मनुष्य हर तरफ से शास्त्र और शब्दों से घिरा है। लेकिन संसार के सारे शास्त्र एवं शब्द मिलकर भी साधना के बिना अर्थहीन हैं। शास्त्रों और शब्दों से सत्य के बारे में तो जाना जा सकता है, पर इसे पाया नहीं जा सकता। सत्य की अनुभूति का मार्ग तो केवल साधना है। शब्द से सत्ता नहीं आती है। इसका द्वार तो शून्य है। शब्द से निःशब्द में छलाँग लगाने का साहस ही साधना है।
विचारों से हमेशा दूसरों को जाना जाता है। इससे ‘स्व’ का ज्ञान नहीं होता। क्योंकि ‘स्व’ सभी विचारों से परे और पूर्व है। ‘स्व’ के सत्य को अनुभव करके ही हम परम सत्ता-परमात्मा से जुड़ते हैं। इस परम भाव दशा की अनुभूति विचारों की उलझन और उधेड़-बुन में नहीं निर्विचार में होती है। जहाँ विचारों की सत्ता नहीं है, जहाँ शास्त्र और शब्द की पहुँच नहीं है, वहीं अपने सत्य स्वरूप का बोध होता है, ब्रह्मचेतना की अनुभूति होती है।
इस परम भावदशा के पहले सामान्य जीवन क्रम में चेतना के दो रूप प्रकट होते हैं 1. बाह्य मूर्छित - अन्तः मूर्छित, 2. बाह्य जाग्रत् - अन्तः मूर्छित। इनमें से पहला रूप मूर्छा-अचेतना का है। यह जड़ता का है। यह विचार से पहले की स्थिति है। दूसरा रूप अर्धमूर्छा का है, अर्ध चेतना का है। यह जड़ और चेतन के बीच की स्थिति है। यहीं विचार तरंगित होते हैं। चेतना की इस स्थिति में जो साधना करने का साहस करते हैं, उनके लिए साधना के सत्य के रूप में चेतना का तीसरा रूप प्रकट होता है। यह तीसरा रूप अमूर्छा - पूर्ण चेतना का है। यह पूर्ण चैतन्य है, विचारों से परे है।
सत्य की इस अनुभूति के लिए मात्र विचारों का अभाव भर काफी नहीं है। क्योंकि विचारों का अभाव तो नशे और इन्द्रिय भोगों की चरम दशा में भी हो जाता है। लेकिन यहाँ जड़ता के सिवा कुछ भी नहीं है। यह स्थिति मूर्छा की है, जो केवल पलायन है, उपलब्धि नहीं। सत्य को पाने के लिए तो साधना करनी होती है। सत्य की साधना से ही साधना का सत्य प्रकट होता है। यह स्थिति ही समाधि है।
ध्यान अध्यात्म पथ का प्रदीप है। ध्यान की ज्योति जिसमें जितनी प्रखर है, अध्यात्म पथ उसमें उतना ही प्रकाशित हो जाता है। परमहंस श्री रामकृष्ण देव अपने शिष्यों से कहा करते थे कि ध्यान की प्रगाढ़ता अध्यात्म ज्ञान की परिपक्वता का पर्याय है। वह कहते थे- ‘जिसे ध्यान सिद्ध है, समझना चाहिए उसे अध्यात्म सिद्ध है।’ ध्यान की इस महिमा से कम-ज्यादा अंशों में प्रायः सभी आध्यात्म साधक परिचित हैं। साधक समुदाय में हर किसी की यही कोशिश रहती है कि उसका ध्यान प्रगाढ़ हो। परन्तु किसी न किसी कारण से ऐसा नहीं हो पाता। यदि कभी हुआ भी तो उसकी सही परख नहीं हो पाती।
कैसे परखें अपने ध्यान को? क्या है ध्यान साधना के सिद्ध होने की कसौटियाँ? ये सवाल इन पंक्तियों को पढ़ रहे प्रत्येक साधक के मन में कभी न कभी पनपते रहते हैं। शायद इन क्षणों में भी कहीं मानस उर्मियों में तरंगित हो रहे हैं। इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की चर्चा तो बहुत होती है। पर प्रायः सही समाधान नहीं जुट पाता। ध्यान के विषय में जब भी बात उठती है तो उसकी विधि प्रक्रियाएँ ही समझायी जाती हैं। इसकी सिद्धि के मानदण्ड क्या हैं? यह सवाल हमेशा अधूरा रह जाता है।
ध्यान प्रक्रिया की सूक्ष्मताओं पर और इसकी सिद्धि के मानदण्डों पर तन्त्र शास्त्रों एवं बौद्ध ग्रन्थों में काफी विस्तार से विचार किया गया है। बौद्ध सिद्ध सरहपा के अनुसार प्रायः साधक प्रकाश दिखना, विभिन्न रंग दिखना, अंतर्चक्षुओं के सामने अलौकिक दृश्यों का उभरना, आनन्द की अनुभूति होना आदि बातों को ध्यान सिद्धि का लक्षण मान लेते हैं। पर यथार्थता यह नहीं है। ऊपर गिनाए गए ये सभी लक्षण तो इतना भर सूचित करते हैं कि साधक ध्यान प्रक्रिया में गतिशील है। पर ये उसकी ध्यान सिद्धि की सूचना नहीं देते। ध्यान सिद्धि के मानदण्ड तो कुछ और ही हैं। शास्त्रकारों एवं सिद्धों ने इनकी संख्या काफी गिनायी है। लेकिन मुख्य तौर पर इन्हें सात तरीके से परखा-जाना जा सकता है।
महासिद्ध सरहपा कहते हैं कि साधक यदि अपने ध्यान को जाँचना चाहता है तो उसे निम्न मानदण्डों पर अपने को परखना चाहिए।- 1. आहार संयम, 2. वाणी का संयम, 3. जागरुकता, 4. दौर्मनस्य का न होना, 5. दुःख का अभाव, 6. श्वास की संख्या में कमी हो जाना और 7. संवेदनशीलता। ये सात ऐसे मानदण्ड हैं- जिनके आधार पर कोई भी साधक कभी भी अपने को जाँच सकता है कि उसकी ध्यान साधना कितनी परिपक्व और प्रगाढ़ हो रही है।
पहली कसौटी आहार संयम की है। ध्यान साधक में यदि आहार संयम सध रहा है तो समझना चाहिए उसका ध्यान भी सध रहा है। यह आहार संयम है क्या? तो इसके उत्तर में महान् योगी आचार्य शंकर कहते हैं- साधक को आहार कुछ इस तरह से लेना चाहिए जैसे कि औषधि ली जाती है। यानि की आहार वही हो और उतना ही हो जितना कि देह के पोषण के लिए पर्याप्त है। भगवद्गीता सात्त्विक आहार को परिभाषित करते हुए ध्यान साधक को ‘लघ्वाशी’ यानि कि कम खाने का निर्देश देती है। संक्षेप में ज्यों-ज्यों ध्यान प्रगाढ़ होता है साधक की स्वाद में रुचि समाप्त होती जाती है। ध्यान द्वारा मिलने वाली ऊर्जा बढ़ने के कारण उसका आहार भी बहुत न्यून हो जाता है।
दूसरी कसौटी है- वाणी संयम। वाणी संयम का अर्थ प्रायः लोग मौन होना समझ लेते हैं। लेकिन ऐसा उसी तरह से नहीं है जिस तरह से आहार संयम का अर्थ उपवास करना नहीं है। इसका अर्थ इतना भर है कि ध्यान साधना ज्यों-ज्यों प्रगाढ़ होती है, त्यों-त्यों अध्यात्म लोक के द्वार खुलते जाते हैं। ज्ञान और प्रकाश का एक नया लोक उसे मिल जाता है। फिर उसकी रुचि बेवजह की बातों में अपने आप ही समाप्त हो जाती है। इस क्रम में एक बड़ी रहस्यपूर्ण स्थिति भी आती है, जिसे केवल ध्यान साधक ही समझ सकते हैं कि ध्यान की प्रगाढ़ता में वाणी की अपेक्षा अन्तश्चेतना कहीं अधिक सक्रिय एवं प्रभावी होती है।
ध्यान की तीसरी कसौटी- जागरुकता है। जागरुकता का अर्थ है- बाह्य जागृति के साथ अन्तः जागृति एक साथ। ध्यान सध रहा है, तो जागरुकता भी अपने आप ही सध जाती है। ध्यान साधक की प्रगाढ़ता में साधक के अन्दर एक गहरी समझ पैदा होती है। वह बाह्य जीवन को भी अच्छी तरह से समझता है और आन्तरिक जीवन को भी। उसे अपने कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्वों का भली प्रकार बोध हो जाता है। वह जिन्दगी की सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों को यहाँ तक कि आसानी से नजर अन्दाज कर दी जाने वाली बातों को न केवल समझता है, बल्कि उनका समुचित उपयोग भी कर लेता है। उसे आन्तरिक एवं सूक्ष्म प्रकृति के संकेतों की भी बहुत गहरी समझ होती है। ध्यान की प्रगाढ़ता साधक में जिस क्रम में बढ़ती है, त्यों-त्यों वह मानवीय चेतना के सभी आयामों में जागरुक एवं सक्रिय हो जाता है।
ध्यान की चौथी कसौटी- दौर्मनस्य का समाप्त हो जाना है। सामान्य क्रम में देखा यही जाता है कि मन में एक के बाद एक नयी-नयी इच्छाएँ अंकुरित होती रहती हैं। इनमें से सभी का पूरी हो पाना प्रायः असम्भव होता है। इच्छा पूरी न होने की स्थिति में मनुष्य या तो स्थिति को उसका दोषी मानता है अथवा फिर किसी सम्बद्ध व्यक्ति को। और मन ही मन उससे बैर ठान लेता है। यही दौर्मनस्य की भावदशा है। ध्यान साधना करने वाले व्यक्ति के मन में इच्छाओं की बाढ़ नहीं आया करती है। उसके अन्तःकरण में निरन्तर जलने वाली ज्योति उसके सामने इस सत्य को प्रकाशित करती रहती है कि यहाँ अथवा किसी अन्य लोक में कुछ भी पाने योग्य नहीं है। इसके अलावा उसे इस महासत्य का हमेशा बोध होता है कि सृष्टि में सब कुछ भगवान् महाकाल की इच्छानुसार हो रहा है, फिर भला दोष किसका? जब दोष ही नहीं तब द्वेष क्यों? ये भावनाएँ उसे हमेशा दौर्मनस्य से बचाए रखती है।
ध्यान की पांचवीं कसौटी है- दुःख का अभाव। ध्यान साधक की चेतना में स्थिरता और नीरवता का इतना अभेद्य कवच चढ़ा रहता है कि उसे दुःख स्पर्श ही नहीं कर पाते। महर्षि पतंजलि ने दुःख को चित्त की चंचलता का परिणाम कहा है। जिसका चित्त जितना ज्यादा चंचल है, वह दुःखी भी उतना ही ज्यादा होता है। जहाँ चंचलता ही नहीं वहाँ दुःख कैसा? चंचल चित्त वाले व्यक्ति एक छोटी सी घटना से भी भारी दुःखी हो जाते हैं। किन्तु जिनका चित्त स्थिर है, उन्हें भारी से भारी दुःख भी विचलित नहीं कर पाते। श्रीमद्भगवद्गीता की भाषा में ‘न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।’
श्वास की संख्या का कम होना, ध्यान साधना की छठी कसौटी है। इस सत्य को हम सभी ने कई बार अनुभव किया होगा कि आवेग-आवेश में श्वास की संख्या बढ़ जाती है। इसी तरह शारीरिक असामान्यता में भी श्वास की गति बढ़ जाती है। ध्यान साधक की न केवल अन्तश्चेतना में स्थिरता और आवेग शून्यता आती है, बल्कि उसके शरीर में धातु साम्यता बनी रहती है। ऐसी स्थिति में स्वभावतः श्वास की गति कम हो जाती है। कभी-कभी तो श्वास की गति बड़ी आश्चर्यजनक ढंग से कम हो जाती है। ध्यान सिद्धि की इस कसौटी पर कोई भी साधक स्वयं को परख सकता है।
इस क्रम में एक चमत्कारी स्थिति और उत्पन्न होती है। वह यह है कि ध्यान साधक के सामने स्वरोदय शास्त्र स्वयं ही प्रकट हो जाता है। अनुभवी जन जानते हैं कि स्वरोदय शास्त्र का समग्र विकास श्वास की गति के आधार पर हुआ है। जो श्वास की गति को समझ जाता है, वह ऐसी चमत्कारी भविष्यवाणियाँ कर देता है, जिसकी सामान्य व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकते। इस बारे में विशिष्ट चर्चा यहाँ इन पंक्तियों में स्थानाभाव के कारण सम्भव नहीं है। पर श्वास की गति का सूक्ष्म ज्ञान और इसका कम होना ध्यान सिद्धि की एक ऐसी कसौटी है- जिस पर स्वयं को साधक गण जाँच-परख सकते हैं।
ध्यान साधना की सातवीं और श्रेष्ठतम कसौटी है- संवेदनशीलता यानि कि भाव संवेदना का जागरण।जिसका ध्यान जितना प्रगाढ़ होगा उसमें भाव संवेदना भी उतनी ही सघन होगी। उसकी करुणा भी उतनी ही तीव्र होगी। करुणा जागी है तो जानना चाहिए कि ध्यान सध रहा है। यदि अपनी संवेदनशीलता में पहले की तुलना में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई तो समझना चाहिए कि अभी अपनी ध्यान की प्रगति भी शून्य है। ध्यान सध रहा है- तो परिवार के प्रति, पड़ोसी के प्रति, मिलने-जुलने वालों के प्रति व्यवहार अपने आप ही करुणापूर्ण हो जायेगा। स्वार्थ और अहं में भारी कमी और करुणा का निरन्तर विस्तार ध्यान सिद्धि की श्रेष्ठतम कसौटी है।
उपर्युक्त वर्णित इन सभी कसौटियों का एक ही मर्म है कि ध्यान- मानव चेतना के रूपांतरण का सबसे समर्थ प्रयोग है। ध्यान ठीक से हो रहा है, तो रूपांतरण भी होगा। यदि पाँच-दस साल ध्यान करने के बाद भी जीवन चेतना में रूपांतरण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो समझना चाहिए कि हमने ध्यान किया ही नहीं। हमने केवल ध्यान के स्थान पर धर्म की रूढ़ि भर निभायी। जबकि ध्यान किसी भी तरह से रूढ़ि नहीं है। यह तो एक बहुत ही गहन वैज्ञानिक प्रयोग है, जिसे ऊपर बतायी गयी सात कसौटियों के आधार पर कभी भी परखा जा सकता है। यदि आप ध्यान साधक हैं तो आज और अभी इस बात की जाँच कीजिए कि आप की ध्यान साधना सिद्धि के किस सोपान तक पहुँच सकी है। जाँच का यह क्रम एक नियमित अन्तराल में हमेशा बना रहे- इसकी सावधानी हममें से हर एक ध्यान साधक को रखनी चाहिए।
एक सिद्ध पुरुष नदी में स्नान कर रहे थे। एक चुहिया पानी में बहती आई। उन्होंने उसे निकाल लिया। कुटिया में ले आए आए और वह वहीं पलकर बड़ी होने लगी।
चुहिया सिद्ध पुरुष की करामातें देखती रहती सो उसके मन में भी कुछ वरदान पाने की इच्छा हुई। एक दिन अवसर पाकर बोली, “मैं बड़ी हो गई, किसी वर से मेरा विवाह करा दीजिए।”
संत ने उसे खिड़की में से झाँकते सूरज को दिखाया और कहा, “इससे करा दें।” चुहिया ने कहा, “यह तो आग का गोला है। मुझे तो ठंडे स्वभाव का चाहिए।” संत ने बादल की बात कही, “यह ठंडा भी है, सूरज से बड़ा भी। वह आता है तो सूरज को अंचल में छिपा लेता है।” चुहिया को यह प्रस्ताव भी रुचा नहीं। वह इससे बड़ा दूल्हा चाहती थी। संत ने पवन को बादल से बड़ा बताया, जो देखते-देखते उसे उड़ा ले जाता है। उससे बड़ा पर्वत बताया, जो हवा को रोककर खड़ा हो जाता है। जब चुहिया ने इन दोनों को भी अस्वीकार कर दिया तो सिद्ध-पुरुष ने पूरे जोश-खरोश के साथ पहाड़ में बिल बनाने का प्रयास करते चूहे को दिखाया। चुहिया ने उसे पसंद कर लिया, कहा-“चूहा पर्वत से भी श्रेष्ठ है, वह बिल बनाकर पर्वतों की जड़ खोखली करने और उन्हें इधर से उधर लुढ़का देने में समर्थ रहता है।” एक मोटा चूहा बुलाकर संत ने चुहिया की शादी रचा दी। उपस्थित दर्शकों को संबोधित करते हुए संत ने कहा, “मनुष्य को भी इसी तरह अच्छे-से-अच्छे अवसर दिए जाते हैं, पर वह अपनी मनःस्थिति के अनुरूप ही चुनाव करता है।”
दर्द देवों का प्रचण्ड घन है। इसके प्रहार से आत्मा जागती है। दर्द जगाने के लिए आता है। यह शरीर एवं मन को जड़ता, वासना, कामनाओं के जंजाल से मुक्त करने आता है। दर्द हृदय की चरम-परम मोहग्रस्त भावुकता को छुड़ाने आता है। यह हृदय की पाषाणी जड़ता को तोड़ने आता है, सुप्त आत्मा को सुषुप्तावस्था से झकझोरने आता है। दर्द आत्मचेतना को जगाता है, जिससे आत्मचेतना परम चेतना की ओर आरोहित हो सके।
दर्द शरीर एवं मन का परिणाम है, कारण नहीं। और यह कारण है विकृति। विकृति जहाँ भी होगी वहीं दर्द होगा, पीड़ा का अनुभव होगा। विकृति का निवारण कर दिया जाए तो दर्द तिरोहित एवं विलीन हो जाएगा। विकृति है अर्थात् पीड़ा भी है, कष्ट भी है। इस पीड़ा की उत्पत्ति कैसे होती है? दर्द का उद्भव कहाँ होता है? और यह किस प्रकार कार्य करता है इसे समझने व जानने के लिए उसके कार्य का, उसकी फिजियोलॉजी का विश्लेषण करना आवश्यक है।
हमारा शरीर तंत्रिकाओं के जाल से बुना एवं बना है। त्वचा पर इनकी बुनावट कुछ अधिक ही होती है। इन तंत्रिकाओं के अंतिम सिरे पर अत्यन्त पतली एवं बारीक संरचनाएँ होती हैं। इन्हें संवेदना ग्राहक (सेंसरी रिसेप्टर) कहते हैं। इन ग्राहकों में कुछ विशेष रूप से दर्द से सम्बन्धित होते हैं। इनके सिरे खुले हुए एवं अनावरित होते हैं। इसके ठीक विपरीत स्पर्श संवेदना के ग्राहक गुच्छों में होते हैं। ग्राहक कई प्रकार के होते हैं। इनकी संरचना भी बड़ी जटिल होती है। विशिष्ट प्रकार के संवेदन ग्राहक विशेष कार्यों को ही सम्पादित करते हैं। स्पर्श, उष्णता, ठण्डकता, दबाव, चुभन, स्वाद, घ्राण, संवेदन आदि के ग्राहक केवल इन्हीं उद्दीपनों पर प्रतिक्रिया करते हैं। परन्तु खुले सिरे वाली तंत्रिकाएँ कई तरह के उद्दीपनों से सक्रिय हो जाती हैं। मानव शरीर में इन ग्राहकों की संख्याओं में बहुत अन्तर होता है। दर्द के ग्राहक ठण्ड के ग्राहकों से 27 गुना अधिक होते हैं और ठण्ड के ग्राहक गर्मी के ग्राहकों से 10 गुना अधिक होते हैं। संवेदना के ये ग्राहक अंगुलियों के पोरों में काफी संख्या में विद्यमान होते हैं।
ग्राहक तो दर्द की संवेदना को मस्तिष्क तक पहुँचाने का कार्य करते हैं। परन्तु दर्द का नियंत्रण मस्तिष्क के द्वारा होता है। अतः जिस जगह दर्द होता है उसकी सूचना इन ग्राहकों के द्वारा गति से मस्तिष्क तक पहुँचायी जाती है। यह प्रक्रिया बड़ी जटिल परन्तु तीव्र होती है। दर्द के ग्राहक संवेदना ग्रहण कर सीधे मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं। कोई जलती हुई या गर्म वस्तु हाथ में स्पर्श होते ही मेरु रज्जु हाथ को हटाने का संदेश प्रसारित कर देता है। इसे परावर्तित क्रिया कहते हैं। और हमारा हाथ हट जाता है। लेकिन इससे संवेदना संदेश का मस्तिष्क तक जाने का कार्य नहीं रुकता। मेरुरज्जु के संदेश के बावजूद मस्तिष्क अपना निर्णय प्रस्तुत करता है कि परिस्थिति से कैसे सामना किया जाय। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया मस्तिष्क द्वारा नियमित एवं संचालित होती है।
संदेश का प्रसार सर्वप्रथम तंत्रिका तंत्र में होता है।यह प्रसार तंत्रिकाओं के माध्यम से रासायनिक और विद्युत आवेगों के रूप में होता है। तंत्रिका कोशिका में संदेश विद्युत आवेगों के रूप में आगे बढ़ता है। तंत्रिका तंत्र पूरी लम्बाई में सीधे नहीं होते। ये छोटे-छोटे गाँठों के रूप में आपस में जुड़े होते हैं, जहाँ एक तंत्रिका कोशिका समाप्त होती है और दूसरी शुरू होती है, इसके बीच छोटा सा अन्तराल होता है। इसे ‘सायनेप्स’ कहते हैं। विद्युत आवेग इस अन्तराल को पार कर दूसरी कोशिका तक नहीं जा पाता है। इसलिए विद्युत आवेग कोशिकाओं को कुछ रासायनिक पदार्थ का स्राव करने हेतु प्रेरित करता है। इन पदार्थों को ‘न्यूरोट्राँसमीटर’ कहते हैं। ये न्यूरोट्रांसमीटर्स सायनेप्स को पार कर दूसरी तंत्रिका कोशिका में पहुँच जाते हैं। पास की तंत्रिका कोशिका में विशेष ग्राहक होते हैं। इनमें से ये न्यूरोट्राँसमीटर्स जाकर मिल जाते हैं। इससे पास की कोशिका में विद्युत आवेग पैदा हो जाता है और संदेश आगे बढ़ जाता है। सभी न्यूरोट्राँसमीटर्स विद्युत आवेग उत्पन्न नहीं करते हैं। इनमें से कुछ अवरोधक भी होते हैं।
आवेग तंत्रिका कोशिकाओं से यात्रा करता हुआ मस्तिष्क में पहुँचता है। मस्तिष्क में यह आवेग बीच मस्तिष्क में स्थित ‘थैलेमस’ तक पहुँचता है। थैलेमस सभी आवेगों का स्विच बोर्ड है। यही पर संवेदना को पहचाना-परखा जाता है। थैलेमस आवेग को और भी ठीक ढंग से परखने के लिए ‘कार्टेक्स’ में भेज देता है। कार्टेक्स ही किसी संदेश को दर्द के रूप में पहचानता है। यहाँ पर उस संदेश को याद रखने या उसे अनदेखा करने के निर्णय लिये जाते हैं। इसी क्षेत्र के कारण हमें दर्द का अनुभव होता है और हम दर्द पैदा करने वाली वस्तुओं से सावधानी रखते हैं।
कभी-कभी दर्द का संदेश मस्तिष्क तक पहुँचाने के लिए ऑटोनॉमिक तंत्र सहयोग करता है। शरीर में सूजन या फैलाव होने से उल्टी एवं रक्त दबाव भी होने लगते हैं। यह प्रक्रिया दर्द के संदेश को सीधे पहुँचाने की बजाय ऑटोनॉमिक तंत्र द्वारा पहुँचाया जाता है। कुछ रोगों में दर्द का अनुभव एकाएक नहीं होता है। कैंसर आदि रोगों में दर्द का अनुभव तब होता है जब यह रोग असाध्य हो चुका होता है। दर्द को झेलने की क्षमता सभी लोगों में समान नहीं होती है। कुछ लोग असह्य दर्द को भी बड़ी सहजता के साथ झेल जाते हैं और कुछ लोग काँटा चुभने से ही तड़प उठते हैं। साधक, योगी, मनस्वी, तपस्वी आदि में दर्द को झेलने की अपार क्षमता होती है।
स्वस्थ निरोगी व्यक्ति दर्द को आसानी से सह जाते हैं। लेकिन अस्वस्थता की स्थिति में उसी दर्द को सहना कठिन हो जाता है। डिप्रेशन एवं तनाव जैसे मनोरोगों में तो यह और भी कष्टप्रद होता है। वैज्ञानिक मान्यता है एस्ट्रोजन हार्मोन तंत्रिका तंत्र में दर्द को फैलने में बढ़ावा देता है। जबकि प्रोजेस्ट्रान दर्द को कम करता है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में प्रोजेस्ट्रान की अधिकता होने के कारण प्रसव पीड़ा से निपटने में सहायता मिलती है।
दर्द भी कई प्रकार का होता है। शरीर को चोट लगने पर कोशिका-उतकों में टूट-फूट होने से शारीरिक दर्द होता है। ऐसी अवस्था में दर्द का दायरा शरीर तक सीमित होता है। हालाँकि इससे मन भी प्रभावित होता है। मन के सूक्ष्म तारों के टूटने से उत्पन्न दर्द मानसिक विकार के रूप में दृष्टिगोचर होता है। तनाव, उदासी, अपराध बोध, चिन्ता, शोक, हताशा, निराशा आदि मनोविकार हैं जो मन के धरातल से उत्पन्न होते हैं। मनोरोगों की फिजियोलॉजी बड़ी ही सूक्ष्म होती है। इससे भी सूक्ष्म एवं संवेदनशील होती है भावना जन्य समस्याएँ। भावना-संवेदना पर लगी चोट मर्मांतक होती है क्योंकि इससे हृदय प्रभावित होता है। यह तथ्य आधुनिक साइको फिजियोलॉजी एवं न्यूरोसाइकोलॉजी के लिए भी अबोध एवं दुर्बोध बना हुआ है कि हृदय, भावना और दर्द का अंतर्संबंध क्या है और इसके निराकरण का उपाय क्या है। अभी तक शारीरिक दर्द एवं कुछ सीमा तक मानसिक विकृतियों का विश्लेषण ही हो पाया है परन्तु भावनात्मक परेशानियों की सही समझ-बूझ विज्ञान को नहीं मिल सकी है।
आखिर यह दर्द का निराकरण और समुचित समाधान कैसे हो? क्या दवा ही इसका एकमात्र निदान है? इसका उत्तर हमें नकारात्मक ढंग से देना पड़ेगा। क्योंकि दवा से दर्द ठीक हो जाता तो फिर क्यों उसका प्रभाव समाप्त होते ही पुनः दर्द प्रारम्भ हो जाता है। दवा समाधान नहीं है क्योंकि दवा दर्द के मूल तक, कारण तक नहीं पहुँच पाती है। दर्द का मुख्य कारण है विकृति। और यह विकृति जिस स्तर पर होगी उसी स्तर पर दर्द का प्रभाव होगा।
दर्द के मुख्य कारण को जानकर ही उसका निराकरण किया जा सकता है। दर्द के उन्मूलन के लिए उसके मुख्य स्रोत विकृति तक पहुँचना होगा। विकृति और विकार को समाप्त करना ही दर्द का कारगर समाधान है, और ऐसा सम्भव है। महर्षि अरविन्द ने अपने अन्दर के विकारों को इतना परिवर्तित कर दिया था कि वहाँ केवल दर्द ही समाप्त नहीं हुआ था बल्कि आनन्द की धारा फूट पड़ी थी। उन्होंने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए एक पत्र में लिखा था कि मेरे पैर को आरी से काटे जाने पर दर्द नहीं परम आनन्द का बोध होगा। वे आगे कहते हैं यह मात्र एक कल्पना ही नहीं एक उन्नत आध्यात्मिक विज्ञान है। क्योंकि दुःख-दर्द, आनन्द के विरोधी होते हैं। इनके हटते-मिटते ही आनन्द का निर्झर झरने लगता है। घटाओं से घिरा सूर्य बादलों के हटते ही प्रकाशित हो उठता है। ठीक उसी प्रकार आत्मा पर चढ़े संस्कारों के विकृत आवरण उतरते ही आत्मा ज्योतिर्मय एवं चैतन्य हो उठती है।
दुःख-दर्द विकारों का एक परत मात्र है, विकृतियों का उलझा जाल मात्र है। दुःख-दर्द शरीर, मन और भावना को रह-रहकर कष्ट और पीड़ा देते रहते हैं। इनके होने में दर्द है और इनके अभाव में हर्ष और आनन्द। अतः हमें संकल्प और साधना के माध्यम से दर्द रूपी इस विकार से मुक्ति का उपाय तलाशना चाहिए। भगवद् देन समझकर दर्द को सहकर ही दर्दमुक्त हुआ जा सकता है। अतः हमें असीम धैर्य और दृढ़ मनोबल से इसका सामना करना चाहिए। यही आत्म चेतना को विकसित करने का उपयुक्त माध्यम है।
एक माली ने बगीचा लगाया और उसे हरा-भरा बनाया। एक दिन कोई गाय बगीचे में घुसी और पौधे चर गई। माली ने क्रोध में उसे ऐसे जोर से लट्ठ मारा कि गाय वहीं चक्कर खाकर गिर पड़ी और ढेर हो गई। गौ हत्या का पाप आया और उसके सामने आकर खड़ा हो गया, बोला- “मैं आ गया और अब तुम्हारा सर्वनाश करूंगा।”
माली घबराया। बचने का कोई उपाय सोचने लगा, उसे एक कथा याद आई। पंडित के मुँह से उसने सुना था कि मनुष्य के हर एक अंग का मालिक एक देवता है, उसी की शक्ति से अवयव काम करते हैं। उस प्रसंग में हाथों का देवता इंद्र को बताया गया था। वह स्मरण आते ही माली की चिंता दूर हो गई।
गौ-हत्या के पाप से उसने कहा- “भाई मैंने नहीं इंद्र ने हत्या की है। तुम उसी के पास जाकर दंड दो।”
पाप चल पड़ा। इंद्रलोक पहुँचा। सारा घटनाक्रम सुनाया और कहा, “जब आपने गौ-हत्या की है, तो दंड भी आप ही को भुगतान होगा।”
इंद्र चकित रह गए। उन्होंने तो वैसा किया नहीं था, फिर माली ने उन पर किस कारण दोष लगाया। वे माली के पास चल पड़े। पाप को कुछ समय प्रतीक्षा करने के लिए मना लिया।
इंद्र अजनबी रूप बनाकर उस बगीचे में पहुँचे, सुँदर उद्यान की भरपूर प्रशंसा की और उपस्थित लोगों से पूछा, “वह माली कौन है, जिसने इतनी कुशलता का परिचय दिया, देखने का मन है।”
माली के कान में भनक पड़ी तो वह दौड़ा गया और विस्तारपूर्वक बताने लगा, “पहले यहाँ जंगल था। उसने इन्हीं हाथों से भूमि बनाई। दूर-दूर से पौधे लाया। इन्हीं हाथों से उसे सींचा-संजोया। यह मेरा ही पुरुषार्थ है और अब मैं इन्हीं हाथों से फल-फूल की फसल बटोरता और कोठे भरता हूँ। उसने गर्वपूर्वक हाथ बढ़ाए और अपरिचित को दिखाए।
अपरिचित के रूप में आए इंद्र अपने असली स्वरूप में प्रकट हुए और बोले, “जब इन हाथों की कमाई का श्रेय और लाभ आप लेते हैं तो गौ-हत्या के पाप का दंड क्यों इंद्र पर लादते हैं। उसे भी आप ही भुगतिए।”
माली को अपनी जरूरत से ज्यादा समझदारी का दंड अंततः भुगतना ही पड़ा।
राजगृह नगर प्रायः भगवान् तथागत के श्री चरणों के स्पर्श से पावन होता रहता था। नगरवासियों में भगवान् के प्रति सहज प्रीति थी। वे सब उठते, बैठते एक-दूसरे से मिलने पर ‘नमो बुद्धस्स’ कहकर तथागत का स्मरण कर लेते थे। इस नगर में दो बालकों की मित्रता बड़ी चर्चित थी। सुवीर और सुयश यही नाम थे उनके। किशोरवय के ये दोनों बालक भाँति-भाँति के खेल-खेला करते। अचरज की बात यह थी सुयश हमेशा जीतता था और सुवीर हमेशा हार जाता। इसमें सबसे अचरज तो इस बात का था कि जो सदा जीतता था, वह हारने वाले से सभी दृष्टियों से कमजोर था।
सुवीर ने अपने जीतने के लिए सभी उपाय किये। खेलने का ज्यादा अभ्यास किया, परन्तु सफलता न मिली। लेकिन परिणाम पहले की ही भाँति बना रहा। सुवीर को इस बात की भारी चिन्ता था कि आखिरकार सुयश के लगातार जीतने का कारण क्या है? हाँ एक बात सुयश में बड़े ही साफ तौर पर नजर आती थी, कि वह आश्चर्यजनक ढंग से शान्त रहता था। उसमें जीत के लिए कभी कोई आतुरता नहीं झलकती थी। उसमें जीतने के लिए कभी कोई आग्रह नहीं था। वह बस खेलता था, सम्पूर्ण मनोयोग से किन्तु अनाग्रह से।
कोई फलाकाँक्षा नहीं थी उसमें। इसे देखकर ऐसा लगता था, जैसे वह अपने आप में केन्द्रित है, स्वयं में ठहरा हुआ है। उसमें एक अनोखी गहराई थी। वह ओछा नहीं था, न ही उसमें कोई छिछलापन था। उसके अंतस् में जैसे कोई लौ निष्कम्प जलती थी। उसके चारों ओर एक प्रसादपूर्ण प्रभामण्डल था। शायद इसीलिए बार-बार हारने पर भी सुवीर उसका शत्रु न बन पाया था। उसकी मित्रता कायम थी। सुयश चाहे जितनी बार जीतता, परन्तु उसमें कभी कोई अहंता न आती थी। जीतना जैसे उसके लिए कुछ खास था ही नहीं। खेलना ही उसके लिए सब कुछ था, फिर जीतें या हारें, इससे उसको कोई प्रयोजन नहीं था। फिर भी वह जीतता था।
सुवीर, सुयश के प्रत्येक व्यवहार को बारीकी से देखता था। इस क्रम में उसने देखा कि सुयश प्रत्येक खेल शुरू करने से पहले आँख बन्द करके एक क्षण को निस्तब्ध हो जाता था। कुछ इस तरह जैसे कि सारा संसार रुक गया हो। हाँ वह अपने होठों में जरूर कुछ बुदबुदाता था। जैसे कि वह कोई प्रार्थना कर रहा हो या कि फिर कोई मंत्रोच्चार करता हो अथवा अपने ईष्ट का स्मरण कर रहा हो।
अन्ततः एक दिन सुवीर ने सुयश से यह रहस्य पूछा- प्रिय मित्र, तुम खेल शुरू करने से पहले यह क्या करते हो? हर खेल शुरू होने से पहले तुम किस दुनिया में खो जाते हो। सुयश ने कहा- प्रिय मित्र! मैं तो बस भगवान् का स्मरण करता हूँ। ‘नमो बुद्धस्स’ का पाठ करता हूँ। शायद इसीलिए मैं जीत जाता हूँ। परन्तु मुझे हर बार-हर समय यही लगता है कि यह जीत मेरी नहीं, भगवान् की है। मैं नहीं जीत रहा, भगवान् जीत रहे हैं।
सुयश की बातें सुनकर उस दिन से सुवीर ने भी नमो बुद्धस्स का पाठ शुरू कर दिया। हालाँकि उसे पहले से कोई अभ्यास नहीं था, फिर भी उसे इसमें धीरे-धीरे रस आने लगा। शुरुआत तो तोता रटन्त से ही हुई थी, पर मंत्रोच्चार के परिणाम मन पर दिखाई देने लगे। गहराई में न सही पर सतह पर इसके स्पष्ट फल दिखाई देने लगे। वह थोड़ा शान्त होने लगा। उसकी उच्छृंखलता कम होने लगी। थोड़ा छिछलापन कम होने लगा। उसकी हार की पीड़ा कम होने लगी। जीतने की महत्त्वाकाँक्षा भी थम सी गयी। खेल बस खेलने के लिए है, ऐसा भाव उसमें जागने लगा।
भगवान् के स्मरण में वह अनजाने ही अपनी अन्तश्चेतना में डूबने लगा। शुरू तो किया था इसलिए कि खेल में जीत जाऊँ। लेकिन धीरे-धीरे जीत-हार की बात ही बिसर गयी। अब तो बस स्मरण में आनन्द बरसने लगा। पहले तो खेल के शुरू-शुरू में याद करता था, पर बाद में जब कभी एकान्त मिल जाता तो बैठकर नमो-बुद्धस्स-नमो बुद्धस्स का जाप करने लगता। यहाँ तक कि कुछ दिन बीतने पर खेल गौण हो गया और जाप प्रमुख हो गया। एक मिश्री सी उसके मुँह में घुलने लगी। सुवीर बुद्ध स्मरण में विभोर होने लगा। नमो बुद्धस्स का जप करते हुए उसे एक खुला आकाश दिखाई पड़ने लगा। धीरे-धीरे उसकी आकाँक्षाएँ खो गयीं। सब समय एक शान्त धारा उसके भीतर बहने लगी।
एक दिन वह अपने पिता के साथ लकड़ी काटने के लिए जंगल गया। लौटने पर पिता-पुत्र दोनों ही रास्ते में श्मशान के पास बैलों को खोलकर थोड़ी देर विश्राम के लिए रुके। भरी दोपहरी थी और वे थक गए थे, इसलिए सो गए। जगने पर देखा उनके बैल नगर में चले गए हैं। पिता ने सुवीर से कहा, बेटा! तुम यहीं रुककर गाड़ी और लकड़ी की रखवाली करो, मैं बैलों को लेकर आता हूँ। काफी खोज-बीन करने पर बैल तो मिल गए, पर तब तक सूर्य ढल चुका था। सूर्य ढलने के साथ ही नगर द्वार बन्द हो गया। अमावस की अंधेरी रात, इकलौता पुत्र अकेला श्मशान में। पिता को भारी चिन्ता हुई, पर क्या करे, विवशता ने उसे जकड़ दिया।
उधर सुवीर अमावस की अंधेरी रात में मरघट में अकेला था। इतना अकेलापन उसे पहली बार मिला था। पर उसे यहाँ डर लगने के बजाय बड़े आनन्द की अनुभूति हुई। वह भक्ति और प्रीति के साथ ‘नमो बुद्धस्स’ का जप करने लगा। जप करते-करते हृदय के तार जुड़ गए, भक्ति की संगीत जम गया, अन्तश्चेतना की वीणा बजने लगी। पहली दफा उसे ध्यान की झलक मिली। धीरे-धीरे वह ध्यान में डूब गया। यह बड़ी गहरी अनुभूति थी। सब तरफ से सुख बरस रहा था, पर शान्ति उसे भिगो रही थी। शरीर सोया था, अन्तर में जागरण का पर्व था। उजियारा ही उजियारा था। जैसे हजार-हजार सूरज एक साथ जग गए। जीवन सब तरफ से प्रकाशित हो गया। जो घटना किसी के लिए अभिशाप बन सकती थी, उसके लिए वरदान बन गयी।
अमावस की उस रात्रि में महानिशाकाल होते ही श्मशान जाग्रत् हो उठा। ब्रह्मराक्षस, पिशाच, योगिनियाँ, डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी के यूथ वहाँ नृत्य करने लगे। श्मशान का सम्पूर्ण वातावरण भयावह हो गया। परन्तु सुवीर की आत्मचेतना किसी अलौकिक राज्य में निमग्न थी। एक आध्यात्मिक प्रभामण्डल उसे घेरे था। नृत्य कर रही इन सूक्ष्म सत्ताओं ने जब उसकी यह भावदशा देखी, तो उन्होंने अपने को धन्य माना। वे भागे हुए गए और सम्राट के महल से सोने के बर्तनों में भोजन लेकर आए। उन सबने मिलकर उसे भोजन कराया एवं सेवा की। प्रातः होते ही वे सभी सूक्ष्म सत्ताएँ अदृश्य हो गयीं।
इधर सम्राट के सिपाहियों ने महल के खोये हुए बर्तनों की खोज की। और खोजते हुए उन्होंने सुवीर को पकड़ लिया। बन्दी सुवीर को सम्राट के सामने लाया गया। उन दिनों बिम्बसार का शासन था। वह स्वयं भगवान् तथागत के भक्त थे। उन्होंने सुवीर से सारी बात जाननी चाही। सुवीर ने भी उत्तर में सम्राट बिम्बसार को प्रारम्भ से सारी कथा कह सुनायी। चकित और हतप्रभ सम्राट उस बालक को लेकर भगवान् के पास पहुँचे। भगवान् इन दिनों राजगृह में ही ठहरे हुए थे। सारी बातें सुनकर भगवान् ने कहा- सम्राट! यह बालक ठीक कह रहा है। बुद्धानुस्मृति स्वयं के ही परम रूप की स्मृति है। जब तुम कहते हो ‘नमो बुद्धस्स’ तो तुम अपने ही परम दशा का स्मरण कर रहे हो।
यह सतह के द्वारा गहराई की पुकार है। यह परिधि के द्वारा केन्द्र का स्मरण है। यह कहते हुए उन्होंने यह धम्म गाथा कही-
सुप्पबुद्धं पबुज्झति सदा गोतम सावका। येसं दिवा च रत्तो च निच्चं बुद्धगता सति॥
‘जिनकी स्मृति दिन-रात सदा बुद्ध में लीन रहती है, वे गौतम के शिष्य सदा सुप्रबोध के साथ सोते और जागते हैं।’ भगवान् की इस बात ने सम्राट बिम्बसार को यह बोध दिया कि सद्गुरु के स्मरण से शिष्य सहज ही परम भावदशा को उपलब्ध हो जाता है।
लालबहादुर शास्त्री तब केंद्रीय गृहमंत्री थे। उनके निवास स्थान का एक दरवाजा जनपथ की ओर था। दूसरा अकबर मार्ग की ओर था। एक बार दो श्रमिक स्त्रियाँ सिर पर घास का गट्ठर रखकर उस मार्ग से निकलीं तो चौकीदार ने उन्हें धमकाना शुरू किया। उस समय शास्त्री जी अपने बरामदे में बैठे कुछ शासकीय कार्य कर रहे थे। उन्होंने सुना तो बाहर आ गए और पूछने लगे, क्या बात है? चौकीदार ने सारी बातें बता दी। शास्त्री जी ने कहा, क्या तुम देख नहीं रहे हो कि उनके सिर पर कितना बोझ है। यदि यह निकट के मार्ग से जाना चाहती हैं तो तुम्हें क्या आपत्ति है? जाने क्यों नहीं देते? जहाँ सहृदयता हो, दूसरों के प्रति सम्मान भाव हो, वहाँ सारी औपचारिकताएं एक तरफ रखकर वही करना चाहिए, जो कर्त्तव्य की परिधि में आता है।
जीव को तीन भवबंधनों में बँधा हुआ माना जाता है। हाथों में हथकड़ी, पैरों में बेड़ी और कमर में रस्सी से बँधे हुए चोर-तस्कर इधर से उधर ले जाए जाते है। घोड़े के पैरों में पिछाड़ी, गले में रस्सी और मुँह में लगाम लगी रहती हैं भवबंधन भी वासना, तृष्णा और अहंता के तीन ही है। इन्हीं के कारण निरंतर खिन्न-उद्विग्न रहना पड़ता है। इन तीन के अतिरिक्त मानव जीवन में अशाँति छाई रहने का और कोई कारण नहीं है। इन्हीं को काम, क्रोध, लोभ कहा गया है। इन्हीं तीनों के सम्मिश्रण में अनेकों प्रकार के मनोविकार उठते है और इन्हीं की प्रेरणा से अनेकानेक पापकर्म बन पड़ते है। इन तीनों बंधनों को खोला-काटा जा सके तो समझना चाहिए, बंधनमुक्ति का सौभाग्य बन गया। साधना विज्ञान में इन तीन बंधनों के खुलने पर तीन दिव्य शक्तियों के दर्शन एवं अनुग्रह का लाभ मिलने की बात कही गई है।
साधना विज्ञान के तत्वदर्शी वैज्ञानिकों ने तीन ग्रंथियों का विस्तृत विवेचन एवं निरूपण किया है। उन्हें खोलने के साधन एवं विधि-विधान बताए हैं। उनके नाम है ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि, रुद्र ग्रंथि। रुद्र ग्रंथि का स्थान नाभि स्थान माना गया है, इसे अग्निचक्र भी कहते हैं। माता के शरीर से बालक के शरीर में जो रसरक्त प्रवेश करता है। उसका थान यह नाभि स्थान ही है। प्रसव के उपराँत नाल काटने पर ही माता और तान के शरीरों का संबंध विच्छेद होता है इस नाभिचक्र द्वारा ही विश्वब्रह्माँड का वह अग्नि प्राप्त होती रहती है जिसके कारण शरीर को तापमान मिलता ओर जीवन बना रहता है। स्थूल शरीर को प्रभावित करने वाली प्राण क्षमता का केंद्र यही है। शरीर शास्त्र के अनुसार नहीं, अध्यात्म शास्त्र के सूक्ष्म वान के अनुरूप प्राण धारण का केंद्र यही है। कुँडलिनी शक्ति इसी नाभिचक्र के पीछे अधोभाग में अवस्थित है मूलाधार चक्र का मुखद्वारा नाभि स्थान में है और अधोभाग में मल-मूत्र छिद्रों के मध्य केन्द्र है। इस केंद्र के जागरण-अनावरण का जो विज्ञान-विधान है यह त्रिपदा गायत्री के प्रथम चरण का क्षेत्र समझा जा सकता है।
