अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-June
आत्मबोध से वंचित आजीवन बंदिनी की तरह घर में बंद रहती हुई चूल्हे चौके और और पौर तक सीमित पुरुषों की संकीर्णता का दण्ड भोगती हुई मिटती चली जा रही है। उसे समाज एवं राष्ट्र की गतिविधि में हाथ बटाना तो दूर उसके ज्ञान का भी अवसर नहीं मिलता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-June
आत्मबोध-साधना ब्रह्मविद्या के उस महान प्रयोजन को पूरा करती है, जिसमें भूमा, ऋतंभरा एवं आत्मजागृति के आधार पर भवबंधन कटने और जीवनलक्ष्य प्राप्त होने की प्रेरणा दी गई है। तत्त्वज्ञान में शरीर और मन के प्रथक्करण का धारण है। वैराग्य, संन्यास, परमहंसगति, स्थितिप्रज्ञ अवस्था का उदय होता है। आत्मबोध और तत्त्वबोध की उभयपक्षीय चेतना का उद्भव जिस अंत:करण में होगा, उसे विज्ञानमयकोश का सफल साधक ठहराया जा सकेगा ।
आत्मबोध के साधक को अपनी इसी दयनीय स्थिति पर करुणा व्यक्त करनी चाहिए। ईश्वर का अविनाशी अंश इस धरती पर ईश्वरीय प्रयोजन पूरे करने के लिए, पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आया था; पर वह सब तो एक प्रकार से सर्वथा विस्मरण ही हो गया। पैर उस जंजाल में फँस गया जिसे आटे के लोभ में गला फँसाने वाली मछली पिंजड़े में घुसे चूहे अथवा जाल में तड़पने वाले पक्षी के समतुल्य दुर्दशाग्रस्त स्थिति कहा जा सकता है। यह विडंबना इतनी दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपनी स्थिति पर आठ-आठ आँसू बहाए जा सकते हैं।
आत्मबोध के अंतर्गत आत्मसत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म, चिंतन एवं कर्त्तव्य की वस्तुस्थिति समझी-समझाई जाती है और तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार एवं समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निधारण किया जाता है। अब तक जो भेड़िया धसान जैसा अव्यवस्थिति एवं अस्त-व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी-विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित-सुसंचालित किया जाता है। अध्यात्म जगत की यही दो धाराएँ— पवित्र गंगा, यमुना कही जाती हैं। इन्हीं का संगम तीर्थराज प्रयाग है, जिसमें स्नान करने से परम-पुरुषार्थ का पुण्यफल प्राप्त होता है।
आत्मबोध और तत्त्वबोध की दोनों साधनाओं का समन्वय है। तीन से पौने चार, पौन घंटा— आत्मबोध। पौने चार से साढ़े चार, पौन घंटे— तत्त्वबोध। यों इन दोनों साधनाओं का विधि-विधान और उपक्रम पृथक-पृथक है, पर बारीकी से देखा जाए तो यह दोनों एक ही लक्ष्य के दो पक्ष हैं। एकदूसरों पर अन्योन्याश्रित हैं— एकदूसरे के पूरक है।
आत्मबोध की, आत्मविश्लेषण की साधना दर्पण के सहारे की जाती है। इसके लिए प्रत्यावर्तन सत्र में जो पेंतालीस मिनट निर्धारित हैं, उनमें आत्मतत्त्व से संबंधित प्रायः सभी समस्याओं पर प्रकाश पड़ जाता है। आत्मबोध, आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार और आत्मविकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है। आस्थाओं में आकांक्षाओं में क्या हेर-फेर होना चाहिए? गतिविधियों में, रीति-नीति एवं कार्यपद्धतियों में क्या उलट-पुलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभु-प्रेरित सुविस्तृत रूपरेखा सामने आती है।
आत्मबोध की विचारधाराओं से अंतःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण उपकरण का उद्देश्य है, उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि वह जीवन निर्माण की प्रेरणाओं को उभारे और उन्हें सक्रिय बनाए। लकीर पीटने जैसी चिह्नपूजा से न तो आत्मकल्याण हो सकता है और न दर्पण का मनुहार करने से आत्मलाभ का प्रयोजन पूरा हो सकता है।
आत्मबोध की साधना दैवी वरदान बनकर सामने आ गई।
आत्मबोध स्तर तक पहुँचने का। अकेला दर्पण आत्मबोधन, आत्मदर्शन करा दे यह किसी भी प्रकार संभव नहीं। पूजा-उपासना के पीछे जो प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं, उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त चिंतन और कर्तृत्व अपनाते हए दिव्य जीवन की रीति-नीति अपनाई जा सके तो ही इन पूजापरक कर्मकांडों का महत्त्व है। आत्मबोध की विचारधाराओं से अंतःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण उपकरण का उद्देश्य है, उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि वह जीवन निर्माण की प्रेरणाओं को उभारे और उन्हें सक्रिय बनाए। लकीर पीटने जैसी चिह्नपूजा से न तो आत्मकल्याण हो सकता है और न दर्पण का मनुहार करने से आत्मलाभ का प्रयोजन पूरा हो सकता है।
आत्मबोध और तत्त्वबोध की उभयपक्षीय चेतना का उद्भव जिस अंत:करण में होगा, उसे विज्ञानमयकोश का सफल साधक ठहराया जा सकेगा ।
आत्मबोध और तत्त्वबोध के आधार पर अपनी मान्यताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन करने की प्रेरणाऐं भरी पड़ी हैं।
आत्मबोध का। आमतौर से ही बाह्य जगत में इतने घुले और व्यस्त रहते हैं कि अपने एक प्रकार से भूल ही बैठे होते हैं। याद तो शरीर और मन की क्षुधा तृष्णा ही रहती है। आत्मा भी कोई होता है। हम भी आत्मा हैं।
आत्मबोध की यथार्थता अंतःकरण में सजग हुई होती तो निश्चित रूप से भौतिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त करने की तरह आत्मोल के लिए भी कुछ करने की प्रेरणा उठी होती और उस दिशा में भी कुछ तो बना ही होता।
आत्मबोध। दर्पण में अपनी छबि देखते हुए अब तक के अवरोधों के लिए, अपने को उत्तरदाई मानते हुए भर्त्सना करना और भविष्य में सत्यपथगमन के लिए अनुरोध-अनुग्रह करना। इसी कलेवर में शैतान और भगवान की परस्पर विरोधी सत्ताएँ अवस्थित देखना। दोनों में से एक को चुनना। आत्मसत्ता के भीतर समाए हुए इष्टदेव का अभिवंदन और प्रत्यक्ष करना।
आत्मबोध की साधना करते हुए किया जाता था। आत्मदेव को सद्गुरु, परमात्मा का प्रतिनिधि, उद्धारकर्त्ता एवं इष्टदेव के रूप में नमन करना चाहिए और आग्रह भरा अनुरोध करना चाहिए कि अपनी गतिविधियों का स्तर ऊँचा उठाए, ताकि लक्ष्य की ओर सुख-शांतिपूर्वक बढ़ चलना संभव हो सके।
आत्मबोध के साथ तत्त्वबोध ही दूसरा चरण है। आत्मा के साथ शरीर का, मन का, परिवार का क्या संबंध है, उसी का पुनर्निर्माण समझना चाहिए। ऋतंभरा प्रज्ञा प्राप्त हो गई और ब्रह्मज्ञान का जो महात्म्य बनाया गया है, वह समग्र रूप में करतल गत हो गया।
आत्मबोधन, आत्मदर्शन करा दे यह किसी भी प्रकार संभव नहीं। पूजा-उपासना के पीछे जो प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं, उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त चिंतन और कर्तृत्व अपनाते हए दिव्य जीवन की रीति-नीति अपनाई जा सके तो ही इन पूजापरक कर्मकांडों का महत्त्व है। आत्मबोध की विचारधाराओं से अंतःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण उपकरण का उद्देश्य है, उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि वह जीवन निर्माण की प्रेरणाओं को उभारे और उन्हें सक्रिय बनाए। लकीर पीटने जैसी चिह्नपूजा से न तो आत्मकल्याण हो सकता है और न दर्पण का मनुहार करने से आत्मलाभ का प्रयोजन पूरा हो सकता है।
आत्मबोध की प्रत्यक्ष विद्या है। अधिक बड़े साइज का दर्पण उपलब्ध हो तो पूरे शरीर को भी देखा जा सकता है; पर अपनी छवि लगभग उतनी ही बड़ी दीखनी चाहिए जितनी कि वह माप में होती है। छोटे दर्पण को दूर रखकर यों पूरा शरीर भी देखा जा सकता है, पर उसमें आकृति बहुत छोटी हो जाएगी, इससे काम नहीं चलेगा। इसीलिए सामान्यतया ऐसा ही करना पड़ता है कि डेढ फुट ऊँचा दर्पण किसी छोटी मेज पर इस तरह रख लिया जाए कि वह सामने लगभग ढ़ाई फुट की दूरी पर रहे। इस दर्पण में अपने स्वरूप को देखना चाहिए और उसका दार्शनिक विवेचन-विश्लेषण गंभीर मनःस्थिति में करना चाहिए।
आत्मबोध और (2) तत्त्वबोध। जीवन तथ्य की गरिमा, गंभीरता तथा यथार्थता को समझना, अनुभव करना ही विज्ञान है। दर्पण के माध्यम से अपने गर्हित और एक महत्तम स्तर का विचार- विष्लेषण किया जाता है और आत्मसत्ता को उच्चस्तरीय स्थिति तक पहुँचाने के लिए उभारा-उगाया जाता है। आत्मदेव को इष्टदेव में परिणत करने की आत्मबोध-साधना ब्रह्मविद्या के उस महान प्रयोजन को पूरा करती है, जिसमें भूमा, ऋतंभरा एवं आत्मजागृति के आधार पर भवबंधन कटने और जीवनलक्ष्य प्राप्त होने की प्रेरणा दी गई है। तत्त्वज्ञान में शरीर और मन के प्रथक्करण का धारण है।
आत्मबोध। पौने चार से साढ़े चार, पौन घंटे— तत्त्वबोध। यों इन दोनों साधनाओं का विधि-विधान और उपक्रम पृथक-पृथक है, पर बारीकी से देखा जाए तो यह दोनों एक ही लक्ष्य के दो पक्ष हैं। एकदूसरों पर अन्योन्याश्रित हैं— एकदूसरे के पूरक है।
आत्मबोध एवं तत्त्वबोध भी कहते हैं। ब्रह्मविद्या का समग्र ढ़ाचा इन्हीं दो धाराओं की सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक विधि-व्यवस्था समझाने के लिए खड़ा हुआ है। आत्मबोध के अंतर्गत आत्मसत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म, चिंतन एवं कर्त्तव्य की वस्तुस्थिति समझी-समझाई जाती है और तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार एवं समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निधारण किया जाता है। अब तक जो भेड़िया धसान जैसा अव्यवस्थिति एवं अस्त-व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी-विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित-सुसंचालित किया जाता है।
आत्मबोध, आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार और आत्मविकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है। आस्थाओं में आकांक्षाओं में क्या हेर-फेर होना चाहिए? गतिविधियों में, रीति-नीति एवं कार्यपद्धतियों में क्या उलट-पुलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभु-प्रेरित सुविस्तृत रूपरेखा सामने आती है। यदि प्रस्तुत दिव्य संदेशों को अंतःकरण की गहन भूमिका में प्रतिष्ठापित किया जा सका और उन्हें क्रियारूप में परिणत करने का प्रबल-पराक्रमभरा आत्मबल उपलब्ध हो सका तो समझना चाहिए कि दर्पण के माध्यम से की जाने वाली आत्मबोध की साधना दैवी वरदान बनकर सामने आ गई।
आत्मबोध और तत्त्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष हैं। लययोग से आनंदमयकोश बिंदुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमयकोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमयकोश की जागृति होती है। इसी साधना में पाँच चक्र भी जागृत होते चले जाते हैं।
आत्मबोध के पश्चात तत्त्वबोध की साधना है। आत्मा का स्वरूप समझने के बाद दूसरा कदम यही उठाना पड़ता है कि संसार के साथ अपने संबंधो का पुनर्निर्धारण करें। इसके लिए सुधार का पहला प्रयास आत्मा और काय-कलेवर के संबंधो में उत्पन्न हुई भ्रांति के निवारण के रूप में आरंभ करना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-January
आत्मबोध हुआ या नहीं यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचंड ह बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव-बंधनों छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन उद्देश्य और आनंद हाथ से चला गया।
आत्मबोध एवं आत्मोत्कर्ष के लिए अधिक गहन चिन्तन मनन 2. बसन्त पर्व पर किसी न किसी प्रकार छोटे या बड़े आयोजन 3. अखण्ड-ज्योति एवं युग-निर्माण पत्रिकाओं की सदस्य संख्या अभिवर्धन 4. नये छपे प्रचार ट्रैक्टों द्वारा अपने क्षेत्र में युग-निर्माण अभियान के स्वरूप का प्रचार परिचय, यह चारों ही क्रिया कलाप पूरे करने के लिये हम उत्साह पूर्वक जुट पड़े तो उसका परिणाम इस प्रकार सामने आ सकता है जिसके आधार पर निर्दिष्ट लक्ष्य की दिशा में आशातीत सफलता के साथ आगे बढ़ा जा सके।
आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन उद्देश्य और आनंद हाथ से चला गया।
आत्मबोध। अपना वास्तविक स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, शरीर और आत्मा का संबंध , श्रेय और प्रेय में से एक का चुनाव-अपनी गतिविधियों और रीति-नीतियों का सुनियोजित निर्धारण जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय इसी केंद्र पर टिके हुए हैं कि आत्मबोध हुआ या नहीं यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचंड ह बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव-बंधनों छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन उद्देश्य और आनंद हाथ से चला गया।
आत्मबोध। शरीर और आत्मा के स्वार्थों और संबंधों का पृथक्करण जीवन-लक्ष्य के प्रति आस्था और रीति-नीति का साहस पूर्वक निर्धारण। दोनों की साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय या पृथक-पृथक सुविधा के समय और शांत एकांत स्थान में, सुसंतुलित चित्त से यह दोनों ध्यान, चिंतन, किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अंतर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर जिन दिव्य संपदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए वे सहज ही करतल गत होती चली जायेगी।
आत्मबोध पर्व के रूप में मानना और युग-निर्माण अभियान के जन्म दिन के रूप में ही मानना अधिक प्रेरणास्पद हो सकता है। विद्या और कला की मस्तिष्कीय और हृदयगत चेतना को उभारने की ही अपनी कार्य - पद्धति है। यह प्रेरणाएँ सरस्वती पर्व से - बसन्त पंचमी से - सहज ही सम्बन्धित है।
आत्मबोधन का - आत्मोत्कर्ष का प्रेरणा पर्व बन सके इसके लिये हमें अपनी मनः स्थिति को अभी से विकसित परिष्कृत करने में लग जाना चाहिए। अब से लेकर बसन्त तक का समय प्रभातकालीन ब्रह्ममुहूर्त समझना चाहिए और हर दिन इस प्रकार से पुण्य चिन्तन में व्यतीत करना चाहिए जिसकी पृष्ठभूमि में देव जीवन में अपने को अधिक गतिशील बनाने का आवश्यक साहस मिल सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-February
आत्मबोध का तात्पर्य ही यह है कि अपने 'अहं' का सच्चिदाऽनंद आत्मा के रूप में हर घड़ी अनुभव किया जाए और शरीर तथा मन को परिधान, कलेवर, उपकरण, वाहनमात्र माना जाए। शरीरगत लोभ और मोह से जुड़े हुए दृष्टिकोण को अज्ञानांधकार माना जाए और उससे छूटने का प्रयास किया जाए। जो अपने को आत्मा मानेगा, वह स्वभावतः शरीरगत लोभ और मनोगत मोह की अपेक्षा आत्मा का हितसाधन करने वाली उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को प्राथमिकता देगा। जिसने कायकलेवर के साथ पक्षपात करते रहने की, मोह-प्रवृत्ति को निरस्त करने और आत्मा के साथ न्याय करने का निश्चय किया होगा। उसे कम-से-कम इतना विवेक विभाजन तो करना ही पड़ेगा कि जीवन की उपलब्धियों में से आधी शरीर सुविधा के लिए और आधी आत्मकल्याण के लिए नियोजित रहे।
आत्मबोध की प्रक्रिया पूरी करने के लिए ही स्वाध्याय सत्संग जैसी धर्म-धारणाएँ विनिमित हुई हैं। उपासना, साधना, तपश्चर्या के विविध विधि-विधानों से लेकर धर्मानुष्ठानों के अगणित कर्मकांडों तक के सारे क्रिया-कृत्य इसलिए हैं कि उनके माध्यम से भौतिकतापरायण पशु-प्रवृत्तियों को आत्मवादी आस्थाओं में परिणत किया जा सके। मनीषी और तत्त्वदर्शी इस रहस्य का समय-समय पर उद्घाटन करते रहे हैं। उपनिषदों की ब्रह्मविद्या इसी मर्म चर्चा से भरी पड़ी है। देवाराधन के विधान प्रकारांतर से अपने ही श्रद्धातत्त्व के विकास की भाव विज्ञान समर्थित पद्धति है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-October
आत्मबोध की दृष्टि से इसलिए अधिक है कि युग चेतना को उभारने औ नवयुग का सृजन करने में निरत महाकाल की महाकाली महाप्रज्ञा के अग्रदूत होन के गौरव का अनुमान किया जा सके।
आत्मबोध भी जगा है कि इस सुअवसर कस सदुपयोग बढ़ा-चढ़ाकर अनुदान प्रस्तुत करने से ही हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-March
आत्मबोध का आलोक प्रस्फुटित होने लगा। भावनाशील व्यक्ति ही ऐसा साहस पूर्ण निर्णय करते हैं कि निर्वाह मात्र के साधनों से सन्तोष करेंगे और परिवार को उतना ही सम्पन्न बनाने तक अपने कर्तव्य की इतिश्री मानेंगे जितने में कि अपने समाज के औसत नागरिक को जीवनयापन करना पड़ता है। भावनाशीलता को दिव्य विभूति की सार्थकता के लिए इस प्रकार का साहसिक निर्णय नितान्त आवश्यक है अन्यथा परमार्थ के लम्बे-चौड़े सपने मात्र कल्पना ही बनकर रह जायेंगे।
आत्मबोध होने से व्यक्ति अपनी वस्तुस्थिति समझता है। वह क्या है, क्यों है और क्या करने से सुख शान्ति एवं प्रगति भरी विभूतियाँ उपलब्ध हो सकती है यह निश्चित हो जाता है। जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए संकल्प पूर्वक बढ़ चलने वाले लोगों की सामान्य कार्य पद्धति से ही कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग की साधना जुड़ जाती है। उन्हें अलग से कुछ बहुत बड़े कर्मकाण्ड नहीं करने पड़ते।
आत्मबोध के अतिरिक्त ईश्वरीय अनुग्रह का प्रमाण दूसरा हो ही नहीं सकता। आत्मबोध के साथ यह व्याकुलता जुड़ी हुई है कि अतिरिक्त उपलब्धियों को उस प्रयोजन के लिये नियोजित किया जाये, जिनके लिए यह अतिरिक्त अनुदान दिया गया है। इस प्रकार की आन्तरिक पुकार को स्पष्टतः ईश्वर की वाणी समझा जाना चाहिए और जिसमें यह आत्मा की पुकार जितनी तीव्र हो उसे अपने को उतना ही बड़ा ईश्वर का प्रियपात्र अनुभव करना चाहिए। जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए जो जितना अधिक पुरुषार्थ कर सके- साहस दिखा सके उसे उतना ही बड़ा अध्यात्मवादी- ईश्वर परायण मानना चाहिए हमें नकलीपन से ऊंचा उठना ही होगा और सच्ची ईश्वर भक्ति का मार्ग अपनाकर वह सच्चा ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करना होगा जो मरने के बाद स्वर्ग मुक्ति मिलने के आश्वासनों में नहीं उलझाता वरन् देवोपम महानता के पथ पर तत्काल अग्रसर करता है। साथ ही आत्म सन्तोष एवं आत्मोल्लास के वरदान से तत्काल सुसम्पन्न करता है।
आत्मबोध, आत्मानुगमन, आत्मोत्कर्ष की सम्मिलित मनः स्थिति का नाम ही श्रद्धा है। यों किसी मन्त्र, आदर्श, व्यक्ति, धर्म आदि के प्रति निष्ठा को भी श्रद्धा कहते हैं पर उसका उच्च स्तर आत्मानुगमन से ही जुड़ा रहता है। जो इस स्तर की प्रेरणा उत्पन्न कर सके भावना उमंग सके वही सच्ची श्रद्धा है। कहना न होगा कि आत्म शक्ति की सुसम्पन्नता केवल श्रद्धालु लोगों को ही उपलब्ध हो सकती है।
आत्मबोध के साथ यह व्याकुलता जुड़ी हुई है कि अतिरिक्त उपलब्धियों को उस प्रयोजन के लिये नियोजित किया जाये, जिनके लिए यह अतिरिक्त अनुदान दिया गया है। इस प्रकार की आन्तरिक पुकार को स्पष्टतः ईश्वर की वाणी समझा जाना चाहिए और जिसमें यह आत्मा की पुकार जितनी तीव्र हो उसे अपने को उतना ही बड़ा ईश्वर का प्रियपात्र अनुभव करना चाहिए। जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए जो जितना अधिक पुरुषार्थ कर सके- साहस दिखा सके उसे उतना ही बड़ा अध्यात्मवादी- ईश्वर परायण मानना चाहिए हमें नकलीपन से ऊंचा उठना ही होगा और सच्ची ईश्वर भक्ति का मार्ग अपनाकर वह सच्चा ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करना होगा जो मरने के बाद स्वर्ग मुक्ति मिलने के आश्वासनों में नहीं उलझाता वरन् देवोपम महानता के पथ पर तत्काल अग्रसर करता है। साथ ही आत्म सन्तोष एवं आत्मोल्लास के वरदान से तत्काल सुसम्पन्न करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
