साधना से सिद्धि

साधना की गयी पर सिद्धि नहीं मिली। तप तो किया गया, पर तृप्ति नहीं मिली। अनेकों साधकों की विकलता यही है। लगातार सालों-साल साधना करने के बाद वे सोचने लगते हैं, क्या साधना का विज्ञान मिथ्या है? क्या इसकी तकनीकों में कोई त्रुटि है? ऐसे अनेकों प्रश्न कंटक उनके अन्तःकरण में हर पल चुभते रहते हैं। निरन्तर की चुभन से उनकी अन्तरात्मा में घाव हो जाता है। जिससे वेदना रिसती रहती है। बड़ी ही असह्य होती है चुभन और रिसन की यह पीड़ा। बड़ा ही दारुण होता है यह दर्द।

महायोगी गोरखनाथ का एक युवा शिष्य भी एक दिन ऐसी ही पीड़ा से ग्रसित था। वेदना की विकलता की स्पष्ट छाप उसके चेहरे पर थी। एक छोटे से नाले को पार करके वह एक खेत की मेंड़ पर हताश बैठा था। रात प्रायः बीत गयी थी। खेतों पर सुबह का सूरज फैलने लगा था। पास से गुजरती बैलगाड़ी की आवाज सुनकर चाँदनी के फूलों सी बगुलों की पात सूरज की ओर उड़ गयी। इनकी ओर उसने बड़ी ही निराश नजरों से देखा। तभी उसे पास के खेत से ही गोरखनाथ आते दिखाई दिये।

उनके चरणों पर सिर रखकर प्रणाम करते हुए उसने पूछा- गुरुदेव! मेरी वर्षों की साधना निष्फल क्यों हुई? भगवान् मुझसे इतना रूठे क्यों हैं? महायोगी हँसे और कहने लगे-पुत्र! कल मैं एक बगीचे में गया था। वहाँ कुछ दूसरे युवक भी थे। उनमें से एक को प्यास लगी थी। उसने बाल्टी कुएँ में डाली, कुआँ गहरा था। बाल्टी खींचने में भारी श्रम करना पड़ा। लेकिन जब बाल्टी लौटी तो खाली थी। उस युवक के सभी साथी हँसने लगे।

मैंने देखा-यह बाल्टी तो ठीक मनुष्य के अन्तःकरण जैसी है इसमें छेद ही छेद हैं। बस यह कहने भर को बाल्टी थी, उसमें छेद ही छेद थे। बाल्टी कुएँ में गयी, पानी भी भरा, पर सब बह गया। वत्स! साधक के मन की यही दशा है। इस छेद वाले मन से कितनी ही साधना करो, पर छेदों के कारण सिद्धि नहीं मिलती। इससे कितना ही तप करो पर तृप्ति नहीं मिलती। सिद्धि और तृप्ति चाहिए तो पहले मन के छेदों को मिटाओ। अपने दोष, दुर्गुणों को दूर करो।

पहले संयम-तब साधना -फिर सिद्धि। यही साधना से सिद्धि का मर्म है। अपने मन की बाल्टी ठीक हो तो साधना सिद्धिदायी होती है। मन की बाल्टी में छेद हो तो तप तो खूब होता है, पर तृप्ति नहीं मिलती। भगवान् कभी भी किसी से रूठे नहीं रहते। बस साधक के मन की बाल्टी ठीक होनी चाहिए। कुआँ तो सदा ही पानी देने के लिए तैयार है। उसकी ओर से कभी भी इन्कार नहीं है।


आत्मा की अक्षय अभिव्यक्ति —प्रेम

प्रेम आत्मा का प्रस्फुटन है, परम सौंदर्य है। प्रेम परमात्मा का अनन्त अनुदान है। यह दिव्य वरदान सभी को समान रूप से मिला हुआ है। प्रेम रूपी अमृत कण से सभी आप्लावित हैं। अपवाद रूप में भी कोई इससे वंचित नहीं हैं। हाँ यह हो सकता है कि प्रेम की यह शीतल ज्योति किसी में कम किसी में अधिक ज्योतित हो रही है। जिसने अपनी अन्तर चेतना को जितना अधिक विकसित किया है उसमें यह उतने ही रूप में अभिव्यक्त होती है। प्रेम चैतन्य विकास की चरम-परम परिणति है, जो लहरों सी उठती-गिरती भावुकता से प्रारम्भ होकर संवेदना, भावना और करुणा के राह से बढ़ती-चलती है। हर कोई चैतन्य विकास के इस रथ पर आरुढ़ होकर प्रेम के पावन पुलकन को स्पर्श कर सकता है, डुबकी लगा सकता है।

प्रेम एक महाभाव है, दिव्य भाव है। प्रेम आत्मा की अक्षय अभिव्यक्ति है। प्रेम आत्मा के धरातल पर ही सम्भव है। जहाँ प्रेम है वहाँ स्वयं परमात्मा का आवास होता है। प्रेम देहातीत होता है, मनोतीत होता है। देह से प्रेम नहीं होता है। देह से वासना हो सकती है, जबकि प्रेम महावासना है, परम वासना है। मन से भी प्रेम सम्भव नहीं है। मन की पृष्ठभूमि में वैचारिक मिलन होता है। प्रेम इससे भी परे एवं पार होता है। बुद्धि के लिए भी यह अगम्य और अगोचर है। प्रेम हृदय से होता है। यह हृदय की गहराई में बसता है। यह हृदय की रागनी है। यह सजल संवेदनाओं में गूँजता है। श्रद्धासिक्त भावनाओं में निखरता है और अविराम करुणा में पल्लवित-पुष्पित होता है।

प्रेम की वाणी संगीतमय है। इसमें सदैव दिव्यनाद निनादित होता रहता है। इसकी बोली सम्मोहनकारी है। इसे बोला नहीं जा सकता। बोल में यह समा नहीं सकता। क्योंकि यह बैखरी वाणी से परे होता है। यह परा और पश्यन्ति की वाणी है, इसे बोला नहीं जा सकता, हृदय की सघन-शान्ति में अविराम मौन में ही अनुभव किया जा सकता है। यह केवल अनुभवगम्य है। अनुभवी ही अनुभव करता है कि इसका स्वाद कितना मीठा, कितना मधुर, कितना दिव्य एवं दिव्यता से भी परे हैं। प्रेम के पुजारी रामकृष्ण परमहंस प्रेम के सागर में आकण्ठ डूबे रहते थे। वे प्रेम के परम आयामों में ही विचरते रहते थे जिसे योगी समाधि सुख का नाम देते हैं। उनके अनुसार इस धरती में केवल तीन प्रेमावतरित मानव ही प्रेम की परम पराकाष्ठा तक पहुँच पाये हैं। ये हैं- राधा, चैतन्य और स्वयं रामकृष्ण परमहंस।

इन्हीं तीन प्रेमावतरित अवतारों के कारण ही यह धरती प्रेम की पुलकन को पा सकी, प्रेम के पावन आस्वाद को चख सकी। और इसी प्रेम के स्पर्श से मन एवं बुद्धि की रेगिस्तानी बंजर भूमि उपजाऊ हो सकी, भावना की हरियाली चादर ओढ़ सकी। प्रेम की कुँआरी छुअन से ही मानव के अन्दर संवेदना की सुन्दर कोपलें-कलियाँ, फूटी-करुणा के सुरभित सुमन खिले। वातावरण का कण-कण इसकी दिव्य गन्ध से महक उठा, इसके सुवास से सुवासित हो उठा। मानव जीवन प्रेम का पर्याय बन गया जहाँ ज्ञान भी प्रेमालोक में सजल एवं सचल हो गया। इसी आधारभूमि में ही भगवान् शंकराचार्य और स्वामी विवेकानन्द का आविर्भाव हुआ जिनमें ज्ञान और प्रेम का समान रूप से मिलन हुआ था। यही इस दिव्य मिलन का सुदृढ़ आधार व आश्रय बना। इसका एक रहस्य है प्रेम, एक ही मर्म है प्रेम।

प्रेम से रीता और रिक्त यहाँ कोई नहीं है। मानव की कोरी भावुकता में भी प्रेम के कण झिलमिलाते हैं। भले ही यह ओस की बूँदों के समान क्यों न हों। लेकिन जब यह होता है तो अप्रतिम सौंदर्य के साथ जिसे देख मोती भी सकुचा जाये। भावुकता की दशा में प्रेम की कसक भरी पुकार उभरती और विलीन होती रहती है। यह स्थायी नहीं होती। यह मोम के समान होती है जो ऊष्मा पाकर पिघलने लगती है तथा इससे दूर होते ही जमने लगती है। परन्तु जब यह स्थायित्व का आकार धारण करती है तो संवेदना बनकर सजती-सँवरती है। फिर अन्तःकरण संवेदनशील हो उठता है। उसे सम वेदना अर्थात् हर किसी की पीर व पीड़ा का अनुभव होने लगता है। और प्रतिपल-प्रतिक्षण उसे दूर करने के लिए बेचैन-व्याकुल रहता है।

संवेदना कुछ नहीं भावुकता की ही परिष्कृत एवं विकसित अवस्था है। इसकी पहचान है संकीर्णता बिखरी। इसकी विशेषता है मैं-पन विलीन-विसर्जित हुआ। जब तक अन्धकार कोठरी का द्वार नहीं खुलेगा, वातायन नहीं टूटेगा, सूर्यालोक कैसे आलोकित हो सकेगा। इसी प्रकार अन्तःकरण की तंग संकीर्णता के बिखरते ही संवेदना नूतन आकार लेने लगती है। जिससे प्रसुप्ति का जागरण होता है, सुषुप्ति का अनावरण होता है, शक्तियों का उद्भव होता है। संवेदनशील हृदय में यह जागरण-अनावरण दो शक्तियों के रूप में होता है। पहली विभूति और शक्ति है सर्वस्व उत्सर्ग का साहस, सर्वस्व समर्पण की उदात्त जिजीविषा। यह सर्वमेध यज्ञ का प्रथम आहुति होना स्वीकारता है। यह दीपक की प्रज्वलित लौ में पतंगें के समान आत्माहुति देना पसन्द करना है। दूसरी शक्ति का अनावरण सहिष्णुता के रूप में होती है, जो हर उपद्रवों, व्यंग्य बाणों, कुटिल कटाक्षों को मुस्कराते हुए सुन-सह लेते हैं और अपने लक्ष्य में निरत रहने में अटल आस्था रखता है।

प्रेम की यह संवेदनशील धारा विकास के नूतन आयामों को पाकर भावना के रूप में प्रस्फुटित होती है। भावना संवेदनशीलता का विकसित स्वरूप है जिसमें एक गहरा स्थायित्व पनपने लगता है। अन्तर की कसक एवं तीव्रता के कारण यह बोध और भी गहरा एवं गम्भीर होने लगता है। इसमें एक नूतन भाव जन्म लेता है। यह नवीन भाव है-सम्बन्धों का शारीरिक धरातल से आरोहित होकर, ऊपर उठकर जीवात्मा के स्तर को स्पर्श करना। इस आयामों में आते ही सम्बन्धों का एक नया अध्याय प्रारम्भ होता है। समस्त शारीरिक सम्बन्ध व रिश्तों के मोहपाश तड़तड़ा कर गिरने-छूटने लगते हैं। आत्मिक भाव पनपने लगता है और आत्मिक उत्कर्ष के लिए अदम्य इच्छा, प्रबल प्रयास तथा प्रचण्ड पुरुषार्थ की त्रिवेणी बहने लगती है। ऐसी स्थिति में दिव्य माँ की ममता जन्म लेती है जिसकी शीतल छाँव तले, पुण्य आँचल में सभी को पनाह मिलती है। अतः भावना ममता बनकर पनपती है और कृतज्ञता बनकर उभरती-उफनती है।

ममता मातृत्व की धरोहर है जिसे पाकर जड़ भी चैतन्य हो उठता है तथा मानव भाव प्रवण बन जाता है। उसमें भावना की सघनता घनीभूत होने लगती है। यह सघन भाव जीवन को सदा सक्रिय, जीवन्त और जागृत बनाये रखता है। इसे भुलाया नहीं जा सकता है। यह तो रोम-रोम में, रग-रग में, कण-कण में कृतज्ञता बनकर उफनता-उबलता रहता है। भावना का यह उफान-उबाल जब असह्य हो जाता है तो बाहर फूटने लगता है, फैलने लगता है, भावना का यह विस्तार समष्टि में विस्तृत होकर अनन्त और असीम विस्तार को पाता है। भावना का भाव विकास जब व्यष्टि से समष्टि में, अणु से विभु में, जीव से जगत् में होने लगता है तब वह करुणा में परिवर्तित हो जाता है। तब वैयक्तिक भावना करुणा के रूप में चैतन्य सागर में विसर्जित-समर्पित हो जाती है।

करुणा की आभा जब अन्तःकरण में अपने स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त कर आभान्वित हो उठती है तो बुद्धत्व की उपलब्धि होती है। यह ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ भावना का पुण्य प्रकाश है। यह भाव सृष्टि के हर जड़-चैतन्य के घट में घटित होता है और सभी में अपने ही अनन्त-असीम आत्मा के प्रेमपूरित सौंदर्य को अनुभव करता है। फिर अपने से कोई पराया नहीं, कोई अलग नहीं, कोई विलग नहीं, सभी अपने होते हैं, नितान्त निजी होते हैं। इसी कारुण्य भावधारा में बहते करुणावतार तथागत बुद्ध एक क्षुद्र जीव को बचाने के लिए अपने प्राण त्यागने को तत्पर हो जाते हैं और एक नन्हीं चींटी के लिए भी करुणामूर्ति स्वामी विवेकानन्द प्राण होमने को हिचकते नहीं। करुणा की यह भावना सभी में अपने आत्म प्रेम की अभिव्यक्ति पाता है।

करुणा जब अपनी व्यापकता में सघन शान्ति, परम प्रसन्नता, गहरी एकात्मता को जन्म देती है तब उसे प्रेम कहते हैं। प्रेम चैतन्य भावधारा का प्रस्फुटित पूर्ण पुष्प है। यह कभी कुम्हलाता नहीं, अम्लान है इसकी मुस्कान। प्रेम का विकास भाव विकास का चरमोत्कर्ष-परमोत्कर्ष है। यही परम है, पूर्ण है, यही परमात्मा है। और यही हर आत्मा का एकमेव लक्ष्य है। इसी प्रेम की प्राप्ति उपलब्धि में ही जीवन की सार्थकता एवं पूर्णता है। अतः हमारे जीवन के समस्त प्रयास पुरुषार्थ इसी ओर उन्मुख होना चाहिए, प्रेम से परिप्लावित होना चाहिए, इसके चरम-परम सौंदर्य में मण्डित होना चाहिए।


आध्यात्मिकता की सही परिभाषा (kahani)

मगध का एक धनी व्यापारी भगवान बुद्ध के पास संन्यास की दीक्षा लेने गया। बुद्ध ने उसका कारण और वृत्ताँत सुना। कहा, पहले अपने को उदार और सज्जन बनाओ। फिर उस सद्व्यवहार से परिवार के दुर्गुणों का निराकरण करो। परिवार का जो तुम पर ऋण है, उसे चुकाओ, सबको स्वावलंबी बनाओ। जब इतना कर सको, तब धर्म की सेवा और जनकल्याण की दीक्षा लेने यहाँ आना।

सिकंदर को एक असाध्य बीमारी हुई। उसका मरण निश्चित मानकर कोई चिकित्सक बदनामी के भय से दवा देने का साहस नहीं कर रहा था।

इस असमंजस भरी परिस्थिति में सिकंदर के एक स्वामिभक्त नौकर ‘फिलिप’ ने दवा बनाई और उसे अच्छा हो जाने का आश्वासन दिया।

चुगलखोरों ने सिकंदर को पत्र लिखकर सूचना दी कि फारस के राजा ने फिलिप द्वारा आपको विष देकर मार डालने का षड्यंत्र किया है और बदले में विशाल संपदा देने का लालच भी।

महर्षि अंगिरा ने गोपमाल को तिलक किया और कहा, “तात! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे अंतःकरण में मुक्ति की आकाँक्षा अत्यंत प्रबल है, तुम जाओ और वर्णाश्रम धर्म की मर्यादानुसार गृहस्थ धर्म का अनुशीलन करो।”

“आपकी आज्ञा शिरोधार्य है गुरुदेव, पर यह संसार तो बंधन है, वहाँ जाकर मुक्ति जैसे जीवनलक्ष्य को भूल गया तो?” “भूलोगे नहीं तात, यदि तुमने कर्म के फल में आसक्ति नहीं रखी तो गृहस्थी जैसे कठोर उत्तरदायित्व का पालन करते हुए भी तुम उसी लक्ष्य की ओर अपने आप को अग्रसर पाओगे। विवाह करो एवं सुख से जीवन बिताओ। गृहस्थ में रहकर ही व्यावहारिक जीवन की साधना करो।”

गृहस्थी को कार्य बड़े बेढंगे होते हैं। एक बार धन के अभाव में गोपमाल को गायें बेचनी पड़ीं। गोपमाल को पता चला कि उन गायों का वध हो गया। वह स्वयं को इस पाप का कारण मानकर ग्लानि से भर गया, उसका मन छटपटाने लगा एवं गृहस्थी का परित्याग करने का निश्चय कर लिया। पत्नी ने भी उनके मन की बात जान ली। उसने निश्चय कर लिया कि मैं भी पति के साथ ही गृह त्याग दूँगी।

रात्रि के निविड़ अंधकार में गोपमाल चुपचाप उठा। पत्नी भी साथ हो ली। ज्यों ही दोनों आगे बढ़े, एक आकृति सामने आई। गोपमाल ने पहचाना कि यह तो महर्षि अंगिरा खड़े हैं। उन्होंने दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहा, “तुम दोनों आत्मकल्याण के इच्छुक हो, परंतु जो सामाजिक जीवन की परिस्थितियों से ही नहीं लड़ सका, तप-तितिक्षाओं को कैसे सहन करेगा। मनुष्य कर्म करे, सफलता या विफलता, सुख-दुःख, मान-अपमान में स्थिर रहकर फल से प्रभावित न हो। अपने आप को भगवान का प्रतिनिधि मानकर लोक-सेवा में स्वयं को नियोजित रखे। फलश्रुतियाँ तो स्वयं ही मिल जाती हैं।”

गोपमाल ने तत्त्वदर्शन को समझा और लौट पड़ा। अपने गृहस्थरूपी तपोवन में पत्नी के साथ, पुनः समर में जूझने हेतु। उसे अब आध्यात्मिकता की सही परिभाषा जो समझ में आ गई थी।


मृत्यु एक मंगलमय महोत्सव

मृत्यु अखण्ड सत्ता की एक अभिव्यक्ति मात्र है। मृत्यु केवल दशा परिवर्तन की द्योतक है। मृत्यु एक पहलू है और जीवन उसका दूसरा पहलू है। मृत्यु का और एक नाम है जीवन, और जीवन का दूसरा नाम है मृत्यु। अभिव्यक्ति के एक रूप विशेष को जीवन कहा जाता है और उसी के अन्य रूप को मृत्यु से अलंकृत किया जाता है। जीवन आत्मा के अर्थ में अनादि, अनन्त और अमर है और मृत्यु का अर्थ है एक शरीर से दूसरे शरीर में केवल केन्द्र परिवर्तन। आत्मा एक ऐसा वृत्त है, जिसकी परिधि कहीं नहीं है परन्तु उसका केन्द्र शरीर में अवस्थित है और मृत्यु का अर्थ है इस केन्द्र का एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानान्तरित हो जाना। यह स्थानांतरण अत्यन्त मंगलमय है, महोत्सव है।

मृत्यु शब्द ‘मृं’ धातु से बना है जिसका अर्थ है प्राण का त्यागना। आत्मदृष्टि से पोषित अपनी सनातन संस्कृति में मरण एक महोत्सव है। एक नूतन जीवन के लिए वर्तमान देह का सहर्ष त्याग है। गीता के अनुसार मृत्यु परवर्ती जीवन का निर्धारण है। महाकवि कालिदास ने उल्लेख किया है कि ‘मरणं प्रकृति शरीरिणाँ’ अर्थात् शरीरधारी साँसारिक प्राणियों का प्राकृतिक स्वभाव है मृत्यु। नूतन देह धारण करने के लिए पुराने का त्याग किया जाता है। यह त्याग ही मृत्यु है और धारण जन्म। अतः जन्म और मृत्यु आत्मा की अभिव्यक्तियाँ हैं। यदि जन्म हर्ष का प्रतीक है तो मृत्यु शोक, दुःख एवं भय का नहीं महोत्सव का महा प्रतीक है।

अतः भारतीय संस्कृति में मृत्यु या मरण के लिए जितने शब्दों का प्रयोग किया जाता है उन सभी के मूल में यही दिव्यार्थ झलकता-जगमगाता है। देहावसान अर्थात् देह का अवसान, शरीर की समाप्ति आत्मा का नहीं। दिवंगत याने स्वर्ग की ओर आरोहण। दिवं का अर्थ ही स्वर्ग होता है। शरीर का स्वर्ग में जाना सम्भव नहीं है, केवल आत्मा ही वहाँ एवं उससे पार पहुँच सकती है। इसी प्रकार ‘वयकुण्ठ’ जिसका अपभ्रंश है ‘वैकुण्ठ’। वय याने आयु और कुण्ठित अर्थात् क्षीण-नष्ट हो जाना। इस तथ्य को और भी स्पष्ट करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द ने ‘समयसार’ में उद्धृत किया है- ‘आऽक्खपेण मरणं’। इसका तात्पर्य है आयुकर्म के क्षय से मरण होता है। अतः मृत्यु को स्थान−विशेष का वाचक मान लिया जाता है जबकि यह मरण का सूचक शब्दान्तर है। यही नहीं, मृत शरीर के लिए एक विशिष्ट शब्द का प्रयोग किया जाता है-’अरथी’। इस शब्द के गूढ़ार्थ में झाँकने पर प्रतीत होता है शरीर रूपी रथ को आत्मा रूपी रथी संचालित-परिचालित करता है। जिस रथ का रथी चला गया उसे मात्र रथ न कहकर ‘अ-रथी’ कहना हमारी सम्यक् एवं आत्मदृष्टि का सूचक है। इसलिए मृत्यु को उतरा हुआ परिधान माना जाता है और आत्मा को सनातन व शाश्वत माना जाता है।

आत्मा ही सत्य एवं चिरन्तन है, देह तो मात्र इसे व्यक्त करने का विनाशशील एवं क्षणभंगुर आवरण है। देह का नाश-विनाश सुनिश्चित है। इसी विनाश को मृत्यु कहा जाता है जो केवल शरीर का होता है। इसी कारण ‘जातस्य मरणं ध्रुवं’ कहा जाता है। जो जन्मा है उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। मर्त्य संसार में जिसने देह धारण किया है उसका देह वियोग सुनिश्चित है। परन्तु शाश्वत और सनातन वही हो सकता है जिसका न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु। जो इन दोनों से परे एवं पार है, और वह आत्मा है। अतः जो मानव स्वयं को मरणधर्मा शरीर न मानकर चिर शाश्वत आत्मा मानता है वही इस जीवन का सच्चा उपयोग एवं उपभोग कर सकता है। जीवन को सुरुचिपूर्ण एवं कलात्मक बनाने का सूत्र उसी को हस्तगत हो सकता है। ऐसी धन्य आत्मा अपने जीवन को गरिमापूर्ण ढंग से जीकर श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट रीति-नीति से नश्वर शरीर को त्याग करने की कला जानती हैं। ऐसा सुयोग और सौभाग्य प्रत्येक मनुष्य को नैसर्गिक रूप से प्राप्त है परन्तु बिरले ही हैं जिसका समुचित रूप से उपयोग कर पाते हैं।

मृत्यु एक महोत्सव है। इस तथ्य को वही समझ पाता है जिसने अपने सम्पूर्ण जीवन में त्याग, सेवा, आदर्श, सच्चाई और सद्चिंतन को अपनाया-आत्मसात् किया। जिसने जीवन पर्यन्त सत्य का साथ दिया। जीवन में उसी को उतारा तथा ईश्वर रूपी महा सत् का चिंतन-मनन एवं व्यवहार में रमाया हो, वही ऐसे आदर्श मृत्यु महोत्सव को प्राप्त कर सकता है। इस आदर्श देह-त्याग विधि को मनीषियों ने ‘सल्लेखना’ कहा है। जीवन रूपी इस प्रवाह में आये राग-द्वेष, लोभ-मोह, काम-क्रोध के प्रसंग कितने ही बने पर विवेकीजन प्राण-प्रयाण बेला में मात्र सत्य का ही चिंतन-मनन करते हैं, अपने आँखों के आगे उन्हीं उत्कृष्ट आदर्शों को उमड़ते-घुमड़ते देखते हैं। वे शरीर की अन्तिम विदाई में इस महानद का श्रवण करते हैं, महा सत्य का साक्षात्कार करते हैं। उनके मृत्यु काल में जैन दर्शन का ‘सल्लेखना’ शब्द घटित होता है, प्रकट होता है।

सत् और लेखना से बने-बुने सल्लेखना का अर्थ ही है- अच्छाई का लेखा-जोखा करना। और अच्छा कर गुजरने का उद्दाम विश्वास एवं संकल्प करना। अन्तिम बेला में जब यह महासंकल्प घनीभूत हो जाता है तो उस व्यक्ति के लिए मृत्यु महापर्व बन जाती है और वह ‘वासाँसि जीर्णानी यथाविहाय’ के आत्मविश्वास से लवरेज होकर जीर्ण शरीर को छोड़ने-त्यागने का मोह-शोक नहीं करना और निर्द्वन्द्व भाव से नूतन तापसी जीवन की तैयारी करने लगता है। इस प्रक्रिया को निष्प्रतीकार मरण कहा जाता है। जब शरीर आत्मा के अनुकूल नहीं रह जाता, उसके महत् कार्यों को सम्पन्न करने हेतु अयोग्य एवं असमर्थ हो जाता है तो उसे प्रसन्न-प्रशान्त भाव से मृत्यु देवता को सुपुर्द कर नये परिवेश में नये सिरे से जीवन की सम्भावना तलाशी जाती है। यही महामृत्यु और नवजन्म का मर्म है।

ऐसा आदर्श देहत्याग सुगति-श्रेष्ठगति का प्रतीक है जिससे भावी जीवन में निश्चय ही सत्य और पवित्रता का समन्वय होता है। अतः जैन आम्नाय में प्रतिदिन भावपूर्ण भावना की जाती है कि हे भगवान्! मुझे बोधि की प्राप्ति हो। यहाँ बोधि का तात्पर्य सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान एवं सम्यक् चरित्र से है। हे भगवान्! मेरा सुगति में गमन हो, ताकि वीतरागी परम गुरु का एवं आत्मतत्त्व का समागम नित-निरन्तर बना रहे। हे भगवान्! मेरा समाधिपूर्वक मरण हो। मरण क्षण में मेरे चित्त में किसी व्यक्ति का मोह, पदार्थ का लोभ एवं वासना का आकर्षण न हो। मैं मरण भय से निर्भय रहूँ, आदर्शों पर अटल रहूँ, मन एकमेव तुम्हारे चिंतन में डूबा रहे, हृदय का प्रत्येक स्पंदन एक तुम्हारे लिये ही स्पंदित होता रहे। ‘तत्त्वमसि’ अर्थात् मैं तुम्हारा ही अविनाशी अंश हूँ और तुम्हीं में समाकर, विसर्जित-विलय होकर पूर्णता की प्राप्ति करने के महाभाव में स्थिर रह सकूँ।

बिखर जाता है। अतः उन्हें इस मरणधर्मा देह के मरण पर तनिक भी शोक व दुःख नहीं होता है बल्कि अपार प्रसन्नता होती है कि देह के सीमित सीमाँकन से छुटकारा तो मिला। 206 हड्डियों, 72 हजार नाड़ियों एवं अरबों-खरबों कोशिकाओं के इस देह में आबद्ध चैतन्य मुक्त आत्मा को महामुक्ति का आस्वाद तो मिला। ये जीवन मुक्त आत्मायें होती हैं जो शरीर को तिनके के समान उतार फेंकती हैं। साक्षात् मौत इनके सामने करबद्ध निवेदित रहती है।

आत्मा के अनन्त सौंदर्य में जीने वाला, उसके अनगिन आयामों में रमण करने वाला महायोगी स्वयं को नरभक्षी शेर के चबाते, पैने दाढ़ों के बीच पाकर भी भयाक्रान्त नहीं होता है। वह कहता है-मैं तो अजेय-अमर आत्मा हूँ, शरीर का भक्षण हो सकता है, आत्मा का नहीं। मृत्यु दूत काल सर्प से वह डरता नहीं, वह उसे आमंत्रित करता है कि महाप्रभु ही उसे इस शरीर से मुक्ति एवं मोक्ष प्रदान करने आये हैं। इस देहातीत दिव्य भाव एवं महाभाव में जीना असम्भव नहीं है। दुर्धर्ष संकल्प बल से स्वयं को देही नहीं देहातीत आत्मा का स्वरूप मानने पर यह सम्भव एवं सरल हो सकता है। और जो आत्मा के धरातल पर जीता है उसके लिए जन्म कैसा? जीवन कैसा? और मृत्यु कैसी? समस्त समस्यायें तो इस देहाभाव में है,जो देह से परे है उसके लिए क्या जन्म और क्या मृत्यु ?

आत्मा का अमृतपान करने वाला भला इस कसैली देह से क्या स्वाद लेगा। कसैला स्वाद तो उसे अमृततुल्य लग सकता है जिसने अमृत चखा नहीं, उसका स्वाद जाना नहीं। इस नश्वर शरीर को अनश्वर-अमर मानने की महा भूल करने वाला ही इसे छोड़ने-त्यागने के लिए चीख पुकार करता है। मृत्यु उसे महादण्ड नारकीय पीड़ा के समान प्रतीत होती है। क्योंकि देह को सजाने, सँवारने, इन्द्रियों को तुष्ट-पुष्ट करने के लिए वह विषय-वासना के महागर्त में पड़ा कीड़ों सा कुलबुलाता रहता है। ऐसे नारकीय जीवन को गीता गायक भगवान् श्रीकृष्ण ने हेय एवं घृणित माना है। वह कहते हैं जिसका जीवन इसके ठीक विपरीत आत्मविश्वास और सदाचार से सुशोभित होता है, उन यशस्वीजनों को कभी मरण का भय या शोक नहीं सताता। वह उद्घोष करते हैं-’नास्ति येषाँ यशः काये जरा मरणजं मयम्’।

सुखपूर्वक एवं शोक रहित मृत्यु वरण करने के लिए महामंत्र है- ‘येनानृत्तानि नोक्तानि प्रीति भेदः कृतो न च। आस्तिकः श्रद्धानश्च स सुखंमृत्युमृच्छति’। अर्थात् जिसने कभी असत्य आचरण नहीं किया हो, जिसके अन्दर ईर्ष्या-द्वेष का भाव न हो, जो आत्मा में परम विश्वासी आस्तिक हो तथा जो अच्छाइयों पर अनन्य श्रद्धा-आस्था रखता हो, वही सुखपूर्वक-शान्तिपूर्वक ढंग से महामृत्यु को वरण कर सकता है। अतः हम भी सद्चिंतन सद्चिंतन, सदाचरण और सद्व्यवहार को उतारकर मृत्यु को माँगलिक महोत्सव के रूप में मना सकते है।


परोपकाररत रहना ही सर्वश्रेष्ठ (kahani)

एक राजा के चार मंत्री थे। उनमें से तीन तो थे चापलूस, चौथा था दूरदर्शी और स्पष्ट वक्त ।

राजा का निधन हुआ तो पहले मंत्री ने बहुमूल्य पत्थरों का स्मारक बनवाया। दूसरे ने उसमें मणि-मुक्त जड़वाए। तीसरे ने सोने के दीपक जलवाए। सभी ने उनकी स्वामिभक्ति को सराहा।

चौथे मंत्री ने उस स्मारक के आस-पास घना बगीचा लगवा दिया।

तीनों की राशि बेकार चली गई। चोर चुरा ले गए, पर चौथे का बगीचा फल देता रहा, मालियों के कुटुँब पलते रहे और राहगीरों को विश्राम करने तथा बनाने वाले का इतिहास पूछने का अवसर मिलता रहा।

सत्प्रवृत्तियों का अभ्यास कहीं भी करते हुए, व्यक्ति अपना व दूसरों का हितसाधन कैसे कर सकता है?

इसका बड़ा सुँदर उदाहरण स्कंद पुराण की एक कथा में मिलता है।

एक बार कात्यायन ने देवर्षि नारद से पूछा, “भगवन्, आत्मकल्याण के लिए विभिन्न शास्त्रों में विभिन्न उपाय-उपचार बताए हैं। गुरुजन भी अपनी-अपनी मति के अनुसार कितने ही साधन-विधानों के माहात्म्य बतलाते हैं। जप, तप, त्याग, वैराग्य, योग, ज्ञान, स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत, ध्यान-धारण, समाधि आदि के अनेक उपायों में से सभी का कर सकना, एक के लिए संभव नहीं। फिर सामान्यजन यह भी निर्णय नहीं कर सकते, इनमें से किसे चुना जाए? कृपया आप ही मेरा समाधान करें कि सर्वसुलभ और सुनिश्चित मार्ग क्या है? अनेक मार्गों के भटकाव से निकालकर मुझे सरल अवलंबन का निर्देश दीजिए।”

उत्तर देते हुए नारद ने कात्यायन से कहा, “हे मुनिश्रेष्ठ, सद्ज्ञान और भक्ति का एक ही लक्ष्य है कि मनुष्य सत्कर्मों में प्रवृत्त हो। स्वयं संयमी रहे और अपनी सामर्थ्य को, इन गिरों को उठाने और उठों को उछालने में नियोजित करे। सत्प्रवृत्तियाँ ही सच्ची देवियाँ हैं, जिन्हें, जो, जितनी श्रद्धा के साथ सींचता है, वह उतनी ही विभूतियाँ अर्जित करता है। आत्मकल्याण और विश्वकल्याण की समन्वित साधना करने के लिए परोपकाररत रहना ही सर्वश्रेष्ठ है, चाहे व्यक्ति किसी भी आश्रम में हो।”


जीव का अपने मूल स्रोत से जा मिलना

भगवान् बुद्ध श्रेष्ठी अनाथपिण्डक के प्राणों में बसते थे। भगवान् की भक्ति को ही वे अपना भाग्य मानते थे। उनकी चिन्तन-चेतना में पल-पल अपने आराध्य के लिए कुछ नया कर गुजरने की कोपलें फूटती थीं। ‘देकर भी करता मन-दे दूँ कुछ और अभी’- यही उनका जीवन दर्शन था। प्रभु की देशना के अनुसार उन्होंने सत्कर्म और सत्प्रवृत्ति के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। अनाथों का सच्चा सहारा बनकर उन्होंने अपने नाम को सार्थक कर दिया था। उनके सत्कार्यों की यशप्रभा से दिगन्त अलोकित हो रहे थे। प्रतिष्ठ और सम्मान की तो जैसे बाढ़ थी उनके जीवन में। फिर भी जीवन में कहीं कुछ ऐसा था जो रह-रह कर कसक उठता था। भावनाओं में भरी टीस उन्हें रह-रहकर बेचैन कर देती थी।

सब सुखों के बीच दुःख का एक ही कंटक था- उनका पुत्र ‘काल’। काल की प्रवृत्तियाँ सामान्य धनिक पुत्रों की भाँति थी। भोग उसे भाते थे। सुख उसे लुभाता था। धन का तो जैसे वह दीवाना था। थोड़े से पैसों के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने के लिए तैयार हो जाता था। काल की यह मनोदशा अनाथपिण्डक को तनिक भी नहीं भाती थी। वह उसे अपने यश चन्द्र के मध्य कलंक मानते थे। ‘काल’ को वशीभूत करने के लिए वह अनेकों उपाय करते थे। पर हर बार उन्हें असफलता ही हाथ लगती थी। एक बार उन्होंने जेतवन में ठहरे हुए भगवान् तथागत को अपनी वेदना सुनायी। अपने अनुगत भक्त की पीड़ा के स्पर्श से भगवान् सोच में पड़ गए।

दो पलों के नीरव मौन के अनन्तर उन्होंने कहा- अनाथपिण्डक, पुत्र की प्रवृत्तियों से तुम दुःखी न हो। उसकी कमजोरियों को ही उसके रूपांतरण का माध्यम बनाओ। तुम्हारे पुत्र ‘काल’ का बोधिकाल अब निकट ही है। गूढ़ रहस्य में लिपटी प्रभु की इन बातों को अनाथपिण्डक ढंग से समझ न सके। उनके नेत्रों में प्रश्न चिह्न वैसे ही अमिट बने रहे। भगवान् ने उनकी मनोदशा को भाँपकर कहा- चिन्तित होने की जरूरत नहीं है। यदि ‘धन’ तुम्हारे पुत्र की कमजोरी है, तो इसे ही उसके भाव परिवर्तन का माध्यम बनाओ। शास्ता का यह संकेत श्रेष्ठी अनाथपिण्डक की समझ में आ गया।

वापस आने पर उन्होंने ‘काल’ को अपने समीप बुलाया। प्रीतिपूर्वक उसकी कुशल-क्षेम पूछने के बाद उन्होंने कहा- पुत्र! मैं तुम्हें सौ स्वर्ण मुद्राएँ देना चाहता हूँ। पिता के इन वचनों ने काल को चौंका दिया। वह सोचने लगा कि आखिर आज इन्हें क्या हुआ है? कहाँ तो ये हमेशा मितव्ययिता का पाठ पढ़ाते थे। कहाँ आज सौ स्वर्ण मुद्राएँ देने की बात कर रहे हैं। पुत्र को चकित करते हुए अनाथपिण्डक ने आगे कहा- परन्तु तुझे भगवान् बुद्ध के वचनों को सुनने जाना पड़ेगा। पिता के इस वाक्य ने काल को किंचित मायूस किया। परन्तु सौ स्वर्ण मुद्राओं का लोभ उस पर भारी पड़ा और वह तैयार हो गया।

अब तो भगवान् का संग उसका नित्यकर्म बन गया। प्रतिदिन वह तथागत को सुनने जाने लगा। लेकिन अभी भी उसके अन्तःकरण पर स्वर्ण मुद्राओं की चमक छायी थी। रोज घर लौटने पर वह अपने पिता से कहता- कहाँ है मेरी सौ स्वर्ण मुद्राएँ? पहले अपनी स्वर्णमुद्राएं गिनवाता, बाद में भोजन करता। उसको बुद्ध के वचनों से कोई मतलब नहीं था। वह तो जब उन्हें सुनने बैठता था, तब भी अपनी स्वर्णमुद्राओं का हिसाब करता रहता था। इस तरह लगभग एक मास बीत गया। एक दिन अनाथपिण्डक ने उसे कहीं अधिक चौंकाते हुए कहा- पुत्र अब मैं तुम्हें हजार स्वर्णमुद्राएं देना चाहता हूँ। तो क्या मुझे किसी और का भी उपदेश सुनने जाना होगा, काल ने पिता से पूछा। नहीं पुत्र! अनाथपिण्डक ने उसे आश्वस्त किया। बस तुम्हें प्रभु की वाणी को सुनकर याद करना होगा और मेरे सामने दोहराना होगा।

काल को यह काम बड़ा उलझन भरा लगा। पर स्वर्णमुद्राओं की संख्या भी तो दस गुना होने वाली थी। इतना बड़ा लालच भला वह कैसे छोड़ देता? उसने ‘हाँ’ कर दी। अगले दिन जब बुद्ध को सुनने गया तो उसे उनके वचनों को बड़े ही ध्यान से सुनना पड़ा। क्योंकि अब तो सारी बातें याद रखनी थी। याद रखने के लिए एक-एक बात पर ध्यान देना जरूरी था। कई दिनों तक यह क्रम चलता रहा। बुद्ध के वचनों पर ज्यों-ज्यों वह ध्यान जमाता त्यों-त्यों उसकी अन्तश्चेतना में स्वर्णमुद्राओं की चमक फीकी पड़ती जाती।

आखिर में एक दिन वह भी आया, जब उसकी चेतना भगवान् की कृपा से आलोकित हो गयी। वह सदा-सदा के लिए सम्पूर्ण रूप से बुद्धत्व में समा गया। उस साँझ वह घर नहीं लौटा। पुत्र को कहीं कुछ हो तो नहीं गया। इस सोच में घबराया हुआ अनाथपिण्डक भगवान् के पास आया। वहाँ पहुँचकर देखा कि ‘काल’ एक ओर आँख बन्द किये बैठा है। पुत्र को झकझोरते हुए उसने कहा- अरे घर चल, हजार स्वर्णमुद्राएं तेरी प्रतीक्षा कर रही हैं। पिता के इन वचनों के उत्तर में पुत्र ने कहा- अब उन्हें आप ही सम्हाल कर रखो। जो पहले मुद्राएँ दी थी- उन्हें भी वापस ले लो। अब इन सबकी कोई जरूरत नहीं रह गयी।

अनाथपिण्डक ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की, पर उस पर कोई असर नहीं हुआ। लालच के सारे तीर बेकार चले गए। श्रेष्ठी को यही समझ में नहीं आ रहा था कि उसके पुत्र को क्या हो गया है। वह भागे हुए शास्ता के पास गए और उनसे कहा- भगवान् यह क्या रहस्य है? मैं वर्षों से आपको सुन रहा हूँ और मेरे पुत्र ने तो अभी कुछ ही दिनों से आपको सुना है। और वह भी धन के लालच में सुना है। स्वर्णमुद्राओं के लोभ में सुना है। बुद्ध ने कहा- तो क्या हुआ- उसने सुना तो है, किसी भी कारण सुना हो, मेरे वचनों की गहराई में पैठने की उसने कोशिश की है, तुमने तो अब तक मुझे सुना ही नहीं है। अब तक जो भी किया है तुमने- वह केवल अपने यश विस्तार के लिए किया है। अपनी प्रतिष्ठ को बढ़ाने के लिए किया है।

जबकि तुम्हारे बेटे ने मेरे वचनों की गहराई में उतरने की कोशिश की है और जिसने मुझे सुना है- वह तो मेरा हो गया। तुम्हारा बेटा भी मेरा हो गया है। उसे अब तुम चक्रवर्ती की भी सम्पत्ति दो, तो वह लौटने वाला नहीं है। तुम उसे देवलोक का सम्राट बना दो, इन्द्र बना दो, तो भी वह लौटने वाला नहीं है। तुम तीनों लोकों की सारी सम्पदा इसके चरणों में रख दो, तो भी यह लौटने वाला नहीं है। इस पर अनाथपिण्डक ने कहा- भगवान् इसे हो क्या गया है? तो बुद्ध ने कहा यह स्रोतापन्न हो गया है। यह ध्यान की सरिता में उतर गया है। इस घड़ी भगवान् ने यह धम्मगाथा कही-

पथव्या एक रज्जेन सग्गस्स गमनेन वा। सब्बलोकाधिपच्चेन सोतापत्ति फलं वरं॥

‘पृथ्वी का अकेला राजा होने से, यह स्वर्ग का गमन करने से अथवा सभी लोकों का अधिपति बनने से भी स्रोतापत्ति का फल श्रेष्ठ है।’ भगवान् की इन बातों को सुनकर अनाथपिण्डक को यह स्पष्ट हो गया कि जीव का अपने मूल स्रोत में जा मिलने से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है।


एकमात्र तरीका जीवन जीने का (kahani)

एक बूढ़ा घास खोदने में सबेरे से लगा हुआ था। दिन ढलने तक वह इतनी खोद सका था, जिसे सिर पर लादकर घोड़े वालों की हाट में बेचने ले जा सके।

एक सुशिक्षित देर से उस बुड्ढे के प्रयास को देख रहा था। सो उसने पूछा, क्यों जी, दिनभर परिश्रम से जो कमा सकोगे, उससे किस प्रकार तुम्हारा खरच चलेगा? घर में अकेले ही हो क्या?

