अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
तत्वबोध की ज्ञान साधना से ही ऋतम्भरा प्रज्ञा प्रकट होती है और जीवात्मा का ‘भूमा’ स्थिति प्रज्ञता में प्रविष्ट होना संभव होता है। आत्मा की यह भूख बुझाने के लिए नये सिरे से विद्याध्ययन करना पड़ता है-यह ब्रह्मचारी की लौकिक शिक्षा से सर्वथा भिन्न होता है, वानप्रस्थ लेने का प्रथम सोपान है-ब्रह्मविद्या का पारायण करना, उसमें पारंगत होना- ज्ञानमृत से परिपूर्ण व्यक्ति ही ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं और लोक निर्माण जैसे महान प्रयोजन के लिए अधिकारी बनते हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-August
तत्वबोध- प्रातःकाल उठते ही नये जन्म का अनुभव। आज की दिनचर्या का निर्धारण तथा रात्रि को सोते समय दिन भर के कार्यों की समीक्षा। मृत्यु का स्मरण। जीवन का सदुपयोग न कर सकने पर अंत समय होने वाले पश्चाताप से मुक्ति दिलाने वाला निर्धारण।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-March
तत्वबोध अर्थात् हर रात को नया मरण। जन्म और मरण के साथ जुड़ी हुई विचारणा पर सच्चे मन से विचार करने पर मनुष्य अपने भीतर एक नई हलचल अनुभव करता है और अपने क्रियाकलाप को, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाकर एक प्रकार से आत्मिक कायाकल्प की दिशा में कटिबद्ध और अग्रसर होता है।
तत्वबोध को ठीक तरह हृदयंगम किया जा सका, तो आकांक्षाओं और कामनाओं का स्वरूप बदला हुआ होगा। रीति-नीति और कार्य पद्धति में वैसा परिलक्षित होगा जैसे आत्मज्ञान सम्पन्न मनुष्य में प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर होना चाहिए।
तत्वबोध की साधना में लगाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-December
तत्वबोध भी कहते हैं। ब्रह्मविद्या का समग्र ढांचा इन्हीं दो धाराओं की सैद्धाँतिक एवं व्यावहारिक विधिव्यवस्था समझाने के लिए खड़ा हुआ है। आत्म बोध के अंतर्गत आत्म सत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म चिंतन एवं कर्तव्य की स्थिति समझाई जाती है और तत्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार और समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अब तक जो ढर्रे का अव्यवस्थित एवं अस्त−व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित सुसंचालित किया जाता है।
तत्वबोध की इन्हीं दोनों साधनाओं का समन्वय करना पड़ता है। इन दोनों का लक्ष्य एक ही है। दोनों अन्योन्याश्रित एवं परस्पर पूरक हैं। इसके लिए ध्यान मुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यान पूर्वक देखा जाना ही आत्म बोध की प्रत्यक्ष विद्या है। अधिक बड़े साइज का दर्पण उपलब्ध हो तो पूरे शरीर को भी देखा जा सकता है।
तत्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार और समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अब तक जो ढर्रे का अव्यवस्थित एवं अस्त−व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित सुसंचालित किया जाता है। अध्यात्म जगत को यही दो धारायें पवित्र गंगा जमुना कही जाती हैं। इन्हीं का संगम तीर्थ राज प्रयाग है- जिसमें स्नान करके परम पुरुषार्थ का पुण्य फल प्राप्त होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
तत्वबोधानन्द मिले। वे सर्दी हो या गर्मी, खुले में ही रहते। कुटिया बना रखी थी, लेकिन उसका इस्तेमाल कम ही करते-कभी-कभार कोई भूला-भटका आ जाता तो दयावश उसे ठहरा देते। इनकी तपस्या एवं सदाशयता की सराहना करते हुए गुरुदेव आगे बढ़ गए। तपोवन के आगे गंगा ग्लेशियर से सटे हुए गौरी सरोवर पहुँचकर पूज्य गुरुदेव किन्हीं अनजानी स्मृतियों में खोने लगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
