अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-April
बलिवैश्व यज्ञ (अग्नि होत्र) नियमित उपासना व सतत् स्वाध्याय अनिवार्य शर्त के रूप में इन स्थापना के साथ जुड़े हुए तीन महत्वपूर्ण कार्यक्रम हैं। ब्रह्मकुण्ड के जल-रज के रूप में प्रतिष्ठित की साकार प्रतिमा प्रतिदिन उपासना का स्मरण करायेगी और ब्रह्मवर्चस् ब्रह्म तेजस्विता प्रदान करेगी। उपासना परिवार के प्रत्येक सदस्य, महिलाओं, बालकों तक के लिए इस देवा स्थापना का अनिवार्य कृत्य है भले ही वह स्थापित प्रतीकों के नमन वंदन जितना संक्षिप्त ही क्यों न हो। देवात्मायें अपनी ब्राह्मी शक्ति को समीप पाकर बिगड़े संसार को सम्हालने आने के अपने लक्ष्य को निरंतर स्मरण रखेंगे।
बलिवैश्व पूर्ण हो जाएगा। जिन घरों में नित्य हवन की परम्परा हो, वे भी एक बरौसी में अग्नि रखकर यह कार्य अवश्य सम्पन्न करें। जहाँ रोटियाँ गैस पर पकती हों, वे छोटी-छोटी समिधाएँ कटी हुई रखें और मिट्टी की बरौसी में पहले उन्हें जला कर अग्नि बना लिया करें।
बलिवैश्व इस स्थापना का दूसरा अनिवार्य कृत्य है मध्याह्न भोजन से पूर्व रोटी के पाँच टुकड़े घृत और गुड़ या चीनी के साथ गायत्री मंत्र के साथ पाँच बार अग्नि में आहुति देने से बलिवैश्व पूर्ण हो जाएगा। जिन घरों में नित्य हवन की परम्परा हो, वे भी एक बरौसी में अग्नि रखकर यह कार्य अवश्य सम्पन्न करें। जहाँ रोटियाँ गैस पर पकती हों, वे छोटी-छोटी समिधाएँ कटी हुई रखें और मिट्टी की बरौसी में पहले उन्हें जला कर अग्नि बना लिया करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-May
बलिवैश्व, जप-ध्यान, श्राद्ध-तर्पण, दान-पुण्य, योगाभ्यास, तप-साधन, ब्रह्मभोज, सन्त-सत्कार, सदावर्त, जलाशय, धर्मशाला, स्मारक आदि के अनेकानेक धर्मकृत्यों का वाह्य स्वरूप भिन्न भले ही हो पर उनका मूल प्रयोजन व्यक्ति को अधिक पवित्रता एवं अधिक उदारता अपनाने की प्रेरणा प्रदान करना ही है। इन क्रिया-कुकृत्यों की सार्थकता उतनी ही आँकी जा सकती है; जितने से कि मूल उद्देश्य के पूर्ण होने में सहायता मिलती है। आत्मा की, परमात्मा की प्रसन्नता इसी तथ्य पर निर्भर है कि अपनाये गये धर्म-कुकृत्यों के सहारे आत्म-परिष्कार का लक्ष्य पूरा कर सकना किस परिणाम में सम्भव हुआ। देवता के वरदान इसी एक कसौटी पर कसकर सत्पात्रों को दिये जाते हैं कि उनने धर्म-कुकृत्यों को अपना कर अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता का कितना विकास किया। देव अनुग्रह की मात्रा और प्रतिक्रिया इसी आधार पर उपलब्ध होती है।
बलिवैश्व में की पाँच आहुतियाँ नित्य देने की विधि परम्परा में इन्हीं पंचशीलों को धारण करने और उन्हें निष्ठापूर्वक अपनाये रहने का संकल्प दुहराया जाता है।
बलिवैश्व-यज्ञ में एक आहुति अतिथि देव की भी है, कुछ अन्न नित्य उस प्रयोजन के लिए हर परिवार में निकाला जाता था। इससे पता चलता है कि उन दिनों अतिथि-तीर्थ यात्री कितने अधिक गौरवान्वित होते थे और उनकी उपयोगिता, आवश्यकता किस कदर समझी जाती थी। यह महत्व अकारण नहीं मिला था। तीर्थयात्री कष्ट साध्य प्रक्रिया अपनाकर धर्म चेतना उत्पन्न करने के लिए जो उदारता बरतते और तितीक्षा सहते थे उसी के फलस्वरूप वे अपने देव प्रयोजन में संलग्न रहने के बदले देव स्तर का आत्मसंतोष एवं लोक सम्मान प्राप्त करते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-April