बूढ़े ने मुस्कराते हुए कहा, कई व्यक्ति यों का मेरा परिवार है। जितने की घास बिकती है, उतने से ही हम लोग व्यवस्था बनाते और काम चला लेते हैं।

युवक को आश्चर्यचकित देखकर बूढ़े ने पूछा, मालूम पड़ता है, तुमने अपनी कमाई से बढ़-चढ़कर महत्त्वाकाँक्षाएँ सँजो रखी हैं, इसी से तुम्हें गरीबी में गुजारे पर आश्चर्य होता है।

युवक से और तो कुछ कहते न बन पड़ा, पर अपनी झेंप मिटाने के लिए कहने लगा। गुजारा ही तो सब कुछ नहीं हैं, दान-पुण्य के लिए भी तो पैसा चाहिए।

बुड्ढा हँस पड़ा। उसने कहा, मेरी घास में तो बच्चों का पेट ही भर पाता है, पर मैंने पड़ोसियों से माँग-माँगकर एक कुआँ बनवा दिया है, जिससे सारा गाँव लाभ उठाता है। क्या दान-पुण्य के लिए अपने पास कुछ न होने पर दूसरे समर्थों से सहयोग माँगकर कुछ भलाई का काम कर सकना बुरा है।

युवक चला गया। रातभर सोचता रहा कि महत्त्वाकाँक्षाएँ सँजोने और उन्हीं की पूर्ति में जीवन लगा देना ही क्या एकमात्र तरीका जीवन जीने का है।


देव संस्कृति बनने जा रही है पुनः विश्वसंस्कृति

देवसंस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है। विश्व का मान्यता प्राप्त सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद इसका साक्षी है। यजुर्वेद (7/14) का मंत्र - ‘सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा’ भी इसे आदि संस्कृति सिद्ध करता है।

हजारों वर्षों के काल प्रवाह में इसके अस्तित्व की अक्षुण्णता, इसकी प्रमाणिकता को सिद्ध करती है। वैदिककाल में ऋषियों ने जो जीवन सूत्र दिये, जो आचार पद्धति निर्धारित की, जिन परम्पराओं की स्थापना की, वे हजारों वर्षों बाद आज भी किसी न किसी रूप में प्रचलित हैं। वेदों के विचार सूत्रों का विकास-विस्तार उपनिषदों में मिलता है, उनका निचोड़ गीता में उपलब्ध होता है। रामायण, महाभारत आदि महाकाव्यों के साथ आज भी ये ग्रन्थ हमारे जीवन के आदर्श एवं प्रेरक बने हुए हैं। इसी तरह वैदिक काल में प्रचलित गायत्री उपासना, यज्ञ-संस्कार, वर्णाश्रम व्यवस्था व अन्य ऋषि परम्परायें किसी न किसी रूप में हमारे जीवन का अंग बनी हुई हैं। इस तरह काल प्रवाह के विभिन्न उतार-चढ़ाव के बावजूद हमारी संस्कृति जीवन्त है, जबकि विश्व की अन्य प्राचीन संस्कृतियों जैसे मिस्र, बेबीलोन, रोम-यूनान आदि के ध्वंसावशेष ही बाकी बचे हुए हैं। उर्दू-शायर इकबाल के शब्दों में -

यूनानो मिस्र रोमाँ सब मिट गये जहाँ से कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।

देव संस्कृति को तमाम विषमताओं के बावजूद भी जीवन्त बनाये रखने वाली यह ‘कुछ बात’ उसकी आध्यात्मिकता है।

स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में -’आध्यात्मिकता ही देवसंस्कृति का जीवन प्राण है।’ श्री अरविन्द के अनुसार - ‘अध्यात्म भारतीय मस्तिष्क को समझने की कुँजी है।’ जीवन और अस्तित्व के सार तत्त्व के रूप में आत्मा-परमात्मा का चिंतन और इन्हीं के इर्द-गिर्द समस्त जीवन का निर्धारण यहाँ की मौलिक विशेषता रही है। इसी आधार पर वैदिक ऋषियों ने मनुष्य को अमृत पुत्र! कहकर सम्बोधित किया और सर्वप्रथम ‘आत्मान् विजाति ही’ अर्थात् आत्मा को जानो का संदेश दिया। इसने सदैव साँसारिक सुख की बजाय आध्यात्मिक सुख को प्रधानता दी है। हमारे ऋषि- मुनियों, तपस्वियों-योगियों, सिद्ध पुरुषों एवं अवतारी पुरुषों की हर युग में विशिष्ट उपस्थिति इस तथ्य की गवाही देती है।

देवसंस्कृति अध्यात्म प्रधान होने के कारण संसार सुख की बजाये आध्यात्मिक सुख को महत्त्व देती है और यहाँ लोक जीवन में अंतर्मुखी वृत्ति प्रधान रही है; किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि इसने समाज-संसार एवं जीवन से कटे, विरक्त, निष्क्रिय एवं पलायनवादी जीवन को प्रश्रय दिया हो, जैसा कि पश्चिमी आलोचकों द्वारा इस पर आरोप लगाया जाता है। परम पूज्य गुरुदेव के अनुसार, आध्यात्मिक होते हुए भी देवसंस्कृति ने लोकजीवन की उपेक्षा नहीं की है। शरीर, मन व आत्मा तथा व्यक्ति,परिवार एवं समाज का समग्र विकास इसका लक्ष्य रहा है। धर्म,अर्थ, काम, मोक्ष के पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धान्त एवं ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के रूप में यहाँ सम्पूर्ण जीवन के सर्वांगीण विकास का विधान रहा है। धर्म की मर्यादा में अर्थ का उपार्जन एवं काम का उपभोग करते हुए मोक्ष की ओर बढ़ने का यहाँ आदर्श निर्धारण रहा है। पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का पूर्ण निर्वाह करते हुए ही यहाँ अन्त में संन्यासी जीवन में प्रवेश का विधान रहा है। इसी तरह ज्ञान के क्षेत्र में वेदान्त का गूढ़ दर्शन एवं योग की गूढ़ क्रियायें जहाँ इसके आध्यात्मिक विकास के चरमोत्कर्ष का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं विज्ञान के क्षेत्र में आयुर्विज्ञान, ज्योतिर्विज्ञान, तंत्रविज्ञान, मंत्रविज्ञान जैसी विद्यायें इसकी विशिष्ट उपलब्धियाँ हैं। इन्हीं के आधार पर यह अतीतकाल में विश्वगुरु के पद पर सुशोभित रहा है। इसी तरह राजनीति के क्षेत्र में चक्रवर्ती साम्राज्यों का दिग्दिगन्त व्यापी विस्तार, आर्थिक क्षेत्र में सोने की चिड़िया की उपाधि, साहित्य, कला आदि क्षेत्रों में इसकी अद्भुत उपलब्धियाँ, इसके लौकिक जीवन की समृद्धता का परिचय देती हैं। इस तरह देवसंस्कृति की विविध उपलब्धियाँ इसकी सर्वांगीणता को सिद्ध करती हैं।

बाह्य अनेकता (भ्रमता) से परे एकता (परम सत्य) की दृष्टि प्राचीनकाल से ही यहाँ की विशेषता रही है। यह इसका उदार दृष्टि एवं सहिष्णुता की परिचायक है। इसी आधार पर विभिन्न भाषा, जाति, प्रान्त, धर्म-सम्प्रदाय के लोग यहाँ पले, बढ़े व आज भी इसकी छत्रछाया में रह रहे हैं। यहाँ हिन्दु, बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि विविध धर्म-सम्प्रदाय विद्यमान हैं, हिन्दु धर्म में ही शैव-शाक्त, वैष्णव, सौर गाणपत्य आदि विविध सम्प्रदाय विद्यमान हैं।

इसी विशेषता के कारण यवन, शक, हूण, कुषाण जैसी विविध विदेशी जातियाँ यहाँ आयीं। वे कुछ समय तक राजनीतिक विजय तो प्राप्त कीं, किन्तु साँस्कृतिक विजय नहीं प्राप्त कर सकीं और अन्ततः इसी की गोद में समा गयीं। इसी तरह बाहर से इस्लाम, यहूदी, पारसी, ईसाई आदि विभिन्न धर्म वाले लोग यहाँ समय-समय पर आये, फले–फुले और अन्ततः यहीं के होकर रह गये। रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं कि विदेशियों को आत्मसात् करने की समन्वयशील पाचनशक्ति वर्षों तक तीव्र रहीं, किन्तु हुणों के बाद कमजोर पड़ गई। इसी कारण यह इस्लाम को मिला न सकी, किन्तु स्वरूप अवश्य बदल डाला। प्रो. डॉडवेल के शब्दों में-’भारतीय संस्कृति महासमुद्र के समान है, जिसमें अनेक नदियाँ विलीन होती रही हैं।’

अध्यात्मिक प्रधान होने के कारण यहाँ की जीवन पद्धति सदैव तप-त्याग एवं आदर्श प्रधान रही है। ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, मागृधः कस्यस्विद् धनम्।’ अर्थात्- त्यागपूर्ण भोग और किसी की वस्तु का लालच नहीं, यह ऋषियों का सनातन संदेश रहा है। यहाँ का लोकजीवन तप-त्याग के इन आदर्शों से ओतप्रोत रहा है। इसके निमित्त वे बड़े से बड़ा त्याग-बलिदान करने के लिए तैयार रहे हैं। शिवि, दधीचि, हरिश्चन्द्र, दशरथ, कर्ण आदि इसी परम्परा के कुछ जाज्वल्यमान सितारे हैं। इस युग में राणा प्रताप से लेकर शिवाजी एवं भगतसिंह, आजाद, विस्मिल, सुभाषचन्द्र जैसे शहीद इसी परम्परा के महानायक हैं। अतीत के गौरवमय क्षणों में घर-घर में यह आदर्श प्रेम की अग्नि ज्वलन्त थी। देश का हर नागरिक तप-त्याग एवं आदर्शनिष्ठ जीवन की उच्चतम कसौटी पर कसने के लिए तैयार रहता था। इसी करण इन्हें देवताओं की संज्ञा दी जाती थी। 33 कोटि देवता भारतवर्ष की ये आदर्शनिष्ठ 33 करोड़ जनता ही थी।

वर्णाश्रम व्यवस्था ऋषियों द्वारा खोजी गयी देवसंस्कृति की एक अन्य मौलिक विशेषता है जो पूर्णतया मनोवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। वर्ण में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शुद्र आते हैं। ये क्रमशः मनुष्य की ज्ञान, बल, धन एवं श्रम-शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ब्राह्मण स्वाध्याय एवं तप प्रधान जीवन जीते हुए लोकशिक्षण एवं धर्मकार्यों का सम्पादन करता था। क्षत्रिय अपनी शक्ति शौर्य का सुनियोजन करते हुए देश की रक्षा एवं समाज व्यवस्था को सम्भालता था। वैश्य व्यापार एवं कृषि कार्यों के द्वारा समाज के सुविधा-साधनों की व्यवस्था जुटाता था। शुद्र अपने श्रम द्वारा तीनों वर्णों की सेवा करते हुए समाज की आवश्यकताओं को पूरी करता था। इस तरह वर्ण विभाजन पूरी तरह गुण-कर्म के आधार पर कार्य विभाजन का सिद्धान्त था, जिससे की समाज का विकास सुव्यवस्थित एवं स्थिर रूप से हो सके। इनमें कोई भी कर्म छोटा या बड़ा नहीं था। हाँ, तप-त्याग एवं ज्ञान की प्रधानता के कारण ब्राह्मण वर्ग को सर्वोच्च स्थान दिया जाता था।

इसी तरह आश्रम व्यवस्था जीवन का मनोवैज्ञानिक विभाजन था, जिसको अपनाता हुआ मनुष्य अपना शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास करता हुआ पूर्ण विकास के चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सके। ब्रह्मचर्य आश्रम में शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास के साथ चरित्र गठन का कार्य सम्पन्न होता था, जो प्रमुखतया ऋषियों द्वारा संचालित गुरुकुलों में सम्पन्न होता था। इसके बाद गृहस्थ आश्रम में धर्मपूर्वक अर्थ एवं काम का अर्जन एवं उपभोग करता हुआ पारिवारिक दायित्त्वों का निर्वाह करता था। इसमें प्रौढ़ता एवं गृहस्थ के दायित्वों के हल्का होने के साथ वह वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। तप और स्वाध्याय प्रधान जीवन जीते हुए लोकसेवा में प्रवृत्त होता था। जीवन के अंतिम चरणों में मानसिक परिपक्वता के अनुरूप संन्यास आश्रम में प्रवेश करता था और पूर्णतया आत्मचिंतन और भगवद् भजन में अपना समय नियोजित करता हुआ मोक्ष का अधिकारी बनता था।

कर्मफल सिद्धान्त देवसंस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। इसके अनुसार कर्म का फल अवश्य मिलता है। अच्छे कर्म का फल अच्छा और बुरे का बुरा सुनिश्चित है। जिसे हम भाग्य कहते हैं वह और कुछ नहीं, हमारे पिछले कर्मों का ही फल होता है। इस तरह हम अपने वर्तमान कर्मों को सुधारकर अपने मनवाँछित भाग्य का निर्माण कर सकते हैं। अतः कर्मफल सिद्धान्त हमें पुरुषार्थी बनाता है और साथ ही उन्हें अच्छे कर्मों की प्रेरणा देता है। कर्मफल इस जन्म तक नहीं जन्म-जन्मान्तरों तक जुड़ा हुआ है। इस तरह वर्तमान कष्टों का फल पिछले जन्मों के कर्मों को मानने से सहनशीलता व संतोष का भाव पैदा होता है। और वर्तमान कर्मों को सुधारकर हम भावी जन्म को सुधार सकते हैं। अतः कर्मफल एवं पुनर्जन्म का सिद्धान्त सहनशीलता, संतोष, सदाचार एवं कर्मठ कर्त्तव्यनिष्ठ का ठोस आधार सिद्ध होता है।

नारी सम्मान यहाँ की एक मौलिक विशेषता है। देवसंस्कृति में नारी को उच्चतम स्थान दिया गया है। परम पूज्य गुरुदेव के शब्दों में -’यहाँ देवत्व के प्रतीकों में पहला स्थान नारी को दिया गया है और दूसरा नर को। लक्ष्मी-नारायण, उमा-महेश, सीता-राम, राधा-कृष्ण आदि इसी के द्योतक हैं। वैदिक काल में नारी को अत्यन्त प्रतिष्ठित एवं उच्च स्थान प्राप्त था। उसे गृहिणी, अर्धांगिनी, गृहलक्ष्मी जैसे अलंकारों से संबोधित किया गया। उसके बिना कोई भी धर्म कार्य अधूरा माना जाता था। जीवन के हर क्षेत्र में उसका वर्चस्व दिखाई देता है। ऋषियों की तरह महिलायें भी मंत्रदृष्टा ऋषिकायें हुई हैं, जिन्होंने मंत्रों की खोज की। लोपामुद्रा, विश्ववारा, इला, शची, इन्द्राणी, मैत्रेयी आदि इसी स्तर के कुछ नाम है। इसी तरह रामायण-महाभारत काल में सीता, सावित्री, कौशल्या, सुमित्रा, अरुन्धती, कुन्ती, मन्दोदरी, द्रौपदी आदि तथा वर्तमान युग में अहिल्याबाई,जीजाबाई, लक्ष्मीबाई, शारदा माँ, श्री माँ, माता भगवती देवी आदि महिलायें भारतीय नारी के सनातन गौरव एवं आदर्श का बखान करती हैं।

‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ अर्थात् सब प्राणियों में अपनी आत्मा के दर्शन या सबको अपने समान मानना, हमारी संस्कृति की मौलिक विशेषता है। इसी आधार पर मनुष्येत्तर प्राणियों, पशु-पक्षियों, जीव-जन्तुओं, वनस्पति यहाँ तक कि जड़ पदार्थों में भी आत्मीय भाव का आरोपण होता रहा है। इसी आधार पर जड़ पृथ्वी को माँ की तरह पूजनीय माना है। पर्वत, नदियों, वृक्ष यहाँ पूजनीय रहे हैं। पशु-पक्षियों में तक कल्याण की भावना रही है। इसी आधार पर राष्ट्र को, जन्मभूमि को माँ के रूप में पूजनीय माना है। सब भूतों में आत्मा के दर्शन और आत्मविस्तार की प्रक्रिया यहाँ देश-राष्ट्र की सीमा से ऊपर विश्व कल्याण तक जाती है। जहाँ ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः....’ के उद्घोष के साथ हम सबके सुख, निरोगिता एवं मंगल की शुभकामना करते हैं। यही भाव क्रमशः विकसित होते हुए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की धारणा को जीवन्त करता है, जहाँ हम पूरी मानव जाति को अपना परिवार मान बैठते हैं। इसी विशेषता के कारण स्वामी विवेकानन्द जी के शब्दों में-’जहाँ अन्य राष्ट्रों एवं धर्मों ने अपना प्रचार-प्रसार, शस्त्रबल, धनबल एवं कूटनीति के बल पर आधिपत्य की भावना से किया, वहीं हमारा प्रयास सदैव अधिकार की बजाय प्यार की भाषा में हुआ है, जिसके आगे शान्ति का संदेश था तो पीछे आशीर्वाद का भाव’।

संस्कृति संकट के वर्तमान दौर में देवसंस्कृति के सार्वभौम, प्रगतिशील एवं लोकोपयोगी निर्धारण मानव मात्र को आशा की किरण के रूप में आभासित हो रहे हैं। इन्हीं मौलिक विशेषताओं के आधार पर देवसंस्कृति पुनः विश्वसंस्कृति बनने जा रही है। ऐसे महत्त्वपूर्ण क्षणों में इसकी सन्तानों का परम पावन कर्त्तव्य बनता है कि देवसंस्कृति के इन आदर्शों को गढ़ने में कोई कसर न छोड़ें, जिससे कि ऋषि संस्कृति का प्रचार-प्रसार मात्र शब्दों एवं बाह्याडंबर तक सीमित न रहकर व्यक्तित्व की समर्थ भाषा द्वारा समूचे विश्व के समक्ष रहे।


युग-युगों तक प्रेरणापुँज (kahani)

डॉ. कौस्तुभ चिकित्सा-परीक्षा पास करने के उपराँत सरकारी क्षय चिकित्सालय में नियुक्त हुए। उनने जार्ज बर्नार्ड शॉ की वह उक्ति अपने कमरे में टाँग रखी थी कि रोगी को दवा की अपेक्षा डॉक्टर की सहानुभूति की जरूर होती है। उनने रोगियों से ममता भरा व्यवहार किया और इतने अनुपात में रोगी अच्छे किए, जितने पहले कभी भी न हुए थे।

उनने अपने अस्पताल की एक नर्स से इस शर्त पर विवाह किया कि वे संतानोत्पादन के फेर में न पड़ेंगी और रोगियों को ही अपना बालक मानेंगी। सेवाधर्म में संलग्न रहकर वे पति-पत्नी अत्यंत सुखी-संतुष्ट रहे।

उनने अपने अस्पताल की एक नर्स से इस शर्त पर विवाह किया कि वे संतानोत्पादन के फेर में न पड़ेंगी और रोगियों को ही अपना बालक मानेंगी। सेवाधर्म में संलग्न रहकर वे पति-पत्नी अत्यंत सुखी-संतुष्ट रहे।

वृद्धावस्था में वे मसूरी आए। वहाँ के अस्पताल में चार घंटा निःशुल्क सेवा करते रहे। असहायों की वे आर्थिक सहायता भी करते रहते थे। एक पगली उन्हें अपना बेटा कहती थी। वे भी उसे माता जी कहने लगे और वह रोगमुक्त हो गई।

डॉ. कौस्तुभ दंपती का शरीर अब नहीं है, पर उनका आदर्श डॉक्टरों को कुछ नए ढंग से सोचने कि लिए अभी भी जीवित है। चिकित्सा व्यवसाय तो कई लोग अपनाते हैं, पर सेवाधर्म के रूप में अपनाकर समाज देवता की आराधना गिने-चुने ही करते हैं। ऐसे प्रकाशस्तंभ युग-युगों तक प्रेरणापुँज बने रहते हैं।


प्रार्थना की शक्ति है अमोघ

प्रार्थना सृष्टि की सबसे विलक्षण प्रक्रिया है एवं अपने प्रभाव में इसकी शक्ति अमोघ है। अस्तित्व के गहनतम तल से, हृदय के गुह्यतम क्षेत्र से उभरने वाली आत्मा की पुकार ही प्रार्थना के रूप में प्रकट होती है और अपनी इष्ट की परमचेतना से अपना अनन्य एकात्म सम्बन्ध स्थापित करती हुई अभीष्ट प्रयोजन को सिद्ध करती है; जिसमें सर्वोपरि है- आत्मशुद्धि, आत्मशक्ति का जागरण और अपने इष्ट की अलौकिक सत्ता से अपने घनिष्ठ सम्बन्ध की आनन्द एवं शान्तिदायक अनुभूति।

प्रार्थना में हृदय बोलता है, इसमें शब्दों की महत्ता गौण है। इसी कारण लूथर ने कहा था - ‘जिस प्रार्थना में बहुत अल्प शब्द हों, वही सर्वोत्तम प्रार्थना है।’ सच्चे हृदय से उठी प्रार्थना सीधे ईश्वर तक पहुँचती है और फलित होती है। इसीलिए स्वामी दयानन्द सरस्वती ने प्रार्थना को आत्मा की आवाज, परमात्मा तक पहुँचाने वाला संदेशवाहक कहा है। किन्तु यह पुकार शुद्ध एवं पवित्र अन्तःकरण से उभरनी चाहिए। अतः प्रार्थना मात्र सदाचारी एवं कर्त्तव्यपरायण की ही फलित होती है, क्योंकि होमर के शब्दों में - जो ईश्वर की बात मानता है, ईश्वर भी उनकी ही सुनता है। इसी कारण संत मैकेरियस ने ठीक ही कहा है कि जिसकी आत्मा शुद्ध व पवित्र होती है, वही प्रार्थना कर सकता है। क्योंकि अशुद्ध हृदय से वह पुकार ही नहीं उठेगी जो परमात्मा तक पहुँच सके, क्योंकि ऐसे में खाली जिह्वा बोलती है और हृदय कुछ कह ही नहीं पाता तथा ब्रुक्स के शब्दों में यदि हृदय मूक है तो ईश्वर भी बहरा ही होगा।

अहंकार और संकीर्ण स्वार्थ में लिप्त भावहीन हृदय से उठने वाली पुकार प्रायः याचना एवं सौदागिरी के स्तर की होती है जबकि प्रार्थना याचना नहीं, बल्कि सच्चे हृदय की पुकार होती है। पवित्र अन्तःकरण के अतिरिक्त निःसहाय अवस्था में उठने वाली पुकार भी आत्मा की गहराइयों से उठती है व अपना प्रभाव दिखाती है, किन्तु प्रार्थना का यथार्थ लाभ इसे सदैव एक सचेतन प्रक्रिया के रूप में जीवन का अभिन्न अंग बनाने में है। ऐसा प्रार्थनामय जीवन ही इस सृष्टि की सबसे सार्थक एवं उत्कृष्ट घटना सिद्ध हो सकती है।

सच्ची प्रार्थना का स्वरूप क्या होना चाहिए, आध्यात्मिक ग्रन्थों एवं महापुरुषों के उद्गार इस विषय में महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। महात्मा गाँधी के ये वचन विचारणीय है-’प्रार्थना अथवा भजन मुँह से नहीं हृदय से होती है। स्वयं की अयोग्यता, कुपात्रता या कमजोरी स्वीकार कर लेना ही प्रार्थना होती है। प्रार्थना पश्चाताप का चिह्न व प्रतीक है। यह हमें अच्छा और पवित्र बनने की प्रेरणा देती है। प्रार्थना धर्म का सार है।’ वे आगे लिखते हैं ‘प्रार्थना हमारी दैनिक दुर्बलताओं की स्वीकृति ही नहीं, हमारे हृदय में सतत् चलने वाला अनुसंधान भी है। यह नम्रता की पुकार है। आत्मशुद्धि एवं आत्मनिरीक्षण का आह्वान है। प्रार्थना आत्मा की खुराक भी है। अपनी गन्दगी या बुराई जब तक बाहर न निकले, तब तक प्रार्थना करते रहना चाहिए।’ सच्ची प्रार्थना के मर्म का स्पर्श करते हुए हितोपदेश के वचन -’स्वयं के दुर्गुणों का चिंतन व परमात्मा के उपकारों का स्मरण ही सच्ची प्रार्थना है। सत्य, क्षमा, संतोष, ज्ञानधारण, शुद्ध मन और मधुर वचन श्रेष्ठ प्रार्थना हैं।’

इस तरह नित्य प्रति की गई प्रार्थना एवं श्रेष्ठ आचार पद्धति में ही जीवन जीने की कला का मर्म छिपा हुआ है। स्वामी रामतीर्थ के अनुसार, प्रतिदिन प्रार्थना करने से अन्तःकरण पवित्र बनता है। स्वभाव में परिवर्तन आता है। हताशा व निराशा समाप्त हो उत्साह से भर जाता है और जीवन को जीने की प्रेरणा मिलती है। प्रार्थना आत्मशक्ति एवं आत्मविश्वास को जगाने का भी अचूक उपाय है। महाभारत के अनुसार ‘परमात्मा की प्रार्थना में आत्मा में निहित अन्तःशक्ति को जगा देने का दैविक बल है।’ जयशंकर के शब्दों में ‘निस्सहाय स्थिति में प्रार्थना के सिवाय कोई उपाय नहीं होता। प्रार्थना प्रातःकाल की चाबी और सायंकाल की साँकल है।’ पैगम्बर हजरत मुहम्मद के अनुसार- प्रार्थना (नमाज) धर्म का आधार व जन्नत की चाबी है।

वास्तव में प्रार्थना पारलौकिक जीवन की सिद्धि का ही नहीं इस जीवन की उत्कृष्टता एवं गुणवत्ता का भी आधार है। क्योंकि श्री अरविन्द के शब्दों में ‘यह एक ऐसी महान् क्रिया है जो मनुष्य का सम्बन्ध शक्ति के स्रोत पराचेतना से जोड़ती है। और इस आधार पर चालित जीवन की समस्वरता, सफलता एवं उत्कृष्टता वर्णनातीत होती है, जिसे अलौकिक एवं दिव्य ही कहा जा सकता है।’ इसीलिए बाइबिल में कहा गया है कि ‘हमें सदैव प्रार्थना करते रहना चाहिए और कभी भी इससे विमुख नहीं होना चाहिए।’ रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में ‘परमात्मा से किसी भी रूप में प्रार्थना करो वह निश्चित रूप से आपकी सुनेगा। वह तो एक चींटी की पग ध्वनि तक सुन सकता है। मन और वाणी एक बनकर जब ईश्वर से कुछ माँगा जाता है तो प्रार्थना तुरन्त फलती है। प्रार्थना एक प्रकार का भावनात्मक ध्यान होता है।’

इस उच्चस्तरीय आध्यात्मिक क्रिया की अपनी भावनात्मक पृष्ठभूमि है, जिसकी सही-सही समझ एवं अभ्यास प्रार्थना में निहित अद्भुत शक्ति के जागरण एवं सदुपयोग का ठोस आधार बनती है। इसे इन पाँच चरणों में समझा जा सकता है। प्रार्थना की शुरुआत अपनी अकिंचन सी, नगण्य एवं क्षुद्र स्थिति की विनम्र स्वीकृति है। साथ ही इसमें सृष्टि एवं अस्तित्व की विराट् सत्ता के प्रति एक विस्मय एवं भयमिश्रित समर्पण का भाव भी है। किन्तु साथ ही एक सुनिश्चितता का भाव भी है कि जीवन एवं सृष्टि का समूचा जटिल तंत्र उसकी नैतिक व्यवस्था के तहत गतिशील है। समूचे प्राणी व जड़ प्रकृति सभी इस सर्वव्यापी सत्ता के दिव्य अनुशासन में बँधे हुए हैं हम भी इस विराट् व्यवस्था के एक नन्हें से अंश हैं। ऐसे विनम्र भाव से की गई प्रार्थना ही ईश्वर को स्वीकार होती है। इसी संदर्भ में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्द-

हृदय नम्र होता नहीं जिस नमाज के साथ। ग्रहण नहीं करता कभी उसको त्रिभुवन नाथ।

प्रार्थना में विनम्रता के साथ दूसरा भाव आत्म सजगता का है। ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’ के रूप में हम उस दिव्य सत्ता से अखण्ड रूप से जुड़े हुए हैं। इस रूप में अपने यथार्थ स्व के प्रति सजगता प्रार्थना का दूसरा महत्त्वपूर्ण चरण है। यह हमें जकड़ने वाले तमाम तरह के वैचारिक एवं क्रियागत अनुबन्धों से मुक्त करता है। हम देह के धरातल से नहीं, आत्मा के धरातल से प्रार्थना करते हैं। दिव्यसत्ता के पवित्रतम एवं अजर-अमर अंश के आधार से उठे प्रार्थना के भाव हमें भय, अनिश्चितता और विषाद के नकारात्मक भावों से मुक्त करते हैं। नित्यप्रति प्रार्थना की यह भावभूमि हमें दैनन्दिन जीवन के उद्वेग एवं चिंता जन्य तनाव से बहुत कुछ राहत दिलाती है।

तीसरा, प्रार्थना में कल्पना का उपयोग है। दिव्यता से स्वयं को जोड़ने में हम कल्पना का प्रभावी उपयोग कर सकते हैं। परम सत्ता के दिव्य तेज की दिव्य चिंगारी के रूप में हम अपना बोध, एक तेजस्वी, पापरहित, देवस्वरूप, आनन्दमयी एवं चैतन्य आत्मज्योति के रूप में कर सकते हैं। दैनन्दिन जीवन में इन भावों का संकल्पपूर्ण निर्वाह करने से हम इन्हें और दृढ़ एवं जीवन्त बना सकते हैं।

चौथा, प्रार्थना में उत्साह एवं आनन्द का भाव है। प्रार्थना कोई याँत्रिक क्रिया नहीं है। इसमें हमारा समूचा अस्तित्व अपने गहनतम स्तर से सक्रिय होता है। यह हमारी क्षुद्रता एवं अपूर्णता की तमाम सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए पूर्णता के असीम एवं अखण्ड साम्राज्य में एक दुस्साहसपूर्ण उड़ान है, । अपने क्षुद्र अस्तित्व की विराट् के प्रति समर्पण, विसर्जन एवं विलय की प्रक्रिया प्रार्थना के ही इन गहन क्षणों की एक घटना है, जिसमें अपने दिव्य स्रोत के सुमिरन, भजन व भाव लोक में उससे एकाकार होने की अनुभूति से हृदय में आनन्द के मेघ उमड़-घुमड़ उठते हैं। अपने प्रभु से जुड़ने वाले दिव्य सूत्रों के बोध से हृदय में ऊर्जा के स्रोत फूट पड़ते हैं। ये सब विनम्र, सजग एवं समर्पण भाव से की गई प्रार्थना की फलश्रुतियाँ हैं।

प्रार्थना का पाँचवा चरण, प्रार्थना में निहित परमार्थ भाव है। सच्ची प्रार्थना कभी अपने लिए भर नहीं होती, बल्कि समूची मानवता के लिए होती है। यह वह आध्यात्मिक शक्ति है जो हमें समस्त प्राणियों से शक्तिशाली और निर्बल, मासूम और दुष्ट, पुण्यात्मा और पापात्मा, सबसे जोड़ती है। यह प्रार्थना ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया....’ के भाव से ओतप्रोत रहती है। भगवद् गीता में इसी स्थिति में की गई प्रार्थना के विषय में कहा गया है -’मैं भगवान् के पास से अष्टसिद्धि या मोक्ष की कामना नहीं करता हूँ। मेरी तो एक ही प्रार्थना है कि सभी प्राणियों का हृदय स्थिर रहे और मैं सब दुःखों को सहन करूं।’ इसी तरह स्वामी विवेकानन्द का मत था कि ‘प्रार्थना से कुछ माँगना है तो यही माँगना चाहिए कि किसी का बुरा न हो। विध्वंसकारी फल मत माँगना। इसकी बजाय सभी के मंगल एवं कल्याण की भावना रखना।’

ऐसे ही भद्र भावों को व्यक्त करता यह प्रार्थना सूत्र मनन योग्य है-

‘शिवमस्तु सर्व जगतः, परहित निरता भवन्तु भूतगणाः। दोषाः प्रयान्तु नाशं, सवत्र सुखी भवतु लोकाः॥’

अर्थात् अखिल विश्व का कल्याण हो, प्राणी-समूह परोपकार में तत्पर बने, दोष, दुख व रोग आदि का नाश हो और सर्वत्र सभी सुखी हो।

यही भाव, उपरोक्त वर्णित प्रार्थना के विविध चरणों का चरमोत्कर्ष है। इन भावों के साथ की गई प्रार्थना निश्चित ही फलदायी होगी। यह जहाँ हृदय को पवित्र व निर्मल करने वाली है, वहीं दूसरों को भी सद्भाव एवं सद्प्रेरणा देने वाली है। इसमें जहाँ आत्मशक्ति के जागरण का मर्म छिपा है वहीं ईश्वर से एकाकार होने की क्षमता भी निहित है। ऐसी ही प्रार्थना में दूसरों के जख्मों को भरने व टूटे हृदयों को जोड़ने की क्षमता होती है और व्यक्तिगत संदर्भ में श्रीमाँ के अनुसार, -’ऐसी प्रार्थना से क्रमशः जीवन का क्षितिज सुस्पष्ट होने लगता है, जीवन का पथ आलोकित होने लगता है और हम अपनी असीम सम्भावनाओं एवं उज्ज्वल नियति के प्रति अधिकाधिक आश्वस्त होते जाते हैं।’ प्रार्थना से ओत−प्रोत ऐसे जीवन में ही यथार्थ सुख-शान्ति एवं आनन्द का रहस्य छिपा है।


दोनों की आँखों में आँसू (kahani)

एडीसन महान वैज्ञानिक हुए हैं। गरीब माँ के बेटे थे, पर बचपन से ही वैज्ञानिक बनने की बात किया करते थे। माँ ने सोचा, इसे किसी वैज्ञानिक के पास रख दूँ तो शायद इसका समाधान हो जाए। विज्ञान पढ़ाने की क्षमता तो उसमें थी नहीं।

एक वैज्ञानिक के पास वे एडीसन को ले गई। वैज्ञानिक ने एडीसन को एक झाडू देकर अपनी प्रयोगशाला की सफाई करने को कहा। एडीसन ने हर काम बड़े करीने से किया। कहीं कोने में भी गंदगी न छोड़ी और हर सामान सफाई के बाद यथास्थान जमा दिया।

मेरी और टॉमस का दाँपत्य जीवन अनंत प्रेम से भरा-पूरा था। हर वर्ष का विवाहोत्सव मनाते और छोटा-मोटा उपहार उस दिन एक-दूसरे भेंट करते, गरीबी में जो दिन काटते थे।

उस वर्ष का विवाह दिन फिर आया। दोनों एक-दूसरे के लिए उपहार देने की योजना बनाने लगे, पर जेबें बिल्कुल खाली थीं।

टॉमस ने पत्नी के सुनहरे बालों में लगाने के लिए एक सुनहरी क्लिप खरीदने की बात सोची। मेरी सोचने लगी, पति की हाथ-घड़ी के लिए सुनहरी चेन खरीदी जाए। दोनों के मनोरथ मन में थे। साधन जुट नहीं रहा था। दिन निकट आ गया।

टॉमस पुरानी घड़ी खरीदने वाले की दुकान पर गया और घड़ी बेचकर बदले में सुनहरी क्लिप खरीद लाया। मन में बहुत प्रसन्नता थी।

मेरी क्या करती, वह सुनहरे बाल खरीदने वाले की दुकान पर गई और अपने घुँघराले बाल कटाकर मिले पैसे से घड़ी की चैन खरीद लाई। सिर पर टोपा लगा लिया।

दिन आया, उपहार देने के लिए एक ने दूसरे की ओर हाथ बढ़ाया। क्लिप कहाँ लगे, बाल नदारद। चेन कहाँ बँधे, घड़ी गायब। पूछने पर तथ्य खुला। शोभित न हो सकने पर भी इन उपहारों ने एक-दूसरे का दिल सदा-सदा के लिए जीत लिया। दोनों की आँखों में आँसू भरे थे।

इस तरह मना वह विवाहदिवसोत्वस।


छह व्यवहारिक सूत्र, व्यक्तित्व परिष्कार के

व्यक्तित्व ही व्यक्ति का वास्तविक परिचय है। समृद्ध एवं श्रेष्ठ व्यक्तित्व उसकी पूँजी एवं सम्पदा होती है। और यह सम्पदा-सम्पत्ति दैनिक जीवन में व्यवहार में आने वाले छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से जमा होती है। जिसके पास यह जमा पूँजी जितनी अधिक होगी वह उतना ही व्यवहारकुशल व सफल व्यक्तित्व का धनी होगा। इसके अभाव में व्यक्ति व्यावहारिक धरातल पर नितान्त दरिद्र होता है भले ही यह अन्य क्षेत्रों में कितना ही समृद्ध क्यों न हो। इसी को आज व्यावहारिक बैंक खाता के रूप में जाना जाता है, जो अत्यन्त लोकप्रिय है। यह हर उम्र के एवं वय के लोगों के लिए एक समान लागू होता है क्योंकि सभी का बाह्य जीवन व्यावहारिक पृष्ठभूमि में पलता-बढ़ता, विकसित होता है। इसी में आन्तरिक जीवन के बन्द कपाट खुलते हैं।

व्यावहारिक जीवन के बनावट-बुनावट को उकेरने-सहेजने वाले प्रसिद्ध लेखक सिन कोवे ने अपनी लोकप्रिय पुस्तक ‘द सेवेन हैबीट्स ऑफ हाइली इफेक्टिव टीन्स’ में इस संदर्भ में बड़ा ही रोचक विवरण प्रस्तुत किया है। इस किताब में उन्होंने व्यावहारिक जीवन के लिए छः बिन्दुओं का उल्लेख किया है। यदि इसे दैनिक दिनचर्या में उतारा-अपनाया जा सके तो जीवन सफलता की ओर, समृद्धि की ओर अग्रसर होने लगता है।

सीन कोवे व्यावहारिक खाते के इन छः विधेयात्मक सूत्रों को वास्तविक जमा पूँजी कहते हैं। ये हैं- अपने वचन की रक्षा करना, दिन में कोई अच्छा कार्य करना, विश्वसनीय होना, दूसरों की सुनना, गल्तियों के लिए विनम्रतापूर्वक क्षमा माँगना और उचित की इच्छा करना। ये सूत्र जब व्यवहार और आचरण में उतरने लगते हैं तो व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आने लगता है। सही मायने में हम स्वयं अन्दर से प्रसन्न होते हैं तथा दूसरों का विश्वास और आत्मीयता भी अर्जन करने लगते हैं।

जीवन का क्रिया व्यापार आपसी विश्वास के आधार पर आधारित है। और इस विश्वास को प्राप्त करने के लिए हमें विश्वसनीय होना अनिवार्य है। जिसका प्रथम चरण है किये गये वायदों का, दिये हुए वचनों को उचित एवं पूर्णरूप से निर्वाह करना। प्रायः हम बड़े-बड़े वायदों का पुलिन्दा बाँधते हैं तथा इसको निभाने का जब वक्त आता है तो हम साफ मुकर जाते हैं। ऐसा आश्वासन राजनीति के अखाड़े में भले ही कुछ देर चल जाय पर व्यावहारिक जीवन में पल भर भी नहीं बढ़ सकता। क्योंकि हम जब तक अपनी कही हुई बातों को करके नहीं दिखा लेते, कोई हम पर क्यों और कैसे विश्वास करे। अतः आवश्यक है कि हम अपने दैनिक जीवन की छोटी-छोटी बातों का पालन करें, उस पर खरे उतरें। यदि हमने किसी को मिलने का समय दिया है, तो दी गई समयावधि में हम उससे मिल लें। यदि हम किसी को कुछ वस्तु देने का आश्वासन दिया है तो उसे अवश्य दें। और यदि किसी नितान्त एवं अपरिहार्य कारणों से उसे कर पाने में अक्षम हो रहे हो तो बड़ी विनम्रता पूर्वक माफी माँग लेनी चाहिए। इसी से विश्वास पैदा होता है और विश्वसनीयता का आधार तय होता है।

यह विश्वसनीयता जीवन में नवगति-प्रगति प्रदान करता है। इससे जीवन गतिशील होता है, प्रगतिशील होता है। गतिशील जीवन के कुछ क्षण, व्यक्ति एवं बातें स्थान, वस्तु ऐसी होती हैं जो हमें अनायास अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। हमें किसी की निश्छल मुस्कान अच्छी लग जाती है, किसी का निष्काम सेवा भाव भा जाता है, किसी का अपनापन आन्दोलित कर जाता है। यह जो हमें अच्छा एवं लुभावना लगता है क्यों न हम इसे औरों को बाँटने लगे। क्योंकि जो दिया जाता है वह लौटकर वापस आता है और निहाल कर देता है। जो दिया या किया उसकी अपेक्षा न भी करें तो भी करते वक्त जो आन्तरिक तृप्ति मिलती है वह भी किसी दिव्य अनुदान-प्रतिदान से कम नहीं होती है। अतः हमें प्रत्येक दिन ऐसा कुछ श्रेष्ठ कार्य करना चाहिए, जिसमें दूसरों की कुछ भलाई की भावना निहित हों।

दूसरों को सतत देने तथा भलाई करने वालों पर कौन नहीं न्यौछावर होगा। दूसरों के दुःख में दुःखी तथा सुख में सुखी का दिव्य भाव जिसके पास हो वही सबके हृदय में बसता है। ये काल्पनिक उड़ानों में, बड़ी-बड़ी बातों में नहीं, कुछ करने में विश्वास रखते हैं। सदा दूसरों का भला चाहने वालों के पास यूँ ही व्यर्थ समय गँवाने के लिए नहीं होता, ये दूसरों के निजी तथा व्यक्तिगत जीवन पर कोई हस्तक्षेप नहीं करते। दूसरों के व्यक्तिगत पक्ष को किसी के सामने उजागर नहीं करते, बल्कि उसका समुचित सम्मान के साथ रक्षा करते हैं। अतः जीवन में इन विशेषताओं का समावेश करने पर हम विश्वास मात्र बनते हैं, भरोसेमन्द बनते हैं। यह पात्रता हमारे जीवन के विकास एवं प्रगति में अत्यन्त सहायक होती है।

ऐसी सुपात्रता में ही भगवद् कृपा अवतरित होती है तथा उसके दिव्य अनुदान-वरदान बरसते हैं। आकाश की घटाओं में मिट्टी के घट को भरने के लिए पानी की कमी नहीं है, कमी है तो उस माटी के घट की जो अपनी छोटी पात्रता के बावजूद अधिक पाने की ललक-लिप्सा सँजोये रहता है। यह केवल अपनी अपात्रता को पात्रता का आवरण चढ़ाकर अपनी ही सुनाता है। सच्चाई को नहीं जानता, उसे नहीं सुनता। बल्कि होना तो यह चाहिए कि हमें अपना व्यर्थ प्रलाप बन्द कर देना चाहिए तथा सुनने लायक को सुनना चाहिए। दूसरों की व्यथा-कथा को सुनना चाहिए, ताकि उसके लिए कुछ किया जा सके। उसे सुनना चाहिए जो अपनी गहन पीड़ा से पीड़ित है तथा अपनी व्यथा को सुनाना चाहता है ताकि कहकर हल्का हो सके। हमें सीमित तथा सारगर्भित संवेदना के दो शब्द देने में विश्वास रखना चाहिए। जिससे हमारे जीवन के विकल व्यथा तथा असह्य दर्द के क्षणों में भी परमात्मा का प्रेम बरस सके, झर सके। यह तय है कि सदा दूसरों के सुनने वाले का भगवान् सुनता है।

हमारे कर्मों से, व्यवहार, आचरण से यदि औरों को कुछ कष्ट होता है तो उसके लिए विनम्रतापूर्वक क्षमायाचना कर लेनी चाहिए। तथा अपने प्रति दूसरों के अशोभनीय आचरण को भी सहजतापूर्वक क्षमा कर देने का प्रयास करना चाहिए। अगर हम दूसरों को नहीं क्षमा कर सके तो परमात्मा कैसे हमारे अनन्त भूलों, पापों को माफ कर देगा। यह जानें कि मनुष्य गल्तियों का पुतला है। कहीं न कहीं उससे जाने-अनजाने त्रुटियाँ हो जाती हैं। अतः दूसरों की त्रुटियाँ क्षम्य है परन्तु अपनी स्वयं की गलती के लिए प्रायश्चित करना चाहिए। अपने द्वारा किये हुए समस्त सद्कर्मों को भगवान् को समर्पित कर अपनी गल्ती के लिए सदैव सजग व जागरुक होना आवश्यक है। इसी भाव में अन्तर की हठीली आग्रह-दुराग्रहपूर्ण वृत्तियाँ कटती-मिटती हैं तथा मनुष्य सरल व विनम्र बनता चला जाता है।

विनम्र, सुपात्र और विश्वसनीय व्यक्ति को उचित और अनुचित का भेद होता है। वह विवेक का पक्षधर होता है। जीवन में अच्छाई व उत्कृष्ट की इच्छा करता है, उच्चस्तरीय अभीप्सा करता है। जीवन में सत्कर्म, सद्व्यवहार और सद्आदर्श को सर्वोपरि मानता है। वही इसका ईष्ट और लक्ष्य होता है और हो भी क्यों न, क्योंकि आदर्शों का समुच्चय ही तो भगवान् है। अतः वह सतत दूसरों का भला करते हुए सेवा करते हुए भी उनसे कोई भी, किसी भी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखता। वह अपने ही बनाये दिव्य आदर्शों पर खरा उतरने की प्रबल आकाँक्षा रखता है।

सेट कोवेन के ये छः विचार सूत्र उच्च व्यावहारिक आदर्श हैं। इससे न केवल जीवन का व्यवहार पक्ष परिष्कृत होता है, समृद्ध होता है बल्कि आन्तरिक जीवन की अनन्त सम्पदा के द्वार भी खुलने लगते हैं। हमें इन दिव्य सूत्रों को अपने चिंतन, चरित्र और आचरण में उतारना चाहिए। क्योंकि सूत्रों में ही अगम्य शास्त्रों का मर्म छुपा हुआ रहता है। इन सूत्रों को हृदयंगम कर हमारा जीवन भी शास्त्र बने, जिससे हम स्वयं प्रकाशित हों औरों को भी आलोकित कर सकें। इसे अपनाकर अन्तर प्रसन्न-प्रफुल्लित हों तथा दूसरों को भी खुशी बाँट सकें। यही सच्ची सम्पदा है, वास्तविक पूँजी है और अक्षय समृद्धि है। अतः हमें इस दिव्य अनुदान से वंचित नहीं होना चाहिए तथा जीवन में इन सूत्रों को अपनाकर दिव्य व्यक्तित्व सम्पन्न बनना चाहिए।


साधनों को बढ़ाए बिना (kahani)

अकबर ने दरबारियों की बुद्धि परखने के लिए एक चादर मँगाई, जो उनकी लंबाई से छोटी थी। सभी से ऐसा प्रश्न पूछा जा रहा था कि बिना चादर को घटाए-बढ़ाए उसका शरीर कैसे ढक जाए?

