जीवन-जीने की कला में है। जिस किसी भी तरह अनगढ़ तौर-तरीकों से जीते रहने का नाम जीवन नहीं है। दरअसल जो जीने की कला जानते हैं, केवल वही यथार्थ में जीवन जीते हैं। जीवन का क्या अर्थ है? क्या है हमारे होने का अभिप्राय? क्या है मकसद? हम क्या होना और क्या पाना चाहते हैं? इन सवालों के ठीक-ठीक उत्तर में ही जिन्दगी का रहस्य समाया है।
यदि जीवन में गन्तव्य का बोध न हो तो भला गति सही कैसे हो सकती है और यदि कहीं पहुँचना ही न हो तो संतुष्टि कैसे पायी जा सकती है? जिसके पास सम्पूर्ण जीवन के अर्थ का विचार नहीं है, उसकी दशा उस माली की तरह है, जिसके पास फूल तो हैं और वह उनकी माला भी बनाना चाहता है, लेकिन उसके पास ऐसा धागा नहीं है जो उन्हें जोड़ सके, एक कर सके। आखिरकार वह कभी भी अपने फूलों की माला नहीं बना पायेगा।
जो जीवन जीने की कला से वंचित है, समझना चाहिए कि उनके जीवन में न दिशा है और न कोई एकता है। उनके समस्त अनुभव निरे आणविक रह जाते हैं। उनसे कभी भी उस ऊर्जा का जन्म नहीं हो पाता, जो कि ज्ञान बनकर प्रकट होती है। जीने की कला से वंचित व्यक्ति जीवन के उस समग्र अनुभव से सदा के लिए वंचित रह जाता है, जिसके अभाव में जीना और न जीना बराबर ही हो जाता है।
ऐसे व्यक्ति का जीवन उस वृक्ष की भाँति है, जिसमें न तो कभी फूल लग सकते हैं और न कभी फल। ऐसा व्यक्ति सुख-दुःख तो जानता है, पर उसे कभी भी आनन्द की अनुभूति नहीं होती। क्योंकि आनन्द की अनुभूति तो जीवन को कलात्मक ढंग से जीने पर उसे समग्रता में अनुभव करने पर होती है। जीवन में यदि आनन्द पाना है, तो जीवन को फूलों की माला बनना होगा। जीवन के समस्त अनुभवों को एक लक्ष्य के धागे में कलात्मक रीति से गूँथना होगा। जो जीने की इस कला को नहीं जानते हैं, वे सदा के लिए जिन्दगी की सार्थकता एवं कृतार्थता से वंचित रह जाते हैं।
सफलता व्यक्तित्व का सम्मोहक प्रकाश है। सफलता समर्पण की चरम परिणति है। सफलता व्यक्तित्व के अन्दर गहरी परतों में ढँकी-छुपी रहती है। यह कहीं बाहर नहीं होती जिसे खरीद कर पाया जा सके। यह खदानों में दबी रहती है जिसे खोदकर एवं खरादकर ही बहुमूल्य रत्नों के रूपों में सजाया-निखारा जाता है। उद्यम एवं समर्पण से ही व्यक्तित्व को गलाया-ढलाया जाता है, जिसकी तपन व ताप से सफलता रूपी व्यक्तित्व की मोहक सुगन्ध महक उठती है। कड़ी मेहनत, धैर्य, लगन एवं साहस के संयोग से ही सफलता का जादुई चिराग हस्तगत होता है जिससे सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है।
सफल व्यक्तित्व को गढ़ने-सँवारने के लिए सात दिव्य सूत्र हैं। ये सूत्र यदि जीवन में शास्त्र बनकर रचे जा सकें तो व्यक्तित्व चमक उठता है। व्यक्तित्व निर्माण के ये सात स्वर्णिम सूत्र हैं-1. प्रोएक्टिव होना अर्थात् अपनी पूरी जिम्मेदारी आप उठाना, 2.सर्वांगपूर्ण योजना बनाना, 3. प्राथमिकता के आधार पर कार्य का निर्धारण करना, 4. विजेता के समान सोचना, 5. दूसरों को सुनने की समझदारी पैदा करना, 6. सच्चा तालमेल रखना तथा 7. सदैव नयापन बनाये रखना।
सफलता के इन दिव्य एवं प्रभावी सात सूत्रों में वैभव, विभूति एवं ऐश्वर्य के आगार एवं भण्डार भरे पड़े हैं। इन सूत्रों में भौतिक जीवन के साथ-साथ नव आध्यात्मिक जीवन की अनन्त सम्भावनाएँ भी सन्निहित हैं। इन सम्भावनाओं को साकार एवं मूर्तिमान करने हेतु प्रथम सूत्र है प्रोएक्टिव होना, जिसका अर्थ है अपने जीवन की पूरी जिम्मेदारी स्वयं उठाना। इसकी गहरी अनुभूति सफल जीवन का एक निर्णायक बिन्दु है। यह बोध हो जाना कि भगवद् प्रदत्त इस जिन्दगी के जिम्मेदार कोई और नहीं, स्वयं हम हैं, हमारी अच्छी-बुरी परिस्थिति एवं परिणाम का उत्तरदायित्व हम ही हैं, एक जागृति है, एक सच्ची समझदारी है। इस समझदारी एवं जिम्मेदारी के साथ ही हम अपने जीवन के भाग्य विधाता एवं निर्माता होने का बोध करते हैं और अपने अभीष्ट लक्ष्य और उद्देश्य की ओर आगे बढ़ते हैं।
यह जिम्मेदारी हमें स्पष्ट बोध कराती है कि हमारी योजना कैसी हो? इस संदर्भ में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि पहले से ही बड़ी योजनाएँ न बनाओ, धीरे-धीरे कार्य प्रारम्भ करो, जिस जमीन पर खड़े हो, उसे अच्छी तरह से पकड़कर क्रमशः ऊँचे चढ़ने का प्रयत्न करो। इसके साथ ही योजना की स्पष्ट रूपरेखा अपने मानस पटल पर अंकित होना चाहिए। स्पष्ट एवं छोटी-छोटी योजनाओं को जीवन में उतारना एवं इसे पूरा करना आसान एवं सरल होता है और इसे पूरा करने के पश्चात् मन में अपार संतोष एवं प्रसन्नता होती है। कार्य को पूर्ण कर पाने पर आत्मविश्वास पैदा होता है। यही आत्मविश्वास ही हमें किसी बड़े कार्य एवं, बड़ी योजना को पूरा करने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है और जीवन में किसी महान् कार्य एवं उद्देश्य तक सफलतापूर्वक पहुँचने में सक्षम बनाता है। महापुरुषों के जीवन की सफलता का मूल मंत्र भी यही है कि वे प्रारम्भ में छोटी-छोटी परन्तु स्पष्ट योजनाओं को अंजाम देते हैं और क्रमशः महानता के उच्चतर शिखरों की ओर आरोहण करते हैं।
योजना की स्पष्ट रूपरेखा बन जाने के बाद ही कार्य का निर्धारण एवं चुनाव सम्भव है कि कौन कार्य अतिमहत्त्वपूर्ण है जिसे सबसे पहले किया जाना है, किसे इसके बाद करना है। कार्यों को सर्वप्रथम करने की प्राथमिकता एवं महत्व देने की निर्णय क्षमता ही सफलता का महान् रहस्य है। परीक्षा के समय विद्यार्थी की सर्वोपरि प्राथमिकता है अपने विषय की तैयारी करना, वर्षा ऋतु में किसान का प्रथम आवश्यकता कार्य है कृषि पर ध्यान देना। यदि विद्यार्थी एवं किसान अपने कार्यों की प्राथमिकता का निर्धारण न कर सकें तो उनकी सफलता सदैव संदिग्ध बनी रहेगी, परन्तु आवश्यकता को ध्यान में रखकर उनके द्वारा किया गया कार्य उनकी सफलता एवं खुशहाली को सुनिश्चित कर देता है। इसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में अपनी अपरिहार्य आवश्यकताओं के आधार पर कार्यों को योजना के अनुरूप चयन करने की कला आनी चाहिए। इस कला-कुशलता के अभाव में जिंदगी पतवार विहीन नाँव की भाँति लहरों के थपेड़ों में डगमगाती रहती है और अन्त में किसी भँवर में फँसकर नदी की अतल गहराई में समा जाती है। निर्णय लेने वाला व्यक्ति पुरुषार्थी कहलाता है जो जिन्दगी की पतवार को अपने हाथों थामकर भाग्य एवं भविष्य की परवाह किये बगैर सकुशल मञ्जिल तक पहुँच जाता है। उसकी सोच सदा विजेता के समान होती है और सफलता उसके चरण चूमती है।
विजेता की तरह सोच जीवन में उत्साह, उमंग एवं सृजनशीलता भर देती है। यह सोच थके हारे एवं निराश जीवन के अंधकार को तार-तार कर आशाओं का दीप जलाती है। यह विचार विश्वास दिलाता है कि सफलता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम इसे किसी भी कीमत पर प्राप्त करके रहेंगे। विजेता का यह प्रखर आत्मविश्वास उसे कभी असफलता के गर्त में नहीं गिरने देता। विजेता का विधेयात्मक चिंतन उसके समस्त एवं सम्पूर्ण नकारात्मक संस्कारों, आदतों एवं वृत्तियों को रौंदता हुआ आगे बढ़ता है। नेपोलियन के समान वह ‘नहीं’ जैसे नकारात्मक शब्द को सुनना तक पसन्द नहीं करता क्योंकि ‘नहीं’ शब्द कार्य प्रारम्भ करने से पहले ही मृत्यु तुल्य असफलता को आमंत्रण देना होता है। विजेता पुरुषार्थी एवं पराक्रमी होता है। उसके गहन में सदा एवं सदैव ‘हाँ’ मंत्र प्रतिध्वनित होता रहता है। वह कहता है ‘हाँ’ मैं यह कर सकता हूँ चाहे इस अभीष्ट एवं उत्कृष्ट उद्देश्य के लिए मेरे प्राणों की बलि ही क्यों न लग जाय ।
विजेता के समान यह सोच व्यक्ति के अन्दर में शाश्वत यौवन को अलभ्य एवं अलौकिक वरदान से भर देती है। यह सोच पूर्ण यौवन का प्रतीक एवं प्रतिनिधि है। यह व्यक्ति को उम्र की सीमित व संकीर्ण सीमाओं में नहीं बाँधती । 60 से 80 वर्ष के ऊपर किसी भी वय का व्यक्ति युवाओं के समान सर्जनशील एवं सक्रिय हो सकता है और 20 से 30 वर्ष का युवा भी बूढ़ों के समान जीवन से हताश-निराश हो सकता है। यही आज के युग की महापीड़ा एवं महावेदना है कि समाज-राष्ट्र एवं विश्व में समझदार एवं सक्रिय युवाओं की घोर कमी हो गयी है। युवाओं के मजबूत एवं फौलादी कंधों पर ही किसी राष्ट्र का भार टिका रहता है। क्योंकि युवावय ही समझदारी, जिम्मेदारी एवं सृजन का महाप्रतीक है। इसी उम्र में जीने की अदम्य चाहत, सीखने की अनन्त लालसा, प्राणों पर खेल जाने का जुझारूपन और महासाहस का महासमन्वय होता है। युवा वय में ही सुनने, समझने एवं विचारने की अपार क्षमता एवं सामर्थ्य होती है। आगत भविष्य की सुनहरी कल्पनाओं को मूर्त रूप प्रदान करने का महासाहस इसी उम्र में पूर्ण होता है। यौवन की महाविशेषता किसी भी उम्र में पैदा की जा सकती है। किसी भी उम्र में तल्लीनता एवं लगनशीलता एक सम्मोहक व मोहक व्यक्तित्व को जन्म देती है। यह व्यक्तित्व ही यौवन की सच्ची परिभाषा है, जो बताती है कि श्रेष्ठ, उत्कृष्ट एवं महान् लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अभी भी प्राण, ऊर्जा एवं शक्ति सामर्थ्य चुकी नहीं है, अशेष है, जीवन्त एवं जागृत है; अभी भी जीवन के आखरी पड़ाव में समझदारी का जखीरा, लगनशीलता का भण्डार एवं जुझारूपन भरा पड़ा है। आवश्यकता है हर युवाओं में यह समझदारी की विचार तरंग हिलोरें लेने लगें, पाषाणी जड़ता में जड़ हो चुके अन्तर में पुनः जीने, सीखने की चाहत सजे और अपने एवं अपने समाज-राष्ट्र के प्रति मर-मिटने का संकल्प जगे। हमारे अन्दर संघबद्ध हो सबको साथ लेकर चलने का साहस एवं उदारता का भाव पनपे। जीवन लक्ष्य के पथ पर हममें से कोई भी छूटने न पावे। पारस्परिक तारतम्य या सच्चे तालमेल का यह भाव ही सफलता का अगला दिव्य सूत्र है, जो आज सिनर्जी के रूप में प्रख्यात् है।
सिनर्जी अर्थात् सच्चे तालमेल में ही प्रेम, आत्मीयता, उदारता, सहानुभूति, सहयोग, सहकार एवं सेवा रूपी सद्गुणों का विकास होता है। यह विचार भाव हमें आन्तरिक ऊर्जा से भर देता है और जीवन की वीणा बज उठती है। इसके अभाव में ही इतनी उदासी है, दुःख है, इतनी पीड़ा है। इसीलिए व्यक्ति, समाज, देश और विश्व में इतना अँधेरा है, इतनी हिंसा है, इतनी घृणा है। सच्चा तालमेल न होने के कारण ही विसंगतिपूर्ण, विचारहीन एवं गलाकाट प्रतियोगिता जन्म लेती है। सच्चा तालमेल इस विषमता एवं व्यथा को दूर कर एक साथ संघबद्ध व संगठित होकर चलने की प्रेरणा एवं प्रोत्साहन देता है। सच्चे तालमेल के भाव-विचार का अंकुरण हमारी आन्तरिक चेतना में होता है। यह भावना अन्दर में उमंगती है, इसका बाह्य आरोपण स्थायी एवं टिकाऊ नहीं हो सकता। सच्चा तालमेल एक ओर जहाँ व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी एकजुट बनाये रखता है वही दूसरी ओर प्रगति व विकास के नये-नये आयाम खोलता है।
सच्चे तालमेल का भाव-विचार हमें प्रतिदिन कुछ नया करने, नया सोचने तथा नयी योजना बनाने के लिए उत्साहित प्रेरित करता है। जो कुछ किया गया है उससे और भी अच्छा कैसे किया जाये, अपनी परिस्थिति एवं साधन के अनुरूप अच्छे से अच्छा और किया जाये, इसकी प्रेरणा हमें प्रतिदिन के मूल्याँकन एवं आन्तरिक अवलोकन से मिलती है। आत्मबोध एवं तत्त्वबोध की साधना से यह निरीक्षण अतिसहज और सुगम हो जाता है। इस सहज व सरल साधना से प्रत्येक दिन अपने नये जीवन एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव करना होता है। इससे हमें प्रतिदिन अपने कार्यों के मूल्याँकन के साथ-साथ अपने व्यक्तित्व की गहराई में झाँकने का अवसर मिलता है। हर दिन एक नये संकल्प के साथ नया कार्य प्रारम्भ होता है जो सफल व्यक्तित्व की सम्मोहक विशेषता है।
सफलता के इन सात सूत्रों में व्यक्तित्व के निर्माण एवं विकास का गहरा मर्म छिपा है। इन सूत्रों को जीवन में संकल्पपूर्वक क्रियान्वित किया जाये तो व्यक्तित्व परिमार्जित होकर महक उठेगा। ऐसे व्यक्तित्व से ही एक नये आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत की जा सकती है। ये सूत्र भौतिक सफलता के साथ ही अध्यात्म जगत् में प्रवेश कराने के लिए अमोघ मंत्र साबित होंगे।
महात्मा गाँधी के जीवन की एक घटना है। एक बार एक परिषद् की कार्रवाई आरंभ करने में उन्हें 45 मिनट की प्रतीक्षा करनी पड़ी। कारण था एक अन्य नेताजी, जिन्हें कार्यक्रम की अध्यक्षता करनी थी, उनका देरी से आना। उनके मंच पर आते ही गाँधी जी कह उठे, “यदि हमारे अग्रगामी नेतागणों की यही स्थिति रही तो स्वराज्य भी 45 मिनट देरी से आएगा।” समय के पाबंद, कर्त्तव्यनिष्ठ बापू की यह अभिव्यक्ति उनके अंतःकरण से सहज ही स्फुरित हुई थी।
महर्षि दयानंद की बीकानेर महाराज से मित्रता थी। वे अक्सर स्वामी जी से अपने ब्रह्मचर्य की शक्ति के प्रदर्शन की बात कहा करते थे, पर स्वामी जी उसे हँसकर टाल देते थे। एक दिन महाराज चार घोड़ों की बग्घी जोतकर प्रातः भ्रमण के लिए तैयार हुए। कोचवान ने घोड़ों को चलने के लिए बहुतेरा चाबुक फटकारा। घोड़े पूरी ताकत लगाकर बढ़े, किंतु एक इंच भी आगे न बढ़ सके। बात क्या है, यह देखने के लिए नरेश ने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि महर्षि ने एक हाथ से बग्घी पकड़ रखी है। वे संयम की इतनी शक्ति देखकर आश्चर्यचकित रह गए।
एक रोगी राजवैद्य शार्गधर के समक्ष अपनी गाया सुना रहा था। अपच, बेचैनी, अनिद्रा, दुर्बलता जैसे अनेक कष्ट व उपचार में ढेरों राशि नष्ट कर कोई लाभ न मिलने के कारण ही वह राजवैद्य शार्गधर के पास आया था। वैद्यराज ने उसे संयमयुक्त जीवन जीने व आहार-विहार के नियमों का पालन करने को कहा। रोगी बोला, “यह सब तो मैं कर चुका हूँ। आप तो मुझे कोई औषधि दीजिए, ताकि मैं कमजोरी पर नियंत्रण पा सकूँ। पौष्टिक आहार आदि भी बना सकें तो ले लूँगा, पर आप मुझे फिर वैसा ही समर्थ बना दीजिए।” वैद्यराज बोले, “वत्स! तुमने संयम अपनाया होता तो मेरे पास आने
की स्थिति ही नहीं आती। तुमने जीवनरस ही नहीं, जीने की सामर्थ्य एवं धन-संपदा भी इसी कारण खोई है। बाह्योपचारों से, पौष्टिक आहार आदि से ही स्वस्थ बना जा सका होता तो
विलासी-समर्थों में कोई भी मधुमेह-अपच आदि का रोगी न होता। मूल कारण तुम्हारे अंदर है, बाहर नहीं। पहले अपने छिद्र बंद करो, अमृत का संचय करो और देखो वह शरीर निर्माण में किस प्रकार जुट जाएगा।” रोगी ने सही दृष्टि पाई और जीवन को नए साँचे में ढाला। अपने बहिरंग व अंतरंग की अपव्ययी वृत्तियों पर रोक-थाम की और कुछ ही माह में स्वस्थ-समर्थ हो गया।
सुख-सुविधाओं एवं उपलब्धियों से भरे सफल जीवन की चाहत हर मनुष्य की एक सहज एवं नैसर्गिक इच्छा है। इस सहज इच्छा को कितने इंसान यथार्थ में साकार कर पाते हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है, क्योंकि सफलता की समग्रता के लिए उपलब्धियों की सुखद अनुभूति के साथ शान्ति और आनन्द का अमृत रस भी घुलना चाहिए, अन्यथा आन्तरिक शान्ति, सुकून एवं संतोष से वंचित कामयाबी एक दुखद विडम्बना बन जाती है और इसके रहते जीवन एक भयावह दुर्घटना प्रतीत होता है। आज की भागम−भाग भरी जिन्दगी में कुछ ऐसा ही बड़े व्यापक स्तर पर एवं बड़े मुखर रूप में घटित हो रहा है।
इसमें प्रायः सभी एवं विशेषकर युवावर्ग सुख-सुविधाओं एवं उपलब्धियों का अम्बार लगाने की अंधी दौड़ में शामिल हैं, किन्तु सफलता के शिखर पर भी यहाँ जो पल्ले पड़ते हैं वे हैं-असंतोष, निराशा और खीज। ऊपर से सब कुछ छीन जाने का भय अलग से आक्रान्त किये रहता है। यहाँ सफलता के जो मायने तय किये गये हैं वे अपनी चरम परिणति में जीवन रूपी वृक्ष को समुन्नत करने की बजाये उसकी जड़ों पर कुठाराघात करने वाले घातक अस्त्र ही सिद्ध होते हैं। इस अंधी दौड़ में एक ओर जहाँ व्यक्ति की पारिवारिक एवं सामाजिक जिन्दगी तबाह हो जाती है वहीं दूसरी ओर भाँति-भाँति के रोग घुन की तरह उसके शरीर व मन को खोखला करने लगते हैं। सफलता की इस त्रास्द पीड़ा के कारणों की समझ व इससे उबरने के उपायों पर गम्भीर विचार अपेक्षित है, जिससे सफलता अपने साथ सुख-शान्ति की अनुभूति भी करा सके।
वास्तव में यह त्रासदी आधुनिक युग की उपभोक्तावाद एवं वैश्वीकरण के दौर की सहज-स्वाभाविक उपज है। अधिक से अधिक सुख-सुविधाओं एवं भोग की साधन-सामग्रियों का अर्जन, इसके लिए किसी भी तरह अधिक से अधिक धन का उपार्जन ही इसके अभीष्ट लक्ष्य हैं। इसकी मायावी चकाचौंध के सम्मोहन में सामान्य व्यक्ति बिना सोचे विचारे इसके निर्देशों का अनुसरण करने के लिए विवश है। इससे उपजी महत्त्वाकाँक्षाओं की मृग तृष्णा जनमानस में इस कदर हावी है कि वह मात्र एक मशीन बनकर इनकी पूर्ति का यंत्र बनकर रह गया है। सफलता की इस अंधी दौड़ में जीवन पद्धति इस कदर अस्त-व्यस्त एवं विकृत हो जाती है कि इसमें बिना रुके, बिना थके दौड़ने वाले धावक शीघ्र ही अनेक रोगों और विकारों के जाल में फँस जाते हैं।
तमाम तरह के शारीरिक एवं मानसिक रोगों के साथ काम-सम्बन्धी विकारों की मार इन्हें झेलनी पड़ती है। ऐसे रोगों में मधुमेह, दिल के रोग, मोटापा, उच्चरक्तचाप, अल्सर, एसिडिटी, तनाव, अवसाद तथा कैन्सर प्रमुख हैं। चिकित्सक इन्हें ‘जीवन शैली रोग‘ या ‘लाइफ स्टाइल डिसआर्डर’ कहते हैं, क्योंकि ये मूलतः खान-पान से लेकर आचरण-व्यवहार की विकृतियों से पनपते हैं। पिछले दो दशक पूर्व जहाँ इन रोगों की कोई खास चर्चा तक नहीं होती थी, आज ये जीवन का गम्भीर संकट बन गये हैं। वास्तव में आधुनिक मानव बिगड़े हुए खान-पान और बुरी तरह अव्यवस्थित जीवन शैली के द्वारा इन रोगों को स्वयं ही निमंत्रण दे रहा है।
तेज रफ्तार जिन्दगी के शोर-शराबे में व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि कब दबे पाँव आ इन रोगों ने उसके शरीर व मन में अड्डा जमा लिया है। दिल्ली के एक प्रख्यात् क्लीनिक ने जब 300 सामान्य व्यक्तियों की जाँच की तो पता चला कि 85 मधुमेह से ग्रसित थे, 58 को उच्चरक्तचाप की शिकायत थी, 22 दिल का रोग लगा बैठे थे और 43 के लीवर में पथरी पल रही थी। जबकि ये सभी लोग जाँच से पहले खुद को स्वस्थ मान रहे थे। महत्त्वाकाँक्षाओं की मृग तृष्णा में भटकते लोगों की माया नगरी मुम्बई में भी ठीक यही हाल है। यहाँ की क्लीनिकों में हुए शोध अनुसंधान भी 30 प्रतिशत रोगों को जीवन शैली से उपजे मानते हैं। युवाओं पर हुए सर्वेक्षण अनुसंधान के आधार पर यह तथ्य उभर कर सामने आया है कि मात्र 20 वर्ष की उम्र का पड़ाव पार करते ही हमारे युवा सब कुछ जल्दी से जल्दी पाने की महत्त्वाकाँक्षा पाल बैठते हैं। बड़े व्यावसायिक घराने और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उनके कच्चे सपनों को हवा देने का काम करती हैं। उन्हें भौतिक सुख-सुविधाओं के मोहक जंजाल में फँसाकर उनका सुख-चैन लूट लेती हैं। युवाओं को पता भी नहीं चलता कि कब उनका हँसती-खेलती जिन्दगी गूँगी-बहरी मशीन में बदल गयी। यही कारण है कि आज युवाओं में भी दिल के रोगों और तनाव जनित विकारों का प्रकोप तीव्रता से बढ़ रहा है।
आधुनिक ‘हाईफाई’ जीवन शैली उन्हें प्रायः धूम्रपान और मदिरापान की बुराई की ओर भी धकेल देती है। क्रमशः ये आदतों में शुमार हो जाती है। व्यसन बनकर तमाम तरह के शारीरिक रोगों के साथ ही खतरनाक मानसिक रोगों को भी जन्म देती हैं। बैंगलोर स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान ‘निमहेंस’ के रिपोर्ट के अनुसार आज देश के मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सालयों में लगभग 40 प्रतिशत रोगी शराब से उपजी पीड़ाओं को झेल रहे हैं। जबकि एक दशक पूर्व यह संख्या मात्र 5 प्रतिशत थी। शराब का साथ निभाने वाला ‘उल्टा-पुल्टा’ खान-पान भी व्यक्ति के तन-मन पर कई ढंग से चोट पहुँचाता है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार शहरी आबादी में मोटापे के बढ़ते प्रकोप के पीछे आधुनिक जीवन शैली और बिगड़े खान-पान का भारी हाथ है।
नित नयी ऊंचाइयों को छूने की अंधी दौड़ में अस्त-व्यस्त जीवन और अत्यधिक तनाव ही पल्ले पड़ता है। स्वस्थ जीवन का प्राकृतिक टॉनिक ‘नींद’ भी इस का शिकार बनता है। एक और जहाँ यह विकृत जीवन शैली आँखों से नींद चुरा लेती है। दूसरी ओर कई बार ऐसा भी होता है कि व्यक्ति दिन भर उनींदा सा रहता है। दोनों ही स्थितियाँ खतरनाक है, जिनका सही उपचार अपेक्षित है। किन्तु सामान्यता रोज नींद की गोलियाँ गटकना ही इनका सरल समाधान मान लिया जाता है। इसी लापरवाही का परिणाम कई बार दिल के दौरे या दिमाग की नस फटने के रूप में सामने आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार बिगड़ी हुई जीवन शैली से उपजे दिन के रोगों के कारण प्रति वर्ष लगभग 24 लाख भारतीय अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। हाल के एक एंग्लो-जापानी सर्वेक्षण अध्ययन से पता चला है कि यदि कोई व्यक्ति सप्ताह में 60 घण्टे से ज्यादा काम करे और हर रात पाँच घण्टे से कम सोयें तो दिल का दौरा पड़ने की सम्भावना दोगुनी से तीन गुनी तक हो सकती है।
जरूरत से अधिक कार्य करना बिगड़ी जीवन शैली का घटक है। एक अभिन्न जबकि हर व्यक्ति मानवीय क्षमताओं की सीमा में बँधा हुआ है। दृढ़ इच्छा शक्ति एवं प्रेरणा के बल पर इन क्षमताओं को एक सीमा तक ही बढ़ाया जा सकता है। इससे आगे जाने पर व्यक्ति के तन-मन में टूटन शुरू हो जाती है, जो तनावजन्य तमाम तरह के विकारों को जन्म देती है और अन्ततः जान भी ले सकती है। जरूरत से ज्यादा काम या ओवर वर्क का सबसे ज्वलंत उदाहरण जापानी लोग हैं, जहाँ आजकल इसी कारण से आत्महत्याओं की दरें बढ़ती जा रही हैं।
जबकि सफलता के साथ स्वस्थ एवं सार्थक जीवन के लिए यह जरूरी है कि हम अपने व्यावसायिक और घरेलू जीवन के बीच एक संतुलन स्थापित करें। संतुलन ऐसा हो कि हमारी क्षमताओं का न केवल इष्टतम उपयोग ही, बल्कि इनमें निरन्तर बढ़ोत्तरी भी होती रहे, किन्तु इसके विपरीत जब व्यक्ति अपने व्यावसायिक जीवन में पूरी तरह डूब जाता है तो धीरे-धीरे उसकी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक क्षमताएँ चूकने लगती हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति की कार्यक्षमता घटने लगती है। निराशा और खीज के कारण उसे मानसिक विकार घेरने लगते हैं। हताश-निराश एवं कुण्ठा के पलते-बढ़ते वह गहन अवसाद का भी शिकार हो जाता है। आजकल कार्पोरेट जगत् में इसका प्रकोप बढ़ता जा रहा है। इस दशा को ‘बर्न आउट’ कहा जाता है। चिकित्सकों ने इसे ‘क्रॉनिक फैटिंग इम्यून डेफिशिएन्सी सिन्ड्रोम’ नाम दिया है। अमेरिका में इसे तेजी से उभरता हुआ संक्रामक रोग माना जा रहा है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व के लगभग एक प्रतिशत मैनेजर इस रोग के शिकार हैं। जापान के लगभग एक तिहाई अधिकारी इसकी गिरफ्त में हैं। इससे त्रस्त रोगों को हर समय थकान तो रहता ही है, इसके साथ हल्का बुखार और पेशियों-जोड़ों में दर्द भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त खराब गला, पेट में दर्द, गाँठों में सूजन जैसी शिकायत भी पनप सकती हैं। भुलक्कड़पन और जुबान पर सही शब्द न आने की समस्या भी बढ़ जाती है। वास्तव में यह रोग व्यक्ति की तमाम रोगों से लड़ने की सामर्थ्य को छीन लेता है। साथ ही उसके शरीर में उत्साह और उल्लास का संचार करने वाले रसायन व हार्मोन बनने भी बन्द हो जाते हैं। परिणामस्वरूप निराशा, खीज और अवसाद हावी होने लगते हैं। दुनिया के कई बेहद कुशल और प्रभावी प्रबन्धक इस ‘सिन्ड्रोम’ के कारण पतन के गर्त में गिर चुके हैं।
उपभोक्तावाद और वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में यदि हम उपलब्धियों के सुखद अहसास के साथ सफल जीवन की सुख-शान्ति भरी खुशहाली को भी पाना चाहते हैं तो इसके लिए सर्वप्रथम अपनी चिंतन पद्धति एवं जीवन शैली को व्यवस्थित करना होगा। अपने खान-पान एवं आचार-विचार में संयम एवं सात्विकता का अधिकाधिक समावेश करना होगा। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हमारे जीवन के सभी पहलुओं के बीच आदर्श संतुलन कायम हो। कोई भी एक पक्ष जरूरत से ज्यादा हावी न हो। काम-काज के साथ खेलकूद, मनोरंजन, विश्राम और नींद भी हमारे जीवन के आवश्यक पहलू हैं।
इसके लिए महत्त्वाकाँक्षाओं की मृग तृष्णा से बाहर निकलकर सोच-विचार को व्यावहारिक धरातल पर लाकर आगे बढ़ना होगा। अपने क्रियाकलापों और लक्ष्यों के बीच व्यावहारिक संतुलन होना चाहिए। अपने ऊपर उतना ही काम लादना चाहिए, जितना तन-मन सह सके। इसके लिए अपनी वास्तविक क्षमताओं का सही आँकलन आवश्यक है। रातों की नींद उड़ाकर काम करना ठीक नहीं है। यदि पूरी ईमानदारी के साथ सामान्य कार्य करते हुए किसी लक्ष्य को पाना नामुमकिन सा है तो अपने अधिकारी को स्पष्ट रूप से ‘ना’ कह दें। जबरदस्ती का तनाव ओढ़ने का कोई लाभ नहीं है। छोटी-छोटी बातों को टालने की कला सीखें। जहाँ मामला वाकई गम्भीर हो और जरूरी हो, वहीं हस्तक्षेप करें। किसी भी नये काम से उपजने वाले तनावों और होने वाले लाभ का तुलनात्मक विश्लेषण अवश्य करें। जहाँ तक सम्भव हो सारी जिम्मेदारी अकेले अपने ऊपर न ओढ़ें, टीम बनाकर कार्य को अंजाम देने की कोशिश करें। समय सीमा तय करते समय तमाम पहलुओं पर नजर रखें और व्यावहारिक बनें। समय सीमा में थोड़ी गुँजाइश अवश्य रखें, इससे तनाव में खासी कमी देखी गयी है। अपनी जिन्दगी वायदों पर नहीं, कोशिशों पर चलायें।
इस तरह खानपान श्रम-विश्राम एवं जीवन शैली सम्बन्धी छोटी-छोटी बातों पर समुचित ध्यान देते हुए आधुनिक जीवन की भागदौड़ भरी जीवन पद्धति के नकारात्मक प्रभावों को बहुत हद तक निरस्त कर सकते हैं और अपने तन-मन के स्वास्थ्य संतुलन को बरकरार रखते हुए अपने पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन को सुखद एवं संतोषपूर्ण बना सकते हैं तथा समुचित उपलब्धियों के साथ आनन्दपूर्वक सार्थक सफलता के शिखर तक पहुँच सकते हैं।
शरीर का वजन अपने ही पैर उठाते हैं। यदि पैर असमर्थ हों तो खड़ा होना या चल-फिर सकना भी कठिन है। भोजन पचाने का काम अपना ही पेट करता है। यदि पाचन-प्रणाली बिगड़ जाए तो दूसरों के पेट से अपना भोजन पचा लेने का काम संभव न हो सकेगा। विद्या प्राप्त करने के लिए स्वयं ही पढ़ना पड़ता है। अपने ही पुण्य-पाप से मनुष्य सुख-दुख प्राप्त करता है।
जिसे सुखद आनंदमय संसार में रहना है, उसे निर्माण-कार्य अपने भीतर से ही आरंभ कर देना चाहिए। बाह्य निर्माण की, जैसी कल्पना हो, उसी के अनुरूप अपना निर्माण किया जाए।
-परमपूज्य गुरुदेव
समूचे जेतवन में एक अलौकिक सुगन्ध व्याप रही थी। यह अनूठी कमल गन्ध भगवान् तथागत की दिव्य देह से पल-पल झरती रहती थी। निरन्तर की तप साधना ने भगवान् की देह को हर तरह से दिव्य बना दिया था। प्रभु जहाँ भी रहते, वही स्थान सुगन्ध से सुवासित हो जाता। प्रकाश की प्रभा उस स्थान को सदा घेरे रहती। इस अनूठे प्रकाश में भगवान् के तप एवं ज्ञान की आभा छलकती रहती थी। इसके संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति सदा-सदा के लिए अपना हो जाता। वह बरबस ही चाहे-अनचाहे भगवान् के प्रेम पाश में बन्ध जाता। उसे इस सत्य का सहज ही अनुभव हो जाता कि प्रभु ही उसके अपने हैं, उनसे अधिक उनका और कोई सच्चा हितैषी नहीं।
भगवान् की यह सहज करुणा, उनका अपरिमित प्यार, उन प्रभु का अनोखा वात्सल्य ही उनके व्यक्तित्व से सुगन्ध एवं प्रकाश की धाराएँ बनकर बहता था। अपने व्यक्तित्व से प्रभु हजार हाथों से लाखों-लाख अनुदान बाँटते रहते थे। उनकी उपस्थिति आशीष एवं कृपा की वर्षा बनकर प्रकट होती थी। जो इसमें भीगते थे, उनका सारा व्यक्तित्व ही धन्य-धन्य हो जाता। पर कुछ दुर्भाग्यशाली भी थे। जिनके कुसंस्कार उन्हें इससे वंचित रखते थे। उनकी दुष्प्रवृत्तियाँ अवरोध बनकर आड़े आती थी। अपनी ही वंचना उनको प्रभु की कृपा से वंचित करती रहती थी। कभी-कभी तो यह स्थिति इतनी दारुण एवं दुष्कर हो जाती कि ऐसे लोग भगवान् की उपस्थिति से ही ईर्ष्या करने लगते।
सम्यक् सम्बद्ध भगवान् तथागत का नाम ऐसे संकीर्ण साम्प्रदायिक चित्त के लोगों को भयाक्रान्त कर देता था। प्रभु का अस्तित्व मानव जीवन में आमूल क्रान्ति का पर्यायवाची था। अपने जीवन की क्षुद्रताओं को अपने से चिपटाए लोग भयभीत होकर उनसे दूर रहने में ही अपना कल्याण समझते थे। यही नहीं अपने बच्चों को भी प्रभु से दूर रखने की कोशिश करते। सच यही था कि बच्चों के लिए युवक-युवतियों के लिए उनका भय स्वभावतः और भी ज्यादा था। ऐसे लोगों ने अपने बच्चों को कह रखा था कि वे कभी बुद्ध की हवा में भी न जायें। उन सबने उन्हें कसमें दिला रखीं थीं कि वे कभी भी बुद्ध या बुद्ध के भिक्षुओं को प्रणाम न करें।
पर जेतवन की अलौकिक सुगन्ध वहाँ पास में रहने वाले बच्चों के सरल अन्तःकरण में अनजाने ही प्रवेश कर रही थी। उनके निष्कपट हृदय प्रभु के प्रकाश से अनायास ही भरते जा रहे थे। जब-तब उन्हें लगने लगता था कोई अदृश्य चेतना उन्हें जेतवन आने का आमंत्रण दे रही है। पर अपने अभिभावकों की आज्ञा से वे विवश थे। एक दिन एक किशोरवय के बालक ने अपने मित्रों को सुझाया कि हम सबके अभिभावकों ने जेतवन के अन्दर जाने से मना किया है, पर वहाँ आसपास बाहर खेलने में क्या बुराई है? बच्चों को यह बात औचित्यपूर्ण लगी और वे सब के सब जेतवन के बाहर खेलने लगे। काफी समय तक खेलते-खेलते उन्हें प्यास और थकान ने घेर लिया। इस थकान और प्यास में वे सब अपने माता-पिता एवं धर्मगुरुओं को दिये गये वचन भूल गये और पानी की तलाश में वे जेतवन में प्रवेश कर गये। सुखद संयोग कि जेतवन में प्रवेश के साथ ही भगवान् से उनका मिलना हो गया। भगवान् ने उन्हें अपने हाथों से पानी पिलाया। बड़े ही स्नेह से उन्हें कुछ मीठे पदार्थ खाने के लिए दिये। भगवान् की समीपता ने उन्हें जता दिया कि वही प्रभु अलौकिक प्रकाश एवं सुगन्ध का स्रोत है। करुणा तार तथागत की करुणा, प्रेम एवं वात्सल्य ने उन सबको मोह लिया।
प्रभु के वचनों से उनको गहरी तृप्ति मिली। तथागत द्वारा दिया गया पल भर का प्रेम उन्हें अपने अभिभावकों के वर्षों के पर भारी लगा। आनन्द विभोर और प्रेम विह्वल हो उठे वे सबके सब। ऐसा प्रेम तो उन्होंने कभी जाना ही न था। कभी सोचा भी न था, ऐसे चुम्बकीय आकर्षण के बारे में। कभी उन्होंने नहीं देखा था ऐसा चुम्बकीय आकर्षण, ऐसा अपूर्व सौंदर्य, ऐसा प्रसाद, ऐसी शान्ति, ऐसा अपूर्व उत्सव। वे सबके सब बच्चे अपना खेल आदि भूलकर दिनभर भगवान् के पास रहे। उनकी अन्तर्चेतना भगवान् की सुगन्ध में खोने लगी। वे भगवान् के अपूर्व रस से भीगने लगे। तथागत का अलौकिक रंग उन सरल बच्चों के हृदयों में लग गया।
अब तो उन्हें भगवान् के प्रेम का चस्का लग गया। वे जिस किसी तरह रोज ही प्रभु के पास पहुँचने लगे। धीरे-धीरे वे भगवान् के पास ध्यान के लिए भी बैठने लगे। देखते ही बनती थी उनकी सरल श्रद्धा। प्रभु पर न्यौछावर होने लगे उनके मन-प्राण। अब तो स्थिति यह बन आयी कि भले ही वे प्रभु के पास हों अथवा फिर घर पर परन्तु उनकी भाव चेतना सदा ही प्रभु के इर्द-गिर्द मँडराती रहती।
अन्ततः उनकी इस उन्मत्त अवस्था की खबर उनके अभिभावकों को लग गई। खबर लगते ही वे आग बबूला हो उठे। उनका क्रोध सारी सीमाएँ लाँघ गया। जिन बच्चों को वे अपने जिगर का टुकड़ा समझते थे, उन्हीं को बड़ी बेरहमी से मारा। उनके कुल पुरोहितों ने भी उन बच्चों को समझाया, डाँटा-डपटा, भय-लोभ, साम-दाम-दण्ड-भेद सबका उन छोटे-छोटे बच्चों पर प्रयोग किया गया। परन्तु भगवान् का अलौकिक प्रेम जो उनके हृदयों में उतर चुका था, वह किसी भी तरह नहीं मिटा। बुद्ध की जो छाप उनके निश्छल हृदयों में पड़ गयी थी सो पड़ गयी थी।
बच्चों के अभिभावक बहुत रोये और पछताये। उनकी नाराजगी बढ़ती गई। वे जिस किसी से अपना दुखड़ा सुनाते फिरते कि इस भ्रष्ट गौतम ने हमारे भोले-भाले बच्चों को भी भ्रष्ट कर दिया है। नाराजगी का यह उनका पागलपन ऐसा बढ़ा कि उन्होंने अपने बच्चों को भी त्याग देने की ठान ली और एक दिन वे उन बच्चों को सौंप देने के लिए बुद्ध के पास गये। चिढ़, गुस्सा एवं आक्रोश से भरे हुए वे ज्यों ही जेतवन पहुँचे, त्यों ही उन्हें प्रभु के प्रकाश, प्रेम एवं सुगन्ध ने घेर लिया। भगवान् की समीपता मात्र से उनके अँधेरे जीवन में ज्योति जला दी। अचरज में भरे हुए उन सब अभिभावकों से भगवान् ने ये धम्मगाथाएँ कहीं-