दूसरी ग्रंथि है-विष्णु ग्रंथि। यह मस्तिष्क मध्य ब्रह्मरंध्र में है। आज्ञाचक्र, द्वितीय नेत्र इसी को कहते है। पिट्यूटरी और पीनियल हारमोन ग्रंथियों का शक्तिचक्र यहीं बनता है। मस्तिष्क के खोखले को विष्णुलोक भी कहा गया है। इसमें भरे हुए भूरे पदार्थ को क्षीरसागर की उपमा दी गई है। सहस्रार चक्र को हजार फन वाला शेष सर्प कहा गया है। जिस पर विष्णु भगवान सोए हुए है। ब्रह्मरंध्र की तुलना पृथ्वी के ध्रुवप्रदेश से की गई हैं अनंत अंतरिक्ष में अंतर्ग्रही प्रचंड शक्तियों की वर्षा निरंतर होती रहती है। ध्रुवों में रहने वाला चुँबकत्व इस अंतर्ग्रही शक्ति वर्षा में अपने लिए आवश्यक संपदाएँ खींचता रहता है। पृथ्वी के वैभव की जड़ें इसी ध्रुव प्रदेश में है। वहाँ से उसे आवश्यक पोषण निखिल ब्रह्माँड की संपदा में उपलब्ध होता रहता हैं। ठीक इसी प्रकार मानवी काया एक स्वतंत्र पृथ्वी है। उसे अपनी अति महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा करने का अवसर इसी ब्रह्मरंध्र के माध्यम द्वारा उपलब्ध होता रहता हैं। यह ध्रुवप्रदेश अवरुद्ध रहने से, मूर्च्छित स्थिति में पड़े रहने से सूक्ष्मजगत के अभीष्ट अनुदान मिल नहीं पाते और पिछड़ेपन की आत्मिक दरिद्रता छाई रहती है। विष्णुग्रंथि के जाग्रत होने पर ही वह द्वार खुलता है। दूरदर्शन, दूर-श्रवण, भविष्य-ज्ञान, विचार-संचालन, प्राण-प्रहार आदि अनेक योग और तंत्र में वर्णित शक्तियों का निवास इसी क्षेत्र में हैं। सिद्धियों की चौंसठ योगनियाँ यहीं समाधिसि बनकर लेटी हुई है। उन्हें यदि जगाया जा सके तो मनुष्य सहज ही सिद्ध पुरुष बन सकता है, उनकी अविज्ञात क्षमता विकसित होकर देवतुल्य समर्थता का लाभ दे सकती है।
यह भ्रम ही तो है जो मनुष्य को पथभ्रष्ट करता और उसके अनुपम सौभाग्य को व्यर्थ की बरबादी में नष्ट करता हैं इस विपत्ति से छुटकारा मिल सकने के साधनात्मक उपाय को विष्णुग्रंथि को खोलना कहते है। यह द्वार खुल जाने पर अनंत आकाश में बिखरी पड़ी बहुमूल्य ज्ञानसंपदा को बटोर लेना भी सहज संभव हो सकता है। सामान्य शिक्षा से जितना जिस क्षेत्र का ज्ञान संपादन किया जाता है, उसकी तुलना में कहीं ऊँचा और कहीं अधिक सुविस्तृत, परिष्कृत ज्ञान जाग्रत मनःसंस्थान से अनायास ही उपलब्ध किया जा सकता है। विष्णुग्रंथि के जागरण से मिलने वाली सफलता के अनुपात से इस प्रकार के अनेकों दिव्यज्ञान साधना प्रयोगों द्वारा सहज ही उपलब्ध होने लगते है। त्रिपदा गायत्री का दूसरा चरण विष्णुग्रंथि खुलने से संबंधित है।
त्रिपदा का तीसरा चरण ब्रह्मग्रंथि से संबंधित है। इसका स्थान हृदयचक्र माना गया हैं। इसे ब्रह्मचक्र भी कहते है। भावश्रद्धा, संवेदना एवं आकाँक्षाओं का क्षेत्र यही है। शरीरशास्त्र के अनुसार भी रक्त का संचार एवं संशोधन करने वाला केंद्र यही है। इस धड़कन को ही पेंडुलम की खट-खट की तरह शरीर रूपी घड़ी का चलना माना जाता है। अध्यात्मशास्त्र की मान्यता इससे आगे की है। उसके अनुसार हृदय की गुहा में प्रकाश ज्योति की तरह यहाँ आत्मा का निवास है। परमात्मा भावरूप में ही अपना परिचय मनुष्य को देते है। श्रद्धा और भक्ति के शिकंजे में ही परमात्मा को जकड़ा जाता है। यह सारा मर्मस्थल यहीं है। किसी तथ्य का हृदयंगम होना, किसी प्रियजन का हृदय में बस जाना जैसी उक्तियों से यह प्रतीत होता है। कि आत्मा का स्थान-निरूपण इसी क्षेत्र में किया गया है। उर्दू का प्रसिद्ध शेर है-“दिल के आइने में है तस्वीर यार की, जब जरा गरदन उठाई देख ली।”
हृदय चक्र ब्रह्मग्रंथि हैं। वहाँ से भावनाओं का, आकाँक्षा-अभिरुचि का परिवर्तन होता है। जीवन की दिशाधारा बदलती है। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अंबपाली, विल्वमंगल, अजामिल आदि का प्रत्यावर्तन-हृदय परिवर्तन ही उन्हें कुछ-से कुछ बना देने में समर्थ हुआ। जीवन का समग्र शासनसूत्र यहीं से संचालित होता है। आकाँक्षाएँ विचारों का निर्देश देती है ओर मनःसंस्थान को अपनी मरजी पर चलाती है। मन के अनुसार शरीर चलता है। शरीर कर्म करता हैं कर्म के अनुरूप परिणाम और परिस्थितियां सामने आती है। परिस्थितियों में सुधार करना हो तो कर्म ठीक करने होंगे। शरीर पर नियंत्रण का और मस्तिष्क का अधिपति हृदय है। प्रियतम को हृदयेश्वर और हृदयेश्वरी कहा जाता है। मानवी सत्ता पर स्वामित्व हृदय का ही है।
तेज प्रवाह में बहती हुई नदी के मध्य जो भँवर पड़ते है, उनकी शक्ति सामान्य प्रवाह की तुलना में सैकड़ों गुनी अधिक होती है। सुदृढ़ नावों, जहाजों और मल्लाहों को भँवर में फंसकर डूबते देखा गया है। हवा गरम होने पर चक्रवात उठते है। उनकी तूफानी शक्ति देखते ही बनती है। मजबूत छत, छप्पर, पेड़ और मकानों को वे उठाकर कहीं से कहीं पटक देते है। रेत को आसमान में छोड़ते है और आँधी-तूफान के बवंडर उठकर अपने प्रभावक्षेत्र को बुरी तरह अस्त-व्यस्त कर देते हैं ऐसे ही कुछ चक्रवात केंद्र भंवर चक्र अपने शरीर में भी है। उनकी गणना षटचक्रों ओर नवचक्रों के रूप में की जाती हैं। छोटे चक्र और भी है। जिनकी गणना 18 तक की गई है। इन सब में तीन ग्रंथियां प्रधान है। रुद्रग्रंथि, विष्णुग्रन्थि और ब्रह्मग्रंथि तीनों ही शरीर को परस्पर जोड़े हुए है ओर सूक्ष्म जगत के साथ आदान-प्रदान का सिलसिला भी बनाए हुए हैं। स्थूल शरीर नाभिचक्र के नियंत्रण में है। सूक्ष्मशरीर पर आज्ञाचक्र का, कारण शरीर पर हृदय चक्र का आधिपत्य हैं ताले खोलने को चाबी डालने के छिद्र यही तीन है। योगाभ्यास इन्हीं की साधना को रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा की साधना माना गया है। इसी समूचे सत्ता क्षेत्र को त्रिपदा गायत्री की परिधि कहा गया है।
गुणों की दृष्टि से त्रिपदा को निष्ठा, प्रज्ञा और श्रद्धा कहा गया है। निष्ठा का अर्थ है-तत्परता-दृढ़ता। प्रज्ञा कहते है-विवेकशीलता-दूरदर्शिता को, श्रद्धा कहते है आदर्शवादिता और उत्कृष्टता को। कर्म के रूप में निष्ठा गुण के रूप में प्रज्ञा और स्वभाव के रूप में श्रद्धा। श्रद्धा की गरिमा सर्वोपरि हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के परिष्कार का परिचय इन्हीं तीनों के आधार पर मिलता है। गुण, कर्म, स्वभाव ही किसी व्यक्तित्व की उत्कृष्टता के परिचायक होते है।
त्रिपदा का एक पक्ष सृजनात्मक है दूसरा ध्वंसात्मक। एक आध्यात्मिक है दूसरा भौतिक। अध्यात्म के सृजन पक्ष को गायत्री कहते है और भौतिक विज्ञान पक्ष को सावित्री। अवाँछनीयताओं के निराकरण का उत्तरदायित्व भी सावित्री का हैं पौराणिक गाथा के अनुसार इन्हें ब्रह्मा जी की दो पत्नियाँ माना जाता है। सृजन पक्ष के रूप में त्रिपदा की चर्चा अधिक हुई है। श्रुति ने असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय-मृत्योर्माऽमृतं गमय के रूप में त्रिपदा के तीन चरणों की अभ्यर्थना की गई है और तृप्ति, तुष्टि एवं शाँति का वरदान माँगा है।
दूसरे सावित्री पक्ष की चर्चा कम ही हुई है, पर है वह भी महत्वपूर्ण पक्ष। खेत जोतने लेकर फसल पकने तक की प्रक्रिया लंबी और समयसाध्य है। काटने का काम तो दो-चार दिन में ही पूरा हो जाता है। शरीर के परिपोषण में ही अधिक समय लगता है। बीमार पड़ने पर सुई लगाने पर आपरेशन होने का काम तो यदा-कदा ही होता है। मित्रता निर्वाह में ही जीवन का अधिकाँश भाग बीतता है। शत्रु से लड़ने के अवसर तो थोड़े ही आते है। भौतिक उपार्जन और उपयोग के लिए तो काया अपने आप ही काम करती रहती है, संतुलन बनाने के लिए आध्यात्मिक प्रयत्नों पर ही जोर देना पड़ता है। ऐसे ही अनेक कारणों से त्रिपदा के गायत्री पक्ष का विवेचन और विधान शास्त्रकारों ने विस्तारपूर्वक बनाया है। यह दक्षिण मार्ग है, इसे देवयान भी कहते है। यह देवत्व का लक्ष्य प्राप्त कराती है।
त्रिपदा का वाममार्ग तंत्र हैं। उसे अपनाने से भौतिक पक्ष सुदृढ़ होता है। दैत्य शब्द वैभव, बड़प्पन, विस्तार बल का बोधक है। पुराणों में दैत्यों की भौतिक और देवताओं की आत्मिक शक्ति का वर्णन हैं दूरदर्शी ऋषि गायत्री की उपासना करते थे और भौतिक लाभों के लिए लालायित को वाममार्गी साधना करनी पड़ती थी। देवपक्ष के आचार्य वृहस्पति थे। दैत्य पक्ष का प्रशिक्षण शुक्राचार्य करते थे। तप-साधना दोनों को ही करनी पड़ती थी, ऋषि और देवताओं का सात्विक तप होता था, दैत्यों का तामसिक। कुँभकरण, मेघनाद, मारीच, हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, भस्मासुर, वृत्रासुर, सहस्रबाहु, महिषासुर आदि अनेक दुर्दांत दैत्यों के वैभव और पराक्रमों का वर्णन पुराणों में मिलता हैं। यह सावित्री पक्ष की उपासना का परिणाम है। एकाँकी दुष्टता को निरस्त करने के लिए आक्रमण अस्त्र के रूप में त्रिपदा के सावित्री पक्ष का प्रयोग होता है। इस प्रकार के प्रयोग-उपचार को ब्रह्मास्त्र कहते है।
रिवाल्वर आदि प्रचंड अस्त्रों के लाइसेंस हर की को नहीं मिलते। प्रामाणिक व्यक्तियों को ही उन्हें रखने की आज्ञा मिलती है। ठीक इसी प्रकार ताँत्रिक प्रयोगों की शिक्षा सर्वसुलभ नहीं की गई किन्तु है वह त्रिपदा का एक महत्वपूर्ण पक्ष। गायत्री का ज्ञान पक्ष ब्रह्मा विद्या कहलाता है और विज्ञान पक्ष ब्रह्मतेजस्। दोनों के समन्वय से ब्रह्मवर्चस शब्द बना है। इसमें आत्म-ज्ञान और आत्मबल दोनों का समन्वय कह सकते है। अथर्ववेद में गायत्री विद्या की सात सिद्धियाँ गिनाई गई है। सबसे अंतिम सोपान ब्रह्मवर्चस कहा गया है। उसकी उपलब्धि के लिए जो संतुलित यात्रा करनी पड़ती है, उसमें दक्षिण और वाममार्ग का ब्रह्मयोग और तंत्रयोग दोनों का समन्वय सम्मिलित है। इसी से उसे पूर्णयोग की संज्ञा दी गई है।
एक नदी तट पर बिच्छु और केकड़ा पास-पास रहते थे। एक दिन बिच्छु बोला, “मित्र तुम्हें पानी में तैरते देखता हूँ, तो आनंद भी आता है और ईर्ष्या भी। आनंद इस बात का कि तैरते समय तुम्हें कितनी प्रसन्नता होती होगी। ईर्ष्या इस बात से कि मैं वैसा भाग्यशाली न बन पाया, जिसे कि तुम्हारी तरह तैरता और आनंद लेता।” केकड़ा उसका प्रयोजन समझ गया, बोला, “पीठ पर सैर करा देने में तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है, किंतु दोस्त तुम स्वभाव न छोड़ोगे और डंक मार कर मेरे लिए प्राण संकट खड़ा करोगे।”
बिच्छु ने कहा, “मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ, जो उपकारकर्ता को डंक मारूं। आपके मरने पर मैं भी तो डूबूँगा।” केकड़े को विश्वास हो गया। उसने बिच्छू को पीठ पर बिठाकर तैरना आरंभ किया। बिच्छू को मस्ती आई तो शपथ की याद ही नहीं रही और डंक उसकी पीठ में चुभो दिया।
केकड़ा तिलमिलाया। बेचैनी में पानी में डूबा और बिच्छु भी जल में डुबकी लेने लगा। मरते समय केकड़े को यह समझ आई कि दुष्ट से बचे रहने में ही खैर है।
गौ-माता भारतीय संस्कृति की दिव्यता एवं दैवत्व का परम पवित्र प्रतीक है। गौ-माता मानव जाति को अनन्य अनुदान देती है। यह माता के समान उपकार करने वाली, दीर्घायु और आरोग्य प्रदान करने वाली है। यह कई प्रकार से मानव मात्र की सेवा करती है और उसे सुख, समृद्धि व शान्ति से ओतप्रोत करती है। इसके उपकार, अनुदान एवं वरदान से मानव कभी उऋण नहीं हो सकता। यही कारण है कि गाय को माता और दैवतुल्य मानकर ‘मातेव रक्षति’ के दिव्य भाव से उसकी प्रार्थना की गयी है। गाय की महत्ता और महिमा अपार है। वह कृषि उद्योग का आधार है तथा समृद्धि की जननी है। इसी कारण सभी धर्मों और सम्प्रदायों में इसका गुणगान किया गया है।
गीता गायक भगवान् श्रीकृष्ण ने गाय को कामधेनु कहा है। कामधेनु अर्थात् हमारी समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली। हमारे दैहिक स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक गुणों की सर्वोत्तम संरक्षिका होने के कारण वेदों में गाय को अमृत नाभि या पीयूष नाभि कहा गया है। गौ-माता की देह में सभी देवता निवास करते हैं। शास्त्रोक्त कथन है कि धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी सर्वप्रथम गाय के रूप में प्रकट हुई और उन्हीं के गोबर से विल्व वृक्ष की उत्पत्ति हुई। वेदों में गाय का गुणानुवाद भाव भरी ऋचाओं और मंत्रों में किया गया है। ऋग्वेद की ऋचा कहती है -
‘गौ में माता ऋषभः पिता में दिवम
शर्म्म जगती में प्रतिष्ठ।’
अर्थात् गाय मेरी माता है और, बैल मेरे पिता हैं, ये दोनों मुझे स्वर्ग और सुख प्रदान करें। गौओं में मेरी प्रतिष्ठ हो।
शुक्ल यजुर्वेद में गाय की महिमा इस तरह से की गई है-
अन्धस्थान्धो वो भक्षीय महस्थ महो वो महीयो। वो भक्षीय रायस्योपस्थ राजत्पोथं वो भक्षीय ॥
अर्थात् हे गौओं! आप अन्न प्रदान करने वाली हैं आपकी कृपा से हम अन्न को प्राप्त करें। आप पूजनीय हैं। आपकी सेवा से हममें सात्त्विक एवं उच्च भाव पैदा हों। आप बल व सामर्थ्य प्रदात्री हैं, हमें भी आप बलवान एवं सामर्थ्यवान् करें। आप धन-सम्पदा को बढ़ाने वाली हैं, अतः हमारे पास भी सम्पदा में अभिवृद्धि हो।
अथर्ववेद में गौओं को ओज, तेज प्रदान करने वाली कहा गया है -
सूर्य गायो भेद कृशं चिद्क्षीरं चि कृणुथा सुप्रतीकम्। अहं गृहं कृणुथा भद्रवाचो वृहदो वय उच्यते समासु॥
गौओं के दूध से निर्बल मनुष्य सबल और स्वस्थ बनता है और निस्तेज व कान्तिहीन मानव तेजस्वी होता है। गौओं से घर की शोभा बढ़ती है। गौओं का शब्द अत्यन्त मधुर है
शास्त्रों में गाय को वेदों की जननी के रूप में उल्लेख किया गया है-
गोभ्यो यज्ञाः प्रवर्त्तन्ते गोम्यो देवाः समुत्थिताः। गोभ्यो वेदाः समुदगोर्णाः सषड्गंपदक्रमाः ॥
गौओं के द्वारा यज्ञ चलते हैं, गौओं से ही देवता हुए हैं। छः अंगों सहित वेदों की उत्पत्ति गौओं से ही हुई है।
श्रृंगमूलं गवा नित्यं ब्रह्मविष्णु समाश्रितो। श्रृंगाग्रे सर्वतीर्थानी स्थावराणि चराणि च॥
गौओं के सींग के मूल में ब्रह्म और विष्णु निवास करते हैं। सींग के अग्रभाग में सब तीर्थ और स्थावर जंगम रहते हैं।
शिरोमध्ये महादेवः सर्वभूतमयः स्थितः। गवामर्गेषु निष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश ॥
गौओं के सिर के बीच में सारे संसार के साथ शिवजी निवास करते हैं। गौओं के अंगों में चौदहों भुवन रहते हैं।
गावः स्वर्गस्य सोपानं गावः स्वर्गेऽपि पूजिताः। गावः कामदुहो देव्यो नान्यात्किचात्परं स्मृतम् ॥
गौएं स्वर्ग की सीढ़ी हैं, स्वर्ग में भी गौओं की पूजा होती है। गौएँ इच्छित फल देने वाली हैं। गौ से बढ़कर उत्तम और कोई वस्तु नहीं है।
गौ की महत्ता केवल हिन्दू धर्म में ही प्रतिपादित नहीं है बल्कि इस्लाम और ईसाई धर्मावलम्बी भी गाय को पवित्र दृष्टि से देखते हैं। मुहम्मद साहब ने गाय को जानवरों का सरदार कहा है और आदेश दिया है कि उसकी बुजुर्गी व इहतराम किया जाए। मुस्लिम प्रचारक ने गौ-हत्या न करने के लिए समय-समय पर फतवा जारी किया है। जब भारत का शासन सूत्र तैमूरवंशी बादशाहों के हाथ आया तो उसका प्रथम शासक बाबर हुआ। बाबर ने जीवन के अन्तिम समय में अपने लड़के हुमायूँ को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि सबसे पहले गाय की कुर्बानी देना बन्द कर देना, क्योंकि ऐसा किए बिना तुम हिन्दुओं के हृदय पर राज नहीं कर सकते। इसी कारण हुमायूँ ने गौ-वध बन्द कराया था। वह गौ-माँस को नापसन्द करते थे। हुमायूँ तथा बहादुरशाह आदि ने जनता के हित और देश की आर्थिक उन्नति को लक्ष्य में रखकर गौ-हत्या पर पाबन्दी लगायी तथा गौ-वध के विरुद्ध कानून बनाया था।
अकबर ने शाही फरमान निकाला था कि यदि कोई व्यक्ति गौ-हत्या करेगा तो वह सुल्तानी गजट के अंतर्गत एक दण्डनीय अपराध माना जाएगा। उन्होंने इस फरमान का उल्लंघन करने वालों की हाथ व पाँवों की अंगुलियाँ कटवाने की आज्ञा दी थी। हकीम अजमल खाँ के अनुसार कुरान और अरब की प्रथा दोनों ही गौ-हत्या का समर्थन नहीं करती हैं। नवाब साहब मुर्शिदाबाद, नवाब राधनपुर, नवाब मंगरौल, नवाज दरजाना आदि गौ वध के विरोधी थे तथा गौ को आदर व सम्मान देते थे।
गो धन के महत्त्व को मुहम्मद बिन तुगलक और गजनवी भी अच्छी तरह से जानते, समझते थे। इसी कारण खिलजी तथा तुगलक वंशों के बादशाहों ने समय-समय पर गाय की रक्षा के नियम बनाये। ‘आइना-ए-अकबरी-आइना’ में गौ के प्रति अनन्य श्रद्धाभाव का उल्लेख मिलता है। इसके पृष्ठ 63 में कुछ इस प्रकार का वर्णन मिलता है- ‘सुन्दर वसुँधरा भारत में गाय माँगलिक समझी जाती है। उसकी भक्तिभाव से पूजा होती है, और इसी से खेती होती है। इसके द्वारा उत्पन्न अन्न, दूध, मक्खन आदि पौष्टिक एवं उपयोगी होते हैं। गौ माँस निषिद्ध है और उसे छूना पाप है।’
पाश्चात्य विद्वान् एवं मनीषी भी गाय को पवित्र एवं आदर भाव से देखते थे। सर विलियम बैडरवर्न ने गौ माता के प्रति अपनी भावाभिव्यक्ति कुछ इस तरह से दी है- ‘मैं इसकी कल्पना कर सकता हूँ कि किसी राष्ट्र के बिना भी गौ हो सकती है, किन्तु मैं स्वप्न में भी यह अनुमान नहीं कर सकता कि कोई राष्ट्र बिना गौ के भी रह सकता है।’ अमेरिका के प्रसिद्ध लेखक वाल्टर ए. डामर के अनुसार गौ के सौम्य रूप में देवत्व भरा है। वह महानता और भव्यता से ओतप्रोत है। गाय में शत-प्रतिशत मातृत्व है और मनुष्य जाति से उसका सम्बन्ध माता के समान है। ‘फिजीकल कल्चर’ पत्रिका के अमेरिकी सम्पादक ने माना है कि कोई जाति बिना गौ पालन के समृद्धिशाली नहीं हो सकती।
गाय के प्रति सम्मान का यह भाव अकारण नहीं है। गो सेवा द्वारा ही प्राचीन भारत खुशहाल और समृद्धिशाली रहा। और यह तथ्य आज भी उतना ही समीचीन व सामयिक है। भारतीय कृषि और गोपालन का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। वे एक दूसरे के पूरक हैं। एक के द्वारा दूसरे का पोषण होता है। हमारे देश की आर्थिक संरचना गोपालन पर निर्भर है, क्योंकि यहाँ की 80 प्रतिशत जनता की आजीविका का मुख्य स्रोत कृषि व्यवसाय है। और उसका प्रमुख आधार बैल है, जो गाय से प्राप्त होता है। हमारी अर्थनीति का प्राण व आधार गौ धन है। इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है, बल्कि इसका समुचित सुनियोजन करके ही विकास व प्रगति के पथ पर बढ़ा जा सकता है।
आरोग्य एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए तो गोपालन अनिवार्य एवं अपरिहार्य है। इटली के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. जी.ई. बिगेंड ने गोबर पर अनेक शोध कार्य किया है। उनके अनुसार ताजे गोबर से तपेदिक और मलेरिया के कीटाणु मर जाते हैं। गाय के गोबर की इस आश्चर्यजनक शक्ति के कारण ही इटली के अधिकाँश सेनेटोरियमों में गोबर का ही उपयोग किया जाता है। गाय के श्वास से निकलने वाली वायु और गाय के रंभाने से बहुत से रोगों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। जहाँ पर गाय बंधी होती है वहाँ रोग नहीं पनपते क्योंकि उस क्षेत्र में कीटाणु जीवित नहीं रह सकते हैं। गाय का गोबर रेडियोएक्टिव जैसे अति विषैले तत्त्वों को निष्क्रिय कर देता है।
आर्ष साहित्य में गौ के गोबर में लक्ष्मी का और मूत्र में गंगा का वास बताया गया है। इस उक्ति के पीछे प्रबल तथ्य है- यह श्रद्धा या संयोगवश नहीं कहा गया है। प्रयोग में पाया गया है कि गाय के गोबर व गोमूत्र में कार्बोनिक एसिड तथा मैंगनीज होता है, जिसके कारण उनमें कीटाणुनाशक गुण होता है। इसमें स्वर्णसार आँरम आक्साइड होता है। अतः यह भी जीवाणु एवं विषनाशक है। सोडियम और आयरन की उपस्थिति के कारण यह अम्लतानाशक और रक्तशोधक भी है। गोमूत्र व गोबर इन विशिष्टताओं की वजह से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। ये अनेक रोगों का शमन व स्वास्थ्य का संवर्धन करते हैं। इसके अलावा इनसे अनेक प्रकार के ऐसे उत्पाद बनाए जा सकते हैं, जो कुटीर उद्योग व ग्रामोद्योग का सुदृढ़ आधार बन सकते हैं। गोबर गैस संयंत्र से जनरेटर चलाकर बिजली पैदा की जा सकती है। इस प्रकार गोवंश की सेवा करना कृषि, उद्योग, ऊर्जा, पर्यावरण आदि के लिए अत्यन्त लाभदायक है।
मनुष्येत्तर जीवों में गाय का भावनात्मक स्तर सर्वाधिक होता है। उसके स्वभाव में करुणा, ममता, शालीनता, संतोष जैसी सत्प्रवृत्तियों का बाहुल्य रहता है। उसमें उत्साह, स्फूर्ति, बलिष्ठता और सहनशीलता अन्य पशुओं की अपेक्षा अधिक होती है। ये सब गुण गाय के दूध में भी रहते हैं। उसे प्रयोग करने वाले की मनःस्थिति एवं प्रवृत्ति भी उसी ढाँचे में ढलती है। तत्त्वदर्शियों ने गाय को अनेक आत्मिक गुणों से सम्पन्न पाया है। उनके अनुसार उसका सान्निध्य, सेवा, उपक्रम एवं गोरस का सेवन बौद्धिक एवं भावनात्मक विकास में सहायक होता है। दुग्ध पान करने वाले के अन्दर भी सात्त्विकता में अभिवृद्धि होती है। गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र एवं गोबर से बने पंचगव्य के सेवन से देह ही नहीं मन एवं बुद्धि के विकार व विकृति भी दूर होते हैं और आयु, बल, तेज आदि की वृद्धि होती है।
गाय चैतन्य, प्रेम, करुणा, त्याग, सन्तोष और सहिष्णुता आदि दिव्य गुणों से परिपूर्ण है। गाय के रोम-रोम में सात्त्विकता का विकिरण होता है। श्रद्धापूर्वक उसकी सेवा करने से अंतःकरण में परमात्मा के स्मरण का स्फुरण होता है। अतः हमें इस लाभ से लाभान्वित होने के लिए गोपालन एवं गोसेवा करनी चाहिए, जिससे हम आर्थिक लाभ, शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शान्ति एवं आत्मिक उपलब्धि प्राप्त कर सकें।
बंगाल के न्यायधीश नीलम बंद्योपाध्याय ने एक बीमा एजेंट के फुसलाने पर पाँच हजार का बीमा करा लिया। मधुमेह की बीमारी होते हुए भी स्वास्थ्य विवरण में उस बात को छिपा दिया गया।
लम्बी बीमारी के बाद जब बंद्योपाध्याय महोदय का अंतकाल निकट आया तो उन्होंने बीमा एजेंट को बुलाकर उस बेईमानी का इकरारनामा लिखा और बीमे को रद्द करा दिया। बोले, जीवनभर बुराइयों से बचता रहा तो मरते समय यह पाप सिर पर लादकर क्यों मरूं?
बापू के पैरों में बिवाई फट गई थी। ‘बा’ गरम पानी से उसको धो रही थीं। पानी बेकार न जाने पाए, इसलिए बापू की हिदायत के अनुसार वे उसे इधर-उधर नहीं, पौधों में ही डालती थीं।
उस दिन पानी ‘बा’ ने गुलाब के पौधों में डाला। बापू बहुत देर तक गुलाबों को नाराजी की दृष्टि से देखते रहे। ‘बा’ ने कारण पूछा, तो बापू ने कहा, “सुन्दर होते हुए भी यह फूल मुझे काँटों जैसे बुरे लगते है। इनके स्थान पर यदि शाक उगाए होते तो उनसे हममें से किसी का पेट तो पलता। श्रम का कुछ सार्थक परिणाम तो हाथ लगता।
एक हाथी बड़ा स्वार्थी और अहंकारी था। दल के साथ रहने की अपेक्षा वह अकेला रहने लगा। अकेले में दुष्टता उपजती है, वे सब उसमें भी आ गई।
एक बटेर ने छोटी झाड़ी में अंडे दिए। हाथियों का झुँड आते देखकर बटेर ने उसे नमन किया और दलपति से उसके अंडे बचा देने की प्रार्थना की। हाथी भला था। उसने चारों पैरों के बीच झाड़ी छुपा ली और झुँड को आगे बढ़ा दिया। अंडे तो बच गए, पर उसने बटेर को चेतावनी दी कि एक इक्कड़ हाथी पीछे आता होगा, जो अकेला रहता है और दुष्ट है। उससे अंडे बचाना तुम्हारा काम है। थोड़ी देर में वह आ ही पहुँचा। उसने बटेर की प्रार्थना अनसुनी करके जान-बूझकर अंडे कुचल डाले।
बटेर ने सोचा कि दुष्ट को मजा न चखाया तो वह अन्य-अनेकों का अनर्थ करेगा। उसने अपने पड़ोसी कौवे तथा मेढ़क से प्रार्थना की। आप लोग सहायता करें तो हाथी को नीचा दिखाया जा सकता है। योजना बन गई। कौवे ने उड़-उड़कर हाथी की आँखें फोड़ दी। वह प्यासा भी था। मेढ़क पहाड़ी की चोटी पर टर्राया। हाथी ने वहाँ पानी होने का अनुमान लगाया और चढ़ गया। अब मेढ़क नीचे आ गया और वहाँ टर्राया। हाथी ने नीचे पानी होने का अनुमान लगाया और नीचे को उतर चला। पैर फिसल जाने से वह खड्ड में गिरा और मर गया। स्वार्थ-परायणों को इसी प्रकार नीचा देखना पड़ता है।
हर युग का अपना मौलिक एवं विशिष्ट विचार होता है। हर युग को अपना विचार पैदा करना होता है, हर युग को अपनी दृष्टि विकसित करनी होती है। आज का युग चरम याँत्रिकी युग है। इसी कारण आज के विचार यंत्रवत हैं और दृष्टि भी भौतिक उपलब्धियों से इतराती-इठलाती संकीर्ण व संकुचित हो गयी है। आज हमारे पास विचार तो है लेकिन भौतिक जगत् में अधिकाधिक सुख-भोग, ऐश्वर्य प्राप्त करने की ललक-लिप्सा लिए हुए है, जीवन लक्ष्य के प्रति नहीं है। दृष्टि तो है पर बाह्य जगत् की चकाचौंध को समेटने की, निहारने की है, आन्तरिक जीवन को विचारने-जानने के लिए नहीं है। आज के इस वैज्ञानिक एवं याँत्रिकी युग ने हमें भौतिक जगत् की तमाम बड़ी उपलब्धियाँ तो दी हैं, परन्तु जीवन के प्रति सोच व विचार को छीन लिया है। अतः वर्तमान युग में विचार हीनता का संकट खड़ा हो गया है। मनुष्य में सोचने, विचारने व समझने की शक्ति का घनघोर पतन हो गया है।
आज वैज्ञानिक युग में विज्ञान ने जानकारी व सूचना के लिए चमत्कारिक स्रोत उपलब्ध करा दिए है। नित नये आविष्कार हो रहे हैं, जिसकी कल्पना मात्र से हैरत होने लगती है। इसी वजह से भौगोलिक रूप से वर्तमान विश्व एक घर एवं आँगन में सिमटकर रह गया है। मन को लुभाने व रंजन करने हेतु मनोरंजन के अपार साधन हस्तगत हुए हैं। हम घर में बैठकर ही नहीं बल्कि अपनी कार चलाते हुए भी इन्टरनेट के माध्यम से विश्व के किसी भी कोने एवं किसी भी चीज की जानकारी पलभर में प्राप्त कर लेते हैं। आज का नन्हा बालक जितना जानता है, पुराने जमाने का एक आदमी उसकी कल्पना तक नहीं कर सकता था।
एक दृष्टि में यह एक बड़ी उपलब्धि है। इसका श्रेय विज्ञान को दिया जाता है और दिया जाना भी चाहिए। क्योंकि विज्ञान ने बिना प्रयास के अनायास हमारे लिए ढेर सारी जानकारी मुहैया करा दी है। हमें इसे पाने हेतु कोई विशेष मेहनत एवं श्रम नहीं करना पड़ता है। किसी विशेष रिसर्च पेपर को पढ़ने के लिए ढेर सारी रिसर्च जर्नल्स को उलटना, पलटना एवं तलाशना नहीं पड़ता, इण्टरनेट के किसी विशेष साइट में जाकर इसे तुरन्त देखा, पाया व पढ़ा जा सकता है। इसके विश्लेषण हेतु बुद्धि लगाने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि इस संदर्भ में अनेक शोध वैज्ञानिकों के मत भी आसानी से मिल जाते हैं। और हम सोचते हैं कि हमने अपना बहुमूल्य समय एवं श्रम को बचाया और यह कुछ हद तक सही भी है, परन्तु हम एक बड़ी बात भूल जाते हैं कि अनायास प्राप्त हुई इस जानकारी से एक बहुत बड़ा नुकसान भी हुआ है। हमारी सोचने-समझने की शक्ति क्रमशः क्षीण होती जा रही है। हमारे विचार निष्क्रिय एवं निस्तेज होते जा रहे हैं। क्योंकि हम स्वयं नहीं सोचते, चिन्तन नहीं करते, संचार माध्यम से केवल तैयार विचारों का आयात करते हैं।
विज्ञान के वरदानों से हमारे शरीर को सुख अवश्य मिला है, परन्तु मन को मनन करने का मौका नहीं मिला। मनन ही मन का सर्वोपरी गुण है। आग की उष्णता एवं बर्फ की ठण्डकता के समान मन की मननशीलता एवं विचारशीलता ही उसकी नैसर्गिक विशेषता है। परन्तु विज्ञान ने इस नैसर्गिकता का हनन करके विष कुँभ पैदा किया है, जिसे न तो पीया ही जा रहा है और न छोड़ा। हम गहरे द्वन्द्व में उलझ गए हैं। सही एवं गलत के बीच निर्णय करने की भेद दृष्टि समाप्त हो गयी है। और इस उचित-अनुचित के निर्णयात्मक विचारों के अभाव में हम अनजाने-अनायास ही ऐसे विचारों के शिकार हो जाते हैं, जिन्हें हम पसन्द तक नहीं करते। और इसी कारण हमारी कभी की नापसन्द आज सबसे बड़ी पसन्द बन गई है, और नासमझी सबसे बड़ी समझ। जहर को समझने वालों को समझाया जा सकता है, उसे उससे दूर रहने की हिदायत दी जा सकती है, परन्तु जो विष को अमृत समझकर आनन्दपूर्वक पी रहा हो उसे नहीं समझाया जा सकता है। आज हम लोग ठीक इसी विचारहीनता की अवस्था में जी रहे हैं।
विज्ञान ने हमारे सोचने विचारने की शक्ति का हरण कर लिया है। हम विचारहीन हो गए हैं। अतः किसी से भी प्रभावित हो जाते हैं, आकर्षित हो जाते हैं। हमने हमारी समृद्ध सनातन संस्कृति को भुला दिया है, जो हमें सोचने, विचारने तथा चिन्तन की कला सिखाती है। यह हमें श्रेय और प्रेय में अन्तर बताती है, उचित और अनुचित में फर्क दिखाती है तथा उपयुक्त, उत्कृष्ट व श्रेष्ठ को चुनाव करने की क्षमता देती है। लेकिन आज हमें हमारी जीवनदायिनी संस्कृति की अपेक्षा भोग-उपभोग की संस्कृति अच्छी लग रही है। यही हमारे जीवन का चरम-परम लक्ष्य बन गया है कि जीवन को अधिकतम रूप में भोग लिया जाय। और उपभोक्तावादी संस्कृति का भी यही मूल मंत्र है। इसके अनुसार मनुष्य को सोचने, समझने एवं जानने का मौका ही न दिया जाए। विज्ञान प्रदत्त संचार माध्यमों ने इस प्रक्रिया को और आसान व सहज बना दिया है।
आज हम इन साधनों के गुलाम बन गए हैं। दूरदर्शन के कई लुभावने चैनल, इण्टरनेट के मनभावन साइट हमारी जीवनचर्या के महत्त्वपूर्ण अंग बन गए हैं। इन चैनलों और साइटों में सीरियल की कहानी एवं विषय की जानकारी के अलावा अनेक उत्पादों का विज्ञापन भरा पड़ा रहता है। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि कहानी तो केवल बहाना है, मुख्य उद्देश्य है अपने-अपने उत्पादों को प्रचार-प्रसार करना तथा उसे बेचना। विचारहीन मन इन उत्पादों के पीछे भागने लगता है। मन की सारी उधेड़-बुन एवं कल्पनाएँ इसे प्राप्त करने में लगी रहती हैं। हम इसी पर विचार करते हैं और यही हमारे विचारों का केन्द्र-बिन्दु बन गया है, जिसमें उथलेपन के अलावा कुछ भी सार-गर्भित नहीं है। यह हमारी अभिरुचि एवं पसन्द बन गयी है।
वस्तुतः मन विभिन्न प्रकार के विचारों को ग्रहण करता है, पर जिनमें उसकी अभिरुचि अधिक रहती है, चयन उन्हीं का करता है। जिन विचारों को वह चयन करता है, उन्हीं के अनुरूप चिन्तन की प्रक्रिया भी चलती है। चयन किए गए विचारों के अनुसार ही दृष्टिकोण का विकास होता है, जो विश्वास को जन्म देता है। वह पुष्ट और परिपक्व होकर पूर्व धारणा में परिवर्तित हो जाता है।
आज हमारी धारणा-अवधारणा अस्वस्थ, अशक्त एवं जर्जर हो गयी है। हमारे अन्दर चिन्तन नहीं दुश्चिंतन घर कर गया है, तथा स्वभाव भोगवादी एवं आरामतलब बन गया है। सद्चिंतन के अभाव में मस्तिष्क क्रियाहीन एवं पंगु बनकर रह गया है। विज्ञान के इस युग में हम यंत्रमानव में बदल गए हैं। कुछ विचारक-विद्वानों को विज्ञान से ऐसी ही उम्मीद और आशा थी। उन्होंने पहले ही मानव जाति को सचेत व सतर्क कर दिया था। इस संदर्भ में आल्डस हक्सले ने सन् 1932 में लिखे अपने उपन्यास ‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ में एक ऐसी भविष्य कालीन दुनिया का चित्रण किया था, जिसमें मनुष्य भी वस्तुओं की भाँति कारखानों में गढ़े जाएँगे और उनकी विचार शक्ति को इच्छानुसार नियंत्रित-नियमित किया जा सकेगा। उससे भी पूर्व एच.जी. वेल्स ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘द टाइम मशीन’ में सचेत किया था कि यदि आदमी विज्ञान से सतर्क व सावधान न हुआ तो वह रोबोट के समान बन जाएगा। हक्सले और वेल्स की यह आशंका आज शत-प्रतिशत सही प्रतीत हो रही है।
वर्तमान याँत्रिकी युग में यंत्र मानव सा बना मानव एक ढर्रे पर चलने को मजबूर और विवश है। हम अपने आचार, आदत एवं स्वभाव से लाचार हैं। लगता है कि हमारा अन्त एवं अवसान इसी दुर्गति में होगा। दूर तक आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही है। हम विज्ञान प्रदत्त इस दुर्वह परिस्थिति के हाथों बिके हुए दास बन गए हैं। परन्तु गहराई से विचार किया जाए तो वास्तविकता ऐसी है नहीं। अभ्यास, अध्यवसाय एवं संकल्प द्वारा उस ढर्रे को तोड़ना हर किसी के लिए संभव है। विपन्न परिस्थिति की सोच के प्रतिकूल सोचा भी जा सकता है। प्रायः लोग जिस ढंग से सोचते एवं दृष्टिकोण अपनाते हैं, उससे भिन्न स्तर का चिन्तन करने के लिए भी अपने मन व विचार को अभ्यास कराया जा सकता है। मानसिक विकास के लिए एवं श्रेष्ठ विचार के लिए अभीष्ट दिशा में सोचने हेतु अपनी प्रकृति को तोड़ा-मरोड़ा भी जा सकता है। प्रयत्नपूर्वक नयी अभिरुचियाँ भी पैदा की जा सकती हैं।
‘त्येन तक्तेन भूँजिथा’ के औपनिषदिक सूत्रों को अपनाकर अर्थात् भोग को त्याग के साथ स्वीकारने की मनोवृत्ति में ही इसका समाधान है। यह अनुभव किया जाए कि मानव जीवन महान् उपलब्धि है, दैवी वरदान है, जिसका उपयोग केवल विचारहीन भोग भोगने में नहीं लगाना चाहिए बल्कि इसका सदुपयोग श्रेष्ठ कार्यों में होना चाहिए। मानव जीवन की गरिमापूर्ण सोच व विचार में ही हमारा वैचारिक एवं आत्मिक विकास संभव है, और तभी विचारहीनता के संकट से मुक्ति पायी जा सकती है।
बात सन् 1935 की है। राजेन्द्र बाबू काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। उन्हें किसी काम से प्रयाग से निकलने वाले अंग्रेजी लीडर के संपादक श्री चिंतामणि से मिलना था।
चपरासी को कार्ड दिया। वह संपादक की मेज पर रखकर लौट आया और प्रतीक्षा करने के लिए कहा।
राजेंद्र बाबू के कपड़े वर्षा से भीग गए थे। समय खाली देखकर वे उधर बैठे मजदूरों की अंगीठी के पास खिसक गए और हाथ सेंकने तथा कपड़े सुखाने लगे।
थोड़ी देर में कार्ड पर नजर गई तो संपादक जी हड़बड़ा गए और उनके स्वागत के लिए स्वयं ही दौड़े, पर राजेंद्र बाबू कहीं नजर न आए।
ढूंढ़-खोज हुई तो वे अंगीठी पर तापते और कपड़े सुखाते पाए गए। चिंतामणिजी ने देर होने और कार्ड पर ध्यान न जाने के लिए माफी माँगी। हंसते हुए राजेंद्र बाबू ने कहा, “इससे क्या हुआ। कपड़े सुखाना भी एक काम था। इस बीच निपट गया तो अच्छा ही हुआ।”
गज और ग्राह की कथा है कि गज ग्राह के मुँह में फंस गया। एक पैर उसने निगल लिया और खींचकर गहरी नदी में ले गया। हाथी ने किनारे पर निकलने की बहुत कोशिश की। ग्राह की शक्ति गज से कम न थी। जब हाथी गहराई में चला गया और सूँड का सिरा मात्र बाहर रह गया तो उसने बचने की कोई रत न देखकर भगवान को पुकार लगाई। भक्तवत्सल आए और उन्होंने ग्राह के मुख से गज को छुड़ाया। इस प्रकार ‘गजेन्द्र मोक्ष’ का कथानक पूरा हुआ।
इस कथानक का आध्यात्मिक रहस्य यह है कि जीवनरूपी गज शरीररूपी ग्राह के मुँह में फंस गया। निकलने का प्रयत्न करने के रूप में वह पूजा-पाठ-तप भी बहुत करता है, पर बाहर निकल नहीं पाता। पुरुषार्थ निरर्थक चला जाता है। अंत में स्थिति यहाँ तक आ जाती है कि नाममात्र को सूँड का अग्र भाग बाहर रह जाता है और उसकी समूची सत्ता ग्राह के क्षेत्र में नदी के कीचड़ में फंस जाती है। ग्राह खींचता है। मायारूपी कीचड़ हाथी के भारी-भरकम शरीर को और भी अधिक जकड़ती जाती है, फिर निकलना कैसे हो पाए?
