वासना या विवेक दो में से एक का चुनाव करना ही पड़ता है। जिन्दगी या तो वासना के पीछे भागती है, अथवा फिर विवेक का अनुसरण करती है। वासना तृप्ति का भरोसा दिलाती है, लेकिन अतृप्ति को और अधिक गहरा करती है। इसलिए वासना के पीछे भागने के लिए आँखों का बन्द होना जरूरी है। जो आँखें खोलकर चलने का साहस करते हैं, वे अपने ही आप विवेक को पा जाते हैं और विवेक की आग में सारी अतृप्ति वैसे ही भाप बनकर उड़ जाती है, जैसे सूरज की तपन में ओस कण।
प्राणिविज्ञानी लिबमैन ने एक खास तरह के कीड़ों का जिक्र किया है। ये कीड़े हमेशा ही अपने नेता कीड़े के पीछे चलते हैं। लिबमैन ने एक बार इन कीड़ों को एक गोल थाली में रख दिया। उन सबने चलना शुरू किया और फिर चलते गये। इस गोल रास्ते का कोई अन्त तो था नहीं, लेकिन उन्हें भला इसका क्या पता था? वे तो बस चल रहे थे, चलते जा रहे थे। आखिरकार वे उस समय तक चलते रहे, जब तक कि थक कर गिर नहीं गये और गिर कर मर नहीं गये।
वासनाओं के पीछे भागते हुए व्यक्तियों की दशा भी कुछ इसी तरह की है। मौत से पहले वे कभी नहीं जान पाते कि जिस मार्ग पर वे हैं, वह मार्ग नहीं, चक्कर है। मार्ग की कोई मञ्जिल होती है। यह कहीं पहुँचाता है। लेकिन चक्कर तो बस गोल-गोल घुमाता है, पहुँचाता कहीं भी नहीं। जो वासनाओं के पीछे दौड़ रहे हैं, वे भी बस चलते जाते हैं। वे यह भी विचार नहीं कर पाते कि जिस राह पर वे हैं, वह कहीं कोल्हू का चक्कर तो नहीं? वासनाओं की राह गोल है। घूम-फिर कर हम वहीं उन्हीं वासनाओं पर अटक जाते हैं।
दुष्पुर वासनाओं के पीछे चलकर भला कब, कौन, कहाँ पहुँचा है। इस राह पर न तो तृप्ति है, न तुष्टि और न ही शान्ति। कम ही ऐसे भाग्यशाली होते हैं जो अपनी मौत से पहले इस अज्ञानपूर्ण अन्ध भटकन से उबर कर विवेक का अनुसरण करने लगते हैं। विवेक उन्हें एक साथ सब कुछ दे देता है। महर्षि रमण कहते थे, जो वासनाओं की अन्धकार पर हैं, उनके लिए मेरे हृदय में आँसू भर आते हैं, क्योंकि उन्हें अतृप्ति, असंतुष्टि और अशान्ति के सिवा कुछ नहीं मिलेगा। उस आदमी से बढ़कर रास्ते से भटका हुआ कौन है, जो कि वासनाओं के पीछे चलता है। इसलिए जीवन का यही एक संदेश है, वासना नहीं केवल विवेक।
आत्मिक उत्कर्ष के उपायों में उपासना का स्थान सर्वोपरि है। इसमें अपनी आस्था, अभिरुचि एवं श्रद्धा के अनुरूप ईष्ट का चयन किया जाता है और उसके साथ घनिष्ठ आत्मीयपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। घनिष्ठता की गहराई के अनुरूप उपासक अपने अन्दर वाँछित परिवर्तन को पाता है। उपासना के ये गम्भीर प्रभाव कोई चमत्कार या रहस्यमय नहीं है बल्कि गूढ़ मनोवैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित है।
प्रख्यात चिकित्सा विज्ञानी डॉ. हेनरी लिंडलहर अपनी कृति ‘प्रेक्टिस ऑफ नेचुरल थेराप्यूरिक्स’ में लिखते हैं कि मनुष्य के मनोभावों का उसके स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है और व्यक्ति किसी महापुरुष, अदृश्य देवदूत तथा सर्वव्यापी तत्त्व से एकत्व स्थापित करके अपने शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य को निश्चयपूर्वक सुधार सकता है। हम जिस भी प्रकार की आत्मा का ध्यान करते हैं, उससे हमारा संपर्क-सम्बन्ध उसी तरह स्थापित हो जाता है, जिस प्रकार रेडियो या टी.वी. का संपर्क इसके प्रसारण केन्द्र से जुड़ जाता है। इस तरह मनुष्य का मन मस्तिष्क एक रेडियो या टी.वी. सेट के समान है जो अभीष्ट ट्युनिंग के अनुरूप अच्छे व बुरे विचारों को ग्रहण करता रहता है और यह प्रक्रिया जागृत एवं स्वप्न दोनों अवस्थाओं में चलती रहती है। उपासना में हम श्रेष्ठता एवं दिव्यता के पुञ्ज ईष्ट पर ध्यान करते हैं तो हमारा मन भी इनके श्रेष्ठ एवं दिव्य भावों को ग्रहण करने लगता है और हम ऊर्ध्वगति को प्राप्त होने लगते हैं तथा पतन-पराभव के मार्ग में गिरने से बचते हैं।
इसी मनोवैज्ञानिक सत्य का उद्घाटन हम उपटन सिंकलेयर की ‘मेण्टल रेडियो’ नामक पुस्तक में पाते हैं। उपटन महोदय लिखते हैं कि मनुष्य अपने विचारों को न केवल भौतिक माध्यमों से भेज सकता है, बल्कि वह अभौतिक मार्गों से भी अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचा सकता है। सिद्ध योगीगण इसी विधि को अपनाते हैं। वे बैठे-बैठे ही अपने विचारों को समूचे विश्व ब्रह्मांड में प्रसारित करते रहते हैं और सुपात्र आत्माएँ इनकी प्रेरणाओं को ग्रहण कर आगे प्रसारित एवं क्रियान्वित करते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति महान् आत्माओं के संदेशों के प्रति अपने मन के द्वार को खोलकर इनकी दिव्य प्रेरणाओं को ग्रहण कर सकता है। उपासना इसी प्रयोजन को सिद्ध करने वाली सशक्त प्रक्रिया है।
उपासना में उपास्य का चुनाव एवं उपासक के व्यक्तित्व का गठन एवं रूपांतरण भी मनोवैज्ञानिक रीति से सम्पन्न होता है। योग सूत्र में कहा गया है कि मनुष्य जो कुछ भी सोचता है, वह वैसा ही बनने लगता है। गीताकार ने इसी तथ्य को सुन्दर रूप से विवेचित किया है-
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो योयच्छन्द्धः स एव च॥ (17/3)
मनुष्य की लगन उसके स्वभाव के अनुरूप ही होती है। यही उसका सत्त्व है। इसी के अनुसार वह अपने मित्रों, गुरुजनों, देवी-देवताओं का चुनाव करता है और उन पर अपनी श्रद्धा और भक्ति को प्रकाशित करता है। यह एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिस के अनुसार मनुष्य जैसी श्रद्धा रखता है, वह वैसा ही बनता जाता है।
आधुनिक मनोविज्ञान इसी तथ्य को आत्मीकरण या तादात्मीकरण के अंतर्गत स्पष्ट करता है। इसके अनुसार मनुष्य का अचेतन मन अनेक प्रकार की गूढ़ प्रक्रियाओं एवं गुप्त चेष्टाओं के द्वारा आत्मा का साक्षात्कार करता है। अन्तरीकरण या आत्मीकरण एक ऐसी ही चेष्टा है। इसके अंतर्गत व्यक्ति अपने अंतर्मन की गहनतम इच्छा के अनुरूप बाहर अपना आदर्श गढ़ता है और इसका ध्यान करने लग जाता है। ध्यान की प्रगाढ़ता में ध्याता और ध्येय में एकत्व स्थापित हो जाता है। सामान्य स्थिति में तादात्मीकरण की इस प्रक्रिया को हम किसी फिल्म अथवा खेल देखने वालने दर्शकों की मनोवृत्ति में देखते हैं। साहित्यिक रचना एवं रसास्वादन में भी सचेतन मन की यही प्रक्रिया काम करती है। भाव तादात्मीकरण की यह प्रक्रिया ही वस्तुतः हो रही घटनाओं में व्यक्ति की सक्रिय भागीदारी का बोध कराकर सृजनात्मक आनन्द का आधार बनती है। तादात्मीकरण की यह वृत्ति अपने परिष्कृत रूप में उपासक की मनोवृत्ति में सक्रिय होती है, जिसकी पराकाष्ठा में उपासक का अस्तित्व पूरी तरह ईष्ट में विलय हो जाता है। अद्वैत की इस चरम स्थिति में ही उपासना के चमत्कारिक फलश्रुतियाँ प्रतिफलित होती हैं।
‘साइकोलॉजी ऑफ रिलीजन’ में थूलेसन, सेन्ट कैथेराइन का उदाहरण देते हुए उपासना की ऐसी चमत्कृति पर प्रकाश डालते हैं। अपने ईष्ट से तादात्मीकरण के विशेष क्षणों में, कैथरीन अपने शरीर के विभिन्न भागों में वैसे ही पीड़ा अनुभव करती थी, जिस प्रकार हजरत ईसा को कभी हुई थी। ऐसी अवस्था में चिकित्सक उसकी देखभाल करते थे। उन्होंने कैथरीन की पीड़ा को वास्तविक अनुभूत पाया। इसी तरह कृष्ण दीवानी मीरा अपने प्रभु के प्रेम में इतना डूब जाती थी कि वह श्रीकृष्ण रूप ही बन जाती थी और अन्त में द्वारिकाधीश में ही समा गयी।
इस तरह उपासना एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है, जिसका अपना ठोस एवं सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक आधार है। अपनी चरम परिणति में यह अपने ईष्ट उपास्य से एकात्मयता के लक्ष्य को सिद्ध करती हैं और व्यक्तित्व के गहनतम स्तर से रूपांतरण एवं गठन के मार्ग को प्रशस्त करती है। सामान्य रूप में लिया गया उपासना का अवलम्बन भी साधक को जीवन की जटिल चुनौतियों से जूझने का बल देता है और मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में एक गहन एवं प्रभावी उपचार के रूप में सिद्ध होता है।
आधुनिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में चार्ल्स युँग ने उपासनात्मक धार्मिक क्रियाओं को मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यक्तित्व विकास के लिए नितान्त आवश्यक माना है। उनका कहना था कि विश्व के सभी मानसिक चिकित्सक मिलकर उतने मानसिक रोगियों को आरोग्य प्रदान नहीं करा पाते, जितना कि विश्व का निम्न से निम्न स्तर की उपासना पद्धति कराती है। इसके अपने ठोस आधार हैं।
मनुष्य को जीवन मात्र देह और मन का मनोकायिक ढांचा भर नहीं है और ना ही उसका अस्तित्व परिवार, समाज एवं इस लोक के जीवन तक सीमित है। उसका इन सबसे परे गहन भावनात्मक एवं आध्यात्मिक अस्तित्व भी है जिसका अपना आलौकिक स्वरूप है। मानव को समग्र सुख-शान्ति एवं सुरक्षा को आधार यही है जो कि गहनतम इच्छा आकाँक्षा के रूप में मनुष्य के अन्तर में अपनी पूर्ति के लिए सदैव लालायित रहता है। भौतिक विज्ञान इस आकाँक्षा की पूर्ति के लिए कुछ नहीं देता। यही कारण है कि भौतिक रूप से समृद्ध एवं विकसित देशों में विक्षिप्त एवं मनोरोगियों की संख्या सर्वाधिक है और अन्य समाज भी जो उपासनात्मक अवलम्बन से हीन है वहाँ भी ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है। मानव की गहनतम आत्मिक पिपासा को उपासनात्मक उपचार ही शान्त कर सकते हैं।
दूसरा मानवीय असंतोष का आधारभूत कारण उसकी अस्तित्व सम्बन्धी ससीमता का बोध है। मात्र देह और मन बुद्धि की शक्ति के बूते वह जीवन की गम्भीरतम चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता। भौतिक विज्ञान द्वारा भी जो सुविधा साधन उसे उपलब्ध होते हैं वे भी अपनी सीमा में बँधे हैं। ऐसे में जीवन की असहनीय निराशा एवं दैवीय संकटों की स्थिति में वह या तो मृत्यु या पागलपन का आह्वान करने लगता है या फिर झूठे संतोष में स्वयं को भुलाने की चेष्टा करता है।
वर्तमान मानव की दयनीय मानसिक स्थिति का सुन्दर चित्रण करते हुए डॉ. आर. के. मुखर्जी ने अपनी पुस्तक ‘सिक्वेंस ऑफ सिविलाइजेशन’ में ठीक ही लिखा है कि हमारी वर्तमान भौतिक उन्नति तथा वैज्ञानिक बुद्धि ने मनुष्य को आध्यात्मिक दृष्टि से विकृत कर दिया है और उससे आन्तरिक शान्ति छीन ली है। इसी का परिणाम है कि समृद्ध राष्ट्र जहाँ गरीब राष्ट्रों के शोषण व सत्ता संघर्ष में उलझे हुए हैं, वहीँ सम्पूर्ण मानव जाति भारी असंतोष एवं विक्षिप्तता के दौर से गुजर रही है। मानवीय प्रयास इस संदर्भ में निराशावादी रुख लिए हुए हैं, जिनके अनुसार सभ्यता का विकास और मानसिक रोगों की वृद्धि एक दूसरे के सहगामी हैं। मनुष्य इस दुर्भाग्य से मुक्त नहीं हो सकता।
किन्तु आध्यात्मिक दर्शन एवं उपचार इस निराशावाद को निरस्त करते हैं। उसके अनुसार मानव के भीतर वह तत्त्व विद्यमान है, जो अपार ज्ञान, शक्ति और आनन्द का स्रोत है। इसका जागरण एवं विकास ही मनुष्य की तमाम समस्याओं का समाधान है। उपासनात्मक उपचार इसी को सम्पन्न करने का सशक्त विज्ञान सम्मत उपाय है, जिसमें मनुष्य के आध्यात्मिक ज्ञान की प्रगति बाहर से भीतर की ओर होती है। इसमें अन्तरात्मा की पूर्णता का प्रक्षेपण (प्रोजेक्षन) चयनित उपास्य देव, महापुरुष या आदर्श में होता है और इससे भाव-संवाद एवं तादात्मीयकरण की प्रक्रिया के साथ आन्तरिक जागरण रूपांतरण एवं विकास की प्रक्रिया शुरू होती है। साथ ही उपासना द्वारा व्यक्ति को जीवन की रिक्तता एवं अपूर्णता को भरने वाला सशक्त एवं पूर्ण आलम्बन मिल जाता है और अस्तित्व की गहनतम जिज्ञासा एवं पिपासा को संतुष्ट एवं तृप्त करने वाला आधार भी मिल जाता है।
गुजरात के रविशंकर महाराज ने अपराधी प्रवृत्तियों के लोगों से उनकी गलती कबूल कराई और प्रायश्चित कराए। एक अपराधी रात भर सोया नहीं। सवेरे महाराज के पास पहुंचा और कहा कि उसने पड़ोसी के यहां शराब की बोतलें रखवाकर पकड़वा दिया। अब वह जेल में है।
महाराज ने उसे प्रायश्चित बताया कि जब तक वह छूटकर न आए तब तक उसके घर का खरच तुम उठाओ और बच्चों की देख−भाल रखो। उसने ऐसा ही किया। अब वह जेल से छूटा तो घनिष्ठ मित्र बन गया।
एक आदमी हनुमान का उपासक था। एक बार वह बैलगाड़ी लिए कहीं जा रहा था। गाड़ी कीचड़ में फँस गई, वह वहीं खड़ा होकर हनुमान चालीसा पाठ करने लगा और गाड़ी बाहर निकलने की कामना करने लगा। तभी उधर आए एक पंडित जी ने कहा, मित्र हनुमान जी पता न चलने पर पहाड़ ही उखाड़ लाए थे, तुम कम−से−कम गाड़ी को हाथ तो लगाओ। आदमी ने थोड़ी ताकत लगाई और बैल गाड़ी बाहर खींच ले गए।
देवता हों या महापुरुष, तब तक फल नहीं देते जब तक मनुष्य स्वयं उन आदर्शों के परिपालन के लिए समुद्यत नहीं होता। कर्म विधान पर भी यही सिद्धाँत लागू होता है। ईश्वर उनका फल तब दें, जब मनुष्य अंतः को बलवान बनाए, याचना भाव नहीं, समर्पण भाव बढ़ाए।
स्वर्ग और नरक करनी के फल हैं, एक संत ने अपने शिष्य को समझाया, पर शिष्य ही समझ में बात चढ़ी नहीं। तब उसका उत्तर देने के लिए अगले दिन संत शिष्य को लेकर एक बहेलिये के पास पहुँचे। वहाँ जाकर देखा, व्याध कुछ जंगल के निरीह पक्षी पकड़कर लाया था और उन्हें काट रहा था। उसे देखते ही शिष्य चिल्लाया, महाराज, यहाँ तो नरक है, यहाँ से शीघ्र चलिए। संत बोले, सचमुच इस बहेलिये ने इतने जीव मार डाले, पर आज तक फूटी कौड़ी इसने नहीं जोड़ी। कपड़ों तक के पैसे नहीं। इसके लिए यह संसार भी नरक है और परलोक में जो इतने मारे गए जीवों की तड़पती आत्माएँ इसे कष्ट देंगी, उसकी तो कल्पना भी नहीं हो सकती।
संत दूसरे दिन एक साधु की कुटी पर पधारे। शिष्य भी साथ थे। वहाँ जाकर देखा, साधु के पास है तो कुछ नहीं, पर उनकी मस्ती का कुछ ठिकाना नहीं। बड़े संतुष्ट, बड़े प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। संत ने कहा, वत्स, यह साधु इस जीवन में कष्ट का, तपश्चर्या का जीवन जी रहे हैं, तो भी मन में इतना आह्लाद! यह इस बात का प्रतीक है कि इन्हें पारलौकिक सुख तो निश्चित ही है।
सायंकाल संत एक वेश्या के घर में प्रवेश करने लगे तो शिष्य चिल्लाया, महाराज, यहाँ कहाँ? संत बोले, वत्स, यहाँ का वैभव भी देख लें। मनुष्य इस साँसारिक सुखोपभोग के लिए अपने शरीर, शील और चरित्र को भी किस तरह बेचकर मौज उड़ाता है, पर शरीर का सौंदर्य नष्ट होते ही कोई पास नहीं आता। यह इस बात का प्रतीक है कि इसके लिए संसार स्वर्ग की तरह है, पर अंत इसका वही है, जो उस बहेलिये का था।
अंतिम दिन वे एक सद्गृहस्थ के घर रुके। गृहस्थ बड़ा परिश्रमी, संयमशील, नेक और ईमानदार था, सो सुख−समृद्धि की उसे कोई कमी नहीं थी, वरन् वह बढ़ ही रही थी। संत ने कहा, यह वह व्यक्ति है, जिसे इस पृथ्वी पर भी स्वर्ग है और परलोक में भी। शिष्य ने इस तत्त्वज्ञान को भली प्रकार समझ लिया कि स्वर्ग और नरक वस्तुतः करनी का फल है।
मंत्र शक्ति प्राच्य विधाओं में अपना एक महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट स्थान रखती है। यह ज्ञान-विज्ञान की एक रहस्यमय किन्तु तथ्यपूर्ण विद्या है, जिसके अद्भुत एवं चमत्कारी प्रभावों से राष्ट्रीय जीवन का अतीत ओतप्रोत रहा है। आज भले ही कालक्रम के प्रवाह में यह विद्या लुप्त प्राय हो गई है, किन्तु इसकी उपयोगिता एवं प्रासंगिकता पहले से कही अधिक बनी हुई है। क्योंकि मंत्र शक्ति की निगूढ़ विद्या जीवन के सर्वांगीण अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त करने में सक्षम है। यह एक ओर जहाँ भौतिक प्रयोजनों को सफलता पूर्वक सिद्ध करने में समर्थ है वहीं इसकी आध्यात्मिक प्रभावोत्पादकता भी असंदिग्ध रूप से मानव को दैवी वरदान देने में अचूक है। बस आवश्यकता इसके सही स्वरूप को समझने व इसकी क्रियाविधि को निष्ठापूर्वक जीवन में अपनाने की है।
मंत्र स्थूल शब्दों एवं अक्षरों द्वारा गुँथित सूक्ष्म शक्तिधारा का एक ऐसा शक्ति पुञ्ज है, जिसकी शक्ति सामान्यतः प्रसुप्त रहती है। साधना के द्वारा इसके सतत मनन के द्वारा यह शक्ति जागृत होने लगती है और साधक को अपनी प्रकृति के अनुरूप अभीष्ट कर देती है। अपने सूक्ष्म भौतिक स्वरूप के अनुरूप यह अभीष्ट लौकिक मनोकामना को पूर्ण करते हैं और आध्यात्मिक प्रकृति के अनुरूप यह साधक के अन्तःकरण में वाँछित हेर-फेर कर मनोभूमि को इतना परिष्कृत करती है कि अभीष्ट ईश्वरीय चेतनधारा अवतरित हो सके और साधक के माध्यम से प्रवाहित हो सके। इस तरह मंत्र विश्व-ब्रह्मांडव्यापी सूक्ष्म एवं अलौकिक शक्तिधाराओं को स्फूरित कर अपने अनुकूल बनाने वाली विद्या है। यह एक ऐसी विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है जिससे शक्ति का उद्भव होता है। यह ज्ञान एवं प्रकाश का एक ऐसा पुञ्ज है जो जागृत होने पर अज्ञान, तमस एवं अंधकार का हरण करता है। इससे जहाँ प्राणबल, मनोबल, बौद्धिक प्रखरता एवं चारित्रिक दृढ़ता के साथ आत्मिक विकास का पथ प्रशस्त होता है, वहीं इससे धन, आरोग्य, आयु, असुरक्षा। विपत्ति, निवारण, आसुरी व्यक्तियों के नाश जैसे भौतिक लाभ एवं लौकिक प्रयोजन भी सिद्ध हो सकते हैं। इस तरह मंत्र में जीवन के सर्वांगीण विकास एवं अभ्युदय का मर्म निहित है।
वस्तुतः आत्मिक दृष्टि से आध्यात्मिक लाभ के लिए मंत्र जप से बढ़ कर कोई साधन नहीं। इसके सबसे सरल, सहज एवं प्रभावकारी माना गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है-‘यज्ञानाँ जप यज्ञोस्मि’ अर्थात् यज्ञों में जप यज्ञ मैं ही हूँ। इस तरह जप साधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। योग दर्शन महर्षि पतञ्जलि ने लिखा है कि ‘जल, औषधि, मंत्र जप और समाधि से सिद्धि प्राप्त होती है’ अर्थात् मंत्र जप को सिद्धि के साधन के रूप में स्वीकारा गया है। इसी तरह मंत्र शास्त्रियों ने बारम्बार कहा है कि ‘जपात् सिद्धि, जपात् सिद्धि, जपात् सिद्धि न संशया।’ अर्थात् मंत्र जप से प्रचण्ड शक्ति का उद्भव होता और सिद्धि प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं होना चाहिए तथा अनेकों भौतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। ‘आनि पुराण’ में मंत्र जप की आत्यंतिक व्याख्या सुन्दर रीति से करते हुए कहा गया है-
न कारो जन्म विच्छेदः, पकारः पापनाशकः। तस्याज्जय इति प्रोक्तो, जन्म पाप-विनाशकः॥
अर्थात् ‘ज’ का अर्थ जन्म का विच्छेद और ‘प’ का अर्थ पापों का नाश है। जिसके द्वारा जन्म-मरण और पापों का नाश होता है। वही जप कहलाता है।
मंत्र जप की इस अनिर्वचनीय महत्ता के बावजूद हम इसके लाभ से वंचित रह जाते हैं, तो निश्चित ही हम कोई भूल कर रहे हैं। हमारी साधन क्रियायें कहीं कोई त्रुटि कर रही हैं। मंत्र साधना को फलदायी बनाने के लिए कुछ आधारभूत तथ्यों का ध्यान रखना अनिवार्य है।
मंत्र साधना के विषय में प्रथम तथ्य है आचरण की शुद्धता। इसके अपने वैज्ञानिक कारण हैं। मंत्र शब्द शक्ति का सूक्ष्म विज्ञान है। किसी भी मंत्र की रचना शब्द विज्ञान के गम्भीर तथ्यों पर आधारित है। इनका सही उच्चारण हमारे शरीर में अवस्थित सूक्ष्म शक्ति केन्द्रों, चक्रों, उपत्यिकाओं को उनकी सुषुप्तावस्था से जागृत करता है और अभीष्ट शक्ति के प्रवाह को संचालित करता है। साथ ही मंत्र जप बिखरी हुई मानसिक शक्तियों को केन्द्रित कर अभीष्ट लक्ष्य की ओर नियोजित करता है और आशातीत सफलता एवं सिद्धि की ओर अग्रसर होता है।
मंत्र साधना के संदर्भ में दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य है-मंत्र की शक्ति, प्रभाव एवं प्रमाणिकता पर अटूट विश्वास। विश्वास को साधना का प्राण कहा गया है। इसके अभाव में साधना आधे-अधूरे मन से ही होती है और ऐसे में अभीष्ट सफलता संदिग्ध ही रह जाती है। वस्तुतः विश्वास स्वयं में ही एक बहुत बड़ी शक्ति है, विश्वास से उद्भूत ऊर्जा तमाम अवरोधों के बीच भी साधक को प्रगति पथ पर बढ़ाती रहती है। मानसकार ने तो ‘श्रद्धा विश्वास’ की महिमा ‘भवानी-शंकर’ से उपमा करते हुए प्रतिपादित की है। वस्तुतः बिना श्रद्धा भाव के मंत्र साधना में वह निष्ठ ही नहीं बन पड़ती जो साधना से सिद्धि तक की दूरी को अध्यवसाय पूर्वक पूर्ण कर सके।
तीसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य है-व्यवहार शुद्धि। जो आहार-विहार के संयम एवं सात्त्विकता द्वारा निर्धारित होती है। साधक का आहार-विहार सीमित ही होना चाहिए। आहार के संदर्भ में भूख से कुछ कम और नियत समय पर लिया गया सात्त्विक आहार एक मोटा आदर्श है। आहार संदर्भ में बरता गया यह संयम मंत्र साधना में सहायक सिद्ध होगा। इसके अभाव में अभक्ष्य आहार, बहुभक्षण भूख से अधिक भोजन आदि के रूप में असंयम मन को चंचल एवं भारी बनाएगा, जो कि मंत्र साधना में एक बड़ा अवरोध है। विहार के संदर्भ में वाणी का संयम प्रमुख है। इसका मोटा सूत्र है-वाणी मित, मधुर व कल्याणकारी ही रहे। परचर्चा और परनिंदा से सर्वथा दूर ही रहें। आचरण के संदर्भ में विपरीत लिंग के प्रति पवित्र एवं शुद्ध भावों को रखना, नितान्त अनिवार्य है। इस संदर्भ में कामोत्तेजक दृश्यों, चलचित्रों, साहित्य से अभीष्ट दूरी ही उचित है। मंत्र साधक को यौन-शुचिता के संदर्भ में विशेष ध्यान रखना चाहिए। आहार-विहार की उपरोक्त शुद्धि मंत्र साधना का एक अहम् पक्ष है, जिसकी प्रायः उपेक्षा की जाती है। अतः सफलता से साधक को वंचित ही रहना पड़ता है। दुराचारी, अनाचारी, व्याभिचारी और कुकर्मी की मंत्र साधना से उत्पन्न शक्ति का वही हश्र होता है जो जलते तवे पर पड़ने वाली पानी की बूँदों का। साधना से उत्पन्न हो रही शक्ति को बूँद-बूँद करके अपने शक्ति घर में इकट्ठा करना पड़ता है। मंत्र सिद्धि में सहायक संयम साधना का यही सार है।
इसके अलावा मंत्र साधना की सिद्धि के लिए शरीर की शुद्धि अभीष्ट है। यह प्रयोजन स्नान द्वारा पूरा होता है। अधिक सर्दी, रोग या किसी विवशता वश हाथ मुँह धोकर या गीले कपड़े से बदन पोंछ कर भी काम चलाया जा सकता है। शरीर पर कम से कम वस्त्र रहने चाहिए। ठण्ड में कम्बल का प्रयोग किया जा सकता है। साधना में स्थान का भी महत्त्व है। यह शान्त, एकाँत व सात्त्विक होना भी श्रेयस्कर है। नदीतट, मन्दिर, बाग एवं घर का एकाँत कोना आदि इसके लिए उपयुक्त स्थल है, यथासंभव दिनभर पहने हुए कपड़ों को पहन कर साधना नहीं करनी चाहिए। आसन ऐसा हो जिस पर लम्बे समय तक बिना कष्ट के बैठ सकें। पाल्थी मारकर सीधे बैठना सबसे सरल है। मेरुदण्ड सदा सीधा रहना चाहिए, जिससे कि सुषुम्ना का प्राण-प्रवाह बिना अवरोध के चलता रहे।
मंत्र साधना के लिए प्रातः का समय श्रेष्ठ माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर साधना करनी चाहिए। साधना नियत स्थान व समय पर नियमित रूप से होनी चाहिए। दिशा को विचार भी अभीष्ट है। सामान्यतः प्रातः पूर्व की ओर तथा सायंकाल पश्चिम ओर मुँह करके साधना में बैठना चाहिए। सात्त्विकता की दृष्टि से माला तुलसी की ही श्रेष्ठ है। मंत्र जप इस तरह हो कि कण्ठ से ध्वनि तो होती रहे और होंठ भी हिलता रहे किन्तु पास बैठा दूसरा व्यक्ति सुन न सके। एक माला पूरी होने पर सुमेरु का उल्लंघन नहीं किया जाता, बल्कि उसके मस्तिष्क तथा नेत्रों से स्पर्श करके वापस पीछे की ओर उलटकर जप शुरू किया जाता है।
जप के संदर्भ यह भी अभीष्ट है कि इस दौरान हो रही अनुभूतियों एवं अनुभवों को अपने तक ही सीमित रखा जाय या अपने मार्गदर्शक या किसी प्रामाणिक साधक को ही प्रकट किया जाय। इनको सार्वजनिक करना न तो आवश्यक है और न ही अभीष्ट। पूजा में बचे पदार्थों का निष्पादन किसी तीर्थ, नदी, बाग या पवित्र स्थल पर ही करना चाहिए। चावल, नैवेद्यों का वितरण क्रमशः चिड़ियों व बच्चों को प्रसाद रूप में किया जा सकता है। बचे जल से सूर्य को अर्घ्यदान देना चाहिए।
साधना नियमित रूप से निश्चित मात्रा में होनी चाहिए। यदि किसी कारणवश विघ्न-बाधा आ जाय तो अगले दिन एक माला प्रायश्चित स्वरूप जपनी चाहिए। जन्म या मृत्यु के सूतक होने पर विधि-विधान पूर्वक साधना करना मना है। ऐसे में मानसिक जप द्वारा काम चलाया जाना चाहिए। यात्रा या रोग की स्थिति में भी जब विधि विधान से जप करना सम्भव न हो तो चलते-फिरते या बिस्तर पर मानसिक जप किया जा सकता है।
साधना में तरह-तरह के विघ्न आते हैं। उनसे धैर्यपूर्वक निपटना चाहिए। समय पर अभीष्ट सफलता न मिलने पर निराशा एवं संशयग्रसित नहीं होना चाहिए। इसकी जगह गहराई से अपनी कमियों का निरीक्षण करना चाहिए और दुगुने उत्साह के साथ साधना में जुट जाना चाहिए।
चंचल मन को अन्तर्मुख बनाए रखने के लिए सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय बहुत सहायक है। इनसे जहाँ आत्म निरीक्षण एवं समीक्षा कर प्रयोजन सिद्ध होता है वहीं मन को उच्चतर प्रेरणा एवं मार्गदर्शन भी मिलता रहता है।
उपरोक्त विधि विधान से की गई मंत्र साधना निश्चित रूप से साधक को मंत्र में निहित शक्ति एवं सामर्थ्य का परिचय करवाने में सफल सिद्ध होती है।
स्वामी दयानंद विरजानंद जी से आदेश पा तपोबल अर्जित करने धरासृं चट्टी पहुँचे व वहाँ परशुराम शिला पर बैठकर उन्होंने कड़ा तप किया। छह वर्ष बीते। उन्हें अपना संकल्प बल, ब्रह्मतेज बढ़ता प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगा। साधना के प्रति मोह ने रोका, और भी ऊँचे आयाम पार कर मुक्त हो जाओ। ऐसे में अंदर से धमकी भरा आदेश आया, मैंने इसीलिए तुझे साधना करने भेजा था था! चल, उठ, समाज में व्याप्त अनीति−अंधविश्वास मिटा। धर्म की चादर को मैला करने वाले पाखंडियों का खंडन कर। लगा, स्वयं गुरुदेव अंदर से कह रहे हों। वे उठ खड़े हुए और उन्होंने धर्मांधों के बीच आकर अपना अड्डा जमाया, ज्ञान−विस्तार कर जनमानस में व्याप्त भ्रांतियों का खंडन किया और यही उनकी जीवनसाधना बन गई।
एक साधु तथा डाकू साथ−साथ यमराज की सभा में जा पहुँचे। यमराज ने उनके कृत्यों का अवलोकन किया व कहा, यदि तुम दोनों को अपने लिए कुछ कहना हो तो कह सकते हो। तुम्हारी करनी तुम्हारे सामने हैं। एक ने भक्ति की है तो दूसरे ने पाप।
डाकू विनम्र स्वर में बोला, महाराज, मैंने जीवन में बहुत पाप किए हैं, जो भी विधान आपके यहाँ मेरे लिए हो, वह करें, मैं प्रस्तुत हूँ। फिर साधु बोले, आप तो जानते ही हैं, मैंने जीवन भर भक्ति की, कृपया मेरे सुख−साधनों का प्रबंध शीघ्र करवाएँ।
यमराज ने दोनों की इच्छा सुनकर डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा शिरोधार्य की, परंतु साधु ने आपत्ति की, महाराज, इस दुष्ट के स्पर्श से मैं भ्रष्ट हो जाऊँगा। मेरी भक्ति तथा तपस्या खंडित हो जाएगी।
अब यमराज बोल उठे, कुकर्मी डाकू तो विनम्रता के साथ आपकी सेवा करने को तत्पर हो गया और आप साधु महाराज मात्र अपने इस कथन से अपनी दुर्गति स्वयं कर बैठे हैं। आपकी भक्ति अधूरी रही है, उसका परिचायक है आपका चिंतन। साधु बहुत लज्जित हुए।
वह विद्वान थे, सर्वमान्य, लोक प्रिय विद्वान। अनेकों उपाधियाँ उनके नाम के साथ टँकी थी। विश्व के अनेक देशों की दर्जनों भाषाओं में उन्होंने हजारों-हजार ग्रंथों का अध्ययन किया था। अनगिनत विषयों का पारदर्शी ज्ञान था उन्हें। पर एक गहरी कसक भी थी। इस ज्ञान से उन्हें सम्मान तो बहुत मिला, लेकिन संतुष्टि न मिल सकी। अन्तःकरण में हमेशा अतृप्ति के अंगारे दहकते रहते थे। महामहोपाध्याय, विद्यावाचस्पति, विद्यावारीधि एवं महापण्डित के अलंकरण किसी भी तरह उनकी जलन और चुभन को शान्त न कर सके। जीवन प्रश्न के समाधान की तल्लीनता में उनके मन में अनेकों तरंगें उठती-गिरती रहती थीं। ऐसी ही अनगिन तरंगों में एक वेग पूर्ण तरंग यह भी उठी कि अन्तःकरण में परम शान्ति केवल परमात्मा के संस्पर्श से पनप सकती है।
इस विचार तरंग ने उन्हें खोजी बना दिया। तीर्थ स्थान, देवमन्दिर और सिद्ध महापुरुषों के द्वार-दरवाजे वह खटखटाने लगे। सब जगह सब कुछ था, पर वह नहीं था जिसकी तलाश में भटक रहे थे। तीर्थ स्थानों में पर्यटन स्थल की रोचकता और भव्यता तो थी, पर पावन तीर्थ चेतना का अभाव था। देवमन्दिर में दैवी गुणों के स्थान पर धन भण्डारण था। संन्यासी त्यागमूर्ति-तपोनिष्ठ होने की जगह ऐश्वर्यवान नजर आये। बड़ी बेबुझ लगी उनको यह उलटबाँसी। पर फिर भी उनकी खोज सच्ची थी-जिज्ञासा पक्की थी। जिन खोजा तिन पाइयाँ का कबीर सूत्र उन्हें और अधिक गहरे पानी पैठने का बल दे रहा था।
खोजते-भटकते, विहरते-विचरते आखिर वह गंगा की गोद और हिमालय की छाँव में बने एक सुरम्य कुटीर में आ पहुँचे। बड़ा ही मनोरम था यह स्थल। यहाँ शान्ति थी, तप की ऊर्जा थी और तीर्थ की पावनता थी। शास्त्रों का बड़ी ही जीवन्त आत्मा थी यहाँ। कुटीर में वास करने वाले महायोगी ब्रह्मचेतना का घनीभूत पुञ्ज थे। उन्हें देखकर अनायास ही श्रद्धा का उद्रेक हो आया। इस कुटीर की सुरम्यता ने उनकी राह की सारी थकान पल भर में हर ली। योगी के मधुर स्वरों ने जैसे मुरझाए अन्तःकरण पर अमृतवर्षा कर दी। ‘वत्स किम् प्रयोजनम्?’ इस संक्षिप्त प्रश्न के उत्तर में उन्होंने अपनी सारी गाथा सुना डाली।
इस गाथा को सुनते हुए महायोगी आचार्य सत्यव्रत उन्हें देखे जा रहे थे। अचानक एक मद्धम मुस्कान के साथ उन्होंने पूछा-वत्स! क्या नाम बताया तुमने? उत्तर में उन्होंने कहा- आचार्यवर, मेरा नाम-महामहोपाध्याय महापण्डित रघुनाथ परचुरे शास्त्री विद्यावाचस्पति विद्यावारीधि है। नाम के साथ इतने अलंकरण सुनकर आचार्य सत्यव्रत हँस पड़े। हँसी थमने पर वह बोले, वत्स रघुनाथ- ज्ञान तो मनुष्य को निर्भर करता है, पर लगता है कि तुम्हारे ज्ञान ने तुम्हें भारवाही बना दिया। आचार्य का इशारा उनकी उपाधियों के साथ शास्त्र पोथियों की उस गठरी की ओर था जिसे पं. रघुनाथ शास्त्री अभी भी अपने सिर पर लादे हुए थे।
हालाँकि वह आचार्य सत्यव्रत से यह पूछ रहे थे कि आचार्यवर परमात्मा को पाने के लिए मैं क्या करूं? वत्स- सबसे पहले तो इस गठरी को नीचे रख दो। पं. रघुनाथ ने इस आदेश को मानने में काफी कठिनाई अनुभव की। फिर भी उन्होंने साहस किया और गठरी को नीचे रख दिया। आत्मा के बोझ को नीचे रखने के लिए सचमुच ही अदम्य साहस की जरूरत होती है। वैसे अभी भी उनका एक हाथ गठरी पर ही था। आचार्य जी ने कहा, वत्स- तुम अपने हाथ को भी उस गठरी से दूर हटा लो। पं. रघुनाथ ने अपनी सच्ची जिज्ञासा का परिचय देते हुए अपना हाथ भी गठरी से दूर कर लिया। इस पर महान् योगी आचार्य जी ने कहा-क्या तुम प्रेम से परिचित हो? क्या तुम्हारे चरण प्रेम के पथ पर चले हैं?
