अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-December
अब किशोरावस्था आने से पूर्व ही मस्तिष्क गृहस्थ धर्म का उपभोग करने के लिए प्रशिक्षित हो जाता है। वासना भड़काने वाली फिल्में, पुस्तकें तथा तस्वीरें बे-हिसाब बढ़ रही हैं। कानाफूसी में प्रायः वहीं चर्चाएँ रहती हैं। जो देखा सुना जाता है, उसमें भावुकता भड़काने वाली प्रेरणाओं की भरमार होती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-August
हैरी ने एक रंगीन फिल्म में काम किया था जो देश-विदेश में चावपूर्वक देखी गई। घटना-क्रम के अनुसार मुख मुद्रा का ठीक उसी के अनुरूप बना लेना इस अभिनय का विशेष चमत्कार था जिसे देख कर दर्शक ताली बजाये बिना रह नहीं सकते थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-September
ऐसों से ही घनिष्ठता साधने के लिए प्रयत्नशील रहता है। कामुक साहित्य पढ़ने, वैसी ही फिल्में देखने और उन्हीं प्रसंगों की चर्चा कहने सुनने में उसे रस आता है। किस इन्द्रिय के द्वारा, किस प्रकार रसास्वादन किया जा सकता है, इसी की कल्पनाएँ उठती रहती है। चिन्तन और समय इन्हीं बातों का ताना-बुना बुनने में बीतता है
हशीश, कोकीन, चरस, गाँजा, हिरोइन जैसी घातक वस्तुओं की एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे देश में तस्करी का ऐसा जाल बिछा हुआ है जो तोड़े नहीं टूटता। फिल्मों ने ऐसे अवसर पर एक उत्प्रेरक(केटेलिस्ट) की भूमिका निभाने का दायित्व उठाया है। वे अपराधों, कामुकता, व्यभिचार, उच्छृंखलता एवं आत्मघाती उन्मादी मनोवृत्ति को जन्म देने वाली प्रवृत्तियों को ही प्रश्रय देती नजर आती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-November
न्यूयार्क विश्व मेले के अवसर पर धरती के नीचे 800 पौण्ड भारी एक टाइम कैप्सूल दफनाया गया है, इसमें इस समय मानवी सभ्यता एवं प्रगति को प्रायः सभी जानकारियाँ सूत्र रूप में संग्रह की गई है। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका जैसी पुस्तकें तथा इस युग की परिस्थिति का परिचय देने वाले चित्र माइक्रो फिल्म बना कर संक्षिप्त किये गये है। कैप्सूल को 50 फुट गहरे गड्ढे में ऐसी व्यवस्था बना कर गाढ़ा गया है जिससे वह आगामी 5 हजार वर्ष तक सुरक्षित रह सके। यह मंजूषा 711 फीट लम्बी नली के रूप में है
चित्रों और पुस्तकों में कुत्सित विषाक्तता की मात्रा दिन-दिन बढ़ती जा रही है, इस सफलता का कारण प्रकाशकों की वह धन लिप्सा है जिसे भोली जनता की पशु प्रवृत्तियाँ भड़का कर सरलता पूर्वक पूरी कर लेते हैं। फिल्मों के क्षेत्र में प्रगति इसी आधार पर हो रही है और भारतीय अभिनय पाश्चात्य नग्न निर्लज्जता को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने के लिए आतुर हो रहा है
कारण और रहस्य बताते हुए उसने इतना ही कहा- यह अत्यधिक एकाग्रता और इच्छा-शक्ति के प्रयोग का प्रतिफल है। उसके करतबों की फिल्म ली गई है, ताकि वैज्ञानिक उसका अध्ययन कर सके। वैज्ञानिकों ने इसे मस्तिष्कीय विद्युत की गुरुत्वाअकर्षण तथा इलेक्ट्रो मैगनेटिक शक्ति की विद्यमानता निरूपित किया है। इस संदर्भ में अधिक विचार करने वाले अन्वेषकों का कहना है कि इस प्रकार की विद्युत शक्ति मनुष्य के पास मौजूद है और वह नेल्सा की तरह देर तक अभ्यास करने के बाद उसे विकसित करने में सफलता प्राप्त कर सकता है
विवाह के बाद दोनों ने और भी अधिक उत्साह के साथ अपना शौक बढ़ाया। अंग्रेज के प्रसिद्ध फिल्म किंग सालोमनड् माइन्स में जिस चालाक लोमड़ी ने तरह-तरह के करतब दिखाये थे वह वस्तुतः डेनिस दम्पत्ति की ही पालतू थी
बच्चा पैदा होने पर उसकी आवाज जितनी देर में उसकी माँ के कानों में पहुँचती है उतनी देर में उस जैसे बीस की जीवन सत्ताओं का अन्त कर देने वाली अणुशक्ति आज के कारखानों में उत्पन्न हो जाती है। इसका विस्तृत विवरण ब्रिटिश कास्टिंग कारपोरेशन द्वारा बनाई गई वृत फिल्म दिडैथ गेय में दिखाया गया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-April
साधारणतया दैनिक जीवन में भी अधिकांश अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें यथार्थ नहीं कहा जा सकता। सिनेमा के पर्दे पर जो दीखता है सही कहाँ है? एक के बाद एक आने वाली अलग-अलग तस्वीरें इतनी तेजी से घूमती हैं कि उस परिवर्तन को आंखें ठीक तरह समझ नहीं पातीं और ऐसा भ्रम होता है है मानो फिल्म में पात्र चल फिर रहे है। लाउडस्पीकर से शब्द अलग चलते हैं पर दर्शकों को ऐसा ही आभास होता रहता है मानो अभिनेताओं के मुख से ही वार्तालाप एवं संगीत निकल रहा है। प्रकाश की विरलता और सघनता भर पर्दे पर उतरती है पर उसी से पात्रों एवं दृश्यों का स्वरूप बन जाता है और मस्तिष्क ऐसा अनुभव करता है मानो यथार्थ ही वह घटना क्रम घटित हो रहा है
मोटी दृष्टि से यह माया सत्य है। यदि सत्य न होती तो फिल्म उद्योग, सिनेमा हाल, उसमें युक्त यन्त्र, दर्शकों की भीड़ उनकी अनुभूति आदि का क्या महत्त्व रह जाता? थोड़ी विवेचनात्मक गहराई से देखा जाय तो यह यन्त्रों की कुशलता और वस्तुस्थिति को समझ न सकने को नेत्र असमर्थता के आधार पर इस फिल्म दर्शन को मायाचार भी कह सकते हैं। दोनों ही तथ्य अपने-अपने ढंग से सही हैं। संसार चूँकि हमारे सामने खड़ा है, उसके घटना क्रम को प्रत्यक्ष देखते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
जन जागरण की-व्यापक विकृतियों के उन्मूलन की आवश्यकता पूरी कर सकने वाली अत्यन्त प्रेरक फिल्म बनाई जा सकती है और उनके निर्माताओं को यह विश्वास दिलाया जा कसता है कि आदर्शवादी उद्देश्य लेकर इस क्षेत्र में प्रवेश करना घाटे का नहीं वरन् लाभ के साथ-साथ यश और पुण्य कमाने का यह तीन गुना लाभदायक कार्य है। पूँजी को उपयोगी ओर लाभदायक उद्योगों की प्यास है पर उसे दिशा दर्शन नहीं मिलता। प्रभावशाली अर्थ क्षेत्र से परिचित वानप्रस्थ उपयुक्त व्यक्तियों को लिमिटेड या प्राइवेट स्तर के ऐसे अर्थ संस्थान खड़े करने के लिए बना सकते हैं जो फिल्म उद्योग क्षेत्र में आदर्शवादी सिद्धान्तों के साथ प्रवेश करके युग की महान सेवा करने के लिए अग्रसर हो
जन-मानस को बौद्धिक और भावनात्मक दृष्टि से झकझोरने वाले आधारों में साहित्य के बाद दूसरा नम्बर गायन का आता है लोकगीत छोटे-छोटे देहातों में यही याद रखे जाते हैं और मस्ती के साथ गाये जाते हैं। कविताओं को गुनगुनाते और उनके रस प्रवाह में बहते अगणित भावुक हृदय सर्वत्र देखे जाते हैं फिल्म गीत बच्चे-बच्चे की जबान पर चढ़े हुए हैं। गायन-गोष्ठियां जगह-जगह रस बरसाती रहती हैं। प्रायः हर आयोजन में कविता पाठ से लेकर गीत वाद्यों का समुचित स्थान रहता है
पूँजी को उपयोगी ओर लाभदायक उद्योगों की प्यास है पर उसे दिशा दर्शन नहीं मिलता। प्रभावशाली अर्थ क्षेत्र से परिचित वानप्रस्थ उपयुक्त व्यक्तियों को लिमिटेड या प्राइवेट स्तर के ऐसे अर्थ संस्थान खड़े करने के लिए बना सकते हैं जो फिल्म उद्योग क्षेत्र में आदर्शवादी सिद्धान्तों के साथ प्रवेश करके युग की महान सेवा करने के लिए अग्रसर हो। ऐसे अनेक कार्य हो सकते हैं जो लोकमानस के परिष्कार में अनुपम योगदान कर सकते हैं। वानप्रस्थों का जन संपर्क इस प्रकार के अनेक आधार भी धर्म प्रचार के साथ-साथ ही प्रस्तुत करता रह सकता है
प्रचार की दृष्टि से सिनेमा क्षेत्र की तुलना और कोई माध्यम नहीं कर सकता। यदि प्रेरक फिल्में बनने लगे तो वे अवश्य ही अच्छी तरह चलेंगी ओर निहित स्वार्थों द्वारा फैलाया हुआ यह क्रम सर्वथा निराधार सिद्ध होगा कि “भारतीय जनता कुरुचिपूर्ण चित्र ही देखती है। दर्शकों में ओछे और फूहड़ लोग ही अधिक है। ” इन्हीं दिनों कुछ अच्छे आदर्शवादी फिल्म बने है और वे इतनी सफलता पूर्वक चले है कि गन्दे फिल्म बने है और वे इतनी सफलता पूर्वक चले है कि गन्दे फिल्म बनाने वाले लोगों की बोलती बन्द हो गई है वे सिनेमा दर्शकों की कुरुचिपूर्ण और स्तर विहीन सिद्ध करने वाले अपने पुराने प्रलाप को वापिस लेने के लिए विवश हुए है
दर्शकों में ओछे और फूहड़ लोग ही अधिक है। ” इन्हीं दिनों कुछ अच्छे आदर्शवादी फिल्म बने है और वे इतनी सफलता पूर्वक चले है कि गन्दे फिल्म बने है और वे इतनी सफलता पूर्वक चले है कि गन्दे फिल्म बनाने वाले लोगों की बोलती बन्द हो गई है वे सिनेमा दर्शकों की कुरुचिपूर्ण और स्तर विहीन सिद्ध करने वाले अपने पुराने प्रलाप को वापिस लेने के लिए विवश हुए है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-March
प्रस्तुत पंक्तियाँ किसी तिलिस्मी उपन्यास अथवा जासूसी फिल्म का अंश नहीं, वरन् एक सच्ची घटना है बात सन् 1651 की है और सम्बद्ध व्यक्ति इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय थे। घटना के अनेकों वर्ष बाद जब पुरातत्ववेत्ताओं ने वारविकशायर स्थित उस मकान का गहन व सूक्ष्म परीक्षण किया, तो चार्ल्स के अचानक गायब होने का रहस्य खुल गया। वस्तुतः उस मकान में एक ऐसा तहखाना था, जिसे ढूँढ़ निकालना असंभव नहीं तो टेढ़ी खीर अवश्य था
यदि इसे निरन्तर पोषण देकर विकसित किया जा सके, तो कोई कारण नहीं है कि मानव महामानव न बन सके, पर विडम्बना यह है कि मानव देवत्व पर असुरत्व हावी हो जाने के कारण देवत्व के अंकुर विकसित वृक्ष बनने के पूर्व ही मुरझा जाते हैं। उन्होंने “ए क्लास वर्क आरेंज” एवं “जाँज” जैसी भयानक व डरावनी फिल्मों के निर्माता श्री क्यूब्रिक के इस कथन पर आपत्ति प्रकट की है कि मनुष्य मूलतः पाश्विक, हिंस्र व सनकी है। श्री एकलिस का कहना है कि वस्तुतः मनुष्य ऐसा है नहीं। यह तो उसके विकास काल के अवशेषी संस्कार है, जिन्हें प्रयासपूर्वक हटा कर वह अपने प्रखर और वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर सकता है
“अंतर के निर्मल प्यार हो तुम, भगवान मेरा संसार हो तुम” वंदनीया माताजी के स्वर में गायी गई इन पंक्तियों के साथ भाव भरे वातावरण में वंदनीया माताजी का उद्बोधन समाप्त हुआ। अखण्ड दीपक के दर्शन व नमन-वन्दन के पश्चात् संध्याकाल में सभी ने नये बने प्रज्ञा रथों के 100 इंच के पर्दों पर नयी बनी तीन वीडियो फिल्में देखीं। इस वर्ष का बसंत नये संकल्प, नये उल्लास के साथ इस प्रकार सम्पन्न हुआ
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-November
यदि मनुष्य किसी प्रकार ऐसे ग्रह पर पहुँच जाय, जो पृथ्वी से सैकड़ों प्रकाश वर्ष दूर तथा वहाँ से किसी शक्तिशाली टेलिस्कोप के माध्यम से पृथ्वी को देखे, तो हजारों वर्ष पूर्व घटित हुए घटनाक्रम उसे फिल्म की भाँति उसी प्रकार दिखाई देंगे, मानों अभी-अभी यह सब उसके सामने घटित हो रहे हों। ऐसी स्थिति में महाभारत व राम-रावण युद्ध एवं ऐतिहासिक काल के ऐसे ही ढेरों घटनाक्रम, देखे जा सकते हैं। अभिप्राय यह है धरती वासियों के लिए जो वर्तमान काल है, वह दूरस्थ ग्रह के लिए भविष्य एवं धरित्री के लिए जो भूतकाल था वह उनके लिए वर्तमान
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-January
उन्होंने “माइ लाइफ इटसेल्फ इज ए मिरेकल” नाम से अपनी एक आत्मकथा लिखी है, जिसमें ढेर सारी ऐसी घटनाओं को वर्णन किया है, जिन्हें आश्चर्यजनक कहा जा सके। एक घटना का उल्लेख करते हुए वह लिखती है कि एक दिन दोपहर में आराम करने की नीयत से जैसे ही वह बिस्तर में लेटीं और आँखें बन्द कीं, वैसे ही फिल्म की भाँति एक दृश्य मानस पटल में घूम गया। दृश्य ‘हैराल्ड ऑफ फ्री इण्टरप्राइज’ में फँसे एक पानी वाले जहाज का था, जिसके सभी यात्री बेचैन दिखाई पड़ रहे थे और मौत से बच निकलने का प्राणप्रण से प्रयत्न कर रहे थे। सहायता हेतु भगवान से करुण प्रार्थना कर रहे थे
एनी ने हत्या की गई लड़की के फोटो और खून से लथपथ वस्त्रों को ध्यानपूर्वक अवलोकन किया। बस फिर क्या था, सारा घटनाक्रम फिल्म की तरह उसके नेत्रों के आगे घूम गया। उसके दिव्य नेत्रों ने देखा कि लड़की का हत्यारा उसका ही अन्तरंग मित्र कार्ल हैन्स स्काफ नर है। इसी सूचना के आधार पर वह पकड़ा गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
इस संगीत के रहस्य का पता लगाने का प्रयास तब से अब तक अनेकों बार किया जा चुका है, पर हर बार विफलता ही हाथ लगी है। एक बार इस पूरे क्षेत्र का कई दिनों तक आडियो रिकार्डिंग व वीडियो कैमरा लगा कर फिल्माँकन भी किया गया, किन्तु फिर भी रहस्य पर से पर्दा न हट सका
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-December
आखिर आए न। फिल्मोर उसके बराबर आ गए और हँसते हुए उसका हाथ पकड़कर गिरजाघर की सीढ़ियां उसके साथ ही उतरने लगे। “मनुष्य कैसा भी हो, कोई भी हो अपने पिता के सामने आए बिना रह नहीं सकता। ”
‘हे भगवान!’ फिल्मोर के स्वर में दृढ़ता और विश्वास था ‘और भगवान ने मेरी रक्षा की। ’ अल्फ्रेड के नेत्र भर गए” सचमुच भगवान ने मेरी रक्षा की मि. फिल्मोर। मैं इतना घायल हो गया था कि छुरा मेरे हाथ में होने पर भी मैं कुछ न कर पाता। मैं अपने सहकारी द्वारा जब ऊपर लाया गया, तब मेरा शरीर खून से लथपथ था
अतः जिनने दृश्य बनने का कौतुक रचा, समझना चाहिए कि उनने स्वयं को खो दिया, अपनी सत्ता खो दी, और आत्मा खो दी। फिल्मों में काम करने वाला व्यक्ति कोई और होता है, पर अभिनय किसी और का करता है। रंगमंच के रंगकर्मियों का भी यही हाल है। यह सब अपनी स्वतंत्र सत्ता को खो देते हैं, आत्मा खो देते हैं और दृश्य बन जाते हैं
मि. फिल्मोर! एक बात अब तक मेरी समझ में नहीं आई। अल्फ्रेड ने बीच में दूसरी बात कही मुझे ठीक-ठीक स्मरण है पहले ही झटके में चाकू मेरे हाथ से छूटकर गिर गया था। और वह मुझे बीसों झटके देता रहा
आज तो विश्राम का दिन हैं। फिल्मोर ने आमंत्रण की अपेक्षा नहीं की। जो व्यक्ति केवल बीस दिन पहले धर्म और आस्तिकता की बात सुनकर ठठाकर हँस पड़ता था, जिसे सुरा......जाने दीजिए किसी के दोषों का वर्णन भी दोष ही है। इतना जानना पर्याप्त होना चाहिए कि अल्फ्रेड खाओ पियो और मौज उड़ाओ के नियम को मानकर चलने वाला था
” “प्रार्थना जीवन में दिव्यता के अवतरण का विज्ञान है। ” इस महान संदेश के प्रचार के लिए चार्ल्स फिल्मोर ने यूनिटी स्कूल ऑफ क्रिश्चिएनिटी की स्थापना की। स्वयं के जीवन को बदले डालने वाले अल्फ्रेड उनके सहकारी हुए
फ्राँस के प्रसिद्ध चित्रकार और फिल्म अभिनेता तुलूज लात्रे यों तो अपनी प्रतिभा के कारण ही प्रख्यात हुए थे, पर उनके बौनेपन ने इस प्रसिद्धि में और भी चार चाँद लगा दिये थे। इसी प्रकार इंग्लैण्ड के एक बौने ने रोते हुए व्यक्ति को भी हँसा देने की कला में भारी ख्यात और प्रवीणता प्राप्त की थी। जेफरी हडसन नामक इस बौने ने इसी आधार पर अपनी अच्छी आजीविका भी उपार्जित करने में सफलता पायी थी
फिल्मोर से उसका घनिष्ठ परिचय है, यह तो नहीं कहा जा सकता, किन्तु सभी से आत्मीय संबंध रखने वाले इस विचित्र व्यक्ति से कई बार पहले भी वह मिल चुका है। उसे अभी तक याद हैं एक बार तूफानी रात्रि में फिल्मोर उसकी झोपड़ी में अतिथि रह चुके हैं
” अल्फ्रेड पूरा पीछे घूम गया और उसने अपने हाथ आगे बढ़ा दिया। फिल्मोर से उसका घनिष्ठ परिचय है, यह तो नहीं कहा जा सकता, किन्तु सभी से आत्मीय संबंध रखने वाले इस विचित्र व्यक्ति से कई बार पहले भी वह मिल चुका है। उसे अभी तक याद हैं एक बार तूफानी रात्रि में फिल्मोर उसकी झोपड़ी में अतिथि रह चुके हैं
मैं भूलता नहीं हूँ तो केवल बीस दिन पूर्व हम यहाँ से पर्याप्त, दक्षिण समुद्र के वक्ष में मिलें थे। ” फिल्मोर को इसकी चिंता नहीं जान पड़ती थी कि उनके जैसे मूल्यवान उज्ज्वल वस्त्रधारी को एक मजदूर का हाथ पकड़कर चलते देख पास से जाने वाले वृद्ध और वृद्धाएँ किस प्रकार देखते हैं, किस प्रकार मुख सिकोड़ते हैं और परस्पर फुसफुसा कर क्या कहते हैं?
“फिल्मोर के चेहरे पर एक मुस्कान थिरक उठी” बस इन भावों को उसी तरह उमगना चाहिए, जैसे समुद्र तल में उमगें थे। “आज गज और ग्राह का उपाख्यान पुनः चरितार्थ हुआ था। ” “प्रार्थना जीवन में दिव्यता के अवतरण का विज्ञान है
‘यह तुम्हारे सहायक की तत्परता होगी,’ फिल्मोर ने कहा
“तुम प्रार्थना करने आये थे? “सभ्यता के नाते तो कहना चाहिए था मि. बुडफेयर, किन्तु चार्ल्स फिल्मोर में तो सहज आत्मीयता है अपने अल्प परिचितों के भी प्रति उसके कारण वे औपचारिकता का निर्वाह आवश्यक नहीं मानते
पर वे कुप्रचलनों को सहज ही पकड़ते हैं। दूषित साहित्य का अवाँछनीय एवं फिल्मी अभिनयों का प्रभाव जितनी तेजी से पशु प्रवृत्तियों को भड़काता है, उतनी तीव्रता सत्साहित्य की नहीं होती। गीता पढ़कर उतने आत्म ज्ञानी नहीं बने, जितने की अश्लील दृश्य, अभिनय से प्रभावित होकर कामुक अनाचार अपनाने में प्रवृत्त हुए हैं। एक संत सज्जन कम ही अपने जैसा बना पाते हैं
“तुमने अभी बताया कि तुमने मूर्छित होते-होते कहा था। ‘हे भगवान!’ फिल्मोर के स्वर में दृढ़ता और विश्वास था ‘और भगवान ने मेरी रक्षा की। ’ अल्फ्रेड के नेत्र भर गए” सचमुच भगवान ने मेरी रक्षा की मि. फिल्मोर। मैं इतना घायल हो गया था कि छुरा मेरे हाथ में होने पर भी मैं कुछ न कर पाता
दोनों के कदम एक ओर मुड़ चले। फिल्मोर के मन में उसके समूचे को बदल डालने वाले रहस्य जानने की इच्छा बलवती हो रही थी। थोड़ी देर बाद उन्होंने छोटी कोठरी में प्रवेश किया। अल्फ्रेड ने चटाई बिछाई और दोनों एक दूसरे के सामने बैठ गये और वह रहस्य का आवरण खोलने लगा, “नित्य की भाँति मैं उस दिन भी समुद्र तल में उतरा
नीचे पहुँचकर मैं खड़ा हो गया और झुककर कुछ सीपों को अपने झोले में झट से डाल लिया। फिल्मोर उत्सुकता से उसकी बात सुन रहे थे। मैं बहुत प्रसन्न था, वहाँ पर्याप्त सीप थीं। आज का गोता मुझे अच्छी रकम दे देगा
“भगवान तो सुनते हैं और रक्षा भी करते हैं किन्तु-” फिल्मोर रुके दो क्षण, “किन्तु हम मनुष्य इतने भाग्यहीन हैं कि प्राण संकट में होने पर भी वे दयामय स्मरण नहीं आते। उस समय भी हम अपने उस कृपालु पिता से प्रार्थना नहीं कर पाते। ”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-July
यह गायत्री हिन्दुस्तान
मात्र की नहीं सारे विश्व की है। नये विश्व की माइक्रोफिल्म इसमें छिपी
पड़ी है। गायत्री मंत्र विश्व मंत्र है। व्यक्ति का अंतस् व बहिरंग बदलने
वाले बीज इस मंत्र के अंदर छिपे पड़े हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-September
इसी प्रकार उस देश की मेडीकल एसोसियेशन ने अपने 140,000 सदस्यों को नवीन तथ्य शोध निष्कर्षों से अवगत करते रहने के लिए 67 क्षेत्रीय केन्द्र संस्थानों की स्थापना की है। कुछ विद्यालयों ने अपने पाठ्यक्रमों की फिल्में बना ली है और वे शिक्षार्थियों की बस्तियों में ले जाकर उन्हें दिखाते है ताकि छात्रों को विद्यालयों तक आने-जाने के समय और पैसा खर्च न करना पड़े
स्काईलैब में 4000 पौण्ड भारी फिल्म वाल्ट लगी थी। 2600 पौण्ड के छः टाइटेनियम के आक्सीजन टैंक जुड़े थे। जिन्हें पृथ्वी की कक्षा में आते ही टूट कर अलग होना था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-April
‘यह बुदबुदाना जारी ही था कि श्रीमती मैसी के हाथ से दूध का बर्तन छूट गया और वह अर्धमूर्छित होकर टेबल पर ही लुढ़क-सी गयीं। वाल्टर को कुछ भी समझ में न आया कि क्या करें? उपलब्ध चिकित्सा उपचार के बाद जब उसकी पत्नी होश में आयी तो उसने बताया कि वह ठीक यही दृश्य किसी फिल्म की तरह चाय की प्याली में देख रही थी। ’
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-January
सैकड़ों मील दूर टेलीविजन स्टेशन पर कोई फिल्म का दृश्य दर्शाया जाता है और वह दूर पड़े टी.वी. सैट पर ज्यों का त्यों देखा जा सकता है। रेडियो से हजारों मील दूर स्थित रेडियो स्टेशन पर प्रसारित समाचारों, सूचनाओं और विवरणों को शब्दशः सुना जा सकता है। आधुनिक विज्ञान ने जड़ साधनों द्वारा भी हजारों मील दूर संपर्क सूत्र तत्काल स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली है फिर चेतना तो उससे हजार गुना समर्थ और लाख गुना शक्तिशाली है
’ अमेरिकी औरतों का उदाहरण देते हुए डा. ब्रियान ने कहा है कि- मर्दों की अपेक्षा औरतों की लम्बी आयु का रहस्य यह है कि वे खूब रोती है। वे ऐसी फिल्में देखने की शौकीन है कि जिनमें बार-बार रोना आता है। इस तरह आँसू लाने से जीवन लम्बा हो जाता है। क्योंकि रोने के कारण व्यक्ति की दबी हुई भावनाओं को बड़ी राहत मिलती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-October
अमेरिका की प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री मर्लिनमनरो की आत्महत्या अभी भी गुत्थी बनी हुई है। उसके पास रुपये, पैसों का भी अभाव नहीं था। किसी बड़े उद्योगपति से वह अधिक सम्पन्न थी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-July
हालीवुड की अभिनेत्री ‘किमनोवाक’ ‘द अमोरम एडवंचर्स माल फ्लेडंर्स’ फिल्म की शूटिंग के लिए इंग्लैण्ड गयी थी। ‘आउट डोर’ सूटिंग के लिए ‘केंटरावरी’ में स्थित ‘चिंलहम कैसल’ नाम प्राचीन किले के आस-पास का स्थान चुना गया। इस किले क अधिकाँश भाग बारहवीं सदी का बना है तथा शेष 300 वर्ष पूर्व बनाया गया है
शूटिंग के समाप्ति दिन में प्रत्येक रात्रि इन घटनाओं के क्रम चलता रहा। फिल्म की शूटिंग की समाप्ति पर सारी घटनाओं का उल्लेख ‘किम’ ने अपने साथी अभिनेता ‘रिचर्ड जानसन’ से किया
अनेकों व्यक्तियों ने बेलचे पर उभरे चित्र का फोटोग्राफ लेने का प्रयत्न किया। किन्तु यह देखकर निराशा हुई कि फिल्म पर कोई चित्र नहीं आया साथ ही बेलचे पर उभरा चित्र भी लुप्त हो गया। इस घटना का विस्तृत विवरण उत्तरी इंग्लैंड के (साउथ शोल्डस) से निकलने वाले पत्र “सण्डे- मिरर” में प्रकाशित हुआ
उन्होंने कहा कि इस प्रकार की उष्णता एवं कोमलता से बना ‘बिंब’ मानस पटल पर ही प्रतिबिंबित होते हैं। ‘कैमरे’ का फिल्म इतना सम्वेदन शील नहीं होता कि उस पर इस प्रकार के बिंब आ सकें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-December
बच्चे को इन दिनों वैज्ञानिकों के विशेष दल द्वारा अध्ययन के लिए लिआओनिग प्रांत की राजधानी शिनयांग में लाया गया है। उसकी एक फिल्म भी बनाई गई है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-February
चार्ल्स फिल्मोर एक सात्विक प्रकृति के व्यक्ति थे। वे स्वयं ध्यान साधना का अभ्यास करते और लोगों से भी कराते थे। एक रात उन्होंने स्वप्न देखा कि एक अपरिचित व्यक्ति उन्हें अपने पीछे - पीछे आने का संकेत कर रहा है
स्पष्ट ही इस स्वप्न का अर्थ उन्होंने लगाया कि वे ध्यान साधना का प्रचार करे, संयोग की बात कि एक दिन कुछ लोगों ने उनके पास आ कर इस कार्य को संगठन बद्ध प्रचार करने का प्रस्ताव रखा। इसके बाद चार्ल्स फिल्मोर कसाँस शहर चले गये। वहाँ के लोगों ने जिस स्थान पर कार्यालय खोलने की बात कही वह स्थान यो तो चार्ल्स के लिए अपरिचित था परन्तु उन्होंने पाया कि स्वप्न में जिस स्थान को उन्होंने देखा था यह वही स्थान है उसी स्थान पर सोसायटी ऑफ सायलेण्ट यूनिटि नामक संस्था की स्थापना की। संस्था की ओर से जो समाचार पत्र निकाला गया उसका प्रथम अक्षर ‘यू’ ही था और अखबार का नाम ‘यूनिटि’ रखा गया
उसी प्रकार विराट् चेतना भी व्यक्ति चेतना का मार्ग दर्शन करती है। अमेरिका के चार्ल्स फिल्मोर को प्राप्त स्वप्न संकेत इसी सिद्धाँत को प्रमाणित करता है
हम कल जो भी कुछ होंगे उसकी पूर्व भूमिका इसी को कहते है कि “कास्मोबायोलाजी”। मेरे अंतरंग की कास्मोलॉजी उन दृश्यों को फिल्म की तरह मानस पटल पर उतार देती है और मैं भविष्य बता देता हूँ
आँख जैसे कैमरों का बन पाना भी अभी तक सम्भव नहीं हो सका है। फिल्में बनाते समय भी फोटो दृश्य और कैमरे की दूरी का सन्तुलन साधते हुए ‘फोकस’ मिलाना पड़ता है। ‘फोकल लेन्थ’ को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। पर पास से पास और दूर से दूर का दृश्य देखने के विभिन्न क्रम हम अपनी आँखों को आगे-पीछे हटाये बिना मजे में देखते रह सकते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-June
अमेरिका के कई अस्पतालों में लाफिंग रूप खुले हैं। जहाँ चुटकुला की किताबें, हँसी वाली फिल्मों के वीडियो एवं दूसरी हँसाने वाली सामग्री रखी जाती है। हँसने को सार्वजनिक स्तर पर प्रचारित करने के लिए मुम्बई का ‘लाफर क्लब इंटरनेशनल’ अपनी तरह का पहला क्लब है। इसके सदस्यों की संख्या हजारों में है व निरन्तर तेजी से बढ़ती जा रही हैं
वैज्ञानिकों की परिकल्पना को बाद में 80 के दशक में ‘ई. टी. ‘ नाम की एक फिल्म के द्वारा हालीवुड ने भी प्रदर्शित करने का प्रयास किया। यह फिल्म लगातार डेढ़ वर्ष तक छबिगृहों में चली व सबके कौतूहल का केन्द्र बनी
तीसरे प्रकार में ऐसी घटनाएँ जिनमें दूसरे ग्रहों से आने अथवा प्रभाव देखने की, घटनाओं का स्पष्ट स्वरूप देखने को मिलता है। वैज्ञानिकों की परिकल्पना को बाद में 80 के दशक में ‘ई. टी. ‘ नाम की एक फिल्म के द्वारा हालीवुड ने भी प्रदर्शित करने का प्रयास किया। यह फिल्म लगातार डेढ़ वर्ष तक छबिगृहों में चली व सबके कौतूहल का केन्द्र बनी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-September
यही उपचार युगनिर्माण मिशन के द्वारा सम्पन्न हो रहा है। अब पिछले दिनों इस विभाग द्वारा मल्टीमीडिया प्रोजेक्टर से दिखाई जाने वाली 5-5 मिनट की देव संस्कृत के विभिन्न पक्षों पर फिल्में बनायी गई हैं, जिन्हें बहुत बड़े स्क्रीन पर देखा जा सकता है
इसका प्रभाव भी पड़ा, न केवल अपने व्यवसायी पूज्य गुरुदेव से मिले अपितु फिल्मों के विज्ञापन का काम करने वाली संस्था मीरा आर्ट्स के डाइरेक्टर श्री बाबूभाई सथवारा ने पूज्य गुरुदेव के पास आकर फिल्म स्क्रिप्ट देने का आग्रह भी किया परमपूज्य गुरुदेव ने तब एक स्क्रिप्ट बनाई थी जिसकी कहानी एक ऐसे आदर्शवादी पति-पत्नी अथवा भाई-बहिन से प्रारम्भ होती थी, जिसके मन में समाज के वर्तमान पतन के प्रति बड़ी पीड़ा था। वे प्रव्रज्या में निकले-एक गाँव में एक लड़की का शव लोग श्मशान की ओर ले जा रहे थे। उन्हें पता चला कि यह दहेज हत्या है
इस कहानी पर आधारित गीत भी पूज्य गुरुदेव ने तैयार कराये थे, पर श्री सथवारा के साथ के व्यक्तियों को ऐसा लगा कि इसमें प्रेम का कहीं स्थान न होने से शायद फिल्म न चलें, अतएव फाठनेर्न्स ने हिम्मत नहीं की। यह अलग बात है कि इस कहानी का आधार लेकर उनकी ही मण्डली के एक मित्र ने इसी तरह की पारिवारिक फिल्म बनाई जो बहुत सफल हुई, पर तब पूज्य गुरुदेव के पास जो भी आए उन्होंने आजकल की तरह अभिव्यक्त प्यार के अभाव को व्यावसायिक बाधा माना और किसी ने इस क्षेत्र में प्रवेश का साहस नहीं किया
बीमारी का असली उपचार फिल्में है। उस ओर कदम उठाने से पूर्व फिल्में हैं। उस ओर कदम उठाने से पूर्व पहले धारावाहिकों पर ध्यान दिया गया
बीमारी का असली उपचार फिल्में है। उस ओर कदम उठाने से पूर्व फिल्में हैं। उस ओर कदम उठाने से पूर्व पहले धारावाहिकों पर ध्यान दिया गया। धारावाहिकों पर ध्यान दिया गया
मीडिया, विज्ञापनों, सीरियलों, फिल्मों के भीतर नारी को मनमाने ढंग से नचाने वाले यह भूल जाते हैं। कि भारत की शोषित, दमित स्त्री की मुक्ति का लक्ष्य बाजार में साबुन, तेल व कॉस्मेटिक सामग्री बेचने वाली स्त्री नहीं हो सकती है अन्यथा मॉडल विज्ञापन के प्रदर्शन के अलावा नारी को और किन्हीं अन्य क्षेत्रों में क्यों इतना महत्व नहीं दिया जाता। एक आँकड़े से यह बात और भी साफ हो जाती है
जिसके अनुरूप वह स्वयं को ढाल सके। अपने आदर्श की खोज की प्रेरणा वह पुस्तकों , फिल्मों , समाचार पत्रों व आस-पास के सामाजिक राजनैतिक माहौल की बीच करता है पहले ऐसे आदर्श कोई ऐतिहासिक कोई ऐतिहासिक महापुरुष, वीर, महात्मा एवं कोई सज्जन पुरुष हुआ करते थे लेकिन आज नई पीढ़ी के आदर्श एवं प्रतिमान बहुत कुछ बदल गए है। जो टूटती परम्पराओं , मान्यताओं एवं गिरते नैतिक मूल्यों का परिणाम हैं आज युवाओं के आदर्श टी0 वी0 एवं फिल्मों के सतरंगी पर्दा से अवतरित होते हैं, जो हिंसा, फैशनपरस्ती एवं फूहड़ता की प्रेरणा देते हैं। इन आदर्शों का अनुकरण करने वाली युवा पीढ़ी में मस्तिष्क में हिंसा, अश्लीलता की ऊल-जुलूल हरकतों , कुकल्पनाओं व दुर्भावनाओं के अतिरिक्त और क्या कल्पना की जा सकती हैं
अपने आदर्श की खोज की प्रेरणा वह पुस्तकों , फिल्मों , समाचार पत्रों व आस-पास के सामाजिक राजनैतिक माहौल की बीच करता है पहले ऐसे आदर्श कोई ऐतिहासिक कोई ऐतिहासिक महापुरुष, वीर, महात्मा एवं कोई सज्जन पुरुष हुआ करते थे लेकिन आज नई पीढ़ी के आदर्श एवं प्रतिमान बहुत कुछ बदल गए है। जो टूटती परम्पराओं , मान्यताओं एवं गिरते नैतिक मूल्यों का परिणाम हैं आज युवाओं के आदर्श टी0 वी0 एवं फिल्मों के सतरंगी पर्दा से अवतरित होते हैं, जो हिंसा, फैशनपरस्ती एवं फूहड़ता की प्रेरणा देते हैं। इन आदर्शों का अनुकरण करने वाली युवा पीढ़ी में मस्तिष्क में हिंसा, अश्लीलता की ऊल-जुलूल हरकतों , कुकल्पनाओं व दुर्भावनाओं के अतिरिक्त और क्या कल्पना की जा सकती हैं। आज नई पीढ़ी का अर्थ किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनुशासन में उभारती पौध नहीं हैं बल्कि स्वच्छन्दता की पराकाष्ठा और कृत्रिम आदर्शों को अन्धी दौड़ में शामिल कॉलेज या विश्वविद्यालय की भीड़ हैं आकाश से अवतरित होने वाला अपसंस्कृति का आक्रमण स्थिति को और बद से बदतर बनाता जा रहा है
देश में एक ऐसी सामाजिक अपसंस्कृति का प्रसार हुआ है, जिससे युवक-युवतियाँ आत्मघाती दुष्चक्र में उलझते जा रहे है। मध्यम व उच्चवर्गीय परिवारों की लड़कियां अपनी ऊर्जा और प्रतिभा को किसी सार्थ कार्य में लगाने के बजाय फैशन शो, सौंदर्य प्रतियोगिता व फिल्मों के प्रलोभन में अपराधी एवं बुरे लोगों के जाल में फंसती जा रही हैं यह आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि भारतीय आभूषण उतार फेंककर जिस्म की नुमाइश की होड़ में शामिल हो गयी है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली के दो डाक्टरों ने हाल ही में दक्षिण दिल्ली के सात स्कूलों के 700 छात्र-छात्राओं को जो सर्वेक्षण किया, उससे हमारी शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक नैतिकता सम्बन्धी कई नाजुक सवाल खड़े हो गए है। सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 60 प्रतिशत छात्र अश्लील गतिविधियों में लिप्त पाए, गए
उसे मारने वाला 9 वर्षीय बालक वहीं खड़ा था। पुलिस ने उससे पूछताछ की तो उसने बताया उसने टी.वी. की एक फिल्म में ऐसा दृश्य देखा था, उसी से उसे प्रेरणा मिली। जब तक महिला का ध्यान बँटता, बच्चा शायद खेलने की उत्कंठा से इस बच्चे के साथ आ गया और यह दुर्घटना घट गई
उस गाँव में यह परम्परा चल पड़ती है जो वे अगले गाँव में जाकर अशिक्षा, उससे आगे अन्ध-विश्वास, बेरोजगारी आदि दूर करते चले जाते हैं। इस कहानी पर आधारित गीत भी पूज्य गुरुदेव ने तैयार कराये थे, पर श्री सथवारा के साथ के व्यक्तियों को ऐसा लगा कि इसमें प्रेम का कहीं स्थान न होने से शायद फिल्म न चलें, अतएव फाठनेर्न्स ने हिम्मत नहीं की। यह अलग बात है कि इस कहानी का आधार लेकर उनकी ही मण्डली के एक मित्र ने इसी तरह की पारिवारिक फिल्म बनाई जो बहुत सफल हुई, पर तब पूज्य गुरुदेव के पास जो भी आए उन्होंने आजकल की तरह अभिव्यक्त प्यार के अभाव को व्यावसायिक बाधा माना और किसी ने इस क्षेत्र में प्रवेश का साहस नहीं किया
कुछ महीने पूर्व दिल्ली में एक आठ वर्ष के बालक ने 6 वर्षीया बालिका के साथ दुराचार किया। पूछने पर उसने भी फिल्म देखकर यह प्रेरणा मिलने की बात स्वीकार कीं। लड़कियों को आवारा लड़कों के साथ भागने, जीवन गँवाने, परिवारों में वीभत्स घटनाएँ की बात तो अब आम हो गई है। बिनोवा के शब्दों में - “फ्री और कम्पलसरी एजुकेशन के रूप में नई पीढ़ी में यह बीमारी बुरी तरह फैलती जा रही है
1991 से लेकर 1996 तक यह क्रमशः 2000,1550,1270ए1000ए 2700तथा 2072 संख्या में रिकार्ड किए गए। इस वर्ष ई. एम.डी. की सारी उटिंग में निर्माण, फिल्माँकन ओर एडीटिंग में लगी होने के करण यद्यपि उपलब्धता नहीं हो पाई, तो भी जो बचे थे वह 421 वीडियो कैसेट्स भी रिकार्ड हुए। यह जहाँ भी सुने और देखे जाते हैं वहां 0161 एक नये सतयुगी वातावरण का विकास होता है। मिलने वाली प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट पता चलता है रोग की तुलना में उपचार हेतु दी गई गोली बहुत छोटी होती है, पर उससे रोग दूर होने का सिद्धांत आकटच है
एक कठिनाई अभी प्रोफेशनल अनुभव की कमी आ रही है। यदि यह कार्य वर्तमान फिल्म इन्डस्ट्री को दिया जाता है, जो आर्थिक रूप से पिट जाने की तो आशंका रहेगी ही, सबसे बड़ा डर इस बात का है कि कहीं अपने मिशनरी आदर्शों, सिद्धांतों की खिचड़ी न बन जाए। इसलिए अपने ही मिशन के स्क्रिप्ट लिखने वालों, गीतकारों, संगीतज्ञों ओर अभिनय में प्रवीण उन लोगों को भी आमंत्रित किया जा रहा है जो विशुद्ध सेवाभावना से अपना योगदान दे सकें। शूटिंग, एडीटिंग, डबिंग आदि सभी उच्च तकनीक की प्रयोगशाला शान्तिकुँज में ही विकसित की गई है
मदर इंडिया, दोस्ती, गान्धी मेकिंग ऑफ महात्मा, नानक नाम जहाज जैसी फिल्मों ने न केवल भारी सफलता अर्जित की, अपितु मनोरंजन के साथ-साथ स्वस्थ सामाजिक परम्पराओं की स्थापना में बहुत उपयोगी माना गया। रामायण, महाभारत, चाणक्य तथा तेरह पन्ने जैसे धारावाहिकों ने भी न केवल जनमानस को आकर्षित और प्रभावित किया वरन् लोगों को भरपूर स्वस्थ मनोरंजन भी प्रदान किया इन तथ्यों से परिचित परमपूज्य गुरुदेव ने 1971 में विधिवत एक पुस्तिका प्रकाशित की और श्री-सम्पत्रों से साफ सुथरी युग-निर्माण फिल्में बनाने का आग्रह किया
यह विस्फोट देश में 90 के दशक से प्रारम्भ हुआ था जब वीडियो का आगमन तथा प्रचलन हुआ। इस दौरान अश्लील फिल्मों का प्रदर्शन प्रारम्भ हुआ। इसके पश्चात् 90 के दशक में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में क्रान्ति की शुरुआत हुई। आर्थिक उदारीकरण के तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तो इसमें बाढ़ ला दी
क्षेत्रों में सम्पन्न 24 अश्वमेध यज्ञों में सु गुना, जयपुर बड़ौदा, बुलंदशहर, आँवलखेड़ा में फिल्मायी गयी डॉक्यूमेण्ट्री वीडियोग्राफी सहित सात वीडियो कैसेट्स (60 मिनट), 4 विधियों कैसेट्स (120 मिनट) तथा श्रद्धांजलि समारोह का एक तीन घंटे का सम्मिलित है। इनमें छोटे-छोटे ड्रामा, नृत्य-नाटिकाएं, प्रवचन आदि सभी है। 1991 से लेकर 1996 तक यह क्रमशः 2000,1550,1270ए1000ए 2700तथा 2072 संख्या में रिकार्ड किए गए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-January
मुम्बई, जो कि महाराष्ट्र की राजधानी होने के साथ कला व फिल्म नगरी भी है की अनायास ही यह श्रेय प्राप्त होने जा रहा है कि पहली बार कम्प्यूटर साइंसेज की नवीनतम विधा ‘मल्टीमीडिया’ के माध्यम से देव संस्कृति के विराट-व्यापक रूप को प्रस्तुत किया जा रहा है। चर्चगेट, जो कि बृहत्तर मुम्बई के दक्षिणी भाग में उस क्षेत्र में स्थित है जहाँ कि बहुसंख्य अन्तर्राष्ट्रीय कार्यालय है, पूरे भारत ही नहीं, एशिया का भी एक का व्यापारिक केन्द्र है तथा जहाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ स्थित है, के सामने सुन्दर बाई हॉल में यह विराट प्रदर्शन 22, 23, 24, 25, 26 जनवरी की तारीखों में होने जा रहा है। इसके लिए बड़े व्यापक स्तर पर तैयारी विगत जुलाई-अगस्त माह में ही आरम्भ कर दी गयी थी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-December
जनमानस की इस माँग की आपूर्ति प्रचलित सिनेमा तंत्र भली-बुरी प्रेरणाओं के साथ कर रहा है। उत्कृष्ट फिल्मों-श्रेष्ठ धारावाहिकों का निर्माण होने लगे, तो कोई कारण नहीं कि नवनिर्माण का महान प्रयोजन पूरा होता न रह सके। बुराई को देखकर बुराई पनपती और अच्छाई से सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है। अच्छी फिल्मों एवं उत्कृष्ट धारावाहिकों के निर्माण के लिए तंत्र खड़ा होते ही पुराने सिनेमा निर्माताओं को अपना ढर्रा बदलने के लिए विवश होना पड़ेगा
यों पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों पर कितनी ही फिल्में बनीं और चली हैं। धार्मिक, तीर्थयात्रा परक कितनी ही फिल्में सामने आयी हैं, पर उनमें निरुद्देश्य कथा-प्रसंग ही भरे पड़े हैं। दिशा और प्रेरणा मिलने की अपेक्षा उनसे चमत्कारवाद से अन्धविश्वास जैसी प्रतिगामी मान्यताएँ ही दर्शकों के मन पर जमती हैं
अभी कुछ ही समय पूर्व वर्तमान दशक के पिछले वर्षों में प्रदर्शित फिल्मों, धारावाहिकों का विश्लेषण कर विशेषज्ञों ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि इनसे समाज को क्या मिलता है? उनके अनुसार बड़े अमीर लोगों को फैशन और आधुनिकतम स्टाइल मिलती है। सुपरहिट फिल्मों में नायक खुली सड़क पर मारधाड़ मचाता है। पुलिस भी तमाशा देखती रहती है
यों पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों पर कितनी ही फिल्में बनीं और चली हैं। धार्मिक, तीर्थयात्रा परक कितनी ही फिल्में सामने आयी हैं, पर उनमें निरुद्देश्य कथा-प्रसंग ही भरे पड़े हैं। दिशा और प्रेरणा मिलने की अपेक्षा उनसे चमत्कारवाद से अन्धविश्वास जैसी प्रतिगामी मान्यताएँ ही दर्शकों के मन पर जमती हैं। ऐसा कुछ भी उनमें नहीं होता जिससे दर्शक की अन्तरात्मा आदर्शवादी चेतना अपनाने के लिए हुलसे-उमगे अपने प्रयास इस क्षेत्र में सर्वथा अभिनव एवं अद्भुत ही होगे, यह कहने की आवश्यकता नहीं है
कुछ फिल्मों के कथानकों की बात इन दिनों मस्तिष्क में चल रही है- जैसे-
फिर यदि किशोर जनसामान्य जीवन में यही कहानी फिल्म की जुबानी दुहराते हैं, तो देखी हुई को ही तो करते हैं। तब जाकर पुलिस और आम जनता को ज्ञात होता है कि फिल्म का असर कहाँ कितना हुआ। भारत में जहाँ आर्थिक विषमता चरम सीमा पर है, वहाँ फिल्मों में प्रदर्शित हिंसा उत्प्रेरक का काम करती है और आर्थिक विषमताओं के भार से दबा हुआ व्यक्ति ये सब कुकृत्य करने पर उतारू हो जाता है
रेडियो-प्रसारण सुनने वालों की संख्या भी इन सिनेमा दर्शकों के सामने फीकी पड़ती है। प्रचार का सबसे प्रमुख और सबसे व्यापक साधन इन दिनों फिल्म मंच ही बना हुआ है। इस मंच से जो सिखाया गया है, सिखाया जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। ऐसी दशा में यही उचित समझा गया कि फिल्म-निर्माण का एक समानान्तर मंच तैयार किया जाये जो अनुपयुक्त के मुकाबले उपयुक्त को रखकर जनता को यह निर्णय करने का अवसर दे कि उसे क्या अपनाना और क्या छोड़ना है?
अभी कुछ ही समय पूर्व वर्तमान दशक के पिछले वर्षों में प्रदर्शित फिल्मों, धारावाहिकों का विश्लेषण कर विशेषज्ञों ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि इनसे समाज को क्या मिलता है? उनके अनुसार बड़े अमीर लोगों को फैशन और आधुनिकतम स्टाइल मिलती है। सुपरहिट फिल्मों में नायक खुली सड़क पर मारधाड़ मचाता है। पुलिस भी तमाशा देखती रहती है। वह दस-बीस को घायल कर एम्बुलेंस में ठूँस कर अस्पताल भेज देता है और निडर होकर चला जाता है
हजार वर्षों की पराधीन, पिछड़ी, पथभ्रष्ट कौम को स्वस्थ मार्गदर्शन देने की अपेक्षा सिनेमा उल्टी दिशा में ही घसीटने लग पड़ा। फिल्मों के कथानक, अभिनय, गायन, नृत्य आदि में प्रेरक प्रसंग यदा-कदा ही दिखाई देते हैं। अधिकतर कामुक, अश्लील, उग्रता, उच्छृंखलता एवं पशु प्रवृत्ति को भड़काने वाले प्रसंग ही अधिक मिलते हैं। सिनेमा- संगीत ही वस्तुतः आत का युग-गायन है
एक सर्वेक्षण के अनुसार समाज के ऊपर इनके प्रभाव के निम्नलिखित तथ्य प्रकाश में आये हैं- (1) डकैती करने का ज्ञान, (2) घर में छिपी हुई तिजोरियों का पता लगाने की युक्ति, (3) घर में प्रवेश करने के लिए मास्टर कुँजी का प्रयोग, (4) डायल टटोलकर तिजोरी खोलने की युक्ति, (5) खिड़की को बिना किसी शोर के तोड़ डालने की युक्ति, (6) चुम्बन- आलिंगन और बलात्कार का ज्ञान, (7) मार-पीट के चमत्कारी तरीके, (8) सिगरेट, शराब और नशीली दवाओं का सेवन, (9) आत्म हत्या की प्रेरणा, (10) अभिभावकों से लड़कर घर छोड़कर भाग जाने की प्रेरणा, (11) भद्दे उत्तेजक और अधनंगे पहनावे का प्रयोग, (12) क्लब, डिस्कोथेक आदि में जाने का शौक और वहाँ कैबरे आदि गन्दे नृत्य का प्रयोग, (13) हेरोइन, कोकीन जैसे खतरनाक नशे एवं हथियार आदि के स्मगलिंग करने के नये-नये तरीके, (14) बम, विदेशी सामान आदि को छुपाने का ज्ञान। इस तरह के और भी सैकड़ों उदाहरण हैं, जिससे यह साबित होता है कि फिल्मों का कितना बुरा प्रभाव समाज पर पड़ रहा है। स्थिति तब और विकट हो जाती है, जब यह सर्वमान्य सत्य हो कि अपने देश में समाचार पत्रों तथा अश्लील पुस्तकों से फिल्मों का प्रभाव कहीं सैकड़ों गुना अधिक है
नवम्बर, 1974 की अखण्ड- ज्योति के पृष्ठों में परमपूज्य गुरुदेव ने इस सम्बन्ध में एक योजना प्रकाशित की थी। उन्हीं के शब्दों में तीसरी योजना फिल्म निर्माण की है। यह एक तथ्य है कि भारत के समस्त समाचार और विचार पत्रों के जितने पाठक हैं, उससे कहीं अधिक लोग हर दिन सिनेमा देखते हैं। रेडियो-प्रसारण सुनने वालों की संख्या भी इन सिनेमा दर्शकों के सामने फीकी पड़ती है
न पुलिस हस्तक्षेप करती है और न समाज का कोई व्यक्ति। फिर यदि किशोर जनसामान्य जीवन में यही कहानी फिल्म की जुबानी दुहराते हैं, तो देखी हुई को ही तो करते हैं। तब जाकर पुलिस और आम जनता को ज्ञात होता है कि फिल्म का असर कहाँ कितना हुआ। भारत में जहाँ आर्थिक विषमता चरम सीमा पर है, वहाँ फिल्मों में प्रदर्शित हिंसा उत्प्रेरक का काम करती है और आर्थिक विषमताओं के भार से दबा हुआ व्यक्ति ये सब कुकृत्य करने पर उतारू हो जाता है
इस प्रयोजन की पूर्ति करने वाले कथानकों से हमारा पुराण-साहित्य विशालकाय समुद्र की तरह बिखरा पड़ा है। उसमें से मनचाहे मोती कितनी ही बड़ी संख्या में बीने जा सकते हैं आर उन आधारों को लेकर व्यक्ति और समाज को बदल देने वाले भटकाव और दिशा निर्देश देने वाले अगणित ऐसे कथानक निकल सकते हैं, जिनके आधार पर फिल्म बनायी जाती रहे और लोकरंजन के साथ लोकमंगल का प्रयोजन बहुत सरलता से और सफलता से सम्पन्न किया जाता रहे
आश्चर्य की ही बात है कि इस प्रयोजन के लिये पूँजी के नाम पर एक पैसा भी हाथ में न होने पर भी यह विश्वास किया जा रहा है कि निकट भविष्य में यह मात्र कल्पना न रहेगी, वरन् कोई न कोई ऐसा आधार बन जायेगा, जिससे फिल्म निर्माण जैसी महँगी योजना को भी कार्यान्वित किया जा सके। हम सदा से असम्भव समझे जाने वाले कार्य हाथ में लेते रहे हैं और साधन-विहीन स्थिति में भी दुस्साहसपूर्ण कदम उठाते रहे हैं। असफलता का मुख कदाचित ही कभी देखना पड़ा है
ऐसा कुछ भी उनमें नहीं होता जिससे दर्शक की अन्तरात्मा आदर्शवादी चेतना अपनाने के लिए हुलसे-उमगे अपने प्रयास इस क्षेत्र में सर्वथा अभिनव एवं अद्भुत ही होगे, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। चिर-प्राचीन को चिर-नवीन के साथ जिस प्रकार हर क्षेत्र में संयुक्त किया गया है, वहीं समन्वय इस फिल्म निर्माण प्रक्रिया में भी होगा। इसके द्वारा क्रान्तिकारी परिणाम उत्पन्न होने की आशा की जा सकती है
तब जाकर पुलिस और आम जनता को ज्ञात होता है कि फिल्म का असर कहाँ कितना हुआ। भारत में जहाँ आर्थिक विषमता चरम सीमा पर है, वहाँ फिल्मों में प्रदर्शित हिंसा उत्प्रेरक का काम करती है और आर्थिक विषमताओं के भार से दबा हुआ व्यक्ति ये सब कुकृत्य करने पर उतारू हो जाता है
बुराई को देखकर बुराई पनपती और अच्छाई से सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है। अच्छी फिल्मों एवं उत्कृष्ट धारावाहिकों के निर्माण के लिए तंत्र खड़ा होते ही पुराने सिनेमा निर्माताओं को अपना ढर्रा बदलने के लिए विवश होना पड़ेगा
इस मंच से जो सिखाया गया है, सिखाया जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। ऐसी दशा में यही उचित समझा गया कि फिल्म-निर्माण का एक समानान्तर मंच तैयार किया जाये जो अनुपयुक्त के मुकाबले उपयुक्त को रखकर जनता को यह निर्णय करने का अवसर दे कि उसे क्या अपनाना और क्या छोड़ना है?