आत्मा अपने स्वरूप, लक्ष्य, दायित्व को एक प्रकार से पूरी तरह भूल जाती है। उसकी सत्ता शरीराभ्यास में पूरी तरह जकड़ जाती हैं कहने को आत्मा और शरीर दो नामों से जाने जाते है। दोनों की भिन्नता भी सर्वविदित हैं इस पृथकता और आमतौर से चर्चा भी होती हैं। इतना ही नहीं इसके प्रत्यक्ष प्रमाण आए दिन मिलते रहते हैं यदि थोड़ी देर भी लाश रखी रहे तो वह स्वयं सड़ने लगती है। सड़न तभी तक रुकी रहती है, जब तक प्राण है, अन्यथा काय-कलेवर उन्हीं तत्वों में मिल जाने के लिए व्यग्र हो उठता है, जिससे मिलकर वह बना था। स्पष्ट है कि काया और आत्मा की सत्ता पृथक-पृथक हैं आत्मा प्रमुख है। काया उसका वाहन, आवरण, उपकरण। दोनों परस्पर मिलजुलकर काम तो करते है, उनकी पृथकता बनी ही रहती है।
आश्चर्य इस बात का है कि जीवात्मा अपनी मूलभूत सत्ता, महत्ता, गरिमा और दिशाधारा को पूरी तरह भूल जाती है। शरीरगत इच्छाएं, कामनाएं, लिप्साएं जिधर भी चाहती है, उधर ही उसे घसीट ले जाती हैं यात्री नाव पर बैठता तो अपनी इच्छा से, पर बैठने के बाद पराधीन हो जाता है। नाविक असावधान हो तो नाव लहरों के साथ किसी भी दिशा में चल पड़ती है। लहरों की ठोकरें खाते-खाते किसी चट्टान से टकराकर उलट भी सकती है, भंवर में फंसकर डूब भी सकती है। यात्री को तैरना न आता हो तो फिर बेचारे का ईश्वर ही मालिक है।
शरीर उन्हीं पंचतत्वों का बना है, जिनसे कि यह विचित्र आकृति और प्रकृति वाला संसार। इसलिए सजातीय होने के कारण वे एक दूसरे को परस्पर खींचते और खिंचते है। शरीर को संसार में बहुरंगे स्वादों एवं आकर्षणों में बहुत रस आता है। उसका सोना-जागना सब इसी क्षेत्र में होता है। इसलिए असाधारण तन्मयता की डोर में वे गुँथ जाते हैं। मछली और पानी यद्यपि अलग-अलग हैं, फिर भी मछली उसके साथ इतनी तादात्म्य होती है कि साथी के बिना जीवित नहीं रह सकती। शरीर इंद्रिय लिप्सा और ममताजन्य तृष्णा में पूरी तरह लिपटा रहता है। इन्हें न छोड़ना चाहता है, न साधारणतया यह बंधन टूटता है भवबंधन इसी को कहा जाता है। उसका अर्थ है-मनुष्य का लिप्सा-लालसा के साथ पूरी तरह जकड़ जाना।
शरीर और संसार के प्रति यह बंधन अत्यधिक घनिष्ठ बन जाते है और दोनों की स्थिति अविच्छिन्न जैसी लगती है। इस स्थिति का दुर्विपाक यह है कि आत्मा अपने मूलभूत आधार परमात्मा की ओर से मुँह मोड़कर इस शरीर को ही अपना सर्वस्व मानने लगती है, जो स्वयं जड़ पदार्थों से बनता और उन्हीं में अहिर्निश रमण करता रहता है।
मान्यता की दृष्टि से शरीर और आत्मा को पृथक मानने में सैद्धांतिक रूप से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए पर व्यवहारतः सब कुछ उलटा ही होता है। ‘स्व’ परक सभी अनुभूतियाँ इस प्रकार होती है, मानो ‘अहम्‘ की समूची परिधि शरीर और इच्छा, इच्छाओं एवं मान्यताओं के साथ एकाकार हो गई है, दूध-पानी की तरह घुल-मिलकर एकात्म स्थापित कर चुकी है। अनुभूतियाँ ही अभ्यास बन जाती हैं। मनुष्य जो कुछ सोचता, चाहता, मानता और करता है, वह समग्र रूप से शरीर से ही संबंधित होता है। शरीरगत स्वार्थ ही इष्ट बन जाता हैं। आत्मकल्याण का प्रयोजन साधने वाले परमार्थ की पूरी तरह उपेक्षा करने लगते हैं
आत्मा ईश्वर का अविनाशी अंश हैं उसका सघन संपर्क ब्रह्मचेतना के साथ ही है। मनुष्य उसकी सर्वोपरि कलाकृति है, जो इसलिए मिली है कि उसे धरोहर समझा जाए और परमार्थ प्रयोजन की सिद्धि की जाए। परमार्थ के दो भाग है- सिक्के के दो पहलू की तरह एक आत्मकल्याण दूसरा लोकमंगल। यही है जीवनलक्ष्य। इसी में इस जीवन की सार्थकता निहित है, किंतु इसके लिए प्रायः कुछ भी करते धरते नहीं बन पड़ता। शरीर की वासना, तृष्णा और अहंता की जकड़ इतनी मजबूत होती है कि उसे छोड़कर अन्य किसी कार्य के लिए अवकाश ही नहीं रहता, उत्साह ही नहीं जगता। जन्म मरणपर्यंत शरीर भाव ही छाया रहता है और उसी की कामनापूर्ति के लिए अहिर्निश प्रयास चलता रहता हैं आत्मकल्याण के लिए जीवनलक्ष्य की पूर्ति के लिए जो किया जाना चाहिए, उसे करने में पग-पग पर व्यस्तता आड़े आती रहती है। अरुचि और उपेक्षा का भाव भी बना रहता हैं आत्मप्रवंचना के लिए पूजा-पाठ की उलटी-सीधी लकीर भर पीटी जाती है, मानों ईश्वर मनुहार और उपहार पाने के लिए ही लालायित बैठा रहता हो। उसे उस प्रयोजन की चिंता एवं स्मृति ही नहीं है, जिसके लिए इस सुरदुर्लभ जन्म की बड़ी आशाओं के साथ धरोहर रूप में सुपुर्द किया गया है।
शरीर भाव और आत्म भाव का गुँथ जाना ही माया की ग्रंथि हैं यही हथकड़ी, बेड़ी और ताले की तरह भवबंधन में बाँधती है एवं भ्रम-जंजाल में भटकती है। दोनों की पृथकता का भाव जाग्रत होने पर कर्तव्य भी बंट जाते है। शरीर को कार्यरत रह सकने योग्य बनाए रखने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं का प्रबंध करने पर काम चल जाता है और इसके उपराँत इस कलेवर से उन कार्यों को करने के लिए योजनाबद्ध रूप से अग्रसर होना पड़ता है, जो लक्ष्य एवं इष्ट है। स्वार्थ को सीमित करके परमार्थ को असीम बनाना ही वह निर्धारण है, जिसे अपनाने पर उन विभूतियों की प्राप्ति होती है, जिन्हें स्वर्ग, मुक्ति एवं ऋद्धि-सिद्धि के नाम से जाना जाता है।
परम पुरुषार्थ के नाम से एक ही सफलता को माना गया है कि शरीर और आत्मा की पृथकता एवं विधि व्यवस्था को भली प्रकार आत्मसात कर लिया जाए। उसी दृष्टि से सोचा और उसी विधि से योजनाबद्ध क्रिया-विधान बनाया जाए।
ऐसी सूझ-बूझ ही ईश्वर की वास्तविक अनुकंपा है। गज की पुकार पर भगवान चक्र सुदर्शन लेकर दौड़े थे और अपने भक्त को ग्राह के पाश से, सरोवर के दलदल से उबारा था। शरीराभ्यास ही ग्राह है और सांसारिक प्रलोभनों का आकर्षण ही दलदल भरा सरोवर। इससे त्राण पाने में गज सफल हुआ था। देखना है कि अपनी जीवात्मा को यह सुयोग मिलता है या नहीं?
माता-पिता के न रहने पर 15 वर्ष की आयु में नारायण झा ने भगवान को प्राप्त करने के लिए वैराग्य लेने की बात ठानी, पर उस क्षेत्र में भ्रमण करके अछूतों की जो दुर्दशा देखी, उससे उनका विचार बदल गया और गिरों को उठाने के लिए जीवन लगाने का व्रत ठाना। हरिजन सेवा के कारण उन्हें सवर्णों का भारी विरोध सहना पड़ा, पर वे डिगे नहीं।
उनकी आदर्श साधना के कारण उन्हें जनसहयोग भरपूर मिलता रहा और देव अनुग्रह से असंभव लगने वाले कार्यों में भी रास्ता बनता चला गया। उन्होँने हरिजनों के लिए अलग से मंदिर बनवाया। शुवर्ण उसे तोड़ने पर तुले रहे, पर विरोध से उनका समर्थन सशक्त था। वे बढ़ते रहे। हरिजन शिक्षा के लिए और भी अधिक उत्साह के साथ लग पड़े। उनकी सेवा-साधना से प्रभावित होकर, गाँधी जी उनसे मिलने स्वयं पहुँचे थे। केरल में उनकी स्थापित कितनी ही हरिजन संस्थाएं है, जिनमें एक कॉलेज भी है। सतत परमार्थ का क्रम अपनाकर श्री नारायण झा आँतरिक और लौकिक दोनोँ ही स्तरों पर महान बने।
गायत्री मंत्र में समस्त संसार को धारण, पोषण और अभिवर्द्धन करने वाले परमात्मा से सद्बुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना की गई है। श्रद्धा-विश्वासपूर्वक की गई यह उपासना साधक की अंतश्चेतना में, उसके मन, अंतःकरण, मस्तिष्क, विचारों और भावनाओं में सन्मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भरती है। साधक जब इस महामंत्र के अर्थ पर विचार करता है तो वह समझ जाता है कि संसार की सर्वोपरि समृद्धि और जीवन की सबसे बड़ी सफलता सद्बुद्धि को प्राप्त करना है।
यह मान्यता स्थिर हो जाने पर साधक की इच्छाशक्ति इसी तत्व को प्राप्त करने के लिए लालायित होती हैं। इस आकाँक्षा अंतरंग क्षेत्र में एक प्रकार का चुंबकत्व उत्पन्न होता है। उसके आकर्षण से निखिल आकाश के ईथर तत्व में विद्यमान सत् तत्व, सत् विचार, भावनाएं और प्रेरणाएं उस स्थान पर एकत्रित होने लगती हैं विचारों की चुंबकीय शक्ति का विज्ञान सर्वविदित हैं एक जाति के विचार अपने सजातीय विचारों को आकाश से खींचते है, फलस्वरूप संसार के मृत और जीवित सत्पुरुषों के फैलाए हुए अविनाशी संकल्प, जो शून्य में सदैव भ्रमण करते रहते है, गायत्री साधक के पास दैवी वरदान की तरह अनायास ही आकर जमा होते रहते है और संचित पूँजी की भाँति उनका एक बड़ा भंडार जमा हो जाता है।
शरीर में सत् तत्व की अभिवृद्धि होने से शरीरचर्या की गतिविधि में काफी हेर-फेर हो जाता है। इंद्रियों के भोगों में भटकने की गति मंद हो जाती है। चटोरपन, तरह-तरह के स्वादों के पदार्थ खाने के लिए मन ललचाते रहना, बार-बार खाने की इच्छा होना, अधिक मात्रा में खा जाना, भक्षाभक्ष का विचार न रहना, सात्विक पदार्थों में अरुचि और चटपटे, मीठे, गरिष्ठ पदार्थों में रुचि, जैसी बुरी आदत धीरे-धीरे कम होने लगती है। हलके, सुपाच्य, सरस, सात्विक भोजनों से उसे तृप्ति मिलती है और राजसी, तामसी खाद्यों से घृणा हो जाती है। इसी प्रकार कामेंद्रियों की उत्तेजना सतोगुणी विचारों के कारण संयमित हो जाती है। कुमार्ग में, व्यभिचारी, वासना में मन कम दौड़ता है, ब्रह्मचर्य के प्रति श्रद्धा बढ़ती है। फलस्वरूप वीर्य-रक्षा का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। कामेंद्रिय और स्वादेंद्रिय दो ही इंद्रियाँ प्रधान है। इनका संयम होना स्वास्थ्य-रक्षा और शरीर-वृद्धि का प्रधान हेतु है। इनके साथ-साथ परिश्रम, स्नान, निद्रा, सोना, जागना, सफाई, सादगी और अन्य दिनचर्याएं भी सतोगुणी हो जाती हैं, जिनके कारण आरोग्य और दीर्घजीवन की जड़ें मजबूत होती है।
मानसिक क्षेत्र में सद्गुणों की वृद्धि के कारण दोष-दुर्गुण कम होने लगते हैं तथा सद्गुण बढ़ने लगते हैं इस मानसिक कायाकल्प का परिणाम यह होता है कि दैनिक जीवन में प्रायः नित्य ही आते रहने वाले अनेक दुःखों का सहज ही समाधान हो जाता है। इंद्रिय यम और दिनचर्या के कारण शारीरिक रोगों का भी निवारण हो जाता है। विवेक जाग्रत होते ही अज्ञानजन्य चिंता, शोक, भय, आशंका, मोह, ममता, हानि आदि दुःखों से छुटकारा मिल जाता है। ईश्वर-विश्वास के कारण मति स्थिर रहती है और भावी जीवन के बारे में निश्चितता बनी रहती है। धर्म-प्रवृत्ति के कारण पाप, अन्याय, अनाचार नहीं बन पड़ते। फलस्वरूप राजदंड, समाजदंड, आत्मदंड और ईश्वरदंड की चोटों से पीड़ित नहीं होना पड़ता है। सेवा, नम्रता, उदारता, दान, ईमानदारी, लोकहित आदि गुणों के कारण दूसरों को लाभ पहुँचता है, हानि की आशंका नहीं रहती। इससे प्रायः सभी लोग उनके कृतज्ञ, प्रशंसक, सहायक, भृत्य एवं रक्षक होते है। पारस्परिक सद्भावनाओं के परिवर्तन से आत्मा की तृप्ति करने वाले प्रेम और संतोष नामक रस दिन-दिन अधिक मात्रा में उपलब्ध होकर जीवन को आनंदमय बनाते चलते है। इस प्रकार शारीरिक और मानसिक क्षेत्रों में सत्-तत्व की वृद्धि होने से दोनों ओर आनंद का स्रोत उमड़ता है और गायत्री का साधक उसमें निमग्न रहकर आत्मसंतोष का, परमानंद का रसास्वादन करता है।
आत्मा ईश्वर का अंश होने से उन सब शक्तियों को बीज रूप से अंदर छिपाए रहता है जो ईश्वर में होती है। वे शक्तियाँ सुप्तावस्था में रहती हैं और मानसिक तापों के, विषय-विकारों के, दोष-दुर्गुणों के ढेर में दबी हुई अज्ञान रूप से पड़ी रहती है। लोग समझते है कि हम दीन-हीन तुच्छ और अशक्त हैं, पर जो साधक मनोविकारों का परदा हटाकर निर्मल आत्मज्योति के दर्शन करने में समर्थ होते है, वे जानते है कि सर्वशक्तिमान ईश्वरीय ज्योति उनकी आत्मा में मौजूद है और वे परमात्मा के सच्चे उत्तराधिकारी हैं। अग्नि के ऊपर से राख हटा दी जाए तो फिर दहकता अंगार प्रकट हो जाता है। वह अंगार छोटा होते हुए भी भयंकर अग्निकाँडों की संभावना से युक्त होता है। यह परदा फटते ही तुच्छ मनुष्य महान आत्मा (महात्मा) बन जाता है। चूँकि आत्मा में अनेकों ज्ञात, विज्ञात साधारण, अद्भुत, आश्चर्यजनक शक्ति के भंडार छिपे पड़े हैं, वे खुले जाते हैं और वह सिद्ध योगी के रूप में दिखाई पड़ता है। सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए बाहर से कुछ लाना नहीं पड़ता, किसी देव-दानव की कृपा की जरूरत नहीं पड़ती है। गायत्री की सतोगुणी साधना का सूर्य तामसिक अंधकार के परदे को हटा देता है और आत्मा का सहज ईश्वरीय रूप प्रकट हो जाता है। आत्मा का यह निर्मल रूप सभी ऋद्धि-सिद्धियों से परिपूर्ण होता है।
गायत्री द्वारा हुई सतोगुणों की वृद्धि अनेक प्रकार की आध्यात्मिक साँसारिक समृद्धियों की जननी है, शरीर और मन की शुद्धि साँसारिक जीवन को अनेक दृष्टियों से सुख-शाँतिमय बनाती हैं आत्मा में विवेक और आत्मबल की मात्रा बढ़ जाने से अनेक ऐसी कठिनाइयाँ जो दूसरों को पर्वत के समाज भारी मालूम पड़ती है, उस आत्मवान् व्यक्ति के लिए तिनके के समान हल्की बन जाती है। उसका कोई काम रुका नहीं रहता या तो उसकी इच्छा के अनुसार परिस्थिति बदल जाती है या परिस्थिति के अनुसार अपनी इच्छाओं को बदल लेता हैं। क्लेश का कारण इच्छा और परिस्थिति के बीच प्रतिकूलता का होना ही तो है। विवेकवान इन दोनों में से किसी को अपनाकर उस संघर्ष को टाल देता हैं और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। उसके लिए इस पृथ्वी पर भी स्वर्गीय आनंद की सुरसरि बहने लगती है।
वास्तव में सुख और आनंद का आधार किसी बाहरी साधन-सामग्री पर नहीं, किंतु मनुष्य की मनःस्थिति पर निर्भर रहता हैं मन की साधना से जो मनुष्य एक समय राजसी भोजनों और ‘रेशमी’ गद्दे-तकियों से भी संतुष्ट नहीं होता, वह किसी संत के उपदेश से त्याग और संन्यासी व्रत ग्रहण कर लेने पर जंगल की भूमि को ही सबसे उत्तम शय्या, वन के कंद-मूल-फलों को ही सर्वोत्तम आहार समझने लगता हैं। यह सब अंतर मनोभाव और विचारों के बदल जाने से ही उत्पन्न होता है।
गायत्री सद्बुद्धि की, ऋतंभरा-प्रज्ञा की अधिष्ठात्री देवी है ओर उससे साधक सद्बुद्धि की याचना करता है। इस सद्बुद्धि के द्वारा सभी प्रकार के दुःखों का कारण मूल से दूर किया जा सकता है। सद्बुद्धि के प्रकाश में वे सभी उपाय सुझाई देने लगते है, जिनको काम में लाने पर दुःखों के कारण दूर हो जाते है। यों संसार में कई प्रकार के दुःख हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी-अपनी समस्याएं और कठिनाइयाँ हैं सबकी अलग-अलग उलझनें है। इस दृष्टि से तो सबके दुःखों का कारण भी अलग-अलग होना चाहिए, परंतु ऐसा है नहीं। गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि जीवन और जगत में विद्यमान समस्त दुःखों के कारण तीन हैं-(1) अज्ञान (2) अशक्ति और (3) अभाव। जो इन तीन कारणों को जिस सीमा तक अपने से दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा।
अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता है, वह तत्वज्ञान से अपरिचित होने के कारण उल्टा-उल्टा सोचता है और उल्टे काम करता है, तदनुसार उलझनों में अधिक फंसता जाता है और दुःखी बनाता है। स्वार्थ, मोह, लोभ, अहंकार, अनुदारता और काम की भावनाएं मनुष्य को कर्तव्यच्युत करती है और वह दूरदर्शिता को छोड़कर क्षणिक क्षुद्र एवं हीन बातें सोचता है तथा वैसे ही काम करता है। फलस्वरूप उसके विचार और कार्य पापमय होने लगते है। पापों का निश्चित परिणाम दुःख हैं दूसरी ओर अज्ञान के कारण वह अपने और दूसरे की साँसारिक गतिविधि में मूल हेतुओं को नहीं समझ पाता। फलस्वरूप असंभव आशाएं, तृष्णाएं, कल्पनाएं किया करता है। इस उल्टे दृष्टिकोण के कारण साधारण-सी बातें उसे बड़ी दुःखमय दिखाई देती है। जिसके कारण वह रोता-चिल्लाता रहता है। आत्मीयों की मृत्यु, साथियों की भिन्न रुचि, परिस्थितियों का उतार-चढ़ाव स्वाभाविक है, पर अज्ञानी सोचता है कि मैं जो चाहता हूँ, वह सदा होता रहे, प्रतिकूल बात सामने आए ही नहीं। इस असंभव आशा के विपरीत घटनाएं जब भी घटित होती है तभी वह रोता-चिल्लाता हैं। तीसरे अज्ञान के कारण भूलें भी अनेक प्रकार की होती है, समीपस्थ सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है, यह भी दुःख का हेतु है। इस प्रकार अनेकों दुःख मनुष्य के अज्ञान के कारण प्राप्त होते है।
अशक्ति का अर्थ है-निर्बलता। शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, बौद्धिक, आत्मिक निर्बलताओं के कारण, मनुष्य अपने स्वाभाविक जन्मसिद्ध अधिकारों का भार अपने कंधों पर उठाने में समर्थ नहीं होता, फलस्वरूप उसे वंचित रहना पड़ता है। स्वास्थ्य खराब हो, बीमारी ने घेरे रखा हो, तो स्वादिष्ट भोजन, रूपवती तरुणी, मधुर गीत वाद्य, सुन्दर दृश्य निरर्थक हैं। धन-दौलत का कोई कहने लायक सुख उसे नहीं मिल सकता। बौद्धिक निर्बलता हो तो साहित्य, काव्य, दर्शन, मनन, चिंतन का रस प्राप्त नहीं हो सकता। आत्मिक निर्बलता हो तो सत्संग, प्रेम, भक्ति आदि का आत्मानंद दुर्लभ हैं इतना ही नहीं, निर्बलों को मिटा डालने के लिए प्रकृति का ‘उत्तम की रक्षा’ सिद्धांत काम करता है। कमजोर को सताने और मिटाने के लिए अनेकों तथ्य प्रकट हो जाते हैं। निर्दोष, भले और सीधे-सादे तत्व भी उसके प्रतिकूल पड़ते है। सरदी, जो बलवानोँ की बलवृद्धि करती है, रसिकों को रस देती, वह कमजोरों को निमोनिया, गठिया आदि का कारण बन जाती है। जो तत्व निर्बलों के लिए प्राणघातक है, वे ही बलवानों को सहायक सिद्ध होते हैं। बेचारी निर्बल बकरी को जंगली जानवरों से लेकर जगत्माता भवानी दुर्गा तक चट कर जाती है और सिंह को वन्यपशु भी नहीं बड़े-बड़े सम्राट तक राजचिन्ह में धारण करते हैं। अशक्त हमेशा दुःख पाते हैं उनके लिए भले तत्व भी आशाप्रद सिद्ध नहीं होते है।
अभावजन्य दुःख है-पदार्थों का अभाव। अन्न, वस्त्र, जल, मकान, पशु, भूमि, सहायक, मित्र, धन औषधि, पुस्तक, शस्त्र, शिक्षक आदि के अभाव में विविध प्रकार की पीड़ाएं , कठिनाइयाँ भुगतनी पड़ती है, उचित आवश्यकताओं को कुचल कर मन मारकर बैठना पड़ता है और जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों को मिट्टी के मोल नष्ट करना पड़ता है। योग्य और समर्थ व्यक्ति भी साधनों के अभाव में अपने को लुँज-पुँज अनुभव करते हैं और दुःख उठाते है।
गायत्री कामधेनु है, जो उसकी पूजा, उपासना और आराधना करता है, वह प्रतिक्षण माता का अमृतोपम दुग्धपान करने का आनंद लेता है और समस्त अज्ञानों, अशक्तियों और अभावों के कारण उत्पन्न होने वाले कष्टों से छुटकारा पाकर मनोवाँछित फल प्राप्त करता है। योग्य गुरु के पथ प्रदर्शन में की गई गायत्री साधना अभीष्ट लाभ पहुँचाती है। इन साधनाओं में फलता प्राप्त करने के लिए भले ही थोड़ा-बहुत अधिक समय व श्रम लगाना पड़े पर अन्य कष्टपूर्ण साधनाओं की अपेक्षा उन साधनाओं में जल्दी ही सफलता मिलती है। योगीजनों का कष्टसाध्य लंबा मार्ग गायत्री द्वारा बहुत सरल हो जाता है और घर में रहते हुए गृहस्थ व्यक्ति भी वनवासी तपस्वियों जैसी सफलता प्राप्त कर लेता है।
कष्टप्रद भवबंधनों, माया-मोह की शृंखला से छुटकारा पाकर परमलक्ष्य को प्राप्त करना इस मार्ग से जितना सरल है उतना और किसी मार्ग से संभव नहीं। गायत्री साधना द्वारा मानसिक परिष्कार, व्यक्तित्व के विकास, दुःखों के निवारण और आत्मिक विकास के दिव्य लाभों के अतिरिक्त कई सिद्धियाँ, विशेष शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं। इन शक्तियों को क्रमशः अर्जित करते हुए व्यक्ति अनुपम और अद्वितीय, असाधारण व्यक्तित्व का स्वामी बन जाता है।
वीरपुर (गुजरात) में एक किसान थे जलाराम। वे कृषि कार्य करते। जो अनाज पैदा होता, उसे दीन-दुखियों के लिए तथा संत-महात्माओं के निमित्त लगाते। वे खेत पर रहते, उनकी पत्नी भोजन बनाती रहती। घर पर सदावर्त लगा रहता। बाल-बच्चों का झंझट उनके सिर पर था नहीं।
उनकी दयालुता और श्रद्धा की परीक्षा लेने एक दिन भगवान साधु वेश में आए। उन्होंने कहा उनका बिस्तर अगले तीर्थ तक पहुँचना है। कोई प्रबंध करो। जलाराम मजूर देने की स्थिति में नहीं थे। उनकी पत्नी उस बिस्तर को सिर पर रखकर चल दी। जलाराम आधे दिन खेत का काम करते, आधे दिन भोजन पकाते-खिलाते।
संत के रूप में आए भगवान की परीक्षा पूरी हो गई। वे कुछ ही दूर आगे चलकर गायब हो गए। उस महिला को अन्नपूर्णा झोली दे गए। घर लौटकर उसने उस झोली को एक कोठरी में टाँग दिया। उस कोठरी में से अन्न कभी कम नहीं पड़ा और अभी भी हजारों लोग उस अन्नपूर्णा झोली का प्रासाद लेने आते है।
आज की दुनिया नई है, एकदम बदली हुई। आज का परिदृश्य अनोखा है, अत्यन्त परिवर्तित रूप में। परन्तु हमारे सोचने का तरीका वही है, अपनी सीमाओं में जकड़ा-बंधा हुआ। हमारी सोच वही पुरानी है, अनेक आग्रहों-दुराग्रहों से लिपटी हुई। और इसी कारण सब ओर अनेकानेक समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं। परन्तु समाधान का स्वर कहीं भी, किसी तरफ सुनाई नहीं दे रहा है।
हम जो उत्तर ढूंढ़ रहे हैं, सवाल का जवाब तलाश रहे हैं, वह तो हमारी संकीर्ण सोच की भाँति जर्जर और मृतप्राय है। आज हमारे सामने अजीब संकट खड़ा है, जिन्दा प्रश्न मरे हुए जवाबों की लाशें ढो रहे हैं। प्रश्न तो सजीव हैं, परन्तु उत्तर मुर्दे के समान निर्जीव एवं निस्सार हैं। जिसके वजन से स्वयं प्रश्नकर्त्ता एवं प्रश्न दोनों बौखला गए हैं। अतः वे अत्यन्त उद्विग्न और उत्तेजित होकर ध्वंस मचाने और आतंक फैलाने पर आमादा हो गए हैं। विचारशील विद्वान व्यथित हैं, मननशील मनीषी हैरान हैं, उन्हें सूझ ही नहीं रहा है कि आखिर हो क्या गया है? वे सोचने के लिए अवश-विवश हैं, परन्तु समाधान के सूत्र नजर नहीं आ रहे हैं। वे विचारते हैं कि आखिर बात क्या है? बात दरअसल यह है कि उनके उत्तर मरणासन्न हैं और प्रश्न जीवन्त हैं।
जिन्दा व्यक्तियों के बीच संवाद होता है, बातचीत होती है मरे हुए और जिन्दा व्यक्ति के बीच कोई वार्तालाप नहीं हो सकता, ठीक ऐसे ही हमारे समाधानों और हमारी समस्याओं के मध्य कोई विचार-विमर्श नहीं हो पा रहा है। एक ओर समाधान का पहाड़ है, दूसरी ओर समस्याओं का ढेर, परन्तु दोनों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है, कोई सेतु नहीं है। और इनके बीच सम्बन्ध सेतु हो ही नहीं सकता। इनके बीच जबरन संवाद पैदा कराने के व्यर्थ प्रयास में उलझा जीवन और उलझता जा रहा है। इस भटकन-उलझन से निजात पाने के लिए हमें अपनी बुनियादी खामियों और कमियों को समझना होगा। यह तथ्य अच्छी तरह से जानना और समझना होगा कि जीवन के वर्तमान प्रवाह में सब कुछ बदल चुका है, अतीत में जो था आज वह नहीं है। आज के प्रश्न एकदम नूतन और ताजे हैं।
आज दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है। यह पुरानी, जीर्ण दीवारों को गिराकर एक होने की कोशिश में है। एकल प्रयास समूहगत पुरुषार्थ में परिवर्तित होने के लिए व्यग्र हैं। सब मिल-बैठकर समाधान ढूंढ़ने के प्रयास में हैं। एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था के बावजूद आज सभी देश संघबद्ध होकर विश्व हित में सोचने के लिए तैयार व तत्पर हो रहे हैं। ‘मैं’ से ‘हम’ की अवधारणा बलवती हो रही है। यह परिकल्पना विश्व राष्ट्र की प्रगति और उन्नति के लिए मूल आधार है। ‘मैं’ से ‘हम’ के इस संकल्प में उज्ज्वल भविष्य की विश्व दृष्टि ढंकी और ढंपी है। क्योंकि संघबद्ध होने की संगठित व उदात्त भावना प्रत्येक व्यक्ति के प्रखर विचार व सक्रिय भागीदारी से ही संभव होगी। यही समाधान के नूतन सूत्र हैं।
स्वहित एवं व्यक्तिगत हित के बदले सबके व विश्व, राष्ट्र के हित में किया गया प्रयास-पुरुषार्थ ही कारगर एवं सफल होता है। यह नये विश्व की नई परिकल्पना है जिसे आज गुणवत्ता दल या ‘क्वालिटी टीम’ के नाम से जाना जाता है। किसी भी संस्था, समूह, परिवार एवं समाज एवं राष्ट्र की प्रगति उस राष्ट्र के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है और इनका समुचित सुनियोजन एवं अच्छा प्रबंधन उस संस्था, समूह, परिवार और समाज की प्रगति का द्योतक है। प्रबंधन एवं सुनियोजन के साथ-साथ उस संस्था व समाज के हर वर्ग के व्यक्तियों-कर्मियों की सक्रिय-भागीदारी का होना भी अत्यावश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति में अपनी संस्था, समाज एवं राष्ट्र के प्रति प्रगाढ़ निष्ठ का भाव होना भी बेहद जरूरी है।
समूह और समाज के हित में अपना हित समझना तथा उसके प्रति प्रत्येक व्यक्ति की कटिबद्धता प्रदर्शित करने से ही वास्तविक व समुचित विकास संभव है। इसी मंत्र के सहारे द्वितीय विश्वयुद्ध में पूरी तरह से विनष्ट जापान आज आधुनिक विश्व के मानचित्र में चमकते सितारे के समान देदीप्यमान है। विश्वयुद्ध के पश्चात् जापान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी तथा उसके उत्पादों की विश्वसनीयता नष्ट हो चुकी थी। ऐसे में जापान ने अपनी स्थिति सुधारने के लिए प्रबंधन के प्रयत्नों का सहारा लिया। इसके सुनियोजन की नए तरकीबें ढूंढ़ी गई, परन्तु वहाँ की सभी इकाइयों के समन्वित एवं प्रेरित सामूहिक प्रयासों को न खोज पाने के कारण सफल समाधान नहीं मिल सका। जापान सरकार ने 1950 में प्रबंधन में सुधार हेतु अमेरिका के प्रसिद्ध प्रबंधन विद्वान डॉ. डगिस एवं डॉ. जे. जुरान को सहयोग के लिए आमंत्रित किया। परन्तु इसका भी कोई प्रभावोत्पादक प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ।
जापान को इस भयावह संकट से उबारने के लिए अपने ही देश के डॉ. के. ईशिकावा ने अप्रैल सन् 1962 में एक नया एवं सफल तरीका ढूंढ़ निकाला। उन्होंने उसे ‘गेम्बा टू क्वालिटी सर्कल’ का नाम दिया। उसमें वर्तमान क्वालिटी टीम का विचार बीज छिपा था। इसके अंतर्गत उन्होंने संस्था व समाज के हित के प्रति गंभीर प्रतिबद्धता के भाव को उभारा तथा उसके विकास के प्रति त्याग व समर्पण की भावना का आह्वान किया। इस प्रयास ने चमत्कारिक प्रभाव दिखाया और देखते-देखते उजड़ा जापान विकासशील से विकसित देशों में शामिल हो गया।
आधुनिक मैनेजमेंट के मनीषी गुणवत्ता की इस विचारधारा को राष्ट्र एवं विश्व के भाग्य और भविष्य के रूप में परिभाषित कर रहे हैं। वे इंसान को उसके स्वार्थ व स्वहित के दायरे से निकालकर व्यापक सोच वाले इंसान के रूप में देखना चाहते हैं। ऐसे इंसान जो पुरानेपन के खोल से बाहर निकलने का साहस जुटा सकें। जिनकी सोच अपनी परम्परावादी मान्यताओं एवं संकीर्णताओं के अगणित बंधन से मुक्त हो। जो परम्पराओं, मान्यताओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देने का साहस संजो सकें। ऐसे साहसी व्यक्तियों के अन्दर ही नेतृत्व क्षमता का गुण विकसित हो सकता है। जो अपने समूह, संस्था, समाज, राष्ट्र व विश्व के प्रति समर्पित-अर्पित हो सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों का समूह सामयिक समस्याओं को देख, जान और समझ सकता है। युगानुकूल, समुचित व समग्र समाधान ढूंढ़ निकालने में वे ही सक्षम व समर्थ हो सकते हैं। इस समूह को क्वालिटी टीम के रूप में देखा जाता है।
क्वालिटी टीम की अवधारणा से आज सारा विश्व जुड़ता हुआ नजर आ रहा है। जापान में एक करोड़ से अधिक व्यक्ति इस सूत्र को अपनाए हुए हैं। जापान के अलावा दक्षिण कोरिया, चीन, ताइवान आदि देशों में यह आधुनिक एवं उदात्त विचारधारा पूर्णरूपेण स्थापित हो चुकी है। विश्व के 130 देशों में इसकी शुरुआत हो चुकी है। अपने देश में इसका प्रथम सफलतापूर्वक प्रयोग भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स की रामचन्द्रपुरम शाखा में किया गया था। तत्पश्चात् उसकी अन्य शाखाओं में विस्तार किया गया। भारतीय स्टेट बैंक ने भी भेल की प्रेरणा से इस अवधारणा को प्रायोगिक तौर पर अपनाया। इसके परिणाम अत्यन्त उत्साहजनक थे। इसे कई संस्थाओं द्वारा संशोधित रूप में और भी व्यापक रूप से अपनाये जाने की तैयारी की जा रही है।
गुणवत्ता अवधारणा की सबसे बड़ी विशेषता है- सजीव समस्याओं का जीवन्त समाधान की विधि प्रस्तुत करना। इसके सिद्धान्त प्रयोगधर्मी एवं प्रगतिशील हैं। इसकी परिकल्पना ‘नीचे से ऊपर की ओर’ उर्ध्वगामी सिद्धान्त पर आधारित है। अर्थात् किसी संस्था से सम्बन्धित सबसे निचले स्तर के सहकर्मियों एवं सहयोगियों की स्वैच्छिक सम्बद्धता एवं वास्तविक सम्बद्धता तथा प्रबंधन के सहयोग से सामूहिक गतिविधियाँ अपनायी जाती हैं। संस्था के छोटे-छोटे सहकर्मियों को वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित पदाधिकारियों के साथ मिलकर एक धरातल पर सम्मानपूर्वक कार्य करने का अवसर मिलता है। सबके मिलकर एक साथ कार्य करने से कार्य में प्रगति एवं सफलता की भावना बढ़ जाती है। जबकि अन्य विधियों में सामान्य तथा ऊपर से नीचे की ओर अर्थात् अधिकारियों से सामान्य सहकर्मियों तक की परिकल्पना होती है। यह सिद्धान्त प्रभावशाली नहीं है क्योंकि इसमें अन्य सहकर्मियों के कार्यों को उचित सम्मान और श्रेय नहीं मिल पाता है।
क्वालिटी टीम की पूरी अवधारणा श्रम, समानता एवं सम्मान के आधार पर आधारित है। और व्यवहार कुशलता भी यही है कि प्रेमपूर्ण भावना एवं उचित सम्मान के बल पर असंभव एवं कठिन कार्य को सरल, सहज बनाया जा सकता है। अतः गुणवत्ता दल में सभी, सभी के प्रति कटिबद्ध होते हैं। इसमें सबकी सहमति पर नेतृत्व गुण वाले एवं उदार व विचारशील व्यक्ति को नेतृत्व हेतु चयन किया जाता है। एक उसका सहयोगी होता है तथा इस कार्य क्षेत्र एवं समान प्रकृति के कार्य से जुड़े पाँच से आठ अन्य सहयोगी कार्यकर्त्ता होते हैं। एक समन्वयक होता है, जो टीम के सदस्यों के बीच मध्यस्थ होता है तथा समस्या के समाधान हेतु आवश्यक संसाधनों की उचित व्यवस्था करता है।
दल प्रमुख का जीवन एकदम खुला, प्रामाणिक एवं सादगी सम्पन्न होता है ताकि यह गुण दल के अन्य सहयोगी कार्यकर्त्ता अनायास अपना सकें। दल प्रमुख अपने लक्ष्य के लिए समर्पित होता है और सभी सदस्यों को लक्ष्य प्राप्ति हेतु मनोयोगपूर्वक श्रम एवं सेवा का आमंत्रण करता है। लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में उत्पन्न समस्याओं का विश्लेषण सभी सदस्य मिलकर एक साथ करते हैं और सर्वसम्मति से इसका समाधान निकालते हैं। सप्ताह में एक बार बैठक बुलायी जाती है जिसमें कार्य की प्रगति तथा इसके प्रस्तुतिकरण आदि विभिन्न बिन्दुओं पर विचार किया जाता है। इसमें सफलता की अपेक्षा ईमानदार प्रयास के बावजूद प्राप्त असफलता को अधिक महत्त्व दिया जाता है। क्योंकि असफलता के निराकरण-निवारण से ही सफलता का पथ प्रशस्त होता है। अतः असफलता के कारणों को ढूंढ़कर सबकी सहमति एवं सक्रिय सहयोग से सफलता की दिशा में प्रयास-पुरुषार्थ किया जाता है। इस अवधारणा में स्वहित की बजाय समूहगत हित को प्राथमिकता दी जाती है। और यह किसी भी संस्था, समाज व राष्ट्र की प्रगति, उन्नति एवं विकास के लिए प्रमुख आधार एवं मूल मंत्र है।
‘मैं’ पन की संकीर्णता से उबरकर ‘हम’ और ‘हमारे’ समाज, राष्ट्र की इस परिकल्पना में ही युग प्रश्नों की चुनौतियों को स्वीकारने की क्षमता और सामर्थ्य है- युग समस्याओं को सुलझाने के सजीव उत्तर हैं- नए सवाल के नए जवाब हैं- उलझती जा रही जिन्दगी के लिए आशा की नई किरण है। इसमें संवाद है जो वैयक्तिक, सामाजिक एवं वैश्विक परिदृश्य को संघं शरणं गच्छामि की विश्व-दृष्टि देगा। छोटे रूपों में ही सही समूहगत भावना की इस चिंगारी में नूतन क्राँतियों के जन्म की शुभ सूचना है। और इस शुभ सूचना में उज्ज्वल भविष्य की आहटें भी हैं, जो हम सबके समन्वित एवं संघबद्ध प्रयास से ही नूतन आकार ले सकेगी।
एक व्यक्ति की नाक कट गई। उसने उपहास से बचने और साथ रहने के लिए औरों को भी वैसा ही बना लेने का कुचक्र रचा। लोगों से कहना शुरू किया, नाक की आड़ में भगवान छिपे थे, उसके कट जाने पर उनके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। बात पर विश्वास करके कई अन्यों ने भी नाक कटवा ली। दर्शन तो किसी को न हुए, पर उपहास से बचने के लिए वे भी झूठ-मूठ वैसा ही कहने लगे। धीरे-धीरे एक बड़ा नकटा संप्रदाय बन गया।
बात राजा तक पहुँची। वह भी नाक कटाने को तैयार हो गया। बूढ़े मंत्री ने रोका और कहा, “पहले मैं कटा लेता हूँ। यदि बात सच हो तब बाद में आप कटाना।” वैसा ही हुआ। मंत्री को भी संप्रदाय वालों ने वही पट्टी पढ़ाई तो उसने इनकार कर दिया। राजा ने वस्तुस्थिति जानी तो उन बहकाने वालों को पकड़कर कठोर दंड दिया।
इन दिनों अंधों के पीछे चलने वाले अंधों की कमी नहीं, जो एक-एक करके जाल में फंसते और गर्त में गिरते जाते है।
साबरमती आश्रम की बात है। एक दिन रात को एक चोर आ गया। चोर नासमझ था, नहीं तो आश्रम में चुराने के लिए भला क्या था!