औरों से उत्तर न बन पड़ा तो बीरबल ने कहा, हुजूर, अपने पैर सिकोड़ें, मजे में उसी चादर में तन ढ़ककर सोएँ।

बुद्धिमानी की बात सभी को पसंद आई। साधनों को बढ़ाए बिना भी आवश्यकताएँ कम करके गुजर हो सकती है।


जिज्ञासा से होगी सत्य की प्राप्ति

भारतीय पद्धति के प्रणेता ऋषियों ने मानव जीवन में जिज्ञासा के अन्यतम महत्त्व को जाना−पहचाना तथा प्रत्येक श्रेयार्थी को जिज्ञासु का सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त करने की प्रेरणा दी। नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् (कठ 1/22) अर्थात् सत्य की प्राप्ति में जिज्ञासा से श्रेष्ठ अन्य कोई सहायक नहीं।

मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? मैं भविष्य में भी रहूँगा या नहीं? प्राणी दुखी क्यों होता है? सच्चा सुख क्या है? इंद्रियों से प्राप्त होने वाला ज्ञान विश्वसनीय है या नहीं? कर्मों को फल मिलता है या नहीं? या नहीं? इस जन्म से पूर्व मेरा अस्तित्व था या नहीं? आदि असंख्य प्रश्नों की जिज्ञासा न केवल संसार से दुखों से पीड़ित प्राणी को ही झकझोरती है, अपितु कई बार सब प्रकार से सुखी मनुष्यों के मन में भी उथल−पुथल मचा देती है। यह जिज्ञासा दिव्य अग्नि के समान है, जिसमें तपने पर मनुष्य का हृदय सत्य के अवतरण का पुण्य तीर्थ बन जाता है।

जिस समय मनुष्य के मन से इन विचारों का झंझावात चलता है, उस समय उसे समस्त साँसारिक सुख विषतुल्य प्रतीत होने लगते हैं। राजमहलों के वैभव−विलास में पले राजकुमार सिद्धार्थ, राजा भर्तृहरि और महावीर जैसे असंख्यों की जीवनगाथाएँ इतिहास के पृष्ठों में बिखरी पड़ी है। विचारों का यह तूफान ही वह सच्ची जिज्ञासा है, जिससे दर्शन का जन्म होता है।

जिज्ञासु के लिए दर्शन का अर्थ मात्र बौद्धिक कलाबाजियाँ खाना नहीं है। वह एकाँत में बैठकर चिंतन करता हुआ अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं समझता। आँग्ल भाषा में दर्शन के लिए प्रयुक्त होने वाला ‘फिलॉसफी’ शब्द यूनानी भाषा के ‘फिलो’ और ‘सोफिया’ के मिलने से बना है, जिसका अर्थ होता है, ज्ञान के प्रति प्रेम। यहाँ ज्ञान का तात्पर्य बुद्धिकृत मीमाँसा से है और तत्संबंधी रुचि ही ‘फिलॉसफी’ है। इसके विपरीत भारतीय शब्द ‘दर्शन’ का तात्पर्य ‘देखने’ से है जिसका अर्थ है, तत्त्व का साक्षात्कार करना। ज्ञान के जिस विवेचन में सत्य या तत्त्व को स्वयं न देखा जाए, उसे ‘दर्शन’ कहना युक्ति संगत प्रतीत नहीं होता। अतः वही तत्त्व सत्य है, जिसके संबंध में हम यह कह सकें कि हमने उसका साक्षात्कार किया है। यह हमारे अनुभव का विषय है अर्थात् यह हमारा ‘तत्त्वदर्शन’ है।

बिना सच्ची जिज्ञासा के तत्त्वज्ञान की उधेड़बुन बुद्धि का कुतूहल मात्र बनकर रह जाती है। आर्ष साहित्य में जिज्ञासा वृत्ति का सर्वोत्तम उदाहरण नचिकेता है। नचिकेता शब्द यथार्थ जिज्ञासु वृत्ति का सूचक है। यह जिज्ञासावृत्ति मनुष्य में प्रायः (यम) के सन्निकट होने अर्थात् मृत्यु का भय उपस्थित होने पर जाग उठती है।

मृत्यु के नाटक को निकट से देखते हैं, तब ‘कस्त्वं कोऽहम्’ से प्रश्न हमें सच्चे और आवश्यक जान पड़ते हैं। नचिकेता की जिज्ञासा का उदय भी यम के सान्निध्य में ही होता है। नचिकेता (न+चिकेतस्) शब्द को अर्थ ही है कि जिसके अंदर जानने की इच्छा हो, परंतु वह जानता न हो।

भगवान बुद्ध अपने उपदेशों में बहुत जोर देकर कहते थे,”मैं जिस मार्ग का पथिक हूँ, मैंने उसे स्वयं देख लिया है।” जब तक किसी उपदेष्टा या ज्ञानी की ऐसी विश्वस्त स्थिति न हो, तब तक वह मानव जीवन के लिए असंदिग्ध या महत्त्वपूर्ण तत्त्व का व्याख्यान नहीं कर सकता ।

यास्काचार्य ने लिखा है, ‘ऋषिदर्शनात्’ (निरुक्त 2/11) अर्थात् ऋषि शब्द का अर्थ है, द्रष्टा या देखने वाला। शुष्क ऊहापोह करने वाला तार्किक भारतीय अर्थ में ‘दार्शनिक’ की पदवी का अधिकारी नहीं बनता। दार्शनिक बनने के लिए ‘दर्शन’ होना चाहिए। दूसरे शब्दों में दार्शनिक में ऋषित्व का होना आवश्यक है। जो व्यक्ति अपने आपको ज्ञान का अधिकारी कहता है, उससे पूर्व उसमें यह कहने की हिम्मत होनी चाहिए कि मैंने ऐसा देखा है। यजुर्वेद की परिभाषा के अनुसार सच्चा दार्शनिक वह है, जो ‘एव मया श्रुतम्’ (ऐसा मैंने सुना) यह नहीं , वरन् आत्मविश्वास के साथ यह कहे।

वेदाहमेंत पुरुषं महान्तमदित्यवर्ण तमसः परस्तात्।

मैं उस परमसत्ता को जानता हूँ, जो आदित्य के सदृश्य भास्वर और तम से परे है।

दर्शन का अर्थ है, ‘आत्मानुभव।’ दूसरों के दर्शन के आधार पर सच्ची तृप्ति संभव नहीं। तार्किक प्रश्नात्मक जिज्ञासा का अर्थ श्रद्धा का अभाव नहीं है। इसके विपरीत जिज्ञासा का अभाव अश्रद्धा है। जिज्ञासा विषय को अपने अध्यवसाय की क्षमता से अनुभव का विषय बना लेना श्रद्धा का लक्षण है।

दार्शनिक काँट ने कहा है, “ नीतिमय जीवन का प्रारंभ होने के लिए विचारक्रम में परिवर्तन तथा आचार का ग्रहण आवश्यक है।” जिज्ञासा उत्पन्न हो जाने पर यदि जीवनक्रम में परिवर्तन नहीं होता है तो इसका अर्थ है कि व्यक्ति वास्तविकता के साथ अपना सीधा संबंध जोड़ना नहीं चाहता है।

व्यक्ति में यदि सही−सही जिज्ञासा का उदय हो जाए तो वह सकाम कर्मों के फल का भी उल्लंघन कर जाता है अर्थात् वह उससे भी आगे बढ़ जाता है, ऐसा गीता का कथन है, जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते। (6/44)

संदेह या प्रश्नों को परास्त करने की शक्ति ही जिज्ञासु की श्रद्धा है। सत्य को जानने के लिए मात्र प्रश्नों या तर्कों का उदय ही पर्याप्त नहीं है। गीता के अनुसार इसके लिए योगयुक्त एकनिष्ठ अभ्यास की भी आवश्यकता है, ‘अभ्यासयोगयुक्तेल चेतसा नान्यगामिना।’

‘ज्ञान’ का सामान्य अर्थ जानकारी है। भौतिक पदार्थों एवं परिस्थितियों की तथा प्रयोग विधियों जानकारी को ही लोकव्यवहार में ‘ज्ञान’ कहा जाता है, किंतु आत्मविज्ञान में इसे आत्मसत्ता की स्थिति एवं परिणीत के संबंध में आवश्यक अनुभव कराने वाली अनुभूति को ही ‘ज्ञान’ कहा गया है। इसी की उपलब्धी मानव जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। अपने संबंध में भ्राँतियाँ बनी रहने पर लोक−व्यवहार एवं पदार्थों का उपार्जन−उपयोग सभी गलता हो जाता है और सुख−संवर्द्धन के लिए किया गया पुरुषार्थ उलटा संकट भरे जाल−जंजालों में फँसाता जाता है। शाँति एवं प्रगति का सही मार्ग उसी को मिल सकता है, जो आत्मचेतना और लोक−व्यवस्था के मध्यवर्ती अंतर को जोड़ने वाली सूत्र− शृंखला को भली प्रकार समझ लेता है। उसी जानकारी को शास्त्र में ‘ आत्मज्ञान’ कहा गया है। यह आत्मज्ञान ही वह अमृत है, जिसे पाने के उपराँत और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता ।

छाँदोग्य उपनिषद् में एक कथा आती है। प्राचीनकाल में दो पुरुष थे। एक का नाम विरोचन था, दूसरे का इंद्र। दोनों के मन में यह प्रश्न उठा कि ‘ मैं कौन हूँ?’ शिष्य भाव से जिज्ञासु की भाँति दोनों हाथ में समिधाएँ लिए प्रजापति के पास पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने प्रश्न किया, आचार्यश्रेष्ठ, हमें बताइए कि हम कौन हैं?

प्रजापति ने उत्तर देने के पूर्व उनकी योग्यता की परीक्षा लेना उचित समझा। उन्होंने कहा, “थाली में पानी भर लो और उसमें अपना मुख देखो, अपने आपका साक्षात्कार कर लोगे।” उत्तम वस्त्र धारण करके दोनों ने जल में अपनी आकृति देखी। विरोचन अपना सौंदर्य देखकर प्रसन्न हो उठा और कहने लगा, “ मैं कितना सुँदर हूँ।” वह अपने सभी साथियों से कहने लगा, “ मैंने ‘मैं’ को पता लगा लिया है।” अपने शरीर को ही ‘मैं’ समझकर वह उसे ही पुष्ट करने एवं सँवारने में लग गया।

इंद्र दूरदर्शी थे। उनने सोचा कि यदि वस्त्र, आभूषण एवं शरीर ही मेरा स्वरूप है तो इसका अर्थ यह है कि उनके मैले होने, जरा−जीर्ण पड़ने पर मेरी भी वैसी ही स्थिति हो जाएगी। निश्चय ही यह मेरा स्वरूप नहीं हो सकता। वह कहने लगे, “ नाहमाम् भोग्य पश्यामि” अर्थात् मैं तो उसमें कुछ भी कल्याण नहीं देखता।

इंद्र की आशंका उचित थी। जिन आकर्षक वस्त्रों द्वारा हम शरीर को सजाते−सँवारते हैं, वह मैला होता है। और फटता भी है, किंतु ‘मैं’ का भाव तो सदा एक जैसा बना रहता है। संबोधन किए जाने वाले स्थल अवयव का स्वरूप बदल जाता है।

बचपन में भी ‘मैं’ का संबोधन किया जाता था, युवावस्था एवं वृद्धावस्था में भी। शरीर तो परिवर्तित होता जाता है, किंतु ‘मैं’ सदा एक जैसा बना रहता है। स्पष्ट है नित्य परिवर्तनशील यह शरीर ‘मैं’ नहीं हो सकता है। ‘मैं’ का भाव शाश्वत, अपरिवर्तनशील होना इस बात को प्रमाण है कि यह कोई शाश्वत, अविनाशी एवं परिवर्तनशील सत्ता होनी चाहिए।

उपनिषद् के इस कथानक का निष्कर्ष यह है कि आत्मसत्ता को शरीर से पृथक और स्वतंत्र मानकर चला जाए। अपना हितसाधन, आत्मकल्याण एवं आत्मोत्कर्ष की समस्याओं एवं उपलब्धियों के साथ जोड़ा जाए। इस स्तर को दृष्टिकोण न अपनाया जाए जैसा कि कि पेट और और प्रजनन तक अपनी आकाँक्षा तथा चेष्टा को सीमाबद्ध रखने वाले नरपशु अपनाते देखे जाते हैं। वासना और तृष्णा, लोभ और मोह के भव−बंधन उन्हीं को बाँधते हैं, जो अपने को शरीर मानकर चलते हैं, और उसी के साथ जुड़े हुए परिकर के साथ बालक्रीड़ा करते रहते हैं। इस स्तर से ऊँचे उठकर जीवन−संपदा को महत्त्व एवं सदुपयोग को समझते हुए चरम लक्ष्य की दिशा में चल पड़ने की प्रेरणा आत्मज्ञान पर अवलंबित है। इसी प्रेरणा को ऋतंभरा प्रज्ञा एवं ब्रह्मविद्या गायत्री कहते हैं।

व्यक्ति की तीन तस्वीरें हैं− (1) लोग उसे किस रूप में समझते हैं। (2) वह किस रूप में जीता है। (3) वह किस रूप में अपने आपको प्रस्तुत करता है। तीनों चित्रों में से पहला मान्यता का, दूसरा यथार्थ का और तीसरा अयथार्थ का है।

राजा भोज की राजसभा जुड़ी हुई थी। बड़े−बड़े विद्वान अपने−अपने आसनों पर विराजमान थे। उसी समय एक भद्र−सा पुरुष आभूषणों से विभूषित वहाँ आ उपस्थित हुआ। राजा भोज सिंहासन से उठे, अभिवादन किया और सम्मान दे ऊँचे आसन पर बिठाया। उसी समय एक दूसरा व्यक्ति फटे−पुराने वस्त्र पहने सभा में आया। राजा ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया और वह एक किनारे बैठ गया।

विद्वानों के वक्तव्य हुए, चर्चा−परिचर्चा चलने लगी। फटे कपड़े में उपस्थित व्यक्ति प्रभावशाली वक्ता एवं विद्वान था। सभा विसर्जित होने पर राजा स्वयं उसके साथ दरवाजे तक विदा करने के लिए गया और उसे विविध प्रकार के वस्त्राभूषणों से सम्मानित किया। जाते समय जो व्यक्ति वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर आया था, उसकी ओर राजा ने ध्यान तक नहीं दिया।

इतने में एक विदूषक घूँघट लगाए रूपसी जैसे आवरण पहनकर दरबार में दाखिल हुआ और फरियाद सुनने की प्रार्थना करने लगा। आरंभ में सभी का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हुआ, पर पीछे जब वास्तविकता का पता चला तो सभी दरबारी उस छद्मवेशी पर ठहाका लगाकर हँस पड़े और उस बहरूपिये को कुछ दे−दिलाकर भगा दिया।

उपस्थित विद्वानों ने तीन प्रकार के लोगों के प्रति तीन तरह का व्यवहार करने और आरंभ में प्रदर्शित किए रुख को बदल देने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा, प्रथम व्यवहार में प्रारंभिक परिचय, दूसरे में यथार्थ निरूपण और तीसरे में भ्रम−निवारण के तथ्यों के काम किया और प्रारंभिक मान्यता को बदल दिया।

यथार्थ जिज्ञासु को भी ऐसे कितने ही चरणों से होकर गुजरना पड़ता है, तब जाकर परम तत्त्व की प्राप्ति होती है। कई बार भ्रम सत्य−सा प्रतीत होता है तो उसकी पड़ताल कर उक्त धारण को परिवर्तित भी करना पड़ता है। जिज्ञासा की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। बिना जिज्ञासा के व्यक्ति प्रगति नहीं कर सकता। चाहे विकास भौतिक हो या आत्मिक, दोनों के लिए यह समान रूप से आवश्यक है।


कर्मफल के अनुरूप (kahani)

शिष्यगण गुरुदेव से स्वर्ग−नरक का विवरण पूछते रहते। गुरुदेव ने कहा, वे दोनों इसी धरती पर हैं। कर्मों के अनुसार इसी जीवन में मिलते रहते हैं।

शिष्यों का समाधान नहीं हुआ तो उन्हें साथ लेकर गुरु कई परिवारों में गए और उनको कर्म तथा प्रतिफल का प्रत्यक्ष दर्शन कराया।

नरक का दर्शन कराने वे एक बहेलिये के घर गए, जो जीवहत्या कर पेट पालता, किंतु था सर्वथा निर्धन। बच्चे सब के सब कुकर्मी, विग्रही और दुर्गुणी। घर में प्रत्यक्ष नरक था।

दूसरा घर वेश्या का था। युवावस्था में उसने कमाया भी खूब और गिराया भी बहुतों को, पर इस वृद्धावस्था में वह अनेक रोगों से ग्रसित हो गई थी। तिरस्कार सहती और भिक्षा से पेट भरती थी।

तीसरा घर सद्गृहस्थ का था। संयमी, परिश्रमी, उदार और सद्गुणी। पूरा परिवार सुखी−समृद्ध था। घर में स्नेह−सौजन्य बिखरा फिरता था।

चौथा प्रवेश एक संत की कुटी में हुआ। मस्ती देखते ही बनती थी। शिक्षा और प्रेरणा पाने के लिए अनेकों श्रेयार्थी श्रद्धापूर्वक उनके चरणों में बैठे थे।

गुरु ने दो नरक के और दो स्वर्ग के रूप दिखाए और शिष्यों से कहा, कर्मफल के अनुरूप इन दोनों ही परिस्थितियों को कहीं भी प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।


स्वस्थ रहना हो तो दिल खोलकर हँसे

हँसी प्रकृति द्वारा मनुष्य को दिया हुआ एक बेशकीमती उपहार है। अन्य किसी प्राणी को यह क्षमता उपलब्ध नहीं, जबकि मनुष्य की चौदह प्रमुख प्रवृत्तियों में से यह एक है। हँसना, ठहाके लगाकर हँसना जहाँ एक सशक्त व्यायाम है वहीं स्वास्थ्य के लिए निसर्ग द्वारा प्रदत्त एक टॉनिक भी है। अंग्रेजी में यह कहावत ठीक ही बनी है कि ‘लॉफ्टर इज द बेस्ट मेडिसिन’ अर्थात् हँसी सर्वश्रेष्ठ दवा है। हँसी जहाँ मानसिक तनाव से राहत दिलाने वाली अचूक औषधि है वहीं मानवीय सम्बन्धों को सरस एवं सुखद बनाकर पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन को सफल बनाने वाला एक निर्णायक साधन भी है। इसके अनगिनत फायदों को देखते हुए हँसी आज वैज्ञानिक शोध अध्ययन का विषय बनी हुई है।

अब तक हुए अनुसंधानों से यह स्पष्ट हुआ है कि हँसी स्वास्थ्य के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितना कि उचित खान-पान। क्रोध, भय, ईर्ष्या, द्वेष जैसे नकारात्मक भाव जहाँ शरीर पर घातक प्रभाव डालते हैं, वहीं हँसी के साथ मानव देह से ऐसे जैव रसायनों का स्रवण होता है जो स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव डालते हैं। हँसी व ठहाके लगाकर हँसने के साथ शरीर में एण्डोर्फिन नामक हार्मोन का उत्सर्जन होता है, जो शरीर में सक्रियता, स्फूर्ति एवं प्रसन्नता को जगाता है। इसके अतिरिक्त एपीनेफ्रन, नारेपाइनफ्रीन, डोपामाइन जैसे हार्मोन भी सक्रिय होते हैं, ये सभी शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यधिक गुणकारी जैव रसायन हैं।

ठहाके मारकर हँसने से शरीर के भीतरी अंग-अवयवों की अच्छी खासी कसरत हो जाती है। प्रख्यात् वैज्ञानिक नारमन कजनस, इसे भीतरी ‘जागिंग’ की संज्ञा देते हैं। उनके अनुसार हँसने से न केवल भीतरी अंगों की मालिश होती है, बल्कि दिमागी खिंचाव भी दूर हो जाता है। खुलकर हँसने से शरीर में रक्त का संचार तीव्रगति से होने लगता है, अतः पसीना अधिक आता है, जिसके साथ विजातीय द्रव्य आसानी से शरीर से बाहर निकल जाते हैं। ठहाके लगाने से पेट और सीने के स्नायु मजबूत होते हैं, फेफड़ों में भरी दूषित वायु बाहर निकल जाती है और ऑक्सीजन का प्रवाह तेज हो जाता है, जिससे कि शरीर में शक्ति, स्फूर्ति और ऊर्जा का संचार होने लगता है। इसके साथ तनाव, अवसाद, सिरदर्द,ऊब आदि अपने आप दूर होने लगते हैं। डॉ. नारमन के अनुसार,हँसने से व्यक्ति अपने तनावों और कुण्ठाओं को भूलकर स्वयं को हल्का अनुभव करता है। प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिदिन चार-पाँच किलोमीटर दौड़ने से जितना व्यायाम होता है, उतना कुछ देर जोरदार ठहाके लगाने से हो जाता है। प्रख्यात् चिकित्सक विलियम फ्राय के अनुसार, जब हम हँसते हैं तो हमारे स्नायु व श्वसनतंत्र का खिंचाव बढ़ जाता है, जिससे हमारे भीतर अधिक ऑक्सीजन का संचार होता है। हँसने से चेहरे की माँसपेशियों की भी अच्छी खासी कसरत हो जाती है। डायफ्राग्म की कसरत से रक्त का संचार सुचारु रूप से होता है व पाचन−तंत्र दुरुस्त रहता है।

हँसने के चिकित्सीय प्रभावों पर भी गम्भीर अध्ययन चल रहा है और इसके निष्कर्ष अद्भुत एवं आश्चर्यजनक हैं। न्यूयार्क में ‘ह्यूमर प्रोजेक्ट’ की स्थापना करने वाले डॉ. गुडमैन के अनुसार, यदि कोई दिन में पंद्रह बार हँसे तो उसके डॉक्टर का बिल लगभग न के बराबर होगा। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जोनेथन स्विफट ने विश्व के तीन चिकित्सकों की प्रशंसा की है, ये चिकित्सक हैं- डॉक्टर डाइट (संतुलित आहार), डॉक्टर पीस (शान्ति) और डॉक्टर स्माइल (मुस्कान या हँसी)। हँसी के अद्भुत चिकित्सीय प्रभावों का उल्लेख यूगोस्लाविया के मनोवैज्ञानिक बरोको बोकुल ने अपनी पुस्तक ‘ट्रीटमेंट बाय ह्यूमर’ में किया है। उन्होंने इसे दुर्बलता, सिरदर्द तथा उच्चरक्तचाप का अचूक उपाय बताया है और कैंसर जैसे घातक रोग में तक इसके अद्भुत प्रभावों पर प्रकाश डाला है। डॉ. फ्राय अपने ग्रन्थ ‘ह्यूमर एण्ड एजिंग‘ में लिखते हैं कि उनकी लम्बी उम्र का राज प्रसन्न व हँसमुख रहना है। हास्य के लाभों पर सारगर्भित शब्दों में टिप्पणी करते हुए फ्रेंक इंविंग फ्लेचर नामक विद्वान लिखते हैं कि यह थके हुए के लिए विश्राम है, हतोत्त्साहित के लिए दिन का प्रकाश और उदास के लिए दिन का धूप है तथा कष्ट के लिए प्रकृति का सर्वोत्तम प्रतिकार है। इस पर खर्च कुछ नहीं आता, किन्तु यह देती बहुत है। इसे पाने वाला मालामाल हो जाता है, साथ ही देने वाला भी दरिद्र नहीं होता।

इस तरह हँसी जीवन का एक अद्भुत वरदान है, जिसके लाभ बहुआयामी हैं। ‘जस्ट फॉर द हेल्थ’ एवं ‘हेल्थ एजुकेशन’ के लेखक डॉ. ज्योल गुडमैन इनका वर्णन करते हुए इन्हें तीन तरह से स्पष्ट करते हैं। प्रथमतः यह शरीर के विकारों का प्राकृतिक ढंग से उपचार करता है, दूसरा यह शरीर को तनाव रहित करता है और तीसरा, हास्य हमारे सामाजिक रिश्तों को मजबूत बनाता है। इस तरह शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के प्राकृतिक संरक्षक एवं संवर्धक के साथ इसे इन्सानी रिश्तों को बढ़ाने, बनाने व इसे निभाने में एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व के रूप में स्वीकारा जा रहा है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रायड इस संदर्भ में हँसी पर बहुत महत्त्व देते थे। उनका मानना था कि हास्य तनाव से मुक्त करता है। पति-पत्नी के जीवन में यदि हास्य की मौजूदगी है तो उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय एवं सरस होगा, अन्यथा यह नीरस होगा और तलाक की नौबत आ जायेगी। प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर. के लक्ष्मण का कहना है कि ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ एक ऐसा हथियार है जिससे केवल दुष्टता खत्म होती है। और यह सच है कि इसके सामने संशय, गलतफहमी, दुर्भाव एवं घृणा, द्वेष जैसे नकारात्मक भाव छूमन्तर हो जाते हैं। प्रसिद्ध फ्राँसिसी दार्शनिक हेनरी, हँसी को सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध लड़ने का एक कारगर अस्त्र मानते थे।

आज जब इन्सान जिन्दगी के विषम दौर से गुजर रहा है, समाज तमाम तरह की बुराइयों से ग्रस्त है, तो ऐसे में हँसी के इस अस्त्र को उपयोग में लाने की आवश्यकता भलीभाँति समझी जा सकती है। आज की भागम-भाग जिन्दगी में लोग गम्भीर तनाव में जी रहे हैं और अनिद्रा, उदासी, अवसाद, ब्लडप्रेशर, मधुमेह, हृदयरोग, नपुँसकता, अर्द्धविक्षिप्तता जैसे शारीरिक एवं मानसिक रोग आम होते जा रहे हैं। दिनों-दिन जटिल होती जा रही विषम परिस्थितियों में लोगों का सुख-चैन एवं स्वास्थ्य संतुलन छिनता जा रहा है। ऐसे में हास्य रूपी नैसर्गिक टॉनिक एवं दिव्य अस्त्र का अचूक उपाय आजमाने योग्य है।

तंज को भाँप कर हँसे थे। अधिकतर लोग तो फिजूल की उबाऊ बातों पर ही हँसे थे, मानो हँसने का फर्ज पूरा कर रहे हों।

जो भी हो हास्य के पर्याय अंग्रेजी शब्द ‘ह्यूमर’ का अर्थ मजाक, परिहास आदि है, वहीं इसके इतावली मूल ‘ह्यूमस’ के अनुरूप इसका अर्थ भीतरी गीलापन भी है, जिसे भारतीय मुहावरे ‘अन्दर से गदगद होना’ के रूप में समझा जा सकता है। इस तरह यह एक आन्तरिक उल्लास एवं प्रसन्नता की सुखद स्थिति का द्योतक है। इसे जीवन का एक अभिन्न अंग बना लेने पर हम जीवन के उत्सव का लुत्फ़ उठा सकते हैं।

कुछ विचारकों के मतानुसार हँसी एक सुखद अनुभव है और इसके आगे-पीछे कुछ नहीं। हँसी के अवसरों को चूको मत। यदि हँसी आये, तो हँसो, खूब जमकर हँसो। हँसी क्यों आयी, कब आयी की सोच में मत पड़ो। हँसी स्वच्छन्द झरने की तरह बहने वाली हो। हँसी के लिए माहौल का इन्तजार करने की भी जरूरत नहीं है। हँसी को उत्पन्न करने वाली घटनाओं को याद करके, उन विनोद एवं उल्लासपूर्ण क्षणों को अनुभव करके, हम कभी भी हँसी को अपने अन्दर पैदा कर सकते हैं। हँसी के इन क्षणों में शरीर रोमाँचित हो उठेगा, हँसी की तरंगें दिल में हिलोरें लेने लगेंगी और रोजमर्रा के भारीपन को बुहारकर हल्केपन का अहसास करायेगी। ऐसे अभ्यास बुढ़ापे के एकाकीपन में विशेष रूप से उपयोगी हैं, जबकि उम्र के अन्तिम पड़ाव में शरीर बोझ रूप लगने लगता है, किन्तु अनुभवी विशेषज्ञों के अनुसार हँसी बुढ़ापे को नजदीक आने नहीं देती। हँसी शरीर के लिए संजीवनी सिद्ध होती है जो रोते हुए को हँसा देती है। बुरे समय में हँसी दवा का काम करती है, खासकर जब कोई अपने साथ नहीं होता। मन को हल्का करने का इससे अच्छा, सरल और सस्ता कोई उपाय नहीं है। इसलिए जब हम खुश हों तो जी खोल कर हँसे और जब खुश न हों तो भी हँसने का प्रयास करें। यह अभ्यास अद्भुत आत्मसंतोष एवं आत्मविश्वास जगाने वाला साबित होगा।

बिना कारण भी हँसने का अभ्यास एक प्रभावी कसरत एवं टॉनिक के बतौर किया जा सकता है। इसी तथ्य के आधार पर पिछले कुछ समय से भारत में ‘लॉफ्टर क्लब’ अर्थात् हास्य या अट्टहास क्लबों की स्थापना हो रही है। लोग सबेरे-सबेरे पार्क में इकट्ठा होकर जोर-जोर से हँसते हैं। बिना कारण हँसते देख अक्सर लोग इनका मजाक भी उड़ाते हैं। लेकिन सच तो यह है कि इनका यह अभ्यास उन्हें कई तरह के छोटे-मोटे रोगों से मुक्त कर रहा है और वे अन्यों की तुलना में अधिक स्वस्थ एवं सजीव अनुभव कर रहे हैं। आज भारत में लगभग 400 से भी अधिक ऐसे क्लब हैं। इन क्लबों के प्रणेता डॉ. मदन कटारिया ‘हास्य योग‘ के रूप में हँसी के स्वास्थ्यवर्धक तकनीकों का विकास विस्तार कर रहे हैं। वर्तमान के तनाव, अवसाद एवं भाग-दौड़ में जी रहे हैरान, परेशान इन्सान की हँसी-खुशी को वापस लाने के ये प्रयास स्तुत्य हैं।

वास्तव में आज भौतिक वाद की आँधी में इन्सान इतना बह रहा है कि वह वर्तमान में अपने जीवन की वास्तविकता में ही जीना भूल गया है। उसकी आकाँक्षायें बढ़ी-चढ़ी हैं। कितनी भी उपलब्धियाँ उसे संतुष्ट नहीं कर पाती। ऐसे में दूसरों का संतोष एवं प्रगति भी ईर्ष्या-द्वेष का कारण बन रही हैं। ऐसे में हँसी के याँत्रिक अभ्यास के साथ यदि हम जीवन की आध्यात्मिक शैली को भी अपना लें तो ऐसे सादे, सरल एवं संयत जीवन में हंसी-खुशी के ढेरों अवसर आयेंगे व जहाँ हम इनके वरदानों से लाभान्वित होंगे, वहीं पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन भी अधिक सरस, सुखी एवं सफल सिद्ध होगा।


अग्नि संस्कार किया (kahani)

महान वैज्ञानिक माइकेल फैराडे उन्नीसवीं सदी में पैदा हुए। उन्हें दिनभर व्यस्त रहना पड़ता था, पर शाम को घर आते ही पत्नी के मनोरंजन और बच्चों को दुलारने में लग जाते। एक बार उनकी पत्नी बीमार पड़ीं तो लगातार तीन हफ्ते रात को जागकर उनकी तीमारदारी करते रहे।

उनकी पत्नी ने उनके संबंध में संस्मरण लिखते हुए कहा है, उनके साथ हर दिन सुखपूर्वक बीता। वृद्धावस्था आने पर हम लोगों ने जाना कि दाँपत्य जीवन की सफलता के सूत्र क्या हैं? उन सूत्रों को अपनाकर ही हमने संघर्षमय जीवन जीते हुए भी स्वर्गीय आनंद के दिन काटे और जाना कि दाँपत्य जीवन की उपलब्धियाँ कितनी सुखद और उमंगभरी होती हैं।

एक बालक की मृत्यु हो गई। अभिभावक उसे नदी तट वाले श्मशान में ले पहुँचे। वर्षा हो रही थी। विचार चल रहा था कि इस स्थिति में संस्कार कैसे किया जाए।

उनकी पारस्परिक वार्त्ता में निकट उपस्थित प्राणियों ने हस्तक्षेप किया और बिना पूछे ही अपनी−अपनी सम्मति भी बता दी।

सियार ने कहा, “ भूमि में दबा देने का बहुत माहात्म्य है। धरती माता की गोद में समर्पित करना श्रेष्ठ है।” कछुये ने कहा, “गंगा से बढ़कर और कोई तरण−तारणी नहीं। आप लोग शव को प्रवाहित क्यों नहीं कर देते?” गिद्ध की सम्मति थी, “ सूर्य और पवन के सम्मुख उसे खुला छोड़ देना उत्तम है। पानी और मिट्टी में अपने स्नेही की काया को क्यों सड़ाया−गलाया जाए?”

