अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-June
तत्त्वबोध होने पर संबद्ध व्यक्तियों तथा समीपवर्त्ती क्षेत्र में फैली हुई दुष्प्रवृत्तियाँ आक्रमणकारी, क्रोध, उद्वेग, द्वेष और प्रतिशोध उत्पन्न नहीं करतीं; वरन शांतिपूर्वक सुव्यवस्थित रीति से विकृतियों के सुधारक्रम में जुट जाने की प्रेरणा करती हैं। डॉक्टर रोग को मारता है, रोगी को बचाता है। विवेकवान पाप को मिटाता है और पापी को बचाता है, जबकि अविवेकी मस्तिष्क रोग और रोगी में अंतर न करके, जहाँ भी प्रतिकूलता दीखती है वहीं आमक्रणकारी बनकर मार-काट फैलाता है। वह भूल जाता है कि कीचड़ को कीचड़ से नहीं धोया जाता, सफाई तो स्वच्छ जल से होती है। क्रोध से नहीं, संतुलित सुधार-प्रक्रिया अपनाने से ही विकृतियों का समाधान होता है।
तत्त्वबोध की, पौने चार से साढ़े चार तक वाली पृथक्करण साधना की पुनरावृत्ति करनी चाहिए। शरीर आत्मा से पृथक हो गया। मरी हुई काया चारपाई पर पड़ी है। चारों पाय चार संबंधी हैं, जो उसे जलाने ले जा रहे हैं। आत्मा दूर खड़ा इस मरण को देख रहा है।
तत्त्वबोध भी कहते हैं। ब्रह्मविद्या का समग्र ढ़ाचा इन्हीं दो धाराओं की सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक विधि-व्यवस्था समझाने के लिए खड़ा हुआ है। आत्मबोध के अंतर्गत आत्मसत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म, चिंतन एवं कर्त्तव्य की वस्तुस्थिति समझी-समझाई जाती है और तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार एवं समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निधारण किया जाता है। अब तक जो भेड़िया धसान जैसा अव्यवस्थिति एवं अस्त-व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी-विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित-सुसंचालित किया जाता है।
तत्त्वबोध की दोनों साधनाओं का समन्वय है। तीन से पौने चार, पौन घंटा— आत्मबोध। पौने चार से साढ़े चार, पौन घंटे— तत्त्वबोध। यों इन दोनों साधनाओं का विधि-विधान और उपक्रम पृथक-पृथक है, पर बारीकी से देखा जाए तो यह दोनों एक ही लक्ष्य के दो पक्ष हैं। एकदूसरों पर अन्योन्याश्रित हैं— एकदूसरे के पूरक है।
तत्त्वबोध ही दूसरा चरण है। आत्मा के साथ शरीर का, मन का, परिवार का क्या संबंध है, उसी का पुनर्निर्माण समझना चाहिए। ऋतंभरा प्रज्ञा प्राप्त हो गई और ब्रह्मज्ञान का जो महात्म्य बनाया गया है, वह समग्र रूप में करतल गत हो गया।
तत्त्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष हैं। लययोग से आनंदमयकोश बिंदुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमयकोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमयकोश की जागृति होती है। इसी साधना में पाँच चक्र भी जागृत होते चले जाते हैं।
तत्त्वबोध के आधार पर अपनी मान्यताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन करने की प्रेरणाऐं भरी पड़ी हैं।
तत्त्वबोध के आधार पर सहज ही विचार-क्षेत्र में उत्कृष्टता और क्रिया-क्षेत्र में आदर्शवादिता भर सकती है। फलस्वरूप बाह्यजीवन में स्वर्गीय वातावरण तथा अंतःजीवन में आनंद और संतोष से मुक्ति जैसा आलोक ज्योतिर्मय हो सकता है।
तत्त्वबोध। जीवन तथ्य की गरिमा, गंभीरता तथा यथार्थता को समझना, अनुभव करना ही विज्ञान है। दर्पण के माध्यम से अपने गर्हित और एक महत्तम स्तर का विचार- विष्लेषण किया जाता है और आत्मसत्ता को उच्चस्तरीय स्थिति तक पहुँचाने के लिए उभारा-उगाया जाता है। आत्मदेव को इष्टदेव में परिणत करने की आत्मबोध-साधना ब्रह्मविद्या के उस महान प्रयोजन को पूरा करती है, जिसमें भूमा, ऋतंभरा एवं आत्मजागृति के आधार पर भवबंधन कटने और जीवनलक्ष्य प्राप्त होने की प्रेरणा दी गई है। तत्त्वज्ञान में शरीर और मन के प्रथक्करण का धारण है।
