अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-October
जीवन-काल में जिन कार्यों, संस्कारों तथा वृत्तियों को अभ्यास द्वारा प्रमुख बनाया जाता है वही मृत्यु के समय चलचित्र की तरह मनुष्य के सम्मुख चक्कर लगाया करते हैं। उस समय मनुष्य उस स्मरण की भीड़भाड़ में अपने सत्कर्मों को ढूंढ़ने का प्रयत्न किया करता है। यदि उसने सुकृत किये रहे होते हैं तो वे उसके स्मृति-पटल पर आकर मित्र की तरह उसे सहारा दिया करते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-January
आज जो हमें तार, टेलीफोन, ग्रामोफोन, चलचित्र, प्रोजेक्टर तथा बिजली के चमत्कार दिखाई दे रहे हैं इनमें वास्तव में अमेरिका के एक वैज्ञानिक एडीसन की लगन, यत्न तथा कार्य कुशलता की विशेषतायें मूर्तिमान हो रही हैं। वह एडीसन, जिसे इस समय लोग जादूगर कहा करते हैं और जिसे ठीक से पेट भर भोजन भी न मिला करता था
इस प्रकार अपनी बुद्धि, लगन तथा निष्ठा के बल पर मानव जाति की सुख-सुविधा की व्यवस्था में जीवन के 84 वर्ष लगाकर महान आविष्कार कर टाँमस अल्वा एडीसन 18 अक्टूबर 1931 ई. को स्वर्ग सिधार गया। एडीसन आज संसार में नहीं है किन्तु बिजली के बल्ब और चलचित्रों का चमत्कार अन्य आविष्कारों के साथ उसकी यश गाथा युग-युग तक गाते रहेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-August
साधनों में श्रद्धा उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं है। साधन सम्पन्न दृश्य खड़े करने और हलचलों को चलचित्रों जैसा प्रतिबिम्ब भर खड़ा कर सकते हैं। मात्र साधनों से विनिर्मित प्रयास लोगों को आकर्षित चमत्कृत तो करते हैं पर अनुकरण की प्रेरणा नहीं देते। यही कारण है कि धनिकों, कलाकारों, विद्वानों प्रचारकों द्वारा खड़े किये गये अभियान आन्दोलन अपनी उछल कूद का परिचय तो देते हैं पर कोई ठोस कार्य कर सकने में सफल नहीं होते
आज के साधन हाँ विनाश का पथ प्रशस्त करते है, वहाँ उनमें यह क्षमता भी विद्यमान है कि विकास के सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दिशा में भी चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर सके। प्रेस, लाउडस्पीकर, चलचित्र जैसे कितने ही उपयोगी यन्त्र ऐसे निकल पड़े है, जिनकी सहायता से चिन्तन को परिष्कृत करने की दिशा में कई प्रचारात्मक कार्य आसानी से सम्पन्न हो सकते है। युगसाहित्य का निर्मा और प्रसारण एक कार्य है। और ज्ञान गोष्ठियों के माध्यम से मनीषियों द्वारा शिक्षण दूसरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-December
अपढ़-गँवार यहाँ तक कि अबोध बच्चे तक इनसे प्रेरित-प्रभावित होते रहते हैं। दृश्य-श्रव्य माध्यम यानि कि चलचित्र और धारावाहिकों के बारे में यही तथ्य लागू होता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-May
इसमें थर्मोडासनिमिक तथा कास्मोलाजिकल समय की दिशा भूत से भविष्य की ओर होती है, जबकि साइकोलॉजिकल समय भविष्य से भूत की ओर गमन करता है। इसी के आधार पर ही हम अपने मन में स्वयं के अतीत कोचलचित्र की भाँति देखते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
जब उपभोक्तावादी विज्ञापन-प्रधान समाज के साथ नहीं चल रहे तो उनकी तरफ मुँह ताककर चैनल का तंत्र कैसे खड़ा किया जाए। अपना परिवार स्वयं में इतना बड़ा है कि वह जनचेतना जगाकर लोगों की, चलचित्र व धारावाहिक निर्माताओं की रुचि को बदल सकता है। आदर्शवादी निर्माण हेतु प्रेरित कर सकता है। हमें कलातंत्र को व्यवस्थित ढंग से आगामी दो वर्ष में एक नर्द दिशा देनी है
आगे चलकर ‘गायत्री महाविद्या’ पर एक चलचित्र तथा ‘युग निर्माण’ पर एक धारावाहिक शृंखला बनाने का मन है। इससे जन-जन को सप्तसूत्री आँदोलनों में-युग के नवनिर्माण की प्रक्रिया में भागीदारी करने का अवसर मिलेगा। इसके साथ-साथ प्रदर्शनी के माध्यम से लोक-शिक्षण का माध्यम जो रहा है, उसे अपने चार हजार से अधिक केंद्रों के द्वारा और अधिक व्यापक बनाने का मन है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-December