तत्वबोध का पर्व भी है। मिशन हर वर्ष अपना वार्षिकोत्सव इन्हीं दिनों मनाता है। यह उनके अपनी दैवी पोक्ष मार्गदर्शक सत्ता जिसे उनने अपना मास्टर, अपना गुरु कहा, से साक्षात्कार का पुण्य दिवस भी है। इसी दिन महागुरु की प्रेरणा ने युवा शिष्य के अंतःकरण में प्रवेश कर उनके अस्तित्व के हर कण को अलौकिक बोध प्राप्त करा दिया। शिष्य के भावभरे समर्पण ने उसे अपने महागुरु के साथ एकाकार कर दिया।
तत्वबोध दिवस पर दे सकता है कि यह 5-6 वर्षों की घड़ियाँ चैन से बैठने की नहीं, सक्रियता का परिमाण निरन्तर बढ़ा देने वाली होंगी। इन दिनों देवमानवों के रूप में वृक्षों की संपदा अपने पूर्ण यौवन पर हैं। बस वे फूलने-फलने की तैयारी में लगे हैं एवं सारी वसुधा को अपने आम्र बौरों की सृवास से महका देना चाहते हैं। अधिक से अधिक पूर्ण समयदानी इस अवधि में सक्रियता बढ़ाते हुए अपना बलिदानी संकल्प पूरा कर दिखाना चाहते हैं। यही अपेक्षित भी था, उन अंशावतारों से, मध्यावतारों से जो निष्कलंक प्रज्ञावतार की सत्ता का हाथ बँटाने विशेष रूप से इन दिनों धरती पर प्रकटे हैं, कैसी सौभाग्यशाली बेला है है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-October
तत्वबोध, 15 मिनट का सार्थक गायत्री जप, ज्योति अवतरण की ध्यान धारणा तथा स्वाध्याय को लिया गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-January
तत्वबोध के आनंद में झूम उठा। आत्म जाग्रति के लिए निर्भयता अनिवार्य है, निष्कामता होनी चाहिए अपने पास जो कुछ है, उस संपूर्ण को विश्व हित में जला देने वाले ही पूर्णता का आनंद ले सकते हैं । इस मर्म को समझकर वह अंतिम साधना के लिए गुरु चरणों में वापस लौट गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-June
तत्वबोध की वीणा झंकृत होने लगी। इन स्वरों ने उपनिषद् का रूप लिया। सूर्य की उपासना से शूद्र इतरा का बेटा ब्रह्मर्षि ऐतरेय हो गया था। इनके आत्मबोध के स्वरों को अपने में समाहित करने वाली उपनिषद् ऐतरेय उपनिषद् कहलाई। भगवान सूर्य की उपासना से कोई भी मनुष्य ब्रह्मर्षि पद पाने में समर्थ हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
तत्वबोध में सहायक बनती रहीं। रहस्योद्घाटन पर वे हँसे बिना न रह सके। तुमने ठीक ही किया महारानी”ऐसी दशा में वह बेचारा ग्रहणशील बने तो कैसे? ऋषिकुमार का वेशधारण किए बगैर भला तुम मुझे कैसे सर्वस्व त्याग का रहस्य समझा पातीं।” दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और एक मुक्त हास्य फूट पड़ा जिससे ब्रह्मविद्या के रहस्य कण झर रहे थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-May
तत्वबोधानां मूढ़ानामपि संमतम्।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
तत्वबोध का क्रम आवश्यक रूप से अपनाते हुए सोचना चाहिए कि शरीर आत्मा से पृथक हो गया मरी हुई काया चारपाई पर पड़ी है चारों पाउ चार सम्बन्धी हैं जो उसे जलाने कि लिए ले जा रहे हैं आत्मा दूर खड़ी इस मरण को देख रही है संबंधी व्यक्तियों एवं एवं सम्पत्ति साधनों को छोड़कर जीवात्मा अपने कर्मभोग भोगने के लिए अन्यत्र जा रहा है मित्र-सम्बन्धी अपने मुख मोड़कर अपने धन्धे में लगने जा रही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-August
तत्वबोधः” यह सुभाषित ही सत्य है पर तत्वबोध के लिए जहाँ वाद होता है, वहीं के लिए यह ठीक है, अन्यथा अपनी बात रखने के लिये जो वाद-विवाद किया जाता है, वह केवल निरर्थक नहीं, अनेक बार हानिकारक भी होता है। कई बार शास्त्रार्थ होते शास्त्रार्थ आरम्भ हो गया है। वाद-वाद के जोश में कितनों को होश नहीं रहता और एक दूसरे के दिलों पर बाग्वाण बरसाने लगते हैं। जिसका परिणाम यह होता है, कि वाद करने वाले ऐसे मित्रों का चित्त एक दूसरे से हट जाता है, कभी-कभी दिल फट जाने की भी नौबत आती हैं। किसी विषय में मित्रों में मतभेद हो, तो उसके लिए बाग्वाद न करके एक दूसरे के मत का आदर करना चाहिए।