बलिवैश्व यज्ञ दैनिक नित्यकर्म में सम्मिलित रखा गया है। भारतीय धर्मानुयायी का विवाह विधान दो आत्माओं की वैल्डिंग की तरह जोड़ने वाले यज्ञ कृत्य के साथ ही संपन्न होता है। पार्थिव शरीर की पूर्णाहुति चिता जलाकर अंत्येष्टि यज्ञ के रूप में ही संपन्न होती है। इन परंपराओं पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि भारतीय जीवनचर्या में यज्ञ को कितनी गहराई तक घुला मिला कर रखा गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-December
बलिवैश्वदेव अर्थात् भोजन से पहले पाँच ग्रासों की अग्नि में आहुति।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-November
बलिवैश्व यज्ञ दैनिक नित्यकर्म में सम्मिलित रखा गया है। भारतीय धर्मानुयायी का विवाह विधान यज्ञ कृत्य के साथ ही सम्पन्न होता है। पार्थिव शरीर का पूर्णाहुति चिता जलाकर अन्त्येष्टि यज्ञ के रूप में सम्पन्न होती है। इन परम्पराओं पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि जीवनचर्या में या को कितनी गहराई से घुला-मिलाकर रखा गया है। इसी पारस्परिक अविच्छिन्नता ने देव संस्कृति को यज्ञ संस्कृति की गरिमा प्रदान की है।
बलिवैश्व यज्ञादि का क्रम चला।
बलिवैश्वदेव का उल्लेख करके यह बात समझायी जा चुकी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
बलिवैश्व की परम्परा है, जिनसे बनता है वे उसे निबाहते भी हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
बलिवैश्व करने वाला व्यक्ति कभी भी परमसत्ता को अखाद्य नहीं खिलाता अतः क्रमशः उसकी आदतें धीरे-धीरे ठीक होती चली जाती हैं व उसी अनुपात में स्वस्थता व चिन्तन में सतोगुणी प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि होती चली है।
बलिवैश्व यज्ञ (अग्निहोत्र जिसमें भोजन के प्रारंभिक पाँच ग्रास गायत्री मंत्राहुति के साथ यज्ञ भगवान को समर्पित किए जाते हैं)संपन्न होता है, उनके घरों में रोगों का आक्रमण कम ही होता है। इस प्रक्रिया के बाद भोजन प्रसाद बन जाता है एवं जो भी उसे ग्रहण करता है, उसके संस्कारों को बल मिलता है। यह मात्र एक पौराणिक मान्यता नहीं, इस संस्थान द्वारा व्यापक स्तर पर जाँचा परखा गया एक ऐसा तथ्य है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। बलिवैश्व करने वाला व्यक्ति कभी भी परमसत्ता को अखाद्य नहीं खिलाता अतः क्रमशः उसकी आदतें धीरे-धीरे ठीक होती चली जाती हैं व उसी अनुपात में स्वस्थता व चिन्तन में सतोगुणी प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि होती चली है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-December
बलिवैश्वदेव भी नहीं हो पाता।
बलिवैश्व देव यज्ञ की ही देन है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-July
बलिवैश्वदेव करने तक की असमर्थता हो तो मात्र जल से हवन कर लेना चाहिए।
बलिवैश्व- दैनिक संध्यावन्दन की तरह प्रातः सायं जो आहुतियाँ दी जाती हैं उन्हें अग्निहोत्र कहते हैं। प्रातः यज्ञ को सूर्योपासन और सायंकालीन को अग्नि साधना कहा गया है।
बलिवैश्वदेव करता हूँ।
बलिवैश्वदेव की इस शास्त्रीय परम्परा के पीछे एक ही तथ्य समझ में आता है कि समाज में बहुत से प्राणी ऐसे है जिन्हें अपने जीवन निर्वाह योग्य साधनों के लाले पड़े होते हैं। ऐसे प्राणियों की भोजन-व्यवस्था हेतु साधन-सम्पन्नों को उदारता बरतनी पड़ती है। बलि वैश्वदेव द्वारा ऐसे ही निरीह प्राणियों को पोषण प्राप्त होता है। हवन के सूक्ष्म प्राणयुक्त अंश से उन्हें पोषण मिलता है।
बलिवैश्वदेव के पीछे उसके कर्त्ता के यही भाव दिखाई पड़ते हैं-
बलिवैश्व किए हुए अकेले भोजन करने वाला ‘पाप’ खाता है अर्थात् पाप का भागी बनता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-February
