विजय पथ पर केवल धर्मपरायण, साहसी ही अपने पाँव रखते हैं, जिनमें जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत है, वही इस राह पर चल पाते हैं। अनीति, अनाचार, अत्याचार और आतंक से लोहा यही लौहपुरुष लेते हैं। विजय दशमी के रहस्य इन्हीं के अन्तर्चेतना में उजागर होते हैं। विजय का महापर्व इनके ही अस्तित्त्व को आनन्दातिरेक से भरता है।
विजय के साथ संयोजित दशम संख्या में कई साँकेतिक रहस्य संजोये है। दशम का स्थान नवम के बाद है। जिसने नवरात्रियों में भगवती आदिशक्ति की उपासना की है, वही दशम की पूर्णता का अधिकारी होता है। वही अपनी आत्मशक्ति के प्रभाव से दस इन्द्रियों का नियंत्रण करने में समर्थ होता है। धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य एवं अक्रोध के रूप में धर्म के दस लक्षण उसकी आत्म चेतना में प्रकाशित होते हैं।
प्रभु श्रीराम के जीवन में शक्ति आराधन एवं धर्म की यही पूर्णता विकसित हुई थी। तभी वह आतंक एवं अत्याचार के स्रोत दशकण्ठ रावण को मृत्युदण्ड देने में समर्थ हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम की जीवन चेतना में अहिंसा, क्षमा, सत्य, नम्रता, श्रद्धा, इन्द्रिय संयम, दान, यज्ञ, तप तथा ध्यान-इन दस धर्म साधनों की पूर्ण प्रभा-प्रकीर्ण हुई थी। इस धर्म साधन के ही प्रभाव से उनकी सभी दस नाड़ियाँ-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गाँधारी, हस्तिजिह्व, पूषा, यशस्विनी, कुह्, अलंवुषा एवं शंखिनी पूर्ण जाग्रत् एवं ऊर्जस्विनी हुई थीं।
प्रभु श्रीराम की धर्म साधना में एक ओर तप की प्रखरता थी, तो दूसरी ओर संवेदना की सजलता। इस पूर्णता का ही प्रभाव था कि जब उन्होंने धर्म युद्ध के लिए अपने पग बढ़ाये तो काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, माँतगी तथा कमला ये सभी दस महाविद्याएँ उनकी सहयोगिनी बनी और ‘यतो धर्मस्ततोजयः’ के महा सत्य को प्रमाणित करते हुए विजय दशमी धर्म विजय का महापर्व बन गयी।
तनाव मनःस्थिति से उपजा विकार है। मनःस्थिति एवं परिस्थिति के बीच असंतुलन एवं असामंजस्य के कारण तनाव उत्पन्न होता है। तनाव एक द्वन्द्व है जो मन एवं भावनाओं में गहरी दरार पैदा करता है। तनाव अन्य अनेक मनोविकारों का प्रवेश द्वार है। उससे मन अशान्त, भावना अस्थिर एवं शरीर अस्वस्थ अनुभव करते हैं। ऐसी स्थिति में हमारी कार्यक्षमता प्रभावित होती है और हमारी शारीरिक व मानसिक विकास यात्रा में व्यवधान आता है। इससे बचने का एकमात्र उपाय है परिस्थिति के साथ तालमेल रखना जिससे तनाव रूपी मनोविकार को हटाया-मिटाया जा सके।
परिस्थिति को अस्वीकार न करने पर तनाव पैदा होता है और यह तनाव कई प्रकार का होता है। पारिवारिक तनाव, आर्थिक तनाव, आफिस का तनाव, रोजगार का तनाव, सामाजिक तनाव, तनाव के विभिन्न स्वरूप हैं। मनोनुकूल परिस्थिति-परिवेश के अभाव में व्यक्ति उद्विग्न, अशान्त एवं तनावग्रस्त हो उठता है। इसमें केवल एक व्यक्ति प्रभावित होता है, परन्तु यह सीमा जब व्यक्ति को लाँघकर परिवार में पहुँच जाती है तो परिवार तनावग्रस्त हो जाता है। पारिवारिक तनाव से परिवार के आपसी संवेदनशील रिश्तों में दरार एवं दरकन पैदा हो जाती है। जिससे छोटी-छोटी बातों को प्रतिष्ठ का प्रश्न बनाकर कलह एवं कहासुनी जैसी उलझनें खड़ी कर दी जाती हैं। सुन्दर व सुरम्य पारिवारिक वातावरण व्यंग्य और तानों का दंगल बन जाता है।
वैयक्तिक एवं पारिवारिक स्तर पर सम्पदा व सम्पत्ति के सुनियोजन एवं सुव्यवस्था के अभाव में आर्थिक तनाव का जन्म होता है। उपभोक्तावादी अपसंस्कृति के कारण अपव्यय एवं अनियमितता में वृद्धि हुई है, जिससे यह संकट और भी गहरा हुआ है। सामाजिक तनाव समाज के विभिन्न घटकों, समूहों एवं वर्गों के बीच आपसी तालमेल के होने से उत्पन्न होता है। आज का व्यक्ति, परिवार व समाज तनाव के इस विघटन, टूटन एवं ढरकन से ग्रस्त है। व्यक्ति हो या समाज आज ये इस कदर तनाव ग्रस्त हैं कि उन्हें अपना भार भी असह्य एवं भारी लग रहा है। वे अपने ही बोझ से दबे-कुचले किसी तरह अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।
तनाव परिस्थिति से नहीं मनःस्थिति से उपजता है। अगर ऐसा नहीं होता तो विपरीत एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आशा, उत्साह एवं उमंग की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। जीवट के धनियों एवं मनीषियों ने प्रतिकूलताओं में जीवन की राह खोजी है तथा अपने गंतव्य तथा लक्ष्य को प्राप्त किया है। सूरदास, अष्टावक्र, अब्राहम लिंकन आदि मनीषियों ने शारीरिक कुरूपता को बोझजन्य तनाव नहीं माना और इसी समाज में उत्कर्ष व सफलता की बुलन्दियों को स्पर्श किया। सन्त तुकाराम का पारिवारिक जीवन तनाव के घनघोर कुहासों में घिरा हुआ था परन्तु वे इसी कुहाशा-हताशा के आवरण को चीरकर भक्ति की भावधारा में सदा सराबोर रहते थे। कबीरदास के जीवन में आर्थिक तनाव सघन घन बनकर बरसा था। परन्तु वे प्रभु के अलावा किसी के आगे हाथ नहीं पसारे, याचना नहीं की और वे अलमस्त एवं आनन्दपूर्वक जिन्दगी जीकर दिखा दिये। सामाजिक निन्दा, अपमान एवं तिरस्कार रूपी गहन आँधी-तूफान के बीच मीराबाई ने कृष्ण भक्ति की ज्योति जलाई। विपरीत परिस्थितियों में इन महामानवों ने जितना कर दिखाया उतना तो सामान्य एवं सहज परिवेश में भी सम्भव नहीं है और इसका एकमात्र कारण है, मनःस्थिति की सुदृढ़ता-सशक्तता। अतः तनाव परिस्थितियों में नहीं दुर्बल व अशक्त मनःस्थिति में वास करना है। मनीषियों व मनस्वियों को यह स्पर्श नहीं कर पाता है।
तनावजन्य मनोविकारों का आक्रमण केवल दुर्बल व कमजोर मानसिकताओं पर होता है। परिस्थिति तो सबके लिए समान होती है। एक ही परिस्थिति में रहने वालों में से संकल्पवान् अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है और विकल्प तलाशने वाला केवल विकल्प तलाशते रह जाता है। परिस्थितिजन्य तनाव ही प्रमुख व प्रबल होता तो एवरेस्ट के शिखर पर चढ़ा नहीं जा सकता था, अटलाँटिक क्षेत्र की दुर्वह शीत में रहकर अनुसंधान नहीं किया जा सकता था और ज्वालामुखी की भीषण गर्मी में उतरने का साहस नहीं संजोया जा सकता था। अतः तनाव न तो परिस्थितियों में और न मनस्वियों में पनपता है। यह पनपना तो है केवल कमजोर व संशयी मनःक्षेत्र में। जिसका मन परिस्थिति से तालमेल नहीं बैठा पाता उसी के अन्दर तनावजन्य विकृतियाँ अपना जाल बुनती हैं। ऐसे व्यक्तियों का तंत्रिका तंत्र मन के आवेग को सहने-सम्भालने हेतु असमर्थ होता है। कष्ट, कठिनाइयों का हल्का झोंका भी इन्हें तार-तार कर देता है।
तनाव मुख्य रूप से सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है। तनाव से यह तंत्रिका तंत्र अत्यन्त सक्रिय हो जाता है। इसकी सक्रियता हृदयगति एवं रक्त शर्करा के स्तर को बढ़ाने में सहायक होती है। इससे घबड़ाहट होती है एवं सिर भारी रहता है। ऐसी अवस्था में नकारात्मक विचार उठते हैं और मन में निराशा-हताशा के बादल मण्डराने लगते है। ये नैराश्यजनक विचार सेरिब्रल कॉर्टेक्स को प्रभावित करते हैं। तनाव के दौरान सक्रिय सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम एड्रेनेलीन एवं नारएड्रेनेलीन हार्मोन का स्राव तेज कर देता है। एड्रेनेलीन के अधिक स्राव से हृदय गति बढ़ जाती है तथा माँसपेशियों में विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं। नारएड्रेनेलीन हार्मोन रक्तवाही नलिका को संकुचित कर देता है, परिणामस्वरूप रक्त का दबाव बढ़ जाता है।
तनाव मन से उत्पन्न होता है अतः तनाव से मन प्रभावित होता है। यह प्रभाव अन्तःस्रावी ग्रन्थियों में भी हलचल उत्पन्न करता है। आधुनिक साइको एण्ड्रोक्राइनो-लॉजी के अनुसार मन और अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के बीच अंतर्संबंध होता है। हालाँकि इस संदर्भ में स्पष्ट प्रतिपादन नहीं हो सका है, परन्तु यह सुनिश्चित तथ्य है कि मन अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को सूक्ष्म रूप से प्रभावित करता है। तनाव के दौरान पिट्यूटरी, थाइराइड, पीनियल एवं एड्रीनल ग्रन्थियाँ अतिक्रियाशील हो उठती हैं। एड्रेलीन ग्रन्थि से उत्पन्न एड्रेनेलीन हार्मोन को तो तनाव हार्मोन कहा जाता है। क्योंकि तनाव के हल्के झोंके से इसका स्राव आरम्भ हो जाता है। तनाव से ACTH (एड्रीनोकार्टिकल हार्मोन या कार्टीसोल) का स्तर एकाएक बढ़ जाता है। कार्टीसोल सोचने-विचारने की प्रक्रिया को तीव्र कर देता है परन्तु इसकी अधिकता एवं स्थायित्व अत्यन्त हानिकारक होता है। मिसौरी यूनिवर्सिटी के एक अनुसंधान से ज्ञात हुआ है कि एक फुटबाल खिलाड़ी में फुटबाल खेलने के पश्चात् कार्टीसोल के स्तर में वृद्धि हो जाती है जो कई घण्टों के बाद अपने सामान्य स्तर में आता है। मानसिक तनाव से भी कार्टीसोल की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि इसे सामान्य स्तर में आने के लिए कई दिन लग जाते हैं।
तनावजन्य नकारात्मक एवं निषेधात्मक विचारों से शरीर की प्रतिरक्षात्मक प्रणाली पर भी विपरीत असर पड़ता है। तनाव की अवधि में WBC (श्वेत रुधिर कणिकाएँ) की सहज सक्रियता कम हो जाती है। ये कणिकाएँ शरीर की रोगों से रक्षा करती हैं तथा शरीर को स्वस्थ एवं निरोग बनाये रखने में अहम् भूमिका निभाती हैं, परन्तु तनाव इस प्रतिरक्षात्मक प्रणाली की मुस्तैदी को कम कर रोगों को प्रवेश करने का अवसर प्रदान करता है। नकारात्मक विचार मस्तिष्क में एण्डार्फीन हार्मोन को घटा देता है जबकि सकारात्मक सोच इसमें अभिवृद्धि करती है। यह हार्मोन प्रतिरक्षा प्रणाली को पुष्ट एवं सुदृढ़ बनाता है जिससे शरीर स्वस्थ एवं प्रसन्न रहता है।
तनाव से मन में कई प्रकार के मनोविकार अपना स्थायी आवास बना लेते हैं। डब्ल्यू. आर. लोवलो ने अपने शोध ग्रन्थ ‘स्ट्रेस एण्ड हेल्थ’ में इस विषय में अनेक अनुसंधान-अन्वेषण के निष्कर्षों का उल्लेख किया है। इनके अनुसार तनाव से चिड़चिड़ापन पैदा हो जाता है। ऐसे व्यक्ति बातों-बातों में चिड़चिड़ा उठते हैं। इनका मानसिक असंतुलन लगभग गड़बड़ा जाता है, परिणामस्वरूप नींद न आना, हताशा-निराशा कल्पनाओं में खोए रहना, डरना आदि मनोरोगों का प्रादुर्भाव होता है। ऐसे लोगों में निर्णय करने की क्षमता नहीं होती है। और यह सही भी है क्योंकि निर्णय तो शान्त मस्तिष्क एवं स्थिर भाव-विचारों की स्थिति में लिया जाता है। इनको मेहनत एवं श्रम के अनुरूप परिणाम नहीं मिलता। इनका अधिकतर समय, श्रम एवं चिंतन व्यर्थ के कार्यों में नियोजित होता है। इस कारण ऐसे लोगों को सदैव असफलता का मुँह देखना पड़ता है जिससे इनका आत्मविश्वास डिगा हुआ होता है।
तनाव शारीरिक एवं मानसिक आधि-व्याधियों का मूल स्रोत है। इसकी गहराई में उतरा जाये तो एक ही तथ्य प्रकट होता है और वह है अहं। अर्थात् तनाव का मूल कारण अहंकार है। अहंकार संसार की समस्त वस्तुओं को प्राप्त करना चाहता है, परन्तु ऐसा सम्भव है नहीं । और यह असम्भव असामंजस्यता पैदा करता है। जिसके कारण तनाव सिर उठाने लगता है। तनाव को पूर्णतया दूर करने के लिए आवश्यक है अहंकार की परतों को हटाना-मिटाना। क्योंकि अहंकार हर छोटी बातों को प्रतिष्ठ का प्रश्न बनाकर फुफकारने लगता है। फिर सामंजस्य एवं समरसता कैसे आ सकती है। इसके अभाव में तनाव प्रबन्धन कारगर नहीं हो सकता है। तनाव प्रबन्धन इसी को ध्यान में रखकर किया जाये तो सफल हो सकता है।
तनाव प्रबन्धन के अंतर्गत 'OCTAPAC'वर्कशाप कारगर सिद्ध हो रही है। इसका तात्पर्य है O=openness (खुलापन), C=collaboration (सहयोग), T=trust (विश्वास), A=autonomy (स्वायतता), P=possibility (सम्भावना), A=authenticity (प्रामाणिकता), C=contribution (योगदान)।
‘OCTAPAC’ के इस वर्कशॉप में तनाव प्रबन्धन का स्वरूप झलकता है। तनाव प्रबन्धन का प्रथम सूत्र है वैचारिक खुलापन अर्थात्, आग्रह, पूर्वाग्रह, हठाग्रह का अभाव। अच्छे विचारों को स्वीकृति एवं समर्थन देना चाहिए। इसी के आधार पर सहयोग-सद्भाव की भूमि तैयार होती है। सहयोग से स्वार्थवृत्ति मिटती है और सेवा का भाव पनपता है जिसमें अपना विश्वास प्रगाढ़ होता है। विश्वास ही विकास का मूल मंत्र है, उन्नति-प्रगति का साधन सोपान है। इस स्थिति में आकर ही स्वायत्तता की परिकल्पना की जा सकती है और स्वतंत्र रूप से अपनी योजना को कार्यरूप प्रदान किया जा सकता है। इसी में आन्तरिक चेतना का परिष्कार तथा बाह्य उन्नति की समस्त सम्भावना सन्निहित है। सम्भावना जब मूर्त रूप लेती है तो प्रामाणिकता के रूप में अभिव्यक्ति पाती है। प्रामाणिकता आत्मविश्वास को जन्म देती है तभी महान् कार्य हेतु स्वयं का योगदान सम्भव हो सकता है और दूसरों का सहयोग मिल सकता है।
तनाव प्रबन्धन के इन सूत्रों में तनाव का समाधान समाहित है। इसके साथ आवश्यक है सर्व शक्तिमान ईश्वर के प्रति श्रद्धा-आस्था की भावना। ईश्वर सर्व समर्थ है। वह हमारी हर समस्याओं का समाधान, हर कठिनाइयों का हल एवं हताशा के कुहासे में ज्योतिर्मय पथ प्रदर्शक है। वह हमारे तनाव का निवारक भी है। वह हमारे हर मनोविकारों के सघन जंजाल को काटकर उत्साह, आनन्द एवं प्रकाश से भर सकता है। अतः उसकी स्मृति को हृदय में बनाये रखने के लिए गायत्री मंत्र की एक माला का न्यूनतम जप करना चाहिए। प्रत्येक दिन अपने नये जीवन का आत्मबोध एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव तत्त्वबोध भी तनाव मुक्ति के लिए रामबाण साधन है। ईश्वर के प्रति गहन आस्था एवं तत्त्वबोध-आत्मबोध की साधना से मनःस्थिति इतनी सक्षम-समर्थ हो जाती है कि वह किसी भी परिस्थिति से तालमेल कर अपने अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकती है। यही तनाव का एकमात्र निदान है और उच्चस्तरीय जीवन का पाथेय पथ भी है।
मगध के राजा सर्वदमन को राजगुरु की नियुक्ति अपेक्षित थी। एक दिन महापंडित दीर्घलोम उधर से निकले। राजा से भेंट-अभिवादन के उपराँत पंडित ने कहा, “राजगुरु का स्थान आपने रिक्त छोड़ा हुआ है। उचित समझें तो उस स्थान पर मुझे नियुक्त कर दें।”
राजा बहुत प्रसन्न हुए। साथ ही एक निवेदन भी किया, “आपने जो ग्रंथ पढ़े हैं, कृपया एक बार उन सबको फिर पढ़ लें। इतना कष्ट करने के उपराँत आपकी नियुक्ति होगी। जब तक आप आएंगे नहीं, वह स्थान रिक्त ही पड़ा रहेगा।”
विद्वान वापस अपनी कुटी में चले गए और सब ग्रंथ ध्यानपूर्वक पढ़ने लगे। जब पढ़ लिए तो नियुक्ति का आवेदन लेकर फिर दरबार में उपस्थित हुए।
राजा ने अबकी बार और भी नम्रतापूर्वक एक बार फिर उन ग्रंथों को पढ़ लेने के लिए कहा। दीर्घलोम असमंजसपूर्वक फिर पढ़ने के लिए चल दिए।
नियत अवधि बीत गई, पर पंडित वापस न लौटे। तब राजा स्वयं पहुँचे और न आने का कारण जानना चाहा।
पंडित ने कहा, “गुरु अंतरात्मा में रहता है, बाहर के गुरु कामचलाऊ भर होते है। आप अंतः के गुरु से परामर्श लिया करें।”
राजा ने नम्रतापूर्वक पंडित जी को साथ ले लिया और उन्हें राजगुरु के स्थान पर नियुक्त किया। बोले, “अब आपने शास्त्रों का सार जान लिया, इसलिए उस स्थान को सुशोभित करें।”
आज हम वैज्ञानिक विकास के विलक्षण युग से गुजर रहे हैं। संचार क्रान्ति की ऐतिहासिक घटना ने पूरे विश्व को एक ग्राम में बदल दिया है। ऐसे में इंसान-इंसान के बीच की भौगोलिक दूरियाँ जहाँ सिमट गई हैं, किन्तु उनके हृदय के बीच का फासला कम नहीं हुआ है। विश्व ग्राम की अवधारणा को एक जीवन्त रूप देने के लिए आज एक समन्वयकारी रसायन की जरूरत महसूस हो रही है जो इंसान के हृदय को आपस में जोड़ने का काम करें, विश्व में व्याप्त विविध धर्म, सम्प्रदाय, संस्कृतियों एवं समाजों की विषमता को मिटाकर उन्हें एक सूत्र में पिरो सकें। इस गुरुत्तर दायित्व का वहन भारतीय संस्कृति भलीभाँति कर सकती है, जिसकी साँस्कृतिक संवेदना में सहज ही उदारता, सहिष्णुता, एवं समन्वयशीलता का वह दिव्य रसायन विद्यमान है जो युग की विषमताओं को मिटाकर विश्व मानव को एक पारिवारिक सूत्र में बाँध सके।
हर राष्ट्र का अपना एक मिशन होता है। रोम का मिशन साम्राज्य एवं शक्ति का विस्तार था। यूनान का मिशन ज्ञान प्राप्त करना था। अरब राष्ट्रों के आविर्भाव से पूर्व मिश्र पिरामिड में मृत व्यक्ति को जीवित रखने की, अमरता की भावना को संजोता था। इसी प्रकार भारत का भी एक मिशन रहा है, जो है इसकी सामाजिक समरसता एवं समन्वय की साधना अनेकता में एकता, विविधता के बीच समता, यही भारतीय संस्कृति की चिरंतन विशेषता रही है। चाहे दर्शन हो या साहित्य, स्थापत्य हो या कला सब जगह वैविध्य है, लेकिन इन विविधताओं में एकता देखना भारतीय मनीषा की अभीप्सा रही है। आज भी भारतीय राष्ट्र इसी का एक प्रतिदर्श है। राष्ट्र के निर्माण में भाषा, धर्म, प्रजाति आदि प्रमुख तत्त्व माने जाते हैं। किन्तु यूरोप में एक ही ईसाई धर्म है, लेकिन दर्जनों राष्ट्र हैं। मध्यपूर्व या दक्षिण एशिया में एक ही धर्म इस्लाम है, किन्तु 40 से ऊपर राष्ट्र हैं। एक ही बौद्ध धर्म को मानने वालों के अनेक राष्ट्र हैं। लेकिन भारत में कम से कम आधे दर्जन वैदिक, इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिक्ख एवं जरथुस्त धर्मों को मानने वाले सैकड़ों वर्षों से बस रहे हैं। जहाँ भाषा को लेकर पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गये और हाल में कनाडा में जनमत संग्रह के आधार पर देश का विभाजन बिल्कुल समीप आ गया था, वहाँ भारत में 18 तो संविधान स्वीकृत राष्ट्र भाषाएँ हैं, बोलियाँ तो एक हजार से भी ऊपर हैं। नस्ल भी एक नहीं, उत्तर भारत में आर्य, दक्षिण में द्रविड़ पूर्वोत्तर भारत में मंगोल सब एक साथ रह रहे हैं। इसी प्रकार खान-पान, पोशाक-त्यौहार, संगीत, साहित्य में विविधता स्पष्ट है।
वस्तुतः भिन्नता में एकता हमारी प्रकृति भी है और नियति भी। जैसे यहूदी धर्म परम्परा में अपनी प्रजाति के नाम पर जेवोह और यूनानी परम्परा में अन्य कोई को एकेश्वर रूप में प्रतिष्ठित कर दिया, भारत में एकेश्वरवाद में भी वैचित्र्य है। एक ही परम सत्य है। लोग उसे अलग-अलग नाम देते हैं - ‘एकं सत्विप्राः बहुधा वदन्ति।’ तत्त्व एक ही है, कल्पनाएँ विविध हैं। कोई उन्हें ब्रह्म, कोई इन्द्र, कोई वरुण आदि कहते हैं। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में हम कह सकते हैं कि वही खुदा या गॉड कहलाता है। ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम।’ यही नहीं, भारतीय श्रुतियों में देव कल्पना एकेश्वरवाद से बढ़कर ‘अद्वैत’ तक चली गई है। ‘एकमेवाद्वितीयम्। एकाऽहं द्वितीयो नास्ति।’ वह एक तत्त्व सगुण-निर्गुण से परे है। यही नहीं, वह आत्मा, अनात्मा, जगत्कर्त्ता, अकर्त्ता आदि कल्पनाओं से परे है। उपनिषद् में उसे ‘नेति-नेति’ कहा गया है, क्योंकि वह शब्दातीत ही नहीं, मनसातीत, वचनातीत एवं कल्पनातीत भी है। इसी प्रकार यहाँ एकेश्वरवाद की कल्पना से अधिक आगे जाने का उपक्रम प्रकट हुआ है।
दर्शन क्षेत्र में भी यह विविधता दर्शनीय है। वैशेषिक, जैन, मीमाँसा में अनेकता प्रतिष्ठित है, साँख्य में पुरुष-प्रकृति द्वैत है और अन्त में अद्वैत का दर्शन आता है। लेकिन वैशेषिक का पंचभूत और साँख्य का पुरुष-प्रकृति द्वैत, अद्वैत की जगत् व्याख्या में समाहित कर दिया जाता है। प्रपंच के अंतर्गत सभी को स्वीकार करते हुए, व्यवहार सत्ता में सबों को समाहित किया गया है। ‘सर्व खलु इदं ब्रह्म’ या ‘ईशावास्यामिदं’ कहने से ही सभी का अन्तर्विधान हो जाता है।
धर्म-समन्वय की साधना भी हमारी साँस्कृतिक विरासत है। यहाँ नास्तिक और आस्तिक, सभी सनातन धर्म में स्थान पाते हैं। चाहे वे वेद को मानते हों या नहीं, किसी को बहिष्कृत करने की परम्परा नहीं है। इसी प्रकार शैव, शाक्त, वैष्णव, उदासी आदि सभी का वैदिक धर्म में समावेश है। इसमें कम से कम 300-400 विभिन्न पंथ हैं। वास्तव में भारतीय मनीषा धर्म को सम्प्रदाय या पंथ विशेष की सीमा में नहीं रखना चाहती। सभी धर्मों एवं धर्म प्रवर्तकों तथा सभी धर्म स्थानों के प्रति आदर एवं पूजा का भाव भारतीय धर्म की विशेषता है। इसीलिए विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानन्द जी ने ‘विश्वधर्म’ की कल्पना प्रस्तुत की, जिसमें विभिन्न धर्मों के विशिष्ट अवदानों से मानव जाति को लाभान्वित होने का निर्देश दिया। हिन्दु धर्म की आध्यात्मिकता एवं सात्विकता, इस्लाम का भ्रातृत्व भाव एवं समानता तथा ईसाइयत की सेवा एवं त्याग भावना आदि मानव जाति की समान सम्पत्ति है। विनोबा जी ने तो स्पष्ट कहा है कि ‘ साम्प्रदायिक धर्म के दिन बीत गए हैं अब अध्यात्म एवं विज्ञान के समन्वय का युग आया है।’ इसी प्रकार नीति एवं राजनीति को ही देखें, आठ प्रकार के राज्यों का वर्णन है। स्वराज्य, वैराज्य, महाराज्य, साम्राज्य आदि। राजसूय यज्ञ और अश्वमेध यज्ञ तथा चक्रवर्ती राज्य की कल्पना में अनेकता में एकता का दर्शन है। राष्ट्र विशेष की संकुचित सीमा में भी रहने की हमारी वृत्ति नहीं है। इसीलिए तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की कल्पना रखी गयी है। राज्य की भौगोलिक सीमा से ऊपर उठकर ‘माताभूमि’ की भावना भी वैश्विकता की ही परिचायक है। आधुनिक समय में विनोबा भावे ने जय-हिन्द से ऊपर उठकर जय-जगत् का उद्घोष आरम्भ किया था। 1978 में विश्व राज्य के लिए प्रयत्न करने का एच. बी. कामथ का प्रस्ताव भारतीय संसद में पारित किया गया था। राष्ट्रीय परिधि से बाहर जाकर ‘भारत-पाक महासंघ’ या ‘दक्षिण एशियाई भाईचारा’ या विनोबा जी द्वारा ‘ए-बी-सी ‘ का प्रस्ताव वैश्विकता की ओर बढ़ते चरण हैं। भारत आज 50 वर्षों से जो गुट निरपेक्ष के मंच में अपना योगदान दे रहा है, इसे भी नई विश्व-व्यवस्था के निर्माण में एक प्रभावशाली कदम माना जा सकता है। भले ही चीन से धोखा हुआ हो, लेकिन पंचशील एवं सह-अस्तित्व की भावना पुष्ट करना राजनीतिक दृष्टि से समन्वय है।
साहित्य और कला के क्षेत्र में विभिन्नता स्वाभाविक है। इसमें अपनी-अपनी प्रतिभा होती है। यहाँ भाषा एवं साहित्य का धर्म विशेष से सम्बन्ध नहीं माना जाता। उत्तर भारत में हिन्दी भाषा के सूत्रधारों में अमीर खूसरो को कोई भूल नहीं सकता। कितने मुस्लिम कवि हैं जिन्होंने न केवल हिन्दी भाषा को समृद्ध किया है बल्कि राम एवं कृष्ण की भक्ति में वे किसी हिन्दु भक्त से कम सराबोर नहीं दिखते। भारतेन्दु जी ने ठीक ही कहा है- ‘इन मुसलमान हरिजन नौ कौटिन हिन्दु न बारि हैं।’ ऐसे अनेक मुसलमान भक्ति कवि हुए हैं जिन्होंने कृष्ण मन्दिर में मक्के का नूर देखा और ब्रजवासियों की धूल में लोट-लोटकर अपने इष्टदेव को रिझाने के लिए स्वयं का होश-हवास तक भूल गए। रसखान और उनकी टोली तो कृष्ण भक्ति में सराबोर हो गए, जबकि यारी या दरिया साहब ने राम-कर्तार को रिझाने के लिए कबीर की सुहागिन का साज सजाया। रहीम खान खाना तो रामचरित मानस को साक्षात् कुरान मानते थे- ‘जमनहि प्रकटकुरान’ रसखान की कृष्ण भक्ति किसी हिन्दु से कम नहीं थी।
रहीम एवं रसखान के अतिरिक्त यारी साहब, दरिया साहब (मारवाड़ वाले), शेख वजीर, कारे खाँ, करीम बख्श, इन्शा वाहिद, दीन दरवेश, अफसोस, खलास, वहजन, मंसूर, लतीफ, हुसैन, चकरंग, काबस, निजामुद्दीन औलिया, फ्रहरत, काजी महमूद, आलम, गालिब शाह, महबूबा, नसीफ खलील, सैयद कासिम अली आदि अनेक भक्त मुस्लिम कवि हैं। उर्दू एवं फारसी में भी अनेक हिन्दु लेखक हुए हैं। फिराक गोरखपुरी, प्रेमचन्द, कृष्णचंदर आदि अनेक उर्दू के स्वनाम धन्य लेखक हैं।
मोक्ष साधन के लिए भी यहाँ एक मार्ग माना गया। ज्ञान-मार्ग, भक्ति मार्ग या कर्म योग का मार्ग या ध्यान-मार्ग आदि सभी उपयोगी हैं। बल्कि आपस में भी इनमें विरोध नहीं है। इन सबका समन्वय भी हो जाता है। श्री अरविन्द का पूर्णयोग या समग्र योग (इंटीग्रल योगा) इस समन्वय को प्रकट करता है। गीता में भी कहा गया है-
यथा नदिनाँ बहवो अम्बु वेगाः
समुद्र मेवा-भिमुखा-वहन्ति।
यहाँ तो एक निष्ठावान् हिन्दू, बुद्ध, जैन ही नहीं सूफी सन्तों की दरगाह एक मजार पर भी भक्ति युक्त पूजा करते हैं। इस्लाम की सूफी धर्मधारा में भी अपार उदारता है।
कहीं समन्वय की यह साधना हमारी दुर्बलता तो नहीं है या इससे सचमुच हमारा नुकसान तो नहीं हुआ है। इतिहास साक्षी है कि समन्वय की साधना के विपरीत मानसिकता वाली संस्कृतियों के नामों-निशान मिट गये। जो जुलियस सीजर या सिकन्दर विश्व विजयी बनने की इच्छा रखते थे वे आज इतिहास के कूड़ेदान में चले गये हैं। जो धर्म या सम्प्रदाय आग और तलवार लेकर फैलना चाहता था, उसका वेग थम गया, उसकी प्रतिष्ठ गिर गई है। ईसाइयत जो विश्व विस्तारक धर्म बनना चाहता था, उसके धर्म गुरु को रोम में ‘धर्म समन्वयक’ का सचिवालय बनाना पड़ा। आज धर्म के क्षेत्र में यदि हम सह-अस्तित्व की संस्कृति धारण नहीं कर सकते हैं तो धर्म का अस्तित्व ही संकट में हो जायेगा।
भारत इसलिए जगत्गुरु माना जा सकता है कि वह समन्वय की संस्कृति का पोषक है। विविधता को नष्ट करने से राष्ट्र की एकात्मकता सशक्त नहीं हो सकती। विविधता हमारी अक्षय निधि है। हमारा दायित्व है कि विविधता में एकता का अन्वेषण करें। वस्तुतः विविधता में एकता ही हमारी नियति है। इसमें विविधताओं का वैभव भी मिलेगा और एकता का सूत्र भी। जिस प्रकार किसी पुष्प माल में अनेक रंग के पुष्प गूँथे होते हैं लेकिन एक अदृश्य सूत्र में सब गूँथे होते हैं, उसी प्रकार विभिन्नता एकता के सूत्र में पिरोये रहेंगे। हीगेल ने अपने तत्त्वज्ञान में भी इसी प्रकार और अनेकता का समन्वय कर उसे शक्तिशाली तत्त्वज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया था। इस तत्त्वज्ञान में विरोधों का समागम भी है लेकिन भारतीय मनीषा ने अनेकता को विरोध तत्त्व नहीं मानकर, एक-दूसरे का पूरक और संवर्धक माना है। इस दृष्टि से यहाँ की समन्वय-साधना में आरम्भ और अन्त दोनों में विरोध नहीं। भिन्नता विरोधिता नहीं है। हमारे शरीर में हाथ, पैर, आँख, नाक, नाक आदि सब पृथक-पृथक तत्त्व हैं लेकिन सब के बीच समन्वय है। समन्वय के बिना शरीर का संचालन असम्भव है। भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि के गुण अलग हैं, लेकिन उनके समन्वय में हमारी समृद्धि बढ़ती हैं। स्वामी विवेकानन्द जी ने इसीलिए कहा था कि ‘भारत में इस्लामी शरीर एवं वेदान्ती मस्तिष्क का समन्वय जरूरी है।’ आज युग की ज्वलन्त चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें ‘सामाजिक समरसता एवं समन्वय की साधना’ के अपने राष्ट्रीय मिशन के प्रति जीवन्त एवं जाग्रत् होने की निताँत आवश्यकता है।
शिष्य अपने गुरु से शिकायत भरे स्वर में कह रहा था, “गुरुदेव! आपने ही तो उस दिन कहा था, जो व्यक्ति त्यागी होते हैं और प्रतिष्ठा से दूर भागने का प्रयास करते हैं, सामाजिक सम्मान उनके पीछे दौड़ा-दौड़ा आता है। मैं गत 15 वर्षों से अपना सर्वस्व समाज सेवा पर न्यौछावर करता आ रहा हूँ, पर सम्मान मेरे पीछे अभी दौड़कर नहीं आया।”
गुरु का उत्तर था, “बात ठीक है, पर तुम्हारी दृष्टि सदैव पाने पर लगी रही, देना तो तुम्हारा नाटक मात्र था।” शिष्य को अपनी भूल समझ में आई।
एक गृहस्थ ने तीन यज्ञ किए। सब धन खरच हो गया। वह गरीबी से घिर गया। उसका दुःख देखकर किसी विद्वान ने कहा, “तुम अपने एक यज्ञ का पुण्य धर्मराज सेठ को बेच दो, तो उतने भर से तुम्हारा काम चल जाएगा।”
गृहस्थ चल पड़ा। रास्ते में खाने के लिए रोटियाँ बाँध लीं। चलते चलते एक जगह रास्ते में एक कुतिया मिली। बच्चे जने थे, पर खाने के लिए उसके पास कुछ न था। भूख से दम तोड़ रही थी। गृहस्थ को सेठ के पास तक पहुँचने में तीन दिन भूखा रहना पड़ा।
जाते ही धर्मराज ने पूछा, “तुम्हारे चार यज्ञ हैं, इनमें किन्हें बेचना चाहते हो।” गृहस्थ ने कहा, “मैंने तो तीन ही यज्ञ किए हैं।” धर्मराज ने कहा, “चौथा दया यज्ञ तो तुमने अभी अभी रास्ते में ही अपने रोटियाँ खिलाकर किया है। उसका पुण्य उन तीनों के बराबर है।”
गृहस्थ ने पिछले तीनों यज्ञ बेच दिए और उसके बदले जो कुछ मिला, उसे आएदिन दया यज्ञों का अवसर ढूंढ़ने और लगाने में खरच करता रहा।
हल को थामे हुए बैलों के पीछे-पीछे चलते हुए उसके पाँव थक गये। माथे पर पसीने की बूंदें छलक आयी। एक पल के लिए उसने आँख उठाकर आसमान की ओर देखा। सूरज सिर पर चढ़ आया था। उसका प्रखर ताप समूचे वातावरण को तपाने लगा था। इस तपन और थकान से उसका अपना तन-मन भी चूर हो रहा था। सो उसने बैलों को हल के साथ वहीं खेत में छोड़ा और खुद खेत के कोने पर खड़े इमली के वृक्ष के नीचे आकर बैठ गया। इमली के वृक्ष की घनी छाँव ने उसे सुखद आश्रय दिया। हल्की बयार की अनुभूति से उसके माथे पर छलक आयी पसीने की बूंदें सूखने लगी। देह पर छायी तपन और थकान से भी राहत मिली।
राहत के इन पलों में उसने देखा भगवान् तथागत एक पगडण्डी से गुजर रहे हैं। उनके साथ कुछ और भिक्षु भी हैं। तथागत को निहार कर उसके अन्तःकरण में एक अद्भुत शान्ति उतर गयी। भगवान् का शान्त एवं प्रसादपूर्ण व्यक्तित्व उसके समूचे अस्तित्व में व्याप्त हो गया। न जाने क्यों उन्हें देखकर उसे अनूठी तृप्ति मिलती थी। खेतों की जुताई या निराई-गुड़ाई अथवा सिंचाई करते समय प्रायः रोज ही उसे भगवान् के दर्शन होते थे। उन्हें देखते ही वह अपना काम रोककर खड़ा हो जाता और दो क्षण उन्हें आँख भरकर देख लेता। फिर अपने काम में जुट जाता। भगवान् के मुख पर छायी हुई शान्ति एवं प्रसन्नता भिक्षु संघ के सदस्यों में उमड़ता उल्लास उसके अन्तःकरण को विभोर कर देता।
शुरुआत के दिनों में उसने भगवान् तथागत के बारे में पता लगाया, काफी खोज बीन की। क्योंकि उन्हें देखकर उसे कुछ अचरज सा लगता था। वह सोचता, यह आदमी इतना प्यारा, इतना सुन्दर लगता है। किन्तु है यह भिक्षु, हालाँकि लगता है सम्राटों का सम्राट। उसने जब उनके बारे पता लगाया तो पता चला कि यह तो राजमहलों को छोड़कर भिक्षु बना है। भगवान् की जीवन गाथा को जानकर उसके मन में तरंगें उठने लगी। उसने सोचा कि अरे! मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। यह एक हल है, यह ..। थोड़ी सी खेती। इसके अलावा भला क्या है मेरे पास छोड़ने को। मैं भी क्यों न इस महान् व्यक्ति की छाया बन जाऊँ। मैं भी क्यों न इसके पीछे चलने लगूँ? इनके व्यक्तित्व से जो अमृत छलक रहा है, एकाध बूँद शायद मेरे भी हाथ लग जाये। .. माना कि मैं निर्धन और अभागा हूँ फिर भी शायद मुझ पर इनकी कृपा हो जाये।
आज जब बुद्ध की परम ज्योति उस पर पड़ी, तो ये भाव प्रकाश समुद्र की भाँति उसके अन्तःकरण में उफन उठे। उससे रहा नहीं गया और उसने भगवान् तथागत की शरण में संन्यास ले लिया। फिर भी अभी कहीं उसके मन में शंका बाकी थी। उसने सोचा-अनजान रास्ते पर निकला हूँ। आज उत्साह-उमंग में हूँ, कल न निभा पाऊँ। शायद कहीं फिर से लौटना पड़े तो..? बस इसी शंकाकुल मनोदशा के कारण उसने बौद्ध विहार के पास खड़े एक वृक्ष के ऊपर अपने नंगल को सम्हाल कर टाँग दिया। अतीत से सम्बन्ध तोड़ना इतना आसान नहीं। यादों की चुभन रह-रहकर उसका अहसास कराती रहती है।
संन्यास लेने के बाद कुछ दिन तो वह बड़ा प्रसन्न रहा। लेकिन फिर चारों ओर से उसे उदासी घेरने लगी। क्योंकि जब भगवान् कहते ध्यान करो तो उसे केवल अपना हल-नंगल नजर आता। जब वह कहते अब तुम अपने भीतर जाओ। तब वह सोचता कि आखिर यह कहाँ की झंझट, कहाँ जाना है भीतर? क्या है भीतर? हर तरफ तो अँधेरा-अँधेरा नजर आता है। उसे लगने लगा कि अजीब झंझट है यह। इससे तो तभी अच्छा था जब अपना हल चलाते थे। कम से कम अपनी दो रोटी तो कमा लेते थे। अब तो वह भी गयी। इस उदासी में उसे वैराग्य से वैराग्य पैदा हो गया।
इस विराग से वैराग्य की भावदशा में वह अपने हल-नंगल को लेकर पुनः खेती-बाड़ी करने के विचार से वृक्ष के नीचे गया। किन्तु वहाँ पहुँचते ही उसे अपनी मूढ़ता दिखी। उसने वृक्ष के नीचे खड़े होकर ध्यानपूर्वक अपनी स्थिति को निहारा कि मैं यह क्या कर रहा हूँ। बोध होते ही उसे अपनी भूल समझ में आयी। वह पुनःविहार वापस लौट आया। फिर तो जैसे यह उसकी साधना बन गयी। जब-जब उसे उदासी होती, वृक्ष के पास जाता, अपने हल को देखता और फिर से वापस लौट आता। संघ के अन्य भिक्षुओं ने उसे बार-बार अपने हल-नंगल को देखते और बार-बार नंगल के पास जाते देखकर उसका नाम ही नंगलकुल रख दिया।
एक दिन वह भी आया जब वह हल-नंगल के दर्शन करके लौटा तो फिर कभी दुबारा वापस नहीं गया। उसे अर्हत्व उपलब्ध हो गया। पकती गई बात-पकती गई बात और एक दिन फल टपक गया। अतीत गया और वर्तमान का उदय हो गया। अर्हत्व का अर्थ ही यही है कि चेतना वर्तमान में आ गयी। एक पल में सब कुछ हो गया। इस क्षण में चेतना निर्विकार होकर प्रज्वलित होकर जल उठी। फिर किसी ने उसे दुबारा हल-नंगल की ओर जाते नहीं देखा। उसकी यह स्थिति देखकर भिक्षुओं को स्वाभाविक जिज्ञासा जगी; इस नंगलकुल को क्या हो गया है? अब यह नहीं जाता उस वृक्ष के पास। पहले तो बार-बार जाता था।
उन्होंने उससे पूछा - आवुस नंगलकुल! अब तू उस वृक्ष के पास नहीं जाता, आखिर बात क्या है? भिक्षुओं की बात सुनकर नंगलकुल हँसा और बोला-जब तक आसक्ति रही अतीत से, जाता था। जब तक संसर्ग रहा, तब तक गया। अब वह जंजीर टूट गयी है। मैं अब मुक्त हूँ। यह सुनकर कुछ भिक्षु ईर्ष्या में जल उठे। उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने भगवान् से शिकायत के लहजे में कहा-भंते! यह नंगलकुल झूठ बोलता है।यह अर्हत्व प्राप्ति की घोषणा कर रहा है। यह कहता है कि मैं मुक्त हूँ। भिक्षुओं की इस शिकायत पर भगवान् करुणार्द्र हो उठे। उनके नेत्रों से करुणा की शुभ ज्योति बरस उठी। उन्होंने बड़े ही स्नेहसिक्त स्वर में कहा- भिक्षुओं! मेरे उस पुत्र ने अपने आपको उपदेश देकर प्रव्रजित होने के कृत्य को पूर्ण कर लिया है। उसे जो पाना था, उसने पा लिया और उसे जो छोड़ना था सो छोड़ दिया। वह निश्चय ही मुक्त हो गया है।
ऐसा कहते हुए उन्होंने दो धम्म गाथाएँ कहीं।
अत्तना चोदयन्तानं परिवासे अत्तमतना। सो अत्तगुत्तो सतिमा सुखम् भिक्खु विहाहिसि॥
अत्ताहि अत्तनो नाथो अत्ता हि अत्तनो गति। तस्मा सञ्जमयत्तानं अस्सं भद्रं व वणि जो॥
अर्थात्, जो आप ही अपने को प्रेरित करेगा। जो आप ही अपने को संलग्न करेगा। वह आत्मगुप्त अपने द्वारा रक्षित-स्मृतिवान् भिक्षु सुख से विहार करेगा। वह मुक्त हो जायेगा।
मनुष्य अपना स्वामी आप है। आप ही अपनी गति है। इसलिए अपने को संयमी बनावें। जैसे सुन्दर अश्व को वणिक संयत करता है।
भगवान् के इन प्रबोध वचनों को सुनकर भिक्षुओं को आत्म विवेक एवं आत्म विचार की महिमा का बोध हुआ। उन्हें यह समझ में आया कि विवेक और विचार के समुचित प्रयोग से कोई भी अर्हत्व की प्राप्ति कर सकता है।