अभिभावकों को समझने में देर न लगी कि तीनों के कथन परामर्श जैसे दीखते हुए भी कितनी स्वार्थपरता से सने हुए हैं। उनने तीनों परामर्शदाताओं को धन्यवाद देकर विदा कर दिया। बादल खुलते ही चिता में अग्नि संस्कार किया।


परिष्कृत−उदात्त मनःस्थिति ही बनाएगी श्रेष्ठ परिस्थिति

मनःस्थिति ही परिस्थिति की जन्मदात्री है। सनातन संस्कृति के इस मूल मंत्र में आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान का गहरा रहस्य छुपा-छिपा है। इसी में नूतन-चिरन्तन सत्य की झलक-झाँकी मिलती है। मानव और समाज के सारे रहस्य इसी में आवृत्त है। जीवन में इस महासत्य का अभाव ही समस्त समस्याओं और कठिनाइयों को जन्म देता है। भले ही आज की भोगवादी सभ्यता का मत इस पर अडिग रहे कि परिस्थितियाँ यदि ठीक कर ली जायँ तो मनःस्थिति बदली जा सकती है। परन्तु यह उक्ति और उद्घोषणा नितान्त एकाँगी और अपूर्ण है। हाँ यह आवश्यक एवं उपर्युक्त है कि मनःस्थिति और परिस्थिति में उचित सामंजस्य और समुचित समन्वय होना चाहिए। अन्यथा इसके द्वन्द्व में मनुष्य की अमूल्य जीवनीशक्ति का ह्रास होता है और सृजन-वरदान के बदले विनाश व अभिशाप ही हाथ लगता है।

वर्तमान युग की समस्त शारीरिक कष्ट-कठिनाइयों और मानसिक रोगों के मूल में यही द्वन्द्व एवं संघर्ष का जोर दिखायी पड़ता है। इसमें से एक की मान्यता है कि अपेक्षित साधनों की प्रचुरता से प्रसन्नता एवं प्रगति पायी जा सकती है। इसके ठीक विपरीत दूसरी विचारधारा है। जिसका आग्नेय मंत्र है -’मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है।’ इस सिद्धान्त के अनुसार साधनों की आवश्यकता, उपार्जन और सत्प्रयोजनों के लिए सदुपयोग इसी के आधार पर ही सम्भव है। इसके अभाव में समस्त साधनों की विपुलता के बावजूद सर्वत्र असंतोष एवं अशान्ति ही परिलक्षित होती है।

मनःस्थिति पर आधारित विचारधारा कहती है कि यदि मन को समझा लिया जाये तो विपन्न परिस्थिति में भी सुख और संतोषपूर्वक निर्वाह किया जा सकता है। आवश्यक साधनों में कमी रहने पर भी उसकी पूर्ति कर ली जाती है। और फिर भी अत्यन्त उपयोगी साधन का अभाव पड़े भी तो उसे संयम, सहानुभूति, संतोष जैसे दिव्य गुणों-सद्गुणों के द्वारा भली प्रकार काम चला लिया जाता है। अभावबोध अखरता नहीं है। साधन का मोह सताता नहीं। दूसरों की सम्पन्न परिस्थितियों को देखकर भी मन में लोभ व मोह व्यापता नहीं। अपने सीमित साधनों-संसाधनों में भी स्वर्गीय सुख की अनुभूति होती है। कहीं भी न कुछ अभाव सालता है और न कुछ न होने की पीड़ा रुलाती है। क्योंकि यहाँ पर मनःस्थिति की परिष्कृति है। मन स्वयं अपने में संतुष्ट एवं प्रसन्न है अतः वह परिस्थितियों की भयावहता एवं विपन्नता में भी मस्त रहता है।

मनःस्थिति पर परिस्थिति को प्रबल मानने वालों की मान्यता है कि जितने अधिक साधन, उतना अधिक सुख। साधन की विपुलता, उसकी मोहकता एवं वैभव से मन को प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाता है। माना जाता है कि ऐश्वर्य के चकाचौंध में ही मन मुग्ध हो सकता है। रहने के लिए भव्य आवास, स्वादिष्ट व्यञ्जन, मनोरञ्जन के अत्याधुनिक सुविधायें ही एकमात्र ऐसी परिस्थिति है जिससे मनःस्थिति को खुश व निहाल किया जा सकता है। इस विचारधारा के अनुसार मन को खुश रखने के लिए समर्थता और सम्पन्नता का होना अनिवार्य है, अपरिहार्य है। और ऐसी परिस्थिति जुटाने के लिए दूसरे दुर्बलों के उपार्जन अधिकार को भी हड़पकर मनचाही मौज-मस्ती करने में भी कोई अपराध नहीं है।

इन मतों-सिद्धान्तों के अपने-अपने तर्क, तथ्य और आधार हैं। और प्रतिपादन एवं विश्लेषण भी इन्हीं को आधार मानकर किया जाता है। प्रयोग भी दोनों का अनन्तकाल से होता चला आया है। यहाँ पर प्रयोगधर्मिता का प्रयोग नहीं हुआ। यहाँ यह नहीं देखा जाता है कि यदि प्रयोग असफल हुआ तो क्यों हुआ और उसकी सफलता के लिए किसी और उपादेय सिद्धान्त को क्यों न अपना लिया जाये। परन्तु ऐसा सुयोग और सौभाग्य नहीं आया कि दोनों मतों में कोई सर्वसम्मत मान्यता निकल सके। अपना ही पक्ष श्रेष्ठ, अपना मत सही, दूसरा ठीक नहीं का दुराग्रह अपनाने के कारण उनके बीच विग्रह भी खड़े होते रहे हैं।

यही देवासुर संग्राम है। पदार्थ से विनिर्मित परिस्थितियों के पक्षधर को दैत्य पक्ष कहा जा सकता है। यह भावनाओं को भ्रान्ति, मन को साधनों का दास तथा शरीर को भोग्य वस्तु मानता है। यह प्रत्यक्ष को ही एकमात्र प्रमाण सिद्ध करता है। परन्तु भावनाओं को सर्वोत्तम स्थान पर आसीन-आरुढ़ करने वाले एवं पदार्थ को गौण एवं नगण्य मानने वालों को देव पक्ष कहा जा सकता है। इनकी नजरों में अदृष्ट भावना ही सर्वोपरि है। दर्शन के आधारभूमि में प्रतिपादन करने पर इसी को भौतिकता और आध्यात्मिकता से नामाँकित किया जाता है। हठवादिता के दुष्चक्र में दोनों ने एक-दूसरे को धुर विरोधी पाया है और ये अपनी ही बातों पर अड़े रहने के लिए अवश-विवश हैं।

अंतर्मन में झाँकने पर हम भी स्वयं को परिस्थिति और मनःस्थिति के इस गहरे द्वन्द्व और दलदल में फँसे हुए पाते हैं। हमें जो परिस्थिति मिली है उससे हम संतुष्ट नहीं और हमारी मनःस्थिति भी इतनी मजबूत नहीं हैं कि मिले हुए परिवेश-वातावरण को सहर्ष अपना सकें। हम प्रायः साधन के अभाव का आँसू बहाते हैं, अपने भाग्य और भविष्य को कोसते नजर आते हैं और दूसरों पर दोषारोपण कर अपनी कमजोर-दुर्बल मनःस्थिति को ढँकने-ढांकने का व्यर्थ प्रयास करते हैं। अगर परिस्थिति अनुकूल मिल भी गयी तो अपनी हेय मानसिकता एवं रुग्ण विचारों से उसे भी प्रतिकूलता तक पहुँचाये बगैर चैन से नहीं बैठते। अंततः परिणाम होता है कि सृजन की ओर बढ़ते कदम अपने को ही विनाश की लपटों में झुलसा देते हैं।

परिस्थिति और मनःस्थिति का यह गहरा द्वन्द्व मनुष्य को दुर्बल एवं अशक्त बनाता है। यह उसे मानवीय गरिमा बोध से वंचित कर देता है। उसके अन्दर दबी-पड़ी अनन्त सम्भावनाओं को रौंद डालता है। सृजन का बीज अंकुरित-विकसित होने से पहले ही भूमिसात् हो जाता है, मिट्टी में मिल जाता है। कुछ भी हाथ नहीं लगता और इस सर्वनाशी दलदल से उपजी असफलता, निराशा एवं हताशा से मनःस्थिति की स्थिति और भी असह्य-दुर्वद्ध हो उठती है। चारों ओर घोर कुहासा-अंधकार फैला पड़ा दिखता है जिसकी सीमा आकाश के समान सीमातीत होती है। ऐसे में उमंगों के दीप, जले तो कैसे जले? आशाओं की सिंदूरी उषा उभरे तो कैसे उभरे? जब मन ही कमजोर एवं परेशान हो तो शरीर से क्या उम्मीद की जा सकती है। बल्कि ऐसा व्यथित मन ही अदृश्य और असाध्य आधि-व्याधियों का कारण बनता है।

इस द्वन्द्व और निराशा के घटाटोप से निकलने से ही आशाओं का सूर्य प्रदीप्त एवं ज्योतिर्मय हो सकता है। मनःस्थिति से कुहासे का यह आवरण हटते-मिटते ही प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आरामयी किरणें जगमगा उठती हैं॥ घनघोर असफलताओं से घिरा वातायन पल भर में नूतन उत्साह से आलोकित हो उठता है। हर परिस्थिति प्रगति एवं विकास का अवरुद्ध मार्ग खोल देती है। यदि अनुकूलता हो तो विकास की यात्रा तीव्रगामी होगी और यदि प्रतिकूल हुई तो उससे निपटने से प्राप्त अनुभव सफलता के लिए धरोहर सिंह होगा। एकमात्र इस बिन्दु पर ही मनःस्थिति और परिस्थिति का सर्वनाशी संघर्ष थमेगा, पूर्वाग्रह-दुराग्रह का आवेश रुकेगा तथा इन दोनों के सामंजस्य-समन्वय से असम्भव कार्य भी सम्भव हो सकेगा।

जड़ और चेतन, भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों की अपनी-अपनी उपयोगिता एवं उपादेयता है। दोनों के मिलन में ही पूर्णता है, सर्वांगीणता है। ठीक इसी प्रकार मानव जीवन की सम्पूर्ण एवं समग्र प्रगति में मनःस्थिति और परिस्थिति दोनों की आवश्यकता है। यह ठीक है कि मनःस्थिति भी श्रेष्ठ व उत्कृष्ट हो और परिस्थिति भी समुन्नत हो। परन्तु यदि मनःस्थिति हेय स्तर का होगा तो किसी भी प्रकार की अनुकूलता काम नहीं आयेगी। इसलिए सर्वोपरि आवश्यकता इस बात की है कि हमारा मन परिष्कृत हो, इसके चिंतन उच्चस्तरीय हों तथा यह उच्च आदर्शों के प्रति कटिबद्ध हो। ऐसी उदात्त मनःस्थिति ही वैभवमयी स्वर्ग का परिचायक-पर्याय है। यही मनवाँछित परिस्थिति की जननी-जन्मदात्री है। अतः उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं को साकार करने के लिए ऐसे ही दुर्धर्ष-प्रचण्ड मनस्वी मन की आवश्यकता है।


साधना की पूर्ति हेतु (kahani)

एक व्यक्ति अपने बच्चों को अनाथ छोड़कर एक रात्रि घर से भाग गया। निकला, आत्मकल्याण के लिए। किसी संत के पास जाकर वह भगवत् प्राप्ति का उपाय पूछने लगा। उस व्यक्ति ने अपने त्याग की कहानी सुनाते हुए यों कहा−

“ मेरी पत्नी उस समय सो रही थी, एकाएक बच्चा चीखा, तो मुझे लगा अब पत्नी जाग पड़ेगी और मेरा घर से निकलना कठिन हो जाएगा, पर पत्नी ने बच्चे को छाती से लगाया और बच्चा चुप हो गया। मैं चुपचाप निकल आया। महात्मन् अब संसार की मोह−माया में फँसना नहीं चाहता।”

साधु बोले, “ मूर्ख, भगवान तो तेरे घर में ही बैठे हैं, जिन्हें तू छोड़ आया। जा, जब तक तू उनकी सेवा नहीं करेगा, तब तक तेरा उद्धार नहीं होगा। पहले परिवार को सँभाल, अपने कर्त्तव्यों को पूरा कर, फिर सोचना कि पारिवारिक दायित्वों को निबाहते हुए तेरा आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा हुआ या नहीं? अध्यात्म भगोड़ों का नहीं, शूरवीरों को साथ देता है। परिवार में रहते हुए भी तेरी साधना पूरी होती रह सकती है। त्याग करना ही है तो अंतः के विकारों एवं भ्रम−जंजालों को कर।” व्यक्ति ने वास्तविकता समझी एवं लौट पड़ा अपने घर को, अपनी व्यावहारिक साधना की पूर्ति हेतु।


आर्षग्रंथ बताते हैं कि भूकंप क्यों व कहाँ आते हैं।

जड़ दिखायी देने वाले इस जगत् का रहस्य अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है। विस्मयकारी है इसकी हर गतिविधियाँ। दुर्बोध है इसका रहस्य। परन्तु प्रकृति को माता मानकर इसकी गोद में पलने-बढ़ने वाले ऋषियों-द्रष्टाओं ने इसकी अथाह सीमाओं की कुछ थाह पायी थी। प्रकृति माँ के गर्भ से जन्मे व पले-बढ़े इन ऋषियों ने इसके कुछ अंश का बोध पाया था। उनका यही अन्तर्बोध ऋग्वेद की ऋचाओं, उपनिषद् के मंत्रों, दर्शन के सूत्रों एवं ज्ञान-विज्ञान के अनेक ग्रन्थों के अनगिनत पृष्ठो और पन्नों में झलकता-जगमगाता है। जीव और जगत् के तमाम रहस्यों को उन्होंने सूत्रों और संकेतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। इसी क्रम में वे भूकम्प आपदा और विपदा की दुर्बोध, जटिल व आकस्मिक घटना से भी सर्वांग रूप से परिचित थे। इसका भी उन्हें समुचित ज्ञान था।

‘सुदूर अतीत में कभी अचल और भीमकाय पर्वत अनन्त गगन में आनन्दपूर्वक उड़ते और गतिमान होते थे। और पुनः अपने गन्तव्य से वापस आकर स्थिर हो जाते थे। परन्तु कभी-कभी वे धरती में गिर पड़ते थे, जिससे उनके असीम भार से धरती काँप उठती थी। उसकी व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाती थी। पृथ्वी के विनम्र एवं आकुल अनुनय पर प्रजापति ने इन्द्र को आदेश दिया कि पर्वतों के पंख को काट दिया जाये। इस प्रकार पंख विहीन पर्वत उड़ने में अक्षम व असमर्थ स्थिर हो गये। पर फिर भी वे वायु, अग्नि और जल के साथ मिलकर धरती को कम्पित व हलचल किये रहते थे। ‘ऋग्वैदिक ऋचाओं में वर्णित इस आख्यान में स्थिर महादेशों के सिद्धान्त तथा भूकम्प की वैज्ञानिकता का अद्भुत संकेत मिलता है। इस ऋचा में निहित संकेत सूत्रों से पता चलता है कि हमारे प्राचीन ऋषि न केवल अन्तर यात्रा के अध्यात्म ज्ञान के ही प्रणेता थे बल्कि विज्ञान के भी सृजेता थे। उन्हें भूकम्प सम्बन्धी परिघटनाओं का गम्भीर ज्ञान था।

इस संदर्भ में बल्लाल सेन की सुविख्यात कृति ‘अद्भुत सागर’ में उल्लेख मिलता है कि इन्द्र, अग्नि, जल और वायु धरती को अपने प्रभाव से भरपूर प्रभावित करते हैं। और क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर में कम्पन पैदा करते हैं। पारासर ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है। उन्होंने ग्रहणों और अन्तरिक्ष हलचलों के साथ भूकम्प की उत्पत्ति का सिद्धान्त दिया है। इस प्रकार प्राचीन ग्रन्थों में काल एवं तत्कालीन नक्षत्रीय संरचना को आधार मानते हुए चार प्रकार के भूकम्प का उल्लेख मिलता है। आश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, हस्ता, चित्रा, स्वाती, उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र की उपस्थिति में रात्रि के अंतिम प्रहर या प्रातः के प्रहर में उत्तर दिशा में जब भूकम्प आता है तो उसे वायुमण्डल भूकम्प कहा जाता है। अद्भुत सागर नामक ग्रन्थ में इससे मिलता-जुलता वर्णन मिलता है। इस ग्रन्थ के अनुसार दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम दिशा से उत्पन्न भूकम्पों को क्रमशः अग्नि, इन्द्र एवं वरुण मण्डलों में विभाजित किया गया है।

प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में भूकम्प को इस मण्डलीकरण या विभाजन का बड़ा ही वैज्ञानिक ढंग से प्रतिपादन किया गया है। इनके सूक्ष्म अध्ययन-अन्वेषण से पता चलता है कि विभिन्न प्रकार के भूकम्प भिन्न-भिन्न क्षेत्र में आते हैं। वृहत् संहिता के अनुसार वायुमण्डल का क्षेत्र है- सौराष्ट्र, कुरु, मगध, दाशार्ण, मत्स्य। अद्भुत सागर में ये क्षेत्र हैं- यवन, दण्डक, सल्व, सौवर्धन, पुलिंन्द, विदेह, नल, दर्द, अंग, बंग, अवन्ती, मालवा, त्रिगर्त, सौवीर, यौधेय, क्षुद्रक, शिविका, मद्रक, शक, कम्बोज, बाहलीक, गाँधार,कलिंग, शबर, मयेद्ध और तंगण। वृहत् संहिता में अग्नि मण्डल क्षेत्राँकन किया गया है। ये क्षेत्र हैं- अश्मक, अनग, ब्राहलीक, तंगण, कलिंग, बंग, द्रविड़ और शबर। अद्भुत सागर में ये क्षेत्र हैं- पुलिंद, यवन, ओद्र, अवन्ती, इक्ष्वाकु, कुलूत, तुषार, शिविका, त्रिगर्त, विदेह, सौराष्ट्र, मध्य देश और दाशार्ण। इन्द्र मण्डल के क्षेत्र वृहत् संहिता में इस प्रकार हैं- काशी, युगान्धर, पौराव, किरात, कीरा, अभिसार, हल, मद्र, अर्बुद, सौराष्ट्र और मालवा। अद्भुत सागर के मतानुसार कश्मीर, द्राविड़, अंधक, चीन, प्राच्य, शक, पहलाव, दण्डक, कैलाश, मल्ल और बहल। वृहत संहिता के अनुसार वरुण मण्डल में गोनर्द, चेढ़ी, कुक्कुर, किरात और विदेह आते हैं। अद्भुत सागर में इन्हें कश्मीर, परत, वत्स, अब्रक, करुव और हिंसल के रूप में वर्णित किया गया है।

भूकम्प के इस वर्गीकरण के पश्चात् सभी प्राचीन भारतीय विद्वानों ने स्वीकार एवं समर्थन किया कि भूकम्प अतिथि के समान कोई भी कभी भी और किसी समय आ सकता है। अतः सम्मिश्रित प्रकार के भूकम्प सम्भव हैं। परासर ने ऐसे सम्मिश्रित भूकम्पों का उल्लेख किया है। ये भूकम्प हैं- 1. वायु-अग्नि मण्डल, 2. वायु-इन्द्र मण्डल, 3. वायु-वरुण मण्डल, 4. अग्नि-इन्द्र मण्डल, 5. अग्नि-वरुण मण्डल और 6. इन्द्र-वरुण मण्डल। इस पहले मण्डल में कुरु, साल्व, मत्स्य, निषाद, पुणद्, आँध्र, कलिंग, विंधत् आते हैं। दूसरे में आते हैं- प्राच्य, शक, चीन, पहलवा, यौधेय, यवन, मगध। तीसरे मण्डल के क्षेत्र हैं-अवन्तिका, पुलिंद, विदेह, सकाश्मीर, दर्द। चौथे मण्डल के क्षेत्र हैं- इक्ष्वाकु, पाटचर, आमीर, चीन, मरुकच्छ। पाँचवें में आते हैं- गोनार्द, अंगनाराजय, तटीय क्षेत्र। छठवें में काशी, अभिसार, अत्त्युत और कच्छद्वीप आते हैं।

सन् 1025 में चालुक्य नरेश जयसिंह ने चामुण्डराय कृत कन्नड़ पुस्तक ‘ लोकोपकारकम्’ नामक संदर्भ ग्रन्थ को प्राप्त किया था। इस दुर्लभ ग्रन्थ में लेखक ने आठ श्लाकों के माध्यम से चार प्रकार के भूकम्पों का विवरण-विवेचन किया है। इस विश्लेषण के अनुसार वायु मण्डल के भूकम्प के प्रभाव क्षेत्र में कुरु, मगध, द्रविड़ और कुन्तल क्षेत्र आते हैं। चामुण्डराय के अनुसार द्रविड़ भूमि को तिगुल देश (तमिल देश) कहते हैं। अग्नि मण्डल के भूकम्प अंग, बंग, कलिंग, केरल, बाहलीक और द्रविड़ क्षेत्रों के अंतर्गत आते हैं। इसी तरह इन्द्र मण्डल के भूकम्प मात्र सौराष्ट्र एवं अभिसार क्षेत्रों तक सीमित है। वरुण मण्डल के भूकम्प -विदेह, गोवर्धन, निषाद एवं बिहार में अवस्थित है।

प्राच्य विद्वानों ने भूकम्प के व्यापक विनाशकारी प्रभाव का भी उल्लेख किया है। यह प्रभाव अलग-अलग मण्डलों के भूकम्पों का अलग- अलग होता है। वायु मण्डल के भूकम्पों के परिणाम स्वरूप भवनों, विहारों, मन्दिरों, प्रासादों, तोरणों और किलों का विनाश होता है। इस भूकम्प के आगमन की सूचना सप्ताह भर के भीतर चक्रवाती आँधियों के घटित होने से मिल जाती थी। इसी प्रकार अग्नि मण्डल के भूकम्पों का प्रभाव गाँवों और नगरों में दिखाई देता है, जिसमें व्यापक रूप से फैल जाने वाली अग्नि और नदियों व अन्य जल स्रोतों के सूख जाने की बात की गई है। इन्द्र मण्डल के भूकम्प वर्षा और कृमि आवासों के विनाश का कारण बनते हैं। वरुण मण्डल के भूकम्प नदी और सागर तट पर मानव जीवन के भयावह विध्वंस का कारण बनते हैं।

प्राच्य विद्वानों ने भूकम्प के व्यापक विनाशकारी प्रभाव का भी उल्लेख किया है। यह प्रभाव अलग-अलग मण्डलों के भूकम्पों का अलग- अलग होता है। वायु मण्डल के भूकम्पों के परिणाम स्वरूप भवनों, विहारों, मन्दिरों, प्रासादों, तोरणों और किलों का विनाश होता है। इस भूकम्प के आगमन की सूचना सप्ताह भर के भीतर चक्रवाती आँधियों के घटित होने से मिल जाती थी। इसी प्रकार अग्नि मण्डल के भूकम्पों का प्रभाव गाँवों और नगरों में दिखाई देता है, जिसमें व्यापक रूप से फैल जाने वाली अग्नि और नदियों व अन्य जल स्रोतों के सूख जाने की बात की गई है। इन्द्र मण्डल के भूकम्प वर्षा और कृमि आवासों के विनाश का कारण बनते हैं। वरुण मण्डल के भूकम्प नदी और सागर तट पर मानव जीवन के भयावह विध्वंस का कारण बनते हैं।

आधुनिक भूकम्प विज्ञान एकाएक एवं अकस्मात् आने वाली इस त्रासदी से भिज्ञ नहीं हो पाता है। परन्तु हमारे पूर्वज मनीषियों एवं धर्म ग्रन्थों में इसका पूर्वाभास के स्पष्ट संकेत परिलक्षित होते हैं। उनके अनुसार भूकम्प भविष्य की कोख में छिपी किसी भीषण दुर्घटना का आभास देते हैं। और यह आभास उन्हें होता था। पुराने विवरणों में भूकम्पों को राज की मृत्यु, युद्ध एवं महामारी की विभीषिका के अपशकुन के रूप में चित्रित किया गया है। वाराह मिहिर ने वृहत संहिता के चौथे अध्याय में स्पष्ट किया है कि जब चन्द्रमा का बाहरी घेरा दक्षिण-उत्तर दिशा में फैले बैलगाड़ी के जुए के समान दीख पड़े तो भूकम्प आता है। वे पाँचवे अध्याय में वर्णन करते है कि यदि ग्रहण के अवसर पर तेज हवा चले, उल्कापात हो, धूल भरी आँधी आये, घना अंधकार छा जाये एवं आकाश में बिजली गिरे तो भूकम्प के आसार होते हैं। प्राचीन मान्यतानुसार 24 महीनों के अन्तराल पर लगे दो ग्रहणों के मध्य एक या अधिक भूकम्प की सम्भावना रहती है।

पाराशार के अनुसार 5000 वर्ष के अन्तराल पर उदित होने वाले चलकेतु नामक धूमकेतु धरती में कंपन पैदा करता है और मध्य देश के एक घनी आबादी वाले देश को विनष्ट करता है। इसी तरह अनियत अन्तराल पर प्रकट होने वाले धूमकेतु भी भूकम्प का कारण बनते हैं। काव्यात्मक ग्रन्थ महाभारत के उद्योग पर्व, द्रोण पर्व, शल्य पर्व और गदा पर्व में भी भूकम्पों के पूर्वाभास का संकेत मिलता है। इस संदर्भ में आधुनिक विज्ञान मूक है। भूकम्प के देश जापान में इसकी भविष्यवाणी करने के लिए ‘अर्थक्वेक ऐसेसमेण्ट कमेटी (ई. ए. सी.)’ के गठन के बावजूद कोई उत्साहवर्धक सफलता नहीं मिली। अन्यथा भूकम्प के लम्बे व दीर्घ इतिहास को छोड़ दें तो भी विगत दशकों में आये लातुर, उत्तरकाशी, ईरान, चमोली, जबलपुर और भुज व कच्छ के भूकम्पों से कुछ तो सावधानी बरती जा सकती थी। परन्तु प्राकृतिक आपदा के इस रहस्य को न आधुनिक विज्ञान ही जान पाया है और न ही आधुनिक मानवी मन। इसे जानने के लिए हमारे प्राचीन ऋषि-मनीषियों के सूत्रों व संकेतों को समुचित अनावरण करने पर ही कोई सहायता मिल सकती है।

‘पुत्रोऽहं पृथिव्या’ के वैदिक मंत्र काँ हृदयंगम एवं आत्मसात् करके ही प्रकृति के इस विप्लव एवं प्रलयकारी दुर्घटना से बचा जा सकता है। इसके लिए हमें पुत्रवत् प्रकृति माँ की गोदी में दुबक जाना होगा एवं इसकी हरियाली चादर तथा पावन पर्यावरण को पुनः दिव्य व पवित्र बनाने में सर्वस्व न्यौछावर करना होगा। इसी प्रयास पुरुषार्थ से ही मानव भूकम्प की आपदा से स्वयं को बचा सकता है, सुरक्षित एवं संरक्षित हो सकता है।


समाज को समर्पित (kahani)

संत तुकाराम की पत्नी बड़े कर्कश स्वभाव की थीं। एक बार उनके लिए किसी किसान ने गन्नों का एक गट्ठा भेजा। रास्ते में जो परिचित बच्चे मिले, उनने एक−एक करके सभी गन्ने माँग लिए। घर के लिए एक बचा, सो उनने पत् नी को थमा दिया।

पत्नी गट्ठे की प्रतीक्षा में थी। एक मिला तो कारण पूछा। बताने पर बहुत क्रुद्ध हुई, उस गन्ने की संत की पीठ पर इतनी जोर से मारा कि टूटकर दो टुकड़े हो गए। चोट जोर की लगी।

इतने पर भी संत ने संतुलन नहीं खोया उलटे मारने वाले हाथों की प्रशंसा करने लगे। कैसे सधे हुए हाथ हैं कि गन्ना ठीक बीच से टूटा। मुलायम वाला भाग पत्नी को थमाते हुए, कड़ा वाला स्वयं ले लिया, न क्रोध किया न उलाहना दिया।

युद्ध के बाद ज्यूरिख में भयंकर अकाल पड़ा। साथ ही महामारियाँ भी फूट पड़ीं। इस आग से जूझने के लिए स्वयंसेवकों की जरूरत पड़ी।

ज्यूरिख के एक समाजसेवी संगठन ने पीड़ितों की सहायता के लिए एक सेवा-समिति गठित की। स्वयंसेवकों के लिए मार्मिक अपील छपी।

इस पुकार को सुनकर एक नवविवाहित दंपत्ति सामने आए। पति का नाम था सूसो, पत्नी का सेरलाओ। वे सेवा का आवेदन लेकर आए थे।

संगठनकर्त्ताओं ने कहा, “यदि सच्चे अर्थों में सेवा करनी है तो आप लोग संतानोत्पादन न करने का व्रत लें अन्यथा उस झंझट के कारण आप सच्चे मन और समय तक लगनपूर्वक काम न कर सकेंगे।” विचार कर दूसरे दिन आने के लिए उन्हें कहा गया।

पति-पत्नी दूसरे दिन नियत समय पर सेवाधिकारी के पास पहुँचे। उनने बाइबिल हाथ में लेकर आजीवन बच्चे न जनने की और सदा सेवाधर्म में लगे रहने की प्रतिज्ञा की।

संगठनकर्त्ताओं की आँखों में आँसू छलक आए। उन्होंने उस सच्चे सेवाव्रती दंपत्ति को हृदय खोलकर आशीर्वाद दिया और काम में जुटा दिया। उनके आदर्श ने अनेकों को प्रेरणा दी और वैसे ही व्रतधारी स्वयंसेवक एक हजार की संख्या में भर्ती हो गए।

विपत्ति से जूझने में इन सबने मोरचा सँभाला और लाखों के प्राण बचाए। सूसो दंपत्ति के अग्रिम कदम उस क्षेत्र में अभी भी भावनापूर्वक स्मरण किए जाते हैं। उन दिनों भी उन्हें धर्मप्राणों से बढ़कर आदर मिला था। समाज को समर्पित ऐसे अग्रदूत विरले ही होते हैं, पर इतिहास में वे अमर बन जाते हैं।


कौन बचायेगा नौनिहालों को टी.वी. के दुष्प्रभावों से

टीवी आज शहरी ही नहीं ग्रामीण बच्चों के भी जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है। बच्चों की टीवी के प्रति बढ़ती दीवानगी आज प्रायः हर घर की कहानी है। दिन भर टीवी पर आँखें गड़ाये रहना और टीवी से चिपके रहना उनकी दिनचर्या का अभिन्न अंग बनती जा रही है। आज के बच्चों के इस टीवी प्रेम के दुष्परिणाम भी प्रत्यक्ष हैं। बच्चों के स्वास्थ्य एवं कोमल मानस पटल पर पड़ रहे इसके गम्भीर दुष्परिणाम विश्व भर के विज्ञजनों के लिए भारी चिन्ता का विषय बने हुए हैं।

प्रसिद्ध विशेषज्ञों एवं मनोचिकित्सकों के अनुसार, ‘बहुत नजदीक से या देर तक टीवी देखने से बच्चों में मिरगी, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, तनाव तथा मोटापा जैसी विकृतियाँ पैदा हो जाती हैं। टीवी का नशा उनके सारे जीवन पर छा जाता है और गम्भीर दुष्प्रभाव डालता है। टीवी से उत्सर्जित होने वाली विशेष घातक किरणें बच्चों के मस्तिष्क की कोमल प्रकाश संवेदी कोशिकाओं पर गहरा असर डालती हैं और कई तरह की जैविकीय विकृतियों को जन्म देती हैं। अतः इन खतरों से बचने के लिए बच्चों को चाहिए कि टीवी देखते समय विशेष सावधानी बरतें और कम से कम समय टीवी के साथ बितायें।’

विशेषज्ञों का यह चेतावनी एवं सुझाव भरा परामर्श ठोस तथ्यों पर आधारित है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में तीन लाख लोग लगातार टीवी देखने से मिरगी के शिकार हुए हैं। जबकि पश्चिमी देशों में टीवी देखने से मिरगी रोग होने के आँकड़े तो और भी गम्भीर हैं। भारत में ऐसे मामले उपग्रह चैनलों के उभर आने के बाद से प्रकाश में आने लगे हैं। इससे पहले बच्चों की पसन्द के कार्यक्रम कम ही होते थे, साथ ही दूरदर्शन में देर रात के कार्यक्रम रात ग्यारह बजे तक ही होते थे। अतः बच्चे हर वक्त टीवी के साथ चिपके नहीं रहते थे। उपग्रह चैनलों के उभरने से टेलीविजन पर रात-रात भर कार्यक्रम प्रसारित होते रहते हैं, जिससे बच्चे चैनल बदल-बदलकर देर रात तक मनपसन्द कार्यक्रम देखते रहते हैं। परिणाम स्वरूप वे अनजाने में ही घण्टों टीवी देखने से मिरगी रोग के शिकार हो रहे हैं।

विशेषज्ञों के मत में टीवी देखना स्वयं में एक नशा होता है। जिन बच्चों को इसकी लत लग जाती है, वे घण्टों टीवी देखते रहते हैं, भले ही कार्यक्रम कैसे ही क्यों न दिखाये जा रहे हों। वैज्ञानिक इसे ‘टीवी सम्मोहन’ की संज्ञा देते हैं। इस दौरान टीवी से विकरित होने वाली घातक किरणें मस्तिष्क की कार्य-प्रणाली को ठप्प कर देती है। बच्चों का दिमाग इन विकिरणों को सहन नहीं कर पाता और एक बार मस्तिष्क सुन्न हो जाता है तो आँखें टीवी के पर्दे पर टिक जाती हैं। इस तरह टीवी बच्चे को अपने सम्मोहन में ले लेता है। इसके बाद बच्चा टीवी देखता रहता है, भले ही कितना ही उबाऊ प्रोग्राम क्यों न आ रहा हो। इस स्थिति में बच्चों के कोमल मस्तिष्क की प्रकाश संवेदी कोशिकायें बहुत तीव्रता से प्रतिक्रियायें करती हैं। वीडियो गेम खेलते समय या तेजी से बदलते कार्टून फिल्मों को देखते समय यह प्रक्रिया और तीव्र होती है क्योंकि इस समय बच्चे अधिक ध्यान से देखते हैं। ऐसी स्थिति में मस्तिष्क पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव मस्तिष्क के संतुलन को बिगाड़ देता है। मस्तिष्क की ऊर्जा अव्यवस्थित हो जाती है और इससे असामान्य तरल पदार्थ बहने लगता है, जो मिरगी रोग का कारण बन सकता है। ऐसी मिरगी को साइकोमोटिव अर्थात् मनोप्रेरित मिरगी के नाम से जाना जाता है। ऐसी मिरगी का पता आसानी से नहीं चलता, क्योंकि इसमें मुँह से झाग नहीं निकलता। किन्तु यदि इस बीमारी को समय रहते पकड़ लिया जाये तो इसका उपचार सम्भव है, अन्यथा बाद में यह गम्भीर रूप धारण कर लेता है।

शोध अध्ययनों से यह भी पता चला है कि मिरगी के अतिरिक्त टीवी व्यसन चिड़चिड़ापन, तनाव, अनिद्रा एवं मोटापा जैसी शारीरिक एवं मानसिक विकृतियों को भी पैदा कर रहा है। टीवी के दीवाने बच्चों को टीवी देखने से मना करने पर वे चिड़चिड़े एवं हिंसक हो उठते हैं। अत्यधिक व देर रात तक टीवी देखने के कारण वे अनिद्रा एवं तनाव के शिकार हो जाते हैं। दिनचर्या के अस्त-व्यस्त होने के कारण न तो उनका खाना सही ढंग से पच पाता है और न सही ढंग से सो पाते हैं। परिणाम स्वरूप थकान, अनिद्रा, तनाव व अवसाद उनके जीवन साथी बन जाते हैं और स्वास्थ्य को चौपट कर देते हैं।

स्वास्थ्य समस्या में मोटापा आज बच्चों के बीच उभरती हुई एक नई बीमारी है, वैज्ञानिक इसका भी कारण टीवी बता रहे हैं। टीवी की लत के कारण वे खेलकूद व व्यायाम से दूर हो गये हैं। बैठे-बैठे उनके शरीर में चर्बी इकट्ठी होती रहती है। विशेषज्ञों के अनुसार ‘दो घंटे लगातार टीवी देखने से रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, जिससे मोटापे के साथ-साथ हृदय रोग एवं मधुमेह की सम्भावना बढ़ जाती है।’

शारीरिक रोगों से भी गम्भीर समस्या बच्चों के अवचेतन मन पर पड़ रहे टीवी के दुष्प्रभावों की है। बच्चों का कोमल मन बिना तर्क-वितर्क किये टीवी के संप्रेषित दृश्यों व संकेतों को सही मान लेता है और उनकी नकल करता है। शीतल पेय के विज्ञापन की नकल करते हुए लखनऊ के छः वर्षीय रिंकू की मौत तथा टीवी फिल्म में किसी अभिनेत्री की आत्म हत्या के दृश्य को देखकर नौ वर्षीय पूजा की खुदकुशी आदि घटनायें यही सिद्ध करती हैं कि टीवी के दृश्यों का बच्चों के कोमल मन पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है।

इसी तरह बढ़ते बाल अपराधों में टीवी को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। टीवी में बेरोक-टोक परोसी जा रही हिंसा, अपराध एवं यौन कुत्सा भड़काने वाली कुत्सित सामग्री बाल मन पर कितना घातक असर डाल रही है, यह शोध से निकलने वाले आँकड़ों की जुबानी से और स्पष्ट हो जाती है। पिछले दिनों, दिल्ली में 12 हत्याओं, 16 बलात्कार, 11 अपहरण, 85 डाके, 105 चोरी व 10 दंगों के अपराधी टीवी द्वारा प्रेरित बालक एवं किशोर अभियुक्त थे। विशेषज्ञों के अनुसार हिंसक दृश्यों का प्रभाव तो इतना गहरा होता है कि कभी-कभी इनका असर 10-15 वर्ष बाद भी उजागर होता है। पिछले दिनों स्कॉटलैंड में सिरफिरों द्वारा अनायास हुई सामूहिक हत्याओं ने यह प्रमाणित कर दिया है कि यह काफी समय पहले देखी गई हिंसक फिल्मों का प्रभाव था। गत वर्षों में यूनेस्को के तत्त्वावधान में, ‘वर्ल्ड आर्गनाइजेशन ऑफ द स्काउट मूवमेन्ट’ और हालैण्ड के उत्रेख्त विश्वविद्यालय के प्रो. डॉ. जो ग्रोएवल ने संयुक्त अभियान के अंतर्गत इस संदर्भ में एक व्यापक शोध किया था, जिसमें 23 देशों के पाँच हजार बच्चों को शामिल किया गया था और यह जानने का प्रयास किया गया कि मीडिया खासकर टीवी में प्रदर्शित की जाने वाली हिंसा का बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

इस अध्ययन से जो निष्कर्ष आये, वे चौंकाने वाले थे, व टीवी के बढ़ते दुष्प्रभावों के प्रति चिंता जताने वाले थे। अध्ययन में शामिल 93 प्रतिशत बच्चों के लिए टेलीविजन जानकारी एवं मनोरंजन देने वाला सबसे शक्तिशाली माध्यम बन चुका है। रेडियो और पुस्तकें अब इतनी प्रभावशाली नहीं रही हैं। इस अध्ययन से यह तथ्य भी उभर कर आया कि विश्व भर के बच्चे दिन में लगभग तीन घण्टे टीवी देखते हैं। अर्थात् स्कूल के बाहर उनका सबसे अधिक समय टीवी के साथ बीतता है। जबकि शेष कार्यों में -होमवर्क के लिए दो घण्टे, परिवार के काम के लिए सत्तर मिनट, खेलकूद के लिए डेढ़ घण्टा, दोस्तों के साथ सवा घण्टा, पढ़ाई के लिए एक घण्टा, रेडियो सुनने के लिए एक घण्टा खर्च होता है। इस तरह अध्ययन के निष्कर्ष से स्पष्ट है कि इन दिनों टीवी बच्चों के जीवन पर पूरी तरह हावी हो चुका है।

टीवी का बच्चों के मानस पर कितना सशक्त प्रभाव पड़ रहा है, यह उनसे पूछे गये प्रश्नों के उत्तरों से स्पष्ट होता है। जीवन में वे किस तरह के व्यक्ति को अपना आदर्श मानते हैं, तो तीस प्रतिशत बच्चों ने ‘ऐक्शन हीरो’ को अपना आदर्श बताया। लड़कियों में 21 प्रतिशत ने इसे अपना आदर्श माना। इसके बाद उन्नीस प्रतिशत ने पॉप स्टार और संगीतज्ञों को अपना आदर्श माना। इसके बाद आठ प्रतिशत ने किसी धार्मिक नेता को, सात प्रतिशत ने सैनिक नेता को और तीन प्रतिशत ने राजनेता को अपना आदर्श माना।

शोध से यह भी निष्कर्ष निकले कि टीवी द्वारा हिंसा का प्रस्तुतीकरण हर देश में बढ़ा-चढ़ाकर महिमा मण्डित रूप से किया जाता है। अध्ययन के अनुसार अधिकतर देशों में एक घण्टे टीवी कार्यक्रम में औसतन पाँच से दस तक हिंसक दृश्य होते हैं, जिससे विश्व भर में एक आक्रामक संस्कृति विकसित हो रही है। हिंसा को स्वाभाविक चीज दिखाया जाता है और आक्रामक कार्यों को सुनियोजित ढंग से बढ़ावा दिया जाता है, लेकिन जीवन की समस्याओं के समाधान में गैर-आक्रामक तरीकों पर जोर नहीं दिया जाता है। इस तरह टीवी द्वारा हिंसा को प्रोत्साहित करने का खतरा बढ़ता जा रहा है, जिसके दुष्परिणाम प्रत्यक्ष है। शोध अध्ययन के अनुसार इनके दूरगामी परिणाम कुछ इस तरह की प्रवृत्तियों के रूप में प्रकट हो सकते हैं, जैसे- आक्रामक प्रवृत्तियों का जन्म लेना, हिंसा को उचित ठहराना, अपराधी के प्रति कोई उपेक्षा न दिखाना, बल्कि आपराधिक कार्यों एवं अपराधियों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहन और शरण देना, हिंसात्मक घटनाओं को भड़काने में सहयोगी बनना आदि।

रिपोर्ट में विश्वभर के अभिभावकों और शिक्षाविदों का आह्वान किया गया है कि वे बच्चों का बचपन हजम कर जाने वाले टीवी पर अंकुश लगाने के लिए आगे आयें और सार्थक उपाय करें। इसके लिए शोधकर्त्ताओं के अनुसार टीवी जैसे संचार माध्यमों पर भी उतना ही ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है जितना कि शिक्षा और संस्कृति पर दिया जाता है। इसके लिए आवश्यक है कि निर्माताओं, अभिभावकों, शिक्षाशास्त्रियों, राजनेताओं और सक्रिय उपभोक्ताओं के बीच सार्वजनिक बहस और संवाद हो। मीडिया के पेशेवर लोगों के लिए आचार संहिता बनाई जाये और वे इसकी सीमाओं में स्वस्थ एवं सुरुचिपूर्ण कार्यक्रम बनायें। लोगों को भी इस विषय में शिक्षित किया जाये, जिससे कि वे टीवी द्वारा परोसी जा रही अवाँछनीय एवं आपत्तिजनक सामग्री की आलोचना एवं विरोध कर सके और उत्कृष्ट कार्यक्रमों के लिए दबाव डाल सकें।

इसके साथ ही अभिभावकों का भी कर्त्तव्य बनता है कि वे विशेषज्ञों की राय को मानते हुए, अपने बच्चों को टीवी के सामने कम से कम समय तक ही टिकने दें व कुछ चुनिंदा कार्यक्रमों को ही देखने की छूट दें। बाल रोग विशेषज्ञों की भी यह सलाह है कि बच्चों के टीवी दर्शन का समय एक-दो घण्टे प्रतिदिन से अधिक न होने दें। एक बार में आधे घण्टे से अधिक टीवी न देखें। सम्भव हो तो बीच-बीच में थोड़ी देर के लिए आँखें बन्दकर लिया करें। टीवी को छः फीट से कम दूरी से न देखें तथा कम से कम समय तक देखें। मेरुदण्ड सीधी रखें व लेटकर कभी भी टीवी न देखें। वीडियो गेम व तेजी से बदलने वाले दृश्यों से बचें। भोजन करते समय टीवी न देखें, क्योंकि इससे पाचन, सम्बन्धी विकारों, जैसे- कब्ज, अल्सर, मधुमेह आदि होने का डर रहता है। इस तरह टीवी से होने वाले खतरों के घातक परिणामों से बचने के लिए अभिभावकों का दायित्त्व अधिक गुरुत्तर है। यदि वे सजगता पूर्वक इसका निर्वाह कर सके, तो नौनिहालों को उनके स्वास्थ्य, संतुलन एवं चरित्र को लीलने वाले टीवी के घातक दुष्प्रभावों से एक सीमा तक सुरक्षित रखा जा सकता है।


पिता का सहयोग लगा (kahani)

एक सद्गृहस्थ लुहार था। श्रम और कुशलता से परिवार का पालन-पोषण भली प्रकार कर लेता था। उसके लड़के को अधिक खरच करने की आदत पड़ने लगी। पिता ने पुत्र पर प्रतिबंध लगाया, कहा, “तुम अपने श्रम से चार चवन्नियाँ भी कमाकर ले आओ तो तुम्हें खरच दूँगा अन्यथा नहीं।”

लड़के ने प्रयास किया, असफल रहा तो अपनी बचत की चार चवन्नियाँ लेकर पहुँचा। पिता भट्टी के पास बैठा था। उसने हाथ में लेकर चवन्नियाँ देखीं तथा कहा, यह तेरी कमाई हुई नहीं हैं। यह कहकर उन्हें भट्टी में फेंक दिया। लड़का शर्मिंदा होकर चला गया।

दूसरे दिन फिर कमाई की हिम्मत न पड़ी तो माँ से चुपके से माँगकर ले गया। उस दिन भी वही हुआ। तीसरे दिन कहीं से चुरा लाया, परंतु पिता को धोखा न दिया जा सका। वह हर बार मेहनत की कमाई नहीं कहकर उन्हें भट्टी में फेंकता रहा।

लड़के ने समझ लिया, बिना कमाए बात नहीं बनेगी। दो दिन मेहनत करके वह किसी प्रकार चार चवन्नियाँ कमा लाया। पिता ने उन्हें देखकर भी वही बात दोहराई तथा भट्टी में फेंकने लगा। लड़के ने चीखकर पिता का हाथ पकड़ लिया। बोला, “क्या करते हैं पिताजी, मेरी मेहनत की कमाई इस बेदर्दी से भट्टी में मत फेंकिए।”

पिता मुस्कराया, बोला, “बेटा, अब समझे मेहनत की कमाई का दरह। जब तुम निरर्थक कामों में मेरी कमाई देते हो, तब मुझे भी ऐसी ही छटपटाहट होती है।”

पुत्र की समझ में बात आ गई, उसने दुरुपयोग न करने की कसम खाई और पिता का सहयोग लगा।


ममता का दिव्य बंधन है, मातृ−शिशु संबंध

‘बचपन’ यह शब्द हमारे सामने नन्हें-मुन्नों की एक ऐसी तस्वीर खींचता है जिनके हृदय में निर्मलता, आँखों में कुछ भी कर गुजरने का विश्वास और क्रिया-कलापों में कुछ शरारत, तो कुछ बड़ों के लिए भी अनुकरणीय करतब। इस बचपन का अधिकाँश समय माता के इर्द-गिर्द ही घूमता है। निःसन्देह बच्चों पर माता के विचारों, भावनाओं, संस्कारों एवं क्रिया-कलापों का जितना प्रभाव पड़ता है, उतना अन्य किसी का भी नहीं।

माता और बच्चे के मध्य ममता का दैवी बन्धन ही बच्चे के जीवन की आधारशिला रखता है। माता की ममता एक सांचे की तरह है जिसमें वह अपने मन के अनुरूप अपनी संतान का निर्माण करती है, पर आज की कई माताएँ अपने संतान को अन्य बच्चों से बड़ा बनाने के जुनून में जाने-अनजाने ममता का खतरनाक खेल-खेलने में जुटी हुई हैं। अगर इस प्रवृत्ति को न रोका गया तो समाज में जल्दी ही ऐसे बच्चों की फौज खड़ी हो सकती है, जो खुशी के साथ जीने की अपनी क्षमता खो सकते हैं।

यह सत्य है कि संतान के प्रति माता के प्यार में कोई कमी नहीं आयी है। वे आज भी अपने बच्चों के भविष्य के बारे में उतनी ही चिन्तित हैं जितनी पहले की माताएँ होती थीं। परन्तु आज की त्रासदी यह है कि वे अपने ही संतान के लिए एक आतंक साबित हो रही हैं। आखिर क्यों?