अवज्जे वज्जभतिनो वज्जे च वज्जदस्सिनो। मिच्छादिट्ठि समादाना सत्ता गच्छंति दुग्गतिं॥
वज्जञ्च वज्जतो ञत्वा अवज्जञ्च अवज्जतो। सम्मादिद्वि समादाना सत्ता गच्छाँत सुग्गतिं॥
जो अदोष में दोष बुद्धि रखने वाले और दोष में अदोष दृष्टि रखने वाले हैं, वे लोग मिथ्या दृष्टि को ग्रहण करके दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
दोष को दोष, अदोष को अदोष जानकर लोग सम्यक् दृष्टि को धारण करके सुगति को प्राप्त होते हैं।
दो छोटे से ये सूत्र देकर प्रभु ने उन्हें सम्यक् दृष्टि दी। तब उन्होंने अनुभव किया कि भगवान् बुद्ध के पास पहुँच कर किस तरह अनायास ही अन्तर्भावनाएँ उन्हीं की हो जाती हैं।
पिता के पुत्र को खेती करने को कहा। कई दिन बाद पूछा, “बेटा! तेरी खेती का क्या हुआ?” बालक ने उत्तर दिया, “खूब लहलहा रही है पिताजी। मैंने सत्कर्म का हल चलाया, उसमें ईश-भजन के बीज बोए, सत्संग की खाद और संतोष के जल सींचा है, अब सर्वत्र आनंद का अन्न उग रहा है।” उत्तर सुनकर पिता अवाक् रह गया। धर्म की खेती करने वाला यही बालक आगे चलकर ‘नानक’ हुआ।
संत ज्ञानेश्वर के किशोरकाल की घटना है। जब वे अपने भाई-बहनों सहित अपने गाँव पहुँचे तो पुरातनपंथी पंडितों द्वारा उनके पिता के संन्यास धर्म त्यागने व गृहस्थ स्वीकार करने पर काफी धिक्कारा गया, उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया गया। वे अपनी पवित्रता का परिचय उन्हें देते, इसी बीच एक व्यक्ति वहाँ से एक भैंसे को कोड़ों से मारते निकला। पंडितों ने साश्चर्य देखा कि कोड़ों के निशान संत की पीठ पर उभर आए थे। उनके यह कहने पर कि ईश्वर सब में निवास करता है और भैंसे की ओर उन्मुख होते ही उसके मुँह से वेदमंत्र निकलने लगे। यह सब देखकर विश्वसत्ता का ही एक स्वरूप संत ज्ञानेश्वर को मान पंडितगण उनके चरणों पर गिर गए व अपनी नादानी पर क्षमा माँगी।
यौवन धधकती अग्नि के समान साहस एवं उसे दिशा देने वाले प्रचण्ड पराक्रम का नाम है। युवक वह है जिसके अन्तराल में आशा और उत्साह का दिव्य एवं दैवीय प्रकाश सघन होता है, जो विघ्न-बाधाओं, कठिनाइयों, समस्याओं को रौंदता-कुचलता हुआ निरन्तर कार्य और उन्नति पथ पर अग्रसर होता है। उसे अतीत पर क्षोभ नहीं, वह पीछे मुड़कर नहीं देखता, वह अपने उज्ज्वल भविष्य को निहारता है और वर्तमान का श्रेष्ठ सदुपयोग करता है। उसके नेत्रों में आशा की ज्योतिर्मय ज्योति जगमगाती रहती है। असम्भव को सम्भव बनाने, अमूर्त को मूर्त करने तथा अकल्पनीय को साकार करने का उद्दाम साहस है यौवन! और युवक उसका सच्चा प्रतिनिधि है। युवा राष्ट्र का मेरुदण्ड है। वह राष्ट्र का भविष्य है।
ऐसे युवाओं के सबल एवं मजबूत कन्धों पर राष्ट्र का सम्पूर्ण भार टिका रहता है। युवा राष्ट्र के धड़कन होते हैं। युवा राष्ट्र को प्रगति एवं विकास के पथ पर आरुढ़ करते हैं। किसी भी राष्ट्र की सच्ची समृद्धि एवं सम्पत्ति होते हैं वीर, चरित्रवान्, उदार एवं जांबाज युवा। युवा विहीन राष्ट्र मृत, मूर्छित एवं निस्तेज होता है। आज भारत की दशा भी कुछ ऐसी ही है। इसी कारण विशाल युवाशक्ति के होते हुए भी भारत अपने सनातन गौरव से वंचित है। इसी कारण भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, विस्मिल जैसे अनगिन और असंख्य जांबाज और शूरमाओं को पैदा करने वाली भारत माता की कोख आज सूनी की सूनी सी नजर आ रही है। इसी कारण लहूलुहान अपनी रोती कलपती मातृभूमि की दुर्दशा को देखते हुए भी युवाओं की धमनियों में उष्ण रक्त उबाल-उफान नहीं दे पा रहा है। इसी कारण ऋषियों की संतान होने का त्याग-तप भरा जीवट उसे महासाधना के लिए नहीं जगा पा रहा।
आज अपने राष्ट्र में सर्वत्र मरघट सा सन्नाटा छाया हुआ है। युवाओं में कहीं कोई राष्ट्र के प्रति न जवाबदेही है और न जिम्मेदारी। है तो केवल स्वयं का भुलाने, ऋषियों की विरासत महान् संस्कृति को मिटाने एवं इसके स्थान पर पाश्चात्य उपभोक्तावादी अपसंस्कृति को पनपाने एवं विकसित करने का तथ्यहीन, कुटिल कुतर्क। कहने में संकोच होता है परन्तु यथार्थ यही है कि राष्ट्र के अधिकतर कर्णधार युवा वर्ग असंयम, चारित्रिक पतन, अश्लीलता एवं आपराधिक दुष्प्रवृत्तियों के महादलदल में आकण्ठ डूबे हुये हैं। इसके दूरगामी परिणाम अब सामने एवं प्रत्यक्ष दिखाई देने लगे हैं।
आज किशोरावस्था में ही युवावस्था की झलक-झाँकी देखने को मिलने लगी है। अपने देश में 10 से 19 वर्ष के किशोरों की आबादी 25 करोड़ है। परन्तु इन सुकोमल पौध की स्थिति अत्यन्त नाजुक एवं दिल दहलाने वाली है। आज के इन किशारों में मोटापा और मधुमेह से लेकर अवसाद तक उन सभी बीमारियों ने आक्रान्त कर दिया है जो कभी वयस्कों तक ही सीमित थीं। इससे समस्या और भी जटिल एवं दुष्कर प्रतीत हो रही है। एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार देश में हर तीसरे किशोर को दृष्टि दोष है। चैन्नई में हुए एक अध्ययन के अनुसार 30 फीसदी किशोर दाँतों के रोगी हैं, 17 फीसदी मोटापे के शिकार हैं। दिल्ली के स्कूलों में किया गया एक सर्वेक्षण बताता है कि 4 प्रतिशत किशोरों ने मोटापा घटाने की दवाएँ लेने और बार-बार उल्टियाँ करने जैसे कठोर उपायों का सहारा लिया। अनुमान है कि 20 प्रतिशत किशोर अवसाद का शिकार हैं। एक सरकारी कार्यदल की रिपोर्ट से पता चलता है कि 40 प्रतिशत युवाओं ने तेज घबराहट एवं तीव्र परेशानी की बात स्वीकारी है।
दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल ने किशोरों में मोटापा को महामारी की संज्ञा दी है। दिल्ली और चण्डीगढ़ में हर चौथा किशोर मोटापे का शिकार है। चैन्नई के स्कूलों में हुए अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि 18 प्रतिशत छात्र एवं 16 प्रतिशत छात्राएँ असामान्य वजन की हैं। अमेरिका में ऐसे किशोरों की संख्या 15 प्रतिशत से कम और ब्रिटेन में तो मात्र 7.3 प्रतिशत ही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में किये गये एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि 10 से 14 साल के बच्चों में से 53 प्रतिशत और 15 से 19 साल के बच्चों में से 45 प्रतिशत हर दिन जंक फूड लेते हैं। मैक्डॉनल्ड संस्कृति के बढ़ते प्रभाव तथा भारतीय मनोवृत्ति और आधुनिक जीवन शैली के बीच संक्रमण की वजह से यह दुर्वह दुर्दशा देखने को मिल रही है।
किशोरों में बढ़ता रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल अधिक चिंता का विषय है। दिल्ली में 50 किशोरों में से 19-25 अधिक कोलेस्ट्रॉल से ग्रस्त हैं और हर 15 वें किशोर में तो यह मात्रा खतरनाक स्तर तक जा पहुँची है। अपने देश में 80 फीसदी मोटे किशोर मोटापा ओढ़े हुए वयस्क की दहलीज तक पहुँचते हैं। जंक फूड (कम पोषक वाले खाद्य) ने तो जैसे दाँतों को उनके कर्त्तव्य से मुक्त कर दिया है। इसके कारण किशोरों को दाँतों में सड़न, मसूड़ों के रक्तस्राव, साँस में बदबू की शिकायत है। उनमें से 40 फीसदी के दूध के दाँत स्वाभाविक रूप से नहीं गिरते। एसी नीलसन के सर्वेक्षण के अनुसार अपने देश के करीब एक तिहाई किशोरवय युवा नेत्र रोग से ग्रस्त हैं। मुम्बई के एक मनोचिकित्सक के अनुसार देश के अधिकतर युवा फ्रायड की अवधारणा से ग्रस्त होकर ऑडियो-वीडियो पर उत्तेजक दृश्य देखने की लत से ग्रस्त हैं जिससे युवाओं का नींद चक्र ध्वस्त हो गया है। परिणाम स्वरूप पिछले 25 वर्षों में किशोर आत्महत्या के मामलों में तीन गुना वृद्धि हुई है। उनमें 40 प्रतिशत किशोर चिंता-तनाव से हैरान-परेशान हैं। वयस्कों में अधिकतर अवसाद किशोरावस्था की देन है।
ऊँची महत्त्वाकाँक्षाओं को जबरदस्त प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है तो निराशा-हताशा का बादल गहरा जाता है। इससे उबरने के लिए किशोर नशीली दवाएँ लेने एवं धूम्रपान करने लग जाते हैं। नशीली दवाएँ लेने वालों में से 4.5 फीसदी तादाद 12-17 आयुवर्ग के किशोरों की है। इनमें से 66.8 फीसदी आपस में मारपीट आदि वारदातों को अंजाम दे चुके हैं। उन्मादी किशोरों में यौन समस्याएँ सामान्य बात हो गई है। मुम्बई और शोलापुर के कुछ अस्पतालों में गर्भपात कराने की जघन्य घटनाओं में 30 फीसदी 15 से कम उम्र की किशोरियाँ शामिल थीं। तिरुवनन्तपुरम में यौन रोगों की 24 फीसदी घटना 19 से 20 आयुवर्ग की थीं।
ये आंकड़े तो मात्र एक झलक-झाँकियाँ है, सच्चाई और वास्तविकता तो और भी कड़वी और आश्चर्यजनक है। जिस किशोरावस्था में भविष्य के भावी जीवन के स्वप्न सजते हैं, आज युवा बनने से पूर्व ही किशोर मुरझाकर कालचक्र के पद तले कुचलने के लिए अवश-विवश हो गये हैं। फ्रायड के उद्धृत काम विकार से उत्तेजित आज की युवा पीढ़ी दीन−हीन, खिन्न, अशान्त, आवेशग्रस्त होकर असमय बुढ़ापे को आमंत्रित कर बैठी है। व्यसनों तथा भोग विलासों के अंधे कुएँ में गिरकर अपने चरित्र एवं ओज-तेज को अपने ही हाथों लुटा चुके युवा वर्ग की निस्तेज पपरिली आँखों में भारत का सुनहरा भविष्य कभी नहीं दिख सकता । तमाम मान-मर्यादाओं, नीति-नियमों को धत्ता बनाकर विषय वासना में विदग्ध जवानी के जर्जर कंधों में राष्ट्र की उन्नति-प्रगति भला कैसे सम्भव हो सकती है। दिवा स्वप्न देखने में मशगूल युवाओं की विकारी आँखों को महान् भारत का दिव्य स्वप्न देखने का अवकाश कहाँ है? जिस युवा ऊर्जा के द्वारा राष्ट्र को विकासशील से विकसित देशों की पंक्ति में खड़ा होना चाहिए वह पथ भ्रमित-दिग्भ्रमित हो चुकी है।
यह गम्भीर आत्ममन्थन का समय है। समाधान का स्वर हमारे ही अन्दर विद्यमान है। कहीं बाहर तलाशने-भटकने की आवश्यकता नहीं है। हमें अपने ही अन्दर झाँकना होगा। अपने सोये हुए विश्वास को झकझोरना होगा। युवामन की धड़कन स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- उसे जगाओ और पहले की अपेक्षा और भी गौरवमण्डित और अभिनव शक्तिशाली बनाकर भक्तिभाव से उसे चिरन्तन सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दो। जिससे उद्देश्य एवं लक्ष्य कार्य रूप में परिणित हो जाये, उसी के लिए प्रयत्न करो। मेरे साहसी, महान् सदाशय बच्चों! काम में प्राण-प्रण से लग जाओ। नाम, यश अथवा अन्य तुच्छ विषयों के लिए पीछे मत देखो। स्वार्थ को बिल्कुल त्याग दो और कार्य करो। आज्ञा पालन, विनम्रता, शिष्टता, सदाचार के गुणों का अनुशीलन-अनुपालन करो, परन्तु अपने आत्मविश्वास को कभी मत खोओ। बिखरी हुई शक्तियों को केन्द्रीभूत किये बिना कोई महान् कार्य नहीं हो सकता।
स्वामी जी युवाओं के लिए अमोघ मंत्र थे। वह युवाओं को आह्वान करते हैं-जो कुछ असत्य है, उसे पास न फटकने दो। सत्य पर डटे रहो, बस तभी हम सफल होंगे, शायद थोड़ा अधिक समय लगे पर सफल हम अवश्य होंगे। हमें जीवन का लक्ष्य एक दिन मिलकर ही रहेगा। इस तरह योजनाबद्ध एवं जिम्मेदारीपूर्वक काम करो कि मानो हममें से हरेक के ऊपर सारा बोझ आ पड़ा है। नीति परायण तथा साहसी बनो। चाँदी के चन्द सिक्कों के लिए अपना ईमान मत बेचो। लक्ष्य के लिए स्वयं को खपा दो, होम दो। पाप एवं अपवित्रता का विचार मन में मत लाओ। कायर लोग ही पापाचरण करते हैं, वीर पुरुष कभी पापानुष्ठान नहीं करते। तुम वीर हो, वीरोचित कर्म करो। आगे बढ़ो। हमें अनन्त शक्ति, अनन्त उत्साह, अनन्त साहस तथा अनन्त धैर्य चाहिए, तभी महान् कार्य सम्पन्न होगा। मेरे बच्चों! जो मैं चाहता हूँ वह है लोहे की नसें और फौलाद के स्नायु जिनके भीतर ऐसा मन वास करता हो जो कि वज्र के समान पदार्थ का बना हो। बल, पुरुषार्थ, क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज।
स्वामी जी युवाओं को ललकारते हैं-तुम तो ईश्वर की संतान हो, अमर आनन्द के भागी हो, पवित्र और पूर्ण आत्मा हो। अतः तुम कैसे अपने को दीन-दुर्बल कहते हो। उठो! साहसी बनो!! वीर्यवान होओ! सब उत्तरदायित्व अपने कंधे पर लो! यह याद रखो कि तुम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हो। तुम जो कुछ बल या सहायता चाहो सब तुम्हारे ही भीतर विद्यमान है। तुम्हारे अन्दर शक्ति का अथाह-अनन्त स्रोत है। उसे जगाओ। उठो और अपना पौरुष-पुरुषार्थ प्रकट करो। अपना आत्मविश्वास प्रदीप्त करो। अंधविश्वासों, भोगवादी अपसंस्कृति के प्रपंचों के सहारे पनपने वाले विकृत घातक अहंभाव से नहीं बल्कि सेवक की भावना के साथ दूसरों को ऊपर उठाकर! उठो! उठो! मानव और मानवता दुःख से जल रही है। क्या तुम सो सकते हो? अरे! मृत्यु जब अवश्यम्भावी है तो कीट-पतंगों की तरह मरने की बजाय वीर की तरह मरना अच्छा है। इस अनित्य संसार में दो दिन अधिक जीवित रहकर भी क्या लाभ? जराजीर्ण होकर थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होते हुए मरने के बजाय वीर की तरह दूसरों के अल्प कल्याण के लिए भी लड़कर उसी समय मर जाना क्या अच्छा नहीं है।
स्वामी जी कहते हैं-मेरी आशा, मेरा विश्वास नवीन पीढ़ी के नवयुवकों पर हैं। मुझे आवश्यकता है वीर्यवान्, तेजस्वी, योद्धा समान और दृढ़विश्वासी, निष्कपट नवयुवकों की। वे सिंहविक्रम से अपने देश की यथार्थ उन्नति सम्बन्धी सारी समस्याओं का समाधान करेंगे। ऐसे सौ मिल जायँ तो संसार का कायाकल्प हो जायेगा। भविष्य की पचास सदियाँ तुम्हारी ओर ताक रही हैं। भारत का भविष्य तुम पर निर्भर है। काम करते जाओ। विश्वास रखो कि तुम्हारा भविष्य अत्यन्त उज्ज्वल है। आइये हम सब राष्ट्र मंत्र से दीक्षित होकर संकल्पित हों-’उत्तिष्ठत् जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत्’ उठो जागो और तब तक रुको नहीं, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।
कौस्तुभ मुनि किसी दीन-दुखी को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करने का अपना व्रत वर्षों से निभाते चले आ रहे थे, किंतु एक दिन उनके द्वार पर कोई सेवा का अधिकारी नहीं आया। दोनों बड़े दुखी हुए। तभी उन्होंने एक वृक्ष तले पड़े कुष्ठ पीड़ित वृद्ध को देखा। वे ईश्वर को इस कृपा के लिए धन्यवाद देते हुए उसके पास पहुँचे और विनम्र शब्दों में उससे उनका आतिथ्य ग्रहण करने का निवेदन किया।
वृद्ध बोला-”आर्य! आपकी इस उदारता के लिए धन्यवाद! पर मैं जाति का चाँडाल हूँ, आपकी उदारता पाने का अधिकार मुझ शूद्र को कहाँ?” सर्वत्र एक ही परमात्मा को देखने वाले कौस्तुभ के लिए कोई शूद्र कैसे हो सकता था। उन्होंने उसको वैसा ही आतिथ्य दिया, जैसा किसी सवर्ण को।
एक लड़का जंगल में गया हुआ था। चारों ओर सुनसान, उस बियाबान जंगल में जहाजों और पेड़ों में झूमने की ही आवाज आती थी। वह लड़का डरा और चिल्लाया, ‘भूत।’ तो उसकी आवाज पहाड़ियों से टकराकर लौट आई और उसे सुनाई दिया, ‘भूत।’ लड़का समझा सचमुच भूत है। अब की बार उसने मुट्ठियाँ कसीं और जोर से चिल्लाया, “तू मुझे खाएगा।” पहाड़ों से टकराकर उसकी आवाज फिर लौट आई और उसने यही समझा कि भूत मुझसे पूछ रहा है। तब वह बोला, “हाँ मैं तुझे खाऊँगा। यही आवाज जब फिर उस तक लौटी तो लड़का डरकर अपने घर चला गया और उसने अपनी माँ से सारी बात कह दी। माँ ने वस्तुस्थिति समझकर कहा, “बेटा अब की बार तुम जंगल में जाओ तो उस भूत से कहना मेरे प्यारे दोस्त मैं तुझे प्रेम करता हूँ। दोबारा जब वह जंगल में गया तो चिल्लाया, “मेरे अजीज दोस्त।” पहाड़ों से उन्हीं शब्दों की प्रतिध्वनि सुनाई दी और लड़के ने समझा, इस बार भूत उसे डरा नहीं रहा है। फिर वह बोला “मैं तुझे प्यार करता हूँ।” पहाड़ों से यही बात फिर टकराकर लौटी तो लड़का खुशी से नाच उठा। क्रिया कि प्रतिक्रिया प्रकृति का एक शाश्वत नियम है।
‘गायत्री मंत्र’ को भारतीय संस्कृति का मेरुदंड कहा गया है। मनुष्य का स्वस्थ क्रियाशील शरीर मेरुदंड के ही स्वस्थ व सक्षम रहने पर होता है। मेरुदंड की विकृति, संपूर्ण शरीर को लुँज-पुँज स्थिति में पहुँचा देती है यहाँ तक कि उसकी संवेदनशीलता के लुप्तप्राय हो जाने से मस्तिष्क का अंगों पर से नियंत्रण भी जाता रहता है, व्यक्ति का उठना-बैठना, चलना घूमना सब बंद हो जाता है। गायत्री मंत्र के आधार पर भारतीय संस्कृति ने विकास पाया है और अपने वर्चस्व को संपूर्ण विश्व में स्थापित करने में सफल हुई है, इसकी साधना उपासना से लोग विवेकशीलता प्राप्त करते रहे, तब तक वे जीवन के हर क्षेत्र में सफल रहे, देवमानव की कोटि में गिने जाते रहें।
गायत्री मंत्र की मूल प्रेरणा विवेकशीलता के रूप में प्राप्त होती है। उपासना के क्षेत्र में इसीलिए सभी मंत्रों में इस गायत्री मंत्र की श्रेष्ठता बताई गई है। इसे महामंत्र माना गया है। देवता भी इसी गायत्री मंत्र की उपासना करते है :-
सप्तकोटि महामंत्रा गायत्री नायकाः स्मृताः। आदिदेव मुपासन्ते गायत्री वेदमातरम॥
संपूर्ण देवगण जिस गायत्री मंत्र की उपासना करते है वह गायत्री मंत्र सात करोड़ महामंत्रों में सर्वश्रेष्ठ है।
व्यक्ति से जाने अनजाने कुछ न कुछ गलत कार्य हो जाया करते है जिनके परिणामस्वरूप पाप का भागी बनना पड़ता है।पाप ताप से मुक्ति दिलाने में गायत्री मंत्र रामबाण होता है। गायत्री मंत्र की प्रेरणाएं उसे सद्बुद्धि देकर कुपथ से विरत कर देती है। शास्त्रों में इसीलिए सर्वत्र पापों से छुटकारा पाने के लिए गायत्री मंत्र के जप करने का विधान किया गया है :-
सावित्रीच्चं जपेन्नित्यं पवित्राणि च शक्तिः। (सम्वर्त स्मृति 133)
अपने पापों से मुक्त करने के लिए यथाशक्ति सावित्री (गायत्री) मंत्र का नित्य जप करना चाहिए।
आपस्तंब स्मृति (5/5) में भी कहा गया है :-
अहोरात्रन्तु गायच्याँ जपं कृत्वा विशुध्यति।
दिन रात गायत्री का जप करके मनुष्य पापों से शुद्ध हो जाता है।
गायत्री उपासना द्वारा पापों से तो विनिवृत्ति होती ही है साथ ही उपासक में श्रेष्ठता, सद्बुद्धि व सद्विचारणा का भी विकास होता है, जिससे उनका व्यक्तित्व परिष्कृत और प्रखर होता जाता है। उसे भौतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियाँ प्राप्त होती जाती है :-
ऐहिकामुष्मिकं सर्व गायत्री जपतो भवेत। -अग्नि पुराण
गायत्री जपने वाले को साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुख प्राप्त हो जाते हैं।
देवता भी जब मनुष्य की सहायता करते है तब वे मनुष्य को सद्बुद्धि ही देते है, न कि अन्य कुछ।
न देवा दंडमादाय रक्षन्ति पशुपालवत। यं हि रक्षितुमिच्छन्ति बुद्धया संयोजन्ति तम॥
देवता लाठी लेकर गोपाल की तरह किसी के पीछे पीछे चलकर उसकी रक्षा नहीं करते अपितु वे जिसकी रक्षा लेकर की इच्छा करते है,उसे सद्विवेक प्रदान कर देते है।
सद्विवेक की प्राप्ति ही गायत्री मंत्र का प्रमुख लाभ है।गायत्री उपासक इसी कामना से गायत्री साधना में प्रवृत्त होता है।
जीवन के परमलक्ष्य को प्राप्त करने हेतु जिस विवेक बुद्धि की निताँत आवश्यकता है वह गायत्री मंत्र की साधना उपासना द्वारा सहज ही प्राप्त हो जाती है इसमें संदेह नहीं।
रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने कई विद्या सिखाई। ज्ञानदीक्षा संपन्न करते हुए उनके आचार्य ने कहा “रामानुज, नीच जाति के लोगों को यह ज्ञान मत देना।” इस पर रामानुज बोले, गुरुदेव! जिसका गिरे हुओं को उठाने में उपयोग न हो, वह शिक्षा मुझे नहीं चाहिए।” शिष्य की विशाल भावना देखते हुए आचार्य ने स्वेच्छा से उसके उपयोग करने की स्वीकृति दे दी।
जिस तरह स्रष्टा परम आश्चर्य एवं विभूतियों से सम्पन्न है, उसी तरह उसके द्वारा रचित सृष्टि भी अद्भुत विलक्षणताओं से भरी पड़ी है। वैज्ञानिक प्रगति के इस दौर में भी, जब मनुष्य बहुत जानकार होने का दावा करता है, कुछ ऐसी विलक्षणताएँ देखने को मिलती हैं, जिन्हें देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है और प्रकृति की विशेषताओं के सामने नतमस्तक होकर उसके सृजेता के प्रति श्रद्धानत होना पड़ता है। प्रस्तुत है कुछ ऐसी ही प्रकृति की विशेषताएँ जो स्वयं में रहस्य एवं रोमाँच से भरी पूरी हैं।
झीलों व नदियों का सामान्य रंग आसमानी नीला, मटमैला या बाढ़ के कारण कुछ और हो सकता है तथा यह प्रायः एक जैसा ही रहता है। किन्तु विश्व के विभिन्न स्थलों पर कुछ ऐसी झीलें व नदियाँ हैं, जो कुछ अलग ही रंगत लिए हुई हैं और कुछ तो अपना रंग भी बदलती रहती हैं। आस्ट्रेलिया में एक ऐसी झील है, जो मौसम के अनुसार अपना रंग बदलती है। नवम्बर-दिसम्बर में इसका जल गहरा नीला हो जाता है, फिर जून में हरा और अगस्त-सितम्बर में दूध की तरह सफेद हो जाता है। आश्चर्य की एक बात यह भी है कि झील के रंग परिवर्तन का इसके जल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और वह स्फटिक के समान स्वच्छ रहता है।
कुछ नदियाँ अपने विशिष्ट रंगों एवं बहुरंगी छटा बिखेरने की विशेषता के लिए प्रख्यात् हैं। इस संदर्भ में मासाइलैंड की काली नदी तथा चीन की पीली नदी बेमिसाल हैं। आस्ट्रिया की ‘ब्लू डेन्यूव’ नदी, ‘मूली इल्ज’ नदी तथा ‘पीली इन’ नदी के मिलन से समृद्ध होकर आगे बढ़ती है। संगम स्थल से काफी दूर तक इनके मिलन से बनी पट्टीदार तिरंगी छटा देखते ही बनती है। स्पेन की ‘रिओरिटो’ नदी में एक ऐसा खनिज भरा पड़ा है जिसके हवा से संपर्क आते ही पूरी नदी लाल रंग में बदल जाती है। उस क्षेत्र में हवा जितनी तेज चलती है, नदी उतनी ही रक्तवर्णी हो जाती है।
झीलों का नाम सुनते ही सामान्यता जल से भरे वृहद् भूखण्ड की कल्पना उभर कर सामने आती है। किन्तु कुछ झीलें ऐसी भी हैं, जिनमें जल की जगह कुछ और ही भरा मिलता है। वेस्टइंडीज के ‘त्रिनिदाद’ नामक द्वीप में एक ऐसी झील है, जिसमें पानी की जगह तारकोल भरा हुआ है। यह झील 29 फीट गहरी और एक मील लम्बी है। सामान्यता यह तारकोल ठोस अवस्था में ही रहता है। कभी-कभी वह बहुत स्थलों पर तरल भी हो जाता है और उसमें बुलबुले भी उठने लगते हैं। वैज्ञानिकों का मत है कि यह खनिज तेल की सूखी हुई झील है जो हजारों वर्ष पहले किसी भूखण्डीय उथल-पुथल के कारण अस्तित्व में आयी होगी। इसी तरह अमेरिका में साबुन की कई झीलें हैं। इनमें से एक झील तो चालीस फुट से भी अधिक गहरी और 69 एकड़ भूखण्ड में विस्तार लिए हुए है। वैज्ञानिकों के अनुसार, झील की भूमि में बहुत सा क्षार जमा हुआ है। यही क्षार नीचे पृथ्वी से निकल रहे प्राकृतिक तेल से मिलकर साबुन की झील को जन्म देता है। अतः झील के जल से साबुन की आवश्यकता भली-भाँति पूरी हो जाती है।
कुछ नदियाँ अपने जल के विलक्षण स्वाद के लिए प्रख्यात् हैं। चिली और अर्जेन्टीना देशों के बीच सीमा रेखा की तरह बहने वाली नदी - ‘रायओद विनाग्रै’ के जल का स्वाद ताजे नींबू पानी की तरह खट्टा है। इसमें इच्छानुसार चीनी या नमक मिलाकर शर्बत तथा शीतल पेय का आनन्द लिया जा सकता है। पूर्वी अफ्रीका में ‘एगारीन्यकी’ नाम की एक भूरे रंग की नदी है। जो ‘बीयर’ जैसा स्वाद लिये हुए है, हालाँकि इसमें अल्कोहल का कोई अंश नहीं पाया जाता है। इसका पीने वालों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। स्थानीय लोग उबालकर इसका जल ग्रहण करते हैं।
अल्जीरिया में एक नदी ऐसी है। जिसका जल स्याही सरीखा गहरा नीला है। इससे कागज पर आसानी से लिखा जा सकता है। इसकी खोज लगभग नौ दशक पूर्व वैज्ञानिकों ने की थी। उनके अनुसार इसके रंग का कारण लोहा तथा लेड आक्साइड है, जिनका रासायनिक मिश्रण अच्छी स्याही को जन्म देता है। यहाँ की भूमि में इन रसायन तत्त्वों की अधिकता है अतः यह अद्भुत नदी यहाँ अस्तित्व में है।
बेल्झिया द्वीप पर ‘हरनोई’ नामक एक विचित्र कुण्ड है जिसका जल हरा है। इस कुण्ड में यदि कोई पुरुष स्नान के लिए उतरता है तो उसे पानी में पहुँचते ही एक प्रकार का झटका लगने लगता है और वह पानी बाहर निकल जाता है। जबकि यदि कोई स्त्री कुण्ड के पानी में उतरती है तो वह रोमाँचित हो उठती है और उसका कुण्ड में निकलने का मन ही नहीं करता है।
हवाई द्वीप में एक आग उगलने वाली झील है, जिसे स्थानीय लोग ‘आग की झील’ कहते हैं। यह झील ‘मोना’ नामक ज्वालामुखी के मुहाने पर बनी है, जिसमें उबलता हुआ लावा भरा हुआ है। अतः इस झील से सदा आग की लपटें और धुँआ ही निकलता रहता है।
झीलों के देश आयरलैण्ड में एक अद्भुत झील है, जिसमें यदि कोई वस्तु डाली जाती है तो वह पत्थर बन जाती है। वस्तु पानी में पड़ते ही क्रमशः पत्थर की तरह जमने लगती है और अन्ततः बहुत कठोर हो जाती है। विज्ञानविद् कई शोध, अनुसंधानों के बावजूद इसका संतोषजनक समाधान नहीं खोज पाये हैं।
अफ्रीका की ‘असाल’ झील विश्व की सबसे अधिक खारी झील है। इसका जल जोर्डन की सीमा पर स्थित मृत सागर अर्थात् ‘डैड सी’ से सात-आठ गुना अधिक खारा है। इसके उच्च घनत्व के कारण इसमें कोई डूब नहीं सकता। स्नान करने वाले बड़े आनन्द से इसमें उत्प्लावन का आनन्द लेते हैं, क्योंकि उनके सिर तथा पैर जल से ऊपर ही रहते हैं। अतः लोग बड़े मजे से पानी में पीठ के बल लेटे-लेटे ही पुस्तक या अखबार पढ़ते रहते हैं।
प्रकृति के ये विलक्षण तथ्य, ज्ञान एवं आश्चर्य के अन्वेषी मानव मन को रोमाँचित करने वाले हैं। इनमें कुछ के पीछे विद्यमान कारण वैज्ञानिक दृष्टि से स्पष्ट हैं, किन्तु कुछ अभी भी उसके लिए चुनौती बने हुए हैं और उसे और गम्भीर-गहन शोध-अन्वेषण के लिए उत्प्रेरित कर रहे हैं।
एक बार संत एकनाथ जी अन्य संतों के साथ प्रयाग से गंगाजी का जल काँवर में लेकर रामेश्वर जा रहे थे। रास्ते में एक रेतीला मैदान आया। वहाँ एक गधा प्यास के मारे छटपटा रहा था। एकनाथ जी ने तुरंत काँवर से गंगाजल लेकर गधे के मुख में डाला। एकनाथ के साथी संत प्रयाग के गंगाजल का इस प्रकार प्रयोग होते देखकर क्रुद्ध हुए। एकनाथ ने उन्हें समझाया, अरे सज्जनवृंदों आप लोगों ने तो बार-बार सुना है कि भगवान घट-घटवासी हैं। तब भी ऐसे भोले बनते हो? जो वस्तु या ज्ञान समय पर काम न आए वह व्यर्थ है। काँवर का जो जल गधे ने पिया, वह सीधे श्रीरामेश्वरम् पर चढ़ गया।
देवासुर संग्राम हेतु पितामाह ब्रह्माजी ने युद्ध की योजना बनाकर दी थी, विष्णु ने संगठन किया था, महर्षि दधीचि ने अस्थियाँ दी थीं, जिससे वृत्रासुर को मारने वाला वज्र बना था, विजय इन योजनाओं और आयुधों से ही मिली थी, किंतु कृतघ्न अहंकार की जितनी निंदा की जाए कम होगी, उसी अहंकार ने विजयी इंद्र को आच्छादित कर लिया था। इंद्र जाल बजाते घूम रहे थे, मैं न होता तो वृत्रासुर को कोई मार नहीं सकता था। अन्य देवतागण भी आत्मप्रशंसा में लगे थे।
ऐसे में भगवान ने माया रची। वे एक काँतियुक्त यक्ष के रूप में प्रकट हुए। दर्प में चूर एक-एक कर अग्निदेव, मरुत, वरुण, पृथ्वी और आकाश सभी उनसे उनका परिचय पूछने लगे। भगवान ने अपना परिचय देने के पूर्व एक छोटे से तिनके को अपने स्थान से हटाने की चुनौती दी। जब सब प्रयास कर चुके तब इंद्र वहाँ पहुँचे। इंद्र भी अपनी कोशिश कर हार गए। मायाजाल हट चुका था। स्वयं भगवान वहाँ विराजमान थे। सभी देवगणों को संबोधित कर उन्होंने कहा, “यह न समझें कि आप अपने आप में पूरे हैं, आपके अलावा, आपसे ऊपर भी कोई सत्ता है। उसे भुलाकर आत्मश्लाघा में पड़ने से ही असुरगण आप पर हावी होते रहे हैं।” देवगणों को प्रबोध देकर भगवान अपने लोक को चले गए।
आज हम संक्रमण के निर्णायक दौर से गुजर रहे हैं। इसमें जहाँ एक ओर पुरानी रूढ़ियों, रीति-रिवाज एवं विचारों की दीवारें दरक-टूट कर ध्वस्त हो रही हैं, वहीं नये प्रतिमान, नये विचार, नये तौर-तरीके इनका स्थान लेने के लिए आतुर हैं। किन्तु दोनों के संगम से जो समाज एवं संस्कृति का नया रूप उभरने जा रहा है वह इनकी साझी भागीदारी के आधार पर ही निर्धारित होना तय है। परिवार संस्था के संदर्भ में भी यह सत्य पूरी तरह लागू होता है। एकल परिवार का प्रयोग अपने लम्बे अनुभव से गुजरने के बाद अपनी मौलिक त्रुटियों से भलीभाँति परिचित हो चुका है और बदलते समय की मुश्किलें एक बार फिर संयुक्त परिवार के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर रही हैं। किन्तु पुराने ढंग के संयुक्त परिवार को यथावत् स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसकी भी मौलिक त्रुटियाँ रही हैं, जिसके कारण यह आज किसी को रास नहीं आ सकता। अतः 21 वीं सदी की चुनौतियों एवं बदली यथार्थता के अनुरूप इसका स्वरूप क्या हो, यह विषय विचारणीय है।
वर्तमान का हमारा समाज एक ऐसी पीढ़ी से बना है जिसने स्वयं संयुक्त परिवार की गोद में ही आँखें खोली और फिर आगे बढ़कर एकल परिवार की स्थापना की। पुरानी संयुक्त परिवार व्यवस्था से अलग होने वाली पीढ़ी ने उस समय एकल परिवार की स्थापना की थी, जब समाज में व्यक्ति के विचारों को स्वतंत्र जगह मिलने लगी थी। यह उस पीढ़ी के लिए बेहद रोमाँचक समय था, जब वह अपने लिए अपनी इच्छा का घर बना रही थी। एकल परिवार व्यवस्था ने इस पीढ़ी को परम्पराओं की उन बन्दिशों से मुक्त किया जो संयुक्त परिवार में रूढ़ियां बन चुकी थीं। ऐसे में जहाँ भी जब कभी किसी परिवार में बड़े हो चुके बच्चों की अपने माँ-बाप से असहमतियाँ पैदा हुई, बच्चों ने अपने लिए अलग घर बना लिये और इस तरह एकल परिवार समाज में तेजी से फैलते चले गये। बिखरते परिवारों में टूटते मूल्यों और एकल परिवार को देख पुरानी पीढ़ी दुःखी थी। लेकिन जब एकल परिवार का बनना समाज में आये दिन की बात बन गये, तो पुरानी पीढ़ी ने धीरे-धीरे इसे स्वीकारना शुरू कर दिया और जमीनी सच्चाइयों से जुड़कर वह इसमें सहज होने लगी।
एकल परिवार की व्यवस्था को बनाने और बढ़ाने में एक महत्त्वपूर्ण कारक था-औद्योगीकरण। औद्योगिक क्रान्ति ने शहरों और कस्बों में रोजगार के रास्ते खोल दिये। ऐसे में स्त्रियाँ और पुरुष घरों से बाहर निकलकर दूसरे शहरों और कस्बों में काम करने के लिए चल पड़े। ऐसे मामलों में अक्सर ही माता-पिता उन्हीं जगहों से जुड़े रहे, जहाँ उन्होंने अपना बचपन और यौवन गुजारा था।
स्वतंत्रता और स्वच्छंदता पाने की आस में संयुक्त परिवारों से अलग होने वाली पीढ़ी आज खुद स्वयं से यह पूछ सकती है कि इस आजादी को पाने की एवज में उसने क्या कुछ नहीं खो दिया है। एकल परिवार की एकमात्र जो सबसे बड़ी विशेषता है, वह यह है कि यह व्यक्ति को अपनी पहचान बनाने और अपनी काबीलियत सिद्ध करने के मौके उपलब्ध कराता है। लेकिन इसके बहुत सारे दोष भी हमारे सामने हैं। यहाँ अपनी कठिनाइयाँ, समस्याएँ या दुख बाँटने के लिए सिवाय अपने जीवन साथी के और कोई कन्धा नहीं मिलता और एक सीमा के बाद इन्हें व्यक्ति को अकेले ही उठाना होता है। परिणामस्वरूप समाज में अनेकों ऐसी समस्याएँ सिर उठा रही हैं, जो पहले बहुत कम होती थीं। तनाव एवं तनावजनित मनोकायिक रोग, डिप्रेशन एवं आत्महत्या आदि इसके कुछ ज्वलन्त उदाहरण हैं।
यहाँ ‘नजरों से दूर तो दिल से दूर वाली’ कहावत गलत नहीं है। परिवार के सदस्यों से दूर होने का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति अक्सर ही आत्मीय जनों के दिलो दिमाग से दूर हो जाते हैं। साथ ही एकल परिवार प्रायः अपनी परम्परा से जोड़ने वाले उत्सवों एवं पर्व-त्यौहारों से कट जाते हैं और उन्हें अकेले होने का अहसास लगातार बना रहा है। एकल परिवार में सबसे अधिक खामियाजा जिसे भुगतना पड़ता है तो वे हैं बच्चे। एकल परिवार के कारण बच्चों को अपने साँस्कृतिक मूल्य विरासत में दे पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है। साँस्कृतिक मूल्यों को बच्चे अपने बड़े-बुजुर्गों से विरासत में सहज रूप से ही ग्रहण एवं आत्मसात् करते हैं। इन्हें अलग से सिखाया भी नहीं जा सकता।
एकल परिवार में छोटे बच्चों को पालने का तनाव सिर्फ पति-पत्नी को झेलना होता है या फिर उन्हें ‘चाइल्ड केयर’ जैसे संस्थानों के भरोसे छोड़ना पड़ता है। छोटे शहरों और कस्बों में यह समस्या काफी जटिल होती है, जहाँ ‘चाइल्ड केयर’ जैसे संस्थानों की सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होती।
