगामी वर्ष की गायत्री जयंती के अगले दिन एकादशी (30 मई, 2004) तक वे यह साधना चलाते रहेंगे। नियम टूटने नहीं देंगे। यह न्यूनतम व्रत है। यदि यह क्रम 2208 तक चला सकें तो और भी श्रेष्ठ है।

सद्ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी गायत्री का प्रसाद ज्ञानप्रसाद के रूप में बाँटना भी उतना ही पुण्य का कार्य माना गया है। सुपात्रों को श्रेष्ठ पुस्तकों का स्वाध्याय कराना, युगशक्ति गायत्री पत्रिका से जोड़े रहने के लिए नए ग्राहक-पाठक बनाना, ब्रह्मभोज में अधिकाधिक साहित्य वितरित करना, इसी शृंखला में आता है। गायत्री तपोभूमि मथुरा की यह स्वर्ण जयंती वर्ष का समापन दिवस भी है। इस वर्ष के महानतम अभियान गायत्री मंत्र लेखन-साधना में जितने अधिक व्यक्तियों को जोड़ा जा सके, जोड़ना चाहिए। स्वयं भी चौबीस मंत्र न्यूनतम रोज लिखने का संकल्प लेना चाहिए। मंत्र लेखन से बड़ा तप कोई नहीं। इसका महत्त्व जप से भी अधिक बताया गया है। थोड़े से मंत्रों का लेखन दस गुना पुण्य देता है।

भारत से बाहर पूर्व व पश्चिम के देशों में जहाँ परिजन रहते हैं, उन्हें शनिवार-रविवार का दिन ही उपयुक्त पड़ता है। वे इस वर्ष को 7, 8 जून या 14, 15 जून को सुविधानुसार मना सकते हैं। इस वर्ष युवाशक्ति को मूल केंद्र में रख एक सप्तसूत्री कार्यक्रम के तहत कुल आठ दल विभिन्न देशों के लिए रवाना किए जा रहे हैं। तीन-तीन वरिष्ठ पूर्णतः प्रशिक्षित भाइयों के ये दल इन पर्वों को संपन्न कराने के लिए सही समय पर पहुँच जाएंगे। अधिक-से-अधिक नए परिजनों को सम्मिलित कर सभी को लाभ दिया जा सकता है। इस वर्ष अमेरिका व कनाडा के लिए तीन-तीन के तीन दल, एक विशिष्ट दल, यूके के लिए एक, पूरे यूरोप के लगभग पंद्रह देशों के लिए एक न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, फिजी के लिए एक तथा केन्या, यूगाँडा, तंज़ानिया, जाँबिया दक्षिण अफ्रीका, मारीशस के लिए तीन भाइयों का एक दल, इस तरह आठ दल जा रहे हैं। इससे देवमाता विश्वमाता बनेंगी एवं विश्व संस्कृति वैदिक ज्ञान से अनुप्रामाणित होगी। अपने कोई प्रियजन विदेश में रहते हों तो उनसे संपर्क कर उन्हें समीप की गायत्री परिवार की शाखा से संपर्क करने को कहना भी एक पुण्य में आता है। इस वर्ष गायत्री तपोभूमि में भी कई नए शिविर आरंभ हुए हैं। छात्र छात्राओं के लिए विशिष्ट शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। सभी इसमें भागीदारी कर सकते हैं।

आशा है परिजन इस वर्ष की गायत्री जयंती को ऐतिहासिक बनाएंगे। नए आँदोलनों की शुरुआत हेतु व्रत लेंगे। अभी तक जो कुछ किया है, उसकी समीक्षा कर आगे के लिए नए कार्य हाथ में लेने का संकल्प लेंगे। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का नया सत्र भी 24 जून से आरंभ हो रहा है। कई नए पाठ्यक्रम आरंभ हुए हैं। अपने बच्चों को पढ़ने हेतु गायत्री तपोभूमि मथुरा अथवा देवसंस्कृति विश्वविद्यालय भेजना चाहिए। हरिद्वार के देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में पात्रता हेतु जून माह के मध्य में एक परीक्षा आयोजित होगी। उसमें उत्तीर्ण पाए जाने व अनिवार्य शर्तों पर खरा उतरने पर ही प्रवेश मिल सकेगा। फीस मात्र 1000 रुपये प्रतिमाह है एवं विश्वविद्यालय पूर्णतः आवासीय है।