आज बच्चों का लालन-पालन पत्र-पत्रिकाओं में छपी नसीहतों एवं हिदायतों के आधार पर किया जाता है। बच्चों की दिनचर्या सम्बन्धी उनके अपने विचार हैं, भले ही बच्चा उस विचार के बोझ को उठा पाने में असमर्थ हो। बच्चे को कब, क्या, कितना खिलाना है, कि भोजन तालिका के साथ दवा और टॉनिक की सूची भी उतनी ही जरूरी हो गयी है। भले ही उसकी आवश्यकता न हो। उनकी अपनी शिक्षा का स्तर चाहे जैसा भी रहा हो, दूध पीते बच्चे से भी अंग्रेजी बोलना, उनकी अनुशासन पुस्तिका का एक अनिवार्य पाठ है।

बच्चे को हर वक्त भूखा समझना और जबरदस्ती खिलाना आज एक फैशन बन चुका है। खाना न खाने पर डराने, धमकाने, मारने के कारण बच्चा खाने के नाम से ही चिढ़ने लगता है। खाने की थाली लेकर आती हुई माता को देखकर बच्चा प्रसन्न होने के बजाय दहशत से भर उठता है। अपनी बात को समझा न पाने के कारण मासूम बचपन सहता, घुटता एवं टूटता रहता है। इस सब का असर उसके स्वास्थ्य पर भी पड़ता है, पर इसके बाद भी माता के व्यवहार में कोई खास फर्क नहीं आता।

बच्चा चाहे शहर में जन्म ले या गाँव में, निश्चित रूप से जिस परिवेश में वह जीता है वह मूलतः भारतीय है, कुछ विदेशी चीजों और रहन-सहन के विदेशी तौर-तरीकों के कारण वह किसी भी तरह पाश्चात्य संस्कृति का नहीं हो सकता। फिर भी आधुनिक मातायें उसे पाश्चात्य संस्कृति के रहन-सहन एवं सोच-विचार में डालना चाहती हैं। उनके विचार से यही प्रगति का असली रास्ता है। बच्चों को इस बनावटी ढांचे में गढ़ने से पैदा होने वाली कुँठाओं की पूरी जिम्मेदारी उन माताओं की है जिनका एकमात्र लक्ष्य उन्हें अधिक से अधिक भौतिकवादी बनाना है।

बड़े होने पर ऐसे बच्चों का जीवन दर्शन ही नहीं मकसद भी गलत हो जाता है। इतना ही नहीं जीवन मूल्यों की काट-छाँट में अपनी आधी शक्ति नये सिरे से उन्हें समझने और उनके अनुसार अपने को फिर से ढालने में लगानी पड़ती है। अपने बच्चे की प्रकृति एवं स्वभाव को समझने में भूल करने वाली मातायें ही निश्चित रूप से बच्चों की इस नाकामयाबी के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं।

माता से संतान को जितना उपकार और अपकार पहुँचता है उतना किसी भी अन्य से नहीं। जितना वह अपने संतान से प्रेम करती है, उसका हित करना चाहती है उतना कोई और नहीं कर सकता। इसीलिए कहा गया है-

“प्रशस्ता धार्मिकी विदूषी माता विद्यते यस्य स मातृमान”

अर्थात्- धन्य है वह माता जो गर्भाधान से लेकर जब तक विद्या पूरी न हो, तब तक संतान को सुशीलता का उपदेश करती है।

होना यह चाहिए कि संतान को माता सदा उत्तम शिक्षा प्रदान करे। उसे यह तथ्य समझना चाहिए कि बच्चा कभी भूखा नहीं रहता है। वह भूख लगते ही जता देता है कि उसे भूख लगी है। चिड़िया भी अपने बच्चों के मुख में जबरदस्ती दाना नहीं डालती, क्योंकि वह उन विकारों से मुक्त है, जो आदमी के हिस्से में पड़े हैं। विकास की प्रक्रिया में पशु-पक्षी भी जंगल-पहाड़, पानी और आकाश में जीना तथा दुश्मनों से लड़ना सीख जाते हैं।

जब बालक बोलना प्रारम्भ करे तो माता को ऐसे उपाय करने चाहिए, जिससे बालक की जिह्वा कोमल होकर स्पष्ट उच्चारण कर सके। जब बालक कुछ-कुछ बोलने और समझने लगे तो उसे सुन्दर वाणी द्वारा बड़ों के साथ बोलने का शिष्टाचार समझाना चाहिए। ऐसा करने पर वह सबके बीच प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। बालक में सत्संग एवं विद्या के प्रति सहज अभिरुचि उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए। व्यर्थ रोदन, क्रीड़ा, हास्य, लड़ाई-झगड़ा, किसी भी पदार्थ के प्रति लोलुपता, ईर्ष्या-द्वेष आदि से उसे दूर रहने की शिक्षा देनी चाहिए। सदा सत्य भाषण, शौर्य, धैर्य, प्रसन्नवदन आदि गुणों की प्राप्ति का प्रयास कराया जाना चाहिए। बालकों द्वारा किये गये अच्छे कार्यों की प्रशंसा जहाँ उसका उत्साह बढ़ाता है, वहीं गलत कार्यों के लिए किया गया ताड़न उसे पुनः गलती न करने की याद दिलाता है। प्रत्यक्ष का यह ताड़न स्वयं की महत्त्वाकाँक्षा, संकुचित स्वार्थ, ईर्ष्या-द्वेष आदि से प्रेरित न होकर आँतरिक प्रेम एवं सही मार्गदर्शन पर आधारित होना चाहिए।

शास्त्र कहते हैं-

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालोन पाठितः। न शोभते सभा मध्ये हंस मध्ये बको यथा॥

अर्थात्- वे माता और पिता अपने संतानों के पूर्ण बैरी हैं, जिन्होंने उनको विद्या की प्राप्ति न करायी। वे विद्वानों की सभा में वैसे ही तिरस्कृत और कुशोभित होते हैं जैसे हंसों के बीच में बगुला।

सब कुछ वही है सिर्फ दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता है। माता व संतान के बीच निर्मल ममता की जो धारा सतत प्रवाहित होती रहती है, उसे निर्मल ही रहने दिया जाय। परमात्मा ने माता को जिस अनमोल ममत्व का खजाना दिया है, उसका उपयोग संकुचित स्वार्थों के लिए किसी भी हालत में नहीं किया जाना चाहिए। तन-मन-धन से संतान को धर्म, संस्कृति, विद्या एवं आध्यात्मिकता से युक्त करने वाली माता ही सच्चे अर्थों में ममतामयी कही जा सकती है।


सहकार-सहयोग में वास्तविक बल (kahani)

ऋषि अंगिरा के शिष्य उदयन बड़े प्रतिभाशाली थे, पर अपनी प्रतिभा के स्वतंत्र प्रदर्शन की उमंग उनमें रहती थी। साथी-सहयोगियों से अलग अपना प्रभाव दिखाने का प्रयास यदा-कदा किया करते थे। ऋषि ने सोचा, यह वृत्ति इसे ले डूबेगी, समय रहते समझाना होगा।

सरदी का दिन था। बीच में रखी अँगीठी में कोयले दहक रहे थे। सत्संग चल रहा था। ऋषि बोले, कैसी सुँदर अँगीठी दहक रही है। इसका श्रेय इसमें दहक रहे कोयलों को है न? सभी ने स्वीकार किया।

ऋषि पुनः बोले, देखो अमुक कोयला सबसे बड़ा, सबसे तेजस्वी है। इसे निकालकर मेरे पास रख दो। ऐसे तेजस्वी का लाभ अधिक निकट से लूँगा।

चिमटे से पकड़कर वह बड़ा तेजस्वी अंगार ऋषि के समीप रख दिया, पर यह क्या, अंगार मुरझा-सा गया। उस पर राख की परतें आ गई और वह तेजस्वी अंगार काला कोयला भर रह गया।

ऋषि बोले, बच्चों, देखो तुम चाहे जितने तेजस्वी हो, पर इस कोयले जैसी भूल मत कर बैठना। अँगीठी में सबके साथ रहता तो अंत तक तेजस्वी रहता और सबके बाद तक गरमी देता, पर अब न इसका श्रेय रहा और न इसकी प्रतिभा का लाभ हम उठा सके।

शिष्यों को समझाया गया, परिवार वह अँगीठी है, जिसमें प्रतिभाएँ संयुक्त रूप से तपती हैं। व्यक्ति गत प्रतिभा का अहंकार न टिकता है, न फलित होता है। परिवार के सहकार-सहयोग में वास्तविक बल हैं।


जीवन के उत्तरार्द्ध को मंगलमय बनाएँ

महिलाओं में रजोनिवृत्ति की क्रिया उनकी जिंदगी का एक अविच्छिन्न अंग है। जो स्त्रियाँ जीवन के पूर्वार्द्ध में मासिकचक्र से होकर गुजरती हैं, उन सबको उत्तरार्द्ध भाग में उपर्युक्त शरीर-क्रिया से निबटना पड़ता है। इसमें नारियों को विभिन्न प्रकार की शारीरिक-मानसिक परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं, कारण कि महिलाओं के लिए यह एक संक्राँतिकाल होता है, जिसमें वे एक दौर से निकलकर दूसरे दौर में प्रवेश करती हैं। अनेक वर्षों के अध्ययनों के पश्चात अब ज्ञात हुआ है कि यह केवल स्त्री शरीर की विशिष्टता नहीं है, वरन् पुरुषों में भी समान रूप से घटित होती है। मेल मेनोपॉज (नर रजोनिवृत्ति) के दौरान नरों में कितनी ही प्रकार की उलझनों का जन्म होता है, जिनका यदि सतर्कता एवं दृढ़तापूर्वक सामना नहीं किया गया तो समस्याएँ और जटिल बनती हैं एवं जीवन दुःखद।

नर रजोनिवृत्ति वास्तव में कोई व्याधि नहीं, एक लक्षण है, जो यह बतलाता है कि व्यक्ति अब उस पड़ाव पर पहुँच गया है, जहाँ सावधानी एवं साहस की जरूरत है। यह उम्र पुरुषों में प्रायः 35 ये 75 वर्ष के बीच आती है और स्त्रियों में 45 से 55 के मध्य। आज से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व एक जर्मन प्रोफेसर निचेल बर्थोल्ड ने इस दिशा में काफी उल्लेखनीय कार्य किया था और इस दौरान पैदा होने वाली समस्याओं को हार्मोन रिप्लेसमेंट विधि द्वारा करने का प्रशंसनीय प्रयास किया था, पर तब उनके इस अनुसंधान की ओर ध्यान नहीं दिया गया और समस्या ज्यों-की-त्यों पूर्ववत बनी रही। सन् 1944 में दो अमेरिकी चिकित्सक कार्ल हेलर और गार्डन मायर्स ने हिम्मत जुटा कर फीमेल मेनोपॉज से पुरुष लक्षणों की तुलना शुरू की तो जो कार्य निचेल बर्थोल्ड ने वर्षों पूर्व आरंभ किया था, वह मील का पत्थर साबित हुआ। उनने पाया कि नर-नारी में रजोनिवृत्ति के दौरान लगभग एक ही प्रकार के लक्षण उभरते हैं। ये लक्षण हैं—चिड़चिड़ापन, थकान, अवसाद, जोड़ों का दर्द, कामेच्छा में कमी, रात में पसीना आना, उत्साहहीनता, उत्तेजना और एकाग्रता में कमी, निराशा एवं स्मृतिभ्रंश आदि। दो वर्ष पूर्व गोल्डक्रम मेडिकल सर्विसेज, लंदन के मूर्द्धन्य वैज्ञानिक मैल्कम कारथर्स ने इस विषय पर गहन अध्ययन किया और पाया कि जो निष्कर्ष विगत के दो अध्ययनों के थे, वे एकदम सही थे। उनका कहना था कि उपर्युक्त लक्षण हार्मोन स्तर में कमी के कारण उत्पन्न होते हैं, अतएव यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि ऐसा किसमें हो रहा है? महिलाओं में या पुरुषों में? महिलाओं में जब यह अवस्था पैदा होती है तो ‘मेनोपॉज’ कहलाती है और पुरुषों में इसी को ‘एंड्रोपॉज’ (मेल मेनोपॉल) कहा गया है।

मैल्कम कारथर्स इस विषय पर इस प्रकार के विस्तृत और सूक्ष्म अध्ययन के प्रथम अध्येता कहे जा सकते हैं। इसके पूर्व तक ‘एंड्रोपॉज’ के संबंध में चिकित्सा जगत में विवाद बना हुआ था, किंतु कारथर्स की इस शोध के बाद विवाद का अंत हो गया। उनने लंदन के एक क्लीनिक में अपने इस अनुसंधान का शुभारंभ किया। उस क्लीनिक के एक हजार मरीजों में से उनने चार सौ ऐसे रोगियों का चयन किया, जिनने महसूस होने वाले लक्षणों के आधार पर स्वयं को मेल मेनोपॉज का शिकार होने की शिकायत की थी। उनमें से 70 प्रतिशत अवसाद के, 62 प्रतिशत चिड़चिड़ेपन के, 80 प्रतिशत मानसिक थकान, 81 प्रतिशत कामेच्छा में कमी, 55 प्रतिशत रात के समय आवश्यकता से अधिक पसीना आना, 60 प्रतिशत हाथ-पैरों के जोड़ों में दर्द और 45 प्रतिशत समय से पूर्व बुढ़ापे के शिकार थे।

अध्ययन से यह भी विदित हुआ कि एंड्रोपॉज के लक्षण स्वतः नहीं उभरते, उसके पीछे कोई-न-कोई तत्त्व और कारक जिम्मेदार होते हैं, जो नर रजोनिवृत्ति के लक्षणों को उभारते हैं। उनका जल्दी या विलंब से प्रकट होना इस बात पर भी निर्भर करता है कि उस तत्त्व की व्यक्ति में तीव्रता कितनी है अर्थात् यदि ऐसा व्यक्ति चिंता से ग्रस्त है तो उसकी चिंता किस स्तर की और कितनी है एवं क्या वह हर समय उसमें डूबा रहता है? यदि ऐसी बात है तो चिंता की यह तीव्रता उसे जल्द ही एंड्रोपॉज से आक्राँत कर देगी। उक्त मरीजों की जब गहन पड़ताल और पूछताछ की गई तो पता चला कि एक-एक रोगी में एंड्रोपॉज के कई-कई तत्त्व जिम्मेदार थे। यदि अलग-अलग तत्त्वों के प्रतिशत को देखा जाए तो 60 प्रतिशत में मनोवैज्ञानिक, 38 प्रतिशत शराब, 30 प्रतिशत धूम्रपान, 30 प्रतिशत चोट के कारण चिंता, 20 प्रतिशत मोटापा और 11 प्रतिशत संक्रमण के कारण रजोनिवृत्ति के लक्षणों से पीड़ित थे।

उपर्युक्त सभी लक्षणों की शिकायत करने वालों में जब टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन की जाँच की गई तब उनमें इनका स्तर मात्र 10-14 प्रतिशत पाया गया और अधिक सूक्ष्म रक्त परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि फ्री एक्टिव टेस्टोस्टेरॉन (एफ.ए. टी.) में लगभग 75 प्रतिशत की कमी आ जाती है। यही कमी नर रजोनिवृत्ति के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है। यहाँ यह बता देना अप्रासंगिक न होगा कि नर और नारी की रजोनिवृत्ति-शैली में थोड़ा फर्क है। नारी में रजोनिवृत्ति अचानक आ जाती है, जबकि पुरुषों में एंड्रोपॉज उम्र के साथ धीरे-धीरे आता है। इसके पीछे प्रधान भूमिका हार्मोन स्तर की है। स्त्रियों में एस्ट्रोजेन हार्मोन के स्तर में 40-45 वर्ष की उम्र में तेजी से गिरावट आती है, जबकि पुरुषों में यह गिरावट धीरे-धीरे आती है और कभी-कभी तो इसकी अंतिम सीमा 75-80 वर्ष के बीच पाई गई है, किंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि पुरुषों में अधेड़ावस्था में रजोनिवृत्ति के लक्षण प्रकट नहीं होते। खान-पान से लेकर रहन-सहन तक में ऐसे अनेक कारण ढूँढ़ निकाले गए हैं, जो उन्हें उद्दीप्त करते हैं। इसका प्रमुख कारण यही है कि खान-पान, रहन-सहन और चिंतनशैली पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन के स्तर को काफी प्रभावित करती है और यदा-कदा तो अधेड़ावस्था तक में उसमें भारी गिरावट ले आती है। जब यह गिरावट 50 प्रतिशत के करीब आ जाती है तो रजोनिवृत्ति के लक्षण मरदों में उभरने लगते हैं। फ्री एक्टिव टेस्टोस्टेरॉन में इस स्तर की गिरावट अनेक प्रकार की पुरुषोचित क्रियाओं को अवरुद्ध करती है, जिससे कितने ही तरह के रोगजन्य लक्षण प्रकट हो जाते हैं, जबकि वे रोग होते नहीं और उन्हें नियंत्रित किया जा सकना संभव हैं।

मैल्कम कारथर्स ने इसके बाद नए प्रकार का अध्ययन शुरू किया। उनने ऐसे दो सौ लोगों की पड़ताल की जो 50-70 वर्ष के आयु वर्ग के थे और जिनकी जीवनशैली कुछ विशिष्ट प्रकार की थी। वे हमेशा हँसते-मुस्कराते हरते थे और दूसरों को अपने विनोदी स्वभाव के कारण आनंदित करते थे। कारथर्स इस प्रयोग के द्वारा यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि आयु को यदि छोड़ दिया जाए तो क्या विनोदी व्यक्ति त्व टेस्टोस्टेरॉन स्तर को प्रभावित करता है? अनुसंधान में इसका उत्तर ‘हाँ’ पाया गया। उन्होंने देखा कि इन लोगों में फ्री एक्टिव टेस्टोस्टेरॉन का स्तर काफी ज्यादा है और वह करीब 70 प्रतिशत के आस-पास पाया गया। इससे यह निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है कि उन्मुक्त हँसी और तनावरहित जीवन अंतःस्रावी तंत्र को बहुत अधिक प्रभावित करता है और जिस प्रकार चिंता और हताशा हार्मोन स्तर को कम करती है, उसी प्रकार आनंद और उत्फुल्लता उसके स्तर को घटने से रोकती है। इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि हमारा अपना आचार-विचार और व्यवहार ही अंतःस्रावी तंत्र को सबसे अधिक प्रभावित करता है। बढ़ती आयु की इसमें कम-से-कम भागीदारी है।

इस प्रकार यह बात साफ हो गई कि व्यक्ति को स्वयं को अधिक-से-अधिक स्वस्थ और सक्रिय रखने के लिए एवं एंड्रोपॉज और बुढ़ापे के लक्षणों को टालने के लिए अपनी अंतःस्रावी ग्रंथियों पर अनुकूल प्रभाव डालना होगा। इसका सबसे सरल उपाय तनावरहित जीवनशैली है। इसके अतिरिक्त संतुलित और शाकाहारी भोजन, जिसमें फलों और हरी सब्जियों की प्रचुरता हो, लेना चाहिए। नियमित रूप से सुबह-शाम टहलना भी उपयोगी है। अधेड़ावस्था में भारी-भरकम व्यायामों से बचना चाहिए और अंग-संचालन, तेज चाल जैसी हल्की-फुल्की कसरत से ही काम चलाना चाहिए। कारण कि इस आयु में ज्यादा-से-ज्यादा ऊर्जा संरक्षण आवश्यक होता है। ऊर्जा के अधिक ह्रास से थकान जल्दी और ज्यादा आएगी, जो कि एंड्रोपॉज का एक लक्षण है। इससे बचना चाहिए। अच्छा तो यह होगा कि इस आयु-वर्ग के लोगों को आसन, प्राणायाम, बंध, मुद्रा एवं ध्यान जैसे आध्यात्मिक उपचारों का सहारा लेना चाहिए। सेवा के विभिन्न कार्य रचनात्मक प्रोजेक्ट्स हाथ में लेना चाहिए। यह ऐसे साधन-अभ्यास हैं, जो सूक्ष्म अवयवों, शक्ति संस्थानों और तंत्रों को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। इनमें अंतःस्रावी ग्रंथियों पर भी वाँछित असर पड़ता है और एंड्रोपॉज स्वयमेव टलता रहता है।

यों चिकित्साशास्त्री एंड्रोपॉज या नर रजोनिवृत्ति के इलाज का एक उपाय हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी भी बताते हैं, जिसमें टेस्टोस्टेरॉन की नियमित खुराकें व्यक्ति को दी जाती हैं, पर इसमें एक खतरा सदा बना ही रहता है कि यदि किसी प्रकार टेस्टोस्टेरॉन की मात्रा शरीर में बढ़ गई हो तो इससे लाभ के स्थान पर नुकसान ही होगा। इससे आदमी के आक्रामक और अति कामुक हो जाने का डर है। दूसरे इस हार्मोन से लीवर, प्रोस्टेट एवं हृदय जैसे कई अवयवों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उनके क्षतिग्रस्त हो जाने की संभावना बनी रहती है। अतएव हमें ‘प्रीवेन्सन इज बेटर दैन क्योर’ की अँगरेजी कहावत को अपनाते हुए एंड्रोपॉज की चिकित्सा की तुलना में उसकी रोकथाम पर अधिक ध्यान देना चाहिए, ताकि उस अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।

नर रजोनिवृत्ति आयु की अपेक्षा हमारे चिंतन और रहन-सहन से अधिक जुड़ी हुई है। हम उसमें अपेक्षित सुधार कर उस अवाँछनीय दशा से बचे रह सकते हैं, जो हमारे जीवन के उत्तरार्द्ध को दुखी बनाती है।


अन्तर्यात्रा का विज्ञान - 13 - अभ्यास और वैराग्य की अनिवार्यता

अन्तर्यात्रा विज्ञान की प्रत्येक नयी कड़ी योग साधकों को नयी प्रेरणा एवं नया प्रकाश दे रही है। इसके पठन, मनन, चिंतन व निदिध्यासन से उनकी चेतना में अनेकों नये आयाम खुल रहे है। उन्हें यह तथ्य भली भाँति समझ में आ रहा है कि यह योगकथा केवल बौद्धिक विचार विन्यास नहीं है। इसमें शब्दों का नियोजन नहीं बल्कि महासाधकों की अनुभूतियों का समायोजन किया गया है। इस योगकथा की प्रत्येक पंक्ति अनुभूति रस में सनी-लिपटी एवं रची-बसी है। यह आमंत्रण पत्रिका है, उनके लिए जो अन्तर्यात्रा विज्ञान को समझना चाहते हैं। साथ ही स्वयं भी अन्तर्यात्रा करने की चाहत रखते हैं। जिनकी चाहत सच्ची है, जिनमें मात्र कौतुक-कौतुहल नहीं आन्तरिक जिज्ञासा है, उनसे कहा जा रहा है कि अब यूँ ही सिकुड़े-सहमे-ठिठके खड़े न रहें, आगे बढ़ें, अपने कदमों में गति लायें। जो बताया जा रहा है उसे समझें ही नहीं, करें भी और योग विभूतियों के अधिकारी बनें।

पिछली कड़ियों की योगकथा में मन की वृत्तियों के बारे में अनेकों रहस्य उजागर किये गये थे। आखिर कितनी और कैसी हैं ये वृत्तियाँ? कब ये साधक के लिए सुखद होती हैं, कब दुःख देने लगती हैं? प्रमाण-विपर्यय, विकल्प, निद्रा एवं स्मृति के अनेकों अचरज योगकथा के पाठकों ने पढ़े। इनकी शक्तियों का परिचय भी उन्होंने पाया। पर यहाँ महर्षि पतञ्जलि की इस चेतावनी को जान लेना बहुत जरूरी है कि शक्तियों को अर्जित करना, सिद्धियों को पाना और विभूतियों के अधिकारी बनना सच्चे साधक के लिए उचित नहीं है। योग साधक की राह में शक्ति भी आती है। सिद्धि और विभूति भी मिलती है, पर वह इन्हें उपेक्षा भरी दृष्टि से देखकर आगे अपनी मञ्जिल की ओर बढ़ जाता है। शक्तियाँ, सिद्धियाँ और विभूतियाँ तो मन और उसकी वृत्तियों का छोटा-मोटा तमाशा भर है।

परम पूज्य गुरुदेव ने ऐसे तमाशों से योग साधकों को सावधान करते हुए गायत्री महाविज्ञान में लिखा है - ‘कोई ऐसा अद्भुत कार्य करके दिखाना जिससे लोग यह समझ लें कि यह सिद्धपुरुष है, गायत्री उपासकों के लिए कड़ाई से वर्जित है। यदि वे इस चक्कर में पड़े तो निश्चित रूप से कुछ ही दिनों में उनकी शक्ति का स्रोत सूख जायेगा और छूँछ बनकर अपनी कष्ट साध्य आध्यात्मिक कमाई से हाथ धो बैठेंगे। उनके लिए संसार को सद्ज्ञान दान कार्य ही इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसी के द्वारा वे जनसाधारण के आन्तरिक, बाह्य और सामाजिक कष्टों को भलीभाँति दूर कर सकते हैं। और स्वल्प साधनों से ही स्वर्गीय सुखों का आस्वादन कराते हुए लोगों के जीवन को सफल बना सकते हैं। इस दिशा में कार्य करने से उनकी आध्यात्मिक शक्ति भी बढ़ेगी। इसके प्रतिकूल यदि वे चमत्कार के प्रदर्शन के चक्कर में पड़ेंगे तो लोगों का क्षणिक कौतूहल अपने प्रति उनका आकर्षण थोड़े समय के लिए भले ही बढ़ा लें, पर वस्तुतः अपनी और दूसरों की इस प्रकार भारी कुसेवा होनी सम्भव है।

इन सब बातों का ध्यान रखते हुए हम कड़े शब्दों में आदेश देते हैं कि योग साधक अपनी सिद्धियों को गुप्त रखें, किसी के सामने प्रकट न करें। जो दैवी चमत्कार अपने को दिखाई दें उन्हें किसी से न कहें। गायत्री साधकों की यह जिम्मेदारी है कि वे प्राप्त शक्ति का रत्ती भर भी दुरुपयोग न करें। हम सावधान करते हैं कि कोई भी साधक इस मर्यादा का उल्लंघन न करे।’ परम पूज्य गुरुदेव के इस आदेश में सद्गुरु का अपने शिष्यों के लिए मार्गदर्शन एवं पथप्रदर्शन निहित है। महायोगी महर्षि पतञ्जलि हों या महान् योगसिद्ध परम पूज्य गुरुदेव दोनों ने ही योग साधकों को मन और उसकी वृत्तियों के खतरे से सावधान किया है। साधक को भटकाने वाला दूसरा कोई नहीं उसका अपना मन और मन की वृत्तियाँ हैं। इनके निग्रह और निरोध से ही योग सधता है। पर यह सम्भव कैसे हो? योग सूत्रकार महर्षि पतञ्जलि अगले सूत्र में इसका समाधान करते हैं।

अभ्यास वैराग्याभ्याँ तन्निरोधः ॥ 1/12॥

शब्दार्थ - अभ्यास-वैराग्याभ्याँ = अभ्यास और वैराग्य से; तत्-निरोधः=उनका (वृत्तियों का) निरोध होता है। यानि कि अभ्यास और वैराग्य से इन वृत्तियों का निरोध हो जाता है।

मन के पार जाना, मन की वृत्तियों के चक्रव्यूह से उबरना है तो उपाय दो ही है-अभ्यास और वैराग्य। जिस योग साधक के जीवन में ये दोनों तत्त्व हैं, उसकी सफलता निश्चित है। इनमें से एक का अभाव योग साधक को असफल बनाये बिना नहीं रहता। यदि अभ्यास है पर वैराग्य नहीं है, तो जो भी साधना की जाती है, जो भी योग-ऊर्जा अवतरित होती है, वह सबकी सब विभिन्न इच्छाओं और आसक्तियों के छिद्रों से बह जाती है। साधक सदा खाली का खाली बना रहता है। इसी तरह केवल वैराग्य है, अभ्यास में दृढ़ता नहीं है तो केवल आलस्य का अँधेरा ही जिन्दगी में घिरा रहता है। ऊर्जा, शक्ति, चैतन्यता की किरणें कहीं भी दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि महर्षि दोनों की समन्वित आवश्यकता बताते हैं।

अभ्यास और वैराग्य को समन्वित रूप से अपनाने में साधना जीवन की सभी समस्याओं का एक साथ समाधान हो जाता है। प्रायः-प्रायः सभी साधकों की साधनागत समस्यायें एवं परेशानियाँ एक ही बिन्दु के इर्द-गिर्द घूमती रहती है - मन नहीं लगता, मन एक जगह में टिकता नहीं है। धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने विश्वम्भर कृष्ण से भी यही समस्या कही थी- ‘चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमथि बलवद्दृढ़भ’ - हे कृष्ण! यह मन बड़ा की चंचल है, बड़े ही प्रमथन स्वभाव वाला और बहुत ही बलवान है। अर्थात् मन की चंचलता ही इतनी बढ़ी-चढ़ी है कि किसी भी तरह काबू में ही नहीं आती। महारथी अर्जुन के इस सवाल को सुनकर भगवान् कृष्ण ने कहा-

‘असंशयं महाबाहो मनोदुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥’ गीता-6/35

हे कुन्तीपुत्र महाबाहु अर्जुन! तुम्हारे इस कथन में कोई संशय नहीं है। इस मन की चंचलता किसी भी तरह से वश में आने वाली नहीं है। परन्तु अभ्यास और वैराग्य से इसे बड़ी आसानी से वश में किया जा सकता है। इसके बाद जगद्गुरु कृष्ण अर्जुन को चेताते हुए एक सूत्र और भी कहते हैं-

‘असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति में मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥’ गीता-6/36

अर्थात्- जिसके वश में मन नहीं है, ऐसे असंयत साधक के द्वारा योग में सफलता पाना अतिकठिन है, असम्भव है। जबकि जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है, ऐसे साधक बड़ी आसानी से योग में सफल हो जाते हैं।

इस प्रकरण में प्रकारान्तर से भगवान् कृष्ण अभ्यास और वैराग्य की साधक के जीवन में अनिवार्य आवश्यकता बताते हैं। इन दोनों तत्त्वों को साधक का परिचय, पर्याय और पहचान भी कहा जा सकता है। यानि कि यदि कोई योग साधक है, तो उसके जीवन में साधनात्मक अभ्यास और वैराग्य होगा ही। इन दोनों के अभाव में साधक और उसकी साधना दोनों ही झूठे हैं। कागज के फूलों की तरह उसके जीवन में न साधना की प्राकृतिक ताजगी आ सकती है और न ही योग की अलौकिक सुरभि। ये दोनों तत्त्व क्या है? किस तरह करें अभ्यास को? कैसे साधें वैराग्य को? इन प्रश्नों का उत्तर महर्षि ने अपने अगले सूत्रों में दिया है। अन्तर्यात्रा विज्ञानी इसकी अगली कड़ी के प्रकाशित होने तक योग साधक अपने अन्तःकरण में मन के पार जाने का संकल्प दृढ़ करें।


श्रद्धास्पद एवं वैभववान् बनाती है (kahani)

हेनरी फोर्ड अमेरिका के मूर्द्धन्य धनाढ्य थे तो भी वे बहुत सादगी से रहते थे।

फोर्ड का एक सूट पुराना हो गया था। फटने भी लगा था। सचिव ने कहा, ”नया सिला लेना चाहिए, लोग क्या कहेंगे?”

फोर्ड मुस्कराए और बोले, “अभी इसकी मरम्मत करा लेने से काम चल सकता है। मिलने वाले सभी जानते हैं कि मैं फोर्ड हूँ। सूट बदलने या न बदलने से मेरी स्थिति में क्या अंतर पड़ता है।”

बात गई-गुजरी हो गई। मरम्मत किए पैंट-कोट से काम चलता रहा। बहुत दिनों बाद फोर्ड को इंग्लैंड जाना था, सो सेक्रेटरी ने फिर सूट बदलने की आवश्यकता बताई और कहा, “नये देश वालों के सामने तो पोशाक बढ़िया ही होनी चाहिए।”

फोर्ड गंभीर हो गए और बोले, “उस देश में मुझे जानता ही कौन है, जो मैं उन पर रौब गाँठने के लिए बढ़िया पोशाक सिलाऊँ। अजनबी के कपड़ों पर कौन ध्यान देता हैं?”

सचिव निरुत्तर हो गए। फोर्ड मरम्मत किए वस्त्र को धुलाकर ही इंग्लैंड की यात्रा पर चले गए। यह है महापुरुषों की सादगी, जो उनके इस गुण के कारण ही उन्हें श्रद्धास्पद एवं वैभववान् बनाती है।


गुरुगीता - 11 - आओ, गुरु को करें हम नमन

गुरुगीता अध्यात्मविद्या के साधकों की प्राणचेतना का स्रोत है। इसके महामंत्रों के अनुशीलन से साधकों को नवप्राण मिलते हैं। उनमें आत्मतत्त्व का अंकुरण होता है। ब्रह्मविद्या स्फुरित होती है। वे यह सत्य जानने में समर्थ हो पाते हैं कि सद्गुरु ही सदाशिव हैं। भगवान् महेश्वर ने ही शिष्य-साधक पर कृपा करने के लिए गुरुदेव का रूप धरा है। गुरु और ईष्ट में कोई भेद नहीं है। निराकार परब्रह्म परमेश्वर की सर्वव्यापी चेतना ही कृपालु सद्गुरुदेव के रूप में साकार हुई है। सद्गुरु को नमन ईष्ट-आराध्य को नमन है। सद्गुरु को समर्पण सर्वव्यापी परमेश्वर को समर्पण है। गुरु और गोविन्द दो नहीं है। गुरु ही गोविन्द हैं और गोविन्द ही गुरु हैं।

पिछली कड़ी में गुरुभक्त साधकों ने इस सत्य की किंचित झलक पायी थी। इसमें बताया गया था कि शिष्य को यह सत्य भली भाँति जान लेना चाहिए कि गुरु से श्रेष्ठ अन्य कोई भी तत्त्व नहीं है। ऐसे परम श्रेष्ठ और शिष्य वत्सल गुरुदेव की सेवा करना शिष्य का कर्त्तव्य है। उनके द्वारा किए जाने वाले लोक कल्याणकारी कार्यों में शिष्य को उत्साहित होकर भागीदार होना चाहिए। अंशदान-समयदान और बन सके तो जीवनदान करने में किसी भी शिष्य को कोई भी संकोच नहीं होना चाहिए। जिसे सेवा करने में अभी संकोच या हिचकिचाहट है, समझना चाहिए उसमें शिष्यत्व अंकुरित ही नहीं हुआ है। मात्र दीक्षा संस्कार का कर्मकाण्ड करा लेने भर से कोई शिष्य नहीं हुआ करता। इसके लिए तो ‘सीस उतारे भुइ धरे’ वाली कबीर बाबा की उक्ति को साकार करना पड़ता है। जब शिष्य बन गए तो अहं के विसर्जन में संकोच क्यों? जब हम अपने को शिष्य कहाते हैं तो फिर गुरुवर को नमन में देरी किस लिए?

गुरु नमन की महिमा को अगले महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव माता पार्वती को समझाते हैं-

संसारवृक्षमारुढ़ा पतन्तो नरकार्णवे। येन चैवोद्धृताः सर्वे तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ 31॥

गुरुर्ब्रह्म गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुरेव परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥ 32॥

हेतवे जगतामेव संसारार्णवसेतवे। प्रभवे सर्वविद्यानाँ शंभवे गुरवे नमः॥ 33॥

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ 34॥

त्वं पिता त्वं च में माता त्वं बंधुस्त्वं च देवता। संसारप्रतिबोधार्थं तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ 35॥

उन सद्गुरुदेव भगवान् को शिष्य नमन करे, जो संसारवृक्ष पर आरुढ़ जीव का नरक सागर में गिरने से उद्धार करते हैं॥ 31॥ नमन उन श्रीगुरु को जो अपने शिष्य के लिए ब्रह्म, विष्णु, महेश्वर होने के साथ परब्रह्म परमेश्वर हैं॥ 32॥ शिव रूपी उन सद्गुरु को नमन जो समस्त विद्याओं का उदय स्थान है। इस संसार का आदिकारण है और संसार सागर को पार करने के लिए सेतु है॥ 33॥ नमन उन श्री गुरु को जो अज्ञान के अन्धकार से अन्धे जीव की आँखों को ज्ञानाञ्जन की शलाका से खोलते हैं॥ 34॥ नमन उन श्री गुरु को जो अपने शिष्य के लिए पिता हैं, माता हैं, बन्धु हैं, ईष्ट देवता हैं और संसार के सत्य का बोध कराने वाले हैं॥ 35॥

इन महामंत्रों में सद्गुरु के नमन का विज्ञान-विधान है। गुरुतत्त्व को जान लेने पर, उनकी महिमा का साक्षात्कार कर लेने पर शिष्य को कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता। उसे किसी का भी भय नहीं रहता। शिष्य के हृदय में जब अपने सद्गुरु के प्रति नमन के भाव उपजते रहते तब उसका सर्वत्र मंगल होता है, उसे अमंगल की छाया स्पर्श भी नहीं कर सकती। सद्गुरु को नमन शिष्य के लिए महाअभेद्य कवच है। इस सम्बन्ध में एक सत्य घटना का उल्लेख करने के लिए भावनाएँ आतुर हो रही हैं। यह घटना समर्थ गुरु रामदास और उनके शिष्य शिवराम के सम्बन्ध में है। उन दिनों स्वामी रामदास अपने तेरह वर्षीय कठोर साधना को पूर्ण करके सारे देश में अलख जगा रहे थे।

इस क्रम में उन्हें बनारस आना था। अपनी बनारस यात्रा की चर्चा उन्होंने अपने शिष्यों से करते हुए कहा कि इस बार की यात्रा मैं अकेले ही करूंगा। सब शिष्यों ने उनका आदेश स्वीकार कर लिया, पर बालभक्त शिवराम ने जिद पकड़ ली कि वह भी उनके साथ जाएगा। शिवराम की आयु बारह साल थी। समर्थ गुरु ने बहुत समझाया कि बेटा तुम इतनी लम्बी यात्रा पैदल कैसे करोगे? पर बालहठ पर कोई असर नहीं हुआ। अन्त में स्वामी रामदास ने उससे कहा- अच्छा बेटा! तुम अपनी माँ से आज्ञा ले लो। अगर वह आज्ञा दे देगी, तो हम तुम्हें ले चलेंगे। शिवराम की माँ एक भक्तिमती विधवा महिला थी। शिवराम उनकी इकलौती सन्तान था। सन्तान के प्रति उनका जितना गहरा ममत्व था। समर्थ गुरु के चरणों में उतनी ही गहरी भक्ति थी। पुत्र की बात सुनकर उन्होंने एक पल की देर लगाये बिना आज्ञा दे दी।

शिवराम की भक्ति और उसकी माँ की आस्था से द्रवित होकर समर्थ गुरु उसे अपने साथ काशी ले आए। काशी आने पर गुरु आज्ञा से शिवराम भिक्षा माँगने के लिए निकला। समर्थ रामदास और उनके शिष्यों का भिक्षा हेतु एक नियम था। वह किसी के द्वार पर खड़े होकर केवल तीन बार पुकारते थे- जय-जय रघुवीर समर्थ। तीन बार पुकारने पर यदि किसी ने भिक्षा दी तो ठीक अन्यथा आगे बढ़ जाते थे। इस तरह तीन घरों में भिक्षा माँगना उनका नियम था। तीन घरों में यदि भिक्षा न मिली तो वे उस दिन उपवास कर लेते थे। शिवराम ने भी इसी नियम के अनुसार एक द्वार पर आवाज लगायी। यह द्वार काशी के महाताँत्रिक भैरवानन्द का था। भैरवानन्द को अनेकों तामसी तान्त्रिक क्रियाएँ सिद्ध थीं। यह महाताँत्रिक होने के साथ महाक्रोधी भी था।

अपने द्वार पर जय-जय रघुवीर समर्थ की आवाज सुनते ही वह भड़क उठा। क्रोधावेश में वह द्वार पर निकलकर आया और बालक शिवराम को डाँटते हुए बोला कि कौन है जो अपने को समर्थ कहता है। शिवराम ने बिना किसी भय के कहा- कि समर्थ हैं मेरे गुरु और उनकी सामर्थ्य का स्रोत उनके आराध्य भगवान् राम हैं। छोटे बालक को अपने सामने इस तरह बोलते हुए देख उस क्रोधी ताँत्रिक ने कहा, जा मैं भैरवानन्द तुझसे कहता हूँ कि तू कल प्रातःकाल तक मर जाएगा, तेरे गुरु में सामर्थ्य है तो तुझे बचा लें। शिवराम ने समर्थ रामदास के पास उपस्थित होकर उस ताँत्रिक की सारी बातें बतायी। उन बातों से भी उन्हें अवगत कराया, जो रास्ते में बनारस के लोगों ने उसे महाताँत्रिक की आश्चर्यजनक शक्तियों के बारे में बतायी थी। इन सारी बातों को सुनकर समर्थ रामदास हंसे और बोले बेटा- समर्थ रघुवीर के होते डर कैसा? तू तो बस आराम से गुरुर्ब्रह्म, गुरुर्विष्णु वाला मन्त्र पढ़ता रह और आराम से मेरे पाँव दबाए जा। इतना कहकर समर्थ रामदास लेट गए।

बालक शिवराम ने उनके पाँव दबाते हुए गुरु नमन के मंत्र पढ़ने शुरू किए। इधर भैरवानन्द ने भी उसके मारण के लिए महाकृत्या का प्रयोग किया था। पूरी रात महाकृत्या ने शिवराम को मारने के लिए अनेकों रूप धरे, उसको कई तरह से गुरु नमन से विरत करना चाहा। परन्तु शिवराम की अटल गुरुभक्ति के सामने उसकी एक न चली। अन्त में असफल होकर उसने भैरवानन्द पर ही अपना आक्रमण किया। महाताँत्रिक अपनी क्रिया को इस तरह उलटते देखकर घबरा गया। वह भागा-भागा आकर समर्थ के चरणों में गिर गया। समर्थ रामदास ने उसे अभय देते हुए कृत्या का शमन किया और उसे चेताया गुरुगीता के गुरु नमन मंत्र साधारण नहीं है। जिसकी वाणी में ये मंत्र है और हृदय में गुरुभक्ति है, वह गुरुकृपा के कवच से सदा सुरक्षित है। कोई अभिचार क्रिया उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। गुरु नमन के इन नमन मंत्रों की शृंखला अभी और भी है। जो अगले अंक में भी प्रकाशित होगी। तब तक गुरु भक्त साधक गुरु नमन की महिमा का चिन्तन करें।


तितली की भी भूख शाँत की (kahani)

बरसात आ गई। लगातार झड़ी लगी थी। तितली उदास बैठी थी। मधुमक्खी ने पूछा, बहन क्या बात है? ऐसे सुँदर मौसम में उदासी कैसी?