इस तरह के और भी सैकड़ों उदाहरण हैं, जिससे यह साबित होता है कि फिल्मों का कितना बुरा प्रभाव समाज पर पड़ रहा है। स्थिति तब और विकट हो जाती है, जब यह सर्वमान्य सत्य हो कि अपने देश में समाचार पत्रों तथा अश्लील पुस्तकों से फिल्मों का प्रभाव कहीं सैकड़ों गुना अधिक है
हरिश्चन्द्र, दधीचि, प्रह्लाद, कर्ण, जनक, चरक, सुश्रुत आदि अगणित महामानवों के चिन्तन एवं कर्तृत्व का ऐसा निर्माण, जो आज की स्थिति में हमें कुछ करने की प्रेरणा दे सके। इन महापुरुषों की अलग-अलग फिल्म न बनाकर उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को एक ही धारावाहिक में आबद्ध किया जाये, ताकि कार्यक्रमों की भिन्नता रहते हुए भी महामानवों का लक्ष्य एक ही रहने की बात समझ में आये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
प्रभु अपने को पुकारने वालों को कभी निराश नहीं करते। दो-दिन बाद से ही एक्सरे-फिल्म में प्रार्थना का चमत्कार स्पष्ट होने लगा। एक्सरे रिपोर्ट असम्भव को सम्भव होता बता रही थी। काफी बड़ा ट्यूमर दिन-प्रतिदिन छोटा पड़ रहा था, प्रार्थना के काम में प्रतिदिन तन्मयता आती गयी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-May
इससे पूर्व वेटीकन सिटी से कर निर्मित चर्चा से विरोध के स्वर पहले ही मुखरित हो चुके है एवं धार्मिक आधारों पर भी इस प्रक्रिया पर ‘बैन’ लगाने की बात की जा चुकी है। किन्तु निजी स्तर पर किये जा चुकी है किन्तु निजी स्तर पर किये जा रहे शोध कार्यों कैसे रोक सकेगा, जैसी कि सम्भावना ‘बायज फ्राम ब्राजील ‘ नामक एक काल्पनिक फिल्म में आज से प्रायः चौदह वर्ष पूर्व व्यक्त की गयी थी, यह सबकी चिंता का कारण बना हुआ है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
फिल्म उद्योग में लगी पूँजी और प्रतिभाएँ यदि पशुता भड़काकर जेब भरने की दुरभिसंधि से बाज न आएँ तो उनकी प्रतिद्वंद्विता में नया मोरचा खड़ा किया जा सकता है। प्रगतिशील फिल्म उद्योग को जन्म दिया जाए, इसके लिए अब ठीक समय आ गया। नए कलाकार उत्पन्न किए जाएँ। सभी कुछ स्वयंसेवक स्तर पर हो
समाचार, फिल्में चौबीस घंटे, अश्लीलता से भरे नाच-गाने चौबीस घंटे। यदि यही सब आम आदमी को मिलता रहा तो नई पीढ़ी का मानसिक, भावनात्मक विकास क्या होगा, सोचा जा सकता है। परमपूज्य गुरुदेव ने जिस चुनौती का वर्णन कलाक्षेत्र के विषय में किया है, वह अब दो सौ गुनी अधिक जिम्मेदारी के साथ आ खड़ी हुई है
प्रकाशक और फिल्म निर्माता चाहिए, जो नारी को कुत्सित, घृणित, विषाक्त, अश्लील रूप में प्रस्तुत न करने की शपथ लें और केवल सुरुचि जगाने वाली तस्वीरें ही प्रस्तुत करें। वे ही युग की आवश्यकता को पूर्ण कर सकेंगे
साहित्य, संगीत, काव्य, चित्र, अभिनय आदि कला के सभी पक्षों का परिष्कार कर उसे विनाश के चंगुल से विमुक्त कर विकास में नियोजित करना है। फिल्म उद्योग को भी नई दिशा दी जानी है। (3) हिन्दु समाज में जिस प्रकार धर्ममंच के माध्यम से हम क्राँतिकारी परिवर्तन कर रहे हैं, उसी प्रकार अन्य धर्मों के लिए ‘उद्देश्य एक पर स्वरूप अनेक’ का प्रयोग करना है। (4) अनीति और अनाचार, मूढ़ता और मूर्खता तथा कुरीतियों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष-मोरचे खोलने हैं, जिनमें विवाहोत्सव से लेकर अपराधी मनोवृत्ति तक हर मोरचे पर शाँति सैनिकों द्वारा जूझना है
कर्त्तव्य-पथ से विमुख हो रहे चिंतन को सृजन का नया मार्ग मिले और बौद्धिक पराधीनता के बंधनों से जकड़ी हुई विचारणा को विवेक के उन्मुक्त आकाश में विचरण करने की संभावना बढ़ चले। फिल्म उद्योग में लगी पूँजी और प्रतिभाएँ यदि पशुता भड़काकर जेब भरने की दुरभिसंधि से बाज न आएँ तो उनकी प्रतिद्वंद्विता में नया मोरचा खड़ा किया जा सकता है। प्रगतिशील फिल्म उद्योग को जन्म दिया जाए, इसके लिए अब ठीक समय आ गया। नए कलाकार उत्पन्न किए जाएँ
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-February
मोटी दृष्टि से यह माया सत्य है। यदि सत्य न होती तो फिल्म उद्योग, सिनेमाहॉल, उसमें युक्त हुए यंत्र, दर्शकों की भीड़, उनकी अनुभूति का क्या महत्त्व रह जाता! थोड़ी विवेचनात्मक गहराई से देखा जाता तो यंत्रों की कुशलता और वस्तुस्थिति को समझ न सकने की नेत्र−असमर्थता के आधार पर इस फिल्म दर्शन को मायाचार भी कह सकते हैं। दोनों ही तथ्य अपने−अपने ढंग से सही हैं। संसार चूँकि हमारे सामने खड़ा है, उसके घटनाक्रम को प्रत्यक्ष देखते हैं, इसलिए वह सही है, किंतु गहराई में प्रवेश करने पर वे दैनिक अनुभूतियाँ निताँत भ्रामक सिद्ध होती हैं
अतः कम से कम समय में अधिक से अधिक मनोरंजन की चाह बनी रही। जिस उपन्यास को पढ़ने में कई दिन लगते हैं; उसका आनन्द सिनेमाघर अथवा दूरदर्शन-वीडियो पर ढाई-तीन घण्टे की फिल्म देखकर लिया जा सकता है। एक-आध घण्टे के दूरदर्शन धारावाहिक भी अच्छा मनोरंजन कर देते हैं। प्रतिस्पर्धा के इस युग में लघु कहानियाँ ही विज्ञान के अत्याधुनिक मनोरंजन के साधनों से होड़ ले सकती हैं
साधारणतः दैनिक जीवन में भी ऐसे कितने ही अनुभव होते हैं, जिन्हें यथार्थ नहीं कहा जा सकता। सिनेमा के परदे पर जो दीखता है, सही कहाँ है! एक के बाद एक आने वाला अलग−अलग तसवीरें इतनी तेजी से घूमती हैं कि उस परिवर्तन को आँखें ठीक तरह समझ नहीं पातीं और ऐसा भ्रम होता है, मानो फिल्म में पात्र चल−फिर रहे हों। लाउडस्पीकर से शब्द अलग−अन्यत्र निकलते हैं और परदे पर तसवीर के ओंठ अलग चलते हैं, पर दर्शकों को ऐसा ही आभास होता रहता है, जैसे अभिनेताओं के मुख से ही वार्त्तालाप एवं संगीत निकल रहा है। प्रकाश की विरलता और सघनता भर परदे पर उतरती है, पर उसी से पात्रों एवं दृश्यों का स्वरूप बन जाता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-September
अब अंतिम तीन श्लोकों में श्रीकृष्ण ऐसे दिव्य योगी बनने की प्रक्रिया की एक झलक दिखाकर अपने इस कर्म-संन्यास योग नामक प्रकरण वाले अध्याय का पटाक्षेप करते है। जैसे फिल्मों के ट्रेलर्स दिखाए जाते हैं, कंप्यूटर के पॉवर पॉईंट द्वारा गहन विषय को सूत्र रूप में समझाने का प्रयास किया जाता है, ठीक उसी तरह सत्ताईसवें, अट्ठाइसवें श्लोक में ध्यान की विधि एवं मोक्ष प्राप्ति (जीवनमुक्ति-बंधनमुक्ति) कैसे की जाए, इसकी एक झलक दिखा दी गई है। इसका विस्तार छठे अध्याय में है। परंतु पहले श्लोक में जिज्ञासा व्यक्त करने वाले अर्जुन की सभी जिज्ञासाओं का समाधान कर श्रीकृष्ण अपनी पराकाष्ठा पर उनतीसवें श्लोक में पहुँचते हैं, जहाँ वे अपने भक्त की परिभाषा बताते है-अपनी विशेषताएं बताते है व भगवत्प्राप्ति से ही शाँति मिलती है, यह समझाते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-May
विशेषज्ञों के अनुसार हिंसक दृश्यों का प्रभाव तो इतना गहरा होता है कि कभी-कभी इनका असर 10-15 वर्ष बाद भी उजागर होता है। पिछले दिनों स्कॉटलैंड में सिरफिरों द्वारा अनायास हुई सामूहिक हत्याओं ने यह प्रमाणित कर दिया है कि यह काफी समय पहले देखी गई हिंसक फिल्मों का प्रभाव था। गत वर्षों में यूनेस्को के तत्त्वावधान में, ‘वर्ल्ड आर्गनाइजेशन ऑफ द स्काउट मूवमेन्ट’ और हालैण्ड के उत्रेख्त विश्वविद्यालय के प्रो. डॉ. जो ग्रोएवल ने संयुक्त अभियान के अंतर्गत इस संदर्भ में एक व्यापक शोध किया था, जिसमें 23 देशों के पाँच हजार बच्चों को शामिल किया गया था और यह जानने का प्रयास किया गया कि मीडिया खासकर टीवी में प्रदर्शित की जाने वाली हिंसा का बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है
इस स्थिति में बच्चों के कोमल मस्तिष्क की प्रकाश संवेदी कोशिकायें बहुत तीव्रता से प्रतिक्रियायें करती हैं। वीडियो गेम खेलते समय या तेजी से बदलते कार्टून फिल्मों को देखते समय यह प्रक्रिया और तीव्र होती है क्योंकि इस समय बच्चे अधिक ध्यान से देखते हैं। ऐसी स्थिति में मस्तिष्क पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव मस्तिष्क के संतुलन को बिगाड़ देता है। मस्तिष्क की ऊर्जा अव्यवस्थित हो जाती है और इससे असामान्य तरल पदार्थ बहने लगता है, जो मिरगी रोग का कारण बन सकता है
बच्चों का कोमल मन बिना तर्क-वितर्क किये टीवी के संप्रेषित दृश्यों व संकेतों को सही मान लेता है और उनकी नकल करता है। शीतल पेय के विज्ञापन की नकल करते हुए लखनऊ के छः वर्षीय रिंकू की मौत तथा टीवी फिल्म में किसी अभिनेत्री की आत्म हत्या के दृश्य को देखकर नौ वर्षीय पूजा की खुदकुशी आदि घटनायें यही सिद्ध करती हैं कि टीवी के दृश्यों का बच्चों के कोमल मन पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
ध्यान की प्रगाढ़ता में ध्याता और ध्येय में एकत्व स्थापित हो जाता है। सामान्य स्थिति में तादात्मीकरण की इस प्रक्रिया को हम किसी फिल्म अथवा खेल देखने वालने दर्शकों की मनोवृत्ति में देखते हैं। साहित्यिक रचना एवं रसास्वादन में भी सचेतन मन की यही प्रक्रिया काम करती है। भाव तादात्मीकरण की यह प्रक्रिया ही वस्तुतः हो रही घटनाओं में व्यक्ति की सक्रिय भागीदारी का बोध कराकर सृजनात्मक आनन्द का आधार बनती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
जब से रंगीन परदे वाला टेलीविजन व फिल्मों का जमाना आया, लोककलाएं लुप्त होती चली गई। इनका स्थान फिल्मी गीतों, फूहड़, नृत्यों, अश्लील प्रदर्शनों ने ले लिया। हमारे घर के अन्दर तक केबल नेटवर्क के माध्यम से पहुँचने वाला नग्नता का यह जहर इतनी बेशर्मी से प्रवेश कर गया कि कोई विरोध तक न कर पाया। हिंसा व अश्लीलता परोसी जाने लगी
कला जो किसी भी राष्ट्र की संस्कृति का मेरुदंड होती है, विगत तीस वर्षों में तेजी से प्रदूषित हुई है। जब से रंगीन परदे वाला टेलीविजन व फिल्मों का जमाना आया, लोककलाएं लुप्त होती चली गई। इनका स्थान फिल्मी गीतों, फूहड़, नृत्यों, अश्लील प्रदर्शनों ने ले लिया। हमारे घर के अन्दर तक केबल नेटवर्क के माध्यम से पहुँचने वाला नग्नता का यह जहर इतनी बेशर्मी से प्रवेश कर गया कि कोई विरोध तक न कर पाया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-April
कथा−कहानियाँ, नाटक, उपन्यास, फिल्म आदि आसानी से याद रहते हैं, क्योंकि इन्हें हम मन लगाकर देखते−पढ़ते हैं। प्रायः विद्यार्थियों के लिए विषयवस्तु भारवत जान पड़ती है। वह इसलिए कि इसमें वे रुचि उत्पन्न नहीं कर पाते, मन नहीं लगाते, उपेक्षा का बरताव करते हैं, परंतु जो मन लगाकर पढ़ते हैं, उनके लिए गंभीर दर्शन एवं जटिल गणित भी कथा−कहानियों जैसे प्रिय लगने लगते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-September
इस संपूर्ण प्रसंग का वर्णन एण्डू थामस ने अपने चर्चित ग्रंथ बियाण्ड दि टाइम बेरियर में विस्तारपूर्वक किया है उक्त घटना के उपराँत विज्ञानी यह मानने के लिये विवश हो गये कि समय के बीते भाग में इस प्रकार का प्रवेश संभव तो है, पर ऐसा मानसिक धरातल पर ही हो सकता है, शारीरिक स्तर पर नहीं। उनका विचार था कि सामान्य कैमरे से इस प्रकार के चित्र नहीं आने का एक ही मतलब हो सकता है साधारण प्रकाश भूत और वर्तमान के मध्यवर्ती अवरोध को चीरकर भूतकाल के गर्भ में प्रवेश पाने की क्षमता नहीं रखता, जो अपेक्षाकृत सूक्ष्म इन्फ्रारेड में विद्यमान है, अतः वह कुछ घंटे पूर्व ही घटना का फिल्माँकन करने में सफल होता है। इस सफलता के उपराँत वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास करने लगे कि क्या ऐसा सुदूर भूत के दृश्यों ओर घटनाओं के साथ भी शक्य हो सकता है? इस निर्मित उनने भिन्न भिन्न स्थानों के कई स्थानों के कई ऐसे चित्र खींचे जहाँ सदियों पूर्व सुविकसित संभावनाएं थी, पर आज वे बीहड़ों जंगलों या रेगिस्तान में परिवर्तित हो चुके है। तस्वीर जब बनकर सामने आयी तो उनमें वही सारे दृश्य देखे, जिनके चित्र खींचे गये थे
इसमें शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि समय के साथ साथ घटनाएं और दृश्यावलियां अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्म स्तरों में प्रवेश करती जाती है फलतः वे विशिष्ट इन्फ्रारेड कैमरे की भी पकड़ से बचती रहती है। यदि कोई और अधिक वेधक सामर्थ्य वाली किरण हो तभी इनका फिल्माँकन कर पाना संभव है, पर विशेषज्ञ अभी ऐसी कोई रोशनी ढूंढ़ पाने में सफल नहीं हो सके है। ऐसी स्थिति में भूतकालीन जानकारियाँ उपलब्ध करने के लिये अनुसंधानकर्ता सूक्ष्म चेतना के महत्व से से इनकार नहीं करते। टाइम दि अल्टीमेट एनर्जी पुस्तक की विद्वान लेखिका महीहोप अपने उक्त ग्रंथ में लिखती है कि चूँकि चेतना विश्व का सर्वाधिक सूक्ष्म तत्व है अतएव व समय के अवरोध को पार करते हुये किसी भी काल खंड में प्रवेश करने में समर्थ होती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
इन दिनों अमरीका में पिछले समय की तुलना में 51 प्रतिशत लोगों में यह शिकायत बढ़ी है। इसका प्रमुख कारण वहाँ डरावने और हिंसक फिल्मोँ के प्रति बढ़ती लोकप्रियता है। स्वास्थ्य संतुलन वस्तुतः अधिकाधिक इस बात पर निर्भर है कि हमारे आहार विहार और दिनचर्या क्या है? किस वातावरण और परिवेश में हम रहते है? हमारी संवेगात्मक स्थिति कैसी है? इन बातों पर समुचित ध्यान दिया जा सके और इन्हें यदि असामान्य बनने से रोका जा सके तो उन कारकों को भी नियंत्रित किया जा सकना शक्य है जो शारीरिक स्थूलता वृद्धि के लिए जिम्मेदार है
शहरों में सिनेमा का तथा अब दूरदर्शन का भी आधिपत्य है पर यदि देहात के लिये उपयुक्त है पर यदि देहात के लिये उपयुक्त अभिनय की व्यवस्था की जा सके तो उसके लिये भावभरी गुंजाइश मौजूद है। जिनके पास पैसा हो रिकार्ड बनाने और सुरुचिपूर्ण फिल्म बनाने के उद्योग में प्रवेश कर सकते हैं। इसमें लोक रंजन लोकमंगल के अतिरिक्त यश और धन उपार्जित करने की भी परिपूर्ण संभावना विद्यमान है
इसके उपरांत उन्हें एक भयोत्पादक फिल्म हलोबीन के कुछ डरावने दृश्य दिखाये गये। आधा घंटा पश्चात फिल्म की समाप्ति पर जब उसकी खाद्य सामग्री का लेखा जोखा लिया गया तो अध्ययनकर्ता यह देख कर विस्मय में पड़ गये कि जो महिलाएँ नियमित डाइटिंग करती थी, उन सबने डाइटिंग नहीं करने वाले ग्रुप में दुगुने परिमाण में भोजन उदरस्थ किया था
सिनेमा न देखने वाले भी देखने वालो की छूत प्रभावित होते हैं, और लोक चिरे पर सिनेमा की प्रेरणाएँ हावी है। यह अभिनय कहीं जीवित होगा तो उस भी फिल्म प्रेरणा का अनुयायी होते ही रहना पड़ रहा होगा। संगीत नाम पर जो कुछ कानों को सुनने के लिये मिलता है उसमें कुरुचि प्रेरणाएँ वाले उतरती है। रिकार्डों लेकर संगीत सम्मेलनों गोष्ठी गाय तथा व्यक्तित्व गुनगुनाहटों में रस के साथ जो विष घुला रहता है उससे लोक चिंतन के निकृष्टता की दिन में गिरने का ही पथ प्रशस्त होता है
इन सभी को निश्चित संख्या में कुछ सुखं खाद्य पैकेट दिये गये। इसके उपरांत उन्हें एक भयोत्पादक फिल्म हलोबीन के कुछ डरावने दृश्य दिखाये गये। आधा घंटा पश्चात फिल्म की समाप्ति पर जब उसकी खाद्य सामग्री का लेखा जोखा लिया गया तो अध्ययनकर्ता यह देख कर विस्मय में पड़ गये कि जो महिलाएँ नियमित डाइटिंग करती थी, उन सबने डाइटिंग नहीं करने वाले ग्रुप में दुगुने परिमाण में भोजन उदरस्थ किया था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-December
प्रख्यात मनोवेत्ता कार्ल जुँग ने फ्रायडवादी मान्यताओं का खण्डन कर इसी तथ्य को प्रतिपादित किया है कि स्वप्न दमित वासनाओं के काल्पनिक चित्र नहीं, वरन् जीवन की गहराइयों से भरे सूत्र हैं। ये मन का विनोद नहीं, वरन् भूत और वर्तमान की विवेचना तथा भवितव्य के संकेतों की एक माइक्रोफिल्म के प्रतीक हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-January
पाया गया कि एरिगो ने तद्नुरूप ही रोगों की पहचानकर उनका उपचार सफलतापूर्वक कर दिखाया। इस पूरी प्रक्रिया का फिल्माँकन भी किया गया था ताकि किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे। सन् 1971 में एरिगो की मृत्यु हुई, इससे पूर्व तक डॉ एडोल्फो फिट्ज की आत्मा उसके माध्यम से शल्य चिकित्सा का अपना परोपकारी काम बराबर करती रही
इस प्रश्न से समय की प्रकृति से संबंधित उस मान्यता का खण्डन हो जाता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि जन्म लेते ही हर मनुष्य एक ऐसे टाइम-कण्टिनुअस (अंतहीन व लगातार) में प्रवेश करता है, जो एक दिशा में समरूप गति से फिल्म रील की तरह खुलता हो। प्रस्तुत अवधारणा के अनुसार कोई भी घटना समय से पूर्व घटित नहीं हो सकती, न तो समय से पहले उसे विज्ञात बनाया जा सकता है। हमें समय के उस भाग से संबंधित घटनाओं की ही जानकारी मिल सकती है, जिसे सर्वसाधारण वर्तमान एवं अतीत के नाम से जानते हैं
उक्त घटना से ग्रीनवुड हैरान रह गये। उनकी हैरानी किपलिंग के शब्दों में कहें, तो निम्न प्रकार से व्यक्त की जा सकती है कि उनकी जीवन रूपी फिल्म का वह भाग, जो अभी रिलीज नहीं हुआ था, किस प्रकार और क्यों दिखाई पड़ गया?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-July
मनुष्य के मानसिक जगत में विवेक रूपी पवित्र ईश्वर हमें निरन्तर प्रकाश देता है, किन्तु जिस तरह फिल्म की अश्लीलता को फोकस फेंकने वाला लाइट नहीं बदल सकता, बल्कि उसका कार्य फिल्म की तस्वीर को पटल पर प्रकाश रूप में दिखाना मात्र है इसीलिये इस आत्मा रूपी फोकस लाइट को निर्दोष बताया गया है। हाँ! यह अवश्य है कि संचालक यदि निपुण हो तो फिल्म की अश्लीलता को शीघ्रता से हटाकर बता सकता है ठीक इसी तरह विवेकवान पुरुष अपने कुत्सित संस्कारों को धर्म रूपी शस्त्र से काटकर संसार के पटल क्षेत्र पर कार्य निपुणता, धार्मिकता, एवं सहाचारी कहा जा सकने की शक्ति रखता है पूर्ण संचित कर्मों से इन्कार नहीं किया जा सकता, किन्तु घोड़े का सवार कोड़े के आश्रय से अड़ियल घोड़े को अच्छा बना लेता है तब हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है इस मन रूपी घोड़े का धर्म रूपी चाबुक से अवश्य सुधार कर सकते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-December
मस्तिष्क में भरे एक खरब से भी अधिक स्नायुकोशों को अद्भुत विशेषताओं से सम्पन्न महादेव कहा जा सकता है। इनमें संचित स्मृतियाँ माइक्रोफिल्म की भाँति सुरक्षित रहती हैं और उत्तेजित किये जाने पर वे उभर कर आती हैं। डॉ. पेनफील्ड एवं डॉ. डेलगार्डो के इस विषय में मनुष्यों व पशुओं पर प्रयोग पहले ही ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। उनसे ज्ञात होता है कि मस्तिष्क का टेम्पोरल कार्टेम्स, पेराइटललोब व लिम्बिक सिस्टम इतना रहस्यमय-तिलिस्मों से भरा हुआ है कि इस विषय में किये गये अनेकानेक प्रयोगों ने वैज्ञानिकों को अपनी अज्ञानता का बोध तो कराया ही है, एक अद्भुत रोमांचकारी लीला जगत भी दिखाता है जो इस पिण्ड से विद्यमान है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-April
यह सब तब होता है, जब वह शरीर छोड़ता है। ‘साइकित ब्रिज’ की लेखिका श्रीमती जेन शेरवुड ने भी इसी मत को दोहराते हुये कहा है कि, “मृत्यु के समय तमाम जीवन की फिल्म, विचारों की भीड़ भाग रही होती है। उल्लेखनीय है इस पुस्तक की लेखिका ने मरणोपरांत प्रेत अवस्था में एक माध्यम से लिखवाया था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-June
इससे आगे कदम बढ़ सके तो अगला चरण और उठता है कि स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से इस संपर्क सूत्र में बंधे लोगों के घरों में और भी अधिक प्रभावी प्रक्रिया अपनाया जा सकता है। जिनने युग निर्माण योजना के स्लाइड प्रोजक्टरों के माध्यम से प्रकाश चित्र दिखाने के साथ-साथ उनका विवरण बताने की भावभरी प्रक्रिया को देखा है वे जानते हैं कि यह पद्धति व्यापक फिल्मी प्रभाव की तुलना में किसी प्रकार भी कम प्रभावी नहीं बैठती। सस्तेपन और सरलता के कारण नाक भौं सिकोड़ना हो तो बात दूसरी है अन्यथा यह ‘चरखा फिल्म’ गाँधी जी के खादी प्रसार की तरफ ही विचार क्राँति के क्षत्र में अत्यन्त कारगर मानी जा सकती है। लोकरंजन के साथ लोक-मंगल का ऐसा अच्छा समन्वय अब तक कदाचित् ही कहीं किया गया है
जिनने युग निर्माण योजना के स्लाइड प्रोजक्टरों के माध्यम से प्रकाश चित्र दिखाने के साथ-साथ उनका विवरण बताने की भावभरी प्रक्रिया को देखा है वे जानते हैं कि यह पद्धति व्यापक फिल्मी प्रभाव की तुलना में किसी प्रकार भी कम प्रभावी नहीं बैठती। सस्तेपन और सरलता के कारण नाक भौं सिकोड़ना हो तो बात दूसरी है अन्यथा यह ‘चरखा फिल्म’ गाँधी जी के खादी प्रसार की तरफ ही विचार क्राँति के क्षत्र में अत्यन्त कारगर मानी जा सकती है। लोकरंजन के साथ लोक-मंगल का ऐसा अच्छा समन्वय अब तक कदाचित् ही कहीं किया गया है। इस माध्यम से नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्राँति का- व्यक्ति परिवार और समाज के नव-निर्माण का वह प्रयोजन भली प्रकार पूरा हो सकता है जो युग सृजन कर्ताओं ने लक्ष्य बनाना है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-July
कार्लजुंग ने फ्रायडवादी मान्यताओं का खण्डन कर इसी तथ्य को प्रतिपादित किया है कि स्वप्न दमित वासनाओं के काल्पनिक चित्र नहीं, वरन् जीवन की गहराइयों से भरे सूत्र हैं। ये मन का विनोद नहीं, वरन् भूत और वर्तमान की विवेचना तथा भवितव्य के संकेतों की एक माइक्रो फिल्म हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-January
मात्र आँख की ही बात करें जो ज्ञात होता है कि प्रकाश देखने में सहायता करने वाले रॉड सेल्स की संख्या 25 करोड़ है जिनमें 30 करोड़ से भी अधिक प्रकाश पकड़ने वाले सूक्ष्म रंगीन कण होते हैं। इन कणों की क्षमता का अनुमान इस बात से करना चाहिये कि 3 घंटे में दिखाई देने वाली फिल्म की लम्बाई यदि दस हजार मील से लम्बी हो यह आंखें 50 हजार मील प्रति दिन के दृश्य मस्तिष्क को भेज सकती हैं, यही नहीं उनमें से अनेकों दृश्यों को आजीवन स्मृति कणों में सुरक्षित भी रख सकती हैं
पिछले दिनों तीन प्रख्यात अमेरिकी चिन्तक जिन्होंने इस विषय पर कई पुस्तकें लिखी हैं, परस्पर मिलकर बैठे एवं अपने अध्ययन, चिन्तन व अनुमान के आधार पर बताया कि विश्व का भविष्य उज्ज्वल है। “दुनिया कहाँ जा रही है” इस शीर्षक से फिल्म बना रहे अमेरिकी टेलीविजन संवाददाता केल्विन सेण्डर्स ने डा. मार्गरेटमीड (अब स्वर्गीय), हरमन कॉन एवं विलीयम टामसन से साक्षात्कार लिया। “स्पॉन” पत्रिका (अप्रैल 1979) में प्रकाशित इस विचार मंथन पर सारे विश्व के बुद्धिजीवियों का ध्यान गया है। वस्तुतः अभी तक जिन-जिन बुद्धिजीवियों ने अपना चिन्तन दिया है, वह निषेधात्मक ही रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-June
भारतीय ध्यानपद्धति के प्रति जो उपेक्षा आज शिक्षित भारतीयों में देखने को आती है, वैसी ही उपेक्षा प्रारम्भ में इस टेड सीरियस के साथ भी की गई। उसे भ्रामक और हिप्नोटिज्म करने वाला कहा जाता रहा, पर जब सन् 1963 में टेड सीरियस ने अनेक वैज्ञानिकों, फोटोग्राफरों, बुद्धिजीवियों तथा ‘इलिनाइस सोसायटी फॉर साइकिक रिसर्च’ (यह संस्थान अमेरिका में मनोविज्ञान तथा अतिमानवीय चेतना सम्बन्धी शोध कार्य करती है) की उपाध्यक्ष श्रीमती पालिन ओहलर की उपस्थिति में कई प्रतिबन्धों, फिल्मों पर नियन्त्रण दूसरे-दूसरे के कैमरों के प्रयोग द्वारा भी टेड सीरियस तथा जोहान्स ने कल्पना के चित्र उतारकर दे दिये तब एक साथ सारे योरोप में तहलका मच गया और वैज्ञानिकों को आश्चर्य हुआ कि दूरवर्ती वस्तुओं के फोटो लेना केवल माइक्रोफिल्म द्वारा ही सम्भव है; और वह भी तब जबकि उस तरह का दृश्य किसी निश्चित फ्रीक्वेन्सी पर निश्चित माइक्रो-ट्रांसमीटर द्वारा शक्तिशाली विद्युत-तरंगों द्वारा प्रेक्षित किया गया हो। बिना किसी यन्त्र और माइक्रो-तरंगों (शब्द की तरह आकार को भी शक्ति तरंगों में बदलकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजते हैं, टेलीविजन उन्हें ही पकड़ते हैं, इन्हें माइक्रो-तरंगें कहते हैं) के केवल मस्तिष्क द्वारा किसी भी स्थान का कैमरे में चित्र उतार देना एक बड़ा भारी आश्चर्य था, जिसने सारे दर्शकों को कौतूहल में डाल दिया, उसका कोई सिद्धान्त वे लोग निश्चित नहीं कर पाये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-March
इस ज्योतिषी का जन्म सन् 1910 में अयोवा (अमेरिका) में हुआ था, उसे लोग ‘एण्डरसन’ के नाम से जानते हैं। एण्डरसन को यद्यपि मुख्य ख्याति उसके अतुलित शारीरिक पराक्रम और व्यायाम सम्बन्धी अद्भुत प्रदर्शनों के कारण मिली है तथापि वह शरीर की अपेक्षा प्रज्ञा-चक्षु अधिक है, उसकी शायद ही कोई भविष्य वाणी असत्य निकली हो, यही कारण है कि न केवल अमेरिका वरन् दूसरे देशों के व्यापारी, उद्योगपति, फिल्म-कलाकार, नेता आदि भी उससे भविष्य सम्बन्धी प्रश्न पूछ कर काम करते हैं
चूँकि श्री मिशल महोदय सम्मोहन विद्या (हिप्नोटिज्म) के ज्ञाता थे, इसलिये श्री पाल बेल्च को आशंका हुई कि सम्भव है उनके सम्मोहित करने के फलस्वरूप यह फोटो आई हो, इसलिये उन्होंने दुबारा फिर अकेले टेड सेरियस को ‘लाईफ’ पत्रिका के कार्यालय में बुलाया। कैमरा लाइफ की फिल्म भी ‘लाईफ’ कार्यालय द्वारा भरी गई। पाल बेल्च ने कहा इस बार वह किसी 17 मंजिल की इमारत का ऐसा चित्र चाहते हैं, जिसकी खिड़कियाँ स्पष्ट दिखाई देती हों। सेरियस फिर पहले की तरह बैठा
अन्त में एक ऐसे व्यक्ति की सहायता ली गई, जिसके बारे में उन दिनों न केवल हालैण्ड वरन् सारे विश्व में यह कहा जाता था कि उसे किसी की वस्तु या शरीर का कोई अंग स्पर्श करते ही उसके सम्बन्ध में अनेक रहस्यों का पता फिल्म में दिखाये गये दृश्यों की भाँति चल जाता है। उसे विलक्षण सिद्धि प्राप्त थी। उसे लोग सर्वदर्शी मानते थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-January
सिनेमा बनाने वाली मशीन एक सेकिंड में 100 से भी अधिक फोटो लेने की क्षमता रखती है एक आदमी एक सेकिंड में चलते हुई, जितनी आकृतियाँ और मुद्रायें बदलता है, उन सब को वह मशीन 100 बार अपने भीतर भर लेती है, दुबारा जब उसे पर्दे पर दिखाया जाता है तो उसी गति को इस अंश तक धीमा कर दिया जाता है कि वही फोटो चलती−फिरती दिखाई देने लगती है। यदि बीच में फिल्म कभी कट जाती है और मशीन चलते−चलते रुक जाती है। तो जो जैसा फोटो सामने होता है, वैसा ही बना रह जाता है और वास्तविकता की पोल खुल जाती है कि दरअसल यह तो फोटो और प्रकाश के चलने का खेल मात्र था, कहानी में असलियत है न पर्दे पर कोई नायक−नायिका। हमारे जीवन को भी उसी प्रकार गति के नियम और उसकी सापेक्षता से बाँध दिया जाता है, इसलिये हम चलते−फिरते, खाते−पीते रहते हुये भी अपनी यथार्थ स्थिति को समझ नहीं पाते
फोटो लेने के लिये अच्छे कैमरों के लेन्स भी पहले एक निश्चित नाभ्याँतर (नाभ्याँतर उस दूरी को कहते हैं, जो लेन्स से प्रारम्भ होती है और जहाँ, जिस वस्तु की फोटो ले रहे हैं, प्रतिबिम्ब पड़ता है में जाकर समाप्त होती है) पर फिट कर लेते हैं, तभी सही फोटो ले सकते हैं। फिल्मों तक में मशीनें पहले फिट करनी पड़ती हैं, किन्तु आँख के रूप में भगवान ने हमें ऐसा कैमरा दिया है, जिससे पास से पास और दूर से दूर वस्तु को भी हम आँखों को आगे-पीछे किये बिना मजे में देख सकते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-April
पिटसवर्ग (अमेरिका) की एक एल्युमिनियम कम्पनी (अल्कोआ) की फिल्म डाइरेक्टर राल्फ लाइन्स हॉय संगीत से बड़ा प्रेम रखते हैं। वे स्वयं एक सुप्रसिद्ध वायलिन वादक और उनकी धर्मपत्नी ग्रेश्चेन अच्छी पियानोवादक हैं। दोनों एक दिन संगीत का अभ्यास कर रहे थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-November
श्री क्लार्क मनुष्य की प्रगति में बड़ा विश्वास रखते हैं उन्होंने फिल्में भी बनाई हैं। उनकी ‘2001 स्पेश ओडेसी’ फिल्म ने अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पाई है, उसमें श्री क्लार्क ने यही दिखाया है कि आज का मनुष्य पहले के बर्बर और अज्ञान ग्रस्त मनुष्य की तुलना में बहुत अच्छा है, उसने साधारण बौद्धिक विकास किया है उसके सहारे वह एक दिन न केवल ब्रह्माण्ड वरन् जीवन के अन्तराल में भी प्रवेश करेगा और सारी पृथ्वी में ‘विश्व-बन्धुत्व’ एकात्मा, परस्पर प्रेम और आत्मीयता पूर्ण जीवन का विकास करेगा
2&156&60&60&12&365 1। 3&50=307686600000 सेंटीमीटर लंबी फिल्म होनी ही चाहिए। उसका यथार्थ मूल्य तो निकाल सकना मनुष्य के लिये कठिन ही नहीं असंभव सा लगता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-September
यह आँखों को प्रभावित करती है और सूर्य प्रकाश को पृथ्वी में नहीं आने देती इससे और भी हानि होती है। इसकी घातक शक्ति का सही अनुमान उस समय हुआ जब अमेरिका में सन् 1965 में क्लीवलैण्ड नगर के एक अस्पताल में एक दिन दुर्घटनावश एक्स-किरणों की फिल्म में आग लग गई। फिल्मों के जलने से नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड का धुआँ अस्पताल के वायु मण्डल में छा गया इसकी घुटन से कुछ ही घन्टों में 125 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि 48 मिलियन टन नाइट्रोजन गैसें मनुष्य के स्वास्थ्य को अन्दर ही अन्दर किस कदर खोखला बनाती होंगी?
इसकी घातक शक्ति का सही अनुमान उस समय हुआ जब अमेरिका में सन् 1965 में क्लीवलैण्ड नगर के एक अस्पताल में एक दिन दुर्घटनावश एक्स-किरणों की फिल्म में आग लग गई। फिल्मों के जलने से नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड का धुआँ अस्पताल के वायु मण्डल में छा गया इसकी घुटन से कुछ ही घन्टों में 125 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि 48 मिलियन टन नाइट्रोजन गैसें मनुष्य के स्वास्थ्य को अन्दर ही अन्दर किस कदर खोखला बनाती होंगी?
यह पिटारी उसका बहुत ही मोटा उदाहरण है। होता यह है कि कैसी भी मोटी और लंबे पन्नों वाली पुस्तक हो, उसकी माइक्रोफिल्म प्रतियाँ उतार ली जाती हैं। जिस प्रकार शीशे के ताल (लेन्स) की मदद से छोटी-से-छोटी वस्तु को बड़ा-से-बड़ा बनाकर दिखाया जा सकता है (पालिमोर आदि वेधशालाओं में ऐसे शक्तिशाली दूरबीन यंत्र हैं, जो करोड़ों मील दूर के ग्रह-नक्षत्रों को भी बड़ा करके दिखा देते हैं) उसी प्रकार बड़ी-से-बड़ी वस्तुओं को छोटा-से-छोटा किया जा सकता है। माइक्रोफिल्म में अधिकतम विस्तार वाली पुस्तकों को इतने नन्हें-नन्हें अक्षरों में अंकित कर दिया जाता है कि 1000 पृष्ठ की पुस्तक भी सिगरेट के पैकेट जितनी मोटाई में आ जाये
जिस प्रकार शीशे के ताल (लेन्स) की मदद से छोटी-से-छोटी वस्तु को बड़ा-से-बड़ा बनाकर दिखाया जा सकता है (पालिमोर आदि वेधशालाओं में ऐसे शक्तिशाली दूरबीन यंत्र हैं, जो करोड़ों मील दूर के ग्रह-नक्षत्रों को भी बड़ा करके दिखा देते हैं) उसी प्रकार बड़ी-से-बड़ी वस्तुओं को छोटा-से-छोटा किया जा सकता है। माइक्रोफिल्म में अधिकतम विस्तार वाली पुस्तकों को इतने नन्हें-नन्हें अक्षरों में अंकित कर दिया जाता है कि 1000 पृष्ठ की पुस्तक भी सिगरेट के पैकेट जितनी मोटाई में आ जाये। अलादीन के चिराग में बन्द भीमकाय असुर की कल्पना को कभी मिथ्या माना जाता था, पर आज का अणु विज्ञान उससे भी अधिक सूक्ष्म में विराट् की कल्पना तक उतर आया है। मनुष्य का शरीर जिन छोटे-छोटे कोशों (सेल्स अर्थात् मनुष्य शरीर जिस प्रोटोप्लाज्म नामक जीवित पदार्थ से बना है, उसका सबसे छोटा टुकड़ा) से बना है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-May
साहित्य, संगीत, काव्य, चित्र, अभिनय आदि कला के सभी पक्षों का परिष्कार कर उसे विनाश के चंगुल से विमुक्त कर विकास में नियोजित करना है। फिल्म उद्योग को भी नई दिशा दी जानी है। (4) अनीति और अनाचार, मूढ़ता और मूर्खता-कुरीतियों और कुनीतियों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष मोर्चे खोलने हैं, जिनमें विवाहोत्सव से लेकर अपराधी मनोवृत्ति तक हर मोर्चे पर शाँति सैनिकों द्वारा जूझना है। इसलिये विरोध असहयोग, सत्याग्रह से लेकर घिराव तक के हर शस्त्र को काम में लाया जाना है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-December
अभी मौसम का प्रकोप प्रारम्भ ही हुआ था कि वहाँ के धर्माचार्यों और भविष्य वक्ताओं ने घोषणा कर दी कि प्रलय आने वाली है, लोगों के पाप बहुत बढ़ गये हैं इसलिये भगवान पुरानी सृष्टि नष्ट करके नई सृष्टि उत्पन्न करेंगे। नये मनुष्य भले ही न गढ़े हों पर इस प्रकोप ने सचमुच ही सैकड़ों हजारों लोगों को नष्ट कर दिया, जो कभी मंदिरों में नहीं गये थे, जिन्होंने फिल्मी गीत गाये थे पर भक्तिगान जिनके ओठों को छू नहीं गया था। उन्हें भी मंदिरों में जाते और भगवान् की प्रार्थना करते देखा गया। पहली बार परस्पर सेवा, प्रेम भावना और मनुष्य का मनुष्य के प्रति इस तरह आदर करते देखकर वहाँ का हर विचारशील व्यक्ति यही कहता था कि मनुष्य सदा ही इस तरह प्रेम भाव और भाई चारे का जीवन जिए तो क्यों प्रकृति को दंड देने की स्थिति में आना पड़े
श्री बल्ली साहब की ख्याति जितनी
एक सन्त के ईश्वर उपासक के रूप में है उससे अधिक एक भविष्यवक्ता के रूप
में। शुद्ध चित्त में भावी जगत के चित्र फिल्म के पर्दे पर दिखाये जा रहे
चल-चित्र कि तरह स्पष्ट और साफ उतरते चले आते हैं, यह बात श्री बल्ली साहब
के जीवन से चरितार्थ हो जाती है। उन्होंने कभी क्रोध नहीं किया था, किसी
जीव को सताया नहीं था, शराब और माँस वे किसी दिन आँख से देख लेते थे तो उस
सम्पूर्ण दिन उपवास रखते थे और भगवान से प्रार्थना करते थे- हे प्रभु! ऐसी
वस्तुयें संसार में न रहें ताकि लोग मार्ग से भ्रष्ट न हों? उनका सारा जीवन
सच्चाई और नेक नीयती की प्रतिमूर्ति ही कहना चाहिये। इसीलिये उन्हें संसार
का भविष्य अपने अन्तःकरण में इतना स्पष्ट उतरता दीख जाता था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-July
अधिकाँश जनता यही देखना चाहती है। इसमें फिल्म-निर्माताओं का उतना दोष नहीं है- उनकी आदर्शवादी फिल्में लोग देखना पसन्द ही नहीं करते जबकि सस्ते ड्रामे रिपीट-रिपीट कर देखने में लोगों को प्रसन्नता होती है। यह साँस्कृतिक मूल्य, सामाजिक मनोवृत्ति के कारण ही बदले हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-December
शिकागो डाऊनटाऊन का यह 12 मंजिला होटल व इसकी एनेक्सीज पुराने स्थल से प्रायः 2 मील दूर स्थित था। जहाँ पुरानी संसद में भागीदारों की संख्या अधिक से अधिक सात सौ थी तथा एक ही केन्द्रीय हॉल में सारी गतिविधियाँ संपन्न हुईं थीं, वहाँ इसमें भाग लेने वालों की संख्या साढ़े सात हजार से अधिक थी, एक ही समय में प्रायः साठ से अधिक स्थानों पर मेजर प्रजेण्टेसन, वर्कशाप, सेमीनार, सिम्पोजियम, साँस्कृतिक गतिविधियाँ, वीडियो फिल्म शो, ध्यान शिक्षण, स्लाइड शो आदि संपन्न हो रहे थे। एक व्यक्ति अधिक से अधिक पाँच या छह गतिविधि में एक दिन में भाग ले सकता था। साथ में एक शानदार प्रदर्शनी भी लगायी गयी थी जिसमें विभिन्न धर्म, संप्रदायों की ओर से स्टाल्स लगाए गए थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-April
वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में किया गया अध्ययन स्पष्ट करता है कि सामाजिक परिवेश से मिलने वाले उद्दीपन व्यक्ति में इन्हीं अवचेतन के संस्कारों को भड़काने वाले सिद्ध हो रहे हैं। सिनेमा में नग्न नर्तन की भरमार ब्लू फिल्मों का पकड़ता जोर अश्लील विज्ञापन व्यक्ति के अतिचेतन के प्रवाह को रोककर उसे मनुष्य से पुनः पशु में परिवर्तन कर रहे हैं। ‘मनुष्य रूपेण मृगाश्चरंति’ की उक्ति अपनी सार्थकता की अभिवृद्धि करती जा रही है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-November
सेमीनार व वर्कशाप के लिए चार बड़े हालों की व्यवस्था की गयी थी। कॉलेज के ड्रामा थिएटर में ऋषि चिंतन’युगपुरुष “संजीवनी साधना ‘तथा भारत के अश्वमेधों की वीडियो फिल्में दिखाया जाना 9 जुलाई को प्रातः से ही आरंभ हो गया था। प्रदर्शनी सभी के आकर्षण की मूल बिंदु थी। लंबी-लंबी लाइनें लगी थीं ताकि सभी क्रम से अंदर जाकर अनुशासित ढंग से अध्यात्म के विज्ञान सम्मत प्रतिपादन को देख समझ सकें प्रायः सौ परिजनों ने भोपाल’भारत’से आए श्रीदत्तात्रेय एम. जोशी के सहायक के रूप में पिछले चार-पाँच दिन से रात-दिन लग कर यह विशाल प्रदर्शनी खड़ी की थी कैप्शन्स लिखे थे एवं लगभग एक हजार चित्रों, ट्राँसपेरेसी तथा वैज्ञानिक उपकरणों-माडल्स के सहारे देवसंस्कृति का आमूलचूल एक नया ढाँचा खड़ा कर दिया था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-May
विश्वास-चिकित्सा की विविध शाखाओं के संस्थापकों में फिल्मोर दंपत्ति विशेष उल्लेखनीय हैं। वे आरंभ में स्वयं भी बीमार थे, किन्तु अपने अगाध ईश-विश्वास के कारण जब स्वस्थ हुए, तो इसका प्रयोग अन्य अनेकों पर किया और उन्हें कष्टसाध्य व्याधियों व्याधियों से मुक्ति दिलायी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-July
इस साल जो युगनिर्माण सम्मेलन हुए है उन सम्मेलनों की बात याद है यहाँ तक कि शिविर चलते हैं उनकी बात याद है। गवर्नमेंट के कितने शिविरों को हम चलाते है इसकी बाद याद है यहाँ का फिल्म स्टूडियो टीवी स्टूडियो फिल्म चलाने वाले है यह सब बाते आपका याद है। बहुत बड़ा काम है बहुत बड़ी योजना है इस काम को हमने आरंभ किया लेकिन अब यह जिम्मेदारी हम आपके सुपुर्द करते हैं। आप में से हर आदमी को हम यह काम सौंपते हैं कि आप हमारे बच्चे के तरीके से हमारी दुकान को चलाइये बन्द मत होने दीजिये हम तो अपनी विदाई ले जायेंगे लेकिन जिम्मेदारी आपके पास आयेगी आप कपूत निकलेंगे तो तो फिर आदमी आपकी बहुत निंदा करेगा और हमारी बहुत निंदा करेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
उससे अधिक सस्ता मनोरंजन का साधन लोगों को और कोई नहीं जँचता। पुराने समय में फिल्में लोकप्रिय उपन्यासों, उत्कृष्ट व्यक्तियों के आधार पर ही बनती थीं, लेकिन आज इसके ठीक विपरीत स्थिति को देखा जा सकता है। शास्त्रीय संगीत के स्थान पर पाश्चात्य धुनों पर पॉप–जॉज की उत्तेजक धुनों पर आधारित संगीत की ही सर्वत्र भरमार है। मनोरंजन के इन उथले, गुदगुदाने वाले एवं कुत्सित भावनायें भड़काने वाले जाल-जंजाल में फँसने से सब प्रकार की हानियाँ उठाते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है
सिनेमा और वीडियो फिल्मों का एक नया दौर और चल पड़ा है। उससे अधिक सस्ता मनोरंजन का साधन लोगों को और कोई नहीं जँचता। पुराने समय में फिल्में लोकप्रिय उपन्यासों, उत्कृष्ट व्यक्तियों के आधार पर ही बनती थीं, लेकिन आज इसके ठीक विपरीत स्थिति को देखा जा सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-February
ट्रेवर जेम्स ने इन्फ्रारेड मूवी फिल्म के लिए प्रयुक्त होने वाले एक विशेष कैमरे आई.आर. 135 का उपयोग करके मोजावे रेगिस्तान के अन्तरिक्ष की स्थिति चित्रित की है। फिल्म में ऐसे पक्षी दिखाई पड़ते हैं, जो स्थूल चक्षुओं से कभी दिखाई नहीं पड़ते
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-August
बौनों में भी कभी-कभी ऐसी विशेषताएँ जाती हैं जिनसे भाग्य पर पुरुषार्थ की विजय का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है। फ्राँस का प्रसिद्ध चित्रकार और फिल्म अभिनेता तुलूज लात्रे अपनी प्रतिभा के कारण ही प्रख्यात हुआ था, पर उसके बौनेपन ने इस प्रसिद्ध में और भी चार चाँद लगा दिये थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-October
इसीलिए उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करते हुए उसने मॉडलिंग का पेशा अपना लिया था। संयोग से वह अवसर वर्ष भर में ही आ गया जब ‘ट्रवण्टियथ सेन्चुरी फोक्स’ ने उसे फिल्मों में काम करने के लिए निमन्त्रित किया। मरलिन वहाँ पहुँची और स्क्रीन टेस्ट दिया। जिस कैमरा मैन ने उसके चित्र खींचे थे, उसने मरलिन के चित्रों को देखकर यह सम्मति दी थी कि यह अभिनेत्री शीघ्र ही फिल्म दर्शकों की हृदय सामग्री बन जाएगी
साल भर बाद ठीक होकर नारमा की माँ आ गयी और अपनी लाड़ली को अपने साथ रखने लगी। नारमा की माँ ग्लैडिशबेकर ने एक फिल्म स्टूडियो में रील काटने की नौकरी कर ली थी। इसके बदले जो भी मिलता उससे माँ बेटी अपना गुजारा करतीं
क्या अमरीकी और क्या गैर अमरीकी सभी फिल्म दर्शकों की जबान पर मर्लिन-मनरो की चर्चा थी। उस वर्ष 5 अगस्त को यह अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने वाली, फिल्म प्रेमियों की चहेती अभिनेत्री प्रातःकाल अपनी कोठी में मृत पायी गयी थी। इस अभिनेत्री के पास बताते हैं कि इतनी दौलत थी, जिससे वह विश्व के सर्वाधिक सम्पन्न व्यक्तियों की गणना में आ जाती थी। उनसे भी अधिक महत्त्व था उसका