आत्मबोध और तत्वबोध की ज्ञान साधना से ही ऋतम्भरा प्रज्ञा प्रकट होती है और जीवात्मा का ‘भूमा’ स्थिति प्रज्ञता में प्रविष्ट होना संभव होता है। आत्मा की यह भूख बुझाने के लिए नये सिरे से विद्याध्ययन करना पड़ता है-यह ब्रह्मचारी की लौकिक शिक्षा से सर्वथा भिन्न होता है, वानप्रस्थ लेने का प्रथम सोपान है-ब्रह्मविद्या का पारायण करना, उसमें पारंगत होना- ज्ञानमृत से परिपूर्ण व्यक्ति ही ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं और लोक निर्माण जैसे महान प्रयोजन के लिए अधिकारी बनते हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-August
आत्मबोध-तत्वबोध- प्रातःकाल उठते ही नये जन्म का अनुभव। आज की दिनचर्या का निर्धारण तथा रात्रि को सोते समय दिन भर के कार्यों की समीक्षा। मृत्यु का स्मरण। जीवन का सदुपयोग न कर सकने पर अंत समय होने वाले पश्चाताप से मुक्ति दिलाने वाला निर्धारण।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-March
आत्मबोध अर्थात् हर दिन नया जन्म। तत्वबोध अर्थात् हर रात को नया मरण। जन्म और मरण के साथ जुड़ी हुई विचारणा पर सच्चे मन से विचार करने पर मनुष्य अपने भीतर एक नई हलचल अनुभव करता है और अपने क्रियाकलाप को, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाकर एक प्रकार से आत्मिक कायाकल्प की दिशा में कटिबद्ध और अग्रसर होता है।
आत्मबोध की साधना करनी चाहिए।
आत्मबोध प्रश्न जीवन की महान समस्या के रूप में सामने आये और उन्हें सुलझाने के लिए हम विवेक का उपयोग करें तो भावी जीवनयापन के लिए एक व्यवस्थित दर्शन और कार्यक्रम सामने आ खड़ा होगा। यदि इस तत्वबोध को ठीक तरह हृदयंगम किया जा सका, तो आकांक्षाओं और कामनाओं का स्वरूप बदला हुआ होगा। रीति-नीति और कार्य पद्धति में वैसा परिलक्षित होगा जैसे आत्मज्ञान सम्पन्न मनुष्य में प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-November
आत्मबोध हुआ, वरन् वह शक्ति भी मिली जिससे दूसरों को प्रभावित कर पाते। उनकी वाणी में वह शक्ति उभरी जिससे सुनने वाले ठगे से रह जाते। गायत्री उपासना से विमल हुई बुद्धि में विद्वता की तीव्रधार चढ़ती चली गयी जिससे अध्यात्म विद्या के गूढ़ रहस्य एक के बाद एक परतों की तरह खुलते चले गये। प्रतिफल यह हुआ कि बड़ी संख्या में लोग उनसे दीक्षा ग्रहण करने लगे। उन्होंने लोगों को बताया कि महाकाली गायत्री की ही एक शक्ति धारा है जिसका अर्थ पशु प्रवृत्तियों का उन्मूलन होता है-पशुवध नहीं, फलतः गोंडवाना प्रदेश का यह कलंक छूटा और लोग गायत्री महाशक्ति की सात्विक दक्षिणमार्गी उपासना में प्रवृत्त हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-January
आत्मबोध यह सब एक ही तथ्य के कई नाम है। आत्मा को विकसित परिष्कृत करते करते उसे ब्रह्मोपम बनाया जाता है। द्वैत की अद्वैत में परिणति इसी प्रकार होती है।
आत्मबोध और आत्म परिष्कार की परिधि में विचारणा को केन्द्रीभूत किया जा सकता है। उपरोक्त चारों प्रयोजन एक साथ सध जाते हैं, चारों आपस में गुंथे हुए हैं।
आत्मबोध करा के जाम्बवन्त ने उन से लंका तक पहुँचने हेतु उड़ान भरवा ली थी। क्या ऐसा ही कुछ उन दिनों सबकी स्थिति नहीं थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
आत्मबोध-आत्मजाग्रति-जीवन्मुक्ति। गायत्री को पंचमुखी इन्हीं कोशों के साथ जोड़ते हुए निरूपित किया जाता है। इस अलंकारिक चित्रण में इतना ही संकेत है कि गायत्री की उच्चस्तरीय उपासना में पंचकोशों के जागरण-अनावरण की साधना का महत्वपूर्ण स्थान है। पाँचकोश वस्तुतः तिजोरी के भीतर पाँच तालों में बंद बहुमूल्य रत्न भण्डार के समान हैं।
आत्मबोध-आत्मजाग्रति की स्थिति वस्तुतः है ही इतनी उच्चस्तरीय। इस दृष्टिकोण को ही अमृत कहा गया है।
आत्मबोध हो सके कि उनके अवतरण का कितना महान प्रयोजन है। हर गुरु ने अपने-अपने समय में अपने शिष्य को इसी तरह ज्ञानचक्षु दिए हैं। निर्देश साथ में यह दिए गए कि वे तुरंत चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण आरंभ कर दें। ये चौबीस वर्ष से सत्ताईस वर्ष में संपन्न किये जायँ। इस अवधि में किसी बंद कोठरी में न बैठकर रोजमर्रा का काम भी करें, स्वतंत्रता संग्राम में भाग लें तथा ज्ञानार्जन कर अखण्ड दीपक जो प्रज्वलित किया है, उसकी ज्योति घर-घर पहुँचाएँ ताकि गायत्री साधना का महत्व जन-जन को समझ में आ सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
आत्मबोध कराने वाला मिल जाय तो उसका अंतः का वैभव निखर सामने आ जाय। पूज्यवर ने यह अपने जीवन में साकार औरों को यही प्रेरणा देकर उन्हें कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया? वस्तुतः मनुष्य जिस मूलभूत सत्ता का बना है वह हाड़-माँस का यह शरीर नहीं वरन् अंतःकरण में विद्यमान वे दिव्य संस्कार हैं जो उसे मानवी गरिमा का बोध कराके सतत् ऊँचा उठने की प्रेरणा देते रहते हैं। बाहर से दीखने में तो सभी एक जैसे हैं, सभी का चोला नर तन का है, परन्तु संस्कारों की सम्पदा ही वह विशिष्टता है तो एक को दूसरे से अलग करती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-December
आत्मबोध, आत्म निरक्षण, आत्म सुधार और आत्म विकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है? आस्थाओं में आकाँक्षाओं में क्या हेर फेर होना चाहिए? गतिविधियों में रीति नीति में एवं कार्यपद्धति में क्या उलट पलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभु प्रेरित सुविस्तृत रूपरेखा सामने आती है।
आत्मबोध, आत्म दर्शन करा दे, यह किसी प्रकार संभव नहीं। पूजा उपासना के पीछे जो प्रेरणायें भरी पड़ी हैं उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त चिंतन और कर्त्तव्य अपनाते हुए दिव्यजीवन की रीति-नीति अपनाई जा सके तो ही इन पूजा परक कर्मकाण्डों का महत्व है। आत्म बोध की विचार धाराओं से अंतःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण उपकरण का उद्देश्य है। उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि जीवन निमार्ण की प्रेरणाओं को उभारे और उन्हें सक्रिय बनायें। लकीर पीटने जैसी चिन्ह पूजा से न तो आत्म कल्याण हो सकता है और न दर्पण की मनुहार करने से आत्म लाभ का प्रयोजन पूरा हो सकता है।
आत्मबोध करने वाला साधक अपनी इस दयनीय स्थिति पर विचार करता और करुणा व्यक्त करता है कि वह ईश्वर का अविनाशी अंश एवं उसका वरिष्ठ राजकुमार होते हुए भी किस तरह भवबंधनों से बँधा हुआ-दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का सताया हुआ रुदन-क्रन्दन करता हुआ, संक्षोभों की आग में जलता हुआ जी रहा है। जबकि वह पृथ्वी पर प्रसन्नता पूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए ईश्वरीय प्रायोजन पूरे करने के लिए पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आया था। पर वह सब तो इक प्रकार से सर्वथा विस्मरण ही हो गया। पैर उस जंजाल में फँस गया जिसे आटे के लोभ में गला फँसाने वाली मछली अथवा जाल में तड़पने वाले पक्षी के समतुल्य दुर्दशाग्रस्त स्थिति कहा जा सकता है। वह चाहता तो ईश्वरीय निर्देश और आध्यात्म कर्तव्य का पालन करते हुए पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता था और अपूर्णता से पूर्णता का वरण करना चाहता था।
आत्मबोध एवं तत्वबोध भी कहते हैं। ब्रह्मविद्या का समग्र ढांचा इन्हीं दो धाराओं की सैद्धाँतिक एवं व्यावहारिक विधिव्यवस्था समझाने के लिए खड़ा हुआ है। आत्म बोध के अंतर्गत आत्म सत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म चिंतन एवं कर्तव्य की स्थिति समझाई जाती है और तत्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार और समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अब तक जो ढर्रे का अव्यवस्थित एवं अस्त−व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित सुसंचालित किया जाता है।
आत्मबोध एवं तत्वबोध की इन्हीं दोनों साधनाओं का समन्वय करना पड़ता है। इन दोनों का लक्ष्य एक ही है। दोनों अन्योन्याश्रित एवं परस्पर पूरक हैं। इसके लिए ध्यान मुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यान पूर्वक देखा जाना ही आत्म बोध की प्रत्यक्ष विद्या है। अधिक बड़े साइज का दर्पण उपलब्ध हो तो पूरे शरीर को भी देखा जा सकता है।
आत्मबोध की साधना एक दैवी वरदान बनकर सामने आई है। आत्मोत्कर्ष के महान प्रायोजन की आवश्यकता पूरी हुई और अणु से विभु, नर से नारायण बनने का लक्ष्य हस्तगत हुआ।
आत्मबोध की यथार्थता अंतःकरण में सजग हुई होती तो निश्चित रूप से भौतिक सुख सुविधायें प्राप्त करने की तरह आत्मोत्कर्षण के लिए भी कुछ करने की प्रेरणा उठी होती और उस दिशा में भी कुछ तो बना ही होता।
आत्मबोध की आत्म विश्लेषण की साधना दर्पण के सहारे की जाती है। इस साधना के द्वारा प्रायः संबंधित सभी समस्याओं पर प्रकाश पड़ जाता है। आत्मबोध, आत्म निरक्षण, आत्म सुधार और आत्म विकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है? आस्थाओं में आकाँक्षाओं में क्या हेर फेर होना चाहिए? गतिविधियों में रीति नीति में एवं कार्यपद्धति में क्या उलट पलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभु प्रेरित सुविस्तृत रूपरेखा सामने आती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-July
आत्मबोध के अभाव, अल्पज्ञता, तथा कषाय−कल्मषों के आवरण से मुक्ति न पा सकने की विडम्बना की फलश्रुति मात्र है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-October
आत्मबोध के ही दिव्य वरदान की माँग की जाय। सर्वतोभावेन परमात्मा के प्रति समर्पित भक्त का योगक्षेम वहन करने की प्रतिज्ञा भगवान ने स्वयं की है, पर उस शर्त को भी तो पूरा किया जाना चाहिए जो पात्रता विकसित करने, हृदय को वासनाओं और तृष्णाओं से रिक्त करने के रूप में जुड़ी हुई है।
आत्मबोध, अन्तःप्रकाश अथवा समर्पण स्वीकार ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-June
आत्मबोध और आत्म विकास की दृष्टि से इसमें महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-September
आत्मबोध से जोड़ने के लिए उन्होंने लोगों को सद् चिन्तन की आधारभूत और परमात्मा की अभिव्यक्त सत्ता गायत्री और सत्कर्म के मूर्तिमान स्वरूप यज्ञ से जोड़ दिया। नास्तिक संसार को आस्तिक संसार में बदलने का सृष्टि के आविर्भाव से लेकर अब तक यह सब बड़ा उपक्रम है, विराटतम, महानतम आँदोलन है।
आत्मबोध,आत्मकल्याण, आत्मोत्कर्ष जैसे शब्दों को भारतीय दर्शन में प्रमुखता मिलने से लगता है कि यह व्यक्तिवादी मान्यता है और स्वार्थी बनने के लिए कहा जा रहा है। इसे स्वार्थान्धता को प्रोत्साहन मिलेगा और सामाजिकता क्षीण होगी। लेकिन यह आशंका तभी सही सिद्ध हो सकती थी, जब व्यक्ति विकास को विश्वात्मा के लिए समर्पित करने के स्थान पर निजी सुख-सुविधा के लिए आत्मकेन्द्रित किया गया होता। पर यहाँ तो यह मान्यता है कि विश्वात्मा के, परमात्मा के चरणों पर उत्कृष्टतम पूजा शाकल्य के रूप में परिष्कृत आत्मसत्ता को समर्पित किया जाए। इस प्रकार यह व्यक्तिवादी स्वार्थान्धता का, एकाकीपन का आक्षेप नहीं आता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-November
आत्मबोध होता है। वह जीवन का महत्व, स्वरूप एवं लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करता है, सत-असत का उचित
आत्मबोध हेतु बिखर गए थे। कुछ ही थे, जो कलकत्ता में रह रहे थे। नरेन्द्रनाथ जिनने स्वामी विवेकानन्द बनने के पूर्व कई नाम बदले थे, ऐसी ही भ्रमण यात्रा पर हिमालय क्षेत्र में थे। गुरु के स्थल सान्निध्य का अभाव उन्हें भी कसमसाता था। अन्दर से गहन प्यास थी कि परमचेतना का वह सान्निध्य क्या पुनः नहीं मिल सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
आत्मबोध, आत्मनिर्माण, कर्तव्यनिष्ठा, सदाचरण, समाजनिष्ठा, राष्ट्रभक्ति आदि वे सभी विषय विद्या कहे जाते हैं, जो वैयक्तिक चिन्तन, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता का समावेश करते हों। इसके बिना मनुष्य के अन्तराल में छिपी हुई रहस्यमय दिव्यता का विकास नहीं हो पाता। विद्या का स्वरूप है-विचारणा एवं भावना के स्तर को उच्चस्तरीय बनाने वाला ज्ञान, अनुभव और अभ्यास। इसी से गुण-कर्म-स्वभाव का परिष्कृत व्यक्तित्व विनिर्मित होता है। शिक्षा और विद्या का समन्वय स्वार्थपरता को हटाता और राष्ट्रनिष्ठा को बढ़ाता है।
आत्मबोध करा दिया- आपातकालीन स्थिति में उनकी मदद की- उन्हें बंधनमुक्त कर मोक्ष भी प्राप्त करा दिया।
आत्मबोध, अन्तःस्फुरणा, दिव्य अनुग्रह, गुरुदर्शन, आन्तरिक दिव्यता या जो कुछ कहा जाए प्राप्त हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-August
आत्मबोध की प्राप्ति के उपरान्त हम अन्तिम सोपान में प्रवेश करते हैं- स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनाम् विप्रमाक्षः। जिसे स्मृति लाभ हो गया है, जिसको आत्मज्ञान हो गया, उसकी सारी ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं, वह बन्धन मुक्त हो जाता है। वासना, तृष्णा अहंता यह मनुष्य के बन्धन के निमित्त है। इनसे मनुष्य में ग्रन्थियाँ पड़ने लगती हैं। कोई लोभ की जंजीर में जकड़ा हुआ है, कोई मोह की जंजीर में, किसी को यश की कामना है, किसी को धन की, किसी को पद-प्रतिष्ठा की।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
आत्मबोध बना रहता है। इस तरह की योगनिद्रा का अभ्यास करने से शुभ मनोवृत्ति बनती और अनेकानेक तरह की जीवनोपयोगी उपलब्धियाँ, क्षमताएँ हस्तगत होती चली जाती हैं। मन की अन्तिम वृत्ति स्मृति हैं इसकी दिशा सार्थक भी हो सकती है और निरर्थक भी। बुद्ध ने सम्यक्-स्मृति को ही अधिक उपयोगी बताया है, जो जीवन की सच्चाई में उतरती और जागरुकता का आभास निरन्तर कराती रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
आत्मबोध, ईश्वर कृपा सभी कुछ सुलभ-सहज हो जाती हैं। गुरु पूर्णिमा सद्गुरु की इसी महा कृपा की अनुभूति का महापर्व है।
आत्मबोध का पर्व है, आत्मचिंतन का पर्व है। यह साधारण नहीं, असाधारण है। इसको गुरुपूर्णिमा का पर्व कहा गया है। अर्थात् उसका दिन जिसने कि सारी जिंदगी राह दिखाई। यह आज का पर्व है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-November
आत्मबोध को प्राप्त कर बुद्ध कहलाए।
आत्मबोध तथा आत्मबल का ज्ञान न होने के कारण लोग छोटे छोटे कारणों को लेकर चिंताग्रस्त, आशंकित आतंकित एवं भयभीत होते है। इस भीरुता को हेय ठहराते हुए प्राणसूक्त के उपर्युक्त मंत्रों में यही निर्देश दिया गया है कि अपने का देवशक्तियों की पंक्ति में बिठाएँ और उन्हीं की तरह निडर उल्लसित जीवन जिए।
आत्मबोध एवं तत्त्वबोध की साधना से यह निरीक्षण अतिसहज और सुगम हो जाता है। इस सहज व सरल साधना से प्रत्येक दिन अपने नये जीवन एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव करना होता है। इससे हमें प्रतिदिन अपने कार्यों के मूल्याँकन के साथ-साथ अपने व्यक्तित्व की गहराई में झाँकने का अवसर मिलता है। हर दिन एक नये संकल्प के साथ नया कार्य प्रारम्भ होता है जो सफल व्यक्तित्व की सम्मोहक विशेषता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-December
आत्मबोध हुआ, साथ ही कर्मबीज भी समयानुसार नष्ट होते गये। महर्षि रमण के तप के प्रभाव से समूचा देश भी प्रभावित एवं प्रकाशित हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-January
आत्मबोध-तत्त्वबोध- प्रातः जागरण के तुरन्त बाद भगवान् का स्मरण करते हुए यह सोचना कि प्रभु कृपा से हमें यह एक दिन का जीवन मिला है। इसके सार्थक उपयोग के लिए संकल्पित होना। इसी तरह रात्रि सोते समय दिन भर के कामों की समीक्षा करते यह चिन्तन करते हुए सोना कि हमारा समूचा अस्तित्त्व प्रभु में समर्पित-विसर्जित एवं विलीन हो रहा है। प्रत्येक दिन अपने नए जीवन का एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव करना ही आत्मबोध-तत्त्वबोध की साधना का सार है।
आत्मबोध-तत्त्वबोध की साधना का सार है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-February
आत्मबोध एवं आत्मोत्कर्ष के लिए अधिक गहन चिंतन−मनन, अपने स्तर पर अपने यहाँ छोटा दीपयज्ञपरक आयोजन, संगठन−सशक्तीकरण की दिशा में आत्ममंथन एवं विद्याविस्तार के निमित्त हमारे सुनिश्चित संकल्प, इन चारों को पूरा करने के निमित्त मनाया जाए, तो ही हमारी गुरुसत्ता के प्रति समर्पण की सार्थकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-May
आत्मबोध हो गया। उनके सामने चाँडाल के स्थान पर स्वयं साक्षात काशी विश्वनाथ खड़े थे। वे बोले, तू ज्ञानी होकर भी शरीर को देखता है, जो चमड़े से बना है। आत्मा का स्पर्श तो आत्मा ही कर सकता है और वह तो सतत निष्पाप है। इस र्स्पशभेद के आधार पर स्वयं को संन्यासी कहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
आत्मबोध करा देता है। अब इस गूढ़ अर्थ वाले श्लोक एवं इससे और क्या उपलब्धियाँ होती हैं, इस व्याख्या वाले अगले श्लोकों का क्रम आगामी अंक में। (क्रमशः)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
आत्मबोध को प्राप्त ज्ञानी बनें। यह ध्यान रखें कि पंडितजन, ज्ञानी, विवेकवान व्यक्ति अनित्य दुःखों के हेतु, विषयभोगों के चक्कर में न पड़कर ब्रह्मयोग मुक्तात्मा ही बनते हैं एवं ब्रह्मानंद की प्राप्ति करते हैं। जीवन-मुक्ति के इन्हीं प्रसंगों की चर्चा अगले श्लोकों के साथ अगले अंक में। (क्रमश:)
आत्मबोध को प्राप्त है तो वह उनमें लिप्त नहीं होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-October
आत्मबोध, चेतना के उद्गम स्थान पर ही पहुंचने पर संभव है।
आत्मबोध की साधना से मनःस्थिति इतनी सक्षम-समर्थ हो जाती है कि वह किसी भी परिस्थिति से तालमेल कर अपने अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकती है। यही तनाव का एकमात्र निदान है और उच्चस्तरीय जीवन का पाथेय पथ भी है।
आत्मबोध एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव तत्त्वबोध भी तनाव मुक्ति के लिए रामबाण साधन है। ईश्वर के प्रति गहन आस्था एवं तत्त्वबोध-आत्मबोध की साधना से मनःस्थिति इतनी सक्षम-समर्थ हो जाती है कि वह किसी भी परिस्थिति से तालमेल कर अपने अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकती है। यही तनाव का एकमात्र निदान है और उच्चस्तरीय जीवन का पाथेय पथ भी है।
आत्मबोध का प्रशिक्षण आरंभ से ही करना होगा, क्योंकि उन तथ्यों को, जिन पर आत्मोन्नति निर्भर है, एक प्रकार से हमने भुला दिया है।”
आत्मबोध तत्वबोध, 15 मिनट का सार्थक गायत्री जप, ज्योति अवतरण की ध्यान धारणा तथा स्वाध्याय को लिया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-March
आत्मबोध है, तो सहायक शक्तियाँ भी हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
आत्मबोध हो जायेगा, उसी क्षण उसको दीनता समाप्त होकर एक ऐसा उपलब्ध हो जायेगा, जिसे उच्च और गरिमामय कहा जा सके। फिर बहृ से दरिद्र होते हुए भी मनुष्य अन्दर से महान और बलवान बन का सदा इस तथ्य को सिद्ध करता रहेगा कि अंतस् की विशालता और अपना के आगे बाहरी बड़प्पन तुच्छ और होगा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-December
आत्मबोध, यही है आत्मिक जीवनक्रम। इसी को अपनाकर- जीवन में उतारकर हम अपने अवतरण की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-November
आत्मबोध से आरम्भ होने वाली यह प्रक्रिया उसे परमसत्ता के समीप ले जाती है। यही आध्यात्मिक विकासवाद है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-September
आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
आत्मबोध के अभाव में होती है। व्यक्ति अपना विश्लेषण कर ही नहीं पाता। यह कार्य कोई सिद्ध समर्थ ही कर सकते हैं। शरीर और मन का अध्ययन लोगों के सामान्य क्रिया-कलापों से कोई भी कर सकता है, पर अंतःकरण का वेधन कोई दिव्य तत्त्वदर्शी ही कर सकते हैं। इसे इस परिवार का सौभाग्य कहना चाहिये कि इसे वह समर्थ संरक्षण पूज्य गुरुदेव के रूप में प्राप्त है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-December
आत्मबोध इसी दिन मिला, जीवन को दिशा उन्हीं क्षणों में बदली, देवत्व की शरण में उसी दिन समर्पण किया और मानव पुत्र न रहकर शक्ति पुत्र के रूप में अपना काया-कल्प होते पाया। वस्तुतः वही हमारा जन्मदिन है। ईश्वर की वाणी उसी दिन सुनी और 24 महापुरश्चरणों की तपश्चर्या का शुभारम्भ उसी दिन किया। इस प्रकार हमारा वास्तविक जन्मदिन वही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-April
आत्मबोध कराये जाने पर ही वह अपना वास्तविक स्वरूप जान सका और तदुपरान्त वैसा बन सका। बिल्ली, बन्दर से लेकर तमाम आक्रामक जीवों में लगभग ऐसी ही प्रक्रिया दिखाई पड़ती है। शावक अपने वरिष्ठों से शिक्षण-प्रक्रिया द्वारा ही अकर्मण्य-प्रत्याक्रमण के घात-प्रतिघात सीखते और तदनुरूप आदत की वंश-परम्परा बनाये रखते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-January
आत्मबोध की आकाँक्षा को?”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-June
आत्मबोध के स्वरों को अपने में समाहित करने वाली उपनिषद् ऐतरेय उपनिषद् कहलाई। भगवान सूर्य की उपासना से कोई भी मनुष्य ब्रह्मर्षि पद पाने में समर्थ हो सकता है। “
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-September
आत्मबोधन का मनोबल कहाँ से आएगा। मन की गाँठें खोलने का इसके अतिरिक्त कोई उपाय भी तो नहीं है कि साधक अपनी इस जन्म की सारी की सारी गुप्त बातें को प्रकट कर अपने कुसंस्कार धोये, स्वप्नों में परिलक्षित होने वालों में पूर्व जन्मों के पापों को भी उसी प्रकार बताये और उनकी शुद्धि प्रायश्चित करे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
आत्मबोध, आत्मानुगमन, आत्मोत्कर्ष की सम्मिलित मनःस्थिति का नाम ही श्रद्धा है। यों किसी मन्त्र, आदर्श, व्यक्ति, धर्म के प्रति निष्ठ को भी श्रद्धा कहते हैं, पर उसकी रज्जू श्रेष्ठता के अनुगमन की दिशा से ही जुड़ी रहती है। जो इस स्तर की प्रेरणा उत्पन्न कर सके, भावना उमगा सके, उसकी ही सच्ची श्रद्धा है। इसको सदुद्देश्य के लिए नियोजित कर देने का नाम ही आत्मशक्ति है। आत्मबल की प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया उन सिद्धियों के रूप में तत्काल देखी जा सकती है जो न केवल अपने को ही महान बनाती हैं, वरन् संपर्क में आने वालों को भी इतना लाभ पहुँचाती हैं, जितना आर्थिक और शारीरिक प्रचुर सहयोग देने पर भी संभव नहीं हो सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-November
आत्मबोध होता है। जीवन का स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग मस्तिष्क की जानकारी तक सीमित न रहकर जब आस्था बनकर परिपुष्ट होता है तब उसे आत्मबोध कहते हैं। यह वह उपलब्धि है जिसे पाकर एक सामान्य सा राजकुमार महान बुद्ध के रूप में साक्षात् भगवान बन गया था। इस तत्त्व की छोटी मात्रा भी मनुष्य को अपने साथियों की तुलना में कहीं अधिक ऊँचा और कहीं अधिक सफल बनाती है। ज्ञान भूमिका का यह तीसरा चरण आत्म साक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन के रूप में माना गया है।
आत्मबोध कहते हैं। यह वह उपलब्धि है जिसे पाकर एक सामान्य सा राजकुमार महान बुद्ध के रूप में साक्षात् भगवान बन गया था। इस तत्त्व की छोटी मात्रा भी मनुष्य को अपने साथियों की तुलना में कहीं अधिक ऊँचा और कहीं अधिक सफल बनाती है। ज्ञान भूमिका का यह तीसरा चरण आत्म साक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन के रूप में माना गया है। आत्मा का एकाकी अस्तित्व आदर्श विहीन और नीरस ही रह जाता है उसमें सरसता का संचार ईश्वर के समन्वय से ही सम्भव होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
आत्मबोध होने पर इस जगत के सारे रहस्य खुल जाते हैं। तदुपरान्त और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता।
आत्मबोध और सोते समय तत्त्वबोध का चिन्तन, मनन नित्य का संध्या वन्दन समझा जा सकता है। इसमें फुरसत न मिलने जैसा कुछ बहाना करने की भी गुँजाइश नहीं है। आँख खुलते ही जीवन का महत्त्व, उद्देश्य, स्वरूप एवं उपयोग स्मरण किया जाय। इस अनुदान के पीछे ईश्वर की अपेक्षा तथा अपने कन्धे पर आई जिम्मेदारी को यदि समझा जा सके तो एक-एक क्षण का- क्षमताओं के एक-एक कण का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात ही सामने होगी। उठने से लेकर सोने तक के समय विभाजन, चिन्तन तथा सतर्कताओं का क्रम बना लेना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-September
आत्मबोध के सम्बन्ध में प्रसुप्त स्थिति में पड़ी है। न उसे अपने स्वरूप का ज्ञान है न लक्ष्य का । मोह मदिरा पीकर वह अज्ञान की मूर्च्छा से ग्रसित हो रही हैं। साड़े तीस फेरो में तीन तो वासना, तृष्णा और अहंता के पूरे हैं। बीच-बीच में कभी-कभी आत्म-कल्याण की बात भी हलके फुलके ढंग से उभरती हैं ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-April
आत्मबोध न हुआ। एक दिन दीर्घतपस् का देहान्त हो गया, उससे पुण्य को तो दुःख न हुआ पर पावन ने कई दिन पिता की स्मृति में रो-रोकर बिताए समय का संयोग कुछ दिन में ही माता का भी देहावसान हो गया तब तो पावन पर एक तरह से वज्रपात ही हो गया। मारे दुःख के उसने कई दिन तक अन्न भी ग्रहण नहीं किया। पुण्य ही ऐसा था जिसे न तो पिता की मृत्यु का दुःख हुआ और न माता के निधन का, उसने दोनों का मृतक संस्कार और श्राद्ध तर्पण शास्त्रीय विधान से सम्पन्न किया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-November
आत्मबोध और तत्त्वबोध की द्विविधि ध्यान धारणा से ब्रह्मयोग की साधना बनती है। यह सब कैसे किया जाय यह पाँच घण्टे प्रतिदिन की भाव साधना में प्रत्यावर्तन सत्र के छात्रों को सिखाया और कराया जाता रहा है। साथ ही प्रवचनों के माध्यम से चिन्तन एवं कर्तृत्व को अध्यात्म दर्शन के अनुरूप कैसे ढाला जाय—व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद का समन्वय कैसे किया जाय इसकी विशद् एवं सुबोध चर्चा की जाती रही है। प्रत्यावर्तन सत्रों की अवधि थोड़ी ही रखी गई थी क्योंकि उस समय आवश्यक जानकारियाँ देना ही अभीष्ट था। साधना का शुभारम्भ मात्र इस अवधि में कराया गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-March
आत्मबोध कहते हैं। अध्यात्म विज्ञान, का समस्त आवरण इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए विनिर्मित हुआ है कि मनुष्य अपने को जाने और उस तथ्य के आधार पर अपने चिन्तन एवं क्रिया कलाप का नये सिरे से निर्धारण करे।
आत्मबोध से होता है। अपने आपको जानने के लिए गम्भीर चिन्तन, मनन अध्ययन और निदिध्यासन करने के लिए अग्रसर होने का निश्चय ही आत्म−साधना का—उपासना, तपश्चर्या और योगसाधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश, परामर्श इस प्रकार है—
आत्मबोध ही ज्ञान साधना का लक्ष्य है। जिसने अपने को जान लिया, उसने संसार को इच्छानुकूल बनाने और पदार्थों तथा प्राणियों को उल्लास प्रदान कर सकने के भर्म को हस्तगत कर लिया।
आत्मबोध प्राप्त हुआ समझा जाना चाहिए। कहने, सुनने और पढ़ने जानने में तो आत्मा और अनात्मा का, ज्ञान और अज्ञान का अन्तर प्रायः हर कोई समझता है पर अन्तःबोध प्रायः भ्रमग्रस्त स्थिति में ही रहता है। जीव अपने को शरीर मात्र अनुभव करता है और उसी के सुख−साधन जुटाने में जीवन सम्पदा को नियोजित किये रहता है। ऐसे ज्ञानवानों को भी अज्ञानी ही कहना चाहिए। आत्मबोध का उदय आत्म और अनात्म तत्व की स्पष्ट एवं सघन मान्यता से ही आरम्भ होता है और वह मान्यता इतनी प्रबल होती है कि आत्मज्ञानी अपने चिन्तन एवं क्रियाकलाप को आत्मानुगामी, परमार्थ परायण बनाये बिना रह ही नहीं सकता।
आत्मबोध का उदय आत्म और अनात्म तत्व की स्पष्ट एवं सघन मान्यता से ही आरम्भ होता है और वह मान्यता इतनी प्रबल होती है कि आत्मज्ञानी अपने चिन्तन एवं क्रियाकलाप को आत्मानुगामी, परमार्थ परायण बनाये बिना रह ही नहीं सकता। ऐसे ही यथार्थ आत्मज्ञान का स्वरूप समझाते हुए शास्त्र कहता है—
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-May
आत्मबोध, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण, आत्म−विस्तार के रूप में चतुर्विधि आत्म−साधना की जाती है और उसी के फलस्वरूप धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चार अनुदान पाये जाते हैं। ब्रह्म−विद्या की—अध्यात्म दर्शन की कथन शैली कुछ भी क्यों न हो उसका सार तत्व इतना ही है कि मनुष्य अपने आपको चिन्तन एवं कर्म की दृष्टि से उत्कृष्ट कोटि का निर्मित करने की दिशा में प्रबल पुरुषार्थ करे। उसी को जीवन का प्रमुख प्रयोजन एवं सर्वोपरि लाभ समझें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-August
आत्मबोध और ईश्वर दर्शन में मात्र शब्दों का ही अन्तर है। आत्मा का उच्चस्तर की परमात्मा है। अपने आपको देव चिन्तन और देव कर्म में नियोजित कर देना ही ईश्वर भक्ति —योगसाधना एवं तपश्चर्या है। सारा साधना विज्ञान और तत्व-दर्शन इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता है। इस संदर्भ में आप्त वचन इस प्रकार हैं—
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-September
आत्मबोध अर्थात् जीवन−लक्ष्य का स्मरण, अपनी ऐन्द्रिक तृष्णाओं और आत्मिक आवश्यकताओं का अन्तर समझना। दोनों अभ्यास जितनी अधिक गहराई से किए जाएंगे तथा भावना जितनी ही प्रगाढ़ वह गहरी होगी अन्तर्ज्योति उतनी ही प्रखर−प्रदीप्त होती चली जाएगी। इससे श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ भी सरल होती जाएंगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-June
आत्मबोध, आत्मकल्याण, आत्मोत्कर्ष जैसे शब्दों को भारतीय दर्शन में प्रमुखता मिलने से यही व्यक्तिवादी मान्यता लगती है और लगता है ? स्वार्थी बनने के लिए कहा जा रहा है। इससे स्वार्थान्धता को प्रोत्साहन मिलेगा और सामाजिकता क्षीण होगी। यह आशंका तभी सही सिद्ध हो सकती थी, जब व्यक्ति विकास को विश्वात्मा के लिए समर्पित करने के स्थान पर निजी सुख -सुविधा के लिए आत्मकेन्द्रित किया गया था, पर यहाँ तो यह मान्यता है कि विश्वात्मा के- परमात्मा के, चरणों पर उत्कृष्टतम पूजा शाकल्य के रूप में परिष्कृत आत्मसत्ता को समर्पित किया जाय , इस प्रकार यह व्यक्तिवाद भी परिष्कृत समाजवाद की भूमिका प्रस्तुत करता है और उस पर व्यक्तिवादी स्वार्थान्धता का एकाकीपन का आक्षेप नहीं आता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-April
आत्मबोध होने व पराक्रम पुरुषार्थ हेतु जुटने भर की कमी ही होती है जो व्यक्ति को ऊँचा नहीं उठने देती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-March
आत्मबोध हुआ तो उनका दृष्टिकोण और क्रिया-कलापों तुरन्त बदल गया। तब वे राजकुमार से बदलकर भगवान हो गये।
आत्मबोध के अभाव में मनुष्य ऐसे ही कुसंग में भटकता और हेय स्तर के स्वभाव प्रचलन अपनाये रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-May
आत्मबोध को सबसे बड़ी उपलब्धि कहा गया है। भगवान बुद्ध को यह लाभ जिस दिन हुआ, उस दिन वे सनकी राजकुमार के रूप में अपना जाना-पहचाना केंचुल छोड़कर सच्चे अर्थों में संत, ऋषि, अवतार भगवान बन गए। आत्मविभ्रम एक जादुई सम्मोहन है। जब सभी अपने को शरीरमात्र मानते हैं और उसी की वितृष्णाओं के लिए खपते दृष्टिगोचर होते हैं, तो कोई एकाकी क्यों झुंड छोड़कर अकेला चलने की बात सोचे और नई राह खोजे। प्रवाह में बहना कितना सरल होता है, इसे सभी जानते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-June
आत्मबोध जागृत रहेगा तब तक यही स्थिति बनी रहेगी। यही गतिविधि चलेगी। यह विषम बेला है, इन दिनों दृश्य और अदृश्य क्षेत्र में जो विषाक्तता भरी हुई है उसका परिशोधन प्रयास अविलम्ब आवश्यक हो गया है। तो संजीवनी बूटी लाने के लिए पर्वत उखाड़ लाने और सुषैन वैद्य की खोज में जाने के लिए जो भी करना पड़े, करना ही चाहिए। यह कार्य स्थूल शरीर से बनता न देखकर सूक्ष्म शरीर को प्रसुप्त से जागृत स्थिति में लाने के लिए हमें अविलम्ब जुटना पड़ रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
आत्मबोध कहा जाता है। इसी को सत्यनारायण का परब्रह्म का साक्षात्कार भी कहते हैं। साधना का लक्ष्य यही है। स्वाध्याय और सत्संग-मनन और चिन्तन के सहारे साधक उस स्थिति तक पहुँचने का प्रयत्न करता है जिसमें माया से भ्रान्ति से छुटकारा मिल सके। यही मुक्ति की- जीवन मुक्ति की स्थिति है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-August
आत्मबोध- ज्ञानोदय कहा है। अन्तः में निहित सत्य को जान लेना ही विकास की अन्तिम परिणति है, ऐसा बुद्ध का मत है। वेदान्त के अनुसार ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होने पर मनुष्य सन्देह जीवनमुक्त हो जाता है। ‘अविद्या लेश’ सिद्धाँत का हवाला देते हुए वेदान्त समर्थक कहते हैं कि ज्ञान से अविद्या का आवरण हटते ही मानव पूर्णता को प्राप्त होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
आत्मबोध हो पाता है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-November
आत्मबोध जागा तो ‘तव कपि भयेऊ पर्वताकारा’ शरीर तो शायद ही उतना लम्बा चौड़ा रहा होगा, पर मनोबल जाग पड़ने से वह पहले की तुलना में इतना अधिक विशाल हो गया जितना कि सामान्य मनुष्य शरीर की तुलना में पहाड़ होता है। सामर्थ्य का इतना अधिक स्फुरण होने पर बल की कुछ कमी नहीं रही। समुद्र छलाँगना, सीता का पता लगाना, अशोक वाटिका उजाड़ना, लंका जलाना जैसे कई एक से एक कठिन काम उनने लगे हाथों कर डाले। सुरसा ने परीक्षा ली तो वे उसमें हर दृष्टि से उत्तीर्ण हुए-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-June
आत्मबोध कराने का हो, तो भारतीय संस्कृति ही इसका सार्थक समाधान का सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-November
आत्मबोध से दृष्टिकोण परिष्कृत करें और साधना में निरत रहकर विभूतियों के अधिकारी बने, इस संदर्भ में मंत्र साधना का आश्रय लेना एक प्रकार से अनिवार्य ही है।
आत्मबोध, लोक व्यवहार, चिंतन परिष्कार को अध्यात्म के निष्ठा पक्ष में लिया जाएगा। संयम, नियम, व्रत, तप, साधना प्रभृति क्रिया–कलापों को ‘साधना’ माना जाएगा। दोनों एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरा अपूर्ण रह जाएगा। ज्ञान और कर्म के समन्वय से ही उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-August
आत्मबोध हुआ या नहीं। यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचण्ड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी। मायापाश के भवबन्धनों से छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा ही नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव-जीवन का उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव-जीवन का उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
आत्मबोध। अपना वास्तविक स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, शरीर और आत्मा का सम्बन्ध, श्रेय और प्रेय में से एक का चुनाव अपनी गतिविधियों और रीति-नीतियों का सुनियोजित निर्धारण जैसे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय इसी केन्द्र पर टिके हुए हैं कि आत्मबोध हुआ या नहीं। यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचण्ड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी। मायापाश के भवबन्धनों से छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा ही नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव-जीवन का उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
आत्मबोध। शरीर और आत्मा के स्वार्थ और सम्बन्धों का पृथक्करण। जीवन लक्ष्य के प्रति आस्था और रीति-नीति का साहस पूर्वक निर्धारण। दोनों की साधना विधियाँ सरल हैं। एक ही समय या दो पृथक-पृथक सुविधा के समय और शान्त एकान्त स्थान में सुसंतुलित चित्त से यह दोनों ध्यान चिन्तन किये जा सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
आत्मबोध संसार को कामना वितान का व्याख्याता बनकर अथर्व रूप में चतुर्थ वेद बना। यह विस्तार विशेषतः वेदत्रयी का चौथे वेद में प्रकट होना ही तंत्र की मूल परिभाषा है।
आत्मबोध-आत्मजाग्रति
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-July
आत्मबोध’ के रूप में पुकारते हैं। यह दिव्य उपलब्धि जिसे भी मिल सकेगी, वह बुद्ध की तरह उसी मार्ग पर चलने वाला और वैसा ही सत्परिणाम प्राप्त करने का अधिकारी माना जाएगा। *
आत्मबोध की प्रत्यक्ष विधा है।
आत्मबोध, आत्मदर्शन करा दे, यह किसी भी प्रकार संभव नहीं। यदि ऐसा होता तो प्रायः हर व्यक्ति दिन में कई-कई बार दर्पण में अपना चेहरा देखता और सजता-सँवरता रहता है, पर इसे उससे मिलता क्या है-मात्र आत्मप्रवंचना और छद्म-अहं की तुष्टि। परन्तु जब यही दर्पण आत्मसाधना का माध्यम बन जाता है, तो वह उपासनात्मक प्रतीक का कार्य करने लगता है। पूजा-उपासना के पीछे जो प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं, उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त
आत्मबोध की साधना गायत्री माता का दिव्य-वरदान बनकर सामने आयी। आत्मबोध से लाभान्वित ऐसी आत्माओं की प्रत्येक विचारणा एवं प्रत्येक क्रियापद्धति में मात्र आदर्शवादिता ही उभरती, छलकती दिखाई पड़ती है। भगवान बुद्ध को जिस दिन आत्मबोध हुआ, उसी दिन से वे दिव्य मानव बन गये। बुद्ध को सामान्य राजकुमार से भगवान बना देने का श्रेय उस आँतरिक जागरण को ही दिया जाता है, जिसे ‘आत्मबोध’ के रूप में पुकारते हैं। यह दिव्य उपलब्धि जिसे भी मिल सकेगी, वह बुद्ध की तरह उसी मार्ग पर चलने वाला और वैसा ही सत्परिणाम प्राप्त करने का अधिकारी माना जाएगा।
आत्मबोध का। आमतौर से हम बाह्य जगत में इतने घुले और व्यस्त रहते हैं कि अपने को एक प्रकार से भूल ही बैठे होते हैं। याद तो शरीर और मन की क्षुधा एवं तृष्णा-वासना ही रहती है। आत्मचेतना भी कुछ होती है, हम भी आत्मा हैं और आत्मा के कुछ अपने स्वार्थ और कर्तव्य भी हैं क्या? यह बात पढ़ी-सुनी तो कई बार होती है, पर उसने तथ्य के रूप में कभी हृदय की गहराई तक प्रवेश नहीं किया होता।
आत्मबोध और तत्त्वबोध की दोनों साधनाओं का समन्वय करना पड़ता है। इन दोनों साधनाओं का लक्ष्य एक ही है। दोनों एक-दूसरे पर अन्योऽन्याश्रित हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके लिए ध्यानमुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यानपूर्वक देखना चाहिए और उसका दार्शनिक विवेचन-विश्लेषण गंभीर मनःस्थिति में करना चाहिए। यही आत्मबोध की प्रत्यक्ष विधा है।