राजा की सेना एक गाँव से होकर गुजरी। सेनापति ने गाँव के मुखिया को बुलाकर पूछा, “घोड़ों को खिलाने लायक सबसे अच्छा खेत किसका है?” मुखिया ने अपना खेत बता दिया। चारा काट लिया गया।
सेनापति ने फिर पूछा, “ये खेत किसके थे?” मुखिया ने कहा, “मेरे। मुझे दूसरों की हानि कराने का क्या अधिकार है।”
सेनापति स्तब्ध रह गए। उन्होंने खेत का मुआवज़ा चुका दिया।
सिकंदर जब मरने लगा तो उसने अपनी सारी बहुमूल्य संपदा आँखों के सामने जमा कराई। मंत्रियों से कहा, “इसे मेरे साथ परलोक भिजवाने का प्रबंध करो।” यह असंभव था। वैभव संसार का अंग है। वह यहीं मिलता है और यहीं छूटता है।
सिकंदर फूट फूटकर रोया। यदि यह सब यहीं पड़ा रहना था, तो मैंने व्यर्थ ही इसके लिए जीवन गंवाया। यदि यह बोध पहले जगा होता तो परमार्थी महामानवों की तरह उपयोगी जीवन बिताता।
समय निकल चुका था। भूल का सुधार संभव न था। सो उसने मंत्रियों से कहा, “जनाजे में उसके खुले हाथ ताबूत के बाहर रखे जाएं, ताकि लोग समझें कि महाबली सिकंदर तक जब खाली हाथ चला गया तो हम क्या साथ ले जा सकेंगे? जिन्हें यह बोध मिलेगा, वह मेरी जैसी मूर्खता न करेगा।”
आज की आपाधापी भरी जीवन शैली का सर्वाधिक वाँछित लक्ष्य है सफलता। जो अन्ततः यह निश्चित करती है कि किसने क्या खोया और क्या पाया। एक सफल व्यक्ति के पास ही सफलता के बन्द दरवाजों की चाबी होती है। वह अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी कई नए अवसरों का सृजन कर सकता है।
सफलता के उच्च शिखर पर पहुँच चुके ज्यादातर लोग सफलता को कठिन परिश्रम, मनोहारी व्यक्तित्व, अपने प्रयास के प्रति पूरी ईमानदारी, प्रत्येक उतार-चढ़ाव को बर्दाश्त करने की शक्ति के रूप में परिभाषित करते हैं। कुछ सफल व्यक्ति इसे ईश्वर की कृपा या फिर किस्मत की अनुकूलता के रूप में स्वीकार करते हैं। फिर भी कुछ बातें ऐसी हैं, जिन पर सभी सफल व्यक्ति एकमत हैं। वे मानते हैं कि कुछ सूत्रों को अपनाकर कोई भी व्यक्ति सफलता के शिखर तक पहुँच सकता है।
पहला सूत्र है, लक्ष्य का निर्धारण। सफलता के आकाँक्षी ज्यादातर लोग महत्त्वाकाँक्षी होते हैं, पर वे यही नहीं समझ पाते कि अपने लक्ष्य को कैसे सुनिश्चित किया जाय। वास्तव में लक्ष्य निर्धारित करने के लिए किसी भी व्यक्ति को अपनी प्रतिभा एवं अपनी कमजोरियों के बारे में सजग होकर सोचना पड़ता है। लक्ष्य निर्धारण के साथ ही लक्ष्य तक पहुँचने के सर्वोत्तम व सहज मार्ग की परिकल्पना भी तैयार हो जाती है। अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जो भी मार्ग अपनाया जाय उसे समयानुकूल परिवर्तित करते रहना चाहिए।
दूसरा सूत्र है, संसाधनों का सदुपयोग। एक मानव के रूप में हम जन्म से ही कुछ न कुछ संसाधनों को प्राप्त करते रहते हैं। जीवन को पल्लवित पुष्पित करने के लिए आवश्यक सारे संसाधन इस सृष्टि के कण-कण में बिखरे पड़े हैं। भोजन, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा की बुनियादी सुविधाएँ तो हमें उपलब्ध हैं ही, साथ ही अभिभावकों एवं शिक्षकों द्वारा प्रदत्त अंतर्दृष्टि भी एक अमूल्य संसाधन के रूप में उपलब्ध है। विभिन्न ज्ञान-विज्ञान का खजाना हमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में मिलता ही है। सफल होने के लिए व्यक्ति को चाहिए कि वह इन संसाधनों का अधिकतम प्रयोग बहुत सोच-समझ कर, सूझबूझ एवं संयम के साथ करे। यहाँ पर यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि सही संसाधनों का प्रयोग गलत लक्ष्य पूर्ति के लिए करने पर सफलता हाथ से फिसल जाती है।
सफलता का तीसरा सूत्र है, सीखने की चाह। अहंकारी व्यक्ति को अपना लक्ष्य हासिल करने में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। क्योंकि दुनिया का सर्वोत्तम शिक्षक भी ऐसे व्यक्ति में ज्ञान की ज्योति नहीं जला सकता। सफलता के लिए यह अनिवार्य है कि नए विचारों को सीखने एवं ग्रहण करने की प्रवृत्ति विकसित की जाए। इस प्रवृत्ति को अपनाकर ही किसी अन्य की उपलब्धियों से ईर्ष्या द्वेष करने के बजाय उसे सराहा जा सकता है, आत्मसात किया जा सकता है।
चौथा सूत्र है, संवाद कौशल। अपनी बात को समुचित एवं सशक्त तरीके से प्रस्तुत करना भी सफलता का अनिवार्य अंग है। संवाद स्थापित करने का यह हुनर घर और बाहर दोनों ही जगहों पर उपयोगी है। इसके लिए तीन आवश्यक तत्त्वों का ध्यान रखना आवश्यक है। संक्षिप्तता, सुस्पष्टता व निरन्तरता।
सफलता के लिए पाँचवा सूत्र है, नेतृत्व करने की योग्यता। अपने भीतर अपनी प्रतिभा एवं क्षमता को पहचान कर आगे बढ़ने वाला व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में नेतृत्व कर सकता है। आत्मविश्वास, विचारों की स्पष्टता एवं दृढ़ निश्चय से सम्पन्न व्यक्ति ही सफल नेतृत्व कर सकता है। इस क्रम में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अपनी असफलता को भी साहस के साथ स्वीकार किया जाये क्योंकि असफलता हमें एक नया अवसर प्रदान करती है कि हम अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए एक नये जोश के साथ प्रयत्न करें।
छठवाँ सूत्र है, प्रशासनिक कौशल। किसी निर्दिष्ट कार्य को समय पर पूरा करना। एक नियत समय के अन्दर कार्य को पूर्ण करने की प्रवृत्ति, किसी अन्य व्यक्ति की कार्यक्षमता एवं गुणवत्ता को कम समय में ही जान लेना, ये सभी ऐसे प्रशासनिक गुण हैं, जो व्यक्ति की सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
सातवें सूत्र के रूप में सफलता के लिए आवश्यक है, क्षमा, करुणा एवं सहयोग की भावना। सफलता की राह में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। कई बार हम किसी अन्य की गल्ती के कारण विफल हो जाते हैं तब ऐसे में क्रोध करने के बजाय उसे क्षमा कर देना चाहिए। शान्त एवं प्रसन्न मन से किया गया कार्य ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। इन गुणों को विकसित करने में जप-ध्यान आदि सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
आठवाँ सूत्र है, वित्तीय संसाधन का सुनियोजन। वित्तीय संसाधन सफलता प्राप्त करने का एक आवश्यक एवं अहम् पहलू है। सफलता के आकाँक्षी व्यक्ति को चाहिए कि वह निकट भविष्य के लिए कार्य-योजना और नीतियाँ बनाये। अपने धन का निवेश व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत मामलों में बहुत सोच-समझ कर करे। अधिकाँश सफल व्यक्तियों ने दौलतमंद होने के बाद भी अपनी दौलत का दुरुपयोग नहीं किया अपितु उसे योजनाबद्ध तरीके से समुचित कार्यों के लिए खर्च किया।
नौवाँ सूत्र है, सकारात्मक सोच। यह निर्विवाद सत्य है कि सकारात्मक सोचने वाला व्यक्ति ही सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच पाता है। हालाँकि सकारात्मक सोच का स्वामी बनना आसान नहीं है, पर थोड़ी सी मेहनत से इसे जीवन में उतारा जा सकता है। सकारात्मक सोच रखने वाला व्यक्ति कभी भी नकारात्मक नहीं सोचता है। अतः सर्वप्रथम अपने भीतर से हीन भावना का परित्याग कर देना चाहिए। “अब मैं क्या कर सकता हूँ, कैसे कर सकता हूँ” इन विचारों को हमेशा के लिए अपने मन-मस्तिष्क से निकाल देना चाहिए। इन नकारात्मक विचारों के स्थान पर “मैं क्या नहीं कर सकता हूँ, सब कुछ संभव है, असंभव कुछ भी नहीं” इन विचारों को अपने चिंतन का अनिवार्य हिस्सा बना लेना चाहिए। सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कभी भी छोटी बात नहीं सोचता है। जब सोच ऊँची होगी, तभी उड़ान ऊँची होगी और ऊँचाइयों पर पहुँचा जा सकेगा।
दसवाँ सूत्र है, आत्मविश्वास। प्रत्येक व्यक्ति में आत्म विश्वास भरा पड़ा है। आवश्यकता सिर्फ उसे जगाने की है। आत्मविश्वास के जगते ही चिन्तन भी बदल जाता है और असंभव लगने वाला कार्य भी संभव बन जाता है। आत्मविश्वास के बिना कोई भी सफलता के शिखर तक नहीं पहुँच पाता।
ग्यारहवाँ एवं अन्तिम सूत्र है, सही समय पर सही कार्य। सफलता के लिए व्यक्ति को चाहिए कि वह समय का सही व संतुलित रूप से प्रयोग करना सीखे। समय ईश्वर द्वारा प्रदत्त बहुमूल्य देन है। इसे व्यर्थ बर्बाद नहीं करना चाहिए। अपना समय सार्थक कार्यों में ही लगायें। जो अपने एवं दूसरों के समय का ध्यान रखते हैं वे समयबद्ध तरीके से अपने लक्ष्य तक पहुँच ही जाते हैं।
परमात्मा ने प्रत्येक व्यक्ति को प्रगति के समान अवसर प्रदान किये हैं। आवश्यकता सिर्फ उन अवसरों का समुचित रूप से लाभ उठाने की है। उपरोक्त सूत्रों को अपनाकर कोई भी व्यक्ति शून्य से शिखर तक की यात्रा तय कर सकता है।
परशुराम उन दिनों शिवजी से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। भगवान शिव शिष्यों में से ऐसे प्रतिभाशाली छात्र की तलाश कर रहे थे, जो न्याय और औचित्य के प्रति अटूट निष्ठावान हो, साथ ही निर्भर और पराक्रमी भी।
खोज के लिए भगवान शिव ने कुछ अनुचित आचरण आरंभ किए और बारीकी से देखा, शिष्यों में से किस की क्या प्रतिक्रिया होती है।
अन्य सभी दरगुजर करते या सहन करते चले गए। मात्र परशुराम ही एक ऐसे थे, जिन्होंने सुझाया ही नहीं, विरोध भी किया। एक दिन बात बढ़ते बढ़ते यहाँ तक पहुँची कि परशुराम तनकर खड़े हो गए और न मानने पर शिवाजी से युद्ध करने को तत्पर हो गए।
भगवान को विश्वास हो गया कि यही है जो फैली अनीति का निराकरण कर सकेगा। उन्होंने प्रसन्न होकर दिव्य परशु प्रदान किया और सहस्रबाहु से लेकर धरातल के समस्त आतताइयों से निपट लेने का आदेश दिया।
गुरु शिष्य की लड़ाई पुराणों की अमर कथा में सम्मिलित है। शिवाजी के सहस्र नामों में से एक नाम ‘खण्ड परशु’ भी है। अर्थात् परशुराम ने जिन्हें खंडित कर दिया।
कस्तूरी की खोज में हिरन भटकता रहता है। वनों, कंदराओं में वह ढूंढ़ता है, पर कही नहीं मिलती। जो भीतर है, उसे बाहर खोजने में उसका जीवन खप जाता है। व्यर्थ की इस भाग दौड़ से उसे निराशा ही हाथ लगती है। अतृप्ति यथावत बनी रहती है। यह बोध हो सके कि जिसे प्राप्त करने की आकुलता में वह वन एवं कंदरा में विचरता रहता है, वह उसके अपने ही भीतर विद्यमान है तो उसे तृष्णा की आग में इस तरह न जलना पड़े। उसकी निकटता प्राप्त कर मृग स्वयं परितृप्त हो जाए।
मृग ही क्यों ? मनुष्य भी तो आनंदं की खोज में मृग मरीचिका की तरह जीवनपर्यंत भटकता रहता है। आनंद की प्राप्ति उसकी चिरंतन माँग है। बचपन से लेकर जरावस्था तक वह इस आकांक्षा की पूर्ति में लगा रहता है, पर हिरन की भाँति दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण मनुष्य सोचता है कि आनंद के स्रोत बाहर है। दृश्य संसार और उससे संबंध परिवर्तनशील पदार्थों के आकर्षण में वह स्थाई और शाश्वत आनंद की खोज करता है। इंद्रियों की तुष्टि के लिए विषयरूपी साधन जुटाता है, पर उनका उपभोग अतृप्ति की आग को ओर भी अधिक भड़कता और बढ़ाता है।
बचपन से लेकर वृद्धावस्था की मध्यावधि में शारीरिक एवं मानसिक स्थिति में अनेकों तरह से परिवर्तन होते है। उन परिवर्तनों के साथ साथ आनंदप्राप्ति के बाह्य साधन भी बदलते रहते है। शैशव अवस्था की मांग अलग प्रकार की होती है और किशोरावस्था की अलग। युवावय की मनःस्थिति और वृद्धों की मनोदशा सर्वथा एक दूसरे से भिन्न प्रकार की होती है। इस कारण आनंदप्राप्ति के बाह्य स्रोत भी क्रमिक रूप से बदलते रहते हैं। नवजात शिशु माँ की छाती से चिपका रहता है। पयपान में ही उसे सामयिक तृप्ति मिलती है, पर थोड़ा बड़ा होते ही दुग्धपान के प्रति उसकी अभिरुचि समाप्त हो जाती है। जो कभी माँ के हृदय से चिपका रहता था, वह अब चित्र विचित्र खिलौनों में रमण करता है। सुखानुभूति के केंद्रबिंदु खिलौने बनते हैं, पर यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं चलने पाती। खिलौने, जो बचपन में अत्यंत ही आकर्षक मनोरंजक लगते थे, किशोरावस्था में नहीं भाते। वह घर की सीमा से बाहर प्रवेश करता है। मित्रों की टोली में उसका अधिकाँश समय व्यतीत होता है। पढ़ने लिखने की, आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्द्धा चल पड़ती है।
बचपन में जो खिलौनों से चिपका रहता था, अब अपना भविष्य बनाने में जी तोड़ परिश्रम करता है। उसकी प्रसन्नता इस बात में सन्निहित रहती है कि कैसे अधिक से अधिक योग्यता संपादित की जाए। संतुष्टि इस आकाँक्षा की पूर्ति से भी नहीं होती। एक की आपूर्ति दूसरे तरह की इच्छा को जन्म देती है। वयस्क होते ही अनुकूल साथी जीवनसंगिनी की खोज चलती है। मिलते ही पत्नी के यौवन, रूप और लावण्य पर वह मुग्ध बना आनंद की अनुभूति करता है, किंतु यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं रहने पाती। शरीराकर्षण कुछ दिनों बाद ही समाप्त हो जाता है, तब तक प्रजनन का दौर चल पड़ता है।
नवागंतुक शिशु प्रसन्नता का नवीन केंद्रबिंदु बनता है। उसकी किलकारियाँ सुनकर वह बड़े से बड़े दुःख भी भूल जाता है। उसकी एक मुस्कान के लिए अपना सर्वस्व लुटाने के लिए मनुष्य तैयार रहता है, जिससे प्रेरित होकर मानव बच्चे के लिए कष्ट उठाने के लिए तत्पर रहता है।
धनोपार्जन, संपदा संग्रह तथा लोकयश पाने की आकांक्षापूर्ति में वह अब सुख आनंद ढूंढ़ने लगता है, तदनुरूप प्रयासों का ताना बाना बुनता है। वह सब मिलने के बाद भी संतोष नहीं होता। अतृप्त और अशाँत मनः स्थिति पुनः नए तरह के खे खिलौने, मन बहलाने के साधन ढूंढ़ती है। संपूर्ण जीवन ही इन बाह्य प्रयासों में खप जाता है। जितना मनुष्य आनंद पाने का प्रयत्न करता है, उतना ही वह उससे दूर होता चला जाता है।
हर मनुष्य की प्रकृति एक जैसी नहीं होती। परस्पर एक दूसरे की अभिरुचि भी भिन्न होती है। एक को एक तरह के काम में आनंद आता है, दूसरे को भिन्न प्रकार के काम में। स्वास्थ्य, धन, ऐश्वर्य, यश, सम्मान, योग्यता की प्राप्ति में अधिकाँश व्यक्ति जीवन खपाते और तदनुरूप सफलता मिलने पर मौज मनाते है, पर वह प्रसन्नता भी चिरस्थायी नहीं होती। कुछ ऐसे भी होते है, जो समाज के ढर्रे से अलग हटकर अपना मार्ग चुनते है, वे असामान्य दुस्साहस का परिचय देते तथा ऐसे काम कर गुजरते है, जिन्हें देखकर दांतों तले अंगुली दबानी पड़ती है। जीवट के धनी व्यक्तियों को संकटों से युक्त कार्यों को करने में ही आनंद आता है। कुछ व्यक्तियों की मनः स्थिति विकृत स्तर की बन जाती है। निकृष्ट कामों में ही उन्हें रस आता है। व्यसनी शराब के प्याले में आनंद देखता और ढूंढ़ता है, उसी में डूबा रहता और अपना सर्वस्व गंवाता है। कामी कामतृप्ति की क्षणिक रसानुभूति में अपने शरीर को गलाता, मन शक्ति को क्षीण करता रहता है। क्रूर आतताइयों को जघन्य अपराधों को करने में प्रसन्नता होती है। दूसरों को रोते कलपते, पीड़ा से कराहते तड़पते देखकर आनंद आता है। यह विकृति उनसे हत्या जैसे पाप कराती है।
बाह्य संसार में आनंदप्राप्ति के लिए मनुष्य भटकता रहता है, यह इस बात का परिचायक है कि शाश्वत सुख की अनुभूति उसके जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए कभी वह एक तरह का माध्यम ढूंढ़ता है तो कभी दूसरे प्रकार का। व्यक्ति के सुख का केंद्र सदा बदलता रहता है। शैशवकाल माँ की गोद में, बाल्यावस्था खिलौने में, छात्र जीवन पुस्तकों में, यौवन पत्नी तथा धन संचय में, गृहस्थाश्रम पुत्रमोह, यशप्राप्ति में नियोजित रहता है। गंभीरता से विचार करने पर पता चलता है कि जिन भौतिक चीजों से आनंद प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है, वे पदार्थ वस्तुतः आनंद से रहित है। यदि इनमें आनंद होता तो मन सदा उनमें लीन रहता , पर आनंद प्राप्ति के केंद्र सतत बदलते रहना इस बात का प्रमाण है कि यह विशेषता उन भौतिक वस्तुओं में नहीं है।
सुख एवं आनंद का केंद्र भीतर है, बाहर नहीं। आनंद की भावना मनुष्य की अंतरात्मा में विद्यमान है। यह भावना ही विभिन्न वस्तुओं में आरोपित होकर हमें आनंददायक प्रतीत होती है। इसी कारण भ्रमवश लोग वस्तुओं को ही आनंद का हेतु समझ लेने की भूल की बैठते है, भ्रमवश विभिन्न वस्तुओं में उसे ढूंढ़ने का प्रयास करते है, फलस्वरूप असफलता ही हाथ लगती है। यह स्थिति उस हिरन जैसी ही है, जो कस्तूरी की गंध से मोहित होकर उसे बाहर तो खोजता है, पर भीतर नहीं झांकता।
आनंद आत्मा का शाश्वत गुण है। वही भीतर बैठा आनंदप्राप्ति का भाव संप्रेषित करता तथा अपनी आनंदमय स्थिति का भान कराता है। इंद्रियों की बनावट बहिर्मुखी है । अंतर्मुखी होकर मूल केंद्र को तलाशने की अपेक्षा वे बाहर की ओर चंचल रहती है। साँसारिक आकर्षणों में वे सुख और आनंद खोजती है। उन्हें ही सुख का आधार मान लेती है।
आनंद की प्रतिच्छाया भावों के रूप में आरोपित होकर जड़ वस्तुओं तक को आकर्षक बना देती है, जबकि उनमें अपना कोई आकर्षण नहीं होता और न ही आनंद। लुभावने दृश्य तथा संसार वही रहते है। समग्र इंद्रियों से युक्त काया का स्वरूप भी नष्ट नहीं होता, पर चैतन्य आत्मा के शरीर से निकलते ही सब खेल समाप्त हो जाता है। कही कोई आकर्षण नहीं दीख पड़ता। जड़ काया के भीतर विद्यमान अंतरात्मा के सौंदर्य प्रवाह की किरणें ही वस्तुओं पर पड़कर सुंदरता का आभास कराती है। दर्पण में दिखाई पड़ने वाली मुखाकृति की प्रतिच्छाया को देखकर दर्पण को माना जाए तो यह मान्यता अविवेकपूर्ण ही होगी। प्रतिच्छाया से आनंदप्राप्ति का भ्रमपूर्ण प्रयास असफल ही सिद्ध होगा।
विषयों में रमण करती कर्मेंद्रियां, भनेंद्रियां कुछ क्षणों के लिए आनंद की अनुभूति करती है, पर उनकी ये विशेषताएं तब तक ही रहती है, जब तक कि आत्मा काया में निवास करती है। इंद्रियों उसी से गति एवं सामर्थ्य प्राप्त करती है। उनकी विभिन्न तरह की क्षमताएं आत्मशक्ति का ही अनुदान है। शब्द,रूप, गंध,स्पर्श, रस आदि कायिक अनुभूतियों से लेकर प्रसन्नता , प्रफुल्लता, उत्साह, उमंग आदि की मानसिक विशेषताएं भी उस आंतरिक चेतन शक्ति की ही प्रतिच्छाया है। शरीर एवं मन से जुड़ी हुई विभिन्न इंद्रियों के काय कलेवर में आत्मसत्ता के बने रहने से ही पदार्थों, दृश्यों एवं विषयों में सुख की अनुभूति कर पाती है। ऐसे सुख की अनुभूति, जो क्षणिक और अस्थाई है।, अतृप्ति को और भी अधिक बढ़ाने वाली है। आत्मा के शरीर छोड़ते ही इंद्रियों किसी प्रकार की अनुभूति नहीं कर पाती। पार्थिव शरीर मिट्टी तुल्य हो जाता है। उसे गाड़ने, दफनाने, जलाने की तुरन्त बात सोची जाती है।
आनंद का केंद्रबिंदु अंतरात्मा है। वह चैतन्य गतिविधियों का प्रेरणास्थल भी है, पर चेतना की यह विशेषता होती है कि वह जड़ वस्तुओं में अधिक समय तक नहीं टिक सकती। जब तक उसका प्रकाश आनंद की किरणें वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा विषयों पर पड़ती है, तब तक वे आकर्षक लगती है। जैसे ही किरणें सिमटती है, वह दृश्यमान सौंदर्य लुप्त हो जाता है। वस्तुतः अंतरात्मा से निकली भावतरंगें दृश्य संसार तथा उससे संबंध वस्तुओं में अपने उद्गम स्थल की खोज करती है। बाहर वह नहीं मिलता। अतृप्ति मिटाने के लिए वह साँसारिक चीजों का सहारा लेती है। मिटने के स्थान पर वह और भी बढ़ती है तथा उसकी स्थिति उस प्यासे व्यक्ति की तरह होती है, जो पानी की तलाश में निकलता है, पर मदिरालय पहुंचकर मद्यपान से अपना होश हवाश गंवा बैठता है। शराबी की तरह ही हालत जीवात्मा की हो जाती है, जो सदा अतृप्त बनी आकुल व्याकुल रहती है।
यह एक विडंबना ही है कि जीव स्वयं आनंद का स्रोत होते हुए भी जीवनपर्यंत उस अमृतत्व से वंचित रहता है। खेल खिलौने, भोग विलास, इच्छाओं, आकाँक्षाओँ, ऐषणाओँ की पूर्ति में बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था खप जाती है, तब वृद्धावस्था में मनुष्य हाथ मलता रह जाता है। व्यतीत हुए भूतकाल के जीवन को स्मरण करके हर व्यक्ति की अंतर्व्यथा जेम्स एलन की भांति मूक रूप से प्रस्फुटित होती,” मैंने सांसारिक जीवन एवं उससे जुड़ी वस्तुओं में आनंद की खोज का प्रयास किया, किंतु वह नहीं मिल सका। विद्याभ्यास किया, ऐश आराम के साधन जुटाए, श्रेय सम्मान अर्जित किया, पर अशांति बढ़ती ही गई। मैंने दर्शनों का अनुशीलन किया, किंतु मेरा हृदय अहंभाव से विदग्ध हो गया, तब पहली बार मुझे अनुभव हुआ है कि शाँति एवं आनंद का केंद्र बाहर नहीं भीतर है।”
ऐसी व्यथा वेदना की अनुभूति हर व्यक्ति को कभी न कभी अवश्य होती है, जिसकी अभिव्यक्ति विभिन्न व्यक्तियों में अलग अलग प्रकार की होती है। यह एक ऐसा अभाव है, जिसकी आपूर्ति भौतिक वस्तुओं, विषयों अथवा भौतिक ज्ञान द्वारा नहीं हो सकती। वे मनुष्य के अंतराल को तृप्त नहीं कर सकते। अंतराल में इस पीड़ा का होना इस शाश्वत तथ्य का परिचायक है कि शाश्वत आनंद की प्राप्ति जीव की प्रमुख मांग है। उसे पाने की उत्कंठा भी उसमें प्रबल है। भीतर की यह आकांक्षा और उत्कंठा उस दिव्य आनंद की प्राप्ति के लिए सतत प्रेरित करती रहती है। दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण मानव उसे बाह्य संसार में ढूंढ़ता है। उसका सामर्थ्य एवं पुरुषार्थ इस प्रयास में ही खप जाता है। इंद्रियों की क्षणिक तृप्ति आग में घी डालने का काम करती है तथा अतृप्त अग्नि को और भी तीव्र करती है। एक कामना की पूर्ति दूसरी कामना को और दूसरी , तीसरी को इस तरह अनेकों प्रकार की कामनाओं की शृंखला चल पड़ती है। उन सभी की पूर्ति कभी नहीं हो पाती। छोटा जीवन और अनंत कामनाएं। ईश्वरप्रदत्त अलभ्य अनुपम जीवन कामनाओं की पूर्ति में ही नष्ट होता रहता है और अंततः पल्ले पड़ती है, अशांति, अतृप्ति, असंतोष और पश्चाताप।
आँतरिक भावों पर ध्यान दिया जा सके तो प्रतीत होगा कि आनंद का अजस्र स्रोत अंदर बैठा सतत अपना प्रवाह संप्रेषित कर रहा है। यह समझाते ही दुश्चिंतन, दुर्बुद्धिजन्य क्रियाकृत्य समाप्त होने लगते है, लालसाएं कम होने लगती तथा चेष्टाएं अंतर्मुखी बन जाती है। ऐसा आत्मबोध, चेतना के उद्गम स्थान पर ही पहुंचने पर संभव है।
वर्जीनिया के एक सुनसान प्रदेश में रेल मार्ग था। रात्रि के समय पहाड़ से बरफीली चट्टानें टूट टूटकर लाइन पर गिरी। गाड़ी आने वाली थी। अंधेरी रात में उसके गिरने का खतरा था।
उस क्षेत्र में एक बुढ़िया रहती थी। चिंतित हुई कि गाड़ी कैसे रुके और दुर्घटना के पास जो चारपाई थी, उसी को तोड़कर रेलवे लाइन पर जलाने लगी और जलती लकड़ियां सिगनल की तरह हिलाती रही। गाड़ी आई। उसने देखा और गाड़ी रोककर उसने दुर्घटना टाल दी। आज भी उसकी प्रतिवर्ष बरसी मनाई जाती है।
एक बार विधाता ने अपना दूत पृथ्वी पर यह पता लगाने के लिए भेजा कि पृथ्वी में स्वर्ग प्राप्ति के योग्य कितने भक्तगण है ?
दूत ने आकर संसार के हजारों भक्तों एवं पुजारियों के नाम पत्ते अपने रजिस्टर में अंकित कर लिए। दूत के विदा होते समय उसे एक अंधा चौराहे पर लालटेन जलाकर खड़ा मिला। दूत ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया।
विधाता ने जब दूत का रजिस्टर देखा तो उसमें उस अंधे का नाम न था। विधाता ने स्वर्ग के सच्चे अधिकारी की परिभाषा बताते हुए, दूत के रजिस्टर को रद्द कर दिया और उस अंधे को स्वर्ग का सच्चा अधिकारी बताया, जो पूजा पाठ तो नहीं करता था, किंतु विश्व व्यवस्था में भगवान का सहयोग कर अंधकार में राहगीरों का मार्ग दर्शन कर रहा था।
30 अक्टूबर को मनायी जा रही सूर्य षष्ठी गायत्री साधकों के लिए अनुदानों का अक्षय कोष है। गायत्री महामंत्र के अधिष्ठाता भगवान् सूर्य प्रत्यक्ष देव हैं। सूर्य भगवान् की आराधना एवं उपासना से शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शान्ति एवं आध्यात्मिक अनुदान-वरदान की उपलब्धि होती है। सूर्योपासना के लिए निर्धारित तिथि को सूर्यषष्ठी के रूप में जाना जाता है। कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि सूर्यषष्ठी कहलाती है। सूर्यषष्ठी व्रत मुख्यतः रोगमुक्ति, पुत्र प्राप्ति और दीर्घायु की कामना के लिए किया जाता है। श्रद्धा और भावना के संग किया गया छठ या सूर्यषष्ठी व्रत अत्यन्त लाभदायक एवं फलदायक होता है।
छठ शब्द का प्रादुर्भाव ‘षष्ठी-षष्ठ’ से हुआ है। यह सूर्य उपासना की विशिष्ट व विशेष तिथि है। सूर्योपासना को सूर्योपस्थान भी कहते हैं, इसमें सूर्य भगवान् को भाव भरा अर्घ्य चढ़ाया जाता है। इस अर्घ्यदान में वैज्ञानिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का गहन-गम्भीर रहस्य भी भरा पड़ा है, जिसे वेद, उपनिषदों एवं पुराणों में विस्तार से उल्लेख किया गया है। वैदिक साहित्य में सूर्यदेव की महिमा-गरिमा का भावभरा गायन किया गया है। इनमें सर्वसुलभ सूर्यदेव के सूक्ष्म एवं दिव्य आध्यात्मिक स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए ‘सविता’ को सूर्य की आत्मा कहा गया है। गायत्री महामंत्र का सूर्य से गहरा तादात्म्य है। इस तथ्य के पीछे तीन कारण हैं-
1. गायत्री महामंत्र का देवता सविता है।
2. सूर्य उपासना सार्वभौमिक है।
3. सूर्य की उपासना-आराधना से होने वाला प्रभाव सर्वथा वैज्ञानिक एवं तथ्यपूर्ण है।
आर्य साहित्य में इस तथ्य को प्रमाणित करते हुए उल्लेख किया गया है। एक कथानक के अनुसार ‘गायत्री वरदाँ देवी-सावित्री वेद मातरम्’ प्रजापति बोले- हे देवताओं! यह जो अनेक प्रकार के वरदान देने वाली गायत्री है उसे तुम ‘सावित्री’ अर्थात् सूर्य से उद्भासित होने वाला ज्ञान जानो। इसके अतिरिक्त गोपथ उपनिषद्-5/3 में ‘तेजो वै गायत्री’ के रूप में इसका निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त ‘ज्योति र्वै गायत्री छन्दसाम, ज्योति र्वै गायत्री, दविद्युतती वै गायत्री, गायत्र्यै व भर्गः तेजसा वै गायत्री प्रथमं त्रिरात्रंदाधार पदैद्वितीय यक्षरै स्तृतीयम’ के रूप में सूर्य और गायत्री के सम्बन्ध सूत्र को दर्शाया गया है। गायत्री मंत्र के ‘सवितुः’ पद में इसी एकात्मता का संकेत है।
गायत्री मंत्र सविता देव से स्वयं को एकात्म करने की गुह्य तकनीक है। गायत्री का देवता सविता सूर्य विश्व के जीवन का, ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र है। यह अन्य समस्त देव शक्तियों का मुख्य केन्द्र भी हैं। चारों वेदों में जो कुछ है वह सब भी इस सविता-सूर्य शक्ति का विवेचन-विश्लेषण मात्र है। शतपथ ब्राह्मण में ‘असौ व आदित्यो देवः सविता’ कहकर सूर्य देव की प्रतिष्ठ की गयी है। निरक्त के दैवकाण्ड-(4-31) में ‘आदित्योऽपि सवितैवोच्यते’ के रूप में सूर्यदेव की महिमा का प्रतिपादन मिलता है। स्कन्द पुराण में सविता की गायत्री के साथ एकरूपता-समरूपता प्रदर्शित की गयी है। सूर्य आदि देव हैं। सूर्योपनिषद् में सूर्य को ‘सूर्य देवस्वरूप’ कहा गया है। भविष्योत्तर पुराण में कृष्ण-अर्जुन के संवाद में सूर्य को त्रिदेवों के गुणों से विभूषित किया गया है। इस संवाद के अनुसार सूर्य उदयकाल में ब्रह्म, मध्याह्न काल में महेश्वर और सायंकाल में विष्णु रूप हैं।
अन्य शास्त्रों में सूर्यदेव को इस तरह अलंकृत किया गया है-’सूर्य वै सर्वेषाँ देवानामात्मा’ अर्थात् सूर्य ही समस्त देवों की आत्मा है, ‘सर्वदेवामय रविः’ अर्थात् सूर्य देवमय हैं। मनुस्मृति का वचन है- ‘आदित्याज्जायते वृष्टिवृष्टरन्नं ततः प्रजाः’। सूर्य से वर्षा, वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा (प्राणी) का जन्म होता है। पौराणिक कथानकों के अनुसार सूर्य महर्षि कश्यप के पुत्र होने के कारण ‘काश्यप’ कहलाये। उनका लोकावतरण महर्षि की पत्नी अदिति के गर्भ से हुआ, अतः उनका एक नाम ‘आदित्य’ भी लोकविख्यात एवं प्रसिद्ध हुआ। उपनिषदों में आदित्य को ब्रह्म के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। छान्दोग्योपनिषद् ‘आदित्यो ब्रह्म’ कहता है तो तैत्तिरियारण्यक ‘असावादित्यो ब्रह्म’ की उपमा देता है।अथर्ववेद की भी यही मान्यता है। इसके मतानुसार आदित्य ही ब्रह्म का साकार स्वरूप है।
ऋग्वेद में सर्वव्यापक ब्रह्म तथा सूर्य में समानता का स्पष्ट रूप से बोध होता है। यजुर्वेद सूर्य और भगवान् में भेद नहीं करता। कपिला तंत्र में सूर्य को ब्रह्मांड के मूलभूत पंचतत्त्वों में से वायु का अधिपति घोषित किया गया है। हठयोग के अंतर्गत श्वास (वायु) को प्राण माना गया है और सूर्य इन प्राणों का मूलाधार है, अतः ‘आदित्यौ वै प्राणः’ कहा गया है। योग साधना में प्रतिपादित मणिपूरक चक्र को ‘सूर्यचक्र’ भी कहते हैं। हमारा नाभिकेन्द्र (सूर्यचक्र) प्राण का उद्गम स्थल ही नहीं बल्कि अचेतन मन के संस्कारों तथा चेतना का संप्रेषण केन्द्र भी है। सूर्यदेव इस चराचर जगत् में प्राणों का प्रबल संचार करते हैं- ‘प्राणः प्रजानामुदयत्येषं सूर्यः’। सूर्य भगवान् को मार्तण्ड भी कहते हैं क्योंकि ये जगत् को अपनी ऊष्मा तथा प्रकाश से ओतप्रोत कर जीवनदान देते हैं। सूर्यदेव कल्याण के उद्गम स्थान होने के कारण शम्भु कहलाते हैं। भक्तों का दुःख दूर करने अथवा जगत् का संहार करने के कारण इन्हें त्वष्ट भी कहते हैं। किरण को धारण करने वाले सूर्य देव अंशुमान् के नाम से भी जाने जाते हैं।
योगशास्त्र में पतंजलि उल्लेख करते हैं कि ‘भुवनज्ञानं सूर्य संयमात्’ अर्थात् सूर्य का ध्यान उपासना करने से समस्त संसार का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है। सूर्य कालचक्र के महाप्रणेता हैं। सूर्य से ही दिन-रात्रि, मास, अयन एवं संवत्सर का निर्माण होता है। भारतीय संस्कृति में किसी वार का प्रारम्भ सूर्योदय से ही होता है। भारतीय सूर्योपासना के मूल में आध्यात्मिक लाभ के अलावा शारीरिक स्वास्थ्य एवं भौतिक लाभ का भाव भी निहित मिलता है। यह कई प्रकार के रोगों से रक्षा करता है। सूर्य की दिव्य किरणों में कुष्ठ तथा अन्य चर्मरोगों के कीटाणुओं को नष्ट करने की अपार क्षमता एवं शक्ति सन्निहित है। इसी कारण ऋग्वेद में कहा गया है- ‘आदित्यासो जगत्स्या देवा विश्वस्य भुवनस्य गोपाः’ अर्थात् सूर्य किरणें सारे चराचर संसार की रक्षा करती हैं। ऋग्वेद में सूर्य की रश्मियों को हृदयरोग तथा पीलिया की चिकित्सा में लाभकारी बताया गया है। कुष्ठरोग का शमन भी सूर्यदेव की कृपा से हो जाता है। श्रीकृष्ण एवं जाम्बवती के पुत्र साम्ब सूर्य की उपासना से ही रोगमुक्त हुए थे। कृष्ण यजुर्वेदीय ‘चाक्षुषोपनिषद्’ में सभी प्रकार के नेत्ररोगों से मुक्ति का उपाय बताया गया है। तंत्रशास्त्र की मान्यता है कि नित्य सूर्य नमस्कार करने पर सात पीढ़ियों से चली आ रही महादरिद्रता दूर हो जाती है। सूर्य नमस्कार स्वयं में सूर्य आराधना भी है और स्वास्थ्य का व्यायाम भी। इससे अनेक प्रकार की बीमारी एवं विकृतियों का निराकरण एवं शमन होता है।
इन्हीं कारणों से सूर्य को आरोग्य का देवता कहा गया है और उसकी किरणों को पवित्र, तेजस्वी एवं अक्षत माना गया है। सूर्य रश्मियाँ नदी की निर्मल धारा के समान पावन है जो अपने संपर्क सान्निध्य में आने वाले हरेक व्यक्ति को तेजस्विता, प्रखरता एवं पवित्रता से भर देती हैं। सूर्योपासना आरोग्य की रक्षा करने के अलावा अन्तःकरण की चट्टानी मलिनता एवं कषाय-कल्मषों को धोकर रख देती है। ‘आरोग्य भास्करादिच्छेन’ से स्वतः ही विदित होता है कि सूर्य आरोग्य प्रदान करने वाले देवता हैं।
यह आरोग्य केवल शरीर के धरातल पर ही सीमित व सिमटा नहीं है वरन् मानसिक एवं आत्मिक स्तर पर प्रभाव छोड़ने में समर्थ एवं सक्षम है। अतः सूर्योपासना सभी रूपों में लाभदायक है।
सूर्योपासना भिन्न-भिन्न रूपों में अनादिकाल से भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के विभिन्न भागों में भक्ति एवं श्रद्धापूर्वक की जाती रही है। अमेरिका के रेड इंण्डिनों द्वारा आबाद क्षेत्रों में सूर्य मंदिर प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। कई प्रकार की सूर्य गाथाएँ हवाई द्वीप, जापान, दक्षिण अमेरिका तथा कैरिबियन द्वीपों में प्रचलित हैं, जो बताती हैं कि सूर्य सबका उपास्य रहा है। चीन के विद्वान् सूर्य को ‘याँग‘ मानते हैं। जापान सूर्य पूजक राष्ट्र है तथा दिनमान का आगमन सर्वप्रथम उसी देश से हुआ माना जाता है। बौद्ध जातकों में सूर्य का प्रसंग वाहन के रूप में स्थान-स्थान पर आया है तथा अजवीथि, नागवीथि और गोवीदि नाम के मार्गों के आधार पर उसकी तीन गतियाँ मानी गयी हैं। इस्लाम में सूर्य को ‘इल्म अहकाम अननजुमे’ का केन्द्र माना गया है। अर्थात् सूर्य इच्छा शक्ति को बढ़ाने वाली चैतन्य सत्ता के प्रतीक हैं। ईसाई धर्म में न्यूटेस्टामेण्ट में सूर्य के धार्मिक महत्त्व का विशद् एवं विस्तृत वर्णन है। सेण्टपाल ने इसीलिए रविवार का दिन पवित्र घोषित कर इस दिन प्रभु की आराधना दान दिये जाने आदि को अत्यन्त फलदायी माना है। ग्रीक और रोमन विद्वानों ने भी इसी दिन को पूजा का दिन स्वीकार किया है।
यद्यपि कालचक्र के दुष्प्रभाव से वर्तमान समय में सूर्योपासना की परम्परा का अत्यन्त ह्रास हो गया है, परन्तु फिर भी धर्म प्रधान भारत वर्ष में सनातन धर्मी जनता आज भी किसी न किसी रूप में सूर्य को देवता मानकर उनकी पूजा अभ्यर्थना करती है। इसी क्रम में सूर्यषष्ठी व्रत को मनाया जाता है। बिहार एवं झारखण्ड की जनता इस पावन तिथि को ‘छठपूजा’ के रूप में अत्यन्त श्रद्धा-उत्साह एवं उमंग के साथ मनाती है। वाराणसी एवं पूर्वांचल में इसे ‘डालछठ’ कहा जाता है। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी के दिन नियम-स्नानादि से निवृत्त होकर फलाहार किया जाता है। पंचमी में दिन भर उपवास करके सायंकाल किसी नदी या सरोवर में स्नान करके अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके पश्चात् अस्वाद भोजन किया जाता है। गायत्री महामंत्र का भावभरा उच्चारण कर विविध पूजोपहार वस्तुओं से सूर्य अर्घ्यदान दिया जाता है तथा अपनी मनोकामना की जाती है।
छठ पुत्र प्राप्ति की कामना की पूर्ति करता है। अतः इसका सम्बन्ध षष्ठी माता से जोड़ दिया गया है। षष्ठी देवी दुर्गा का ही प्रतिरूप है। इसलिए छठ व्रत के अवसर पर सूर्यदेव और षष्ठीमाता के प्रति समान भक्ति भावना के दर्शन होते हैं। इस व्रत को सर्वप्रथम च्यवन मुनि की पत्नी सुकन्या ने अपने जराजीर्ण अन्ध पति की आरोग्यता के निमित्त किया था। व्रत के सफल अनुष्ठान के सुप्रभाव से ऋषि को नेत्र ज्योति प्राप्त हुई और वे जराजीर्ण वृद्ध से युवा हो गये। ऐसी मान्यता है कि आज भी गायत्री महामंत्र का जप करते हुए नियमपूर्वक 12 वर्ष यह व्रत निरन्तर करता है उसकी इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है। सूर्यषष्ठी में गायत्री मंत्र के जप एवं सूर्यध्यान करने से सहज ही आन्तरिक चेतना परिष्कृत होती है और पवित्रता-प्रखरता में अभिवृद्धि होती है।
एक संत नदी के किनारे बैठे बैठे छोटे छोटे पत्थरों का ढेर जमा कर रहे था। ढेर बड़ा हो गया था तो भी उनका प्रयास रुका नहीं।
एक राजा उधर से निकला, पूछा-”यह पत्थर किसलिए जमा किए जा रहे हैं?”