इस प्रकार इन तथ्यों से अन्य लोकों के निवासियों की एक शारीरिक संरचना की परिकल्पना उभरती है। इस परिकल्पनाओं के आधार पर अनेकों लेख, वृत्तचित्र, चलचित्र एवं धारावाहिकों का भी निर्माण हो चुका है, जिसमें अन्तरिक्षवासियों की शारीरिक संरचना एवं अन्य क्रियाकलापों पर रोमाँचक कल्पना को दृश्यचित्र में उतारा, उकेरा गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
आचरण के संदर्भ में विपरीत लिंग के प्रति पवित्र एवं शुद्ध भावों को रखना, नितान्त अनिवार्य है। इस संदर्भ में कामोत्तेजक दृश्यों, चलचित्रों, साहित्य से अभीष्ट दूरी ही उचित है। मंत्र साधक को यौन-शुचिता के संदर्भ में विशेष ध्यान रखना चाहिए। आहार-विहार की उपरोक्त शुद्धि मंत्र साधना का एक अहम् पक्ष है, जिसकी प्रायः उपेक्षा की जाती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
राजनीतिक कर्णधार जनता की सज्जनता अपनाने की अपीलें करते रहते हैं। उनके प्रचार साधन रेडियो चलचित्र बुलेटिन विज्ञानी पत्रिकाएँ आदि कार्य भी इसी उद्देश्य के लिये विविध विविध मनोरंजक आयोजनों की व्यवस्था करते रहते हैं, किंतु जब विचारपूर्वक इन सब कार्यों के परिणामों को देखा जाता है तो भारी निराशा होती है। लगता है कि प्रयत्नों की तुलना में परिणाम की मात्रा नगण्य है। बुराइयाँ जितनी तेजी से बढ़ रही है और सुधार के प्रयत्न जिस प्रकार निष्फल से सिद्ध हो रहे है उसे देखते हुए हर विचारशील व्यक्ति के मन में व्यथा होना स्वाभाविक है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-December
यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मवेत्ता मनीषियों ने भौतिक जगत के विकास की अपेक्षा अतीन्द्रिय चेतना के विकास पर अधिक बल दिया है और कहा है कि मानवी काया पं, कलेवरों से विनिर्मित प्रतीत अवश्य होती है, पर उसके कण-कण में सर्वव्याप्त दिव्य चेतना उतनी ही तक सीमित नहीं है-वरन् वह विश्व-ब्रह्मांड के विस्तार जितनी आसीन है। मानो मन जितना शुद्ध, परिष्कृत और पवित्र होता है, अदृश्य जगत के वास्तविक जगत चलचित्र को चेतनाजगत में परिभ्रमण कर वह स्वप्नों के माध्यम से उतना ही स्पष्ट देख सकता है। भविष्य के गुण रहस्यों की स्पष्ट ध्वनि भी सुन सकता है। महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक आइन्स्टीन से एक बार पूछा “ गया” आपकी सृजनात्मक प्रक्रिया का क्या रहस्य है? “ उत्तर में आइन्स्टीन का कहना था कि सोते समय स्वप्न में एक ऐसी स्थिति आती है जब बुद्धि एक लम्बी सी छलाँग लगाकर बोध के उच्चस्तर पर पहुँच जाती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-July
चलचित्र का विकास हुआ। ‘फ्रीजग्रीने’ को चलचित्र का आविष्कारक माना जाता है। कालान्तर में चल-चित्र में आश्चर्यजनक विकास हुआ। अब उसे विज्ञान के विलक्षण चमत्कार के रूप में देखा जाता है
चेतना विश्व ब्रह्माण्ड के विस्तार जितनी असीम है। अदृश्य जगत के वास्तविक दृश्य चलचित्र को हम चेतना जगत में परिभ्रमण कर स्वप्नों के माध्यम से देख सकते हैं। यही कारण है कि भारतीय मनीषी भौतिक जगत के विकास की अपेक्षा अतीन्द्रिय चेतना के विकास पर अधिक बल देते रहे हैं
जिज्ञासा कल्पना तक सीमित नहीं रही वरन् क्रिया में परिणित हुई। चलचित्र का विकास हुआ। ‘फ्रीजग्रीने’ को चलचित्र का आविष्कारक माना जाता है। कालान्तर में चल-चित्र में आश्चर्यजनक विकास हुआ

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-September
उनके मस्तिष्क से प्रकाश की रेखा फूटीं और एक वृक्ष के मोटे तने पर गोलाकार बिम्ब उभर उठा-फिर उसमें जो कुछ देखा वह बिलकुल ठीक सिनेमा की तरह व्यवस्थित चलता फिरता बोलता नाटक सा था। जिसमें उस युवक के पूर्व जीवन की अनेक घटनायें ठीक चलचित्र जैसी ही प्रत्यक्ष आँखों से दिख रही थीं। बीच-बीच में वह युवक कुछ उत्तेजित सा हो उठता था, हाँ-हाँ यह सब मैंने ही किया है ऐसा बोल पड़ता था। उसकी मृत्यु तक की सारी घटनायें श्री फैरेल ने भी देखीं तो वे भारतीय दर्शन की इस महानतम उपलब्धि से इतने प्रभावित हुये कि अपना सारा जीवन और अपने संस्कार ही बदल कर उन्होंने अपने को पूरा भारतीय बना लिया