एकल परिवारों में आने वाली उपरोक्त वर्णित कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए आज नये मॉडल के संयुक्त परिवारों की नींव रखे जाने की सख्त जरूरत है। संयुक्त परिवारों की नई संरचना में मौलिक आधार तो पुराने होने चाहिए, लेकिन परिवार के सदस्यों में संवाद की परम्परा को नये ढंग से स्थापित करने की जरूरत है। संयुक्त परिवार के मूल में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि परिवार के सभी सदस्य एक ही छत के नीचे रहें और आपसी समझ और आपसी सहयोग के साथ एक-दूसरे की मदद करें। लेकिन संयुक्त परिवार के नये मॉडल में एक ही परिवार के सदस्य न होकर लोग अलग-अलग परिवारों से भी हो सकते हैं। यह नया संयुक्त परिवार मॉडल ‘मित्र परिवारों’ को एक छत के नीचे रखकर तैयार किया जा सकता है। परम पूज्य गुरुदेव ने इसे ‘लार्जर फैमिली’ के रूप में परिभाषित किया है।
किन्तु ‘लार्जर फैमिली’ के रूप में नये संयुक्त परिवार मॉडल को क्रियान्वित करने के लिए पुराने संयुक्त परिवार मॉडल की मौलिक खामियों से बचना होगा, जिसके कारण कभी नई पीढ़ी में इसके प्रति विद्रोह का भाव पनपा था। संयुक्त परिवार से बगावत का पिछली पीढ़ी का एक ठोस कारण था, पुरानी पीढ़ी का रवैया जो अपनी बात के आगे छोटों की बात को कुछ नहीं समझती थी। अधिकाँश परिवारों में सबसे बुजुर्ग व्यक्ति या पिता का वाक्य ही निर्णायक हुआ करता था, उसके खिलाफ कोई मुँह नहीं खोल सकता था। ऐसी स्थिति में घर में अशान्ति और बोलचाल बन्द होनी आम बात थी। यदि नये संयुक्त परिवार की आधारशिला परिवार के सदस्यों में परस्पर निस्वार्थ प्रेम और सम्मान पर रखी जाती है, तो इसकी सफलता में रत्ती भर संदेह नहीं होना चाहिए। प्रेम, स्नेह और सम्मान हृदय में होने पर कोई भी किसी पर हुक्म नहीं चलायेगा। बच्चों को प्रेम और सम्मान देकर ही उनसे बदले में इसकी उम्मीद की जानी चाहिए। यदि बच्चों के प्रति बड़े लोग समझदारी, प्रेम और सम्मान नहीं दिखाते हैं, तो बेटे या बेटी से अपने विचारों या सलाह के प्रति सम्मान की उम्मीद बेईमानी है।
परिवार के सदस्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे एक-दूसरे से खुलकर और ईमानदारी से आपस में बातचीत करें। परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को छोटों को अपनी बात कहने के लिए प्रेरित करना चाहिए। ऐसा वातावरण न होने पर परिवार के सदस्य अपनी भावनाओं को दबा हुआ महसूस करते हैं और ऐसे में बड़ों से उनकी असहमति सहज ही बनने लगती है। पूर्वाग्रह से रहित होकर बात सुनना और परस्पर विश्वास का प्रदर्शन निश्चित रूप से सदस्यों को एक-दूसरे के करीब लाता है। पुराने संयुक्त परिवारों में यह एक बड़ी कमी थी। नये मॉडल में इसका निराकरण अवश्य होना चाहिए।
किसी भी संयुक्त परिवार में यह जरूरी होता है कि वह अपने सदस्यों को उसी रूप में स्वीकार करे, जैसा कि वह है। उससे बेवजह की उम्मीदें पालना गलत है। परिवार को अपने हर सदस्य की क्षमताओं और सीमाओं का ज्ञान होना चाहिए। साथ ही अपनी कमजोरियाँ भी जानना जरूरी है। ऐसा करने से किसी भी सदस्य के साथ गैर-जरूरी उम्मीदें नहीं बँधती। किसी से भी जरूरत से ज्यादा उम्मीद करना प्रायः दुःख और असहमतियों को बुलावा देना होता है।
अगर एक से अधिक परिवार साथ-साथ रहते हैं, तो इसका सीधा सा अर्थ है कि विभिन्न क्षमताओं से लैंस लोग एक छत के नीचे हैं। एकल परिवार की तुलना में इस परिवार का सबसे बड़ा लाभ यह है कि सबमें अलग-अलग प्रतिभा होती है और सबके साथ होने पर कोई भी काम रुकता नहीं। समझदारी के साथ चलें तो अलग होते हुए भी एक-दूसरे के पूरक होते हैं। इस तरह सब अलग-अलग होते हुए भी एक होते हैं। इस तरह संयुक्त परिवार के पुराने मॉडल में अभीष्ट सुधार करते हुए इसका नया ढाँचा बना सकते हैं, जिसमें परिवार के सभी सदस्यों की समझ को जगह और सम्मान देना होगा।
संयुक्त परिवार का यह नया मॉडल आने वाली पीढ़ियों के लिए ‘ट्रेनिंग ग्राउंड’ साबित हो सकता है। वे समाज से सद्भावना के साथ रहने का पाठ यहाँ सीख सकते हैं। यदि हम आज के पारिवारिक ढाँचे को अपनी लाइफ स्टाइल का आइना मानें, तो पता चलेगा कि यह व्यवस्था हमारे स्वार्थ पर खड़ी है। हम किसी दूसरे के विचार सहन नहीं कर सकते हैं। ऐसे में हम अपने समाज से दूसरों के लिए बेहतर और कल्याणकारी होने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? संयुक्त परिवार का नया मॉडल हमें ऐसा समाज बनाने में मदद दे सकता है, जो एक-दूसरे के विचारों और असहमतियों को सम्मान देता हो और जहाँ लोग एक-दूसरे से परस्पर सहयोग और प्रेम से रहते हों।
इस तरह एकल परिवार के अनुभवों और उसकी कमियों को देखने के बाद अब हम अपने लिए एक ऐसा मॉडल तैयार कर सकते हैं, जिसमें एकल परिवार और संयुक्त परिवार दोनों को लाभ हों। उपरोक्त चर्चा के आधार पर ऐसे संयुक्त परिवार की आवश्यकता स्पष्ट होती है। दूसरा यह करना हमारे लिए इसलिए भी जरूरी है कि हमारे संसाधन दिन प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं और समय तेजी से गुजर रहा है। समय की चुनौती को देखते हुए एवं अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए भी हमें हर कीमत पर नये रूप में संयुक्त परिवार की व्यवस्था को स्वीकार करना ही होगा।
परम पूज्य गुरुदेव ने ‘लार्जर फैमिली’ के रूप में प्रतिपादित नये संयुक्त परिवार की इस अवधारणा को सतयुगी समाज का आधार माना है, जिसके रूप, आकार लेने की वैचारिक पृष्ठभूमि आज तीव्र रूप से चल रही है। इसके साकार होने के निमित्त अपने भावभरा सहयोग ही इस समय सभी विचारशील परिजनों का परम कर्त्तव्य है।
भिक्षु आनंद ने पूछा, “भगवान! आप प्रव्रज्या हेतु विश्वभर में दूत भेज रहे हैं, पर उनके पास साधन तो हैं ही नहीं। वे कैसे रहेंगे, किस प्रकार धर्मधारणा का प्रसार कर पाएँगे? यह प्रश्न मेरे मन में अभी भी विद्यमान है।”
तथागत कह उठे, “भदंत! ये दूत एक विशिष्ट संपत्ति अपने साथ लेकर जा रहे हैं, जो ईश्वरप्रदत्त है। अपनी इंद्रियसंयम, समयसंयम, विचारशक्ति रूपी विभूति के माध्यम से ये पुरुषार्थ द्वारा जहां जाएँगे, जनसहयोग, साधन-संपदा तथा श्रद्धा अर्जित करेंगे और विश्वभर में विचार-क्राँति के अग्रदूतों के रूप में फैल जाएँगे। यथार्थ संपदा वही है, जो ये ले जा रहे हैं, चौथी तो इनकी परिणति है।”
देवमंदिर में शिवरात्रि के दिन एक सोने का थाल उतरा। आकाशवाणी हुई कि सच्चे भक्त को ही थाल मिलेगा। काशीराज ने ढिंढोरा पिटवाकर अपनी भक्ति की परीक्षा देने के लिए आह्ममडडडड किया।
सर्वप्रथम एक पुजारी आगे बढ़े। उन्होंने कहा, “मैंने सच्चे मन से ईश्वर की उपासना की है। इसलिए थाल का अधिकारी मैं हूँ।” राजा ने थाल पुजारी को दिया। हाथ में लेते ही सोने का थाल पीतल का हो गया। पुजारी ग्लानि से भर उठे और एक किनारे हट गए। पुनः थाल सोने का हो गया। तत्पश्चात् एक तपस्वी पहुँचे। उन्होंने अपने योग-तप की दुहाई दी, पर थाल उनके हाथ में भी लेते ही पीतल का हो गया।
उसी समय एक किसान भी देवदर्शन के लिए दूर स्थान से पहुँचा। ईश्वर के प्रति उसकी अटूट निष्ठा थी। जितना समय मिलता, परमात्मा का नाम ले लेता। बाकी समय में पूरे परिश्रम से कृषि करता। किसी तरह उसने थोड़े पैसे बचाए। शिवरात्रि के दिन देवमंदिर के दर्शन के लिए आ रहा था। एक गठरी में थोड़ा-सा सत्तू बँधा था। रास्ते में भूख-प्यास से तड़पता, रुग्ण एक मनुष्य पड़ा था। उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा था। सोने का थाल प्राप्त करने की आतुरता में भीड़ उसी ओर चली जा रही थी। किसान ने तड़पते व्यक्ति को उठाया, पानी पिलाया और सत्तू खिलाकर उसकी क्षुधा मिटाई। निकटवर्ती एक धर्मशाला के संचालन को सुपुर्द करके मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचा। किसान का पहुँचना था कि सोने का थाल काशी नरेश के हाथों से चला और किसान के हाथों में आ गया। सब सचाई देखने लगे। आकाशवाणी हुई कि “जो आत्म सामर्थ्य का सही उपयोग करता है, वही मेरा सच्चा भक्त है, सुपात्र है।”
मनुष्य का अंतराल प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है। जो कोई उसको साधसुधार कर परिष्कृत विकसित कर लेगा, वह स्वयं तो धन्य बनेगा ही अन्य अनेकों को निहाल कर जाएगा। वास्तविक सहायता शुद्ध अंतःकरण से ही बन पड़ती है। जहाँ ईर्ष्या द्वेष अहंकार प्रतिकार ही भावना भरी हो, वहाँ तो अपना ही कल्याण मुश्किल है दूसरों का उपकार क्या हो सकेगा। इसीलिए विज्ञजन यह कहते है कि अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।जो इसे संपन्न कर लेते है वे अपने साथ-साथ दूसरों का भी कल्याण करते है। इसे सत्यापित करने वाली आए दिन ऐसी कितनी ही घटनाएं घटती रहती है जिनसे विदित होता है कि सचमुच परिमार्जित अंतराल से देवतुल्य लाभ है।
ऐसी ही एक सत्य घटना सन 1914 की जनवरी माह की है। एक व्यक्ति अपने सीने से एक किशोर को चिपकाए बेतहाशा दौड़ा चला जा रहा था और किशोर बुरी तरह चीखता चिल्लाता जा रहा था। अलबामा नदी तट पर स्थित सेल्मा शहर के मिनोटा मुहल्ले की खिड़कियां और दरवाजे खड़खड़ाकर खुलने लगे, यह देखने के लिए कि आखिर बात क्या है? उस मुहल्ले में रहने वाले डॉ. युजिन भी जिज्ञासावश निकल पड़े तो पता चला कि एक व्यक्ति अपनी गोद में एक बालक को लेकर दौड़ रहा है, जो कि जल गया है। पीछे पीछे वे भी अस्पताल पहुँचे। वहाँ पहले से ही भीड़ इकट्ठी थी। उन्होंने बालक को देखा तो पता चला कि उसका चेहरा बुरी तरह झुलस गया है। यह सब कैसे हुआ? इसके जवाब में पिता ने संभावना व्यक्त की कि फोटो xलैश का पाउडर फर्श पर बिखरा पड़ा था। अनुमान है कि मेरी अनुपस्थिति में किशोर ने उसे इकट्ठा किया और माचिस जलाई होगी। इससे ज्वलनशील पाउडर में आग लगने और विस्फोट होने से इसका चेहरा जल गया।
बालक को अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में लाया गया और उपचार आरंभ कर दिया गया। जब पिता पुत्र को लेकर अस्पताल के कमरे में पहुँचा तो बाहर खड़ी भीड़ में से किसी ने उन्हें पहचानते हुए कहा कि ये सम्मोहन विद्या के विशेषज्ञ विलक्षण क्षमतासंपन्न विश्वप्रसिद्ध व्यक्ति एडगर केसी है और बालक उनका पुत्र हगलीन।
चिकित्सालय में अवलोकन कर विशेष डॉक्टरों के दल ने अनुमान लगाया कि बालक को तो निस्संदेह बचाया जा सकता है पर उनकी आँखों को बचा पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव भी है। चिकित्सा चलती रही। एक सप्ताह बाद एक आँख में तेज दर्द आरंभ हुआ। चिकित्सकों ने विचार विमर्श कर एडगर केसी से कहा कि बच्चे की एक आँख निकालनी पड़ेगी। किसी प्रकार यह बात बालक को ज्ञात हो गई तो उसने चिकित्सकों का विरोध करते हुए कहा कि आप ऐसा नहीं कर सकते। हमारे पिता स्वयं एक आध्यात्मिक चिकित्सक है। उन्होंने कइयों का सफल उपचार किया और गंभीर लोगों से उन्हें मुक्ति दिलाई है।आप कृपया इस संदर्भ में उन्हें अपनी चिकित्सा करने की अनुमति प्रदान करें।
चिकित्सकों ने किशोर की प्रार्थना स्वीकार कर ली और एडगर केसी से अपना उपचार आरंभ करने का कहा। एडगर केसी बेंच पर बैठे और थोड़ी ही देर में स्वसम्मोहन द्वारा गहन तंद्रा की स्थिति में चले गए। पत्नी को इसके बाद क्या करना है, इसे उन्होंने पहले ही समझा दिया था।
पत्नी से एडगर की बताई प्रक्रिया आरंभ की।उसने पति की सम्मोहन अवस्था में प्रश्न करने आरंभ किए। इसी क्रम में एडगर ने बताया कि हगलीन की नेत्र ज्योति समाप्त नहीं हुई है। क्षति तो थोड़ी पहुँची है पर उपचार द्वारा उसे ठीक किया जा सकता है। उन्होंने आगे कहा कि डॉक्टर जो दवा चला रहे है वह ठीक है पर उसमें तनिक टेनिक एसिड भी स्वल्प मात्रा में मिलना आवश्यक है। ऐसा ही किया गया। यद्यपि चिकित्सकों को विश्वास नहीं था कि नेत्र दृष्टि लौट सकेगी किन्तु सोलह दिनों के उपराँत जब आँखों से पट्टी हटाई गई तो बालक उत्फुल्लत से चीख पड़ा मैं देख सकता हूँ। और यह कहकर डॉक्टरों को अचंभे में डाल दिया।
एक सामान्य सा व्यक्ति नेत्र विशेषज्ञ की वैज्ञानिक जानकारी से भी अधिक गहराई से कैसे प्रवेश कर सका? यह प्रश्न इस घटना के बाद से अनेकों के मन में उभरा, जिसका समाधान स्वयं एडगर केसी ने यह कहते हुए किया कि उन्हें अवचेतन मन की विलक्षण क्षमता का तनिक भी ज्ञान है, उनके लिए यह आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। यदि मन को परिष्कृत कर उसकी उस सामर्थ्य को जाग्रत किया जा सके तो ऐसा करतब हर कोई दिखा सकता है यह माना हुआ तथ्य है और एक सत्य भी।
पेड़-पौधे, वृक्ष-वनस्पतियाँ एवं पुष्प प्रकृति के सौंदर्य अभिव्यक्ति के अनुपम अंग हैं। इनकी विविध छटा जहाँ एक ओर मन को असीम तृप्ति देती है वहीं दूसरी ओर स्वयं में ये अपरिमित शक्ति व रहस्य छुपाये हुये होती है। इतना ही नहीं ये मनुष्यों की तरह ही प्रेम भी करते हैं। अपने संरक्षकों से इतनी गहरी आत्मीयता रखते हैं कि उनके दुःख से दुःखी एवं सुख से सुखी होते हैं। नवीनतम वैज्ञानिक शोध परिणाम भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। एक अमेरिकी प्रयोगशाला में कार्य करते हुए एक वैज्ञानिक की उँगली कट गई। कमरे में रखे पौधे ने तुरंत शोक व्यक्त करना शुरू कर दिया। उसकी व्यथा की कहानी ग्राफ पर उतरने लगी। पौधे अदृश्य तरंगों द्वारा मानव की भावनाओं को पकड़ लेते हैं। उनके पास कोई ऐसी सूक्ष्म शक्ति होती है जो हमारे मस्तिष्क की थोड़ी सी हलचल को भी तुरंत भाँप जाती है। जैसे ही मस्तिष्क पौधे के बारे में सोचना शुरू करता है, अदृश्य तरंग पौधों तक सूचना पहुँचा देते हैं।
इसी प्रकार वैज्ञानिक कर्ल्यू वैक्सटर ने पेड़-पौधों की भावनाएँ जानने के लिए कई प्रयोग किये। उनमें से एक प्रयोग के अंतर्गत कई दिनों से प्यासे पौधे की शाखा को पॉलीग्राफ के संवेदनशील तार से जोड़ दिया गया और फिर उसकी जड़ों को पानी दिया गया। पौधे ने तुरंत अपनी खुशी ग्राफ पर एक रेखा के रूप में जाहिर की। प्रयोगों के दौरान वैक्सटर ने पौधे की एक शाखा को जला डालने की सोची। जैसे ही वे तीली जलाकर पौधे की ओर बढ़े ग्राफ पर भय दर्शाने वाली रेखा खींच गई। वैक्सटर ने दुबारा तीली जलाई पर अब पौध की शाखा को जलाने का उनका कोई इरादा नहीं था। उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब जलती हुई तीली को शाखा के पास ले जाने पर भी पौध ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।
उपरोक्त प्रयोगों से यह स्पष्ट पता चलता है कि पौधों में ऐसी शक्ति होती है जो हमारे मन की बात तक बता देती है। यहाँ तक कि पौधों में मनुष्य के झूठ को पकड़ने की भी अद्भुत क्षमता होती है। एक प्रयोग के तहत पौधे को पॉलीग्राफ से जोड़कर उसका सम्बन्ध एक व्यक्ति से स्थापित करा दिया गया। अब इस व्यक्ति से कुछ सवाल पूछे गये। जब भी उसने झूठ बोलना चाहा ग्राफ पर रेखा खिंचने लगी।
वैक्सटर ने अपने प्रयोगों से यह भी सिद्ध किया कि पौधे अपने मित्र व शत्रु को पहचानते हैं। अगर माली पौधों के पास जाते हैं तो वे शान्त रहते हैं लेकिन कोई फूल तोड़ने के इरादे से उनके पास जाता है तो उनकी व्यथा ग्राफ पर उतरने लगती है। लकड़हारे को पास आता देखकर तो वृक्ष ठीक वैसे ही भयभीत होता है जैसे किसी कातिल को अपने पास आता हुआ देख मनुष्य भयभीत हो उठता है। अगर वृक्ष बोल पाते तो निश्चित ही वे लकड़हारे को देख बचाओ-बचाओ की गुहार लगाते। इतना ही नहीं पौधे अपने शत्रु को पुनः पहचानने की क्षमता भी रखते हैं। वैक्सटर ने बन्द कमरे में रखे दो पौधों को पॉलीग्राफ से जोड़ा। अब कमरे में छः व्यक्तियों को बुलाया गया और उन्हें एक हैट में रखे हुए छः पर्चियों को बारी-बारी से उठाने के लिए कहा गया। इन पर्चियों में पाँच पर्चियाँ सादी थी परन्तु एक में लिखा गया था ‘इन पौधों की हत्या कर दो।’ जिसे यह पर्ची मिली उसने मौका मिलते ही अकेले में एक पौधे को नष्टकर डाला। दूसरे पौधे को छोड़कर अन्य कोई भी गवाह नहीं था। तीन दिन बाद उन्हीं छः व्यक्तियों को बारी-बारी से उस पौधे के सामने से गुजारा गया। नष्टकर्त्ता के पास आते ही दूसरे पौधे का भय से कँपकँपाना ग्राफ पर साफ-साफ उतर आया। पौधे ने बिना किसी पहचान के हत्यारे को कैसे पहचान लिया? बिना मस्तिष्क के यह कैसे सम्भव हुआ यह रहस्य ही है।
ऐसे प्रयोग रूस में भी हुए हैं। जिनके आधार पर ‘प्रावदा’ ने पेड़-पौधों के इस रहस्यपूर्ण पहलू पर शोध रिपोर्ट प्रकाशित की है। मास्को के कृषि विज्ञान अकादमी में किये गये एक प्रयोग के अंतर्गत पौधों के नन्हें अंकुरों को गर्म पानी में डाले जाने पर उनकी कराह स्पष्ट रूप से ग्राफ पर देखी गई। क्लोरोफार्म के छिड़काव से पौधों का बेहोश हो जाना भी स्पष्ट परिलक्षित हुआ।
मुम्बई के प्रसिद्धि वनस्पति विज्ञानी गोपीकृष्ण याल ने भी अपने विभिन्न प्रयोगों से यह सिद्ध कर दिखाया है कि पौधे भी सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। उनमें भी संवेदना होती है। क्याल ने वैज्ञानिकों का एक दल बनाया और बीस प्रकार के अलग-अलग किस्म के पेड़-पौधे लिये। यह पौधे देश के विभिन्न भागों से मंगाये गये। सभी पौधों पर विचारों के होने वाले प्रभाव को अलग-अलग गैल्वेनोमीटर से आँका गया। प्रयोगशाला में कोई कुत्ता, चूहा, बन्दर, बिल्ली लाया जाता तो पौधे भय से अलग-अलग कँपन करते। जैसे बिल्ली के प्रवेश पर वे सबसे कम भयभीत हुए और बन्दर के प्रवेश पर सबसे ज्यादा। यहाँ तक कि कोई मनुष्य प्रयोगशाला में किसी पौधे के प्रति दुर्भावना लेकर आता तो पौधा उसे भी अंकित कर देता। गैल्वेनोमीटर द्वारा अंकित किये गये कँपन को ध्वनि तरंगों में रूपान्तरित करने पर उनमें कहीं भय, कहीं प्रसन्नता, कहीं हर्ष तो कहीं उल्लास की ध्वनियाँ निकलती थीं।
पौधों को सर्दी व गर्मी भी लगती है। उन्हें प्यास भी लगती है तथा एक निश्चित मात्रा में खनिज लवणों तथा पोषक तत्त्वों की भी जरूरत होती है। पौधे संगीत के रसिया भी होते हैं। भारतीय वैज्ञानिक टी.एन सिंह ने कुछ फूल देने वाले पौधों को नियम से प्रतिदिन 25 मिनट वीणा सुनाई। एक हफ्ते बाद ये पौधे अन्य पौधों से ज्यादा तीव्र गति से विकसित हुए। उनमें फूल भी जल्दी और ज्यादा आये। अपनी सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने कुछ खेतों में रोज लाउडस्पीकर से राग ‘चारुकेशी’ प्रसारित करवाना शुरू कर दिया। इससे फसलों की उपज बढ़ने लगी। यह प्रयोग कनाडा, अमेरिका आदि देशों में भी आधुनिक यंत्रों की सहायता से किया गया परन्तु यह रहस्य ही बना हुआ है कि संगीत किस तरह से पौधों के वृद्धि हार्मोनों को उत्तेजित कर देता है।
पौधों में एक-दूसरे के प्रति जिस उच्च स्तर का प्रेम पाया जाता है वह मनुष्यों में भी दुर्लभ होता है। वे एक-दूसरे का स्पर्श तक नहीं करते बस मुग्धावस्था में कुछ समय तक रहने के बाद एक-दूसरे से दूर हट जाते हैं। उनके इस मौन, शर्मीले दांपत्य जीवन को सफल बनाने का दायित्व उन विषाणुओं पर होता है जो उनमें परजीवी होते हैं। तालाब व नहरों में मिलने वाला एक पौधा होता है ‘बैलिसनेरिया’ इसके नर व मादा फूल का डण्ठल सर्पिल रूप में मुड़ा होता है एवं पूर्ण यौवन की अवस्था में इसकी डण्ठल सर्पिलाकार कुण्डली के रूप में धीरे-धीरे खुलती है। इस अवस्था में यह फूल सम्पूर्ण रूप से पानी की सतह से ऊपर तैरने लगता है। ठीक उसी समय नर फूल के पराग जल की सतह पर तैरते हुए मादा फूल से आ मिलते हैं।
पेड़-पौधों की भावनाओं की पहचान सर्वप्रथम भारत में ही हुई। विश्वविख्यात वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु ने दुनिया को पहली बार बताया कि पौधों में भी हमारी तरह भावनाएँ होती हैं। उन्हें भी सुख-दुःख का आभास होता है। भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता में सदा से ही पेड़-पौधों को सजीव प्राणी की दृष्टि से देखा गया है। ज्योतिष के संहिता ग्रन्थों में वृक्षों में प्राण संचार प्रक्रिया एवं मनुष्यों की तरह सुनने व समझने की शक्ति को स्वीकार किया गया है।
पेड़-पौधों के प्रेम व्यवहार, उनकी मानवीय भावनाओं को उजागर करने वाला वर्णन उनकी रोचक संसार की एक झलक मात्र है। सच्चाई तो यही है कि सम्पूर्ण वनस्पति जगत् मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत है। आवश्यकता सिर्फ उन्हें समझने की है। वनस्पति एवं मनुष्य में मात्र इतना ही अन्तर है कि वनस्पति मनुष्य की भाषा में बात नहीं कर सकता है। परन्तु किये गये शोध परिणामों को देखकर यह कहा जा सकता है कि शीघ्र ही हम पॉलीग्राफ के जरिये वनस्पति जगत् से संवाद कायम करने में सक्षम हो पायेंगे। अतः संवेदनशील वनस्पति जगत् को समुचित स्नेह-प्यार एवं संरक्षण देकर उन्हें विकसित करना हममें से प्रत्येक का परम कर्त्तव्य होना चाहिए।
एक बार महात्मा बुद्ध के पास एक धनपति आए। वैभव का साम्राज्य चारों ओर था, पर वे अंदर से एक बहुत बड़ा अभाव अनुभव करते। अपनी यही व्यथा उन्होंने भगवान बुद्ध को सुनाई। भगवान बुद्ध ने कहा, आपने जीवन में कर्म व श्रम को तो महत्व दिया, पर भावना को नहीं। सत्संग-कयाश्रवणडडडड इत्यादि से तो विचारों को पोषण भर मिलता है। अंदर की शुष्कता कम करने के लिए सबको स्नेह दीजिए, अनाथों, निर्धनों के बीच जाइए, उन्हें स्वावलंबी बन सकने योग्य सहायता दीजिए, अपना शरीर-श्रम भी जितना इस पुण्य कार्य में लगा सकें, लगाइए। फिर देखिए, आपकी भूख भी लौट आएगी तथा नित्य चैन की नींद सोएँगे। सेठ जी ने ऐसा ही किया व चमत्कारी परिवर्तन ने उन्हें जो शाँति-प्रसन्नता दी, वह पहले कभी मिली नहीं थी।
ऋषि ने पुकारा है ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’। हे प्रभु! हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, असत से सत की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर। देखना है कि यह अमृत कहाँ है? सत कहाँ है और ज्योति कहाँ है? उन तक कैसे पहुँचा जा सकता है? इन तीनों देव विभूतियों को पाकर किस प्रकार कृतकृत्य हुआ जा सकता है? ये तीनों हृदय गुफा में अवस्थित है और अंतर्मुखी होकर इस रत्नराशि को कोई भी विवेकशील व्यक्ति सरलतापूर्वक बटोर सकता है।
गुफा निवास एक बात है और गुफा की उपलब्धि दूसरी। भौतिक क्षेत्र की पर्वतीय प्रदेशों की जगह जगह पाई जाती है। वे प्रकृति की संरचनाएँ है। उनमें वन्य पशु अपने आश्रय बनाते है और अपना विश्रामकाल उन्हीं में बिताते है। प्राचीनकाल में आत्मचिंतन, अंत क्षेत्र के अनुसंधान के लिए ऐसा वातावरण अधिक उपयोगी माना जाता था। तब उसमें स्थान स्थान पर अनेक योगी यती रहते थे। उनका आत्मबल ऐसा होता था कि शरीर निर्वाह के साधन भी अनायास ही मिल जाते थे और सुरक्षा संकट उत्पन्न नहीं होता था।
अब वैसी स्थिति नहीं रही, तो भी लोग नकल बनाने में ही अपनी महत्ता समझते हैं। असली राजा या ऋषि बनना यदि संभव न हो तो लोग रंगमंचों पर उन्हीं वेशों के वस्त्र विन्यास के आधार पर मुखौटे लगाकर वैसा ही प्रदर्शन करते है। इमारतों की तरह तहखाने के डिजाइन भी बना लेते है और उसी को गुफा कहते है। उसमें बैठे बैठे समय गंवाते हुए सोचते है कि वे भी पुरातनकाल के ऋषियों जैसी सिद्धियाँ प्राप्त कर रहे है। वे भूल जाते है कि चिंतन और लक्ष्य में जमीन आसमान जितना अंतर रहते हुए भी असली और नकली की एक जैसी स्थिति कैसे हो सकती है? यदि गुफा में रहने से ही सिद्धियाँ मिली होती तो सभी चूहे सिद्धपुरुष हो गए होते। शीत आतप का जहाँ अधिक दबाव होता है या दृष्टि से बचने की आवश्यकता होती है वहाँ वन्य पशु प्रायः गुफाओं में रहते है या उसे अपने पंजों से खोदकर बना लेते है। नेवला, गोह साँप आदि का अधिकाँश जीवन गुफाओं में ही समय काटते हुए बीतता है।
अध्यात्म क्षेत्र में वातावरण की महत्ता तो है ही पर उस दिशा में प्रगति करने के लिए इतने भर से काम नहीं चल जाता। इससे अधिक भी कुछ करना होता है अन्यथा वातावरण का लाभ शारीरिक स्वस्थता तक ही सीमित होकर रह जाता है।
तत्वदर्शियों ने हृदयक्षेत्र को ‘गुफा’ कहा है। यहाँ हृदय के भौतिक और आत्मिक पक्ष के अंतर को समझना होगा। भौतिक हृदय सीने में बांयी ओर नाशपाती जैसे आकार की एक छोटी सी माँसल संरचना है जो अपने रचना प्रयोजन के अनुसार धमनियों और छोटी नलिकाओं द्वारा निरंतर रक्त फेंकती और खींचती रहती है। इसकी धड़कन उस स्थान पर हाथ रखकर आसानी से पहचानी जा सकती है। इसी पर रक्तचाप की न्यूनाधिकता का प्रभाव पड़ता है और क्रियाकलाप थोड़ी देर रुकते ही प्राणाँत हो जाता है।
अध्यात्म क्षेत्र की हृदय गुफा इससे भिन्न है। वह मेरुदंड में अनाहत चक्र के समीप है। पंचकोश गणना में यही विज्ञानमयकोश है। इसे भौतिक हृदय की सीध में तनिक पीछे हटकर अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रहने वाला माना गया है। संक्षेप में यही अंतराल या अंतःकरण है - भाव संवेदनाओं का केंद्र। कविता में किसी को दिल दे बैठना उस पर निछावर होने को कहते है। उर्दू का एक शेर है ‘दिल के आइने में है तस्वीरें यार, जब जरा गर्दन झुकाई देख ली’। यह आइने जैसी दिल रक्तसंचार ग्रंथि से सर्वथा भिन्न है। हिम्मत, साहस, बहादुरी आदि के संदर्भ में भी उसी आत्मिक हृदय का उल्लेख किया जाता है।
भावनाओं का तो केंद्र ही यह है। यहाँ भावनाओं से तात्पर्य आदर्शवादी पुण्य परोपकार से मिश्रित भावसंवेदनाओं से है। यह कार्य बुद्धि नहीं कर सकती। बुद्धि का आधार प्रत्यक्ष लाभ हानि है। घाटा पड़ने पर उसे झटका लगता है और लाभ होने पर गर्व का उभार आता है। किसी वृद्धजन के मर जाने पर खुशी मनाई जाती उसकी अरथी को सजाया जाता है। मृत्युभोज में पैसा खरचा जाता है मानो कोई आकस्मिक लाभ हुआ हो। बुद्धि का यह निर्णय ठीक ही है कि बेकार आदमी घर घेरे हुए था, पैसा खरच कराता था और आएदिन सेवा सहायता की माँग करता था। ऐसी झंझटों से पीछा छूटा तो अच्छा ही हुआ। उस घटना पर खुशी होनी चाहिए, किन्तु उसकी धर्मपत्नी को बिछोहजन्य जो दुःख होता है उसे वही जानती है। यह भावना है।
बुद्धि को तर्क के आधार पर प्रभावित किया जा सकता है और प्रलोभन या दबाव से उसकी दिशा बदली जा सकती है। किन्तु वह लुढ़केगी सदा स्वार्थ साधना की दिशा में ही।उसे मोड़ना इसी पक्ष में संभव है। घाटे का सौदा वह नहीं करना चाहती। इसीलिए ऐसे उच्च आदर्शों के परिपालन में उसे कटिबद्ध नहीं किया जा सकता, जिससे प्रत्यक्ष घाटा पड़ता हो कारण कि बुद्धिवादी धर्मोपदेशक आदर्शों की बड़ी बड़ी बातें तो कहते है उनके भाषण बड़े लच्छेदार होते है पर जब उस कथन को निजी जीवन में कार्यान्वित करने के अवसर आते है तो पीछे हट जाते है। इसका कारण एक ही है कि उन्होंने धर्मचर्चा को बुद्धिक्षेत्र में अपनाया है पर अंतःकरण में, भावना क्षेत्र में स्थान नहीं दिया।
संसार में अनेक व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो आदर्शों को प्रमुखता देते है। उनकी भावनाएँ उस रंग में रंग जाती है और उस उत्कृष्टता को अपनाने में वे बड़े से बड़ा जोखिम उठाते हैं। शारीरिक कष्ट पैसे की हानि, विरोधियों द्वारा हास उपहास आदि की घटनाएं उनके सामने आती है। यहाँ तक कि अपने पिछले कुसंस्कारों को उलटा पुलटा करते देखा गया है। किसी के तनिक से बहकाने पर बहक जाते है। स्वार्थ त्यागने, परमार्थ अपनाने का श्रेय तो लेना चाहिए, पर उसके लिए जो त्याग बलिदान करना पड़ता है उसके लिए कदम बढ़ाने का साहस नहीं करते। करते है तो कुछ ही दिनों में क्षणिक उत्साह का बबूला फूटते ही पीछे लौट जाते है। इस लौटने में अपनी कमजोरी स्वीकार न करके किसी न किसी अन्य पर दोषारोपण करते है। परिस्थितियों की मजबूरी बताते है। यह भावनाओं का अधूरापन ही है।
इसके विपरीत महापुरुषों, महामानवों का अंतःकरण उच्चस्तरीय आदर्शवादिता से, दया करुणा से लबालब भरा होता है। इसलिए वे सत्साहयुक्त श्रेष्ठ और उदात्त कार्य करने में सफल होते है जबकि सर्वसाधारण ऐसा नहीं कर पाते, क्योंकि वे बुद्धि के आश्रित होते है और बुद्धि द्वारा ऐसे कार्यों का मूल्याँकन करते है। जहाँ नफा नुकसान का वणिक व्यापार हो वहाँ बुद्धि भावनाओं पर हावी हो जाती है, इस कारण कोई उच्च आदर्शवादी कार्य नहीं हो पाता। किसी रोगी से, किसी वृद्ध एवं मुरदे से किसी को क्या लेना-देना। वे तो आएदिन की घटनाएं है किन्तु इन्हीं को देखकर किसी बुद्ध को वैराग्य हो जाता है। वह घर द्वार और ऐश आराम को लात मारकर इनके समाधान के लिए निकल पड़ता है। ऐसा कोई बुद्ध ही कर सकता है साधारण आदमी नहीं। ये अंतराल से जुड़ी बातें है। इनमें समाज की सुख−सुविधा और समाधान प्रमुख है। महर्षि रमण कोढ़ियों की सेवा करते थे और उन्हें अपना भगवान बताते थे। जिसका भाव इतना उच्च हो, वहाँ तो सेवा होनी ही है। अन्यत्र जहाँ ऐसा कार्य दीख पड़े, वहाँ पीछे धनबल प्रधान होता है, परमार्थ भावना नहीं।
भाव संवेदना का क्षेत्र यदि समुन्नत सुसंस्कृत हो तो उसमें सच्ची सहानुभूति उपजती है। दूसरों के लिए कष्ट बंटा लेने और अपनी सुविधाओं को बाँट देने के लिए मन करता है मन ही नहीं करता, साहस भी उभरता है और वे तथाकथित मित्र स्वजनों के असहमत होते हुए भी वैसा आदर्शवादी साहस कर गुजरते है। यही है ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय असतो मा सद्गमय मृत्योर्माअमतं गमय’ के पीछे का वास्तविक तत्वदर्शन।
पेड़ का मालिक पके आमों की खोज बीन करने वृक्ष पर चढ़ा भी,पर आम पत्तों की झुरमुट में ऐसा छिपा कि हाथ आया ही नहीं। दूसरे दिन उसने देखा कि उसके सब पड़ोसी जा चुके, उसका अकेले ही रहने का मोह नहीं टूटा था। अब मित्रों की विरह व्यथा और सताने लगी। आम कभी तो सोचता नीचे कूद जाऊँ और अपने मित्रों से जा मिलूँ, फिर उसे मोह अपनी ओर खींचता, आम इसी उधेड़ बुन में पड़ा रहा।
संशय का यही कीड़ा धीरे धीरे फल को खाने लगा और एक दिन उसका सारा रस समाप्त हो गया। मात्र सूखी बोंडी नर कंकाल के समान पेड़ में लगी रही।
भारत माता ग्रामवासिनी है। इस सत्य से हम सभी परिचित हैं। यहाँ के 72 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। और कृषि के सहारे जीवनयापन करते हैं। हालाँकि सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का योगदान 27-28 प्रतिशत ही है लेकिन 60 प्रतिशत लोग उससे सीधे जुड़े हुए हैं। कृषि जैसे महत्त्वपूर्ण उद्योग से जुड़े रहकर भी इन 60 प्रतिशत लोगों की आय इतनी अपर्याप्त है कि वे अपने दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाते।
इस ग्रामीण जनसंख्या में 28 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे रहते हैं। इसमें सीमाँत किसान, खेतिहर मजदूर, ग्रामीण कारीगर आदि आते हैं। इनकी पारिवारिक आय प्रतिवर्ष औसतन 14 हजार रुपये से कम बैठती है। 250 रुपया प्रतिमाह से भी कम पाने वाले लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। शहरी क्षेत्रों में यह 320 रुपया के आसपास बैठती है। इतनी कम आमदनी से गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोग किस तरह अपनी जीविका निर्वाह करते होंगे इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।
इस स्थिति को बदलने के लिए सर्वप्रथम रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे। यह स्थिति सदैव कायम नहीं रखी जा सकती। हमें यह याद रखना होगा कि आय का सम्बन्ध रोजगार से होता है और रोजगार के अवसर पिछली पाँच शताब्दियों में जितने बढ़ने चाहिए थे उतने नहीं बढ़े। दूसरी तरफ जनसंख्या बढ़कर आज 103 करोड़ के ऊपर हो गई है। दसवीं योजना (2001-02) में अनुमान लगाया गया है कि कोई 70 से 80 लाख नये लोग रोजगार के बाजार में प्रवेश करेंगे। इस बड़ी संख्या में पूर्व से चले आ रहे बेरोजगार शामिल नहीं हैं। दसवीं योजना के पूरी होने पर यदि योजनानुसार रोजगार के अवसर बन गये तब बेरोजगारों की संख्या 6 करोड़ के ऊपर होगी। उसमें से लगभग 70 प्रतिशत अर्थात् 4 करोड़ 20 लाख लोग ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगार होंगे। कृषि में भी इन्हें खपाने की कोई गुंजाइश नहीं है।