आत्मबोध की यथार्थता अन्तःकरण में सजग हुई होती तो निश्चित रूप से भौतिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त करने की तरह आत्मोत्कर्ष के लिए भी कुछ करने की प्रेरणा उठी होती और उस दिशा में भी कुछ तो बना ही होता।
आत्मबोध हुआ, उसी दिन से वे दिव्य मानव बन गये। बुद्ध को सामान्य राजकुमार से भगवान बना देने का श्रेय उस आँतरिक जागरण को ही दिया जाता है, जिसे ‘आत्मबोध’ के रूप में पुकारते हैं। यह दिव्य उपलब्धि जिसे भी मिल सकेगी, वह बुद्ध की तरह उसी मार्ग पर चलने वाला और वैसा ही सत्परिणाम प्राप्त करने का अधिकारी माना जाएगा। *
आत्मबोध, आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार और आत्मविकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है? आस्थाओं, आकांक्षाओं में क्या हेर-फेर होना चाहिए, गतिविधियों में रीति-नीति में एवं कार्यपद्धति में क्या उलट-पलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभुप्रेरित रूप-रेखा सामने आती है।
आत्मबोध की विचारधाराओं से अन्तःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण-उपकरण का उद्देश्य है। उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि वह जीवन-निर्माण की प्रेरणाओं को उभारें और उन्हें सक्रिय बनाये।
आत्मबोध के अंतर्गत आत्मसत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म, चिन्तन एवं कर्तव्य की वस्तुस्थिति समझी-समझाई जाती है और तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक सम्बन्धों एवं कर्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ सम्बन्ध बनाते हुए परिवार तथा समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अध्यात्म जगत की यह दो धाराएँ-पवित्र गंगा-यमुना कही जाती हैं। इनका संगम तीर्थराज प्रयाग है, जिसमें स्नान करने से परम पुरुषार्थ का पुण्यफल प्राप्त होता है।
आत्मबोध और तत्त्वबोध भी कहते हैं। ब्रह्मविद्या का समग्र ढाँचा इन्हीं दो धाराओं की सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक विधि-व्यवस्था समझाने के लिए खड़ा हुआ है। आत्मबोध के अंतर्गत आत्मसत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म, चिन्तन एवं कर्तव्य की वस्तुस्थिति समझी-समझाई जाती है और तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक सम्बन्धों एवं कर्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ सम्बन्ध बनाते हुए परिवार तथा समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अध्यात्म जगत की यह दो धाराएँ-पवित्र गंगा-यमुना कही जाती हैं।
आत्मबोध की-आत्मविश्लेषण की साधना के द्वारा प्रायः सम्बन्धित सभी समस्याओं पर प्रकाश पड़ जाता है। आत्मबोध, आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार और आत्मविकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है? आस्थाओं, आकांक्षाओं में क्या हेर-फेर होना चाहिए, गतिविधियों में रीति-नीति में एवं कार्यपद्धति में क्या उलट-पलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभुप्रेरित रूप-रेखा सामने आती है।
आत्मबोध के साधक को अपनी इसी दयनीय स्थिति पर करुणा व्यक्त करनी चाहिए। ईश्वर का अविनाशी अंश इस धरती पर ईश्वरीय प्रयोजन पूरे करने के लिए-पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आया था। पर वह सब तो एक प्रकार से सर्वथा विस्मरण ही हो गया। पैर उस जाल-जंजाल में फँस गया, जिसे आटे की गोलियों के लोभ में गला फँसाने वाली मछली, पिंजड़े में फँसे हुए चूहे के समतुल्य दुर्दशाग्रस्त स्थिति कहा जा सकता है।
आत्मबोध से लाभान्वित ऐसी आत्माओं की प्रत्येक विचारणा एवं प्रत्येक क्रियापद्धति में मात्र आदर्शवादिता ही उभरती, छलकती दिखाई पड़ती है। भगवान बुद्ध को जिस दिन आत्मबोध हुआ, उसी दिन से वे दिव्य मानव बन गये। बुद्ध को सामान्य राजकुमार से भगवान बना देने का श्रेय उस आँतरिक जागरण को ही दिया जाता है, जिसे ‘आत्मबोध’ के रूप में पुकारते हैं। यह दिव्य उपलब्धि जिसे भी मिल सकेगी, वह बुद्ध की तरह उसी मार्ग पर चलने वाला और वैसा ही सत्परिणाम प्राप्त करने का अधिकारी माना जाएगा। *
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-November
आत्मबोध आत्म निरीक्षण आत्म सुधार आत्म निर्माण और आत्म विकास की योजनाएं बने आत्म उत्कर्ष को आत्म परिष्कार को आत्म कल्याण को शरीरगत लिप्सा लालसा की तुलना में अधिक महत्व दिया जाये। चिन्तन चरित्र और व्यवहार में अन्तर्मुखी होकर जिया जाये।
आत्मबोध दिशा निर्धारण एवं कर्तव्यपालन की दिशाधारा अपनाने वाली उत्कृष्टता बनाये रहने वाले प्रकाश प्रवाह का आविर्भाव किया है। इसी को अध्यात्म कहते है। धर्म धारणा भी यही है। कला के पीछे भी यही मर्म सन्निहित है कि उसकी भाव संवेदनाओं में अधिक सहृदयता और शालीनता का समावेश बना रहे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
आत्मबोध कहते हैं। आँख खुलते ही यह भावना करनी चाहिये कि आज अपना नया जन्म हुआ। एक दिन ही जीना है। रात्रि को मरण की गोद में चले जाना है। इस अवधि का सर्वोत्तम उपयोग करना ही जीवन साधना का महान लक्ष्य है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-March
आत्मबोध होने पर भेड़ों के झुंड में पले हुए सिंह की तरह हेय स्थिति में नहीं पड़ा रहना पड़ता।
आत्मबोध जैसा भगवान बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। जीवन का उद्देश्य, स्वरूप और उपयोग समझ में आने पर मनुष्य ईश्वर के इस बहुमूल्य उपहार का श्रेष्ठतम उपयोग करने का प्रयत्न करता है। मणि को काँच समझकर उसे इधर से उधर ठुकराते फिरने वाले जीवन को लिप्सा, तृष्णा, अहंता की पूर्ति में खर्च करते हुए अपने को बुद्धिमान मानते है। वासना और सम्पदा के निमित्त ही वह जीवन समाप्त हो जाता है जो चौरासी लाख योनियों में भटकते के उपरान्त एक बार मिलता है। जीवन पारस पत्थर है, इसका सदुपयोग करने पर कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-August
आत्मबोध को अन्तःकरण के रूप में जाना जाता है। लगन, तत्परता, एकाग्रता, तन्मयता, निष्ठा, दृढ़ता, हिम्मत जैसे मानसिक गुण ऐसे है जिनके आधार पर अणु शक्ति से भी करोड़ों गुनी अधिक प्रखर आत्मिक शक्ति को जगाया, बढ़ाया, रोका, सँभाला और प्रयुक्त किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-September
आत्मबोध होता हैं तब पता चलता हैं कि आत्म सत्ता “शुद्धोडसि-बुद्धाकडसि-निरजंनोडसि” के सिद्धांत को अक्षरशः चरितार्थ करती हैं। “मनुष्य भटका हुआ देवता हैं” इस कथन में उसका सही विश्लेषण देखा जा सकता हैं। यदि भटकाव दूर हो जाये तो समझाना चाहिए कि समस्त समस्याओं का हल निकल आया, समस्त भवबंधनों से छुटकारा मिल गया। मोक्ष और कुछ नहीं अपने संबंध में जो अचिन्त्य-चिन्तनवश भूल हो गई हैं, उससे त्राण पा लेन का परम पुरुषार्थ है। मकड़ी अपने लिए जाला अपने भीतर का द्रव निकाल कर स्वयं ही बुनती हैं, स्वयं ही उसमें उलझती और छटपटाती हैं, किन्तु देखा गया हैं कि जब उसमें उमंग उठती है तो उस जाले को समेट बटोर कर स्वयं ही निगल भी जाती हैं।
आत्मबोध को उस प्रकाश का उदय माना जाता है, जिसमें अपने सही स्वरूप का आभास भी मिलता है और मार्ग ढूंढ़ने में भी विलम्ब नहीं लगता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-January
आत्मबोध उन्हें जामवंत जी ने कराया ही था। उनने ही यह बीड़ा भी उठाया, चल पड़े और समय की माँग पूरी करने के लिए प्राण हथेली पर रखकर जैसे भी बन पड़ा, संजीवनी बूटी लेकर समय पर वापस लौट आए। लक्ष्मण को वह दी गयी, मूर्च्छना जगी और संकट टल गया। दोनों भाई मिलकर वह करने में जुट गये जिसके लिए कि उनका अवतरण हुआ था। प्रयोजन दोनों ही संपन्न हुए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-October
आत्मबोध-तिथि निर्वाण महाप्रयाण-तिथि अंकित कर दी गयी है। सारे देश के समर्पित दस हजार से अधिक स्वयं सेवक पहुँच चुके हैं व अपने-अपने श्रमप्रधान, कलाप्रधान, निर्माणप्रधान कार्यों में लगे हैं। जब तक परिजनों के हाथों में यह पत्रिका पहुँचेगी, सभी घर से निकलने की तैयारी में होंगे। एक विराट संकल्प मन में लिए कि आगामी एक वर्ष तक अनुयाज के रूप में देवसंस्कृति को सुदूर उत्तर पूर्व व दक्षिण भारत तथा पंजाब, जम्मू-कश्मीर से लेकर पूरे विश्व में पहुँचाने के लिए उन्हें क्या करना है। निश्चित ही यह आयोजन अनेकानेक रूपों में अनूठा होगा क्योंकि इसमें श्रद्धांजलि संकल्प-समारोह, शपथ समारोह एवं आश्वमेधिक प्रयोगों का एक अभिनव समन्वित रूप देखा जा सकेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
आत्मबोध सम्पन्न व्यक्ति निरन्तर अपने अंदर एक अलौकिक सम्बल एक अविच्छिन्न साथी और एक शक्तिशाली सहायक की अनुभूति करता रहा है। आत्मबोध से आत्मविश्वास और परमात्मनिष्ठा की पुष्टि होती है। इतने बल सम्बल के साथ श्रेष्ठता की ओर बढ़ने वाले का लक्ष्य पूरा न हो, यह संभव नहीं।
आत्मबोध’। जिसमें आत्मबोध की कमी है, आत्मा की शक्तियों की प्रतीत नहीं है, आत्मविश्वास का अभाव है और जो यह अनुभव नहीं करता कि आत्मा परमात्मा का अंश है, जो मानव देह में जीव को वह दिव्य प्रकाश देने के लिए अवतरित हुई है, जिसको अपनाकर मनुष्य किसी भी उन्नत ही नहीं उच्चतम शिखर पर चढ़ सकता है, वह मनुष्य सर्व गुण संपन्न बलवान और साधनों से पूर्ण होने पर भी प्रगति के नाम पर एक कदम नहीं बढ़ सकता। जिसने जीवन के मूल तत्त्व को ही नहीं जाना, उसने अन्य सब बातें जान भी लीं तब भी अनजानी ही माना जायेगा। आत्मबोध सम्पन्न व्यक्ति निरन्तर अपने अंदर एक अलौकिक सम्बल एक अविच्छिन्न साथी और एक शक्तिशाली सहायक की अनुभूति करता रहा है। आत्मबोध से आत्मविश्वास और परमात्मनिष्ठा की पुष्टि होती है।
आत्मबोध की कमी है, आत्मा की शक्तियों की प्रतीत नहीं है, आत्मविश्वास का अभाव है और जो यह अनुभव नहीं करता कि आत्मा परमात्मा का अंश है, जो मानव देह में जीव को वह दिव्य प्रकाश देने के लिए अवतरित हुई है, जिसको अपनाकर मनुष्य किसी भी उन्नत ही नहीं उच्चतम शिखर पर चढ़ सकता है, वह मनुष्य सर्व गुण संपन्न बलवान और साधनों से पूर्ण होने पर भी प्रगति के नाम पर एक कदम नहीं बढ़ सकता। जिसने जीवन के मूल तत्त्व को ही नहीं जाना, उसने अन्य सब बातें जान भी लीं तब भी अनजानी ही माना जायेगा। आत्मबोध सम्पन्न व्यक्ति निरन्तर अपने अंदर एक अलौकिक सम्बल एक अविच्छिन्न साथी और एक शक्तिशाली सहायक की अनुभूति करता रहा है। आत्मबोध से आत्मविश्वास और परमात्मनिष्ठा की पुष्टि होती है। इतने बल सम्बल के साथ श्रेष्ठता की ओर बढ़ने वाले का लक्ष्य पूरा न हो, यह संभव नहीं।
आत्मबोध से आत्मविश्वास और परमात्मनिष्ठा की पुष्टि होती है। इतने बल सम्बल के साथ श्रेष्ठता की ओर बढ़ने वाले का लक्ष्य पूरा न हो, यह संभव नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-March
आत्मबोध हुआ करोड़ों लोगों की आराध्य अवलंबन हुआ करोड़ों लोगों की आराध्य अवलंबन बन गई भगवत् गायत्री। फिर से यज्ञ धूम्र उठा वैदिक ऋचाएँ गूँजने लगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
आत्मबोध जो मुझे हुआ, वह हम में से हर एक को मिल सकता है। हम में से हर एक आदमी को यह प्रयास करना चाहिये कि हम ये कहें कि हम भूतकाल में क्या थे। हम भूतकाल में भगवान के अंश थे। हमको भगवान ने विशेष कामों से भेजा है। जिन लोगों में मेरे ही तरीके से आकांक्षायें उत्पन्न हुई हो उन्हें यह भी जानना चाहिए कि उनके पूर्व जन्म में कोई न कोई दिव्य काम हुए हैं अन्यथा ये आकांक्षायें जो भगवान की इच्छानुरूप हैं उनके मन में पैदा न होती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-March
आत्मबोध, कराया तो वे खुशी-खुशी तैयार हो गये, और सहज ही उस कार्य को सम्पन्न कर सकने में भी सफल हो गये। हनुमान की उस सफलता में जामवन्त का उद्बोधन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है। यदि जामवन्त के स्थान पर उस समय कोई कायर और डरपोक सलाहकार रहा होता तो वह अनेक आशंकाएं व्यक्त करके हनुमान के मनोबल को और भी अधिक गिरा सकता था, ऐसी दशा में उनके लिए समुद्र लाँघने की बात का सोच सकना भी कठिन हो जाता। संगति का प्रभाव अन्य जीवों के लिए महत्वहीन भले ही हो मानव प्राणी के लिए तो वहीं सबसे बड़ा प्रश्न है। सुसंगति और कुसंगति को उसके जीवन-मरण एवं उत्थान-पतन की समस्या कहा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-January
आत्मबोध की, आत्मा दर्शन की, आत्म प्राप्ति की, आत्मा निष्ठा की, स्थिति है। क्षर को नष्ट करके अक्षर को प्राप्त कर लेना ही जीवन मुक्ति है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
आत्मबोध न हो जाय, अन्तःशक्ति सम्पन्नता का लाभ मनुष्य को नहीं मिल पाता। अन्तः क्षेत्र में प्रतिष्ठित हुई दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति का समन्वय कुसंस्कार ही वह परत है जो न साधना को सिद्ध होने देती है और न उस निमित्त श्रद्धा जमने-मन लगने देती है। कुसंस्कार ही हैं जो यमदूतों की तरह पग-पग पर त्रास देते रहते हैं, व्यक्तित्व को हेय बनाते हैं। आत्मबल सम्पन्न गुरु का वरण इसीलिये किया जाता है। अपने आत्मबल द्वारा वह शिष्य में ऐसी प्रेरणाएँ भरते हैं जिससे वह सदमार्ग पर चल सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-September
आत्मबोध होने के बाद गौतम बुद्ध ने परिव्रज्या आरंभ की। विश्राम का नाम भी नहीं। सतत् चलते रहना व लोगों को जीवनमुक्ति का पाठ पढ़ाना । शिष्य आनन्द उनसे बोला-”प्रभु! टाप इतना चले, न थके-न उकताए।” बुद्ध बोले।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-May
आत्मबोध जब भी हो, अंतः की पुकार पर फिर निर्णय ले ही लेना चाहिए। हर दृष्टि से वह नफे का सौदा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-November
आत्मबोध, तत्व विवेक के रूप में अनुभव किए जा सकते हैं।
आत्मबोध की स्थिति तक पहुँचने के लिए मार्ग के सारे अवरोध ही उस सेना की तरह होते है, जिनसे अंतःकरण के देवत्व को युद्ध करना पड़ता है, पर यदि उन्हें साहस पूर्वक पछाड़ दिया जाये तो व्यक्ति अपने अलौकिक और आध्यात्मिक स्वरूप को स्वतः समझ लेता है, उस स्थिति में परिस्थितियाँ अनुकूल हो तो भी पाप से वैसे ही घृणा होगी जैसे गन्दगी से। उपरोक्त कथानक इस तथ्य का अलंकार मात्र है। इस युद्ध के बाद भी देवी की वही स्तुति देवताओं ने गाई है, जो पहली विजय के समय गाई थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
आत्मबोध-तत्वबोध की दर्पण साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की। कहीं ऐसा वर्णन साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
आत्मबोध की बात कहते रहते हैं। अपने को जानने, देखने, सोचने, ढूँढ़ने का उपदेश देते रहते हैं। यह कोई रहस्यवाद नहीं है, अपितु सीधे अर्थों में इतना भर समझना चाहिए कि मनुष्य जीवन की महत्ता और गरिमा असाधारण है। इसका उच्च प्रयोजनों में ही सदुपयोग होना चाहिए। किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते रहना अबोध पशु पक्षियों और कीट पतंगों के लिए तो क्षम्य हो सकता है पर मनुष्य द्वारा बरते जाने वाला यह प्रसाद अक्षम्य है।
आत्मबोध की भूमिका से जाग पड़े । उस प्रसुप्ति से छुटकारा पाये जिसमें वासना, तृष्णा और अहंता का गुलाम बनकर नर वानर की तरह निरर्थक उचक मचक करते रहने की उसकी आदत पड़ जाती है । पेट और प्रजनन के लिए पशु जीते हैं । मनुष्यों में भी कितने ही नर पशु होते हैं जिन्हें लोभ और मोह के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं । वह सत्य को उतने तक ही सीमित मान लेते हैं जो इन्द्रियों की ललक के सहारे अनुभव में आता है ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-April
आत्मबोध की महिमा शास्त्रकारों ने असाधारण बताई है । उसे अध्यात्म तत्वज्ञान का मुख्य चरण कहा गया है। आत्मा अनन्त शक्तियों का, विशिष्टताओं का और विभूतियों का पुँज है। इस महानता को हृदयंगम करने के साथ ही यह भी अनुभव होना चाहिए कि मनुष्य की वर्तमान सामर्थ्य भी इतनी अधिक है कि वह उसके सहारे प्रगति पथ पर निरन्तर आगे बढ़ सकता है। और उस लक्ष्य तक पहुँच सकता है, जिस पर पहुंचने के बाद मनुष्य की गणना सहज ही महामानवों और देव पुरुषों में होने लगती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-May
आत्मबोध कराने में उन्हें कुछ समय लगा। जब समय आ ही पहुँचा तो उन्हीं की प्रेरणावश नरेंद्र ने अपनी नौकरी की समस्या उनके समझ रखी। परमहंस ने उसे काली की शरण में जाने का निर्देश दिया। काली के समक्ष जाकर उसका विराट् स्वरूप साक्षात् सामने देखकर वे मात्र आत्मशक्ति व भक्ति की याचना के और कुछ नहीं माँग सके। काली के इस साक्षात्कार व रामकृष्ण के मार्गदर्शन ने नरेंद्र को विवेकानंद उसी दिन बना दिया था, शक्ति भले ही गुरु से उन्होंने अवसान के पूर्व पाई हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-February
आत्मबोध कर लिया हैं, अज्ञान से वह दूर हैं, अतः उसे ही द्विज कहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-August
आत्मबोधजन्य ईश्वरीय संदेश को व्यापक बनाने वे निकल पड़े और जन-जन तक पहुँचकर विचार-क्राँति कर सकने में सफल हुए। प्रव्रज्या बौद्ध धर्म का प्रधान अंग मानी जाती थी। भिक्षुगण सतत् चलते रहते थे व बुद्ध के साथ संघ, धर्म शरणम् गच्छामि नारा लगो, भारतवर्ष ही नहीं, सारे विश्व भर में उनका संदेश पहुँचाने का लक्ष्य पूरा कर सके। सिद्धार्थ के अंदर विश्वकल्याण की कामना रूप में जो बीज पला वह गौतम बुद्ध के रूप में विकसित होकर सारी मानवता को धन्य कर गया।
आत्मबोध हुआ। कठोर तपश्चर्या के बाद प्राप्त उपलब्धि से वे निर्वाण-मोक्ष की ओर भी बढ़ सकते थे। पर उनका लक्ष्य था-अनाचार-कुरीति से भर समाज का परिशोधन तथा विवेक रूपी अस्त्र द्वारा जनमानस का परिष्कार। आत्मबोधजन्य ईश्वरीय संदेश को व्यापक बनाने वे निकल पड़े और जन-जन तक पहुँचकर विचार-क्राँति कर सकने में सफल हुए। प्रव्रज्या बौद्ध धर्म का प्रधान अंग मानी जाती थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-April
आत्मबोध की झलक थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-April
आत्मबोध नहीं होता, जो आत्म सम्मान और आत्म गौरव को भूले हुए हैं, वे अपने को सदा हीन, नीच, पतित तथा दुर्भाग्यग्रस्त ही अनुभव करते हैं। अपनी सभी बातें उन्हें निकृष्ट, तुच्छ प्रतीत होती हैं। इस प्रकार के अनात्मवान व्यक्ति अपने आत्मा को कुटिल खल कामी, अपने शरीर को नरककुण्ड, अपने संसार को भवसागर, अपने समय को कलिकाल, अपने समाज को सबसे गिरा हुआ मानते हैं और निराशा के अन्धकार को ही सर्वत्र देखते हैं। अपना सब कुछ बुरा प्रतीत होना दीनता और दासता की हीन मनोवृत्ति हैं। अपने देश में उत्पन्न हुई महान आत्माओं का हम तिरस्कार करते हैं, परन्तु दूसरे देश का मामूली हमारी दृष्टि में बहुत ऊंचा जँचता हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-January
आत्मबोध प्रज्ञा स्वयमेव जगी रहती है और उसी की स्फुरणा से ‘सोऽहम्’ का आत्म−बोध अजपा जाप बनकर स्वसंचालित बना रहता है। संस्कृत भाषा के स+अहम् शब्दों से मिलकर ‘सोऽहम्’ का आविर्भाव माना जाता है। यहाँ व्याकरण शास्त्र की संधि प्रक्रिया के झंझट में पड़ने की जरूरत नहीं है। जो सनातन ध्वनियाँ चल रही हैं वे व्याकरण शास्त्र के अनुकूल हैं या नहीं यह सोचना व्यर्थ है। देखना इतना भर है कि इन सनातन शब्द संचार का क्या बैठता है?