फैरेल आश्चर्यचकित रह गये कि वह व्यक्ति मनुष्य है या देवता बातें मेरे मन में उठ रही हैं और जान यह रहे हैं मनुष्य भी क्या कोई पुस्तक हैं? इस तरह के विचित्र प्रश्न और चिन्तन करते हुए श्री फैरेल चलचित्र की छाया की तरह नीचे उतरने लगे और थोड़ी देर में ही वहाँ पर जा पहुँचे जहाँ साधु बैठे थे। वहाँ एक व्यक्ति के आराम करने भर की जगह और धूनी में जल रही आग के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था वहाँ

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-July
इससे उनको एक प्रकार से सारा संसार ‘करतलगत आमलक समान’- हो जाता है। वे अपने कक्ष में बैठे हुये संसार की सारी गतिविधियाँ, अपने ज्ञान बल पर चलचित्र की भाँति देखा करते हैं। ज्ञान द्वारा प्राप्त यह दिव्य दृष्टि एवं यह आश्चर्यजनक उपलब्धि कितना आनन्द दे सकती है इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इस आनन्द की प्रेरणा आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर न करेगी तो क्या इन्द्रिय जन्य भोग सुख की ओर करेगी? इसी प्रकार संसार का कोई भी विषय क्यों न हो उसका सम्पूर्ण ज्ञान समग्र जानकारी आत्मानन्द का ही हेतु बनती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-October
अपने एक परिचित पेंटर के बारे में एक दिन ऑफिस में बैठे वेन्जोन ने सहसा चलचित्रवत् दृश्य देखा कि वह एक दीवार की पेंटिंग करते समय सीढ़ियों से लुढ़क कर गिर पड़ा है। तीन दिन के भीतर ही यह दुर्घटना इसी रूप में हुई और मोहल्ले ने एक मकान की दीवार की रंगाई के समय सीढ़ी से फिसल कर गिरने से उक्त पेंटर की मृत्यु हो गईं। वेन्जोन का पूर्वाभ्यास सत्य सिद्ध हुआ

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-December
एक दिन वह अपने आफिस में बैठे हुये कुछ काम कर रहे थे। जैसे चलचित्र में पर्दे पर कहानी के दृश्य एक पर एक उभरते हुए चले आते है, विचारों को फिल्म में एकाएक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जैसे मार्टिन किसी दीवार को पेन्टिंग करते समय सीढ़ियों से लुढ़क कर गिर पड़ा है, उसके सारे शरीर में पेन्ट के से धब्बे पड़े दिखाई दिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-March
उन्होंने श्रीमती नियेशन को एक बन्द कमरे में रखा और एक उनके सर्वथा अजनबी व्यक्ति की एक वस्तु दी। उस वस्तु को हाथ में लेते ही उन्होंने उस व्यक्ति का न केवल नाक−नक्शा अपितु उसके पूर्व जीवन की अनेक घटनाएँ यों कह सुनाई मानों वे चलचित्र में सब देख रही हैं। कु0 एडम नामक एक अन्य लड़की की अतीन्द्रिय क्षमता के बार में भी प्रो0 क्रेग ने लिखा है कि वह सूँघकर टेलीफोन पकड़ कर दूरवर्ती वस्तुओं को ऐसे बता देती थी मानों वह सामने पड़ी पुस्तक पढ़ रही हो

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-June
स्वप्नों में भविष्य के इस प्रकार के दर्शन की समीक्षा करने बैठते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि चेतना मनुष्य शरीर में रहती है। वह विश्व- ब्रह्माण्ड के विस्तार जितनी असीम है; और उसके द्वारा हम बीज रूप से विद्यमान अदृश्य के वास्तविक दृश्य, चलचित्र की भांति देख और समझ सकते हैं। यह बात चेतना के स्तर पर आधारित है; इसीलिये भारतीय मनीषी भौतिक जगत के विकास की अपेक्षा अतीन्द्रिय चेतना के विकास पर अधिक बल देते हैं। हिन्दू धर्म और दर्शन का समस्त कलेवर इसी तथ्य पर आधारित रहा है ;और उसका सदियों से लाभ लिया जाता रहा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
अब इसी सिद्धान्त के आधार पर चलचित्रों द्वारा रोगियों के उपचार का एक अभिनव तरीका ढूँढ़ा गया हैं। इसे ‘मूवी थेरेपी’ कहते हैं। अमेरिका एक योरोप में इन दिनों इसकी धूम मची हुई हैं
‘मूवी थेरेपी’ यद्यपि सफल चिकित्सा पद्धति के रूप में सुस्थापित अभी नहीं की जा सकती, फिर भी एक संभावना बताती है कि मानवी मस्तिष्क को प्रभावी व रचनात्मक घटनाक्रमों से आदर्शों व दृढ़ संकल्पों की ओर भी मोड़ा जा सकता है। आज के साँस्कृतिक प्रदूषण से भरे युग में ऐसे चलचित्रों की सर्वाधिक आवश्यकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-April