कृषि प्रधान देश होते हुए भी यहाँ खेती सामान्यतः छोटे-पैमाने पर होती है। जिनसे किसानों को अपर्याप्त आय होती है। यदि लगातार एक-दो वर्ष तक प्रकृति नाराज रहे अर्थात् सूखा या अधिक वर्षा हो जाये तो आय की कमी अपना भयंकर रूप ले लेती है। किसान कर्ज में आकंठ डूब कर यह साबित करने लगता है कि भारतीय किसान कर्ज में जन्म लेता है और कर्ज में ही मर जाता है। ऐसे में यह अत्यन्त आवश्यक है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सहायक पूरक तथा प्रतिस्थापक उद्योग में कृषि को मुख्य उद्यम मानते हुए उससे उत्पन्न वस्तु को अन्तिम उपयोग की वस्तु बनाने के उद्योग जैसे-दाल, चावल, खाद्य तेल आदि की स्थापना होनी चाहिए। पूरक उद्यम में खेती के काम में आने वाली वस्तुओं का निर्माण होना चाहिए, जैसे-हल, पारी का पंप इसके अतिरिक्त पशुपालन और मुर्गी पालन आदि भी सम्मिलित किये जा सकते हैं। कोई किसान खेती के साथ-साथ उक्त उद्यमों में से तीनों या दो अथवा एक को अपनाकर अपनी कम आमदनी को बढ़ाने का प्रयास कर सकता है।
यह उन लोगों की आयपूर्ति की एक आवश्यकता है जो खेती कर रहे हैं। जिनके पास खेती और काम नहीं है उन्हें तो उन उद्यमों को अपनाना ही होगा जिनसे वे वस्तु बनाकर और विक्रय कर अपनी आय स्रोत बनाये रख सकें। इनमें कृषि श्रमिक और ग्रामीण कारीगर तथा अन्य लोग आते हैं। सवाल उठता है कि किस प्रकार के काम किये जाने चाहिए? निश्चित रूप से उत्पादन के कार्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। फिर सेवा व संरचना के कार्य आते हैं। उत्पादन के क्षेत्र में सर्वप्रथम ग्रामोद्योग को लिया जाना चाहिए, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे लोगों को काम मिल सके और उनके द्वारा निर्मित वस्तुएँ ग्रामीण बाजारों में ही उपलब्ध हो सके। सेवा में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल, विद्युत प्रदाय संचार सेवा आदि हैं जिनका उपयोग कुशलता तथा उत्पादकता निर्माण करने और उनको बढ़ाने में किया जाना चाहिए। निर्मित वस्तुओं को बाजार तक पहुँचाने और बाजार से आवश्यक उपभोग की वस्तु लाने के निमित्त सड़क व अन्य यातायात के साधन आवश्यक हैं। यदि हम रोजगार प्राप्तकर आय निर्माण करते हुए इसे बढ़ाने की दृष्टि से विवेचना करें तो पाते हैं कि ग्रामोद्योग को छोड़कर अन्य क्षेत्रों ने स्थाई व निरन्तर रोजगार प्रदान नहीं किये हैं। जो रोजगार उपलब्ध कराये हैं, वे तात्कालिक ही रहे हैं। व्यवस्थित एवं सुप्रबन्धित बाजार के अभाव में संकट की स्थिति बनी रही। ‘सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना’ ‘प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना’ ‘स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना’ आदि पर गत तीन वर्षों में क्रमशः 9260, 9205 तथा 10270 करोड़ रुपये व्यय किये गये हैं। परन्तु फिर भी स्थाई कार्य उपलब्ध करवाने की समस्या यथावत विद्यमान है।
ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामोद्योगी कार्यक्रम अवश्य स्थाई रोजगार देने में कुछ सक्षम हुए हैं। नवीं योजना के आँकड़ों को देखें तो पाँच वर्षों यानि कि 1997-97, 1998-99, 1999-2000, 2000-2001 और 2001-2002 खादी ग्रामोद्योग में क्रमशः 56.50, 58.29, 59.23, 60.08, 62.40 लाख लोगों को रोजगार मिला था। इस प्रकार पाँच वर्षों में लगभग 56 लाख से बढ़कर यह संख्या 63 लाख अर्थात् 7 लाख अधिक लोग खादी ग्रामोद्योग में काम पा सके हैं। रोजगार की व्यापक आवश्यकता में इस वृद्धि को सिर्फ प्रतीकात्मक रोजगार निर्माण ही माना जा सकता है।
भारतीय नियोजन में लघु तथा ग्रामोद्योगों के लिए एक मद रहती आयी है। तीसरी से नवीं योजना के बीच इस मद में आबंटित राशि 240.8 करोड़ से बढ़कर 14194.01 करोड़ रुपये हो गई थी किन्तु व्यवहार में अब तक सरकार द्वारा यह स्पष्ट ही नहीं हो पाया कि दोनों में भेद क्या है? दोनों का अन्तिम स्वरूप क्या होगा? 1956 में स्थापित ‘खादी ग्रामोद्योग आयोग‘ का ही स्वरूप कुछ हद तक स्पष्ट हो पाया है। यह आयोग तीन उद्देश्यों को लेकर कार्यरत है। रोजगार प्रदान करना, बिक्री योग्य वस्तुओं को उत्पादित करना, लोगों के बीच आत्मावलम्बन को गति देना। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आयोग ने उपयुक्त संस्थानों एवं एजेन्सियों को वित्त प्रदान किया है। खादी ग्रामोद्योग के कार्यक्रम के लिए अनुसंधान करने के साथ-साथ खादी ग्रामोद्योग की वस्तुओं के विपणन को भी बढ़ावा दिया है। इन सब के बाद भी खादी के उपभोक्ताओं की संख्या में निरन्तर कमी आती जा रही है।
आज के उपभोक्ताओं में तड़क-भड़क व प्रदर्शनकारी वस्तुओं की चाह बढ़ती जा रही है। ऐसे में उनके मध्य ग्रामोद्योगी वस्तुओं जिनमें प्रदर्शन कम उपयोगिता अधिक है की जानकारी से ही काम बन सकता है। प्रचार-प्रसार के साथ-साथ उत्पादन में गुणवत्ता व विविधता भी होनी चाहिए। इसके लिए नई तकनीक अपनाने की आवश्यकता है जिससे गुणवत्ता में वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन लागत में कमी आये। वैश्वीकरण के हाल ही के वर्षों में न केवल देशी वस्तुओं में वरन् विदेशी वस्तुओं में भी प्रतियोगिता बढ़ती जा रही है। ऐसे में गुणवत्ता में सुधार ही एक मार्ग है। उपभोक्ता चाहे जो हो भावना से नहीं बल्कि मूल्य व गुणवत्ता के आधार पर वस्तु क्रय करता है।
औद्योगीकरण के दौर में ग्रामोद्योग को भावनात्मक संरक्षण के साथ-साथ सशक्त अनुदान की भी आवश्यकता है। कर नीति में ग्रामोद्योगी वस्तुएँ कर मुक्त रखी जानी चाहिए। उत्पान का क्षेत्र भी निश्चित कर दिया जाये ताकि कुछ वस्तुएँ सिर्फ ग्रामोद्योग में ही निर्मित हो। उन्हें अन्य उद्योग उत्पादित न करें। योजना आयोग की ग्रामोद्योगों की ऋण देने की अनुसंशा तभी सार्थक हो सकती है जब ग्रामोद्योगी वस्तुओं के बाजार निर्माण व व्यापार की शर्तें उनके पक्ष में हो।
उत्पादन एवं वितरण के व्यतिक्रम का ही परिणाम है कि एक ओर धन-सम्पदा का अथाह भण्डार भरता जा रहा है दूसरी ओर लोग रोटी के टुकड़े के लिए तरस रहे हैं। इस रीति-नीति एवं संकीर्ण स्वार्थपरता को बदलना ही होगा। ग्रामीण जीवन की सर्वांगीण उन्नति को सर्वाधिक महत्व दिया जाये तभी व्यक्ति एवं समाज का स्वस्थ विकास सम्भव हो पायेगा। परम पूज्य गुरुदेव ने जिस आध्यात्मिक साम्यवाद की परिकल्पना की थी वह भी तभी साकार हो पायेगी।
शीत रोगों एवं श्वास संबंधी बीमारियों में अतीस का सेवन करना अत्यंत लाभकारी पाया गया है। अतीस क्रॉनिक या एलर्जिक ब्रोन्काइटिस में तो लाभकारी है ही, साथ ही साथ निमोनिया, टी बी, अरधमा, सरदी-जुकाम, हड्डी या जोड़ों का दर्द, गाँठों में दर्द एवं सूजन में भी दूसरी दवाइयों के साथ देने से शीघ्र लाभ पहुँचाती है। इसे आधी रत्ती से आरंभ करके 1 रत्ती एक नित्य सुबह-शाम जल या शहद से साथ रोगी व्यक्ति को खिलाना चाहिए।
अतीस शुद्ध होगी चाहिए। अतीस को शोधित करने के लिए उसे गोमूत्र में 24 घंटे के लिए भिगो देते हैं, तदुपराँत 24-24 घंटे के अंतराल से उसे दूसरी एवं तीसरी बार ताजे गोमूत्र में डालते रहते हैं। इस तरह 72 घंटे तक गोमूत्र में भिगोने के बाद उसे सुखाकर, कूट-पीसकर पाउडर बना लेते हैं और इसी शुद्ध अतीस को दवा के रूप में प्रयुक्त करते हैं।
इंद्र, अग्नि, वायु, आकाश आदि सभी देवताओं का ब्रह्मा ने आवाहन किया। उनके सामने एक तिनका रखा और कहा कि इसे उठाओ, जलाओ और उड़ाओ, पर एक नन्हे से तिनके को हस्ताँतरित करने में कोई भी समर्थ न हुआ। तब ब्रह्मा ने उस तिनके को उठाया, फूँक मारकर उड़ाया और जलाकर भी दिखा दिया। पराभूत देवताओं को उपदेश देते हुए केनोपनिषद में ब्रह्मा ने समझाया कि शक्ति का केन्द्र शरीर नहीं, आत्मचेतना है। शरीर तो जड़ है उसका अभिमान नहीं करना चाहिए।
इस आख्यायिका में बताया गया है कि मनुष्य के शरीर में विभिन्न पदार्थों की सम्मत शक्ति होने पर भी यदि चेतना नहीं है तो मात्र पिंड कुछ नहीं कर सकता। सर्वशक्तिमान चेतना है जड़ शरीर नहीं।वह चेतना, शरीर से स्वतंत्र अस्तित्व है।
ऋग्वेद (1/117/3) में कहा गया है यह जीवात्मा अनेक मार्गों द्वारा शरीर में आता है (शरीर से पैदा नहीं होता) शरीर से पृथक होता है अविनाशी और इंद्रियों का रक्षक होता है। वह शरीर के साथ भी रहता है, शरीर को छोड़कर भी रहता है।
पाश्चात्य वैज्ञानिक अभी कोई ऐसा प्रयोग नहीं कर पाए है, जिससे आत्मचेतना के अस्तित्व की पृथक अनुभूति की जा सके, पर योग साधनाओं द्वारा प्रमाण प्रत्यक्ष प्रदर्शनों द्वारा प्रस्तुत किए है, जिनसे पता चलता है कि आत्मा अज्ञानवश शरीर के व्यापार में आसक्त पड़ी रहे यह अलग बात है, पर वह है स्वशासी, अपनी नियंत्रक आप। अनेक वर्ष पूर्व सुप्रसिद्ध योगी देशबंधु की इस मान्यता को कुछ डाक्टरों ने अमान्य कर दिया, फलस्वरूप मुँबई मेडिकल यूनियन की ओर से श्री देशबंधु का प्रदर्शन कराया गया। उसे देखने के लिए मुँबई मेडिकल कॉलेज के छात्र, स्टाफ और अन्य विशिष्ट नागरिक भी एकत्र हुए। डॉ. बसंत रैले ने उनके शरीर परीक्षण के लिए नियुक्त किए गए। श्री देशबंधु से कहा गया कि यदि आप जानते है कि चेतना को शरीर से भिन्न किया जा सकता है तो आप दाहिने हाथ की शरीर क्रिया को शून्य करके दिखाइए।
श्री देशबंधु ने लंबी श्वास प्रश्वास क्रिया की। उसे कुछ देर तक जारी रखा, फिर दोनों हाथ बाहर निकाल दिए। श्री रैले ने देखा कि बाएँ हाथ की नाडी यथावत धकधक कर रही है, पर दाहिने हाथ की नाडी में संचालन की तनिक भी गति नहीं थी। दोबारा फिर वैसा ही करके उन्होंने दाहिने हाथ की नाडी चलाकर दिखादी और बाएँ हाथ की नाडी गति को शून्य कर दिया। दूसरी बार योगी देशबंधु ने विभिन्न प्राणायाम क्रियाओं द्वारा सारे शरीर को नाडी संस्थानों को तो गतिशील रखा किन्तु हृदय गति देकर मृतक को जिंदा कर दिया हो, जबकि प्रत्यक्ष उदाहरण यह था कि शेष शरीर जी रहा था और शरीर का इंजन हृदय रुका पड़ा था। श्री देशबंधु ने कहा ‘आत्मा स्वतंत्र तत्व है उस पर केंद्रस्थ होकर आश्चर्यजनक दीखने वाला एक काम संभव है।’
डॉक्टरों ने उस समय यह तर्क दिया कि संभव है, यह सब आपने हिप्नोटिज्म द्वारा लोगों को सम्मोहित करके दिखाया हो। इस पर उन्होंने दोबारा प्रदर्शन किया। इस बार कार्डियोग्राम द्वारा विधिवत हृदय गति की जाँच की गई, तो भी परिणाम ज्यों का त्यों रहा। श्री देशबंधु ने इसे महज खेल बताते हुए कहा ‘आत्मचेतना नाडी संस्थानों द्वारा इस शरीर से संबद्ध है। ये क्रियाएँ और कुछ नहीं, मात्र वेगस नर्व’ के नियंत्रण का परिणाम है। भली भाँति नियंत्रित आत्मचेतना से दूरगमन, दूरश्रवण, परकाया प्रवेश ईशित्व, वशित्व, अणिमा, महिमा आदि विलक्षण सिद्धियाँ और सामर्थ्य अर्जित की जा सकती है। अणु से विराट बनने का श्रेय इन साधनाओं द्वारा ही समुलब्ध होता है।
योग मार्ग न सही, ऐसे अनुभव पाश्चात्य लोगों ने भी किए है और माना ही कि शरीर की मुख्य चेतना अपने स्वतंत्र अस्तित्व में रह जाती है। इसकी अनुभूति द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अगस्त, सन 1944 को एक फौजी अफसर को हुई। वह ऑफिसर एक कार द्वारा जा रहा था, तभी जर्मनी की एक एंटी तोपों का सीधा प्रहार हुआ। ऑफिसर की गाड़ी में और भी विस्फोट पदार्थ भरे हुए थे,उसमें भी विस्फोट हो गया। उस समय की स्थिति का वर्णन करते हुए ऑफिसर ने द्वितीय विश्वयुद्ध के मित्र राष्ट्र गजेटियर में लिखा है जैसे ही विस्फोट हुआ, मैं लगभग 7 मीटर दूर जा गिरा। ऐसा लगा कि मैं दो भागों में विभक्त हो गया हूँ। मेरा स्थूल शरीर नीचे जमीन में पड़ा तड़प रहा था उसके कपड़ों में आग लगी थी, जबकि दूसरा शरीर इस शरीर के ऊपर आकाश में गुब्बारे की तरह तैर रहा था। मैं अपने रूप को स्वयं पहचानने में असमर्थ था, यद्यपि वहाँ की हर वस्तु, सड़क के पार का युद्ध दृश्य झाड़ियां जलती कार, मैं सब कुछ स्पष्ट देख रहा था। मेरे भीतर से इसी बीच एक अंतःप्रेरणा उठी कि जल्दी जल्दी शरीर को जमीन से रगड़ो, ताकि आग बुझ जाए। शरीर ने ऐसा ही किया। वह लुढ़ककर बगल की खाई में जा गिरा। खाई में कुछ नमी थी। आग बुझ गई और मुझे ऐसा लगा जैसे एक पक्षी द्वारा घोंसले में प्रवेश की तरह मैं फिर उसी शरीर में आ गया। अब मुझे शरीर की पीड़ा का भान होने लगा, जबकि थोड़ी देर पूर्व यही दृश्य मैं मात्र दर्शक बना देख रहा था।
यह उदाहरण विवेक-चूड़ामणि की इस सत्यता का ही बोध कराता है :-
असंडोअहमनमलिडोअहमभंगुरः। प्रशान्तोअहमनन्तोअहं चिरन्तनः॥490॥
मैं (आत्मचेतना) असंग हूँ, मेरा कोई संग नहीं, मेरा नाश नहीं होता, अत्यंत शाँत, अनंत, अताँत और चिरंतन हूँ। मेरा कोई आदि अंत नहीं।
भारतीय दर्शन के इन गूढ रहस्यों का मर्म रामकृष्ण परमहंस बहुत सीधे सादे उदाहरण से समझाया करते थे, कहा करते थे-जिस तरह प्याज की गाँठ का छिलका उतार दो, दूसरा छिलका आ जाता है। छिलके उतारते जाओ, अंत में उसका बीज मात्र रह जाता है। उसी प्रकार शरीर के पदार्थ की समीक्षा और विश्लेषण करते जाओ तो समस्त स्थूल पदार्थों के बाद जो शेष बचेगा, वह आत्म चेतना ही होगी।
इसकी विधिवत अनुभूति लंबी योग साधनाओं से संभव है पर कई बार आकस्मिक घटना भी आत्मचेतना के पृथक अस्तित्व का बोध करा देती है। जम्मू में शिक्षा विभाग के एक मध्यम श्रेणी कर्मचारी श्री गोपीकृष्ण थे। उनके किसी पुस्तक में पढ़ रखा था कि मस्तिष्क मध्य ज्योतिर्लिंग का ध्यान करने से परमात्मा की अनुभूति होती है। एक दिन वे इसी तरह ध्यान कर रहे थे। जिज्ञासा की प्रखरता में बड़ी प्रबल शक्ति ही मन की चंचलता के कारण ध्यान का जो लाभ कुछ लोग वर्षों अभ्यास के बाद भी नहीं ले पाते, वह उनकी तीव्र जिज्ञासा के क्षणभर में प्रदान कर दिया। उन्हें सहस्रार की स्पष्ट अनुभूति अकस्मात हो गई। वे समझ न सके, यह क्या हुआ। वे एक दिव्य लोक में खोए रहने लगे।
एक दिन वे तवी पुल पार कर रहे थे, तभी एक प्रकार के बोध के साथ ही उनके मस्तिष्क में बहुत ही दिव्य भाव छंदबद्ध काव्य के रूप में उदित हुए। साधारण शिक्षित व्यक्ति में असाधारण कवित्व शक्ति का उदय उनके लिए एक आश्चर्य बन गया। वे कविताएँ लिखने लगे। आश्चर्य तब और भी गहरा हो गया, जब उनके मुख से जर्मन, फ्रेंच, अरबी, संस्कृत आदि भाषाओं में काव्य धाराएँ फूटने लगी, जिनका कि उन्हें ज्ञान तक न था। उन रचनाओं की जाँच की गई तो पाया गया कि वे व्याकरण की मर्यादा के अंतर्गत है और उनमें प्रस्तुत विचार शृंखलाबद्ध नियमित और स्पष्ट है। रहस्य को न समझने पर भी सबने माना कि श्री गोपीकृष्ण के शरीर में किसी ऐसी सत्ता का विकास हो गया है, जो शरीर और मन की पहुँच से बहुत व्यापक पहुँच वाली है। ये विलक्षण घटनाएँ देखकर योगवासिष्ठ के ये कथन याद आते है।आत्मा का शरीर से कोई संबंध नहीं। अंधकार और प्रकाश की तरह दोनों दो विलक्षण पदार्थ है। (6/16/6) सोना कीचड़ में गिर जाने से उस पर कीचड़ का आवरण चढ़ गया जान पड़ता है तथापि सोने के कणों की शुद्धता में कोई अंतर नहीं आता। उसी प्रकार शरीर में आ जाने पर भी आत्मा के अस्तित्व में किसी प्रकार का अंतर नहीं आता। (5/5/25)
जो सब में अपने का अपने में सबको देखते है जो दुःख बँटाते और सुख बाँटते है, जिनके लिए समस्त संसार अपना कुटुँब है,ऐसे उदारचेता मनुष्य अपनी कर्मसाधना से परमात्म सत्ता के साथ घनिष्ठ होते जाते है। -परमपूज्य गुरुदेव
यदा कदा व्यक्ति को ऐसी सद्प्रेरणाएं मिल जाती है जिनसे उनका कोई बड़ा नुकसान टल जाता है। प्रियजन अथवा स्वयं उसकी आत्मरक्षा हो जाती है। इसे वह बड़ा चमत्कार मानने लगता है और तरह तरह के संज्ञा संबोधन देने लगता है। कभी भगवान की अहैतुकी कृपा मान बैठता है, पर इस बात को भुला देता है कि जिसे वह अचम्भा मान बैठा है वस्तुतः इसमें वैसा कुछ है नहीं। परिष्कृत अंतःकरण ही वह कारण है जिसकी उपलब्धि बन पड़ने पर ऐसी घटनाएँ घटने लगती है। तनिक उच्च भावभूमि की उपलब्धि हो जाने पर ये घटनाएँ सामान्य जीवनक्रम का अभिन्न अंग बन जाती है और फिर व्यक्ति अनवरत रूप से ऐसी सूक्ष्म तरंगों से संबंध बनाए रह सकता है।
आएदिन ऐसी घटनाएँ घटती ही रहती है। एक घटना साउथ बेट, कैलिफोर्निया की है। वहाँ के एक समाजसेवी थी आर. एल. बेजेडिक्ट अपनी एक सहयोगिनी श्रीमती एम बी जीन के साथ फिलाडेल्फिया के लिए अपनी कार में यात्रा कर रहे थे। कुछ खराबी के कारण एक स्थान पर कार खड़ी करनी पड़ी। कार पार्किंग के लिए वहाँ विशाल क्षेत्र था। श्रीमती जीन कार खड़ी कर रही थी तभी अचानक श्री बेनेडिक्ट के अंतःकरण में एक प्रवाह आया और वे कहने लगे कि कृपया गाड़ी यहाँ खड़ी न करें कुछ अनर्थ हो सकता है। जीन उस पर विश्वास करती थी। उनने स्थान बदल दिया। सभी उतरकर आवश्यक वस्तुएँ खरीदने लगे। इसमें काफी समय लग गया। जब वे लोग लौटे तो दृश्य देखकर आश्चर्य का ठिकाना न रहा। जिस स्थान पर कार खड़ी करने से मना किया था उसी स्थान पर खड़ी दूसरी कार मकान गिरने से चकनाचूर हो गई थी। उनकी कार सुरक्षित बच गई। यह दैवी प्रेरणा ही थी।
दूसरी घटना का उल्लेख करते हुए श्री आर एल बेनेडिक्ट बताते हैं कि हम सभी परिवार के सदस्यगण यात्रा कर रहे थे और एक ऊँची पहाड़ युक्त घनघोर जंगल से गुजर रहे थे। उनका छोटा लड़का कार चला रहा था। अचानक उन्हें ऐसी अनुभूति हुई कि कोई दुर्घटना होने वाली है। वे जोर से चिल्लाए मिक, कार की गति तुरंत कम करो, ऐसा न करने पर कोई बड़ी दुर्घटना होने वाली है। इसके कारणों की व्याख्या करने के लिए समय नहीं है।” तुरंत ही मिक ने आज्ञा का पालन किया और गति कम कर दी। अगले मोड़ पर सामने ही हिरणों का झुँड गुजर रहा था। यदि गति कम नहीं की जाती तो सुनिश्चित तौर पर दुर्घटना घटती। ब्रेक लगाने पर कुछ इंच पर गाड़ी जाकर रुकी ओर एक बड़ी दुर्घटना टल गई।
प्रेरणाएँ दिव्य अंतःकरण से प्रस्फुटित होता है। जहाँ कषाय कल्मषों का घनीभूत आवरण है वहाँ उनका प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है इसलिए सर्वसाधारण के लिए लोग इस दैवी प्रवाह का लाभ नहीं उठा पाते। जो अंतराल की इस अपरिष्कृति को घटाने मिटाने में सफल होते है समझना चाहिए उनने आत्मदेव को प्रसन्न कर लिया। इसके अतिरिक्त यह अंतःकरण इतना सामर्थ्य है कि वह दूसरों को भी प्रेरणा मार्गदर्शन दे सकता है। इसी आधार पर ऋषि मनीषी अपने परिकर से जुड़े लोगों को वैचारिक दबाव देकर सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते थे। इसी को विचार संप्रेषण कहा जाता है। इसे अब पूर्णतः विज्ञानसम्मत माना गया है।
एरलिंगटन, टेक्सास की श्रीमती बी एन केन्योन अपने जीवन में घटी घटनाओं से इसकी पुष्टि करती है। वे लिखती है कि मेरे पति मानसिक तनाव से गुजर रहे थे। उन्हें एक बार बैंक से लोन लेना पड़ा जिसको समय परा चुका देने के लिए उनके बड़े भाई ने आश्वासन दिया था किन्तु समय पर उसने चुका पाने के कारण बैंक से दबाव पड़ने लगा। परिस्थिति इतनी बिगड़ गई कि मेरे पति को कुछ सूझ ही नहीं पड़ता था। वे रात्रि के देर तक काम करते रहे और फिर कमरे से बाहर चले गए किन्तु उनका यह व्यवहार मुझे विचित्र नहीं लगा, क्योंकि वे प्रायः ऐसा किया करते थे। रात्रि में टहलने के लिए पास के पार्क में चले जाया करते थे, किन्तु उस रात जब पुत्र सो गया तो मुझे ऐसा लगने लगा कि कुछ अनर्थ होने वाला है। मैं उठ बैठी और जोर से कहने लगी?, ‘टोबी! ऐसा मत करो,’ मुझ पर दया करो। अचानक उठने वाले ये भाव अत्यंत गहराते चले गए और अपना विचार प्रवाह उन तक पहुँचाने की मनः स्थिति बनाकर कहने लगी, ‘टोबी! जल्दी घर आओ, हमें इस तरह छोड़कर न जाओ। अपने बच्चों के बारे में सोचो। ऐसा मत करो। जिससे मुझे उम्रभर दुःख भोगना पड़े। मुझे तुम्हारी आवश्यकता है। जल्दी घर आओ।’ मैं भाव जगत में गहरे उतरकर इसी तरह उन्हें बुलाने लगी।
अचानक तभी दरवाजा खुला और उनके आते ही मैं बोल पड़ी, कृपया वादा करें कि फिर ऐसा कभी नहीं करने की सोचेंगे। उन्हें आश्चर्य हुआ, पूछा ‘तुम कैसे जानती हो?’ तुम्हें कैसे मालूम कि तुमसे दूर मैं क्या योजना बना रहा था? मैंने उनसे कहा मैं नहीं जानती कि मुझे कैसे भान हुआ, पर कुछ अनिष्ट होने वाला है, इसकी स्पष्ट अनुभूति हो रही थी, उन्होंने बताया कि उनकी टेबल की दराज में पिस्तौल थी और वे योजना बना रहे थे कि इससे आत्महत्या की जाए किन्तु अचानक एक तीव्र प्रवाह आया और ऐसा लगा, मानो कोई उन्हें खींच रहा है इस तीव्रता से कि उनसे रुकते ही नहीं बना और वे घर की ओर चल पड़े।
ऐसी ही एक घटना का उल्लेख ‘बियॉण्ड मिरैकल’ नामक ग्रंथ में फ्रैंकल इरा प्रोगाफ ने किया है। वे लिखते है कि एक बार वे अपने मित्र के साथ कार में सैर के लिए निकले। भ्रमण के लिए जो रास्ता चुना गया, वह एकदम सुनसान था। रोड के दोनों ओर सघन वन था। गाड़ी पूरी गति से दौड़ी चली जा रही थी तभी अचानक सामने कुछ जंगली भैंसे आ गए। प्रोगाफ गति नियंत्रित कर पाते इसके पूर्व ही कार पूरे वेग से भैंसों से जा टकराई। कई भैंसे घायल हुए। एक वहीं रोड पर गिर पड़ा और तड़पने लगा। कुछ समय पश्चात उसने दम तोड़ दिया। उधर कार उछलकर बगल की खाई में जा गिरी। खाई इतनी संकरी थी कि वह उसमें ऐसे समाई कि उसके दोनों ओर अटक गए। दोनों से लाख कोशिश की, पर खोल नहीं पाए। परिणामस्वरूप उन्हें अंदर ही बंद रहना पड़ा। दोनों को काफी चोटें आई। वहाँ से निकलने का कोई मार्ग न देख उनने एस ओ एस संदेश देना शुरू किया। मानसिक स्तर पर प्रसारित इस संदेश से प्रोगाफ के भाई को बेचैनी होने लगी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसका भाई संकट में है। बार बार उसके मन में यही विचार आने लगा। अंततः उसने उसकी खोज कर निकलने का फैसला किया। वह अपने तीन मित्रों के साथ एक कार में निकल पड़ा। संयोग ऐसा कि वे उसी ओर उसी सड़क पर बढ़ने लगे जिस पर प्रोगाफ दुर्घटनाग्रस्त हुआ सहायता की प्रतीक्षा कर रहा था। सामने रोड पर भैंसे को मरा हुआ देखकर उन्हें कुछ संदेह हुआ। वे सब गाड़ी से उतर पड़े और बगल की खाई में झाँकने लगे, तभी प्रोगाफ और उसके मित्र के चिल्लाने की आवाजें आई। तीनों से खाई में उतरकर मुश्किल से कार के गेट को खोला और उन्हें बाहर निकला।
इन घटनाओं से स्पष्ट है कि मनुष्य चाहे तो दूसरों तक अपना विचार प्रवाह संप्रेषित कर उन्हें आवश्यक प्रेरणा मार्गदर्शन दे सकता है एवं स्वयं मौका पड़ने पर इस तरह की विचार तरंगें ग्रहण कर सकता है। यह क्षमता हर व्यक्ति में सन्निहित है पर भाव संस्थान अनगढ़ होने के कारण वह उस क्षमता का लाभ नहीं उठा पाता। यदि वह अपनी भावनाओं को तनिक उच्चस्तरीय बना ले तो फिर अनायास ही उसे इस प्रकार के सूक्ष्म मार्गदर्शन एवं प्रेरणाएँ मिलती रह सकती हैं। इतना बन पड़ने पर वह न सिर्फ दूरस्थ व्यक्ति से संपर्क साधने में समर्थ हो सकेगा, वरन् आस पास उमड़ते घुमड़ते उन समस्त श्रेष्ठ विचार प्रवाहों के अतिरिक्त ब्राह्मीचेतना से भी तादात्म्य स्थापित करने में सफल हो सकेगा, जो उसके आत्मिक विकास में सहायक हो सके।
राजा विक्रमदेव एक बार जंगल में आखेट के लिए निकले। जंगल में भटक गए। साथी भी कहीं मार्ग में छूट गए।निविड वन में प्यास के कारण राजा का दम घुटने लगा। कही पानी दिखाई नहीं दे रहा था। सामने एक पर्णकुटी पर दृष्टि पड़ी। किसी तरह कुटी तक राजा पहुँचे। भीतर देखा ता एक साधु समाधिमग्न थे। इतने में राजा मूर्च्छित होकर गिर पड़े।
मूर्च्छा दूर हुई तो महाराज विक्रमदेव ने देखा वही संत उनका मुँह धो रहे है तथा पंखा झल रहे हैं। होश में आते ही संत ने राजा को पानी पिलाया। राजा ने विस्मयवश पूछा “आपने मेरे लिए समाधि क्यों भंग की? अपनी उपासना क्यों बन्द कर दी?” संत मधुर वाणी में बोले, “वत्स! भगवान की इच्छा है कि उनके संसार में कोई दुखी न रहे। उनकी इच्छा की पूर्ति आवश्यक है। दूसरों की सेवा से ही उपासना फलवती होती है।”
भारतीय संस्कृति में प्रकृति और पर्यावरण की अर्चना एवं आराधना की पुण्य भावना सन्निहित है। इसमें अन्तःकरण और पर्यावरण के घनिष्ठ सम्बन्धों की बड़ी ही साँकेतिक एवं अलंकृत शैली में विवेचना की गयी है। प्राच्य ऋषियों ने मनुष्य की पराप्रकृति अर्थात् जीवसत्ता एवं अपराप्रकृति अर्थात् प्रकृति परिवेश के सूक्ष्म एवं स्थूल सम्बन्धों पर व्यापक चिंतन करके प्रकृति के विकासक्रम को पूर्ण करके इससे उर्ध्व स्तरों पर आरोहण का निर्देश किया है। भारतीय संस्कृति में जीवन को मूर्त एवं अमूर्त रूप में पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र, नदी, निर्झर, उपवन, वृक्ष-वनस्पति, पशु-पक्षी आदि के साहचर्य एवं सहयोग के रूप में देखा गया है। अतः पर्यावरण का संरक्षण यहाँ का धर्म कर्त्तव्य रहा है।
पर्यावरण शब्द का तात्पर्य है-हमारा चारों ओर का आवरण। इसके अंतर्गत पंचमहाभूत आते हैं। जबकि परिवेश में आसपास की वस्तुएँ आती हैं। एक ही परिवेश में भिन्न-भिन्न वातावरण हो सकते हैं। वातावरण में विचारों एवं भावनाओं का चुम्बकत्व घुला-मिला होता है। पर्यावरण का दायरा परिवेश बड़ा एवं विस्तृत होता है। पर्यावरण का संतुलन इनमें विद्यमान पंचमहाभूतों के संतुलन पर निर्भर करता है। इनके समुचित समन्वय एवं संतुलन से ही पर्यावरण को संरक्षित किया जा सकता है। आर्य ऋषि-मनीषी पर्यावरण संरक्षण के इस तत्त्व को बड़े ही सूक्ष्म एवं बारीकी से जानते-समझते थे। उन्हें पर्यावरण और प्राणियों के मध्य विद्यमान अंतर्संबंधों का स्पष्ट ज्ञान था। यही कारण है कि भारतीय चिंतन में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है, जितना मानव जाति का इतिहास।
भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण का भाव अति प्राचीन एवं पुरातन है और यह इतना ही नवीन व सामयिक भी है। प्राचीन काल में इसका स्वरूप भिन्न था। यह मानव जीवन के नियमित क्रियाकलापों एवं गतिविधियों से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था। इसी कारण वेदों, उपनिषदों से लेकर कालिदास, दाण्डी, पन्त, प्रसाद आदि सभी के काव्य में इसका व्यापक, विस्तृत व रोचक वर्णन किया गया है। वैदिक ऋषि प्रार्थना करते हैं-’पृथ्वी, जल, औषधि एवं वनस्पतियाँ हमारे लिए शुभ एवं लाभप्रद हों।’ इनके अभाव में मानव जीवन की सुख-शान्ति की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। उपनिषद् के द्रष्ट भावभरे शब्दों में स्तुति करते हैं- हे अस्वरूपधारी परमात्मा! बालू तुम्हारे उदरस्थ अर्धजीर्ण भोजन हैं, नदियाँ तुम्हारी नाड़ियाँ हैं, पर्वत-पहाड़ तुम्हारे हृदयखण्ड हैं, समग्र वृक्ष-वनस्पतियाँ एवं औषधियाँ तुम्हारे रोम सदृश हैं। ये सभी हमारे लिए शिव हों, कल्याणकारी हों। हम नदी, वृक्षादि को तुम्हारे अंग स्वरूप समझकर इनका सम्मान और संरक्षण करते हैं। ये उदात्त विचार भाव पर्यावरण के प्रति हमारे गम्भीर एवं गहन दृष्टिकोण से अवगत कराते है।
पर्यावरण के प्रति आदर एवं संरक्षण का यह भाव यहीं तक सीमित एवं आबद्ध नहीं रहा, बल्कि पुराणकाल तक संचरित हुआ है। समुद्र मन्थन से वृक्ष के प्रतिनिधि के रूप में कल्पवृक्ष का निकलना एवं देवताओं द्वारा उसे संरक्षण-सम्मान प्रदान करना इसके जीवन्त उदाहरण हैं। मत्स्यपुराण में भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, गर्ग, विशालाक्ष आदि अट्ठारह ऋषियोँ-मनीषियों का उल्लेख मिलता है जिन्हें पर्यावरण एवं प्राणियों के सम्बन्धों का गहरा ज्ञान था। अग्निपुराण, मत्स्यपुराण एवं भविष्यपुराण में भी इसी प्रकार का विवेचन-विश्लेषण हुआ है। भगवान् कृष्ण की गोवर्धन पूजा का लौकिक पक्ष यह स्पष्ट करता है कि जन सामान्य, मिट्टी, पर्वत, वृक्ष एवं वनस्पति का आदर व सम्मान करना सीखे। भगवान् कृष्ण वे स्वयं को ऋतु स्वरूप, वृक्ष स्वरूप, नदी स्वरूप एवं पर्वत स्वरूप कहकर इनके महत्त्व एवं विशेषता को इसलिए रेखाँकित किया है कि हमें इनकी अभ्यर्थना करना आना चाहिए।
भारतीय विचारधारा में जीवन का विभाजन भी प्रकृति पर ही आधारित-आश्रित था। आश्रम व्यवस्था के रूप में जीवन के इस विभाजन में चार में से तीन आश्रम तो पूरी तरह से प्रकृति के साथ ही व्यतीत होते थे। विद्याध्ययन हेतु गुरु गृह में प्रवेश कराने वाला ब्रह्मचर्य आश्रम के लिए गुरुकुल सदैव वन-प्रदेश एवं नदी तट पर हुआ करते थे। यहाँ आकर बालक प्रकृति के आँचल में पलता-बढ़ता एवं विद्यार्जन करता था। आचार्य उसे विद्या के साथ-साथ प्रकृति के साथ तालमेल एवं सामंजस्य का सूत्र भी सिखाते थे। वानप्रस्थ आश्रम में व्यक्ति वन-प्रान्तरों में रहकर आत्मचिंतन तथा जनकल्याण का कार्य करता था। संन्यास आश्रम में तो समग्र उत्तरदायित्वों एवं जिम्मेदारियों को भावी पीढ़ी को समर्पित-अर्पित कर निर्जन वन एवं गिरि-कन्दराओं में रहकर आत्मकल्याण हेतु तप करने का विधान तय किया गया था।
गृहस्थाश्रम भी प्रकृति से अनछुआ एवं अछूता नहीं रहा है। इसमें वृक्ष-वनस्पतियों को पूजन-अर्चन के रूप में लिया गया है। धार्मिक कार्यों में इनके महत्त्व का दृष्टिगोचर होते हैं। धार्मिक मान्यताओं में पीपल को पूज्य मानकर उसे अटल सुहाग से सम्बद्ध किया गया है। भोजन में तुलसी का भोग पवित्र माना गया है तथा बिल्व वृक्ष को भगवान् शंकर से जोड़ा गया है। दाक्, पलाश, दूर्वा, कुश आदि को नवग्रह पूजा आदि के पुण्य कार्यों में सम्मिलित किया गया है। पूजा के कलश में सात नदियों का जल एवं सप्तभृत्तिका का पूजन करना नदी व भूमि को पवित्र बनाये रखने की भावना संचरित करता था। सिंधु सभ्यता की मोहरों पर वृक्षों का मुद्रण करना, सम्राटों द्वारा अपने राजचिन्ह के रूप में वृक्षों एवं पशुओं को स्थान देना, गुप्त सम्राटों द्वारा बाज को पूज्य मानना, मार्गों में वृक्ष लगवाना, कुएँ एवं जलाशय खुदवाना, दूसरे प्रदेशों से वृक्ष मँगवाना आदि तात्कालिक प्रयास-पुरुषार्थ पर्यावरण के प्रति गहन प्रेम को ही प्रदर्शित करते हैं।
इस तरह भारतीय चिंतन में पर्यावरण के प्रति उच्चस्तरीय भाव सन्निहित थे। पश्चिम का दार्शनिक चिंतन उर्ध्व स्तरों की चर्चा न कर मात्र मानव तथा प्रकृति के सम्बन्धों को सूक्ष्म व स्थूल स्तर पर लेता है, जबकि आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में इन सम्बन्धों का दायरा केवल स्थूल स्तर तक सीमित व सिमट कर रह गया है। अध्ययन के आधार पर प्राप्त तथ्यों की विवेचना-व्याख्या करने पर पता चलता है कि प्राच्य ऋषियों का उद्देश्य बाह्य प्रकृति से अन्तःप्रकृति में प्रवेश कर तथा उससे परे व पार जाकर आनन्द पाना था। पश्चिमी दार्शनिकों में से अधिकाँश का लक्ष्य बाह्य प्रकृति के साथ अन्तःप्रकृति का सम्बन्ध सूत्र स्थापित कर अन्तरंग में रमणकर सुख की उपलब्धि थी। जबकि आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में यह लक्ष्य बाह्य प्रकृति से अधिकाधिक प्राप्त कर मात्र उसका उपभोग करना रह गया है।
वैज्ञानिक चिंतन प्रकृति-पर्यावरण और मानव के बीच के सूक्ष्म व संवेदनशील सम्बन्धों को पूरी तरह भुला देने के कारण ही प्रकृति का घनघोर दोहन-शोषण की स्वार्थमयी घृणित प्रक्रिया चल पड़ी है। आज हम अपनी ही प्रकृति माता का चीरहरण करने का अक्षम्य अपराध करते चले जा रहे हैं। इसलिए प्रकृति भी सिंहनी की तरह उठ खड़ी हुई है। पर्यावरण और अन्तःकरण के विघटन एवं टूटन से ही विभिन्न प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोग पनप रहे हैं। आज इस तथ्य की पुष्टि करते हुए व्यवहार विज्ञानी, मनोवैज्ञानिक एवं पर्यावरणविद् स्वीकारने लगे हैं कि व्यक्ति के अन्तःकरण की संरचना तथा मनःस्थिति निकटस्थ पर्यावरण के विघटन की स्थिति पर निर्भर करती है। आज के पर्यावरणविद् को यह मानने में कोई संकोच नहीं हो रहा है कि संक्रामक रोग की तरह जनमानस में फैल रहा विघटन फ्रायड द्वारा बनाई गई कामुक वासनाओं के दमन के कारण नहीं, अपितु पर्यावरण तथा अन्तःकरण के सम्बन्धों को विस्मृत करने तथा पर्यावरण में विघटन उत्पन्न करने के कारण है।
पर्यावरण असंतुलन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न उन्मादग्रस्त मनःस्थिति की विडम्बना से मुक्ति पाने के लिए उन मधुर सम्बन्धों को वृक्षारोपण, हरीतिमा संवर्धन आदि के माध्यम से पुनः स्थापित करना होगा। इस पुण्य परम्परा के प्रति पुनः सजगता एवं सक्रियता का भावबोध उत्पन्न करना होगा। इसके लिए ऐसे वृक्षों का चुनाव करना चाहिए जो छायादार शीघ्र पनपने वाले तथा आर्थिक मूल्य वाले हों, जो वृक्ष मनभावन, सुन्दर एवं गृह उद्योग, कुटीर उद्योग के लिए उपयुक्त हों, उनका वृक्षारोपण में प्रयुक्त करना चाहिए। ऐसे वृक्षों में गुलमोहर, अशोक, अमलतास, कचनार, सैंजना, जकरण्डा, ढाक, केशिया, सामिया, बकायन आदि प्रजातियाँ को सड़क किनारे या किसी उपर्युक्त स्थल पर रोपित किया जा सकता है।