उस समय मरलिन की आयु 22 वर्ष की थी। स्क्रीन टेस्ट में सफल हो जाने के बाद मरलिन को ‘स्काड हू’ नामक फिल्म के लिए अनुबन्धित कर लिया गया
यह लोकप्रियता मरलिन की लोकप्रियता ही थी। इसी से प्रभावित होकर हालीवुड की एक फिल्म कम्पनी ने मरलिन की ओर हाथ बढ़ाया। यह तो वह चाहती ही थी। कुछ समय पहले उसने स्वयं फिल्म जगत में प्रवेश पाने के लिए हाथ-पैर मारे थे पर असफलता ही मिली थी
यह कैलेण्डर और उसमें चित्रित चेहरा लोगों ने इतना पसन्द किया कि उक्त कम्पनी ने इससे साढ़े सात लाख डॉलर का मुनाफ़ा कमाया। समझा जा सकता है कि फिल्म के रूपहले पर्दे पर आने से पहले मरलिन ने अपनी सुन्दरता के बल पर कितने लोगों को अपना प्रशंसक बना लिया था
सुन्दर तो वह थी ही। अपनी सुन्दरता का अहसास भी उसे इतना जबर्दस्त था कि उसी के बल पर उसने फिल्म जगत में प्रवेश पाने और चमकने को स्वप्न संजोया
जब उसकी फिल्म बनकर तैयार हुई और प्रदर्शित हुई तो सारे सिनेमाहॉल जिनमें कि वह फिल्म चल रही थी आदि से अन्त तक दर्शकों से खचाखच भरे रहे। अपनी पहली फिल्म से ही इतनी लोकप्रियता प्राप्त कर लेने वाली मरलिन दिनों दिन ऊंचाइयों चढ़ती गयी। लेकिन जैसे-जैसे वह प्रसिद्ध होती गयी जैसे-जैसे उसके पास सम्पत्ति का अम्बार जुटने लगा, उसकी भावनाएँ असन्तुलित होने लगीं। फिल्म-जगत में रहते हुए उसने दो और विवाह किये; पर उसकी यही शिकायत रही कि मुझे सच्चा प्यार देने वाला कोई नहीं मिला
लेकिन जैसे-जैसे वह प्रसिद्ध होती गयी जैसे-जैसे उसके पास सम्पत्ति का अम्बार जुटने लगा, उसकी भावनाएँ असन्तुलित होने लगीं। फिल्म-जगत में रहते हुए उसने दो और विवाह किये; पर उसकी यही शिकायत रही कि मुझे सच्चा प्यार देने वाला कोई नहीं मिला। वह हमेशा ही यह कहती रहती कि मेरे पास जो भी आया और जिसने भी प्रेम करना चाहा वह या तो मेरी दौलत की ओर देखता था अथवा मेरी सुन्दर और कमनीय देह को देखकर आकृष्ट होता था
मरलिन वहाँ पहुँची और स्क्रीन टेस्ट दिया। जिस कैमरा मैन ने उसके चित्र खींचे थे, उसने मरलिन के चित्रों को देखकर यह सम्मति दी थी कि यह अभिनेत्री शीघ्र ही फिल्म दर्शकों की हृदय सामग्री बन जाएगी। उस समय मरलिन की आयु 22 वर्ष की थी। स्क्रीन टेस्ट में सफल हो जाने के बाद मरलिन को ‘स्काड हू’ नामक फिल्म के लिए अनुबन्धित कर लिया गया
जब उसकी फिल्म बनकर तैयार हुई और प्रदर्शित हुई तो सारे सिनेमाहॉल जिनमें कि वह फिल्म चल रही थी आदि से अन्त तक दर्शकों से खचाखच भरे रहे। अपनी पहली फिल्म से ही इतनी लोकप्रियता प्राप्त कर लेने वाली मरलिन दिनों दिन ऊंचाइयों चढ़ती गयी। लेकिन जैसे-जैसे वह प्रसिद्ध होती गयी जैसे-जैसे उसके पास सम्पत्ति का अम्बार जुटने लगा, उसकी भावनाएँ असन्तुलित होने लगीं
घटना सन् 1962 की है। क्या अमरीकी और क्या गैर अमरीकी सभी फिल्म दर्शकों की जबान पर मर्लिन-मनरो की चर्चा थी। उस वर्ष 5 अगस्त को यह अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने वाली, फिल्म प्रेमियों की चहेती अभिनेत्री प्रातःकाल अपनी कोठी में मृत पायी गयी थी। इस अभिनेत्री के पास बताते हैं कि इतनी दौलत थी, जिससे वह विश्व के सर्वाधिक सम्पन्न व्यक्तियों की गणना में आ जाती थी
यह तो वह चाहती ही थी। कुछ समय पहले उसने स्वयं फिल्म जगत में प्रवेश पाने के लिए हाथ-पैर मारे थे पर असफलता ही मिली थी। इसीलिए उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करते हुए उसने मॉडलिंग का पेशा अपना लिया था। संयोग से वह अवसर वर्ष भर में ही आ गया जब ‘ट्रवण्टियथ सेन्चुरी फोक्स’ ने उसे फिल्मों में काम करने के लिए निमन्त्रित किया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-November
प्रतिकूलताओं की छोटी तस्वीरों को फिल्म प्रोजेक्टर पर चढ़ाने से एक ऐसी डरावनी कहानी को आँखों के सामने घुमाना आरम्भ किया जा सकता है, जिसे देखते देखते दम घुटने लगे और पसीना छूटने लगे। सोचा यह जाता है कि हम सुख चैन से जियें। मनोवाँछित परिस्थितियाँ उपलब्ध होती रहें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
फरवरी की महिला जागृति अभियान पत्रिका को संगठन अंग के रूप में छापा जा रहा है॥ इस अभियान को अपने परिवार से आरम्भ करके देश-व्यापी विश्व -व्यापी बनाने के लिए हमें क्या सोचना और क्या करना चाहिए? इस दिशा में आवश्यक मार्ग-दर्शन इस अंग में दिया जा रहा हैं। उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा और पढ़ाया जाय- तो यह रूप रेखा सहज ही मस्तिष्क में प्रेरक फिल्म की तरह भ्रमण करेगी, जिसमें थोड़े से प्रयत्न से इस महान् कार्य में महत्त्वपूर्ण योगदान करने की रूप रेखा सामने होगी। जो लोग अभी तक महिला पत्रिका के सदस्य न बने हो वे शान्ति -कुंज उसका चन्दा भेजकर अपनी सदस्यता चालू करा लें आन्दोलन के स्वरूप और मार्गदर्शन को परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए इस पत्रिका का शुभारम्भ किया गया हैं। महिला जागरण शाखा का गठन-नारी उत्कर्ष की हलचलों का आरम्भ एक ऐसा कार्य समझा जायेगा जिसे स्वर्ण जयन्ती वर्ष का स्मारक स्तम्भ कहा जा सकें
उसे नित्य कर्म में सम्मिलित रखा जाय। मस्तिष्क में ऐसी कल्पना फिल्में घूमती रहनी चाहिए जिनमें उत्कृष्ट चरित्रों के घटनाक्रम एवं संस्मरण भरे पड़े हों। जीवन समस्याओं के सुलझे हुए समाधान प्रस्तुत करने वाली पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र हो सकती है। इस स्वाध्याय के लिए सत्साहित्य को उपलब्ध करने के साधन जुटाये जाएँ
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-December
कैसे? यह मैं नहीं जानती। जान को बचपन से ही माँस और अण्डों से अरुचि रही है, उसने कठिन शीत में भी कभी बियर नहीं पी, कभी फिल्मी गीत गाते नहीं सुना, भगवान की भक्ति की प्रार्थनाएँ ही उसे प्रिय रही है। एक बार फ्लोरिडा एक भारतीय महात्मा पधारे- जान स्वयं ही उनसे मिलने गई। उनसे बहुत सारी बातें पूछती रहीं, आज भी वह भारतीय पद्धति से भगवान् की उपासना करती है
स्कूली छात्रों को पाठ याद न होने की शिकायत रहती है, पर वे ही किसी देखी हुई फिल्म का पूरा कथानक भली प्रकार सुना देते हैं और साथ ही उसके गीत भी याद रखते हैं। दादी अपनी पोती का नाम बार-बार भूल जाती है पर अपने पति या ससुर की श्राद्ध तिथि नहीं भूलती। व्रत उपवास की तिथियाँ भी विस्मरण नहीं होती
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-January
यही है आन्तरिक महाभारत की पृष्ठभूमि प्रत्यक्ष संग्राम तब खड़ा होता है जब अभ्यस्त गन्दे विचारों को उभरने न देने के लिए कड़ी नजर रखी जात है और जब भी वे प्रबल हो रहे हों तभी उन्हें कुचलने के लिए प्रतिपक्षी सद्विचारों की सेना सामने ला खड़ी की जाती है। व्यभिचार की ओर जब मन चले तो इस मार्ग पर चलने की हानियों का फिल्म चित्र मस्तिष्क में घुमाया जाय और संयम से हो सकने वाले लाभों का- उदाहरणों का- सुविस्तृत दृश्य आँखों के सामने उपस्थित कर दिया जाय। यह कुविचारों और सद्विचारों की टक्कर हैं यदि मनोबल प्रखर है और न्यायाधीश जैसा विवेक जागृत हो तो कुविचारों का परास्त होना और पलायन करना सुनिश्चित है। सत्य में हजार हाथी के बराबर बल होता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-July
उस स्थिति में अंतर्मन निर्भय और निश्चिन्त होकर जो कुछ कर रहा होता है उसे स्वप्न स्थिति समझना चाहिए। अस्तु इस मुफ्त की फिल्मों का विश्लेषण करते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्तित्व के अंतरतम स्थल पर क्या कुछ बन या पक रहा हैं। यह जानकारी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। उससे रोग परीक्षा में रक्त, मल, मूत्र आदि का विश्लेषण करके निदान करने की तरह चेतना की परतों के सम्बन्ध में भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है
एक दिन श्रीमती मैसी (वाल्टर जे. मैसी की पत्नी) अपने घर आये मेहमान मिस्टर हाफमैन के लिए चाय बना रही थी। चाय प्याले में छानी ही थी कि गजब हो गया जिस प्रकार त्राटक सिद्ध अपनी वेधक दृष्टि से अपने दोनों अँगूठों के नाखूनों में दूर के दृश्य देख लेते हैं उसी तरह उन्हें प्याले में फिल्म की तरह विलक्षण दृश्य दिखाई दिया। उन्होंने देखा एक होटल में एक क्रूर मनुष्य घुसा, सेकेण्डों में उसने उसके मैनेजर को गोली मार दी, रुपये पैसे छीने वापस कार में बैठा और भाग खड़ा हुआ। कार के बाहर निकलते ही दो मोटर साइकिलें उसका पीछा करती दिखाई दी
उन्हें ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिए और उनमें जो प्रेरक प्रसंग हो अपनी वर्तमान परिस्थितियाँ कार्यान्वित हो सकते योग्य हो, उन्हें अलग से नोट कर लेना चाहिए। जब भी अवकाश मिले उन प्रसंगों के कल्पना चित्र मस्तिष्क में एक सुनियोजित फिल्म का तरह प्रस्तुत करने चाहिए। श्रेष्ठ मार्ग पर चलते हुए समुन्नत स्थिति तक पहुँचे हुए महामानवों की जीवनियाँ, गतिविधियाँ, नीतियाँ आदि अपने कल्पना लोक में दृढ़तापूर्वक जड़े जमा सके और अनायास ही स्मरण आती रहे तो समझना चाहिए कि बाहरी दुनिया के पतनोन्मुख प्रभात को निरस्त कर सकने वाला स्वनिर्मित वातावरण बनकर तैयार हो गया
एक स्वप्न दर्शन की अवधि में व्यक्ति करवट कभी नहीं बदलता। स्वप्न दर्शन के समय पुतलियों की गतिविधि वैसी ही होती है जैसी कोई फिल्म देखते समय
वास्पा एडर को देख खिल उठा। फिल्म के समय दिखाए गए करतब दुहराने लगा
क्रीमिया में डान क्विग्जोट पर फिल्म बनने के दौरान बोरिस एडर ने लेनिनग्राड चिड़ियाघर के एक शेर वास्पा का भी सहयोग लिया। डेढ़ वर्ष बाद एडर लेनिनग्राड गया और वास्पा से मिला। वास्पा एडर को देख खिल उठा
यह अनुमान है कि इस तत्व की व्यापक प्रक्रिया मस्तिष्क में चल पड़े तो मनुष्य सहज ही ब्रह्माण्ड व्यापी ऊर्जा के साथ सम्बन्ध स्थापित करने लगेगा और अपनी ज्ञान परिधि को इतना असीम बना लेगा कि उसकी कल्पना करना भी कठिन हो। उस स्थिति में मनुष्य धरती की एक बन्द कोठरी में ही वह सारे दृश्य फिल्म की भाँति देख सकेगा जो चन्द्रमा या मंगल पर जाकर कोई मनुष्य या उपकरण देख सकता है और उतना ही स्पष्ट
एक दूसरे प्रयोग में किर्लियान दम्पत्ति ने एक रुग्ण पत्नी की फिल्म खींची इसमें प्रकाश कणों का वह वलय आरम्भ से जीर्ण था और वह शीघ्र ही समाप्त भी हो गया। अगले प्रयोग में किर्लियान दम्पत्ति ने एक मनुष्य के पास से उसके शरीर के चित्र इसी विशेष विधि से लिये। ये छाया चित्र उसके शरीर के विभिन्न भागों के लिये गये थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-April
फोटो लेने के लिए अच्छे कैमरों के लेन्स भी पहले एक निश्चित नाभ्यान्तर पर फिट करने होते हैं। फिल्मों तक में फोटो दृश्य और कैमरे की दूरी का सन्तुलन मिलाकर फोकस सही करना पड़ता है। इस व्यवस्था को बनाये बिना अभीष्ट फोटो खिंच ही नहीं सकेगा। किन्तु नेत्र संरचना में ऐसा कुछ साथ करना पड़ता
मास्को निवासी कुमारो माइखोनोवा रूसी वैज्ञानिकों के लिए एक दिलचस्प शोध का विषय रही है। वह अपने दृष्टिपात से चलती घड़ियाँ बन्द कर देती थीं अथवा सुइयाँ आगे पीछे छुपा देती थीं इसके करतत्रों की फिल्म बना कर कितनी ही प्रयोगशालाओं में भेजी गई ताकि अन्यत्र भी उस विशेषता के संबन्ध कार्य चलता रह सकें। वैज्ञानिकों ने इसे मस्तिष्कीय विद्युत की चुम्बकीय शक्ति-इलेक्ट्रो-फार्म की विद्यमानता निरूपित किया है। वे कहते हैं यह शक्ति हर मनुष्य में मौजूद है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-December
एक दिन वह अपने आफिस में बैठे हुये कुछ काम कर रहे थे। जैसे चलचित्र में पर्दे पर कहानी के दृश्य एक पर एक उभरते हुए चले आते है, विचारों को फिल्म में एकाएक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जैसे मार्टिन किसी दीवार को पेन्टिंग करते समय सीढ़ियों से लुढ़क कर गिर पड़ा है, उसके सारे शरीर में पेन्ट के से धब्बे पड़े दिखाई दिये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-September
जब डा.पेनफील्ड ने उस लड़की की माता से पूछा तो माता ने बताया कि सचमुच जब वह 3 वर्ष की थी तब ऐसी घटना घटी थी। आमतौर पर 3 वर्ष की बालिका को कोई घटनायें याद नहीं रहतीं पर इस प्रयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि मनुष्य के मस्तिष्क में न जाने कितने जीवनों के संस्कार छिपे पड़े हैं और वह फिल्म की रील की तरह जाग्रत और स्वप्नावस्था में गूँजते रहते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-January
1947 में सेना से छुट्टी लेने के बाद भी वह पाप छाया की तरह उसका पीछा करता रहा। जहाँ भी वह फोटो और फिल्में देखता वही उसके सिर भूत सवार होता। उसके कानों में सैकड़ों जख्मी जापानियों की चीख पुकारें गूँजने लगती। एक दिन तो उसने पश्चाताप से आविर्भूत अपनी एक रक्त वाहिनी नली ही काट डालीं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-March
युग-निर्माण योजना का आरम्भ और अन्त तथा बीच में हो चुके और होने वाले कार्यक्रमों का स्वरूप, यह सभी बातें एक कथानक के रूप में प्रस्तुत की जायेगी। इन्हीं पर एक पूरी फिल्म बनेगी। उसमें अभिनय कर्ता अपने शिविरार्थी हो होंगे। प्रयत्न यह किया जाएगा कि चारों शिविरों में आने वाले प्रायः सभी सदस्यों को उसमें किसी रूप में भाग लेने का अवसर मिल जाय
इस बार एक अन्य अनोखा कार्यक्रम भी है, जो कभी पहले नहीं हुआ और न आये होने की सम्भावना है। वह है अपनी कार्य पद्धति पर एक रंगीन फिल्म का निर्माण। युग-निर्माण योजना का आरम्भ और अन्त तथा बीच में हो चुके और होने वाले कार्यक्रमों का स्वरूप, यह सभी बातें एक कथानक के रूप में प्रस्तुत की जायेगी। इन्हीं पर एक पूरी फिल्म बनेगी
ताकि इन सभी की छवियाँ चित्र-बद्ध होकर एक चिरस्थायी स्मृति के रूप में विद्यमान् रहें। यह फिल्म समय-समय पर अपनी ही सिनेमा मशीनों से शाखाओं में दिखाने के लिये भेजे जाते रहें थे और परिवार के दूरगामी सदस्य भी इस माध्यम से परस्पर एक दूसरे के दर्शन का लाभ लेते रह सकेंगे। नव-निर्माण के कार्यक्रमों की जानकारी और प्रेरणा सर्वसाधारण को देने के लिये तथा परिजनों का परिचय एक दूसरे तक कराये रखने की दृष्टि से यह फिल्म व्यवस्था उपयोगी समझी गई और उसका प्रबन्ध किया गया
यह फिल्म समय-समय पर अपनी ही सिनेमा मशीनों से शाखाओं में दिखाने के लिये भेजे जाते रहें थे और परिवार के दूरगामी सदस्य भी इस माध्यम से परस्पर एक दूसरे के दर्शन का लाभ लेते रह सकेंगे। नव-निर्माण के कार्यक्रमों की जानकारी और प्रेरणा सर्वसाधारण को देने के लिये तथा परिजनों का परिचय एक दूसरे तक कराये रखने की दृष्टि से यह फिल्म व्यवस्था उपयोगी समझी गई और उसका प्रबन्ध किया गया
उससे 10 लाख से लेकर एक हजार करोड़ कम्पन प्रति सेकेण्ड की कर्णातीत ध्वनि तक तैयार कर ली गई है और उससे दूर–दूर तक सन्देश भेजने धातुओं को काटने–छीलने आदि का महत्त्वपूर्ण कार्य लिया जाता है। फोटो के अत्यन्त सूक्ष्मकारी फिल्मों के ‘इमल्शन’ विभिन्न प्रकार के रंग (पेन्ट) बनाने की रासायनिक औषधियों का निर्माण और सर्जरी तक का काम इस ध्वनि शक्ति से लिया जाता है। अनेक एण्टी बायोटिक औषधियों और इञ्जेक्शन भी इस ध्वनि शक्ति से निर्माण किये जाते है। रूस में अनेक व्यवसायिक प्रयोजन पूरा करने में उसका उपयोग होता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-February
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नोवारो ने अपने एक स्वप्न एक दुःखी लड़के का बड़ा हित किया था, उस घटना की चर्चा उसने इस प्रकार की है-मैं जिस सराय में ठहरा था उसका स्वामी मर चुका था। उसके दो लड़कों में उत्तराधिकार को लेकर लड़ाई चल रही थी। सराय का स्वामी वसीयत लिखकर कहीं छोड़ गया, उसके न मिलने से एक भाई तो सारी सम्पत्ति पर अपना अधिकार बताता है और दूसरा छोटा, सीधा और भोला होने के कारण सताया जा रहा था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-August
जब डा.पेनफील्ड ने उस लड़की की माता से पूछा तो माता ने बताया कि सचमुच जब वह 3 वर्ष की थी तब ऐसी घटना घटी थी। आमतौर पर 3 वर्ष की बालिका को कोई घटनायें याद नहीं रहतीं पर इस प्रयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि मनुष्य के मस्तिष्क में न जाने कितने जीवनों के संस्कार छिपे पड़े हैं और वह फिल्म की रील की तरह जाग्रत और स्वप्नावस्था में गूँजते रहते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-October
जीन डिक्सन छोटी अवस्था में ही बहुत विख्यात हो चुकी थी। एक बार एक असफल और निराश फिल्म अभिनेत्री उसके पास आई और पूछा-मुझे अपना अभिनय जारी रखना चाहिये अथवा एक छात्रावास चलाना चाहिए, दोनों में से मेरे लिए क्या लाभदायक रहेगा। ” जीन ने हँसते हुए कहा-बहन मनुष्य कार्यक्षेत्र में स्वतन्त्र है, परिश्रम से भाग्य की लकीरें भी बदली जा सकती है, तुम यदि परिश्रम करती रहो तो अपने क्षेत्र में ही पर्याप्त सफलता प्राप्त कर सकती हो, मेरी ड्रेसप नाम की उक्त अमेरिकी अभिनेत्री इन शब्दों से बहुत प्रभावित हुई और वह पुनः कला के क्षेत्र में निष्काम परिश्रम करने लगी, उसे उस क्षेत्र में बड़ी सफलता मिली। एक दिन वह अमेरिका की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री बनी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-November
इसके लिये अपने गौरवास्पद साँस्कृतिक इतिहास को कलात्मक किन्तु प्रेरक आदर्शवादी परम्पराओं के साथ प्रस्तुत करना पड़ेगा। इस प्रयोजन की पूर्ति करने वाले कथानकों से हमारा पुराण साहित्य एक विशालकाय समुद्र की तरह बिखरा पड़ा है उसमें से मन चाहे मोती—कितनी ही बड़ी संख्या में बीने जा सकते हैं और उन आधारों को लेकर व्यक्ति और समाज को बदल देने वाले—भटकाव को दिशा निर्देश देने वाले अगणित ऐसे कथानक निकल सकते हैं जिनके आधार पर फिल्म बनाये जाते रहें और लोकरंजन के साथ−साथ लोक−मंगल का प्रयोजन बहुत सरलता और सफलता के साथ सम्पन्न किया जाता रहे
यों पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों पर कितने ही फिल्म बने और चले हैं। धार्मिक, तीर्थयात्रा—परक कितने ही फिल्म सामने आये हैं पर उनमें निरुद्देश्य कथा प्रसंग ही भरे पड़े हैं। दिशा और प्रेरणा मिलने की अपेक्षा उनसे चमत्कारवाद से अन्धविश्वास जैसी प्रतिगामी मान्यतायें ही दर्शकों के मन पर जमती हैं
रेडियो प्रसारण सुनने वाले भी इन सिनेमा दर्शकों की अपेक्षा कहीं कम हैं। प्रचार का सबसे प्रमुख और सबसे व्यापक साधन इन दिनों फिल्म मंच ही बना हुआ है। इस मंच से जो सिखाया गया है−सिखाया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है जिसे सराहा जा सके, वह नगण्य है। ऐसी दशा में यही उचित समझा गया कि फिल्म निर्माण का एक समानान्तर मंच तैयार किया जाय जो अनुपयुक्त के मुकाबले उपयुक्त को रखकर जनता को यह निर्णय करने का अवसर दे कि उसे क्या अपनाना और क्या छोड़ना है
सौ फिल्म बनाने की योजना मस्तिष्क में है। उतना न सही दस सही—दस न सही पाँच या दो सही पर कार्य तो आरम्भ करना ही है ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि प्रगतिशील फिल्में असफल नहीं होतीं। कौशल की कमी ही असफल होती है
पुस्तक प्रकाशन सन् 75 के मध्य तक आरम्भ होने की आशा है। फिल्मों के सम्बन्ध में आवश्यक खोज−बीन की जा रही है और वे सब तैयारियाँ करके रखी जा रही हैं जिनके हाथ में रहने से जब भी पूँजी का प्रबंध हो जाय तभी तत्काल कदम बढ़ाने में कोई कठिनाई न रहे
साहित्य की तरह ही हमें फिल्म निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ेगा। योजना सौ फिल्मों की—भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रत्येक पक्ष की—अति कुशलतापूर्वक निर्माण करने की है; जिनमें देश भर के सिनेमा−गृह आच्छादित रहें। लोकरंजन और लोकमंगल का समुचित समावेश करने का ध्यान रखा जाय तो उसके फेल होने का कोई कारण नहीं
आश्चर्य की ही बात है कि इस प्रयोजन के लिए पूँजी के नाम पर एक पैसा भी हाथ में न होने पर भी यह विश्वास किया जा रहा है कि निकट भविष्य में यह मात्र कल्पना न रहेगी, वरन् कोई न कोई ऐसा आधार बन जायगा, जिससे फिल्म निर्माण जैसी महंगी योजना को भी कार्यान्वित किया जा सके। हम सदा से असम्भव समझे जाने वाले कार्य हाथ में लेते रहे हैं और साधन विहीन स्थिति में भी दुस्साहस पूर्ण कदम उठाते रहे हैं। असफलता का मुख कदाचित ही कभी देखना पड़ा है
इस क्षेत्र की उपेक्षा नहीं की जा सकती। साहित्य की तरह ही हमें फिल्म निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ेगा। योजना सौ फिल्मों की—भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रत्येक पक्ष की—अति कुशलतापूर्वक निर्माण करने की है; जिनमें देश भर के सिनेमा−गृह आच्छादित रहें। लोकरंजन और लोकमंगल का समुचित समावेश करने का ध्यान रखा जाय तो उसके फेल होने का कोई कारण नहीं
कुछ फिल्मों के कथानकों की बात इन दिनों मस्तिष्क में चल रही है। जैसे—
असफलता का मुख कदाचित ही कभी देखना पड़ा है। युग की पुकार यदि जनमानस को अवाँछनियता के चंगुल से छुड़ा कर वाँछनीयता की दिशा में घसीट ले जाने के लिये—फिल्म निर्माण को कार्य को आवश्यक समझ रही हो तो उसे भी इसलिये अपूर्ण न रहने दिया जायगा कि अपने हाथ खाली हैं और साधनों का सर्वथा अभाव है। आकाँक्षा की प्रबलता यदि सदुद्देश्य की दिशा में चल रही हो तो उसकी पूर्ति के लिये दैवी साधन जुटते रहे हैं—जुटते रहेंगे
एक फिल्म में कई कथानकों, घटनाओं या व्यक्तियों का चरित्र चित्रण सम्मिलित करना अटपटा नहीं लगेगा वरन् उससे उनका आकर्षण और भी अधिक बढ़ जायगा। मूल कथानक एक समूची सुव्यवस्थित कथा के रूप में होगा। भिन्न−भिन्न कथानक उसी संदर्भ में अलग अलग कड़ियों के रूप में जुड़ते चले जायेंगे
अपने प्रयास इस क्षेत्र में सर्वथा अभिनव एवं अद्भुत ही होंगे यह कहने की आवश्यकता नहीं। चिर प्राचीन को चिर नवीन के साथ जिस प्रकार हर क्षेत्र में संयुक्त किया गया है वही समन्वय इस फिल्म निर्माण प्रक्रिया में भी होगा। इसके द्वारा क्रान्तिकारी परिणाम उत्पन्न होने की आशा की जा सकती है
तीसरी योजना फिल्म निर्माण की है। यह एक तथ्य है कि भारत के समस्त समाचार और विचार पत्रों के जितने पाठक हैं उससे कहीं अधिक लोग हर दिन सिनेमा देखते हैं। रेडियो प्रसारण सुनने वाले भी इन सिनेमा दर्शकों की अपेक्षा कहीं कम हैं
यों पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों पर कितने ही फिल्म बने और चले हैं। धार्मिक, तीर्थयात्रा—परक कितने ही फिल्म सामने आये हैं पर उनमें निरुद्देश्य कथा प्रसंग ही भरे पड़े हैं। दिशा और प्रेरणा मिलने की अपेक्षा उनसे चमत्कारवाद से अन्धविश्वास जैसी प्रतिगामी मान्यतायें ही दर्शकों के मन पर जमती हैं। ऐसा कुछ भी उनमें नहीं होता जिससे दर्शक की अन्तरात्मा आदर्शवादी चेतना अपनाने के लिये हुलसें−उमँगें
सौ फिल्म बनाने की योजना मस्तिष्क में है। उतना न सही दस सही—दस न सही पाँच या दो सही पर कार्य तो आरम्भ करना ही है ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि प्रगतिशील फिल्में असफल नहीं होतीं। कौशल की कमी ही असफल होती है। एक−एक करके यह प्रयत्न महंगा पड़ेगा
यदि पाँच फिल्में एक बारगी बन जाँय तो उसी पैसे की उलट−पलट होती रह सकती है और नये−नये फिल्म बनते रह सकते हैं। पाँच फिल्मों में लगी पूँजी से यह कार्य अनवरत रूप से चलता रह सकता है और उससे एक सौ फिल्म बनाने जैसी असम्भव लगने वाली महत्वाकाँक्षा पूरी की जा सकती है। नवीन किन्तु स्फूर्तिवान संगीतकार अभिनेता, कलाकार उस नियमित कार्य के लिये उचित पारिश्रमिक देकर रखे जा सकते हैं
पिछले पृष्ठों पर जिन दस कथानकों का चित्रण है। इनमें से दसों न सही पाँच भी प्रथम प्रयास में एक साथ बन सके तो फिर यह आशा की जा सकती है कि भारत की महान संस्कृति का स्वरूप समझाने वाले अनेक आधार एक से एक बढ़कर कथानकों के आधार पर प्रस्तुत किये जा सकेंगे और उसी पूँजी की उलट−पुलट होते रहने से सौ फिल्म बन जायेंगे; यदि ऐसा सम्भव हुआ तो हम देखेंगे कि भारतीय जनता को अपनी गरिमामयी परम्पराओं से किस प्रकार परिचित प्रशिक्षित किया जा सकता है और उनसे लोक मानस का काया कल्प करने में कितनी महत्वपूर्ण सहायता मिल सकती है। साधन कब इस ओर कदम बढ़ाने की इजाजत देते हैं प्रतीक्षा केवल इसी बात की है। आशा की जानी चाहिये आज भले ही इस संदर्भ में घोर अन्धकार ही सामने क्यों न हो पर कल कहीं न कहीं से, किसी न किसी प्रकार प्रकाश किरणों का उदय होगा और युग की पुकार पूरी करने के लिए इस अति कठिन किन्तु अति आवश्यक कार्य को भी पूरा किया जा सकेगा
हरिश्चन्द्र, दधीचि, शुनिशेष, प्रहलाद, कर्ण, जनक, चरक, सुश्रुत आदि अगणित महामानवों के चिन्तन एवं कर्तृत्व का ऐसा निर्माण जो आज की स्थिति में ही हमें कुछ करने की प्रेरणा दे सके—रास्ता बता सके। इन महापुरुषों के अलग अलग फिल्म न बनाकर उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को एक ही शृंखला में आबद्ध किया जाय ताकि कार्यक्रमों की भिन्नता रहते हुए भी महामानवों का लक्ष्य एक ही रहने की बात स्पष्ट हो सके
इस मंच से जो सिखाया गया है−सिखाया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है जिसे सराहा जा सके, वह नगण्य है। ऐसी दशा में यही उचित समझा गया कि फिल्म निर्माण का एक समानान्तर मंच तैयार किया जाय जो अनुपयुक्त के मुकाबले उपयुक्त को रखकर जनता को यह निर्णय करने का अवसर दे कि उसे क्या अपनाना और क्या छोड़ना है। अभी तो अवाँछनीयता का एकाधिकार है। दूसरा पक्ष है ही नहीं तो जनता को मनोरंजन की आवश्यकता पूरी करने के लिए उसी को अपनाना पड़ता है जो प्रस्तुत है
यदि पाँच फिल्में एक बारगी बन जाँय तो उसी पैसे की उलट−पलट होती रह सकती है और नये−नये फिल्म बनते रह सकते हैं। पाँच फिल्मों में लगी पूँजी से यह कार्य अनवरत रूप से चलता रह सकता है और उससे एक सौ फिल्म बनाने जैसी असम्भव लगने वाली महत्वाकाँक्षा पूरी की जा सकती है। नवीन किन्तु स्फूर्तिवान संगीतकार अभिनेता, कलाकार उस नियमित कार्य के लिये उचित पारिश्रमिक देकर रखे जा सकते हैं। अपने गरीब प्रयास को अन्धाधुन्ध पैसा वसूल करने वाले प्रख्यात कलाकारों के लिए जाने की तनिक भी आवश्यकता नहीं
टैप रिकार्डरों वाली योजना अभी−अभी चालू की गई है उसने ही ढेरों पैसा माँग लिया और भविष्य के लिये लगातार खर्च की आवश्यकता बताई हैं। प्रकाशन और फिल्म के कदम अगले दिनों बढ़े तो उनकी झोली भी भरनी ही पड़ेगी। शान्ति−कुञ्ज का अकेला चना ही भाड़ नहीं फोड़ सकता। यहाँ के कार्यकर्ता जगह−जगह जाकर वैसी ही प्रशिक्षण प्रक्रियाएँ आरम्भ करेंगे और वहाँ भी जो नये ढाँचे खड़े किये जायेंगे उनकी प्राथमिक आवश्यकता कुछ न कुछ खर्चा ही करावेगी
आखिर हर क्षेत्र में हमें सेवाभावी और आदर्शवादी लोग प्रचुर परिमाण में मिल रहे हैं तो इस क्षेत्र में ही क्यों निराश होना पड़ेगा। हम उन सभी तथ्यों का उपयोग करेंगे जो फिल्म की लागत दूसरों की तुलना में कहीं अधिक सस्ती बना सकें साथ ही इस निर्माण की उत्कृष्टता एवं आकर्षक लोकप्रियता को भी अक्षुण्ण बनाये रह सके
(2) जीवन विद्या की शिक्षा घर घर तक पहुँचाने वाले साहित्य का प्रकाशन। (3) फिल्म निर्माण द्वारा लोकरंजन और लोकमंगल का अद्भुत समन्वय
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-June
उसके अभिनय ने सारे यूरोप का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। 11 वर्ष की आयु तक पहुँचते −पहुँचते वह फिल्म दर्शकों का सुपरिचित प्रिय−पात्र बन गया। ऐसा ही एक दूसरा बालक था लन्दन का कवेंट गार्डन, उसका अभिनय देखने के लिए आकुल भीड़ को हटाने के लिए एकबार तो सेना बुलानी पड़ी थी उसे इतना अधिक पारिश्रमिक मिलता था जितना पाने का अन्य किसी कलाकार को सौभाग्य न मिला। एकबार तो ‘हाउस आफ कामन्स ‘ का अधिवेशन इसलिए स्थगित करना पड़ा कि उस दिन कवेंट गार्डन द्वारा हेमलेट का अभिनय किया जाना था और सदस्यगण उसे देखने के लिए आतुर थे
फिल्मी दुनिया में तहलका मचाने वाला बाल अभिनेता विलियम हेनरी वेट्टी बाल्यकाल से ही अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देने लगा। उसके अभिनय ने सारे यूरोप का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। 11 वर्ष की आयु तक पहुँचते −पहुँचते वह फिल्म दर्शकों का सुपरिचित प्रिय−पात्र बन गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-February
दो वर्ष का होने तक उसका व्यवहार बहुत ही सज्जनतापूर्ण रहा। वे उसे गोदी में उठा कर अकसर खिलाती थीं, एक बार भारतीय चित्र वृत्त विभाग के द्वारा डाक्यूमेन्टरी फिल्म ली जानी थी, जिसमें वे बाघ को गोदी लेकर चित्र खिंचवाती। यह शूटिंग खुले में हो रहा था। दर्शकों की भीड़ बहुत थी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-January
फिल्म−उद्योग भी उसी स्तर का है। भारत से कुल मिलाकर जितने अखबार पढ़ने वालों की संख्या है, उससे अधिक सिनेमा देखने वालों की है। सारे अखबार मिलकर जैसा कुछ वातावरण बना सकते हैं, उतना अकेला सिनेमा बना सकता है
ऊपर चार विशिष्ट उद्योगों की ओर जो संकेत किया गया है, उन्हें तो विचार−क्रान्ति, नैतिकक्रान्ति और बौद्धिक−क्रान्ति की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण आधार माना जा सकता है। साहित्य−प्रकाशन, चित्र प्रकाशन, रिकार्ड−निर्माण एवं फिल्म−निर्माण के लिए यदि पूँजी और प्रतिभा जुट सके तो वह व्यावसायिक आधार भी नव−निर्माण की पृष्ठ−भूमि बनाने में अभिनव योगदान कर सकते हैं
जो भी पुराने हस्त−लिखित ग्रन्थ वहाँ मिलते हैं, उनमें यही विषय है, या कुछ ग्रन्थ अन्य विषयों के भी मिले हैं। थाईलैण्ड के सिनेमा−घरों में भारत की धार्मिक−फिल्में सफलता पूर्वक चलती हैं
साहित्यकार बनकर जो सरस्वती से व्यभिचार कर रहे है, पशु प्रवृत्तियों को भड़का कर चाँदी बटोर रहे है, हम उनका नाम लिये बिना जनता को यह बतायेंगे कि इस अनाचार ने किस प्रकार जन−जीवन का सर्वनाश किया है जो भी उस दुष्टता में संलग्न होंगे उनका मुँह काला होगा। संगीत अभिनय, कला,चित्र और फिल्मों के सहारे जिनने पशु प्रवृत्तियाँ भड़का कर मनुष्य को पशुता के गर्त में धकेला है उस सोना बटोरने वाली लिप्सा के विरुद्ध हम घृणा का अभिमान छेड़ेंगे फिर जो कोई इस कलंक कालिमा में हाथ धो रहे होंगे कलंकियों की पंक्ति में खड़े किये जायेंगे। आज इन लोगों को जनता की अज्ञानता का लाभ लेकर श्रेय सम्मान और धन−वैभव दोनों हाथों से समेटने का अवसर है कल इन्हें सड़क पर चलना और भले लोगों की पंक्ति में सिर उठा कर चल सकना कठिन हो जायगा। हम जन−आक्रोश का ऐसा वातावरण पैदा करेंगे जहाँ भी छद्म बन कर अनाचार छिपता है उन सभी छिद्रों को बन्द करके रहेंगे
इतने पर भी वह नर वैसा नहीं हो सकता, जैसा कि वह मृत व्यक्ति था। सूर, कबीर, मीरा, तुलसी, चैतन्य,विवेकानन्द, ज्ञानेश्वर आदि पर फिल्में बन चुकी हैं। जिनने पाठ किये है, वे देखने वाले को असली या नकली के भ्रम में डाल देते हैं। ’बहुरूपिये’ कई−कई तरह के वेष बदल कर दर्शकों को चक्कर में डाल देते हैं और अपनी कला का पुरस्कार पाते है
साहित्य प्रकाशन,चित्र प्रकाशन, फिल्म−निर्माण, रिकार्ड−निर्माण जैसे कुछ उद्योग ऐसे है, जिनमें तत्काल अधिकाधिक पूँजी लगानी चाहिए और देवत्व के पक्ष में लोक−मानस को मोड़ने का अभिनव प्रयत्न किया जाना चाहिए। यह कार्य वर्तमान उद्योगपति भी कर सकते हैं। उनका लालच यदि आगे न बढ़ने दे तो जन−स्तर पर भी पूँजी जुटाई जा सकती है
क्रिया या कलेवर एक जैसे होने पर भी व्यक्तियों की वास्तविकता एक जैसी नहीं हो सकती। किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की फिल्म बनाने वाले सुरत का आदमी ढूँढ़ निकालते हैं और उससे ऐक्टिंग भी वैसा ही करा लेते हैं। इतने पर भी वह नर वैसा नहीं हो सकता, जैसा कि वह मृत व्यक्ति था। सूर, कबीर, मीरा, तुलसी, चैतन्य,विवेकानन्द, ज्ञानेश्वर आदि पर फिल्में बन चुकी हैं
सारे अखबार मिलकर जैसा कुछ वातावरण बना सकते हैं, उतना अकेला सिनेमा बना सकता है। फिल्म−उद्योग में खरबों रुपयों की पूँजी लगी है, लाखों लोग काम करते हैं। महत्वपूर्ण प्रतिभाएँ उससे जुड़ी हुई हैं, पर उसकी दिशा जिस ओर है वह सबके सामने है। जन−मानस को विकृत करने में उसने जितना विष घोला है, उतना शायद ही अन्य किसी उद्योग ने घोला हो
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-May
आगे पीछे के नहीं। फोटोग्राफी, चित्रकला एवं फिल्म टेलीविजन जैसे माध्यमों से भूतकाल के दृश्य भी देखे जा सकते थे। अब तक इतनी ही उपलब्धियों से मनुष्य को सन्तुष्ट रहना पड़ा है
परीक्षण काल में उन प्राणियों में से एक−एक का प्राण हरण बिजली का करेन्ट लगाकर किया गया। मरने के उपरान्त क्या होता है इसकी फिल्म उतारी गई तो प्रतीत हुआ कि भूत प्राणी की हू−व−हू आकृति उस रासायनिक कुहरे में तैर रही है। वह निश्चेष्ट नहीं थी वरन् वैसी ही हरकतें कर रही थी जैसी कि जीवित अवस्था में वह प्राणी किया करता है। छोटे−छोटे कीड़े−मकोड़ों से लेकर चूहे, मेढ़क जितने विकसित प्राणियों तक का मरणोपरान्त हरकतों के सम्बन्ध में इस चेम्बर ने इतना प्रमाण तो दे ही दिया है कि खुली आँखों ने न दीख पड़ने वाली—तोले जो सकने वाले पदार्थ स्तर से अधिक हलकी कोई सत्ता विद्यमान रहती है और उसे विशेष उपायों में देखा जा सकता है
आमतौर से फोटोग्राफी लम्बाई−चौड़ाई का ही बोध कराती है गहराई का तो उसमें आभास मात्र ही होता है, यदि गहराई को भी प्रतिविम्बित किया जा सके तो फिर आँखों से देखे जाने वाले दृश्य और छाया अंकन में कोई भेद न रहेगा। ऐसा दृश्य प्रचलन सम्भव हो सका तो फिल्में अपने वर्तमान अधूरे स्तर की फोटोग्राफी तक सीमित नहीं रहेगी वरन् पर्दे पर रेल, मोटर, घोड़े, मनुष्य आदि उसी तरह चलते, दौड़ते दिखाई पड़ेंगे मानो वे अपने यथार्थ स्वरूप में ही आँखों के आगे से गुजर रहे हैं यदि सामने से अपनी ओर कोई रेल दौड़ती आ रही हो या शेर झपटता आ रहा हो तो बिलकुल यही मालूम पड़ेगा कि वे अब अपने ऊपर ही चढ़ बैठने वाले हैं। ऐसी दशा में आरम्भिक अभ्यास की स्थिति में सिनेमा दर्शक को भयभीत होकर अपनी सीट छोड़कर भागते ही बनेगा
निकट भविष्य में मनुष्य उन चमत्कारों को भी इन्हीं आँखों से देख सकेगा जो भूतकाल में केवल अध्यात्म विज्ञानियों के लिए ही सम्भव थे। भूतकाल की घटनाएँ सदा सर्वदा के लिए सुरक्षित रखी जा सकेंगी और उन्हें फिल्म टेलीविजन की तरह आभास मात्र स्तर पर नहीं वरन् बिलकुल उसी तरह देखा जा सकेगा जिस तरह आँखों से देखा जाता है। तब यह पहचानना कठिन हो जायगा कि जो दृश्य देख रहे हैं वह असली है या नकली। भूतकाल को हम वर्तमान में पूर्णतया वैसा ही देखेंगे मानो वह सचमुच अभी−अभी ही घटित हो रहा है और हम उसे बिलकुल असली रूप में देख रहे हैं
यों अभी उसका क्षेत्र निर्धारित प्रयोगशालाओं में ही है। फिल्म या टेलीविजन की तरह उसका विस्तार इतना व्यापक नहीं हुआ है कि जनसाधारण उससे लाभ उठा सके पर वह दिन दूर नहीं जब यह आविष्कार भी सर्व सुलभ हो जायगा। फोटोग्राफी का विज्ञान आविष्कृत होने के 112 वर्ष बाद सर्व साधारण लिए प्रयोग योग्य बन पाया था। टेलीफोन 56 वर्ष बाद—टेलीविजन 12 वर्ष बाद—एटम बम 5 वर्ष बाद—अपने आविष्कार के बाद उपयोग में आये थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-April
संसार प्रसिद्ध फिल्म ‘किंग काँग‘ में प्रमुख करतब एक भीम काय गोरिल्ला कर है। इस फिल्म को अत्यधिक ख्याति मिली
इसकी पकड़ में किसी जानवर का कोई अंग आ जाय तो उसे एक ही झटके में उखाड़ कर फेंक सकता है। संसार प्रसिद्ध फिल्म ‘किंग काँग‘ में प्रमुख करतब एक भीम काय गोरिल्ला कर है। इस फिल्म को अत्यधिक ख्याति मिली
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-July
भारत सरकार के फिल्म डिवीजन ने ‘हमारे मन्त्री’ नाम से एक वृत्त चित्र बनाया था, जिसमें पं. जवाहरलाल नेहरू की दिनचर्या, कार्यक्षमता, श्रमशीलता, चुस्ती−फुर्ती, स्वास्थ्य, सतर्कता और निस्पृहता आदि उन गुणों का दिग्दर्शन कराया था, जिनके आधार पर वे उतना अधिक कार्य करने और इतने ऊँचे पद का उत्तरदायित्व भली प्रकार वहन कर सकने में समर्थ हो सके
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-June
विद्वानों की पूजा होगी, लोग विद्याध्ययन की ओर झुकेंगे। जनता फिल्म अभिनेताओं और अभिनेत्रियों का सम्मान करती है तो नवयुवक और नवयुवतियाँ घर भाग कर भी वह बनने की चेष्टा करते हैं आज विद्यार्थियों में उद्दण्डता अनुशासनहीनता व दूषित वातावरण के कारण अन्य भी हो सकते हैं परन्तु उनमें से एक अध्यापकों का वह महान आदर्श उपस्थित न करना भी है। सार यह कि विद्यावानों का जितना हम सम्मान करेंगे उतने ही विद्वान बढ़ेंगे और देश की उन्नति होगी यह हमारा कर्तव्य है। इसी को एक प्रकार के यज्ञ के अर्थों में एक देव पूजा भी है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-May
मुहब्बत के तूफान उड़ रहे हैं। सिनेमाबाज, मनचले, शौकीन फिल्म अभिनेत्रियों से प्रेम करते हैं, उनकी तस्वीरों को आँखों में छिपाये फिरते हैं। सूरत मन में बसी हुई है, उनके हाव-भाव और भाव-भंगी का ऐसा स्मरण करते रहते हैं मानो ये ही इनकी उपास्य देवता हैं। “प्रेम का घर हो प्रेम की छत हो” के गीत उनकी जबान पर गुनगुनाते रहते हैं, उन्हीं की प्रतिध्वनि उनके कानों में गूँजती रहती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-December
जो कुछ भले या बुरे काम हम करते हैं उनका सूक्ष्म चित्र उतारकर अपने भीतर जमा करता रहता है। सिनेमा के पर्दे पर मनुष्य की बराबर लम्बी चौड़ी तस्वीर दिखाई देती है पर उसकी फिल्म केवल एक इंच ही चौड़ी होती है। इसी प्रकार पाप पुण्य का घटना क्रम तो विस्तृत होता है पर उसका सूक्ष्म चित्र एक पतली रेखा मात्र के भीतर खिंच जाता है और वह रेखा गुप्त मन के किसी परमाणु पर अदृश्य रूप से जमकर बैठ जाती है। शॉर्टहैंड लिखने वाले बड़ी बात की थोड़ी सी उलटी सीधी लकीरों से इशारों से जरा से कागज पर लिख देते हैं
मूल्य प्रत्येक भाग 2/) रु.। 3-राग दर्शन-6- तिरंगे चित्रों सहित राग भौरव और उसके परिवार की स्वरलिपियाँ मू. 3) 4-संगीत पारिजातः पं. अहोबल का लिखा हुआ प्राचीन संस्कृति ग्रन्थ 500 श्लोकों की सरल हिन्दी टीका सहित मू 21) 5-तानसेन-संगीत सम्राट तानसेन की जीवनी, स्वरलिपियाँ और तानसेन का फिल्मी ड्रामा दिया गया है, मू. 2/) 6-म्यूजिक मास्टर-बिना मास्टर के हारमोनियम, तबला और बाँसुरी सिखाने वाली पुस्तक जिसके 8 संस्करण हो चुके है मू. 1) 7-अवैयों का मेला-तरह तरह के चुने हुए 500 गायनों का संग्रह मू. 1) गवैयों का जहाज -इसमें भी तबियत खुश कर देने वाले 400 गाने हैं 1) 9-पुष्पवाटिका-भजन, गजल, प्रार्थना, आरती, फिल्म -गीत इत्यादि 404 गाने मूल्य 1) महिला हारमोनियम गाइड -स्त्री व कन्याओं के लिए मनोहर गीतों सहित बाजा बजाना बताया गया है मू.। ) 11-रुक्मणि मंगल-राधेश्यामी तर्ज में समस्त रुक्मणि मंगल की कथा 1) 12-गीता गायन-राधेश्यामी तर्ज में गीता की कथा मू. 11) ताल अंक-घर बैठे तबला बजाना सीखिये, मू. 21) संगीत मासिक पत्र भी बराबर निकल रहा है, 200 पृष्ठ के विशेषाँक सहित वार्षिक मू. 3) है
1-संगीत संसार संगीत का विशाल ग्रन्थ दूसरी बार छापकर तैयार हुआ है। मू. 4/) 2- फिल्म संगीत (चार भाग) प्रथम भाग में 70, दूसरे में 72, तीसरे में 70 और चौथे में 70 गीतों की पूरी-पूरी स्वर लिपियाँ है। मूल्य प्रत्येक भाग 2/) रु.। 3-राग दर्शन-6- तिरंगे चित्रों सहित राग भौरव और उसके परिवार की स्वरलिपियाँ मू. 3) 4-संगीत पारिजातः पं. अहोबल का लिखा हुआ प्राचीन संस्कृति ग्रन्थ 500 श्लोकों की सरल हिन्दी टीका सहित मू 21) 5-तानसेन-संगीत सम्राट तानसेन की जीवनी, स्वरलिपियाँ और तानसेन का फिल्मी ड्रामा दिया गया है, मू. 2/) 6-म्यूजिक मास्टर-बिना मास्टर के हारमोनियम, तबला और बाँसुरी सिखाने वाली पुस्तक जिसके 8 संस्करण हो चुके है मू. 1) 7-अवैयों का मेला-तरह तरह के चुने हुए 500 गायनों का संग्रह मू. 1) गवैयों का जहाज -इसमें भी तबियत खुश कर देने वाले 400 गाने हैं 1) 9-पुष्पवाटिका-भजन, गजल, प्रार्थना, आरती, फिल्म -गीत इत्यादि 404 गाने मूल्य 1) महिला हारमोनियम गाइड -स्त्री व कन्याओं के लिए मनोहर गीतों सहित बाजा बजाना बताया गया है मू.