आज के साधन जहाँ विनाश का पथ प्रशस्त करते हैं वहाँ उनमें यह क्षमता भी विद्यमान है कि विकास के साँस्कृतिक पुनरुत्थान की दिशा में भी चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकें। प्रेस, लाउडस्पीकर, चलचित्र जैसे कितने ही उपयोगी यन्त्र ऐसे निकल पड़े हैं, जिनकी सहायता से चिंतन को परिष्कृत करने की दिशा में कई प्रचारात्मक कार्य आसानी से सम्पन्न हो सकते हैं। युगसाहित्य का निर्माण और प्रसारण एक कार्य है और ज्ञान-गोष्ठियों के माध्यम से मनीषियों द्वारा शिक्षण दूसरा। रचनात्मक और सुधारात्मक गतिविधियों की सुगठित रूपरेखा बनाकर उनमें असंख्यों सद्भाव सम्पन्नों की श्रम-साधना नियोजन की जा सकती है
सामर्थ्य का आकर्षण साधनों और सहयोगियों का प्रचुर परिमाण में खींचकर बुला लेता है उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति सदा इसी प्रकार सम्भव होती रही है। साधनों में श्रद्धा उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं हैं साधन सम्पन्न दृश्य खड़े करने और हलचलों का चलचित्रों जैसा प्रतिबिम्ब भर खड़ा कर सकते है। मात्र साधनों से विनिर्मित प्रयास लोगों को आकर्षित चमत्कृत तो करते है पर अनुकरण की प्रेरणा नहीं देते। यही कारण है कि धनिकों कलाकारों विद्वानों प्रचारकों द्वारा खड़े किये अभियान आन्दोलन अपनी उछल-कूद का परिचय तो देते हैं पर कोई ठोस कार्य कर सकने में सफल नहीं होते

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
इस प्रकार के चलते-फिरते मुर्दे वहाँ के स्थानीय बोली में जाम्बी कहलाते हैं, एक समय में वहाँ के वे अजीबोगरीब जाम्बी इतने चर्चित हुए थे कि कई देशों ने इन पर हिट फिल्ते बनायी। हॉलीवुड में भी इस कथानक पर अनेक चलचित्र बने, जिनमें ‘व्हाईट जाम्बी’ ‘किंग ऑफ जाम्बीज़’ तथा ‘ फ्रैंकस्टीन मास्टर’ प्रसिद्ध है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-July
उन्होंने आशा प्रकट की है कि गीजा के पिरामिड में सुरक्षित रखे प्राचीन मिश्री राजा तूतनखामन के मृत शरीर में अब भी इतने पर्याप्त डी.एन.ए. हो सकते हैं किस उससे राजा की कार्बन कॉपी ‘तैयार की जा सके। ज्ञातव्य है कि बहुचर्चित अंग्रेजी फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ इसी कथानक पर आधारित चलचित्र है। उसमें किसी वैज्ञानिक ने जुरासिक युग में प्रचुर संख्या में विद्यमान महाकाव्य डायनासोर के कुछ डी.एन.ए. कहीं से एकत्र करने में सफलता प्राप्त कर ली थी फिर उसी अवशेष से उसने उसका -ब्लूप्रिण्ट’ तैयार कर लिया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-December
सदियों से बेड़ियों में जकड़ी नारी शक्ति को पूज्यवर ने आगे लाकर खड़ा कर दिया किन्तु अभी भी नारी का अपमान भिन्न-भिन्न रूपों में बराबर हो रहा है। चाहे वे चलचित्र हों, चाहे विज्ञापन हों, चाहे टेलीविजन के धारावाहिक हों, नारी अभी भी उपभोक्ता बनी है, उपभोग करने वाला पुरुष वर्ग है। क्या उस सत्ता को जो संस्कार देकर परिवार में नूतन प्राण संचार करती है राष्ट्र को एक नागरिक देती है-हम उस शिकंजे से निकाल सकते हैं जहाँ आज के समाज ने उसे लाकर खड़ा कर दिया है? क्या अभी भी अविवाहित विकसित लड़कियों के कारण माता-पिता हृदय घात से या आत्मघात कर मौत को प्राप्त होते रहेंगे? क्या दहेज का दानव इसी प्रकार नारियों को अग्नि में जलाता रहेगा व हम मूक देखते रहेंगे? जवाब सभी को देना है क्योंकि हम अब सबके लिए जवाब देह हो गए हैं? नारी जागरण का नारा अब व्यवहारिक परिप्रेक्ष्य में लागू होकर परिवार संस्था के मूल्यों की पुनर्स्थापना तक गुँजायमान होना चाहिए, यही समय की माँग हे। इसके लिए हमें विधिवत् योजना बनानी है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-October
बालक के बुद्ध बनने से पूर्व अपनी अवश्यंभावी मृत्यु का चलचित्र देखकर तृषा, ग्लानि, निराशा, पश्चाताप और प्रलोभन की पीर से महर्षि कालदेवल का हृदय समुद्र उद्वेलित हो उठा। उनकी आँखें मिचमिचाईं, होठों से स्फुरण हुआ, हाथ-हथेलियाँ काँपी, जटा, श्मश्रु के केशों में प्रकम्प आया और वे फफक कर रो उठे। महाराज शुद्धोधन घबराकर उनके चरणों में बैठ गए और धीरे-धीरे उनके पैर दबाने लगे