सदाबहार गुलमोहर छायादार एवं सदा हरा रहने वाला वृक्ष है। इनके नारंगी तथा गहरी लाली लिये हुए फूल गुच्छों में बड़े मनभावन लुभावने एवं आकर्षण होते हैं। इसमें अप्रैल से जुलाई तक फूल आते हैं, बीज बोने के चार-पाँच वर्ष पश्चात् ही इसमें फूल आने प्रारम्भ हो जाते हैं। इसकी एक और प्रजाति होती है, जिसमें सफेदी लिए पीले तथा क्रीम रंग के फूल फरवरी से मार्च तक आते हैं। ढाक के सुन्दर फूलों ने कवियों को आकर्षित किया है। ढाक एक छोटा एवं मध्यम आकार वाला झुरमुट वृक्ष है, जो पथरीली, पहाड़ी, मैदानी एवं कम उपजाऊ भूमि पर उगता है। ये हरे और भूरे रंग के होते हैं और तेज गर्मी में अप्रैल से जून तक की अवधि में हरे-भरे रहते हैं। इसमें मार्च में लाल-काले, गहरे भूरे, पीलापन लिए हुए चमकीले विभिन्न रंगों से युक्त फूल आते हैं। इसका वृक्ष कई प्रकार से उपयोगी है।
जकराण्डा खुले छत्रवाला मध्यम आकार का सुन्दर वृक्ष है। यह मार्च से मई तक नीले छोटे-छोटे सुन्दर फूलों से ढँका रहता है। इसकी लकड़ी कठोर एवं अच्छी प्रकार की होती है। गधाप्लाश लघु आकार का शीघ्र पनपने वाला वृक्ष है। इसके गुलाबी, पीले फूल बहुत ही मनभावन एवं आकर्षण होते हैं, जो समूह में फरवरी से अप्रैल तक खिले हुए रहते हैं। इसकी लकड़ी से आकर्षण वस्तुएँ से बनायी जाती हैं। अशोक धार्मिक मान्यता प्राप्त मंगलकारी वृक्ष है। धार्मिक अनुष्ठान के समय इसके पत्तों से घर को सजाया-सँवारा जाता है। अशोक सदा हरा रहने वाला आकर्षक एवं सुडौल वृक्ष है। इसकी शाखाएँ चहुँओर सघन पत्तियों से फैलने वाली होती है। शृंगारिक वृक्ष कचनार सुन्दर आकार का सदाबहार वृक्ष है। इसकी शाखाएँ सघन होती हैं। इसका शिखर गोल होता है। इस वृक्ष का महाकवि कालिदास ने रोचक वर्णन किया है। इसमें गुलाबी फूल नवम्बर से फरवरी तक खिलते हैं।
अमलतास खुले छत्रवाला मध्यम आकार का पर्णपाती वृक्ष है। जनवरी से मार्च तक यह वृक्ष सुनहरे पीले फूलों के गुच्छों से प्राच्छादित होता है। इसकी फल्ली औषधि में प्रयोग होती है। शहदमी सुगन्ध बिखेरने वाला, सैंजना मध्यम एवं छोटे आकर में तेजी से बढ़ने वाला वृक्ष है। यह बहुआयामी गुणों वाला वृक्ष है, जिसके जड़ से बीज तक सभी अंग उपयोगी होते हैं। इसमें फरवरी से अप्रैल तक सफेद सुगन्धित फूल आते हैं।इस प्रकार अनेक और भी सुन्दर उपयोगी एवं आकर्षक वृक्ष हो सकते हैं,जिन्हें रोपणकर पर्यावरण को समृद्ध एवं संरक्षित किया जा सकता है।
हरीतिमा संवर्धन से अशान्त, उद्विग्न मनःस्थिति को शान्त किया जा सकता है तथा संवेदना भावना को निखारा-उभारा जा सकता है। हरे-भरे वृक्ष, आकर्षक पुष्प, नदी-नाले, झरनों से मन प्रसन्न एवं भावना उल्लसित हो उठती है। ऐसे में मानवीय अन्तःकरण चारों ओर के पर्यावरण से जुड़कर एकत्व की अनुभूति करता है, इस अनुभूति में ही व्यक्तित्व के विघटन एवं बिखराव को रोकने और मानवीय चेतना के आरोहण एवं विकास के सूत्र निहित हैं। अतः पर्यावरण संरक्षण एवं सम्मान के प्रति सजग-सतर्क होना हम सबका पावन कर्त्तव्य है।
एक संत के पास एक व्यक्ति दुखी होकर आया। “मैं अभागा हूँ, मेरे पास कुछ भी नहीं है। ऐसा जीवन जीने से तो अच्छा है, स्वयं को समाप्त कर लिया जाए।” संत ने कहा, “तुम्हें अपने पास छिपी विभूतियों की जानकारी है? यदि न हो तो मैं देता हूँ। तुम अपनी एक आँख, एक हाथ व एक पैर के बदले में क्या लेने को तैयार हो? प्रत्येक के लिए मैं एक-एक लाख स्वर्णमुद्राएं देता हूँ।” व्यक्ति बोला, “भगवन्? ये तो मैं दे नहीं सकता। इनके बिना मैं जीऊँगा कैसे?” तब संत बोले, “रे मूर्ख? करोड़ों को संपदा तो अपने साथ लिए धूम रहा है व रोना यह रोता है कि मेरे पास कुछ भी नहीं है।”
मधुवर्त नामक वैश्य महाराज समुद्रदत्त के यहाँ नौकरी करता था। जितना मिलता था, उसमें घर का अच्छा गुजर-बसर चलता था। बालक-बच्चे सभी सुखी थे। एक दिन मधुवर्त जंगल से गुजर रहा था तो एक पीपल से आवाज आई, “सात घड़ा धन लोगे?” मधुवर्त लालच में आ गया। उसने “हाँ” कर दी। अदृश्य आवाज ने कहा, “जाओ तुम्हारे घर पहुँचा दिए जाएँगे।” मधुवर्त घर लौटा तो पत्नी ने बताया, “सातों घड़े आ गए हैं।” उसने सातों देखे। छह तो भरे थे। एक आधा खाली था। मधुवर्त को उसे पूरा करने की चिंता सताने लगी। अब उसने अपना, बच्चों का सभी का पेट काटना शुरू कर दिया। फलतः स्वयं हो चला दुर्बल, बच्चे करने लगे उत्पात, पत्नी कभी उसकी तरफ, कभी बच्चों की तरफ। घर में हाहाकार मच गया। एक दिन इसी शोक में डूबे मधुवर्त को देखकर महाराज समुद्रदत्त ने पूछा, “कहीं तुम्हें यक्ष के सात घड़े तो नहीं मिल गए?” मधुवर्त ने कहा “हाँ महाराज।” वे हँसकर बोले, “तुम्हारे दुखों का यही कारण है, सुख चाहो तो उन्हें लौटा दो।” गलती समझ में आई तो मधुवर्त ने घड़े लौटाए और जितना भी कुछ अपने पास था, उसी में गुजारा करने लगे।
अथर्ववेदीय पिप्पलाद संहिता के ‘प्राण सूक्त’ में निर्भयता का संकल्प ऐसा है, जिसे बार-बार दोहराया जाना पाठ किया जाना चाहिए। इससे हमारे अंदर की निर्भयता को प्रेरणा और शक्ति मिलेगी और वह गंभीर संकट की स्थिति में भी तनकर खड़ी हो जाएगी।
अभयावस्था अध्यात्म का एक ऐसा गुण है, जिसके न रहने पर व्यक्ति जीवन में अनेक बार मरता है जबकि निर्भय आदमी की मौत सिर्फ एक बार होती है इसलिए हमारी आँतरिक संरचना ऐसी सुदृढ़ होनी चाहिए, जिसमें यह नौबत न आए तो ही अच्छा। इसी निमित्त सूक्त प्रेरणा देते हुए कहता है :-
यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिष॥
जिस प्रकार की द्यौ और पृथ्वी न तो किसी से डरते है और न क्षीण होते है उसी प्रकार हे प्राण! तू न तो किसी से डर और न क्षीण हो।
यथा वायुश्चाँतरिक्षं च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिष॥
जिस प्रकार वायु और अंतरिक्ष न किसी से डरते है और न क्षीण होते है उसी तरह हे प्राण! तू न तो किसी डर और न क्षीण हो।
यथा सूर्यश्च चंद्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः॥
जिस प्रकार सूर्य और चंद्रमा न किसी से डरते है और न क्षीण होते है उसी प्रकार हे प्राण! तू न तो किसी से डर और न क्षीण हो।
यथाहश्च रात्री च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः॥
जिस तरह दिन और रात न तो किसी से डरते है और न क्षीण होते हैं उसी तरह हे प्राण! न तो तू किसी से डर और न ही क्षीण हो।
यथा धोनुश्चानडवाँश्च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः॥
जिस तरह गाय और बैल किसी से न तो डरते है और न क्षीण होते है उसी तरह हे प्राण! न तो तू डर और न क्षीण हो।
यथा मित्रश्च वरुणाश्च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः॥
जिस तरह मित्र और वरुण न तो किसी से डरते है और न क्षीण होते है उसी तरह हे प्राण! न तो तू डर और न क्षीण हो।
यथा ब्रह्म च क्षदं च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः॥
जिस तरह ब्राह्मण और क्षत्रिय न तो किसी से डरते हैं और न क्षीण होते हैं उसी तरह हे प्राण! न तो तू डर और न क्षीण हो।
यथेंद्रश्चेंद्रियं च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः॥
जिस तरह इंद्र और इंद्रियाँ न तो किसी से डरते है और न क्षीण होते है उसी तरह हे प्राण! न तो तू डर और न क्षीण हो।
यथा वीरं च वीर्य च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः॥
जिस तरह वीर और वीर्य न तो किसी से डरते है और न क्षीण होते है उसी तरह हे प्राण! न तो तू डर और न क्षीण हो।
यथा प्राणश्चापानश्च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा में प्राण मा बिभेः एवा में प्राण मा रिषः॥
जिस तरह प्राण और अपान न तो किसी से डरते है और न क्षीण होते है उसी तरह हे प्राण! न तो तू डर और न क्षीण हो।
मनुष्य को डरना केवल दो से चाहिए एक ईश्वर के न्याय से और दूसरे पाप अनाचार से। जो इनसे डरता बचता रहेगा, उसे और किसी से डरने की आवश्यकता न पड़ेगी। आत्मबोध तथा आत्मबल का ज्ञान न होने के कारण लोग छोटे छोटे कारणों को लेकर चिंताग्रस्त, आशंकित आतंकित एवं भयभीत होते है। इस भीरुता को हेय ठहराते हुए प्राणसूक्त के उपर्युक्त मंत्रों में यही निर्देश दिया गया है कि अपने का देवशक्तियों की पंक्ति में बिठाएँ और उन्हीं की तरह निडर उल्लसित जीवन जिए।
पृथ्वी की गहराई में प्रवेश करते जाने पर पता चलता है की वहाँ अनादिकाल जैसी गरमी अभी भी मौजूद है। आरंभकाल में पृथ्वी भी अन्य ग्रहों के जन्मकाल में पाई जाने वाली स्थिति में थी। उन दिनों वह आग का गोला थी। ठंडी होने का क्रम चला तो छोटी बड़ी दरारें बन गई। वर्षा ने उन्हें भरा और जलाशय बना दिए। ये हलचलें ऊपरी परतों को ही प्रभावित करती रही। वनस्पति तथा प्राणियों का विकास इसी ऊपरी परत पर हुआ।
पृथ्वी वायु और पानी के कारण क्रमशः ठंडी हुई है। उसके मध्यवर्ती अंतराल में प्रचंड गरमी मौजूद है। वह बहते हुए गरम लाल लोहे की तरह है। ऊपर से ठंडा घेरा उस गरमी को कैद किए हुए है। उसकी मोटाई और मजबूती भी बहुत है। इतने पर भी प्रकृति के नियम उस आतप को भी प्रभावित किए बिना नहीं रहते। गरमी से हर वस्तु फैलती है। पृथ्वी का गहरा भीतरी भाग भी स्वभावतः फैलना आगे बढ़ना चाहता है। ऊपरी परत उसे कसे रहती है, फिर भी भीतरी का लावा चैन से नहीं बैठता और अपने विस्तार के लिए रस्साकशी करता रहता है। बाहर निकलने के लिए कोई खिड़की चाहता है। यह प्रयास निरंतर चलता है। तनाव की यह खोज रहती है कि उसे फूट पड़ने के लिए अवसर मिले। जहाँ वह कमजोरी देखता है वहीं चढ़ दौड़ता है और छेद बनाकर बाहर निकलता है। ज्वालामुखी उसी स्थिति का नाम है। वे जब फटते है तो लावा उगलते है। भीतर की आग ऊपर की ठंडी परतों को ऊपर उछालती है तो जमीन पर लावा बहने लगता है। वह सुरंग फटने की तरह आकाश में भी उछलता है और बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेता है। वहाँ विनाशलीला खड़ी हो जाती है वृक्ष,वनस्पति मकान, आश्रय, जलाशय सभी उस मलबे से भर जाते है।
इस विस्फोट के समय प्रभावित होने वाले क्षेत्र थरथराते भी है। उस हड़कंप को ‘भूकंप’ कहते है। धरती काँपी जैसी प्रतीत होती है। जमी हुई वस्तुएँ उलट पुलट जाती है। इस उलट पुलट में जो गिरता है वह नीचे वालों को दाब दबोच देता है। साथ ही यह भी होता है कि जो कुछ भला बुरा नीचे दबा था वह उलटकर ऊपर आ जाए और धरातल की स्थिति इतनी बदल जाए कि पूर्व स्वरूप का अता पता भी न चले।
आँका गया है कि हर वर्ष प्रायः 24 हजार सशक्त भूकंप आते है। एक हजार के करीब ज्वालामुखी फटते है। चूँकि समुद्र पृथ्वी का दो-तिहाई हिस्सा घेरे हुए है, इसलिए ज्वालामुखियों से भूकंपों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है, कारण कि समुद्र की गहराई वाला जल मध्य भूतल की आग्नेय परत के समीप पड़ता है वहाँ से सीलन, नमी, रिसन क्रमशः नीचे उतरती रहती है। आग में पानी का स्पर्श होने से भाप बनती है। भाप में अपेक्षाकृत दबाव अधिक होता है। यही कारण है कि भाप से बादल, रेलगाड़ियों के इंजन एवं घरेलू प्रेशर कुकर तक छोटे उपकरण काम करते है। भापस्नान से मैल फूलने और छूटने का अधिक उपयुक्त लाभ मिलता है। उससे रोमकूप खुलते और स्वेद बिन्दु निकलते है। इसी को जमीन द्वारा साँस लिया जाना कहते है। मात्र ऊपर से ही हवा के झोंके, अधड, चक्रवात नहीं आते, अविज्ञात रूप से धरती भीतर से भी उफनती रहती है। झरने फूटते है। नदियों के स्रोत खुलते है। बहुत जगह गरम जल के स्रोत भी पाए जाते है। खोदने पर जलने वाली गैसें निकल पड़ती है। खनिजों की जो परतें कभी बहुत गहरी थी, वे नीचे के दबाव से ऊपर उठती है और धरातल के इतने समीप आ जाती है कि उनका आसानी से पता लगाया जा सके, खोदकर खनिजों को ऊपर निकाला जा सके।
उपर्युक्त वस्तुस्थिति को भूगर्भ विद्या की उच्च कक्षाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थी भली प्रकार जानते है। भूकंपों, ज्वालामुखियों एवं अन्य प्रकार से नीचे की संपदा ऊपर आने के विषय में बहुत कुछ जान सकते है पर यह रहस्य किन्हीं बिरलों को ही विदित है कि विराट ब्रह्म की तरह मनुष्य की एकाकी सत्ता भी पृथ्वी की तरह ही विशाल, रहस्यमय और समानाँतर है।
पृथ्वी की भीतरी आग्नेय परत की बाहर आकर समीपवर्ती स्थिति को प्रभावित करती है। इससे इसके गुरुत्वाकर्षण पर कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि वह धरातल पर चलने वाली समस्त गतिविधियों को प्रभावित करता है। इसके अतिरिक्त स्वयं पृथ्वी को भी अपनी धुरी पर घूमने तथा सूर्य परिक्रमा के लिए चल पड़ने के लिए आगे ढकेलता है। उस परिभ्रमण की एक कक्षा भी बनती है, ताकि सौरमंडल के अन्यान्य ग्रहों के मार्ग में व्यवधान न पड़े, टकराव न हो। यह गतिशीलता ही पदार्थों में प्रवेश करके उनके अणु परमाणुओं को गति देती है और संसार का उत्पादन, अभिवर्द्धन, परिवर्तनक्रम चलाता हो संसार में जो कुछ संपदा, प्रगति, सुँदरता दीख पड़ती है, उसका निमित्त कारण पृथ्वी के अंतराल की ऊर्जा और उसके कारण उत्पन्न होने वाले दबाव को ही माना जाना चाहिए।
मनुष्य के अंतराल में भी ऊर्जा केंद्र है। उन्हें शरीर-क्षेत्र में अनहद क्षेत्र, हृदय एवं मनः क्षेत्र में ब्रह्मरंध्र कहा जा सकता है। यह ऊर्जा जब प्रबल प्रखर होती है तो शरीरगत समर्थता, बलिष्ठता, सुँदरता के रूप में उगती है। मस्तिष्क क्षेत्र में जब वह सक्रिय होती है तो बुद्धिमता, गुणवत्ता, विवेकशीलता के रूप में काम करती देखी जा सकती है। मानवी अंतराल में दबी ऊर्जा को ही आत्मचेतना, प्रेरणा के रूप में समझा जा सकता है। वही उमंग, आकाँक्षा, भावना के रूप में उभरती हैं जब उसका स्तर उत्कृष्ट एवं ऊर्ध्वगामी होता है तो उसे श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा के रूप में भाव संवेदना स्तर की देखा जाता है। शरीर क्षेत्र में वही पराक्रम, कौशल, संयम बनकर काम करती है। उसकी समग्रता ओजस, तेजस, वर्चस के रूप में जानी जाती है। यह उसका सौम्य और सृजनात्मक पक्ष है। यही जब विद्रूप होने लगता है तो शरीर में आधि व्याधि बनकर फूटता है। स्वभाव एवं चरित्र में दुष्टता, भ्रष्टता, अनाचार, आतंक, दुर्व्यसन जैसे आसुरी कहे जाने वाले लक्षणों के रूप में प्रकट होता है। द्वेष, दुर्भाव, ईर्ष्या, जलन, कुढ़न इन्हीं की सहोदरा है। भावक्षेत्र में जब इन विद्रूपताओं का उद्भव होता है तो वह मनुष्यता को नैतिकता को, मानवी मूल्यों को समरसता को, शालीनता और सौम्यता को बुरी तरह क्षत विक्षत कर देता है। फिर अंतःकरण की यह शुष्कता ओर कुरूपता उसके प्रगति पथ पर पग पग पर आड़े आती है और मार्ग में अटल चट्टान की तरह अड़ जाती है। इससे सहयोग सहकार के वे समस्त रास्ते बंद हो जाते है, जो अंतःऊर्जा के सौम्य प्रयोग से मिल सकते थे। लड़ाई-झगड़े वाद विवाद की संभावनाएँ बढ़ जाती है और जीवन को इतरा उपद्रवी बना जाती है कि उसे दानवी कहने में तनिक भी संकोच नहीं। जीवन में इन आसुरी लक्षणों का प्रकटीकरण ज्वालामुखी या भूगर्भ के भयावह उपद्रवों के समतुल्य समझा जा सकता है।
भीतरी अग्नि अंतःचेतना है। यही प्राण है जिसके रहने तक शरीर जीवित रहता है। उसमें सौम्य पक्ष चिंतन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादी बनकर छलकता है। उसी के परिपोषण हेतु व्रत नियमों का निर्धारण, परिपालन किया जाता है। इसको आध्यात्मिक अग्नि क्षेत्र कहते है।
पृथ्वी के अंतराल की अग्नि का किस दिशा में निष्क्रमण हो, यह प्रकृति परमेश्वर के हाथ में है। वह उसके सौम्य या भयावह निष्क्रमण की उपयोगिता समझता और व्यवस्था बनाता है, किंतु मनुष्य अपनी ऊर्जा और उसकी दिशाधारा का इच्छित उपयोग करने में स्वतंत्र है। वह अनुशासन में रहकर अपने जीवनकाल और बुद्धिबल का उत्साहवर्द्धक उपयोग भी कर सकता है और उसके लिए यह भी संभव है कि घुटन, असंयम, विद्रोह का मार्ग अपनाकर न केवल अपने लिए संकट उत्पन्न करे, वरन् संबंधित लोगों को भी उस विनाशलीला का चपेट में ले ले। आत्मिक अग्नि ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति और संपदा है। उसे यही दिशा देना विवेकशील मनुष्य का अपना काम है।
एक संत आर्त-भाव से प्रभु की शरण में जाने के सत्परिणाम एवं दुष्कर्मों की परिणति प्रतिफल की चर्चा कर रहे थे। श्रोताओं में ही एक डाकू भी बैठा था, जिसने कथा के तुरंत बाद पंडित जी तथा आए हुए वैभवसंपन्न श्रोताओं को लूटने की योजना बनाई थी। अनायास ही उसने अजामिल, गणिका, तुलसीदास, विल्वमंगल का जीवन बदलने व तरने की चर्चा सुनी तो वह अंदर तक हिल गया। जिन मार्मिक शब्दों में ये कथाएँ सुनाई गई थी, उन शब्दों ने उसे अपने दुष्कर्मों पर चिंतन व पश्चाताप करने को प्रेरित किया। कथा समाप्ति के तुरंत बाद वह पंडित जी के चरणों में गिर गया, अपने विगत पापोँ की जानकारी कराई व आगे के लिए जीवन सुधारने की दिशा पूछी। उन निर्देशों ने उसका जीवन बदल दिया। तदुपराँत वह प्रभुनारायण जीवन बिताने व जो पापों की खाई उसने खोदी थी, सेवा परमार्थ द्वारा उसे पाटने लगा।
यज्ञ चिकित्सा अपने आप में सर्वांगपूर्ण चिकित्सा पद्धति है। इस उपचार प्रक्रिया को अपनाने से न केवल शारीरिक मानसिक आधि व्याधियों का शमन होता है, वरन् यह जीवनीशक्ति का अभिवर्द्धन कर दोबारा रोगाणुओं के आक्रमण से भी व्यक्ति की रक्षा करती है। संक्रमणजन्य बीमारियों को दूर करने से यज्ञोपचार से आश्चर्यजनक रूप से लाभ मिलता है। विविध प्रकार के रोगाणु विषाणुजन्य बुखार, क्षयरोग, चेचक, प्लेग आदि से लेकर यौन संक्रमित रोगों का उपचार भी इस प्रक्रिया द्वारा सरलतापूर्वक किया जा सकता है और दीर्घायुष्य जीवन का आनंद उठाया जा सकता है। सोजाक, उपदंश, शैंकरायड एवं एड्स जैसी प्राणघातक एवं संसर्गज बीमारियों में यज्ञीय उपचार उपक्रम को अपनाया जाए तो अन्यान्य चिकित्सापद्धतियों की अपेक्षा यह अधिक कारगर सुरक्षित एवं हानिरहित सिद्ध होती है। प्रायः सभी संक्रमणजन्य बीमारियों का पूर्ण उपचार इससे संभव है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में रतिज रोगों को संक्षेप में एसटीडी (सेक्सुअली ट्राँसमीटेड डिसिजेज) कहते है। इसमें जिन प्रमुख रोगों की गणना होती है उन्हें निम्न समूहों में बाँटा जा सकता है -(1) वायरसजन्य संक्रमण से होने वाले रतिज रोग, जैसे सायटोमिगोलो इन्फेक्शन एवं हरपीस वायरल इन्फेक्शन (2) प्रोटोजोआ वर्ग के एककोशीय जीवाणुओं से होने वाले रतिज रोग, जैसे ट्राइकोमोनिएसिस एवं शैंकरायड (3) क्लेमाइडियल इन्फेक्शन से होने वाले रोग ग्रेन्युलोमा इन्गुइनल आदि (4) फंगल इन्फेक्शन से उत्पन्न कैन्डिडिएसिसि एवं (5) बैक्टीरियाजन्य रतिज रोग गोनोरिया (सोजाक) एवं सिफलिस (उपदंश) आदि। एचआईवी अर्थात् एड्स की गणना भी यौन संक्रमित रोग के अंतर्गत आती है। यह वायरसजन्य संसर्गज रोग है जो व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली ‘इम्यून सिस्टम’ पर सीधे प्रहार कर शीघ्रातिशीघ्र रोगी को मरणोन्मुख बना देता है।
यहाँ पर जिन रतिज रोगों का वर्णन किया जा रहा है, उनमें से दो प्रमुख है सोजाक एवं उपदंश यिफरंग रोग। सोजाक को अंगरेजी में ‘गोनोरिया’ एवं आयुर्वेद में पूयमेह, व्रणमेह, औपनसर्गिक मेह, आगंतुक मेह आदि नामों से जाना जाता है। इसे प्रमुख संक्रामक रोगों में गिना जाता है जिसके कारण विश्वभर में संक्रमित व्यक्तियों की संख्या निरंतर बढ़ती जाती है। यह स्वच्छंदता एवं असुरक्षित यौन व्यवहार के कारण पनपते वाला रोग है, जिससे नर नारी दोनों ही प्रभावित होते है। यह रोग एक वर्ग से दूसरे वर्ग में संसर्ग के द्वारा फैलता है। 15 से 30 वर्ष आयु के नर नारी प्रायः इस संक्रमण के शिकार होते हैं।
गोनोरिया शीघ्रता से फैलने वाला संक्रामक रोग है। इसका प्रमुख कारण कॉफी के बीज के आकार के सूक्ष्म गोनोकोकस नामक बैक्टीरिया होते है जिन्हें ‘नाइसेरिया गोनोरी’ कहते हैं। इसके जीवाणु मूत्रमार्ग एवं श्लेष्मल त्वचा से शरीर में प्रवेश करते है। इनका प्रमुख आक्रमण स्थल मूत्रजनन संस्थान एवं श्वेत रक्तकण होते हैं। समय पर चिकित्सा उपचार न होने से यह रोग अपना विषैला प्रभाव मूत्रनलिका से लेकर पौरुश ग्रंथि, शुक्रवाही संस्थान, गर्भाशय ग्रीवा आदि अंग अवयवों पर डालता है। परिणाम स्वरूप जलन, पेशाब का बार बार आना अर्थात् मूत्रकृच्छ, मवाद निकलना, सूजन आदि प्रमुख लक्षण प्रकट होते है। कई बार गोनोकोकस बैक्टीरिया से दूषित हाथ का स्पर्श नेत्र, नाक आदि अंगों पर होने से क्रमशः नेत्राभिष्यदं एवं नासाशोथ हो जाता है। रेक्टम व फैरिंग्स भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं रहते।
यों तो आधुनिक चिकित्साविज्ञानी सोजाक के शमन के लिए पेनिसिलीन, स्ट्रेप्टोमाइसिन, टेट्रासाइक्लिन, सल्फोनामाइड जैसी तीव्र एंटीबायोटिक दवाइयों का प्रयोग करते है और प्रायः तीन सप्ताह तक इस क्रम को चलाते है। आयुर्वेद चिकित्सा में विष से विष को मारने ‘विषस्य विषमौषधम’ की प्रक्रिया अपनाई जाती है। कहा भी है -
औपदंशिक सौजाका व्रणा विष समुद्रभवाः। विषजातो यथा कीटो विषेणैव विपधते॥
उपदंश और सोजाक के व्रण या रोग विष से (विषाणुओं से) उत्पन्न होते है, अतः इन्हें नष्ट करने के लिए विषैला औषधियों का प्रयोग आवश्यक हो इसके लिए आयुर्वेद में सोमल (संखिया) रसकपूर (पारा) प्रभृति तत्वों को जिन्हें परम विष कहा जाता है, उनके विविध योग इन आगंतुक संक्रामक रोगों एवं उनसे उद्भूत विकारों को दूर करने में प्रयुक्त होते हैं। सोजाक से पूरी तरह निजात पाने के लिए यज्ञोपचार प्रक्रिया का आश्रय लेने से अन्यान्य चिकित्सापद्धतियों की अपेक्षा यह रोग आसानी से ठीक हो जाता है तथा प्राणशक्ति जीवनीशक्ति के अभिवर्द्धन के साथ-साथ दूसरे दुष्प्रभावों से रक्षा भी होती है।
(1) गोनोरिया (सोजाक) हेतु विशेष हवन सामग्री इसमें निम्नलिखित चीजें मिलाई जाती है-
(1) अनंतमूल (2) अपराजिता पंचाँग (3) चोपचीनी (4) कालीमिर्च (5) अतिबला (कंघी) पंचाँग (6) अपामार्ग (7) विलायती बबूल के पत्ते (अरिमेद) (8) आमवृक्ष की छाल (9) गोक्षुरु (10) पीपल की छाल (11) इमली के वृक्ष की छाल (12) आँवला (13) छोटी इलायची (14) कबावचीनी (शीतल चीनी) (15) कतीरा (16) कमरकस (समुद्रसोख) (17) काँटा चौलाई की जड़ (18) गंध बिरोजा (19) खिरेंजी (बला) के बीज (20) दारुहलदी (21) रसौत (22) गावजवाँ (23) इंद्र जौ (24) बिधारा (25) मकोय पंचाँग (26) मंजीष्ठ (27) सालवृक्ष की छाल (28) शीशम (29) शरपुँजा (30) सुँरजान (31) मोचरस (सेमर का गोंद) (32) सौंफ (33) र्स्वणक्षारी (सत्यानाशी) मूल (34) मुलहठी (35) रेवंदचीनी (36) चंदन सफेद (37) नीम छाल (38) माजूफल (39) जवासा (40) हरड (41) तृणपंचमूल (कुश, काँस खस, ईख, शरकंडे की जड़) (42) दुग्धिका (दूधीलाल) (43) शतावर (44) मेहंदी के पत्ते (45) कत्था या खैर की छाल।
उपर्युक्त सभी चीजों का बराबर मात्रा में लेकर कूट पीसकर उनका जौकुट पाउडर बना लेना चाहिए और उसे एक डिब्बे में सुरक्षित रख लेना चाहिए। साथ ही उस पर ‘सोजाक रोग की विशेष हवन सामग्री क्रमाँक (2)’ का लेबल चिपका देना चाहिए। हवन करने से पूर्व उसमें बराबर मात्रा में पहले से तैयार की गई काँमन हवन सामग्री क्रमाँक (1) को मिला लेते है। काँमन हवन सामग्री में अगर, तगर, देवदार, लाल चंदन, सफेद चंदन, जायफल, लौंग, गूगल, चिरायता एवं गिलोय समभाग में मिली होती है। हवन के लिए पलाश या आम की सूखी लकड़ी प्रयुक्त करनी चाहिए। हवन नित्य प्रायः सूर्य गायत्री मंत्र से करना चाहिए। सूर्य गायत्री का मंत्र इस प्रकार है ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विग्रहे, दिवाकराय धीमहि, तन्नः सूर्यो प्रचोदयात्। कम से कम चौबीस आहुतियाँ इस मंत्र से अवश्य देनी पड़ती है। अधिकतम इक्वायन या एक सौ आठ आहुतियाँ दी जा सकती है। हवन करने के साथ-साथ क्वाथ लेना अधिक लाभकारी सिद्ध होता है।
इसके लिए उपर्युक्त सभी 45 चीजों से बने जौकुट पाउडर (सोजाक रोग की विशेष हवन सामग्री 1-2) में से रोग की तीव्रता के अनुसार 5 से 10 चम्मच पाउडर लेकर उसे शाम को स्टील के एक भगोने में आधार लीटर पानी में भिगो देना चाहिए। सुबह मंद आँच पर पकाना चाहिए और चौथाई अंश बचे रहने पर उसे उतारकर ठंडा होने पर साफ कपड़े से छान लेना चाहिए। हवन करने के बाद क्वाथ की आधी मात्रा सुबह एवं आधी मात्रा शाम को रोगी को पिलाते रहना चाहिए। यहाँ ध्यान देने योग्य विशेष बात यह है कि उपर्युक्त हवन सामग्री में क्रमाँक (2) में सम्मिलित कतीरा, कत्था, गंध बिरोजा, रसौत एवं मोचरस जैसी चीजों को न मिलाकर केवल क्वाथ वाले जौकुट पाउडर में मिलाकर भी सेवन किया जा सकता है।
गोनोरिया अर्थात् पूयमेह में निम्नाँकित औषधियों को मिलाकर बनाया गया चूर्ण भी बहुत फायदेमंद सिद्ध होता है। इसमें सम्मिलित है (1) चोपचीनी (2) रसौत (3) सफेद जीरा (4) मुलहठी (5) शीतल चीनी (6) गिलोय (7) चंदन (8) निशोथ (9) दारुहलदी (10) स्वर्णक्षीरी मूल की छाल प्रत्येक औषधि 6-6 ग्राम। (11) इंद्रजी (12) बंशलोचन (13) शुद्ध फिटकिरी (14) शुद्ध गंधक (15) राल चूर्ण (16) कत्था (17) शुद्ध गेरु (18) मंजीष्ठ (19) मेंहदी (20) कलमी शोरा (21) शुद्ध यवक्षार (22) गंध बिरोजा (23) छोटी इलायची (24) पलाश पुष्प (24) रेवंद चीनी (25) पाषाण भेद-प्रत्येक घटक औषधियाँ 3-3 ग्राम।
उपर्युक्त सभी घटक द्रव्यों को साफ शुद्ध करके कूट पीसकर एवं खरल करके एकरस कर लेना चाहिए और ठंडे पानी से दिन में तीन बार 2-2 ग्राम की मात्रा में रोगी को तब तक सेवन कराना चाहिए, जब कि रोग समूल नष्ट न हो जाए।
यज्ञोपचार एवं औषधि सेवनकाल में पथ्य परहेज का ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए। गोनोरिया सोजाक के रोगी को रोगमुक्त होने तक संयम का पालन करना चाहिए। दौड़ धूप करना, नाचना, घोड़े की सवारी करना, साइकिल चलाना, स्त्री-संसर्ग आदि छोड़ देना चाहिए। चाय, कॉफी, माँस मछली, गरम मसाले, मद्यपान, खट्टे पदार्थ आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। कामोत्तेजक दृश्यों, विषयों, के दर्शन, भाषण, मनन चिंतन से बचना चाहिए। रोगी को पथ्य में शीघ्र पचने वाले हलके तथा ठंडे आहार देना चाहिए। जौ, गेहूँ का दलिया, मूँगदाल, पुराने चावल की खिचड़ी, पतली रोटी, डबल रोटी, हरा शाक, पालक, चौलाई बथुआ, तोरई घिया की सब्जी, बकरी या गाय का दूध, दूध की लस्सी, नींबू का शर्बत, नारियल के पानी का सेवन इस रोग में हितकारी है। पथ्य परहेज युक्त संयमित जीवनचर्या स्वास्थ्य रक्षा के स्वर्णिम सूत्र है, इन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए।
भगवान बुद्ध के समय श्रावस्ती में भयंकर अकाल पड़ा। साधनसंपन्न लोग न केवल घरों में छिप गए, अपितु अपने पास उपलब्ध अन्न वस्त्र भी छिपा बैठे। ऐसे समय बुद्ध के समक्ष सुप्रिया नाम की एक कुलीन कन्या ने राज्य के भरण पोषण की प्रतिज्ञा की। वह घर घर जाकर अन्न वस्त्र माँगने लगी। उसकी निष्ठा से जन भावनाएँ उमड़ उठी और देखते देखते अकाल से लड़ने वाली शक्ति सामर्थ्य जुटकर खड़ी हो गई।
विशेष ज्ञातव्य
‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के माह अगस्त, 23 के अंक में पृष्ठ संख्या 36 पर प्रकाशित ‘क्लाथ चिकित्सा द्वारा जटिल रोगों का सरल उपचार’ शीर्षक के अंतर्गत ‘उच्च रक्तचाप नाशक क्वाथ’ का वर्णन किया गया है। उसमें कुछ सूत्र संकेत अति संक्षेप में लिखे होने के कारण समझने में किसी को असुविधा न हो, अतः उसका कुछ स्पष्टीकरण इस प्रकार है ‘-
उस क्वाथ में प्रयुक्त घटक द्रव्यों में से क्रमाँक-1 ब्राह्मी से लेकर क्रमाँक-13 सज्जीखार तक की औषधियां क्वाथ में प्रयोग करने के लिए है। इनका क्वाथ बनाकर सुबह शाम सेवन किया जाता है।
क्रमाँक-14 मुक्तापिष्टी से लेकर क्रमाँक-2 कामदुधारस तक के घटक द्रव्यों को उनकी निर्धारित मात्रा में लेकर सभी को एक साथ खरल करके एकरस करके बराबर मात्रा की दस पुड़िया तैयार कर लेते है। इनमें से एक पुड़िया प्रायः काल एवं एक पुड़िया 3 बजे दूध अथवा जल के साथ सेवन करते है। यदि इस पुड़िया को न ले रहे तो केवल मुक्तापिष्टी आधार ग्राम सुबह एवं आधा ग्राम भोजन के तीन घंटे बाद लेते रहना चाहिए।
पृष्ठ 36 के ही अंतिम पैराग्राफ में वर्णित गोली (बटी) के निर्माण के सम्बन्ध में यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि क्वाथ एवं पुड़िया सेवन न करने वाले ही इस गोली को खाएँ। इस गोली के निर्माण में उच्च रक्तचाप के लिए वर्णित क्वाथ के समस्त क्रम-1 से क्रम-13 तक के घटक द्रव्यों के कपड़छन बारीक चूर्ण में निम्नाँकित चीजों का एकरस किया चूर्ण सम्मिलित रूप में प्रयुक्त किया जाता है। संशोधित मात्रा में ये द्रव्य है (1) मुक्तापिष्टी-1 ग्राम (2) मुक्ताशक्ति-2 ग्राम (3) चाँदी भस्म-5 ग्राम (4) प्रवालपिष्टी-2 ग्राम (5) शंख भस्म-2 ग्राम (6) नौसादर-3 ग्राम (7) कादुधारस-2 ग्राम। दोनों चूर्ण एक बार फिर से आपस में अच्छी तरह मिलाकर जब घृतकुमारी के गूदे के रस के आटे की तरह गूँथकर 1-1 पत्ती की गोली बनाकर सुखा लेते है। इनमें से 2 गोली सुबह एवं 2 गोली शाम को जल के साथ लेते है। रक्तचाप की जाँच कराते हुए बीपी की घट बढ़ के हिसाब से गोलियों की मात्रा कम ज्यादा कर सकते है। भोजनोपरान्त महाशंखबटी का सेवन यथावत चलता रहेगा।
इतिहास में जितने भी संत और भक्त हुए हैं यह एक विलक्षण सत्य है कि उनमें से प्रायः सभी कवि, गीतकार और संगीतकार हुए है। उनकी रचनाओं में जितनी जीवन बोध और दर्शन है, उतनी ही इष्टदेव या उपास्य के प्रति भावविह्वलता है। इस विह्वलता में यद्यपि इष्ट के रूप, रंग, कर्तृत्व, समर्थ और संरक्षक स्वरूप का ही स्तवन मात्र होता है, किन्तु उसमें छलकने वाला भाव-प्रवाह इतना रसमय, स्फूर्तिदायक और हृदय को पुलकित करने वाला होता है कि सैकड़ों बार पढ़ लेने पर भी उसकी चिर नवीनता विद्यमान रहती है। स्तवन एक प्रकार की विरह पुकार है, जिसमें मिलन का सा सुख तृप्ति और आनंदानुभूति होती है। भक्ति साहित्य में इसी से स्तवनों को अत्याधिक प्रतिष्ठा प्रदान की गई है।
भगवती गायत्री माँ के प्रति श्रद्धा भाव विकसित करने में गायत्री स्तवनों का महत्व वैसा ही है। इनमें माँ के चरणों में श्रद्धा और अनुराग बढ़ता है। अतएव चलते फिरते एकाँत या समूह में इन स्तवनों की परंपरा चलती रहनी चाहिए। यहाँ ऐसा ही स्तुतिगान प्रस्तुत है :-
नमस्तेस्तु मातः श्रुति स्वरेशे, स्वमस्ते शुभस्तोमवतेअध्रिमूहे। श्रमः स्तान्नमे त्वज्जपादौ कृपालो। भ्रमोपि प्रमा स्यात प्रमेये दृशोत॥
समस्त वेदों की अधीश्वरी माँ! हम तुम्हें प्रणाम करते है। आपके अरविंद पुष्प सदृश चरणों को हम अपने मस्तक पर धारण करते है। हे दयालु! तेरी उपासना में मुझे श्रम न मालूम पड़े। यदि जप में मुझसे त्रुटि हो जाए तो अपनी कृपा से उसे सत्य में परिणत करें।
श्रुत्यन्तसंचारि विनोदकारि, विसारि धीरेक्षण सद्विलासैः। श्रुतमम्ब लीलानतनुषे त्वमेका। अमोघमंत्रा सकला स्वतंता।
हे वेदमाता! तू वेदाँत में संचार कर रही है। विनोदकारी, सर्वव्याप्त, सुख समृद्धि एवं अमोघ मंत्रों से युक्त सर्वथा स्वतंत्र हे माँ! आप ही विभिन्न रूपों में लीलाएँ कर रही है।
अम्बाअर्कविम्बान्तरूपेयुषि त्वाँ, विम्वोष्ठि कम्बु प्रतिविंव कंठि। स्तंबेरमास्यासुराभिवन्द्याम। जाम्बूनदालड करणेअवलम्बे॥
सूर्य बिंब में रहने वाली बिंवफल के समान ओठों वाली, शंख के समान मधुर ध्वनियुक्त, गणेश आदि देवताओं द्वारा पूजनीय, स्वर्णिम आभूषणों से युक्त हे माँ! मैं तेरी शरण में आया हूं।
साधना में जिस एकाग्रता की बात कही जाती है, वह सहज ही साधन को माँ की छवियुक्त आकृति के ध्यान से प्राप्त हो जाती है।
कान्त्ये वाअधः कृतं पदमं हेमपीठमधिष्ठिताम। अलंकरिष्ण श्रीमत्याः पादौ ते देवि संश्रये॥
हे माँ! तुम्हारे चरणों के नीचे सुवर्ण पीठ ऐसा जान पड़ता है, जैसे कि आपके पद सदृश्य चरणों की आभा द्वारा प्रपंच के सभी पदमपुष्प थककर तेरी शरण में आ गए हो तथा तेरी चरणसेवा के लिए आकर पादपीठ का रूप धारण किए है। तेरे उन अलंकृत चरणों को मैं नतमस्तक होता हूँ।