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-April
लोबेल फिल्मोर
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-December
'फ्रन्टियर्स ऑफ द आफ्टर लाइफ' के लेखक एडवर्ड सी. रेंडेल ने भी एक ऐसी दिवंगत आत्मा के अनुभवों को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है— “मरने के बाद मैंने स्वयं को चारों ओर से स्वजन-संबंधियों से घिरा हुआ पाया, जो आत्माएँ मुझे लेने आई वे चलने को कह रही थी, किंतु उस समय सगे-संबंधी रो-धोकर मुझे न जाने के लिए बाध्य कर रहे थे” इसी तरह का कथन मूर्धन्य परामनोविज्ञानी डाॅ. जे. आर्थर फिडले का भी है। उन्होंने अपनी कृति 'व्हेयर टू वर्ल्ड्स मीट' में लिखा है कि मरणशय्या पर लेटे व्यक्ति को अपने विगत जीवन की पूरी फिल्म दिखाई देने लगती है। जो व्यक्ति दूसरी दुनिया में प्रयाण के पूर्व ही लौट आए, वे इसका प्रमाण देते हैं। ऐसे कोई 1300 हवाले उन्होंने एकत्र किए हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-October
किन्तु खेद है, इस कसौटी पर कसने में निराशा ही हाथ लगती है। फिल्में देखकर पशु प्रवृत्तियों के शिकार हुए लोगों की कितनी ही घटनाएँ नित्य प्रकाश में आती हैं। गीत संगीत के नाम पर अधिकतर फिल्मी गानों का ही उपयोग किया जाता है। प्रचलित साहित्य की भी यही हालत है
फिल्में देखकर पशु प्रवृत्तियों के शिकार हुए लोगों की कितनी ही घटनाएँ नित्य प्रकाश में आती हैं। गीत संगीत के नाम पर अधिकतर फिल्मी गानों का ही उपयोग किया जाता है। प्रचलित साहित्य की भी यही हालत है। मानवीय गुणों के प्रति आस्था जाग्रत करने वाले उपन्यास, कहानियाँ, कविताएँ कम ही दिखाई पड़ती हैं और सस्ती रोमाँटिक पुस्तकों की बाढ़ दिखाई देती है
आजकल उपयोग में लाए जा रहे साधनों में फिल्म व साहित्य की प्रमुखता है। किन्तु खेद है, इस कसौटी पर कसने में निराशा ही हाथ लगती है। फिल्में देखकर पशु प्रवृत्तियों के शिकार हुए लोगों की कितनी ही घटनाएँ नित्य प्रकाश में आती हैं
घुटन को हार की तरह छाती से चिपटाए रहना ठीक नहीं। एक बात सामने आयी उस पर विचार किया और सिनेमा की फिल्म की तरह दिमाग के पर्दे से हटा दिया। जब हम फेफड़े में साँस को रोके नहीं रख सकते। तो किसी विक्षोभ को ही मन में जमाकर, दबाकर क्यों बैठें रहें! नई साँस लेने के लिए जरूरी है कि पुरानी साँस बाहर निकले
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-February
रूस स्थिति औरों साइकियेट्रिक इन्स्टीट्यूट की प्रमुख महिला विज्ञानी डा0 थेल्मा माँस ने भी अपने प्रयोग परीक्षणों में पाया है कि ध्यान, सम्मोहन अथवा ट्रग्स की स्थिति में अँगुलियों के अग्रभाग से निकलने वाली प्राण रश्मियों में भारी परिवर्तन होता है। तनाव, उत्तेजना अथवा निषेधात्मक चिंतन की स्थिति में अवस्थिति जिन व्यक्तियों के विर्लियन चित्र उतारे गये तो देखा गया कि फिल्म पर गहरे लाल रंग के चकते पड़ जाते हैं। इसका सर्वाधिक प्रभाव हाथ पर ही होता है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य के भले बुरे अणुओं की आभा हाथों से प्रकट होती और संपर्क में आने वालों को प्रभावित करती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-March
इन घटनाओं के बाद उसे अभिशप्त समझकर जे.एस.सैम्सन एक फोटो ग्राफर को मुफ्त में ही दे दिया गया जिसने उसके चित्र लिये। फोटो फिल्म धोने के पश्चात् सेम्सन यह देखकर आश्चर्य चकित रह गया कि उसमें एक सुन्दर नव युवती का चित्र उभर आया है। दूसरे दिन से वह भी पागल हो गया और कुछ दिनों के पश्चात् मृत्यु की गोद में सो गया। दुःखी एवं भयभीत पत्नि ने तब उस ममी को ब्रिटिश म्यूजियम को सौंप दिया लेकिन वहाँ भी ममी के साथ-साथ मौत का साया बराबर छाया रहा छूने-और फोटो लेने वालों को त्रास देता रहा
उसी भाषा को बोलने में रुचि दिखाई। आहार-विहार में भी वही अनुकृति सहज स्थान पाती चली गई यह फिल्मों का जमाना है, इन दिनों हर युवक-युवती पर वैसा ही स्वभाव एवं रहन सहन व्यवहार अपनाने की उतावली पड़ी हुई है। बुद्ध, ईसा, गाँधी की भी अपने-अपने समय में प्रचण्ड लहरें चली थी और उनसे बहुत बड़ा जन समुदाय प्रभावित होता चला गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-June
उसके अभिनय ने सारे यूरोप का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर दिया। 11 वर्ष की आयु तक पहुँचते पहुँचते वह फिल्म दर्शकों का सुपरिचित प्रिय-पात्र बन गया। ऐसा ही एक दूसरा बालक था लन्दन का काँवेट गार्डन, उसका अभिनय देखने के लिए आकुल भीड़ को हटाने के लिए एकबार तो सेना बुलानी पड़ी थी। उसे इतना अधिक पारिश्रमिक मिलता था, जितना पाने का अन्य किसी कलाकार को सौभाग्य न मिला
फिल्मी दुनिया में तहलका मचाने वाला बाल अभिनेता विलियम हेनरी वेट्टी बाल्यकाल से ही अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देने लगा। उसके अभिनय ने सारे यूरोप का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर दिया। 11 वर्ष की आयु तक पहुँचते पहुँचते वह फिल्म दर्शकों का सुपरिचित प्रिय-पात्र बन गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-January
मिनीसोटा के सेंटपाल — रैम से मेडीकल सेंटर के बायो केमिस्ट डाॅ. विलियम एच. फ्रे ने दो स्वयंसेवक दल बनाए। एक को एक घंटे तक अंदर तक दुखी कर देने वाली करुण फिल्म दिखाई गई, दूसरे दल की आँखों के सामने ताजे कटे प्याज रखकर आँसू एकत्र किए गए। मात्रा दोनों में समान थी। आँसुओं को एकत्रकर विश्लेषण करने पर पाया गया कि भाव-संवेदनाओं से उत्पन्न आँसुओं में उत्तेजना से उत्पन्न आँसुओं की तुलना में प्रोलेक्टीन, ए॰सी॰टी॰एच॰ एवं ल्यूसीन एनसेफेलीन जैसे प्रोटीन बाउंड हारमोन्स अच्छी खासी मात्रा में पाए गए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-July
प्रेस और फिल्म, यह दो उद्योग जन मानस को प्रभावित करने में असाधारण भूमिका निभाते हैं। विज्ञान की इन दिनों उपलब्धियों के लिए यह अनुशासन रहा होता, कि उनके द्वारा उपयोगी मान्यता प्राप्त विचारधारा को ही छपाया फिल्माया जायेगा, तो इनसे मनुष्य की बहुमुखी शिक्षा की आवश्यकता की पूर्ति होती, जन साधारण को सुविज्ञ और सुसंस्कृत बना सकने में सफलता मिल गयी होती
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-April
साहित्य का भी प्रभाव रहता है। फिल्म अभिनय जैसे दृश्य भी निजी व्यक्तित्व के विकास में सहायता करते है। पूर्व-संचित संस्कारों की वंश परम्परा की भी किसी अंश में भूमिका रहती है। कोई घटना विशेष भी ऐसा मोड़ लेती है कि पिछला उपक्रम बदलता और नई दिशा में चल पड़ने के लिए उत्साह भरता है
इसी तरह पाश्चात्य सिनेमा के जाने माने कलाकार फ्रैंस सिनाट्रा को राम में कार्य आरंभ करने और सफलता तक पहुँचने की धुन सवार रहती थी। अपनी प्रसिद्ध फिल्म-”एहोल इन दी हेड” को उसने एक रात्रि में पूर्ण कर दिखाया जबकि उस समय आम प्रचलन दिन में ही कार्य करने का था
मागरेट मीड“दुनिया कहाँ जा रही है?” इस शीर्षक से फिल्म बना रहे अमेरिकन टेलीविजन संवाददाता केल्विन सैर्ण्डस ने डा. मार्गरेट मीड (अब स्वर्गीय), हरमन काँन एवं विलियम थामसन का इंटरव्यू कुछ वर्ष पूर्व लिया था। यू. एस. आई. एस. द्वारा प्रकाशित पत्रिका “स्पाँन” में छपे इस साक्षात्कार में अमेरिकन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री की अध्यक्षा, नृतत्व विज्ञानी स्व0 मार्गरेट मीड तथा हडसन फ्यूचरालॉजी इंस्टीट्यूट के निदेशक हरमन काँन ने यह आशावादी भविष्यवाणी की कि निश्चित ही तृतीय विश्व का भविष्य उज्ज्वल है। उसे अंततः पूरी मानवजाति का नेतृत्त्व जो करना है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-November
प्रार्थना वह प्रचण्ड चुम्बकत्व है, जो दैवी सहायता का अपने समीप खींच बुलाती और अभीष्ट स्तर का परिणाम प्रस्तुत करती है। अमेरिका निवासी चार्ल्स फिल्मोर शारीरिक दृष्टि से अशक्त थे। बचपन में स्केटिंग खेलते समय कूल्हे की हड्डी अपने स्थान से हट गई थी। अनेक तरह की चिकित्सा के बाद भी वह स्वस्थ नहीं हुए और एक पैर से लँगड़े हो गये
फिल्मोर के अनुसार प्रार्थना एक रचनात्मक और सक्रिय चीज है। उनके अनुसार प्रार्थना के लिए बस तीन शर्तें हैं ईश्वर पर विश्वास, सरल प्रार्थना और विधेयात्मक पोषक विचार (पॉजेटिव थिंकिंग)। प्रार्थना का उद्देश्य है-चिन्तन पद्धति में परिवर्तन ला देना
अमेरिका के चार्ल्स फिल्मोर एक सात्विक व सन्त प्रकृति के व्यक्ति थे। वे अपना कुछ समय नित्य ही ध्यान-साधना में लगाया करते थे। अपने उत्तरार्ध जीवन में उन्होंने जिस ‘सोसायटी ऑफ सायलेण्ड यूनिटी’ नामक संस्था की स्थापना की थी, उसकी अभिप्रेरणा उन्हें दैवी सत्ता द्वारा ही प्राप्त हुई थी
फिल्मोर ने स्वस्थ होते ही अपने जीवन का उपयोग संकीर्ण स्वार्थों के लिए नहीं किया। उनका विचार था कि ईश्वर प्रदत्त सामर्थ्य का उपयोग ईश्वरीय कार्यों में ही होना चाहिए। उनको जो नया प्रकाश, नया जीवन, नया विश्वास, नया मार्ग मिला उससे वे अपने पड़ोसियों, परिचितों, अपरिचितों का, दुःखी पीड़ितों का, जो भी रोग से दुःख से अविश्वास से परेशान एवं संत्रस्त थे उन सभी का हित सम्पादन करने लगे
उनको जो नया प्रकाश, नया जीवन, नया विश्वास, नया मार्ग मिला उससे वे अपने पड़ोसियों, परिचितों, अपरिचितों का, दुःखी पीड़ितों का, जो भी रोग से दुःख से अविश्वास से परेशान एवं संत्रस्त थे उन सभी का हित सम्पादन करने लगे। लोक सेवा ही चार्ल्स फिल्मोर तथा उसकी पत्नी मार्टिन फिल्मोर का एक मात्र काय हो गया। अमेरिका में वे प्रार्थना मानव के रूप में विख्यात हुए। उन्होंने “यूनिटी स्कूल ऑफ क्रिश्चिएनिटी” नामक एक संस्था की स्थापना की
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-December
अमेरिका की एक रेडियो कम्पनी ने इस करुण संगीत को टेप कर सुनाया तो कुछ ही दिनों में आकाशवाणी केन्द्र को हजारों श्रोताओं ने पत्र लिखे और बताया कि इस संगीत को सुनकर उनका हृदय व्यथा वेदना से भर आया। एक टी0 वी0 कम्पनी ने इस स्थान की टी0 वी0 फिल्म भी उतारी और अपने दर्शकों को बिना किसी कमेंट्री के सुनायी तो दर्शक रोने भी लगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-May
अच्छाइयों और बुराइयों का क्षेत्र भी उसी तरह सर्वत्र खुला पड़ा है। स्वाध्याय के माध्यम से हम अर्वाचीन युग के देवत्व को भी अपने वर्तमान जीवन में बुला सकते हैं और नाटकों, फिल्मों से भी अच्छे बनने की प्रेरणा ले सकते हैं। दूसरों के अच्छे आचरण हमारे जीवन दीप बन सकते हैं और उनकी शिक्षायें भी वही प्रेरणा दे सकती हैं। बुराइयों के लिए भी ठीक यही स्थिति है बुलायें तो मन ही मन से करोड़ों मनोविकार आमन्त्रित कर लें दृढ़ता हो तो दृष्टि में पड़ने वाली कुत्सा भी अन्दर झाँकने न पाये
जिस तेजी से फिल्म घूमती है उतनी तेजी से आँखों के ज्ञान−तन्तु मस्तिष्क तक सही सूचना पहुँचा सकने में समर्थ नहीं होते। फलतः फिल्में चलती−फिरती दीखने लगती हैं। जब सामान्य घटना क्रमों के सम्बन्ध में यह बात है तो संसार की, जीवन की वस्तुस्थिति समझने में तो आँखें और भी कम काम करती हैं। भगवान का, आत्मा का, दर्शन दिव्य चक्षुओं से, ज्ञान नेत्रों से ही सम्भव है
सिनेमा में चलती फिरती तस्वीरों का दीखना आँखों का भ्रम है वस्तुतः वे अचल होती हैं। जिस तेजी से फिल्म घूमती है उतनी तेजी से आँखों के ज्ञान−तन्तु मस्तिष्क तक सही सूचना पहुँचा सकने में समर्थ नहीं होते। फलतः फिल्में चलती−फिरती दीखने लगती हैं। जब सामान्य घटना क्रमों के सम्बन्ध में यह बात है तो संसार की, जीवन की वस्तुस्थिति समझने में तो आँखें और भी कम काम करती हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-August
उसने अपने शोध प्रकाशन में ऐसे कई रोगियों का वर्णन किया है जो मरकर जी उठे और मरण क्षणों के मध्यवर्ती अनुभव बता सकने में समर्थ हुए। कैन्सर से मरे डीन नामक एक रोगी ने पुनर्जीवित होने पर बताया कि पहले वह गहरे अन्धकार में डूबा, इसके बाद उसे प्रकाश दीखा और उस पर फिल्म के पर्दे की तरह किये गये भले-बुरे कामों की तस्वीरें फिल्म की तरह दिखाई पड़ीं। उसे लगा कि यह किसी न्यायाधीश का काम है। जो दण्ड पुरस्कार देने से पहले यह दृश्य साक्षियाँ प्रस्तुत कर रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-February
फिल्म देखने के लिए सिनेमा घर में प्रवेश करते समय उत्सुकता होती है और देखकर हाल से बाहर निकलते समय सन्तुष्टि। किसी दर्शक को सिनेमा हाल छोड़ने का दुःख नहीं होता। जीवन को सिनेमा घर समझा जा सके तो खेल समाप्त होने की घण्टी सुनकर सन्तोष की साँस ही ली जा सकेगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-March
सामान्य स्तर पर चर्खों से सूत कातते समय न तो उसकी उतनी आवश्यकता अनुभव की जाती है, और न हर जगह वह स्थिति पैदा करना ही सम्भव है; किन्तु कताई मिलों में जहाँ महीन किस्म का सूत बड़ी तेजी से काता जाता है, वहाँ वायु में निश्चित आद्रता पैदा करनी ही पड़ती है। जहाँ फोटो ग्राफिक फिल्में बनाई जाती है, उस फैक्ट्री में तापमान को एक निश्चित मर्यादा में ही रखना पड़ता है। यदि इसकी उपेक्षा की जाय तो सारे साधनों के होते हुए भी अच्छी फिल्में बनाना सम्भव नहीं हो सकता। विशेष औषधियों एवं रासायनिक पदार्थों के निर्माण में भी इसी प्रकार विशेष परिस्थितियाँ बनाकर रखी जाती हैं
वजन की तुलना में उसकी कार्यक्षमता असंख्य गुनी बढ़ जाती है। माइक्रो फिल्मों के माध्यम से विशालकाय ग्रन्थ छोटी−सी डिबिया में बन्द करके रखे जा सकते हैं। एक स्वस्थ और सुविकसित मस्तिष्क में प्रायः एक करोड़ ग्रन्थों में लिखी जा सकने जितनी सामग्री संग्रह करके रखी जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर इस क्षमता में सहज ही दूनी अभिवृद्धि भी की जा सकती है
जहाँ फोटो ग्राफिक फिल्में बनाई जाती है, उस फैक्ट्री में तापमान को एक निश्चित मर्यादा में ही रखना पड़ता है। यदि इसकी उपेक्षा की जाय तो सारे साधनों के होते हुए भी अच्छी फिल्में बनाना सम्भव नहीं हो सकता। विशेष औषधियों एवं रासायनिक पदार्थों के निर्माण में भी इसी प्रकार विशेष परिस्थितियाँ बनाकर रखी जाती हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-January
इस पुस्तक में विश्व चेतना का आरंभ से अब तक का इतिहास अंकित है। माइक्रो फिल्मों की विशालकाय लाइब्रेरी की तरह इसे समझा जा सकता है। मोटे रूप में तो पता नहीं चलता कि कहाँ क्या-क्या अभिलेख अंकित हैं, पर विशेषज्ञ यह तलाश कर सकते हैं कि इन संग्रहालय की अलमारी के किस खाने में किस स्थान पर क्या रखा हुआ है? इस कला में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए मस्तिष्कीय विद्या की साधना की जाती है। इस प्रक्रिया को पदार्थ वैज्ञानिक अपने ढंग से और आत्म विज्ञानी अपने ढंग से विकसित कर सकते हैं
अगला काम विवेक बुद्धि का है वह इसमें से उपयुक्त-अनुपयुक्त की काट-छांट करती है। फिल्म खींचते समय कैमरा द्वारा ढेरों फिल्म खिंचती हैं। डायरेक्टर उसमें से उपयुक्त अनुपयुक्त की कांट-छांट करता है। बेकार भाग को निकाल कर फेंक देता है और उपयोगी अंशों को इधर से उधर जोड़ गाँठ करके उसका कारगर ढाँचा खड़ा करता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-November
फिल्में देखकर पशु-प्रवृत्तियों के शिकार हुये लोगों की कितनी घटनाएँ अखबारों में प्रकाशित हुआ करती हैं। साहित्य भी बहुत कुछ फिल्मों से प्रभावित हुआ। मानवीय गुणों के प्रति आस्था जागृत करने वाले उपन्यास, कहानियाँ, कवितायें बहुत कम दिखती हैं और सस्ती रोमांटिक पुस्तकें बड़ी मात्रा में छपकर धड़ल्ले से बिकती हैं
खेद है कि इस ओर से हमें निराश ही होना पड़ेगा। फिल्में देखकर पशु-प्रवृत्तियों के शिकार हुये लोगों की कितनी घटनाएँ अखबारों में प्रकाशित हुआ करती हैं। साहित्य भी बहुत कुछ फिल्मों से प्रभावित हुआ। मानवीय गुणों के प्रति आस्था जागृत करने वाले उपन्यास, कहानियाँ, कवितायें बहुत कम दिखती हैं और सस्ती रोमांटिक पुस्तकें बड़ी मात्रा में छपकर धड़ल्ले से बिकती हैं
इस आधार पर उपलब्ध सभी मनोरंजन साधनों का विश्लेषण किया जा सकता है। आजकल उपयोग में लाये जाने वाले मनोरंजन साधनों में फिल्म और पुस्तकें प्रमुख हैं। खेद है कि इस ओर से हमें निराश ही होना पड़ेगा। फिल्में देखकर पशु-प्रवृत्तियों के शिकार हुये लोगों की कितनी घटनाएँ अखबारों में प्रकाशित हुआ करती हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-June
क्षय से
पिड़ित एक लँगड़े व्यक्ति चालर्स फिल्मोर को जब सब ओर से निराशा मिली और डाक्टरों ने उनके रोग को असाध्य धोषित कर दिया,तो उन्होंने प्रार्थाना का अवलम्बन किया और उसी को चिकित्सा – उपचार के स्थान पर काम में लाने लगे | जीवन बच गया,तो उन्होंने उपासना को आरोग्य – रक्षा के लिए प्रयुक्त करना आरम्भ किया | एक छोटे से किराये के मकान में उनने कार्य आरम्भ किया |रोगियोंको लाभ मिला, तो ख्यति भी फैली ओंर श्रध्या भी बढ़ी ; फलत: उस आश्रम का बिस्तार बढ़ता चला गया | इन दिनों उसका विस्तार 12oo एकड़ भूमि में है| हजारों की संख्या में रोगी निरन्तर निवास करते ओंर आरोग्य लाभ लेते है| सात सौ कर्मचारी काम करते है | दो साप्ताहिकों और सात मासिक – पत्रों की 20 लाख प्रतियों यहाँ से हर महीने प्रकाशित होती है | प्रतिदिन 6 हजार पत्र आते है | यहाँ से छपने वाले प्रार्थना – साहित्य का अनुवाद संसार की 140 प्रमुख भाषाओं में होता है | वह यूनिटी संस्था अमेरिका का एेसा धर्म –संस्थान है,जिसकी आधारशिला भर ईसाई मतावलम्बी है |लाभ पाने की द्रष्टि से सभी धर्मो और वर्गो को समान सुविधा है |
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-April
जिस आत्म-विश्वास के साथ वे बातें करती थीं उसे देखकर डायरेक्टरों ने उन्हें छोटा काम दे दिया। उनके परिश्रम, मधुर-स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व ने उस क्षेत्र में बढ़-चढ़कर काम करने का अवसर दिया अस्तु उन्होंने लगातार तेरह वर्षों तक प्रख्यात फिल्मों में काम किया
अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री ‘दादी रेनाल्डस’ ने पाश्चात्य जगत में बहुत ख्याति प्राप्त की है। उनकी फिल्म सफलता समूची जीवन साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी थीं। तब उन्हें उत्साह उठा कि जो शिक्षा उन्होंने प्राप्त कर रखी है, वह कम है, उन्हें सफल जीवन जीने के लिए अधिक विद्या उपार्जित करनी चाहिए
एक बार प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नोवारों एक होटल में ठहरे हुए थे। उस होटल का स्वामी मर चुका था। उसकी सम्पत्ति की वसीयत न होने के कारण बड़ा लड़का सब हड़प जाना चाहता था, जिससे उसका छोटा लड़का बहुत दुखी था
अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री ‘दादी रेनाल्डस’ ने पाश्चात्य जगत में बहुत ख्याति प्राप्त की है। उनकी फिल्म सफलता समूची जीवन साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी थीं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-October
सामान्यतया फिल्मी गीतों, शादी-ब्याह में गाये जाने वाले गानों, लोक गीतों में प्रयुक्त शब्दों की अनदेखी कर दी जाती है। इसी प्रकार कैलेंडरों में देवी-देवताओं के चित्रों में भाव-भंगिमाओं, वस्त्र परिधान आदि भी उत्तेजक बनाये जाते हैं। यह भी अनुचित है
दुर्व्यसनों को भड़काने वाली दुष्प्रवृत्तियों में अपना पैसा लगाकर अपना अधिक लाभ सरलतापूर्वक कमाने के लिए कितने ही अनुपयुक्त कार्य करते हैं। अश्लील साहित्य, गन्दे चित्र, पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाली फिल्में बनाने में कितने ही धनवानों ने अपनी प्रचुर पूँजी लगाई हुई है। ऐसा वे गरीबी या किसी मजबूरी के कारण नहीं करते। वरन् लोभ-लिप्सा वश लाख को करोड़ बनाने की ललक में ऐसे कामों में हाथ डालते हैं
प्रेरणाप्रद चित्रों की अत्यधिक आवश्यकता है। ऐसी फिल्में बननी चाहिए जो सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दे सकें। इन कार्यों में हाथ डालने पर इतना ही जोखिम है कि थोड़ा अधिक परिश्रम करना पड़ेगा और सीमित लाभ मिलेगा। जिनके पास पर्याप्त पूँजी है, उनके लिए इसमें क्या कठिनाई हो सकती है
प्रयोगकर्ताओं के एक दल द्वारा 1977 के ग्रीष्म काल में फोर्टली- न्यूजर्सी के ग्राहकों को एक प्रोजेक्टर के माध्यम से ‘लावा खाओ और कोका-कोला पीओ’ का सन्देश प्रत्येक पाँच सेकेंड पर पूरे फिल्म के दौरान प्रेषित किया गया। चेतन मस्तिष्क के लिए यह सन्देश उतना महत्वपूर्ण नहीं था परन्तु अचेतन मस्तिष्क में यह अत्यन्त विस्मयकारी परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ हुआ। शीघ्र ही बाजार में लावा की बिक्री में 5.75 प्रतिशत तथा कोका कोला में 38 प्रतिशत की वृद्धि आँकी गई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-September
सन्देह यह किया गया कि वे कैमरे या उसके फिल्म में कोई चालाकी करता होगा। इस संदेह का निवारण करने के लिए शोध संस्थान ने उत्पादकों की सील लगे हुए कैमरे और फिल्म उसे दिये। उपस्थित व्यक्तियों में से किसी की कल्पना में क्या बात चल रही है उसके वह हूबहू फोटो खींच देता
सन्देह यह किया गया कि वे कैमरे या उसके फिल्म में कोई चालाकी करता होगा। इस संदेह का निवारण करने के लिए शोध संस्थान ने उत्पादकों की सील लगे हुए कैमरे और फिल्म उसे दिये। उपस्थित व्यक्तियों में से किसी की कल्पना में क्या बात चल रही है उसके वह हूबहू फोटो खींच देता। यह प्रयोग उलट-पलटकर कई बार किया गया और यह सही पाया गया कि कल्पना के फोटो भी ठीक उसी तरह खींचे जा सकते हैं जैसे सामने खड़े किसी प्रत्यक्ष आदमी के
हशीश, कोकीन, चरस, गाँजा, हिरोइन जैसी घातक वस्तुओं की एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे देश में तस्करी का ऐसा जाल बिछा हुआ है जो तोड़े नहीं टूटता। फिल्मों ने ऐसे अवसर पर एक उत्प्रेरक (केटेलिस्ट) की भूमिका निभाने का दायित्व उठाया है। वे अपराधों, कामुकता, व्यभिचार, उच्छृंखलता एवं आत्मघाती उन्मादी मनोवृत्ति को जन्म देने वाली प्रवृत्तियों को ही प्रश्रय देती नजर आती है
ऐसों से ही घनिष्ठता साधने के लिए प्रयत्नशील रहता है। कामुक साहित्य पढ़ने, वैसी ही फिल्में देखने और उन्हीं प्रसंगों की चर्चा कहने सुनने में उसे रस आता है। किस इन्द्रिय के द्वारा, किस प्रकार, क्या रसास्वादन किया जा सकता है, इसी की कल्पनाएँ उठती रहती हैं। चिन्तन और समय इन्हीं बातों का ताना-बुना बुनने में बीतता है
संयोग से वे भी वहीं उपस्थित थे। प्रदर्शन के दौरान एक कर्मचारी का हाथ कैमरे के सामने आने से फिल्म में हाथ की काली छाया के चारों ओर धुएँ के समान भूरे रंग के छल्ले दिखाई दिए। चूंकि इस फोटोग्राफी में उच्च वोल्टेज के ऊर्जा स्रोत का प्रयोग नहीं किया जाता अतः हानि की प्रत्यक्ष संभावना न देख उन्होंने चेहरे व शरीर को भी इस माध्यम से फोटोग्राफ किया। तभी से उनके शोध प्रयास इस दिशा में आगे बढ़ते चले गए एवं अंततः वे आभा मंडल का छायांकन कर उसका विश्लेषण करने में सफल हो गए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-March
बढ़ते उत्साह एवं असीम उत्कण्ठा को दृष्टिगत रख इस सत्र शृंखला व परिजनों के क्रियाकलापों के वीडियो फिल्मांकन को मार्च में भी जारी रखने का निर्णय लिया गया। अब मार्च में 3 से 31 तारीख तक चार-चार दिन के कुल 6 सत्र हैं। हर शिविर के बीच में एक दिन का स्थान खाली रखा गया है
प्रस्तुत बसन्त पर्व उद्घाटन सत्र के रूप में मनाया गया। 2 सत्रों के फरवरी बसन्त पर्व को पाँच सत्रों में बदल दिया गया व अगणित परिजनों को भाषा धर्म महाविद्यालय, पत्रकारिता शिक्षण एवं वीडियो फिल्मांकन स्टूडियो के रूप में आरम्भ हो रही नई प्रवृत्तियों से सम्बन्धित इन सत्रों में स्थान दिया गया। पूज्य गुरुदेव की बहिरंग से निवृत्ति एवं एकाकी तपश्चर्या के इस पर्व से शुभारम्भ पर परिजन को दो प्रतीक सतत् उनके सूक्ष्म संरक्षण व उपस्थिति का बोध कराने हेतु दिये गये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-June
लोक-शिक्षण और लोकरंजन का समन्वित कार्यक्रम पूरा करने के लिए केन्द्र की शाखाएं- सुगम संगीत विद्यालयों के रूप में चल रही हैं। अब उसमें वीडियो फिल्म का एक साहस भरा सोद्देश्य कदम और सम्मिलित किया गया है। इसे प्रकारांतर से नारद परम्परा ही कह सकते हैं
इस संदर्भ में प्रहलाद का फिल्म चित्र आंखों के आगे तैरने लगा। वह समाप्त न होने पाया था कि ध्रुव की कहानी मस्तिष्क में तैरने लगी। इसका अन्त न होने पाया कि पार्वती का निश्चय उछलकर आगे आ गया
(11) प्रचार तन्त्र अब तक टेप रिकार्डरों और स्लाइड प्रोजेक्टरों के माध्यम से ही चलता रहा है। अब उसमें वीडियो फिल्म निर्माण की एक कड़ी और जोड़ी जा रही है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
जहाँ फोटो ग्राफिक फिल्में डेवलप की जाती हैं, उस स्थान पर तापमान को एक निश्चित मर्यादा में ही रखना पड़ता है। यदि इसकी उपेक्षा की जाय तो सारे साधनों के होते हुए भी अच्छी फिल्में बनाना सम्भव नहीं हो सकता। विशेष औषधियों एवं रासायनिक पदार्थों के निर्माण में भी इसी प्रकार विशेष परिस्थितियाँ बनाकर रखी जाती हैं। किसी प्रयोगशाला चिकित्सालय, शोधसंस्थान की योजना बनाते समय भी उपयुक्त परिस्थितियों की खोज की जाती है
उससे भी बन्दूक की नली की तरह ही क्रान्तिकारी वातावरण बनाता है। विज्ञान ने इस वर्ग को प्रेस के साथ-साथ फिल्म का भी एक नया आधार प्रदान किया है। इन दोनों के समन्वय से जनमानस को एक विशेष प्रकार के प्रवाह में बहने के लिए वाँछित होना पड़ रहा है। आज के लोकचिंतन पर लेखन और अभिनय की गहरी छाप है
सामान्य स्तर पर चर्खों से सूत कातते समय न तो उसकी उतनी आवश्यकता अनुभव की जाती है और न हर जगह वह स्थिति पैदा करना ही सम्भव है, किन्तु कताई मिलों में जहाँ महीन किस्म का सूत बड़ी तेजी से काता जाता है, वहाँ वायु में निश्चित आर्द्रता पैदा करनी ही पड़ती है। जहाँ फोटो ग्राफिक फिल्में डेवलप की जाती हैं, उस स्थान पर तापमान को एक निश्चित मर्यादा में ही रखना पड़ता है। यदि इसकी उपेक्षा की जाय तो सारे साधनों के होते हुए भी अच्छी फिल्में बनाना सम्भव नहीं हो सकता। विशेष औषधियों एवं रासायनिक पदार्थों के निर्माण में भी इसी प्रकार विशेष परिस्थितियाँ बनाकर रखी जाती हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
लोगों की कुरुचि को भड़काने और पैसा बनाने में उसे न जनता रोक पाती है न शासन। जन मानस को प्रभावित करने वाले साहित्य, चित्र, फिल्म आदि में कुरुचि वाले उत्पादन की भरमार है। अगले दिनों इस प्रकार के उपार्जन पर रोक लगेगी। नशा उत्पन्न करने की बात कोई मानवी मौलिक अधिकार की दुहाई देकर न कह सकेगा
बात यहीं से गड़बड़ी की आरम्भ होती है। फिल्म उद्योग लोक शिक्षण का एक उपयोगी माध्यम हो सकता था पर उसके उत्पादनों को देखकर दुख होता है। प्रेस भी एक अनूठी शक्ति है पर उस क्षेत्र में भी काम का कम और बेकाम का अधिक छपता है। फिल्म दर्शक और साहित्य पाठक अन्ततः इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि यदि इनसे दूर रहते तो भ्रम जंजाल से बचकर कहीं अधिक नफे में रहते
प्रेस भी एक अनूठी शक्ति है पर उस क्षेत्र में भी काम का कम और बेकाम का अधिक छपता है। फिल्म दर्शक और साहित्य पाठक अन्ततः इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि यदि इनसे दूर रहते तो भ्रम जंजाल से बचकर कहीं अधिक नफे में रहते
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-November
इन लोगों की समझ उल्टी से सीधी दिशा में मुड़ सके तो वह बर्बाद होने वाला धन उस पूँजी का काम दे सकता है जिनके बिना प्रगति का काफी काम रुका हुआ है। उपयोगी साहित्य प्रकाशन, उपयोगी फिल्मों का निर्माण यह दो काम ही ऐसे हैं, जो लोगों के मस्तिष्क को उलटकर सीधा कर सकते हैं। बड़े गाँवों में सोलह मिलीमीटर के सिनेमा घर खड़े किये जा सकते हैं। विचार क्राँति की आवश्यकता पूरी करने वाली एक-एक घण्टे दिखाई जाने वाली फिल्में बनाने में कहीं कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए
अमेरिका के पश्चिमी छोर पर लॉस ऐंजेल्स महानगर में हालीवुड नामक सुप्रसिद्ध फिल्म नगरी है। यहाँ कितने कलाकारों एवं संचालकों का बाहुल्य है। सभी सुशिक्षित एवं सुसम्पन्न वर्ग के हैं एवं कला की सुरुचिपूर्ण महत्ता के पक्षधर हैं
अपना लाभ हो, किन्तु दूसरे का अनर्थ न हो- यह व्यापार बुद्धि है। किन्तु अनर्थ बुद्धि के व्यवसाय हैं- बूचड़ खाने में साझेदारी, शराब खाना, व्यभिचार के अड्डे चलाना, ब्ल्यू फिल्में दिखाना, चोरी डकैती का माल लाना, बच्चों का फिरौती के लिए अपहरण, लड़कियाँ भगाना और वेश्यालयों को बेचना, नशे की वस्तुएँ यहाँ से वहाँ पहुँचाना, खाद्य-पदार्थों में मिलावट- जैसे कार्य ऐसे हैं इसमें लाभ तो सीमित ही होता है, पर अनर्थ बहुत होता है, यह बात इसलिए कहीं जा रही है कि चोरी बदमाशी के कार्य में बीसियों साझेदार होते हैं। उन सबको खुश रखना पड़ता है। एक को भी नाखुश किया जाय तो जो कमाया है उससे कहीं अधिक जेब से देना पड़ता है
बड़े गाँवों में सोलह मिलीमीटर के सिनेमा घर खड़े किये जा सकते हैं। विचार क्राँति की आवश्यकता पूरी करने वाली एक-एक घण्टे दिखाई जाने वाली फिल्में बनाने में कहीं कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। अभी तो भाषा की दृष्टि से हिन्दी की गणना ही उनमें होती है जिनमें विचारोत्तेजक साहित्य उपलब्ध होता है। अन्य भाषाऐं इस दृष्टि से दरिद्र मानी जाती हैं
9 वीं से लेकर 18 वीं शताब्दी तक बने ऐसे अनेकों किले हैं जिनमें प्रेत लीला का ताण्डव नृत्य देखा- अनुभव किया गया है। ऐसा ही चिलहम नामक 12 वीं शताब्दी का बना एक किला उ. इंग्लैण्ड में है जहाँ अक्सर फिल्मों की शूटिंग हुआ करती है। रात्रि में सामान्यतया वहाँ कोई नहीं ठहरता। एक बार एक नर्तकी किमनोवाक रात्रि विश्राम हेतु वहीं रुक गयी
गायन-वादन का यन्त्रीकरण हो गया। ग्रामोफोन रिकार्ड, टेप रिकार्डर, फिल्म संगीत इस कदर व्यापक हुए हैं कि गली-कूँचों में उनकी धूम है। इनका विषय मात्र कामुकता है। प्रेमी, मैत्री, विछोह जैसी निम्न भावनाओं को उत्तेजित करने वाले यन्त्र गायन इतनी अधिक मात्रा विकसित हुए हैं कि रास्ता चलते वे जबरदस्ती कानों में घुस पड़ते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-December
इस आश्चर्य पर उस देश में भी अविश्वास करने वाले कम नहीं हैं। इसलिए कुछ पूर्व इस दृश्य की एक फिल्म बनाई गई है, ताकि 10 दिवसीय इस आश्चर्यजनक दृश्य को अविश्वासी लोग भी देख सकें
फ्री वर्ग विश्व विद्यालय के परा मनोविज्ञानी डा. हेन्स वेन्डर को द्वितीय विश्वयुद्ध में घटित होने वाले घटनाक्रम का पूर्वाभास हुआ था वे घटनाएँ ठीक उसी क्रम में घटित हुईं। एक फिल्म अभिनेत्री क्रिस्टराइन मीलियस ने अपने 200 स्वप्नों का विवरण भेजा जो उसके निजी जीवन से तथा अन्यान्यों से सम्बन्धित थे उनमें से प्रायः आधे स्वप्न सत्य हुए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-January
उद्घाटन समारोह में मात्र समर्थ स्वाध्याय मण्डल संचालकों को ही आमंत्रित किया गया है। उनकी उपस्थिति प्रथम फिल्म निर्माण हेतु आवश्यक समझी गई है। जो यह स्थापना कर चुके या करने जा रहे हैं, वे अपने पहुँचने की सूचना अविलम्ब शांतिकुंज भिजवा दें। स्त्री बच्चों के साथ न लाएँ
अब युग निर्माण की विचारधारा को व्यापक बनाने वाली फिल्में बनाने और उन्हें देश के कोने-कोने में विदेश की समस्त शाखाओं में दिखाने का कार्य हाथ में ले लिया गया है। शान्तिकुंज में इसके लिए सुनियोजित स्टूडियो बनाया गया है, कलामंच बन रहा है एवं सभी अनिवार्य यन्त्र उपकरण खरीद लिए गए हैं
परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर भी वे किस प्रकार अपने मुट्ठी भर साथियों की सहायता से चल प्रज्ञा संस्थान खड़ा कर सके। इस फिल्म का उद्देश्य सर्वत्र यह उत्साह उभारना है कि अन्यत्र भी इसका अनुकरण चल पड़े और 24000 समर्थ स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञासंस्थानों का संकल्प पूरा करने के लिए सभी वरिष्ठ प्रज्ञापरिजनों में उत्साह उभरे
वसन्त पंचमी 7 फरवरी की है। शान्ति कुंज में बसन्त पर्व पर परिजनों की संख्या एक तो वैसे ही अधिक रहती है इस बार फिल्म स्टूडियो का उद्घाटन समारोह सम्मेलन होने से आदमियों की संख्या और भी अधिक रहने की सम्भावना को दृष्टिगत रखते हुए उद्घाटन समारोह के दो चरणों में सम्पन्न करने की व्यवस्था की गई है- (1) 4 से 8 फरवरी (2) 10 से 14 फरवरी
पहली फिल्म समर्थ स्वाध्याय मण्डलों पर बनेगी। उनके संचालक फिल्म के पात्र होंगे और बताया जाएगा कि वे किस प्रकार अपने यहाँ इस स्थापना में सफल हो सके। परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर भी वे किस प्रकार अपने मुट्ठी भर साथियों की सहायता से चल प्रज्ञा संस्थान खड़ा कर सके। इस फिल्म का उद्देश्य सर्वत्र यह उत्साह उभारना है कि अन्यत्र भी इसका अनुकरण चल पड़े और 24000 समर्थ स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञासंस्थानों का संकल्प पूरा करने के लिए सभी वरिष्ठ प्रज्ञापरिजनों में उत्साह उभरे
उन पर अब वीडियो रंगीन एवं बोलती फिल्में दिखाया जा सकना कहीं भी सम्भव हो जायेगा। फिल्म निर्माण का कार्य इस प्रकार वीडियो के माध्यम से कहीं अधिक सरल हो चला। नव निर्माण की फिल्में बनाने और उन्हें घर-घर, गाँव-गाँव लगे टेलीविजनों पर विशेष अटेचमैन्ट के माध्यम से दिखाने की सुविधा सम्भव हो गयी। पूँजी भी इसमें अधिक नहीं लगती
फिल्म निर्माण का कार्य इस प्रकार वीडियो के माध्यम से कहीं अधिक सरल हो चला। नव निर्माण की फिल्में बनाने और उन्हें घर-घर, गाँव-गाँव लगे टेलीविजनों पर विशेष अटेचमैन्ट के माध्यम से दिखाने की सुविधा सम्भव हो गयी। पूँजी भी इसमें अधिक नहीं लगती
निर्माण कार्य में ऐसी तत्परता रखी गई है कि उसे हाथों हाथ दिखाया जा सके। सभी आगन्तुकों को ये फिल्म दिखायी जाएँगी
इसका उत्साहवर्धक नए किन्तु अत्यन्त शक्तिशाली माध्यम का शुभारम्भ उद्घाटन इसी बसन्त पर्व पर होने जा रहा है। पहली फिल्म समर्थ स्वाध्याय मण्डलों पर बनेगी। उनके संचालक फिल्म के पात्र होंगे और बताया जाएगा कि वे किस प्रकार अपने यहाँ इस स्थापना में सफल हो सके। परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर भी वे किस प्रकार अपने मुट्ठी भर साथियों की सहायता से चल प्रज्ञा संस्थान खड़ा कर सके
इन्सेट उपग्रह की सफलता व इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों पर ड्यूटी घटने से टेलीविजन अब सर्वसुलभ हो गए हैं। उन पर अब वीडियो रंगीन एवं बोलती फिल्में दिखाया जा सकना कहीं भी सम्भव हो जायेगा। फिल्म निर्माण का कार्य इस प्रकार वीडियो के माध्यम से कहीं अधिक सरल हो चला। नव निर्माण की फिल्में बनाने और उन्हें घर-घर, गाँव-गाँव लगे टेलीविजनों पर विशेष अटेचमैन्ट के माध्यम से दिखाने की सुविधा सम्भव हो गयी
फिल्म का प्रभाव इन दिनों साहित्य से भी अधिक बढ़ चला है। युग परिवर्तन प्रयोजन हेतु साहित्य की ही तरह अब फिल्म निर्माण की भी बात सोची गयी है। चिन्तन तो काफी पूर्व से चल रहा था लेकिन उतने महँगे साधन न जुट पाने से उस आवश्यकता को पूरी करने का सुयोग नहीं बन पा रहा था
उद्घाटन समारोह में मात्र समर्थ स्वाध्याय मण्डलों के संस्थापक संचालकों को बुलाया गया है। उनका कार्य विवरण ही फिल्माया जायेगा। निर्माण कार्य में ऐसी तत्परता रखी गई है कि उसे हाथों हाथ दिखाया जा सके। सभी आगन्तुकों को ये फिल्म दिखायी जाएँगी
वीडियो फिल्म स्टूडियो अपना बन जाने का समाचार समूचे प्रज्ञा परिवार में उत्साहपूर्वक सुना जाएगा। उद्घाटन समारोह में मात्र समर्थ स्वाध्याय मण्डल संचालकों को ही आमंत्रित किया गया है। उनकी उपस्थिति प्रथम फिल्म निर्माण हेतु आवश्यक समझी गई है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
सारा विश्व इसकी चपेट में रहा विज्ञान की सृजनात्मक उपलब्धियाँ सम्भवतः इसी कारण इस एक विनाशकारी घटनाक्रम के सामने फीकी पड़ गयी। फिर भी पेनसिलिन एवं इन्सुलिन की खोज एवं उड़ान तथा रेडियो तरंगों का सम्प्रेषण फिल्मों के क्षेत्र में हुआ, अन्वेषणकार्य आगे की प्रगति का एक आधारशिला बने
(23) ‘कैन्सफिल्म फेस्टीवल’ के साथ 1946 में विधिवत फिम्मों का अन्तर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान क्रम आरम्भ हो गया, जिसने आज विराटतम रूप ले लिया है
(26) स्टीवन स्पीलबर्ग की ई.टी. नामक बहुप्रचलित फिल्म जो सुदूर अंतरिक्ष से धरती पर आए प्राणी के विषय में थी, 1982 में प्रसारित हुई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-August
फिल्म की रील की तरह घूम रहे दृश्य का पटाक्षेप हो गया। इसके पश्चात् यान्ति एक बार पुनः उक्त सज्जन के स्वप्न में प्रकट हुई, बोली- श्वेम! मैं युगों से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। आज मिलकर बहुत तृप्ति अनुभव कर रहीं हूँ, पर यह मिलन तो क्षणिक है
सभी बीड़ी वाले चिल्लाते हैं कि सत्ताईस नम्बर की बीड़ी भाइयों, पिया करो, सत्ताईस नम्बर पिया करो। फिल्मिस्तानी भाई और बीड़ी वाले भाई और गुरुजी के वनस्पतियों में फिर क्या फर्क रह गया है? माइक, इसकी कोई कीमत नहीं, कहाँ कोई इसे सुनने को आते हैं, कान बन्द कर लेता है। बोल - बोलकर माँगकर चला जाएगा। इस माइक की बात कोई नहीं सुनता
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
आजकल के प्रदूषण भरे भौतिकता प्रधान युग में संयम कितना सध सकता है, इसे अपने अंदर झाँककर देखा जा सकता है। पत्र-पत्रिकाएँ समाचार पत्र, केबल टीवी-फिल्मों से भरी बहिरंग की दुनिया में सतत् चिंतन क्षेत्र पर कुविचारों का आक्रमण होता रहता है। आज योग के नाम पर बहिरंग का कर्मकाण्ड मात्र ही संपन्न हो रहा है-पूज्यवर गुरुदेव को अनुसार शरीर के तल से साधना कर पाना आज संभव नहीं है-मन के तल से आरंभ कर अंतःकरण की ओर जाना व समर्पण भाव से परमात्मचेतना में स्वयं को प्रतिष्ठित कर सकना भक्तियोग से ही संभव है। गीता में योग को साधने की अनिवार्य शर्तों के रूप में जो वर्णन आया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
इसमें रोगी से संबंधित दो मुख्य बातें बतायी जाती है। प्रथम यह कि रोगी किस स्तर का बीमार है? इसकी पहचान करना तथा दूसरा, उसे कैसी और कितनी गंभीर फिल्में दिखाई जाएँ जो उसके मनः संस्थान पर अनुकूल प्रभाव डाल सके। रंग यदि गहरा हो, तो हलके रंग उसी में घुल-मिल जाते है, मूल वर्ण पर उससे शायद ही कोई अन्तर पड़ता हो। ऐसे ही मरीज यदि लम्बे समय से बीमार चल रहा हो, तो हलकी-फुलकी स्तर की मनोवैज्ञानिक फिल्में उसके मन की गहराई तक नहीं उतर पातीं और एक प्रकार से निष्प्रभावी सिद्ध होती है
मूर्धन्य मनः चिकित्सक डॉ. गैरीसोलेमन ने मूवी-थेरेपी पर पिछले दिनों एक पुस्तक लिखी है, नाम है-ए मोशन पिक्चर प्रिसक्रिप्शन’। इस पुस्तक में लेखक ने करीब २.. फिल्मों को सूचीबद्ध किया है और विस्तारपूर्वक यह बताया है कि किस किस्म के मरीज को इनमें से कौन-सी फिल्म देखने की सलाह दी जाए। डॉ. सोलोमन अपने ८. प्रतिशत मरीजों का इलाज फिल्मों के द्वारा ही करते है। उनका मत है कि उक्त फिल्मों का सर्वाधिक चिकित्सकीय असर तभी होगा, जब व्यक्ति अकेले में निश्चय होकर उसे देखे
डॉ. सोलोमन अपने ८. प्रतिशत मरीजों का इलाज फिल्मों के द्वारा ही करते है। उनका मत है कि उक्त फिल्मों का सर्वाधिक चिकित्सकीय असर तभी होगा, जब व्यक्ति अकेले में निश्चय होकर उसे देखे। चंचल मनः स्थिति एवं सिनेमा हॉलों में उसका प्रभाव नगण्य होता है। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि भीड़-भाड़ की दशा में रोगी अपने ध्यान को फिल्म पर पूरी तरह केन्द्रित नहीं कर पाते
लेकिन यदि किसी तीन वर्षीय बालिका को ऐसा पुरस्कार मिले तो बात आश्चर्यचकित कर देने वाली हो जाती है। विक्टोरीथिविसोल ऐसी ही विलक्षण अभिनय कुशलता की धनी बालिका है, जिसे वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री घोषित किया गया। इस तीन वर्षीय बालिका ने फ्रेंच भाषा में बनी फिल्म ‘पोनेट’ में उत्कृष्ट अभिनय किया था
इन सभी बच्चों को फिल्म देखने के बाद उलटी और मिर्गी के दौरे पड़ने लगें। हुआ यों कि लोकप्रिय कार्टून फिल्म ‘पाकेट मोन्स्टर’ के एक एपिसोड में एक बालक और एक कम्प्यूटर राक्षस को लड़ते हुए दिखाया गया था। दृश्य का अन्त श्वेत, लाल और नीले रंग की मिश्रित रोशनियों की चमक के साथ हुआ। यद्यपि हर रंग का विस्फोट लगभग एक सेकेण्ड का था, किन्तु लड़ाई का पूरा दृश्य करीब २. मिनट तक चला
ऐसे ही मरीज यदि लम्बे समय से बीमार चल रहा हो, तो हलकी-फुलकी स्तर की मनोवैज्ञानिक फिल्में उसके मन की गहराई तक नहीं उतर पातीं और एक प्रकार से निष्प्रभावी सिद्ध होती है। इसलिए इस प्रणाली में उपर्युक्त फिल्म का सटीक निर्णय सर्वोपरि है। इसी पर रोगी की स्वस्थता अस्वस्थता टिकी होती है
कहा जाता है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन की ‘बेरुत बंधक कांड’ से निपटने को लेकर जब काफी आलोचना हुई, तो उन्होंने रैम्बो - फर्स्ट ब्लड पार्ट - ११ नामक एक ऐसी फिल्म देखी, जिसने उनके ध्वस्त मनोबल को फिर से दुरुस्त कर दिया, वे आत्मविश्वास से भर उठे। बंधकों की रिहाई के बाद उनने देश के नाम संदेश में कहा - “अब मुझे पता चल गया है कि इस प्रकार के संकट के समय क्या करना चाहिए। ”
रंग यदि गहरा हो, तो हलके रंग उसी में घुल-मिल जाते है, मूल वर्ण पर उससे शायद ही कोई अन्तर पड़ता हो। ऐसे ही मरीज यदि लम्बे समय से बीमार चल रहा हो, तो हलकी-फुलकी स्तर की मनोवैज्ञानिक फिल्में उसके मन की गहराई तक नहीं उतर पातीं और एक प्रकार से निष्प्रभावी सिद्ध होती है। इसलिए इस प्रणाली में उपर्युक्त फिल्म का सटीक निर्णय सर्वोपरि है। इसी पर रोगी की स्वस्थता अस्वस्थता टिकी होती है
विक्टोरीथिविसोल ऐसी ही विलक्षण अभिनय कुशलता की धनी बालिका है, जिसे वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री घोषित किया गया। इस तीन वर्षीय बालिका ने फ्रेंच भाषा में बनी फिल्म ‘पोनेट’ में उत्कृष्ट अभिनय किया था
पिछले दिनों जापान में एक कार्टून फिल्म शो को देखकर ६.. बच्चे बीमार पड़ गए। इन सभी बच्चों को फिल्म देखने के बाद उलटी और मिर्गी के दौरे पड़ने लगें। हुआ यों कि लोकप्रिय कार्टून फिल्म ‘पाकेट मोन्स्टर’ के एक एपिसोड में एक बालक और एक कम्प्यूटर राक्षस को लड़ते हुए दिखाया गया था
इस पुस्तक में लेखक ने करीब २.. फिल्मों को सूचीबद्ध किया है और विस्तारपूर्वक यह बताया है कि किस किस्म के मरीज को इनमें से कौन-सी फिल्म देखने की सलाह दी जाए। डॉ. सोलोमन अपने ८. प्रतिशत मरीजों का इलाज फिल्मों के द्वारा ही करते है। उनका मत है कि उक्त फिल्मों का सर्वाधिक चिकित्सकीय असर तभी होगा, जब व्यक्ति अकेले में निश्चय होकर उसे देखे। चंचल मनः स्थिति एवं सिनेमा हॉलों में उसका प्रभाव नगण्य होता है
चंचल मनः स्थिति एवं सिनेमा हॉलों में उसका प्रभाव नगण्य होता है। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि भीड़-भाड़ की दशा में रोगी अपने ध्यान को फिल्म पर पूरी तरह केन्द्रित नहीं कर पाते। इस प्रकार एकाग्रता के अभाव में उसकी प्रभावोत्पादकता निष्फल हो जाती है
पिछले दिनों जापान में एक कार्टून फिल्म शो को देखकर ६.. बच्चे बीमार पड़ गए। इन सभी बच्चों को फिल्म देखने के बाद उलटी और मिर्गी के दौरे पड़ने लगें। हुआ यों कि लोकप्रिय कार्टून फिल्म ‘पाकेट मोन्स्टर’ के एक एपिसोड में एक बालक और एक कम्प्यूटर राक्षस को लड़ते हुए दिखाया गया था। दृश्य का अन्त श्वेत, लाल और नीले रंग की मिश्रित रोशनियों की चमक के साथ हुआ
कला क्षेत्र में भी बाल प्रतिभाओं ने हर युग में अपनी विलक्षणता का परिचय दिया है। फिल्मों में श्रेष्ठ अभिनय के लिए बाल कलाकारों को पुरस्कार मिलना वैसे तो सामान्य-स्त्री बात है। लेकिन यदि किसी तीन वर्षीय बालिका को ऐसा पुरस्कार मिले तो बात आश्चर्यचकित कर देने वाली हो जाती है। विक्टोरीथिविसोल ऐसी ही विलक्षण अभिनय कुशलता की धनी बालिका है, जिसे वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री घोषित किया गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-April
उन लोगों को चुनौती है जिन्होंने ऐसी परिस्थितियों को जन्म दिया, जिससे कि इनसान की बरबादी होकर रहे। जिनने विनाशकारी, एटमबम बनाए, जिन्होंने असमानताएँ, फैलाई, जिन्होंने क्राइम को प्रोत्साहन दिया जिन्होंने आपाधापी का प्रोत्साहन दिया, जिन्होंने गन्दी फिल्में बनायी, जिन्होंने इस तरह की रिवाजें चलायी जिससे इनसान तबाह होने जा रहा है। अब इन लोगों को चुनौती है। किसकी ओर से? भगवान की ओर से, प्रज्ञावतार की ओर से, नये युग की ओर से, जो कि अब बिलकुल नजदीक आ गया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-July
प्रसिद्ध जर्मन उपन्यासकार जैराट हाॅपर्ट ने उस पर एक उपन्यास लिखा। इसके अतिरिक्त ‘दि आर्मलेस मैन’ नामक वहाँ उस पर एक फिल्म भी बनी, जिसमें उसकी खूबियों को भली प्रकार प्रदर्शित किया गया था। वह एक जुझारू इनसान था
दोनों ने विवाह किये और उनके बच्चे भी हुए। उन्हें ‘चेण्ड फॉर लाइफ’ नामक एक अमेरिकी फिल्म में काम करने का मौका भी मिला, पर इसी बीच एक सुबह वायलट की मृत्यु हो गई, शाम तक डेजी भी इस संसार से विदा हो गई। उस समय उनकी उम्र 41 वर्ष थी
उन्हें अतीन्द्रिय दर्शन की यह क्षमता एक दुर्घटना में अनायास ही प्राप्त हुई थी और इस कारण उन्हें इतना अधिक परेशान होना पड़ा कि वे सोचने लगे कि किस प्रकार से इस सिद्धि से छुटकारा पाया जाए? उनमें जब यह क्षमता जागृत हुई तो वे जिस किसी को भी देखते थे, उसके बारे में सब कुछ जान जाते थे। न केवल जिसे देखते थे, उसके बारे में, वरन् उससे संबंधित जीवित और मृत व्यक्तियों के बारे में उनका भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ किसी फिल्म की तरह आँखों के आगे नाचने लगता था। उनकी इसी असाधारण अतीन्द्रिय चेतना से कई लोग उनकी जान के दुश्मन बन गये और कई बार उन पर प्राणघातक हमले भी हुए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
प्रायः पुरानी बातें हम भूल जाते हैं। इतनी बातें याद कर सकना संभव भी नहीं इसलिये स्मरण विस्मरण का क्रम साधारणतया चलता रहता है, किन्तु साथ ही यह भी होता रहता है कि दैनिक जीवन में काम आने वाले समस्त घटनाचक्रों की एक अति सूक्ष्म साउण्ड फिल्म बनती रहती है, जिसे आवश्यकतानुसार कभी प्रोजेक्ट किया जा सकता है
इसमें जितने किस्म का, जितनी मात्रा में ज्ञान भरा रहता है, उसकी तुलना में विश्व के बड़े-से-बड़े पुस्तकालय एवं सुपर कम्प्यूटर को भी तुच्छ ठहराया जा सकता है। 25 वर्ग इंच की यह छोटी-सी पुस्तक अपने अन्दर इतनी स्मृतियाँ व अगाध ज्ञान समेटे हुए है, जिसकी तुलना में किसी आधुनिक माइक्रोफिल्म को भी तुच्छ ठहराया जा सकता है। इतने पर भी मस्तिष्क की अधिकाँश क्षमता प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। काम न मिलने पर या प्रयुक्त न होने पर हर चीज निरर्थक हो जाती है
परन्तु विस्मृति का अर्थ यह कदापि नहीं होता कि जो चीजें हम भूल गये हैं, वे सदा के लिये विलुप्त हो गयी हैं। हमारे मस्तिष्क में कितने ही ज्ञानकोष ऐसे हैं, जिनमें माइक्रोफिल्मों की तरह न जाने कब-कब की स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं। आमतौर से जिन बातों को हम भूल चुके होते हैं, वे भी वस्तुतः विस्मृत नहीं होतीं, वरन् मस्तिष्कीय ज्ञानकोषों के स्नायुतंतुओं के एक कोने में छिपी पड़ी रहती हैं जब अवसर पाती हैं तो वर्षा की घास की तरह उभरकर ऊपर आ जाती हैं। ‘स्पीच एण्ड ब्रेन’ नामक अपनी कृति में पेनफील्ड एवं रॉबर्ट ने कहा है कि मनुष्य की स्मरणशक्ति स्नायुतंतुओं के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है
यही वह केन्द्र या पट्टी है जिसमें से देखे सुने और सोचे हुए सभी विचार जो मस्तिष्क के भीतर प्रवेश करते हैं उन्हें उसमें से होकर गुजरना ही पड़ता हैं। अतः वे स्मृतियाँ माइक्रोफिल्मों की तरह अथवा टेपरिकार्डर में भरी आवाज की तरह जम जाती है, और एक कोने में पड़ी रहती है। साधारणतया प्रयुक्त न होने पर वे स्मृति के गर्त में चली जाती है, परन्तु यदि विशेष प्रयत्न किये जाये तो उन्हें उभारा जा सकता है और कितनी ही पुरानी देखी-सुनी या सोची हुई बात फिर से उसी स्पष्टता के साथ सजग की जा सकती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
यह एक नृतत्ववेत्ता थी। फिल्म शूटिंग दौरान एक दुर्घटना में वह घायल हो गये, जिसके फलस्वरूप सन् 1929 उसकी मृत्यु हुई। यह सारी घटना हर्स्टन के समक्ष ही हुई थी। जब वह जख्मी हुई, तब भी जोरा हर्स्टन वहाँ मौजूद थी और जब उसने अस्पताल में अन्तिम साँस ली उस समय भी वह वहीं थीं
आरम्भ में हैती के जाम्बी कपोल-कल्पना भर माने जाते थे, किन्तु सन् 1966 में वहाँ की आर्टिबोनाइट घाटी में जब एक ऐसी महिला निरर्थक विचरण करती देखी कई, जिसकी मौत साठ वर्ष पूर्व हो चुकी थी, तब धूम मच गई। फेलिसिया मेण्टर नामक यह महिला एक फिल्म कलाकार थी, जोरा हर्स्टन से उसकी गहरी दोस्ती थी। यह एक नृतत्ववेत्ता थी। फिल्म शूटिंग दौरान एक दुर्घटना में वह घायल हो गये, जिसके फलस्वरूप सन् 1929 उसकी मृत्यु हुई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-July
उत्सव के विभिन्न अवसरों की चलती फिरती सिनेमा फिल्म खींची गई जो छोटे और बड़े सिनेमाओं में आसानी से दिखाई जा सकेगी। कितने ही फोटो भी लिये गये जो सम्भवतः अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में छपेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-January
प्रत्येक फिल्म मोहब्बत की कहानी घुमा फिराकर युवकों के सम्मुख उपस्थित करते हैं, प्रेम व्याधि को अप्राकृतिक उत्तेजना देते हैं। कच्ची आयु में प्रेम करने की तीव्र आकाँक्षा में सत् असत्, विवेक अविवेक का मार्ग नहीं दीखता। युवक युवतियां गन्दे व्यक्ति के पंजे में फँस कर सम्पूर्ण आयु नष्ट कर डालते हैं
जिनके समाचार पढ़कर मानवता कलंकित होती है। जितनी गन्दी हरकतों से आज सभ्य समाज कलंकित हो रहा है, उसमें से नब्बे प्रतिशत का उत्तरदायित्व अकेले सिनेमा की गन्दी, सारहीन, कामोत्तेजना, से परिपूर्ण फिल्मों पर है
उपरोक्त कथन में अक्षरशः सत्यता है। इनके अतिरिक्त सामाजिक गन्दगी का एक मुख्य कारण आज कल के गन्दे कामुकता पूर्ण अश्लील फिल्म, गन्दा साहित्य और उत्तेजक चित्र हैं। इनकी एक बाढ़ देश में आ गई है। आज का जैसा विकारमय वातावरण सहशिक्षा वाले स्कूलों, कालेजों, क्लबों, सोसाइटियों में है, कृत्रिम सन्तति निग्रह के साधनों का इतना प्रचार है कि चारों ओर स्वच्छन्दता, उच्छृंखलता विकार का साम्राज्य फैल गया है, स्त्री-पुरुष तेजहीन, लम्पट और अल्पायु हो रहे हैं, विषपी वातावरण में पले बच्चे आरम्भ से विषयी संस्कार लेकर गुप्त रोगों के शिकार हो रहे हैं
हम सारे दिन गली गली में प्रेम के गीत सुनते हैं, लेकिन यह वह दुनिया है जहाँ प्रेम वास्तविक जीवन में न होकर सिनेमा के पर्दे पर है। यहाँ आदर्श फिल्मों में दिखाया जाता है जबकि दैनिक जीवन में वह विलुप्त प्रायः हो गया है, यह वह समाज है, जिसमें पारस्परिक सद्भाव, सहानुभूति, भ्रातृभाव, प्रेम, सेवा, सहायता विनष्ट होकर उनके स्थान स्वार्थ प्रविष्ट हो गया है। सबको अपनी अपनी पड़ी है। प्रत्यक्ष जीवन में यहाँ आदमी आदमी की सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ने का प्रयत्न कर रहा है
आधुनिक सभ्यता, जिसकी हम प्रशंसा करते नहीं थकते, वासनामय, विलासपूर्ण, चमक दमक, तामसिक वातावरण, गन्दे आमोद प्रमोद, दिखावटी रहन सहन की जननी है। यदि वासना का नग्न नृत्य देखना हो, यदि सामाजिक बन्धन तथा लाज शर्म को ताक में रखा देखना हो तो वह आज के फिल्म जगत में देखा जा सकता है। सिनेमा का जगत उच्छृंखलता का जीता जागता नमूना है
इसलिए अवसर पाकर लड़के ने लड़की का खून कर दिया और पकड़ा गया। इतनी छोटी सी उम्र में प्रेम और खून करने के दुस्साहस हो जाय, ये संस्कार उसे सिनेमा की सस्ती रोमाँस पूर्ण गन्दी फिल्मों से मिला
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-October
जिनमें प्राण शक्ति अधिक है वे ही सुन्दर हैं। महात्मा गाँधी का सौंदर्य, हजारों फिल्म या नाटक में नाचने वाले तथा कथित सुन्दर अभिनेताओं से अधिक है। गार्गी और मैत्रेयी की सुन्दरता के सामने दुनिया भर की क्रिया मिलकर भी फीकी रहेंगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-June
जीवन में जो बातें भूलकर मस्तिष्क के सूक्ष्म कोष्ठकों में सुषुप्त अवस्था में पड़ रहती हैं वे सब एकत्रित होकर एक साथ निकलने के कारण जागृत एवं सजीव हो जाती हैं। इसलिए कुछ ही क्षण के अन्दर जीव अपने समस्त जीवन की घटनाओं को फिल्म की तरह देख जाता है। इस समय मन की आश्चर्यजनक शक्ति का पता लगता है। उनमें से आधी भी घटनाओं, मानसिक चित्रों को देखने के लिए जीवित समय में बहुत समय की आवश्यकता होती है पर इन क्षणों में वह बिल्कुल ही स्वल्प समय में पूरी-पूरी तरह मानस पटल पर घूम जाती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-May
अमरीकी फिल्मी कम्पनियों में काम करने वाले हेरी, टिनी, ग्रेस और डेजी नामक बौने बहुत ख्याति अर्जित कर चुके है। साढ़े बत्तीस इंच के मंचू ने भी सर्कस के नाम कमाया था दो फूट एक इंच के थम्ब और टाम अमेरिका भर का मनोरंजन करते रहे। टामथम्ब का बाद में वैसी ही लड़कियों से विवाह भी हो गया था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
दाद खुजाते खुजाते रक्त निकल आता है पर खुजाने वाले हाथ रुकते कहा हैं। कुत्ता सूखी हड्डी चबाकर अपने मसूड़े छील लेता है और घावों से टपकने वाले खून को चाटकर समझता है कि सूखी हड्डी बड़ी रसदार और जायकेदार है यौनाचार तो कुछ क्षण के लिए ही अवसर मिलने पर संभव होता है पर अश्लीलता का विषम ज्वर तो मस्तिष्क को हर घड़ी आन्दोलित करता रहता हैं ऐसे रंगीन सपने गढ़े और कल्पनालोक में फिल्माये, दिखाये जाते हैं, मानो अब तब में वह प्रत्यक्ष ही होने जा रहा हो यह हवस कुदृष्टि को जन्म देती है, भगिनी पुत्री जैसी पवित्रता विमोहित हो जाती है और संसार भर की युवतियां मात्र ऐसी ही अपना समर्पण करने की प्रतीक्षा कर रही हो। इस ललक से यौनाचार से अधिक घातक और अहर्निशि विषमज्वर की तरह चढ़ा रहने वाला बुखार मानसिक दक्षता को खोखला करके ही रहता है। शरीर तो समय कुसमय निचुड़ता ही रहता है
पन्तनगर (उ.प्र.) फिल्म निदेशक डॉ. ए. अरविन्द की उपस्थिति में दीप यज्ञ कार्यक्रम सोल्लास सम्पन्न हुआ। अनचीन्हे अनजाने टी.वी. सीरियल की शूटिंग के लिए आये श्री अरविन्द दीपयज्ञ कार्य क्रम से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने पूरे कार्यक्रम की वीडियो रिकार्डिंग करवाई
पन्तनगर (उ.प्र.) फिल्म निदेशक डॉ. ए. अरविन्द की उपस्थिति में दीप यज्ञ कार्यक्रम सोल्लास सम्पन्न हुआ। अनचीन्हे अनजाने टी.वी. सीरियल की शूटिंग के लिए आये श्री अरविन्द दीपयज्ञ कार्यक्रम से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने पूरे कार्यक्रम की वीडियो रिकार्डिंग करवाई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-March
अगणित पुस्तकें अनेकानेक भाषाओं में प्रायः इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु लिखी जाती, छपती और बिकती है। रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म, अखबार, पत्रिकाएं आदि भी इसी प्रयोजन की पूर्ति होती है। यह शिक्षा-तंत्र अत्यन्त विशद् और विस्तृत है। इसी के आधार पर मनुष्य अनेकानेक विषयों में प्रवीण, पारंगत बनता है
सत्पुरुषों का सहयोग अनुग्रह बरसा, जिसके सहारे ऐसे प्रयोजन पूरे करते रहते ही सुविधा मिलती चली गई। दिवंगत अदृश्य महा-पुरुष उन्हें अपनी जीवन गाथा फिल्म चित्र की तरह दिखाते हुए यह भी बताते रहते हैं कि परमार्थ पक्ष अपना कर हमने खोया कम और पाया ज्यादा। दूसरे लोग शरीर समाप्त होने के साथ ही अपनी सत्ता का समापन कर देते है, पर महापुरुष है जो यश शरीर से जीवित रहते हैं और अनेकों का अद्यावधि मार्ग दर्शन करते हैं, भविष्य में भी करते रहेंगे। अमर स्तर की पट्टी से इसी कारण प्राप्त करते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-August
सभी महत्वपूर्ण वनौषधियों गुण-कर्म के वर्णन सहित लगाई गयी है तथा उनकी पहचान आरोपण, पौधशाला बनाने का शिक्षण देने की तैयारी पूरी हो चुकी है। स्काउटिंग, फर्स्ट एड, रोगी परिचर्या, आहार विज्ञान रोगों के कारण निवारण संबंधी विभिन्न चार्ट गचा कैसे जाय व किस प्रकार रोग निवारण की सेवा साधना का आश्रय लेकर जन-जन तब पहुँचा जाय, इसका शिक्षण जिन स्लाइडों व वीडियो फिल्मों द्वारा किया जाएगा, वे बन कर तैयार है। यह अंक पाठकों के हाथों में पहुँचने तक सह अभिनव सत्र आरंभ हो चुके होंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
मनोरंजन के लिए उसमें अधिक समय नियोजित है एवं वह भी स्तर का नहीं है। शान्ति कुँज के वीडियो विभाग ने दिशा बोधक मार्गदर्शन छोटी-छोटी 10-10 मिनट की फिल्में बनाई है ताकि जन-साधारण को उनकी ही भाषा में समझाया जा सके। स्वास्थ्य स्वच्छ शिक्षा .... विस्तार समाज-सुधार की विभिन्न गतिविधियों पर प्रश्नोत्तरी एवं एक्शन साइंस के माध्यम से जन-रुचि को आकर्षित करने वाली फिल्में इस विभाग ने तैयार की है। एक वीडियो स्टूडियो .... रचनात्मक कार्यों में सक्रिय विभिन्न प्रतिभावान व्यक्तियों को आमंत्रित कर उनके विचार मीडिया द्वारा रिकार्ड कर चित्रों को जोड़ते हुए उनके व्यापक विस्तार की शान्ति-कुँज योजना है
वे है तो पुरातन काल की; पर उन्हें इस प्रकार प्रतिपादित किया गया है कि वे आज की बहुमुखी समस्याओं का समाधान कर सकें। इन कथाओं की एक फिल्म भी बनने जा रहीं है। इस ग्रन्थ की कथाओं को लोग सायंकाल अपने-अपने परिवार के सदस्यों को एकत्रित कर उन्हें सुनाते है और चरित्रनिष्ठा तथा समाज निष्ठा का सर्वांगपूर्ण प्रशिक्षण देते है। इसका प्रभाव भी असाधारण रूप से पड़ता देखा गया है
अपने हाथ उतनी ऊँचाई छू सकने जितने तो नहीं है, पर सस्ता उपकरण वीडियो अपना लिया गया है। उस पर लोकशिक्षण के समस्त आवश्यक आधारों को फिल्माया गया है। गायन अभिनय संवाद, कथानक, प्रवचन, रचनात्मक कार्यक्रमों का स्वरूप उसी के कैसेटों में भर दिया गया है। अनीति अवाँछनीयता, मूढ़मान्यता, कुरीतियाँ जैसी विकृतियों के उन्मूलन का स्वरूप एवं परिणाम भी कथानक रूप में इन्हीं वीडियो कैसेटों में अंकित रहता है
शान्ति कुँज के वीडियो विभाग ने दिशा बोधक मार्गदर्शन छोटी-छोटी 10-10 मिनट की फिल्में बनाई है ताकि जन-साधारण को उनकी ही भाषा में समझाया जा सके। स्वास्थ्य स्वच्छ शिक्षा .... विस्तार समाज-सुधार की विभिन्न गतिविधियों पर प्रश्नोत्तरी एवं एक्शन साइंस के माध्यम से जन-रुचि को आकर्षित करने वाली फिल्में इस विभाग ने तैयार की है। एक वीडियो स्टूडियो .... रचनात्मक कार्यों में सक्रिय विभिन्न प्रतिभावान व्यक्तियों को आमंत्रित कर उनके विचार मीडिया द्वारा रिकार्ड कर चित्रों को जोड़ते हुए उनके व्यापक विस्तार की शान्ति-कुँज योजना है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-February
वे काया को ब्रह्माण्ड का लघु-संस्करण मानते हैं और कहते हैं कि ब्रह्माण्ड में जो-जो संरचनाएं है वह सब कुछ इस काया में देखी जा सकती है। मगर वह सब इस शरीर में माइक्रोफिल्म की तरह है। जिस प्रकार माइक्रोफिल्म में अंकित चित्रों और अक्षरों को सीधे आँखों द्वारा देख-समझ नहीं पाती। इसके लिए ज्ञान-चक्षु, दिव्य-चक्षु की आवश्यकता पड़ती है, जिसे पराक्रमपूर्वक विकसित करना पड़ता है
मगर वह सब इस शरीर में माइक्रोफिल्म की तरह है। जिस प्रकार माइक्रोफिल्म में अंकित चित्रों और अक्षरों को सीधे आँखों द्वारा देख-समझ नहीं पाती। इसके लिए ज्ञान-चक्षु, दिव्य-चक्षु की आवश्यकता पड़ती है, जिसे पराक्रमपूर्वक विकसित करना पड़ता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-June
वह साइकिल पर सवार होकर बिना भटके अभीष्ट स्थान तक पहुँच जाती है। यह बंदरिया अमेरिका तथा इंग्लैंड के कई फिल्मों में भी काम करती है और अपने मालिकों के लिए ढेरों पैसे कमाती है
वे सभी बहुत भोले और प्रेमी थे। उनकी फिल्में बनाने संसार भर की कई कम्पनियाँ आई। जिस बात पर लोग बिल्कुल यकीन नहीं करते थे उस स्वभाव परिवर्तन की बात पर लाखों करोड़ों को विश्वास करना पड़ा
नोबुल पुरस्कार विजेता प्रो0 डगलस ए.डीन के अनुसार मानवी अंगुलियों के पोरुओं तथा हथेली के चारों ओर के आभामंडल से किसी के भविष्य में रोगी होने, न होने की संभावना व्यक्त की जा सकती हैं। फरवरी ... के अंतिम सप्ताह में “बायोइलैक्ट्रोग्राफी” पर पाण्डीचेरी में हुई एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में अपने शोध निष्कर्ष बताते हुए प्रोफेसर डीन ने कहा कि उन्होंने पोलेराइड इंस्टाण्ड फिल्म एवं बायोइलैक्ट्रोग्राफ की मदद से मात्र दो मिनट में प्रभामण्डल का मापन व रो का निदान कर पाने में वे सफल हुए हैं। अपने इसी कार्य पर उन्हें नोबुल पुरस्कार भी मिल चुका हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि अगले दिनों “आरामापन” चिकित्सा विज्ञान में एक महत्वपूर्ण स्थान ले ले
फिल्मों में कितने ही बन्दर ओर कुत्ते ऐसे पार्ट करते है कि उन्हें किसी कलाकार से कम नहीं ठहराया जा सकता। कुछ दिन पूर्व एक कुत्ता पोस्टमैन की भूमिका निभाने, घर-धर चिट्ठियाँ बाँटने में यशस्वी हो चुका है। उनकी गंध शक्ति का उपयोग करके पुलिस वाले अभी भी चोरों और अपराधियों का पता लगाते है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-April
तुम किसी विशेष काम के लिए आये हो। आंखें बन्द करो आंखें बन्द की मैंने और तीन जन्मों का दृश्य फिल्म की तरीके से दिखायी पड़ा मैं कौन हूँ? और कब कब जन्म लिया और यह शक्ल जो मुझे गुरुदेव के रूप में दिखायी पड़ती है, कब कब मेरे साथ नृत्य करती रही? बस इतनी घटना घटित हुई और मेरे जीवन का कायाकल्प हो गाय। मैंने उनके चरणों झुकाया और कहा आप मुझे लम्बे समय से राह बताते रहे है अब इस जीवन की भी राह बताइये। उन्होंने एक राह बतायी चौबीस साल तक चौबीस गायत्री के महापुरश्चरण करने के लिए आज्ञा दी और कहा तुझे लोहे का स्टील का बनना पड़ेगा बड़े काम करने के लिए मजबूती की जरूरत है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-January
देखा यही जाता है उनके मन में दीन-दुखियों के प्रति करुणा और सेवा की बात तो दूर, नैतिकता से भी कोई वास्ता नहीं। लोक सेवा उनके लिए वीडियो फिल्म बन जाने, अखबारों में फोटो छपवाने का अच्छा माध्यम है। इस तरह की लोकसेवा का अगर विश्लेषण किया जाय तो वह मात्र फैशन साबित होती है। जिसके पास करने को कोई काम नहीं अथवा जो यह समझते हैं कि इस प्रकार समाज में कुछ इज्जत कमा लेंगे या जिसके पास पूर्वजों की कमाई हुई पैतृक संपदा है कि उससे आराम से निर्वाह हो जाय, वे लोकसेवा का मुखौटा लगा लेते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-July
उन्होंने आशा प्रकट की है कि गीजा के पिरामिड में सुरक्षित रखे प्राचीन मिश्री राजा तूतनखामन के मृत शरीर में अब भी इतने पर्याप्त डी.एन.ए. हो सकते हैं किस उससे राजा की कार्बन कॉपी ‘तैयार की जा सके। ज्ञातव्य है कि बहुचर्चित अंग्रेजी फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ इसी कथानक पर आधारित चलचित्र है। उसमें किसी वैज्ञानिक ने जुरासिक युग में प्रचुर संख्या में विद्यमान महाकाव्य डायनासोर के कुछ डी.एन.ए. कहीं से एकत्र करने में सफलता प्राप्त कर ली थी फिर उसी अवशेष से उसने उसका -ब्लूप्रिण्ट’ तैयार कर लिया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-October
इस समय तक माइक्रोवेव, माइक्रो फिल्म तथा माइक्रो ट्रान्समीटर का आविष्कार हो चुका था, जिससे यह बात तो सिद्ध हो चुकी थी कि “शब्द” और “आकार” को शक्ति तरंगों (एनर्जी वेव) में बदल कर उन्हें नियन्त्रित अवस्था में एक स्थान से दूसरे स्थान में भेजा जा सकता है। इस प्रणाली को “टेलीविजन” कहते हैं जिसके द्वारा एक स्थान से शक्तिशाली विद्युत तरंगों के सहारे चित्र और ध्वनियाँ चारों ओर प्रक्षेपित की जा सकती हैं। यह तरंगें जितनी अधिक विद्युत शक्ति से अनुप्रेरित होंगी प्रेषण उतनी ही दूर तक ग्रहण किया जा सकता है
जिसमें किसी तरह की अस्वस्थता की कहीं कोई उल्लेख नहीं था, तो भी इस समाचार से उसकी स्मृति धर्मपत्नी के लिये घनीभूत होती चली गई। जिस समय वह कैमरे के सामने बैठा, उस समय वह पूरी तरह अपनी पत्नी के ही विचारों में खोया हुआ था, उसी स्थिति में जोहान्स नामक उसके फोटोग्राफर ने उसका फोटो लिया, जब उसने फिल्म धोई तो वह यह देखकर आश्चर्य चकित रह गया कि जिस नम्बर की फिल्म में उसने टेड सीरियस का चित्र उतारा था, उसमें चारपाई पर लेटी हुई एक महिला का चित्र था उसके आस-पास एक पुरुष, एक महिला, दो युवतियाँ खड़े थे और एक अन्य व्यक्ति जो डॉक्टर लगता था, स्टेथिस्कोप से उस महिला के शरीर की जाँच कर रहा था। पीछे पता चला कि सचमुच उसकी पत्नी बीमार थी और उसी स्थिति में सचमुच उसी डॉक्टर ने उसका मुआइना किया था
सन् 1962 की बात है, शिकागो के टेड सीरियस नाम के एक व्यक्ति ने कल्पना द्वारा दूरवर्ती वस्तुओं के चित्र फिल्म कैमरे पर उतार कर न केवल वैज्ञानिकों को अचम्भे में डाल दिया अपितु विज्ञान के समक्ष एक चुनौती खड़ी कर दी-क्या उसे प्रकृति, पदार्थ और ब्रह्माण्ड की जानकारियों के लिये मात्र भौतिक उपकरणों तक ही सीमित रहना पड़ेगा? क्या मनुष्य शरीर उससे भी समर्थ उपकरण नहीं है जिसके द्वारा ब्रह्माण्ड व्यापी हलचलों की इतनी स्पष्ट जानकारी ली जा सकती है जितनी भौतिक उपकरणों के द्वारा भी सम्भव नहीं है?