उनके मस्तिष्क से प्रकाश की रेखा फूटी और एक वृक्ष के मोटे तने पर गोलाकार बिम्ब उभर उठा-फिर उसमें जो कुछ देखा, वह बिलकुल सिनेमा की तरह व्यवस्थित चलता फिरता, बोलता नाटक सा था। जिसमें उस युवक के पूर्व जीवन की अनेक घटनाएँ ठीक चलचित्र जैसी ही प्रत्यक्ष आँखों से दिख रही थी। बीच-बीच में वह युवक कुछ उत्तेजित सा हो उठता था, हाँ हाँ यह सब मैंने ही किया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-November
कोई भी चित्र, दृश्य चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक कलाकृति हो या किसी चलचित्र का अंश यदि वह अश्लील, भद्दा और फूहड़ है तो उससे बचने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि इनसे मनुष्य में पाशविक प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहन मिलता, जागृत होती हैं। दूषित कामनायें भड़क उठती हैं, गन्दी प्रेरणायें मिलती हैं जो मनुष्य के चरित्र-आचरण, स्वभाव, प्रकृति को दूषित बना देते हैं
खेद है आज कला के नाम पर, चलचित्रों के माध्यम से, धन के लोभ के लिए समाज में बहुत ही भद्दे अश्लील चित्रों की बाढ़-सी आ गई है। यत्र-तत्र बाजार में इस तरह के चित्र अधिक मिलते हैं जिनमें दूषित हाव-भाव, भड़कीले पोशाक शारीरिक अंगों का फूहड़ प्रदर्शन मुख्य होते हैं। सिनेमा में तो अभिनेता और अभिनेत्रियों के अर्धनग्न शरीर, उनकी अश्लील मुद्राएँ भड़काने वाले तथा कथित ‘ऐक्टिंग‘ दर्शकों पर कैसा प्रभाव डालता होगा इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-July
” यहाँ तक कि धार्मिक फिल्मों में भी अश्लीलता, अशिष्टता की बहुतायत होती है। तथाकथित सामाजिक चलचित्र तो और गये-बीते होते हैं। फिर इनसे बच्चों में अपराध प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है। इसीलिए उक्त समाजशास्त्री ने सुझाव दिया है कि बाल-अपराधों को मिटाने के लिए अन्य उपायों के साथ-साथ चल-चित्रों के प्रति काफी कड़ाई बरतनी चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-April
गैसें कई तो दिखाई भी नहीं देती पर इतनी क्रियाशील होती हैं कि उनके माध्यम से उनकी गतिशीलता के आधार पर लाखों मील दूर की बात को एक सैकिण्ड में जान लिया जाय। आगे इसी विज्ञान के विकास के द्वारा लाखों वर्ष पूर्व की घटनाओं का चित्रण चलचित्र की भाँति सम्भव हो जाये तो कुछ असम्भव नहीं। इसी को कहते हैं कि लघुता की महत्ता। प्रकाश का अणु आज तक पकड़ में नहीं आया, पर वह सारे संसार को प्रकाश गर्मी देता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-March
इस प्रकार का सरल सौम्य जीवन क्रम जिन बुद्धिमानों ने अपनाया है, उन्हें तत्काल गहरी निद्रा का वरदान मिलता है। उस कारण वे न केवल थकान मिटाने, अभिनव स्फूर्ति पाने में सफल होते हैं वरन् सुखद स्वप्नों का उत्साहवर्धक चलचित्र भी बिना टिकट खरीदे देखते रहते हैं और दुहरे आनन्द का लाभ लेते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-July
संगीत की ध्वनि मन्द पड़ने लगी थी। किसी चलचित्र की भाँति मेरे विगत जीवन की सारी घटनाएँ मेरी आँखें के सामने नाचने लगीं। आश्चर्य की बात तो यह थी कि मुझे वही घटनाएँ दिखाई देती थी जिनमें मैंने आनन्द ही आनन्द अनुभव किया था, या जिनसे मैं आनन्दित हुआ था। ”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-August
“गोल्डन पाथ” नामक अन्तर्राष्ट्रीय शाँति संस्थान की संस्थापिका श्रीमती आयरीन ह्यूजेज को एक प्रामाणिक भविष्यवक्ता के रूप में ख्याति प्राप्त है। उनका कथन है कि ध्यान की गहराइयों में उन्हें भविष्य में सम्भावित घटनाओं की झाँकी चलचित्र की भाँति दिखाई देती है। उनकी भयावहता से वे रोमाँचित हो उठता है। 1985 व 1991 के मध्य तृतीय विश्वयुद्ध की सुनिश्चित सम्भावना प्रकट करते हुए वे कहती हैं कि “विनाश की तैयारी होते हुए भी महासत्ता विश्व मानवता को बचा लेगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-October