पं. रघुनाथ को आचार्य सत्यव्रत के इस कथन पर हैरानी हुई। अभी तक उन्होंने प्रेम को जीवन पथ की बाधा ही माना था। लेकिन आचार्य जी तो कुछ नया कह रहे थे। उन्होंने प्रश्नवाचक निगाहों से आचार्य सत्यव्रत की ओर देखा। इन प्रश्न सूचक निगाहों के उत्तर में आचार्य जी ने भी कुछ प्रश्न वाचक वाक्य कहे-क्या प्रेम ही परमात्मा नहीं है? क्या प्रेम में डूबा हुआ हृदय ही उसका मन्दिर नहीं है और क्या जो प्रेम को छोड़कर उसे कहीं और खोजता है, वह व्यर्थ ही नहीं खोजता है।
आचार्य जी के स्वरों में उनके अनुभव का संगीत था। वह बता रहे थे-परमात्मा को जो खोजता है, वह घोषणा करता है कि प्रेम उसे उपलब्ध नहीं हुआ है, क्योंकि जो प्रेम को उपलब्ध होता है, वह परमात्मा को भी उपलब्ध होता है। परमात्मा की खोज प्रेम के अभाव से पैदा होती है, जबकि प्रेम के बिना परमात्मा का पाना असम्भव ही है। परमात्मा को जो खोजता है, वह परमात्मा को तो पा ही नहीं सकता प्रेम की खोज से अवश्य ही वंचित हो जाता है। किन्तु जो प्रेम को खोजता है, वह प्रेम को पाकर ही परमात्मा को पा लेता है। प्रेम मार्ग है, प्रेम द्वार है, प्रेम पैरों की शक्ति है। प्रेम प्रहरों की प्यास है। अन्ततः प्रेम ही प्राप्ति है। वास्तव में प्रेम ही परमेश्वर है।
सत्यव्रत के ये वचन पं. रघुनाथ को आश्चर्यजनक तो लग रहे थे, पर इनमें उन्हें सत्य की झलक भी मिल रही थी। सत्यव्रत कहे जा रहे थे-‘मैं कहता हूँ, परमात्मा को छोड़ो-प्रेम को पाओ। मन्दिर को भूलो-हृदय को खोजो, क्योंकि वह तो वहीं है।’ उन्होंने अपनी बात पर बल देते हुए कहा- ‘परमात्मा की यदि कोई मूर्ति है तो वह प्रेम है। लेकिन पाषाण मूर्तियों में वह मूर्ति खो गई है। परमात्मा का कोई मन्दिर है, तो वह हृदय है, लेकिन मिट्टी के मन्दिरों ने उसे भलीभाँति ढँक लिया है। इस लिए हे वत्स! तुम प्रेम के मन्दिर में प्रवेश करो। प्रेम को जियो और जानो, इसके बाद आना। फिर मैं तुम्हें परमात्मा तक ले चलने का आश्वासन देता हूं’ आचार्य की ये बातें सुनकर पं. रघुनाथ अपनी ज्ञान की गठरी वहीं छोड़कर वापस लौटने लगे।
सचमुच ही उनकी जिज्ञासा असाधारण और अद्भुत थी, क्योंकि साम्राज्य छोड़ना सरल है, परन्तु ज्ञान छोड़ना कठिन है। आखिर ज्ञान अहंकार का अन्तिम आधार जो है। पर यह भी सच है कि प्रेम के लिए अहंकार का जाना जरूरी है। प्रेम का विरोधी घृणा नहीं है। प्रेम का मूल शत्रु अहंकार है। घृणा तो उसकी अनेक सन्तानों में से एक है। राग-विराग, आसक्ति-विरक्ति, मोह, घृणा, ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष, काम सभी उसकी ही सन्तानें हैं। अहंकार का यह परिवार काफी बड़ा है। आचार्यवर की सत्संगति में पं. रघुनाथ ने यह सत्य जान लिया था। उन्होंने आचार्यवर से विदा ली। आचार्य जी भी उन्हें बाहर तक छोड़ने आये। वह इस योग्य थे भी। आचार्य सत्यव्रत उनके साहस से आनन्दित थे। क्योंकि जहाँ साहस है वहीं साधना की सम्भावना है। साहस से स्वतंत्रता आती है और स्वतंत्रता से सत्य का साक्षात्कार होता है।
इस घटना को हुए कई वर्ष बीत गये। आचार्य सत्यवर उनके लौटने की प्रतीक्षा में अतिवृद्ध हो गये। परन्तु पं. रघुनाथ वापस नहीं लौटे। अन्ततः थक-हारकर आचार्य सत्यव्रत ही उन्हें खोजने के लिए चल पड़े। और एक दिन उन्होंने उनको खोज ही लिया। वह एक गाँव में बड़े ही आत्मविभोर हो एक कुष्ठरोगी की सेवा कर रहे थे। उन्हें पहचानना भी कठिन था। प्रेम भरे आनन्द से उनका कायाकल्प हो गया था। आचार्य सत्यव्रत ने उन्हें टोकते हुए कहा-तुम आये नहीं? मैं तो प्रतीक्षा करते-करते थक गया और आखिर में तुम्हें स्वयं ही खोजने के लिए चल पड़ा। क्या तुम्हें परमात्मा को नहीं खोजना है। पं. रघुनाथ ने कहा-‘नहीं बिल्कुल नहीं। जिस क्षण प्रेम को पाया, उसी क्षण से सभी प्राणियों में उसे ही निहार रहा हूँ। मैं जान गया हूँ, प्रेम ही परमेश्वर है।’
चित्रकेतु एक राजा था, जिसे महर्षि अंगिरा की कृपा से एक संतान प्राप्त हुई थी। बच्चा अभी किशोर ही था कि उसकी मृत्यु हो गई। राजा पुत्र वियोग से बड़ा व्याकुल हुआ। अंत में ऋषिदेव आए और उन्होंने दिवंगत आत्मा को बुलाकर शोकातुर राजा से वार्त्तालाप कराया। पिता ने पुत्र से लौटने के लिए कहा तो उसने जवाब दिया, हे जीव, मैं न तेरा पुत्र हूँ और न तू मेरा पिता। हम सब जीव कर्मानुसार भ्रमण कर रहे हैं, इसलिए तू अपनी आत्मा को पहचान। हे राजन्, उसी से तू साँसारिक संतापों से छुटकारा पा सकता है। इसके लिए तू तप−पहनान। हे राजन्, उसी से तू साँसारिक संतापों से छुटकारा पा सकता है। इसके लिए तू तप−साधना कर। राजा आश्वस्त हुआ और शेष जीवन उसने आत्मकल्याण की साधना में लगाकर आत्मज्ञान प्राप्त किया व जीवनमुक्त हो गया।
वास्तविक पुरुषार्थ आत्मज्ञान की प्राप्ति है। योग एवं तप इसी निमित्त किए जाते हैं। स्वयं का परिष्कार एवं अभ्यस्त कुसंस्कारों से जूझना ही तप है।
सफलता संकल्पवानों के संकल्प में निवास करती है। इसका मूल मंत्र है आत्मविश्वास। और असफलता का कारण है आत्म विश्वास का अभाव। सफलता न अनुकूल परिस्थितियों पर आधारित है और उपर्युक्त अवसरों पर। यह तो आत्म विश्वास पर ही निर्भर करती है। आत्म विश्वास का अर्थ कोरी भावुकता नहीं है बल्कि यह उस दूरदर्शिता का दूसरा नाम है जिसके साथ अटल संकल्प और अदम्य साहस जुड़ा रहता है। आत्मविश्वास का तात्पर्य है अपने आप के प्रति प्रबल आस्था और गहन निष्ठ। आस्था और निष्ठ ही सफलता का पथ प्रशस्त करती है।
सफलता के कँटीले रास्तों पर आने वाले बाधा, विघ्नों और अवरोधों को दूर करने का एक ही उपाय है,आत्मविश्वास की गंगोत्री से ही शक्ति का प्रवाह फूट पड़ता है और प्रचण्ड पुरुषार्थ की भागीरथी बहने लगती है। इस पयस्विनी में स्नान कर तमाम असफल व्यक्तियों की असफलताएँ धुली एवं दुर्बलताएँ मिटी और सफलता के पुण्य आनन्द का लाभ मिला।
जीवन में सफलता कैसे अर्जित हो आत्म बल कैसे बढ़े? इसके लिए सामान्य व व्यावहारिक परन्तु प्रेरणाप्रद दस नियमों को अपनाना, पालन करना चाहिए। सबल आत्मशक्ति के दस नियम हैं- सहजता का नियम (लॉ ऑफ सिम्पिलिसिटी), कर्म का नियम (लॉ ऑफ कर्म), कामना का नियम (लाफ ऑफ होप्स), परवाह का नियम (लॉ ऑफ केअर), विश्वास का नियम (लॉ ऑफ ट्रस्ट), आदर का नियम (लॉ ऑफ रेस्पेक्ट), सक्रियता का नियम (लॉ ऑफ डायनेमिज्य), परोपकार का नियम (लॉ ऑफ बेनोवोलेन्स), कृतज्ञता का नियम (लॉ ऑफ ग्रैटीच्यूड) और बलिदान का नियम (लॉ ऑफ सैक्रीफाइस)।
सहजता का नियम सफलता का प्रथम सोपान है। इसका तात्पर्य है-शान्ति और सरलता में विश्वास। शान्त मन से, शान्त ढंग से किया गया हर कार्य सफल होता है। बेवजह जल्दी बाजी काम को बनाने की अपेक्षा बिगाड़ता अधिक है। अनावश्यक आतुरता से कुछ भी उपलब्ध नहीं होता है उल्टा नुकसान और हानि उठानी पड़ती है। अनौचित्य परिश्रम से सफलता मिलती नहीं है बल्कि असफलता का घना कुहासा छा जाता है जहाँ कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखता।
आज मशीनी युग की सबसे बड़ी समस्या है-निरर्थक भाग दौड़। मूल्यहीन व्यस्तता और दूसरे से आगे बढ़ने की सर्वनाशी होड़। व्यक्ति वाहन का उपयोग इसलिए करता है क्योंकि वह सुरक्षित और सहजता से अपने गन्तव्य तक पहुँच जाय। परन्तु वाहन को तीव्र, तीव्रतर, तीव्रतम चलाकर न जाने किससे आगे और कहाँ पहुँच जाना चाहता है। यह हाल जीवन के हर क्षेत्र में है। हर ओर आपाधापी मची हुई है। राशन और गैस स्टोर या किसी अन्य काउंटर पर पंक्तिबद्ध खड़ा होकर अपनी बारी की प्रतिक्षा में हम असहज और परेशान हो जाते हैं। परिणामतः लाइन टूटती है दैनिक जीवन की व्यवस्था भंग होती है और आन्तरिक जीवन चकनाचूर हो जाता है।
अतः जीवन में सफलता पाने के लिए शान्त रहना चाहिए और सरलता व सहजता में घनघोर विश्वास रखना चाहिए। सहज व शान्त मन में विवेक विचार का उदय होता है जो सफलता के अनिवार्य शर्त हैं।
सफलता के लिए कर्म के नियमों का पालन करना भी आवश्यक है। कर्म की उत्कृष्टता एवं श्रेष्ठता में ही सफलता का मानदण्ड एवं मापदण्ड निर्धारित होता है। सद्कर्म से मिली असफलता भी सफलता से बढ़ी-चढ़ी होती है। इससे मन में अपार शान्ति एवं प्रसन्नता का अनुभव होता है और यदि कर्म निष्काम भाव से किया जाय तो जिन्दगी की दिशा धारा ही बदल जाती है। इससे आन्तरिक जीवन पवित्र एवं प्रखर होता है। आन्तरिक एवं बाह्य दोनों की सफलता के लिए निष्काम कर्म करना चाहिए।
संसार में हर व्यक्ति सफलता प्राप्त करना चाहता है। परन्तु हरेक की सफलता की चाहत अलग-अलग होती है। कोई भौतिक जीवन में सफल होने की कामना करता है तो कोई धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता की इच्छा करता है। कर्म भी मन की इच्छाओं के द्वारा नियमित एवं निर्धारित होते हैं। मनोनुकूल कार्य सहजता से सम्पन्न होते हैं जबकि जिस कार्य में इच्छा न हो वह बड़ा भारी एवं उबाऊ लगता है। अतः हरेक व्यक्ति को अपने भावी भविष्य की कामना सुखद एवं सफल करनी चाहिए। परन्तु यथार्थ के धरातल पर उतारने के लिए व्यवहार में लाने के लिए बुरे से बुरे परिस्थितियों के लिए भी तैयार रहना चाहिए। अन्यथा सुखद कल्पना एवं कामना पानी के बुलबुले के समान विलीन हो जायेगी।
हमें जितनी अपनी सफलता एवं विकास के लिए परवाह होती है उतनी ही औरों के लिए भी होनी चाहिए। परवाह की यह उदात्त भावना हमें उदार बना देती है। और हम दूसरों के सुख में सुखी तथा दुःख में दुखी होते हैं। इससे मन में ईर्ष्या, द्वेष, दुर्भाव जैसे असाध्य मनोविकारों को मन के अन्दर जड़ जमाने का मौका नहीं मिलता। परिणामतः व्यक्ति बड़ा खुश एवं आनन्दित रहना है। जब हम अपने समान दूसरों का भी ख्याल रखते हैं तो सभी हमारे मित्र एवं हितैषी बन जाते हैं और ईश्वर भी हमारा ख्याल रखता है। अतः परवाह का नियम सफल जीवन के लिए अत्यन्त जरूरी है।
विश्वास-आत्मविश्वास सफलता का अमोघ अस्त्र है। संसार का इतिहास उन थोड़े से व्यक्तियों का इतिहास है, जिनमें आत्मविश्वास था। यह विश्वास हमारे अन्दर विद्यमान देवत्व को ललकार कर प्रकट कर देता है। तब व्यक्ति कुछ भी कर सकता है, सर्व समर्थ हो जाता है। असफलता तभी होती है, जब हमें अपने ऊपर विश्वास नहीं होता है। स्वामी विवेकानन्द ने सिंहनाद करते हुए कहा है कि जिसमें आत्मविश्वास नहीं हो वही नास्तिक है। जिस क्षण व्यक्ति या राष्ट्र आत्मविश्वास खो देता है, उसी क्षण उसकी मृत्यु हो जाती है। विश्वास-विश्वास। अपने आप पर विश्वास, यही उन्नति एवं सफलता का एकमात्र उपाय है।
विश्वास हमें सफलता दिलाता है और प्रतिष्ठ भी दिलाता है। परन्तु जीवन में मान एवं प्रतिष्ठ तभी आते हैं, जब व्यक्ति विनम्र हो और दूसरों का आदर सम्मान करना जानता हो। दूसरों को आदर करने वाला व्यक्ति ही सम्मान का सच्चा अधिकारी होता है। जिसे स्वयं का सम्मान करना नहीं आता वह मृत एवं मुर्दे के समान है उसके अन्दर स्वाभिमान का घोर अभाव होता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों का सम्मान भी नहीं करते और बदले में निरादर-अनादर के समान तिरस्कृत होते हैं। अतः सफल होने के लिए आदर के नियमों का पालन करना चाहिए। क्योंकि आदर चाहे दूसरों का करें या स्वयं का सदैव कुछ अच्छा व श्रेष्ठ लेकर ही आता है।
सम्मान की यह अभिलाषा व्यक्ति को सक्रिय एवं सजग कर देती है। वह भाग्य और भविष्य के भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठा नहीं रहता है। बल्कि वह कुछ करने में विश्वास रखता है और सफलता के प्रति सक्रिय हो जाता है। उसकी यही सक्रियता उसे प्रबल प्रयास एवं प्रचण्ड पुरुषार्थ के लिए प्रेरित करती है। फिर उसमें साहस और बल का संचार होता है और अपनी सफलता के लिए असफलताओं के भँवर में भी असीम धैर्य का परिचय देता है। ऐसे सक्रिय व्यक्ति के निजी और बाहरी दोनों जीवन चमक उठते हैं, जो हमेशा अपने लिए और औरों के लिए कुछ करने के लिए सजग रहता है।
दूसरों के लिए कुछ करने की भावना ही परोपकार है। परोपकार खेत में बोए जाने वाले बीज के समान है। जब परोपकार किया जाता है तो कुछ भी दिखाई नहीं देता है परन्तु जब इसकी फसल पक जाती है तो सद्भावना एवं प्रेम के रूप में लहलहाने लगती है। अतः सफल व्यक्ति वही नहीं जिन्होंने बेशुमार सम्पत्ति जमा कर ली हो या समाज में मान-सम्मान पाकर प्रतिष्ठिता, सहायता करके दुआओं की दौलत से मन का खजाना भर लिया हो। परोपकार जेठ की दुपहरी में ठण्डी व शीतल छाँव के समान है जहाँ पर कुछ देर आराम और विश्राम किया जा सकता है।
उपकारों का बदला केवल कृतज्ञता के भाव से ही चुकाया जा सकता है। कोई हमारे लिए कुछ भी किया हो सदैव उसके प्रति कृतज्ञता का भाव होना चाहिए तथा उसके लिए कुछ करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। कृतज्ञ व्यक्ति सफल होता है परन्तु कृतघ्न अपयश का भागी होता है और उसे असफलता ही हाथ लगती है क्योंकि कृतज्ञता प्रकट करने से विनम्रता आती है और कृतघ्नता से अहंकार। कृतज्ञ का सभी सहयोग करते और वह सफल हो जाता है और ठीक इसके विपरीत कृतघ्न का कोई साथ नहीं देता।
सफलता के लिए जिस चरित्र की सबसे बड़ी आवश्यकता पड़ती है वह है-त्याग, बलिदान और समर्पण का आदर्श भाव। इससे कम में सफलता की चाहत नहीं करनी चाहिए। जो कुछ करने के लिए या पाने के लिए कटिबद्ध है वही त्याग कर सकता है, जिसके इरादे मजबूत एवं दृढ़ है, जिसके विश्वास अटल है, जो संकल्पवान है वही बलिदान कर सकता है, समर्पित हो सकता है और इसी पथ पर बढ़ते हुए ही सफलता की मंजिल को पार किया जा सकता है। यही आत्मविश्वास के आग्नेय मंत्र है, यही नियम एवं विधान है जिसे अपनाकर सफलता के रथ पर व्यक्ति सवार हो सकता है।
सबने श्रम करना बंद कर दिया और संचित पूँजी से पेट भरने लगे। यह स्थिति देख राजा घबराया और अपने गुरु के पास पहुँचा। उन्होंने स्थिति का विवरण सुनकर कहा, दीक्ष को आचरण में न उतारे तो वह असफल ही रहती है। जिन्हें तुम गुरुभाई मानते हो, वे सब तो आलसी हैं, पर तुम प्रभावी हो। तुम अपनी व्यवस्था नियमानुसार चलाओ, नहीं तो उनके साथ तुम भी पाप के भागी बनोगे।
एक बार एक वृद्ध और एक वृद्धा अपने बालक के लिए भिक्षा माँग रहे थे। पार्वती जी ने उन असहायों को देखा तो करुणार्द्र हो उठीं। शिवजी से बोलीं, आपकी सृष्टि में भी कैसे असहाय लोग हैं। आप उनका दुःख भी दूर नहीं कर सकते? शिवजी ने बहुतेरा समझाया, यह लोग अपनी आँतरिक दुर्बलता के कारण दुखी हुए, असहाय बने हैं। पार्वती जी को संतोष नहीं हुआ तो शिवजी को उनके सम्मुख प्रकट होना पड़ा। उन्होंने तीनों से वरदान माँगने को कहा। सबसे पहले वृद्धा ने कहा, भगवन्, मुझे तो आप बीस वर्ष की नवयौवना बना दें, उसकी आसक्ति काम में जो थी। शिवजी ने कहा, तथास्तु! और वह नवयौवना बन गई। यह देखकर वृद्ध कुँठित हो उठा, बोला, दुष्टे, मैं तो पहले ही जानता था, तू कितनी कुटिल है, मुझे वृद्धावस्था में छोड़कर यह राग−रंग? उसका सारे जीवन का विद्वेष उमड़ उठा। शंकर जी बोले, परेशान क्यों हैं, आप भी वरदान माँग लें। क्षोभ से भरे वृद्ध ने कहा, इसे शूकरी बना दें। शिवजी ने कहा, तथास्तु! और अब बुढ़िया सूअरिया बन गई। यह देखकर बच्चा रोया, भगवन्, मुझे तो मेरी माँ ही वापस कर दीजिए। शिवजी ने कहा, तथास्तु! और शूकरी फिर वृद्धा रूप में प्रकट हो गई। सबको वरदान मिल गया और सब जैसे के तैसे रहे न पार्वती? यह कहकर वे चल पड़े। पार्वती जी ने इतना ही कहा, आपका ही कहना सच निकला। तीनों श्रेष्ठ वस्तुएँ माँग सकते थे, पर माँगते कैसे? जो मन में था, वही बाहर आया।
यदि मन में निकृष्टता भरी पड़ी हो तो स्वयं प्रभु भी आ जाएँ तो भी सहायता नहीं कर सकते। उनका प्रवेश तो निश्छल मन में ही होता है।
महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थीं−मैत्रेयी और कात्यायनी। जब महर्षि ने संन्यास लेना चाहा तो अपनी दोनों पत्नियों को बुलाकर कहा, “हम सब संन्यास लेने वाले हैं, तुम दोनों घर की संपत्ति को आधा−आधा बाँट लो।” यह सुनते ही मैत्रेयी बोल उठी, “देव, क्या इन संपदाओं को प्राप्त कर मैं अमर हो जाऊँगी?” “नहीं।” याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया−”जिस प्रकार धन−संपत्ति वालों का लोभ−मोह से भरा जीवन होता है, देवि, उसी प्रकार का तुम्हारा भी जीवन हो सकेगा।” “तब तो ऐसे धन ही हमें आवश्यकता नहीं।” मैत्रेयी ने बड़ी दृढ़ता के साथ कहा। पुनः निवेदन किया, “देव, हमें तो अमरत्व का साधन बताइए। हमें धन−संपदा नहीं चाहिए।”
मैत्रेयी के बार−बार आग्रह करने पर महर्षि को विवश होकर अमरत्व का साधन, आत्मकल्याण का साधन बताना ही पड़ा। उन्होंने सूत्र रूप में कहा−
आत्मा वाऽरे मैत्रेयि! द्रष्टव्यः श्रोतव्यों मन्तव्यों निदिध्यासितव्यो। आत्मनों खलु दर्शनेन इदं सर्वं विदितं भवति। (वृहदारण्यक)
हे मैत्रेयी, आत्मा ही देखने योग्य, सुनने योग्य, मनन करने योग्य और अनुभव करने योग्य है। अपने आपको, आत्मा को जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। यही अमरत्व का साधन है, यही आत्मकल्याण का मार्ग है।
गीताकार ने भी आत्मोत्कर्ष की गरिमा समझाते हुए कहा है−
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनों बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अपनी आत्मा द्वारा अपना उद्धार करो, आत्मा को पतित न करो। आत्मा ही अपना बंधु है और आत्मा ही अपना शत्रु है।
व्यक्ति को दुनिया की, विश्व−ब्रह्माँड की यत्किंचित् जानकारी कितना संतोष प्रदान करती है। जान−पहचान के लोगों से मिलने पर कितनी प्रसन्नता होती है। कदाचित् अपने को पहचाना जा सके, आत्मा को जाना जा सके तो कितने महान आनंद की प्राप्ति हो। उपनिषद्कार के शब्दों में अपने आप को जान लेने वाले को ही सर्वोपरि सुख की प्राप्ति होती हैं।
तमात्मस्थं मेऽनुपश्यन्ति धीराः। तेषाँ सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ (कठ॰ 2/2/12)
उस अपने में स्थित आत्मा को जो विवेकी पुरुष देख लेते हैं, जान लेते हैं, उन्हीं को नित्य सुख प्राप्त होता है, अन्यों को नहीं।
कठोपनिषद् में अन्यत्र कहा गया है−
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते। (1/3/15)
उस अनादि, अनंत महत्तत्व से परे तथा ध्रुव आत्मा को जानकार मनुष्य मृत्यु के मुख से छूट जाता है।
इस प्रकार अनेकानेक श्रुतिवचनों द्वारा आत्मज्ञान की गरिमा को प्रतिपादित कर उसे प्राप्त करने की प्रेरणा दी गई है। व्यक्ति को जिसमें अपना लाभ दिखाई पड़ता है, उस कार्य को बड़े परिश्रम, मनोयोग एवं प्रसन्नतापूर्वक संपन्न करता है। यदि आत्मज्ञान के लाभों को जाना जा सके तथा इसे प्राप्त करने का प्रयास किया जा सके तो व्यक्ति धन्य हो जाए।
आत्मा के इस स्वरूप को जानने की लंबी प्रक्रिया है। आत्मनिरीक्षण, आत्मपरिष्कार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की लंबी मंजिल पार करके ही आत्मा के सही स्वरूप का अनुभव किया जा सकता है।
सर्वप्रथम अपने को शरीर से भिन्न होने की धारणा को पुष्ट करना पड़ता है। हम दूसरे हैं और हमारा शरीर दूसरा है। शरीर केवल उपकरण है, साधन है, साध्य नहीं। हम अपनी सारी शक्ति शरीर को ही सुख पहुँचाने में न झोंक दें। शरीर से भिन्न भी कुछ है, वही मैं हूँ। इस प्रकार का बोध हो जाने पर अपने द्वारा किए जाने वाले ओछे कार्यों को छोड़ना पड़ता है। यहीं से आत्मपरिष्कार आरंभ होता है।
दोष−दुर्गुणों के दूर हो जाने पर उनके स्थान पर सद्गुणों, श्रेष्ठताओं का समावेश करना आवश्यक होता है। कषाय−कल्मषों से रहित होने पर शुद्ध अंतःकरण में श्रेष्ठ सद्गुणों की अभिवृद्धि होने लगती है, यही आत्मनिर्माण है। इसके उपराँत आत्मविकास आता है। अपने ही समान सभी प्राणियों को समझाना ही आत्मविकास है। आत्मसात् सर्वभूतेषु का यही आदर्श है।
इसके बाद आत्मज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान प्राप्त होने पर मानव निर्दोष हो जाता है तथा सभी कर्मों के क्षय हो जाने से अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान लेता है। फिर यह अपना है, वह दूसरे का है, ऐसा विचार नहीं आता। ऐसा क्षुद्र विचार तो संकीर्ण हृदय वाले करते हैं, उदारचेता आत्मज्ञानी तो संपूर्ण विश्व को ही अपना परिवार समझते हैं−
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानाँ तु वसुधैव कुटुँबकम्।
प्रार्थना परमात्मा के प्रति अन्तर की सघन एवं व्याकुल पुकार है। भजन इस आर्त पुकार की अभिव्यक्ति है। प्रार्थना शान्त, निस्पन्द मानसरोवर है तो भजन इस झील से निकलने वाली जलधाराएँ है, जिसकी हर बूँदों में नृत्य की थिरकन होती है। अन्ततः सरोवर भी सूर्य की रश्मियों के संग आकाश में खो जाता है और नदी भी समुद्र में गिरकर, सूर्य किरणों में चढ़कर व्योम में विलीन हो जाती है। प्रार्थना की भी मञ्जिल वही है जो भजन की है, परन्तु मार्ग अलग है, द्वार अनेक हैं।
प्रार्थना बीज है, भजन वृक्ष। प्रार्थना कली है, भजन पुण्य, प्रार्थना सद्चिंतन है, भजन सद्कर्म। प्रार्थना में प्रभु के प्रति गहन आत्मीयता, तीव्र तड़पन है तो सही पर शान्त एवं निष्क्रिय। प्रार्थना का यह निष्कम्प स्वरूप भगवान महावीर, तथागत बुद्ध, लाहिड़ी महाशय, श्रीअरविन्द, रमण महर्षि आदि सन्त, अवतारी पुरुषों में परिलक्षित होता है। प्रभु के प्रति इनका प्रेम गहन शान्ति में उठा या फैला था एवं विस्तार पाया था। शान्ति निरव तो होती है परन्तु निष्क्रिय नहीं। इसमें तलवार के समान पैनी धार होती है। प्रार्थना इसी शान्ति एवं निरवता में ही गतिमान होती है। इन सन्त-महात्माओं के भीतर जब यह प्रेम का प्रवाह सम्भला हुआ शान्त था तो प्रार्थना था, पर जब यह बाहर बहने लगा, उमड़ने लगा तो भजन बन गया। मीरा, चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस में अन्तर की यह निस्पन्द छलक गयी थी और भजन बन गयी थी। वे झूमने लगे थे, नाचने लगे थे। अतः भजन को प्रार्थना की अभिव्यंजना माना जाता है।
प्रार्थना प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम है, जिसे बड़े ही यत्नपूर्वक, प्रयासपूर्वक सहेज-सँवारकर रखा जाता है। प्रार्थना करने वाला तो बस यह जानता है कि वह कर रहा है। वह तो यह भी नहीं देखता कि जिसे वह प्रेम कर रहा है वह उसे देख, जान-समझ रहा है कि नहीं। अगर वह ऐसा करने लगे तो फिर यह प्रेम न होगा, सौदेबाजी होगी, व्यापार होगा। प्रेम तो केवल एकतरफा होता है। उसे क्या जरूरत किसी को कहने की, क्या आवश्यकता किसी को बताने की। कहना क्या, होना काफी है। बोलना क्या, जानना पर्याप्त है। परन्तु वह प्रेम जब प्रकट होता है तो भजन बन जाता है। यह कभी गीत में फूट पड़ता है, वाणी में मचल उठता है, आँखों की भाव व्यंजना में छलक पड़ता है। जब प्रकट होता है तो फूल खिल जाते हैं, कली-कली नहीं रह जाती। समूचा वातावरण दिव्यत्व से ओतप्रोत हो जाता है, सुरभित हो उठता है।
रमण महर्षि ने प्रार्थना को अपनाया, भगवान महावीर ने मौन हो इसे स्वीकारा। उन्हें कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी। उन्होंने अपने शून्य और मौन में परमात्मा को साथ लिया था। परन्तु मीरा, चैतन्य, नानक को इतना ही पर्याप्त नहीं था। जितना है उससे और अधिक की आवश्यकता थी। जब तक उनके ऊपर से जलधारा कहने न लगे, जब तक उनका पात्र भर कर बाहर उलीचने न लगे, तब तक पर्याप्त नहीं था। प्रार्थना में जो अन्दर ही अन्दर बना रहता है, छलकता नहीं भजन से बहने लगता है। अतः भजन एक बहाव है, एक प्रवाह है। मीरा की स्वर लहरी में, चैतन्य की अलमस्त थिरकन में भजन अभिव्यक्त होता है।
प्रार्थना भी शुभ है, भजन भी श्रेष्ठ है। प्रभु प्रेम को भीतर सहेज कर रखना भी उत्तम है और उसे बाँटना भी सुन्दर है। दोनों अतुलनीय, अनुपम हैं। किसी से कोई तुलना नहीं क्योंकि दोनों की राह बस उसी एक प्रभु के द्वार की ओर जा रही है। प्रार्थना रूपी बीज भी अच्छा है क्योंकि फूल उसकी अभिव्यक्ति है और भजन रूपी फूल भी सुन्दर है क्योंकि इसी में बीज बनते हैं, उसका निर्माण होता है। दोनों जुड़े हैं, सम्बन्धित हैं। दोनों सर्वोत्तम हैं, उत्कृष्ट हैं।
प्रार्थना धन्यवाद है और भजन अहोभाव। प्रार्थना करने वाला मंत्र गुहार लगाता है हे प्रभु! तुमने जो दिया है, वह बहुत है। तुमसे जो मिला, जितना भी मिला उसी में परम संतोष है, परम आनन्द है। जो पाया है उसमें गहन तृप्ति है। परन्तु भजन की मस्ती कहती है- हे प्रभु! तुमने जो दिया, वह आवश्यकता से अधिक है, जरूरत से कहीं ज्यादा है। जो अधिक है, जो ज्यादा है वह हमसे सम्भाले नहीं सम्भलता। इसे बाँटना है, लुटाना है, बिखेरना है ताकि सभी में इस मस्ती की खुमार चढ़ने लगे। सभी इस आनन्द में निमग्न हो जायँ, और मस्त हो नाचने लगे। इसलिए तो भजन नाचता है, केवल कहता नहीं। भजन बोलता है अनबोला नहीं है। इसी में ही भजन का अपना सौंदर्य निखरता है।
प्रार्थना का सौंदर्य भी निराला है। यह अनबोला बोल है, अनगाया गीत है, अनछुआ स्पर्श है। यह चित्रकार की कल्पना में छुपा वह चित्र है जो अभी कैनवास पर उतरा नहीं, उकेरा गया नहीं, पत्थर में दबी-छुपी वह सुन्दर मूरत है जिसे मूर्तिकार की छैनी से काटा नहीं गया है, तराशा नहीं गया है। भजन चित्रकार द्वारा पूर्ण किया गया रंग भरा हुआ चित्र है। तुलिका अपने रंग भरने में एवं छैनी मूर्ति तराशने में अपना काम कर चुकी होती है। भजन कवि की कविता है जो कल्पनाओं एवं भावनाओं के लोक से उतर आयी है। भजन गाया हुआ गीत है।
कविवर रवीन्द्रनाथ भी अपने लिखे गीतों को गाना चाहते थे। उन्हें गाने की बड़ी इच्छा थी और न गा पाने की एक कसक और तड़प रह गयी थी। उनके जीवन के अन्तिम दिनों में उनके एक मित्र ने कहा-‘तुम धन्य हो! तुम्हारा जीवन धन्य है। तुमने जीवन भर गीत गाया। इतना तो किसी कवि ने नहीं गाया। पश्चिम के महाकवि शैली के तो केवल तीन हजार गीत हैं। तुमने तो छः हजार गीत गाये।’ यह सुनकर रवीन्द्रनाथ ने कहा-मैं जो गीत गाना चाहता था, वह अभी तक नहीं गा सका हूँ। वह अनगाया गीत अभी भी मेरे भीतर बीज की तरह सुषुप्त पड़ा है, जाग्रत् नहीं हुआ है। वह जो मैंने छः हजार गीत गाये, वे मेरे असफल प्रयास हैं, प्रभु के एक गीत गाने के लिए। जैसे मैं गाना चाहता था गा न सका और जो गाया वे मेरी असफलता की व्यथा-कथा है। मैं अब भी कोई गीत गा न सका। मैं बिन गाया पड़ा हूँ और मुझे अब जाना है। कविवर रवीन्द्र बादल फकीर की तरह इकतारा लेकर नाचना-गाना चाहते थे।
भजन मुखर होता है, प्रार्थना मौन। प्रार्थना के पुजारी सूफी सन्तों ने कहा है कि प्रार्थना निरवता में, गहन एकान्त में होती है, सधती है। प्रार्थना होती है, इसका शीतल स्पर्श का अनुभव होता है पर यह दिखती नहीं है। यह दिखावा नहीं है। दिखाने से प्रदर्शन झलकता है और प्रदर्शन में आत्मघाती अहंकार का जन्म होता है। अहंकार के प्रादुर्भाव होते ही प्रार्थना विनष्ट हो जाती है, उसका उद्देश्य एवं लक्ष्य भटक जाता है। इसलिए प्रार्थना मौन है, नीरव है, दिखावा एवं आडम्बर नहीं।
भजन खुले चौराहे पर उतर आता है। वह कहता है कि-पने चले तो क्या और न चले तो क्या ? प्रभु का नाम सुनते ही रामकृष्ण परमहंस जहाँ होते वहीं पर नाच पड़ते थे, भाव मग्न हो जाते थे। भजन करने वाला प्रभु अर्पित नृत्य में ही अहंकार को गिरा देता है। उसी में उसका अहंकार गल जाता है, मिट जाता है। अतः प्रार्थना में अहंकार विनष्ट होता है और भजन में भी छुट जाता है, गिर जाता है। प्रभु प्राप्ति के लिए दोनों पथ वरेण्य है बल्कि दोनों के समन्वय से भी बढ़ा जा सकता है।
दोनों की संगति इसलिए कि प्रार्थना उच्चस्तरीय चिंतन है, दिव्य अभीप्सा है और भजन प्रभु अर्पित किया हुआ सद्कर्म है। उच्चस्तरीय चेतना की अभीप्सा भी हो और सद्कर्म भी सधता रहे तो अनन्त की यह यात्रा तीव्रतर एवं वेगवान हो जाती है जो किया जाय सब प्रभु के लिए और जो सोचा-विचारा भी जाय तो एक उसी के लिए। चिंतन में भी वही विचरता रहे, कर्म में भी वही झरता रहे। ऐसे सद्चिंतन और सद्कर्म में प्रार्थना और भजन दोनों एक ही साथ जाते हैं, समन्वित हो जाते हैं। अतः सदैव उत्कृष्ट चिंतन की अभीप्सा तथा सद्कर्म में निरत-निमग्न रहना चाहिए। यही प्रार्थना और भजन का मर्म है।
एक दिन पंडित जी की कथा सुनने एक डाकू भी आया। पंडित जी समझा रहे थे, क्षमा और अहिंसा मनुष्य के भूषण हैं, इनका परित्याग नहीं करना चाहिए। कथा समाप्त हुई। पंडित जी दक्षिणा आदि लेकर गाँव की ओर चल पड़े। बीच में जंगल पड़ता था। वहाँ डाकू आ धमका और पंडित जी को सारा धन रख देने के लिए कहा। पंडित जी निडर थे, पास में लाठी रहती थी, सो प्रहार करने के लिए डाकू की ओर दौड़े। डाकू घबरा गया और विनयपूर्वक बोला, महाराज, आप तो कह रहे थे कि क्षमा और अहिंसा मनुष्य के भूषण हैं, इन्हें नहीं त्यागना चाहिए। पंडित जी बोल, वह तो सज्जनों के लिए था, तेरे जैसे दुष्टों के लिए तो यह लाठी ही उपयुक्त है। पंडित जी का रौद्र रूप देखकर डाकू वहाँ से भाग गया।
संगीत की सुरलहरियाँ किसे पसन्द नहीं? इसकी मनोनुकूल एवं मधुर ताल एवं लय में कौन भाव-विभोर नहीं हो उठता? संगीत की सुन्दर धुनों का प्रभाव बड़ा गहरा होता है। इससे मन और भाव शान्त एवं प्रसन्न ही नहीं होते बल्कि इनके विकारों एवं समस्याओं का भी निराकरण हो जाता है। इतना ही नहीं संगीत भाव-संवेदना को उभारने उकेरने के अतिरिक्त यह मनुष्य के स्वभाव व आदतों को भी प्रभावित कर देता है। इसी प्रभावोत्पादक प्रभाव से ही म्यूजिक थेरेपी अर्थात् संगीत चिकित्सा का प्रादुर्भाव हुआ जो काफी लोकप्रिय व उपयोगी सिद्ध हो रही है।
संगीत प्रेमी कार्लाइल ने तो यहाँ तक कहा है कि संगीत के पीछे-पीछे खुदा चलता है और जहाँ पर स्वयं भगवान् होगा वहाँ भला कैसे कोई रोग-शोक टिक सकते हैं, वहाँ तो आनन्द का निर्झर बहेगा। कार्लाइल की इस उक्ति को आज के आधुनिक चिकित्सा शास्त्रियों ने यथार्थ में परिणित कर दिखाया है। वस्तुतः संगीत का सूक्ष्म प्रभाव मन के बारीक तन्तुओं एवं सुकोमल भावनाओं पर पड़ता है, और शरीर की समस्त जैविक क्रिया पद्धति इन्हीं मनोभावों के नन्हें तारों से जुड़ी होती है, संचालित व नियमित होती है। यह वह आधार है जो संगीत को चिकित्सा क्षेत्र में भी उपयोगी व उपादेय साबित कर दिया। इसी कारण पाश्चात्य जगत् में ‘म्यूजिक थेरेपी’ प्रचलन बन गई है। इस पद्धति की अनन्त सम्भावनाओं को देखकर डॉ. लीक ने ठीक ही कहा है कि यदि संगीत को दैनन्दिन जीवन में शारीरिक एवं मानसिक आवश्यकता के रूप में उतारा एवं स्वीकारा जा सके तो मानव जाति का बहुत बड़ा लाभ एवं उपकार हो सकता है।
योग के सदृश्य संगीत भी मनुष्य के सुप्त दिव्य क्षमताओं को जागृत करता है। संगीत और योग दोनों ही नाद विद्या के अंतर्गत आते हैं। योग को अनाहत नाद के रूप में जाना जाता है तो संगीत आहत नाद के रूप में। अतः संगीत के स्वरों का सीधा सम्बन्ध मानवीय काया में उपस्थित सात चक्रों से होता है। संगीत के आधारभूत सात स्वर- सा, रे, ग, म, प, ध, नि का सम्बन्ध एक-एक चक्रों से है। मूलाधार का सम्बन्ध ‘सा’ से, स्वाधिष्ठान का ‘रे’, मणिपुर का ‘ग‘, अनाहत का ‘म’, विशुद्ध का ‘प’, आज्ञाचक्र का ‘ध’ एवं सहस्रार का ‘नि’ से माना जाता है। स्वरों का आरोह और अवरोह इन्हीं चक्रों के क्रम में होता है। मूलाधार से सहस्रार की ओर के स्वर को अवरोह कहते हैं। सामान्यतः हृदय, कण्ठ और मूर्धन्य से नाद की उत्पत्ति होती है। संगीत में प्रयुक्त सात स्वर इन्हीं तीन स्थानों से अभिव्यक्त होते हैं। इसी कारण संगीत को हृदय की वाणी के रूप में जाना जाता है।
भारतीय संगीत की रचना स्वरों और चक्रों के सम्बन्धों पर आधारित है। अतः संगीत से एक ओर जहाँ शारीरिक व मानसिक समस्याओं का समाधान मिलता है, वहीं दूसरी ओर प्रसुप्त क्षमताओं का विकास होता है। शास्त्रीय संगीत की चिकित्सीय महत्ता अत्यधिक है। इसका प्रमाण 1933 की एक विस्मयकारी घटना से मिलता है। इन दिनों इटली के तानाशाह मुसोलिनी अनिद्रा रोग से हैरान-परेशान थे। कोई भी चिकित्सा कारगर नहीं हो पा रही थी। यहाँ तक की पाश्चात्य संगीत भी उन्हें कोई लाभ न दे सका। उन्हीं दिनों शास्त्रीय संगीतकार पं. ओंकारनाथ ठाकुर यूरोप की यात्रा पर निकले हुए थे। मुसोलिनी की व्यथा को सुनकर पं. ओंकारनाथ ने राग पुरिया का आलाप किया और आधे घण्टे के अन्दर ही मुसोलिनी को नींद आ गयी। इस घटना से अनेक चिकित्सा शास्त्री एवं वैज्ञानिक आकृष्ट व प्रभावित हुए तथा संगीत चिकित्सा पर नयी-नयी खोज प्रारम्भ हुई।
लन्दन के चिकित्सा वैज्ञानिकों के अनुसार शास्त्रीय रागों का प्रभाव रोगियों पर सकारात्मक होता है। उनका मानना है कि रागों से सर्वप्रथम जो लाभ होता है वह मानसिक शान्ति। क्योंकि राग मानसिक तनाव एवं उदासी दूर करने में सक्षम होते हैं। अनुसंधानकर्त्ताओं ने अपने शोध निष्कर्षों के आधार पर स्पष्ट किया है कि शरीरगत पाँच प्राणों पर संगीत का सीधा प्रभाव पड़ता है। संगीत से शरीर में प्राण ऊर्जा में वृद्धि होनी है। प्राण ऊर्जा की कमी से ही तो शरीर में रोग का निवास होता है और व्यक्ति दुर्बल, कमजोर व अशक्त हो जाता है। संगीत ऐसे लोगों में प्राणों का संचार करता है और आशा एवं उत्साह में अभिवृद्धि करना है जिससे मानसिक विकारों में कमी आती है। भावावेश, तनाव, कुण्ठा, निराशा, मानसिक अस्थिरता, अनियंत्रित क्रोध आदि संगीत से शमित, संतुलित व नियंत्रित होते हैं। उच्च रक्तचाप, माइग्रेन, अनिद्रा, सिर दर्द आदि रोग भी संगीत चिकित्सा से ठीक होते हैं। डॉ. वान्टर एच. वैलेस के कथनानुसार पीलिया, यकृत रोग और अपच भी संगीत के प्रभाव से दूर हो जाते हैं।
संगीत के स्वर केवल मन को ही झंकृत नहीं करते बल्कि शरीर के अंग-प्रत्यंगों पर भी अपनी तान की छाप छोड़ते हैं। डॉ. जेनी के अनुसार भारतीय राग से मस्तिष्क की सिकुड़ी हुई माँसपेशियों को नूतन शक्ति मिलती है। संगीत की स्वर आकृतियाँ कानों की झिल्लियों को प्रकम्पित करती हैं। परिणामतः स्नायु तंत्र के सेन्सरी एवं मोटर नर्वस सजग व सक्रिय होकर शारीरिक प्राण चेतना के प्रवाह को बढ़ा लेते हैं।
भारतीय रागों पर अनुसंधान-अन्वेषण करने वाले चिकित्सा वैज्ञानिक कहते हैं कि राग भैरवी से शरीर में कफजन्य बीमारियाँ दूर होती है। राग आसावरी रक्त अशुद्धियों का शमन करता है। राग मल्हार से क्रोध एवं मानसिक अस्थिरता दूर होते हैं। राग सौरत एवं राग जैजैवन्ती से भी मानसिक रोगों से छुटकारा मिलता है। श्वाँस सम्बन्धी बीमारी, तपेदिक, खाँसी, दमा आदि में राग भैरवी का प्रयोग किया जाता है। राग हिण्डोल से मेधा वृद्धि तथा यकृत व प्लीहा रोगों से आराम मिलता है।