आत्मबोध की प्रक्रिया अपनाकर अन्तरंग में छिपी गरिमा को जगाया जाता है और तत्वबोध से बाह्य जगत में फैले हुए पदार्थों और प्राणियों में सुव्यवस्थित संबंध साधा जाता है। आत्मज्ञानी उसे कहते हैं जो अपने आपे को सही तरीके से संभाल सके और सदुद्देश्य में नियोजित कर सके। तत्वज्ञानी उसे कहते हैं जो संसार की यथार्थता और प्राणियों की स्थिति विचित्रता को ठीक तरह पहचान सके। सही रीति का लोक व्यवहार इसी स्थिति में बन पड़ता है। लगता तो ऐसा है मानो आत्म−ज्ञानी लोक व्यवहार को भुला बैठा पर वस्तुतः वही सबसे अधिक क्रिया कुशल होता है।
आत्मबोध का प्रथम और तत्वबोध का द्वितीय चरण जब क्रमिक गति से उठना आरम्भ होता है तो उस प्रयास से महान जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकना सम्भव हो जाता है। आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने वाला पथिक प्रत्येक कदम पर एक से एक बढ़ी−चढ़ी उपलब्धियाँ, ऋद्धि−सिद्धियाँ प्राप्त करता चला जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-June
आत्मबोध होने पर उन्हें पश्चाताप होता है। यदि इससे पूर्व वह स्वयं को जान लेता तो उसे इस दुःख के संसार में डूबना न पड़ता। अपना अहम् अंकुरित नहीं होने देता तब उसका वह क्षण इस वासना वृत्ति में समाप्त न होकर जीवन के उत्थान में लगा होता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-November
आत्मबोध की स्थिति जागृत करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
आत्मबोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है और ज्ञान वैराग्य का प्रकाश अन्तरात्मा में परिलक्षित हो सकता है। वेदान्त साधनाओं की अहं-ब्रह्मादिकपरक-सोऽहम् शिवोऽहम् की उद्बोधक वृत्ति ज्ञानयोग का प्रयोजन पूरा कर सकती है। उसे आत्मबोध की स्थिति जागृत करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-February
आत्मबोध के रूप में पुकारते हैं। यह उपलब्धि जिसे भी मिल सकेगी वह उसी मार्ग पर चलने वाला और वैसा ही सत्परिणाम प्राप्त करने का अधिकारी माना जायगा।
आत्मबोध सिखाता है कि ईश्वर की तरह ही उसके पुत्र मनुष्य को भी शालीनता, सज्जनता, पवित्रता, सरलता, नम्रता, सहिष्णुता जैसी सत्प्रवृत्तियों का उत्तराधिकारी होना चाहिए। इतना ही नहीं आत्म−विश्वासी सोचता है कि किसी भी दिशा में बढ़ चलने की प्रचण्ड सामर्थ्य मानवी सत्ता में भरी पड़ी है, उसका उपयोग ठीक से न बन पड़ना ही पिछड़ापन है। मनोयोग और एकाग्र पुरुषार्थ का समन्वय हो सका तो फिर हाथ में लिए हुए कार्य उत्कृष्ट स्तर के बनते चले जाएंगे और क्रम का चलते रहना एक दिन उच्चस्तरीय सफलता प्रस्तुत किये बिना रहेगा नहीं। अहंकारी केवल उन्हीं कार्यों में रस लेता है जो सस्ती वाहवाही दिला सके। आत्म−विश्वासी, आत्म−गौरव को ध्यान में रखकर उनके आदर्शवादी प्रयत्नों को अपनाता है जिनसे आत्मा−परमात्मा और विश्वात्मा को सन्तोष मिल सके।
आत्मबोध में मनुष्य अपने आपको ईश्वर का तेजस्वी अंश विश्वात्मा का घटक समझता है और सुर−दुर्लभ मानव जन्म का लक्ष्य पूरा करने वाले व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनाने वाले−लोक मंगल का प्रयोजन पूरा करने वाले कार्यों में ही हाथ डालता है। अन्य किसी भटकाव में उसका मन नहीं फिसलता। सामान्य स्तर का आत्म−विश्वास भी इसी आत्मबोध का प्रथम चरण है। इस प्रवेश द्वार में पैर रखते ही मनुष्य उत्थान और पतन के उत्तरदायित्वों को अपने कन्धे पर ओढ़ता है। दूसरों को दोष देने अथवा दूसरों से याचना करने की ओछी दृष्टि उसके पास नहीं फटकती।
आत्मबोध से लाभान्वित आत्माओं को प्रत्येक विचारणा और प्रत्येक क्रिया−पद्धति में मात्र आदर्शवादिता ही उभरती, छलकती दिखाई पड़ती है। ऐसे लोग अभावग्रस्त और संकटग्रस्त हो सकते हैं, पर अन्तःकरण में उन्हें असीम आनन्द और सन्तोष की अनुभूति हर घड़ी होती रहती है।
आत्मबोध, तत्वबोध, चिन्तन क्रम मिलाकर प्रायः एक घण्टा ही हो जाता है। इतनी उपासना, श्रद्धा एवं तत्परता मनोयोगपूर्वक निभती चली जाय तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति का सुनिश्चित आधार बन गया। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में विशेष तप साधना का उपक्रम बन जाया करे तो उसका प्रभाव भी छह−छह महीने बने रहने का महत्वपूर्ण आधार बन जायगा।
आत्मबोध का प्रथम चरण है। इस प्रवेश द्वार में पैर रखते ही मनुष्य उत्थान और पतन के उत्तरदायित्वों को अपने कन्धे पर ओढ़ता है। दूसरों को दोष देने अथवा दूसरों से याचना करने की ओछी दृष्टि उसके पास नहीं फटकती। वह सोचता है संसार में शुभ अशुभ सभी कुछ है उसमें अपना चुम्बकत्व अनुकूल स्तर के व्यक्तियों तथा साधनों को एकत्रित करेगा। यदि अपना स्तर सुधार लिया जाय तो दूसरों के दोषों से अपनी हानि न्यूनतम मात्रा में ही होगी।
आत्मबोध हुआ था उसकी टहनियाँ काट−काटकर उनके अनुयायी अपने−अपने क्षेत्रों में ले गये और वहाँ उसकी मूर्तिमान देवता के रूप में स्थापना की। इसका तात्पर्य है बुद्ध को सामान्य राजकुमार से भगवान बना देने का श्रेय उस आन्तरिक जागरण को ही दिया गया, जिसे आत्मबोध के रूप में पुकारते हैं। यह उपलब्धि जिसे भी मिल सकेगी वह उसी मार्ग पर चलने वाला और वैसा ही सत्परिणाम प्राप्त करने का अधिकारी माना जायगा।
आत्मबोध चिन्तन और तत्वबोध मनन भी इसी से जुड़ा हुआ है। (2) जीवन के स्तर को परिष्कृत करने के लिए आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की प्रक्रिया (3) दिव्य−सत्ता केन्द्र से मिलने वाले विशिष्ट अनुदान जो साधकों की श्रद्धा एवं सम्वेदना के आधार पर ग्रहण किये जाते एवं फलित बनते हैं।
आत्मबोध का तात्पर्य है अपने में सन्निहित शक्ति एवं सम्भावना से परिचित होना। आत्मिक प्रगति का अर्थ है आन्तरिक दोष दुर्गुणों को निरस्त करके सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को समुन्नत बनाने के उपक्रम में निरन्तर निरत रहना। इन सत्प्रयत्नों से मानवी और दैवी दोनों प्रकार की सहायताएँ अनायास ही उपलब्ध होती रहती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-July
आत्मबोध कराने पर उसे ज्ञान हुआ था और वह पुनः अपने को सिंह समझने और वैसा ही आचरण करने में समर्थ हुआ था। हम सब इसी प्रकार की भेड़ें बने हुए हैं। जैसा हमने अपने को समझा है दूसरों ने जैसा कुछ हमें हमारा स्वरूप समझाया है वैसे ही हम बने और ढले हैं। करोड़ों अछूतों की दयनीय स्थिति का एकमात्र कारण यही है। मानव ने ही मानव को मानव नहीं समझा और उन पद-दलित मानवों ने अपने को सचमुच ही निम्नकोटि का जीव समझकर अपने को अछूत समझ लिया और उच्च वर्ण वालों के साथ उठने-बैठने और व्यवहार करने में संकोच करने लगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
आत्मबोध के लिए उच्चस्तरीय स्वाध्याय-सत्संग मनःचिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। आत्म-चिन्तन और आत्म मन्थन पर विचार शक्ति को केन्द्रित करना होता है। भगवान बुद्ध और आत्मज्ञानियों को अपनी साधना का केन्द्र बिन्दु इसी को मान कर चलना पड़ा था। अध्यात्म की भाषा में इसे योग कहते हैं। योग का अर्थ है जोड़ना।
आत्मबोध’ जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। भगवान बुद्ध का जिस वट वृक्ष के नीचे ‘आत्मबोध’ हुआ उसे भी सौभाग्यवान माना गया और उसकी टहनियाँ भक्तजनों ने अपने-अपने देशों में ले जाकर उगाईं और उन बोधिवृक्षों को देव तुल्य मानकर पूजा संस्थान के रूप में प्रतिष्ठित किया। ब्रह्मविद्या में आत्मज्ञान की महिमा का सर्वोपरि बखान है। ‘आत्मावारे ज्ञातव्य।’ श्रुति वचन में मनुष्य को आत्मसत्ता के सम्बन्ध में अधिकाधिक जानने का निर्देश किया गया है।
आत्मबोध’ हुआ उसे भी सौभाग्यवान माना गया और उसकी टहनियाँ भक्तजनों ने अपने-अपने देशों में ले जाकर उगाईं और उन बोधिवृक्षों को देव तुल्य मानकर पूजा संस्थान के रूप में प्रतिष्ठित किया। ब्रह्मविद्या में आत्मज्ञान की महिमा का सर्वोपरि बखान है। ‘आत्मावारे ज्ञातव्य।’ श्रुति वचन में मनुष्य को आत्मसत्ता के सम्बन्ध में अधिकाधिक जानने का निर्देश किया गया है। जानने के बाद ही उपयोग की बात बनती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-June
आत्मबोध की याचना उन परमपिता से करूंगा। मनुष्य जीवन में इन मूल मन्त्रों का समावेश हो जाय तो डडडड उसका मनुष्य तन जीवन सार्थक हुआ समझना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-November
आत्मबोध ही परिणित है और यह आत्मबोध ही ज्ञान साधना का चरम लक्ष्य है। जिसने अपने को जान लिया, उसने संसार को इच्छानुकूल बनाने और पदार्थों तथा प्राणियों को उल्लास प्रदान कर सकने का मार्ग हस्तगत कर लिया।
आत्मबोध ही ज्ञान साधना का चरम लक्ष्य है। जिसने अपने को जान लिया, उसने संसार को इच्छानुकूल बनाने और पदार्थों तथा प्राणियों को उल्लास प्रदान कर सकने का मार्ग हस्तगत कर लिया।
आत्मबोध से होता है। अपने आपको जानने के लिए गम्भीर चिन्तन, मनन अध्ययन और निदिध्यासन करने के लिए अग्रसर होने का निश्चय ही आत्म साधना का उपासना, तपश्चर्या और योग साधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश परामर्श इस प्रकार है-
आत्मबोध का उदय आत्म तत्व की स्पष्ट एवं सघन मान्यता से ही आरम्भ होता है और वह मान्यता इतनी प्रबल होती है कि आत्मज्ञानी अपने चिन्तन एवं क्रिया-कलापों को आत्मानुगामी, परमार्थ परायण बनाये बिना रह नहीं सकता। ऐसे ही यथार्थ आत्मज्ञान का स्वरूप समझाते हुए ईशोपनिषद् में कहा गया है। “ज्ञान ओर अज्ञान के अवलम्बन के परिणाम अत्यन्त भिन्न है। यह अनुभव हमने उनसे सुना है जिन्होंने तत्व गहन अवगाहन किया है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-March
आत्मबोध की दिशा में अग्रसर स्वामी रामतीर्थ व दयानन्द को भी आये थे। उन्होंने अन्तः की प्रेरणा के आधार पर अपनी जीवन दिशा बनायी खुद तरे और कइयों को पार किया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-August
आत्मबोध। जिसमें आत्मबोध की कमी है, आत्मा की शक्तियों की प्रतीति नहीं है, आत्म-विश्वास का अभाव है और जो यह अनुभव नहीं करता कि आत्मा परमात्मा का अंश है, जो मानव देह में जीव को वह दिव्य-चेतना और दिव्य-प्रकाश देने के लिए अवतरित हुई है जिसको अपनाकर मनुष्य किसी भी उन्नत ही नहीं उन्नततम शिखर पर चढ़ सकता है। वह मनुष्य सब कुछ गुणी, बली और विपुलता पूर्ण होने पर भी प्रगति के नाम पर एक कदम भी नहीं बढ़ सकता। जिसने जीवन के मूलतत्व को ही नहीं जाना उसने अन्य सब बातें जान भी लीं तब भी वह अनजाना ही माना जाएगा। आत्म-बोध सम्पन्न व्यक्ति निरन्तर अपने अन्दर एक अलौकिक सम्बल, एक अविच्छिन्न साथी और एक शक्तिशाली सहायक का अनुभव करता है।
आत्मबोध की कमी है, आत्मा की शक्तियों की प्रतीति नहीं है, आत्म-विश्वास का अभाव है और जो यह अनुभव नहीं करता कि आत्मा परमात्मा का अंश है, जो मानव देह में जीव को वह दिव्य-चेतना और दिव्य-प्रकाश देने के लिए अवतरित हुई है जिसको अपनाकर मनुष्य किसी भी उन्नत ही नहीं उन्नततम शिखर पर चढ़ सकता है। वह मनुष्य सब कुछ गुणी, बली और विपुलता पूर्ण होने पर भी प्रगति के नाम पर एक कदम भी नहीं बढ़ सकता। जिसने जीवन के मूलतत्व को ही नहीं जाना उसने अन्य सब बातें जान भी लीं तब भी वह अनजाना ही माना जाएगा। आत्म-बोध सम्पन्न व्यक्ति निरन्तर अपने अन्दर एक अलौकिक सम्बल, एक अविच्छिन्न साथी और एक शक्तिशाली सहायक का अनुभव करता है। आत्म-बोध से आत्म-विश्वास और परमात्मनिष्ठा की पुष्टि होती है।
आत्मबोध के अभाव में दुस्तर दिख रहा था साधारण गड्ढा-सा विदित होने लगा। बस फिर क्या था? उन्होंने अपनी शक्ति का उपयोग किया और कर्तव्य में सफल हो गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-July
आत्मबोध-ज्ञानोदय कहा है। वेदाँत के अनुसार ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होने पर मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
आत्मबोध चिंतन की व रात्रि सोते समय 15 मिनट तत्व-बोध-मनन की साधना भी सम्मिलित थी। इस साधना में प्रत्येक साधक द्वारा प्रतिदिन 600 गायत्री मंत्र जपने का प्रावधान रखा गया था। उपासना क्रम को छह भागों में विभाजित किया गया था, आत्मशोधन के लिए षट्कर्म, प्रतीक पूजा उपचार, सोऽहम्, प्राणयोग, गायत्री जप और ध्यान, खेचरी मुद्रा तथा सूर्यार्घ्य दान। प्रत्येक का महत्व विस्तार से सात पृष्ठ के संपादकीय द्वारा समझाया गया था। एक लाख साधकों द्वारा पूज्यवर ने प्रतिदिन छह करोड़ प्रतिदिन की साधना संपन्न कराई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
आत्मबोध एवं तत्त्वबोध का चिन्तन तथा भगवद् भजन करना चाहिए। शिथिलीकरण एवं प्राणायाम जैसे सरल यौगिक क्रियाओं का भी अनुसरण किया जा सकता है। इन्हीं उपायों से मन को शान्त कर तनाव से मुक्त हो पाना सम्भव है। अतः ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से जीआ गया आस्था एवं श्रद्धापूर्ण जीवन और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार ही तनाव रूपी महाव्याधि के उपचार का एकमात्र प्रभावी उपाय है।
आत्मबोध, आत्मकल्याण, ईश्वरदर्शन, प्रभु अनुग्रह आदि नामों से जाना जाता है। वह सचमुच ही किसी मात्रा में उपलब्ध हो सके, तो ऐसा मनुष्य उतनी ही तत्परता से आत्मकल्याण की बात सोचेगा और उतना ही मनोयोग भरा पराक्रम। सद्भावनाएं, सद्विचारणाएं, सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए नियोजित करेगा। यह एक दूसरी ही दुनिया है।’ आगे वे लिखते हैं, ‘जिस मुक्ति को अध्यात्म क्षेत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया है, वह किसी लोक विशेष में जा बसने जैसी बात नहीं है।
आत्मबोध की साधना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-January
आत्मबोध को प्राप्त किया।
आत्मबोध प्राप्त किया, निर्वाण प्राप्ति का उपाय उन्हें दिखाई देने लगा। उधर वह लड़की भी फिर जन्मी, पर न उसे विगत जन्म की स्मृति थी, न यह मालूम कि यह बुद्ध कौन हैं?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-May
आत्मबोधजन्य उपलब्धि है। अपना अंतः जिसे कहे, उस आत्मज्ञान की प्राप्ति के बाद, ईश्वरीय संदेश मानकर जब मनुष्य चल पड़ता है तो ध्येय प्राप्ति सुनिश्चित है।
आत्मबोध अर्जुन का दूसरा जन्म था। गाँडीवधारी अर्जुन ने जब श्रीकृष्ण से कहा-
आत्मबोध का ज्ञान कराया। वस्तुतः यही आत्मबोध अर्जुन का दूसरा जन्म था। गाँडीवधारी अर्जुन ने जब श्रीकृष्ण से कहा-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-March
आत्मबोध, रात्रि में तत्त्वबोध की साधना करें। षट्कर्म एवं ज पके साथ ध्यान का क्रम नियमित रखें। ध्यान के लिए परमपूज्य गुरुदेव की पुस्तक ‘उपासना के दो चरण जप और ध्यान’ देखी जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-April
आत्मबोध और तत्वबोध की साधना करनी चाहिए। प्रातःकाल जब आप उठा करें, तो एक नए जीवन का अनुभव किया कीजिए कि रात को सोने का अर्थ हैं, ‘पिछले जन्म की स्मृति और उस दिन की मौत’ सबेरे उठने का अर्थ हैं, ‘नया जन्म’। ‘जब आँख खुली तब नया जन्म’ आप यह अनुभव कर लिया करें, तो मजा आ जाए। आप हर दिन सबेरे यह अनुभव किया कीजिए कि हमारा नया जन्म हो गया। अब नए जन्म में क्या करना चाहिए?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
आत्मबोध की साधना कैसेट द्वारा होती है 4.15 से 5.15 नित्य कर्म, व्यायाम, शिथिलीकरण निर्देशानुसार हलके वाद्य संगीत के साथ संपन्न होगा।
आत्मबोध की साधना भी कर पाते थे। एक घंटे का प्रवचन दो खंडों में सुनाया जाता था। इस समग्र दस सूत्री साधनापद्धति से भरा शिक्षण यद्यपि कुछ साधक (तीस से चालीस अधिकतम) पूरे शाँतिकुँज में रहकर करते रहे, पर जिनने भी इसमें भागीदारी की, वे आज तक अपना सौभाग्य सराहते हैं, उन दिनों की याद करते हैं। उन दिनों शाँतिकुँज छोटा था, पर्यटकों को आने की सख्त मनाही थी एवं कमरे भी गिने−चुने थे। सारा वातावरण साधनामय था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-March
आत्मबोध के अभाव में ही हम रोते−कलपते हैं। इसे प्राप्त किया जा सके तो फिर सदा सर्वदा आनन्द ही आनन्द है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-September
आत्मबोध’ हुआ और आत्म-कल्याण का द्वार खुला। जब तक कानों से सुनने, जीभ से कहने और हाथों से वस्तुओं की उलट-पुलट को ही अध्यात्म साधना समझा और उतने भर से ही सन्तोष किया जाता हो, तब तक यही समझना चाहिए कि अभी मन बाल-क्रीड़ाओं में रम भर रहा है।
आत्मबोध नहीं हो पाता जो शरीर आत्मा की पृथकता अनुभव करने पर होता है। यह स्पष्ट हो जाता है कि सारा चिन्तन और क्रिया-कलाप शरीर सुख के लिए ही नियोजित न रहे उसमें आत्म-कल्याण के लिए भी समुचित स्थान रहे। ऐसी उमंगें उठने लगें तो समझना चाहिए कि ‘आत्मबोध’ हुआ और आत्म-कल्याण का द्वार खुला। जब तक कानों से सुनने, जीभ से कहने और हाथों से वस्तुओं की उलट-पुलट को ही अध्यात्म साधना समझा और उतने भर से ही सन्तोष किया जाता हो, तब तक यही समझना चाहिए कि अभी मन बाल-क्रीड़ाओं में रम भर रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-August
आत्मबोध की एक नई उपलब्धि हस्तगत होती है वह अनुभव करता है कि काय कलेवर उसका समग्र स्वरूप नहीं वरन् एक वाहन उपकरण आच्छादन मात्र है। उसके भीतर रहने वाली चेतना ही मनुष्य को ऊँचा उठाती नीचे गिराती है। मनः स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदाता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। वह प्रकृति की कठपुतली मात्र नहीं है।
आत्मबोध मन को सुसंस्कृत बनाने के बाद होता है। इस प्रकार पुत्र पहले जन्मा और माता पीछे। आत्म ज्ञान गुरु है और संसार ज्ञान चेला। संसार ज्ञान के उपरान्त आत्म ज्ञान होता है। इस प्रकार चेला का पैर गुरु नमन करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-February
आत्मबोध की वह स्थिति उभरने लगती है जो बोधि वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध के अन्तराल में प्रकट हुई थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-February
आत्मबोध द्वारा ही संभव हो सका। वह डाकू जब तक जीवित रहता संसार में भारी पीड़ा और अशान्ति उत्पन्न करता रहता, पर जब वह महर्षि बन गया तो न जाने कितने और महर्षि उसकी प्रेरणा और शिक्षा से बन गये होंगे। उनकी बनाई बाल्मीकि रामायण ने कितने मनुष्यों को श्रेष्ठ मनुष्य बना दिया होगा इसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है।
आत्मबोध का ऐसा ही महत्व है। इसे प्राप्त कर मनुष्य बदलता है।
आत्मबोध कराने में संलग्न रहने का सेवा व्रत ही था। ज्ञान का ज्ञान, स्वर्ण एवं रत्न दान से भी बढ़ कर माना गया है।