विचारशील राजनीतिज्ञ अपने देश के, अपने निवास के एक छोटे-से कक्ष में बैठा हुआ दूर देशाँतर में होने वाली घटनाओं अथवा घटना मूलक परिस्थितियों को अपने मस्तिष्क में चलचित्र की तरह देखता रहता है और वहीं से विचारों द्वारा बैठा-बैठा, नियन्त्रित अथवा परिवर्तित करता रहता है। पारस्परिक प्रतिस्पर्धा में राज-नायकों की हार-जीत उनकी विचार-शक्ति पर ही निर्भर रहती है। जिनके विचार जितने अधिक सतेज तथा सूक्ष्म होते हैं, वे संसार-चक्र को उतना ही अपनी मनोवांछित दिशा में घुमा सकने में समर्थ होते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-February
यह सब देखते ही अरुण हतप्रभ रह गया। विगत स्मृति चलचित्र की भाँति चलने लगी। इसी बीच पुष्पा चाँदी के गिलास में दूध और सोने की तश्तरी में स्वल्पाहार लेकर उपस्थित हुई। उसने बड़े विस्तार के साथ अपनी आपबीती सुनाई

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-June
जन्म और मृत्यु आत्मा की यात्रा के पड़ाव है। किसी एक जीवन के प्रति व्यक्ति विशेष का लगाव रहने पर अगले जीवन में भी यह संस्मरण सजीव रहता है और पुनर्जन्म के रूप में अतीत के चलचित्र को उजागर करता है। क्या मौत और जिंदगी के बीच की स्थिति का वर्णन संभव है,? करीब पाँच साल पहले तक चिकित्सा शास्त्री मानते थे कि जीवन के उस पार का वर्णन करना असंभव है, कारण कि उनके अनुसार हृदय की गति रुकते ही मस्तिष्क को रक्त के जरिए ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाता है और उसके बाद से मौत के होने तक (जो करीब पाँच मिनट बाद मस्तिष्क तंतुओं में विकार पैदा हो ही जाती है) मनुष्य न कुछ देख सकता है, न कुछ अनुभव कर सकता है और न कुछ समझ सकता है। इसलिए वे मृत्यु के स्वरूप के सब वर्णनों और मृत्यु के बाद के सब संस्मरणों को काल्पनिक मानते है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-September
“आज कल भारत वर्ष में जितने भी चलचित्र बन रहे हैं उनमें बहुत ही कम ऐसे हैं जिनमें पश्चिमी स्वर-प्रणाली के सस्ते और गन्दे प्रेम के गीत न गाये जाते हों तथा जनता की काम वासना को प्रज्ज्वलित करने वाले, अशिष्टतापूर्ण नग्नप्राय नृत्य न दिखाये जाते हों। दुख की बात तो यह है कि ये सभी चलचित्र हमारी राष्ट्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किये गये सेंसर- अधिकारियों द्वारा प्रदर्शन-योग्य प्रमाणित किये जाते हैं। हमारी समझ में नहीं आता कि आधुनिकता के प्रवाह में हम इस प्रकार बेबस होकर क्यों बहते जा रहे हैं कि हमें उचित अनुचित तक का ध्यान नहीं रह गया है। जो कुछ पश्चिमी है वही आधुनिक है और जो कुछ भारतीय है वह संकुचित विचारधारा का द्योतक है, ऐसा सोच बैठना ही, हमारी समझ में, हमारे राष्ट्र की साँस्कृतिक अवनति का प्रमुख कारण है
“आज कल भारत वर्ष में जितने भी चलचित्र बन रहे हैं उनमें बहुत ही कम ऐसे हैं जिनमें पश्चिमी स्वर-प्रणाली के सस्ते और गन्दे प्रेम के गीत न गाये जाते हों तथा जनता की काम वासना को प्रज्ज्वलित करने वाले, अशिष्टतापूर्ण नग्नप्राय नृत्य न दिखाये जाते हों। दुख की बात तो यह है कि ये सभी चलचित्र हमारी राष्ट्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किये गये सेंसर- अधिकारियों द्वारा प्रदर्शन-योग्य प्रमाणित किये जाते हैं। हमारी समझ में नहीं आता कि आधुनिकता के प्रवाह में हम इस प्रकार बेबस होकर क्यों बहते जा रहे हैं कि हमें उचित अनुचित तक का ध्यान नहीं रह गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-July
आप के नेत्र घृणास्पद, वासना से भीगे दृश्यों को देखने को दौड़ते हैं। बड़े वेग से सिनेमा के चलचित्रों, नृत्यों, नग्न मानव शरीरों की ओर आकृष्ट होते हैं, तो यह मन की दुर्बलता के चिन्ह हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-March
उल्टे इससे मद्यपान और नशे में झूमने वाले इन युवकों ने हत्या तथा खुलेआम अश्लील हरकतें करना और शुरू कर दिया। 1920 से 1959 के मध्य समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और चलचित्रों पर भी फ्रायड विचार-धारा का पूरा प्रभाव पड़ा और इस अवधि के ये सारे माध्यम रोमांस, प्रेम कथा प्रसंगों यौन अपराधों आदि की खबरों, दृश्यों से भरे रहे। परिणाम स्वरूप स्वच्छन्द सम्भोग, रोमांस की लहर बड़ी तेजी से सारे पश्चिमी युवा समुदाय में फैलने लगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-July
