अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-July
वह 15 तारीख को छपा करेगी। ‘अखण्ड-ज्योति’ जितने ही पृष्ठ रहेंगे और उतना ही 4) वार्षिक मूल्य रहेगा। ‘अखण्ड-ज्योति’ में जो बातें सैद्धान्तिक रूप से प्रतिपादित की जाती हैं वे कार्य रूप में किस तरह लाई जा सकती हैं या लाई जा रही हैं, इसका व्यावहारिक मार्ग-दर्शन उसमें रहा करेगा। एक प्रकार से ‘युग निर्माण’ को ‘अखण्ड-ज्योति’ का पूरक ही कहना चाहिए
उन सबका उल्लेख आज ही कर दिया जाय यह आवश्यक नहीं। इन पंक्तियों में तो उतनी ही चर्चा करनी उचित है जिसका ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों से सीधा सम्बन्ध हो
‘अखण्ड-ज्योति’ जितने ही पृष्ठ रहेंगे और उतना ही 4) वार्षिक मूल्य रहेगा। ‘अखण्ड-ज्योति’ में जो बातें सैद्धान्तिक रूप से प्रतिपादित की जाती हैं वे कार्य रूप में किस तरह लाई जा सकती हैं या लाई जा रही हैं, इसका व्यावहारिक मार्ग-दर्शन उसमें रहा करेगा। एक प्रकार से ‘युग निर्माण’ को ‘अखण्ड-ज्योति’ का पूरक ही कहना चाहिए। अब तक उसे कोई पढ़ते थे कोई नहीं पढ़ते थे
इस प्रकार उसके ग्राहक भी घट जायँ तो हर्ज नहीं। ‘अखण्ड-ज्योति’ तो दिसम्बर तक इतनी ही छपेगी, उसे जनवरी से उतनी ही छापेंगे, जितने स्थायी सदस्य होंगे
इन दिनों ‘अखण्ड-ज्योति’ के ग्राहक बहुत हैं उनमें से हर साल कितने ही नये बनते और कितने ही पुराने टूटते हैं। यह धमाचौकड़ी अब बन्द होनी चाहिए। हजार-दो हजार भी ग्राहक रहें तो हमें पूरा-पूरा सन्तोष रहेगा
‘अखण्ड-ज्योति’ में जो बातें सैद्धान्तिक रूप से प्रतिपादित की जाती हैं वे कार्य रूप में किस तरह लाई जा सकती हैं या लाई जा रही हैं, इसका व्यावहारिक मार्ग-दर्शन उसमें रहा करेगा। एक प्रकार से ‘युग निर्माण’ को ‘अखण्ड-ज्योति’ का पूरक ही कहना चाहिए। अब तक उसे कोई पढ़ते थे कोई नहीं पढ़ते थे। अब यह उचित रहेगा कि जो ‘अखण्ड-ज्योति’ पढ़ते हैं वे ‘युग निर्माण योजना’ भी पढ़ें और जो ‘युग निर्माण योजना’ पढ़ते हैं वे ‘अखण्ड-ज्योति’ भी मंगावें
‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों के साथ हमारे सीधे संबंध की अवधि अब धीरे-धीरे घटती चली जा रही है। अज्ञातवास से लौटने के पश्चात् हमें 10 वर्ष काम करने के लिए मिले थे। जिनमें से 5 वर्ष इस गुरु पूर्णिमा को पूरे हो चले, अब 5 वर्ष की अवधि और शेष है जिसमें हम अपने प्रिय परिजनों के साथ उस तरह का संबंध और रख सकेंगे जैसा कि अब तक रखते रहे हैं
अब तक उसे कोई पढ़ते थे कोई नहीं पढ़ते थे। अब यह उचित रहेगा कि जो ‘अखण्ड-ज्योति’ पढ़ते हैं वे ‘युग निर्माण योजना’ भी पढ़ें और जो ‘युग निर्माण योजना’ पढ़ते हैं वे ‘अखण्ड-ज्योति’ भी मंगावें। इसलिए अगले मास ‘युग निर्माण योजना’ भी उतनी ही छापने का विचार है जितने पाँच वर्ष तक साथ देने वाले स्थायी सदस्य होंगे। जो कभी ग्राहक रहते, कभी टूटते हैं, उन्हें ‘युग निर्माण योजना’ मँगाना भी अनावश्यक है
साहित्य-सृजन की चर्चा तो इसलिए विशेष रूप से इन पृष्ठों में की गई है क्योंकि ‘अखण्ड-ज्योति’ तथा उसके पाठकों का स्थूल रूप से यही प्रमुख माध्यम रहा है। इसलिए यह प्रसंग साफ करना आवश्यक था। इसी महीने यह बात इसलिए विशेष रूप से स्पष्ट करनी पड़ी कि 1 जुलाई से ‘युग निर्माण योजना’ पाक्षिक का नया वर्ष आरम्भ होता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-September
(14) स्थायी सदस्य अपने आस-पास के उन लोगों से संपर्क बनाये रहें जो केवल अखण्ड-ज्योति या युगनिर्माण-योजना के सदस्य रहना चाहते हैं। उनका चन्दा वसूल करलें और अपने नाम उनके अंक भी मँगवाकर उनके पास पहुँचा दिया करें। इस प्रकार ऐसे ग्राहकों को निराश भी न रहना पड़ेगा और हमें भी हर साल बनने-टूटने वाले ग्राहकों के रजिस्टर बनाने का झंझट न उठाना पड़ेगा
रोज इस स्वाध्याय का झंझट क्यों उठायें? साल में 4) खर्च क्यों करें? यह कसौटी सामने आते ही उस भीड़ में से अधिकाँश लोग हट गये। केवल 40 हजार सदस्य ही अखण्ड-ज्योति परिवार के रूप में रह गये
‘अखण्ड-ज्योति’ अखबार की तरह न तो निकाली गई थी और न वैसी है। लोगों को कोरे मनोरंजन की सामग्री बेचने का व्यवसाय हमारे लिये असम्भव है। संस्कारवान जागृत आत्माओं को इस आकर्षण से एकत्र करने और उन्हें आत्म-कल्याण के मार्ग पर लगाने के उद्देश्य से यह आयोजन आरम्भ किया गया था और इसी प्रयोजन के लिये वह जीवित भी है
एक ही पत्रिका को दो अंकों में विभाजित करके 15-15 दिन के अन्तर से भेजते हैं, यह मानना चाहिये। अखण्ड-ज्योति को हो पाक्षिक हो गई समझना चाहिए। इसलिए प्रयत्न यह किया जाय कि दोनों पत्रिकाएँ साथ-साथ मँगाई जायँ, दोनों का चन्दा इकट्ठा भेजा जाय
(16) जो केवल अखण्ड-ज्योति के ग्राहक रहना चाहते है, उनसे अनुरोध है कि हो सके तो युग-निर्माण-योजना भी साथ-साथ मँगाने का साहस और भी कर लें। अब दोनों पत्रिकाएँ एक-दूसरे की पूरक बन गईं हैं। अपने मिशन की विचारधारा अखण्ड-ज्योति में है और कार्य-पद्धति युग-निर्माण योजना में रहती है
इसके लिए उन्हें समीपवर्त्ती अस्थायी ग्राहकों से संपर्क बनाकर तथा अपने नये प्रयत्न का अनुमान कर अपने जिम्मे कुछ अधिक ग्राहकों की पत्रिकाएँ ले लेनी चाहिये। हम आशा करेंगे कि स्थायी सदस्य कम-से-कम तीन-तीन अखण्ड-ज्योति और दो-दो युग-निर्माण-योजना के छुटपुट सदस्य अपने द्वारा बनाये रखने का उत्तरदायित्व तो संभाले ही रहेंगे
जब सहस्र-कुण्डी यज्ञ हुआ था, तो लगभग इतने ही हमारे साथी थे। पीछे जब यह शर्त रखी गई कि पाँच मिनट का जप ही पर्याप्त नहीं, हमारे विचारों को—युग के अनुरूप प्राचीन अध्यात्म परम्परा के व्यावहारिक स्वरूप को भी समझना चाहिए, अखण्ड-ज्योति भी पढ़नी चाहिए, तो लोगों को अखरा। रोज इस स्वाध्याय का झंझट क्यों उठायें? साल में 4) खर्च क्यों करें? यह कसौटी सामने आते ही उस भीड़ में से अधिकाँश लोग हट गये। केवल 40 हजार सदस्य ही अखण्ड-ज्योति परिवार के रूप में रह गये
(19) इस वर्ष नवम्बर दिसम्बर में ही ‘अखण्ड-ज्योति’ का चन्दा जमा कराया जायगा, ताकि जनवरी का अंक नियत संख्या में ही छापा जाय। पाठकों से अनुरोध है कि वे सन् 67 के लिये तकाजा आने की प्रतीक्षा किये बिना ही नवम्बर या दिसम्बर में अपना चन्दा भेज दें
अब दोनों पत्रिकाएँ एक-दूसरे की पूरक बन गईं हैं। अपने मिशन की विचारधारा अखण्ड-ज्योति में है और कार्य-पद्धति युग-निर्माण योजना में रहती है। दोनों के मिलने से ही एक पूरी बात बनती है। एक ही पत्रिका को दो अंकों में विभाजित करके 15-15 दिन के अन्तर से भेजते हैं, यह मानना चाहिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-April
(1) जहाँ भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, वहाँ के सदस्यों में से तीन या पाँच उत्साही कार्यकर्ताओं की एक समिति सदस्यों के जन्मदिन मनाने का कार्य सुचारु रूप से चलाये
इस कसौटी को “युग-निर्माण योजना” के रूप में प्रस्तुत किया गया है। परिजनों ने “अखण्ड-ज्योति” की प्रेरणाओं को कितना अपनाया? इन प्रश्न का उत्तर इसी तरह मिलेगा कि उनमें व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण के लिये कितनी लगन, श्रद्धा, स्फूर्ति एवं भावना उत्पन्न हुई? यदि ऐसा कुछ न हुआ हो तो समझना चाहिए कि परिजन केवल पाठक मात्र हैं और केवल पाठ तो अखण्ड-ज्योति तो क्या, वेद-शास्त्र या स्तोत्र-कीर्तन का भी करते रहा जाय तो कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। काम तो काम से ही चलता है। सद् विचारों का उद्देश्य— सत्कर्म का उद्भव है
इसकी उपयोगिता भी है और आवश्यकता भी। अखण्ड-ज्योति परिवार में इस प्रथा का प्रचलन, सामूहिक एवं व्यवस्थित रीति से आरम्भ किया जाय। इससे पारस्परिक प्रेम, सद्भाव एवं संगठन बढ़ेगा। साथ ही इस शुभ अवसर पर एकत्रित लोगों में जन-जागरण की भावनाएं जागृत करने का अवसर मिलेगा
अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
अखण्ड-ज्योति अपने परिजनों को अध्यात्म आश्चर्यजनक लाभ उपलब्ध कराने के लिये सचेष्ट है। हमारे प्रेरक एवं मार्ग दर्शक ने जो रास्ता हमें बताया है वही हम अपने परिजनों को बता रहे हैं। वह ऋषि-प्रणीत, शास्त्र-सम्मत सुनिश्चित राज मार्ग है
“अखण्ड-ज्योति” विगत 27 वर्षों से इसी सेवासाधना में संलग्न है। अपने पाठकों में वह हर मास ऐसी प्रेरणा एवं ज्योति प्रदीप्त करती है, जिससे आदर्शवादिता के मानवोचित सत्पथ पर चलते हुए जीवन को सार्थक बना सकना सम्भव हो सके। यह प्रेरणा किसने कितनी ग्रहण की? इसकी परख इसी कसौटी पर की जा सकती है कि कौन उस प्रेरणा को अपने व्यावहारिक जीवन में किस सीमा तक कार्यान्वित कर रहा है? विचारों में विलक्षण शक्ति तो अवश्य है, पर वह सजीव तभी होती है, जब कार्य रूप में परिणत होती चले
(3) एक वर्षीय प्रशिक्षण योजना मार्च की अखण्ड-ज्योति में छपी है। जिन्हें इतना अवकाश हो उसमें सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। इस शिक्षा में अपने व्यक्तित्व को प्रतिभाशाली बनाने, जीवन में महत्वपूर्ण कार्य कर सकने, आजीविका की समस्या सुलझाने तथा आत्मबल संग्रह करने के सभी लाभ विद्यमान हैं
पता—अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
पर साथ ही यह भी कहते हैं कि जितना ध्यान उपासना में दिया जाय, जितना माहात्म्य उपासना का समझा जाय उससे कहीं अधिक ध्यान जीवन-साधना पर दिया जाय और कहीं अधिक माहात्म्य उस आत्म-निर्माण के प्रयास का समझा जाय। अखण्ड-ज्योति इसी दिशा में अपने परिवार का पथ-प्रदर्शन करती है। हम पत्रिका एवं पुस्तकों से विचार-क्षेत्र को परिष्कृत करने का प्रयत्न करते हैं। पर साथ ही यह भी सुझाया जा रहा है कि आत्म-निर्माण का अभ्यास तत्परतापूर्वक जारी रखें
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों के सम्मुख इस वर्ष जो कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये हैं, प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उनके प्रति आशाजनक उत्साह दिखाया है। कदम इसी प्रकार बढ़ते रहे तो यह कहा जा सकता है कि अपना परिवार नव निर्माण की दशा में ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करेगा
अन्य व्यवसायों की अपेक्षा यह सरल ही है, कठिन नहीं। इसलिए अखण्ड-ज्योति केवल विचार निर्माण का कर्तव्य पूरा करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं मान लेती, वरन् उस पथ का निर्माण भी करती है। जिस पर चलकर कल्याण-पथ के पथिकों को अभीष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके। जिस मार्ग पर, जिस प्रकार चलते हुए हम जितनी सफलता स्वयं प्राप्त कर सके हैं, उसका रहस्य तो हमें बता ही देना है
(4) जन्म दिन मनाने की कार्य-पद्धति हर जगह प्रचलित की जाय। जहाँ भी अखण्ड-ज्योति परिवार के थोड़े भी सदस्य हों वहाँ यह प्रथा अवश्य चलने लगे। इससे परस्पर संगठन सूत्र में बँधने तथा मिल-जुलकर बहुत कुछ कर सकने का पथ प्रशस्त होगा। जहाँ अन्य संस्कारों का प्रचलन भी संभव हो वहाँ उसकी व्यवस्था की जाय
युग निर्माण योजना को कोई बाहरी कार्य-पद्धति नहीं वरन् व्यक्तिगत जीवन को आध्यात्मिक दिशा में परिष्कृत करने की एक अनुभूत साधना-पद्धति मानना चाहिये। यह आस्था हमारे मनों में इतनी गहरी जमे कि उसे क्रियान्वित किए बिना किसी से रहा ही न जा सके तो अखण्ड-ज्योति अपने प्रयत्नों की सार्थकता माने और हम अपने श्रम को सफल हुआ समझें
परिजनों को यह तथ्य हृदयंगम करने चाहियें। अखण्ड-ज्योति में छपने वाले सद्विचारों को वे पढ़ते और पसन्द करते हैं तो इतने मात्र से ही उन्हें सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिये। मंजिल के अगले कदम भी उठाने चाहियें। जीवन-शोधन की पुनीत प्रक्रिया को तीव्र करना चाहिये
(13) जन्मोत्सवों का आरम्भ अभी उन्हीं लोगों से आरम्भ किया जाय जो अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं। आगे चलकर समिति अपनी सुविधा के अनुसार अन्य अनुरोध कर्ताओं के यहाँ भी वैसा प्रबन्ध कर सकती है
जो केवल थोड़े से भजन का, टंट-घंट का सहारा लिये बैठे हैं और वह लाभ पाने की आशा करते हैं—जो त्रिविध समग्र साधना करने पर ही किसी को मिल सकती है—तो इसे एक भूल ही कहना चाहिए। हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति का एक पाठक भी इस भूल या भ्रम में न रहे। यदि उनसे उपासना में निष्ठा प्रदर्शित की है जो फिर दो कदम और भी आगे बढ़ाने चाहियें। जीवन-शोधन और परमार्थ के लिये भी उसे उतना ही मन, उतना ही अपना ध्यान, समय और श्रम संलग्न करना चाहिये
जो बीज अंकुर न उत्पन्न कर सके, उसकी क्या सार्थकता है, जो विचार—कर्म में परिणत न हो सके उसे निर्जीव एवं निरर्थक ही कहा जायगा। परिजनों के अन्तःकरण में जो सद्प्रेरणाओं का बीजारोपण अखण्ड-ज्योति करती रही है, उसकी सार्थकता, निरर्थकता परखने का समय अब आ पहुँचा। हमें अपने श्रम के परिणामों का लेखा-जोखा अब देखना-ढूँढ़ना ही चाहिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-November
इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये कुशल सेनापति फौजी ट्रेनिंग तो बहुतों को देते हैं पर महत्वपूर्ण मोर्चे पर लड़ने को उन्हें ही भेजते हैं, जिनकी वीरता और कुशलता पर उन्हें पूर्ण विश्वास होता है। अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की वर्तमान छटनी इसी दृष्टि से हो रही है
जो स्वयं प्रकाश पूर्ण बौद्धिक प्रखरता को सुनने-समझने के लिए तैयार नहीं, वे भला और किसी को क्या कुछ कह सुन सकेंगे और क्या अपने जीवन में प्रखरता ला सकेंगे। अखण्ड-ज्योति हमारी भावनाओं और विचारधाराओं का दर्पण है। जिन्हें उसे पढ़ने से रुचि, आकाँक्षा न जग सकी तो वे शरीर से हमारे समीप भले हों, भावनात्मक दृष्टि से हजारों कोस दूर हैं। जिन्हें हम विचार भी न दे सकेंगे उनके जीवनों में परिवर्तन तथा उस परिवर्तन से युग को प्रभावित करने का प्रयोजन कैसे पूरा करेंगे? अतएव सोचा कि भीड़ को लाखों से करोड़ों में ले जाने की अपेक्षा- भावनात्मक दृष्टि से परिष्कृत व्यक्तियों का चयन किया जाय
सन् 66 में अखण्ड-ज्योति अपने परिवार की संख्या घटा रही है पर उसका स्तर अपेक्षाकृत बहुत ही उत्कृष्ट बन जायगा। इन उत्कृष्ट व्यक्तियों की सहायता से हमें नव निर्माण मिशन में अपेक्षाकृत अधिक सहायता मिलेगी। क्योंकि एक सीमित संख्या के साथी रह जाने पर उनकी ओर अधिक ध्यान दे सकना—उनके साथ अधिक परिश्रम कर सकना हमारे लिए अधिक सम्भव होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-October
किसी की आर्थिक स्थिति खराब हो गई तो किसी को फुरसत न मिली, यह झूँठे और बेबुनियाद बहाने हैं। इस महंगाई के जमाने में जो व्यक्ति रोटी खाता और कपड़े पहनता है तो उसी में से कोई बचत कर अखण्ड-ज्योति मंगाई जा सकती है और दस-बीस मिनट रोज पढ़ा जाय तो एक महीने में उसके सब लेख पढ़े जा सकते हैं। भला ऐसा भी कोई अभावग्रस्त हो सकता है जो इतना न कर पाये। बात तुच्छ सी थी पर जिन्हें भागना था—भाग खड़े हुए
समय और धन खर्च करने की एक बहुत ही छोटी—नगण्य सी शर्त—अभी हमने अखण्ड-ज्योति परिजनों के सामने रखी है—दस नया पैसा और एक घण्टा समय का अनुदान—सो भी अपने निजी संबंधियों के लिए, किसी को क्यों भार लगना चाहिये, खास तौर से तब जबकि उसका पूरा-पूरा लाभ अपने परिवार और मित्रों के लिए ही मिलने वाला है। यह शर्तें किसी भावनाशील व्यक्ति को भारी नहीं हो सकतीं यह सोच कर युग निर्माण परिवार में ऐसे ही लोग लिए जा रहे हैं जो अपनी निष्ठा का कम से कम इतना तो परिचय दे सकें
बात बहुत छोटी और नगण्य सी है। उतनी ही सरल जितनी गायत्री परिवार के लोगों के लिये यह सरल था कि वे अखण्ड-ज्योति पढ़ा करें। पर अपना मन ही तो है—मन में जो बात न जमे उसके लिए हजार बहाने बन जाते हैं। किसी की आर्थिक स्थिति खराब हो गई तो किसी को फुरसत न मिली, यह झूँठे और बेबुनियाद बहाने हैं
बहुत करके ऐसा हुआ भी है। अखण्ड-ज्योति की प्रखर प्रेरणा ने करोड़ों नहीं तो लाखों मनुष्यों की जीवन दिशा में आशाजनक मोड़ दिया है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-May
परिवार में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो पूजा, उपासना के माध्यम से, अपनी कतिपय कठिनाइयों के समाधान की आशा करते हैं, उनका मूल प्रयोजन उतना मात्र ही है। इस दृष्टि से वे संपर्क में आते हैं, संपर्क में आने पर किसी प्रकार संकोचवश ही सही, अखण्ड-ज्योति या अन्य पुस्तकें भी पढ़ने लगते हैं। वैसे उनकी इस सम्बन्ध में कोई निजी दिलचस्पी नहीं है
गत वर्ष हमने परिजनों से यह पूछताछ की थी कि आप लोगों में से कौन ऐसे हैं, जो हमारे उत्तराधिकारी के रूप में आगे आ सकते हैं? कोई भौतिक धन-दौलत पास में होती तो अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य अपने को हमारा सच्चा अनुयायी एवं शिष्य बताता और जो उसे मिलता, उस पर खुशी मनाता। पर जो चीज मिलने वाली है वह आध्यात्मिक है, प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ती, फिर उसके बदले में तृष्णा और वासना की पूर्ति नहीं होती, इतने पर भी वह पात्रता की कसौटी पर खरा उतरने के पश्चात् ही मिल सकती है, उत्तराधिकार में मिलने वाली इसी वस्तु को लेकर कोई करेगा भी क्या? अधिकाँश ने ऐसा ही सोचा है और जिन लोगों के उत्तराधिकार की इच्छा प्रकट करने वालों के नाम आये हैं, वे कम ही हैं। उन्हें सन्तोषजनक संख्या में नहीं कहा जा सकता
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों में से प्रत्येक को अब पुनः अपने उत्तराधिकार के लिए आमंत्रित करते हैं। जिनने गतवर्ष अपनी प्रतिज्ञा की सूचना दी थी, उन्हें उसे नियमित रूप से चालू रखने का स्मरण दिलाते हैं। कहकर मुकर जाना बुरी बात है
इस दृष्टि से गत वर्ष परिजनों से पूछा था कि आप लोगों में से ऐसे कौन-कौन हैं, जो हमारे कन्धों पर आये हुए उत्तरदायित्वों के भार को अपना कन्धा लगाकर हल्का कर सकें? इसका उत्तर सन्तोषजनक मिला था। बेशक परिवार में ऐसे लोग भी हैं, जो हमारी विचारधारा में रस लेते हैं, उसे पसन्द करते हैं और अखण्ड-ज्योति अथवा अन्य साहित्य को पढ़कर अपना संतोष कर लेते हैं। परिवार में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो पूजा, उपासना के माध्यम से, अपनी कतिपय कठिनाइयों के समाधान की आशा करते हैं, उनका मूल प्रयोजन उतना मात्र ही है। इस दृष्टि से वे संपर्क में आते हैं, संपर्क में आने पर किसी प्रकार संकोचवश ही सही, अखण्ड-ज्योति या अन्य पुस्तकें भी पढ़ने लगते हैं
हर उत्तराधिकारी के घर में इस प्रकार का पुस्तकालय, चले। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाएं इसी पैसे से मंगाई जाँय। जिन सर्वांग सुन्दर 5 ट्रैक्टों का प्रकाशन हर महीने हो रहा है उन्हें नियमित रूप से मँगाकर उस पुस्तकालय का कलेवर बराबर बढ़ाते रहा जाय। गत वर्ष 10 ट्रैक्ट विवाहोन्माद सम्बन्धी छपे थे
अखण्ड-ज्योति पवार के विवेकवान् वयोवृद्धों के लिये ऐसी सुविधा उत्पन्न करना हमारा कर्त्तव्य है। परिजनों में से प्रत्येक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि इस लेख को उन सभी व्यक्तियों को पढ़ाने-सुनाने का प्रयत्न करें, जो पचास वर्ष की आयु पार कर चुके। उन्हें ढलती आयु के धर्म-कर्तव्यों का पालन करना ही चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-December
अखण्ड-ज्योति इस अंक के साथ अपने जीवन के 27 वर्ष समाप्त कर 28वें में प्रवेश करेगी। यह संधि वेला उसके पिछले सभी वर्षों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण एवं मार्मिक है। अब तक इन पंक्तियों में ग्राहक बनाने की अपील की जाती रही थी, इस बार घटाने की—छटनी की अपील की गई है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-March
युग-नेतृत्व कर सकने की क्षमता से परिपूर्ण लौह-पुरुषों का एक दल उत्पन्न करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति अखण्ड-ज्योति परिवार की सुसंस्कृत आत्माएं यदि अपना स्वरूप समझें तो बड़ी आसानी से कर सकती हैं
(1) एक से दस आन्दोलन को तीव्र किया जाय। अपने परिवार, रिश्ते तथा संपर्क के प्रत्येक भावनाशील व्यक्ति को नवनिर्माण की विचारधारा से परिचित सम्बन्धित रखने के लिए उसे अखण्ड-ज्योति एवं जनजागरण का अन्य साहित्य नियमित रूप से पढ़ने सुनाने के लिए तैयार किया जाय। लोगों में विचार शक्ति का सन्देश पढ़ने सुनने की अभिरुचि उत्पन्न करना हमारा आरम्भिक एवं आवश्यक कार्य है। इसलिए हम में से ही एक को कम से कम दस व्यक्तियों तक युगनिर्माण की विचारधारा का सन्देश पहुँचाते रहने का व्रत लेना चाहिये
“अखण्ड-ज्योति” के गत अंक में परिजनों के सम्मुख चार सामयिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए थे
इसका लाभ आगे चलकर और भी अधिक होता है। इसमें अखण्ड-ज्योति का प्रत्येक सदस्य भागीदार बने। जिसने अभी यह उपासना आरम्भ न की हो वे अब से शुरू कर दें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-February
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को नवनिर्माण का उत्तरदायित्व सौंपते हुए हम निरन्तर यह आशा करते रहते हैं कि इस परम पुनीत आध्यात्मिक एवं सामाजिक कर्तव्य की पूर्ति के के लिए भी वे वैसा ही ध्यान देंगे और प्रयत्न करेंगे जैसी कि आजीविका उपार्जन एवं पारिवारिक सुख-सुविधाओं के लिये करते हैं। जो इस ओर उपेक्षा बरतते हैं उनके बारे में हम यही सोचते हैं कि उन्हें अखण्ड-ज्योति बाँचने का शौक भले ही हो, हमसे व्यक्तिगत परिचय, मोह भले ही हो पर वे उस मिशन के लिए कुछ करना नहीं चाहते जो अखण्ड-ज्योति का, हमारा, जीवन-प्राण है। युग की माँग एवं पुकार को पूरा करने के लिए प्रबुद्ध, जागृत आत्माओं को सक्रिय रूप में कुछ कदम उठाने पड़ते हैं, कुछ त्याग तप का परिचय देना पड़ता है। यह सब जिन्हें अरुचिकर, उपेक्षणीय, निरर्थक, भारस्वरुप लगता है, उन्हें उत्कृष्टता के, आदर्शवादिता के पथ का पथिक कैसे माना जाय? और कैसे यह समझा जाय कि अखण्ड-ज्योति की प्रेरणा को सचाई से सुना समझा है
युग की माँग एवं पुकार को पूरा करने के लिए प्रबुद्ध, जागृत आत्माओं को सक्रिय रूप में कुछ कदम उठाने पड़ते हैं, कुछ त्याग तप का परिचय देना पड़ता है। यह सब जिन्हें अरुचिकर, उपेक्षणीय, निरर्थक, भारस्वरुप लगता है, उन्हें उत्कृष्टता के, आदर्शवादिता के पथ का पथिक कैसे माना जाय? और कैसे यह समझा जाय कि अखण्ड-ज्योति की प्रेरणा को सचाई से सुना समझा है। हमारे आत्मीयों को, हमारे मार्ग पर भी चलना चाहिए। कौन कितना हमारे साथ है, उस कसौटी पर परिजनों की आत्मीयता को परखें तो इसमें कुछ भी अनुचित न होगा
इसके अतिरिक्त बाहर के भावनाँवित उन व्यक्तियों को भी प्रभावित करना चाहिए जो अपने प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। अपनी अखण्ड-ज्योति, अपनी युग निर्माण पत्रिका अपने जन-जागरण ट्रैक्ट उन्हें नियमित रूप से पढ़ने देने और वापिस लेने का क्रम चलाना चाहिए। एक आना नित्य और एक घंटा समय नित्य देते रहने का संकल्प, हमसे सच्चा सम्बन्ध रखने वाले प्रायः सभी परिजन ले चुके हैं। कोई विरले ही ऐसे होंगे जिनने इतना छोटा त्याग करने में भी कृतज्ञता न दिखाई हो
नव निर्माण की यह प्रारम्भिक प्रक्रिया अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य को आरम्भ कर ही देना चाहिए। अखण्ड-ज्योति अपने श्रम की सार्थकता तभी मानेगी जब उसके परिजन उसका प्रकाश इतना हृदयंगम भी करें कि लोकमंगल की दिशा में कुछ करना उनके लिये अनिवार्य हो जाय। इसके बिना उनसे रहा ही न जाय। आशा है परिजन! आप—इस कसौटी पर खोटे नहीं, खरे उतरेंगे
इस महान आध्यात्मिक उपचार से राष्ट्र की शक्ति निश्चित रूप से बढ़ेगी, शत्रुओं का दर्प निश्चित रूप से चूर्ण होगा और भविष्य की उज्ज्वल आशाओं की संभावनाएं निश्चित रूप से बढ़ेंगी। ऐसे समर्थ प्रयास में भागीदार होना अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य का राष्ट्रीय एवं धार्मिक कर्तव्य है। हमें आशा है कि परिवार का एक भी सदस्य इस महान् अभियान में सम्मिलित रहने से वंचित न रहेगा
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों द्वारा विगत शरद्-पूर्णिमा से राष्ट्र की शक्ति बढ़ाने एवं शत्रुओं का दर्प-मर्दन करने के लिये जो सामूहिक शक्ति -पुरुश्चरण आरम्भ किया गया है, वह आशातीत सफलता के साथ चल रहा है। शक्ति-बीज के साथ गायत्री महामंत्र का हर महीने 24 करोड़ विधिवत् शक्ति-पुरुश्चरण धार्मिक जगत के इतिहास में एक अनुपम आयोजन है। पिछले हजारों वर्षों से इतना बड़ा पुरुश्चरण दूसरा नहीं हुआ
जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति सदस्य हैं, उन्हें एक परिवार जैसा संगठन गठित करना चाहिये। इस युग की सबसे बड़ी सामर्थ्य संघ शक्ति है। संगठन के द्वारा ही भावनात्मक नव निर्माण के स्वप्न सार्थक होंगे
नव निर्माण की यह प्रारम्भिक प्रक्रिया अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य को आरम्भ कर ही देना चाहिए। अखण्ड-ज्योति अपने श्रम की सार्थकता तभी मानेगी जब उसके परिजन उसका प्रकाश इतना हृदयंगम भी करें कि लोकमंगल की दिशा में कुछ करना उनके लिये अनिवार्य हो जाय। इसके बिना उनसे रहा ही न जाय
जन-जागरण के लिये यह दोनों ही अवलम्बन अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों को बार-बार बहुत जोर देकर यह कहा जा रहा है कि वे अपने घर-परिवार में, शाखा समाज में संस्कार एवं पर्वों को प्रेरणाप्रद ढंग से मनाने की प्रथा को पूरे उत्साह एवं मनोयोग के साथ आरम्भ करें
दूर परदेश में रहने वाले व्यक्ति छुट्टियों में अपने कुटुम्ब-परिवार वालों से, सम्बन्धी रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं। आखिर अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य हमारे भी तो कुटुम्बी, सम्बन्धी हैं, क्या ऐसी दशा में यह उचित न होगा कि वे बीस दिन हमारे पास रहें, हमारे साथ हंसे, खेलें, अपने मन की बात हमसे कहें और हमारे मन की बात सुनें?
अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य को अपने इस अविस्मरणीय कर्त्तव्य को सामने रखना चाहिये कि उसे एक पत्रिका का पाठक मात्र नहीं रहना है वरन् उसे एक युग निर्माता की भूमिका प्रस्तुत करनी है। “एक से दस” हमारी युग साधना का बीज मंत्र है। जिन विचारों को युग निर्माण योजना के प्रकाश से ग्रहण किया जा रहा है, उसे कम से कम दस दूसरों तक तो हमें पहुँचाना ही चाहिए
जहाँ भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, वहाँ उसका पहुँचना सार्थक हुआ या नहीं यह इस कसौटी पर परखा जायगा जब यह प्रतीत हो कि वहाँ कुछ संगठनोत्पादक एवं प्रचारात्मक हलचल भी चल रही है या नहीं? जहाँ जो भी प्रबुद्ध परिजन हों उन्हें यह कसौटी अपने लिए व्यक्तिगत चुनौती के रूप में ग्रहण करनी चाहिए, और कुछ करने के लिये योजना बनानी चाहिये। हिम्मत दिखानी चाहिए। हर शाखा का एक केन्द्र कार्यालय होना ही चाहिए जहाँ सामूहिक पुस्तकालय हो
हर परिवार में कई नर-नारी, बाल-वृद्ध होते हैं, उनमें से जो पढ़े हैं, जिसकी रुचि जागृत है—उन्हें साहित्य पढ़ने को देकर और जो पढ़े नहीं हैं या जिन्हें रुचि नहीं है उन्हें सुना कर जन-जागरण का कर्त्तव्य पालन करना चाहिए। अपने घर का कोई भी सदस्य ऐसा न रहे जिसे अखण्ड-ज्योति के, युग-निर्माण के विचारों का परिचय एवं प्रकाश निरन्तर नियमित रूप में न मिलता हो। जिन परिजनों ने यह व्यवस्था अभी तक नहीं बनाई है, उन्हें अब निश्चित रूप से यह बना लेनी चाहिए। किसी न किसी प्रकार घर के हर सदस्य को इन विचारों को पढ़ने, सुनने के लिए सहमत कर ही लेना चाहिए
हाथी के बच्चे हाथी ही होते हैं। अखण्ड-ज्योति लाखों को प्रेरणा और प्रकाश देती है तो क्या उसके पुत्र दस-दस का प्रकाश देने का उत्तरदायित्व भी वहन न करेंगे। हाथी की सन्तानों को हाथी जैसी क्षमता ही प्रकट करनी चाहिये
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को नवनिर्माण का उत्तरदायित्व सौंपते हुए हम निरन्तर यह आशा करते रहते हैं कि इस परम पुनीत आध्यात्मिक एवं सामाजिक कर्तव्य की पूर्ति के के लिए भी वे वैसा ही ध्यान देंगे और प्रयत्न करेंगे जैसी कि आजीविका उपार्जन एवं पारिवारिक सुख-सुविधाओं के लिये करते हैं। जो इस ओर उपेक्षा बरतते हैं उनके बारे में हम यही सोचते हैं कि उन्हें अखण्ड-ज्योति बाँचने का शौक भले ही हो, हमसे व्यक्तिगत परिचय, मोह भले ही हो पर वे उस मिशन के लिए कुछ करना नहीं चाहते जो अखण्ड-ज्योति का, हमारा, जीवन-प्राण है। युग की माँग एवं पुकार को पूरा करने के लिए प्रबुद्ध, जागृत आत्माओं को सक्रिय रूप में कुछ कदम उठाने पड़ते हैं, कुछ त्याग तप का परिचय देना पड़ता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-January
हम अपने हृदय के रक्त से जो कुछ लिखते हैं, उसका कुछ भी असर पाठकों पर न हो ऐसा हो नहीं सकता। इतना विशाल परिवार इन प्रेरणाओं के आधार पर ही विनिर्मित हुआ है, आगे भी इन प्रेरणाओं का प्रवाह जारी रहे और वह वर्तमान सदस्यों तक ही नहीं—नये लोगों तक भी पहुँचे इसके लिये यह आवश्यक है कि अखण्ड-ज्योति के पाठकों की संख्या घटने न पावे वरन् बढ़ती ही रहे। आर्थिक दृष्टि से अखण्ड-ज्योति सदा से घाटे से चलती है, पर उसका सबसे बड़ा लाभ यही है कि जो इसे पढ़ता है, अपने भीतर, एक चेतना, प्रेरणा, स्फूर्ति एवं जागृति अनुभव करता है। ऐसा प्रकाश अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाना ही चाहिये
(5)परिवार बढ़े तो-पर बिखरे नहीं —अखण्ड-ज्योति परिवार के अभी केवल 40 हजार सदस्य हैं। यही वह सेना है, जिसके आधार पर हम 40 करोड़ के भारत का ही नहीं—तीन अरब की आबादी वाले विश्व के नव-निर्माण का युग परिवर्तन का स्वप्न देखते हैं। भौतिक निर्माण, राजनैतिक, इंजीनियर वैज्ञानिक आदि कर सकते हैं, पर आध्यात्मिक आधार पर संसार का भावना स्तर सुविकसित करना केवल वैसे ही लोगों का काम है जैसे कि युग निर्माण योजना के झंडे के अंतर्गत अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य संगठित हो रहे हैं
सदस्य अपनी माता की तरह ही उसका भी ज्ञान रूपी दूध पीते हैं। वर्ष में एक ही बार इस ज्ञान माला को अखण्ड-ज्योति की—श्रद्धाँजलि अर्पित करने का अवसर आता है। थोड़ा समय लगाकर एक टोली के रूप में यदि चल पड़ने का साहस कर सकें तो इतनी भर चेष्टा अखण्ड-ज्योति के प्रति उसके जन्म-दिन पर समर्पित की गई सर्वश्रेष्ठ श्रद्धाँजलि हो सकती है। पुराने सदस्यों से चन्दा वसूल करने और नये ग्राहक बनाने के लिए रसीद बहियाँ छपा ली गई हैं
अखण्ड-ज्योति का 26 वर्ष से पय-पान करते रहने के कारण परिजनों को अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्व का समुचित ज्ञान है, और उस ज्ञान को वे कर्म रूप में भी परिणित कर रहे हैं। ज्ञान की महत्ता कर्म की परिणति में ही है। कर्म रहित धर्म तो विडम्बना मात्र है
सन्तोष की बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य अपनी साधना में श्रद्धा एवं निष्ठापूर्वक लगे हुए हैं। युग निर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रम अपने-अपने ढंग से, अपनी-अपनी जगह चला रहे हैं। फिर भी बार-बार प्रोत्साहन एवं उद्बोधन की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि यदि कहीं कुछ शिथिलता आने लगी हो तो वह दूर हो जाय
यह समय और धन जिस कार्य के लिये निश्चित निर्धारित है उसे उसी में लगाना चाहिये। गंगा स्नान में लगे समय को और गाय को घास खिलाने के लिये खर्च हुए धन को, अखण्ड-ज्योति परिवार के नव-निर्माण उद्देश्य की पूर्ति के लिये आरम्भ किये गये ज्ञान यज्ञ में सम्मिलित न किया जा सकेगा। अन्य कार्यों के लिये अपना अलग समय या धन लगाया जाय। यह एक घंटा समय और एक आना नित्य का अनुदान तो विशुद्ध रूप से जन-जागरण के लिये, विचार क्रान्ति के लिये है
दोनों की जोड़ी ही अभीष्ट प्रयोजन पूरा कर पाती है। इसलिए हर अखण्ड-ज्योति सदस्य को ‘युग निर्माण योजना’ पाक्षिक के पढ़ने की आवश्यकता अनुभव करनी चाहिए। उसे भी मिल-जुलकर सब सद
यही वह सेना है, जिसके आधार पर हम 40 करोड़ के भारत का ही नहीं—तीन अरब की आबादी वाले विश्व के नव-निर्माण का युग परिवर्तन का स्वप्न देखते हैं। भौतिक निर्माण, राजनैतिक, इंजीनियर वैज्ञानिक आदि कर सकते हैं, पर आध्यात्मिक आधार पर संसार का भावना स्तर सुविकसित करना केवल वैसे ही लोगों का काम है जैसे कि युग निर्माण योजना के झंडे के अंतर्गत अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य संगठित हो रहे हैं। कार्य की महानता और क्षेत्र की विशालता को देखते हुए अपना परिवार अभी बहुत छोटा है—इसे अभी बहुत बढ़ाया जाना चाहिये
इसलिए हमें समस्त समाज को धार्मिक आधार पर संगठित करना होगा। इस प्रयोजन की तैयारी के लिये सक्रिय कार्यकर्ताओं की एक सेना के रूप में हमें अखण्ड-ज्योति परिवार को संगठित कर लेना चाहिये। जहाँ जितने सदस्य हैं वे सब एक युग निर्माण शाखा के रूप में संगठित हो जायें। शाखा का एक कार्यालय एक जगह बना लिया जाय, जहाँ से विभिन्न रचनात्मक कार्यों का सृजन होता रहे
फिर भी बार-बार प्रोत्साहन एवं उद्बोधन की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि यदि कहीं कुछ शिथिलता आने लगी हो तो वह दूर हो जाय। कुछ सदस्य ऐसे भी हो सकते हैं जिनने परिवार में अभी नया प्रवेश किया हो और यह अनुभव न किया हो कि अखण्ड-ज्योति के पन्ने पढ़ना ही नहीं, वरन् एक प्रबुद्ध परिवार के सम्मान्य सदस्य होने के नाते कुछ विशेष कर्तव्य पालन करने का उत्तरदायित्व भी उन पर है। ऐसे लोगों के लिए भी सामयिक उद्बोधन की अपेक्षा रहती है। इस स्तंभ के अंतर्गत हर अंक में ऐसा ही प्रेरणा प्रकाश उद्बोधन एवं मार्ग दर्शन प्रस्तुत किया जाता रहता है, और आशा की जाती रहती है कि उसे पढ़ा ही नहीं जायगा वरन् समझा, विचारा, स्वीकारा एवं कार्यान्वित भी किया जायगा
इतना विशाल परिवार इन प्रेरणाओं के आधार पर ही विनिर्मित हुआ है, आगे भी इन प्रेरणाओं का प्रवाह जारी रहे और वह वर्तमान सदस्यों तक ही नहीं—नये लोगों तक भी पहुँचे इसके लिये यह आवश्यक है कि अखण्ड-ज्योति के पाठकों की संख्या घटने न पावे वरन् बढ़ती ही रहे। आर्थिक दृष्टि से अखण्ड-ज्योति सदा से घाटे से चलती है, पर उसका सबसे बड़ा लाभ यही है कि जो इसे पढ़ता है, अपने भीतर, एक चेतना, प्रेरणा, स्फूर्ति एवं जागृति अनुभव करता है। ऐसा प्रकाश अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाना ही चाहिये
सदस्यों की अन्तः प्रेरणा को सक्षम एवं गतिशील बने रहने के लिये उनका अखण्ड-ज्योति पढ़ते रहना आवश्यक है। हम अपने हृदय के रक्त से जो कुछ लिखते हैं, उसका कुछ भी असर पाठकों पर न हो ऐसा हो नहीं सकता। इतना विशाल परिवार इन प्रेरणाओं के आधार पर ही विनिर्मित हुआ है, आगे भी इन प्रेरणाओं का प्रवाह जारी रहे और वह वर्तमान सदस्यों तक ही नहीं—नये लोगों तक भी पहुँचे इसके लिये यह आवश्यक है कि अखण्ड-ज्योति के पाठकों की संख्या घटने न पावे वरन् बढ़ती ही रहे
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को अपने कन्धों पर आये हुए नव निर्माण के उत्तरदायित्वों को अधिक तत्परता एवं श्रद्धा के साथ सँभालना चाहिए। यों स्वभावतः इस संगठन के अंतर्गत वे ही लोग एकत्रित हुए हैं, जिन में पूर्व जन्मों के संचित कुछ विशेष संस्कार विद्यमान हैं और जो अपने इस मानव-जीवन को ईश्वर की महान अनुकम्पा मानकर उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग के लिए प्रयत्नशील हैं
आन्दोलन का मार्गदर्शन, प्रेरणा, प्रसार, प्रचार, सभी कुछ तो उसके द्वारा होता है। अखण्ड-ज्योति रूपी कृष्ण के सन्देश को कार्यान्वित करना इसी अर्जुन रूपी पाक्षिक का काम है। दोनों की जोड़ी ही अभीष्ट प्रयोजन पूरा कर पाती है। इसलिए हर अखण्ड-ज्योति सदस्य को ‘युग निर्माण योजना’ पाक्षिक के पढ़ने की आवश्यकता अनुभव करनी चाहिए
इससे परस्पर प्रेम-भाव बढ़ेगा, संगठन मजबूत होगा और युग निर्माण योजना के आगामी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के लिये पृष्ठभूमि विनिर्मित होगी। जहाँ कहीं भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, वहाँ के विचारशील परिजन मिलकर एक पाँच या न्यूनाधिक सदस्यों की युग निर्माण शाखा बना लें। एक व्यक्ति इसका संचालक नियुक्त कर दिया जाय। अधिकाँश स्थानों पर तो पहले ही यह शाखाएं बन चुकी हैं
वर्ष में एक ही बार इस ज्ञान माला को अखण्ड-ज्योति की—श्रद्धाँजलि अर्पित करने का अवसर आता है। थोड़ा समय लगाकर एक टोली के रूप में यदि चल पड़ने का साहस कर सकें तो इतनी भर चेष्टा अखण्ड-ज्योति के प्रति उसके जन्म-दिन पर समर्पित की गई सर्वश्रेष्ठ श्रद्धाँजलि हो सकती है। पुराने सदस्यों से चन्दा वसूल करने और नये ग्राहक बनाने के लिए रसीद बहियाँ छपा ली गई हैं। आवश्यकतानुसार पृष्ठों की रसीद बहियाँ इस प्रयोजन के लिए मथुरा से मँगाई जा सकती हैं
(3) नियमित समय दान-अनुदान —अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रायः सभी प्रबुद्ध सदस्यों ने “एक घंटा समय और एक आना नित्य” नव निर्माण प्रयोजन के लिये नियमित रूप से लगाते रहने की प्रतिज्ञा की है। यह व्रत जिन्होंने अभी न लिया हो उन्हें अब ले लेना चाहिए। वह छोटा त्याग किसी भी भावनाशील व्यक्ति के लिए यह कोई बड़ा काम नहीं है
ऐसे लोगों के साथ रहते हुए भी जिनके अन्तःकरण में आत्म-कल्याण, परमार्थ, लोक मंगल एवं मानवीय कर्तव्यों की पूर्ति की उमंगें उठती रहती हैं उन्हें भाग्यवान ही कहना चाहिए। अखण्ड-ज्योति परिवार ऐसे ही भाग्यवानों का समूह- संगठन है
बसन्त पंचमी अखण्ड-ज्योति का जन्म-तिथि है। सदस्य अपनी माता की तरह ही उसका भी ज्ञान रूपी दूध पीते हैं। वर्ष में एक ही बार इस ज्ञान माला को अखण्ड-ज्योति की—श्रद्धाँजलि अर्पित करने का अवसर आता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-August
उसकी उपेक्षा करना अपने लोक और परलोक को बिगाड़ना है। हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य इसे निबाहने में तत्परता प्रकट करें। उनके इस कार्य में हम भी पूरा-पूरा सहयोग देंगे। अगले 5 वर्ष तक हम अत्यन्त सस्ता किन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण साहित्य छोटे-छोटे ट्रैक्टों के रूप में लिखेंगे
कई इन लेखों का अभिप्राय ठीक तरह समझ न सके होंगे। इन सभी तक हमारी यह वर्तमान विचारणा ठीक तरह—ठीक समय पर—पहुँच जाय इसके लिए यह आवश्यक है कि हर जगह कुछ प्रबुद्ध व्यक्ति उठ खड़े हों और अखण्ड-ज्योति के भूतपूर्व एवं वर्तमान सदस्यों को इस विधि व्यवस्था का ठीक तरह परिचय करा दें। जिन लोगों ने अभी तक जुलाई मास में संलग्न फार्म न भरा हो, उनसे भविष्य में सदस्य रहने न रहने की सूचना उस फार्म द्वारा भिजवा दें। इस महीने का यह एक आवश्यक कार्य है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-June
(3) अपने यहाँ कम से कम दस ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य पूरे करने और उन्हें संगठित करके कार्यालय की स्थापना तथा संचालक की नियुक्ति का काम पूरा कर लें। (4) जहाँ भी ऐसे संगठन बनें वहीं हर जगह सदस्यों के जन्म दिन मनाने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाय ताकि रचनात्मक कार्यों के लिए आवश्यक उत्साह बढ़ाने की प्रक्रिया चल पड़े
आदर्शवादिता पर आस्था रखने वाले हर अध्यात्मवादी विचारशील व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि उत्कृष्ट विचारधारा का वास्तविक लाभ एवं आनन्द लेने के लिए, उसे कार्यान्वित करने के लिए भी तत्परता प्रकट करे। हम अपने स्वजनों में से प्रत्येक से यही आशा करते हैं कि यदि उन्हें ‘अखण्ड-ज्योति’ के विचार पसंद आते हों तो वे उन्हें कार्य रूप में परिणत करके अपनी आन्तरिक ईमानदारी का परिचय दें। हम लोग इन दिनों जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें भ्रान्तियों और विकृतियों की भरमार है। अतएव वैयक्तिक और सामाजिक दोनों ही स्तर पर व्यक्ति अनेक समस्याओं में घिरा उलझा पड़ा है
गत अंक में अखण्ड-ज्योति परिवार के उन वयोवृद्धों से जो परिवार के उपार्जन, उत्तरदायित्व से निवृत्त हो चुके हैं- यह अनुरोध किया गया था कि वे अपनी ढलती आयु का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए अपनी भावना तथा प्रवृत्ति को मोड़ें। यह उनके ज्ञान, अनुभव और दूरदर्शिता की कसौटी है। बुद्धिमान उसे कहते हैं जो भविष्य की तैयारी में संलग्न है
आशा है ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठक इन पंक्तियों को भावनापूर्वक पढ़ेंगे और आलस्य छोड़कर निर्धारित लक्ष्य की ओर तत्परतापूर्वक कदम उठाने के लिये कटिबद्ध होंगे। हमारी ऐसी ही अभिलाषा एवं आकाँक्षा है
इस सुनिश्चित तथ्य को ध्यान में रखते हुए ‘अखण्ड-ज्योति’ ने अपने प्रिय परिजनों को ज्ञान की शिक्षा, उपासना की प्रेरणा देते हुए साथ ही सेवाधर्म अपनाने का भी पूरे जोर से प्रतिपादन किया है, युग-निर्माण योजना ऐसी ही एक सेवा साधना है। जिसका उद्देश्य समाज का नवनिर्माण ही नहीं उस कार्यक्रम में संलग्न व्यक्तियों का अध्यात्म लक्ष्य पूरा करना भी है। हमने स्वयं भी यही रीति-नीति अपनाई है, और अपने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को भी अपने जीवन का वैसा ही अंग बनावें जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्य कर्म करने में प्रयत्नशील रहते हैं
हमारे गत अंक में व्यक्त किये अनुरोध के पीछे एक ही पुकार एवं प्रेरणा थी कि वृद्धावस्था अस्त-व्यस्त तरीके से नहीं जीनी चाहिए। कम-से-कम अपने परिवार के उन लोगों को तो-जिन्होंने देर से अखण्ड-ज्योति पढ़ी है-कुछ अधिक साहस का परिचय--कुछ अधिक विवेक का परिचय देना ही चाहिए। ज्ञान की वास्तविकता कार्य की कसौटी पर परखी जाती है। जो पढ़ते, सुनते, सोचते समझते तो बहुत हैं पर उसे करने की हिम्मत नहीं दिखा पाते उनका नपुँसक ज्ञान एक प्रकार से भार रूप ही कहा जायगा
‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के हर ढलती आयु के परिजन को हमने गत अंक में पुकारा, ललकारा और धिक्कारा है। हम चाहते हैं कि उनके भीतर जो धर्म भावना के अंकुर विद्यमान हैं वे अब अंकुरित होकर बढ़ें और पत्र पल्लवों से लदे हुए, फल-फूलों से सजे हुए दिखाई पड़ें। इसके लिए आवश्यक मार्ग दर्शन—प्रकाश एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आवश्यक प्रबन्ध गायत्री-तपोभूमि में किया गया है
यदि इतना कर लिया तो समझना चाहिए कि बहुत बड़ी सफलता मिल गई। विचार क्राँति को सुनने समझने में निरन्तर अभिरुचि लेने वाले यदि दस व्यक्ति भी हम घर या बाहर बना सकें और इन तक निरन्तर इस प्रेरक प्रकाश की धारा को पहुँचाते रहने में संलग्न हो सकें तो समझना चाहिए कि ‘अखण्ड-ज्योति’ की उनको सदस्यता सार्थक हो गई और हमने जो आशा अपने प्रिय परिजनों से कर ली है, उसको पूरा करके दिखा दिया गया है। हम तीस हजार से तीन लाख, और तीन लाख से तीस लाख बने तो ही नव-निर्माण का उद्देश्य पूरा होगा
‘अखण्ड-ज्योति’ ने मानव-जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने वाली विचारधारा का सृजन एवं प्रसार किया है। लोक-मानस तक उस प्रकाश को पहुँचाने का अविरत प्रयत्न किया है। साथ ही यह भी आवश्यक माना है कि जो लोग इन विचारों को पढ़ें वे मानसिक विलासिता ही इस पठन को न बना लें वरन् उसे कार्यान्वित करने के लिए भी साहसपूर्ण कदम उठायें
जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ पहुँचती है वहाँ के सदस्यों का प्रयत्न यह होना चाहिये कि वे मिलजुल कर नये लोगों के पास जायें और कम से कम दस सदस्य तो अपने यहाँ बना ही लें। ताकि वहाँ एक छोटा संगठित युग-निर्माण केन्द्र-विधिवत् स्थापन हो सके। इन सदस्यों को परस्पर मिल-जुलकर बैठना सीखना चाहिए और एक विधिवत् संगठन बना लेना चाहिये
अखण्ड-ज्योति अपने परिजनों को विगत 27 वर्षों से अध्यात्म ज्ञान और धर्म का प्रकाश उपलब्ध कराती रही है। उसका प्रयास कहाँ तक सफल हुआ इसकी परख एक ही कसौटी पर कसी जा सकती है कि जिनने इन विचारों को पढ़ा उनने उन्हें जीवन में अपनाया, उतारा या नहीं? ज्ञान की सार्थकता तभी है जब वह कार्य रूप में परिणत हो। अन्यथा बकरे के गले में लटकते हुए थनों की तरह उसे निरर्थक ही मानना चाहिए
इस पवित्र धर्म युद्ध में हम में से हर एक को सम्मिलित होना चाहिए। यह अनुरोध प्रत्येक भावनाशील विचारशील व्यक्ति से है पर ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों से तो इस संदर्भ में विशेष आग्रह ही है। उन्हें इस दिशा में कुछ न कुछ करना ही चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-December
अखण्ड-ज्योति परिवार’ और युग-निमार्ण परिवार’ के प्रत्येक सदस्य के लिए यह परम-पुनीत प्रेरणा-पर्व है। इसे हर साल उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। इस वर्ष भी उसे भाव-भरो श्रद्धा के साथ, परिपूर्ण उल्लास के साथ मानना चाहिए
गत वर्ष इस महँगाई ने अखण्ड-ज्योति को इतना घाटा दिया है कि इस वर्ष आर्थिक दृष्टि से उसके पैर ही लड़खड़ाने लगे हैं। अगले वर्ष भी वही स्थिति चलने दी जाय तो निश्चित रूप से उसे बन्द कर देने के अतिरिक्त और कोई मार्ग शेष नहीं रहेगा
कहना न होगा कि वे अभी भी अपनी निजी लेखनी से अखण्ड-ज्योति-को प्यार किये बिना गुरुदेव के प्रति सद्भावना अधूरी और एकांकी ही रह जाती है। अखण्ड-ज्योति पढ़ना-गुरुदेव को पढ़ना है और उसका प्रसार करना-उनके जीवन-प्राण नव-निमार्ण मिशन का पोषण करना है। इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह से समझ लिया जाय-उतना ही उत्तम है। बसन्त-पर्व पर श्रद्धांजलि का श्रेष्ठतम माध्यम यह है कि इन दिनों अधिक से अधिक सदस्य ‘पत्रिका’ के बनाये जाएँ
बहुत सोच-विचार के बाद यत्किंचित् मूल्य वृद्धि करके किसी प्रकार काम चलाने का निश्चय किया गया है और मात्र एक रुपया ही बढ़ाया गया है। अब जनवरी 74 से अखण्ड-ज्योति का चन्दा सात के स्थान पर ‘आठ रुपया वार्षिक’ कर दिया गया है, इससे महंगाई के घाटे की एक एक सीमा तक ही पूर्ति होगी। शेष कमी पूरा करने के लिये सम्भव है-कुछ पृष्ठ भी घटाने पड़ें
बढ़ी हुई महँगाई के कारण बढ़े हुए चंदे का अतिरिक्त भार उदारता पूर्वक उठा कर प्रेमी-पाठक अखण्ड-ज्योति के प्रति अपनी सहज श्रद्धा और सघन आत्मीयता का परिचय देंगे, ऐसी आशा है-और विश्वास भी
पाठकों को भी अखरेगी ही, पर विवशता ने और कोई मार्ग शेष नहीं रहने दिया, इसलिए उसे हमें स्वीकार करना ही होगा। आशा है, प्रेमी पाठक अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर उपलब्ध होती रहने वाली प्रकाश-किरणों का महत्व समझते हुए इस अतिरिक्त भार को अपनी सहज उदारता पूर्वक स्वीकार करेंगे
आत्म-निमार्ण परिवार-निमार्ण और समाज-निमार्ण की त्रिविधि क्रिया-प्रक्रिया सम्पन्न करते हुए युग-निमार्ण की समग्र आवश्यकता पूरी की जाय-उसके लिए बढ़-चढ़कर शौर्य, साहस दिखाया जाय-इसी में अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों का गौरव है
असल में उनका असली स्वरूप इन प्रेरणाओं में ही देखा-समझा जाना चाहिए। कहना न होगा कि वे अभी भी अपनी निजी लेखनी से अखण्ड-ज्योति-को प्यार किये बिना गुरुदेव के प्रति सद्भावना अधूरी और एकांकी ही रह जाती है। अखण्ड-ज्योति पढ़ना-गुरुदेव को पढ़ना है और उसका प्रसार करना-उनके जीवन-प्राण नव-निमार्ण मिशन का पोषण करना है। इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह से समझ लिया जाय-उतना ही उत्तम है
आवश्यक खर्चों में भी कटौती करके किसी प्रकार काम चलाना पड़ रहा है। ऐसी दशा में उसे अखण्ड-ज्योति के चंदे में वृद्धि होना निश्चित रूप से भारी पड़ेगा। दूसरी ओर हमारी भी वही स्थिति है। घाटे का असह्य बोझ उठाना अपने लिये भी असम्भव है
इन परिस्थितियों में अखण्ड-ज्योति का चन्दा बढ़ने के अतिरिक्त और कोई चारा शेष नहीं रह गया है। पृष्ठ घटाकर काम चलाने की बात भी सोची गई, पर हिसाब लगाने से पता चला कि ठीक आधे पृष्ठ घटाने पर ही जमा-खर्च बराबर होगा। अब 64 पृष्ठ छपते हैं, आगे यदि 7 रुपया ही चन्दा रखना हो तो 32 पृष्ठ से अधिक न दिये जा सकेंगे
अखण्ड-ज्योति मिशन का जन्म दिन-बसन्त पंचमी’ है। वहीं गुरुदेव का अध्यात्मिक ‘जन्मदिन’ है। युग-निमार्ण आन्दोलन का श्रीगणेश भी उसी दिन हुआ

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-January
आत्मबोध एवं आत्मोत्कर्ष के लिए अधिक गहन चिन्तन मनन 2. बसन्त पर्व पर किसी न किसी प्रकार छोटे या बड़े आयोजन 3. अखण्ड-ज्योति एवं युग-निर्माण पत्रिकाओं की सदस्य संख्या अभिवर्धन 4. नये छपे प्रचार ट्रैक्टों द्वारा अपने क्षेत्र में युग-निर्माण अभियान के स्वरूप का प्रचार परिचय, यह चारों ही क्रिया कलाप पूरे करने के लिये हम उत्साह पूर्वक जुट पड़े तो उसका परिणाम इस प्रकार सामने आ सकता है जिसके आधार पर निर्दिष्ट लक्ष्य की दिशा में आशातीत सफलता के साथ आगे बढ़ा जा सके
बसन्त पर्व तक कौन कितने सदस्य बनाता है इसके लिये स्वस्थ प्रतिस्पर्धा चलनी चाहिए। लक्ष्य यह रहना चाहिए कि अगले वर्श अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या कम से कम पाँच गुनी अवश्य हो जाय। इसके लिये हम सब अपना व्यक्तिगत कर्तव्य यह माने कि अपनी भाव भरी श्रद्धांजलि अधिक सदस्य बनाने और बढ़ाने के रूप में प्रस्तुत करेंगे
प्रत्येक महत्त्वपूर्ण कार्य का आरम्भ उन्होंने बसन्त पर्व से ही किया है। पन्द्रह वर्श की आयु में गायत्री महापुरश्चरण की शृंखला का आरम्भ - अखण्ड-ज्योति पत्रिका का प्रकाशन - गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास - सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ का संकल्प - वेदों के अनुवाद का श्रीगणेश - युग-निर्माण पत्रिका का आरम्भ - मराठी, अंग्रेजी गुजराती आदि पत्रिकाओं का प्रकाशन - युग- निर्माण प्रेस की स्थापना - गायत्री परिवार एवं युग- निर्माण परिवार का प्रारम्भ - शान्तिकुञ्ज का संस्थापन प्रभृति अनेकों ज्ञात और अविज्ञात कार्य गुरुदेव द्वारा आरम्भ किये गये। मंगल कार्यों का शुभारम्भ इसी वसन्त पर्व में होता रहा है
इन सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अखण्ड-ज्योति तथा युग-निर्माण पत्रिकाओं के सदस्य बनाने और बढ़ाने के लिए उन्हीं दिनों टोली बनाकर निकलना चाहिए पुराने सदस्यों से तो चन्दा वसूल करना ही चाहिये नये सदस्य बनाने का अभियान भी आरम्भ करना चाहिए। यह पत्रिकाएँ ही गुरुदेव की वाणी है वे अधिक लोगों तक मिशन का प्रकाश पहुँचा सके इसके लिये अनिवार्य रूप से यह आवश्यक है कि उनकी प्रेरणा को नियमित रूप से ग्रहण करते रहने वालों की संख्या बढ़ाई जाय और यह कार्य मात्र पत्रिकाओं की सदस्य संस्था बढ़ाने से ही सम्भव हो सकता है। बसन्त पर्व तक कौन कितने सदस्य बनाता है इसके लिये स्वस्थ प्रतिस्पर्धा चलनी चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-May
गायत्री नगर में देव परिवार, बसाने की योजना, निश्चित रूप से अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को उपयुक्त समय पर उपयुक्त कदम उठाये जाने के रूप में स्वभावतः प्रिय लगेगी। तिनी मनःस्थिति और परिस्थिति उसके लिए उपयुक्त है। वे उसमें सम्मिलित होने का प्रयत्न भी करेंगे
इस पुनरावर्तन में अखण्ड-ज्योति के प्रबुद्ध परिजन अन्यान्यों से एक कदम आगे बढ़कर अपनी भूमिका निभा सकते है। प्राचीन तत्वदर्शन को जीवन व्यवहार में उतारने की अभिनव प्रयोगशाला गायत्री नगर के रूप में खड़ी की गई है। अब इसमें देव परिवार बसाने का दूसरा चरण उठाया जाना है इस धरती को उस साधना में प्रवृत्त किया जायेगा जिसमें भूत कालीन प्रचलनों को व्यवहार में उतारने का प्रयत्न प्रमुख है स्पष्ट है कि साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा का चतुर्विध उपचार ही व्यक्तित्व निर्माण का, आत्मविकास का, ईश्वर प्राप्ति का सुनिश्चित आधार है, इससे कम से वास्तविक आत्मोत्कर्ष सम्भव नहीं, इस प्रक्रिया को अपनाने के उपरान्त और कुछ अधिक खोजने की आवश्यकता नहीं रह जाती
प्रेषक- अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा-प्रेषक डाकघर गायत्री तपोभूमि मथुरा डाकघर
जो भी पत्र-व्यवहार करें उसकी एक प्रति अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर भी भेजने का अनुग्रह करें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य की इस प्रयोजन में सक्रिय अभिरुचि लेनी चाहिए। अपने संपर्क क्षेत्र में जो भी उसके लिए उपयुक्त हो उन्हें इस अंक को आग्रह पूर्वक पढ़वाना चाहिए। बार-बार चर्चा करनी चाहिए ओर बात को क्रमिक रूप से इस प्रकार आगे बढ़ाना चाहिए कि उनका मन जीवन लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाने की आवश्यकता अनुभव करने लगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-September
इन आयोजनों से जो ऊर्जा विस्तार प्रक्रिया सम्पन्न होगी उसका चमत्कार शीघ्र ही परिजन विराट रूप में देखेंगे। इन आयोजनों के अतिरिक्त उनके लिए जो उपासना पराक्रम महाकाल की सत्ता ने निर्धारित किया है, तत्संबंधी मार्गदर्शन देने हेतु आगामी मास की अखण्ड-ज्योति पत्रिका का अंक “उपासना विशेषाँक” के रूप में प्रकाशित होगा। इसमें अपनी स्थूल सूक्ष्म व कारण शरीर की सत्ता को निखारने व इस विशिष्ट संक्रातिकाल में विशिष्ट साधना