रागों से रोग निवारण होता है, इसके अलावा शंख और घण्टा की ध्वनि भी इस क्षेत्र में चमत्कारिक परिणाम उत्पन्न करती हैं। बर्लिन विश्वविद्यालय में हुए अनुसंधान से पता चलता है कि शंख-ध्वनि की लहरों से बैक्टीरिया और अन्यान्य रोगों के जीवाणु नष्ट होते हैं। प्रति सेकेण्ड सत्ताईस घन फुट की शक्ति से यदि शंख को फूँका जाय तो बाईस सौ फीट के क्षेत्र में रहने वाले बैक्टीरिया मर जाते हैं और छब्बीस सौ फीट क्षेत्र के बैक्टीरिया निष्क्रिय हो जाते हैं। इसके साथ ही मलेरिया के कीटाणुओं का दुष्प्रभाव भी खत्म हो जाता है। शंख ध्वनि का प्रभाव मिर्गी, मूर्च्छा, कण्ठमाला तथा कोढ़ जैसे रोगों में अद्भुत रूप से देखा गया है। शिकागो के डॉ. डी ब्राइन ने शंख ध्वनि के माध्यम से हजारों बहरे रोगियों को ठीक कर पौराणिक मान्यता को सही कर दिखाया। इस दिशा में मास्को, सेनेटोरियम, जर्मनी, हालैण्ड आस्ट्रेलिया के कई शोध केन्द्रों में अन्वेषण जारी है। यह प्रयोग उत्साहवर्धक हैं। वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है कि शंख ध्वनि एवं राग विशेष के स्वरों से मानसिक उपचार किये जा सकते हैं।
डॉ. हेकेने की मान्यता है कि म्यूजिक थेरेपी में पाश्चात्य और पूर्वी संगीत को उपयोग में लाया जाता है। परन्तु भारतीय शास्त्रीय संगीत में रोग निवारण की क्षमता अपेक्षाकृत अत्यधिक होती है। हालाँकि वर्तमान में प्रचलित रॉक, जेज, बल्यू, रैप आदि पाश्चात्य संगीत अत्यधिक लोकप्रिय हो रहे हैं। हाइबिट्स से लोग इन्हें पसन्द जरूर करते हैं, परन्तु इसका शारीरिक दुष्प्रभाव भी देखने को मिल रहा है। इस संदर्भ में स्वीडन तथा जर्मनी में अनेक शोध कार्य कर चुके डॉ. बालाजी ताम्बे का कहना है कि रॉक तथा हाईबिट्स संगीत को कम समय जैसे 5-10 मिनट तक सुनने से तो स्फूर्ति आती है, आलस्य दूर होता है। पर लगातार सुनने से रीढ़ की हड्डियों में कई प्रकार की समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। कान के अन्दर का द्रव सूख जाता है। इसी कारण चिकित्सा में भारतीय शास्त्रीय संगीत ही अधिक उपयोगी साबित हो रहे हैं।
संगीत चिकित्सा संवेदना के तारों से संचालित होती है। इसकी स्वर लहरियाँ तथा तरंगें स्नायु तंत्र को आन्दोलित-उद्वेलित कर रोगी को निरोग बनाने में सहायक होती है। इसी वजह से संगीत का सबसे सफल चिकित्सा उपचार मानसिक रोगों के निराकरण में किया जा रहा है। इससे मन स्थिर व शान्त रहता है तथा भाव सरस व सुविकसित हो उठता है।
म्यूजिक थेरेपी की इस सफलता को देखकर यह कहा जा सकता है कि संगीत विद्या में अनेकों सम्भावनाएँ सन्निहित हैं। संगीत की धुनों और ध्वनि तरंगों में मंत्र विद्या की विलुप्त कड़ियों को यदि ढूंढ़ा व जोड़ा जा सके तो मंत्र चिकित्सा की भावी एवं नूतन पद्धति को विकसित किया जा सकता है। यह मानव जीवन के लिए एक वरदान सिद्ध हो सकती है।
एक पुजारी नियत समय पर पूजा करने आता और आरती करते−करते भावविह्वल हो जाता, पर घर आते ही अपनी पत्नी−बच्चों के प्रति कर्कश व्यवहार करने लगता। एक दिन उसका छोटा वाला बालक भी साथ लगा चला आया। पुजारी स्तुति कर रहा था, “हे प्रभु, तुम सबसे प्यार करने वाले, सब पर करुणा लुटाने वाले हो।”
अभी वह इतना ही कह पाया था कि बच्चा बोल उठा, “हे पिता, जिस भगवान के पास इतने दिन रहने पर भी आप करुणा और प्यार करना न सीख सके, उस भगवान के पास रहने, न रहने से क्या लाभ!” पुजारी को अपनी भूल मालूम पड़ गई और वह उस दिन से आत्मनिरीक्षण व आत्मसुधार में लग गया।
न जाने क्यों इन दिनों मन बहुत परेशान है। ये स्वर किसी एक के नहीं, अनेकों के हैं। जो उन्हें थोड़ा−बहुत कुरेदने पर बड़ी आसानी से सुने जा सकते हैं। काम में जी नहीं लगता, बात−बात में गुस्सा आता है। हर समय चिड़चिड़ाहट घेरे रहती है। मन में घाव−सा हो गया है। ऊपर−ऊपर तो यदा−कदा ठहाके भी लगा लेते हैं, पर अंदर क्रोध का ज्वालामुखी दहकता−धधकता रहता है। सुविख्यात मनोचिकित्सक मौरिस फ्रेडमैन इन लक्षणों का ब्योरा देते हुए कहते हैं कि यदि ऐसा है तो परखिए, जरूर कहीं मन की किसी निचली परत में कोई गाँठ पड़ गई हैं। भले ही यह बात सतही तौर पर समझ में न आए, परंतु ये सारी परेशानियाँ होती इसी कारण हैं। यही गाँठ जब−तब कसकती है, चुभती है, टीसती, दुखती है, आक्रोध दिलाती है और रुलाती भी है।
मन की गहरी परतों को कुरेदने और सँवारने में माहिर जे0 डी0 फ्रैंक ने इस विषय पर काफी ज्यादा शोध−अनुसंधान किए हैं। उन्होंने अपने अनुसंधान−निष्कर्षों का ब्योरा ‘हिडेन माइंडः ए फारगाँटन चेप्टर ऑफ अवर लाइफ’ में प्रकाशित किया है। इस पुस्तक में प्रकाशित विवरण के अनुसार मन में ऐसी गाँठ प्रायः किसी के उस कटु व्यवहार के कारण पड़ जाती है, जिसे हम भूल नहीं पाते। किसी के द्वारा की गई अवहेलना, उपेक्षा, तिरस्कार, अपमान के क्षण हमारे मन में गाँठ बनकर कसकते रहते हैं। यह कसक कभी तो बदला लेने के आक्रोध का ज्वालामुखी बनना चाहती है और कभी अपने असहाय होने के अहसास की पीड़ा बनकर छटपटाती रहती है। आक्रोश और छटपटाहट का यह दर्द अपने अंतर को अनचाहे टूक−टूक करता रहता है।
जापानी चिकित्साशास्त्री के0 कुरोकावा के अनुसार मन की राह पीड़ा तन में उतरे बिना नहीं रहती। उनके शोध−निष्कर्ष बताते हैं कि मन की परेशानी ज्यों−ज्यों गहरी होती जाती है, तन की बीमारी का रूप ले लेती है। हाल ही में कुरोकावा और उनकी सहवैज्ञानिक योशीयुकी कागो ने अपने वैज्ञानिक शोध से इस तथ्य का खुलासा किया है−जो लोग नकारात्मक भावों, जैसे विश्वासघात, द्वेष, ईर्ष्या, जलन, प्रतिशोध आदि में प्रायः डूबे रहते हैं, वे उच्च रक्तचाप और इसके जरिए आगे चलकर पनपने वाली हृदयाघात व गुर्दों आदि से संबंधित अनेक बिन बुलाई बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। इस तरह नकारात्मक भावनाएँ न केवल मन को पीड़ा और छटपटाहट से भर देती हैं, बल्कि उनसे तन भी हर पल जलता−गलता और मरता रहता है।
कुरोकावा और योशीयुकी के शोध−अध्ययन से यह भी पता चलता है कि जो लोग दूसरों को क्षमा कर देते हैं, उन्हें उच्च रक्तचाप से संबंधित बीमारियाँ अपेक्षाकृत कम होती हैं। यानि की यदि हम अपने देश की मिट्टी में अंकुरित हुई प्राचीन कहावत ‘क्षमा करें और भूल जाएँ’ को अपना लें तो जिंदगी बदल सकती है। दूसरे जैसे भी हों, पर हम उनके लिए गए दुर्व्यवहार को यदि क्षमा कर दें तो हमारी अपनी जिंदगी में शाँति और आनंद का रस घुल सकता है। क्षमा करना हमारे बड़प्पन को प्रकट करता है। प्राचीन संत कवि के वचन हैं−
क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात। का रहीम हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात॥
जो क्षमा करते हैं। यथार्थ में वही बड़े हैं। वही अपने सद्गुणों के कारण महान कहे जाते हैं। उत्पात मचाने वाले और दुर्व्यवहार करने वाले तो छोटे हैं और छोटे ही रहेंगे। भगवान विष्णु की भगवत्ता महर्षि भृगु के पद−प्रहार से किसी भी तरह कम नहीं हुई। वैज्ञानिक अनुसंधान कहते हैं कि यह क्षमाशीलता न केवल हमारे बड़प्पन को प्रकट करती है, बल्कि हमारे स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाती है। शोध−निष्कर्ष यह बयान करते हैं यदि क्षमाशील व्यक्ति को उच्च रक्तचाप से जुड़ी हुई बीमारियाँ किसी कारण हो भी जाती हैं तो उन्हें जल्द ही नियंत्रित किया जा सकता है। शोध से इस तथ्य का भी खुलासा हुआ है कि क्षमा करने या न करने का सीधा संबंध उच्च रक्तचाप से बचे रहेंगे। यदि नहीं हैं तो उच्च रक्तचाप का दबाव आपको विकल−बेचैन बनाए रहेगा।
क्षमा करें कैसे? यह कठिन सवाल अनेक मनों में अनुत्तरित हैं। यदि कोई विवेकवान किसी के दुर्व्यवहार को क्षमा करना भी चाहे तो विगत की यादें भावनाओं पर इस तरह छा जाती हैं कि क्षमा जन्मने के पहले ही मर जाती हैं। आधुनिक मनःचिकित्सक ऐसी भावदशा से परिचित हैं। यही कारण है कि उन्होंने कतिपय ऐसी तकनीकों की खोज की है, जिन्हें इस्तेमाल करके इस स्थिति से उबरा जा सकता है। इस क्रम में पहला बिंदु है−अपने प्रति ईमानदार बनिए। जिस शख्स को आप क्षमा नहीं कर पा रहे हैं, उसे नकारिए नहीं। हो सकता है, उसकी उतनी गलती ही न हो, जितना कि आप बढ़ा−चढ़ाकर सोच रहे हैं। उससे कतराने की कोई जरूरत नहीं है। तटस्थ होकर, पूर्वाग्रह मुक्त होकर इत्मीनान से विचार करिए। इस क्रम में आपके मन में जो भी भाव आएँ, उन्हें सहजतापूर्वक आने दीजिए। फिर देखिए धीर−धीरे आपके मन का बोझ उतर जाएगा।
इस क्रम में दूसरा बिंदु थोड़ा−सा अटपटा जरूर है, पर है बड़ा प्रभावकारी। आप एक कागज का टुकड़ा उठाइए और अपने भीतर उमड़ती−घुमड़ती भावनाओं को लिख डालिए। ऐसा एक बार नहीं, अनेक बार कीजिए। मनोविज्ञान की भाषा में इसे मनोविरेचन कहते हैं। इससे क्रमिक रूप से मन हलका होगा। फिर इसके बाद कागज पर लिखने का दूसरा पहलू भी है। इसके अनुसार आप कागज पर यह लिखिए कि आपने अमुक शख्स को माफ कर दिया है। ऐसा एक बार नहीं, अनेक बार लिखिए। इस तरह करने से मन के आक्रोश की दिशा बदलेगी और कुछ समय बाद स्वयं को बेहतर महसूस करने की स्थिति आ जाएगी।
तीसरा बिंदु इस क्रम में सार्थक विश्लेषण का है। केवल अपने बारे में ही न सोचें। खुद को दूसरे की स्थिति में भी आकलन करने की कोशिश करें। दूसरे के नजरिए को भी समझें। संभव है कि आपकी अपनी सोच ही गलत हो। दूसरे के नजरिए को समझकर आसानी से अपना सही आत्मविश्लेषण किया जा सकता है। इसके नतीजे संभव है कि ये बता दें कि दूसरे की उतनी गलती नहीं है, जितना कि आपका मन बढ़ा−चढ़ाकर सोचे जा रहा है। फिर तो उसे बड़ी ही आसानी से माफ करके मन का सारा बोझ उतारा जा सकता है।
तरीका कोई भी अपनाया जाए, पर माफ करने का खयाल मन में जिस गति से गाढ़ा और गहरा होगा, उसी गति से मन की सारी परेशानी, पीड़ा दूर हो जाएगी। मौरिस फ्रेडमैन तो इस तरह से माफ करने को एक नई जिंदगी की शुरुआत कहते हैं। उनके अनुसार माफ करने के बाद जिंदगी को एक नई ताजगी, ऊर्जा और गति मिलती है। मनश्चेतना ग्रंथिमुक्त हो जाती है। टीस, चुभन और दुखन कहाँ खो जाती है, पता ही नहीं चलता। तो फिर देर किस बात की, अपने अंदर क्षमाशीलता को विकसित करें और प्रकाशपूर्ण जीवन की दिशा में एक नया कदम बढ़ाएँ।
नवदिक्षित शिष्य ने कहा, “गुरुदेव, उपासना में मन नहीं लगता। भगवान की ओर चित्त दृढ़ नहीं होता।” गुरु ने गंभीर दृष्टि डालकर शिष्य को देखा और जैसे कोई बात समझ में आ गई हो, बोले, “सच ही कहते हो वत्स, यहाँ ध्यान लगेगा भी नहीं। अन्यत्र चलकर साधना करेंगे, वहाँ ध्यान लगेगा। आज सायंकाल ही यहाँ से प्रस्थान करेंगे।
सायंकाल शिष्य कुछ चिंतित स्वर में प्रश्न कर बैठा, जिसका गुरु ने कोई उत्तर न दिया। सूर्यास्त के साथ ही वे दोनों एक ओर चल पड़े। गुरु के हाथ में एक कमंडल था, शिष्य के हाथ में थी एक झोली, जिसे वह बहुत यत्नपूर्वक सँभाले हुए चल रहा था। मार्ग में एक कुआँ आया। शिष्य ने शौच की आशंका व्यक्त की। दोनों रुक गए। बहुत सावधानी से उसने झोला गुरु के पास रखा और शौच के लिए चल दिया। जाते−जाते उसने कई बार झोले पर दृष्टि डाली।
‘गड़ाम’, एक तीव्र प्रतिध्वनि भर सुनाई दी और झोले में पड़ी कोई वस्तु कुएँ में जा समाई। शिष्य दौड़ा हुआ आया और चिंतित स्वर में बोला, “भगवन्, झोले में सोने की ईंट थी सो क्या हुई?” गुरु बोले, “कुएँ में चली गई। अब कहे तो चलें, कहे तो फिर वहीं लौट चलें, जहाँ से आए हैं। अब ध्यान न लगने की चिंता कहीं न रहेगी।”
एक दीर्घ श्वास छोड़ते हुए शिष्य ने कहा, “सच ही गुरुदेव, आशक्ति का मन से परित्याग किए बिना कोई भी ईश्वर में मन नहीं लगा सकता।”
साधना जीवन के स्थायी सुख एवं आनन्द को प्राप्त करने की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत मन की इच्छा-कामनाओं का निग्रह करते हुए कठोर व्रत एवं अनुष्ठान का दीर्घकाल तक अभ्यास किया जाता है। जीवन में सुख और आनन्द को पाने की ये साधनात्मक प्रक्रियाएं ठोस मनोवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं, जिन्हें आसानी से समझा जा सकता है।
जीवन का यह एक शाश्वत सत्य है कि हर प्राणी सुख की खोज में भटक रहा है, किन्तु स्थायी सुख किसी को प्राप्त नहीं होता। ज्यों ही प्राणी सुख का स्पर्श करते हैं, त्यों ही यह अभाव में विलीन हो जाता है। महाकवि कीट्स ने ठीक ही फरमाया है कि जिस तरह बूँद पड़ते ही उसके धक्के से पानी का बुलबुला फूट पड़ता है, उसी तरह स्पर्श मात्र से ही सुख अभाव में विलीन हो जाता है। जब हमें मनचाही वस्तु प्राप्त हो जाती है तो हम खुशी से फुला नहीं समाते और इसके हाथ से छूटते ही शोकातुर हो जाते हैं। इतना ही नहीं, मनचाही वस्तु की प्राप्ति होने पर भी खुशी की स्थिति अधिक देर तक नहीं बनी रहती और मन में फिर बेचैनी पैदा हो जाती है। इस दशा का सारगर्भित चित्रण करते हुए मनीषी शॉपेन हॉवर ने कहा है कि मानव का मन सदा क्लान्ति और दुःख के बीच झूलता रहता है। इस स्थिति से उबरने के लिए भौतिकवादी विचारकों का कहना है कि मनुष्य को सदा अनेक प्रकार के सुखों का संग्रह करते रहना चाहिए। हमें स्वयं को संसार के हजारों कार्यों में इतना व्यस्त रखना चाहिए कि हमें सुख और दुःख के सम्बन्ध में सोचने का अवसर ही न मिले। वरट्रैण्ड रसेल ने अपनी पुस्तक ‘कॉक्वेस्ट ऑफ हैपिनेस’ में इसी तथ्य का प्रबल प्रतिपादन किया है। यही 12 वीं सदी इंग्लैण्ड में वैन्थम महोदय द्वारा प्रचलित सिद्धान्त रहा है। इसकी सामयिक उपयोगिता के बावजूद यह गम्भीर त्रुटियों से ग्रस्त सिद्धान्त है। इस तरह की भौतिकवाद को इंग्लैण्ड के ही प्रसिद्ध लेखक कालिर्थन ने शैतान का राज्य तक की संज्ञा दी है। जो कि कभी तुष्ट न होने वाले भौतिक सुखों के अपरिमित संग्रह का सहज परिणाम है।
इसके विपरीत सुख एवं आनन्द का ठोस आकार आध्यात्मिक दर्शन में सुख भोगों का अधिकाधिक संग्रह नहीं है, बल्कि इनका संयम एवं विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए इनका त्याग है। संयम एवं त्याग मूलक साधना ही स्थिर सुख एवं शान्ति का द्वार खोलता है। प्रख्यात मनोविद विलियम जेम्स ने इस तथ्य को गणितीय सूत्र के द्वारा स्पष्ट किया है- संतोष या आनन्द, आशा या तृष्णा। इस तरह यदि हमारी आशा या तृष्णा बढ़ी-चढ़ी है तो कितनी भी उपलब्धि या लाभ के बावजूद आनन्द की मात्रा न्यून ही रहेगी और यदि आशा न्यून है तो हल्की-फुल्की उपलब्धियाँ भी बड़े संतोष का कारण बनेंगी और यदि आशा शून्य है तो आनन्द अनन्त गुना हो जायेगा। अर्थात् जिसे ब्रह्मानंद कहा गया है उसकी प्राप्ति इस सूत्रानुसार तृष्णा का आशा के शून्य होते ही सिद्ध होती है।
साधना मन की इस आशा या तृष्णा को शून्य की ओर ले जाने की प्रक्रिया है। आशा या तृष्णा मन की तरंगें हैं। विचलित मन आशा और तृष्णामय होता है। प्रशान्त मन आशा और तृष्णा रहित होता है। नित्य की साधना मन की इसी प्रशान्त स्थिति को प्राप्त करने का अभ्यास है। गीताकार ने यह स्पष्ट किया है कि मन का निग्रह बहुत कठिन है, क्योंकि इसका वेग वायु के समान है, किन्तु नियंत्रण सम्भव है और इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अभ्यास और वैराग्य का उपदेश देते हैं।यह भी वस्तुतः साँसारिक आसक्ति, आशा एवं तृष्णा को शून्य की ओर ले चलने का ही प्रतिपादन है।
साधना के अंतर्गत अभ्यास का अपना गहरा मनोवैज्ञानिक आधार है, जिसे जीवन के सामान्य क्रम में ही देखा एवं समझा जा सकता है। शेर वर्षों तक पिंजड़े में ही रहता है, वह पिंजड़े का दरवाजा खुलने पर भी पिंजड़े से बाहर नहीं भागता। यदि उसे बाहर निकाल भी दिया जाय तो वह पुनः पिंजड़े में ही घुसता है। जिन कैदियों की सारी उमर कैद में ही बीतती है, वे कैद से मुक्त होने पर कैद में जाने के लिए तरसते हैं। इस तरह मन अभ्यास का अनुवर्ती है। यह दीर्घकालीन अभ्यास के द्वारा स्वतः ही इच्छानुरूप ढल जाता है। साधना के अंतर्गत मन को उपरोक्त सूत्र के अनुरूप कठोर अभ्यास द्वारा उपयुक्त साँचे में ढाला जाता है। यही साधना का मर्म है। इसी आधार पर गीता मानव को यह शाश्वत संदेश देती है कि जो व्यक्ति (साधक) मन को साधना द्वारा शान्ति, अशान्ति, मान-अपमान, सुख-दुःख में निर्लिप्त बना लेता है वही निर्विघ्न शान्ति का अधिकारी है। जो व्यक्ति काम-क्रोध के वेगों को सह सकता है, वही वास्तविक सुखी है।
साधना के अभ्यास द्वारा ही जो व्यक्ति मन को दुःखों को सहने के लिए पहले से ही तैयार कर लेता है, वह दुःखों के आने पर विचलित नहीं होता। जीवन में परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव सदा होते ही रहते हैं, जो इन परिवर्तनों के लिए मन को पहले ही साधना द्वारा अभ्यस्त कर लेता है, वह इन परिवर्तनों के आने पर डरता नहीं, ना ही किसी प्रकार के उद्वेग को प्राप्त होता है। ऐसा ही साधक एकरस आनन्द और शान्ति को प्राप्त कर पाता है। ऐसा ही व्यक्ति अध्यात्म तत्त्व का वास्तविक चिंतन कर सकता है। सत्यान्वेषण के लिए मन का अनुद्विग्न होना आवश्यक है; बिना मन को वश में किये सत्य का चिंतन सम्भव नहीं। अतः मन को वश में करने की साधना ही सत्य की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है।
उच्च आध्यात्मिक उपलब्धियों को प्राप्त करने वाले महान् साधकों का जीवन साधना के कठोर प्रतिमानों से होकर गुजरता है। कई बार ये अभ्यास चित्र-विचित्र रूप तक ले लेते हैं। यूनान के प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता डायोजिनीज का जीवन एक ऐसा ही उदाहरण है। वह अपना जीवन एक नाद में ही बिता लेता था, वह रहने के लिए घर बाँधना आवश्यक नहीं समझता था। एक बार किसी युवक ने उसे काफी देर तक एक पत्थर की मूर्ति से भीख माँगते देखा। युवक की जिज्ञासा स्वाभाविक थी। इसे शान्त करते हुए डायोजिनीज ने स्पष्ट किया- ‘मैं इस मूर्ति से भीख माँग कर, भीख न मिलने पर मन को शान्त एवं अविचलित रखने का अभ्यास कर रहा हूँ।’ इसी तरह श्रीरामकृष्ण एक हाथ में पैसा और दूसरे में मिट्टी लेकर ‘टाकामाटी-टाकामाटी’ कहते हुए दोनों को फेंक देते थे और काँचन को मिट्टीवत् मानते हुए तृष्णा से निर्लिप्त रहने का अभ्यास करते थे। इसी तरह किसी भी विषय-वस्तु एवं साँसारिक भोगों की आत्याँतिक अपूर्णता को समझते हुए, मन को इसके प्रति राग, आसक्ति एवं ममत्त्व को क्रमशः अभ्यास द्वारा ही क्षीण करते हुए अपने ईष्ट, आध्यात्मिक सत वस्तु एवं उच्चतर लक्ष्य पर केन्द्रित किया जाता है। शमन-दमन एवं तप-तितिक्षा द्वारा मन का यह अभ्यास साधना का अभिन्न अंग है जो क्रमशः साधक को स्थिर सुख-आनन्द एवं शान्ति की ओर ले जाता है।
आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के बीच यह एक भ्रान्ति व्याप्त है कि मन पर हठपूर्वक किया गया अभ्यास लाभकारक नहीं बल्कि घातक है। यह कई शारीरिक और मानसिक रोगों का कारण बनता है। हमारी आन्तरिक इच्छाओं का अवरोध हमारे अदृश्य मन में अनेक तरह की गम्भीर ग्रन्थियों (काम्पलेक्शन) को उत्पन्न करता है, जिनके कारण बेचैनी, विस्मृति, उन्माद, हिस्टीरिया जैसे रोग पैदा हो जाते हैं। अतः इन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हमारी निम्न वृत्तियों का दमन हानिकारक है।
यह कथन पूर्ण सत्य से दूर है। उपरोक्त समस्याएँ तब पैदा होती हैं, जब निम्न वृत्तियों को अविवेकपूर्ण दबाया जाता है। विवेकपूर्ण निम्न वृत्तियों का दमन सामयिक भ्रान्तियों का कारण तो बन सकता है किन्तु घातक रोगों को जन्म नहीं देता। विवश होकर प्रतिकूल वातावरण के कारण जो इच्छाएँ तृप्त नहीं होती, वे ही उन्माद आदि का कारण बनती हैं। स्वेच्छा से किया गया आत्मनियंत्रण कभी आत्मघाती नहीं हो सकता।
आज मनोविज्ञान की प्रगति के साथ यह भी स्पष्ट हो रहा है कि जो अपनी नैतिक बुद्धि (सुपर-इगो) की आज्ञा की अवहेलना करता है, उसे भी अनेक प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोग होते हैं। आत्मा की अन्तर्ध्वनि को कुचलकर किया गया दुष्कृत्य, कुकर्म व्यक्ति को गहन आत्मप्रताड़ना एवं अशान्ति के दौर से गुजारता है। अतः पाप के दुःखदायी एवं पुण्य के सुखदायी होने के पीछे भी मनोवैज्ञानिक सत्य निहित है।
मन को सीधे गतिहीन करना या शून्यता में विलीन करना भी सम्भव नहीं है। मन जब तक मन रूप में है, तब तक वह गतिशील ही रहेगा। इन वृत्तियों कर निरोध ही योग सूत्रों में योगाभ्यास का लक्ष्य बताया गया है-‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः, तदा द्रष्टः स्वरुपेऽवस्थानम्।’ अर्थात् जहाँ चित्तवृत्ति का निरोध हुआ कि आत्मस्वरूप की प्राप्ति निश्चित ही है। किन्तु मन का यह निग्रह समय साध्य है और यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान की सीढ़ियों को पार करते हुए ही क्रमशः इसके निरोध की चरम समाधि अवस्था को प्राप्त किया जाता है।
जब तक मन का विलय परमात्मा तत्त्व में नहीं हो जाता अर्थात् उसका पूर्ण रूपांतरण नहीं हो जाता, उसका चंचल होना व इधर-उधर दौड़ना स्वाभाविक है। इसी मनोवैज्ञानिक सत्य को समझते हुए गीताकार ने मन को वश में करने का श्रेष्ठ उपाय कर्मयोग और भक्तियोग को बतलाया है। इसके अनुसार मन को वश में करने का सरल उपाय उसे अखिल विश्व में व्याप्त परमात्म तत्त्व के हेतु निरन्तर श्रेष्ठ कार्यों में लगाए रखना है। साधना के अनुरूप क्रमशः मन ब्रह्म भाव को प्राप्त होता है, अद्वैत स्थिति की ओर अग्रसर होता है, व स्वतः अपनी निम्न इच्छा, वासनाओं एवं कामनाओं से मुक्त होने लगता है और उसी अनुपात में स्थायी सुख-शान्ति और आनन्द को प्राप्त होने लगता है।
प्रह्लाद हिरण्यकशिपु के पुत्र थे। पुत्र को सभी वैभव असुर संस्कृति के अनुकूल ही मिले, इसकी सारी व्यवस्था कराई गई, पर प्रभु भक्ति को ही अपना लक्ष्य मान उन्होंने उस प्रतिकूल वातावरण से भी आत्मिक संपदा अर्जित करने का पुरुषार्थ किया। जब बेटा ही विषयासक्ति के विरुद्ध एवं भगवान के आदर्शों की स्तुति पिता के समक्ष करने लगा तो वह असुर उसे मारने को उद्यत हुआ। सारी माया का प्रयोग कर वह उसे पराजित न कर पाया और अवतार का संकल्प लिए स्वयं नृसिंह भगवान को असुर का वध करने आना पड़ा।
पतिव्रता के सामने ही वेश्या रहती थी। पतिव्रता उसकी चेष्टाओं को लुक−छिपकर देखा करती और समय−समय पर उसकी भरपेट निंदा करती।
वेश्या देखती कि कुरूप, गुणहीन, अस्वस्थ और निर्धन पति की भी पतिव्रता एकाग्र भाव से कैसी सेवा करती है तो उसका मन श्रद्धा से गदगद हो जाता। उसे वह साक्षात् देवी मानती और जब भी अवसर मिलता, उसकी भरपूर प्रशंसा करती।
कुछ दिन पश्चात मृत्यु का समय आया। पतिव्रता की आत्मा स्वर्ग गई। संयोगवश दूसरे ही दिन वेश्या भी मर गई और उसकी आत्मा भी वहीं जा पहुँची।
पतिव्रता को निम्न श्रेणी का स्वर्ग मिला और वेश्या को ऊँचे स्वर्ग में ले जाने की आज्ञा हुई। इस न्याय को अनुचित बताते हुए पतिव्रता ने धर्मराज से कहा, “भगवन्, वेश्यावृत्ति का पाप कर्म करते हुए भी मुझसे श्रेष्ठ सद्गति क्यों?”
अपनी बात जारी रखते हुए धर्मराज ने कहा, “वेश्या ने परिस्थितियों की विवशता में वह व्यवसाय तो अपनाया, पर अपने पाप के लिए सदा दुखी रही। तुम्हारे सत्कर्म को देखकर श्रद्धा से उसका मन भरा रहा और वैसी ही स्वयं बनने की प्रार्थना भगवान से करती रही, इसलिए उसे उच्चकोटि का स्वर्ग मिला। शरीर से मन बड़ा है।”
क्रिया से भावना श्रेष्ठ है। स्वर्ग की संहिता के अनुसार मन के पुण्य−पापों की भी गणना की जाती है और उसी आधार पर फल का निर्धारण होता है।
उपनिषद् साहित्य देवसंस्कृति की अमूल्य धरोहर है। यह जहाँ वैदिक चिंतन का चरमोत्कर्ष है वहीं भारतीय दर्शन की अन्य विचार धाराओं का आदि स्रोत भी है। ऋतम्भरा प्रज्ञा के उच्चतम आलोक से प्रकाशित ऋषियों की चिंतन चेतना इनसे निर्झरित हुई हैं। मानव मात्र के लिए इनका संदेश एवं महत्त्व सार्वभौमिक है तथा इनके प्रतिपादन समग्र हैं। मानव जाति का यह श्रेष्ठ वाङ्मय मनुष्य के आध्यात्मिक पथ को जहाँ ज्ञान का पाथेय प्रदान करता है, वहीं उसके जीवन पथ को आलोकित करने वाला दीपस्तम्भ भी है। यह श्रेयस और प्रेयस, विद्या और अविद्या, संभूति और असंभूति, परा और अपरा विद्या का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। इस तरह आध्यात्मिक मानसरोवर रूपी उपनिषद् से निसृत ज्ञान की सरिताएँ मानव मात्र के लौकिक अभ्युदय एवं आध्यात्मिक कल्याण के लिए प्रवाहमान होती हैं।
इस आधार पर आज के मानव के लिए उपनिषदों की प्रासंगिकता को भलीभाँति समझा जा सकता है। जबकि एकाँगी अध्यात्मवाद एवं एकाँगी भोगवाद मनुष्य के विनाश का कारण बना हुआ है। अस्तित्व को लीलती भोगवाद की आँधी यहाँ मानवीय अस्मिता के लिए खतरा बनी हुई है वहीं जीवन से अपना नाता तोड़े बैठी आदर्शवादिता जीवन की चुनौतियों से भागकर पलायनवाद का मार्ग अपना बैठी है। जीवन के स्पष्ट आदर्श एवं दिशा के अभाव में, किंकर्त्तव्यविमूढ़ता के इस मोड़ पर उपनिषदों के महर्षियों की आलोकित प्रज्ञा आज भी मानव को प्रखर दिशा बोध एवं कर्त्तव्य निर्धारण करवाने में सक्षम है। सर्वांगीण प्रगति के मार्ग पर बढ़ते हुए जीवन की गुणवत्ता का आधार क्या हो, उपनिषदों के प्रखर चिंतन में इसका स्पष्ट मार्गदर्शन मिलता है।
उपनिषदों के अनुसार मनुष्य जन्म दुर्लभ है और जो लोग इसे प्राप्त करते हैं, वे धन्य हैं, क्योंकि एक तो यह जन्म लाखों योनियों को पार करने के बाद मिलता है और इन समस्त योनियों में केवल मनुष्य ही ब्रह्मज्ञान का अधिकारी है।
मनुष्य की सर्वश्रेष्ठता का आधार उपनिषद् उसके स्वतंत्र चिंतन, विवेकशीलता और सृजनशीलता की अद्भुत क्षमताओं को मानता है। उसके अनुसार मानवेत्तर योनियाँ मात्र भोग योनियाँ हैं। ‘जायस्व म्रियस्व’ अर्थात् जन्म लो, भोगो और मरो, यही उनकी नियति है, किन्तु मनुष्य योनि भोग योनियाँ तो है ही, कर्म योनि भी है। अतः ‘मनुर्भव’ का आदेश देकर उसे मनुष्य बनने के लिए सचेत करता है, क्योंकि मनुष्य जन्म तो सहज है किन्तु मनुष्यता उसे कठिन एवं सचेतन प्रयत्न द्वारा अर्जित करनी होती है।
इसमें मानव देह को ‘देवपुरी और ब्रह्मपुरी’ की संज्ञा देकर स्तुति गान किया गया है। क्योंकि समूचा देवत्व एवं दिव्यत्त्व इसी मानवीय देह में विद्यमान है बस आवश्यकता इसके प्रति सजग होने की एवं इस जन्म सिद्ध अधिकार को प्राप्त करने में चेष्टारत होने की है।
इस संदर्भ में उपनिषद्कार मानव शरीर की तुलना एक रथ से करते हुए कहते हैं कि आत्मा ही इस शरीर रूप रथी का स्वामी है। इन्द्रियाँ इसके अश्व हैं, मन लगाम और बुद्धि सारथी। रथ के दो पहिये भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के प्रतीक हैं। आवश्यकता अपने आत्म स्वरूप के प्रति सजग होने की है, तभी हम बुद्धि रूपी सारथी को सही निर्देश देते हुए मन रूपी लगाम द्वारा इन्द्रिय रूपी अश्वों को सही दिशा में बढ़ा पायेंगे और समग्र प्रगति का पथ प्रशस्त हो पायेगा। यदि हमारी आत्मा मूर्छित है तो इन्द्रियों का स्वच्छन्द विचरण, मन की दिशाहीनता और बुद्धि का भ्रम ही नियति बन जायेगी, क्योंकि मन व इन्द्रियाँ स्वभाव से ही बहिर्मुखी हैं, इन्हें सुख-भोग ही रुचता है और फिर तृष्णा-वासना का कोई अन्त नहीं। इन्द्रिय एवं भौतिक सुखों के दलदल में डूबा आज का मनुष्य इसी का उदाहरण है। यह मूर्छित आत्मा की परिणति है।
इन्द्रियों एवं विषयों के संयोग से उत्पन्न भोग, जीवन का अविच्छिन्न अंग है, किन्तु इन्द्रियों का दास बन जाना हर दृष्टि से अकल्याणकारी है और अन्ततः विनाशकारी ही सिद्ध होता है। इसीलिए भोगों में डूबी भटकी मानवता के लिए उपनिषदों का संदेश है- ‘तेनत्यक्तेन भुँजीथा’ अर्थात् त्याग पूर्ण भोग करो। अर्थात् मनुष्य इन्द्रियों का उपयोग स्वामी की तरह करे न कि इनका दास बन कर।
मनुष्य मन प्रधान प्राणी है। अतः जीवन की गुणवत्ता मन द्वारा निर्धारित होती है। इस तथ्य के मर्मज्ञ उपनिषदीय ऋषि अन्न की शुद्धि पर बल देते हैं, उनके अनुसार अन्न के सूक्ष्मतम अंश से मन बनता है अतः आहार की शुद्धि से मन की शुद्धि होती है और अन्तःकरण के पवित्र होने से स्मृति दृढ़ हो जाती है और इसी के अनुरूप जीवन के हर क्षेत्र की गुणवत्ता सुनिश्चित होती है तथा जीवन के परम लक्ष्य की मञ्जिल समीप होती जाती है।
ऋषि मन की प्रकृति से भलीभाँति परिचित हैं अतः वह कहता है कि मन वायु की भाँति चंचल और दुर्निह है। जैसे वायु को बाँधना कठिन है, वैसे ही मन को नियंत्रित करना। परन्तु अभ्यास एवं वैराग्य द्वारा इसे वश में किया जा सकता है। बुद्धि रूपी सारथी द्वारा मन रूपी लगाम से इन्द्रिय रूपी अश्वों को नियंत्रित करना चाहिए। और जीवन में सफलता के लिए हमें सनसनाते तीर की भाँति लक्ष्य का भेदन करना चाहिए। (शरवत् तन्मयो भवेत्) अर्थात् जिस भी कार्य को करें उसे पूरा मन लगाकर, तल्लीन होकर करना चाहिए। आधे-अधूरे मन से किया गया कार्य हमें असफलता की ओर धकेलता है, परिणामस्वरूप निराशा, क्षोभ, कुण्ठा, आवेग आदि ही हाथ आते हैं और हमें विक्षिप्तता की ओर धकेल देते हैं। अतः जीवन की उत्कृष्टता के लिए मनोनिग्रह एवं एकाग्रता पर ऋषि बल देते हैं। साथ ही इसका सरलतम उपाय ओंकार ‘ॐ’ का जप बतलाते हैं। क्योंकि यह स्वयं ब्रह्म का नाम है तथा अनहद नाद के रूप में अंतर्भूत है। तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है कि किसी कार्य को ओंकार पूर्वक प्रारम्भ करने से सफलता अवश्य प्राप्त होती है।
उपनिषदों में स्वाध्याय को जीवनोत्कर्ष का एक अनिवार्य अंग माना गया है। ‘स्वाध्यायात् मा प्रमदः’ कहकर इसमें प्रमाद को वर्जनीय माना है। क्योंकि साँसारिक माया एवं मन की प्रकृति दोनों मिलकर जीवात्मा को अपने लक्ष्य के प्रति भ्रमित ही अधिक रखती है। सद्ग्रंथों, महापुरुषों द्वारा रचित साहित्य एवं शास्त्र ग्रन्थों के अध्ययन से आत्ममूर्छना टूटती है; जीवन के अँधेरे कोनों में प्रकाश पड़ता है और अभ्युदय का मार्ग प्रकाशित होता है। अतः स्वाध्याय को जीवन का अभिन्न अंग बनाने का आदेश दिया गया है।
सत्य को सबसे बड़ा तप एवं धर्म बताया है। और ‘सत्येन जयते नानृतम’ अर्थात् सत्य की ही जीत है। सत्य का अवलम्बन मनुष्य को नरकाग्नि की तपन से सुरक्षित पार ले जाता हुआ मुक्ति की ओर ले जाता है। जो असत्य का अवलम्बन लेता है, वह नष्ट हो जाता है।
जीवन में भौतिकता एवं आध्यात्मिकता का समन्वय उपनिषदों की अद्वितीय विशेषता है। यहाँ भौतिक सुख, ऐश्वर्य, समृद्धि और पारलौकिक सुख में परस्पर विरोध नहीं दिखाई पड़ता। वे परस्पर बाधक न होकर साधक हैं। उपनिषदिक ऋषियों का स्वयं का जीवन इसका आदर्श उदाहरण रहा है। विदेहराज जनक राजा थे तो साथ ही तत्त्व जिज्ञासु भी थे। महर्षि याज्ञवल्क्य ब्रह्मनिष्ठ थे तो गोकामी भी थे। किन्तु उनकी कामना धर्म द्वारा मर्यादित थी। ‘मा गृधः’ लालच मत करो, ऋषियों का स्पष्ट आदेश था। क्योंकि वे जानते थे कि कितने भी धन से मनुष्य की तृप्ति नहीं हो सकती । धन से भरी सम्पूर्ण पृथ्वी भी मनुष्य को शाश्वत ब्रह्मानंद की प्राप्ति नहीं करवा सकती। अतः मनुष्य जीवन में दोनों का समन्वय ही अपेक्षित है। एकान्तिक सुख और एकान्तिक आध्यात्मिकता में डूबे रहना, दोनों ही मनुष्य के लिए आत्मघाती हैं। त्याग पूर्वक निसंगता और समन्वित दृष्टि से जीना ही समग्र उत्कर्ष का आधार है।
उपनिषदों में भौतिक प्रगति का आदर्श स्पष्ट है, जब वह कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने का सुझाव देता है। किन्तु साथ ही कर्म का हेतु भी स्पष्ट करता है, जो आत्म केन्द्रित, स्वार्थपरक एवं भोगपरक वृत्ति नहीं बल्कि यज्ञीय भावना है, जिसका सार ‘इदम् न मम्’ के भाव में निहित है। इसके अनुरूप कर्म करने से जब वह अपने में सबको और सबमें अपने को देखने लगेगा तब जीवन में से शोक और मोह नष्ट हो जायेगा। ब्रह्मानंद का सागर हिलोरे मारने लगेगा। इसको व्यावहारिक रूप से क्रियान्वित करने के लिए ऋषि इन्द्रियों के संयम और सबमें एक ही परमात्मा के भाव को प्रौढ़ करते हुए मानव मात्र के प्रति दया-प्रेम-मैत्री और सौहार्द्र के भाव को विकसित करने का मार्ग सुझाते हैं। साथ ही दया और श्रद्धा को मानव धर्म की आधारशिला मानते हुए ऋषि दान द्वारा इसे सुदृढ़ करने पर बल देते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि नाव में जल भर जाय और घर में आवश्यकता से अधिक धन आ जाये तो दोनों हाथों से जल और धन उलीचकर फेंकना चाहिए अन्यथा नाव में पानी भर जायेगा और वह डूब जायेगी। घर में धन का अत्यधिक संग्रह भी विनाशकारी ही सिद्ध होता है। अतः दान हर दृष्टि से श्रेयस्कर होता है। जो भी कम-अधिक हो मिल बाँटकर खाना चाहिए, क्योंकि अकेला खाने वाला पाप ही को खाता है। अतः आत्मभाव के विस्तार के लिए, अपना पराये का भेद मिटाने के लिए परस्पर करुणा मैत्री की स्थापना के लिए दान का महत्त्व सर्वोपरि है।
स्वत्व के विस्तार के निमित्त ऋषि मीठी एवं प्रिय वाणी का प्रतिपादन करते हैं। कठोर, रूखे, तीखे व्यंगबाणों का प्रयोग कभी न करें, क्योंकि इनसे वैमनस्य,ईर्ष्या, द्वेष की भावना उत्पन्न होती है। ‘जिह्व मधुमत्तमा’ - जिह्वा मधुमती हो। क्योंकि मीठी वाणी से शत्रु भी मित्र और पराये भी अपने हो जाते हैं। साथ ही ऋषि मानव शरीर को बलिष्ठ एवं निरोग रखने पर बल देते हैं, क्योंकि मानव शरीर ही धर्म करने का पहला आधार है।
जीवन के लौकिक सुख एवं पारलौकिक आनन्द के आदर्श समन्वय का प्रतिपादन करते हुए ऋषि कहते हैं कि इस सतत् परिवर्तनशील जगत् में भौतिक एवं साँसारिक सुखों को भोगते हुए आनन्दित होते हुए भी मनुष्य को सदैव यह प्रयत्न करना चाहिए कि वह अमृत के दिव्य गुणों को धारण करे। इस हेतु नित्य सोने से पूर्व अपने दिनभर किये हुए कर्मों को यादकर उनको सुधारने की चेष्टा करें। परम परमेश्वर को प्रतिदिन, प्रतिक्षण याद कर कुटिल एवं पाप मार्ग से स्वयं को अलग करें और सुपथ पर चलें। जिससे कि अंधकार से प्रकाश की ओर का (तमसो मा ज्योतिर्गमय) तथा मृत्यु से अमरता की ओर का (मृत्योर्माऽमृतं गमय) जीवन आदर्श जीवन्त हो सके।
पर्वत शिखर पर दो चींटियाँ रहती थीं। एक उत्तर में, एक दक्षिण में। उत्तर वाली के पास चीनी की खान थी, दक्षिण वाली के पास नमक की। एक दिन शक्कर की खान वाली चींटी ने दूसरी चींटी को निमंत्रण दिया, “बहन, कहाँ इस नमक की खान में पड़ी हो, मेरे यहाँ शक्कर−ही−शक्कर है। खाकर मुँह मीठा करो और अपना जीवन सफल करो।” दूसरी चींटी ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया और बड़े सवेरे नहा−धोकर पहली चींटी के घर जा पहुँची। चींटी ने उसे घूम−घूमकर शक्कर की खान दिखाई और कहा, “बहन, जी चाहे जितनी शक्कर खाओ, यहाँ किसी बात की कमी नहीं हैं।”
चींटी दिनभर इधर−उधर भागती फिरी और शाम को पहली चींटी से यह कहकर चली गई, “बहन, तुमने मुझे बड़ा धोखा दिया। यदि शक्कर तुम्हारे पास न थी तो मुझे निमंत्रण ही क्यों दिया?”