संयोग से कोई आश्रमवासी जग गया उसने धीरे से कुछ और लोगों को जगा दिया। सबने मिलकर चोर को पकड़ लिया और कोठरी में बंद कर दिया।
व्यवस्थापक ने प्रातः यह खबर बापू को दी और चोर को उनके सामने पेश किया। बापू ने निगाह उठाकर उसकी ओर देखा। वह नौजवान सिर झुकाए आतंकित खड़ा था कि बापू उससे नाराज हैं और हो सकता है कि उसे पुलिस को सौंप दें।
बापू ने जो किया, उसकी तो वह स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकता था। बापू ने उससे पूछा, “क्यों तुमने नाश्ता किया?”
कोई उत्तर न मिलने पर उन्होंने व्यवस्थापक की ओर प्रश्नभरी मुद्रा में देखा। व्यवस्थापक ने कहा, “बापू! यह तो चोर है, नाश्ते का सवाल ही कहाँ उठता है।”
बापू का चेहरा गंभीर हो आया। दुःख भरे स्वर में बोले, “क्यों क्या यह इंसान नहीं है? इसे ले जाओ और नाश्ता कराओ।”
व्यवस्थापक, जिसे चोर मानकर लाए थे, वह अब एक क्षण में इन्सान बन गया था। उसकी आँखों में प्रायश्चित के आँसू बह रहे थे।
करुणा ने बुद्ध को बुद्ध बनाया, प्रेम ने महावीर को महावीर बनाया, किंतु करुणा और प्रेम ने गाँधी को बापू बना दिया।
वर्तमान उपभोक्तावादी संस्कृति ने समूची दुनिया का परिदृश्य ही बदल दिया है। आज सब के लिए सब कुछ है। अगर नहीं है तो सिर्फ नन्हें-मुन्नों के पढ़ने के लिए कुछ नहीं है। आज जब भी कोई बच्चा स्कूली किताबों के अतिरिक्त कुछ और पढ़ना चाहता है, तो उसके सामने यह प्रश्नचिह्न उपस्थित हो जाता है कि वह क्या पढ़े? अभिभावक भी उसकी समस्या का समाधान दे पाने में असफल हैं। बाल साहित्य की इतनी घोर उपेक्षा पहले कभी नहीं हुई।
पहले प्रतिष्ठित लेखकों की लेखनी भी इस दिशा में गतिशील थी। सच तो यह है जब तक कोई लेखक बाल साहित्य न लिखे उसे लेखक ही नहीं माना जाता था। परन्तु आज हालत यह है कि बाल साहित्य लिखना द्वितीय श्रेणी का लेखन माना जाता है। सम्भवतः उनकी दृष्टि में बच्चों के लिए साहित्य का कोई महत्त्व ही नहीं है। उनकी यह सोच कुछ हद तक सत्य भी है, क्योंकि टीवी एवं कम्प्यूटर से आक्राँत, स्कूली किताबों के बोझ तले दबे बच्चे आखिर कब और क्या पढ़ें? साथ ही बच्चों के सोच में भी बदलाव आया है, परन्तु इसमें बच्चों का दोष नहीं है। दोष है उन अभिभावकों का जो बच्चों की नैसर्गिक इच्छाओं को दबाकर उनके माध्यम से अपनी इच्छा पूरी करते हैं। दोष है उन साहित्यकारों का जो बच्चों की सोच, उनकी रुचियाँ, उनके बौद्धिक स्तर के अनुरूप साहित्य नहीं लिख पा रहे हैं।
इसका दुष्परिणाम भी सामने है। सकारात्मक बाल साहित्य के अभाव में बच्चों में आदर्शों एवं मूल्यों के प्रति कोई लगाव नहीं है। वे अपनी ही संस्कृति को हीनता की दृष्टि से देखते हैं। साहित्य नहीं पढ़ने से संवेगात्मक मूल्यों में जो शून्यता आयी है, उस शून्य को साहित्य ही भर सकता है। एक जमाना था जब मुँशी प्रेमचन्द जैसे प्रतिष्ठित लेखकों की कलम से बाल-मन को झाँकती, टटोलती ढेरों रचनाएँ निकलती थीं। ऐसे-ऐसे चरित्र गढ़े जाते थे, जो बाल-मन के साथ बड़ों को भी छू लेते थे, क्योंकि वे चरित्र यथार्थ के करीब हुआ करते थे। बच्चे स्वयं को उन चरित्रों में महसूस करते थे। फलस्वरूप उनमें संवेदनाओं की निर्मल निर्झरिणी बचपन से ही प्रवाहित होने लगती थी।
हममें से जिसने भी अपने बचपन में मुँशी प्रेमचन्द की कहानी ‘ईदगाह’ पढ़ी है, वह ईदगाह के अमर पात्र हमीद को शायद जीवन भर नहीं भूल पाएगा। मेले के समस्त बाल सुलभ आकर्षणों के बीच भूखे-प्यासे नन्हें हमीद का अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदने के लिए सारे पैसे खर्च कर देना आज भी हमारी संवेदना में, हमारी भावनाओं में एक उफान ला देता है।
वास्तव में बच्चों के मन की बात कोई जानना ही नहीं चाहता। घर में अभिभावक, स्कूल में शिक्षक सभी जगह उन पर अपने मन की थोपी जाती है। आज भी बच्चे संवेदनशील व जागरुक हैं। पर मूल्य बिखर रहे हैं और यहीं पर अच्छे बाल साहित्य की आवश्यकता होती है। बच्चों की दुनिया में, उनके आसपास के परिवेश में जो परिवर्तन हो रहा है, उसे समझना होगा। बच्चे क्या सोचते हैं, किस रूप में सोचते हैं इसकी जानकारी भी होनी चाहिए।
बच्चों के लिए ऐसा लिखा जाना चाहिए जिसे बच्चे खुद से जोड़ सकें। किसी भी प्रकार से वह उन्हें जबरदस्ती थोपा हुआ न लगे। उनके परिवेश और उनके इर्द-गिर्द की रचना ही उन्हें समझ में आएगी। बच्चों को यह लगना चाहिए कि उनकी रचना उन्हीं की दुनिया से ली गयी है। बच्चों के लिए कई तरह के सकारात्मक साहित्य लिखे जा सकते हैं। पर ‘यह अच्छा है, इसी को पढ़ो’ यह कहना ठीक नहीं। उनकी रुचि के अनुरूप चुनाव की स्वतंत्रता उन्हें ही होनी चाहिए। परी कथा जैसी पारम्परिक रचनाएँ बाल-मन को निश्चित ही आकर्षित करती हैं। अतः इस तरह की कहानियों को आज के परिवेश में कुछ ऐसे लिखा जाना चाहिए कि वे परियों पर निर्भर रहने के बजाय परी कथाओं से प्रेरणा ग्रहण करें।
कल्पनाशील दुनिया के अतिरिक्त एक यथार्थ की दुनिया भी है और वह है सामाजिक व समसामयिक संघर्ष की दुनिया। यह संघर्ष खासकर बच्चों का जो संघर्ष है उससे उनके मन में हजारों प्रश्न पैदा होते हैं। इन प्रश्नों को उजागर करना और उनका रचनात्मक समाधान बाल साहित्य का अनिवार्य अंग होना चाहिए। वास्तव में बच्चों के अनगिनत प्रश्नों का जवाब कितने रोचक एवं रचनात्मक तरीके से बच्चों को दिया जा सकता है। यह साहित्यकारों के लिए एक चुनौती है। बच्चों के लिए लेखन को द्वितीय श्रेणी का मानने वालों को इस सत्य को समझना होगा कि बच्चों के लिए लिखे बिना हर साहित्यकार अधूरा है। मनुष्य की प्रकृति के विकास में जो चीजें शामिल होती हैं, उनकी जानकारी बच्चों का साहित्य लिखकर ही प्राप्त हो सकता है। मानव मस्तिष्क और उसकी संवेदनाओं को समझने का सबसे अच्छा साधन बच्चों का साहित्य ही है।
पर इन सबके लिए जरूरी है लेखक का बाल मनोविज्ञान से परिचित होना। बच्चों की रुचियों एवं समस्याओं को बहुत करीब से महसूस करना। माता-पिता, गुरु, समाज, राष्ट्र इन सबके प्रति जो कर्त्तव्य की बात है, वह बदले जरूर हैं पर बिगड़े नहीं हैं। विकसित होते नये आदर्शों के अनुरूप साहित्य सृजन करना होगा। नागरिक व्यवहार, कानून, संविधान, संस्कृति, राष्ट्रीयता, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावनाओं को जिस प्रकार पहले की जातक कथाओं में उभारा जाता था, उसका महत्त्व आज भी है। आवश्यकता सिर्फ समय के अनुरूप उनमें परिवर्तन की है।
कॉमिक्स बच्चों में सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह अलग बात है कि साहित्य की इस विधा का दुरुपयोग पर्याप्त मात्रा में हुआ है। हर गली-मुहल्ले में बिकने वाली 95 प्रतिशत कॉमिक्स का स्तर निम्न ही होता है। कुछ और उपलब्ध न हो पाने के कारण बच्चा जो भी हाथ में आता है उसे ही पढ़ लेता है। कोर्स की किताबों से ऊबा हुआ मन परिवर्तन की चाह में कुछ भी अनाप-शनाप पढ़कर अपनी ऊब मिटाना चाहता है।
विदेशों में ‘कॉमिक्स कोड अथॉरिटी’ होती है। जिसकी मंजूरी के बिना कॉमिक्स छप नहीं सकते। परन्तु हमारे यहाँ ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। शिक्षा मंत्रालय का भी कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसी स्थिति में जैसे भी कॉमिक्स हों सब निकल रहे हैं। जबकि इस लोकप्रिय विधा का उपयोग बच्चों के स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ उनकी कठिन से कठिन समस्याओं के समाधान हेतु भी रोचक तरीके किया जा सकता है।
बाल साहित्य में बच्चों की स्वयं की उपस्थिति भी होनी चाहिए। उन्हें अपनी पूरी शख्सियत एवं रचनात्मक ऊर्जा के साथ आना चाहिए। बच्चों को यह महसूस होना चाहिए कि जो वह पढ़ रहा है वह उनके साथ घट रहा है। इस दिशा में ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ बहुत अच्छा काम कर रहा है। मलयालम में तो एक ऐसी संस्था है जो सैकड़ों की संख्या में बच्चों की पुस्तकें छापती है, प्रदर्शनियाँ लगाती है और बच्चों से सम्बन्धित अन्य कई गतिविधियाँ चलाती है। वास्तव में हर प्रदेश में बाल साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएँ होनी चाहिए। जो राज्य सरकार से समर्थित हो। रूस, हंगरी, चैकोस्लोवाकिया एवं पूर्व यूरोप के देशों में बच्चों के लिए जिस स्तर का साहित्य लिखा जाता है वह अत्यन्त प्रशंसनीय है। उन्होंने; बच्चों के विकास के लिए समग्र रूप से ध्यान दिया है। हमारे देश में भी इस प्रकार के जागरुक प्रयास की आवश्यकता है।
यह सत्य है कि पहले के बच्चों एवं आज के बच्चों के विचारों में, रहन-सहन में, चिन्तन में जमीन-आसमान का अन्तर आया है। संयुक्त परिवारों के बिखरने से जहाँ उनका पारिवारिक दायरा सिमटा है, वही माता-पिता के द्वारा ‘कम्पीटिशन’ की दौड़ में उन्हें बलात् धकेल दिये जाने से दुनिया के बारे में नन्हीं सी उम्र में ही उन्हें ढेरों जानकारियाँ हो जाती हैं। इन सबके बाद भी क्या बालसुलभ भावनाओं को बदला जा सकता है? बच्चे कल के हों या आज के, उनका नैसर्गिक भोलापन कैसे बदल सकता है? उनकी सरलता, उनकी सहृदयता को सकारात्मक बाल साहित्य का सृजन एक नयी दिशा दे सकता है।
बच्चों के मानसिक विकास में, व्यक्तित्व के विकास में साहित्य महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कभी-कभी कुछ पढ़ते हुए कोई बात मन को इतना प्रभावित कर जाती है कि सम्पूर्ण जीवन क्रम ही बदल जाता है। बच्चों के विकास के लिए इतनी अनिवार्य आवश्यकता की इतनी उपेक्षा किसी भी तरह उचित नहीं। साहित्यकारों का यह नैतिक दायित्व है कि वे ऐसे बाल साहित्य का सृजन करें,जो बाल-मन के टूटते-बिखरते भावनाओं को संवारे, पोषण दे और सही दिशा में नियोजित करे।
अब्राहम लिंकन को बचपन में महापुरुषों की जीवनी पढ़ने का बहुत शौक था। गरीबी के कारण पुस्तकें खरीद तो नहीं सकते थे, पर जहाँ-तहाँ से माँगकर लाते, पढ़ते, लौटाते और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान करते थे।
एक बार वे दस मील चलकर एक पुस्तक माँगकर लाए। रात को वर्षा हुई। छत टपकी और पुस्तक भीग गई। सुरक्षित लौटाने की शर्त कैसे निभेगी, लिंकन इस चिंता में डूबे जा रहे थे।
नियत समय पर लौटाने पहुँचे, पर साथ ही उसके खराब होने की बात भी कही। झंझट का फैसला यह हुआ कि लिंकन उस सज्जन के यहाँ इतने दिन मजदूरी करें, जितने में नई पुस्तक खरीदने जितना पैसा चुक जाए। लिंकन खुशी-खुशी तैयार हो गए और पैसे चुकाकर वापस लौटे।
दूर-दूर फैली खेतों की मखमली हरियाली, निर्मल आकाश, नदी, नद, सरोवर, झरनों की सुमधुर आवाज, पक्षियों का कलरव, मिट्टी की सौंधी-सौंधी महक गाँवों की प्राकृतिक सम्पदा एवं सम्पत्ति है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति अपने समस्त सौंदर्य एवं शृंगार के साथ गाँव में बस गयी हो। गाँव का परिवेश एवं पर्यावरण मनभावन, मोहक एवं सजीव होता है। शहर-नगर का वातावरण भले ही चकाचौंध से चुँधियाता रहता है परन्तु गाँवों जैसा सुरम्य एवं सजीव नहीं होता। प्राकृतिक परिवेश से परे वहाँ के वातावरण में उबाऊ एवं बोझिल कृत्रिमता फैली रहती है। इसके बावजूद विकास के सारे साधन और सुविधाएँ शहरों में मिलते हैं और गाँव इनसे अछूते एवं अनछुए रह जाते हैं। दिनों-दिन शहर विकसित हुए हैं एवं ग्राम पिछड़ के पिछड़े रह गए हैं।
प्रकृति प्रेमी राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी गाँवों के वातावरण से अत्यन्त प्रभावित थे। वह तो यहाँ तक कहते थे - ‘भारत की आत्मा ग्रामों में बसती है।’ उनके इस कथन में बड़ा ही गहन-गम्भीर मर्म छुपा है और यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। गाँव को समुन्नत एवं सभ्य करके ही शहरों का समग्र विकास किया जा सकता है। क्योंकि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। राष्ट्रीय समस्या का समग्र समाधान भी इसी में सन्निहित है।
आधुनिक सभ्यता के विकास की अवधारणा में गाँवों का कोई मूल्य एवं स्थान नहीं रह गया है। आज गाँवों का न सुदृढ़ वर्तमान है और न उज्ज्वल भविष्य। वे अतीत की वस्तु मात्र बनकर रह गए हैं। अमेरिका तथा पश्चिम यूरोप में तो गाँव का अस्तित्व ही लुप्त हो गया है। गाँव केवल उन्हीं देशों में बचे हैं, जो औद्योगिक दृष्टि से विकसित नहीं हैं, जहाँ पर कृषि उद्योग ही एकमात्र साधन एवं जीविका का आधार है। गाँव के बचने का अर्थ है कृषि सभ्यता का बचना। गाँव को बचाने का तात्पर्य है कृषि सभ्यता का सम्मान। हमारा कृषि प्रधान देश इसी आधार पर ही विकसित हो सकता है। गाँवों का देश भारत की प्रगति, उन्नति एवं समृद्धि का एकमात्र मूल मंत्र है- सर्वप्रथम कृषि का सम्मान करना, तत्पश्चात उद्योग का आदर करना।
भारत में आज भी लाखों-लाख गाँव हैं। इन गाँवों को विकसित करके ही भारत को विकास के रथ पर आरुढ़ किया जा सकता है। गाँधी जी के सपनों को साकार किया जा सकता है। उनके सपनों का भारत आदर्श गाँवों के अंतर्संबंधों पर आधारित है। परन्तु हमने उनकी इस परिकल्पना व अवधारणा को पूरी तरह से अमान्य एवं अस्वीकार कर दिया और इसके ठीक विपरीत हमने राष्ट्र के विकास का मूलभूत आधार शहरीकरण को माना। हमने शहर बनाने-बसाने एवं इसे विकसित करने की प्रक्रिया को ही उन्नति का मापदण्ड स्वीकारा। परन्तु विडम्बना है कि आजादी के 56 वर्ष पश्चात् भी देश की आधी आबादी का अभी शहरीकरण नहीं हो पाया है। इस समय लगभग 40 करोड़ लोग शहरों में रहते हैं और 60 करोड़ लोग गाँवों में निवास करते हैं। शहरों में रहने वाली लगभग आधी आबादी अत्यन्त दीन-दयनीय अवस्था में जीवन बिता रही है। दूसरी ओर गाँवों की ओर समुचित ध्यान न देने से गाँव उजड़ रहे हैं। गाँवों से शहर की ओर ग्रामीणों का पलायन हो रहा है। और बढ़ी हुई आबादी वाले शहर और भी भरते जा रहे हैं।
गाँव और शहर के बीच विषमता-विभेद की खायी दिनों-दिन चौड़ी हो रही है, बढ़ रही है। एक ओर जहाँ गाँवों में बुनियादी सुविधाएँ तक नहीं पहुँच पायी हैं, वहीं दूसरी ओर शहर अत्याधुनिक सुविधा-साधनों से सम्पन्न होते जा रहे हैं। एक ओर विकास की चरम सीमा है तो दूसरी ओर सामान्य आवश्यकताओं की चीजों का अभाव है। एक ओर गगनचुम्बी इमारतें, अत्याधुनिक बंगला, वाहन और विलास के साधन जुट रहे हैं तो दूसरी ओर शिक्षा, चिकित्सा एवं भोजन आदि की बुनियादी समस्याएँ मुँह बाये खड़ी हैं। गाँव और शहर की इस असमानता एवं विषमता का कारण अपनायी गयी विकास की रणनीति है, जिसमें गाँवों के लिए या गाँवों में रहने वालों के लिए कोई स्थान नहीं है। उद्योग नीति को अपनाए जाने, प्रोत्साहित करने तथा कृषि नीति को उपेक्षित कर देने के कारण ही यह समस्या खड़ी हुई है।
कृषि की ओर समुचित ध्यान न देने के कारण इसकी उत्पादन क्षमता में गिरावट आयी है। उत्पादन घटने से उस पर पूरी तरह से निर्भर गाँव गरीबी का अभिशाप झेलने को मजबूर हैं। कृषि ही एकमात्र साधन होने तथा अन्य उद्योगों का अभाव होने के कारण देश की बहुत बड़ी श्रमशक्ति खाली एवं बेकार पड़ी है। इससे बेरोजगारी की समस्या भी बढ़ रही है। इसके समाधान के लिए हरितक्रांति का प्रयोग किया गया। जिन क्षेत्रों को हरित क्रान्ति का लाभ हुआ है, वहाँ समृद्धि तो है। पर ऐसे क्षेत्र बहुत कम हैं। अपने देश में हरित क्राँति को सफल कर पाना अत्यन्त कठिन है। क्योंकि देश की अधिक आबादी अभी भी छोटे-छोटे खेतों में बँटी हुई है। वंश वृद्धि से किसान के हिस्से में आने वाली जमीन कम हुई है। जहाँ पर आधुनिक यंत्रों का प्रयोग असम्भव है, वहाँ कैसे एवं किस प्रकार हरित क्राँति की परिकल्पना की जा सकती है।
आज भारतीय गाँवों की सबसे बड़ी त्रासदी व समस्या है- पलायन। देश के लाखों गाँव पलायन का दर्द झेल रहे हैं। शहर की चमक-चकाचौंध हर ग्रामीण को आकर्षित करती है। गाँव का साक्षर युवा गाँव में नहीं शहर में रहना ज्यादा पसन्द करता है। देश में कृषि के विकास में जागरुकता लाने के लिए अनेक कृषि विश्वविद्यालय खुले, लेकिन वहाँ से निकलने वाले स्नातक गाँवों की कृषि में योगदान देने के बदले शहरों की ओर उन्मुख हुए। उन्होंने गाँवों के बदले शहरों को चुना।
इन समस्याओं से निपटने के लिए कृषि के औद्योगीकरण की नीति को लागू किया गया है, परन्तु इसकी सफलता की सम्भावना भी क्षीण है। इस असफलता के मुख्य कारण हैं - छोटी-छोटी जमीन तथा गरीबी। छोटे आकार के खेत याँत्रिकी खेती के लिए के लिए अनुपयुक्त होते हैं। किसानों को इन खेतों से इतनी कम आय प्राप्त होती है कि वह जीवन निर्वाह के लिए भी पर्याप्त नहीं होती। ऐसे में बचत कर पूँजी निवेश कर पाना तो दिवा स्वप्न के समान है। और इसके अभाव में इस नीति से किसी प्रकार की सफलता की आशा नहीं की जा सकती। इस संदर्भ में कर्नाटक प्रान्त में अपनाया गया भूमि हदबंदी कानून भी सफल नहीं हो सका। पूँजीवादी कृषि व्यवस्था भी गाँवों के भविष्य को सँवार नहीं सकी। इस व्यवस्था से गाँव का पूरी तरह से शहरीकरण हो जाता है। ठीक इसके विपरीत विफल पूँजीवाद में भी आशा की कोई किरण दिखाई नहीं देती है। इससे सभी ओर हताशा-निराशा का भय व्याप रहा है।
ऐसी स्थिति में समय की सर्वोपरी आवश्यकता है कि ग्रामीण औद्योगीकरण को प्रचलित किया जाए। गाँवों में उपलब्ध मानवीय व प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग किया जाए। गाँवों में उपलब्ध कच्ची वस्तु, उद्योग कौशल व श्रम शक्ति के अनुरूप औद्योगिक संस्कृति के विकास से ही गाँवों के भविष्य को उज्ज्वल बनाया जा सकता है। जहाँ पर जिस चीज की उपलब्धता सहजता से होती है उसका उपयोग करना ही बुद्धिमत्ता है। इस संदर्भ में स्विट्जरलैण्ड के घड़ी उद्योग एवं जापान के तकनीकी उद्यम हमारे लिए विकास के प्रेरणा स्रोत बन सकते हैं। क्योंकि इन देशों के विभिन्न क्षेत्रों में इस उद्योग के लिए कच्ची वस्तु प्रचुर मात्रा में मिलती है जिसको समुचित श्रम व कौशल के द्वारा वहाँ एक बड़ा उद्योग का रूप दे दिया गया है। ठीक इसी प्रकार भारतीय ग्रामीण परिवेश के अनुरूप उद्योग संस्कृति विकसित किये जाने की आवश्यकता है। जिससे सबको काम मिले, पलायन थमे और ग्रामों में समृद्धि की धारा बहे।
वर्तमान समय की सर्वोपरि माँग है कि लघुता में सौंदर्य की तलाश। अर्थात् छोटे-छोटे कार्यों को बड़ी खूबसूरती के साथ किया जाये और उत्पाद को बाजार में प्रस्तुत किया जाये। मोमबत्ती, अगरबत्ती, बेकरी आदि कुटीर उद्योग इसी श्रेणी में आते हैं। अल्पकालीन प्रशिक्षण से ही इसे सीखा व किया जा सकता है। इसमें केवल श्रम की आवश्यकता है। अल्प पूँजी से भी इसे आसानी से किया जा सकता है। हमारे देश की तीन चौथाई जनसंख्या गाँवों में बसती है। स्वावलम्बन एवं कुटीर उद्योगों में गाँवों के अपार एवं विशाल श्रम को नियोजित किया जा सके तो हर गाँव को समृद्ध व उन्नत किया जा सकता है।
राष्ट्रीय समृद्धि के लिए शहर के साथ-साथ गाँव की ओर उन्मुख होना पड़ेगा। ग्रामों में फैले पड़े विशाल व विस्तृत संसाधनों को सुनियोजित करना होगा। आधुनिक उद्योग संस्कृति में अप्रासंगिक हो चले कुटीर उद्योगों को फिर से जीवित एवं जाग्रत् करना पड़ेगा जिससे हमारे विशाल व विस्तृत श्रम भण्डार का सार्थक उपयोग हो सके। गाँवों में कुटीर उद्योगों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा जाना चाहिए। इससे कुटीर उद्योगों को नये ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है। आधुनिक तकनीक व छोटी पूँजी वाले उद्योग ही गाँवों में कारगर व सफल हो सकते हैं। इससे गाँवों की बेकार पड़ी श्रम शक्ति एवं कौशल का उपयोग गाँवों की समृद्धि व प्रगति के लिए किया जा सकता है। हथकरघा, दस्तकारी, खादी जैसे ग्रामोद्योग सहकारिता के आधार पर चलाया जाना चाहिए। इस तरह यदि समुचित प्रबन्धन एवं संसाधनों का सुनियोजन किया जा सके तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में लघु उद्योग निर्णायक एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं।
भारतीय गाँवों का क्षेत्र एवं पटल अति व्यापक एवं विशाल है। इसी के बल पर भारत की पूरी अर्थव्यवस्था चल सकती है। आवश्यकता है तो बस इस ओर समुचित ध्यान देने की, संसाधनों के विकास एवं लोगों में श्रम व स्वावलम्बन के प्रति जागरुकता लाने की। ग्रामीण लोगों में व्यावहारिक सामंजस्य एवं स्वावलम्बन जैसे गुणों का विकास किया जा सके तो वे कभी भी परमुखापेक्षी एवं परावलम्बी नहीं होंगे। यह विकास एवं प्रगति का मुख्य आधार है। इसके कुशल नियोजन से अपार सफलता मिल सकती है। इस प्रकार गाँवों और शहरों के बीच विभेद व विभाजन की दीवार गिरेगी। हर व्यक्ति स्वावलम्बी होगा चाहे वह ग्रामीण हो या शहरी। इससे गाँवों को विकसित होने का अवसर मिलेगा तथा पलायन थमेगा और शहरों पर आबादी का दबाव कम होगा। और शहरों में गाँवों के इस स्वावलम्बी उद्यमों को समुचित सम्मान मिलेगा।
राष्ट्र की अर्थनीति केवल शहर पर ही आधारित नहीं होनी चाहिए। इसमें गाँवों का मुख्य योगदान सुनिश्चित करना चाहिए। अगर स्वदेशी को स्वरोजगार पर आधारित किया जा सके तो यह बहुत बड़ी आर्थिक क्राँति होगी। इसी से साँस्कृतिक क्राँति का शंखनाद होगा। वस्तुतः जीवन एक सम्पूर्ण इकाई है। इसका गाँव और शहर के रूप में भिन्न-भिन्न आकलन नहीं करना चाहिए। इसे समग्रता से सोचना व देखना चाहिए। गाँव एवं शहर के आपसी सहयोग से ही सम्पूर्ण विकास सम्भव है। इसे क्रियान्वित कर हम स्वहित के साथ राष्ट्रहित, मानवहित एवं विश्वहित के उदात्त भाव को साकार कर सकेंगे। इससे गाँवों की हरियाली फिर से लौट सकेगी एवं शहर सुव्यवस्थित प्रदूषण मुक्त होंगे।
प्राचीनकाल में एक संत थे। धर्मश्रद्धा के कारण सदा प्रसन्न रहते थे,चेहरे पे उल्लास टपकता रहता था।
चोरों ने समझा उनके पास कोई बड़ी दौलत है, अन्यथा हर घड़ी इतने प्रसन्न रहने का और क्या कारण हो सकता है?
अवसर पाकर चोरों ने उनका अपहरण कर लिया, जंगल में ले गए और बोले, “हमने सुना है कि आपके पास सुखदा मणि है, इसी से इतने प्रसन्न रहते हैं, उसे हमारे हवाले कीजिए, अन्यथा जान की खैर नहीं।”
संत ने एक एक करके हर चोर को अलग अलग बुलाया और कहा, “चोरों के डर से मैंने उसे जमीन में गाड़ दिया है। यहाँ से कुछ ही दूर पर एक स्थान है। अपनी खोपड़ी के नीचे चंद्रमा की छाया में खोदना, मिल जाएगी।”
संत पेड़ के नीचे सो गए। चोर अलग अलग दिशा में चले और जहाँ तहाँ खोदते फिरे। जरा सा ही खोद पाते कि छाया बदल जाती और उन्हें जहाँ तहाँ खुदाई करनी पड़ती। रात भर में सैकड़ों छोटे बड़े गड्ढे बन गए पर कहीं मणि का पता न लगा।
चोर हताश होकर लौट आए और संत पर गलत बात कहने का आरोप लगाकर झगड़ने लगे।
संत हंसे, बोले-“मूर्खों! मेरे कथन का अर्थ समझो। खोपड़ी तले सुखदा मणि छिपी है, अर्थात् धार्मिक विचारों के कारण मनुष्य प्रसन्न रह सकता है। तुम भी अपना दृष्टिकोण बदलो और प्रसन्न रहना सीखो।”
चोरों को यथार्थता का बोध हुआ तो वे अपनी आदतें सुधारकर प्रसन्न रहने की कला सीख गए। यही थी वह सुखदा मणि।
महालय भाद्रपद पूर्णिमा 10 सितंबर 2003-अंग्रेजी तारीख के क्रम से, 19/09/94 को हम सबकी माँ का महाप्रयाण दिवस है। माँ भगवती का अवतरण भी इसी माह आश्विन कृष्ण चतुर्थी (14 सितंबर) को हुआ था। वंदनीया माताजी के रूप में उनकी लीला−कथा दरअसल सृष्टि की जननी के ममत्व की कथा है। यह वही कथा है जो श्री दुर्गा सप्तशती में महामंत्रों में प्रकट हुई है। जिसमें भारत राष्ट्र, राष्ट्रीय संस्कृति, मानव धर्म और माता की ममता के बहुमूल्य तत्त्व सँजोए हैं। इसे संपूर्ण विश्व व अखिल सृष्टि के मातृत्व की कथा भी कह सकते हैं। आज के दौर में इस कथा को, माता के वंदनीया स्वरूप को कहीं ज्यादा गहराई ये समझने की जरूरत हैं, क्योंकि समूचे विश्व में आज यदि कुछ टूट-दरक रहा है तो बस माँ का हृदय है।
असुरों की मदाँध सेना, आज फिर से जगन्माता के विरुद्ध खड़ी दिखाई दे रही है। आदिमाता भगवती के विरुद्ध दुर्बुद्धि असुर फिर से सिरफिरे अट्टहास कर रही हैं। महिषासुर, चंड-मुँड,रक्तबीज, शुँभ-निशुँभ सबके-सब एक साथ मिलकर सृष्टि विनाश के लिए तत्पर हैं। अपनी दुर्गति के लिए तेज हो रही उनकी दौड़ उनके कथन और कर्म से प्रकट हो रही है। आज भी वे कह रहे हैं-
केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि। तदोशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम्॥ (देवी सप्तशती 6/23)
“उसके केश पकड़कर अथवा उसे बाँधकर शीघ्र यहाँ ले आओ। यदि इस प्रकार उसको लाने में संदेह हो, तो युद्ध में सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों तथा समस्त आसुरी सेना का प्रयोग करके उसकी हत्या कर डालना।”
“आदिमाता को पकड़ लाओ, बाँध लो” ऐसी दुर्बुद्धि के साथ क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि दुनिया का कोई प्राणी सुखी हो सकेगा? नशे के गिलास पीकर, पॉप संगीत में झूमकर अथवा नाइट क्लबों में जंगली पशुओं की तरह उछल-कूद मचा लेने से सुख नहीं मिला करता। गीता माता की भाषा में ‘अशाँतस्य कुतः सुखम्‘ जब शाँति ही नहीं है, तब सुख कैसा ? सच्चा सुख डालर, रुपया अथवा पाउंड में नहीं मिल सकता। यह तो माँ की सजल ममता में है और इसकी कभी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती! शिशु के माथे पर माँ का चुँबन भला कितने डालर में खरीदा जा सकता है! जब सामान्य मानवी माता के प्यार की कोई कीमत नहीं सोची जा सकती तो फिर अखिल ब्रह्माँड में संव्याप्त माता भगवती की ममता का कोई मूल्याँकन किस तरह से किया जा सकता है?
उनकी ममता सभी सीमाओं से परे हैं। जब वह देह धारण करके हम सबके बीच में साकार होती ही, तब भी उनकी ममता अखिल सृष्टि में संव्याप्त होती है और जब वह देहातीत हो निराकार होती है, तब भी उनकी ममता सभी श्वास में घुली होती है। हम सब प्राणी उन्हीं के द्वारा रचे, बनाए और पाले गए है। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हम इस सचाई को न तो समझ पाते है और न ही समझने की कोशिश करते हैं हम पलते है, बड़े हो जाते है, किंतु संसार की चकाचौंध में, इच्छाओं की उलझन में, कामनाओं की उधेड़-बुन में अपनी माँ को, सृष्टि जननी को भूल जाते है। अपनी चेतना पर छाए तमस के सघन घन यह होश ही नहीं आने देते कि एक बार माँ को देखें, उसे जानें। वह माँ, जो हमें जन्म देने वाली माँ की भी माँ हैं। सृष्टि के कण-कण में उस माँ को पहचानें, उसे याद करें, उसकी अनुभूति पाने की कोशिश करें।
‘एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीय का ममापरा’ (देवी सप्तशती 10/5), मैं अकेली ही हूँ। इस संसार में मेरे सिवा दूसरा कौन है। माँ के इन वचनों को आज का संकीर्ण, जड़ और धर्मविहीन विज्ञान समझने में असमर्थ हैं आज के युग की साइंस तो प्रकृति को, कुछ अलग ही परिभाषित कर रही है। अणु-परमाणुओं में सेल और जीन में सृष्टि के अवयवों को बाँटने वाली उसकी यह परिभाषा भी बड़ी बंटी-बिखरी हैं। विज्ञान की समझ में इंसान बस देह और दैहिक क्रियाओं में सिमटा हुआ एक जैव उपक्रम भर है।
यह उलटी सोच उसने सृष्टि के साथ भी अपनाई है। तभी संसार के लोग प्रकृति को माँ पुकारना भूलते जो रहे है। भारत भूमि के महर्षियों ने समूची सृष्टि और प्रकृति को माँ के रूप में देखा था। उसे माँ कहकर पुकारा था। परिणाम में वह माँ उन्हें भरपूर वात्सल्य देती रही। आसुरी प्रवृत्तियां तो बस उस प्रकृति माँ को अपने अधीन करने में विश्वास रखती हैं परिणाम में भाव वत्सला माता भगवती भी उनके लिए अपना सौम्य रूप छोड़कर महाकाली चंडी और चामुँडा का रौद्र रूप धारण कर लेती है। आसुरी प्रवृत्तियों के कुकर्म ही मौत की छाया बनकर उन पर मंडराने लगते हैं।
आज यत्र-तत्र यही हो रहा है। इस संकट का मूल कारण एक ही है कि जगदंबा के स्वरूप को अब तक न तो देखा गया है और न उनके साथ भावभरा संबंध बन पाया है। यह स्थिति विश्व स्तर पर भी है और घर-परिवार के तर पर भी। नारी को, स्त्री को यदि माँ के रूप में देखने की दृष्टि नहीं होगी तो कष्ट घटने की बजाय बढ़ेगा। वात्सल्य, स्नेह और ममता की सजल धारा सदा सूखी ही रहेगी। आज के दौर में बिखरते परिवारों के दर्द का अहसास प्रायः सभी को है। इसके समाधान के लिए मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री बहुतेरी बातें कहते हैं, पर क्या केवल मानवता की दुहाई देकर आर्थिक लोभ या कानून की धाराओं के बंधन में बाँधकर संबंध निभाए जा सकते है।?