युगशक्ति का गायत्री का आलोक इस वर्ष राष्ट्र के कोने-कोने तक पहुँचे, यही हमारा लक्ष्य रहे। अब परमपूज्य गुरुदेव की जन्मशताब्दी वर्ष को आरंभ होने में मात्र आठ वर्ष रह गए हैं। 2011-2012 में मनाया जाने वाला यह शताब्दी वर्ष ऐतिहासिक हो एवं हम अपनी ढेर सारी उपलब्धियाँ लेकर गुरुसत्ता के चरणों में पुष्प चढ़ा सकें, यही हमारा लक्ष्य हो। सभी परिजनों को गायत्री जयंती पर्व की संपादन तंत्र की ओर से भावभरी मंगलकामनाएं।


आदेश प्रदान किया (kahani)

रक्षाबंधन का पुनीत पर्व था। बीकानेर नरेश का दरबार लगा हुआ था। राजद्वार पर ब्राह्मणों के मध्य मालवीय जी भी नारियल लिए खड़े थे। शनैः शनैः कतार छोटी होती जा रही थी। प्रत्येक ब्राह्मण, नरेश के पास जाकर राखी बाँधता और दक्षिणा के रूप में एक रुपया प्राप्त कर खुशी-खुशी घर लौटता जा रह था।

मालवीय जी का नंबर आया तो वे भी नरेश के समक्ष पहुँचे, राखी बाँधी, नारियल भेंट किया और संस्कृत में स्वरचित आशीर्वाद दिया। नरेश के मन में इस विद्वान का परिचय जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। जब उन्हें मालूम हुआ कि यह तो मालवीय जी हैं, तो वह बहुत प्रसन्न हुए और अपने भाग्य की मन-ही-मन सराहना करने लगे। मालवीय जी ने विश्वविद्यालय की रसीद वहीं उनके सामने रख दी। उन्होंने भी तत्काल एक सहस्र मुद्रा लिखकर हस्ताक्षर कर दिए। नरेश अच्छी तरह जानते थे कि मालवीय जी द्वारा संचित किया हुआ सारा द्रव्य विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों में ही व्यय होने वाला है।

मालवीय जी ने विश्वविद्यालय की समूची रूपरेखा नरेश के सम्मुख रखी। उस पर संभावित व्यय तथा समाज को होने वाला लाभ भी बताया तो नरेश मुग्ध हो गए और सोचने लगे, इतने बड़े कार्य में एक सहस्र मुद्राओं से क्या होने वाला है, उन्होंने पूर्व लिखित राशि पर दो शून्य और बढ़ा दिए, साथ ही अपने कोषाध्यक्ष को एक लाख मुद्राएं देने का आदेश प्रदान किया।


क्लीव न हम कहलाएँ


क्लीव न हम कहलाएँ (kavita)

गुरु का शक्ति-प्रवाह बह रहा, अब इससे जुड़ जाएं हम, भागीरथ-तप के यूँ भागीदार स्वयं बन जाएं हम।

भागीरथी और गायत्री का अवतरण हुआ इस दिन, थी मृतप्राय मनुजता, प्राणों का संचरण हुआ इस दिन, सुधा-बिंदु पाकर उनसे फिर प्राणवान बन जाएं हम, भागीरथ-तप के यूँ भागीदार स्वयं बन जाएं हम।

ऋषि ने तप से किया मुक्त, गायत्री रही न बंधन में, पहुँची देश-देश, घर-घर में, संपन्नों में, निर्धन में, इस प्रभाव को शेष जनों तक भी निश्चित पहुँचाएं हम, भागीरथ तप के यूँ भागीदार स्वयं बन जाएं हम।

जो हो गया, न उस पर हम कुछ गर्व करें, अभिमान करें, वह प्रभाव था केवल गुरु के तप का, इसका ध्यान करें, व्यर्थ आत्म-सम्मोहन से संपूर्ण मुक्ति पा जाएं हम, भागीरथ तप के यूँ भागीदार स्वयं बन जाएं हम।

करें साधना, हों सशक्त, ठहरें न कहीं बाधाओं में, दृष्टि स्वच्छ हो, जिससे पलभर भ्रमित न हो भटकावों में, सर्वप्रथम व्यक्तित्व स्वयं का पावन प्रखर बनाएं हम, भागीरथ-तप के यूँ भागीदार स्वयं बन जाएं हम।

ऋषि का शक्ति-प्रवाह हमें हर कोने तक पहुँचाना है, युग के महत्कार्य में जनसहयोग सभी का पाना है, इसके लिए सशक्त संगठन, मिलकर अभी बनाएं हम, भागीरथ-तप के यूँ भागीदार स्वयं बन जाएं हम।

चिंतन का बिखराव दूर हो, ऐसा सतत प्रयास करें, संकल्पित ही श्रेय-सफलता पाएंगे, विश्वास करें, असमंजस को त्यागें, कायर-क्लीव नहीं कहलाएं हम, भागीरथ-तप के यूँ भागीदार स्वयं बन जाएं हम।

-शचींद्र भटनागर

*समाप्त*