तितली बोली, मौसम की सुँदरता से पेट की भूख अधिक प्रभावित कर रही है। कहीं भोजन लेने जा नहीं सकती, इसीलिए परेशान हूँ।

मधुमक्खी बोली, बहन, ऐसे समय के लिए कुछ बचत क्यों नहीं की? कल की बात न सोचने वाले यों ही परेशान होते हैं। ऐसा समझाकर मधुमक्खी ने अपने संचित कोश में से तितली की भी भूख शाँत की।


हृदय रोग की यज्ञोपचार प्रक्रिया

शरीर में प्रधान व सर्वश्रेष्ठ अंग हृदय को माना गया है। आयुर्वेद ग्रंथों में इसकी गणना शरीर के सबसे प्रमुख मर्म स्थान के रूप में की गई है। यों तो मानवी काया में कुल एक सौ सात मर्मस्थान हैं, जिसका वर्णन करते हुए चरकसंहिता चि. 26/3−4 में कहा गया है−

सप्तोत्तंर मर्मशतं यदुत्तं शरीरसंख्यामधिकृत्य तेभ्यः। मर्माणि बस्तिं हृदयं शिरश्च प्रधानभूतानि वदन्ति तज्ज्ञा॥

प्राणाशयान्तान् परिपीडयन्ति वातादयोऽसूनपि पीडयन्ति। तत्संश्रितानामनुपालनार्थं महागदानाँ शृणु सौम्य रक्षाम्॥

शरीर में एक सौ सात मर्मस्थान हैं, जिनमें तीन प्रमुख हैं—वस्ति, हृदय एवं शिर और उनमें भी हृदय सबसे प्रमुख है। हृदय जब तक लपडप लपडप करता हुआ धड़कता रहता है, तभी तक जीवन माना जाता है। जैसे ही धड़कन बंद हुई कि व्यक्ति को मृतक घोषित कर दिया जाता है। इसीलिए हृदय को चेतना का केंद्र माना गया है और कहा गया है—

षडंगमंग विज्ञानमिन्द्रियार्ण्यथ पञ्चकम्। आत्मा च सगुणेश्चेतश्चिन्त्यं च हृदि संश्रितम्॥

छहों अंगों से युक्त शरीर, विज्ञान अर्थात् बुद्धि, इंद्रियाँ, इंद्रियों के पाँचों विषय, सगुण आत्मा, मन और मन के विषय−ये सभी हृदय के आश्रित हैं। हृदय ही रस−रक्त एवं ओज का आश्रयस्थल है। अतः बुद्धिमान मनुष्य को उन सभी कारणों से अपने हृदय की रक्षा करनी चाहिए, जो हृदय रोग को जन्म देते हैं। विशेषकर मन को दुःखी एवं बोझिल, तनावयुक्त बनाने वाले उन सभी कारणों का, आचरण एवं व्यवहार का परित्याग कर देना चाहिए और ऐसे आहार−विहार का सेवन करना चाहिए, जो हृदय के लिए लाभकारी हों तथा ओज की रक्षा एवं वृद्धि करने वाले हों।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान हृदय को रक्त −परिवहन संस्थान का प्रमुख केंद्र मानता है। यह हृदय सहित शरीर के समस्त अंग अवयवों को छोटी−बड़ी रक्त वाही धमनियों के द्वारा पोषक तत्त्वों से भरपूर ऑक्सीजन युक्त रक्त की आपूर्ति निरंतर करता रहता है और उन अंगों से छोटी−बड़ी रक्त शिराओं द्वारा एकत्रित किए गए अशुद्ध रक्त फेफड़ों में भेजकर शुद्ध करता और दुबारा परिसंचरण योग्य बनाता रहता है। यह प्रक्रिया सतत अविराम रूप से चलती रहती है। किन्हीं कारणों से जब हृदय एवं उससे जुड़े हुए अंग−अवयवों, रक्त नलिकाओं या उनकी क्रियाओं में विकार आ जाता है या अवरोध उत्पन्न हो जाता है, तब कहा जाता है कि हृदय रोग हो गया है। इनमें क्रिया संबंधी (फन्क्शनल डिसआर्डर विकारों का शमन उपचार से शीघ्र हो जाता है, जबकि अंग संबंधी विकारों (आर्गेनिक डिसआर्डर) को ठीक होने में समय लगता है और कभी−कभी वे ठीक न होकर प्राणघातक सिद्ध होते हैं।

सुश्रुत संहिता उत्तरतंत्र 43 में हृदय रोग को परिभाषित करते हुए कहा गया है—

दूषयित्वा रसं दोषा विगुणा हृदयं गताः। कुर्वन्ति हृदये बाधाँ हृद्रोगं तं प्रचक्षते॥

जब प्रकुपित वात, पित्त, कफ आदि दोष रस रक्त को दूषित कर हृदय में पहुँचकर हृदय के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करते हैं तो उसे हृदय रोग कहते हैं। जिन कारणों से यह रोग उत्पन्न होता है, उसका उल्लेख करते हुए चरक संहिता में कहा गया है−

अत्युष्ण−गुर्वन्न−कषाय−तिक्त श्रमाभिघाताध्यसनप्रसंगैः। सञ्चिन्तन्नैर्वेगाविधारणैश्च हृदामयः पञ्चविधः प्रदिष्टः॥

अत्यधिक उष्ण गरम प्रकृति वाले पदार्थ, अत्यंत भारी पदार्थ, कषाय रसप्रधान एवं तिक्त रसप्रधान भोज्यपदार्थों का निरंतर सेवन करने से, हृदयप्रदेश में आघात लगने से, अध्यसन अर्थात् अजीर्ण रहने पर भी भोजन करने से, अधिक चिंता करने या तनावग्रस्त रहने, भयभीत रहने से, मलमूत्र आदि वेगों को रोकने से, पहले से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा न करने आदि कारणों से पाँच प्रकार के हृदय रोग उत्पन्न होते हैं। इस तरह हृदय रोग के मूल में शारीरिक, मानसिक एवं आगंतुक कारण माने जाते हैं।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार हृदय रोग का सबसे प्रमुख कारण रक्त वाही धमनियों में कोलेस्ट्रॉल, वसा एवं कैल्शियम के जमा होने से उनका कठोर होना और सिकुड़ना है। इसके कारण हृदय की माँसपेशियों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन और रक्त नहीं मिल पाता, परिणामस्वरूप हृदय सही ढंग से काम नहीं कर पाता और उसकी कोशिकाएँ मरने लगती हैं। अधिक तनाव, अत्यधिक निम्न या उच्च रक्त चाप, डायबिटीज, उच्च कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान, मद्यपान आदि हृदय रोग उत्पन्न करने वाले प्रमुख कारण हैं। अधिक मात्रा में लिया गया कोलेस्ट्रॉल एवं उच्च वसायुक्त आहार, हैमबर्गर आदि जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक, चाय व कॉफी आदि का अत्यधिक सेवन भी हृदय रोग उत्पन्न करते हैं। मोटापा एवं शारीरिक वजन की अभिवृद्धि हृदय रोग बढ़ाने में महती भूमिका निभाते हैं।

आयुर्वेद शास्त्रों में पाँच प्रकार के हृदय रोग बताए गए हैं (1) वातज हृदय रोग, (2) पित्तज हृदय रोग, (3) कफज हृदय रोग, (4) त्रिदोषज हृदय रोग एवं (5) कृमिज हृदय रोग।

वातज हृदय रोग उत्पन्न होने के कारणों एवं लक्षणों का उल्लेख चरक संहिता में करते हुए कहा गया है−

शोकोपवासव्यायामशुष्करुक्षाल्पभोजनैः। वायुराविश्च हृदयं जनयत्युत्तमाँ रुजम्॥ वेपथुर्वेष्टनं स्तम्भः प्रमोहः शून्यता द्रवः। हृदि वातातुरे रुपं जीर्णे चार्त्यथवेदना॥

खान−पान में असंयम यथा रुक्ष, शुष्क और अत्यल्प मात्रा में भोजन करना, अधिक उपवास करना, शोक करना, अधिक व्यायाम करना आदि कारणों से प्रकुपित वायु हृदय−प्रदेश में जाकर अधिक वेदनापूर्वक वातज हृदय रोग को उत्पन्न करती है। इस प्रकार के हृदय रोग में पीड़ा अधिक रहती है। हृदय की धड़कन का तेज हो जाना, हृदय गति में रुकावट होना, ऐंठन होना, शरीर का शून्य−सा मालूम होना, मूर्च्छित होना, भय लगना, हृदय में सुई चुभोने या चीरा लगाने जैसी पीड़ा होना आदि लक्षण इस रोग में प्रकट होते हैं।

पित्तज हृदय रोग के कारण एवं लक्षण इस तरह बताए गए हैं−

उष्णाम्लवणक्षारकटुकाजीर्णभोजनैः। मद्यक्रोधातपश्चाशु हृदि पित्तं प्रकुप्यति॥

हृद्दाहस्तित्तता वक्रे क्लम पित्ताम्लकोद्गरः। तृष्णा मूर्च्छा भ्रमः स्वेदः पित्तहृद्रोगलक्षणम्॥

उष्ण, लवणरसप्रधान, क्षारीय एवं कटु रस वाले पदार्थों का सेवन करने से, अजीर्ण रहने पर भी भोजन करने से, अधिक शराब पीने से, अधिक क्रोध करने से, देर तक अधिक तेज धूप में रहने से हृदय में जाकर पित्त अधिक प्रकुपित हो जाता है और पित्तज हृदय रोग उत्पन्न करता है। हृदय में दाह होना, मुख में तिक्त ता एवं अम्लीय, खट्टा पानी आना, खट्टी डकार आना, खट्टा वमन होना, इंद्रियों में थकावट होना, तृष्णा, बेहोशी, चक्कर आना, पसीना होना, मुख का सूखना आदि लक्षण इस रोग में उत्पन्न होते हैं।

कफज हृदय रोग के कारण एवं लक्षण इस प्रकार बताए गए हैं−

अत्यादानं गुरु स्निग्धमचिन्तनमचेष्टनम्। निद्रासुखं चाभ्यधिकं कफहृद्रोगलक्षणम्॥

हृदयं कफहृद्रोगे सुप्तं स्तिमितभारिकम्। तन्द्रारुचिपरीतस्य भवत्यश्मावतं यथा॥

अधिक मात्रा में भोजन करना, भारी और चिकने पदार्थों का अधिक सेवन करना, चिंतारहित होना, अकर्मण्य अर्थात् किसी प्रकार का परिश्रम न करना, ज्यादा−से−ज्यादा समय सोने में व्यतीत करना आदि कारणों से कफज हृदय रोग उत्पन्न होता है। इस रोग की चपेट में आने वाले को ऐसा मालूम पड़ता है कि जैसे उसका हृदय प्रसुप्त−सा हो गया है, सिकुड़ गया है या भीग गया है, हृदय के ऊपर बोझ रखा हुआ है अथवा हृदय किसी पत्थर से दब गया है। तंद्रा, भोजन में अरुचि आदि अन्यान्य लक्षण प्रकट होते हैं।

त्रिदोषज हृदय रोग− इसे सान्नपातिक हृदय रोग कहते हैं। इसके कारणों एवं लक्षणों का वर्णन करते हुए कहा गया है− हेतुलक्षणसंसर्गादुच्यते सान्निपातिकः अर्थात् वात, पित्त एवं कफ के प्रकुपित होने से होने वाले हृदय रोगों के जो कारण एवं लक्षण कहे गए हैं, वे सब संयुक्त रूप से जहाँ इकट्ठे दिखाई पड़ें, समझना चाहिए कि सान्निपातिक हृदय रोग है। यह कष्टसाध्य माना गया है।

कृमिज हृदय रोग− यह त्रिदोषज हृदय रोग का उपचार न करने एवं खान−पान में असंयम बरतने, तिल, दूध, गुड़ आदि मीठे पदार्थों का अधिक सेवन करने से उत्पन्न विकार के कारण पैदा होता है। इसके कारण हृदयप्रदेश में एक ग्रंथि बन जाती है, जिसमें आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार कृमि उत्पन्न होते और संख्या में अभिवृद्धि करके हृदय को खोखला करने लगते हैं। इससे हृदयप्रदेश में सुई चुभाने या शस्त्र से काटने जैसी भयंकर पीड़ा होती है। यह रोग असाध्य माना जाता है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान एलोपैथी के अनुसार हृदय रोग के कितने ही भेद−उपभेद हैं और वे सभी कष्टदायी हैं तथा इनमें से कितने ही ‘सडन डैथ’ असमय मृत्यु का कारण बनते हैं। इनमें से प्रमुख हैं−(1) इस्चीमिक हार्ट डिजीज या एंजाइना पेक्टोरिस अर्थात् हृद्शूल, (2) मायोकार्डियल इन्फार्क्शन या हार्ट अटैक अर्थात् दिल का दौरा, (3) हार्ट फेल्योर अर्थात् हृदयनिपात, (4) हाइपरटेंशन या उच्च रक्त चाप, (5) हाइपोटेंशन या निम्न रक्त चाप, (6) एथीरोस्कलेरोसिस या एथीरोमा, (7) एरीथीमिया अर्थात् हृदय की धड़कन में अनियमितता एवं हार्ट ब्लॉक, (8) रिह्यूमेटिक हार्ट डिजीज, (9) पेरीकोर्डाइटिस, (10) इंडोकोर्डाइटिस, (11) मायोकोर्डाइटिस, (12) वेनस थ्रोम्बोसिस, (13) टैकीकार्डिया (हृदय की गति 60 से कम), (15) एओर्टिक हार्ट डिजीज (हृदय की गति 125 से अधिक) आदि।

उपर्युक्त सभी प्रकार के हृदय रोग असंयम एवं असावधानी बरतने तथा समय पर चिकित्सा न करने से बढ़ते जाते हैं और अंततः जानलेवा सिद्ध होते हैं। इनसे बचने का सर्वोत्तम उपाय यही है कि आहार−विहार में संयम बरता जाए और

रोग के अनुरूप चिकित्सा अपनाई जाए। इसके लिए सबसे सरल एवं निरापद चिकित्सा है—यज्ञोपचार। इस प्रक्रिया को अपनाकर हृदय रोगों से छुटकारा पाया और स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन का लाभ उठाया जा सकता है।

हृदय रोग की विशेष हवन सामग्री

(सभी तरह के हृदय रोगों के लिए)

इसमें निम्नलिखित वनौषधियां बराबर मात्रा में मिलाई जाती हैं

अर्जुन छाल, (2) अपामार्ग, (3) पुष्कर मूल, (4) ब्राह्मी, (5) अगर, (6) तगर, (7) जटामाँसी, (8) शालपर्णी, (9) दारुहल्दी, (10) हरड़, (11) द्राक्ष (दाख), (12) तिलपुष्पी (डिजिटेलिस) के पत्ते, (13) सोंठ, (14) कुटकी, (15) मुँडी, (16) कूठ, (17) पुनर्नवा, (18) चित्रक, (19) मीठी बच, (20) नागबला (गंगेरन), (21) रास्ना, (22) बला (खिरैटी) की जड़।

उपर्युक्त सभी बाईस चीजों को संभाग में लेकर कूट−पीसकर जौकुट पाउडर बना लेना चाहिए। उसे एक डिब्बे में सुरक्षित रखकर उस पर ‘हृदय रोग की विशेष हवन सामग्री−क्र.−2’ का लेबल लगा देना चाहिए। हवन करते समय उसमें बराबर मात्रा में पहले से तैयार की गई ‘काँमन हवन सामग्री−क्र.−1’ को मिलाकर हवन करना चाहिए। इसमें अगर, तगर, देवदार, लाल चंदन, सफेद चंदन, जायफल, लौंग, गूगल, चिरायता एवं गिलोय बराबर मात्रा में मिली होती हैं। हवन के लिए समिधा आम या पलाश की सूखी हुई लकड़ी प्रयुक्त करनी चाहिए। हवन नित्य प्रातः 12 गायत्री मंत्र के अलावा 12 बार सूर्य गायत्री मंत्र अर्थात् ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यो प्रचोदयात् से करना चाहिए।

उपर्युक्त 22 चीजों से तैयार ‘हृदय रोग की विशेष हवन सामग्री क्र.−2’ के सम्मिश्रित जौकुट पाउडर की कुछ मात्रा को अधिक बारीक घोट−पीसकर कपड़छन चूर्ण तैयार कर लेना चाहिए और इसे एक अलग कार्क बंद शीशी में रख लेना चाहिए। इसमें से प्रतिदिन हवन के पश्चात सुबह एवं शाम को एक−एक चम्मच पाउडर दूध अथवा घी अथवा शक्कर के साथ पूर्ण स्वस्थ होने तक खिलाते रहना चाहिए। बाद में खाने वाले पाउडर में क्र.−12 तिलपुष्पी (डिजिटेलिस) के सूखे पत्र की मात्रा अन्यान्य औषधियों से आधी कर देनी चाहिए अर्थात् द्राक्ष या सोंठ यदि 10−10 ग्राम लिए गए हैं तो तिलपुष्पी के पत्ते 5 ग्राम ही लेने चाहिए।

मस्तिष्कीय तनाव से उत्पन्न होने वाले हाई बी. पी. अर्थात् उच्च रक्त चाप एवं एन्जाइना पेक्टोरिस या हृद्शूल में निम्नलिखित औषधियों से बने चूर्ण का सेवन रोगी को करना चाहिए−

अर्जुन, (2) पुनर्नवा, (3) जटामाँसी, (4) नागरमोथा, (5) मुलहठी, (6) हरड़, (7) कुटकी, (8) तेजपत्र, (9) कालमेघ, (10) सोंठ, (11) पुष्कर मूल, (12) कूठ, (13) शरपुँखा, (14) ब्राह्मी, (15) तिलपुष्पी, (16) सुरंजान एवं (17) सर्पगंधा।

इन सभी 17 चीजों को लेकर कूट−पीसकर कपड़छन पाउडर तैयार कर लेना चाहिए और रोज सुबह−शाम एक−एक चम्मच पाउडर दूध या घी अथवा शक्कर के साथ रोगी व्यक्ति को खिलाना चाहिए।

लो ब्लडप्रेशर अर्थात् निम्न रक्त चाप में निम्नलिखित चीजों से बने पाउडर को खिलाना चाहिए−

अश्वगंधा, (2) शतावर, (3) मुलहठी, (4) विधारा, (5) पिपलामूल−इन सभी पाँचों चीजों को संभाग लेकर कूट−पीस करके कपड़छन पाउडर बना लेना चाहिए। इसमें से सुबल एक चम्मच तथा शाम को एक चम्मच पाउडर शुद्ध घी एवं शक्कर के साथ खिलाना चाहिए। इसके साथ ही सुबह−शाम आधा−आधा ग्राम शुद्ध शिलाजीत थोड़े−से दूध में घोलकर पिलाना चाहिए एवं चौथाई रत्ती सुबह एवं चौथाई रत्ती शाम को घी में भुना हुआ शुद्ध कुचला उक्त पाउडर के साथ रोगी व्यक्ति को सेवन कराना चाहिए। इससे निम्न रक्त चाप निवारण में महत्त्वपूर्ण सफलता मिलती है। यज्ञोपचार की हवन−प्रक्रिया तीनों में एक समान रहेगी।

हृदय को स्वस्थ रखने के लिए अपने दैनिक आहार में विटामिन ‘बी’, विटामिन ‘सी’ एवं ‘ई’ युक्त खाद्य पदार्थों की पर्याप्त मात्रा सम्मिलित रखनी चाहिए। इनकी कमी से रक्त वाही नलिकाएँ कठोर पड़ती हैं, कोलेस्ट्रॉल जमा होने लगता है, रक्त का थक्का जमने लगता है और हृदयाघात जैसी व्यथा का सामना करना पड़ता है। इससे बचने के लिए यीस्ट, अंकुरित गेहूँ, अंकुरित दालें यथा सोयाबीन, मसूर, मूँग आदि कच्चा केला, भुनी हुई मूँगफली, हरे पत्ते वाली सब्जियाँ, बंदगोभी, पत्तागोभी, लौकी, तोरई, कच्चा पपीता, गाजर, टिंडा, करेला, परवल, पालक, हरी मेथी, सहजन की फली, सेमल के कच्चे फूल, शीघ्र पचने वाले फल, सेब, पपीता, आँवला, अमरूद, नींबू, नारंगी आदि। फलों का रस, मक्का, चोकर युक्त आटे की रोटी आदि लेना चाहिए। गाय का दूध, दूध में अल्प मात्रा में कभी−कभी ईसबगोल आदि का प्रयोग उपयोगी है। दूध में अर्जुन की छाल पकाकर पीना हृदयरोग में अति लाभप्रद है। हृदय रोग में पानी खूब पीना चाहिए, इससे रक्त की साँद्रता कम होती है और खून का थक्का जमने की संभावना नहीं रहती। धूम्रपान, मद्यपान, कोल्ड−सॉफ्ट ड्रिंक, चाय, कॉफी, वेजिटेबल घी, मक्खन, अंडे, चर्बीयुक्त आहार, माँसाहार आदि हृदय रोग उत्पन्न करने वाले पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी - अभिभावक हैं तो उत्तरदायित्व भी निभाइए

( परिवार निर्माण सत्र सितंबर 1980 में शाँतिकुँज में दिया गया उद्बोधन)

गायत्री मंत्र हमारे साथ−साथ,

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो, भाइयो! संतान उत्पन्न करने के साथ साथ अभिभावकों के ऊपर उनके निर्माण की भी जिम्मेदारी स्वभावतः चली आती है। संतान अपने गुण, कर्म, स्वभाव से कैसी हो, शरीर से कैसी हो, यह इस बात पर निर्भर करता है कि जन्मदाता माता और पिता की मनःस्थिति कैसी है? माता अर्थात् जमीन। जमीन जिस तरह की होगी, पौधों का उसी तरह से बढ़ना और फलना−फूलना संभव होगा। पिता अर्थात् बीज। बीज जिस किस्म का होगा, उसी किस्म का पौधा पैदा होगा। जमीन में गेहूँ का बीज बोया जाएगा तो गेहूँ का पौधा पैदा होगा। मक्का बोई जाएगी तो मक्का पैदा होगी। फूल बोया जाएगा तो फूल पैदा होगा। संतान कैसी होगी और क्या होगी? इसका नमूना देखना हो तो पिता को देखना चाहिए कि पिता के गुण, कर्म और स्वभाव, उसका जीवन लक्ष्य क्या है?

मित्रो! जमीन के ऊपर ही पौधों का विकास टिका हुआ है। यदि बीज अच्छा हो और जमीन खराब हो तो ऐसी जमीन में, जहाँ खाद न हो, पानी न हो तो फिर उस निकम्मी जमीन में अच्छा पौधा पैदा नहीं हो सकता। अच्छी संतान उत्पन्न करने के लिए माता−पिता को पहले से ही तैयारी करनी चाहिए। अच्छी संतान की जिनको इच्छा है, उनको मात्र यही विचार नहीं करना चाहिए कि बच्चों को हम पढ़ाएँगे कहाँ? बच्चों को हम पढ़ाएँगे क्या? बच्चों के लिए हम करेंगे क्या? वरन् यह भी सोचना चाहिए कि बच्चों को हम क्या और कैसे संस्कार देंगे? बच्चों को जो करना है, जैसा भी उनको बनना है, वह सारी तैयारियाँ बालक पेट में नौ महीने के भीतर पचास फीसदी तैयारी पाँच वर्ष की उम्र के भीतर हो जाती है। सबसे संवेदनशील अवस्था पाँच वर्ष के पहले तक समाप्त हो जाती है। माता के पेट में जिस दिन से बच्चा आता है, उसी दिन से सीखना शुरू कर देता है और पाँच वर्ष का होते होते जब तक उसको बोलना आता है, समझना आता है, उस वक्त तक उसके संस्कारों के पड़ने वाली बात पूरी हो जाती है। बाकी तो सारे जीवनभर स्कूल कॉलेज में जाकर और जहाँ कहीं भी जाता है, अनुभव, ज्ञान इकट्ठा करके वह अपना भौतिक ज्ञान इकट्ठा करता है।

मित्रो! स्वभाव का निर्माण, चरित्र का निर्माण, क्रियाओं का निर्माण उस समय होता है, जबकि व्यक्ति का बाह्य मन जाग्रत नहीं होता और अचेतन मन पूर्णतया जाग्रत होता है। अचेतन मन की जाग्रत अवस्था पेट में आने से लेकर पाँच वर्ष तक की है और चेतन मन? चेतन मन का विकास पाँच वर्ष से लेकर शुरू होता है और वह जीवन के अंतिम समय तक चला जाता है।

अचेतन मन को ढालिए

मनुष्य का गुण, कर्म और स्वभाव, उसका व्यक्ति त्व और उसका लक्ष्य, ये सारे−के−सारे मनुष्य के अचेतन मन से संबंधित हैं और चेतन मन में व्यवहारकुशलता, शिक्षा, बाह्यज्ञान, कला−कौशल आदि बातें बाह्य मस्तिष्क से संबंधित हैं। मनुष्य का व्यक्ति त्व उसके अचेतन मन से जुड़ा है। चेतन मन के साथ उसकी जानकारियों एवं क्रियाकलापों का ही संबंध है। अचेतन मन जिन दिनों विकसित हो रहा होता है, उस समय शिक्षण करने के लिए कोई और उपाय नहीं है। बच्चा स्वयं उसका शिक्षण नहीं कर सकता। उस समय माता−पिता का कर्त्तव्य है कि वे अपने बालकों को जैसा भी बनाना हो, उसका अचेतन मन जैसा भी ढालना हो, उसका भविष्य जैसा भी बनाना हो, उसके अनुरूप स्वयं की अपने आप में तैयारी करना सीखें।

मित्रो! बच्चा पेट में आए, उससे पहले ही माता पिता को यह प्रयत्न करना चाहिए कि स्वयं देखें कि उनका स्वयं का स्वभाव कैसा है? उनके कर्म कैसे हैं? उनके गुण कैसे हैं? उनके विचार कैसे हैं? उनके भाव कैसे हैं? इन सब बातों की तैयारी बच्चे का निर्माण करने से पहले ही करनी चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण को एक अच्छी संतान पैदा करनी थी। रुक्मिणी ने कहा कि हमको एक अच्छी संतान की जरूरत है तो उन्होंने कहा कि इसके लिए पहले अपने आपको तैयार करना चाहिए। कैसे तैयार करना चाहिए? इसके लिए रुक्मणी और श्रीकृष्ण दोनों के दोनों ही उस स्थान पर हिमालय में चले गए जिसको आजकल बदरीनारायण कहते हैं। रुक्मणी और श्रीकृष्ण बेर के फल खाकर हिमालय के उस पर्वत पर घोर तपस्या करने लगे। उसके बाद जब वे लौटकर आए तो उन्होंने एक संतान पैदा की। उसका नाम था −प्रद्युम्न। मित्रो! प्रद्युम्न शक्ल से, सूरत से, गुण से, कर्म से, स्वभाव से ठीक उसी तरह का था, जैसे कि श्रीकृष्ण भगवान थे। कई बार तो पहचानने वालों को भ्रम हो जाता था कि इनमें से श्रीकृष्ण कौन है और प्रद्युम्न कौन है? इसका कारण सिर्फ यह था कि उन लोगों ने बच्चा पैदा करने से पूर्व अपनी तैयारी की थी।

तैयारी माता−पिता की होनी चाहिए

बच्चे को किस तरीके से बनाया जाए और क्या किया जाए? इसके लिए अपनी मनोभूमि और अपने क्रियाकलाप, अपने स्वभाव, अपने आचरण माता पिता को बच्चे के जन्म से पहले ही तैयार करने चाहिए, ताकि जिस रज और वीर्य के द्वारा बच्चा बनने वाला है, उसके पेट में आने से पहले उस रज और वीर्य में सात्विकता का समावेश, अच्छाइयों का समावेश, श्रेष्ठता का समावेश होकर रहे। इसके बाद में बच्चे की अच्छी वाली पाठशाला आरंभ होती है, जिसके मुकाबले में पब्लिक स्कूलों की कोई कीमत नहीं, कॉलेजों की कोई कीमत नहीं है। ट्यूटरों की कोई कीमत नहीं है। वह सारे का सारा शिक्षण और उसके व्यक्ति त्व के विकास का शिक्षण बच्चे के पेट में आने से लेकर जब तक वह बाहर आता है, बहुत कुछ पूरा हो चुका होता है। उस समय माता की मनोभूमि जैसी भी कुछ होगी, उसके हिसाब से वही स्वभाव और वही संस्कार बच्चे पर पड़ते चले जाएँगे।

मित्रो! उन दिनों गर्भवती की स्थिति नाजुक होती है, इसलिए उस समय उसको कोई मानसिक आघात नहीं लगना चाहिए और कोई प्रसंग ऐसा नहीं आना चाहिए जिससे उसके अंदर क्षोभ उत्पन्न हो, क्रोध उत्पन्न हो, ईर्ष्या और डाह के भाव उत्पन्न हों अथवा उसको दुष्कर्म करने का मौका मिले। उस समय उसकी प्रसन्नता को अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए। घर के लोगों का, पति का काम है, परिवार के लोगों का काम है कि गर्भवती का स्वभाव और संस्कार बढ़िया बनाकर रखें। उसको हँसी−खुशी के वातावरण में रखा जाए और इस तरह की परिस्थितियों से उसको दूर रखा जाए जिसमें उसको भय पैदा होता हो, चिंता पैदा होती हो, रोष पैदा होता हो, क्लेश पैदा होता हो। इस तरह की मनोभूमि यदि माता की रखी गई है तो निस्संदेह बालक का व्यक्ति त्व निखरता हुआ चला जाएगा।

महाभारत में एक कथा आती है कि अभिमन्यु जब अपनी माँ के पेट में था, तब उसको कुछ शिक्षा की जरूरत थी। उसके पिता अर्जुन ने चक्रव्यूह−भेदन की क्रिया अपनी धर्मपत्नी को सुनानी शुरू की और वह बालक, जो पेट के अंदर बैठा हुआ था, महाभारत की कथा के अनुसार वह सारी−की−सारी विधियों और चक्रव्यूह भेदने का विज्ञान सातवें सोपान तक सीखता हुआ चला गया। भेदन का अंतिम क्रम वह सुन नहीं पाया। जब वह पैदा हुआ, बड़ा हुआ तो उसे वह मौका भी नहीं मिला था कि यदि चक्रव्यूह की लड़ाई लड़नी पड़े तो कैसे लड़ना चाहिए, लेकिन जब चक्रव्यूह भेदने का समय आया तो उसने अपने पिता से माता के पेट में रहते हुए जो ज्ञान सीखा था, वह सारा−का−सारा ज्ञान अनायास ही जाग्रत हो गया और अनायास ही वह काम करने लगा जो बड़े बड़े शूरवीरों को नहीं आता था। चक्रव्यूह के छह चक्र उसने भेद डाले। सातवाँ चक्र किसी तरीके से छल−कपट के आड़े आ गया तो बेचारा मारा भी गया, लेकिन अभिमन्यु का शिक्षण माता−पिता ने उस समय किया था, जब वह माता के पेट में था।

अनिवार्य है संयम

साथियों! माता को संयम और ब्रह्मचर्य के वातावरण में रखा जाना चाहिए, अगर बच्चे को कामुक नहीं बनाना है तब। कई माता−पिता भूल जाते हैं और यह समझते हैं कि कोई बालक तो है नहीं, हम अकेले हैं। अकेले समय में तरह−तरह के अश्लील क्रियाकलाप आपस में करते रहते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि लोग वे बातें, जो गर्भवती के साथ नहीं की जानी चाहिए, करने लगते हैं। छोटा बच्चा, जो पेट में बैठा हुआ है, उन सारी प्रक्रियाओं को, सारी संवेदनाओं को ग्रहण करता हुआ चला जाता है और जब पैदा होता हैं तो उसमें कामुकता के सारे संस्कार पाए जाते हैं। कई बार ऐसा देखा गया है कि बहुत छोटे बच्चे, जिनको ठीक तरह से बोलना भी नहीं आता और दुनिया की जानकारी भी नहीं है, उन्हें काम क्रिया की ओर अग्रसर होते पाया गया है। इसका कारण सिर्फ यही है कि वे सारे−के−सारे क्रियाकलाप उसने माँ−बाप के बीच होते हुए अश्लील व्यवहार के रूप में उस समय सीख लिए, जब वह पेट में था।

वस्तुतः जब बच्चा पेट में होता है तो परिवार का सारा वातावरण ही उसका शिक्षण करता है। स्कूल में अध्यापक और प्रोफेसर कितने ही होते हैं, कोई कुछ पढ़ाता है, कोई कुछ पढ़ाता है, लेकिन असली−वास्तविक प्रोफेसर वे लोग होते हैं जिनके संपर्क में गर्भवती को रहना पड़ता है। घर के लोग जिस स्वभाव के होते हैं, जिस तरह के होते हैं, जिस आचरण के होते हैं, वही वास्तव में बच्चे के प्रोफेसर हैं। अच्छे बालक का निर्माण करने के लिए भगवान राम ने यह आवश्यक समझा कि अपनी धर्मपत्नी सीता जी को वहाँ भेज दिया जाए, जहाँ संस्कारवान वातावरण हो। लव−कुश जब पेट में थे, तब महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में उन्होंने सीता जी को भेज दिया, जहाँ साधना का वातावरण था, तपश्चर्या का वातावरण था, जहाँ ज्ञान का वातावरण था, जहाँ भक्ति का वातावरण था। उस सुसंस्कारित वातावरण में रहकर न केवल सीता का दुःख और शोक समाप्त हो गया, वरन् जो पेट में रहने वाले बालक थे, उनका भी न जाने क्या−से−क्या हो गया।

बालकों का शिक्षण, बालकों का निर्माण वास्तव में ये सारी−की−सारी जिम्मेदारियाँ माता−पिता की हैं। जब तक बालक उत्पन्न नहीं हुआ है, उससे पहले पोषक आहार के रूप में वे चीजें माता को देनी चाहिए, जो सात्विक आहार के रूप में कही जा सकती हैं। माता के स्वास्थ्य की रक्षा करने का प्रयत्न उस समय करना चाहिए, जब वह गर्भवती है। भविष्य में बालक के स्वास्थ्य की गारंटी इस बात के ऊपर टिकी हुई है कि गर्भावस्था में माता ने क्या खाया? माता ने क्या पहना? किस वातावरण में रही और उसकी मनःस्थिति किस तरह की रही? इस तरह की व्यवस्था बनाना पिता का काम है।

जिम्मेदारी पिता की भी

मित्रो! बच्चे का निर्माण करना केवल माता का काम नहीं है, पिता की भी जिम्मेदारी है। परिस्थितियाँ माता किस तरह से बना सकती है? अगर घर में क्षोभ का वातावरण है तो उसका सुधार करना, उसकी व्यवस्था को बनाना पिता का काम है। अगर गर्भवती को उचित आहार प्राप्त नहीं होता है तो उसकी जिम्मेदारी उसके पिता की है। बेचारी गर्भवती स्त्री किस तरीके से क्या−क्या कर सकती है? घर के लोगों का स्वभाव अच्छा नहीं है, दूषित है, कलुषित है तो उस स्त्री को कहाँ रखा जाए या घरवालों को क्या कहा जाए? स्थिति को कैसे सुधारा जाए, यह सोचना गर्भवती का काम नहीं है, बल्कि उसके पिता का काम है। बच्चे का निर्माण यहाँ से प्रारंभ होता है। बच्चे के बारे में ये बातें हर किसी को समझनी चाहिए।

कहा जाता है कि पिंडदान देने वाला न हो तो पिता नरक को चला जाता है। कर्मकाँड में जहाँ तक पिंडदान का संबंध है, उसके बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकता, लेकिन जहाँ तक बालक के क्रियाकलाप और पिंड का संबंध है, जहाँ तक उसके शरीररूपी पिंड का संबंध है, जहाँ तक उसके मनरूपी पिंड का संबंध है। अगर बालक का पिंड अर्थात् शरीर, बालक का व्यक्ति त्व पिंड सही है, ठीक है, अच्छा है तो पिता को स्वर्ग में जाना ही पड़ेगा। क्यों? क्योंकि समाज की सेवा के लिए उसने अपना एक प्रतिनिधि प्रस्तुत किया। उसने एक ऐसा सुयोग्य प्रतिनिधि प्रस्तुत किया जो समाज की सेवा के लिए और दुनिया में श्रेष्ठ काम करने के लिए, दुनिया में शाँति पैदा करने के लिए अपना जीवन लगा सकने में समर्थ हुआ। क्या यह समाज की सेवा नहीं है? हाँ समाज की सेवा है, अगर अच्छा व्यक्ति अपने बालक के रूप में, अपनी संतान के रूप में अपना प्रतिनिधि बना करके समाज को दे। यह कार्य पिता का है, साथ में माता का भी।

इस तरीके से अगर किसी ने सुयोग्य संतान पैदा की है तो वह निस्संदेह स्वर्ग को जाएगा। उसने समाज की बड़ी सेवा की, एक श्रेष्ठ व्यक्ति समाज को दिया, लेकिन कोई व्यक्ति यदि काम−वासना से पीड़ित होकर और बच्चों का मोह एवं व्यामोह, जो कि आजकल समाज में फैला हुआ है, उसी तरीके से बिना सोचे−विचारे बच्चे पैदा करने लगा और उसको संस्कारवान नहीं बना सका। पत्नी जिस समय गर्भवती थी, उसके लिए सुयोग्य व्यवस्था नहीं बना सका। अपनी मनोभूमि को ठीक नहीं कर सका, परिवार का वातावरण श्रेष्ठ नहीं बना सका। बच्चे का विकास करने के लिए, उसके विनोद के लिए जिन परिस्थितियों और वातावरण की आवश्यकता थी, वह नहीं दे सका। फलस्वरूप यदि बालक निकम्मा और दुष्ट हो गया, नीच और कुमार्गगामी हो गया, समाज में अनाचार पैदा करने वाला हो गया तो उस अनाचार पैदा करने वाले बालक को जिसने जन्म दिया है, ऐसा बनाने का दोष जिसके ऊपर है, उसको नरक में जाना चाहिए, क्योंकि समाज में उसने एक ऐसी विकृति पैदा की है, जो अगर वह न करता तो शायद दुनिया में ज्यादा शाँति बनी रहती और सुव्यवस्था बनी रहती। इस मायने में बच्चे के द्वारा और संतान के द्वारा पिता नरक में जाता हो तो प्रकाराँतर से यह बात आलंकारिक रूप से सही मानी जा सकती है, क्योंकि उसके जिम्मेदार माता और पिता हैं।