बलिवैश्व आदि आहुतियाँ समर्पित की जा सकें, तो इसके सकारात्मक परिणाम
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-November
बलिवैश्व का विधान कुछ बड़ा है और उसे पूरा करने के लिए संस्कृत भाषा के निर्धारित मन्त्रों को भी याद करना पड़ता है। पर उतना न बन पड़े तो उसे अति संक्षेप में रसोई पकाने वाली महिला भी बिना किसी कठिनाई के पूरा करती रह सकती है।
बलिवैश्व की उपयोगिता एवं विधि−व्यवस्था का निर्देश किया गया है। शांखायन, गुह्य सूत्र के अध्याय (2.) काण्ड 17, सूत्र 4 में कहा गया है कि जो प्रायः सायं वैश्व देव यज्ञ करते हैं वे लक्ष्मी, दीर्घजीवन, यश तथा सुसन्तति प्राप्त करते हैं।
बलिवैश्व को आवश्यक कर्त्तव्यों की श्रेणी में गिना गया है और उन्हें कर लेने के उपरान्त तब भोजन ग्रहण करने का अनुशासन बनाया गया है। साथ ही उसकी परिणति का प्रतिफल भी बहुत आकर्षक बताया गया है।
बलिवैश्व में जिन पाँच आदर्शों का प्रतिपादन पाँच महायज्ञों के रूप में किया गया है उन्हें मानवी गरिमा को समुन्नत बनाने वाले ‘पञ्चशील’ कह सकते हैं बौद्ध धर्म में पंचशीलों का बहुत ही विस्तारपूर्वक वर्णन विवेचन किया गया है। उनका बहुत महत्व−माहात्म्य बताया गया है। इन पंचशीलों को जीवनचर्या एवं समाज व्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों से वर्गीकृत भी किया गया है। इस प्रकार पंचशीलों के वर्ग उपवर्ग प्रकारान्तर से व्यक्ति एवं विश्व समस्याओं को सुलझाने सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करते हैं।
बलिवैश्व को मात्र कृत्य ही नहीं जीवन नीति का आवश्यक अंग माना गया है और उसे कभी भी न छोड़ने के लिए कहा गया है। जबकि विशाल यज्ञ जब कभी ही होते हैं और उनका प्रयोजन भी सामयिक समस्याओं एवं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होते हैं जब कि बलिवैश्व को आवश्यक कर्त्तव्यों की श्रेणी में गिना गया है और उन्हें कर लेने के उपरान्त तब भोजन ग्रहण करने का अनुशासन बनाया गया है। साथ ही उसकी परिणति का प्रतिफल भी बहुत आकर्षक बताया गया है।
बलिवैश्व प्रक्रिया के पाँच विभागों को पाँच ‘महायज्ञ’ कहा गया है। विशाल आकार−प्रकार से अग्निहोत्रों को जहाँ मात्र ‘यज्ञ’ नाम से पुकारा गया है वहाँ कुछ मिनटों में पूरी हो जाने वाली क्रिया को जरा-सी सामग्री लगने वाली क्रिया को महायज्ञ क्यों कहा गया? इसका सीधा−सा उत्तर है कि बलिवैश्व को मात्र कृत्य ही नहीं जीवन नीति का आवश्यक अंग माना गया है और उसे कभी भी न छोड़ने के लिए कहा गया है। जबकि विशाल यज्ञ जब कभी ही होते हैं और उनका प्रयोजन भी सामयिक समस्याओं एवं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होते हैं जब कि बलिवैश्व को आवश्यक कर्त्तव्यों की श्रेणी में गिना गया है और उन्हें कर लेने के उपरान्त तब भोजन ग्रहण करने का अनुशासन बनाया गया है। साथ ही उसकी परिणति का प्रतिफल भी बहुत आकर्षक बताया गया है।
बलिवैश्व के पाँच महायज्ञों में जिन पंचशीलों की ओर संकेत हैं उन्हें अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में प्रमुख स्थान देना चाहिए। समग्र सुख शान्ति का यही मार्ग है।
बलिवैश्व को भोजन से पूर्ण करने का विधान है इसलिए वे इसे आसानी से कर सकती हैं। चूल्हे में से पहली बनी रोटी के एक−एक टुकड़े को घी और शकर में मिला कर गायत्री मन्त्र बोलते हुए पाँच आहुतियों के रूप में होम देने की क्रिया जहाँ तनिक−सा समय और तनिक−सा वातावरण धार्मिक बनने की दृष्टि से उसका महत्व असाधारण है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-September