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-November
“कादम्बिनी” मासिक 84 रुपये वार्षिक, “सरिता” 240 रुपये वार्षिक “सर्वोत्तम” डाइजेस्ट 190 रुपये वार्षिक तथा “इण्डिया टुडे” 240 रुपये वार्षिक पर आज सबको उपलब्ध हैं। अखण्ड-ज्योति से आधे कलेवर वाली पत्रिकाओं का भी चन्दा इसके वर्तमान वार्षिक मूल्य से कहीं ज्यादा है। ऐसे में अपनी प्राणों से प्रिय पत्रिका के सतत् इससे जुड़े रहेंगे, ऐसी अपेक्षा है
अखण्ड-ज्योति मात्र कागज का, कतिपय लेखों का पुलिन्दा नहीं, अपितु वह संकल्प है जो नवयुग की स्थापना को लेकर जन्मा है व लक्ष्य पूरा होने तक अपना दायित्व निभाएगा किन्तु परोक्ष शक्ति को भी साधन तो प्रत्यक्ष ही चाहिए। अखबारी कागज, स्याही, छपाई की व्यवस्था का विशाल तंत्र आदि वे प्रत्यक्ष साधन हैं, जिनके अभाव में विचार चाहे वह कितना ही सशक्त क्यों न हो, जन-जन तक नहीं पहुँचाया जा सकता। विगत पाँच-छः वर्षों से इस क्षेत्र में अनेक झंझावात आए हैं व इन असाधारण आर्थिक आक्रमणों से डर लगता है कि कहीं ज्योति को वे प्रभावित न करें
नये पाठक-ग्राहक बढ़ाएँगे तथा पुरानों का उत्साह बढ़ाते रहेंगे। अब इस पत्रिका का बढ़ा हुआ मूल्य 40 रुपये वार्षिक ही अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर भेजा जाय। आजीवन ग्राहकों का चन्दे का मूल्य पाँच सौ पचास रुपया रहेगा
इक्कीसवीं सदी की सतयुग लाने वाली महान क्रान्ति का अपने अनोखे ढंग से संचालन अखण्ड-ज्योति ही कर रही है। इस पत्रिका की सदस्य संख्या बढ़ाने का सीधा अर्थ है युग परिवर्तन के पुण्य प्रयोजन में अपनी भी एक अंजुलि चढ़ाना। आशा है कि इस संदर्भ में परिजन पहले से भी अधिक पुरुषार्थ करेंगे
उसी कड़ी में इस वर्ष एक विशेषाँक गायत्री उपासना पर तथा पूज्य गुरुदेव के जीवन के लीला प्रसंगों पर एक अंक निकाला गया था। यदि यह सामग्री यथावत देते रहना है तो कागज का संकट सामने आ खड़ा होता है व वर्तमान दरों पर ही अखण्ड-ज्योति के साथ पृष्ठ कम करने की बात कहता है। दूसरा विकल्प यह है कि सामग्री दी जाती रहे, परिजनों को इस महत्वपूर्ण लाभ से वंचित न किया जाय एवं चन्दा इतना बढ़ा दिया जाय कि लागत मूल्य पर पत्रिका सब तक पहुँचती रहे। कोई भी परिजन सामग्री में घटोत्तरी के लिए तैयार नहीं है
परम पूज्य गुरुदेव की वाणी, उनका हृदय तथा उनका अंतःकरण तीनों “अखण्ड-ज्योति” में समाहित हैं। यह वह पावन प्रवाह है जो अविरल गति से बढ़ता व मूर्च्छितों में जीवन स्पन्दन पहुँचाता रहेगा। 1940 में प्रज्वलित की गयी यह ज्योति घोर तमिस्रा भरे समय में भी अपने पुरुषार्थ से प्रकाश किरणें बिखेरकर आदर्शवादी दुस्साहस दिखाती रही है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-May
इस वर्ष का जून 21 का अखण्ड-ज्योति अंक भी बड़े आकार का होगा व पूज्य गुरुदेव संबंधी विशिष्ट सामग्री से युक्त होगा। इसका अलग से कोई अधिक मूल्य न होगा व सब के लिए उपलब्ध रहेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
“गायत्री चर्चा” नामक स्तंभ के माध्यम से पूज्य गुरुदेव ने “अखण्ड-ज्योति” के पाठकों को प्रेरणा दी कि वे गायत्री उपासना को जीवन में स्थान दें। इसके चमत्कारी परिणामों से लेकर जीवन के ऊँचा उठने तक की बातें उनने पत्रिका,किताबों व व्यक्तिगत पत्र से सब तक पहुँचायी। जिनने सही अर्थों में गायत्री को समझा व जीवन में उसकी साधना को उतारा उसका जीवन ही बदल गया
यह वस्तुतः उनकी साधना की प्रत्यक्ष सिद्धि का प्रमाण है कि आज उसी पत्रिका की पाँच लाख से अधिक प्रतियाँ आधुनिकतम मशीनों द्वारा छपती हैं व दस गुने पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं। गायत्री परिवार को जन्म वस्तुतः “अखण्ड-ज्योति” ने दिया है व इसे पूज्य गुरुदेव “नवयुग के मत्स्यावतार” की उक्ति दिया करते थे,जोकि नितान्त सटीक है
सत्य, अहिंसा, अस्तेय मैत्री, ब्रह्मचर्य, साधना, स्वाध्याय, शुचिता, सेवा के एक से एक मार्मिक प्रसंग उनके जीवनक्रम में देखें जा सकते हैं। उनके अधिक विस्तार में न जाकर जब “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका का शुभारंभ हम देखते हैं तो पाते हैं कि यह छोटा सा बीजारोपण गायत्री के तत्वज्ञान के विस्तार का था। इस बीज से जो वटवृक्ष बनने वाला था, उसी की छाया में अगले दिनों गायत्री परिवार तथा युगनिर्माण योजना नामक विशाल संगठन बनना था। “एकोहं बहुस्यामि” का मूल मंत्र उनने “अखण्ड-ज्योति” के प्रकाशन से कार्य रूप में उतारना आरंभ किया व चिट्ठी की तरह निकली प्रारंभिक पत्रिका की सौ प्रतियाँ देखते-देखते हजार व लाखों में छपने लगीं
इस बीज से जो वटवृक्ष बनने वाला था, उसी की छाया में अगले दिनों गायत्री परिवार तथा युगनिर्माण योजना नामक विशाल संगठन बनना था। “एकोहं बहुस्यामि” का मूल मंत्र उनने “अखण्ड-ज्योति” के प्रकाशन से कार्य रूप में उतारना आरंभ किया व चिट्ठी की तरह निकली प्रारंभिक पत्रिका की सौ प्रतियाँ देखते-देखते हजार व लाखों में छपने लगीं। यह वस्तुतः उनकी साधना की प्रत्यक्ष सिद्धि का प्रमाण है कि आज उसी पत्रिका की पाँच लाख से अधिक प्रतियाँ आधुनिकतम मशीनों द्वारा छपती हैं व दस गुने पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं। गायत्री परिवार को जन्म वस्तुतः “अखण्ड-ज्योति” ने दिया है व इसे पूज्य गुरुदेव “नवयुग के मत्स्यावतार” की उक्ति दिया करते थे,जोकि नितान्त सटीक है
नित्य यहाँ 24 लक्ष का जप सतत् चलता रहता है। 67 वर्ष से जलने वाली अखण्ड-ज्योति की यहाँ अनुपम स्थापना है जिसका दर्शन मात्र समस्त भवबन्धनों आधि-व्याधियों, दुःख तापों से मुक्ति दिलाने में समर्थ है। नौ कुण्डों की यज्ञशाला में अनुष्ठानी साधकों द्वारा सहस्राधिक आहुतियों का यज्ञ नित्य होता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
परिवर्तन प्रक्रिया की पृष्ठभूमि तैयार करने की ईश्वरीय जिम्मेदारी कुछ विशेष आत्माओं पर सौंपी गयी है। उन्हीं को “अखण्ड-ज्योति परिवार “ के अंतर्गत संगठित कर दिया गया है। जो आत्माएँ बाहर हैं, वे भी अगले प्रवाह में साथ हो लेंगी। ” इन आत्माओं का आह्वान वे 1971 के बाद अखण्ड-ज्योति के लेखों द्वारा सतत् करते रहे
जब जून 1991 की अखण्ड-ज्योति पत्रिका को एक विशेषाँक का रूप देने की बात आयी तो उसी ऋषि सत्ता ने प्रेरणा दी कि अब एक वर्ष बाद अंशरूप में वह सब क्रमशः दिया जा सकता है जिसे पढ़ने जानने की अनेकों को ललक रही है। जिसे पढ़कर अगणित व्यक्तियों की शंकाओं का समाधान होगा तथा जिसका स्वाध्याय करने पर अनेकों की आस्थाएँ मजबूत होंगी। यह एक अविस्मरणीय तथ्य है कि “अखण्ड-ज्योति” एक शाश्वत-सनातन विचारधारा है जो परमपूज्य गुरुदेव की प्राण चेतना का साकार रूप है
जो आत्माएँ बाहर हैं, वे भी अगले प्रवाह में साथ हो लेंगी। ” इन आत्माओं का आह्वान वे 1971 के बाद अखण्ड-ज्योति के लेखों द्वारा सतत् करते रहे। 1980-81 में जब शाँतिकुँज में देव परिवार बसाने की उनने चर्चा की तब भी इसी पक्ष को प्रधानता दी। बाद में 1988 में 12 वर्षीय युग संधि पुरश्चरण आरंभ करते समय भी विशिष्ट आत्माओं के जन्म लेने की, या जन्म ले चुकी हैं तो उन्हें आत्म बोध होने की उनने बार-बार चर्चा की
किन्तु कभी कभी यह भी अनिवार्य हो जाता है। जब पूज्यवर के महाप्रयाण के पश्चात् अगस्त-सितम्बर 1990 के अखण्ड-ज्योति संयुक्ताँक के रूप में एक स्मृति विशेषाँक प्रकाशित हुआ जब कई स्वजनों की इच्छा थी कि इसमें वह सब पढ़ने को मिले जो वे अपनी गुरुसत्ता के बारे में जानना चाहते थे, जिसका उनने अपने जीवन में अनुभूति रस के रूप में रसास्वादन किया था, पर शब्द रूप में वे एक धरोहर की तरह जिसे अपने पास सुरक्षित रखना चाह रहे थे। इस दृष्टि से स्मृति विशेषाँक से संभवतः उन्हें निराशा मिली होगी क्योंकि उसमें युगपुरुष के विराट रूप के मिशन का विशद वृत्तांत था। लिखा भी वह उसी सत्ता की प्रेरणावश ही गया था
साथ ही यह भी प्रमाणित होता है कि जटिलतम प्रतिकूलताओं से भी मोर्चा लेकर अपने लिए अपना भाग्य विनिर्मित कर पाना हर किसी के लिए संभव है। लक्ष्यसिद्धि की यात्रा की ज्योतिर्विज्ञान सम्मत व्याख्या यहाँ अखण्ड-ज्योति परिवार के विद्वान डॉ. प्रेम भारती (सारंगपुर, म.प्र.) के एक विशिष्ट अनुसंधान के आधार पर प्रस्तुत है। स्वयं पूज्य गुरुदेव एक प्रकाण्ड ज्योतिर्विद् थे व उनने स्वयं से जुड़ी सारी संभावनाओं का अध्ययन कर अपना भाग्य स्वयं अपने हाथों विनिर्मित किया था, वह इस अध्ययन से प्रतिपादित होता है। पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी की जन्म कुण्डली इस प्रकार स्वीकृत की गयी है
जिसे पढ़कर अगणित व्यक्तियों की शंकाओं का समाधान होगा तथा जिसका स्वाध्याय करने पर अनेकों की आस्थाएँ मजबूत होंगी। यह एक अविस्मरणीय तथ्य है कि “अखण्ड-ज्योति” एक शाश्वत-सनातन विचारधारा है जो परमपूज्य गुरुदेव की प्राण चेतना का साकार रूप है। पुस्तककार कोई जीवनी देने के पूर्व सर्व सामान्य जानकारी योग्य समझे गए संस्मरण पहले “अखण्ड-ज्योति” के विचार प्रवाह के रूप में ही दिये जायें, यही प्रेरणा शक्ति स्वरूप वंदनीया माताजी ने दी। वंदनीया माताजी जिनका जीवन पूज्यवर के जीवन से अविभाज्य है, सतत् पाण्डिचेरी की श्री माँ की तरह कहती रही हैं-”विदाउट हिम आय एक्जिस्ट नाट, विदाउट मी ही इज अनमेनीफेस्ट” (उनके बिना मेरा अस्तित्व नहीं है वह मेरे बिना उनकी कल्पना नहीं हो सकती)
चौबीस वर्ष तक जिसके मार्गदर्शन संरक्षण में पूज्य गुरुदेव के महापुरश्चरण संपन्न हुए वह अखण्ड दीपक यहाँ स्थापित है। उसी के प्रकाश में “अखण्ड-ज्योति” का लेखन कार्य संपन्न होता गया तथा अनेक करोड़ होता है। वंदनीया माताजी ने 16 कुमारिकाओं द्वारा यहीं अखण्ड महापुरश्चरण संपन्न कराया। परम पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना जो वर्षों चली, यहीं संपन्न हुई
अक्टूबर 1967 में “महाकाल एवं उसकी युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के अंतर्गत पूज्यवर ने “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका में लिखा कि “विशेष प्रयोजन के लिए विशिष्ट आत्माओं का अवतरण हो चुका है। परिवर्तन प्रक्रिया की पृष्ठभूमि तैयार करने की ईश्वरीय जिम्मेदारी कुछ विशेष आत्माओं पर सौंपी गयी है। उन्हीं को “अखण्ड-ज्योति परिवार “ के अंतर्गत संगठित कर दिया गया है
जहाँ परम पूज्य गुरुदेव ने पुरुषार्थ को प्रधानता दी व फलित ज्योतिष के निराशावादी, अकर्मण्य बना देने वाले स्वरूप का जीवन भर खण्डन किया, वहाँ स्वयं उनके जीवन में ज्योतिर्विज्ञान ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उज्ज्वल भविष्य के प्रवक्ता के रूप में वे अखण्ड-ज्योति के प्रकाशन वर्षों से ही सृजनात्मक चिन्तन को बढ़ावा देते आए हैं। स्वयं उनने लिखा है कि अन्तर्ग्रही प्रभावों की वैज्ञानिकता को समझा व दृश्य गणित पर आधारित ज्योतिर्विज्ञान को मान्यता दी जानी चाहिए। सत्प्रेरणा देने वाले व्यक्ति को विधेयात्मक चिन्तन की ओर ले जाने वाले ज्योतिर्विज्ञान के समर्थक होने के नाते उनने गायत्री नगर में देव परिवार बसाने के लिए एक वेधशाला स्थापित की, पंचाँग प्रकाशित कराया तथा यहाँ से जन्म समय के आधार पर श्रेष्ठता की दिशा में चलने का मार्गदर्शन तंत्र चलाया
यह एक अविस्मरणीय तथ्य है कि “अखण्ड-ज्योति” एक शाश्वत-सनातन विचारधारा है जो परमपूज्य गुरुदेव की प्राण चेतना का साकार रूप है। पुस्तककार कोई जीवनी देने के पूर्व सर्व सामान्य जानकारी योग्य समझे गए संस्मरण पहले “अखण्ड-ज्योति” के विचार प्रवाह के रूप में ही दिये जायें, यही प्रेरणा शक्ति स्वरूप वंदनीया माताजी ने दी। वंदनीया माताजी जिनका जीवन पूज्यवर के जीवन से अविभाज्य है, सतत् पाण्डिचेरी की श्री माँ की तरह कहती रही हैं-”विदाउट हिम आय एक्जिस्ट नाट, विदाउट मी ही इज अनमेनीफेस्ट” (उनके बिना मेरा अस्तित्व नहीं है वह मेरे बिना उनकी कल्पना नहीं हो सकती)। उन्हीं प्रातः स्मरणीया स्नेहसलिला माँ की प्रेरणा से यह अंक श्रद्धा सुमन के रूप में पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में समर्पित है इस भाव के साथ कि हम कोई पुरुषार्थ नहीं कर रहे आपका काम कर आपका कर्ज चुका रहे हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-December
अखण्ड-ज्योति परिजनों के लिए विशेष सामयिक संदर्भ-
सर्वविदित है कि अखण्ड-ज्योति के पृष्ठो पर मात्र विचार प्रतिपादनों का ही उल्लेख नहीं रहता, वरन् उसमें ऐसी प्राणवान प्रेरणाएँ भी भरी रहती हैं कि पाठकों के मन, मस्तिष्क और अंतराल को भी हिलाकर रख दें। उपयुक्त मार्ग दर्शन प्रदान करें और ऐसा साहस भी जिसके सहारे आदर्श निर्वाह का कठिन दिखने वाले मार्ग पर उल्लास पूर्वक चलते जा सकें। यही कारण है कि इस परिकर के वाचक प्रकारान्तर से युग सृजन के क्रिया कलापों में किसी न किसी प्रकार नियमित रूप से लम्बे समय से भाग लेते चलें आ रहें हैं
इस प्रकार क्रियाकलापों में संलग्न होने वाले अखण्ड-ज्योति के परिजन ‘व्रतधारी प्रज्ञापुत्र’ कहलावेंगे। इन्हें तैयार तो स्थानीय प्रज्ञा मण्डल ही करेंगे, पर उन्हें कुम्हार के अवे की तरह पकाया शाँतिकुँज में जायेगा। इससे वे युगशिल्पी नल-नील की, अंगद-हनुमान की भूमिका निभा सकने के लिए इस महाक्राँति के अंशधर बन सकेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-January
उच्च शिक्षा प्राप्त गृह कार्यों में निर्वाह आजीविका की दृष्टि से आत्म निर्भर व्यक्ति ही इस कार्य में सहयोगी सिद्ध हो सकेंगे। ऐसी प्रतिभाएं अखण्ड-ज्योति परिवार में हों और वे अपना समय दान उदारता पूर्वक परमार्थ बुद्धि से दे सकें तो अपना विस्तृत परिचय देते हुए पत्र व्यवहार कर लें। यह समयदान उन्हें हरिद्वार रहकर ही देना होगा प्रस्तुत शोध कार्य ऐसा नहीं है जो अपने घरों पर रहकर भी संपन्न किया जा सके
अखण्ड-ज्योति परिवार की नर्सरी में उगने बौर बढ़ने वाले पौधे अगले दिनों विश्व परिवार के नंदनवन विकसित कर सकें और अपने कल्प वृक्ष जैसे अस्तित्व व्यक्ति की विशिष्टता को देवोपम सिद्ध कर सके, प्रयत्न इसी का चल रहा है। अपनी पारिवारिकता का यही उद्देश्य और यही स्वरूप है। सफलता कहाँ तक मिलती है यह दूसरी बात है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-June
मानव मस्तिष्क एक जादुई पिटारा है। उसमें संग्रहित स्मृतियों की यदि लिपिबद्ध किया जाय और छाया जाय तो साधारण से साधारण मनुष्य के मन में इतनी स्मृतियाँ भरी पड़ी हैं कि उनसे अखण्ड-ज्योति के आकार की 32 अरब पृष्ठों मोटी के बराबर छपी हुई सामग्री निकल सकती है। यह तो तब है जबकि कहा जाता है साधारण व्यक्तियों में मस्तिष्कीय क्षमता का चार प्रतिशत से भी कम अंश काम में लाया जाता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-November
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजन ही अब तक शान्ति कुँज आते रहे हैं। सृजन शिक्षण के कार्य में जिन युग शिल्पियों की आवश्यकता थी, उन्हीं को सत्रों में बुलाया जाता रहा है। स्थान सम्बन्धी असुविधा रहने के कारण स्त्री, बच्चों को साथ लाने पर रोक रही है
आचार्य जी की लेखनी ने हिन्दी साहित्य के विविध आयामों को चिर प्रतीक्षित समृद्धि दी है। फलतः वे साहित्यकार तो हैं ही साथ ही वे अनन्य साधक एवं अखण्ड-ज्योति के लेखक हैं
पुस्तकें मंगाने का पता- अखण्ड-ज्योति प्रकाशन मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-August
जहाँ विश्वविद्यालय अथवा समृद्ध पुस्तकालय हैं, वहाँ उच्च शिक्षित साथी सहकारी इस प्रयोजन के लिए ढूँढ़े और सदस्य बनाये जा रहे हैं। अखण्ड-ज्योति परिजनों में से जो इसके लिए अपने को उपयुक्त समझे वे सदस्यता प्राप्त कर अपना नाम पंजीकृत करा लें। इन सदस्यों का प्रथम विचार विनिमय सात दिवसीय सत्र दशहरा दिवाली की छुट्टियों में ता. 5 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 76 तक शांतिकुंज में लगेगा। शोध सदस्यों को इसमें सम्मिलित होने के लिए कहा गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-March
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-February
युग-चेतना के उभार की इस भाव-भरी बेला में सृजन शिल्पियों की सर्वोपरि आवश्यकता है। अखण्ड-ज्योति परिवार की जागृत-आत्माओं को इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए आगे आने का युग निमंत्रण इन पंक्तियों के द्वारा रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष में एक बार फिर से भेजा जा रहा है
अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में प्रव्रज्या अभियान के संदर्भ में प्रकाश डाला और उसका स्वरूप तथा कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता रहा है। व्यक्ति की समस्त जागृत सफलताओं में से प्रत्येक को समयदान के लिए अनुरोध किया गया है और उसके उपयोग का प्रधान उपाय जन-संपर्क के लिए परिभ्रमण सुझाया गया है। यों व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुसार ऐसा भी हो सकता है कि अन्य उपायों से बाहर न जा सकने की स्थिति में भी, प्रव्रज्या का उद्देश्य पूरा कर सकने में योगदान दे सकें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-June
उनका आत्म-विश्वास डगमगाने लगता है। ऐसी स्थिति में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अगस्त 1979 की अखण्ड-ज्योति में लिखा यह लेख उनके लिए एक विशिष्ट संजीवनी का कार्य करेगा। न केवल वे बाह्य व आन्तरिक आक्रमणों की ओर से जागरुक रहेंगे, अपना मन्यु जगाकर परमसत्ता के विधान पर अटल विश्वास रख और सक्रिय हो सकेंगे। इसी आशय से यह लेख यहाँ गायत्री जयंती परमपूज्य गुरुदेव की महाप्रयाण तिथि की बेला में जन-साधारण के लिए पुनः प्रकाशित किया जा रहा है
अखण्ड-ज्योति के आगामी दा विशेषाँक अखण्ड-ज्योति पत्रिका परमपूज्य गुरुदेव के प्राण प्रवाह चेतनापुँज के रूप में प्रकाशित होती है। इसका जुलाई अंक ऋषियुग्म को गुरु पूर्णिमा की पावन वेला में समर्पित है। कुछ दुर्लभ संस्मरणों-पत्रों व चित्रों के साथ इस विशेषाँक को संग्रहणीय मानकर अधिक से अधिक परिजनों तक इसे पहुँचायें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-September
सोऽहं की हंसयोग साधना नादयोग, त्राटक, ज्योति अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनाएँ मूलतः ध्यानपरक हैं। इनसे अखण्ड-ज्योति के मनस्वी पाठक परिचित भी हैं। समयानुसार अपनी दिनचर्या में उन्होंने इनको यथोचित स्थान भी दे रखा है
परमवंदनीया माताजी के द्वारा इसी के साथ-साथ देव संस्कृति दिग्विजय के निमित्त भारत व विदेश में सत्ताईस आश्वमेधिक पुरुषार्थ सम्पन्न करने के संकेत दिए गए। नवम्बर 1992 का ‘अखण्ड-ज्योति’ विशेषांक इसी निमित्त प्रकाशित हुआ था। इसके अतिरिक्त जून, जुलाई, अगस्त 1992 के ‘अखण्ड-ज्योति’ के विशेषाँक भी भारतीय संस्कृति, देव-संस्कृति, विश्व-संस्कृति के विभिन्न आयामों पर केन्द्रित हो प्रकाशित हुए। नवम्बर 1992 में जयपुर (राजस्थान) से आरम्भ हुआ आश्वमेधिक यज्ञ अभियान ग्रामतीर्थ स्थापना, ग्राम प्रदक्षिणा, जल-रजवंदन जैसे त्रिसूत्री अभियान के बाद विराट 1008 कुण्डी यज्ञायोजनों के रूप में आरम्भ हुआ, जिसमें प्रत्येक में न्यूनतम पचास हजार से एक लाख व्यक्तियों की समयदान व अंशदान की आहुतियाँ पड़ी-इससे प्रायः दस से पंद्रह गुना अधिक व्यक्तियों ने भावपूर्वक इनमें भागीदारी की
इसकी विधिवत् शुरुआत परमपूज्य गुरुदेव ने पहली बार 1954 के नरमेध से की थी। उन्होंने उस समय के अधिकतम एक हजार रहे अखण्ड-ज्योति के पाठकों से विश्व के लिए आत्मनिर्माण हेतु नरमेध अर्थात् समाज-सेवा के लिए नचिकेता और शतमन्यु की तरह सम्पूर्ण समर्पण का आग्रह किया था। यह परमेध या उस समय का एक अद्भुत कौतुक था, पुरातन मान्यता के अनुसार इसे मनुष्यों की बलि माना गया था और उसे देखने के लिए सारी मथुरा उमड़ पड़ती थी। तब टूटे-टाटे कुल 27 व्यक्ति मिले थे
गुजराती भाषा में युगशक्ति की प्रकाशन संख्या 125,000 है। इसी क्रम में अखण्ड-ज्योति के तेलगू,मराठी, बंगाली, एवं उड़िया संस्करण भी प्रकाशित होते हैं। जो जन-जन को संजीवनी-विद्या को सुगम बोध कराने में सक्षम एवं समर्थ भूमिका अतिरिक्त युगसाहित्य के रूप में लगभग अब तक 3,000 से भी अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। इनमें से कइयों के गुजराती, मराठी, बंगाली एवं उड़िया व तेलगू संस्करण उपलब्ध है
1976, 77, 78, 79 में प्रतिमाह 140 महिलाएँ और इन्हीं प्रथम तीन वर्षों में 3 माह का प्रशिक्षण लेकर क्रमश 400, 550 तथा 480 महिलाएँ कार्यक्षेत्र में उतरीं और महिला जागरण अभियान को गतिशील किया। नियमित रूप से अखण्ड-ज्योति, युगनिर्माण योजना, युगशक्ति गायत्री सभी भाषाओं की पत्रिकाएँ थोक में मंगाकर ज्ञानदान देने वालों की संख्या भी प्रायः 25 हजार से अधिक है। ज्ञातव्य है कि इस पत्रिका को बाहर लाख से अधिक संख्या में ‘नो प्रोफिट नो लॉस’ की स्थिति में छाया जाता है। यह उपलब्धियाँ अपने आपमें एक सशक्त-समर्थ संगठन का पर्याय है
नवम्बर 1992 का ‘अखण्ड-ज्योति’ विशेषांक इसी निमित्त प्रकाशित हुआ था। इसके अतिरिक्त जून, जुलाई, अगस्त 1992 के ‘अखण्ड-ज्योति’ के विशेषाँक भी भारतीय संस्कृति, देव-संस्कृति, विश्व-संस्कृति के विभिन्न आयामों पर केन्द्रित हो प्रकाशित हुए। नवम्बर 1992 में जयपुर (राजस्थान) से आरम्भ हुआ आश्वमेधिक यज्ञ अभियान ग्रामतीर्थ स्थापना, ग्राम प्रदक्षिणा, जल-रजवंदन जैसे त्रिसूत्री अभियान के बाद विराट 1008 कुण्डी यज्ञायोजनों के रूप में आरम्भ हुआ, जिसमें प्रत्येक में न्यूनतम पचास हजार से एक लाख व्यक्तियों की समयदान व अंशदान की आहुतियाँ पड़ी-इससे प्रायः दस से पंद्रह गुना अधिक व्यक्तियों ने भावपूर्वक इनमें भागीदारी की। इस अभियान का प्रथम विराम 28 वें कार्यक्रम के रूप में युगसंधि महापुरश्चरण की प्रथम पूर्णाहुति के रूप में 3, 4, 5, 6, 7 नवम्बर 1995 की तारीखों में आँवलखेड़ा (आगरा) गुरु ग्राम में सम्पन्न विराट आयोजन के रूप में हुआ, जिसमें पचास लाख से अधिक परिजनों की भागीदारी रही
संजीवनी-विद्या के तत्वज्ञान को युगानुरूप वैज्ञानिक प्रतिपादन करने वाली मासिक पत्रिका अखण्ड-ज्योति 5 लाख प्रतिमास छपती है। इसी तरह युग-प्रवाह को जन-जीवन तक पहुँचाने वाली 50,000 है। गुजराती भाषा में युगशक्ति की प्रकाशन संख्या 125,000 है
आयोजन छोटे रहे हों, बड़े या मध्यम, अखण्ड-ज्योति के लेख रहे हों या बौद्धिक प्रवचन, पूज्य गुरुदेव ने अपनी याचना कभी बंद नहीं की। फलतः 1958 के हजार कुँडी या में नैष्ठिक स्तर के चार समर्पित आत्मदानी परमपूज्य गुरुदेव को मिले, जिन्हें गुरुदेव ने पुत्रवत् स्नेह दिया, प्रशिक्षण दिया। अधिकार दिए और उन्हें अपने समान कार्यक्षेत्र में उतारा
पिछले 25 वर्षों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करें तो उसके लिए अखण्ड-ज्योति का एक सम्पूर्ण विशेषाँक ही बनाना पड़ेगा। इसलिए यहाँ मात्र 19991 से अब तक के कर्तृत्व एवं उपलब्धियों का उल्लेख किया जा रहा है। गत 25 वर्षों के न तो संकल्पों का उल्लेख है न व्यक्तिगत प्रयत्नों का

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-November
अखण्ड-ज्योति समष्टि के अनंत प्रकाश की प्रतीक है। कितने ही मंदिर ऐसे होते हैं जहाँ अखण्ड-ज्योति की रक्षा की जाती थी। अब वे कहाँ रहे जहाँ अखण्ड दीपों की रक्षा की जाती हो। अखण्ड नियम और अखण्ड दीपक की रक्षा एक ही बात है
यज्ञ की अग्नि तो हवन-कुण्ड में समाप्त हो जाती है, पर अखण्ड-ज्योति तो कई-कई दिन रखी जाती है। अखण्ड-ज्योति समष्टि के अनंत प्रकाश की प्रतीक है। कितने ही मंदिर ऐसे होते हैं जहाँ अखण्ड-ज्योति की रक्षा की जाती थी। अब वे कहाँ रहे जहाँ अखण्ड दीपों की रक्षा की जाती हो
ये तो किन्हीं-किन्हीं ऋषियों के यहाँ और किन्हीं-किन्हीं महत्वपूर्ण व्यक्तियों के यहाँ पाई जाती है। हमने भी अखण्ड-ज्योति जलाई है, ताकि आप अखण्ड-ज्योति को और गायत्री माता को अपने कंधों पर, अपने हृदय पर रखे, साथ ही साथ और लोगों के कंधों पर, अपने हृदय पर रखें, साथ ही साथ और लोगों के कंधों पर भी उन्हें स्थापित करें। यह काम आपको करना ही पड़ेगा। इसका यह नियम है कि स्वयं प्रकाशित हों और अन्यों को भी प्रकाशित करें, प्रेरित करें
इसके लिए अपने अंतराल में छिपी दिव्य-ज्योति को जाग्रत करना पड़ता है। यज्ञ की अग्नि तो हवन-कुण्ड में समाप्त हो जाती है, पर अखण्ड-ज्योति तो कई-कई दिन रखी जाती है। अखण्ड-ज्योति समष्टि के अनंत प्रकाश की प्रतीक है। कितने ही मंदिर ऐसे होते हैं जहाँ अखण्ड-ज्योति की रक्षा की जाती थी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
व्यक्तिगत स्तर पर कइयों को अनुभूतियाँ सावित्री साधना के दौरान हुईं जिन्हें 1984-85 की अखण्ड-ज्योति के विभिन्न अंकों में प्रकाशित किया गया था। यहाँ कुछ संस्मरण उस समय उस के बाद की अवधि के हम दे रहे हैं, जो मात्र एक झलक देते हैं प्रज्ञावतार की उस दिव्यसत्ता की, जो सतत् हम सभी परिजनों के आस-पास है हमारे योगक्षेमं का वहन करने को तत्पर है
फिर संबंध कैसे स्थापित हो। परमपूज्य गुरुदेव के जीवनकाल में अंतिम विशेषांक अखण्ड-ज्योति पत्रिका के अप्रैल 1990 अंक के रूप में प्रकाशित हुआ था, वही बाद में एक पुस्तकाकार में ‘इक्कीसवीं सदी के लिये हमें क्या करना होगा?” शीर्षक से सबको उपलब्ध हुआ। उसी से कुछ पंक्तियाँ ऐसे पाठकों के लिये उद्धृत हैं- “कोई यह न समझे कि दीप बुझ गया और प्रगति का क्रम रुक गया। दृश्य शरीर रूपी गोबर की मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिये नियुक्त किया गया प्रहरी अगली शताब्दी तक पूरी जागरुकता के साथ अपनी जिम्मेदारी वहन करता रहेगा
अखण्ड-ज्योति संस्थान
आज से पचास वर्ष पहले जब समूचा राष्ट्र स्वाधीनता-प्राप्ति की खुशी मना रहा था, उस समय स्वतन्त्रता संग्राम के जुझारू सेनानी, अनन्य राष्ट्रभक्त परमपूज्य गुरुदेव किसी गहन चिन्तन में निमग्न थे। अखण्ड-ज्योति कार्यालय मथुरा के अपने एकान्त कक्ष में बैठे वह सोच रहे थे कि इस स्वाधीनता को पूर्ण कैसे किया जाय ? उनकी आँखें खुशी और गम आँसुओं से भीगी थीं। उन्हें खुशी थी, निश्चित ही बेहद खुशी, क्योंकि आज भारतमाता की गुलामी की बेड़ियाँ टूट गईं। वह आजाद हो गयीं
पूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण के इस गुह्यविज्ञान को और स्पष्ट करते हुए अपनी उस अवधि में प्रकाशित अखण्ड-ज्योति के मार्गदर्शन में लिखा है कि “इस प्रक्रिया में अपनी प्राणऊर्जा को इतना प्रचण्ड किया जाता है कि उससे अपने ही अन्तराल में सन्निहित पाँच कोष इतने गरम हो सकें कि एक स्वतंत्र इकाई के रूप में उनकी सत्ता विनिर्मित हो सके। ” वस्तुतः इस साधना के बाद ही मिशन के विराट पंचकोशी शरीर में वह मोड़ आया कि वह भी विराट रूप लेता चला गया। न जाने कितने व्यक्तियों को अपनी ध्यान साधना में, स्वप्नों में, रोजमर्रा के जीवन में ऐसा मार्गदर्शन अनुभूतियों के रूप में मिलता चला गया कि जिसका विवरण संकलित करने पर एक विशाल ग्रन्थ का निर्माण किया जा सकता है
अखण्ड-ज्योति संस्थान घीयामण्डी मथुरा-क्-ख्ब् में प्रज्ज्वलित अखण्ड-ज्योति दीपक के साथ पूज्य गुरुदेव आगरा से मथुरा आए। दो तीन मकान बदलने के बाद वे वर्तमान मकान में जिसे भुतहा करार दिया गया था। पूज्यवर को यहाँ से अपनी प्राणचेतना के विस्तार हेतु अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रकाशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था
लेकिन भला उनके जैसा उच्च व्यक्तित्व ऐसी कौतूहल-वर्धक कथाएँ गढ़कर किसी को भ्रमित करने की चेष्टा क्यों करेगा ? फिर ये बातें उन्होंने सिर्फ वन्दनीया माताजी को ही बतायी थीं। इतने समय बाद इनकी चर्चा अखण्ड-ज्योति की इन पंक्तियों में की जा रही है। वह भी सिर्फ इसलिए कि हिमालय की दिव्यता को समझाया जा सके
संयोगवश कभी दोनों बिछड़ भी जाते हैं, फिर भी एक दूसरे को ढूँढ़ने और पुकारने में कमी नहीं रहने देते। वर्तमान अखण्ड-ज्योति पत्रिका- पाठकों का, अपने परिवार का परिकर अगले दिनों बढ़ सकता है, पर घटेगा नहीं। मिशन की पत्रिकाओं के रूप में प्रकाश-चेतना हर माह अपने पाठक- परिजनों के यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से जा पहुँचती है। इससे परोक्ष मिलन एवं नियमित आदान-प्रदान का क्रम चलता रहता है
वस्तुतः यह सब सूक्ष्मजगत में घटित हो ही रहा था, 1967 की जून माह की अखण्ड-ज्योति पत्रिका में पृष्ठ 17 पर एक लेख प्रकाशित हुआ-महाकाल और उसका युग-निर्माण प्रत्यावर्तन। ’ इसमें पूज्यवर ने संकेत किया कि “आगामी तीस वर्ष अत्यन्त कष्ट भरे हैं। युगपरिवर्तन की पृष्ठभूमि बन रही है
यह स्थिति घर वापस लौटने तक बनी रही। अखण्ड-ज्योति संस्थान में पूज्य गुरुदेव के आस-पास के पशु-पक्षी उनके आस-पास फुदकने में प्रसन्नता अनुभव करते। हिमालय प्रवास में यह दशा इतनी सघन थी कि वन्य प्रदेश के सारे प्रणी उनके अपने स्वजन हो गये थे। कहते हैं कभी भरत सिंहनी के बच्चों के साथ खेलते थे, शिवाजी ने सिंहनी को दूहा था, संत ज्ञानेश्वर ने भैंसे से वेद उच्चारण कराये थे
(अप्रैल 1985 अखण्ड-ज्योति यह निर्देश चौथी हिमालय यात्रा जो सूक्ष्मशरीर से सम्पन्न हुई थी, में पूज्यवर को अपनी गुरुसत्ता से प्राप्त हुआ। क्या करना है, कैसे करना है, यह सब हिमालयवासी गुरुसत्ता ने उन्हें अपनी परावाणी से समझा दिया। पाँचों शरीर को जो पाँच काम करने थे वे इस प्रकार थे- (1) वायुमण्डल का संशोधन, (2) वातावरण का परिष्कार, (3) नवयुग का नवनिर्माण, (4) महाविनाश का निरस्त्रीकरण-समापन तथा (5) देवमानवों का उत्पादन-अभिवर्द्धन
वर्तमान निराशाजनक स्थिति में भी हम चाहें तो कल उदय होने वाले इस सौभाग्य-सूर्य की निश्चितता से स्वयं में स्फूर्ति एवं उल्लास अनुभव कर सकते हैं। परमपूज्य ने अगस्त 1947 की अखण्ड-ज्योति में एक लेख लिखा था, ‘क्या हम हार गये ?’ इस लेख में जहाँ एक ओर उनके मन में छिपी पीड़ा का अहसास मिलता है वहीं दूसरी ओर उत्साहवर्द्धक आह्वान भी है। स्वाधीनता प्राप्ति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उनके शब्द हैं-मत सोचिए कि हम हार गये। हमने खोया कुछ नहीं, कुछ न कुछ पाया ही है
” वे लिखती हैं कि उनके स्थूल शरीर की उपलब्धि देखकर नहीं लगता कि एक व्यक्ति एक शरीर से इतना काम कभी कर सकता है। पाँच शरीर कैसे ? इसकी व्याख्या वन्दनीया माताजी ने उनकी दिनचर्या का विस्तृत विश्लेषण करके अखण्ड-ज्योति नवम्बर 1971 के अंक में की है
गुरुदेव के अबोध बचपन की बातों का तो ठीक से पता नहीं, पर जब से वे कुछ समझने-समझाने लायक हुए तब से उन्होंने अपनी साहसिक शूरवीरता को ही आगे रखा। जिस गाँव में वह जन्में थे, उसी गाँव की एक वृद्ध अछूत महिला की सेवा की कहानी से तो अखण्ड-ज्योति के पाठक परिचित ही हैं। आज की स्थिति में ये बातें किसी को सामान्य लग सकती हैं। लेकिन अब से लगभग 75 साल पूर्व का जमाना दूसरा था
अपनी तप-साधना का केन्द्रबिन्दु गुरुदेव ने जिस हिमालय को बनाया, वह चेतना का ध्रुव केन्द्र भी रहा और सुलभ हिमालय का प्रदेश भी। उनकी तीन हिमालय यात्राएँ तो अखण्ड-ज्योति के पाठकों को सुविदित ही हैं। लेकिन इसके अलावा वे समय-समय पर कम या अधिक समय के लिए चौबीस पुरश्चरणों के बीच में तथा बाद में जाते रहे हैं। जब हिमालय की दिव्य सत्ताओं से मिलने की उत्कण्ठा हुई, वे सीधे हिमालय की ओर चल पड़े
उन्हें आने वाले हर परिवर्तन, काल की चाल का अहसास सतत् होता रहता है। अपने द्वितीय हिमालय प्रवास (1959-1961) से लौटकर आने के बाद से ही, जब उन्होंने ‘युगनिर्माण योजना’ के शुभारम्भ की घोषणा की-पंचकोशी साधना भी गायत्री तपोभूमि से अखण्ड-ज्योति के मार्गदर्शन के माध्यम आरम्भ करा दी थी। उनकी इस हिमालय यात्रा में सम्पादन का दायित्व परमवन्दनीया माताजी को सौंपा गया था। उनने अपनी पत्रिका के संपादकीय में लिखा-उनकी (पूज्यवर की) यह विशेष तपश्चर्या स्वर्ग-मुक्ति सिद्धि-शक्ति के लिए नहीं, क्योंकि उन्हें तो वे बहुत पहले ही प्राप्त कर चुके हैं
सामान्यजन के लिए प्रायः मौन रहने वाले कृष्णानन्द गुरुदेव के लिए पर्याप्त मुखर थे। अखण्ड-ज्योति के पाठक जानते ही होंगे कि इन्हीं स्वामी कृष्णानन्द ने महामना मालवीय जी के आग्रह पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी थी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-January
गायत्री परिवार, युग निमार्ण योजना, प्रज्ञा अभियान, शांतिकुंज की युगान्तरीय चेतना नामों से प्रख्यात हमारा यह मिशन सत्तर वर्ष पूरे कर इस माह से इकहत्तरवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। अखण्ड-ज्योति भी प्रकाशन के साठवें वर्ष में प्रवेश कर रही है। इस मध्य यह परिवार उत्तरोत्तर विराट बनता चला गया है। देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के माध्यम से अब यह संख्या करोड़ों में पहुँच गयी है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-August
स्थापना के अवसर पर चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरणों का यहाँ आयोजन किया गया। सन् १९२६ से निरन्तर जलने वाली अखण्ड-ज्योति की यहाँ अनुपम स्थापना है। अखण्ड अग्नि पर नौकुण्डीय यज्ञशाला में अनुष्ठानी साधकों द्वारा नित्य हजारों आहुतियों का यज्ञ होता है। नियमित पुरश्चरण क्रम, नवरात्रियों में सामूहिक महापुरश्चरण के अतिरिक्त स्थानीय निवासी तथा बाहर के आगन्तुक सभी अपनी साधना बड़ी मात्रा में करते हैं, जो प्रतिदिन कितने ही लक्षमंत्र जप के समकक्ष हो जाती है
इन समारोहों की तैयारियाँ भी असामान्य स्तर की होंगी, जिनमें, यहाँ के वरिष्ठ-कनिष्ठ सभी को चौतरफा नाचना पड़ेगा। अखण्ड-ज्योति का सितम्बर अंक ‘रजत जयंती समारोह विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। इन आयोजनों के यथार्थ स्वरूप का तभी अनुमान कर सकना सम्भव होगा। १५ जुलाई के प्रज्ञा अभियान पाक्षिक से भी परिजनों को भावी कार्यक्रम की स्पष्ट झलक-झाँकी मिलेगी
एक दो नहीं प्रायः पाँच सौ छोटी-बड़ी कारों और बसों का काफिला किसी अघोषित जुलूस की तरह पीछे-पीछे चलता रहा। कभी-कभी अखण्ड-ज्योति साथ लेकर चल रहे परमपूज्य गुरुदेव, वंदनीया माताजी मार्ग में रुकते तो

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-December
युगद्रष्टा परमपूज्य गुरुदेव इस सत्य की स्वीकारोक्ति करते हुए जुलाई, 1970 की अखण्ड-ज्योति में लिखते हैं- सिनेमा इस युग में एक नये जादू की तरह आया है। उसने कोमल भावना वाले उदीयमान नवयुवक-नवयुवतियों को अपने सम्मोहन पाश में कस कर जकड़ा है। यह सस्ता मनोरंजन जन-साधारण को अच्छा लगा है और एक प्रकार से सर्वत्र उसका स्वागत हुआ है
इस पृष्ठ पर जिन सूचनाओं को दिया जा रहा है, वह प्रायः सभी प्रज्ञा अभियान ‘पाक्षिक’ में पढ़ते रहे हैं। कार्यकर्ताओं को वह मुखपत्र चूँकि सब तक नहीं पहुँच पाता, इन पंक्तियों द्वारा सभी अखण्ड-ज्योति परिजनों को महाकाल के बढ़ते चरण तीव्रतर होते जा रहे इस अभियान की झलक भर दी जा रही हैं
अखण्ड-ज्योति पत्रिका अपने आप में एक ऐसी स्थापना है, जिसे हम अपनी आराध्य सत्ता परमपूज्य गुरुदेव की ‘भावकाया’ का नाम दे सकते हैं। उन्हीं के विचार इसमें विभिन्न लेखों के रूप में अभिव्यक्ति पाते हैं। 1940 से अविराम प्रकाशित हो रही यह पत्रिका संजीवनी विद्या के बहुमूल्य सूत्रों का ऐसा समुच्चय है, जैसा आज के वैचारिक प्रदूषण के युग में बड़ी मुश्किल से देखने को मिलता है
जो वार्षिक ग्राहक हैं- वे आजीवन बन सकें, तो संरक्षक बनकर एक ऐसी पूँजी को बढ़ाने के बड़भागी बनेंगे, जो हमारी आध्यात्मिक विरासत रही है व जो अगले दिनों के लिए मानवजाति का भविष्य लिखने का कार्य कर रही है। किसी को भेंट-उपहार में देने के लिए भी अखण्ड-ज्योति के एक वर्ष के चंदे से श्रेष्ठ कुछ और वरेण्य नहीं हो सकता। ज्ञानदान को सबसे बड़ा दान माना गया है
‘मन्थन’ के रूप में इसी प्रयास का शुभारम्भ किया गया है। यह वस्तुतः उसी योजना का क्रियान्वयन है, जो परमपूज्य गुरुदेव ने 1974 में बनायी थी और इसी वर्ष की नवम्बर अखण्ड-ज्योति के पृष्ठो में प्रकाशित की थी
निःशुल्क आयोजित इस वर्कशाप की प्रणेता अस्पताल की प्रमुख एवं डाँटा ब्लास्टर कैम्पेन में भारत की अगुआ रहीं डॉ. ललिता मेसन, जो पैंतीस वर्षों से वहाँ ख्याति प्राप्त चिकित्सक भी थीं। उनके द्वारा आयोजित इस वर्कशाप को अखण्ड-ज्योति पत्रिका के संपादक ने तीन खण्डों में- (1) मेडीटेशन टूवड्स रिवर्लस ऑफ स्ट्रेस, (2) आर्ट ऑफ लिविंग तथा (3) हर्बल हीलिंग। बिना किसी विराम के धाराप्रवाह अंग्रेजी में लगातार छह घंटे तक मल्टीमीडिया प्रोजेक्टर, कम्प्यूटर ग्राफिक्स व कलर ट्राँसपेरेंसी तथा प्रज्ञायोग-ध्यान-प्राणायाम-आसन आदि के प्रत्यक्ष डिमाँस्ट्रेशन द्वारा प्रस्तुति दी। तनाव के बारे में अधिकाधिक जानने को उत्सुक यह युवा प्रौढ़ दोनों ही वर्गों का सम्मिश्रित चिकित्सक समुदाय पूज्यवर की विचारधारा से अनुप्राणित हो हतप्रभ सुनता रहा
अगले दिनों कुछ विशेषांक परिजनों को पढ़ने को मिलेंगे-बसंत पंचमी के उपलक्ष्य में फरवरी का ‘युगपरिवर्तन विशेषांक गायत्री जयंती पर्व के समय ‘साधना विशेषांक तथा गुरुपूर्णिमा की पावन बेला में ‘समर्पण विशेषांक प्रकाशित करने की योजना है, जिसमें अगणित संस्करण एवं भविष्य की योजनाएँ होंगी, इसके अलावा एक विशेष तौर पर अगले ही माह से साधना-प्रक्रिया पर एक लेखमाला आरम्भ की जा रही है। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अखण्ड-ज्योति में दी जाती रही विभिन्न साधनाएँ विधि-विधान के साथ माह व वर्ष के उल्लेख के साथ प्रति माह इसमें पाठकगण पढ़ते रहेंगे। इसके अतिरिक्त हरिद्वार के कुम्भ महापर्व के सम्बन्ध में प्रथम चार माह विशेष सामग्री प्रकाशित होती रहेगी। कथा-साहित्य चुभने वाले संस्मरण, सद्वाक्यों की संख्या भी अब अधिक होगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-October
विगत माह सितम्बर 97 का अखण्ड-ज्योति का अंक ‘क्रान्ति विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ है। यह मातृसत्ता को समर्पित एक विशेषांक है। शान्तिकुञ्ज द्वारा घोषित रजत जयन्ती वर्ष संसर्ग समारोहों का विस्तार वे विवेचन इस अंक में तथ्यों, आँकड़ों एवं प्रतिपादनों के माध्यम से हुआ है
अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा- 281003

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
अध्ययन के क्रम में अनेकों विशेषताएँ एवं उपलब्धियाँ सामने आयी हैं। जिन्हें पाठकों के आग्रह पर अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित किया जाता रहेगा। विषयक विस्तारपूर्वक अध्ययन के लिए एक महाग्रन्थ का कलेवर वाँछित है, जो समयानुसार विशिष्ट शोध रीति से जनम लेगा और अध्ययन की यह शृंखला बन्धन के नहीं मुक्ति के रहस्य खोलेगी। सर्वांग मनोविज्ञान के तत्वों को जानने के बाद अपना मन बन्धन का नहीं, मुक्ति का कारण बनेगा
अनेक परिजनों ने इस स्तम्भ का स्वागत करते हुए अनेक प्रकार के सुझाव दिए हैं। कइयों ने लम्बे-लम्बे लेख लिख भेजे हैं, आग्रहपूर्वक प्रकाशन करने के दबाव के साथ तो कइयों ने राष्ट्र की, अंतर्राष्ट्रीय स्तर की समस्याएँ सुलझा पाने में अखण्ड-ज्योति की असमर्थता, अशक्यता की चर्चा कर उस पर भी अपनी टिप्पणियाँ दी हैं। कइयों को उज्ज्वल भविष्य की भवितव्यता पर संदेह है, तो कइयों को लगता है कि एक प्रश्न के समाधान से उनकी अनेक जिज्ञासाओं का उत्तर मिल जाता है। इसी ऊहापोह में विगत माह यह स्तम्भ छपने में जाने से रह गया
‘पाक्षिक’ के माध्यम से कुछ कार्यकर्त्ताओं तक ही संदेश जाता है। अखण्ड-ज्योति द्वारा यह संदेश अनेकों तक जाएगा
उत्तर- जागरुक पाठक समय समय पर कमियों को बताते रहते हैं इससे ज्ञात होता है कि अखण्ड-ज्योति कितने ध्यान से पढ़ी जाती है। प्रयास यही रहता है कि प्रेस में जाने से पूर्व पत्रिका के एक-एक लेख की एक-एक लाइन का एक-एक अक्षर प्रामाणिकता की कसौटी पर कसकर ही दिया जाय। कभी-कभी भूलवश एक-दो गलतियाँ ऐसी रह गयी है जिनके बारे में परिजनों ने पत्र भी लिखे हैं एवं आगे यही प्रयास है कि इन्हें और कड़ाई से परखकर ही छपने में जाने दिया जाय

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
भरपूर प्रयास करने पर भी डाकघर सम्बन्धी समस्याओं का निदान न हो पाने के कारण अखण्ड-ज्योति पहुँचने में अप्रत्याशित विलंब हो रहा है। अतः अखण्ड-ज्योति न पहुँचने की शिकायत प्रत्येक माह की 30 तारीख के बाद ही करनी चाहिए
*अखण्ड-ज्योति मात्र एक पत्रिका नहीं, छपे कागज का पुलिन्दा नहीं, अपितु युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा की प्राणशक्ति का एक अंश है, जो आप तक प्रत्यक्ष मार्गदर्शक के रूप में पहुंचा है
बिना किसी विज्ञापन के, बिना किसी एजेण्ट के “न लाभ न नुकसान” की नीति पर चलते हुए आदर्शों का प्रतिपादन करने वाली एक आध्यात्मिक पत्रिका कैसे सफलतापूर्वक इतनी लम्बी यात्रा पार कर सकती है, इसका एक प्रत्यक्ष जीवन्त उदाहरण अखण्ड-ज्योति है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
शिष्यत्व की साधना कहाँ से और कैसे प्रारम्भ करें? यह सवाल प्रत्येक गुरु अनुरागी के मन में रह-रहकर स्पन्दित होता है। पिछले कई महीनों से अखण्ड-ज्योति के पाठक गुरु-गीता को श्रद्धा के साथ पढ़ रहे हैं। गुरु तत्त्व की व्यापकता, समर्थता और रहस्यमय आध्यात्मिकता ने उनकी श्रद्धा को और अधिक प्रगाढ़ किया है। उनके हृदय में उफनती-उमड़ती भक्ति और भी अधिक बलवती हो गयी है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-May
शाखाओं की गतिविधियाँ, योजनाएँ, रिपोर्ट, समाचार उसी में छपते रहेंगे तथा यहाँ से जो सूचनाएँ हर महीने जाती थी, वे अब अलग से न जाकर इसी में छपा करेंगी। अखण्ड-ज्योति में वह सब समाचार बहुत संक्षेप में छापने पर भी बहुत पृष्ठ घिर जाते थे और विचार सामग्री पाठकों को कम मिलती थी। अब परिवार-पत्रिका निकलने से यह कठिनाई दूर होगी। शाखाओं की गतिविधियाँ भी ठीक तरह छप सकेंगी और अखण्ड-ज्योति में अधिक विचार सामग्री दी जा सकेगी
अब परिवार-पत्रिका निकलने से यह कठिनाई दूर होगी। शाखाओं की गतिविधियाँ भी ठीक तरह छप सकेंगी और अखण्ड-ज्योति में अधिक विचार सामग्री दी जा सकेगी। अब अखण्ड-ज्योति में शाखाओं के समाचार एवं अनुभव न छपा करेंगे। परिवार पत्रिका का ग्राहक होना प्रत्येक शाखा के लिए आवश्यक है
शाखाओं की गतिविधियाँ भी ठीक तरह छप सकेंगी और अखण्ड-ज्योति में अधिक विचार सामग्री दी जा सकेगी। अब अखण्ड-ज्योति में शाखाओं के समाचार एवं अनुभव न छपा करेंगे। परिवार पत्रिका का ग्राहक होना प्रत्येक शाखा के लिए आवश्यक है। शाखाएँ 2) चन्दा भेज दें
इसमें थोड़ी देखभाल तो है पर खर्च बहुत कम है। घी का अखण्ड दीप जैसाकि अखण्ड-ज्योति कार्यालय में जलता है 24 घंटे में प्रायः एक पाव घी खर्च करा देता है। इसमें तीस चालीस रुपया मासिक खर्च पड़ता है। पर अखण्ड अग्नि यज्ञ कुण्ड में जलती रखने में गाय के गोबर के 2-3 मन उपले एक महीने के लिये पर्याप्त होते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-August
ठीक इसी प्रकार आध्यात्मवाद के आश्रय में बिरले ही मानव भगवान् के चरणों में पहुँचने में समर्थ थे और हैं। अतः साधारणजनों की रक्षार्थ मूर्ति-पूजन के सरल साधन द्वारा मानव को प्रभु चरणों से सम्बन्ध स्थापित करने का विधान बनाकर जिस अटूट सिद्धान्त की रचना की गई, कोई कुछ भी कहे वह अखण्ड-ज्योति की भाँति आज भी सारे संसार को प्रकाश दे रही है। संसार में अन्य देशों अथवा जातियों ने मूर्ति-पूजा का आन्तरिक महत्व नहीं समझा, वरन्, मानवी आवश्यकता के कारण उसे अनजाने ही अपना लिया। अतः उस अपनाने में मूल वस्तु तो रह गई, पर अन्य भौतिक साधन नष्ट हो गये
(2) जिनके यहाँ ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में भाग लेने के लिए कोई होता, यजमान या संरक्षक तैयार नहीं हुए। (3) जिनके यहाँ न ये अखण्ड-ज्योति मँगाई जाती है न गायत्री-परिवार-पत्रिका। इनके बिना उन तक संस्था के विचार या सन्देश पहुँचने का सम्बन्ध सूत्र ही नहीं जुड़ पाता, वे शाखाएं निष्क्रिय मानकर खारिज कर दी जावेंगी। भविष्य में उन स्थानों पर शाखाएं न बनाई जायं जहाँ उपरोक्त तीन कार्य होने की सम्भावना न हो
गायत्री परिवार के द्वारा जो महत्वपूर्ण कार्य किये जा रहे हैं उनके समाचार अब अखण्ड-ज्योति में न छपकर गायत्री-परिवार-पत्रिका में छपते हैं। शाखाओं सम्बन्धी आदेश, संदेश एवं ज्ञातव्य अब उसी पत्रिका में छपते हैं। पत्रिका के अप्रैल मई, जून, जुलाई के 4 अंक निकल चुके
अखण्ड ज्योति के पाठकों के ऐसे अनेक पत्र आए हैं कि वे उन लेखों के पढ़ने से वंचित रह गए। इसलिए अगले अंक में पत्रिका के आवश्यक लेखों को अखण्ड-ज्योति में छाप रहे हैं। अगला अंक एक प्रकार से ‘गायत्री महायज्ञ अंक’ ही होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-February
इस शुभारम्भ के श्रीगणेश का आज ही उपयुक्त अवसर है। अखण्ड-ज्योति के पाठकों को इसे चूकना नहीं है। तीर्थ यात्रा एवं ब्रह्मभोज आवश्यक धर्मकृत्य हैं, इन्हें हमारे दैनिक जीवन में समुचित और स्थायी स्थान मिलना चाहिए
परन्तु पूर्व जन्म के पुण्य से श्री छेदीलालजी शर्मा वैद्य का सत्संग प्राप्त हुआ और उन्होंने मुझे सदुपदेश देकर गायत्री का जप करने की प्रेरणा की। फिर मैं ‘अखण्ड-ज्योति’ का ग्राहक बना तथा वहाँ से प्रकाशित पुस्तकें पढ़ने लगा, जिससे मेरी काया पलट हो गई और मैं पूरी तरह से धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति बन गया। इस कार्य में मेरे गुरुदेव श्री रामेश्वरप्रसाद रावत ने भी हर प्रकार से सहायता तथा प्रोत्साहन दिया। मैं वास्तव में अपने इस परिवर्तन को आश्चर्यजनक और वेदमाता का प्रसाद समझता हूँ

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-January
अखण्ड-ज्योति में छपने के लिए समाचार भेजने वाले बन्धुओं से प्रार्थना है कि प्रत्येक पत्र में अपना नाम व पता और व्यक्तियों के नाम बहुत स्पष्ट अक्षरों में लिखकर भेजें। इसमें लापरवाही करने के कारण अनेक लोगों और स्थानों के नाम गलत छप जाते हैं और बहुत से सज्जनों का नाम छोड़ भी देना पड़ता है। पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सम्पादक हर समय परिचित सज्जनों के ठीक-ठीक नाम भी स्मरण नहीं रख सकता
-सम्पादक ‘अखण्ड-ज्योति’

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-June
पता- अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-September
दिसम्बर 57 की अखण्ड-ज्योति में पृष्ठ 35 पर हिमालय निवासी त्रिकालदर्शी परम सिद्ध महात्मा विशुद्धानन्द जी महाराज की एक विशेष सन्देश द्वारा भेजी हुई एक महत्वपूर्ण चेतावनी छपी है, जिसमें उन्होंने गायत्री-परिवार को इस वर्ष अधिक सावधान रहने के लिए कहा है और संकेत किया है कि असुरता अपने नये हथियारों से आक्रमण करेगी। भ्रम, अश्रद्धा, लाँछन, लोकापवाद फैलाना तथा कोई दुर्घटना भी उत्पन्न कर सकता है। आचार्य जी के शरीर को, उनके उज्ज्वल चरित्र को, महायज्ञ के परम पवित्र कार्यक्रम को कलंकित करने के लिए कोई भी षड़यन्त्र रच सकती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-October
नैष्ठिक साधक इन दिनों अपनी साधना को तीव्र कर देते हैं। साधारण लोग जो साल के अन्य समयों में उपासना के लिए समय नहीं निकाल पाते, वे इन दिनों साँसारिक कामों से अवकाश लेकर साधना रत होते हैं, अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य इस पर्व पर अपनी सुविधा के अनुरूप कुछ न कुछ समय नवरात्रि में विशेष गायत्री साधना के लिए निकालते हैं। इस बार भी सभी परिजनों को वैसा करना चाहिए
साँस्कृतिक पुनरुत्थान के हिमालय की पुनीत तीर्थ यात्रा में अपने साथ चलने के लिए हम अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक परिजन को आह्वान करते हैं। इस मार्ग पर बढ़ाया हुआ प्रत्येक कदम पुण्यमय होगा। अनेक कठिनाइयों, व्यस्तताओं से घिरा हुआ व्यक्ति भी इस यात्रा में बहुत दूर तक हमारे साथ-साथ चल सकता है
अब तक गायत्री संस्था के इन विचारों ने जो काम किया है उसे देखते हुए आगे के लिए भी बहुत कुछ आशा की जा सकती है। छोटे से अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों की अन्तरात्माओं के इन विचारों की प्रेरणा से जो स्फूर्ति पैदा हुई है वह देशव्यापी एक प्रचण्ड संगठन के रूप में, जिसकी दो हजार शाखाएं तथा एक लाख सदस्य हैं-उपस्थित हैं। इस संगठन के द्वारा जो कार्य हो रहा है या जो होने जा रहा है उसका मूल्याँकन आज नहीं हो सकता, उसका महत्व तो आगे की पीढ़ियाँ ही समझेंगी। फिर भी यह एक प्रकट रहस्य है कि जलते हुए अन्तःकरण में से निकली हुई आग, जिनमें कुछ भी सजीवता है उन अन्तःकरणों में गर्मी पैदा किये बिना रह नहीं सकती