तत्त्वबोध की उभयपक्षीय चेतना का उद्भव जिस अंत:करण में होगा, उसे विज्ञानमयकोश का सफल साधक ठहराया जा सकेगा ।
तत्त्वबोध की प्रतिक्रिया ऋतंभरा प्रज्ञा को उपलब्ध होने के रूप में सामने आती है और व्यक्ति भ्रांतियों के भवबंधनो से मुक्त होकर समुन्नत जीवनधारा के साथ प्रवाहित होता हुआ; अंततः आनंद और ऐश्वर्य उपलब्ध करता है।
तत्त्वबोध। यों इन दोनों साधनाओं का विधि-विधान और उपक्रम पृथक-पृथक है, पर बारीकी से देखा जाए तो यह दोनों एक ही लक्ष्य के दो पक्ष हैं। एकदूसरों पर अन्योन्याश्रित हैं— एकदूसरे के पूरक है।
तत्त्वबोध। शरीर और आत्मा का पृथक्करण। अपने शरीर का मृतक स्थिति में कुत्ते, कौओं, कीड़ों द्वारा खाया जाना, जलाया, गाड़ा जाना देखना। अपने को किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर यह सब दृश्य देखने की स्थिति में रखना। शरीर और मन को आत्मा का वाहन-उपकरणमात्र समझना।
तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार एवं समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निधारण किया जाता है। अब तक जो भेड़िया धसान जैसा अव्यवस्थिति एवं अस्त-व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी-विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित-सुसंचालित किया जाता है। अध्यात्म जगत की यही दो धाराएँ— पवित्र गंगा, यमुना कही जाती हैं। इन्हीं का संगम तीर्थराज प्रयाग है, जिसमें स्नान करने से परम-पुरुषार्थ का पुण्यफल प्राप्त होता है।
तत्त्वबोध की साधना है। आत्मा का स्वरूप समझने के बाद दूसरा कदम यही उठाना पड़ता है कि संसार के साथ अपने संबंधो का पुनर्निर्धारण करें। इसके लिए सुधार का पहला प्रयास आत्मा और काय-कलेवर के संबंधो में उत्पन्न हुई भ्रांति के निवारण के रूप में आरंभ करना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-November
तत्त्वबोध कराऊँगा।” अष्टावक्र सच्चे अभीप्सु थे। जिज्ञासा की प्रचण्ड वुि उनके अन्तः-करण को जलाए दे रही थी। महर्षि वदानय की बातें महयाचल की शीतल बयार और वर्षा की ठण्डी फुहारों की भाँति लगीं। उन्होंने बड़ी प्रसन्नता और श्रद्धा के साथ सिर नवाकर उनकी बात स्वीकार कर ली एवं यात्रा के लिए चल पड़े।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-December
तत्त्वबोध प्राप्त कर लिया था। वे सर्वस्व गँवाकर भी सर्वोपरि सत्ता को उपलब्ध कर लेने के कारण धन्य अनुभव कर रहे थे। आज उन्हें ईश्वर-दर्शन हुआ था। साक्षात्कार में प्रभु ने कहा- पूर्व जन्म के शेष बचे भोगों को इस कष्ट के बहाने भुगताकर समाप्त करा दिया गया। अब तुम मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-November
तत्त्वबोध की साधना से यह निरीक्षण अतिसहज और सुगम हो जाता है। इस सहज व सरल साधना से प्रत्येक दिन अपने नये जीवन एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव करना होता है। इससे हमें प्रतिदिन अपने कार्यों के मूल्याँकन के साथ-साथ अपने व्यक्तित्व की गहराई में झाँकने का अवसर मिलता है। हर दिन एक नये संकल्प के साथ नया कार्य प्रारम्भ होता है जो सफल व्यक्तित्व की सम्मोहक विशेषता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-December
तत्त्वबोधानंद ने जो सावधानी बताई थी, श्रीराम ने उसका पूरा ध्यान रखा। फिर भी कुछ स्थानों पर कठिनाई आई। पाँव ठीक से जमाने पर भी गहराई में धँसता प्रतीत हुआ। फिर अगले ही क्षण लगा कि जैसे कोई बाँह पकड़कर सँभाल रहा है।
तत्त्वबोधानंद ने बता दिया था, एक पग आगे बढ़ाओ तो बर्फीली सतह पर धीरे से कदम रखना। इतने धीरे कि जैसे फूल रख रहे हो। पाँव टिकाने से पहले भी यही सावधानी रखना। छड़ी का उपयोग भी कर सकते हो, लेकिन अकेले छड़ी के भरोसे ही मत रहना। शरीर का पूरा वजन उठाते हुए पाँव ठीक से टिक न जाए, तब तक अगला कदम न उठाना।