तत्वबोध के लिए जहाँ वाद होता है, वहीं के लिए यह ठीक है, अन्यथा अपनी बात रखने के लिये जो वाद-विवाद किया जाता है, वह केवल निरर्थक नहीं, अनेक बार हानिकारक भी होता है। कई बार शास्त्रार्थ होते शास्त्रार्थ आरम्भ हो गया है। वाद-वाद के जोश में कितनों को होश नहीं रहता और एक दूसरे के दिलों पर बाग्वाण बरसाने लगते हैं। जिसका परिणाम यह होता है, कि वाद करने वाले ऐसे मित्रों का चित्त एक दूसरे से हट जाता है, कभी-कभी दिल फट जाने की भी नौबत आती हैं। किसी विषय में मित्रों में मतभेद हो, तो उसके लिए बाग्वाद न करके एक दूसरे के मत का आदर करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
तत्वबोध की दर्पण साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की। कहीं ऐसा वर्णन साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-January
तत्वबोध से बाह्य जगत में फैले हुए पदार्थों और प्राणियों में सुव्यवस्थित संबंध साधा जाता है। आत्मज्ञानी उसे कहते हैं जो अपने आपे को सही तरीके से संभाल सके और सदुद्देश्य में नियोजित कर सके। तत्वज्ञानी उसे कहते हैं जो संसार की यथार्थता और प्राणियों की स्थिति विचित्रता को ठीक तरह पहचान सके। सही रीति का लोक व्यवहार इसी स्थिति में बन पड़ता है। लगता तो ऐसा है मानो आत्म−ज्ञानी लोक व्यवहार को भुला बैठा पर वस्तुतः वही सबसे अधिक क्रिया कुशल होता है।
तत्वबोध का द्वितीय चरण जब क्रमिक गति से उठना आरम्भ होता है तो उस प्रयास से महान जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकना सम्भव हो जाता है। आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने वाला पथिक प्रत्येक कदम पर एक से एक बढ़ी−चढ़ी उपलब्धियाँ, ऋद्धि−सिद्धियाँ प्राप्त करता चला जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-February
तत्वबोध 36.37
तत्वबोध, चिन्तन क्रम मिलाकर प्रायः एक घण्टा ही हो जाता है। इतनी उपासना, श्रद्धा एवं तत्परता मनोयोगपूर्वक निभती चली जाय तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति का सुनिश्चित आधार बन गया। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में विशेष तप साधना का उपक्रम बन जाया करे तो उसका प्रभाव भी छह−छह महीने बने रहने का महत्वपूर्ण आधार बन जायगा।
तत्वबोध मनन भी इसी से जुड़ा हुआ है। (2) जीवन के स्तर को परिष्कृत करने के लिए आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की प्रक्रिया (3) दिव्य−सत्ता केन्द्र से मिलने वाले विशिष्ट अनुदान जो साधकों की श्रद्धा एवं सम्वेदना के आधार पर ग्रहण किये जाते एवं फलित बनते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-April
तत्वबोध की साधना करनी चाहिए। प्रातःकाल जब आप उठा करें, तो एक नए जीवन का अनुभव किया कीजिए कि रात को सोने का अर्थ हैं, ‘पिछले जन्म की स्मृति और उस दिन की मौत’ सबेरे उठने का अर्थ हैं, ‘नया जन्म’। ‘जब आँख खुली तब नया जन्म’ आप यह अनुभव कर लिया करें, तो मजा आ जाए। आप हर दिन सबेरे यह अनुभव किया कीजिए कि हमारा नया जन्म हो गया। अब नए जन्म में क्या करना चाहिए?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-October
तत्वबोध का यह त्रिविध सम्पादन साथ-साथ सम्पन्न होकर साधक को उसके अन्तिम लक्ष्य पर प्रतिष्ठित कर देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
तत्वबोध के रूप में सोते समय ईश्वर की अमानतें ईश्वर को सौंपने और स्वयं खाली हाथ प्रसन्नचित विदा होने की निद्रा देवी की गोद में जाने की बात सोचनी होती है। रात्रि को सोते समय मृत्यु का चिन्तन, आत्म-निरीक्षण, पश्चाताप और कल के लिए सतर्कता-वैरागी एवं संन्यासी जैसी हल्की-फुलकी मनः- स्थिति लेकर शयन करने से दुर्भावनाएँ एवं दुर्वासनाएँ अपने आप पीछा छोड़ देती हैं।