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-April
इसमें देश भर में फैली गायत्री शाखाओं की कार्यवाहियाँ, यज्ञों का विवरण और कार्यकर्ताओं के प्रयत्नों का उचित रूप में परिचय दिया जायगा। “अखण्ड-ज्योति” में स्थानाभाव से इन समाचारों को बहुत संक्षिप्त कर देना पड़ता था, अब इस पत्रिका में गायत्री प्रचार का वास्तविक रूप देखने को मिलेगा। प्रत्येक गायत्री शाखा का कर्तव्य है कि तुरन्त ही 2 रु. मनीआर्डर भेजकर ग्राहकों में नाम लिखा लें। प्रथम अंक 15 अप्रैल तक तैयार होकर ग्राहकों को भेज दिया जायगा
पता- गायत्री परिवार पत्रिका, “अखण्ड-ज्योति प्रेस” मथुरा
सच पूछा जाय तो मूर्तियों की अपेक्षा चित्र स्थापना अधिक सुविधाजनक है क्योंकि उनमें नियमित भोग, प्रसाद एवं पूजा अर्चा का कठिन प्रतिबन्ध नहीं हैं। जहाँ सम्भव हो वहाँ अखण्ड-ज्योति भी स्थापित करनी चाहिए और नित्य अग्निहोत्र का प्रबन्ध करना चाहिए। ऐसे मन्दिरों से धर्म सेवा की, समाज सेवा की अनेकों सत्प्रवृत्तियाँ संचालित की जा सकती हैं। जहाँ नया मन्दिर बनाना सम्भव न हो वहाँ एक कमरा माँगकर या किराये पर लेकर गायत्री मन्दिर के रूप में सुसज्जित किया जा सकता है
जिस प्रकार इस वर्ष 52 पुस्तकें 52 सप्ताहों के हिसाब से 13 रु. मूल्य की छापी गई हैं, उसी प्रकार मानव-जीवन की विभिन्न समस्याओं पर प्रकाश डालने वाली ऐसी ही सर्वांग सुन्दर पुस्तकें हर वर्ष छापी जाती रहेंगी। पुरुष समाज के लिए अखण्ड-ज्योति तथा नारी समाज के कल्याणार्थ शीघ्र ही निकलने वाली ‘गृह लक्ष्मी’ यह दो पत्रिकाएं पहुँचती रहेंगी। आदर्श वाक्य भी 16 इसी प्रकार छपते रहेंगे। 52 पुस्तकों का मूल्य 13 रु. दोनों पत्रिकाओं का मूल्य तीन-तीन रु. व 6 रु. आदर्श वाक्य 1 रु. इस प्रकार कुल मिलाकर 20 रु. हुए, शेष 4 रु. का कोई चित्र, चालीसा आदि वितरण साहित्य मँगाया जा सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-December
संस्था के उत्थान के लिये संघर्ष करते हुए आप कारावास के लिए भी प्रस्तुत हो गये। गायत्री-मन्दिर की स्थापना के पूर्व ही आप बड़ी लगन व उत्साह से गायत्री-प्रचार व ‘अखण्ड-ज्योति’ के ग्राहक बनाने में लगे रहे। ज्यों-ज्यों आचार्य जी से संपर्क बढ़ता गया आपकी लगन व उत्साह में तीव्रता से वृद्धि होती रही। वर्तमान महायज्ञ के आरम्भिक दिनों से तो आपके हृदय की तड़पन इतनी बढ़ गई कि वह बिना आत्मदान दिये शाँत न हो सकी
पिछले दो वर्षों से इन दोनों पति-पत्नि का जीवन गायत्री तथा यज्ञ प्रचार में ही लगा रहा है। गायत्री-परिवार से इनका सम्बन्ध दिसम्बर 1954 में हुआ और जनवरी 1955 के अखण्ड-ज्योति के ‘गायत्री ज्ञान अंक’ की हजारों प्रतियाँ इन्होंने बरेली के घर-घर और दुकान-दुकान में पहुँचा कर उल्लेखनीय प्रचार कार्य किया। स्वयं भी ‘गायत्री से समाज-सुधार’ और ‘यज्ञ क्यों करना चाहिए?’ नाम की दो पुस्तकें छपा कर लोगों को वेद माता की उपासना के लिए प्रेरित किया। नित्य-प्रति दंगतर से घर लौटते ही भोजन करने के पश्चात ये और इनकी पत्नी प्रचार कार्य में लग जाते थे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-July
प्रसंग यहाँ गुरु-पूर्णिमा पर्व के परिप्रेक्ष्य में मातृसत्ता की अपने संतानों के प्रति गहरी आँतरिक वेदना एवं अजस्र स्नेह की वर्षा का चल रहा है जो विगत चौबीस वर्षों से निरंतर प्रवाहित होती रह हमें आत्मिक प्रगति के पथ पर प्रशस्त कर अब देवसंस्कृति दिग्विजय वाहिनी का सदस्य बनाकर सतयुगी भविष्य की ओर ले जाने को कृत संकल्प है। अठारह अश्वमेध यज्ञ संपन्न हो चुके, जिसकी घोषणा पूज्यवर ने प्रायः पचास वर्ष पूर्व ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका में कर दी थी तथा जिसे यज्ञदेवता की दैनन्दिन स्तुति में समाहित कर प्रत्येक के लिए अपने स्थूल-शरीर के महाप्रयाण के बाद एक समर्थ सत्ता के सहारे छोड़कर सूक्ष्म व कारण सत्ता में स्वयं को प्रविष्ट करा विराट के एकाकार कर लिया था। अठारह की संख्या अब एक सौ आठ तक छोटे बड़े दिग्विजयी पराक्रमों के रूप में - विश्वव्यापी संकल्पों के रूप में पहुँचेगी, इसमें किसी को संदेह नहीं करना चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-May
मनुष्य का स्वाभाविक रुझान की उत्कृष्टता परक है हुआ देवता है, उठा हुआ पशु उसे संयम-शील व उदात्त जीवन जीने की प्रेरणा भी दी जा सकती है। भगवत्प्रेरणा, ब्रह्मांडीय सुव्यवस्था के साथ तारतम्य बिठाकर चलने के लिए दैनंदिन जीवन में जिन अनुशासनों का समावेश करना जरूरी है, वे प्रारम्भिक साधकों के लिए न्यूनतम हों एवं वे इसे दैनंदिन जीवन का ही एक अंग माने, यह समझाने का प्रयास उनने 1940 से प्रकाशित हो रही अपनी अखण्ड-ज्योति पत्रिका को दिये जाने वाले सतत् मार्गदर्शन से आरम्भ कर दिया था
न केवल अखण्ड-ज्योति पाठकों के माध्यम से एक करोड़ से अधिक परिजनों का अपितु पूज्यवर पर संपादित किये जा रहे उनके व्यक्तित्व कर्तृत्व, पत्र लेखन, लेखनी- संजीवनी के एक सर्वांग पूर्ण वाङ्मय द्वारा आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन कर लिए शाँतिकुँज को उन अनुपलब्ध आडियो, कैसेटों की आवश्यकता है जो किन्हीं ने कभी प्रवास में या मथुरा हरिद्वार में हुए शिविरों में रिकार्ड किए थे। सभी के नाम हमें ज्ञात नहीं है, किंतु 1945 से लेकर 1990 तक अनेकों ने उनके संदेश को आडियो, वीडियो, कैसेटों द्वारा रिकार्ड किया अथवा लिपिबद्ध किया है। अपनी थाती अपने पास संरक्षित रखना चाहते हों तो कैसेटों की एक स्पष्ट कापी कराके तथा “स्पूल” पर से टेप पर ट्रांस्फर कर हमें शीघ्रातिशीघ्र पहुँचा दें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-March
जेलयात्रा बारबार होने से जमींदार घर की कुर्की तक की नौबत आने पर भी राष्ट्र की आजादी सर्वोपरि उन्हें दिखाई दी। जब द्वितीय सर्वोपरि उन्हें दिखाई दीं जब द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ होने के साथ भारत की आजादी सन्निकट दिखाई दे रही थी तब वे अपने गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला के साथ साथ “अखण्ड-ज्योति’ मखिका आरंभ कर बापू के निर्देशों एवं अपनी अदृश्य शरीरधारी गुरुसत्ता के सतत् मार्गदर्शन के अनुरूप एक ऐसे परिवार के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ कर रहे थे जिसे स्वतंत्र भारत को इक्कीसवीं सदी के शुभारंभ से अंत तक ले जाने का महत्ती जिम्मेदारी वाला काम करना था। इसके लिए उनने जमींदारी का वैभव त्याग, स्वयं के साधनात्मक पराक्रम द्वारा, मुक्ति, सिद्धि की लक्ष्य सिद्धि को गौण एवं औरों के कष्टों में सहभागिता को वरीयता देकर स्वल्प साधनों में भी एक ऐसी संस्था के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ कर दी, जिसका आदि से अंत तक का इतिहास त्याग आदि से अंत तक का इतिहास त्याग व बलिदान, संवेदना व समर्पण का इतिहास है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
अखण्ड-दीपक जो परमपूज्य गुरुदेव द्वारा सन् 1926 में प्रज्वलित किया गया था, आज भी शाँतिकुँज में प्रदीप्त है व आने वाले परिजनों को नूतन प्रेरणा का संचार करता रहता है, हम सभी को नित नये उत्साह बढ़ाने वाले संकल्पों का दायित्व उठाने की क्षमता देता है। उसी का जाग्रत ज्वलन्त, दृश्यमान रूप अखण्ड-ज्योति पत्रिका है जो पूज्यवर द्वारा आज से 57 वर्ष पूर्व स्नेह सान्निध्य से भरा भावनाशीलों का एक परिवार बनाने के लिए आरंभ की गयी थी। वह पत्रिका चेतना सत्ता के प्राण प्रवाह के रूप में सूक्ष्मजगत से ऋषि सत्ताओं की प्रेरणा से निकलती है। इसकी पाठ्य सामग्री के साथ वह जीवन्त ऊर्जा जुड़ी हुई है जो हमें हमारी गुरुसत्ता से प्रतिमास-प्रतिदिन-प्रतिपल अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखने का प्रयास करती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-December
नौ कुण्डों की विनिर्मित यज्ञशाला में नित्य नियमित रूप से यज्ञ होता है और वर्ष में आहुतियों की संख्या करोड़ों तक जा पहुँचती हैं। जिस अखण्ड-ज्योति की स्थापना इस महा मिशन के साथ साक्षी रूप में हुई थी। उस दीपक का प्रज्ज्वलन पिछले उनहत्तर वर्षों से अनवरत रूप से ज्योतिर्मय है। किसी दिव्य सत्ता का संरक्षण यहाँ गंगावतरण की तरह अवतरित होने की उपमा में इसके साथ जुड़ा देखा जा सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-October
अक्टूबर सन् 1959 की “अखण्ड -ज्योति” पत्रिका के पृष्ठ 4 पर एक लेख छपा था-”अखण्ड-ज्योति के उत्तरदायित्वों में परिवर्तन-लेखिका के स्थान पर लिखा था-”भगवती देवी शर्मा धर्मपत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य। ” लेख का शीर्षक पढ़कर सब चौंके कि अकस्मात् यह परिवर्तन क्यों? संपादक के रूप में तो हम आचार्य श्री को ही जानते क्यों हैं? उनने अपना नाम यो दायित्व क्यों माताजी को सौंप दिया क्या वे अब हमें पत्रों-पत्रिकाओं-स्थूल दर्शनों के माध्यम से नहीं मिलेंगे? तरह-तरह की जिज्ञासायें सभी के मन में थीं। माताजी ने बड़े सरल भाव से उस लेख में लिखा था-”अखण्ड-ज्योति के इस अंक पर संपादक के स्थान पर मेरा नाम पढ़कर पाठकों को आश्चर्य होगा
एक परीक्षा पूरी हुई। कितना विधि व्यवस्था पूर्ण-सुनियोजित लीला पुरुषों का जीवनक्रम होता है-यह अखण्ड-ज्योति के पिछले पृष्ठों को पलट कर देखा जा सकता है। ठीक दस वर्ष बाद पूज्यवर ने अज्ञातवास पर मथुरा से स्थायी रूप से विदाई लेकर परम वंदनीया माताजी के कंधों पर पूरे मिशन की जिम्मेदारी सौंपकर साधना उपक्रम हेतु हिमालय प्रस्थान किया। दोनों ने जिसे कर्मभूमि बनाया था व अखण्ड-ज्योति संस्थान (घीया मंडी मथुरा) तथा गायत्री तपोभूमि (वृन्दावन रोड मथुरा) से क्रमशः साधना-लेखन एवं सत्र संचालन-प्रचार-संगठन का कार्य बखूबी 30 वर्षों तक संपन्न किया था उसे सदा के लिए छोड़कर पूज्यवर 20 जून को चले गए
” लेख का शीर्षक पढ़कर सब चौंके कि अकस्मात् यह परिवर्तन क्यों? संपादक के रूप में तो हम आचार्य श्री को ही जानते क्यों हैं? उनने अपना नाम यो दायित्व क्यों माताजी को सौंप दिया क्या वे अब हमें पत्रों-पत्रिकाओं-स्थूल दर्शनों के माध्यम से नहीं मिलेंगे? तरह-तरह की जिज्ञासायें सभी के मन में थीं। माताजी ने बड़े सरल भाव से उस लेख में लिखा था-”अखण्ड-ज्योति के इस अंक पर संपादक के स्थान पर मेरा नाम पढ़कर पाठकों को आश्चर्य होगा। ” काफी दिन हो गये परिवार के परिजनों की भोजन व्यवस्था का कार्य मेरे जिम्मे है”-”वह कार्य मेरे स्वभाव का एक अंग बन गया है। परिवार के परिजनों आगंतुक अतिथियों की आये दिन बड़ी संख्या देखकर मुझे भोजन संबंधी अधिक कार्यभार की वृद्धि से परेशानी होना तो दूर उलटे दूने आनंद की अनुभूति होती है
इन पंक्तियों का लेखक जनवरी 1972 के उन क्षणों का साक्षी है, जब पूज्यवर ने अपनी सारी आगामी योजनाएं हृदयाघात के कष्ट से उबर रहीं वंदनीया माताजी को समझायीं तथा जैसे आये थे वैसे ही वे चले गये, पुनः गायत्री जयंती तक कभी भी आने का आश्वासन देकर। अप्रैल 1972 की “अखण्ड-ज्योति” की “अपनों से अपनी बात” में “गुरुदेव क्यों आये? क्यों चले गये?” शीर्षक से परम वंदनीया माताजी ने विस्तार से इन सभी घटनाक्रमों का, भावी योजनाओं-प्राण प्रत्यावर्तन से लेकर अन्य सत्रों की भूमिका पर विवेचन प्रस्तुत किया है, जो कि प्रथम पंचवर्षीय योजना में पूज्यवर के अज्ञातवास के बाद प्राण प्रत्यावर्तन के, जीवन साधना के, वानप्रस्थों आदि के महत्वपूर्ण शिक्षण सत्र ऋषि परंपरा के बीजारोपण प्रक्रिया के अंतर्गत चलने थे। 1975 तक यही क्रम चला। इस बीच पूज्यवर पहले विदेश प्रवास पर तेजनिद्या व केन्या की यात्रा पर पानी के जहाज से गये तथा डेढ़ माह बाद फरवरी 1973 में लौट आये
ठीक दस वर्ष बाद पूज्यवर ने अज्ञातवास पर मथुरा से स्थायी रूप से विदाई लेकर परम वंदनीया माताजी के कंधों पर पूरे मिशन की जिम्मेदारी सौंपकर साधना उपक्रम हेतु हिमालय प्रस्थान किया। दोनों ने जिसे कर्मभूमि बनाया था व अखण्ड-ज्योति संस्थान (घीया मंडी मथुरा) तथा गायत्री तपोभूमि (वृन्दावन रोड मथुरा) से क्रमशः साधना-लेखन एवं सत्र संचालन-प्रचार-संगठन का कार्य बखूबी 30 वर्षों तक संपन्न किया था उसे सदा के लिए छोड़कर पूज्यवर 20 जून को चले गए। परम वंदनीया माताजी को शाँतिकुँज सप्त सरोवर हरिद्वार में अखण्ड दीपक चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण करने वाली छः कुमारी कन्याएँ व तीन वरिष्ठ कार्यकर्ता गणों के साथ नीरव एकाँत में रहने का निर्देश दे गए। कैसा निष्ठुर सा लगता है यह कदम एक बैरागी संत का, जिसने जीवन भर औरों के हित स्वयं को तिल-तिल कर जलाया था, अगाध स्नेह लुटाकर एक विराट् परिवार का अभिभावक कहलवाया था, किंतु ऐसा लगता भर है
सितंबर 1961 के “अखण्ड-ज्योति” अंक के अंतिम दो पृष्ठों 38, 39 पर बड़ी विनम्रतापूर्वक उनने लिखा कि उनके दुर्बल कंधों ने गुरुदेव की अज्ञातवास की अवधि में जो जिम्मेदारियाँ सँभाली, उनमें कई त्रुटियाँ रही होंगी, जिसके लिए वे क्षमाप्रार्थी हैं। उनने लिखा “सदा की भाँति अब पूज्य आचार्य जी ही अखण्ड-ज्योति का कार्यभार आगामी माह से स्वयं ही सँभालेंगे। यद्यपि पिछले अंकों में भी उनके ही विचार और भावनाओं की प्रतिध्वनि ही पत्रिका के पृष्ठों पर गूँजती रही है पर आगे तो स्वयं ही हम सबका मार्गदर्शन करेंगे”-”अखण्ड-ज्योति अब आत्मविकास के व्यावहारिक मार्गदर्शन की पत्रिका रहेगी”-”दस वर्षीय एक शिक्षण योजना पूज्य आचार्य जी ने बनाई है, उसी से साधनात्मक मार्गदर्शन अब चलेगा। ”
बहुत दिनों से मेरी यही कार्यशैली रही है। अब उस कार्य से भिन्न “अखण्ड-ज्योति” के संपादन के कार्य भी मुझे संलग्न देखकर पाठकों को निश्चय ही आश्चर्य होगा। ” आगे पाठकों को हुए असमंजस का समाधान भी था
समय-समय पर वे मुझे कड़ी परीक्षाओं में डालते रहे हैं”-”मैंने अपने इस छोटे से जीवन (1943 से 1959) ऐसी अगणित घटनायें देखी हैं जिनमें उनके आशीर्वाद को पाकर तुच्छ व्यक्ति भी महान कार्य संपन्न कर सके हैं। उसी बलबूते पर मेरा संकोच शाँत हो जाता है और “अखण्ड-ज्योति” की गुरुतम जिम्मेदारी को अपने कंधे पर लेने का साहस किसी प्रकार समेट पाती हूँ”-”उन्हें अब फिर साधना क्षेत्र में लौटना है। अखण्ड-ज्योति का यह संपादन परिवर्तन भी इसी योजना का एक अंग है। ” “पूरी बात तो उनने अभी स्पष्ट नहीं की है, पर मालूम होता है कि किन्हीं विशेष स्थानों पर किन्हीं विशेष आत्माओं के सान्निध्य में मथुरा से बहुत दूर रहने की उनकी योजना है
वे राष्ट्र के लिए एक विशेष शक्ति का आविर्भाव करने के लिए कुछ विशेष साधनात्मक कार्यक्रम बना रहे हैं। ”-”अखण्ड-ज्योति का यह संपादकीय परिवर्तन भी उसी का एक पूर्व भाग माना जा सकता है। ”
पूज्यवर गुरुदेव वापस हिमालय प्रवास से लौटे। इस बीच दुर्गम हिमालय से जहाँ देवता-ऋषिगण श्रेष्ठ आत्मायें सतत विश्व कल्याण के निमित्त तप करती रहती हैं-हिमालय के हृदय यमुनोत्री से लेकर नंदादेवी के तपःपूत ऊर्जा पुँज क्षेत्र से “एक साधक की डायरी के कुछ पृष्ठ” भी लिख-लिखकर भेजते रहे अखण्ड-ज्योति में छपे। अखण्ड दीप इस बीच जलता रहा व वंदनीया माताजी की परीक्षा लेता रहा। पूज्य गुरुदेव ने आते ही पुनः संपादनक्रम अक्टूबर 1961 से सँभाल लिया और साधकों के मार्गदर्शन के निमित्त पंचकोशी जागरण साधना से लेकर उनके द्वारा आराधना उपक्रम के अंतर्गत युग निर्माण योजना एवं सत्संकल्प रूपी घोषणा पत्र द्वारा मिशन को एक नया मोड़ दिया
“अपनों से अपनी बात” के क्रम को जारी रखते हुए जुलाई 1971 की अखण्ड-ज्योति में “पत्रिकाओं का संपादन और-मैं” शीर्षक से वंदनीया माताजी लिखती हैं “मेरे लिए मेरे गुरु, अवलंबन और भगवान आचार्य जी ही हैं। उनकी आज्ञानुवर्तिनी और इच्छा अनुगामिनी बनने के अतिरिक्त और कभी कुछ सोचा नहीं। सो मथुरा छोड़ने, हरिद्वार रहने, चौबीस लक्ष्य के उन जैसे चौबीस पुरश्चरण करने के आदेश शिरोधार्य करने के अतिरिक्त और कुछ सोच ही नहीं सकती थी-”संपादक की जगह पर कानूनी दृष्टि से किसका नाम छपता है, इसका कुछ मूल्य-महत्व नहीं, वस्तुतः स्थिति यही रहेगी कि भूतकाल की तरह भविष्य में भी गुरुदेव के विचार ही परिजनों को निरंतर उपलब्ध होते रहेंगे
उनने लिखा “सदा की भाँति अब पूज्य आचार्य जी ही अखण्ड-ज्योति का कार्यभार आगामी माह से स्वयं ही सँभालेंगे। यद्यपि पिछले अंकों में भी उनके ही विचार और भावनाओं की प्रतिध्वनि ही पत्रिका के पृष्ठों पर गूँजती रही है पर आगे तो स्वयं ही हम सबका मार्गदर्शन करेंगे”-”अखण्ड-ज्योति अब आत्मविकास के व्यावहारिक मार्गदर्शन की पत्रिका रहेगी”-”दस वर्षीय एक शिक्षण योजना पूज्य आचार्य जी ने बनाई है, उसी से साधनात्मक मार्गदर्शन अब चलेगा। ”
सो मथुरा छोड़ने, हरिद्वार रहने, चौबीस लक्ष्य के उन जैसे चौबीस पुरश्चरण करने के आदेश शिरोधार्य करने के अतिरिक्त और कुछ सोच ही नहीं सकती थी-”संपादक की जगह पर कानूनी दृष्टि से किसका नाम छपता है, इसका कुछ मूल्य-महत्व नहीं, वस्तुतः स्थिति यही रहेगी कि भूतकाल की तरह भविष्य में भी गुरुदेव के विचार ही परिजनों को निरंतर उपलब्ध होते रहेंगे। “अखण्ड-ज्योति शत-प्रतिशत उन्हीं की अभिव्यक्तियों से आगे भी उसी तरह परिपूर्ण रहेगी, जैसी अब तक रही है। ” कितनी सरलता व विनम्रता से दिया गया आश्वासन है पाठकों को? वह पूरी तरह निभा भी। पूज्यवर के प्राण चेतना का प्रवाह “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका के रूप में परिजनों तक पहुँचता रहा व क्रमशः पाठकों-उसके निर्धारणों को जीवन में उतारने वालों की संख्या बढ़ती चली गई
” कितनी सरलता व विनम्रता से दिया गया आश्वासन है पाठकों को? वह पूरी तरह निभा भी। पूज्यवर के प्राण चेतना का प्रवाह “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका के रूप में परिजनों तक पहुँचता रहा व क्रमशः पाठकों-उसके निर्धारणों को जीवन में उतारने वालों की संख्या बढ़ती चली गई। अपना पूर्व से चला आ रहा संकल्प उसने पूरी तरह निभाया-लागत मूल्य पर पत्रिका सभी को मिले तथा उसमें किसी प्रकार का विज्ञापन न प्रकाशित हो यह आज भी निभ रहा है
मात्र 200/- रुपये की आय में दो बच्चे, एक माँ स्वयं दो, पाँच व्यक्तियों की व्यवस्था उन सौ-डेढ़ सौ व्यक्तियों के अतिरिक्त करना, जिनका अखण्ड-ज्योति संस्थान आना नित्य होता ही रहता था, मात्र उन्हीं के वश की बात थी। हाथ से कागज कूटकर बनाना उसे सुखाना व फिर उससे पैर से चलने वाली हैंडल प्रेस द्वारा छोटे-छोटे ट्रैक्ट व “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका छापना, उन पर पते लिखकर डिस्पैच करना, बच्चों की पढ़ाई की, देखभाल की व्यवस्था-यह सब अकेले ही उनने किया। इस बीच उनने पूज्य आचार्य जी की पहली पत्नी से उत्पन्न दो संतानों श्री ओमप्रकाश व श्रीमती दयावती शर्मा की विवाह की व्यवस्था की। भले घरों से बहू आयीं, व लड़की भेजी गयी व अपनों से अधिक प्यार दिया गया, जिसे अंत तक निभाया गया
उसी बलबूते पर मेरा संकोच शाँत हो जाता है और “अखण्ड-ज्योति” की गुरुतम जिम्मेदारी को अपने कंधे पर लेने का साहस किसी प्रकार समेट पाती हूँ”-”उन्हें अब फिर साधना क्षेत्र में लौटना है। अखण्ड-ज्योति का यह संपादन परिवर्तन भी इसी योजना का एक अंग है। ” “पूरी बात तो उनने अभी स्पष्ट नहीं की है, पर मालूम होता है कि किन्हीं विशेष स्थानों पर किन्हीं विशेष आत्माओं के सान्निध्य में मथुरा से बहुत दूर रहने की उनकी योजना है। वे राष्ट्र के लिए एक विशेष शक्ति का आविर्भाव करने के लिए कुछ विशेष साधनात्मक कार्यक्रम बना रहे हैं
बच्चों के लिए आए दूध में पानी पड़ता जाता व उसी से चाय बनाकर दुःखी-पीड़ितों की सेवा की जाती-कष्ट सुने जाते व घावों पर मलहम लगाए जाते। मात्र 200/- रुपये की आय में दो बच्चे, एक माँ स्वयं दो, पाँच व्यक्तियों की व्यवस्था उन सौ-डेढ़ सौ व्यक्तियों के अतिरिक्त करना, जिनका अखण्ड-ज्योति संस्थान आना नित्य होता ही रहता था, मात्र उन्हीं के वश की बात थी। हाथ से कागज कूटकर बनाना उसे सुखाना व फिर उससे पैर से चलने वाली हैंडल प्रेस द्वारा छोटे-छोटे ट्रैक्ट व “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका छापना, उन पर पते लिखकर डिस्पैच करना, बच्चों की पढ़ाई की, देखभाल की व्यवस्था-यह सब अकेले ही उनने किया। इस बीच उनने पूज्य आचार्य जी की पहली पत्नी से उत्पन्न दो संतानों श्री ओमप्रकाश व श्रीमती दयावती शर्मा की विवाह की व्यवस्था की
सितंबर 1961 के “अखण्ड-ज्योति” अंक के अंतिम दो पृष्ठों 38, 39 पर बड़ी विनम्रतापूर्वक उनने लिखा कि उनके दुर्बल कंधों ने गुरुदेव की अज्ञातवास की अवधि में जो जिम्मेदारियाँ सँभाली, उनमें कई त्रुटियाँ रही होंगी, जिसके लिए वे क्षमाप्रार्थी हैं। उनने लिखा “सदा की भाँति अब पूज्य आचार्य जी ही अखण्ड-ज्योति का कार्यभार आगामी माह से स्वयं ही सँभालेंगे। यद्यपि पिछले अंकों में भी उनके ही विचार और भावनाओं की प्रतिध्वनि ही पत्रिका के पृष्ठों पर गूँजती रही है पर आगे तो स्वयं ही हम सबका मार्गदर्शन करेंगे”-”अखण्ड-ज्योति अब आत्मविकास के व्यावहारिक मार्गदर्शन की पत्रिका रहेगी”-”दस वर्षीय एक शिक्षण योजना पूज्य आचार्य जी ने बनाई है, उसी से साधनात्मक मार्गदर्शन अब चलेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-July
इस मास ज्ञान यज्ञ की सहायता के लिए कागज फण्ड में निम्नलिखित सहायताएं प्राप्त हुई हैं। अखण्ड-ज्योति प्रेषक महानुभावों के प्रति अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है
मैनेजर ‘अखण्ड-ज्योति’ मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-September
जो समाचार हमारे पास आये हैं उनसे प्रतीत होता है कि उस दिन असंख्य गुप्त प्रकट आध्यात्मिक उत्सव मनाये गये, प्रचण्ड आत्म शक्ति वाले युग युगान्तरों से तपस्या करने वाली आत्माओं ने उस दिन विशेष रूप से युग परिवर्तन की समस्या पर विचार किया है और उसे शीघ्र इस भूतल पर लाने का कार्यक्रम बनाया है। अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में भारतवर्ष के महान योगी श्री अरविन्द घोष के कुछ प्रवचन छपे हैं उनमें प्रकट है कि युग परिवर्तन निश्चित रूप से हो रहा है और उसे निकट लाने के लिये तपस्वी आत्मायें संपूर्ण शक्ति के साथ कार्यरत हैं। पतन, दुख, अनीति, अधर्म की हद हो चुकी, पाप के भीषण दावानल से संसार बुरी तरह जल रहा है। अब इसे शीतल करने के लिए सत्य की प्रेम की, न्याय की गंगा प्रकट हुआ ही चाहती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-February
कीमत करीब 10 गुनी हो गई है। अखण्ड-ज्योति की एक कापी में पहिले यदि दो पैसे का कागज लगता था, सो अब पाँच आने का लगेगा। छपाई, डाक खर्च, बाइंडिंग, खोये हुए अंकों को दुबारा भेजने का खर्च अलग। इस प्रकार इन दिनों निर्धारित अखण्ड-ज्योति की लागत कई गुनी पड़ती है
छपाई, डाक खर्च, बाइंडिंग, खोये हुए अंकों को दुबारा भेजने का खर्च अलग। इस प्रकार इन दिनों निर्धारित अखण्ड-ज्योति की लागत कई गुनी पड़ती है। पृष्ठ संख्या कम कर देने पर भी खर्च प्रति कापी के ऊपर चार आना आता है। कागज मिलने की असुविधा हमारे मार्ग की सब से बड़ी बाधा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-August
, सच्चिदानन्द प्रभु जन साधारण के हृदय में ऐसे ज्ञान की प्रेरणा कर रहे हैं जिसके आधार पर पशुता को दौड़कर मनुष्य सच्चे अर्थोंमें ‘मनुष्य’ बन सके और पृथ्वी पर सुख शाँति पूर्ण जीवन बिता सके। उसी अदृश्य प्रेरणा के अनुसार कुछ व्यवहारिक ज्ञान और शिक्षा ‘अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय की ओर से प्रकाशित हुई है। श्रावण बंदी अमावस्या ता. 1 अगस्त को सतयुग का शुभ मुहूर्त है, ठीक उसी दिन आठ नवीन पुस्तकें हमारे यहाँ से प्रकाशित हो रही हैं। आचार्य श्रीराम शर्मा ने घोर तपश्चर्या के साथ-साथ इन पुस्तकों को लिखा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-July
सद्ज्ञान की बुद्धि के लिए, मानवता के कर्त्तव्यों सद्गुणों, सद्विचारों, सद्भावों को बढ़ाने के लिए अखण्ड-ज्योति मिशन गत सात वर्षों से जो महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है उससे प्रायः सभी पाठक भली भाँति परिचित हैं। भारतवर्ष से एक छोर से दूसरे छोर तक धर्म प्रचार का कार्य जितनी तत्परता से जिस सफलता के साथ किया गया है उसे देखकर अनेकों विद्वानों, नेताओं एवं महात्माओं ने मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। विचार क्षेत्र में घुसे हुए शैतान से, पाप से, अज्ञान से, अखण्ड-ज्योति का मिशन, कड़ा मोर्चा ले रहा है
भारतवर्ष से एक छोर से दूसरे छोर तक धर्म प्रचार का कार्य जितनी तत्परता से जिस सफलता के साथ किया गया है उसे देखकर अनेकों विद्वानों, नेताओं एवं महात्माओं ने मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। विचार क्षेत्र में घुसे हुए शैतान से, पाप से, अज्ञान से, अखण्ड-ज्योति का मिशन, कड़ा मोर्चा ले रहा है। असंख्यों व्यक्तियों की जीवन दिशा को उलट-पुलट कर देने में इस छोटे से मठ को अभूतपूर्व सफलता मिली है
पता- मैनेजर ‘अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
लड़ाई के दौरान में एक समय ऐसा आया था जब कागज की दुर्लभता एवं सरकारी कन्ट्रोल कठोरता इतनी बढ़ गई थी कि अनेकों पत्र लड़खड़ा कर मर गये। अखण्ड-ज्योति के सामने भी उसकी मृत्यु मुँह फाड़कर नाच रही थी क्योंकि उसके संचालक एक प्रकार से निर्धन ही है। इस विषम घड़ी में पाठकों ने अपने प्रेम से सने पैसे सहायता के लिए भेजे। उन पैसों से हाथ का बना कागज बनाकर पत्रिका और पुस्तकें जीवित रखी गई
इस प्रकाशन से होने वाला लाभ अन्य उपयोगी, धर्म वृद्धि करने वाले कार्यों को प्रगति एवं प्रेरणा देगा। जिस प्रकार घड़ी में चाबी लगा देने से फिनर में ताकत भर जाती है और फिनर की ताकत में घड़ी के अनेकों छोटे बड़े पुर्जे घूमने लगते हैं उसी प्रकार प्रेस की व्यवस्था ठीक प्रकार हो जाने से अखण्ड-ज्योति में शक्ति भर जायगी। इस बल के कारण अनेकों धर्म प्रवृत्तियों के आसानी से चलते रहने में बड़ी सुविधा हो जायगी
उन्होंने एक अद्भुत आदर्श रखा। दाल की छोटी सी दुकान से उन्हें जो कुछ आमदनी होती थी उसमें से भोजन वस्त्र लेकर प्रायः सबका सब अखण्ड-ज्योति को भेज देते थे। अन्य पाठकों ने अपने ढंग से सहायताएँ कीं। कानपुर के राजनरायण जी श्रीवास्तव, अहमदाबाद के बाबू भाईजी, वेतिया के गोपालप्रसाद जी आदि सज्जनों ने बिल्कुल निस्वार्थ भाव से, अपना बहुमूल्य समय देकर सैकड़ों ग्राहक बनाये
अपना प्रेस हो जाने पर यह सब कठिनाइयाँ दूर हो जावेंगी और मन चाहा साहित्य, समय पर, सुविधापूर्वक, कम खर्च में तैयार हो सकेगा। इन सब बातों पर विचार करते हुए अखण्ड-ज्योति अपना प्रेस लगाना चाहती है। यह कार्य पूरा होते ही अधिक उत्तम, अच्छा, सुन्दर, उपयोगी एवं आवश्यक साहित्य प्रकाशित होना आरम्भ हो जायगा। इस प्रकाशन से होने वाला लाभ अन्य उपयोगी, धर्म वृद्धि करने वाले कार्यों को प्रगति एवं प्रेरणा देगा
दूसरे महायुद्ध का दौरा ठंडा पड़ गया है, तीसरा महायुद्ध भी बहुत समीप नहीं है। जो कठिनाइयाँ आज हैं निकट भविष्य में उनके घटने और हटने की आशा है इन नयी परिस्थितियों में अखण्ड-ज्योति का सद्ज्ञान प्रसार का, धर्म स्थापना का कार्य अधिक तत्परता से करना है। जनता को सात्विक आध्यात्मिक भोजन पहुँचा कर उसके मस्तिष्क में सतोगुणी भावनाओं को ओत-पोत करना है, इस कार्य के लिए बहुत बड़े परिमाण में, देश की विभिन्न भाषाओं में, सुलभ सस्ता, सुन्दर, साहित्य तैयार करके उसे जन साधारण तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य करना है। अखण्ड-ज्योति में पुस्तकों में, अधिक उन्नति करनी हैं
हम अपने साथियों, स्वजनों, कुटुंबियों, पाठकों के उच्च अन्तःकरण में निवास करने वाली सद्भावना को इन पंक्तियों द्वारा जागृत करते हैं और ज्ञान यज्ञ के महत्व पूर्ण आयोजन के लिए सहायता प्राप्त करने की आशा करते हैं। हमें विश्वास है कि हमारे आत्मीयजनों का उच्च अन्तःकरण उन्हें अखण्ड-ज्योति के प्रेस फण्ड के लिए कुछ न कुछ भेजने को अवश्य प्रेरित करेगा और इसी वर्ष प्रेस की स्थापना हो जायगी। प्राप्त हुई सहायताएं अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित की जावेंगी
उन पैसों से हाथ का बना कागज बनाकर पत्रिका और पुस्तकें जीवित रखी गई। हिसार के श्री मुँशीराम जी गुप्ता जो मथुरा आकर कुछ दिनों अखण्ड-ज्योति में ठहरे थे। उन्होंने एक अद्भुत आदर्श रखा। दाल की छोटी सी दुकान से उन्हें जो कुछ आमदनी होती थी उसमें से भोजन वस्त्र लेकर प्रायः सबका सब अखण्ड-ज्योति को भेज देते थे
सात वर्ष बाद अब अखण्ड-ज्योति के जीवन का दूसरा अध्याय आरम्भ होता है। पहले परिच्छेद में वह मृत्यु के मुख से बच गई और भद्दे, रद्दी, खराब कागजों पर बुरी भली छपाई से छपा साहित्य देकर जनता को आध्यात्मिक खुराक पहुँचाती रही। यह दो ही निष्कर्ष अब तक के कार्य का सिंहावलोकन करके कहे जा सकते हैं
इस साहसपूर्ण कदम को हम अकेले नहीं बढ़ा सकते। अखण्ड-ज्योति अपने दूसरे अध्याय में प्रवेश करते हुए स्वजनों का सहारा चाहती है। इस दिशा में सबसे प्रथम कार्य जो करना है वह है—अपना प्रेस लगाना। अपने पास प्रेस न होने के कारण बाहर के प्रेसों से पत्र तथा पुस्तकों की छपाई करानी पड़ती है
क्योंकि उन्होंने सच्चे हृदय से अपना सद्भाव हमारे साथ रखा है। पाठकों ने अखण्ड-ज्योति के साथ वैसे ही आत्मीयता भरे सद्भाव रखे हैं जैसे गुरुजनों के साथ, सगे कुटुम्बों के साथ, हितू रिश्तेदारों के साथ एवं आन्तरिक आत्मीय सखाओं स्वजनों के साथ रखे जाते हैं। अपनी शारीरिक, मानसिक, घरेलू, व्यापारिक, धार्मिक गुत्थियों को, समस्याओं को पाठक हमारे सामने हृदय खोलकर उसी प्रकार रख देते हैं जैसे अपने सबसे अधिक विश्वासी मित्र के साथ रखा जा सकता है। इन गुत्थियों का जो सुलझाव यहाँ से भेजा गया है उसे उन्होंने श्रद्धापूर्वक अपनाया और कार्य रूप में परिणत किया फल स्वरूप ऐसे ऐसे मधुर परिणाम सामने आये, जिनका स्मरण करने मात्र से आनन्द के रोमाँच हो आते हैं
हमें विश्वास है कि हमारे आत्मीयजनों का उच्च अन्तःकरण उन्हें अखण्ड-ज्योति के प्रेस फण्ड के लिए कुछ न कुछ भेजने को अवश्य प्रेरित करेगा और इसी वर्ष प्रेस की स्थापना हो जायगी। प्राप्त हुई सहायताएं अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित की जावेंगी
जनता को सात्विक आध्यात्मिक भोजन पहुँचा कर उसके मस्तिष्क में सतोगुणी भावनाओं को ओत-पोत करना है, इस कार्य के लिए बहुत बड़े परिमाण में, देश की विभिन्न भाषाओं में, सुलभ सस्ता, सुन्दर, साहित्य तैयार करके उसे जन साधारण तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य करना है। अखण्ड-ज्योति में पुस्तकों में, अधिक उन्नति करनी हैं। मिशन की अन्य प्रगतियों को विविध प्रकारों प्रभु की इच्छा पूर्ण करने में निमित्त बनने के लिए, धर्म स्थापना के लिए, नये धर्म युग का सूत्र पात करने के लिए इस कार्य प्रणाली को आगे बढ़ाना सचमुच आज की घड़ी में बहुत ही आवश्यक है
अपने जीवन के दूसरे अध्याय में प्रवेश करते हुए अखण्ड-ज्योति अपने स्वजनों आत्मीयों, कुटुम्बियों की सहायता चाहती है। जिस धर्म तरु के सुस्थित हो जाने से अनेक भ्रान्त व्यक्तियों को सद्ज्ञान का अमृत लाभ होगा, जिसकी छाया में बैठ कर असंख्य नर नारी रोग, शोक, क्लेश, पीड़ा और पाप तापों से छुटकारा प्राप्त करेंगे, ऐसे पौधे की जड़ में आज थोड़ा-थोड़ा जल, अपने परिजन छिड़क दें तो उन छींटों से उनके घड़े में घाटा न आवेगा, पर यह पौधा उन सद्भावमयी बूँदों के द्वारा नवजीवन धारण करके कुछ ही समय में परिपुष्ट वृक्ष बन जायेगा
परमात्मा की धर्म संस्थापन की पुनीति इच्छा में, उन्हीं की प्रेरणा से सहस्रों पाठकों ने पूरी दिलचस्पी से सहयोग दिया, उस सहयोग के कारण ही अखण्ड-ज्योति द्वारा सत प्रचार का इतना कार्य हो सका। इसका श्रेय उन सहस्रों स्वजनों को है जिन्हें मोटी भाषा में हम ‘पाठक’ भी कह देते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-November
अखण्ड-ज्योति कार्यालय में विगत छः वर्षों में कई हजार पत्र इस आशय के आ चुके होंगे कि वे योग के चमत्कारों को सीखना चाहते हैं, मथुरा कार्यालय में पधारने वाले सज्जनों में से भी सैकड़ों ने यही प्रस्ताव हमारे समक्ष रखे। पर अब तक हम इन पत्रों और प्रस्तावों को अस्वीकृत ही करते रहे। कारण यह था कि पिछले बीस वर्ष में इसी संबंध में हमने सुदूर प्रदेशों की यात्राएं की हैं
जागेगी अखण्ड-ज्योति तेरे मनोमंदिर में,

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-March
पता-मैनेजर ‘अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-December
अखण्ड-ज्योति, देश के विचारकों से, राजनीतिज्ञों से, नेताओं से, शासकों से एवं जन साधारण से अपील करती है कि इन शैतानी साम्प्रदायिक उत्पातों के भस्मासुर को रोको, यह काबू से बाहर हुआ जा रहा है। आग लगाने वाले तमाशा देख रहे हैं और इस भस्मासुर के प्रकोप से निरीह जनता भुनी जा रही है। इस दाबानल का अन्त करना है तो तात्कालिक रोक-थाम के अतिरिक्त उन लोगों को भी काबू में किया जाना चाहिए जिन्होंने मनुष्यता को कलंकित करने वाली यह आग लगाई है
सन् 47 के आरंभिक आरंभिक अंकों में अखण्ड-ज्योति अपने पाठकों को बड़ी अमूल्य पाठ्य सामग्री भेंट कर रही है। अखण्ड-ज्योति संपादक ने विगत बीस वर्षों में जो आध्यात्मिक शोधें की हैं उनका निचोड़ इन अंकों में होगा। ऐसी अद्भुत एवं अपूर्व सामग्री पाठकों के लिए कितनी उपयोगी होगी इसका कुछ अनुमान नीचे दी हुई लेखों की सूची से लगाया जा सकता है
पता- मैनेजर ‘अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-January
मेरी नन्ही सी पुत्री, रश्मि अपने खिलौनों से खेलते-खेलते मेरे पास भागी-भागी आती है और कहती है- “बाबू जी, क्या लिख रहे हैं? हम भी लिखेंगे। ” आप ही बताइए इस तीन वर्ष की बालिका को क्या समझाओ कि मैं अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक के लिए कुछ लिख रहा हूँ। अनेक बार आ-आकर यह मुझसे विविध प्रश्न पूछती है। “ग्रामोफोन में कौन बोलता है? हमें कालेज क्यों नहीं ले चलते? हमारे लिए भी साइकिल मँगा दीजिए? बाबू जी हम छिपते हैं आप हमें ढूढ़िये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-February
ऐसा मालूम हुआ है कि कुछ लोगों को यह भ्रम हुआ है कि विशाल भारत के यशस्वी सम्पादक और सुप्रसिद्ध साहित्यकार पं. श्रीराम शर्मा तथा अखण्ड-ज्योति के सम्पादक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एक ही व्यक्ति हैं। जिनकी यह धारणा है वे गलती पर हैं। उपरोक्त दोनों व्यक्ति सर्वथा भिन्न हैं
यहाँ से दो बार भली प्रकार जाँच कर हर महीने अखण्ड-ज्योति सब ग्राहकों के पास भेजी जाती है। फिर भी रास्ते में डाक की गड़बड़ी से कुछ अंक हर महीने गुम हो जाते हैं। जिनके अंक न पहुँचें, उन्हें अपने पोस्ट ऑफिस से पूछना चाहिए और वहाँ के उत्तर समेत हमें लिखना चाहिए
अधूरे वर्ष से हिसाब रखने में हमें भी और पाठकों को भी बहुत असुविधा होती है। अखण्ड-ज्योति का वर्ष जनवरी से आरम्भ होता है
-मैनेजर ‘अखण्ड-ज्योति’ मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-April
प्रभु के सम्मुख वह दीप जलाता है। ज्ञान का दीपक भगवान की अखण्ड-ज्योति का निकटतम प्रतिनिधि है। ज्ञान का प्रकाश ही आत्मा को परमात्मा से मिलाता है। इस प्रकाश को जगाये बिना पूजा का कार्य पूरा हो नहीं सकता

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-June
अखण्ड-ज्योति-
लगभग एक—एक सौ अखण्ड-ज्योति के ग्राहक पूर्ण निस्वार्थ
—मैनेजर “अखण्ड-ज्योति”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-December
अध्यात्म को सही रूप में समझाने के लिए अखण्ड-ज्योति विगत 44 वर्षों से प्रयत्न कर रही है। समय-समय पर उसके बिखरे प्रतिपादन पाठकों को उपलब्ध होते रहे हैं। अब इन अंकों में यह प्रयत्न किया जा रहा है कि रहस्यमय तत्वज्ञान एवं चेतना विज्ञान की जानकारी अगले दिनों क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत की जाय
इस उत्साह को दृष्टिगत रख यह नया निर्णय हुआ है कि अखण्ड-ज्योति के अगले अंक उसी पाठ्य-सामग्री के छापे जायें जो पत्राचार के माध्यम से पाठ्यक्रम के रूप में भेजी जाती थी। इससे सभी पाठकों को समान रूप से इस बहुमूल्य सामग्री का लाभ मिल सकेगा। संक्षिप्त पाठ्यक्रम तो चार अंकों में पूरा हो जाएगा
अखण्ड-ज्योति के परिजनों का सौभाग्य है कि वे अध्यात्म तत्वज्ञान और प्रयोग-उपचार का न केवल दर्शन वरन् अभ्यास भी इस रूप में जान सकेंगे जिसे तथ्यों की हर कसौटी पर कसा और खरा पाया जा सके। यह प्रतिपादन दिसंबर 81 से प्रारंभ होकर दिसंबर 82 तक तेरह अंकों में प्रकाशित होते रहेंगे। यह कतरनों का संकलन-संपादन नहीं है वरन् 72 वर्ष की आयुष्य तक निरंतर चलते रहे अध्ययन, अध्यवसाय, चिंतन, मनन और समुद्र मंथन जैसे प्रयास का प्रतिफल है
(1) अखण्ड-ज्योति- में अध्यात्म तत्व ज्ञान के उच्चस्तरीय प्रसंग रहते हैं
इस घोषणा को कसौटियों पर कसे जाने से आविष्कर्ताओं को प्रसन्नता ही होती है, नाराजी नहीं। अगले दिनों अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर जो छपने वाला है उसे इसी स्तर का समझा जाय। इस गंभीर प्रसंग को इस रूप में इससे पूर्व कहीं प्रतिपादित किया गया हो- ऐसा स्मरण नहीं आता। अस्तु इसे अभूतपूर्व कहने में भी कोई अत्युक्ति नहीं है
अखण्ड-ज्योति का चन्दा 15), युग निर्माण योजना का 10) तथा प्रज्ञा अभियान का 6) है। परिजन तीनों का महत्व समझें। तीनों को पढ़कर ही मिशन का समग्र स्वरूप समझा जा सकता है
इस संदर्भ में एक और भी अनुरोध है कि यदि समय मिले और उत्साह उभरे तो अपने प्रभाव क्षेत्र में विज्ञजनों को अगले वर्ष के लिए अखण्ड-ज्योति के सदस्य बनाने के लिए भी कुछ दिन दौड़धूप कर ली जाय। आरंभ में यह कहते हुए अनख या संकोच लग सकता है, पर जिन्हें सदस्य बनाया गया है उनकी प्रतिक्रिया कुछ समय उपरांत जानी जायेगी तो वे यही कहते पाये जायेंगे कि चंदा वसूल कर हानि नहीं पहुंचायी गई वरन् उन्हें अप्रत्याशित लाभ से लाभान्वित किया गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-November
परिजनों से आग्रहपूर्वक अनुरोध है कि वे इस वर्ष ‘अखण्ड-ज्योति’ के नये सदस्य मात्र पत्रिका को परिपुष्ट करने-प्रज्ञा अभियान को अग्रगामी बनाने-बसन्त पर्व की श्रद्धांजलि चढ़ाने के लिये ही नहीं वरन् इस दृष्टि से भी बढ़ायें कि उस विलक्षण पाठ्य सामग्री का लाभ उनके सभी प्रियजनों को मिल सके। स्मरण रखने योग्य रखने योग्य तथ्य यह है कि ये अंक कुछ ही समय में मिलने दुर्लभ हो जायेंगे। माँगकर पढ़ लेना बात दूसरी है, पर इन्हें स्थायी निधि के रूप में सुरक्षित रख सकना उन्हीं के लिये सम्भव हो सकेगा जो स्थायी ग्राहकों के रूप में उन्हें उपलब्ध कर सकेंगे
कहना न होगा कि इस प्रस्तुतीकरण की विशिष्टता और उस आधार पर परिजनों को कुछ विशेष लाभ ले सकने की सम्भावना का ध्यान रखते हुए ही पत्राचार विद्यालय का नया झंझट सिर पर उठाया गया था। अब उस रहस्यमयी जानकारी को अखण्ड-ज्योति के अंकों में छाप कर सर्वसाधारण के लिए सुलभ बनाया जा रहा है
इन दिनों अध्यात्म विद्या के प्रति सन्देह और अविश्वास बढ़ता जा रहा है, निराशा का वातावरण बन रहा है, उसका कारण वह असफलता ही है जो आरम्भ तो बहुत उत्साहपूर्वक की गई किन्तु अंत में पूरी न हो सकी। इस असमंजस को दूर करने के लिए अखण्ड-ज्योति में लगातार अध्यात्म का सैद्धांतिक एवं प्रयोगात्मक “रहस्योद्घाटन” प्रतिपादन प्रकाशित होने जा रहे हैं। यह लेख माला दिसंबर 81 अंक से आरम्भ हो रही है और प्रायः एक साल तक चलेगी। इस प्रतिपादन को उनके अध्यात्म क्षेत्र के निजी अनुभवों का निचोड़ निष्कर्ष कहा जा सकता है
सन् 82 से अखण्ड-ज्योति का चन्दा बारह के स्थान पर पन्द्रह रुपया होगा। चालीस प्रतिशत महंगाई का भार पड़ने पर भी चंदे में वृद्धि मात्र पच्चीस प्रतिशत ही की गई है। इसमें भी यह निश्चय किया गया है कि पत्रिका के कलेवर में वृद्धि कर दी जाय
इसलिए उसे तीन अंकों में छापने का निश्चय किया गया। दिसम्बर, जनवरी, फरवरी की अखण्ड-ज्योति के तीनों अंक अब इसी पाठ्य-सामग्री से भरे-पूरे छपेंगे। दिसम्बर अंक से व्यक्ति के अन्तराल में छिपी हुई रहस्यमय क्षमताओं की जानकारी रहेगी। जनवरी में ब्रह्माण्डगत उन अदृश्य प्रवाहों का परिचय होगा जिनसे तनिक-सा संपर्क सध जाने पर मनुष्य कुछ से कुछ हो सकता है
यह पाठ्यक्रम किसे कितना रुचा और किसने उससे क्या लाभ उठाने के संबंध में सोचा तथा क्या कदम उठाया इसकी जाँच पड़ताल भी परीक्षा पद्धति से होगी। पाठ्य सामग्री अखण्ड-ज्योति के जिस अंक में पूर्ण होगी, उसी में दो का एक प्रश्न पत्र छाप दिया जायेगा और उत्तर कापियाँ आने पर परामर्श के अतिरिक्त मान्यता प्राप्त साधकों से उन्हें पंजीकृत कर लिया जायेगा। ताकि आदान-प्रदान एवं मार्गदर्शन का सिलसिला उस वर्ग की स्थिति जमा लेने पर सरलतापूर्वक चलाया जाता रहे
प्रयत्न यह होना चाहिए कि सन् 82 की अखण्ड-ज्योति के सदस्य उन सभी को बना लिया जाय जो अपने निकटवर्ती स्वजन, सम्बन्धी, मित्र एवं प्रमुख क्षेत्र के विचारशील व्यक्ति हों। पत्रिका के चन्दे को राशि इतनी बड़ी या इतनी असह्य नहीं है जो इतनी बहुमूल्य सामग्री के बदले में जुटाई न जा सके। प्रश्न पैसे का नहीं, समझने समझाने का है
इस विवशता में प्रायः सभी पत्रिकाओं ने लागत वृद्धि के अनुपात में अपनी मूल्य वृद्धि कर दी है। अखण्ड-ज्योति तो पहले ही कठिनाई से अपनी लागत पूरी कर पा रही थी। अब चालीस प्रतिशत वृद्धि का भार उसके लिये किसी भी प्रकार सहन नहीं हो सकता। पृष्ठ घटा देने या चन्दा बढ़ा देने के अतिरिक्त कोई तीसरा विकल्प नहीं
जिनके बारह रुपये आ चुके हैं वे उसे वापस मंगा सकते हैं या अखण्ड-ज्योति के अगले वर्ष के चन्दे में जमा कर सकते हैं। भेजने वालों की जैसी मर्जी होगी तुरन्त वैसा ही प्रबन्ध कर दिया जायेगा
लाभ तो उससे मनस्वी और श्रद्धालु ही प्राप्त कर सकेंगे किन्तु जो उपयोगी है उसे जानना तो सभी को चाहिए। अस्तु अखण्ड-ज्योति में वह रहस्योद्घाटन छपना आरम्भ हो गया है और जब तक प्रसंग पूरा न हो जाय जब तक चलता ही रहेगा
अस्तु परिचय कराने, उत्साह बढ़ाने एवं आग्रह करने में कमी नहीं रखी जानी चाहिए। जिनका पू. गुरुदेव की गरिमा और उपलब्धियों पर श्रद्धा विश्वास हो, उन सभी का कर्त्तव्य है कि सन् 82 की अखण्ड-ज्योति में छपने वाले उनके निष्कर्षों, विश्वासों एवं अनुभवों का सार अपने प्रभाव क्षेत्र के हर भावनाशील तक पहुँचाने के लिए कुछ कारगर प्रयत्न करें। इन्हीं दिनों एकाकी या टोली बनाकर निकल पड़ा जाय तो एक ही दिन में दस सदस्य अपने प्रभाव क्षेत्र में ही बनाये जा सकते हैं। यह एक-दो दिन का प्रयास परिश्रम काम में कुछ हर्ज करता हो तो भी उसे सहन करना चाहिए और यह प्रयत्न करना चाहिये कि प्रतिपादन की उपयोगिता एवं अलभ्यता को देखते हुए उसे सभी स्वजनों के गले मढ़ दिया जाय

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-April
जिन्हें भगवान ने खता, पीता बनाया है। ‘‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों में भी भावनाशीलों को अग्रिम पंक्ति में खड़े होने और प्रज्ञा-पुत्र योजना को अपनाकर अपने संपर्क क्षेत्र में आलोक वितरण की नई जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। युग संधि के इस पावन पर्व पर उन्हें इतना साहस दिखाने में आना-कानी नहीं करनी चाहिए
‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों को ‘प्रज्ञा परिजन’ कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। वे लम्बी अवधि से जिसे माता का दूध पीते रहे हैं। उनकी प्रतिक्रिया सीता पुत्र लव-कुश, शकुन्तला पुत्र भरत, गंगा पुत्र भीष्म, अंजनी पुत्र हनुमान जैसी ही होनी चाहिए
इन दिनों ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों में से जो प्राणवान हैं उनसे एक अनुरोध किया जा रहा है कि वे अपने संपर्क क्षेत्र में युगान्तरीय चेतना का आलोक पहुँचाने का प्रयास करें। यह आरम्भ में ही कुछ अटपटा और अनख जैसा लगेगा पर थोड़े ही समय तक अपनाये रहने पर प्रतीत होगा कि वह कितना सरस, कितना सरल और कितना अधिक श्रेयस्कर है। ‘प्रज्ञापुत्र योजना’ की गत अंक में चर्चा हो चुकी है
‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के प्रज्ञापरिजनों को युग संधि के पावन पर्व पर कुछ विशेष उत्तरदायित्व वहन करने के लिए कहा जायेगा तो वे उसे भी उसी श्रद्धा भावना के साथ शिरोधार्य करेंगे जैसा कि पिछले दिनों समय-समय पर किये गये अनुरोधों का उत्साहपूर्वक परिपालन किया गया है। अनिवार्य व्यस्तता रहने पर कईयों की परिस्थिति सामूहिक प्रयासों में सम्मिलित हो सकने जैसी नहीं होती। फिर भी भावनाशीलों के लिए यह तनिक भी कठिन नहीं है कि वे सामान्य जीवन के निर्धारित कार्यों को पूरा करने के साथ-साथ युग धर्म के निर्वाह के निमित्त भी यथासंभव कुछ करते रहें
वह निरर्थक नहीं है। ‘अखण्ड-ज्योति’ द्वारा प्रस्तुत प्रेरणाओं को सम्बद्ध व्यक्ति किसी समर्थ पयस्विनी से कम नहीं मानते, आँकते रहे हैं। इस मान्यता में बहुत कुछ तथ्य भी है
‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों में से कितने ही ऐसे भी हैं जिन्हें विशिष्ट, वरिष्ठ, प्रतिभाशाली एवं विभूतिवान कहा जा सकता है। उनसे इन दिनों अतिरिक्त रूप से आग्रह किया गया है कि वे अपनी विभूतियों को इन दिनों युग-सृजन की दिशा में भी मोड़ने का प्रयत्न करें और जितना संभव हो उतना अनुदान-अंशदान इस पुण्य प्रयोजन के लिए प्रस्तुत करने का साहस जुटायें
इसी वर्ष अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, बंगला, उड़िया, भाषाओं में अनुवाद कराने तथा छापने का काम हाथ में लिया जा रहा है। अखण्ड-ज्योति परिजनों में से जिनका उपरोक्त भाषाओं पर अच्छा अधिकार हो, जो हिन्दी भी अच्छी तरह से समझते हों और स्तर का अनुवाद कर सकते हों, वे अपनी सेवायें इस कार्य के लिये प्रस्तुत करें
‘अखण्ड-ज्योति’ के सुविस्तृत प्रज्ञा परिवार में से मात्र 24000 प्रज्ञा पुत्र आगे आ सके तो इतने भर का अग्रगमन देश के विचारशीलों को उन भावनाओं से अनुप्राणित कर सकता है जो सर्वतोमुखी प्रगति के लिए उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए आवश्यक हैं
‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रिय परिजनों की संख्या लाखों में है। उनमें से मात्र 24 हजार से तो इस नये उत्तरदायित्व को वहन करने की आशा अपेक्षा की ही जा सकती है। अपने विशालकाय भाव सम्पन्न परिवार में इतने लोगों की उदारता एवं सेवा साधना इस ऐतिहासिक अवसर पर उपलब्ध होने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होनी चाहिए
अपना और अपनी पयस्विनी का गौरव बढ़ाते हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ को कामधेनु तो नहीं कहा जा सकता और न वह सीता, शकुन्तला, गंगा, अंजनी की श्रेणी में खड़ी होती है, फिर भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि उसका पयपान करने वाले शिवाजी, नैपोलियन, विनोबा स्तर के अवश्य हो सकते हैं। माता के दूध की समय-समय पर बोलचाल के मुहावरों में चुनौती दी जाती रही है। वह निरर्थक नहीं है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-March
मिशन के उद्घोषित दोनों प्रयोजन किस प्रकार सम्पन्न हो सकेंगे। उसकी सम्भावनाएं किस प्रकार बन रही हैं, इसकी अविज्ञात जानकारियाँ सर्वसाधारण को कराने के लिए अगले दिनों अखण्ड-ज्योति के कई अंक लगातार प्रकाशित होंगे, जिनमें (1) मनुष्य में देवत्व के उदय (2) धरती पर स्वर्ग के अवतरण की कार्यपद्धति का अदृश्य एवं अविज्ञात सम्भावनाओं का रहस्योद्घाटन किया जायेगा। किया जाना चाहिए से अब समाधान नहीं होता। क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है? उसकी अदृश्य पृष्ठभूमि में सर्वसाधारण को परिचित कराने वाले यह अंक ऐसे होंगे जिसे तथ्यों के एक स्थान पर प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से अभूत पूर्व कहा जा सकेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-June
अखण्ड-ज्योति परिजन रुचिकर साहित्य पढ़ने की दृष्टि से ही इस देव परिवार में सम्मिलित नहीं हुए हैं, उनके पीछे उनके पूर्व संचित संस्कारों का तथा दैवी अपेक्षाओं का एक भारी भरकम दबाव भी है, जिसके कारण वे मात्र साधक न रहकर सूत्र संचालकों के घनिष्ठ एवं अन्यान्य बनते चले आये हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि समय-समय पर जो अनुरोध किये गये उनकी पूर्ति समर्थता असमर्थता का विचार किये बिना भावभरी भूमिका के साथ सदा सर्वदा होती रही है
अखण्ड-ज्योति, परिजनों में से प्रत्येक को शान्तिकुँज की आत्मा और भावभरा अनुरोध इन पंक्तियों में लपेट कर भेजती है। वे इस युग संधि के पुनीत प्रभात पर्व पर मूक दर्शक बनकर न रहें। प्रज्ञा-पुत्र योजना में सम्मिलित हों और उस सुयोग को हाथ से न जाने दें जो प्रायः युग परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर ही हजारों लाखों वर्ष बाद कभी-कभी ही आते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-July
इस प्रकार प्रायः चार हजार प्रज्ञा परिजनों के हाथ से यह स्थापना उपचार शास्त्रीय विधि-विधान के साथ चलता रहा। इस अवसर पर उपस्थित लोगों को मौखिक रूप से और ‘अखण्ड-ज्योति’ ‘प्रज्ञा-अभियान’ के पाठकों को मुद्रित रूप से इस स्थापना की जानकारी पहुँचा दी गई है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-October
इस समय के उनके क्रिया-कलापों, परिस्थितियों के समाधान परक विवेचन तथा उपचार-साधना के प्रत्यक्ष मार्ग-दर्शन के लिये ‘प्रज्ञा अभियान’ पत्रिका का एक विशेषाँक इस आश्विन नवरात्रि पर प्रकाशित किया गया है। इसका साइज ‘अखण्ड-ज्योति’ के समान ही है एवं पृष्ठ संख्या 2 अंकों के बराबर। इसमें छपे लेखों पर प्रश्न पूछे जायेंगे व सही उत्तर भेजने वालों को ‘वरिष्ठ प्रज्ञापुत्रों’ की मान्यता मिलेगी। मान्यता प्राप्त ये वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र परिवार के अंतरंगों में गिने जायेंगे व आगामी विषम बेला में उनकी भूमिका मुख्य होगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-May
‘अखण्ड-ज्योति’ के अतिरिक्त अब दूसरी ‘‘युग निर्माण योजना मासिक’’ और तीसरी ‘‘प्रज्ञा अभियान मासिक’’ भी प्रकाशित होने लगी है। इन तीनों के तीन कार्य क्षेत्र विभाजित कर दिये गये हैं- 1. ‘अखण्ड-ज्योति’ मनुष्य में देवत्व के उदय का, विश्व मानव के भावनात्मक परिष्कार का, आत्मोत्कर्ष का ताना-बाना बुनती और तद्नुरूप प्रतिपादन प्रस्तुत करती रहेगी। विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय करने की यज्ञोपैथी जैसे अभिनव आविष्कारों से जन-साधारण को लाभान्वित करने की जिम्मेदारी इसी की है। ब्रह्मवर्चस् के अनुसंधान और पर्यवेक्षण का निष्कर्ष युग मनीषा तक पहुँचाने का भारी भरकम काम उसी का है
अखण्ड-ज्योति एवं युग-निर्माण की तरह तीसरी पत्रिका प्रज्ञा-अभियान की भी अपनी महत्ता है। इन तीनों के मिलने से सरस्वती, लक्ष्मी, काली जैसा त्रिवेणी संगम बनता है और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का सुनिश्चित द्वार खुलता है
अखण्ड-ज्योति में ‘अपनों से अपनी बात’ स्तम्भ छपता था। अब उसका समय की आवश्यकता के अनुरूप विस्तार किया गया है और ‘प्रज्ञा-अभियान’ के नाम से स्वतन्त्र रूप से प्रकाशित करते रहने का निश्चय किया गया है। उसके जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल, 1981 के अंकों में युग सन्धि के द्वितीय वर्ष में क्रियान्वित होने वाले ‘सप्त सूत्री कार्यक्रम’ की प्रधान रूप से चर्चा है
लोकमानस को परिष्कृत करने के उद्देश्य को लेकर आज 45 वर्ष पूर्व छोटा-सा शुभारम्भ ‘अखण्ड-ज्योति’ के नाम से हुआ था। कार्य विस्तार के साथ-साथ उसे गायत्री तपोभूमि, युग-निर्माण योजना, शान्ति-कुंज, ब्रह्मवर्चस्, गायत्री नगर के रूप में विकसित करना पड़ा। इतने से भी काम नहीं चला तो अब 2400 प्रज्ञापीठों के सहारे उसे व्यापक बनाया जा रहा है
अब से 45 वर्ष पूर्व तत्कालीन आवश्यकता एवं परिस्थिति के अनुरूप अकेली ‘अखण्ड-ज्योति’ से ही भली प्रकार काम चल जाता था- चलता भी रहा है। पर अब बात वैसी नहीं है। मिशन अब बचपन से आगे निकल कर प्रौढ़ता की परिधि में जा पहुँचा है और उसे परामर्श से लेकर साधनों तक की इतनी अधिक आवश्यकता पड़ती है जितनी कि बचपन वाले दिनों में कभी सोची भी नहीं गई थी
अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में विश्व के दो प्रसिद्ध खगोलशास्त्री जौन ग्रिविन तथा स्टीफन प्लैगमेन द्वारा लिखी गई पुस्तक के उदाहरण प्रकाशित हुये थे। जिनमें कहा गया था कि ‘‘सन् 1982 में हमारे सौर मण्डल में नवों ग्रह सूर्य के एक ओर पंक्तिबद्ध हो जायेंगे। चूँकि यह घटना ऐसे समय घटेगी जब सूर्य की गतिविधियाँ सर्वाधिक होंगी, इसीलिये दुनिया भर के सभी क्षेत्रों में ऋतुएँ आश्चर्यजनक रूप से बदलेंगी
दोनों ही हिन्दी मासिक हैं और युग-निर्माण योजना मथुरा के तत्वावधान में प्रकाशित होती हैं। अखण्ड-ज्योति परिजनों से अनुरोध है कि वे जिस प्रकार ‘अखण्ड-ज्योति’ के साथ आत्मीयता जोड़े रहे हैं, उसी प्रकार इन दिनों नये प्रकाशनों को भी अपनाने का प्रयत्न करें। यह चौदह रुपये की राशि और भी खर्च की जानी चाहिए। आयुष्य बढ़ने से- वैभव एवं उत्तरदायित्व के विस्तार से कुछ नया भार तो बढ़ता ही है
दोनों के सहयोग से कभी समुद्र मंथन हुआ था और चौदह रत्न निकले थे। अखण्ड-ज्योति और युग निर्माण को दोनों पक्षों को नेतृत्व करने की बात कही गई है। वे बृहस्पति और शुक्राचार्य भूमिका को सृजनात्मक प्रयोजन के लिए नियोजित करेंगे तो फिर नया समुद्र मंथन होगा और व्यक्ति की श्रद्धा-सम्वेदना से लेकर समाज की प्रथा परम्परा के हर क्षेत्र में सतयुगी सम्भावनाओं का दर्शन होने में देर न लगेगी
यहाँ विस्तार और विभाजन की चर्चा इस प्रसंग में की जा रही है कि अब से 45 वर्ष पूर्व ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका के माध्यम से जो दीपक जलाया गया था वह चिरकाल तक सामयिक आवश्यकता के अनुरूप अपना कार्य यथावत् सम्पन्न करता रहा। इतने पर भी नये-नये कमरे बन जाने पर एक दीपक की गरिमा को शत-शत नमन करते हुये भी नये दीपक जलाने की आवश्यकता पड़ेगी। छोटे बच्चे को भोजन वस्त्र और खिलौने देकर भली-भाँति संतुष्ट रखा जा सकता है, पर जब वह बढ़ता है तो शिक्षा, स्वास्थ्य एवं समाज संपर्क के कतिपय नये साधनों की माँग करता है
इतना ही नहीं वे इसलिए भी क्रियान्वित होंगे कि उज्ज्वल भविष्य का और कोई विकल्प है नहीं। ‘अखण्ड-ज्योति’ एवं ‘युग निर्माण योजना’ के सम्बन्ध में फिर एक बार इस प्रकार समझ लेना चाहिए कि मिशन के दोनों संकल्पों को पूरा करने के लिए चिन्तन एवं व्यवहार का समग्र ढाँचा खड़ा करें और उन्हें क्रियान्वित करने के लिए प्रतिभाओं को उभारने तथा साधन जुटाने का उत्तरदायित्व वहन करें। दोनों संकल्प सर्वविदित हैं (1) ‘‘मनुष्य में देवत्व का उदय’’ अर्थात् व्यक्तित्वों का आदर्शवादी निर्माण (2) ‘‘धरती पर स्वर्ग का अवतरण’’ अर्थात् क्षमताओं और सम्पदाओं का मात्र सत्प्रयोजनों के लिये नियोजन
इन तीनों को अपने-अपने क्षेत्र का उत्तरदायित्व सम्भालने में निरत रहते देखा जा सकता है। ‘अखण्ड-ज्योति’ के अतिरिक्त अब दूसरी ‘‘युग निर्माण योजना मासिक’’ और तीसरी ‘‘प्रज्ञा अभियान मासिक’’ भी प्रकाशित होने लगी है। इन तीनों के तीन कार्य क्षेत्र विभाजित कर दिये गये हैं- 1. ‘अखण्ड-ज्योति’ मनुष्य में देवत्व के उदय का, विश्व मानव के भावनात्मक परिष्कार का, आत्मोत्कर्ष का ताना-बाना बुनती और तद्नुरूप प्रतिपादन प्रस्तुत करती रहेगी। विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय करने की यज्ञोपैथी जैसे अभिनव आविष्कारों से जन-साधारण को लाभान्वित करने की जिम्मेदारी इसी की है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-January
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजनों ने युग परिवर्तन की मशाल जलाने और ज्योति जगाने में अग्रगामी भूमिका निभाई- इस तथ्य और सत्य से विज्ञ समुदाय का हर व्यक्ति भली-भाँति अवगत है। विगत 43 वर्षों की लम्बी अवधि पर दृष्टिपात करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचाना पड़ता है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ की गणना लोकरंजन के लिए प्रचार विज्ञापन या उपार्जन के लिए निकलने वाली पत्रिकाओं के परिवार में नहीं हो सकती। उसका उदय अवतरण एक सुनिश्चित मिशन के रूप में- एक लक्ष्य विशेष के लिए हुआ था
युग सन्धि पर्व पर प्रज्ञा परिजनों का क्या सोचना और क्या जानना-मानना चाहिए। इसका प्रतिपादन अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर मिलता है। अब समय के प्रगति क्रम ने प्रत्येक जागृत आत्मा को कुछ नये कर्तव्य और उत्तरदायित्व सौंपे हैं। उनका स्वरूप, निर्वाह एवं उपक्रम जानने के लिए ‘पाक्षिक युग निर्माण’ का पढ़ना भी उतना ही आवश्यक हो गया है जितना अखण्ड-ज्योति का, दोनों को परस्पर पूरक और अन्योन्याश्रित समझा जाय
उनका स्वरूप, निर्वाह एवं उपक्रम जानने के लिए ‘पाक्षिक युग निर्माण’ का पढ़ना भी उतना ही आवश्यक हो गया है जितना अखण्ड-ज्योति का, दोनों को परस्पर पूरक और अन्योन्याश्रित समझा जाय। उसे मंगाने, पढ़ने और पढ़ाने में उतना ही उत्साह अपनाया जाय जितना कि अब तक अखण्ड-ज्योति के लिए प्रदर्शित किया जाता रहा है। ‘पाक्षिक युग निर्माण’ गायत्री तपोभूमि मथुरा से निकलता है और उसका चंदा आठ रुपया वार्षिक है। जो परिजन उसके सदस्य न हों नये वर्ष जनवरी से ही उसे मंगाने लगें
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजनों ने युग परिवर्तन की मशाल जलाने और ज्योति जगाने में अग्रगामी भूमिका निभाई- इस तथ्य और सत्य से विज्ञ समुदाय का हर व्यक्ति भली-भाँति अवगत है। विगत 43 वर्षों की लम्बी अवधि पर दृष्टिपात करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचाना पड़ता है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ की गणना लोकरंजन के लिए प्रचार विज्ञापन या उपार्जन के लिए निकलने वाली पत्रिकाओं के परिवार में नहीं हो सकती। उसका उदय अवतरण एक सुनिश्चित मिशन के रूप में- एक लक्ष्य विशेष के लिए हुआ था। यह कहने में कोई अत्युक्ति या दर्पोक्ति नहीं है कि इस लम्बी अवधि में व्रतशील तीर्थयात्री की तरह उसने प्रयाण क्रम को बिना थके-बिना डरे डगमगाये-अनेकानेक विघ्न बाधाओं को झेला और गतिशीलता को अनवरत जारी रखा है
अब समय के प्रगति क्रम ने प्रत्येक जागृत आत्मा को कुछ नये कर्तव्य और उत्तरदायित्व सौंपे हैं। उनका स्वरूप, निर्वाह एवं उपक्रम जानने के लिए ‘पाक्षिक युग निर्माण’ का पढ़ना भी उतना ही आवश्यक हो गया है जितना अखण्ड-ज्योति का, दोनों को परस्पर पूरक और अन्योन्याश्रित समझा जाय। उसे मंगाने, पढ़ने और पढ़ाने में उतना ही उत्साह अपनाया जाय जितना कि अब तक अखण्ड-ज्योति के लिए प्रदर्शित किया जाता रहा है। ‘पाक्षिक युग निर्माण’ गायत्री तपोभूमि मथुरा से निकलता है और उसका चंदा आठ रुपया वार्षिक है
अखण्ड-ज्योति परिजनों ने सदा से प्रज्ञा परिजन की भूमिका निभाई है और नव सृजन के लिए नियमित रूप से योगदान दिया है। अब बढ़ती हुई आवश्यकताओं को देखते हुए उसमें अधिकाधिक अभिवृद्धि की आवश्यकता है। युग सन्धि पर्व का जागृत आत्माओं को विशेष रूप से यह आह्वान आमंत्रण है कि वे निर्वाह और परिवार के दो उत्तरदायित्वों में एक तीसरा ‘‘नव निर्माण’’ और सम्मिलित करें
लड़ाई छिड़ जाने पर तो एक ही बात ध्यान में रहती है जो साधन मौजूद हैं उन्हीं के सहारे आक्रांता को धकेलने और सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने के लिए जो संभव हो कर गुजरा जाय। विगत 43 वर्षों से अखण्ड-ज्योति ने कुंती की तरह अपना परिवार सृजा संजोया, पर अब तो समय के आह्वान पर उन सभी को कृष्ण के नेतृत्व में महाभारत की सृजन योजना में निछावर होने के लिए तिलक लगाना और विदा करना ही एक मार्ग है। सामान्य समय और आपत्ति काल का अंतर तो समाधान ही होता है। एक मैं सामान्य निर्धारण चलता रहता है, पर दूसरे अवसर पर अन्यत्र से सामर्थ्य समेट कर एक ही केंद्र पर नियोजित करनी होती है
उन्होंने सदाशयता को सींचने और दुष्टता को निरस्त करने के अनमेल प्रयासों की संगति बिठाई समन्वित नीति अपनाई थी। अखण्ड-ज्योति का प्रज्ञा परिवार प्रायः उसी मार्ग पर चलता और उज्ज्वल भविष्य के लक्ष्य तक जा पहुँचने के लिए समग्र साहस सँजोये हुए बढ़ता रहा है। प्रयास कितने बन पड़े और कितने सफल हुए इसका लेखा-जोखा रख सकना दूरवर्ती लोगों के लिए कठिन है। मूक साधना की प्रवृत्ति और उपलब्धि का पर्यवेक्षण मात्र अतिनिकटवर्ती लोगों के लिए ही सम्भव है
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजनों की सौभाग्य भरी दूरदर्शिता देर-सबेर में कोटि-कोटि कंठों द्वारा इसलिए सराही जायेगी कि उनने अंधेरे में दीपक जलाने जैसा साहस दिखाकर अपनी विशिष्टता एवं वरिष्ठता का परिचय दिया। साहस के धनी अनेकों होते हैं। उद्दण्ड आतंकवादी, दस्यु आततायी आये दिन दुस्साहस बरतते और दुष्टता करते देखे जाते हैं
अखण्ड-ज्योति ने ऐसे ही मणि-मुक्तकों को जहां-तहां से ढूंढ़ा और हीरक हार की तरह उन्हें कलात्मक ढंग से गूंथ कर युग देवता की सौंदर्य सज्जा को बढ़ाया है। दूसरे शब्दों में उसे ऐसी पुष्प वाटिका की उपमा भी दी जा सकती है जिसमें एक से एक सुंदर सुरभित फूलों को खिलते-महकते देखकर दर्शकों का मन हुलसता है। इस खिली पीढ़ी का विशिष्ट सौभाग्य यही है कि उनका उपयोग वैश्या गृहों में नहीं देवमंदिरों में ही होता चला जा रहा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-August
दस पैसा इसके लिये निर्धारित है कि मथुरा से निकलने वाली अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकायें तथा ट्रैक्ट-साहित्य, जो अब तक छप चुका है या तेजी के साथ छपने वाला है, उसे माँगते रहा जाये। इसी पैसे से विज्ञप्तियों के वितरण की भी प्रक्रिया चलती रह सकती है। यों इस पैसे का सारा साहित्य सदस्य के घर में ही पहुँचेगा और वह कभी भी बेचना चाहे, तो आसानी से बिक भी सकता है
वे अभी तक स्थूल विवेचन तक ही सीमित है, इसलिये आगे जीव की जिन सात अवस्थाओं का विवेचन करेंगे, उनका वैज्ञानिक दृष्टि से कोई प्रमाण नहीं मिलेगा। उनको प्रमाणित करने वाले तत्व केवल मनोवैज्ञानिक और घटनापरक तथ्य ही होंगे, जिनका विवरण अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में लगातार दिया जा रहा हैं
जब हम रहते हैं, तो हम स्वयं उत्तर लिखते या लिखाते हैं-हमारे न रहने पर माताजी उत्तर देती हैं। चूँकि माता जी अखण्ड-ज्योति संस्थान में ही रहती हैं और वहीं की व्यवस्था संभालती हैं, इसलिये व्यक्तिगत पत्र वहीं भेजे जाने उचित हैं
दोनों पत्रिकायें इस वर्ष घीयामण्डी से ही निकलेंगी। जनवरी से ‘युग-निर्माण योजना’ का प्रकाशन गायत्री तपोभूमि से होगा और ‘अखण्ड-ज्योति’ घीयामण्डी से निकलेगी। पर अभी इस वर्ष दोनों पत्रिकाओं का दफ्तर घीयामण्डी ही है, सो चन्दा शिकायतें आदि इसी पते पर भेजने चाहिएं। पाठक इस डाक-विभाजन को ध्यानपूर्वक समझ लें और नोट कर लें
साधना तथा व्यक्तिगत परामर्श संबंधी डाक ‘अखण्ड-ज्योति संस्थान’ के पते पर ही भेजनी चाहिये, क्योंकि इन दिनों इस प्रकार की डाक माताजी ही खोलती हैं। जब हम रहते हैं, तो हम स्वयं उत्तर लिखते या लिखाते हैं-हमारे न रहने पर माताजी उत्तर देती हैं। चूँकि माता जी अखण्ड-ज्योति संस्थान में ही रहती हैं और वहीं की व्यवस्था संभालती हैं, इसलिये व्यक्तिगत पत्र वहीं भेजे जाने उचित हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-June
(1) इन दिनों चल रहे 4-4 दिन के परामर्श शिविरों की उपयोगिता अनुपम है। इनमें हर अखण्ड-ज्योति पाठक को सम्मिलित होने का लाभ लेना ही चाहिए। इतना महत्त्वपूर्ण शिक्षण शायद ही फिर कभी किसी को मिल सके। इनमें सम्मिलित होने की तैयारी अभी से करनी चाहिए और मार्च में छपी अखण्ड-ज्योति में छपे शिविर क्रम में अपने लिये जो उपयोगी पड़ता हो उसमें आने की स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिये
किन्तु ध्यान विज्ञान का एक गूढ़तम सिद्धान्त है जिसके द्वारा न केवल चेतन और कोमल वस्तुओं का वरन् कठोर-से कठोर वस्तुओं का भी भेदन करके वहाँ की स्थिति का पता लगाया जा सकता है। कई भारतीय योगियों द्वारा पृथ्वी के अन्दर जन-स्रोतों का पता देने के वर्णन अखण्ड-ज्योति में छप चुके हैं। गड़ा धन, भूतों से सम्बन्ध स्थापित करना देव-शक्तियों से तादात्म्य स्थापित कर दिव्य एवं चमत्कारिक शक्तियों का अर्जन सब ध्यान की परिपक्वता के ही परिणाम है। टेड सीरियस ने भी गुप्त खजानों की खोज के लिये यह अभ्यास प्रारम्भ किया था
इतना महत्त्वपूर्ण शिक्षण शायद ही फिर कभी किसी को मिल सके। इनमें सम्मिलित होने की तैयारी अभी से करनी चाहिए और मार्च में छपी अखण्ड-ज्योति में छपे शिविर क्रम में अपने लिये जो उपयोगी पड़ता हो उसमें आने की स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिये
(2) अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण योजना के अंक कम से कम अपने दस मित्रों को पढ़ाते रहने का क्रम बनाइये और प्रयत्न कीजिए कि कुछ नये सदस्य बन सकें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-March
यह उदाहरण कोई अपवाद नहीं। अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में ऐसे सैंकड़ों उदाहरण देते चले आ रहे हैं। ‘एलगी’ जाति के ‘प्रोटोकोकश’ पौधे और फंगस जाति के ‘एस्कोमाइसिटीज’ पौधे भी आपस में मिलकर एक दूसरे को बहुत सुन्दर ढँग से पोषण की वस्तुएँ प्रदान करते हैं। हमें शिक्षक ज्ञान देता है, शिक्षा देता है पर हम अपनी अनपढ़ धर्मपत्नी या अशिक्षित पड़ौसी के लिये एक घण्टा भी नहीं निकाल सकते, हमारे माता-पिता हम जब बच्चे थे, तब आधे पेट गीले वस्त्रों में सोकर हमारी परवरिश करते थे पर आज जब वे वृद्ध हो गये, तब हम उनकी कितनी अवहेलना करते हैं
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-April
निश्चय किया गया है कि हम गायत्री परिवार, अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण शाखाओं के सदस्यगण सन् 70 से लेकर एक वर्ष तक विदाई वर्ष मनायेंगे। गुरुदेव के इस जन्म का एक मात्र उद्देश्य जन-मानस में परिवर्तन करने के लिए ‘ज्ञान-यज्ञ’ अभियान को ज्योतिर्मय एवं गतिशील बनाना है। हम अगले वर्ष को ‘ज्ञान-यज्ञ’ वर्ष भी कह सकते हैं
‘अखण्ड-ज्योति’ संस्थान, मथुरा
(8) हिन्दी के अतिरिक्त गुजराती, मराठी, अँग्रेजी, उर्दू, तमिल, बांग्ला आदि अन्य भाषाओं में अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं का साराँश लेकर मासिक पत्रिकायें निकाली जानी हैं और ट्रैक्ट साहित्य प्रकाशित किया जाना है। अन्य भाषा-भाषी अपनी भाषाओं में यह अनुवाद प्रकाशित कराने और फैलाने में योगदान करें
यह बचत 3 रु. मासिक की हुई। इससे अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिका का चन्दा 12 रु. वर्ष (एक रुपया मासिक) गया। शेष 2 रु. मासिक से विज्ञप्ति वितरण किया जाय और नये प्रकाशित होते रहने वाले ट्रैक्ट साहित्य को मँगाया जाता रहे। इस प्रकार घरेलू ज्ञान मन्दिर पुस्तकालय की नियमित व्यवस्था इस धर्म घट के माध्यम से दस पैसा रोज निकालने से चलती रहेगी
(9) अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं के लिए नये सदस्य बनाने के लिए अपने क्षेत्र में टोली बना कर भ्रमण करें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-November
पता-1. अखण्ड-ज्योति गायत्री परिवार शाखा 5-विट्ठलबाड़ी, झवेरी बाजार
माता भगवती देवी जो जून से ही सप्त सरोवर हरिद्वार चली जायेंगी और वहाँ अपनी साधना में लग जायेंगी। वहाँ से वे अखण्ड-ज्योति का सम्पादन करेंगी तथा परिजनों को मार्गदर्शन एवं स्नेह प्रदान करती रहेंगी। बाप मर जाता है तो माँ बच्चों को पाल लेती है। माँ न रहे तो बाप के लिये कठिन पड़ता है
हम इन दिनों क्या कर रहे हैं और जिन पर हमारा प्रभाव अधिकार है- उनसे क्या करा रहे हैं, इसकी विस्तृत चर्चा इसी अक्टूबर की युग-निर्माण पत्रिका में पढ़ लेना चाहिए। केवल अक्टूबर का ही क्यों नवम्बर, दिसम्बर के भी युग-निर्माण अंक हर अखण्ड-ज्योति के पाठक को पढ़ लेने चाहिए जो उसे मंगाते न हों या माँगकर पढ़ने की सुविधा न प्राप्त कर सकें वे 3 अंकों का चन्दा 1)50 भेज दें और उन्हें प्राप्त करलें। हम चाहते हैं कि उन तीनों अंकों को हर पाठक पढ़लें। ताकि हमारी तथा आन्दोलन की वर्तमान तथा भावी गति-विधियों की जानकारी ठीक तरह सभी को मिल जाय
इस बीच साधनात्मक एवं व्यक्तिगत कार्यवाहियों के संबंध में परामर्श का कार्य माता भगवती देवी करेगी। अखण्ड-ज्योति का सम्पादन संचालन भी उन्हीं के जिम्मे छोड़ा गया है
2. सन 1939 में पश्चिमी कमान के सैनिक कमाण्डेन्ट श्री एल.पी. फैरेल ने आसाम बर्मा सीमा पर एक योगी को अपनी आँखों अपने वृद्ध शरीर से निकलकर एक स्वस्थ के शव में प्रविष्ट होकर जीवित देखा था। यह घटना अखण्ड-ज्योति मई, 1970 के अंक पेज 29-30 में छपी है
पता-अ.भा. अखण्ड-ज्योति गायत्री परिवार शाखा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-May
इस वर्ष हमें पूरी तत्परता के साथ अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं के सदस्य बढ़ाने में लग जाना चाहिए। यों कितने ही सज्जन यह प्रयत्न थोड़ा-थोड़ा करके सदा ही करते रहते हैं पर इस वर्ष इस दिशा में कुछ अधिक काम होना चाहिए। अपने क्षेत्र के सभी सुसंस्कारी शिक्षितों की लिस्ट बनानी चाहिए और एक-एक करके कुछ अंक उन्हें इस पत्रिकाओं के नमूने के तौर पर पढ़ाने चाहिएं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-December
अखण्ड-ज्योति सन् 1942 का जनवरी अंक “सतयुग अंक” था उसमें संसार के मूर्धन्य ग्रह-गणितज्ञों संतों और भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियाँ छपी थीं जिनमें यह बताया गया था कि संसार में तीव्र उलट-फेर होने वाला है। सारी पृथ्वी में व्यापक हलचल होगी भयंकर युद्ध और रक्तपात होंगे और उस अशान्ति की, संकटपूर्ण परिस्थिति के भीतर से ही एक स्वर्णिम लालिमा का उदय होगा जो एक नये युग के सूर्य के रूप में छा जायेगी और संसार में आज जो भीषण परिस्थितियाँ दिखाई दे रही हैं उनका अन्त हो जायेगा उनके स्थान पर मानवीय सुख-शान्ति, सद्भाव, परस्पर प्रेम, दया, समता आदि सद्गुणों का विकास होगा। यही सतयुग या स्वर्गीय जीवन की रूपरेखा होगी
केवल हमारा आत्मिक जन्म तो वसन्त पंचमी को नहीं हुआ वरन् हर महत्वपूर्ण कार्य हमने इसी दिन से शुरू किये हैं। अखण्ड-ज्योति पत्रिका का आरम्भ वसन्त पंचमी से। युग-निर्माण पत्रिका जन्मी वसन्त पंचमी को। गायत्री तपोभूमि का निर्माण कार्य आरम्भ किया वसन्त पंचमी से
अखण्ड-ज्योति हमारे उद्गारों, अनुभवों, निष्कर्षों, अनुरोधों एवं निर्देशों को परिजनों तक पहुँचाने का प्रधान माध्यम है। हमें सुनने, समझने में जिन्हें दिलचस्पी है उन्हें अखण्ड-ज्योति को स्वयं पढ़ने तक ही सीमित न रह जाना चाहिए वरन् उसका कार्यक्षेत्र आगे बढ़ाने के लिए भी प्रयत्नशील होना चाहिए। अगले वर्ष पत्रिका के सदस्य अधिक बढ़ सकें इसके लिए हम में से प्रत्येक को विशेष रूप से उत्साह एवं पुरुषार्थ करना चाहिए
1 जनवरी 71 से अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं की पाठ्य सामग्री की सम्मिलित पत्रिका अन्य भाषाओं में भी प्रकाशित होने जा रही है। (1) गुजराती युग-निर्माण योजना, (2) मराठी युग-निर्माण योजना, (3) उड़िया युग-निर्माण योजना छपना शुरू हो गई है। अँग्रेजी पत्रिका की तैयारी चल रही है
युग-निर्माण योजना की पूरी रूपरेखा तथा रीति-नीति और भावी कार्य पद्धति ‘युग-निर्माण पत्रिका’ के अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर अंकों में है। इन तीनों अंकों को अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक पाठक अवश्य पढ़ लें। स्वयं न मंगाने हों तो मंगाने वालों से माँगकर पढ़ लें ये अंक समाप्त हो गये है- अतः इन्हें अपने में ही मिलकर पढ़ावें
वैज्ञानिक अध्यात्मवाद, तत्व-दर्शन, आत्म-निर्माण, संजीवनी विद्या, प्रसुप्त शक्तियों का जागरण जैसे विषय उसमें रहेंगे। इसका प्रकाशन पूर्ववत् अखण्ड-ज्योति संस्थान, घीयामंडी मथुरा से होता रहेगा। सम्पादन माता भगवती देवी करेंगी। दोनों की अर्थ व्यवस्था तथा प्रकाशन प्रक्रिया भी अलग-अलग रहेगी
अस्तु संस्था सम्बन्धी पत्र व्यवहार, युग-निर्माण योजना का चन्दा तथा दान-अनुदान गायत्री तपोभूमि मथुरा के पते पर भेजने चाहिए। तथा अखण्ड-ज्योति का चन्दा एवं तत्सम्बन्धी पत्र व्यवहार घीयामंडी के पते पर करना चाहिये। दोनों पत्रिकाओं की ग्राहक लिस्ट तथा ड्राफ्ट आदि एक लिफाफे में बन्द तो किये जा सकते हैं पर होने अलग-अलग चाहिएं ताकि भिन्न स्थानों पर चल रही दो भिन्न व्यवस्थाओं में गड़बड़ी न पड़े
इस प्रकार के कार्यों में अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं के नये ग्राहक बढ़ाने पुराने ग्राहकों से चन्दे एकत्रित करने के कार्य को सर्वोपरि प्राथमिकता मिलनी चाहिए। दिसम्बर के अंक के साथ प्रायः सभी का चन्दा समाप्त हो जाता है। जिनका वर्ष बीच में समाप्त होता है उन नये ग्राहकों से भी आग्रह किया जाता है कि शेष महीने के पैसे चुकाकर जनवरी से दिसम्बर तक का हिसाब सीधा कर लें
अब युग-निर्माण योजना और अखण्ड-ज्योति दोनों पत्रिकाओं का अलग-अलग सीमा विभाजन कर दिया गया है। युग-निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि से प्रकाशित होगी और उसमें मिशन की परम्परा, रीति-नीति तथा गतिविधियाँ घटनाएं तथा दिशाएं रहा करेंगी। सम्पादन अभी तो हम करते हैं पीछे उसे तपोभूमि के कार्यकर्त्ता सँभालेंगे
अँग्रेजी पत्रिका की तैयारी चल रही है। पृष्ठ संख्या अखण्ड-ज्योति के बराबर रहेगी। कागज सफेद ग्लेज बढ़िया लगेगा। कम संख्या में छपने तथा कागज बढ़िया लगाने से इसका मूल्य 1) बढ़ाना पड़ा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-July
उसे यदि इन जीवों का शाप न भी कहा जाये तो इतना तो निश्चित ही है कि इन प्रयोगों से आज का मनुष्य इतना तक निष्ठुर हो सकता है कि वह कल मनुष्यों के भी गले घोटने लगे। ऐसा होने भी लगा है, इसका हृदयस्पर्शी वर्णन अखण्ड-ज्योति के अगले पृष्ठों में करेंगे जबकि डाक्टरों ने माताओं के गर्भ से जीवित भ्रूण धोखा देकर निकाला और प्रयोग के बाद उसे एक तरफ फेंक दिया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-April
अखण्ड-ज्योति, युगनिर्माण योजना एवं युगशक्ति गायत्री पत्रिका के पाठकों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहना। इसी के माध्यम से युग चेतना का संदेश जन-जन तक हर माह अपनी प्राण चेतना समेत जा पहुँचता है। जहाँ संभव हो वहाँ ज्ञानरथ स्वयं चलायें
हमने किसी का दिया हुआ धन खाया नहीं। तो आप नुकसान में रहें होंगे? आप नुकसान की बात करते हैं-कभी आप हमारे गाँव जाइये, गायत्री तपोभूमि मथुरा, अखण्ड-ज्योति कार्यालय देखिये। आप यहाँ आइये शान्तिकुँज, गायत्री नगर देखिये-ब्रह्मवर्चस् देखिये, कितने शानदार हैं। 2400 गायत्री शक्ति पीठों को देखिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-November
तीसरी बात जो खगोल विघा के जानकार बताते हैं कि सन् 81 के बाद में एक और आपत्ति आने वाली है- बृहस्पति के जानकार भी बतलाते हैं। कि अगले बीस पच्चीस साल सन् 1980 से 2005 तक का समय युग-संधि का वह पक्ष है जो नुकसान देय है-खौफ नाक है अखण्ड-ज्योति में आपने कई बार ऐसी भविष्यवाणियाँ पढ़ी होगी। अब कुछ और लेख जनवरी और फरवरी 1980 के अंक में जा रहे हैं। ताकि लोगों को आगाह किया जा सके