यदि भयमभविष्यदत्र मातः। सपदिशिवेअशमयिष्ट एव तन्मे। सुमहसि हृदिमेत्वयि प्रदीप्ते, प्रभवति किन्तुतमस्समीपमेतुम॥
हे मंगलकारिणी माँ! यदि हम भयग्रस्त होते है तो तू उसे शीघ्र दूर करने में सक्षम है। रत्नदीप के रूप में आप मेरे हृदय में प्रकाशित हो रही हो, फिर अंधकार को सामने आने का क्या साहस होगा।
वेदमाता गायत्री के प्रति इस प्रकार की समर्पण भावना से साधक का विवेक जाग्रत होता है, जिससे अज्ञानरूपी अंधकार में भटकने की संभावना नहीं रहती।
इस प्रकार भावयुक्त स्तुति से साधन की श्रद्धा एवं निष्ठा माँ के प्रति दृढ़ होती है, जो साधना की सफलता का आधार है।
शिष्य संजीवनी के नियमित सेवन से शिष्यों को नव स्फूर्ति मिल रही है। वे अपने अन्तःकरण में सद्गुरु प्रेम के ज्वार को अनुभव करने लगे हैं। उनकी अन्तर्चेतना में नित्य-नवीन दिव्य अनुभूतियों के अंकुरण यह जाता रहे हैं कि उन्हें उपयुक्त औषधि मिल गयी है। अपने देव परिवार के परिजनों में यह चाहत सदा से थी कि सद्गुरु के सच्चे शिष्य बने। पर कैसे? यही महाप्रश्न उन्हें हैरानी में डाले था। हृदय की विकलता, अन्तर्भावनाओं की तड़प के बीच वे जिस समाधान सूत्र की खोज कर रहे थे, वह अब मिल गया है। शिष्य संजीवनी के द्वारा शिष्यों को, उनके शिष्यत्व को नव प्राण मिल रहे हैं।
इसके प्रत्येक सूत्र में सारगर्भित निर्देश है। इन सूत्रों में शिष्यत्व की महासाधना में पारंगत सिद्ध जनों की अनुभूति संजोयी है। इन सूत्रों में जो कुछ भी कहा जा रहा है, उसके प्रत्येक अक्षर में एक गहरी सार्थकता है। सार्थक निर्देश के यही स्वर चौथे सूत्र में भी ध्वनित हैं। इसमें कहा गया है- उत्तेजना की इच्छा को दूर करो। इसके लिए इन्द्रियजन्य अनुभवों से शिक्षा लो और उसका निरीक्षण करो, क्योंकि आत्मविद्या का पाठ इसी तरह शुरू किया जाता है और इसी तरह तुम इस पथ की पहली सीढ़ी पर अपना पाँच जमा सकते हो।
उन्नति की आकाँक्षा को भी पूरी तरह से दूर करो। तुम फूल के समान खिलो और विकसित होओ। फूल को अपने खिलने का भान नहीं रहता। किन्तु वह अपनी आत्मा को वायु के समक्ष उन्मुक्त करने को उत्सुक रहता है। तुम भी उसी प्रकार अपनी आत्मा को शाश्वत के प्रति खोल देने के लिए उत्सुक रहो, परन्तु उन्नति की किसी महत्त्वाकाँक्षा से नहीं। शाश्वत ही तुम्हारी शक्ति और तुम्हारे सौंदर्य को आकृष्ट करे, क्योंकि शाश्वत के आकर्षण से तो तुम पवित्रता के साथ आगे बढ़ोगे, पनपोगे, किन्तु व्यक्तिगत उन्नति की बलवती कामना तुम्हें केवल जड़, कठोर, संवेदनहीन व आध्यात्मिक अनुभवों से शून्य बना देगी।
इस सूत्र को वही समझ सकते हैं, जिनके दिलों में अपने गुरुवर के लिए दीवानापन है। जो गुरु प्रेम के लिए अपना सर्वस्व वारने, न्यौछावर करने के लिए उतावले हैं। जिनका हृदय पल-पल प्रगाढ़ आध्यात्मिक अनुभवों के लिए तड़पता रहता है। इस सूत्र में उनकी तड़प का उत्तर है। सभी महान् साधक अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं कि आध्यात्मिक अनुभवों के लिए बड़ी ही शुद्ध एवं सूक्ष्म भावचेतना चाहिए। ध्यान रहे सद्गुरु प्रेम का आनन्द अति सूक्ष्म है। गुरुदेव की चेतना से निरन्तर स्पन्दित हो रहे अन्तर्स्वर बहुत धीमे हैं। इन्हें केवल वही सुन सकते हैं, जिन्होंने बेकार की आवाजों और उसके आकर्षण से अपने आपको मुक्त कर लिया है। सद्गुरु की कृपा का स्वाद बहुत ही सूक्ष्म है। इसे केवल वही अनुभव कर सकेंगे, जिनकी स्वाद लेने की क्षमता उत्तेजना की दौड़ ने अभी बर्बाद नहीं की है।
साधारण तौर पर सभी इन्द्रियाँ और मन उत्तेजना के लिए आतुर हैं। और उत्तेजना का यह सामान्य नियम है कि उत्तेजना को जितनी बढ़ाओ उतनी ही और ज्यादा उत्तेजना की जरूरत पड़ती है। स्थिति यहाँ तक आ खड़ी होती है कि उत्तेजना की यह दौड़ हमें जड़ बना देती है। उदाहरण के लिए भोजन में तेज उत्तेजनाएँ मन को बहुत भाती है। ज्यादा मिर्च, ज्यादा खटाई का परिणाम और ज्यादा चाहिए बनकर प्रकट होता है। यहाँ तक कि यदि हम बाद में बिना मिर्च या बिना खटाई का भोजन लें तो ऐसा लगता है कि मानो मिट्टी खा रहे हैं। भोजन का सहज स्वाद लुप्त हो जाता है। सभी मानसिक व इन्द्रिय अनुभवों के बारे में भी यही सच है। तेज संगीत सुनने वाले कभी भी प्रकृति के संगीत का आनन्द नहीं ले सकते।
इसीलिए अनुभवी साधक कहते हैं कि यदि सूक्ष्मतम एवं शुद्धतम तत्त्व को अनुभव करना है तो अपने मन एवं इन्द्रियों को उत्तेजना की दौड़ से बचाये रखो। मानसिक चेतना एवं इन्द्रिय चेतना ज्यों-ज्यों सूक्ष्मतम एवं शुद्धतम होगी, उसे सूक्ष्मतम एवं शुद्धतम का स्वाद मिलने लगेगा। शिष्यों का, साधकों का यह चिर−परिचित महावाक्य है कि ‘ये हि संर्स्पशजा भोगा दुःख योनय एवते’ अर्थात् उत्तेजना से जो सुख मिलता है, वह प्रकारान्तर से दुःख को ही बढ़ाता है। उत्तेजना की इच्छा को दूर किये बिना कोई भी व्यक्ति साधना के जगत् में प्रवेश नहीं पा सकता। क्योंकि साधना का तो अर्थ ही सूक्ष्मतम एवं शुद्धतम का अनुभव है और यह अनुभव स्वयं को सूक्ष्म एवं शुद्ध बनाकर ही पाया जा सकता है।
उत्तेजना की चाहत केवल इन्द्रियों तक सीमित नहीं है। मन के महादेश में भी इसके अंकुर उगते हैं। मानसिक उत्तेजना उन्नति की महत्त्वाकाँक्षा बनकर प्रकट होती है। अनुभवी साधक कहते हैं कि यह शिष्यत्व की प्रबल विरोधी है। उन्नति की चाहत रखने वाले कभी भी अपने गुरुदेव के दीवाने नहीं हो सकते। उन्हें कभी भी प्रेम एवं समर्पण का स्वाद नहीं मिल सकता। इसलिए शिष्यों के लिए किसी भी तरह की उन्नति की चाहत वर्जित है। उन्हें सभी तरह की लौकिक उन्नति या आध्यात्मिक उन्नति की चाहत से दूर रहना चाहिए। आध्यात्मिक उन्नति की चाहत से दूर रहने की बात थोड़ी विचित्र लग सकती है। पर है यह पूरी तरह से सही। दरअसल सारी चाहतें अहंता के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं और प्रकारान्तर से अहंकार को मजबूत करती हैं। जबकि आध्यात्मिकता सिरे से अहंकार की विरोधी है।
यह फूल की तरह खिलना और विकसित होना है। फूल को तो अपने खिलने का भान भी नहीं होता। सच यही है कि कली कब फूल बन जाती है पता ही नहीं चलता। हाँ यह जरूर है कि वह सदा ही अपनी आत्मा को वायु के समक्ष-प्रकाश के समक्ष खोलने को उत्सुक रहती है। कली समर्पित होती है, प्रकाश के प्रति, हवा के प्रति, समूची प्रकृति के प्रति। इसके अलावा वह कोई और चेष्टा नहीं करती। उसमें तो बस इतनी आतुरता होती है, सिर्फ इतनी प्यास होती है कि उसके भीतर जो सुगन्ध है, वह हवाओं में लुट जाये। इस क्रम में जो सबसे बेशकीमती बात है, वह यह है कि आतुरता के क्षणों में भी कली कोई चेष्टा नहीं करती, बस प्रतीक्षा करती रहती है। निरन्तर एवं अनवरत प्रतीक्षा। उसकी प्रतीक्षा होती है कि सूरज उगेगा, हवायें आयेंगी और फिर वह फूल बन जायेगी। फूल बनकर वह सारी सुगन्ध को हवाओं में लुटा देगी।
बस शिष्यों के लिए भी यही राह है। उत्तेजना एवं उन्नति की चाहत को त्याग कर अपने गुरुदेव के होकर रहना। उन्हें निरन्तर एवं अनवरत समर्पण करते रहना। शिष्य की बस एक ही टेक-एक ही रटन होनी चाहिए-देकर भी करता मन, दे दें कुछ और अभी। शिष्य में होना चाहिए अपने गुरुदेव की कृपा पर अनवरत विश्वास। गुरुकृपा के प्रति उन्मुक्त होकर ही शिष्य की चेतना कली से फूल बनती है, तभी उसके जीवन को सार्थकता मिलती है। यही रहस्य है शिष्य के जीवन का। रहस्य के आयाम और भी हैं, जो क्रमिक रूप से अखण्ड ज्योति के पृष्ठो में खुलते रहेंगे।
एक बार पाँच असमर्थ और अपंग इकट्ठे हुए। अंधा बोला, “मेरी आँखें होती तो जो कुछ अनुपयुक्त दिखाई देता, उसे ठीक करता।” लँगड़ा बोला, “मैं तो दौड़-दौड़कर लोगों की भलाई करता।” निर्बल बोला, “मेरे पास बल होता तो दीन-दुखियों की सेवा करता।” निर्धन ने कहा, “मैं धनी होता तो किसी को भूखा न रहने देता।” मूर्ख बोला, “मैं पंडित डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड इच्छाएँ उन्होंने पूरी कर दीं। पर अब तो अंधा सौंदर्य दर्शन में ही लीन रहने लगा। लँगड़ा सैर-सपाटे के लिए निकल पड़ा। निर्धन धन के नशे में डूब गया। निर्बल दूसरों को सताने लगा और मूर्ख अपनी ही शेखी बघारने लगा। वरुणदेव ने यह देखा तो उन्हें बड़ा दुख हुआ। उन्होंने अपनी शक्तियाँ छीन लीं।
मनुष्य के लिए उचित है कि वह अपनी गरिमा के अनुरूप सदैव उत्थान की ओर बढ़े। अन्यों को भी साथ ले। इस तथ्य को मनुष्य समझ नहीं पाता और अपनी ही रची नारकीय सृष्टि से दूर भागने का विफल प्रयास करता है।
अन्तर्यात्रा का विज्ञान योग साधकों के लिए स्नेह भरा निमंत्रण है। इसमें उनके लिए आह्वान है जो अन्तर्यात्रा करने के लिए उत्सुक हैं, जिज्ञासु हैं। जिनमें महर्षि पतंजलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव की योग अनुभूतियों का साझीदार बनने की निष्कपट चाहत है। इसकी प्रत्येक पंक्ति में उठ रही पुकार उनके लिए है, जो अध्यात्म विद्या के वैज्ञानिक बनना चाहते हैं। अगर ऐसा कुछ आपमें है, तो इसे सुनिश्चित सत्य मानें कि महर्षि पतंजलि एवं ब्रह्मर्षि गुरुदेव आपकी अंगुली थामकर आपको कदम दर कदम इस अन्तर्यात्रा पथ पर आपको आगे बढ़ायेंगे। बस आपको केवल उठकर खड़ा होना होगा। इसके लिए इस योग कथा की प्रत्येक पंक्ति के प्रत्येक शब्द पर गहनता से मनन करना होगा। यदि आप ऐसा कर रहे हैं तो निश्चित मानिये कि आपके अपने जीवन में योग अनुभूतियों के द्वार बस खुलने ही वाले हैं।
जिनके जीवन में यह सुखद सम्भावना साकार हो चुकी है, वे अन्तर्यात्रा के महत्त्व को सहज ही अनुभव कर रहे हैं। ऐसों को प्रतीक्षा रहती है, सर्वथा एक कदम की, एक नये प्रकाश लोक की। यह धारावाहिक योग कथा अपनी हर नयी कड़ी में उन्हें यह अनुभव प्रदान करती है। ऐसे श्रद्धालु साधकों के लिए अन्तर्यात्रा विज्ञान की प्रत्येक कड़ी उनकी साधना कड़ी बन चुकी है। इस योग कथा की पिछली कड़ी में सम्प्रज्ञात समाधि की चर्चा की गयी थी। महर्षि के अनुसार यह वैराग्य का सहज परिणाम है। निर्मल चित्त की सहज अवस्था है। महर्षि कहते हैं कि सम्प्रज्ञात समाधि वह समाधि है, जो वितर्क विचार, आनन्द और अस्मिता के भाव से संयुक्त होती है। इस भाव दशा में चेतन मन अपनी शुद्धतम अवस्था में होता है। परन्तु इसकी उपस्थिति बनी रहती है। इसकी विलीनता चित्त की असम्प्रज्ञात भावदशा में सम्भव बन पड़ती है।
असम्प्रज्ञात समाधि क्या है? इस जिज्ञासा के समाधान में महर्षि का कथन है-
विराम प्रत्ययाभ्यास पूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः॥ 1/18॥
शब्दार्थ- विराम प्रत्ययाभ्यास पूर्वः= विराम-प्रत्यय का अभ्यास जिसकी पूर्व अवस्था है और संस्कारशेषः = जिसमें चित्त का स्वरूप ‘संस्कार’ मात्र ही शेष रहता है, वह योग, अन्य-अन्य है।
अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि में सारी मानसिक क्रिया की समाप्ति होती है ओर मन केवल अप्रकट संस्कारों को धारण किये रहता है।
सम्प्रज्ञात समाधि का पहला चरण पूरा करने के बाद ही योग साधक को असम्प्रज्ञात अवस्था सुलभ होती है। पहला चरण है शुद्धता का और दूसरा चरण है- विलीनता का। हालाँकि ये दोनों ही क्रियायें मन की ऊपरी सतह पर ही सम्पन्न होती हैं। भीतरी सतह यानि कि अचेतन मन में पूर्व जन्मों के संस्कार जस के तस बने रहते हैं। इनका नाश अभी भी नहीं होता है। हालाँकि ये अप्रकट रहते हैं। फिर भी इनकी उपस्थिति बरकरार रहती है।
परम पूज्य गुरुदेव इस भाव सत्य को अपने वचनों में कुछ यूँ प्रकट करते थे। वह कहते थे कि निष्काम कर्म करते हुए मन शुद्ध हो जाता है। विचार और भावनायें धुल जाती हैं तो सम्प्रज्ञात समाधि की झलक मिलती है। लेकिन इस शुद्धतम अवस्था में भी मन तो बना ही रहता है, लेकिन यह जब मन ही विलीन हो जाता है तो समझो कि असम्प्रज्ञात समाधि उपलब्ध हो गयी। पहली अवस्था में काँटे हट जाते हैं, छट जाते हैं तो दूसरी अवस्था में फूल भी गायब हो जाते हैं।
असम्प्रज्ञात समाधि की यह भाव दशा बड़ी अजब-गजब है। साधारण तौर पर सामान्य मनुष्य तो इसकी कल्पना ही नहीं कर सकता। मनोलय, मनोनाश की कल्पना करना, इसमें निहित सच्चाई की अनुभूति करना अतिदुर्लभ है, क्योंकि साधारण तौर पर तो सारी की सारी जिन्दगी मन के चक्कर काटते, मन की उलझनों में उलझते बीतती है। एक विचार, एक कल्पना से पीछा नहीं छूटता कि दूसरी आ धमकती है। यही सिलसिला चलता रहता है। अनवरत-निरन्तर यही प्रक्रिया गतिशील रहती है। हाँ यह जरूर होता है कि कभी अच्छी कल्पनायें, अच्छे विचार उपजते हैं तो कभी बुरे विचार और बुरी कल्पनायें सताती हैं।
पहली समाधि की दशा जिसे सम्प्रज्ञात कहते हैं, उसमें बुराई गिर जाती है। मन की सारी अशुद्धता तिरोहित हो जाती है। दूसरी अवस्था में असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में अच्छाई भी गिर जाती है। यहाँ तक कि अच्छाई या शुद्ध अवस्था को धारण करने वाला मन भी समाप्त हो जाता है। मन की यह समाप्ति प्रकारान्तर से देह बोध की समाप्ति है। इस अवस्था में देह के पृथक होने का अहसास होता है। अभी हम कितना ही कहते रहें कि मैं अलग और मेरी देह अलग। परन्तु यह बात होती निरी सैद्धान्तिक है। अनुभूति के धरातल पर इसकी कोई कीमत नहीं है। जब तक मन रहता है, तब तक हम सदा देह से चिपके रहते हैं। देह की चाहतें, देह के सुख, दुःख हमें लुभाते या परेशान करते रहते हैं।
लेकिन मन के गिरने के बाद, असम्प्रज्ञात दशा में देह और दैहिक व्यवहार का संचालन मन की गहरी परत में, चित्त में दबे हुए अप्रकट संस्कार करते हैं। अतीत के कर्मबीज, विगत जन्मों का प्रारब्ध-बस इसी के द्वारा जीवन की सारी गतिविधियाँ चलती रहती हैं। ध्यान रहे इस असम्प्रज्ञात भाव दशा में नये कर्म बीज नहीं इकट्ठे होते, क्योंकि इनको इकट्ठा करने वाला मन ही जब नहीं रहा तो फिर ये किस तरह इकट्ठा होंगे। अब तो बस जो कुछ अतीत का लेन-देन है, उसी का समाप्त होना बाकी रह जाता है। कुछ भी नये की कोई गुँजाइश या उम्मीद नहीं रहती है।
इस सत्य को हम इस तरह भी अनुभव कर सकते हैं कि हम असम्प्रज्ञात समाधि द्वारा वृक्ष तो मिटा देते हैं। यहाँ तक कि उसकी जड़ें भी खोद देते हैं। फिर भी जो बीज धरती पर पड़े रह गये हैं वे तो अभी फूटेंगे। ज्यों-ज्यों उनका मौसम आयेगा, वे अंकुरित होते चलेंगे। असम्प्रज्ञात समाधि के बावजूद जीवन और मरण का चक्र तो बना ही रहता है। हाँ यह जरूर है कि जीवन की गुणवत्ता भिन्न होती है। लेकिन जन्म तो लेना ही पड़ेगा क्योंकि बीज अभी जले नहीं है। जो व्यक्त था, वह तो कट चुका, परन्तु जो अव्यक्त है वह तो अभी भी बाकी है। असम्प्रज्ञात समाधि सबीज समाधि है। इन बीजों के कारण योग साधक का जन्म होता है। हालाँकि यह जन्म अद्भुत होता है। ऐसे योगियों को विदेह एवं प्रकृतिलय अवस्थाएँ सहज ही प्राप्ति होती हैं। इसी के कारण ये योगीजन समाधि की अन्तिम अवस्था की ओर बढ़ चलते हैं। विदेह एवं प्रकृतिलय की अवस्था क्या है? इसे योग साधक अखण्ड ज्योति के आगामी अंक में पढ़ सकेंगे।
जब भगवान बुद्ध आत्मशाँति की खोज में गृह त्यागकर निकले और आत्मा की प्राप्ति का मार्ग विभिन्न गुरुजनों से पूछा तो उनके अंतः से आवाज आई, “तप से अपने भीतर प्रकाश उत्पन्न कर।” तप और शम से मैं स्वयं ही तत्व को जानूँगा और उसे ग्रहण करूंगा, यह संकल्प उन्होंने लिया और वे आत्मबोध को प्राप्त कर बुद्ध कहलाए।
नोयडा के ‘गायत्री चेतना केंद्र’ का लोकार्पण
दिल्ली भारत का हृदय है, इस विराट राष्ट्र की राजधानी है। समीपस्थ सबसे बड़े शहर नोयडा (गौतमबुद्ध नगर) में शांतिकुंज, हरिद्वार के तत्वाधान में विगत चौबीस अगस्त, 23 को ‘गायत्री चेतना केंद्र’ की स्थापना-लोकार्पण समारोह द्वारा हो गई। इस समारोह में शाँतिकुँज के वरिष्ठतम प्रतिनिधियों सहित भारत के उपराष्ट्रपति श्री भैरोंसिह शेखावत एवं राज्यपाल उप्र श्री विष्णुकाँत शास्त्री सहित केंद्रीय व राज्य के मंत्रीगणों ने भागीदारी की। सेक्टर 12, क्यू ब्लॉक, क्रमाँक 2 में स्थित इस विराट पाँच मंजिला भवन से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में संस्कार चेतना फैलाने का प्रयास किया जा रहा है। परिजन दिल्ली आएँ तो इस केंद्र को अवश्य देखें। यहाँ विधिवत कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण, सेमीनार एवं है। साथ ही गुरुसत्ता, युगनिर्माण मिशन से संबंधित एक स्थाई प्रदर्शनी भी है। पूज्यवर का पूरा साहित्य, वनौषधियों सहित स्वावलंबन के उत्पाद यहाँ उपलब्ध है।
गुरुगीता का गायन शिष्यों के अंतर्मन को गुरुभक्ति से भिगोता है। उनके हृदय में सद्गुरु समर्पण के स्वर फूटते हैं। मन-प्राण में गुरुवर के लिए अपने सर्वस्व को न्यौछावर करने की उमंग जगती है। अन्तर्चेतना में सद्गुरु की चेतना झलकने और छलकने लगती है। जिन्होंने भी गुरुगीता की अनुभूति पायी है- सभी का यही मत है। साधनाएँ अनेक हैं। मत और पथ भी अनगिनत हैं। पर गुरुभक्तों के लिए यही एक मंत्र है अपने गुरुदेव का नाम। उनका एक ही कर्म है, अपने गुरुवर की सेवा। उनमें सदा एक ही भाव विद्यमान रहता है, गुरुदेव के प्रति समर्पण का भाव। जिन्दगी के सारे रिश्ते-नाते, सभी सम्बन्ध गुरुदेव में ही हैं। उनके सिवा त्रिभुवन में न कोई सत्य है और न कोई तथ्य।
गुरुभक्ति के इस तत्त्व में रमे हुए शिष्य-साधकों ने इस सद्गुरु-कथा की पिछली कड़ी में भगवान् भोलेनाथ के इन वचनों को पढ़ा था- कि दुःख देने वाले, रोग उत्पन्न करने वाले प्राणायाम का भला क्या प्रयोजन है? अरे! गुरुवर की चेतना के अन्तःकरण में उदय होने मात्र से बलवान वायु तत्क्षण स्वयं प्रशमित हो जाती है। ऐसे गुरुदेव की निरन्तर सेवा करनी चाहिए। क्योंकि इससे सहज ही आत्मलाभ हो जाता है। अपने गुरुदेव के स्वरूप का थोड़ा सा चिन्तन भी शिव-चिन्तन के समान है। उनके नाम का थोड़ा सा कीर्तन भी शिव-कीर्तन के बराबर है। सद्गुरु का स्मरण और उन्हें ही समर्पण-शिष्यों के जीवन का सार है। इस सरल किन्तु समर्थ साधना से उन्हें सब कुछ अनायास ही मिल जाता है।
गुरु भक्ति की इस साधना महिमा के अगले क्रम को स्पष्ट करते हुए भगवान् सदाशिव जगन्माता पार्वती से कहते हैं-
यत्पादरेणुकणिका काऽपि संसारवारिधेः। सेतुबंधायते नाथं देशिकं तमुपास्महे॥ 55॥
यस्मादनुग्रहं लब्ध्वा महदज्ञानमुत्सृजेत्। तस्मै श्रीदेशिकेन्द्राय नमश्चाभीष्टसिद्धये॥ 56॥
गुरुदेव की कृपा को उद्घाटित करने वाले इन मन्त्रों में अनगिनत गूढ़ अनुभूतियाँ समायी हैं। इन अनुभूतियों को गुरुभक्तों की भावचेतना में सम्प्रेषित करते हुए भगवान् महादेव के वचन हैं- गुरुदेव की चरण धूलि का एक छोटा सा कण सेतुबन्ध की भाँति है। जिसके सहारे इस महाभवसागर को सरलता से पार किया जा सकता है। उन गुरुदेव की उपासना मैं करूंगा, ऐसा भाव प्रत्येक शिष्य को रखना चाहिए॥ 55॥ जिनके अनुग्रह मात्र से महान् अज्ञान का नाश होता है। वे गुरुदेव सभी अभीष्ट की सिद्धि देने वाले हैं। उन्हें नमन करना शिष्य का कर्त्तव्य है॥ 56॥
गुरुगीता के इन महामन्त्रों के अर्थ गुरुभक्त शिष्यों के जीवन में प्रत्येक युग में, प्रत्येक काल में प्रकट होते रहे हैं। प्रत्येक समय में शिष्यों ने गुरुकृपा को अपने अस्तित्त्व में फलित होते हुए देखा है। ऐसा ही एक उदाहरण लक्ष्मण मल्लाह का है। जो अपने युग के सिद्ध सन्त स्वामी भास्करानन्द का शिष्य था। काशी निवासी सन्तों में स्वामी भास्करानन्द का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है। सन्त साहित्य से जिनका परिचय है वे जानते हैं कि अंग्रेजी के सुविख्यात साहित्यकार मार्क ट्वेन ने उनके बारे में कई लेख लिखे थे। जर्मनी के सम्राट कैसर विलियम द्वितीय, तत्कालीन प्रिंस ऑफ वेल्स स्वामी जी के भक्तों में थे। भारत के तत्कालीन अंग्रेज सेनापति जनरल लूकार्ट तो उन्हें अपना गुरु मानते थे। इन सब विशिष्ट महानुभावों के बीच यह लक्ष्मण मल्लाह भी था। जो न तो पढ़ा लिखा था और न ही उसमें कोई विशेष योग्यता थी। लेकिन उसका हृदय सदा ही अपने गुरुदेव के प्रति विह्वल रहता था।
भारत भर के प्रायः सभी राजा-महाराजा स्वामी जी की चरण धूलि लेने में अपना सौभाग्य मानते थे। स्वयं मार्क ट्वेन उनके बारे में अपनी पुस्तक में लिखा था- ‘भारत का ताजमहल अवश्य ही एक विस्मयजनक वस्तु है, जिसका महनीय दृश्य मनुष्य को आनन्द से अभिभूत कर देता है, नूतन चेतना से उद्बुद्ध कर देता है। किन्तु स्वामी जी के समान महान् एवं विस्मयकारी जीवन्त वस्तु के साथ उसकी क्या तुलना हो सकती है।’ स्वामी जी के योग ऐश्वर्य से सभी चमत्कृत थे। प्रायः सभी को स्वामी जी अनेक संकट-आपदाओं से उबारते रहते थे। लेकिन लक्ष्मण मल्लाह के लिए तो अपनी गुरुभक्ति ही पर्याप्त थी। गुरुचरणों की सेवा, गुरु नाम का जप, यही उसके लिए सब कुछ था।
श्रद्धा से विभोर होकर उसने स्वामी भास्करानन्द की चरण धूलि इकट्ठी कर एक डिबिया में रख ली थी। स्वामी के खड़ाऊं उसकी पूजा वेदी में थे। इनकी पूजा करना, गुरु चरणों का ध्यान करना और गुरु चरणों की रज अपने माथे पर लगाना उसका नित्य नियम था। इसके अलावा उसे किसी और योगविधि का पता न था। कठिन आसन, प्राणायाम की प्रक्रियाएँ उसे नहीं मालूम थी। मुद्राओं एवं बन्ध के बारे में भी उसे बिल्कुल पता न था। किसी मंत्र का उसे कोई ज्ञान न था। अपने गुरुदेव का नाम ही उसके लिए महामंत्र था। इसी का वह जाप करता, यदा-कदा इसी नाम धुन का वह कीर्तन करने लगता।
एक दिन प्रातः जब वह रोज की भाँति गुरुदेव की चरण रज माथे पर धारण करके गुरुदेव का नाम जप करता हुआ उनके चरणों का चिन्तन कर रहा था, तो उसके अस्तित्त्व में कुछ आश्चर्यकारी एवं विस्मयजनक दृश्यावली प्रकट हो गयी। उसने अनुभव किया कि दोनों भौहों के बीच गोल आकार का श्वेत प्रकाश बहुत ही सघन हो गया है। यूँ तो यह प्रकाश पहले भी कभी-कभी झलकता था। यदा-कदा सम्पूर्ण साधनावधि में भी यह प्रकाश बना रहता था। पर आज उसकी सघनता कुछ ज्यादा ही थी। उसका आश्चर्य और भी ज्यादा तो तब हुआ जब उसने देखा कि गोल आकार के श्वेत प्रकाश में एक हलका सा विस्फोट सा हो गया है। और उसमें श्वेत कमल की दो पंखुड़ियाँ खुल रही हैं।
गुरु नाम की धुन के साथ ही ये दोनों श्वेत पंखुड़ियाँ खुल गयी और उसके अन्दर से प्रकाश की सघन रेखा उभरी। इसी के पश्चात् उसे अनायास ही अपने आश्रम में स्वामी भास्करानन्द ध्यानस्थ बैठे हुए दिखाई दिए। योग विद्या से अनभिज्ञ लक्ष्मण मल्लाह को यह सब अचरज भरा लगा। दिन में जब वह गुरुदेव को प्रणाम करने गया, तो उसने सुबह की सारी कथा कह सुनायी। लक्ष्मण की सारी बातें सुनकर स्वामी जी मुस्कराए और बोले- बेटा! इसे आज्ञा चक्र का जागरण कहते हैं। अब से तुम जब भी भौहों के बीच में मन को एकाग्र करके जिस किसी स्थान, वस्तु या व्यक्ति का संकल्प करोगे वही तुम्हें दिखने लगेगा।
स्वामी जी के इस कथन के उत्तर में लक्ष्मण मल्लाह ने कहा- ‘हे गुरुदेव, मैं तो सदा-सदा आपको ही देखते रहना चाहता हूँ। मुझे तो इतना मालूम है कि मैं आपके चरणों की धूलि को अपनी भौहों के बीच में लगाया करता था। यह जो कुछ भी है आपकी चरण धूलि का चमत्कार है। अब तो यह नयी बात जानकर मेरा विश्वास हो गया है कि गुरुचरणों की धूलि से शिष्य आसानी से भवसागर पार कर सकता है।’ लक्ष्मण मल्लाह की यह अनुभूति हम सब गुरुभक्तों की अनुभूति भी बन सकती है। बस उतना ही सघन प्रेम एवं उत्कट भक्ति चाहिए। असम्भव को सम्भव करने वाली गुरुवर की चेतना की महिमा के अगले क्रम को शिष्य-साधक अगले अंक में पढ़ सकेंगे।
एक राज्य का यह नियम था कि जनसाधारण में से जो राजा चुनकर गद्दी पर बैठाया जाए, उसे दस वर्ष बाद ऐसे निविड़ एकाकी द्वीप में छोड़ दिया जाए, जहाँ अन्न-जल उपलब्ध न हो। कितने ही राजा इसी प्रकार अपने प्राण गँवा चुके थे। जो अपना राज्यकाल बिताते थे, उन्हें अंतिम समय में अपने भविष्य की चिंता दुखी करती थी, तब एक समय आ चुका होता था।
एक बार एक बुद्धिमान व्यक्ति जान-बूझकर उस समय गद्दी पर बैठा, जब कोई भी उस पद को लेने को तैयार न था। उसे भविष्य का ध्यान था। उसने उस द्वीप को अच्छी तरह देखा व वहाँ खेती करने, जलाशय बनाने, पेड़ लगाने तथा व्यक्तियों को बसाने का कार्य आरंभ कर दिया। दस वर्ष में वह नीरव एकाकी प्रदेश अत्यंत रमणीक बन गया। अपनी अवधि समाप्त होते ही राजा वहाँ गया और सुखपूर्वक शेष जीवन व्यतीत किया।
जीवन के थोड़े दिन ‘स्वतंत्र चयन’ के रूप में हर व्यक्ति को मिलते हैं। इसमें वर्तमान का सुनियोजन और भविष्य की सुखद तैयारी जो कर लेता है, वह दूरदर्शी राजा की तरह सुखपूर्वक जीता है।
गायत्री महामंत्र हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। देवियो, भाइयो। लोहे को गलाए बिना हम उससे कीमती हथियार नहीं बना सकते, पुरजे नहीं बना सकते। आप इससे क्या बनाएँगे? साहब! हमारा मन पुरजे बनाने का है, तलवार बनाने का है, तरह-तरह के औजार बनाने का है। लोहे से कैसे बनाएँगे? पहले इसको गलाएँगे, तपाएँगे? जब तक इसे गलाएँगे-तपाएँगे नहीं, तब तक कोई हथियार नहीं बन सकता। सोना हमारे पास है और उससे हमें कई तरीके के जेवर बनाने है। क्या-क्या जेवर बनाने है? बहुत बढ़िया वाले जेवर बनाने है। तो सोने से यों ही बनाइए न? नहीं साहब! जब तक तपाएँगे नहीं, गलाएँगे नहीं, तब तक सोने से कोई जेवर नहीं बन सकता।
गलाई और ढलाई
मित्रो! ठीक इसी तरह इन्सान को गलाए बिना, तपाए बिना कोई कीमती नसल नहीं बन सकती। बहादुर महापुरुषों के इतिहास जब हम पढ़ने लगते है तो हमको यह बात पता चलती है कि इनमें से हर व्यक्ति को तपना पड़ा है, गलना पड़ा है और ढलना पड़ा है। गरम होना पड़ा है। आप क्या चाहते है? साहब, हम तो चैन की जिन्दगी जीना चाहते है और खुशहाली की जिन्दगी जीना चाहते है, मौज करना चाहते है, मजे उड़ाना चाहते है। और क्या करना चाहते है आप? और हम आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलना चाहते है। खबरदार! बकवास बंद कीजिए। किस बात की? इस बात की कि आप आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलना चाहते है। भगवान के रास्ते पर चलना चाहते है। अपने शरीर में से शक्तियाँ उभारना चाहते है। सिद्धियाँ उभारना चाहते है। देवता को इस शरीर में अवतरित करना चाहते है। इस घिनौने जीवन में जिसमें कि विलासिता कूट-कूटकर भरी हुई है। अय्याशी कूट-कूटकर भरी हुई है। इस शरीर में महानता किस तरह से पैदा कर पाएगा? नहीं साहब! हम महानता पैदा कर सकते है। ग्यारह माला जप करेंगे। बंद कीजिए आप ग्यारह माला। नहीं साहब! ग्यारह माला जप करेंगे, हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे, देवी का पाठ करेंगे। आपकी मरजी है, चाहे जो करें या ना करें, लेकिन महानता का उद्देश्य, आध्यात्मिकता का एक मात्र उद्देश्य है कि आपको अपने आप को तपाना पड़ेगा, अपने बहिरंग जीवन को गरम करना पड़ेगा। तपाने और गरम करने की प्रक्रिया को मैं समझाता हुआ चला आ रहा हूँ आपको और यह बताता आ रहा हूँ कि आदमी को अपना उद्धार करने के लिए और दूसरों का उद्धार करने के लिए तपस्वी का जीवन जीने के अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है। आध्यात्मिकता के लिए भी इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं है। विलासिता का जीवन जीएंगे, अय्याशी का जीवन जीयेंगे और आध्यात्मिकता के लाभों को प्राप्त करेंगे-बेटे, ये बेकार के सपने देखना बंद कर। दोनों काम साथ-साथ नहीं हो सकते-”दुइ कि एकसंग नहिं होहि भुआलू। हसब ठठाइ फुलाउब गालू॥ आप दोनों काम एक साथ किस तरह से करेंगे। जो से हंसेंगे तो आप गाल नहीं फुला सकते और अगर गाल फुलाएँगे तो हँसने का उद्देश्य पूरा नहीं कर पाएँगे। हँसना और गाल फुलाना, दोनों काम एक साथ नहीं हो सकती। हम पूरब को भी चलेंगे और पश्चिम को भी चलेंगे। पूरब और पश्चिम, दोनों दिशाओं की ओर आप एक साथ नहीं चल सकते है। अगर आप पूरब की ओर चलेंगे तो पश्चिम की ओर नहीं जा सकते और पश्चिम को चलेंगे तो पूरब को नहीं जा सकते। इसी तरह तृष्णाओं का, वासनाओं का जीवन जीएंगे तो आप आध्यात्मिक प्रगति की ओर नहीं बढ़ सकते। आध्यात्मिक प्रगति की ओर बढ़ेंगे तो आपको वासनाओं-तृष्णाओं से भरे जीवन पर अंकुश लगाना पड़ेगा। आप इन दोनों के फायदे उठाना चाहते है तो यह नहीं हो। एक को मंजूर कर लीजिए और एक को मना कर दीजिए। हमको यह करना है कि नहीं करना है। इधर चलना है कि नहीं चलना है। आप यह फैसला कर ले तो नफे में रहेंगे। दोनों तरफ चलेंगे तब? तब हम क्या कह सकते है।
दोहरा व्यक्तित्व न हो
बेटे, इस सम्बन्ध में हम कछुए का एक छोटा सा किस्सा सुनाते है। दोनों तरफ से चलने वाले एक साँप का और एक कछुए का किस्सा अखण्ड ज्योति में छपा है। एक साँप के दो मुँह थे एक आगे की तरफ और एक पीछे की तरफ। यह जापान का किस्सा है। उसका मालिक जब उसे दूध पिलाता था तो दोनों के बीच में रस्सी लगा देता था, ताकि दोनों साँप आपस में लड़ने न पाए। ये क्या करते थे? दोनों एक दूसरे को काटने की कोशिश करते थे और दूध छीनने को प्रयत्न करते थे। कछुआ भी ऐसे ही था। उसका एक मुँह पीछे की तरफ था और एक आगे की तरफ। पीछे वाला कछुआ यह कोशिश करता था कि आगे की ओर चलना चाहिए। इस तरह सारा दिन खींच तान करता रहता था। आधा इंच इधर चला, आधा इंच उधर चला सारे दिन ऐसे ही चलता रहता था। मित्रों! आपके भीतर भी अगर दो व्यक्तित्व बने रहेंगे तो आप एक में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे। अगर आप दुनिया में अय्याशी का, विलासिता का, तृष्णा का जीवन भी जीना चाहेंगे और आध्यात्मिकता की चालें भी चलाना चाहेंगे तो आपकी हैसियत उस कछुए जैसी हो जायेगी, जैसे मैं अभी कह रहा था। एक फैसला कर लीजिए कि आपको कहाँ चलना है? एक रास्ता बंद कर लीजिए कि आपको कहाँ चलना है? एक रास्ता बंद कर दीजिए। अगर आपको आध्यात्मिकता की राह पर चलना है तो आप अपने भौतिक जीवन को तपस्वी बनाने के लिए नष्ट कीजिए।
तपस्वी जीवन बनाइए
भगवान बुद्ध अन्तिम भगवान है, जो हमारे सबसे नजदीक आते है। भगवान के दस अवतार हुए है या बीस, इस बहस में मैं नहीं पड़ता। दस अवतारों का भी जिक्र आता है और चौबीस अवतारों का भी जिक्र आता है। दोनों ही अवतारों में अन्तिम हमारे बुद्ध हुए। भगवान बुद्ध ने जनसाधारण का जैसा बढ़िया मार्गदर्शन किया है मैं नहीं जानता कि इससे भी अच्छा कोई मार्गदर्शन किया गया हो। कलाओं के इतिहास में भगवान की कलाओं का जैसे-जैसे विकास हुआ है, उस क्रम में सबसे ज्यादा कलायें भगवान बुद्ध में है। परशुराम जी में तीन कलायें थी। रामचन्द्र जी की बारह कलायें मानी गयी है। बुद्ध की कितनी कलायें मानेंगे, मुझे मालूम नहीं, लेकिन कलाओं के क्रम में यह इतिहास बढ़ता हुआ चला गया। मत्स्य, कच्छप से लेकर वामन, वाराह तक कलाओं का यह क्रम पुराण ग्रंथों में भरा हुआ पड़ा है। श्रीकृष्ण भगवान को हम सोलह कला का मानते है तो बुद्ध भगवान की भी इतनी तो होगी ही। बीस कलाओं तो उनकी माननी पड़ेगी। पुराणों में कही लिखा जरूर होगा, पर मेरी निगाह में नहीं आया। उनकी जरूर ज्यादा कलायें रही होगी। उन्होंने यह बताया था कि अपने आप को सम्पन्न और दूसरे आदमियों को समुन्नत बनाने के लिए अगर आदमी को कुछ करना चाहिए तो उसकी गतिविधियाँ क्या होनी चाहिए? इसके लिए भगवान बुद्ध के पास एक ही हथियार था-तपस्वियों का हथियार। तपस्वियों का हथियार प्राप्त करके बुद्ध स्वयं समर्थ बने थे। मित्रों! मैं सोचता हूँ कि दुनिया में सबसे सम्पन्न आदमियों में भगवान बुद्ध का नाम होना चाहिए। इनसे और कोई मालदार है? नहीं, उनसे और अधिक कोई मालदार नहीं हो सकता। मालदारों में फोर्ड का मैंने सुना है, निजाम हैदराबाद का सुना है और भी बेटा छप्पन आदमियों का नाम आते है, पर मैं जानता हूँ कि भगवान बुद्ध का नाम, केवल आज के जमाने में ही नहीं है। पहले भी उनसे अधिक मालदार कोई भी आदमी नहीं हो सकता। अंगकोरवाट कंबोडिया का एक शहर था, जो अब मात्र खंडहर है। यह इतना बड़ा खंडहर है इतना शानदार खंडहर है कि लोग अभी भी यह कहते हैं कि दुनिया के इतिहास में इतनी बड़ी इमारत किसी ने नहीं बनाई। पुरातत्ववेत्ता, जो खंडहरों का इतिहास जानते है वे भी मानते है कि दुनिया का सबसे बड़ा खंडहर कौन सा हो सकता है। दुनिया पैसे पर जाती है फिर भी लोग इस सबसे प्राचीन और सबसे बड़े खंडहर और इमारत को देखकर आते है। कंबोडिया का अंगकोरवाट भगवान बुद्ध की सम्पन्नता का स्मरण दिलाता है। यह एक विशाल बुद्ध विहार था। बेटे और क्या बताऊँ आपको, सारे संसार में चले जाइए। अरब देशों में मक्का-मदीना के पास जो पुराने बौद्ध विहार बने हुए है। उनका इतिहास हमने अपनी भारतीय संस्कृति के विश्व को अजस्र अनुदान में लिखा हुआ है। मक्का मदीने में जहाँ हजरत मोहम्मद साहब की मीनार बनाई गयी थी, वहाँ का बौद्ध विहार उससे भी ज्यादा ऊँचा था, ऊपर से दिखाई पड़ता था, अतः हुक्म दिया गया कि इसको तोड़ा जाये, गिराया जाये और यहाँ के विहार बंद किए जाये। सारे-के-सारे मुस्लिम देशों में और सारे-के-सारे अरब देशों में बुद्ध विहार फैले हुए पड़े थे।