पास ही एक कुटिया में एक संत और उनका शिष्य निवास करते थे। शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, शक्कर के पहाड़ में घूमने पर भी चींटी को शक्कर का पता क्यों न चला?” संत बोले, “बात यह थी वत्स कि चींटी अपने मुँह में नमक का टुकड़ा दाबे हुए थी, इसी से उसे मिठास का आभास नहीं हो पाया।” इसी प्रकार जो लोग अपने पुराने संस्कार नहीं बदलते, आत्मशोधन द्वारा अपनी बुराइयाँ नहीं हटाते, वे परमात्मा के समीप होते हुए भी उसकी कृपा से वंचित रह जाते हैं।
वर्तमान परिदृश्य में क्रान्ति का आह्वान मंत्र गूँज रहा है। अलगाव, आतंक, अस्थिरता, असन्तोष, अविश्वास के अनेकों यक्ष प्रश्न राष्ट्रीय जन-मानस से अपना उत्तर माँग रहे हैं। उनका एक ही दृढ़ स्वर है- ‘उत्तर या मरण’। या तो इन सबके सार्थक उत्तर देकर उज्ज्वल भविष्य के अधिकारी बनो अथवा फिर महाविनाश के लिए तैयार हो जाओ। मानव इतिहास के मर्मज्ञ मनीषी अर्नाल्ड टायनबी ने अपने चिन्तन में क्रान्ति को जन्म देने वाली परिस्थितियों का बड़ा ही विचारपूर्ण विवेचन किया है। उनका कहना है कि राष्ट्र की हर इकाई अलग होने की माँग करने लगे, व्यवस्थाओं की स्थिरता समाप्त होती दिखे, चारों ओर आतंक का साया घना हो जाय, अविश्वास इतना बढ़ जाय कि समाज के दरो-दीवार टूटने लगे और युवाओं में असन्तोष की ज्वालाएँ धधकती नजर आए तो समझो कि अब क्रान्ति में देर नहीं।
भारत देश की परिस्थितियाँ कुछ ऐसी ही हैं। मूल्यों का भयावह क्षरण, भ्रष्टाचार का महाताण्डव, चरमराती हुई राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्थाएँ, विघटित मानवीय जीवन, क्रान्ति का साज छेड़ना चाहते हैं। बेरोजगारी और दिशाहीनता से युवाओं की कुण्ठा इस कदर बढ़ चली है कि वे निराशा और आक्रोश के बीच झूल रहे हैं। निराशा उन्हें आत्महत्या के लिए प्रेरित करती है और आक्रोश उन्हें अपराधी बनने के लिए विवश करता है। जीवन व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप में वे कहीं, कोई स्थान नहीं खोज पा रहे। देश की आधी जनसंख्या के रूप में अपनी पहचान के लिए तरस रही नारियों की दशा और भी विपन्न है। शास्त्र उन्हें भले ही देवी की महिमा से मण्डित करते रहे, पर समाज का प्रचलित ढर्रा उन्हें मानवी मानने के लिए भी तैयार नहीं है।
रूसी चिन्तक क्रोपाटिकन के शब्दों में- इन सब का एक ही समाधान है क्रान्ति। क्रान्ति का अर्थ है- आमूल-चूल बदलाव। यानि कि व्यवस्था भी बदले, व्यवस्थापक भी बदले। इस तरह के बदलाव को दुनिया के कई भागों में कई बार अनुभव किया जा चुका है। रूस की क्रान्ति, फ्राँस की क्रान्ति, भारत देश की स्वाधीनता की क्रान्ति आदि अनेकों इसके उदाहरण हैं। जिनसे उस क्षेत्र के निवासियों ने तात्कालिक राहत पायी है। पर अबकी बार जरूरत कुछ ज्यादा है। इस बार की क्रान्ति में संघर्ष किन्हीं आक्रान्ताओं से नहीं अपनों और अपने से है। जिन्हें उलटना है- वे जीवन मूल्य हैं, जिनकी प्रतिष्ठ होनी है, वे जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र हैं। जिसे बदलना है- वह राष्ट्र की जीवन व्यवस्था है। राजनीतिक व्यवस्था को बदल देने भर से कुछ होने वाला नहीं है। हर पाँच साल में सरकारों के बदल जाने का अनुभव सभी को है। पर इससे समस्याएँ घटती नहीं, बल्कि पचास गुना बढ़ जाती हैं।
समस्याओं के सार्थक समाधान के लिए सम्पूर्ण क्रान्ति की जरूरत है। महान् दार्शनिक योगी श्री अरविन्द के शब्दों में- यह सम्पूर्ण क्रान्ति ही साँस्कृतिक क्रान्ति है। संस्कृति- जीवन की परिष्कृति है। इस तरह साँस्कृतिक क्रान्ति का अर्थ है जीवन और उसकी व्यवस्था को सम्पूर्ण रूप से निर्मल बनाने का, उसे परिष्कृत कर देने का सफल और सार्थक प्रयास। अब तक के विश्व इतिहास में जो प्रचलित क्रान्तियाँ हुई हैं, उनमें केवल बाहरी परिवर्तन से ही सन्तुष्ट होना पड़ा है। इनमें व्यवस्था तो बदली, पर व्यवस्थापकों के अन्तःकरण नहीं बदले। परिणाम वही ढाक के तीन पात रहे। राजतंत्र का लोकतंत्र में परिवर्तन लोक लुभावना तो हुआ, पर लोक जीवन की अपेक्षाएँ पूरी न हो सकीं। क्योंकि लोकतन्त्र ने भी नव-सामन्तवाद को जन्म देने और बढ़ावा देने में कोई कसर न छोड़ी। स्थिति केवल इतनी भर बदली कि पहले जो कार्य राजा और उसके सामन्त करते थे, वही कार्य अब नेता और उसके चाटुकार करने लगे। मूल्यों का क्षरण और पतन यथावत रहा।
साँस्कृतिक क्रान्ति ही इससे जूझने और उबरने का एक मात्र उपाय है। यही वह ब्रह्मास्त्र है, जिससे मानव की मनःस्थिति बदलेगी। उसकी आस्थाएँ, मान्यताएँ और धारणाएँ बदलेंगी। विश्वास और मूल्य बदलेंगे। व्यक्ति का व्यक्तित्व बदलेगा। यह क्रान्ति लहू और लोहे से नहीं विचारों और भावनाओं से की जा सकेगी। ‘मनःस्थिति बदले तो परिस्थिति बदले’ इस महाक्रान्ति का ध्येय वाक्य होगा। राष्ट्रीय नव जागरण के पुरोधा स्वामी विवेकानन्द ने अपने समय में इस महाक्रान्ति के विचार बीज बोए थे। इसकी भावी आवश्यकता का प्रतिपादन करते हुए कहा था- राष्ट्र की सबसे पहली आवश्यकता- मनुष्य निर्माण है। मनुष्य होने का परिचय केवल मानवीय कलेवर भर नहीं है। उसमें मानवीय गुणों का समन्वय भी चाहिए। मानवीय गुणों, भावों एवं सम्वेदनाओं से मनुष्य गढ़ने के लिए साँस्कृतिक क्रान्ति की कार्यशाला की आवश्यकता है। इसी से मनुष्य को अपनी खोयी पहचान मिलेगी। उसका अपनी लुप्तप्राय महिमा और गरिमा से परिचय होगा। ऐसे गरिमा सम्पन्न महिमान्वित व्यक्तित्व की प्रचण्ड चेतना धारा में अनेकों नए व्यक्तियों की चेतना परिष्कृत होगी। एक दीपक की लौ दूसरे नए दीपों को जलाएगी। मनुष्यों की मनःस्थिति बदलेगी तो परिस्थितियाँ भी बदलेंगी ही। व्यक्ति ही व्यवस्था का बीज है। व्यक्ति बदलता है- तो व्यवस्था के गुण और मूल्य बदल जाते हैं। साँस्कृतिक क्रान्ति में व्यक्ति और व्यवस्था दोनों के ही परिवर्तन के सूत्र और कार्यक्रम निहित हैं।
अर्नाल्ड टायनबी, ए.एल. बाशम जैसे सुप्रसिद्ध इतिहासविद्, महर्षि अरविन्द और डॉ. राधाकृष्णन जैसे दार्शनिक इसे भारत देश के महारोगों की एकमात्र औषधि के रूप में स्वीकारते हैं। विशेषज्ञों और विश्लेषकों का एक स्वर से मानना है कि भारतभूमि की वर्तमान परिस्थितियों में साँस्कृतिक क्रान्ति संजीवनी औषधि की तरह है। जिसके थोड़े से सेवन से भारत जननी नवप्राण पा सकती है। ‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतोभयात्’। इस महाधर्म का थोड़ा सा आचरण भी हमें महान् भय से मुक्ति दिला सकता है।
यही युगधर्म है। विचार क्रान्ति अभियान के द्वारा इसी को गति दी जा रही है। इससे जुड़कर इसे आत्मसात करके साँस्कृतिक क्रान्ति के धर्मचक्र प्रवर्तन की योजना में शामिल हुआ जा सकता है। एक के बाद एक नए व्यक्तियों का जुड़ाव न केवल उन व्यक्तियों को लाभान्वित करेगा बल्कि भारत माता का मैला होता जा रहा आँचल भी शुभ्र होगा। ध्यान रहे- क्रान्ति के बीज एक-दो महान् विचारकों के दिमाग में जमते हैं। वहाँ से वे फूल-फल कर बाहर आए कि संक्रामक रोग की तरह अन्य दिमागों में उपजकर बढ़ते हैं। सिलसिला जारी रहता है क्रान्ति की बाढ़ आती है। चिंगारी से आग और आग से दावानल बन जाता है। बुरे-भले सब तरह के लोग उसके प्रभाव में आते हैं, कीचड़ और दलदल में भी आग लग उठती है। साँस्कृतिक क्रान्ति के महामंत्र की भाव साधना की परिणति और परिणाम यही है। यही राष्ट्र के समस्त प्रश्नों का सार्थक हल और राष्ट्रीय उज्ज्वल भविष्य को निर्माण करने वाला ऊर्जा प्रवाह है।
एक बार एक वयोवृद्ध को, जो अन्य कार्यों से निवृत्त हो व्यर्थ में समय नष्ट करता था |एक दिन एक साधु ने समझाया, “तात्, अब तुम्हें लोक−कल्याण की साधना में जुट जाना चाहिए, घर का मोह त्यागकर समाज को अपने अनुभवों का लाभ और लोकश्रद्धा का आनंद लेना चाहिए।” लेकिन बुड्ढे के मन में नाती−पोतों का मोह समाया था, बोला, “महात्मन्, मेरे बिना बच्चे कैसे रहेंगे?” वृद्ध घर लौटा। वृद्धावस्था का शरीर, रात नींद जल्दी टूट गई। उसे लगा बगल के कमरे में कोई बात कर रहा है। ध्यान देकर सुना तो पता चला उसी का लड़का और बहू बात कर हरे हैं, “बुड्ढा दिन−रात खाँसता रहता है, मरता भी नहीं,अपनी टाँग अड़ाता रहता है।” यह अपमान सुनकर बुड्ढे को समझ आई और तब उसने घर का त्याग कर दिया।
मनुष्य का मन ही है जो सदा साँसारिकता के मोह में पड़ा रहता है और भगवान जैसी महान अपनी आत्मसत्ता से मिल नहीं पाता। जीवनभर के तुच्छ अभ्यास, जड़ आदतें, आसक्तियाँ मृत्यु के समय भी पीछा नहीं छोड़तीं। कई बार तो शिक्षित और विचारशील लोगों को भी इसी तरह की इंद्रियों की लिप्सा में पड़े देखते हैं तो आश्चर्य होता है कि मनुष्य अपने ऐश्वर्यवान स्वरूप को भूलकर किस तरह पाप−पंक में फँसा रहने में आनंद अनुभव करता है।
घर-आँगन, चौबारे, गलियारे में आज रंगों की धूम है। होली के उल्लास में उमड़ते इन रंगों में कई चिंतन के रंग भी शामिल हैं। जिनसे तन नहीं मन भीग रहा है। हमारा और शायद आपका भी। परिस्थिति एवं परिवेश को तनिक गहराई से देखेंगे तो इन रंगों का अनुमान होगा। अपने आप में उतरेंगे तो चिंतन के इन रंगों की चटख और शोख छटा नजर आयेगी। इनमें उल्लास के साथ विषाद का भी पुट है। खुशी के साथ गम भी है यहाँ। हँसी के साथ रुदन भी यहाँ बिखरे हैं। चिंतन के इन रंगों में सारी इन्सानी जिन्दगी का वजूद आ सिमटा है। कई -क्या? क्यों? कैसे? और किसलिए? की पिचकारियाँ हमारे ऊपर आपके ऊपर इन रंगों को उड़ेल रही है। जो भी विचारशील हैं उनमें से कोई चिंतन के रंगों की इस फुहार से बच नहीं सकता।
होली की सुप्रसिद्ध कहावत है-‘बुरा न मानो होली है।’ तब फिर बुरा मानने की क्या जरूरत है। आप भी हमारे साथ भीगिये इन चिंतन के रंगों में और मित्रों-परिचितों को भी बचने न दीजिए, उन्हें भी भिगोइए इन गाढ़े रंगों में। सदस्य परिवार के हों या पड़ोस के कोई भी छूटने न पाये। हम आप और सभी विचारशील जन मजबूती से थाम लें अपनी पिचकारियाँ और उड़ेलें चिंतन के रंग एक-दूसरे पर । हमारी, हम सबकी विचारशीलता में विमर्श पैदा हो, मतों में दुराग्रह की बजाय पारस्परिक संवाद की स्थिति बने और अन्ततः समाधान जन्म ले। तभी तो उल्लास में सार्थकता आएगी। सहस्राब्दियाँ, शताब्दियां बीत गयी हमें होली मनाते। कई रंग देखें हैं हम सबने। कई गीत गाये हैं हमने। कई धुनें छेड़ी है। कई रंगों और कई तालों ने हमारी जिन्दगी को लय दी है। वैदिक ऋचाओं की गूँज और सामगान की सुमधुर ध्वनि के साथ होली मनाना शुरू किया था हमने। अपने आचरण और कर्त्तव्यनिष्ठ, प्रचण्ड तप और अविराम साधना से हमीं ने जिन्दगी को ऐसा गढ़ा था कि देवता भी हमारे घर-आँगन में आकर हम सबसे होली खेलते थे। देवत्व हमारी निजी जिन्दगी की परिभाषा थी। स्वर्ग हमारी सामाजिक जिन्दगी का सच था। ऐसा नहीं था कि इस क्रम में व्यतिक्रम के अवसर नहीं आए। असुरता ने अपनी हुँकार भरी, हिरण्यकश्यपु और होलिका के सहोदर षड़यंत्रों ने हमारे देवत्व और स्वर्ग को मटियामेट करने का कुचक्र रचा। पर हमारे प्रह्लाद-पराक्रम ने आसुरी प्रवृत्ति के इन भाई-बहिन को पनपने नहीं दिया। अपनी ही नफरत की आग में होलिका जल मरी। भगवान नृसिंह ने असुरता का वक्ष विदीर्ण कर दिया और होली के गीत-प्रह्लाद की भक्ति की थिरकन के साथ गूँज उठे।
प्रेम का स्वाँग भरे होलिका आज भी नफरत फैला रही है। घर-परिवार की टूटन, जाति-वंश का भेद, सम्प्रदायों और धर्मों की दीवारें, भाषा और क्षेत्र के विभाजन इन नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं। चतुर होलिका हमारे-हम सबके प्रह्लाद-पराक्रम के अभाव में सफल है। सवाल हमसे है और आप से भी कि आखिर कहाँ खो गयी वह साधना, प्रचण्ड तप करने का वह पुरुषार्थ, जिस पर रीझकर भगवान नृसिंह हमारे-हम सबके अन्तःकरण में अवतरित हो सके। ध्यान रहे- भगवान केवल भक्तों और तपस्वियों को वरदान देते हैं। भावसंवेदना की सघनता और पुरुषार्थ की प्रचण्डता ही प्रभु के वरदान की अधिकारी बनती है। निष्ठुर और कायर तो सदा ही दुःख भोगते आये हैं।
इस स्थिति से उबरना है तो आसुरी षड़यंत्रों का भेद समझना होगा। नफरत की विषाक्त बेल को जड़ से उखाड़कर संवेदना और पराक्रम के सघन उद्यान रोपने होंगे। भगवान तो सदा से हमारे बीच आने के लिए तैयार हैं, पर हमीं कहीं अपनी सत्पात्रता नहीं सिद्ध कर पा रहे हैं। अन्यथा नन्दनन्दन तो सदा से यही चाहते हैं कि हम सबकी होली में वही उल्लास बिखरे जो उन्होंने कभी बरसाने में बिखेरा था। ‘सम्भवामि युगे-युगे’ का उनका वचन निरर्थक नहीं है। प्रभु भक्तों के आह्वान पर अवतरण के लिए प्रतिज्ञा बद्ध हैं। पर हममें से हर एक से वह एक ही बात कह रहे हैं- ‘क्लैव्य माँ स्म गमः’ छोड़े इस क्लीवता और कायरता को। ‘मामनुस्मर युध्यस्व च’ मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो।
सघन संवेदना और महा पराक्रम का उच्च आदर्श प्रस्तुत करके गीता गायक ने होली को एक नयी परिभाषा दी थी। बरसाने की होली में उन्होंने जीवन के कई रंग बिखेरे थे। शुद्ध सात्त्विक और निर्मल प्रेम से भरी अपनी चिंतन फुहारों से उन्होंने अनेकों अन्तःकरण रंगे थे। भक्ति व प्रेम के अगणित रंगों के साथ उन्होंने पराक्रम का गुलाल भी उड़ाया था। कंस हो या कालयवन, जरासंध हो अथवा दुर्योधन किसी के आसुरी षड़यंत्रों को उन्होंने पनपने नहीं दिया। मानवीय हितों के खिलाफ कोई भी दुरभिसंधि उन्होंने चलने नहीं दी। अपने युग के अनुरूप प्रभु ने होली को नये अर्थ दिये।
समय बदला, युग बदला परन्तु चुनौतियाँ तो अभी भी है, पर हम हैं कि इनसे मुँह मोड़े एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में लगे हैं। बहाना यह है कि अबीर, गुलाल और रंग महंगे हो गये हैं। ऐसे में एक कीचड़ ही तो बचा है। उसी को जब जी चाहा किसी पर उछाल दिया। ऐसा करते समय भूल जाते हैं कि इसके छींटे अपने आप पर पड़े बिना न रहेंगे। अबीर, गुलाल और रंग महंगे हो गये तो अपनी प्रकृति में पलाश उगाने का पराक्रम क्यों नहीं करते? आखिर क्यों सोई हुई है हमारी संवेदना। क्यों नहीं सुनते महाकाल की वाणी जो अभी भी हमें चेताने के लिए गगन में गूँज रही है।
क्या हम भूल गये अभी कुछ ही दिन हुए महेश्वर महाकाल हमारे, आपके, हम सबके द्वार पर भिक्षुक बनकर आये थे और उन्होंने इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य की अलख जगाते हुए हमसे हमारे मन की भिक्षा माँगी थी। ‘मनोरथवती नाम भिक्षापात्रं समर्पिता’ (काशीखण्ड 30/102) ताकि उनके चिंतन के कुछ रंग हमारे मन पर भी पड़ सके। और हममें वह साहस पैदा हो सके, जिसके बल पर हम नयी सदी की चुनौतियों का सामना कर सकें। ध्वस्त कर सकें होलिका और हिरण्यकश्यपु के षड़यंत्रों का दुर्गम व्यूह। जिसमें आज सारी मानवता छटपटा रही है। काश्मीर से चेचन्या तक जो खून के छींटे उड़ रहे हैं उन्हें हम हास-परिहास में डूबे रहकर नहीं रोक सकते। इसके लिए तो दैवी तत्त्वों को संगठित करने वाला पराक्रम ही करना पड़ेगा।
शुरुआत आज से और अभी से करें। संकल्पित हों कि होलिका का यह मंगल पर्व हमारे जीवन में एक नयी क्रान्ति लाए। घर हो या पड़ोस होलिका के नफरत भरे ढोंग को पनपने न दें। सघन संवेदना ही नफरत फैलाने वाली होलिका का समर्थ उत्तर है। उल्लास के रंगों को तो भरपूर बिखेरे पर व्यंग्य और बुराई का कीचड़ न उछलने दें। जीवन में जूझने का हौसला पैदा करें। निराशा-हताशा और थकान क्यों? जब भगवान् नृसिंह स्वयं हम पर कृपा करने के लिए तैयार हैं तो आखिर डर और भय किसलिए। सघन संवेदना और प्रचण्ड पराक्रम के रंगों से ऐसी होली खेलें कि नफरत की होलिका अपने ही षड़यंत्र में जल कर राख हो जाए और भय और आतंक को फैलाने वाला हिरण्यकश्यपु की छाती खुद भय से फट जाय। इस होली पर अपने चिंतन और आचरण से सिद्ध करें कि हम भगवान् नृसिंह के भक्त है प्रह्लाद के अनुगामी हैं। और हममें बरसाने में होली के रंगों की छटा बिखेरने वाले गीता गायक कृष्ण के उपदेशों पर चलने का साहस है।
तीन पथिक पहाड़ी की ऊपरी चोटी पर लंबा रास्ता पार कर रहे थे। धूप और थकान से उनका मुँह सूखने लगा। प्यास से व्याकुल हो उनने चारों ओर देखा, पर वहाँ पानी न था। एक झरना बहुत गहराई में नीचे बह रहा था। एक पथिक ने आवाज लगाई, “हे ईश्वर, सहायता कर हम तक पानी पहुँचा।” दूसरे ने पुकारा, “हे इंद्र, मेघमाला ला और जल बरसा।” तीसरे पथिक ने किसी से कुछ नहीं माँगा और चोटी से नीचे उतर तलहटी में बहने वाले झरने पर जा पहुँचा और प्यास बुझाई।
दो प्यासों की आवाजें अभी भी सहायता के लिए पुकारती हुई पहाड़ी को प्रतिध्वनित कर रही थीं, पर जिसने आत्मावलंबन का साहस किया, वह तृप्तिलाभ कर फिर आगे बढ़ चलने में समर्थ हो गया।
आत्मावलंबी किसी अनुग्रह, वरदान की प्रतीक्षा नहीं करते, न ही याचना, वरन् प्रगति का पथ स्वयं बनाते हैं। अपनी सहायता आप करते हैं।
भगवान् महाकाल के दिव्य स्वरूप को प्रकट करने व साधकों को अनेकों वरदान देने महाशिवरात्रि आ गयी। महाशिवरात्रि अनेकानेक पर्वों के क्रम में आने वाला सामान्य पर्व नहीं है। यह साधना का परम दुर्लभ योग है। जिसमें उपवास और उपासना करने वाले पर देवाधिदेव महाकाल की कृपा बरसती है। भगवान् भूतभावन उस पर प्रसन्न होते हैं। सदाशिव-महामृत्युञ्जय उसका कल्याण करते हैं। इस महापर्व के बारे में शास्त्रों में कहा गया है कि एक बार कैलास शिखर पर माता पार्वती ने भोलेनाथ से पूछा-
कर्मणा केन भगवन् व्रतेन तपसायि वा। धर्मार्थ काममोक्षाणाँ हेतुस्त्वं परितुष्यति॥
हे भगवन्! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के हेतु तुम्हीं हो। साधकों की साधना से संतुष्ट हो, तुम्हीं इन्हें प्रदान करते हो। अतएव यह जानने की इच्छा होती है कि किस कर्म, किस व्रत या किस प्रकार की तपस्या से तुम प्रसन्न होते हो?
इसके उत्तर में प्रभु ने कहा-
फाल्गुने कृष्ण पक्षे या तिथिः स्याच्च्तुर्दशी। तस्यो या तामसी रात्रिः सोच्यते शिवरात्रिका॥ तत्रोपवासं कुर्वाणः प्रसादयति माँ ध्रुवम्। न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया॥ तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः॥
फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आश्रय कर जिस अन्धकारमयी रजनी का उदय होता है, उसी को शिवरात्रि कहते हैं। उस दिन जो उपवास करता है, वह निश्चय ही मुझे संतुष्ट करता है। उस दिन उपवास करने से जैसा प्रसन्न होता हूँ, वैसा स्नान, वस्त्र, धूप और पुष्प के अर्पण से भी नहीं होता।
इन शास्त्र वचनों में अनेकों गूढ़ार्थ संजोये हैं। इन्हें सही ढंग से जाने और समझे बिना प्रयोजन पूरा नहीं होता। कहा भी गया है- ‘अज्ञात ज्ञापकं हि शास्त्रम्’ जो ज्ञात नहीं है उसे ज्ञात करा दे, यही शास्त्रों का कार्य है। शिवरात्रि के उपवास-अनुष्ठान में शास्त्र का कौन सा गूढ़ उद्देश्य है, वह किस अज्ञात तत्त्व की ओर संकेत कर रहा है, यह हमें जरूर जानना चाहिए। अन्यथा हम महाशिवरात्रि की परम दुर्लभ साधना का लाभ न उठा सकेंगे। और यह दुर्लभ सुयोग व्यर्थ चला जायेगा। भगवान् महाकाल के वरदान हम पा न सकेंगे।
इन वरदानों को पा सकें इसके लिए आवश्यक है कि महाशिवरात्रि के उपवास के मर्म को समझें। उपवास में दो तत्त्वों का समावेश है। प्रथम वह है जो उपवास के शब्द से ध्वनित होता है-‘आहारनिवृत्तिरुपवासः’ यानि कि आहार से निवृत्ति अथवा निराहार रहना ही उपवास है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि आहार का मतलब केवल भोजन नहीं है। शास्त्रकार कहते हैं-‘अह्नियवे मनसा बुद्धया इन्द्रियैर्वा इति आहारः’ मन, बुद्धि अथवा इन्द्रियों के द्वारा जो बाहर से भीतर आहृत-संग्रहीत होता है, उसी का नाम आहार है। इस निराहार रहने का मतलब यह हुआ कि हम न केवल भोजन का त्याग करें बल्कि कल्पना, भावना और विचारों से भी साँसारिकता को भी छोड़ दें। साँसारिक विषय वासना या प्रपंच के किसी भी स्पन्दन को अपनी अन्तर्चेतना में प्रवेश न करने दें।
उपवास का दूसरा तत्त्व उसके धातु मूलक अर्थ से ध्वनित होता है। यह अर्थ है अपने आराध्य के समीप होना और यह समीपता हमें प्रभु के स्वरूप चिंतन से ही मिल सकती है। भगवान् महाकाल के दिव्य स्वरूप के रहस्य पर ध्यान करने से मिल सकती है। इस तरह महाशिवरात्रि में किये जाने वाले उपवास की सार्थकता तभी है जब हम शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि से किसी बाहरी और संसारी तत्त्व को न ग्रहण करते हुए प्रतिपल-प्रतिक्षण भगवान् महाकाल की महिमा का चिंतन करें।
उन भगवान् महेश्वर की महिमा भला माँ माहेश्वरी के सिवा और कौन जानेगा? शिवतत्त्व का बोध कराते हुए माँ के वचन हैं-
स आदिः सर्वजगताँ कोऽस्य वेदान्वयं ततः। सर्वजगद्धयस्य रुपं दिग्वासाः कीर्त्यते ततः॥
गुणत्रयमयं शूलं शूली यस्माद्विभर्ति सः। अबद्धा सर्वतो मुक्ता भूता एव स तत्पतिः॥
श्मशान वापि संसारस्तद्वासी कृपयार्थिनाम्। भूतयः कथिता भूतिस्ताँ विभर्त्तिसम्तिभृत॥
वृषो धर्म इति प्रोक्तस्तमा रुढ़स्ततो वृषी। सर्पाश्च दोषाः क्रोधाद्यास्तान विभर्त्ति जगन्मयः॥
नाना विधान् कर्मयोगाञ्जटारुपान् विभर्त्तिसः। वेदत्रयी त्रिनेत्राणि त्रिपुरः त्रिगुण वपुः॥
भस्मी करोति तद्देवस्त्रिपुरः स्मृतः। एवं विधं महाकालं विदुर्ये सूक्ष्मदर्शिनः॥
देवाधिदेव प्रभु जगत् के आदि हैं, फिर उनके वंश का वृत्तांत कौन जान सकता है? समस्त जगत् उनका स्वरूप है, इसीलिए वे दिगम्बर हैं। वे त्रिगुणात्मक शूल धारण करते हैं, इसीलिए उन्हें शूली कहते हैं। वे पंचभूतों से बद्ध नहीं बल्कि सर्वथा मुक्त हैं, इसीलिए वे भूतगणों के अधिपति है। यह संसार ही श्मशान है, प्रभु अपने भक्तों के प्रति कृपा करके इसमें वास करते हैं। उनकी विभूति (राख) ही सबको विभूति (ऐश्वर्य) प्रदान करती है। इसीलिए वे विभूति को अपने शरीर पर धारण करते हैं। धर्म ही वृष है और उस पर आरुढ़ होने के कारण वे वृषभवाहन हैं। क्रोधादि दोष समूह ही सर्प हैं, जगन्मय महेश्वर इन सबको वशीभूत करके इन्हें भूषण के रूप में धारण करते हैं। विविध क्रियाकलाप ही जटाएँ हैं, इन्हें धारण करने के कारण वे जटाधारी हैं। त्रिगुणमय शरीर ही त्रिपुर है, इसे भस्मसात् करने के कारण ही प्रभु त्रिपुरदन हैं। जो सूक्ष्मदर्शी पुरुष इस प्रकार के भगवान् महाकाल के स्वरूप को जानते हैं, वे भला उन्हें छोड़कर और किसकी शरण में जायेंगे।
महाशिवरात्रि के पुण्य क्षणों में सम्पूर्ण रीति से उपवास करते हुए महेश्वर महाकाल का चिंतन भक्तों को उनका मनवाँछित देने वाला है। महाकाल इस समस्त सृष्टि के अधिष्ठाता व नियामक हैं। वे काल के भी अधीश्वर होने के कारण महाकाल के रूप में जाने जाते हैं। उन्हीं के इंगित से युग परिवर्तित होते हैं और सृष्टि अपना क्रम बदलती है। उनकी शक्ति से ही युग प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया गतिमान होती है। समय-समय पर वे ही प्रभु ‘सम्भवामि युगे-युगे’ की अपनी चिरंतन प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए इस धरा पर अवतरित होते हैं। उनकी अवतार बेला में अनेकों लीला सहचर उनसे जुड़ते और कृतार्थ होते हैं। उनकी महत् चेतना के स्पर्श से युग बदलता और धरा धन्य होती है।
इस वर्ष की महाशिवरात्रि के महापर्व पर वे ही भगवान् महाकाल शान्तिकुञ्ज के देवसंस्कृति विश्वविद्यालय परिसर में अपने विग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हो रहे हैं। विश्वविद्यालय परिसर में उनकी यह प्रतिष्ठ, विचारक्रान्ति अभियान के सर्वथा नवीन आयाम की प्रतिष्ठ है। महेश्वर महाकाल द्वारा संचालित युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया में नयी सम्भावनाओं की प्रतिष्ठ है। यह भक्तों के लिए भगवान् महाकाल के नये वरदानों का आगमन है। महाशिवरात्रि के पुण्य क्षणों में निराकार भगवान् के इस साकार रूप का अर्चन भक्तों और साधकों के जीवन में अनेकों अनुदानों का अनुग्रह प्रदान करेगा। इन पुण्य क्षणों का लाभ उठाने से कोई कहीं चुके नहीं।
लगभग दो हजार वर्ष पूर्व एक बौद्ध मतावलंबी संत ज्ञानार्जन के लिए भारत आया। उसने अनेक विद्यापीठों और विश्वविद्यालयों में रहकर भारतीय दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया। वह आया तो केवल कुछ ही समय के लिए था, किंतु जब उसमें उसे भारतीय ज्ञान के स्तर खुलते मिले, तब उसकी ज्ञान−जिज्ञासा इतनी बलवती हो उठी कि भारत में जमकर लगभग बारह साल तक दर्शन का अध्ययन पूरा करने के बाद वह अनेक दुर्लभ ग्रंथों की पाँडुलिपियाँ अपने साथ लेकर अपने देश चीन लौट चला। वह नाव द्वारा जलमार्ग से अपने देश चीन को वापस जा रहा था। लगभग आधी यात्रा के बाद तूफान आ गया। नाव में पानी भर गया और वह बोझिल होकर बैठने लगी।
उस संत के साथ वाले भारतीय छात्र उस आसन्न अंत के समय भी अधीर न होकर ज्ञानग्रंथों तथा विद्यान अतिथि की रक्षा का उपाय सोचने लगे। पूछने पर मल्लाह ने बतलाया कि यदि एक−आध को छोड़कर बाकी सब लोग नाव को रिक्त कर दें तो नाव पार लग सकती है। बस, फिर क्या था, सारे छात्रों ने सिंधु के अथाह जल में कूदकर आत्मबलिदान कर दिया।
समाज, देश और संस्कृति के ऐसे रक्षक ही जनमानस के सच्चे प्रेरणा−स्त्रोत हैं। इनकी परमार्थ निष्ठा से ही समाज और संस्कृति सुविकसित होती, फूलती और फलती हैं।
स्वादिष्ट भोजन, बस यही उनकी कमजोरी थी। सारी जीवन चेतना जैसे जिह्वा में आ केन्द्रित हुई थी। खाना, फिर खाना और उसके बाद भी खाते रहना। इसका परिणाम भी कुछ ऐसा ही था-सोना, फिर सोना और उसके बाद भी सोते रहना। भोजन और शयन के इस अतिरेक के कारण कई बीमारियों ने उन्हें घेर लिया था। सम्राट होने के कारण उन्हें जिन्दगी की सारी सुविधाएँ उपलब्ध थीं। पर इन सुविधाओं का उपयोग पहले बीमारी के साधन जुटाने में और फिर उनके समाधान ढूंढ़ने में ही होता था। हमेशा चिकित्सक उन्हें घेर रहते। स्थूल देह भारी-भरकम हो गयी थी। उसमें न आभा रही थी। बस एक मुर्दा लाश की तरह हो गया था जीवन।
ऐसे जीवन के क्षण-क्षण गुजारते हुए वह जिस किसी तरह जिए जा रहे थे। तभी खबर मिली कि भगवान तथागत अपने भिक्षु संघ के साथ राजधानी में पधारे हैं। जन-जन उनके दर्शनों के लिए उमड़ पड़ा है। सभी जा रहे हैं। ऐसे में तो जाना ही पड़ेगा। उन्होंने सोचा कि न जाने पर तो बड़ी फजीहत होगी। जनता जाए और वहाँ का राजा न जाए तो सब यही सोचेंगे कि बड़ा अधार्मिक राजा है। सलाहकारों ने भी उन्हें यही समझाया, जाना तो पड़ेगा ही सम्राट, नहीं तो प्रतिष्ठा में बट्टा लगेगा। अगर लोगों को पता लग जाए कि राजा अधार्मिक है तो सम्मान कम हो जाने का खतरा तो है ही।
पर मेरे भोजन का क्या होगा? सम्राट के माथे की लकीरें इस प्रश्न चिह्न के साथ गहरी हो गयीं। बुद्ध को पता नहीं घण्टा भर सुनना पड़े, डेढ़ घण्टा सुनना अथवा फिर दो ढाई घण्टा सुनना पड़े। न जाने कितनी देर बुद्ध बोले और न जाने कितनी देर वहाँ रुकना पड़े। हाँ सो तो सही है, कुछ चापलूस सलाहकारों ने उनकी हाँ में हाँ मिलाई और कुछ चतुर समझे जाने वाले ने लगे हाथ सलाह भी दे डाली, महाराज! आप तो खूब डट कर भोजन कर लीजिए। यह सलाह अपने मन मुताबिक होने के कारण उन्हें जम गयी। सो अन्य दिनों की तुलना में उन्होंने कुछ अधिक ही भोजन किया। इस अधिक भोजन के पश्चात कहीं आने-जाने की सामर्थ्य तो बची न थी-फिर भी प्रतिष्ठा की लाज और लोभ से वह भगवान तथागत की धर्म सभा में पहुँच गए।
सम्राट होने के कारण उन्हें भगवान के सामने ही बैठाया गया। थोड़ी देर में ही भगवान् की अमृत वाणी का प्रवाह बह चला। ज्ञान, विवेक, वैराग्य की अनेकों तरंगें जन-मन को संस्पर्शित-संवेदित करने लगी। लेकिन सम्राट स्वयं इस अमृत वर्षण से अछूते थे। उन्हें तो अधिक भोजन के कारण बार-बार नींद के झोंके आ रहे थे। उन्हें फुरसत ही कहाँ थी। वह न तो बुद्ध को सुनने आये थे, न उनकी सुनने की स्थिति थी। इतना खाना खाकर आये थे कि बैठते ही नींद से झूमने लगे। दूसरे तो आनन्द में झूम रहे थे और वह नींद में झूम रहे थे।
करुणापुञ्ज भगवान बुद्ध उनकी यह दशा देखकर करुणा से विगलित हो उठे। मानव जीवन जो विभूतियों, उपलब्धियों एवं शक्तियों का अक्षय कोष है, उसकी इस सम्राट कहे जाने वाले व्यक्ति ने इस कदर दुर्दशा कर रखी है। अपनी सम्पदा को इसने अपनी लिए विपदा बना लिया है। सारे साधन इसके लिए न तो साधना न बन सके न समाधान सिद्ध हो सके। उन्हें बड़ी दया आयी। झपकियों में झूमते सम्राट को उन्होंने पुकारा, महाराज? क्या ऐसे ही जीवन गँवा देना है। जागना नहीं है? बहुत गयी, थोड़ी बची है, अब तो होश सम्भालो सम्राट प्रसेनजित। भोजन जीवन नहीं है। इस परम अवसर को ऐसे ही मत गँवा दो।
भगवान के इन वचनों से सम्राट प्रसेनजित की निद्रा में थोड़ा व्यतिरेक हुआ। वह बोले- प्रभु सब दोष भोजन का है-मानता हूँ , इसके कारण ही मेरा स्वास्थ्य भी सदा खराब रहता है। तन्द्रा भी बनी रहती है। प्रमाद और आलस्य भी घेरे रहता है। और इसके बाहर होने का कोई मार्ग भी नहीं दिखाई पड़ता। सारा दोष भोजन का ही है भगवान।
प्रसेनजित के इन वचनों को सुनकर बुद्ध की करुणा भी सघन हो गयी। वह बोले- अरे सम्राट! प्रज्ञावान बनो, भला भोजन का दोष कैसे हो सकता है? अपने दोष को भोजन पर टाल रहे हो। भोजन जबरदस्ती तो आपके पेट में नहीं चला जाता। परन्तु भगवान के यह वचन भी सम्राट को बोध न दे सके। वह सफाई में कह उठे- मेरी समझ में तो भगवान सब दोष भोजन का है। इसके कारण ही सब उलझन हो रही है। इससे बाहर आने का कोई उपाय भी नहीं दिखता है।
अपने वचनों से बोधिज्ञान का वरदान देने वाले भगवान सम्यक्-सम्बुद्ध बोले- दोष भोजन का कैसे हो सकता है वत्स! तनिक विचार तो करो, दोष बोध का है। तुम्हें पता है कि स्वास्थ्य खराब हो रहा है, तुम्हें पता है आलस्य आ रहा है, तुम्हें पता है। जीवन व्यर्थ जा रहा है लेकिन यह बोध तुम भोजन करते वक्त सम्भाल नहीं पाते। यह बोध भोजन कर लेने के बाद तुम्हारे पास होता है। लेकिन जब भोजन करते हो तब चूक जाता है।