संत ने कहा, “मरने के दिन नजदीक हैं। परलोक में महल चिनाना है तो साथ ले जाने के लिए पत्थर जमा कर रहा हूँ।”
राजा हंस पड़ा, “परलोक में तो साथ कुछ नहीं जाता। यहाँ का सामान यहीं पड़ता रहता है।”
संत गंभीर हो गए। उन्होंने राजा को पास बिठाते हुए, प्यार से कहा, “यदि यह ज्ञान आपने स्वयं अपनाया होता तो वैभव बढ़ाने के बदले जीवन को उस पुण्य परमार्थ में लगाया होता, जो मरने के बाद भी साथ जाता है।”
राजा का दृष्टिकोण ही नहीं कार्यक्रम भी बदल गया।
गैरीवाल्डी ने अपने देश का स्वतंत्रता संग्राम जिस कुशलता और बहादुरी से लड़ा, उसकी चर्चा उन दिनों दूर देशों तक फैली हुई थी और उन्हें बहुत कुछ बड़ा माना जाता था।
एक सेनापति सैन्य संचालन संबंधी कुछ महत्वपूर्ण परामर्श करने उनके पास पहुँचे। इन दिनों वे एक मामूली डेरे में रहते थे। साज सज्जा के सामान का अभाव था। उसी सादगी के वातावरण में सारगर्भित वार्तालाप होता रहा।
अंत में सेनापति को, एक गोपनीय नक्शा दिखाकर स्थानीय परिस्थितियों के संबंध में पूछताछ करनी थी, पर कठिनाई यह थी कि लालटेन का कोई प्रबंध नहीं था। अस्तु, नक्शे को देखना दिखाना संभव ही न हो सका।
गैरावाल्डी जैसे विश्व विख्यात व्यक्ति को इतनी सादगी, गरीबी और अभावग्रस्त स्थिति में देखकर सेनापति को आश्चर्यमिश्रित दुःख हुआ।
दूसरे दिन प्रकाश होने पर जब नक्शे के संबंध में परामर्श करने के लिए सेनापति आए तो उन्होंने बड़ी नम्रता और सम्मान के साथ पाँच हजार पौंड भेंट किए और कहा, “अपनी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए यह नगण्य सी भेंट स्वीकार करने का अनुग्रह करें।”
गैरीवाल्डी ने मुस्कराते हुए कहा, “वस्तुतः मुझे कभी इन चीजों की आवश्यकता अनुभव नहीं हुई, जिन्हें आप अभाव समझ रहे हैं। इस पैसे की मुझे तनिक भी आवश्यकता नहीं है।”
सेनापति का अत्यधिक आग्रह देखा और अस्वीकार करने पर उन्हें खिन्न पाया तो फैसला यहाँ समाप्त किया गया कि सेनापति पाँच पौंड वजन की मोमबत्तियाँ दे जाएं, ताकि भविष्य में रात्रि के समय कोई परामर्श करने आएं तो उनके लिए प्रकाश की सुविधा हो सके।
संसार में जानने को बहुत कुछ है, पर सबसे महत्वपूर्ण जानकारी अपने आप के संबंध की है। उसे जान लेने पर बाकी जानकारियां प्राप्त करना सरल हो जाता है। ज्ञान का आरंभ आत्मज्ञान से होता है। जो अपने को नहीं जानता, वह दूसरों को क्या जानेगा?
आत्मज्ञान जहाँ कठिन है, वहाँ सरल भी बहुत है। दूसरी वस्तुएं दूर भी है और उनका सीधा संबंध भी अपने से नहीं है। किसी के द्वारा ही संसार में बिखरा ज्ञान पाया और जाना जा सकता है, पर अपना आपा सबसे निकट है, हम उसके अधिपति है। आदि से अंत तक उसमें समाए हुए है। इस दृष्टि से आत्मज्ञान सबसे सरल भी है। शोध करने योग्य एक ही तथ्य है, आविष्कृत किए जाने योग्य एक ही चमत्कार है, यह है अपना आपा, जिसे पाने के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।
बाहर की चीजें ढूंढ़ने में मन इसलिए लगा रहता है कि अपने को ढूंढ़ने के झंझट से बचा जा सके, क्योंकि जिस स्थिति में आज हम है, उसमें अंधेरा दीखता है और अकेलापन यह डरावनी स्थिति है। सुनसान को कौन पसंद करता है? खालीपन किसे भाता है? मनुष्य ने स्वयं ही अपने को डरावना बना लिया है और उससे भयभीत होकर स्वयं ही भागता है। अपने को देखने , खोजने और समझने की इच्छा इसी से नहीं होती और मन बहलाने के लिए बाहर की चीजें खोजते फिरते है। कैसी है विडंबना !
क्या वस्तुतः भीतर अंधेरा है? क्या वस्तुतः हम अकेले और सूने है? नहीं, प्रकाश का ज्योतिपुंज अपने भीतर विद्यमान है और एक पूरा संसार ही अपने भीतर विराजमान है। उसे पाने ओर देखने के लिए आवश्यक है कि मुंह अपनी ओर हो। पीठ फेर लेने पर तो सूर्य भी दिखाई नहीं पड़ता और हिमालय तथा समुद्र भी दीखना बंद हो जाता है। फिर अपनी ओर पीठ करके खड़े हो जाए तो शून्य के अतिरिक्त और दीखेगा भी क्या?
बाहर केवल जड़ जगत है, पंचभूतों का बना हुआ निर्जीव। बहिरंग दृष्टि लेकर तो हम मात्र जड़ता ही देख सकेंगे। अपना जो स्वरूप आँखों से दीखता, कानों से सुनाई पड़ता है, जड़ है। ईश्वर को भी यदि बाहर देखा जाएगा तो उसके रूप में जड़ता या माया ही दृष्टिगोचर होगी। अंदर जो है, वही सत है। इसे अंतर्मुखी होकर देखना पड़ता है। आत्मा और उसके साथ जुड़े हुए परमात्मा को देखने के लिए अंतर्दृष्टि की आवश्यकता है। इस प्रयास में अंतर्मुखी हुए बिना काम नहीं चलता।
स्वर्ग, मुक्ति,सिद्धि, शाँति आदि विभूतियों की खोज में कही अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं है बाहर भरी हुई जड़ता में चेतना कैसे पाई जा सकेगी? जिसे ढूंढ़ने की प्यास और पाने की चाह है, वह तो भीतर ही भरा पड़ा है। जिसे कुछ मिला है, यही से मिला है। कस्तूरी वाला हिरन तब तक उद्विग्न और अतृप्त ही फिरता रहेगा, जब तक कि अपने ही नाभिकेंद्र में कस्तूरी की सुगंध सन्निहित होने पर विश्वास न करेगा। बाहर जो कुछ भी चमक रहा है, सब अपनी ही आंखों और प्रकाश का प्रतिबिंब मात्र है।
श्रुति कहती है अपने आपको जानो, अपने को प्राप्त करो और अमृतत्व में लीन हो जाओ। उसी को ऋषियों ने दुहराया है और तत्वज्ञानियों ने उसे बाहर दीख रहा है, वह भीतरी तत्व का ही विस्तार है। अपना आपा जिस स्तर का होता है, संसार कर स्वरूप भी वैसा ही दीखता है। बाहर हमें जैसा देखना पसंद हो, उसे भीतर से खोज निकाले। यही अन्वेषण की चरम सीमा है।
दुःख, दारिद्रय, शोक, संताप और अभाव उद्वेग का निवारण करने के लिए इन अनात्म तत्वों की अंतरंग में जमी हुई जड़ों को खोदना पड़ेगा। भीतर का दीपक जलने पर ही बाहर फैले हुए अंधकार का समाधान होगा। जो कुछ हमारे लिए अभीष्ट और आवश्यक है, उसकी समस्त संभावनाएं अपने भीतर सुरक्षित रखी हुई है। आवश्यकता उन्हें प्रयोग करने की है अपने आपे को प्रयोग करना यदि हमें आया होता तो हम दूसरे ईश्वर बन सकने में समर्थ होते है। अपने को खोकर हमने खोया ही खोया है। बाहर ढूंढ़ने में जीवन गवा डाला, पर मिला कुछ नहीं। मिलता तब, जब बाहर कुछ होता।
अनात्म तत्वों की जो गंदगी भीतर भर गई है, उसे निकाल दे तो शेष वही रह जाता है, जो हमारा स्वरूप है। कुछ पाने के लिए, कुछ खोने के लिए तप साधन किए जाते है। आत्मा तो स्वयं उपलब्ध ही है। उसे पाने के लिए कुछ करना नहीं है। कहने की बात इतनी ही है कि जो अनुपयुक्त और अवांछनीय अपने भीतर भर लिया है, उसे निकाल कर फेंक दे। यह परिशोध ही उपलब्धि का निमित्त बन जाता है।
किसी तत्ववेत्ता से जिज्ञासु ने पूछा,” गुरुदेव! तप साधना से आपने क्या पाया?” उन्होंने उत्तर दिया,”खोया बहुत, पाया कुछ नहीं।”जिज्ञासु ने आश्चर्य से पूछा,”ऐसा क्यों?” ज्ञानी ने कहा,”जो पाने लायक था, वह तो पहले से ही प्राप्त था। जो खोने लायक विषय विकार और अज्ञान अंधकार के अनात्म के अनात्म तत्व भीतर घुस पड़े थे, उन्हें साधना ने निकाला भर है। अपने आपको खाली कर लिया।” इस तरह साधक साधना में खोता ही खोता है, पाता कुछ नहीं। हम स्वप्न खोते है, तब सत्य पाते है।
रोवर गोडल ने अपनी पुस्तक’दि कंटेन्योटेरी साइंसेज एंड दि लिवरेटिव एक्सपीरियेन्सेज आफ योगा’ में लिखा है,” मनुष्य के यह जानने से पहले कि वह वास्तव में क्या है? अब तक के जाने हुए को भूलना होगा। वर्तमान नकारात्मक मान्यताओं के कारण मानव अपने भीतर स्थूल अहंवाद के साथ जुड़ी हुई मिथ्या मान्यताओं से ही परिचित हो पाया है। आत्मिक प्रगति के लिए हमें आत्मबोध का प्रशिक्षण आरंभ से ही करना होगा, क्योंकि उन तथ्यों को, जिन पर आत्मोन्नति निर्भर है, एक प्रकार से हमने भुला दिया है।”
महर्षि रमण ने कहा है, “ अपने को जानने का प्रयत्न करो। अपने स्वरूप को समझो और जिस लिए जन्मे हो, उस पर विचार करो। तुम्हें दिशा मिलेगी और सही दिशा में कदम उठ गए तो वह प्राप्त करके रहोगे, जिसके पाए बिना अपूर्णता और अतृप्ति घेरे ही रहेगी।”
स्वामी विवेकानंद इस संदर्भ में एक कथा सुनाया करते थे, एक तत्वज्ञानी अपनी पत्नी से कह रहे थे संध्या आने वाली है, काम समेट लो। एक सिंह कुटी के पीछे यह सुन रहा था। उसने समझा संध्या कोई बड़ी शक्ति है, जिससे डरकर यह निर्भय रहने वाले ज्ञानी भी अपना सामान समेटने को विवश हुए है। सिंह चिंता में डूब गया। उसे संध्या का डर सताने लगा।
पास के घाट का धोबी दिन छापने पर अपने कपड़े समेटकर गधे पर लादने की तैयारी करने लगा। देखा तो गधा गायब। उसे ढूंढ़ने में देर हो गई। रात घिर आई और पानी बरसने लगा। धोबी को एक झाड़ी में खड़खड़ाहट सुनाई दी, समझा गधा है, सो लाठी से उसे पीटने लगा धूर्त यहां छिपकर बैठा है। शेर डर से थर थर कांपने लगा। धोबी उसे घसीट लाया और कपड़े लादकर घर चल दिया।
रास्ते में एक दूसरा सिंह मिला। उसने अपने साथी की दुर्गति देखी तो पूछा, यह क्या हुआ? तुम इस प्रकार लदे क्यों फिर रहे हो। सिंह ने कहा,” संध्या के चंगुल में फंस गए हैं। यह बुरी तरह पीटती है और इतना वजन लादती है।”
सिंह को कष्ट देने वाली संध्या नहीं, उसकी भ्रांति थी, जिसके कारण धोबी को कोई बड़ा देव दानव समझ लिया गया और उसका भार एवं प्रहार बिना सिर हिलाए स्वीकार कर लिया गया। यह तो मात्र एक दृष्टाँत है, हमारी यही स्थिति है। अपने वास्तविक स्वरूप को न समझने और संसार के साथ, जड़ पदार्थों के साथ अपने संबंधों का ठीक तरह तालमेल न मिला सकने की गड़बड़ी ने ही हमें उन विपन्न परिस्थितियों में धकेल दिया है, जिनमें अंधकार के अतिरिक्त और कुछ दीखता ही नहीं। इस भ्रांति को ही माया कहा गया है। माया को ही बंधन कहा गया है और दुखों का कारण बताया गया है। यह माया और कुछ नहीं, वास्तविकता से अपरिचित रखने वाला अज्ञान ही है।
गीता में माया की व्याख्या और प्रतिक्रिया समझाते हुए भगवान ने कहा है-
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्रान्ति जन्तवः।
ज्ञान अज्ञान के द्वारा ढक दिया गया है, इस कारण सब प्राणी मोह को प्राप्त होते है।
नाहं प्रकाशं सर्वस्य योगमायासमावृतः।
अपनी योगमाया से ढके हुए होने के कारण में सबके लिए दृश्य नहीं हूँ।
दैवी ह्मेषा गुणमयी मम माया दृरत्यया।
तीन गुणों से युक्त इस मेरी माया को पार करना बड़ा कठिन है।
शरीर को आत्मा समझ बैठने, शरीर के सुख दुख हानि लाभ और संयोग वियोग को आत्मा पर घटित हुआ मान लेने से मनुष्य दुखी होता है। उपलब्धियों की अपेक्षा यदि अपना ध्यान आत्मा के निर्मल, निर्विकार स्वरूप में बना रहे और जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए कर्तव्य कर्मों को करते रहने एवं दिव्य विचारों में रमण करने की प्रवृत्ति अपना ली जाए तो न दुख की गुंजाइश रहे, न शोक की। अपने को आत्मा बना इस संसार को परमेश्वर का स्वरूप मानकर परमात्मा के लिए आत्मा द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले अनुदानों,कर्तव्यों कर्मों को अपनाते हुए जीवनयात्रा पूरी करने लगे तो सारे दुख दूर हो जाए, जिन्हें अज्ञता के कारण मायाबद्ध जीव पग पग पर भुगतता रहता है।
आह्वान युवाओं का है! पुकार युवा रक्त के लिए है!! इक्कीसवीं सदी की इस प्रभात बेला में देश के युवक-युवतियाँ स्वार्थ की नींद में सोए हुए निजी प्रतिष्ठ के सपने देखते रहें, यह किसी भी तरह से उचित नहीं। अपनी भारत माता की सिसकियों, कराह भरी करुण पुकारों की यदि वही अनसुनी करेंगे, तो कैसे उन्हें सुपुत्र और सुपुत्रियाँ कहेंगे। देश आज गम्भीर संक्रमण संकट से गुजर रहा है। जैसी वैचारिक शून्यता अभी दिख रही है, वैसी इस देश के राजनैतिक इतिहास में पहले कभी नहीं रही। अवसरवादिता चहुँओर हावी है। जातिवाद और साम्प्रदायिकता के षड्यंत्र से समाज की समरसता रोज-रोज नष्ट हो रही है। दरकनों-दरारों एवं विभाजन की पीड़ा समाज में सब तरफ रिस रही है।
अर्थव्यवस्था का अन्तराल कम पीड़ित नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दबाव, प्रलोभन और सम्मोहन के चक्रव्यूह में फँसा हुआ शासक वर्ग देश के प्राकृतिक संसाधनों एवं अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को कौड़ियों के भाव बेच रहा है। देश में ऐसी राजनैतिक संस्कृति का चलन बढ़ा है, जो अपनी सोच में पूरी तरह से सामंती है। जनता की सेवा और जनता के प्रति जवाब देही की भावनाएँ मुरझा गयी हैं। अमीरों और गरीबों के बीच फर्क बढ़ा है, तो दूसरी तरफ देश में कुछ ही जगहों पर न्यूनतम मजदूरी मिल पाती है। किसानों को कल तक जो न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी थी, वह खत्म हो रही है।
पानी जैसी चीज जो प्रकृति की देन है और जो सभी के सुलभ होनी चाहिए आज बिकाऊ है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को इस देश में पानी बेचकर मनमाना मुनाफा कमाने की छुट मिली हुई है। यहाँ तक कि नदियों को बेचने का सिलसिला शुरू हो चुका है। भ्रष्टाचार की स्थिति भ्रष्टता की सभी सीमा रेखाओं को लांघ चुकी है। गरीब से गरीब इंसान को मिलने वाली सुविधाएँ जैसे कि राशन का अनाज, वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन भी रिश्वतखोरों के शिकंजे में हैं। सरकारी कर्मचारी-अधिकारी जनता का काम करते हुए अहसास जताते हैं तथा उसकी भारी कीमत वसूलते हैं। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक पूरा समय नहीं देते, दवाएँ मुहैया नहीं होती। महिलाओं के खिलाफ हिंसा में भारी बढ़ोत्तरी हुई है।
दलितों-पीड़ितों के नाम से शासन करने वाले नेता स्वयं ही सामंती सोच के शिकार हैं। उनकी शानो-शौकत देखते ही बनती है। जबकि उन्हें वोट देने वाली जनता वैसा ही सामाजिक, आर्थिक पिछड़ापन भुगत रही है। साधारण जनता जमीन-जायदाद के छोटे-छोटे झगड़ों को लेकर पुलिस-कचहरी के चक्कर काटती रहती है और वहाँ उसका जमकर शोषण होता है। व्यवस्था इतनी जटिल हो गयी है कि जगह-जगह बिचौलिए और दलालों के बिना काम नहीं चलता। हार-थककर इनकी शरण में आना ही पड़ता है। स्थिति बनने की बजाय बिगड़ रही है और हम सभी कठपुतली बने असहाय पड़े हुए सारा तमाशा देख रहे हैं।
सवाल यह है कि अब किया क्या जाये? या तो हम मूक दर्शक बने रहें और किसी बड़ी दुर्घटना की प्रतीक्षा करें। अथवा चुप्पी तोड़कर इस व्यवस्था को बदलने के लिए अपनी भूमिका तय करें। इस देश में लोकसेवियों की महत्त्वपूर्ण परम्परा हमेशा मौजूद रही है, जो मूल्य आधारित विचारशक्ति जीवन का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी चिन्ता हमेशा समाज का अन्तिम इंसान होता है। लोकसेवियों की यह जीवनधारा शासन में कोई रुचि न रखते हुए भी राष्ट्रीय व्यवस्था एवं देश के भविष्य के लिए हमेशा ही चिंतनशील रहती है। जब देश की व्यवस्था गड़बड़ाती है, तो लोकसेवियों की परम्परा इसे अपना कर्त्तव्य समझकर उसे फिर से सुधारने का प्रयास करती है। लोकसेवियों की इस परम्परा को आम आदमी के जीवन से जुड़े हुए मुद्दों का हमेशा ध्यान रहता है। कोई निहित स्वार्थ न होने के कारण लोकसेवियों की इस परम्परा में सदैव इतना नैतिक साहस होता है कि सही को सही और महान लोकमत कह सकें। गलत को गलत कह सकें। यही इसकी विशेषता है और निश्चित रूप से यही इसकी उपयोगिता और ताकत भी है।
आचार्य चाणक्य, समर्थ गुरु रामदास, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, विनोबा एवं लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपने जीवनकाल में लोकसेवियों की इसी परम्परा को निभाया और राष्ट्रीय व्यवस्था को परिष्कृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। उन्होंने भारतीय समाज एवं मानवीय समाज के उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा। विनोबा ने तेरह वर्षों की पदयात्रा के अथक प्रयास से यह दिखाया कि एक पेचीदा समस्या का मानवीय समाधान क्या हो सकता है? विनोबा के प्रयासों से भारत में जितने भूमिहीनों को जमीनें मिली उतनी किसी और के प्रयास से नहीं मिली।
सवाल यह है कि आज के दौर में अँधेरी राहों के लिए प्रकाश दीप कहाँ है? किधर है वह दिशा सूचक यंत्र जिसके सहारे हम समाधान की खोज में चल पड़े। शान्तिकुञ्ज द्वारा संचालित विचार क्रान्ति अभियान में इन सभी प्रश्नों के उत्तर अन्तर्निहित हैं। नैतिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति इसके महत्त्वपूर्ण आयाम हैं। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण इसके अनिवार्य उद्देश्य हैं। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज इसकी क्रियात्मक गतिविधियों का आधार है। साँस्कृतिक संवेदना की सजल भावधारा इस राष्ट्रीय जनआंदोलन का ऊर्जा स्रोत है। आध्यात्मिक जीवन दृष्टि एवं प्रगतिशील जीवन दर्शन को आधार बनाकर इसका समूचा ढाँचा खड़ा किया गया है। इस जनआंदोलन में जो नयी युवा शक्ति खड़ी होगी वह उम्मीद की नयी किरण होगी।
नव सृजन के इस राष्ट्रीय एवं मानवीय आन्दोलन में आदर्शवादी युवक-युवतियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे युवा-युवतियों को जो एक आदर्श समाज की रचना का स्वप्न देखते हों, अपने संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठना होगा। उन्हें अपने एवं परिवार से ऊपर उठकर समाज एवं देश को प्राथमिकता देनी होगी। अपनी-अपनी रुचि के कुछ रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कामों से स्वयं को जोड़ना होगा। उदाहरण के लिए कुछ कार्य सभी जगह किये जा सकते हैं। प्रौढ़ शिक्षा, साक्षरता, स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता, स्वच्छता आदि कार्य हर कहीं किये जा सकते हैं। दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन जैसे दहेज प्रथा विरोध, नशा निवारण आदि के लिए भी अपने आपको समर्पित किया जा सकता है।
युवा शक्ति आज के समय में क्या करें? इसके लिए शान्तिकुञ्ज में एक विस्तृत खाका-ब्यौरा तैयार किया गया है। युवा शक्ति के नियोजन एवं उनकी ऊर्जा के क्रियान्वयन के विषय में यह महत्त्वपूर्ण ब्लु प्रिन्ट है। बस जरूरत युवाओं के अन्तःकरण में उमड़ते, उफनते उत्साह की है आवश्यकता उस साहस और समर्पण की है, जो राष्ट्रीय नव निर्माण में शामिल होने के लिए विकल हैं, यदि आप में वह हिम्मत और जोश है, तो आप आज ही स्वयं को इस नव निर्माण आन्दोलन से सम्बद्ध कर सकते हैं। स्वयं को विचार क्रान्ति अभियान का एक प्राणवान कार्यकर्त्ता बना सकते हैं। युवा शक्ति द्वारा प्रेरित एवं प्रवर्तित विचार क्रान्ति अभियान में इस तरह युवा-युवतियों की व्यापक भागीदारी से इस देश को बचाने एवं बनाने का एक बड़ा आन्दोलन देश भर में व्यापक हो सकेगा। इक्कीसवीं सदी में होने वाले उज्ज्वल भविष्य की आधारभूमि यही होगी।
एक बार ईसा अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। उसी समय एक व्यक्ति दौड़ते हुए उनके पास आया और चरणों से लिपटकर बोला, “प्रभु! सच्चा जीवन जीते हुए परमात्मा के पास पहुँचने का क्या साधन हो सकता है।”
ईसा ने कहा, “नम्रता, प्रेम, दया, निरहंकारिता, सत्य, अहिंसा, त्याग आदि परमात्मा को प्राप्त करने के साधन है।”
धनी युवक ने कहा, “प्रभु मैं तो बचपन से ही इन नियमों का पालन कर रहा हूँ।”
ईसा यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और फिर बड़ी आत्मीयता के साथ बोले, “यह सब होते हुए भी तुझमें एक कमी है, जिसे मैं जानता हूँ। तुम अपने नियमों का तो हमेशा पालन करते रहो। एक बात और करो तुम्हारे पुरुषार्थ और भगवान ने जो तुम्हें दिया उसे तुम जरूरतमंदों को दे दो। इस आदान-प्रदान के शाश्वत नियम का परिपालन करने से ही परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है।”
इस आदेश का पालन करने में उस धनी युवक को बड़ी कठिनाई महसूस हुई और वह चुपचाप वहाँ से चलता बना।
ईसा कुछ देर तक उस युवक की ओर देखते रहे। फिर शिष्यों को संबोधित करते हुए बोले, “देखा! संचयी लोगों का परमात्मा के पास पहुँचना कितना कठिन है। वे केवल दोनों हाथों से बटोरना जानते हैं, देना नहीं।”
ध्यान किस तरह से करें? यह सवाल उन अनेक साधकों का है, जो मानव चेतना के रहस्यों को अनुभव करना चाहते हैं। जिनकी चाहत जिन्दगी के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने की है। जो अन्तर्यात्रा के पथ पर तेजी से कदम बढ़ाना चाहते हैं। शास्त्रकार एवं अनुभवी योग साधक सभी एक स्वर से ध्यान की प्रशंसा करते हुए नहीं थकते। सबका यही मानना है कि ध्यान अध्यात्म राज्य का द्वार है। मानवीय चेतना के रहस्यों को अनुभव करने की विधि है। जिन्दगी के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने की सरल प्रक्रिया है। अन्तर्यात्रा पथ के लिए समर्थ पाथेय है। ध्यान के इस महत्त्व निरूपण के क्रम में विभिन्न साधना परम्पराओं में अनेकों विधियाँ भी सुझाई गई हैं। साधकों की समस्या यह है कि इन अनगिनत विधियों में किसका चुनाव करें?
ध्यान साधना के जिज्ञासुओं के सवालों के सटीक समाधान के लिए इन पंक्तियों के माध्यम से ध्यान की अतिसुगम किन्तु अति समर्थ विधि प्रस्तुत है। इसका प्रयोग सभी आयु वर्ग के साधक सरलता से कर सकते हैं। इसका प्रयोग उनके लिए भी लाभकारी है जो वर्षों से नियमित साधना कर रहे हैं। इनके साथ वे साधक भी इस प्रयोग को अपना सकते हैं, जिन्होंने साधना पथ पर अभी पहला पग रखा है। ध्यान साधना के इस महाप्रयोग का नाम है-’ज्योति अवतरण की ध्यान साधना’। यह साधना इतनी अधिक प्रभावी है कि साधकों को पंद्रह दिन के अभ्यास के बाद अपने अस्तित्व एवं अन्तःकरण में स्पष्ट परिवर्तन नजर आने लगते हैं। ध्यान के इस महाप्रयोग की प्रक्रिया निम्न बिन्दुओं में स्पष्ट है।
(1) जहाँ तक सम्भव हो साधक इस साधना के लिए शान्त, एकान्त, खुले एवं हवादार स्थान का चुनाव करे। इस क्रम में अपनी पूजा स्थली का भी चुनाव किया जा सकता है। सामूहिक ध्यान साधना के योग्य स्थान का चुनाव आचार्य एवं साधक मिल कर करें। उपयुक्त स्थान पर स्थिर चित्त हो, सुखासन पर बैठें। ध्यान साधना के लिए बैठते समय यथासम्भव शरीर पर कसे हुए कपड़े न रहे। ढीले वस्त्र पहनें। सुखासन पर स्थिरता पूर्वक बैठकर रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए भावना करें कि अपना मन, शरीर एवं आत्म चेतना पूर्ण शान्त निश्चिन्त एवं प्रसन्न स्थिति में अवस्थित है। यह भावना प्रगाढ़ता पूर्वक पाँच मिनट करने से अन्तःकरण में ध्यान के लिए उपयुक्त शान्ति उत्पन्न होने लगती है।
(2) अब यह धारणा करें कि आपके अपने चारों ओर श्वेत, शीतल, स्निग्ध प्रकाश पुञ्ज फैला हुआ है। आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सब तरफ प्रकाश फैल रहा है। हर तरफ से आप प्रकाश से घिरे हुए हैं। प्रकाश की यह आभा सूर्य मण्डल के मध्य में स्थित भगवती आदिशक्ति माता गायत्री से निकलकर सीधी आप तक आ रही है। वही इस प्रकाश का परम स्रोत है जो इस समय हर ओर से आपको घेरे हुए है।
(3) अगले क्रम में आप भावना करें कि ये प्रकाश किरणें धीरे-धीरे आपके शरीर में त्वचा छिद्रों से प्रवेश करती हुई प्रत्येक अवयव में समा रही हैं। मस्तिष्क, हृदय, फेफड़े, आमाशय, आँतें, हाथ, पाँव आदि शरीर के सभी अंग इस प्रकाश पुञ्ज को अपने भीतर धारण कर परिपुष्ट एवं प्रकाशवान हो रहे हैं। जिह्वा, नेत्र, कान, नाक आदि सभी ज्ञानेन्द्रियाँ माता गायत्री के इस आलोक से आलोकित होकर पवित्र हो रही हैं। इनमें से प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय की असंयमवृत्ति जल रही है। समूची देह के कण-कण में अज्ञान एवं अपवित्रता का अँधेरा समाप्त हो रहा है। पवित्रता एवं ज्ञान की यह ज्योति शरीर के कण-कण को पवित्र बनाने में संलग्न हैं।
(4) स्थूल शरीर में रक्त-माँस अस्थि आदि से बने हुए अवयवों के प्रकाश पुञ्ज बनने और उनके परिपुष्ट, पवित्र, स्फूर्तिवान् एवं ज्योतिर्मय होने का ध्यान दस मिनट करना चाहिए। इसके उपरान्त दस मिनट इस ध्यान की सूक्ष्म शरीर पर केन्द्रित करना चाहिए।
(5) सूक्ष्म शरीर का स्थान मस्तिष्क है। इस साधना को प्रगाढ़ करें कि मस्तिष्क के भीतर मक्खन जैसे कोमल एवं बालू के जैसे बिखरे हुए कणों में अगणित प्रकार की मानसिक शक्तियों एवं विचारणाओं के केन्द्र छिपे हुए हैं। उन तक आदि शक्ति माता गायत्री के प्रकाश की धाराएँ पहुँच रही हैं और वे सभी कण उसके द्वारा रक्तकणों की तरह ज्योतिर्मय होकर जगमगाने लगे हैं।
(6) इस प्रकाश के प्रवेश होने से मन में छिपे हुए अज्ञान के अंधकार का, असंयम एवं स्वार्थ का, भय और भ्रम के जंजाल का विनाश हो रहा है और मानसिक संस्थान का कण-कण, सूक्ष्म शरीर का अणु-अणु विवेक, सद्विचार, संतुलन एवं सुरुचि जैसी विभूतियों से जगमगाने लगा है। माता गायत्री की इन ज्योति किरणों के द्वारा मनोभूमि पवित्र प्रेरणाओं का पुञ्ज बन गयी है।
(7) दस मिनट तक सूक्ष्म शरीर गायत्री माता के प्रकाश का प्रवेश अनुभव करने के बाद, दस मिनट हृदय स्थान में स्थित कारण शरीर में ज्योति अवतरण की धारणा करनी चाहिए।
(8) इस भावना को प्रगाढ़ करें कि ज्योतिर्मय आकाश से अनन्त प्रकाश की आभा अवतरित होकर अपने हृदय स्थान में अवस्थित आत्मा के अणु मात्र प्रकाश पुञ्ज में प्रवेश कर रही है। उसकी सीमाबद्धता, संकीर्णता और तुच्छता को दूर कर अपनी तरह बना रही है। लघु और महान् का यह मिलन-अणु ज्योति एवं विभु ज्योति का यह आलिंगन परस्पर महान् आदान-प्रदान के रूप में परिणत हो रहा है। जीवात्मा अपनी लघुता परमात्मा में विसर्जित कर रहा है और परमात्मा अपनी महानता जीवात्मा को सौंप रहा है।
(9) धारणा करें कि ये परम मिलन के दिव्य क्षण हैं। जीवात्मा का लघु प्रकाश परमात्मा के परम प्रकाश से लिपट रहा है और दीपक पर जलने वाले पतंगे की तरह, यज्ञ कुण्ड में पड़ने वाली आहुति की तरह अपने अस्तित्व को होम रहा है। इस महामिलन के फलस्वरूप अन्तःकरण में सद्भावनाओं की हिलोरें उठ रही हैं। आकाँक्षाएँ आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता से परिपूर्ण हो चली हैं। ईश्वरीय संदेशों और आदर्शों पर चलने की निष्ठ परिपक्व हो रही है। विश्व के कण-कण में परमब्रह्म को ओतप्रोत देखकर वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना प्रबल हो रही है और सेवा धर्म अपनाकर ईश्वर भक्ति का मधुर रसास्वादन करने की उमंगें उठ रही हैं। आत्मा की महिमा के अनुरूप अपनी विचारणा और कार्य पद्धति रखने का निश्चय प्रबल हो रहा है।
(10) ध्यान की इस परम प्रगाढ़ स्थिति में अनुभव करें कि अनन्त प्रकाश के आनन्दमय समुद्र में स्नान करते हुए आत्मा अपने आपको धन्य एवं कृतकृत्य अनुभव कर रहा है।
ज्योति अवतरण की ध्यान साधना की यह समर्थ प्रक्रिया पूरा करने में लगभग पैंतीस मिनट लग जाते हैं। पैंतीस मिनट के इस क्रम में पाँच मिनट आसन पर बैठने एवं मनोभूमि के निर्माण में एवं शेष दस मिनट स्थूल शरीर ज्योति धारण करने में, दस मिनट सूक्ष्म शरीर में ज्योति अवतरण की भावना करने में, दस मिनट अंगुष्ठ प्रमाण जीवात्मा की ज्योति के साथ आकाश में स्थित भगवती आदिशक्ति के मिलन की अनुभूति में लग जाता है। समय कम हो तो इसी अनुपात में थोड़ा-थोड़ा समय चारों धारणाओं में कम किया जा सकता है। यह अति समर्थ एवं परम गोपनीय साधना है। इस साधनक्रम को अपनाने वाले अपने जीवनक्रम में कायाकल्प जैसा परिवर्तन होते हुए अनुभव करेंगे और उन्हें अपनी आन्तरिक प्रगति पर उत्साहवर्धक संतोष अनुभव होगा।
द्रौपदी गंगा स्नान कर रही थी। दृष्टि दौड़ाई तो देखा कि कुछ दूर पर एक साधु स्नान कर रहा है। हवा से उसकी किनारे पर रखी लंगोटी पानी में बह गई और जिसे वह पहने था, पुरानी होने के कारण संयोगवश वह भी उसी समय फट गई। बेचारा असमंजस में था। नंगी-उघारी स्थिति में लोगों के बीच से कैसे गुजरे। उसने दिन भर झाड़ी में छिपकर समय काटने और अंधेरा होने पर कुटी में लौटने का निश्चय किया। सो छिप गया।
द्रौपदी को स्थिति समझने में देर न लगी। वे झाड़ी तक पहुँची। अपनी साड़ी का एक भाग फाड़कर साधु को दे दिया। कहा-इसमें से दो लंगोटी बना लीजिए। अपनी लाज बचा लें। साधु ने कृतज्ञतापूर्वक वह अनुदान स्वीकार किया।
दुर्योधन की सभा में द्रौपदी की लाज उतारी जा रही थी। उसने भगवान को पुकारा। भगवान सोचने लगे इसका कुछ पुण्य जमा हो तो बदले में अधिक दे सकना संभव है। देखा तो साधु की लंगोटी वाला कपड़ा ब्याज समेत अनेक गुना हो गया था। भगवान ने उसी को द्रौपदी तक पहुँचाया और उसकी लाज बची।
संपदा संपादित करना सर्वथा अपने हाथ के बलबूते की बात नहीं है। परिस्थितियों की प्रतिकूलता उसमें बाधक भी हो सकती है। प्रकृति के कारण कई बार ऐसी विपन्नता उत्पन्न हो जाती है कि करा धरा पुरुषार्थ मटियामेट हो जाता है।
खेत में अच्छा बीज डालने और खाद पानी का उचित प्रबंध करने से भी यह निश्चित नहीं है कि इच्छित उत्पादन होकर ही रहेगा। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओले, कीड़े, टिड्डी जैसे कई उत्पात खड़े हो सकते है। दाव लगे तो वन्य पशु पक्षी भी उसके अधिकांश भाग को हड़प सकते है। चोर उपज को ही नहीं, खड़ी फसल को भी काट सकते है। आंधी तूफान से भारी क्षति हो सकती है। सहायता के लिए मजदूर न मिले, बैल बीमारी से चल बसें तो संपन्न बनने की योजना में प्रकृतिगत या मानवी कारणों से ऐसा कुछ हो सकता है, जिससे मनसूबे धरे के धरे ही रह जाए। प्रयास के साथ परिस्थिति की अनुकूलता और साधन सहयोग की विपुलता ही भौतिक प्रगति के पथ प्रशस्त करती है अन्यथा आकाँक्षाएं धरी की धरी रह जाती है।
उच्च शिक्षा की प्राप्ति, ऊँचे पद पर आरुढ होना, प्रतियोगिताओं में सफल होना उन्नतिशील बनने के लिए आवश्यक है। इनके लिए पूरी तैयारी करने पर भी आकस्मिक रुग्णता, दुर्घटना, आवेश भरी योजना कुछ से कुछ कर सकती है, जो संजोया गया था, वह उलटा हो सकता है। यह संभव हो सकता है कि उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेने पर उपयुक्त पद न मिले और किसी छोटी नौकरी से संतोष करना पड़े। पहलवान भी दंगल में मात खा जाते है। अफसर पदावनत और निलंबित होते देखे गए हैं। जीवनभर की कमाई को चोर मार सकते है। घर के कुपात्र सदस्य ही कुसंग में पड़कर दुर्व्यसनों के शिकार बनकर उस संपदा को स्वाहा कर सकते है, जिसके बारे में सोचा गया था कि जिंदगी का सहारा बनेगी और सुख सुविधाओं में कोई कमी न पड़ेगी। संपन्नता अभीष्ट तो है, पर प्रयत्नरत व्यक्ति उसका समुचित लाभ उठा सकेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं।
इसकी तुलना में सुसंस्कारिता की फसल ऐसी है, जो मात्र अपने संकल्प के बलबूते उगाई और पकाई जा सकती है। मन अपना है। शरीर भी अपना है। उन दिनों पर पूरी तरह अपना स्वामित्व है। इच्छानुसार उन्हें सिखाया, समझाया, बदला सुधारा और मोड़ा मरोड़ा जा सकता है। इस क्षेत्र में किसी दूसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं। यदि प्रण कर लिया जाए कि सुसंस्कारी बनकर रहेंगे तो यह प्रतिभा अपने बूते ही पूरी की जा सकती है। दूसरों की सहायता इसके लिए आवश्यक नहीं। प्रतिकूलताओँ की स्थिति में थोड़ी कठिनाई तो हो सकती है, पर इतनी शक्ति किसी में नहीं, जो आदर्शों के प्रति निष्ठावान को पतित पराभूत कर सके। शरीर पर आघात हो सकते है। साधनों को नष्ट किया जा सकता है, किंतु यह संभव नहीं कि व्रतशीलों को उत्कृष्टता अपनाए रहने से विरत किया जा सके। देवमानवों की कथा गाथाएं इसकी साक्षी है कि उन्होंने कठिन समय में भी महानता अपनाए रखी, व्यवधानों को सहते या विकट संघर्ष करके उन्हें निरस्त करते रहे।