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-May
पाठकों को याद दिलादें कि जून 93 का अखण्ड-ज्योति का अंक बढ़े कलेवर के साथ “सूर्य साधना विशेषाँक” के रूप में प्रकाशित हो रहा है। परम पूज्य गुरुदेव की तृतीय पुण्यतिथि गायत्री जयंती 30 मई 1993 पर प्रकाशित जून का यह अंक सूर्य-सविता-सावित्री के विभिन्न नवयुग की गायत्री-सावित्री साधना के कई रहस्यों का उद्घाटन करने वाला होगा। इसका मूल्य अन्य अंकों के समान ही होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-June
परमपूज्य गुरुदेव ने मार्च 1977 से मई 1977 तक चारमाह सतत् अखण्ड-ज्योति के विशेषांकों द्वारा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
दुर्गम हिमालय से लेकर उत्तरकाशी एवं ऋषिकेश की छोटी-सी कुटिया से लेकर सप्तऋषि आश्रम परिसर में बनी विश्वामित्र कुटीर तथा अखण्ड-ज्योति संस्थान का साधना कक्ष, उनके कठोर तप−साधना के क्षेत्र रहे हैं। गायत्री चर्चा स्तंभ 40 वे दश्याक में प्रारंभ कराने बाद क्रमशः पंचकोशी साधना, कल्प साधना, प्राण−प्रत्यावर्तन साधना, कुण्डलिनी साधना, जीवन साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है
परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर साधनाएँ की व करायी। दुर्गम हिमालय से लेकर उत्तरकाशी एवं ऋषिकेश की छोटी-सी कुटिया से लेकर सप्तऋषि आश्रम परिसर में बनी विश्वामित्र कुटीर तथा अखण्ड-ज्योति संस्थान का साधना कक्ष, उनके कठोर तप−साधना के क्षेत्र रहे हैं। गायत्री चर्चा स्तंभ 40 वे दश्याक में प्रारंभ कराने बाद क्रमशः पंचकोशी साधना, कल्प साधना, प्राण−प्रत्यावर्तन साधना, कुण्डलिनी साधना, जीवन साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है
6− जन व्यक्तियों के नाम व पते जो समाचार-पत्र के स्वामी हो तथा जो समस्त पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक के साझेदार या हिस्सेदार हों। - अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-March
इस स्थिति का चित्रण कमल पुष्प के दीपक में जलने वाली प्रकाश-ज्योति के रूप में किया गया है। इस ब्राह्मी स्थिति की प्रतीक प्रतिमा अखण्ड-ज्योति के रूप में की गई है। निरन्तर जलने वाला घृत दीप इस ब्रह्मरंध्र का ब्रह्मलोक का प्रतीक प्रतिनिधि मानकर पूजा उपचार में प्रतिष्ठापित किया जाता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-October
अपने 40 वर्षों के प्रयास में अखण्ड-ज्योति ने ब्राह्मण संस्था का एक छोटा ढाँचा खड़ा करने में थोड़ी सफलता प्राप्त की है। युग निर्माण परिवार के कर्मठ कार्यकर्ता सद्ज्ञान सम्पदा के निर्माण एवं वितरण की आवश्यकता समझते हैं। वे संयमी ब्राह्मणों की तरह अपनी निजी सुख-सुविधा में कटौती करके जो समय, मनोयोग, पैसा बचाते हैं उसे ज्ञान देवता के युग यज्ञ में भावनापूर्वक झूमते रहते हैं
हमारे अगले प्रयास इसी दिशा में होने चाहिए और साधु ब्राह्मणों की गरिमा को मूर्तिमान करने में अपना समूचा जीवन समर्पित करने वाले उदाहरण आगे आने चाहिए। यह प्रयोजन अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों को ही पूरा करना होगा। अब उसमें इतनी भावना और क्षमता उत्पन्न होनी चाहिए कि साधु और ब्राह्मणों को आधे अधूरे नहीं पूरे परिपक्व प्रतीकों को युग देवता के चरणों में प्रस्तुत कर सकें। अपने परिवार ने बालपन समाप्त करके प्रौढ़ता में प्रवेश पा लिया; इसका यही प्रमाण हो सकता है-कि वह साधु और ब्राह्मणों की युग आवश्यकता को पूरा करके दिखाये
अखण्ड-ज्योति प्रयत्न यह भी करती रही है कि वंश और वेश धारण करने वाले लोगों को उनके कर्तव्य उत्तरदायित्वों का बोध कराया जाय और उन्हें कर्तव्य पालन करने के लिए कहा जाय जिसके नाम पर उन्हें पीढ़ियों से प्रचुर धन सम्मान मिलता चला आ रहा है। ऋण चुकाने के नाम पर भी उन्हें कुछ करना चाहिए था, देव लक्ष्य पूरा करने की भावना जगती तब तो बात ही क्या थी; पर हमें अत्यन्त दुःख के साथ अपनी असफलता स्वीकार करनी पड़ती हैं कि परम्परा गत साधु ब्राह्मणों के दरवाजे पर पूरी तरह लम्बे समय से सिर फोड़ते रहने पर भी उन्हें पिघलाना सम्भव न हो सका। जिन्हें मुफ्त का धन और मान मिल रहा है उन्हें ऐसे झंझट में पड़ना जरा भी नहीं सुहाया जिसमें उन्हें स्वयं कष्ट साध्य आदर्शवादी अपनाना पड़ता और लोक सेवा पथ पर चलते हुए पग-पग पर तप-तितीक्षा का परिचय देना पड़ता

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
कर्त्तव्यों का उद्बोधन करने के लिए हमारे प्रतिनिधि के रूप में घर-घर जाने और जन-जन से सम्पर्क साधने का प्रयत्न करें। दिसम्बर की अखण्ड-ज्योति के ‘अपनों से अपनी बात’ तथा आवाहन आमंत्रण वाले पृष्ठ पढ़ने के लिए विशेष रूप से अनुरोध करें। इसके बाद चर्चा-परिचर्या में कुछ बदलने और कुछ करने का उत्साह उत्पन्न करें। यदि इतना बन पड़े तो अपने ही सम्पर्क क्षेत्र में अभिनव उत्साह उमड़ता देखा जा सकता है
व्यक्तिगत भौतिक लाभों की तरह ही यदि आत्मिक कर्तव्यों को महत्त्व दिया जा सके तो व्यस्तता अभावग्रस्तता एवं कठिनाइयों की समस्या रहते हुए भी युग कर्तव्यों को पूरा करने के लिए कुछ न कुछ कर सकने का अवसर हर किसी को मिल सकता है। नव-निर्माण के लिए हमें क्या करना चाहिए इस सम्बन्ध में दिसम्बर अखण्ड-ज्योति के ‘अपनों से अपनी बात’ स्तम्भ में बसन्त पर्व का उद्बोधन भी पाक्षिक युग-निर्माण योजना में छपते रहे हैं। यदि उपेक्षा टूटे और श्रद्धा उमड़े तो हर व्यक्ति अपने लिए-नव निर्माण के लिए कुछ न कुछ कर सकने का मार्ग खोज सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-September
उसी के सहारे वह प्रगति की अभीष्ट दिशा में आगे बढ़ता और सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचता है। अखण्ड-ज्योति का आरम्भ से ही यह प्रयास रहा है कि परिजनों के चिंतन में मनुष्यता को गौरवान्वित करने वाली विचारणा और क्रिया-कलापों में आदर्शवादी गतिविधियों का समावेश हो। पिछले चालीस वर्ष में इस उत्कृष्टता सम्बन्ध प्रयास में जो सफलता मिली है। उसने यह उत्साह उत्पन्न किया है कि परिवार के सदस्यों को केवल दिशा देते रहने से सन्तोष न किया जाय, वरन् प्रत्येक के व्यक्तिगत जीवन का स्पर्श एक व्यवस्थित योजना के अनुसार किया जाय

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-December
कुछ समय पूर्व तक हम लोग परस्पर बिखरे हुए एक दूसरे से अपरिचित थे। जिस सूत्र से यह मणिमाला के दाने परस्पर इतनी सघनता पूर्वक गुँथ गये उसे अखण्ड-ज्योति पत्रिका कहा जा सकता है। अखण्ड-ज्योति क्या है? बसन्त पर्व की एक स्फुरणा। प्रकारान्तर से हम लोगों को नितांत दूरवर्ती और अपरिचित होते हुए भी एक-दूसरे के अधिकतम निकट सच्चे शब्दों में सघन आत्मीय बना देने का श्रेय इस स्फुरणा को ही है जो बसन्त पर्व के उपहार स्वरूप उमगी और जिसके बन्धनों में बँध कर हम एक कारवाँ के रूप में किसी महान लक्ष्य की ओर कन्धे से कन्धा मिलाकर चल पड़े
इस परामर्श मार्गदर्शन को गुरुदेव स्वयं ही लिखेंगे। जिस प्रकार अखण्ड-ज्योति के पृष्ठो पर उनकी निजी लेखनी से लिखा गया उनका तत्त्वदर्शन पाठकों के पास पहुँचता है ठीक उसी प्रकार ये स्वयं ही परिजनों के व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्टता का ऐसा समावेश करेंगे जो सर्व साधारण के लिए सरल एवं सम्भव हो सके। कठिन और अति उच्चस्तरीय गतिविधियाँ तो कुछ विशिष्ट व्यक्ति ही अपना सकते हैं। व्यस्त और अनभ्यस्त व्यक्तियों के तो सरलता ही व्यवहार में उतर पाती है
जिस सूत्र से यह मणिमाला के दाने परस्पर इतनी सघनता पूर्वक गुँथ गये उसे अखण्ड-ज्योति पत्रिका कहा जा सकता है। अखण्ड-ज्योति क्या है? बसन्त पर्व की एक स्फुरणा। प्रकारान्तर से हम लोगों को नितांत दूरवर्ती और अपरिचित होते हुए भी एक-दूसरे के अधिकतम निकट सच्चे शब्दों में सघन आत्मीय बना देने का श्रेय इस स्फुरणा को ही है जो बसन्त पर्व के उपहार स्वरूप उमगी और जिसके बन्धनों में बँध कर हम एक कारवाँ के रूप में किसी महान लक्ष्य की ओर कन्धे से कन्धा मिलाकर चल पड़े। इस प्रकार लोगों की मैत्री आत्मीयता का कारणभूत जन्म दिन बसन्त पर्व ही कहा जा सकता है
इस प्रयोजन के लिए प्रायः सभी समर्थ शाखाओं ने एक एक स्थायी कार्यकर्ता की नियुक्ति कर ली है और क्रियाकलाप इस तरह चलाया है जिससे भविष्य में कभी भी शिथिलता आने की आशंका न रहे। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण-नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति की- लक्ष्य पूरा करने के लिए जिस भावना और कर्मनिष्ठा की आवश्यकता है वह अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों में इन दिनों पहले की अपेक्षा अनेक गुनी अधिक दृष्टिगोचर हो रही है। इस बार देश भर में आश्विन नवरात्र आयोजन सर्वत्र सामूहिक रूप से मनाये गये हैं। यह पहला प्रयोग है
इन पंक्तियों को प्रत्येक परिजन के लिए एक आग्रह पूर्ण परामर्श समझा जाय और साप्ताहिक पत्रिका को पढ़ना अखण्ड-ज्योति की तरह ही आवश्यक माना जाय। पाक्षिक युग निर्माण में 20 पृष्ठ अर्थात् महीने में कुल 40 पृष्ठ रहते थे। अब 1 नवम्बर से साप्ताहिक के हर अंग में 6 पृष्ठ महीने में 64 पृष्ठ रहेंगे
इस प्रकार लोगों की मैत्री आत्मीयता का कारणभूत जन्म दिन बसन्त पर्व ही कहा जा सकता है। भले ही वह प्रत्यक्षतः आरम्भ किसी भी वर्ष- किसी भी महीने या दिन से क्यों न हुआ हो? हम लोगों में से प्रत्येक का यह अधिकार है कि अखण्ड-ज्योति परिवार को जोड़ने वाली कड़ी का जन्म दिन-मैत्री जन्म दिन बसन्त पर्व को मनाएँ। परिवार के सूत्र संचालक से उनका जो परिचय एवं सद्भाव है उसका उद्गम गोमुख भी बसन्त पर्व को ही माने और उस पर्व को भावनापूर्वक मनाये। पिछले 40 वर्ष से होता ही ऐसा रहा है
यह अवधि इसी तैयारी में लगनी चाहिए कि उस दिन उत्साहपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने वाला समारोह सम्पन्न हो सके और उसमें उपस्थित परिजनों में आत्मोत्कर्ष के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक इन चार आधारों को अपनाने के लिए कुछ ठोस कार्यक्रम बनाने के लिए संकल्प लेने पर सहमत किया जाय। यह सब कैसे किया जा सकता है इसके लिए फरवरी की पूरी अखण्ड-ज्योति को ही मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा
उनने अपने श्रम साधन से पत्थरों के ढेर लाकर जमा किये थे। ठीक यही कार्य अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाने से पूरा हो सकता है। लागत की दृष्टि से प्रायः हर साल की कागज, छपाई पोस्टेज का मूल्य पूरा करने में कमी रह जाती है। इसकी पूर्ति ग्राहक संख्या बढ़ने से ही पूरी हो सकती है
बसन्त पर्व पर तो इस सन्दर्भ में जिन भावनाशील परिजनों से जितना श्रम बन पड़े उसके लिए भरपूर प्रयत्न किया जाना चाहिए। अखण्ड-ज्योति के प्रति-उसके सूत्र संचालक के प्रति यह सबसे महत्वपूर्ण और आनन्ददायक श्रद्धांजलि बसन्त पर्व के अवसर पर हो सकती है
पिछले 40 वर्ष से होता ही ऐसा रहा है। अखण्ड-ज्योति के प्रकाशन से लेकर अब तक जो भी अपने निकट संपर्क में आये हैं उन्होंने इस मिशन के पीछे दैवी अनुदान का रहस्य झाँकता देखा है। इस झाँकी उन्होंने बसन्त मुसकराता देखा है। फलतः बसन्त पंचमी को किसी न किसी रूप में परिजनों में अपना श्रद्धा केन्द्र माना है और उसे व्यक्तिगत एवं सामूहिक आयोजनों के रूप में किसी न किसी रूप में मनाया है
चैत्र की नवरात्र और भी अधिक उत्साह में मनाये जाने की सम्भावना है। इन उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर यह अनुमान लगाने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं है कि बसन्त पर्व भी अखण्ड-ज्योति परिजनों द्वारा पहले की अपेक्षा अधिक उत्साहपूर्वक मनाया जाएगा। मिशन के प्रति निष्ठावानों की सघन श्रद्धा उसके जन्म दिन पर उभरेगी ही। वे उसके प्रकटीकरण के लिए कुछ किये बिना चैन से रह भी न सकेंगे
इसी प्रयोजन की पूर्ति उपरोक्त चार आधार अपनाने पर सही रूप से बन पड़ती है यदि यह बसन्त पर्व परिजनों में आत्मिक प्रगति की उत्कण्ठा उत्पन्न कर सके और उस मार्ग पर चलने के लिए इन आधारों को जीवनचर्या में समाविष्ट करने की प्रेरणा दे सके तो समझना चाहिए कि इस बार को बसंती पर्व साक्षात् सरस्वती की तरह अपने अन्तःकरणों में अवतरित हो गई। इसी के लिए हमने इस बार सर्व शक्तिमान सत्ता से प्रार्थना की है, परिजनों से इसी दिशा में कदम बढ़ाने का अनुरोध किया है और हर साल पूरा मन इसी कार्य में लगाने का निश्चय किया है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को किसी न किसी रूप में साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चतुर्विध प्रयोजनों में संलग्न करने के लिए भरपूर प्रयत्न करेंगे और आशा रखेंगे कि इन सिद्धान्तों को-गतिविधियों को अपनाने के लिए जिससे जितना बन पड़ेगा वह उसके लिए प्रयत्न करेगा। जो अब तक इस दिशा में प्रयास नहीं कर सके हैं वे शुभारम्भ करेंगे और जो कुछ करते रहे है वे इसमें अभिवृद्धि का साहस जुटाएँगे। सर्वथा विरत अपने परिवार का एक भी व्यक्ति न रहने पावे
साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चारों चरणों में से किसी को भी छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मोत्कर्ष का उद्देश्य पूरा हो सके। इस सन्दर्भ में अखण्ड-ज्योति के पृष्ठो पर चिरकाल से विभिन्न रूपों में कहा जाता रहा है
इस बार भी सर्वत्र बसन्त पर्व अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों द्वारा मनाया जाएगा। पुनर्गठन आह्वान से परिजनों की विचार-निष्ठा प्रत्यक्ष सक्रियता के रूप में उभरी है और सर्वत्र जागरूकता के, क्रियाशीलता के, उत्साह के, अधिकाधिक तत्परता के समाचार आ रहे हैं। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का लक्ष्य पूरा करने के लिए चल रही ज्ञान-ग्रह की लपटें अधिक ऊँची उठी हैं
हमारे व्यक्तिगत जीवन की कुछ प्रमुख और सर्वविदित घटनाएँ इस प्रकार है- (1) 24 वर्ष 24 गायत्री महापुरश्चरणों की कष्ट साध्य तपश्चर्या का श्रीगणेश (2) अखण्ड दीपक की स्थापना (3) अखण्ड-ज्योति पत्रिका का प्रकाशन (4) गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास (5) सहस्र कुण्डीय गायत्री यज्ञ से देश भर के अध्यात्म प्रेमियों का एकत्रीकरण (6) गायत्री परिवार की स्थापना (7) वेद शास्त्र आदि आर्ष ग्रन्थों का अनुवाद प्रसारण (8) विचार क्रान्ति अभियान के लिए युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री आन्दोलन (9) अज्ञातवास घटनाएँ (10) शान्ति कुँज की स्थापना (11) युगान्तरीय चेतना के लिए सत्र-शिक्षण योजना का आरम्भ (12) महिला जागृति अभियान (13) ब्रह्म वर्चस् आरण्यक (14) अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का वह प्रयास जिसके आधार पर उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित सम्भावना है। समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले थे, दैवी प्रेरणा और समग्र समर्पण के साथ किये गये पुरुषार्थ का प्रतिफल इतना ही है जो सर्वविदित है। इनमें प्रत्येक क्रिया का शुभारम्भ बसन्त पर्व के दिन की हुआ है दिव्य प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने का यह मुहूर्त जितना उत्तम है उतना हमारी दृष्टि में कदाचित ही कोई हो सकता है
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि जिस अखण्ड-ज्योति पत्रिका ने परिजनों को स्नेह सूत्र में बाँधा और अपरिचितों को आत्मीय बनाया है उसके प्रति भाव भरी कृतज्ञता हम सब के मन में स्वभावतः रहती ही है। आवश्यकता इस बात की भी है कि उस श्रद्धा, सद्भावना का इस रूप में प्रकटीकरण हो सके जिससे इस ‘बोधि वृक्ष’ का सिंचन भी सम्भव हो सके। संस्कृति की सीता को वापिस लाने के लिए अपना वानर परिवार जिस दिशा में चल रहा है उसकी पथ-प्रदर्शक अखण्ड-ज्योति को समझा जाय तो उसके प्रकाश को जीवन्त रखने के लिए तेल बाती का प्रबन्ध भी सोचना ही होगा
आवश्यकता इस बात की भी है कि उस श्रद्धा, सद्भावना का इस रूप में प्रकटीकरण हो सके जिससे इस ‘बोधि वृक्ष’ का सिंचन भी सम्भव हो सके। संस्कृति की सीता को वापिस लाने के लिए अपना वानर परिवार जिस दिशा में चल रहा है उसकी पथ-प्रदर्शक अखण्ड-ज्योति को समझा जाय तो उसके प्रकाश को जीवन्त रखने के लिए तेल बाती का प्रबन्ध भी सोचना ही होगा। यह महान प्रयोजन हम में से प्रत्येक थोड़-थोड़े श्रमदान द्वारा सम्पन्न कर सकता है। सेतुबंधनं के समय ऐसा ही श्रमदान रीछ, वानरों ने किया भी था
अपना अध्यात्म परिवार ही अखण्ड-ज्योति पत्रिका के सदस्यों के रूप में बिखरा पड़ा है। कुछ समय पूर्व तक हम लोग परस्पर बिखरे हुए एक दूसरे से अपरिचित थे। जिस सूत्र से यह मणिमाला के दाने परस्पर इतनी सघनता पूर्वक गुँथ गये उसे अखण्ड-ज्योति पत्रिका कहा जा सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-May
आवश्यक जानकारी के उपरान्त ही यह निर्णय ठीक तरह हो सकता है कि इस दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है भी या नहीं। यदि है तो उसके लिए क्या करना पड़ेगा? इसी जिज्ञासा का समाधान करने के लिए अखण्ड-ज्योति के प्रस्तुत मार्च, अप्रैल, मई के अंकों में आवश्यक जानकारी प्रस्तुत की गई है। यह जानकारी क्रमशः आगे भी चलती रहेगी। इन तीनों अंकों में ब्रह्म वर्चस् विज्ञान की संक्षिप्त पृष्ठभूमि प्रस्तुत की गई है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-June
प्राचीन काल में हिमालय क्षेत्र ही स्वर्ग क्षेत्र कहलाता था। इसके अनेकों ऐतिहासिक प्रमाण अखण्ड-ज्योति में लगातार एक लेख माला के रूप में छप चुके है। देव मानवों की यही भूमि थी। थियोसोफिकल वालों की मान्यता है कि अभी भी दिव्य आत्माएँ वहीं निवास करती हैं चमत्कारों और सिद्धियों की खोज करने वाले प्रत्येक शोधकर्ता को हिमालय की कन्दराएँ छाननी पड़ी है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-January
अगले वर्ष के नये उत्सव निश्चय इसी पुण्य पर्व पर करने की उमंग प्रत्येक परिजन में उत्पन्न की जाय। दिसम्बर की अखण्ड-ज्योति में आह्वान-आमन्त्रण एवं वसन्त पर्व के उपलक्ष में अभीष्ट कर्तव्यों की जानकारी देने वाले लेख छपे हैं। उनके आधार पर हम में से प्रत्येक को विचारे करना चाहिए ओर देखना चाहिए कि इनमें से किस प्रकार’-’ कौन क्या कर सकता है? बसन्त पर्व ऐसी ही प्रेरणा लेखक युग-निर्माण परिवार के सदस्यों के सम्मुख आता है कि उन्हें आदर्शवादी चिन्तन तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, वरन् उस दिशा में अपनी श्रद्धा की गहराई एवं जीवन्त कर्मनिष्ठा का परिचय भी देना चाहिए। यह बसन्त पर्व इतने उत्साह के साथ मनाया जाना चाहिए कि उसे स्वर्ण-जयन्ती साधना वर्ष की उत्साहवर्धक पूर्णाहुति के स्तर का माना जा सके

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-April
अखण्ड-ज्योति का अपना महत्व है। उसे परिजन रुचिपूर्वक पढ़ते और प्रसार करते हैं। यह उनकी गुण ग्रहिता एवं सत्प्रयोजनों में सहकार करने की सद्भावना का परिचायक है
अखण्ड-ज्योति परिजनों से अनुरोध है कि वे इन सभी पत्रिकाओं को मिशन का ढाँचा खड़ा करने में रक्त, माँस, अस्थि, चर्म आदि की तरह अविच्छिन्न और आवश्यक समझे। इनके सदस्य रहने और नये सदस्य बनाने की बात का वैसा ही ध्यान रखें जैसा कि अखण्ड-ज्योति का रखा जाता है। इन पत्रिकाओं का नया वर्ष भी जनवरी से आरम्भ होता है, अस्तु उनके ग्राहक बनाने का प्रयत्न भी इन्हीं दिनों पूरे उत्साह के साथ किया जाना चाहिए
ब्रह्म वर्चस् प्रक्रिया शक्ति-कुँज आकर क्रियात्मक शिक्षण प्राप्त करने वालों के लिए भी है और उन दूरवर्ती व्यस्त लोगों के लिए भी जो कारण वश उसमें सम्मिलित हो सकने की स्थिति में नहीं हैं। अखण्ड-ज्योति के प्रस्तुत अंगों में दोनों के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई जा रही हैं। यह सभी के लिए उपयोगी है। जो साधना करने की स्थित में नहीं हैं उनके लिए भी यह ज्ञान उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि किसी श्रेष्ठतम ज्ञातव्य का संचय करना
अखण्ड-ज्योति परिजनों से अनुरोध है कि वे इन सभी पत्रिकाओं को मिशन का ढाँचा खड़ा करने में रक्त, माँस, अस्थि, चर्म आदि की तरह अविच्छिन्न और आवश्यक समझे। इनके सदस्य रहने और नये सदस्य बनाने की बात का वैसा ही ध्यान रखें जैसा कि अखण्ड-ज्योति का रखा जाता है। इन पत्रिकाओं का नया वर्ष भी जनवरी से आरम्भ होता है, अस्तु उनके ग्राहक बनाने का प्रयत्न भी इन्हीं दिनों पूरे उत्साह के साथ किया जाना चाहिए। - भगवती देवी शर्मा
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-December
आशा हैं पर अखण्ड-ज्योति परिजन व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से मनाने के लिए अभी से तैयारी करने में संलग्न होगा
आवश्यकता प्रयत्न करने भर की हैं। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की परिपुष्टि का जो क्रम अखण्ड-ज्योति व्रत एक वर्ष से आरम्भ किया हैं, उसे आगे भी जारी रखा जायेगा और पूर्णता के उस स्तर तक पहुँचाया जायेगा, जहाँ हर, परख और हर कसौटी पर सचाई को कसे जाने के लिए प्रस्तुत किया जा सकें
उसे दस गुना इसी वर्ष बढ़ा देने का लक्ष्य रखा जाना चाहिये। वह कार्य अखण्ड-ज्योति तथा युग-निर्माण पत्रिकाओं के प्रसार बिना सम्भव नहीं। सो हम लोग अभी से इस कार्य में प्रवृत्त ही और अगले 40 दिनों का एक प्रसार अनुष्ठान करने के लिए दो-दो घन्टे का नित्य समय निकालें अच्छा साप्ताहिक छुट्टी का पूरा दिन इस कार्य के लिए दें। एकाकी या प्रभावशाली मित्र-मंडली के साथ दोनों पत्रिकाओं के एक वर्ष के नमूना अंक साथ लेकर 100 विचारशील लोगों के पास सदस्य बनने का आग्रह लेकर जाना चाहिये
गायत्री उपासना का सर्वसाधारण के लिए जितना प्रयोग सरल और उपयुक्त था, उसे हम गत 20 वर्षों कसे सिखाते, समझाते चले आ रहे हैं। जिन विद्या की उच्च स्तरीय साधना के दो पक्ष हैं-(1) योग, (2) तन्त्र योग-मार्ग में उच्च-स्तरीय गायत्री साधना पंच-कोशों के अनावरण की हैं, जिसकी ‘घोड़ी’ चर्चा गायत्री महाविज्ञान के तृतीय खंड में हैं और थोड़ा-सा मिश्रण अखण्ड-ज्योति के माध्यम से तीन वर्ष तक कर चुके हैं। अभी इस विद्या को सांक्तोपांक्त बताया जाना शेष हैं। उसी प्रकार तन्त्र मार्ग की गायत्री कुण्डलिनी कहलाती हैं
सिद्धांतों को बौद्धिक स्तर पर प्रतिपादन की साहित्यिक प्रक्रिया अखण्ड-ज्योति ने चलाई हैं और यह आगे भी चलती रहेगी। हम जहाँ भी रहेंगे, उसके लिए आवश्यक विचार सामग्री, प्रस्तुत करते रहेंगे। अध्ययन से ही नहीं, यह सामग्री चिन्तन, मनन और दिव्य दृष्टि से भी उपलब्ध की जा सकती हैं
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को वह पर्व अपना सर्वोत्तम एवं मानना चाहिए और उसे मनाने के लिए पहले से ही तैयारी करनी चाहिये। इस बार बसन्त-पंचमी दिनाँक 10 फरवरी सन् 70 मंगलवार की होगी। उस दिन जप, हवन, पूजा-प्रार्थना, संकल्प, पाठ, भजन, प्रवचन आदि के आयोजन रखने चाहिये, पहल ही से यदि सूचना आह्वान, आमन्त्रण एवं अवरोध की व्यवस्था की जाय तो उस दिन विचारशील व्यक्ति अच्छी संस्था में एकत्रित किये जा सकते हैं और उन्हें मिशन का उद्देश्य, स्वरूप एवं कार्यक्रम समझाकर सहयोग के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता हैं
इसकी छुट-पुट चर्चा इन दिनों हम कर रहें हैं। अगले दिनों नैतिक साधकों को योग मार्ग की पंचकोश अनावरण साधना और तन्त्र मार्ग को कुण्डलिनी जागरण की समग्र शिक्षा भी अखण्ड-ज्योति के पूजा पर ही मिलेगी। अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया जा वह शिक्षण सर्वथा सार्थक होगा और उससे अनेक प्रतिष्ठान भारी लाभ उठा सकेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-May
पंच-कोशों का जागरण उसी पर निर्भर है। कई वर्ष पूर्व हमने अत्र भय कोश,मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश,ओर आनन्दमय कोश,के जागरण की पंच-कोसी उच्च-स्तरीय गायत्री साधना पाठको को सिखानी आरम्भ की थी अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में उसका क्रम तीन वर्ष तक चला भी था पर अनुभव यह हुआ कि वह सर्वसाधारण का है। समस्त सत्प्रवृत्तियाँ उसी की सहचरी हैं। कृष्ण-चरित्र में जिस रास और महारास का- असंकारिक रूप से सुविस्तृत और आकर्षक वर्णन हुआ है, उसमें प्रेम-प्रसंग को कृष्ण के रूप में और सत्प्रवृत्तियों को गोपियों के रूप में चित्रित किया गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-March
गायत्री परिवार और युग-निर्माण परिवार के माध्यम से तथा व्यक्तिगत स्नेह सम्पर्क से अनेक परिजन हमारे आस-पास इकट्ठे हो गये है और सहज स्वभाव इनमें इतना मोह जुड़ गया है कि उसमें तनिक सी शिथिलता आने की घड़ी में हमारी मनोभूमि चरमरा उठी है। अखण्ड-ज्योति के गत दो अंक में अपना उफान व्यक्त करके थोड़ा चित्त हल्का कर लिया गया है, अन्यथा कुछ दिनों लगता रहा, विकलता से हमारे शिर की कोई नस फुट जाएगी। पढ़ने वालों ने व्यर्थ भले ही समझा हो पर हमारे लिये यह एक तत्काल उपचार था। अब चित्त थोड़ा हल्का हुआ है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-October
“वैज्ञानिक अन्ध-विश्वास और उसकी लाल रोशनी” शीर्षक से पिछली जुलाई 69 की अखण्ड-ज्योति में एक लेख दिया गया था, उसमें बताया गया था कि औषधियों के लिये प्राणियों की किस प्रकार हिंसा की जाती है। कैसे-कैसे उत्पीड़ित करके उन पर प्रयोग किये जाते हैं। उनके रक्त, मल-मूत्र से जाने कैसी-कैसी औषधियाँ बनती और जन स्वास्थ्य सेवा के नाम पर प्रयुक्त की जाती हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-November
यह प्रक्रिया विज्ञप्ति वितरण के सरल किन्तु अति आकर्षक प्रयोग से बड़ी सुविधापूर्वक गतिशील हो सकती है। पिछले दो महीने के अनुभव ने यह बताया है कि विज्ञप्ति वितरण वाला कार्य यदि ठीक ढंग से अखण्ड-ज्योति परिवार के मात्र सदस्यों ने चला लिया तो हम इस विचार-धारा को देशव्यापी ही नहीं, विश्व-व्यापी भी बना सकेंगे
विवाह कहीं भी हो, होना आदर्श पद्धति से चाहिये। अखण्ड-ज्योति परिवारों बीच प्रचलित हुई यह प्रथम आँधी-तूफान की तरह सारे देश में फैलेगी और देखते-देखते सामाजिक क्राँति का एक प्रखर सामने प्रस्तुत होगा। यह क्राँति आगे बढ़ेगी और हर क्षेत्र में फैली हुई अनैतिकता और अवांछनीयता को भस्म करके रहेगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-March
उन्हीं ने शाखा संगठनों की स्थापना की है और प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाया है। मनुष्य में देवत्व के उदय के लिए-धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को सृजन सेना को सृजन सेना का सैनिक बनना है यह अपने महान परिवार की गौरवशाली परम्परा के सर्वथा अनुकूल ही है
नव-निर्माण अभियान का प्रायः सारा ही उत्तरदायित्व अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को वहन करना पड़ रहा है। उन्हीं ने शाखा संगठनों की स्थापना की है और प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाया है। मनुष्य में देवत्व के उदय के लिए-धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को सृजन सेना को सृजन सेना का सैनिक बनना है यह अपने महान परिवार की गौरवशाली परम्परा के सर्वथा अनुकूल ही है
जनवरी 74 का अंक भी उसी प्रयोजन का पूरक था। इन दो अंकों को पढ़ने के बाद अखण्ड-ज्योति परिवार का भावनाशील वर्ग उसी प्रकार उभर कर आया है जिस तरह दूध गरम करने पर मलाई ऊपर तैरने लगती है
इनमें प्रथम चरण है वरिष्ठ और कनिष्ठ वानप्रस्थों की शिक्षा। गत जुलाई 73 की अखण्ड-ज्योति में वानप्रस्थ प्रचलन के पुनरुत्थान का शंखनाद किया गया था। जनवरी 74 का अंक भी उसी प्रयोजन का पूरक था। इन दो अंकों को पढ़ने के बाद अखण्ड-ज्योति परिवार का भावनाशील वर्ग उसी प्रकार उभर कर आया है जिस तरह दूध गरम करने पर मलाई ऊपर तैरने लगती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-January
अपनी योजना के अनुसार ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के प्रबुद्ध परिजनों को थोड़े-थोड़े समय के लिए वानप्रस्थ लेने का साहस करना चाहिए और नियत अवधि पूरी करके अपने घरों को लौट जाना चाहिए। जब-जब उन्हें अवकाश मिले, तब-तब ऐसे कदम बार-बार उठा सकते हैं। नियत समय पर नियत अवधि के लिए पहले से भी ऐसा व्रत ले लिया जाय तो उससे अपने ऊपर एक बन्धन, उत्तरदायित्व बँधता है
आशा की जानी चाहिए कि बसन्त पर्व में आरम्भ होने वाले इस नये वर्ष में अखण्ड-ज्योति के परिजन नवनिर्माण की दिशा में कुछ अधिक कर गुजरने के लिए साहस भरे कदम बढ़ावेंगे। जिनकी स्थिति वरिष्ठ अथवा क्लिष्ट वानप्रस्थ के लिए उपयुक्त होगी व उसके लिए साहसपूर्वक कदम बढ़ावेंगे। जिनकी स्थिति वैसी नहीं वे पिछले पृष्ठ पर छुपे-”इतना तो व्यस्त और विवश होते हुए भी किया जा सकता है
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को इस योजना में अपने को पूरी तरह सम्बद्ध रखना चाहिए, उसे यह मान कर चलना चाहिए कि संचालकों एवं संरक्षकों में से ही एक वह भी है। इस अंक को बहुत ध्यान से दो बार पढ़ना चाहिए और यह देखना चाहिये कि योजना में कहाँ त्रुटि है, उसमें सुधार की—परिवर्तन, परिवर्धन की कहाँ क्या गुंजाइश है। ऐसे परामर्श, विस्तार पूर्वक भेजने चाहिए और सम्भव हो तो यह भी लिखना चाहिए कि मिशन के इस अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम में उसका अपना क्या योग−दान होगा, इसे सफल बनाने के लिए वह किस प्रकार क्या प्रयत्न करेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-July
वे जो कुछ कहते हैं उसे ध्यानपूर्वक सुनें, विचार मनन करें और हृदयंगम करने का प्रयत्न करें। ‘अखण्ड-ज्योति’ उनकी जिह्वा है, वाणी है। जिस प्रकार किसी ब्राह्मण को भोजन कराते समय उसके जिह्वा के मधुर और तृप्त करने वाला आहार प्रदान करते है, उसी प्रकार आचार्यजी की जिह्वा ‘अखण्ड-ज्योति’ को सींच कर हम उन्हें तृप्त कर सकते हैं, उनके निश्चय को सफल बनाने का पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अखण्ड ज्योति को हम नियमित रूप से पढ़ें, दूसरों को पढ़ावें, उसमें उल्लिखित विचारों को आध्यात्मिक लोगों में प्रशस्त करें तो एक बड़ी बात आचार्य जी को तृप्त करने के लिए हो सकती है
‘अखण्ड-ज्योति’ उनकी जिह्वा है, वाणी है। जिस प्रकार किसी ब्राह्मण को भोजन कराते समय उसके जिह्वा के मधुर और तृप्त करने वाला आहार प्रदान करते है, उसी प्रकार आचार्यजी की जिह्वा ‘अखण्ड-ज्योति’ को सींच कर हम उन्हें तृप्त कर सकते हैं, उनके निश्चय को सफल बनाने का पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अखण्ड ज्योति को हम नियमित रूप से पढ़ें, दूसरों को पढ़ावें, उसमें उल्लिखित विचारों को आध्यात्मिक लोगों में प्रशस्त करें तो एक बड़ी बात आचार्य जी को तृप्त करने के लिए हो सकती है। इस वर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक काफी घट जाने से आचार्यजी अज्ञातवास जाने से पूर्व काफी खिन्न और चिंतित थे
इन महाविद्याओं का विस्तृत वर्णन इन पंक्तियों में सम्भव नहीं। सुविधानुसार अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में कुछ समय उपरान्त करेंगे, अभी तो इतना ही जानना पर्याप्त होगा कि गायत्री के तीनों अक्षर एक प्रकार से आध्यात्मिक त्रिवेणी के समान हैं। जिस प्रकार गंगा, यमुना और सरस्वती के मिलन से तीर्थराज प्रयोग की भौतिक त्रिवेणी बनी है, उसी प्रकार गायत्री के तीन अक्षरों से सन्निहित इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की तीन महाधाराओं के मिलन से आध्यात्मिक त्रिवेगी बनती है। प्रयाग की त्रिवेणी में स्नान करने का पुण्य फल होता है पर इस योग त्रिवेणी में स्नान का जो महाफल है उसका तो वर्णन ही हो सकना कठिन है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-August
विधि विधान को समझने और करने के लिए तो संस्कार पद्धति हैं ही। अखण्ड-ज्योति के आगामी अंकों में प्रत्येक संस्कार पर एक लेख माला आरम्भ होगी जिसमें उनके रहस्य और महत्व को दर्शाया जाएगा। आशा है पाठक उनसे कुछ प्रेरणा प्राप्त करेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-February
’ इसमें कुछ थोड़े समय के लिए ही सतयुग के आगमन का उल्लेख है। अखण्ड-ज्योति के पिछले किसी अंक में पं. भोजराज जी शुक्ल ने लिखा था कि जैसे दिशोत्तरी दशा में सब ग्रहों की अंतर्दशाएं आती हैं इसी प्रकार एक युग को अन्य युगों की भी अंतर्दशाएं बरतती हैं, संभव है इसी प्रकार कुछ समय के लिए नवीन युग आवे और पुनः वह पुराना समय बरतने लगे
इसलिये ‘सत्य बोलना’ केवल इतनी सी छोटी शिक्षा तो छोटे-छोटे बालकों के लिये हैं जो मिट्टी खा लेते हैं ओर कहते हैं कि हमने मिट्टी नहीं खाई। अखण्ड-ज्योति के पाठक अब वैसे बालक नहीं हैं। यदि ‘सत्य बोलिये’ इतना सा संदेश दिया जाय तो यह उनका अपमान करना होगा। ‘सत्य को पहचानिये’ आज का संदेश यह है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-May
अखण्ड-ज्योति के नियम—
व्यवस्थापक—’अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
मैनेजर- अखण्ड-ज्योति, मथुरा
अखण्ड-ज्योति कार्यालय ने अब तक जितनी पुस्तकें प्रकाशित की हैं, वह एक प्रकार का शिक्षा कोर्स है। इस कोर्स का जिन्होंने अध्ययन कर लिया है वे अपने विषयों की परीक्षाएँ देकर उपाधि सहित प्रमाण-पत्र प्राप्त कर सकते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-December
मैनेजर-अखण्ड-ज्योति, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-September
भारत में भी उसकी अनेक कथाएँ प्रचलित है। इनमें से कुछ छोटी-छोटी कथाएँ अखण्ड-ज्योति के पाठक भी अगले अंकों में पढ़ते रहेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-June
‘अखण्ड-ज्योति’ मथुरा
अखण्ड-ज्योति का अगस्त अंक-
अपनी उन स्मृतियों को, जिन्होंने आप को ईश्वर और आत्मा की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया है, लिख भेजिए। इन्हें अगस्त की अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित किया जायगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-March
जीवन अखण्ड है, जगत अखण्ड है। नाथ! आपका ही तो वरद पुत्र हूँ, मेरा ‘अहम’ आपकी ही अखण्ड-ज्योति की एक विनम्र चिनगारी है, मैं क्षुद्र जीव नहीं हूँ, नीच या दुष्ट कर्मी कीड़ा नहीं हूँ, आपके पवित्र तेज से पोषण पाता हुआ मेरा आत्म भी पवित्र है, संसार में आप ही व्याप्त हैं। सम्पूर्ण विश्व आपकी प्रभा से आलोकित हो रहा है, सो हे उद्धारक! आपकी विश्वव्यापी विभूति को मैं प्रणाम करता हूँ
अखण्ड-ज्योति के पाठक महानुभावों से हमारी यह गम्भीर प्रार्थना है कि वे सत्यनारायण के अवतार पर विश्वास करें। भविष्य में पाप घटेंगे और उनका स्थान पुण्य लेगा, यह बिल्कुल निश्चित है। मनुष्य सुस्थिर और विवेकपूर्ण जीवन व्यतीत करने को एक अदृश्य सत्ता द्वारा बाध्य किये जायेंगे
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रतिष्ठित सदस्य अजमेर निवासी श्री मंगलचन्द जी भण्डारी के छोटे भाई श्री सोहन राज जी भण्डारी का, एवं वाय (जयपुर) के प्रधानाध्यापक श्री जगन्नाथ प्रसाद शर्मा के सुपुत्र श्री सुरेन्द्र कुमार जी का स्वर्गवास हो गया। उपरोक्त दोनों बन्धुओं एवं उनके परिवार के दुख से हम अपनी संवेदना प्रकट करते हुए, दिवंगत आत्माओं की सद्गति के लिये ईश्वर से प्रार्थना करते हैं
देश-देशान्तरों में फैले हुए अखण्ड-ज्योति के हजारों पाठक-पाठिकाओं से हमारा अनुरोध है कि वह सतयुग को समीप लाने के लिये तपस्या करने में जुट जावें। अपनी आवाज जहाँ तक पहुँच सकें, वहाँ तक सत्य, प्रेम और न्याय का सन्देश पहुँचावें। स्वयं सत्य के उपासक बनें और दूसरों को बनावें
एक विचार के व्यक्तियों के एक संगठन में चाहे कितने ही थोड़े व्यक्ति क्यों न हों, पर वही संगठन अन्ततः बड़ा भारी, मजबूत और कामयाब प्रमाणित होता है, इसलिए सतयुग सभा का वह संगठन होना चाहिए। जहाँ चार-पाँच भी उत्साही सत्य प्रेमी हों उन सभाओं की स्थापना की सूचना अखण्ड-ज्योति में प्रकाशनार्थ भेज देनी चाहिए और उन्हें अखण्ड-ज्योति से सम्बन्धित कर लेना चाहिए। इन सभाओं के द्वारा अमरबेल का प्रचार किया जा सकता है, परन्तु एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह पर्चे छपाकर बाँटने से उद्देश्य की पूर्ति न होगी। लिखकर बाँटने में जो श्रम होता है, उसमें लिखने वाले के संस्कार दृढ़ होते हैं और लिखने में उसकी भावनाएं पर्चे में लिपट कर जाती हैं
सतयुग आन्दोलन का आरम्भ करने के लिये हम अखण्ड-ज्योति के पाठकों को आज विशेष रूप से आमंत्रित करते हैं। यह सूर्य की तरह स्पष्ट है कि भविष्य में शुभ समय आने वाला है। वह वर्तमान की बुराइयों का शोधन करके बुराई को हटा कर भलाई की नई व्यवस्था स्थापित करेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-October
मैनेजर-’अखण्ड-ज्योति’ मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-April
अखण्ड-ज्योति मानती है कि आत्मा स्वतन्त्र, शक्तिवान् और प्रकाशस्वरूप है। उस पर नाना प्रकार के नियन्त्रण स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है। केवल आत्मा के दैवी अंश को प्रोत्साहन देने और आसुरी अंश को दबाने की व्यवस्था करने से धर्मग्रन्थ की आवश्यकता पूरी हो सकती है
संप्रदायों के मूल धर्म-ग्रन्थों की रचना और उनमें हुए संशोधन एवं एक-दूसरे की भिन्नता पर गंभीर पर्यावलोकन करने से यह बात अच्छी तरह समझी जा सकती है कि विश्व के लाखों-करोड़ों धर्म-ग्रन्थ उस महान् ‘सत्’ की व्याख्या करने में लगे हुए हैं किन्तु कोई भी पूर्णता को नहीं पहुँच सका है। जब हजारों-लाखों धर्म-ग्रन्थों में सत् की व्याख्या पूरी नहीं हो सकी और अभी तक उनमें लगातार सुधार होते चले आ रहे हैं तो अखण्ड-ज्योति से ऐसे किसी धर्म-ग्रन्थ की आशा करना व्यर्थ है जो पूर्ण हो। पाठकों को किसी धर्म-ग्रन्थ की माँग करने से पूर्व इस बात पर विचार करना होगा कि यह शास्त्र आखिर हैं क्या? करीब तीन सौ धर्मों के प्रधान शास्त्रों का अध्ययन करके हम (सम्पादक) यह जान सके हैं कि उनकी अन्तरात्मा में ज्ञान और कर्म की विवेचना है। कुछ-2 इतिहास का भी सम्मिश्रण है
सत्य धर्म का प्रचार करने के लिये अखण्ड-ज्योति की ओर से जो सतयुग आन्दोलन आरम्भ किया गया है, वह कोई नवीन पथ नहीं है। सृष्टि का निर्माण जिन तत्वों के आधार पर हुआ है और जिनके द्वारा निखिल विश्व ब्रह्माण्ड की समस्त क्रियायें हो रही हैं, उन्हीं को नवीन व्यवस्था के साथ उपस्थित किया गया है। वर्तमान पाप-तापों से छुटकारा पाना है तो इस त्रिवेणी में डुबकी लगा कर ही मुक्ति प्राप्त की जा सकती है
वहाँ पर राबर्ट साहब का 6 माह तक इलाज करवाया, वहाँ पर हमारा स्वास्थ्य तो अवश्य ठीक हो गया, मगर पाँव की बीमारी में कोई सन्तोषजनक लाभ न हुआ। यहीं पर हमने एक अखण्ड-ज्योति की नमूने की प्रति मँगाई थी!
कई पाठक हम से पूछते हैं कि “अखण्ड-ज्योति द्वारा जो सत्-धर्म का प्रचार किया जा रहा है। क्या यह कोई सम्प्रदाय है? उसका कोई धर्म-ग्रन्थ है? किस शास्त्र के आधार पर इसका निर्माण हुआ है? सत्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को क्या करना चाहिये? क्या मानना चाहिये? क्या न मानना चाहिये? इन सब बातों का विस्तारपूर्वक उत्तर देने वाला कोई विधान होना चाहिये। ”
इस लिये यह स्वीकार करना ही होगा कि सब से प्राचीन धर्म अनादि धर्म ‘सत्’ है और उसका आश्रय लेकर प्राचीन और अर्वाचीन मजहबों की रचना हुई है। इसलिये पाठकों को ऐसा न समझना चाहिये कि अखण्ड-ज्योति द्वारा प्रचारित ‘सत्-धर्म’ कोई नवीन संप्रदाय है। यह तो वही महान् तत्व है जिसे अनादि कह सकते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-August
एकाएक दिल में नाना प्रकार की शंकाएं उत्पन्न हो गईं। सब से बड़ी शंका यह थी कि ‘अखण्ड-ज्योति’ से क्या तात्पर्य? इसका क्या भाव? इसके भीतर वास्तविक रहस्य क्या है? इसी उथल-पुथल में पूजा भी प्रेम से न कर सका। चित्त में व्यग्रता छा गई, तीन रोज तक खाना-पीना भी काल स्वरूप हो गया। अन्त में मैंने प्रार्थना की कि हे प्रभो! मेरे सन्देह को निवारण कराइए
यों तो सत्य को मैं पहले से मानता चला आ रहा हूँ, परन्तु अन्धकार में था, धर्म का मार्ग मेरी समझ में कुछ स्पष्ट रूप से नहीं आया था। दैवयोग से पूना के सैसून अस्पताल में अखण्ड-ज्योति से मेरा साक्षात्कार हुआ और बड़े मनोयोग के साथ इसे पढ़ने लगा। इससे मेरे सारे भ्रम और अज्ञानों का निवारण हो गया। अब तत्परता के साथ सत्य धर्म का पालन कर रहा हूँ

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-December
चुल्लूभर पानी से उत्पन्न हुई मछली 'अखण्ड-ज्योति' परिकर को समझा जा सकता है। यह पत्रिका मात्र छपे कागज का पुलिंदा नहीं है। यह अखण्ड ज्योति ही है जिसने अपने पाठकों को एक विशेष स्तर तक समुन्नत करने में सफलता पाई है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-February
समीपवर्ती 10 गाँवों से श्रद्धालु जनता कार्यक्रम में सम्मिलित हुई श्री मोती लाला चौकसे द्वारा गायत्री शक्ति पीठ के निर्माण के लिए भूमि दान स्वरूप दी गई। 14 अखण्ड-ज्योति के सदस्य कार्यक्रम के समय ही बने

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-April
अखण्ड-ज्योति परिवार ने अपने समुदाय में से एक लाख सृजन शिल्पी विश्व मानवता के चरणों पर अर्पित करने का संकल्प लिया है। उस पूरा करने में प्राणपण से कटिबद्ध भी होना है। योजनाबद्ध रूप से प्रयत्नशील होने पर ही भारी भरकम लक्ष्य तक पहुँचना संभव हो सकेगा
स्थापना के अवसर पर चौबीस लाख .... चौबीस महापुरश्चरणों का यहाँ आयोजन किया ....। 65 वर्ष से जलने वाली अखण्ड-ज्योति की .... अनुपम स्थापना है। नौ कुण्डों की यज्ञशाला .... अनुष्ठानी साधकों द्वारा हजारों आहुतियों का यज्ञ .... है। स्थानीय निवासी तथा बाहर के आगन्तुक .... अपनी साधना बड़ी मात्रा में करते हैं, जो प्रतिदिन कितने ही लक्ष मंत्र ज पके समकक्ष हो जाती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-December
यह सुखद समाचार पूरे अखण्ड-ज्योति परिवार में बहुत ही उत्साह और आनन्द के साथ सुना जायगा कि ब्रह्मवर्चस् आरण्यक अध्यात्म तत्व ज्ञान के दार्शनिक एवं प्रयोगात्मक दोनों ही पक्षों का उत्तरदायित्व वहन करने की स्थिति में पहुँच रहा है। संसार भर में आस्तिकवाद की अनेक धाराओं के पक्ष-विपक्ष में जो कुछ कहा जाता रहा है तुलनात्मक रूप से उसका अध्ययन किया जायगा और देखा जायगा कि ऋषि परम्परा के साथ उसकी संगति कहाँ खाती है। प्रत्यक्षवादी तथ्य अध्यात्म आस्थाओं की उपयोगिता, अनुपयोगिता के सम्बन्ध में किस आधार पर, किस नतीजे पर पहुँचते हैं?
जो कार्य आज से दो सौ वर्ष पूर्व आरम्भ होना चाहिए था, वह अब हो रहा है। यह विलंब अखरा तो बहुत और उसने हानि भी बहुत पहुँचायी पर यह भी अच्छा ही है कि देर-सवेर में सही कदम उठा लिए गए और अखण्ड-ज्योति के शोध-प्रयत्न चल पड़े। ब्रह्मवर्चस् के रूप में उसकी सुनियोजित प्रगति हर दृष्टि से सन्तोषप्रद है। इन प्रयत्नों के अन्तर्गत अध्ययन और अनुसन्धान के प्रयत्न दार्शनिक पृष्ठभूमि पर चलेंगे
अखण्ड-ज्योति के संचालक सूत्र एक व्यक्ति के साथ गुँथे हुए हैं। मनुष्य आखिर मनुष्य ही है। उसकी सामर्थ्य सीमित और अस्तित्व, काल के सीमा बन्धनों में प्रतिबन्धित
इन शोध निष्कर्षों के निष्कर्ष अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर प्रस्तुत होते रहेंगे। इस दृष्टि से पत्रिका की उपयोगिता और गरिमा अगले दिनों पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ जायगी। यह प्रसंग प्रेमी परिजनों के लिए हर दृष्टि से उत्साहवर्धक और आनन्ददायक ही होगा
अध्यात्म अनुसंधान की ऋषि परम्परा का पुनरुत्थान अब नये सिरे से आरम्भ हुआ है। छुट-पुट प्रयास अन्यत्र भी होते हैं, पर जिस सुनियोजित आधार को अपना कर अध्यात्म तत्वज्ञान के अनेकानेक पक्षों का ऊहापोह करने के लिए अखण्ड-ज्योति ने कदम उठाया है उसे अपने ढंग का अनुपम, अभूतपूर्व एवं अद्भुत ही कहा जा सकता है। उसके छोटे से प्रयास को भी विज्ञ समाज में एक स्वर से सराहा गया है
इन तीनों ही प्रयोजनों को पूरा करने के लिए ब्रह्मवर्चस् आरण्यक के रूप में ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित किया गया है। अखण्ड-ज्योति ने विज्ञान और अध्यात्म के अनुसंधान का कार्य सन् 65 से हाथ में लिया है। एक व्यक्ति के द्वारा किये गये अध्ययन अनुसंधान का ही वह प्रतिफल है जो पत्रिका के पृष्ठों पर अनवरत क्रम से प्रकाशित होता रहा है। उससे बुद्धिवादी पक्ष को एक नई दिशा, चेतना और प्रेरणा मिली है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-July
उसमें उपासना के योगाभ्यास पक्ष से सम्बन्धित उत्तरार्ध का भी परिपूर्ण समावेश है। उसका परिचय गत वर्ष मार्च, अप्रैल, मई, जून की अखण्ड-ज्योति अंकों में प्रस्तुत किया गया है। विषय की गम्भीरता उसके विस्तार व्यवहार को देखते हुए उसे संक्षिप्त एवं सांकेतिक ही कहा जा सकता है। सर्वसाधारण को प्राथमिकता जानकारी देने की दृष्टि से इतना ही पर्याप्त समझा गया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-October
इनमें भेजने के लिए गायक मिशन के पास नहीं हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के कुशल संगीत गायकों में से जो अपना समय इन चार महीनों में जितना दे सकें, वे शान्ति-कुँज के पते पर पत्र व्यवहार कर लें। यह समयदान इन दिनों अधिक आवश्यक प्रतीत हो रहा है। संगीत गायकों का इन पंक्तियों द्वारा विशेष रूप से आह्वान किया जा रहा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-September
(3) विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का शोध कार्य चिरकाल से चल रहा है और उसी के निष्कर्ष प्रतिपादन में अखण्ड-ज्योति में लेख छपते हैं। अब तक यह कार्य एक व्यक्ति के अध्यवसाय के आधार पर ही चलता रहा है। अब इस खोज का क्षेत्र बढ़ाया जा रहा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-April
संकल्प वर्ष में जिनने जो करने का निश्चय किया हो उसकी जानकारी हरिद्वार भेजनी चाहिए। अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक से आत्म-निर्माण, परिवार-निर्माण और समाज निर्माण के लिए ऐसे संकल्प करने की अपेक्षा की गई जिसमें एक का ही नहीं वरन् तीनों पक्षों का न्यूनाधिक समन्वय होता हो
जिन्हें मिशन की गतिविधियों में रुचि है, उन्हें उसे नियमित रूप से पढ़ना तथा साथियों को पढ़ाना आवश्यक है। साप्ताहिक पढ़ने माँगने की उपयोगिता अखण्ड-ज्योति से कम नहीं समझी जानी चाहिए। उसके ग्राहक बनने में प्रत्येक परिजन में समुचित उत्साह होना चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-November
अध्यात्म और विज्ञान की समन्वय शक्ति का प्रादुर्भाव जिन प्रतिपादनों और प्रभावों के आधार पर संभव हो सकता है, अगले दिनों उन्हीं की चर्चा अखण्ड-ज्योति में और भी अधिक गम्भीर तथ्य प्रस्तुत करते हुए छपा करेगी। यों इस दिशा में हलके-भारी प्रयत्न तो बहुत पहले ही से किये जाते रहे हैं। इस प्रकार पत्रिका की उपयोगिता और अधिक बढ़ जायेगी और उसे बुद्धिजीवी वर्ग तक पहुँचाने की आवश्यकता और भी अधिक अनुभव की जायेगी
अखण्ड-ज्योति में जिस-तिस की, जहाँ-तहाँ से संकलन करके लिखी गयी पाठ्य सामग्री नहीं छपती। उसकी एक-एक पंक्ति के पीछे अगाध अध्ययन एवं प्रयोक्ताओं का अनुभव भरा रहता है। इस पाठ्य सामग्री को अधिकतम लेखनी का अमृतोपम पुण्य प्रसाद कहा जा सकता है
अतएव वैज्ञानिकों के निष्कर्षों की उपेक्षा करने का अर्थ असत्य का समर्थन और सत्य से इनकार के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा। अखण्ड-ज्योति में समय-समय पर वैज्ञानिकों की वह सम्मतियाँ प्रकाशित की जाती रही हैं जिनमें उन्होंने विराट् के प्रति, असीम के प्रति श्रद्धा वश, ज्ञान के अगाध विस्तार और मानवीय विवेक के आधार पर समर्थ सत्ता के औचित्य को स्वीकार किया है। ऐसा ही जोरदार प्रश्न एक बार अमेरिका के वैज्ञानिकों के सम्मुख वहाँ के बुद्धिवादियों ने उठा दिया उस समय “न्यूयार्क एकेडमी आफ साइन्सेज” के तत्कालीन अध्यक्ष-वैज्ञानिक ए क्रैशी मारिशन ने उसका उत्तर इतने तार्किक और व्यवस्थित ढंग से दिया जिससे डार्विन के सिद्धान्त को मानने वालों में तहलका मच गया। ईश्वरीय अस्तित्व के प्रतिपादन में उन्होंने जो सात मूलभूत आधार निश्चित किये हैं वे इतने सशक्त और प्राणवान हैं जिनसे एकाएक तो कोई पूर्वाग्रह ग्रस्त नास्तिक भी इनकार नहीं कर सकता
बसन्त पर्व अखण्ड-ज्योति का, युग निर्माण योजना का, उनके सूत्र संचालक का, जन्मदिन है। इस अवसर पर आत्मीय जन अपनी भावभरी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने की एक ही परम्परा अपनाते रहे हैं-अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की संख्या वृद्धि। इस बार न केवल उसका परम्परागत निर्वाह करना पर्याप्त होगा वरन् उसमें और दूनी-चौगुनी तत्परता बरतनी होगी
धर्म तन्त्र ने लोकशिक्षण प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए उसकी युग-निर्माण योजना रचनात्मक संगठन शृंखला की तरह क्रियान्वित हो रही है। धर्मतंत्र को राष्ट्रीय प्रगति के चिन्तन पक्ष को उच्चस्तरीय बनाने की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति ने जो भागीरथी प्रयास किये हैं उन्हें अनुपम ही माना जाता है
यह एक पक्ष है। इसका दूसरा पक्ष है अखण्ड-ज्योति के प्राणवान परिजनों का भाव भरा वह पुरुषार्थ जिसके सहारे उसकी सदस्य संख्या बढ़ती रही है और समुद्र मन्थन से निकली हुई रत्न-राशि का विवरण जनसाधारण तक हो सकना संभव हुआ है। कोई उत्पादन कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो यदि उसका प्रसार विस्तार न हो सके तो समझना चाहिए कि लगी हुई पूँजी और मेहनत बेकार ही चली गई। अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादनों दार्शनिक उत्पादनों को जन-साधारण तक पहुँचाने और उस आलोक से व्यापक क्षेत्र को अलोकित करने का श्रेय ऐसे ही परिजनों को है जो अपनी पत्रिका आप मंगाने और पढ़ने मात्र से अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर लेते वरन् अपने व्यक्तिगत मान-अपमान की चिन्ता किये बिना जन-जन के पास जाते और पत्रिका के नये सदस्य बढ़ाने के लिए आग्रह भरा प्रयत्न करते हैं
अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादनों दार्शनिक उत्पादनों को जन-साधारण तक पहुँचाने और उस आलोक से व्यापक क्षेत्र को अलोकित करने का श्रेय ऐसे ही परिजनों को है जो अपनी पत्रिका आप मंगाने और पढ़ने मात्र से अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर लेते वरन् अपने व्यक्तिगत मान-अपमान की चिन्ता किये बिना जन-जन के पास जाते और पत्रिका के नये सदस्य बढ़ाने के लिए आग्रह भरा प्रयत्न करते हैं। स्पष्ट है कि यदि यह प्रयत्न न बन पड़े तो ‘अखण्ड-ज्योति’ की सदस्य संख्या उसके आधी चौथाई भी न रही होती, जितनी कि अब है। भविष्य में इस संस्थान द्वारा-उसके सूत्र संचालकों द्वारा जा कुछ किया जाना है, उसका प्रकाश एवं लाभ जन-जन तक पहुँचाने का और कोई दूसरा माध्यम नहीं है। प्राणवान परिजनों द्वारा किये जाने वाले नये सदस्य बनाने और पुरानों को संभाले रहना यह कार्य जिन लोगों के द्वारा होता रहा है, वे भी अगले दिनों में आशा के केन्द्र बनकर रहेंगे
अखण्ड-ज्योति हिन्दी मासिक पत्रिका- विगत 42 वर्ष से निरन्तर प्रकाशित होती आई है। उसकी पाठ्य सामग्री जितनी ज्ञानवर्धक है, उतनी ही आकर्षक भी। अपनी लोकप्रियता के कारण उसकी सदस्य संख्या निरन्तर बढ़ती ही गई है
अखण्ड-ज्योति ने इस खतरे के साथ पिछले चार दशकों से जमकर लोहा लिया है। बुद्धि को बुद्धि से, तर्क को तर्क से, तथ्य को तथ्य से, विज्ञान को विज्ञान से निपटने की उसकी रणनीति ऐसी है, जिसे इतिहासकार अद्भुत और अनुपम ही कहते रहें। आस्था संकट से निपटे बिना मानवी गरिमा का संरक्षण हो नहीं सकता
धर्म अध्यात्म और ईश्वर के नाम पर प्रचलित भ्रान्तियों और विकृतियों को निरन्तर करने तथा उनके स्थान पर उत्कृष्ट विवेकशीलता की प्रतिष्ठापना का जैसा प्रयत्न अखण्ड-ज्योति ने किया है उसे अभूतपूर्व ही कहा जाता है। तत्वदर्शन की गूढ़ गुत्थियों का सरल और सहज मान्य जैसा प्रस्तुतीकरण इस पत्रिका के पृष्ठों पर किया जाता है उससे आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता की जड़ें विचारशील वर्ग में दिन-दिन गहरी होती चली जा रही है
अब तक जो किया गया वह सन्तोषजनक है पर अगले दिनों जो किया जाने वाला है वह और भी अधिक आशाजनक है। अखण्ड-ज्योति परिजनों को यह जानकर हर्ष और गर्व होगा कि अध्यात्म और विज्ञान को जोड़ने वाले जो प्रतिपादन अब तक पत्रिका के पृष्ठों पर किये जाते रहे हैं, अब उनके प्रत्यक्ष प्रमाणित करने के लिए सुसम्पन्न प्रयोगशाला खड़ी की जा रही है। अध्यात्म सिद्धान्त विज्ञान की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं उसके अनेकानेक पक्षों को प्रयोगशाला में सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाएगा। इस परीक्षण से उन लोगों के मुँह बन्द हो सकेंगे जो अध्यात्म सिद्धान्तों को अन्धविश्वास कहने में अपनी शान समझते हैं
अब तक तर्क और तथ्यों के आधार पर ही अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर अध्यात्म का विवेचन, निरूपण होता रहा है अब उसके लिए भौतिक विज्ञान का भी सहयोग लिया गया है। इसी वर्ष एक साधन सम्पन्न प्रयोगशाला खड़ी की जा रही है जिसमें अध्यात्म सिद्धान्तों को विज्ञान अनुसंधान की तरह परीक्षण किया जाएगा। यह संसार भर में अपने ढंग की अनोखी और प्रथम प्रयोगशाला होगी, जिसने अध्यात्म को श्रद्धा के क्षेत्र से आगे बढ़ाकर वैज्ञानिक आक्षेपों का सामना करने के लिए चुनौती स्वीकार की है
अखण्ड-ज्योति मँगाने वाले मात्र किसी पत्रिका के पाठक भर नहीं होते वरन् वे एक सुगठित देव परिवार के सदस्य बनते हैं। मिशन के सूत्र संचालक के साथ उनका सम्पर्क एक सघन कुटुम्बी की तरह जुड़ जाता है और अति महत्वपूर्ण परामर्श एवं सम्भव सहयोग का सिलसिला चल पड़ता है। यह कौटुम्बिकता अन्ततः कितनी सुखद एवं श्रेयस्कर सिद्ध होती है, इसके इस देव परिवार के परिजन भली-भाँति जानते हैं
गान्धी जी द्वारा सम्पादित पत्रिकाओं का भी यही दृष्टिकोण था। अखण्ड-ज्योति ने भी विज्ञापन न छापने की नीति अपनाकर उसी मार्ग का अनुसरण किया है
युग शक्ति गायत्री के सदस्य बढ़ाने के साथ-साथ अखण्ड-ज्योति के कार्यक्षेत्र एवं प्रयोजन को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। इस बार तो शोध प्रयत्नों के परिपोषण एवं प्रसार विस्तार की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाना और भी अधिक आवश्यक हो जाएगा। यह आवश्यकता आत्मीयजनों में भली प्रकार समझी जाएगी और उसके लिए भाव-भरी चेष्टा की जाएगी, ऐसा विश्वास है
कोई उत्पादन कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो यदि उसका प्रसार विस्तार न हो सके तो समझना चाहिए कि लगी हुई पूँजी और मेहनत बेकार ही चली गई। अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादनों दार्शनिक उत्पादनों को जन-साधारण तक पहुँचाने और उस आलोक से व्यापक क्षेत्र को अलोकित करने का श्रेय ऐसे ही परिजनों को है जो अपनी पत्रिका आप मंगाने और पढ़ने मात्र से अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर लेते वरन् अपने व्यक्तिगत मान-अपमान की चिन्ता किये बिना जन-जन के पास जाते और पत्रिका के नये सदस्य बढ़ाने के लिए आग्रह भरा प्रयत्न करते हैं। स्पष्ट है कि यदि यह प्रयत्न न बन पड़े तो ‘अखण्ड-ज्योति’ की सदस्य संख्या उसके आधी चौथाई भी न रही होती, जितनी कि अब है। भविष्य में इस संस्थान द्वारा-उसके सूत्र संचालकों द्वारा जा कुछ किया जाना है, उसका प्रकाश एवं लाभ जन-जन तक पहुँचाने का और कोई दूसरा माध्यम नहीं है
बसन्त पर्व अखण्ड-ज्योति का, युग निर्माण योजना का, उनके सूत्र संचालक का, जन्मदिन है। इस अवसर पर आत्मीय जन अपनी भावभरी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने की एक ही परम्परा अपनाते रहे हैं-अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की संख्या वृद्धि। इस बार न केवल उसका परम्परागत निर्वाह करना पर्याप्त होगा वरन् उसमें और दूनी-चौगुनी तत्परता बरतनी होगी। नये शोध-प्रयासों की सफलता का एक अति महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इस अमृतोपम उत्पादन का प्रसार विस्तार द्रुतगति से बढ़ सके
किन्तु चरित्रनिष्ठा, उदात्त-विचारणा, सद्भाव युक्त सहकारिता, जैसे उत्कृष्टतावादी तत्वों का राष्ट्रीय जीवन में समावेश करना धर्मतंत्र की जिम्मेदारी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के दिन से ही अखण्ड-ज्योति नैतिक क्रान्ति-बौद्धिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति के लिए प्रबल प्रयत्न कर रही है। धर्म तन्त्र ने लोकशिक्षण प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए उसकी युग-निर्माण योजना रचनात्मक संगठन शृंखला की तरह क्रियान्वित हो रही है। धर्मतंत्र को राष्ट्रीय प्रगति के चिन्तन पक्ष को उच्चस्तरीय बनाने की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति ने जो भागीरथी प्रयास किये हैं उन्हें अनुपम ही माना जाता है
आध्यात्मिक दृष्टि के आधार पर शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक क्षेत्रों में किस प्रकार सुखद सफलता पाई जा सकती है। स्वर्ग, मुक्ति पूर्णता, ईश्वरदर्शन जैसे लक्ष्यों को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? इसका हृदयग्राही एवं अनुभव भरा मार्गदर्शन जैसा अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर मिलता है, वैसा अन्यत्र मिल सकना कठिन है
योग साधना गृह त्यागी वनवासी लोगों के लिए ही नहीं, वरन् सामान्य जीवन में सरलतापूर्वक अपनाई जाने योग्य व्यक्तित्व का समग्र विकास करने वाली प्रक्रिया है यह प्रमाणित करने में अखण्ड-ज्योति का प्रतिपादन और प्रशिक्षण बहुत सफल ही रहा है
इससे जूझने के लिए जैसे अस्त्र-शस्त्रों और जैसे कौशल की आवश्यकता उसे जुटाने में कुछ उठा नहीं रखा गया है। अखण्ड-ज्योति का अद्यावधि इतिहास ऐसी ही है, जिसका आज भले ही मूल्यांकन न हो सके, पर भावी विचारक इस निष्कर्ष पर पहुँचे बिना न रहेंगे कि आस्था संकट से लड़ने और उसे पराजित करने में जो पुरुषार्थ किया गया उसमें विश्व भविष्य को उज्ज्वल बनाये रखने में अखण्ड-ज्योति के साधनहीन किन्तु प्राण पुण्य संस्थान ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई
यह अखण्ड-ज्योति संस्थान के सूत्र संचालकों द्वारा किये जाने वाले भावी प्रयासों का एक दिग्दर्शन हुआ। यह एक पक्ष है। इसका दूसरा पक्ष है अखण्ड-ज्योति के प्राणवान परिजनों का भाव भरा वह पुरुषार्थ जिसके सहारे उसकी सदस्य संख्या बढ़ती रही है और समुद्र मन्थन से निकली हुई रत्न-राशि का विवरण जनसाधारण तक हो सकना संभव हुआ है
उत्कृष्टतावादी चिन्तन और आदर्शवादी व्यवहार से समन्वित देव जीवन किस प्रकार सामान्य अथवा जटिल परिस्थितियों के बीच जिया जा सकता है उसका अनुभवपूर्ण मार्गदर्शन अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर मिलता है। असंख्यों ने इन प्रेरणाओं और परामर्श के आधार पर अपने को बदला और ढाला है। पत्रिका का मार्गदर्शन एक प्रकार से जीवन साधना का पाठ्यक्रम ही कहा जा सकता है
कलेवर की सुन्दरता-पाठ्य सामग्री की उत्कृष्टता-मूल्य की दृष्टि से अत्यन्त सस्ती, ग्राहक संख्या की दृष्टि से अपने स्तर की अन्य समस्त पत्रिकाओं में अग्रणी-ऐसी-ऐसी कितनी ही विशेषताओं की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति का अपना कीर्तिमान है। उसमें छपे लेखों को हिन्दी का अनुवाद-प्रकाशन भारत की अन्य भाषा-भाषी पत्रिकाओं में जितनी बड़ी संख्या में होता है उतना कदाचित ही कहीं नहीं हुआ है
भौतिक जानकारियों के अन्वेषण, प्रत्यक्षीकरण एवं प्रयोग के लिए जो कार्य विज्ञान क्षेत्र से हुआ है। उसी के समतुल्य आध्यात्म तत्वदर्शन को अखण्ड-ज्योति इस प्रकार प्रस्तुत करती है जिससे अन्धविश्वास को नहीं तथ्यों को अपनाने वाली प्रखरता को ही प्रश्रय मिलता है। फलतः अखण्ड ज्योति के प्रतिपादन बुद्धिजीवी वर्ग में गहरी मान्यता प्राप्त करते चले जा रहे हैं
स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की संरचना के लिए जिस तत्वदर्शन की आवश्यकता है उसे अखण्ड-ज्योति द्वारा तर्क, तथ्य, प्रमाण, उद्धरण, संस्मरण आदि का आधार लेकर इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि कठिन समझा जाने वाला आत्मनिर्माण, सरलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सके। व्यक्तित्व के समग्र निर्माण में सफल होने के लिए अखण्ड-ज्योति के लेखों का आधार किसी अनुभवी एवं दूरदर्शी मार्गदर्शक के परामर्श जैसा ही उपयोगी सिद्ध होता है
शरीर को भोजन, वस्त्र आदि को सुविधा देने की तरह ही जो आत्मा की भूख-प्यास बुझाना भी आवश्यक समझते हैं और उसके लिए सद्ज्ञान सामग्री की तलाश करते हैं, उनके लिए स्वाध्याय सामग्री अखण्ड-ज्योति से उत्कृष्ट स्तर की अन्यत्र मिल सकना कठिन है। इसे चन्दन, पुष्पों द्वारा एकत्रित किया हुआ परम पौष्टिक मधु संचय कह सकते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-October
अखण्ड-ज्योति गत 47 वर्षों से प्राणवान परिजनों व प्रज्ञा मिशन के दैवी सूत्र-संचालन के मध्य एक कड़ी की भूमिका निभाती आई है। जब-जब भी किसी परिजन ने स्वयं को विभीषिकाओं की- प्रतिकूलताओं को तमिस्रा में घिरा पाया है, उसे समाधान परोक्ष रूप से पत्रिका के माध्यम से सतत् मिलता रहा है। स्थूल दृष्टि रखने वाले परिजन प्रत्यक्ष संपर्क को ही सब कुछ मान बैठते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-September
अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
ट्रेन में बैगों की लोडिंग आदि की समस्या भी बनी रहने के कारण प्रायः देरी हो जाती है। अखण्ड-ज्योति पत्रिका पाठकों का बौद्धिक आहार है। विलम्ब होने से व्यथा होना स्वाभाविक है। हमारे प्रयास तो यही रहते हैं कि पत्रिका परिजनों को समय पर मिलती रहे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-March
उनके मार्गदर्शक द्वारा सौंपे गए सभी प्रमुख दायित्व इसी पावन दिवस की बेला में संकल्पित हुए। 24 लक्ष के 24 गायत्री महापुरश्चरण अखण्ड-ज्योति पत्रिका का शुभारम्भ से लेकर चौबीस सौ प्रज्ञा संस्थानों का निर्माण जैसे युगान्तरीय कार्य इसी बेला में सम्पन्न हुए। अब अपने मार्गदर्शक के निर्देशानुसार अपने विशाल प्रज्ञा परिकर की प्रचण्ड ऊर्जा से सिंचित करने उन्हें आत्मबल की शक्ति से अनुप्राणित करने हेतु एक नया अध्याय उनके जीवन का आरम्भ होने जा रहा है। बहिरंग जगत से निवृत्ति लेकर वे स्वयं को सूक्ष्मतम बनाने जा रहे हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-June
जिनके साथ पूर्वजन्मों से सघन सम्बन्ध रहे हैं उन्हें संयोगवश या प्रयत्न पूर्वक हमने परिजनों के रूप में एकत्रित कर लिया है और वे जिस-तिस कारण हमारे इर्द-गिर्द जमा हो गए हैं। इन्हें अखण्ड-ज्योति अपने अंचल में समेटे बटोरे रही है। संगठन के नाम पर चलने वाले रचनात्मक कार्यक्रम भी इसी संदर्भ में आकर्षण उत्पन्न करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त बच्चों और अभिभावकों के बीच जो सहज वात्सल्य भरा आदान-प्रदान रहता है वह भी चलता रहा है
समय रहते आर्डर मिल जाने पर उतने अतिरिक्त अंक छपने की व्यवस्था करने में सुविधा रहेगी। -व्यवस्थापक अखण्ड-ज्योति मथुरा
जून के इस अखण्ड-ज्योति अंक में गुरुदेव ने अपनी गायत्री उपासना, जीवन साधना एवं समष्टि आराधना सम्बन्धी संदर्भ अपनी लेखनी से लिखे हैं। उनका जीवन क्रम बहुमुखी रहा है, तो भी उसमें से जितना भी सम्भव था, सर्वसाधारण हेतु हृदयंगम करने योग्य गायत्री-महाप्रज्ञा विषयक प्रेरणा प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया
(4) “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका का सन् 1937 से अनवरत प्रकाशन। बिना विज्ञापन और बिना चन्दा माँगे, लागत मूल्य पर निकलने वाली गाँधी जी की हरिजन पत्रिका जबकि घाटे के कारण बन्द करनी पड़ी थी तब अखण्ड-ज्योति अनेकों मुसीबतों का सामना करती हुई निकलती रही और अभी एक लाख पचास हजार की संख्या में छपती है। एक अंक को कई पढ़ते हैं इस दृष्टि से पाठक दस लाख से कम नहीं
उस विश्वास के साथ अपनी बात पर दृढ़ रहा गया। “अखण्ड-ज्योति” घीया मण्डी में अपना परिवार पाँच सदस्यों का था। तब उसका औसत खर्च 200 रु. मासिक बनाये रखा गया। मिल-जुलकर, मितव्ययितापूर्वक लोगों से भिन्न अपना अलग स्तर बना लेने के कारण यह सब मजे में चलता रहा
सन् 2000 तक हमारी लेखनी रुकेगी नहीं। प्रज्ञा परिजन अखण्ड-ज्योति के माध्यम से उसे नियमित रूप से पढ़ते रहेंगे। यह व्यास परम्परा के अंतर्गत गतिशील हमारी जीवनचर्या रही है व आगे और भी प्रखर बनेगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
उपलब्ध सूचनाओं से विदित है कि अखण्ड-ज्योति के अधिकाँश पाठकों ने विकास विस्तार के इस प्रथम चरण को पूरी श्रद्धा के साथ स्वीकारा है और उसे नियमित रूप से कार्यान्वित करते रहने का व्रत भी धारण किया है। आधे लोग ऐसे हैं जिनने घरेलू प्रज्ञा पुस्तकालय स्थापित करने का एक कदम और आगे बढ़ाया है। पचास पैसा नित्य का बजट इस निमित्त रखा है और प्रज्ञा फोल्डरों के दैनिक स्वाध्याय का विशेष उपक्रम बना लिया है
अखण्ड-ज्योति का हर सदस्य, अब संकल्प पूर्वक- दस को पढ़ाने सुनाने लगा है। साथ ही युग निर्माण योजना की प्रज्ञा अभियान आन्दोलन पत्रिका को भी मँगाते रहने की व्यवस्था बना ली गयी है। महीने में दो मासिक पत्रिकाएँ नियमित रूप से दस द्वारा पढ़े जाने का प्रभाव कुछ ही दिनों में स्पष्टतया दृष्टिगोचर होने लगेगा
देर सवेर में पहुँचेंगे वे भी। उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर यह विदित हुआ है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के दो तिहाई परिजनों ने जूनियर स्तर के स्वाध्याय मण्डल स्थापित कर लिये हैं और ‘एक से दस’ का विकास विस्तार क्रम नियमित रूप से कार्यान्वित करना आरम्भ कर दिया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-August
“साइकिक डिस्कवरीज बिहाइण्ड आयरन करटेन” एवं बाद में इसके द्वितीय भाग में किर्लियन फोटोग्राफी सम्बन्धी कार्य प्रकाशित हुआ है। समय-समय पर अखण्ड-ज्योति में भी इस “माइक्रोसटलर” पक्ष को लगातार उभारा जाता रहा है। पिछले दिनों “मद्रास मेडिकल कॉलेज” के स्नायुविज्ञानी डा. नरेन्द्रन् ने पत्तियों, अँगुलियों की पोरों के आभा मण्डल से आगे बढ़कर समस्त शरीर का आभा मण्डल अंकित करने में सफलता प्राप्त की है। मानवी ऊष्मा को “थर्मोग्राम” द्वारा तथा विद्युत्चुम्बकत्व को “इलेक्ट्रो मैग्नेटोग्राम” द्वारा माप सकने में तो पिछले एक दशक में वैज्ञानिकों को काफी सफलता मिली है
जून एवं जुलाई के अखण्ड-ज्योति अंकों ने चर्म चक्षुओं से दर्शनों के आग्रह पर अड़े परिजनों के ज्ञान चक्षु खोले। कभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था- “दिव्यं ददामिते चक्षु” और अपना विराट् रूप दिखाया था। वे ही दिव्य चक्षु इन अंकों में वर्णित सारगर्भित गुरु वाणी सुनकर खुले और अनेकों को उस विराट् रूप के दर्शन हुए
इब्राहिमपुर (म.प्र.) के श्री नारायण त्रिवेदी इसी अभिलाषा को लेकर गुरु पूर्णिमा पर आए थे कि सम्भवतः पूज्यश्री के दर्शन होंगे एवं वे अपनी उस असाध्य व्याधि से मुक्ति पा जाएँगे जो उन्हें गत एक वर्ष से ग्रास में लिए थी। शांति-कुज जाने का निर्णय लेते, उसके पूर्व ही अखण्ड-ज्योति से ज्ञात हुआ- अब उनके दर्शन नहीं हो पाएंगे। सुनी बातों के आधार पर बड़ी आशा लेकर गुरुपूर्णिमा पर आए तो प्रणाम के समय पाया “मानो वेद माताजी के पास छाया रूप में पूज्य गुरुदेव बैठे आशीष दे रहे, मुस्करा रहे हैं। प्रणाम के लिए झुकते ही लगा जैसे किसी ने पीठ को स्पर्श किया हो