ऐसे में मैं क्या करूं भगवान? प्रसेनजित की उलझन थोड़ी गहरी हुई। बुद्ध मुस्काते हुए बोले- उपाय तो है परन्तु शायद तुम से हो न सके। ऐसे कहते हुए उन्होंने पास खड़े हुए सम्राट के अंग रक्षक सुदर्शन की ओर देखते हुए कहा-वत्स सुदर्शन! कैसे अंगरक्षक हो तुम। जिस अंग की रक्षा के लिए तुम नियुक्त हो, वह तो सब खराब हुआ जा रहा है। क्या रक्षा कर रहे हो तुम अपने सम्राट के शरीर की। अबसे ध्यान रखो जब तुम्हारे सम्राट भोजन के लिए बैठे तो ठीक सामने खड़े हो जाना और उन्हें याद दिलाते रहना कि ध्यान रखो-याद करो, बुद्ध ने क्या कहा था। चूकना मत अपने इस कर्त्तव्य में। तुम्हारे इस कर्त्तव्य पालने में सम्राट तुम पर नाराज हो तो तुम्हें दण्डित करने की धमकी भी देंगे, पर तुम बिना घबराए अपना दायित्व निभाना।
बुद्ध के ये वचन सुदर्शन के अंतस् में गहरे उतर गये। उसे यह बात जमी कि वह अंगरक्षक तो है ही और उसकी आँखों के सामने सम्राट का शरीर खराब होता जा रहा है। वह देह जिसकी रक्षा के लिए वह नियुक्त है। वह डट गया अपने कर्त्तव्य में। प्रसेनजित की नाराजगी उस पर बढ़ती गयी। जब भी ज्यादा खाने की कोशिश करते, वह बोल पड़ता-याद करो बुद्ध के वचन। डाँटने पर भी वह याद दिलाए जाता। धीरे-धीरे इसका परिणाम होने शुरू हुआ।
थोड़ा-थोड़ा बोध जगने लगा। नाराज होने के बाद प्रसेनजित क्षमा भी माँग लेते। धीरे-धीरे उनका भोजन और जिह्वा पर नियंत्रण होने लगा। भगवान तीन महीने उस नगर में रुके थे। प्रसेनजित जब दुबारा आए तो वह एकदम बदले हुए थे। उनके चेहरे की आभा लौट आयी थी। तेजस्विता फिर वापस आ गयी थी। उनका मन अपने अंगरक्षक सुदर्शन के प्रति भी अनुग्रह से भरा हुआ था। उन्हें इस तरह स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त देखकर भगवान ने यह धम्मगाथा कही-
आरोग्य परमालाभा संतुद्वी परमं धनं। विश्वास परमा बन्धु निब्बानं परमं सुखं॥
आरोग्य सबसे बड़ा लाभ है। संतोष सबसे बड़ा धन है। विश्वास सबसे बड़ा बन्धु है और निर्वाण सबसे बड़ा सुख है।
इस धम्मगाथा को सुनकर सभी उपस्थित जन भाव-विभोर हो गए। भगवान अपने वचनों से सभी को परम आरोग्य का लाभ देने आये हैं, यह उन्हें अनुभव हो रहा था। क्योंकि आरोग्य केवल शारीरिक स्वास्थ्य भर नहीं है। यह तो शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक तलों पर सभी स्तरों से मुक्ति है। भगवान बुद्ध को अपने चिकित्सक के रूप में पाकर प्रसेनजित कृतार्थ हो रहे थे। यह कृतार्थता के भाव बरबस उनकी वाणी से फूट पड़े-‘नमामि देवं भवरोग वैद्यं।’
कथा में युवक ने सुना, “भगवान सबको रोटी देते हैं।” युवक को बात जँच गई। उसने काम पर जाना बंद कर दिया। जो पूछता, यही उत्तर देता, “भगवान जब रोटी देने ही वाले हैं तो मेहनत क्यों करूं?” एक ज्ञानी उधर से निकले। मतिभ्रम ग्रस्त लड़के की हालत समझी और प्यार से दूसरे दिन सवेरे उसे अपने पास बुलाया और कुछ उपहार देने को कहा। युवक भावुक था। सवेरे ही पहुँच गया। ज्ञानी ने पूछा, “कैसे आए?” उसने उत्तर दिया, “पैरों से चलकर।” ज्ञानी ने उसे मिठाई उपहार में दी और कहा, “तुम पैरों से चलकर मेरे पास तक आए, तभी मिठाई पा सके। ईश्वर रोटी देता तो है, पर देता उसी को है जो हाथ−पैरों के पुरुषार्थ से उसे कमाने और पाने के लिए चलता है। जब मेरा मिष्ठान्न तुम बिना पैरों से चले प्राप्त नहीं कर सके तो भगवान द्वारा दी जाने वाली रोटी कैसे प्राप्त कर सकोगे?” युवक को अपनी भूल प्रतीत हुई।
पुष्प वृक्ष के हृदय का आनन्द है, उल्लास है। वृक्ष अपने आनन्द की अभिव्यक्ति पुष्पों के माध्यम से करता है। पुष्प को सुमन भी कहा जाता है। इसकी व्युत्पत्ति करते हुए महाभारत में कहा गया है-
मनो ह्लदयने यस्माचिछरयं चापि दधाति च। तस्मात् सुमनसः प्रोक्ता नरैः सुकृतमभिः॥
अर्थात् पुष्प मन को आह्लादित करते हैं तथा शोभा और सम्पत्ति का आधार है। अतः पुण्यात्माओं ने इन्हें सुमन कहा है।
भारतीय जीवन में पुष्पों का अत्यधिक महत्त्व है। किसी न किसी रूप में इसका उपयोग सभी जगह होता है। प्राचीन मान्यता है कि पुष्प की सुगन्ध से देवता प्रसन्न होते हैं। उसको देखकर यक्ष और राक्षस तुष्ट होते हैं। नाग उसका उपभोग करके ही तृप्त होते हैं। परन्तु मनुष्य गंध, दर्शन और उपभोग तीनों से ही आनन्दित और खुश होते हैं। चूँकि देवता गन्ध प्रिय होते हैं। अतः गन्धवा के पुष्प देवताओं को प्रिय होते हैं। कहा भी गया है- ‘इष्ट गन्धानि देवानाँ पुष्पाणीति विमावय।’ काँटों से रहित वृक्षों के श्वेतवर्ण वाले पुष्प देवताओं को बहुत भाते हैं। इसी कारण कमला, तुलसी और चमेली की प्रशंसा की जाती है।
अथर्ववेद में इस तथ्य का और भी रोचक वर्णन किया है। इसमें उल्लेख है कि जिन पुष्पों के वृक्षों में काँटे अधिक हों, जो सख्त हों, जिसको रंग गहरा लाल या काला तथा जिनकी गन्ध का प्रभाव तीव्र हो, ऐसे पुष्प प्रेतों को अर्पित किये जाते हैं। महाभारत के अनुसार कमला और उत्पल आदि पुष्प नागों को और यक्षों को समर्पित किये जाते हैं। भिन्न-भिन्न देवात्माओं के लिए प्रयुक्त पुष्प भिन्न-भिन्न होते हैं। आम की मञ्जरी से कामदेव की पूजा की जाती है। शिव जी को पुष्कर बीज माला एवं धतूरे का फूल पसन्द है। आक पुष्पों से उनके पाँच प्रमुख गणों की पूजा की जाती है। पार्वती अपने कण्ठ में कनेर की पुष्पों की माला धारण करती हैं। देव विग्रहों पर चन्दन के पुष्प चढ़ाये जाते हैं। सूर्य अर्चना कुटज (कट सरैया) से करने का विधान है। विद्याधर गण दिव्य मंदान्त पुष्पों को सूर्य देव को समर्पित करते हैं।
महाभारत में वनमालाधारी भगवान श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिर का पुष्प संवाद उल्लेखनीय है। श्रीकृष्ण अपनी प्रिय एवं पसन्द के पुष्पों का नाम बताते हैं- कुमुद, करवीर, चणक, मालती, जातिपुष्प, नन्धावर्त, नंदिक, पलाश, मृंगक और वनमाला। गुणों के आधार पर सभी प्रकार के फूलों का अपना महत्त्व एवं प्रभाव होता है। परन्तु सभी प्रकार के फूलों से उत्पन्न पुष्प को हजार गुना अच्छा माना गया है। उत्पन्न से बढ़कर क्रमशः पद्म, शतदल, सहस्रदल, पुण्डरिक, तुलसी तथा सौवर्ण आदि हैं।
सभी पुष्प देवार्चन में प्रयोग नहीं होते। वेदव्यास ने त्याज्य एवं वर्जित पुष्पों का नाम बताया है। ये पुष्प हैं-किंकिषी, मुनिपुष्प, धुधूर, पाटल, लाँगुलीजपा, कर्णिकार, अशोक, सेमल, कुसुम, कोविदार, वैभीतक, कुरंटक, कल्पक, कालक, अंकोल, गिरिकर्णी, नीले रंग के फूल और पंखुड़ी वाले फूल। नीम पुष्प को भी अच्छा नहीं माना जाता। जो फूल श्मशान या अपवित्र स्थान पर उत्पन्न हुए हों उनको भी उपयोग नहीं करना चाहिए।
पुष्प तो साहित्य का हृदय है। यह कोमल भावनाओं का प्रतीक है। वकुल या मौलश्री की माला का उपयोग धार्मिक कृत्यों में भी किया जाता है। जयमाला के रूप में यह काम आता है। नाटककार भवभूति के ‘मालती माधवम्’ में इसका रोचक वर्णन मिलता है।
शिखि का फूल शृंगार के लिए प्रसिद्ध है। महाकवि शुद्रक ने अपने लोकप्रिय नाटक ‘मृच्छकटिकम्’ में लाल-लाल कुसुम, कल्कीपोवाली, करवीर की माला का उल्लेख किया है, जो प्राण दण्ड के समय पहनायी जाती है। कवि कुलगुरु कालिदास ने अपने कालजयी नाटक ‘अभिज्ञानशाँकुन्तलम्’ में पुष्पों का बड़ा ही मनोरम चित्रण किया है। उन्होंने पुष्प के माध्यम से प्रकृति एवं मानव के प्रगाढ़ मैत्री एवं घनिष्ठ सम्बन्धों को जितना सुन्दर तथा प्रभावोत्पादक ढंग से संजोया है, उतना अन्यत्र दुर्लभ है। उनके ‘अभिज्ञानशाँकुन्तलम्’ की नायिका शकुंतला को पुष्प प्राण से भी प्रिय हैं। कालिदास शकुंतला के सौंदर्य का जीवन्त उदाहरण देते समय ‘कुसुमभिवलोभनीयम्’ उक्ति के माध्यम से सौंदर्य जगत् में पुष्पों को उच्च से उच्चतर श्रेणी प्रदान करते हैं।
इसी कारण लोक जीवन में पुष्पों को मानव से अभिन्न माना गया है। पुष्पों में भी सहज, सरल मानवीय संवेदनाओं का समावेश कर निकटता स्थापित की गयी है। क्योंकि जीवन की जटिलताओं से अशान्त मन को पुष्पों ने अगाध आत्मीयता व स्नेह दिया है। इसी कारण मनुष्य किसी बाग-बागान में जाकर भिन्न-भिन्न रंगों के पुष्पों के संग बड़ी ही शान्ति व प्रसन्नता का अनुभव करता है। वहाँ जाकर वह अपने समस्त दुःख-पीड़ा व कष्ट कठिनाइयों को भूलकर फूलों के समान सहज, सरल व भावपूर्ण हो जाता है। पुष्प हमारी कल्पनाओं को नव रंग से भर देते हैं, उसकी ऊँची उड़ान के लिए प्रेरणा भरते हैं साथ ही यथार्थ जीवन में जीने के लिए नया उत्साह व उमंग प्रदान करते हैं। इस प्रकार पुष्पों में मस्त, संतप्त, हर्ष, उल्लास, अनुराग, विराग, विरह, मिलन, शृंगार सभी कुछ की एकरूपता दृष्टिगोचर होती है।
पुष्प सुकोमल संवेदना और पवित्र भावनाओं के प्रतीक एवं पर्याय हैं। सुख-दुःख के साँसारिक चक्र में डूबते-उतरते मानव का मन इसे देख के हर्षित हो उठता है, भावनाएँ प्रफुल्लित हो उठती हैं। यह मानव जीवन के यथार्थता को बोध कराता है कि हे मानव! तुम महान् एवं दिव्य हो और तुम्हारी दिव्यता निराशा के घने कुहासे में भटक जाने में नहीं है, उदासी की कालिमा में मलिन हो जाने के लिए नहीं है वरन् श्रेष्ठ आदर्शों और उच्चतम लक्ष्य के लिए मेरे समान मुस्काते हुए समर्पित हो जाने में है। पुष्प की मुस्कुराहट मानव जीवन के लिए एक गहरी सीख है, एक पवित्र धरोहर है। इसकी कोमल भावनाओं, सजल संवेदनाओं को यदि हम अपने हृदय में संचरित कर सकें तो जीवन धन्य हो उठेगा। देवार्चित पुष्प के समान हमारा जीवन भी प्रभु के चरणों में उल्लास, आनन्द के संग समर्पित हो सके तो ही इसका उपादेयता एवं उपयोगिता है।
एक गुरु के दो शिष्य थे। दोनों बड़े ईश्वरभक्त थे। ईश्वर उपासना के बाद वे आश्रम में आए रोगियों की चिकित्सा में गुरु की सहायता किया करते थे। एक दिन उपासना के समय ही कोई कष्टपीड़ित रोगी आ पहुँचा। गुरु ने पूजा कर रहे शिष्यों को बुला भेजा तो शिष्यों ने कहा, “अभी थोड़ी पूजा बाकी है, पूजा समाप्त होते ही आ जाएँगे।” गुरुजी ने दुबारा फिर आदमी भेजा। इस बार शिष्य आ गए, पर उन्होंने अकस्मात् बुलाए जाने पर अधैय व्यक्त किया। गुरु ने कहा, “मैंने तुम्हें इस व्यक्ति की सेवा के लिए बुलाया था, प्रार्थनाएँ तो देवता भी कर सकते हैं, किंतु अकिंचनों की सहायता तो मनुष्य ही कर सकते हैं। सेवा प्रार्थना से अधिक ऊँची है, क्योंकि देवता सेवा नहीं कर सकते।”
शिष्य अपने कृत्य पर बड़े लज्जित हुए और उस दिन से प्रार्थना की अपेक्षा सेवा को अधिक महत्त्व देने लगे।
अमेरिका के एक वैज्ञानिक के दिमाग में एक बार एक विलक्षण विचार कौंधा। उसने सोचा कि यदि अपने शरीर को मेंढ़कों की शीत और ऊष्ण निष्क्रियता की तरह सुषुप्तावस्था में ले आया जाए तो फिर अनेक वर्ष बाद जागने पर कैसी अनुभूति होगी? यह जानने के लिए एक इंजेक्शन लगाकर अपने शरीर को प्रशीतित (डीप फ्रीज) कर लिया। इस क्रिया से पूर्व उसने अपनी पत्नी को संपूर्ण प्रक्रिया समझा दी थी और बता दिया था कि जब उसकी (पत्नी की) उम्र 50 वर्ष की हो जाए तो वह दूसरा इंजेक्शन उसकी देह में लगा दे। प्रशीतन क्रिया समाप्त हो जाएगी और वह जग पड़ेगा।
ऐसा ही किया गया। ठीक 50वें वर्ष पत्नी ने ताबूत में मृतप्राय बंद प्रति की काया में सुई लगा दी। धीरे−धीरे शरीर में प्राणचेतना लौट आई वह जग पड़ा। जगते ही उसकी दृष्टि पत्नी पर पड़ी। उसका झुर्रीदार चेहरा, सिर पर की श्वेत केशराशि उसकी अधेड़ावस्था का स्वयं बखान कर रही थी। इसके उपराँत उसने स्वयं को निहारा। वह 25 वर्ष का नवयुवक प्रतीत हो रहा था। इससे वह रोमाँचित हो उठा और गदगद अनुभव करने लगा। वह अपने प्रयोग में पूर्ण सफल रहा था।
यह किसी सचमुच के प्रयोग का प्रसंग नहीं, एक विज्ञान कथा के लेख का अंश है। अब वैज्ञानिक इसी तर्ज पर मनुष्य को लंबी उम्र देने की दिशा में अनुसंधानरत हैं, जिसमें उनने कुछ सफलता भी हस्तगत की है। पिछले दिनों इस तरह के प्रयोग बंदरों पर किए गए। कैलिफोर्निया की ‘बायोटाइम’ अनुसंधान कंपनी ने कुछ बंदरों को बरफ द्वारा प्रशीतित करने के कुछ घंटे पश्चात उन्हें फिर से जीवित कर दिया। इससे वैज्ञानिकों का उत्साह बढ़ा और अब वे उन्हें कई दिनों तक प्रसुप्तावस्था में रखने का प्रयास कर रहे हैं। इस प्रयोग की विस्तृत जानकारी ‘अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ एंटी एजिंग मेडिसिन’ की वार्षिक बैठक में दी गई। इस प्रक्रिया के मूल में ‘हेक्सटेण्ड’ नामक एक रसायन है। यह रसायन उन प्राणियों के रक्त का स्थान ग्रहण करता है, जिन्हें लम्बी नींद सुलानी है। उनके शरीर से रक्त को निकालकर उसकी जगह उक्त रसायन को भर दिया जाता है। देह में इसे प्रविष्ट कराने का एक विशेष कारण यह है कि शरीर को मूर्च्छित कर जब उसे 1 डिग्री सें0 ग्रे0 तक ठंडा किया जाता है, तब इस अत्यधिक ठंड से ऊतकों को हानि पहुँचने की संभावना रहती है। हेक्सटेंड शरीर के ऊतकों में पहुँचकर उक्त संभाव्यता को निरस्त कर देता है। इस संबंध में अनुसंधान दल के प्रमुख हॉल र्स्टनबर्ग का कहना है कि मेंढ़कों में हाइबरनेशन (शीत निष्क्रियता) और एस्टीवेशन (ऊष्ण निष्क्रियता), ध्रुवीय भालुओं में हाइबरनेशन एवं मनुष्यों में ‘समाधि’ में लगभग एक जैसी क्रियाएँ होती हैं। इन सबका गहन अध्ययन हो रहा है और यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि आखिर इनमें शारीरिक क्रियाएँ इतनी मंद क्यों और कैसे हो जाती हैं?
समाधि में तो जीवन के बाह्य लक्षण तक लुप्त हो जाते हैं। इतने पर भी व्यक्ति वर्षों तक जीवित रहता है और यह उसकी इच्छा पर निर्भर करता है कि वह कब इस स्थिति से बाहर आए। यदि रसायनों द्वारा हम यह स्थिति लाने में सफल रहे तो फिर व्यक्ति को लंबी नींद सुलाया जा सकना संभव होगा। इतना ही नहीं, इससे उसकी आयु भी इच्छानुसार बढ़ाना सरल हो जाएगा। इसके अतिरिक्त एक और महत्त्वपूर्ण लाभ यह होगा कि आदमी की कायिक आयु (बायोलॉजिकल एज) को लंबे समय तक स्थिर रखना शक्य हो जाएगा। जब तक शरीर निष्क्रिय स्थिति में रहेगा, तब तक उसकी उम्र भी स्थिर प्रतीत होगी। लंबी निद्रा के बाद जागने पर वह उसी अवस्था का दिखलाई पड़ेगा, जिस आयु और अवस्था का वह सोते समय था।
यहाँ कुछ वैज्ञानिक आयु बढ़ाने की इस प्रक्रिया से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि तात्त्विक दृष्टि से आयु बढ़ाना इसे तभी कहा जा सकेगा, जब व्यक्ति उस अतिरिक्त आयु से लाभ उठाए। जो सोया पड़ा हो, निष्क्रिय दशा में डूबा हुआ हो, वह तो मृत के समान है। जीवन का वह भाग तो कार्य की दृष्टि से निरर्थक ही हुआ। दार्शनिक ढंग से कहें तो यह मनुष्य की मृत्यु है। यथार्थ देहाँत तो एक चिरंतन सत्य है। उसे तो कोई भी रोक नहीं सकता, वह तो हर एक के साथ घटित होगा, पर जो जीते−जी मृतक के समान हैं, वह मरण तो वास्तविक मृत्यु से भी खराब है। फिर वैसे जीवन से क्या लाभ, जहाँ मृत्यु जीवन में ही घटित हो जाए। निष्क्रियता मरण है, सक्रियता जीवन। मनुष्य का मूल्याँकन इस बात पर निर्भर है कि उसने जिंदगी के कितने वर्ष किन−किन महत्त्वपूर्ण कार्यों में गुजारे और उससे समाज का कितना कल्याण हुआ। सवाल यहाँ आयु की दृष्टि से वयोवृद्ध हो जाने का नहीं है। प्रश्न यह है कि हमने उस जीवन के कितने भाग लोक−मंगल में बिताए। मनुष्य का वास्तविक जीवन यही है। हमारी साँसें कितने वर्षों तक चलीं, इस बात पर मनुष्य−जन्म की सार्थकता नहीं समझी जा सकती। यह भी एक प्रकार की निश्चेष्टता है और इसे भी मरण की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। निष्कर्ष यह है कि जो जीवन सक्रिय नहीं, वह निरुपयोगी और बेकार है। उससे पिंड छुड़ाया जाना चाहिए।
यहाँ मन में एक सवाल यह उठता है कि विज्ञान इन जटिल प्रक्रियाओं में क्यों उलझना चाहता है और जो सरल है, प्रत्यक्ष है, उस पर गंभीर अध्ययन क्यों नहीं करता? यहाँ चर्चा योग विज्ञान की, की जा रही है। योग में ऐसा प्रावधान है, जिसके अनुपालन से न सिर्फ वय बढ़ाना संभव है, वरन् कायिक आयु को घटना और स्थिर रखना भी सरल है। विज्ञान यदि योग प्रक्रिया के अध्ययन को अपनाता है तो इससे एक साथ सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी। आयुष्य भी बढ़ेगी, उसे स्थिर भी रखा जा सकेगा और इस क्रम में जीवन सक्रिय भी बना रह सकेगा। निष्क्रिय का दोष पल्ले न बँधेगा। योगी−यती आएदिन इसे अपनाते देखे जाते हैं और अपनी शताधिक आयु को युवकों जैसी बनाए रखते हैं।
एक बार बंगाल के प्रसिद्ध योगी निगमानंद किसी योग्य योग गुरु की तलाश में भटक रहे थे। इस क्रम में एक बार उन्हें एक जंगल से होकर गुजरना पड़ा। वहाँ उन्हें दो कश्मीरी बालाएँ मिलीं। देखने से वे 20 वर्षीय प्रतीत हो रही थीं। निगमानंद को आश्चर्य हुआ कि इतनी कम वय की युवतियाँ एकाकी इस सघन वन में! पूछने पर पता चला कि उन्हें योग विज्ञान में महारत हासिल है और उनकी वास्तविक उम्र 20 वर्ष की, 80 वर्ष है। इस उम्र में जबकि संपूर्ण शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, बाल सन के−से सफेद हो जाते हैं, अंग−अवयवों में शिथिलता आ जाती है, वे महिलाएँ बिलकुल तंदुरुस्त एवं स्फूर्तिवान थीं।
इसे योग विज्ञान का चमत्कार कहना चाहिए कि इसमें कायिक आयु को एक जैसी स्थिति में लंबे काल तक स्थिर रखा जा सकना संभव है। भौतिक विज्ञान अब इसी स्थिति को प्राप्त करने के लिए अपने स्तर पर प्रयास कर रहा है, जिसमें शायद वह कुछ सफल भी हो जाए, पर थोड़ी सफलता मिल जाने का यह अर्थ नहीं कि उसे संपूर्ण सफलता मिल जाएगी और मानवेत्तर प्राणियों पर आजमाया गया प्रयोग मानवों में भी सफल एवं सार्थक कहा जाएगा। पदार्थ विज्ञान के साथ सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह मनुष्य को मुरदे की तरह जिंदा रखना चाहता है। इस कार्य में यदि उसे सफलता मिल भी गई तो उसकी उपयोगिता क्या होगी, यह समझ से परे है।
जीवन का एक−एक क्षण मूल्यवान है। उसका सदुपयोग होना चाहिए, न कि मुरदे की तरह जड़वत् पड़ा रहकर उसे बरबाद किया जाना चाहिए। विज्ञान इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए नई तकनीक की खोज कर रहा है, जबकि कई बार यह अवस्था संयोगवश प्राप्त हो जाती है, तब पता चलता है कि इस प्रकार का जीवन कितना दुःखदायी है। पिछले दिनों ऐसे कई उदाहरण शरीरशास्त्रियों के समक्ष, प्रस्तुत हुए, जिनमें व्यक्ति किन्हीं दुर्घटनाओं का शिकार होकर वर्षों ‘कॉमा’ की स्थिति में पड़े रहे। उनका जीवन शरीरविज्ञानियों और सगे−संबंधियों के लिए भारभूत बना रहा। उनकी सेवा शुश्रूषा में जो समय और साधन व्यय हुआ, उससे कितने ही लोकोपयोगी कार्य किए जा सकते थे, पर संभव न हो सके। यहाँ कहने का यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि ऐसे बीमारों की शुश्रूषा नहीं की जानी चाहिए। कहा मात्र इतना जा रहा है कि विज्ञान यदि किन्हीं प्रक्रियाओं के अंतर्गत व्यक्ति को मिलती−जुलती दशा में लाकर आयुष्य बढ़ाने का स्वाँग रचता है, तो इससे न तो उस व्यक्ति विशेष का हितसाधन होने वाला है और न ही समाज का। यह मात्र एक कौतुक−क्रिया होगी, जिसे हर प्रकार से हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
विगत दिनों इस प्रकार की एक घटना पटना में प्रकाश में आई। हुआ यों कि वहाँ एक महिला लगभग एक वर्ष से ‘कॉमा’ की स्थिति में पड़ी हुई थी। पटना मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों ने उसे सामान्य दशा में लाने के बहुतेरे प्रयास किए, पर सफल न हो सके। अंततः घर वालों को उसे वापस घर ले जाना पड़ा। पिशाच पति को उसकी उक्त दशा पर तनिक भी दया न आई और उसे गर्भवती बना दिया। जड़वत् पड़ी पत्नी प्रतिरोध करती भी तो कैसे, वह तो संज्ञाशून्य पड़ी थी। एक बार पुनः उसे पटना मेडिकल कॉलेज ले जाना पड़ा, जहाँ डॉक्टरों की मशक्कत से उसे सुरक्षित प्रसव कराया गया। इससे यह अंदाज लगाना कठिन नहीं कि यह अवस्था कितनी अप्रिय होती है, जिसमें आदमी को दूसरों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसी स्थिति में काया से अवाँछनीय छेड़छाड़ संभव है? निर्मम व्यक्ति विद्वेष भाव से अथवा प्रतिशोध में आकर शरीर को नुकसान पहुँचाने से हिचकेगा नहीं।
देह को प्रशीतित करके जीवित बनाए रखना एक बात है और उसको गतिशीलता प्रदान करना सर्वथा दूसरी। एक में प्रच्छन्न जीवन है, दूसरी में जीवंतता, गतिशीलता। संसार की हर गतिशील प्रच्छन्न प्रक्रिया हमें प्राणवान बनने का संदेश देती है। यह गति, यह स्पंदन, यह सक्रियता जिसमें जितनी होगी, उसे उतना ही प्राणवान माना जाएगा और समझा जाएगा कि वह अपने जीवन का मालिक आप है। दूसरों की दया पर तो पशु−पक्षी जीते हैं। हम उतना निर्बल क्यों बनें! विज्ञान को यह बात समझनी होगी और आयुष्य−संवर्द्धन संबंधी निर्णय पूर्णतः समाज पर छोड़ देना होगा कि वह उसे स्वीकार करे या अस्वीकार।
स्वास्थ्य संवर्द्धन एवं रोग निवारण की आयुर्वेद चिकित्सा में अनेक विधाएँ है। इनमें रस−भस्मों से लेकर चूर्ण, वटी, अवलेह, आसव, अरिष्ट, क्वाथ आदि सम्मिलित हैं। इनमें से आसव, अरिष्ट तथा क्वाथ क्रमशः अधिक शीघ्र कार्य करते हैं। क्वाथ इन सभी से अधिक उपयोगी पाया गया है। क्वाथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें यदि कोई पदार्थ अहितकर या कम उपयोगी लगे तो उसे छोड़ा जा सकता है और उसके स्थान पर अधिक गुणकारी चीजें मिलाई जा सकती हैं। क्वाथ के घटक द्रव्यों को स्वयं जाँच−परखकर ताजी एवं वीर्यवान स्थिति में एकत्र किया और उनका जौकुट तैयार किया जा सकता है। इसमें नकली दवाओं, पुरानी व सड़ी−गली औषधियों की मिलावट की भी संभावना नहीं रहती। क्वाथ में प्रयुक्त होने वाली अधिकाँश वनौषधियां खेतों, बगीचों एवं वनों, जंगलों में सहज ही उपलब्ध हो जाती हैं। इन्हें गमलों या खेतों में आसानी से उगाया जा सकता है।
इसे एक विडंबना ही कहा जा सकता है कि आधुनिक कैप्सूल, इंजेक्शन, टैबलेट, टॉनिक, सीरप आदि के अधिक प्रचलन के कारण आयुर्वेद की सर्वोपयोगी क्वाथ−चिकित्सा का प्रायः लोप ही हो गया है। आयुर्वेद को पुनरुज्जीवित करने में प्रयासरत ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के वरिष्ठ चिकित्सा विज्ञानियों एवं आयुर्वेद विशेषज्ञों ने इस संदर्भ में गहन अनुसंधान किए हैं। पाया गया है कि क्वाथ−चिकित्सा जीवन का कायाकल्प करने वाली सबसे सरल, सफल व निरापद पद्धति है। अन्यान्य चिकित्सा−उपचारों के कभी−कभी हानिकारक प्रभाव भी देखे जाते हैं, किंतु क्वाथ−चिकित्सा में इस प्रकार का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। अपने मृदु एवं पाचक गुणों के कारण अन्यान्य दवाओं की अपेक्षा यह शीघ्र कार्य करता है। क्वाथ को बनाना और पीना भी सरल है। इसे हर कोई बना सकता है। तीव्र विकारों एवं जड़ जमाकर बैठी असाध्य बीमारियों को दूर करने में क्वाथ−चिकित्सा को अत्यन्त उपयोगी पाया गया है। शारीरिक एवं मानसिक रोगों का शमन−परिशोधन कर जीवन कायाकल्प कर सकने में क्वाथ−चिकित्सा पूर्णरूपेण सक्षम है।
अग्नि की सहायता से उबाली हुई औषधि के काढ़े को ‘क्वाथ’ कहते हैं। श्रृत, काढ़ा, निर्पूह, जुशाँदा, ये सभी नाम क्वाथ के हैं। आयुर्वेद में इसकी गणना पंचकषाय के अंतर्गत की गई है। क्वाथ, हिम, फाँट, कल्क एवं स्वरस या अर्क, इन पाँचों को ‘पंचकषाय’ कहते हैं। ये उत्तरोत्तर हलके होते हैं अर्थात् स्वरस से क्वाथ, क्वाथ से कल्क, कल्क से हिम और हिम से फाँट हलका माना गया है। निर्माण−विधि एवं जलीय मात्रा की घट−बढ़ इनकी प्रमुख विशेषता है।
(1) क्वाथ−आयुर्वेद के अनुसार पानीयं षोडशगुणं क्षुण्णे द्रव्य पले क्षिपेत् अर्थात् एक पल (एक पल=चार तोला, एक तोला=12 ग्राम) जौकुट औषधि लेकर सोलह गुने पानी में मंद आँच पर चतुर्थांश रहने तक उबालें। हलका कुनकुना रहने पर स्वच्छ वस्त्र से छानकर प्रयुक्त करें। इसे क्वाथ या काढ़ा कहते हैं।
(2)हिम−इसमें अभीष्ट मात्रा में अर्थात् 24 ग्राम द्रव्य या औषधि को छह गुने सामान्य जल में पहले दिन शाम को भिगो देते हैं और सुबह हाथ से अच्छी तरह मलकर छान लेते हैं तथा पी जाते हैं।
(3)फाँट−फाँट बनाने के लिए सबसे पहले औषधि द्रव्य से चौगुना पानी लेकर उसे गरम कर लेते हैं। पीछे उसी जल में औषधि−चूर्ण को थोड़ी देर के लिए भिगोकर रखते हैं और फिर पीस−छानकर रोगी को पिला देते हैं।
(4)कल्क−इसमें गीली या सूखी औषधि को सिल पर भाँग की तरह पीसकर उसकी लुगदी तैयार कर लेते हैं। यही कल्क कहलाता है।
(5) स्वरस−इसे अर्क भी कहते हैं। यह कच्ची वनौषधियों को मिल पर कूट−पीसकर कपड़े से निचोड़ एवं छानकर तैयार किया जाता है।
क्वाथ सात प्रकार के होते हैं−(1) पाचन, (2) दीपन, (3) शोधन, (4) शमन (5) संतर्पण (6) क्लेदन एवं (7) शोषण क्वाथ।
(1) पाचन क्वाथ−जिस क्वाथ में पानी उबलते−उबलते आधा रह जाता है, उसे पाचन क्वाथ कहते हैं। इस प्रकार के क्वाथ दोषों को पचाते हैं, इसलिए ज्वर आदि में इसे पहले दोषों को पचाने के लिए देते हैं।
(2) दीपन क्वाथ−जिस क्वाथ में पानी उबलते−उबलते दसवाँ भाग शेष रहे, उसे दीपन क्वाथ कहते हैं। यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है।
(3) शोधन क्वाथ−जिसमें पानी उबलते−उबलते बारहवाँ भाग शेष बच रहे, उसे शोधन क्वाथ कहते हैं। यह मल का शोधन करता है।
(4) शमन क्वाथ−इसमें पानी उबलते−उबलते आठवाँ भाग शेष बच रहता है। यह रोगों को शाँत करता है। पाचन क्वाथ देने से दोष परिपक्व होते हैं, तत्पश्चात शमन क्वाथ पिलाते हैं, जिससे दोष शाँत हो जाता है। कच्चे दोषों में इसे नहीं देना चाहिए।
(5) संतर्पण क्वाथ−जिसे केवल गरम किया जाता है, वह संतर्पण क्वाथ कहलाता है। यह शारीरिक धातुओं को तृप्त करता है।
(6) क्लेदन क्वाथ−जिस क्वाथ में उबलते−उबलते पानी चतुर्थांश बच रहता है, उसे क्लेदन क्वाथ कहते हैं।
(7)शोषण क्वाथ−जिस क्वाथ में उबलते−उबलते सोलहवाँ भाग पानी शेष बच रहता है, उसे शोषण क्वाथ कहते हैं। यह दोषों को सुखाता है। आयुर्वेदानुसार पाचन क्वाथ रात्रि में, शमन क्वाथ दोपहर से पहले, दीपन क्वाथ दोपहर बार, संतर्पण एवं शोधन क्वाथ प्रातःकाल दिया जाना चाहिए।
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में गत कई वर्षों से जिन रोगों पर क्वाथ−चिकित्सा के सर्वाधिक प्रयोग−परीक्षण किए गए हैं और उनके कायाकल्प करने वाले सफल सत्परिणाम सामने आए हैं, उनमें से कुछ का वर्णन यहाँ किया जा रहा है। ये हैं−
(1) कालमेघ क्वाथ, (2) वासा क्वाथ (3) निर्गुंडी क्वाथ, (4) कुटज क्वाथ, (5) अश्वगंधा क्वाथ, (6) सरस्वती पंचक क्वाथ, (7) त्रिफला क्वाथ, (8) अशोक क्वाथ एवं (9) काँचनार क्वाथ।
(1) कालमेघ क्वाथ
इसमें निम्नलिखित औषधियां मिलाई जाती हैं−
कालमेघ−1 चम्मच, कुटकी−1/4 चम्मच, चिरायता−1 चम्मच, गिलोय−1 चम्मच, पुनर्नवा−1/2 चम्मच, सारिवा−1 चम्मच, काली जीरी−1/2 चम्मच, मुलहठी−1 चम्मच, शरपुँखा−1 चम्मच, वायविडंग−1/2 चम्मच, खदिर−1 चम्मच। (एक चम्मच बराबर 3 से 5 ग्राम होता है।)
उक्त 11 औषधियों को पहले अलग−अलग कूट−पीसकर उनका जौकुट पाउडर बना लेते हैं और तब उपर्युक्त निर्धारित मात्रा में लेकर क्वाथ बनाते हैं। क्वाथ बनाने की विधि इस लेख के उत्तरार्द्ध में (अगले अंक में) दी जाएगी।
कालमेघ क्वाथ लीवर, मलेरिया, बुखार, पीलिया आदि में विशेष लाभकारी होता है।
(2) वासा क्वाथ
इसमें निम्नाँकित चीजें मिलाई जाती हैं−
वासा−1 चम्मच, कंटकारी−1 चम्मच, भारंगी−1 चम्मच, तेजपत्र−1/2 चम्मच, मुलहठी−1 चम्मच तुलसी−1/2 चम्मच, त्रिकटु−1/4 चम्मच, चित्रक−1/4 चम्मच, नौसादार−2 चुटकी, अतीस−1 चुटकी, तालीस पत्र−1/2 चम्मच, गुलवनफ्शा−1 चम्मच।
(सोंठ, पीपल एवं काली मिर्च को बराबर मात्रा में मिलाकर कूट−पीस लेने से ‘त्रिकुट’ बनता है।)
वासा क्वाथ सरदी, खाँसी, जुकाम, नजला, सायनो साइटिस आदि रोगों में बहुत ही लाभकारी पाया गया है।
(3) निर्गुंडी क्वाथ
इसमें निम्नलिखित वनौषधियां मिलाई जाती हैं−
निर्गुंडी−1 चम्मच, सलई छाल−1/2 चम्मच, महारास्ना−1/2 चम्मच, नागरमोथा−1 चम्मच, अश्वगंधा−1/2 चम्मच, मुलहठी−1 चम्मच, दशमूल−1 चम्मच, सोंठ−1/2 चम्मच, शुद्ध गुग्गुल−1 ग्राम, हींग−1 ग्राम, रास्ना−1/2 चम्मच, चित्रक−1/2 चम्मच, उपर्युक्त वासा क्वाथ के समस्त घटक−1 चम्मच।
यहाँ इस क्वाथ में दिए गए ‘महारास्न’ एवं ‘दशमूल’ के घटक द्रव्यों के बारे में जान लेना आवश्यक है।
महारास्ना के घटक द्रव्य−रास्ना 600 ग्राम, धमासा, बला (खिरैटी), एरंड मूल की छाल, देवदार, कचूर, बच, वासा, सोंठ, हरड़, चव्य, नागरमोथा, पुनर्नवा, गिलोय, विधारा, सौंफ, गोक्षुर, अश्वगंधा, अतीस, अमलतास का गूदा, शतावर, छोटी पिप्पली, कटसरैया (पियाबाँसा), धनिया, छोटी कंटकारी बड़ी कंटकारी− प्रत्येक 12 12 ग्राम। इन सभी 26 चीजों को एकत्र करके कूट−पीसकर उनका जौकुट पाउडर बना लेते हैं। यही ‘महारास्ना’ है।
दशमूल−निम्नलिखित औषधियों को समभाग लेकर दशमूल बनाया जाता है। ये हैं−बिल्व छाल, गंभारी छाल, पाढ़ल छाल, अरणी छाल, अरलू (श्योनाक) छाल, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, छोटी कंटकारी, बड़ी कंटकारी एवं गोक्षुर। इन सभी दस चीजों को बराबर मात्रा में लेकर उनका जौकुट पाउडर बना लेते हैं और इस मिश्रण में से एक चम्मच पाउडर निर्गुंडी क्वाथ में मिलाते हैं।
निर्गुंडी क्वाथ वात, गठिया, आर्थ्रराइटिस, स्पाँण्डि−लाइटिस, साइटिका आदि वात व्याधियों में विशेष लाभकारी होता है। ओस्टियो आर्थ्रराइटिस में निर्गुंडी क्वाथ के साथ सलई या सरई (ब्रोसवेलिया सेरेटा) का गोंद प्रतिदिन आधा ग्राम सुबह एवं आधा ग्राम शाम को लेने पर अत्युत्तम प्रभाव देखा गया है।
(4)कुटज क्वाथ
इसमें निम्नाँकित औषधियां मिलाई जाती हैं−
कुटज−1 चम्मच, बिल्व−1 चम्मच, कालमेघ−1/2 चम्मच, नागरमोथा−1 चम्मच, मुलहठी−1/2 चम्मच, चिरायता−1/2 चम्मच, गिलोय−1 चम्मच, दारु हल्दी−1/4 चम्मच, हल्दी−1/2 चम्मच।
कुटज क्वाथ आँव, पेचिश एवं दस्त रोगों में विशेष लाभकारी है। नया या पुराना अमीबायसिस रोग पथ्य परहेज के साथ इस क्वाथ के नियमित सेवन से समूल नष्ट हो जाता है।
(शेष अगले अंक में)