सभी तरह के संबंधों को निभाना और इन्हें प्रगाढ़ बनाना तो भावों की सजलता से ही संभव है। इसके लिए सबसे पहले माँ, उसकी ममता और उसके वात्सल्य की उस विमल भावधारा को समझना पड़ेगा, जो परिवार के छोटे दायरे से लेकर लोक-लोकाँतर तक व्याप्त है। यह माता ही सृष्टि संचालन और परिवार संचालन करने वाली आधारभूत संरचना का कारण है। यही आनंद और सुख का वास्तविक स्रोत है। अपनी संतानों की माँ में, अपनी माँ में, अपने पिता और माता की माँ में उन्हीं जगज्जननी माता भगवती की ममता की धारा बह रही है। वे देहधारी होते हुए भी देहातीत थी और अब देहातीत होते हुए भी समस्त देहधारियों में संव्याप्त है।
पिंड से ब्रह्माँड तक फैली हुई उन माता भगवती की ममता का अनुभव करने के बाद भी क्या कोई पराया हो सकता है? इस अनुभूति के बाद तो सभी अपने ही नजर आएंगे। फिर किससे हो पाएगी बेईमानी? किससे पनपेगा ईर्ष्या-द्वेष? यह भाव-बंधन तो व्यक्ति-व्यक्ति को अपने आप ही निःस्वार्थ जोड़ देगा। इस की नींव पर व्यक्ति, परिवार, समाज और विश्व का जो ढाँचा खड़ा होगा वह न केवल सौहार्द्रपूर्ण बल्कि स्थाई भी होगा। यदि विज्ञान और वैज्ञानिकता की भी नींव यही होगी तो अपने आप ही मानव जीवन की अनुकूलता का वातावरण विकसित होगा। विश्वमंगल की राहें उजली होगी।
सिर्फ अधिकार पाने की होड़, दौड़ और द्वंद्व से अशाँति और आतंक ही पनप सकते है। आज हो भी यही रहा है। हमें हमारी अपनी माँ का वात्सल्य और धर्म भूल गया हैं। धर्म में भूल ही जीवन का शूल बनती है। धर्मविहीन जीवन चाहे जितनी विधाओं से भरा-पूरा हो, पर उसमें खडडडड नहीं अंकुरित हो पाता। आज की वैश्विक परिस्थितियों के नियमन एवं संचालन के लिए इसका बोध निहायत जरूरी हैं। दुनिया भर में सुख को पाने के लिए भौतिक विकास की दौड़ और होड़ हो रही है। रोज नए विकास के दावे किए जा रहे है, पर दुःख के पहाड़ टूट-टूटकर न केवल जिंदगी को बल्कि दूसरे जीवों और वनस्पतियों की जिंदगी तबाह कर रहे है। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है। क्यों? इसलिए कि सुख के लिए किया जा रहा विकास दिशाहीन, धर्मविहीन और माता प्रकृति की ममता से विहीन है।
आज आर्थिक वैश्वीकरण के आधार पर विश्वग्राम और वैश्विक जीवनशैली को विकसित करने की बातें की जा रही है। सूचना तकनीक को इसका संवाहन माना जा रहा है, पर सच यह है इसके कारण सुसंस्कारों को नहीं विकृतियों को ही बढ़ावा मिल रहा है। आत्मीयता घट रही है, भावनाएं मुरझा रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसके संचालन में धर्म के सार्वभौमिक एवं सनातन स्वरूप की सार्थक भूमिका नहीं हैं। विश्वमाता की ममता इसमें संचारित नहीं हो रही है। मजहब और विश्वासों की अलग-अलग पहचान बनाकर खड़ी मान्यताएं मनुष्य को गिरोह बंद तो कर सकती है, पर उसे सार्वभौमिक धर्म तो वह है, जिसमें अलग-अलग आस्थाओं का एक विश्व दर्शन हो। जिसमें विश्वमाता की सच्ची विचार संवेदना झंकृत हो। किसी भी मजहबी आस्था को स्वीकारते हुए जिसका अनुकरण किया जा सके, साथ ही जिसमें विश्वकल्याण के भाव भी कूट-कूटकर भरें हो।
विश्वमाता की ममता की अनुभूति करके ही विश्व दर्शन विकसित हो सकता है और इसी से विश्वबंधुत्व, विश्वशाँति, वसुधैव कुटुँबकम् के भाव पनप सकते है। यही मात्र विश्वग्राम एवं सच्ची जीवन शैली को विकसित करने में समर्थ हो सकता है। इस तरह के वैश्विक जीवन में विश्व जीवन की विविधता का नाश नहीं होगा, बल्कि उसे पोषण मिलेगा। विविधता में एकता का दर्शनीय स्वरूप निखरेगा। एकात्मता के इस बोध से ही वैश्वीकरण का आधार और मार्ग विनिर्मित हो सकता है।
भारतभूमि में चिर अतीत से इसकी भावभरी साधना की जाती रही है। यहाँ के महर्षियों ने विश्व जीवन की एकात्मता और समरसता को सदा से अनुभव किया है। यहाँ के दिव्यदर्शियों ने विश्वमाता के वैभव के रूप में पूरे विश्व जीवन को देखा और जाना है। विश्वमाता की संतानों के रूप में समूचे विश्व को अपनाया जाना है। विश्व जननी की भक्ति करने वाले भारत देश का यह वैश्वीकरण न तो स्वार्थ प्रेरित है और न ही विनाशकारी, अपितु इसमें तो ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के महान भाव भरे है। आज इसे फिर से नवजीवन देने की आवश्यकता है। माता भगवती अपने परमवंदनीया स्वरूप में इसी हेतु हम सबके बीच प्रकट हुई और इसी हेतु अपनी संतानों के अनेकानेक कष्टों को स्वयं सहकर 19 सितम्बर 1994 को उन्होंने महाप्रयाण किया। उनके द्वारा बताए, दर्शाए गए धर्मबोध को आज प्रत्येक देश के प्रत्येक मनुष्य को धारण करने की जरूरत है, क्योंकि इसमें हर एक के लिए निःश्रेयस और अभ्युदय के लिए राह है। इसमें उनकी ममता है, सहभागिता है, संरक्षण है और सदा-सदा के लिए अपनी सभी संतानों पर प्यार लुटाने का आश्वासन भी है।
कर्ण कौरवों की सेना में होते हुए भी महान धर्मनिष्ठ योद्धा थे। श्रीकृष्ण तक उनकी प्रशंसा करते थे। महाभारत युद्ध में कर्ण ने अर्जुन को मार गिराने की प्रतिज्ञा की थी। उसे सफल बनाने के लिए खाँडव वन के महासर्प अश्वसेन ने यह उपयुक्त अवसर समझा। अर्जुन से वह शत्रुता तो रखता था, पर काटने का अवसर मिलता नहीं था। वह बाण बनकर कर्ण के तरक में जा घुसा, ताकि जब उसे धनुष पर रखकर अर्जुन तक पहुँचाया जाए, तो काटकर प्राण हर ले।
कर्ण के बाण चले। अश्वसेन वाला बाण भी। कृष्ण ने वस्तुस्थिति को समझा और रथ-घोड़े जमीन पर बिठा दिए। बाण मुकुट काटता हुआ ऊपर से निकल गया।
असफलता पर क्षुब्ध अश्वसेन प्रकट हुआ और कर्ण से बोला, “अबकी बार अधिक सावधानी बरतना, साधारण तीरों की तरह मुझे न चलाना। इस बार अर्जुन का वध होना ही चाहिए। मेरा विष उसे जीवित रहने न देगा।”
इस पर कर्ण को भारी आश्चर्य हुआ। उसने उस कालसर्प से पूछा, “आप कौन हैं और क्यों अर्जुन को मारने में इतनी रुचि रखते है?”
सर्प ने कहा, “अर्जुन ने एक बार खाँडव बन में आग लगाकर मेरे परिवार को मार दिया था, सो उसका प्रतिशोध लेने के लिए मैं व्याकुल रहता हूँ। उस तक पहुँचने का अवसर न मिलने पर आपके तरक में बाण रूप में आया हूँ। आपके माध्यम से अपना आक्रोश पूरा करूंगा।”
कालसर्प कर्ण की नीति-निष्ठा को सराहता हुआ वापस लौट गया। उसने कहा, “कर्ण तुम्हारी यह धर्मनिष्ठा ही सत्य है, जिसमें अनीतियुक्त पूर्वाग्रह को, छद्म को ही स्थान नहीं।”
प्राकृतिक सौंदर्य एवं साँस्कृतिक समृद्धि अपने भारत देश का परिचय है। यही राष्ट्रीय अस्मिता और गौरव की पहचान है। ‘सा प्रथमा संस्कृतिः विश्ववारा’ कहकर यजुर्वेद के ऋषि ने इसे परिभाषित किया है। इस वेदमंत्र का मर्म यही है कि वह विश्ववारा- सबके वरण करने योग्य, सबसे प्रथम संस्कृति है। संस्कृति की पहली किरणें भारत भूखण्ड में उतरीं। संस्कृति के प्रभातकालीन सूर्योदय का श्रेय इसी देश को मिला। हालाँकि इसकी किरणें समूची धरा को प्रकाशवान बनाने के लिए निःसृत होती रहीं। भारतीय विद्याओं के महामनीषी डॉ. भीखनलाल आत्रेय ने अपने ग्रन्थ ‘भारतीय संस्कृति’ में इस निष्कर्ष को बड़े ही तर्कपूर्ण ढंग से प्रतिपादित किया है कि ज्ञात संसार की सभी संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन है और सभी संस्कृतियों की माता है।
इस ऐतिहासिक सच से अनेकों विद्वान सहमत हैं कि प्राचीन काल में ईसा से पूर्व ही धर्म, कला, नीति, सभ्यता व संस्कृति के क्षेत्र में भारत की ख्याति समूची दुनिया में फैल चुकी थी। संस्कृति-मनुष्य को सुसंस्कृत एवं मानवीय चेतना को परिष्कृत बनाने का विज्ञान है। इस सम्बन्ध में जितने व्यापक एवं बहुआयामी प्रयोग भारत में किए गए, उतने कहीं और नहीं। अपना देश एवं अपने यहाँ की संस्कृति विविध प्रकार के अनुभवों में रची-बसी है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस साँस्कृतिक भव्यता को तैयार करने में भारत देश के भूगोल और जलवायु का काफी बड़ा हाथ है। भारत भूमि प्राकृतिक विविधताओं की स्थली है। यहाँ एक ओर जहाँ विश्व की सबसे ऊँची पर्वत शृंखला हिमालय है, वहीं दूसरी ओर समुद्र तट से भी नीचे दिखती उर्वर घाटियाँ, उपजाऊ भूमि के विशाल मैदान, घने जंगल, जलहीन मरुस्थल, असीम जलराशि को अपने में समेटे महासागर, लहराती नदियाँ और दलदली जमीन के टुकड़े भी हैं।
उत्तरी भारत में यह विविधता कुछ ज्यादा ही नजर आती है, जहाँ हिमालय की ऊँचाई नापती पावन नदी गंगा अपने साथ नीचे लाई उर्वर खाद उत्तरप्रदेश और बिहार के धान एवं गेहूँ के घने खेतों में जा बिखेरती है। बीहड़ जंगल और झिलमिलाती झीलों की रक्षा में तैनात पूर्व घाटियों के दुर्गम पर्वत, सर्पीले रास्तों से नीचे उतर कारोमण्डल तट रेखा पर ताड़ के पेड़ों से सटे बेहद खूबसूरत समुद्र तटों से जा मिलते हैं। पश्चिम में गोवा और दक्षिण में केरल की भव्य तटरेखा ने समुद्री यात्रियों को हमेशा से ही आकर्षित किया है। गुजरात का समुद्र तट तो कई शताब्दियों तक व्यापारियों का आवाजाही का मूकदर्शक रहा है। किलों, महलों और घाटियों में साँस्कृतिक समृद्धि को समेटे राजस्थान का परिवेश हैरत में डाल देता है। जब जैसलमेर जैसी गुलाबी बाजू पत्थर की नगरी, थार मरुस्थल के बीच से मरीचिका सी उभरती नजर आती है।
भारत संस्कृतियों का ऐसा अनोखा सामञ्जस्य है, जो आज के दौर में भी विश्व के सामञ्जस्यपूर्ण जीवन के अनेकों समाधान सुझा सकता है। समस्याएँ राष्ट्रीय हो या अन्तर्राष्ट्रीय, भारतीय संस्कृति में इनके समाधान के अंकुर खोजे जा सकते हैं। यह मत उन सभी का है, जो यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य एवं साँस्कृतिक समृद्धि से आकर्षित होकर आए। ख्वारिज्म में जन्मे अलबरूनी का नाम इस क्रम में शीर्ष पर अंकित किया जाता है। ग्यारहवीं सदी में आने वाले भारतीय संस्कृति को जितना गहराई से इसने परखा, उतनी गहराई कम ही लोगों में देखने को मिलती है। अपनी इस परख और समझ के आधार पर उसने 114 से अधिक पुस्तकें लिखीं। इन सभी पुस्तकों में ‘किताब-उल हिन्द’ विशेष उल्लेखनीय है। इस पुस्तक में उसने भारत की संस्कृति एवं यहाँ की परम्पराओं का सूक्ष्मता से उल्लेख किया है।
अलबरूनी का कहना है कि संस्कृति एवं पर्यटन दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। संस्कृति जहाँ ज्ञान-विज्ञान की प्रक्रियाओं व परम्पराओं को जन्म देती है, वहीं पर्यटन इन्हें देश व्यापी और विश्व व्यापी बनाता है। उसके अनुसार भारतवासी पर्यटन की महिमा से चिर अतीत से परिचित थे। तभी यहाँ तीर्थयात्रा, प्रव्रज्या एवं धर्मचक्र प्रवर्तन जैसी अनोखी परम्पराएँ विकसित हो सकीं। अलबरूनी की एक बात और महत्त्वपूर्ण है, जो उसने ‘किताब उलहिन्द’ में कही है। इसके अनुसार भारतीय संस्कृति में इस सत्य को पहली बार अनुभव किया गया कि ज्ञान सच्चे अर्थों में अन्तर्राष्ट्रीय होता है। विचारों तथा प्रमुख आविष्कारों का लाभ चाहे वे किसी भी क्षेत्र में किए हों, सभी राष्ट्रों को पहुँचने चाहिए।
भारतीय संस्कृति से आकर्षित होने वाले अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटकों में इब्नबतूता का नाम भी उल्लेखनीय है। इब्नबतूता का वास्तविक नाम ‘अबू अब्दुल्ला महमूद’ था। इब्नबतूता उसके कुल का नाम था, हालाँकि वह इसी नाम से मशहूर हुआ। इब्नबतूता ने अपने यात्रा वृत्तांत में भारतीय संस्कृति के कई महत्त्वपूर्ण पक्षों को उजागर किया है। भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों में ह्वेनसांग, इत्सिंग और फाह्यन का नाम भी विशिष्ट क्रम में रखा जाता है। इनमें से फाह्यन ने अपनी सम्पूर्ण युवावस्था भारत के साँस्कृतिक एवं प्राकृतिक सौंदर्य के अध्ययन व अवलोकन में लगा दी। बाद में उसने अपने यात्रा वृत्तांत को 40 पर्वों में प्रकाशित किया।
भारतीय संस्कृति एवं पर्यटन का यह प्राचीन क्रम आज भी चिर नवीन है। आज के दौर में भी न केवल भारत को बल्कि समूची विश्व-सभ्यता को इसकी आवश्यकता है। हाँ जरूरत बस इतनी है कि भारतीय संस्कृति का युगानुरूप प्रस्तुतीकरण हो। वर्तमान समय के राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय प्रश्नों के अनुरूप इसमें नए शोध-अनुसंधान किए जाएँ। इसके अध्ययन-अध्यापन की नयी परम्परा सुविकसित हो। साथ ही भारत के साँस्कृतिक ज्ञान के विस्तार एवं प्राकृतिक सौंदर्य के निखार के लिए नया पर्यटन प्रबन्धन विकसित किया जाय। इस क्रम में आध्यात्मिक पर्यटन को सर्वथा नया रूप देने की जरूरत है। जिससे कि प्राचीन ऋषियों की शिक्षण व संस्कार परम्परा फिर से अपना ओजस् अर्जित कर सके।
नालन्दा-तक्षशिला एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालय की प्राचीन परम्परा में शान्तिकुञ्ज द्वारा नव स्थापित देव संस्कृति विश्वविद्यालय ने इसे पूरा करने का ऋषि संकल्प लिया है। इस क्रम में यहाँ सत्र 2003-2004 में ‘भारतीय संस्कृति एवं पर्यटन प्रबन्धन’ का सर्वथा नवीन पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया है। इस पोस्ट ग्रेजुएट (एम.ए.) पाठ्यक्रम की अनेकों विशेषताएँ हैं। इसमें एक ओर जहाँ भारतीय संस्कृति के प्राचीन गौरव का समग्र बोध है, वहीं वर्तमान युग में इसके अनगिनत प्रयोगों का आयोजन है। पर्यटन प्रबन्धन के अंतर्गत तीर्थ परम्परा को नवप्राण देने के साथ भारत के प्राकृतिक गौरव को विश्व पटल पर लाने का सार्थक आयोजन किया जाएगा। वे छात्र-छात्राएँ सौभाग्यशाली होंगे, जिनकी इस पाठ्यक्रम में भागीदारी बनेगी। क्योंकि यही भविष्य में भारत भूमि के संस्कृति दूत की सार्थक भूमिका निभा सकेंगे।
“दूसरों का सहयोग, प्यार हमें नहीं मिला। भाग्य ने साथ नहीं दिया” जैसी शिकायतें करने वालों को लियोनार्दो ने पूरी तरह झुठला दिया। उसके जीवन का प्रारंभ घोर अभावों के बीच हुआ, पर उसने हर विषय को गहराई से सोचने और हर कार्य में पूरी तत्परता बरतने की नीति अपनाकर अनेक विषयों की प्रतिभा अर्जित की। उसकी उत्कंठा और चेष्टा को देखकर अनेकों सहयोगी रास्ता चलते मिल गए और प्रतिकूलताएं अपना स्वरूप बदलकर अनुकूलताओं में बदलती गई।
नीरोग और बलिष्ठ शरीर का स्वामी, महान मूर्तिकार, चित्रकार, साहित्यकार, कवि, दार्शनिक, गणितज्ञ, संगीतज्ञ, वैज्ञानिक, मिस्त्री, युद्ध कला विशेषज्ञ, विद्वान, वक्ता और सुसंस्कृत व्यक्तित्व का धनी जैसा लियोनार्दो था, उसकी तुलना में बहुमुखी प्रतिभा का धनी इतिहास में दूसरा नहीं दिख पड़ता।
वह इटली के फलोरेन्स नगर में एक निर्धन परिवार में जन्मा था। माता दो वर्ष को छोड़कर मर गई थी, फिर भी उसने अपना निर्माण और मार्गदर्शन स्वयं किया और यह सिद्ध करके दिखाया कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।
नवरात्रि शक्ति साधना का पर्व है। वैसे तो माता का प्रेम अपनी संतान पर सदा ही बरसता रहता है, पर कभी-कभी यह प्रेम छलक पड़ता है, तब वह अपनी संतान को सीने से लगाकर अपने प्यार का अहसास कराती है। संरक्षण का आश्वासन देती है। नवरात्रि की समयावधि भी आद्यशक्ति की स्नेहाभिव्यक्ति का ऐसा ही विशिष्ट काल है। यही शक्ति विश्व के कण-कण में विद्यमान है। इसी तथ्य को इंगित करते हुए कहा गया है-
तेजोयस्य विराजते स बलवान स्थूले बुकः प्रत्ययः। - देवी भागवत्
अर्थात्- शक्ति व तेज से प्रत्येक स्थूल पदार्थ में विद्यमान अतुलित बलशाली परमेश्वरी हमारी रक्षा और विकास करे।
वर्षा अपने साथ-साथ हरियाली की छटा लेकर आता है। ग्रीष्म की तपती दोपहरी में वृक्षों की छाया मन को कितना सुकून पहुँचाती है। पर कितने लोग वृक्षों की हरियाली को बनाये रखने में योगदान देते हैं। मनुष्य की दुर्बुद्धि तो क्षणिक लाभ के लिए छाया देने वाली वृक्ष को भी जड़ से काटने पर जुटी हुई है। यही व्यवहार हम उस आद्यशक्ति जगन्माता के साथ कर रहे हैं। परिणाम में हमें उनके प्यार-दुलार के बदले उनका प्रलयंकारी विध्वंस देखने को मिल रहा है। जब पुत्र बार-बार समझाने पर भी नहीं मानता तो माता को अपना रौद्र रूप दिखाने के लिए विवश होना ही पड़ता है। आद्यशक्ति जगन्माता भी इन दिनों हमें बार-बार चेतावनी दे रही हैं कि अब आत्मसुधार एवं सत्कर्म के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है।
उस परम शक्ति की आशा एवं अपेक्षा के अनुरूप स्वयं को गढ़े बिना हमारा त्राण संभव नहीं है। यह पृथ्वी सदाचार पर ही टिकी हुई है। न्याय को अनदेखा नहीं किया जा सकता। सारा विश्व गणित के समीकरण जैसा है, इसे चाहे जैसा उलटो-पलटो, वह अपना संतुलन बनाए रखता है।
मनुष्य पर दैवी और आसुरी दोनों ही चेतनाओं का प्रभाव है, वह जिस ओर उन्मुख होगा वैसा ही उसका स्वरूप बनता जाएगा। जड़ता एवं माया में लिप्त होते चलने पर वह अधोगति का अधिकारी होता है और पाप, पतन और नर्क की दुर्गति में गिर जाता है। परन्तु यदि वह अपनी मूल प्रकृति सदाचार का निर्वाह करे तो बंधन से मुक्ति निश्चित है। फिर उसे पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होती। आवश्यकता अपना सही स्वरूप जानने भर की है।
इसके लिए प्रयास करने का सबसे उपयुक्त समय यही है। शास्त्रकारों से लेकर ऋषि-मनीषियों सभी ने एकमत होकर शारदीय नवरात्रि की महिमा का गुणगान किया है। सामान्यतः गायत्री परिवार से जुड़ा प्रत्येक साधक इस समयावधि में गायत्री महामंत्र के 24 हजार का लघु अनुष्ठान अवश्य ही करता है। अनुष्ठान की विधि-व्यवस्था से भी परिजन अपरिचित नहीं हैं। वैसे इसे गायत्री महाविज्ञान के प्रथम भाग से पढ़कर भी जाना जा सकता है। जप के लिए गायत्री महामंत्र से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। इसे गुरुमंत्र भी कहा गया है। यह महामंत्र बाह्य परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के साथ-साथ अन्तः चेतना के परिष्कार के लिए भी सर्वश्रेष्ठ है। वेदों में सन्निहित ज्ञान-विज्ञान का सारा वैभव बीज रूप में इन थोड़े से अक्षरों में विद्यमान है। साधना का परिणाम सिद्धि है। यह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें गायत्री महामंत्र के जप को प्रथम स्थान दिया गया है।
इस बार हमारी साधना बाह्य जड़ता को दूर करने तक ही सीमित न हो। हम अपनी आँतरिक जड़ता को मिटाने का प्रयास करें। व्यर्थ के ईर्ष्या, द्वेष, प्रपंच में निमग्न मन की गतिविधियों को ‘स्व’ की ओर उन्मुख करें। क्योंकि जो जड़ पदार्थों से अधिक प्रेम करेगा, उसे उनका स्वामित्व, संग्रह, उपभोग भी उतना ही उच्चतर लगेगा। मोह और अहंकार के पाश में वे उतनी ही दृढ़ता से बंधेंगे। निर्जीव जड़ पदार्थों से जड़ता ही बढ़ेगी।
नवरात्रि के पावन पर्व पर देवता अनुदान-वरदान देने के लिए स्वयं लालायित रहते हैं। ऐसे दुर्लभ समय का उपयोग हम जड़ता में अनुरक्त होकर न बिताएँ, चेतना के करीब जाएँ। ईश्वर चेतन है इसीलिए उसका अंश जीव भी चैतन्य स्वरूप है। साथ ही उसमें वे सब विशेषताएँ मौजूद हैं, जो उसके मूल उद्गम परमात्मा में है। वह अपने उद्गम केन्द्र का सत्गुण अपने में गहराई तक धारण किए हुए है। जब भी वह चेतना अशक्त या अस्त-व्यस्त होती है तो शरीर का ढाँचा भी लड़खड़ाने लगता है। यदि सच्ची जिज्ञासा का सहारा लिया जाय, तो इस सत्य को अनुभव भी किया जा सकता है। दैवी अनुशासन के अनुरूप जो अपनी जीवनचर्या का निर्धारण करने में सक्षम होता है वही इस सत्य का साक्षात्कार कर पाता है। इस यात्रा में स्वयं से कठोर संघर्ष करना पड़ता है, पर आत्मबल सम्पन्न साधक लक्ष्य तक पहुँच ही जाते हैं।
मनुष्य का जीवन प्रतिक्षण गतिशील है, वह जो कुछ है वह नहीं रहता है। उसे जितना भी हो सके आगे बढ़ना है। अपनी वर्तमान परिधि से निकलकर अधिक विस्तृत सीमाओं में प्रवेश करना है। एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाना है। एक स्तर से चलकर दूसरे स्तर तक पहुँचना है। अपने चेतन होने का प्रमाण देना है। उसे इस महापुरुषार्थ को कर दिखाना होगा कि सुरदुर्लभ मानव जीवन तृष्णा एवं वासनाओं की वेदी पर चढ़ा देने के लिए नहीं है, वरन् उच्च आदर्शों की पवित्र वेदिका पर उत्सर्ग कर देने के लिए है। यदि संकल्पपूर्ण पुरुषार्थ एवं लगन हो तो कोई कारण नहीं कि हम अपनी वर्तमान स्थिति से आगे बढ़कर श्रेय प्राप्त न कर सकें।
नवरात्रि की बेला शक्ति आराधना की बेला है। माता के विशेष अनुदानों से लाभान्वित होने की बेला है। अपनी साधना तपस्या द्वारा हम स्वयं ही अपने बाह्य एवं अंतर को साफ-सुथरा कर लें। अन्यथा जगन्माता को यह कार्य बलपूर्वक करना पड़ेगा। हम चाहें या न चाहें परिवर्तन तो होना ही है, सृष्टि की संचालिनी शक्ति इस विश्व-वसुन्धरा के कल्याण के लिए कटिबद्ध है। आत्मसुधार कर हम भी उसके उद्देश्य में सहयोगी बनें, यही इस नवरात्रि का संदेश है।
पति पत्नी में अनबन हो गई। एक दूसरे को कटु शब्द बोले गए। मनों को चोट पहुँची और बोलचाल बंद हो गई।
उनका एक सात वर्षीय बालक था। वह कहीं से गीत के बोल सुन आया, “मुख से कड़ुवे बोल न बोल।” बच्चे को रुचा, वह उसे पिता के कमरे में बैठकर गुनगुनाने लगा।
पिता का उस पर ध्यान गया तो चौंके, मन में खीझे, “क्या मैं ही कड़ुवा बोलता हूँ?” बच्चे से बोले, “बेटा जा, अपनी माँ के कमरे में जाकर गा।”
भोला बालक वही गीत माँ के कमरे में जाकर गाने लगा। माँ ने सुना तो उसे खीझ भी आई, हंसी भी। वह भी बोली, “जा अपने पिताजी के पास बैठकर गा।”
बालक फिर पिताजी के कमरे में जाकर गाने लगा तो डाँट पड़ गई। बेचारा क्या करता? दोनों कमरों के बीच बरामदे में बैठकर गाने लगा, ‘मुख से कड़ुवे बोल न बोल।’ आवाज सुनकर माता पिता दोनों अपने अपने कमरे से निकले बच्चे को रोकने, पर एक दूसरे को देखकर चुप रह गए।
बालक ने दोनों को देखा, भाव पढ़े और बोला, “आप दोनों को यह गाना अच्छा नहीं लगता तो अलग बैठकर गा रहा हूँ, अब आपको क्या शिकायत है?”
पति पत्नी ने एक दूसरे को देखा, अपनी भूल पर हंसी आ गई। दोनों बालक के पास गए, बोले, “अच्छा भाई, हमें भी अच्छा लगता है। अब हमारे सामने ही गा लो।”
क्वाथ-चिकित्सा द्वारा सामान्य से लेकर कष्टसाध्य एवं कई बार असाध्य समझे जाने वाले जटिल रोगों तक का उपचार किया जा सकता हैं पिछले अंक में वातरोग नाशक एवं उच्चरक्तचाप नाशक क्वाथ का वर्णन किया जा चुका है। यहाँ इससे आगे की चर्चा करते हैं।
(3) अनिद्रानाशक क्वाथ
अनिद्रा या नींद न आना-जिसे चिकित्साविज्ञानी ‘स्लीपलेसनेस या इंसोम्निया’ कहते हैं, व्यक्ति के स्वयं के खान-पान, चिंतन-मनन एवं आचार-व्यवहार की देन है। अपर्याप्त नींद या अनिद्रा के कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता तो घटती ही है, साथ-ही-साथ इसके अनेकानेक दुष्प्रभाव भी शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर स्पष्ट परिलक्षित होने लगते हैं। इससे त्रस्त व्यक्ति नींद लाने वाली गोलियों, नशीली दवाओं आदि का सहारा लेने लगता है। रोग का मूल कारण हटाए- मिटाए बिना व्याधि मिटती नहीं, वरन् नए एवं परिवर्तित रूपों में उभरती रहती है।
यों तो अनिद्रा के कई कारण हो सकते हैं-जैसे सोते समय वर्तमान या भविष्य के ताने-बाने बुनते रहना, भूतकाल की बातों में उलझे रहना या उन्हें मन से न निकाल पाना, सिर दर्द या अंग दर्द, बुरे विचारों से घिरे रहने, अजीर्ण, हृदय रोग, श्वास रोग, शोथ, ज्वर, दुःस्वप्न आदि के कारण भी कभी-कभी नींद नहीं आती और व्यक्ति करवटें बदलता रहता है। मानसिक चिंता, तनाव, भय, क्रोध आदि के कारण मन अशाँत बना रहता है और अत्यधिक बेचैनी की अनुभूति होती है।
अनिद्रा रोग के ये सभी कारण प्रायः अस्थाई होते हैं। रोग का शमन होते ही नींद आने लगती है और व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है, किंतु हाइपरटेंसन अर्थात् उच्चरक्तचाप के कारण उत्पन्न अनिद्रा रोग सर्वाधिक कष्टकारी होता है। निद्राकारक दवाइयों की भरमार करते रहने से सुखकर नींद तो नहीं आती, हाँ रोगी व्यक्ति नशा-सेवन की तरह अर्द्धप्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है। ऐसी स्थिति में ‘अनिद्रा नाशक क्वाथ ‘ का सेवन बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुआ है। पथ्य-परहेज के साथ इस क्वाथ का नित्य-नियमित रूप से सेवन करने से न केवल अनिद्रा रोग दूर होता है, वरन् उसके कारण में मूल उच्चरक्तचाप आदि व्याधियाँ भी नियंत्रित एवं शमित होती हैं।
‘अनिद्रानाशक क्वाथ ‘ में निम्नलिखित औषधियां मिलाई जाती हैं-
(1) ब्राह्मी-1 चम्मच (पाँच ग्राम-चाय का चम्मच) (2) शंखपुष्पी-1 चम्मच (3)विजया-1 चम्मच (4) खुरासानी अजवायन- चौथाई 1/4 चम्मच (5) जटामांसी-10 ग्राम से 30 ग्राम तक (6) सर्पगंधा-1/2 चम्मच (7) हरड़- 1 चम्मच (8)अश्वगंधा-(1/4) चम्मच (9) गिलोय-1 चम्मच (10) पुनर्नवा-1 चम्मच (11) अर्जुन-1 चम्मच (12) वरुण-1/2 चम्मच।
इन सभी 12 घटक द्रव्यों को अपनी आवश्यकता के अनुरूप उनके गुणनक्रम में लेकर उनका सम्मिलित जौकुट पाउडर तैयार कर लेते हैं और एक स्वच्छ डिब्बे में सुरक्षित रख लेते हैं। क्वाथ बनाते समय सम्मिलित पाउडर में से 5-6 चम्मच (30 ग्राम) पाउडर लेकर शाम को आधा लीटर पानी में भिगो देते हैं और सुबह मंद आँच पर क्वाथ बनाते हैं। चौथाई अंश शेष रहने पर क्वाथ को ठंडा करके साफ-सुथरे कपड़े से छान लेते हैं। तैयार क्वाथ की आधी मात्रा सुबह एवं आधी मात्रा शाम को सेवन करते हैं। अनिद्रा रोग में पथ्य-परहेज का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए, विशेषकर उच्चरक्तचाप जन्य अनिद्रा में। रात के वक्त तली-भुनी एवं पचने में भारी चीजें नहीं खानी चाहिए। रात का भोजन सदैव हलका ही लेना चाहिए। भोजनोपराँत ‘महाशंखबटी‘ की दो गोली सुबह एवं दो गोली शाम को जल के साथ सेवन करना चाहिए। अनिद्रा रोग को दूर करने का सबसे सरल उपाय है- ध्यान एवं मानसिक जप। बिस्तर पर लेटते ही ‘शवासन मुद्रा’ में पड़कर शरीर और मन को ढीला छोड़ देना चाहिए और अपने इष्टदेव का ध्यान करते हुए गायत्री महामंत्र या महामृत्युँजय मंत्र का मानसिक जप करते हुए रोम-रोम में नींद का आह्वान करते हुए सुखकर नींद लेने का उपक्रम करना चाहिए।
4. मलेरिया बुखार नाशक क्वाथ
मलेरिया बुखार के कई प्रकार होते हैं। उन सभी, में यह क्वाथ अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुआ है। इसमें निम्नलिखित औषधियां मिलाई जाती हैं-
(कालमेघ-1 ग्राम (2) चिरायता-10 ग्राम (3) सायतरा (शाहतरा)-10 ग्राम (4) पद्माख-5 ग्राम (5) लालचंदन-5 ग्राम (6) गिलोय-1 ग्राम (7) कालीमिर्च-15 दाने (8) अजवायन-1 ग्राम (9) छोटी हरड़-10 ग्राम (10) लौंग- 5 नग (11) खुबकला-10 ग्राम (12) तुलसी पत्र-15 पत्ते (13) सफेद फिटकरी का फूला (तवे पर भुनी हुई फिटकरी)- 5 ग्राम (14) आर्टीमीसिया-10 ग्राम (15) नीम पत्र-10 ग्राम (16) कुटकी-5 ग्राम (17) भुई आँवला-10 ग्राम (18) पटोल पत्र -10 ग्राम (19) नागरमोथा-10 ग्राम (20) कुटज छाल-10 ग्राम (21) करंज-10 ग्राम (22) आक पत्र-2 ग्राम।
उक्त सभी 22 चीजों का जौकुट पाउडर तैयार करके उन्हें मिलाकर एक डिब्बे में रख लेना चाहिए। उसमें से प्रतिदिन 4-5 चम्मच (25 ग्राम) पाउडर लेकर रात्रि में आधा लीटर पानी में भिगो देना चाहिए और सुबह मंद आँच पर क्वाथ बनाना चाहिए। जब क्वाथ पकते-पकते चौथाई अंश शेष रह जाए तो उतारकर ठंडा होने पर स्वच्छ कपड़े से छान लेना चाहिए। इसे दो भागों में विभक्त कर आधा क्वाथ सुबह और आधा क्वाथ शाम को पीना चाहिए।
यह देखा गया है कि क्वाथ पीने के साथ ही साथ उपर्युक्त जौकुट पाउडर का बारीक पिसा हुआ चूर्ण एक चम्मच सुबह एवं एक चम्मच पाउडर शाम को जल के साथ लेते रहा जाए तो अधिक लाभ होता है और बुखार जल्दी ठीक होता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि खाने वाला पाउडर अधिक बारीक होना चाहिए। इसके लिए उपर्युक्त 22 चीजों से बने जौकुट पाउडर को घोट-पीसकर अधिक महीन कर लेते हैं और कपड़े से छानकर सूक्ष्म चूर्ण तैयार करते हैं। इसी चूर्ण को 1-1 चम्मच खाने के लिए कहा गया है। मलेरिया बुखार में एक और प्रयोग अत्यंत लाभकारी पाया गया है।
मलेरिया बुखार आने से पहले हरारत या कंपकंपी महसूस होती है। उसी समय यदि आधा बूंद आक (अर्क) का दूध एक चम्मच घी या मक्खन में रखकर ले लिया जाए तो यह ‘एंटीडोट’ का काम करता है। अर्थात् मलेरिया के परजीवी विषाणुओं द्वारा उत्पन्न विषाक्तता को आक का दूध शमन करता है। आक का दूध लेने से यदि किसी प्रकार की तकलीफ या हानि मालूम पड़े तो 1-2 चम्मच घी या शक्कर मिला हुआ एक पाव दूध पीना चाहिए। इससे गरमी नहीं लगेगी। दूध या घी सदैव बुखार आने से पहले पीना चाहिए। बुखार चढ़ने के बाद दूध नहीं लेना चाहिए।
(5) शीतरोग नाशक क्वाथ
यह क्वाथ क्राँनिक या एलर्जिक ब्रोन्काइटिस में अत्यंत लाभकारी पाया गया है। इसमें निम्नलिखित चीजें मिलाई जाती हैं।-
(1) रुदंती-1 चम्मच (2) रुद्रवंती-1 चम्मच (3) वासा-1 चम्मच (4) कंटकारी-1 चम्मच (5) भारंगी-1 चम्मच (6) तेजपत्र-1 चम्मच (7) मुलहठी-1/2 (आधा) चम्मच (8) त्रिकटु-(पिप्पली, सुँठी, काली मिर्च समभाग में ) (9) पित्तपापड़ा-1 चम्मच (10) नौसादर-एक चुटकी (11) दसमूल-1 चम्मच (12) पिप्पली पंचाँग-1 चम्मच (13) तालीस पत्र-1/2 (आधा) चम्मच (14) चित्रक-1 चम्मच (15) तुलसी-1/2 (आधा) चम्मच (16) गुलबनफ्शा-1 चम्मच (17) अलीस-1 चुटकी।
इन सभी 17 चीजों को निर्धारित मात्रा में लेकर उनका सम्मिलित जौकुट पाउडर तैयार कर लेते हैं और प्रतिदिन 4-5 चम्मच पाउडर के क्वाथ से पुराना शीत रोग एवं एलर्जीजन्य ब्रोन्काइटिस रोग ठीक हो जाता है।
(5) ब्रोन्कियल अस्थमा (दमा) अर्थात् श्वास-कास नाशक क्वाथ
ब्रोन्कियल अस्थमा-श्वास-कास एवं दमा रोग से छुटकारा दिलाने में यह क्वाथ सर्वोत्तम लाभकारी पाया गया है। इसमें निम्नलिखित औषधियां मिलाई जाती हैं-
(1) सोमलता-2 चम्मच (2) अतीस-क्रत्ती (3) नौसादर-1/2 (आधी) चुटकी (4) बेलमूल की छाल-1 चम्मच (5) काकड़ासिंगी-1 चम्मच (6) पिप्पलामूल-1/2 (आधा) चम्मच (7) कंटकारी-2 चम्मच (8) भारंगी-2 चम्मच (9) मुलहठी- 2 चम्मच (10) त्रिकटु-2 चम्मच (11) वासामूल-1 चम्मच (12) रुदंती फल-2 ग्राम (13) रुद्रवंती-1 चम्मच (14) गुलनबनफ्शा-1 चम्मच (15) गाजवाँ-1 चम्मच (16) रास्ना-1 चम्मच।
उपर्युक्त सभी 16 चीजों को अलग-अलग कूट-पीसकर उनका जौकुट पाउडर तैयार कर लेते हैं और फिर उन्हें मिश्रित करके एक डिब्बे में रख लेते हैं। काढ़ा बनाते समय इसी सम्मिलित पाउडर में से 4-5 चम्मच (20-25 ग्राम) पाउडर लेकर आधा लीटर पानी में क्वाथ बनाते और सुबह-शाम रोगी व्यक्ति को सेवन कराते हैं। खाँसी, दमा, एलर्जिक ब्रोन्काइटिस आदि जीर्ण रोगों में निरंतर पथ्य-परहेज के साथ इस क्वाथ का सेवन करने से रोग समूल नष्ट हो जाता है और व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है।
शिष्य संजीवनी का सेवन (मनन-चिन्तन) जिन्होंने भी किया है- वे इसके औषधीय गुणों को अनुभव करने लगे हैं। अपने व्यक्तित्व में उन्हें नए परिवर्तन का अहसास हो रहा है। कुछ ऐसा लग रहा है- जैसे अन्तःकरण में कहीं शिष्यत्व की मुरझाई-कुम्हलायी बेल फिर से हरी होने लगी है। निष्क्रिय पड़े भक्ति एवं समर्पण के तत्त्वों को सक्रियता का नया उछाह मिल गया है। आन्तरिक जीवन में भावान्तर की अनुभूति उन सबको है- जो इस अमृत औषधि को ले रहे हैं। इन सभी की अनुभूतियों में निखरा हुआ शिष्यत्व बड़ा ही स्पष्ट है। हालाँकि इन अनुभूतियों में उनकी जिज्ञासाएँ भी घुली-मिली हैं। इन जिज्ञासाओं का सार एक ही है कि शिष्य संजीवनी की सेवन विधि क्या है?