तत्त्वबोधानंद से भेंट हुई। उन्होंने एक छोटी-सी कुटिया बना रखी थी, लेकिन उसमें कम ही रहते थे। ज्यादा समय तुषार आच्छादित तपोवन में ही रहते। खुले में शरीर पर एक वस्त्र लिपटा होता। कुटिया का उपयोग यदा-कदा आने वालों के लिए होता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-January
तत्त्वबोध- प्रातः जागरण के तुरन्त बाद भगवान् का स्मरण करते हुए यह सोचना कि प्रभु कृपा से हमें यह एक दिन का जीवन मिला है। इसके सार्थक उपयोग के लिए संकल्पित होना। इसी तरह रात्रि सोते समय दिन भर के कामों की समीक्षा करते यह चिन्तन करते हुए सोना कि हमारा समूचा अस्तित्त्व प्रभु में समर्पित-विसर्जित एवं विलीन हो रहा है। प्रत्येक दिन अपने नए जीवन का एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव करना ही आत्मबोध-तत्त्वबोध की साधना का सार है।
तत्त्वबोध की साधना का सार है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-October
तत्त्वबोध भी तनाव मुक्ति के लिए रामबाण साधन है। ईश्वर के प्रति गहन आस्था एवं तत्त्वबोध-आत्मबोध की साधना से मनःस्थिति इतनी सक्षम-समर्थ हो जाती है कि वह किसी भी परिस्थिति से तालमेल कर अपने अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकती है। यही तनाव का एकमात्र निदान है और उच्चस्तरीय जीवन का पाथेय पथ भी है।
तत्त्वबोध-आत्मबोध की साधना से मनःस्थिति इतनी सक्षम-समर्थ हो जाती है कि वह किसी भी परिस्थिति से तालमेल कर अपने अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकती है। यही तनाव का एकमात्र निदान है और उच्चस्तरीय जीवन का पाथेय पथ भी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-March
तत्त्वबोध की ज्ञान धारा जीवन के हर क्षेत्र का सिंचन करती और उसे हरितमा, शोभा , सुषमा युक्त बनाती हैं । इस आनन्द को आत्म-विस्तार को सरसता के रूप में अनुभव किया जाता है। परमेश्वर की विवेचना ‘रसो वै सः के रूप में की गई है। यह ‘रस’ इन्द्रिय उत्तेजना से मिलने वाले उन्माद जैसा नहीं, वरन् ‘प्रेम’ जैसा सौम्य एवं सात्विक है। इसे भक्ति-रस भी कहा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
तत्त्वबोध का चिन्तन, मनन नित्य का संध्या वन्दन समझा जा सकता है। इसमें फुरसत न मिलने जैसा कुछ बहाना करने की भी गुँजाइश नहीं है। आँख खुलते ही जीवन का महत्त्व, उद्देश्य, स्वरूप एवं उपयोग स्मरण किया जाय। इस अनुदान के पीछे ईश्वर की अपेक्षा तथा अपने कन्धे पर आई जिम्मेदारी को यदि समझा जा सके तो एक-एक क्षण का- क्षमताओं के एक-एक कण का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात ही सामने होगी। उठने से लेकर सोने तक के समय विभाजन, चिन्तन तथा सतर्कताओं का क्रम बना लेना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-June
तत्त्वबोध कहते हैं। यदि इतना भर ठीक तरह जान लिया जाय तो समझना चाहिए कि ज्ञान साधना का उद्देश्य पूरा हो गया।
तत्त्वबोध की दोनों साधनाओं का प्रयोजन पूरा करता है। प्रातःकाल नींद खुलते ही हर रोज यह भावना जागृत करनी चाहिए कि आज हमारा नवीनतम जन्म हुआ है और वह सोते समय तक एक रोज के लिए ही है। इसे हर दृष्टि से श्रेष्ठतम और आदर्श रीति-नीति अपनाते हुए जिया जाय। इसके लिए शैया त्याग से लेकर रात को सोते समय तक का कार्यक्रम बनाना चाहिए। दिनचर्या ऐसी हो जिसमें आलस्य के लिए तनिक भी गुँजाइश न हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-November
तत्त्वबोध की द्विविधि ध्यान धारणा से ब्रह्मयोग की साधना बनती है। यह सब कैसे किया जाय यह पाँच घण्टे प्रतिदिन की भाव साधना में प्रत्यावर्तन सत्र के छात्रों को सिखाया और कराया जाता रहा है। साथ ही प्रवचनों के माध्यम से चिन्तन एवं कर्तृत्व को अध्यात्म दर्शन के अनुरूप कैसे ढाला जाय—व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद का समन्वय कैसे किया जाय इसकी विशद् एवं सुबोध चर्चा की जाती रही है। प्रत्यावर्तन सत्रों की अवधि थोड़ी ही रखी गई थी क्योंकि उस समय आवश्यक जानकारियाँ देना ही अभीष्ट था। साधना का शुभारम्भ मात्र इस अवधि में कराया गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-July
तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक सम्बन्धों एवं कर्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ सम्बन्ध बनाते हुए परिवार तथा समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अध्यात्म जगत की यह दो धाराएँ-पवित्र गंगा-यमुना कही जाती हैं। इनका संगम तीर्थराज प्रयाग है, जिसमें स्नान करने से परम पुरुषार्थ का पुण्यफल प्राप्त होता है।
तत्त्वबोध की दोनों साधनाओं का समन्वय करना पड़ता है। इन दोनों साधनाओं का लक्ष्य एक ही है। दोनों एक-दूसरे पर अन्योऽन्याश्रित हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके लिए ध्यानमुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यानपूर्वक देखना चाहिए और उसका दार्शनिक विवेचन-विश्लेषण गंभीर मनःस्थिति में करना चाहिए। यही आत्मबोध की प्रत्यक्ष विधा है।
तत्त्वबोध भी कहते हैं। ब्रह्मविद्या का समग्र ढाँचा इन्हीं दो धाराओं की सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक विधि-व्यवस्था समझाने के लिए खड़ा हुआ है। आत्मबोध के अंतर्गत आत्मसत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म, चिन्तन एवं कर्तव्य की वस्तुस्थिति समझी-समझाई जाती है और तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक सम्बन्धों एवं कर्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ सम्बन्ध बनाते हुए परिवार तथा समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अध्यात्म जगत की यह दो धाराएँ-पवित्र गंगा-यमुना कही जाती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-June
तत्त्वबोध से एकीकृत करने का प्रयास है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-November
तत्त्वबोध भी प्रदान किया। उनके अनुभव में आ गया कि गायत्री समस्त वेदज्ञान का सार हैं इसके प्रयोग से मानव प्रकृति का समग्र परिशोधन-परिमार्जन सम्भव एवं सुगम है। मनुष्य के आचार-विचार ही नहीं, संस्कार भी गायत्री साधना से परिवर्तित-रूपांतरित होते हैं। अन्य साधना-पद्धतियाँ, अन्य मंत्र लाभप्रद हैं, परन्तु ये लाभ तात्कालिक हैं, सामयिक हैं। इनसे चेतना आंशिक रूप से ही प्रभावित होती है, जबकि गायत्री महामन्त्र का प्रभाव शाश्वत एवं समग्र है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-January
तत्त्वबोध एवं ध्यान अभ्यास के साथ करना चाहिए। मन की प्रचण्ड संकल्प शक्ति को अभीष्ट दिशा में नियोजित किये बिना प्राण-साधना मात्र श्वास-प्रश्वास का साधारण व्यायाम और फेफड़ों की कसरत होकर रह जाती है। उससे स्वास्थ्य लाभ तो सम्भव है, किन्तु वह न तो योग है और न ही उसके द्वारा प्राण-शक्ति पर नियन्त्रण हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-July
तत्त्वबोध को हम अनुभव कर सकें, तो निश्चित रूप से यह गुरुपूर्णिमा हमारे लिए ‘सद्गुरुणाँ आश्रय’ का दुर्लभ सुयोग सिद्ध हो सकेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
तत्त्वबोध की साधना एवं तदुपराँत विश्राँति, योगनिद्रा।
तत्त्वबोध का चिन्तन तथा भगवद् भजन करना चाहिए। शिथिलीकरण एवं प्राणायाम जैसे सरल यौगिक क्रियाओं का भी अनुसरण किया जा सकता है। इन्हीं उपायों से मन को शान्त कर तनाव से मुक्त हो पाना सम्भव है। अतः ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से जीआ गया आस्था एवं श्रद्धापूर्ण जीवन और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार ही तनाव रूपी महाव्याधि के उपचार का एकमात्र प्रभावी उपाय है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-March