अन्तर्यात्रा विज्ञान की प्रत्येक कड़ी आपको अपनी सम्भावनाओं से परिचय कराती है। इन्हें साकार और सम्भव करने की विधियाँ सुझाती हैं। इस योग कथा के पाठकों से योगसूत्र का महर्षि पतञ्जलि का कहना है कि सम्भावनाएँ केवल विभु में ही नहीं अणु में भी है। पर्वत में ही नहीं राई में भी बहुत कुछ समाया है। जिन्हें हम तुच्छ समझ लेते हैं, क्षुद्र कहकर उपेक्षित कर देते हैं। उनमें भी न जाने कितना कुछ ऐसा है जो बेशकीमती है। जागरण के महत्त्व से तो सभी परिचित हैं। महर्षि कहते हैँ कि निद्रा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। पिछली कड़ी में समाधिपाद के नवें सूत्र की व्याख्या प्रस्तुत की गयी थी। इस सूत्र में योग सूत्रकार ने मन की तीसरी वृत्ति ‘कल्पना’ के बारे में बताया है। इन कल्पनाओं का यदि कोई ढंग से सदुपयोग करना सीख जाय तो जीवन की डगर में बढ़ते हुए हर कदम पर नए खजाने मिल सकते हैं।
अब महर्षि चौथी वृत्ति के स्वरूप और सत्य को समाधिपाद के दसवें सूत्र में उद्घाटित करते हैं-
‘अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा’ ॥ 1/10॥
शब्दार्थ-अभाव-प्रत्यय-आलम्बना= अभाव की प्रतीति को आश्रय करने वाली; वृत्ति=वृत्ति; निद्रा=निद्रा है।
अर्थात् मन की यह वृत्ति जो अपने में किसी विषय वस्तु की अनुपरिस्थिति पर आधारित होती है-निद्रा है। यही निद्रा ही सार्थक और यथार्थ परिभाषा है। नींद के अलावा हर समय मन अनेकों विषय वस्तुओं से भरा रहता है। भारी भीड़ होती है मन में। विचारों की रेल-पेल, अन्तर्द्वन्द्वों की धक्का-मुक्की क्षण-प्रतिक्षण हलचल मचाए रहती है। कभी कोई आकाँक्षा अंकुरित होती है तो कभी कोई स्मृति मन के पटल पर अपना रेखा चित्र खींचती है, यदा-कदा कोई भावी कल्पना अपनी बहुरंगी छटा बिखेरती है। हमेशा ही कुछ न कुछ चलता रहता है। यह सब क्षमता तभी होती है जब सोये होते हैं गाढ़ी नींद में। मन का स्वरूप और व्यापार मिट जाता है, केवल होते हैं आप अपने क्षुद्रतम रूप में बिना किसी उपाधि और व्याधि के।
परम पूज्य गुरुदेव कहते थे-नींद के क्षण बड़े असाधारण और आश्चर्य जनक होते हैं, कोई इन्हें समझले और सम्हाल ले तो। बहुत कुछ पाया जा सकता है। ऐसा होने पर साधकों के लिए यह योगनिद्रा बन जाती है, जबकि सिद्ध जन इसे समाधि में रूपांतरित कर लेते हैं। दिन के जागरण में जितनी गहरी साधनाएँ होती हैं, उससे कहीं अधिक गहरी और प्रभावोत्पादक साधनाएँ रात्रि की नींद में हो सकती है। वैदिक संहिताओं में, अनेकों प्रकरण ऐसे हैं, जिनसे गुरुदेव के वचनों का महत्त्व प्रकट होता है।
ऋग्वेद के रात्रि सूक्त में कुशिक-सौभर व भारद्वाज ऋषि ने रात्रि की महिमा का बड़ा ही तत्त्वचिंतन पूर्ण गायन किया है। इस सूक्त के आठ मंत्र निद्रा को अपनी साधना बनाने वाले साधकों के लिए नित्य मननीय है। इनमें से छठवें मंत्र में ऋषि कहते हैं-‘यावयावृक्यं वृकं यवय स्तेनभूर्म्ये। अथा नः सुतरा भव’॥ 6॥ ‘हे रात्रिमयी चित्शक्ति! तुम कृपा करके वासनामयी वृकी तथा पापमय वृक को अलग करो। काम आदि तस्कर समुदाय को भी दूर हटाओ। तदन्तर हमारे लिए सुख पूर्वक तरने योग्य बन जाओ। मोक्षदायिनी एवं कल्याणकारिणी बन जाओ।’
ये स्वर हैं उन महासाधकों के जो निद्रा को अपनी साधना बनाने के लिए साहस पूर्ण कदम बढ़ाते हैं। वे जड़ता पूर्ण तमस और वासनाओं के रजस् को शुद्ध सत्व में रूपांतरित करते हैं। और निद्रा को आलस्य और विलास की शक्ति के रूप में नहीं जगन्माता भगवती आदि शक्ति के रूप में अपना प्रणाम निवेदित करते हुए कहते हैं-
या देवी सर्वभूतेषु निद्रा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ देवी सप्तसती 5/23-25
जो महा देवी सब प्राणियों में निद्रा रूप में स्थित हैं उनको नमस्कार, उनको नमस्कार उनको बारम्बार नमस्कार है।
महायोगी आचार्य शंकर अपने अप्रतिम साधना ग्रन्थ योगतारावली में इसकी समूची साधना विधि को बड़े ही संक्षेप में वर्णित करते हैं-
विच्छिन्न संकल्प विकल्प मूले निःशेष निर्मूलित कर्मजाले। निरन्तराभ्यासनितान्तभद्रा सा जृम्भ्रते योगिनी योग निद्रा॥
विश्राँतिमासाद्य तुरीय तल्पे विश्वाद्यावस्था त्रितयोपरिस्थे। संविन्मयीं कामपि सर्वकालं निद्राँ भज निर्विश निर्विकल्पम्॥ योग तारावली 25-26
निरन्तर अभ्यास के फल स्वरूप मन के संकल्प-विकल्प शून्य तथा कर्मबन्धन के क्षय हो जाने पर योगी जनों में योग निद्रा का आविर्भाव होता है।
त्रिकालातीत विश्व की आद्यावस्था तुरीयावस्था में सर्वकालवादिनी संवित्-स्वरूपिणी निद्रा प्रकाशित होती है, जहाँ योगी विश्रान्ति प्राप्त कर विचरण करते हैं। अतः निर्विकल्प स्वरूपिणी उसी निद्रा की आराधना करो।
यह आराधना कैसे हो? इस सवाल के जवाब में परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि सोना भी एक कला है। सोते तो प्रायः सभी मनुष्य हैं परन्तु सही कला बहुत कम लोगों को पता है। इसी वजह से वे सही ढंग से आराम भी नहीं कर पाते। ज्यादातर लोग जिन्दगी की चिंताओं और तनावों का बोझ लिए बिस्तर पर जाते हैं और अपनी परेशानियों की उधेड़बुन में लगे रहते हैं। बिस्तर पर पड़े हुए सोचते-सोचते थक जाते हैं और अर्द्ध चेतन अवस्था में सो जाते हैं। इसी वजह से वे सही ढंग से आराम भी नहीं कर पाते। उन्हें खुद भी पता नहीं लगता कि हम सोच रहे हैं या सोने जा रहे हैं। इसी वजह से नींद में मानसिक उलझनें विभिन्न दृश्यों तथा रूपों में स्वप्न बनकर उभरती है। इस तरह भले ही शरीर कुछ भी नहीं करता हो, फिर भी मानसिक तनावों के कारण शारीरिक थकान दूर नहीं हो पाती। इस स्थिति से उबरने के लिए जरूरी है कि जब हम सोने के लिए बिस्तर में जायें तो हमारी शारीरिक एवं मानसिक दशा वैसी ही हो जैसी कि उपासना के आसन पर बैठते समय होती है। यानि कि हाथ-पाँव धोकर पवित्र भावदशा में बिछौने पर लेटे। आराम से लेटकर गायत्री महामंत्र का मन ही मन उच्चारण करते हुए कम से कम दस बार गहरी श्वाँस लें। फिर मन ही मन अपने गुरु अथवा ईष्ट की छवि को सम्पूर्ण प्रगाढ़ता से चिंतन करें। अपने मन को धीरे-धीरे किन्तु सम्पूर्ण संकल्प के साथ सद्गुरुदेव अथवा ईष्ट की छवि से भर दें। साथ ही भाव यह रहे कि अपनी सम्पूर्ण चेतना, प्रत्येक वृत्ति गुरुदेव में विलीन हो रही है। यहाँ तक कि समूचा अस्तित्व गुरुदेव में खो रहा है। सोचते समय मन को भटकने न दे। मन जब जहाँ जिधर भटके, उसे सद्गुरु की छवि पर ला टिकाएँ। इस तरह अभ्यास करते हुए सो जाएँ।
इस अभ्यास के परिणाम दो चरणों में प्रकट होंगे। इसमें से पहले चरण में आपके स्वप्न बदलेंगे। स्वप्नों के झरोखे से आपको गुरुवर की झाँकी मिलेगी। उनके संदेश आपके अन्तःकरण में उतरेंगे। इसके दूसरे चरण में योग निद्रा की स्थिति बनेगी। क्योंकि अभ्यास की जागरुक अवस्था में जब आप नींद में प्रवेश करेंगे तो यह जागरुकता नींद में भी रहेगी। आप एक ऐसी निद्रा का अनुभव करेंगे जिसमें शरीर तो पूरी तरह से विश्राम की अवस्था में होगा पर मन पूरी तरह से जागरुक बना रहेगा। यही योग निद्रा है। जिसकी उच्चतर अनुभूति आप भी समाधि का सुख उठाता है। इस भावदशा की अनुभूति आप भी अभ्यास की प्रगाढ़ता में कर सकते हैं। निद्रा की इन रहस्यानुभूतियों के बाद मन की पांचवीं वृत्ति स्मृति का कम है जिसकी कथा अगली कड़ी की विषय वस्तु बनेगी। तब तक आप सब साधक गण निद्रा को समाधि में रूपांतरित करने की साधना का अभ्यास करें।
“ईश्वर की प्राप्ति कहाँ से हो सकती हैं?” एक जिज्ञासु युवक ने पूछा। संत नामदेव ने कहा, “सायंकाल मेरे साथ चलना, मैं तुम्हें ईश्वर के साक्षात् दर्शन करा लाऊँगा।
युवक शाम की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने लगा। शाम हुई और चल पड़ा संत के साथ। संत नामदेव ने हरिजन बस्ती में एक वृद्ध के घर उसे ले जाकर खड़ा कर दिया।
टूटी खाट पर एक बोरा बिछाए एक दस वर्षीय मातृहीन बालक लेटा हुआ था। वैद्यों ने बताया था कि उसे क्षयरोग हो गया है। संत नामदेव ने प्यार से उसे दवा पिलाई सेवा−शुश्रूषा की। थोड़ी देर बार दूसरी दिन पुनः आने का आश्वासन देकर युवक को लेकर वापस चल पड़े। युवक ने पूछा, “तात, आपने ईश्वर के दर्शन कराने का आश्वासन दिया था।” संत बोले, “वह बच्चा ही ईश्वर था।” युवक को विश्वास हो गया कि पीड़ित मानवता की सेवा ही सच्ची आराधना है।
गुरुगीता के महामंत्रों में साधना जीवन का परम सत्य निहित है। इनमें वह परम रहस्य संजोया है, जिसके आचरण का स्पर्श पारसमणि की भाँति है। जो छूने भर से साधक के अनगढ़ जीवन और कुसंस्कारों को आमूल-चूल बदल देता है। गुरु कृपा से मानवीय कमियाँ-कमजोरियाँ ईश्वरीय विभूतियों व उपलब्धियों में बदल जाती है। गुरु निष्ठ से क्या नहीं हो सकता? इस प्रश्न चिन्ह का एक ही उत्तर है सब कुछ सम्भव है-सब कुछ सम्भव है। इसलिए हानि में-लाभ में, यश में-अपयश में, जीवन में-मरण में, किसी भी स्थिति में सद्गुरु का आश्रय नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि परम कृपालु सद्गुरु का प्रत्येक अनुदान उनकी कृपा ही है। ये अनुदान सुख भरे हों या फिर दुःख से सने हों, साधक के साधनामय जीवन के लिए कल्याण कारी ही हैं। परम रहस्य सद्गुरु की कृपा भी बड़ी ही रहस्यमय होती है। इसका बौद्धिक विवेचन किसी भी तरह सम्भव नहीं। इसे तो बस सजल भावनाओं में ग्रहण किया जा सकता है।
गुरु गीता की पिछली कड़ी में इसके धारण ग्रहण की कतिपय विधियों का उल्लेख किया गया था। गुरुदेव की छवि का स्मरण, उनके नाम का जप, जीवन की विपरीतताओं में भी गुरुवर की आज्ञा का निष्ठ पूर्वक पालन साधक को गुरु कृपा का सहज अधिकारी बनाता है। गुरु के मुख में तो ब्रह्म का वास है वे जो भी बोलें वह शिष्य के लिए ब्रह्मवाक्य है। गुरुकृपा ही साधक को ब्रह्मानुभूति का वरदान देती है। परम पतिव्रता स्त्री जिस तरह से हमेशा ही अपने पति का ध्यान करती है, ठीक उसी तरह से साधक को अपने गुरु का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान इतना प्रगाढ़ हो कि उसे अपना आश्रय, जाति, कुल, गोत्र सभी कुछ भूल जाय। गुरु के अलावा कोई अन्य भावना उसे न भाये।
इस भक्ति कथा में नई कड़ी जोड़ते हुए भगवान महादेव माता पार्वती को समझाते हैं-
अनन्यश्चिन्तयन्तो माँ सुलभं परमं पदम्।तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरोराधनं कुरु॥21॥
त्रैलोक्ये स्फुटवक्तारो देवाद्यसुरपन्नगाः। गुरुवक्त्रस्थिता विद्या गुरुभक्तया तु लभ्यते॥22॥
गुकारस्तवन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते। अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः॥23॥
गुकारः प्रथमो वर्णो मायादिगुणभासकः। रुकारो द्वितीयो ब्रह्म मायाभ्रान्ति विनाशनम्॥24॥
एवं गुरुपदं श्रेष्ठ देवानामपि दुर्लभं। हाहाहूहू गणैश्चैव गन्धर्वैश्च प्रपूज्यते॥25॥
शिष्य को यह तथ्य भलीभाँति आत्मसात् कर लेना चाहिए कि सद्गुरु का अनन्य चिंतन मेरा ही (भगवान सदाशिव) चिंतन है। इससे परमपद की प्राप्ति सहज सुलभ होती है। इसलिए कल्याण कामी साधक को प्रयत्न पूर्वक गुरु आराधना करनी चाहिए॥21॥ तीनों लोकों के देव-असुर एवं नाग आदि सभी इस सत्य को बड़ी स्पष्ट रीति से बताते हैं- कि ब्रह्म विद्या गुरुमुख में ही स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है॥22॥ ‘गुरु’ शब्द में ‘गु’ अक्षर अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश। इस तरह गुरु ही अज्ञान का नाश करने वाले ब्रह्म है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है॥23॥ शास्त्र वचनों से यह प्रमाणित होता है कि ‘गुरु’ शब्द के प्रथम वर्ण ‘गु’ से माया आदि गुण प्रकट होते हैं। और इसके द्वितीय वर्ण ‘रु’ से ब्रह्म प्रकाशित होता है। जो माया की भ्रान्ति को विनष्ट करता है॥24॥ इसलिए गुरुपद सर्वश्रेष्ठ है। यह देवों के लिए भी दुर्लभ है। हाहाहूहू गण और गंधर्व आदि भी इसकी पूजा करते हैं॥25॥
इन महामंत्रों के प्रत्येक अक्षर से गुरु महिमा प्रकट होती है। इस महिमा में अपने को घुला-मिला कर ही साधक की साधना सफल होती है। साधनामय जीवन की सर्वोच्च कक्षा की व्याख्या प्रस्तुत करनी हो तो उसका सार यही होगा; साधक का सद्गुरु में समर्पण-विसर्जन-विलय। अनन्य चिंतन की निरन्तरता साधक के सद्गुरु में समर्पण को सुगम बनाती है। समर्पण की परमावस्था में साधक का समूचा अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। और तब आती है। विलीनता की अवस्था, इस भावदशा में शिष्य साधक का काय-कलेवर तो यथावत् बना रहता है, पर उसमें उसकी चेतना अनुपस्थित होती है। वहाँ उपस्थित होती है उसके सद्गुरु की चेतना । वह दिखते हुए भी नहीं होता। होता है केवल उसका सद्गुरु।
जो गुरुभक्ति की डगर पर चलने का साहस करते हैं। उन्हें दो-चार कदम आगे बढ़ते ही बहुत से साधना सत्यों का साक्षात्कार होता है। वे जानते हैं कि सद्गुरु ही साधक हैं, वही साधना है और अन्त में वही साध्य के रूप में प्राप्त होते हैं। यह कथन पहली बार में कबीर वचनों की उलटबाँसी जैसा भले ही लगे, पर थोड़ा सा ही चिंतन करने पर सब कुछ ठीक-ठीक समझ में आ जाता है। इस तत्त्व का सत्य बोध कुछ यूँ है-सद्गुरु ही साधक है, इस वाक्य का अर्थ यह है कि सामान्य देहधारी मनुष्य जब सद्गुरु की कृपा छाँव में आता है, तब वह शिष्य बनता है। उस शिष्य में गुरु जब अपने एक अंश को प्रतिष्ठित करते हैं, तब साधक के रूप में उसका नवसृजन होता है। इस तरह अपने शिष्य के काय-कलेवर में दरअसल सद्गुरु ही साधक के रूप में अवतार लेते हैं।
‘सद्गुरु ही साधना है’ - इस वाक्य का भाव यह है कि साधना का परम दुर्गम पथ पार करना सद्गुरु की कृपा शक्ति के बिना सम्भव नहीं है। सद्गुरु की कृपा शक्ति ही साधक में साधना की शक्ति बनती है। उसी के सहारे वह अपने साधनामय जीवन की डगर पर आगे बढ़ता है। सद्गुरु की कृपा से ही उसे साधना की विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ मिलती हैं और अन्त में साध्य से उसका साक्षात्कार होता है और तब उसे इस सत्य का बोध होता है कि सद्गुरु ही साध्य है क्योंकि सद्गुरु और ईष्ट दो नहीं बल्कि एक हैं। अपने गुरु ही गोविन्द है। वही सदाशिव और परमशक्ति हैं। ये सभी साधना के सत्य निरन्तर और लगातार सद्गुरु के अनन्य चिंतन से प्राप्त होते हैं।
प्रयत्न पूर्वक सद्गुरु की आराधना के सिवा शिष्य को कुछ भी करने की जरूरत नहीं। मन से सद्गुरु का चिंतन-स्मरण, हृदय से अपने गुरु की भक्ति, वाणी से उनके पावन नाम का जप और शरीर से उनके आदेशों का निष्ठापूर्वक पालन करने से समस्त दुर्लभ आध्यात्मिक विभूतियाँ, शक्तियाँ, सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाती हैं। गुरु ही ब्रह्म है, उनके वचनों में ही ब्रह्म विद्या समायी है। इस सत्य को जो अपने जीवन में धारण करता है, आत्मसात् करता है, अनुभव करता है वही शिष्य है-वही साधक है। गुरु तत्त्व से भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है। इसे अनुभव करने के उपाय गुरु गीता के अगले मंत्रों में वर्णित है। जो गुरु गीता की भक्ति कथा की अगली कड़ी में प्रकाशित होंगे। इस अगली कड़ी को प्रतीक्षा साधक गण अपने सद्गुरु का अनन्य भाव से चिंतन करते हुए करें।
एक प्रसिद्ध ज्ञानी नगर के शाँत कोने में रहते थे और जब लेखन से समय बचता तो अपनी फूस की झोंपड़ी के बाहर बैठकर एकतारा बजाया करते थे। एक धनिक उनकी ख्याति सुनकर अपने रथ पर चढ़कर उनसे मिलने आया। रास्ता इतना सँकरा था कि उसे उतरकर पैदल जाना पड़ा। संत अतिथि का स्वागत करने द्वार पर आए। फटे वस्त्र, पत्ते की टोपी, फिर भी चेहरे पर एक दिव्य शाँति व प्रफुल्लता। देखते ही धनिक ने कहा, “ओह, संत, आप इतने दुखी, दरिद्र, संकटग्रस्त।”
संत मुस्कराए और बोले, “मैंने सुना है, धन के अभाव में मनुष्य गरीब भर रहता है परन्तु दुखी वे रहते हैं, जो अज्ञानग्रस्त हैं। बताओ मैं गरीब हुआ या दुखी?” धनिक सिटपिटाए से चुप खड़े रह गए।
संत ने धनिक से कहा, “संतों के पास देने को अपार आत्मिक संपदा है। वे किसी से धन−संपदा नहीं चाहते, वरन्, इच्छुकों को, पात्रों को बाँटते रहने में सदैव प्रसन्नता अनुभव करते हैं। जो याचक है, वह सच्चा संत नहीं। जब भी वह माँगता है, सीधे ईश्वर से, पर अपने लिए नहीं, मानव मात्र के लिए, विश्व−वसुधा के लिए।”
आजकल के युवक−युवतियाँ शरीर के विभिन्न भागों में रंग−बिरंगी आकृतियाँ बनवाकर इस प्रकार के हाव−भाव प्रदर्शित करते हैं, मानो वे बहुत प्रगतिशील हों, जबकि कभी यही चित्र प्रतिगामिता के लक्षण माने जाते थे और ग्रामीण परंपरा से संबद्ध थे। पेट−पीठ और हाथ−पैरों पर चित्रित इन तस्वीरों को ‘टैटू’ या ‘गोदना’ कहते हैं।
गोदना ग्रामीण परिवेश की देन है। ग्रामवासी महिला और पुरुष प्रायः अपने नामों को हाथ में गोदवा लिया करते थे और जब कभी कहीं परिचय देने की आवश्यकता पड़ती, वहाँ अपने हाथ को आगे बढ़ा देते। सामने वाला व्यक्ति उसे पढ़कर उसका नाम जान लेता। इस प्रकार गोदना का विकास गाँवों में परिचय देने के प्रयोजन से हुआ। बाद में नाम के साथ−साथ दूसरे हाथ में अनेक प्रकार की आकृतियाँ भी शौकवश बनवाई जाने लगीं। इस तरह यह प्रवृत्ति प्रथा बन गई। यह वर्षों पूर्व की बात है। शिक्षा के विकास के साथ−साथ यह परिपाटी गाँवों में अब अपनी अंतिम साँसें गिन रही हैं। जिन दिनों यह परंपरा पूरे रौ में थी, उन दिनों इसे वनस्पतियों के रसों से लिखा जाता था। वह लिखावट इतनी अमिट होती कि बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक ज्यों−की−त्यों बनी रहती। इससे स्वास्थ्य संबंधी कोई संकट खड़ा नहीं होता था, इसलिए भी ऐसा तब लोग बढ़−चढ़कर करते थे।
आज स्थिति दूसरी है। तब से अब तक हम प्रगति के कई सोपान पार कर चुके हैं। उसके साथ ‘गोदना’ ने भी विकसित होकर टैटू का रूप ले लिया है और गाँव से हटकर शहरों में अपने पैर पसार चुका है। यहाँ यह फैशन का प्रतीक बन गया है और केवल हाथ ही में नहीं, वरन् पाँव, पेट, पीठ तथा गाल में गोदवाया जाने लगा है। गोदवाने के तरीके में भी प्रगति हुई है। गाँवों में तो इसे अनाड़ी ग्रामीण जैसे−तैसे गोद देते थे, किंतु शहरों में इसके लिए अब अन्य पार्लरों की तरह ‘टैटू पार्लर’ भी खुल चुके हैं। वहाँ इसे बनाने के दो तरीके हैं। एक में तो कलाकार इसे रंग और ब्रुश के माध्यम से हाथ से बनाते हैं, जो कई रंगों का आकर्षक एवं मनमोहक डिजाइन वाला होता है। दूसरे में एक विशेष प्रकार के प्लास्टिक पेपर द्वारा इसे शरीर में बनाया जाता है।
यहाँ टैटूज का गुणगान नहीं किया जा रहा है, न ही उन्हें प्रगतिशीलता का प्रतीक बताया जा रहा है। कहा मात्र यह जा रहा है कि फैशन की अंधी दौड़ में कोई कार्य बिना विचारे किया गया हो तो वह हानिकारक हो सकता है और स्वास्थ्य को उससे क्षति पहुँच सकती है। अब यही बात आधुनिक टैटूज के बारे में कही जा रही है और ऐसी आशंका प्रकट की जा रही है कि उनसे कई प्रकार के लीवर संबंधी रोग हो सकते हैं। यह संभावना व्यक्त की है राबर्ट हैली नामक चिकित्सा विज्ञानी से। ‘मेडिसिन’ नामक चिकित्सा विज्ञान की अमेरिकी पत्रिका में इस संबंध में उनने विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि अधुनातन टैटूज से हिपेटाइटिस−सी का संक्रमण हो सकता है।
यदि यह संक्रमण हुआ तो उससे लीवर सीरोसिस हो सकता है। बाद की अवस्था में इसके लीवर कैंसर में परिवर्तित होने की संभाव्यता बढ़ जाती है, इसलिए वे युवा वर्ग को सावधान करते हुए कहते हैं कि उन्हें आँख मूँदकर ऐसे किसी फैशन को अपना नहीं लेना चाहिए, जो खतरनाक हो। वे कहते हैं कि जिस स्थान पर टैटू बनाया गया हो, उस स्थान का प्रयोग यदि इंजेक्शन लगाने में, रक्त लेने या देने में किया गया तो उससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है और संक्रमण भीतर पहुँच सकता है। शोध के दौरान देखा गया है कि जिनके शरीर में एक से अधिक टैटूज हैं एवं जो लाल, पीले, नारंगी रंग के हैं, उन्हें हिपेटाइटिस−सी का खतरा ज्यादा होता है। इनकी तुलना में काले रंग का टैटू कम खतरनाक है। वे यह भी कहते हैं कि उक्त रोग से संक्रमित होने पर यह आवश्यक नहीं कि व्याधि का लक्षण तुरंत प्रकट हो जाए। यह संभव है कि वर्षों तक वह अप्रकट स्थिति में पड़ा रहे और व्यक्ति एकदम स्वस्थ प्रतीत हो। लीवर में दर्द के रूप में उसका प्रथम लक्षण सामने आता है और फिर आदमी बीमार बनता जाता है। अतएव हर युवा को टैटू से परहेज करना चाहिए।
टैटू फैशनजन्य है, पर कब वह रोगजन्य बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। उसे प्रगतिशीलता का प्रतीक मानने वालों को उससे सावधान रहना चाहिए। कहीं वह गंभीर स्वास्थ्य−संकट का कारण न बन जाए, इसका भी ध्यान रखना चाहिए।
(प्रस्तुत है वसंत पर्व 1974 की पावन वेला में निस्सृत शक्तिस्वरूपा माताजी की अमृतवाणी परमपूज्य गुरुदेव सूक्ष्मीकरण साधना में थे।)
गायत्री मंत्र हमारे साथ−साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
बेटियों, आत्मीय प्रज्ञा परिजनों! उपासना जीवन की बहुमूल्य निधि है। उस निधि से यदि दूर हट जाते हैं तो हम खोखले रह जाते हैं, निर्जीव हो जाते हैं। उपासना आत्मा की भूख है। आत्मा की भूख जब तक नहीं मिटती, तब तक आत्मा को तृप्ति नहीं होती। दिमाग की भूख बौद्धिक होती है और आत्मा की जो भूख होती है, वह उपासना होती है। उपासना माने भगवान के पास बैठना। समीपता। बड़े व्यक्ति के समीप बैठते हैं तो वही छाया हमारे ऊपर पड़ती है और हमारा भी उतना ही महत्त्व हो जाता है, जितना कि बड़े व्यक्ति का होता है। जिस तरह प्रधानमंत्री का सम्मान होता है और राष्ट्रपति का सम्मान होता है और जो उस समय उनके समीप होते हैं, उन्हें भी उतना ही सम्मान उस समय मिलता है, उससे कम नहीं मिलता। हमारा भगवान उससे भी ऊँची सत्ता है। भगवान हमारे राष्ट्रपति का भी राष्ट्रपति है, प्रधानमंत्री का भी प्रधानमंत्री है। भगवान से जब मनुष्य मिल जाता है तो वह भगवान का ही स्वरूप हो जाता है। उसमें कोई भी अंतर नहीं होता। जैसे कीट और भृंगी की समीपता। जब भृंगी अपनी भाषा में कीट को आवाज देता है तो कीट उसके पास दौड़ता हुआ चला जाता है और उसमें मिल जाता है।
निकटता का लाभ
बेटे, नाला पहले गंदा होता है और जब गंगा में मिल जाता है तो गंगा का स्वरूप हो जाता है। कौन? नाला। गंगा जब गोमुख से निकलती है तो उसका दायरा छोटा होता है। छोटा−सा मुँह होता है, जिसमें से गंगा प्रवाहित होती है। गंगा की विशालता−जैसे−जैसे गंगा प्रवाहित होती है, वह फैलती चली जाती है। अनेक नदी−नाले उसमें आते चले जाते हैं। वे सभी गंगा हो जाते हैं और विशाल गंगा समुद्र में जाकर विलीन हो जाती है। कौन? गंगा। वह गंगा जो एक छोटे−से गोमुख से निकल रही थी। तब उसका कोई अस्तित्व नहीं था, कोई वजूद नहीं था, पर जब वही गंगा विश्वमानव के लिए बहती गई, बहती गई और जाकर समुद्र में समा गई।
भगवान शंकर ने गंगा को अपने सिर पर जटाओं में धारण किया था। भगवान शंकर को गंगा बहुत प्यारी थी। भगवान को भक्त बहुत प्यारा होता है, प्राणों से भी ज्यादा, बशर्ते उसका जीवन समर्पित हो, तब। यदि जीवन समर्पित नहीं है तो वह भक्त कैसे हो सकता है! भक्त वह होता है, जैसे एक सेठ जी थे और एक ब्राह्मण। ब्राह्मण ने अपने कुछ रुपये उस सेठ के यहाँ जमा किए थे। एक दिन ब्राह्मण ने सेठ से कहा कि मेरे रुपये दे दीजिए, मेरी लड़की की शादी है। सेठ ने बहाना बनाया, कैसे रुपये? मेरे पास तुम्हारे कोई रुपये−पैसे नहीं हैं। गरीब ब्राह्मण बहुत दुखी हुआ। यह बात राजा तक पहुँची तो राजा ने कहा, ब्राह्मण देवता कल हमारी सवारी निकलने वाली हैं और आप फलाँ दुकान के सामने हमें मिल जाना।
जहाँ राजा ने बताया था, उसी स्थान पर ब्राह्मण देवता पहुँच गए। राजा की सवारी निकल रही थी। जैसे ही राजा ने उस ब्राह्मण को देखा तो अपने हाथी पर से उतरे और उनके पास आकर प्रणाम करके बोले, “अरे गुरुदेव, आप नीचे नंगे पाँव! आइए−आइए” और उन्होंने अपने समीप उनको बिठा लिया। जब उस सेठ ने ब्राह्मण को राजा के समीप बैठा देखा तो बहुत परेशान हुआ। कुछ आगे चलकर राजा ने ब्राह्मण से कहा, “अब आप उतर जाइए, आपके भाग्य का होगा तो मिल जाएगा। मेरी भूमिका खत्म हो गई।” दूसरे दिन वह सेठ आया और एक हजार रुपये जो उस सेठ के ऊपर ब्राह्मण के थे, उसने वे हजार रुपये तो दिए ही, ऊपर से हजार रुपये और भी दिए। क्यों दिए क्योंकि ब्राह्मण राजा के समीप था और राजा उन्हें ‘गुरु संबोधित कर रहा था।
समीप बैठकर देखें
जिस भगवान को हम अपना पिता कहते हैं, वरन् सर्वशक्तिमान है। उसके समीप जब हम बैठेंगे तो हम सा विश्व के मालिक हो जाएँगे। भगवान ने हमें जो मानव शरीर रूप में जन्म दिया है तो न मालूम क्या−क्या तमन्नाएँ उसने रखी होंगी। भगवान के हाथ नहीं हैं, भगवान के पाँव नहीं हैं, भगवान की आँखें नहीं हैं। भगवान ने मनुष्य को शरीर दिया है और कहा है कि बेटे, तू इस दुनिया के संग्राम में जा और मेरे आँख नहीं हैं, तेरे आँख हैं। मैं कुछ कर नहीं सकता हूँ, तू कर सकता है। शक्ति मैं दूँगा तुझे, तू मेरा काम कर। लेकिन जब वह नाउम्मीद होता है तो पछताता है और व्यक्ति के हाथ तो कुछ लगता ही नहीं है।
बेटे, मैं कह रही थी कि भगवान की भक्ति के लिए−कि भगवान में भक्त अपने को मिला लेता है तो वह भगवान का ही स्वरूप हो जाता है। यही समर्पण है। जब तक समर्पण नहीं किया जाएगा, उसके हाथ कुछ लगने वाला नहीं हैं। जैसे पत्नी समर्पण कर देती है और पति के संपूर्ण वैभव की अधिकारिणी बन जाती है। जिस दिन से आती है अपने पति के घर, अपना सारा−का−सारा पिछला जीवन भूलती हुई चली जाती है। कल जो लड़की सूट−बूट पहने फिरती थी, बाल कटाए फिरती थी, कहना नहीं मानती थी, शादी के बाद दूसरे ही दिन से उसकी कायापलट हो गई। कैसे हो गई? यह हो गया उसके समर्पण से। पति के लिए वह समर्पित हो गई तो क्या हो गया, पति की जो भी संपत्ति थी, उसकी वह स्वामिनी हो गई। डॉक्टर की पत्नी डॉक्टरनी हो जाती है। कहिए, एम0 बी0 बी0 एस0 किया है क्या? नहीं एम0 बी0 बी0 एस0 तो नहीं किया है। तो फिर आप डॉक्टरनी कैसे हो गई? हम डॉक्टर की पत्नी हैं, इसलिए डॉक्टरनी हो गई। सेठ जी की पत्नी हैं, इसलिए सेठानी हो गई और पंडित जी की पत्नी हैं, इसलिए पंडितानी हो गई। कहिए, आपने ज्योतिष पढ़ी है क्या? ज्योतिष तो नहीं पढ़ी है, पर चूँकि हम पंडित की पत्नी हैं, इसलिए पंडितानी हैं।
समर्पण किया जाता है
हम उस परब्रह्म के पुत्र और पुत्रियाँ हैं। यदि हम उसके समीप हो जाएँ तो फिर हम वहीं हो जाएँगे, जैसा कि मैंने आपको अभी बताया है। पहले समर्पण किया जाता है, लिया नहीं जाता है। दो हाथों से दिया जाता है, हजार हाथों से मिलता है। गुरु जी ने कई बार उदाहरण दिया है कि भगवान ने हम से कहा, बेटे, कुछ माँगना है क्या? अपने बच्चों के लिए माँग ले, अपनी पत्नी के लिए माँग ले, तूने इतना तप किया है। वे बराबर इस बात को ठुकराते ही रहे। ठुकराना बड़ा शब्द होता हैं, लेकिन मुझे कहने दीजिए। उन्होंने कहा, भगवान मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे तो आपकी आज्ञा चाहिए। अपने गुरुदेव से भी उन्होंने कभी कुछ नहीं माँगा। उन्होंने कहा, गुरुदेव आपकी आज्ञा ही मेरे लिए सर्वोपरि है। आप माँगिए तो सही, आप बताइए तो सही, आपने मुझे सब कुछ दिया है। मेरे पास जो कुछ भी है, सब आपका है। मैं तो आपके लिए समर्पित हूँ।
उन्होंने कहा कि बेटे, तू मेरे लिए समर्पित है तो मैं बोल नहीं सकता, तेरे अंदर वाणी है, तेरे हाथ हैं, तेरी अक्ल है, तेरी आँखें हैं। मुझे चाहिए तेरी अक्ल और चाहिए तेरे हाथ और चाहिए मेरी आँखें। जिनके द्वारा मैं समाज में, राष्ट्र में और सारे विश्व में एक हलचल मनुष्य जाति के अंदर पैदा करना चाहता हूँ, यही मुझे चाहिए। उन्होंने कहा, गुरुदेव, ‘तेरा तुझको सौंपता क्या लागता है मोर।’ मुझे क्या आपत्ति है, गुरुदेव, सब कुछ आपका ही है। आपका ही है तो आप नहीं समझते क्या? मैं तो कहूँगी उनका लाखों गुना, करोड़ों गुना अनुदान बरसता रहा और अभी भी बरसता है। पत्नी के लिए माँगा होता, बच्चों के लिए माँगा होता, अपने लिए माँगा होता तो एक सीमित दायरा होता। सीमित होते तो जो आज इतना विशाल से विशालता की ओर बढ़े, वह विशालता नहीं होती।
जब मनु भगवान गंगा जी नहाने गए तो गंगा जी में एक मछली मिली। उन्होंने उस मछली को हाथ पर रख लिया और उसे दुलारने लगे। दुलारने लगे तो उसने कहा, भगवन् मैं इस दायरे में नहीं रहूँगी, मुझको फैलने दीजिए। उन्होंने कहा, बेटी, तू मुझको बहुत प्यारी लगती है, तू चल कमंडल में बैठ जा। कमंडल में डाल दी मछली। मछली ने कहा, गुरुदेव, मेरा दम घुटता है, मैं इसमें नहीं रह सकती, तो उसको तालाब में डाल दिया। तालाब में भी उसने यही कहा, गुरुदेव, मैं नहीं रह सकती तो उन्हें तालाब में से समुद्र में डाल दिया। मत्स्यावतार रूप होने के कारण समुद्र में वह बहुत विशाल हो गई। विशालता−भक्त की विशालता बढ़ती जाती है और उसका हृदय, हृदय एक सरोवर की तरह से, एक समुद्र की तरह से अथाह हो जाता है। पर्वत जैसा वह ऊँचा हो जाता है और समुद्र जैसी उसकी गहराई होती है और गंगा जैसी निर्मलता−स्वच्छता−पवित्रता होती है, उदारता होती है भक्त के अंदर।
बेटे, गाय की तरह से भगवान कहता है कि बच्चों आओ, मेरे बेटे आओ, मेरी बेटियों आओ, मेरे थन में अथाह दूध है, इसको पियो ताकि तुम बलवान हो जाओ। उपासना रूपी दूध को पियो, लेकिन वह अभागा बछड़ा ठुकराता चला जाता है और गाय रँभाती रहती है। गाय का जो दूध है, वह इधर−उधर फैल जाता है और बछड़ा भूखा रह जाता है। बछड़ा माने है आत्मा−जीवात्मा और गाय, वह है हमारा भगवान। भगवान चिल्लाता रहता है और हमारे कानों में सुनाई नहीं पड़ता। हम हैं निर्जीव, हम हैं, आँखों से गूँगे, अपंग हैं, जो कहते हैं कि रास्ता दिखाई ही नहीं पड़ता। वह रास्ता है हमारी उपासना।
उपासना का मर्म