इस सार्थक प्रश्न के समाधान में शिष्यत्व की साधना करने वाले अपने स्वजनों से यही कहना है- कि प्रथम बार शिष्य संजीवनी की कथा को उसी भाँति पढ़ें, जैसे इस पत्रिका के अन्य लेखों को पढ़ते हैं। दूसरी बार इसमें बताए गए सूत्र पर गहरा चिन्तन करें और उसे अपने जीवन में आत्मसात करने के लिए संकल्पित हों। इसके बीच-बीच में शिष्य संजीवनी के प्रकाश में अपने को परखते रहें कि हम अपनी शिष्यत्व साधना में कहाँ तक खरे उतर रहे हैं। दृढ़ निष्ठ एवं श्रद्धा सिक्त समर्पण ही इस महासाधना का सम्बल है।
जिन्होंने अपने अन्तर्जीवन में यह पूँजी जुटा ली है- उनके लिए शिष्य संजीवनी का दूसरा सूत्र है- “जीवन की तृष्णा और सुख प्राप्ति की चाहत को दूर करो। किन्तु जो महत्त्वाकाँक्षी हैं उन्हीं की भाँति कठोर श्रम करो। जिन्हें जीवन की तृष्णा है, उन्हीं की भाँति सभी के जीवन का सम्मान करो। जो सुख के लिए जीवन यापन करते हैं, उन्हीं की भाँति सुखी रहो। अपने हृदय के भीतर पनपने वाले पाप के अंकुर को ढूंढ़कर, उसे बाहर निकाल फेंको। यह अंकुर श्रद्धालु शिष्य के हृदय में भी यदा-कदा उसी तरह पनपने लगता है जैसे की वासना भरे मानव हृदय में। केवल महावीर साधन ही उसे नष्ट कर डालने में सफल होते हैं। जो दुर्बल हैं, वे तो उसके बढ़ने-पनपने के साथ भी नष्ट हो जाते हैं।”
यह अनुभव सभी महान् शिष्यों का है। शिष्य के जीवन में तृष्णा और सुख की लालसा की कोई जगह नहीं है। मजे की बात है कि तृष्णा और सुख की लालसा किसी को भी सुखी नहीं कर पाती, हालाँकि प्रायः सभी इसमें फँसे-उलझे रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए जीवन आज में नहीं है, आने वाले कल में है। भविष्य में जीवन को खोजने वाले अपने वर्तमान से हमेशा असन्तुष्ट, असंतृप्त बने रहते हैं। इस सच्चाई का एक पहलू और भी है, जो तृष्णा और सुख की लालसा से अपने आप को जितना भरता जाता है- वह उतना ही अपने अहंकार को तुष्ट और पुष्ट करता रहता है। जबकि अहंकार का शिष्यत्व की साधना से कोई मेल नहीं है।
शिष्यत्व तो समर्पण की साधना है- जिसका एक ही अर्थ है- अहंकार का अपने सद्गुरु के चरणों में विसर्जन। हालाँकि इस समर्पण-विसर्जन के साथ भी कई तरह के भ्रम जनमानस में व्याप्त हैं। कई लोगों का सोचना है कि जब हमने समर्पण कर दिया- तब हम फिर कुछ काम क्योँ करें? जब तृष्णा नहीं सुख की लालसा नहीं तब फिर मेहनत किसलिए? ये सवाल दरअसल भ्रमित मन की उपज है। जो जानकार हैं, समझदार हैं वे जानते हैं कि समर्पण और श्रद्धा का मतलब-निकम्मापन या निठल्ले बैठे रहना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है- सत्य के लिए, अपने गुरुदेव के लिए स्वयं को सम्पूर्ण रूप से झोंक देना। इस सम्बन्ध में रमण महर्षि कहा करते थे- यह कैसी उलटबाँसी है कि मिट्टी की खोज में आदमी सब कुछ लगा देता है- पर अमृत की खोज में कुछ भी नहीं लगाना चाहता। जबकि शिष्य तो वही है- जो गुरु के एक इशारे पर जीवन पर्यन्त अटूट और अथक श्रम करता रहे।
केवल शिष्य ही जीवन का सच्चा ज्ञाता होता है, इसलिए उसे जीवन की महान् सम्भावनाओं को उजागर करने में तत्पर रहना चाहिए। यह तभी सम्भव है कि जब उसके मन में अपने और सभी के जीवन का सम्मान हो।साथ ही वह सुख के लिए इधर-उधर भटके नहीं बल्कि अपने कर्त्तव्य पालन में सुख की अनुभूति करे। भगवान् बुद्ध का कथन है कि इस संसार में सुखी वही है, जिसने सुख की वासना छोड़ दी है। वास्तविक दुख तो वासनाओं का है। जो जितना ज्यादा वासनाओं, कामनाओं एवं लालसाओं से भरा है, वह उतना ही ज्यादा दुःखी है। वासनाओं और लालसाओं के छूटते ही अन्तश्चेतना में शान्ति और सुख की बाढ़ आ जाती है। सब तरफ से सुख ही सुख बरसता है। समूची प्रकृति हर पल मन-अन्तःकरण को सुख से भिगोती रहती है।
समर्पण, श्रमशीलता के साथ शिष्य को हर पल जागरुक भी रहना जरूरी है। उसे हमेशा सजग रहना पड़ता है कि कहीं कोई दुर्विचार, कोई बुरा भाव तो उसके अन्तःकरण में नहीं पनप रहा। कोई पाप तो उसकी अन्तर्चेतना में नहीं अंकुरित हो रहा। यद्यपि श्रद्धालु शिष्य में इसकी सम्भावना कम है, परन्तु वातावरण का कुप्रभाव कभी भी किसी पर भी हावी हो सकता है। इस समस्या का समाधान सूत्र एक ही है- अपने प्रति कठोरता, दूसरों के प्रति उदारता। औरों के प्रति हमेशा प्रेमपूर्ण व्यवहार करने वाले साधक को अपने प्रति हमेशा ही कठोर रहना पड़ता है। हमेशा ही अपने बारे में सावधानी बरतनी पड़ती है।
अंतरमन में वर्षों के, जन्मों के संस्कार हैं। इनमें भलाई भी मौजूद है और बुराई भी। प्रकृति ने परत-दर-परत इनकी बड़ी रहस्यमय व्यवस्था बना रखी है। ऊपरी तौर पर इसे जानना-पहचानना-समझना आसान नहीं है। बड़ी मुश्किल पड़ती है इस गुत्थी को सुलझाने में। जो बहुत ही ध्यान परायण है, जिनका अपने गुरु के प्रति समर्पण सच्चा और गहरा है, वही इनके जाल से बच पाते हैं। अन्यथा अचानक और औचक ही इसमें फँस कर अपना और अपनी साधना का सत्यानाश कर लेते हैं।
पौराणिक साहित्य में ऐसे कई कथानक हैं, जिन्हें पढ़ने से पता चलता है कि बहुत ही समर्थ साधक वर्षों की निरन्तर साधना के बावजूद एक दिन अचानक अपना और अपनी साधना का सत्यानाश करा बैठे। महर्षि वाल्मीकि रामायण के आदिकाण्ड में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की कथा कुछ ऐसी ही है। त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग भेजने वाले विश्वामित्र को अपनी साधना में कई बार स्खलित होना पड़ा। ऐसा केवल इसलिए हुआ, क्योंकि उन्होंने अपने ऊपर सजग दृष्टि नहीं रखी। शिष्य का पहला और अनिवार्य कर्त्तव्य है कि वह अपने गुरुदेव के आदर्श को सदा अपने सम्मुख रखे।
गुरु चेतना के प्रकाश में हमेशा स्वयं को परखता रहे कि कहीं कोई लालसा, वासना तो नहीं पनप रही। कहीं कोई चाहत तो नहीं उमग रही। यदि ऐसा है तो वह अपनी मनःस्थिति को कठिन तप करके बदल डाले। उन परिस्थितियों से स्वयं को दूर कर ले। क्योंकि पाप का छोटा सा अंकुर, अग्नि की चिंगारी की तरह है- जिससे देखते-देखते समस्त तप साधना भस्म हो सकती है। इसलिए शिष्यों के लिए महान् साधकों का यही निर्देश है कि जीवन की तृष्णा एवं सुख की चाहत से सदा दूर रहें। इस सूत्र को अपनाने पर ही शिष्य संजीवनी का अगला सूत्र इसी कथा में अगली बार प्रकट होगा। जिसके द्वारा शिष्यत्व की साधना के नए वातायन खुलेंगे, नए आयाम विकसित होंगे।
उन दिनों इटली और आस्ट्रिया के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। जीतने की धुन में आगे बढ़ने और शत्रु सैनिकों को मारने का जुनून दोनों पक्षों पर सवार था, पर मृतकों की और घायलों की देखभाल की, किसी पक्ष को चिंता न रहती थी। उन्हें दयनीय दुर्दशा में पड़े रहना पड़ता था।
इस समस्या पर जेनेवा बैंक के एक कर्मचारी जीन हैनरी डूमा ने भावनापूर्ण मनःस्थिति से विचार किया और तात्कालिक उपाय सोचा। उन्होंने नौकरी छोड़ दी। फ्राँसीसी डालजीरिया में एक फार्म खरीदा और दोनों पक्षों से संपर्क साधकर इस बात पर सहमत किया कि घायलों की चिकित्सा और मृतकों की अन्त्येष्टि की सुविधा उन्हें दी जाए। इस प्रयास का नाम रखा गया, ‘रैडक्रास’। उसका आरंभ तो छोटे रूप में हुआ, पर आएदिन होने वाले युद्धों में उसकी उपयोगिता बहुत बढ़ गई। अनेक देशों की सरकारों ने इसमें सहयोग किया। एक आचार संहिता बनी कि युद्ध क्षेत्र में घायलों को उठाने के लिए जाने वाले रैडक्रास वाहनों को कोई रोकेगा नहीं। रैडक्रास की आज बहुत ही समुन्नत स्थिति है। इसका श्रेय डूमा को है, जिन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला।
अन्तर्यात्रा के विज्ञान पर चिन्तन, मनन एवं निदिध्यासन करते हुए हजारों-हजार योग साधक अपनी अन्तर्यात्रा के लिए चल पड़े हैं। यह यात्रा उन्हें नित-नयी रोचक, रोमाँचक एवं रहस्यमयी अनुभूतियों के वरदान दे रही है। हर बढ़ते पग पर उन्हें अहसास हो रहा है कि दिव्यलोक में तपोलीन महर्षि पतंजलि की सूक्ष्म चेतना उनके साथ है। और परम पूज्य गुरुदेव हर पल उनका हाथ थामे हैं। युगाचार्य स्वामी विवेकानन्द ने अलीपुर जेल की काल-कोठरी में महर्षि अरविन्द को अतिमानस का बोध कराया था। इस सत्य से योग साधकों का समुदाय भली प्रकार सुपरिचित है। इन दिनों यह ऐतिहासिक सच कुछ निष्ठावान योग साधकों के जीवन में फिर से दुहराया जा रहा है। अपने साधना कक्ष में उन्हें युग ऋषि गुरुदेव के साधना संदेश एवं महर्षि पतंजलि के दिव्य संकेत मिलते हैं।
जिन्हें यह दिव्य अनुदान मिल रहे हैं- वे पुलकित एवं गदगद हैं। जो अभी इस सीढ़ी तक नहीं पहुँच पाये हैं- पल-पल उन्हें अपना आत्मावलोकन व आत्मावलोचन करना चाहिए। अपनी निष्ठ एवं समर्पण भावना को परखना चाहिए। अपने वैराग्य को बार-बार उस कसौटी पर खरा साबित करना चाहिए, जिसे महर्षि ने अपने सूत्र में परिभाषित किया है। साधकों को स्मरण होगा कि इस योग कथा की पिछली कड़ी में इसकी विवेचना की गयी थी। इसमें बताया गया था कि वैराग्य ‘निराकाँक्षा की वशीकार संज्ञा’ नाम की पहली अवस्था है। इसका मतलब है ऐन्द्रिक सुखों की तृष्णा में सचेतन प्रयास द्वारा भोगासक्ति की समाप्ति। परन्तु यह केवल साधन वैराग्य है। सिद्ध वैराग्य इसकी अगली और चरमावस्था है।
यह सिद्ध वैराग्य क्या है? इस जिज्ञासा के उत्तर में महर्षि कहते हैं-
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्॥ 1/16॥
शब्दार्थ- पुरुषख्यातेः= पुरुष के ज्ञान से; गुणवैतृष्ण्यम्= जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का अभाव हो जाना है; तत्= वह; परम्= पर वैराग्य है।
अर्थात्- यह पर वैराग्य निराकाँक्षा की अन्तिम अवस्था है- पुरुष के परम आत्मा के अन्तरतम स्वभाव को जानने के कारण समस्त इच्छाओं का विलीन हो जाना।
वैराग्य की यह अवस्था अतिदुर्लभ है। परमात्मा में अन्तश्चेतना के विलीन हो जाने पर यह अपने आप ही प्रकट हो जाती है। इसीलिए इसे पर वैराग्य कहते हैं। सिद्ध महापुरुषों की यह स्वाभाविक दशा होने के कारण इसे सिद्ध वैराग्य भी कहा जाता है। यह समस्त साधनाओं का फल है, जो सिद्ध योगियों को सहज सुलभ रहता है। अन्तर्चेतना प्रभु में विलीन होने के कारण विषयों के प्रति, भोगों के प्रति न गति होती है, न रुचि और न ही रुझान। यह प्रभुलीन भावदशा की सहज अभिव्यक्ति है। प्रभु प्रीति की सहज रीति है यह।
यह अवस्था कैसे मिले? इस परम सिद्धि का भाव चेतना में किस भाँति अवतरण हो? योग साधकों की जिज्ञासाओं का एक ही उत्तर है, प्रभु प्रेम। जिनमें भगवान् की भक्ति है, प्रभु चरणों में अनुरक्ति है, उन्हें यह सिद्धि अपने आप ही मिल जाती है। भक्ति के अलावा अन्य जो भी साधना मार्ग है- उन पर चलकर इस सिद्ध वैराग्य के दर्शन हो तो सकते हैं पर बड़ी कठिनाई से। यह भी सम्भव है कि इन राहों पर साधकों को कई बार अटकना या रुकना पड़े। और हो सकता है सब कुछ करके भी सिद्ध वैराग्य तक न भी पहुँचा जा सके।
इस सम्बन्ध में परम पूज्य गुरुदेव के श्री मुख से निकले आप्त वचन मानसिक चेतना में उस दिन की भाँति ही प्रखरता से प्रदीप्त है। जब उन्होंने वैराग्य के मर्म को समझाते हुए कहा था- बेटा! मीरा, तुलसी, सूर, रैदास आदि भक्तों को यह अपने आप ही सुलभ हो जाता है। प्रभु स्मरण, प्रभु चिन्तन और प्रभु प्रेम में भीगा हुआ मन जब एक बार उनके चरणों में विलीन हो जाता है- तो किसे याद रह जाते हैं विषय भोग। कहाँ याद रह पाती है- इन्द्रिय विलास की बातें। सब कुछ साँप की केंचुल की तरह उतर जाता है। पेड़ से सूखे पत्ते की भाँति झड़ जाता है।
इस बारे में गुरुदेव प्रायः नारद मोह की कथा सुनाया करते थे। देवर्षि नारद पहले महान् ज्ञानी योग साधक थे। उनकी योग साधना अति प्रखर थी। विवेक उनमें पूर्णतया प्रज्वलित था। अपनी साधना की प्रचण्ड अविरामता में उन्होंने हिमालय में समाधि लगा ली। उनकी योग साधना का तेज ऐसा बढ़ा की देव शक्तियाँ परेशान हो गयी। देवलोक वासियों ने उन्हें डिगाने के लिए भाँति-भाँति के मायाजाल रचे। एक के बाद एक नए तरीके अपनाए, पर कोई कामयाबी न मिली। अन्तिम अस्त्र के रूप में उन्होंने कामदेव को सम्पूर्ण सेना के साथ भेजा। काम की सारी कलाएँ, अप्सराओं की सारी नृत्य लीलाएँ देवर्षि नारद के वैराग्य के सामने पराजित हो गयी। अन्ततः उन सबने देवर्षि से क्षमा याचना की और वापस अपने लोक चले गए।
काम को पराजित करने वाले अपने महान् वैराग्य से नारद को गर्व हो गया। अपनी काम विजय की कथा उन्होंने शिव, ब्रह्म एवं विष्णु को सुना डाली। सर्वेश्वर ने उनके गर्वहरण के लिए लीला रची। जिन नारद के वैराग्य का प्रभाव कुछ ऐसा था कि - ‘काम कला कछु मुनिहि न व्यापी। निज भय डरेउ मनोभव पापी॥’ अर्थात् काम की कोई भी कला मुनिवर को नहीं व्यापी और वह कामदेव अपने पाप से डर गया। वही नारद कुछ ऐसे हो गए कि- ‘जप तप कुछु न होई तेहि काला। हे विधि मिलहि कवन विधि बाला॥’ अर्थात् उनसे उस समय कुछ भी जप-तप नहीं बन पड़ा। बस वे यही सोचने लगे कि हे विधाता किस तरह मेरा विवाह इस कन्या से हो जाय।
यह कथा सुनाते हुए गुरुदेव ने कहा था सब कुछ होने पर भी जब तक अहं का भगवान् में समर्पण, विसर्जन, विलय नहीं होता, तब तक कभी वैराग्य सिद्ध नहीं होता। भक्तिमार्ग में पहले ही कदम पर अहं का बलिदान करना पड़ता है। इसीलिए भक्त को अपने आप ही सिद्ध वैराग्य मिल जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भक्ति की महिमा की अरण्यकाण्ड में बड़ी ही सुन्दर चर्चा की है। नारद की जिज्ञासा के उत्तर में भगवान् कहते हैं-
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुह का काम क्रोध रिपु आही॥ यह विचारि पंडित मोहि भजहीं। पायहु ज्ञान भगति नहि तजहीं॥
भक्त को मेरा बल (भगवान् का बल) रहता है और ज्ञानी को अपने बल (स्व विवेक) का सहारा रहता है। काम क्रोध दोनों के ही शत्रु हैं। यह सोचकर विद्वज्जन मेरी भक्ति करते हैं। ज्ञान मिलने पर भी इसका त्याग नहीं करते। गुरुदेव कहते थे कि भक्त में वैराग्य की परम भावदशा प्रकट होती है। उसके लिए विराग (वैराग्य) आराध्य के प्रति वि+राग यानि कि विशिष्ट राग बन जाता है। श्री रामकृष्ण देव इस प्रसंग पर कहा करते थे कि एक बार उनके प्रति प्रेम जग जाय तो फिर रम्भा-तिलोत्तमा जैसी रूपसी अप्सराएँ चिता भस्म जैसी त्याज्य लगने लगती हैं। भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने भी यही सत्य कहा है-
विषयाः विर्निवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसोवर्ज रसोऽप्स्य परं दृष्ट्व निर्वतते॥
यानि कि विषय भोग तो उसके भी छूट जाते हैं, जो इन्द्रिय से विषयों को नहीं ग्रहण कर रहा है। पर रस तो प्रभु दर्शन के बाद ही छूटता है। यह परं दृष्ट्वा स्थिति ही पर वैराग्य है। जो प्रभु भक्ति से सहज प्राप्त है। इस वैराग्य में ही समाधान की समाधि है। इसके स्वरूप की व्याख्या महर्षि के अगले सूत्र में है। जिसे साधक गण अगले अंक में पढ़ेंगे।
दिल्ली का बादशाह मुहम्मद तुगलक विद्वान भी था और उदार भी। प्रजा के लिए कई उपयोगी काम भी उसने किया, किंतु दो दुर्गुण उसमें ऐसे थे, जिनके कारण वह बदनाम भी हुआ और दुर्गति का शिकार भी। एक तो वह अहंकारी था, किसी का उपयोगी सलाह भी अपनी बात के आगे स्वीकार न करता था। दूसरा जल्दबाज इतना कि जो मन में आए उसे तुरंत कर गुजरने के लिए आतुर हो उठता था।
उसी सनक में उसने नई राजधानी दौलताबाद बनाई और बन चुकने पर कठिनाइयों को देखते हुए रद्द कर दिया। एक बार बिना चिह्न के ताँबे के सिक्के चलाए। लोगों ने नकली बना लिए और अर्थ-व्यवस्था बिगड़ गई। फिर निर्णय किया कि ताँबे के सिक्के खजाने में जमा करके चाँदी के सिक्कों में बदल लें। लोग इस कारण सारा सरकारी कोष खाली कर गए। एक बार चौगुना टैक्स बढ़ा लिया। लोग उसका राज्य छोड़कर अन्यत्र भाग गए।
विद्वत्ता और उदारता जितनी सराहनीय है, उतनी ही अहंकारिता और जल्दबाजी हानिकर भी, यह लोगों ने तुगलक के क्रियाकलापों से प्रत्यक्ष देखा। उसका शासन सर्वथा असफल रहा।
गुरुगीता के महामन्त्रों में अध्यात्मविद्या के गूढ़तम रहस्य संजोये हैं। योग, तन्त्र एवं वेदान्त आदि सभी तरह की साधनाओं का सार इनमें है। महाकठिन साधनाएँ इन महामंत्रों के आश्रय में अति सुगम हो जाती हैं। ऐसा होते हुए भी सभी लोग इस सत्य को समझ नहीं पाते हैं। जिनके पास गुरुभक्ति से मिली दिव्य दृष्टि है, उन्हीं की अन्तश्चेतना में यह तत्त्व उजागर होता है। गुरुदेव भगवान् के प्रति श्रद्धा अति गहन हो तो फिर साधक को इस बात की प्रत्यक्ष अनुभूति हो जाती है कि विश्व-ब्रह्मांड में यदि कहीं कुछ भी है तो वह अपने गुरुदेव में है। इन्हीं के आश्रय में सभी तरह की साधनाएँ सिद्धिदायी होती हैं।
गुरु श्रद्धा की तत्त्व कथा की पिछली कड़ी में परम पूज्य गुरुदेव के इसी अन्तःसत्य की अनुभूति कराने की चेष्टा की गयी थी। इसमें यह ज्ञान कराया गया था कि गुरुदेव साकार होते हुए भी निराकार हैं। वे परात्पर प्रभु त्रिगुणमय कलेवर को धारण करके भी सर्वथा गुणातीत हैं। अपने वास्तविक रूप में निर्गुण व निराकार गुरुदेव की महिमा अनन्त हैं। वे ही सदाशिव सर्वव्यापी विष्णु एवं सृष्टिकर्त्ता ब्रह्म हैं। ऐसे दयामय गुरुदेव को प्रणाम करने से जीवों को संसार से मुक्ति मिलती है। इस सत्य को विरले विवेकवान ही समझ पाते हैं। विवेक न होने पर यह सच्चाई प्रकट होते हुए भी समझ में नहीं आती। परम कृपालु सद्गुरु के चरण जिस दिशा में विराजते हैं, उधर भक्तिपूर्वक प्रणाम करने से शिष्य का सर्वविध कल्याण होता है।
गुरुदेव भगवान् के महिमामय स्वरूप के अन्य रहस्यमय आयामों को प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव आदिमाता जगदम्बा से कहते हैं-
तस्यै दिशे सततमञ्जलिरेष आर्ये प्रक्षिप्यते मुखरितो मधुपैर्बुधैश्च। जागर्ति यत्र भगवान् गुरुचक्रवर्ती विश्वोदयप्रलयनाटकनित्यसाक्षी॥ 51॥
श्रीनाथादिगुरुत्रयं गणपतिं पीठत्रयं भैरवं सिद्धौघं बटुकत्रयं पदयुगं दूतीक्रमं मण्डलम्। विरान् द्वयष्ट-चतुष्क-षष्टि-नवकं-वीरावलीपञ्चकं श्रीमन्मालिनिमंत्रराजसहितं वन्दे गुरोर्मण्डलम्॥ 52॥
गुरुतत्त्व के रहस्य को प्रकट करने वाले इन महामंत्रों में अनेक तरह की साधनाओं के रहस्यों का गूढ़ संकेतों में वर्णन है। भगवान् भोलेनाथ की वाणी शिष्यों के समक्ष इस रहस्य को प्रकट करती है, कि गुरुदेव भगवान् में साधना, साध्य एवं सिद्धि के सारे मर्म समाए हैं। गुरुदेव सृष्टि में चल रहे उत्पत्ति एवं प्रलय रूप नाटक के नित्य साक्षी हैं। वे ही सम्पूर्ण सृष्टि के चक्रवर्ती स्वामी हैं। ऐसे गुरुदेव भगवान् जिस दिशा में भी विराज रहे हों, उसी दिशा में विद्वान् शिष्य को मन्त्रोच्चार पूर्वक सुगन्धित पुष्पों की अञ्जलि समर्पित करनी चाहिए॥ 51॥
श्री गुरुदेव ही परमगुरु एवं परात्पर गुरु हैं। उनमें तीनों नाथ गुरु आदिनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ एवं गोरक्षनाथ समाये हैं। उन्हीं में भगवान् गणपति का वास है। उन परम प्रभु में तंत्र साधना के तीनों रहस्य मयपीठ-कामरूप, पूर्णागिरि एवं जालंधर पीठ स्थित हैं। मन्मथ आदि अष्ट भैरव, सभी महासिद्धों के समूह, तंत्र साधना में सर्वोच्च कहा जाने वाला विरंचि चक्र उन्हीं में है। स्कन्दादि बटुकत्रय, योन्याम्बादि दूतीमण्डल, अग्निमण्डल, सूर्यमण्डल, सोममण्डल आदि मण्डल, प्रकाश व विमर्श के युगल पद के रहस्य उन्हीं में हैं। दशवीर, चौसठ योगिनियाँ, नवमुद्राएँ, पंचवीर तथा अ से क्ष तक सभी मातृकाएँ एवं मालिनीयंत्र गुरुदेव के चेतनामण्डल में ही स्थित हैं। सभी तत्त्वों से युक्त गुरु मण्डल को मेरा बारम्बार प्रणाम है।
गुरुगीता में बताया गया यह सत्य किसी भी तरह से बुद्धिगम्य नहीं है। बुद्धिपरायण, तर्कशील लोग इसे समझ नहीं सकते। किन्तु? क्यों? और कैसे? के प्रश्न कुहासे से इसे अनुभव नहीं किया जा सकता। इसे वही जान सकते हैं, समझ सकते हैं और आत्मसात कर सकते हैं- जो साधना की डगर पर काफी दूर तक चल चुके हैं। ऐसे साधना परायण जनों के लिए ही यह गुरुदेव की महिमा नित्य अनुभव की वस्तु बन जाती है। महान् अघोर संत बाबा कीनाराम के साधना अनुभव से इस बात को बहुत ही स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। सिद्धों के, सन्तों के बीच बाबा कीनाराम का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। बाबा कीनाराम का ज्यादातर समय काशी में बीता। वह अघोर तंत्र के महान् सिद्ध थे। उनके चमत्कारों, अति प्राकृतिक रहस्यों के बारे में ढेरों किंवदंतियाँ कही-सुनी जाती हैं।
बाबा कीनाराम उत्तरप्रदेश-राज्य के गाजीपुर के रहने वाले थे। उनमें जन्म-जन्मान्तर के साधना संस्कार थे। विवेकसार ग्रन्थ में उनकी जीवनकथा विस्तार से वर्णित है। इसमें लिखा है कि जब वह जूनागढ़ के परम सिद्धपीठ गिरनार गए तो उन्हें स्वयं भगवान् दत्तात्रेय ने दर्शन दिए। और उन्होंने कीनाराम को एक कुबड़ी देते हुए कहा- जहाँ यह कुबड़ी तुमसे कोई ले ले, वहीं तुम स्थायी रूप से रहना तथा उन्हीं को अपना अघोर गुरु बनाना। इसी के साथ भगवान् दत्तात्रेय ने उन्हें गुरुगीता में वर्णित उपरोक्त महामंत्रों के रहस्य को समझाते हुए उनको गुरु महिमा के बारे में बताया।
कीनाराम जब काशी पहुँचे तो वहाँ हरिश्चन्द्र घाट पर बाबा कालूराम से उनकी भेंट हुई। पहली भेंट में कालूराम ने उनकी तरह-तरह से अनेकों परीक्षाएँ लीं। बड़ी कठिन और रहस्यमयी परीक्षाओं के बाद वह उन्हें अपना शिष्य बनाने के लिए तैयार हो गए। शिष्य बनने के बाद तंत्र साधना का एक परम दुर्लभ एवं अति रहस्यमय अनुष्ठान किया जाना था। इस अनुष्ठान के लिए कई तरह की सामग्री आवश्यक थी। जिन्हें साधना का थोड़ा सा भी ज्ञान है- वे जानते हैं कि तंत्र साधना में उपयोग की जाने वाली सामग्री कितनी दुर्लभ हुआ करती है। प्रश्न था- कहाँ से और कैसे लायी जाय। तंत्र अनुष्ठान की इस शृंखला में अनेक देवों, योगिनियों को संतुष्ट करना था। एक साथ यह सब कैसे हो?
इन प्रश्नों ने बाबा कीनाराम को आकुल कर दिया। शिष्य की चिन्ता से शिष्य वत्सल बाबा कालूराम द्रवित हो उठे। उन्होंने कहा- चिन्ता किस बात की रे! मैं हूँ न, तू मेरी ओर देख, मुझ में देख! उनके इस तरह कहने पर बाबा कीनाराम ने अपने गुरु की ओर देखा। आश्चर्य! परमाश्चर्य!! तंत्र साधना की सभी अधिष्ठात्री देव शक्तियाँ महासिद्ध कालूराम में विद्यमान थीं। सभी तंत्रपीठ उनमें समाहित थे। सद्गुरु चेतना में तंत्र साधना के समस्त तत्त्व दिखाई दे रहे थे। शिष्यवत्सल बाबा कालूराम की यह अद्भुत कृपा देखकर कीनाराम भक्ति विह्वल हो गए। और ‘गुरुकृपा ही केवलम्’ कहते हुए उनके चरणों में गिर पड़े। अपने सद्गुरु के पूजन से ही उन्हें तंत्र की समस्त शक्तियाँ, सारी सिद्धियाँ मिल गयीं। गुरु कृपा ने उन्हें अघोरतंत्र का महासिद्ध बना दिया। सद्गुरु पूजन में सबका यजन है। सभी शिष्य साधक इस साधना रहस्य को भलीप्रकार जान लें। अगले अंक में सद्गुरु चेतना के नए आध्यात्मिक रहस्य प्रकट होंगे।
एक राजा जंगल में भटक गया। प्यास से आकुल व्याकुल होकर वह इधर उधर घूमने लगा। उसे एक झोंपड़ी दिखाई दी। वह वहाँ पहुँचा। वहाँ एक बूढ़ा आदमी बैठा था। पास ही ईख का खेत था। राजा ने पानी माँगा। बूढ़े ने दो चार ईख तोड़े, कोल्हू में उन्हें पेरा, रस से एक कटोरा भर गया। राजा ने वह पिया और उसका मन पुलकित हो गया। उसने बूढ़े से पूछा, “क्या ईख पर कर भी लगता है?” बूढ़े ने कहा, “हमारा राजा दयालु है। वह भला हमसे क्या कर लेगा?” राजा ने मन ही मन सोचा, “ऐसी मीठी चीज पर अवश्य कर लगना चाहिए।” मन में संकल्प विकल्प उठने लगे। आखिर ‘कर’ लगाने का निश्चय कर लिया। राजा ने चलते चलते बूढ़े से कहा, “एक प्याला रस और पिलाओ।” बूढ़े ने फिर दो चार ईख तोड़े। उन्हें कोल्हू में पेरा, पर रस से कटोरा नहीं भरा, यह क्यों?” बूढ़ा दूरदर्शी था। उसने कहा, “लगता है मेरे राजा की नीयत बिगड़ गई, अन्यथा ऐसा नहीं होता!” राजा मन ही मन पछताने लगा।
राजा की नीयत का इतना असर होता है, तो क्या धर्माध्यक्षों, राजनेताओं अधिकारियों एवं गणमान्य व्यक्तियों के आचरण का प्रभाव समाज पर नहीं पड़ता?
(गताँक से आगे)
विगत अंक (अगस्त 23) में आपने परमपूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से जाना कि क्रियायोग एवं भावयोग का अपना महत्त्व है। भजन तो सभी करते हैं, पर वास्तविकता को न समझ पाने के कारण व्यर्थ की मृगमरीचिका में उलझकर रह जाते हैं। अध्यात्म का मर्म बताते हुए गुरुवर कहते हैं कि जब तक भावना नहीं होगी, किसी कर्मकाँड में प्राण नहीं होगा। भावनाएँ कैसे परिष्कृत हों, इसी तथ्य को इस अंक में पढ़ें।
साथियो! अध्यात्म के बारे में यदि आप भावनाओं को परिष्कृत करने की बात समझ जाएँ तो मैं समझ लूँगा कि पचास फीसदी मंजिल आपने पूरी कर ली और आपको अध्यात्मिकता का लाभ उठाने का मौका मिल गया। अगर आपको यह भारी मालूम पड़ता है, कठिन मालूम पड़ता है तो आप अपने पैर इसमें न डालिए। इसमें बड़ा झगड़ा है। साहब! हमें क्या पता था कि इसमें बड़ा झगड़ा है। हमने तो समझा था कि हनुमान चालीसा पढ़ने से हनुमान जी खुश हो जाते हैं, पर अब तो वे खुश नहीं होंगे। हाँ बेटे ? पाँच पैसे का तूने हनुमान चालीसा खरीद लिया और तीन घंटे जप कर लिया, अब जो गलती हो गई सो हो गई, अब अपने पैर पीछे ले जा। सारी जिंदगी भर हनुमान चालीसा पढ़ने से तेरा कोई फायदा नहीं हो सकता। अगर हनुमान जी से फायदा उठाना चाहता है तो कर्मकाँडों के साथ-साथ भावनाओं का समन्वय कर। जिस दिन यह बात तेरी समझ में आ जाएगी, बस समझना चाहिए कि रास्ता खुल गया। तेरे लिए द्वार खुल गया है।
गीता और रामायण का शिक्षण
मित्रो! तब तो आप समझ गए होंगे कि वास्तविकता क्या है ? गीता रामायण जिसका हम यहाँ से प्रचार करते हैं, उसका हम यहाँ पर विद्यालय बनाने वाले हैं। गीता और रामायण को हम नियमित रूप से पढ़ाएँगे और हमारा विश्वास है कि रामचरित और कृष्णचरित के माध्यम से हम व्यक्ति और समाज दोनों की समस्याओं का समाधान करने में समर्थ होंगे। व्यक्ति को कैसा होना चाहिए ? व्यक्ति जीवन का परिष्कार कैसे होना चाहिए। यह हम रामायण के द्वारा लोगों को सिखा देंगे, यह हमें पूरा विश्वास है। रामायण में वे सारी-की-सारी चीजें विद्यमान हैं, जो व्यक्ति और परिवार दोनों को ठीक और समन्वित बना सकती हैं। इसलिए हम रामायण का उपयोग करेंगे,। भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और कृष्ण पूर्ण पुरुष हैं। सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने के लिए मनुष्य की नीतियाँ क्या होनी चाहिए ? समाज के साथ में अपनी डीलिंग करने के लिए, लोकव्यवहार के लिए, समाज की कुरीतियों का समाधान करने के लिए जो शिक्षाएँ हमें कृष्णचरित से मिलती हैं, रामचंद्र जी से नहीं मिलतीं। वे एकाँगी हैं। पिताजी ने वनवास दे दिया । अरे साहब ! पिताजी ने निकाल दिया तो चलो जंगल में। पिताजी गलती करते हैं तो करते हैं, हमको तो गलती नहीं करनी चाहिए। हम तो पिताजी की आज्ञा मानकर जाएँगे। उनका जीवन एकाँगी है ? किनका ? राम का। ठीक है कि प्रजा के हित का ध्यान रखना चाहिए, प्रजा का कहना मानना चाहिए, लेकिन सीताजी के साथ क्यों अन्याय करना चाहिए ? यह एकाँगी जीवन है। एकाँगी जीवन में राम ने मर्यादाओं का पालन किया।
पूर्णपुरुष श्रीकृष्ण
कृष्ण? कृष्ण को हम पूर्ण पुरुष कहते हैं। पूर्ण पुरुष क्यों ? क्योंकि उनके जीवन में इन सारी बातों का समन्वय है। जहाँ उन्होंने त्याग की जरूरत समझी है, सेवा की जरूरत समझी है, दान देने की जरूरत समझी है, सबको दान देते चले गए हैं। उन्होंने निस्पृह योगी की तरह जीवन जिया और जहाँ उन्होंने जरूरत समझी है, वहाँ चालाक के साथ चालाकी, बेईमान के साथ बेईमानी और झूठ के साथ झूठ की भूमिका निभाई है। भगवान श्रीकृष्ण पूर्ण व्यक्ति हैं, पूर्ण पुरुष हैं। मित्रो! दोनों ग्रंथों के माध्यम से अब हम समाज को नए रूप से उठाने के लिए तैयार हो गए हैं, प्रतिबद्ध हो गए हैं। हम लोगों को रामचरित पढ़ाएँगे, जो उन्होंने अब तक पढ़ा ही नहीं। अब हम ‘हरे रामा, हरे कृष्णा ‘ का आँदोलन नए ढंग से चलाएँगे। हम लोगों को यह बताएँगे कि ताली बजाने से, खंजरी बजाने से, करताल बजाने से और उदक-फुदक मचाने से राम का नहीं हो सकता। ‘हरे रामा हरे कृष्णा के पीछे जो एक प्रेरणा है, जो एक दिशा है, जो भावना है, जो चेतना है, जो आग उसके पीछे जल रही है, उससे हमें गरम होना पड़ेगा। इसलिए हम रामचरित और कृष्णचरित के माध्यम से अब खड़े हुए हैं। रामचरित और कृष्णचरित के बारे में जिन पुस्तकों का हमने चयन किया है, उसके बारे में मैं एक बार चुपचाप विचार करने लगा कि अरे भाई ये किसकी किताबें हैं, गीता लड़ाई-झगड़े की किताब है ? धत् तेरे की! वहाँ एक ओर “द्यौ शाँति ......की किताबें पढ़ने चले हो और अब दूसरी ओर लड़ाई-झगड़े की किताब लेकर चल दिए लोगों को पढ़ाने। अरे रामचंद्र के जीवन में सब लड़ाई-झगड़ा भरा पड़ा है । विश्वामित्र उनको अपने यहाँ ले गए और उन्होंने ताड़का को मारा, सुबाहु को मारा, मारीचि को मारा, खरदूषण को मारा, मेघनाद को मारा, कुँभकर्ण को मारा और रावण को मारा। मारकाट-मारकाट सब तरफ मारकाट मची हुई है। धत् तेरे की! ये कौन-सी किताब ले आये गुरुजी? आप तो पहले शाँति की किताब ले आए थे, पर अब तो आप अशाँति की किताब लाए हैं। शाँतिकुँज में अशाँति की किताब! बेटे, तो मैं क्या कर सकता हूँ! हमारे ऋषियों ने यही बताया था कि रामचंद्र जी का जीवन ऐसे पढ़ना चाहिए।
गीता का मर्म
मित्रों! जब श्रीकृष्ण भगवान की किताब पढ़ो तो यह पाया कि भई! यह क्या चक्कर है? ये सब क्या गड़बड़ हो गया है? अर्जुन बेचारा तो कह रहा था कि हम तो चाय की कैन्टीन चलाएँगे और गुजारा करेंगे और चना-चिरवा बेचेंगे और पच्चीस रुपये रोज कमाएँगे। बहुत से आदमी होटल चलाते हैं। हम भी अपने बच्चों का पाजन कर लेंगे। आप हमें लड़ाई-झगड़े में क्यों फँसाते हैं? इस पर श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को खूब गालियाँ सुनाईं और कहा, ‘तू क्जीव है, नपुँसक है, तू ऐसा है, तू वैसा है, हजार गालियाँ सुनाईं और हजार खुशामदें भी कीं। कहा मरने के बाद चारों ओर तेरा सुयश गूँजेगा। उन्होंने कहा- “हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥”
कैसी-कैसी चालाकियाँ, कैसी-कैसी बातें कीं तू जीता तो राजा बन जाएगा और मारा गया तो मोक्ष मिलेगा। कैसी-कैसी बातें बताईं और जब नहीं माना, तो कहने लगे कि तू कायर है, नपुँसक है, उल्लू है, बेवकूफ है। चल-लड़ाई कर, मर। जब अर्जुन का विवेक जगा, तब उसने कहा, “करिष्ये वचनं तव” जैसा आप कहेंगे, वैसा हम मानेंगे और करेंगे।
अरे बाबा! ये किसकी किताब है? बेटे ये लड़ाई की किताब है, झगड़े की किताब है, मार-काट की किताब है, हत्याखोरी की किताब है, खून बहाने की किताब है। तो महाराज जी। आप शाँतिकुँज में खून-खराबे की किताब काहे को लिए फिरते हैं? बेटे, इस बात की जरूरत थी। फिर मैं इस बात पर विचार करने लगा कि क्या गीता की किताब मुझे पढ़नी चाहिए थी और लोगों को पढ़ानी या बतानी चाहिए थी?
हम तो क्षत्रिय हैं
क्या बात बतानी चाहिए थी? आप कौन हैं? हम तो साहब! यदुवंशी राजपूत हैं। तो आप में कोई ब्राह्मण भी है क्या? नहीं साहब! ब्राह्मण तो नहीं है। अच्छा तो कोई बनिया होगा, कोई पोरवाल होगा, अग्रवाल होगा, खंडेलवाल होगा आप में से कोई? नहीं साहब! हम कोई खंडेलवाल नहीं, हममें से कोई अग्रवाल नहीं। तो आप में से कोई पंडित जी हो सकते हैं, कोई गौड़, कान्यकुब्ज, सनाढ्य, सारस्वत तो होंगे ही। नहीं महाराज जी। हम यह भी नहीं हैं। हम तो क्षत्रिय हैं। राम और कृष्ण दोनों के दोनों, जिनका चरित्र हम आपको पढ़ाने वाले हैं, जिनकी शिक्षाएँ हम आपको देने वाले हैं और जिनके हम अनुयायी बनाने वाले हैं और आपको जिनका अनुचर बनाने वाले हैं, वे कौन हो सकते हैं? वे बहादुर हो सकते हैं। क्षत्रिय से मतलब हमारा जाति-बिरादरी से नहीं हैं। जाति-बिरादरी का मैं कायल नहीं हूँ। आप हमारे चौके में रोटी खाते हैं। मैंने कब पूछा आपसे कि आप बनिया हैं कि शूद्र हैं कि राजपूत कौन हैं आप? आप इन्सान हैं और भगवान के भक्त हैं और गायत्री के उपासक हैं। इतना परिचय मेरे लिए काफी हैं।
मित्रों! गायत्री तपोभूमि में जब मैंने हजार कुँडीय यज्ञ किया था तो एक बार पंडों से झगड़ा हो गया। पंडों ने कहा कि इनके चेलों को भड़काना चाहिए और कहना चाहिए कि ये तो ब्राह्मण नहीं हैं। तो कौन हैं? बढ़ई हैं। बढ़ई कौन होता है? वो जो लकड़ी का धंधा करता है। ये वही हैं और अब बामन बन गए हैं। लोगों ने मुझसे पूछा-क्यों साहब! आप तो बढ़ई हैं? नहीं बेटा, तुझसे समझने में गलती हुई है। तो कौन हैं आप? आपकी बिरादरी क्या हैं?