आत्मबोध का ऐसा ही महत्व है। इसे प्राप्त कर मनुष्य बदलता है। और इस परिवर्तन के कारण वह तुच्छ से महान बन जाता है। इसलिए ज्ञान-दान को संसार का सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है। जो ब्राह्मण के पूज्य माना जाने का कारण उसका यह आत्मबोध कराने में संलग्न रहने का सेवा व्रत ही था।
आत्मबोध के कारण बाल्मीकि का परिवर्तन होने पर वे महान ऋषि बने, इतने बड़े ऋषि कि उनके संरक्षण में भगवान राम ने अपने स्त्री बच्चा की सुरक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा। यह कोई साधारण स्थिति नहीं थी।
एक अन्त्यज कुल में उत्पन्न, डाकू का व्यवसाय अपनाये हुए घृणित व्यक्ति का महर्षि बाल्मीकि के रूप में परिवर्तन कर देना आत्मबोध द्वारा ही संभव हो सका। वह डाकू जब तक जीवित रहता संसार में भारी पीड़ा और अशान्ति उत्पन्न करता रहता, पर जब वह महर्षि बन गया तो न जाने कितने और महर्षि उसकी प्रेरणा और शिक्षा से बन गये होंगे। उनकी बनाई बाल्मीकि रामायण ने कितने मनुष्यों को श्रेष्ठ मनुष्य बना दिया होगा इसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है।
आत्मबोध द्वारा ही संभव हो सका। वह डाकू जब तक जीवित रहता संसार में भारी पीड़ा और अशान्ति उत्पन्न करता रहता, पर जब वह महर्षि बन गया तो न जाने कितने और महर्षि उसकी प्रेरणा और शिक्षा से बन गये होंगे। उनकी बनाई बाल्मीकि रामायण ने कितने मनुष्यों को श्रेष्ठ मनुष्य बना दिया होगा इसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है।
आत्मबोध कराने में संलग्न रहने का सेवा व्रत ही था। ज्ञान के
आत्मबोध की, ज्ञान-दान की महान सेवा से हमें वंचित ही रहना पडे़गा? क्या उस उत्कृष्ट पुण्य का लाभ हमें साधारण महत्व की, अन्न-जल आदि की सेवाओं तक ही सीमित रहना पडे़गा? नही ऐसी बात नहीं है। हमारे लिये भी वैसा अवसर मौजूद है। हमारा अपना मन, हमारे सबसे अधिक आज्ञानुवर्ती और अधिक निकट होने के कारण ऐसा सत्पात्र हो सकता है जिसकी आत्मबोध द्वारा सेवा की जा सके।
आत्मबोध का ऐसा ही महत्व है। इसे प्राप्त कर मनुष्य बदलता है। और इस परिवर्तन के कारण वह तुच्छ से महान बन जाता है। इसलिए ज्ञान-दान को संसार का सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है। जो ब्राह्मण इस पुण्य कार्य में संलग्न रहते थे उन्हें अत्यधिक आदर की दृष्टि में देखा जाता था ।
आत्मबोध की उत्कृष्ट सेवा के लिये तत्पर होने और उसके लिये सत्पात्र तलाश करने का प्रयत्न करना चाहिये। सत्पात्र के साथ किया हुआ श्रम ही सफल होता है। कुपात्रों को दिया दान सर्प को दूध पिलाने की तरह विष उत्पन्न करता है। उन्हे यदि धन दिया जाय तो उसका कुकर्मों में दुरूपयोग करते है और यदि शिक्षा दी जाय तो उसका उपहास करते है। अहंकार वश वे अपने को, अपनी स्थिति को बड़प्पन से भरा हुआ मानते है।
आत्मबोध के कारण बाल्मीकि का परिवर्तन होने पर वे महान ऋषि बने, इतने बड़े ऋषि कि उनके संरक्षण में भगवान राम ने अपने स्त्री बच्चा की सुरक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा। यह कोई साधारण स्थिति नहीं थी।
आत्मबोध द्वारा सेवा की जा सके। इसे आज की डाकू की स्थिति में से बदल कर यदि महर्षि बना सके तो, हम भी नारद के समान ज्ञान-दान की महान सेवा का पुण्य फल प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है और आत्म निर्माण द्वारा परमार्थ के साथ-साथ अत्यन्त उस कोटि का स्वार्थ भी सिद्ध कर सकते है। -क्रमशः
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-May
आत्मबोध कराया जाता रहा है कि युग परिवर्तन ईश्वरीय आकाँक्षा है, उसकी पूर्ति के वे माध्यम बनें तो वस्तुतः वे हैं। साधनों और सामर्थ्यों की चिन्ता नहीं करनी है पुरुषार्थ और लगन इन दो हाथों से हम जुट पड़ने का साहस कर सकें तो उसी सत्ता का सहयोग निरन्तर मिलता रहेगा जिसकी आकाँक्षा में हम निमित्त हैं और यदि इतना साहस भी हम न कर सके तो हम जैसा अभागा और कौन होगा ? सहस्राब्दियों बाद ही कभी ऐसा अवसर आता है जब जाग्रत आत्माओं को नव निर्माण का दायित्व सौंपा जाता है। यद्यपि वह ईश्वरीय आकाँक्षा है, परन्तु मानवीय सामर्थ्य का भी उपयोग किया जा सके, इस उद्देश्य से विशिष्ट व्यक्तियों को ही इस प्रयोजन की पूर्ति का माध्यम बनाया जाता है और उसे पूरा करने से कोई भी समझदार व्यक्ति चूकना, अवार गंवाना पसंद नहीं करता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-February
आत्मबोध हुआ या नहीं। यह चेतना जब तक जागेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचण्ड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव बंधनों से छुटकारा मिलेगा ही नहीं फलतः व्यथा वेदनाओं के झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ भी न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन की उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
आत्मबोध। शरीर और आत्मा के स्वार्थों और संबंधों का पृथक्करण। जीवन लक्ष्य के प्राप्त आस्था और रीति नीति का साहस पूर्ण निर्धारण । दोनों की साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय या दो पृथक पृथक सुविधा के समय और शान्त एकान्त स्थान में, सुसंतुलित चित्त में यह दोनों ध्यान, चिंतन किये जा सकते हैं।
आत्मबोध का लाभ भी न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन की उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-October
आत्मबोध, तत्वबोध का यह त्रिविध सम्पादन साथ-साथ सम्पन्न होकर साधक को उसके अन्तिम लक्ष्य पर प्रतिष्ठित कर देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
आत्मबोध चिन्तन-जिसमें यह मान्यता चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमानी होती है कि आज का एक दिन पूरे जीवन की तरह है इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाया जाना चाहिए। सोचा जाना चाहिए कि ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं जो मनुष्य को प्राप्त हैं। यह पक्षपात या उपहार नहीं वरन् विशुद्ध अमानत हैं जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादी रीति-नीति अपनाकर पूर्णता प्राप्त करने, स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द इसी जन्म में लेने के लिए दिया गया है। यह प्रयोजन तभी पुरा होता है जब प्राप्त क्षणों का योजनाबद्ध रूप से सदुपयोग किया जाय।
आत्मबोध और तत्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष है। लययोग से आनन्दमय कोश -बिन्दुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमय कोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमय कोश की जागृति होती है।
आत्मबोध । दर्पण में अपनी छबि देखते हुए अब तक के अवरोधों के लिए अपने को उत्तरदायी मानते हुए भर्त्सना करना और भविष्य में सत्पथ गमन के लिए अनुरोध, अनुग्रह करना । इसी कलेवर में शैतान और भगवान की परस्पर विरोधी सत्ताएँ अवस्थित देखना । दोनों में से एक को चुनना । आत्मसत्ता के भीतर समाए हुए इष्ट देव का अभिवन्दन और प्रत्यक्ष करना ।
आत्मबोध की शिक्षा दी जाती और सायंकाल एक घण्टा भाव गीतों द्वारा अन्तःकरण में उच्चस्तरीय उत्कृष्टता को उमगाया जाता था । छह घण्टे साधना, 2 घण्टे प्रशिक्षण इस प्रकार आठ घण्टे का नियमित और अनुशासित कार्यक्रम इन सत्रों में रहता । दिनचर्या इतनी सुगठित कि फौजी अनुशासन का पालन करने वाले ही उसमें फिट बैठे । अस्तव्यस्तता के आदी लोग इसमें रुक नहीं सकते थे । साधना वाले चार दिनों में प्रत्येक साधक को शाँतिकुँज की समी-मर्यादा में रहना पड़ता ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
आत्मबोध-ज्ञानोदय कहा है। अन्तः में निहित सत्य को जान लेना ही विकास की अन्तिम परिणति है, ऐसा बुद्ध का मत है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-July
आत्मबोध उगा और तत्व ज्ञान जगा होता तो आत्मिक प्रगति को प्रमुखता मिलती और भौतिक सुविधाओं की वैसी ही उपेक्षा बन पड़ती जैसी कि इन दिनों वैभव के निमित्त जीवनोद्देश्य की अर्वज्ञा होती रहती है। यह आन्तरिक परिवर्तन प्रस्तुत कर सकना ही सच्चे अर्थो में आत्मिक क्षेत्र का पुरुषार्थ है जो इसे जिस मात्रा में कर पाता है वह इसी कायकलेवर में रहते हुए अपने में देवी विशिष्टताओं का अनुभव करता और परिचय देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-October
आत्मबोध की दृष्टि से इसलिए अधिक है कि युग चेतना को उभारने औ नवयुग का सृजन करने में निरत महाकाल की महाकाली महाप्रज्ञा के अग्रदूत होन के गौरव का अनुमान किया जा सके।
आत्मबोध भी जगा है कि इस सुअवसर कस सदुपयोग बढ़ा-चढ़ाकर अनुदान प्रस्तुत करने से ही हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-December
आत्मबोध, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की अभिनव दिव्य चेतना का संचार करना ही निष्कलंक-अवतार का प्रयोजन है ! प्रजा का पाँचजन्य फूँका जा चुका है । ऋतम्भरा प्रज्ञा और युगशक्ति के रुप में ही यह नया अवतार अपना प्रयोजन पूरा करेगा ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-March
आत्मबोध हो ताकि पीछे जो एक महत्वपूर्ण काम कराना है, अध्यात्म का जो व्रत रखने का भार तुम पर डालना है-उस क्षमता का विकास भी हो सके।
आत्मबोध, आत्मनिर्माण, कर्त्तव्यनिष्ठा, सदाचरण, समाज निष्ठा आदि वे सभी विषय विद्या कहे जाते हैं जो व्यैक्तिक चिन्तन, दृष्टिकोण एवं सम्मान में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता का समावेश करते हों, स्वार्थपरता को घटाते और लोक निष्ठा को बढ़ाते हों। धर्म और अध्यात्म का सारा ढाँचा मात्र इसी प्रयोजन के लिए तत्वदर्शियों ने खड़ा किया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-May
आत्मबोध यही है आत्मिक जीवन क्रम। इसी को अपनाकर हम अपने अवतरण की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-July
आत्मबोध से दृष्टिकोण परिष्कृत करें और साधना निरत रह कर विभूतियों के अधिकारी बनें। इस संदर्भ में मन्त्र साधना का आश्रय लेना एक प्रकार से अनिवार्य ही है।
आत्मबोध, लोक व्यवहार, चिन्तन परिष्कार को अध्यात्म ‘निष्ठा’ पक्ष में लिया जायगा। संयम, नियम, व्रत, तप, साधन प्रभृति क्रियाकलापों को साधना माना जायगा। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरी अपूर्ण रह जायगी। ज्ञान कर्म के समन्वय से ही उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-October
आत्मबोध की किरणें उस अन्धकार को दूर कर देती हैं जिसके कारण पग-पग पर ठोकरें खाने के लिये विवश होना पड़ता है। पाने योग्य इस संसार में एक ही वस्तु है आत्म-ज्ञान और उससे बढ़कर किसी को देने योग्य वस्तु भी किसी के पास और कुछ नहीं हो सकती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-April
आत्मबोध की पहली सीढ़ी यह है कि लोक-चिन्तन की अवाँछनीयता को समझा जाय और अपनी अब तक की ढर्रे पर लुढ़कती हुई मान्यताओं के औचित्य
आत्मबोध एक प्रकार के अन्धकार का परित्याग कर प्रकाश को वरण करना है। इसके लिए क्रान्तिकारी कदम उठा सकने वालो साहस की जरूरत पड़ती है। ढर्रे में राई-रत्ती अन्तर करने से काम नहीं चलता। यह पढ़ने और सुनने की नहीं सर्वतोमुखी परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक लोक को छोड़कर दूसरे लोक में जाने-एक शरीर त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करने जैसी इस प्रक्रिया को जो कोई सम्पन्न कर सके उसे ही आत्मा ज्ञानी कहा जायगा।
आत्मबोध को अन्तःकरण के रूप में जाना जाता है। लगन, तत्परता, एकाग्रता, तन्मयता, निष्ठा, दृढ़ता, हिम्मत जैसे मानसिक गुण ऐसे हैं जिनके आधार पर अणु शक्ति से भी करोड़ों गुनी अधिक प्रखर आत्मिक शक्ति को जगाया, बढ़ाया, रोका, सँभाला और प्रयुक्त किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-June
आत्मबोध के अभ्यासरूप में ही उसे देखना चाहिए। आत्मचेतना को मनुष्यों
तक सीमित न रखकर प्रत्येक जड़-चेतन में अपनी आत्मा का प्रकाश जगमगाते हुए
देखने की दिव्य अनुभूति का इसे एक प्रयोग माना जाना चाहिए।"
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-August
आत्मबोध प्राप्त किया, अपने को आत्मा के रूप में अंगीकार किया। शरीर और मन को बाह्य उपकरण मानकर उसी अनुपात से उन्हें संरक्षण दिया। आत्म-परिष्कार जब लक्ष्य बना तो सर्वतोमुखी प्रगति प्रयास भी उसी क्षेत्र में केन्द्रित होने स्वाभाविक थे। पुरश्चरणों का कर्मकाण्ड और आत्म-परिष्कार का प्रबल पुरुषार्थ- यह उभय पक्षी समन्वय ही उस तपश्चर्या में प्रखरता उत्पन्न कर सका। यदि वह एकाँगी रहा होता, माला भर गिनते रहने की लकीर पिटती रहती तो असंख्य अन्य भजनानंदियों की तरह वे भी छूँछ ही बने रहते।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-September
आत्मबोध का प्रकाश ग्रहण करना चाहिए। निरंतर यह विचार करना चाहिए कि वह स्वयं क्या है, क्यों है? किस रीति-नीति को अपनाने में अपनी भलाई है। विवेकशीलता, दूरदर्शिता और यथार्थता को अपनाने का साहस आत्मबोध की एकमात्र देन है। जिसे अपने आपे का ज्ञान हो गया होगा, वह अज्ञानग्रस्त भीड़ का नेतृत्त्व अस्वीकार करेगा।
आत्मबोध के रूप में उठाया जाना चाहिए। यह समझा ही नहीं, अनुभव भी किया जाना चाहिए कि शरीर और मन हमारे वाहन-उपकरणमात्र हैं। अपना यथार्थ स्वरूप आत्मा है। आत्मा ईश्वर का अंश है— परमेश्वर का उत्तराधिकारी राजकुमार। उसे अपना स्तर आत्मगौरव के अनुरूप ही बनाना चाहिए।
आत्मबोध, आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार की प्रक्रिया पूरी की है। हमें यदि खिलवाड़ का ही शौक हो तो हम तंत्र-मंत्रों के विधि-विधान में सीमित रह सकते है, यदि कुछ पाना हो तो कदम आगे बढ़ाने ही होंगे।
आत्मबोध को आत्मबल के रूप में देखा, परखा जा सकता है। आत्मबल जितनी मात्रा में उदय होता जाता है, उतने ही उसके प्रयास आत्मनिर्माण की दिशा में अग्रसर होते हैं। जन्म-जन्ममांतरों के कुसंस्कार आज के घिनौने वातावरण, दुष्प्रवृत्तियों के प्रवाह अंधड़ ने अपनी मनोभूमि को भी आच्छादित कर रखा हो, यह नितांत स्वाभाविक है। सुधार यहीं से आरंभ होता है, निर्माण का प्रथम केंद्र यहीं है— संसार को सुखी, समुन्नत और सुंदर बनाने का शुभारंभ अपने को सुधारने की प्रक्रिया के साथ आरंभ करना होता है। जीवन-साधना विशुद्ध रूप से एक संग्राम है, जिसे लड़े बिना आगे बढ़ने का कोई उपाय नहीं।
आत्मबोध, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की त्रिविधि आत्मोत्कर्ष प्रक्रिया अपनाने के लिए जो साधना करनी पड़ती है, उसका क्रम अहर्निश चलता है। जागने से लेकर सोने तक का प्रत्येक क्षण इस प्रयास में लगाना पड़ता है कि चिंतन में उत्कृष्टता का और कर्त्तृत्व में आदर्शवादिता का परिपूर्ण समावेश रहे। अपनी कोई भाव तरंग उच्च गौरव से गिरी पिछड़ी न रहे, अपनी कोई हलचल ऐसी न हो जो ईश्वर के पुत्र की गरिमा के माथे पर कलंक-कालिमा लगाए। उचित-अनुचित का, श्रेय और प्रेय का निरंतर अंतर करते रहने वाली, सन्मार्ग पर अग्रसर करने वाली ऋतंभरा प्रज्ञा को जिन्होंने सर्वोपरि प्रतिष्ठा प्रदान की है वस्तुतः वे ही आत्मज्ञानी हैं। आत्मोत्कर्ष उन्हीं का हो सकता है जिन्होंने अपने सोचने और करने की समस्त हलचलों में उच्चस्तरीय तत्त्व दर्शन का समावेश कर सकने में सफलता प्राप्त की है।
आत्मबोध हो गया वह इस दिशा में प्रयाण करता हुआ ही दिखाई देगा।
आत्मबोध की एकमात्र देन है। जिसे अपने आपे का ज्ञान हो गया होगा, वह अज्ञानग्रस्त भीड़ का नेतृत्त्व अस्वीकार करेगा। प्रचलित परंपराओं और मान्यताओं से नहीं; वरन उच्च आदर्शों से ही प्रभावित होगा उन्हें ही स्वीकार अंगीकार करेगा। अपने को अल्पमत में पाने कि उसे चिंता नहीं होती और न इसकी परवाह रहती है कि कोई उसका उपहास करता है या स्तवन, न वह विरोध को देखता है, न समर्थन को। मात्र उसे उच्च आदर्श के लिए जीवन संपदा को नियोजित करने की चिंता होती है और इस प्रयोजन को वह विरोध, अवरोध की घनघोर घटाओं को चीरता हुआ भी पूरा करके रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-April
आत्मबोध उभरता है। अपनी स्थिति का सही ज्ञान होता है। लगता है कि अज्ञान आच्छादन से छुटकारा पाना ही परम पुरुषार्थ है। यही जीवन लक्ष्य भी है। आत्मबोध को अध्यात्म दर्शन में परम पुरुषार्थ कहा गया है।
आत्मबोध आत्मदर्शन ही उच्चस्तरीय देव वरदान है। जिसे उसकी उपलब्धियां जिस अनुपात में ही गयी, समझना चाहिए कि वह उतना ही बड़ा श्रेयाधिकारी वन गया।
आत्मबोध अर्थात् जीवन सम्पदा की उच्चस्तरीय ईश्वरीय अनुदान के रूप में मान्यता। इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे बन पड़े इसी चिंतन, मन्थन और निर्धारण को ब्रह्मविद्या का सार तत्व समझना चाहिये। इसी से आध्यात्मिक काया−कल्प रूपी सिद्धि अनुदान की प्राप्ति होती है।
आत्मबोध होने और पिछला स्वभाव तत्काल बदल देने वाले दृष्टान्त सभी ने सुने हैं। इन उदाहरणों में उपनिषद्कार का वही उद्बोधन झाँकता है जिसमें–”आत्मा काऽरे ज्ञातव्यं ” आदि की हंकार है। गीताकार ने भी इसी आशय का मन्तव्य देते हुए कहा है–”उद्धरेत् आत्मनात्मान।” यह आत्मदर्शन ही प्रकारान्तर से ईश्वरदर्शन है। इसी उपलब्धि को जीवन्मुक्ति कहा गया है।
आत्मबोध को अध्यात्म दर्शन में परम पुरुषार्थ कहा गया है। यही चरम सौभाग्य है। इसी एक साधन के सधने से असंख्यों विपत्तियों से छुटकारा मिलता है और समस्त सिद्धियों का द्वार खुलता है। ब्रह्मविद्या की उपनिषद् चर्चा में अनेकानेक तर्कों, तथ्यों व मार्ग−उपचारों के माध्यम से श्रेयार्थी को एक ही शिक्षा−एक ही प्रेरणा दी गयी है कि वह माया−बन्धनों से मुक्त होने का प्रयत्न करे। ‘माया’ अर्थात् अपने को शरीर मानने की, उसे ही वासना तृष्णा से पोसने की ललक−लिप्सा।
आत्मबोध आदि की अध्यात्म शास्त्रों में भावभरी चर्चा है। भगवान बुद्ध को जिस वट वृक्ष के नीचे आत्मबोध हुआ था, उसे बोधि वृक्ष नाम दिया गया− देव तुल्य पूजा गया। उसकी टहनियाँ काटकर संसार भर के बौद्ध धर्मानुयायी ले गये और अपने−अपने यहाँ उसकी स्थापना करके वैसी ही देवात्मा बोधि वृक्ष उगाये। यहाँ चर्चा वृक्ष विशेष की नहीं हो रही है वरन् कहा जा रहा है कि आत्मबोध आत्मदर्शन ही उच्चस्तरीय देव वरदान है। जिसे उसकी उपलब्धियां जिस अनुपात में ही गयी, समझना चाहिए कि वह उतना ही बड़ा श्रेयाधिकारी वन गया।
आत्मबोध हुआ था, उसे बोधि वृक्ष नाम दिया गया− देव तुल्य पूजा गया। उसकी टहनियाँ काटकर संसार भर के बौद्ध धर्मानुयायी ले गये और अपने−अपने यहाँ उसकी स्थापना करके वैसी ही देवात्मा बोधि वृक्ष उगाये। यहाँ चर्चा वृक्ष विशेष की नहीं हो रही है वरन् कहा जा रहा है कि आत्मबोध आत्मदर्शन ही उच्चस्तरीय देव वरदान है। जिसे उसकी उपलब्धियां जिस अनुपात में ही गयी, समझना चाहिए कि वह उतना ही बड़ा श्रेयाधिकारी वन गया।