राजनैतिक कर्ण धार जनता को सज्जनता अपनाने की अपील करते रहते हैं। उनके प्रचार साधन, रेडियो, चलचित्र, बुलेटिन विज्ञप्ति, पत्रिकाएँ आदि कार्य भी इसी उद्देश्य के लिये बहुत व्यय और प्रयत्न करते हैं। किन्तु जब विचारपूर्वक इन सब कार्यों के परिणामों को देखा जाता है तो भारी निराशा होती हैं। लगता है कि प्रयत्न की तुलना में परिणाम की मात्रा बहुत ही नगण्य है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-January
घटना जून 1974 की है। एक शनिवार को फिलक्सबोरी, हम्बरसाइड की लेस्ली कैसल्टन नामक एक महिला सुबह सुबह अपने टेलीविजन सेट पर फिल्म देख रही थी, तभी अचानक बीच में ही चलचित्र रुक गया और टेलीविजन के पर्दे पर दो शब्द उभरे -’विशेष समाचार’। इसी के साथ एक पुरुष शब्द उभरा और समाचार देने लगा कि फिलक्सबोरी के विशाल रसायन संयंत्र में एक भयानक विस्फोट के साथ आग लग गई है। इससे लगभग संपूर्ण संयंत्र विनष्ट हो गया है और करीब 21 लोग मारे गये हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-March
मन हर वस्तु का रसास्वादन करता था पर किसी से तृप्ति नहीं हो रही थी। इस तरह श्री लाहिड़ी ने अपने पिछले अनेक जन्मों के दृश्यों से लेकर वहाँ पहुँचने तक का सारा वर्णन चलचित्र की भाँति देख लिया तब कही सम्मोहन टूटा। वे विस्मय के साथ आत्म-बोध से भर चुके थे और योगिराज सम्मुख खड़े मुस्करा रहे थे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-January
कथा, उपन्यासों में ऐसी बातों का समावेश होता है जो मनोरंजन के लिए आवश्यक हैं किन्तु फिर भी मनुष्य सिनेमा, नाटक, सर्कस देखने जाता है और उसके माध्यम से भले−बुरे प्रभावों को ग्रहण करता है। विचार कथाएँ और सम्बद्ध सिद्धान्तों का समावेश होते हुए भी उपन्यासों, कथाओं की पुस्तकों की तुलना में सिनेमा के चलचित्र कही अधिक लोकप्रिय बने हुए हैं। कारण एक ही है−−प्रतीकों के माध्यम से मनोरंजन अधिक हो जाता है। आरम्भ में निराकार विराट् चेतना से संपर्क साधने और प्रेम भावना उत्पन्न करने में मन को कठिनाई होती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-March
कितने ही व्यक्तियों में भविष्य बोध की सामर्थ्य पायी जाती है। चलचित्र की भाँति उन्हें भविष्य के गर्भ में पक रही घटनाएँ पहले ही दिखाई पड़ने लगती है। प्रत्यक्ष नेत्रों एवं संपर्क क्षेत्र से दूर रहने वाले व्यक्तियों की परिस्थितियों में क्या हेर फेर हो रहा है तथा वहाँ किस तरह की घटनाएँ घटित हो रही हैं इसका आभास किन्हीं-किन्हीं को होने लगता है। यह सब आज्ञाचक्र की जागृति का ही चमत्कार है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-November
तीसरे बालक का नाम है- स्टीवेन्स जो अति प्रतिभावान गणितज्ञ है कम्प्यूटर की तरह वह जटिल से जटिल गिनतियाँ तुरन्त कर दिखता है। विगत 700 वर्षों के किसी भी दिनाँक का वार, उस समय घटी घटनाएँ वह ऐसे बता देता है, जैसे उसके मस्तिष्क में वे चलचित्र की तरह घूम रही हों

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-February
हमारे आधुनिक जीवन का अभिशाप यह है कि अश्लील आख्यानों से भरे हुए उपन्यासों, कामोद्दीपक चित्रों और लेखों से पूर्ण समाचार पत्रों, तथा लम्पटतापूर्ण दृश्यों से भरे हुए नाटकों और चलचित्रों की प्रबल धारा में बहाकर हम अपने नौजवानों का दिमाग अनेक गलत धारणाओं से भर ही नहीं देते, वरन् उनकी स्वाभाविक एवं सामान्य काम-वृत्ति को बुरी तरह उत्तेजित और विकृत भी बना देते हैं। जहाँ एक तरफ हम अपने ही हाथों इतने विक्त वातावरण की सृष्टि करते हैं, वहाँ दूसरी तरफ लैंगिक-ज्ञान (सैक्स) के ऊपर एक गुप्त और अपवित्रता का झूठा पर्दा डालकर अपने बच्चों को जीवन की इस अमूल्य जानकारी से वंचित रखते हैं। जिस समय लड़की को यह विश्वास कराया जाता है कि उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य विवाह को सफल बनाना तथा एक सुन्दर घर बसाना है, कामवृत्ति और गर्भाधान आदि सम्बन्धी अत्यन्त उपयोगी जानकारी उससे छिपा कर रखी जाती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-November