आदर्शवादी दृढ़ता ऐसा संबल है कि उसे एक बार दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया जाए तो फिर उससे डिगा सकने की सामर्थ्य किसी में नहीं। दधिची, भगीरथ, हरिश्चंद्र, मोरध्वज, कर्ण आदि ने महानता को अक्षुण्ण बनाए रखने का निश्चय किया था। कठिनाइयां आती रही और वे उन्हें दुलराते रहे। ध्रुव प्रह्लाद जैसे बालकों के साहस भी कठिन प्रसंगों में न टूटे। दमयंती, सीता, सावित्री, सुकन्या, शैव्या, अरुंधती, इला, अपाला एवं मीरा जैसी महिलाएं जब अपनी उत्कृष्टता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए कटिबद्ध हो गई तो उनकी गरिमा पर अंगुली उठाने की किसी में भी हिम्मत न हुई। विपत्तियों के तूफान उनसे टकराकर वापस लौट गए।
भौतिक संपदाओं को उन्नति का आधार तो माना जा सकता है, पर कोई दावे के साथ यह नहीं कह सकता कि किसी की आकांक्षाएं उनसे पूरा होकर ही रहेगी। उस निमित्त पोषण ही पर्याप्त नहीं, परिस्थितियों की अनुकूलता भी चाहिए। प्रतिकूलता अड़ जाने पर तो सारा गुड़ गोबर हो जाता है।
सुसंस्कारिता संपादनं के संबंध में ऐसी बात नहीं है। उसे स्वावलंबनपूर्वक कमाया और बढ़ाया जा सकता है। सद्गुणों का अभ्यास अपने बलबूते हो सकता है। दुर्बल मन वाले ही कुसंग से प्रभावित होते है। मनस्वी के लिए आत्मा का संकल्प और परमात्मा का विश्वास इन दिनों के सुदृढ़ बने रहने पर ही काम चल जाता है। बुरी आदतें डाली जा सकती है, पर यह नहीं समझना चाहिए कि अच्छी आदतें डालना उससे कठिन है। कुम्हार अपनी मर्जी के अनुरूप चाक पर चित्र विचित्र आकृतियों के बर्तन बनाता रहता है। मनुष्य की अंतरात्मा यदि समर्थ सतेज बनी रहे तो वह भी अपने आप को जैसा भी चाहे भला या बुरा गढ़ सकता है। यह कार्य कठिन नहीं, सरल है। समृद्धि अर्जित करने की तुलना में प्रतिभा का उपार्जन सरल है।
करोड़ करोड़पति मिलकर भी एक गाँधी की बराबरी नहीं कर सकते। एक महामानव लाख पहलवानों से बढ़कर है। इस तथ्य को समझा जा सके तो व्यक्ति समृद्ध बनने के लिए जितना प्रयत्न करता है, उससे हजार गुना अधिक प्रबुद्ध बनने के लिए करे।
मूर्द्धन्य लोगोँ को यह सूझ पड़े कि प्रजाजनों की शारीरिक आवश्यकताओं की तरह अंतरात्मा की भावनाओं को विकसित करना भी आवश्यक है तो वे दूसरी तरह से सोचे और अपनी प्रयास योजनाओं का कम से कम आधा भाग सद्भाव संवर्द्धन के लिए निश्चय ही सुरक्षित रखे। विचारशील व्यक्ति आलस्य प्रमाद से छूट सकता है, अवगति के गड्ढे से उछलकर प्रगति की मुंडेर पर आ सकता है और उस राजमार्ग को पकड़ सकता है, जिस पर चलते हुए अपनी ही नहीं, प्रभावक्षेत्र की भी दरिद्रता को मार भगा सकता है। संपत्ति पुरुषार्थ को उत्पन्न नहीं करती, पुरुषार्थ संपत्ति को उत्पन्न करता है। संपदा से मनुष्य पैदा नहीं होता। मनुष्य के पसीने से दौलत पैदा होती है। यह समझा जा सके तो मनुष्य को समृद्ध, शिक्षित, बलिष्ठ, चतुर बनाने की अपेक्षा ऐसा शिल्पी बनाया जाए जो अपने आप को भी ढाल सके और समीपवर्ती मिट्टी खोदकर उसे देवप्रतिमा के रूप में सुसज्जित कर दे। यदि ऐसा एक भी व्यक्ति ढल सके तो उस पर स्नातक प्रमाण पत्रों के गाड़ी भरे कागज तोरणों की तरह स्वागतपथ पर लटकाए जा सकते है।
परिश्रमी पसीने की बूंदों से खेती उगाते है। सज्जन अपने अनेक सहयोगी और प्रशंसक बुला लेते है। जिज्ञासा उभरे तो समाधान बताने वाले ब्रह्मांड के किसी भी कोने से निकल आते है। पढ़ने में रुचि हो तो जेल के कैदी फर्श की स्लेट पर अभ्यास कर विद्यावान् बनते देखे जाते है। इसी प्रगतिशीलता को बोते, उगाते, सींचते, बढ़ाते और रखवाली करते हुए वैभव भरी उपज के स्तर तक पहुंचाया जाना चाहिए। यदि यह लगन लग पड़े तो अकबर जैसे निरक्षर इतने प्रवीण हो सकते है कि बचपन से ही काम काज संभाल ले और सभा के नवरत्नों का मार्गदर्शन करे।
शिक्षा का अपना महत्व है। साक्षरता संवर्द्धन के प्रयत्न तो सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर चलते ही रहने चाहिए। यहां कहा यह जा रहा है कि उस प्रज्ञा उन्नयन की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए, जिसके आधार पर मनुष्य अपनी गरिमा को पहचानता है, जिम्मेदारी को समझता है और साहस भरे पराक्रम के आधार पर जो हस्तगत हो सकता है, उसकी अनुभूति कर सके।
संपदा के संपादन से बढ़कर सुसंस्कारिता का उत्पादन महत्वपूर्ण है। हम श्रेष्ठ बने तो सहयोग सहकार के रूप में वैभव के बादल आकर्षित होते चले जाते है, पर अकेला वैभव मानवी जीवन को गरिमामय बनाने में विफल होता है, अतएव हर एक को अपनी आँतरिक समृद्धि के लिए प्राणपण से प्रयत्न करना चाहिए।
अमीन पाशा अफ्रीका में औषधि शोध संस्थान की ओर से काम करने गए थे। जड़ी बूटियों की खोज में घूम रहे थे।
एक गाँव में पहुंचे तो देखा कि वहां शीतला का भयानक प्रकोप है। गुलामों की उस बस्ती में लोग मर रहे है।” यहां से जल्दी चलिए। वह छूत का रोग है।” सरकारी ने कहा।
“तुम जाओ। मुझे यहां खुदा की पुकार सुनाई पड़ रही है।” पाशा ने यात्रा रोक दी और उस गाँव में रोगियों की सेवा में जुट गए।
अनेक रोगियों को पाशा की सेवा ने जीवन दिया। अंतं में रोग उन्हें लगा। चेचक निकली। मरते मरते वे प्रसन्न थे। कह रहे थे,” खुदा की मेहरबानी है, जो उसने इस नाचीज को गरीब निराधार रोगियों की सेवा करने का अवसर दिया। मैं बड़े संतोष से मर रहा हूँ।
रामायण भगवान् राम के आदर्श चरित्र की पावन कथा है जो युगों से एक प्रचण्ड प्रेरक शक्ति के रूप में भारतीय संस्कृति को आदर्शोन्मुख दिशा की ओर प्रवृत्त किये हुए है। आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने जहाँ देवभाषा में इसका आदि संकलन किया, बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के रूप में इस कथा को जन-जन के बीच लोकप्रिय बनाया। कम्बन रामायण के रूप में इसने दक्षिण भारत में लोकप्रियता पायी। इस तरह नाना भाषाओं में इस पावन कथा के भाषान्तरण के साथ भारतवर्ष में इतनी लोकप्रिय हुई है कि यहाँ ‘घर-घर में बसे है राम’ की उक्ति चरितार्थ होती है।
रामायण कथा की अपार लोकप्रियता का कारण इसमें निहित जीवन की समग्रता का बोध है, जिसमें पाठक, श्रोता एवं दर्शक को आदर्श एवं व्यवहार का, लौकिकता एवं अलौकिकता का, काम-अर्थ एवं धर्म-मोक्ष का, ज्ञान एवं भक्ति का विरल संयोग मिलता है। जीवन के हर पक्ष को छूते इसके आदर्श पात्रों के प्रेरक प्रसंग में दिशा निर्धारक दृष्टि सहज ही प्राप्त हो जाती है। अतिपावन राम कथा वस्तुतः जीवन के समस्त पाप-ताप, दुःख-दारिद्रय एवं संकट-कष्टों को हरने वाली है। और दशहरे के पावन पर्व पर तो इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। दशहरा, असुरता के प्रतीक रावण के वध, संस्कृति प्रतीक माता सीमा की स्वतंत्रता के साथ अधर्म के नाश व धर्म की स्थापना का उद्घोषक पर्व है। नवरात्र की दुर्गापूजा के बाद इस पर्व की स्थिति इसे और भी विशिष्ट रूप प्रदान करती है। इसे दशविध पाप को हरण करने वाली तिथि, दशजन्मकृत पाप को हरण करने वाली तिथि माना गया है। ‘दशहरा’ नाम के अर्थ में यही मर्म निहित है।
महर्षि शुक्राचार्य कृत शुक्रनीति (3,7-8) के अनुसार दशविधपाप हैं-1. हिंसा-किसी की हत्या या किसी को कष्ट पहुँचाना, 2. स्तेय-चोरी करना, 3. अन्यथाकाम-अवैध मैथुन, 4. पैशुन्य-चुगलखोरी, 5. निष्ठुर भाषण-कटुवचन, 6. अनृत-मिथ्या कथन, 7. भेदवार्ताव्यापार-भेदवार्ता से हृदय विदारण, 8. अविनय-विनय हीनता दिखाना, 9. नास्तिकता-आस्थाहीनता, निरीश्वरता तथा 10. अवैध आचरण-शास्त्र विरुद्ध आचरण।
वास्तव में पाप ही जीवन को दुख-कष्टमय, रोग-शोकमय एवं दरिद्र-संतापमय बनाने वाला मूल कारण है। दशहरे में भक्ति भाव पूर्ण किया गया रामकथा का श्रवण, दर्शन एवं परायण मानव को इन दशविध पापों से मुक्त करने वाला है। इसके साथ ही मानव मात्र की लौकिक समृद्धि एवं आन्तरिक शान्ति-संतोष एवं समग्र विकास का मार्ग भी सहज ही प्रशस्त हो जाता है। रामकथा की इस अद्भुत विशेषता के कारण ही यह भारतवर्ष भर में ही नहीं, बल्कि विश्व के हर कोने में लोकप्रिय होती गई है और आज रामायण का स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय विस्तार लिये हुए है। दक्षिण एशिया में थाईलैण्ड, मलेशिया, इण्डोनेशिया आदि से लेकर मध्य एशिया चीन तक व यूरोप में रूस से लेकर फ्राँस, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका तक इसके विश्वव्यापी विस्तार के दिग्दर्शन किये जा सकते हैं।
दक्षिण पूर्व एशिया में रामकथा किस कदर जनजीवन में व्याप्त है व यहाँ के साँस्कृतिक जीवन को प्रभावित कर रही है यह अद्भुत एवं आश्चर्य जनक है। हालाँकि इसमें भारत के अतीतकालीन उन गौरवशाली क्षणों की भी याद आती है जब यह समूचा क्षेत्र भारत का साँस्कृतिक उपनिवेश था। विश्व के इस भू-खण्ड ने राम और उसके देश की संस्कृति को भली-भाँति समझा और उसकी महत्ता स्वीकार किया है। थाईलैण्ड इसका जीवन्त उदाहरण है। इसके साँस्कृतिक और धार्मिक जीवन में राम पूर्णतः समरस हैं। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि इस देश में कहीं-कहीं राम और बुद्ध के बीच कोई पृथकता की रेखा नहीं है। यहाँ के जीवन में दोनों का सहअस्तित्व है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बैंकाक स्थित शाही बुद्ध मंदिर हैं, जिसमें नीलम की मूर्ति है। यह मंदिर पूरे देश में बहुत प्रसिद्ध है तथा दूर-दूर से लोग इसके दर्शनार्थ आते हैं। मंदिर की दीवारों पर सम्पूर्ण रामकथा चित्रित है। इस देश की अपनी रामायण है-रामकियेन, जिसके रचयिता थे- नरेश राम प्रथम। उन्हीं के वंश के नरेश रामनवम्, वर्तमान में देश के शासक हैं।
थाईलैण्ड में यदि किसी एक स्थल पर राम के भव्य दर्शन करने हो तो इसके बैंकाक स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में किये जा सकते हैं। यहाँ के संग्रहालय में प्रवेश करते ही धनुर्धारी श्रीराम के दर्शन होते हैं। रामकथा यहाँ के लोकजीवन में इतनी रची-बसी है कि थाईवासियों का यहाँ तक विश्वास है कि रामायण की घटनाएँ उनके देश में ही घटी। आश्चर्य की बात नहीं कि थाईलैण्ड में एक अयोध्या और लवपुरी (लोयबुरी) भी है। थाई जीवन में राम की लोकप्रियता की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसके प्रमाण यहाँ के शास्त्रीय नृत्य हैं, जिनमें रामकथा के दर्जनों प्रसंग प्रदर्शित किये जाते हैं और ये नृत्य आज भी थाईलैण्ड में लोकप्रिय हैं।
थाईलैंड की तरह कम्बोडिया में राम के महत्त्व का जीता-जागता प्रमाण है- अंगकोरवाट जो दक्षिण पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतीक है। यहाँ बुद्ध, शिव, विष्णु, राम आदि सभी भारतीय देवों की मूर्तियाँ पायी जाती हैं। इसका निर्माण ग्यारहवीं सदी में सूर्य वर्मन द्वितीय ने कराया था। इस मन्दिर के कई भाग हैं-अंगकोरवाट, अंगकोरथाम, बेयोन आदि। अंगकोरवाट में रामकथा के अनेक प्रसंग दीवारों पर उत्कीर्ण हैं। जैसे सीता की अग्नि परीक्षा, अशोक वाटिका में रामदूत हनुमान आगमन, लंका में राम-रावण युद्ध, बालि-सुग्रीव युद्ध आदि। यहाँ की रामायण का नाम है- रामकेर, जो थाई रामायण से बहुत मिलती-जुलती है। इसी तरह लाओस और वर्मा जैसे बौद्ध देशों के जीवन में भी रामकथा महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है, इसे नृत्य नाटकों और छायाचित्रों के माध्यम से देखा जा सकता है। यहाँ के बौद्ध मंदिरों में इनके प्रदर्शन होते हैं।
इण्डोनेशिया में रामायण की लोकप्रियता उल्लेखनीय है। यहाँ चाहे बाली का हिन्दु हो या जावा-सुमात्रा का मुसलमान, दोनों ही राम को अपना राष्ट्रीय महापुरुष और राम साहित्य तथा राम सम्बन्धी ऐतिहासिक अवशेषों को अपनी साँस्कृतिक धरोहर समझता है। जोगजाकर्ता से लगभग 15 मील की दूरी पर स्थित प्राम्बनन का मंदिर इस बात का साक्षी है, जिसकी प्रस्तर भीतियों पर सम्पूर्ण रामकथा उत्कीर्ण है। बाली में रामलीला या रामकथा से सम्बन्धित नृत्य-नाटिकाओं की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इस द्वीप का वातावरण पूर्णतः राममय है। इण्डोनेशिया की प्रसिद्ध रामायण का नाम रामायण काकविन है।
मलेशिया में रामायण मनोरंजन का अच्छा माध्यम है। यहाँ चमड़े की पुतलियों द्वारा रात्रि में रामायण प्रसंग दिखाये जाते हैं। यहाँ की रामायण का नाम है- हेकायत सेरीरामा, जिसमें राम को विष्णु का अवतार माना गया है। हालाँकि इस पर इस्लाम का प्रभाव भी स्पष्ट है। सिंहल द्वीप में कवि नरेश कुमार दास ने छठी शताब्दी में जानकी हरण काव्य की रचना की थी। यह संस्कृत ग्रन्थ है। बाद में इसका सिंहली भाषा में अनुवाद हुआ। आधुनिक काल में जान डी सल्वा ने रामायण का रूपांतरण किया।
रामायण का विस्तार जहाँ दक्षिण पूर्व एशिया में साँस्कृतिक पृष्ठभूमि में हुआ है, वही यूरोप एवं अमेरिका में इसकी पृष्ठभूमि प्रमुखतः साहित्यिक रही है। यूरोपीय देशों व अमेरिका के विश्व विद्यालयों में इसकी पहुँच का माध्यम भारतवंशी नहीं बल्कि स्थानीय विद्वान रहे, जिन्होंने प्राच्य विद्या या भारतीय विद्या के रूप में संस्कृत का पठन-पाठन किया। इन्होंने रामायण को आध्यात्मिक ग्रन्थ की बजाये, एक साहित्यिक ग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया, हालाँकि इसके आध्यात्मिक एवं साँस्कृतिक प्रभावों से वे अछूते न रह सके। देवभाषा संस्कृत को पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों में स्थान मिलने के कारण वाल्मीकि रामायण से इनका परिचय शताब्दियों पूर्व हो गया था, किन्तु रामचरितमानस के प्रति पश्चिमी देशों का आश्चर्यजनक रुझान मुख्यतः पिछली शताब्दी से ही शुरू होता है, जिसका अनुवाद अभी तक लगभग सभी महत्त्वपूर्ण विश्व भाषाओं में हो गया है और अभी हो रहा है।
फ्रांसीसी विद्वान गार्सादतासी ने 1839 में रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड का अनुवाद किया था। फ्राँसिसी भाषा में मानस के अनुवाद की इस धारा को पेरिस विश्वविद्यालय के श्री वादिविल ने आगे बढ़ाया। अंग्रेजी में मानस का पद्यानुवाद पादरी एटकिंस ने किया, जो बहुत लोकप्रिय है। इसका प्रकाशन हिन्दुस्तान टाइम्स में देवदास गाँधी ने कराया था। इसी प्रकार के अनुवाद जर्मनी, सोवियत संघ आदि में हुए। रूसी भाषा में मानस का अनुवाद करके अलेक्साई वारान्निकोव ने भारत-रूस की साँस्कृतिक मैत्री की सबसे सशक्त आधारशिला रखी। उनकी समाधि पर मानस की अर्द्धाली ‘भलो भलाहिह पै लहै’ लिखी है, जो सेट पीटर्सबर्ग के उत्तर में उनके गाँव कापोरोव में स्थित है। चीन में वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों का पद्यानुवाद हो चुका है। डच, जर्मन, स्पेनिश, जापानी आदि भाषाओं में भी रामायण के अनुवाद हो चुके हैं।
शोध ग्रन्थों के माध्यम से भी यह धारा पश्चिम में आगे बढ़ी है। हिन्दी साहित्य में सर्वप्रथम शोधग्रन्थ इटली निवासी डॉ. टेसीटोरी का माना जाता है, जिस पर फ्लोरेंस विश्वविद्यालय ने उन्हें 1910 में डॉक्ट्रेट की उपाधि दी थी। विषय था- ‘मानस और वाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन।’ दूसरा शोध ग्रन्थ जे. एन. कार्पेण्टर ने ‘थियोलॉजी ऑफ तुलसीदास’ शीर्षक के तहत लंदन विश्वविद्यालय में 1918 में प्रस्तुत किया था।
इस तरह रामायण की विश्वव्यापी भूमिका प्रकाश में आ रही है और इसमें अनेक साँस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं साहित्यिक धाराओं के साथ अन्तर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलनों की एक धारा की भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसके अंतर्गत अब तक 12 देशों में 16 रामायण सम्मेलन हो चुके हैं। भारत से शुरू होकर कई विश्व-परिक्रमाएँ कर चुकी यह सम्मेलन शृंखला एक विश्व साँस्कृतिक मंच के रूप में उभर कर आयी है।
रामायण की साहित्यिक, साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विशेषताएँ रामकथा को अपने-अपने ढंग से विश्वव्यापी लोकप्रियता दिलाने में सहायक सिद्ध हो रही हैं। हर धारा का व्यक्ति, परिवार से लेकर समाज, राष्ट्र एवं विश्व के आध्यात्मिक उत्थान, संस्कार एवं साँस्कृतिक निर्माण के संदर्भ में अपनी भूमिका है। दशहरे के पावन पर्व के संदर्भ में हर स्तर पर इसके परायण की महत्ता कुछ विशेष ही हो जाती है। नवरात्रियों में इसका किया गया श्रद्धापूर्वक विधिवत् परायण या कथा श्रवण दस पाप-तापों के हरण के साथ दशहरे के नाम की सार्थकता सिद्ध करने वाला है। दशहरे के पुण्य पर्व पर रामकथा की इस विशेषता से किसी को भी वंचित नहीं रहना चाहिए।
पाँच तत्वों की मंडली एक सुरम्य पर्वत पर पहुँची। चर्चा छिड़ी तो अपने अपने बड़प्पन का प्रसंग उभर आया।
पृथ्वी बोली-”सारी दुनिया का बोझ मैं उठाती हूँ।”
जल ने कहा-”मेरे बिना जीवन ही नहीं।”
पवन बोला-”दीखता नहीं हूँ, तो क्या। मेरे बिना घुटन ही सबका गला न घोंट देगी?”
अग्नि ने कहा-”गरमी रोशनी के बिना इस लोक में शीत निस्तब्धता के अतिरिक्त और क्या बचेगा?”
चारों का कथन पूरा हो गया, फिर भी आकाश बोला नहीं। बार बार पूछने पर उसने एक शब्द ही कहा, “आप सबके मिलने से ही यह संसार गतिशील है। न तो किसी के अकेले चलाने से यह चलेगा और न किसी अकेले के रूठ जाने से, सब लोग मिलकर रहेंगे तो ही खुशहाली रहेगी।”
युधिष्ठिर का अंतकाल आया। पुण्य पाप का लेखा जोखा लिया गया। एक बार उनने अश्वत्थामा के प्रसंग में अर्द्ध झूठ बोला था, इसके लिए उन्हें एक दिन नरक में रहना था और सौ वर्ष स्वर्ग में।
पूछा गया, आप पहले स्वर्ग भुगतेंगे या नरक! युधिष्ठिर ने पहले एक दिन नरक में रहना उचित समझा, सो वे वहीं चल दिए।
नरक में सभी दुःखी थे। युधिष्ठिर के आगमन से उस जलते क्षेत्र में शीतलता की लहर आई। यमदूतों के व्यवहार बदल गए। वहाँ के निवासियों ने संतोष की साँस ली। पुण्यात्मा के आगमन की सभी ने खुशी मनाई।
दूसरे दिन युधिष्ठिर जब विदा होने लगे तो नरक निवासी रोने लगे। कहने लगे-आप यहीं ठहरे रहते तो हम लोगों का कितना उपकार होता।
युधिष्ठिर गंभीर हो गए। सोचने लगे, कोई ऐसा उपाय होता, जिससे मुझे स्वर्ग न जाना पड़ता, इन दुखियारों के बीच ही सदा सर्वदा यहीं बना रहता। उपाय चित्रगुप्त से पूछा। उन्होंने कहा-”यदि युधिष्ठिर अपना समस्त पुण्य नरक निवासियों को दान दे दें और वहाँ के निवासियों का पाप अपने ऊपर ओढ़ लें तो ऐसा हो सकता है।”
युधिष्ठिर तैयार हो गए। उनने अपना सारा पुण्य नरक वासियों को दे दिया। वे सभी स्वर्ग चले गए। नरक वालों के पाप अपने ऊपर लेकर वे अकेले ही नरक में रहने लगे। अपने सद्व्यवहार से उन्होंने यमदूतों को अपना परम मित्र बना लिया। सभी लोग हिल−मिलकर रहने लगे। कुछ दिनों में नरक लोक ही सद्भावना, सहकारिता और स्नेह सौजन्य का घर बन गया तथा वहाँ स्वर्ग जैसी परिस्थितियाँ दृष्टिगोचर होने लगीं।
समग्र जीवन की प्रतिपादक भारतीय संस्कृति की एक मौलिक विशेषता है-इसके पर्व त्यौहारों की अविरल शृंखला। ये पर्व-त्यौहार जहाँ सामूहिक उल्लास एवं जीवन्तता के द्योतक हैं वहीं सामाजिक चेतना के परिष्कार के सशक्त माध्यम भी हैं। वर्ष के 365 दिनों में वह कौन सा दिन है जिस दिन कोई पर्व न हो। पर्वों की इस अटूट शृंखला में मुकुटमणि का स्थान यदि किसी को प्राप्त है तो वह है- प्रकाश पर्व दीपावली को। दीपावली मात्र एक पर्व अथवा त्यौहार नहीं अपितु पर्व पुञ्ज है। कार्तिक कृष्णा एकादशी अर्थात् रमा एकादशी से प्रारम्भ कर गोवत्स द्वादशी, धन्वन्तरी त्रयोदशी, नरकचतुर्दशी एवं हनुमान जयन्ती, कमला जयन्ती एवं दीपावली, अन्नकूट-गोवर्धन-विश्वकर्मा प्रतिपदा और भ्रातृ अथवा यम द्वितीया तक पूरे सात दिन तक, यत्र-तत्र-सर्वत्र दीपमालिका का प्रकाश दृष्टिगोचर होता है। यह श्रेष्ठ पर्व पुञ्ज भारतीय संस्कृति का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रसंग है। जिसमें आनन्द और प्रकाश की शाश्वत विजय का बड़ा मार्मिक इतिहास जगमगा रहा है।
प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इस दिन रघुवंशी भगवान् श्रीराम ने वनवास की चौदह वर्षीय अवधि को पूरा कर अयोध्या में पदार्पण किया था। इस आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने घी के दीये जलाये थे। तब से दीपावली प्रतिवर्ष मनायी जाने लगी। इसी दिन धर्मराज यम ने जिज्ञासु नचिकेता को ज्ञान की अंतिम वल्लि का उपदेश दिया था। पतिव्रता सावित्री ने भी इसी दिन अपने अपराजेय संकल्प द्वारा यमराज के मृत्युपाश को तार-तार कर मनवाँछित वरदान पाया था। एक अन्य कथा के अनुसार जैनतीर्थंकर भगवान् महावीर ने इसी दिन निर्वाण प्राप्त किया था और देवलोक से समस्त देवताओं ने दीप जलाकर उनकी स्तुति की थी।
ज्योतिपर्व के साथ जुड़े पावन प्रसंगों की यह शृंखला अनन्त है। जो भी हो भारतभूमि का सबसे विशाल पर्व दीपावली सदैव अंधकार से लड़ने की हमारी उत्कट अभिलाषा और प्रबल जिजीविषा का प्रतीक रहा है। परन्तु न जाने क्यों दीपावली का पर्व शताब्दियों से पसरे उस अंधकार को दूर नहीं कर पा रहा है जो भारतीय जनजीवन को निराशा और संत्रास की अतल गहराइयों में धकेल रहा है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के छप्पन वर्षों बाद भी भारतीय जनमानस की जो स्थिति है, वह एक व्यापक मोह भंग एवं एक भयंकर मनोवैज्ञानिक संघात की है। सामाजिक, साँस्कृतिक एवं नैतिक धरातल पर एक विचित्र सी सड़न व्याप्त है। जातिवाद, क्षेत्रवाद, और सांप्रदायिकता की बेड़ियों में जकड़ी राजनीति अपने ही संकीर्ण स्वार्थों की कारा में बंदिनी है। देशकाल पर छाया महाशून्य सुरसा की तरह अपना आकार बढ़ाता जा रहा है। चहुँओर हिंसा, आतंक, भय, घृणा व संशय का वातावरण जनजीवन को आक्राँत कर रहा है।
आज रक्तरंजित कश्मीर, मर्मांतक संघात सहती गुर्जर भूमि, सुलगता तेलंगाना, झारखण्ड, बिहार और उत्तरपूर्व हमें सौगात में मिले हैं। बाहरी आक्रमणों का भय पूर्व की अपेक्षा बढ़ा है। पाकिस्तान और चीन के कुत्सित इरादे छद्मयुद्ध एवं आतंकी घुसपैठ आये दिन देश की नींद हराम किये हुए हैं। इनकी आतंकी गतिविधियाँ, अबाध घुसपैठ एवं आत्मघाती बम-विस्फोटों की रक्तरंजित शृंखलाएं जहाँ राष्ट्र को बाह्य चुनौतियों के रूप में सतत् आक्राँत किये हुए हैं। उस पर करेला-नीम चढ़ा की भाँति देश की भीतरी दुर्दशा से स्थिति और बदतर हो रही है। बेरोजगारी, युवा असंतोष, जातीय हिंसा, साम्प्रदायिक तनाव, माफिया गिरोहों का अंतरजाल, आये दिन रक्तपात आदि समस्याओं ने स्थिति भयावह होती जा रही है। इन भयावह आन्तरिक एवं बाह्य समस्याओं तथा चुनौतियों के मकड़जाल में उलझा राष्ट्र इनसे मुक्त होने के लिए तड़प रहा है, छटपटा रहा है। कब, कैसे व किस तरह वह इस भयावह एवं दुसह्य प्रारब्ध से मुक्त होगा? कौन इस दुर्दशा से उसका उद्धार करेगा? ये महाप्रश्न सौ करोड़ अभिशप्त लोगों के समक्ष खड़े हैं, जिनका वे यथोचित उत्तर चाहते हैं।
स्वतंत्रता के पश्चात् जिस लोकसम्पदा एवं शक्ति का नियोजन लोकहित में गरीब, असहाय-अशिक्षित, पिछड़े एवं दलित वर्ग के उत्थान में होना था, उसकी बँदर बांट स्वार्थी एवं भ्रष्ट राजनेताओं और कालाबाज़ारी करने वाले व्यापारियों के बीच हुई। इनमें एक ओर वर्ग जुड़ा शहर-कस्बे स्तर पर उग आये छुटभैया नेताओं का, धूर्त और ढपोरशंख लोगों का। ओछी हरकतों, खोखले भावुक नारों, बाहुबल और काले धन से जीती हुई राजनीतिक शक्ति के मद में चूर राजनेताओं ने उत्पादन के समस्त स्रोतों को जोंक की तरह चूसना प्रारम्भ किया। बौद्धिक और नैतिक दृष्टि से खोखले ये नेता सर्वशक्तिमान बन बैठे। सारी प्रशासनिक व्यवस्था इनकी चैरी बन गयी। इनकी बदौलत आज भ्रष्टाचार का धंधा फल-फूल रहा है और भारत विश्व के भ्रष्टतम देशों की शृंखला में शीर्षतम देशों में से एक हैं।
जनता की सामूहिक रचनात्मक शक्ति के विकास के स्थान पर इस विगलित एवं महाभ्रष्ट राजनीति ने इसे अपने राजनैतिक व्यापार का अस्त्र बना लिया है। वस्तुतः आज की राजनीति सौ करोड़ जनता की पराजय का दस्तावेज है। सौ करोड़ भारतवासी अभिशप्त हैं और कुछ आदमी राजनीतिज्ञ मदमस्त। ये राजनीतिज्ञ एक आम आदमी की पीड़ा और निराशा को समझने के लिए अपनी-अपनी अट्टालिकाओं से नीचे उतरने को तैयार नहीं हैं। जो शोषण एवं पीड़ा के अभिशाप को झेलने को मजबूर हैं वे इस कदर पंगु, निकम्मे और असहाय बना दिये गये हैं कि इस झंझावात से उबरना उनके लिए दुष्कर है।
ऐसे में ज्योतिपर्व तो अब एक औपचारिकता बनकर रह गया है। अपनी परम्परागत प्रवाह की लीक में बहते असंख्य दीप अवश्य जलाते हैं, किन्तु इनकी ज्योति अंतर्मन को प्रकाशित नहीं कर पाती। परिणामस्वरूप आन्तरिक अंधकार गहराता ही जाता है और हमारी कुण्ठित आशाएँ मानसिक विकृति की दशा में बहाये जा रही हैं। संक्रान्ति के परिवर्तनशील दौर में नैतिकता, मर्यादा एवं मूल्यों का पथ धुँधलके में विलीन होता जा रहा है। इससे उपजी कुण्ठा व्यक्तिगत जीवन में अर्द्धविक्षिप्त मनोदशा, पारिवारिक जीवन में वैमनस्य एवं सामाजिक जीवन में विघटन एवं टूटन के साथ चतुर्दिक् अराजकता एवं आतंक एवं अशान्ति के रूप में परिलक्षित होती है।
पारिवारिक जीवन में घुलता विष, आने वाली पीढ़ी को कुसंस्कारित ही बना रहा है। इसका दुष्परिणाम पूरे समाज और देश को भुगतना पड़ रहा है। अभिभावक अपने नौनिहालों के प्रति महान् दायित्व से, समय की कमी का रोना-रोकर, पल्ला झाड़ ले रहे हैं। उनका समय कटता है तो चौराहों की गप्प-शप में, दुनिया भर के प्रपंच-जाल में और महफिल-पार्टियों की अय्याशी एवं विलासिता में। माताएँ बाल कटाकर ब्यूटी पार्लर में प्रत्येक सप्ताह जाकर सौंदर्य के टिप्स लेना जरूरी समझती हैं। बच्चों को आया या ट्यूटरों के हवाले करके अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री समझने वाली ये तथाकथित आधुनिकायें यदाकदा कथा प्रवचनों में भी पधारती हैं, बर्थडे पार्टियों को भी अपनी उपस्थिति से आकर्षक बनाने की जिम्मेदारी निबाहती हैं। जिस गोद में आर्यावर्त का भविष्य खेलता दिखाई देना चाहिए उस गोद में कुत्ता घूमता है। देश का भविष्य किन संस्कारों को लेकर बड़ा होगा? विचारणीय है।
विशाल वट वृक्ष सरीखी देश की विराट् साँस्कृतिक अवधारणा भी आज खतरे में है। इसकी जड़ों पर कुठाराघात हो रहा है। इसकी टहनियों को कुतरा जा रहा है। सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए जिस वर्ण-व्यवस्था की स्थापना ऋषियों ने की थी, उसकी दुर्दशा-दुर्गति हो रही है। गुण-कर्म-स्वभाव की अपेक्षा जन्म से जाति को जोड़कर जातीय दम्भ-दुराग्रह सक्रिय है; उस पर राजनीति का रंग जातीय हिंसा के रूप में समाज को लहूलुहान किये हुए हैं। विश्व को धार्मिक सहिष्णुता एवं उदारता का पाठ पढ़ाने वाला राष्ट्र आज धार्मिक संकीर्णता एवं साम्प्रदायिक हिंसा के दावानल में दग्ध हो रहा है। यहाँ भी संकीर्ण साम्प्रदायिक सोच एवं राजनैतिक स्वार्थ ने धर्म के मूल भाव को कलंकित ही किया है, जिसके खूनी खेल में निर्दोष, असहाय, गरीब एवं धर्मभीरु जनता ही मोहरे बनते हैं।
ऐसे में प्रख्यात् गाँधीवादी मनीषी प्रो. रामचंद्र सिंह के ये वचन यहाँ प्रासंगिक है कि- ’कितनी ही सदियाँ बीतीं, कितने ही हमने दीप जलाये पर ज्योति पर्व मानव जीवन का अँधियारा दूर न कर सका। देश के भाग्य में अमावस्या की यह रात्रि न जाने कब और कितनी दूर तक लिखी है, यह तो भगवान् राम ही जानें। जीवन तो वायु का एक झोंका है जो दो पल का मेहमान है। जीवन और मृत्यु के बीच जो थोड़े से पल हैं, उन्हें जितनी निष्ठा और प्रेम के साथ जिया जाय, वही मानव जीवन की उपलब्धियाँ हैं। किन्तु सहस्रों दीपावलियाँ बीत गई, आशाओं की लतायें सूखी ही रही। मन की अयोध्या कभी भी दीपान्वित न हो सकी। दर्द जब तक भीतर रहता है, तभी तक वश में रहता है, बाहर आने पर यह बेकाबू हो जाता है। जिस पुनीत भूमि के लिए कहा जाता था कि, ‘गायन्ति देवा किल गीतकानि, धन्यास्तु हे भारतभूमि भागे।’ आज वह भारत भूमि नरक से भी अधिक कष्टप्रद स्थिति में है। किन्तु सोये हुए घावों को न जगाना ही उचित है। अभी ज्यादा देर नहीं हुई है। वसन्त की बयारें हमसे पूरी तरह रूठी नहीं है। पहल कौन करें? निश्चय ही हम राजनेताओं से कोई आशा रखने की मूर्खता नहीं कर सकते। चातक भी बिना पानी वाले बादलों से पानी नहीं माँगता। ‘निर्गलिताम्बुगर्भः शरद्धन नार्दति चातकोऽपि-कालिदास।’ हमें वह करना होगा जो हमारे वश में है।
हमें धर्माचरण करना होगा। बाल्मीकि ने कहा है, ‘धर्मोहि परमो लोके धर्मे सत्यम् प्रतिष्ठितम्’ अर्थात् धर्म ही संसार में श्रेष्ठ है, धर्म से ही सत्य की प्रतिष्ठ है। और धर्म का व्यावहारिक मर्म क्या है, इसे वेदव्यास ने महाभारत में स्पष्ट किया है-
श्रुयताम् धर्मसर्वस्व श्रुत्वा चैवावधार्यताम् आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्॥
सावधान होकर धर्म का वास्तविक रहस्य सुनो और उसे सुनकर उसी के अनुसार आचरण करो। जो कुछ तुम अपने लिए हानिप्रद समझते हो, वह आचरण दूसरों के साथ मत करो।
वर्तमान राष्ट्रीय संदर्भ में राजनीतिक मर्यादा हीनता ही सारे फसाद की जड़ है, उससे किसी समाधान की आशा व्यर्थ है। भर्तृहरि ने भी राजनीति को वैश्या समान कहा है। इससे सच्चाई, निष्कपटता और स्वार्थहीनता की अपेक्षा नहीं रखी जा सकती है।’
वर्तमान परिस्थिति सचमुच जटिल है किन्तु युग मनीषा के अनुसार हमें जरूरत है बस थोड़ी सी समझदारी की और ढेर सारे विश्वास की। मनोवैज्ञानिक अनास्था के घोर संक्रमण काल में सौ करोड़ लोगों का देश सिर्फ मर-मरकर जीने के लिए नहीं है। घोड़ा हल में नहीं जुटता, उसकी नियति तो रणक्षेत्र में ही उतरने की होती है। हमें संघर्ष जीतना ही होगा। खोने के लिए अब हमारे पास कुछ नहीं बचा है। हमें जो कार्य मिला है, जितना हम कर सकते हैं, उसे निष्ठ पूरी लगन के साथ हम करें, यही वास्तविक पूजा, यही वास्तविक धर्माचरण है। ज्योतिपर्व तभी हमारे मन में और जीवन में कोटि-कोटि दीपों का प्रकाश स्थापित करने में समर्थ होगा, तभी जीवन कमल की पंखुड़ियाँ खिलेंगी और तभी चेतना के अंधतमस में उजाला छायेगा। भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता के सर कट सकते हैं, प्यार में अगर थोड़ी सी धार हो। हमारे युगों से संजोये स्वप्न साकार हो सकते हैं यदि हमारी श्रद्धा के साथ थोड़ी सी निष्ठ का सबल आधार हो। आइये, इसी संकल्प के साथ अंतर्मन के दीप को प्रज्ज्वलित करने वाले ज्योतिपर्व के उल्लास को हृदयंगम करें।
दैत्यराज बलि के सेनापतियों ने स्वर्ग पर आक्रमण करके विश्वकर्मा को पकड़ बुलाया और इंद्रपुरी के स्तर का राज्य भवन बनाकर खड़ा करने का आदेश दिया।
सामान जुटता गया और विश्वकर्मा का प्रयास चलता रहा। कुछ समय में ही दैत्यपुरी तैयार हो गई। अब बलि ने विश्व-विजय की तैयारी की और सेनापतियों को विश्व-विजय के लिए साज-सामान समेत भेजा।
सफलता कुछ ही दिन मिली। फिर आगे बढ़ सकना दैत्य सेना के लिए कठिन हो गया। कारण यह था कि अब सीमित सैनिकों से लड़ना नहीं हो पा रहा था। असीम जनता आक्रमणकारियों से जूझने के लिए कटिबद्ध हो गई थी।
बलि ने इरादा छोड़ दिया और सेनाएं यह कहकर वापस बुला लीं कि सैनिकों को जीता जा सकता है, किंतु जनचेतना को, संगठित जनमानस को परास्त कर सकना संभव नहीं।
अहमदशाह अब्दाली भारत पर अपने छोटे से सैन्य दल के साथ आक्रमण करता हुआ आगे बढ़ रहा था। मराठे वीरतापूर्वक उससे लोहा ले रहे थे।
रात हुई। दोनों ओर से लड़ाई बंद हुई, रात में उन दिनों लड़ाइयाँ नहीं हुआ करती थी। अहमदशाह ने मराठों की सेना में जगह-जगह धुआँ उठते हुए देखा तो उसे आश्चर्य हुआ कि इसका क्या कारण हो सकता है?