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
इसका प्रत्यक्ष रूप युग मनीषा का हो सकता है जो अपनी लेखनी शक्ति द्वारा उस उत्कृष्ट स्तर का साहित्य रच सके जिसे युगान्तरकारी कहा जा सकता है। अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जो संकल्प हमने आज से सैंतालीस वर्ष पूर्व लिया था, उसे अनवरत निभाते रहने का हमारा नैतिक दायित्व है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-November
व्यक्तिगत रूप से अखण्ड-ज्योति पाठकों, प्राणवान परिजनों को जो अनुभूतियाँ सूक्ष्म रूप में हुई हैं, उन सभी को इन पृष्ठों में देना सम्भव नहीं। कुछ ऐसी हैं जिनके रहस्योद्घाटन के बारे में शुरू से ही प्रतिबन्ध रहा है, अब और कड़ा हो गया है। कुछ खुले अध्याय की तरह है अतः उन्हें प्रकाशित करने में कोई संकोच आड़े नहीं आता
प्रज्ञा साहित्य एवं पत्र व्यवहार के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ इस प्रकार हैं। अखण्ड-ज्योति पत्रिका, गायत्री साहित्य एवं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद साहित्य हेतु अखंड-ज्योति संस्थान मथुरा को लिखें। युग-निर्माण योजना मथुरा को जीवन निमार्ण साहित्य, गुजराती एवं उड़िया “युग शक्ति गायत्री” पत्रिका, “युग निर्माण योजना” पत्रिका, स्टीकर्स, फोल्डर्स एवं चित्र प्रचार सामग्री हेतु लिखें। सम्पादन सम्बन्धी, शिविर तथा साधना निर्देश संबंधी समस्त व्यवहार शान्ति-कुँज हरिद्वार से करें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-December
परिजनों ने वर्ष 1984 में बढ़ी हुई सामग्री एवं बदले कलेवर में अखण्ड-ज्योति पत्रिका को देखा, सराहा एवं अपनी सम्मतियाँ केन्द्र को भेजी हैं। पाठ्य सामग्री में सम्मिलित कई नए विषयों की गुणवत्ता की प्रशंसा करते हुए लागत मूल्य में प्राप्त होने वाली इस सामग्री को बढ़े हुए चन्दे के साथ सभी ने सहर्ष स्वीकार किया है। आगामी वर्षों में इस सामग्री को और भी सरस, बोधगम्य बनाने का प्रयास किया जाता रहेगा एवं यथा सम्भव इसी वार्षिक मूल्य व कलेवर में परिजन पत्रिका को पाते रहेंगे
प्रत्यक्षतः दर्शन देने का, परामर्श का क्रम जो पहले चलता था, उस पर अब पटाक्षेप पड़ चुका है। उनसे वार्तालाप करने, मार्गदर्शन पाने एवं संरक्षण अनुदान ग्रहण करने का माध्यम अब “अखण्ड-ज्योति” एवं “युग निर्माण योजना” ये दो ही पत्रिकाएँ हैं। जो परिजन जितने अधिक व्यक्तियों तक इस लेखनी प्रसाद को पहुँचाएँगे, वे प्रकारान्तर से पूज्यवर की वाणी एवं परोक्ष शक्ति सामर्थ्य के प्रसार-विस्तार के जन-जन तक इसे पहुँचाने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। इस तरह उन्हें भी गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना में सहभागी बनने का सौभाग्य मिलेगा
तब सृजन की तैयारी के साथ-साथ जटिलताएँ, प्रतिकूलताएँ भी बढ़ती चली जाएँगी। प्रज्ञा परिजनों के लिये अखण्ड-ज्योति प्रतिपादन एक प्रकार की आत्मिक पोषण-अभिपूर्ति की भूमिका अपने जन्मकाल से निभाते चले आए हैं। विषमताओं के मध्य संकल्प बल बढ़ाने, दैनन्दिन जीवन में व्यावहारिक मार्गदर्शन देने की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी इस पत्रिका ने प्रारम्भ से ही उठायी व निष्ठा पूर्वक निभायी है। इसमें परिजनों का भी योगदान है जिन्होंने इस प्रतिपादनों को अन्य अनेकों तक पहुँचाकर पाठकों की संख्या लक्षाधिक पहुँचा दी है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-June
जनकल्याण के लिए किए जाने वाले प्रयासों के साथ स्वयं पूज्य गुरुदेव के जीवन में हिमालय के अधिक एकान्त एवं गहन प्रदेशों में की जाने वाली विशेष तप-साधना की भिन्नता नहीं, अधिक उपयोगी वातावरण का अधिक प्रखर सान्निध्य का लाभ लेना ही था। उचित समझा गया कि अखण्ड-ज्योति के वे परिजन जो लेखों का पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं समझते, बल्कि साधना-क्षेत्र में कुछ साहस भरे विशिष्ट कदम बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए अन्य आधार अपनाने की तरह यह भी आवश्यक है कि वातावरण एवं सान्निध्य की प्रखरता का लाभ उठाते हुए अपनी साधना-प्रक्रिया सम्पन्न करें। गंगा की गोद एवं हिमालय की छाया में बनाए जाने वाले इस अभिनव साधना-आरण्यक का उद्देश्य यही है
सर्वप्रथम व अब से पूर्व का अंतिम नौवाँ अवतार अपना इतिहास पुनः दुहरा रहा है। परमपूज्य गुरुदेव ने दशावतार को तीन खण्डों में बाँटकर 1967 की जून से नवम्बर तक की अखण्ड-ज्योति के अंकों में बड़े ही विस्तार से उसके लीला-प्रसंगों के विषय में लिखा है। पूज्यवर ने प्रथम खण्ड के रूप में श्री रामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानन्द के अवतरण व क्रिया–कलापों को, द्वितीय खंड के रूप में योगीराज श्री अरविन्द एवं महर्षि रमण की तपश्चर्या व गतिविधियों को तथा तृतीय खण्ड के रूप में युगनिर्माण योजना, गायत्री परिवार के रचनात्मक क्रान्तिकारी क्रिया–कलापों को वर्णित किया है। यदि विगत डेढ़ सौ वर्षों इतिहास को पलटें तो यह अक्षरशः सही प्रतीत होता है
आज फिर वही परीक्षा की घड़ी आ गयी है, जब अध्यात्म की जीवनरक्षा के लिए बड़े-से-बड़ा त्याग करने की हिम्मत दिखाई जाए। अखण्ड-ज्योति परिवार के उन परिजनों को, जिनके हृदय में कुछ सार्थक कर गुजरने का तूफान मचल रहा है-शान्तिकुञ्ज द्वारा संकल्पित इस योजना को पूरी करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। उन्हें ही इस बात का प्रण लेना है कि उक्त की अन्तिम बूँद और साँस का अंतिम प्रवाह शेष रहने तक जीवन-विद्या के आलोक को जन-जन तक पहुँचाने में जुटे रहेंगे। उनके इसी संकल्प में मानवता का उज्ज्वल भविष्य निहित है
गायत्री महाविद्या के तत्वदर्शन एवं उसकी समर्थ साधना से अखण्ड-ज्योति के पाक चिर-परिचित हैं। यदि उसे पात्रता का समर्थता का, व्यक्तित्व के परिष्कार की प्रक्रिया माना जाए और उस महाप्रयास में निरत हुआ जाए, तो ऐतिहासिक एवं विद्यमान अध्यात्मवादियों की तरह हर कोई आने स्तर को क्रमशः अधिकाधिक ऊँचा उठा सकता है। इतना ऊँचा जिसकी गरिमा को हिमालय से कम नहीं वरन् अधिक ही उत्तुंग, समुन्नत एवं समृद्ध कहा जा सके

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-November
परमपूज्य गुरुदेव ने फरवरी १९७३ की अखण्ड-ज्योति में एक लेख में भूमि श्रम, पूँजी, संगठन साहस इन पाँच साधनों को प्रधान उत्पादक उपकरण माना है। उनने लिखा है कि उनका उपयोग कहाँ किस तरह हो रहा है इस पर भी कड़ी दृष्टि रखी जानी चाहिए अन्यथा इनका दुरुपयोग विघातक उत्पादन भी खड़े कर सकता है और सारे विश्व-समुदाय को विपत्तियों की विभीषिकाओं को सहन करने के लिए विवश होना पड़ सकता है। पूज्यवर ने लिखा है कि विलासी प्रसाधनों पर नियंत्रण रख जो उपयोगी है-श्रम की वृत्ति के साथ संस्कारों का भी संवर्द्धन कर विश्वकल्याण को ध्यान में रख उत्पादित किया जाए-उसी को वरीयता मिलनी चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
को जन्म भी दिया है। आज उज्ज्वल भविष्य की किरण यदि हर किमसी को चारों ओ छाएण् क्हासे के बीच दिखाई देती है तो उसके मूल में वह क्रांतिधर्मी चिन्तन है जो विचार बीज के रूप में समाज को विश्व ही हर समस्याओं के समाधान के रूप में परमपूज्य गुरुदेव लिखकर ‘अखण्ड-ज्योति पत्रिका उसी प्राणचेतना का कलेवर है क्रान्ति की संदेशवाहिका है एवं पूज्यवर के विचारों का प्रतिबिम्ब है। पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय आज से प्रायः सवा दो वर्ष पूर्व आंवलखेड़ा की प्रािम पूर्णाहुति पर पहली बार 24 खण्डों के रूप में सबके समक्ष आया था इसके शेष बीस खण्ड कुछ माही बाद एवं पहले घोषित सत्तर विरात 3 माह में जन-जन पहुंच चुके है कुल 108 में से आगे के अड़तीस खण्डों का संपादन चल रहा हैं एवं संभावना है कि युग संधि की महापूर्णाहुति के साधनावर्ष के साथ-साथ में सब भी प्रकाशित हो जायेंगे जिस खण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी मथुरा के पते पर पत्र लिखकर मागा सकते है
1967 में ही सिडनी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एम,टी, बटलर ने घोषणा की थी कि इकास क्षुद्रग्रह पृथ्वी से टकराने की पूर्ण सम्भावना है। इस बारे में परमपूज्य गुरुदेव ने अखण्ड-ज्योति, 1968 के नवम्बर अंक में लिखा कि जब-जब ऐसे विस्फोट हुए हैं अथवा ऐसी परिस्थितियाँ बनी है ओर पृथ्वी के धरातल में हलचल हुई है, तब-तब मानव-जाति का इतिहास करवट बदलता रहा है
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा कि”युग का अवसान सद्विचारों एवं सत्प्रवृत्तियों के घट जाने से होता हैं युग का निर्माण करना यदि अभीष्ट हो तो सद्विचारों एवं उच्च आदर्शों की प्रतिष्ठापना ही करनी होगी एवं तब युगपरिवर्तन का कार्य भी कठिन नहीं प्रतीत होगा” ( अखण्ड ज्योति, जनवरी 1962, पृष्ठ 44) इसी चिंतन को और भी परिमार्जित करते हुए उनने सितम्बर, 1962 की अखण्ड ज्योति में नवयुग के संविधान के रूप में -युगनिर्माण सत्संकल्प’ की घोषणा की एवं प्रत्येक की विस्तार से व्याख्या करते हुए एक विशेषाँक सबके समझ प्रस्तुत किया उनने लिखा कि अखण्ड-ज्योति परिवार उसी आधार पर सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ, कार्यक्रमों को संचालित करेगा। आज राजनैतिक पार्टियाँ कर्मकारण की रहते हैं किन्तु परमपूज्य गुरुदेव ने इसे ‘घोषणा-पत्र’ निकालती है। बड़े-बड़े वादे उनमें रहते हैं किन्तु, परमपूज्य गुरुदेव ने इसे ‘घोषणा-पत्र’ कहते हुए नवयुग के आगमन तक सबके लिए इसे एक दैनिक धर्मकृत्य की तरह नित्य पढ़ने, मनन करने एवं जीवन में उतारने जैसा एक संकल्पपत्र कहा एवं तब से ही युगनिर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान, गायत्री परिवार, अखण्ड ज्योति के दर्शन की यह मूल धुरी बना रहा हैं सारी योजनाएं इसी एक केंद्रक के जो विचार क्रान्ति परिक्रमा करती रही हैं
इस अवधि में हुई और होने वाली विभिन्न अन्तरिक्षीय हलचलों की चर्चा करते हुए परमपूज्य गुरुदेव ने वर्ष 1989 की अखण्ड-ज्योति के मई अंक में स्पष्ट घोषणा की थी, “पिछली सहस्राब्दियों के समय जो परिवर्तन हुए होंगे, उनकी तुलना में इस प्रकार की अन्तरिक्षीय हलचलों को हद दृष्टि से अद्भुत माना जाना चाहिए। इसे नयी सदी में आने वाले नवयुग के प्रभातकालीन अरुणोदय की वेला कहा जा सकता है। ”
जिस गुरुसत्ता ने ऋषियुग्म ने अपना सारा जीवन देवसंस्कृति को घर -घर पहुंचाने के निमित्त लगा दिया, समिधा व घूत की तरह इस विराट हवनकुण्ड में जिनने अपने आपको होम कर दिया उनके प्रति यदि हमारे अन्दर थोड़ी थी कृतज्ञता की भावना उनके थोड़ी भी कृतज्ञता की भावना उनके अनुदानों के बदले हो तो हमें एक क्षण भी गंवाए बिना अब लोकसेवा के इस परमपुण्य प्रयोजन प्रज्ञावतार के अवतरण की वेला में सम्पन्न किए जाने वाले ब्राह्मण में स्वयं को खपा देना चाहिए। पेट-प्रजनन, सुविधा बटोरने के समय तो और भी आते रहेंगे, किन्तु आपत्तिकाल की यह घड़ियां बार- बार नहीं आएगी प्रत्येक परिजन को जो युगनिर्माण की प्रक्रिया से अखण्ड-ज्योति के तत्वज्ञान से पाठक, हितैषी परिजन जिस भी रूप में से जुटा है प्रयासपूर्वक मणिमुक्तकों की तरह संग्रह करके एवं अदृश्यसत्ता की इच्छानुसार एवं बहुमूल्य माला की तरह पिरोया गया है उसे युगावतार के गले का हीरकहार बनाना है रावण युग की विकृतियों के समाधान के लिए रीछ−वानरों ने जो भूमिका सम्पादित की है कंस और दुर्योधन के अनाचार को निरस्त करने के लिए पाण्डवों ने जो रीति -नीति अपनायी थी, वही ठीक वही हमें भी करना है। प्रश्न हमारी स्वल्प योग्यता, न्यूनशक्ति का साधनों के अभाव का नहीं महत्व है इस विशिष्ट वेला में भावनाओं के उभरते स्तर का यदि हमें युगकर्तव्यों के प्रति उत्साह हो तो संगठित सत्प्रवृत्तियों के प्रति उत्साह हो तो संगठित सत्प्रवृत्तियों को अंगीकार कर यथाशीघ्र प्रवाह को रो सकते हैं जो इन दिनों विश्वमानव का भविष्य सदा के लिए अन्धकारमय बनाने के लिए द्रुतगति से बढ़ता हुआ चला आ रहा है। महाकाल के प्रस्तुत आह्वान को हर किसी को स्वीकार करना ही श्रेयस्कर है इनकार करने से तो अनार्य, अस्वग्ये अकीर्तिकर वाली नियति को ही प्राप्त होना होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-August
परमपूज्य गुरुदेव के कुछ कथनों को उद्धृत करने का मन कर रहा है। पूज्यवर ने मई ७१ की अखण्ड-ज्योति में लिखा है- “ अगले दिनों बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति की त्रिवेणी किस तरह उद्भूत होती है, उसे लोग आश्चर्य भरी आँखों से देखेंगे। भावी भारत का संचालन करने के लिए कितने ही कर्मनिष्ठ महामानव अपनी वर्तमान मूर्च्छना को छोड़कर आगे आने हैं। इस चमत्कार को छोड़कर आगे आने हैं
पूज्यवर पुनः अखण्ड-ज्योति के इसी अंक में एक स्थान पर लिखते हैं। “जिस शक्ति सहारे यह प्रबल प्रयास अब तक चलता रहा है, वह आगे भी स्वयं ही उस चलाएगी। माताजी माध्यम रहें तो भी उनके पीछे वही समर्थसत्ता रहेगी, जो हमारे पीछे रही है
वहाँ तो हमने शिविर की व्यवस्था ही नहीं की है। वहाँ तो हमने मंजूरी ही नहीं दी है और ये देखा है कि यहाँ पर पहले से भी स्टेज है क्या? पहले से भी जानकारी है क्या? ये लोग शिविर चला सकते हैं क्या? आप उन सौ आदमियों की लिस्ट माँगना कार्यकर्ताओं से या फिर आप गायत्री तपोभूमि चले जाना और पता करना कि कौन - कौन आदमी हैं, जो हमारी अखण्ड-ज्योति मंगाते हैं, युग-निर्माण मंगाते हैं। आप उन सबके पास बजाय इसके कि तू जाना- तू जाना आप स्वयं ही जाना वहाँ के आदमियों को लेकर के और लिस्ट पर निशान लगाते चले जाना। जिस दिन से आपका आयोजन होगा उससे तीन दिन पहले हम आपको भेजते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
कारण कि उस परिवार के लोग अनेक आदान-प्रदानों के सहारे असाधारण रूप से गुँथे रहते हैं। शान्तिकुञ्ज के सहभागी यों तो करोड़ों बन गए हैं और बनेंगे, पर शुभारम्भ श्रीगणेश के लिए तो अखण्ड-ज्योति के पाठकों-परिजनों से ही अपेक्षा की जाती है। उनके सहयोग पर उत्साह भी बढ़ता है और उपेक्षा बरतने पर निराशा भी होती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
आपको मालूम होगा - अखण्ड-ज्योति कार्यालय से गायत्री तपोभूमि प्रतिदिन दो बार आना-जाना होता था। भोजन अखण्ड-ज्योति जलाकर ही करते थे। यदि कभी तपोभूमि में देर तक रुकना पड़ता था, तो भोजन अखण्ड-ज्योति संस्थान से मँगा लेते थे और वहाँ बैठकर खाते थे। आपको मालूम है कि नहीं, हमें ज्ञात नहीं
शरीर के निर्वाह करने के लिए रोटी ले। आपको मालूम होगा - अखण्ड-ज्योति कार्यालय से गायत्री तपोभूमि प्रतिदिन दो बार आना-जाना होता था। भोजन अखण्ड-ज्योति जलाकर ही करते थे। यदि कभी तपोभूमि में देर तक रुकना पड़ता था, तो भोजन अखण्ड-ज्योति संस्थान से मँगा लेते थे और वहाँ बैठकर खाते थे
भोजन अखण्ड-ज्योति जलाकर ही करते थे। यदि कभी तपोभूमि में देर तक रुकना पड़ता था, तो भोजन अखण्ड-ज्योति संस्थान से मँगा लेते थे और वहाँ बैठकर खाते थे। आपको मालूम है कि नहीं, हमें ज्ञात नहीं। हमारे पास जमीन थी, उस वक्त तक

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
विगत गुरुपर्व से आयोजित सात पर्वों की श्रृंखला में श्रद्धा-समर्पण पर्यावरण-स्वास्थ्य, साधना, शक्ति-संवर्धन, सद्ज्ञान, सद्शिक्षा, संस्कृति, नारी-जागरण तथा स्वावलम्बन-युवा शक्ति जागरण-ये छह विराट समारोह क्रमशः गुरुपूर्णिमा से मार्गशीर्ष पूर्णिमा तक बड़ी सफलता के साथ सम्पन्न हो चुके है। प्रत्येक की अपनी उपलब्धियाँ रही हैं जो समय-समय पर पाठक-परिजन “अखण्ड-ज्योति” मासिक एवं “प्रज्ञा अभियान” पाक्षिक में पढ़ते रहे हैं। अब सातवाँ समारो पौष पूर्णिमा पर न होकर हेमन्त की ठिठुरन की समापन बेला में महाकुँभ के साथ वसंत पंचमी की पावन वेला में हो रहा है। भारतीय संस्कृति कैसे विराट व्यापक रूप लेकर विश्व-संस्कृति बनने जा रही है तथा भारत भर में विभिन्न भाषाओं में पूज्यवर के साहित्य के अनुवाद तथा ऑडियो कैसेट्स का ज्ञानयज्ञ का विस्तार किस विराट रूप में सम्पन्न होने जा रहा है, उसकी झलक-झाँकी इस वसंत से परिजन देख सकेंगे
(2) अखण्ड-ज्योति पत्रिका का शुभारम्भ भी विधिवत सन् 1940 से उसी दिन से आरंभ हुआ
एक हाथ में किताब लेती है। कौन-सी किताब लेकर चलती है? अखण्ड-ज्योति की किताब लेती है, दूसरी किताब नहीं लेती है। नावेल पढ़ने के लिए नहीं है। रास्ते में किताब नहीं पढ़ती तो बेचारी को कैसे याद होगा- और सवारी? कौन-सी सवारी करती है
‘अखण्ड-ज्योति’ सदस्य-युग-निर्माण गायत्री परिवार के परिजन अब एक देव परिवार के सदस्य हैं एवं अगले दिनों एक महती जिम्मेदारी उनके कंधों पर सौंपी जाने वाली है। वह आत्मशक्ति के उपार्जन द्वारा युगसंधि की प्रसवपीड़ा जैसी संकटापन्न स्थिति से विश्व-वसुधा को भी उबारना-स्वयं को भी इस घनघोर घटाटोप से निकाल कर नवयुग में प्रवेश कराना। इस हेतु शाँतिकुँज का संचालन-तंत्र सतत् सबको झकझोरता एवं साधना-पुरुषार्थ हेतु प्रेरित करता रहता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-July
उन दोनों को यज्ञ में स्थापित किया गया। पंचमुखी घृत दीप की अखण्ड-ज्योति आयोजन के आरम्भ से अन्त तक जलती रही

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-June
इसलिए दुर्बल, बच्चे, बुड्ढ़े एवं अस्वस्थ लोग न आवें तो ही अच्छा है। जो लोग न आ सकें वे अप्रैल की अखण्ड-ज्योति में बताये हुए नियमों का पालन करते हुए घर रहते हुए भी यज्ञ में भागीदार रह सकते हैं यज्ञ के तीन दिनों में यथासम्भव उपवास, जप, हवन, मंत्रलेखन गायत्री चालीसा पाठ, गायत्री साहित्य का प्रचार, दान आदि शुभ कार्यों के आयोजन कर सकते हैं। जो सज्जन मथुरा पूर्णाहुति यज्ञ में अपनी ओर से कुछ सामग्री, घृत आदि सम्मिलित करना चाहें तो वैसा प्रसन्नतापूर्वक कर सकते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-March
सदा की भाँति अखण्ड-ज्योति का जुलाई 53 का अंक गायत्री अंक होगा। उसमें गायत्री उपासकों के अनुभव तथा चित्र रहेंगे। यदि गायत्री उपासना से आपको कोई आध्यात्मिक या साँसारिक ऐसा विशेष लाभ हुआ हो जिससे दूसरे लोग भी उसे पुण्य मार्ग पर आकर्षित हों तो उन अनुभवों को विस्तारपूर्वक लिखते हुए अपने आधे शरीर के फोटो समेत छपने को भेज दें
अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति यदि अपने निश्चय की पूर्व सूचना अखण्ड-ज्योति के पते पर हमें भेज देंगे तो उनकी साधना को संरक्षण तथा अनुष्ठान में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन यहाँ पर किया जाता रहेगा। तप में बहुधा आसुरी शक्तियाँ बहुत विघ्न फैलाती हैं, इसीलिए उसके संरक्षण के लिए ब्रह्मा तथा दृढ़ पुरुष आदि की नियुक्ति की जाती है
नवरात्रि का महत्व अखण्ड-ज्योति के पाठकों से छिपा नहीं है। पिछली नवरात्रियों से इस महापर्व के सम्बन्ध में प्रकाश डाला जाता रहा है। गर्भाधान के लिए ऋतु काल का जो महत्व है, बीज बोने के लिए खेत की उचित स्थिति (ओठ आना) का जो महत्व है, मिठाई बनाने के लिये चासनी पककर तार उठने के समय का जो महत्व है, साधना के लिए संध्या काल का जो महत्व है, वैसा ही महत्वपूर्ण अवसर अध्यात्मिक कार्यों के लिए नवरात्रि का होता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-September
(1) वायु की शुद्धता से आनन्दमय वातावरण विनिर्मित होना, (2) वर्षा, अन्त और वनस्पतियों की प्रचुरता, (3) अनेक रोग कीटाणुओं का नाश, (4) अनेक कामनाओं की मनोवांछित पूर्ति, (5) देव और पितरों का पोषण तथा पूजन, (6) पापों का परिमार्जन (7) आध्यात्मिक प्राण चेतना का स्पन्दन, (8) स्वर्ग और मुक्ति की प्राप्ति, (9) परम कल्याण और ब्रह्म निर्माण आदि अनेकों लाभ यज्ञ के हैं। इन विषयों पर विस्तृत प्रकाश डालने के लिए आगामी महीने से प्रति मास एक लेख अखण्ड-ज्योति में छपता रहेगा। जिससे पाठक यह सही प्रकार जान सकेंगे कि हमारे धर्म में यज्ञ को इतना महत्व क्यों दिया गया है। भारतीय धर्म में प्रत्येक शुभ वर्ष यज्ञ के साथ आरम्भ होता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-December
-व्यवस्थापक “अखण्ड-ज्योति”
(2) अखण्ड-ज्योति उतनी ही छपती हैं जितने उसके ग्राहक होते हैं। देर से चन्दा भेजने का परिणाम यह होता है कि पिछले अंक समाप्त हो जाने पर ग्राहकों की फाइलें अधूरी रह जाती हैं। पिछले अंक समाप्त हो जाने पर वे किसी भी मूल्य पर उपलब्ध नहीं हो पाते
(6) गत वर्षों में अखण्ड-ज्योति अपना कागज छपाई और टिकट खर्च स्वयं पूरा कर लेती थी। सम्पादन, दफ्तर, क्लर्क आदि का खर्च तो अखण्ड ज्योति के हिसाब में एक पाई का भी जोड़ा नहीं जाता। इस वर्ष तिरंगा कवर लगाने के कारण प्रति ग्राहक पीछे प्रायः सात पैसे का नुकसान रहता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-December
जीवनों में सात्विक परिवर्तन कराना ब्रह्म यज्ञ है। जो सज्जन अखण्ड-ज्योति के पाठक बढ़ाते हैं वे ब्रह्म यज्ञ का प्रत्यक्ष आयोजन करते हैं। ब्रह्म यज्ञ का पुण्य फल किसी अन्य यज्ञ से कम नहीं है
अखण्ड-ज्योति को प्रेम करने वाले सज्जनों के लिए यह एक परीक्षा अवसर है। ता. 9 दिसम्बर को आचार्य जी के जन्म-दिवस के उपहार स्वरूप अपना एक दिन का समय देना चाहिए और उस दिन अखण्ड-ज्योति के ग्राहक बनाने का प्रयत्न करना चाहिए
पता मैनेजर “अखण्ड-ज्योति” मथुरा
अखण्ड-ज्योति पत्रिका को तथा यहाँ से प्रकाशित अन्य साहित्य को अधिक से अधिक व्यक्ति पढ़ें, इस कार्यक्रम में सहयोग देकर अधिक व्यक्ति इस मिशन की सहायता कर सकते हैं। पाठक इसके सम्पादक श्री आचार्य जी का 9 दिसम्बर जन्म दिन है। परिवार के आत्मीयजन उस दिन लिए सद् भावनाएं भेजते हैं
जिनका इस अध्यात्मिक प्रकाशन के प्रति प्रेम, अनुग्रह आत्म भाव है, वे अक्सर यह पूछते हैं- “हमारे योग्य कोई हो तो लिखिए। ” अखण्ड-ज्योति व्यापारिक नहीं आध्यात्मिक संस्था है। उसकी सेवा यही है कि- सद् विचारों का, सद्ज्ञान का और सदाचार का अधिकाधिक प्रचार एवं प्रसार किया जाय। ” इस प्रकार की सहायता एवं सेवा करने से इस संस्थान की उद्देश्य पूर्ति होती है
अखण्ड-ज्योति के आरम्भ काल से ही उसके संपर्क रखने के कारण-आचार्य जी तथा पाठकों के बीच होने वाले विचार परिवर्तन से निश्चिंत होने के कारण-मुझे मालूम है कि पाठक- अखण्ड-ज्योति तथा आचार्य जी के प्रति कितना प्रगाढ़ आदर तथा सम्मान रखते हैं, कितनी ऊँची दृष्टि से देखते हैं
ता.9 सक्रिय सहायता के लिए देना चाहिए। उस दिन अखण्ड-ज्योति के नये ग्राहक बढ़ाने के लिए निकलना चाहिए। प्रयत्न करने पर कुछ न कुछ नये ग्राहक अवश्य बढ़ाये जा सकते हैं। नये ग्राहकों का चंदा वसूल करके, अपने चंदे के साथ भेज देना चाहिए
एक दिन इस धर्म कार्य के लिए दे देने से कोई बड़ा घाटा नहीं आ सकता। पर इससे अखण्ड-ज्योति की शक्ति अनेक गुना बढ़ जाती है
जो सज्जन पाठक बनते हैं उन्हें अपने आचरण और विचारों में परिवर्तन करते का अलभ्य अवसर मिलता है। लगातार नियमित रूप से जो एक वर्ष अखण्ड-ज्योति को पढ़ लेगा उसके जीवन में सतोगुणी असाधारण परिवर्तन होने अवश्यंभावी हैं। उच्च अध्यात्मिक सत्पुरुष, तपोपूत अन्तःकरण से जिन विचारों को प्रकट करते हैं वे लोगों के मन में तीर की तरह धँस जाते हैं। जीवनों में सात्विक परिवर्तन कराना ब्रह्म यज्ञ है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-October
अखण्ड-ज्योति के पाठको! आत्म वंचना में मत भटको, दंभ का आश्रय मत लो, केवल अपने ही स्वर्ग या मुक्ति सुख के स्वार्थ में मत डूबो वरन् प्रभु के सच्चे भजन का, सच्ची सेवा का मार्ग तलाश करो, प्रभु के पुत्रों को अधिक सुखी और समृद्ध बनाने वाले लोक कल्याण कारी सत्कार्यों में लग जाओ
अखण्ड-ज्योति द्वारा जो दो रसायनें वितरित की गई थीं। उनसे आश्चर्यजनक एवं आशातीत लाभ हुआ है। ओजवर्धक रसायन से आठ पागलों के स्वस्थ हो जाने और अनेकों के अनेकों प्रकार के मानसिक रोग दूर हो जाने की सूचनायें आई हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-June
उदारता आत्म-त्याग और परमार्थ की मनोवृत्ति ही युद्धों का अन्त कर सकती है। विश्व की समस्त विवेकवान आत्माओं का अखण्ड-ज्योति आह्वान करती है कि सत्य प्रेम और न्याय के शस्त्रों द्वारा मनुष्य जाति में फैली हुई स्वार्थपरता और दुर्भावना को परास्त करो, बिना इस जीत के युद्ध की जीत का कोई महत्व नहीं है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-April
प्रेम में दिव्य सौम्यता, और प्रचण्ड शौर्य तेज विद्यमान है। प्रेम इष्टदेव है, प्रेम साधना है, प्रेम अखण्ड ध्यान है, अखण्ड-ज्योति है, अनन्त मूर्ति है आनन्द का लहराता हुआ समुद्र है, प्रेम सिद्ध मन्त्र है, सिद्ध तन्त्र है, प्रेम की भावना सिद्धि दाता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-January
मैनेजर ‘अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-May
जीवन एक अखण्ड धारा है। यह कभी न बुझने वाली अखण्ड-ज्योति है। जीव अनादि और अनन्त है, इस जीव का स्वाभाविक धर्म ही जीवन है। जब तक जीव है तब तक जीवन कायम रहेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-July
नेत्र दुख रहे हों तो किसी नाच रंग में रुचि न होगी। इन्द्रिय भोग जो इतने मधुर प्रतीत होते हैं, वास्तव में उनके अंतर्गत प्रकाशित होने वाली अखण्ड-ज्योति के ही स्फुल्लिंग है। अन्यथा बेचारी इन्द्रियाँ क्या आनन्ददायक हो सकती हैं
(1) अपने परिचितों, मित्रों और प्रियजनों से अखण्ड-ज्योति की चर्चा किया कीजिए और उन्हें इस साहित्य को पढ़ने के लिए उत्साहित किया करें। नित्य एक नये आदमी से अखण्ड-ज्योति का परिचय और अपनाने की प्रेरणा की जाय तो एक वर्ष में बहुत कार्य हो सकता है। (2) जिन लोगों में आध्यात्मिकता का अंकुर मौजूद हो ऐसे शिक्षित व्यक्तियों के तथा पुस्तकालयों के पते अखण्ड-ज्योति कार्यालय में भेजें। जिन व्यक्तियों के पते भेजे जायें वे एक ही स्थान के नहीं होने चाहिए
नित्य एक नये आदमी से अखण्ड-ज्योति का परिचय और अपनाने की प्रेरणा की जाय तो एक वर्ष में बहुत कार्य हो सकता है। (2) जिन लोगों में आध्यात्मिकता का अंकुर मौजूद हो ऐसे शिक्षित व्यक्तियों के तथा पुस्तकालयों के पते अखण्ड-ज्योति कार्यालय में भेजें। जिन व्यक्तियों के पते भेजे जायें वे एक ही स्थान के नहीं होने चाहिए। अपना व्यक्तिगत परिचय भले ही न हो पर जिनके विचारों के बारे में परिचय हो उनके पते भेजने चाहिए, चाहे वे कितनी ही दूर के रहने वाले क्यों न हो
अपना व्यक्तिगत परिचय भले ही न हो पर जिनके विचारों के बारे में परिचय हो उनके पते भेजने चाहिए, चाहे वे कितनी ही दूर के रहने वाले क्यों न हो। यह पते प्राप्त होने पर उन्हें अखण्ड-ज्योति के नमूने तथा प्रेरणा पत्र भेजकर कार्यालय की ओर से उन्हें इस सत्साहित्य को अपनाने के लिए प्रभावित किया जायेगा
व्यवस्थापक- ‘अखण्ड-ज्योति’ मथुरा
जो पाठक इस दशा में अखण्ड-ज्योति की कुछ सहायता करना चाहते हैं उनके सम्मुख हम दो कार्य उपस्थित करते हैं। (1) अपने परिचितों, मित्रों और प्रियजनों से अखण्ड-ज्योति की चर्चा किया कीजिए और उन्हें इस साहित्य को पढ़ने के लिए उत्साहित किया करें। नित्य एक नये आदमी से अखण्ड-ज्योति का परिचय और अपनाने की प्रेरणा की जाय तो एक वर्ष में बहुत कार्य हो सकता है। (2) जिन लोगों में आध्यात्मिकता का अंकुर मौजूद हो ऐसे शिक्षित व्यक्तियों के तथा पुस्तकालयों के पते अखण्ड-ज्योति कार्यालय में भेजें
‘अखण्ड-ज्योति’ सत् ज्ञान, सद्विचार और सत्कार्यों के प्रचार के लिए कार्य करती है। यह महान कार्य परखे हुए त्यागी, तपस्वी, सत्यनिष्ठ, ब्रह्मपरायण, सूक्ष्मदर्शी उद्भट विद्वानों द्वारा होता है। एक बार भी किसी व्यक्ति के हाथ में यहाँ का साहित्य पहुँच जाता है, उसके जीवन में भारी परिवर्तन उपस्थित हो जाता है, उसके विचार और कार्यों में सात्विकता की एक झलक स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगती है
अखण्ड-ज्योति के कार्यकर्त्ताओं द्वारा इस वर्ष पर्वतीय वन्य प्रदेशों की यात्रा के समय कुछ अमूल्य जड़ी-बूटियाँ लाई गई हैं। इनके गुण असाधारण और आश्चर्यजनक हैं। इन बूटियों के वैज्ञानिक संमिश्रण से दो रसायनें बनाई गई हैं (1) ओजवर्धक रसायन (2) गर्भपोषक रसायन
जो पाठक इस दशा में अखण्ड-ज्योति की कुछ सहायता करना चाहते हैं उनके सम्मुख हम दो कार्य उपस्थित करते हैं। (1) अपने परिचितों, मित्रों और प्रियजनों से अखण्ड-ज्योति की चर्चा किया कीजिए और उन्हें इस साहित्य को पढ़ने के लिए उत्साहित किया करें। नित्य एक नये आदमी से अखण्ड-ज्योति का परिचय और अपनाने की प्रेरणा की जाय तो एक वर्ष में बहुत कार्य हो सकता है
ऐसे पुनीत ज्ञान प्रसार के कार्य में हर एक पाठक को हाथ बटाना चाहिए और इस भार को उठाने में अखण्ड-ज्योति के कार्यकर्त्ताओं के साथ अपना कंधा लगाना चाहिए। जो सत्साहित्य अखण्ड-ज्योति की ओर से प्रकाशित होता है उससे अधिक से अधिक लोग लाभ उठावें इस बात का प्रयत्न उन सभी लोगों को करना चाहिए जो इस उद्ज्ञान में कुछ भी दिलचस्पी, आत्मीयता और श्रद्धा रखते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-November
उनका चरण प्रसाद प्राप्त करते रहने से यह पुण्य कार्य अधिक सुपल्लवित होगा। ” इस आदेश अनुसार अपने घर पर रहने से मिलने वाली विधाओं को छोड़कर “अखण्ड-ज्योति” को मथुरा लाया गया। आरम्भ के एक वर्ष में यह कार्य आगरा रह कर तत् पश्चात् मथुरा चला आया और तब से अब तक नियमित रूप से यहीं है
ता. 1 जनवरी सन् 1946 को प्रकाशित होगा। पेपर कन्ट्रोल कानून के अनुसार अखण्ड-ज्योति को बहुत थोड़ा कागज मिलता है। इसलिए पृष्ठ संख्या साधारण अंक से दूनी के करीब ही होगी। पर इससे भी पाठ्य सामग्री बहुत अधिक है
पत्र-पत्रिकाओं में अनेकों लेख उन विज्ञ व्यक्तियों द्वारा उन्हीं सिद्धान्तों के प्रसार में लिखे गये हैं जिनका प्रचार अखण्ड-ज्योति करती है। इस प्रकार जहाँ जनता को अखण्ड-ज्योति द्वारा जीवन को सात्विक बनाने के लिए तैयार किया जाता है वहाँ इस मिशन द्वारा अनेकों विद्वानों को इसी दिशा में सोचने, लिखने, बोलने और कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस दिशा में भी आशातीत सफलता मिली है। पचासों विद्वान अपने-अपने क्षेत्र में अपने-अपने ढंग से सात्विकता का प्रचार करने में अपनी शक्तियों को उत्साहपूर्वक नियोजित कर रहे हैं
‘अखण्ड-ज्योति’ का आध्यात्मिक मिशन विगत वर्षों से अपने वर्तमान स्वरूप में कार्य रहा है। इस समय में क्या कार्य हुआ यह जानने की परिवार के हर एक सदस्य को जिज्ञासा होना स्वाभाविक है। जैसे किसी घर की स्थिति की समुचित जानकारी उस घर में रहने वालों को होनी आवश्यक है
गत छः वर्षों में लाखों व्यक्तियों ने अखण्ड-ज्योति का आध्यात्मिक संदेश सुना है। इससे लोगों के व्यावहारिक जीवन में असाधारण परिवर्तन हुए हैं। सैकड़ों व्यक्तियों को हम स्वयं जानते हैं जिनके जीवन की दिशा बिल्कुल बदल गई
अखण्ड-ज्योति पत्रिका का देश के कोने-कोने में प्रसार हुआ है। गोरखपुर के “कल्याण” को छोड़ कर एक भी धार्मिक पत्र इसके बराबर प्रचलित नहीं है। भारतवर्ष का एक भी प्रान्त ऐसा नहीं है जहाँ पर्याप्त संख्या में उसकी पहुँच न हो
जैसे किसी घर की स्थिति की समुचित जानकारी उस घर में रहने वालों को होनी आवश्यक है। उसी तरह ‘अखण्ड-ज्योति’ के परिजनों को अपने आध्यात्मिक घर की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। इसलिए नीचे की पंक्तियों में अब तक के कार्य पर संक्षिप्त दृष्टि डाली जा रही है
यह प्रगति बड़ी तीव्र गति से चल रही है। अखण्ड-ज्योति को बाँचने वाला अपने अन्दर एक परिवर्तन अनुभव किये बिना नहीं रह सकता। कारण यह है कि एक पंक्ति का एक-एक अक्षर अत्यंत सचाई और तपःपूत मनोवस्था में लिखा जाता है। लेखक के गहन अन्तः प्रदेश में से निकले हुए भाव पाठकों के हृदयों में बहुत गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं
(2) अखण्ड-ज्योति का प्रेस स्थापित करना जिससे आवश्यक साहित्य के प्रकाशन की सुविधा रहे
सन् 2001 के आरम्भ होते ही ‘अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय में “कर्म योग विद्यालय की” स्थापना की गई थी, जिसमें आध्यात्मिक दृष्टिकोण के आधार पर व्यावहारिक जीवन को स्वर्ग के समान समृद्ध एवं समुन्नत बनाने की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक शिक्षा देने का आयोजन किया गया। शिक्षा की फीस, रहने का महान किराया, चारपाई, तेल, बत्ती, पुस्तक, स्टेशनरी आदि का खर्च छात्रों पर नहीं पड़ता था। विद्यार्थियों को केवल मात्र भोजन व्यय अपने पास से खर्च करना पड़ता था
उस विचार विनिमय के फल- स्वरूप अनेकों उत्तमोत्तम ग्रन्थ लिखे गये हैं, जो विभिन्न स्थानों से प्रकाशित हुए हैं। पत्र-पत्रिकाओं में अनेकों लेख उन विज्ञ व्यक्तियों द्वारा उन्हीं सिद्धान्तों के प्रसार में लिखे गये हैं जिनका प्रचार अखण्ड-ज्योति करती है। इस प्रकार जहाँ जनता को अखण्ड-ज्योति द्वारा जीवन को सात्विक बनाने के लिए तैयार किया जाता है वहाँ इस मिशन द्वारा अनेकों विद्वानों को इसी दिशा में सोचने, लिखने, बोलने और कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस दिशा में भी आशातीत सफलता मिली है
जिनकी फाइलों के कोई पुराने अंक गुम हो जाते हैं वे कभी-कभी एक-एक रुपया प्रति अंक देकर भी उन अंकों को प्राप्त करना चाहते हैं। यह सब बाते प्रकट करती हैं कि पाठक अखण्ड-ज्योति को ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं और उसका महत्व अनुभव करते हैं
उच्चकोटि के विद्वानों का अखण्ड-ज्योति में निरन्तर आना-जाना बना रहता है। इन विद्वानों की शक्तियाँ मनुष्य जाति की वर्तमान समस्याओं को सुलझाने में प्रयुक्त हों इस उद्देश्य से लम्बे विचार विनिमय होते रहते हैं। उस विचार विनिमय के फल- स्वरूप अनेकों उत्तमोत्तम ग्रन्थ लिखे गये हैं, जो विभिन्न स्थानों से प्रकाशित हुए हैं
अखण्ड-ज्योति के संपादक का घर आगरा होने के कारण कई सुविधाओं की दृष्टि से आरंभ आगरा से ही किया गया था, परन्तु जिन महात्माओं की आत्मिक प्रेरणा से यह मिशन चलता है उनका आदेश हुआ कि-”उर्वर भूमि में ही अच्छी खेती हो सकती है। कल्प कल्पाँतर से आध्यात्मिक विभूतियों का अतुलित भण्डार जहाँ जमा होता रहा है, ऐसी पुनीत मथुरापुरी इस कार्य के लिए उचित क्षेत्र है। वहाँ प्रकट और अप्रकट रूप से आत्मिक जगत की सर्वोच्च विभूतियों का आवागमन बना रहता है
गीता का यह भाष्य लगभग दस हजार पृष्ठों का होगा। अखण्ड-ज्योति सम्पादक के अगाध ज्ञान और असाधारण स्वाध्याय का इस ग्रन्थ से पता चलेगा। यह भाष्य 18 बड़ी जिल्दों में समाप्त होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-July
ये जिस भी मार्ग से निकले, उस पर युग संगीत सुनाते चले और युग चेतना से जन-जन को अनुप्राणित करते चलें। साथ में अखण्ड-ज्योति पत्रिका एवं युग निर्माण योजना, युग शक्ति गायत्री भी कम मूल्य पर वितरण हेतु रखें। साथ-साथ इस प्रकार अन्य साहित्य भी बिकता रहता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-May
सुश्री मनोरमा पाण्डेय, सुषमा चौधरी, मीना चौधरी उमा माहेश्वरी तथा कमला सिंह का सराहनीय योगदान मिल रहा है। गायत्री जयन्ती एक सौ सात महिला सदस्य बनाने सौ सात अखण्ड-ज्योति तथा चौबीस युग निर्माण योजना के सदस्य बनाने का सामूहिक संकल्प लिया गया है
असरोडा बसन्त पर्व के सम्मेलन में श्रीमती करुणा भ्राडे ने दस स्थानों पर महिला प्रौढ़ पाठशाला, एक सौ सात स्थानों पर धर्म घटों की स्थापना एक सौ सात सद्वाक्य लिखाने तथा चौबीस अखण्ड-ज्योति के सदस्य बनाने का संकल्प लिया था। उन्हें प्रसन्नता तब हुई जब यह कार्य डेढ़ माह की स्वल्पावधि में ही पूरा हो गया। इसके पीछे परम पूज्य गुरुदेव की अदृश्य शक्ति को ही उनने सक्रिय देखा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-November
अखण्ड-ज्योति पत्रिका में विज्ञापनों की कोई आमदनी नहीं है। सहायता के लिए भी याचना नहीं की जाती। बिना लाभ और बिना नुकसान के निर्माण नीति का अवलम्बन लिया गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-April
उपरोक्त चारों निर्धारणों को क्रियान्वित करने के लिए शान्ति-कुँज में तीन-तीन माह के एवं दस-दस दिन के सत्र एक साथ चल रहे है। अखण्ड-ज्योति परिवार के शिक्षित नर-नारी जिनकी आयु पच्चीस वर्ष से अधिक हो, इन सत्रों में इच्छित मास अथवा सत्र में सम्मिलित होने का आवेदन कर सकते हैं। प्रशिक्षण में उपरोक्त चारों निर्धारणों का संक्षिप्त एवं सारगर्भित प्रशिक्षण पूरा कराने का प्रयत्न किया जाता है
उसे प्रेरणातंत्र माना जाता है क्योंकि उसने अपने पाठकों को उत्कृष्ट आदर्शवादिता अपनाने और सेवा साधना में निरत होने हेतु सहमत सक्रिय किया है। यही कारण है कि अखण्ड-ज्योति पाठक चरित्रवान, लोकसेवी के रूप में विकसित हुए है। उनने नवसृजन का दायित्व अपने कंधों पर उठाया है
समूचे क्षेत्र में सद्वाक्य लेखन कार्यक्रम उत्साहपूर्वक कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया। अखण्ड-ज्योति पत्रिकाओं के अधिकाधिक सदस्य बनाने का संकल्प स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा लिया गया
ग्राम वासियों ने उत्साहपूर्वक संकल्प पत्र भरे। शाखा कार्यवाहक श्री कुन्दन सिंह द्वारा अपने क्षेत्र में अधिकाधिक अखण्ड-ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया
वर-कन्या दोनों पक्षों के पाँच-पाँच व्यक्तियों से अधिक नहीं आएँ ऐसे विवाह बड़ी संख्या में हर वर्ष शान्ति-कुंज में होते हैं। अखण्ड-ज्योति परिजन यदि अपने यहाँ नितान्त सादगी का विवाह न कर सकें तो शान्ति-कुंज आकर उसे सम्पन्न करने की व्यवस्था बनायें
शान्ति कुँज में चल रहे सत्रों में सम्मिलित होने हेतु गणमान्य व्यक्तियों ने आवेदन पत्र भरे। अखण्ड-ज्योति पत्रिका के माध्यम से परम पूज्य गुरुदेव का संदेश जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प भी कर्मठ कार्यकर्त्ताओं द्वारा लिया गया
शावत धर्मधारणा और समय की महती आवश्यकता का समन्वय उन चार निर्धारणों में हुआ है जो अखण्ड-ज्योति के विज्ञ परिजनों के सम्मुख अपनाने के लिए प्रस्तुत की गई हैं। आत्म-परिष्कार, शिक्षा संवर्धन, नारी जागरण, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के चार निर्धारणों को जिस रूप में, जितने अंशों में कार्यान्वित किया जा सके उसी अनुपात में कर्ता की, और वर्तमान समाज की उतनी ही बड़ी सेवा साधना बन पड़ेगी। यों करने को तो संसार में अनेकानेक क्षेत्र और कृत्य खाली पड़े है
-- अखण्ड-ज्योति मनोरंजन नहीं है। उसे प्रेरणातंत्र माना जाता है क्योंकि उसने अपने पाठकों को उत्कृष्ट आदर्शवादिता अपनाने और सेवा साधना में निरत होने हेतु सहमत सक्रिय किया है। यही कारण है कि अखण्ड-ज्योति पाठक चरित्रवान, लोकसेवी के रूप में विकसित हुए है
ग्रामवासियों ने नशा निवारण दहेज उन्मूलन, वृक्षारोपण कार्यक्रम के लिए भाव भरे संकल्प लिए। 10 अखण्ड-ज्योति पत्रिका के सदस्य तुरंत बने। यह संख्या 100 तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है
-- इन दिनों अखण्ड-ज्योति परिजनों की परीक्षा हो रही है। उसके सूत्र संचालक अपनी प्रत्यक्ष गतिविधियों का स्थानान्तरण कर रहे हैं। अपने दायित्व वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों को सौंप रहे हैं
15 और 17 फरवरी को वंदनीय माताजी ने उद्बोधन किया। उन्होंने नये कार्यक्रमों- (1) गाँव-गाँव दीप-यज्ञ (2) समय दान (3) नारी जागरण (4) अखण्ड-ज्योति आलोक विस्तार (5) प्रवाह परिवर्तन कार्यक्रमों की व्याख्या की। उपस्थित जन समुदाय भाव विभोर हो उठा। प्रत्येक कार्य इतने अनुशासित ढंग से सम्पन्न हुए कि दर्शक आश्चर्यचकित रह गये
बलीपुर (सुल्तानपुर)- प्रबुद्ध जन समुदाय की भारी संख्या के बीच शतवेदीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा अखण्ड-ज्योति पत्रिका के अधिकाधिक नियमित सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया। 150 से भी अधिक नये कार्यकर्ता इस आयोजन में उभरकर आये
अखण्ड-ज्योति की ज्ञान गंगा ने अनेकों उद्यानों खलिहानों को सुसम्पन्न बनाया है। इस प्रकाश पुँज को व्यापक और विस्तृत बनाने के लिए प्रयत्नशील रहा जाये। अपनी पत्रिका कम से कम दस को पढ़ाते रहने का नियम निभाया जाय
जन समुदाय के इस उत्साह को बनाये रखने के लिए स्थानीय कार्यकर्ताओं ने योजना बनाई है। टोली-बद्ध रूप से अपने संपर्क क्षेत्र में अधिकाधिक अखण्ड-ज्योति पत्रिका के सदस्य बनाकर आयोजन की ऊर्जा से समूचे क्षेत्र को अनुप्राणित करने में संलग्न है
सामूहिक विवाह बच्चों के संस्कार एवं अन्य धार्मिक कृत्य सफल हुए। अखण्ड-ज्योति, युग शक्ति गायत्री के सदस्य बनाये गये। इस अभियान को तीव्र करने का निश्चय किया गया
श्री मोयर अपने वाहन से कार्यक्रम स्थल पर टोली पहुँचाने व वापस भिजवाने का महत्वपूर्ण कार्य करते है। इस वर्ष कार्यकर्ता विशेष रूप से अखण्ड-ज्योति के नये सदस्य बनाने में लगे हुए है
सभी ने देश की वर्तमान स्थिति में इस सामयिक कार्यक्रम द्वारा जन-जागरण के प्रयास की सराहना की। समूचे क्षेत्र में महाप्रज्ञा के आलोक के विस्तार के लिए परमपूज्य गुरुदेव के व्यक्तिगत पत्र के रूप में अधिकाधिक स्वजनों तक अखण्ड-ज्योति पत्रिका पहुँचाने का संकल्प शाखा कार्यकर्ताओं ने लिया
कनिष्ठों को उस रिक्त स्थान की पूर्ति करनी पड़ती है। अखण्ड-ज्योति के संचालक और पाठक इसी प्रकार अपनी भूमिका निबाहें, इसी में उनकी परीक्षा और सफलता है
अखण्ड-ज्योति परिजनों की विशिष्टता देखते हुए उनके कंधों पर नव सृजन के कुछ उत्तरदायित्व सौंपे गये है, जिनमें से चार अनिवार्य स्तर के हैं, जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है। इन चारों में भी यदि किसी को प्राथमिकता देनी हो तो वा नारी-जागरण अभियान है, कारण कि उससे कर्त्ता को सीधा और तत्काल लाभ मिलता है। ग्रह संचालिकाएँ यदि उत्कृष्ट प्रगतिशीलता अपनाने होंगे तो उसका प्रभाव समूचे पारिवारिक वातावरण पर पड़ना निश्चित है
रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए शाखा गठन कर श्री धनपाल सिंह राजपूत को कार्यवाहक बनाया गया। आयोजन के समय ही 25 अखण्ड-ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य बनाये गये। समीपवर्ती क्षेत्र में 100 नए सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया
विचारशीलों से नये सदस्य बनने का आग्रह किया जाय। इन प्रयत्नों से अखण्ड-ज्योति को पचास वर्षों में हजार गुनी होने का श्रेय मिल सकता है। बढ़े सदस्यों के माध्यम से युगान्तरीय चेतना का आलोक कई गुना ज्योतिर्मय एवं व्यापक बन सकता है
-- अखण्ड-ज्योति के पाठक प्रज्ञा पुत्र कहे जाते है। उन्हें अपने भाव क्षेत्र की वंश परम्परा का अनुसरण करना है। सौंपे जा रहे दायित्वों का समग्र श्रद्धा के साथ अपनाना है और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए प्राण-पण से जुटना है
इस आधार पर बने वातावरण से अगणित लोगों को प्रगति प्रेरणा से अभिसिंचित होने का आधार बन सकता है। इस सुखद संभावना को मूर्तिमान करने के लिए अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी घटकों को अपनी-अपनी क्षमता के अनुरूप कुछ न कुछ करते रहने का व्रत लेना ही चाहिए
मिल-जुल कर काम करने से प्रगति की संभावना अनेक गुनी बढ़ जाती है। अखण्ड-ज्योति परिजन यह लक्ष्य निर्धारित कर लें कि ‘हम पाँच-हमारे पच्चीस’। परिवार नियोजन वाले ‘हम दो-हमारे दो का नारा लगाते है पर अपना लक्ष्य परिसीमन नहीं अभिवर्धन हैं। यहाँ विस्तार अभीष्ट है
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रायः पाँच लाख सदस्य है। उसका प्रभाव क्षेत्र प्रायः पच्चीस लाख सुशिक्षितों तक जा पहुँचता है। इतने परिवारों में उसका प्रवेश है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
पटना (बिहार) कर्मठ कार्यकर्ताओं की पदयात्रा टोली पटना से शान्तिकुँज के लिए उत्साहपूर्ण वातावरण में विदा हुई। मार्ग में पड़ने वाले नगरों में युगचेतना के विस्तार के लिए वाहनों, घरों, दुकानों, ऑफिसों में स्टीकर चिपकाने, सद्वाक्य लिखने तथा अखण्ड-ज्योति के नियमित सदस्य बनाने के प्रयास व्यापक स्तर पर किए जा रहे है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-March
लगभग 3500 छात्रों, अध्यापकों ने अपना हाथ उठाकर मिशन द्वारा निर्धारित कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए सहयोग देने की सहमति दी। विद्यालयों में अधिकाधिक अखण्ड-ज्योति पत्रिका मंगाने का संकल्प लिया गया। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने नशा निवारण दहेज उन्मूलन। वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाने के भाव भरे संकल्प लिए
चूँकि यह सचेतन आवश्यकताएं परब्रह्म से उद्भव होती है। इसीलिए इसे अखण्ड-ज्योति भी कहते है। जिसका भावार्थ है-चेतनात्मक दिव्य प्रेरणा। ऐसी ऊर्जा जो मनुष्य के अन्तराल तक प्रवेश कर सकने का मार्ग बनानी है और उस क्षेत्र की रहस्यमय परतों का उभार कर उजागर करती है
सभी जगह रचनात्मक कार्यक्रमों के लिए संकल्प पत्र भराये जा रहे है। साथ ही अखण्ड-ज्योति के अधिकाधिक सदस्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है। कार्यक्रमों के संचालन में सर्वश्री गणेश प्रसाद, तुलसीराम, जोहनलाल, पंचराम, होलसाय, विश्राम प्रसाद, आर बी अग्रवाल तथा पंडरियाजी का सराहनीय सहयोग मिल रहा है
पता - अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
परम पूज्य गुरुदेव के संदेश से प्रभावित होकर सैकड़ों नागरिकों ने दहेज उन्मूलन, नशा निवारण वृक्षारोपण तथा प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम को क्रियान्वित करने के संकल्प पत्र भरे। स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा अधिकाधिक अखण्ड-ज्योति पत्रिका के सदस्य बनाने के लिए संकल्प लिया गया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
अखण्ड ज्योति के पृष्ठ लिखने वाले ऋषि युग्म-माताजी के व्यक्तित्व को चरित्र को आदि से अन्त तक खुली पुस्तक की तरह पढ़ने के उपरान्त ही यह सम्भव हुआ कि अग्रिम पंक्ति पर चलने वाले के पीछे प्रयाण करने का साहस जुट सके। अखण्ड-ज्योति की पंक्तियों में जो प्राणवान ज्योति ज्वाला रहती है। वस्तुतः वह प्रस्तोताओं की प्राणाग्नि ही है। जो चुम्बक का काम करती है
व्यक्ति-निर्माण की यह योजना लम्बे समय से चल रहीं है और भविष्य में भी यथावत् चलती रहेगी। दो हजार शक्तिकेन्द्रों के प्रायः दस हजार कार्यकर्ताओं का युग अवतरण के प्रयत्नों में निरन्तर संलग्न रहना एक ऐसा आयोजन है, जिसकी योजना बनाने से लेकर कार्यान्वयन की लम्बी मंजिल पूरी करने का श्रेय अखण्ड-ज्योति के हिमगिरि को दिया जा सकता है जिससे अनेकों पुण्य धाराएँ निकली और सुविस्तृत भूभाग को सींचती रहीं
हरिद्वार का शांतिकुंज-गायत्री तीर्थ और ब्रह्मवर्चस देखने में इमारतों की दृष्टि से अपनी स्वतंत्र इकाई जैसे दीखते है। पर यदि कोई इनके निर्माण का मूलभूत आधार गहराई में उतरकर देखे तो वे सभी अखण्ड-ज्योति के अण्डे-बच्चे दिखाई पड़ेंगे। यहाँ यह समझ लेना भी आवश्यक होगा कि वह पत्रिका मात्र नहीं है, उसमें लेखक का सूत्र संचालक का दिव्य प्राण भी आदि से अन्त तक घुला है अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी न इतनी बड़ी युग-सृजेताओं की सेवा वाहिनी खड़ी की है और न इतने ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक-सहयोगी अनुयायी ही मिले है। फिर इन अनुयायियों की भी यह विशेषता है कि जिस लक्ष्य को उनने हृदयंगम किया है
अखण्ड-ज्योति पत्रिका मथुरा की प्रेस से छपती है। उसका प्रभाव विस्तार अपनी जगह है पर हरिद्वार का पत्र व्यवहार तंत्र अपनी भूमिका इस प्रकार निभाता है कि उसे पत्रिका द्वारा मिलने वाले शिक्षण की तुलना में किसी भी प्रकार कम विस्तृत और कम महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता। सामान्यतया सभी परिजन अपने पत्रों के साथ जवाबी लिफाफा भेजते है ताकि मार्गदर्शन क्रम सुनिश्चित रूप से चलता रहे एवं मिशन पर आर्थिक बोझ न आये
इन परिस्थितियों में अखण्ड-ज्योति जीवित कैसे है? यह व्यावसायिक दृष्टि से एक आश्चर्यचकित कर देने वाला प्रश्न है। दान अनुदान के रूप में कोई राशि स्वीकार न करने पर भी वह कागज, छपाई, पोस्टेज का खर्च किसी प्रकार निकाल लेती है। इस रहस्य की बारीकी में जाने वालों को कुछ समाधान कारक रहस्य और तथ्य हस्तगत हो सकते है
अखण्ड-ज्योति कार्यक्षेत्र अब तक हिन्दी भाषियों तक रहा है। अब अगले ही दिनों उसे इसी रूप, कलेवर, एवं चिन्तन से ओत-प्रोत रखते हुए भारत की सभी भाषाओं में प्रकाशित किया जाये। ऐसा ही सर्वतोमुखी साहित्य प्रकाशन तंत्र भी खड़ा किया जाय
आस्था संकट की विभीषिका से मोर्चा लेने हेतु अखण्ड-ज्योति ने अति महत्वपूर्ण दायित्व ब्रह्मवर्चस को सौंपा है। प्रत्यक्षवादी चिन्तन ने जिस नास्तिकता एवं अनैतिकता को जन्म दिया है। उसे तर्कों तथ्यों प्रमाणों तथा वैज्ञानिक प्रयोगों के निष्कर्षों के माध्यम से निरस्त किया जाना एक ऐसा भागीरथ कार्य था
शेष आधी को उस आधार पर उभरा पुरुषार्थ पूरी कर देता है। यही है अखण्ड-ज्योति का परिचय स्वरूप और प्रभाव
सत्प्रवृत्तियों को तो सेवा साधना का खाद पानी नियमित रूप से मिलना चाहिए। अखण्ड-ज्योति जहाँ दार्शनिक स्तर पर पुण्य-परमार्थ के पक्षधर तर्क तथ्य, प्रमाण उपस्थित करती रहीं है वहाँ उसने “अपनों से अपनी बात” शीर्षक के अंतर्गत प्रत्येक संबंधित व्यक्ति का इस हेतु भी उकसाया गया है कि वह समयदान अंशदान को आवश्यक नित्य कर्मों में सम्मिलित करे ओर जनमानस के परिष्कार को-सत्प्रवृत्ति संवर्धन को अनिवार्य धर्म कर्तव्यों की तरह जीवन-चर्या में सम्मिलित करे। शरीर और परिवार तक ही सीमित न रह कर समाज की हित साधना में भी बढ़-चढ़ कर योगदान दे
हम लोगों की स्थिति प्रत्यंचा की तरह अभी भी तनी है और भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेगी। अखण्ड-ज्योति की ज्योति ज्वाला प्रेरणाप्रद लेखों में अबकी ही तरह भविष्य में भी प्राणवान बनी रहें, इसके लिए अगले बीस वर्षों के लिए अभी से सुनिश्चित संग्रह करके रख दिया गया है। सूत्र संचालकों ने इसमें पूरा सहयोग दिया है
इस विग्रह को समर्थन में बदलने के लिए अखण्ड-ज्योति ने एक ऐसा तंत्र खड़ा किया है। जो युग की सबसे बड़ी दार्शनिक कठिनाई का हल प्रस्तुत कर सके। यह है ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान
इसे प्रस्तुतीकरण का व्यवहार पक्ष भी कह सकते है और उच्चस्तरीय सत्संग भी। इनका लाभ उठाने के लिए अखण्ड-ज्योति के परिजनों को समय रहते लाभ उठाना चाहिए। सूत्र संचालकों की प्रत्यक्ष उपस्थिति न रहने पर शिविरों की प्रशिक्षण प्रक्रिया में कुछ तो कमी आवेगी ही
भविष्य में ऐसे-ऐसे अनेकों अभियान-आन्दोलन चलाने और प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों को उलट कर सीधा करने की विशाल योजना है। अखण्ड-ज्योति का उन भावी सम्भावनाओं का प्रेरणा-स्त्रोत समझा जा सकता है
विश्वास किया गया है कि अखण्ड-ज्योति के प्रज्ञापुत्र अब तक इतनी प्रेरणा ग्रहण कर चुके है कि वे व्यवहारिक रूप से कुछ करने के लिए कटिबद्ध होंगे ही। इसके लिए आज का दिन ही सबसे उत्तम शुभ मुहूर्त है
दरवाजे पर खड़ा पोस्टमैन का इन्तजार करता रहता है। अखण्ड-ज्योति ने यही भूमिका निभाई है। इसकी पंक्तियों में इतना सारगर्भित भावना भरा और प्राण चेतना से परिपूर्ण अंकन रहा है कि लिखने वाले की लेखनी उतनी ही तृप्त रही है जितनी की गाय अपने बच्चे को दूध पिलाकर राहत अनुभव करती है। पाठकों ने भी वस्तुस्थिति के अनुरूप प्रतिक्रिया व्यक्त की है उनने उसे दैवी वरदान का अवतरण समझा है और एक ++++ को अनेक-अनेक बार पढ़ा है
अखण्ड-ज्योति की प्रकाश प्रेरणा से अनेकों महत्वपूर्ण और दर्शनीय सेवा संस्थाओं की निर्धारण हुआ है। वे अपने-अपने प्रयोजन को आशातीत सफलता के साथ सम्पन्न कर रहे हैं। उनमें से मथुरा में विनिर्मित गायत्री तपोभूमि युग निर्माण योजना से प्रज्ञा परिवार का हर सदस्य परिचित है
अखण्ड-ज्योति के सूत्र संचालक ने इस वस्तुस्थिति पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया और ऐसी सुव्यवस्थित .... बनायी जिससे युग परिवर्तन के स्वप्न साकार होने का व्यावहारिक ढाँचा खड़ा हो सके। इनमें प्रथम निर्धारण था धर्मतंत्र से लोक-शिक्षण, जिसके आधार पर ऐसी अनेक गतिविधियाँ विनिर्मित और अग्रसर की गई जो व्यावहारिक भी हो बोधगम्य भी ओर गति पकड़ने की दृष्टि से लोक-प्रिय एवं सर्वसुलभ भी
उसके अभिवर्धन में उनका यह प्रयास ही प्रमुख रूप से सराहा गया है कि हर पाठक हर वर्ष न्यूनतम एक-एक दो-दो ग्राहक नए बनायें। इस आधार के स्थिर रहने पर ही अखण्ड-ज्योति अपने निर्धारित महान लक्ष्य तक पहुँच सकेगी
अखण्ड-ज्योति जिन तथ्यों को लेख रूप में स्वाध्याय के लिए प्रस्तुत करती रही है, उन्हीं को क्रियात्मक रूप से अभ्यास से उतारने के लिए इन जीवन सत्रों की व्यवस्था की गई है। इसे प्रस्तुतीकरण का व्यवहार पक्ष भी कह सकते है और उच्चस्तरीय सत्संग भी। इनका लाभ उठाने के लिए अखण्ड-ज्योति के परिजनों को समय रहते लाभ उठाना चाहिए
तेलगू भाषा की मासिक अखण्ड-ज्योति अगले ही दिनों प्रकाशित होने जा रही है। बँगला वाले अपनी तैयारी अलग से करने में जुटे हुए है। यह सब प्रकारान्तर से मथुरा के प्रकाशन का ही विस्तार समझा जाना चाहिए, जो अखण्ड ज्योति के गोमुख से निस्सृत होती है और क्रमशः अग्रगामी सुविस्तृत होती चली जा रही है
अखण्ड-ज्योति का कलेवर, स्तर और उसका प्रसार तेजी से हो रहा है। इसका कारण एक ही है- उसके पाठकों ने यह विश्वास किया है कि इस सुधा धारा को अपने तक सीमित नहीं रहने देना चाहिए, वरन् अपने साथी, सहचरों को यह लाभ उठाने के लिए अपने प्रभाव और आग्रह का दबाव डालकर इसे मँगाते रहने के लिए विवश करना चाहिए। यही वह तथ्य और सत्साहस है जिसके कारण अखण्ड-ज्योति अपने पैरों खड़े रह सकने की स्थिति तक पहुँच गई है और यह योजना बन रही है कि भारत की सभी भाषाओं में उसी विचारणा और साज-सज्जा के साथ प्रकाशित किया जाय
युग-निर्माण योजना का अन्तिम बड़ा प्रकाशन ‘गीता विश्वकोष’ के रूप में छपने की तैयारी हो रही है। उसे उसी लेखनी से लिखा जा रहा है, जिससे अखण्ड-ज्योति लिखी जाती है। इसमें संसार भर में गीता सम्बन्धी प्रायः आठ हजार ग्रन्थों के प्रतिपादनों का सार-संक्षेप होगा। उनमें प्रतिपादित आलोचनाओं, व्याख्याओं, समर्थनों, खण्डनों का समावेश करते हुए यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया जायेगा कि यह सभी प्रतिपादन एक-दूसरे के पूरक है, विभेद और विवाद उत्पन्न करने वाले नहीं
यह सूर्योदय का प्रभाव है। महाप्रज्ञा की, भावश्रद्धा की अखण्ड-ज्योति का जब और जहाँ भी अवतरण होता है। वहाँ उसका प्रभाव सुदूर क्षेत्रों के अनेकानेक पक्षों को प्रभावित करते देखा जाता है। वह व्यक्ति विशेष तक या क्षेत्र विशेष तक या क्षेत्र विशेष तक सीमाबद्ध होकर बैठा नहीं रहता
समझना चाहिए कि देवात्मा हिमालय क्षेत्र में स्थूल शरीरधारी और सूक्ष्म शरीर धारी ऋषि कल्प देव शक्तियों के संयुक्त मार्गदर्शन और अनुदान के सहारे शाँति-कुंज की बहुमुखी गतिविधियां चल रही है। इसी की एक शाखा अखण्ड-ज्योति से निस्सृत होने वाली सप्त रंगों वाली सात किरणों की समुचित भूमिका निभा रही है
युग-साहित्य का लेखन-सृजन उसी कलम से हो जाता है, जो अखण्ड-ज्योति को विगत 50 साल से लिखती रही है। कहना न होगा कि यह साहित्य नहीं, वरन जीवित युग चेतना है, जिसे युग-निर्माण योजना-गायत्री तपोभूमि द्वारा निरन्तर प्रकाशित और प्रसारित किया जा रहा है
अखण्ड-ज्योति की प्रधान चेतना इसी विचार क्रान्ति अभियान के रूप में फटी है। उसने त्रिदेव की भाँति त्रिपदा गायत्री की भाँति, तीन लोकों और तीन शरीरों की भाँत बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक कान्ति का पांचजन्य बजाया है और उस तुमुलनाद ने न केवल अपने देश में, वरन् समस्त विश्व के वातावरण में अभूतपूर्व हलचल उत्पन्न की है। उसे विचारशीलों का परिपूर्ण सहयोग भी मिलेगा
विनोबा कहते रहते थे कि “किसी संस्था को तभी तक जीवित रहना चाहिए जब तक उसके कार्यकर्ता निस्पृह और सच्चे सेवाभावी हों। वे न रहे घट जाये तो उन्हें विलासी प्रलोभन के सहारे रोके रहना व्यर्थ है” इस कसौटी पर अखण्ड-ज्योति के प्रज्ञा परिजन अब तक निरन्तर खुद उतरते रहें है और उनके सेवा कार्यों से संतुष्ट जनता उन्हें इतना सम्मान और सहयोग प्रदान करती है कि उनकी ब्राह्मणोचित निर्वाह आवश्यकताएँ निरन्तर पूरी होती रहती है साथ ही इस परमार्थी वर्ग की संख्या भी बढ़ती रहती है। आमतौर से सादगी का ब्राह्मणोचित जीवन लोगों को रास नहीं आता। सभी आलसी और विलासी रहना चाहते है
जो बाजार में विभिन्न योग उपलब्ध है, उन्हें लिये जाने पर गुर्दे त्वचा एवं लीवर को जो हानि पहुँचती है, उसके सैंकड़ों केस प्रतिवर्ष एलोपैथी के चिकित्सकों के पास पहुँचते देखे जाते है। इस विडम्बना से बचने के लिए ही नितान्त सुरक्षित वनौषधि विधा को ही “अखण्ड-ज्योति” द्वारा हाथों में लिया गया है क्योंकि वे सर्व सुलभ हैं जाती स्थिति में कल्क के रूप में सूखी स्थिति में चूर्ण के रूप में कभी-भी ली जा सकती हैं
शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा; पर क्षण भर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक की ज्वलन्त ज्योति में समा जायेंगे, जिसके आधार पर अखण्ड-ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड-ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत की स्थिति में रहे है। भविष्य में दोनों की सत्ता एक में विलीन हो जायगी और उसे तेल-बाती की पृथक सत्ताओं की एक ही लौ में समावेश होने की तरह अद्वैत रूप में गंगा-यमुना के संगम रूप में देखा जा सकेगा
पाठकों की सुरुचि ने “अखण्ड-ज्योति” को जागृत रखा है। उसके अभिवर्धन में उनका यह प्रयास ही प्रमुख रूप से सराहा गया है कि हर पाठक हर वर्ष न्यूनतम एक-एक दो-दो ग्राहक नए बनायें। इस आधार के स्थिर रहने पर ही अखण्ड-ज्योति अपने निर्धारित महान लक्ष्य तक पहुँच सकेगी
अखण्ड-ज्योति के पौत्र शान्ति-कुंज ने वनौषधि अनुसन्धान का जो कार्य हाथ में लिया है उसकी अपनी विशेषता है। इसलिए उसे अपने ढंग का अनोखा भी कह सकते है। कारण कि यहाँ इस उत्पादन के साथ प्रयोग परीक्षण भी चलता रहता है
व्यावसायिक विज्ञापनों के संबंध में प्रायः यही होता रहता है। ऐसी आजीविका कमाना अखण्ड-ज्योति को अपने आदर्शों के अनुकूल नहीं लगा। इसलिए उसने उस नीति का आरम्भ से ही परित्याग कर दिया। यह जानबूझ कर आर्थिक संकट मोल लेना था
मात्र मासिक पत्रिकाएँ ही ऐसी विद्या है जो धीमीचाल से चलते हुए अपनी गाड़ी किसी प्रकार घसीटती रह सकती है। अखण्ड-ज्योति ने अपने लिए यही मार्ग अपनाया
साथ ही साधना का सम्बल भी। शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा; पर क्षण भर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक की ज्वलन्त ज्योति में समा जायेंगे, जिसके आधार पर अखण्ड-ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड-ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत की स्थिति में रहे है
इस प्रकार घर में बैठकर थोड़े- से आदमी भी इन्हें सुनते रहते है और दूरदर्शन प्रदर्शन की आवश्यकता छोटे रूप में पूरी करते रहते है। यही है लोक शिक्षण के अनेकानेक प्रयोग जिन्हें अखण्ड-ज्योति का पौत्र शान्ति-कुंज अपने ढंग से पूरा करता रहता है
उसे उन सबकी सम्मिलित सम्पदा भी कहा जा सकता है। अखण्ड-ज्योति को ज्ञान गंगा कहा जाय तो मानना पड़ेगा कि वह किसी व्यक्ति या शक्ति का एकाकी प्रयास नहीं है उसके साथ अनेक मूर्धन्य शक्ति केन्द्रों की दिव्य चेतना जुड़ती चली गयी है
उनका अनुवाद, प्रकाशन देश की अधिकाँश भाषाओं में हुआ है। यह प्रवाह अभी रुका नहीं है अखण्ड-ज्योति पत्रिका उद्बोधन की प्रमुख धारा है। वह पढ़ने के बाद किसी कोने में फेंक नहीं दी जाती; पर पन्ने फट-टूट जाने पर भी सम्बन्ध बनाने वालों में न बुझने वाली प्राण प्रेरणा फूँकती रहती है। यह स्वाध्याय पक्ष हुआ
अखण्ड-ज्योति को एक प्रतीक माना जाय, एक आदर्श कहा जाय, या उसे उसके आराधक का प्रतिनिधि स्वरूप माना जाय- हर हालत में उसकी ऐसी प्रकाश किरणें फूटनी चाहिए। जो युगधर्म की महत्ती आवश्यकताओं को पूरी करने में प्राणपण से कटिबद्ध दृष्टिगोचर हो। संक्षेप में एक ही शब्द द्वारा इस प्रयास का स्वरूप प्रस्तुत किया जा सकता है
अखण्ड-ज्योति की अनेक प्रेरणाओं और स्थापनाओं में से एक शान्ति-कुंज भी है, जिसे तीर्थ परम्परा का- ऋषि युग की रीति-नीति का सार संक्षेप समझा जा सकता है। यहाँ व सभी प्रवृत्तियां चलती है जिनके आधार पर इन दिनों भी इन्हीं कारणों से ऋषि युग का साक्षात्कार किया जा सकता है
उसी दिव्य सत्ता का प्रतीक केन्द्र गायत्री तीर्थ है जिसे शान्ति कुंज के नाम से जाना जाता है। वह भी कलेवर भर है उसमें प्राण-चेतना का संचार उसी उद्गम से होता है जिसे अप्रत्यक्ष रूप में अखण्ड-ज्योति में सन्निहित प्राण-ऊर्जा कहा जा सकता है। इस माध्यम से उसी प्रशिक्षण की सर्वांगपूर्ण व्यवस्था होती है जिसे लोक-शिक्षण, जनमानस का परिष्कार, व्यक्ति निर्माण प्रतिमा संवर्धन आदि के रूप में देखा जाना जाता है। इसे ऋषि-परम्परा का निर्वाह भी समझा जा सकता है
ध्यानपूर्वक देखने वालों ने यह माना है कि यह सम्भावना दीख पड़ती है कि अध्यात्म और विज्ञान परस्पर विरोधी न रह कर एक-दूसरे का सहयोग करते हुए मानवी प्रगति का महत्वपूर्ण आधार बनेंगे। इस प्रकार अखण्ड-ज्योति के दार्शनिक प्रतिपादनों को, प्रत्यक्ष प्रतिपादनों को यह दृश्य रूप में प्रस्तुत करने की एक सशक्त प्रक्रिया है
अखण्ड-ज्योति का कलेवर छपे कागजों के छोटे पैकेट जैसा लग सकता है, पर वास्तविकता यह है कि उसके पृष्ठों पर किसी की प्राण चेतना लहराती है और पढ़ने वालों को अपने आँचल में समेटती है, कहीं-से-कहीं पहुँचाती है। बात लेखन तक नहीं सीमित हो जाती, उसका मार्गदर्शन और अनुग्रह अवतरण किसी ऊपर की कक्षा से होता है। इसका अधिक विवरण जानना हो, तो एक शब्द में इतना ही कहा जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाले ऋषि चेतना का समन्वित अथवा उसके किसी प्रतिनिधि का सूत्र संचालन है, अन्यथा साधना विहीन एकाकी, व्यवहार कुशलता की दृष्टि से पिछड़ा हुआ व्यक्ति बड़े सपने तो देख सकता है; पर बड़े कामों का भार अपने दुर्बल कंधों पर नहीं उठा सकता
अखण्ड-ज्योति के विगत 52 वर्ष के उत्पादन में बहुत बड़ी संख्या उन चन्दन वृक्षों की है। जिनकी सुगन्ध और शोभा से सारा वातावरण महक उठा है। उन्हें शान्ति कुंज, हरिद्वार में गायत्री तपोभूमि, मथुरा में तथा सहस्त्रों शक्ति केन्द्रों में काम करते देखा जा सकता है
इससे भी बड़ी बात थी लगनशील और उच्च शिक्षित कार्यवाहकों का बड़ी संख्या में उपलब्ध करना। यह कार्य भी अखण्ड-ज्योति ने ही सम्पन्न किया। उसके पाठकों में ही ऐसे प्रतिभावान भावनाशील निकल पड़े। जिनने हरिद्वार संस्थानों में आजीवन सेवा करके लिए संकल्प लिये और जीवनदानी के रूप में सदा-सर्वदा के लिए आ गये एवं अहर्निश सौंपे काम को करने में जुट गये
वही हो भी रहा है। अखण्ड-ज्योति बड़ी संख्या में छपनी है, वह हर महीने लाखों, करोड़ों का अन्तराल नियमित रूप से झकझोरती है। इसका प्रभाव परिणाम भी हाथों सामने आता रहा है। लोकसेवियों का, युग शिल्पियों का, प्रज्ञापुत्रों का एक बड़ा समुदाय उभर कर दूध की मलाई की तरह ऊपर आया है
वरन उनके सूत्र-संचालकों के साथ घनिष्टतम संपर्क स्थापित होने के उपरान्त दीपक से, दीपक जलने जैसी प्रक्रिया सम्पन्न हुई है। अखण्ड-ज्योति के लेखों से परमार्थ परायणता की सेवा-साधना की प्रेरणा अवश्य मिली है पर इतने भर से यह नहीं हो सकता कि कोई अपनी सुख-सुविधाओं को लात मारकर संतमय तपस्वी जीवन जीने के लिए आतुर हो उठे और उस प्रकार का व्रत लेकर रहे, .... उच्च वर्ग के सुशिक्षित नहीं। उन्हें गहराई तक वास्तविकता की जाँच-परख भी करनी पड़ती है। यही हुआ भी है
अखण्ड-ज्योति के मस्तिष्क से उपजी गायत्री तपोभूमि और युगनिर्माण योजना के सामने एक प्रश्न अभी भी है कि देश के 75 प्रतिशत अशिक्षितों को युग-चेतना से कैसे जोड़ा जाय? इस संदर्भ में कुछ उपाय निकाले गये है और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए कदम उठाने की तैयारी में जुटा जा रहा है। इन उपायों में एक उपाय है- दीवारों पर आदर्श वाक्यों का बड़े अक्षरों में लेखन, जिन्हें बच्चे भी पढ़ते है और घर जाकर उस नये उल्लेख की चर्चा करते है। बिना पढ़े भी उन्हें दूसरे पढ़ों के मुँह से सुनते हैं
सफलता भी अत्यन्त उच्चस्तरीय अर्जित करेंगे। हमारी प्रवृत्तियाँ मरेंगी नहीं, वरन् अखण्ड-ज्योति की बढ़-चढ़ कर अभिनव भूमिका सम्पन्न करेगी। इसलिए शरीर परिवर्तन की बात सोचने पर न हमें कुछ खिन्नता होती है और न हम लोगों का वास्तविक स्वरूप समझने वाले अन्य किसी स्वजन, परिजन को होनी चाहिए मिशन तीर की तरह सनसनाता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगा। हम लोगों की स्थिति प्रत्यंचा की तरह अभी भी तनी है और भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेगी
इसी पंक्ति में एक नाम अखण्ड-ज्योति का भी जुड़ता है। उनकी ऊर्जा ने अनेकों में प्राण-संचार किया है। 24 लाख की गणना सदस्यों-पाठकों की है
अखण्ड-ज्योति में चरित्र, चिन्तन, व्यवहार का परिष्कार-उत्कृष्टता का पक्षधर तत्वदर्शन अतीन्द्रिय क्षमताओं की प्रभाव क्षेत्र आदि विषयों पर तो प्रामाणिक विवेचन रहता ही है, इसके अतिरिक्त उसमें गायत्री मंत्र और अग्निहोत्र के संदर्भ में भी विवेचनात्मक चर्चा रहती है। गायत्री यज्ञों का आन्दोलन भी चलता रहा है। कमी इसी बात की थी कि वह प्रतिपादन दार्शनिक एवं शास्त्रीय पृष्ठ भूमि पर ही होता रहा है
कुछ ही समय में आशा यह है कि देश की सभी भाषाओं में होता रहेगा। कुछ ही समय में आशा यह है कि देश की सभी भाषाओं में अखण्ड-ज्योति छपने लगेगी और इस सीमा को पारकर वह विश्व भाषाओं की परिधि में भी प्रवेश करेगी
वह अंगद-हनुमान नल-नील जैसी समर्थ तो नहीं थी, फिर भी उसने स्वल्प सामर्थ्य को दाँव पर लगा कर सेतु बाँधने के लिए अपने बालों में भर कर बालू पहुँचाई थी। युग बदलने का समय कब आयेगा? यह तो नहीं कहा जा सकता; पर यह निश्चित है कि अखण्ड-ज्योति और उसका समूचा परिकर इस प्रयास के लिए अपने आपको समर्पितों की श्रेणी में खड़ा करेगा कर रहा है
इसका कारण एक ही है- उसके पाठकों ने यह विश्वास किया है कि इस सुधा धारा को अपने तक सीमित नहीं रहने देना चाहिए, वरन् अपने साथी, सहचरों को यह लाभ उठाने के लिए अपने प्रभाव और आग्रह का दबाव डालकर इसे मँगाते रहने के लिए विवश करना चाहिए। यही वह तथ्य और सत्साहस है जिसके कारण अखण्ड-ज्योति अपने पैरों खड़े रह सकने की स्थिति तक पहुँच गई है और यह योजना बन रही है कि भारत की सभी भाषाओं में उसी विचारणा और साज-सज्जा के साथ प्रकाशित किया जाय। इसमें से गुजराती, मराठी, उड़िया, बंगला, तमिल एवं अंग्रेजी में प्रकाशन का कार्य हाथों में है जो अगले ही दिनों नई सज धज के साथ अपने-अपने क्षेत्रों की जनता की भावनात्मक प्यास बुझाने में उत्साह वर्द्धक मात्रा में सफल हो सकेगा
समझा जा सकता है कि दिव्य विभूतियों से सुसम्पन्न ऋषिकल्प देवात्मा हिमालय के सिद्ध पुरुषों का संयुक्त वरदान सम्मिलित अनुदार गायत्रीतीर्थ शान्ति-कुंज की पुण्य-प्रक्रिया है। उसकी अखण्ड-ज्योति अपने दिव्य आलोक से युग चेतना का आलोक दसों दिशाओं में विकीर्ण कर रही है। उसकी प्रस्तुत गतिविधियों में यह देखा जा सकता है कि ऋषियों के भूत कालीन क्रिया-कलापों की मुखाकृति इन दिनों किस सरलता और सफलता के साथ सम्पन्न हो रही है
ब्रह्मवर्चस की शोध प्रक्रिया वस्तुतः अखण्ड-ज्योति में निरन्तर किये जाने वाले अध्यात्म आधारों को ही प्रत्यक्ष की कसौटी पर खरा सिद्ध करने का एक विनम्र प्रयास है जिसके अब तक के प्रयासों को असाधारण सफलता भी मिली है। ध्यानपूर्वक देखने वालों ने यह माना है कि यह सम्भावना दीख पड़ती है कि अध्यात्म और विज्ञान परस्पर विरोधी न रह कर एक-दूसरे का सहयोग करते हुए मानवी प्रगति का महत्वपूर्ण आधार बनेंगे। इस प्रकार अखण्ड-ज्योति के दार्शनिक प्रतिपादनों को, प्रत्यक्ष प्रतिपादनों को यह दृश्य रूप में प्रस्तुत करने की एक सशक्त प्रक्रिया है
अखण्ड-ज्योति प्रकाशन के पीछे पत्रिका निकालने भर के शौक काम नहीं कर रहा था वरन् उसके साथ लोक-मानस के परिष्कार का अत्यन्त विशाल और कष्ट साध्य लक्ष्य था। उसे पूरा करने के लिए ऋषियों की तरह द्वार-द्वार जाने और जन संपर्क साधने का एक उपाय तो सामने था। पर वह भी समय से पीछे रह गया
विवशता की स्थिति में प्राथमिकता उन्हीं को दी जाती है जो मिशन के साथ पहले से ही जुड़े रहे है। जिन्होंने अपनी जानकारी इस संदर्भ में अखण्ड-ज्योति युग निर्माण या युग शक्ति पत्रिकाएँ पढ़ते रहकर इस स्तर की बना ली है कि उन्हें निर्धारित विषयों के सम्बन्ध में अधिकाधिक जानकारी पहले से ही उपलब्ध रहे और शिक्षकों को प्रशिक्षण देने तथा साधना कराने में किसी प्रकार के असमंजस का सामना न करना पड़े
समय की चुनौती का स्वीकरण युग परिवर्तन। इस परिवर्तन के लिए जो कुछ आवश्यक है, उसके सुविस्तृत होते हुए भी सरंजाम जुटाने का संकल्प अखण्ड-ज्योति ने अब तक पूरा किया है और वह व्यक्ति विशेष का संचालन उठ जाने पर भी अनन्त काल तक अपनी ज्योति-ज्वाला ज्वलन्त रखें रहेंगी
वह यथासमय सम्पन्न हुई। उसी अवधि में न बुझने वाली घृतदीप के रूप में दृश्यमान अखण्ड-ज्योति की स्थापना हुई। प्रयोजन था- दृश्यमान श्रद्धा प्रतीक को अदृश्य अन्तःकरण में प्रकाशवान अनुभव करना। यह निराकार और साकार का संयुक्त समन्वय अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में असाधारण भूमिका निभाता रहा और लक्ष्य के अधिकाधिक निकट पहुँचाने के लिए बलपूर्वक धकेलता रहा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-February
प्रत्येक जाग्रत आत्मा को जन नेतृत्व करने की क्षमता अर्जित करनी है, ताकि लोक मानस को वातावरण के प्रवाह को शालीनता की दिशा में मोड़ने मरोड़ने का लक्ष्य पूरा हो सके। यह कार्य अखण्ड-ज्योति के प्रज्ञा परिजनों को ही करना होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-June
कुम्भराज (म0प्र्र0) गायत्री शक्तिपीठ के कार्यकर्ताओं ने 25 गाँवों में अखण्ड-ज्योति के ग्राहक बनाने का अभियान चलाया हैं। इस इलाके के मीना समाज में दहेज बहुत अधिक लिया दिया जाता हैं। शाखा झडेरा के कार्यवाहक श्री निरन्जन सिंह भील ने अपने पुत्र चि0 बाबूलाल का विवाह बिना देन दहेज के श्री अमरलाल मीना की पुत्री सौ0 का0 लताबाई से यज्ञीय वातावरण में कराया
अखण्ड-ज्योति मासिक
अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादन का महत्व केवल उसे व समझ भर लेने में समाप्त नहीं हो जाता, वरन् उसकी सार्थकता इसमें है कि अपनी स्थिति के अनुरूप सुझाये गये निर्धारणों में से कुछ को तो कार्यान्वित करने ही लग .... जाँय। अनुभव और अभ्यास बढ़ते चलने पर कुछ और उत्तरदायित्व वहन करने के लिए उत्साह जगाया और साहस जुटाया जा सकता है
मिशन का प्रचार करने के साथ-साथ शान्तिकुँज दर्शन का भी वायदा किया। इस अभियान क्रम में अखण्ड-ज्योति के ग्राहक 500 से 100 हो गये हैं। सभी सक्रिय कार्यकर्ताओं ने समयदान के संकल्प लिए
पिछले दिनों अखण्ड-ज्योति परिवार में प्रायः 2540 पीठें बनी है। स्वाध्याय मंडलों की स्थापना 15000 के .... बनी हैं। स्थापना के समय जो उत्साह था वह .... शिथिल होने लगा तो जिन रचनात्मक क्रियाकलापों के निरन्तर चलने की आवश्यकता थी, उनमें आ गई