चलचित्रों में तस्वीरें भागती, दौड़ती मालूम पड़ती हैं, पर वस्तुतः वह आँखों की भ्रम ग्रस्तता मात्र है। फिल्म अपनी चरखी पर इतनी तेजी से घूमती है कि आँखों की दृश्य शक्ति उन्हें उतनी तेजी से मस्तिष्क को आभास नहीं करा पाती, फलतः नेत्रगोलक और मस्तिष्क दोनों ही धोखा खाकर चलचित्रों में भगदड़ के दृश्य देखते हुए भ्रमग्रस्त बने रहते हैं
उस्तरे की धार-सामान्यतया बिलकुल सीधी दिखाई पड़ती है, पर माइक्रोस्कोप बताता है उसमें तिरछी लहरियाँ भरी पड़ी हैं। चलचित्रों में तस्वीरें भागती, दौड़ती मालूम पड़ती हैं, पर वस्तुतः वह आँखों की भ्रम ग्रस्तता मात्र है। फिल्म अपनी चरखी पर इतनी तेजी से घूमती है कि आँखों की दृश्य शक्ति उन्हें उतनी तेजी से मस्तिष्क को आभास नहीं करा पाती, फलतः नेत्रगोलक और मस्तिष्क दोनों ही धोखा खाकर चलचित्रों में भगदड़ के दृश्य देखते हुए भ्रमग्रस्त बने रहते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-March
ठोस देखने में बड़ा लगता है पर उसकी गति स्थूल होती है। गैसें कई तो दिखाई भी नहीं देती पर इतनी क्रियाशील होती हैं कि उनके माध्यम से उनकी गतिशीलता के आधार पर लाखों मील दूर की बात को एक सेकेण्ड में जान लिया जाये आगे इसी विज्ञान के विकास द्वारा लाखों वर्ष पूर्व की घटनाओं का चित्रण चलचित्र की भाँति सम्भव हो जाये तो कुछ असंभव नहीं इसी को कहते हैं लघुता की महत्ता। प्रकाश का अणु आज तक पकड़ में नहीं पर वह सारे संसार को प्रकाश, गर्मी देता है उसकी पहुँच इतनी विकट है कि वह एक सेकेण्ड में 186000 मील पहुँच जाता है। मनुष्य का उतावला मन यदि स्थूल से सूक्ष्म तथा उसे छोटा बनाया जा सके, बड़े होने के अहंकार से बचाकर उसे छोटे बनाया जा सके तो उसमें एक सेकेण्ड के भी लाखवें हिस्से में सारे ब्रह्मांड का भ्रमण कर आने की क्षमता, सक्रियता विद्यमान प्रत्यक्ष देखी जा सकती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
उतने प्राचीन रिकार्ड ढूंढ़ना कठिन था पर मेरी मेव ने इस समय जो बातें बताईं वह एक-एक कर सभी लुई अठारहवें के समय से मिलती-जुलती थीं। लोग सारा घटना चक्र चलचित्र की भाँति सुन रहे थे। यह कथन भारतीय मान्यताओं के कितने समीप है, यह देखकर अपने पूर्वजों के गहन अध्ययन, शोध और उपलब्धि पर आश्चर्य भी होता है, गर्व भी, पर इन्हें संसार तो क्या अपने देशवासियों ने ही किस तरह भुला दिया यह बात मन में आती है तो उससे भी अधिक दुःख और चिन्ता होती है कि यदि यह स्थिति ऐसी ही रही आने दी गई हम भारतीयों ने ही अपने आध्यात्म को सँवारा व सुधारा नहीं तो लोक-मंगल और विश्व के कल्याण का क्या होगा? हमारे ब्रह्म वचेस का क्या होगा जिसके द्वारा हम कभी संसार के शिरोमणि थे। मेरी मेव की घटना से क्या यह कथन प्रमाणित नहीं होते?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-May
श्री शास्त्री जी धार्मिक और साधनाशील व्यक्ति होकर भी ऐसे अन्धश्रद्धालु नहीं थे कि मन में आये हुये किसी भी संकल्प-विकल्प को पागलों की भांति स्वीकार कर लेते। ईश्वर उपासना, योग और साधनाओं से मन, बुद्धि, चित्त और अन्तःकरण इतने स्वच्छ हो जाते हैं कि ईश्वरीय प्रेरणाओं और दूर भविष्य की अनजानी घटनाओं के दृश्य चलचित्र की भाँति उतरते चले आते हैं। श्री शास्त्री जी इस बात को स्वीकार करते थे, पर वे इस तरह का अहंकार अपने लिये व्यक्त नहीं करना चाहते थे। श्री शास्त्री जी ने सन् 1945 और 1950 के मध्य भारतवर्ष को स्वतन्त्र होने की भविष्यवाणी की थी, वह सच हुई

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-October
विश्वविख्यात वैज्ञानिक आविष्कारक थामसअल्वा एडीसन ने जीवनभर एकनिष्ठ भाव से आविष्कारों में रुचि ली और अपनी समूची तत्परता उसी एक कम में लगायी ग्रामोफोन, टेपरिकार्डर; चलचित्र, कैमरा, बिजली के बल्ब जैसे छोटे-बड़े २५०० आविष्कारों का अपना कीर्तिमान है। दूसरा कोई भी अभी तक इतने प्रकार के इतने महत्वपूर्ण कम नहीं कर सका है। एडीसन बचपन में ही बहरे हो गए थे, लेकिन इसका उन्होंने कभी दुःख नहीं माना