गुप्तचर भेजे गए। वे पता लगाकर आए। हिंदू एक दूसरे का छुआ नहीं खाते। सिपाही लोग अपनी अलग-अलग रसोई बना रहे हैं।
अहमदशाह की प्रसन्नता का पारावार न रहा। उसने सेनापति को बुलाकर कहा, “जिनमें एक−दूसरे का छुआ खाने जितनी भी एकता नहीं, वे बाहर से बलवान भले ही दीखें, भीतर से पूरी तरह खोखले होंगे। इन पर अभी ही हमला कर दो।”
पूरी शक्ति के साथ आक्रमण हुआ। रसोई बनाते सैनिक भारी संख्या में मार डाले गए और अब्दाली जीत का डंका बजाता हुआ आगे बढ़ता चला गया।
क्रोध सामान्य मानव की जीवनचर्या का अभिन्न अंग है। आज लोग बात-बात पर गुस्सा करते देखे जाते हैं परन्तु क्रोध मनुष्य का स्वभाव नहीं है। मनोविज्ञान और शरीर विज्ञान के विभिन्न शोध परिणामों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य स्वभावतः क्रोधी नहीं होता अपितु सभ्यता के विकासक्रम में किन्हीं कारणों से वह मानव जीवन में सम्मिलित हो गया है।
मनुष्य स्वभावतः शान्त प्राणी है। फिर वे कौन से कारण हैं जो मनुष्य की शान्ति भंग कर उसे क्रोधी व अशान्त बना देते हैं? मनोविज्ञान के अनुसार यह उसके सीखने-सिखाने की अद्भुत विशेषता के कारण होता है। मनुष्य जब अपनी क्षमताओं का सही सदुपयोग नहीं करता तो वे गलत दिशा में नियोजित हो जाती हैं। पिछली कुछ पीढ़ियों से उसे यह दुर्गुण विरासत के रूप में मिलता चला आ रहा है जो आज उसमें आदत के रूप में रच-बस गया है। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया द्वारा प्राणी की किसी भी प्रवृत्ति को नियंत्रित, परिवर्तित अथवा आदत में सम्मिलित किया जा सकता है। इसे सोवियत वैज्ञानिक इवान पावलोव ने एक कुत्ते पर प्रयोग कर सिद्ध कर दिखाया। जब भी कुत्ते को खाना देना होता, वे पहले घण्टी बजाते फिर भोजन देते। यह प्रक्रिया अनेक दिनों तक चलती रही। घण्टी बजती, कुत्ता उपस्थित होता व भोजन कर चला जाता। कुछ दिनों में ही उसके मस्तिष्क में यह बात बैठ चुकी थी। घण्टी बजने का अर्थ भोजन दिया जाना है। अतएव दूसरे अवसरों पर भोजन देखने के बाद भी वह उस ओर से निरपेक्ष ही बना रहता, क्योंकि वह अच्छी तरह समझ चुका था कि यह उसके लिए नहीं है।
इस प्रयोग के द्वारा यह सिद्ध हो गया कि कोई भी आदत प्राणी तब तक आत्मसात् नहीं कर सकता, जब तक वह इस प्रकार की किसी प्रक्रिया से होकर न गुजरा हो। सामान्य जीव-जन्तु से लेकर अविकसित मनुष्य सभी में यह सिद्धान्त समान रूप से लागू होता है। कुछ अपवादों को छोड़कर जो कि अपनी अंतःप्रेरणा से स्वतः ही सीख लेते हैं, शेष सभी को प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। सिंह-शावकों की स्थिति बकरी के बच्चों जैसी ही होती है। कलेवर भले ही उन्हें सिंह का मिला होता है पर व्यवहार में वे भी अनाक्रामक, अहिंस्र जंतुओं जैसे ही होते हैं। यह तो उनके माता-पिता ही होते हैं जो उन्हें नियमित प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने मूल स्वरूप में आक्रामक पशु के रूप में गढ़ देते हैं। यदि आरम्भ से ही इन सिंह-शावकों को अहिंस्र पशुओं के साथ रख दिया जाये तो वे भी उनके जैसे ही अहिंसक बनते देखे जाते हैं। शावक अपने वरिष्ठों के शिक्षण प्रक्रिया द्वारा ही आक्रमण प्रत्याक्रमण के घात-प्रतिघात सीखते और तदनुरूप आदत की वंश-परम्परा बनाये रखते हैं।
मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं है। जन्म के बाद उसके चलने, बोलने, पढ़ने, सीखने और सुसभ्य बनने तक में यही विद्या काम आती है। सामान्यतः यदि किसी अबोध बच्चे को मानवी समुदाय से पृथक् कर पशुओं के समुदाय में रख दिया जाये तो वह अपने सुविकसित व सुसंस्कृत प्राणी के समस्त लक्षणों को भुला बैठता है। रामू भेड़िये कि वास्तविकता सर्वविदित है।
उपरोक्त तथ्यों से यह पता चलता है कि मनुष्य स्वभाव से ही क्रोधी नहीं है, न ही क्रोध उसकी मूल प्रवृत्ति है। जो ऐसा मानते हैं, वे निश्चित रूप से मानवी मस्तिष्क को ठीक से समझ नहीं पाते। ऐसे लोग शायद क्रोध को मनुष्य की चारित्रिक विशिष्टता समझ लेते हैं। यदि क्रोध मनुष्य की मूल प्रवृत्ति ही होती तो सन्त व सज्जनों में, ऋषियों-महर्षियों में इसकी अनुपस्थिति की व्याख्या करना किस प्रकार संभव होता। जबकि अनाचारी, अत्याचारियों में क्रोध उनका नैसर्गिक गुण प्रतीत होता है। इस अन्तर्विरोध की स्थिति में मनोवैज्ञानिकों के लिए यह उत्तर दे पाना कठिन हो जाता कि जो मूल प्रवृत्ति है उसका समाज के सज्जन पुरुषों में अचानक अभाव कैसे हो गया? क्योंकि मूल प्रवृत्ति तो प्राणी की प्रकृति का अविच्छिन्न अंग होती है। फिर कहीं अभाव, कहीं स्वभाव यह कैसे सम्भव हो पाता?
वास्तव में मनुष्य एक कोरे कागज की तरह है। उसका मन सर्वथा निर्विकार है। उसमें सही-गलत, अच्छा-बुरा जो भी अंकित कर दिया जाता है, वही उसकी आदत बन जाती है। मनुष्य की वर्तमान बुराइयाँ उसके बीते कल की कठिनाइयों की परिणति है। विकास-यात्रा के दौरान उसे जिन प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ा उसके कारण उसके मन में रोष पैदा हुआ, जो बाद में उसकी प्रकृति का अंग बन गया। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही स्वभाव चलते हुए मनुष्य के विकास के वर्तमान पड़ाव तक आ पहुँचा।
शरीर विज्ञान भी मनुष्य को शान्त प्राणी सिद्ध करता है। आस्ट्रेलियाई जीव विज्ञानी डॉ. ज्विंग ने इसके लिए एक प्रयोग किया। उन्होंने बिल्ली के मस्तिष्क में हाइपोथैलेमस वाले हिस्से को बिजली का झटका दिया। प्रतिक्रिया तुरंत सामने आई। बिल्ली क्रोध में आकर गुर्राने और आक्रामक भाव-भंगिमा बनाने लगी। झटका समाप्त होते ही वह पुनः सामान्य हो गई। ठीक ऐसा ही प्रयोग गुरिल्लाओं पर किया गया, किन्तु परिणाम वैसा नहीं पाया गया। उनके दिमाग के उक्त भाग को उत्तेजित करने पर भी वे अनुत्तेजित बने रहे। इसका कारण बताते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि प्राइमेट (स्तनपायी जन्तु का वर्ग विशेष) में जन्तुओं का व्यवहार हाइपोथैलेमस के स्थान पर सेरेबल कोर्टेक्स द्वारा नियंत्रित होता है। इनमें कोई भी निर्णय मस्तिष्क के इसी हिस्से द्वारा लिया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इतना होने के बाद भी सेरेबल कोर्टेक्स किसी बाह्य कारण की उपस्थिति मात्र से ही कोई निर्णय नहीं लेता, वरन् वह उस समय की परिस्थिति एवं मस्तिष्क में अंकित विगत अनुभवों का पूरा-पूरा अध्ययन-विश्लेषण करने के उपरान्त ही कोई प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्राइमेटों की विशिष्ट मस्तिष्कीय संरचना ही है, जो उन्हें काफी सावधानी से कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की छूट देती है।
मनुष्य नैसर्गिक रूप से क्रोधी नहीं है यह मनोविज्ञान एवं शरीर विज्ञान के तर्कों एवं तथ्यों से प्रमाणित हो चुका है, परन्तु क्रोध की अग्नि में आज जिस प्रकार सम्पूर्ण मानव समाज जल रहा है उसमें क्रोध के विश्लेषण का समय निकल चुका है। मनुष्य क्रोधी है या शान्त, स्वभावतः आक्रामक है या अनाक्रामक यह निर्णय करने के बजाय यह ज्यादा आवश्यक हो गया है कि इन दिनों की इस विनाशक प्रवृत्ति पर काबू किस प्रकार पाया जाये? उसे एक विकसित, बुद्धिमान, विवेकशील प्राणी के अनुरूप विनिर्मित कैसे किया जाये?
समाधान के लिए हमें अध्यात्म-विज्ञान की ओर उन्मुख होना पड़ेगा। अध्यात्म उपचारों द्वारा ही आज के तनावग्रस्त, तुनकमिज़ाज व्यक्ति के मानस को बदला जा सकता है। मनुष्य की बहुत सारी समस्याएँ सुविचारों की कमी के कारण पैदा होती हैं। गलतियाँ होने पर क्रोध कर और एक गलती करने की बजाय उससे सीख लेना चाहिए। जिसे बदला नहीं जा सकता, उसे स्वीकार कर लेना चाहिए और जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता, उसे हर हाल में बदल देना चाहिए। अपने लिए औरों को बदलना उतना आसान नहीं है, जितना कि उनके लिए खुद को बदलना आसान है।
क्रोध का बाह्य परिणाम आस-पास के वातावरण को विषाक्त बना देता है, वहीं आँतरिक परिणाम मनुष्य के भीतर की कोमल भावनाओं को अवरुद्ध कर देता है। आध्यात्मिक उपचार के रूप में ‘ध्यान’ क्रोध घटाने का सशक्त माध्यम है। यदि व्यक्ति की चेतना को अन्तर्मुखी बना कर उसे प्रशिक्षित कर लिया जाये तो क्रोध की महामारी से मुक्त हुआ जा सकता है।
उच्च श्रेणी में ग्रेजुएट होने पर युवक हंसराज को अच्छी सरकारी नौकरी मिल रही थी, पर उनने सरकारी शिक्षा से भिन्न उद्देश्यों के लिए चलने वाले विद्यालयों की स्थापना को अपना लक्ष्य बनाया और आदर्शवादी पीढ़ी के उत्पादन में सर्वतोभावेन जुट गए। एक छोटा विद्यालय उन्होंने स्वयं ही स्थापित किया। उसके सत्परिणाम देखते हुए उन्होंने उस कार्य को बड़े रूप में करने का निश्चय किया। डी.ए.वी. स्कूल-कॉलेजों की स्थापना में वे पूरे उत्साह के साथ जुट गए। जनता का अच्छा सहयोग मिला, फलतः पंजाब क्षेत्र में इस स्तर के छोटे-बड़े अनेकों विद्यालय स्थापित हो गए। उनकी नम्रता और सेवा-भावना के कारण उन्हें महात्मा कहा जाता था।
डी.ए.वी. विद्यालयों में ऐसे लगनशील अध्यापक नियुक्त किए गए, जो छात्रों के साथ पूरी तरह घुल जाते थे। फलतः वे न केवल चरित्रवान-देशभक्त बनते थे, वरन् अच्छे डिविजनों से पास भी होते थे। एक डी.ए.वी. हाईस्कूल ने तो उस क्षेत्र के लिए आबंटित सारी छात्रवृत्तियाँ जीत ली।
महात्मा हंसराज जी द्वारा चलाया गया डी.ए.वी. स्कूल स्थापना आँदोलन हर दृष्टि से बहुत सफल रहा। उनके जीवन काल में अनेकों टेक्निकल स्कूल, आयुर्वेदिक कॉलेज, नॉर्मल स्कूल, शोध संस्थान, विज्ञान कॉलेज, धर्मोपदेशक विद्यालय स्थापित हुए।
दूध को गरम करने से उसका घृत वाला अंश मलाई के रूप में ऊपर तैरने लगता है। गरमी से पिघलकर विशेष पत्थरों के भीतर रमा हुआ शिलाजीत बाहर निकल आता है। सूर्य की गरमी बढ़ते ही सभी प्राणी निद्रा त्याग की जाग पड़ते और काम में लगते है। तप की गरमी से मनुष्य की अंत चेतना जाग्रत, सक्रिय और सक्षम बनती है। झकझोरने से सोया व्यक्ति जाग पड़ता है। आँतरिक मूर्च्छा और उदासी को दूर करने के लिए तपश्चर्या से उत्पन्न ऊर्जा अपना चमत्कार दिखाए बिना नहीं रहती। उसका प्रभाव संचित कुसंस्कारोँ को जलाता है और ऐसी अभिनव शक्ति प्रदान करता है, जिसके सहारे प्रगतिपथ पर द्रुतगति से बढ़ चलना संभवं हो सके। आग तापने से ठंडक दूर होती है। अगति और अकर्मण्यता को निरस्त करने में तप की गरमी से भी वैसा ही उद्देश्य पूरा होता है।
गायत्री साधना पंचमुखी है। उसके प्राणरूपी प्रकरण पाँच पाँच अध्याय सोपानों में बंटे हुए है। तप साधना वाला प्रकरण भी पाँच भागों में विभक्त है। पाँच तत्वों से बना हुआ काय कलेवर, पाँच प्राणों से बने हुए चेतना संस्थान भी पाँच प्रकार की तपश्चर्याओं से प्रभावित परिष्कृत होते है। गायत्री उपासना को सफल बनाने वाली पाँच तपश्चर्याएं (1)उपवास (2)मौन (3)ब्रह्मचर्य (4)तितिक्षा (5)अनुदान इन पांचों नामों से प्रसिद्ध है। साधना के साथ साथ इनका समन्वय जितना हो सकेगा उसी अनुपात से उसकी कार्यक्षमता बढ़ती चली जाएगी।
उपवास का प्रयोजन है- आहार की संयमशीलता और सात्विकता। पापों के प्रायश्चित के लिए तो चाँद्रायण, संतापन आदि कितने ही विशिष्ट व्रत है। अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी एवं साप्ताहिक उपवासों का क्रम कितने ही लोग चलाते है। श्रावण, कार्तिक, माघ बैसाख महीने के पूरे व्रत साधना का विस्तृत माहात्म्य है। रमजान में रोजे तो मुसलमान भी रखते है। जन्माष्टमी, रामनवमी, शिवरात्रि, गंगा दशहरा, नवरात्र आदि पर्वों पर उपवास की परंपरा हैं। आहार न करने से पेट को विश्राम मिलना और उसका नई शक्ति, नई स्फूर्ति अर्जित करना स्वास्थ्य की दृष्टि से तो हितकर है ही, उसका प्रभाव मन पर भी पड़ता है। शारीरिक आवश्यकता भूख के रूप में प्रकट होती और आहार मांगती है। धर्मश्रद्धा के साथ जुड़ी हुई संकल्प शक्ति उस मांग को पूरा करने से इंकार करती है। संस्कार और संकल्प के बीच विग्रह खड़ा होता है। समझाकर या बलपूर्वक संस्कार का दमन किया जाता है और धर्मबुद्धि के सहारे शरीर को संतोष समाधान कराया जाता है। उपवास की तपश्चर्या के सहारे आत्मानुशासन स्थापित करने का महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध होता है।
उपवास किसे, किस प्रकार, कितना करना चाहिए? यह साधक की मन स्थिति और परिस्थिति पर निर्भर है। पूर्ण उपवास तो वही है, जिसमें मात्र जल पर रहा जाए। आंशिक उपवास के कितने ही प्रकार है- (1) दूध छाछ, फलों का रस, शाकोँ का रस जैसे पेय पदार्थों पर रहना (2)अन्नाहार छोड़कर शाक फल दूध आदि पर निर्वाह करना (3) एक समय भोजन करना (4) एक अन्न, एक लगावन, रोटी शाक, दाल भात आदि से पेट भरना (5) खिचड़ी दलिया जैसी एक ही पात्र से पकाई वस्तु से काम चलाना। उपवास की इन प्रक्रियाओं में से जो जितना कठिन सरल चुनाव कर सके, वह उसे अपना सकता है।
अस्वाद व्रत इसी उपवास प्रक्रिया का एक अतिरिक्त भाग है। नमक शक्कर मसाले छोड़कर बिना स्वाद का भोजन करना इंद्रिय निग्रह का एक बड़ा कदम है। स्वास्थ्य की दृष्टि से इसमें तनिक भी हानि नहीं। खाद्य पदार्थों में उपयोगी क्षारों की मात्रा प्रकृतितः होती है। उसमें ऊपर से नमक शक्कर आदि मिलाने की स्वास्थ्य की दृष्टि से तनिक भी आवश्यकता नहीं है। सृष्टि का कोई भी प्राणी ऊपर से नमक मसाले नहीं खाता। शरीर के लिए सभी आवश्यक तत्व सामान्य खाद्य पदार्थों में ही मिल जाते हैं। जीभ को चटोरेपन की आदत डालकर भोजन को अखाद्य बनाया जाता है और उसे अनावश्यक मात्रा में खाकर पेट खराब किया जाता है। मन में चंचलता और तामसिकता की वृद्धि भी उन मिलावटों के कारण ही उत्पन्न होती है।
अस्वाद व्रत जिह्वा इंद्रिय का संयम है। जीभ को चटोरेपन के दुर्गुण से छुड़ा लेने से साहसिकता का समावेश है। इसे जीत लेने पर अन्य सभी इंद्रियों पर अनुशासन स्थापित कर सकना सरल हो जाता है। इसमें भी आत्म निग्रह का, आत्मानुशासन का संकल्प प्रखर होता है और इससे बढ़ा हुआ साहस अन्य कुसंस्कारी दुष्प्रवृत्तियों पर विजय पा सकने में समर्थ हो जाता है। स्वाद छूटने पर जो कुछ खाया जाएगा, प्रायः वह सीमित और सात्विक ही रहता है। आहार का संयम मन का संयम होता है। उससे आत्मिक प्रगति में बड़ी सहायता मिलती है। इसलिए उपवास ओर उसकी एक महत्वपूर्ण शाखा अस्वाद व्रत का पालन तपश्चर्या में ही सम्मिलित हैं। उसका लगातार कितने समय तक पालन किया जाए, यह साधक की इच्छा पर निर्भर है। न्यूनतम सप्ताह में एक बार इस तप के पालन के अभ्यास तो करना ही चाहिए।
जप स्तवन, कीर्तन, पठन आदि जिह्वा से किए जाते हैं। इस उपकरण की शुद्धि नितांत आवश्यक है। जिस जीभ रूपी बंदूक से मंत्र रूपी कारतूस चलाया जाता है, उसकी सफाई पहले ही कर लेनी चाहिए। नली में कूड़ा करकट भरा हो, दबाने का घोड़ा तथा दूसरे पुरजे अस्त व्यस्त हो तो अच्छे कारतूस होने पर भी निशाना लगाना कठिन है। वंशी बजाने वाले यह देख लेते है कि उसके छेद साफ है या नहीं। मैले बर्तन में दूध दुहने या उबालने से उसके फटने की आशंका रहेगी। यही बात अशुद्ध जिह्वा के संबंध में भी है, उसके द्वारा किए गए पूजा उपचार एवं मंत्र साधन सफल नहीं होते। अस्तु, उपासना को सार्थक बनाने के लिए जिह्वा शुद्धि की प्रक्रिया पर पूरा ध्यान देना चाहिए।
जिह्वा का एक कार्य है आहार ग्रहण, दूसरा है उच्चारण। उच्चारण का तात्पर्य है- साधक के संभाषण में पवित्रता का समावेश। असत्य भाषण, छल, शेखीखोरी ,अवाँछनीय परामर्श, अपमान, तिरस्कार,कटुवचन, चुगली, हिम्मत गिराना जैसे अनेक वाणी दोष है। इनके रहते भी वाणी की पवित्रता नहीं बन पाती। साधक को नपा-तुला बोलना चाहिएं। व्यर्थ की बकझक करते रहने की आदत पड़ गई हो तो वह दूर करनी चाहिए। अन्य वाणी दोषों को सुधारने के लिए पूरा पूरा ध्यान देना चाहिए। इस संदर्भ में वाणी का विश्राम, निरीक्षण,संशोधन करने के लिए मौन का अभ्यास करना चाहिए। मौन को वाणी का तप कहा गया है।
सुविधानुसार हर दिन जाग्रत स्थिति में एक दो घंटे मौन रहने का अभ्यास करने का प्रयत्न करना चाहिए। भोजन के समय, मल मूत्र विसर्जन में, उपासना के समय तो मौन रहने की परंपरा भी है। इसके लिए जिस समय कम जनसंपर्क रहता है उस समय एक दो घंटे का मौन रखने का नियम बनाना चाहिए। सप्ताह में या महीने में एक दिन पूरा मौन रखना भी जिह्वा की अवाँछनीय गतिविधियों पर रोक लगाने, पुरानी आदतें भुलाने का एक अच्छा उपाय है।
शक्ति संचय की दृष्टि से कम बोलना उपयोगी है। जब मनुष्य अधिक दुर्बल हो जाता है तो उसकी वाणी बंद हो जाती है या लड़खड़ाने लगती है। यद्यपि होश हवाश बने रहते है। बोलने में अंत शक्तियों पर बहुत जोर पड़ता है। अनेक अवयवों की संयुक्त शक्ति के अतिरिक्त उसमें शरीर की विद्युत शक्ति का भी एक बहुत बड़ा भाग खरच होता है। दुर्बलता की स्थिति में उतनी सामर्थ्य न रहने से ही बोलने में कठिनाई होती है।
वायस आफ साइलेस ग्रंथ में थियोसॉफी के जन्म दाताओं ने यह बताया है कि मौन रहने की स्थिति में दैवी वाणी को सुनने का अवसर मिलता है। कहने और सुनने की दोनों क्रियाएं साथ साथ चलाने में कितनी कठिनाई होती है, यह सभी जानते है। ईश्वर की वाणी सुनने, अदृश्य लोक के दिव्य संदेशों को पकड़ने के लिए मौन धारण का अभ्यास करना उचित ही है। गायत्री उपासकों के लिए उपवास, अस्वाद एवं मौन का अभ्यास करने के साथ में जिह्वा के माध्यम से की जाने वाली दोनों ही तपश्चर्याएं आवश्यक है। आहार की तामसिकता और अनर्गल वार्ता का संयम करने से जिह्वा में वह शक्ति उत्पन्न होती है जिससे उसके द्वारा किया हुआ जप आराधन सफल हो सके।
तीसरा तप है ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य का मोटा अर्थ है। वीर्य रक्षा। स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से यह भी आवश्यक है । इस बहुमूल्य धातु का सूक्ष्म रूप ओजस है। नेत्रों में ज्योति, वाणी में प्रभाव, मस्तिष्क में स्मृति, व्यक्तित्व में प्रतिभा, शरीर में स्फूर्ति, चेहरे पर तेजस्विता, मन में साहसिकता के रूप में यह ओजस ही काम करता है। जीवन ज्योति का आलोक जिस तेल के आधार पर प्रकाशवान रहता है, वह वीर्यरक्षा से ही संचित होता है। आत्मिक प्रगति के लिए प्रचंड संकल्प शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। भौतिक आकर्षणों से लेकर कुसंस्कारों के अवरोधों से पग पग पर जूझना होता है। इसके लिए योद्धाओं जैसे शौर्य साहस की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए अभीष्ट शक्ति संचय की दृष्टि से ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है। दांपत्य जीवन का अर्थ आत्मघात नहीं है। पति पत्नी भी दो भाइयो और मित्रों की तरह, दो बहनों और सहेलियों की तरह मित्रता और प्रसन्नता भरा जीवन सरलता और सफलतापूर्वक जी सकते है।
ब्रह्मचर्य का सूक्ष्म और महत्वपूर्ण भाग वह है, जिसमें नर नारी को और नारी नर को कामुकता की दृष्टि से न देखकर सामान्य प्राणी की तरह देखते है। अश्लील विचारों और वासनात्मक कुदृष्टि कस समन्वय नहीं होने देते। यदि स्नेहपूर्वक एक दूसरे को देखना आवश्यक हो तो पुत्र भागिनी या माता की, पुत्र, भाई या पिता की पवित्र दृष्टि रखते हुए घनिष्ठता एवं मित्रता का भी निर्वाह हो सकता है। मस्तिष्क को अनावश्यक रूप से उत्तेजित करने में चिंतन को उच्चस्तरीय प्रयोजनों में संलग्न न होने देने में कामुकता के विचार ही अत्यधिक बाधक होते है। कल्पना शक्ति का महत्वपूर्ण भाग इन्हीं कुप्रसंगों का ताना बाना बुनने में नष्ट हो जाता है। कामुक दृष्टि रहने पर नेत्रों की दिव्य दृष्टि का बुरी तरह अपव्यय होता रहता है। ऐसा चिंतन वीर्यपात से भी अधिक हानिकारक होता है। रति कर्म से स्थूल शरीर में जैसी हानि होती है वही कामुक चिंतन से सूक्ष्मशरीर की प्राण प्रतिभा को क्षति उठानी पड़ती है, इसलिए ब्रह्मचर्य की तप साधना में न केवल वीर्यरक्षा का वरन् कामुक दृष्टि को निरस्त करने का भी अनुशासन है।
गायत्री माता का चित्र युवा नारी का है, उसमें पवित्रता भरी मातृबुद्धि की श्रद्धा जमाने का एक उद्देश्य यह भी है कि नारी यौवन पर दृष्टि जाते ही उत्कृष्ट चिंतन उभरने का अभ्यास होता रहे। सरस्वती, लक्ष्मी, काली आदि अन्य देवियों की प्रतिमाओं में भी यौवन के साथ भावभरी श्रद्धा संजोए रहने की मान्यता है। इसी प्रकार देवताओं को रूपयौवन संपन्न बनाकर नारी को वह अभ्यास करने का अवसर दिया गया है कि ये नर यौवन से कामुक उत्तेजना ग्रहण न करे वरन् ईश्वरतुल्य मान्यताओं का अभ्यास करे। मीरा आदि की आराधना इसी स्तर की थी।
चौथी तपश्चर्या है तितिक्षा। तितिक्षा का अर्थ है-सुविधाओं का स्वेच्छापूर्वक परित्याग और कष्टसाध्य जीवनक्रम का अभ्यास यह कई कारणों से आवश्यक है। मितव्ययी ब्राह्मण जीवन की स्थिति अपनाने पर ही परमार्थ प्रयोजनों के लिए समय, मन और धन बच सकता है। विलासी व्यक्ति की आवश्यकताएं आकांक्षाएं इतनी बढ़ी चढ़ी होती है कि उसके लिए परमार्थ प्रयोजन के लिए कुछ कर सकना तो दूर, सोच सकना भी कठिन पड़ता है। अल्प व्यय में निर्वाह करने वाले को कई प्रकार की असुविधाएं सहन करनी पड़ती है, इसका पूर्वाभ्यास तितिक्षा से ही करना पड़ता है।
लोकमंगल की सेवा साधना ईश्वर उपासना का अविच्छिन्न अंग है। विराट ब्रह्म की, विशाल विश्व की सेवा आराधना से विरत रहकर पूजा अर्चा मात्र से कोई भी जीवनलक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता। सेवा साधना में निरत व्यक्तियों को कितने ही प्रकार के कष्ट सहने पड़ते है। परिव्राजक जीवन की कठिनाइयाँ तो सर्वविदित ही है। वानप्रस्थ संन्यास में भी कष्टसाध्य जीवनयापन ही करना पड़ता है। तितिक्षा इसी का पूर्वाभ्यास है, ताकि समय आने पर अभ्यास प्रक्रिया अपनाने में कठिनाई अनुभव न हो।
सचाई और न्याय निष्ठा अपनाने वाले को अनीति के विरुद्ध संघर्ष भी करना पड़ता है, इसमें प्रतिपक्षी असुरता के प्रत्याक्रमण होने स्वाभाविक है। ईसा, गाँधी, सुकरात, दयानंद, मसूर, वंदा वैरागी, गुरु गोविंद सिंह के बालक जैसे असंख्य पुरुषों को प्राणों से हाथ धोने पड़े हैं वास तो असंख्यों ने सहे है। हिंस्र व्याघ्र आदि तो आक्रमण करने से रोकने पर प्रतिरोध करने वाले पर ही टूट पड़ते है। असुरता की यही नीति रही है कि वह सज्जनता को अपने अस्तित्व के लिए संकट मानती है और उस पर आक्रमण करती है। जिनके स्वार्थों को क्षति पहुंचती है, वे सब अपने विराने अध्यात्मवादी से रुष्ट रहते और उसे हानि पहुंचाने का प्रयत्न करते है। ऐसी विपत्तियों के फंसने की जानकारी एवं तैयारी पहले से ही बनी रहे इसलिए कई प्रकार के काय कष्ट सहने की तितिक्षा को तपश्चर्या माना गया है और साधक को उसका अभ्यास करते रहने के लिए कहा गया है।
सरदी, गरमी, भूख, प्यास सहने का अभ्यास तितिक्षा है। भूमिशयन, बिना जूते के चलना, कम वस्त्रों का उपयोग भी इसी श्रेणी में आता है। बिना दूसरों की सहायता का स्वावलंबी जीवन, अपनी शरीरयात्रा के कार्य अपने हाथों करने का अभ्यास भी इसी प्रयोजन के लिए है। कपड़े धोना, हजामत बनाना जैसे दैनिक आवश्यकता के काम बिना दूसरों की सहायता लिए करने के नियम इसी तितिक्षा तप के अंतर्गत आते है।
पाँचवा तप है अनुदान। अपने सुविधा साधनों में कमी करके उस बचत को सत्प्रयोजन में लगाते रहना अनुदान अथवा अंशदान है। समयदान, श्रमदान, धनदान, ज्ञानदान आदि इसी वर्ग में आते है। अपने धर्मकृत्यों में से प्रत्येक के साथ किसी न किसी रूप में दान देने का विधान जुड़ा हुआ है। विविध प्रकार के दान पुण्य परमार्थ एवं धर्मकृत्य माने गए है।
अंशदान का अर्थ है-अपना उपार्जन उसका एक न्यूनतम अंश ही अपने निर्वाह में खरच करना, शेष को परमार्थ प्रयोजनों में लगा देना तपश्चर्या का एक रूप है। समयदान ओर धनदान का न्यूनतम अनुदान गायत्री परिवार के सदस्यों को ज्ञानयज्ञ के लिए प्रस्तुत करना पड़ता है। ज्ञानघटों की स्थापना से इसी तपश्चर्या का शुभारंभ होता है। अपने युग का सबसे बड़ा परमार्थ ज्ञानयुग माना गया है। हमें प्राचीनकाल के ऋषियों महामानवों और देवपुरुषों की तरह बढ़ा चढ़ा अंशदान पीड़ा और पतन का समग्र निवारण कर सकने वाले ज्ञानदान के निमित्त करते रहना चाहिए। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के पुण्य प्रयोजन के निमित्त अधिकाधिक अंशदान निकालना भी एक तप है। तपश्चर्या का यह पंचम चरण है। इन पांचों को किसी न किसी रूप में कार्यान्वित करके नवरात्रि की गायत्री उपासना का वास्तविक सत्परिणाम देखने का अवसर प्राप्त करना चाहिए।
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जैफरसन बहुत सादगी से रहते थे। वे कहीं बाहर गए तो अपना बिस्तर कंधे पर लादे एक होटल में ठहरने पहुंचे।
होटल मालिक ने ऐसे साधारण आदमी को अपने यहां ठहराने में हेठी समझी और स्थान खाली न होने के बहाने इंकार कर दिया। जैफरसन चले गए और किसी अन्य होटल में ठहरे।
बाद में होटल मालिक को पता चला तो वह हड़बड़ा गया। इतने बड़े अधिकारी की अवज्ञा पर उसे डर लग रहा था। गाड़ी लेकर मैनेजर को भेजा और लौटा लाने का आदेश दिया।
जैफरसन ने नम्रता से कहा, जिस होटल में साधारण व्यक्ति के ठहरने तक का स्थान नहीं, उसमें उपराष्ट्रपति को ठहराने जितना स्थान कहा खाली होगा। वे नहीं गए।
एक आलसी ऊंट ने बहुत लंबे समय तक तप किया। देवताओं ने प्रसन्न होकर वरदान मांगने के लिए कहा।
आलसी ऊंट ने मागा कि एक जगह बैठे बैठे ही दूर दूर की घास चर लिया करे। अपनी गरदन को एक मील लंबा करा लिया। सो बहुत प्रसन्न था।
बरसात आई। उसने सिर छिपाने की कोई जगह तलाश की। एक गुफा में सिर भर रख सका। इतने में दो सियारों का जोड़ा उसमें घुस पड़ा। उन्होंने ऊंट की गरदन काट डाली और महीनों माँस खाते रहे। वरदान भी बेकार चला गया।
अट्ठारहवीं सदी में गुजरात में भीषण अकाल पड़ा। चारों ओर हाहाकार मच गया, पशु पक्षी सभी भूख से तड़प तड़पकर मरने लगे।
गुजरात के राजा ने साधु संतों से यज्ञानुष्ठान करने की प्रार्थना की। स्वयं भी बड़े बड़े ज्ञानी पंडितों को लेकर अनेक यज्ञ किए, फिर भी वर्षा नहीं हुई। प्रजा के दुख को देखकर राजा व्याकुल हो उठा। आंखों में आंसू भरकर स्वयं भगवान से प्रार्थना करने लगा। एक दिन प्रार्थनारत राजा के सामने एक संन्यासी प्रकट हुआ और साँत्वना के स्वर में बोला,राजन! चिंता मत करो। आपके राज्य में अमुक व्यापारी रहता है, यदि वह चाहे तो वर्षा हो सकती है।
राजा स्वयं चलकर व्यापारी के घर पहुंचे और उससे वर्षा कराने के लिए निवेदन करने लगे। पहले तो व्यापारी ने कुछ करने से आना कानी की, परंतु राजा की विनय और मनुष्यों के दुख को देखकर उसका हृदय द्रवित हो उठा। उसने राजा से कहा, “राजन! आप धैर्य धारण करे। मैं जलवृष्टि के लिए अवश्य उपाय करूंगा।”
व्यापारी ने अपनी तराजू उठा ली और बाहर निकलकर बोल उठा, ”हे इंद्रदेव! यदि इस तराजू से मैंने कभी कम या अधिक न तोला हो, सदा ईमानदारी का पालन किया हो तो देवराज इंद्र आप अवश्य जलवृष्टि करें।” व्यापारी का इतना कहना था कि आकाश में बादल आ गए और घनघोर वर्षा होने लगी। चारों ओर जल जल ही भर गया। लोग हर्ष से नाच उठे।
आयुर्वेद चिकित्सा में किसी भी रोगोपचार में औषधि सेवन से अधिक पथ्य परहेज पर जोर दिया जाता है। कहा जाता है कि पचास प्रतिशत बीमारी तो पथ्य परहेज का सही ढंग से पालन करने से ठीक हो जाती है। शेष बीमारी नियमित रूप से निर्धारित औषधि के सेवन करने से दूर हो जाती है। वस्तुतः आयुर्वेद में औषधि सेवन का अपना एक सुनिश्चित नियम व विधान है। सारी औषधियां त्रिदोष अर्थात् वात, पित्त व कफ के प्रकुपित होने से उपजे दोषों के आधार पर दी जाती है और तदनुरूप ही पथ्यापथ्य का निर्धारण किया जाता है।
विविध रोगों में सामान्य पथ्यापथ्य
सामान्य पथ्य अर्थात् हितकर आहार
रोगोपचार करने से पूर्व यह जान लेना जरूरी है कि किस रोग में व्यक्ति को कौन सा आहार देना चाहिए। कुछ पदार्थ तो ऐसे है, जो सभी प्रकार के रोगियों को दिए जा सकते है। इनमें सम्मिलित है गेहूं, मूंगदाल छिलके वाली, लौकी, तोरी, कच्चा पपीता, गाजर, टिंडा, पत्तागोभी, करेला, परबल, पालक , हरी मेथी, अंकुरित अन्न, सहजन की फली, सेमल के कच्चे फूल की सब्जी, हरी मिर्च व अदरक अल्प मात्रा में। गाय का दूध व घृत सर्वोत्तम है। गौ दुग्ध उपलब्ध न होने पर भैंस का दूध प्रयोग में लाया जा सकता है।
फलों में वृक्ष के पके सेव, पपीता,चीकू,अनार, अमरूद, बग्गुगोसा, जामुन,मौसमी आदि फलों का प्रयोग सामान्यतः किया जा सकता है। सूखे फलों में काजू, बादाम, मुनक्का, किसमिस, अंजीर, चिलगोजा, छुआरा, मखाना, खजूर आदि का प्रयोग किया जा सकता है।
वात, पित्त एवं कफ प्रधान रोगों के अनुसार पथ्यापथ्य इस प्रकार है-
(1) वातरोगों में पथ्य
वातप्रधान रोगों में सामान्य पथ्य में लिखित उपर्युक्त आहार लेना चाहिए। सहजन के फूल व कच्ची फली की सब्जी ,सेमल के फूल, मेथी,अदरक, अजवायन,लहसुन आदि का उपयोग भोजन के साथ साथ करना वातजव्याधियों में औषधीय कार्य भी करता है।
वात रोगों में अपथ्य :- उड़द की दाल, चावल, फूलगोभी, आलू,खीरा, मटर,टमाटर, अमचूर,नीबू,संतरा, अंगूर, कार्बाइड से पके हुए फल जैसे आम, केला, पपीता आदि , आचार ,दही, छाछ आदि कोई भी खट्टी चीज वात रोगों में नहीं खानी चाहिए। भैंस का दूध, पेठा,राजमा, मसूर आदि का सेवन भी नहीं करना चाहिए। ठंडे पानी से स्नान नहीं करना चाहिए। गरम जल में तेल नमक डालकर पीड़ा व सूजनयुक्त स्थान पर सिकाई करने से विशेष लाभ होता है।
(2) पित्त रोगों में पथ्य
सामान्य पथ्य में वर्णित उक्त आहार ही पित्तजन्य रोगों को भी अनुकूल पड़ता है। गेहू,दलिया, ठढाँ दूध, छिलके वाली मूगं दाल ,तोरी आदि सुपाच्य भोजन पित्त रोगों में लाभप्रद है। दूध में मुनक्का व अंजीर का उपयोग कर सकते है। कच्चे नारियल का पानी पित्त रोगों में पीना लाभकारी होता है।