तत्त्वबोध की साधना करें। षट्कर्म एवं ज पके साथ ध्यान का क्रम नियमित रखें। ध्यान के लिए परमपूज्य गुरुदेव की पुस्तक ‘उपासना के दो चरण जप और ध्यान’ देखी जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
तत्त्वबोध, नादयोग, दो बार के दस साधनाक्रमों का समावेश किया गया। अंतः करण की भावभूमिका को उच्चस्तरीय बना देना ही इसका प्रधान लक्ष्य था। आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया को प्रथम दिन महत्वपूर्ण स्थान दिया गया, जिसे पूज्यवर स्वयं व्यक्तिगत परामर्श के लिए मिले 15 मिनट के समय में संपन्न करते थे। बीच में दर्पण−साधना के दौरान भावभरे गीत टेपरिकॉर्डर से साधकों को सुनाए जाते थे तथा इन्हें सुनकर वे हलके ही नहीं होते, आत्मबोध की साधना भी कर पाते थे। एक घंटे का प्रवचन दो खंडों में सुनाया जाता था।
तत्त्वबोध साधना (निर्देशों द्वारा) संपन्न होकर साधकों को योगनिद्रा एवं विश्राम में चले जाना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
तत्त्वबोध के दो अभ्यास सिखाये जाते हैं आत्मबोध प्रातःकालीन अभ्यास है। प्रातःकाल बिस्तर से सोकर जागते ही बिस्तर पर ही पूर्वाभिमुख, पालथी मार कर ध्यान मुद्रा में बैठें। तीन बार लम्बे-लम्बे श्वास लें और धीरे-धीरे साँस बाहर निकाल दें। साँस इतनी गहरी लें कि वह नाभिचक्र तक भर जाये। तीन बार यह क्रिया करने के उपरान्त अँगड़ाई लें और पुनः ध्यान मुद्रा में चले जायें अपने इष्ट को सम्मुख हुआ अनुभव करें यह नया जन्म हुआ है।
तत्त्वबोध की साधना रात्रि के समय के लिए निर्धारित है इसमें भी आत्मबोध जितना ही 15 मिनट का समय लगता है। रात्रि को सोने से पूर्व शैया पर पड़े-पड़े जीवन के अन्त का स्मरण करें। मृत्यु को अनिवार्य अतिथि मानें। उसके उपरान्त ईश्वर के दरबार में पहुँचने और जीवन सम्पदा के सदुपयोग-दुरुपयोग के सम्बन्ध में लेखा-जोखा माँगे जाने की बात सोचें। बरते हुए प्रमाद की परिणति निकृष्ट योनियों में भटकने, यन्त्रणाएँ सहने और पतन पराभव के गर्त में गिरने की यथार्थता को समझें।
तत्त्वबोध साधना निद्रा से पूर्व पन्द्रह मिनट तो चलना ही चाहिए। उसमें कल्पना को चिन्ह पूजा जैसी विडम्बना नहीं यथार्थता जैसी अनुभूति रहनी चाहिए।
तत्त्वबोध । नित्यकर्म से निवृत्त होकर जप ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन-मनन में उपयोग। यही है-त्रिविधि सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है।
तत्त्वबोध की सायंकालीन साधना जिसमें दिन भर का लेखा-जोखा लिया जाता है तथा पूरे दिन को एक पूरा जीवन मानकर मृत्यु की गोद में जाने का चिन्तन करते हुए प्राप्त के पर्यवेक्षण की एक रिहर्सल की जाती है। भावी निर्धारण व आने वाले डडडडकी अपनी दिनचर्या की भूमिका बनाते हुए साधक निद्रा की गोद में चले जाते हैं। इन लोगों का समन्वय ही ‘प्रज्ञायोग‘ है। उपासना के प्रथम चरण में जहाँ कृत्यों के साथ जुड़े भावनात्मक संकल्पों की प्रधान भूमिका है वहाँ आत्म-बोध-तत्व-बोध की साधना में चिन्तन-मनन का प्राधान्य है। कल्प साधकों को इन तीनों ही उपक्रमों को समान महत्व देते हुए नियमित रूप से भावनापूर्वक सम्पन्न करने के लिये कहा जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-May
तत्त्वबोध)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
तत्त्वबोध और आत्मबोध का यह विज्ञान वर्तमान को ऊर्जावान बना देता है। जिसका वर्तमान, जितना अधिक प्राणवान है, वह उतना ही श्रेष्ठ साधक है।वर्तमान में जीने का अभ्यास सतत चौबीस घण्टे प्रारम्भ कर दें। होश में रहें कि कहीं मन फिर से अतीत और भविष्य के झूले में नहीं झूलने लगा। इससे छुटकारा पाने के लिए इसके प्रति जाग्रत् होना ही पर्याप्त है।