यह विशेषता फिल्म की थी? या कोई फोटोग्राफर को हिप्नोटाइज कर रहा था टेड के दिमाग में कोई चक्कर था? इस प्रश्न से फोटोग्राफर के दिमाग में पर्त के पर्त उमड़ते रहे। उसने कई तरह की फिल्मों से, कैमरे बदल बदल कर स्वस्थ चित्त से टेड के चित्र लिये। वह हर बार यह देख हैरान रह जाता कि टेड जिस भी वस्तु का ध्यान कर रहा होता कैमरे की फिल्म में वही ध्यान वाला चित्र उतरता
उसने कई तरह की फिल्मों से, कैमरे बदल बदल कर स्वस्थ चित्त से टेड के चित्र लिये। वह हर बार यह देख हैरान रह जाता कि टेड जिस भी वस्तु का ध्यान कर रहा होता कैमरे की फिल्म में वही ध्यान वाला चित्र उतरता। यह एक ऐसी घटना थी जो वैज्ञानिकों को भी आश्चर्य चकित करने वाली थी सो उसने उसकी सूचना पत्रकारों को दी, पत्रकारों की उपस्थिति में टेड के चित्र खींचे गये तब भी टेड की सशक्त कल्पना के ही चित्र आये। टेड अखबारों के आकर्षण का विषय बन गया, उसकी कल्पना के फोटो सहित उसके तरह-तरह के फोटो अखबारों में छपे, उसे देखने परीक्षण करने वालों का ताँता लग गया
यह विशेषता फिल्म की थी? या कोई फोटोग्राफर को हिप्नोटाइज कर रहा था टेड के दिमाग में कोई चक्कर था? इस प्रश्न से फोटोग्राफर के दिमाग में पर्त के पर्त उमड़ते रहे। उसने कई तरह की फिल्मों से, कैमरे बदल बदल कर स्वस्थ चित्त से टेड के चित्र लिये। वह हर बार यह देख हैरान रह जाता कि टेड जिस भी वस्तु का ध्यान कर रहा होता कैमरे की फिल्म में वही ध्यान वाला चित्र उतरता। यह एक ऐसी घटना थी जो वैज्ञानिकों को भी आश्चर्य चकित करने वाली थी सो उसने उसकी सूचना पत्रकारों को दी, पत्रकारों की उपस्थिति में टेड के चित्र खींचे गये तब भी टेड की सशक्त कल्पना के ही चित्र आये
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-September
कभी-कभी अपने नाटकों में स्वयं भी अभिनय किया है। उनकी कृतियों पर कई फिल्में बनी हैं। उनके उपन्यासों को श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है और गीतों को भावनापूर्वक गाया जाता है। इस लोक-प्रियता के पीछे कवि का वह महान् व्यक्तित्व और कर्तृत्व काम करता है, जिसने मानवता की सेवा को ही अपना लक्ष्य रखा और उसी के लिए अपने को खपा दिया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-July
इसीलिए उक्त समाजशास्त्री ने सुझाव दिया है कि बाल-अपराधों को मिटाने के लिए अन्य उपायों के साथ-साथ चल-चित्रों के प्रति काफी कड़ाई बरतनी चाहिए। ऐसी फिल्में जिनमें काम, तड़क-भड़क की प्रधानता होती है, बच्चों के कोमल मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती हैं। बच्चे भी वैसा ही करने लगते हैं और इस अभ्यास में उन्हें अपराधी जीवन का मार्ग अपनाना पड़ता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अधिकाँश फिल्मों का प्रभाव बच्चों में वासनामय जीवन का सूत्रपात कर देता है
मद्रास के एक समाजशाही रामास्वामी अय्यर ने बाल-अपराधों की जाँच करके अपनी रिपोर्ट में लिखा है—”सिनेमा बाल-अपराध का एक बहुत बड़ा कारण है। ” यहाँ तक कि धार्मिक फिल्मों में भी अश्लीलता, अशिष्टता की बहुतायत होती है। तथाकथित सामाजिक चलचित्र तो और गये-बीते होते हैं। फिर इनसे बच्चों में अपराध प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है
बच्चे भी वैसा ही करने लगते हैं और इस अभ्यास में उन्हें अपराधी जीवन का मार्ग अपनाना पड़ता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अधिकाँश फिल्मों का प्रभाव बच्चों में वासनामय जीवन का सूत्रपात कर देता है
(9) चित्रकला प्रदर्शिनी , अभिनय, जीवन लीलाएँ, नाटक, एकांगी आदि मनोरंजन माध्यमों से सुरुचि उत्पन्न करने का प्रयत्न किया जाय। यदि सम्भव हो तो व्यापारिक आधार पर ऐसी कम्पनियाँ भी बनें जो लाउडस्पीकरों पर गाये जा सकने योग्य भावनापूर्ण रिकार्ड तथा सिनेमा घरों में दिखाये जा सकने योग्य नव-निर्माण के उद्देश्य से फिल्म बना सकें
अश्लील, अनैतिक साहित्य एवं चित्रों का बहिष्कार किया जाए। कुरुचिपूर्ण पत्रिकाएं, गन्दे गीत, अश्लील पुस्तकें, तस्वीरें, गाली देना, फिल्में, अवाँछनीय नृत्य आदि घृणित समझा जाय और लोग उनसे बिच्छू की तरह बचना सीखें। शारीरिक और मानसिक दुराचार को घटाया जाय। समय-समय पर इन बुरी वस्तुओं की होली जलाई जाय
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-February
नेत्रों से सिनेमा आदि देखते रहें। कानों से फिल्मी संगीत सुनते रहें। वीर्यपात में भी कोई बन्धन न हो। आहार-विहार अनियमित होता रहे, मगर मन वश में हो जावे यह कैसे मुमकिन है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-December
विविध विषयों की अगणित शिक्षा संस्थाएं इसी प्रशिक्षण के लिये खुली हुई हैं जिनमें पढ़ कर छात्र अपनी रुचि एवं आवश्यकतानुसार जानकारी अर्जित करते हैं। पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन, फिल्म, परस्पर संभाषण, भ्रमण आदि साधनों से भी मस्तिष्क को समुन्नत करने वाली जानकारी मिलती है। यह सब शिक्षा के ही भेद है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-February
उस अबोध लड़की को फिल्म ऐक्ट्रेस बनने के प्रयत्न में आने वाली नैतिक बाधाओं का पता न था और न उसे उन ख्यातिनामा अभिनेत्रियों के गर्हित जीवन के विषय में ही कोई जानकारी थी, जिनको उसने चित्रपट पर देखा, जिनके चित्र बाजार में बिकते और घरों, दुकानों पर टंगे देखे और जन-जन से सुनी थी जिनकी प्रशंसा। अभिनय संसार का जीवन कितना नीरस, कटु, कलुषित, कृत्रिम, प्रदर्शन एवं पीड़ापूर्ण हो सकता है-इसकी उस बालिका को कोई जानकारी नहीं थी। उसके सामने तो अभिनेत्रियों का यह ही रंगीन तथा प्रशंसापूर्ण चित्र था जिसको वह देखा सुना करती थी
एक बार एक समाचार छपा था कि एक लड़की छज्जे से रात के समय धोती लटका कर नीचे उतरती हुई पकड़ी हुई। उससे जब उसकी इस अवाँछनीय तथा आशंकापूर्ण क्रिया का कारण पूछा गया तो उसने बताया कि वह बम्बई जाकर फिल्म ऐक्ट्रेस बनने की लालसा में घर से भाग जाने का प्रयत्न कर रही थी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
अश्लील उत्तेजक, अनाचारी साहित्य सुशिक्षितों का ही लिखा हुआ है। दुष्प्रवृत्तियों को भड़काने वाली फिल्में सुशिक्षित ही बनाते हैं। छल, प्रपंच, पाखण्ड , अन्धविश्वास उत्पन्न करने वाला मायाजाल विद्वानों का ही रचा हुआ है। धर्म के नाम पर व्यापक जालसाजी का बखेड़ा उन्हीं धर्मगुरुओं द्वारा खड़ा किया है जो अपने को विद्वान और पंडित कहते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-September
सामान्य डर से दृष्टि क्षमता कम हो जाती है जबकि अधिक डरावने दृश्य उपस्थित हो जाने पर व्यक्ति बेहोश भी हो जाता है। कुछ वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड में एक ऐसी फिल्म दिखाई जा रही थी जिसके अंतर्गत कुछ भयोत्पादक दृश्य थे, जिन्हें देख कर कई दर्शक बेहोश हो जाते थे और उन्हें अस्पताल पहुँचाना पड़ता था। बाद में उस अंश को निकाल दिया गया। मूर्धन्य चिकित्सा विशेषज्ञों ने इस तथ्य को भी स्वीकार किया है कि तीव्र डर और चिंता के कारण मनुष्य के बाल रातोंरात सफेद हो सकते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-May
इसके बाद युगों-युगों तक ऐसा मौका नहीं आने वाला। गाँधी फिल्म आयी थी उसमें नमक सत्याग्रह वालों को जाते हुए हम देखते रहे। यह महादेव भाई जा रहे हैं, यह प्यारे लाल जा रहे हैं, यह हरिभाऊ उपाध्याय जा रहे हैं। हम नाबालिग थे अतः नहीं जा पाए
सिनेमा में चलती फिरती तस्वीरें दीखती हैं पर वस्तुतः बात वैसी नहीं होती। होता इतना भर है कि आँखों की दृश्यावलोकन शक्ति एक सेकेण्ड में सोलह चित्र देख सकने तक ही सीमित है किन्तु फिल्म घुमाने की मशीन अपेक्षाकृत अधिक तेजी से चलती है। इसलिए चित्रों में काम करने वाले पात्र चलते बोलते दीखते हैं। लाखों व्यक्ति नित्य सिनेमा देखते हैं पर अपनी आँखों पर अविश्वास नहीं करते और चित्रों को ही चलता फिरता अपनी सहज बुद्धि से मान लेते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
वे हक्का बक्का रह गए ऐसी विलक्षण स्मरण शक्ति देखकर वह भी इतनी लम्बी बेहोशी के बाद। उनके दिमाग की कैटस्कैनिंग फिल्में न्यूरोलॉजी की कान्फ्रेन्स में सर्जन्स के समक्ष रखी गयीं व सबने यही कहा कि ऐसे व्यक्ति को तो मर जाना चाहिए था। किन्तु उनके चिकित्सक ने बताया कि अपने “भगवान” की कृपा से वह व्यक्ति जिन्दा है व वे सभी उसे चेक कर सकते हैं। सब आश्चर्यचकित थे कि विज्ञान जिसकी व्याख्या नहीं कर सकता, वह चमत्कार क्यों व कैसे संभव हुआ? बाद में सारे दायित्व निभते ही ढाई वर्ष बाद दूसरी बार की तकलीफ में उनका देहान्त हो गया पर वे अपने बाद की सारी व्यवस्था कर गए थे अपने गुरु के निर्देशानुसार
जब व्यक्ति तनाव की चपेट में होता है तो उसकी शिकायत रहती है कि कुछ विशेष कार्य करने के लिए वह अपने आपको अक्षम सा पाता है। परिणामतः वह बाह्य साधनों यथा टेलीविजन, फिल्म आदि का सहारा लेता है किन्तु अशाँति और भी बढ़ती देखी जाती है। तनाव रहित होने, थकान दूर करने वाले विभिन्न योगाभ्यास ऊर्जा खपत करने की अपेक्षा बचाते हैं। टहलने या तैरने जैसे कुछ शारीरिक व्यायाम शरीर की चयापचयिक दर (मेटाबॉलिक रेट) धीमी करते हैं फलस्वरूप शरीर तनावमुक्त अनुभव होता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-May
युगसाहित्य की तरह ही प्रज्ञा अभियान को कलाक्षेत्र में भी प्रवेश करना होगा। छोटे-छोटे रचनात्मक धारावाहिक-फिल्मों को बनाने वाला तंत्र खड़ा करना होगा। जो ‘ब्रेनवाशिंग’ की क्राँतिकारी भूमिका प्रस्तुत कर सके। स्लाइड प्रोजेक्टर से आरंभ हुआ हमारा प्रज्ञा अभियान मल्टीमीडिया प्रोजेक्टर तक, साइबर क्राँति तक पहुँच चुका है
वहाँ पहुँचकर उन्होंने 17000 डालर में एक लबादा खरीदकर ही चैन की साँस ली। यह लबादा सुपरमैन की शृंखला वाली फिल्म में अभिनेता किटोकारीब ने पहना था। एक क्रम में उनका अगला दौर रूस का लगने वाला है। उन्हें पूरा विश्वास है कि वे प्रसिद्ध रूसी अंतरिक्षयात्रियों द्वारा पहने गए स्पेससूटों की खरीद पाने में सफल होंगे
डेविड इन जीव-जंतुओं को सिखाता-पढ़ाता भी है। उसके इन मित्रों में से कुछ फिल्मों में भी काम कर चुके हैं
(3) कलातंत्र-लोकरंजन से लोकमंगल-इलेक्ट्रानिक मीडिया की क्राँति द्वारा जन-जन को प्रभाव क्षेत्र में लेना-आज टेलीविजन, कलामंच, इंटरनेट वेबसर्फिंग विचार-संप्रेषण के एक विलक्षण माध्यम बन गए हैं। संगीत, अभिनय, एक्शन साँग, चित्रकथाएँ, नाटिकाएँ, फिल्मों ने मनोरंजन की दुनिया को एक क्राँतिकारी आयाम देकर रोजमर्रा की चीज बना दिया है। कामुकता-विलासिता यदि इस माध्यम से फैली है, तो इसके लिए प्रतिभाएँ दोषी हैं, जिन्होंने इस माध्यम का सदुपयोग-सुनियोजन नहीं किया। युगसाहित्य की तरह ही प्रज्ञा अभियान को कलाक्षेत्र में भी प्रवेश करना होगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-January
ऐसा ही संयोग अभिनेता एंथोनी हापकिंस के साथ घटा - जब वे वर्ष 1973 में अपनी फिल्म “द गर्ल फ्राँम पेट्रोबका” के संदर्भ में विएना जा रहे थे। यह फिल्म जॉर्ज फेफर की पुस्तक पर आधारित थी। दुर्भाग्य से पार्श्व टिप्पणियों से युक्त मूल प्रति दो वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड में चोरी हो गई थी, अतः फिल्म के उपयुक्त महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ को पुनः तैयार किया जाता था
यह फिल्म जॉर्ज फेफर की पुस्तक पर आधारित थी। दुर्भाग्य से पार्श्व टिप्पणियों से युक्त मूल प्रति दो वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड में चोरी हो गई थी, अतः फिल्म के उपयुक्त महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ को पुनः तैयार किया जाता था। फिल्म साइन करने के बाद हापकिंस पुस्तक की एक प्रति के लिए लंदन रवाना हो गए, किंतु कहीं भी पुस्तक उपलब्ध न हो सकी, अतः निराश होकर हापकिंस अपने घर की ओर चल पड़े। तभी अचानक अपनी सीट के किनारे उन्हें एक खुला पार्सल दिखा जिसमें वही मूल प्रति थी जो दो वर्ष पूर्व चोरी हो गई थी
संवेदना से ओतप्रोत सहानुभूति की अभिव्यक्ति भी व्यक्ति को रुला देती है। किसी घटना -कहानी -फिल्म आदि से भावनाओं के स्तर पर एकाकार हो जाने से भी इसी तरह की अभिव्यक्ति होने लगती है। सहानुभूति के सहज स्वर आँखों में आँसू बनकर झरने लगते हैं। सामान्यतः कष्ट के क्षणों में ऐसा होता है
दुर्भाग्य से पार्श्व टिप्पणियों से युक्त मूल प्रति दो वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड में चोरी हो गई थी, अतः फिल्म के उपयुक्त महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ को पुनः तैयार किया जाता था। फिल्म साइन करने के बाद हापकिंस पुस्तक की एक प्रति के लिए लंदन रवाना हो गए, किंतु कहीं भी पुस्तक उपलब्ध न हो सकी, अतः निराश होकर हापकिंस अपने घर की ओर चल पड़े। तभी अचानक अपनी सीट के किनारे उन्हें एक खुला पार्सल दिखा जिसमें वही मूल प्रति थी जो दो वर्ष पूर्व चोरी हो गई थी। इस संयोग को हापकिंस ने अचेतन मन द्वारा वातावरण पर प्रभाव की परिणति माना
मानो, घटना का ताना बाना सूक्ष्मजगत् में काफी पहले से ही बुना जा चुका हो। दुर्घटना के समय ही एक फिल्म डायना एण्डी निकलने ही वाली थी, उसमें उसका एक सनकी चाहने वाला पापराजियो से मिलकर डायना के पीछे पड़ा हुआ था। वास्तव में डायना की मृत्यु पापराजियो से भागते हुए ही हुई थी। इस तरह डायना पर लिखी गई पुस्तक रायल वर्ल्ड प्रकाशित होने पर रोक लगा दी गई थी क्योंकि इस पुस्तक में एक मुस्लिम से शादी के विरोध में दक्षिणपंथी उग्रवादी डायना की हत्या की योजना बना रहे थे
ऐसा ही संयोग अभिनेता एंथोनी हापकिंस के साथ घटा - जब वे वर्ष 1973 में अपनी फिल्म “द गर्ल फ्राँम पेट्रोबका” के संदर्भ में विएना जा रहे थे। यह फिल्म जॉर्ज फेफर की पुस्तक पर आधारित थी। दुर्भाग्य से पार्श्व टिप्पणियों से युक्त मूल प्रति दो वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड में चोरी हो गई थी, अतः फिल्म के उपयुक्त महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ को पुनः तैयार किया जाता था। फिल्म साइन करने के बाद हापकिंस पुस्तक की एक प्रति के लिए लंदन रवाना हो गए, किंतु कहीं भी पुस्तक उपलब्ध न हो सकी, अतः निराश होकर हापकिंस अपने घर की ओर चल पड़े
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-June
गीतों के ऑडियो कैसेट्स, सी.डी. जन-जन तक पहुँचे। प्रेरक धर्मप्रेरणा प्रधान धारावाहिक एवं फिल्में बनें
इसी सेंटर में विहैवियरल एनालिसिस एंड मैनेजमेंट विभाग के अध्यक्ष डॉ गौतमदास दारा भावनात्मक रूप से असंतुलित 90 प्रतिशत व्यक्तियों पर 20 मिनट का संगीत प्रयोग किया गया। इनमें प्रथम 30 के समूह को शंकर मरनम् (कर्नाटक) व द्वितीय 30 व्यक्तियों को फिल्मी संगीत सुनाया गया व तीसरे समूह को कुछ भी नहीं सुनाया गया। दो सप्ताह तक किए गए इस अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि प्रथम समूह में 22 व्यक्तियों का तनाव स्तर तीव्रता से कम हुआ। दूसरे समूह में मात्र 8 व्यक्तियों में कुछ सुधार हुआ, जबकि तीसरा समूह यथावत रहा
चित्र, मूर्तियाँ, नाटक, अभिनय, संगीत, धारावाहिक, फिल्में, लोकगीत सभी इस तंत्र में आते हैं। सरल संगीत के ऐसे पाठ्यक्रम बनें, जो वर्षों में नहीं, मात्र कुछ माह में सीखे जा सकें। संगीत विद्यालय जगह-जगह खुले
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-July
चित्र, मूर्तियाँ, नाटक, अभिनय, संगीत, धारावाहिक, फिल्में, लोकगीत सभी इस तंत्र में आते हैं। सरल संगीत के ऐसे पाठ्यक्रम बनें, जो वर्षों में नहीं, मात्र कुछ माह में सीखे जा सकें। संगीत विद्यालय जगह-जगह खुलें
गीतों के ऑडियो कैसेट्स, सी.डी. जन-जन तक पहुँचे। प्रेरक धर्मप्रेरणा प्रधान धारावाहिक एवं फिल्में बनें
सभी की गुणवत्ता और संरचना के बारे में बढ़ चढ़कर दावे किए जाते हैं। फिल्मी सितारों से लेकर खिलाड़ी, कलाकार और बुद्धिजीवी तक जिनका काम व्यक्तित्व के आकर्षण से चलता है, इनका विज्ञापन करते देखे जाते हैं। प्रायः सभी साबुन सौंदर्य के रक्षक, प्रहरी और त्वचा को चिकना, कोमल रखने वाले विज्ञापित होते हैं। सन् 1970 तक आठ प्रकार के नहाने के साबुन प्रचलित थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-February
सन् 1903 में विश्वपटल पर पहली बार सिनेमा का उदय हुआ। सन् 1913 में यहाँ पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ के रूप में सामने आई। 1913 में ही अमेरिका में नारी स्वतंत्रता, समता एवं वोट अधिकार को लेकर नारीमुक्ति संघर्ष की जबरदस्त शुरुआत हुई। सन् 1921 में विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन को उनके वैज्ञानिक योगदान के नोबुल पुरस्कार मिला
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-September
वजन की तुलना में उसकी कार्यक्षमता असंख्य गुनी बढ़ जाती है। माइक्रो फिल्मों के माध्यम से विशालकाय ग्रंथ छोटी-सी डिबिया में बंद करके रखे जा सकते हैं। एक स्वस्थ और समुन्नत मस्तिष्क में लगभग एक करोड़ ग्रंथों में लिखी जा सकने जितनी सामग्री संग्रह करके रखी जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर इस क्षमता में सहज ही दूनी अभिवृद्धि भी की जा सकती है
शारीरिक कष्ट से लेकर पीड़ित-उपचार के प्रयास निमित्त मात्र बने थे। आज छह वर्ष बीतने पर भी सभी कुछ मानो आँखों के सामने एक दृश्यचित्र-फिल्म की रील की तरह घूम जाता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-November
समारोह संचालक श्री कालीचरण शर्मा जी ने आए सभी प्रतिभावानों का स्वागत किया, तो प्राथमिक परिचयात्मक उद्बोधन में महापूर्णाहुति के प्रथम तीन चरणों सहित इस आयोजन की महत्ता पर प्रकाश डाला। मल्टीमीडिया की एक 24 मिनट की फिल्म द्वारा आंकड़ों के माध्यम से प्रस्तुति दी गई, जो पूरे स्टेडियम में देखी गई। बीच-बीच में प्रेरक प्रज्ञागीतों ने सभी को स्थिर बैठाए रखा व उल्लास के भाव से भर दिया
तदनुसार प्रायः पाँच सौ बीस रुपये प्रतिवर्ष माना जाना चाहिए, पर वार्षिक चंदा है 699 रुपये अन्य कई पत्रिकाएँ जो हिंदी में प्रकाशित होती थी, बंद होती चली गई। संस्कृति से इतर फिल्मी पन्नों वाले तो ढेरों दैनिक, पत्रिका बिकते ही रहते है। इनसे निताँत भिन्न है। ‘अखण्ड ज्योति’
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-February
ऐसे व्यवसाय से हम अपने व्यक्तित्व को समाज के समष्टिगत जीवन में डुबा नहीं सकते। यदि हम सिनेमा का धन्धा करें और जनता के हित को ध्यान में न रखते हुए ऐसी फिल्में तैयार करें जो लोगों की वासनाओं को उत्तेजित करें तो इस दृष्टिकोण से किए गए सिनेमा के व्यवसाय की कमाई ईमानदारी की कमाई नहीं कही जा सकती। तम्बाकू, बीड़ी, चाय, वनस्पति घी, मदिरा आदि के व्यवसाय इस दृष्टिकोण से शुद्ध आजीविका वाले व्यवसाय नहीं होते। यदि हम जनता को संकटमय परिस्थिति में पाकर उसे अपनी वस्तु के अत्यधिक दाम देने को बाध्य करते हैं तो भी हम इस द्रव्य को ईमानदारी से नहीं पा रहे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-January
कुविचारों को फैलाने के अगणित माध्यम आज मौजूद हैं। अश्लीलता, कामुकता, व्यभिचार, उच्छृंखलता को प्रोत्साहन देने वाली पुस्तकों, तस्वीरों, गीतों, पत्र−पत्रिकाओं, फिल्मों की आज भारी धूम है, उनका आकर्षक एवं व्यापक प्रचार जन साधारण के भोले मस्तिष्कों को प्रभावित करके उन्हें अपने चंगुल में जकड़ लेता है और लोगों के मन बुराइयों की ओर झुक पड़ते हैं
जिस स्कूल के बच्चे गंदी गालियाँ देते हैं उसमें पढ़ने जाने पर हमारा बच्चा भी गालियाँ देना सीखकर आएगा। गंदे गीत, गंदे फिल्म, गंदे प्रदर्शन, गंदी पुस्तकें, गंदे चित्र कितने असंख्य अबोध मस्तिष्कों पर अपना प्रभाव डालते हैं और उन्हें कितना गंदा बना देते हैं, इसे हम प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख सकते हैं। दो वेश्याएँ किसी मुहल्ले में आकर रहती हैं और वे सारे मुहल्ले में शारीरिक या मानसिक व्यभिचार के कीटाणु फैला देती हैं। शारीरिक न सही, मानसिक व्यभिचार तो उस मुहल्ले के अधिकाँश निवासियों के मस्तिष्क में घूमने लगता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-February
फिल्म अभिनेता श्री पृथ्वीराज कपूर ने पत्रकारों को बताया कि आगामी 5 वर्षों में उन्होंने 9 भाषाऐं सीखने का निश्चय किया है। उन्होंने पंजाब की भाषा समस्या पर व्यंग करते हुए कहा कि पंजाबी 14 साल से इस बात पर बहस कर रहे हैं कि वे पहले हिन्दी पढ़ें या पंजाबी। यदि वे मेरे उदाहरण पर चलते तो अब तक 27 भाषाऐं सीख लेते
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-November
फिल्म की तस्वीरें एक के बाद दूसरी न आवें तो सिनेमा देखने का मजा ही मिट्टी हो जाए। पूरे खेल में एक ही तस्वीर सामने खड़ी रहे तो उसे देखना कौन पसंद करेगा? अनेकों हलचल भरे दृश्य होने से ही तो मनोरंजन का आनंद मिलता है, जिसने जितनी अधिक गुत्थियाँ सुलझाई होंगी, उसका साहस उतना ही बढ़ेगा, उसका अंतःकरण उतना ही खिलेगा, उसका चेतन उतना ही विकसित होगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही परमात्मा ने अपनी समस्त सृष्टि में ऐसी व्यवस्था की है कि समस्याओं से रहित कोई भी प्राणी रह न पावे
चोर का चोरों से वास्ता बढ़ता जाता है और सज्जनों के सत्संग में सत्पुरुषों की संख्या बढ़ती जाती है। कामुकता के गंदे विचार जिन मस्तिष्कों में भरे पड़े रहते हैं, उन्हें अश्लील पुस्तकें, बेहूदी तस्वीरें, भद्दे फिल्म, घृणित स्त्रियाँ, दुष्ट साथी कहीं-न-कहीं से मिल ही जाते हैं। यह सब सरंजाम जुट जाने के बाद वह दुर्गति भी अपने आप आगे आ जाती है, जो ऐसे लोगों के लिए उचित है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-December
शब्द का वेग प्रायः सेकेण्ड में 1100 फुट का हैं शब्द कम्पनों को मृदु वस्तुओं पर अंकित करते हैं। इस तरह के शब्दाँक हमें फिल्म तथा रिकार्डो पर दिखाई देता है। शब्द तो प्रकाश में भी परिवर्तित किया जा सकता है। उस प्रकाश से या शक्ति से शब्द सुनाया जा सकता है यह सब आधुनिक विज्ञान की देन मानी जाती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-September
मस्तिष्क के विद्युत कोषों में से प्रति सैकिण्ड करीब 30 या 31 विचार तरंगें निकलती हैं। सिनेमा के फिल्म में एक सैकिण्ड में करीब सोलह चित्र आँखों के आगे से निकल जाते हैं आँखें उन चित्रों की पृथकता को इतनी तेजी से देखने में असमर्थ रहती हैं इसलिए ऐसा भ्रम होने लगता है कि एक ही तस्वीर चल फिर रही है, वास्तव में होता यह है कि एक तस्वीर जरा सी हरकत करती दीखती है उतनी ही देर में उसके सैकड़ों चित्र आँखों के आगे से निकल जाते हैं। इसी प्रकार मस्तिष्क में से भी प्रति सैकिण्ड करीब 30-31 एक प्रकार की तरंगें निकलती हैं इनके सम्मिलन से जो एक बहुत बड़ा समूह बनता है उसे ‘विचार’ कहते हैं। मस्तिष्क के विद्युत कोषों का तरंगित होना भी एक सूक्ष्म संगीत के ऊपर निर्भर है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-November
जैसे सिनेमा में जब फिल्म दिखलाते हैं तो बिजली गुल कर देते है अंधेरे में तसवीरें खूब दिखलाई पड़ती हैं? तो जब तक अविद्यारूपी अंधेरा अन्तःकरण में रहेगा तब तक जीव ब्रह्म से पृथक सा मालूम होगा अविद्या हटते ही जीव ब्रह्म में जो पृथकता भास रही थी वह मिट जायगी। यानी अंधेरे वाला अक्ष अज्ञानियों का जीवात्मा है और उससे उजाले में जो अक्ष है वह ज्ञानियों का जीवात्मा है, तब ही बन्ध और मोक्ष का भ्रम मिट जावेगा। अविद्या ज्ञान से दूर होती है ज्ञान सत्मार्ग से प्राप्त होता है, राम को वशिष्ठ और कृष्ण को सन्दीपन पारमार्णिक गुरु करने पड़े थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-June
जब मैं दीवारों पर चिपके हुये पोस्टरों, सिनेमा की फिल्मों, बाजार में बिकने वाली तस्वीरों, मासिक पत्रिकाओं में छपने वाले चित्रों, नृत्य ग्रहों में नारी का अर्धनग्न स्वरूप उपस्थित किया जाता देखती हूँ तो मेरी आंखें क्रोध से जल उठती हैं। पुरुष ने हमारा यही सम्मान करना सीखा? हमारा स्वरूप उसने यही समझा है जिसे देखकर वह प्रसन्न होता है और अपने ग्राहकों को आकर्षित करता
जन साधारण की यह दुष्प्रवृत्ति दिन दिन बढ़ती जा रही है। जनता का सर्वप्रिय मनोरंजन सिनेमा इस बात का साक्षी है कि अर्धनग्न और नीच वृत्तियों को उकसाने वाले फिल्म ही अधिकाँश बनते हैं। पिता और पुत्र, भाई और बहिन, इन मित्रों को क्या साथ-साथ बैठकर देख सकते हैं? उन पर पूरी समालोचना कर सकते हैं? यदि नहीं तो इस कुरुचि पूर्ण विचारधारा को क्यों बढ़ने दिया जाता है? समाज के पिता इस ओर क्यों चुप्पी साधे हुये हैं?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-January
मंत्रजाप की तरह इन शब्दों को दुहराने की जरूरत नहीं है, वरन अत्यंत गंभीरतापूर्वक इस तथ्य को हृदयंगम किया जाना चाहिए। कल्पना-चित्र सिनेमा फिल्म की तरह स्पष्ट उभरने चाहिए और उनके साथ इतनी गहरी आस्था का पुट देना चाहिए कि यह चिंतन वस्तुस्थिति बनकर मस्तिष्क को पूरी तरह आच्छादित कर ले
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-May
यदि गहराई को भी प्रतिबिम्बित किया जा सके तो फिर आँखों से देखे जाने वाले दृश्य और छाया अंकन में कोई भेद नहीं रहेगा। ऐसा दृश्य प्रचलन सम्भव हो सका तो फिल्में अपने वर्तमान अधूरे स्तर की फोटोग्राफी तक सीमित नहीं रहेंगी वरन् पर्दे पर रेल, मोटर, घोड़े मनुष्य आदि उसी तरह दौड़ते दिखाई पड़ेंगे मानो वो अपने यथार्थ स्वरूप में ही आँखों के आगे से गुजर रहे हैं। यदि सामने से अपनी ओर कोई रेल दौड़ती आ रही हो या शेर झपटता आ रहा हो तो बिल्कुल यह मालूम पड़ेगा कि वे अब अपने ऊपर ही चढ़ बैठने वाले हैं। ऐसी दशा में आरम्भिक अनभ्यास की स्थिति में सिनेमा दर्शक को भयभीत होकर अपनी सीट छोड़कर भागते ही बनेगा
शत प्रतिशत साफ फोटो खींचता हो। जिसमें फोटोग्राफर की आवश्यकता न हो और फिल्म प्लेट आदि लगाने का झंझट न हो। ऐसा कैमरा बनना तो दूर किसी वैज्ञानिक के मस्तिष्क में इस तरह की सम्भावना की कल्पना भी अभी तक नहीं आई है। यदि कोई सोचने भी लगे तो इन सारी सुविधाओं से सम्पन्न किसी विशालकाय यन्त्र की ही कल्पना की जा सकती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-June
इस संदर्भ में कितने ही विद्यालय खुले हैं और खुलते जा रहे हैं। पिछले दिनों इस आन्दोलन को अधिक अच्छी तरह समझाने के लिए तीन फिल्में बनी हैं (1) रोज मरीज वेवी (2) दि पजेशन ऑफ जील डेलने (3) दि अदर। यह तीनों फिल्में असाधारण रूप से सफल हुई हैं। इन्हें देखने के लिए सिनेमा घर में हफ्तों पहले रिजर्वेशन कराना पड़ता है
स्कूली पढ़ाई भी इन्हीं साधनों के सहारे हो जाया करेगी। महत्वपूर्ण तथ्यों वाली पुस्तकें ‘माइक्रो फिल्मों’ के रूप में उपलब्ध रहेंगी। पत्र-पत्रिकाएँ, पुस्तकें आज जितना कागज खराब करती हैं उसकी तब बिलकुल आवश्यकता न रहेगी। प्रमुख समस्या जीवनयापन के साधनों की होगी
कामुक उत्तेजना भड़काने के लिए जितना साहित्य लिखा और छापा जा रहा है-जितनी तस्वीरें बिक रही हैं, जितने गीत वाद्य-अभिनय और फिल्म चल रहे हैं उन सबके बनाने, प्रचारित करने और उपयोग करने में जितनी धन-शक्ति और जन-शक्ति लगती है उसका लेखा-जोखा लिया जाय तो प्रतीत होगा कि यह उद्योग युद्ध और नशे की तुलना में किसी भी प्रकार कम नहीं है। उसके दुष्परिणाम उन दोनों के सम्मिलित उपद्रव की अपेक्षा कहीं बढ़कर हैं। इस भड़की हुई उत्तेजना से लोग अपना शारीरिक, मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य किस बुरी तरह नष्ट करते हुए खोखले बनते जा रहे हैं उसके निष्कर्षों का मूल्याँकन करने पर प्रतीत होता है कि यह मंद गति से सम्पन्न होने वाली आत्म-हत्या है
पिछले दिनों इस आन्दोलन को अधिक अच्छी तरह समझाने के लिए तीन फिल्में बनी हैं (1) रोज मरीज वेवी (2) दि पजेशन ऑफ जील डेलने (3) दि अदर। यह तीनों फिल्में असाधारण रूप से सफल हुई हैं। इन्हें देखने के लिए सिनेमा घर में हफ्तों पहले रिजर्वेशन कराना पड़ता है
सभ्यता का यन्त्रीकरण में इस प्रकार बताते हैं कि मनुष्य के चिन्तन पर यन्त्रों का इतना दबाव पड़ेगा कि वह स्वतन्त्र रीति से कुछ सोच ही न सकेगा और लगभग पराधीन हो जायगा। प्रेस प्रकाशन, रेडियो, टेलीविजन और फिल्में चलाने का अधिकार, सत्ता अथवा सम्पत्ति के आधार पर चन्द लोगों के हाथों चला जा रहा है। वे लोक-मानस पर अपनी मर्जी का दबाव आकर्षक पोटलियों में लपेट कर इस कदर डालते हैं कि आदमी उससे भिन्न प्रकार नहीं सोच सकते उसे हाथ-पाँवों की हरकत करने भर की आजादी रहती है सोचने की नहीं। फलतः वह बौद्धिक कठपुतली बनता जा रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-November
फिल्म-तारिका ओलिविया एक शाम को कुछ उदास थी। अपने एक मित्र के यहाँ से काम के बाद पैदल ही टहलती घर की ओर चल पड़ा। घर के पास वह पहुँची तो लगा-उसकी बाँह के नीचे कोई हाथ है और साथ का व्यक्ति धीरे-धीरे एक गीत गुनगुना रहा है
एक और तीसरी घटना भी अंतर्राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी रही है। ‘दि इंटर आफ दि ड्रगन’ फिल्म का शूटिंग वहाँ चल रहा था जिस दिन प्रधान शूटिंग होना था उसी दिन वर्षा उमड़ पड़ी, इस अवसर पर भी अब्दुला विन उमर नाम के मान्त्रिक की सहायता ली गई और शूटिंग क्षेत्र पूरे समय वर्षा से बचा रहा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-October
अश्लील साहित्य पढ़ते-पढ़ते मन में कामुकता उभरती है और फिर यौनाचार की पृष्ठभूमि किसी न किसी प्रकार बनने ही लगती है। अपराधी दृश्यों की फिल्में देखकर कितने ही कच्ची मनोभूमि के युवक उसी प्रकार का आचरण करने पर उतारू हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार उपयोगी विचारों को मस्तिष्क में लगातार स्थान मिलते रहने के कारण जीवन प्रवाह उसी धारा में बहने लगता है। विचारों का बिखराव रोका जा सके, निरर्थक और अनर्थमूलक चिन्तन से बचा जा सके, निर्धारित लक्ष्य की परिधि में ही विचार प्रक्रिया को नियन्त्रित किया जा सके तो तद्विषयक बौद्धिक प्रगति आश्चर्यजनक रीति से होती देखी जा सकती है
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नोवारो ने एक घटना बताई कि वह जिस होटल में ठहरा था उसका स्वामी मर चुका था और सम्पत्ति की कोई वसीयत न होने के कारण बड़ा लड़का सब हड़प जाना चाहता था। अतः वह छोटे को तंग भी करता रहा। छोटे लड़के ने नोवारो से अपना दुःख दर्द बताया, पर वह कुछ भी मदद करने में असमर्थ था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-March
इन दस अरब कोशों को अद्भुत विशेषताओं से सम्पन्न देव दानव कहा जा सकता है। इनमें से कुछ में तो माइक्रो फिल्मों की तरह न जाने कब−कब की स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं। मोटेतौर पर जिन बातों को हम भूल चूके होते हैं वे भी वस्तुतः विस्मृत नहीं होतीं, वरन् एक कोने में छिपी पड़ी रहती हैं और जब अवसर पाती हैं वर्षा की घास की तरह उभरकर ऊपर आ जाती हैं। केनेडा के स्नायु विशेषज्ञ डॉ0 पैनफील्ड ने एक व्यक्ति का एक स्मृति कोश विद्युतधारा के स्पर्श से उत्तेजित किया
केनेडा के स्नायु विशेषज्ञ डॉ0 पैनफील्ड ने एक व्यक्ति का एक स्मृति कोश विद्युतधारा के स्पर्श से उत्तेजित किया। उसने बीस वर्ष पहले देखी हुई फिल्मों के कथानक और गाने ऐसे सुनाये मानों अभी−अभी देखकर आया हो
महेश योगी की ध्यान साधना से अमेरिका के फिल्म कलाकार सिनावे और शर्लें मेवलेन बहुत प्रभावित हुए हैं और वे योग की अगली सीढ़ियां सीख रहे हैं
‘लान्स सेट’ पत्रिका के द्वारा भी उनका प्रचार बहुत हुआ। फिल्म कलाकार भी उस शिक्षा प्रक्रिया में सम्मिलित हुए हैं। अब तक तीन हजार से ऊपर अमरीकी उनकी दीक्षा ले चुके हैं। योग शिक्षा का पाठ्यक्रम तीन सप्ताह का है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
असत्य इसलिए कि वहाँ न तो घोड़े हैं और न दौड़ हो रही है। मस्तिष्क की रचना आँखों की निरीक्षण शक्ति फिल्म पर खिंचे फोटो और दिखाने की मशीन का द्रुत धावन आदि की प्रक्रियाओं से मिलकर सिनेमा एक प्रत्यक्ष सत्य बना हुआ है। इतने पर भी उसे वैज्ञानिक एवं दार्शनिक दृष्टि से भ्रान्ति दर्शन ही ठहराया जायगा। वेदान्त ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या कहता है तब उसका तात्विक प्रतिपादन क्या है? इसका यत्किंचित् आभास ऊपर की पंक्तियों से प्राप्त किया जा सकता है
पहला ग्रास तोड़ते ही वे सन्न रह गई और थाली एक ओर खिसकाकर खाना बन्द कर दिया। पूछने पर सहेलियों से उन्होंने इतना कहा अब राष्ट्रपति की हत्या होने में कुछ मिनट ही बाकी हैं, इस दुर्घटना का पूर्वाभास मुझे फिल्म देखने की तरह हो रहा है। सचमुच वैसा ही हुआ। आधा घन्टे बाद ही रेडियो पर दुर्घटना का समाचार आ गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-November
टेलीफोन, रेडियो, विद्युत टाइप राइटर, मल्टीफोन, लाउडस्पीकर, मूवी और टाकी फिल्में, टेलीविजन, इन्हीं दश वर्षों के भीतर आविष्कृत हुए और बाजार में आये। कृषि क्षेत्र में क्रान्ति करने वाले ट्रैक्टर पम्प, और कृत्रिम खाद का आविष्कार इसी अवधि में हुआ। हैलिकाप्टर एवं वायुयानों की उड़ाने संसार को प्रथम बार इन्हीं दिनों देखने को मिलीं
अनेकानेक कम्पनियों को उनकी चोरी का पता बताकर लाभान्वित करा देने से उन्हें भी काफी सम्पत्ति हाथ लगी और कुछ ही दिनों में वे धनवान् हो गये। सन् 1973 में टोरोंटो नगर में इस विलक्षण शक्ति के प्रदर्शन में एक फिल्म भी बनी। इस क्षमता के विषय में श्री रेग का कहना था कि हर मनुष्य में ऐसी विलक्षण सामर्थ्य पाई जाती है। जिस को पुरुषार्थ द्वारा जगाना बढ़ाना पड़ता है
उसने सिर को गोल-गोल घुमाकर एक अंगूठी को भी बिना किसी धुरी के गोल-गोल घुमाकर प्रदर्शित किया। उसकी एक फिल्म में उसको पिंग पांग की गेंद को ऊपर हवा में उड़ाकर वापस नीचे बुलाते हुए दिखाया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-December
इनसैट उपग्रह का नया आधार बनने से अगले दिनों टेलीविजन सर्वसुलभ होगा। इस माध्यम से छोटे बड़े ‘वीडियो फिल्म’ प्रस्तुत किये जा सकेंगे और उनके द्वारा सतयुग की वापसी का स्वरूप दर्शाने और उसके लिए तद्नुरूप जन-मानस विनिर्मित करने की नई सम्भावना प्रकट हुई है। अस्तु कला क्षेत्र में नये उत्साह के साथ प्रवेश करते हुए कैसिड निर्माण एवं वीडियो फिल्मों की लम्बी शृंखला चलाने का निश्चय किया गया है। तद्नुरूप गायक वादक अभिनयकर्ताओं से संपर्क साधने और उनके उपकरण खरीदने की अर्थ व्यवस्था बनाने का ताना-बाना बुनना आरम्भ कर दिया गया हैं
इस माध्यम से छोटे बड़े ‘वीडियो फिल्म’ प्रस्तुत किये जा सकेंगे और उनके द्वारा सतयुग की वापसी का स्वरूप दर्शाने और उसके लिए तद्नुरूप जन-मानस विनिर्मित करने की नई सम्भावना प्रकट हुई है। अस्तु कला क्षेत्र में नये उत्साह के साथ प्रवेश करते हुए कैसिड निर्माण एवं वीडियो फिल्मों की लम्बी शृंखला चलाने का निश्चय किया गया है। तद्नुरूप गायक वादक अभिनयकर्ताओं से संपर्क साधने और उनके उपकरण खरीदने की अर्थ व्यवस्था बनाने का ताना-बाना बुनना आरम्भ कर दिया गया हैं। बन पड़ा तो ऐसा नाटक मंच भी इसी योजना के अंतर्गत बन सकता है
अगले दिनों कैलेंडरों के माध्यम से महान व्यक्तियों और महान घटनाओं की छवियाँ घर-घर पहुँचाने की योजना कार्यान्वित हो सकती है। निजी फिल्में बनाने की योजना तो बहुत बड़ी है। उसे तो कोई मिल खड़े करने वाला तन्त्र ही हाथ में ले सकता है। नितान्त आवश्यक कार्यों की पूँजी जुटाने के उपरान्त फिल्म बनाने जैसी व्यवस्था बन सकेगी
उसे तो कोई मिल खड़े करने वाला तन्त्र ही हाथ में ले सकता है। नितान्त आवश्यक कार्यों की पूँजी जुटाने के उपरान्त फिल्म बनाने जैसी व्यवस्था बन सकेगी। इसकी आशा वर्तमान सूत्र संचालनों के जीवन काल में बन पड़ने की सम्भावना कम ही है। फिर भी इस आशा को जीवन्त रखा जाना चाहिए कि शिक्षा और कला के दो महान माध्यमों को कोई न कोई कभी न कभी अवश्य ही हाथ में लेगा और समय की माँग पूरी करेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-March
इन्होंने अपने शोध प्रकाशनों में ऐसे कई रोगियों का वर्णन किया है, जो मरकर जी उठे और मरण क्षणों के मध्यवर्ती अनुभव बता सकने में समर्थ हुए। कैन्सर से मरे डीन गिबसन नामक एक रोगी ने पुनर्जीवित होने पर बताया कि पहले वह गहरे अन्धकार में डूबा, इसके बाद उसे प्रकाश दीखा और उस पर फिल्म के पर्दे की तरह जीवन में किये गये भले-बुरे कर्मों की तस्वीरें फिल्म की तरह दिखाई पड़ीं। उसे लगा कि यह किसी न्यायाधीश का काम है। जो दण्ड-पुरस्कार देने से पहले यह दृश्य साक्षियां प्रस्तुत कर रहा है
साथ ही 6000 डालर का अनुदान भी मंजूर कर दिया। रंगीन बोलती फिल्म बनी। पैसे की कमी पड़ी तो अन्यत्र से उसकी पूर्ति हुई। अन्ततः उसे अमेरिका के छात्रों में, विशेषतया बाधितों में उसे दिखाया गया
साथी छात्रगण उसकी लगन और साहसिकता पर मुग्ध थे। उनके विश्व विद्यालय के डीन से प्रार्थना की गयी कि अपंगता को चुनौती देने वाली इस प्रतिभा का एक फिल्म बनाना चाहिए जो पिछड़ों में उत्साह जगाने का काम कर सके। छात्रों की समिति के इस प्रस्ताव को डीन ने तत्काल स्वीकार कर लिया। साथ ही 6000 डालर का अनुदान भी मंजूर कर दिया
कैलीफोर्निया के फिल्म अभिनेता ल्यू ग्रेजाना को किसी तांत्रिक ने मार डालने की चुनौती दी थी। वह डर गया और अपने को एक कमरे बन्द कर लिया। दरवाजा तक वह खोलता नहीं था
गोल्डन ग्रेट पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म का नाम था- ‘ग्रेविटी इज माई ऐनिमी’ अर्थात् गुरुत्वाकर्षण मेरा दुश्मन। इस फिल्म में गिराने वाली परिस्थितियों की तुलना पृथ्वी की ग्रेविटी से की गई है और सिद्ध किया गया है कि साहस के आधार पर किसी भी प्रकार की गिरावट के माहौल से जूझा जा सकता है, जीवन को नयी दिशा दी जा सकती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-April
सो कर उठने के उपरान्त उन्हें याद किया और दूसरों को बताया सुनाया जाता है जो देखा था। इतने पर भी यह रहस्य ही बना रहता है कि अकारण अनियमित यह असंगत फिल्म चलती क्यों रही, और उस समय उसके मिथ्या भ्रान्ति होने का आभास क्यों नहीं हुआ?