बुद्ध का चमत्कार
मित्रो! बुद्ध विहार में कितनी सामर्थ्य थी- यह मैं इमारतों की बात कह रहा हूँ। तक्षशिला की बात कह रहा हूँ। नालंदा विश्वविद्यालय की बात कह रहा हूँ। हिन्दुस्तान में श्रावस्ती की कह रहा हूँ। अजंता और एलोरा के बुद्ध विहारों की बात कह रहा हूँ। रंगून के पगोडा की बात कह रहा हूँ, जो स्वर्णमंदिर के नाम से प्रचारित है। पगोडा में सात टन भारी सोने की बुद्ध की मूर्ति बनी हुई है। बेटे, मैं यह इमारतों की बात कहता हूँ। बुद्ध के ज्ञान की बात मैं नहीं कहता, बुद्ध साहित्य की बात नहीं कहता केवल इमारतों की बात करता हूँ। चाइना में जितने ज्यादा प्राचीनकाल के मन्दिर दिखाई पड़ते है, सब बुद्ध का इतिहास है। आप सारे चीन में घूम आइए, कितना बड़ा देश है। हिन्दुस्तान से कई गुना बड़ा है। लम्बाई-चौड़ाई में और जनसंख्या की दृष्टि से भी। मन्दिर हिन्दुस्तान में भी हैं और मन्दिर चीन में भी है। लेकिन चीन में किसके मन्दिर है? वे सब बुद्ध के मन्दिर हैं। बुद्ध की यह समर्थता बेटे, इमारतों के हिसाब से बता रहा हूँ और किसी हिसाब से नहीं बता रहा हूँ। मित्रो! सम्पन्न बुद्ध ने क्या काम किया? मैं सोचता हूँ कि इतनी बड़ी क्रान्ति और किसी आदमी ने नहीं की। जिस समय में बुद्ध ने विचार क्रान्ति की थी, उस समय और कोई नहीं कर सका। बुद्ध ने कहा, बुद्धं शरणं गच्छामि। बुद्ध की शरण जाओ। नाम तो उनका सिद्धार्थ था, पर लोगों ने उनका नाम बुद्ध दे दिया। बुद्ध माने बुद्धि के देवता, विचारों के देवता, क्रान्ति के देवता। उस जमाने में उन्होंने जो गदर किया था, क्रान्ति की थी, आपका यह मिशन उसी का अनुगमन करता है। धर्मचक्र प्रवर्तन उनका उद्देश्य था। विचार क्रान्ति अभियान हमारा उद्देश्य है। दोनों में पूर्ण संगति और तालमेल है। वह पूर्वार्द्ध था और ये उत्तरार्द्ध है। उन्होंने सारे एशिया में बहुत भारी परिवर्तन किया था और अब युग निर्माण योजना अंत में बहुत बढ़िया और शानदार क्रान्ति के लिए कटिबद्ध हुई है। धर्मचक्र प्रवर्तन और युग निर्माण क्रान्ति की संगति मिलाकर मैं एक लेखमाला बना रहा हूँ। अभी तीन-चार लेख लिख लिए है। चार-पाँच और लेख लिखने अभी बाकी है। इनको आप पढ़िए कि बुद्ध की क्रान्ति और आपकी आज की क्रान्ति में कितना साम्य है। दोनों ने किस तरीके से एक ही सिद्धान्त का अनुकरण किया है। दोनों की कार्यपद्धति में कैसी एकरूपता है।
क्रान्ति का मूल : तप
भगवान बुद्ध ने अपने समय में समय के प्रवाह को बदलने के लिए प्रयत्न किया था। यह प्रयत्न उन्होंने किसके माध्यम से किया था? प्रचारकों के द्वारा। उनके पास प्रचारकों की सेना रहती थी। तो क्या सेना पंडितों की थी या उपदेशकों की? नहीं भाई! तपस्वियों की थी। तपस्वियों की सामर्थ्य असीमित होती है। सामर्थ्य की दृष्टि से एक ही व्यक्ति सम्पन्न हो सकता है और उसका नाम है तपस्वी। लेकिन संसार की दृष्टि में वही व्यक्ति बलवान हो सकता है, जिसके हाथ में या तो पैसा हो अथवा बन्दूक। चीनी नेता माओ कहते थे क्रान्ति या ताकत बन्दूक की नली में से निकलती है। माओ की ठीक बात भी ठीक हो सकती है। क्या पता, ताकत बन्दूक की नली से निकलती होगी? लेकिन जिसको हम आध्यात्मिक ताकत कहते है। उसे आध्यात्मिकता की शक्ति को यदि आप स्वीकार करते हो तो मैं यह कहता हूँ कि यह ताकत एक ही जगह से निकलती है और उसका नाम है तपश्चर्या। तपश्चर्या के अलावा वह कही से नहीं निकलती है और न निकल सकती है। गुरुजी और ये भजन-पूजन? बेटे ये तो उसके शृंगार है। जिस तरह बन्दूक की, तलवार की मूठ तरह तरह की होती है म्यान तरह-तरह के होते है। कोई मखमल के म्यान होते है। कोई मूठ किसी चीज की बनी होती है। कोई सोने की बनी होती है। किसी में हीरे के नग जुड़े हुए होते है। तरह-तरह के शृंगार होते है और उनके अनुसार तलवार की कीमत ज्यादा हो जाती है। हम जानते है कि किसी जमाने में बादशाह की तलवारें बहुत अच्छी और कीमती होती थी। ये शृंगार के कारण थी। इसी तरह मंत्र आपके शृंगार है। जप आपके शृंगार है। पूजा आपके शृंगार है। शक्ति के स्त्रोत नहीं है। अगर ये शक्ति के स्त्रोत रहे होते तो पंडितों के पास तो अब तक कब की ताकत आ गई होती। पंडित तो सारे देवी-देवताओं का पाठ करना जानते है। आप नहीं जानते, आपको देवी का, चंडी का पाठ करना नहीं आता। परन्तु पंडित जी को आता है। पंडित जी श्लोक बोलना ठीक से जानते है। आपको नहीं आता। अगर इसके साथ तप भी जुड़ा होता ता, अब तक पंडित अमीर हो गये होते, अगर इनके कर्मकाण्ड में ताकत रही होती।
तप से उत्पन्न होती है विद्या
मित्रो! कर्मकांडों में ताकत नहीं है। ताकत वहाँ होती है, जहाँ पर अपने आप को तपाने के बाद में आदमी शक्ति का उदय करते है। हमने आपको शृंगी ऋषि का किस्सा बताया था और कितनों का किस्सा बताया था। ऋषियों के पास किसकी महत्ता थी, क्या महत्ता थी बताइए? विद्वान थे, किताब पढ़े थे? नहीं पढ़े थे वहाँ तक जहाँ तक हम लोग पढ़े हैं। क्या वे लोग इतने ही ज्ञानी थे, जितने कि हम लोग विद्वान है? आज के पीएचडी के ज्ञान का मुकाबला प्राचीनकाल के विद्वान से कैसे किया जाए? बेटे, प्राचीनकाल में एक-एक ऋषि एक-एक विषय में पारंगत होता था। विश्वामित्र जी ने एक विषय में पारंगतता हासिल की थी और वह थी गायत्री। गायत्री में पीएचडी थे विश्वामित्र जी। आज हम सारे-के सारे तीस हजार वेद के मंत्रों का व्याख्यान कर सकते है। इस जमाने में शिक्षा ज्यादा है। उस जमाने में शिक्षा की वजह से एग्जाम परीक्षा नहीं होती थी, वरन् तपश्चर्या की वजह से एग्जामिनेशन होते थे। ऋषियों की महत्ता, ऋषियों की गरिमा, ऋषियों का गौरव इस बात पर टिका हुआ था कि उन्होंने अपने जीवन में तपश्चर्या को किस मात्रा में ग्रहण किया था। साथियों! मैं आपसे यह निवेदन कर रहा था कि आपके जीवन में तपश्चर्या के लिए स्थान मिले। अगर आप स्वीकार करें कि हम तपस्वी जीवन जीएंगे, तब क्या हो जायेगा? तब आपका बहिरंग जीवन जो पंचतत्वों का बना हुआ है, जो पदार्थों से सम्बन्धित है, जो दुनिया से सम्बन्धित है और उसे प्रभावित करता है, उसे प्रभावित करने के लिए आप तपश्चर्या के माध्यम से शिक्षित कर सकते है और श्रद्धालु बनने के बाद में अगर आप में सामर्थ्य है तो भगवान को भी अपनी सहायता करने के लिए मजबूर कर सकता है। मजबूर शब्द? हाँ बेटे, इसके अलावा और कोई शब्द मेरे पास नहीं है।
आप भगवान से दया की बात करते हैं कि भगवान बड़े दयालु हैं कृपालु हैं। अगर भगवान दयालु है कृपालु है। तो मैं यह सोचता हूँ कि मय्यत में जाकर के मैं बैठूँ और सवेरे से शाम तक भगवान की दयालुता की पोल खोलता जाऊँ। मरघट में आप जाइए और भगवान की पोल खोलते जाइए ये कौन मर गया? जवान आदमी मर गया। उसकी माँ बिलख रही है। उसके बच्चे बिलख रहे हैं। औरत बिलख रही है। यह कैसे हो गया? यह किसने मार डाला? भगवान ने। भगवान को आप गाली देंगे। आप अस्पताल होकर आइए और देखिए कि भगवान कितना दयालु है। वहाँ कितने आदमियों की आंखें फोड़ी जा रही हैं। कितनों के हाथ काटे जा रहे हैं। कितनों का क्या किया जा रहा है। ये कौन कर रहा है? भगवान कर रहा है। तो भगवान को गाली दें? नहीं, मैं गाली नहीं दे सकता, आप गाली दीजिए। तो फिर आप क्या कहेंगे? बेटे, इसे मैं केवल न्यायाधीश कह सकता हूँ।
कायदे-कानून वाला भगवान
गुरुजी! आप भगवान को न्यायाधीश क्यों कहते हैं? बेटे, मैं न्यायाधीश इसलिए कहता हूँ कि बिजली के तरीके से भगवान के कुछ कायदे और कानून है। बिजली के कायदे और कानून का हम पालन करते है तो वह पंखा चलाती है बत्ती जलाती है हमारा रेफ्रिजरेटर चलाती है। हर चीज चलाती है। भगवान भी बड़े दयालु है। बिजली के तरीके से। बिजली हमारी बहुत सेवा करती है। बिजली हमारे कमरे को गरम करती है। बिजली हमारे कमरे को ठंडा भी कर देती है। हमें टेलीविजन दिखा देती है। हमारा रेडियो चला देती है। बिजली हमारे कुएँ में से पानी निकाल कर लाती है। बिजली जितनी सेवा कर सकती है, उतनी दस नौकर भी नहीं कर सकते। बिजली रातभर हमारे ऊपर पंखा झलती है। बेटे, वह बड़ी दयालु है। इससे बड़ा दयालु और कौन हो सकता है। माता और नौकर भी रातभर पंखा नहीं झल सकते। नौकर को भी नींद आ जाती है। कभी हाथ धीमा चलाता है तो कभी तेज चलाता है लेकिन बिजली आपका पंखा बिना रुके एक स्पीड से चलाती रहेगी। एक दिन चलवाइए, दो दिन चलवाइए, वह बिना थे चलाती रहेगी। इससे बड़ा दयालु और कोई हो सकता है क्या? नहीं बेटे, बिजली से बड़ा दयालु कोई नहीं हो सकता। इसलिए उसे दयालु कहने में हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन मित्रो! आपको मालूम होना चाहिए कि बिजली बड़ी खौफनाक और खतरनाक भी है। अगर आप बिजली का गलत तरीके से इस्तेमाल करेंगे तो वह आपको मार डालेगी, आपके बच्चे को मार डालेगी, आपकी औरत को मार डालेगी। सब चीजें बरबाद हो जाएँगी। अरे साहब! आप तो दयालु हैं। नहीं भाईसाहब। हम दयालु नहीं है तो आप क्या है? नियम है मर्यादा है कायदा है और कानून है। अगर यह बात आप मान लेंगे तो आगे चलेंगे। आप यदि नहीं मानते रहेंगे कि भगवान को फुसलाकर फुसलाने के चक्कर में फँस रहेंगे तो फुसलाइए। अच्छा आप भगवान को फुसलाकर क्या करेंगे? अपना उल्लू सीधा करेंगे। उल्लू सीधा करने किसे कहते है? जो हमारी उचित और अनुचित माँगों को पूरा कर दे, जो हम माँगे, वह लाकर दे दे, वह उल्लू है। बेटे, ये विचार आप मन से निकाल दे। यदि यही विचार अपने मन में भरे रहेंगे तो आप आध्यात्मिकता से बहुत दूर बने रहेंगे। आध्यात्मिकता भी आपसे बहुत दूर रहेगी, क्योंकि आप आध्यात्मिकता के सिद्धान्तों को नहीं जानते। आप भगवान के सिद्धान्तों को नहीं जानते। भगवान को सहायता करने के लिए मकबूल किया जा सकता है पंखा झलने के लिए। अपने आप बिजली पंखा नहीं चला देगी। पहले हमें बिजली का बटन दबाना पड़ता है। इसी तरह तपश्चर्या द्वारा भगवान को मकबूल करना पड़ता है। तपश्चर्या करना आपको स्वीकार न हो तो फिर आप यह उम्मीद मत रखिए कि भगवान दयालु है देवता दयालु है अमुक दयालु है। इसलिए दयालुता के वशीभूत होकर के आपकी सहायता करेंगे। बेटे ऐसी सहायता आपको नहीं मिलेगी। आप लिख लीजिए, यदि इस तरह से सहायता मिल जाए तो हमसे कहना। (क्रमशः अगले अंक में)
(आत्मसंयम योग नाम श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय की युगानुकूल व्याख्या द्वितीय किस्त)
विगत अंक में छठे अध्याय का शुभारम्भ विगत पाँच अध्यायों की एक संक्षिप्त विवेचना के साथ किया गया था। प्रथम छहों अध्याय कर्मयोग प्रधान हैं, पर उनमें संयम साधना का महत्व कितना है यह इन छह अध्यायों में में एक पूरा अध्याय इसी के लिए सुनियोजित किये जाने पर समझा जा सकता है। इस अध्याय का शुभारम्भ प्रथम श्लोक की व्याख्या के साथ किया गया था। उसमें योगेश्वर श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को सच्चे संन्यासी का स्वरूप बताते है। जो निष्काम भाव से कर्म करते है। वे भले ही संन्यासी का वेश न धरें, सही अर्थों में संन्यासी है। जो अग्नि का त्याग कर उसका मात्र ढोंग करते है। परोपकार के कार्य भी नहीं करते, वे संन्यासी मानने योग्य नहीं है। श्रीकृष्ण की यह व्याख्या अर्जुन की दुविधा को देखकर की गई है, जिसमें वह युद्ध की तुलना में संन्यास को उचित मानता है। श्रीकृष्ण उसे पलायनवादी कहकर समझा रहे है। अगले श्लोक में इसी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते है कि जिसने संकल्पों का त्याग कर दिया हो, वही सच्चा योगी है। यहाँ संकल्पों से उनका आशय है महत्वकाँक्षाएं-कामनाएँ। इन्हें छोड़कर निष्काम भाव से जो कर्म करें, वही दिव्यकर्मी है। ऐसा योगी अपने अहं के ढाँचे को गिराकर ही सच्चा योगी बनता है। भावी सुख की इच्छाओं-कल्पनाओं में तल्लीन बने रहना संकल्प क्रीडा कहा गया है। भगवान इसीलिए मन को शाँत करने का यह उपाय बताते है। अब आगे।
पूर्व भूमिका
सच्चे संन्यासी कर्मयोगी एवं मात्र आडम्बर रचने वाले तथाकथित वेशधारियों के मध्य अन्तर हम समझ सकें तथा आकाँक्षाओं कामनाओं का त्याग कर सही अर्थों में योगी बनें, यह मर्म प्रथम दो श्लोकों का है। योग में आरुढ होने की यह पूर्व भूमिका है। बिना योग में आरुढ हुए कोई संन्यस्थ नहीं हो सकता। बार-बार पैदा होते रहने वाली इच्छाओं से मनोकामनाओं से मुक्ति मिले तो योगी बनने हेतु मनःस्थिति बने। हमारा संकल्प एक ही हो कि हमारे व ईश्वर के संकल्प मिल जाए। दोनों मिलकर एक हो जाए। ईश्वर का, नवयुग के प्रज्ञावतार का, हमारे इष्ट-आराध्य का एक ही संकल्प है युग-परिवर्तन। यदि हम आत्मनिर्माण से युग के नवनिर्माण की दिशाधारा से इतर सोच रहे है, तो फिर हम ईश्वरीय धारा से अलग चल रहे है। परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर एक ही बात कही कि तुम हमें मानते हो तो हमारे संकल्प से जुड़ जाओ। हमारा संकल्प अर्थात् ईश्वरीय संकल्प युग निर्माण योजना प्रज्ञा, अभियान, युग परिवर्तन, इक्कीसवीं सदी में नारीशक्ति का, संवेदना का अभ्युदय, सतयुग का आगमन। हर श्वास हम इसी संकल्प की पूर्ति हेतु जिए।
यदि हम गुरुसत्तारूपी भगवान के प्रमुख पार्षद के एक छोटे से अंश है तो हम अपनी जिम्मेदारी समझ सकते है। यदि हम अपनी गुरुसत्ता को भगवान की कम्पनी का मैनेजिंग डायरेक्टर मान लें तो स्वयं को उस कम्पनी का एक छोटा मोटा कारिंदा गुमाश्ता तो मान ही सकते है। वैसे ही यदि बन जाये अपने संकल्पों को गुरुसत्ता के संकल्पों के साथ जोड़ लें तो हमें अपना युगधर्म समझ में आ जाए। आज के युग का धर्म है-समग्र समाज का अभिनव निर्माण, सारे समाज का आध्यात्मीकरण, विश्व वसुधा को गायत्रीमय बना देना। इसके लिए कर्मयोगी बनकर अपनी सारी आसक्ति को, सुखों की चाह को आकाँक्षाओं को, मनोकामनाओं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर जीना होगा। हर क्षण यही भाव रहे कि हम परमात्मा के लिए कह रहे है, अपने लिए नहीं। हमारे संकल्प भगवान को अर्पित हो जाए। यही प्रभु चाहते है। हम निष्काम कर्मयोगी बन जाए।
हर गुरु प्रभु-समर्पित कर्म चाहता है
भगवान अर्जुन से यह अपेक्षा क्यों रख रहे हैं, बार-बार यह बात क्यों कह रहे हैं? इसलिए बार-बार जोर दे रहे हैं कि अर्जुन के प्रारब्ध कट जाए। हर गुरु अपने अपने समय में अपने शिष्य के हित हेतु ऐसा कहता व करता है। प्रारब्ध व्यक्ति को काटने ही पड़ते है। कष्ट भोगने ही पड़ते है किन्तु अच्छे कर्म करके, सतयुगी पुरुषार्थ में भागीदारी करके जल्दी काटे जा सकते है। जो कर्म हम कर चुके और जो अभी पके नहीं, जिनका अभी प्रारब्ध व संचित के रूप में संस्कार नहीं बना, उनको तो निष्काम कर्म करके प्रारब्ध बनने से रोका जा सकता है। इसलिए सद्गुरु कहते है, योगेश्वर कहते है निष्काम कर्म करता चल। तेरे संचित और क्रियमाण कर्म कटते चले जाएंगे। तेरा यह लोक भी, परलोक भी सुधर जाएगा।
जीवन जीने के क्रम में हमें भाँति-भाँति के दुःखों कष्टों से गुजरना होता है। उच्चस्तरीय, सद्गुरु स्तर की सत्ताएँ जानती है कि विगत जीवन में, विगत जन्मों में किए गये कर्मों की विधि व्यवस्था के कारण यह शरीर मिला है, कष्ट भोगना तो पड़ेगा ही। परमपूज्य गुरुदेव ने हम सबसे कहा था कि अपने तप व आशीर्वाद से हम तुम्हारे पापों का, प्रारब्ध का जखीरा नष्ट कर देंगे। यह गुरु का सदैव शिष्य को आश्वासन है, पर है यह एक शर्त पर, वह यह कि हम इसके बदले गुरु का कार्य करें, युगधर्म में स्वयं को नियोजित करें, कुछ कष्ट सहना पड़े तो उसे तप मान लें। वैसे न जाने कितना भोगना पड़ जाता। पर हमारा सौभाग्य कि हम सद्गुरु से जुड़े। हमारे कष्ट थोड़े में टल जाएँगे। प्रारब्ध भी कट जाएँगे। दिव्यकर्मी होने के कारण संचित-क्रियमाण का अनुपात घटेगा। पाप होंगे ही नहीं तो मोक्ष सुनिश्चित है। कर्म का यह विधान समझना, निष्काम कर्मयोगी बनना एवं अच्छे कर्मों का अपना फिक्सड डिपॉजिट बढ़ाते चलना यही हमारा उद्देश्य होना चाहिए।
मैं पन छोड़ें व साधक बनें
अभी हमारी पहले दो श्लोकों की व्याख्या ही चल रही है। भगवान संकल्पों से (कामना-आकाँशाओं इच्छाओं से) मुक्ति चाहते है एवं एक आदर्श शिष्य को सच्चा मार्गदर्शन कर रहे है कि जीवन मिला ही श्रेष्ठ कर्मों को करने के लिए है। श्रेष्ठ के खाते में वृद्धि करते रहिए एवं अपने पाप-कर्मों को, प्रारब्ध संचित को काटते चलिए। यही जीवन की रीति-नीति हमारी होनी चाहिए। हमारा हर कार्य ईश्वर समर्पित हो। जीवन व्यापार को ईश्वरीय स्वरूप मानकर करें। कभी भी अपना मैं पर निजी इच्छा आकाँशा को न जोड़ें। योग मनोविज्ञान की एक बड़ी जटिल व्यवस्था को वे अर्जुन के समक्ष रखना चाह रहे है ताकि वह आत्मसंयम, ध्यानयोग का कर्म समझ सके। अभी दोनों श्लोकों का प्रतिपादन संन्यास सम्बन्धी भ्रान्तियाँ मिटाने, दिव्यकर्मी के लक्षणों को बताने के लिए एवं यह समझाने के लिए किया गया है कि जिसने संकल्पों का त्याग न किया वह योगी नहीं हो सकता। (असंन्यस्त संकल्पः कश्चन योगी न भवति)। यदि संकल्प रखता है तो वह भ्रष्ट होकर पुनर्जन्म प्राप्त करता है एवं जब तक सारी इच्छायें मिट नहीं जाती, निरन्तर जन्म लेता रहता है। पूर्णतः बंधन मुक्ति का पथ प्रभु यहाँ समझा रहे है एवं चाह रहे है कि अर्जुन इस तथ्य को समझ ले।
एक बानगी
एक घटनाक्रम इसी संदर्भ में, जो इस युग का ही है। यहाँ बताने का मन है। प्रसिद्ध उद्योगपति एवं बिड़ला परिवार के आदि संस्थापक श्री जुगल किशोर जी बिड़ला के परिवार में एक बालक जन्मा। उसने आगे चलकर एक डायरी लिखी। यह बालक प्रतिभाग की दृष्टि से विलक्षण था एवं उसने आदित्य बिड़ला ग्रूप नाम से एक भरा पूरा संगठन खड़ा किया। उसकी मुम्बई-बैंगलोर फ्लाइट के क्रैश (हवाई दुर्घटना) में मृत्यु हो गयी। मृत्यु के बाद उसकी डायरी पायी गयी। डायरी के यह अंश उन दिनों प्रचलित सुप्रसिद्ध साप्ताहिक धर्मयुग में प्रकाशित हुआ जो कि पत्रिका का संयोग से अन्तिम अंक था। मृत्यु के समय उसकी आयु 32-33 वर्ष की रही होगी। उस डायरी में उसने लिखा था। अब मुझे अहसास हो रहा है, जाग्रति की अनुभूति हो रही है कि मैं पूर्वजन्म का संन्यासी हूँ। अमेरिका के रामकृष्ण मिशन में मैं पूर्वजन्म में सक्रिय रहा हूँ। वहाँ काम करते करते संन्यास लेने के बावजूद मेरे मन में एक लड़की के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। मैंने बहुत सोचा कि उसके बारे में न सोचूँ। फिर मैंने शरीर छोड़ दिया। पूर्वजन्म के संस्कारोंवश मेरा इस परिवार में पुनः जन्म हुआ। अब मैं इंग्लैण्ड में पढ़ने आया हूँ तो ठीक उसी शक्ल सूरत की एक लड़की से मेरी मुलाकात हुई। क्या यह मेरी जीवनसाथी बन सकेगी? डायरी यहाँ मूक हो जाती है। परिवार के लोगों ने उनका विवाह कही और किया एवं दोनों पति-पत्नी क्रैश में मारे गये। उन्हीं की संतान अब उनका विशाल तंत्र चला रही है। वे डायरी में यह भी लिखते है मैं कर्मों का भोग भोगने आया हूँ। संन्यासी होने के नाते मेरी मुक्ति हो जानी चाहिए थी। शायद अभी और कष्ट भोगना भाग्य में लिखा है।
भोग छूटा तो ज्ञान जन्मा
पूर्वजन्म के तप ने एक साधन को एक धनीमानी परिवार में कर्मयोगी के रूप में जन्म दिलवाया। जैसे जैसे भोग छूटा, ज्ञान का उदय होता गया। किसी भी सामान्य व्यक्ति को अनायास ही पूर्वजन्म की स्मृति आने लगे व उसे आभास होने लगे कि वह कौन है तो वह कब संसार से जाने वाला है, यह ज्ञान उसे हो चुका ऐसा मान लेना चाहिए। परमहंस की स्थिति के लोग अपने विषय में जानते है, पर कभी कभी ही जग−जाहिर करते हैं। परमपूज्य गुरुदेव को तीन जन्मों की जानकारी उनकी अदृश्य सूक्ष्म शरीरधारी सत्ता ने दी। जो राम था, कृष्ण था, वही रामकृष्ण बनकर आया है, यह श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा था। ऐसे परमहंस अपने महानिर्वाण का दिन भी तय कर लेते हैं और स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करते हैं।
यह सुनिश्चित है कि पूर्वजन्म की कर्मवासना एवं संकल्पों के अनुसार भावी जीवन के संस्कार तय होते है। योग पर आरुढ होकर ही, निष्काम भाव से कर्म करते हुए ही व्यक्ति बंधक मुक्त हो सकता है, नहीं तो चौरासी लाख योनियों का फेर है। यदि यह तथ्य समझ में आ जाए तो हमारे सभी कर्म स्वतः निर्मल होते चले जाएंगे एवं हम मोक्ष को प्राप्त हो जाएंगे। संकल्पों से निवृत्ति की चर्चा श्रीकृष्ण इसीलिए कर रहे है। पुनर्जन्म एवं संकल्पों वासनाओं से जुड़े रहने की परिणति की व्याख्या इसी अध्याय में आगे 41-44 क्रमाँक के श्लोकों में विस्तार से हुई है। तब उसे वहाँ दृष्टांतों के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे। अभी यहाँ अध्याय 6 के तीसरे व चौथे श्लोक की व्याख्या की ओर बढ़ते है।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगरुढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥3॥
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसंकल्पसन्यासी योगारुढस्तदोच्यते॥4॥
पहले शब्दार्थ देखते है -
“ज्ञानयोग में (योग) आरोहण करने के इच्छुक (आरुरुक्षो) मुनि के लिए (मुनि) निष्काम कर्म (कर्म) कारण कहा जाता है। (कारणम् उच्यते)। योगमार्ग में आगे बढ़े होने के कारण इनके लिए। (योगारुढस्य तस्य एवं) कर्म निवृत्ति (शमः) को ज्ञान की पूर्णता प्राप्ति का सहायक (कारण) कहा गया है (उच्यते)।”
जब(जिस समयावधि में) (यदा) सब प्रकार के संकल्प छोड़ने वाले साधन अर्थात् इहलोक व परलोक में सुख भोग की वासना त्यागने वाले (सर्वसंकल्पसंन्यासी) रूप रसादि इंद्रिय भोग्य विषयों में (इंद्रियार्थेषु) आसक्त नहीं होते (न अनुषज्जते) उनके साधनरूप कर्मों में भी आसक्त नहीं होते (न कर्मसु च न) तब (यदा) उन्हें योग में प्रतिष्ठित (योगारुढः) कहते है। (उच्यते)।
अब तीसरे व चौथे श्लोकों का भावार्थ देखते है :-
“योग में आरुढ होने की इच्छा रखने वाले साधन के लिए प्रभु समर्पित कर्म ही एकमेव साधन है। ऐसा होने पर उस योगारुढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों के अभाव वाला भाव है, वह उसके लिए शाँतिप्रदाता, कल्याणकारी होता है। (श्लोक 3, अध्याय 6)। जब व्यक्ति (जिस काल अवधि में) विषय भोगों और कर्मों में आसक्त नहीं होता, उस काल में उसे (तब ही) एकाग्र योग में आरुढ-त्यागी पुरुष माना जाता है। (श्लोक 4, अध्याय 6)।”
एकाग्रता का अभ्यास
अब यहाँ इन दो श्लोकों में कही गई बातों के मर्म को समझना जरूरी है। हर व्यक्ति एकाग्र होकर ध्यान करना चाहता है। यह आत्मा की प्यास है। बहुचित्तीय (पॉली साइकिक) मन वाला मनुष्य योगारुढ़ हुए बिना एकाग्रता को साध नहीं सकता। एकाग्रता का अर्थ मन चित्त की निश्चलता नहीं है। सभी बाधक विरोधी विचारों को परे हटाकर समग्र मन द्वारा (vलेvिटव माइंड) किसी एक ही विषय के चिंतन की विधि ही ध्यान कहलाती है। मन को खुला छोड़ देते है तो अनगढ़ कुसंस्कारी अवचेनत मन के कारण अस्थिरता के दिखाई देती है। मनोयोग तत्परता एकाग्रता तल्लीनता जैसी उपलब्धियाँ नहीं मिल पाती। मन की निरर्थक भाग दौड़ को नियंत्रित करने एवं उसे एक ही विषय पर केंद्रित करने के लिए एकाग्रता की शक्ति हर साधन को अभीष्ट है। तब ही तो मन शक्तिशाली संकल्पहीन बन पाएगा।
श्रीकृष्ण तीसरे श्लोक में कहते है कि एकाग्रता की प्राप्ति के लिए कर्मयोग साधन है किन्तु इसे क्रमशः विकसित करते हुए इसका व्यावहारिक प्रयोग आत्मा पर गहन ध्यान लगाने के रूप में किया जाना चाहिए। ‘शम’ अर्थात् मन की शाँति मन को चुपकर एक ही भाव में तल्लीन कर लेना। मन की शाँति के बिना योगारुढ़ नहीं हुआ जा सकता। जब मन कामनाओं के दबाव से मुक्त हो जाता है, उसकी भोग वासना की इच्छाएँ निवृत्त हो जाती है तो कहीं भी केंद्रित कर मनवाँछित आध्यात्मिक सफलताएँ अर्जित की जा सकती है, अतींद्रिय क्षमताओं को जाग्रत किया जा सकता है।
योग पर आरुढ साधक
श्री भगवान ने ‘आरुढ’ होना अर्थात् सवारी करना शब्द जान बूझकर प्रयुक्त किया है। योग पर आरुढ अर्थात् योग के घोड़े पर सवार साधक। वीर अर्जुन को युद्धक्षेत्र में इससे सुँदर और क्या समझाया जा सकता है। “यथा स्थान तथा शैली” का प्रयोग कर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते है कि जो योग के घोड़े पर सवार होना चाहते है उनके लिए निःस्वार्थ कम अति अनिवार्य है, सहायक है (कर्म कारणमुच्यते)। किंतु ऐसा हो जाने के बाद (योगरुढस्य तस्यैव) साधक हेतु आध्यात्मिक ऊँचाई पर पहुँचने हेतु ‘शम’ अर्थात् मन की शाँति ही एकमात्र साधन है (शमः कारणमुच्यते)। एकाग्रता की उपलब्धि हेतु मन के विक्षेप के कारणों का हटाया जाना जरूरी है।
मनोविग्रह हेतु मानसिक विक्षोभ पैदा करने वाले अहंकार, अहंकेंद्रित कामनाएँ-वासनाएँ आदि कारणों से मुक्त होना पड़ेगा। निःस्वार्थ सेवाप्रधान समर्पित कर्मों के माध्यम से इन सभी कारणों का निवारण हो जाता है। कर्मयोग उन सभी लोगों के लिए एक साधन है, जो मन की एकाग्रता के लिए प्रयत्नशील है, ध्यानस्थ होना चाहते, मनः शक्ति के कुछ कार्य करना चाहते है। एकाग्रता प्राप्त होते ही आध्यात्मिक साधन को अधिकाधिक मानसिक शाँति प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। मन की भटकन रुकेगी तो ही शाँति मिलेगी।
सफल ध्यान हेतु निष्काम योग
हर व्यक्ति आज के भोगवादी युग में मन की शाँति चाहता है। सुख साधनों का उपभोग करते हुए अपने अहं को पालकर उससे नियंत्रित होते हुए यह शाँति कभी मिलेगी नहीं। लोग उसे तलाशते भी इन्हीं चीजों के माध्यम से है। फलतः अतृप्ति बेचैनी-तनाव-उन्माद ही हाथ लगते है। ध्यान का नाटक करने से क्या लाभ, यदि संकल्पों से अहंकेंद्रित कामनाओं से मुक्ति नहीं मिल पाई। ध्यान तभी सफल है, जब वह मन को शाँत कर दे। उसे भटकन से मुक्त कर दे। योग पर आरुढ होने के बाद समर्पित कार्य करना अनिवार्य है। प्रभु समर्पित जीवन जिए बिना योगारुढ़ नहीं हुआ जा सकता और योगारुढ़ हुए बिना मन शाँत नहीं हो सकता। सभी बातें शर्तें एक दूसरे पर निर्भर है।
निष्काम कर्मों के परिणामस्वरूप चित्तशुद्धि होकर आत्मानुभूति होती है एवं ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते है, “ज्ञान काँटे से अज्ञान काँटे को निकालना होता है, तब दोनों ही काँटे फेंक दिए जाते है। तत्पश्चात तो ज्ञान व अज्ञान से परे ब्राह्मी स्थिति में पहुँचना अति सरल है” योगारुढ़ होने के लिए शुभ या अशुभ दोनों ही प्रकार की वासनाओं को छोड़ना होगा। तनिक सी भी रह गई तो मन अशाँत बना रहेगा। ठाकुर श्री रामकृष्ण देव कहते है, “सूत में जरा सा भी रेशा रहने से वह सुई के छेद में नहीं घुस सकता। उसी प्रकार मामूली सी वासना भी हुई तो मन ईश्वर के चरणकमलों का ध्यान, उनमें लीन होने का भाव नहीं कर सकता।” अब प्रश्न यह उठता है कि यह कैसे जाना जाए कि हमें पर्याप्त एकाग्रता मिल गई व हम योग आरुढ हो गए? इसकी व इससे आगे मन की शक्ति की चर्चा आगामी अंक में। (क्रमशः)
‘गायत्री महिमा’ धारावाहिक का प्रसारण आरंभ
युगशक्ति गायत्री के माहात्म्य को प्रतिवादित करने वाले टेलीविजन धारावाहिक की बड़े समय से प्रतीक्षा थी। अब गुरुसत्ता के संरक्षण में भावनाशील व इसी क्षेत्र के निष्णात परिजनों के माध्यम से इसकी विधिवत शुरुआत दूरदर्शन-1 (राष्ट्रीय) पर प्रति रविवार 1 से 1.3 प्रातः की अवधि में ‘गायत्री महिमा’ नाम से हो गई है। पहली कड़ी 21 अगस्त, 23 रविवार को प्रसारित हुई। अभी तो विभिन्न ऋषियों से जुड़ी गायत्री संबंधी कथाओं उनके तत्वदर्शन का सार 26 कड़ियों के लिए स्वीकृत हुआ है। बाद में इसे 14 कड़ियों तक बढ़ाने का मन है। सभी परिजन वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, दधीचि, जमदग्नि, आदि सतयुग काल के ऋषियों के दृष्टाँतों के माध्यम से गायत्री के तत्वदर्शन को समझने हेतु औरों को भी प्रेरित करें, स्वयं भी देखें।
शाँकर मठ का विवाद
ज्योतिर्मठ में शंकराचार्य और उनके शिष्य तथा इस पीठ के प्रथम आचार्य त्रोटक की मूर्तियाँ है। मंदिर में तब कोई पीठाधीश नहीं था। दक्षिण भारत से नियुक्त पुजारी रावल ही मठ में पूजा अर्चना करते थे। लगभग डेढ़ सौ वर्ष से वहाँ की आचार्य परंपरा विच्छिन्न थी। जिन विभूति या शंकर के अवतार कहे जाने वाले महापुरुष ने इस मठ की स्थापना की थी, उन्हीं की आरंभ की हुई परंपरा की दुर्गति के बारे में सुनने को मिला तो श्रीराम का हृदय दुखी हो उठा। वृत्तांत वहाँ के रावत पुरोहितों से सुनने को मिला। सुनकर श्रीराम देर तक शंकराचार्य की प्रतिमा के सामने बैठ रहे। उठकर मठ में स्थापित स्फटिक शिवलिंग के समीप आए। वहाँ अभिषेक किया। शाँकर गुफा में स्थापित शिवलिंग के बारे में कहते है कि यह कैलाश से लाया गया था। स्वयं आदि शंकराचार्य ने ही इसकी स्थापना की थी। इन उल्लेखों को ध्यान से सुनने के बाद श्रीराम किसी गहरे विचार मंथन में चले गए। कुछ कदम चलने के बाद वे खीजे हुए से दिखाई दिए। संभवतः भीतर आए उतार चढावों ने उन्हें खिन्न किया हो। भावों और विचारों के वे उभार अपनी संस्कृति और प्राचीन गौरव गरिमा के क्षत विक्षत हो जाने से ही आ रहे थे।
श्रीराम मंदिर से बाहर निकलकर कुछ दूर स्थित एक वृक्ष की छाया में बैठ गए। वे सोचने लगे कि अब किस दिशा में जाना है। इस ऊहापोह के साथ बदरीनाथ के खंडित गौरव और नर नारायण पर्वत मिलने के बाद होने वाले विनाश की किंवदंतियों पर भी ध्यान जा रहा था। इस पंद्रह मिनट अपने अंतस् में डूबते उतराते कब आँख लग गई, पता ही नहीं चला। पेड़ के सहारे बैठे बैठे जैसे नींद आ गई। पहाड़ी यात्रा ने बुरी तरह थका दिया था। ऊबड़-खाबड़ रास्तों से आने के कारण पर बेहद दबाव पड़ा था। रात में अच्छी नींद आई थी, लेकिन थकान अभी बाकी थी शायद। आधा घंटे बाद नींद खुली। ज्योतिष्पीठ के सामने ही एक झरना बहता है। उसे दंडधारा कहते हैं। श्रीराम ने पानी से हाथ मुँह धोए और आचमन किया।
आचमन के बाद क्षणभर के लिए ही मन में प्रश्न आया कि अब किधर चलना है? प्रश्न के तत्क्षण बाद या उससे मिलता हुआ ही समाधान भी आया। भविष्यबदरी होते हुए मानसरोवर की ओर निकलना चाहिए। समाधान अपने भीतर ही आंतरिक प्रेरणा की तरह उभरा था। इसे मार्गदर्शक सत्ता का प्रेषित निर्देश भी मान सकते है। गंतव्य और मार्ग स्पष्ट होते ही श्रीराम नीतिघाटी की ओर चल दिए। लगभग दस किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता तय करने के बाद तपोवन पहुँचे। वहाँ के तप्तकुँड में गुनगुने पानी से स्नान आर कुछ देर विश्राम कर भविष्यबदरी पहुँचे। चारों तरफ सन्नाटा था। इक्का दुक्का लोग ही दिखाई दिए। विष्णु मंदिर अभी खुला नहीं था। पुजारी यद्यपि पास ही रहता था, लेकिन लोगों की आवाजाही खास नहीं थी, इसलिए पूजा आरती का क्रम नियमित नहीं बन पाया था। मंदिर पूजा आराधना के लिए कहाँ होते है, उनकी व्यवस्था और अनुशासन में दर्शकों की भीड़ भाड़ ही मुख्य आधार होती है। मथुरा, वृंदावन और ऋषिकेश में श्रीराम ने यह तथ्य अच्छी तरह अनुभव कर लिया था। मंदिर के पट बंद देखकर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ।
भविष्य बदरी में