दायित्व दोनों का बराबर

मित्रो! न केवल पिता के बारे में यह पिंडदान की बात कही जानी चाहिए, वरन् माता के बारे में भी कही जानी चाहिए। माता को भी स्वर्ग और नरक इसी रूप में मिलता है कि उसने किस तरह की संतान उत्पन्न की और वह समाज के लिए उपयोगी साबित हुई या अनुपयोगी। किसी की अनुपयोगी संतान है तो समझना चाहिए कि इसके कुपात्र माता−पिता अपने बच्चे के निर्माण करने की जिम्मेदारी से परिचित नहीं थे और जो उन्हें करना चाहिए था, वह नहीं कर सके। काम−वासना को पाप इस रूप में माना गया है कि यदि उसके परिणामस्वरूप कुयोग्य, बीमार और अयोग्य संतानें उत्पन्न हों और वे जमीन पर भार बनकर रहें तो काम−वासना वस्तुतः नरक में ले जाने वाली है। परिष्कृत कामबीज स्वर्ग में ले जाने वाला भी है, यदि उसके फलस्वरूप इस तरह की संतानें हों, जैसे कि महात्मा गाँधी थे, विनोबा भावे जैसे थे, विवेकानंद जैसे थे, शंकराचार्य जैसे थे। ऐसे समर्थ व्यक्ति को जिन माता−पिता ने जन्म दिया, उनकी प्रशंसा ही की जाएगी।

माता−पिता मात्र दो का ही उत्तरदायित्व बच्चों के निर्माण में नहीं है, वरन् उस कुटुँब का उत्तरदायित्व भी है। मान लीजिए माता−पिता भले आदमी हैं, सज्जन हैं, श्रेष्ठ हैं, लेकिन माता−पिता के बीच में बालक अकेला तो रहता नहीं है। ऐसा तो कभी−कभी होता है और कहीं−कहीं होता है कि माता−पिता और उनका बालक के अतिरिक्त कोई कुटुँब का व्यक्ति न हो।

चाचा−ताऊ, भाई−भतीजे, बाबा−दादी न जाने कौन−कौन घर में रहते हैं। अपने देश में संयुक्त परिवार की प्रणाली है और एक ही घर में, एक ही खानदान में, एक ही कुटुम्ब में एक ही मकान के भीतर अनेक व्यक्ति रहते हैं। अनेक व्यक्ति यों की छाप पड़ती है। मान लीजिए पिता बीड़ी−तंबाकू नहीं पीते और कोई बुरा काम नहीं करते, लेकिन उसी घर के दूसरे लोग गालियाँ बकते हैं, तंबाकू पीते हैं, माँस खाते हैं, लड़ाई−झगड़ा करते हैं, बुरे आचरण करते हैं तो गर्भ से निकलने के बाद केवल माता−पिता तक ही बालक सीमित नहीं रहेगा। गर्भ में जब तक है, तब तक तो यह बात कही जा सकती है कि उसके ऊपर बहुत सारा असर माता का होता है, थोड़ा असर पिता का रहता है।

धाय का दूध पिलाती है और जो नौकर बच्चों को खिलाते हैं, उनका प्रभाव बच्चे पर पड़ना ही चाहिए, क्योंकि बच्चा बहुत संवेदनशील होता है।

पाँच वर्ष के भीतर बच्चे की संवेदना इतनी तीव्र होती है कि जहाँ कहीं भी, जिसके भी संपर्क में आएगा, उससे कुछ−न−कुछ प्रभाव ग्रहण किए बिना नहीं रह सकता। जब वह बड़ी उम्र का हो जाता है और उसकी अक्ल विकसित हो जाती है, तब तो वह काँट−छाँट करने लगता है कि किसका प्रभाव ग्रहण किया जाए, किसका न किया जाए, किसकी उपेक्षा की जाए, किसको प्रेम किया जाए, किसकी ओर आकर्षित हुआ जाए और किसकी ओर न हुआ जाए। पाँच वर्ष के बाद तो उसकी बहुत−सी चीजें विकसित हो जाती हैं, लेकिन बहुत छोटा बालक इस बात को नहीं कर पाता और जो भी कोई वातावरण उसके आस पास होता है, उससे प्रभावित हो जाता है। अगर गोदी में खिलाने वाले लोग कुसंस्कारी हैं, दुष्ट स्वभाव के हैं, बुरी वृत्तियों के हैं, जो धाय उनके लिए दूध पिलाने के लिए रखी गई है अथवा कुटुँबी लोग जो उनको खिलाते−पिलाते रहते हैं, वे अगर बुरे स्वभाव के हैं तो बच्चे का अच्छा निर्माण नहीं हो सकता।

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए पहले भी कहा जा चुका है कि बच्चे पैदा करना बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि अगर हमने समाज को कुसंस्कारी बालक दिया है तो समाज की कुसेवा की है, बहुत बड़ी हानि की है। हमने अगर समाज के लिए एक अच्छी संतान और सुयोग्य संतान बना कर दी है तो समझना चाहिए कि भामाशाह ने राणा प्रताप को जैसे प्रचुर धन दिया था और समाज की बड़ी सेवा की थी, उसी तरीके से हम भी बड़ी सेवा कर रहे हैं।

बच्चों का निर्माण घर की पाठशाला में

मित्रो! बच्चों का निर्माण घर की पाठशाला में होता है। अतः घर को एक पाठशाला के तरीके से बनाया जाना चाहिए। बालक घर में जो क्रियाकलाप होते हुए देखेगा, उसी की छाप उस पर पड़ेगी। अगर घर में सफाई रखी जाती है तो बालक का स्वभाव छोटी उम्र से सफाई वाला हो जाएगा। घर के वातावरण में अगर गंदगी फैली हुई है तो बच्चा गंदा हो जाएगा। सही मायने में तो बात यह है कि बच्चा अपने पिता का पिता है और गुरु का गुरु है, क्योंकि उसको ठीक रखने के लिए लोगों को सतर्क रहना पड़ता है। जब कहीं घर में पुलिस आती है तो चोरी की चीजें अगर घर में रखी हैं तो हर आदमी उसे छिपा देता है। पुलिस आ गई और कहीं ऐसा न हो कि वह पकड़ में आ जाए, इसलिए उसे छिपा देते हैं। बच्चा एक तरह की पुलिस है। समझदार आदमी और जिम्मेदार आदमी अगर इस बात को अनुभव करते हैं कि यह हमसे कुछ सीखने वाला है तो कोई ऐसा क्रियाकलाप नहीं करते, जिसको बच्चा सीख जाए।

मित्रो! जब तक बच्चा बड़ा नहीं हो जाता, तब तक माता−पिता को अश्लील क्रियाएँ नहीं करनी चाहिए। उन्हें यह ख्याल नहीं करना चाहिए कि यह तो छोटा सा बालक है, यह बेचारा क्या समझेगा? इसे दुनियादारी का ज्ञान ही कहाँ है? हम हँसते खेलते रहें और गंदी बातें करते रहें तो इस पर क्या असर पड़ने वाला है? यह समझना माता पिता की बहुत भारी भूल है। वास्तव में छोटा बच्चा इतना अधिक जानकार होता है, जितना बड़ा आदमी नहीं होता। बड़ा आदमी सो जाता है तो बेखबर हो जाता है, लेकिन बच्चा जिस समय सोया रहता है, उसका अचेतन मन बहुत तीव्र गति से काम करता रहता है और माता पिता क्या करते हैं, उसको बहुत बारीकी से, गौर से देखता रहता है। न केवल देखता रहता है, वरन् सीखता भी है। न केवल सीखता रहता है, वरन् अपने भीतर के चरित्र का निर्माण भी करता रहता है। घर की पाठशाला में ही, वास्तव में बच्चों का निर्माण किया जा सकता है।

मित्रो! जब तक बच्चा बड़ा नहीं हो जाता, तब तक माता−पिता को अश्लील क्रियाएँ नहीं करनी चाहिए। उन्हें यह ख्याल नहीं करना चाहिए कि यह तो छोटा सा बालक है, यह बेचारा क्या समझेगा? इसे दुनियादारी का ज्ञान ही कहाँ है? हम हँसते खेलते रहें और गंदी बातें करते रहें तो इस पर क्या असर पड़ने वाला है? यह समझना माता पिता की बहुत भारी भूल है। वास्तव में छोटा बच्चा इतना अधिक जानकार होता है, जितना बड़ा आदमी नहीं होता। बड़ा आदमी सो जाता है तो बेखबर हो जाता है, लेकिन बच्चा जिस समय सोया रहता है, उसका अचेतन मन बहुत तीव्र गति से काम करता रहता है और माता पिता क्या करते हैं, उसको बहुत बारीकी से, गौर से देखता रहता है। न केवल देखता रहता है, वरन् सीखता भी है। न केवल सीखता रहता है, वरन् अपने भीतर के चरित्र का निर्माण भी करता रहता है। घर की पाठशाला में ही, वास्तव में बच्चों का निर्माण किया जा सकता है।


कोई चारा न था (kahani)

मंगोलियावासी चाँगशेन नामक न्यायाधीश अफसर के पास उनका एक मित्र पहुँचा और अशर्फियों की थैली भेंट करते हुए बोला, आप मेरा काम कर दें। इस लेन−देन की बात आपके और मेरे अतिरिक्त कोई नहीं जानेगा।

चाँगशेन कभी किसी से रिश्वत नहीं लेते थे। भले ही अपनी इस आदर्शवादिता के कारण उन्हें अभावग्रस्त जीवन जीना पड़ता था। उन्होंने अपने धनी मित्र को इस बात का उत्तर दिया, मित्र, ऐसा न कहो कि कोई नहीं देखता। कोई मनुष्य नहीं देखता तो क्या? सर्वव्यापी परमेश्वर तो सब कुछ देखता है, उसकी नजरों से मेरा यह अनैतिक कर्म कहाँ छिपा रहेगा। अनीति का उपार्जन महामानव को कभी स्वीकार्य नहीं होता।

धन लक्ष्मी वहीं विराजती हैं, जहाँ दुरुपयोग न होता हो, जहाँ सदैव पुरुषार्थ में निरत रहने वाले व्यक्ति बसते हों।

बलि अपने समय के धर्मात्मा राजा थे। उनके राज्य में सतयुग विराजता था।

सौभाग्य लक्ष्मी बहुत समय तो उस क्षेत्र में रहीं, पर पीछे अनमनी होकर किसी अन्य लोक को चली गइ। इंद्र को असमंजस हुआ और इस स्थान−परिवर्तन का कारण पूछ ही बैठे।

सौभाग्य लक्ष्मी ने कहा, मैं उद्योगलक्ष्मी से भिन्न हूँ। मात्र पराक्रमियों के यहाँ ही उसकी तरह नहीं रहती। मेरे निवास में चार आधार अपेक्षित होते हैं−(1) परिश्रम में रस, (2) दूरदर्शी निर्धारण, (3) धैर्य और साहस तथा (4) उदार सहकार।

बलि के राज्य में राज्य में जब तक ये चारों आधार बने रहे, तब तक वहाँ रहने में मुझे प्रसन्नता थी। पर अब, जब सुसंपन्नों द्वारा उन गुणों की उपेक्षा होने लगी तो मेरे लिए अन्यत्र चले जाने के अतिरिक्त और कोई चारा न था।

कर्म संन्यास योग नामक गीता के पाँचवें अध्याय की डडडड

गच्छन्ति अपुनरावृत्तिम्ः

भगवान श्रीकृष्ण का स्पष्ट कथन है कि ऐसे व्यक्ति जो भक्ति भाव से तद्रूप परमात्मामय हो जाते हैं, वे फिर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते, सीधे मोक्षत्व धारण करते हैं। परमात्मामय होने की भी चार अवस्थाएँ बताई गई हैं− तद्बुद्धयः, तदात्मानः, तन्निष्ठ, तत्परायण। उसी परमात्मसत्ता में बुद्धि, आत्मा, निष्ठा लगा, उसको जीवन का सर्वस्व बना लेना। ऐसे साधक आत्मज्ञान के द्वारा पापरहित (ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः) बन जाते हैं एवं इस संसार में पुनः बार−बार आगमन नहीं करते। यदि हम अपने अंदर इस प्रकार चार प्रकार के परिवर्तन ला सकें तो हम भी अपने आपको महान साधकों की कड़ी में खड़ा पा सकते हैं। ‘गच्छन्ति अपुनरावृत्तिम्’ वापस न लौटने की स्थिति, पुनर्जन्म न होना। परमात्मा में ही विलीन हो जाना, ध्रुव की तरह, मीरा एवं प्रह्लाद की तरह हर साधक का जीवनलक्ष्य होना चाहिए, किंतु उसके लिए स्वयं को परमात्मा में लीन करना होगा। समस्त वासनाओं को ज्ञानाग्नि से दग्ध कर वासनातीत अवस्था में जाना होगा। इस तरह का आत्मानुभव जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण अनुभूति है। यह रूपांतर प्रकृति का चरम विकास और दिव्य जन्म की परम सिद्धि है। भगवद् इच्छा की ही एक इच्छा बनकर वैसा जीवन जीकर ऐसा साधक प्रकृति की क्रियाओं को दिव्यकर्म में रूपांतरित कर पाने में समर्थ हो जाता है।

इस तरह का आत्मानुभव एक बार कर लेने पर मनुष्य का संपूर्ण जीवन−दृष्टिकोण बदल जाता है। इसी आशय पर केंद्रित है अठारहवाँ श्लोक−

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥ −5/18

विद्या−विनय से युक्त सत्वगुण संपन्न ब्राह्मण में, गौ में, हाथी में तथा कुत्ते और चाँडाल में आत्मतत्त्वज्ञ व्यक्ति समदर्शी होते हैं।

ज्ञानीजनों की विद्या और विनयसंपन्न ब्राह्मण में, गाय, हाथी, कुत्ते और चाँडाल में समदृष्टि होती है। सबके भीतर एक ही आत्मा क्रीड़ा−कल्लोल कर रहा है, यह अनुभूति कितनी दिव्य−विलक्षण है, यह इस श्लोक से हमें ज्ञात होती है। ऐसी अनुभूति करने वाले ही आत्मज्ञानी, 52 ऋषि और संत सही अर्थों में पंडित होते हैं। यह मर्म है पूरे श्लोक का।

आद्य शंकराचार्य को मिली दृष्टि

आद्य शंकराचार्य काशी में गंगास्नान कर बाहर निकल रहे थे। देखा सामने चाँडाल खड़ा है। उनने कहा, ऐ चाँडाल, परे हट। मुझे निकल जाने दे। चाँडाल ने पूछा, यदि मैं छू लूँगा तो क्या हो जाएगा? उनने कहा कि फिर से नहाना पड़ेगा, क्योंकि तू चाँडाल (श्वपाक) है। चाँडाल बोला कि किसे छुएँगे? चमड़ी को, चमड़े से बने शरीर को या आत्मा को। इतना सुनते ही शंकराचार्य को ज्ञान हो गया, आत्मबोध हो गया। उनके सामने चाँडाल के स्थान पर स्वयं साक्षात काशी विश्वनाथ खड़े थे। वे बोले, तू ज्ञानी होकर भी शरीर को देखता है, जो चमड़े से बना है। आत्मा का स्पर्श तो आत्मा ही कर सकता है और वह तो सतत निष्पाप है। इस र्स्पशभेद के आधार पर स्वयं को संन्यासी कहता है। आद्य शंकराचार्य ने त्रुटि समझी। क्षमा माँगी और स्वयं में समदर्शी भाव पैदा किया। जिस दिन यह भाव पैदा हो जाता है, उस समय छोटे−बड़े में, जातिस्वरुप किसी भी रूप में ॐ चा नीचा होने पर भी हर व्यक्ति एकसमान दिखाई पड़ता है। सही अर्थों में समदर्शी ज्ञानी एक दिव्यकर्मी शंकराचार्य के अंदर इसके बाद जाग्रत हो गया, जब उनने इस भेद का मर्म जान लिया।

समदर्शी है नाम तिहारो

स्वामी विवेकानंद खेतड़ी के महाराजा अजीतासिंह के यहाँ सत्संग में भाग ले रहे थे। देखा, तुरंत नर्तकी वहाँ आ गई है। राजा बोले, अब आपके सामने भक्ति −संगीत ये प्रस्तुत करेंगी, तुरंत विवेकानंद बाहर निकलकर अपने कक्ष में चले गए। नर्तकी परेशान हो गई। मैंने ऐसा कौन−सा काम किया कि संन्यासी मुझे देख बाहर चले गए। उसने राजा से पूछा कि उससे क्या त्रुटि हो गई? महाराज बोले कि वे तुम्हें देखकर चले गए। तुम्हारा नृत्य समाप्त होने व तुम्हारे यहाँ से जाने के बाद वे पुनः आएँगे। तब उस नर्तकी ने दूसरा गीत गाया, “प्रभु, मोरे अवगुन चित न धरौ, समदर्शी है नाम तिहारौ।” हे प्रभु, मेरे अवगुणों को भुला दें, मन में न रखें। आप तो समदर्शी हैं, सब आपके लिए समान हैं तो फिर यह भेद क्यों? मुझे देखकर आप उठ क्यों गए? मेरी आत्मा को क्यों नहीं देखा? उस गीत को सुनते सुनते विवेकानंद लौटकर चले आए और प्रवेश करते ही बोले कि माँ, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ। मुझसे दृष्टिभेद हो गया था, बहुत बड़ी गलती हो गई थी। मुझे क्षमा करें। आम लोगों की तरह मैं आपको भी वही वेश्या−नर्तकी−पददलित स्त्री मान बैठा, जबकि आपके अंदर एक दिव्य आत्मा है, उसे मैं न देख पाया। यह भेदबुद्धि मुझमें कहाँ से आ गई! इतना कहकर वे नर्तकी के चरणों में गिर पड़े।

महापुरुष ‘पंडिताः समदर्शिनः’ ऐसे ही बनते हैं। यों ही जमाना उन्हें नमन नहीं करता, सब उनकी समदृष्टि को सराहते हैं। सब उनके अंदर के उस ज्ञान को सर्वोपरि मानते हैं। जो उनका परमात्मा से एकत्व भाव स्थापित कर देता है। जिस दिन आदमी चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, अपने अंदर भेदबुद्धि पैदा कर लेता है—यह अछूत है, यह छोटी जाति का है, यह पापी है, यह जीव−जगत का एक प्राणिमात्र है, उस दिन उसके अंदर का ज्ञानी नष्ट हो जाता है। समदर्शिता के भाव को पैदा करना, सभी जीवों में उस परमचेतना को संव्याप्त मानना (सर्वभूतात्म भूतात्मा−श्लोक−7, अध्याय 5) सच्चे साधक का परम कर्त्तव्य है। स्वामी विवेकानंद ऐसा कर सके, क्योंकि वे संन्यासी के अतिरिक्त कर्म−संन्यास के सच्चे साधक थे। स्वयं का आत्मविश्लेषण साहसपूर्वक कर सकते थे। तभी तो एक नर्तकी से उनने पैर छूकर क्षमा माँग ली। हम भी इस श्लोक से एक शिक्षण लें, स्वयं को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया सीखें।

दिव्यकर्मी बनने की अभीप्सा

भगवान इसी कारण अर्जुन के समक्ष ‘परफेक्शन’ (पूर्णत्व) का एक आदर्श रख रहे हैं। सारी परिस्थितियाँ हमारे सामने रख रहे हैं, हमारे अंदर प्रबल अभीप्सा एक दिव्यकर्मी बनने की पैदा कर रहे हैं। जिस प्रकार द्वितीय अध्याय में उनने अर्जुन को स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताए थे, उसी तरह यहाँ वे दिव्यकर्मी के लक्षण अर्जुनसहित हम सबको बता रहे हैं। दिव्यकर्मी बनने की अभीप्सा पैदा होगी तो विघ्न स्वतः हटते चले जाएँगे।

अठारहवें श्लोक में कही गई बात की ही पुष्टि अगले उन्नीसवें श्लोक में है−

इहैव तैर्जितः सर्गो येषाँ साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥−5/19

जिन लोगों का (येषाँ) मन (मनः) समब्रह्म में (साम्ये) निश्चल रूप से प्रतिष्ठित है (स्थितं), इस लोक में शरीर में रहते हुए ही (इह एव) उनके द्वारा (तैः) यह दृश्य संसार (सर्गः) विजित है (जितः), क्योंकि (हि) ब्रह्म सभी में समान रूप से (ब्रह्म समं) गुणदोषरहित (निर्दोषं) है। इसी कारण (तस्मात्) समदर्शी 53 लोग (ते) ब्रह्म में ही (ब्रह्मणि) ब्रह्मभाव से प्रतिष्ठित हैं (स्थितः)।

यह शब्दार्थ हुआ। यह एक प्रकार से ब्रह्मज्ञान की फलश्रुति बताई गई है। इस पूरे श्लोक का अब भाव समझें, जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही संपूर्ण संसार जीत लिया गया है, क्योंकि सच्चिदानंदघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इसी कारण वे परमात्मा में ही ब्रह्मभाव से स्थित हैं।

ब्रह्मज्ञान−प्राप्ति के बाद दिव्यकर्मी के लक्षण क्या होंगे, वे योगेश्वर बता रहे हैं। समभाव में स्थित होने के कारण दिव्यकर्मी यह सारा दृश्य संसार जीत लेते हैं। वे उसके राजा होते हैं। निर्दोष समरूप ब्रह्म में वे सदा प्रतिष्ठित रहते हैं। जो ब्रह्म की अपरोक्षानुभूतिरुपी ज्ञान में प्रतिष्ठित हुए हैं, वे जीवन−मुक्त बन जाते हैं। फिर उन्हें पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता।

समत्व का दिव्य संगीत

कितना विलक्षण−सुँदर विवेचन है—आत्मिक प्रगति की यात्रा का। साम्य बुद्धि वाले ब्रह्म में स्थित दिव्यकर्मी बनना हम सबका जीवनलक्ष्य होना चाहिए। साम्य बुद्धि वाला व्यक्ति ही समत्व का दिव्य संगीत सुन पाता है। चाहे मनुष्य रूप में श्रेष्ठ ब्राह्मण हो अथवा बुद्धिमान पशु (गौ एवं हाथी), जड़बुद्धि मनुष्य (श्वपाक, चाँडाल) अथवा कुत्ते जैसा पशु, ज्ञानी इस सबमें एक जैसे ब्रह्म की ही सतत अनुभूति करता है। समदर्शी बन पाना एक दैवी विभूति प्राप्त करने के समान है। देवसंस्कृति हमें यही तो सिखाती है। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के जीवनभर किए गए ज्ञान−पुरुषार्थ का निचोड़ यही है कि हम समत्व दृष्टि विकसित करें। स्वयं उनने अपने जीवन में मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत् (वासना एवं तृष्णा के समापन) के बाद आत्मवत् सर्वभूतेषु क ी साधना की थी। यह आत्मवत् सर्वभूतेषु ही समत्व दृष्टि है। इसके बिना तो सभ्य जीवन संभव नहीं है। सुसंस्कृत देवोपम जीवन जीनार हो तो यही समत्व का दृष्टिकोण जीवन में उतारना होगा, ऐसा परमपूज्य गुरुदेव का भी मत है।

आज सारे समाज में अहं की टकराहट है। साँप्रदायिक सद्भाव खतरे में है, पूरी राजनीति जातिवाद पर टिकी है, राष्ट्रीय स्तर पर व सीमा पर आतंकवाद तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्धोन्माद फैला पड़ा है। यह समदृष्टि के अभाव की ही फलश्रुति है। जाति−वर्ण के नाम पर पारस्परिक विद्वेष एवं झगड़े, परिवार संस्था में टूटन, पति−पत्नी में, पिता−पुत्र में पारस्परिक भेद, मन−मुटाव व विक्षुब्धता चारों ओर संव्याप्त तनाव भी भेद−दर्शन का ही परिणाम है। यदि हम चारों ओर समत्व संव्याप्त देखें तो यह सारी समस्याएँ स्वतः ही मिटती चली जाएँ। अच्छा हो हम सामने वाले में अपने ही एक अथवा दूसरे पहलू का दर्शन करें, उसे मित्र मानें, उसकी कुटिलताओं के बावजूद उसकी आत्मा से प्रेम करें तो उसके वे भाव भी स्वतः सताप्त होते चले जाएँगे। इसीलिए भगवान कहते हैं कि सही अर्थों में पंडित वे ही होते हैं जो ज्ञान−पढ़ाई−शिक्षा की दृष्टि से नहीं, आध्यात्मिक दृष्टि से समदृष्टि संयुक्त हों, सर्वत्र एक ही आत्मा का अनुभव करते हों, आत्मज्ञानी हों, विराट जिनका हृदय हो।

धरती के सम्राट समदर्शी

ऐसे समदर्शी व्यक्ति इस धरती के सम्राट कहलाते हैं, वे ब्रह्मभाव से परमात्मा में स्थित होते हैं। इसी कारण वे भवबंधनों से मुक्त हो जाते हैं। अगला बीसवाँ श्लोक इस सत्य को आगे बढ़ाकर दिव्यकर्मी की विशेषताओं की परिधि और बड़ी कर देता है−

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्माणि स्थितः॥ 5/20

ब्रह्म में अवस्थित (ब्रह्माणि स्थितः), निश्चल स्थिर बुद्धि वाले (स्थिर बुद्धिः), संशयरहित दृष्टिकोण वाले (असम्मूढः), ब्रह्मज्ञ व्यक्ति (ब्रह्मविद), प्रिय वस्तु मिलने पर भी (प्रियं प्राप्य) हर्षित नहीं होते (न प्रहृष्येत्) और अप्रिय वस्तु मिलने पर (अप्रियं च प्राप्य) दुखी भी नहीं होते (न उदविजेत्)।

जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रिय को प्राप्त कर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित है।

समान पूर्व के श्लोक की ही तरह ‘ब्रह्मणि स्थितः’ में ही है। यह सारी विशेषताएँ दिव्यकर्मी की हैं, जो उसे देवमानवों की श्रेष्ठतम स्थिति में ला खड़ा करती हैं। इस श्लोक में ठीक स्थितप्रज्ञों की तरह दिव्यकर्मी का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण बताया गया है कि वह परमात्मा में स्थित होने के कारण तथा बिना किसी संशय की स्थिति में होने के कारण प्रिय वस्तु से न तो प्रसन्न ही होता है एवं न अप्रिय वस्तु या स्थिति को प्राप्त होकर दुखी होता है। एकीभाव से, समभाव से सभी परिस्थितियों में बना रहता है।

सतंप्त अर्जुन को दिशा−निर्देश

यहाँ सीधी चोट अर्जुन के विक्षुब्ध मन पर की गई है, जो युद्ध में लड़ने के नाम पर संतप्त है, क्षुब्ध है। एक बीमार मनःस्थिति वाला अर्जुन (श्रीकृष्ण की दृष्टि में) मनःचिकित्सा के योग्य है। अतः गीता के रचयिता काव्य सृजेता महाकवि श्री व्यास इस श्लोक द्वारा श्रीकृष्ण के श्रीमुख से वह कहलवाते हैं, जो इस समय के लिए सटीक है। यहाँ आत्मज्ञानी का चित्रण चल रहा है, पर साथ−ही−साथ उसके समत्वभाव एवं कभी भी उद्विग्न न होने की विशेषताएँ भी बताई गई हैं। अर्जुन की दुर्बलता का श्रीकृष्ण को ज्ञान है। अतः यह चोट ठीक निशाने पर लगती है। वे उसे बताते हैं कि उनके इस प्रिय शिष्य को आत्मज्ञानी होना चाहिए। समत्व बुद्धि वाला तथा उसकी सबसे बड़ी विशेषता होनी चाहिए कि दुःख−सुख की पराकाष्ठा में भी वह तनिक भी विचलित न हो।

सामान्यतः होता यह है कि हम अपने आस−पास के अनुकूल और प्रतिफल घटनाओं के कारण जन्मी अपनी प्रतिक्रियाओं से दुखी व सुखी होते रहते हैं। जो हमें हमारे स्वभाव और रुचि के अनुकूल हो, वह बात या वस्तु या घटना हमें प्रसन्नता देती है, परंतु जब हम अपनी रुचियों के विरुद्ध परिस्थितियाँ घटती देखते हैं तो हमारे लिए वे दुःख का मूल बन जाती हैं। इसीलिए भगवान कहते हैं कि हमें आत्मज्ञानी ‘ब्रह्मणि स्थितः’ बनना चाहिए। ऐसा महापुरुष अपनी वासनाओं का क्षय कर चुका होता है। वह प्रतिकियारहित जीवन जीता है। उस पर घटनाक्रमों के उतार चढ़ाव का कोई प्रभाव नहीं होता।

प्रतिक्रियाओं में खपता है जीवन

योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार सिद्धपुरुष, श्रेष्ठ दिव्यकर्मी ही मात्र कर्म करता है। शेष हम सभी साधारण मानव तो जीवनभर प्रतिक्रियाएँ करते हैं, इसी में सारा जीवन खपा देते हैं। कर्म करने का, श्रेष्ठ गुणों के संपादन का हमें अवसर ही कहाँ मिल पाता है! हमारा जीवन ज्ञानी के समान प्रतिक्रियारहित होना चाहिए। किसी को लग सकता है कि यह जीवन भी कोई जीवन है, जिसमें न दुःख है, न सुख है, न किसी भाव की अनुभूति है, कोई उतार−चढ़ाव नहीं। किसी को भी नीरसता से भरा जीवन लग सकता है। किसी को भी यह जीवित−मृत्यु की तरह जीवन लग सकता है। क्या प्रतिक्रियारहित जीवन ही है? कहीं यह पूर्ण जड़ता को जन्म तो नहीं देगा। ऐसा दिव्यकर्मी बनने से क्या लाभ, जहाँ सुख की अनुभूति भी न हो। इन सब शंकाओं का, जो अर्जुन के मन में उठ सकती हैं, श्रीकृष्ण अगले श्लोक में उत्तर देते हैं, जब वे उसे अक्षय आनंद की प्राप्ति, जो बहिरंग सुख से, परिस्थितिजन्य सुखों से भी बढ़कर बताते हैं। इसीलिए वह इक्कीसवें श्लोक में कह उठते हैं कि जिसका मन बाह्य विषयों में अनासक्त है, वह आत्मस्थित आनंद को प्राप्त करता है तथा जिसका मन ब्रह्म के साथ पूरी तरह तद्रूप हो गया है, वह अक्षय आनंद की प्राप्ति करता है, सदैव उसी में मग्न−प्रसन्न रहता है। इस श्लोक व इसके विस्तार की चर्चा अगले अंक में। (क्रमशः)


स्वयंसेवक के रूप में विकसित (kahani)

गाँधी जी के आश्रम में सफाई और व्यवस्था के कार्य हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से करने पड़ते थे। एक समाज को समर्पित श्रद्धावान बालक उनके आश्रम में आकर रहा। स्वच्छता−व्यवस्था के काम उसे भी दिए गए। उन्हें वह निष्ठापूर्वक करता भी रहा। जो बतलाया गया, उसे जीवन का अंग बना लिया।

जब आश्रम निवास की अवधि पूरी हुई तो गाँधी जी से भेंट की और कहा, “बापू, मैं महात्मा बनने के गुण सीखने आया था, पर यहाँ तो सफाई व्यवस्था के सामान्य कार्य ही करने को मिले। महात्मा बनने के सूत्र न तो बतलाए गए, न उनका अभयास कराया गया।”

बापू ने सिरे पर हाथ फेरा, समझाया, कहा, “बेटे, तुम्हें यहाँ जो संस्कार मिले हैं, वे सब महात्मा बनने के सोपान हैं। जिस तन्मयता से सफाई तथा छोटी−छोटी बातों में व्यवस्था−बुद्धि का विकास कराया गया, वही बुद्धि मनुष्य को महामानव बनाती है।”

गाँधी जी ने इसी प्रकार छोटे−छोटे सद्गुणों के माहात्म्य समझाते हुए अनेकों लोकसेवियों के जीवनक्रम को ढाला, उन्हें सच्चे निरहंकारी स्वयंसेवक के रूप में विकसित किया।


55 चेतना की शिखर यात्रा−15 - बलिहारी गुरु आपुनो−3

ऐतिहासिक वसंत (18−1−1926) के ब्राह्ममुहूर्त में कबीर, समर्थ गुरु रामदास एवं फिर रामकृष्ण परमहंस का वृत्ताँत दृश्यरुप में श्रीराम को उनकी अदृश्य सूक्ष्मधारी सत्ता द्वारा दिखाया गया। उसी क्रम में रामकृष्ण परमहंस के जीवन से जुड़ी कुछ घटनाएँ।

विभिन्न साधना−परंपराओं का अभ्यास और उनके शिखर तक पहुँचना रामकृष्णदेव का अनूठा प्रयोग था। राम की उपासना शुरू की तो हनुमान की तरह व्यवहार करने लगे। राम−रघुवीर कहते हुए वे वृक्षों पर चढ़ जाते, फल तोड़ते, दाँत से काटते और चखकर फेंक देते। प्राणिमात्र में और कण−कण में राम के दर्शन की अवस्था में पहुँच जाने के बाद साधना को विराम दिया। एक बार सखीभाव से श्रीकृष्ण की आराधना करने लगे। इस भाव से साधना करने वाले साधक अपने आपको श्रीकृष्ण की सहेलियाँ, गोपियाँ मानते हैं और स्त्रियों की तरह ही रहते हैं। रामकृष्ण भी उसी तरह साधना करने लगे। सखीरुप धारण करने के लिए उन्होंने केश रखवाए। वेणी गूँथने लगे। नाक में बेसर, आँखों में अंजन, माथे पर सिंदूर, बिंदी और होठों पर लाली लगाने लगे। साधना की प्रगाढ़ अवस्था में वे पुकारने लगते, कहाँ है ललिता, कहाँ है विशाखा? मुझ पर दया करो। मैं अति दीन−हीन हूँ। तुम्हारी दया के बिना मैं राधिका जी का दर्शन नहीं कर सकूँगी और राधिका जी के बिना श्रीकृष्ण तक नहीं पहुँच पाऊंगी।

सखी संप्रदाय की साधना करते हुए रामकृष्णदेव के शरीर में स्त्रियोचित परिवर्तन होने लगे थे। उनकी आवाज मधुर और कोमल होने लगी। आवाज सुनकर उन्हें कोई भी पहचान नहीं सकता था। कुछ दिन बाद उनकी चाल भी बदल गई। वक्ष पर स्त्री जैसे उभार दिखाई देने लगे और पाँव किसी तन्वंगी नारी की तरह सँभल−सँभलकर उठते थे। साधना की यह स्थिति प्रमाण है कि तन्मय होकर आराधना करने पर व्यक्ति त्व में आमूलचूल परिवर्तन आने लगता है। यहाँ तक कि शरीर भी उसी के अनुसार ढलने और बदलने लगता है। सखीभाव की साधना को विराम देने के महीनों बाद ठाकुर सहज स्थिति में पहुँचे।

भक्ति मार्ग के बाद वेदाँत की साधना शुरू की। उस क्षेत्र में ‘सोऽहम्’ और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ रूप की सिद्धि तक पहुँचे। ताँत्रिक, बंगला, बाउल, वैष्णव और शाक्त आदि संप्रदायों का मार्ग भी अपनाया। विभिन्न संप्रदयों, पंथों की साधना के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि स्वरूप से मार्ग भले ही अलग हों, तात्त्विक दृष्टि से किसी में कोई अंतर नहीं है। खालास पंथ की दीक्षा लेकर उसका मर्म समझा। एक दिन विचार आया कि हिंदू−मूसलमान में क्या भेद है, यह भी मालूम किया जाए। अपनी इष्ट−आराध्य भवानी से अनुमति माँगी, माँ ने अनुमति दे दी। टमटमा गाँव में एक सूफी साधक रहता था, उससे दीक्षा ली और साधना की विधि सीखी। तीन दिन साधना के बाद ही भाव बदल गए। उनके अंतः करण से हिंदू का भाव विलुप्त हो गया। उन्होंने मंदिर में जाना बंद कर काली का प्रसाद नहीं खाया। साधना के दिनों में किसी ने कहा कि इस्लाम के अनुसार जो काफिरों का वध करेगा, वही स्वर्ग में सुख से रहेगा। तुम भी क्या काफिरों का वध करोगे? रामकृष्ण परमहंस ने कहा, “काफिर बाहर नहीं रहते, वे हमारे भीतर ही हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि ही हमारे भीतर रहने वाले विजातीय तत्त्व हैं। उनका विनाश करने से ही अल्लाह की मेहरबानी होती है। विद्या और शक्ति ही मनुष्य को सुख देती है। उसके सिवा कोई सुँदरी या अप्सरा नहीं है, जो मनुष्य को निरंतर अगाध सुख देती हों।”

ईसाई धर्म की साधना−उपासना का मार्ग भी अपनाया। सब धर्मों और साधना−परंपराओं का मर्म जान−समझ लेने के बाद वे अपने स्वभाव में स्थिर हो गए। मुक्त और सिद्ध आत्माओं को वैसे अपना कोई स्वतंत्र स्वभाव नहीं होता। वे परमात्मचेतना से इस तरह ओत−प्रोत हो जाते हैं कि उनकी अपनी स्वतंत्र सत्ता कहीं दिखाई ही नहीं देती। जिस स्थिति और स्तर का साधक आता है, उसी के अनुरूप वे दिखाई देने लगते हैं। दर्पण की तरह, स्फटिक से बने विग्रह की भाँति हो जाते हैं, जो सामने उपस्थित दृश्य या वर्ण को ही अपने स्वरूप में प्रतिबिंबित करने लगता है।

तोतापुरी से सीखी साधना

रामकृष्णदेव तब विविध साधना धाराओं को ही परख रहे थे। पूजा की कोठरी में बैठे श्रीराम को ये दृश्य जीवंत घटनाओं की तरह दिखाई देते हैं। दक्षिणेश्वर मंदिर में भिन्न−

56 भिन्न संप्रदायों के साधक, संन्यासी, फ कीर, पादरी आदि आ रहे हैं। किसी दिन सात सौ नागा साधुओं के प्रमुख तोतापुरी नामक संन्यासी आते हैं। चारों ओर उनकी बड़ी ख्याति है। पौष महीने में गंगासागर से स्नान कर लौटते हुए वे दक्षिणेश्वर में ठहरते हैं और रामकृष्णदेव को देखकर पूछते हैं, “तुम कुछ साधना करोगे?”

“माँ कहेगी तो जरूर करेंगे।” रामकृष्ण ने बालसुलभ सरलता से कहा। तोतापुरी ने समझा कि वे अपनी जननी माता की अनुमति चाहते हैं, शायद। कह दिया, जाओ पूछ आओ। रामकृष्ण काली के सामने बैठकर पूछने लगे तो उधर से उत्तर आया, कर लो। फिर पूछा, “कौन सिखाएगा साधना?”