अभी मैंने कहा था कि उपासना माने है भगवान की समीपता। भगवान की समीपता के लिए गाय और बछड़े का उदाहरण मैं अभी आपको सुना रही थी। दूसरा उदाहरण है पतंग और डोरी का। आप अपनी बागडोर को जरा उस भगवान के हाथों में सौंपकर तो देखिए। फिर देखिए कि पतंग कहाँ तक जाती है। पतंग का कोई वजूद नहीं हैं। पतंग में कोई शक्ति नहीं हैं। शक्ति है उस उड़ाने वाले की, उस चलाने वाले की। शक्ति पतंग की नहीं होती। शक्ति कठपुतली की नहीं है, उसके नाच की नहीं है, वह उस नचाने वाले की है, पर पहले कठपुतली अपना समर्पण तो करे। किसी के हाथ में अपने को सौंपे तो, फिर देखिए कमाल। क्या−क्या नाच नचाता है। कौन? वह जिसके हाथ में डोरी सौंपी गई हैं। वह तरह−तरह के नाच नचाता है। कभी राजा बना देता है, कभी रानी बना देता है, कभी क्या बना देता है, कभी क्या बना देता है। कौन बना देता है? जिसके हाथ में डोरी बँधी है। अपने जीवन की डोरी सौंपिए, उस भगवान के हाथों में और फिर पाइएगा अनेक गुना अनुदान।
बेटे, भगवान संकीर्ण नहीं है। मनुष्य संकीर्ण है, उसकी संकीर्णता नहीं जाती। भगवान का नाम ही उदारता है। वह उदारता बरतता है और अपने अनुदान की भक्त के ऊपर वर्षा करने लगता है। मीरा ने कहा था कि भगवान से शादी करूंगी, लेकिन यदि वह कल को धोखा दे जाए और कह दे कि हम तो तलाक देते हैं। अच्छा तो यह तलाक देगा। तब उन्होंने कहा कि मैं भगवान को नौकर रखूँगी। अरे नौकर भी दगा दे जाएगा तो फिर मैं क्या करूंगी? तब उसने कहा कि अच्छा अब उसे मैं खरीदकर लाती हूँ। मीरा ने भगवान को खरीद लिया। भगवान को क्या खरीदा जा सकता है? हाँ, भगवान को खरीदा जा सकता है, यदि भक्त में वे भावनाएँ हों, वे निष्ठाएँ हों और वह श्रद्धा का बीज हो तो मैं कहूँगी कि भगवान को खरीदा जा सकता है। गुरुजी ने अपने गुरुजी को खरीद लिया, भगवान को खरीद लिया। वह पायलट के तरीके से चलता है और बॉडीगार्ड के तरीके से उनके दायें और बायें चलता है। खरीद लिया न।
गिरधर लीनो मोल
भगवान को किस तरीके से खरीदा जा सकता है? उन्होंने मोल ले लिया, किसने? मीरा ने और द्रौपदी ने। जब आर्त्तनाद से भगवान को पुकारा तो भगवान दौड़ते हुए चले आए और भगवान पर जितना था, वे देते चले गए, देते चले गए और दुशासन हारता ही गया। जिस समय जल के भीतर गज और ग्राह की लड़ाई हो रही थी तो जब ‘जौ भर सूँड़ रही जल ऊपर तब हरि नाम पुकारा।’ उसने हृदय से भगवान को पुकारा और भगवान गजराज के लिए दौड़ते हुए आ गए। उन्होंने सवारी की परवाह नहीं की, अपने गरुड़ को छोड़ करके आए। उन्होंने कहा कि मेरे भक्त के ऊपर आपत्ति आई है और मैं यहाँ सिंहासन पर बैठा हूँ। वे दौड़ते हुए चले आए गज की सहायता के लिए।
बेटे, विभीषण और सुग्रीव की कहानी मालूम है न आपको। जब वे भगवान की समीपता में आए और भगवान के सहयोगी, भगवान के मित्र बन गए। विभीषण को लंका का राज्य मिल गया। ऐसा हो सकता था क्या? जब रावण ने भगा दिया था तो उसके लिए संभव था क्या? संभव नहीं था, लेकिन भगवान की समीपता थी न, भगवान का वह काम कर रहा था न, भगवान का स्मरण कर रहा था न, तो भगवान ने कहा यही राजा बनेगा। सुग्रीव वानर था, लेकिन उसने भगवान की कितनी सहायता की। भगवान ने उसको राजा बनाया। किसको? सुग्रीव को।
जीतेंगे पाँडव ही
अर्जुन का रथ भगवान कृष्ण ने स्वयं हाँका था। उसकी बागडोर कृष्ण ने सँभाली थी। अर्जुन जब हिम्मत हार रहा था तो भगवान कृष्ण ने कहा कि अर्जुन तू कायर मत बन, नपुँसक मत बन, तू उठ खड़ा हो कौरवों से लड़ाई के लिए। कौरव अर्थात् जो दुर्गुण हमारे अंदर विराजमान रहते हैं और जो कौरवों के समान हैं। युद्ध हो रहा है। पाँडव और कौरव आपस में लड़ाई कर रहे हैं हमारे अंदर। कौन जीतेगा? जीतेंगे पाँडव, लेकिन पाँडव में वह हिम्मत हो तो सही। हिम्मत होनी चाहिए और करनी चाहिए। किनको? भक्त को। कौरव कौन हैं? हमारे अंदर जो कषाय−कल्मष बैठे हैं, आलस्य और प्रमाद बैठे हुए हैं। जो हमको आगे नहीं बढ़ने देते हैं।
बेटे, हमारी श्रद्धा न मालूम कहाँ विलीन हो गई हैं। हमें फिर से उसी श्रद्धा को उभारना है। जैसे प्रह्लाद और ध्रुव ने अपने माँ बाप को छोड़ दिया था और उस भगवान की गोदी को याद किया था, जिसने कि हमको जन्म दिया है। जिसकी कृपा से हम पृथ्वी पर आए हैं, वही हमारी गोदी है, वही हमारा पिता है। हम उसकी गोदी में ही बैठेंगे, उसकी गोदी में बैठने से उनको क्या फायदा हुआ? भगवान की गोदी में बैठे तो आज तब उनका नाम चला आ रहा है। कहते हैं ध्रुवतारा आकाश में चमकता है। ध्रुवतारे के रूप में ध्रुव का नाम विद्यमान है अभी तक और रहेगा लाखों वर्ष तक, करोड़ों वर्ष तक, क्योंकि वह परब्रह्म परमात्मा की गोदी में जाकर बैठ गया। उसने साधारण पिता की गोदी को ठुकरा दिया और असली पिता की गोदी में वह बैठा। उसका मन पवित्र था, ‘कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर। पीछे−पीछे हरि फिरत कहत कबीर−कबीर॥’
जित देखूँ तित लाल
भगवान स्मरण करता है भक्त का। भगवान का स्मरण भक्त नहीं करता, पर कब करता है? जब वह भगवान का स्वरूप हो जात है, ‘लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल। लाली देखन मैं चली, मैं भी हो गई लाल॥’ जब लाली को देखने गए तो स्वयं भी लाल हो गए। क्यों न हो जाएँगे हम उपासना रूपी लालिमा से लाल। उस भगवान की गोदी में जब हम बैठ जाएँगे और भगवान से जब हम लिपट जाएँगे तो हम क्यों न वैसे हो जाएँगे! मनुष्य अपनी संकीर्णता को छोड़ दे और भगवान की शरण में चला जाए तो फिर वैसा ही हो जाएगा, जैसा कि अभी मैंने कबीर के दोहे से बताया।
नारद और वाल्मीकि का यही हुआ था। नारद जी को मारने के लिए वाल्मीकि आए। वाल्मीकि ने कहा कि मैं तो आज मारूंगा ही, यह मेरा काम है। नारद जी ने कहा कि मारोगे तो सही, लेकिन एक बात अपने घर से पूछ करके आओ और हमको बताओ। क्या आपके इस पाप कार्य में आपके घर वाले भागीदार हैं क्या? घर में पूछने गए, पत्नी से पूछा, बेटे से पूछा, माँ से पूछा। सबका उत्तर एक ही था कि हमको तो उदरपोषण के लिए चाहिए, उदरपूर्ति के लिए चाहिए और हमें तो संपत्ति चाहिए, उदरपूर्ति के लिए चाहिए और हमें तो संपत्ति चाहिए। हमको क्या मतलब है कि आप कहाँ से लाते हैं। नैतिक कार्य से लाते हैं या अनैतिक कार्य से कमाते हैं। हमको सोचने−विचारने की कोई जरूरत नहीं हैं कि हम आपके इस कार्य में सहयोग दें अथवा न दें। हम क्यों देंगे? आपका फर्ज और कर्त्तव्य है हमारे लिए, लाइए। उन्होंने कहा कि मैं नरक में जाऊँगा तो आप लोग चलेंगे क्या? मैं सजा भुगतूँगा तो आप मेरे साथ सजा भुगतेंगे क्या? घर वालों ने कहा कि हम नहीं भुगतेंगे आपके साथ, आप ही जाइए। हमको तो चाहिए आपसे पैसा। जो आपका फर्ज और कर्त्तव्य कहता है, उसे आप पूरा करते रहें।
वाल्मीकि पहुँचे और नारद जी के चरणों में गिर पड़े और कहा, नारद आप तो भगवान के सच्चे भक्त हैं। आप दर−दर अलख जगाते फिरते हैं और मैं एक नरक का कीड़ा, नरक में ही रह जाऊँगा क्या? उन्होंने कहा, बस अब नहीं रहेगा। तूने अपने मन की मलीनता को निकाल दिया। तू धूल गया, तेरी जीवात्मा धुल गई, अब तक जो गर्त्त में समाई हुई थी। हीरा जब मिट्टी में पड़ा रहता है तो चमकता नहीं है, वह दब जाता है, पर जब उस हीरे को मिट्टी में से निकाल देते हैं तो हीरा चमक जाता है। उसका वास्तविक स्वरूप सामने आ जाता है। भक्त का स्वरूप उस दिन सामने आता है, जब वह अपनी अहंता को मिटा देता है। अहं को गला देता है और भगवान को समर्पण कर देता है। तब उसका सही स्वरूप सामने आता है।
अनुदान स्वतः मिलेंगे
बेटे, उपासना जितनी हम अपनी जीवात्मा की मलीनता को दूर करने के लिए करेंगे, उतनी ही हमारी जीवात्मा की सफाई होगी और उसी अनुपात से हमें अनुदान मिलता चलेगा। जैसे कि भेड़ के ऊपर ऊन जमी रहती है, उसे जितना काटते हैं, ऊन उतनी ही मिलती चली जाती है। इसी प्रकार भगवान का जो अनुदान है, वह स्वतः ही हमको मिलता चला जाएगा, माँगना नहीं पड़ेगा। मनुष्य भिखारी नहीं है, वह तो भगवान का बेटा है। वह तो स्वयं ही अधिकारी है भगवान की उस दौलत का। कौन−सी दौलत का? जो संसाररूपी दौलत उसने हमारे हाथ में सौंपी है। भगवान ने सब कुछ सौंप दिया है। लोग कहते है, ‘सब सौंप दिया भगवान तुम्हारे हाथों में।’ मैं कहूँगी कि भगवान ने सब सौंप दिया हमारे हाथों में। हम उसे उजाड़ें या उसको सँभाल करके रखें। संभाल करके रखेंगे तो वह हमारी धरोहर है। हम उसके इस बगीचे को और भी खूबसूरत बनाएँगे और उसमें तरह−तरह के पौधे लगाएँगे, फूल लगाएँगे। भगवान ने हमको यह संसाररूपी बगीचा और मानव रूपी फुलवारी सौंपी है, उसकी सेवा के लिए हम उसी तरीके से प्रयत्नशील रहेंगे, जिस तरीके से रामकृष्ण परमहंस थे।
परमहंस का भगवान
रामकृष्ण परमहंस के पास एक पादरी गए। पादरी ने कहा कि कहीं भगवान है क्या, हमको दिखाओगे क्या? उन्होंने कहा चलिए, अभी मैं भगवान के समीप ही जा रहा हूँ। मेरा भगवान से मिलने का समय हो गया है। पादरी ने आश्चर्य से कहा, भगवान से मिलने का समय हो गया है, आपका भगवान कहाँ है, कहीं दिखाई तो नहीं दे रहा है? क्या आपको दिखाई देता हैं? उन्होंने कहा कि तुम अभागे हो और मैं भाग्यशाली हूँ। मुझे भगवान हर समय दिखाई देता है। मेरी भुजाओं में दिखाई देता है, मेरी अक्ल में दिखाई देता है, मेरे पाँव में दिखाई देता है और भगवान मेरे रग−रग में समाया हुआ है। भगवान का तेज और ओजस् मेरे अंतःकरण में इस तरीके से झिलमिलाता रहता है, जैसे रोशनी, जैसे बल्ब चमकता है। सूरज और चंद्रमा चमकते रहते हैं। इसी तरीके से मेरे हृदय में भगवान की रोशनी हर समय समाई रहती है। चलो मैं भगवान को दिखा करके लाता हूँ। वे एक कोढ़ी के पास गए, उन्होंने उसका मवाद साफ किया, मरहम−पट्टी की। उसको साफ−सुथरा किया और उसे खिलाया−पिलाया। इसके बाद रामकृष्ण परमहंस ने स्वयं अन्न ग्रहण किया। उन्होंने कहा कि यही है मेरा भगवान, यही मेरी उपासना है। पादरी ने कहा, मैं धन्य हो गया, आज मैंने भगवान को आपके ही रूप में पा लिया। अभी तक मैं अंधकार में था।
सच्ची उपासना
बेटे, अंधकार की मिटाइए और सच्ची उपासना कीजिए। हम नहीं जानते कि रामकृष्ण परमहंस ने कितनी उपासना की थी और हनुमान ने कितनी माला जपी थी, लेकिन जब तक रामायण रहेगी, भगवान राम का नाम रहेगा, तब तक हनुमान का नाम भी रहेगा, उनके कलेजे से चिपका रहेगा। साधारण वानर होते हुए भी हनुमान का नाम भी रहेगा, उनके कलेजे से चिपका रहेगा। साधारण वानर होते हुए भी हनुमान ने भगवान राम का काम किया था और उनने भाइयों से ज्यादा बेटे समान दरजा ले लिया था। कैसे ले लिया? अपनी अहंता को मिटा करके ले लिया था। जिस उपासना के बारे में अभी मैं कह रही थी, सच्चे अर्थों में जो उपासना की जाती है, वह इसी तरीके से की जाती है। उपासना का और ध्यान का सही स्वरूप आप समझ गए होंगे। आप सभी इसी ओर कदम बढ़ाएँगे, ऐसी मुझे आशा है। ॥ ॐ॥
जब राजा परीक्षित को भागवत सुनाते हुए शुकदेव जी से छह दिन बीत गए और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया, तब भी राजा का शोक और मृत्युभय दूर न हुआ। कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर वह क्षुब्ध हो रहा था।
शुकदेव जी ने परीक्षित को एक कथा सुनाई, “राजन् बहुत समय पहले की बात है। एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला, रात्रि हो गई, वर्षा पड़ने लगी। सिंह−व्याघ्र बोलने लगे। राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा। कुछ दूर पर उसे दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बीमार बहेलिये की झोंपड़ी देखी। वह चल−फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल−मूत्र का स्थान बना रखा था। अपने खाने−पीने के लिए जानवरों का माँस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। झोंपड़ी गंदी, छोटी, अँधेरी और दुर्गंधयुक्त थी। पहले तो वह ठिठका, पर अन्य कोई आश्रय न देखकर बहेलिये से उसी में ठहर जाने की प्रार्थना करने लगा। बहेलिये ने उसे समझाया, ‘राजन्, आप इस स्थान पर रह नहीं पाएँगे। पर एक दिन रह लेंगे तो इस गंध के आदी होकर छोड़ेंगे भी नहीं।’ राजा बोले, ‘यह तो आज भर की विवशता है। मैं सवेरे अवश्य चला जाऊँगा।’ हुआ वही जो होना था। राजा ने सवेरे उस स्थान से जाने से मना कर दिया।”
यह कथा चल ही रही थी कि परीक्षित बोल पड़े, “वह कैसा मूर्ख राजा था!” शुकदेव बोले, “परीक्षित, वह मूर्ख तुम्हीं हो, तो मल−मूत्र की इस कोठरी को छोड़ने से डर रहे हो। अवधि पूरी हो जाने पर भी तुम झंझट फैला रहे हो।” परीक्षित का ज्ञान जाग पड़ा और वे बंधन−मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए।
(कर्म-संन्यास-योग नामक गीता के पाँचवें अध्याय की )
इससे पूर्व के अंक में परिजनों ने पढ़ा कि सकाम कर्म करने वाला व्यक्ति फल में आसक्ति के कारण बंधनों को प्राप्त होता है, जबकि सच्चा कर्मयोगी आत्मनिष्ठा से उपजी भगवत्प्राप्तिरूपी शाँति को प्राप्त होता है। (बारहवाँ श्लोक)। आज के आस्था−संकट के इस युग में दिव्यकर्मी के क्या कर्त्तव्य होने चाहिए, यह बताया गया था। भगवान ने आगे यह भी कहा कि यह मानवी काया नवद्वारों वाली एक नगरी है, भगवान का एक देवालय है। संयमी व्यक्ति अपने अंतःकरण को अपने वश में करके किन्हीं भी कर्मों में कर्त्ताभाव न रखकर आनंदपूर्वक परमात्मा में स्थित होकर रहता है। संयम के साथ यज्ञीय कर्मों में लगना दोनों ही अनिवार्य हैं। यह तप व योग का सार्थक समन्वय है, जिसकी परिणति भगवान ‘आस्ते सुखं’−सुख में स्थित रहता है (तेरहवाँ श्लोक) में बताते हैं। न कुछ करते हुए, न कराते हुए कैसे कोई यज्ञीय कर्म कर सकता है, इसके प्रमाणरूप में रमण महर्षि एवं परमपूज्य गुरुदेव के उदाहरण दिए गए। गीता बार−बार युवा मानसिकता वाले, संन्यस्य भाव वाले कर्मठ दिव्यकर्मियों का आह्वान करती है। चौदहवें श्लोक के द्वारा यह बताया गया था कि यह त्रैगुण्यमयी प्रकृति ही है जो कर्त्तापन की, कर्मों की, कर्मफल संयोग की रचना करती है। स्वभावतः ही सब को रहा है (स्वभावस्तु प्रवर्तर्त)। अब इसी श्लोक की विस्तृत व्याख्या के साथ अगला क्रम इस अंक में।
अंदर की शाँति−परमात्मा की प्राप्ति
देखने में इन तीन श्लोकों के अर्थ से यह लगता है कि ये भिन्न−भिन्न अर्थ वाले हैं एवं यहाँ किसी अन्य संदर्भ में अर्जुन से श्रीकृष्ण ने कहे हैं। ऐसा नहीं है। एक की फलश्रुति दूसरे में व दूसरे की तीसरे में बताकर श्रीकृष्ण अब मूल प्रकरण पर आ गए हैं। पहले में यह कहा कि आसक्ति के बंधनों में बँधकर भगवत्प्राप्तिरूपी शाँति नहीं मिल सकती। दूसरे में यह कहा कि कायारूपी (नवद्वारों वाली) इस देवालय से, परमात्मा जिससे निरंतर झरता रहता है, ऐसे उपकरण से ‘वशी) संयमी व्यक्ति वे सारे सेवाकार्य यज्ञीय भाव से कर सकता है, जिनसे उसे सत्−चित्−आनंद परमात्मा की अनुभूति हो, सदैव अपने अंदर उस चिरस्थायी शाँति का आनंद वह लेता रहे, किंतु यह सब तभी संभव है, जब त्रैगुण्यमयी हमारी प्रकृति से परे हम चलेंगे। मुक्त होने के लिए दिव्यकर्मी को प्रकृति के कर्म से हटकर अक्षरपुरुष की स्थिति में आना होगा। तभी तो हम त्रिगुणातीत हो सकेंगे। जो अपने आप को अक्षर ब्रह्म, अविकारी परमपुरुष, परब्रह्म का एक घटक मानेगा, स्वयं को निर्गुण आत्मा के रूप में जान लेगा, वह प्रकृति के कर्म को साक्षी भाव से स्थिर शाँतचित्त के साथ देखेगा, प्रकृति और उसके कर्म से प्रभावित नहीं होगा। प्रभु स्तर की, विभु स्तर की सत्ता कर्म या कर्तृत्व या कर्मफल संयोग की रचना नहीं करती, बल्कि वह तो क्षर भाव में प्रकृति के द्वारा होते चलने वाले सभी कर्मों को मात्र देखती रहती है। यही भाव चौदहवें श्लोक में आया है।
विभु स्तर की अक्षर−पुरुषोत्तम सत्ता
पाठकों को थोड़ा विषय जटिल तो लग रहा होगा, किंतु विगत अंक के अंतिम दो उपशीर्षकों (स्वभावस्तु प्रवर्तते एवं मुक्ति का पथ) से यह भाव समझ में आ गया होगा कि अविद्या रूपी प्रकृति एवं परब्रह्म, अक्षर−पुरुषोत्तम भगवान में अंतर क्या है एवं हमें किसकी शरण में जाना चाहिए। कौन हमें चिरस्थायी शाँति दे सकता है। भगवद्सत्ता के बारे में आगे चलकर योगेश्वर तो यह भी बोले हैं कि वह तो इस जन्म में किसी भी प्राणी के पाप और पुण्य को अपना मानकर उन्हें अपने सिर पर नहीं लेती (पंद्रहवें श्लोक का पूर्वार्द्ध), फिर हम कैसे उसे निम्न स्थिति में लाकर उसको प्रकृति समान मान बैठते हैं। ‘यह तो अंदर बैठा परमात्मा करा रहा है’, ऐसा कहने वाला यह समझ ही नहीं पाता कि परमात्मा तो इससे भी परे है। वह तो अपनी आध्यात्मिक विशुद्ध दिव्य स्थिति में सतत विद्यमान है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह तो अज्ञान के कारण होता है कि उससे जन्मा अहंकार उन सबको मानव ने उपलब्ध किया है, यह कहकर अपनी मान लेता है। वह कर्त्तापन की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेता है और स्वयं को उसी रूप में देखना भी पसंद करता है, न कि अपने असली स्वरूप में। अज्ञान का यह साम्राज्य ही सारे विभ्रमों−अहंताओं−असमंजसों का कारण है। इसी ने ज्ञान को, सही−सच्चे यथार्थ ज्ञान को ढक रखा है। श्लोक क्रमाँक पंद्रह हैं−
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यनित जन्तत्वः॥ (5/15)
वह सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न किसी के शुभ कर्म को ग्रहण करते हैं। यह तो ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।
अविद्या−अज्ञान ही मूल कारण
सारी माया उस अज्ञान−अविद्या के कारण है, जिसने ज्ञान को ढक रखा है। यह ज्ञान प्राप्त हो जाए तो फिर बात ही क्या है। इसी की प्राप्ति हेतु तो हर कर्मयोगी−दिव्यकर्मी सतत निरत रहता है। इसी अज्ञान के कारण ही तो सारे गलत कार्य आज हो रहे हैं। वही सही दिख रहा है, तो गलत है। सही अर्थों में आत्मभाव में जीने वाले व्यक्ति ऐसे नहीं होते, वे त्रिगुणमयी प्रकृति से नियंत्रित होकर शुभ−अशुभ कर्म नहीं करते, वरन् परमात्मसत्ता में स्थित होकर उस आत्मज्ञान को प्राप्त कर ही सारे कार्य करते हैं।
यहाँ भगवान ने मनुष्य को, जो अज्ञानी है, सहज रूप में जंतु घोषित किया है। जीव−जंतु शब्द हम सामान्यतः प्रयोग करते हैं− कीड़े−मकोड़े, मूक जीवधारियों के लिए जिनका शिश्नोदरपरायण (पेट−प्रजनन का) जीवन होता है। भगवान ऐसी श्रेष्ठ स्थिति में है एवं तब भी अज्ञान की स्थिति में जी रहा है, ‘जंतु’, ‘एनीमल’, ‘बिहंग’ कहा है।
‘जंतु’ से दिव्यकर्मी की यात्रा
गीता के काव्य की शोभा सही स्थान पर सही शब्दों के चयन में ही है। यहाँ जंतु नाम देकर उनने अपने मन की सारी बात मानो कह दी है कि जो आत्मज्ञानरूपी कस्तूरी नाभि में रखकर भी इधर−उधर ज्ञान की तलाश में घूमते हैं, उनने तो उसे अज्ञान से स्वयं ढक रखा है। कोई अवसर मिला होता एवं इस अज्ञान के आवरण से मुक्त हुआ जा सकता तो ज्ञात होता कि मनुष्य वास्तव में क्या है? वह तो असीम शक्ति का भाँडागार है। स्वयं साक्षात् परमात्मा उसमें हैं। गुरु ऐसी ही स्थिति में से अपने शिष्य को, जो पूर्ण समर्पण भाव के साथ उसके पास आता है, उबारता है और उसे ज्ञान का सुरमा देकर उसकी दृष्टि खोल देता है−
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन् तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
चौथे अध्याय में भी भगवान ने ज्ञान की महिमा गाई थी (37 व 38वाँ श्लोक) तथा बार−बार यह कहा था कि ज्ञान की नौका में बैठकर तो पापी से पापी व्यक्ति भी तर जाता है (36वाँ श्लोक)। यहाँ भी भगवान उसी ज्ञान का माहात्म्य बखान कर रहे हैं। वह भी त्रिगुणातीत होकर परमसत्ता को समझने हेतु प्रेरित करने के लिए। यह समझे बिना हम आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में एक भी कदम आगे नहीं रख सकेंगे।
भगवान का सही स्वरूप
श्रीकृष्ण ने इसीलिए कहा है कि (विभुः) सर्वव्यापी ईश्वर किसी का पाप (कस्यचित् पापं) और पुण्य भी (सुकृतं च एव) ग्रहण नहीं करते (न आदत्ते)। अज्ञानरूपी अविद्या से (अज्ञानेन्), सर्वत्र सच्चिदानंदघन परमात्मा व्याप्त हैं, ऐसा ज्ञान (ज्ञानं) ढका रहता है (आवृतं)। उसी से (तेन) जीव, साँसारिक मनुष्य (जन्तवः) मोह को प्राप्त होते हैं अर्थात् आत्मस्वरूप ज्ञान को भूलकर आत्मा को संसारी ही समझ बैठते हैं, फलस्वरूप मोहमुग्ध हो भटक जाते हैं (मुह्यन्ति)। शब्दों के विग्रह से गीता के उपदेश को भली भाँति समझा जा सकता है। परमहंस श्री रामकृष्णदेव कहते थे, “वेदाँत के अनुसार निर्गुण भाव से परब्रह्म (ब्रह्म) अव्यय आत्मा है और वह जीव का पाप−पुण्य ग्रहण नहीं करते (कर्मफल भोगी नहीं होते) सगुण भाव से वह बहा तो जीव की परमगति तथा कर्मफल का प्रदाता ईश्वर है।” वे कहते थे कि जो अखंड सच्चिदानंद हैं, वे ही लीलास्वरूप हो विविध रूप धारण कर आते हैं। वस्तुतः माया ही अज्ञान है। वही अहंबुद्धि को जन्म देती है, जो कि जीव के मोह−बंधन का व आत्मस्वरूप का ज्ञान खो बैठने का कारण बनती है। इस अहंरूपी अज्ञान के मिटने पर ही ब्रह्म आत्मारूप में प्रकट होते हैं, सही दिव्य शक्तिशाली रूप में पूर्ण ज्ञान के साथ अवतरित होते हैं। चैतन्य चरितामृत में भगवान कहते हैं−अद्वय ज्ञान−तत्त्व कृष्णेर स्वरूप। ब्रह्म आत्मा भगवान तिन सार−रुप॥
दृष्टिकोण ठीक हो, ज्ञान प्रकाशित हो
दृष्टाँत से समझें। इस शरीररूपी मशीन को चलाता तो ईंधन ही है, पर उसे कहाँ जाना है, यह चिंतन तो मस्तिष्क एवं शरीर धारी मनुष्य का इच्छातंत्र करता है। इस मशीन को चलाने वाला कितना समर्थ है, इसका उस ईंधन से कोई संबंध नहीं, जो ग्रहण किया जा रहा है, भोजन या प्राणवायु के रूप में। यदि मशीन चलाने वाला खुद ही होश में न हो तो ईंधन से उत्पन्न शक्ति उस उपकरण−काया को नष्ट ही कर देगी। यदि हमारे मन−बुद्धि जाग्रत−सावधान हों तो हमारी जीवनयात्रा सुखकर हो सकती है। जीवनीशक्ति हमारे अंदर सतत काम कर रही है। यह चेतना के स्तर पर आत्मसत्ता रूप में विद्यमान है। वह किसी से प्रभावित−अप्रभावित (बहिरंग क्रिया−कलापों से, अनगढ़ विचारों से) कभी नहीं होती। यदि व्यक्ति का दृष्टिकोण ही गलत है, भावनाएँ ही दूषित हैं तो यह गड़बड़ी जीवात्मा के विनाश का कारण बनेगी। चूँकि ज्ञान अज्ञान से ढका है, वासनाओं ने उसे जकड़ रखा है, सत्य संबंधी जानकारी मनुष्य तक नहीं पहुँच पा रही है, मिथ्या धारणाएँ हमारे जीवन में घर कर लेती हैं। यह अज्ञानरूपी आवरण अपनी आत्मसत्ता को विकसित कर, न कि त्रिगुणमयी (सत्, रज, तम से युक्त) प्रकृति से प्रभावित हो, हटाया जाना चाहिए। यही आत्मज्ञान की प्राप्ति का, जीवनसाधना का एकमेव मार्ग है। जीवन भर जीव को इसी पुरुषार्थ में लगे रहना होता है। जो अज्ञानरूपी आवरण से जल्दी मुक्त हो मोह से मुक्त हो जाता है, वह मोक्ष में प्रतिष्ठित हो आनंदमय जीवन जीता है। कुँठाओं रहित जीवन, संत्रास−तनाव−विक्षुब्धता रहित जीवन जीने का एक ही मार्ग है कि अज्ञानरूपी आवरण जो ज्ञान पर ढका है, जिसमें मुग्ध हो जीव गलत कामों में लगा है, किसी तरह हटे। चाहे वह साधना (ज्ञान) का मार्ग हो, गुरु के प्रति भक्ति व समर्पण हो, दिव्यकर्मी रूप में कर्मयोग का मार्ग हो, सभी उसके लिए खुले पड़े हैं। त्रिगुणातीत होते ही अज्ञान मिट जाता है, ज्ञान बादल हटने पर जाज्वल्यमान सूर्य की तरह प्रकाशित हो उठता है व जीव कह उठता है, सोऽहम्। मैं भी वहीं हूँ, जो यह परमात्मा है।
युग निर्माण योजना की प्रगतियात्रा
परमपूज्य गुरुदेव जीवन भर इसी पुरुषार्थ में निरत रहे। गायत्री−साधना उनने जन−जन के लिए इसी अज्ञान के आवरण से मुक्त होने के लिए प्रतिबंधों से मुक्त कराई। स्वयं कठोर तप कर उस स्वरूप में पहुँच गए, जहाँ उत्कीलन−शाप विमोचन स्वयं गुरुसत्तारूपी अवतारी चेतना करती है। गायत्री त्रिपदा है। अज्ञान, अभाव, अशक्ति, इन तीनों को मिटाने की सामर्थ्य रखती हैं। चेतनातत्त्व की इकाई यही परमतत्त्व है। उपासना (भक्तियोग), साधना (ज्ञानयोग) एवं आराधना (कर्मयोग) द्वारा हमारी गुरुसत्ता ने जन−जन को अपनी ऋतंभरा−प्रज्ञा विकसित करने को प्रेरित किया। सभी की जीवनसाधना निखरी, दृष्टिकोण बदले, मुग्धता की स्थिति से निकलकर वे जंतु से दिव्यकर्मी बने एवं सद्बुद्धि का आश्रय ले वे आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ते रहे। अपने आप का ज्ञान उन्हें स्वाध्याय से होने लगा। श्रेष्ठ विचारों में स्नान उनके स्वभाव को उच्चस्तरीय भाव में प्रतिष्ठित करता चला गया। जीवनोद्देश्य की जानकारी उस ध्यान से हुई, जिसमें उनने जाना कि वे कौन हैं−एक सामान्य जीव नहीं−विशिष्ट प्रयोजन के लिए जन्मे प्रज्ञा परिजन, जिन्हें उलटे को उलटकर सीधा करना हैं, विचार−क्राँति करनी है। अपने साथ औरों के चिंतन पर छाए कुहासे को भी मिटाना है। यही युग निर्माण योजना की प्रगतियात्रा है। गीताकार के संदेश को किस कुशलता से इस युग के संस्कृति पुरुष ने−योगेश्वर स्तर की सत्ता ने सामान्यजन तक पहुँचाया है, इसे शाँतिकुँज के प्रज्ञा अभियान को, युग निर्माण की प्रक्रिया को समीप से देखकर ही समझा जा सकता है। तब समझ में आएगा कि देव संस्कृति पुरुष ने−योगेश्वर स्तर की सत्ता ने सामान्यजन तक पहुँचाया है, इसे शाँतिकुँज के प्रज्ञा अभियान को, युग निर्माण की प्रक्रिया को समीप से देखकर ही समझा जा सकता है। तब समझ में आएगा कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय का वास्तविक उद्देश्य क्या है? अज्ञान का आवरण आत्मसत्ता पर से उठाना−व्यक्ति को उसके यथार्थ सत्त्व का बोध करा देना। फिर गीता के संदेश पर आते हैं।
निर्लिप्त−निर्गुण स्थिति
निर्गुण−आत्मस्थिति में जैसे ही लौटकर जीव आत्मज्ञान को पुनः पाता है, वह प्रकृति के मुग्ध कर देने वाले लीलाजगत से, कर्मबंधनों से मुक्ति पा जाता है। तब प्रकृति के गुण उसे स्पर्श नहीं करते। वह अलिप्त बना रहता है। मन−प्राण−शरीर सभी रहते हैं, प्रकृति अपना कर्म भी करती रहती है, पर आँतरिक सत्ता निरपेक्ष ही बनी रहती हैं। “इस उच्च स्थिति को प्राप्त जीव स्थिर, मुक्त सर्वसाक्षी अक्षरब्रह्म हो जाता है,” ऐसा श्री अरविंद का मत है। वे कहते हैं कि यह पूर्णत्व नहीं हैं। आत्मा में तो मुक्ति है, पर प्रकृति में अपूर्णता है। इसके लिए कोई संन्यास की बात कह सकता है, पर गीता कर्म−संन्यास (सर्व कर्माणि सन्यस्य) की बात कहती हैं, क्योंकि उसमें ब्रह्म को आँतरिक अर्पण है। क्षर भाव में ब्रह्म प्रकृति के कर्म को पूरा−पूरा सहारा देता है, जबकि अक्षर भाव में ब्रह्म प्रकृति के कर्म को सहारा देते हुए भी अपने मुक्त स्वरूप को कायम रखता है।
जब एक आदर्श दिव्यकर्मी अपने ज्ञान के सहारे कर्म करते हुए भी त्रिगुणातीत बन जाता है तो वह श्रीकृष्ण के आदेश का पालन करता है, जिसमें भगवान ने आदेश दिया था−”निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।” ऐसी स्थिति में वह भगवान के प्रिय निर्देश ‘मन्मना, मच्चित्तः, मद्भावम्’ को प्राप्त हो जाता है। यही हम सबका भी लक्ष्य होना चाहिए। दिव्यजन्म की परमसिद्धि, किसी महामानव की लोक−यात्रा का चरमबिंदु यह रूपांतर ही होना चाहिए। श्री अरविंद यह रूपांतर ही होना चाहिए। श्री अरविंद कहते हैं कि यह संसिद्धि जब प्राप्त हो जाती है, तब पुरुष अपने आप को प्रकृति के स्वामी के रूप में जानता है और भागवत् इच्छा का एक हिस्सा बनकर वह अपनी प्रकृति की क्रियाओं को दिव्यकर्म में रूपांतरित करने में लग जाता है। ऐसे ही व्यक्ति उच्चस्तरीय महापुरुष बनते हैं, अक्षय कीर्ति को प्राप्त होते एवं जन−जन का कल्याण करते हैं। युग उन्हीं को आज पुनः तलाश रहा है। गीता के पंद्रहवें श्लोक की व्याख्या हमें ऐसे ही चैतन्य जीवंत दिव्यकर्मी की पहचान कराती है। युग परिवर्तन ऐसे ही महापुरुष करते हैं। सदा से ऐसा होता आया है व अब इस युग में भी ऐसा ही होने जा रहा है, यह सुनिश्चित माना जाना चाहिए।
सूर्यवत् प्रकाशित अंतरात्मा
ज्ञान प्राप्त हो गया, त्रिगुणातीत स्थिति प्राप्त हो गई तो यह समझें कि काफी काम हो गया। ज्ञान तो था ही भीतर मात्र भ्राँतियों का परदा उस पर पड़ा था, अतः वासना, तृष्णा, अहंता ही सब कुछ दिखाई देते थे, ज्ञान का वास्तविक स्वरूप समझ में नहीं आता था। बिना किसी कामना के, कर्मफल की चिंता के जीवन जीने का तरीका ज्ञान पर छाए परदे का अनावरण ही है। तभी मनुष्य अंदर की शाँति के साथ प्रसन्नतापूर्वक जीवन की सकता है। इसीलिए वे अगले (सोलहवें) श्लोक में कहते हैं−
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषाँ नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
किंतु (तु) जिन लोगों का (येषाँ) वह (तत्) अज्ञान या मोह (अज्ञानं) आत्मा या ब्रह्म के (आत्मनः) तत्त्वज्ञान के द्वारा (ज्ञानेन) नष्ट कर दिया गया है (नाशितं), उन लोगों का (तेषाँ) वह (तत्) ज्ञान (ज्ञानं) सूर्य की तरह अज्ञानाँधकार को नष्ट कर देता है (आदित्यवत्), आत्मतत्त्व को−सच्चिदानंदघन परमात्मा को (परम्) प्रकाशित कर देता है (प्रकाशयति)।
कितना स्पष्ट व सही प्रतिपादन है। उपमा भी कितनी सुँदर है। भावातीत अक्षर परब्रह्म की सत्ता का अनुभव सर्वोच्च सत्य को प्रकाशित कर देता है। हमें वस्तुतः आत्मबोध करा देता है। अब इस गूढ़ अर्थ वाले श्लोक एवं इससे और क्या उपलब्धियाँ होती हैं, इस व्याख्या वाले अगले श्लोकों का क्रम आगामी अंक में। (क्रमशः)
देवताओं ने विष्णु भगवान से कहा, “स्वर्ग में रहते हुए बहुत दिन हो गए, सो ऊब आने लगी है। किसी इससे भी अच्छे लोक को भेज दीजिए।” विष्णु ने ‘हाँ’ कह दी और मनुष्य लोक भेज दिया, साथ ही यह भी कहा, “सुख और सौंदर्य तभी दृष्टिगोचर होगा, जब तुम लोग करुणा जीवित करोगे और सेवाधर्म का रसास्वादन करोगे।”
देवता विमानों में बैठकर मनुष्य लोक चल पड़े, पर वहाँ तो सभी लोग दुःखों में डूबे थे। देवताओं ने उनकी सेवा करने का निश्चय किया। कोई मेघ बनकर बरसने लगा। किसी ने ऊष्मा और ऊर्जा बिखेरी। कोई रात्रि में शीतलता भरा प्रकाश बाँटने लगा। किन्हीं ने वनौषधियों का रूप बनाया और अपरिग्रही बनकर लोगों की कष्टमुक्ति का उपाय बताते हुए परिभ्रमण करने लगे।
बहुत दिन बाद विष्णु भगवान ने नारद को देवताओं की स्थिति मालूम करने पृथ्वी पर भेजा। उनने आकर उत्तर दिया, “देवता लोकसेवा के आनंद को स्वर्ग से बढ़कर मान रहे हैं और उनका वापस लौटने का मन नहीं है।”
दीक्षा से मिली दिशा
पूरब दिशा में तारों की चमक हलकी−सी फीकी होने लगी थी। अँधेरा कुछ उठता दिखाई दिया और अपने घोंसले में सोए पक्षियों का कलरव सुनाई देने लगा। तभी श्रीराम अपनी पूजा की कोठरी में आसन बिछाने लगे। बैठकर ‘अपवित्रः पवित्रों वा सर्वावस्थाँ गतोऽपि वा......’