आत्मबोध। आत्मबोध अर्थात् जीवन सम्पदा की उच्चस्तरीय ईश्वरीय अनुदान के रूप में मान्यता। इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे बन पड़े इसी चिंतन, मन्थन और निर्धारण को ब्रह्मविद्या का सार तत्व समझना चाहिये। इसी से आध्यात्मिक काया−कल्प रूपी सिद्धि अनुदान की प्राप्ति होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-February
आत्मबोध’ और सोते समय वाले चिंतन को ‘तत्वबोध’ कहा गया है। यह दोनों देखने, कहने, सुनने एवं करने में अत्यंत साधारण जैसे लगते हैं; किंतु यदि चिन्ह पूजा की तरह उनकी लकीर न पीटी जाए और गंभीरतापूर्वक उन विचारणाओं की परिणति एवं फलश्रुति पर विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि इस बीज का विकास विस्तार विशालकाय वटवृक्ष के रूप में होता है। चिनगारी तनिक-सी होती है; किंतु उसे ईंधन की सुविधा मिल सकें तो उसे प्रचंड दावानल बनते और योजनों लंबे वनप्रदेश उदरस्थ करते देर नहीं लगती। आँख से न दीख पड़ने वाला, बाल की नाक से भी कम विस्तार वाला शुक्राणु जब नौ महीने जितने स्वल्पकाल में एक अच्छा खाना शिशु बनकर प्रकट होता है तो कोई कारण नहीं कि उपरोक्त विचारद्वय समुचित परिपोषण पाने पर जीवन को देवत्व से लपेट लेने वाले वरदान— सौभाग्य के रूप में प्रकट-विकसित न हो सकें।
आत्मबोध की भूमिका में जागरण यही है ध्यानयोग का लक्ष्य। इस कल्पवृक्ष की छाया में बैठकर सब कुछ पाया जा सकता है। ईश्वरीय सत्ता से संपर्क, सान्निध्य, घनिष्ठता बना लेने के बाद ऐसा कुछ शेष नहीं रहता जिसे अभाव, दारिद्रय अथवा शोक-संताप कहा जा सके। ‘ध्यानयोग‘ इसी महान लक्ष्य की पूर्ति में सहायता करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-June
आत्मबोध’ कराया। कहा−उनमें सामर्थ्य की कमी नहीं,मात्र आत्म विश्वास घट रहा है। वे महान कार्य कर सकते हैं पर इसके लिए उन्हें आत्मविश्वास उभारना होगा। अपना स्वरूप समझना होगा। ऐसा बन पड़े तो आदर्शों के ऊपर सामान्य सुविधाओं को निछावर करने में कुछ भी कठिनाई नहीं रहेगी वरन् यह एक लाभदायक सौदा प्रतीत होगा।
आत्मबोध है। भगवान बुद्ध का आरम्भिक और उपरान्त के जीवन क्रम में जो आश्चर्यजनक परिवर्तन दीखता है उसका एकमात्र कारण वह आत्मबोध था जो उन्हें बोधि वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि अनायास ही नहीं हुई। उनने आत्म सत्ता का पर्यवेक्षण परिशोध और परिष्कार की तप साधना की। फलतः वह सिद्धि उनके हाथ लगी जिसे आत्मज्ञान कहते है−पोथी के बेंगनों वाला पढ़ने सुनने तक सीमित रहने वाला बुद्धि विलास नहीं वरन् वह सुनिश्चित निर्धारण जो विश्वास ही नहीं साहस से भी भरा रहता है।
आत्मबोध था जो उन्हें बोधि वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि अनायास ही नहीं हुई। उनने आत्म सत्ता का पर्यवेक्षण परिशोध और परिष्कार की तप साधना की। फलतः वह सिद्धि उनके हाथ लगी जिसे आत्मज्ञान कहते है−पोथी के बेंगनों वाला पढ़ने सुनने तक सीमित रहने वाला बुद्धि विलास नहीं वरन् वह सुनिश्चित निर्धारण जो विश्वास ही नहीं साहस से भी भरा रहता है। जिसके कारण दृष्टिकोण बदलता है और कार्यपद्धति का प्रवाह ही उलट जाता है।
आत्मबोध कराया और महान बनाया था। वे सदा एक ही बात कहती थीं। “शुद्धोसि, बुद्धोसि, निरंजनोसि” तुम शुद्ध बुद्ध और निरंजन हो। अपने को पहचानो और अपने गौरव के अनुरूप मार्ग चुनो। सभी बालक महान बने।
आत्मबोध की शक्ति सामर्थ्य के भी कुछ चमत्कार हैं। वह जिस सौभाग्यशाली के हाथ लगता है वह ‘अतुलित बलधाँम रामदूतं नमामि’ का श्रेयाधिकारी बनता है। हुआ भी ऐसा ही। जामवन्त ने हनुमान को आत्मबोध करा दिया। उनका वास्तविक स्वरूप समझा सकने में सफलता प्राप्त करली।
आत्मबोध करा दिया। उनका वास्तविक स्वरूप समझा सकने में सफलता प्राप्त करली। फलतः वे व्यामोह मुक्त हुए। तथ्य तक पहुँचे, जीवन की सार्थकता आदर्शों के परिपालन में अनुभव करने लगे। साहस उभरा और हेय हीनता का मकड़ जंजाल टूट गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-December
आत्मबोध, शरीर और आत्म के स्वार्थों और सम्बन्धों का पृथक्करण, जीवन लक्ष्य के प्रति आस्था और सरल रीति−नीति का साहसपूर्वक निर्धारण दोनों की साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय में या अलग−अलग समय में सुविधा समय और शान्त−एकान्त स्थान में, सुसन्तुलित चित्त से यह दोनों ध्यान किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अन्तर्ज्योति प्रखर होती चली जायगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर दिव्य सम्पदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए, वे सहज ही करतलगत होती चली जायेगी।
आत्मबोध हुआ या नहीं। यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचण्ड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव−बन्धनों से छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन का उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
आत्मबोध। अपना वास्तविक स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, शरीर और आत्मा का सम्बन्ध, श्रेय और प्रेय में से एक का चुनाव—अपनी गतिविधियाँ और रीति−नीतियों का सुनियोजित निर्धारण जैसे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय इसी केन्द्र पर टिके हुए हैं कि आत्मबोध हुआ या नहीं। यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचण्ड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव−बन्धनों से छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन का उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन का उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-March
आत्मबोध अजपा जाप बनकर स्वसंचालित रहता है। सोऽहम् का भाव स्थापित हो जाने का अर्थ है–आत्मा−परमात्मा का एकीकरण–अद्वैत की स्थापना। तत्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म–शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम्, शुद्धोऽसि, बुद्धोऽसि, निरंजनोऽसि आदि विवेचनों में इसी वेदान्त दर्शन का प्रतिपादन है।
आत्मबोध प्रज्ञा जो उसके वास्तविक ‘स्व’ का स्वरूप है, जागृत अवस्था में रहती है और उसी की स्फुरणा से सोऽहम् का आत्मबोध अजपा जाप बनकर स्वसंचालित रहता है। सोऽहम् का भाव स्थापित हो जाने का अर्थ है–आत्मा−परमात्मा का एकीकरण–अद्वैत की स्थापना। तत्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म–शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम्, शुद्धोऽसि, बुद्धोऽसि, निरंजनोऽसि आदि विवेचनों में इसी वेदान्त दर्शन का प्रतिपादन है।
आत्मबोध न हो जाय अन्तःशक्ति के वैभव का समुचित लाभ उठा पाना साधक के लिये सम्भव नहीं हो पाता। गुरु शिष्य को अंतर्जगत का पर्यवेक्षण कराते हैं, उसकी सामर्थ्य का बोध कराते हैं। सामर्थ्य को जागृत विकसित कर सुनियोजित करने के हर सम्भव उपाय बताते है। इसका साधक को आत्मबल व मनोबल के रूप में मिलता है। यही शक्ति साधक के अंतर्जगत के देवासुर संग्राम में विकारों को उखाड़ फेंक देने में सहायक सिद्ध होती है।
आत्मबोध को मानव जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि माना गया है। इसी के आधार पर मनुष्य अपनी सत्ता, महत्ता, क्षमता एवं सम्भावना का मूल्याँकन कर सकने में समर्थ होता हैं। इसी अनुभूति के साथ वह पराक्रम शीलता उभरती है जिसके सहारे व्यक्ति अपने जन्म-जन्मान्तरों से संचित कुसंस्कारों को समझता, उनकी हानियों को अनुभव करता तथा उन्हें उखाड़ने के लिये कृत संकल्प हो जाता है। वस्तुतः इस उखाड़-पछाड़ने की प्रक्रिया–अपने आप से संघर्ष में जितना पराक्रम लगता है उतना ही अनगढ़ मन को उत्कृष्टता के पक्षधर अनभ्यस्त आधारों को अपनाने के लिये मनाने व स्वभाव का अंश बना लेने की मंजिल पूरी करने में नियोजित करना पड़ता है। अपने हाथों अपने आपको ढालना बहुत बड़ा काम है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
आत्मबोध प्रातःकालीन अभ्यास है। प्रातःकाल बिस्तर से सोकर जागते ही बिस्तर पर ही पूर्वाभिमुख, पालथी मार कर ध्यान मुद्रा में बैठें। तीन बार लम्बे-लम्बे श्वास लें और धीरे-धीरे साँस बाहर निकाल दें। साँस इतनी गहरी लें कि वह नाभिचक्र तक भर जाये। तीन बार यह क्रिया करने के उपरान्त अँगड़ाई लें और पुनः ध्यान मुद्रा में चले जायें अपने इष्ट को सम्मुख हुआ अनुभव करें यह नया जन्म हुआ है।
आत्मबोध और तत्त्वबोध के दो अभ्यास सिखाये जाते हैं आत्मबोध प्रातःकालीन अभ्यास है। प्रातःकाल बिस्तर से सोकर जागते ही बिस्तर पर ही पूर्वाभिमुख, पालथी मार कर ध्यान मुद्रा में बैठें। तीन बार लम्बे-लम्बे श्वास लें और धीरे-धीरे साँस बाहर निकाल दें। साँस इतनी गहरी लें कि वह नाभिचक्र तक भर जाये। तीन बार यह क्रिया करने के उपरान्त अँगड़ाई लें और पुनः ध्यान मुद्रा में चले जायें अपने इष्ट को सम्मुख हुआ अनुभव करें यह नया जन्म हुआ है।
आत्मबोध की प्रातःकालीन साधना जिसमें दिन भर क्या किया जाना है, इस सुर दुर्लभ मानव शरीर का सदुपयोग किस प्रकार होता है इस पर चिन्तन किया जाता है। आत्म-विश्लेषण व निरीक्षण की इस साधना का प्रज्ञायोग का प्राण कहा जा सकता है। (3)तत्त्वबोध की सायंकालीन साधना जिसमें दिन भर का लेखा-जोखा लिया जाता है तथा पूरे दिन को एक पूरा जीवन मानकर मृत्यु की गोद में जाने का चिन्तन करते हुए प्राप्त के पर्यवेक्षण की एक रिहर्सल की जाती है। भावी निर्धारण व आने वाले डडडडकी अपनी दिनचर्या की भूमिका बनाते हुए साधक निद्रा की गोद में चले जाते हैं। इन लोगों का समन्वय ही ‘प्रज्ञायोग‘ है।
आत्मबोध जितना ही 15 मिनट का समय लगता है। रात्रि को सोने से पूर्व शैया पर पड़े-पड़े जीवन के अन्त का स्मरण करें। मृत्यु को अनिवार्य अतिथि मानें। उसके उपरान्त ईश्वर के दरबार में पहुँचने और जीवन सम्पदा के सदुपयोग-दुरुपयोग के सम्बन्ध में लेखा-जोखा माँगे जाने की बात सोचें। बरते हुए प्रमाद की परिणति निकृष्ट योनियों में भटकने, यन्त्रणाएँ सहने और पतन पराभव के गर्त में गिरने की यथार्थता को समझें।
आत्मबोध-सोते समय तत्त्वबोध । नित्यकर्म से निवृत्त होकर जप ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन-मनन में उपयोग। यही है-त्रिविधि सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-January
आत्मबोध”। आत्मबोध का तात्पर्य है— अपनी सत्ता की महत्ता काे समझना और अपने आपको इस योग्य बनाना कि ईश्वर के जेष्ठ पुत्र, अंशधर, युवराज सच्चे अर्थों में कहला सकें। दीन-हीनों की तरह जिस-तिस के सामने सहायता के लिए हाथ न पसारते फिरें। बहुमूल्य जीवन-संपदा को निरर्थक न गँवा बैठें। यही है— आत्मबोध या आत्मसाक्षात्कार।
आत्मबोध या आत्मसाक्षात्कार। आत्मा की प्राप्ति परमात्मा की प्राप्ति ही मानी गई है; क्योंकि ब्रह्मांडव्यापी निराकार भगवान को निकटतम और स्नेही सहायक के रूप में अपने भीतर ही प्राप्त कर सकते हैं। इससे समीप और सरलतापूर्वक पहुँच सकने योग्य और कोई स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ आत्मा का— परमात्मा से मिलन हो सके।
आत्मबोध का तात्पर्य है— अपनी सत्ता की महत्ता काे समझना और अपने आपको इस योग्य बनाना कि ईश्वर के जेष्ठ पुत्र, अंशधर, युवराज सच्चे अर्थों में कहला सकें। दीन-हीनों की तरह जिस-तिस के सामने सहायता के लिए हाथ न पसारते फिरें। बहुमूल्य जीवन-संपदा को निरर्थक न गँवा बैठें। यही है— आत्मबोध या आत्मसाक्षात्कार। आत्मा की प्राप्ति परमात्मा की प्राप्ति ही मानी गई है; क्योंकि ब्रह्मांडव्यापी निराकार भगवान को निकटतम और स्नेही सहायक के रूप में अपने भीतर ही प्राप्त कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-December
आत्मबोध की एक ऊँची कक्षा भी है, जिसमें अपने को ईश्वर का युवराज मानते हुए उसके विश्व उद्यान को सींचने-समुन्नत करने में दायित्व रहने का दायित्व कंधों पर आता है। अपनी अपूर्णताओं को दूर करने के लिए सेवा धर्म अपनाना पड़ता है। सभी आध्यात्मिक कृत्यों में कुछ न कुछ कर्मकाण्ड जुड़ा रहता है। आत्मशोधन और लोकमंगल यह दो कार्य ऐसे हैं जिन्हें सरलतम, श्रेष्ठतम साधन-विधान समझा जा सकता है। जप-ध्यान से, पूजा-अर्चा से तो मात्र आत्मशुद्धि का प्रयोजन ही आँशिक रूप से सधता है, किन्तु परमार्थ पारायणता का- सेवा साधना का- उपचार ऐसा है जिसके सहारे व्यक्ति अनायास ही सद्गुणी और परमार्थी बनता जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
आत्मबोध के रूप में जब अपने को ईश्वर- ईश्वर का अंश मानने की आस्था जागती है, तो अन्तरंग और बहिरंग जीवन में दोनों ही पक्ष फड़फड़ाने लगते हैं। पक्षी उन्मुक्त आकाश में विचरण करने लगता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-July
आत्मबोध का अर्थ आत्मा की पूर्ण जानकारी है। इस आत्मज्ञान को ही वेदांत में बुद्धि कहते हैं। बुद्धि का अर्थ पदार्थ जगत का ज्ञान मात्र नहीं है, जो आजकल समझा जाता है। वेदांत और ज्ञानयोग इसी बुद्धि को प्रशिक्षित और शुद्ध करते हैं। वेदांत वेद का सार है और सर्वोच्च ज्ञान ‘सत्य’ का बोध कराता है।
आत्मबोध के द्वारा सत्य को जाना जाता है। आत्मबोध का अर्थ आत्मा की पूर्ण जानकारी है। इस आत्मज्ञान को ही वेदांत में बुद्धि कहते हैं। बुद्धि का अर्थ पदार्थ जगत का ज्ञान मात्र नहीं है, जो आजकल समझा जाता है। वेदांत और ज्ञानयोग इसी बुद्धि को प्रशिक्षित और शुद्ध करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-June
आत्मबोध हुआ या नहीं- इसकी एक ही पहचान है कि जीवनक्रम मोहग्रस्तों की तरह व्यतीत हो रहा है या उसमें उत्कृष्टता का, आदर्शवादिता का पुट लगने लगा या नहीं, स्वार्थ, परमार्थ में बदला या नहीं, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की मान्यता के अनुरूप चिन्तन एवं चरित्र में महानता का समावेश हुआ या नहीं?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-April
आत्मबोध का उदय हो वरन् ऐसी प्रखरता- ऊर्जा भी उत्पन्न हो जिसके सहारे अपने को भटकाव के दलदल में से निकाल कर सही मार्ग अपना सके और गर्त में गिरने की अपने उबरने की स्थिति अपना सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-May
आत्मबोध द्वारा अपने वैभव को जाना व समुन्नत बनाया जा सके तो योगवाशिष्ठ के रहस्योद्घाटन को सत्यापित किया जाना असम्भव नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-June
आत्मबोध है, और यही परमात्मा के अस्तित्व की अनुभूति है।
आत्मबोध का वास्तविक अर्थ है, स्थूल शरीर और आत्मा की भिन्नता अनुभव करना। आमतौर से चेतना शरीर के साथ इतनी गहराई तक गुँथ जाती है कि अपना अस्तित्व और सर्वस्व उसी को समझने लगती है। उसी की सुख-सुविधाओं का ताना-बना बुनती है और अहिर्निश उसी को अधिकाधिक प्रसन्न एवं सम्पन्न बनाने के लिए श्रम करती रहती है। अपना आपा काया के साथ इतना अधिक घुल जाता है कि उससे पृथक् अपनी सत्ता का कोई भान ही नहीं होता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-December
आत्मबोध न होने की स्थिति में वयस्कों की भी यही दुर्दशा होती है। वे अपना स्वपूर्व, आश्रय, कर्त्तव्य, भविष्य आदि के संबंध में समुचित जानकारी न रहने पर व्यामोहग्रस्तों जैसी स्थिति बना लेते है। वह भटकावों में भटकता रहता है। ऐसे मार्ग पर चल पड़ता है, जिसमें कटीले झाड़-झंखाड़ों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। उसी जंजाल में कपड़े फटते, अंग छिलते और पैरों में छाले पड़ते रहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-July
आत्मबोध को प्रकाश में मिलता है, वे इतने भर से संतुष्ट नहीं रहते, उन्हें महानता की आकांक्षा कचोटती है, फलतः ऐसी दिशाधारा खोजते हैं, जो व्यक्तित्व में दैवी तत्त्वों का समावेश कर सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-December
आत्मबोध से ही जीवन और संसार के रहस्यों पर से पर्दा उठता है। आत्म जागृति ही दिव्य -जीवन में प्रवेश का द्वार है। आत्म-विश्वास से हिम्मत बंधती है और प्रबल पुरुषार्थ करके बढ़ी-चढ़ी सफलताएँ प्राप्त करना सम्भव होता है। आत्म तृप्ति के लिए ही सारी दौड़−धूप हो रही है। आत्मसन्तोष पाने के लिए बड़े से बड़े कष्ट सहे जा सकते हैं।
आत्मबोध ही यथार्थ ज्ञान है जो इंद्रियानुभूति से नहीं परिष्कृत आत्मचेतना से ही उपलब्ध हो सकता है।
आत्मबोध पूरी तरह सोया रहता था। अचेतन में दबी प्रवृत्ति अत्यन्त तीव्र हो उठती थी और वह सचेतन के एक भाग पर कब्जा करके उसके शरीर और मस्तिष्क से मनचाहा काम कराती थी। यह स्थिति जब तक अचेतन चाहता, बनाये रहता और जब उसकी तृप्ति हो जाती तो शरीर को लाकर उसी चारपाई पर पटक देता जहाँ से उसे उठाया था। नींद से उठने के बाद उस डाक्टर को उस सारे घटना-क्रम की स्वप्न जैसी धुँधली स्मृति भी नहीं रहती थी। इतना गहरा विस्मरण भी अचेतन का ही अभिशाप था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-March
आत्मबोध होता है और आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास की जीवन साधना चल पड़ती है। तीसरी का उद्देश्य है कि सामाजिक क्रिया-कलापों एवं मर्यादाओं का सुव्यवस्थित निर्वाह। व्यक्ति और समाज के बीच टकराव को निरस्त करते हुए सघन सहयोग का निर्वाह। यह तीनों ही धाराएं मिलकर जिस तीर्थराज संगम का निर्माण करती हैं उसी को आदर्शवादी दर्शन कहते हैं। यह दार्शनिकता जिस देश, समाज के उच्च स्तर पर टिकी रहेगी वह हर दृष्टि से समुन्नत , विकसित दिखाई देगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-September
आत्मबोध प्राप्त करते हुए जिस परमात्म सत्ता में प्रवेश करते है उसे इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। आत्मानुभूति ही उसे उपलब्ध करने का एकमात्र साधन है। यदि इन्द्रियों से उसे देखने का प्रयत्न किया जाय तो निराशा अथवा भ्रान्ति ही हाथ लगेगी। इस सर्न्दभ में केनेपनिषद का अगला प्रतिपादन है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-May
आत्मबोध एवं आत्म−तत्त्व की अखण्डता को समझना आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-August
आत्मबोध प्राप्त करते हुए जिस परमात्म सत्ता में प्रवेश करते है; उसे इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। आत्मानुभूति ही उसे उपलब्ध करने का एकमात्र साधन है। यदि इन्द्रियों से उसे देखने का प्रयत्न किया जाय तो निराशा अथवा भ्रान्ति ही हाथ लगेगी। इस संदर्भ में केनेपनिषद का अगला प्रतिपादन है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-December