माँ ने उत्तर दिया, “जो तुझे वेदाँत सिखाने आया है, वही साधना भी सिखाएगा।” स्वामी रामकृष्ण ने महंत तोतापुरी से सारा संवाद ज्यों−का त्यों कह सुनाया। वे हँसे, फिर कहा, “हमसे उपदेश ग्रहण करना है तो संन्यासी बनना पड़ेगा।”

रामकृष्ण उसी सहजता से पूछते हैं, “संन्यासी होने के लिए क्या करना पड़ेगा।” कोठरी में अपनी मार्गदर्शक सत्ता के दिव्य सान्निध्य में बैठे श्रीराम अनुभव कर रहे थे, जैसे रामकृष्ण के रूप में वे स्वयं ही यह संवाद कर रहे हों। तोतापुरी जी संन्यास के बारे में समझाते हैं, उसके लिए श्राद्ध, होम, तर्पण आदि करना पड़ेगा। भगवा वस्त्र पहनना होगा और निरंतर विचरण करते रहना पड़ेगा। रामकृष्ण ने कहा, “सब स्वीकार है, लेकिन भगवा पहने बिना संन्यासी हुआ जाए, ऐसा कुछ कीजिए। मैं यह स्थान छोड़कर अन्यत्र नहीं जा सकता। मेरी माँ जीवित है। अब उनका और कोई पुत्र नहीं, इसलिए उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता।”

तोतापुरी ने स्वीकार कर लिया। संन्यास की तैयारी होने लगी। शिखा−सूत्र, कं ठी, माला आदि चिह्नों का विसर्जन हो गया। चिता−आरोहण और श्राद्ध−तर्पण की क्रियाएँ भी संपन्न कर ली गइ, सर्वस्व त्याग का व्रत ग्रहण कर लिया। दीक्षा के बाद तोतापुरी अपने शिष्य को उपदेश देते हैं और समाधि में ले जाने का प्रयत्न करते हैं। स्फटिक की माला से एक मनका अलग निकाला और रामकृष्णदेव को पद्मासन लगा लिया। तोतापुरी ने रामकृष्ण की आँखों के बीच भौंहों के मध्य स्फटिक का स्पर्श किया। उसे कु छ जोर से दबाया, थोड़ा सा दबाव पड़ना था कि रामकृष्णदेव की समाधि लग गई। वे अचेत से हो गए। नाड़ी की गति और हृदय क ी धड़कन यथावत चल रही थी, लेकिन उन्हें कोई बोध नहीं था।

यह अवस्था देखकर तोतापुरी थोड़े डरे। उन्हें लगा कि रामकृष्ण कहीं शरीर न छोड़ दें। बड़ी सावधानी से उन्होंने साधक की देखभाल की। एक दिन बीत गया, दूसरे दिन की शाम भी ढल गई और तीसरे दिन की सुबह हुई, तब भी रामकृष्ण की स्थिति में कोई अंतर नहीं आया। उन्होंने अपने प्रमुख शिष्यों से कहा, तीन दिन तक यदि साधक अपनी सहज अवस्था में नहीं आता तो कठिन हो जाता है। शरीर उस आत्मचेतना को वापस धारण करने योग्य नहीं रह जाता।

बहुत आगे हो ठाकुर

“लेकिन गुरुदेव, रामकृष्ण के शरीर में तो कोई विकार नहीं है।” तोतापुरी के उन्हीं शिष्य ने कहा, “श्वास−प्रश्वास उसी तरह चल रे हैं। नाड़ी की गति भी ठीक है। शरीर में कोई विकार नहीं दिखाई देता। “ तोतापुरी को चिंता नहीं थी, लेकिन वे विस्मय−विमुग्ध थे। कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करें? सिद्ध गुरु अपने शिष्यों को समाधि से वापस लाने के जो भी उपाय कर सकते, कर लिए। कोई अंतर नहीं आया। थक−हारकर वे शाँत बैठ गए। यकायक उन्हें कुछ सूझा और अपना मुँह ठाकुर के कान तक ले गए और कहा, “वह आ गया है रे, जिसकी तुम्हें प्रतीक्षा है। “

सुनना था कि रामकृष्ण इस तरह उठकर बैठ गए जैसे किसी ने झकझोर दिया हो। वे आतुर−व्याकुल हो उठे और पूछने लगे, “कहाँ है वह? कहाँ है? “ तोतापुरी ने कहा, “पहुँच ही रहा होगा। “ इसके बाद वे बोले, “तुम तो मुझसे बहुत आगे हो ठाकुर। तुम महापुरुष हो। चालीस वर्ष तक कठोर साधना करके भी मैं जो स्थिति प्राप्त नहीं कर सका, एक ही दिन में तुमने उसे उपलब्ध कर लिया। तुम धन्य हो।” तोतापुरी वेदाँती थे। वे मूर्तिपूजा को नहीं मानते थे। अपने शिष्य की सिद्ध अवस्था से चमत्कृत होकर उन्होंने दक्षिणेश्वर मंदिर में स्थित माँ काली की प्रतिमा को प्रणाम किया।

जो संदेश देकर तोतापुरी ने रामकृष्ण को समाधि से जगाया था, वह नरेंद्र के बारे में था। ‘नरेंद्रनाथ दत्त’ जो बाद में स्वामी विवेकानंद हुए। जिस दिन वे संसर्ग में आए, उसी दिन रामकृष्ण ने उन्हें सीने से लगा लिया था। फूट−फूटकर रोए थे, जैसे वर्षों से गुम हुई संतान को पाकर माता पिता विह्वल हो उठते हैं। नरेंद्रनाथ तब रोजगार की तलाश में था। मुमुक्षा का आवेग अपने चरम पर था। वह क्षुधा से भी ज्यादा प्रचंड हो उठता था। तृप्ति के लिए वे साधु−संतों के यहाँ भटकते रहते। रामकृष्ण के यहाँ पहुँचे और गुरु ने उन्हें देखते ही अंक में भर लिया तो लगा कि खोज पूरी हुई।

क्या ईश्वर को देखा है

नरेंद्र ने पूछा, “आपने ईश्वर को देखा है क्या?” जिस वेग से सवाल आया था, उससे भी प्रचंड वेग से उत्तर मिला, “तुम देखना चाहते हो क्या?” नरेंद्र ने अब तक कितने ही संन्यासियों और योगियों से यही प्रश्न पूछा था। इतने विश्वास और वेग के साथ किसी ने जवाब नहीं दिया। कोई कहता, “हाँ देखा है, लेकिन उस हाँ में विश्वास का बल नहीं होता था।” कोई कहता, अगर कहें कि देखा है तो यह अपनी स्थिति का ढिंढोरा पीटना हुआ। यदि मना करते हैं तो उत्तर गलत हो जाएगा। इसलिए कुछ नहीं कहना ही ठीक है। तुम अपनी जिज्ञासा बताओ, हम समाधान देने का प्रयास करेंगे।

कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर से भी उन्होंने यही प्रश्न पूछा था। महर्षि देवेंद्रनाथ नदी की धारा में बजरे पर विश्राम कर रहे थे। नरेंद्रनाथ धम्म से नदी में कूदे और तैरकर बजरे पर आ गए। आते ही उन्होंने महर्षि से ईश्वर के बारे में पूछा। नरेंद्रनाथर के प्रश्न से वे हड़बड़ा गए थे। उन्हें लगा था जैसे कोई काँलर पकड़कर पूछ रहा हो। नरेंद्र ने अपनी उत्कंठा को पूरी तरह व्यक्त करते हुए ही पूछा था। उसमें डराने जैसा कोई ढंग नहीं था, लेकिन उनकी उत्कंठा ने ही योगी को अचकचा दिया था। वह कहने लगे, “पहले बैठो तो सही। शाँत होकर बैठो। मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देता हूँ।” इस व्यवहार ने नरेंद्रनाथ को आभास करा दिया कि प्रश्न का उत्तर वहाँ नहीं है। वे यह कहकर वापस चले आए कि अब आपको कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। मुझे उत्तर मिल गया है।

सिद्ध योगियों के व्यवहार और रुख से ही अपने प्रश्न का भविष्य समझ लेने वाले नरेंद्रनाथ की यात्रा रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में पहुँचकर पूरी हुई। उन्होंने नरेंद्र से कहा, “जो माँगना है, अपनी माँ से ही माँग लेना। मुझसे कुछ मत कहना।” रामकृष्ण ने जब यह बात कही थी, तब नरेंद्र के मन में अपने परिवार के निर्वाह की चिंता घुमड़ रही थी। गुरु के कहने पर वे मंदिर में माँ की प्रतिमा के पास गए तो सही लेकिन कुछ माँगते नहीं बना। माँ के मनोहारी रूप ने उन्हें इतना विभोर कर दिया कि वे माँगने की बात ही भूल गए। बिना कुछ कहे वापस चले आए। रामकृष्ण ने उन्हें दो बार और मंदिर में भेजा। दोनों बार वे फिर वापस आ गए। इसके बाद गुरु ने कहा, “माँ का काम कर। माँ तेरी चिंता अपने आप रखेगी। परिवार के लिए मोटे−झोटे की कमी कभी नहीं रहेगी।”

नरेंद्र के मिलने के पाँच वर्ष बाद ठाकुर ने शरीर छोड़ दिया। शरीर छोड़ना भी जैसे किसी दैवी योजना का हिस्सा था। एक दिन उन्होंने शिष्य से कहा, “सुनो, अब लोगों के साथ ज्यादा बात नहीं कर सकूँगा। इसलिए माँ से निवेदन किया है कि नरेंद्र, राजा (राखाल महाराज), तारक, बाबू (बाबूराम), योगीन, शशि आदि शिष्यों को शक्ति दे। अब आगे से यही लोग भक्तों को उपदेश दिया करें।” इस घोषणा के कुछ दिन बाद गले में पीड़ा उठने लगी। पीड़ा बढ़ी। भोजन करने में कठिनाई होने लगी। रोग बढ़ता गया। भक्तों ने उपचार के लिए कहा। रामकृष्ण कहने लगे, माँ की इच्छा है, वह चाहेगी तो रोग ठीक होगा, वरना कितना ही उपचार करो, कुछ होने वाला नहीं।

लीला संवरण

उपचार नहीं कराने के पीछे औषधियों के निर्माण में बरती जाने वाली क्रूरता मुख्य कारण थी। भक्तों ने दबाव डाला कि जिन औषधियों में पशु−हिंसा नहीं हुई हो, उनका उपयोग किया जाए। होम्योपैथी और आयुर्वेदिक चिकित्सा शुरू हुई। उनसे भी कुछ लाभ नहीं हुआ। हालत ज्यादा बिगड़ने लगी। एक दिन ठाकुर ने कहा कि जब रोग मिटता नहीं तो इसके लिए कष्ट सहने की क्या आवश्यकता? माँ को कष्ट क्यों दिया जाए? उस दिन ठाकुर ने भोजन भी नहीं किया। माँ शारदामणि की लाई हुई भोजन की थाली वापस कर दी। माँ ने भक्तों को ढाढ़स बँधाया और कहा, ठाकुर ने शरीर छोड़ने का निश्चय कर लिया है। उस दिन 16 अगस्त की तारीख थी। दिनभर सहज दिखाई दिए। शाम को भरपेट भोजन किया। आधी रात बीत जाने के बाद एक बजे के करीब रामकृष्ण परमहंस ने अपनी लीला का संवरण कर लिया। उनके शिष्यों ने ठाकुर का सौंपा हुआ दायित्व निभाने का संकल्प करते हुए गुरु के पार्थिव अवशेषों को श्रद्धा−भक्ति से प्रणाम किया, उन्हें समाधि दी गई।

पूजा की कोठरी में बैठे श्रीराम इन दृश्यों की यात्रा करते हुए चुपचाप बैठे रहे। स्मृतिफ्यों से वे बाहर आए और सामने प्रसन्नमुद्रा में खड़ी मार्गदर्शक सत्ता को निहारा। स्मृतियों से वापस लौटते हुए चेतना क्लाँत−सी हो रही थी। जैसे बहुत दूर श्रीराम की अंतर्यात्रा भी सूक्ष्म और दिव्य विस्तार में प्रवेश की यात्रा थी, लेकिन जब वे वर्तमान में लौटे तो थकान ने घेर लिया। मार्गदर्शक सत्ता ने दायाँ हाथ आगे बढ़ाया, उसका अँगूठा भ्रूमध्य में रखा और चारों उँगलियाँ सिर के उस भाग पर जिसे योगीजन सहस्रार या ब्रह्मरंध्र कहते हैं। इस स्पर्श ने श्रीराम की क्लाँति को दूर कर दिया। चेतना में स्फूर्ति लहराने लगी। एक नया जगत सामने प्रस्तुत हो गया। उस जगत में आलोक से भरा हुआ पूजा कक्ष, गुरुदेव और अपने सिवा वातावरण में दिव्य गंध की व्याप्ति अनुभव हो रही थी।


गुरुकथामृत—43 - लोकशिक्षण करने वाली आत्मीयता से भरी कार्यशैली

महापुरुषों के जीवन की कार्यशैली बड़ी विलक्षण होती है। वे अपने आचरण से शिक्षण भी देते हैं एवं स्वयं भी वातावरण से शिक्षण पाते रहते हैं। सद्गुरु तो शिक्षण लेने का नाटक भी कर लेते हैं, क्योंकि उन्हें लोकशिक्षण करने क लिए उनके धरातल पर आकर कार्य करना होता है, परंतु इनकी यह कार्यशैली जन−जन के लिए एक किताब बन जाती है। हमारे सद्गुरु परमपूज्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का जीवन भी इसी प्रकार का रहा है। उनके हाथ के लिखे पत्र हम पाठकों−परिजनों के लिए इसीलिए प्रस्तुत करते रहे हैं कि वे इनसे कुछ सीख ले सकें। गुरु को इस रूप में जानने पर उनके बहुआयामी व्यक्ति त्व का परिचय हमें मिलता है। यहाँ इसी के प्रमाण रूप में कुछ पत्र प्रस्तुत हैं। पहला पत्र शिवसागर (आसाम) से 27−12−1961 को लिखा गया प्रस्तुत है, जो वहाँ की स्थिति का परिचायक है। गुरुदेव की लेखनी से यह जानने के बाद लगता है कि कितना सही उनका तब का मूल्याँकन रहा होगा। पत्र इस प्रकार है—

चि. रमन, आशीर्वाद, स्नेह

हमारे पत्र पहंचते रहे होंगे। हमारे तूफानी दौरे में इस बार भाग−दौड़ बहुत है। यज्ञ और सम्मेलन तो तिनसुकिया, दुमदुमा, सफराई, शिवसागर चार ही थे, पर दौरे बहुत थे। नेफा, नागालैंड प्रदेशों में इन दिनों बहुत घूमें हैं। यहाँ की परिस्थितियाँ ऐसी हैं जो अपने यहाँ से बिल्कुल भिन्न हैं। लगता है किसी और देश में रह रहे हैं। गधों की तरह भार ढोने वाले गाँव−गाँव में हाथियों के टोले, सघन वन, गैंडे, हाथी, रीछ, लंगूर और हिरन को दौड़कर पकड़ लेने और जिंदा निगल जाने वाले अजगर यहाँ पग−पग पर भरे पड़े हैं। इन्हें देखकर अचरज और भय होता है। तेल से मिला पानी मुँह में नहीं घुसता। योरोप में जैसे बीयर पीते रहते हैं वैसे ही हम लोग किसी प्रकार चाय से प्यास बुझाते हैं। अन्य प्राँतों के लोग भी बहुत हैं, ये हिंदी जानते हैं। आसाम निवासियों को केवल अपनी ही भाषा आती है। उनके साथ संपर्क में दुभाषियों से ही काम चलता है। गरीबी है, पर साहसी, संतोषी और स्वस्थ मनुष्य हैं।

यह समस्याओं से भरा प्राँत है−

सौ वर्षों से ईसाई मिशनों ने 70 फीसदी आदिवासियों को अपने धर्म में दीक्षित कर लिया है। वे अपने को हिंदुस्तानी भी नहीं मानते। (2) मुसलमानों की आबादी 46 फीसदी पहुँच चुकी है। ईसाई और मुसलमान संयुक्त मोरचा बना लें तो मुश्किल खड़ी हो जाए। (3) तेल और चाय की विपुल संपदा पर विदेशियों का दाँत। (4) शत्रु पाकिस्तान और चीन के नितनए षड्यंत्र। (5) गरम सीमाएँ। (6) भारत सरकार की ढिल−मिल नीति। (7) व्यापार के लिए यहाँ आए संपन्न अन्य प्राँतवासियों की इस प्राँत की प्रगति में सहयोग देने की उपेक्षा। (8) गरीबी, अशिक्षा और बेकारी से पीड़ित जनता आदि−आदि अनेक समस्याओं से भरा यह प्राँत है। हिंदू धर्म का ढोल पीटने वालों में से एक भी आदमी इस वन्यप्रदेश में काम करने के लिए जीवन खपा देने वाला इधर नहीं है। हाथ में लेख भाषण और प्रपंच−प्रचार को ही शूरता मान बैठे हैं। त्याग और बलिदान के लिए कौन आगे बढ़े?

लगता है हमें इस प्रदेश पर भी अधिक ध्यान देना पड़ेगा। इसी दृष्टि से आजकल यहाँ गहरा अध्ययन कर रहे हैं ........कुछ रचनात्मक काम करने की व्यवस्था बनाकर रहेंगे।

चि. रमन उपशीर्षक डडडड

हमारे पत्र पहुँचते रहे होंगे। हमारे तूफानी दौर में इस डडडडड वस्तु है। डडडड सम्मेलन तो डडडड हुआ, सफाई, डडडड चले ही थे। पर डडडड बहुत थे। नेफा, नागालैंड प्रदेशों डडडड बहुत दूरी है। यहाँ की डडडड होती है जो डडडड देश में रह रहे है। गधों से डडडड

59 डडडड−डडडड

पत्र अपने आप में पूर्वोत्तर की तत्कालीन स्थिति और गुरुसत्ता की एक राष्ट्रभक्त लोकसेवी होने के नाते अंतः से उपजी वेदनाका प्रतीक है। वे जब लिखते हैं तो वर्णन ऐसा लगता है मानो सामने घटित हो रहा हो। किसी एक कार्यकर्त्ता को वहाँ से यह पत्र लिखकर वे मानो उसका शिक्षण कर रहे हैं, उसका आह्वान कर रहे हैं एवं अपने मन को उसके समक्ष खोल रहे हैं। इस पत्र को लिखे 34 वर्ष बीत गए। घटनाएँ पूर्वोत्तर में बद से बदतर स्थिति ला चुकी हैं। कुछ नए प्राँत बन गए। राजनीति, दुर्व्यसन व बेकारी ने युवाशक्ति को कुँद कर दिया है, नास्तिक बना दिया है, उसी समय जो विचार गुरुवर ने लिखे थे, वे सभी के लिए गहन मंथन के योग्य थे। यदि समय पर कदम उठाए जाते तो आज जैसी विषम स्थिति आसाम सहित उसकी छह बहिन स्टेट्स की न होती। चाय के बागान उजड़ चुके हैं। उग्रवादियों के गुट राजतंत्र से पोषण पाकर राष्ट्र की संपत्ति का ही नुकसान कर रहे हैं। खैर, चिंतर रचनात्मक रहा पूज्यवर का। तिनसुकिया (आसाम), जीरो (अरुणाचल) में शक्ति पीठें बनीं। ढेरों संस्कार महोत्सव हुए। अलख जगा। सिलीगुड़ी को एक केंद्र बनाया गया, ताकि वहाँ से सभी भाषाओं में साहित्य प्रकाशित हो एवं कार्यकर्त्ताओं का प्रशिक्षण हो। अब कोलकाता में 25 एकड़ भूमि में गायत्री चेतना केंद्र खुलने जा रहा है, जहाँ पश्चिम बंगाल, सिक्किम, भूटान, नेपाल, असम सहित छहों प्राँतों की साँस्कृ तिक गतिविधियों को मूल में रखकर गायत्री महाशक्ति का प्रकाश जन−जन तक पहुँचने का कार्य होगा। एक विराट प्रशिक्षण केंद्र शाँतिकुँज के मार्गदर्शन में बनकर तैयार हो जाएगा।

देरी से हुआ, पर गिलहरी समान कुछ प्रयास तो हुआ। पूज्यवर की इच्छाओं को कितने नवयुवक, युवा दुपती पूरा कर पाएँगे, मालूम नहीं, पर एक आह्वान तो हम कर ही सकते हैं, ताकि जो भी कुछ शेष है, वह बिगड़े नहीं। वनवासी कल्याण परिषद् एवं विवेकानंद केंद्र ने कुछ कार्य तो किया, पर वह काफी नहीं। वहाँ काफी संख्या में जीवनदानी−जीवनव्रती कार्यकर्त्ताओं की जरूरत होगी।

आसाम के एक पत्र के बाद अब पूज्यवर द्वारा 15 12−66 को श्री रणसिंह (आँवलखेड़ा, आगरा) को लिखे गए पत्र की ओर चलते हैं, जो व्यवस्थाबुद्धि का प्रशिक्षण हमें देता है। श्री रणसिंह माता दानकुँवरि इंटर कॉलेज, आँवलखेड़ा के मुख्य प्रबंधक थे। अब तो वे रहे नहीं, पर समय−समय पर उन्हें पूज्यवर का मार्गदर्शन सतत मिलता रहा। पूज्यवर लिखते हैं—

चि. रणसिंह, आशीर्वाद

पत्र मिला। स्थिति को जाना। हमारे सामने एकमात्र स्वार्थ विद्यालय का हित होना चाहिए। इसके लिए किसी भी व्यक्ति का ख्याल नहीं करना चाहिए। चाहे विरोध मोल लेना पड़े, चाहे प्रशंसा सुननी पड़े, इसका रत्तीभर भी ख्याल नहीं करना चाहिए। व्यक्ति गत मित्रता, शत्रुता को भी इसमें आड़े नहीं आने देना चाहिए। ऐसी रीति−नीति रखी जा सकी तो ही आप अपनी इस उपयोगी संस्था को जीवित रख सकेंगे।

आपके द्वारा विद्यालय के सुधार में जो दिलचस्पीर ली जा रही है, उससे हमें बड़ा संतोष, उत्साह और आनंद मिलता है। संस्थाओं का काम सात−पाँच का होने से बड़ा टेड़ा−मेड़ा होता है। इसमें युक्ति यों से ही काम लेना पड़ता है। आप लोगों की शिक्षा तथा सद्भावना का उपयोग यदि पूरी तरह होता रहा तो वर्तमान अड़चनें उत्पन्न कर देने वालों पर विजय प्राप्त कर लेना निश्चित

हिसाब हर महीने प्रबंधक तथा कोषाध्यक्ष के हाथों चला जाना चाहिए। अध्यापकों के हाथ में वह रहेगा तो कठिनाइयाँ ही उत्पन्न होंगी। अब ऐसी व्यवस्था बनाएँ कि हिसाब हर हालत में अधिकारी व्यक्ति के हाथ में ही पहुँचा करे।

डडडड−−−−डडडड

कितना स्पष्ट व सटीक मार्गदर्शन है। किसी संस्था का संचालन कैसे होना चाहिए, नीतिमत्ता, सूझ−बूझ का ध्यान रख कुशलतापूर्वक प्रबंधन किस प्रकार किया जाना है, इस पर स्पष्ट चिंतन है। परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी भूमिदान देकर यह इंटर कॉलेज बनवाया था एवं एक ही शर्त रखी थी, नाम उनकी माता का होगा। स्वयं को प्रबंधन मंडल में भी नहीं रखा, पर समय−समय पर व्यवस्था संबंधी मार्गदर्शन सतत देते रहे। कोई भी प्रबंधन कला के गुर−स्वस्थ सूत्र इस पत्र से सीख सकता है। विद्यालय का हित अपना एकमात्र स्वार्थ बने, यह कितना नीतिपूर्ण विचार है, देखा जा सकता है।

अगला पत्र सरगुजा बैकुँठपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़) के श्री बिजेंद्र लाल गुप्ता, एडवोकेट को 31−12−53 को लिखा गया है। यह भी अपने आप में निराला व हम सभी के लिए मार्गदर्शक है। देखें−

हमारे आत्मस्वरूप,

युग निर्माण योजना को व्यापक बनाने के लिए अखण्ड ज्योति का प्रसार आवश्यक है। इस दिशा में आप जो प्रयत्न कर रहें हैं, निश्चय ही उससे इस विचारधारा को सुनिश्चित बनाने में बहुत सफलता मिलेगी।

सुशिक्षित वर्ग इस ओर आकर्षित होगा तो उनके सत्प्रयत्नों से राष्ट्र का नवनिर्माण अधिक तीव्रगति से संभव होगा। आपने उच्चस्तर के लोगों तक इस विचारधारा को पहुँचाने का जो क्रम बनाया है, वह बहुत ही उपयुक्त है।

उस क्षेत्र में एक चुनाव जैसा दौरा करने का प्रयत्न सुविधानुसार समय निकालकर आरंभ कर दें। हम लोगों को आगे बहुत महत्वपूर्ण कार्य करने हैं। इसलिए अपना संपर्क और प्रभावक्षेत्र अखण्ड ज्योति के माध्यम से बढ़ाना ही पड़ेगा।

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स्पष्ट निर्देश है कि प्रबुद्ध वर्ग में श्री बिजेंद्रलाल जी अखण्ड ज्योति को आधार बनाकर पैठ बनाएँ। चूँकि वे विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके थे। उनको लिखा भी इसी तरह गया है, चुनावों जैसा दौर सुशिक्षित वर्ग को प्रभावित करने के लिए वे करें। संभवतः गुरु सत्ता के उन्हीं स्वप्नों को साकार करने के लिए ‘प्रज्ञा परिषद्’ की अवधारणा हुई है तथा अब तेजी से प्रबुद्ध वर्ग का तबका देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कार्य में एकजुट होता दिखाई देगा।


अपनों से अपनी बात - विश्व भर में उमड़ता वासंती सैलाब

गायत्री तीर्थ हरिद्वार, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं क्षेत्रों में विगत दिनों काफी कुछ गतिविधियाँ हुई हैं। परिजन पाक्षिक (प्रज्ञा अभियान) समाचार-पत्र के माध्यम से काफी कुछ पढ़ते रहते हैं, पर ‘अखण्ड ज्योति’ जितने लोगों तक पहुँचती है, उतनों तक पाक्षिक नहीं जाता। अतः दिसंबर 2002 से अप्रैल 2003 तक की गतिविधियों का एक लेखा-जोखा इस बार की अपनों से अपनी बात में दिया जा रहा है।

भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की विकास यात्रा

इस वर्ष (2002-2003) की भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा पूरे भारत में बत्तीस लाख से अधिक छात्र-छात्राओं के माध्यम से संपन्न हुई। अक्टूबर से जनवरी के बीच विभिन्न प्राँतों में अलग-अलग समय पर संपन्न इस परीक्षा से इस बार रिकॉर्ड संख्या में विद्यार्थी, उनके अभिभावक, अध्यापकगण जुड़े हैं। हर परिजन ने उसमें बढ़-चढ़कर पुरुषार्थ किया है। सभी ने अपना समय देकर विद्यालयों से संपर्क किया, छात्रों व अध्यापकों को आश्वस्त किया एवं मात्र दस रु पया प्रति विद्यार्थी के आधार पर पाठ्यपुस्तकों का वितरण किया गया। प्रश्नपत्र इस बार देवसंस्कृति का वितरण किया गया। प्रश्नपत्र इस बार देवसंस्कृति विश्वद्यालय के कुलसचिव व उनके क्षेत्र के तथा विभाग के सहयोगियों द्वारा बनाया गया। समय पर कुशलतापूर्वक सारी परीक्षाएँ पूरी हुई। अब उनकी परीक्षा-पुस्तिकाएँ समयदानी परिजन निःशुल्क जाँच रहे हैं। स्थान-स्थान पर परिणाम घोषित कर पुरस्कार वितरण की प्रक्रिया भी आरंभ हो गई है। राजस्थान में तो विषयवस्तु पर चर्चा द्वारा महाविद्यालयों को भी इस शृंखला में सम्मिलित कर लिया गया है।

इस वर्ष (2003-2004) के लिए तैयारी पूर्व से ही आरंभ क र दी गई एवं जनवरी 2003 से ही प्रदेशवार दो दिवसीय विचारगोष्ठी-सुझाव-परामर्शप्रधान सत्र शाँतिकुँज में आयोजित हुए। लगभग सभी प्राँतों के ढाई हजार से अधिक ही व्यक्ति यहाँ शाँतिकुँज आकर गए। मुद्रण-प्रकाशन इस वर्ष अप्रैल अंत तक समाप्त कर मई-जून में सामग्री का वितरण हो, ऐसा सोचा गया है। गायत्री तपोभूमि, मथुरा में ही यह कार्य किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त सभी में ही यह कार्य किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त सभी से विचार-विमर्श कर पाठ्यसामग्री व प्रमाण-पत्र को और अधिक आकर्षक बनाया जा रहा है। सभी से सही संख्या अभी से निर्धारित कर सूचना भा.सं.ज्ञा.प. के केंद्रीय कार्यालय को मई अंत तक भेजने को कहा जा रहा है। स्थान-स्थान पर विगत परीक्षा के आधार पर ‘संस्कृति मंडलों’ की स्थापना भी गति पकड़ रही है। पाँच-पाँच प्राणवान छात्रों के ये मंडल प्रत्येक विद्यालय में बनेंगे। ऐसा अनुमान है कि प्राय। पैंतीस हजार विद्यालयों ने इस वर्ष भागीदारी की है। यदि प्रत्येक में पाँच-पाँच छात्र गायत्री परिवार से जुड़ गए व छात्र-छात्राओं व केंद्र के बीच कड़ी बन गए तो हर वर्ष पौने दो लाख नए कार्यकर्त्ता शाँतिकुँज को मिल जाएँगे। सभी परिजन इन मंडलों की स्थापना की महत्ता को समझ रहे हैं। व मूल्यपरक शिक्षा पर आधारित देवसंस्कृ ति विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय के सतत संपर्क में है।

विद्या-विस्तार कार्यशाला एवं युग त्रषि के जीवनदर्शन पर त्रिदिवसीय आयोजन

वसंत पर्व 2003 बड़ा ऐतिहासिक रह्वहा। इस पर्व की पूर्व वेला में एक विद्या-विस्तार कार्यशाला आयोजित की गई जो 4 व 5 फरवरी के दिन रखी गई। 4 फरवरी से एक विलक्षण प्रदर्शनी सप्त आँदोलनों एवं युगऋषि के जीवनदर्शन पर उनके आध्यात्मिक जन्मदिवस पर विश्वविद्यालय में आयोजित की गई। इस प्रदर्शनी से मिशन के बहुआयामी स्वरूप को समझा जा सकता था। छोटे-छोट पाँच वर्षक के बालकों से लकर बड़े छात्र-छात्राओं व विश्वविद्यालय के आचार्यगणों ने भी गुरुसत्ता के जीवन के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला। तीन दिन मानो पूर्णतः गुरुसत्तामय हो गए थे। उसके साथ ही एक नाटक जो प्रायः ढाई घंटे का था, शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ के हॉल में परमपूज्य गुरुदेव के जीवन पर मल्टीमीडिया एवं विश्वविद्यालय के छात्रों के अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। वसंत पर उपस्थित सभी परिजन इससे लाभान्वित हुए।

विद्या-विस्तार कार्यशाला अपने में अनूठी थी। युग-साहित्य में रुचि रखने वालों एवं विस्तार पटलों के परिजनों की इस प्रकार की प्रथम कार्यशाला को सभी ने बहुत ही सराहा। पूज्यवर स्वयं कहते थे कि मेरा स्वरूप मेरे क्राँतिकारी विचारों में छिपा पड़ा है। उसे जन−जन तक पहुँचा दो। मात्र चार दिन पूर्व टेलीग्राम, फैक्स एवं फोन की चर्चा के प्रभारी कार्यशाला में पहुँच गए। कार्यशाला के साथ पूज्यवर के साहित्य (3200 पुस्तकें, 70 खंड वाङ्मय) के एक अंश की स्वतः बोलती, जीती−जागती प्रदर्शनी भी मुरादनगर के परिजन प्रदीपराव के सहयोग से शाँतिकुँज कार्यकर्त्ताओं ने लगाई। इसे देखकर इसकी सार्थकता सभी ने महसूस की। बीच−बीच में गुरुमत्ता के सद्वाक्य शोभायमान थे। अब हर विस्तारपटल सहित सभी बड़ी शक्तिपीठों पर ऐसी स्थायी प्रदर्शनी लगाने का मन बन रहा है, ताकि गुरुसत्ता के विचार चहुँओर पहुँचें। मुरादनगर शाखा ने साहित्य विक्रय हेतु एक पोर्टेबल स्टाँल लगाया था, जो कभी भी हटाया व लगाया जा सकता है।

सभी जानते हैं कि परमूज्य गुरुदेव ने जीवनभर जीवनकला के हर पहलू पर बड़े विस्तार से लिखा है। वे कहते थे कि हम बुकसेलर नहीं, न ही अखबारनवीस हैं। हम तो क्राँतिधर्मी विचारों के पोषक हैं। इसी आधार पर विगत वर्ष साहित्य विस्तार-पटलों की स्थापना का क्रम चला। जिनकी संख्या अब साठ को पार कर गई है। इस पत्रिका के पहुँचने तक यह सौ तक पहुँच जाए तो कोई आश्चर्य नहीं करना चहिए। इन विस्तार-पटलों पर पुस्तकों वीडियो कैसेट, सीडी तथा प्रचार-सामग्री उपलब्ध रह्वहती है। जो गायत्री तपोभूमि मथुरा या शाँतिकुँज हरिद्वार बार-बार नहीं जा पाते, उन्हें अपने आस-पास ही यह सब सुलभ हो सकता है। इसकी एक सूच्ी अगले अंकों में प्रकाशित की जाएगी, ताति पाठकों-परिजनों को आसानी हो। कार्यशाला में दिए गए सुझावों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के सेट तैयार किए जा रह्वहे हैं, ताकि पर्व विशेषों, आयोजन-विशेषों पर उनकी तदनुसार बिक्री की जा सके। गायत्री ज्ञान मंदिर लखनऊ ऐसे एक आदर्शतंत्र के रूप में उभरा है। वहाँ गुरुसत्ता का पूरा ज्ञानशरीर प्रदर्शित है। सभी से इसी तरह के केंद्र बनाने का आग्रह किया गया है।

छपाई व प्रकाशन का एक विराट तंत्र खड़ा हो रहा है गायत्री तपोभूमि में

मथुरा की गायत्री तपोभूमि में सभी परिजनों के भावभरे सहयोग से परमपूज्य गुरुदेव के संपूर्ण साहित्य के मुद्रण व प्रकाशन का एक विराट तंत्र खड़ा किया जा रहा है। इसके अंतर्गत एक चार रंगों वाली आँफसेट प्रिंटिंग मशीन व एक बाइंडिंग मशीन ली जानी है। पतन-निवारण की सेवा के मिमित्त पूज्यवर के श्रेष्ठ विचार जन-जन तक पहुँच सकें, यही सोचकर वर्तमान सेटअप के अतिरिक्त यह तंत्र खड़ा करने का मन बना लिया है। सहयोग व मार्गदर्शन शांतिकुंज का रहेगा। अर्थाभाव में कार्य न रुके, इसलिए परिजनों से भावभरा अनुरोध किया गया है कि दो करोड़ रुपये की राशि से होने वाली इस स्थापना हेतु दिल खोलकर राशि मथुरा भेजें। संपर्क-सूत्र व्यवस्थापक गायत्री तपोभूमि मथुरा ही हैं। यहाँ भारत की सभी भाषाओं तथा विदेश की छह भाषाओं में युग साहित्य के प्रकाशन की योजना भी बन रही है। निश्चित ही बनकर खड़ा होने पर यह अपने आप में एक अद्वितीय विचारों के विस्तार का तंत्र होगा।

तंत्राधिपति-प्रज्ञेश्वर महादेव की विश्वविद्यालय के केंद्र में स्थापना

’महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ के लेखन से लेकर अब तक हम पूज्यवर के साहित्य को देखें तो उनका चिंतन सतत युग निर्माण हेतु महाकाल की विशिष्ट भूमिका की ओर इंगित करता दिखाई देता है। इस संबंध में विस्तार से लिखते-लिखते 1988-89 में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा जो क्राँतिधर्मी साहित्य लिखा गया, तब तक की यात्रा में ‘एतद् कर्म प्रधान श्रीमन्महाकालाय नमः’ और जुड़ गया। दीपयज्ञ में उनने प्रधान देवता के रूप में महाकाल-सदाशिव भगवान शिव को ही स्थापित किया। उनका मत रहा कि आद्यशक्ति गायत्री युग परिवर्तन की अपनी प्रज्ञावतार वाली भूमिका महाकाल के माध्यम से ही निभाएँगी। इसी शृंखला में उनने पुस्तिका लिखी, ‘नवसृजन के लिए महाकाल की तैयारी।’ उनने बार-बार लिखा व कहा कि सतयुग के प्रधान देवता ब्रह्मा, त्रेता के सूर्य एवं द्वापर के विष्णु रहे हैं। अब कलियुग को बदलने में सक्षम युगाधिपति-तंत्राधिपति महाकाल ही हैं। इसी कारण संभवतः जहाँ-जहाँ आद्यशक्ति गायत्री स्थापित थीं, वहाँ स्वतः महाकाल आकर विराजते गए अथवा जहाँ महाकाल थे, वहाँ आद्यशक्ति के विग्रह की स्थापना हो गई।

शाँतिकुँज भी अपवाद नहीं है। पहले भी यहाँ गायत्री महाशक्ति के एक छोटे-से मंदिर के साथ सप्तर्षियों के समक्ष सात शिवलिंग स्थापित रह्वहे हैं। शाँतिकुँज परिसर में एक छोटा महाकाल का मंदिर भी है, किंतु अब बड़े विराट रूप में प्रज्ञेश्वर महादेव देवसंस्कृति विश्वविद्यालय परिसर के केंद्रविंदु में आकर विराजमान हो गए हैं। हमें यह विशाल ज्योतिर्लिंग नर्मदा तट से लाकर नासिक के गारगोटी म्यूजियम के प्रमुख, अपने प्राणवान कार्यकर्त्ता श्री कृष्णचंद्र पाँडेय जी के माध्यम से प्राप्त हुआ। प्रायः साढ़े सात क्ंिवटल भार एवं लगभग 5 फीट &साढ़े तीन फीट के बड़े आकार का यह शिवलिंग विधिवत पूजन द्वारा18−4−2002 को नासिक में शाँतिकुँज द्वारा स्वीकार लिया गया। इस बीच महाकाल का तुँगनाथ(पंचकेदार) के स्थापत्य के अनुरूप एवं वास्तुविदों के परामर्श के अनुरूप एक विराट परिसर विश्वविद्यालय के केंद्र में विकसित किया जा रहा था। बड़े ही सुँदर लैंड स्केपिंग के साथ एक परिसर विकसित हो गया।

14 जनवरी 2003 मकरसंक्राँति के दिन त्र्यंबकेश्वर महादेव के स्थान गोदावरी तट नासिक नगरी (कुँभस्थली) से एक चौबीस कुँडीय महायज्ञ के साथ एक रथयात्रा रवाना की गई, जिसमें महाकाल को विशेष ढंग से स्थापित किया गया था। एक माह में प्रायः बत्तीस स्थानों से होती हुई नर्मदा−यमुना को पार कर गंगाटत पर यह यात्रा 13−2−03 के दिन सामाप्त हुई। उसी दिन उस बहुशिला को शास्त्रोक विधान के साथ स्थापित कर दिया गया, जिस पर जलहरी एवं फिर विग्रह को स्थापित करना था। अखण्ड जप (गायत्री मंत्र, महामृत्युँजय मंत्र ॐ नमः शिवाय) का क्रम चल पड़ा एवं 26 फरवरी को 108 कुँडी यज्ञ के शुभारंभ के साथ महाशिवरात्रि 1 मार्च के दिन ब्राह्ममुहूर्त में प्रज्ञेश्वर महादेव की बरसती मूसलाधार बारिश के बीच स्थापना हो गई। बिजली कड़क रही थी, मार्च के बावजूद कड़ी ठंढ थी, पर सारा दृश्य शिवमय हो गया था। बड़ा ही विलक्षण अविस्मरणीय समारोह बन गया। हजारों परिजनों की उपस्थिति में गायत्री तपोभूमि मथुरा, शाँतिकुँज हरिद्वार के प्रतिनिधिगणों के सान्निध्य में श्री के.सी पाँडे दंपती, श्री वीरेंद्र अग्रवाल(जयपुर), श्री अमरनाथ गर्गं (दिल्ली) एवं श्री पी.के तिवारी (दिल्ली) दंपत्तियों द्वारा यजमानों की भृमिका निभाई गई। गोमुख के जल से रुद्रभिषेक हुआ और जय महाकाल के नारों से सारा परिसर गूँज उठा। निश्चित ही यह स्थापना युग परिवर्तन की प्रक्रिया को तीव्र गति देगी, ऐसा ही कुछ संकेत 129 वर्षीय वीरराग स्वामी कल्याणदेवज जी महाराज ने अपने उद्बोधन में दिया। संयोग से विश्वविद्यालय के भूमिपूजन में भी स्वामी जी की उपस्थिति थी।

निंरतर आगे बढ़ता देवसंस्कृति विश्वविद्यालय 1 जनवरी 2003 से ‘धर्म विज्ञान’ की विधा को छह माह के प्रमाण पत्र कोर्स के साथ आरंभ कर दिया गया। चालीस छात्र−छात्रराएँ इसमें भाग ले रहे हैं। एवं एक देवालय प्रबंधक के रूप में तैयार हो रहे हैं। 9 जुलाई से दूसरा सत्र आरंभ होगा। इस बीच देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के योग विभाग के छात्र−छात्राओं ने 67 विश्वविद्यालय की योग प्रतियोगिता में अमृतसर में भागीदारी की। एकवर्षीय डिप्लोमा की छात्रा उत्तराँचल का गौरव कु. इंदु शर्मा ने व्यक्ति गत प्रतिस्पर्द्धा में प्रथम स्थान लेकर विश्वविद्यालय का सम्मान बढ़ाया।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में एक ‘एलराँन हबर्ड खंड’ स्थापित किया गया है। 1911 में जन्में श्री हबर्ड ने विचार विज्ञान− वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर 5000 से अधिक किताबें लिखी हैं। अमेरिका के उनके कार्यकर्त्ताओं ने ये पुस्तकें श्री थॉमस गोल्डनित्ज के माध्याम से विश्वविद्यालय को दानरुप में सौंपी। इस वर्ष विवेकानन्द जयंती विश्वविद्यालय के छात्र−छात्राओं ने वक्तता, विभिन्न प्रसंगों की चर्चा, उनके जीवन−दर्शन पर प्रदर्शनी एवं एक बड़ी सुँदर नाट्यप्रस्तुति के माध्यम से मनाई। विवेकानंद के रामकृष्ण के पास आने से लेकर उनके विश्वविख्यात बनने एवं भगिनी निवेदिता को शक्ति देकर महाप्रयाण तक के वृत्तांत ने सभी के दिलों को छू लिया। यह मंचन शाँतिकुँज के केंद्रीय सत्संग हॉल में हुआ।

विराट सम्मेलन, कार्यकर्त्ता समागमों की ऑ चारों ओर धूम

इन दिनों भारम के कोने−कोने में कार्यकर्त्ता सम्मेलनों, युवा सम्मेलन, रचनात्मक आयोजनों को मनाया जा रहा है। पिछले दिनों जोनव्यापी संगठन के दौरों के बाद इन आयोजनों के गति पकड़ी। बैतूल युवा सम्मेलन, गोंडा पूर्वांचल सम्मेलन, अखिल गुजरात सम्मेलन बड़ोदरा एवं जामनगर, आँचलिक सम्मेलन बस्तर, बहराइच (माता भगवती कुँज) की रचनात्मक पीठ के विराट आयोजन आदि ने एक नई शृंखला आरंभ की है। अगला पूर्वांचल का सम्मेलन नवंबर 2003 (7, 8, 9) में गोरखपुर में तथा युवा सम्मेलन जबलपुर में नवंबर की 1, 2 तारीखों में प्रस्तावित है।

इस बीच कोलकाता के परिजनों ने 24 एकड़ भूमि गायत्री चेतना केंद्र हेतु क्रय कर ली है। निर्माण श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के अधीन होगा। हैदराबाद में मुँबई मार्ग पर एक विशाल स्थापना इसी तरह की श्री विश्वनाथ जी के सौजन्य से 3500 वर्गगज के प्लाँट में होने जा रही है। चारों ओर उल्लास भरा वातावरण है। विदेश के लिए मई में पाँच दल प्रवास पर निकल रहें हैं।


प्रकाश पुत्रों की जीवट


प्रकाश पुत्रों की जीवट (kavita)

यह सच है तमभरी−अमावस, है चहुँदिशि गहराई। पर प्रकाश पुत्रों ने, तम हरने की शपथ उठाई॥

यह प्रकाशपुँज की पीड़ा अरे! उन्हें खलती है, रे प्रकाश पुत्रों, क्यों तम की मनमानी चलती है। इसीलिए क्या जीवन भर ही पीड़ा तुम्हें पिलाई, अब प्रकाश पुत्रों ने, तम हरलने की शपथ उठाई॥

क्यों अज्ञान−तिमिर गहराए सविता−सुत के रहते, महाप्राज्ञ के वंशज क्यों अज्ञान−तिमिर को सहते। सविता−सुत की छाती, इस पीड़ा से अब भर आई, अब प्रकाश पुत्रों ने, तम हरने की शपथ उठाई॥

पंक्तिबद्ध होकर प्रकाश पुत्रों की पंक्ति चलेगी, तम के हर एक मोरचे पर जा, तम को ध्वस्त करेगी। जनमानस आलोकित करने, ज्ञान मशाल उठाई, क्योंकि अब तमभरी−अमावस, है चहुँदिशि गहराई॥

उसे शक्ति संगठनकरण की, यह सामर्थ्य पता है, घोर अमावस में दीपों ने नवइतिहास रचा है। पंक्ति बद्ध होकर दीपों ने दीपावली बनाई, अब प्रकाश पुत्रों ने, तम हरलने की शपथ उठाई॥

मातृस्नेह छलछला उठा है, प्राण−प्रदीप जलेंगे, महाप्राज्ञ के वंशज, तम−छाती पर मूँग दलेंगे। जनपथ को आलोकित करने, जीवट आज जगाई, क्योंकि अब तमभरी−अमावस, है चहुँदिशि गहराई॥

मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’

*समाप्त*