बलिवैश्व की परम्परा है, जिनसे बनता है वे उसे निबाहते भी हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-April
बलिवैश्व के रूप में कर ली जाए; पर उस माध्यम से इस तथ्य का स्मरण किया जाता है कि अपने खाने से पहले पिछलों की अपनी कमाई में साझेदारी स्वीकार की जाए। सत्प्रयोजनों की सहायता करने में यदि अपने ग्रास कम करने पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहा जाए। पेट भरना आवश्यक है। किंतु उससे भी बड़ी बात है, पारमार्थिक भावनाओं को जीवित रखना। इसके लिए प्रतीक रूप में कुछ क्रिया-कृत्य करते रहा जाए ताकि दायित्वों का विस्मरण न होने पाए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-January
बलिवैश्व धर्म सभी को यज्ञ कहा है, श्रीमद्भागवत् गीता में भी द्रव्य यज्ञ तपोयज्ञ, योग-यज्ञ, स्वाध्याय यज्ञ, प्राणायाम यज्ञ तथा ज्ञान यज्ञ की ओर संकेत करके उनके अभ्यासियों को “सर्वेघते यज्ञ विदः” कहा गया है, बृहदारण्यक के पंचांग विद्या प्रकरण में यज्ञ के अर्थ को और अधिक व्यापकता दे दी गई।
बलिवैश्व-देव आदि के लिए अनेक विद्वान इन्हें उपयोग में लेते हैं।
बलिवैश्वदेव यज्ञ (गाय बैल, अश्व, श्वानादि पशुओं से सेवा लेने के फलस्वरूप जो हमने उन्हें कष्ट पहुँचाया है उसका प्रत्युपकार करने के लिए उनको प्रथम खिलाना) सम्मिलित है। इन पञ्च महायज्ञों में देवयज्ञ का सम्बन्ध हवन यज्ञ में है, और हवन यज्ञ का संबंध हमारे व्यक्तिगत भौतिक जीवन से विशेष है। यद्यपि हवन का प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर विशेष पड़ता है, परन्तु परोक्ष रूप से यह हमारे सारे जीवन को प्रभावित करता है। हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के इस व्यापक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए ही कहा गया है कि ‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’ अर्थात् शरीर ही सब प्रकार के धर्मों की सिद्धि का साधन है। और शरीर को स्वस्थ रखने का साधन हवन यज्ञ है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
बलिवैश्व, दीपयज्ञ, सामूहिक यज्ञायोजन।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-November
बलिवैश्व आदि द्वारा नित्य अग्नि की उपासना करते हैं, वे ओजस्, तेजस् एवं वर्चस् का लाभ प्राप्त करते है। अग्निकोण में दीप प्रज्वलित रखने, रसोईघर में सतत् अग्नि जलाए रखने व उसे न बुझने देने को शास्त्रों ने इसीलिए शुभदायक बताया है। यदि भवन में अग्निकोण का समुचित सदुपयोग किया जा सके तो जीवन में प्रगति-उन्नति तो होती है, व्यक्तित्व भी आकर्षक एवं ओजस्वी-तेजस्वी बनता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-October
बलिवैश्व की तथा कथा−कहानियों की परंपरा पूरे उभार पर थी। पहली रोटी गो−ग्रास की बच्चों में परमार्थ भावना का बीजारोपण करती है। बलिवैश्व से देवत्व के प्रति समर्पण का पाठ पढ़ाया जाता है। षोडश संस्कार बाल मनोविज्ञान का अति उच्चस्तरीय निर्धारण कहा जा सकता है। सड़क के हर मोड़ पर, चौराहे पर दिशा−निर्देश के बोर्ड लगे होते हैं, ताकि यात्रियों और वाहनों को निर्धारित दिशा की राह पकड़ने में सुविधा हो।
बलिवैश्व से देवत्व के प्रति समर्पण का पाठ पढ़ाया जाता है। षोडश संस्कार बाल मनोविज्ञान का अति उच्चस्तरीय निर्धारण कहा जा सकता है। सड़क के हर मोड़ पर, चौराहे पर दिशा−निर्देश के बोर्ड लगे होते हैं, ताकि यात्रियों और वाहनों को निर्धारित दिशा की राह पकड़ने में सुविधा हो। संस्कारों को भी इसी तरह का उच्चकोटि का मार्गदर्शक समझना चाहिए, बल्कि इससे अनेक गुना श्रेष्ठ।