इन दिनों कामुकता निस्सन्देह बढ़ रही है। उसे अश्लील साहित्य तथा फिल्म-चित्रों ने विशेष रूप से भटकाया है। ऐसे क्लब और चकले भी आग में घी का काम करते हैं और मानसिक प्रवाह को घसीटकर कहीं से कहीं ले जाते हैं। इतने पर भी यह देखने योग्य है कि क्या इस चिन्तन में निरन्तर निरत रहने वाले शारीरिक दृष्टि से भी रति कर्म के लिए उपयुक्त क्षमता बनाये हुए हैं
ह्यूबनर से पूर्व पीनियल ग्रन्थि की रहस्यमय क्षमता के संबंध में ईसा में 400 वर्ष पहले यूनान के चिकित्सक हैरी फिल्म ने ऐसे संकेत दिये थे कि यह क्षेत्र मानवी व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को प्रभावित कर सकने में समर्थ है। फ्राँसीसी तत्ववेत्ता रेने डेस्कार्टीज ने भी इस क्षेत्र को आत्मा का निवास माना था और वहाँ दिव्य दर्शन की सम्भावना व्यक्ति की थी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-July
अमेरिका के एक अन्तरिक्ष ज्ञाता ट्रेवर जेम्स ने अदृश्य आकाश की परिस्थितियों के इन्फ्रारेड फिल्म उतारे हैं। उनमें अन्य जानकारियों के अतिरिक्त आकाशगामी ऐसे प्राणियों के भी चित्र हैं जिन्हें सामान्य आँखों से नहीं देखा जा सकता। ये विचित्र प्राणी रचना में भिन्न प्रतीत होते हैं
भेद खुला और इतिहास प्रकाश में आया। संयोगवश रूडोल्फ पर एक फिल्म बनी। उसका पार्ट अदा करना था हैरी नामक अभिनेता को। पुलिस से जमानत पर मांगकर वह अँगूठी लायी गई और फिल्माने के लिए उसे हैरी को पहनाया गया
उसका पार्ट अदा करना था हैरी नामक अभिनेता को। पुलिस से जमानत पर मांगकर वह अँगूठी लायी गई और फिल्माने के लिए उसे हैरी को पहनाया गया। हैरी भी बीमार पड़ा और अस्पताल में दाखिल होने के बाद जीवित लौटकर घर नहीं आया
शुक्राणु में पैतृक विशेषताओं समेत एक समूचे मनुष्य की सत्ता का अस्तित्व समाया होता है। माइक्रो फिल्म के एक छोटे से फीते में विशालकाय ग्रन्थ की झाँकी देखी जा सकती है। ठीक इसी प्रकार गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों में ज्ञान और विज्ञान की दोनों धाराओं का समान रूप से समावेश है। अध्यात्म दर्शन की शाखा- प्रशाखाओं में बँटा समूचा विज्ञान इन अक्षरों में पढ़ा जा सकता है
उन्हें वह न जाने क्यों बहुत पसंद आई थी। अभिनेता की सभी फिल्में हिट होती थीं। पर उस अंगूठी को पहनकर जो फिल्म बनी थी, उसका भट्टा ही बैठ गया। बेचारे को दो वर्ष तक किसी कंपनी ने कौड़ी मोल न पूछा
अभिनेता की सभी फिल्में हिट होती थीं। पर उस अंगूठी को पहनकर जो फिल्म बनी थी, उसका भट्टा ही बैठ गया। बेचारे को दो वर्ष तक किसी कंपनी ने कौड़ी मोल न पूछा। अँगूठी उतारकर जब बक्से में बन्द कर दी तब कहीं नये काम मिले
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-October
परिणाम हुआ कि जब ‘कुआलालम्पुर’ (मलाया की राजधानी), में सब जगह मूसलाधार वर्षा होती रही, खेलने का मैदान बिल्कुल सूखा रहा। इसी प्रकार अमरीका की एक फिल्म कम्पनी जो मलाया में ‘शूटिंग’ करने आई थी, उसने भी इन जादूगरनियों की सहायता से ही अपना कार्यक्रम सकुशल पूरा किया। वहाँ के राजा परमेसुरी अगोंग और रानी यांग दि येर्तुआन ने जब भी रहमाह नाम की जादूगरनी को बुलाया गया और शाही बारिश की विघ्न-बाधाओं के बिना अच्छी तरह हो गई। मंत्र में निहित शब्द-शक्ति का यह चमत्कार हजारों व्यक्तियों ने अपनी आँखों से देखा है
भारतीय कर्म फिलासफी के अनुसार मनुष्य का कोई कर्म तब तक नष्ट नहीं होता, जब तक वह उसका फल भोग नहीं लेता। मनुष्य के कर्म आकाश में उसी प्रकार अंकित रहते, जैसे कुछ फुट लम्बे फिल्म-रील पर लाखों छोटे-छोटे चित्र बने रहते हैं। इसी को पौराणिक-भाषा में चित्रगुप्त द्वारा मनुष्य के समस्त कर्मों का ‘हिसाब-किताब’ रखना कहा जाता है
हमारे यहाँ तो भूतकाल की बातों को जानना और देखना भी योग-विद्या का एक बहुत छोटा कार्य माना जाता था। हमारी पौराणिक कथाओं के तो प्रत्येक पृष्ठ पर यही बात पर यही बात पढ़ने में आती है कि अमुक व्यक्ति ने किसी ऋषि या मनीषी से अपनी कठिनाइयों के विषय में पूछा तो उन्होंने तुरन्त उसके एक नहीं अनेक जन्मों का वृतान्त इस प्रकार सुना दिया, मानो वे उसके गत जीवनों का फिल्म देख रहे हों। और वास्तव में बात ऐसी ही होती भी है। भारतीय कर्म फिलासफी के अनुसार मनुष्य का कोई कर्म तब तक नष्ट नहीं होता, जब तक वह उसका फल भोग नहीं लेता
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-December
उस दिन तीन बार यही प्रयोग हुआ और तीनों बार डाक्टर एलेक्जेंडर ने सफलतापूर्वक बादलों को गायब कर दिया। जब कैमरे की फिल्में साफ की गईं और फोटो निकाले गये, तो देखा कि हर बार बादलों का गायब होना उनमें पूरी तरह उतर आया है। तब वहाँ के प्रमुख अखबार ने इस समाचार को “क्लाउड डेस्ट्रायड बाई डाक्टर” (बादल डाक्टर द्वारा नष्ट किये गये) का बहुत बड़ा हैडिंग देकर प्रकाशित किया
जब फोटो खींच लिया गया तो डा. वरहाजमान ने कहा- मुझे ऐसा लगा जैसे फोटो खींचते समय कोई मेरे साथ हो, जबकि उनके साथ कोई भी दृश्य प्राणी खड़ा न हुआ था। लेकिन दूसरे दिन जब फिल्म धुल कर आई तो लोग यह देखकर दंग रह गये है कि उस फोटो के साथ ही स्वर्गीय ग्लेडस्टोन का फोटो आ गया था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-August
वाल्ट डिज्ने लिखते हैं- “एक बार मैं अपनी ‘मरुस्थल’ फिल्म बना रहा था तो पशु-पक्षियों के साथ मेरी मैत्री ऐसी प्रगाढ़ हो गई मानो उनका सारा जीवन मेरे लिए एक खुली पुस्तक है। हमारे आपके भीतर पशु-पक्षियों की जो आदतें आज भी देखने में आती हैं, वे स्पष्ट करती हैं कि पशुत्व से मनुष्यत्व तक की मंजिल बरसों के हिसाब से लम्बी रही हो, फासले के नाम पर कुछ ही इंचों की है। कल जो पशु था आज वही मनुष्य है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-July
क्योंकि एपल के अनुसार अचेतन मन वह जानता है, जो चेतन नहीं जानता। पट कथा लेखक जेम्स केमराँन ने स्वप्न से प्राप्त संकेतों के आधार पर ही अर्नाल्ड श्वार्जनेगर की प्रसिद्ध एक्शन फिल्म ‘द टर्मीनेटर’ की स्क्रिप्ट लिखी थी
सरस्वती का प्रतीक कला के मंच क्या गजब ढा रहे हैं, आपको दिखाई नहीं पड़ता? हिंदुस्तान में जितनी संख्या में सारे अखबार प्रकाशित होते हैं, हिंदी से लेकर अँगरेजी तक सब भाषाओं के, उससे तीन गुने पाठक वे हैं जो सिनेमा को रोज देखने जाते हैं। सिनेमा अगर हमारे हाथ में रहा होता, सिनेमा तंत्र को चलाने के लिए अगर हमको धन मिल गया होता, तो मित्रो! हमने ऐसी सैकड़ों, हजारों फिल्में नई बनाकर समाज में फेंक दी होतीं, जिसमें कि ऋषियों का जीवन, देवताओं का जीवन, संतों का जीवन, महापुरुषों का जीवन, उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए होते। वे सारी-की-सारी घटनाएँ, जो लोगों को अपने जीवन में क्राँति और हलचल पैदा करने वाली दिखाई दे सकती थीं, उनको बनाने के लिए हम समर्थ हो सकते थे, लेकिन करोड़ों रुपया फिल्म उद्योग में लगा हुआ है
सिनेमा अगर हमारे हाथ में रहा होता, सिनेमा तंत्र को चलाने के लिए अगर हमको धन मिल गया होता, तो मित्रो! हमने ऐसी सैकड़ों, हजारों फिल्में नई बनाकर समाज में फेंक दी होतीं, जिसमें कि ऋषियों का जीवन, देवताओं का जीवन, संतों का जीवन, महापुरुषों का जीवन, उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए होते। वे सारी-की-सारी घटनाएँ, जो लोगों को अपने जीवन में क्राँति और हलचल पैदा करने वाली दिखाई दे सकती थीं, उनको बनाने के लिए हम समर्थ हो सकते थे, लेकिन करोड़ों रुपया फिल्म उद्योग में लगा हुआ है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
पहले केवल राजनीतिक अथवा सामाजिक समाचारों को प्रमुखता दी जाती थी। अब खेल, वाणिज्य संगीत, कला, विज्ञान, स्वास्थ्य, फिल्म आदि भी प्रमुख अंग बनते गए। इस तरह पत्रकारिता का चहुंमुखी विकास हुआ
मनोरंजन भी ऐसा नहीं है कि जिसे सात्विक, सुरुचिपूर्ण एवं स्वस्थ कहा जाए, बल्कि यह अश्लील, कुत्सित एवं भौंड़ी प्रकृति का होता है। इनकी चर्चा का विषय फिल्मी दुनिया का ग्लैमर, हीरो-हीरोइन के संवाद, साक्षात्कार व उनके निजी जीवन की मनगढ़ंत खबरें ही रहती हैं
फिल्मी मनोरंजन के बाद राजनीतिक घटनाचक्र इनकी चर्चा का प्रिय विषय रहता है। इसके बाद व्यवसाय को ले सकते है। इसकी भी पृष्ठ संख्या क्रमशः बढ़ती जा रही है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
मेजर आहलुवालिया 13 पुस्तकें लिख चुके हैं। जिनमें ‘हायर देन द एवरेस्ट’ पर फिल्म भी बनने वाली है। इस पुस्तक के सात संस्करण बिक चुके हैं। जीवन की व्यस्तता के बीच ये हृदय में विद्यमान रोमाँच एवं दुस्साहस के जज्बे को कई चुनौतीपूर्ण अभियानों के माध्यम से क्रियान्वित कर चुके हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-January
उनने मस्तिष्क को पूरी तरह विचार शून्य किया और सामने की ओर देखने लगे। वहाँ एक लोमहर्षक दृश्य फिल्म की तरह प्रकट हुआ। लगभग बीस स्त्री, पुरुष और बच्चे परस्पर संघर्ष कर रहे थे। उनके चेहरे से स्पष्ट झलक रहा था, जैसे वे बहुत थके हुए हों
भारत के गायकों में फिल्म जगत् पर अपना आधिपत्य जमाने वाले एक ही थे, के.सी.डे। जिन फिल्मों के साथ उनका नाम जुड़ा होता, उसे देखने दर्शकों की भीड़ टूट पड़ती। वे सदैव इस यश का श्रेय अपनी माँ को देते रहे
कुछ दिनों में उनकी ख्याति सर्वत्र फैली। छोटे-छोटे संगीत सम्मेलनों के बाद उन्हें फिल्म कंपनियों ने बुलाया। अनवरत अभ्यास ने उनका कंठ भी निखार दिया था। एक-एक करके उनने प्रायः एक दर्जन गाने फिल्मों में पार्श्व गायक के रूप में गाए
अनवरत अभ्यास ने उनका कंठ भी निखार दिया था। एक-एक करके उनने प्रायः एक दर्जन गाने फिल्मों में पार्श्व गायक के रूप में गाए। कभी अभिनय करना पड़ा, तो अपनी सादी पोशाक में कैमरे के सामने आए थे। बनावट से उन्हें चिढ़ थी
भारत के गायकों में फिल्म जगत् पर अपना आधिपत्य जमाने वाले एक ही थे, के.सी.डे। जिन फिल्मों के साथ उनका नाम जुड़ा होता, उसे देखने दर्शकों की भीड़ टूट पड़ती। वे सदैव इस यश का श्रेय अपनी माँ को देते रहे। अंतिम समय तक उनकी सेवा भी खूब की
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-February
भावनाओं को सही पोषण नहीं मिल पाता, तो परिणाम भयावह होता है। दुर्भाग्य से आज की व्यावसायिक फिल्मों ने मानवी मानसिकता को ऊँचा उठाने के बजाय उसे विकृति की गहरी खाई में धकेल दिया है। आर्थिक लाभ हेतु यह व्यवसाय समाज एवं खासकर युवा वर्ग के लिए आत्मघाती सिद्ध हो रहा है
आय ये आदर्श एवं सपने धूमिल पड़ गए हैं। आज युवा पीढ़ी के पास सिर्फ फिल्म स्टार या टी.वी. स्टार बनने का सपना है। फिल्मों और टी. वी. की मायावी दुनिया ने उनके सामने एक छद्म स्वर्ग में सभी समस्याओं के इंस्टेंट समाधान मौजूद हैं। बात ही बात में सभी समस्याएँ हल हो जाती हैं
अदना−सी नौकरी के लिए भटकने वाला युवक अचानक किसी जादुई चमत्कार से करोड़ पति हो जाता हैं। एक ईमानदार दिखने वाला फिल्मी अभिनेता भ्रष्ट व्यवस्था को बदल देता है। सचाई से कोसों दूर ये चित्र और बिंब चूँकि हमें इंस्टेंट तृप्ति देते हैं, युवा इन्हीं में खो जाते हैं और भविष्य के प्रति अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसे धारावाहिक आज की यूवा पीढ़ी को अधिक आकर्षित करते दिखाई देते हैं
बात ही बात में सभी समस्याएँ हल हो जाती हैं। फिल्मी हीरो माफिया गिरोह का अकेले ही सफाया कर सकता है। अदना−सी नौकरी के लिए भटकने वाला युवक अचानक किसी जादुई चमत्कार से करोड़ पति हो जाता हैं। एक ईमानदार दिखने वाला फिल्मी अभिनेता भ्रष्ट व्यवस्था को बदल देता है
आज युवा पीढ़ी के पास सिर्फ फिल्म स्टार या टी.वी. स्टार बनने का सपना है। फिल्मों और टी. वी. की मायावी दुनिया ने उनके सामने एक छद्म स्वर्ग में सभी समस्याओं के इंस्टेंट समाधान मौजूद हैं। बात ही बात में सभी समस्याएँ हल हो जाती हैं। फिल्मी हीरो माफिया गिरोह का अकेले ही सफाया कर सकता है
अंतःचेतना से लगातार संपर्क एवं संबंध बनाए रखना उसकी अनिवार्य आवश्यकता है। फिल्में समाज से कटकर जीव नहीं बनी रह सकतीं। सिनेमा जो कुछ भी चुता उसके मूल बीज समाज में विद्यमान होते हैं। अतः नाव का आधार भी इसी को लेकर होना चाहिए
इससे समाज और भी अधिक उन्नत हो सकता है। फिल्मों द्वारा अकल्पनीय सफलता प्राप्त हो सकती है। ऐसा रूस ने किया है। फ्राँस कर रहा है, इंग्लैंड ने आरंभ कर दिया, अमेरिका भी इस दिशा में प्रयासरत है
भारतीय समाज की संरचना अनोखी एवं विचित्र है। अब तक फिल्म निर्माता इस संरचना को समझ नहीं लेता, उसकी सफलता संदिग्ध बनी रहेगी। जब तक सिनेमा में समाजरूपी जमीन में बिखरे पड़े बीजों का अंकुरण नहीं होगा, वह सिनेमा इस समाज में स्वीकृत नहीं होगा। अंतःचेतना से लगातार संपर्क एवं संबंध बनाए रखना उसकी अनिवार्य आवश्यकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-May
होलोग्राम में इन्हीं दो प्रतिबिंबों की पुनः संरचना होती है। फोटोग्राफी फिल्म में जहाँ पर वास्तविक प्रतिबिंब दिखता है। उस स्थान पर उस वस्तु के प्रतिबिंब का प्रकाश पड़ता है। होलोग्राम में उस स्थान पर किसी प्रकार के प्रकाश स्त्रोत न होने के बावजूद जो प्रतिबिंब बनता है, उसे आभासी प्रतिबिंब कहते हैं
जबकि वास्तविकता इससे अनंत गुना अधिक सामर्थ्यशाली है। पीटर वान हीडैन ने आप्टीकल होलोग्राफी में संकेत दिया है कि एक वर्ग इंच की होलोग्राफी फिल्म में 5 बाइबिल समा सकती है। मस्तिष्क में होलोग्राफी मेमोरी को यदि अनावृत किया जाए, तो उसमें समाहित अनंत स्मृति ग्रंथों के पृष्ठों को अपने सामने रखे कंप्यूटर के परदे के समान स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। यह स्मृति प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करने वाले विशेषज्ञ जैसे संगीतकार, चित्रकार, इंजीनियर, पायलट, प्रोफेसर आदि सभी को इतना ही स्पष्ट एवं साफ संकेत प्रदान कर सकती है
वैज्ञानिकों के अनुसार वस्तुतः कोई भी कण विनष्ट नहीं होता, बल्कि वह अपने मूल अस्तित्व की ओर लौट जाता है, जहाँ से उसकी उत्पत्ति हुई थी। होलोग्राफी फिल्म भी इन्हीं दो क्रमों के बीच बनती है। क्वाँटम सिद्धाँत के अनुसार तरंग और कण के बीच के परिवर्तन को भी इसी प्रकार समझा जा सकता है। इस तरह वैज्ञानिकों ने ब्रह्माँड को होलोग्राम के बजाय ‘होलोमूवमेंट’ कहना ज्यादा सार्थक समझा है
संसार का प्रत्येक कण जहाँ अपना अलग एक अस्तित्व रखता है वही सभी के बीच एक सामंजस्य एवं तारतम्य भी स्थापित करता है। यही होलोग्राफी फिल्म का निर्माण होता है। इसी के क्रमशः ढ्ढठ्ठद्धशद्यस्रद्गस्र शह्स्रद्गह् तथा ठ्ठद्धशद्यस्रद्गस्र शह्स्रद्गह् कहा जाता है। समस्त ब्रह्माँड इन्हीं दो क्रमों के बीच का परिणाम है
होलोग्राम एक ऐसी फिल्म है, जो किसी वस्तु या पदार्थ के सूक्ष्मतम भाग से उस वस्तु का संपूर्ण प्रतिबिंब उतार लेता है। होलोग्राम ग्रीक शब्द है। होलो (॥शद्यश) संपूर्ण तथा ग्राम (त्रह्ड्डद्व) अंकन अर्थात् संपूर्णता का अंकन
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-March
1885 में फ्राँस के एल. प्रिंस ने फिल्म की खोज की। इस दिशा में पहल करते हुए फ्राँस के ई. जूल्स मैरी ने मूविंग पिक्चर कैमरा तैयार कर लिया। इस कैमरे से 12 तस्वीरें प्रति सेकेंड खींची जा सकती थीं
परंतु सही मायने में फिल्म बीसवीं सदी में बनकर आई। 1927 में फिल्में बोलने लगीं और 1930 में इनमें रंग भी भर गया
एक ऐसे कल्पनालोक में ले जाते हैं, जिसका कोई अस्तित्व नहीं। दूरदर्शन एवं अन्य टेलीविजन चैनलों में जो सुपरमैन, हीमैन, फैंटम जैसी कार्टून फिल्में दिखाई जाती हैं, वे बच्चों में विज्ञान चेतना व तर्क क्षमता पैदा करने के बजाय उनमें अंधविश्वास व चमत्कारों को सही मानने की भावना भरते हैं। बच्चों के चेहरे से बालसुलभ मुस्कान गायब होती जा रही है। उनकी आँखों में मासूम शरारत की जगह उद्दंडता और अवज्ञा के भाव परिलक्षित होने लगे हैं
जब हमारे यहाँ उत्कृष्ट कलाकारों व निर्देशकों की कमी नहीं है, फिर कोई कारण नहीं हो सकता कि अच्छे कार्यक्रम न बनाये जा सकें। फिल्मी विज्ञापनों के बजाय अच्छे कार्यक्रमों को हाईलाइट किया जाना चाहिए, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग उसे देख सकें। निजी चैनलों को भी चाहिए कि समाज निर्माण में योगदान दें व बेहतर शैक्षणिक कार्यक्रम बनवाएँ। इससे सजग व कर्त्तव्यनिष्ठ पीढ़ी तैयार होगी
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अन्य चैनलों के साथ राष्ट्रीय व मैट्रो चैनल भी निजी चैनलों से स्पर्द्धा करते हुए प्रायः जीवन के इन्हीं नकारात्मक पक्षों को दिखाने में जुट गए हैं, जबकि इन्हें अपेक्षाकृत अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। हिंसा, अपराध व अश्लीलता को लेकर फिल्म उद्योग की छवि तो पहले ही धूमिल हो चुकी है, अब उसकी काली छाया का प्रभाव टेलीविजन तक पहुँचना किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं कहा जा सकता
1895 में फ्राँस के लुईस और एगस्ते लुमिएरे नामक दो भाइयों ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर सिनेमा का प्रदर्शन किया। परंतु सही मायने में फिल्म बीसवीं सदी में बनकर आई। 1927 में फिल्में बोलने लगीं और 1930 में इनमें रंग भी भर गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-April
कि साधारण प्रकाश भूत और वर्तमान के मध्यवर्ती अवरोध को चीरकर भूतकाल के गर्व में प्रवेश पाने की क्षमता नहीं रखता, जो अपेक्षाकृत सूक्ष्म इन्फ्रारेड में विद्यमान है। अतः वह कुछ घंटे पूर्व की घटना का फिल्माँकन करने में सफल होता है। इस सफलता के उपराँत वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास करने लगे कि क्या ऐसा सुदूर भूत के दृश्यों और घटनाओं के साथ भी संभव हो सकता है? इस निमित्त उनने भिन्न-भिन्न स्थानों के कई ऐसे चित्र खींचे, जहाँ सदियों पूर्व सुविकसित सभ्यताएँ थीं, पर आज वे बीहड़ों जंगलों और रेगिस्तानों में परिवर्तित हो चुके हैं। तस्वीर जब बनकर सामने आई, तो उसमें वही सारे दृश्य देखे गए, जो तब साकार रूप में वहाँ मौजूद थे अर्थात् चित्रों में झाड़ झंखाड़ के अतिरिक्त कोई ऐसी विलक्षणता नहीं दिखलाई पड़ी, जो इन स्थानों में उस समय दृश्यमान न हो
विद्यार्थियों को पाठ याद न होने की अक्सर शिकायत रहती हैं, पर वे ही किसी देखी फिल्म का पूरा कथानक भलीप्रकार सुना देते हैं और साथ ही उसके गीत भी याद रखते हैं। दादी अपनी पोती का नाम बार-बार भूल जाती हैं, पर अपने पति या ससुर की श्राद्ध तिथि नहीं भूलती। व्रत-उपवास की तिथियाँ भी विस्मरण नहीं होती
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, किलट्ज और दिनमान साप्ताहिक पत्रों के अलावा हजारों पाक्षिक और मासिक पत्रों ने इस दौरान देश में साहित्य, राजनीति, शिक्षा, वाणिज्य, कृषि, विज्ञान, कम्प्यूटर, तकनीकी, चिकित्सा, खेल, फिल्म तथा धर्म संस्कृति के विविध पक्षों पर विस्तृत प्रकाश डाला। यह काल हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्ण युग है। इस समय में राजनीतिक, सामाजिक, साँस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियाँ उत्कर्ष के शिखर पर था
नए गाने तो बन ही रहे हैं, साथ ही पुराने को भी पॉप मिश्रित नए रंग−रूप में श्रोताओं के समक्ष पेश किया जा रहा है। आज बाजार की यह स्थिति है कि नई फिल्म के गाने का ‘रिमिक्स’ यानि तेज म्यूजिक डाले गए कैसेट आ जाने के बाद सामान्य कैसेट की बिक्री में बहुत ज्यादा गिरावट आई है। सब कुछ पॉप में ढालकर युवाओं को परोसा जा रहा है और वह पसंद भी किया जा रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-September
उसी समय हमारे देश के माननीय नेता आचार्य पी.सी. राय ने भी कहा था कि “माँ बाप अपने लड़कों की शिक्षा के लिये अत्यन्त कष्ट से रुपया बचाकर भेजते हैं, पर वे उसे सिनेमाओं में उड़ा देते हैं। ” तब से यह व्याधि बहुत बढ़ गई है और अब हमारा देश ही ऐसे फिल्मों के निर्माण का एक बड़ा केन्द्र बन गया है। हम चाहते हैं कि विधान सभाओं और लोक सभा में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों में से कोई सज्जन इस विषय पर वहाँ अपनी आवाज बुलन्द करें। साथ ही प्रभावशाली पत्रों को भी इस सम्बन्ध में जनमत को जागृत करके सरकार पर दबाव डालना चाहिये कि वह इस अश्लीलता के प्रवाह को रोके
हमारे कच्ची मति के बालकों और महिलाओं पर इसका कैसा घातक प्रभाव पड़ेगा और वे किस प्रकार अनेक दोषों के शिकार बन जायेंगे यह सोचकर मन को बड़ी व्यथा होती है। इधर कुछ समय से सिनेमाओं के फिल्मों में नग्नता की वृद्धि हो रही है और घटिया किस्म के विदेशी फिल्मों की नकल करके अश्लील नाचों का प्रदर्शन किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में दिल्ली के साप्ताहिक ‘हिन्दुस्तान’ ने हाल ही में एक मार्मिक सम्पादकीय टिप्पणी में लिखा है-
सिनेमा के निर्माता अपना लक्ष्य केवल रुपया कमाना रखते हैं, फिर चाहे उससे जनता का चरित्र बने या बिगड़े इसकी उन्हें परवाह नहीं। आज से बीस वर्ष पहले भी अमरीका के अनेक पादरियों ने अश्लील फिल्मों के बहिष्कार का आन्दोलन आरम्भ किया था। उसी समय हमारे देश के माननीय नेता आचार्य पी.सी. राय ने भी कहा था कि “माँ बाप अपने लड़कों की शिक्षा के लिये अत्यन्त कष्ट से रुपया बचाकर भेजते हैं, पर वे उसे सिनेमाओं में उड़ा देते हैं। ” तब से यह व्याधि बहुत बढ़ गई है और अब हमारा देश ही ऐसे फिल्मों के निर्माण का एक बड़ा केन्द्र बन गया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-January
गायत्री तपोभूमि मथुरा की पूर्णाहुति के समय का बम्बई के श्री डूँगरशी भाई द्वारा तैयार किया हुआ रंगीन फिल्म जब पंडाल में सिनेमा द्वारा दिखाया गया, तब हजारों नर-नारियों की भीड़ उसे देखकर रोमाँचित हो गई। बड़ा प्रभाव पड़ा। उस समय सभी लोग इस प्रकार के फिल्म माध्यम द्वारा साँस्कृतिक प्रचार की बड़े आयोजन के साथ व्यवस्था बनाने की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे
बड़ा प्रभाव पड़ा। उस समय सभी लोग इस प्रकार के फिल्म माध्यम द्वारा साँस्कृतिक प्रचार की बड़े आयोजन के साथ व्यवस्था बनाने की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे। यह आयोजन बहुत सफल रहा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-July
इस लिये मैं उसे देखने गया। मेरी निगाह में तुकाराम जैसा फिल्म भी विष रहित नहीं है। उसमें विष को धर्म के अनुपान के साथ मिला दिया जाता है। इस लिए एक दृष्टि से वह खुल्लमखुल्ला अनीति का प्रचार करने वाले चित्रों से भी ज्यादा हानिकारक है
वे इस आशा से मुझसे उक्त चित्रपट देखने का आग्रह करने लगे कि अगर मैं एकाध बार सिनेमा हो आऊं तो उनका सिनेमा-प्रेम सर्वथा अक्षम्य न माना जायेगा। वर्षों से मैंने सिनेमा न देखा था और बोलने वाली फिल्म में विज्ञान की कौन सी करामात काम करती है, इस बात को जानने का कुछ कौतूहल मन में था। इन सब बातों के अतिरिक्त उक्त मित्र ने तथा घर के बच्चों ने तुकाराम को निर्दोषिता का जो प्रमाण पत्र दे रखा था उसकी सचाई का पता लगाने की भी इच्छा हुई। इस लिये मैं उसे देखने गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-October
उसकी शर्त एक ही है कि वह उद्देश्य के अनुरूप ऊँचे स्तर का होना चाहिए। यह गुण प्रयत्नपूर्वक उत्पन्न करने पड़ते हैं वे बाजारू फिल्मी या दूसरे तरह के विछोह भर, शिकायत भरे, अश्लील संगीत में नहीं हो सकता। फिर बाजारू रिकार्ड गायन भरे होते हैं। जबकि चिकित्सा प्रयोजन के लिए स्नायु संस्थान में उपयोगी हलचलें उत्पन्न करने वाली ध्वनि तरंगों की ही आवश्यकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-January
इसके लिए प्रलोभनों की हाट लगी रहती है। कुशिक्षण के लिए अश्लील साहित्य, ब्लू फिल्में तथा इसी प्रशिक्षण में पारंगत बनाने वाले लाल, गली मुहल्लों में खुले रहते हैं। भेड़ियों की कहीं कमी नहीं। अन्तर सभ्यों और असभ्यों का है, कहीं रुलाकर, कहीं हंसाकर तरीके अपने-अपने हैं, पर नारी आखिर नारी है
पौराणिक गाथाओं के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के कर्मफल का बहीखाता उन्हीं के पास है और प्रतिफल का निपटारा यथावत् वे ही करते रहते हैं। फोटोग्राफी के फिल्म की तरह वे दृश्यों का अंकन करते रहते हैं। टेप रिकार्डर की तरह उनकी मशीन पर जो घटित होता रहता है उसका अंकन चलता रहता है और समय आने पर उसकी प्रतिक्रिया यथा समय सामने आ खड़ी होती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-March
इन सबमें आग में घी की तरह काम किया है− रेडियो, टी. वी., फिल्मों, वीडियो द्वारा अश्लील विज्ञापनों एवं ब्लू फिल्मों के जहर ने। यह जहर अब बढ़ता ही जा रहा है। फलतः स्कूल में प्रवेश करने वाले भावी समाज के कर्णधार भी इसकी लपेट में आ रहे हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
अब वीडियो क्षेत्र में प्रवेश किया गया है। उनके माध्यम से कविताओं के आधार पर प्रेरक फिल्में बनायी जा रही हैं। देश के विद्वानों, मनीषियों मूर्धन्यों नेताओं के दृश्य प्रवचन टैप कराकर उनकी छवि समेत सन्देश घर-घर पहुँचाये जा रहे हैं। भविष्य में मिशन के कार्यक्रमों को उद्देश्य, स्वरूप और प्रयोग समझाने वाली फिल्में बनाने की बड़ी योजना है जो जल्दी ही कार्यान्वित होने जा रही है
नन्दन वन प्रवास का अगला दिन और भी विस्मयकारी था। पूर्व रात्रि में गुरुदेव के साथ ऋषिगणों के साक्षात्कार के दृश्य फिल्म की तरह आँखों के समझ घूम रहे थे। पुनः गुरुदेव की प्रतीक्षा थी- भावी निर्देशों के लिए। धूप जैसे ही नन्दन वन के मखमली कालीन पर फैलने लगी, ऐसा लगा स्वर्ग धरती पर उतर आया हो
देश के विद्वानों, मनीषियों मूर्धन्यों नेताओं के दृश्य प्रवचन टैप कराकर उनकी छवि समेत सन्देश घर-घर पहुँचाये जा रहे हैं। भविष्य में मिशन के कार्यक्रमों को उद्देश्य, स्वरूप और प्रयोग समझाने वाली फिल्में बनाने की बड़ी योजना है जो जल्दी ही कार्यान्वित होने जा रही है
इस स्थिति में डुबकी लगाते ही एक-एक करके मुझे अपने पिछले तीन जन्मों का दृश्य क्रमशः ऐसा दृष्टिगोचर होने लगा मानों वह कोई स्वप्न न होकर प्रत्यक्ष घटनाक्रम ही हो। तीन जन्मों की तीन फिल्में आँखों के सामने से गुजर गयीं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-August
कनाडा का एक व्यापारी जो अपने जीवन में एक फिल्म अभिनेता तो नहीं बन सका किन्तु उसने अपनी वसीयत में लिखा था कि मेरी मृत्यु के पश्चात् मेरी सारी सम्पत्ति किसी ऐसे नाटक कार को दी जाय जो प्रति वर्ष शेक्सपीयर का नाटक हेलमेट का प्रदर्शन करे और इस प्रदर्शन में कब्रिस्तान का दृश्य दर्शाने के लिए उसकी निजी खोपड़ी का ही उपयोग किया करे
मनोरंजन पक्ष में दूसरे लोग बहुत हैं जो गोष्ठियों में, उत्सवों में, नाटकों में, फिल्मों में बजने वाले तरह-तरह के गायनों और वादनों का उपयोग करते रहते हैं। इस विषय में विज्ञान ने इतना ही किया है कि इलेक्ट्रानिक मल्टीट्यून, हाई-फी-वाद्य यन्त्र बनाये हैं जो मनुष्य के अभ्यास श्रम को बचाते हैं और हारमोनियम की तरह उंगलियाँ बदलने भर से स्वासन यन्त्रों, तार यन्त्रों, ताल वाद्यों की बाल सुलभ सरलता से बढ़ा देते हैं। यह श्रम की बचत हुई
इतनी सही-सही जानकारी कोई किसी अजनबी क्षेत्र का बिना किसी परिभ्रमण किये दे नहीं सकता। इस बारे में डिकेन्स से पूछने पर उनने बताया कि रोड के पार्श्व के दृश्य देखने के बाद इस क्षेत्र के सारे दृश्य स्वतः उनके स्मृति-पटल में फिल्म की भाँति उभरने लगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-June
सिनेमाओं में ऐसे कृत्य गायनों, हाव-भावों की भरमार रहती है। इसके अतिरिक्त यौनाचार के चित्र एवं ब्लू फिल्मों के रूप में जहर गैर कानूनी होते हुए भी लुक-छिपकर खूब बिकता है। ऐसे उपकरणों की विषाक्त परिणति को समझते हुए साँप बिच्छू की तरह दूर रहने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए पर यह सामयिक एवं अधूरे प्रयत्न मात्र हैं
अमेरिका के एक कन्सास नगर की एक फिल्म कम्पनी ने एक चिंपेंजी इस प्रकार सधाया था कि वह कई फिल्मों में बताये हुए पार्ट बड़ी खूबसूरती से करता रहा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-December
अमेरिका की एक रेडियो कम्पनी ने इस करुण संगीत को टैपकर सुनाया तो कुछ ही दिनों में आकाश वाणी केन्द्र को हजारों श्रोताओं ने पत्र लिखे और बताया कि इस संगीत को सुनकर उनका हृदय व्यथा वेदना से भर आया। एक टी.वी. कम्पनी ने इस स्थान की एक टी. वी. फिल्म भी उतारी और अपने दर्शकों को बिना किसी कमैन्ट्री के सुनाई तो दर्शक रोने भी लगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-July
पृथ्वी पर अन्य लोकवासियों के आवागमन के प्रमाण चिन्हों में उड़नतश्तरियों की चर्चा होती है। इन दिनों प्रति रविवार को टेलीविजन पर एक सीरियल ‘प्रोजेक्ट यू. एफ. ओ.’ भी प्रसारित हो रहा है जो कथा प्रसंग नहीं अपितु ऐसी घटनाओं पर आधारित एक तथ्यपूर्ण फिल्म है, इससे वैज्ञानिकों की रुचि का पता लगता है। वस्तुतः प्रागैतिहासिक काल के चिन्ह जहां−तहां ऐसे पाये गये हैं जिन्हें किन्हीं अतिमानवों की कृतियाँ ही माना जा सकता है। सबसे बड़ी बात है मनुष्य के अन्तराल में पाई जाने वाली आदर्शवादी सदाशयता और योगाभ्यास के आधार पर अथवा कई बार बिना प्रयास के भी अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकसित होना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-May
फिल्म क्षेत्र में काम करने वाले हंघरडिक को भी ऐसे ही एक मकान से पाला पड़ा। उसमें रात को जो अदृश्य किन्तु डरावनी घटनाएँ घटित होती थीं, उनसे उनका पूरा परिवार भयभीत हो गया और जल्दी ही दूसरा मकान तलाश करके उसमें चला गया
सपनों में अनेकानेक ऐसी घटनायें फिल्म रूप में उपस्थित रहती हैं जो कि स्वप्नदर्शी के लिए आगम भविष्य के लिए संकेत या संदेश के रूप में होती हैं। अपने इन स्वप्नों की फिल्म का वह स्वयं ही दर्शक और अभिनेता दोनों एक साथ होता है। वह अपनी स्मृतियों से प्रभावित रहता है, वह ऐसी घटनायें देखता है जो कि भूत, वर्तमान में अभी तक कभी भी घटित नहीं हुई हैं, उसमें वह काल्पनिक स्थान भी देखता है
सपनों में अनेकानेक ऐसी घटनायें फिल्म रूप में उपस्थित रहती हैं जो कि स्वप्नदर्शी के लिए आगम भविष्य के लिए संकेत या संदेश के रूप में होती हैं। अपने इन स्वप्नों की फिल्म का वह स्वयं ही दर्शक और अभिनेता दोनों एक साथ होता है। वह अपनी स्मृतियों से प्रभावित रहता है, वह ऐसी घटनायें देखता है जो कि भूत, वर्तमान में अभी तक कभी भी घटित नहीं हुई हैं, उसमें वह काल्पनिक स्थान भी देखता है। कल्पना पर आधारित होने पर भी सपने स्पष्ट भावनामय तथा नियन्त्रण से परे होते हैं
भारत के पिछड़े समाज में अक्सर भूतोन्माद आते हैं। तब उन्हें ढोंग समझा जाता है, किन्तु अमेरिका फिल्म उद्योग में संलग्न कलाकारों को कोई ऐसा ढोंगी नहीं कह सकता। उनमें से कइयों को मृतात्मा का पाला पड़ा है और वे अपने अनुभव में आई प्रत्यक्ष घटनाओं की सचाई पर पूरा विश्वास करते हैं। सि अल्ले ड्राइव में मकान नं0 10050 में एक महिला शैरोटेड की हत्या हुई थी
एक दूसरे फिल्म कलाकार का भी यही हाल हुआ। उसे उसकी पत्नी ने छोड़ दिया था। इस दुःख से बचने के लिए उसने एक छोटा किंतु प्राकृतिक दृश्यों से भरा-पूरा सुहावना मकान लिया
बैटरी चार्ज करने के लिए जिस प्रकार पू. गुरुदेव को समय-समय पर हिमालय बुलाया जाता रहा है, ठीक इसी प्रकार इन पाँच दिवसीय सत्रों को उच्चस्तरीय आमन्त्रण माना जाना चाहिए। इनमें गुरुदेव से प्रत्यक्ष मिलना तो न हो सकेगा, पर उनके वीडियो फिल्म तैयार कर लिए गए हैं, जिनमें उनकी आज की स्थिति में झाँकी करने और वाणी सुनने का अवसर नित्य ही मिलता रहेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-February
जिस विज्ञान के सहारे मांसाहार का व्यवसाय चमका, नशेबाजी की चित्र−विचित्र वस्तुएँ बनकर तैयार हुई। कामुकता को उत्तेजित करके वर्जनाओं पर प्रहार करने वाले अश्लील साहित्य एवं फिल्मों का घटाटोप उमड़ा वह विज्ञान की ही काली करतूत है। जहां चिकित्सा क्षेत्र में सर्जरी जैसे उपयोगी साधन बनाये वहाँ उद्योगीकरण के नाम पर ऐसे विशालकाय तन्त्र भी खड़े किये जिनने मुट्ठी भर लोगों को धन कुबेर बनाकर अगणित लोगों को बेकारी, बीमारी और भुखमरी के गर्त्त में बिलख-बिलख कर मरने के लिए छोड़ दिया। शहरों की तोंद फूल गई और देहातें उड़कर वनवासियों के झोंपड़ों में अभावग्रस्त हो गईं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-December
टी.वी में प्रदर्शित फिल्मों, सीरियलों को देखने वालों की संख्या तो करोड़ोँ में है। इनमें से अधिकांश फिल्में दर्शकों पर अवांछनीय प्रभाव छोड़ती है। इससे नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का बेतरह ह्रास होता है इसे कोसने कसे काम नहीं चलेगा। सुसंगठित रूप से यदि सृजनात्मक फिल्में बनाई जाने लगें तो उस माध्यम से भावनात्मक नवनिर्माण में बहुत सहायता मिल सकती हैं और नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति का पथ प्रशस्त हो सकता हैं
अन्त में एक स्नेह प्रेम की गरमाहट से भरा प्रकाश पुँज सामने प्रकट होता है। जो पहल कभी नहीं देखा गया था वह बिना किसी शब्द के प्रश्न पूछता है व जीवन के सभी घटनाचक्रों की फिल्मांकित करते हुए उनका मूल्याँकन करता है मूडी के अनुसार शायद इसी का प्रतीकात्मक चित्रण हिन्दू धर्मशास्त्रों में चित्रगुप्त के रूप में किया गया है। उनके अनुसार इसी प्रसंग में कभी कभी मृतात्मा एक बाधा के रूप में एक संकेत द्वारा महसूस करती है कि उसे धरती पर वापस जाना चाहिए, लेकिन वह वापस नहीं जाना चाहती। क्योंकि वहां वह प्रेम, शान्ति एवं आनन्द की तीव्र अनुभूति से अभिभूत हो उठती हैं
बालिकाओं में रजोदर्शन की आयु घटने के पीछे कितने ही कारण बताये जाते हैं। इनमें से कुछ तो प्राकृतिक है, जबकि कुछ ऐसे जो हमारी वर्तमान जीवन पद्धति के परिणाम हैं इनमें से कतिपय प्रमुख कारण निम्न है - मन-मस्तिष्क में अश्लीलता का कुप्रभाव, गंदी तस्वीर, फिल्में, टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले कामोत्तेजक कार्यक्रम , अत्यधिक मानसिक दबाव, प्रदूषित वातावरण, माता-पिता का नशा सेवन, पैवि स्मेकिंग, सहशिक्षा, अतिशय खेलकूद, मिलावटी भोजन, कृत्रिम रहन-सहन आदि लोगों को पैसा कमाने की अंधी दौड़ में शामिल हो जाने के कारण अब नैतिकता, अनैतिकता की चिन्ता नहीं रही। इससे कितने की खाद्य हानिकारक बन जाती हैं जो शरीर में पहुंचकर उसकी स्वाभाविक क्रिया और व्यवस्था में हस्तक्षेप करते हैं। यह न्योता बुलाते हैं
इससे नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का बेतरह ह्रास होता है इसे कोसने कसे काम नहीं चलेगा। सुसंगठित रूप से यदि सृजनात्मक फिल्में बनाई जाने लगें तो उस माध्यम से भावनात्मक नवनिर्माण में बहुत सहायता मिल सकती हैं और नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति का पथ प्रशस्त हो सकता हैं
मस्तिष्क के इस भाग की भूमिका को समझने के लिए लिवरपुल युनिवर्सिटी के दो मनःशास्त्रियों जी ब्राउन एवं हैरिस ने एक विशेष प्रकार का प्रयोग किया। उन्होंने एक थियेटर में एक फिल्म के दौरान थोड़े-थोड़े अन्तराल में दर्शकों के समक्ष एक संदेश संप्रेषित किया, जिसमें कहा गया “सैण्डविच खाना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। एक सप्ताह के इस प्रयोग के दौरान देखा गया कि इस मध्य सैण्डविच की बिक्री में अप्रत्याशित ढंग से वृद्धि हो गई बाद में इसकी व्याख्या करते हुए शोधकर्मियों ने यह स्पष्ट किया कि चेतन मस्तिष्क के लिए यह किन्तु अचेतन मस्तिष्क ने इसे गम्भीरतापूर्वक लिया। इसी का परिणाम था कि इस मध्य सैण्डविच के प्रति लोगों का सामान्य रुझान बढ़ा-बढ़ा देखा गया
सिनेमा आज की सर्वप्रिय मनोरंजन हैं देश के हजारों सिनेमाघरों में हर रोज लाखों आदमी देखने आते हैं। टी.वी में प्रदर्शित फिल्मों, सीरियलों को देखने वालों की संख्या तो करोड़ोँ में है। इनमें से अधिकांश फिल्में दर्शकों पर अवांछनीय प्रभाव छोड़ती है। इससे नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का बेतरह ह्रास होता है इसे कोसने कसे काम नहीं चलेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-May
अपने जीवन में उनके करामाती शो तथा कई फिल्मों में अपने काम का प्रदर्शन करने वाले हुडिनी ने एक बार पत्रकारों को बताया था कि उसके चमत्कारों का रहस्य श्रवास की सिद्धि एवं मन की एकाग्रता में है। इसी को भारतीय योगी प्राणायाम एवं ध्यान कहते हैं। श्रवास की सिद्धि से शरीर को पर्याप्त रूप से फैसला -सिकोड़ा जा सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-September
फिल्म हो या दूरदर्शन, मॉडलिंग हो या पत्रकारिता का क्षेत्र हर कहीं नारी की अनावृत देह का विनाशकारी प्रदर्शन छाया हुआ है। जो समाज द्वारा वैयक्तिक आजादी के बतौर मिलता है। सुप्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाएँ फैशन परेड के अर्द्धनग्न चित्रों से भरी रहती हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-February
उस रात्रि में इस तरह की घटनाओं की पन्द्रह से ज्यादा सूचनायें मिली। कुछ इन्हीं घटना क्रमों के आधार पर हालीवुड द्वारा एक काल्पनिक फिल्म आज से प्रायः 8 वर्ष पूर्व बनायी गयी थी। नाम था ईटी। यह फिल्म अपने फन्टासी भर्र दृश्यों के कारण काफी लोकप्रिय हुई थी
नाम था ईटी। यह फिल्म अपने फन्टासी भर्र दृश्यों के कारण काफी लोकप्रिय हुई थी। डॉ0 ऐनराइन ने अपनी पुस्तक- “दी यू0 एफ॰ ओ॰ एक्पीरियेन्स “ में उड़न तश्तरियों के विभिन्न अनुभवों का वर्णन किया है। वे अमेरिका की प्रसिद्ध शोध संस्था - “नासा” के अध्यक्ष रह चुके है उनके अनुसार सन 1973 में ट्युपोलो क्लीवलैण्ड के एक मजिस्ट्रेट एवं वन्य विभाग के चार रेजरों ने एक उड़न तस्तरी को आकाश में उड़ते हुए देखा था जिससे लाल, पीले व हरे रंग की रोशनी निकल रही थी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-November
इन दिनों टी.वी. और सिनेमा ने अपराध जगत को जितना समृद्ध बनाया है, उसे अभूतपूर्व ही कहना चाहिए। इसका एक ज्वलन्त प्रमाण हाल में घटी पश्चिम बंगाल की इस घटना से मिल जाता है, जिसमें एक पन्द्रह वर्षीय किशोर ने माँ की जघन्य हत्या कर दी और सबूतों को उसी अन्दाज में मिटाने का प्रयास किया, जैसा फिल्म में देखा था। पुलिस द्वारा पूछताछ के दौरान उसने यही कहा कि माँ से उसका कोई बैर नहीं था। वह तो सिर्फ यह अनुभव प्राप्त करना चाहता था कि उक्त तरीके द्वारा हत्या सम्भव है क्या?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-April
उससे 10 लाख से लेकर एक हजार करोड़ कम्पन प्रति सेकिण्ड की कर्णातीत ध्वनि तक तैयार कर ली गई है और उससे दूर-दूर तक सन्देश भेजने धातुओं को काटने-छीलने आदि का महत्वपूर्ण कार्य लिया जाता है। फोटो के अत्यन्त सूक्ष्मकारी फिल्मों के ‘इमल्शन विभिन्न प्रकार के रंग बनाने की’ रासायनिक औषधियों का निर्माण और सर्जरी तक का काम इस ध्वनि शक्ति से लिया जाता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-October
मस्तिष्क की ग्रहणशीलता पर निर्भर करता है कि स्वाध्याय सार्थक हो पा रहा है या नहीं। पूज्यवर के साहित्य के महत्वपूर्ण अंश अब ‘ऑडियो बुक्स’ के रूप में भी शाँतिकुँज की रजत जयंती के उपलक्ष्य में प्रतिमाह निकलते रहेंगे एवं दीपावली उनके प्रथम किश्त निकल जाय, यह विदेश प्रवास से लौटकर सुनिश्चित कर लिया गया है, इसी तरह वीडियो के माध्यम से नन्हें-मुन्हें बच्चों के लिए एनीमेशन फिल्मस से लेकर बड़ों के लिए एक्शन साँग्स, एकाँकी नाटिकाएँ एवं पूज्यवर एवं मातृसत्ता का संदेश और भी प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करने की योजना बनी है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
देवेन्द्र वर्मा
फिल्म अभिनेता, मुम्बई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
चार्ल्स फिल्मोर एक सात्विक प्रकृति के व्यक्ति थे। वे स्वयं ध्यान साधना का अभ्यास करते और लोगों से भी कराते थे। एक रात उन्होंने स्वप्न देखा कि एक अपरिचित व्यक्ति उन्हें अपने पीछे-पीछे आने का संकेत कर रहा है
स्पष्ट ही इस स्वप्न का अर्थ उन्होंने लगाया कि वे ध्यान साधना का प्रचार करे। संयोग की बात, एक दिन कुछ लोगों ने उनके पास आकर इस कार्य को संगठन बद्ध प्रचार करने का प्रस्ताव रखा इसके बाद चार्ल्स फिल्मोर कंसास शहर चले गए। वहाँ के लोगों ने जिस स्थान पर संस्था का कार्यालय खोलने की बात कही, वह स्थान यूँ तो चार्ल्स के लिए अपरिचित था, परन्तु उन्होंने पाया कि स्वप्न में जिस स्थान को उन्होंने देखा था, यह वही स्थान है। उसी स्थान पर सोसाइटी ऑफ सायलेन्ट यूनिटी नामक संस्था की स्थापना की
उसी प्रकार विराट चेतना भी व्यक्ति चेतना का मार्गदर्शन करती है। अमेरिका के चार्ल्स फिल्मोर को प्राप्त प्रमाणित करता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
देहातों में ग्रामीणों के सामने उपस्थित सभी समस्याओं के कारण और निवारण बताने वाले सामूहिक वीडियो घर बनाये जायँ। उनके लिए सस्ते दामों पर दिखाने के लिए रचनात्मक एवं सुधारात्मक वीडियो फिल्में शांतिकुंज जैसी संस्था बनाती रहें और उसे व्यापक रूप से छोटे-छोटे गाँवों तक पहुँचाने का प्रबन्ध किया जाय। यह योजना सरकार हाथ में लेने के झंझट में न पड़ना चाहे, तो स्वयंसेवी संस्थाओं को यह काम सौंपा जा सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-January
तभी सही फोटो ले सकते हैं। फिल्मों तक में मशीन पहले फिट करनी पड़ती है, किन्तु आँख के रूप में भगवान ने हमें ऐसा कैमरा दिया है जिससे पास से पास और दूर से दूर से वस्तु को भी हम आँखों को आगे पीछे किये बिना मजे से देख सकते हैं
यह सुनकर लेस्ली की हैरानी और बढ़ी। वह विचार करने लगी कि फिर जो कुछ उसने फिल्म के मध्य सुना वह क्या था ? इसे कानों का धोखा कहा जा सकता है। मन मानने को तैयार नहीं था, क्योंकि उसमें दुर्घटना का सुविस्तार वर्णन था, जिसका जिक्र उसने अपनी एक सहेली से दोपहर के वक्त किया था एवं मृतकों एवं घायलों की संख्या भी बताई थी, रसायनों के नाम भी बताये। यह सब कुछ समाचार पत्र से हू बहू मिल रहें थे
इस उद्घोषणा के साथ विशेष समाचार समाप्त हुआ और पर्दे पर फिल्म पुनः अपने लगी। कैसन्टन ने समझा कि दुर्घटना की जानकारी देने और उससे निकल रही विशेष गैस के प्रति लोगों को सतर्क करने के लिए ऐसा किया गया। दोपहर को उसके जब कुछ मित्र भोजन के लिए घर पर आई तो उनसे इस घटना की चर्चा की
घटना जून 1974 की है। एक शनिवार को फिलक्सबोरी, हम्बरसाइड की लेस्ली कैसल्टन नामक एक महिला सुबह सुबह अपने टेलीविजन सेट पर फिल्म देख रही थी, तभी अचानक बीच में ही चलचित्र रुक गया और टेलीविजन के पर्दे पर दो शब्द उभरे -’विशेष समाचार’। इसी के साथ एक पुरुष शब्द उभरा और समाचार देने लगा कि फिलक्सबोरी के विशाल रसायन संयंत्र में एक भयानक विस्फोट के साथ आग लग गई है। इससे लगभग संपूर्ण संयंत्र विनष्ट हो गया है और करीब 21 लोग मारे गये हैं
बाद में उसने अधिकारियों को दुर्घटना का विस्तृत ब्यौरा दिया तो पुलिस अफसर ने इससे सहमति प्रकट की। अधिकारियों के यह पूछने पर उसने इतनी जानकारी कहाँ और कैसे प्राप्त की? उसने खिड़की पर उभरी फिल्म का विस्तृत वृत्तान्त बताकर सभी को अचम्भे में डाल दिया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-January
हाँ, यदि कोई उच्च कोटि का सामाजिक या धार्मिक चित्र आ जाये तो दूसरी बात है। यह स्मरण रहे कि हमारे अधिकाँश फिल्म अत्यंत विषैली, कामोत्तेजिक सामग्रियों से भरे हुए हैं और यदि संभलकर चुनाव न किया जाये, तो यह मनोरंजन हमारे समाज को पतन और मृत्यु के मार्ग में ढकेल सकता है। हमें चाहिए कि परिवार के लिए घरेलू खेलों को अपनावें। जब सिनेमा न था, अखाड़ों की मिट्टी बोलती थी और भजन, कीर्तन, हुआ में दिल हँसते-रोते थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-February