पित्त रोगों में अपथ्य :- वातरोगों में जो चीजें अपथ्य बताई गई है, वही पित्त रोगों में भी अपथ्य है। इसके अतिरिक्त बैंगन, नारियल गिरी, अदरक, हरी मिर्च ,लहसुन, सभी प्रकार के मिर्च मसाले , तीखे व तले हुए पदार्थ पित्त रोगों में अपथ्यकर होते हैं। अतः इन्हें नहीं खाना चाहिए।
(3) कफ रोगों में अपथ्य
वात रोगों में बताए गए अपथ्य का कफ रोगों में भी पालन करना चाहिए। उसके अतिरिक्त तैल,घृतादि,किसी भी प्रकार की चिकनाई का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सब्जी आदि में छोंक बघार के लिए अति अल्प मात्रा में सरसों व तिलादि के तैल का उपयोग किया जा सकता है।
(4) मधुमेह में पथ्य
मधुमेह डायबिटीज में मीठा, मिठाई, अधिक मीठे फल, चावल, आलू आदि खाना वर्जित है। फलों में सेब, मौसमी, अनार, देशी पपीता अमरूद आदि कम मीठे फल अल्प मात्रा में ले सकते है। सुगर की मात्रा यदि बढ़ी हुई हो तो ये फल भी नहीं खाने चाहिए। करेला, जामुन, नीम, गेहूं व सोयाबीन तथा चने से मिश्रित आटे की रोटी का सेवन करना मधुमेह रोगी के लिए सर्वोत्तम आहार है।
(5) पाइल्स बवासीर
इस व्याधि से पीड़ित व्यक्ति को सामान्य पथ्य में वर्णित आहार लेना चाहिए। लाल मिर्च, तीखे व तले हुए पदार्थ, अमचूर, गरम मसाले, बैंगन आदि के सेवन से बचना चाहिए। प्रात काल व दिन में भी पर्याप्त मात्रा में जल पीना चाहिए, जल के उचित सेवन से कब्ज नहीं होता।
(6) हृदय रोग
हृदय रोग में भी सामान्य पथ्य में वर्णित आहार लेना उपयुक्त रहता है उनमें से भी शाक सब्जियां, शीघ्र पचने वाले फल, सेव, पपीता आदि एवं फलों का रस, अंकुरित अन्न, गाय का दूध,दूध में अल्प मात्रा में कभी कभी ईसबगोल आदि का प्रयोग उपयोगी है। दूध में अर्जुन की छाल पकाकर पीना अत्यंत लाभकारी होता है।
(7) पीलिया
पीलिया रोग में घृतादि सभी प्रकार की चिकनाई, दूध, हल्दी जैसी कोई भी पीले रंग की चीज, चावल, मिर्च,मसाले आदि पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहिए। गेहूं व जौ के आटे की रोटी, ताजा दही, छाछ, लौकी, तोरी, मूंग की दाल छिलकायुक्त आदि सुपाच्य भोजन इस रोग में लाभदायक है।
(8) हाइपोथाइरायडिज्म
यह थाइराक्सिन हार्मोन की गड़बड़ी से उत्पन्न होने वाला रोग है। इसमें भी सामान्य पथ्य में वर्णित सुपाच्य आहार लेना चाहिए। अमचूर, दही, खटाई, अचार, नीबू, खट्टे फल, टमाटर,फूलगोभी, कार्बाइड से पके फल आदि नहीं खाने चाहिए। ऋतु फलों में देशी आम जो स्वाभाविक रूप से पेड़ पर पके हो और मीठे हो, उन्हें खा सकते है। इसी तरह पेड़ पर नैसर्गिक रूप से पके हुए पपीता खा सकते है। आयोडीन की अधिकता वाले पदार्थ या फल आदि पर्याप्त मात्रा में लिए जा सकते है। गेहूं, चना व सोयाबीन से मिश्रित आटे की रोटी का सेवन करना लाभदायक है। कचनार वृक्ष की ताजी छाल थोड़ी थोड़ी मात्रा में मुंह में डालकर चूसते रहने से अत्यधिक लाभ मिलता है।
(9) मोटापा
मोटापा सभी रोगों का आदि स्रोत है। इसमें मीठे पदार्थ एवं घृत का सेवन बिलकुल नहीं करना चाहिए। सामान्य पथ्य के अंतर्गत वर्णित सुपाच्य आहार का सेवन करना स्वास्थ्य संतुलन के लिए सर्वथा हितकारी है। गौ दुग्ध अल्प मात्रा में ले सकते है। प्रातः उष्णजल, उचित औषधि व व्यायाम अति लाभप्रद है।
सर्वथा असेवनीय पदार्थ
चाय, काफी, कोल्ड ड्रिंक्स, आईसक्रीम तंबाकू, गुटका, पानमसाला, माँस, मदिरा, अंडे व मैदे से बने ब्रेडादि, कन्फेशनरी एवं सिंथेटिक फूड्स कार्बाइड से पके फल।
औषधि सेवन की सामान्य विधि
आयुर्वेद औषधियों में प्रमुख रूप से वटी या गोलियाँ, पाउडर या चूर्ण, रस भस्में (पुड़िया), आसव आरिष्ट व क्वाथ या कढ़ा आदि का सेवन किया जाता है। इन्हें लेते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-
(1) गोलियां व चूर्ण
भोजन करने के लगभग 1-2 मिनट बाद गोली व चूर्ण लेना चाहिए। वातज कफ प्रधान रोगों में गरम जल से तथा पित्त प्रधान रोगों में सामान्य जल से गोलियां तथा चूर्ण का सेवन करना चाहिए। गोलियां चबाकर खाना उत्तम माना जाता है। यदि गोली कड़वी हो तो बिना चबाए भी जल के साथ सीधे निगल सकते हैं। इस संबंध में दो बाते विशेष रूप से ध्यान में रखनी चाहिए-
(अ) मुक्तादि वटी, मधुनाशिनी एवं कायाकल्प वटी इनका सेवन खाने से लगभग एक घंटा पहले ताजे पानी से करना चाहिए।
(ब) दस्त अथवा अम्लपित्त के लिए सेवनीय चूर्ण खाने से पहले वैद्य या चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।
(2) भस्में (पुड़िया)
भस्म व रस आदि का मिश्रण करके जो पुड़िया में औषधि दी जाती है, उसका सेवन भोजन करने से लगभग आधा से एक घंटा पहले शहद, मलाई अथवा गरम जल के साथ करना चाहिए।
(3) आसव-आरिष्ट
सभी प्रकार के आसव आरिष्ट खाने के 10-15 मिनट बाद समान मात्रा में जल मिलाकर उपयोग में लाए जाते है।
(4) क्वाथ या काढ़ा
क्वाथ का स्वाद यदि कड़वा हो तो शहद या मीठा मिलाकर भी पी सकते हैं, वैसे मीठे के बिना पीना अधिक लाभप्रद होता है।
(5) क्वाथ-स्नान
रोगानुसार दिए गए क्वाथ से यदि वाष्प (भाप) लेनी हो तो निर्दिष्ट औषधि को एक डेढ़ किलो पानी में प्रेशरकुकर में डालकर पकाएं। जब सीटी से वाष्प निकलने लगे, तब सीटी को हटाकर उसके स्थान पर गैस वाला रबर का पाइप लगाए तथा पाइप के दूसरे सिरे से निकलती हुई वाष्प से रोगयुक्त स्थान पर वाष्प दे। पाइप के जिस सिरे से वाष्प निकलती है, वहां कपड़ा लगाकर रखे अन्यथा तेज उष्ण वाष्प ही शरीर पर लगनी चाहिए। उचित समय में वाष्प लेने के बाद शेष बचे हुए जल से पीड़ा युक्त स्थान पर मध्यम उष्ण पानी डालते हुए सिंकाई करनी चाहिए।
(6) मालिश
मालिश सदैव हृदय की ओर उचित बल का प्रयोग करते हुए शनैः शनैः करनी चाहिए।
उपयुक्त नियमोपनियमों का पालन करते हुए यदि चिकित्सा उपचार किया जाए तो उसके सत्परिणाम सुनिश्चित रूप से मिलते है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
शिष्य संजीवनी में सद्गुरु प्रेम का रस है। जो भी इसका सेवन कर रहे हैं, उन्हें इस सत्य की रसानुभूति हो रही है। गुरु भक्ति के भीगे नयन-गुरु प्रेम से रोमाँचित तन-मन-अन्तःकरण यही तो शिष्य का परिचय है। जो शिष्यत्व की साधना कर रहे हैं, उनकी अन्तर्चेतना में दिन-प्रतिदिन अपने गुरुदेव की छवि उजली होती जाती है। बाह्य जगत् में भी सभी रूपों और आकारों में सद्गुरु की चेतना ही बसती है। गुरु प्रेम में डूबने वालों के अस्तित्व से द्वैत का आभास मिट जाता है। दो विरोधी भाव, दो विरोधी अस्तित्व एक ही स्थान पर, एक ही समय प्रगाढ़ रूप से नहीं रह सकते। प्रेम से छलकते हुए हृदय में घृणा कभी नहीं पनप सकती। जहाँ भक्ति है, वहाँ द्वेष ठहर नहीं सकता। समर्पित भावनाओं के प्रकाश पुञ्ज में ईर्ष्या के अँधियारों के लिए कोई जगह नहीं है।
संक्षेप में द्वैत की दुर्बलता का शिष्य की चेतना में कोई स्थान नहीं है। अपने-पराये का भेद, मैं और तू की लकीरें यहाँ नहीं खींची जा सकती। यदि किसी वजह से अंतर्मन के किसी कोने में इसके निशान पड़े हुए हैं तो उन्हें जल्द से जल्द मिटा देना चाहिए। क्योंकि इनके धूमिल एवं धुँधले चिन्ह भी गुरु प्रेम में बाधक है। द्वैत की भावना किसी भी रूप में क्यों न हो, शिष्यत्व की विरोधी है, क्योंकि द्वैत केवल बाह्य जगत् को ही नहीं, बाँटता, बल्कि अंतर्जगत् को भी विभाजित करता है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि जिसकी अन्तर्चेतना विभाजित है, बँटी-बिखरी है, वही बाहरी दुनिया में द्वैत का दुर्भाव देख पाता है। आखिर अंतर्जगत् की प्रतिच्छाया ही तो बाह्य जगत् है।
इसीलिए शिष्यत्व की महासाधना के सिद्ध जनों में इस मार्ग पर चलने वाले पथिकों को चेतावनी भरे स्वरों में शिष्य संजीवनी के तीसरे सूत्र का उपदेश दिया है। उन्होंने कहा है- “द्वैत भाव को समग्र रूप से दूर करो। यह न सोचो कि तुम बुरे मनुष्य से या मूर्ख मनुष्य से दूर रह सकते हो। अरे! वे तो तुम्हारे ही रूप हैं। भले ही तुम्हारे भिन्न अथवा गुरुदेव से कुछ कम तुम्हारे रूप हों, फिर भी हैं वे तुम्हारे ही रूप। याद रहे कि सारे संसार का पाप व उसकी लज्जा, तुम्हारी अपनी लज्जा व तुम्हारा अपना पाप है। स्मरण रहे कि तुम संसार के एक अंग हो, सर्वथा अभिन्न अंग और तुम्हारे कर्मफल उस महान् कर्मफल से अकाट्य रूप से सम्बद्ध हैं। ज्ञान प्राप्त करने के पहले तुम्हें सभी स्थानों में से होकर निकलना है, अपवित्र एवं पवित्र स्थानों से एक ही समान।”
इस सूत्र को वही समझ सकते हैं, जो अपने गुरुदेव के प्रेम में डूबे हैं। जो इस अनुभव के रस को चख रहे हैं, वे जानते हैं कि जब प्रेम गहरा होता है तो प्रेम करने वाले खो जाते हैं, बस प्रेम ही बचता है। जब भक्त अपनी पूरी लीनता में होता है, तो भगवान् और भक्त में कोई फासला नहीं होता। अगर फासला हो तो भक्ति अधूरी है, सच कहें तो भक्ति है ही नहीं। वहाँ भक्त और भगवान् परस्पर घुल-मिल जाते हैं। दोनों के बीच एक ही उपस्थिति रह जाती है। ये दोनों घोर लीन हो जाते हैं और एक ही अस्तित्व रह जाता है। प्रेम और भक्ति में अद्वैत ही छलकता एवं झलकता है।
सच यही है कि सारा अस्तित्व एक है और हममें से कोई उस अस्तित्व से अलग-थलग नहीं है। हम कोई द्वीप नहीं है, हमारी सीमाएँ काम चलाऊ हैं। हम किन्हीं भी सीमाओं पर समाप्त नहीं होते। सच कहें तो कोई दूसरा है ही नहीं तो फिर दूसरे के साथ जो घट रहा है, वह समझो अपने ही साथ घट रहा है। थोड़ी दूरी पर सही, लेकिन घट अपने ही साथ रहा है। भगवान् महावीर, भगवान् बुद्ध अथवा महर्षि पतंजलि ने जो अहिंसा की महिमा गायी, उसके पीछे भी यही अद्वैत दर्शन है। इसका कुल मतलब इतना ही है कि शिष्य होते हुए भी यदि तुम किसी को चोट पहुँचा रहे हो, या दुःख पहुँचा रहे हो अथवा मार रहे हो तो दरअसल तुम गुरु घात या आत्म घात ही कर रहे हो, क्योंकि गुरुवर की चेतना में तुम्हारी अपनी चेतना के साथ समस्त प्राणियों की चेतना समाहित है।
ध्यान रहे जब एक छोटा सा विचार हमारे भीतर पैदा होता है, तो सारा अस्तित्व उसे सुनता है। थोड़ा सा भाव भी हमारे हृदय में उठता है, तो सारे अस्तित्व में उसकी झंकार सुनी जाती है। और ऐसा नहीं कि आज ही अनन्त काल तक यह झंकार सुनी जायेगी। हमारा यह रूप भले ही खो जाये, हमारा यह शरीर भले ही गिर जाये, हमारा यह नाम भले ही मिट जाये। हमारा नामो−निशान भले ही न रहे। लेकिन हमने जो कभी चाहा था, हमने जो कभी किया था, हमने जो कभी सोचा था, हमने जो कभी भावना बनायी थी, वह सब की सब इस अस्तित्व में गूँजती रहेगी। क्योंकि हममें से कोई यहाँ से भले ही मिट जाये, लेकिन कहीं और प्रकट हो जायेगा। हम यहाँ से भले ही खो जायें, लेकिन किसी और जगह हमारा बीज फिर से अंकुरित हो जायेगा।
हम जो भी कर रहे हैं, वह खोता नहीं है। हम जो भी हैं, वह भी खोता नहीं है। क्योंकि हम एक विराट् के हिस्से हैं। लहर मिट जाती है, सागर बना रहता है और वह जो लहर मिट गयी है, उसका जल भी उस सागर में शेष रहता है। यह ठीक है कि एक लहर उठ रही है, दूसरी लहर गिर रही है, फिर लहरें एक हैं, भीतर नीचे जुड़ी हुई हैं और जिस जल से उठ रही हैं यह लहर उसी जल से गिरने वाली लहर वापस लौट रही है। इन दोनों के नीचे के तल में कोई फासला नहीं है। यह एक ही सागर का खेल है। थोड़ी से देर के लिए लहर ने एक रूप लिया । फिर रूप खो जाता है और अरूप बचा रहता है। हम सब भी लहरों से ज्यादा नहीं है। इस जगत् में सभी कुछ लहरवत् हैं। वृक्ष भी एक लहर है और पक्षी भी, पत्थर लहर है तो मनुष्य भी। अगर हम लहरें हैं एक महासागर की तो इसका व्यापक निष्कर्ष यही है कि द्वैत झूठा है। इसका कोई स्थान नहीं है।
परमेश्वर से एक हो चुके गुरुदेव की चेतना महासागर की भाँति है। सारा अस्तित्व उनमें समाहित है। हमारे प्रत्येक कर्म, भाव एवं विचार उन्हीं की ओर जाते हैं, वे भले ही किसी के लिए भी न किये जाये। इसलिए जब हम किसी को चोट पहुँचती है, दुःख पहुँचाते हैं, तो हम किसी और को नहीं सद्गुरु को चोट पहुँचाते हैं, उन्हीं को दुखी करते हैं। यह कथन कल्पना नहीं सत्य है। महान् शिष्यों के जीवन की जीवन्त अनुभूति है-श्रीरामकृष्ण परमहंस के एक शिष्य ने बैल को चोट पहुँचायी। बाद में वह दक्षिणेश्वर आकर परमहंस देव की सेवा करने लगा। सेवा करते समय उसने देखा कि ठाकुर की पाँव उस चोट के निशान थे। पूछने पर उन्होंने बताया, अरे! तू चोट के बारे क्या पूछता है, यह चोट तो तूने ही मुझे दी है। सत्य सुनकर उसका अन्तःकरण पीड़ा से भर गया।
महान् शिष्यों के अनुभव के उजाले में परखें हम अपने आपको। क्या हम सचमुच ही अपने गुरुदेव से प्रेम करते हैं? क्या हमारे मन में सचमुच ही उनके लिए भक्ति है? यदि हाँ तो फिर हमारे अन्तःकरण को सभी के प्रति प्रेम से भरा हुआ होना चाहिए। पापी हो या पुण्यात्मा हमें किसी को भी चोट पहुँचाने का अधिकार नहीं है। क्योंकि सभी में हमारे गुरुदेव ही समाये हैं। अपवित्र एवं पवित्र कहे जाने वाले सभी स्थानों पर उन्हीं की चेतना व्याप्त है। इसलिए हमारे अपने मन में किसी के प्रति कोई भी द्वेष, दुर्भाव नहीं होना चाहिए। क्योंकि इस जगत् में गुरुदेव से अलग कुछ भी नहीं है। उन्हीं के चैतन्य के सभी हिस्से हैं। उन्हीं की चेतना के महासागर की लहरें हैं। इसलिए शिष्यत्व की महासाधना में लगे हुए साधकों को सर्वदा ही श्रेष्ठ चिंतन, श्रेष्ठ भावना एवं श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा उनका अर्चन करते रहना चाहिए।
एक संत के पीछे एक आदमी गालियाँ बकता चला जा रहा था। संत बड़े शाँत भाव से अपनी राह चले जा रहे थे। वह सारा इलाका जंगली था। यह इलाका समाप्त होकर जहाँ से बस्ती दिखने लगी, वहीं संत ठहर गए और उस व्यक्ति से बोले, “भाई, मैं यहाँ रुक गया हूँ। अब जितना जी चाहे, मुझे गाली दे दो।”
“ऐसा, क्यों?” उस दुष्ट आदमी से पूछा।
“ऐसा इसलिए भाई कि इस बस्ती के लोग थोड़ा मुझे मानते हैं। उनके सामने तुम मुझे गाली दोगे तो वे तुमको जरूर सजा देंगे।”
“तो इससे तुझे क्या?” उस दुष्ट ने फिर पूछा।
“तुम्हें तंग किया जाएगा तो मुझे बहुत तकलीफ होगी। आखिर तुम इतनी दूर तक मेरे पीछे पीछे आए हो तो मुझे भी तुमसे स्नेह हो गया है।” संत ने प्यार से समझाते हुए कहा।
वह दुष्ट व्यक्ति संत के चरणों पर गिर पड़ा। जानते हो, वह संत कौन था? ये थे शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास।
अन्तर्यात्रा का विज्ञान- महर्षि पतंजलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक प्रयोगों का निष्कर्ष है। परम पूज्य गुरुदेव ने बार-बार अपने इस जीवन सत्य को दुहराया है कि अध्यात्म एक सम्पूर्ण विज्ञान है। हाँ यह अंतर्जगत का विज्ञान है, जबकि प्रचलित विज्ञान की अन्य शाखा-प्रशाखाएँ बाह्य जगत् की हैं। इस दृष्टि से अन्तर्यात्रा का विज्ञान सब तरह से अनूठा है। इसके वैज्ञानिकद्वय भी अनोखे हैं। क्योंकि जो अन्तर्यात्रा का अन्वेषण करते हैं, वे सामान्यतया रहस्यदर्शी कवि होते हैं- वैदिक ऋषियों की भाँति, कबीर-मीरा की भाँति। और जो जीवन की बाह्य यात्रा का पथ अन्वेषित करते हैं, वे वैज्ञानिक होते हैं- आइन्स्टीन की भाँति, वारनर हाइज़ेनबर्ग, स्टीफेन हाकिंग की भाँति। परन्तु महर्षि पतंजलि एवं ब्रह्मर्षि गुरुदेव मानव चेतना के अति दुर्लभ पुष्प हैं। वे सम्पूर्णतया वैज्ञानिक हैं, लेकिन उनकी यात्रा आन्तरिक है।
इसलिए उनके एक-एक शब्द को समझने की कोशिश करनी होगी। दरअसल यह कठिन कार्य है। क्योंकि उनकी शब्दावली तर्क की, विवेचना की, विज्ञान की है, पर उनका संकेत परमात्मा की ओर है, महाभाव की ओर है, प्रभु प्रेम के अहोभाव की ओर है। अपनी शब्दावली में ये दोनों महान् वैज्ञानिक आइन्स्टीन एवं स्टीफेन हाकिंग की भाँति हैं, परन्तु उनकी प्रयोगशाला मानव की अन्तर्चेतना है, मानवीय अस्तित्त्व का रहस्यमय क्षेत्र है। उनके वैज्ञानिक ज्ञान में परम काव्य की सुगन्ध है। हालाँकि उनके काव्य में वैज्ञानिक प्रयोगों की निरन्तरता समायी है। इस अनूठे मेल को अन्तर्यात्रा के सभी पथिक अब पहचानने लगे हैं। यह योग कथा अब तो उनकी जिन्दगी का अभिन्न हिस्सा बन गयी है। इस योग कथा की पिछली कड़ी में सिद्ध वैराग्य की चर्चा की गयी थी। महर्षि के अनुसार यह सिद्ध वैराग्य निराकाँक्षा की अन्तिम अवस्था है। यह पुरुष के परम आत्मा के अन्तरतम स्वभाव को जानने के कारण समस्त इच्छाओं का विलीन हो जाना है। वैराग्य की यह अति दुर्लभ अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि की ओर ले जाती है।
यह सम्प्रज्ञात समाधि क्या है? इस जिज्ञासा के समाधान में महर्षि कहते हैं-
वितर्कविचारानंदास्मितानुगमात् सम्प्रज्ञातः॥1/17॥
शब्दार्थ- वितर्क विचारानन्दास्मितानुगमात्= वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता- इन चारों के सम्बन्ध से युक्त (चित्तवृत्ति का समाधान), सम्प्रज्ञातः= सम्प्रज्ञात समाधि है।
अर्थात्- सम्प्रज्ञात समाधि वह समाधि है, जो वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता के भाव से संयुक्त होती है।
दरअसल यह वैराग्य से धुले हुए निर्मल चित्त की सहज परिणति है। इस स्थिति में मन पूरी तरह से सूक्ष्म और शुद्ध हो जाता है। यह इतना शुद्ध एवं सूक्ष्म हो जाता है कि उसकी कोई प्रवृत्ति नहीं रहती चिपकने की। हालाँकि यह समाधि का पहला चरण है। इसके अगले चरण में तो मन ही नहीं रहता। अ-मन की अवस्था है वह। लेकिन यह जो पहला चरण है वह भी पुलकन और आनन्द से ओत-प्रोत है। ज्यादातर साधक तो यहीं ठहर जाते हैं। उन्हें आगे बढ़ने की सुध ही नहीं रहती। इस पहले चरण में भी चार भाव दशाएँ हैं।
पहली भावदशा है वितर्क की। यह तर्क का एक खास रूप है। यूँ तर्क साधारण तौर पर तीन रूपों में प्रकट होता है। इनमें से पहली अवस्था है कुतर्क की। यह तर्क की निषेधात्मक स्थिति है। कुतर्क में जीने वालों की नजर हमेशा ही जिन्दगी के अन्धेरे पहलुओं पर होती है। उदाहरण के लिए गुलाब के पौधे में सुन्दर फूल होते हैं, लेकिन चुभने वाले काँटे भी होते हैं। कुतर्क वाला व्यक्ति काँटों की गिनती करेगा और अन्ततः यह नतीजा निकालेगा कि वास्तविक सच्चाई तो काँटे ही हैं, यह गुलाब तो निरा भ्रम है। फिर है तर्क- यानि की गोल-गोल चक्करों वाली भूल−भुलैया। तर्क में प्रवीण व्यक्ति कितना ही तर्क करे, पर पहुँचेगा कहीं नहीं। वह यूँ ही पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में भटकता हुआ ऊर्जा गंवाएगा। बिना ध्येय का विचार तर्क कहलाता है।
जबकि वितर्क की भूमि विधेयात्मक है। एक तरह से वितर्क ‘आर्ट ऑफ पॉजिटिव थिंकिंग‘ है। विधेयात्मक चिन्तन की कला है। यह सम्प्रज्ञात समाधि का पहला तत्त्व है। जो व्यक्ति आन्तरिक शान्ति पाना चाहता है, उसे वितर्क को अपनाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति ज्यादा प्रकाशमय पक्ष की ओर देखता है। वह फूलों को महत्त्व देता है, काँटों को भूल जाता है। उसके लिए अपने आप ही शुभ और सुन्दर के द्वार खुलते हैं।
परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि जो व्यक्ति हमेशा पॉजिटिव सोचता है, तो समझो उसका अध्यात्म राज्य में प्रवेश निश्चित है। उसने समाधि के द्वार पर अपना पहला कदम रख दिया। उनका कहना था- विधेयात्मक सोच से विचारणा उदय होती है। विचारणा का अर्थ है-सुव्यवस्थित विचार। इसे विचारों की समग्रता भी कह सकते हैं। गुरुदेव का कहना था कि विचार और विचारशीलता में भारी फर्क है। विचार तो यूँ ही उठते-गिरते रहते हैं, बनते-बिगड़ते रहते हैं। जबकि विचारशीलता अपने अस्तित्त्व की आन्तरिक गुणवत्ता है। विचारशीलता का अर्थ है-सजग एवं जागरुक बने रहना। यह विचारशीलता सम्प्रज्ञात समाधि की दूसरी भावदशा है। यहाँ चिन्तन की नवीन कोपलें फूटती हैं। चेतना का अंधियारा समाप्त होता है।
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि वितर्क यानि की सम्यक् तर्क ले जाता है- विचारणा की ओर और विचारणा ले जाती है आनन्द की ओर। इस आनन्द की अनुभूति में अपनी अन्तर्चेतना की पहली झलक मिलती है। सम्प्रज्ञात समाधि की यह ऐसी अवस्था है, जैसे बादल हट गए और हमने क्षण भर के लिए सही चाँद को देख लिया। फिर से बादल घिर आते हैं। इसे कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि जैसे हम हिमालय यात्रा पर गए और वहाँ चहुँओर धुँध छायी हुई है। यकायक धुँध हटी और हिमालय के उच्चतम शिखर की शुभ्र धवल ज्योतिर्मय झलक मिल गयी। सच कहें तो यथार्थ में यह सम्प्रज्ञात समाधि का पहला स्वाद है।
आनन्द की यह भावदशा ले जाती है विशुद्ध अंतस् सत्ता की अवस्था में। यह विशुद्ध अंतस् सत्ता ही अस्मिता है। अंतस् सत्ता का अशुद्ध प्रकटीकरण अहंकार के रूप में होता है। अहंकार में तुलना होती है। यह किसी से ज्यादा होने का सुख हो उठता है। किसी का विरोध करने में, उससे जीवन में इसे बड़ा आनन्द आता है। अहंकार जीवन का नकारात्मक दृष्टिकोण है। जबकि अस्मिता विधेयात्मक दृष्टिकोण की अनुभूति है। इस अनुभूति में अपने स्वरूप की झलक मिलती है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि अस्मिता मैं का सम्यक् बोध है, जबकि अहंकार मैं का गलत बोध है। ध्यान की प्रगाढ़ता में अस्मिता की बड़ी सम्मोहक झलक मिलती है। ऐसा लगता है, जैसा सागर के बीच बूँद- जो अपने होने का अहसास तो कर पाती है, परन्तु अलगाव की अनुभूति नहीं कर पाती।
इस तरह सम्प्रज्ञात समाधि में सम्यक् तर्क, सम्यक् विचारणा, आनन्द की अवस्था और ‘हूँ’ पन की या अस्मिता का अनुभव समाया है। इस समाधि की भावदशा में चेतना अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है। परन्तु यहाँ अभी कर्मों के संस्कारों के बीज बने रहते हैं। इन्हें निर्बीज करने के लिए समाधि के अगले चरण में प्रवेश आवश्यक है। इसकी चर्चा और इसका चिन्तन महर्षि के अगले सूत्र की विषय वस्तु है। जो अखण्ड ज्योति के अगले अंक में प्रकट होगा।
अरब के दो मित्र थे। नावेर और वहेर। वहेर के पास बड़ा शानदार घोड़ा था। नावेर उसे किसी भी तरीके से प्राप्त करना चाहता था। कोई और उपाय न दिखा, तो एक दिन नावेर समुद्र के किनारे बीमार बुढ़िया का रूप बनाकर पड़ा रहा और रोने लगा। वहेर ने घोड़ा रोका और उस पर बीमार को बिठाकर खुद पैदल चलने लगा।
दाव लग गया। बुढ़िया बने नावरे ने एक लगाई और घोड़े को ले भागा। वहेर को आश्चर्य भी हुआ और दुःख भी। उसने जोर की आवाज लगाकर नावेर को खड़ा किया और पास जाकर कहा, “घोड़ा तुमने पा लिया, सो ठीक, पर इस घटना को किसी से न कहना, अन्यथा गरीब और बीमार सहायता से वंचित हो जाएंगे, उन्हें भी धूर्त माना जाएगा।”
नावेर रास्ते भर दोस्त की बात पर विचार करता रहा और दूसरे दिन उसका घोड़ा लौटा दिया।
गुरुगीता गुरुभक्ति का सुमधुर गायन है। सद्गुरु भक्ति से साधक को सब कुछ सहज सुलभ हो जाता है। गुरु प्रेम की छाँव में रहने वाला शिष्य जीवन के सभी विघ्नों-बाधाओं से अनायास ही सुरक्षित-संरक्षित रहता है। धन्य हैं वे लोग जिनके अन्तःकरण में गुरु भक्ति का उदय हुआ है। क्योंकि इसके उदय होने से साधक का अन्तःकरण सदा ही दिव्य आलोक से आलोकित रहता है। अध्यात्मविद्या की सभी रहस्यात्मक प्रक्रियाएँ अपने आप ही उसके अन्तःकरण में स्फुरित होती रहती हैं। अनेकों अलौकिक अनुभव उसे हर क्षण धन्य करते रहते हैं। इन पंक्तियों में जो कुछ कहा जा रहा है, वह केवल वैचारिक-तार्किक यथार्थ भर नहीं है, बल्कि समर्पण पथ पर चल पड़े साधकों के अनुभवों का सार है। इसे प्रत्येक साधक आज, अभी और इन्हीं क्षणों में अनुभव कर सकता है।
गुरु भक्ति की इस तत्त्व कथा की पिछली कड़ी में परम पूज्य गुरुदेव के इसी चैतन्य तत्त्व की अनुभूति कराने का प्रयास किया गया था। गुरुदेव सृष्टि में चल रहे उत्पत्ति एवं प्रलय रूप नाटक के नित्य साक्षी हैं। वे प्रभु जिस भी दिशा में विराज रहे हों, उसी दिशा में शिष्य को भक्तिपूर्वक पुष्पाञ्जलि अर्पित करना चाहिए। श्री गुरुदेव ही परात्पर एवं परम गुरु हैं। तीनों नाथ गुरु उनमें समाए हैं। उन्हीं में गणपति का वास है। तन्त्र साधना के तीनों रहस्यमय पीठ उन्हीं में है। अष्ट भैरव, विरंचि चक्र, सभी मण्डल, पंचवीर, नव मुद्राएँ, चौसठ योगिनियाँ, सभी मातृकाएँ उन गुरुदेव के ही चेतना मण्डल में अवस्थित हैं। साधना की जितनी भी प्रक्रियाएँ हैं, उन सभी का कोई भी महत्त्वपूर्ण तत्त्व उनसे अलग नहीं है। सभी कुछ उन्हीं शिष्यवत्सल प्रभु में समर्पित है।
गुरुदेव भगवान् के इस अध्यात्ममय स्वरूप को स्पष्ट करने के बाद भगवान् सदाशिव साधकों को निर्देश देते हैं- कि अपने परम पूज्य गुरुदेव का आश्रय छोड़कर अन्य कहीं भी न भटको। वेदान्त एवं तन्त्र की किन्हीं रहस्यमय उलझनों में मत उलझो। सद्गुरु शरण में, सद्गुरु समर्पण में सब कुछ है। इस तथ्य को और भी अधिक स्पष्ट स्वरों में बताते हुए देवाधिदेव महादेव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-
अभ्यस्तैः सकलैः सुदीर्घमनिलैः व्याधिप्रदैर्दुष्करैः प्रणायाम शतैरनेककरणै र्दुःखात्मकैर्दुजयैः।
यस्मिन्नभ्युदिते विनश्यति बली वायुः स्वयं तत्क्षणात् प्राप्तुँ तत्सहजं स्वभावमनिशं सेवध्वमेकं गुरुम्॥ 53॥
स्वदेशिकस्यैव शरीर चिन्तनं भवेदनन्तस्य शिवस्य चिन्तनं। स्वदेशिकस्यैव च नाम कीर्तनं भवेदनन्तस्य शिवस्य कीर्तनं॥ 54॥
गुरुदेव की आध्यात्मिक चेतना के रहस्य को प्रकट करने वाले ये मंत्र अपने फलितार्थ में रहस्यमय एवं गूढ़ होते हुए भी प्रक्रिया में अति सरल हैं। देवाधिदेव महादेव स्कन्दमाता जगदम्बा से कहते हैं, देवी! दुःख देने वाले, रोग उत्पन्न करने वाले, इन्द्रियों को पीड़ा पहुँचाने वाले, दुर्जय दीर्घश्वास की क्रिया रूपी सैकड़ों की संख्या में प्राणायाम के अभ्यास का भला क्या सुफल है? अरे! जिनकी चेतना के अन्तःकरण में उदय होने मात्र से बलवान वायु तत्क्षण स्वयं प्रशमित हो जाती है। ऐसे गुरुदेव की निरन्तर सेवा करनी चाहिए। क्योंकि इस गुरुसेवा से सहज ही आत्मलाभ हो जाता है॥ 53॥ अपने गुरुदेव के स्वरूप का थोड़ा सा भी चिन्तन भगवान् शिव के स्वरूप के अनन्त चिन्तन के समान है। गुरुदेव के नाम का थोड़ा सा भी कीर्तन भगवान् शिव के अनन्त नाम कीर्तन के बराबर है॥ 54॥
गुरुगीता के इन मन्त्रों के अर्थ को अधिक स्पष्ट रीति से समझने के लिए गुरुभक्ति साधना की एक सत्यकथा साधकों के समक्ष प्रस्तुत है। यह कथा आदि गुरु शंकराचार्य एवं उनके शिष्य तोटकाचार्य से सम्बन्धित है। आचार्य शंकर उन दिनों बद्रीनाथ धाम में वेदान्त दर्शन पर अपने प्रसिद्ध शारीरिक भाष्य को लिख रहे थे। वेदान्त दर्शन यानि कि ब्रह्मसूत्र पर यह सुप्रसिद्ध भाष्य है। इसकी एक-एक पंक्ति में वेदान्त साधना एवं ब्रह्मज्ञान के अद्भुत रहस्य संजोये हैं। हिमालय के शुभ्र धवल शिखरों की छाँव में भगवान् नारायण की पावन तपस्थली में उन दिनों आचार्य की लेखन पयस्विनी प्रवाहित हो रही थी। आचार्य का प्रायः सम्पूर्ण दिन अपने एकान्त चिन्तन एवं लेखन में बीतता था। दिन के अन्तिम प्रहर में सन्ध्या से पूर्व आचार्य अपने भाष्य के लिखित अंशों को शिष्यों को पढ़ाते थे।
आदिगुरु भगवान् शंकराचार्य के शिष्यों में पद्मपाद, सुरेश्वर आदि परम विद्वान शिष्य थे। विद्वान शिष्यों की इस मण्डली में एक मूढ़मति मन्दबुद्धि, बेपढ़ा-लिखा एक बालक भी था। यह बालक बिना पढ़ा-लिखा भले ही था, उसकी बुद्धि भले ही तीव्र न थी, परन्तु उसका हृदय आचार्य के प्रति भक्ति से भरा था। आचार्य उसके लिए सर्वस्व थे। आचार्य की सेवा ही उसका जीवन था। इसके अलावा उसे और कुछ भी न आता था। उसकी मूढ़ता और मन्दबुद्धि पर कभी-कभी आचार्य के अन्य शिष्य उपहास भी कर लेते थे। पर इससे उसे कोई फर्क न पड़ता था। वह तो बस गुरुगत प्राण था। गुरुसेवा के अलावा उसे और कोई चाह न थी। फिर भी आचार्य न जाने क्यों उसे अपनी सायं कक्षा में बुलाना न भूलते थे।
एक दिन आचार्य की नियमित कक्षा का समय हो गया था। पद्मपादाचार्य, सुरेश्वराचार्य, हस्तामलकाचार्य आदि सभी भगवान् शंकराचार्य के श्रीचरणों के समीप आ जुटे थे। किन्तु आचार्य का वह सेवक शिष्य दिखाई नहीं दे रहा था। आचार्य को उसी की प्रतीक्षा थी। वह रह-रहकर इधर-उधर देख लेते। कक्षा में विलम्ब हो रहा था। उपस्थित शिष्यों में से प्रत्येक को प्रतीक्षा असह्य हो रही थी। सभी को भारी उत्सुकता थी कि उनके गुरुदेव ने आज नया क्या लिखा है। यह उत्सुकता अपने चरम बिन्दु पर जा पहुँची। पर कोई कुछ कह नहीं पा रहा था। अन्त में पद्मपाद ने साहस किया, पाठ प्रारम्भ करने की कृपा करें भगवन्। वत्स! मुझे अपने एक शिष्य की प्रतीक्षा है। आचार्य ने उत्तर दिया। पर वह तो निरा विमूढ़ है भगवन्। उसका आना न आना दोनों ही एक जैसे हैं। पद्मपाद के स्वरों में विनम्रता होते हुए भी एक खीझ थी।
आचार्य भगवत्पादशंकर से यह बात छुपी न रही। उन्होंने यह जान लिया कि उनके इन विद्वान शिष्यों को अपनी विद्वता का कुछ अभिमान हो आया है। शिष्यों का गर्व हरण करने वाले आचार्य शंकर मुस्कराए और एक क्षण के लिए ध्यानस्थ हो गए। उनका वह शिष्य, जिसकी उन्हें प्रतीक्षा थी, उन्हीं के वस्त्र धोने के लिए गया था। यह उसका नित्य का कार्य था। किन्तु आज अचानक उसके अन्तःकरण में समस्त विद्याएँ एक साथ प्रकाशित हो गयी। वह गुरुकृपा की इस अनुभूति पर कृतकृत्य हो गया। अपने काँधे पर गुरुदेव के धुले वस्त्रों को लिए हाथ जोड़े तोटक छन्दों में आचार्य की स्तुति करते हुए वह चला आ रहा था।
विदिताखिलशास्त्र सुधा जलधे, महितोपनिषत्कथितार्थनिधे। हृदये कमले विमलं चरणं, भवशंकरदेशिकमम् शरणं॥
करुणावरुणालय पालयमाम्, भवसागरदुःखविदून हृदम्। रचयाखिल दर्शन तत्त्वविदं, भव शंकरदेशिकमम् शरणं॥
तोटक छन्द में स्व स्फुरित इस गुरु वन्दना को सुनकर वहाँ उपस्थित सभी अवाक् रह गए। उन्हें भारी अचरज तो तब हुआ, जब उसे आचार्य ने आदेश दिया- वत्स!
