अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
अखण्ड-दीपक जो परमपूज्य गुरुदेव द्वारा सन् 1926 में प्रज्वलित किया गया था, आज भी शाँतिकुँज में प्रदीप्त है व आने वाले परिजनों को नूतन प्रेरणा का संचार करता रहता है, हम सभी को नित नये उत्साह बढ़ाने वाले संकल्पों का दायित्व उठाने की क्षमता देता है। उसी का जाग्रत ज्वलन्त, दृश्यमान रूप अखण्ड-ज्योति पत्रिका है जो पूज्यवर द्वारा आज से 57 वर्ष पूर्व स्नेह सान्निध्य से भरा भावनाशीलों का एक परिवार बनाने के लिए आरंभ की गयी थी। वह पत्रिका चेतना सत्ता के प्राण प्रवाह के रूप में सूक्ष्मजगत से ऋषि सत्ताओं की प्रेरणा से निकलती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-May
जो दस पैसे रोज देंगे उनके घर में घरेलू पुस्तकालय ‘ज्ञान मन्दिर’ की स्थापना हो जाय। यह ज्ञान मन्दिर अखण्ड-दीपक की तरह अपने क्षेत्र में नव-निर्माण का- विचार क्रान्ति का- प्रकाश फैलाते रहेंगे। कार्तिकी अमावस्या की इस सघन तमिस्रा में जबकि सूर्य और चन्द्रमा ने असहयोग ठान रखा है इन दीपकों को जलाकर दिवाली मनाई जायगी और वह दीप पर्व अपना अनुपम आदर्श प्रस्तुत करेगा। युग निर्माण के लिये अब किसी अवतार-महात्मा-देवता या स्वर्ग दूत की प्रतीक्षा में देर तक न बैठा रहना पड़ेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
अविनाशी चेतना के रूप में आत्मा सदा अजर-अमर है। परिजन हम लोगों का संयुक्त जीवन अखण्ड-दीपक का प्रतीक मानकर उसे आत्म सत्ता की साकार प्रतिमा मानते रहे। वही हम लोगों के लिए मत्स्य बेध जैसा लक्ष्यबेध करने वाले शब्दबेधी बाण की तरह आराध्य बनकर रही है। साथ ही साधना का सम्बल भी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
अब निवास के योग्य आवश्यक व्यवस्था हो गई तब हम और माताजी ने नव निर्मित शाँतिकुंज को अपनी तपःस्थली बनाया। साथ में अखण्ड-दीपक भी था। उसके लिए एक कोठरी और गायत्री प्रतिमा की स्थापना करने के लिए सुविधा पहले ही बन चुकी थी