हम तो धोबी और भंगी हैं
कोई मुझसे जब मेरी अच्छी बिरादरी जानना चाहता है तो हम कहते है कि धोबी हैं और जब खराब बिरादरी जानना चाहता है तो कहते हैं कि हम भंगी हैं। तो गुरुजी! आप धोबी और भंगी कैसे हैं? बेटे, धोबी ऐसे हैं कि मैं कपड़े धोना चाहता हूँ और भंगी ऐसे हैं कि टट्टियाँ साफ करना चाहता हूँ। मेरा मकसद एक है- मैं झाडू लेकर अवतरित हुआ हूँ, बुहारी लेकर अवतरित हुआ हूँ। मन मस्तिष्क के भीतर वाले और बाहर वाले हिस्से की सफाई के अतिरिक्त मेरे अवतरण का और कोई मकसद नहीं हैं। मैंने अपने आपकी सफाई एवं औरों की सफाई कराने के लिए कसम खाई है। अपना कपड़ा धोने के लिए तथा दूसरों के कपड़े धोने के लिए मैंने कसम खाई है। इसलिए मुझे धोबी होना चाहिए। अच्छा तो आप ब्राह्मण हैं? बेटे, मैं नहीं कह सकता, क्योंकि ब्राह्मण होने के नाम पर यदि तू मेरी पूजा करता हो तो मत कर। अगर तूने यह समझकर गुरु दीक्षा ली हैं कि मैं पंडित हूँ, ब्राह्मण हूँ, तो बेटे मैं इंकार करता हूँ और अपनी गुरुदीक्षा वापस लेता हूँ और तूने जो सवा रुपया गुरुदक्षिणा दी थी, वह भी तू वापस ले जा। इसलिए जन्म के आधार पर मैं बहस नहीं करता। मैं यह बात कर्म के आधार पर कहता हूँ। मनुष्य जाति के आधार पर नहीं, अपने कर्म के आधार पर ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि बनता है। यही सनातन सत्य है।
अध्यात्म एक प्रकार का समर
मित्रो! कर्म के आधार पर प्रत्येक अध्यात्मवादी को क्षत्रिय होना चाहिए, क्योंकि, “सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्“ अर्थात् इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय ही लड़ते हैं। बेटे, अध्यात्म एक प्रकार की लड़ाई हैं। स्वामी नित्यानंद जी की बंगला की किताब है ‘साधना समर’। ‘साधना समर’ को हमने पढ़ा, बड़े गजब की किताब है। मेरे ख्याल से हिंदी में इसका अनुवाद शायद नहीं हुआ है। उन्होंने इसमें दुर्गा का, चंडी का और गीता का मुकाबला किया है। दुर्गा सप्तशती में सात सौ श्लोक हैं और गीता में भी सात सौ श्लोक हैं। दुर्गा सप्तशती में अठारह अध्याय हैं, गीता के भी अठारह अध्याय हैं। उन्होंने ज्यों-का-त्यों सारे-के सारे दुर्गा पाठ को गीता से मिला दिया है और कहा है कि साधना वास्तव में समर है। समर मतलब लड़ाई, महाभारत। यह महाभारत हैं, यह लंकाकाँड है। इसमें क्या करना पड़ता है? अपने आप से लड़ाई करनी पड़ती है, अपने आपकी पिटाई करनी पड़ती है, अपने आप की धुलाई करनी पड़ती है और अपने आपकी सफाई करनी पड़ती है। अपने आप से सख्ती से पेश आना पड़ता है।
हम बाहर वालों के साथ जितनी भी नरमी कर सकते हैं, वह करें। दूसरों की सहायता कर सकते हैं। उन्हें क्षमा कर सकते हैं, दान दे सकते हैं, उदार हो सकते हैं, दूसरों को सुखी बनाने के लिए जितना भी, जो कुछ भी कर सकते हों, करें। लेकिन आने साथ, अपने साथ हमको हर तरह से कड़क रहना चाहिए। अपनी शारीरिक वृत्तियों और मानसिक वृत्तियों के विरुद्ध हम जल्लाद के तरीके से, कसाई के तरीके से इस तरह से खड़े हो जाएँ कि हम तुमको पीटकर रहेंगे, तुमको मसल कर रहेंगे, तुमको कुचलकर रहेंगे। अपनी इंद्रियों के प्रति हमारी बगावत इस तरह की होनी चाहिए और अपनी मनः स्थिति के विरुद्ध बगावत इस स्तर की होनी चाहिए। हम अपनी मानसिक कमजोरियों को समझें, न केवल समझें, न केवल क्षमा माँगें, वरन् उनको उखाड़ फेंकें। गुरुजी, क्षमा कर दीजिए। बेटे, क्षमा का यहाँ कोई लाभ नहीं, अंग्रेजों के जमाने में जब काँग्रेस का आँदोलन शुरू हुआ था, तब यह प्रचलन था कि माफी मांगिए, फिर छुट्टी पाइए। जब अँग्रेजों ने देखा कि ये तो माफी माँग कर छुट्टी ले जाते हैं फिर दुबारा आ जाते हैं। उन्होंने कहा ऐसा ठीक नहीं है, जमानत लाइए पाँच हजार रुपये की। जो जमानत लाएगा, उसी को हम छोड़ेंगे, नहीं तो नहीं छोड़ेंगे। माफी ऐसे नहीं मिल सकती। फिर पाँच-पाँच हजार की जमानतें शुरू हुईं। जिनको जरूरी काम थे, उन्हें इस तरह की जमानत पर छोड़ देते थे। फिर पाँच हजार की इन्क्वायरी शुरू हुई। उन्हीं सी.आई.डी. ने रिपोर्ट दी कि साहब, ये जमानत पर चले जाते हैं और पाँच हजार से ज्यादा का आपका नुकसान कर देते हैं। फिर उन्होंने जमानतें भी बंद कर दीं।
अपने साथ कड़ाई करिए
मित्रों! भगवान ने भी ऐसा किया है कि माफी देने का रोड-रास्ता बंद कर दिया है किसी को माफी दीजिए गुरुजी! माफी कहाँ है यहाँ, दंड भोग। इसलिए क्या करना पड़ेगा? अपने साथ में कड़ाई करने की जिस दिन आप कसम खाते हैं, जिस दिन आप प्रतिज्ञा करते हैं कि हम अपनी कमजोरियों के प्रति कड़क बनेंगे। अपनी शारीरिक कमजोरियोँ के तई और अपनी मानसिक कमजोरियों के तई कड़क बनेंगे। बेटे, दोनों क्षेत्रों में इतनी कमजोरियों भरी पड़ी है कि इन्होंने हमारा भविष्य चौपट कर डाला, व्यक्तित्व का सत्यानाश कर दिया। आध्यात्म यहाँ से शुरू होता है। यहाँ से भी भगवान को मानने वाली बात शुरू होती है, भगवान का दर्शन शुरू होता हैं अंगार के ऊपर चढ़ी हुई परत को जिस तरह हम साफ कर देते है और वह चमकने लगता है, उसी तरह हमारी आत्मा पर मलीनताओं की जो परत चढ़ी हुई हैं। मलीनताओं की इन परतों को हम धोते हुए चले जाएँ तो भीतर बैठे हुए भगवान का, आत्मा का साक्षात्कार हो सकता है।
मंत्र नहीं, मर्म से जानें
क्यों साहब लक्स साबुन से हम कपड़ा धोएं कि हमाम से धोएँ या सर्फ से धोएँ। बेटे, मेरा दिमाग मत खा। तू चाहे तो सर्फ से धो सकता है, लक्स से-सम्राट से धो सकता है, हमाम से धो सकता है, नमक से, रीठा से धो सकता है। महाराज जी! क्या गायत्री मंत्र से मेरा उद्धार हो जाएगा? चंडी के मंत्र के उद्धार हो जाएगा या हनुमान जी के मंत्र से उद्धार होगा? बेटे, इसमें बस इतना फर्क है जितना कि सर्फ और सनलाइट में फर्क होता है और कोई खास बात नहीं है। हनुमान जी के मंत्र से भी साफ हो सकता है। तू हिंदू है या मुसलमान है तो भी साफ हो सकता है। बस तू ठीक तरीके से इस्तेमाल कर! गुरुजी! गायत्री मंत्र से मुक्ति मिल जाती है या ‘राम रामाय नमः’ से? बेटे अब मैं इससे कहीं आगे चला गया हूँ। अब मैं यह बहस नहीं करता कि गायत्री मंत्र का जप करेंगे तो आपकी मुक्ति होगी और हनुमान जी का जप करेंगे, तो मुक्ति नहीं होगी। बेटे, सब भगवान के नाम हैं साबुन में केवल लेबल का फर्क है, असल में उनका उद्देश्य एक है।
मित्रों! साधना का उद्देश्य एक है कि हमारी भीतर वाली मनः स्थिति की सफाई होनी चाहिए, जो हमारी शरीर की विकृतियों और मानसिक विकृतियों के लिए जिम्मेदार है। हमारी मानसिक और शारीरिक विकृतियाँ ही है, जिन्होंने हमारे और भगवान के बीच में एक दीवार खड़ी की हैं। अगर हम इस दीवार को नहीं हटा सकते, तो हमारे पड़ोस में बैठा हुआ भगवान हमें साक्षात्कार नहीं दे सकता। बेटे, भगवान ओर हम में दीवार का फर्क है, जिससे भगवान हमसे कितनी दरी पर है? गुरुजी! भगवान तो लाखों-करोड़ों कि.मी. दूर रहता है? नहीं बेटे, करोड़ों कि.मी. दूर नहीं रहता। वह हमारे हृदय की धड़कन में रहता है, लपडप के रूप में हमारी साँसों में प्रवेश करता है। हमारी नसों में गंगा-जमुना की तरह से उसी का जीवन प्रवाहित होता है। हमारा प्राण भगवान है और हमारे रोम-रोम में समाया हुआ है। तो दूर कैसे हुआ? दूर ऐसे हो गया कि हमारे और भगवान के बीच में एक दीवार खड़ी हो गई। उस दीवार को गिराने के लिए जिस छैनी-हथौड़े का इस्तेमाल करना पड़ता है, उसका नाम है पूजा और पाठ।
(शेष अगले अंक में)
महायाजक शाल्वनेक का अनायास ही आगमन हुआ। श्रेष्ठि उदयन ने उनका समुचित स्वागत-सत्कार किया। दूसरे दिन ज्ञान-दीक्षा का क्रम चल पड़ा।
महायाजक ने अपनी अनेक संग्रहीत विद्याओं का परिचय देते हुए उदयन से पूछा कि वे जिसमें भी रुचि रखते हों, उसके संबंध में पूछे और प्राप्त करें।
श्रेष्ठि ने पूछा, “क्या ऐसा संभव है, अपने जो-जो जाना है, उन सबके मूल आधार को ही मुझे प्रदान करने का अनुग्रह कर दिया जाए?”
महायाजक असमंजस में पड़े धीरे-धीरे सिर हिला रहे थे। उनकी कठिनाई दूर करने के लिए उदयन ने घर में प्रयुक्त होने वाले अनेकों पात्र, उपकरण, प्रस्तुत कर दिए और फिर पूछा, “देव? इन सबको क्या एक ही रथ में भरकर नहीं ले जाया जा सकता।” शाल्वनेक की आंखें खुल गई। उन्होंने नव-चेतना अनुभव की और कहा, “ऐसा हो सकता है। एक ही आत्मज्ञान के समुद्र में ज्ञान की समस्त सरिताओं का समावेश हो सकता है। मैं अब उसी को उपलब्ध करूंगा और जब प्राप्त कर सकूँगा तो आपको ज्ञान-दीक्षा का साहस करूंगा।”
(कर्म-संन्यास-योग नामक गीता के पाँचवें अध्याय की ड़ड़ड़ड़)
पिछली कड़ी में श्लोक क्रमाँक 26,27,28 की विस्तृत व्याख्या के साथ एक महावाक्य के रूप में 29 वें अंतिम श्लोक की संक्षिप्त टिप्पणी दी गई थी। पाँचवाँ अध्याय इन चारों के माध्यम से पराकाष्ठा पर पहुँचा है। पहले तो यह कहा गया कि काम-क्रोध आदि विकारों से युक्त, संयत चित वाले आत्मज्ञ योगीजन (यती) शरीर छोड़ने से पूर्व व बाद ब्रह्मनिर्वाण की स्थिति को प्राप्त होते हैं अर्थात् परब्रह्म परमात्मा से साक्षात्कार कर पाते है। इसके बाद योगेश्वर श्रीकृष्ण ध्यानयोग की पृष्ठभूमि तैयार करते है। वे 27 वे व 28 वें श्लोक में ध्यान का स्वरूप व उसकी महिमा बताते हैं। वे विधि भी बताते है। कि बाह्य विषयों को कैसे मन से बाहर रखकर, चक्षुओं को भ्रूमध्य मार्ग में स्थित करें एवं प्राण-अपान को समभाव से स्थित रखकर, इच्छा-भय-क्रोध से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त करें। अपने आप से साक्षात्कार का सबसे श्रेष्ठ तरीका है ध्यान। तनाव से मुक्त हो बंधनमुक्ति का पथ प्रशस्त करता है ध्यान। इसके बाद श्रीकृष्ण कहते है कि जब ऐसा साधक मुझ श्रीकृष्ण रूपी भगवान को भी यज्ञों और तपों का भोक्ता, लोकों का महेश्वर तथा सभी प्राणियों का हितैषी, उनके प्रति दयालु, इस रूप में जान लेता है तो वह परमशांति रूपी मुक्ति को प्राप्त होता है। यह महावाक्य है। इसी की विशद व्याख्या व पूरे अध्याय की एक समीक्षा इस समापन कड़ी में है।
महावाक्य एवं उसकी व्याख्या
श्री भगवान इस अंतिम श्लोक में जो कह रहे है वह भलीभाँति समझने योग्य है। दो पंक्तियों में मानों वेदव्यास ने श्रीकृष्ण के सारे प्रतिपादन को समाहित कर दिया है। कर्मयोग की महत्ता बताते-बताते भगवान सारी साधनाओं की सिद्धि का मर्म भी कह जाते है। वह मर्म है-ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को पहचानकर संपूर्ण समर्पण। भगवान को तत्व से जानना। अपने भी यज्ञीय कर्मों एवं तप साधनादि कठोर संयम से पाले गए व्रतों का भोक्ता प्रभु को मानना, स्वयं को नहीं। ईश्वर को स्वार्थरहित, पक्षपात रहित एवं दयालु मानकर उसके प्रति पूरे निष्ठाभाव से समर्पण। वह सुहृदय है, दयालु है, प्रेमी है, यह मानकर निष्काम भाव से अपने सभी कर्म एवं आत्मिक प्रगति के लिए किए गए साधना-उपचार करते चलना। कभी फल की कामना में जल्दबाजी न करना। यह गीता के योग की पराकाष्ठा है, जिसमें प्रभु इस महावाक्य के माध्यम से परमशाँति की मानों कुँजी अर्जुन के माध्यम से हमें सौंप देते है।
भोक्तारं यज्ञतपसाँ सर्वलाकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानाँ ज्ञात्वा माँ शाँतिमृच्छति॥ -5/29
यह जो अंतिम श्लोक है पाँचवें अध्याय का, सभी साधकों के लिए जो कर्म-संन्यासयोग जानना चाहते है, इस प्रकार से सूत्र रूप में की गई समग्र व्याख्या है। कर्मयोग में ज्ञान व भक्ति का स्थान-स्थान पर तालमेल पूर्वक समन्वय एवं जीवन को सर्वांगपूर्ण ढंग से जीने का विज्ञान गीता की विशेषता है। गीता जीवन प्रबंधन की पाठ्य पुस्तिका है एवं स्थान-स्थान पर योगत्रयी को जीवन में समाहित करने का संदेश देती रहती है। मानव की सबसे बड़ी इच्छा इस लोक में शाँति पाने की है। वह परमात्म-तत्व को जाने बिना संभव नहीं। परमात्मा को कर्म से समझकर कर्मयोग का भलीभाँति संपादन कर तथा इस परमपिता परमात्मा को सर्वलोक महेश्वर मानकर सर्वतो भावेन समर्पण-यही वह राजमार्ग है, जिस पर चलकर मनुष्य को शाँति मिल सकती है। तनावमुक्त जीवन, आत्मिक प्रगति का खुले वातायनों से भरा पथ इस प्रक्रिया से सुलभ हो जाता है।
सर्वलोक महेश्वर को अर्पण
चूँकि परमात्मा ही सभी प्रकार के यज्ञों एवं तपों के भोक्ता हैं, इसलिए मुक्ति की कामना रखने वाले सभी साधकों को अपने सभी कर्मों को यज्ञ व तप रूप में करते हुए विराट पुरुष उस महेश्वर को उनके फल को अर्पित कर देना चाहिए। मुक्त पुरुष यदि बंधनों से मुक्त भी हो गया है तो भी उसे लोकसंग्रह हेतु (लोकशिक्षण हेतु) कर्म करते रहना चाहिए अर्थात् भटकों को राह दिखाने, सन्मार्ग के पथ पर चलने का शिक्षण देते रहना चाहिए। छब्बीसवें श्लोक में भगवान ने एक शब्द का प्रयोग किया है-“ अभितो वर्तते”। निर्वाण केवल अंदर ही नहीं, हमारे चारों ओर भी विद्यमान हो। हम उस ब्रह्माचैतन्य में निवास करें। यही बात इस अंतिम श्लोक में बताई है कि वही मुनि है, जिसने अपने अंदर, अपने चारों ओर निर्वाण लाभ प्राप्त कर लिया है, फिर भी वह जीवमात्र के कल्याण में सतत निरत रहता है। जो भगवान के साथ उन्हें तत्व से जानकर एक रूप हो गया, वह मनुष्य मात्र से दिव्य प्रेम कर सकता है। ईश्वर को दयालु, प्रेमी मानने के बाद व्यक्ति उस विराट पुरुष का ही एक अंग बन जाता है एवं एक प्रकार से उनके कर्म को तत्व से जानकर शाँति की पराकाष्ठा को प्राप्त होता है।
अंतिम श्लोक रूपी महावाक्य-आखिरी वचन से जो हम कर्म समझ पाते हैं, वह हमारे जीवन के हर क्षम में उतर जाए तो हम एक सच्चे दिव्यकर्मी बन सकते है। ऐसे महामानव को कर्म करते हुए जो दिव्य शाँति मिलती है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। इस अंतिम श्लोक में जो “सर्वलोकमहेश्वर” शब्द आया है, उसे कई बार हम कर्म रूप में समझ नहीं पाते। इसे समझाते हुए श्री जयदयाल गायंदका जी अपनी तत्ववेचिनी टीका में लिखते हैं कि अपने-अपने ब्रह्माँड का नियंत्रण करने वाले जितने ईश्वर हैं, भगवान उन सभी के स्वामी और महान ईश्वर-परमेश्वर है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् का हवाला देते हुए वे कहते है, “तमीश्वराणाँ परमं महेश्वरम्“ (उन ईश्वरों के भी परम महेश्वर को) पद इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इस रूप में भगवान को मानने वाला भक्त कभी भटकता नहीं। काम-क्रोधादि विकार उसके पास कभी फटकते नहीं। ऐसा भक्त शाँत, निर्विकार एवं सदैव प्रभु के ध्यान में डूबा रहता है।
भगवान को अहैतुक प्रेमी मान लेना व यह विश्वास करना कि वे जो भी कुछ करते है, मेरे मंगल के लिए करते हैं, इस श्लोक की धुरी है। लोग इस तथ्य को समझ नहीं पाते इसीलिए दुखी बने रहते हैं व कभी शाँति को प्राप्त नहीं होते। यदि सर्वशक्तिमान, सर्वनियंता व सर्वदर्शी परमात्मा हमें अपना सुहृद मानता है और हम भी इस तथ्य पर विश्वास कर उसे अपना सखा, प्रेमी, निःस्वार्थ भाव से साथ दे रहा सहयोगी मान लें तो हम अलौकिक आनंद प्राप्त करेंगे एवं अपूर्व शाँति को हस्तगत करेंगे।
भगवान को तीन गुणों से पहचानें
ऊपर तीन बातें बताई गई। भगवान को यज्ञों व तपों का भोक्ता मानना, समस्त लोकों का महेश्वर मानना तथा सभी प्राणियों का सुहृद मानना। यदि इन तीन में से साधक-योगी किसी एक पर भी अडिग रह दृढ़ विश्वास कर ले तो वह परमशाँति को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार एक दिव्यकर्मी वह ही है, जो इन तीनों के अर्थ को भलीभाँति समझकर किसी एक पर या तीनों पर दृढ़ विश्वास रख महापुरुषों के सत्संग, मनन, श्रेष्ठ पुस्तकों के स्वाध्याय द्वारा श्रेष्ठतम कर्म करते हुए अपनी जीवन यात्रा को आगे बढ़ाए। उसका इहलोक-परलोक दानों ही सध जाएंगे।
परमपूज्य गुरुदेव ने अपने जीवनकाल के पूर्वार्द्ध में सबसे पहली पुस्तक लिखी-“मैं क्या हूँ”। वेदाँत दर्शन पर आधारित यह पुस्तक एक आत्मनिवेदन रूप में यह बताती है कि हमारे अंदर विद्यमान आत्मसत्ता में कितनी शक्ति भरी पड़ी है। वह किस विराट सत्ता की अंशधारी है। बाद में पूज्यवर ने काफी पुस्तकें लिखीं, परंतु ‘ईश्वर और उसकी अनुभूति’ ईश्वर कौन है, कहाँ है, कैसा है’ तथा ‘आत्मज्ञानः जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि’ इस विषय पर सर्वोत्तम ग्रंथ हैं। पुस्तकों में वही व्याख्या है जो गीता के पाँचवें अध्याय के डडडडडड इ ख्− वें श्लोक में वर्णित हैं। ईश्वर को जन-समझ लिया तो फिर सारे क्लेशों, बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। परमपूज्य गुरुदेव इस संबंध में ईसा एवं रामकृष्ण परमहंस से संबंधित उस घटना का उल्लेख करते थे, जिसमें कुष्ठग्रस्त रोगी की सेवा ईश्वर मानकर की गई थी। किसी भी प्रकार की जुगुप्सा नहीं, कोई और भाव नहीं। जीवमात्र में जब ईश्वर की झलक दिखाई देती है तो मनुष्य ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का भाव रख प्रधान जीवन जीने लगता है।
पूरे अध्याय का सारामृत
छठवें अध्याय की ओर बढ़ने से पूर्व इस अंतिम महत्वपूर्ण पाँचवें अध्याय के सारामृत को एक बार फिर ग्रहण करने का प्रयास करें, ताकि तेरह माह से चला आ रहा यह स्वाध्याय जड़ जमाकर हमारे अंतस् में बैठ जाए एवं हमारे कर्मों में उतरने लग। इस अध्याय का शुभारम्भ ही अर्जुन की जिज्ञासा से हुआ है। वह भ्रमित हैं उसने चौथे अध्याय में कर्मयोग की महिमा जानी, किन्तु बीच-बीच में श्रीकृष्ण के श्रीमुख से ज्ञानयोग (कर्म संन्यास) की बातें भी ‘ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुहृवति’ (श्लोक 24) के माध्यम से जानीं। श्रीकृष्ण से अर्जुन यह जानना चाहता है कि कौन-सा साधन श्रेष्ठ है-कर्मयोग अथवा ज्ञानयोग।
भगवान ने अर्जुन को यहाँ बताया है कि पूर्णतया कर्मफल का परित्याग कर वह कर्मयोगी, नित्य संन्यासी बने। गीता का उपदेश कर्म त्यागना नहीं है, न ही स्वधर्म त्यागना। कर्म त्याग करके संसार में रहना संभव नहीं है। मनुष्य दिव्यकर्मी बने, न किसी द्वेष करे, न किसी वस्तु की आकाँक्षा रखे। राग-द्वेषादि द्वंद्वों से मुक्त व्यक्ति संन्यासी के ही समान है, यह श्रीकृष्ण का प्रतिपादन है। आगे वे ज्ञानियों व नासमझों में अंतर बताते है। वे कहते है कि पंडितजन (ज्ञानी-अध्यात्म के कर्म को समझने वाले) जानते है कि कर्म-संन्यास एवं कर्मयोग दोनों ही मार्ग एक ही लक्ष्य पर ले जाते है-परमात्मा की ओर। उन्हें पृथक फल देने वाला नहीं मानना चाहिए। दोनों ही मार्ग पर चलकर मनुष्य परमात्मा के परमधाम तक पहुँचता है। आगे वे कहते है कि यदि कोई दिव्यकर्मी कर्म करते हुए जीवन व्यापार में सामान्यक्रम से जीते हुए अपने मन को अपने वश में रखता है, इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है एवं अंतःकरण को शुद्ध बनाए रखता है, सभी प्राणियों में परमात्मा की झाँकी देखता है तो वह कर्म करते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होता। हर कर्मयोगी को ज्ञानयोग के इस मर्म को मन में बिठाकर भगवत्स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। यहाँ प्रभु, जो योगेश्वर भी है एवं नीतिपुरुष भी, कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग के एक सम्यक् संतुलन को जीवन में उतारने का शिक्षण देते है। (श्लोक 6 व 7) जीवन जीने की कला के ये कुछ महत्वपूर्ण सूत्र है।
आसक्ति को त्यागो
शिष्य अर्जुन के गुरु श्रीकृष्ण उसे बताते है कि उसे ऐसा कर्मयोगी बनना चाहिए जो काया, मन बुद्धि एवं इंद्रियों से मात्र प्रभु अर्पित होकर कर्म करता है। वह समाज-समष्टि के हित हेतु जीवन जीता है एवं ये दिव्यकर्म मात्र अपनी अंतःशुद्धि हेतु करता है। (श्लोक 11)। श्रीकृष्ण बार-बार एक बात पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश देते है- ‘संगत्यक्त्वा’ अर्थात् आसक्तियों को छोड़कर कर्म करो। ऐसे आसक्तिरहित जीवन जीने वाले दित्यकर्मी जै बालगंगाधर तिलक एवं हमारे गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी। इस प्रकार किए गए कर्मों की परिणति बताते हुए श्रीकृष्ण कहते है कि इससे कर्मयोगी भगवत्-प्राप्ति रूपी शाँति को प्राप्त होता है। सकाम कर्म करने वाला तो बंधनों में फंसता चला जाता है। (शुल्क 12) आगे श्रीकृष्ण कर्मयोग से अर्जुन का ध्यान ज्ञानयोग की ओर आकर्षित करते हैं कि परमेश्वर तो कर्मफल संयोग परे है, यह तो मानवी प्रकृति है, जो उससे कर्म करा रही है। यदि अज्ञान से ढके हुए ज्ञान के अमृतकण ग्रहण कर लिए जाएं तो उस दुर्गति से बचा जा सकता है जो आज के आम आदमी की हो रही हैं वह तो अज्ञान से मोहित हो, शिश्नोदरपरायण जीवन जी रहा है। परमात्मा का तत्वज्ञान उस अज्ञान को नष्ट कर देता है, जो सद्ज्ञान रूपी सूर्य पर बदली बनकर छाया हुआ है अथवा शीशे पर मैल की परत के रूप में विद्यमान है। (श्लोक 16, 16) अब श्रीकृष्ण भक्तियोग की सीढ़ी पर अर्जुन को चढ़ाते है व कहते हैं कि अपनी मन-बुद्धि को वह परमात्मा में विलय कर दे, अपनी निष्ठा आदर्शों के समुच्चय परमात्मा में रखे तथा तत्परायण (उन्हीं परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से स्थित) बनने की कोशिश करें। ऐसा करने पर वह परमगति को प्राप्त होगा, बार-बार वासनाओं के वशीभूत हो उसका पुनर्जन्म नहीं होगा। ‘ज्ञान निर्धूत कल्मषाः’ को उद्धृत कर वे कहते है कि ज्ञान द्वारा पापरहित होने पर योगी के हर कर्म दिव्य कर्म बन जाते है। (श्लोक 17)
ब्रह्मणि स्थितः
बड़ी विलक्षण है इन अध्याय के उनतीस श्लोकों की यात्रा। एक-एक श्लोक मानों एक अध्याय के समान है। तुरंत अगले श्लोक में योगेश्वर कह बैठते है कि जो योगी अपनी भाँति संपूर्ण भूतों में-जीवधारियों में, गौ, हाथी, कुत्ते अथवा चाँडाल, ब्राह्मण में सभी को समभाव से देखता है, वही श्रेष्ठतम योगी है एवं सही मायने में ज्ञानी है (श्लोक 18)। आगे छठे अध्याय में हम 32 वें श्लोक में भी कुछ ऐसा ही प्रतिपादन सुनेंगे। समभाव में स्थित योगी ऐसे जीता है मानो उसने सारा संसार जीत लिया हो। वह सदैव ब्रह्म में स्थित होकर कर्म करता है। कौन-सा योगी ब्रह्म में स्थित हो सकता है। इसके लिए श्रीकृष्ण कुछ विशेषताएं भी बताते हैं- जो प्रिय को प्राप्त कर हर्षित न हो, अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, सदैव स्थिर बुद्धि से बिना की संशय के जीवन जिए। सतत कर्म करता रहे एवं अपनी बुद्धि को प्रभु के श्री चरणों में नियोजित कर समर्पित भाव से जिए। (श्लोक 19, 20)
आगे श्रीकृष्ण अक्षय आनंद की प्राप्ति का सूत्र अर्जुन को बताते हैं। आदिकाल से मानव को इसी की तो तलाश रही हैं दुर्भाग्यवश वह उसे इंद्रिय सुख में खोजता है। वहाँ से आसक्ति हटे, अंतर्मुखी हो वह ध्यान रूपी योग द्वारा सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा से एकाकार होने का प्रयास करे तो ही उसे वह आनंद मिलेगा। बुद्धिमान विवेकी पुरुष इसी कारण बहिरंग के भोग को छोड़कर अंतः के ब्रह्म में रमण करता है। (श्लोक 21, 22) सच्चे सुख की, अनिर्वचनीय आनंद एवं अक्षय शाँति की यही कुँजी है। शरीर हमारा भोगों में नष्ट हो-दुःख के हेतु बने विषयों में लिप्त हो जर्जर बन जाए, उसके पूर्व ही हमारा विवेक जाग जाना चाहिए एवं हमें काम-क्रोध से उत्पन्न वेग को सहन करने हेतु स्वयं को समर्थ बना लेना चाहिए। काम और क्रोध परस्पर जुड़े हैं। दमित काम ही क्रोध के रूप में अभिव्यक्त होता है और क्रोध आदमी की सारी शक्ति को नष्ट कर डालता है। जो इन दोनों आवेगों को नियंत्रित कर ले, श्रीकृष्ण की दृष्टि में वही योगी है, वही सुखी है-(स युक्तः स सुखी नरः) (श्लोक 23)
शाँत परब्रह्म बने हमारा इष्ट
तो फिर कर्मयोगी को, जो ज्ञानी भी है एवं तत्परायण एक भक्त भी, करना चाहिए। उसे ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए। आत्मा में ही रम कर, आत्मज्ञान को प्राप्त कर, अपने सभी पापों व संशयों को नष्ट कर सर्वाहितार्थय कर्म करने वाला योगी शाँत ब्रह्म को प्राप्त होता है। यह शाँत परब्रह्म ही हम सबका इष्ट है। ऐसे व्यक्ति अपने अंदर व अपने आस-पास भी शाँति का वातावरण बना देते हैं। ये युग प्रवर्तक होते है। युगनायक होते है एवं दूसरों के लिए जीते है। काम-क्रोध रूपी विकारों से ये युक्त होते हैं तथा अपने चित्त पर, स्वभावजन्य आदतों पर इनका अपना नियंत्रण होता है। ऐसे व्यक्ति परब्रह्म परमात्मा की चेतना से आपूरित होते हैं, उनका साक्षात्कार कर चुके होते है। (श्लोक 24, 25) हर व्यक्ति के अंदर ऐसे दिव्य योगी बनने की अनंत संभावनाएं मौजूद है।
प्रतिपादन की पराकाष्ठा
अब अंतिम तीन श्लोकों में श्रीकृष्ण ऐसे दिव्य योगी बनने की प्रक्रिया की एक झलक दिखाकर अपने इस कर्म-संन्यास योग नामक प्रकरण वाले अध्याय का पटाक्षेप करते है। जैसे फिल्मों के ट्रेलर्स दिखाए जाते हैं, कंप्यूटर के पॉवर पॉईंट द्वारा गहन विषय को सूत्र रूप में समझाने का प्रयास किया जाता है, ठीक उसी तरह सत्ताईसवें, अट्ठाइसवें श्लोक में ध्यान की विधि एवं मोक्ष प्राप्ति (जीवनमुक्ति-बंधनमुक्ति) कैसे की जाए, इसकी एक झलक दिखा दी गई है। इसका विस्तार छठे अध्याय में है। परंतु पहले श्लोक में जिज्ञासा व्यक्त करने वाले अर्जुन की सभी जिज्ञासाओं का समाधान कर श्रीकृष्ण अपनी पराकाष्ठा पर उनतीसवें श्लोक में पहुँचते हैं, जहाँ वे अपने भक्त की परिभाषा बताते है-अपनी विशेषताएं बताते है व भगवत्प्राप्ति से ही शाँति मिलती है, यह समझाते हैं। इस श्लोक का व्याख्या-विस्तार से इस लेख के पूर्वार्द्ध में कर दी गई। हम ईश्वर को अपना हितैषी-सर्वलोक महेश्वर मानें एवं अपने सभी यज्ञीय कर्मों, तपों का फल उन्हें सौंप दें, इस महावाक्य के साथ ही इस अध्याय का समापन हो जाता है।
(अगले अंक से छठवाँ अध्याय)
हमें घर-घर पहुँचा दें -परमपूज्य गुरुदेव
परमपूज्य गुरुदेव के मूर्तिमान स्वरूप वाङ्मय को घर-घर पहुँचाने के लिए निष्ठावान परिजनों की आवश्यकता है। जो भाई इस कार्य हेतु अपने को योग्य समझते हों, निम्नलिखित विवरण सहित अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा से संपर्क करें। समयदान की अवधि दो माह की रहेगी। टोलियाँ प्रत्येक माह की 1 तारीख से निकलेंगी।
विवरण-नाम-पता, फोन नं. (एस.टी.डी. कोड सहित) शैक्षिक योग्यता, आयु, मिशन से कब जुड़े, मिशन संबंधी योग्यता, पद/व्यवसाय, कब से कब तक का समयदान आदि।
व्यवस्थापक : अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा
‘सैनिक’ के लिए हुँकार
शिविर के संयोजकों में एक नाम श्रीकृष्णदत्त पालीवाल का भी था। आगरा ही नहीं उत्तरप्रदेश के आँदोलन में उनका बड़ा नाम था। उम्र में वे श्रीराम से काफी बड़े थे। शिविरार्थी उन्हें भाईसाहब और नेताजी कहकर पुकारते थे। आँदोलन को नेतृत्व देने के साथ पत्रकारिता और क्राँतिकारी साहित्य तैयार करने में भी वे सिद्धहस्त थे। श्रीराम को देखकर न जाने क्यों उन्हें लगा कि यह स्वयंसेवक और युवकों से भिन्न और विलक्षण है। श्रीराम तब अपनी लिखी हुई कविता साथियों को सुना रहे थे। देशभक्ति से ओतप्रोत उस कविता के बोल कुछ इस तरह थे-
कोई भी हो तेरा दुश्मन, निश्चय ही मिट जाएगा, त्रिंश कोटि हुँकारों से नभमंडल फट जाएगा॥
पालीवाल जी ने कविता सुनी और पीठ थपथपाई। कहा, “यह कविता सैनिक में छाप लें। जो भी पढ़ेगा, गाएगा, गुनगुनाएगा।” श्रीराम ने हामी भरने के साथ उत्साह भी दिखाया कि इस तरह की रचनाएँ ओर भी तैयार की जा सकती है। पालीवाल जी तब सैनिक पत्र का संपादन व प्रकाशन कर रहे थे। देशभक्ति और क्राँति की भावनाओं से भरपूर यह पत्र पिछले तीन साल से छप रहा था। पालीवाल जी के कंधों पर संगठन और सेवा की और भी जिम्मेदारियाँ थी। उन्हें अपने लिए एक सहयोगी की तलाश थी। श्रीराम के रूप में वह तलाश पूरी होती दिखाई दे रही थी। उन्होंने बढ़ावा दिया, लिखा करो। खूब लिखा करो। तुम्हारी कविताएं लोगों में देश प्रेम जगाएंगी। श्रीराम ने इस भेंट के दौरान अपने पिछले साहित्यिक या आँदोलनकारी लेखन का परिचय भी दिया। वह साहित्य या प्रचार-पत्र जो उन्होंने लिख-लिखकर गाँवों में बाँटे थे।
पालीवाल जी ने कहा, आगरा आकर अपने पत्र में हाथ बँटा को तो अच्छा रहेगा। श्रीराम ने हामी भरी और व्यवस्था बनने पर अपने की बात कही। व्यवस्था बनने का अर्थ अनुमति मिलना था। शिविर पूरा हुआ। लौटकर आँवलखेड़ा आए और वहाँ अपने साथ के किशोरों को फिर इकट्ठा किया। उनके अभिभावकों की लगाई पाबंदियाँ तब काम नहीं आई। स्वतंत्रता आँदोलन का प्रभाव इस तरह फैल रहा था कि उससे अलग रहना पिछड़ेपन और दब्बूपन की निशानी समझा जाता था। लोग भले ही सक्रिय हिस्सा न लें, इस तरह की टिप्पणियाँ कर ही देते थे। श्रीराम के थोड़े से संपर्क ने किशोरों में नया उत्साह फूँक दिया। अभिभावकों की परवाह किए बिना वे प्रभातफेरियों में शामिल होने लगे। फेरियों में श्रीराम के लिखे गीत गाए जाते। गीत गाते-गाते वे इतने तन्मय हो जाते थे कि उन्हें अपनी सुध-बुध ही नहीं रहती।
1929-30 के दिन स्वतंत्रता आँदोलन के उफान के दिन थे। दिसंबर 1929 में काँग्रेस ने लाहौर अधिवेशन के समय पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित कर दिया। विधानमंडलों से प्रतिनिधि वापस बुला लिए गए। सरकार के साथ हर तरह की बातचीत बंद कर दी गई। अधिवेशन के दौरान 31 दिसंबर की रात को घड़ी ने जैसे ही बारह का घंटा बजाया और नए साल का पहला दिन शुरू हुआ, जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर में राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया। उस समय झंडा तिरंगा ही था, लेकिन चक्र की जगह चरखे का निशान अंकित था। झंडा फहराते ही जैसे देश ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया। जगह-जगह जलसे हुए, बैठकें हुई। 26 जनवरी को देशभर में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। उस दिन जगह-जगह तिरंगा फहराया गया। आँवलखेड़ा में श्रीराम शर्मा ने भी ध्वजारोहण किया। अखबार में कविताएं और लेख आदि में वे अपना पूरा नाम लिखने लगे थे। हवेली के बाहर आँगन में झंडा फहराने पहले पंडित गेंदाराम ने उन्हें पहली बार पूरे नाम से संबोधित किया। नाम के आगे पंडित लगाते हुए वे बोले, “पंडित श्रीराम शर्मा समारोह के बारे में कुछ कहेंगे।”
एक नए अवतार की प्रतिष्ठा
पंडित श्रीराम शर्मा ने उपस्थित युवकों को संबोधित करते हुए जो कहा उसका रिकार्ड नहीं है। बहरहाल वह कार्यक्रम पंडित श्रीराम शर्मा के नेतृत्व में आँदोलन की व्यवस्थित और संगठित शुरुआत जरूर थी। 26 जनवरी को पहला स्वाधीनता दिवस मनाने के बाद पंडित श्रीराम शर्मा जी ने गुड़ का प्रसाद बाँटा था। उस समय यह घोषणा भी की गई कि स्वतंत्रता दिवस हर साल मनाया जाएगा। दल के लोग जहाँ भी इकट्ठे होंगे, बैठक करेंगे या कोई कार्यक्रम चलाएंगे तो झंडा भी फहराया जाएगा। पूरे देश में 26 जनवरी का वह दिन इतिहास का एक नया शीर्षक बन गया। आँवलखेड़ा में श्रीराम शर्मा के नए अवतार की उसी दिन प्रतिष्ठा भी हुई।
अप्रैल डडडडडड में अवज्ञा आँदोलन शुरू हुआ। यह आँदोलन लाहौर अधिवेशन में पास हुए प्रस्ताव को जनमानस में रचा-बा देने वाली रणनीति का हिस्सा था। 6 अप्रैल को महात्मा गाँधी ने अपने साबरमती आश्रम से कूच किया। उनके साथ हजारों सत्याग्रही थे। समुद्र तट पर स्थित दाँडी नामक स्थान पर पहुँचे और वहाँ नमक बनाया। अंग्रेज सरकार की नमक पर लगाई पाबंदियों को तोड़ते हुए यह आँदोलन उस पूरी व्यवस्था के लिए ही बड़ी भारी चुनौती था। अंग्रेजों ने भी इसे भाँपा और किसी बड़े विस्फोट का सूचक माना। दमनचक्र तेज होता चला गया। गिरफ्तारियाँ होने लगी।
दमन और गिरफ्तारी के इस दौर में कुछ युवक ऐसे भी थे, जो पुलिस की पकड़ में नहीं आए। पंडित श्रीराम शर्मा उनमें एक थे। गाँव के बाहर उन्होंने एक स्थान पर गड्ढा खोदा। वहाँ नमकीन पानी भरा और उससे नमक बनाने का न अनुभव था और न ही प्रशिक्षण लिया था। सत्याग्रहियों ने जगह-जगह प्रशिक्षण कैंप लगाए तो थे, लेकिन सभी लोग उनमें शामिल नहीं हो सके थे। प्रतीकात्मक रूप से पंडित जी ने नमक बनाया। वह कार्यवाही पूरी होती, इससे पहले ही पुलिस दल आ गया। युवकों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने डंडे चलाए। जिस गड्ढे में नमक का पानी भरा गया था, उसमें श्रीराम के साथ तीन-चार युवक और उतरे हुए थे। नमक बनाने की कोशिश कर रहे थे।
पुलिस वालों ने उन्हें बाहर निकलने के लिए कहा। पानी के बाहर खड़े लड़के तो लहराते हुए डंडों के डर से भाग खड़े हुए थे, पानी में उतरे लड़के भी खिसकने लगे लेकिन श्रीराम ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। पुलिस वालों ने तीन-चार बार हाँक लगाई। उन्होंने हर बार अनसुना कर दिया। अवज्ञा-उपेक्षा होते देख दो पुलिस वाले पानी में उतरे और श्रीराम पर तड़ातड़ बेंतें बरसा दी। पीठ, हाथ, कंधे और सिर पर चोटें आई। इस मार से वे पानी में गिर पड़े। पुलिस वाले उन्हें पानी में ही गिरा-पड़ा छोड़कर चले गए। शाम हो गई, पुलिस के डर से श्रीराम की सुध लेने कोई नहीं आया। वे रात भर नमक के घोल में पड़े रहे। सुबह उन्हें बाहर निकाला गया। ताई जी रातभर यह समझे बैठी रहीं कि श्रीराम को पुलिस पकड़कर ले गई होगी।
महापुरश्चरण ओर समाजसेवा साधना
स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी के साथ अनुष्ठान साधना भी चल रही थी। महापुरश्चरण के लिए छह घंटे प्रतिदिन लगते थे। श्रीराम यह साधना सुबह छह बजे पहले और शाम को सूर्यास्त होने तक पूरी कर लेते थे। जप का अभ्यास होने के बाद में पाँच घंटे समय ही पर्याप्त होता। साधना में ज्यादा समय लगने के दिनों राष्ट्रीय और सामाजिक मोरचों पर सक्रियता बढ़ी। तिथिक्रम निश्चित नहीं है, लेकिन घटनाएं उस समय की है, जब श्रीराम अठारह-उन्नीस वर्ष के थे। लूली-लंगड़ी गायों को बेच देने और दूध नहीं देने वाली गायों को यों ही सड़क पर छोड़ देने की प्रवृत्ति तब भी थी। गाँव में किसी ने दो गायें काई को बेच दी। उनके पाँव खराब थे। कसाई उन गायों को लेकर चले।