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-January
उस कवितामय पुस्तक पर हजारों आदमियों ने टिप्पणियाँ की हैं। उसी में से एक आप अखण्ड-ज्योति के अगले अंक में पढेंगे जो उसने हिन्दुस्तान के बारे में की है। उसकी भविष्यवाणी है कि हिन्दुस्तान का अध्यात्म और पाश्चात्य का तत्व विज्ञान यह दोनों आपस में मिल जायेंगे पाश्चात्य भौतिक विज्ञान और अध्यात्म मिल जायेंगे। रूस और हिन्दुस्तान मिल जायेंगे
रात में हमारा क्रम पूजा-उपासना का रहता है। सबेरे से लेकर दोपहर तक हम अपना लेख लिखते हैं ताकि अखण्ड-ज्योति बीस साल तक बराबर निकलती रहे। बीस साल के लिए लेख और जो पुस्तकें लिखनी हैं, वह सब हम लिखकर रख जायेंगे। जब यह युगसंधि समाप्त होगी और सन् 2000 आयेगा, उस वक्त तक आप यह अनुभव करेंगे कि गुरुजी जो लिखकर रख गये थे, उनकी लेखनी में कोई फर्क नहीं आया, उनके अक्षरों में कोई फर्क नहीं आया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-November
युग निर्माण के महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए यह नितान्त आवश्यक हैं इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए जीवन जीने की कला के व्यवहारिक आध्यात्म का प्रतिपादन शिक्षण किया भी जा रहा है। अखण्ड-ज्योति पत्रिका इसी प्रयोजन की पूर्ति में संलग्न है और आवश्यक गोला बारूद, विचार, प्रवाह प्रस्तुत करती चली आ रही हैं यह प्रयत्न आगे इसी गति से-और भी अधिक तीव्र गति से आगे बढ़ें ऐसे प्रयास चल रहे हैं आत से तीस वर्ष पूर्व यह कहा जाता था कि- ‘जहाँ विज्ञान समाप्त होता हैं वहाँ से अध्यात्म आरम्भ होता हैं विज्ञान और अध्यात्म का क्षेत्र सर्वथा पृथक् एक दूसरे से सर्वथा असंबद्ध है। पर अब ऐसी स्थिति नहीं रही। गत पचास वर्षों में विज्ञान ने अति तीव्रगति से प्रगति की है और उसका हर चरण अध्यात्म के समर्थन की ओर बढ़ा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-December
अभी सत्तर खण्ड प्रस्तावित हैं। इन्हीं को सात हजार रुपये मूल्य में अखण्ड-ज्योति संस्थान द्वारा दिया जा रहा है। इसके लिए हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लिए टोलियाँ अखण्ड-ज्योति संस्थान को वाङ्मय लेकर केन्द्र की ओर से भेजी गयी है। इस स्थापना को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाय जितना हमने वैदिक वाङ्मय को माना हैं
पुनर्गठन-अनुयाज यही अब आँवलखेड़ा कार्यक्रम के बाद चलेगा और कहीं भी बड़े भव्य आयोजन नहीं होंगे,” यह जानकारी परिजनों को विगत वसंत पर्व (जनवरी 1995 की अखण्ड-ज्योति से बराबर दी जा रही हैं किसी को असमंजस हो सकता है कि इतने बड़े कार्यक्रम से उत्पन्न ऊर्जा को आप बेकार क्यों जाने दे रहे हैं? क्यों नहीं आप पुनः बड़े आश्वमेधिक कार्यक्रम कर रहे है? क्या आपका संकल्प इतने तक का ही था? क्या परिस्थितियों ने थका डाला या केन्द्रीय तंत्र इस स्थिति में नहीं है कि अब बड़े कार्यक्रम कर सकें? इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि निश्चित ही बड़े-बड़े कार्यक्रम-भव्यतम् स्तर के कार्यक्रम और अधिक भीड़ के साथ सम्पन्न होते रह सकते थे किन्तु उससे पूज्य गुरुदेव के बताए मूल उद्देश्यों के अनुरूप न चलकर हम गड़बड़ा जाते। कार्यकर्ता को कार्य क्षेत्र में उत्पन्न ऊर्जा का सुनियोजन करना है- सृजनात्मक बड़े आयोजनों में अपनी शक्ति गँवाना है। यही सोचकर अभी अक्टूबर ९६ तक के समय को अनुयाज-पुनर्गठन वर्ष घोषित कर विभिन्न कार्यक्रम उसके लिए बनाकर प्रस्तुत ही नहीं किए गए, उनका बार-बार स्पष्टीकरण इस पूर्णाहुति समारोह में देवमंच व ज्ञानमंच से किया जाता रहा
इन्हीं को सात हजार रुपये मूल्य में अखण्ड-ज्योति संस्थान द्वारा दिया जा रहा है। इसके लिए हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लिए टोलियाँ अखण्ड-ज्योति संस्थान को वाङ्मय लेकर केन्द्र की ओर से भेजी गयी है। इस स्थापना को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाय जितना हमने वैदिक वाङ्मय को माना हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-February
सारे महीने का हिसाब खर्चा माताजी स्वयं रखती थीं। साथ ही अखण्ड-ज्योति पत्रिका की हाथ से बने कागज पर हाथ से छपाई, किताबों की छपाई व सिलाई तथा धीरे-धीरे करके पूर्व में उपेक्षा करने वाले बाद में घर आकर बस जाने वाले नजदीक दूर के सभी रिश्तेदारों व उनके बच्चों की देखरेख-उनकी पढ़ाई का ध्यान व उनसे भी खाली समय काम करा लेना, पूज्यवर के पास आने वाली नित्य की डाक को खोलकर पढ़ते चले जाना व पूज्यवर द्वारा उनका हाथों-हाथ जवाब लिखते चले जाना यही सब नित्य नैमित्तिक दिनचर्या थी। न जाने कितने बच्चे जो आज बड़ी-बड़ी पोस्ट पर मैनेजर हैं, अधिकारी हैं उनके ऋणी हैं कि यदि माताजी ने उन्हें आत्म निर्भर न बनाया होता तो शायद आज वे वह न होते जो बन पाए हैं
उन्हीं पैसों से बच्चों ने अच्छी-अच्छी किताबें खरीदीं व शादी के समय कुछ पहनने लायक कपड़े बनवाए। यह उन्हीं की शिक्षा थी जो आगे भी हरिद्वार में विशाल शाँतिकुँज बनने तक भी चली व वही क्रियापद्धति यहाँ आने वाला भूखा नहीं रहा जैसा कि अखण्ड-ज्योति संस्थान में होता था। प्रश्न यह नहीं है कि पैसे का अभाव है या किसी के पास साधन नहीं है। साधन न्यूनतम होते हुए भी अपने ब्राह्मणत्व के सहारे व्यक्ति बड़े से बड़े अवरोधों से जूझता हुआ चल सकता है व लोक मंगल के निमित्त एक बड़े से बड़ा निर्माण कर सकता है
सामान्यक्रम में पत्रिका और पाठक के रिश्ते पढ़ने-पढ़ाने तक सीमित रहते हैं। माताजी की उपस्थिति के साथ ही अखण्ड-ज्योति पत्रिका ने ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ का रूप ले लिया। पत्रिका को पढ़ने वाले उनके अपने आत्मीय हो गए। इस क्रम में लोगों का घर आने-जाने, ठहरने, खाने-पीने का सिलसिला चल पड़ा
उन दिनों अखंड-ज्योति पत्रिका से जुड़े एक परिजन ने अपनी यादों की पुलकन उड़ेलते हुए बताया-अहा! वे भी क्या दिन थे। मैंने अखण्ड-ज्योति नयी-नयी पढ़ी थी। एक दो महीने पत्रिका पढ़ने के बाद मन में विचार आया कि लिखने वाला तो बड़े कमाल का आदमी है, उससे मिलना चाहिए। बस फिर क्या मथुरा के लिए रवाना हो गया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-August
अब यह समग्र वाङ्मय प्रायः पाँच-पाँच सौ पृष्ठों के, जो अखण्ड-ज्योति आकार के होंगे, साठ खण्डों के रूप में इस वर्ष के अंत तक प्रकाशित होने जा रहा हैं प्रथम पूर्णाहुति तक प्रायः चालीस खण्ड जन-जन के लिए उपलब्ध हो सकेंगे, ऐसी व्यवस्था त्वरित स्तर पर छपाई का प्रबन्ध बनाकर की गयी है। यह ऐसा दुर्लभ संकलन है जो सम्भवतः साहित्य जगत के इतिहास में स्वयं में एक अभूतपूर्व स्थापना के रूप में सामने आएगा। प्रत्येक खण्ड में परमपूज्य गुरुदेव उनकी जीवनचर्या में क्षण-क्षण साथ कहीं शक्ति स्वरूपा परम वंदनीय माताजी तथा इन दोनों के जीवन से गुँथे मिशन की भूमिका भी प्रस्तुत की जा रही है
अखण्ड-ज्योति बंगला जो कलकत्ता से प्रकाशित होती है, अब जन-जन में लोकप्रिय हो रही है। इसका जुलाई-अगस्त 15 का अंक एक विशेषांक के रूप में मातृसत्ता के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में बृहत् आकार में प्रकाशित हो रहा है। जो भी परिजन इसे बंगला भाषी मित्रों-परिचितों रिश्तेदारों को देना चाहें इसका सदस्य बनाना चाहें-इस पते पर सम्पर्क कर लें- युग निमार्ण योजना
हमने दो सौ रुपये महीने में बहुत सारी जिन्दगी काट डाली। यहाँ आने से पहले हम अखण्ड-ज्योति कार्यालय में जितने समय तक रहे है, हमने दो-सौ रुपये महीने में अपना समय काटा है। पैंतीस साल के करीब हम अखण्ड-ज्योति कार्यालय में रहे है। वहाँ भी, हमारी गवाही सुरक्षित है ताकि कोई आदमी यह न कहे कि पाँच आदमियों की गृहस्थी दो सौ रुपये में नहीं चल सकती? जरूरत चल सकती है
कपड़े को जिल्द पर एक प्रोटेक्टिंग कवर एवं अच्छी गुणवत्ता वाले कागज पर छपाई के साथ एक विशेषता है प्रत्येक में गुरुदेव माताजी के भिन्न-भिन्न मुद्राओं में भिन्न अवस्थाओं के रंगीन चित्र। ब्रह्मवर्चस् द्वारा सम्पादित तथा अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा द्वारा मुद्रित-प्रकाशित इस समग्र वाङ्मय का मूल्य एक साथ लेने पर 6000/- रुपये रखा गया है। यों अलग-अलग खण्डों का मूल्य लागत के आधार पर 125/- है। पूर्णाहुति के अवसर पर चालीस खण्ड उपलब्ध होंगे, शेष बीस खण्ड परिजनों को बाद में भेज दिए जाएँगे
उनका स्पर्श पाकर लेखनी भी धन्य हो गयी, इस युग का साहित्य समुदाय भी धन्य हो गया एवं एक विलक्षण कीर्तिमान स्थापित हो गया। 1940 से अनवरत प्रकाशित अखण्ड-ज्योति पत्रिका जो बाद में और कई सहचरी पत्रिकाओं युग निर्माण योजना मासिक-पाक्षिक-साप्ताहिक प्रज्ञा अभियान (पाक्षिक), युगशक्ति गायत्री, महिला जागृति अभियान, युगसाधना आदि अनेकों के साथ मिल कर पत्रकारिता का एक इतिहास विनिर्मित करती चली आयी है। इस पत्रिका को अब प्रायः अट्ठाईस वर्ष प्रकाशित होते हो गये हैं, क्योंकि पहला अंक 1937 में पूज्यवर ने हाथ से बने कागज पर छापा था पर यह मासिक नियमित न रहकर दो-ढाई वर्ष तक एक पाती का ही काम करता रहा। बाद में नियमित रूप से वसन्तपर्व 1490 से यह पत्रिका पहले आगरा व फिर मथुरा से प्रकाशित होने लगी
यहाँ आने से पहले हम अखण्ड-ज्योति कार्यालय में जितने समय तक रहे है, हमने दो-सौ रुपये महीने में अपना समय काटा है। पैंतीस साल के करीब हम अखण्ड-ज्योति कार्यालय में रहे है। वहाँ भी, हमारी गवाही सुरक्षित है ताकि कोई आदमी यह न कहे कि पाँच आदमियों की गृहस्थी दो सौ रुपये में नहीं चल सकती? जरूरत चल सकती है। पैसे का संयम कीजिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
यों तो मिशन का सूत्रपात उसी दिन हो गया था जिस दिन गुरुदेव 1926 में हिमालयवासी दिव्य सत्ता से साक्षात्कार हुआ था, पर प्रकट रूप में इसकी आधारशिला सन् 1940 की बसंत पंचमी पर ही रखी गई, जब से अखण्ड-ज्योति पत्रिका का नियमित प्रकाशन आरंभ हुआ एवं धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया का शुभारम्भ। यह योजना उनके दिमाग में बहुत पहले ही बन चुकी थी कि आगे चलकर उन्हें नव निर्माण योजना की विशाल मुहिम खड़ी करनी है और उसके माध्यम से व्यक्ति एवं समाज को दिशा देनी है। अतः इसके अनुरूप पात्रता का विकास भी उन्होंने आवश्यक समझा, क्योंकि इसे वे भली−भाँति समझते थे कि जब तक संचालक का व्यक्तित्व खरा और प्रामाणिक नहीं होगा, तब तक कोई बड़ा संगठन खड़ा करने की आशा दुराशा मात्र ही होगी
बसन्त पर्व के ब्रह्ममुहूर्त में उन्हें उनकी अशरीरधारी हिमालय वासी गुरुसत्ता जिनने उन्हें उनके जीवनोद्देश्य से परिचित कराया, भावी कार्यक्रमों की रूपरेखा समझाई व बताया कि विगत जन्मों में जो महान् कार्य उनसे पूरे हुए उन्हें किस तरह पूरा किया जाना है। चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण करने, अखण्ड दीपक के प्रकाश में स्वाध्याय जन्म चिन्तन को लिपिबद्ध कर अखण्ड-ज्योति रूपी पत्रिका प्रकाशित किये जाने तथा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सान्निध्य में जाने, स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के नाते सहयोग देने के निर्देश आँवलखेड़ा की इस बस्ती के उनके विशाल घर की छोटी-सी पूजा की कोठरी में ही मिले। यहीं पर उन्होंने बतलाया गया कि साधना स्वाध्याय व स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के रूप में मातृभूमि की सेवा के त्रिसूत्री कार्यक्रम के साथ-साथ उन्हें चार बार हिमालय यात्रा करनी पड़ेगी संभावित समय व स्थान के निर्देश भी मिले व जीवन यात्रा के आगामी कार्यक्रम का एक स्वरूप उन्हें समझा दिया गया। तब से बसंत पंचमी को ही उनके आध्यात्मिक जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
तिब्बत वाला कैलाश और मानसरोवर किस कारण से मान लिया गया मैं कह नहीं सकता। लेकिन अगर सही रूप में ढूँढ़ा जाय तो ऐसे असंख्य प्रमाण मैंने अखण्ड-ज्योति में छापे हैं जिनसे यह सिद्ध किया जा सकता है कि असली कैलाश और मानसरोवर वही है जहाँ मेरे गुरुदेव निवास करते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-June
हमें आशा न थी कि अखण्ड-ज्योति मासिक पत्र इतने थोड़े समय में ही बुद्धि और विचार का भण्डार बनेगी। इस पत्रिका की जितनी तारीफ करें, तो भी थोड़ी ही है कारण? जब से आपका ग्राहक बनकर ‘अखण्ड-ज्योति’ अवलोकन किया, तब से हमारी आत्मा को धैर्य और शान्ति प्राप्त हुई है
मुझे ‘अखण्ड-ज्योति’ का नमूना ता 11 जून को मिला। पढ़ने से ऐसा प्रतीत हुआ कि मानों मैं। किसी ऋषि के आश्रम में बैठा उपदेश सुन रहा हूँ
सचमुच ‘अखण्ड-ज्योति’ की वाणी की अखण्ड झनकार मेरे हृदय में बज रही है। मेरे पास इस समय पैसा न होने के कारण मैं अखण्ड-ज्योति का ग्राहक नहीं हो सका। लेकिन मैं शीघ्र ही आपके पत्र का ग्राहक बनूँगा और अपने मित्रों को भी बनाऊँगा
किसी ऋषि के आश्रम में बैठा उपदेश सुन रहा हूँ। सचमुच ‘अखण्ड-ज्योति’ की वाणी की अखण्ड झनकार मेरे हृदय में बज रही है। मेरे पास इस समय पैसा न होने के कारण मैं अखण्ड-ज्योति का ग्राहक नहीं हो सका। लेकिन मैं शीघ्र ही आपके पत्र का ग्राहक बनूँगा और अपने मित्रों को भी बनाऊँगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-January
आप देख रहे हैं कि “अखण्ड-ज्योति” का मिशन मनुष्य समाज में सदाचार, धर्मनिष्ठा, भ्रातृभाव और सुख शान्ति के विचारों का प्रचार करना है। मनुष्य में देवत्व का आविर्भाव करने के लिये नारद की तरह अलख जगाती हुई द्वार-द्वार पर फिरती है। मीरा की तरह इसकी एक ही रट है- ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई’
हर ग्राहक अनुग्राहक अपना कर्तव्य धर्म समझकर अखण्ड-ज्योति के कम से कम दो ग्राहक अवश्य बना दें
अखण्ड-ज्योति पूछती है कि ‘क्या आप हमारे लिये इतना कर सकते हैं?”
विमल ‘अखण्ड-ज्योति’ के नीचे सब सच्चा पथ पावें॥
“अखण्ड-ज्योति” के सदुद्देश्य में सहायता करना हर एक ईश्वर भक्त , धर्म प्रेमी, सदाचारी और पवित्र हृदय वाले व्यक्ति का कर्तव्य है। इस नास्तिकता, स्वार्थपरता और महंगाई के युग में धर्म प्रेमियों की सहायता बिना यह अखण्ड-ज्योति का धर्म तक मुरझा जायगा
प्रेमी पाठकों से अखण्ड-ज्योति’ एक भिक्षा चाहती है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-May
मैं 9 विघ्न, ‘अखण्ड-ज्योति’ अप्रैल मास के शीर्षक लेख “जप-योग“ में दिखला चुका हूँ, उनके पुनः लिखने की आवश्यकता नहीं समझता हूँ, बस सबसे बढ़ा विघ्न मन की चंचलता है आप विश्वास रखिये धीरे-धीरे अभ्यास करने से मन वशीभूत हो ही जाता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-July
अखण्ड-ज्योति के लेख
अखण्ड-ज्योति के पाठकों! अपनी आध्यात्मिक साधनाओं में इन दो साधनाओं का समावेश करना मत भूलना। हृदय पलट पर इन शब्दों को अंकित कर लो-
आशा है कि पाठक इसे पसन्द करेंगे। आध्यात्मिक साधनाओं को पत्रिका में प्रकट करने की अपेक्षा पुस्तकों द्वारा बताना उपयुक्त समझ कर साधना विषय पुस्तकों के रूप में और ज्ञान का प्रसार अखण्ड-ज्योति द्वारा हुआ करेगा। -सम्पादक

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-December
सब व्यवस्था यथा विधि चलने लगी। विभिन्न प्रकार की ऐसी घटनाएं नित्य घटित होती रहती हैं जिनसे प्रतीत होता है कि अखण्ड-ज्योति का अपना कोई विशेष मिशन नहीं हैं। यह तो एक अदृश्य प्रेरणा की हुंकार मात्र है
तुम तो निमित्त मात्र हो। मैं अखण्ड-ज्योति के अधिक पाठक बढ़ाने की अपने भक्तजनों के हृदयों में स्वयं प्रेरणा कर रहा हूँ। इसकी उन्नति करने के लिये मेरी माया यथाविधि काम कर रही है
इस वर्ष भी स्थूल दृष्टि से उन दोनों बातों को दुहराने की आवश्यकता प्रतीत होती है। परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर इसका कुछ महत्व प्रतीत नहीं होता क्योंकि जो पाठक निस्वार्थ भाव से अखण्ड-ज्योति पर इतना हार्दिक प्रेम प्रकट कर रहे हैं, उसका कारण हम या ‘ज्योति’ नहीं वरन् ईश्वरीय सत्ता है। अनेक अपरिचित मित्रों का सच्चा सौहार्द, पवित्र प्रेम गुरुजनों का वात्सल्य हमारी योग्यता के आधार पर नहीं प्रभु की प्रेरक शक्ति द्वारा प्राप्त हो रहा है। अपनी पुण्य नगरी में बुलाकर जिन लीला धर भगवान् ने इस महान प्रचार का साधन निर्मित किया है उन्हीं नन्दकिशोर की वीणा हमारे कानों में झनझना रही है
4. सन् 41 के अखण्ड-ज्योति के सब अंक मौजूद हैं। जो मँगाना चाहे प्रति के हिसाब से मँगा सकते हैं। इस पर कोई कमीशन न दिये जायेगा
अखण्ड-ज्योति के तेरह ग्राहक बना कर भेज रहा हूँ। मैंने अपने उन मित्रों को आग्रह पूर्वक अनुरोध किया था, क्योंकि मैं समझता हूँ कि इन लोगों का सब से बड़ा हित इसी में है। इस छोटे से प्रयत्न में मुझे यज्ञ करने जैसी शान्ति मिली है
इसलिये इन क्षेत्रों में हम धन्यवाद का कोरा दम्भ न दिखाकर पाठकों की ईश्वर प्रेरित सात्विक आत्म चेतना को श्रद्धा से नत-मस्तक होकर प्रणाम करते हुए, इन पंक्तियों को समाप्त करते हैं और आशा करते है कि अखण्ड-ज्योति का ज्ञान यज्ञ सत्य के अन्वेषकों के हृदयों में एक नवीन स्फूर्ति प्रदान करेगा, जिसके आधार पर वे समुचित शाँति प्राप्त कर सकेंगे। परमात्मन्, आपकी इच्छा पूर्ण हो
उच्च विचार, सादा जीवन में ही संभव है। अखण्ड-ज्योति के पाठक उच्च विचारों का महत्व जानते होंगे और उन्हें प्राप्त करने के लिए लालायित रहते होंगे। उन्हें जानना चाहिए कि यह सादा जीवन द्वारा ही संभव हैं। जितनी बनावट और अस्वाभाविकता को हम अपनाते जावेंगे उतने ही उच्च विचार जीवन से दूर हटते जावेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-February
पता अखण्ड-ज्योति कार्यालय, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-March
(1) अखण्ड-ज्योति का वार्षिक मूल्य 1॥) और एक प्रति का :) है। मूल्य मनीआर्डर से भेजना चाहिए। वी.पी.मँगाने पर
पत्र व्यवहार का पता—मैनेजर-अखण्ड-ज्योति