आपके पास पैसे नहीं हैं, फिर भी आप बढ़िया सूट पहनते हैं, पान खाते और सिगरेट लेकर पीते हैं, अपना बाहरी लिफाफा ऐसा रखते हैं जैसे 1000 रु मास प्राप्त करते हों, जबकि आमदनी से मुश्किल से सौ रुपये मास हैं। इस आडम्बर तथा मिथ्याचार से क्या तो आप अपना लाभ कर सकते हैं, और क्या पड़ौसी, समाज या नगर का? कोई सत्कार्य के लिए चन्दा माँगने आता है, तो अपनी जेब उलटकर दिखा देते हैं, पर जब चटकीली भड़कीली फिल्म आती है, तो आप न जाने कहाँ से रुपया पा लेते हैं? घी, दूध, मक्खन, दही के लिये आपके पास पैसे नहीं, पर पान, सिगरेट, चाय या मित्रों में खर्च करने के लिये आपके पास रुपयों की कमी नहीं होती? वैसे तो आप टूटी झोपड़ी में रहते हैं, पर रेशमी वस्त्रों के बिना बात नहीं करते? यह कृत्रिमता आपके जीवन की एक बड़ी कमजोरी है। समाज में आप वैसा ही प्रदर्शित कीजिए, जैसे आप वास्तव में हैं। आडम्बर, मिथ्याचार, कृत्रिमता से पूर्ण मुक्त व्यक्ति ही समाज में प्रतिष्ठा पाता है
दिवा स्वपन् की वृत्ति का सर्वथा त्याग कर दीजिए। हवाई किले बनाना, अनहोनी बातों को सोचना, सिनेमा के फिल्मों या प्रेम कहानियों में वर्णित प्रेम प्रसंगों को पढ़कर यह कल्पना करना कि हम भी किसी स्त्री से ऐसा ही प्रेम करते, ऐसे ही काल्पनिक लोक में विहार करते, रँगरँगलियाँ मनाते, मस्त तराने गाते, मजेदारियाँ करते फिरते- यह सब मूर्खतापूर्ण कल्पनाएँ हैं। आज पढ़े-लिखे युवक अपने प्राचीन साहित्य में आये हुए प्रेमों या ख्यालों के चरित्रों को पढ़कर, या अश्लील फिल्म देख कर किसी भी स्त्री से प्रेम करने को इच्छुक से प्रतीत होते हैं। वासना लोलुप दृष्टि से स्त्रियों को देखते हैं, गुपचुप यह सोचा करते हैं कि क्या अच्छा होता यदि हम वे होते
हवाई किले बनाना, अनहोनी बातों को सोचना, सिनेमा के फिल्मों या प्रेम कहानियों में वर्णित प्रेम प्रसंगों को पढ़कर यह कल्पना करना कि हम भी किसी स्त्री से ऐसा ही प्रेम करते, ऐसे ही काल्पनिक लोक में विहार करते, रँगरँगलियाँ मनाते, मस्त तराने गाते, मजेदारियाँ करते फिरते- यह सब मूर्खतापूर्ण कल्पनाएँ हैं। आज पढ़े-लिखे युवक अपने प्राचीन साहित्य में आये हुए प्रेमों या ख्यालों के चरित्रों को पढ़कर, या अश्लील फिल्म देख कर किसी भी स्त्री से प्रेम करने को इच्छुक से प्रतीत होते हैं। वासना लोलुप दृष्टि से स्त्रियों को देखते हैं, गुपचुप यह सोचा करते हैं कि क्या अच्छा होता यदि हम वे होते। किन्तु इस प्रकार कुरुचिपूर्ण कल्पना की प्रचिर स्थानी उड़ान भर कर वे सभ्य समाज में अपना उपहास करते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-May
आपको अपनी वासना के ऊपर विजय प्राप्त करनी चाहिए। सिनेमा के गन्दे फिल्मों को न देखिये, दूसरों की स्त्रियों की ओर वासना लोलुप दृष्टि न डालिये, गन्दे चित्र, बुरे गाने, कुसंगति त्याग दीजिए, आप इन महा अनर्थकारी चिंताओं से मुक्त रहेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-July
उनकी रुचि, लगन और मधुर व्यवहार देखकर फिल्म डायरेक्टर ने उन्हे एक छोटा-सा रोल दे दिया। इस भूमिका को उन्होंने इतनी कुशलता के साथ निभाया कि बाद में उनके सामने फिल्मों के ढेर लग गये और वे लगातार 13 वर्ष तक फिल्मो में काम करती रही
अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री दादी रेनाल्डम ने पश्चिमी जगत में बहुत ख्याति अर्जित की। 65 वर्ष की आयु में जब वे चार बच्चो की माँ और दर्जनो नाती-पोतों की दादी बन चुँकी थी तब शिक्षा प्राप्त करने की सूझी और काँलेज जाने लगी। 69 वर्ष की आयु में वे कैलिफोनिया विश्वविद्यालय में स्नातिका हुई
इसके बाद वे हालीवुड पहुँची। उनकी रुचि, लगन और मधुर व्यवहार देखकर फिल्म डायरेक्टर ने उन्हे एक छोटा-सा रोल दे दिया। इस भूमिका को उन्होंने इतनी कुशलता के साथ निभाया कि बाद में उनके सामने फिल्मों के ढेर लग गये और वे लगातार 13 वर्ष तक फिल्मो में काम करती रही
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-March
कई वेधशालों से गुब्बारे छोडे जायगे पर आकाश में उस समय होने वाले परिवतनो का पता लगाया जायेगा। आन्ध्र प्रदेश चल चित्र स्थान ने इस अवसर पर ऐसी फिल्म बनाई जिससे प्राणियों और पदार्थो पर होने वाले सूर्य ग्रहण का पता चल सके
सौर विकरण का अल्झवायोलेट एवं इन्फ्रारेड वाला हिसा दृष्टि में नहीं आये, इसकी व्यवस्था करने के लिए विशेष फिल्टर ग्लास उपयुक्त होते हैं। काली एक्सपोज की गई फाटोग्राफी की फिल्म को दुहरा कर ग्रहण को देखा जा सकता है। बेल्डर का डार्क-आर्क, लान्स भी प्रयोग किया जा सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-November
ट्रेचर जेम्स ने ‘इन्फ्रारेड मूडी फिल्म’ के लिए प्रयुक्त होने वाले एक विशेष कैमरे आई.आर. 135 के द्वारा मोजापे रेगिस्तान के अन्तरिक्ष की स्थिति चित्रित की है। इस फिल्म में ऐ पक्षी दिखाई पड़ते हैं जो अपनी आँखों से कभी देखी ही नहीं जा सकते हैं
इतना ही नहीं ऐसे दृश्य भी कैमरे ने चित्रित किये जो आँखों से दिखाई ही नहीं पड़ते हैं। ट्रेचर जेम्स ने ‘इन्फ्रारेड मूडी फिल्म’ के लिए प्रयुक्त होने वाले एक विशेष कैमरे आई.आर. 135 के द्वारा मोजापे रेगिस्तान के अन्तरिक्ष की स्थिति चित्रित की है। इस फिल्म में ऐ पक्षी दिखाई पड़ते हैं जो अपनी आँखों से कभी देखी ही नहीं जा सकते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-December
इन कोशों में से कुछ तो माइक्रों फिल्मों की तरह न जाने कब की स्मृतियाँ संजोये हुए है। इनमें न जाने कब की स्मृतियाँ सुरक्षित है ? मोटे तौर पर जिन बातों को हम भूल चुके होते है, वे भी वस्तुतः विस्मृत नहीं होतीं, वरन् इन कोशों में सुरक्षित रहती है या कहा जा सकता है कि मस्तिष्क के एक कौने में छिपी पड़ी रहती है और जब अवसर पाती है तो वर्षो में उग आने वाली घास की तरह उभर कर ऊपर आ जाती है
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नेवारी एक बार एक होटल में ठहरा हुआ था। होटल के मालिक को मरे हुए थोड़े ही दिन हुए थे। उसके लड़कों में सम्पत्ति के बटबारे को लेकर बहुत ही झगड़ा चला रहा था बाप ने मरने से पहले जो वसीयत लिखी थी, इससे गुत्थी और उलझ गयी
कनाडा के स्नायु विशेषज्ञ डा. पेनफील्ड ने इस तथ्य को को जाँचने के लिए एक व्यक्ति का स्मृति कोश विद्युत धारा से उत्तेजित किया तो उसने बीस वर्ष पहले देखी गई एक फिल्म के कथानक, दृश्य और सम्वाद इस प्रकार बताने आरम्भ कर दिए कि मानो वह वही फिल्म देखता जा रहा हो और सामने के दृश्यो का वर्णन करता जा रहा हो। मस्तिष्क में रहने वाले इन कोशों का सम्बन्ध शरीर के प्रत्येक अंग अवयव से है। इन कोशों से सम्बन्धित नाड़ी तन्तु समस्त शरीर में फैले पड़े है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-September
उसके विवरण रेडियों पर सुनाये गये और घटनाक्रम टेलीवजन पर दिखाये गये। सन् 1973 में उसकी विलक्षता प्रदर्शित करने वाली एक फिल्म भी टोरेन्टो नगर में बनी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-December
पर अभी उसे सभी भाषाओं के लिए - प्रयोजनों के लिए उपयुक्त बनाने में बड़ी शक्ति तथा पूँजी लगानी पड़ेगी। इसी प्रकार फिल्म निर्माण का कार्य हाथ में लेना होगा। आँकड़े यह बताते हैं कि समाचार पत्र और रेडियो मिलकर जितने लोगों को सन्देश सुनाते हैं उससे कहीं अधिक सन्देश अकेला सिनेमा पहुँचाता है। समाचार पत्रों के पाठकों और रेडियो सुनने वालों की मिली संख्या से भी सिनेमा देखने वालों की संख्या अधिक है
पिछले पृष्ठों पर ऐसे कितने ही क्रियाकलापों की चर्चा की गई है, जिनमें पूँजी के रूप में भी यदि धन लग सके यदि उन क्रियाकलापों की व्यावसायिक रूप से खड़ा किया जा सके तो भी बहुत कुछ हो सकता है। 1. साहित्य प्रकाशन 2. चित्र प्रकाशन 3. अभिनय मंडलियाँ 4. ग्रामोफोन रिकार्ड 5. फिल्म निर्माण यह पाँच कार्य ऐसे हैं जिनके लिए विशालकाय अर्थशास्त्र खड़े किये जाने चाहिए और लोक मानस को परिष्कृत बनाने की आवश्यकता पूरी की जानी चाहिए
बात यों थी कि एक दिन उनके मित्र मि. हाफमैन चाय पीने के लिए बुलाये गये। चाय छानी ही जा रही थी कि उनकी पत्नी ने उस प्याले में तैरता हुआ एक घटना क्रम फिल्म की तरह देखा- “किसी होटल के मैनेजर को गोली मारकर एक हत्यारा एक कार पर चढ़ कर भाग जा रहा है दो मोटर साईकिल उसका पीछा कर रही हैं। हत्यारे ने पीछा करने वालों पर भी गोली चलाई, उनमें से एक सवार मारा गया। अन्ततः हत्यारा मोटर छोड़कर एक अधबनी झोंपड़ी में घुस गया उसे पड़ौस में रहने वालों ने देखा और पुलिस को पकड़वा दिया
यन्त्रीकरण के साथ कला समन्वय होने से ग्रामोफोन रिकार्ड, टेपरिकॉर्डर तथा फिल्म सिनेमा के नये प्रभावशाली माध्यम सामने आये हैं। उनका सदुपयोग होना चाहिए। चित्र प्रदर्शनियों के उपयुक्त बड़े साइज के चित्र छपने चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-May
देश के 7 हजार सिनेमाओं में हर रोज लाखों आदमी देखने जाते हैं। उनमें से अधिकाँश फिल्में दर्शकों पर अवाँछनीय प्रभाव छोड़ती हैं और इससे नैतिक तथा सामाजिक मूल्यों का बेतरह ह्रास होता है। इसे कोसने से काम नहीं चलेगा। सुसंगठित रूप से यदि सृजनात्मक फिल्म बनाये जाने लगें तो उस माध्यम से भावनात्मक नव निर्माण में बहुत सहायता मिल सकती है और नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्राँति का पथ प्रशस्त हो सकता है
शरीर को समुन्नत स्थिति में रखने के लिए पौष्टिक आहार की- सुसज्जा साधनों की- व्यायाम विनियोग की चिकित्सा की- विनोद आनन्द की अगणित व्यथाएं की गई हैं। मस्तिष्कीय उन्नति के लिए स्कूल, कालेज, प्रशिक्षण केन्द्र, गोष्ठियाँ सभाएं विद्यमान हैं पुस्तकें, पत्रिकाएं, रेडियो फिल्म, कलाकृतियाँ, संग्रहालय आदि न जाने कितने उपकरणों का सृजन किया गया है कि मस्तिष्कीय समर्थता बढ़े और विनोद आनन्द की अधिक मात्रा उपलब्ध हो सके। देखते हैं कि मानवीय चिन्तन और कर्तृत्व का अधिकाँश भाग उपरोक्त दो प्रयोजनों की पूर्ति में ही नियोजित है। आदमी जो सोचता है जो करता है उसके पीछे शारीरिक और मानसिक लाभ ही प्रधान होते हैं
इसे कोसने से काम नहीं चलेगा। सुसंगठित रूप से यदि सृजनात्मक फिल्म बनाये जाने लगें तो उस माध्यम से भावनात्मक नव निर्माण में बहुत सहायता मिल सकती है और नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्राँति का पथ प्रशस्त हो सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
उसमें प्रायः एकाँगी पागलपन ही भरा रहता है। फिल्मों के नट नर्तक नर-नारी बहुतों के लिये आराध्य बने रहते हैं, उनके चित्र छाती से चिपकाये रहते हैं, जन्म दिन पर बधाई सन्देश भेजते हैं, सोचते हैं कि इस प्रेम प्रदर्शन के आधार पर वे अपनी छाप उन पर छोड़ सकेंगे पर सही बात है कि इन प्रेमोन्मादियों की ओर आँख उठाकर देखने की भी उन्हें फुरसत नहीं होती इसी प्रकार प्रतिभा सम्पन्न लोग झूठे आश्वासन देकर लुभाते, ललचाते तो कितनों को ही रहते हैं पर जब कसौटी का समय आता है तब पल्ला झाड़कर अलग जा खड़े होते हैं। ऐसी एकांगी और छद्म प्रेम विडम्बनाएं भी कम देखने को नहीं मिलती। अपनी हवेली, तिजोरी, मोटर वाहवाही से भी कितनों को बड़ा प्यार होता है पर जब वे दूसरे के अधिकार में चली जाती हैं तो आँख उठाकर देखने जितना भी लगाव उनमें नहीं रह जाता
दुर्भाग्य यही है कि आज बेचारा ‘प्रेम’ शब्द इसी कीचड़ में पड़ा हुआ सड़ रहा है। फिल्म, उपन्यास, संगीत, शृंगार, नृत्य अभिनय से लेकर दैनिक व्यवहार में प्रेम की यही फूहड़ व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। यही क्रम चला तो सम्भवतः कुछ समय में लोग यथार्थ प्रेम के स्वरूप से भी अपरिचित हो जायेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-July
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नोवारी एक बार एक होटल में ठहरा था। होटल के मालिक को मरे हुये थोड़े ही दिन हुये थे, उसके लड़कों में सम्पत्ति के बारे में बहुत झगड़ा चल रहा था बाप की लिखी वसीयत मिल नहीं रही थी इससे गुत्थी और भी उलझ गई थी। नेवारो ने भी यह सारा वृत्तान्त सुना, पर वह बेचारा आखिर क्या कर सकता था परदेशी जो ठहरा
मस्तिष्क विद्या विशारद डॉ0 विल्डर पेनफील्ड ने मस्तिष्क के भीतर एक ऐसी पट्टी का पता लगाया है जो स्मरण शक्ति का मूलभूत आधार है। देखे, सुने और सोचे हुए सभी विचार जो मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं उन्हें उस पट्टी में होकर ही गुजरना पड़ता है अस्तु वे स्मृतियाँ अति सूक्ष्म फिल्मों की तरह अथवा टेपरिकॉर्डर में भरी आवाज की तरह जम जाती हैं और एक कोने में पड़ी रहती हैं। साधारणतया वे स्मृति पटल पर नहीं आतीं पर यदि विशेष प्रयत्न किया जाय तो उन्हें उभारा जा सकता है और कितनी ही पुरानी देखी, सुनी या सोची हुई बात फिर से उसी स्पष्टता के साथ सजग की जा सकती हैं
इतनी बातें याद कर सकना सम्भव भी नहीं। इसलिए स्मरण-विस्मरण का क्रम साधारणतया चलता रहता है किन्तु साथ ही यह भी होता रहता है कि दैनिक जीवन में काम आने वाले समस्त घटना क्रम की एक अति सूक्ष्म साउण्ड फिल्म बनती रहती है, जिसे आवश्यकतानुसार कभी भी प्रोजेक्ट किया जा सके
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-January
ऐसे ही उपग्रह इस रेडियो फोटो संचार पद्धति को संचालित रखने में सहायता करते हैं। इस ‘इंटेसाल्ट उपग्रह पद्धति का विकास करके शब्द संचार की तरह चित्र संचार की सुविधा भी सरल बनाई जा सकती है और हम घर बैठे विश्व की महत्वपूर्ण घटनाओं को सिनेमा के पर्दे पर देखी जाने वाली फिल्मों की तरह प्रत्यक्ष देख सकते हैं। टेलीविजन में अभी जो छोटे दायरे से ही काम करने की कठिनाई है वह भी इस प्रणाली से दूर की जा सकती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-April
शत-प्रतिशत साफ फोटो खींचता हो। जिसमें फोटोग्राफर की आवश्यकता न हो और फिल्मप्लेट आदि लगाने का झंझट न हो। ऐसा कैमरा बनना तो दूर किसी वैज्ञानिक के मस्तिष्क में इस तरह की सम्भावना की कल्पना भी अभी तक नहीं आई है। यदि कोई सोचने भी लगे तो इन सारी सुविधाओं से सम्पन्न किसी विशालकाय तन्त्र की ही कल्पना की जा सकती है
जो आधुनिक आपरेशनों से सम्भव है वह कर देने का दावा टोनी भी करता है। उसकी चिकित्सा विधि देखने डॉक्टर वैज्ञानिक आते हैं और सारे क्रिया-कृत्य के फोटो फिल्म ले जाते हैं पर इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते कि यह असम्भव दीखने वाली बात सम्भव कैसे हो पाती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-June
इन दस अरब कोशों को अद्भुत विशेषताओं से
संपन्न देव या दानव कहा जा सकता है। इनमें से कुछ में तो माइक्रोफिल्मों की
तरह न जाने कब-कब की स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं। मोटे तौर पर जिन बातों
को हम भूल चुके होते हैं, वे भी वस्तुतः विस्मृत नहीं होतीं, वरन एक कोने
में छिपी पड़ी रहती हैं। जब अवसर पाती हैं तो वर्षा की घास की तरह उभरकर
ऊपर आ जाती हैं
केनेडा के स्नायुविशेषज्ञ डॉ.पेनफील्ड ने एक व्यक्ति का
एक स्मृतिकोश विद्युतधारा के स्पर्श से उत्तेजित किया। उसने बीस वर्ष पहले
देखी हुई फिल्मों के कथानक और गाने ऐसे सुनाए मानो अभी-अभी देखकर आया हो
फिल्म अभिनेता स्वर्गीय चंद्रमोहन सेन ने एक
दिन पूर्व स्वप्न देखा कि उनका रेस का घोड़ा दौड़ते हुए एक गड्ढे में गिरकर
मर गया। जागने पर उनने घोड़े को सही स्थिति में पाया और स्वप्न को निरर्थक
समझा, पर तीसरे ही दिन वह भवितव्यता होकर रही। घोड़ा ठीक उसी स्थिति में
उसी स्थान पर मरा जैसा कि उनने स्वप्न में देखा था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-September
हत्या-चोरी, व्यभिचार, उद्दंडता का विस्तृत चर्चा करने वाला जासूसी, अय्याशी का कथा साहित्य आज बेहिसाब छप और बिक रहा है। फिल्में ऐसी ही कुरुचि भड़का रही हैं। उसका प्रभाव कच्चे मस्तिष्कों पर बेतरह पड़ता है और वे इन अपराधों के माध्यम से अपनी साहसिकता एवं चतुरता प्रकट करने के लिए इस प्रकार के दुष्कर्म करते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-September
वैज्ञानिकों का कहना है कि-दूर की फोटो लेना अथवा दूरवर्ती वस्तुओं का फोटो लेना, केवल माइक्रो फिल्म द्वारा ही सम्भव है और वह भी जबकि उस तरह का दृश्य किसी निश्चित फ्रीक्वेंसी पर निश्चित माइक्रो फिल्म द्वारा ही संभव है और वह भी जबकि उस तरह का दृश्य किसी निश्चित फ्रीक्वेंसी पर निश्चित माईक्रोट्रान्समीटर द्वारा शक्ति शाली विद्युत तरंगों द्वारा प्रेक्षित किया गया हो
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-February
सामान्य स्तर का कोई कार्य सामान्य वातावरण में भी किया जा सकता है; पर विशिष्ट स्तर का कार्य करना हो तो उपयुक्त वातावरण की ही खोज−बीन करनी पड़ती है। जहाँ फोटोग्राफिक फिल्में बनाई जाती हैं, उस फैक्ट्री में तापमान को एक निश्चित मर्यादा में ही रखना पड़ता है। यदि इसकी उपेक्षा की जाए तो सारे साधनों के रहते हुए भी अच्छी फिल्में बनाना संभव नहीं हो सकता। स्वास्थ्य के लिए कुछ पर्वतीय क्षेत्र बहुत ही उपयोगी माने जाते हैं
जहाँ फोटोग्राफिक फिल्में बनाई जाती हैं, उस फैक्ट्री में तापमान को एक निश्चित मर्यादा में ही रखना पड़ता है। यदि इसकी उपेक्षा की जाए तो सारे साधनों के रहते हुए भी अच्छी फिल्में बनाना संभव नहीं हो सकता। स्वास्थ्य के लिए कुछ पर्वतीय क्षेत्र बहुत ही उपयोगी माने जाते हैं। विशिष्ट रोगियों को, दुर्बल व्यक्तियों को, विशिष्ट सेनेटोरियमों में रहने का प्रबंध किया जाता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-June
बन पड़ा तो नाटक मण्डली अन्यथा संगीत मण्डली तो अवश्य ही पहुँचेगी। सरकारी सहयोग मिल सका तो उनके समाज कल्याण जैसे विभागों की प्रदर्शनियाँ—फिल्में भी आमन्त्रित की जायेंगी। क्षेत्रीय संगीतज्ञों के मधुर गान सुनने का अवसर मिलेगा। कला संसदें यदि अपने क्षेत्र में नाटक, अभिनव का प्रबन्ध कर सकीं तो उनसे भी पहुँचने का आग्रह किया जायगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-December
फ्रांस के सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता पितरी मिसी में जहाँ अभिनय सम्बन्धी अनेक विशेषतायें थीं वहाँ उसमें कई अभूतपूर्व चमत्कारिक विशेषतायें भी थीं। वह अपनी इच्छानुसार ही शरीर के किसी भी हिस्से का कोई भी बाल हिला सकता था। बाल की नोक को खड़ा कर सकता था उन्हें पानी और आँधी के कारण गिरी हुई फसल की तरह लिटा सकता था, इतना ही नहीं कोमल सपाट बालों को को वह जब चाहे अपनी इच्छा शक्ति द्वारा ही घुँघराले बना सकता था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-July
उससे ठीक काम लेता हो सन्तुलित परिस्थितियाँ बनाये रहना आवश्यक है। फोन फिल्में अनावश्यक गर्मी सहन नहीं कर पाती। इस प्रकार के मस्तिष्क अब भी उत्तेजना एवं आवेश की स्थिति उत्पन्न होने पर एक प्रकार से अपना काम करना ही बन्द देते हैं। यदि कुछ करते भी हैं तो वह उलटा होता वह उलटापन लाभ के स्थान पर हानि ही उत्पन्न करने लगता है
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नावोरी के जीवन की एक घटना है। एक बार उसे रात्रि की किसी कार्य वश होटल में ठहराना पड़ा। होटल मालिक को मरे हुए कुछ ही दिन बीते थे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-August
डडडड उसकी ओर आकर्षित हुई थी। फिल्मी ढंग से दोनों का कथित प्रेम परवान चढ़ने लगा और दोनों ने साथ-साथ मरने की कसमें खाई। घर वालों को जब इसका पता चला तो दोनों पर प्रति बन्ध लगा दिया। अवसर पाकर दोनों भाग निकले किन्तु रास्ते में ही बीना की मृत्यु हो गई
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-October
चित्रकथाएँ बालकों को कितनी प्रिय होती हैं। समूचा फिल्म उद्योग इसी मानवी प्रकृति पर टिका हुआ है कि लोग घटनाक्रम देखना अधिक पसंद करते हैं। अभिनय-नाटकों की लोकप्रियता सर्वविदित है। संगीत समारोहों में समा बँधता है और बाल-वृद्ध, नर-नारी सभी उन्हें सुनने के लिए दौड़ पड़ते हैं
प्रचार-प्रकाशन के समतुल्य ही कला का क्षेत्र है। उस पर इन दिनों फिल्म उद्योग का आधिपत्य है। पत्र-पत्रिकाओं के पाठकों से भी कहीं अधिक संख्या सिनेमा दर्शकों की रहती है। अभिनय, संगीतयुक्त कथानक अपने पीछे जो प्रभाव सँजोए रहते हैं, उसका प्रभाव सीधे चिंतन और चरित्र पर पड़ता है
इस दिशा में शासन रेडियो, टेलीविजन प्रकाश आदि के द्वारा जो कर लेता है, उतने को भी न कुछ-से-कुछ कह कर संतोष किया जा सकता है। साहित्य और कला की विकृतियों पर अंकुश लगाने का कुछ कारगर कदम भर उठने लगे तो फिल्म एवं प्रकाशन-उद्योग की विकृतियाँ फैलने से रोकने का आग्रह भी प्रस्तुत किया जा सकता है। युग दर्शन को शासन का सहयोग न सही, समर्थन भर मिलता रहे तो काम चलेगा। अवरोध उत्पन्न न करना भी प्रकारांतर से समर्थन ही माना जाएगा
शहरों की दर-गुजर की जा सके और देहात को अपने कल्पना-चित्र से प्रमुखता दी जा सके तो उसे युगचेतना से अवगत-प्रभावित करने के लिए इस ‘दृश्य’ माध्यम को नए सिरे से गठित किया जा सकता है। आवश्यक नहीं कि वह फिल्म-उद्योग की तरह मुट्ठी भर पूँजीपतियों के हाथ में ही रहे। उसे छोटी पूँजी वाले सरकारी मंडली की सहायता से हर जगह स्थानीय प्रतिमाओं के सहारे गठित किया जा सकता है। स्वसंचालित विशालकाय कारखानों की प्रतिद्वंद्विता का सामना करते हुए यदि चरखा और करघा जीवित रह सकता है तो कोई कारण नहीं कि लोकरंजन के साथ लोक-मंगल का समन्वय योजनाबद्ध रूप से आगे न बढ़ाया जा सके
हर दिन पचास की उपस्थिति मानी जाए तो वर्ष में देखने वालों की संख्या 360 X 50 =18000 होती है। ऐसे पाँच हजार स्लाइड प्रोजेक्टर कार्यक्षेत्र में उतरें तो उस मिनी सिनेमा से, उससे अधिक लोग इस प्रभाव-प्रेरणा की परिधि में आते हैं, जितने कि अरबों-खरबों की लागत वालो फिल्म-उद्योग द्वारा होता है। यह है— अपना मिनी फिल्म उद्योग
प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत एक छोटा रेडियो-स्टेशन और छोटा फिल्म-उद्योग बड़ी सफलता के साथ चल रहा है। टेप-रिकार्डर द्वारा सुनाए जाने वाले संगीत और प्रवचनों के टेप बड़ी संख्या में बनने और उन्हें छोटे समुदायों को एकत्रित करके सुनाए जाने के प्रयत्न में हजारों युगशिल्पी लगे हैं। लाउडस्पीकरों की सहायता से इन प्रेरक टेपों को प्रतिदिन हजारों-लाखों की संख्या में लोग सुनते हैं
आवश्यकता यह अनुभव की जानी चाहिए कि पुरातन सतयुगी वातावरण को आज की स्थिति में अवतरित कर सकने वाले कथानकों को कम-से-कम एक फिल्म-शृंखला तो चल ही पड़े। मार्गदर्शन और पथ प्रशस्त होने पर दूसरे लोग भी उसका अनुकरण करेंगे। यह बड़ी पूँजी का उद्योग है
यह बड़ी पूँजी का उद्योग है। एक फिल्म बनाने से नहीं एक शृंखला चलाने से काम बनेगा। इस शृंखला शुभारंभ के अपने निजी साधन बनाने होंगे। इसमें न्यूनतम पचास लाख की पूँजी चाहिए
ऐसे पाँच हजार स्लाइड प्रोजेक्टर कार्यक्षेत्र में उतरें तो उस मिनी सिनेमा से, उससे अधिक लोग इस प्रभाव-प्रेरणा की परिधि में आते हैं, जितने कि अरबों-खरबों की लागत वालो फिल्म-उद्योग द्वारा होता है। यह है— अपना मिनी फिल्म उद्योग
200रु. की पूरी मशीन। 36 स्लाइडों का एक प्रसंग फिल्म 45रु. का। इसे कोई भी लोकसेवी निजी पूँजी से अथवा मिल-जुल खरीद लेता है और हर दिन मुहल्ले-मुहल्ले में दिखाते रहने का उपक्रम चलाता है। हर दिन पचास की उपस्थिति मानी जाए तो वर्ष में देखने वालों की संख्या 360 X 50 =18000 होती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-January
उसकी बड़ी-बड़ी मूँछें भी थीं। 1932 में उसमें एक अद्भुत फिल्म अभिनेत्री की तरह काम किया। इसके धनी होने के कारण एक पुरुष ने उससे विवाह भी कर लिया था; पर वह अधिक समय जीवित न रहा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-March
आहार-विहार में उत्तेजनाओं की भरमार होने से कामुकता भड़कती है। इस भड़काव में अश्लील साहित्य, कामुक फिल्मों का उत्तेजनात्मक वातावरण बनाने में भी असाधारण योगदान मिलता है। फलतः अल्पायु में ही प्रजनन महत्वाकाँक्षा उभर पड़ती है। नर-नारी के बीच रहने वाला एक झीना अन्तर चिरकाल से चला आया है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-February
फोटो लेने के लिए अच्छे कैमरों के लेन्स भी पहले एक निश्चित नाभ्यान्तर पर फिट करने होते हैं। फिल्मों तक में फोटो दृश्य और कैमरे की दूरी का सन्तुलन मिलाकर फोकस सही करना पड़ता है। इस व्यवस्था को बनाये बिना अभीष्ट फोटो खिंच ही नहीं सकेगा। किन्तु नेत्र संरचना में ऐसा कुछ नहीं करना पड़ता
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-December
प्रख्यात फिल्म कलाकार रोमान रोवारी उस दिन एक छोटे होटल में ठहरे हुए थे। होटल के मालिक की मृत्यु के उपरान्त उसके लड़कों के बीच सम्पत्ति के बटवारे का झगड़ा चल रहा था। पिता इस सम्बन्ध में मरने से पूर्व कोई वसीयत कर गये हैं क्या? इसका उन लड़कों को पता न था
यह समय की अनिवार्य आवश्यकता है। उसे साहित्यकारों, चित्रकारों, विज्ञापन वालों, फिल्म व्यवसायियों के लिए मनोरंजन और कमाई का साधन नहीं बनने देना चाहिए। उसे इस रूप में सज्जित प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए जिससे वह विलास की पुतली दीख पड़े और इस कारण हर ओर से विपदाओं के बादल टूटें
कुछ पुनर्जन्म संबंधी होते हैं तो कुछ पूर्वानुभूति के रूप में। अनेक व्यक्तियों को आने वाले घटना क्रम, विभीषिका, दुर्योग या समष्टिगत विपत्ति का आभास ऐसे होने लगता है, मानो उनकी आंखों के सामने फिल्म चल रही हो। उस समय तो सब कुछ रहस्यमय आश्चर्यजनक लगता है, पर जब यह सत्य सिद्ध होता है तो फिर अविज्ञात के संबंध में कोई दुविधा मन में रह नहीं जाती
वाल्टर नामक एक लेखक की पत्नी मैसी चाय बना रही थी। उसने भरे प्याले में एक फिल्म जैसा दृश्य देखा। एक हत्यारा दो व्यक्तियों की हत्या करके डाका मार ले गया। पुलिस ने मोटर साइकिल पर उसका पीछा किया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
इतने पर भी मन की कल्पनाओं का क्या ठिकाना। उनका परीलोक तो हर घड़ी नया बन सकता है और फिल्म की लड़ी में उसे बदला जा सकता है। इतना उपभोग किस प्रकार संभव हो सके और फिर अभीष्ट तृप्ति किस प्रकार मिल सके। यदि इसी तृप्ति पर शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन टिका है तो उस बालू की भीत का गिरना निश्चित है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-May
कामुकता और शृंगारिकता की उत्तेजना भर देने पर उसकी गरिमा भी नष्ट होती है और उपयोगिता भी। सामंतीयुग के उपरान्त शृंगारिकता ने फिल्मों के कोंतर में छिपकर अपना व्यवसाय जारी रखा। यही कारण है कि ऐसे माहौल में समझदार लोग अपने लड़के-लड़कियों को जाने से रोकते हैं। यदि उस प्रवाह में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को प्रश्रय मिला होता तो संगीत ने आज की विकृतियों के निवारण और सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन में महती भूमिका निभाई होती
संगीत की महत्ता इसलिए घटी, उसकी अवमानना इसलिए हुई कि उसे घटिया लोगों द्वारा घटिया प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। फिल्मी गानों से नाक भौं इसीलिए सिकोड़ी जाती है कि उनके प्रभाव से अपरिपक्व बुद्धि को कुमार्ग पर चल पड़ने का खतरा उठाते हुए देखा गया है। दूध में मक्खी पड़ जाने से वह रस से विष हो जाता है। कामुकता और शृंगारिकता की उत्तेजना भर देने पर उसकी गरिमा भी नष्ट होती है और उपयोगिता भी
बात पुरानी हो गई पर जिन्होंने वह विवरण पुस्तकों में पढ़ा, फिल्मों में देखा है वे रात-रात बेचैन पाये जाते हैं और नींद खो बैठते हैं। इससे आगे पीछे भी अनेक नर पिशाच रक्त पिपाशु पैदा होते रहे। पर उनके कृत्य भुला दिये गये
अमेरिका की अन्धी और गूँगी हेलन केलर ने विकलाँग होते हुए भी अपनी प्रतिभा से सर्वत्र हलचल मचा दी थी। कार्टून फिल्मों के निर्माता वाल्ट डिस्ने जब 22 वर्ष के थे तभी उन्होंने सिनेमा जगत को नई दिशा दी थी
व्राम स्टोकर के उस इतिहास ग्रन्थ के आधार पर कई फिल्में बनाई गईं। वे जहाँ भी दिखाई गईं दर्शक काँपने लगते और सिसकियां भरने लगते फिर भी उन कुकृत्यों को देखने वालों की कमी नहीं रही। पाँच सौ वर्ष पुरानी उस वीभत्स घटना का महल देखने के लिए दुनिया भर के लोग पहुँचते हैं और उससे रूमानिया सरकार को दो करोड़ डालर की प्रतिवर्ष टिकट आमदनी होती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-July
अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री ‘दादी रेनाल्डस’ ने पाश्चात्य जगत में बहुत ख्याति प्राप्त की है। उनकी फिल्म सफलता समूची जीवन-साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी
उनके परिश्रम मधुर-स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व ने उस क्षेत्र में बढ़-चढ़कर काम करने का अवसर दिया। अस्तु उन्होंने लगातार तेरह वर्षों तक प्रत्यक्ष फिल्मों में काम किया। 82 वर्ष की उम्र में वे एक विद्वान शरीरशास्त्री से वह परामर्श लेने गई कि उनके पेट का मांस थुलथुला हो गया है। यह कसा हुआ कैसे हो सकता है? डाॅक्टर गैलार्ड हॉजर ने उपचार बताए
अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री ‘दादी रेनाल्डस’ ने पाश्चात्य जगत में बहुत ख्याति प्राप्त की है। उनकी फिल्म सफलता समूची जीवन-साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी। तब उन्हें उत्साह उठा कि जो शिक्षा उन्होंने प्राप्त कर रखी है, वह कम है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-August
इस थ्री डायमेन्शनल तकनीक को विज्ञानी यूक्लिड ने आविष्कृत किया था और इसका नाम स्टीरियोस्कोपी दिया था। इस आधार पर प्रथम फिल्म “बवाना डेविल” बनी थी, जो बहुत ही सफल रही। बीच में तकनीकी कठिनाइयों के कारण वह बहुत विस्तार न पा सकी, पर बाद में नये सिरे से ऐसी शृंखला को कार्यान्वित करने की हालीवुड ने एक समग्र योजना बनायी एवं वे इसमें सफल रहे
बच्चों के टेलिस्कोप और दो बिन्दीदार चित्रों को आपस में सटाकर भी यह कौतूहल बच्चों के लिए सुलभ हो गया है कि वे त्रिआयामीय चित्र देखें। सिनेमा ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया और कुछ थ्री.डी. फिल्में भी पिछले दिनों बनाई हैं। यह फिल्में होलोग्राफी के सिद्धान्त के आधार पर बनाई गई थीं। इसमें मात्र गहराई, ऊँचाई, निचाई ही नहीं दीखती थी पर साथ ही इतना और भी देख पड़ता था कि सामने का पर्दा कोई खुला मैदान है और उसमें से निकल कर शेर घोड़े वगैरह इस तरह दौड़ते आ रहे हैं मानो वे दर्शकों पर सवार ही होने वाले हैं
सिनेमा ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया और कुछ थ्री.डी. फिल्में भी पिछले दिनों बनाई हैं। यह फिल्में होलोग्राफी के सिद्धान्त के आधार पर बनाई गई थीं। इसमें मात्र गहराई, ऊँचाई, निचाई ही नहीं दीखती थी पर साथ ही इतना और भी देख पड़ता था कि सामने का पर्दा कोई खुला मैदान है और उसमें से निकल कर शेर घोड़े वगैरह इस तरह दौड़ते आ रहे हैं मानो वे दर्शकों पर सवार ही होने वाले हैं। प्रारंभ में इन्हें देखकर अनेक सिनेमा दर्शक भयभीत हो गये और चीखते हुए हाल से भागे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-March
1972 में मास्को विश्वविद्यालय के बायोफिजीक्स विभाग के डॉ. बेरिस टारुसोव ने बहुत ही मन्दी पर संवेदन शील प्रकाश किरणें मानवी जीव कोशों एवं पौधों की पत्तियों से निकलती नोट की। इसी बीच कजाकिस्तान (आल्मा अता) की स्टेट यूनिवर्सिटी के डॉ. विक्टर इन्युशिन ने बताया कि मानवी नेत्रों व जीव जन्तुओं से विशेष प्रकार की अल्ट्रा वायलेट किरणें निकलती हैं एवं इन्हें एक विशेष सेंसीटिव फिल्म पर स्पेशल फिल्टर्स का प्रयोग कर रिकार्ड किया जा सकता है। लाइफ फील्ड एल-फील्ड के माध्यम से “इलेक्ट्रोमैग्नेटिक मैट्रिक्स” के रूप में हैराँल्डबर एवं लियोनार्ड रैवीट्ज ने इस सिद्धान्त को आगे बढ़ाया। हाईवोल्टेज फोटोग्राफी (किलियन, इलेक्ट्रोग्राफी, कोरोना डिस्चार्ज फोटोग्राफी) भी आभामण्डल का मापन करने की ऐसी तकनीक थी जो क्रमशः विकसित हुई
कामुकता का आवेश उत्पन्न करने में अश्लीलता की पक्षधर साज सज्जा विशेष रूप से जिम्मेदार है। इस प्रकार की उत्तेजना देने वाली पुस्तकें, तस्वीरें, फिल्में, भावुक और कोमल मस्तिष्कों पर गहरी छाप छोड़ती हैं और किशोरों-किशोरियों से लेकर तरुण और प्रौढ़ों का ध्यान अन्य उपयोगी प्रसंगों से खींचकर अपने साथ जोड़ती है। फलतः दिवास्वप्नों में भूतपिशाच की तरह यौनाचार ही मनों पर छाया रहता है। इसे आवेश ही कह सकते हैं, एक प्रकार का उन्माद भी
वैज्ञानिकों का कथन है कि सामान्यतः मानवी मस्तिष्क पूरे जीवन भर में ही गीता का भाष्य लिख चुके थे। वैज्ञानिकों का कथन है कि सामान्यतः मानवी मस्तिष्क पूरे जीवन भर में प्राप्त जानकारी का सौवाँ हिस्सा ही स्मरण शक्ति की माइक्रोफिल्म के रूप में जमा कर पाता है। अर्थात् हमें प्राप्त 100 जानकारियों में से 99 हम सहज ही भुला देते हैं। फिर ऐसे घटनाक्रम क्यों कर देखने में आते हैं, जिसमें व्यक्ति अनायास ही, अथवा साधना-योगाभ्यास द्वारा अथवा अध्ययन क्षमता के माध्यम से अपने मस्तिष्क में अगणित सूचनाएँ भर एक साथ उन्हें प्रकट भी करने की सामर्थ्य भी अर्जित कर लेता हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-June
व्यक्ति निर्माण, प्रतिभा विकास, परिवारों में सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन, समाज सुधार, अर्थ-संतुलन उदात्त दृष्टिकोण, आदर्श चरित्र, सुसंस्कृत व्यवहार, सामाजिक उत्कर्ष, सामयिक समस्याओं का समाधान जैसे मानव जीवन से संबंधित सभी विषयों पर “यूमेटिक” सिस्टम से नयी टी.वी. फिल्में तैयार करने की योजना बनी है। प्रेरणाप्रद गीतों के एक्शन से अन्यान्य विषयों पर प्रश्नोत्तर शैली से प्रस्तुतीकरण की रीति-नीति अपनाई जायगी। आरम्भ में इनका प्रदर्शन शान्तिकुँज में नई व्यवस्था बनाकर किया जायगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-April
अकेला वह अपनी रियासत के भव्य भवन में बैठा विगत जीवन पर विचार करता रहता था। ज्यों-ज्यों पिछले जीवन के क्षण फिल्म की तरह उसकी स्मृति पटलकर आने लगे, उसे लगने लगा कि वे सभी, जिन्हें उसने सताया था, उसके आस-पास खड़े हैं एवं कभी भी उसे मार डालेंगे। वह अपनी रायफल लेकर बैठने लगा व उन छायाओं पर, जो उसे दिखाई पड़ती थी, गोली चलाता रहता। साथ ही उन्हें गाली भी देता, धमकाता रहता कि वह सबको गोली मार देगा
घटिया लोग अश्लील कामुकता के चित्र-विचित्र स्वरूपों का रसास्वादन करते हैं। ब्लू फिल्मों व साहित्य का आश्रय लेते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-February
गायन वादन अभिनय आदि उसी के अंतर्गत आते हैं। व्यक्तिगत क्षेत्र में फिल्म नाटक आदि चलते हैं और सरकारी तंत्र रेडियो, टेलीविजन चलाता है। यह समूचा कलामंच यदि लोक रंजन के लिए कम ओर लोक मंगल के लिए अधिक प्रयास करता तो जनजीवन की लोकमानस की स्थिति अपेक्षाकृत कहीं अधिक अच्छी रही होती और अनैतिकताओं अवाँछनीयताओं, अन्धविश्वासों, कुप्रचलनों, दुर्व्यसनोँ के जंजाल से अपनी दुनिया को कब की मुक्ति मिल गई होती। किन्तु इस दुर्भाग्य ही कहना चाहिए किस सम्पदा शिक्षा की तरह कला का कलेवर तो फूल रहा है, पर उसके भीतर विजातीय द्रव्य की ही भरमार पाई जाती है
गायकों, वादकों, अभिनेताओं, फिल्म निर्माताओं ने मिल−जुलकर जो माहौल रचा है उस पर अगणित लोग झूमने लगे हैं। फिल्म दर्शकों की संख्या अखबार पाठकों से भी अधिक है। रिकार्डों को सुनने वाली संख्या भी कम नहीं है, उन्हें तो जहाँ-तहाँ मुफ्त में ही सुना जाता हैं
गायकों, वादकों, अभिनेताओं, फिल्म निर्माताओं ने मिल−जुलकर जो माहौल रचा है उस पर अगणित लोग झूमने लगे हैं। फिल्म दर्शकों की संख्या अखबार पाठकों से भी अधिक है। रिकार्डों को सुनने वाली संख्या भी कम नहीं है, उन्हें तो जहाँ-तहाँ मुफ्त में ही सुना जाता हैं। साँप बीन पर लहराते हैं और सुनने वाले गीतों का रसास्वादन करते हैं
सभा सम्मेलनों समारोहों में गीतवाद्य सुनने को मिलते हैं। फिल्म देखने तो लोग पैसा देकर जाते हैं और लौटते समय उसी रंग में रंगे हुये होते हैं जो दिखाया गया है। मस्तिष्क को बदलने में गायन वदन अभिनय का बड़ा हाथ है। वहां अपना लक्ष्य बदले तो सुनने वालों का मनःक्षेत्र बदले बिना रह नहीं सकेगा
कितने ही विद्यालय चल सकते हैं। फिल्में बन सकती हैं। शतकुण्डी यज्ञों की एक बड़ी श्रृंखला चल सकती है। जिस छोटी-सी इमारत में शाँति कुँज चल रहा है उसे दूना भी कर दिया जाय तो युग सृजन के लिए जीवन-दान, समय-दान करने वालों की कमी न पड़ेगी
दोनों ही पक्ष के उत्पादक तत्वों में भारी कमी हो जाय और वैसी स्थिति अनायास ही बन जाय जैसी कि परिवार नियोजन वाले कृत्रिम उपायों से करना चाहते हैं। यह भी हो सकता है कि कामुकता भड़काने वाले साहित्य और चित्रों को फिल्मों को प्रतिबंधित कर दिया जाय और नर नारी कुत्साओं से छूट कर भाई-भाई की तरह सदाचरण पूर्वक रहने लगे और मिल जुल कर काम करें। ऐसे ही उपायों का मिला जुला रूप अगले दिनों सामने आवेगा। विकिरण की वृद्धि से जब अपंग संतानें होने लगेंगी तो मनुष्य उस आफत से अपना बचाव करने में सतर्कता बरतने लगेगा और रोकथाम के उपाय अपनायेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-December
देश भर के पुस्तकालयों से गीता पर लिखे गए शोध प्रबंधों को एकत्रकर संदर्भ हेतु उनके महत्त्वपूर्ण अंश सारबद्ध करने की व्यवस्था बनाई गई है। माइक्रो फिल्में बनाने व उसके द्वारा दुर्लभ महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का अवलोकन करने की व्यवस्था बनाई जा रही है। देश के कोने-कोने से खोजकर एवं प्रतिनिधि भेजकर ऐसे संदर्भ ग्रंथों का संकलन किया जा रहा है। “अखण्ड ज्योति” पाठकों से अनुरोध किया गया है, कि यदि उनके पास इस विषय पर महत्त्वपूर्ण साहित्य हो तो उनकी जानकारी भेजें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-January
सिनेमा देखने वाले युवक तो इन सस्ते फिल्मों से इतने प्रभावित रहते हैं कि उसी प्रकार की नाना प्रकार की नाना क्रियाएँ अनुचित और अनैतिक प्रेम सम्बन्ध,गीतों का गायन,अभिनय,गन्दे मजाक आदि किया करते हैं यह नितान्त अनुचित है। कम से कम फिल्म देखिये। अपने दैनिक व्यवहार में मर्यादा और बड़ों के सम्मान का ध्यान रखिये
अबोध बच्चे जो प्रेम या काम वासना का तात्पर्य तक नहीं समझते हैं, ऐसे गन्दे गीत गाते देखे जाते हैं कि सुनकर लज्जा से सिर नीचा हो जाता है। सिनेमा देखने वाले युवक तो इन सस्ते फिल्मों से इतने प्रभावित रहते हैं कि उसी प्रकार की नाना प्रकार की नाना क्रियाएँ अनुचित और अनैतिक प्रेम सम्बन्ध,गीतों का गायन,अभिनय,गन्दे मजाक आदि किया करते हैं यह नितान्त अनुचित है। कम से कम फिल्म देखिये। अपने दैनिक व्यवहार में मर्यादा और बड़ों के सम्मान का ध्यान रखिये
क्लर्क ऑफिसों में देर से पहुँचते हैं, डाकिया देर से डाक बाँटता हैं। यहाँ तक कि सिनेमा का मनोरंजन देखने वाले दर्शक भी समय की परवाह नहीं करते चाहे आधी फिल्म निकल जाय
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-August
युवा स्त्रियों के अर्ध नग्न चित्रों को इसलिये टाँगना और देखते रहना कि पाशविक वृत्तियाँ भड़के मनुष्य की शील मर्यादा के बाहर की वस्तु है। गन्दे उपन्यास, कहानियाँ, तस्वीरें, फिल्में, गन्दे गाने, जिनसे नारी के प्रति विकार बुद्धि भड़के मानव जाति के लिये निश्चय ही अहितकर बात है। नारी का सम्मान गिराने वाले इन कुकृत्यों को यदि हम त्यागने का निश्चय कर लें और उनसे घृणा की जाने लगे तो सर्वत्र पवित्रता का वातावरण दृष्टिगोचर हो सकता है। योजना में लड़कियों को यह विशेष रूप से समझाया गया है कि वे अपने गौरव का ध्यान रखते हुये ऐसी पोशाक न पहिने, ऐसा वेश विन्यास और शृंगार न करें जो उन्हें रमणी या ओछे स्तर की सिद्ध करता हो
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-June
युग की पुकार ऐसी वस्तुओं के प्रतिकूल नहीं अनुकूल ही है। कलाकारों, नये गायकों, नये अभिनेताओं द्वारा युग के लिए किये गये यह नवीन प्रयत्न जन-मानस की दिशा मोड़ सकते हैं और पुराने फिल्म निर्माताओं को इसी मार्ग पर लोटने के लिए विवश कर सकते हैं। पर मार्ग-दर्शन, नेतृत्व तो उन्हें चाहिए। इसे जुटाने का हमें प्रयत्न करना चाहिए
कोई सज्जन ऐसा प्रयत्न भी कर सकते हैं कि केवल भावनात्मक रिकार्ड वाले लाउडस्पीकर रखें और उन्हें दूसरों की अपेक्षा कुछ कम दाम पर किराये पर दिया करें। फिल्म देखने हों तो पहले यह जान लेना चाहिए कि उसमें दूषित अंश अधिक तो नहीं हैं। स्वयं तथा अपने मित्रों, परिवार एवं संबंधियों को गंदे चित्र देखने की सहमति नहीं देनी चाहिये
जिन्हें इस दिशा में आवश्यक उत्साह, अनुभव और साधन प्राप्त हों उन्हें इन क्षेत्रों में प्रवेश करना चाहिए। अच्छी फिल्मों और अच्छे रिकार्डों का देश में स्वागत ही होगा। युग की पुकार ऐसी वस्तुओं के प्रतिकूल नहीं अनुकूल ही है। कलाकारों, नये गायकों, नये अभिनेताओं द्वारा युग के लिए किये गये यह नवीन प्रयत्न जन-मानस की दिशा मोड़ सकते हैं और पुराने फिल्म निर्माताओं को इसी मार्ग पर लोटने के लिए विवश कर सकते हैं
विज्ञान के माध्यम से कुछ कलात्मक माध्यमों इतना विकास हो गया है कि उनका उपयोग तो जनता करती है पर निर्माण ऊँचे स्तर पर ही हो सकता है। ग्रामोफोन के रिकार्ड और सिनेमा फिल्में इसी प्रकार के दो माध्यम हैं, जिनने जनमानस पर भारी प्रभाव डाला है। ग्रामोफोन का प्रचलन तो रेडियो के विस्तार से घट गया है पर उत्सवों के अवसरों पर लाउडस्पीकरों द्वारा रिकार्ड अभी भी बजाये जाते हैं और उन्हें लाखों व्यक्ति प्रतिदिन सुनते हैं। इसी प्रकार देश भर में हजारों सिनेमा घर हैं जिनमें लाखों फिल्में चल जाती हैं
बुरी चीजों को तभी हटाया जा सकता है जब उनके स्थान पर अच्छी वस्तुएँ प्रस्तुत की जायं। रिकार्ड और फिल्म दोनों ही उद्योग यह अपेक्षा करते हैं कि प्रतिभाशाली व्यक्ति इन क्षेत्रों में प्रवेश करके एक बड़े अभाव की पूर्ति कर
ग्रामोफोन का प्रचलन तो रेडियो के विस्तार से घट गया है पर उत्सवों के अवसरों पर लाउडस्पीकरों द्वारा रिकार्ड अभी भी बजाये जाते हैं और उन्हें लाखों व्यक्ति प्रतिदिन सुनते हैं। इसी प्रकार देश भर में हजारों सिनेमा घर हैं जिनमें लाखों फिल्में चल जाती हैं। इन्हें भी करोड़ों व्यक्ति हर साल देखते हैं और जैसे भी संस्कार उन दृश्यों में होते हैं उन्हें देखने वाले ग्रहण करते हैं। मानवीय मस्तिष्क को प्रभावित करने के लिये विज्ञान की यह दो बड़ी कलात्मक देन हैं
यों छोटे घरेलू फिल्म प्रोजेक्टर, मेजिक लालटेन, टेपरिकॉर्डर आदि द्वारा भी छोटे जन समूह का कुछ मनोरंजन हो सकता है। विज्ञान के इन माध्यमों से भी कुछ मनोरंजन हो सकता है, जहाँ इनकी उपयोगिता से भी काम लिया जा सकता है
80- कम्पनियों द्वारा रिकार्ड और फिल्मों का निर्माण
युग-निर्माण की भावनाओं के अनुरूप जीवन विद्या के भावोत्पादक गायनों के रिकार्ड देश के लिए बड़े उपयोगी सिद्ध होंगे। इसी प्रकार यदि दुष्प्रवृत्तियों पर करारी चोट करने वाले और परमार्थ प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन करने वाले फिल्म बन सकें तो उससे भी बड़ा उपकार होगा। बुरी चीजों को तभी हटाया जा सकता है जब उनके स्थान पर अच्छी वस्तुएँ प्रस्तुत की जायं। रिकार्ड और फिल्म दोनों ही उद्योग यह अपेक्षा करते हैं कि प्रतिभाशाली व्यक्ति इन क्षेत्रों में प्रवेश करके एक बड़े अभाव की पूर्ति कर
अश्लील साहित्य, अर्ध नग्न युवतियों के विकारोत्तेजक चित्र, गन्दे उपन्यास, कामुकता भरी फिल्में, गन्दे गीत वेश्यावृत्ति, अमर्यादित काम चेष्टाएँ, नारी के बीच रहने वाली शील संकोच मर्यादा का व्यक्तिक्रम, दुराचारों की भोंड़े ढंग से चर्चा, आदि अनेक बुराइयाँ अश्लीलता के अंतर्गत आती हैं। इनसे दाम्पत्य-जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है और शरीर एवं मस्तिष्क खोखला होता है। शारीरिक व्यभिचार की तरह यह मानसिक व्यभिचार भी मानसिक एवं चारित्रिक संतुलन को बिगाड़ने में दावाग्नि का काम करता है