तत्वबोध, नाद योग के दस साधना क्रमों का समावेश था । इसके अतिरिक्त आत्मशोधन की प्रक्रिया ही अमूल्य थी, जिसे साधक गुरुदेव के सान्निध्य में पूरा करते । यह प्रक्रिया विगत जीवन के पापों का स्मरण करने और बताने प्रायश्चित करने ओर भविष्य में पुनः उन भूलों को न दुहराने का निश्चय करने के रूप में सम्पन्न होते । यह प्रत्यावर्तन का प्रथम और आवश्यक चरण था । पहले दिन जब साधक पू.गुरुदेव से मिलने जाते, तो वह उनसे अकेले में अपनी सभी ग्रन्थियों को खोलने की बात कहते ।
तत्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष है। लययोग से आनन्दमय कोश -बिन्दुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमय कोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमय कोश की जागृति होती है।
तत्वबोध । शरीर और आत्मा का पृथक्करण । अपने शरीर की मृतक स्थिति -कुत्तों, कौओं, कीड़ों, द्वारा खाया जाना, जलाया, गाड़ा जाना । अपने को किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर यह सब दृश्य देखने की स्थिति में रहना । शरीर और मन को आत्मा का उपकरण, वाहन मात्र समझना ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-July
तत्वबोध के आधार पर सहज ही विचार क्षेत्र में उत्कृष्टता और क्रिया क्षेत्र में आदर्शवादिता भर सकती है । फलस्वरुप बाह्ना जीवन में स्वर्गीय वातावरण तथा अन्तः-जीवन में आनन्द और उल्लास के द्वारा मुक्ति जैसा आलोक अपने भीतर उत्पन्न किया जा सकता है ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-February
तत्वबोध’ कहा गया है। यह दोनों देखने, कहने, सुनने एवं करने में अत्यंत साधारण जैसे लगते हैं; किंतु यदि चिन्ह पूजा की तरह उनकी लकीर न पीटी जाए और गंभीरतापूर्वक उन विचारणाओं की परिणति एवं फलश्रुति पर विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि इस बीज का विकास विस्तार विशालकाय वटवृक्ष के रूप में होता है। चिनगारी तनिक-सी होती है; किंतु उसे ईंधन की सुविधा मिल सकें तो उसे प्रचंड दावानल बनते और योजनों लंबे वनप्रदेश उदरस्थ करते देर नहीं लगती। आँख से न दीख पड़ने वाला, बाल की नाक से भी कम विस्तार वाला शुक्राणु जब नौ महीने जितने स्वल्पकाल में एक अच्छा खाना शिशु बनकर प्रकट होता है तो कोई कारण नहीं कि उपरोक्त विचारद्वय समुचित परिपोषण पाने पर जीवन को देवत्व से लपेट लेने वाले वरदान— सौभाग्य के रूप में प्रकट-विकसित न हो सकें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-January
तत्वबोध कर लेना कोई साधारण काम नहीं है, क्योंकि यह विषय बहुत ही सूक्ष्म है। स्थूल शक्तियों का विचार करने वालों के लिये उसका यथार्थ बोध हो सकना असंभव ही है। योग के आचरण से बुद्धि को सूक्ष्म बनाकर सविचार और निर्विचार समापत्ति द्वारा (चित्त जिस विषय में संलग्न होता है और स्फटिक मणि जैसा प्रतीत होता है उस तदाकारापत्ति को ही ‘समापत्ति’ कहा जाता है) सूक्ष्म विषयों की प्रतीति की जाती है। सूक्ष्मता की अवधि अलिंग तक होती है, अलिंग ही सर्व प्रधान तत्व है। जिसका किसी में लय हो सके ऐसा कोई तत्व ही जहाँ नहीं हैं, अथवा वह किसी के साथ मिल सके ऐसा भी कुछ जहाँ शेष नहीं रहता, वहीं प्रधान तत्व होता है।
तत्वबोध, विद्या, नागरिकता, संस्कृति, सभ्यतादि है। एक व्यक्ति का ‘चिन्तन’ उसका ज्ञान, सोची समझी बात ही हो सकता है। एक जाति का ‘चिन्तन’ उसका साहित्य, उसकी भाषा, धर्म आदि ही हो सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-July
तत्वबोध 67-67
तत्वबोध में इसी तथ्य की पुष्टि करते हुये लिखा है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-August
तत्वबोध होने लगता है। गुरुकृपा की महिमा ही ऐसी है। इस महिमा की अभिव्यक्ति गुरुगीता की अगली कथा-गाथा में होगी। अखण्ड ज्योति के अगले अंक में इसकी उज्ज्वल किरणें प्रकाशित होंगी। क्रमशः।