श्रीराम को पता चला। उन्होंने अपनी बालसेना के सदस्यों की आपात बैठक बुलाई और तुरंत निश्चित कर लिया कि क्या करना है। अपने एक साथी को लेकर श्रीराम दौड़े गए। कसाइयों से मिले और बातचीत की। गायों को नहीं काटने का अनुरोध किया। उन लोगों ने कहा कि जो कीमत अदा की है, वह वापस मिल जाए तो गायें वापस कर देंगे। श्रीराम थोड़ी देर के लिए असमंजस में पड़े। दोनों गायों की कीमत अठारह रुपए बताई गई थी। ताईजी से इतनी रकम माँगी जा सकती थी, लेकिन यह करना नहीं चाहते थे। कुछ सोचकर श्रीराम ने हाँ कर दिया। कुछ समय माँगा और गाँव के साहूकार गुलजारी के पास आए। उससे पैंतीस रुपए उधार लिए। गुलजारी इस युवक के स्वभाव और निष्ठा से अच्छी तरह परिचित था। ब्याज तय नहीं किया, न ही कोई मान गिरवी रखने को कहा। कुछ दिन के लिए बिना ब्याज और बिना जमानत के ही रुपए उधार दे दिए। उन रुपयों से गाय की कीमत अलग रखकर एक बैलगाड़ी किराये पर ली। कसाई को पैसे देकर गायें छुड़ाई और उन्हें बैलगाड़ी में बिठाया। कुछ दूर चलने पर एक बैल अड़ने लगा। पता चला कि वह बीमार है। श्रीराम ने उसे जुए से बाहर निकाला। उसकी जगह खुद अपना कंधा लगाया। एक और बैल और जुए के दूसरे सिरे पर श्रीराम। इस तरह गायों को लादकर गाड़ी आगे खिसकती रही। तीन दिन तक बैलगाड़ी खिसकती रही। श्रीराम गायों को लेकर हाथरस पहुँचे। वहाँ की गोशाला में गायों को रखवाया। चौथे दिन वापस आ गए। साहूकार का कर्ज उतारने के लिए बालसेना के सदस्यों का सहयोग लिया। थोड़ी-थोड़ी राशि सभी ने इकट्ठी की और गुलजारी का कर्ज उतारा।
अकल्पनीय साहस
उन्हीं दिनों की घटना हैं। गाँव में एकमात्र परचून की दुकान चलाने वाले सुलेखचंद के घर में लाग लगी। दुकान और घर के साथ-साथ ही थे। मकान ईंट-गारे का बना हुआ था, लेकिन छत बाँस-बल्लियों की बनी थी। खपरैलों से छाई हुई थी। देखते-ही-देखते छत ने आग पकड़ ली। सुलेखचंद अपने बच्चों को बचाने से ज्यादा दुकान में फँसे समान के लिए चिंतित था। बच्चे होशियार थे। लाँघते-फलाँगते लपटों से बाहर निकल आए और बाहर आकर हल्ला मचाने लग कि भाभी भीतर ही रह गई है। भाभी अर्थात् साहू की पुत्रवधू। वह गर्भवती थी।
श्रीराम वहाँ पहुँचे और हाय-पुकार सुनकर मामला समझा। संकट को समझते ही उन्होंने आस-पास झाँका पास के घर में गए और वहाँ से नसैनी निकालकर लाए। दरवाजे के पास आग इस बुरी तरह फैल गई कि अंदर जाना कठिन था। नसैनी लगाकर वे छत की तरफ से भीतर कूदे। कुछ ही मिनटों में बहू को कंधे पर लादे बाहर आ गए। वह थोड़ी बहुत झुलस गई थी। उसकी प्राथमिक चिकित्सा का प्रबंध किया। साहू का परिवार धन्यवाद देता रह गया और वे अपना काम कर आगे बढ़ गए।
अग्निकाँड में फंसी बहू को अपनी जान जोखिम में डालकर बचाने के कुछ दिन बाद की घटना है एक विधवा युवती किसी विजातीय युवक से गर्भवती हो गई। शादी के कुछ दिन बाद ही विधवा हो जाने के कारण ससुराल वालों ने उसे मायके वापस भेज दिया था। वह अपने माँ-बाप के साथ रहती थी। विधवा का घर में होना ही उन दिनों गाँव-बस्ती की लानत ढोने के लिए काफी था। फिर वह गर्भवती और हो गई। माता-पिता के लिए गाँव में रहना मुश्किल हो गया। जितने मुँह उतनी बातें।
श्रीराम ने इस संकट में हस्तक्षेप किया और उस युवती के पुनर्विवाह की सलाह दी। लोगों ने शुरू में इस सुझाव का मजाक उड़ाया। घरवालों ने भी कहा कि हम पर तरस खाओ। वैसे ही कठिनाई में फँसे है। नई मुसीबत क्यों मोल ली जाए। श्रीराम ने समझाया कि इसमें कोई पाप नहीं है। पुराने जमाने में ऐसा होता रहा है। शास्त्रों में इसकी व्यवस्था दी गई है। कुछ रुककर उन्होंने कहा, “सरकार भी कहती है कि विधवा लड़कियाँ चाहे तो फिर शादी कर सकती हैं। उन्हें घर-गृहस्थी बसाने का अधिकार है।” श्रीराम ने शास्त्र परंपरा, सरकार और महापुरुषों का हवाला दिया तो वे राजी हो गए। उनके मन में एक ही बाधा रह गई कि गर्भ में स्थित बच्चे का क्या किया जाए? माता-पिता को तैयार हुआ देख श्रीराम ने कहा “उसे भी दुनिया में आने दीजिए। भगवान उसकी देखभाल करेगा।”
अभिभावकों के राजी हो जाने पर श्रीराम युवती के पिता को लेकर मथुरा गए। वहाँ आर्य समाज की चौक शाखा के प्रधान पंडित वेदव्रत से मिल। उन्हें सारी स्थिति समझाई। तीन-चार महीने की खोजबीन और बातचीत के बाद उपयुक्त वर मिल गया। जीवनप्रसाद शर्मा नामक वह युवक भी विधुर था। उसकी एक संतान थी। युवती और परिवार की स्थिति उसे स्पष्ट रूप से बता दी गई और रिश्ता तय हो गया। उस युवती से जन्मी संतान उत्तरप्रदेश के एक औद्योगिक नगर में इस समय जीवन की संध्यावेला व्यतीत कर रही है। उसका वंश खूब फल-फूल रहा है।
गिरवर के घर कथा
किशोरवय पार कर वे युवावस्था में पहुँचे ही थे, तब का एक और प्रसंग है। आँवलखेड़ा में हवेली के बाहर की सफाई करने और ताऊजी की घोड़ों पर खरहरा करने के लिए गिरवर नामक एक सफाई कर्मचारी आता था। उसका मन हुआ कि घर पर सत्यनारायण की कथा की जाए, लेकिन कोई पंडित इसके लिए तैयार नहीं हो रहा था। चार-पाँच जगह कहा, पर्याप्त दान-दक्षिणा देने की बात भी कही, लेकिन निम्न जाति के लोगों के यहाँ कथा करने में हर किसी ने संकोच ही किया। कथा आयोजन नहीं हो पाने से गिरवर कान उखड़ा रहने लगा। एक दिन श्रीराम के सामने मुँह से निकल गया, “भैयाजी हम अपने यहाँ कथा कराना चाहते हैं, लेकिन हमारा भाग्य ही खराब है।”
“क्यों? क्या हुआ भाग्य को?” श्रीराम ने पूछ लिया। उनके प्रश्न में आत्मीयता के साथ आक्रोश का स्वर भी था। आक्रोश गिरवर की दिखाई गई निराशा पर था। उसने कहा, “हम लोग अछूत है न। इसलिए हमारे यहाँ कोई कथा नहीं करता।” श्रीराम ने कुछ पल रुककर कहा, “कल नहा-धोकर तैयार रहना। घर के सब लोग साफ-स्वच्छ रहें। हम तुम्हारे यहाँ कथा करने आएंगे।” गिरवर का चेहरा यह आश्वासन पाकर खिल उठा; लेकिन अगले ही क्षण वह फिर उदास हो गया। कहने लगा, “जब दूसरे पंडित लोग नहीं आ रहे तो आप ही को कौन आने देगा। आपकी ताईजी और दूसरे लोग आपको नहीं जाने देंगे।”
श्रीराम ने इस तरफ से निश्चित रहने के लिए कहा। गिरवर संशय और विश्वास की मिली-जुली अनुभूति से गदगद होता घर लौटा। घर के सब लोगों को बताया। बताने के बाद ही तैयारी भी शुरू हो गई। घर की सफाई, कपड़े, बिस्तर आदि की धुलाई और बर्तनों की मँजाई के साथ मकान के फर्श पर लीपना-पोतना चालू हुआ। देर रात तक लगे रहने पर गिरवर का घर चमक उठा। अगले दिन अठारह-उन्नीस साल के युवा पंडित पोथी, हवन कुँड, सामग्री, शंख, तस्वीर, झालर आदि लेकर पहुँच गए। विचार ने अपनी जात-बिरादरी के लोगों को भी आमंत्रित किया। पच्चीस-तीस लोग इकट्ठे हो गये।
विधिवत कथा आरंभ हुई। एक अध्याय पूरा होने के बाद शंख बजता और जयकार भी होता। कथा पूरी होने के बाद घंटे-घड़ियाल बजाकर आरती होने लगी। वहाँ इकट्ठे लोगों में उल्लास फूट पड़ रहा था। ‘ऊँ जय जगदीश हरे’ पूरी आवाज से उन लोगों ने आरती गाई। शंखनाद और जयकार की गूँज गाँव के दूसरे घरों तक पहुँची। तत्काल कुछ समझ नहीं आया। जब समझ आया तो ब्राह्मण और ठाकुर टोले के लोगों का कोप जाग उठा।
पंद्रह-बीस लोगों का दल गालियाँ बकता हुआ हरिजन टोले की तरफ दौड़ा। दूर से ही शोर-शराबा सुनाई दिया। गिरवर ने कहा लोग मारने आ रहे हैं बाबू साहब। आप बचकर निकल जाइए। श्रीराम ने कहा, नहीं भागेंगे नहीं। आप लोगों को उनका शिकार नहीं बनने देंगे। गिरवर और परिवार के लोगों ने चीख-चिल्लाकर कहा, समझाया, दबाव बनाने की कोशिश की। श्रीराम ने भी शर्त रखी कि अपने आपको दोषी मत मानना। वे लोग कुछ कहें इसके पहले ही स्पष्ट कर देना कि श्रीराम ने ही कथा की जिद की थी। हम लोग तो इसके लिए तैयार नहीं थे। यह शर्त मान ली और कसम खाई तभी श्रीराम जाने के लिए राजी हुए।
ब्राह्मण-ठाकुर टोले के लठैत घर के पास पहुँचे, इससे पहले ही श्रीराम ने पोथी-पन्ना और कथा का सामान समेटा। अपने साथ लाई चादर में सामान बांधा। कंधे पर रखा और खेतों में से होते हुए निकल गए। लोगों से छिपते-छिपाते हवेली पहुँचे। उधर गिरवर और साथ के लोगों ने लठैतों को वही सफाई दी, जिसकी कसम खाई थी। श्रीराम के जिद्दी स्वभाव से सभी परिचित थे। इसलिए मान लिया कि उसने कथा कहने के लिए हठ किया होगा। उन्होंने हवेली में आकर ताई जी से शिकायत की। ताई जी ने श्रीराम को थोड़ा-सा डाँटा-डपटा और बात वहीं खत्म हो गई।
क्राँतिकारी कार्यालय
समाज में नए संस्कार जगाने के लिए श्रीराम ने अपनी बातों को लिखकर और बोलकर भी कहना शुरू किया। उन दिनों स्वतंत्रता आँदोलन के पक्ष में या अँग्रेजों के खिलाफ लिखना आसान नहीं था। लिखा जाता तो वह छपना मुश्किल था। श्रीराम ज्यादातर कविताएं लिखते। उन्हें छपने के लिए आगरा के सैनिक, कानपुर के प्रताप और कलकत्ता के विश्वमित्र आदि पत्रों में भेज देते। ‘शिरकत’ ‘मस्ताना’ आदि पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएँ छपती थी।
स्वतंत्रता आँदोलन के लिए बैठक करने के अलावा सामाजिक कार्यों के लिए भी विचार-विमर्श की जरूरत होती। बैठकें यहाँ-वहाँ हो जातीं। कथा आयोजन का प्रसंग बीतने पर श्रीराम ने अपने साथियों से कहा कि बैठक के लिए कोई स्थान नियत होना चाहिए। वह स्थान किसी का घर नहीं हो सकता। घर में दूसरे लोग भी रहते हैं, बड़े-बुजुर्गों का प्रभाव भी रहता है और आने-जाने वालों का ताँता भी लगा रहता है। वहाँ एकाँत नहीं मिलता।
समाधान ताई जी ने निकाला। उन्होंने हवेली का एक हिस्सा बताया। सैनिकों ने अपनी बैठकें घर से दूर करने का निश्चय बताया। ताईजी ने कहा, तुम लोगों को वहाँ कोई छेड़ने नहीं आएगा। चौबीसों घंटे बैठे रहोगे तो भी नहीं पुकारुँगी। बाल सेना के युवा सदस्य फिर भी नहीं माने। ताईजी ने अपनी मनोबाधा रखी। असल में शिवालय के श्रीराम के लिए खतरा देखती हूँ। वह हमारे हाथ से निकलकर शिवजी के हाथ में चला जाएगा।
ताईजी का यह उत्तर ब्रह्मास्त्र सिद्ध हुआ। उनके संकोच का सम्मान करते हुए सबने हवेली के लिए हिस्से को अपने लिए मान लिया। यह वचन जरूर लिया कि उनकी बैठकों व कार्यों के बारे में किसी को भनक तक नहीं लगने दी जाएगी। ताईजी ने खुद जाकर वह कमरा दिखाया। बीस-पच्चीस लोगों के आराम से बैठने लायक जगह वहाँ थी। जब आवश्यकता लगे, तब भोजन-पानी माँगने, नाश्ते की व्यवस्था होने का आश्वासन भी मिल गया और आँवलखेड़ा की उस कोठरी में एक क्राँतिकारी कार्यालय आरंभ हुआ।
सितंबर माह आते ही स्मरण आने लगती है भाद्रपद पूर्णिमा महालय को वह वेला, जिसमें हमारा हमारी मातृसत्ता से विछोह हुआ था। माँ यह एकाक्षर ही हमारा प्रारंभ से प्राण रहा है और हम उनकी कृपा-किरणों की वर्षा से सराबोर हैं, यह सभी जानते हैं। मातृत्व के माध्यम से स्नेहसिक्त अंतःकरण की जो झलक-झाँकी हमें हमारी शक्तिस्वरूपा माता भगवती देवी से मिली, वही हमारी आज की शक्ति को स्रोत बनी हुई है। माँ शारदा-ठाकुर रामकृष्णदेव की तरह वे भी हमारी आराध्य गुरुसत्ता के साथ हमारे बीच आई। पिछली बार की तरह मौन भूमिका नहीं थी उनकी। वे अपनत्व लुटाने आई व संगठन को शक्ति देने आई। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आगे करने पर उन्होंने संगठन की बागडोर भी सँभाली व ऋषिसत्ताओं के सूक्ष्म मार्गदर्शन में अपनी जिम्मेदारी खूब निभाई।
विवाह के बाद के सात वर्श तो देखते-देखते अखंड दीपक की रक्षा, तीन बच्चों (पूर्व के) एवं एक बालक (मृत्युंजय) की देखभाल आदि तथा अपने आराध्य के बहुआयामी पक्ष को समझने में लग गए। फिर दो बच्चों के विवाह संपन्न किए। भले घरों में उन्हें विदा किया। गुरुसत्ता के निर्देश पर एक शक्ति का साकार रूपकन्या शैलबाला को जन्म दिया एवं इसी के साथ गायत्री तपोभूमि मथुरा की स्थापना, सत्ताईस वर्ष तक अनवरत आराध्य सत्ता द्वारा संपन्न कठोर-जप-अनुष्ठान में एवं उसकी महापूर्णाहुति में भागीदारी की। सच पूछा जाए तो यहीं से दिसंबर 1952, बसंत पर्व 1953 से माताजी की एक नई भूमिका आरंभ हुई, जिसमें उन्हें बढ़-चढ़कर कार्य करना था, एक विराट परिवार की माँ बनना था एवं जी भरकर स्नेह-अपनत्व लुटाना था। अपने पूर्वजन्मों के संस्कारों के कारण उनकी कोई व्यक्तित्व इच्छा थी नहीं, न कोई शौक, न किसी प्रकार की महत्वाकांक्षा। जो गुरुदेव कहें बस वही करना, सही अर्थों में अपनी आराध्य सत्ता की जीवनसंगिनी ही नहीं, सहगामिनी एवं प्रथम शिष्या होने का गौरव उन्हें अपने निष्काम समर्पण के नाते मिला। 1952 से चली यह यात्रा बयालीस वर्ष तक अनवरत चलती रही एवं 19 सितंबर 1994 में उनके महाप्रयाण तक समर्पण के एक अभूतपूर्व इतिहास की रचना गई।
जिस किसी ने भी मथुरा में या शाँतिकुँज हरिद्वार में उनका अपनत्व पाया है, उनके आँचल की छाँव में संरक्षण पाया है, वह उनके प्यार भरे दुलार को अपने जीवन की एक अनमोल धरोहर मानते हैं। आतिथ्य सत्कार में उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता था। आने वाला भूखा रह ही नहीं सकता था। वह माँ अन्नपूर्णा कैसे सारी व्यवस्था करती थी, कोई नहीं जानता, किंतु अभावग्रस्त (ओढ़ी हुई गरीबी) परिस्थितियों में तत्कालीन अखण्ड ज्योति संस्थान आने वाला अतिथि-परिजन-पारिवारिक रिश्तेदार आदि कोई भी उनके इस आतिथ्य से, स्नेह भरे शब्दों के साथ भोजन के आग्रह एवं अपना जी खोलने से बचा नहीं। साँवला-सा-चेहरा, गोल-सी आकृति एवं सरल नाक-नक्श के साथ जो अंत गहराई वाला निश्छल प्रेम उनकी आँखों में रहता था, वह बुजुर्ग को भी बेटी बनकर उनसे कुछ पाने को, वात्सल्य के कण बटोरने की विवश कर देता। इसीलिए तो गुरुदेव कहते थे कि वह जन्म से ही माताजी के रूप में जन्मी हैं, माताजी ही रहेंगी और माताजी ही कहलाएँगी।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी मातृसत्ता को तब मिली जब उन्होंने विदाई सम्मेलन में भागीदारी की। जून माह 1971 का यह समय उनके लिए गहरी अंतर्वेदना से भरा था। अपनी 19 वर्षीय लाडली का विवाह 3 जून गायत्री जयंती को कर उन्हें एक विराट सम्मेलन में अपने आराध्य का साथ देना था, जो 17 से 20 जून की तारीखों में संपन्न होने जा रहा था। सारे परिजनों से अंतिम विदाई लेकर उन्हें 2 जून को मथुरा हमेशा के लिए छोड़ देना था। अपने 22 वर्षीय पुत्र पर एक महती जिम्मेदारी डाल उससे भी उनका विछोह होना था। परमपूज्य गुरुदेव तो अपनी अंतर्वेदना ‘अपनों से अपनी बात’ के रूप में अखण्ड ज्योति में लिखकर हल्के हो जाते थे, वे वहाँ किसके पास अपनी व्यथा-वेदना के बोल लेकर जातीं व सुनाती। उन्हें तो घर का सारा अंदर का काम भी देखना था, संगठन को भी मार्गदर्शन देना था एवं सबसे भारी पीड़ादायी कार्य अपने आराध्य से 3 जून को हरिद्वार में हमेशा के लिए विदाई देने का करना था। वे हिमालय जा रहे थे। तब तो यह निश्चित भी नहीं था कि वे कब लौटेंगे, आएंगे भी कि नहीं।
इन सबका दबाव उन पर पड़ा व शरीर-मन दोनों ही इससे प्रभावित हुए। एक सहारा मिला, जब लगभग बारह-पंद्रह वर्ष से भी कम आयु की कुँवारी कन्याएँ पूज्यवर के हिमालय रवाना होने के तुरंत बाद माताजी के पास आ गई। उन्हें छह वर्ष में मिलकर चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण अखण्ड दीपक की साक्षी में संपन्न करने थे। छोटी-छोटी अपने गायत्री परिवार के कार्यकर्त्ताओं की बच्चियाँ थीं। बहुत कुछ जीवन-व्यवहार व कठोर तप का अनुशासन माताजी को ही सिखाना पड़ा। प्रातः जल्दी उठकर सारा क्रम उन्हीं को सँभालना पड़ता था। एक प्रकार से वे अब बारह बच्चियों एवं उनकी देखभाल के लिए नियुक्त प्रायः-छह सात कार्यकर्त्ता, अकेले व सपरिवार सभी की माँ थीं, जिन्हें इस नवोदित शांतिकुंज तब इतना बड़ा नहीं था। मात्र सामने का भवन, दुमंजिला सड़क की तरफ तीन-तीन छोटी कोठरियां, एक गौ-शाला व लगभग आधा बीघा पीछे तक बगीचा। चारों और नीरव सुनसान। शाम का झुटपुटा होते ही पक्षियों की व नाना प्रकार की आवाजें आती। गजराज नियमित रूप से ठंडक के पाँच-छह माह में आते व गन्ने चूसकर खेतों में धमाल मचाया करते थे। किसान उन्हें भागने के लिए शोर करते। वह भी निद्रा में व्यवधान डालता। फिर ‘अखण्ड दीपक’ की देखभाल का जिम्मा भी सबसे बड़ा था। वह कार्य भी माता जी स्वयं ही करती थी। रात्रि में उसके लिए भी उठना पड़ता, आराध्य सत्ता की याद बराबर आती रहती थी। पहले के प्रवास में तो यह सुनिश्चित था कि अब थोड़े माह बचे हैं, फिर मथुरा वापस आ जाएंगे, किंतु अब तो यह भी स्पष्ट नहीं था कि कब आएंगे, वहीं से कोई संपर्क करेंगे या नहीं।
जनवरी 1972 की बात है। बंगलादेश मुक्ति युद्ध पराकाष्ठा पर पहुँचकर समाप्त हुआ ही था। एक विशिष्ट संधिवेला से गुजरा था राष्ट्र। उन दिनों माताजी को सूक्ष्म जगत से मिले आदेशानुसार विशिष्ट तप करना पड़ा। शरीर पर इन सबका प्रभाव पड़ा। दिल का बड़ा तीव्र स्तर का दौरा पड़ा। उन दिनों हरिद्वार के लिए दिल्ली से मात्र दो बसें चला करती थीं, एक वृंदावन जाती थीं। यहाँ न कोई चिकित्सक थे, न विशेष देखभाल वाला कोई तंत्र ही था बी.एच.ई. आरंभ ही हुआ था। मथुरा से चिकित्सकों को लेकर उनके पुत्र मृत्युंजय हरिद्वार आए। सारी चिकित्सा का निर्धारण हुआ। बेतार के तार की तरह माताजी का संदेशा हिमालय में बैठी गुरुसत्ता के पास पहुँचा। चिकित्सकों के जाते ही वे आ गए। उनके आते ही मातृसत्ता को ऐसा लगा मानों किसी ने पीड़ा निवारक औषधि दे दी हो। आँखों से छलक रहे आँसुओं सहित भावभरी अभिव्यक्ति के माध्यम से मौन वार्त्तालाप होता रहा। इसके अगले दिन की बात है।
बिना किसी पूर्व सूचना के इन पंक्तियों का लेखक-पत्रिका का संपादक अपना एमबीबीएस का इम्तिहान देकर इंदौर से हरिद्वार आया। साइकिल रिक्शा से स्टेशन से लगभग दो घंटे की दूरी तय कर जब वह शाँतिकुँज के मुख्य द्वार पर पहुँचा तो उसने माताजी के वेदना भरी कराह सुनी एवं वहीं पूज्यवर को टहलते पाया मानों किसी की प्रतीक्षा कर रहे हों। तुरंत हाथ पकड़कर विस्मित आगंतुक के ऊपर ले गए व बोले तुम डॉक्टर बन गए हो, अब इलाज करो। नए-नए चिकित्सक की, जिसने अभी इंटर्नशिप भी नहीं की हो, क्या स्थिति होती होगी, वैसी स्थिति थी। हाँ! इलाज तो क्या होना था। सब दवाएँ चल रही रही थीं, सेवा का अवसर मिल गया। लगभग पाँच दिन तक पूज्यवर गुरुदेव वंदनीया माताजी दोनों का सान्निध्य मिल गया। (इसके पश्चात रात्रि में पूज्यवर अचानक वापस हिमालय चले गये थे। बहुत कुछ समझने-जानने को मिला इक्कीस वर्ष के इस युवा को। सबसे बड़ा चमत्कार जो देखा गया, वह था पूज्यवर के जाने के तुरंत बाद इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम में सभी असामान्यताओं का मिट जाना। सामान्यतया मायोकार्डियल इन्फार्क्शन में यह समाप्त होने में छह माह से एक वर्ष लगता है। विज्ञान जगत के लिए यह एक चुनौती थी। माताजी को संजीवनी मिल गई या वह एक बहाना बना पूज्यवर के बुलावे का, कुछ समझ में नहीं आता। (1 सितंबर 23) आज भाद्रपद पूर्णिमा के पावन दिन महाप्रयाण दिवस पर उस मातृसत्ता का स्मरण और अधिक हो आता है व याद आता है, उनका तप, कष्ट झेलने की सामर्थ्य, ममत्व एवं वह विशाल हृदय, जिसमें सारा विराट गायत्री परिवार आज समाया हुआ है। सजल श्रद्धारूप उस सत्ता को भावभरा नमन पुष्पाँजलि।
गायत्री परिवार एक विशिष्ट लक्ष्य लेकर विशिष्ट कार्ययोजना के साथ विनिर्मित एक ऐसा संगठन है, जिसे हिमालयवासी सूक्ष्मशरीरधारी सत्ताओं का संरक्षण प्राप्त है। इसकी संस्थापक सत्ता परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं शक्तिस्वरूपा माता भगवती देवी ने जीवन भर वाणी, लेखनी और अपने आचरण से दिव्य प्रेरणाएँ संचरित कीं। हम सबको विरासत में अपने विराट ज्ञान एवं भाव संवेदनाओं की पूँजी दी। यह समिति लक्ष्य लेकर चलने वाले अन्य गैर सरकारी अथवा धार्मिक संगठनों की तरह नहीं है। इसका तो ध्येय ही युग का नए सिरे से निर्माण करना हैं ऐसे में उन सैनिकों की भूमिका विशिष्ट हो जाती है, जो इस संगठन रूपी विराट भवन की नींव के पत्थर हैं, वे ईंटें हैं, जिन्हें परस्पर जोड़कर भवन खड़ा किया गया है मिशन के सभी शुभेच्छु, मिशन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने वाले पर्यवेक्षकों एवं अन्य संगठनों के मूर्द्धन्य आदि यही अपेक्षा रखते हैं कि युग सैनिक जो भी कार्य करेंगे उस गुरुसत्ता की गरिमा के अनुरूप ही करेंगे। सारे समाज व भारतवर्ष ही नहीं, पूरे विश्व को ‘अखिल विश्व गायत्री परिवार’ से बड़ी भारी अपेक्षाएँ हैं।
हम मिशन के प्रौढ़ताकाल के प्रारंभिक समय से गुजर रहे हैं। 1926 में अखण्ड दीप प्रज्वलन के साथ आरंभ हुआ यह संगठन अपनी शतसूत्री युग निर्माण योजना के साथ एक लंबी यात्रा पूरी कर इस मुकाम तक आ पहुँचा है, जहाँ अपने वाले नौ वर्ष विषम परिवर्तनों से भरे हुए हैं। साधनात्मक स्तर पर यदि हमारी अच्छी तैयारी नहीं होगी तो हम उस कार्य को कर पाने में समर्थ नहीं हो पाएंगे, जो हमें गुरुदेव की सत्ता सौंप गई है। प्रस्तुत नवरात्रि की पावन मेला (26 सितंबर-4 अक्टूबर 23) में भी हमें अपने आपको बार-बार यह याद दिलाना चाहिए कि साधना की धुरी पर ही हमारा व्यक्तित्व परखा गया था एवं में एक विराट अभियान का अंग बनाया गया था। गायत्री उपासना एवं जीवन साधना जिसकी जितनी गहरी होगी, उतना ही वह गुरुसत्ता के उच्चस्तरीय अनुदानों का भागीदार बनेगा। व्यक्तित्व में जब जीवन-साधना फलीभूत होने लगेगी तब हम आराधना प्रधान विभिन्न आँदोलनों को गति दे सकेंगे।
छोटे-छोटे रूपों में स्थान-स्थान पर साधना की धुरी पर हमारे शेष छहों आँदोलन चल पड़े है। जिसने भी साधनात्मक अवलंबन छोड़ा है, वह भटका है। आँदोलन समूह अपने स्तर पर अपना प्रभाव दिखा भी रहे है। सातों जोन्स के माध्यम से उनका सुनियोजन हो सके, यह प्रयास भी केन्द्र द्वारा सतत किया जा रहा है। अभी प्रशिक्षण की आवश्यकता सभी ओर अनुभव की जा रही है, जिसकी पूर्ति नवरात्रि के पूर्व वर्षा ऋतु के विशेष क्षेत्रीय सत्रों द्वारा करने का प्रयास किया जा रहा है।
अब बारी आती है हमारे इस वर्ष के अक्टूबर माह से आरंभ होने वाले क्षेत्रीय आयोजनों की। सामान्यतः हर वर्ष माह अक्टूबर से मार्च अंत तक ये कार्यक्रम भिन्न-भिन्न रूपों में सारे भारत में संपन्न होते रहते हैं। क्षेत्र में आँदोलनों की गरमी बढ़ी है तो इन आयोजनों की माँग भी बढ़ी है। कई क्षेत्रीय कार्यकर्त्ता अपनी ढपली अपना राग बजाते हुए अव्यावहारिक कार्यक्रम रख लेते हैं एवं फिर केंद्र से टोली भेजने का दबाव डालते हैं। परचे भी छाप लेते हैं एवं उसमें भी अपनी विवशता का रोना रोते हैं। इन सब परिस्थितियों से बचने के लिए एवं क्षेत्र का एक आदर्श अनुशासन स्थापित करने हेतु केन्द्र ने क्षेत्रीय आयोजनों का एक स्वरूप बनाया है। बनाए गए ढांचे एवं शृंखलाबद्ध कार्यक्रमों के अतिरिक्त किन्हीं फुटकर कार्यक्रमों की केन्द्रीय टोली से संपन्न कराने की छूट नहीं दी जाएगी। सभी फुटकर कार्यक्रम अभी 15 अक्टूबर से पूर्व ही पूरे करा लिए जा रहे हैं।
इन आयोजनों के अतिरिक्त इस वर्ष सारे देश में लगभग बीस कार्यक्रम सम्मेलन भी संपन्न होंगे। अक्सर आयोजनों में यह देखा जाता है कि अपने सभी कार्यकर्त्ता विभिन्न स्थानों पर सक्रिय होते हैं, अमुक-अमुक जिम्मेदारियां उन्हें सौंपी हुई होती है। वे चाहकर भी उस महत्त्वपूर्ण कार्यकर्त्ता गोष्ठी में शामिल नहीं हो पाते, जिसे केन्द्रीय प्रतिनिधि संपन्न कर रहे हैं। सुनने वाले वही आम जनता के सदस्य अथवा जिम्मेदारी न निभा सकने वाले परिजन होते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि इस वर्ष के आयोजनों में गोष्ठियाँ नहीं होंगी। चार दिन के इन प्रज्ञोपनिषद्-यज्ञ-प्रज्ञापुराण कथा प्रधान आयोजनों में कार्यकर्त्ताओं की सुविधानुसार ऐसा समय रखा जाएगा जिसमें जिम्मेदार स्तर के सभी कार्यकर्त्ता केन्द्रीय प्रतिनिधि से मिल लें, जोनल स्तर पर एक या दो बड़े कार्यकर्त्ता सम्मेलन दो दिवसीय आयोजन के रूप में इसलिए रखे जा रहे हैं ताकि आँदोलनों की भावी कार्ययोजना की, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में भागीदारी की विस्तार से चर्चा कर संकल्प लिए जा सकें।
इस वर्ष विगत साल की ही तरह महिला जागरण की टोलियाँ निकलेंगी। उनकी संख्या माँग के अनुरूप व यहाँ की परिस्थितियों को देखते हुए निर्धारित की जाएगी। आयोजनों की एकरूपता रखते हुए छह सदस्यीय चार दल, चार दिवसीय आयोजन एवं तीन दिवसीय महिला सम्मेलन सहित आयोजनों की कुल संख्या अभी एक सौ आठ रखी गई है। संभावित स्थानों के चयन भी कर लिए गए हैं। यह संख्या कम या ज्यादा भी हो सकती है।
आयोजन स्थलों का चयन इस पर निर्भर करता है कि जिस स्थान से माँग आ रही है वहाँ समुचित तैयारी पहले से है कि नहीं? अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान पत्रिका के सुनिश्चित संख्या में सदस्य पहले से वहाँ बना लिए गए हैं कि नहीं? प्रयाज के रूप में क्षेत्रीय छोटे-छोटे कार्यक्रम वहाँ पहले से संपन्न हो चुके हैं कि नहीं, ज्ञानघट कितने सक्रिय हैं वह कितने संकल्पित? पुराने दीक्षित परिजनों, संस्कारों से जुड़े परिजनों से संपर्क बन सका या नहीं? सातों आँदोलनों में कुछ गति आई या नहीं? यदि आई तो उपलब्धियाँ क्या-क्या हैं? उन सभी का पर्यवेक्षण करके ही यह आयोजन दिए जाएंगे।
रूपरेखा- चार दिवसीय आयोजनों की रूपरेखा इस प्रकार है- प्रथम दिन प्रातः स्थानीय स्तर पर शोभायात्रा का संचालन। टोली का पूर्व के स्थान से पहुँचना, टोली में कुछ छह सदस्य (दो नायक, एक सहायक, एक गायक, एक वादक, एक चालक) होंगे। संध्या 7 से − तक केन्द्रीय प्रतिनिधि द्वारा कार्यक्रम का स्वरूप व गुरुसत्ता के संदेश के साथ भावी तीन दिनों के अनुशासनों का स्वरूप समझना। दूसरे दिन प्रातः 55.3 से 6.3 ध्यान-साधना टेप द्वारा संपन्न कराई जाएगी। 6.3 से 7.3 का समय योग-व्यायाम एवं योग प्रधान परामर्श हेतु रखा गया है। 7.3 से 12.3 यज्ञ का समय रहेगा।
कुँडों की संख्या, आयोजकों द्वारा की गई पूर्व तैयारी, क्षेत्रविशेष की परिस्थितियाँ एवं अधिकाधिक प्राणवान परिजनों (जो आगे चलकर समयदानी भी बन सकते हैं) की संभावित संख्या को देखते हुए निर्धारित की जाएगी। पूज्यवर के निर्देशानुसार यज्ञ कुँडी न होकर मुँडी हो, अर्थात् यज्ञीय भाव से जुड़ने वाले समर्पित परिजनों की भागीदारी हमारा प्रधान लक्ष्य हो न कि कुँडों की संख्या। ये यज्ञ 24 कुँडीय, 51 कुँडीय एवं एक सौ आठ कुँडीय भी हो सकते हैं। यज्ञों में संस्कार अधिकाधिक संपन्न हों, यह ध्यान हमारे परिजन रखेंगे।
दोपहर दो बजे तक भोजनावकाश, उसके बाद अपराह्न 2 से 4 बजे तक साधना-संगठन आँदोलन प्रधान गोष्ठियाँ होगी। भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा और उसके अनुयाज, रचनात्मक आंदोलन की रूपरेखा संबंधी चर्चाएँ भी इसी समय कर ली जाएँगी। सायंकाल प्रज्ञोपनिषद् प्रधान ऋषि संदेश मंच से प्रतिनिधियों द्वारा प्रसारित होगा। यह इस वर्ष की विशिष्टता होगी। परमपूज्य गुरुदेव के विराट वाङ्मय में प्रज्ञोपनिषद का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। सूत्र रूप में किए गए अध्यात्म के इन मार्मिक प्रतिपादनों को विज्ञानसम्मत ढंग से तथा रुचिकर दृष्टाँतों-उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया जाएगा।
तीसरे दिन दोपहर भोजन तक यथावत क्रम रहेगा। भोजनोपराँत दीपयज्ञ की तैयारी एवं कार्यकर्त्ताओं-आगंतुकों से भेंट-परामर्श का क्रम चलेगा। सायं 7 से − तक विराट् दीप महायज्ञ संपन्न होगा, जिसमें देवसंस्कृति विश्वविद्यालय ज्ञानघट स्थापना के संकल्प कराए जाएंगे।
चौथे दिन प्रातः स्वल्पाहार तक क्रम यथावत रहेगा। 8 से 12.3 यज्ञ एवं पूर्णाहुति का क्रम संपन्न होगा। आम जनता से केन्द्रीय टोली की भागीदारी इसी के साथ पूरी हो जाएगी। भोजनावकाश के बाद टोली के सदस्य स्थानीय कार्यकर्त्ताओं, ट्रस्टीगणों, आँदोलन समूह के कार्यकर्त्ताओं से मिलते रहेंगे तथा 7 से − संध्या को समाधानपरक गोष्ठी लेंगे। कार्यक्रम का अनुयाज्ञ कैसे हो? स्वस्थ समीक्षा कर भविष्य की कार्ययोजना कैसे बनाई जाए? यह चर्चा स्थानीय स्तर के कार्यकर्त्ताओं के मध्य कर रात्रि विश्राम के बाद पाँचवे दिन प्रातः टोली अगले क्रम के लिए रवाना हो जाएगी।
इसी प्रकार दो दिवसीय कार्यकर्त्ता सम्मेलनों की रूपरेखा बनाई गई है। पूर्व संध्या की वेला में आ चुके कार्यकर्त्ताओं एवं स्थानीय स्तर पर सम्मिलित परिजनों को सम्मेलन का उद्देश्य समझाया जाएगा। साथ ही विभिन्न जिलों से आए कार्यकर्त्ताओं का परिचय आदि का क्रम रहेगा। अगले दिन जो सम्मेलन का प्रथम दिन होगा प्रातः 6 से 7 बजे त्रिवेणी संगम वाला सामूहिक ध्यान संपन्न कराया जाएगा। 7.15 से 8.15 योग-व्यायाम, योग प्रधान परामर्श का क्रम रहेगा। 8.15 से −.15 जलपान −.3 से 11.3 तक प्रथम बैठक संपन्न होगी। इसमें चर्चा का मुख्य आधार रहेगा-युग निर्माण के लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए कार्ययोजना का स्वरूप क्या होगा? जो भी जिले इस सम्मेलन में भागीदारी कर रहे हैं, उनकी भौगोलिक एवं सामाजिक स्थिति क्या है? इस स्थिति को दृष्टिगत रख कितने समयदानी, समर्थ परिजनों एवं संगठित इकाइयों की जरूरत पड़ेगी, वर्षवार लक्ष्य चरणबद्ध रूप से क्या रखा जाए? आँदोलनों में परस्पर सहभागिता तथा अन्यान्य संगठनों से अपना संबंध किस तरह हो, यह चर्चा भी इसमें होगी।
भोजनावकाश के बाद समूह चर्चा जिलेवार होगी। व्यक्तिगत भेंट-परामर्श का क्रम इसके बाद सात बजे तक चलता रहेगा। सात से नौ सायंकाल उपलब्धियों पर चर्चा, क्षेत्रवार संगठनों की प्रस्तुतियाँ तथा केन्द्रीय प्रतिनिधियों द्वारा देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के विराट लक्ष्य एवं सप्त आँदोलनों को स्वरूप को सामने रखते हुए मार्गदर्शन दिया जाएगा।
सम्मेलन के दूसरे दिन प्रातः −.15 तक क्रम यथावत रहेगा। −.15 से 11.15 तक जिलेवार संगठनों की स्थिति क्या हैं? कहाँ तक विकसित करने की योजना है, आगे क्या-क्या आँदोलन व संकल्प लेने जा रहे हैं, इस पर समूह चर्चा होगी। यह भी निर्धारण होगा कि देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के लिए ज्ञानघटों की स्थापना से लेकर अन्य कार्यों में परिजन जिलेवार सहभागिता किस प्रकार करेंगे। आँदोलनों के लिए वे क्या करेंगे, इस पर चर्चा एवं विगत दिन की गोष्ठी निष्कर्षों पर चर्चा होगी। भोजनावकाश के बाद अपराह्न 2 से 4 बजे तक हर जिले के लिए निर्धारित कार्ययोजना के अनुसार पहले चरण के (एक वर्ष में पूरे किए जाने वाले) संकल्पों का स्वरूप निश्चित किया जाएगा। उसमें समर्थ समयदानियों, सहयोगियों की सूचियाँ, संगठन एवं आँदोलनों को पुष्ट और गतिशील बनाने के लिए जिम्मेदार परिजनों का निर्धारण, मंडलों, संगठन समूहों, समन्वय समितियों के विकास-विस्तार के लक्ष्यों आदि का सुनिश्चित निर्धारण होगा। मंच पर स्थापित देव प्रतीकों, गुरुसत्ता, कलश प्रज्वलित (पाँच या अधिक) दीपकों की साक्षी में भाव भरे वातावरण में विधिवत संकल्प कराए जाएंगे। इसके बाद सुदूर क्षेत्रों से आए अपने-अपने स्थान को रवाना हो सकते है। 6.3 से 8.3 के बीच दीपयज्ञ संपन्न होगा, जिसमें वे चाहें तो भाग ले सकते हैं। स्थानीय स्तर पर सभी परिजनों की भागीदारी रहेगी ही। संकल्प की सार्वजनिक घोषणा एवं युगऋषि के संदेश के साथ सम्मेलन का दीप महायज्ञ के माध्यम से समापन हो जाएगा। ये सभी सम्मेलन विभिन्न आयोजनों की शृंखला के बीच रखे जा रहे हैं, जिनमें चल रही टोली के अतिरिक्त केन्द्र के वरिष्ठ प्रतिनिधिगणों की भागीदारी भी दो दिन के लिए रहेगी। जिस जिले में महायोजन होगा, उसमें सम्मेलन नहीं होगा, न ही कोई अन्य विराट आयोजन। सम्मेलन व आयोजन के बची दो समीप के स्थानों में परस्पर दो-तीन माह का अंतर रहेगा।
सामान्यतया विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों की माँग क्षेत्र से रहती है। ये यज्ञायोजन प्रधान होते हैं अथवा प्रज्ञा पुराण की कथा के निमित्त होते हैं। इनके अलावा योग प्रशिक्षण, प्रबुद्ध वर्ग गोष्ठियाँ, सामूहिक विवाह संस्कार, प्राण प्रतिष्ठा आयोजन आदि के निमित्त भी अलग से कार्यक्रम माँगें जाते हैं। प्रयास यह किया जा रहा है कि इन विविध माँगों को छह सदस्यीय टोली द्वारा संपन्न किए जा रहे इन आयोजनों-सम्मेलनों में ही समाहित कर लिया जाए। छोटे-छोटे आयोजन व उपर्युक्त में से भी काफी कुछ स्थानीय स्तर पर भी संपन्न किया जा सकता है। इनके लिए केंद्र की टोली अब अपवाद रूप में ही कहीं भेजी जाएगी। आशा है कि अपना विराट परिवार इस क्षेत्रीय अनुशासन का क्रम इस वर्ष बना लेगा, ताकि आराध्य सत्ता के दिव्य स्वप्नों को आगामी वर्षों में पूरा किया जा सके।
क्षुद्रता जीकर, यहाँ कोई महान हुआ नहीं, ‘सत्यवानों’ को वरण करती रहीं ‘सावित्रियाँ’। टसतसेवी, प्राण कोई, ‘सत्यवान’ हुआ नहीं। क्षुद्रता जीकर यहाँ कोई महान हुआ नहीं॥
भूलकर पुरुषार्थ, पौरुष, भाग्य का रोना लिए, पुरुष कोई इस धरा का भाग्यवान हुआ नहीं। क्षुद्रता जीकर यहाँ कोई महान हुआ नहीं॥
वेद की गरिमामयी ऊषा कहाँ से देखते, सूर्य के निकले बिना तो नवविहान हुआ नहीं। क्षुद्रता जीकर यहाँ कोई महान हुआ नहीं ॥
प्राण पाए किस तरह से भावना का रस भला, प्राप्ति से पहले मनुज मन बोधवान हुआ नहीं। क्षुद्रता जीकर यहाँ कोई महान हुआ नहीं।
-लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’
*समाप्त*