महामना मालवीय जी ने मंत्रदीक्षा के समय विधि−विधान समझाया था। यह भी कि संध्यावंदन दोनों समय होना चाहिए। उस मार्गदर्शन में संध्या के उपक्रम, स्थान और समय का निर्देश भी था। उनके कहे हुए शब्द स्मृति में हमेशा रहते थे और कुछ महीनों के अभ्यास से तो स्वभाव में ही घुल−मिल गए थे। शास्त्रों में संध्या के लिए जिन स्थानों को उत्तम बताया गया है, उनमें पुण्यक्षेत्र, नदीतट, पवित्र जलाशय, पर्वत की गुहा या शिखर, एकाँत बगीचा, देवमंदिर या अपना घर प्रमुख है। श्रीराम पहले तो गाँव से बाहर देवमंदिर में बैठकर संध्यावंदन करते थे। पिता का स्वर्गवास होने के बाद घर में ही बैठने लगे। विशाल हवेली के एक कमरे में पूजास्थान बना दिया। कमरे का दरवाजा पूरब दिशा में खुलता था। दरवाजे के बाहर तुलसी का बिरवा था। संध्या के लिए बैठते समय मुँह पूरब दिशा की ओर होता था। अर्घ देना होता तो वे बाहर आ जाते और बिरवे के पास खड़े होकर सूर्य नमस्कार करके इस तरह जल चढ़ाते कि वह जमीन पर न गिरकर तुलसी की क्यारी में गिरे।
मंदिर में संध्यावंदन करते हुए अर्घ के लिए उठकर कहीं जाना नहीं पड़ता था। जिस जगह बैठते, वहीं सामने एक पात्र रख लेते और खड़े होकर जल चढ़ा देते। माँ के कहने पर घर में ही उपासना शुरू की तो अर्घ के लिए बाहर जाना जरूरी हो गया। जिस सावधानी से स्थान का चुनाव किया, वैसी ही सावधानी समय के निर्धारण में भी बरती। उसे पूरी तरह निभाने का प्रयत्न किया। प्रातः−संध्या सुनहरा सूर्य उदय होने से पहले आरंभ हो जानी चाहिए और सायंकाल की संध्या सूर्यास्त से पहले।
श्रीराम सुबह चार बजे उठ जाते। स्नान आदि से निवृत्त होने और संध्यावंदन के लिए बैठने में एक घंटा समय लगता। हवेली परिसर में बने कुएँ से वे अपने हाथ से पानी खींचते। बाहर कंदील की रोशनी फैली रहती। उसे कोई कठिनाई नहीं होती। हवेली के लोग हालाँकि जग जाते थे, फिर भी श्रीराम इस बात की पूरी सावधानी बरतते थे कि बाल्टी रखने या पानी गिराने की आवाज नहीं हो। चुपचाप स्नान से निपट जाते। किसी को आहट तक नहीं होती थी।
संध्या आरंभ करने के बाद श्रीराम जप और ध्यान में पूरी तरह तन्मय हो जाते थे। अवधि की दृष्टि से उनकी संध्या चालीस मिनट में संपन्न हो जाती थी, लेकिन इस अवधि में भी उनकी तन्मयता पूरी हो जाती थी। गायत्री मंत्र की एक माला और सूर्योदय के स्वर्णिम प्रकाश का ध्यान करने में छह मिनट का समय लगता है। सध जाने पर चार मिनट ही लगते हैं। इस स्थिति में गणना में थोड़ी चूक की संभावना रहती है। गायत्री दीक्षा लेने के बाद श्रीराम पाँच माला सुबह और दो माला शाम के समय जपते थे। तन्मयता इतनी रहती थी कि भूल−चूक की गुँजाइश ही नहीं बचती। प्रातः−सायं की संध्या में कुल मिलाकर एक घंटा समय लग जाता। ध्यान−धारणा का क्रम जप के बाद भी यथासमय चलता रहता।
ऐतिहासिक घड़ी
विक्रम संवत् 1973 की वसंत पंचमी थी। अँगरेजी तारीख के अनुसार 17 जनवरी, 1926 का दिन। श्रीराम की आयु लगभग पंद्रह वर्ष हुई होगी। वे संध्यावंदन कर रहे थे। गायत्री जप करते हुए तन्मय अवस्था थी। सुखासन से बैठे श्रीराम के सिर्फ होंठ हिल रहे थे। मुँह से कोई ध्वनि नहीं हो रही थी। जप की उपाँशु अवस्था थी, जिसमें होंठ तो हिलते हैं, मुँह के भीतर स्वर यंत्रों में भी स्फुरण होता रहता हैं, लेकिन ध्वनि नहीं होती। मुँह बंद कर मानस जप में अधिक समय लगता है और विस्मरण की आशंका भी रहती है। मालवीय जी ने इसीलिए उपाँशु जप को वरीयता दी थी। इस जप के साथ पूरब दिशा में उग रहे सविता देवता का ध्यान। बंद नेत्रों से भृकुटि में जो क्षितिज दिखाई दे रहा है, वही जैसे उदायचल है। भ्रूमध्य की आकृति भी ऐसी ही बनती है, जैसे पर्वतों के दो गोलार्द्ध मिल रहे हों और उनके संधिस्थल पर नए आलोक का उदय होता हो।
उदित हो रहे आलोक के समय चेतना−जगत में स्वर्णिम आभा फैलने लगी। प्रकाश की चादर बिछती चली जा रही है। अपना अस्तित्व निसर्ग की चादर बिछती चली जा रही है। अपना अस्तित्व निसर्ग के इस विस्तार से अभिभूत हो रहा है। शरीर, मन, बुद्धि, चित्त और उससे आगे सत्ता के जितने भी लोक हो सकते हैं, सबमें उस प्रकाश से जीवन−चेतना व्यापती जा रही है। भोर होते ही रात की नींद जैसे अपने आप उचटने लगती है, वैसे ही चेतना में छाई क्लाँति दूर हो रही है और नया उत्साह आ रहा है। सुबह की ताजगी अस्तित्व के रोम−रोम में फैलती जा रही है। स्वर्णिम प्रकाश का ध्यान करते हुए यह अनुभूति भी प्रगाढ़ होती जाती थी।
जिस क्षण की घटना का उल्लेख आगे की पंक्तियों में किया जा रहा है, उस क्षण में जप और ध्यान की क्या अवस्था चल रही थी, कहना कठिन है। जिस तरह के उल्लेख मिलते हैं, उनमें वह अवस्था मनोमय की ही कही जा सकती है। इस अवस्था में चित्त संकल्प−विकल्प से मुक्त हो जाता है। योगशास्त्रों में ‘निर्वात निष्कंप दीपशिखा’ कहते हुए ही ऐसे चित्त का वर्णन किया गया है। वायु रहित स्थान में जलते हुए दीपक की लौ जिस तरह नहीं काँपती, उसी तरह हमेशा काँपते और डोलते रहने वाला चित्त भी संकल्प−विकल्प के वेगों का अभाव हो जाने से स्थिर हो जाता है। कुछ योगियों के अनुसार यह ध्यान में गहरे उतरने और समाधि के समीप पहुँच जाने की अवस्था है।
प्रकाश शरीर का अवतरण
श्रीराम अपने आसन पर बैठे मनोलय अथवा समाधि की भूमिका में हैं। उस भूमिका से गुजरते हुए जप के अंतिम चरण तक पहुँचते हैं। जप पूरा होता है, सविता देवता के चरणों में जप−निवेदन करते हुए हाथ जोड़कर बैठे ही थे कि कोठरी में अचानक बिजली−सी कौंधी। चकाचौंध करने वाला प्रकाश भर गया। बिजली चमकने के तत्क्षण ही प्रकाश लुप्त हो जाता है, लेकिन उसकी प्रखरता शाँत−शीतल हो गई। सूर्य की स्वर्णिम आभा और चंद्रमा की चाँदनी जैसा शीतल और शाँत।
जिस समय प्रकाश कौंधा था, उस समय कोठरी में जैसे हजार सूर्य एक साथ चमक उठे थे। उस समय हुई चकाचौंध जब धीरे−धीरे स्थिर हो गई, तो कोठरी में एक सौम्य आकृति प्रकट हुई। लंबी जटाएँ, शरीर अत्यंत कृश, लेकिन देदीप्यमान। आकृति क्षीण जरूर दिखाई देती थी, लेकिन स्वरूप में तेजस्विता और बल का पूर्ण समावेश था। वह कृश काया फौलाद से बनी प्रतीत होती थी। आकृति दिगंबर थी। आस−पास आभामंडल छाया हुआ था और शरीर कहीं−कहीं बरफ की चादर से ढका हुआ सा लगता था। साधक श्रीराम उस सौम्य आकृति को देखकर हर्षित हुए। मन में आश्वस्ति का भाव आया। क्षण भर पहले जो भय व्याप्त रहा था, वह तिरोहित हो गया। उस आकृति को देखकर मन में उल्लास उमगने लगा। इच्छा हुई कि उठकर प्रणाम कर लें। संध्याकर्म में प्रदक्षिण कर्म अभी बाकी था। उस दिव्यमूर्ति ने श्रीराम के भावों को पढ़ लिया और बैठे रहने का संकेत किया। श्रीराम बैठे उस आकृति को निहारते रहे, जैसे सविता देवऋषि रूप में प्रकट हुए हों।
आकृति करीबी आई। ऐसा प्रतीत नहीं होता था कि वे कुछ कदम आगे बढ़कर आए हों। यह प्रतीत हो रहा था कि जैसे दूरी अपने आप घट गई हो। समीपता इतनी बनी कि बैठे−बैठे ही हाथ आगे बढ़ाकर चरण छू लें। चरण स्पर्श की आवश्यकता नहीं पड़ी, सिर अपने आप चरणों में झुक गया। उस दिव्य आकृति ने अपना हाथ श्रीराम के सिर पर रख दिया। वह स्पर्श व्यक्तित्व में जो झंकार जगा गया, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मनीषियों ने उस तरह की अनुभूतियों को हजार तरह से कहने की कोशिश की है और कोशिश कर चुकने के बाद थककर चुप हो गए हैं। उपनिषदों ने उसे इन भावों में व्यक्त किया है कि जो सुनते हैं। (कान) वे बोलते नहीं और जो बोलता है (मुँह), वह सुनता नहीं। कबीर ने इसे ‘गूँगे केरी सरकरा’ कहकर गाया है। स्वाद तो आता है, लेकिन कहना कठिन है।
समय मानो ठहर गया
स्पर्श ने श्रीराम के सामने एक अलग ही संसार खोल दिया। उस संसार में वाणी की आवश्यकता नहीं हुई, समय भी ठहर गया और स्थान तो जैसे अपनी सीमाएँ ही भूल गया। देश−काल से परे उस अनुभूति में मार्गदर्शक सत्ता ने पिछले कई जन्मों की यात्रा करा दी। यह यात्रा स्मृतियों में उतरकर नहीं, शुद्ध चेतना के जगत में प्रवेश कर संपन्न हुई थी। उस जगत में प्रवेश करते ही श्रीराम अपने आप को वाराणसी में उपस्थित अनुभव करते हैं। उस क्षण को अनुभव कहना भी शायद गलत हो। वे वाराणसी में ही थे। पूजा की कोठरी में जिस रूप, अवस्था और वेश में थे, उससे सर्वथा भिन्न। अपने आपको एक अनजाने रूप में पाया, लेकिन ऐसा नहीं लगा कि किसी आश्चर्य लोक में हों। अपरिचित होते हुए भी वह समय, स्थिति और स्वरूप सहज लग रहा था, जैसे अपनी चेतना में ही घट रहा हो या स्वयं उस स्थिति के नायक हों।
एक दृश्य में स्वामी उस स्थिति के घाट पर स्नान करने जा रहे है। सीढ़ियों पर कोई लेटा हुआ, रामानंद से रामनाम की दीक्षा लेने की आस लिए हुए। पहले प्रयत्न कर देखा था, लेकिन गुरु के सहयोगियों ने यह कहकर मना कर दिया कि अंत्यजों को रामनाम की दीक्षा नहीं दी जाती। वे अपने आप चाहे जप लिया करें, गुरुमुख से सुनने की योग्यता उनमें नहीं हैं। वह ‘कोई’ संत कबीर थे और पूजा की कोठरी में सिर पर हाथ का स्पर्श पाकर जो श्रीराम यह सब अनुभव कर रहे थे। वह अपने आप को सीढ़ियों पर लेटा हुआ भी देख रहे थे। ब्राह्ममुहूर्त्त में स्वामी रामानंद गंगास्नान के लिए आए। सीढ़ियों पर कबीर ने अपने आप को इस तरह समेट लिया कि दिखाई न दें। शरीर पर पड़ा और बोध हुआ कि किसी को चोट लगी है। इस बोध के साथ स्वामी जी के मुँह से ‘राम−राम’ की ध्वनि निकल आई। कबीर ने तत्क्षण उठकर स्वामी जी के पाँव पकड़ लिए और कहा, मैं धन्य हुआ पूज्यवर! मुझे गुरुमंत्र मिल गया।
इस घटना के बाद स्वामी रामानंद ने कबीर को विधिवत् अपना शिष्य स्वीकार किया। काशी के विद्वानों, आचार्यों, साधुओं और महामंडलेश्वरों ने इसका घोर विरोध किया। उन्हें धर्मद्रोही तक करार दिया। रूढ़ियों और परंपरा के प्रति अतिशय आग्रह रखने वाले स्वामी रामानंद पर इसका जरा भी असर नहीं हुआ।
कबीर कपड़ा बुनकर अपना निर्वाह चलाते थे। काम करते हुए ही वे साधकों और जिज्ञासुओं को धर्मोपदेश देते थे। दिखाई दे रहा है कि दसियों लोग उन्हें घेरे बैठे हैं। चर्चा के विषय अध्यात्म तक ही सीमित नहीं हैं, घर, परिवार, समाज और समकालीन घटनाओं पर भी बात−चीत होती है। निर्वाह होने योग्य कपड़ा तैयार हो जाने के बाद कबीर खुद उसे बेचने जाते। कोई मोल−भाव नहीं, जिसने जो मूल्य आँका और देना चाहा, वह ले लिया। फिर घर आ गए। इस तरह के सौदे में कभी घाटा नहीं हुआ।
एक सत्संग में किसी ने पूछा, “कबीर साहब, आपका परिवार बड़ा खुश है। सुखी दाँपत्य का क्या रहस्य है?” सुनकर कबीर कुछ क्षण तक चुप रहे। फिर पत्नी को पुकारा, “लोई, बड़ा अँधेरा है, दीपक जलाकर लाना।” (लोई उनकी पत्नी का नाम था।) सुनने वालों को भारी असमंजस हुआ। भरी दोपहरी का समय था, बीच आसमान में सूरज चमक रहा था। जिस जगह कबीर सत्संगियों के साथ बैठे थे, वहाँ भी पर्याप्त रोशनी थी। अबूझ स्थिति में पड़े लोगों को तब और आश्चर्य हुआ, जब लोई दीपक जलाकर लाई और कबीर के पास रखी एक चौकी पर रखकर चली गई। कबीर ने कहा, “पति−पत्नी में इस तरह का विश्वास हो तो दाँपत्य बड़े मजे से चलता है। लोई भी जानती है कि भरी दोपहरी है और दीपक की जरूरत नहीं है, फिर भी कहा तो उसने संदेह नहीं जलाया। वह कहे अनुसार चुपचाप अपना काम कर चली गई।”
परिवार की आमदनी सीमित थी और आगंतुकों का ताँता लगा रहता था। आने वालों की आवभगत भी होती। घर में हमेशा तंगी बनी रहती। पुत्र कमाल बड़ा हुआ। परिवार में बनी रहने वाली तंगी का अच्छी तरह खयाल था। उसने व्यापार−व्यवसाय में ध्यान दिया। कबीर का जोर वहाँ भी शुद्धता और न्याय की कमाई पर रहता था। पुत्र को व्यावहारिक अध्यात्म की दीक्षा दी। वैसे संस्कार भी दिए। (क्रमशः)
रेखागणित के अनेक सिद्धाँतों का आविष्कारक यूक्लिड पिता के विरोध करने पर भी अपने काम में लगा रहता था। एक दिन उसके पिता ने कहा, यह बेवकूफी का काम अगर तुम नहीं छोड़ोगे तो मेरी संपत्ति में हिस्सा न पा सकोगे। यूक्लिड ने कहा, आप अपना धन भले ही अपने भाइयों को दे दें, मुझे अपने काम में इतना आनंद आता है कि आपकी दौलत उसके सामने तुच्छ है।
यूक्लिड पिता के धन का लोभ न छोड़ते तो दुनिया को गणित के उच्च सिद्धाँतों के लाभ देने में सफल न होते। छोटे लोभ में बड़े लाभ से वंचित रह जाते।
सतगुर हम सूँ रीझि कर एक कह्या प्रसंग। बरस्या बादल प्रेम का भीजि गया सब अंग॥
कबीरदास जी की इस साखी का अर्थ है, “सद्गुरु मुझ पर प्रसन्न हुए और उन्होंने रहस्य से भरा भगवद् भजन या परमात्मा के ज्ञान की बात मुझे बताई। इसे भक्ति तथा योग प्रसंग कहना चाहिए। इस प्रस्ताव से प्रेम के बादल बरसने लगे और मेरे सब अंग भीग गए।” (अंग भीगना अर्थात् अंतःकरण प्रेम से सराबोर हो जाना।)
सद्गुरु कबीर अपनी साखियों से गुरु−शिष्य के परस्पर अंतर्मिलन पर जो भी कहते आए हैं, वह इतिहास बन गया है। उन्हीं का प्रसंग इसी अंक में हमारी गुरुसत्ता के जीवन में जुड़ा आपने अभी पढ़ा है। बहुत बड़ा साम्य है दोनों के जीवन में, होगा भी क्यों नहीं, एक ही सत्ता दो अलग−अलग समयों में दो भिन्न रूपों में अवतरित हुई। कबीर सहज ही अपना कर्मयोग संपादित करते चलते थे और साथ−साथ जो कह जाते थे, वह एक संत, सुधारक और शहीद के नाते उनकी कही साखियाँ बन गई। परमपूज्य गुरुदेव जीवन भर आचरण से सीख देते रहे, एक कर्मठ लोकसेवी का जीवन जी गए। पत्रों से, प्रत्यक्ष मिलन से, अखण्ड ज्योति पत्रिका द्वारा एवं समय−समय पर अपने विराट आयोजनों के माध्यम से उनने कितने व्यक्तियों को प्रभावित किया होगा, उनके अंतःकरण को सराबोर किया होगा, गणना भी नहीं की जा सकती।
समय−समय पर इस स्तंभ में गुरुसत्ता के हाथ में लिखे पत्र हम उपर्युक्त तथ्य की साक्षी रूप में देते रहते हैं। इसके अलावा ऐसे व्यक्तियों के संस्मरण भी, ताकि हमारी श्रद्धा गुरुतत्त्व के प्रति अक्षुण्ण बने− और भी अधिक बढ़े। जिस स्तर पर एक लंबी अवधि 1940 से 1990 के बीच में उनने कार्य किया, वह भागीरथी पुरुषार्थ से भरा तो है ही, गुरुवर, के वैविध्यपूर्ण जीवन, लोक−व्यवहार एवं शिक्षण की एक अद्भुत तकनीक का परिचायक है। प्रेम बाँटना, व्यवस्था चलाना, सत्परामर्श से जीवन बदल देना, ये सभी अलग−अलग कार्य हैं, पर पत्रों की भाषा में यही सब कुछ गुँथा दिखाई देता है। इस अंक के लिए कुछ पत्र चुने हैं, जो प्रस्तुत हैं।
पहला पत्र 1 जुलाई, 1941 का है, जो अजमेर के श्री मोहनराज जी को लिखा गया है। वे लिखते हैं−
चि0 मोहनराज, स्नेह
तुम्हारा पत्र मिला। संभवतः अब आयु की दृष्टि से तुम बड़े हो गए होगे, पर जब मथुरा आए थे, तब छोटे थे। हमारे मस्तिष्क में तुम्हारा वही चित्र सदा रहता है। नंद के लिए कृष्ण सदा बालक ही थे। हमें अपने घर में बालकों की ही तरह सदा लगते रहे हो। चिट्ठी−पत्री आने−जाने में कभी देर−सबेर हो जाए तो ऐसा नहीं समझना चाहिए कि पं0 जी का स्नेह या स्मरण कुछ कम हो गया है। काम का झंझट बहुत रहता है, इसलिए प्रायः आगत पत्रों का ही उत्तर जा पाता है। अपनी ओर से तो पत्रा कभी ही शायद किसी को लिख पाते हैं। तुम अपनी ओर से पहल करके पत्रव्यवहार का क्रम चला दिया करो।
यहाँ का कार्य साधारणतः अच्छा चल रहा है। प्रकाशन भी काफी पहुँच चुका। पत्रिका जी करीब दस हजार छपती है। कोई आर्थिक कष्ट नहीं हैं।
पत्र की भाषा स्नेह से सनी है, एक गुरु का शिष्य के प्रति, एक पिता का पुत्र के प्रति, एक बड़े भाई का छोटे भाई के प्रति। नंद−कृष्ण, घर के बालक की उक्ति देकर गुरुदेव अपना स्नेह ही जता रहे हैं। पत्राचार में दो दिन का भी विक्षेप होता था तो मोहन भंडारी जी व्यथित हो जाते थे। अतः वे अपनी मन की व्यथा लिख देते थे। एक पत्र भी अनुत्तरित नहीं गया। एक घंटे में साठ या सत्तर से अधिक पत्र लिखना एक असंभव−सा कार्य लगता है, पर वह हुआ है एवं वही इस मिशन का मूल आधार बना।
अगला पत्र बिजनौर की काँति त्यागी को लिखा गया है। यह 29-4-54 को पोस्ट किया गया। इसमें वे लिखते हैं−
प्रिय पुत्री काँती, आशीर्वाद, पत्र मिला। यदि तुम श्रद्धापूर्वक गायत्री माता का आँचल पकड़े रहोगी तो उसका परिणाम बहुत ही कल्याणकारक होगा। इतना निश्चित है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती।
तुम्हारे पूछे हुए सभी प्रश्नों का उत्तर गायत्री महाविज्ञान के प्रथम खंड में मौजूद हैं। एक बार उसे ध्यानपूर्वक पढ़ लो तो सभी बातें ठीक प्रकार समझ में आ जाएँगी।
तुम हर महीने अखण्ड ज्योति पत्रिका अवश्य पढ़ती रहा करो। इससे तुम्हें अनेक महत्त्वपूर्ण बातें विदित होती रहेंगी।
गायत्री के प्रति परिपूर्ण श्रद्धा विकसित करने की बात पितृवत् लेखनी से पूज्यवर कर हरे हैं, साथ ही गायत्री महाविज्ञान से सभी समस्याओं का समाधान एवं ‘अखण्ड ज्योति’ के स्वाध्याय को एक नियमित रुटीन बनाने की बात भी कह रहे हैं। उनका स्पष्ट मत, शुरू के भी कई पत्रों का जब हम अनुशीलन करते हैं, तो यही रहा है कि अपनी सारी समस्याओं का समाधान ‘अखण्ड ज्योति’ में ढूँढ़ने का प्रयास करें। यही नहीं, वास्तविक ज्ञान, आत्मज्ञान भी उसी से मिलता है, यह वे लिखते रहे हैं। वस्तुतः पत्र−लेखन व पाती की ही तरह से ‘अखण्ड ज्योति’ का लेखन−संपादन उनकी दैनिक साधना का एक अंग था, चाहे वे मथुरा हों या बाहर। पहले के पत्र में हम पढ़ चुके हैं कि दस हजार पत्रिकाएँ उस समय छपती थीं। अब छपती हैं साढ़े छह लाख, लगभग पैंसठ गुना अधिक। इतनी ही विभिन्न भाषाओं में भी छपती हैं। यही वह धरोहर है, जिसने मिशन को इतनी ऊँचाइयाँ दी हैं।
ऐसा ही एक पत्र श्री रामजी लाल खंडेलवाल (कोटा) के नाम है, जिसमें 20-7-62 को वे लिखते हैं−
आप अपने परिचित, संबंधी एवं सत्पात्र व्यक्तियों में से नौ ऐसे चुन लें, जिनके लिए एक वर्ष तक पत्रिका अपनी ओर से उपहार में भेजी जाएँ। लिस्ट प्राप्त होते ही चालू महीने से उनके नाम पत्रिकाएँ जारी कर देंगे।
संभवतः यही कुँजी थी पत्रिका के बहुगुणित होने की। पत्रिका नहीं, वह प्राणचेतना का प्रवाह कहते रहे हैं, जो हिमालय से आता है। श्रेष्ठ विचारों के प्रति आज के युग में यह चसका पैदा करना एक बहुत बड़ा पुरुषार्थ है। श्रेष्ठ साहित्य तो हिंदी में अब दिखाई ही नहीं देता। मात्र हलका मनोरंजन शेष रह गया है। सारी किताबें अँगरेजी में ही उपलब्ध हैं। ‘अखण्ड ज्योति’ व उसकी सहयोगी पत्रिकाओं ने हिंदी जगत की कितनी बड़ी सेवा की है, इसका जब भी मूल्याँकन होगा, तब लोग जानेंगे।
अब अंत में एक पत्र पूज्यवर द्वारा परमवंदनीया माताजी को अपने प्रवासक्रम से लिखा गया प्रस्तुत है। 70 से 72 के प्रारंभिक माहों में शक्तिपीठों के उद्घाटन, प्राणप्रतिष्ठा के दौरे पर पूज्यवर निकले थे। लंबे प्रवास होते थे। हर दिन वे जहाँ भी होते थे, वहाँ से शाँतिकुँज की व्यवस्था, कार्यकर्त्ताओं के लिए निर्देश−संपादन आदि के मार्गदर्शनपरक पत्र लिखा करते थे। कभी−कभी एक दिन में तीन−चार पत्र हुआ करते थे। प्रत्येक पर क्रमाँक डाला होता था। ऐसे कई पत्र हमने विगत 2002 के अक्टूबर/नवंबर माह की पत्रिकाओं में इसी स्तंभ में दिए हैं। यहाँ मेहसाणा से लिखा 16-11-71 का क्रमाँक−13 वाले पत्र का एक अंश प्रस्तुत हैं−
सत्र, सुरक्षा, पत्र−व्यवहार, मिलन, संपर्क, चौका, निर्माण, ब्रह्मवर्चस, जड़ी−बूटी आदि सभी काम ऐसे हैं, जो पूरा−पूरा मनोयोग तथा परिश्रम चाहते हैं। छोटे आकार के होने पर भी उनका स्तर उठाना चाहिए। सभी कार्यकर्त्ताओं में जिम्मेदारी, सहयोग तथा श्रमनिष्ठा की भावना भरनी चाहिए। उसी से उनका निज का तथा मिशन का स्तर उठेगा। नित्य प्रातः सभी को बुलाकर सुझाव, परामर्श, पर्यवेक्षण का क्रम चलाना चाहिए।
यहीं कुँजी है संगठन संचालन की, किसी संस्था को खड़ा करने की एवं विधि−व्यवस्था से उसे आगे बढ़ाते रहने की। परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन को पढ़ते हैं तो उसमें एक श्रेष्ठ साधक बनने की सीख मिलती है, स्वाध्यायशीलता का मार्गदर्शन मिलता है एवं संगठित होकर ‘सलाह लें−सम्मान दें’ वाली नीति का परामर्श प्राप्त होता है। यही कारण है कि समूह−साधना इस मिशन की नस−नस में संव्याप्त है एवं यह परिवार निरंतर बढ़ता, प्रगति ही करता चला जा रहा है। विनोबा कहते थे, कार्यकर्त्ता को ‘यश’ का दान कर देना चाहिए, निर्लिप्त भाव से बिना श्रेय लिए जीना चाहिए। आज के लिए भी यही मार्गदर्शन हम सबके लिए है।
एक बार लक्ष्मी धरती पर प्रसन्न भाव से उतरीं तो पृथ्वी ने उनका स्वागत किया। वह बोलीं, देवी! मेरे परिश्रमी पुत्रों को वरदान मत देना, इन्हें श्रमपरायण बने रहने देना, नहीं तो वे आलसी हो जाएँगे। दर्पमिश्रित स्वर में लक्ष्मी बोल उठीं, मेरी कृपा को तो सभी लालायित रहते हैं, मैं तुम्हारे पुत्रों को सुखी बनाने आई हूँ, तुम्हारा मूर्खतापूर्ण अनुरोध मुझे स्वीकार्य नहीं।
धरती कुछ और निवेदन करती, इससे पूर्व ही लक्ष्मी आगे बढ़ गई। देखते−देखते लोगों के घर सोने−चाँदी से भर गए। लोग अपने सौभाग्य को सराहने लगे। श्रम−पुरुषार्थ की ओर अब कौन ध्यान देता? वर्षा आई, न बीज बोया गया, न अन्न उपजा। खेतों में खरपतवार जम गए। घरों में भरे अन्न−भंडार समाप्त होते ही हा−हाकार मच गया। छाती से सोने की ईंटें बाँधे क्षुधा पीड़ितों ने प्राण त्याग दिए।
धरती रो पड़ी। विधाता से उसने विनती की। विधाता ने आकस्मिक लाभ के वरदान से प्रस्तुत अभिशाप को देखा और कुछ सोचकर गिने−चुने कर्मठ पुरुषार्थी धरती पर भेजकर सारा वैभव क्षण भर में समेट लिया। इन पुरुषार्थियों ने अपने परिश्रम से शीघ्र ही नई सृष्टि रच डाली। पृथ्वीवासियों ने परिश्रम−पुरुषार्थ की महत्ता को स्वीकारा।
इस वर्ष की त्रिविध योजना समझें, अपना दायित्व सँभालें
संक्राँतिकाल से गुजर रही सारी विश्व−वसुधा आज साँस्कृतिक−आध्यात्मिक स्तर पर किए जा रहे उन क्रियाकलापों को निहार रही है, जो भविष्य का निर्धारण करेंगे। परिवर्तन सुनिश्चित है। इन्हीं दिनों होना है, यह भी निश्चित है। स्रष्टा का संकल्प भी मुखर होता जा रहा है, किंतु साथ ही बाजारवाद−उपभोगवाद पर टिकी सभ्यता एवं संवेदनामूलक आध्यात्मिक मूल्यों से बनी संस्कृति का संघर्ष भी साफ दिखाई दे रहा है। मूल्यों को खोकर बाजार में मूल्य पाना, यह आज सभ्यता सिखा रही है। पैसा ही सब कुछ है एवं यदि विज्ञान के साधन हमें सुख दे रहें है तो मूल्य रहित जीवन जीकर व्यक्ति उद्विग्नता, तनाव, बेचैनी, व्याधियों का शिकार होना अधिक पसंद कर रहा है। इसे विधि की विडंबना कहें या असुरता का कुचक्र, चारों ओर
नंगा नाच ही दिखाई पड़ता है। सभी कुछ तो वैश्वीकरण की बलि चढ़ गया है। हमारी अपनी मूल धरोहर वनौषधियां, जल−मिट्टी−फसल ही नहीं, वेद जो धर्म के मूल हैं, उन्हें जन्म देने वाला गायत्री मंत्र तक पेटेंट किया जा रहा है। शिक्षा अब जनसामान्य के लिए नहीं रही। मात्र पैसे वाले ही पढ़ सकते हैं। गरीबों की अब यह रही नहीं।
कहाँ जाकर रुकेगा यह क्रम, कुछ समझ में नहीं आता। पिछले दिनों प्रदूषण व ऋतु विपर्यय की मार के चलते आधा भारत कुहासे की चपेट में आ गया। सूर्योदय होकर अस्त भी हो गया, पर प्रायः तीन सप्ताह से अधिक की नववर्षारंभ की अवधि ऐसी बीती कि दिन भर पास का भी ठीक से नहीं दीख पाया। यही कुहासा लगता है, सारी मानव जाति पर, उनके चिंतन पर छा गया है। भ्राँतियाँ ही जोर मारती दिखाई देती हैं। दूरदर्शिता, समझदारी, ज्ञान की बातें लोगों को रुचिकर नहीं जान पड़तीं।
समाधान एक ही है, देवसंस्कृति। जो मानव में देवता बनाने वाले मूल्यों को विकसित करे, वह भारतीय संस्कृति। इसी से पारिवारिक प्रधान समाज पुनः बन पाएगा एवं विश्व−वसुधा एक वृहत् कुटुँब की तरह रह सकेगी। इंटरनेट ने एक ‘वेबवर्ल्ड’ बना डाला, ग्लोबल छाते के नीचे एक ग्राम बना दिया, जिसकी परिधि में पूर विश्व आ गया, पर यह मूल्यप्रधान नहीं था, यंत्र प्रधान एवं बाजारवाद प्रधान था। इसीलिए जानकारी के आदान−प्रदान तक तो ठीक है, पर विश्व को एक परिवार बनाने का कार्य इससे न हो पाया, न हो पाएगा। वह तो वैदिक सूक्त ‘अयं निजः परो वेति.....’ के आधार पर ही हो पाएगा। हमें सभ्यता से संस्कृति की ओर, वैश्वीकरण से स्वदेशी की ओर, शहरों से गाँवों की ओर, बहिर्मुखी बाजारवादी जीवन से पारिवारिक जीवन की ओर तथा शिक्षा से विद्या की ओर वापसी की यात्रा करनी होगी। यह कार्य विज्ञान और अध्यात्म के परस्पर अन्योन्याश्रित समन्वय की धुरी पर स्थापित होगा एवं इसे आज के बालकों−कल की युवा पीढ़ी संपन्न करेगी। हमारे राष्ट्रपति महामहिम ए0 पी0 जे0 कलाम ने अकारण ही इस शिशुवर्ग को अपना लक्ष्य नहीं बनाया है। इसके पीछे दूरदृष्टि है, 2015-2020 के बीच भारत को हर दृष्टि से विकसित कर विश्व के महानायक के रूप में स्थापित करना।
हमें पाठक के नाते क्या करना होगा? हमें उत्प्रेरक की भूमिका निभानी होगी। युग निर्माण योजना को जन्म तो महाकाल की सत्ता ने, ऋषियों की हिमालय स्थित संसद ने दिया है, किंतु इसमें कार्य करने का समय हमारे लिए अब आया है। अभी तक तो छावनी में रसदपूर्ति, सेना की रगड़ाई−कवायद आदि जैसे कार्य चल रहे थे। अब मोरचे पर चलने का समय आ गया। वासंती उल्लास बार−बार अंदर से यही उछाल मार रहा है। यदि इन पंद्रह−सत्रह वर्ष में काम हो गया तो समझ लेना चाहिए कि भावी पीढ़ी के लिए सतयुगी सपनों का महल खड़ा हो गया।
इन दिनों दो कार्य हम सब परिजनों की हर कार्य की मूल धुरी में होने चाहिए, वह है जीवनसाधना का निखार एवं दूसरा विद्याविस्तार। जीवनसाधना हर पल की होती है। उपासना−अजान−प्रेयर−अरदास थोड़ी देर की, कुछ पल से कुछ घंटों की हो सकती है, पर साधना तो हर श्वास में जी जानी चाहिए। साधना का अर्थ है−अपने आप पर अपना स्वयं का नियंत्रण, अपने आपे को खुद साधना, क्षरित हो रही वृत्तियों पर कठोरता से अंकुश लगाना। इसी को संयम कहा गया है एवं संयम−साधना शब्द एक साथ प्रयुक्त होता है। समय, अर्थ, इंद्रिय एवं विचारों का−चार संयम किए जाते हैं, तब जीवन देवता प्रसन्न होते हैं एवं कल्पवृक्ष की तरह मनोकामना पूर्ण करते हैं। अपने पर कड़ी दृष्टि, स्वयं को जिम्मेदार नागरिक मानकर हर त्रुटि की (अपनी स्वयं की) समीक्षा, अवलोकन, सुधार एवं नई आदतों का, अच्छी आदतों का निर्माण−यह हम सबका, जिन्हें युग−नेतृत्व सँभालना है, अब अनिवार्य दायित्व है। जितना यह निखरेगी, उतना ही आत्मसंतोष एवं लोक−सम्मान मिलेगा। दैवी अनुग्रह तो बरसेगा ही।
जीवनसाधना को निखारता है स्वाध्याय। स्व का पर्यवेक्षण−अध्ययन एवं श्रेष्ठ विचारों में सतत् स्नान। व्यक्तित्व अच्छे विचारों से स्नात रहेगा तो विचार स्वतः ही विधेयात्मक−सुगढ़ होते चले जाएँगे। स्वाध्याय का एक अच्छा तरीका है विद्याविस्तार योजना का स्वयं को एक अंग बना लेना। जो भी पुस्तक या पत्रिका या ऑडियो बुक या कैसेट औरों को देना, पढ़ाना, सुनाना है, उसे पहले स्वयं पढ़ना, अच्छी तरह से उसे गुनना। जितना अधिक मनन किया जाएगा, उतना ही अपना विश्वास प्रचंड हो जाएगा एवं गुरुवर के विचारों की आग सतत सक्रिय बनाती रहेगी। मन उल्लसित, तनावमुक्त रहेगा।
अब इन विचारों की आग औरों तक पहुँचानी है। ज्ञानयज्ञ से बड़ा पुण्य कोई है नहीं। चाहे वे स्टीकर्स हों, चाहे सौजन्य से छपाए जा रहे फोर्ल्डस−परचे हों अथवा छोटी−छोटी किताबें, जहाँ तक हो सके जन−जन तक पहुँचाए जाने चाहिए। बड़ा ही अनमोल खजाना मिशन के पास परमपूज्य गुरुदेव के विचारों के रूप में है। वह साहित्य के भिन्न−भिन्न रूपों−ब्रोशर्स, आडियो, वीडियो कैसेट्स एवं वी0 सी0 डी0 तथा स्टीकर्स आदि रूपों में है। वह जन−जन तक भिन्न−भिन्न भाषाओं में पहुँचना चाहिए। इस साधना−संगठन−सशक्तीकरण वर्ष के उत्तरार्द्ध में यदि झोला पुस्तकालय, ज्ञानरथ, वीडियो रथ पुनः गति पकड़ लें तो आनंद ही आ जाए। पतन−निवारण की सर्वश्रेष्ठ सेवा इससे होगी।
अब इन दो मूल कार्यक्रमों की धुरी पर इस वर्ष का एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है। वह है रचनात्मक पीठों का निर्माण एवं रचनात्मक दीपयज्ञ, महायज्ञ, महासम्मेलनों के आयोजन। हमारा देवसंस्कृति विश्वविद्यालय इस रचनात्मक अभियान हेतु ही ड्डद्गष्द्बड्ड हुआ है। उसका लक्ष्य ही है देवमानवों का निर्माण एवं उनके द्वारा राष्ट्र का साँस्कृतिक नवोन्मेष। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन एवं पर्यावरण ग्राम विकास आपदा प्रबंधन, ये चार कार्यक्रम इसीलिए साधना की धुरी पर इस विश्वविद्यालय ने लिए हैं।
हमें अनौपचारिक शिक्षा का, विद्या व शिक्षा के सार्थक समन्वय का मॉडल खड़ा करना है। नूतन शिक्षापद्धति इसके लिए बनानी होगी। जिन−जिन स्थानों पर भारतीय इसके लिए संस्कृति ज्ञान परीक्षाएँ हुई, वहाँ संस्कृति मंडलों का निर्माण व उनके द्वारा हर विद्यालय में, महाविद्यालय में मूल्य आधारित शिक्षा का प्रचार−प्रसार आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। साँस्कृतिक चेतना भी इससे गति पकड़ेगी। स्वास्थ्य की दृष्टि से प्राकृतिक, वनौषधिप्रधान एवं वैकल्पिक चिकित्सापद्धतियों का प्रशिक्षण अब स्थान स्थान पर देना होगा। स्थान−स्थान पर स्मृति उपवन लगाना अब जरूरी है, जहाँ जड़ी बूटियों की धरोहर रूप में पितरों की स्मृति सुरक्षित रखी जा सके। अस्पताल बनाया जाना उतना जरूरी नहीं, जितना सही जीवनशैली सिखाने वाले स्वास्थ्य संवर्द्धन केंद्र अनिवार्य हैं।
हमारा स्वावलंबन स्वदेशी पर आधारित है एवं ग्रामों की ओर पुनः लौटाने की नीति पर टिका है। गोवंश को जीवित रखना व उसी आधार पर गाँवों का उत्कर्ष वापस लौटा लाना एक ऐसा पुरुषार्थ है, जो भारत की अर्थव्यवस्था को शीर्ष पर पहुँचा सकता है। गौ उत्पादों एवं वनौषधि को साथ जोड़कर ग्रामोद्योगों की शृंखला खड़ी की जा सकती है। बेरोजगारी का उन्मूलन इसी से होगा। शहरीकरण, औद्योगीकरण− अपराध एवं प्रदूषण का उपचार यही है कि गाँवों को स्वस्थ−स्वावलंबी बनाया जाए। इसी के साथ पर्यावरण भी सुधरेगा एवं ग्राम विकास, ग्राम आपदा प्रबंधन योजनाएँ साकार होकर ग्रामतीर्थ अभियान को गति देंगी। 2005 के अंत तक पूरे भारत के प्रायः साढ़े आठ सौ जिलों के पंद्रह हजार ब्लॉक, तहसीलों में हमें एक एक ग्रामतीर्थ−रचनात्मक केंद्र खड़ा कर देना है।
वसंत पंचमी से होली तक का पूरा समय वासंती उमंगों से भरा माना जाता है। इस चालीस दिन की अवधि में मन तरंगित रहता है एवं नए नए संकल्प मन में उभरने लगते हैं। इस अवधि में यही संकल्प लिए जाएँ, जो बताए गए एवं इन्हें अप्रैल की चैत्र नवरात्रि में पका लिया जाए तो इससे बड़ी समझदारी क्या होगी।
मंत्रमहार्णव ग्रंथ में बताया गया है कि कलियुग के प्रधान देवता तंत्राधिपति महाकाल शिव हैं। इसी ग्रंथ में उद्धृत है−
ब्रह्मकृत युगे देवः त्रेतायाँ भगवान रविः। द्वापरे भगवान विष्णुः कलौ देवो महेश्वरः॥
सतयुग में ब्रह्मा प्रधान देव थे। त्रेता में सूर्य भगवान उपासना के प्रमुख देव हुए। द्वापर में मुख्य रूप से विष्णु भगवान की पूजा की प्रधानता थी। इसी प्रकार कलियुग के प्रधान देव भगवान महादेव−महाकाल हैं।
ऐसे महाकाल की रथयात्रा पुण्यभूमि भारतवर्ष की कुँभनगरी नासिक (महाराष्ट्र), ज्योतिर्लिंगों में एक प्रमुख त्र्यंबकेश्वर, भगवान श्रीराम की पंचवटी एवं पावनतीर्थ शिरडी से होती हुई, मध्य भारत की सतपुड़ा, विंध्याचल श्रृंखलाओं को पार कर, गोदावरी, ताप्ती, नर्मदा, पार्वती, चंबल, यमुना का सान्निध्य पाकर शाँतिकुँज हरिद्वार पहुँच रही है। महाशिवरात्रि की पूर्व वेला में, वसंत के तुरंत बाद। 1, 10, 11, 12 जनवरी की तारीखों में पंचवटी क्षेत्र में गोदावरी तट पर कैलाश मठ, भक्तिधाम में इस ज्योतिर्लिंग का पूजन संपन्न हुआ। साढ़े सात क्विन्टल के नर्मदा तट पर पाए गए ये महाकाल स्वयंभू शिवलिंग के रूप में शाँतिकुँज, गायत्रीतीर्थ में स्थापित होने आ रहे हैं। सुपर्ब मिनरल्स के प्रमुख एवं ‘गारगोटी’ म्यूजियम के मुख्य निदेशक एक पुण्यात्मा श्री कृष्णचंद्र पाँडेय जी ने इसे प्राप्त होते ही शाँतिकुँज के लिए संकल्पित कर लिया था। श्री पाँडेय जी व कैलाश मठ के महामंडलेश्वर श्री संविदानंद जी के हाथों पूजन संपन्न कर एक विराट रथयात्रा 14 जनवरी मकरसंक्राँति की पावन वेला में रवाना हुई हैं। इसका शाँतिकुँज पहुँचने का निर्धारित दिन 13 फरवरी गुरुवार है। इस बीच यह प्रायः सत्ताईस स्थानों से होती हुई आ रही है।
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह महाराष्ट्र की यात्रा पूर्ण कर मध्य भारत के गुना क्षेत्र तक आ चुकी थी। अब वसंत पर्व पर गायत्री तपोभूमि, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा रहकर यह फरीदाबाद, नोएडा होकर 13 फरवरी की शाम तक शाँतिकुँज आ जाएगी। पत्रिका सबके पास पहुँचने तक यह यात्रा पूरी हो चुकी होगी। भारत इतना बड़ा देश है। इसका एक छोटा−सा क्षेत्र में ही महाकाल की इस भव्ययात्रा का साक्षी बन पाया। मन तो यह था कि सभी उनका दर्शन करते, फिर ये स्थापित होते, पर यह संभव नहीं था, इसीलिए इस पत्रिका से, वीडियो पत्रिका युगप्रवाह द्वारा, अलग से उपलब्ध वीडियो पत्रिका युगप्रवाह द्वारा, अलग से उपलब्ध वीडियो कैसेट/सीडी द्वारा जन−जन को यह ज्ञात होगा कि जन−जन में इस यात्रा ने कैसी उमंगे पैदा की हैं। जन उत्साह किस तरह हिलोरें ले रहा है।
नासिक से शिरपुर तक की यात्रा में चाँदवड़, धुले होकर इस यात्रा ने अपना सफर चार दिन में पूरा किया। सेंधवा के माध्यम से उसका प्रवेश मध्यप्रदेश में हुआ। पावन निमाड−मालवा अंचल के धामनोद, इंदौर, उज्जैन, देवास, शाजापुर राजगढ़, कुँभराज होकर यह गुना पहुँची है। शिवपुरी, झाँसी, डबरा, ग्वालियर, मुरैना, धौलपुर, आगरा, आँवलखेड़ा होकर यह मथुरा पहुँच रही है, जहाँ इसका विश्राम दो दिन रखा गया है। फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद, मोदीनगर, मेरठ, मुजफ्फरनगर होकर ब्रह्मकुँड, हर की पौड़ी के समझ से निकल यह गायत्री तीर्थ में प्रवेश कर 27 फरवरी तक यहीं विराजमान रहेगी। 1 मार्च महाशिवरात्रि की ब्राह्ममुहूर्त−वेला में गायत्रीकुँज−देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के केंद्र में इसकी प्राण−प्रतिष्ठा है। इसमें सभी उन परिजनों को आमंत्रित किया गया है, जिन्हें विशिष्ट दायित्व अगले दिनों सँभालने हैं।
इस यात्रा के साथ पाँच वाहन चल रहे हैं। हर जगह उत्साह देखते बनता है। त्रिपुरारि−महाकाल की यह सवारी परिवर्तन का संकेत लेकर आई है। शिवत्व धारण करने का, व्यसनों से मुक्त होकर सद्बुद्धि के मार्ग पर चलने का लाखों लोगों ने संकल्प लिया है। युगसाहित्य विभिन्न धर्म−मतावलंबियों ने पढ़ा व देवसंस्कृति का दिग्दर्शन प्रदर्शनी के माध्यम से किया है। महाकाल से साझेदारी करने हेतु हर किसी का मन मचल रहा है। माना जा रहा है कि युग−परिवर्तन की वेला आ पहुँची। इस ज्योतिर्लिंग की प्राण−प्रतिष्ठा हिमवान् विराट हिमालय के द्वार पर विशिष्ट महत्त्व रखती है। आइए, हम सभी इससे जुड़ें व स्वयं को सौभाग्यशाली बना।
कुटिल−चाल, कलिकाल चल रहा, युग की गति पहिचानो। क्रूर−ध्वंस का साज सह रहा, चेत उठो दीवानों॥
इसीलिए तो महाकाल ने, चौदह वर्ष तपाया। और साधना की भट्ठी में, हमको सतत गलाया। क्या लोहा ‘सोना’ बन पाया? इतना तो अनुमानो॥
जिनने बदल लिया अपने को, वे ही टिक पाएँगे। महाकाल के ‘वीरभद्र’ भी, वे कहलाएँगे।
महाकाल के गण जैसी ही, अपना सीना तानो॥ जिनको बदल नहीं पाएँगी, समझाइश की बातें। उन्हें बदलने तुली हुई हैं, महाकाल की लातें।
कुचल जाओगे, महाकाल के ताँडव से, अनजानो॥ महाशक्ति भी द्रवित हुई है, देख ध्वंस की चालें।
महाकाल भी कुपित हुआ है, भरने लगा उछालें। युग परिवर्तन होना ही है, इसे सुनिश्चित जानो॥ अपनी सृष्टि न मिटने देने, युग स्रष्टा संकल्पित।
सृजन सैनिकों को करती है, युगप्रा आमंत्रित। करो सृजन−संकल्प और अब नए सृजन की ठानो॥
−मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’
*समाप्त*