विज्ञान द्वारा कला का विकास करने के (1) रिकार्ड और (2) फिल्म इन दोनों का निर्माणकार्य बहुत पूँजी और बहुत अनुभव के आधार पर ही हो सकना संभव है। अखण्डज्योति परिवार वर्तमान सदस्यों में ऐसे लोग नहीं के बराबर हैं जो इन कार्यों को आरंभ कर सकें। पर यह प्रयत्न जारी रखना चाहिए कि जो व्यक्ति इन कार्यों के उपयुक्त हों वे इन्हें भी आरंभ करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-April
जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए ब्रह्मचर्य को व्यवहारिक बनाने के लिए हम अधिक निष्ठापूर्ण आचरण करें। वासना भड़काने वाले साहित्य, चित्र, फिल्म, दृश्य एवं प्रसंगों का बहिष्कार करें। वानप्रस्थ की परम्परा आरम्भ करें, बाल विवाहों को रोकें, संतति सीमा बन्ध का ध्यान रखें। इस संबंध में परिवार नियोजन विशेषज्ञों का भी परामर्श प्राप्त करें
नशेबाजी का प्रचलन बढ़ जाय तो अपने स्वजन संबन्धी भी कहीं न कहीं से उस लत को सीख आवेंगे और इसका प्रभाव अपने घर पर भी पड़ेगा। सिनेमा की गन्दी फिल्मों की गन्दी हवा चुपके-चुपके हर घर में प्रवेश करती चली आ रही है। जिस फैशन का प्रचलन बाजार में सब ओर दीखता है उसके लिये अपने स्वजन-संबन्धी ललचाने लगते हैं और अनुपयुक्त समझने पर भी हम उसे रोक नहीं पाते
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-January
दो एक अभिनेत्रियों की तसवीरें, एक फड़कता हुआ गाना, और जनता को धोखे में डालने वाले वर्णन लिख-लिख कर लोगों को आकर्षित किया जाता है। प्रत्येक फिल्म में घुमा−फिरा कर वही प्रेम कहानी वासना को उद्दीप्त करने वाले गाने, रति चेष्टाएं, कुरुचिपूर्ण रुचि भ्रष्ट करने वाले दृश्य। इस निर्धन देश के युवक इस विषैले मनोरंजन से वेश्यागामी होते हैं, कुपथ पर चलते हैं और राग रंग में मस्त रहते हैं। हमारी फिल्मों का स्तर अभी तक ऊँचा नहीं उठ पाया है
आपको देख कर वह मुस्करा उठता है? हँस कर दो बातें करता है। फिल्म अभिनेत्रियों की तारीफ के पुल बाँध देते हैं। आप यह फिल्म देखते हैं, साथ ही दूसरे का नमूना देख कर दूसरी को देखने के बीज मन में ले आते हैं। एक के पश्चात् दूसरी फिर तीसरी फिल्म को देखने की धुन सवार रहती है
इस निर्धन देश के युवक इस विषैले मनोरंजन से वेश्यागामी होते हैं, कुपथ पर चलते हैं और राग रंग में मस्त रहते हैं। हमारी फिल्मों का स्तर अभी तक ऊँचा नहीं उठ पाया है
आप यह फिल्म देखते हैं, साथ ही दूसरे का नमूना देख कर दूसरी को देखने के बीज मन में ले आते हैं। एक के पश्चात् दूसरी फिर तीसरी फिल्म को देखने की धुन सवार रहती है। और रुपया व्यय कर, आप सिनेमा से लाते हैं वासनाओं का ताँडव, कुत्सित कल्पना के वासनामय चित्र, गन्दे गीत, रोमांटिक भावनाएँ, शरारत से भरी आदतें। साथ ही अपनी नेत्र ज्योति भी बरबाद करते हैं
फिल्म अभिनेत्रियों की तारीफ के पुल बाँध देते हैं। आप यह फिल्म देखते हैं, साथ ही दूसरे का नमूना देख कर दूसरी को देखने के बीज मन में ले आते हैं। एक के पश्चात् दूसरी फिर तीसरी फिल्म को देखने की धुन सवार रहती है। और रुपया व्यय कर, आप सिनेमा से लाते हैं वासनाओं का ताँडव, कुत्सित कल्पना के वासनामय चित्र, गन्दे गीत, रोमांटिक भावनाएँ, शरारत से भरी आदतें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-April
19—जो सज्जन इस पूर्णाहुति उत्सव में नहीं आ सकेंगे, उनको भी समुचित जानकारी मिल सके इस दृष्टि से 1 मई की जगह 15 मई को निकलने वाली अखण्ड-ज्योति का पाँचवाँ दिन के कार्यक्रम का विवरण आगामी योजनाओं का कार्यक्रम तथा विभिन्न घटनाओं के अनेकों चित्र छपेंगे। सिनेमा में दिखाई जा सकने वाली फिल्म भी इस अवसर पर तैयार की जायगी, जिसमें चिरकाल तक इन पुनीत दृश्यों को देख सकने का आनन्द लिया जा सके
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-August
तुलसी कृत रामायण, राधेश्याम रामायण, कीर्तन, सन्तों के भजन आदि को प्रधानता दी जाती है। फिल्मी ध्वनि पर भी अनेक अच्छे धार्मिक गीत सिखाने की व्यवस्था की गई है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-February
पूर्णाहुति के समय भारतवर्ष के अधिकाँश गायत्री उपासकों के आने की संभावना है। ऐसा अवसर फिर कभी शायद ही आवे, इसलिए इन तीर्थ स्वरूप गायत्री-उपासकों की स्मृति को सदैव ताजा रखने के लिए एक फिल्म-चित्रपट बनाया जायगा, यह कार्य श्रीडूँगर शी भाई के सुपुर्द कर दिया गया है। वे सभी दृश्यों और सभी व्यक्तियों की रंगीन फिल्म लेने के लिए अपना फिल्म कैमरा तथा आवश्यक सामान तैयार कर रहे हैं। जो लोग इस पुनीत अवसर पर मथुरा न आ सकेंगे
जो लोग इस पुनीत अवसर पर मथुरा न आ सकेंगे। उनके लिए भी इस फिल्म द्वारा पूर्णाहुति के सारे दृश्य देख सकना सरल हो सकेगा
कमरे बन रहे हैं, कुण्ड तैयार किये जा रहे हैं, बिजली भी फिटिंग हो रही है, हवन सामग्रियाँ, भोजन बनाने, खाद्य पदार्थ एकत्रित करने आदि की व्यवस्था की जा रही है। तम्बू, रोशनी, पानी, स्पेशल ट्रेनें, बसें, टेलीफोन, पूर्णाहुति का फिल्म चित्र, विद्वानों को निमंत्रण, मुक्ति-सेना के आत्म-त्यागी, आत्म-दानी और व्रतधारी सैनिकों का संगठन, नरमेध की तैयारी, औषधि पौधों की नर्सरी, दैनिक यज्ञ व्यवस्था, सर्व सांप्रदायिक सम्मेलन आदि नाना प्रकार के कार्यक्रमों की हलचलें यहाँ चल रही हैं। कार्य बहुत भारी है, समय थोड़ा है, इसलिए यह सब दौड़-धूप आवश्यक भी है, अन्यथा समय पर सब कार्य कैसे पूरे हो सकेंगे? खर्च बहुत और धन याचना न करने की अपनी परम्परा, इन दोनों का समन्वय करना भी उलझन भरा है। तपोभूमि इन गुत्थियों को सुलझाने में लगी हुई हैं
ऐसा अवसर फिर कभी शायद ही आवे, इसलिए इन तीर्थ स्वरूप गायत्री-उपासकों की स्मृति को सदैव ताजा रखने के लिए एक फिल्म-चित्रपट बनाया जायगा, यह कार्य श्रीडूँगर शी भाई के सुपुर्द कर दिया गया है। वे सभी दृश्यों और सभी व्यक्तियों की रंगीन फिल्म लेने के लिए अपना फिल्म कैमरा तथा आवश्यक सामान तैयार कर रहे हैं। जो लोग इस पुनीत अवसर पर मथुरा न आ सकेंगे। उनके लिए भी इस फिल्म द्वारा पूर्णाहुति के सारे दृश्य देख सकना सरल हो सकेगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-October
(श्री. लावेल फिल्मोर)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-June
कार्लबाल फ्रिच ने मधुमक्खी नृत्य की अनेक मुद्राओं के फिल्म लिये हैं और बताया है कि उनकी क्या हलचल-कितनी दूर, किस दिशा में, किस स्तर की, क्या स्थिति है इसकी सूचना ठीक प्रकार देती है। मधुमक्खियों की इस संकेत भाषा के आधार पर उनने परीक्षा की तो उनका प्रतिपादन शत-प्रतिशत सही निकला
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-October
इसी प्रकार उस देश की मेडिकल एसोसिएशन ने अपने 1,40,000 सदस्यों को नवीन तथ्य शोध निष्कर्षों से अवगत करते रहने के लिए 67 क्षेत्रीय केन्द्र संस्थानों की स्थापना की है। कुछ विद्यालयों ने अपने पाठ्यक्रमों की फिल्में बना ली हैं और वे शिक्षार्थियों की बस्तियों में ले जाकर उन्हें दिखाते हैं ताकि छात्रों को विद्यालयों तक आने−जाने में समय और पैसा खर्च न करना पड़े
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-March
इनके अतिरिक्त महिला आन्दोलन से सम्बन्ध रखने वाले छोटे प्रचार पत्रक, पोस्टर, कार्ड, रबड़, स्टैंप आदि की एक शृंखला बनाने की योजना है। स्लाइड प्रोजेक्टर पर महिला समस्याओं को रंगीन प्रकाश चित्रों के रूप में प्रदर्शित किये जा सकने के उपकरण जुटाये जायेंगे और संभव हुआ तो चलते-फिरते, बोलते, गाते फिल्म भी शान्ति-कुंज से ही बनने लगेंगे जिनके आधार पर गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले, गाँव- गाँव आकर्षक मनोरंजन के साथ -साथ महिला जागरण का सन्देश सुनाया जा सके और युगान्तर चेतना का पांचजन्य बजाया जा सके। अभी यह योजनाएं तैयारी के क्षेत्र में पक रही हैं। पर आशा की जानी चाहिए कि मनुष्य की कल्पनाएं निष्फल हो सकती हैं, पर महाकाल के संकल्प तो मूर्तिमान होकर ही रहते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-September
इन्टर नेशनल गिल्ड आफ हिप्नोटिस्टस् संस्था के प्रभावी सदस्य स्टैनले मिशेल से ट्रेड का परिचय हुआ और उस पिछ़डी बात को फिर से पुनर्जीवित किया गया। कल्पना के फोटो ठीक उतरे तो उस संस्था ने इस संदर्भ में एक पूरी फिल्म ही बनाकर रख दी। इससे उस और अनेक लोगों को ध्यान गया और वस्तुस्थिति को जानने के लिए अधिक ठोस प्रयास हुए
ट्रेवर जेम्स ने इन्फ्रारेड मूवी फिल्म के लिए प्रयुक्त होने वाले एक विशेष कैमरे आई. आर. 135 का उपयोग करके मोजावे रेगिस्तान के अन्तरिक्ष की स्थिति चित्रित की है। फिल्म में ऐसे पक्षी दिखाई पड़ते हैं जो अपनी आँखों में कभी भी दिखाई नहीं पड़ते
‘मंकी ट्रायल’ मुकदमा देखने को जन-साधारण की इच्छा को देखते हुए एक प्रख्यात फिल्म बना है-”इन हेरिट दी विड” यह फिल्म संसार भर में बड़े चाव से देखी गई है। मुकदमे में हारा हुआ डार्विन का बन्दर फिल्म के पर्दे पर जन विवेक से यह पूछता दिखाया गया है बताइए मेरा नीचे का ऊपर चढ़ना ठीक है या परम्परा वादियों के अनुसार मुझे ऊपर से नीचे गिराने की बात सीखनी चाहिए
इस विद्यालय की एक कक्षा की मुर्गियाँ आज्ञा देने पर जूक वाक्स का स्विच दवाकर फिल्मी रिकार्ड चालू कर देती हैं और उनकी ध्वनि पर ताल बद्ध नृथ्य करती हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-November
मिशीजन विश्वविद्यालय के डा0 डोनाल्ड माइकेल का कथन है कि हिंसात्मक घटनाओं की अधिक चर्चा करने से उस स्तर की प्रवृत्तियां भड़कती हैं। युद्ध, मार-काट हत्या, एवं क्रूरता का विवरण प्रस्तुत करने वाली पुस्तकें, फिल्में तथा पत्रिकाएं रोकी जानी चाहिए। उनसे हिंस्रोन्माद फैलता है। हत्यारों को श्रेय मिले, नाम छपे ऐसा तो होना ही नहीं चाहिए
चलचित्रों में तस्वीरें भागती, दौड़ती मालूम पड़ती हैं, पर वस्तुतः वह आँखों की भ्रम ग्रस्तता मात्र है। फिल्म अपनी चरखी पर इतनी तेजी से घूमती है कि आँखों की दृश्य शक्ति उन्हें उतनी तेजी से मस्तिष्क को आभास नहीं करा पाती, फलतः नेत्रगोलक और मस्तिष्क दोनों ही धोखा खाकर चलचित्रों में भगदड़ के दृश्य देखते हुए भ्रमग्रस्त बने रहते हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-May
घुटन को डिब्बी में बन्द करके तकिये के नीचे दबाये रहना ठीक नहीं। एक बात सामने आई उस विचार किया और सिनेमा की फिल्म की तरह उसे दिमाग के पर्दे से हटा दिया। जब हम साँस को फेफड़े में नहीं रोके रह सकते, तो किसी विक्षोभ हो की मन में जमाकर, दबाकर क्यों बैठे रहें। नई साँस लेने के लिये पुरानी साँस बाहर निकलना आवश्यक है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-August
ट्रेवर जेम्स ने इन्फ्रारेड मूवी फिल्म के लिए प्रयुक्त होने वाले एक विशेष कैमरे आई॰ आर॰ 135 का उपयोग करके मोजाबें रेगिस्तान के अन्तरिक्ष की स्थिति चित्रित की है। फिल्म में ऐसे पक्षी दिखाई पड़ते हैं जो अपनी आँखों से कभी भी दिखाई नहीं पड़ते। जीवाणुओं की अपनी अनोखी दुनिया है वे मिट्टी घास-पात, पानी और प्राणियों के शरीरों में निवास करते और अपने ढर्रे की मजेदार जिन्दगी जीते हैं
इस विद्यालय की एक कक्षा का मुर्गियाँ आज्ञा देने पर जूक वाक्स का स्विच दबाकर फिल्मी रिकार्ड चालू कर देती है और उनकी ध्वनि कर ताल बद्ध नृत्य करती है। ,
ट्रेवर जेम्स ने इन्फ्रारेड मूवी फिल्म के लिए प्रयुक्त होने वाले एक विशेष कैमरे आई॰ आर॰ 135 का उपयोग करके मोजाबें रेगिस्तान के अन्तरिक्ष की स्थिति चित्रित की है। फिल्म में ऐसे पक्षी दिखाई पड़ते हैं जो अपनी आँखों से कभी भी दिखाई नहीं पड़ते। जीवाणुओं की अपनी अनोखी दुनिया है वे मिट्टी घास-पात, पानी और प्राणियों के शरीरों में निवास करते और अपने ढर्रे की मजेदार जिन्दगी जीते हैं। पर हम उनमें से कुछ को ही सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से देख पाते हैं
इंटर नेशनल गिल्ड आफ हिप्नोटिस्टस संस्था के प्रभावी सदस्य स्टैनले मिशेल से ट्रेड का परिचय हुआ और कल्पना के फोटो ठीक उतरे तो उस संस्था ने इस संदर्भ में एक पूरी फिल्म ही बनाकर रख दी। इससे उस ओर अनेक लोगों को ध्यान गया और वस्तुस्थिति को जानने के लिए अधिक ठोस प्रयास हुए
‘मंकी ट्रायल’ मुकदमा देखने को जन-साधारण की इच्छा को देखते हुए एक प्रख्यात फिल्म बना है-”इन हेरिट दी ब्रिड यह फिल्म संसार भर में बड़े चाव से देखी गई है। मुकदमे में हारा हुआ डार्विन का बन्दर फिल्म के पर्दे पर जन विवेक से यह पूछता दिखाया गया है बताइए मेरा नीचे का ऊपर चढ़ना ठीक है या परम्परा वादियों के अनुसार मुझे ऊपर से नीचे गिराने की बात सीखनी चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-July
अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री ‘दादी रेनाल्डस’ ने पाश्चात्य जगत में बहुत ख्याति प्राप्त की है। उनकी फिल्म समूची जीवन साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी थीं
अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री ‘दादी रेनाल्डस’ ने पाश्चात्य जगत में बहुत ख्याति प्राप्त की है। उनकी फिल्म समूची जीवन साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी थीं। तब उन्हें उत्साह उठा कि जो शिक्षा उन्होंने प्राप्त कर रखी है वह कम हैं उन्हें सफल जीवन जीने के लिये अधिक विद्या उपार्जित करनी चाहिये
जिस आत्म-विश्वास के साथ वे बातें करती थी उसे देखकर डायरेक्टरों ने उन्हें छोटा काम दे दिया। उनके परिश्रम मधुर स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व ने उस क्षेत्र में बढ़-बढ़ कर काम करने के अवसर दिया अस्तु उन्होंने लगातार तेरह वर्षों तक प्रख्यात फिल्मों में काम किया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-April
उपरोक्त प्रयोगशाला में उसे प्रस्तुत किया गया। इसके लिए कम्पनी में बना सील बन्द पोलारायड कैमरा खरीदा गया और फिल्म बनाने वाली कम्पनी से सीधे ही उसमें फिल्म भराई गई। यह कैमरा ऐसा है जो अपने आप ही एक मिनट में तैयार फोटो हाथ में रख देता है। यह प्रयोग उपकरण इसलिए ऐसी सावधानी के साथ प्रयुक्त किये गये कि किसी को यह सन्देह न रहे कि−किसी व्यक्ति विशेष की ख्याति के लिए कोई बाजीगरी की गई हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-February
बाजार में जाते हुए स्त्रियों की तड़क भड़क, बनावटी सौंदर्य और फैशन मन में तूफान खड़े किये बिना नहीं रहता। दीवारों पर चिपके हुए फिल्मों के गन्दे पर्चे हमें काल कोठरी में जाकर शूद्रता का परवाना लेने के लिए प्रेरित करते हैं। वहाँ के अश्लील गाने और अर्ध नग्न नाच, वेशभूषा व कामोत्तेजक वार्तालाप वासनाओं को उद्दीप्त किये बिना नहीं रहते। पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंगे हुए उपन्यास व पत्र पत्रिकाओं में निकलने वाले लेख इस ओर प्रेरित देने में कुछ कम काम नहीं कर रहे हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-March
इसके लिए अधिक दोषी कलाकार वर्ग है जिसने समाज के सोचने की दिशा ही अति भ्रमित करके रखदी। नारी को रमणी कामिनी और वेश्या के रूप में प्रस्तुत करने की कुचेष्टा में जब कला के सारे साधन झोंक दिये गये तो जन मानस विकृत क्यों न
होता ? चित्रकार जब उसके मर्मस्थलों को निर्लज्ज निर्वसन बनाने के लिए दुशासन की तरह अड़े बैठे है, कवि जब वासना भड़काने वाले ही छन्द लिखें, गायक जब नख शिख का उत्तेजक उभार और लम्पटता के हाव-भावों भरे क्रिया-कलापों को अलापें-साहित्यकार कुत्सा ही कुत्सा सृजन करते चले जायें-और प्रेस तथा फिल्म जैसे वैज्ञानिक माध्यमों से उन दुष्प्रवृत्तियों को उभारने में पूरा-पूरा योगदान मिले तो जनमानस को विकृत और भ्रमित कर देना क्या कुछ कठिन हो सकता है ? हमें इस विकृति के मूल स्त्रोत कला के अनाचार को रोकना बदलना होगा। स्नेह और सद्भाव की- देवी सरस्वती के साथ किया जाने वाला यह बर्बर व्यवहार यदि उल्टा जा सकता हो तो लोक मानस में नारी के प्रति स्वाभाविक सौजन्य फिर पुनः जीवित किया जा सकता है
कला मंच यह सब आसानी से कर सकता है। साहित्य का सृजन इसी दिशा में हो, कविताएं ऐसी ही लिखी जायें, चित्र इसी प्रयोजन के लिए बनें, गायक यही गायें, प्रेस यही छापे, फिल्म यही बनायें तो कोई कारण नहीं कि नारी का स्वाभाविक एवं सरल सौम्य स्वरूप पुनः जन मानस में प्रतिष्ठापित न किया जा सके ऐसी दशा में वह जोखिम न रहेगा जिसे पाश्चात्य लोग भुगत रहे है। उनने नारी स्वतंत्रता तो प्रस्तुत की पर विकारोन्मूलन के लिए कुछ करना तो दूर उलटे उसे भड़काने में लग गये और दुष्परिणाम भुगत रहे है। हमें यह भूल नहीं करनी चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
(1) इस अति पवित्र अवसर पर हमारे हाथों विवाह सम्पन्न कराने से वर-कन्या के भावी जीवन पर पड़ने वाला सुन्दर प्रभाव। (2) सामाजिक क्रान्ति के महान् अभियान के लिए इस उत्साह वर्धक कदम द्वारा असंख्यों को अनुकरण की प्रेरणा (3) फिल्म, फोटो, जुलूस आदि अनेक माध्यमों से इस विवाहों का देश-व्यापी प्रचार तथा उपस्थित 50 हजार प्रबुद्ध एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्वों का आशीर्वाद यह तीनों ही लाभ ऐसे ही जो किन्हीं से अवगत कराके अपने क्षेत्र से अधिक संख्या में ऐसे विवाह तैयार करने और उन्हें मथुरा लाने की प्रतिस्पर्धा सभी कर्मठ कार्यकर्त्ताओं में अभी से आरम्भ हो जानी चाहिए। बाल-विवाह, अनमेल विवाह तथा कानून झंझट वाले विवाहों की स्वीकृति न माँगी जाय
जहाँ इस वर्ष विवाह होने वाला हो उन्हें मथुरा आकर इस अवसर पर विवाह कराने के लिए तैयार करना चाहिए। इन विवाहों का मथुरा में विशाल जुलूस निकालने पत्र-पत्रिकाओं में फोटो छपाने तथा फिल्म बना कर सर्वत्र दिखाने की विशेष प्रचारात्मक तैयारी की गई है। (1) इस अति पवित्र अवसर पर हमारे हाथों विवाह सम्पन्न कराने से वर-कन्या के भावी जीवन पर पड़ने वाला सुन्दर प्रभाव। (2) सामाजिक क्रान्ति के महान् अभियान के लिए इस उत्साह वर्धक कदम द्वारा असंख्यों को अनुकरण की प्रेरणा (3) फिल्म, फोटो, जुलूस आदि अनेक माध्यमों से इस विवाहों का देश-व्यापी प्रचार तथा उपस्थित 50 हजार प्रबुद्ध एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्वों का आशीर्वाद यह तीनों ही लाभ ऐसे ही जो किन्हीं से अवगत कराके अपने क्षेत्र से अधिक संख्या में ऐसे विवाह तैयार करने और उन्हें मथुरा लाने की प्रतिस्पर्धा सभी कर्मठ कार्यकर्त्ताओं में अभी से आरम्भ हो जानी चाहिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-August
फ्रांस के सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता पियरी मिसी में जहाँ अभिनय सम्बन्धी अनेक विशेषतायें थी वहाँ उसमें कई अभूतपूर्व चमत्कारिक विशेषतायें भी थी। वह अपनी इच्छानुसार ही शरीर के किसी भी हिस्से को कोई भी बाल हिला सकता था। बाल की नोक को खड़ा कर सकता था उन्हें पानी और आँधी के कारण गिरी हुई फसल की तरह लिटा सकता था, इतना ही नहीं कोमल सपाट बालों को वह जब चाहे अपनी इच्छा शक्ति द्वारा ही घुँघराले बना सकता था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-November
ऐसी ही स्थिति एक बार 'दि ईयर ऑफ दि ड्रेगन' फिल्म की शूटिंग के अवसर पर भी उपस्थित हुई थी। शूटिंग प्रारंभ हुई ही थी कि बारिश आ गई। विख्यात वमोह [ताँत्रिक] अब्दुल्ला बिन उमर की सेवाएँ ली गईं और उसी का परिणाम था कि जिस क्षेत्र में शूटिंग हो रही थी, उस क्षेत्र में एक बूँद भी पानी नहीं हुआ उसके चारों ओर इतनी सघन वर्षा हुई कि सारा क्षेत्र जलमग्न हो गया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-June
(7) ऐसी व्यापारिक संस्थाओं की लिमिटेड कम्पनी आदि के रूप में आवश्यकता अनुभव की जा रही है जो (1) कैलेंडर तथा चित्र प्रकाशन, (2) बड़े पैमाने पर ग्रामोफोन रिकार्डों का निर्माण, (3) धार्मिक एवं ऐतिहासिक कथाओं को परिष्कृत करके उनके आधार पर बौद्धिक क्राँति, नैतिक क्राँति एवं सामाजिक क्राँति कर सकने की प्रेरणा से भरे फिल्मों का लगातार निर्माण। (4) छोटी नाटक मंडलियां जो आदर्शवादिता को लेकर आगे बढ़े। ऐसी योजना चला सकने से पूंजी की सुरक्षा, धन लगाने वालों को ब्याज का लाभ होने के साथ-साथ जन-जागृति का अति महत्व पूर्ण प्रयोजन भी सिद्ध हो सकता है
देखने में ऐसा लगता है कि आकाश पोला और अँधेरा है पर यह बात सन् 1800 में ही यूरेनस की खोज करने वाले वैज्ञानिक लियम दर्शल ने बता दी थी कि अन्धकार नाम की कोई सत्ता संसार में है ही नहीं कण-कण में प्रकाश घुला हुआ है भले ही हमारी बाह्य आँखें उसे न देख पाती हों। अँधेरे में फोटो “फिल्में” धोने का आविष्कार इसी वैज्ञानिक सिद्धाँत पर आधारित है फिर भी हम उस सर्वव्यापी प्रकाशवान् विद्युत् आत्मा की अनुभूति क्यों नहीं कर पाते उसका कारण है कि उसी माप, पवित्रता, प्रकाश पूर्णता, शुद्धता और तत्व की विद्युत् हमारे पास नहीं हमारा मन दूषित रहता है। अस्पष्ट स्वप्न, स्वप्नों में भय और विकार इसी बात के प्रतीक है कि हमारा मन अस्त-व्यस्त, अपवित्र है ऐसे बुरे स्वप्नों का कारण-
प्रचार तंत्र द्वारा वर्तमान विनाशात्मक स्वरूप को निरस्त करने के लिये उतना ही बड़े सृजनात्मक प्रचार तंत्र को खड़ा करना पड़ेगा। इसके लिये साहित्य-निर्माण उसकी खपत, प्रवचन, संगीत, फिल्म आदि अनेक माध्यमों के विशाल रूप दिया जाना है। इसके लिए प्रचुर परिमाण में धन-शक्ति और जन शक्ति की जरूरत पड़ेगी। इसकी व्यवस्था हम लोग स्वयं बड़ी आसानी से जुटा सकते हैं यदि लोभ और मोह के जंजाल से निकल कर वासना तृष्णा को ठोकर मार कर- निर्वाह भर के लिए प्राप्त पर सन्तोष करके अपनी शारीरिक मानसिक और आर्थिक क्षमता को प्रयुक्त करने लगें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-January
मात्र आँख की ही बात करें जो ज्ञात होता है कि प्रकाश देखने में सहायता करने वाले राँड सेल्स की संख्या 25 करोड़ है जिनमें 30 करोड़ से भी अधिक प्रकाश पकड़ने वाले सूक्ष्म रंगीन कण होते हैं। इन कणों की क्षमता का अनुमान इस बात से करना चाहिये कि 3 घंटे में दिखाई देने वाली फिल्म की लम्बाई यदि दस हजार मील से लम्बी हो यह आंखें 50 हजार मील प्रति दिन के दृश्य मस्तिष्क को भेज सकती हैं यही नहीं उनमें से अनेकों दृश्यों को आजीवन स्मृति कणों में सुरक्षित भी रख सकती है
पिछले दिनों तीन प्रख्यात अमरीकी चिन्तक जिन्होंने इस विषय पर कई पुस्तकें लिखी हुई, परस्पर मिलकर बैठे एवं अपने अध्ययन, चिन्तन व अनुमान के आधार पर बताया कि विश्व का भविष्य उज्ज्वल है। “दुनिया कहाँ जा रही है” इस शीर्षक से फिल्म बना रहे अमेरिकी टेलीविजन संवाददाता केल्विन सेर्ण्डस ने डॉ. मार्गरेटमीड (अब स्वर्गीय), हरमन काँन एवं विलीयम टामसन से साक्षात्कार लिया। “स्पाँन” पत्रिका (अप्रैल 1979) में प्रकाशित इस विचार मंथन पर सारे विश्व के बुद्धिजीवियों का ध्यान गया है। वस्तुतः अभी तक जिन-जिन बुद्धिजीवियों ने अपना चिन्तन दिया है, वह निषेधात्मक ही रहा है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-June
इसलिए साधना मार्ग के पथिकों को इसके प्रति सदा सावधान रहना चाहिए तथा आहार-विहार एकदम सात्विक रखना चाहिए। अश्लील साहित्य एवं फिल्म अथवा चित्रों से परहेज रखते हुए मन को स्वाध्याय एवं चिंतन में व्यस्त रखकर इस अवस्था से पर किया जा सकता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
वहाँ भी ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो इसे ‘झूठों का मिथ्या प्रचार’ बताते हैं। अतएव वहाँ के पादरियों ने इस भ्रम को दूर करने के लिए कुछ वर्ष पूर्व इस संपूर्ण दृश्य की एक वीडियो फिल्म बनायी, ताकि इस आश्चर्य को जनसामान्य देख-समझ सकें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
1978-79 के दौरान इटली में और 19 अप्रैल 1979 को दक्षिण फिलीपीन्स के दो नगरों में उड़नतश्तरियाँ पहचानी गयी। मार्च 1979 में न्यूजीलैंड में उड़नतश्तरियों पर बकायदा फिल्म बनायीं गई। कुछ साल पूर्व सोवियत संघ के यूरोपीय हिस्से में उड़नतश्तरियों की हलचलें एवं इनकी गतिविधियाँ एक-एक बढ़ गई। यह क्षेत्र है काकेशस और साइबेरिया
सन १८६७ में रोगर पेटर्सन इसकी फिल्म लेने में सफल हो गया। यह सब एकाएक हो गया फिल्म दूर से लिए जाने व प्रकाश का सामंजस्य न हो पाने के कारण अत्यंत धुँधली आयी। किन्तु इससे येती की अस्तित्व को बहुत बल मिला। सन १८७२ में प्रसिद्ध पर्वतारोहियों पुंडराक ने तथा १८७७ में नवे के एक पर्वतारोही ने बर्फ पर सहित ऋतु की अंत में अत्यंत विशालकाय मानव पगचिह्न देखने की बात कही थी
वह लगभग दस फुट ऊंचा था और उसका शरीर लाल रंग के बालों से ढका हुआ था। सन १८६७ में रोगर पेटर्सन इसकी फिल्म लेने में सफल हो गया। यह सब एकाएक हो गया फिल्म दूर से लिए जाने व प्रकाश का सामंजस्य न हो पाने के कारण अत्यंत धुँधली आयी। किन्तु इससे येती की अस्तित्व को बहुत बल मिला
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-October
पिछले दिनों रूसी वैज्ञानिकों ने भी पिरामिड के अंदर की ऊर्जा-प्रतिक्रिया को दर्शाने वाला एक प्रयोग किया। उन्होंने एक छह इंच लम्बी और दो-तीन पत्तियों वाली पौध को काँच के एक पिरामिड में गमले सहित रखा और उसकी प्रतिक्रिया को एक टाइमलैस कैमरे द्वारा वीडियो फिल्म बनाकर प्रदर्शित किया। देखा गया की पौधा पहले पूरब से पश्चिम की ओर घुमा, वैसे ही जैसे कोई नर्तक वाद्ययन्त्र की स्वर-लहरियों पर लहराता है। सर्वप्रथम वह धरती की ओर प्रणत हुआ, फिर दायें से अर्द्ध गोलाकार मुद्रा, पुनः पश्चिम की ओर मुड़कर सीधा हो गया और डोलने लगा
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-April
आज प्रचलन है-देर रात्रि तक भोजन करने का, टेलीविजन फिल्में देखने का। ऐसे में सुबह कौन जल्दी उठता है, पर रोगों से दूर रह प्रसन्नता पानी है, तो इस क्रम को बदलना ही होगा। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में शय्या अवश्य छोड़ देनी चाहिए
प्रथम समूह को 20 मिनट तक प्रतिदिन दो बार दो सप्ताह तक शंकरमरणम् राग सुनाया गया। दूसरे वर्ग को इसी अवधि में संगीत की फिल्म दिखाई गयी। तीसरे वर्ग को ऐसे ही छोड़ दिया गया। प्रयोगोपराँत जब इन रोगियों का स्वास्थ्य-परीक्षण किया गया तो प्रथम वर्ग के 30 में से 22 रोगियों का तनाव घट गया था, जबकि दूसरे वर्ग के मात्र आठ रोगी ही कम तनावग्रस्त पाए गए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-August
उदारीकरण के बाद यह भोगवादी प्रवाह और ज्यादा प्रबल हुआ है। टी.वी. फिल्मों एवं अन्य संचार माध्यमों में इसके अश्लील, कुत्सित एवं भोंडे प्रदर्शन के नंगे नाच की आँधी उमड़ पड़ी हैं, जिसके घातक प्रभाव से नर-नारी युवा बच्चे कोई भी नहीं बचा है। बढ़ती हिंसा, अपराध आत्महत्या बलात्कार की घटनाएँ बहुत कुछ इसी से प्रेरित एवं प्रभावित हैं। यहीं से बच्चों को हिंसा के बीच संस्कार के रूप में मिल रहे हैं
अब जब संधिकाल की अंतिम वेला पहुँची, तो इन सौर−कलंकों की संख्या सतत् बढ़ती ही जा रही है। अमेरिका वैज्ञानिक ने सौरलपटों का फिल्माँकन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि सूर्य इस समय बड़ा कुपित है। एवं इसके प्रभाव समष्टिगत है। हो सकते है
विज्ञापनों में इसके अश्लील एवं उत्तेजक व्यवसाय के अच्छे-खासे दर्शन किए जा सकते हैं। टी.वी. फिल्म व अन्य संचार माध्यम भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। नारी को मात्र एक भोग्य वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है
अब जब संधिकाल की अंतिम वेला आ पहुँची तो इन सौर−कलंकों की संख्या सतत् बढ़ती ही जा रही है। अमेरिका वैज्ञानिकों ने सौरलपटों का फिल्माँकन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि सूर्य इस समय बड़ा कुपित है एवं इसके प्रभाव समष्टिगत हो सकते है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
दया, प्रेम व सद्भाव से भरी मनःस्थिति भी स्वास्थ्य के लिए सर्वथा उपयुक्त पाई गई है। हार्वर्ड के डॉक्टर मैक्लीनेड ने कुछ लोगों पर मदर टेरेसा की रोगियों एवं पीड़ितों की सेवा करती हुई फिल्म देखते समय प्रयोग किए। ऐसे व्यक्तियों में कुछ देर तक टी. सेल में वृद्धि दर्ज की गई। उनमें से जिन्होंने दूसरे लोगों द्वारा अपने प्रति किए गए उपकारों के प्रति कृतज्ञतापूर्वक ध्यान-चिंतन किया, उनमें टी. सेल की वृद्धि दीर्घकाल तक देखी गई
उनमें से जिन्होंने दूसरे लोगों द्वारा अपने प्रति किए गए उपकारों के प्रति कृतज्ञतापूर्वक ध्यान-चिंतन किया, उनमें टी. सेल की वृद्धि दीर्घकाल तक देखी गई। इसके विपरीत नाजी-जर्मनी की अत्याचार एवं क्रूरता भरी फिल्मों का प्रभाव सर्वथा प्रतिकूल देखा गया
हार्वर्ड के शोधकर्ताओं ने प्रसन्नता के क्षणों में स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की जाँच की। कॉमेडी फिल्म देख रहे व्यक्तियों में कार्टिसाल हारमोन की मात्रा को गिरा हुआ पाया गया व प्राकृतिक ‘किलर’ कोशिकाओं को बढ़ा हुआ पाया गया। 36 स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं में सात वर्ष बाद जो मृत पाई गईं, उनके पाँच वर्ष पूर्व किए गए मनोवैज्ञानिक परीक्षण की जाँच से पता चला कि मरने व न मरने वाली महिलाओं में एकमात्र भावनात्मक अंतर जीवन में प्रसन्नता का भाव था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-January
तज्जनित अनाचार, कामोपभोग की इच्छा तृप्ति के नाना साधन, गुप्त व्यभिचार, भ्रष्टता, यौन रोग बढ़ती पर हैं। गन्दे उत्तेजक उपन्यास कहानियाँ पढ़ने से और गन्दे सिनेमा के फिल्म देखने से युवक-युवतियों की कामवासनाएँ अल्पवयस में ही उत्तेजित हो उठती हैं। वे कामोपभोग के लिए बुरी तरह लालायित रहते हैं। युद्ध कालीन व्यभिचार ने समाज में मनमाना दुराचार, गुप्तरोग, अपराधों की संख्या बढ़ाई है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-January
हाँ साहब!वह मुँबई चला गया था। क्यों गया था, जब आपने पूछा, तो उसने बताया था कि हम फिल्मों में काम करेंगे। फिल्मी ऐक्टर बनेंगे। लेकिन वहाँ फिल्म वालों ने इसे घुसने भी नहीं दिया, तो भागकर वापस आ गया
क्यों गया था, जब आपने पूछा, तो उसने बताया था कि हम फिल्मों में काम करेंगे। फिल्मी ऐक्टर बनेंगे। लेकिन वहाँ फिल्म वालों ने इसे घुसने भी नहीं दिया, तो भागकर वापस आ गया। इसलिए कहता हूँ कि आप सिनेमा से बच्चों को बचाकर दिखाइए
ऐसे में एशिया का बदलता परिवेश और तकनीकी व औद्योगिक गतिविधियों ने भारतीयों में एक नई आशा एवं उत्साह का संचार किया। इस दौरान लोगों ने फिल्मों, पत्र-पत्रिकाओं और सेटेलाइट चैनलों के द्वारा अत्याधुनिक जीवन स्तर को गर्व के साथ अपनाया
फिल्मी ऐक्टर बनेंगे। लेकिन वहाँ फिल्म वालों ने इसे घुसने भी नहीं दिया, तो भागकर वापस आ गया। इसलिए कहता हूँ कि आप सिनेमा से बच्चों को बचाकर दिखाइए। साहब! हम तो रामायण पढ़ते हैं और हम अपने बच्चों को गुरुदीक्षा दिलाकर लाएंगे
मित्रों! आपका लड़का आपसे तो नहीं कहता, परंतु अपने दोस्तों से कहता फिरता है कि हम फिल्म के ऐक्टर बनेंगे। वह अपनी मम्मी का जेवर चुराकर घर से भाग जाता है। हाँ साहब!वह मुँबई चला गया था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-April
ऐसे वीडियो कैमरे द्वारा की गई जासूसी का पहला मामला सन् 1979 में अमेरिका में तब प्रकाश में आया, जब ‘एबेस्कैम’ नाम से चलाए गए इस अभियान में सात अमेरिकी साँसद घूस लेते हुए पकड़े गये। उक्त वीडियो फिल्म द्वारा उपलब्ध कराए गए प्रमाण के कारण ही उन्हें जेल जाना पड़ा। पिछले दिनों भारतीय राजनीति में काफी समय तक छाए रहने वाले तहलका प्रकरण में भी ऐसे कैमरों का प्रयोग किया गया था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-July
इस त्रियाआमी चित्र वाली फिल्म के दो टुकड़े कर लिए जाय तो हर टुकड़े में पूरे सेव का साफ चित्र दिखाई पड़ेगा। इस चित्र वाली फिल्म को भले ही चार, आठ, सोलह, बत्तीस आदि टुकड़ों में बाँटा जाय तो भी इसके प्रत्येक टुकड़े में सेव का वही सम्पूर्ण चित्र दिखाई देगा। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि होलोग्राफी पारदर्शिता से युक्त हर एक टुकड़े में सेव का समग्र बिश्ब होता है
परमपूज्य गुरुदेव कभी मौज में आते थे, तो एक गीत सुनाते थे, ‘मेरे पैरों में घुंघरू बँधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले। ’ किसी फिल्म का यह गीत सुनाकर वे कहते थे कि ऐसे व्यक्ति की चाल फिर गलत हो ही नहीं सकती। लय और ताल के साथ ही वह चलेगी। ऐसा व्यक्ति कभी गलती नहीं करता, क्योंकि परमात्मा उसका हर क्षण संचालन करते हैं
अब जैसे एक सेव का होलोग्राफ लिया जाय, तो इसमें सेव का त्रिआयामी चित्र उभरेगा। इस त्रियाआमी चित्र वाली फिल्म के दो टुकड़े कर लिए जाय तो हर टुकड़े में पूरे सेव का साफ चित्र दिखाई पड़ेगा। इस चित्र वाली फिल्म को भले ही चार, आठ, सोलह, बत्तीस आदि टुकड़ों में बाँटा जाय तो भी इसके प्रत्येक टुकड़े में सेव का वही सम्पूर्ण चित्र दिखाई देगा। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि होलोग्राफी पारदर्शिता से युक्त हर एक टुकड़े में सेव का समग्र बिश्ब होता है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
इसके अतिरिक्त तनाव, दबाव और भय जैसी स्थिति में भी पलकों की गति बढ़ जाती है। एक प्रयोग के दौरान लिंवरपूल यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिकों ने बूढ़े और युवाओं के दो दल बनाये और उन्हें जाँचा ‘जाज’ नामक एक अमेरिकी फिल्म के कुछ दृश्य दिखलाए। उक्त फिल्म बहुत ही डरावनी थी। फिल्म देखते समय दोनों समूहों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया, तो पाया गया कि युवाओं में पलकों के गिरने-उठने की गति वृद्धों से अधिक तीव्र थी
एक प्रयोग के दौरान लिंवरपूल यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिकों ने बूढ़े और युवाओं के दो दल बनाये और उन्हें जाँचा ‘जाज’ नामक एक अमेरिकी फिल्म के कुछ दृश्य दिखलाए। उक्त फिल्म बहुत ही डरावनी थी। फिल्म देखते समय दोनों समूहों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया, तो पाया गया कि युवाओं में पलकों के गिरने-उठने की गति वृद्धों से अधिक तीव्र थी। स्पष्ट था, वे डरावने दृश्य के कारण ज्यादा तनावजन्य स्थिति से गुजर रहे थे जबकि वृद्धों की परिपक्व मनोभूमि उन्हें इस अप्रिय दशा से काफी हद तक बचा रही थी
इन सभी को निश्चित संख्या में कुछ सूखे खाद्य पैकेट दिए गए। इसके उपरांत उन्हें ऐसे भयोत्पादक फिल्म ‘हलोबीन’ के कुछ डरावने दृश्य दिखाए गए। आधे घंटे के पश्चात फिल्म की समाप्ति पर जब उनकी खाद्य सामग्री का लेखा-जोखा लिया गया, तो अध्ययनकर्त्ता यह देखकर विस्मय में पड़ गए कि जो महिलाएँ नियमित डाइटिंग करता थीं, उन सबने डाइटिंग नहीं करने वाले ग्रुप से दुगने परिणाम में भोजन उदरस्थ किया था
उक्त फिल्म बहुत ही डरावनी थी। फिल्म देखते समय दोनों समूहों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया, तो पाया गया कि युवाओं में पलकों के गिरने-उठने की गति वृद्धों से अधिक तीव्र थी। स्पष्ट था, वे डरावने दृश्य के कारण ज्यादा तनावजन्य स्थिति से गुजर रहे थे जबकि वृद्धों की परिपक्व मनोभूमि उन्हें इस अप्रिय दशा से काफी हद तक बचा रही थी। यों पलक संचालन की गति उनमें भी असामान्य थी, पर युवा-समूह की तुलना में वह कम थी
हमारे आवेग-संवेग नियमित-नियंत्रित बने रहें, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम किस परिवेश में रहते हैं और हमारी दिनचर्या क्या है? हम किस प्रकार की पुस्तकें पढ़ते और मनोरंजन के लिए कैसी फिल्में देखते हैं? यदि सब कुछ सहज-स्वाभाविक रहा, तो अचेतन पर उसका अनुकूल असर पड़ता है, जो शरीर तंत्र को सुचारु और स्वस्थ बनाए रखता है
इसके उपरांत उन्हें ऐसे भयोत्पादक फिल्म ‘हलोबीन’ के कुछ डरावने दृश्य दिखाए गए। आधे घंटे के पश्चात फिल्म की समाप्ति पर जब उनकी खाद्य सामग्री का लेखा-जोखा लिया गया, तो अध्ययनकर्त्ता यह देखकर विस्मय में पड़ गए कि जो महिलाएँ नियमित डाइटिंग करता थीं, उन सबने डाइटिंग नहीं करने वाले ग्रुप से दुगने परिणाम में भोजन उदरस्थ किया था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-December
उनके गायन के अन्य प्रशंसक थे- राजाजी, पं. नेहरू एवं सरोजनी नायडू। लार्ड माउण्ड बेटन उनके इतने प्रशंसक थे कि 1947 में उनकी फिल्म मीरा को उन्होंने ही रिलीज किया था। इस तरह संगीत एवं कला के क्षेत्र में महिलाओं का योगदान अभूतपूर्व रहा है
उस समय हमारे मन की दिशा एक होती है और इतने तरह के विचार आते है, इतने रिफरेंस आते हैं कि अमुक विद्वान ने ये कहा, उसने ये कहा। हमारे हाथ लिखते चले जाते हैं और हमारे दिमाग की फिल्म इतनी तेजी से दौड़ रही होती है कि सिनेमा वाली फिल्म तो एक कोने पर रखी रहेगी। हजारों किताबों हमारे दिमाग में मिनटों और सेकेंडों में घूमती चली जाती है। इस तरह हमारे दिमाग की चाल तेज होती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-March
उन धब्बों को देखने से ऐसा प्रतीत होता था, मानो किसी ने उसे गोली मारी हो और उसके घाव सूखने के बाद दो काले निशान उन धब्बों के रूप में शेष रह गए हो। जब वह शरीर पर विद्यमान इन धब्बों और स्वप्न में देखे गए घटनाक्रम के बीच संगति बिठाने के लिए उस पर बार-बार विचार करने लगी, तो धीरे-धीरे फिल्म पर छाई धूल की परत की तरह उसकी पूर्व जन्म की स्मृति साफ होने लगी। उसे आभास हुआ कि पहले जन्म में वह एक फ्राँसीसी थी। उसकी माता का नाम अंजाला तथा पिता का नाम सेवित्रे था
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-July
निर्देशक अयोग्य हो, तो अच्छी कहानियों वाली फिल्में भी हिट हो जाती है। अयोग्यों को सौंपे गये अन्य कार्य भी घाटा देते और असफल सिद्ध होते हैं। संसार के हर क्षेत्र में विशिष्टता और योग्यता की ही भारी माँग रहती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
इसके साथ साथ पूज्यवर के जीवन वृत्त पर जन्म से लेकर महाप्रयाण तक के महत्वपूर्ण प्रसंगों की एक भव्य प्रदर्शनी शाँतिकुँज में लगाई जा रही है जिसमें आगन्तुकों को दृश्य रूप देख सहज प्रेरणा मिल सके। जीवन दर्शन पर एक आद्योपान्त वीडियो फिल्म भी बनाई जा रही है जो नित्य परिजन टी. वी. के पदों पर देखते रह सकेंगे। पूज्य गुरुदेव का अब तक अप्रकाशित साहित्य एवं पुरानी 1940 से लेकर अब तक की सभी पुस्तकें पुनः प्रकाशित की जा रही हैं ताकि उनके विचार सबको उपलब्ध हो सकें, विभिन्न भाषाओं में अनूदित उनके संस्करण भी उपलब्ध होंगे। पूज्य गुरुदेव की ही आवाज में समय समय पर रिकार्ड किये गये प्रवचनों के वे वीडियो कैसेट भी सबको मिल सकेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-November
अगले दिन के लिए यह निर्धारण छोड़ रात्रि 100 पर वीडियो फिल्म पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर बनायी गयी थी। पहले दिन “युगपुरुष” नामक एक घण्टे की फिल्म 300 इंच के चार बड़े पर्दों, चार वीडियो रथों तथा 100 टेलीविजन सैटों के माध्यम से सारे समुदाय ने देखी। अनेकों को पूज्यवर के जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंग पहली बार देखने को मिले
सभी के मन में यह ललक थी कि इस दिशा में हम क्या कुछ कर सकते हैं, अपनी लौकिक महत्त्वाकाँक्षाओं पर कड़ा नियंत्रण रखते हुए समाज हितार्थ अपनी विभूतियों, उपार्जन व समय का अधिक से अधिक अंश मिशन के सदुद्देश्यों के निमित्त लगा सकते हैं, यह प्रत्यक्ष मार्गदर्शन दिया जाय। अगले दिन के लिए यह निर्धारण छोड़ रात्रि 100 पर वीडियो फिल्म पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर बनायी गयी थी। पहले दिन “युगपुरुष” नामक एक घण्टे की फिल्म 300 इंच के चार बड़े पर्दों, चार वीडियो रथों तथा 100 टेलीविजन सैटों के माध्यम से सारे समुदाय ने देखी। अनेकों को पूज्यवर के जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंग पहली बार देखने को मिले
इसे किये बिना उच्चतर जीवन के लिए कदम बढ़ाना कहाँ सम्भव है? विद्यार्थी जीवन में यही तो किया था - उनने। जब सब विद्यार्थी उपन्यास, कहानियों और फिल्मी जीवन का आनन्द ले रहे होते, उस समय वह उपनिषदों का चिन्तन करते अथवा नागपुर रामकृष्ण मठ के साधुओं का सत्संग
दृश्य नयनाभिराम था, अलौकिक था व ऐसा लगता था मानो स्वर्ग से देवता स्वयं दृश्य देखने धरती पर उतर आए हों। सवालक्ष वेदी ब्रह्मयज्ञ के बाद वीडियो फिल्माँकन हुआ व कार्यक्रम का समापन हो गया
वंदनीया माता जी के उपासना, साधना, आराधना परक त्रिविध अध्यात्म प्रधान प्रसंगों, पर उद्बोधन इसके पश्चात् हुआ। “ऋषिचिन्तन” नाम फिल्म के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-October
जिन्होंने साहित्य सृजा और फिल्में बनाई, उनको अपना लाभ प्रधान दिखा होगा, अन्यथा प्रचार साधनों में अवांछनीयता का समावेश करते समय हजार बार विचार करना पड़ता कि निजी लाभ कमाने के अत्युत्साह से लोकमानस को विकृत करने का खतरा उत्पन्न नहीं किया जाना चाहिए। युद्धोन्माद का वातावरण बनाने और सरंजाम जुटाने में किसी वर्ग विशेष को लाभ ही लाभ सूझा होगा, अन्यथा उस आक्रमण प्रत्याक्रमण के माहौल से असंख्यों मनुष्यों की परिवारों की भयंकर बरबादी सूझ ही न पड़ती, ऐसी बात नहीं है। अपने को सर्व समर्थ सर्वसम्पन्न बनाने के लिए उभरे उन्माद ने शोषण से लेकर आक्रमण तक के अनेकों कुचक्र रचे हैं
आयु बढ़ने के साथ यह उत्सुकता और भी अधिक बढ़ती जाती है। अखबार पढ़ने, फिल्म, टीवी देखने, रेडियो सुनने, पर्यटन करने, मेले समारोहों में सम्मिलित होने का उत्साह भी इसी निमित्त बढ़ा चढ़ा रहता है। तृप्ति कभी भी नहीं होती। एक के बाद दूसरी प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त करने की उत्सुकता उभरती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-December
दीपयज्ञ कितना बड़ा हो, इसका निर्धारण परिजन पत्राचार द्वारा पहले कर लेंगे। प्रथम रात्रि के उद्बोधन के बाद शाँतिकुँज के विराट रूप पर दूसरी रात्रि में पूज्य गुरुदेव के जीवन वृत्त पर तथा तीसरे दिन सत्र श्रृंखला का परिचय मिशन के कार्यकलापों पर वीडियो फिल्में रथों में लगें 100 इंच के पर्दों पर दिखाई जाएँगी। इस प्रकार पहले दिन मध्याह्न पहुँचने वाला रथ चौथे दिन प्रातः ध्यान साधन के उपरान्त अपने गन्तव्य की ओर चल देगा
इन सभी के लिए प्रातः से मध्याह्न तक आश्रम की निर्धारित दिनचर्या रहेगी। युगसन्धि पुरश्चरण की भागीदारी के बाद वे अपना दैनन्दिन क्रम घूमने आसपास के स्थान आदि देखने का बनाकर डडडड वीडियो फिल्म प्रदर्शन तक लौटकर आ सकते हैं। अपेक्षा उन से सही है कि वे जितने दिन तीर्थ में रहे यहाँ की प्रचण्ड प्राणचेतना से अनुप्राणित होने का प्रयास करें
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
इसके साथ साथ पूज्यवर के जीवन वृत्त पर जन्म से लेकर महाप्रयाण तक के महत्वपूर्ण प्रसंगों की एक भव्य प्रदर्शनी शाँतिकुँज में लगाई जा रही है जिसमें आगन्तुकों को दृश्य रूप देख सहज प्रेरणा मिल सके। जीवन दर्शन पर एक आद्योपान्त वीडियो फिल्म भी बनाई जा रही है जो नित्य परिजन टी. वी. के पदों पर देखते रह सकेंगे। पूज्य गुरुदेव का अब तक अप्रकाशित साहित्य एवं पुरानी 1940 से लेकर अब तक की सभी पुस्तकें पुनः प्रकाशित की जा रही हैं ताकि उनके विचार सबको उपलब्ध हो सकें, विभिन्न भाषाओं में अनूदित उनके संस्करण भी उपलब्ध होंगे। पूज्य गुरुदेव की ही आवाज में समय समय पर रिकार्ड किये गये प्रवचनों के वे वीडियो कैसेट भी सबको मिल सकेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-January
इस अर्थ में बात सही भी है कि जितने सुविधा-साधन इन दिनों उपलब्ध हैं, उतने इससे पहले कभी भी हस्तगत नहीं हो सके। विज्ञान के विकास से जलयान, वायुयान, रेल, मोटर जैसे द्रुतगामी वाहन, तार, रेडियो, फिल्म, दूरदर्शन जैसे संचार-साधन इससे पूर्व कभी कल्पना में भी नहीं आए थे। कल-कारखानों का पर्वताकार उत्पादन, सर्जरी, अंग-प्रत्यारोपण जैसी सुविधाएँ भूतकाल में कहाँ थीं? कहा जा सकता है कि विज्ञान ने पौराणिक विश्वकर्मा को कहीं अधिक पीछे छोड़ दिया है
इस संदर्भ में विकसित वैज्ञानिक साधन भी बहुत कुछ कर दिखाता है। रेडियो प्रसारण, टीवी की फिल्मों और रिकार्डरों से भी प्रचार-प्रक्रिया में बहुत कुछ सहयोग मिलता है