आज मेरे स्थान पर तुम इन्हें ब्रह्मसूत्र पर मेरे मन्तव्य को समझाओ। इतना ही नहीं, तुम इनके सम्मुख उन सूत्रों की व्याख्या भी करो, जिन पर अभी मैंने भाष्य नहीं लिखा है। तोटकाचार्य- जो आज्ञा गुरुदेव! कहकर आचार्य की आज्ञा का पालन कर दिखाया। तोटकाचार्य की अनायास उदित हुई प्रखर प्रतिभा को देखकर सभी को इस सत्य की अनुभूति हो गया कि तोटकाचार्य पर गुरु-कृपा बरस गयी है। त्राहिमाम गुरुदेव! कहते हुए सभी शिष्य आचार्य के चरणों में गिर पड़े। आचार्य ने उन्हें निराभिमानी बनने की सलाह दी। सभी अनुभव कर रहे थे कि गुरु-कृपा से सब कुछ सम्भव है। असम्भव को सम्भव करने वाली गुरु-कृपा के अन्य आयामों को सभी शिष्य साधक अगले अंक में पढ़ेंगे।
स्वर्गीय गोखले के लेखों और भाषणों का अनुवाद गुजराती में करने का कार्य एक सज्जन को सौंपा गया। वह छपने भी लगा। उसकी भूमिका गाँधी जी को लिखनी थी। छपे फर्मे सामने आए और अनुवाद का स्तर देखा गया तो वह घटिया प्रतीत हुआ।
गाँधी जी ने कहा, “अप्रामाणिक वस्तु जनता को दूँ, यह मुझसे न हो सकेगा।” उन्होंने सारे छपे हुए फर्मे जलवा डाले, उन्हें रद्दी में नहीं बेचने दिया गया।
समापन किश्त (गताँक से आगे)
पहले थ्योरी समझें
पूजा ओर पाठ किस चीज का नाम है? दीवार को गिरा देने का, इसी ने हमारे और भगवान के बीच में लाखों कि.मी. की दूरी खड़ी कर दी है, जिससे भगवान हमको नहीं देख सकता और हम भगवान को नहीं देख सकते। हम इस दीवार को गिराना चाहते है। उपासना का वास्तव में यही मकसद है। छैनी और हथौड़े को जिस तरह से हम दीवार गिराने के लिए इस्तेमाल करते हैं, उसी तरीके से अपनी सफाई करने के लिए पूजा पाठ के , भजन के कर्मकांड का, क्रियाकृत्य का उपयोग करते है। भजन उसी का उद्देश्य पूरा करता है। यह मैं आपको फिलॉसफी समझना चाहता था। अगर आप अध्यात्म की फिलॉसफी समझ जाए, इस थ्योरी को समझ जाए तो आपको प्रेक्टिस से फायदा हो सकता है। नहीं साहब, हम तो प्रेक्टिस से इम्तिहान देंगे, थ्योरी में नहीं देंगे, किसका इम्तिहान देना चाहते है? हम तो साहब वाइवा देंगे और थ्योरी के परचे आएंगे तो? थ्योरी, थ्योरी के झगड़े में हम नहीं पड़ते, हम तो आपको सुना सकते हैं। हम फिजिक्स जानते हैं। देखिए ये हाइड्रोजन गैस बना दी। देखिए ये शीशी इसमें डाली और ये शीशी इसमें डाली, बस ये पानी बन गया। अच्छा अब आप हमको साइंस में एम एससी की उपाधि दीजिए। गैस क्या होती है? गैस, गैस क्या होती है, हमें नहीं मालूम। इस शीशी में से निकाला ओर इस शीशी में डाला, दोनों को मिलाया, पानी बन गया। अब आपको शिकायत क्या है इससे? नहीं साहब, आपको साइंस जाननी पड़ेगी, फिजिक्स पढ़नी पड़ेगी तब सारी बातें जानेंगे। नहीं साहब जानेंगे नहीं।
बेटे , आपको जानना चाहिए और करना चाहिए। जानकारी और करना दोनों के समन्वय का नाम एक समग्र अध्यात्मवाद होता है। मैंने आपको अध्यात्म के बारे में इन थोड़े से शब्दों में समझाने की कोशिश की कि आप क्रिया कृत्यों के साथ साथ आत्म संशोधन की प्रक्रिया को मिलाकर रखें तो हमारा उद्देश्य पूरा हो सकता है। बच्चों को यही करना पड़ता है। पूजा का हर काम बड़ा कठिन है। नहीं साहब! सरल बता दीजिए। सरल तो एक ही काम है और वह है मरना। मरने से सरल कोई काम नहीं है। जिंदगी, जिंदगी बड़ी कठिन है। जिंदगी के लिए आदमी को संघर्ष करना पड़ता है, लड़ना पड़ता है। प्रगति के लिए हर आदमी को लड़ना पड़ा, संघर्ष करना पड़ा। मरने के लिए क्या करना पड़ता है? मरने के लिए तो कुछ भी नहीं करना पड़ता। छत के ऊपर चढ़कर चले जाओ और गिरो, देखो अभी खेल खत्म। गंगाजी में चले जाओ झट से डुबकी मारना, बहते हुए चले जाओगे। बेटे,मरना ही सरल है। पाप ही सरल है, पतन ही सरल है। अपने आपका विनाश ही सरल है। दियासलाई की एक तीली से अपने घर को आग लगा दीजिए। आपका घर जो पच्चीस हजार रुपये का था, एक घंटे में जलकर राख हो जाएगा। तमाशा देख लीजिए। आहा गुरुजी! देखिए हमारा कमाल, हमारा चमत्कार। क्या चमत्कार है? देखिए पच्चीस हजार रुपये का सामान था, हमारे घर में, हमने दियासलाई की एक तीली से जला दिया। कमाल है न वाह भई वाह! बहादुर हो तो ऐसा, जो एक तीली से पच्चीस हजार रुपये जला दे।
कमाना कठिन गंवाना सरल
मित्रो! पच्चीस हजार रुपये कमाना कितना कठिन होता है, कितना जटिल होता है, आप सभी जानते है। इसी तरह जीवन को, व्यक्तित्व को बनाना, विकसित करना कितना कठिन, कितना जटिल है। यह उन लोगों से पूछिए जिन्होंने सारी जिंदगी मेहनत मशक्कत की और आखिर के दिनों में पंद्रह हजार रुपये का मकान बना पाए। देखिए साहब, अब हम मर रहे हैं, लेकिन हमने इतना तो कर लिया कि अपने बाल बच्चों के लिए एक मकान बनाकर छोड़े जा रहे है। निज का मकान तो है। पंद्रह हजार रुपये बेटा क्या है? पंद्रह हजार रुपये हमारी सारी जिंदगी की कीमत है। जिंदगी की कीमत किसे कहते है? अपने व्यक्तित्व को बनाना, अपने जीवन को बनाना, अपनी जीवात्मा को महात्मा, देवात्मा बनाना और परमात्मा बनाना, यह विकास कितना बड़ा हो सकता है? इसके लिए कितना संघर्ष करना चाहिए, कितनी मेहनत करनी चाहिए, कितना परिश्रम और कितना परिष्कार करना चाहिए।
अगर आपके मन में यह बात नहीं आई और आप यही कहते रहे कि सरल रास्ता बताइए, सस्ता रास्ता बताइए, तो मैं यह समझूंगा कि आप जिस चीज को बनाना चाहते है, असल में उसकी कीमत नहीं जानते। कीमत जानते होते तो आपने सरल रास्ता नहीं पूछा होता। आप इंग्लैंड जाना चाहते हैं? अच्छा साहब, इंग्लैंड जाने के लिए छह हजार रुपये लाइए, आपको हवाई जहाज का टिकिट दिलवाएं। नहीं साहब, इतने पैसे तो नहीं खरच कर सकते। क्या करना चाहते हैं? सरल रास्ता बताइए इंग्लैंड जाने का। इंग्लैंड जाने का रास्ता जानना चाहते हैं? कैसा सरल रास्ता बताऊं बेटे? बस गुरुजी ज्यादा से ज्यादा मैं छह नए पैसे खरच कर सकता हूँ पहुंचा दीजिए न। अच्छा ला छह नए पैसे। इंग्लैंड अभी चुटकी में पहुंचाता हूँ ये देख हरिद्वार में बैठा था और पहुंच गया इंग्लैंड देख ये लिखा हुआ है इंग्लैंड। अरे महाराज जी, यह तो आप चालाकी की बात कहते हैं। अच्छा बेटे, तू क्या कर रहा था? तू चालाकी नहीं कर रहा था। नहीं महाराज जी, भगवान तक पहुंचा दीजिए, मुफ्त में अपनी सिद्धि से पहुंचा दीजिए। यहां पहुंचा दीजिए, वहां पहुंचा दीजिए। पागल कही का, पहुंचा दे तुझे जहन्नुम में। तू कही नहीं जा सकता, जहां है वही बैठा रह।
कीमत चुकाइए
इसलिए मित्रो! ऊंचा उठने और श्रेष्ठ बनने के लिए जिस चीज की, जिस परिश्रम की जरूरत है, उसके लिए आप कमर कसकर खड़े हो जाइए, कीमत चुकाइए और सामान खरीदिए। पाँच हजार रुपये लाइए, हीरा खरीदिए। नहीं साहब, पाँच पैसे का हीरा खरीदूंगा। बेटे, पाँच पैसे का हीरा न किसी ने खरीदा है और न कही मिल सकता है। सस्ते में मुक्ति बेटे हो ही नहीं सकती। अगर तुम कठिन कीमत चुकाना चाहते हो तो सुख शाँति पा सकते हो। सुख और शाँति पाने के लिए हमको कितनी मशक्कत करनी पड़ी है, आप इससे अंदाजा लगा लीजिए। सुख बड़ा होता है या शाँति? पैसे वाला बड़ा होता है या ज्ञानवान? बनिया बड़ा होता है या पंडित? तू किसको प्रणाम करता है- बनिया को या पंडित को और किसके पैर छूता है? लालाजी के या पंडित जी के? पंडित जी के क्यों? क्योंकि वह बड़ा होता है। ज्ञान बड़ा होता है और धन कमजोर होता है। इसलिए सुख की जो कीमत हो सकती है, शाँति की कीमत उससे ज्यादा होनी चाहिए। सुख के लिए जो मेहनत, जो मशक्कत, जो कठिनाई उठानी पड़ती है, शाँति के लिए उससे ज्यादा उठानी पड़ती है और उठानी भी चाहिए। आपको यदि यह सिद्धाँत समझ में आ जाए तो मैं समझूंगा कि आपने कम से कम वास्तविकता की जमीन पर खड़ा होना तो सीख लिया। आप इस पर अपनी इमारत भी बना सकते है और जो चीज पाना चाहते है वह पा भी सकते है।
इतना बताने के बाद अब मैं आपको क्रियायोग की थोड़ी सी जानकारी देना चाहूंगा। उपासना की सामान्य प्रक्रिया हम आपको पहले से बताते रहे है। उसमें सबसे पहला प्रयोग चाहे वह उपासना के पंचवर्षीय साधनाक्रम में शामिल हो, चाहे हवन में, चाहे अनुष्ठान में, पाँच कृत्य आपको अवश्य करने पड़ते है- यह आत्मशोधन की प्रक्रिया पाँच है-(1) पवित्रीकरण करना (2) आचमन करना (3)शिखाबंधन (4)प्राणायाम और (5) न्यास। इन चीजों के माध्यम से मैंने आपको एक दिशा दी है, एक संकेत दिया है। हमने यह नियम बनाया है कि आपको स्नान करना चाहिए, प्राणायाम करना चाहिए न्यास करना चाहिए। इन माध्यमों से आपको अपनी प्रत्येक इंद्रिय का परिशोधन करना चाहिए।
आत्मशोधन
मित्रों! हमारी हर चीज संशोधित और परिष्कृत होनी चाहिए, स्नान की हुई होनी चाहिए। न्यास में हम प्रत्येक इंद्रिय के परिशोधन की प्रक्रिया की ओर आपको इशारा करते है और कहते है कि इन सब इंद्रियों को आप सही कीजिए, इंद्रियों को ठीक कीजिए। न्यास में हम आपको आंख से पानी लगाने के लिए कहते है, मुंह से, वाणी से पानी लगाने के लिए कहते है। पहले आप इनको धोइए। मंत्र का जप करने से पहले जीभ को धोकर लाइए। तो महाराज जी! जीभ का संशोधन पानी से होता है? नहीं बेटे, पानी से नहीं होता। पानी से इशारा करते हैं जिह्वा के संशोधन का, इंद्रियों के संशोधन का। जिह्वा का स्नान कही पानी पीकर हो सकता है? नहीं, असल में हमारा इशारा जिह्वा के प्राण की ओर है, जिसका शोधन करने के लिए अपने आहार और विहार दोनों का संशोधन करना पड़ेगा।
मित्रो! हमारी वाणी दो हिस्सों में बांटी गई है, एक को ‘रसना’ कहते हैं, जो खाने के काम आती है ओर दूसरी को वाणी का भाग कहते हैं, जो बोलने के काम आती है। खाने के काम से मतलब यह है कि हमारा आहार शुद्ध और पवित्र होना चाहिए, ईमानदारी का कमाया हुआ होना चाहिए। गुरुजी! मैं तो अपने हाथ का बनाया हुआ खाता हूँ। नहीं बेटे, अपने हाथ से बनाता है कि पराये हाथ का खाता है, यह इतना जरूरी नहीं है। ठीक है सफाई का ध्यान होना चाहिए, गंदे आदमी के हाथ का बनाया हुआ नहीं खाना चाहिए, ताकि गंदगी आपके शरीर में न जाए, लेकिन असल में जहाँ तक आहार का संबंध है, जिह्वा के संशोधन का संबंध है, उसका उद्देश्य यह है कि हमारी कमाई अनीति की नहीं होनी चाहिए, अभक्ष्य की नहीं होनी चाहिए। आपने अनीति की कमाई नहीं खाई है, अभक्ष्य की कमाई नहीं खाई है, दूसरों को पीड़ा देकर आपने संग्रह नहीं किया है। दूसरों को कष्ट देकर, विश्वासघात करके आपने कोई धन का संग्रह नहीं किया है तो आपने चाहे अशोका होटल में बैठकर प्लेट में सफाई से खा लिया हो, चाहे पत्ते पर खा लिया हो, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं है।
अपने श्रम की कमाई खाएँ
मित्रों! ईमानदारी का कमाया हुआ धान्य, परिश्रम से कमाया हुआ धान्य नहीं है। ध्यान रखें, हराम की कमाई को भी मैंने चोरी का माना है। जुए की कमाई, लाटरी की कमाई, सट्टे की कमाई ओर बाप दादाओं की दी हुई कमाई को भी मैंने चोरी का माना है। हमारे यहाँ प्राचीनकाल से ही श्राद्ध की परंपरा है। श्राद्ध का मतलब यह था कि जो कमाऊ बेटे होते थे, बाप दादो की कमाई को श्राद्ध में दे देते थे, अच्छे काम में लगा देते थे, ताकि बाप की जीवात्मा, जिसने जिंदगी भर परिश्रम किया है, उसकी जीवात्मा को शाँति मिले। हम तो अपने हाथ पांव से कमाकर खाएंगे। ईमानदार बेटे यही करते थे। ईमानदार बाप यही करते थे कि अपने बच्चों को स्वावलंबी बनाने के लिए उसे इस लायक बनाकर छोड़ा करते थे कि अपने हाथ पांव की मशक्कत से वे कमाए खाएं।
अपने हाथ की कमाई, पसीने की कमाई खा करके कोई आदमी बेईमान नहीं हो सकता, चोर नहीं हो सकता, दुराचारी नहीं हो सकता, व्यभिचारी नहीं हो सकता, कुमार्गगामी नहीं हो सकता। जो अपने हाथ से कमाएगा, उसे मालूम होगा कि खरच करना किसे कहते हैं। जो पसीना बहाकर कमाता है, वह पसीने से खरच करना भी जानता है। खरच करते समय उसको कसक आती है, दर्द आता है, लेकिन जिसे हराम का पैसा मिला है, बाप दादों का पैसा मिला है, वह जुआ खेलेगा, शराब पिएगा और बुरे से बुरा कर्म करेगा। कौन करेगा पाप? किसको पड़ेगा पाप? बाप को। क्यों पड़ेगा? मैं इसे कमीना कहूंगा, जिसने कमा कमाकर किसी को दिया नहीं। बेटे को दूंगा, सब जमा करके रख गया है दुष्ट कही का। वह सब बच्चों का सत्यानाश करेगा। मित्रो! हराम की कमाई एक और बेईमानी की कमाई दो, दोनों में कोई खास फर्क नहीं है, थोड़ा सा ही फर्क है। ईमानदारी और परिश्रमी व्यक्ति हराम की और बेईमानी की कमाई नहीं खाते।
वाणी का सुनियोजन करिए
मित्रो! आपकी जिह्वा इस लायक है कि इससे जो भी आप मंत्र बोलेंगे, सही होते हुए चले जाएंगे और सार्थक होते चले जाएंगे, अगर आपने जिह्वा का ठीक उपयोग किया है तब और आपने दूसरों को बिच्छू के से डंक चुभोए नहीं है, दूसरों का अपमान किया नहीं है। दूसरों को गिराने वाली सलाह दी नहीं है , दूसरों की हिम्मत तोड़ने वाली सलाह दी नहीं है। जो यह कहते हैं कि हम झूठ नहीं बोलते। अरे! झूठ तो नहीं बोलता, पर दूसरों का दिल तोड़ता है दुष्ट। हमें हर आदमी की हिम्मत बढ़ानी चाहिए और ऊंचा उठाना चाहिए। आप तो हर आदमी को मार गिरा रहे हैं, उसे डिमारलाइज कर रहे हैं। आपने कभी ऐसा किया है कि किसी को ऊंचा उठाने की बात की है। आपने तो हमेशा अपनी स्त्री को गाली दी कि तू बड़ी पागल है, बेवकूफ है, जाहिल है। जब से घर में आई है सत्यानाश कर दिया है। जब से वह आपके घर आई, तब से हमेशा बेचारी की हिम्मत आप गिराते हुए चले गए। उसका थोड़ा बहुत जो हौसला था, उसे आप गिराते हुए चले गए।
महाभारत में कर्ण और अर्जुन दोनों का जब मुकाबला हुआ तो कृष्ण भगवान ने शल्य को अपने साथ मिला लिया। उससे कहा कि तुम एक काम करते रहना, कर्ण की हिम्मत कम करते जाना। कर्ण जब लड़ने के लिए खड़ा हो तो कह देना कि अरे साहब! आप उनके सामने क्या है? कहा भगवान और अर्जुन और कहा आप सूत के बेटे, दासी के बेटे? भला आप क्या कर सकते है? देखिए अर्जुन सहित पांचों पाँडव संगठित है। वे मालिक है और आप नौकर है। आपका और उनका क्या मुकाबला? बेचारा कर्ण जब कभी आवेश में आता, तभी वह शल्य ऐसी फुलझड़ी छोड़ देता कि उसका खून ठंडा हो जाता। आपने भी हरेक का खून ठंडा किया है। आपने झूठ बोलने से भी ज्यादा जुर्म किया है। एक बार आप झूठ बोल सकते थे।
आपके झूठ में इतनी खराबी नहीं थी, जितनी कि आपने हर आदमी को जिसमें आपके बीबी बच्चे भी शामिल हो, आपने हरेक को नीचे गिराया। आपने किसी का उत्साह बढ़ाया, हिम्मत बढ़ाई? किसी की प्रशंसा की? नहीं, आपने जीभ से प्रशंसा नहीं की, हर वक्त निंदा की, इसकी निंदा की, उसकी निंदा की। आप निंदा ही करते रहे। मित्रो! हमारी जीभ लोगों का जी दुखाने वाली, टोचने वाली नहीं होनी चाहिए। टोचने वाली जीभ से जब भी हम बोलते है, कड़ुवे वचन बोलते है। क्या आप मीठे वचन कहकर वह काम नहीं करा सकते, जो आप कड़ुवे वचन बोलकर या गाली देकर कराना चाहते है, वह प्यार भरे शब्द, सहानुभूति भरे शब्द कहकर नहीं करा सकते? करा सकते है।
जिह्वा ही नहीं, हर इंद्रिय का सदुपयोग करें
मित्रो! ये जिह्वा का संकेत है, जो हम बार बार पानी पीने के नाम पर, पवित्रीकरण के नाम पर, आचमन करने के नाम पर आपको सिखाते है और कहते है कि जीभ को धोइए, जीभ को साफ कीजिए। जिह्वा को आप ठीक कर लें तो आपका मंत्र सफल हो जाएगा। तब राम नाम भी सफल हो सकता है, गायत्री मंत्र भी सफल हो सकता है और जो भी आप चाहें सफल हो सकता है।
यह आत्मसंशोधन की प्रक्रिया है। जीभ का तो मैंने आपको एक उदाहरण दिया है। इसके लंबे में कहा तक जाऊँ कि आपको सारी की सारी इंद्रियों का वर्णन करूं और उनके संशोधन की प्रक्रिया बताऊं कि आप अमुक इंद्रिय का संशोधन कीजिए। आंखों का संशोधन कीजिए। आंखों में जो आपके शैतान बैठा रहता है, जो छाया के रूप में प्रत्येक लड़की को आपको वेश्या दिखाता है। स्कूल पढ़ने कौन जाती है वैश्या ये कौन बैठी है वेश्या! सड़क पर कौन जाती है? गंगाजी पर कौन नहा रही है? सब वेश्या । अरे साहब! दुनिया में कोई सती साध्वी, बेटी,माँ,बहन कोई है? नहीं साहब! दुनिया में कोई बहन नहीं होती, कोई बेटी नहीं होती। जितनी भी रेलगाड़ियों में चल रही है, जितनी भी गंगाजी में नहाती है, जो स्कूल जा रही है, ये सब वेश्या है। नहीं बेटे, ये वेश्या कैसे हो सकती है। तेरी भी तो कन्या होगी? तेरी भी तो लड़की स्कूल जा रही होगी। वह भी फिर वेश्या है क्या? नहीं साहब! हमारी लड़की तो वेश्या नहीं है। बाकी सब वेश्या है। ये कैसे हो सकता है? बेटे, यह तेरे आँखों का राक्षस, आंखों का शैतान, आंखों का पशु और आंखों का पिशाच तेरे दिल दिमाग में छाया हुआ है। यही तुझे यह दृश्य दिखाता है। इसका संशोधन कर, फिर देख तुझे हर लड़की में, हर नारी में अपनी बेटी, अपनी बहन ओर अपनी माँ की छवि दिखाई देगी।
दृष्टि बदले, अपने आपे को संशोधित करें
बेटे, इन आंखों से देखने की जिस चीज की जरूरत है, वह माइक्रोस्कोप तेरे पास होना चाहिए। क्या देखना चाहता है? गुरुजी। सब कुछ देखना चाहता हूँ। बेटे, इन आँखों से नहीं देखा जा सकता । इसको देखने कि लिए माइक्रोस्कोप के बढ़िया वाले लेंस चाहिए। कौन से बढ़िया वाले लेंस “दिव्य ददामि ते चक्षुः” तुझे अपनी आँखों में दिव्यचक्षु को फिट करना पड़ेगा। फिर देख कि तुझे भगवान दिखाई पड़ता है कि नहीं पड़ता। “सियाराममय सब जग जानी” की अनुभूति होती है कि नहीं। फिर जर्रे जर्रे में भगवान, पत्ते पत्ते में भगवान तुझे दिखाई पड़ सकता है, अगर तेरी आँखों के लेंस सही कर दिए जाए तब। अगर लेंस यही रहे तो बेटे, फिर तुझे पाप के अलावा, शैतान के अलावा, हर जगह चालाकी, बेईमानी, हर जगह धूर्तता और दुष्टता के अलावा कुछ भी नहीं दिखाई पड़ सकता।
मित्रो! अध्यात्म पर चलने के लिए आत्मसंशोधन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। पूजा उपासना के सारे कर्मकाँड, सारे के सारे क्रिया कृत्य आत्मसंशोधन की प्रक्रिया की ओर इशारा करते है। मैंने आपको जो समझना था, वह सूत्र बता दिया। हमारा अध्यात्म यही से शुरू होता है। इसलिए यह जप नहीं हो सकता, भजन नहीं हो सकता, कुछ नहीं हो सकता। केवल यही से अर्थात् आत्म संशोधन से हमारा अध्यात्म शुरू होता है। आत्मसंशोधन के बाद ही देवपूजन होता है। देवता बनकर ही देवता की पूजा की जाती है। आज की बात समाप्त।
संत शिवली को खलीफा ने कीमती कपड़े उपहार में दिए। साथ में नौकर भेजा जो सामान को घर तक पहुंचा आए।
नौकर ने बेशकीमती कपड़े गंदे कर दिए। फलतः वे फेंकने पड़े। खलीफा को नौकर की इस हरकत का पता चला तो उसे नौकरी से बरखास्त कर दिया।
जब इस प्रसंग की चर्चा सत्संग में हुई तो संत ने कहा-” ईश्वर हम सबको कीमती कपड़ों जैसा शरीर और साधन संपदा देता है। अगर हम उस बहुमूल्य संपदा को यों ही मूर्खतावश गवाँ दे तो फिर बदनामी और बर्खास्तगी के सिवाय और क्या मिलेगा?
(आत्मसंयम योग नामक श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय की युगानुकूल व्याख्या-प्रथम किस्त)
जीवन जीने की शिक्षण संदर्शिका
श्री गीताजी के प्रथम छह अध्याय कर्मयोग प्रधान है, यह तथ्य सभी जानते है। फिर भी योगेश्वर स्थान स्थान पर ज्ञान व भक्ति की महिमा बताते चलते हैं। योगमयी का गुंथन पारस्परिक समन्वयात्मक प्रतिपादन जिस सुंदर ढंग से हुआ है, उसमें ही इस काव्य की विशेषता है। हर व्यक्ति के लिए इन श्लोकों व उनकी व्याख्या के माध्यम से जीवन जीने का विधिवत मार्गदर्शन है। अर्जुन युद्धक्षेत्र में जब श्रीकृष्ण का शिष्यत्व स्वीकार कर लेता है।
(शिष्यस्तेडह शाधि माँ त्वाँ प्रपन्नम-2/7) तब श्रीकृष्ण उसे उपदेश देते है। ‘ततो युद्धाय युज्यस्व’ कहकर वे उसे बार बार कर्मयोग में तत्पर होने को कहते है। तो क्या युद्ध ही एकमात्र कर्म है? भगवान अर्जुन के माध्यम से कर्मों का जीवन में महत्व, कर्म अकर्म विकर्म की व्याख्या, दिव्यकर्मियों के लक्षण, युगधर्म के अनुरूप कर्म यज्ञरूपी सत्कर्म तथा माहात्म्यपरक विस्तृत विवेचन हम सभी जनसामान्य स्तर के जिज्ञासु साधकों के लिए प्रस्तुत करते है। पहले से पांचवें अध्याय की यात्रा में उन्होंने केवल स्थितप्रज्ञ की विस्तार से व्याख्या की है, सृष्टि की उत्पत्ति, यज्ञ एवं यज्ञीय जीवन का महत्व तथा ज्ञान से मिलने वाली परम शाँति का बोध भी कराया है। अब कर्मयोग की पराकाष्ठा पर योगेश्वर’ आत्म संयमयोग‘ नामक ब्रह्मविद्या के योग शास्त्र की व्याख्या पर आते है। बिना संयम सधे न अर्जुन साधक बन पाएगा, दिव्यकर्मी बन सकेगा, न हम। हम सभी को आत्मसंयम का मर्म समझाने हेतु युद्धभूमि में दोनों सेनाओं के बीच खड़े श्रीकृष्ण बड़ा सरस प्रतिपादन प्रस्तुत करते है।
संयम मन की महिमा का योग
इस छठे अध्याय में कही भी श्रीकृष्ण ने युद्ध की चर्चा नहीं की है, पर युद्ध तो वही कर सकता है, जो एकाग्रचित्त हो, संयत मन वाला हो, बलशाली हो तथा समबुद्धि से सब कुछ देखता हो। जीवन संग्राम भी ऐसे ही व्यक्ति जीतते है। जीवन जीने की कला की धुरी है
आत्मसंयम योग। जीवन को हर पल हर श्वास में कैसे जिया जाए, इसकी व्याख्या है इस अध्याय में। अर्जुन इस अध्याय में श्रीकृष्ण को दो बार टोकता है, अपनी जिज्ञासाएं सामने रखता है। एक प्रकार से वे हम सबकी जिज्ञासाएं भी है। उसे सम्यक् समाधान मिलता है -जीवन जीने की दृष्टि मिलती है एवं “ यो माँ पर्श्यात सर्वत्र......सचमेन प्रणश्यति”(6/30) जैसे सुविख्यात श्लोक रूपी आश्वासन के साथ उसे तपस्वी एवं योगाभ्यासी में अंतरं जानने को मिलता है। योगीजनों में, दिव्यकर्मियों में भी श्रीकृष्ण को भक्तिमार्ग पर चलने वाले ज्यादा प्रिय है, यह भी अंतिम श्लोक में उद्घाटन होता है।
‘आत्मसंयम योग‘ नामक इस अध्याय में कर्मयोग के विषय व योगारुढ़ पुरुष के लक्षण बताए गए है। साथ ही आत्मोद्धार के लिए प्रेरणा एवं भगवत्प्राप्त पुरुष की विशिष्टताएं भी बताई गई है। ध्यानयोग की विस्तार से व्याख्या है। कैसे ध्यान किया जाए? कैसे विचारो का सुनियोजन हो, मन का निग्रह कैसे सधे? यह चर्चा इस अध्याय में बड़े स्पष्ट रूप में प्रस्तुत की गई है। अंत में योगभ्रष्ट पुरुष की गति क्या होती है, यह समझाकर वे ध्यान योग की महिमा बताकर समापन कर देते है। संक्षेप में यह है इस सैंतालीस श्लोक वाले एक महत्वपूर्ण अध्याय की सिनाप्सिस।
इस अध्याय में हम प्रवेश कर रहे है तो पहले इसके मर्म को समझ ले। यहाँ विचार जल्दबाजी में, युद्ध की मनोभूमि में व्यक्त नहीं किए गए है, अपितु बड़ी शांति के साथ, धीरे धीरे बुद्धि संस्थान में स्थापित किए गए है। इस अध्याय को समझ लेने वाले को फिर एक दिव्यकर्मी, श्रेष्ठ योगी बनने में कोई संशय नहीं रहता। कई भ्रांतियां भी ध्यान के विषय में इस अध्याय के द्वारा निर्मूल की गई है। अपने प्रिय शिष्य के प्रति श्रीकृष्ण का भाव इस अध्याय में पूर्व में डाट लगाने वाले गुरु का नहीं है, अपितु बड़े ही प्रेमपूर्वक शाँतिभाव से उन्होंने अर्जुन को समझाने का प्रयास किया है। जब पहले व दूसरे अध्याय में उसके मन का विषाद निकला था, तब श्रीकृष्ण को डाट लगानी पड़ी थी, वे झल्ला पड़े थे, पर यहां वे पार्थ की ही नहीं हम सबकी मानसिक दुर्बलताओं को लक्ष्य कर बड़े विस्तार से (मात्र सूत्र रूप में नहीं) तथा स्नेहभाव से उसका समाधान खोज निकालते है। वे बताते है कि समस्त भ्रांतियों का, मन की चंचलताओं का समाधान ध्यान है। यदि ध्यानयोग भली भांति समझ लिया, आहार विहार के नियमों का पालन किया, भगवद्भक्ति का आश्रय लिया, तो लोक परलोक दोनों ही ठीक बने रहेंगे। ध्यान की धुरी है अपने आप पर अपना ही संयम।
एक सच्चे योगी की परिभाषा
इस अध्याय का शुभारंभ एक सच्चे योगी, आध्यात्मिक जीवन जीने वाले दिव्यकर्मी की परिभाषा से होता है। त्रिपुडंधारी, खड़ाऊ पहनकर, भ्रांति के ढोंग रचकर, भगवे कपड़े पहनने वाला संन्यासी नहीं बन जाता, यह तथ्य समझाते हुए श्रीकृष्ण संन्यासी योगी की परिभाषा अपने प्रिय शिष्य को बताते है। पहला श्लोक (6/1) इस प्रकार है-
अनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।
अब इसका शब्दार्थ देखें
श्री भगवान ने कहा (श्रीभगवानुवाच) जो (यः) कर्म के फल का (कर्मफलं) आश्रय न करके (अनाश्रितः) कर्तव्य कर्म (कार्य कर्म) करते हैं (करोति) वह (सः) संन्यासी (संन्यासी चं) और योगी भी है (योगी च ); वैदिक कर्मत्यागी नहीं (न निरग्निः) , शारीरिक कर्मत्यागी भी नहीं (न च अक्रियः),
भावार्थ इसका हुआ-
“जो कर्म के फल की अपेक्षा न रखकर निष्काम भाव से अपने कर्तव्य कर्म करते है वही संन्यासी है और वही योगी है, किंतु जो यज्ञ होम आदि अग्नि में आहुति देने के कार्यों का त्याग करते है और जो लौकिक दृष्टि से परोपकार के कार्य भी नहीं करते, वह संन्यासी मानने योग्य नहीं है।”
श्रीकृष्ण यहाँ कह रहे है कि जो कर्मफल त्यागी होकर शास्त्रविहित कर्म करते है वही संन्यासी है, किंतु जिनने वैदिक होम यागादि कर्म छोड़ दिए है। साथ ही लौकिक परोपकार के कार्य को नहीं करना चाहते, वे संन्यासी नहीं कहलाते। कर्मफल त्याग ही संन्यासी या दिव्यकर्मी योगी के लिए प्रथम साधन है। इस प्राथमिक शर्त के पूरा होने पर ही किसी को संन्यासी कहा जा सकता है। सब कार्य छोड़कर दंड कमंडल धारण करने मात्र से ही कोई संन्यासी नहीं हो जाता।
पलायनवाद के विरुद्ध
अर्जुन के मन में दुविधा है। वह सोचता है कि कभी श्रीकृष्ण कहते है- कर्मयोग से एवं कभी कहते है कि संन्यास से भी जीवनलक्ष्य की सिद्धि प्राप्त होती है। फिर कर्मयोग में लगने से क्या लाभ है? युद्ध करने से क्या फायदा? इससे तो अच्छा संन्यास ही ले लिया जाए। अर्जुन भिक्षाजीवी होना पसंद करता है, पर युद्ध को घोर व न करने योग्य कर्म कहता है। वह पलायनवादी बनना चाह रहा है। यह तो संन्यास नहीं है। सही अर्थों में संन्यास तब आता है, जब कर्मयोग करते करते मनुष्य अकर्म की स्थिति में चला जाए, ज्ञानयोग में प्रतिष्ठित हो जाए। कुछ ऐसे सिद्ध होते है कि पूर्वजन्मों के अपने प्रारब्ध अर्जित सिद्धियों के कारण कम उम्र में ही संन्यास में प्रवृत्त हो जाते है, यथा आद्य शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद। ऐसे लोग काम पूरा होते ही शरीर छोड़ देते है। सही अर्थों में यही संन्यासी है।
आज तो हमारा देश बाबाओं का अखाड़ा बना हुआ है। पूज्यवर ने 1970 में टैऊक्टस की शृंखला लिखी थी, उनमें एक थी” ब्राह्मण जागे साधु चेते।” इसमें उन्होंने क्रांतिकारी चिंतन प्रस्तुत किया था। ऐसी लगभग सौ किताबें थी। इस पुस्तिका में उन्होंने बाबाजी लोगों की संख्या छप्पन लाख लिखी थी व लिखा था कि यही लोग विद्याविस्तार, ग्रामोत्थान, स्वावलंबन, राष्ट्रधर्म में प्रवृत्त हो जाएं तो भारत को पुनः सोने की चिड़ियां बनाया जा सकता है। एक विकल्प के रूप में उन्होंने वानप्रस्थियों परिव्राजकों का तंत्र खड़ा किया। 1970 में जो संख्या संन्यास वेशधारी लोगों की थी। अब वह निश्चित ही 1 अरब 1/2 करोड़ के इस देश में डेढ़ करोड़ पार कर चुकी होगी। होगी क्यों नहीं? अकर्मण्यता के साथ सवेरे शाम का अन्नक्षेत्र में भोजन, कौन नहीं स्वीकार करेगा? सब ऐसे है, जो पलायनवादी होकर इस राह पर चले है। धर्मतंत्र के नाम पर यह कितना बड़ा छलावा है।
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा कि आज कलियुग की पराकाष्ठा की परिस्थितियों में संन्यास नितांत अव्यावहारिक है। सौ वर्ष पूर्व हो सकता है, वह प्रासंगिक रहा होगा। आज नवयुग का संन्यास परिव्राजक धर्म है। आज का अध्यात्म विद्याविस्तार की अपेक्षा इस समुदाय से रखता है। ब्राह्मणत्व के जन जन तक विस्तार की अपेक्षा रखता है। ब्राह्मण के दो धन पूज्यवर ने बताए है। तप और विद्या। तपस्वी बनें, संयमी बने, विद्या का विस्तार करे, योग महाविद्या को जन जन तक पहुंचाकर जीवन जीने की कला सिखाए।
निरग्नि का मर्म
यहाँ श्लोक में उद्धृत कुछ शब्द स्पष्ट कर दे। ‘निरग्निः’ शब्द का अर्थ है अग्नि का परित्याग करने वाला। चूंकि कर्म का प्रतीक है अग्नि, संन्यासी अग्नि से जुड़े कर्मकांड नहीं करते। वे यज्ञ नहीं करते एवं अग्नि का पका नहीं खाते। यज्ञ कर्म की अविरल धारा का प्रतीक है। पहले जो गृहस्थ होते थे उनके घर गार्हपत्याग्नि होती थी। उसे साथ लेकर चलते थे। हवन नित्य करते थे। देवताओं और मनुष्य के बीच की कड़ी यज्ञ है। सृष्टि संचालन के एक घटक के प्रतीक के रूप में है यह विद्या सन्न्यस्थ होते ही व्यक्ति ब्राह्मी स्थिति में पहुंच जाता है। परमात्मसत्ता में अवस्थिति के लिए अग्नि की जरूरत नहीं है। इसी कारण विधिवत संन्यास में दीक्षित अग्नि से जुड़े वैदिक कर्मकांड संपन्न नहीं करते। “च अक्रियः” शब्द के माध्यम से श्रीकृष्ण इसी श्लोक में कहते हैं कि केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला भी योगी नहीं है। कर्मयोग मूल धुरी है। अकर्म की स्थिति में तो साधक बहुत आगे चलकर पहुंचता है, पर संन्यासी सच्चा है तो वह अकर्म की स्थिति में जा पहुंचता है। श्रीकृष्ण कहते है कि जो युगधर्म का पालन करता है, घर घर जाकर ज्ञान बांटता है, कर्म के फल की आकांक्षा न रखकर सतत कर्म क्रियाशील बन परोपकार करता रहता है, वही सच्चा योगी है। ऐसे योगी ही सच्चे संन्यासी कहलाने योग्य है। मात्र कर्मकांडों तक सीमित रह अग्नि व कर्म छोड़ देने वाला किसी भी स्थिति में संन्यासी नहीं कहा जाना चाहिए। न यह मानना चाहिए कि ऐसा संन्यास लेने से हमारा कल्याण हो जाएगा। कल्याण तो दूर आत्मा का पतन और होगा।
अनासक्त ही संन्यासी
योगेश्वर श्रीकृष्ण की स्पष्ट मान्यता है कि कर्म ज्ञान का सूक्ष्मतम रूप है। कर्म से ऊपर उठकर ज्ञान में स्वयं को स्थापित कर देना होता है। अर्जुन को वह समझाते है कि युद्ध छोड़कर (कर्म छोड़कर) चले गए, गेरुए वस्त्र पहन लिए, अग्नि से परहेज कर लिया तो भी संन्यासी नहीं कहलाओगे,। संन्यासी की परिभाषा है- वह दिव्यकर्मी, जिसकी कर्मफल में आसक्ति नहीं है। सतत वह औरों के लिए परमार्थरत हो कर्म करता रहता है। अर्जुन की अज्ञान की जड़ पर भगवान बार बार कुठाराघात करते है। उसे समझाते है कि संन्यास ले लेने मात्र से, उसे युद्ध से, रक्तपात से, कौरवों से, निंदा से, अपयश से, द्रौपदी के तानों से, विभिन्न प्रकार से होने वाली लोकभर्त्सना से मुक्ति नहीं मिलेगी। क्यों? क्योंकि भगवान का कर्मफल का अकाट्य सिद्धाँत सब जगह लागू होता है। जब तक अर्जुन श्रीकृष्ण के समक्ष है, वे बार बार उसे आसक्ति छोड़कर कर्म करने रहने का शिक्षण देते है। यह बता रहे है कि असली संन्यास आँतरिक है, बाह्य नहीं। जिसने अपने मन के वासनामूलक संकल्पों का त्याग नहीं किया, वह योगी नहीं हो सकता। कर्म तो किसी भी स्थिति में करना ही होगा। कर्म ही मुक्ति के, ब्रह्मनिर्वाण के कारण बनेंगे। आँतरिक संन्यास के निरंतर अभ्यास के साथ साथ कर्म करते रहने से वासनात्मक मन और निम्न प्रकृति पर आसानी से विजय प्राप्त की जा सकती है।
इसी प्रतिपादन को आगे बढ़ाते हुए भगवान अगले श्लोक में कहते है-
यं सन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाँडव। न हासन्न्यस्तसडकल्पो योगी भवति कश्चन। 6/2
इसका शब्दार्थ पहले देखते है-
“हे अर्जुन! (पांडव) जिसे (यं) (पंडित लोग) संन्यास शब्द से कहते हैं (संन्यास इति प्राहुः) उसी को (तं) (तू) योग रूप से जानना (योगं विद्धि) क्योंकि (हि) फल का संकल्प न छोड़ने से (असन्नयस्त संकल्पः) कोई भी (कश्चन) योगी (योगी) नहीं बन जाता (न भवति)।” कितना स्पष्ट अर्थ है-
भावार्थ हुआ-”हे अर्जुन! जिसको संन्यास कहते है उसी को तू योग रूप में जान, क्योंकि ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसने संकल्प का त्याग न किया हो, योगी नहीं हो सकता।” 6/2
संकल्पों का त्याग
संन्यास को योग मानकर संकल्पों का त्याग करने वाला ही सच्चा कर्मयोगी दिव्यकर्मी बनता है, यह श्रीकृष्ण का स्पष्ट मत है। संन्यास और कर्मयोग दोनों एक−दूसरे का पोषण करते है। जब मनुष्य अपना अहं त्याग देता है तो वह संन्यास के माध्यम से एक श्रेष्ठ योगी बनने की दिशा में आगे बढ़ता है। जब वह निस्वार्थ भाव से किए गए कर्मों को संपन्न करता है, कर्मफल की आकांक्षा ही त्याग देता है तो वह सच्चा कर्मयोगी बन जाता है। आकाँक्षाओं इच्छाओं संकल्पों को त्याग देने वाला अपने अहं के ढांचे को गिराकर सच्चा योगी बनने की दिशा में आगे बढ़ता है।
संकल्प और ‘संकल्पशक्ति अलग अलग शब्द है। संकल्पशक्ति अर्थात् आत्मबल मनोबल इच्छाशक्ति। यहाँ संकल्प से योगेश्वर का आशय है, सकाम कर्म। जिन कर्मों से इच्छाएं जुड़ जाए, वह संकल्प बन जाता है। हमें इतना मिल गया, उतना और मिल जाए। इच्छाएं संकल्प कभी मिटते नहीं, कभी पूरे होते नहीं। पहले संकल्पों को हम पालना बंद कर दे। जो भी ले अणु व्रत ले। उसे पूरा करे। उसके निभते ही संकल्पशक्ति बढ़ती चली जाएगी। हमने कामनाओं महत्वकांक्षाओं संकल्पों का जखीरा अपने अचेतन में बिठा रखा है। यही हमें बार बार जीवनयात्रा में तंग करता है। संन्यास लेना है तो वेशभूषा वाला नहीं, संकल्पों से मुक्ति वाला ले।
भावी सुखों के स्वप्नों से बाहर आए
भारतीय मनोविज्ञान में प्रयुक्त यह संकल्प शब्द बड़ा ही भावपूर्ण एवं व्यापक अर्थ लिए है। मनुष्य शेखचिल्ली की तरह भावी सुखों की संभावनाओं के विषय में सोचता है। उसके बाद उन स्वप्नों को मजबूती से पकड़े रहता है। उन्हें पूरा करने के लिए वह जी जान से श्रम करता है। उसके मन की इसी तल्लीनता को संकल्प क्रीडा नाम दिया गया है। जब तक हमें कामनाएं वासनाएं तंग करती रहेगी, मन कभी भी शाँत हो, लक्ष्य के प्रति समर्पित नहीं हो सकता। इसलिए श्रीकृष्ण कहते है कि जिसने अपने संकल्पों सकाम इच्छाओं ऐषणाओं का त्याग नहीं किया है, वह कभी भी दिव्यकर्मी नहीं बन सकता एक श्रेष्ठ लोकसेवी, सम्मानित कार्यकर्ता नहीं बन सकता। कभी भी एक योगी नहीं बन सकता। लोग भाँति भांति की योजनाएं बनाते रहते हैं और अपने कर्मों का फल भोगने की उत्सुकता में इस इच्छा के साथ कि फल कब मिलेगा, अशाँत बने रहते है। ऐसा व्यक्ति कभी भी योगी नहीं बन सकता, हो सकता है तप का दिखावा वह कर लेता हो, पर मन से योगी बनना अत्यंत अनिवार्य है।
ध्यान की प्रक्रिया आरंभ हो, इसके पूर्व मन को शाँत करने की जो प्रणाली श्री गीताजी के माध्यम से योगेश्वर ने अपनाई है, वह अनूठी है। इतिहास में अपने आप में एक ही है। ध्यान ऐसे ही नहीं हो जाता। उसके लिए पहले योगी बनना होता है, संकल्पों को त्यागना होता है। मन स्वतः नहीं चुप होगा, उसे निग्रह की स्थिति में लाना होगा। यह और कोई नहीं करेगा, हमें स्वयं ही करना होगा। यही संदेश है प्रथम दो श्लोकों का।
एक बार एक भक्त ने नानक से पूछा- “आप कहते हैं कि सब पैसे वाले एक जैसे नहीं होते। इसका क्या तात्पर्य है?” नानक बोले- “उत्तम लोग वे हैं जो उपार्जन को सत्प्रयोजनों के निमित्त खरच कर देते हैं। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति वे हैं, जो कमाते हैं जमा करते हैं, पर सदुपयोग करना भी जानते हैं तीसरी श्रेणी उनकी है, जो कमाते नहीं कही से पा जाते हैं और उड़ा जाते हैं। ऐसे लोग संसार में पतन का कारण बनते है।”
एक जंगल में एक सिंह रहता था। प्रायः सिंहों का स्वभाव होता है कि ये हिंसक वृत्ति के होते हुए भी अकारण हिंसा नहीं करते। किंतु यह सिंह बड़ा अहंकारी था और प्रकृति के नियम का अपवाद करता था। जंगल के सारे जानवर परेशान थे। अस्तु, एक छोटे से खरगोश ने उसे खत्म करने का निश्चय कर लिया। उसने बुद्धि का सहारा लिया और एक दिन उस दुर्बुद्धि सिंह का विनाश कर दिया।
उसने शेर की मांद के पास एक छोटा बिल बनाया और उसमें बैठकर उसे गाली देने लगा। शेर ने सुना तो क्रोध से पागल हो गया। शेर बिल के भीतर तो घुस नहीं सकता था, इसलिए बिल के मुंह पर बैठकर उसके निकलने की प्रतीक्षा करने लगा। फल यह हुआ कि चार छह दिन बाद भूखा प्यासा क्रोधी सिंह तड़प तड़पकर मर गया। उसका क्रोध स्वयं उसे ही खा गया। क्रोधी की यही दशा होती है।
हिमालय से आमंत्रण
संवत् 1985 का चैत्र मास। संवत्सर आरंभ हुआ ही था। वासंती नवरात्र पर पूरे गाँव में शक्तिपूजा और मानपारायण के आयोजन शुरू हो गए थे। चार, पाँच दिन बीत गए थे। श्रीराम की साधना अपने ढंग से चल रही थी। उन्होंने चैत्र नवरात्र में विशेष कुछ नहीं किया। जो साधनाक्रम चल रहा था, वही अद्भुत और अलौकिक था। इन नौ दिनों में फिर भी उन्होंने पूरी तरह निराहार रहने का व्रत लिया। सिर्फ जल और दूध पर ही निर्भर रहे। संभवतः पंचमी का दिन था। सुबह ढाई तीन बजे उठे और नित्य के उपासना अनुष्ठान में प्रवृत्त हुए। उठने और स्नानादि के समय से मन हिलोरे ले रहा था। वस्तुतः पूर्व संध्या से ही मन में संकल्प विकल्प आ रहे थे। लग रहा था कि सुबह कुछ नया आरंभ करना है। क्या आरंभ करना है, यह आभास नहीं हो रहा था। किसी अगले पड़ाव के लिए रवाना होना है, यह जरूर लग रहा था।
महापुरश्चरण के लिए नियत जप और ध्यान पूरा हुआ। देवता के लिए जप का समर्पण करने के बाद प्रदक्षिणा करते हुए बैठे ही थे कि भीतर से पुकार उठी। वाणी अपनी उसी मार्गदर्शक सत्ता के कंठ से प्रकट हुई प्रतीत हो रही थी, जिसने दो वर्ष पहले वसंत पंचमी पर हिमालय यात्रा का निर्देश दिया था। उस दिन पूजा की कोठरी में साक्षात्कार के दिन जैसी पवित्र गंध व्याप्त हो गई थी और चेतना में पिछली वसंत पंचमी जैसा उल्लास छा गया था। वह सत्ता प्रकट तो नहीं हुई थी। वाणी भी ऐसी नहीं थी कि दूसरों को सुनाई दे। आँतरिक क्षेत्र में ही वह गुंजन हुआ था। कहा गया था कि पिछली बार प्रत्यक्ष सान्निध्य के लिए बुलाने की बात कही थी वह समय आ गया है। नया संवत्सर आरंभ होने पर हिमालय की ओर प्रयाण कर देना है। वही भेट होगी।
पाँचवे नवरात्र पर पिछले वसंत के उसी निर्देश का स्मरण कराया जा रहा था। अभी उत्तराखंड के रास्तों में बर्फ जमी हुई है। बदरी केदार के कपाट भी बंद हैं। महीने भर के भीतर वहाँ के द्वार खुलने वाले हैं। यात्रा की तैयारी और वहाँ तक पहुंचने में इतना समय लग ही जाएगा। इन स्थानों की यात्रा करते हुए आगे तक पहुँचना है। निर्देश कही बाहर से नहीं, अपने भीतर से ही आ रहे थे। लग रहा था कि अपने भीतर बैठकर कोई बोल बता रहा है। उस प्रेरणा या निर्देश से सोच विचार की जरा भी गुँजाइश नहीं थी। स्फुरणा ही संकल्प बन गई कि अब चलने की तैयारी करनी है। संध्या जप से निवृत्त होने के तुरंत बाद माँ से कहा, गुरुवर का आदेश हुआ है।
भीतर से आया निर्देश
‘क्या आदेश हुआ है? ‘ताई जी ने पूछा। ’कुछ समय के लिए उनके सान्निध्य में रहना है।’ श्रीराम ने कहा। ताई जी को अपने चिरंजीव के बारे में यह आशंका नहीं रह गई थी कि वह हिमालय चला जाएगा या कही और चला जाएगा और फिर वापस नहीं लौटेगा या साधु संन्यासी बन जाएगा। उन्होंने पूछा,’ कितने दिन के लिए जाना है?’