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-March
6.स्वत्वाधिकारी - श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
इसलिए बार-बार मिलते-जुलते रह कर या पत्र लिख कर यह प्रयत्न करना चाहिए कि जिन्हें सदस्य बनाया गया है वे उसे पढ़ने में अभिरुचि लें और अपने संपर्क के दूसरे लोगों को भी उस ज्ञान से लाभान्वित किया करें। एक भी अखण्ड-ज्योति की प्रति ऐसी न हो जिससे कम से कम दस व्यक्तियों ने लाभ न उठाया हो। यह कूड़े-कचरे में पड़ी रहने देने की वस्तु नहीं वरन् युग-निर्माण की प्रेरक अग्नि है जिससे समुचित गर्मी और रोशनी प्राप्त होती रहनी चाहिए
मँगाने का पता-”अखण्ड-ज्योति संस्थान” मथुरा
प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के विचारशील लोगों ने वैवाहिक अपव्यय को रोकने के लिए, सक्रिय संगठन बनाने की उपयोगिता समझी है और भारी उत्साह प्रकट करते हुए यह आतुरता प्रदर्शित की है कि ऐसा कदम जल्दी से जल्दी उठाया जाय। प्रगति के लिए संघर्ष के लिए, साहस और त्याग के लिए उत्साह आवश्यक है। जहाँ यह दोनों सुयोग बनते हैं वहाँ कठिन से कठिन मञ्जिल पार होती है
गैर सरकारी क्षेत्र भी बहुत कुछ कर सकते हैं। संजीवन विद्या की शिक्षा का एक सर्वांगपूर्ण विश्वविद्यालय ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार भी चला सकता है। इसके लिए धन की नहीं भावनाओं की आवश्यकता है। भावनापूर्ण परिजन यदि चाहेंगे तो यह शिक्षण-पद्धति एक स्थान से आरम्भ होकर देश-व्यापी रूप में विस्तृत होकर युग-निर्माण के उपयुक्त वातावरण उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध हो सकेगी
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को रजत जयन्ती के प्रेरणा पर्व में अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने के लिए आमंत्रण दिया गया था। प्रसन्नता की बात हैं कि अधिकाँश परिजनों ने सन्तोषजनक उत्साह के साथ उसमें भाग लिया है। जो सज्जन किसी कारणवश दिसम्बर अंक में छपी पंच-सूत्री योजना के अनुसार अभी कोई प्रक्रिया कार्यान्वित नहीं कर सके उनसे भी यह आशा की जा रही है कि अगले दो तीन महीनों के भीतर किसी न किसी रूप में जयन्ती मनाने के माध्यम से युग-निर्माण योजना को व्यापक बनाने के लिए कोई न कोई कदम जरूर उठावेंगे
यह क्रम किस महीने चलेगा यह आवश्यक तैयारी के बाद अगले किसी अंक में घोषित कर दिया जायगा, पर इतना निश्चित है कि वह इसी वर्ष आरम्भ हो जायगा। अतएव ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों को उसके लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए। जो इच्छुक हों वे अपने नाम नोट करा सकते हैं ताकि इस वर्ष में जितने लोगों का शिक्षण सम्भव हो उनमें इन पहले नाम नोट करा लेने वालों को प्राथमिकता दी जा सके
प्रत्येक युग-निर्माण से हमें एक ही आशा और एक ही याचना है कि वह इस विचारधारा को लोगों के मनों में प्रवेश करने के लिये जन-संपर्क बढ़ावे और उसके लिये उत्साहपूर्वक समय लगावे। इस प्रक्रिया को अपनाये बिना योजना का पहला कदम एक से दस की परिणित का सफल होना किस प्रकार पूरा हो सकेगा? और यदि इतना भी कार्य इस अगली छमाही में पूरा न हो सका तो जिस आध्यात्मिक नैतिक साँस्कृतिक एवं सामाजिक क्रान्ति के लिये चतुर्मुखी अभियान आरम्भ किया गया है उसमें सफलता कैसे मिलेगी? हमारी प्रबुद्ध चेतना को जागृत रहना चाहिये और अखण्ड-ज्योति की रजत-जयन्ती से जो प्रेरणा ग्रहण की गई है उसे अखण्ड ही रखा जाना चाहिये
पिछले मास रजत-जयन्ती पर जिन्होंने अपनी श्रद्धा, सक्रियता, कर्तव्य परायणता और सद्भावना का परिचय दिया है उन्हें आशा भरी दृष्टि में देखा जा रहा है और उनसे यह आशा की जा रही है कि युग-निर्माण के इस महान यज्ञ में वे आगे भी समय-दान की आहुति निरन्तर देते रहें और अपने सत्प्रयत्न को जयन्ती के अवसर पर प्रकट हुआ सामयिक उफान मात्र न रहने देकर उसे अखण्ड ही बनाये रहें। अखण्ड-ज्योति के प्रति अखण्ड श्रद्धा ही शोभा देगी
अखण्ड-ज्योति परिवार का प्रत्येक घर आदर्श व्यक्तित्व ढालने की टकसाल बने यही प्रयत्न हमें करना होगा। इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि इनमें ऐसा सौम्य वातावरण रहा करे जिसके सान्निध्य में रहने वाले बालक संस्कारवान बनते चले जायँ और प्राचीन भारत की तरह हर घर में नर रत्नों का उद्यान खिला हुआ दृष्टिगोचर हो सके जन्मजात संस्कारों के अभाव में स्कूली शिक्षा व्यक्तित्व निर्माण में बहुत ही कम सहायक हो सकती है। आज कितने ही आदर्श विद्यालय, छात्रालय, एवं गुरुकुल अच्छी शिक्षा की व्यवस्था रख रहे हैं पर जन्म-जात संस्कारों के अभाव में उनमें पढ़ने वाले बालक भी वैसे नहीं बन रहें हैं जैसे कि आशा की जाती थी
पता - ‘अखण्ड-ज्योति’ संस्थान मथुरा
जिन सज्जनों ने भारी प्रयत्न करके अथवा अपने ग्राम में पैसा खर्च करके जिन महानुभावों को अखण्ड-ज्योति का ग्राहक-युग-निर्माण योजना का सदस्य बनाया है, वे आगे वह भी करें कि उनसे मिलने-जुलने की प्रक्रिया क्रमबद्ध रूप से जारी रखें और यह प्रयत्न करते रहें कि वे सज्जन न केवल ध्यानपूर्वक स्वयं ही अखण्ड-ज्योति पढ़ा करें वरन् अपने कुटुम्बियों को भी उसे पढ़ने-सुनने का अवसर दिया करें
अखण्ड-ज्योति परिवार में हर जाति एवं उपजाति के लोग मौजूद हैं। उसकी छाँट करके प्रारम्भिक रूप में प्रगतिशील जातीय सभाएं गठित कर दी जावेंगी, पर उतने थोड़े लोगों के संगठन किसी जाति पर व्यापक प्रभाव कहाँ डाल सकेंगे? उन्हें अपने-अपने संगठनों का व्यापक विस्तार करना होगा। प्रगतिशीलता का तात्पर्य और उद्देश्य समझाने के लिए उन्हें अपने-अपने कार्य क्षेत्र में दर दर मारा-मारा फिरता पड़ेगा
ईंटें कच्ची रहती हैं तो दीवार भी कमजोर ही बनेगी। परिवारों का तारतम्य यदि अस्त-व्यस्त हो रहा होगा जो सभ्य समाज की भव्य रचना का दृश्य कहाँ दिखाई देगा? परिवारों में स्वस्थ परम्पराओं का प्रवेश’ कराने के लिए ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार सदस्यों को प्रेरणापूर्वक लगाया गया है। फलस्वरूप तीन चौथाई से अधिक इस परिवार के सदस्य अपने-अपने कुटुम्बों की अभिनव रचना करने में लगे हुए हैं। नियमित रूप से कुछ समय वे इस कार्य के लिये लगाते रहते हैं
रजत-जयन्ती पर जिनने अपनी श्रद्धा और तत्परता का परिचय दिया है उनसे विशेष रूप से यह आग्रह है कि वे अपने नगर में ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों से संपर्क स्थापित करके उन्हें पत्रिका ध्यानपूर्वक पढ़ने की प्रेरणा दिया करें। प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्ता को अपने जिम्मे कम से कम दस सदस्य तो रखने ही चाहिए और आरम्भ में यह प्रयत्न करना चाहिए कि वे विचारों को पढ़ने में अभिरुचि लें। जिनमें यह रुचि उत्पन्न हो गई उनसे ही यह आशा भी की जा सकेगी कि प्रस्तुत योजना को कार्यान्वित करने के लिए भी कुछ कदम उठा सकेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-April
इन सभी में सम्मिलित होने के लिये अधिकाधिक स्वजनों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजन स्वयं भी इसके लिये बहुत उत्सुक हैं
इतने बड़े आन्दोलन का अभी तक कहीं कोई प्रचार नहीं हो पा रहा है। इससे ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार से बाहर के व्यक्ति न तो उससे परिचित हो पाते हैं और न प्रकाश ग्रहण करने या सहयोगी बनने की स्थिति में होते हैं। यह एक बड़ी कमी है जो सभी को खटकती है। ‘अखण्ड-ज्योति’ विचार-पत्रिका है
उसका पढ़ना तो सभी स्वजनों के लिए आवश्यक है पर मँगाना नहीं। अखण्ड-ज्योति पीढ़ियों तक सुरक्षित रखी जा सकने वाली, जीवन में क्रान्ति उपस्थित करने वाली प्रेरणा से परिपूर्ण पुस्तिका है उसे हर सदस्य एक धर्म ग्रन्थ की तरह जीवन की बहुमूल्य निधि के रूप में सुरक्षित रखता है, इसलिए इसे इस युग-निर्माण योजना के हर सदस्य के लिए मँगाना आवश्यक है, पर यह बात इस पाक्षिक पत्र के बारे में लागू नहीं होती। इसकी एक पत्रिका कई व्यक्ति पढ़ कर भी काम चला सकते हैं
इस अंक के अन्त में ‘कार्य विवरण और सूचना पत्रक’ लगा है। अखण्ड-ज्योति के सभी पाठकों को इसे भर कर अप्रैल के अन्त तक मथुरा भेज देना चाहिए
यह एक बड़ी कमी है जो सभी को खटकती है। ‘अखण्ड-ज्योति’ विचार-पत्रिका है। उसमें समाचार छपें तो उसका सारा कलेवर इसी से घिर जाया करे, इसलिए हर महीने हजारों प्रेरणा-प्रद रचनात्मक प्रयत्नों में से कभी-कभी दो चार की हो चर्चा उसमें हो पाती है। दूसरे अखबार प्रायः राजनैतिक दृष्टि से निकलते हैं, उनमें राजनीति की बातें ही प्रधान रहती हैं
1 जुलाई से इसका निकलना आरम्भ हो जायगा। सक्रिय कार्यक्रम-शाखा संचालक-अपने संपर्क के अन्य अखण्ड-ज्योति सदस्यों से यह पैसा इकट्ठा कर लें, उसे मथुरा भेज दें और ऐसी व्यवस्था बनायें कि एक पत्रिका का लाभ दस सदस्यों को मिल जाया करे। जिन्हें अधिक रुचि हो ये अपनी प्रत्येक भी मँगा सकते हैं। जो भी उपाय संभव हो, युग-निर्माण प्रवृत्तियों की जानकारी एवं प्रेरणा देने वाले इस मासिक-पत्र को भी सब स्वजन पढ़ सकें ऐसी व्यवस्था हर जगह होनी चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-November
तब अपने रचनात्मक कार्य की प्रेरणा सन्देश भी सभी परिजनों तक पहुँचना संभव हो जायेगा। ऐसी दशा में अखण्ड-ज्योति में उस स्तम्भ के रखने की कुछ उपयोगिता नहीं रह जाती
अगले शिविरों में यह त्रुटियाँ दूर हो जायेंगी और वे अधिकाधिक उपयोगी सिद्ध होते जायेंगे। फिर भी हमें पहले शिविर में आशाजनक सफलता प्राप्त हुई है और यह सुनिश्चित हो गया है कि आगे इस पुण्य प्रक्रिया का लाभ उठा सकना हर अखण्ड-ज्योति पाठक के लिये सम्भव हो सकेगा। जीवन शोधन की इस विद्यापीठ को आरम्भ होते और उसका सफलतापूर्वक मूर्तिमान होते देखकर हमें कितना सन्तोष एवं हर्ष है उसका परिचय लेखनी द्वारा नहीं दिया जा सकता
नई पत्रिका अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिये अनिवार्य आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत हुई है। उसे पढ़कर ही युग-निर्माण आन्दोलन में भाग ले सकने के लिये आवश्यक उत्साह एवं मार्ग दर्शन प्राप्त होता है। अतएव परिजन उसे उसी भाव से पढ़ने भी लगे हैं
उसमें कुछ दिनों “युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति” नामक स्तम्भ रखकर इस आवश्यकता की आँशिक पूर्ति की गई थी पर वह चिन्ह पूजा मात्र थी। जिस प्रचण्ड आन्दोलन में तीस हजार मस्तिष्क और साठ हजार हाथ काम कर रहे हैं, जिसकी गतिविधियां निरन्तर तूफानी तेजी के साथ बढ़ती जा रही हों उसके लिये ‘अखण्ड-ज्योति’ में रहने वाला चार छह पन्ने का छोटा-सा स्तम्भ क्या काम कर सकता था? उससे आवश्यकता की कितनी पूर्ति हो सकती थी? काम भी कुछ बनता न था और अखण्ड-ज्योति के स्थायी महत्व की सामग्री भी उतनी कम पड़ जाती थी। इन परिस्थितियों में नई पाक्षिक पत्रिका आरम्भ करने के अतिरिक्त और कोई चारा शेष न रह गया था
चार महीने का यह प्रयास इतना सत्कार प्राप्त करेगा इसकी किसी को स्वप्न में भी आशा न थी। अखण्ड-ज्योति परिवार से बाहर लोग भी उसे एक अनुपम पत्रिका मानकर माँग रहे है। इसे ईश्वर की महती अनुकम्पा के अतिरिक्त और क्या कहा जाए?
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा। (यू.पी.)
इसी बीच में माता सरस्वती का जन्म दिन बसन्त पंचमी पर्व भी पड़ता है। अखण्ड-ज्योति की, हमारी साधना जीवन की जयन्ती भी उसी दिन है। इन कारणों से भी यह माघ मास अधिक शुभ अवसर बन जाता है
अखण्ड-ज्योति परिवार ने युग-निर्माण योजना को कार्यान्वित करने के लिए जिस श्रद्धा तथा तत्परता से कदम बढ़ाये हैं उसे देखते हुये अपनी क्षमता से दस गुना काम करने की आकाँक्षा हम भी करते हैं पर समय और हाथ पाँव सीमित होने के कारण इच्छानुरूप कार्य यथा समय हो नहीं पाता। पिछले तीन महीनों से दिन रात व्यस्त रहते हुए भी इतने तात्कालिक कार्य शेष रह गये हैं कि उनकी पूर्ति के लिये आगामी तीन महीने शिविरों को स्थगित करने के अतिरिक्त और कोई चारा शेष नहीं रह गया है। कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष इन तीन महीनों में रुके हुए आवश्यक कार्य पूरे हो जाने की आशा है
अब युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति का संक्षिप्त संकेत ही अखण्ड-ज्योति के अन्तिम दो-चार पृष्ठों में रहा करेगा। बाकी तो सब कुछ विस्तारपूर्वक बताने के लिये पाक्षिक पत्रिका है ही जहाँ उसे नहीं मँगाया गया है वह अगले ही दिनों उसे मंगाया भी जाने लगेगा। तब अपने रचनात्मक कार्य की प्रेरणा सन्देश भी सभी परिजनों तक पहुँचना संभव हो जायेगा
आन्दोलनों में सामयिक परिस्थितियों एवं प्रेरणाओं की प्रधानता रहती है इसलिये उसे समाचार प्रधान बनाना पड़ता है। ‘अखण्ड-ज्योति’ विचार प्रधान है। उसमें कुछ दिनों “युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति” नामक स्तम्भ रखकर इस आवश्यकता की आँशिक पूर्ति की गई थी पर वह चिन्ह पूजा मात्र थी। जिस प्रचण्ड आन्दोलन में तीस हजार मस्तिष्क और साठ हजार हाथ काम कर रहे हैं, जिसकी गतिविधियां निरन्तर तूफानी तेजी के साथ बढ़ती जा रही हों उसके लिये ‘अखण्ड-ज्योति’ में रहने वाला चार छह पन्ने का छोटा-सा स्तम्भ क्या काम कर सकता था? उससे आवश्यकता की कितनी पूर्ति हो सकती थी? काम भी कुछ बनता न था और अखण्ड-ज्योति के स्थायी महत्व की सामग्री भी उतनी कम पड़ जाती थी
अखण्ड-ज्योति स्थायी महत्व की वस्तु है। उसे लोग इस युग की गीता के रूप में नियमित स्वाध्याय के लिये पीढ़ियों तक संग्रह करने के लिये सुरक्षित रखते हैं। उसमें जो कुछ छपता है वह स्थायी महत्व का होता है
इसलिये अन्य भूमिकाओं के साथ विवेक की साधना भी सतत् चलती रहनी चाहिये ताकि हमारे जीवन का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पहलू आँखों से ओझल न होने पाये। एक भाग अप्रकाशित ही न बना रहे इसके लिये विवेक की अखण्ड-ज्योति प्रत्येक मनुष्य के जीवन में जगमगाती ही रहनी चाहिये। हमारा हृदय इतना शुद्ध और पवित्र होना चाहिये कि प्रत्येक भावना का सूक्ष्मतर प्रत्युत्तर वह दे सके
इस पाक्षिक ने सारे परिवार में एक नया उत्साह, नया जीवन, नया प्राण फूँका है और जो सदस्य निष्क्रिय पड़े हुए थे वे भी करवटें ही नहीं बदल रहे हैं वरन् कुछ करने के लिये भी कटिबद्ध हो रहे हैं। जिस प्रकार अखण्ड-ज्योति सोचने की दिशायें ठीक करती है। उसी प्रकार योजना जीवन-क्रम को ठीक तरह संचालित करने-’क्रियाशीलता में उल्लास भरने के लिये महत्वपूर्ण मार्ग दर्शन करती है। विचार और कार्य दोनों के मिलने में ही तो प्रगति का पथ प्रशस्त होता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-December
अलग से परिपत्र भेजकर यह मालूम किया जा रहा है कि किस स्थान पर किन्हें प्रतिनिधि नियुक्त किया जाय। जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ पहुँचती होगी वहाँ हमें अपने प्रतिनिधियों की नियुक्ति करनी है। कम से कम एक तो हर जगह होगा। जहाँ अधिक संख्या में सदस्य हैं वहाँ तीन जहाँ बहुत अधिक सदस्य हैं वहाँ पाँच तक का एक प्रतिनिधि मण्डल रह सकेगा
चान्द्रायणव्रत की तपश्चर्या एवं संजीवन विद्या की शिक्षा, दोनों का सम्मिश्रित स्वरूप जिन शिविरों में सम्मिलित रहता है उनका लाभ ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सौभाग्यशाली सदस्य प्राप्त कर रहे हैं। जो इन शिविरों में रहकर गये हैं, उनके परिवर्तित एवं विकसित जीवन-क्रम को देखकर अन्य अनेकों के मन में भी वैसी ही आकाँक्षा जग रही है। तपोभूमि में ठहरने एवं प्रवचनों के लिए स्वल्प स्थान होने के कारण आश्विन शिविर में 50 व्यक्तियों को आने की स्वीकृति दी गई थी पर वह रोकते-रोकते भी 75 हो गई और धीरे-धीरे वह संख्या 100 से ऊपर निकल गई
जो प्रेरणायें परिवार को दी गई हैं उन्हें किस प्रकार कार्यान्वित किया जा रहा है, या किया जाना चाहिए, उसका व्यावहारिक स्वरूप प्रस्तुत पाक्षिक पत्रिका से ही सामने आता है। जो विचार ‘अखण्ड-ज्योति’ द्वारा दिये जा रहे हैं उन्हें कहाँ किस प्रकार किसने, कब, किसको कार्यान्वित किया और उसके क्या परिणाम निकले, उसकी जानकारी हम सब को होनी ही चाहिए। अपने निजी परिवार के बारे में हमें जितनी दिलचस्पी रहती है उतनी ही इस धर्म परिवार के बारे में भी रहनी चाहिए। अन्यथा संकीर्णता के दायरे में सीमाबद्ध रहने का, समाज विमुख स्वार्थी होने का दोष अपने ऊपर आवेगा
अध्यात्म को हमने सदा उदारता, सेवा और प्रस्ताव की कसौटी से कसा है और स्वार्थी को खोटा एवं परमार्थी को खरा कहा है। अखण्ड-ज्योति परिवार में दोनों ही प्रकार के खरे-खोटे लोग मौजूद हैं। अब इनमें से उन खरे लोगों की तलाश की जा रही है जो हमारे हाथ में लगी हुई मशाल को जलाये रखने में अपना हाथ लगा सकें, हमारे कंधे पर लदे हुए बोझ को हलका करने में अपना कंधा लगा सकें। ऐसे ही लोग हमारे प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी होंगे
बेशक ‘अखण्ड-ज्योति’ पीढ़ियों तक संग्रह करने की चिरस्थायी वस्तु है। उसका प्रत्येक अंक एक पुस्तक है जो सैंकड़ों वर्षों तक बेटे पोतों के लिये भी संजोकर रखी जानी चाहिए। मासिक पत्रिका के सम्बन्ध में यह बात नहीं कही जा सकती क्योंकि वह सामाजिक है
आजकल हम ऐसे ही अपने प्राणवान् उत्तराधिकारी ढूँढ़ने में लगे हैं। जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य हैं उन सभी स्थानों में अपने प्रतिनिधि नियुक्त करना चाहते हैं। इन प्रतिनिधियों पर युग-निर्माण के अनुरूप चेतना उत्पन्न करते रहने का उत्तरदायित्व रहेगा। हमारे जीवन का बाह्य कार्यक्रम भी यही रहा है
जो साधन सम्पन्न हैं, वे अकेले ही वार्षिक चन्दा का छः रुपया भेजकर उसे मँगाने एवं अन्य सदस्यों तक उसे पहुँचाने का श्रेय लाभ कर सकते हैं। तरीका जो भी हो हर नगर में जहाँ ‘अखण्ड-ज्योति’ पहुँचती है वहाँ युग पत्रिका का पहुँचना भी आवश्यक है। जहाँ अभी तक व्यवस्था नहीं है। वहाँ अखण्ड ज्योति पत्रिका पहुंचाने की व्यवस्था कर ली जानी चाहिये
गत अंक में शिविरों के कार्यक्रम में परिवर्तन की सूचना छपी थी। लगातार हर महीने शिविर चलाने की बात तो आवश्यक है क्योंकि ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के 30 हजार सदस्यों को अगले 7 वर्ष में इस शिक्षा एवं तपश्चर्या का लाभ देने एक महीने अपने सान्निध्य में रखने की हमारी अभिलाषा है। उसकी पूर्ति लगातार हर महीने शिविर चलाकर ही की जा सकती है। पर इन दिनों समुचित व्यवस्था न बन पड़ने के कारण उस क्रम में हेर-फेर करने को विवश होना पड़ा है
चार मास का स्वल्प समय ही अभी उसे निकलते हुए हुआ कि उसकी चर्चा चारों ओर फैली। इस थोड़ी अवधि में उसके जितने ग्राहक बने हैं उतने ‘अखण्ड-ज्योति’ के अपने आरम्भिक जीवन में दस वर्ष के लगातार प्रयत्न के बाद बन पाये थे। ऐसा सुन्दर, सुसंपादित, विविध विषय विभूषित सस्ता पाक्षिक अब तक हिन्दी में नहीं निकला ऐसा लोगों को कहना है। जिस आदर्श और उद्देश्य को लेकर यह प्रयास आरम्भ हुआ है उसकी विचारशील क्षेत्र में एक स्वर से भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है
इन दिनों उसका अन्तिम निराकरण होने जा रहा है। हमने अपने लोक सेवा कार्य काल के ‘अखण्ड-ज्योति’ के जीवन के पच्चीस वर्ष पूरे करते ही यह कदम उठाया है कि अपने सहयोगी विशिष्ट कार्यकर्ताओं की अन्तरंग गोष्ठी अलग से विनिर्मित करना आरम्भ कर दें और जो परिपक्व लोग हों उनके कन्धों पर वह सब कुछ सौंपना आरम्भ करदें जो आज हमें करना है। प्रश्न केवल कुपात्र की परख का है। सो उसके लिए आरम्भिक जाँच की जा रही है
वहाँ अखण्ड ज्योति पत्रिका पहुंचाने की व्यवस्था कर ली जानी चाहिये। ‘अखण्ड-ज्योति’ का नये वर्ष का चंदा भेजते समय साथ ही ‘युग-निर्माण’का चन्दा भेजने की बात का भी स्मरण रक्खा जाना चाहिए। पत्रिका के नये ग्राहक बढ़ाते समय युग-निर्माण की भी पाठक संख्या बढ़ती रहे, ऐसी चेष्टा करते रहना चाहिए
दूसरे शब्दों में इसे ‘उत्तराधिकार घोषणा’ भी कह सकते हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ के जीवन के पच्चीस वर्ष इसी दिसम्बर में पूरे हो रहे हैं। रजत-जयन्ती की शानदार अवधि उसने पूरी कर ली। अब वह स्वर्ण-जयन्ती वाले दूसरे अध्याय में प्रवेश करती है
धर्म प्रचार करते हुए—जन-जागरण का शंख बजाते हुए—’अखण्ड-ज्योति’ को पूरे पच्चीस वर्ष बीत गये। इस अंक के साथ ‘अखण्ड-ज्योति’ अपने जीवन-काल के पूरे पच्चीस वर्ष समाप्त करती है
इन दिनों जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ जाती है उन स्थानों में हम अपने प्रतिनिधि नियुक्त कर रहे हैं। एक प्रधान प्रतिनिधि और दो सहायक प्रतिनिधि होने से तीन व्यक्तियों की वह मण्डली पर्याप्त हो सकती है। जहाँ अधिक सक्रिय लोग है, वहाँ यह संख्या पाँच तक भी बढ़ सकती है
‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रत्येक सदस्य को इसे पढ़ना चाहिए। ताकि उसे अपने परिवार द्वारा चल रही महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों की जानकारी रह सके। जो प्रेरणायें परिवार को दी गई हैं उन्हें किस प्रकार कार्यान्वित किया जा रहा है, या किया जाना चाहिए, उसका व्यावहारिक स्वरूप प्रस्तुत पाक्षिक पत्रिका से ही सामने आता है
इस प्रयोजन के लिए ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों से आवश्यक पूछ-ताछ आरम्भ कर दी है। अलग से परिपत्र भेजकर यह मालूम किया जा रहा है कि किस स्थान पर किन्हें प्रतिनिधि नियुक्त किया जाय। जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ पहुँचती होगी वहाँ हमें अपने प्रतिनिधियों की नियुक्ति करनी है
अन्यथा संकीर्णता के दायरे में सीमाबद्ध रहने का, समाज विमुख स्वार्थी होने का दोष अपने ऊपर आवेगा। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना कम-से-कम अपने धर्म परिवार ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार तक तो बढ़ानी ही चाहिए। और उसकी उन्नति अवनति के सम्बन्ध में, क्रिया प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में दिलचस्पी भी लेनी ही चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-January
(4) हिन्दी भाषी लोगों तक ही ‘अखण्ड-ज्योति’ की आवाज सीमित रहे तो 46 करोड़ आबादी के 14 भाषा-भाषी भारत में युग-निर्माण की आवाज कैसे पहुँचेगी? और उन कार्यक्रमों का आयोजन कैसे संभव होगा? इसलिये भारत की अन्य भाषाओं में ‘अखण्ड-ज्योति’ के संस्करण प्रकाशित होने आवश्यक हैं। मैं यह प्रयत्न करूंगा कि गुजराती, मराठी, बंगला और अँग्रेजी भाषाओं के संस्करण जल्दी ही सामने आवें। इसके लिये सेवाभावी अनुवादकों तथा अपने क्षेत्र में कुछ ग्राहक बना सकने की क्षमता वाले लोगों को विशेष रूप से प्रेरणा दूँगा, ताकि यह कठिन कार्य सरल हो सके
प्रतिदिन तीन चार व्यक्तियों से मिल लेता हूँ। अपना तथा अपनी योजना का परिचय देने के बाद ‘अखण्ड-ज्योति’ की युग-परिवर्तन करने वाली विचारधारा का परिचय देता हूँ, जो प्रभावित होते हैं उन्हें पत्रिका का एकाध लेख तथा स्थल पढ़ने के लिए देता हूं और कहता हूँ कि यदि आप को रुचिकर होगी तो स्वतः आपके घर आकर उसे पढ़ने देने तथा लेने आया करूंगा। इसके लिए आपको कुछ भी खर्च न करना पड़ेगा
तारीख 13 से तक 7 दिन ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य बढ़ाने के लिए तीन-तीन व्यक्ति यों की दस टोली बना दी गई हैं। प्रत्येक टोली ने प्रतिज्ञा की है कि वह रजत -जयंती के पच्चीसवें वर्ष के उपलक्ष में 25 ग्राहक अवश्य बनाएंगी देंगी। इस प्रकार 10 टोलियों द्वारा 250 सदस्य बन जाना निश्चित है
‘अखण्ड-ज्योति’ की रजत-जयन्ती का शुभ अवसर उसके प्रत्येक पाठक के लिये हर्ष, गर्व, और गौरव का दिन हैं। जिस प्रकाश प्रेरणा को पाकर हम में से हजारों लाखों ने अपनी जीवन दिशायें निर्माण की हैं, अस्त-व्यस्त गतिविधियों को छोड़ कर महापुरुषों के पद-चिन्हों पर चल सकने का बल प्राप्त किया है वह अवलम्बन दैवी वरदान की तरह ही हमारे लिये उपयोगी सिद्ध हुआ है
दिसम्बर अंक में रजत जयन्ती का कार्यक्रम पढ़ा, और तुरन्त ही सत्संग में इस विषय पर चर्चा हुई तो हम सबने अपनी ज्ञान-माता ‘अखण्ड-ज्योति’ की शान के अनुरूप वसन्त-पंचमी के दिन एक प्रभावशाली उत्सव मनाने का निश्चय कर डाला। उसकी तैयारी की योजना बनी और कार्य विभाजन हो गया। जो पाँच बातें जयन्ती के सम्बन्ध में कही गई हैं उनके लिये हम में से प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग यह विचार कर रहा है कि वह इस दिशा व्यक्ति गत रूप से क्या करे? दस दिन में सब लोग अपना निश्चय कर लेंगे तब उनके संकल्पों का सम्मिलित स्वरूप बनाकर एक सुव्यवस्थित योजना बनाई जायगी और इस आधार पर हम सन् 64 के रजत-जयन्ती वर्ष का कार्यक्रम निर्धारित करेंगे
(6) ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के जो भी लोग मिलेंगे उन्हें समयदान देते रहकर युग-निर्माण जैसी महान योजना में भागीदार बनने के लिये कहूँगा। इस विचारधारा को व्यापक बनाने के लिये ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों की संख्या बढ़ाना आवश्यक है साथ ही यह और भी महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक अंक को कई-कई अशिक्षित सुनें और कई-कई शिक्षित पढ़े। समय दान देने वाले सदस्य सबसे पहले इसी कार्य को हाथ में लें और योजना का क्षेत्र बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहें। आचार्यजी अपना प्रशिक्षण इस वर्ष लाख व्यक्तियों तक विस्तृत करना चाहते हैं, यह संख्या अधूरी न रहने पावे इसके लिये प्रयत्न से उन सब को तत्पर करूंगा, जो परिवार का तनिक भी उत्तरदायित्व अनुभव करते होंगे
हिन्दी भाषी चारों ही प्रान्त उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य-प्रदेश और राजस्थान मेरे भ्रमण क्षेत्र हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ का गत बीस वर्ष से पाठक हूँ। भ्रमण में भी किसी-न-किसी प्रकार उसे प्राप्त कर ही लेता हूँ
आज नकली अध्यात्म अपनाने से सर्वत्र दुष्प्रवृत्तियाँ पनप रही हैं और बर्बादी के सरंजाम से जुटे हुए हैं। लोगों में कहूँगा कि असली अध्यात्म का सच्चा स्वरूप समझने के लिये ‘अखण्ड-ज्योति’ पढ़ा करें और अध्यात्म को व्यावहारिक जीवन में उतारते हुए स्वर्गीय जीवन का मार्गदर्शन प्राप्त करते रहें
प्राचीन काल के मंगलमय वातावरण को पुनः वापिस लाने के जिन पुण्य प्रयत्नों में अखण्ड-ज्योति संलग्न है उनका प्रमुख आधार अध्यात्म ही है। सतयुग में मनुष्य को अगणित सुख सुविधाएं प्राप्त थी, उसकी शक्ति सामर्थ्य प्रत्येक दिशा में बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। इस सुयोग का कारण और कुछ नहीं केवल एक ही था-जीवन का अध्यात्म प्रेरणा से अनुप्राणित एवं प्रेरित होना
इस वर्ष मैंने अपने निजी पैसे से 10 प्रतियाँ ‘अखण्ड-ज्योति’ की अपने नाम से मँगानी आरम्भ कर दी हैं। आते ही इन पर जिल्द चढ़ा लेता हूँ और थैले में भर कर जन संपर्क के लिए धर्म फेरी पर निकलता हूँ। नगर के धार्मिक वृत्ति के शिक्षित व्यक्तियों के नाम तलाश करके अपनी डायरी में नोट कर लिए हैं
(7) ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी पत्नी समेत कम से कम एक महीना आचार्यजी के सान्निध्य में संजीवन विद्या का प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा। अभी नहीं तो कुछ दिन बाद प्रत्येक सदस्य को इसका निमंत्रण मिलेगा। इस शिक्षण में कितने ही जीवन विद्या के ज्ञान-सुयोग्य एवं वयोवृद्ध शिक्षकों की आवश्यकता होगी
पर अच्छा यही है कि अपने स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की समग्र परिशुद्धि की दृष्टि से किसी अनुभवी व्यक्ति के सान्निध्य में ही उसे किया जाय। अखण्ड-ज्योति के अगले अंकों में चान्द्रायणव्रत सम्बन्धी पेचीदगियों का वर्णन किया जायगा जिसे पूरी तरह समझ लेने के उपरान्त ही किसी को अपने आप करने की बात सोचनी चाहिए। लाभ की बात सोचकर अविधिपूर्वक कदम उठाने लगने की जल्दबाजी कई बार अहितकर भी सिद्ध होती है। चान्द्रायण व्रत के साथ-साथ किया गया गायत्री अनुष्ठान सोने में सुगन्ध का काम करता है
इस संख्या में कोई कमी रही तो हम वर्तमान सदस्य अपने पास से पैसा देकर किन्हीं सार्वजनिक संस्थाओं, लोकसेवकों, या अपने मित्रों को पत्रिका चालू करावेंगे। ‘अखण्ड-ज्योति’ का विस्तार हमारे सत्संकल्प की सफलता का एक मात्र आधार है। आचार्य जी ने संजीवन विद्या के शिक्षण करने को एक लाख छात्र माँगे हैं तो उनका एक भाग हमें भी पूरा करना ही चाहिए था। 250 की संख्या बड़ी नहीं है
‘अखण्ड-ज्योति’ की आचार्य जी की, साधना के अखण्ड घृत-दीप की प्रतीक पूजा इसी दिन स्थापित हुई थी। ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका भी उन्होंने इसी दिन निकाली
(6) ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के जो भी लोग मिलेंगे उन्हें समयदान देते रहकर युग-निर्माण जैसी महान योजना में भागीदार बनने के लिये कहूँगा। इस विचारधारा को व्यापक बनाने के लिये ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों की संख्या बढ़ाना आवश्यक है साथ ही यह और भी महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक अंक को कई-कई अशिक्षित सुनें और कई-कई शिक्षित पढ़े। समय दान देने वाले सदस्य सबसे पहले इसी कार्य को हाथ में लें और योजना का क्षेत्र बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहें
‘अखण्ड-ज्योति’ हमारी माता है उसने अपना ज्ञान और स्नेह पिलाकर हमें क्या से क्या दिया इसका मूल्याँकन करते हैं तो कृतज्ञता से अन्तरात्मा पुलकित हो उठती है। यहाँ हम 32 व्यक्ति ‘अखण्ड-ज्योति’ मँगाते हैं। सभी परस्पर परिचित हैं और समय-समय पर सामूहिक आयोजन भी करते रहते हैं। दिसम्बर का अंक पढ़ते ही सबका मन अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए आकुल हो उठा
उत्सव आयोजन पर गहरी दृष्टि डालने से हम लोग समझ गये कि यह युग-निर्माण आन्दोलन को प्रगति देने का निमित्त मात्र है। ‘अखण्ड-ज्योति’ का हर दिन दिवाली है। उसका प्रत्येक अंक हर्षोत्सव जैसा है। उसका स्वागत या अभिनन्दन उसकी लक्ष्य पूर्ति द्वारा ही संभव भी है
रजत जयन्ती का कार्यक्रम अखण्ड-ज्योति में पढ़कर हम लोगों के हर्ष का पारावार न रहा। ‘अखण्ड-ज्योति’ हमारी माता है उसने अपना ज्ञान और स्नेह पिलाकर हमें क्या से क्या दिया इसका मूल्याँकन करते हैं तो कृतज्ञता से अन्तरात्मा पुलकित हो उठती है। यहाँ हम 32 व्यक्ति ‘अखण्ड-ज्योति’ मँगाते हैं। सभी परस्पर परिचित हैं और समय-समय पर सामूहिक आयोजन भी करते रहते हैं
अब की बार रजत-जयन्ती मनाये जाने का ऐतिहासिक सुअवसर भी इसी तिथि को मनाया जा रहा है यह कितने आनन्द की बात है। हमारे नगर में लगभग 50 ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य हैं। दिसम्बर के अंक में जब रजत-जयन्ती मनाने का पंचसूत्री कार्यक्रम छपा तो सभी का मन-मयूर नाचने लगा। यों एक व्यक्ति को पचासों के नाम और स्थान मालूम न थे पर एक ने दूसरे से पता लगा कर लगभग सभी को तलाश कर लिया और ता.10 दिसम्बर को एक मीटिंग विल्वेश्वर महादेव के मन्दिर पर बुलाई गई
रजत जयन्ती का कार्यक्रम अखण्ड-ज्योति में पढ़कर हम लोगों के हर्ष का पारावार न रहा। ‘अखण्ड-ज्योति’ हमारी माता है उसने अपना ज्ञान और स्नेह पिलाकर हमें क्या से क्या दिया इसका मूल्याँकन करते हैं तो कृतज्ञता से अन्तरात्मा पुलकित हो उठती है। यहाँ हम 32 व्यक्ति ‘अखण्ड-ज्योति’ मँगाते हैं
इसलिए जातीय सभाओं के संगठन की भारी आवश्यकता है। अगले वर्ष आचार्यजी ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों में से छाँट कर 100 जातीय सभाओं का संगठन उन्हीं लोगों द्वारा आरंभ करने वाले हैं, उस विस्तृत योजना के लिए मैं अभी से हिन्दी भाषा-भाषी प्रान्तों में पूर्व भूमिका तैयार करूंगा
उद्देश्य ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यगण मिलकर प्रत्येक रविवार को साप्ताहिक सत्संग चलाते हैं—सदस्यों का जन्मदिन जब होता है तब उनके घरों पर हवन एवं पारिवारिक सत्संग का आयोजन चलता है। इस प्रकार परस्पर मिल-जुलकर आत्मीयता बढ़ाने और विचार विनिमय करने के बार-बार अवसर प्राप्त होते रहते हैं। कुछ वर्ष पूर्व भी यहाँ हवन, जप, कीर्तन आदि के माध्यम से सत्संग होते थे, पर उन लोगों में अधिकाँश अन्धविश्वासी और अविकसित मनोभूमि के लोग थे
रेलवे की नौकरी से रिटायर्ड होकर जब गत वर्ष स्थायी रूप से घर वापिस आया तो तलाश किया कि इस नगर में कोई और भी ‘अखण्ड-ज्योति’ का ग्राहक है या नहीं? पता चला कि मैं अकेला ही हूँ। गत गुरु पूर्णिमा पर युग-निर्माण योजना का उद्घाटन हुआ तो जी में आया कि मेरे पास समय तो रहता ही है, क्यों न इस नगर में इस महान कार्य में संलग्न होकर देश, धर्म और अध्यात्म की सेवा करता हुआ जीवन को सार्थक बनाऊँ?
इस पर्व का धर्म, संस्कृति, एवं मानवता के भविष्य निर्माण की दृष्टि से भारी महत्व है। फिर ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों के लिये तो वह व्यक्तिगत आनंद का सबसे अधिक महत्वपूर्ण अवसर है। पच्चीस वर्ष की रजत-जयंती पर जो हम लोग मौजूद हैं, उनमें से आधे भी स्वर्ण जयंती मनाने के लिये जीवित न रहेंगे। इस प्रकार हम में से अधिकाँश के जीवन में ऐसा अवसर दुबारा आने वाला नहीं है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-June
यह जीवन्त प्रेरणा ऐसी सशक्त है कि जिसके भी भीतर प्रवेश करेगी, उसे उस दिशा में चलने के लिए भी विवश करेगी। किताबों और अखबारों को जिस हलके दृष्टिकोण से पढ़ा जाता है और समयक्षेप एवं मनोरंजन करके उन्हें एक कौने में रख दिया जाता है वह बात अखण्ड-ज्योति के लिए लागू नहीं हो सकती। इन पंक्तियों को एक विशेष मनोभूमिका के साथ लिखा जाता है, अतएव उनका प्रभाव भी वैसा ही पड़ता है। यह विश्वास करने योग्य तथ्य है कि इस पत्रिका को नियमित रूप से पढ़ने वाले पाठकों में से हजारों नहीं लाखों ने अपने जीवन क्रम में आश्चर्यजनक परिवर्तन होते देखा है
इस महीने हम प्रत्येक अखण्ड-ज्योति सदस्य से यह आशा करेंगे कि वह एक से दस की संगठन पद्धति के अनुसार संगठित हो जाय। दस पीछे एक शाखा संचालन चुन लिया जाए, नियुक्ति हो जाय या कोई कर्मठ कार्य-कर्ता स्वतः ही करने लगे। जिस नगर में अधिक सदस्य है वहाँ भी इसी पद्धति से वर्गीकरण कर लिये जाय और इन शाखा संचालकों का हर नगर में एक संगठन बना रहे
यह प्रशिक्षण प्राप्त किये बिना जो लोग गृहस्थ बसा लेते हैं वे किसी प्रकार रोते झींकते ही जिन्दगी के दिन पूरे करते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों की यह कठिनाई हल करने के लिए यह एक महीने का गृहस्थ प्रशिक्षण इतना उपयोगी सिद्ध होगा, कि जो भी इस का लाभ उठावेंगे वे अपना एक महीने का समय तथा मार्ग व्यय आदि का खर्च निरर्थक गया है ऐसा अनुभव कदापि न करेंगे
वस्तुतः बात भी ऐसी ही है। जो कुछ कहना है वह हम अखण्ड-ज्योति के माध्यम से पाठकों को घर बैठे पहुँचाते ही रहते हैं, अब जो शेष है कि वह यह है कि उनके उत्कृष्ट विचारों को कार्यान्वित करने में परिजन जो कठिनाई अनुभव करते हैं उसे हल करने में क्रियात्मक मार्ग दर्शन एवं सहयोग दिया जाय। इसके लिए व्यक्तिगत संपर्क एवं सान्निध्य अपेक्षित था। त्रिविध प्रशिक्षण में उसी की व्यवस्था की गई है
यह विचार केवल विचार बनकर नहीं रह सकते, उन्हें व्यवहार क्रम में प्रत्यक्ष किये बिना किसी पाठक को चैन नहीं पड़ सकता। आज की गई गुजरी परिस्थितियों और दूषित वातावरण में भी नवजीवन संचार के लिए दृष्टिकोण के परिष्कार के लिए सच्चरित्रता और सज्जनता को विकसित करने के लिए अखण्ड-ज्योति से जितना कार्य किया है, उतना शायद ही अन्य किसी माध्यम से हुआ है। इसे अत्युक्ति नहीं, वरन् एक सुनिश्चित तथ्य ही मानना चाहिए
तभी किसी घर में पत्रिका का पहुँचना सार्थक है। किसी के दबाव से चंदा तो दे दिया पर पत्रिका को रद्दी में पटक दिया तो इससे अपना घाटा सह कर अपनी अन्तरात्मा का रस निचोड़ कर इतना उपयोगी आध्यात्मिक भोजन परोसने के पीछे हमारा जो उद्देश्य है वह कहाँ पूरा हुआ? सक्रिय कार्यकर्ता शाखा संचालकों का यह कर्त्तव्य है कि अपने समीपवर्ती दस अखण्ड-ज्योति सदस्यों के यहाँ समय-समय पर जाया करें और यह देखा करें कि उस परिवार के लोग उसे पढ़ने या सुनने का लाभ उठाते हैं या नहीं। यदि इस संबंध में शिथिलता दिखाई पड़े तो अपनी सारी बुद्धिमता इस बात में खर्च करनी चाहिए कि उन लोगों को इन विचारों के पढ़ने एवं सुनने में अभिरुचि तथा आकर्षण पैदा हो जाय। यदि यह सफलता मिल गई तो समझना चाहिए कि ‘शाखा संचालक’ ने अपने कर्त्तव्यों का एक बड़ा भाग पूरा कर लिया
हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति परिवार का जून के अन्त तक इस पद्धति से वर्गीकरण हो जाय। दस सदस्यों से संपर्क बनाये रहने का कार्य एक सक्रिय कार्यकर्ता अपने जिम्मे ले लें। दो सक्रिय कार्यकर्ता अपने संबंधित सदस्यों की बीस अखण्ड-ज्योतियाँ अपने नाम रेल या डाक से मंगा लिया करें और हर महीने उनके घर देने जाया करें
अखण्ड-ज्योति के माध्यम से अध्यात्मवाद के उत्कृष्ट सिद्धाँतों को जन-मानस तक पहुँचाने और आदर्श जीवन बनाने की प्रेरणा जिन लोगों को उपलब्ध होती है वे अपने में प्रत्यक्ष परिवर्तन अनुभव करते हैं। यह जीवन्त प्रेरणा ऐसी सशक्त है कि जिसके भी भीतर प्रवेश करेगी, उसे उस दिशा में चलने के लिए भी विवश करेगी। किताबों और अखबारों को जिस हलके दृष्टिकोण से पढ़ा जाता है और समयक्षेप एवं मनोरंजन करके उन्हें एक कौने में रख दिया जाता है वह बात अखण्ड-ज्योति के लिए लागू नहीं हो सकती
ऐसा सेवा कार्य ईश्वर उपासना या आत्मकल्याण की साधना में किसी भी प्रकार कम नहीं है। जिसने यह आदर्श स्वीकार कर लिया है और जो लोक-सेवा का परमार्थ करने के लिए घर से बाहर भी कुछ समय देने लगे हैं उन्हें अखण्ड-ज्योति परिवार का ‘शाखा संचालक’ कहा जाता है
दो अठन्नियों से मिलकर भी एक रुपया बन सकता है। हम आदर्श जीवन की प्रेरणाएं अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में लपेट कर भेजते हैं उन्हें पाठकों के गले उतारना शाखा संचालक अपने जिम्मे ले लें तो यह हम दोनों का मिला−जुला प्रयत्न प्राचीन काल के धर्म पुरोहितों जैसी आवश्यकता पूर्ण कर सकता है
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को युग निर्माण के लिए कुछ ‘समय दान’ नित्य नियमित रूप में करते रहने का आह्वान किया है। अधिक व्यस्त और संकोची स्वभाव के व्यक्तियों को भी इतना तो करना ही पड़ता है कि अपने निज के व्यक्तित्व और परिवार को सुविकसित करने के लिए कुछ समय नियमित रूप में लगाया करें। साधना, स्वाध्याय, व्यायाम आदि द्वारा आत्म-विकास करें और एक घंटा नित्य अपने परिवार को सुशिक्षित एवं विचारशील बनाने के लिए गोष्ठी का कार्यक्रम चलाया करें
साधना, स्वाध्याय, व्यायाम आदि द्वारा आत्म-विकास करें और एक घंटा नित्य अपने परिवार को सुशिक्षित एवं विचारशील बनाने के लिए गोष्ठी का कार्यक्रम चलाया करें। घर का कोई वयस्क व्यक्ति ऐसा न बचे जो अखण्ड-ज्योति पढ़ता या सुनता न हो। घर के लोगों को और अपने को आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देते रहने की समाज-सेवा तो हर परिजन के जिम्मे आई है। इसे अधिकाँश सदस्य पूरा कर रहे हैं जिसने अभी शिथिलता बरती है उनसे जल्दी इस क्रम को आरंभ कर देने की आशा की जाती है
पीछे प्रयत्न करके और नये सदस्य भी बढ़ाये जा सकते हैं। जिन सज्जनों ने जिन्हें अखण्ड-ज्योति का ग्राहक बनाया है, वे तो सहज ही उनके शाखा-संचालक बन सकते हैं
अखण्ड-ज्योति परिवार में गत वर्ष की अपेक्षा सदस्य बहुत बढ़ गये हैं और गत वर्ष जो शिथिल थे उनमें से अनेकों में उत्साह भी बहुत बढ़ा है इसलिए गत वर्ष के सक्रिय कार्यकर्ताओं की अपेक्षा अब उनकी संख्या कहीं अधिक है। अपना नाम ‘शाखा संचालकों’ के रजिस्टर में बहुत लोग नोट करा चुके हैं, अब इसकी जरूरत नहीं, अब इस बात की आवश्यकता है कि जिनकी अन्तरात्मा में इस महान मिशन को सफल बनाने के लिए कुछ करने की प्रेरणा उठे वे उसे कार्यान्वित करने में तुरन्त ही लग पड़े। उस कार्य को ही किसी के ‘शाखा संचालक’ होने, न होने का प्रमाण माना जायेगा
हमारा मन है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के स्वजनों को जीवन का उत्कृष्ट बनाने वाला प्रशिक्षण हम स्वयं करें। उन्हें अपने व्यक्तिगत सान्निध्य में कुछ दिन रखें और अपने पास जो यत्किंचित् श्रेष्ठता है उसे उपहार की तरह दे सकने का प्रयत्न करें। अपनी इस कामना की पूर्ति से हमें जो सुख मिलेगा उसी के लिए त्रिविध प्रशिक्षण का निमंत्रण परिवार के प्रत्येक सदस्य के नाम भेजना है
सबसे पहला-सब से महत्वपूर्ण-सबसे आवश्यक कार्य एक ही है कि परिवार के व्रतधारी सक्रिय सदस्य-शाखा संचालक दस परिवार को प्रोत्साहन देते रहने का उत्तरदायित्व उठा लें। जो प्रशिक्षण अखण्ड-ज्योति द्वारा किया जा रहा है इसे जीवन्त बनाने के लिए हमारे व्यक्तिगत प्रतिनिधि की तरह उन शिक्षार्थियों के पास प्रेरणा देते रहने के लिए स्वयं जाना और मिलना आवश्यक है। विचारों के साथ-साथ जब व्यक्तित्व जुड़ा होता है तभी कुछ प्रयोजन सिद्ध होता है। अखण्ड-ज्योति पाठकों के पीछे एक प्रेरक व्यक्ति होना ही चाहिए
हर ‘अखण्ड-ज्योति’ कम से कम पाँच व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जानी चाहिए। जिस घर में वह पहुँचती है उसका एक भी वयस्क सदस्य ऐसा न बचे उसे पढ़ता या सुनता न हो। तभी किसी घर में पत्रिका का पहुँचना सार्थक है
प्रत्येक घर में औसतन पाँच वयस्क नर-नारी माने जायं तो दस घरों में पचास व्यक्ति ऐसे होने चाहिए जो अखण्ड-ज्योति की प्रेरणा को सुन और समझ सकें शाखा संचालक जिसने दस अखंड-ज्योति सदस्यों के परिवारों के साथ अपना व्यक्तिगत संबंध जोड़ते हुए इस विचारधारा को उस क्षेत्र से हृदयंगम कराने का लिया है, सरलता से पचास व्यक्तियों का प्रेरणा केन्द्र बना रह सकता है और समय-समय पर उन्हें आवश्यक परामर्श एवं प्रोत्साहन देकर उत्कृष्ट जीवन जीने के लिए प्रस्तुत कर सकता है। एक व्यक्ति दूसरे पचास व्यक्तियों को प्रकाश देने लगे तो इसे सामान्य नहीं असामान्य बात ही मानी जायेगी। इसे छोटी नहीं बड़ी वस्तु ही कहा जायेगा
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्ता को अपने लिए मार्ग दर्शन प्राप्त करने तथा जन-जीवन को सुविकसित करने के लिए जो रचनात्मक कार्य सारे देश भर में हो रहे हैं उन्हें जानने के लिए यह पत्र एक बड़ी आवश्यकता की पूर्ति करेगा। एक से दस पद्धति के अनुसार दस परिजनों को इसके पढ़ाये जाने से इसे संगठन कार्यक्रम का एक केन्द्र बिन्दु भी माना गया है
विचारों के साथ-साथ जब व्यक्तित्व जुड़ा होता है तभी कुछ प्रयोजन सिद्ध होता है। अखण्ड-ज्योति पाठकों के पीछे एक प्रेरक व्यक्ति होना ही चाहिए
दस सदस्यों से संपर्क बनाये रहने का कार्य एक सक्रिय कार्यकर्ता अपने जिम्मे ले लें। दो सक्रिय कार्यकर्ता अपने संबंधित सदस्यों की बीस अखण्ड-ज्योतियाँ अपने नाम रेल या डाक से मंगा लिया करें और हर महीने उनके घर देने जाया करें। इस प्रकार उन्हें एक बार तो अपने इस विचार परिवार से मिलने का विशेष अवसर मिल ही जाया करेगा। अंक खोने की शिकायतों से भी इस प्रकार सहज ही छुटकारा मिल जायेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-September
अपने मित्रों, स्वजनों को उपहार में भी भिजवाना चाहिए। यों अखण्ड-ज्योति के ग्राहक एक वर्ष से कम के लिए नहीं बनाये जाते पर इन दिनों उसमें यह ढील कर दी गई है कि जुलाई से दिसम्बर तक छह महीनों के लिए 2) रुपया भेज कर भी उसका ग्राहक बना जा सकता है
इन तीस हजार व्यक्तियों को सुसंगठित करना हमारा प्राथमिक एवं आधारभूत कार्य है। जहाँ, जितने अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं, उन्हें इकट्ठे होकर एक शाखा के रूप में परिणत हो जाना चाहिए और पाँच व्यक्तियों की एक कार्य समिति उन्हीं में से चुन लेनी चाहिए। उन्हीं में से एक शाखा संचालक चुना जाय। यह अनुरोध गत कई महीनों से किया जाता रहा है
प्रगति के इतने चरण जो शाखा पार कर लेगी, वह एक प्रचण्ड शक्ति के रूप में प्रकट होगी और आगे चलकर नव-निर्माण के महान अभियान में ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करेगी। अखण्ड-ज्योति के सदस्यों से गुरु पूर्णिमा की श्रद्धाँजलि के रूप में यही योजना की गई है। जिनमें कुछ जीवट हो वे इतना कर डालने के लिए उठ खड़े हों। कार्य बहुत सरल है
जिन्हें 4) रुपया देने कठिन पड़ते हैं, या उपहार में अधिक खर्च नहीं करना चाहते वे छह महीने के लिए भी ग्राहक बन या बना सकते हैं। रजत-जयन्ती वर्ष में अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए हममें से हर एक को उत्साह एवं भावनापूर्वक प्रयत्न करना चाहिए
जुलाई की अखण्ड-ज्योति में ‘जीवन- निर्माण का मासिक प्रशिक्षण’ और ‘गीता के माध्यम से जन - जागरण की शिक्षा’ शीर्षक दो लेखों में अखण्ड - ज्योति के पाठकों को मथुरा आने का आमन्त्रण दिया गया था। अगस्त अंक में इस सम्बन्ध में और भी अधिक स्पष्टीकरण किया जा चुका है। हर्ष की बात है कि इन दोनों निमन्त्रणों का परिजनों ने उत्साह - वर्धक स्वागत किया है और अपनी-अपनी सुविधा का समय देखकर इन प्रशिक्षणों में भाग लेने की स्वीकृतियाँ प्राप्त करके आने की तैयारी में लग रहे हैं
यह वर्ष अखण्ड-ज्योति की रजत-जयंती का वर्ष है। इसमें हर परिजन को कुछ नये ग्राहक बनाकर अपनी श्रद्धाँजलि अर्पित करनी है, जिनने अभी यह नहीं किया है, उन्हें अब कर लेना चाहिए। अपने मित्रों, स्वजनों को उपहार में भी भिजवाना चाहिए
युग-निर्माण योजना का प्रथम वर्ष ता॰ 24 जुलाई आषाढ़ गुरु पूर्णिमा- को पूरा हुआ और दूसरा आरम्भ हुआ। यह पुनीत पर्व अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य ने किसी- न -किसी रूप में मनाया। ऐसे कोई विरले ही बचे होंगे जिनने इस ओर उपेक्षा बरती हो। जहाँ कुछ अधिक सदस्य हैं, वहाँ सामूहिक आयोजन हुए और जहाँ उनकी संख्या एक - दो ही है वहाँ व्यक्तिगत रूप से गुरु पूजन के साथ-साथ योजना के अनुभव जीवन में डालने की तैयारी की गई
गुरुपूर्णिमा पर्व को जिस शान के साथ अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों ने देश भर में मनाया है उसके समाचार, ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक पत्रिका में संक्षिप्त रूप से छपेंगे ही। उन पर दृष्टिगत करने से कोई भी विचारशील व्यक्ति यह अनुमान भली प्रकार लगा सकेगा कि अपने छोटे से परिवार ने युग - निर्माण की दिशा में इस शुभ दिन से जिस उत्साह और लगन के साथ कदम बढ़ाये हैं उससे उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना स्पष्ट है। अभी एक वर्ष ही हुआ है
अखण्ड-ज्योति के सदस्यों को ही युग -निर्माण का सदस्य माना गया है। इन तीस हजार व्यक्तियों को सुसंगठित करना हमारा प्राथमिक एवं आधारभूत कार्य है। जहाँ, जितने अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं, उन्हें इकट्ठे होकर एक शाखा के रूप में परिणत हो जाना चाहिए और पाँच व्यक्तियों की एक कार्य समिति उन्हीं में से चुन लेनी चाहिए
संगठन के मूल में कोई दिशा, प्रेरणा, आस्था एवं कार्य पद्धति होनी चाहिये। ‘अखण्ड-ज्योति’ नियमित रूप से पढ़ने वालों की विचारधारा, आस्था, अभिरुचि एवं कार्य-प्रणाली एक विशेष दिशा में ढलती है, यह निश्चित है। इस पत्रिका के पृष्ठों पर जो ज्वलन्त प्रेरणाएँ बिखरी पड़ी रहती हैं वे पाठक की मनोभूमि पर एक गहरा प्रभाव डालती हैं यह अनुभव सिद्ध तत्व है। इस लिए युग -निर्माण जैसे महान् कार्य का शुभारम्भ करने के लिए सर्वप्रथम उन लोगों को लिया गया है जो इसके आवश्यक मनोभूमि उपलब्ध कर चुके हैं
यह अनुरोध गत कई महीनों से किया जाता रहा है। कितनी ही जगह संगठन बन भी गये हैं, पर अब यह आवश्यक समझा गया है कि जहाँ भी अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं, वहाँ इसी महीने संगठन कार्य पूरा कर लिया जाय। युग-निर्माण योजना का द्वितीय वर्ष आरम्भ होते ही पहला काम हमें यही पूरा कर लेना है। सन्तोष की बात है कि गुरु पूर्णिमा के दिन सैकड़ों स्थानों पर शाखाओं की विधिवत् स्थापना हो गई
जहाँ अभी तक इस प्रकार का संगठन नहीं बना है, वहाँ अब इस अगस्त मास में उसे पूरा कर लिया जाना चाहिए। इन पंक्तियों के द्वारा प्रत्येक अखण्ड-ज्योति परिजन से हमारा आग्रहपूर्वक अनुरोध है कि संगठन की उपेक्षा न की जाय। इस युग की सबसे बड़ी शक्ति संगठन है। जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं वे इसी महीने संगठन सूत्र में आबद्ध हो जायेंगे, ऐसी आशा है
व्यक्ति-निर्माण, समाज-निर्माण, युग-निर्माण की प्रेरणा लेकर अखण्ड-ज्योति का प्रकाश पिछले 25 वर्षों से चल रहा है। इसकी किरणें जिन पर भी पड़ी हैं उन्हें अन्धकार से छुटकारा पाने और अपने को आलोकित करने का अवसर मिला है। लाखों व्यक्तियों ने अपनी जीवन दिशा मोड़ी और संकीर्ण दायरे में कीड़े - मकोड़ों को जीवन जीने वाले देवत्व की परिधि स्पर्श कर सकने की स्थिति तक पहुँचे यह एक वास्तविकता है
इस युग की सबसे बड़ी शक्ति संगठन है। जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं वे इसी महीने संगठन सूत्र में आबद्ध हो जायेंगे, ऐसी आशा है
इस लिए युग -निर्माण जैसे महान् कार्य का शुभारम्भ करने के लिए सर्वप्रथम उन लोगों को लिया गया है जो इसके आवश्यक मनोभूमि उपलब्ध कर चुके हैं। अखण्ड-ज्योति के पाठकों को इसी श्रेणी के विशिष्ट व्यक्तियों में माना जा सकता है। अतएव इस महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए सर्व प्रथम उन्हें ही संगठित एवं शृंखलाबद्ध किया गया है
दोनों प्रकार के रचनात्मक और ध्वंसात्मक - कार्यक्रम जन-शक्ति के आधार पर ही सम्पन्न होंगे। अतएव हमारा प्रारम्भिक प्रयास यह है कि अपने छोटे से कुटुम्ब को- अखण्ड-ज्योति परिवार को - एक सुगठित संगठन के रूप में विकसित कर लिया जाय और फिर उन योजनाओं को इस छोटे क्षेत्र में प्रारम्भ किया जाय जिन्हें आगे चलकर देशव्यापी एवं विश्वव्यापी बनाना है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-October
अभी तो हमें गायत्री उपासना के उस उच्चस्तरीय-आत्मोन्नति के प्रयोजन से किये जाने वाले पञ्चकोशी साधना क्रम की ही चर्चा करनी है। गत तीन वर्षों से हर अक्टूबर मास की अखण्ड-ज्योति में एक वर्ष का साधना क्रम छापते रहे हैं। साधकों ने इस मार्ग पर चलते हुए आशातीत लाभ भी उठाया हैं। तीन वर्ष से चलते हुए उस साधना क्रम का यह चौथा वर्ष इस अक्टूबर मास से आरम्भ होना है
अखण्ड-ज्योति परिवार के सब सदस्यों को दस-दस सदस्यों के छोटे-छोटे संगठनों में संगठित कर देने का जो क्रम चलाया गया है, वह बहुत ही उपयोगी एवं आवश्यक है। प्रसन्नता की बात है कि सभी जगह उत्साही सदस्यों यह संगठन कार्य आरंभ कर दिया है। जहाँ अभी उस ओर ध्यान नहीं दिया गया है वहाँ तुरन्त ही अपना संगठन पूरा कर लिया जाना चाहिए
उस माध्यम से मनुष्य निश्चय ही अपनी बहुत आत्मोन्नति कर सकता है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों की गत पच्चीस वर्षों से यह प्रेरणा निरन्तर दी जाती रही है और प्रसन्नता की बात है कि उनमें से अधिकाँश इस सम्बल को अपने जीवन का आधार बना भी चुके हैं। जिन्होंने अभी इस मार्ग पर चलना आरम्भ नहीं किया है, उन्हें चाहिए कि अवलम्बन के एक परीक्षण के रूप में गायत्री उपासना आरम्भ करें और देखें कि उनके उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना उत्पन्न करने में कैसे आश्चर्यजनक ढंग से यह महान् उपासना सहायक होती है
अखण्ड-ज्योति जिस विचारधारा का प्रतिपादन सैद्धान्तिक रूप से करती है, उसका व्यावहारिक स्वरूप क्या हो सकता है, इसका क्रियात्मक मार्ग दर्शन करने के लिए ‘युगनिर्माण’ पाक्षिक पत्रिका निकाली गई है। परिवार के प्रत्येक सदस्य को यह दोनों ही पढ़नी चाहिएं ताकि अध्यात्मवाद के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों ही पक्ष समझने की आवश्यकता पूरी हो सके। एकांगी शिक्षण अधूरा रह जाता है
इन दिनों अखण्ड-ज्योति के जो नये ग्राहक बन रहे हैं, उन्हें छह महीने के लिए जुलाई से दिसम्बर तक के लिए ही बनाया जा रहा है। अस्तु छह महीने का चंदा 2) ही भेजना चाहिए। यों नियमानुसार एक वर्ष से कम के ग्राहक नहीं बनायें जाते, पर बीच में ग्राहक नहीं बनायें जाने पर बीच में ग्राहक बनने से नये वर्ष का हिसाब रखने में जो असुविधा होती है उसे देखते हुए इस वर्ष यह विशेष व्यवस्था की गई है
उनका उल्लेख यहाँ किया जाना अनावश्यक है। वह सब कुछ हम अपने गायत्री ग्रन्थों में लिख चुके हैं और समयानुसार अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर उसका विस्तृत विवेचन आगे चलकर फिर करेंगे। अभी तो हमें गायत्री उपासना के उस उच्चस्तरीय-आत्मोन्नति के प्रयोजन से किये जाने वाले पञ्चकोशी साधना क्रम की ही चर्चा करनी है। गत तीन वर्षों से हर अक्टूबर मास की अखण्ड-ज्योति में एक वर्ष का साधना क्रम छापते रहे हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-August
सब सदस्यों को इकट्ठे करके उन्हें ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के युग-निर्माण योजना की सदस्यता का—उत्तरदायित्व समझाना चाहिये। केवल पत्रिका मंगा लेना ही पर्याप्त नहीं वरन् उनके लिए यह भी आवश्यक है कि समय-समय पर इकट्ठे होने एवं मिल बैठ कर विचार विनिमय करते रहने में भी आवश्यक उत्साह रक्खें। परिवार के हर सदस्य को युग-निर्माण संगठन का एक अंग होकर रहना चाहिए
गत 24 जुलाई (गुरु पूर्णिमा) से युग-निर्माण आँदोलन का प्रथम वर्ष पूरा होकर द्वितीय वर्ष आरम्भ हुआ है। प्रथम वर्ष में इस महान विचारधाराओं का भारतवर्ष में ही नहीं, 17 अन्य देशों में भी, जहाँ अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, उत्साहवर्धक प्रसार हुआ है। इस सत्प्रयास का विचारशील क्षेत्रों में सर्वत्र जैसा आशाजनक स्वागत हुआ है, उसे देखते हुए स्पष्ट है कि यह युग की पुकार—अनसुनी एवं उपेक्षित नहीं रह सकती। जिस दिव्य प्रेरणा के आधार पर इस पुण्य प्रकाश का अवतरण हुआ है उसकी सामर्थ्य को देखते हुए यह निश्चित है कि यह महान अभियान अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा करके रहेगा
उपरोक्त कार्यक्रमों को आवश्यक प्रगति मिल सके इसके लिए निताँत आवश्यक यह है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार का नियमित और व्यवस्थित स्वरूप एक सुसंगठित परिवार के रूप में बन जाय। यों इस संगठन को किसी सभा, सोसाइटी के ढंग से गठित करके पार्टीबन्दी और व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं का अखाड़ा नहीं बनने देना है। फिर भी जिस प्रकार हर कुटुम्ब अपने आप में एक व्यवस्थिति इकाई होता है उसी प्रकार हम भी एक संगठित इकाई के रूप में रहकर ही कुछ कहने लायक प्रगति कर सकेंगे
पिछले जुलाई अंग में इस संबंध में सर्वांगपूर्ण कार्यक्रम छपा है। जेष्ठ के शिविर में हुआ निश्चय अखण्ड-ज्योति परिवार का अगले वर्ष का कार्यक्रम है। उसे पूरा करने के लिए आवश्यक वातावरण बनाने के उद्देश्य से यह पाक्षिक निकालना पड़ा है। अखण्ड-ज्योति के पाठकों को उसे एक व्यावहारिक मार्ग दर्शन के रूप में अपनाना चाहिए
माना कि ऐसी प्रवृत्तियों को चलाने वाले कुछ ही लोग होते हैं और उन्हीं के प्रयत्न से सारा ढाँचा खड़ा रहता है फिर भी उन्हें संगठन के रूप में कार्य करते हुए सुविधा रहती है। यदि विचार निर्माण तक की ही बात होती तो उसे ‘अखण्ड-ज्योति’ के पृष्ठ भी एक हद तक पूरा कर सकते थे, पर चूँकि योजना के साथ-साथ अनेक—108 कार्यक्रम भी जुड़े हुए हैं, उन्हें अग्रगामी बनाने के लिए व्यक्तियों का प्रत्यक्ष सहयोग समय दान एवं संगठन ही सफल बना सकता है। इसलिये पिछले वर्ष बलपूर्वक यह अनुरोध किया जाता रहा कि जहाँ जिन नगरों, कस्बों और गाँवों में थोड़ी-थोड़ी भी ‘अखण्ड-ज्योति’ पहुँचती हो, वहाँ युग-निर्माण परिवार का नियमित संगठन बन जाना चाहिए
अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक ग्राहक को इसे मँगाना आवश्यक नहीं, पर पढ़ना आवश्यक है। कई सज्जन मिल जुलकर उसकी एक प्रति मँगा सकते हैं और एक-एक दिन एक-एक घर में पहुँचाने की व्यवस्था करके 10—15 सदस्य उससे लाभ उठा सकते हैं। अखण्ड-ज्योति पीढ़ियों तक संग्रह करने की वस्तु है, इसलिये उसे दो सगे भाई भी अलग-अलग मँगावें तो उचित है पर इस पाक्षिक के बारे में वैसी बात नहीं, इसे मिलजुल कर मँगाया जा सकता है
आशा है युग-निर्माण योजना पाक्षिक नियमित रूप से पढ़ने के लिए प्रत्येक अखण्ड-ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य इस महीने अपनी कोई व्यवस्था ठीक तरह बना लेगा। अखण्ड-ज्योति और ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक दोनों को एक दूसरे की पूरक होने से अपने महान मिशन की पूर्ति में आवश्यक योग-दान मिलेगा, ऐसा विश्वास है
हर जगह यह प्रयत्न होना चाहिए कि जहाँ ‘अखण्ड-ज्योति’ के जितने सदस्य हैं वे परस्पर इकट्ठे होकर एक कौटुम्बिक संगठन बना लें। बहुत स्थानों पर यह कार्य गुरु-पूर्णिमा के पुनीत पर्व पर पूर्ण कर लिया गया है। जहाँ अभी यह नहीं हुआ है वह इस अगस्त मास में पूरा कर लिया जाना चाहिए
उसे पूरा करने के लिए आवश्यक वातावरण बनाने के उद्देश्य से यह पाक्षिक निकालना पड़ा है। अखण्ड-ज्योति के पाठकों को उसे एक व्यावहारिक मार्ग दर्शन के रूप में अपनाना चाहिए
ज्येष्ठ के तीन शिविरों में आये हुए ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के विचारशील सक्रिय सदस्यों के परामर्श से अगले वर्ष के कार्यक्रम की रूप-रेखा निर्धारित कर ली गई है। जुलाई अंक में इसे विस्तारपूर्वक छाप भी दिया गया है। आत्म-निर्माण की जीवन साधना के लिए हम में से प्रत्येक को 10 कार्यक्रम अपनाने आरम्भ कर देने चाहिएं
जहाँ-जहाँ अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वहाँ उसके ग्राहकों का एक संगठन बन जाना आवश्यक है। इसे युग-निर्माण शाखा संगठन कहा जायगा। इस मास इस तरह के संगठन हर जगह बन जाने चाहिएं
गत अंक में जीवन निर्माण का मासिक प्रशिक्षण’ और गीता-माध्यम से जन-जागरण की शिक्षा” शीर्षक दो लेख छपे हैं। इन्हें ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों के लिये एक खुला निमन्त्रण समझा जाना चाहिये। दो आधारों पर स्वजनों को एक-एक महीना मथुरा आने के लिये आह्वान किया गया है। इन शिविरों में क्या सिखाया जायेगा यह स्पष्टीकरण उन पृष्ठों पर छप चुका है
यह कर्म स्वाध्याय और सत्संग से ही सम्भव है। ‘अखण्ड-ज्योति’ स्वाध्याय की सामग्री विनिर्मित करती है पर उसको हृदयंगम करने एवं मूर्तरूप मिलने का उद्देश्य तो सत्संग से ही संभव होगा। युग-निर्माण शाखाओं में सत्संग को मूर्तिमान ज्ञान मन्दिरों का रूप दिया जाना है जहाँ सदस्यगण एकत्रित होकर परस्पर एक दूसरे को प्रेरणा उत्साह एवं मार्ग-दर्शन प्रदान करते रह सकें
इसके लिए प्रगतिशील जातीय संगठनों की रचना आरम्भ करने के अतिरिक्त वर्तमान परिस्थितियों में और कोई मार्ग नहीं। ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों की संख्या बहुत बड़ी है। इन सदस्यों के प्रभाव में जो परिवार हैं, उनकी संख्या लाखों तक पहुँचती है। इन्हें प्रगतिशील जातीय संगठनों में संगठित करके आदर्शवादी दोनों पक्ष मिल सकना सरल हो सकता है
‘अखण्ड-ज्योति’ केवल प्रेरणा प्रस्तुत कर सकती है। फिर भी वह कागज के पन्नों का पुलिन्दा मात्र है। उसकी प्रेरणाओं को कौन व्यक्ति, किस प्रकार, कब, किस सीमा तक कार्यान्वित करे, और किस की शिथिलता कैसे दूर हो? किन परिस्थितियों में कहाँ क्या प्रगति संभव हो सकती है यह सब विचार करना व्यक्तियों का काम है और वे व्यक्ति संगठित शाखा के रूप में जब एकत्रित हों तभी कुछ काम बनेगा
यदि विचार निर्माण तक की ही बात होती तो उसे ‘अखण्ड-ज्योति’ के पृष्ठ भी एक हद तक पूरा कर सकते थे, पर चूँकि योजना के साथ-साथ अनेक—108 कार्यक्रम भी जुड़े हुए हैं, उन्हें अग्रगामी बनाने के लिए व्यक्तियों का प्रत्यक्ष सहयोग समय दान एवं संगठन ही सफल बना सकता है। इसलिये पिछले वर्ष बलपूर्वक यह अनुरोध किया जाता रहा कि जहाँ जिन नगरों, कस्बों और गाँवों में थोड़ी-थोड़ी भी ‘अखण्ड-ज्योति’ पहुँचती हो, वहाँ युग-निर्माण परिवार का नियमित संगठन बन जाना चाहिए
‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्य हमारे वैसे ही आत्मीय एवं निकटवर्ती हैं जैसे कि किसी पर- कुटुम्ब के सदस्य घनिष्ठ एवं निकटवर्ती होते हैं। अपने परिजनों तक जीवन को ऊँचा उठाने वाली प्रेरणायें एवं अनुभूतियाँ पहुँचाने की हमारी आन्तरिक अभिलाषा है। जो कुछ ‘उत्तम’ जाना है और जो कुछ ‘श्रेष्ठ’ इस जीवन में पाया है उसको अपने स्वजनों को दे जाने की इच्छा बहुत दिन से उठती रहती थी
कई सज्जन मिल जुलकर उसकी एक प्रति मँगा सकते हैं और एक-एक दिन एक-एक घर में पहुँचाने की व्यवस्था करके 10—15 सदस्य उससे लाभ उठा सकते हैं। अखण्ड-ज्योति पीढ़ियों तक संग्रह करने की वस्तु है, इसलिये उसे दो सगे भाई भी अलग-अलग मँगावें तो उचित है पर इस पाक्षिक के बारे में वैसी बात नहीं, इसे मिलजुल कर मँगाया जा सकता है। इसे जो अपने पैसे से मँगाये वे अपनी प्रति अन्य सदस्यों को पढ़ने दे सकते हैं। हर हालत में इतना तो होना ही चाहिए कि अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को किसी न किसी प्रकार यह पत्रिका पढ़ने को मिलती रहे
इसे जो अपने पैसे से मँगाये वे अपनी प्रति अन्य सदस्यों को पढ़ने दे सकते हैं। हर हालत में इतना तो होना ही चाहिए कि अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को किसी न किसी प्रकार यह पत्रिका पढ़ने को मिलती रहे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-July
यह ज्ञानदान किसी भी धर्म-कृत्य से कम महत्वपूर्ण नहीं। फिर हम अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य अपने युग-निर्माण संकल्प के अंतर्गत इस बात के लिये प्रतिज्ञाबद्ध भी हैं कि अपनी आजीविका का एक अंश युग-निर्माण कार्यों के लिये लगाते रहेंगे। योजना का प्रधान माध्यम विचार परिवर्तन ही होता है। इस प्रयोजन के लिए हमारी आजीविका का एक अंश लगना ही चाहिये
वास्तविक प्रभाव तो तभी पड़ता है जब अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करके किसी को प्रभावित किया जाय। चूँकि हमें नये समाज की, नये आदर्शों की, जन-मानस में प्रतिष्ठापना करनी है इसलिए यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य दूसरों के सामने अपना अनुकरणीय आदर्श रखें। प्रचार का यही श्रेष्ठ तरीका है। इस पद्धति को अपनाये बिना जन-मानस को उत्कृष्टता की दिशा में प्रभावित एवं प्रेरित किया जाना सम्भव नहीं
यदि यह प्रयत्न जारी रहे तो यह निश्चित है कि इन शिक्षार्थियों में से अनेकों प्रकाशवान् उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह चमकते हुए दृष्टिगोचर होंगे। पिछले पच्चीस वर्षों में अखण्ड-ज्योति आध्यात्मिक आदर्शों के प्रसार में लगी रही, अब वह समय आ गया है कि उन आदर्शों को व्यवहारिक जीवन में समाविष्ट करने के लिए एक आन्दोलन के रूप में कटिबद्ध हुआ जाय। यही शिविर उसी भावना से बुलाये गये थे। स्थिति को देखते हुए यह विश्वास किया जा सकता है कि वे पूर्ण सफल रहे
स्वयं का व्यक्तित्व यदि दूसरों को ऊँचा उठाने के उपयुक्त न हो, अपने को इतना प्राप्त न हो जो जहाँ यह सब मौजूद है उसके साथ सम्बद्ध करके भी दूसरों का भारी हितसाधन किया जा सकता है। अगले वर्ष यह कार्य अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य को पूरा करना है। एक भी पाठक ऐसा न हो तो अकेला ही अपनी पत्रिका पढ़कर उसे कूड़े में पटक देता हो। हममें से हर एक को यह व्रत लेना है कि उसकी पत्रिका से लाभ उठाने वालों की—पढ़ने या सुनने वालों की संख्या कम से कम दस होगी
अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जीवन-निर्माण का, व्यावहारिक आध्यात्म का—जो व्यापक प्रशिक्षण हो रहा है उसकी देश विदेश के असंख्य विचारकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यह सर्वथा सत्य है कि अखण्ड-ज्योति में प्रस्तुत विचार-धारा को अपना कर कोई भी व्यक्ति जीवन की समग्र प्रगति का द्वार प्रशस्त कर सकता है। हमें चाहिए कि अपनी अखण्ड-ज्योति को अपने घर के समस्त सदस्यों को पढ़ाने या सुनाने की व्यवस्था बना लें
इसलिये समय रहते उनके परिष्कार का उपाय किया जाय। इस प्रकार के उपायों में एक कारगर उपाय यह है कि उन्हें अखण्ड-ज्योति द्वारा प्रस्तुत विचारधारा को पढ़ने या सुनने में अभिरुचि उत्पन्न की जाय। अपने परिजनों के साथ इससे बड़ा उपकार दूसरा और कोई हो नहीं सकता कि वे सद्गुणी और सुसंस्कृत बनने की प्रेरणा प्राप्त करें। उनके भविष्य उज्ज्वल बनाने वाला यही श्रेष्ठ साधन है जो कोई अभिभावक आसानी से अपने परिवार के लिये प्रस्तुत कर सकता है
यह धर्मप्रचार-ज्ञानप्रसार, ब्रह्मदान जितना सरल है उतना ही महत्वपूर्ण भी है। हम तीस हजार अखण्ड-ज्योति के सदस्य इस प्रक्रिया को अपना कर कुछ ही महीनों में तीन लाख हो सकते हैं
अखण्ड-ज्योति परिवार के—युग-निर्माण योजना के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है कि उपरोक्त तीन पुण्य प्रक्रियाओं को अपने-अपने क्षेत्र में गतिशील बनाने के लिए, आन्दोलन का रूप देने के लिए प्रयास करे। संगठन की बड़ी शक्ति है। जहाँ अपने दस भी सच्चे कार्यकर्ता होंगे वहाँ यह आन्दोलन आशाजनक रूप से आगे बढ़ रहा होगा
उसकी पूर्ति इस महान् प्रयास के द्वारा संभव हो सकेगी ऐसी संभावना स्पष्ट दिखाई पड़ती है। अखण्ड-ज्योति परिवार ने इस आन्दोलन को आरम्भ करके एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व अपने कन्धे पर लिया है। आशा करनी चाहिये कि उसे वह ईश्वरीय सहायता मिलेगी जिसके आधार पर इस अभियान को प्रगति के पथ पर काफी दूर तक आगे बढ़ाया जा सके
प्रत्येक शाखा संचालन के पास इसका पहुँचना आवश्यक है। हर सक्रिय कार्यकर्ता का कर्तव्य है कि वह अपने नाम एक प्रति मंगाकर क्षेत्र के कम-से-कम दस अखण्ड-ज्योति पाठकों को उसे पढ़ा दे। एक भी परिजन ऐसा न बचे जिसे युग-निर्माण पत्रिका पढ़ने को न मिलती हो। इसे सब खरीदें यह आवश्यक नहीं पर पढ़ना तो इसे सभी को चाहिए
आत्म-शोधन के लिए दस प्रश्नों को रोज अपने आपसे पूछना और जो त्रुटियाँ परिलक्षित हों उन्हें क्रमशः किन्तु पूर्ण श्रद्धा और दृढ़ता के साथ सुधारने के लिये नित्य नियमित रूप से प्रयत्न करते रहना यह आध्यात्मिक उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रथम साधन है। अखण्ड-ज्योति परिवार के युग-निर्माण योजना के प्रत्येक सदस्य को अनिवार्य रूप से इसे आरम्भ कर देना है। दूसरा कार्यक्रम जो इतना ही महत्वपूर्ण है वह यह है कि सत्प्रवृत्तियों को केवल अपने तक ही सीमित करके सन्तोष न कर लिया जाय वरन् उन्हें व्यापक बनाने के लिये, अपने समीपवर्ती क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने के लिये सामर्थ्य भर प्रयत्न किया जाय। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि एक व्यक्ति कितना ही भला, कितना ही सज्जन, कितना ही आध्यात्मवादी क्यों न हो, यदि वह चारों ओर बुरे व्यक्तियों और बुरे वातावरण से घिरा होगा, तो अपनी शक्ति एवं सज्जनता को स्थिर न रख सकेगा जिसके स्त्री, पुत्र, भाई, बहिन, चाचा, ताई, भतीजे, दुष्ट प्रकृति के हों निरन्तर कलह और दुष्टता का वातावरण बनाए रहते हों तो वहाँ अपने आत्मिक प्रयोगों को पूरा कर सकना भी असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जायगा
उसी के आधार पर नये समाज की अभिनव रचना का उद्देश्य पूर्ण हो सकेगा। अखण्ड-ज्योति परिवार को यदि ठीक ढंग से संगठित कर लिया जाय तो प्रबुद्ध वर्ग का यह विशाल जन-समुदाय राष्ट्र की एक महती रचनात्मक शक्ति बन सकता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये इस अखण्ड ज्योति सदस्यों के संगठन को एक शाखा और उसके प्रमुख कार्यकर्ता को शाखा संचालक माने जाने की पद्धति बना दी गई है। इस प्रक्रिया के अनुसार आधे से अधिक सदस्य संगठित हो चुके हैं
यह सर्वथा सत्य है कि अखण्ड-ज्योति में प्रस्तुत विचार-धारा को अपना कर कोई भी व्यक्ति जीवन की समग्र प्रगति का द्वार प्रशस्त कर सकता है। हमें चाहिए कि अपनी अखण्ड-ज्योति को अपने घर के समस्त सदस्यों को पढ़ाने या सुनाने की व्यवस्था बना लें। परिवार के साथ ही हमें जीवन काटना है, यदि वे सुसंस्कृत नहीं बनते तो अपनी अवाँछनीय गतिविधियों के कारण स्वयं भी दुख पायेंगे और हमें भी उद्विग्न बनाये रहेंगे। इसलिये समय रहते उनके परिष्कार का उपाय किया जाय
अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जीवन-निर्माण का, व्यावहारिक आध्यात्म का—जो व्यापक प्रशिक्षण हो रहा है उसकी देश विदेश के असंख्य विचारकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यह सर्वथा सत्य है कि अखण्ड-ज्योति में प्रस्तुत विचार-धारा को अपना कर कोई भी व्यक्ति जीवन की समग्र प्रगति का द्वार प्रशस्त कर सकता है। हमें चाहिए कि अपनी अखण्ड-ज्योति को अपने घर के समस्त सदस्यों को पढ़ाने या सुनाने की व्यवस्था बना लें। परिवार के साथ ही हमें जीवन काटना है, यदि वे सुसंस्कृत नहीं बनते तो अपनी अवाँछनीय गतिविधियों के कारण स्वयं भी दुख पायेंगे और हमें भी उद्विग्न बनाये रहेंगे
अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को इन पंक्तियों द्वारा इस जीवन निर्माण की शिक्षा के लिए सादर-आमन्त्रण भेजते हैं। जिन्हें अपने लिए यह उपयुक्त लगे वे अपने आने के संबंध में पत्र व्यवहार द्वारा महीना निश्चित कर लें, क्योंकि शिक्षार्थी अधिक और व्यवस्था कम करने से क्रमशः ही स्थान मिल सकना सम्भव होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-May
इस प्रकार एक दूसरे के घर पहुँचाने का क्रम चलाते हुए परस्पर संगठन की इस विशेष कार्य पद्धति का आरंभ करेंगे। इस प्रकार दस अखण्ड-ज्योति ग्राहकों के पीछे एक पाक्षिक से काम चल जाया करेगा। ‘एक से दस’ की संगठन पद्धति इस प्रकार स्वयमेव चलने लगेगी
नौकरी पर दूर देशों में रहने वाले लोगों को वर्ष में एक बार तो अपने कुटुम्ब से मिलने घर जाने की छुट्टी मिलती है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों का एक घर वह है जहाँ वे रहते हैं पर दूसरा उनकी भाव प्रेरणा का केन्द्र मथुरा भी है, इसलिए यह भी उनका घर है। माता-पिता के घर की भाँति ही ‘गुरु गृह’ भी अपना ही होता है, वहाँ भी वर्ष में एक बार जाया जाय तो यह ठीक ही है
युग-निर्माण योजना के शत-सूत्री कार्यक्रमों को मूर्त देने के लिए अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को संगठित रूप में कुछ न कुछ प्रयत्न हर जगह करते ही जाना पड़ेगा। कहाँ, कौन किस प्रकार, क्या कितना कर सकता है, इसकी चर्चा यदि हम लोग परस्पर मिल जुल कर लें तो इससे कार्य की प्रगति में सहायता हो सकेगी। हममें से प्रत्येक को अपना व्यक्तिगत जीवन अधिक उत्कृष्ट बनाने के लिए, परिवार को सुसंस्कृत एवं विकसित करने के लिए, तथा अपने देश, धर्म समाज एवं संस्कृति को सजीव, तेजस्वी तथा सशक्त बनाने के लिए बहुत कुछ काम करना है
ऐसी दशा में घाटा सहकर पत्रिका चलाने और पाठकों के सुविकसित व्यक्तित्व को नर-नारायण बनाने का हमारा मनोरथ अधूरा ही रह जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि जो भी सज्जन अखण्ड-ज्योति मंगाते हैं एक लेख प्रतिदिन के हिसाब से पूरी श्रद्धा के साथ पठन करें और उनके घर का एक भी सदस्य ऐसा न बचे जो प्रशिक्षित होते हुए भी पढ़ता न हो। प्रयत्न यह होना चाहिए कि उस घर में जो अशिक्षित हो उन्हें पत्रिका घर के किसी शिक्षित द्वारा सुनने को मिल जाया करें
गत अंक में अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को यह खुला निमंत्रण भेजा गया है कि अपने परिवार समेत एक महीना मथुरा आकर हमारे पास रहें और जीवन-निर्माण की जो विचारधारा अखण्ड-ज्योति के माध्यम से दी जाती रहती है उसे कार्य रूप में परिणत करने, अभ्यास में लाने, जीवन में उतारने का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करें। स्वास्थ्य रक्षा, स्वभाव सुधार, दृष्टिकोण का परिष्कार, आर्थिक संतुलन, स्नेह सौहार्द, दांपत्ति निष्ठा, बच्चों के विकास, शिक्षा एवं विवाह की समस्या, पारस्परिक मनोमालिन्य एवं शत्रुता का निराकरण, उपासना तथा आत्म-कल्याण जैसी अगणित समस्यायें हमें घेरे रहती हैं और अपना उचित हल चाहती हैं। किन्तु जीवन विद्या के आधारभूत सिद्धांतों का समुचित ज्ञान न होने से हम इन्हें सुलझा नहीं पाते वरन् कई बार तो दिन-दिन इस तरह और उलझते चले जाते हैं कि जीवन नरक बन जाता है
(2) अखण्ड-ज्योति की पंक्तियाँ कलम, स्याही में नहीं वरन् हमारी अन्तरात्मा के आग पानी से लिखी जाती है उसे जो लोग ध्यानपूर्वक पढ़ते है उनके भीतर भी वे ही चिनगारियाँ उठना स्वाभाविक है जो कागज के पन्नों में लपेटकर हम यहाँ से भेजते हैं। पर कई नये ग्राहक जो किन्हीं दूसरों की बलात् प्रेरणा से इसी वर्ष सदस्य बने हैं, उसके महत्व से अपरिचित होने के कारण पढ़ने में आलस्य और उपेक्षा करते रहते हैं। ऐसी दशा में घाटा सहकर पत्रिका चलाने और पाठकों के सुविकसित व्यक्तित्व को नर-नारायण बनाने का हमारा मनोरथ अधूरा ही रह जाता है
अखण्ड-ज्योति परिवार के स्वजनों में से 25 किशोर छात्र लेकर यह प्रशिक्षण जल्दी ही आरंभ करेंगे। शिक्षा, छात्रावास आदि की कोई फीस न होगी। पर अपने भोजन वस्त्र का व्यय भार छात्रों को स्वयं ही उठाना पड़ेगा
अधिक दिनों के लिए पूरे परिवार समेत बाहर जाने से सभी को कठिनाई होती है। 2. हमें भी अपने विचार परिवार- अखण्ड-ज्योति परिवार के 30 हजार सदस्यों को शिक्षण देना है। समय कम है। थोड़ा-थोड़ा लाभ सभी को मिल सके, इसलिये एक महीने का क्रम रखकर ही संतोष करना पड़ेगा
“युग-निर्माण योजना” पाक्षिक पत्रिका की आवश्यकता अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक ने अनुभव की है। स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद युग-निर्माण आन्दोलन को जनता का दूसरा व्यापक अभियान कहा जा सकता है। सामाजिक क्रान्ति एवं विचार क्राँति की इतनी विशाल योजना को अग्रगामी बनाने के लिए कितने ही समाचार पत्रों को, कितने ही विचार पत्रों की आवश्यकता है
अप्रैल अंक के अंत में ‘कार्य विवरण और सूचना’ शीर्षक एक परिपत्र लगाया गया था और अखण्ड-ज्योति के पाठकों से प्रार्थना की गई थी कि उसे अप्रैल के अंत तक भरकर भेज दें। वह जानकारी प्राप्त करना हमारे लिए नितान्त आवश्यक था। इसलिए इस बात पर बहुत जोर दिया गया था कि उसे भरकर भेजने में उपेक्षा न की जाय
जहाँ इस संबंध में शिथिलता हो उसे दूर करने के लिए प्रयत्न करना, अभिरुचि, उत्पन्न करना तथा प्रोत्साहन देना शाखा संचालकों का आवश्यक कर्त्तव्य रहे। प्रत्येक परिवार में औसतन पाँच वयस्क व्यक्ति माने जाय तो इस अखण्ड-ज्योति सदस्यों के परिवारों में पचास व्यक्ति होंगे। शाखा संचालक इन पचासों का एक प्रकार से प्रेरणा पुरोहित होगा। और उन सब तक युग-निर्माण विचारधारा का प्रकाश पहुंचाने का प्रयत्न करेगा
संगठन किसी कार्यक्रम के आधार पर ही बनता है। प्राथमिक आधार अखण्ड-ज्योति तथा “युग-निर्माण योजना” पाक्षिक पत्रिका को वर्तमान पाठकों के गले उतारने की कार्यप्रणाली के आधार पर सुनियोजित किया जाय, इससे अगला कदम शत सूत्री कार्यक्रमों को जहाँ, जिस प्रकार, जितनी मात्रा में कार्यान्वित किया जा सकना संभव हो उतना वहाँ आरंभ कराते हुए प्रगति के स्वयं ही बढ़ना होना चाहिए। कदम-कदम बढ़ने का संकल्प किया 7) हो तो आज जो कुछ असंभव एवं आश्चर्य जैसा दीखने वाला एक दिन है कल वह पूर्ण व्यावहारिक, सर्वथा संभव और नितान्त सरल प्रतीत होने लगेगा
संतोष की बात है कि इस योजना का परिवार के भीतर और बाहर आशातीत स्वागत हुआ है। अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को इस बात की तैयारी करनी चाहिए कि वह अपनी स्थिति के अनुसार जीवन-निर्माण के त्रिविध प्रशिक्षणों द्वारा आत्म-कल्याण और युग-निर्माण का दुहरा श्रेय प्राप्त करने का जीवन को धन्य बनाने वाला सुअवसर प्राप्त कर सके
इस वर्ष की तैयारी के लिए जो रूपरेखा बनी है उस मोर्चे बंदी के हर पहलू से परिवार के प्रबुद्ध लोगों को परिचित करना चाहिए। यों यह सब अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर भी समझाया जा रहा है और आन्दोलन को बल देने के लिए ही सज-धज और शान का ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक में भी 1 जुलाई से आरंभ किया जा रहा है फिर भी इतने महत्वपूर्ण कार्य को प्रारंभ करते हुए परस्पर विचार विनिमय भी आवश्यक है। इसलिए जिनमें राष्ट्र निर्माण के अपने कार्यक्रमों में विशेष रुचि है उनसे इन शिविरों में आने की विशेष रूप से अपेक्षा की गई है
(1) अखण्ड-ज्योति का प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्ता पाक्षिक ‘युग-निर्माण योजना’ पत्र मंगाना आरंभ करे और उसे एक-एक दिन के लिए अपने से संबंधित दस व्यक्तियों के पास पहुँचाने का व्यवस्था क्रम बनावें। उस एक पत्रिका को कम से कम दस व्यक्ति पढ़ें। एक दूसरे को पढ़ने देता रहे और अन्त में दस दिन बाद वह पत्रिका दसों व्यक्तियों के पास घूमता हुआ उसी सक्रिय कार्यकर्ता-शाखा संचालक के पास वापिस आ जाय
एक सुझाव यह था कि दो-चार दिन का एक सम्मेलन वर्ष में एक बार किया जाया करे पर यह इसलिए न रुचा क्योंकि एक साथ अधिक व्यक्ति आ जाने से सभा सम्मेलन की शोभा तो अच्छी हो सकती है पर एक साथ अधिक व्यक्तियों से परामर्श संभव न हो सकने से विचार विनिमय का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकता। सभा में जो बात भाषण द्वारा कहनी है वह सब तो अखण्ड-ज्योति द्वारा कह ही देते हैं, कभी केवल व्यक्तिगत परिस्थितियों और कठिनाइयों को समझने तथा उसके हल करने को सुझाव परामर्श देने का काम रह जाता है। यह तभी तो हो सकता है जब समय अधिक और व्यक्ति कम हों। वस्तु यह निश्चय किया गया है कि जेष्ठ में दस-दस दिन के तीन परामर्श शिविर किये जाया करें
इनका एक शाखा संचालक हो। प्रत्येक शाखा संचालक अपने संबंधित दसों अखण्ड-ज्योति सदस्यों के घर आने-जाने का क्रम बनाये रखें और यह देखें कि उस परिवार के सब सदस्यों को पत्रिका के पढ़ने सुनने का लाभ मिलता है या नहीं। जहाँ इस संबंध में शिथिलता हो उसे दूर करने के लिए प्रयत्न करना, अभिरुचि, उत्पन्न करना तथा प्रोत्साहन देना शाखा संचालकों का आवश्यक कर्त्तव्य रहे। प्रत्येक परिवार में औसतन पाँच वयस्क व्यक्ति माने जाय तो इस अखण्ड-ज्योति सदस्यों के परिवारों में पचास व्यक्ति होंगे
जहाँ कम से कम बीस अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं, जहाँ कम से कम दो शाखा संचालक हैं, वहाँ ऐसा किया जाना चाहिए कि सब सदस्यों की पत्रिकाएं इकट्ठी ही मंगा ली जायं। जहाँ रेलवे स्टेशन पास हो वहाँ रेल से, जहाँ रेलवे न हो वहाँ डाक से हम रजिस्ट्री डाक पार्सल या रेल पार्सल से अंक भेज दिया करेंगे और शाखा संचालक उन सदस्यों के पास पत्रिका पहुँचा दिया करे। इसमें साधारण डाक व्यय की अपेक्षा हमें थोड़ा दुगना खर्च करना पड़ेगा
हमारी अभिलाषा है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य उत्कृष्ट प्रकार के व्यक्तित्व से सम्पन्न भारतीय धर्म और संस्कृति का शिर ऊंचा करने वाला सज्जन व्यक्ति बने। उसका जीवन उलझनों और कुण्ठाओं से भरा हुआ नहीं वरन् आशा, उत्साह, संतोष एवं मस्ती से भरा हुआ बीते। हर व्यक्ति अपने परिवार के बारे में ऐसा ही सोचता है, हम भी ऐसा ही सोंचे तो यह स्वाभाविक ही है
ब्रह्मचारी किशारों के लिए चार वर्ष की,गृहस्थों के लिये एक मास की शिक्षण बन रही हो तो वानप्रस्थों को ही अछूता क्यों छोड़ा जायेगा, उनके लिए एक वर्ष की शिक्षा का कार्यक्रम बनाया गया है। इस अवधि में उपासना के एक ऊंचे स्तर तक पहुँचाने का, जीवन शोधन की दिशा में काफी आगे बढ़ चलने का और परमार्थ कार्यों में युग की आवश्यकता के अनुरूप समुचित अनुभव प्राप्त करने का कार्यक्रम बना लिया गया है और अखण्ड-ज्योति परिवार के उन भावनाशील एवं सुशिक्षित लोगों को इसी जेष्ठ सदी पूर्णिमा से एक वर्ष के लिए मथुरा आने का आमंत्रण गत अंक में दिया गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-February
इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए कई उपायों का अवलम्बन करना पड़ेगा पर सबसे प्रारम्भिक उपाय यह है कि इस विचारधारा से अधिकाधिक लोग परिचित हों, उसका महत्व समझें और प्रस्तुत मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक प्रेरणा एवं उत्साह प्राप्त करें। यह आवश्यकता पूरी करने का इस समय एकमात्र उपाय ‘अखण्ड-ज्योति’ का विस्तार ही सामने है। अखण्ड-ज्योति के सदस्य गत वर्ष 30 हजार थे। अब इस वर्ष उस संख्या को एक लाख तक पहुँचा देने का लक्ष्य रखा गया है
यह आवश्यकता पूरी करने का इस समय एकमात्र उपाय ‘अखण्ड-ज्योति’ का विस्तार ही सामने है। अखण्ड-ज्योति के सदस्य गत वर्ष 30 हजार थे। अब इस वर्ष उस संख्या को एक लाख तक पहुँचा देने का लक्ष्य रखा गया है। एक लाख परिवार यदि नियमित रूप से इस विचारधारा को अपनाने लगे तो यह आशा की जा सकती है कि हम प्रगति को ओर सचमुच ही चल रहे हैं
वर्ष की दूसरी छमाही में जुलाई से अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को प्रगतिशील जातीय संगठनों के रूप में एक दूसरा सामाजिक मोर्चा बनाने के लिए संगठित करेंगे। जून की पत्रिका में एक फार्म लगा कर प्रत्येक परिजन से यह पूछेंगे कि वह किस वर्ण के अंतर्गत किस जाति या किस उपजाति का है। उसकी विवाह शादी अपनी ही उपजाति में होती है या अन्य उपजातियों में भी
इसके बिना युग-निर्माण का कोई ठोस कदम उठ भी नहीं सकेगा। थोड़े आदमी महान कार्य का सम्पादन करने में समर्थ कैसे हो सकते हैं? इसलिए परिवार के हर व्यक्ति को यह प्रेरणा दी गई है कि वह अपने सम्बन्धित और परिचित क्षेत्र में युग-निर्माण का संदेश पहुँचाने के लिए अखण्ड-ज्योति का प्रवेश कराने का प्रयत्न करे और उसमें आलस्य एवं उपेक्षा की तनिक भी गुंजाइश न रहने दें
उस दिन अपने व्यक्तिगत जीवन का आदर्श बनाने के लिए परिवार के प्रत्येक परिजन ने अपने अन्दर कोई नया विचार या कार्यक्रम आरम्भ किया। नशेबाजी, जुआ, माँसाहार, व्यभिचार, बेईमानी जैसे पाप ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठक बहुत पहले ही छोड़ चुके हैं। निषेधात्मक आन्दोलन गायत्री परिवार के दिनों से ही चल रहा है। अब निर्माणात्मक आन्दोलन का शुभारम्भ है
वसंत-पंचमी को यों रजत-जयन्ती का हर्षोत्सव मनाया गया है पर उसके साथ ही जो अनेक कार्यक्रम जुड़े हुए हैं उनमें भी तो क्रियान्वित करना है, इसके बिना उस उत्सव का कोई मूल्य नहीं रह जाता। अखण्ड-ज्योति परिवार की संख्या वृद्धि, उसे एक लाख बना देने की बात भी सामने है। इसके बिना युग-निर्माण का कोई ठोस कदम उठ भी नहीं सकेगा। थोड़े आदमी महान कार्य का सम्पादन करने में समर्थ कैसे हो सकते हैं? इसलिए परिवार के हर व्यक्ति को यह प्रेरणा दी गई है कि वह अपने सम्बन्धित और परिचित क्षेत्र में युग-निर्माण का संदेश पहुँचाने के लिए अखण्ड-ज्योति का प्रवेश कराने का प्रयत्न करे और उसमें आलस्य एवं उपेक्षा की तनिक भी गुंजाइश न रहने दें
परिवार की एक दूसरी पंक्ति जातीय संगठनों के रूप में भी रहे तो इसमें कुछ हर्ज नहीं। हमारा विचार है कि अखण्ड-ज्योति संगठन बनाने का भी एक काम सौंप दें और सहायक आन्दोलन के रूप में हम सब उस कार्य को भी चलाते रहें। विवाहों को जाति के अन्दर ही करने की मान्यता जब तक प्रचलित है तब तक इस प्रकार के संगठन भी तात्कालिक समस्या हल करने में, उपयुक्त सम्बन्ध तलाश कराने में बहुत सहायक बन सकते हैं
वसन्त पंचमी ता. 19 जनवरी को लगभग 7000 स्थानों में सामूहिक हवन हुए। जिनमें ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों और पाठकों ने पच्चीस-पच्चीस आहुतियाँ दी। अखण्ड धृत दीप उस दिन इन सभी जगह रखा गया। दीपक को अपने मिशन का प्रतीक मानकर सभी स्वजनों ने उसके आगे पुष्पाँजलि अर्पित की और श्रद्धा से मस्तक झुकाया
अपना परिवार इस वर्ष तीन गुना तो हो ही जाना चाहिए। इस महत्वपूर्ण तथ्य की गरिमा का अनुभव करते हुए कितने ही भावनाशील परिजन 250, 108, 25 अखण्ड-ज्योति के नये सदस्य बनाने की प्रतिज्ञा लेकर उसे पूरा करने के लिए उत्साहपूर्वक जुट गये हैं। कई व्यक्तियों ने 25 व्यक्तियों एवं संस्थाओं की लिस्ट भेजकर उनका चन्दा अपने पास से दिया है और एक वर्ष के लिए उपहार में पत्रिकाएं भिजवाई हैं। कई ने अपने स्वजन, सम्बन्धी, कन्या, जामाता, पुत्र, मित्र आदि को सुविकसित, सुसंस्कृत बनाने की कामना से उन्हें अपने पास के पत्रिकाएं चालू कराई हैं
“अखण्ड-ज्योति” परिवार एक आध्यात्मिक एवं साँस्कृतिक संगठन है और उसका लक्ष केवल वही रहेगा। पर वैवाहिक कुरीतियों की असुरता से निपटने के लिए उसका एक सामयिक दूसरा मोर्चा भी खोला जाना आवश्यक हो गया है। परिवार की एक दूसरी पंक्ति जातीय संगठनों के रूप में भी रहे तो इसमें कुछ हर्ज नहीं
अगले किसी महीने की शुक्लपक्ष की पंचमी या अन्य किसी शुभ दिन वैसा ही सामूहिक आयोजन किया जाना चाहिए जैसा अधिकाँश स्थानों पर गत वसन्त-पंचमी को मना लिया गया। हमें विश्वास है कि अखण्ड-ज्योति का एक भी सदस्य न बचेगा जो रजत-जयन्ती का आयोजन किसी न किसी रूप में मना कर अपनी श्रद्धा अभिव्यक्त न करे
प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रायः सभी विचारशील लोगों ने कुछ समय दान नियमित रूप से युग-निर्माण यज्ञ के लिए देते रहने का संकल्प किया है। एक से दस योजना के अंतर्गत लोगों के घरों पर जा जा कर साहित्य एवं वाणी के माध्यम से योजना का संदेश सुनाना भी उनने आरम्भ कर दिया है। पर यह कार्य अभी मन्द उत्साह के साथ ही अग्रसर हो रहा है
इस सम्बन्ध में अगले अंकों में, और भी प्रकाश डाला जायगा और परिजनों को इसके लिए प्रेरणा दी जायगी कि वे अगले तीन-चार महीनों में अपनी मनोभूमि इस योग्य तैयार कर लें कि उनके सहयोग से हिंदू-समाज को कलंकित और विपन्न बनाने वाली इस हत्यारी प्रथा का पूतना, ताड़का और सूर्पणखा की तरह काला मुँह किया जा सके। अखण्ड-ज्योति परिवार के लोग इस आदर्श का मार्ग-दर्शन करके सारे देश को एक नई दिशा देंगे और संघर्ष में जो कष्ट उठाना पड़ता है उसके लिए त्याग और बलिदान करके भव्य-समाज की नव्य रचना की भूमिका प्रस्तुत करेंगे। राजनैतिक क्रान्ति की- स्वराज्य की- लड़ाई में त्यागी, बलिदानी वीरों की तरह सामाजिक क्रान्ति की दिशा में प्रथम मोर्चा अपने परिवार के जिम्मे ही रहने वाला है। गान्धी जी के 79 साथियों ने धरसाना पर नमक बनाने की चढ़ाई करते हुए स्वतन्त्रता-सत्याग्रह का आरम्भ किया था आगे वह देश-व्यापी बना और अन्ततः स्वराज्य लेकर ही पूर्ण हुआ
सन् 64 की प्रथम छमाही में अखण्ड-ज्योति की रजतजयन्ती से सम्बन्धित पंच-सूत्री कार्यक्रम में सभी परिजन लगे हैं। वसंत-पंचमी को यों रजत-जयन्ती का हर्षोत्सव मनाया गया है पर उसके साथ ही जो अनेक कार्यक्रम जुड़े हुए हैं उनमें भी तो क्रियान्वित करना है, इसके बिना उस उत्सव का कोई मूल्य नहीं रह जाता। अखण्ड-ज्योति परिवार की संख्या वृद्धि, उसे एक लाख बना देने की बात भी सामने है
दूसरी बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का- युग-निर्माण योजना के सदस्यों का विस्तार। यदि इस एक बात की ही उपेक्षा कर दी जाय तो रजत-जयन्ती का तीन चौथाई महत्व समाप्त हो जाएगा। हम जितने थोड़े से लोग इस समय संगठन के अंतर्गत हैं यदि उतने ही बने रहे तो युग-निर्माण एवं विश्व-कल्याण की बात सोचना भी मूर्खतापूर्ण होगा
एक-एक लाइन में भी एक केन्द्र का कार्य छापा जाय तो ‘अखण्ड-ज्योति’ के वर्तमान कलेवर से दूने पृष्ठ उसी के लिए चाहिये। इतना कागज मंगाने की अपेक्षा काम की बात ही ‘अखण्ड-ज्योति’ में छपे इस दृष्टि से जयन्ती समारोह के सम्बन्ध में ज्ञात सूचनाओं का साराँश उपरोक्त पंक्तियों में छाप दिया गया है
रात्रि को उत्सव स्थान पर सामूहिक रूप में दिवाली की गई और परिजनों ने अपने-अपने घरों पर कम से कम 25-25 दीपक जलाये। प्रवचनों द्वारा उपस्थित जनता को ‘अखण्ड-ज्योति’ की प्रकाश प्रेरणा- युगनिर्माण योजना का उद्देश्य, स्वरूप एवं कार्यक्रम समझाया गया। ‘युग-निर्माण सत्संकल्प’ को एक प्रमुख व्यक्ति ने पढ़ा और उपस्थित लोगों ने दुहराया। युग-निर्माण सत्संकल्प की करीब एक लाख प्रतियाँ लोगों ने वितरित की
‘अखण्ड-ज्योति’ का रजत-जयन्ती पर्व ता.19 जनवरी (वसन्त-पंचमी) को भारतवर्ष तथा विदेशों में बड़े भावनापूर्ण वातावरण में मनाया गया। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार केवल 2 हजार सदस्य ही ऐसे हैं जिनने या तो सूचना नहीं भेजी या वे इस आयोजन को कारणवश मना नहीं सके। शेष 28 हजार ने अपनी ज्ञान-माता ‘अखण्ड- ज्योति’ के प्रति श्रद्धाँजलि अर्पित करने में जो उत्साह दिखाया उसके प्राप्त समाचारों से स्पष्ट होता है कि परिवार के प्रत्येक परिजन का मन अपने इस प्रकाशपूर्ण प्रेरणा केन्द्र के प्रति कितना अधिक श्रद्धा एवं सद्भावना से ओतप्रोत है
छापना संभव भी नहीं था। एक-एक लाइन में भी एक केन्द्र का कार्य छापा जाय तो ‘अखण्ड-ज्योति’ के वर्तमान कलेवर से दूने पृष्ठ उसी के लिए चाहिये। इतना कागज मंगाने की अपेक्षा काम की बात ही ‘अखण्ड-ज्योति’ में छपे इस दृष्टि से जयन्ती समारोह के सम्बन्ध में ज्ञात सूचनाओं का साराँश उपरोक्त पंक्तियों में छाप दिया गया है
कारण यही था कि उन्हें अपने अनुरूप विचार एवं स्थिति के लोग अपनी जाति में न मिले और एक पक्षीय व्यवस्था बन नहीं सकती थी इसलिये विवश होकर उन्हें अपना मत बदलना पड़ा। ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के स्वजनों में से अधिकाँश हमारी ही विचारधारा के हैं वे खुशी-खुशी आदर्श विवाह करने को तैयार हैं पर दूसरा पक्ष भी उन्हें वैसा ही मिले तब तो बात आगे बढ़े। जिसकी कन्या सयानी हो गई है उसे तो जल्दी रहती है, जहाँ अवसर मिल जाता है वहीं सम्बन्ध करना पड़ता है। अपने परिवार की हर शाखाओं में भी अनेकों सदस्य होते हैं पर जाति का बन्धन रहने से उनमें भी विवाह होने का योग जम नहीं सकता
कार्य की सुविधा के लिए 10-10 पन्ने की ग्राहक बनाने की रसीद-बहियों छपा ली गई हैं, जो कुछ थोड़े से स्वजनों को गतमास भेज दी गई थी। जिन्हें उत्साह हो वे सभी परिजन इस प्रकार की रसीद बहियाँ मंगा सकते हैं और उनके आधार पर ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य बनाने के कार्यक्रम में निष्ठा एवं उत्साहपूर्वक लग सकते हैं। यह कार्य इस पूरे वर्ष चलता रहना चाहिए। सन् 64 रजत-जयन्ती वर्ष है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-July
लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। इसी अवसर पर मेरे मित्र विश्वनाथ प्रसाद जी के बड़े भाई दुर्गाप्रसाद जी ने “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका मंगाया था, मैंने मन बहलाने के लिए मंगाकर पढ़ने लगा। गायत्री महिमा पढ़कर मन प्रसन्न हुआ, और कई छोटी-छोटी पुस्तकें मंगवाकर पढ़ी, पढ़ कर खाट पर बैठे-बैठे ही मानसिक साधना को आरम्भ कर दिया। उस समय मकान मालिक ने मकान से निकालने के लिये कैन्टोमेंट से मुकदमा चलवा दिया था, मैंने परीक्षा का यही अवसर अच्छा समझा, विधि विधान से करना उस समय मुश्किल था, जैसे तैसे 1 माला जपने लगा
एक मन होकर गायत्री साधना प्रारम्भ कर दी दो वर्ष की कठिन साधना के बाद मेरा रोग दूर हो गया मैं स्वस्थ हूँ परन्तु एक मानसिक रोग शेष रह गया। अन्त में उस रोग का इलाज बहुत कुछ आचार्य जी पूज्यनीय श्रीयुत श्रीराम शर्मा जी अखण्ड-ज्योति के सम्पादक एवं गायत्री तपोभूमि के अधिष्ठाता ने किया। इनके श्री चरणों की कृपा से मुझे गायत्री माता की महिमा का अनुभव हुआ। तब से मैंने माँ के श्री चरणों में आश्रय ले लिया है एवं भगवती की अनुकम्पा से बड़े-2 कठिन टी. बी. सरीखे रोगियों को अच्छा करने में सफलता प्राप्त कर चुका हूँ एवं अब धीरे-2 यह विश्वास होने लगा है कि माँ के आशीष से मैं अवश्य अपने पिता का नाम और यश फिर से स्थापित करने में सफल हो सकूँगा
गायत्री साहित्य में मैंने पहली बार गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार किताब पढ़ी, इसके पीछे सब साहित्य मथुरा से मँगवाया। अखण्ड-ज्योति का सदस्य भी बना हूँ
गायत्री की महिमा तथा उसकी उपासना के महत्व को मैं बहुत समय से जानता हूँ। पर जब गायत्री मन्त्र लेखन की साधना का वर्णन अखण्ड-ज्योति में पढ़ा तो उस पर विशेष मनोयोग पूर्वक विचार किया तो लगा कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होगी
अहमदाबाद के एक सज्जन ने भी इस सम्बन्ध में मुझे बहुत कुछ बताया था। अखण्ड-ज्योति को भी देखा था और उससे प्रेरणा प्राप्त की थी। उन सब बातों की प्रतीक्षा करने का यही अवसर था। मैंने पूरी भक्ति भावना के साथ गायत्री उपासना आरम्भ कर दी और प्रतीक्षा करने लगा कि देखें किस प्रकार मुझे इस ऋण भार से मुक्ति मिलती है
सन् 1952 ई. में आपने जो अखण्ड-ज्योति गायत्री अंक पढ़ा होगा, उसमें मेरा आग्नेयास्त्र सम्बन्धी लेख पढ़ा होगा, वह इस दास का साधारण अनुभव था। माता गायत्री सर्व शक्तिमान है इसलिए इसमें अचम्भे की कोई बात नहीं है उसकी शक्ति अनन्त है जिसका वर्णन वेद भी नेति-2 करते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-November
गायत्री सम्बन्धी आवश्यक सभी जानकारियाँ एक स्थान पर अत्यधिक सस्ते रूप में छापने के लिए इस महापुरश्चरण में आये हुए साधकों ने बहुत जोर दिया। तद्नुसार “अखण्ड-ज्योति, प्रेस” ने तीन हजार रुपये का घाटा देना स्वीकार करके एक ‘गायत्री ज्ञान अंक’ जनवरी 55 में छापने की व्यवस्था की है। इस ज्ञान अंक में इतनी सामग्री ठूँस दी जायगी कि एक नये व्यक्ति को सब कुछ नहीं तो काम चलाऊ बहुत कुछ मिल जायेगा। बिना कुछ अधिक पूछ-ताछ की अपेक्षा रखे इस अंक में साधारण अंकों को बराबर या उससे अधिक पृष्ठ रहेंगे दो चित्र भी भीतर रहेंगे पर असली लागत की अपेक्षा इसका मूल्य आधा रखा जायगा
हर बार घाटा देते रहना भी संभव नहीं इसलिए दुबारा इसके छपने की भी आशा नहीं है। ‘अखण्ड-ज्योति’ के ग्राहक या गायत्री प्रेमी जितनी अधिक संख्या में इन्हें दान के लिए या बेचने के लिए मँगाना चाहें अपनी कापियाँ अभी से रिजर्व करा लें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-October
सितम्बर के अंक में प्रस्तुत योजना के सम्बन्ध में अखण्ड-ज्योति तथा गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने विचारों की अभिव्यक्ति हमें लिखनी चाहिये। हम अपने प्रत्येक परिजन से यह आशा करेंगे कि अक्टूबर मास में एक विस्तृत पत्र हमें भेजें जिसमें (1) प्रस्तुत योजना को सफल बनाने संबंधी अपने सुझाव तथा (2) उनमें अपने भाग लेने संबंधी सम्भावनाएं तथा दैनिक, साप्ताहिक तथा मासिक रूप से कुछ समय इनके कार्यों के लिए निकाल सकने की सम्भावना का उल्लेख करना चाहिए। यह पत्र आने पर आपसी परामर्श से कुछ न कुछ ऐसा कार्यक्रम अवश्य बन सकेगा जो वर्तमान स्थिति में भी आपके लिये सम्भव हो सके
पिछले अंक में साँस्कृतिक पुनरुत्थान की योजना उपस्थित की जा चुकी है। अखण्ड-ज्योति और गायत्री परिवार के सदस्यों को इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य करना है। समय की पुकार, कर्त्तव्य की चुनौती और ईश्वरीय प्रेरणा के आधार पर बनी हुई इस कार्यप्रणाली से मुख मोड़ना जागृत आत्माओं के लिए किसी भी प्रकार उचित न होगा। राष्ट्र निर्माण का, धर्म प्रसार का, प्राचीन भारतीय गौरव की प्रतिष्ठापना का, पुनीत कार्य ऐसा है जिसे व्यक्तिगत कठिनाइयों की उपेक्षा करके भी हमें पूरा करना चाहिये
जिनके पास कुछ विशेष काम नहीं हैं, पर गृहस्थ की जिम्मेदारी हैं वे यदि प्रभु पूर्ण ढंग से बात चीत करने की योग्यता रखते और गायत्री ज्ञान प्रसार के लिए देश करना चाहते हों तो उसके परिवार के लिए भी कुछ व्यवस्था सोची जा सकती है। कुछ ऐसी शिथित महिलाओं की भी आवश्यकता है जो अखण्ड-ज्योति प्रेस की व्यवस्था तथा साहित्य निर्माण, सम्पादन आदि महत्वपूर्ण कार्यों में लग कर धर्म सेवा करती हुई, अपने जीवन को धन्य बना सके। इसी प्रकार हर व्यक्ति चाहे वह बीमार, वृद्ध, स्त्री, घर से बाहर जा सकने में भले ही असमर्थ हो-धर्म स्थापना के महान कार्य में किसी न किसी रूप में अवश्य भाग ले सकता है। किसके लिए क्या कार्य उपयुक्त रहेगा-यह व्यक्तिगत रूप से या पत्र व्यवहार द्वारा निश्चित किया जा सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-August
तदनुसार मेरी भावना उनके प्रति किसी बुद्धि जीवी व्यक्ति की होनी चाहिए। मेरी यह श्रद्धा ही है जो रात-रात भर जागकर अखण्ड-ज्योति को सींचने के लिए कुछ कार्य करने को बलपूर्वक विवश करती है। आचार्य जी ने अपनी योग्यता और प्रतिभा का उपयोग पत्रकार जगत में आकर भी यदि धन कमाने के लिए किया होता तो निःसंदेह आज वे भी दूसरों की तरह बहुत सम्पन्न होते। पर आरम्भ से ही उनका स्वभाव और आदर्श ऐसा रहा है जिनके कारण आर्थिक तंगी उन्हें घेरे रहती है
जिन साहित्यकारों से मेरा परिचय है उनमें से एक अपने ढंग के अनोखे व्यक्ति आचार्य जी हैं। अखण्ड-ज्योति के जन्मकाल से ही मैं व्यक्तिगत रूप से उनके घनिष्ठ संपर्क में हूँ और प्रायः इस पत्रिका का आरम्भ से ही तत्परता पूर्वक उसका सम्पादन कार्य करने में प्रमुख रूप से हाथ बंटाता रहा हूँ। हर महीने अनेक पत्रों का आदान-प्रदान हम लोगों के बीच में होता हैं और जल्दी-जल्दी हम आपस में मिलते भी रहते हैं। साल के 365 दिनों में शायद ही कुछ दिन ऐसे होते है, जिनमें अखण्ड-ज्योति के सम्बन्ध में आचार्य जी के सम्बन्ध में कुछ सोचने या करने का अवसर न आता हो
“अपना श्रम देकर उनकी सहायता करूं” यह मेरी अन्तरात्मा मुझ से निरन्तर कहती रही है। उसी प्रकार पर मैंने गत 14 वर्षों से अखण्ड-ज्योति का सम्पादन कार्य करने तथा 50 पुस्तकें लिख देने का कार्य किया है। निश्चित है कि इतना श्रम मैंने किसी दूसरे के लिए किया होता तो उससे हजारों रुपयों की मुझे प्राप्ति हुई होती। पर ईश्वर जानता है कि आज तक मैंने एक कानी कौड़ी भी पारिश्रमिक इसके लिए कभी नहीं लिया है
उसका घर जितना ही विचार करता हूँ उतना ही अधिक खेद और निराशा होती है। यह बात है अखण्ड-ज्योति की ग्राहक संख्या। जबकि कहानियों के, सिनेमा के तथा अन्य प्रकार के अखबार इतनी भारी संख्या में छपते हैं तब अखण्ड-ज्योति की ग्राहक संख्या इतनी थोड़ी रहे यह चिन्ता की बात है। हम लोग दिन रात खून पसीना बहाकर इतनी उच्च कोटि की पाठ्य सामग्री जुटाते हैं
यह तनिक भी कठिन नहीं कि अखण्ड-ज्योति का एक सदस्य चाहे तो एक दो और अपने नये साथी न बना ले। हर सदस्य का थोड़ा-थोड़ा सहयोग आचार्य जी की वाणी के बल और क्षेत्र में असाधारण वृद्धि कर सकता है। मैं सोचता रहता हूँ कि किन शब्दों में अपने साथियों के आगे अपना हृदय उड़ेल कर रखूँ कि वे अपने-अपने परम आवश्यक कर्त्तव्य को समझें और इसके लिए प्रयत्न करें
अखण्ड-ज्योति का गायत्री साहित्य पढ़ कर मेरी अन्तरात्मा ने कहा- आत्मा की पवित्रता में व्यक्ति के सच्चे विकास की सारी योजनाएं सन्निहित है, वह वह पवित्र गायत्री महामंत्र की शिक्षा एवं साधना को अपनाकर प्राप्त की जा सकती है। ऋषियों ने इसी आधार को अपना प्रथम लक्ष्य माना था और वे अपना तथा संसार का बहुत कुछ कल्याण करने में समर्थ हो सके थे। मुझे लगा कि उस प्राचीन गौरव को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक आधार है इस मान्यता के आधार पर मैं गायत्री उपासक बन गया
पर जो लोग पैर छूने में सबसे आगे रहते हैं, तरह-तरह की सेवाएं और सहायताएं प्राप्त करने की आशा करते हैं पर जब स्वयं कुछ करने का अवसर आता है तो हाथ झाड़ कर अलग खड़े हो जाते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार में ऐसे लोगों की आशा मुझे कभी न थी। पर जब इस बार पत्रिका दफ्तर का भली प्रकार अध्ययन किया तो व्यवस्थापक श्री सत्यदेव जी ने बताया कि ऐसे लोग उंगलियों पर गिनने मात्र हैं। जो दूसरों को अखण्ड-ज्योति का ग्राहक बनाने के लिए कुछ प्रयत्न करते है
तभी इतने बड़े देश की इतनी बड़ी जनसंख्या में उन सुसंस्कृत तथ्यों की स्थापना सम्भव हो सकेगी। यों अपने-अपने ढंग से अनेकों सत्पुरुष इस दशा में प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं, यह कोई नई बात नहीं है फिर भी अखण्ड-ज्योति एवं गायत्री परिवार से सम्बन्धित स्वजन सम्बन्धियों को साथ लेकर हम एक आयोजन का कार्यक्रम उपस्थित करते हैं। इसे आगे बढ़ाने में हम लोग तत्पर होंगे इसकी उपयोगिता को प्रतिपादन करने में सफल होंगे तो निश्चय है कि अगणित सहयोगी इसे पूरा करने में अपना समय, सद्भाव और सहयोग प्रदान करेंगे और उस गतिविधि का देशव्यापी एवं विश्वव्यापी होना कुछ कठिन न रहेगा। योजनाएं इस प्रकार हैं :-
ये कैसे मित्र है, हितैषी हैं, प्रेमी हैं, श्रद्धालु हैं, जो अपनी आदर भावना की श्रद्धा को चरितार्थ करने के लिए कुछ नहीं करते। यदि आचार्य जी की वाणी अन्तरात्मा की पुकार अखण्ड-ज्योति खराब है, हानिकारक है तो उसका विरोध करना चाहिए और उसे बन्द कराने का प्रयत्न करना चाहिए यदि वह उत्तम है तो उसके प्रसार के लिए कुछ तो प्रयत्न करना चाहिए कुछ तो समय देना ही चाहिए। न विरोध न सहयोग यह उपेक्षा तो मृतप्रायः सड़ी गली मनोवृत्ति की द्योतक है। यदि हमारा परिवार सचमुच ऐसा ही है तो निराशा और अंधकार की ही कल्पना की जा सकती है
पर आरम्भ से ही उनका स्वभाव और आदर्श ऐसा रहा है जिनके कारण आर्थिक तंगी उन्हें घेरे रहती है। व्यक्तिगत रूप से उनकी आर्थिक स्थिति इतनी दुर्बल रहती है कि अखण्ड-ज्योति को चलाने तथा अपने पारिवारिक खर्च चलाने में चिंता ही करनी पड़ती रहती है। उनकी इस कठिनाई को देखकर मेरी भावनायें उमड़ती रही हैं, पर ईश्वर ने अमीर मुझे भी नहीं बनाया। मैं भी मजदूर ही हूँ
पर जब इस बार पत्रिका दफ्तर का भली प्रकार अध्ययन किया तो व्यवस्थापक श्री सत्यदेव जी ने बताया कि ऐसे लोग उंगलियों पर गिनने मात्र हैं। जो दूसरों को अखण्ड-ज्योति का ग्राहक बनाने के लिए कुछ प्रयत्न करते है। अधिकाँश तो ऐसे हैं जो अपना चन्दा ही मुश्किल से भेजते हैं। इस स्थिति को देखकर सुनकर मेरा सिर लज्जा से नीचे गढ़ने लगा है
अखण्ड-ज्योति में सरस्वती यज्ञ और साँस्कृतिक शिक्षण शिविर की योजना पढ़ी तो वह पिछली अभिलाषाएं अचानक जागृत हो गई और नियम समय पर मथुरा के लिए चल पड़ा और गायत्री तपोभूमि में जा पहुँचा। स्थान की दृष्टि से यह इमारत कोई इतनी बड़ी या प्रभावशाली नहीं है जैसी अन्यत्र कहीं नाप हो। इससे हजारों नहीं तो सैकड़ों गुनी कीमत के मन्दिर मैंने अपनी आँखों देखे हैं पर इस स्थान में जो विशेषताएं मैंने देखी वे निश्चित रुप से आज तक मैंने कहीं नहीं देखी है
जुलाई में हर साल एक गायत्री अंक निकलता है। गायत्री संस्था से सम्बन्ध रखने के लिए- अखण्ड-ज्योति का ग्राहक रहना आवश्यक है
इसी दौरान में जब मैं बम्बई था तब एक सज्जन के यहाँ अखण्ड-ज्योति कार्यालय की कुछ पुस्तकें देखीं। उन्हें पढ़ा। पढ़ने पर ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरी ही जैसी भावना और वेदना इन पुस्तकों के लेखक की भी है
अखण्ड-ज्योति तथा गायत्री परिवार के सदस्यों को समय-समय पर हम यथा अवसर प्रेरणा देते रहते हैं, कार्यक्रम सुझाते रहते हैं तथा योजनाएं करते हैं। परिजनों की हमारे प्रति जो श्रद्धा सद्भावना ममता तथा आत्मीयता है उसके आधार पर इन कार्यक्रमों पर चलने एवं सहयोग देने पर प्रयत्न भी करते रहते हैं, इस प्रकार परस्पर सहयोग से दिन-दिन सदुद्देश्य की ओर प्रगति होती रहती है। यह क्रम आगे और भी उत्साहपूर्वक चलना चाहिए क्योंकि बहुत बड़ा लक्ष्य सामने खड़ा हुआ है उसे छुटमुट कार्यों से ही पूर्ण नहीं किया जा सकता
उन्हें भावना की साक्षात् प्रतिमूर्ति ही कहना चाहिए। जब मैंने अखण्ड-ज्योति में शिक्षण शिविर की योजना पढ़ी तो हृदय हर्ष से भर गया। वकालत के व्यस्त कार्यक्रम को छोड़कर मथुरा पहुँचा। और इस महत्वपूर्ण शिविर में सम्मिलित होकर इस भावना प्रसार के शिक्षा परीक्षण में सहयोग देता रहा
इन बातों का तो दोष है ही जो ऐसे उपयोगी कार्य आगे पढ़ नहीं पाते पर अधिक दोष हम लोगों का है जो इसकी उपयोगिता और महत्ता को समझते हुए भी इस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए क्रियात्मक रूप से कुछ नहीं करते। अखण्ड-ज्योति आचार्य जी की वाणी है, उनकी अन्तरात्मा की पुकार है इसे अधिक लोग सुनें समझें तभी उनका श्रम सार्थक हो सकता है। इस सार्थकता की जिम्मेदारी उनकी है जो अपने आचार्य जी का प्रेमी, हितैषी मित्र या शिष्य कहते हैं। सच्ची सद्भावना हमेशा क्रिया रूप में प्रकट होती है
हर महीने अनेक पत्रों का आदान-प्रदान हम लोगों के बीच में होता हैं और जल्दी-जल्दी हम आपस में मिलते भी रहते हैं। साल के 365 दिनों में शायद ही कुछ दिन ऐसे होते है, जिनमें अखण्ड-ज्योति के सम्बन्ध में आचार्य जी के सम्बन्ध में कुछ सोचने या करने का अवसर न आता हो। कह सकते हैं कि वे मेरे मानसिक परिवार के एक अंग बन चुके है
जो कुछ प्रयत्न मैंने वहाँ देखा उनसे मैं असाधारण रूप से प्रभावित हुआ और तब से मेरा लगाव उनसे निरन्तर बढ़ता ही गया है। जो भी लोग मेरे संपर्क में आते हैं उनको अखण्ड-ज्योति तथा वहाँ की विविध पुस्तकें पढ़ने के लिए बलपूर्वक प्रेरणा करता रहा और मैं देखता हूँ कि उनसे, उन लोगों को वस्तुतः बहुत लाभ पहुँचता है, इससे मेरे मन को बड़ा सन्तोष होता है और अधिक लोगों को अधिक बलपूर्वक प्रेरणा करने का उत्साह बढ़ता रहता है
यह बात है अखण्ड-ज्योति की ग्राहक संख्या। जबकि कहानियों के, सिनेमा के तथा अन्य प्रकार के अखबार इतनी भारी संख्या में छपते हैं तब अखण्ड-ज्योति की ग्राहक संख्या इतनी थोड़ी रहे यह चिन्ता की बात है। हम लोग दिन रात खून पसीना बहाकर इतनी उच्च कोटि की पाठ्य सामग्री जुटाते हैं। मूल्य इतना सस्ता रखा है जिससे कागज छपाई की लागत मात्र मुश्किल से पूरी होती है
‘अखण्ड-ज्योति’- यह गायत्री संस्था की मुख्य पत्रिका है। यह गत 14 वर्ष से निरन्तर प्रकाशित हो रही है। इसमें हर महीने गायत्री सम्बन्धी लेख रंगीन चित्र तथा समय-समय पर गायत्री उपासना सम्बन्धी आवश्यक सूचनाएं विज्ञप्तियाँ तथा जानकारियाँ प्रकाशित होती रहती हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-December
साथ ही इससे आपकी पत्रिका की सामर्थ्य और सेवा संभावना भी बढ़ती है। अपने प्रिय जनों को अखण्ड-ज्योति का सदस्य बनाने के लिए कुछ-कुछ सक्रिय प्रयत्न करना हर अखण्ड-ज्योति प्रेमी को अपना आवश्यक कर्त्तव्य मानना चाहिए
(7) अखण्ड-ज्योति के सदस्य बढ़ाना दूसरों को कल्याण मार्ग पर अग्रसर करने का एक परम पुनीत परमार्थ कार्य है। साथ ही इससे आपकी पत्रिका की सामर्थ्य और सेवा संभावना भी बढ़ती है। अपने प्रिय जनों को अखण्ड-ज्योति का सदस्य बनाने के लिए कुछ-कुछ सक्रिय प्रयत्न करना हर अखण्ड-ज्योति प्रेमी को अपना आवश्यक कर्त्तव्य मानना चाहिए
(4) अखण्ड-ज्योति का नया वर्ष जनवरी से प्रारम्भ होता है। जो लोग बीच के महीनों से ग्राहक बनते है उनकी फाइलें भी अधूरी रहती हैं। और अधूरे वर्ष का हिसाब रखने में हमें भी बड़ी अड़चन होती है
(1) इस अंक के साथ अधिकाँश अखण्ड-ज्योति के सदस्यों का चंदा समाप्त हो जाता इसलिए पाठकों से प्रार्थना है कि मनीआर्डर से 2) अपना चन्दा तुरन्त ही से भेज दो। अखण्ड-ज्योति उतनी ही छपनी है जितने उसके ग्राहक होते हैं। अतएव जो सज्जन देरी से चंदा भेजते हैं, उन्हें कई अंकों से वंचित रहना पड़ता है और फाइल अधूरी रह जाती है
और उसके लौट आने में यह भार हमारे ऊपर पड़ता है। इस व्यर्थ अपव्यय से बचने के लिए वी0 पी0 मंगाने के अपेक्षा अखण्ड-ज्योति का चंदा 2) मनीआर्डर से भेजना में ही दोनों का हित है
‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा
(1) इस अंक के साथ अधिकाँश अखण्ड-ज्योति के सदस्यों का चंदा समाप्त हो जाता इसलिए पाठकों से प्रार्थना है कि मनीआर्डर से 2) अपना चन्दा तुरन्त ही से भेज दो। अखण्ड-ज्योति उतनी ही छपनी है जितने उसके ग्राहक होते हैं। अतएव जो सज्जन देरी से चंदा भेजते हैं, उन्हें कई अंकों से वंचित रहना पड़ता है और फाइल अधूरी रह जाती है। इस उलझन से बचने के लिए यह अंक पहुँचते ही चंदा भेज देने की प्रार्थना है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-May
स्वल्प काल में अनेक सद्गुणों के विकास का यह अच्छा आयोजन है। अखण्ड-ज्योति परिवार के छात्रों को इसमें सम्मिलित होने का प्रयत्न करना चाहिए
इन दिनों स्कूलों की छुट्टियाँ होती हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के बालकों को उत्तम जीवन यापन करने की शिक्षा देने के लिए यह आयोजन इस दृष्टि से किया गया है कि वे अपने मन में कुछ सुसंस्कारों की स्थापना करके अपने परिवार के लिए उपयोगी एवं सन्तोषदायक एवं अव्यवस्थित चित्त वृत्तियों के कारण मनुष्य को अपने जीवन में पग-पग पर जो असफलताएं एवं परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं, वे न उठनी पड़ें। शिक्षा के साथ-साथ सरस्वती यज्ञ का आयोजन भी इसी दृष्टि से किया गया है कि जो कभी केवल मौखिक शिक्षा से नहीं हो सकती, वह उन दिनों उत्पन्न किए गए सद्बुद्धिवर्धक वातावरण के द्वारा पूर्ण हो सके। आशा की जाती है कि इस सत्र में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में से अधिकाँश का अच्छा लाभ होगा
सदा की भाँति अखण्ड-ज्योति का जुलाई का अंक गायत्री अंक होगा। उसमें गायत्री उपासना से हुए भौतिक एवं अध्यात्मिक अनुभवों के दर्शन रहेंगे। जिन्हें स्वयं कोई उत्साह वर्धक अनुभव हुए हो