मंदिर के पास पीपल का एक वृक्ष था। उसके नीचे एक शिला रखी दिखाई दी। श्रीराम उसे निहारने लगे। शिला पर किसी समय चढ़ाए गए फूल और पूजा सामग्री दिखाई दी। सूखे पत्ते, तिनके और हवा में उड़कर आया गर्द गुबार शिला पर फैले हुए थे। पिछले तीन चार दिन से जैसे किसी ने सफाई नहीं की थी। श्रीराम को लगा कि यह शिला सामान्य नहीं है। पूजा सामग्री चढ़ाई गई दिखाई दे रही है, इसका अर्थ है कि यह कोई देवप्रतिमा है। शिला को साफकर गौर से देखा तो स्पष्ट प्रतीत हुआ कि प्रतिमा ही है। प्रतिमा है, लेकिन अधबनी है जिस किसी भी देवता की हो, आकृति आधी ही बनी दिखाई देती है। धड़ के ऊपर का भाग पहचाना जा सकता है। वह भी बहुत स्पष्ट नहीं है। बहुत कोशिश करने पर अनुमान लगाया जा सकता है कि यह विष्णु की प्रतिमा हो सकती है।
असमंजस हुआ कि विष्णु मंदिर पास ही है। प्रतिमा उसमें स्थित न होकर बाहर क्यों रखी हुई है। कोई कारण समझ नहीं आने के बाद श्रीराम ने उस सवाल को अनुत्तरित छोड़ दिया और वृक्ष के पास ही बैठ गए। वे देखना चाहते थे कि भविष्य के बदरीनाथ कैसे हैं? इसलिए पुजारी का इंतजार कर रहे थे। दोपहर का सूरज पश्चिम की ओर खिसकना शुरू हुआ, तब पुजारी आता दिखाई दिया। उसने मंदिर के पट खोले। उससे पहले दरवाजे पर चढ़ाई हुई सामग्री बटोरी। वह बुदबुदाता जा रहा था। सामग्री कम देखकर शायद आगंतुकों के लिए कुछ कह रहा था।
पट खुलने पर श्रीराम दर्शन के लिए आगे बढ़े। विष्णु मंदिर में गर्भगृह के भीतर नहीं जाया जाता। श्रीराम ने बाहर खड़े होकर ही हाथ जोड़े। पुजारी से कहा, “भीतर आना है। पास से दर्शन करना चाहो तो कर सकते हो। सवा रुपया लगेगा।”
सुनकर श्रीराम स्तब्ध रह गए। इस जंगल में भी भगवान के दर्शन से कमाई। वे चुप रहे। पुजारी ने फिर टोका, “सोचा लो। कोई है नहीं, इसलिए मौका है, वरना विष्णु मंदिर में अंदर किसी को नहीं आने दिया जाता।” श्रीराम ने पुजारी की पेशकश पर कहा, “नहीं महाराज!” मैं मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता। यही ठीक हूँ।”
पुजारी फिर कुछ बुदबुदाया। श्रीराम को यह तो सुनाई नहीं दिया कि वह क्या कह रहा है, लेकिन उसके भाव जरूर समझ जा गए। श्रीराम ने कहा, “परेशान मत होएं महाराज! मैं अभीष्ट दक्षिणा चढ़ाऊँगा।” यह कहते हुए उन्होंने थैली में से सवा रुपया निकाला और गर्भगृह की चौखट पर रख दिया।
“किसी कुलीन परिवार के लगते हो।” पुजारी ने प्रसन्नता व्यक्त की। थोड़ा खुलने की दृष्टि से कहा, “अकेले ही आए तो क्या? इस छोटी से उम्र में तीर्थयात्रा की क्या सूझी? क्या साधु संन्यासी होने का मन है? यहाँ किसी बाबा जोगी को अपना गुरु मत बनाना। ज्यादातर लोग कपट मुनि होंगे।”
पुजारी ने एक ही साँस में कई सवाल कर दिए और सलाह भी दे दी। वह सवा रुपया मिलने की खुशी में आत्मीयता जाता रहा था। जिस किसी भी कारण जी खोल रहा हो, श्रीराम ने उसका आदर ही किया। पूछने लगे, “बाहर जो प्रतिमा है, वह किनकी है।”
“वह प्रतिमा अधूरी है। किसी ने गढ़ी नहीं है। समय अपने आप गढ़ रहा है। जब पूरी हो जाएगी तो बदरी विशाल यहीं पूजे जाएंगे।” पुजारी ने कहना जारी रखा, “तब नर और नारायण पर्वत भी मिल जाएंगे। लाता देवी के मंदिर में अभी तो चौबीस वर्ष में मेला लगता है। बदरी विशाल के यहाँ प्रकट होने पर हर वर्ष मेला लगेगा।”
विवरण देते हुए पुजारी अचानक गंभीर हो गया। “तब मुझे भी गर्भगृह के भीतर बुलाने का पाप नहीं करना पड़ेगा। मेले में ही बहुत लोग आएंगे और हाँ, बदरीनाथ जी के दर्शन करने वाले भी तो यही आएंगे। उनके चढ़ाए पैसों से मैं मालामाल हो जाऊँगा।” पुजारी कहे जा रहा था। श्रीराम उसकी बातें विनोद की तरह सुन रहे थे। थोड़ी देर पहले सवा रुपया माँगने पर जो गुस्सा आ रहा था, वह तरस में बदल गया था। गरीबी है इसीलिए ये लोग उम्मीद लगाते है। पुजारी कहे जा रहा था, “लेकिन वह दिन देखने के लिए मैं कहाँ बचूँगा। पता नहीं कब नर और नारायण मिलेंगे और कब बदरी विशाल यहाँ पधारेंगे। कोई बात नहीं, आने वाली पीढ़ियां ही वह सुख देखेंगी।”
पुजारी सवा रुपया की दक्षिणा से मगन था। उसे अपने ढंग से उल्लास व्यक्त करता छोड़कर श्रीराम मंदिर से बाहर आ गए। नीतिघाटी होते हुए वह अज्ञात स्थान गंतव्य था, जिसके लिए भीतर से प्रेरणा उमंग रही थी। यों कहें कि वह जगह मंजिल थी, जिसके बारे में पता नहीं था कि कहाँ है? लेकिन वह खींच रही थी। जिस रास्ते वे जा रहे थे, वह दुरूह चढ़ाई वाला था। संकरी पगडंडी और काँटे कंकड़ों से अटे पड़े उस मार्ग पर कुछ दूर चलते हुए ही थकान आ जाती थी। जोशीमठ में दंडधारा में स्नान करने के बाद श्रीराम पर थकान ने दोबारा हमला नहीं किया। दोनों कंधों पर दो थैलियाँ, हाथ में लाठी और पाँव में मोटे तले वाले रबड़ के जूते पहने वे समगति से आगे बढ़ रहे थे।
हेमकुँड साहिब में
करीब पच्चीस किलोमीटर दूरी तय करने के बाद श्रीराम एक झील के किनारे रुके। झील सभी दिशाओं से पहाड़ियों से घिरी थी। उनका प्रतिबिंब पानी में दिखाई देता था। तट पर जगह जगह पत्थर की चौकियाँ बनी हुई थी। लगता था किसी समय लोग इनका उपयोग बैठने, वहाँ के नैसर्गिक सौंदर्य का आनन्द लेने या ध्यान धारणा के अभ्यास में करते होंगे। एक चौकी पर बैठकर श्रीराम ने झील के पानी में झाँका। लगा, अभी बर्फ पिघलकर आई है और द्रवीभूत हिम पहाड़ियों की गोद में जमा हो गई है। स्वच्छ पारदर्शी जल शीशे की तरह साफ था। उसमें निरभ्र आकाश, पहाड़ियों की चोटियाँ और देखने वाले के प्रतिबिंब के साथ जल की गहराई के अलावा कुछ नहीं दिखाई दे रहा था।
जहाँ बैठे थे, वहीं से सब दिशाओं में नजरें दौड़ाकर श्रीराम ने गणना की। सात पहाड़ियां झील को घेरे हुए थी। उन्हें देखकर श्रीराम चौकियों की गिनती करने लगे। जहाँ बैठे थे, वहीं से गणना की। पाया कि चौबीस आसन बने हुए है। क्या यह स्थान किसी समय तपस्थली रहा होगा? मन में विचार आया। हिमालय ऋषि मुनियों का निवास है, किसी समय क्या, अब भी यहाँ ऋषिसत्ताएँ आती होंगी।
सात पहाड़ियों से घिरी उस झील के बारे में बाद में पता चला कि खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोविन्दसिंह ने अपने पूर्वजन्म में यहाँ तप किया था। तब उनका नाम मेधस मुनि था। यह पता चलने के बाद 1936 में वहाँ सिखों के तीर्थों की स्थापना हुई। वही स्थान अब हेमकुँड साहिब के नाम से विख्यात है। यहाँ गुरुद्वारा भी बना हुआ है और आने जाने ठहरने की उत्तम व्यवस्था हो गई हैं श्रीराम उस स्थान पर देर तक बैठे रहे। उनके बैठने से लग रहा था, जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रहे हो। झील के किनारे बैठे बैठे उन्हें प्रतीत हुआ कि कोई उनसे संवाद की कोशिश कर रहा है। अस्फुट ध्वनि सुनाई दे रही थी। आस पास देखा, कोई नहीं था। आवाज फिर भी आ रही थी।
चित को बहुत शाँत और निश्चित करने के बाद ध्वनि स्पष्ट हुई। यह आवाज इतनी क्षीण थी कि लगता था, वर्षों से चुप रहे कंठ से आ रही हो। ऐसे कंठ से, जो बोलना ही भूल चुका हो। ध्वनि की दिशा का अनुमान किया। पाँच आसन दूर एक कृष्णवर्ण आकृति दिखाई दी। वह श्रीराम को संबोधित करती हुई अपने पास बुला रही थी। चौकी से उठकर श्रीराम उस आकृति के पास गए। उसे प्रणाम किया तो आकृति से आवाज हुई, मुझे किसी भी नाम से पुकार सकते हो। मेरा कोई नाम नहीं है।
मुझे सिर्फ यह कहने का निर्देश हुआ है कि तुम गोमुख के पास पहुँचे। गोमुख से आगे नंदनवन है, वहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा हो रही है।
गुरुसत्ता के निर्देश
आकृति ने जो कुछ कहा, उसे श्रीराम ने मन में ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया। इतना ही कहा कि मार्ग का पता नहीं है। आकृति ने कहा, “कठिन नहीं है। यहाँ से जोशीमठ वापस जाओ। चमोली, गोपेश्वर, गुप्तकाशी आदि स्थानों पर जाने की आवश्यकता नहीं है। रास्ता बहुत लंबा पड़ेगा। जोशीमठ में कुछ लोग मिलेंगे। उनका साथ पकड़ लेना। छोटे रास्ते पर चलते हुए शाम तक गोमुख पहुँच जाओगे।” श्रीराम ने इस निर्देश को भी मार्गदर्शक सत्ता के किसी प्रतिनिधि का संकेत माना और मान लेने के अर्थ में सिर हिलाया। उसी आकृति ने कहा, “कहीं रुकने अटकने की जरूरत नहीं है। सीधे गोमुख पहुँचकर ही दम लेना है, समझे।”
श्रीराम ने कहा, ‘जी’ और उस आकृति को प्रणाम करने के लिए सिर झुकाया। उनके प्रणाम पर ध्यान किए बिना ही वह आकृति झील में उतर चुकी थी और घुटनों घुटनों पानी में जाकर अर्घ चढ़ाने लगी थी। श्रीराम ने झील में स्नान किया और कुछ देर जप करने के बाद ध्यान लगाया। उस आकृति ने निस्पृहता दिखाई थी। घुटनों तक पानी में उतरने के बाद पीछे मुड़कर भी नहीं देखा था। साधना मार्ग के पथिकों को वैसा ही निस्संग होना चाहिए। श्रीराम भी अपने साधन भजन में तत्पर हो गए। उस आकृति से विरत होने या क्षणभर पहले हुई भेंट को भुला देने के लिए उन्हें कुछ नहीं करना पड़ा था। पानी में खींची लकीर की तरह वह स्मृति अपने आप तिरोहित हो गई। झील के तट पर कुछ देर और बैठकर श्रीराम जोशीमठ के लिए वापस मुड़ गए।
वशिष्ठ मुनि के आश्रम पर विश्वामित्र एक बार सेना सहित पहुँचे। अपनी कामधेनु की शक्ति से महर्षि ने उनका यथोचित सत्कार किया। उस गौ का प्रभाव देखकर राजा विश्वामित्र ने उसे लेना चाहा। स्वेच्छया देने से इन्कार करने पर बलात् ले जाने लगे। कामधेनु ने महर्षि से अनुमति प्राप्त कर अपने शरीर से लाखों सैनिक प्रकट करके उनकी सेना को पराजित कर दिया। ब्रह्मतेज का यह बल देखकर उन्होंने क्षात्र धर्म त्याग कर ब्राह्मणत्व प्राप्त करने का निश्चय किया। ”धिक बलं क्षत्रिय बलं ब्रह्मतेजो बलं बलम।” यह कहते हुए उन्होंने महान तप किया। तपस्या के प्रभाव से वे इतने सामर्थ्य हो गए कि दूसरी सृष्टि रचने लगे। ब्रह्म ने उन्हें सृष्टि सकार्य से रोका, ब्राह्मणत्व पद प्रदान किया और वसिष्ठ जी ने उन्हें ‘ब्रह्मर्षि’ स्वीकार किया। पात्रता का विकास ही अनेकानेक विभूतियों और संपदाओं की उपलब्धि का एकमात्र मार्ग है।
दैवी शक्तिसंपन्न महापुरुष चमत्कार दिखाने में विश्वास नहीं रखते। वे अपने शिष्य का हित देखते है एवं तदनुसार ही प्रकृति के नियमों में फेरबदल करते है। आकाश से अँगूठी निकालकर दिखाना चित्र के फ्रेम से भस्म निकालने लगना, भूत भविष्य बता देना, किसी को भी भवितव्यता बताकर डराना, प्रलोभन हेतु कोई प्रदर्शन करना यह महापुरुषों की शैली नहीं है। वे तो साधन को स्वयं को निर्मल बनाने, सद्बुद्धि को धारण करने एवं सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहते हैं। अष्टसिद्धि नवनिधि से सुसज्जित सदगुरु की सत्ता छोटे मोटे प्रदर्शनात्मक चुटकुलों में विश्वास नहीं करती। ऐसे सदगुरु जीवित अवस्था में भी तथा शरीर छोड़ने पर सूक्ष्म व कारणशरीर से यही काम करते है कि उनके बताए मार्ग पर चलने वाला आगे आध्यात्मिक पथ पर बढ़ने की प्रेरणा पा सकें।
परमपूज्य गुरुदेव प श्रीराम शर्मा आचार्य स्वयं गायत्री रूप थे (नमोअस्तु गुरवै तस्मै गायत्रीरूपिणे सदा) माँ गायत्री सविता देवता की शक्ति उनके कण कण में संव्याप्त थी। जीवन भर उन्होंने कई साधकों को श्रेष्ठता के पथ पर चलाया। तंत्र विज्ञान पर उनकी पक्की पकड़ थी। फिर भी उन्होंने प्रदर्शन हेतु चमत्कारी प्रदर्शन पर विश्वास नहीं किया। ये तो स्वतः हो जाते है एवं उन्हें इसकी अनुभूति होती है। वह स्वयं को सौभाग्यशाली मानते है। एक साथ कई स्थानों पर सूक्ष्मशरीर को स्थूल रूप देकर अगणित व्यक्तियों की सहायता हमारे गुरुदेव ने की है। व्यक्ति के प्रारम्भ के अनुरूप उसे गुरु का संरक्षण मिला है। प्रारब्ध प्रबल हो तो गुरु उसे हलका जरूर कर देता है एवं मामूली कष्ट के माध्यम से उसका भी हिसाब किताब कर साधक को जीवनमुक्त बना देता है। अगणित व्यक्तियों की अनुभूतियाँ हमारे पास सुरक्षित है, जिनमें एक लाख से ज्यादा लोगों ने चुनौती के साथ कहा कि जिन दिनों गुरुदेव किसी से नहीं मिलते थे, तब वे मिलकर आए एवं दो ढाई घंटे बैठकर उनका सान्निध्य पाया। ये अनुभूत तथ्य सही हो सकते हैं, पर स्थूल जगत में इनके प्रमाण खोजे तो पता चलता है कि ऐसा कुछ हुआ नहीं था। जनसामान्य के लिए वे अनुपलब्ध थे, पर उनकी लीला ही थी कि उन्होंने अपने प्रिय परिजनों के लिए स्वयं की उपलब्ध बना लिया।
भाँति भाँति के पत्र हम इस स्तंभ में प्रकाशित कर रहे है, जो पूज्यवर ने अपने शिष्य शिष्याओं को लिखे। ये तो प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सूक्ष्मशरीर से यात्रा कर कितने ही लाखों व्यक्तियों की जीवनशैली में उन्होंने फेरबदल किया, जिसे कुछ ना था, एवं सत्प्रेरणा देकर कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। ऐसे ही कुछ पत्र प्रस्तुत है :-
13 मई, 1955 को एक साधक को लिखे पत्र में पूज्यवर लिखते है -
“हमारे आत्मस्वरूप, पत्र मिला। विवाह का विस्तृत समाचार जाना। ये सब समाचार पूर्ण रूप से हमें मालूम है, क्योंकि हमारा सूक्ष्मशरीर उस समय चौकीदार की तरह वहीं अड़ा रहा है और विघ्नों को टालने के लिए, शत्रुओं को नरम करने के लिए, आपत्तियों को हटाने के लिए जो कुछ बन पड़ता है, सो बराबर करते रहे है। फिर भी आपके पत्र से सब बातें भली प्रकार विदित हो गई।”
पत्र बड़ा स्पष्ट है एवं अपने शिष्य के यहाँ संपन्न हुए विवाह में गुरुसत्ता ने सूक्ष्मशरीर से अपनी उपस्थिति की सुनिश्चितता सिद्ध की हैं पत्र से सब समाचार मिले तो उनकी भी स्वीकारोक्ति की है, किन्तु सबसे बड़ी बात वह आश्वासन कि सूक्ष्म संरक्षण सदैव साथ रहेगा, यदि शिष्य का परिपूर्ण समर्पण किया। इसी तरह का एक और पत्र है जो द्रष्टव्य है। दानाभाई मेघजी जबलपुर के बहुत संपन्न ठेकेदार थे। बड़े ही समर्पित शिष्य भी। गायत्री तपोभूमि, मथुरा एवं शाँतिकुँज, हरिद्वार में उनके द्वारा किए गए कार्य, उनका अंशदान सदैव याद किया जाता रहेगा। अब पति पत्नी दोनों इस संसार में नहीं है। पत्र के रूप में स्मृति है, जो हम यहाँ दे रहे है :-
“हमारे आत्मस्वरूप आपका पत्र मिला। आपकी धर्मपत्नी की तबियत अब सुधर रही है, यह जानकर संतोष होता है। उनकी हमें बहुत चिंता रहती है। उस दिन हमारी आत्मा उन्हें देखने और साँत्वना देने गई थी। वही दृश्य उन्होंने सपने में देखा होगा। अब उनकी तबियत जल्दी ठीक हो जाएगी, ऐसी आशा है।”
लक्ष्मी बेन दानाभाई मेघजी गुरुदेव के लिए पुत्री से भी बढ़कर थी। उधर उन्होंने स्वप्नावस्था में रोगशैया पर लेटे हुए गुरुसत्ता का दर्शन किया, पतिदेव से चर्चा की एवं उन्होंने पत्र पूज्य गुरुदेव को लिखा। बड़ा स्पष्ट आश्वासन आया है कि स्वप्न में आकर सूक्ष्मशरीर का सान्निध्य देकर उन्होंने अपनी पुत्री का संकट मिटा दिया है। आश्वासन भी बड़ा स्पष्ट है “अब इनकी तबियत जल्दी ठीक हो जाएगी।” इतना स्पष्ट लिखित तथ्य होते हुए भी हम अपनी गुरुसत्ता के स्वरूप को समझ क्यों नहीं पाते?
एक पत्र अपने प्रिय शिष्य को 15-7-1966 को लिखा गया, जिसमें गुरु की ओर से शिष्य को सतत संरक्षण का आश्वासन है।
पूज्यवर लिखते है :-
“तुम्हें हम पूर्वजन्मों के अनुरूप इस जन्म में भी छोटा बालक ही समझते है। साँसारिक हलचलों में अभी हम यथासंभव सहायता करते रहते है। आगे तुम्हारी आत्मिक प्रगति में भी भरसक सहयोग करेंगे। मनुष्य (योनि में) के अवतरित होने का लक्ष्य भी तुम्हें इसी जन्म में प्राप्त होगा। ता. 6 को जो स्वप्न तुमने देखा, वह अपने स्वजनों की देख भाल के लिए सूक्ष्मशरीर से जाया करते है। उस दिन तुम्हारे पास भी अपना वात्सल्य प्रकट करने गए थे। सो ही तुमने देखा।”
यह पत्र प्रथम दो पत्रों की तरह से ही स्वप्न में दर्शन व गुरुवर का संरक्षण, इसी भाव को लेकर है। इस घटनाक्रम को आचार्य श्री ‘वात्सल्य प्रकट करने’ की बात कहकर निपटा देते है। न जाने कितनों ने यह वात्सल्य, सुनिश्चित संरक्षण का आश्वासन, भविष्य संबंधी नीति निर्धारण ध्यान या स्वप्नावस्था में पाया है।
अक्सर परिजन मोहवश अपने संबंधियों के स्वास्थ्य संबंधी बातों के साथ उनकी आयु लंबी करने का निवेदन भी कर देते थे। ऐसी स्थिति में उनकी राय बड़ी स्पष्ट होती थी। जहाँ सुनिश्चितता थी, वहाँ पात्रता के अनुरूप वरदान मिल जाता था पर जहाँ संभव नहीं था, वहाँ वे वस्तुस्थिति बता देते थे। एक पत्र 21-7-1957 का है -
“आपके नानाजी का वास्तविक आयु अब लगभग समाप्तप्रायः है। एक वर्ष वे ठहर सकते है। उनकी अपनी आयु इतनी ही है। किसी दूसरे की आयु काटकर किसी में नहीं जोड़ी जा सकती। ऐसा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। यदि ऐसा संभव रहा होता तो कौशल्या आदि ने अपनी आयु देकर दशरथ को अवश्य दीर्घजीवी किया होता।”
प्रकृति के नियमों का हवाला देकर एक सदगुरु उसमें हस्तक्षेप न करने की बात भी कहता है एवं एक उदाहरण द्वारा समझाता भी है। हम ही है कि मोहवश शरीरधारी संबंधियों से चिपके रहते है। आशीर्वाद भी माँगते है कि हमारे वयोवृद्ध संबंधी शतायु हो, हमें सतत प्यार करते रहे, परंतु गुरुवर यही रुक नहीं जाते। आगे लिखते है -
“आपके नानाजी के प्राण में जितना प्राण घोल सकता संभव है, उतना हम घोल रहे है। हमने पिछले पत्र में कहीं नहीं लिखा है कि हमारे प्रयत्न निष्फल हो गए है या अब आयु बढ़ने की कोई आशा नहीं है। ऐसा अनुमान आपने किस आधार पर लगा लिया?”
यह सिद्ध स्तर के महापुरुषों के ही बस की बात है कि वे अपने प्राण संप्रेषित कर सामने वाले के आयुष्य को भी बढ़ा दे, उनके कष्ट को भी कम कर दें अथवा उनकी जीवनरक्षा कर बीमारी को भी निर्मूल कर दें।
इसी प्रकार का एक विलक्षण चमत्कारी स्वरूप एक अन्य पत्र से देखने को मिलता है, जिसमें वे लिखते है -
“हमारे आत्मस्वरूप पत्र मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई।सरस्वती बेटी का बालक कन्या से बदलकर पुत्र किया गया है। उसकी छवि में कुछ झलक कन्या की सी होगी।यह बालक अभी बहुत दुर्बल होगा। इसको दीर्घजीवी बनाने की एक बड़ी समस्या हमारे सामने है।”
बड़े ही अपवाद रूप से पूज्यवर ने यह किया होगा। सदगुरु सब कुछ करने में सक्षम है। परंतु वे तो पिता−पुत्री में कोई भेद नहीं मानते थे। यहाँ लेने वाले की पात्रता, विधि के विधान एवं आध्यात्मिक पुरुषार्थ की चरमावस्था की बात आ जाती है। अत्यधिक आग्रह आने पर पूज्यवर ने सूक्ष्म में झाँका,एक संभावना सी लगी और गर्भस्थ बालक का लिंग बदल दिया। क्या चिकित्सा जगत इसकी कोई व्याख्या कर सकता है? संभवतः नहीं। अध्यात्म पूर्णतः विज्ञानसम्मत है एवं यदि इस विज्ञान को कोई गहराई से समझ सके तो अनेकानेक विभूतियाँ हस्तगत हो सकती है। अपनी गुरुसत्ता के जीवन उनके सत्परामर्शों कर्तृत्व के माध्यम से हम उस परोक्ष जगत को झरोखे द्वारा देख सकते है, जो अविज्ञात है। सही साधना परमार्थ हेतु इसका नियोजन व नियमित गायत्री उपासना किसी भी व्यक्ति को सिद्धि संपन्न बना सकती है।
किसान ने अपने बच्चे को बताया, बेटे,अगली फसल बरसात में बोई जाती है। बेटे ने बात गाँठ बाँध ली। कुछ दिनों में वर्षा ऋतु आई। युवक अगले दिन तड़के ही उठकर अपने खेतों में गया और बीज बिखेर आया। किसान को मालूम हुआ तो माथा पीटकर रह गया। बोला बेटे वर्षों होने के बाद खेत को साफ करना, उसे जोतना भी आवश्यक था, तभी बीज उगकर पौधे बनते और फल देते है।
अखिल विश्व गायत्री परिवार, युग निर्माण योजना के क्रियाकलाप जिस धुरी पर चलकर 67 वर्षों की यात्रा कर वर्तमान स्थिति में पहुँचे है उसके पीछे ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका की एक विशिष्ट भूमिका है। यह पत्रिका परमपूज्य गुरुदेव, वंदनीया माताजी की प्राणचेतना की संवाहिका है। सभी को यह ज्ञात है कि 1926 ईसवी की बसंत पंचमी (18 जनवरी) की पावन वेला में सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता के निर्देशानुसार एक अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलित किया गया था। यह अखण्ड दीप तब से निरंतर जल रहा है एवं विगत तैंतीस वर्षों से गायत्री तीर्थ-शाँतिकुँज में स्थापित है। मिशन के सभी महत्वपूर्ण निर्धारण इस अखण्ड दीपक की साक्षी में ही किए गए। ‘अखण्ड ज्योति’ उसी का परिणाम है। कठोर गायत्री तप के माध्यम से युवा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी समन्वयात्मक तर्क, तथ्य, प्रमाणों सहित परोक्षजगत की विधि व्यवस्था एवं आर्ष वाङ्मय की युगानुकूल प्रस्तुति इसकी विशेषता रही है, जिसने छात्र, अध्यापक, प्रस्तुति एवं प्रबुद्धवर्ग, सभी को अपनी ओर खींचा है।एक बहुत बड़ा वर्ग नास्तिक होने से बचा है।
जीवन जीने की कला का विशेष देते हुए यह अनवरत बिना किसी विज्ञापन के ‘नो प्रॉफिट, नो लॉस’ (न लाभ न हानि) स्तर पर जन जन तक पहुँचती रही है। आज तनाव विक्षोभ संक्षोभों की चारों ओर बाढ़ है। अशक्ति का साम्राज्य भोगवाद की बढ़ोतरी के कारण दिखाई देता है।जीवनशक्ति की दृष्टि से दुर्बल कमजोर मनोबल के व्यक्ति बढ़ते जा रहे है जबकि इससे भी अधिक तेजी से अस्पताल, मेडिकल कॉलेज एवं नर्सिंग होम खुलते चले गए है। मानवी स्वास्थ्य चिंतन पद्धति में परिवर्तन, पथ्यापथ्य के नियमों का परिपालन तथा आयुर्वेद योग यज्ञोपचार से कैसे मनुष्य जाति को स्वस्थ बनाया जा सकता है, यह मार्गदर्शन ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में नियमित रूप से देखा जा सकता है। दृष्टाँतों की शैली से जीवन में गुणों का विकास कैसे किया जाए यह समग्र मार्गदर्शन इस पत्रिका में मिलता है।
‘अखण्ड ज्योति’ युगधर्म को महती आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ही अखण्ड दीपक का एक प्रतीक बनी। इस पावन प्रतीक द्वारा ही युग परिवर्तन की आँधी ने जन्म लिया है। आज जनसामान्य का एक बहुत बड़ा तबका, नारीशक्ति एवं युवावर्ग आशावादी हो चला है तो उसके मूल में ‘अखण्ड ज्योति’ की भूमिका नकारी नहीं जा सकती। परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म कारणसत्ता ही इस पत्रिका रूपी कागजों के बंडल के माध्यम से जन जन को प्रकाश दे पाने में समर्थ हो पाई है। संपादक के रूप में किसी का भी नाम हो, लिखने वाले की कलम में प्राण सूक्ष्म अंतरिक्ष से गुरुसत्ता के माध्यम से आता है। यह तो लौकिक औपचारिकता है जो विभिन्न व्यक्तियों के नाम छपते है, नहीं तो इस प्राण−प्रवाह को सतत अध्यात्म चेतना के ध्रुव केंद्र हिमालय से आता माना जाना चाहिए। अपना सौभाग्य मानना चाहिए कि उस ज्ञानगंगा से जुड़ने, उसमें स्नान करने का अवसर मिला।
गायत्री महाविद्या की शब्दशक्ति प्रधान साधना, यज्ञ की ऊर्जा एवं उसकी पदार्थ जगत की कारण शक्ति में उभार लाने की वृत्ति पर वैज्ञानिक शोध निरंतर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में हो रहा है। 1971 में स्थापित यह संस्थान अगले वर्ष (24-25) अपनी रजत जयंती मना रहा है। शोध संस्थान एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण ज्ञान विज्ञान संबंधी निष्कर्ष ‘अखण्ड ज्योति’ के माध्यम से सबके पास पहुँचते है। आज की परिस्थितियों में हमारा राष्ट्रधर्म क्या हो, हम कैसे एक श्रेष्ठ नागरिक बनें यह समग्र मार्गदर्शन इस पत्रिका में 66 पृष्ठों में पाया जा सकता है। टूटते परिवार, कलह द्वेष की बढ़ती महाव्याधि हेतु इसने परिवार निर्माण, सुसंस्कारिता संवर्द्धन जैसे प्रयोगों को प्रमाण सहित प्रस्तुत किया है। हिंदी की तो इस पत्रिका ने इतनी सेवा की है कि आने वाले समय की पीढ़ी ही इसका मूल्याँकन कर सकेगी। एक पत्रिका युगसृजेताओं की एक सेवावाहिनी खड़ी कर दे,उनसे समयदान अंशदान का संकल्प भी करा ले एवं कलियुगी चिंतन प्रवाह में एक उत्कृष्ट चिंतन का माहौल बना दे, इसका उदाहरण अन्यत्र कही देखने को नहीं मिलता। यह तो इस प्राणपंच की ही महिमा है।
‘अखण्ड ज्योति’ यदि मस्तिष्क है तो पाठक परिजनों के रूप में फैला विशालकाय समुदाय उसका काय कलेवर हैं।दोनों का अस्तित्व परस्पर अन्योन्याश्रित है। परिजन ही है जो इस पत्रिका के प्रवाह को अमृत चिंतन को जन जन तक पहुँचाते है। ये सभी पोस्टमैन की भूमिका भी निभाते है एवं सत्परामर्श देने वाले ऋषि की भी। 66 पृष्ठों का यह प्राण प्रवाह सभी परिजनों तक पहुँचकर नूतन प्राणसंचार करता है। सभी इसकी प्रतीक्षा करते है व मिलने पर ऐसा अनुभव करते है, मानो गुरुसत्ता की पाती सीधे उनके पास पहुँच गई हो।यह जो पाठक परिजन का परिकर है, अत्यधिक महत्वपूर्ण है। अधिक संख्या में पत्रिका मँगाकर ज्ञान के जिज्ञासु साधकों तक पहुँचाने का कार्य यही परिकर करता है। पहले तो प्रकाशन में विलंब भी हो जाता था, परंतु विगत दो वर्षों से उसे एक माह पूर्व ही तैयार कर डिस्पैच कर दिया जाता है। एक माह से पंद्रह दिन पूर्व मिलने पर पाठक हार्दिक प्रसन्नता की अभिव्यक्ति भरे पत्र हमें भेजता है। यह इस पत्रिका की लोकप्रियता, उसकी व्यक्ति निर्माण में भूमिका का परिचायक है।
पिछले दिनों महँगाई बेतहाशा बढ़ी है। छपाई संबंधी सामग्री, कागज आदि अत्यधिक महंगे हो गए है। जब गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाता, प्रिटिंग पेपर श्रेष्ठ ही खरीदा जाता, डी टी पी के माध्यम से अशुद्धि रहित सामग्री भेजी जाती है तो परिजनों को यह मानना चाहिए कि हमारी भी कुछ जिम्मेदारी है। निरंतर घाटे में चलकर तो कोई भी संस्थान चला पाना संभव नहीं है। वर्तमान समय में पत्रिका की यही स्थिति है। छपाई मूलतः रंगीन कवर पृष्ठों पर गुरुसत्ता के संग्रहणीय चित्रों सहित तथा मिशन की गतिविधियों सहित सभी तक पत्रिका भेजी जाती रही है। अब वर्तमान मूल्य में यह संभव नहीं है।
आज की साप्ताहिक हिंदी पत्रिकाओं इंडिया टुडे, आउटलुक अथवा कादंबिनी (मासिक) पर निगाह डालें तो पता चलेगा कि विज्ञापन भी छापने वाली ये पत्रिकाएं ‘अखण्ड ज्योति’ की तुलना में कितनी महंगी हैं। इंडिया टुडे बारह रुपये एक प्रति एवं आउटलुक दस रुपया प्रति पर (वार्षिक 441 रुपये, 45 रुपये) बचत नीति के आधार पर उपलब्ध है। कादंबिनी हिंदी साहित्य की एक स्वस्थ विधा स्थापित करने वाली पत्रिका है। इसका मूल्य भी एक प्रति का पच्चीस रुपये तथा दो सौ तीस रुपये वार्षिक है। पाठ्यसामग्री में किसी की भी तुलना नहीं की जा रही है। गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित ‘कल्याण’ मासिक काफी पुरानी पत्रिका है। इसका भी वार्षिक शुल्क एक सौ तीस रुपये है। 77 वर्षों से निरंतर प्रकाशित यह पत्रिका अत्यधिक सुँदर है, आस्तिकता संवर्द्धन में सहायक रही है, किंतु यह भी वर्तमान मूल्य पर 47 पृष्ठों के साथ कुछ श्रीमंतों के अनुदानों के माध्यम से सब्सीडाइज्ड (न्यूनतम) मूल्य पर प्रकाशित होती है। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका विगत तीन वर्षों से निरंतर 72 रुपये वार्षिक (6 रुपये एक प्रति) के आधार पर परिजनों को मिल रही है। अखण्ड ज्योति संस्थान का म्रुदण प्रकाशन डिस्पैच वाला महकमा ही इतना बड़ा है कि उसे एक विराट परिवार का नाम दिया जा सकता है।उनमें कई वेतनभोगी है, उनकी आवश्यकताओं का पूरी करना भी इस संस्थान के अभिभावक का दायित्व है। डी टी पी, मशीन, बिजली, कागज व स्याही के खरच अतिरिक्त है एवं रुपये के अवमूल्यन के साथ ये भी जमीन से आसमान तक जा पहुँचे है।
इन्हीं सब कारणों को देखते हुए ‘अखण्ड ज्योति’ का वार्षिक मूल्य प्रति काँपी एक रुपया बढ़ाकर चौरासी रुपये इस दिसंबर मास से किया जा रहा है। 24 की जनवरी वाली पत्रिका अब बढ़े हुए मूल्य पर मिलेगी एवं तदनुसार ही सबको चंदा भेजना होगा। पहले यह छह रुपया प्रति काँपी था, अब सात रुपया प्रति काँपी होगा, जो कि किसी भी स्थिति में अधिक नहीं माना जाना चाहिए। ज्ञानगंगा का अविरल प्रवाह अवरुद्ध न हो, उसका एक ही तरीका है कि इस पत्रिका के प्राप्त होते ही नए ग्राहक बनाने, पुरानों को जोड़े रखने एवं चंदे की राशि समय पर अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा पहुँचाने का क्रम चलता रहे। मिशनरी स्तर पर चल रहे इस प्रयोग को अपने परिजनों को ही सींचना होगा, आगे बढ़ाना होगा।
परिजनों पर आए आर्थिक भार को हम समझते है। विकल्प मात्र यही था। नहीं तो पत्रिका के बारह पृष्ठ कम करने पड़ते। अभी 67 पृष्ठ रंगीन कवर सहित यह भेजी जा रही है। बीच में मूल्य बढ़ाने की अपनी नीति है नहीं। यदि पृष्ठ कम किए जाते हैं तो इस प्राण संजीवनी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अप्रकाशित ही रहा जाएगा। इसलिए मूल्य बढ़ाकर इसकी गुणवत्ता और बढ़ाने का एक निर्णय लिया गया। कई ऐसे भविष्यकथन है, जो पूज्यवर द्वारा सत्तर व अस्सी के दशक में किए गए थे। वे आज कैसे सही होते जा रहे है, प्रमाण सहित यह सामग्री अब पत्रिका में सभी पढ़ सकेंगे। इसके अलावा जीवन जीने की कला के गुहासूत्रों (जिनका संक्षिप्त विवेचन विगत अंक में प्रस्तुत किया गया था) पर आधारित एक विशेषाँक भी परिजन जनवरी, 24 में पढ़ सकेंगे। ऐसी विलक्षण पाठ्यसामग्री का क्रम सतत चलता रहेगा।
परिजन पाठक लोकशिक्षण करने वाली इस पत्रिका की पाठक संख्या जितनी बढ़ायेंगे, उतने ही पुण्य के भागीदार बनेंगे। सभी पाठक, थोक पत्रिका मँगाने वाले परिजन नोट कर लें कि अब दिसंबर, 23 के अंक के समापन के साथ ही जनवरी, 24 से पत्रिका का वार्षिक चंदा 84 रुपये (चौरासी रुपये) होगा। विदेश के लिए यह नौ सौ रुपये होगा तथा आजीवन (सुरक्षा निधि) पंद्रह सौ रुपया होगी। आशा है कि सभी इसे स्वीकार कर पूरे उत्साह से पत्रिका की संख्या बढ़ाने में लग जाएंगे।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय
गायत्रीकुँज शाँतिकुँज, हरिद्वार (उत्तरांचल) 249499
उत्तराँचल विधानसभा द्वारा पारित देवसंस्कृति विश्वविद्यालय विधेयक 2 (सं. 123/विधायी एवं संसदीय कार्य/2 देहरादून, 11 अप्रैल, 22) के अंतर्गत स्थापित एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुमोदित तथा श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट, शाँतिकुँज, हरिद्वार द्वारा संचालित।
जनवरी, 2004 हेतु प्रवेश सूचना
सर्टिफिकेट कोर्स (6 माह) - योग विज्ञान समग्र स्वास्थ्य विज्ञान धर्म विज्ञान ग्राम प्रबंधन
इन समस्त पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए निर्देश पुस्तिका एवं आवेदन पत्र रु. 5/- के नगद भुगतान पर कुलसचिव कार्यालय से प्राप्त किए जा सकते है। डाक द्वारा आवेदन पत्र मँगाने हेतु अपना प्रार्थना पत्र कुलसचिव, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, शाँतिकुँज, हरिद्वार के नाम देय रु. 10/- के ड्राफ्ट के साथ भेजे।
प्रवेश के लिए अर्हता, आरक्षण, चयन प्रक्रिया के लिए निर्देश पुस्तिका एवं विश्वविद्यालय की वेबसाइट ख्ख्ख्.स्रह्यक्क्.शह्द्द का अवलोकन करें।
निर्धारित तिथियाँ -1. आवेदन पत्रों की बिक्री प्रारंभ 01.11.03 से
2. पूरित आवेदन वि वि में प्राप्ति की अंतिम तिथि 30.11.03
3. प्रवेश परीक्षा की तिथि 24.12.03
4. प्रवेश परीक्षा परिणाम 27.12.03
5. साक्षात्कार तिथि 27.12.03
6. प्रावीण्य सूची का प्रकाशन 30.12.03
7. प्रवेश तिथि 02.01.04
दूरभाष : 11-1334-260723, 262014, 261367 (एक्सटेंशन 405, 431, 401) वेबसाइट www.dsvv.org
देवसंस्कृति वेदना अनुभव करे जो, वह तरुण पीढ़ी बुलाई जा रही है। कर सके गुरुदेव के संकल्प पूरे, बस वही विद्या पढ़ाई जा रही है॥
कई शिक्षा संस्थाएँ चल रही है, ‘भोगवादी’ व्यक्तियों को ढल रही है। लक्ष्य जिनका मात्र अर्थोपार्जन है, वासनाएँ, कामनाएँ पल रही है। आचरण में अनैतिकता घुस गई है, और नैतिकता भुलाई जा रही है॥
शिष्य आरुणि और नचिकेता कहाँ है, विवेकानन्द राष्ट्र के चेता कहाँ है। चंद्रगुप्त चाणक्य, शिवा समर्थ जैसे, राष्ट्र निर्माता व उद्गाता कहाँ है। शील, संयम,शौर्य, सेवा, समर्पण की, साधना क्यों कर भुलाई जा रही है॥
आक्रमण सुर संस्कृति पर हो रहे है, और हम अपसंस्कृति को ढो रहे है। तरुण पीढ़ी को अरे, क्या हो गया है, आत्मविस्मृति के तिमिर में खो रहे है। वेदना गुरुदेव की उनको उछाले, बस यही जीवट जगाई जा रही है।
आप आए है सुसुप्त देवत्व जगाने, बने बजरंग संस्कृति सीता बचाने। आपने व्यक्तित्व अपना ढल लिया तो, काम आएँ राष्ट्र को ऊँचा उठाने। हनुमान, अर्जुन, मैत्रेयी, लक्ष्मीबाई, की सुखद संभावना दिखला रही है।
ऊर्जा गुरुदेव के तप की यहाँ है, युग सृजन संकल्प के व्रत की यहाँ है। ईंट कच्ची रह गई व्यक्तित्व की यदि, पकाने की और फिर भट्ठी कहाँ है। नहीं कुछ भी असंभव संकल्प बल से, शिल्प की यह विधि बताई जा रही है। देवसंस्कृति वेदना अनुभव करे जो, वह तरुण पीढ़ी बुलाई जा रही है।
-मंगल विजय
*समाप्त*