श्रीराम ने कहा,’ यह तो नहीं पता। लेकिन लगता है, वे तीन चार दिन अपने पास रखेंगे। आने जाने में दस बारह दिन समझो।
सुनकर ताई जी के चेहरे पर स्वीकृति का भाव आया। फिर बोली’ ठीक है। दो सप्ताह लगेंगे। इतने दिन के लिए पूरे इंतजाम से जाना। कुछ रुककर वे बोली,’ इधर मौसम बदल गया है, लेकिन जिस तरफ तुम्हें जाना है, वहाँ हमेशा सरदी रहती है। ओढ़ने पहनने में किसी तरह की ढील पोल मत रखना, सरदी के कपड़े अपने साथ ही रखना।’
वे बिना रुके कहे जा रही थी, तू क्या ले जाएगा। सारा सामान मैं ही अपने हाथों से जमा दूंगी और सुन, पंडित जी से पूछ लेना। वे हरिद्वार ऋषिकेश आते जाते रहते हैं। आगे गंगोत्री तक भी गए हैं। उन्हें रास्तों के बारे में ठीक से पता होगा। वे सही सलाह देंगे।
श्रीराम ने अपने हिमालयवासी गुरु के बारे में उनसे साक्षात्कार और भावी निर्देश के बारे में ताईजी से ज्यादा चर्चा नहीं की थी। दो चार बार ही छुटपुट रूप से बताया था कि गुरुदेव हिमालय में कही रहते है। वे कही भी आ जा सकते है। अपने आपको अंतर्धान कर सकते है, प्रकट हो सकते है आदि। जब उन्होंने कहा कि गुरुदेव का बुलावा आया है, तो ताईजी को समझने में देर नहीं लगी कि श्रीराम अपने उन्हीं सिद्ध गुरु के बारे में कह रहे हैं। यह विश्वास अविचल था कि वे श्रीराम को उनसे दूर नहीं करेंगे और न ही बाबा जोगी बनाएंगे। विश्वास का कोई स्पष्ट कारण समझ में नहीं आ रहा था। वे समझना भी नहीं चाहती थी। उन्होंने अपने चिरंजीव को हिमालय की ओर जाने की अनुमति दी तो रिश्ते में चाचा लगने वाले पंडित धर्मदीन ने उनसे कहा,’ भाभी , अकेले कहा जाने दे रही हो? वहाँ साधु संन्यासी वैराग की पुड़िया खिला देंगे।
ताईजी इस सलाह पर विनोदपूर्ण हंसी हंसकर रह गई थी। सिर्फ इतना ही कहा कि रास्ता सुगमता से कट जाए, ऐसी कोई सीख दे सको तो दे दो। श्रीराम जिस तरह जा रहा है, उसी तरह वापस भी आ जाएगा। अन्य लोगों ने भी अकेले नहीं जाने देने या हिमालय से बचने की सलाह दी थी, उन सबको ताईजी ने अनदेखा, अनसुना कर दिया।
उन्हें लग रहा था वैशाख में भी बदरी केदार के आसपास ठिठुरा देने वाली सरदी होती है। इधर पौष माघ में जैसा जाड़ा होता है, उधर वैशाख ज्येष्ठ में उससे भी ज्यादा सरदी होती है। वे कभी उस क्षेत्र में गई नहीं थी, लेकिन साधु संतों और बदरी केदार की यात्रा कर आने वालो से सुना था। इसलिए उन्होंने श्रीराम को सरदी के समय दिया जाने वाला आहार जारी रखा। इस आहार को वे चैत्र नवरात्र में बंद कर देती थी। आहार कोई विशेष नहीं था। ताईजी ने शहद, अदरक, तिल आदि गरम चीजें देना जारी रखा।
हिमालय यात्रा का अर्थ उनके लिए बदरीनाथ, केदारनाथ तक सीमित था। बहुत हुआ तो गंगोत्री और यमुनोत्री भी जाया जा सकता था, लेकिन वह बहुत आगे की बात थी। श्रीराम ने जब कहा कि हिमालय जाना है तो वे केदारनाथ तक ही समझी थी। न उन्होंने ज्यादा कुछ पूछने की जरूरत समझी और न ही श्रीराम ने बताया उन्हें स्वयं नहीं मालूम था कि हिमालय यात्रा का आमंत्रण किस क्षेत्र तक पहुंचने के लिए है।
लोगों से पूछताछ कर ताईजी ने सूती और ऊनी कपड़ों के अलावा मोजे,रबर के मोटे तले वाले जूते, कंबल, लाठी, मोमबत्ती ,टार्च आदि का इंतजाम किया। सब सामान कपड़े के बने दो बड़े थेलों में बाँध दिया। किसी ने कहा कि ट्रक में रखना ज्यादा ठीक रहेगा। बारिश आदि से भीगेगा नहीं। ताईजी ने जवाब दिया, लेकिन ट्रंक कितना भारी होगा। उसे उठाए उठाए ही लड़का थक जाएगा। रही बारिश की बात तो लड़का खुद को जहां छुपाएगा, वही थैले भी सुरक्षित हो जाएंगे। यात्रा पर रवाना करने से पहले ताईजी को छाते की और याद आई। हवेली से ढूंढ़ खोजकर निकाला और थमा दिया। श्रीराम अब हिमालय की यात्रा के लिए पूरी तरह तैयार थे।
कम से कम सामान
ताईजी ने स्नेह और दुलार से जो सामान बांधा था, वह बहुत ज्यादा नहीं था। भार की दृष्टि से वह आधा मन (करीब बीस किलोग्राम) भी नहीं था। ऋषिकेश पहुंचकर लगा कि वह भी ज्यादा है। श्रीराम 23 अप्रैल को ऋषिकेश पहुंचे थे। उसी शाम को गंगातट पर बैठे ध्यान कर रहे थे। सायंकाल का समय था। अप्रैल के अंत तक ऋषिकेश का मौसम सुहाना हो जाता है। सर्दी बिलकुल नहीं रहती और गरमी पूरी तरह आई नहीं होती है। यात्रियों का आना जाना शुरू हो जाता है। यों अब तो सभी ऋतुओं में यात्रियों का रेला लगा रहता है। सरदी गरमी से बचाव के सस्ते महंगे सभी साधन आसानी से मिल जाते है। 1927-28 के दिनों में ऐसी स्थिति नहीं थी। तब गरम कपड़े लेकर चलना भी अच्छी आर्थिक स्थिति का द्योतक समझा जाता था। मध्यम और मध्यम से कुछ अच्छी आर्थिक स्थिति के लोग भी धूप सेंकने या आग तापने को ही सरदी से बचाव का तरीका मानते थे। दोनों उपाय नहीं हो सकने की स्थिति में तीन चार कपड़े एक साथ पहन लेते थे।
गंगा तट पर बैठे बैठे श्रीराम की निगाहें कुछ संन्यासियों पर पड़ी। वे गंगास्नान कर निकल रहे थे। धारा से बाहर आकर सीढ़ियों पर बैठ गए। शरीर पोंछने के बाद उन्होंने अपनी थैली में से भभूत निकाली और मलने लगे। भभूत रमाए साधु संन्यासी इससे पहले भी कई बार देखे थे। तब ध्यान नहीं गया था। उन संन्यासियों को देखकर ध्यान आया कि सरदी से बचाव का एक तरीका यह भी हो सकता है। साधुओं का वह दल सायंकालीन नित्यकर्मों से निपटकर जाने लगा तो श्रीराम भी अपने आसन से उठे। दल में सबसे बुजुर्ग संन्यासी के पास गए। उन्हें प्रणाम किया। संन्यासी ने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठा दिया। श्रीराम ने पूछा-” महाराज आप किधर यात्रा करेंगे।”
संन्यासी ने बताया कि बदरीनाथ जाएंगे। फिर वह बोला,’ तुम्हें चलना हो तो चलो। अकेले ही जान पड़ते हो। यात्रा अच्छी कट जाएगी। कुछ ज्ञान ध्यान की बातें भी होती रहेंगी।
श्रीराम को लगा कि महाराज कुछ ज्यादा ही बोलने वाले हैं। साथ जाने के लिए उनका मंतव्य नहीं पूछा था। उद्देश्य यात्रा की तैयारी के बारे में कुछ समझना था। उन्होंने कहा,’ नहीं नहीं हमें बदरीनाथ नहीं जाना?’
‘तो कहाँ जाना है?’ संन्यासी चलते चलते रुक गए। घर से भागकर आए हो क्या? वैराग्य लेना है? यहाँ क्या कर रहे हो? कहां के रहने वाले हो..........?’ मंडलेश्वर लगने वाले उन साधु ने एक साथ ढेरों सवाल कर दिए। श्रीराम उन सवालों के कारण अचकचा गए। लगा कि किसे छेड़ दिया। वे बोले’ क्षमा करें महाराज, हमसे गलती हो गई। हमने आपका समय नष्ट किया?’
‘व्यर्थ ग्लानि में मत जाओ बच्चा। हम जानते है तुम क्या पूछना चाहते हो?’ उस संन्यासी ने कहा। श्रीराम कोई उत्तर दिए बिना महात्मा की ओर देखते रहे,’ जिसकी पुकार पर यहाँ आए हो न उसी का विश्वास रखो, वही तुम्हें जहाँ ले जाना होगा ले जाएगा। किसी संगत में जाने के बजाय अकेले जाना ही श्रेयस्कर है।’
बदरीनाथ की ओर
संन्यासी ने ये बाते क्या सोचकर कही थीं? श्रीराम को कुछ समझ नहीं आया। उन्होंने अर्थ निकालने के लिए माथापच्ची भी नहीं की। संवाद से सिर्फ यह भाव जगा कि मार्ग की चिंता, सरदी से बचाव और कठिनाइयों के बारे में सोचना व्यर्थ है। जिस मार्गदर्शक सत्ता ने हिमालय के लिए बुलाया है, वही आगे का प्रबंध भी करेगी। उन्हीं भाव धाराओं में बहते हुए कुछ सामान ऋषिकेश में छोड़ दिया। जो सामान छोड़ा, उसमें छाता, कुछ वस्त्र और एक कंबल था। थैली में एक कंबल रखा तो प्रथम साक्षात्कार के समय मार्गदर्शक सत्ता का दिगंबर रूप स्मरण हो आया। विचार आया कि सफेद बरफ से घिरे वातावरण में बिना वस्त्रों के रहा जा सकता है तो सरदी से बचाव के ताम−झाम लेकर चलने का क्या औचित्य है?
संतों की वह मंडली बदरीनाथ जा रही थी। उनसे कुछ दूरी बनाकर श्रीराम भी चल दिए। यह निर्धारित नहीं किया था कि बदरीनाथ जाना है, कहां जाना है यह भी निर्धारित नहीं था। आँतरिक स्फुरणा का अनुसरण करते हुए चलते रहे। देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और विष्णुप्रयाग होते हुए बदरीनाथ तक पहुंचा जाता है। उन दिनों भी सामान्य वाहन और पैदल पथ थे, लेकिन संन्यासियों ने अलग ही रास्ता चुना। परिचित मार्गों से जाने पर ऋषिकेश से बदरीनाथ लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर पड़ता है। साधु मंडली ने जो रास्ता चुना वह मुश्किल से पचास किलोमीटर लंबा था। अज्ञात पहाड़ी मार्गों से गुजरते हुए वे लोग अगली शाम तक ही जोशीमठ पहुंच गए।
नृसिंह मंदिर के सामने पहुंचकर विश्राम किया। प्रातःकाल संध्या पूजा के बाद श्रीराम नृसिंह मंदिर गए। शालिग्राम शिला में तराशी गई यह मूर्ति अद्भुत है। प्रतिमा की एक भुजा बहुत पतली है पहली बार देखने पर लगता है कि थोड़ा भी छुआ या दबाया तो भुजा टूट सकती है, लेकिन यह भय निराधार है। शताब्दियों से विग्रह इसी स्थिति में हैं। किंवदंती है और लोगों का विश्वास भी कि जिस दिन यह भुजा अलग हो जाएगी, उस दिन नर नारायण पर्वत मिल जाएंगे। दोनों पर्वत जोशीमठ से थोड़े ही फासले पर हैं। उनके बीच से रास्ता निकलता है और बदरीनाथ तक जाता है। लोगों का मानना है कि नर नारायण पर्वत के मिलते ही बदरीनाथ जाना असंभव हो जाएगा। फिर बदरी विशाल की पूजा आराधना भविष्य में बदरी में होगी। यह भी कि उस दिन कलियुग का अंत हो जाएगा अथवा सृष्टि में प्रलय भी हो जाएगा।
मंदिर परिसर में ही श्रीराम ने इस तरह की चर्चाएं सुनी, लेकिन उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। वे नृसिंह भगवान के दर्शन करते ही जोशीमठ आ गए। मठ की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। यहाँ उन्होंने तोटकाचार्य को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया था। जोशीमठ की प्रतिष्ठा इस पीठ के कारण ही है। शीतकाल में बदरीनाथ की पूजा आरती का प्रचलन शंकराचार्य ने ही कराया था। प्रमाण तो यह भी मिलते है कि बदरीनाथ का मंदिर हिमालय के दर्रे से आने वाले आतताई विदेशियों ने ध्वस्त कर दिया था। वहाँ की प्रतिमा भी खंडित कर कुंड में फेंक दी थी। बदरीनाथ की पुनर्प्रतिष्ठा आदि शंकर ने ही की थी। उन्हीं विभूति ने जोशीमठ में शाँकरमठ की स्थापना की। सभी जानते है कि इस तरह के चार मठ देश के चारों कोनों में स्थापित किए गए।
मनुष्य का जीवन स्वयं ही प्रत्यक्ष देवता है। अन्य देवताओं की कृपा तो परलोक में मिलती है, पर अपने जीवन को सुघड़, सुसंस्कृत बनाने की उपासना के लाभ तो इसी जीवन में ही मिलते हैं।
“गायत्री तु पंर तत्वं गायत्री परमागतिः” (बृहत्पाराशर गायत्री मंत्र पुरश्चरण वर्णनम 4/4) के अनुसार कहा गया है कि गायत्री परम तत्व है, गायत्री परमगति है। गायत्री महाशक्ति सभी प्रकार की आपत्तियों से मनुष्य की रक्षा करती है। इसमें इतनी विलक्षण सामर्थ्य छिपी पड़ी है कि इसके दस सहस्र बार उच्चारण से साधक पर आई सारी विपत्तियों का निवारण हो जाता है। विपरीत परिस्थितियों की धारा से वाण पाने के लिए धैर्य, साहस, विवेक और प्रयत्न पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। इन चार कोनों वाली नाव पर चढ़कर ही संकट की नदी को पार करना सुगम हो जाता है। गायत्री साधना साधक में इन चार तत्वों का संवर्द्धन करती है, जिससे उसकी रक्षा भी होती चलती है एवं वह विपत्ति के समुद्र से अपनी नाव खेता निकल जाता है।
परमपूज्य गुरुदेव ने ‘गय’ अर्थात् प्राण एवं ‘व’ अर्थात् वाण करने वाली गायत्री महाशक्ति को पुनर्जीवित किया, उसका युगानुकूल प्रस्तुतीकरण किया, साथ ही उससे जुड़ी भ्रांतियों को निर्मूल कर सबके लिए इस साधना को सुगम बना दिया। समय समय पर उन्होंने इस साधना की प्रेरणा देते हुए अगणित लोगों की रक्षा की। इस संबंध में उनके कुछ पत्र इस अंक में प्रस्तुत है, जो प्रत्यक्ष प्रमाण देते है।
पहला पत्र 21-10-58 का है, जो मलाड मुँबई के श्री रजनीकाँत शुक्ल को लिखा गया है-
हमारे आत्मस्वरूप ,
पत्र मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई चि. नीला के लिए प्राणघातक जो संकट उत्पन्न किया गया था वह गायत्री माता की कृपा से टल गया। उसकी प्राणरक्षा हो गई। स्वप्न में गायत्री माता ने ही उसे दर्शन दिए है।
पत्र में स्पष्ट आश्वासन है एवं संकेत है कि संकटों से रक्षा माँ की कृपा से ही हुई है। गायत्री महामंत्र में अपरिमित शक्ति छिपी पड़ी है। यदि कोई धैर्यपूर्वक भावविह्वल हो जप करे तो उसके ऊपर आए संकट मिट सकते है। प्रतीक रूप में चि. नीला ने स्वप्न में गायत्री माँ को देखा। यह हमारी भावना ही है जो आरोपित होकर तरह तरह के भावचित्र दिखाती है। माँ के दर्शन भी उसी के परिणाम थे।
गायत्री महाशक्ति क्या नहीं कर सकती? यह आए हुए संकटों को निरस्त करने में साधक की बड़ी मदद करती है। एक पत्र में पूज्यवर यही लिखते है। यह 14/3/53 को श्री शिवशंकर को लिखा गया था-
आपका पत्र मिला। ता. 12 की घटना की सूचना मिली। अपना लक्ष्य किसी पर आक्रमण करना नहीं है, पर किसी के हमलों को निष्फल करने में बहुत कठिनाई नहीं होती। आप लोगों के संरक्षण की व्यवस्था सब ठीक है। घर में सबको आशीर्वाद कहे।
स्पष्ट आश्वासन है कि गायत्री साधना किसी को अपनी ओर से आक्रमण करना तो नहीं सिखाती, पर आए हुए हमलों को निष्फल अवश्य कर देती है। यह जो रक्षाकवच है, वह सबसे बड़ी विभूति है। गायत्री ब्रह्मास्त्र तो है, पर साधक के चारों ओर एक घेरा बनाकर रखती है एवं आज के इस लौकिक जगत में जहाँ षड़यंत्रों की भरमार है, पूरी तरह से संरक्षण की व्यवस्था बनाती है। समर्थ गुरु का, गायत्री के सिद्ध साधक का आश्रय मिल जाने के बाद तो वह सुरक्षाकवच अभेद्य हो जाता है।
25/6/64 को श्री वैजनाथ प्रसाद सौनकिया (ग्वालियर वर्तमान में दिगौडा टीकमगढ़) को लिखे पत्र में वे कहते हैं-
हमारे आत्मस्वरूप,
पत्र मिला, आपरेशन सफलता पूर्वक पूरा हो गया और भाई की स्थिति सुधर रही है, यह जानकर संतोष हुआ। आप ही नहीं, आपका भाई भी हमारा अपना बच्चा है। आप लोगों की सुरक्षा के लिए हम वही सब कुछ करेंगे जो कोई पिता अपने बालकों के लिए कर सकता है।
जीवनरक्षा के लिए हमारा कठोर आध्यात्मिक उपचार विधिवत चल रहा है। जब तक खतरे की स्थिति पूरी तरह टल न जाएगी, हम आवश्यक प्रयत्न करते रहेंगे। आप तनिक भी चिंता न करे। चि. जमुना प्रसाद की रक्षा माता करेगी।
“नमोडस्तु गुरवे तस्मै गायत्री रुपिणै सदा”- सदगुरु हमेशा गायत्री रूप में अपने शिष्य कर रक्षा करते रहते है। यहां पूज्यवर का गायत्री रूप प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रहा है। जब गुरुसत्ता स्वयं आध्यात्मिक उपचार में तत्परतापूर्वक तप में लीन हो, किसी का क्या बिगड़ सकता है। पाठकगण समझ सकते है कि कितना आश्वस्त हुए होंगे पत्र पाने वाले। आत्मीयतापूर्ण संबोधन भी है कि आपका बच्चा हमारा बच्चा है। पिता बेटे के लिए जो कर सकता है, वही किया जाएगा। गायत्री महाशक्ति का यह बड़ा ही अद्भुत रूप है।
श्री ध्रुवनारायण जौहरी (सिवनी) को लिखे एक पत्र में उनकी कही बात गौर से पढ़ने योग्य हैं। गायत्री मृत्यु से बचाती है, कष्टों का शमन करती है एवं चूंकि हर एक की मृत्यु एक दिन होनी ही है, वह कष्टप्रद मृत्यु नहीं होने देती। हम भी तो मूर्ख है। चाहते है कि अपना प्रिय अपने पास ही रहे, पर गायत्री साधना साधक को बल देती है, जीवन पथ पर चलते हुए हर मोड़ को सुगम बना देती है।
पत्र 6/5/57 का है।
हमारे आत्मस्वरूप चि. ध्रुवनारायण आशीर्वाद। पत्र मिला, कपड़ा भी। उसके आधार पर बहुत गंभीरतापूर्वक विचार किया तो प्रतीत हुआ है, इस शरीर में अधिक से अधिक एक वर्ष तक चलने की क्षमता है। इनका शरीर बाहर से स्वस्थ भले ही दीखता है, पर भीतर की जीवनी शक्ति का तेल चुक गया है।
बहुत लंबी अवधि तक इनकी गाड़ी खिच सकना मुश्किल है। फिर भी जितना अधिक इन्हें ठहराना संभव होगा, उसके लिए प्रयत्न करेंगे। सम्मेलन के बाद इनकी आयुवृद्धि के लिए कुछ विशेष उपचार का प्रबंध करेंगे और तभी तुम्हारी नानी के लिए सौभाग्य रक्षाकवच बनाकर भेजेंगे। सोने के ताबीज में बंद करके उसे धारण करा देना।
पत्र में वास्तविक स्थिति का विवरण है, पर” जापर कृपा तुम्हारी होई तापर कृपा करें सब कोई “ को आधार बनाकर पूज्यवर कहते है कि एक सौभाग्य रक्षाकवच भी देंगे। यद्यपि आयु मात्र एक वर्ष ही है, उसे आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। ध्रुवनारायण जी की नानी उसके बाद भी पाँच वर्ष जीवित रही। सारे काम विधिवत पूरे करके गई।
औरों के कष्ट अपने ऊपर लेकर वरदान बांटकर ठाकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस ने गले का कैंसर पाल लिया था। काया से पृथक जिसका अस्तित्व हो, उसे काया का कष्ट क्या पीड़ित करे। फिर भी लौकिक लीला स्वरूप वे झलक दिखाते रहे। रामकृष्ण वचनामृत का तीसरा खंड उनकी अस्वस्थता एवं इसी के साथ जुड़ी उनके चिकित्सक शिष्यों से हुई गूढ दर्शनपरक चर्चाओं के लिए प्रसिद्ध है। जो महासिद्ध होते है, वे ही समर्थ होते है एवं गायत्री महाशक्ति की अनुकंपा से अपने शिष्य,शिष्य समुदाय का कष्ट अपने ऊपर लेने की क्षमता रखते हैं।
ऐसा ही एक वाकया पूज्यवर के जीवन का है। पाँच दिसंबर 1967 को प्रसिद्ध कवयित्री माया वर्मा को लिखे एक पत्र में वे कहते है-
स्वास्थ्य (हमारा) ठीक है। वह अपने काबू में है। किसी दूसरे का संकट अपने ऊपर लेकर उसका बोझ हलका किया जा सकता है। इसी की बीमारी थी। प्रयोजन पूरा हो जाने पर हमारा कष्ट भी ठीक हो गया।
पूज्यवर कुछ दिन शियाटिका की पीड़ा से ग्रस्त रहे थे। समाचार माया जीजी तक भी पहुंचा। पत्र का जवाब बताता है कि उन्होंने किसी दूसरे का संकट अपने पर लिया था। उधर बीमारी ठीक हुई, इधर पूज्यवर की पीड़ा स्वतः कम हो गई। कोई अस्वस्थता नहीं थी, पर तकलीफ स्थानाँतरित हो गई, प्रकृति के भी तो कुछ नियम हैं। उनका पालन समर्थ गुरु भी करते हैं।
इसी संदर्भ में एक प्रसंग याद आया। दिल्ली के निकटस्थ परिजन की जंघा पर से तांगे का पहिया निकल गया। श्री प्रेमनाथ जी ने धोती उठाकर देखा तो खरोंच भी नहीं थी, फ्रैक्चर भी नहीं हुआ। गुरुकृपा मानकर अगले रविवार हरिद्वार आए। पूरा विवरण सुनाया। जवाब में पूज्यवर ने अपनी धोती ऊपर उठाकर कहा,” सावधान होकर चलता नहीं है। देख तेरी जांघ को तो कुछ नहीं हुआ, यह निशान देखा” एक गहरा लाल नीला सा निशान उनकी उसी जांघ पर गोलाई में बना था। यह देख अश्रुपात करते प्रेमनाथजी गुरुवर के पैरों से लिपट गए। इस घटना का साक्षी इन पंक्तियों का लेखक भी है। कुछ ही दिनों में यह निशान चला गया।
गायत्री रूप में विद्यमान सदगुरु की महिमा अनंत है। कबीरदास जी कहते हैं, “ परे से परचा भया, सब दुःख मेल्या दूरि।” परे अर्थात् पूर्ण ब्रह्म, परचा अर्थात् परिचय अर्थात् भक्त का पूर्ण ब्रह्मरूपी सदगुरु से परिचय हो गया, जिससे सारे दुख दूर हो गए। आज भी पूज्यवर व मातृसत्ता की सूक्ष्म सत्ता हमारे दुख कष्ट उसी तरह दूर कर रही है, सदैव तत्पर है।
जीवन व्यवस्थित ढंग से जीना भी एक कला है। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधा है, जिसे हर युवा जिज्ञासु मानव को जानना चाहिए। दुर्भाग्य का विषय है कि आज विभिन्न विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों एवं विद्यालयों में बाकी तो सब पढ़ाया जा रहा है, पर जीवन जीने की कला, आर्ट आफ लिविंग का अर्थ है- हर श्वास में अध्यात्म को जीना। श्री अरविंद कहते थे। होल लाइफ इज योगा।”
(संपूर्ण जीवन योग है) परमपूज्य गुरुदेव ने कहा, होज लाइफ इज स्प्रिचुएल्टी (संपूर्ण जीवन ही अध्यात्म है) दोनों ने एक ही तथ्य को भिन्न भिन्न रूपों में कहा। आर्ट आफ लिविंग को आज ए. ओ. एल. संक्षिप्त नाम देकर श्वसन से जुड़ी प्राणायाम की क्रिया के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। नाक से हवा खींच या छोड़कर कोई जीवनकला में माहिर नहीं हो सकता। इससे शारीरिक स्वास्थ्यपरक यत्किंचित् लाभ अवश्य होगा, पर जीवनकला से मिलने वाले अन्य लाभ नहीं मिलेंगे, क्योंकि उसे उस व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा ही नहीं गया।
वस्तुतः भारतीय अध्यात्म अपने शुद्ध परिष्कृत रूप में जीवन जीने की कला ही है। इसलिए अपनी संस्कृति ही जीवन प्रबंधन, जीवनकला की मूल धुरी बन सकती है, पाश्चात्य सभ्यता नहीं। जीवन जीने की कलारूपी विधा में वे सभी सूत्र समाए पड़े है, जो मनुष्य को महान बनाते है। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में आगामी वर्ष 2004-2005 के शैक्षणिक सत्र से जीवन जीने की कला को विधिवत पाठ्यक्रम में समाहित किया जा रहा है। इसमें जीवन की विभिन्न समस्याएं , जीवनशैली से जुड़े घटकों, व्यवहारकुशलता , जप साधना से लेकर आत्मप्रबंधन के सूत्र सिखाए जाएंगे। निश्चित ही इस विद्या कि प्रशिक्षण से छात्रों में आज की शिक्षणपद्धति में पाई जाने वाली एक बहुत बड़ी कमी दूर होगी, शिक्षा सर्वांगपूर्ण बनेगी।
जीवन जीने की कला के पाठ्यक्रम को चार भागों में बाटा गया है। ये चार सेमेर्स्टस में बड़ी कुशलता से गूंथ दिए जाएंगे। प्रथम सेमेस्टर में रचनात्मक जीवन की कला सिखाई जाएगी। दूसरा सेमेस्टर जीवन की विकृतियाँ निदान व समाधान पर केंद्रित होगा। तीसरा सेमेस्टर आध्यात्मिक जीवन की कला का शिक्षण देगा तथा चौथा सेमेस्टर आध्यात्मिक शिक्षण की कला को मूल मानकर चलेगा। चार सेमेस्टर वाले सभी डिग्री/परास्नातक
(पी.जी.) कोर्सेस में इन चार सेमेर्स्टस के प्रशिक्षणों को इस तरह समाहित कर दिया जाएगा कि देवसंस्कृति पर आधारित यह अनिवार्य पाठ्यक्रम योग, मनोविज्ञान ,भारतीय संस्कृति, समग्र स्वास्थ्य प्रबंधन सहित स्वावलंबन एवं अन्य भविष्य में खुलने वाले संकायों के साथ अनिवार्य रूप में जुड़ जाए। योग का छात्र भी इस जीवन विद्या में प्रवीण होकर निकले एवं आई. टी. या बी. टी. या होलिस्टिक मेडिसिन का छात्र भी। फिर धीरे धीरे इसकी वर्कशॉप्स का आयोजन विभिन्न विश्वविद्यालयों में भी किया जाएगा, ताकि यह हमारी शिक्षण प्रणाली का एक अंगं बन सके।
इस जीवन जीने की कला के पाठ्यक्रम के प्रथम सेमेस्टर में रचनात्मक जीवन की कला को मूल आधार बनाया गया है। इसमें सैद्धांतिक व प्रायोगिक दोनों ही शिक्षण है। थ्योरी की दृष्टि से मानव जीवन का परिचय ,अनंत श्रेष्ठतम संभावनाएं , लक्ष्य निर्धारण , अपने व्यक्तित्व की समझ आदि के बारे में सामान्य परिचय दिया जाएगा। आज मानव की जीवनशैली विकृत हो गई है। शारीरिक स्वास्थ्य की देखभाल के साथ लाइफ स्टाइल (जीवनशैली, खान पान, रहन सहन , वेशभूषा बोलचाल) को कैसे ठीक रखा जाए। संयम सदाचार का जीवन में महत्व क्या है।? परिवेश परिस्थिति के अनुसार जीवन का समायोजन कैसे हो, यह शिक्षण भी अनिवार्य है। इसी के अभाव में कुछ गिने चुने छात्र क्रूरता पर उतर आते हैं, रेगिंग करते हैं, कुछ भुक्तभोगी प्रवीण बुद्धिमान किंतु जीवनशैली से अपरिचित छात्र उनके शिकार होते हैं।
कल्पनाशक्ति, इच्छा संकल्पशक्ति, भावना, बुद्धि, स्मृति, रचनात्मकता, विधेयात्मक चिंतन की कला (पी.एम.ए. पॉजिटिव मेटल एटीच्यूड) भी इसी प्रथम छह माह के पाठ्यक्रम में आते है। श्रेष्ठ विचारो व आदर्शों का महत्व, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, आत्म मूल्यांकन, सफलता के सही मायने, व्यवहारकुशलता व घर परिवार तथा सामाजिक परिस्थितियों में उसका समायोजन इसी विधा में आता है। समय प्रबंधन (टाइम मैनेजमेंट), संतुलित एवं आकर्षक व्यक्तित्व का निर्माण, प्रभावी आत्म प्रस्तुतिकरण एवं नेतृत्व क्षमता का विकास इसी सेमेस्टर में आते हैं। क्रियात्मक प्रायोगिक रूप में प्रज्ञायोग, शिथिलीकरण प्राणाकर्षण प्राणायाम डायरी लेखन, सेल्फ विजुअलाइलेशन, योजनाबद्ध कार्यपद्धति का निर्धारण, आत्मबोध तत्वबोध, 15 मिनट का सार्थक गायत्री जप, ज्योति अवतरण की ध्यान धारणा तथा स्वाध्याय को लिया गया है।
दूसरा सेमेस्टर जीवन की विकृतियों के निदान एवं समाधान पर केंद्रित रखा गया है। इसमें थ्योरी पक्ष में मानव जीवन में सफलताओं का अभाव, संभावनाएं साकार न होने की स्थिति, कर्मफल का विधान , नैतिक आस्था में होती कमी, इससे घटती कार्यक्षमता, परिवार, कार्यालय एवं सामाजिक परिस्थितियों में असमायोजन जैसे पक्ष लिए गए है। अव्यवस्थित उच्छृंखल जीवनशैली, अस्वच्छता, दिशाहीन जीवन, दुर्व्यसन, असंयम, आलस्य व प्रमाद से होने वाली हानियाँ इनका निदान व समाधान भी इसी में लिया गया है। नकारात्मक चिंतन, तनाव, निराशा, कुंठा, अवसाद, उद्विग्नता, असफलता का भय आत्ममुग्धता दिवास्वप्न, आत्महीनता,अपराध भाव,निंदा, परदोषारोपण, ईर्ष्या द्वेष जैसे दुर्गुणों के निदान व समाधान इसी में आते है। दंभ, उग्रभाव, हिंसक स्वभाव ,लालच, अतिमहत्वाकांक्षा,अपराधी मनोवृत्ति,विखंडित व्यक्तित्व के निदान समाधान पक्ष इसी में है।
प्रायोगिक रूप में प्रथम सेमेस्टर की सभी विधियों के साथ लोम विलोम प्राणायाम,दिव्य अनुदान की ध्यान धारणा, प्रार्थना, प्रायश्चित विधान, मृदु चाँद्रायण, निष्कासन तप, निष्काम सेवा के विभिन्न क्रियात्मक पहलुओं का शिक्षण होगा।
तीसरे सेमेस्टर की धुरी है-आध्यात्मिक जीवन। इसमें मनुष्य में निहित आध्यात्मिक संभावनाएं, अंतर्दृष्टि (इंट्यूशन), अतींद्रिय क्षमताएं, आध्यात्मिक जीवनदृष्टि के जागरण का विज्ञान तप एवं योग सिखाया जाएगा। गुरु की आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में भूमिका, गुरु शिष्य संबंध, आध्यात्मिक साधना में सहायक तत्व,आने वाले अवरोध, पुनर्जन्म एवं मोक्ष, आध्यात्मिक जीवनशैली क्या है, यह बताया जाएगा। स्थूल, सूक्ष्म व कारणशरीर का आध्यात्मिक परिचय,विभूतियां, इनके जागरण की विधि,कर्मयोग ज्ञानयोग, भक्तियोग एवं इनके लिए आराधना, साधना, उपासना का शिक्षण भी इसी में आता है। श्रद्धा प्रज्ञा निष्ठा का तत्वदर्शन भी इसी में है। पंचकोशों का आध्यात्मिक परिचय, इनमें निहित दिव्य संभावनाएं, इनके जागरण की विधियाँ, षटचक्रों एवं कुंडलिनी का परिचय, जागरण का विज्ञान तथा आध्यात्मिक जीवन के लक्षण एवं मापन इसमें सिखाए जाएंगे।
क्रियात्मक पक्ष में प्रथम एवं द्वितीय सेमेस्टर की विधियों के साथ साथ साधक दैनंदिनी का नित्य पालन, साप्ताहिक उपवास, सोऽहम्, प्राणायाम, सविता ध्यान, आत्मदर्शन की साधना एवं नादयोग इसमें है।
चौथा सेमेस्टर आध्यात्मिक शिक्षण की कला को केंद्र में रखकर बनाया गया है। इसमें आध्यात्मिक आचार्य के अनिवार्य गुण, उच्च ध्येय, ईश्वरनिष्ठ जीवन, तपश्चर्या, सादगी विनम्रता परिष्कृत एवं प्रभावशाली व्यक्तियों के विषय में शिक्षण होगा। विद्यार्थियों में छिपी योग्यताएं, विशेषताएं, संभावनाएं, दुर्बलताएं, द्वंद्व दुविधा आदि द्वारा उनके मन एवं व्यवहार की समझ समुचित सहानुभूतिपूर्ण मार्गदर्शन का शिक्षण इस सेमेस्टर में होगा। साथ ही भावपूर्ण संप्रेषण,सहृदयता,संवेदनशीलता का स्थान, प्रभावी आध्यात्मिक शिक्षण की विधियाँ, सूक्ष्म वैचारिक संप्रेषण,दीक्षा तत्व आदि सिखाए जाएंगे। चिर, चिंतन एवं व्यवहार की प्रामाणिकता, गुण कर्म, स्वभाव की श्रेष्ठता, लोकसेवा के प्रति प्रतिबद्धता, ईश्वरीय कार्यों के प्रति समर्पण,निरहंकारिता जैसे स्वर्णिम सूत्र इसमें सिखाए जाएंगे। भगवान बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, महर्षि रमण एवं आचार्य श्रीराम शर्मा जी की शिक्षण विधियाँ भी बताई जाएगी। क्रियात्मक रूप में पहले तीन सेमेस्टर की सभी कार्यविधियों को पुनः कराकर निष्णात बनाया जाएगा।
जैसे अनगढ़ स्वर्ण को अग्नि में प्रविष्ट कराकर शुद्ध व फिर भस्म रूप में औषधीय प्रयोजन में दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार जीवन जीने की कलारूपी अग्नि विद्या द्वारा तपाकर भविष्य के भारत के नागरिकों को प्रबुद्ध, संवेदनशील एवं जीवन प्रबंधन में कुशल बनाए जाने का यह शिक्षण होगा। कहना न होगा कि ये सभी पक्ष जीवन में कितना महत्व रखते है। आज नहीं तो कल, सभी विश्वविद्यालयों तकनीकी भी, गैर तकनीकी भी, को अपना पाठ्यक्रम की धुरी इसी जीवन कला को बनाना होगा।
शांतिकुंज गायत्रीतीर्थ आना एवं यहां के साधना सत्रों में भागीदारी करना जीवन का एक बहुत बड़ा सौभाग्य माना जाना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव इसे महाकाल का घोंसला कहते रहे है, जहाँ से इक्कीसवीं सदी की ज्ञान गंगोत्री प्रवाहित हुई है। शीतऋतु, जो आश्विन नवरात्रि से आरंभ हो जाती है, तो अति विशिष्ट होती है। सभी महत्वपूर्ण साधनाएं इन्हीं दिनों की जाती है। दिन छोटे होते है, रात्रि बड़ी। वैसे भी आदमी अति शीत के कारण स्वयं को अंतर्मुखी बना लेता है। ऐसे में साधना फलदायी होती है।
मार्च अप्रैल से आरंभ होकर अक्टूबर के प्रथम सप्ताह तक वह समय चलता है, जब भारत व विदेशों के कोने कोने से कार्यकर्ता कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों के लिए यहाँ आते है। अत्यधिक भीड़ होती है। क्षेत्र के वरिष्ठ किंतु भावुक कार्यकर्ता एक स्लिप लिखकर अपना संदर्भ देते हुए एक बस भरकर परिजनों को भेज देते है। निश्चित ही इनने अनुमति नहीं ली होती है। इस अनगढ़ आगमन से साधना सत्र प्रभावित होते है। इसलिए शीतऋतु में शांतिकुंज आकर साधना करना एक ऐसा अवसर है, जिसे किसी भी आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुक को नहीं छोड़ना चाहिए। अब तो यहाँ देवसंस्कृति विश्वविद्यालय भी है, जहाँ लगभग दस हजार से अधिक ग्रंथ है, पढ़ाने वाले समयदानी विद्वान है तथा बहुत कुछ सीखने योग्य है। इतनी अधिक ठंड भी नहीं पड़ती कि भारतीय हुआ जाए।
शांतिकुंज हरिद्वार व गायत्री तपोभूमि मथुरा में तथा जन्मभूमि तीर्थ आंवलखेड़ा (आगरा) में भी सत्र वर्षभर चलते रहते है। शेष दो स्थानों पर घोषित सत्र ही होते है, पर शांतिकुंज में प्रति क्षण कोई न कोई सत्र चल रहा होता है। पूर्वानुमति लेकर अपना विस्तृत विवरण भेजकर कोई भी आ सकता है। शांतिकुंज के विशिष्ट सत्र, जो इस वर्ष शीतऋतु में किए जा सकते है, इस प्रकार है-
(1) नौ दिवसीय या एकमासीय संजीवनी साधना सत्र- ये सत्र प्रतिमाह 1 से 1,11 से 11,21 से 21 तारीखों में चलते हैं। नौ दिन की अवधि में चौबीस हजार गायत्री मंत्र का एक अनुष्ठान, आठ प्रेरक उद्बोधन, इतनी ही प्रेरणादायी गोष्ठियां तथा वीडियो संदेश दिनभर की दिनचर्या साधक को व्यस्त रखते हैं। प्रातः 4 बजे (26 सितंबर 23 से 2 मार्च 24 तक) उठाना होता है। हिमालय समीप होने पर भी ठंड इतनी नहीं होती कि कोई परेशानी हो। फिर तप तितिक्षा का विशेषकर तीर्थों में तो विशेष महत्व है ही। कुछ व्यक्ति एक माह की साधना का संकल्प लेकर आते हैं, उन्हें एक जीवन साधना सत्र व शेष समय साधनाक्रम समुचित मार्गदर्शन के साथ पूरा करने को कहा जाता है।
(2) अंतः ऊर्जा जागरण सत्र- ये मौन साधना सत्र है जो पाँच दिन के होते है। इनमें भागीदारी के लिए अनिवार्य है कि न्यूनतम नौ दिन का एक सत्र पहले संपन्न कर लिया हो। इस वर्ष ये सत्र 11 अक्टूबर से आरंभ होकर 25 दिसंबर तक चलेंगे (1 से 5, 6 से 10..... इस क्रम से) फिर 6 जनवरी से 12 जनवरी तक एवं 31 जनवरी से 21 फरवरी एवं 1 मार्च से 2 मार्च 24 तक चलेंगे। कुल 28 सत्र इस वर्ष के लिए निर्धारित है। इस वर्ष प्रति सत्र मात्र 32 साधक ही लिए जा रहे है। प्रत्येक को अपने विषय में विस्तार से लिखना होता है कि वे मौन से जुड़ी अन्य मर्यादाओं को निभा पाएंगे कि नहीं।
(3) युगशिल्पी एवं परिव्राजक सत्र- ये सत्र क्रमशः एक व डेढ़ माह के होते है। युगशिल्पी पाठ्यक्रम में पौरोहित्य, संभाषण, संगीत, युगनेतृत्व की प्रारंभिक जानकारी दे दी जाती है। परिव्राजक सत्र इन्हीं को आगे बढ़ाकर आगामी माह की 15 तारीख तक चलते है। लोकनायक बनने हेतु उत्सुक साधकों के लिए ये बहुत सटीक है। प्रतिमाह 1 से 21 एवं 1 से अगले माह की 15 तक ये चलते है।
(4) नौ दिवसीय रचनात्मक एवं छह दिवसीय आर.सी.एच. सत्र- ये सत्र बड़े विशिष्ट है। स्वावलंबन ग्राम प्रबंधन कुटीर उद्योग प्रधान ये शिक्षण सत्र प्रतिमाह 7 दिन के लिए 1 से 18 एवं 21 से सात तारीखों में होते है। शिशु एवं मातृ स्वास्थ्य, प्रजनन संबंधी प्रशिक्षण भी छह दिन हेतु प्रतिमाह 23 से 28 की तारीखों में संपन्न होता है। सरकारी संगठनों अथवा मिशन के उत्साही स्वास्थ्य से जुड़े समूहों को प्राथमिकता दी जाती है।
(5) विविध सत्र- इनमें भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की संगोष्ठियाँ, विश्वविद्यालय की कार्यशालाएं, कार्यकर्ता संगठन प्रशिक्षण, पाँच दिवसीय व्यक्तित्व परिष्कार सत्र, नैतिक प्रशिक्षण शिविर तथा ढाई दिवसीय जीवन प्रबंधन सत्र प्रमुख है, जो माँग के अनुसार आयोजित होते है।
प्रस्तुत शीतऋतु एक अवसर लेकर आई है। बिना प्रशिक्षण के मनुष्य अपने कौशल को, आत्मशक्ति को निखार नहीं सकता। इस शीतऋतु में ऐसा अवसर अपने भी जीवन में आए, ऐसा चिंतन अभी से चलने लगे।
भारती पुकारती, संस्कृति गुहारती। जाग! नौजवान जाग! राह पथ निहारती।
जाग, राष्ट्र को जगा, जागरण के गीत गा। देख तो सही उधर , सूर्य सुबह का उगा।
किलकिला उठी किरण तिमिर को बुहारती। जाग! नौजवान जाग! राह पथ निहारती।
किंतु भारती निराश, क्योंकि सामने विनाश। और देश का तरुण, इन क्षणों भी है उदास।
संस्कृति की व्यथा, तरुण को पुकारती। जाग! नौजवान जाग! राह पथ निहारती।
देश के जवान जाग! शौर्य, स्वाभिमान जाग। राष्ट्र, संस्कृति, समाज, भाग्य के विधान जाग।
जागी तरुणाई ही, राष्ट्र को संवारती। जाग! नौजवान जाग! भारती पुकारती।
परिवर्तन काल है, हवा में उछाल है। जो चला प्रवाह संग, हो गया निहाल है।
महाकाल की उमंग, प्रखरता निखारती। जाग! नौजवान जाग! भारती पुकारती।
-मंगल विजय ‘विजयवर्गीय’
*समाप्त*