आत्मबोध का प्रकाश इसी शुभ मुहूर्त में मिला था। उन्होंने अपनी 24 वर्षीय गायत्री पुरश्चरण साधना अखण्ड दीपक पर उसी दिन आरम्भ की थी। इतना ही नहीं वे हर वसन्त पंचमी पर एक अभिनव दिव्य प्रकाश प्राप्त करते रहे और इस आधार पर अगले एक वर्ष का कार्यक्रम निर्धारित करते रहे। एक-एक कदम हर वसन्त पंचमी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इतनी लम्बी यात्रा की और लक्ष्य के समीप तक पहुँचे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-September
आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
आत्मबोध के अभाव में होती है। व्यक्ति अपना विश्लेषण कर ही नहीं पाता। यह कार्य कोई सिद्ध समर्थ ही कर सकते हैं। शरीर और मन का अध्ययन लोगों के सामान्य क्रिया - कलापों से कोई भी कर सकता है, पर अंतःकरण का वेधन कोई दिव्य तत्वदर्शी ही कर सकते है। इसे इस परिवार का सौभाग्य कहना चाहिए कि इसे वह समर्थ संरक्षण पूज्य गुरुदेव के रूप में प्राप्त है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-November
आत्मबोध का प्रशिक्षण आरम्भ से ही करना होगा। क्योंकि उन
तथ्यों को जिन पर आत्मोन्नति निर्भर है, एक प्रकार से हमने भुला ही दिया
है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-June
आत्मबोध, धर्मधारणा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-January
आत्मबोध एक प्रकार को वरण करना है। इसके लिए क्रान्तिकारी कदम उठा सकने वाले साहस की जरूरत पड़ती है। ढर्रे में राई-रत्ती अन्तर करने से काम नहीं चलता। यह पढ़ने और सुनने की नहीं सर्वतोमुखी परिवर्तन की प्रक्रिया है। एक लोक को छोड़कर दूसरे लोक में जाने, एक शरीर त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करने जैसी इस प्रक्रिया को जो कोई सम्पन्न कर सके, उसे ही आत्मज्ञानी कहा जाएगा।
आत्मबोध न होने से मनुष्य की महत्त्वाकाँक्षाएँ, चेष्टाएँ योजनाएँ, गति-विधियाँ एक प्रकार से निरर्थक कामों में लगी रहती है और बहुमूल्य मानव-जीवन रहती है और बहुमूल्य मानव-जीवन ऐसे ही उन विडम्बनाओं में गल जाता है, जो सुख-साधन भौतिक-जीवन में उपलब्ध थे उनको भी गलत दृष्टिकोण के कारण समझा और सराहा नहीं जाता। स्त्री, सन्तान, शरीर, शिक्षा, सहायक, साधन जो कुछ भी मिले हुए है, उनके मूल्य, महत्व को भी यदि समझने की चेष्टा की जाय- इनसे मिलने वाली सहायता-सुविधा का लेखा-जोखा लिया जाय तो भी हर व्यक्ति को अपनी स्थिति बहुत हद तक हर्ष-संतोष से भरी हुई प्रतीत हो सकती है। पर इस दुर्भाग्य को क्या कहा जाय, जिसके अनुसार केवल अभाव और छिद्र ही दिखाई पड़ते है। आंतरिक दुर्बलता, आशंका, अविश्वास, अवरोध, द्वेष -घृणा के रूप में फुफकारती और वातावरण को विषाक्त करती रहती है। सो उन्हीं विडम्बनाओं में उलझा हुआ, विभीषिकाओं में उलझा हुआ, विभीषिकाओं में संत्रस्त, आशंकाओं से उद्विग्न-मनुष्य अन्तर्दाह की आग में हर क्षण जलता हुआ नारकीय जीवन जीता है।
आत्मबोध न होने का ही परिणाम है।
आत्मबोध, आत्मोत्थान, आत्म-साक्षात्कार-जीवन का सबसे बड़ा लाभ हैं इससे बड़ी उपलब्धि इस मनुष्य के लिए और और कोई दूसरी हो ही नहीं सकती। मैं क्या हूँ? कौन हूँ किस लिये हूँ इस तथ्य को समझ लेने के बाद यह भी अनुभूति होने लगती है कि उपकरण, औजार एवं पदार्थों का उपयोग-उपभोग, संबंध-स्नेह की सीमा कितनी रहनी चाहिए, इस सीमा का स्वरूप और निर्धारण जब भी, जो भी कर लेगा वह दिव्य-जीवन जियेगा, सुख-शान्ति से ओत-प्रोत रहेगा और सर्वत्र धरती के देवताओं की तरह महामानवों की तरह हर किसी के अन्तरंग पर श्रद्धा भरा शासन करेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-September
आत्मबोध के क्षण होते हैं, उन क्षणों को जीआ जा सके तो चित्त में ध्यान और समाधि के फूल खिल उठते हैं। ‘विज्ञान भैरव’ तंत्र में इस तरह के कई अवसरों का उल्लेख है, जिसमें व्यक्ति अपनी आत्मचेतना के केंद्र में स्थिर होता है। संकट का सदुपयोग किया जाए तो बोध का एक सामान्य-सा भाव भी साधक की दिशाधारा मोड़ देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
आत्मबोध के ही दिव्य वरदान की माँग की जाए। सर्वतोभावेन परमात्मा के प्रति समर्पित भक्त का योगक्षेमं वहन करने की प्रतिज्ञा भगवान ने स्वयं की है, पर उस शर्त को भी तो पूरा किया जाना चाहिए, जो पात्रता विकसित करने, हृदय को वासनाओं और तृष्णाओं से रिक्त करने के रूप में जुड़ी हुई है।
आत्मबोध की स्थिति में अपने अंतस् को ले जाना। तत्वमसि, अयमात्माब्रह्म, सच्चिदानंदोऽहम् का भाव लाते हुए कि हम शरीर नहीं, हाड़-माँस का पुतला नहीं हम श्रेष्ठता की प्रतिमूर्ति हैं, भाव-संवेदनाओं का पुँज हैं-हम वही हैं जो भगवान हैं। हमें वैसा ही बनना है जैसे भगवान हैं। “मुखड़ा देख ले दर्पण में” शीर्षक वाले श्री प्रदीप के गीत पर जब प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों (1973-74) में ध्यान का क्रम चल पड़ता था तो साधक फूट-फूट कर रो पड़ते थे। उन्हें बार-बार स्मरण दिलाया जाता था कि अब तक जो जीवन जिया था वह एक पशु का था।
आत्मबोध, अंतःप्रकाश अथवा समर्पण स्वीकार ही है।
आत्मबोध की भूमिका में पुनः जागरण, यही है ध्यानयोग का लक्ष्य।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-February
आत्मबोध को प्राप्त कर बुद्ध कहलाये तथा धर्म चक्र प्रवर्तन जैसे महान कार्य को संपन्न कर सके।
आत्मबोध कराया और फिर निर्देश दिया कि समाज में व्याप्त अनाचार, कुरीतियों, धर्म के नाम पर छाये आडम्बरों को मिटाने अकेले निकल जाओ। गुरु की शक्ति लेकर शिष्य चल पड़ा और धीरे-धीरे दयानन्द सारे समाज पर छा गए।
आत्मबोध लाभ प्राप्त नहीं कर सका। अपने पुरुषार्थ से ही अपना निर्माण किया जा सकता है। अपने भाग्य को बनाने वाले कोई दूसरा नहीं वरन् उसका पुरुषार्थ ही होता है। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए पुरुषार्थ का स्थान ही सर्वोपरि है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
आत्मबोध की साधना जैसे पक्षों का विवरण था। इस अंक में इसी क्रम को आगे बढ़ाते है। इसमें अभ्यंग (तेल मालिश), क्षौरकर्म (दाढ़ी बनाना), व्यायाम, प्रातः भ्रमण एवं स्नान से लेकर वस्त्रधारण तक की चर्चा है। किसी को लग सकता है कि उनके पीछे क्या वैज्ञानिकता हो सकती है, पर जब आयुर्वेद के मर्मज्ञ ऋषिगणों का चिंतन आर्षवचनों के परिप्रेक्ष्य में पढ़ते है तो ज्ञात होता है कि कितनी दूरदर्शिता से दिव्यद्रष्टा होने के नाते वे यह सब डेलीरूटीन (दिनचर्या) को व्यवस्थित बनाने के लिए लिख गये है।
आत्मबोध हो एवं वे युगपरिवर्तन के कार्य में हाथ बटाना आरम्भ कर दे, यही हम सबको सौंपा गया इस संधिवेला का विशिष्ट दायित्व है। इसी एक सूत्र कार्यक्रम में पूरी शक्ति झोंककर ज्ञानयज्ञ को प्रज्वलित ही नहीं उसकी लपटों को आकाश तक पहुँचा देना हम सबका इस समय का कर्तव्य होना चाहिए। इससे इतर न किसी को सोचना है, न अपनी ओर से कोई कल्पना करनी है तथा अगणित देवात्माएँ इस प्रचंड शक्तिप्रवाह से जुड़ने को तैयार है, तो हम सभी को संचालन-साधक स्तर की प्रौढ़ता अपने अन्दर विकसित करना एवं फिर ऐसे नवरत्नों को खोज-खोजकर नवनिर्माण के कार्य में जुटाना है। इतना स्पष्ट मार्गदर्शन है कि कहीं किसी शक की कोई गुँजाइश ही नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-July
आत्मबोध जाग्रत हो जाता है व उनका रूपांतरण हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-November
आत्मबोध और आत्मविस्तार।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-October
आत्मबोध जिस-जिसको हुआ है, वह महामानव-यशस्वी बना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-April
आत्मबोध की साधना है। दर्पण में जब भी दृश्यमान हैं वह तो मात्र हाड़-माँस का पिंड हैं, जिसे एक दिन भस्मीभूत बन जाना है। फिर इसे सजाने का इतना प्रयास क्यों? सुंदर, आकर्षक तो भीत वालों को जिन्हें विचारणा- आकांक्षाओं का केंद्र मन एवं भावसंवेदना की गंगोत्री अंतःकरण कहते हैं, बनाया जाना चाहिए उनके लिए कभी प्रयास होता नहीं इसीलिए मात्र शरीर तक मनुष्य सीमित होकर रह जाता है। कारण व सूक्ष्मशरीर के परिष्कार के लिए दर्पण- साधना श्रेष्ठतम हैं, क्योंकि यह सीधे वेदाँत के सच्चिदानंदोऽहम् की अवधारणा तक साधक को ले जाती है।
आत्मबोध की साधना के साथ हमें जन्म देने वाली पृथ्वी माँ को नमस्कार करना चाहिए
आत्मबोध की साधना प्रातः जागरण के साथ ही संपन्न की जाती है। रात्रि में नींद आते ही यह दृश्यजगत समाप्त हो जाता है। मनुष्य स्वप्न-सुषुप्ति के किसी अन्य जगत में रहता है। इस जगत में पड़े हुए स्थूलशरीर से उसका संपर्क नाममात्र का कामचलाऊ भर रह जाता है। जागते ही चेतना का शरीर से सघन संपर्क बनता है, यही नये जन्म जैसी स्थिति है।
आत्मबोध साधना के बाद तथा सायंकाल एक बार। बहुत से लोग मल-मूत्रों के वेगों को रोक लेते हैं, ऐसा करना शरीर के लिए बहुत हानिकारक है, इससे रोग उत्पन्न होते हैं।
आत्मबोध की साधना, पृथ्वी माँ को नमस्कार, ऊषापान, शौच, दंतधावन, अभ्यंग (तैल मालिश) प्रातःभ्रमण, व्यायाम, क्षौरकर्म, स्नान, वस्त्रधारण, संध्योपासना, स्वाध्याय, भोजन आदि कर्म आते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
आत्मबोध की एक शीतल लहर समूचे अस्तित्व में व्याप्त हो जाएगी व बाह्य जीत स्वतः अनुसरित होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
आत्मबोध का यह विज्ञान वर्तमान को ऊर्जावान बना देता है। जिसका वर्तमान, जितना अधिक प्राणवान है, वह उतना ही श्रेष्ठ साधक है।वर्तमान में जीने का अभ्यास सतत चौबीस घण्टे प्रारम्भ कर दें। होश में रहें कि कहीं मन फिर से अतीत और भविष्य के झूले में नहीं झूलने लगा। इससे छुटकारा पाने के लिए इसके प्रति जाग्रत् होना ही पर्याप्त है।
आत्मबोध, पञ्चीकरण प्रक्रिया, विवेकचूड़ामणि, उपदेशसहस्री आदि अनेकों ग्रन्थों का प्रणयन किया। दक्षिणामूर्ति स्रोत, सौंदर्य लहरी, आनन्द लहरी जैसे रहस्यमयी साधनाओं को बताने वाले अनेकों स्त्रोतों की रचना की।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-August
आत्मबोध के द्वारा ही सम्पूर्ण मानसिक स्वास्थ्य एवं आन्तरिक शक्तियों का विकास सम्भव है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-March
आत्मबोध का स्वर सदा से है और सर्वत्र मुखर रहा है। उपनिषदों का उद्घोष है- ‘आत्मनम् विद्धिः’ अर्थात् संसार को जानने के साथ-साथ आत्मा को भी जानो। बिना आत्मज्ञान के मानव जीवन की सच्ची सार्थकता सिद्ध नहीं हो सकती।
आत्मबोध को पाना है। सत्य तो यह है कि इसमें निहित प्रेरणाओं को सभी धार्मिक आस्थाओं वाले किसी न किसी रूप में महत्त्व देते हैं। हाँ उनकी रीति-नीति भले ही स्पष्ट हो या अस्पष्ट। और हो भी क्यों नहीं, जीवन-बोध के बना जीवन का अंधेरा नहीं मिटता।
आत्मबोध करना कि उस व्यक्ति का, शिष्य का कर्त्तव्य क्या है। 27/7/6161 को पं. बैजनाथ जी सौनकिया को लिखा एक पत्र यहाँ दे रहे हैं--
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
आत्मबोध, स्वयं की गरिमा का साक्षात्कार अवश्य रामकृष्ण ने करा दिया व कहा कि परोक्ष सत्ता सूक्ष्म जगत से सदैव तेरे साथ रहेंगी। वे ही तेरे से सब कार्य सिद्ध करायेंगी। विश्वधर्म सम्मेलन में संभवतः उसी सत्ता ने गेरुआ वस्त्रधारी एक रात्रि पहले रेलवे वैगन में ठिठुरकर सो रहे अकिंचन से ऐसी सारगर्भित वक्तृता करा ली कि विश्वभर में उनका डंका बज गया।
आत्मबोध कराना कठिन नहीं है कि वे क्या हैं?
आत्मबोध कराया एवं शिष्य ने अपना आपा, अस्तित्व ही उन्हें समर्पित कर दिया। समर्पण में स्वयं की इच्छा कैसी? जो मार्गदर्शक की इच्छा वही अपनी इच्छा। तर्क की वहाँ कोई गुँजाइश ही नहीं। कठपुतली तो बाजीगर के इशारे पर नाचती है।
आत्मबोध अंतःस्फुरणा, गुरुदर्शन, आत्म साक्षात्कार कुछ भी नाम जा सकता है, पर उस दिन प्रकट वह प्रकाश ही उनका मास्टर, मार्गदर्शक उनकी परोक्षसत्ता बन गया। इसकी भौतिक रूप से व्याख्या की जाय तो इसे दुर्गम हिमालय से प्रकटी उस चिनगारी से भी जोड़ा जा सकता है जहाँ ऋषिसत्ता सूक्ष्म शरीर में निवास करती हैं। हिमालय से विराट व्यक्तित्व वाले पूज्य गुरुदेव ने अपने आध्यात्मिक पिता के रूप में स्वयं हिमालय के उस क्षेत्र की जो उत्तराखंड क्षेत्र में स्थित है, हिमालय का हृदय कहा जाता है। यह परोक्ष चेतना पन्द्रहवें वर्ष पूरा होने के तीन माह बाद ही बसंत पर्व के दिन युवा श्रीराम के पूजा गृह में प्रकट हुई, स्थूल शरीर एक ऐसे कृशकाय सिद्धपुरुष के रूप में है जो अनादिकाल से एकाकी, मग्न, मौन, निराहार रहकर अपनी तप ऊर्जा द्वारा अपने को अधिकाधिक प्रचण्ड प्रखर बनाते चले आ रहे हैं। एक दिगंबर देहधारी हिमराशि के मध्य खड़ी दुर्बल काया-यह तो स्थूल रूप में उपलब्ध उनका एक मात्र चित्र है जो अपनी पहली हिमालय यात्रा के समय उनके आग्रह पर स्वयं पूज्य गुरुदेव को प्रकट रूप में उनने प्रदान किया यही चित्र गायत्री परिवार में दृश्य प्रतीक के रूप में उपलब्ध है।
आत्मबोध अंतःस्फुरणा, गुरुदर्शन, आत्म साक्षात्कार कुछ भी नाम जा सकता है, पर उस दिन प्रकट वह प्रकाश ही उनका मास्टर, मार्गदर्शक उनकी परोक्ष सत्ता बन गया। इसकी भौतिक रूप से व्याख्या की जाय तो इसे दुर्गम हिमालय से प्रकटी उस चिनगारी से भी जोड़ा जा सकता है जहाँ ऋषिसत्तायें सूक्ष्म शरीर में निवास करती हैं। हिमालय से विराट व्यक्तित्व वाले पूज्य गुरुदेव ने अपने आध्यात्मिक पिता के रूप में स्वयं हिमालय के उस क्षेत्र की जो उत्तराखंड क्षेत्र में स्थित है, हिमालय का हृदय कहा जाता है। यह परोक्ष चेतना पन्द्रहवें वर्ष पूरा होने के तीन माह बाद ही बसंत पर्व के दिन युवा श्रीराम के पूजा गृह में प्रकट हुई, स्थूल शरीर एक ऐसे कृशकाय सिद्धपुरुष के रूप में है जो अनादिकाल से एकाकी, मग्न, मौन, निराहार रहकर अपनी तप ऊर्जा द्वारा अपने को अधिकाधिक प्रचण्ड प्रखर बनाते चले आ रहे हैं। एक दिगंबर देहधारी हिमराशि के मध्य खड़ी दुर्बल काया-यह तो स्थूल रूप में उपलब्ध उनका एक मात्र चित्र है जो अपनी पहली हिमालय यात्रा के समय उनके आग्रह पर स्वयं पूज्य गुरुदेव को प्रकट रूप में उनने प्रदान किया यही चित्र गायत्री परिवार में दृश्य प्रतीक के रूप में उपलब्ध है।
आत्मबोध कहा जाय या परोक्ष सत्ता द्वारा शक्तिपात स्तर का अनुग्रह., जो भी कुछ यह था, उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-November
आत्मबोध और स्वरूपबोध के कर्तव्यबोध कर पाना संभव है? कदाचित् नहीं। जब गन्तव्य ही न मालूम हो, तो कोई कदम किस ओर बढ़ायेगा?
आत्मबोध की स्थिति है। हमें अपने शोध के दायरे को विस्तृत कर इस दिशा में कदम बढ़ाना होगा। आन्तरिक परिपूर्णता का यही सुगम मार्ग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-February
आत्मबोध” प्राप्त कर ले और समझ ले कि मैं कौन हूँ? क्या हूँ? और क्या कर सकता हूँ? तो समझना चाहिए कि उसे क्षुद्रता से उबरने का मार्ग मिल गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
आत्मबोध, स्वयं की गरिमा का साक्षात्कार अवश्य रामकृष्ण ने करा दिया व कहा कि परोक्ष सत्ता सूक्ष्म जगत से सदैव तेरे साथ रहेंगी। वे ही तेरे से सब कार्य सिद्ध करायेंगी। विश्वधर्म सम्मेलन में संभवतः उसी सत्ता ने गेरुआ वस्त्रधारी एक रात्रि पहले रेलवे वैगन में ठिठुरकर सो रहे अकिंचन से ऐसी सारगर्भित वक्तृता करा ली कि विश्वभर में उनका डंका बज गया।
आत्मबोध कराना कठिन नहीं है कि वे क्या हैं?
आत्मबोध कराया एवं शिष्य ने अपना आपा, अस्तित्व ही उन्हें समर्पित कर दिया। समर्पण में स्वयं की इच्छा कैसी? जो मार्गदर्शक की इच्छा वही अपनी इच्छा। तर्क की वहाँ कोई गुँजाइश ही नहीं। कठपुतली तो बाजीगर के इशारे पर नाचती है।
आत्मबोध अंतःस्फुरणा, गुरुदर्शन, आत्म साक्षात्कार कुछ भी नाम जा सकता है, पर उस दिन प्रकट वह प्रकाश ही उनका मास्टर, मार्गदर्शक उनकी परोक्षसत्ता बन गया। इसकी भौतिक रूप से व्याख्या की जाय तो इसे दुर्गम हिमालय से प्रकटी उस चिनगारी से भी जोड़ा जा सकता है जहाँ ऋषिसत्ता सूक्ष्म शरीर में निवास करती हैं। हिमालय से विराट व्यक्तित्व वाले पूज्य गुरुदेव ने अपने आध्यात्मिक पिता के रूप में स्वयं हिमालय के उस क्षेत्र की जो उत्तराखंड क्षेत्र में स्थित है, हिमालय का हृदय कहा जाता है। यह परोक्ष चेतना पन्द्रहवें वर्ष पूरा होने के तीन माह बाद ही बसंत पर्व के दिन युवा श्रीराम के पूजा गृह में प्रकट हुई, स्थूल शरीर एक ऐसे कृशकाय सिद्धपुरुष के रूप में है जो अनादिकाल से एकाकी, मग्न, मौन, निराहार रहकर अपनी तप ऊर्जा द्वारा अपने को अधिकाधिक प्रचण्ड प्रखर बनाते चले आ रहे हैं। एक दिगंबर देहधारी हिमराशि के मध्य खड़ी दुर्बल काया-यह तो स्थूल रूप में उपलब्ध उनका एक मात्र चित्र है जो अपनी पहली हिमालय यात्रा के समय उनके आग्रह पर स्वयं पूज्य गुरुदेव को प्रकट रूप में उनने प्रदान किया यही चित्र गायत्री परिवार में दृश्य प्रतीक के रूप में उपलब्ध है।
आत्मबोध अंतःस्फुरणा, गुरुदर्शन, आत्म साक्षात्कार कुछ भी नाम जा सकता है, पर उस दिन प्रकट वह प्रकाश ही उनका मास्टर, मार्गदर्शक उनकी परोक्ष सत्ता बन गया। इसकी भौतिक रूप से व्याख्या की जाय तो इसे दुर्गम हिमालय से प्रकटी उस चिनगारी से भी जोड़ा जा सकता है जहाँ ऋषिसत्तायें सूक्ष्म शरीर में निवास करती हैं। हिमालय से विराट व्यक्तित्व वाले पूज्य गुरुदेव ने अपने आध्यात्मिक पिता के रूप में स्वयं हिमालय के उस क्षेत्र की जो उत्तराखंड क्षेत्र में स्थित है, हिमालय का हृदय कहा जाता है। यह परोक्ष चेतना पन्द्रहवें वर्ष पूरा होने के तीन माह बाद ही बसंत पर्व के दिन युवा श्रीराम के पूजा गृह में प्रकट हुई, स्थूल शरीर एक ऐसे कृशकाय सिद्धपुरुष के रूप में है जो अनादिकाल से एकाकी, मग्न, मौन, निराहार रहकर अपनी तप ऊर्जा द्वारा अपने को अधिकाधिक प्रचण्ड प्रखर बनाते चले आ रहे हैं। एक दिगंबर देहधारी हिमराशि के मध्य खड़ी दुर्बल काया-यह तो स्थूल रूप में उपलब्ध उनका एक मात्र चित्र है जो अपनी पहली हिमालय यात्रा के समय उनके आग्रह पर स्वयं पूज्य गुरुदेव को प्रकट रूप में उनने प्रदान किया यही चित्र गायत्री परिवार में दृश्य प्रतीक के रूप में उपलब्ध है।
आत्मबोध कहा जाय या परोक्ष सत्ता द्वारा शक्तिपात स्तर का अनुग्रह., जो भी कुछ यह था, उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-March
आत्मबोध होते ही इस स्थिति में पहुँच जाते हैं कि महाकाल का आमंत्रण सुन सकें और उस हुँकार की दिशा में शब्दवेधी बाण की तरह सनसनाते हुए बढ़ चलें। ऐसा भूतकाल में भी होता रहा है और आज की आवश्यकता भी उन्हें कहीं-न-कहीं से पकड़कर निर्णायक मोर्चे पर खड़ा होने के लिए बाधित करके रहेगी।