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-September
इच्छुक महिलाएं- इस पते पर पत्र व्यवहार कर सकती हैं। श्रीमती भगवती देवी धर्मपत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा
गत मास की अखण्ड-ज्योति में साँस्कृतिक पुनरुत्थान की व्यवहारिक योजना प्रस्तुत की जा चुकी है। बीस सूत्री कार्यक्रम विस्तार पूर्वक बनाया जा चुका है। उन्हें कार्यान्वित करने के लिए हमें जन साधारण के सामने अपनी संस्कृति की उपयोगिता सिद्ध करनी पड़ेगी क्योंकि यह बुद्धि प्रधान युग है किसी को कोई बात तर्क, प्रमाण, उदाहरण, विज्ञान, आदि के आधार पर उपयोगी सिद्ध नहीं कर दी जाती तब तक केवल प्राचीनता के आधार पर उसे मानने के लिए तैयार नहीं किया जा सकता
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा
आत्म-सेवा और आत्म-निर्माता अपने संकल्प पत्रों से भी भेज सकते हैं। जब नरमेध यज्ञ होगा तब इस सेना के सैनिकों का परिचय छापने के लिए अखण्ड-ज्योति का एक विशेषाँक भी प्रकाशित किया जायेगा
स्त्रियों में स्त्रियाँ ही काम करे जिससे कभी किसी विकृति की सम्भावना न रहे। अभी अखण्ड-ज्योति सम्पादक की माता जी, धर्म पत्नी तथा बहिन ने मिल कर योजना बनाई है कि अखण्ड-ज्योति प्रेस तथा कार्यालय का कार्य ऐसा है जो घर के भीतर हो सकता है। इस कार्य को स्त्रियाँ भी आसानी से कर सकती हैं। पुरुष इस कार्य को छोड़ कर अन्य महत्वपूर्ण कार्यों के लिये बाहर रहें और इस संस्था का आदि से अन्त तक पूरा कार्य महिलाएं ही सम्भाल लें
नरमेध में अपनी आहुति देने के लिये भी कुछ न कुछ हुतात्माओं के मन में अन्तः प्रेरणा उत्पन्न होगी और नरमेध में आहुतियाँ पड़ेंगी। श्री तारकेश्वर झाँ का संकल्प पिछले महीने अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित हो चुका है और भी कुछ संकल्प शीघ्र ही सामने आ रहे है ऐसा हमें स्पष्ट दीखता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-December
जन्म-दिन मनाने की प्रक्रिया के साथ युग-निर्माण योजना के अंतर्गत आत्म-ज्ञान का व्यापक उद्बोधन-व्यापक अभियान- चलाया जा रहा है। अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक परिजन को बहुत जोर देकर कहा जा रहा है कि वह अपना जन्म दिन समारोहपूर्वक मनाया करे। उस दिन अपने में भावनात्मक उल्लास उत्पन्न किया करे। जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग के महान् तत्वज्ञान पर एकान्त में विचार किया करे और अपने आपसे यह प्रश्न पूछा करे कि अपने अस्तित्व का मूल स्वरूप क्या है? इस सुर दुर्लभ मानव जीवन का उद्देश्य क्या? और इन बहुमूल्य क्षणों का सर्वोत्तम सदुपयोग किस प्रकार किया जा सकता है? इन प्रश्नों का यदि सही उत्तर भीतर से मिले और इतना साहस उत्पन्न हो जाय कि जो श्रेयस्कर है उसी को अपना लिया जाय तो हमारे जीवन में एक आध्यात्मिक क्रान्ति उपस्थित हो सकती है
‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रिय परिजनों को ज्ञान-योग की साधना के लिये स्वाध्याय को अनिवार्य आवश्यकता को समझने के लिये आग्रह किया गया है। देवत्व के अभिवर्धन का- सूक्ष्म शरीर के परिष्करण का यह एक असाधारण उपाय है। हमें नित्य ही अनिवार्य रूप से इस ‘युग निर्माण साहित्य’ का अध्ययन करना चाहिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-March
अनावश्यक भीड़-भाड़ की छटनी कर देने के बाद अब अखण्ड-ज्योति परिवार में इस वर्ष थोड़े-से व्यक्ति ही बचे हैं। उन्हें काम-के भावनाशील एवं प्रबुद्ध कहा जाये तो कुछ अत्युक्ति न होगी। गत वर्ष छटनी इसी प्रयोजन के लिए भी की गई थी
अखण्ड-ज्योति के भावनाशील प्रत्येक परिजन को विचार क्राँति की मानव के भावनात्मक नव-निर्माण की महती आवश्यकता की गरिमा समझनी ही होगी और यह निश्चय करना ही होगा कि जो कर्त्तव्य उसके सामने हैं उसे बिना हिला-हुज्जत के पूरा करता रहे
5. योजना का पाँचवा अंग है-भावनात्मक नव-निर्माण का सर्वांगपूर्ण साहित्य सृजन एवं उसका व्यापक प्रसार। अब तक अखण्ड-ज्योति एवं युग-निर्माण पत्रिकाओं द्वारा एक छोटे क्षेत्र में अपने परिचित परिजनों में हम युग के अनुरूप अध्यात्म तत्व ज्ञान का प्रसार करते रहें है। आगे यह क्षेत्र अत्यन्त व्यापक और विशद् बनना है। हमारे सामने समस्त राष्ट्र, समस्त विश्व, समस्त मानव समाज है, उसका सर्वांगीण भावनात्मक परिवर्तन करने के लिए अभिनव प्रेरणाओं का क्षेत्र भी उसी अनुपात से बड़ा किया जाना है
उसके लिए अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी सदस्यों की जन्म-तिथियाँ मंगाई जा रही हैं। जो पंचवर्षीय स्थायी सदस्यता फार्मों के साथ लिख चुके हैं, उन्हें छोड़कर शेष सभी अखण्ड-ज्योति के सदस्य अपनी जन्म-तिथि महीना, सन-संवत् सहित लिखकर भेज दें। उस अवसर पर हम उन्हें प्रेरणाप्रद संदेशों से भरी एक छोटी उपहार पुस्तिका भी भेजा करेंगे। पाँच वर्ष तक यह पुस्तिकाएं हमारे एक चिर-स्मरणीय उपहार की तरह जिनके पास रहेंगी, वे उनसे आजीवन महत्वपूर्ण प्रेरणाएं प्राप्त करते रहेंगे
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
अखण्ड-ज्योति परिवार के वर्तमान सदस्यों में अब केवल सक्रिय कर्मठ, प्रबुद्ध एवं भावनाशील व्यक्ति ही रह गये हैं। कौतूहल के रूप में समय काटने के लिए जो लोग पत्रिका मंगाते थे और चंदा भेजने तक में बेतरह हीला-हुज्जत करते थे उनकी छटनी गत वर्ष कर दी गई है। अब हम लोग एक ऐसे छोटे परिवार के रूप में रह गए हैं जिनका विश्वास सद्विचारों को पढ़ने-सुनने तक ही सीमित न रह कर उन्हें कार्यान्वित करने पर भी है
कई सज्जनों के पत्र भी आये हैं। अभी इतना ही करना चाहिये कि अखण्ड-ज्योति के किसी लेख का अनुवाद करके वे हमारे पास उस भाषा में भेज दें। उससे अनुमान लगाया जायेगा कि उनका साहित्यिक ज्ञान एवं अनुवाद प्रवाह किस स्तर का है। घटिया लड़खड़ाती, अस्त-व्यस्त भाषा के अनुवाद उपयुक्त न होंगे
इन लाभों पर ध्यान रखते हुए जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति सदस्य हैं उन सबका जन्म दिन मनाने की व्यवस्था हर जगह बना ली जाए। छोटे बच्चों के जन्म दिन मनाने का आरंभ संस्था के जिम्मे पर छोड़ा जाए, यह कार्य उनके माता-पिता का है। संगठित रूप में केवल वयस्कों के जन्म दिन मनाये जाएं जिससे उन्हें कुछ प्रेरणा दी जा सके
नव-निर्माण के लिए जन-मानस के परिष्कार का जो पुण्य-परमार्थ अपनाने के लिए अखण्ड-ज्योति परिजनों को प्रेरणा दी गई है, उसे सामाजिक कार्यमात्र नहीं मान लेना चाहिए। वस्तुतः वह आत्मिक प्रगति की ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग की संगम साधना है। सद्विचारों का निरन्तर चिन्तन करना-सत्प्रवृत्तियों में भावना-स्तर को निमग्न करना वस्तुतः अन्तःकरण में परमेश्वर की प्रतिष्ठापना करने का ही एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग है
अखण्ड-ज्योति के किसी अंक में हम एक महत्त्वपूर्ण भविष्यवाणी कर चुके हैं कि अब से तीस वर्ष पश्चात् इस संसार की मानव-समाज की स्थिति आज के सर्वथा भिन्न होगी। युग सर्वथा पलटा हुआ दिखाई देगा सन् 2000 के लगभग इस दुनिया को आज की आँखों में देखा जाए तो सब कुछ बदला हुआ ही दिखाई देगा। यों पिछले तीन सौ वर्षों में विज्ञान की प्रगति ने संसार की बाह्य परिस्थितियों में जमीन आसमान जैसा अंतर ला दिया है
संस्कृति-सीता को वापिस लाने का त्रेता युगी अभियान, रीछ-बन्दरों के ही नहीं-बालों में धूलि भर कर समुद्र पाटने में सहायता करने वाली गिलहरी तक के सहयोग से आगे बढ़ा था। युग-निर्माण अभियान भी अखण्ड-ज्योति परिवार के हर प्रबुद्ध सदस्य से उसकी स्थिति के अनुरूप सहयोग की अपेक्षा करेगा
इसके लिए गायत्री तपोभूमि की सिद्ध पीठ हर दृष्टि से उपयुक्त है। यहाँ अखण्ड-ज्योति व नित्य यज्ञ व्यवस्था रहने से तथा गायत्री माता के सान्निध्य में निरन्तर जप पुरश्चरण होते रहने से भूमि में वह प्रभाव है जिससे गायत्री साधना भली प्रकार सफल हो सकती है। साथ-साथ उच्चस्तरीय पञ्चकोषी गायत्री उपासना का भी साधना क्रम चलेगा। अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष इन पाँचों आवरणों के हटने से आत्म साक्षात्कार तथा ब्रह्म निर्वाण का लक्ष्य पूरा होता है
हर जगह यह प्रचलन आरंभ किया जाए। अखण्ड-ज्योति का एक भी सदस्य ऐसा न बचे जिसका जन्म दिन न मनता हो
ब्रह्म-विद्यालय को निरन्तर संचालित रखना है। हर परिजन के पास अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाएं जाती हैं, उन्हें अपने परिवार के हर शिक्षित व्यक्ति को पढ़ाना और अशिक्षित को सुनाना एक अनिवार्य कर्त्तव्य बताया गया है। घर का एक भी व्यक्ति ऐसा न बचे जो इन विचारों से प्रेरणा ग्रहण न करता हो। इसके अतिरिक्त पड़ौस, रिश्तेदारी, मित्र, दफ्तर में जहाँ भी अपना प्रवेश, प्रभाव है, वहाँ इस विचारधारा को पढ़ाने एवं सुनाने की सुविधा उत्पन्न करनी चाहिए
अब हम स्वयं अपने परिजनों के जन्म दिन अपनी पूजास्थली पर बैठकर मनाया करेंगे और उनके लिये विशेष प्रेरणा एवं विशेष आशीर्वाद भेजा करेंगे। उसके लिए अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी सदस्यों की जन्म-तिथियाँ मंगाई जा रही हैं। जो पंचवर्षीय स्थायी सदस्यता फार्मों के साथ लिख चुके हैं, उन्हें छोड़कर शेष सभी अखण्ड-ज्योति के सदस्य अपनी जन्म-तिथि महीना, सन-संवत् सहित लिखकर भेज दें। उस अवसर पर हम उन्हें प्रेरणाप्रद संदेशों से भरी एक छोटी उपहार पुस्तिका भी भेजा करेंगे
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के सामने यह पाँच प्रश्न उपस्थित हैं। देश, धर्म और समाज पर संस्कृति की ओर से उसके सम्मुख एक चुनौती प्रस्तुत है। बन पड़े तो इसे स्वीकार करना चाहिए
अखण्ड-ज्योति परिवार के किशोरों और वयस्क नव-युवकों को इस शिक्षा-व्यवस्था का लाभ लेना चाहिए। बेशक उन्हें इस पढ़ाई से सरकारी नौकरी में काम आने वाली डिग्री नहीं मिलेगी। परीक्षा और उपाधियाँ हमारी अपनी होंगी, पर इतना निश्चित है कि यह पढ़ाई शिक्षार्थी को इस योग्य बनाकर भेजेगी जिससे वह आजीविका के क्षेत्र में कभी असफल न रहे-दूसरों को अपने यहाँ नौकर रखने की ही बात सोचे
कार्य अत्यन्त विशाल है, उसे कैसे किया जाए, इसका मार्गदर्शन करने, व्यावहारिक स्वरूप बताने के लिए मथुरा में जून से शुभारंभ किया जा रहा है, इसे सफल बनाने के लिए प्रयत्न करना हर अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य का पवित्र कर्त्तव्य है। इन समस्याओं पर विस्तृत विचार-विनिमय करने के लिये उन्हें 14 दिन के शिविर में 9 से 22 जून तक मथुरा आना आवश्यक है। तथा जो प्रौढ़, किशोर, वृद्ध उपर्युक्त तीनों शिक्षाओं के उपयुक्त जान पड़े, उनसे व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करके इन प्रशिक्षणों में सम्मिलित होने की प्रेरणा देनी चाहिए
इस वर्ष छंटनी कार्यक्रम के कारण अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या बहुत घट गई है। बेकार लोगों का हट जाना तो ठीक हुआ पर उनकी स्थानपूर्ति अच्छे लोगों से होनी चाहिए अन्यथा उसका प्रभाव अपने महान मिशन पर पड़ेगा। एक नया सदस्य बढ़ाने की चेष्टा प्रत्येक परिजन को करनी चाहिए
विचार क्राँति के लिए अखण्ड-ज्योति परिजनों को अपना ज्ञान यज्ञ निरन्तर चालू रखना है। ब्रह्म-विद्यालय को निरन्तर संचालित रखना है। हर परिजन के पास अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाएं जाती हैं, उन्हें अपने परिवार के हर शिक्षित व्यक्ति को पढ़ाना और अशिक्षित को सुनाना एक अनिवार्य कर्त्तव्य बताया गया है
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी उपासना के साथ इस आत्म-निरीक्षण की साधना को भी जोड़ लेना चाहिये। इस आधार पर जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिये आँतरिक प्रकाश एवं मार्ग-दर्शन मिलता रह सकता है
अखण्ड-ज्योति परिवार द्वारा आरंभ की गई इस पुण्य प्रक्रिया का, युग-निर्माण योजना का यही प्रयोजन है। इसके लिए जन-मानस में उत्कृष्टता की विवेकशीलता की, लोक-मंगल के लिये मानवोचित कर्त्तव्य पालन करने की, ज्योति का जागरण किया जाना आज की सर्वप्रथम सर्वप्रधान आवश्यकता है। हमारा प्रथम चरण इसी के लिये है
अखण्ड-ज्योति के वर्तमान पाठकों से गत अंक में अनुरोध किया गया था कि वे हिन्दी के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा पर अच्छा अधिकार रखते हों, और साहित्य की दृष्टि से ऊंचे स्तर का अनुवाद कर सकते हों तो वे अपनी सेवाएं हमें दें। कई सज्जनों के पत्र भी आये हैं। अभी इतना ही करना चाहिये कि अखण्ड-ज्योति के किसी लेख का अनुवाद करके वे हमारे पास उस भाषा में भेज दें
अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
इस भवितव्यता में हमें अनुकूल भूमिका प्रस्तुत कर अपने को श्रेय-साधकों-भागीरथों की पंक्ति में खड़ा करना चाहिये। अखण्ड-ज्योति परिवार यही कर रहा है
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को यह प्रेरणा दी जाती रही है कि वे बदलती हुई संभावनाओं को विवेक की दिव्य दृष्टि से देखें और यह निर्णय करें कि ऐसे मध्यकाल में उनका विशेष कर्त्तव्य है या नहीं? मूढ़ की एक ही पहचान है कि वह जिस ढर्रे में बंध गया उसी में कोल्हू के बैल की तरह घूमता रहता है। वह न अपनी कोई भूल सुधारता है और न किसी श्रेष्ठ संभावना के लिये तैयार होता है। इस स्तर के लोगों से और कहना सुनना बेकार है, वे और सोचने-समझने, छोड़ने, पकड़ने की स्थिति में हैं ही नहीं तो उनसे सिरफोड़ी कौन करे? उन्हें तो प्रकृति के थपेड़े ही रास्ते पर लाते हैं
कोई बड़ा गुरुकुल चलाने की स्थिति में अभी हम नहीं हैं, पर इतना अवश्य चाहते हैं कि वर्तमान अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में से हर वर्ग के लोगों को अपने जीवन के अनुभवों एवं निष्कर्षों की पूँजी के आधार पर जिनसे हमने स्वयं प्रगति की है-उन सद्गुणों की सम्पत्ति का वितरण इन थोड़े से शेष दिनों में करते जाने की उत्कंठा प्रबल हो रही है। इसलिए प्रशिक्षण की ‘एक योजना इन दिनों बनाई है और उसे आगामी जून से कार्यान्वित करने जा रहे हैं
अखण्ड-ज्योति असली अध्यात्म की प्रबल प्राण-प्रतिष्ठा करने के लिए अवतीर्ण हुई है। उसने अपने जीवनकाल से ही वस्तुस्थिति को सर्व-साधारण के सामने उपस्थित किया है। क्योंकि संसार का भावी निर्माण अध्यात्मवाद के नाम पर होने वाला है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-May
इस प्रक्रिया को आरम्भ करने के लिये संगठित रूप से कार्य किया जाए तो अधिक सुविधा रहेगी और अधिक सफलता मिलेगी। अखण्ड-ज्योति के सदस्य मिला कर एक छोटी समिति कार्य के लिये संगठित कर सकते हैं। या-दो व्यक्ति ही आगे बढ़ कर स्थानीय व्यवस्था जमाने के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं। अपने यहाँ जितने भी अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं उन सब के पास जाकर उनकी जन्म तिथियाँ नोट कर लेनी चाहिएं
या-दो व्यक्ति ही आगे बढ़ कर स्थानीय व्यवस्था जमाने के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं। अपने यहाँ जितने भी अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं उन सब के पास जाकर उनकी जन्म तिथियाँ नोट कर लेनी चाहिएं। उस दिन उन्हें क्या करना है, यह विस्तारपूर्वक समझा देना चाहिये परिवार के सभी सदस्यों को उसमें उपस्थित होने की सूचना दे देनी चाहिये। निजी मित्र, कुटुम्बियों को आमन्त्रित एवं सूचित करने का कार्य संबद्ध व्यक्ति को स्वयं ही करना चाहिये
यह प्रचलन अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में आरम्भ किया जा रहा है पर आगे चल कर इसका जन-जन में प्रचार होगा। यह प्रेरणा हर व्यक्ति का आत्म-निर्माण करके समाज निर्माण की महती आवश्यकता पूरी करने में आश्चर्यजनक रूप से सहायक होगी। इसलिये प्रचलन को अग्रगामी बनाने में हमें पूरे उत्साह से काम करना चाहिये
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य, परिजन इस वर्ष छंटनी योजना के कारण काफी घट गये हैं। पर जो रह गये हैं वे भावनाशील, सक्रिय, विवेकशील और आदर्शवाद में निष्ठा रखने वाले हैं, इसमें सन्देह नहीं। इसलिये देश-व्यापी, विश्वव्यापी परम्परा का प्रचलन करने के लिये अपने उस वर्त्तमान-दस हजार व्यक्तियों के परिवार में कार्य आरम्भ कर देना चाहिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-November
मनुष्यों और उनके स्वयम्भू नेताओं की भूलों तथा त्रुटियों के कारण संसार में जो भेदभाव, विरोध, मनोमालिन्य, संघर्ष का वातावरण उत्पन्न हुआ वह अब अपनी चरम-सीमा पर पहुँच चुका है और विनाश के प्रलयकालीन मेघों की भाँति पृथ्वी पर फटने ही वाला है। इस भीषण-भविष्य का कुछ परिचय जुलाई की अखण्ड-ज्योति में दिया गया था। इस प्रलयकाण्ड के लिये सूक्ष्म जगत् की शक्तियों में कैसा परिवर्तन हो रहा है और लोगों को गलत रास्ते से लौटाने के लिये महाकाल का डमरू क्या सन्देश सुना रहा है इस पर अक्टूबर के अंक में भरपूर प्रकाश डाला गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-January
अखण्ड-ज्योति परिवार के अब इस अंक से बहुत कम सदस्य रह गये हैं। जो किसी दबाव संकोच के चंदा तो दे देते थे पर पत्रिका को पढ़ते नहीं थे, ऐसे सभी पाठकों को हटा दिया गया है। 40 हजार में से 4 हजार अब वे बचे हैं जो हमारे शरीर के प्रति नहीं, विचारों के प्रति श्रद्धा रखते हैं
जिन घरों में यह दोनों स्थापित नहीं, उन्हें अध्यात्मवादियों का घर नहीं कहा जा सकता। अतएव हर अखण्ड-ज्योति के परिजन को अपने घर में यह दोनों स्थापनायें कर ही लेनी चाहिए
उस संकल्प को 40 दिन के भीतर कार्यान्वित कर लेना चाहिए। जिनमें थोड़ी भी विचार-शीलता का अंकुर हो ऐसे लोगों के नाम इस अवधि में ढूँढ़ लेने चाहिए और उन्हें पिछले अखण्ड-ज्योति तथा युग-निर्माण के अंक, ट्रैक्ट पढ़ाने आरंभ कर देने चाहिए
अस्तु, अखण्ड-ज्योति के परिजनों को सच्चे अध्यात्मवादी अपने साथी सहयोगी के रूप में देखने की आकाँक्षा के साथ यह इच्छा रहना भी स्वाभाविक है कि परिजनों के क्रिया-कलाप में सेवा-साधना का पुट अवश्य रहें। कहना न होगा कि अन्न, वस्त्र, जल, निवास आदि के दान तो बहुत ही स्थूल स्तर के शरीरों को थोड़ी देर के लिये लाभ पहुँचा सकने मात्र की सुविधा देते हैं। वास्तविक दान तो किसी की मनोदशा विचारधारा को सन्मार्ग की ओर मोड़ देने में ही है
गत गीता जयंती (23 दिसम्बर 1966) से अपने 4 हजार साथियों, अखण्ड-ज्योति के वर्तमान सदस्यों को साथ लेकर ज्ञान-सत्र-ज्ञान-यज्ञ का विधिवत् समारंभ किया है, यह आगामी 5 वर्ष तक चलता रहेगा। इसकी पूर्णाहुति करके हम योगी अरविंद एवं महर्षि रमण के स्तर की युगाँतर प्रस्तुत करने वाली साधना के लिए हिमालय चले जायेंगे। अपने वर्तमान निष्ठावान परिजनों से हम यह आशा करेंगे कि वे उपेक्षा, लापरवाही, ढील-पोल की आदत छोड़ दें और जो कुछ करना है उसे पूरे मन से ठीक तरह करने का स्वभाव बनायें
वर्तमान अखण्ड-ज्योति परिजनों से यह आशा की गई है कि वे जिस विचारधारा को पत्रिका के पृष्ठों में पढ़ते हैं, उसे क्रियान्वित करने का भी प्रयत्न करें। विचार जब तक कार्यरूप में परिणित नहीं होते, तब तक वे संस्कार का रूप धारण नहीं करते। संस्कार स्वभाव का अंग बनकर व्यक्ति को दिशा देते और आगे बढ़ाते हैं
अखण्ड-ज्योति के पाठकों के सामने सबसे प्रथम आध्यात्मिक साधना का ऐसा ही विधान रखा गया है जो आत्मबल की, साहस की अपेक्षा रखता है। अपने परिवार एवं परिजनों में नव-निर्माण की विचार-धारा फैलने में एकमात्र कठिनाई अपनी झिझक एवं संकोच-शीलता ही है। किसी से हुई बात कैसे कहें? कोई क्या समझेगा? इसमें अपनी हेटी होती है, हम क्यों किसी के पास जाएं? कोई कुछ पूछ बैठा तो क्या उत्तर देंगे? आदि-आदि न जाने कितने प्रश्न मन में उठते हैं, और एक झिझक एवं संकोच भरा वातावरण उपद्रव के रूप में खड़ा कर देते हैं
बात इतनी भर है कि- ‘अपने परिवार के तथा प्रभाव क्षेत्र के सभी व्यक्तियों के नाम एक उसी प्रयोजन के लिए बनाई गई विशेष कापी में नोट कर लिए जायें। उन्हें ही अपनी अखण्ड-ज्योति या युग-निर्माण पत्रिकायें पढ़ने के लिए दी जाएं और ऐसी चतुरता पूर्ण रीति-नीति बरती जाए कि वे रुचिपूर्वक उन्हें पढ़ने को तैयार हो जायें। ’
गायत्री तत्व ज्ञान का महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन करने वाले लेख तो अगले पाँच वर्ष तक छपे रहेंगे, कितनी ही साधनायें बताई जाती रहेंगी पर उनका उपयोग अधिकारी पात्र अनुभवी मार्ग दर्शकों के सहयोग से ही कर सकते हैं। सामान्य प्रशिक्षण जिसका मार्ग-दर्शन अखण्ड-ज्योति में होगा, हर साधक को एक अनुपम प्रकाश एवं आह्लाद प्रदान करेगा। उसकी तैयारी हमें करनी चाहिए। एक महीने का समय इसलिए दिया गया है कि जिनके घर में पूजा स्थली नहीं है वे उसकी व्यवस्था कर लें और जिनसे उपासना क्रम छोड़ रखा है या जिसने अभी आरंभ ही नहीं किया वे उसका आरंभिक उपचार तो चालू कर सकें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-April
इस वर्ष छटनी कार्यक्रम के कारण अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या बहुत घट गई है। बेकार लोगों का हट जाना तो ठीक हुआ पर उनकी स्थान -पूर्ति अच्छे लोगों से होनी चाहिए अन्यथा उसका प्रभाव अपने महान् मिशन पर पड़ेगा। एक नया सदस्य बढ़ाने की चेष्टा प्रत्येक परिजन को करनी चाहिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-September
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-February
इन सब कार्यों में अखण्ड-ज्योति परिजनों का आवश्यक सहयोग मिलेगा ऐसी आशा है
पाँच वर्ष तक गायत्री तत्वज्ञान का स्वरूप समझाने वाले लेख अखण्ड-ज्योति में नियमित रूप से छपते रहेंगे। उनमें षट्-चक्र बंधन, कुण्डलिनी जागरण, सहस्रार कमल प्रस्फुरक आदि अनेक सिद्धि साधनाओं का स्वरूप एवं विवेचन प्रस्तुत किया जाता रहेगा ताकि अधिकारी व्यक्ति आवश्यकतानुसार उनसे लाभ ले सकें। अखण्ड-ज्योति परिजन उन्हें समझने को तो पूरी तरह चेष्टा करते रहें पर साधना उसी क्रम से करें जो उनके स्तर के अनुरूप हो
वह है-सदस्यों के जन्मोत्सवों का शुभारंभ। एक-दो महीने बाद परिजनों को यह करना ही होगा कि स्थानीय अखण्ड-ज्योति परिजनों का एक संगठन बना लें। एक संचालक नियुक्त कर लें। सदस्यों के जन्म दिन नोट करके उस तिथि पर सब सदस्यों को इकट्ठे करके उत्सव मनाने की व्यवस्था करें
अखण्ड-ज्योति परिजनों को ब्रह्म विद्यालय का पुण्य परमार्थ तत्परता-संकल्प और दृढ़ता के साथ पूरा करते रहने के लिए कहा गया था। प्रसन्नता की बात है कि उसका उत्साहवर्धक प्रत्युत्तर मिला है। गीता जयंती की जैसी सूचनायें प्राप्त हुई हैं, उनसे प्रतीत होता है कि अधिकाँश सदस्य उस संकल्प की पूर्ति में जुट गये हैं
उनमें षट्-चक्र बंधन, कुण्डलिनी जागरण, सहस्रार कमल प्रस्फुरक आदि अनेक सिद्धि साधनाओं का स्वरूप एवं विवेचन प्रस्तुत किया जाता रहेगा ताकि अधिकारी व्यक्ति आवश्यकतानुसार उनसे लाभ ले सकें। अखण्ड-ज्योति परिजन उन्हें समझने को तो पूरी तरह चेष्टा करते रहें पर साधना उसी क्रम से करें जो उनके स्तर के अनुरूप हो। अभी तो इस लेख में प्रस्तुत साधना ही अधिकाँश परिजनों के लिए उपर्युक्त रहेगा
गुजराती, मराठी, बंगाली, उड़िया, आसामी, तमिल, तेलगु, अंग्रेजी अभी इन आठ भाषाओं का कार्य हाथ में लेना है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में जो इन भाषाओं को अच्छी तरह जानते हों और उनको अखंण्डता हुआ नहीं, साहित्यिक प्रवाहपूर्ण अनुवाद कर सकते हों, वे सेवा-भाव से थोड़ा समय इस कार्य के लिए देना शुरु कर सकते हैं। अनुवाद तैयार होते रहेंगे और साधनों के अनुरुप उनका प्रकाशन चलता रहेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-July
मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी ज्ञान है। इसलिए अखण्ड-ज्योति के पाठको! वास्तविकता को समझो धन के पीछे दिन-रात पागल रहने की अपेक्षा सद्ज्ञान का संचय करो। आत्मनिर्माण की ओर अपनी अभिरुचि को मोड़ो

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-May
तत्पश्चात पचासों बार आजमाया, सदा ही उससे आश्चर्य जनक लाभ हुआ। अब इन पंक्तियों द्वारा उस नुस्खा को अखण्ड-ज्योति के पाठकों के सामने उपस्थित कर रहा हूँ
हमें हर्ष है कि “अखण्ड-ज्योति” परिवार के कितने ही सदस्यों ने “अखण्ड-ज्योति” सम्पादक को ऐसा विष नियुक्त किया हुआ है। इस नियुक्ति से उन्हें थोड़े ही दिनों में जो लाभ हुए हैं, उसका वर्णन करना न तो उचित ही है न आवश्यक ही। पर उससे “गोच्य प्रकाशन” के महान लाभों का आश्चर्यजनक प्रमाण अवश्य प्राप्त होता है और यह विश्वास हो जाता है कि इस छोटी, सरल एवं सीधी साधना द्वारा जो लाभ होते हैं उन्हें अपने ढंग का अद्भुत ही कहा जा सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-June
पता :- “अखण्ड-ज्योति” कार्यालय, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
यह सुनिश्चित माना जाना चाहिए कि आत्मशक्ति का उपार्जन करने वाले साधक ही अगले दिनों व्यष्टि परक, समष्टिपरक प्रतिकूलताओं को निरस्त कर सकने व अपनी जीवन यात्रा आगे बढ़ा पाने में सफल होंगे। ऐसे में शक्ति संचार की इस प्रक्रिया में जितने अधिक भागीदार बनाए जा सकें , बनाना व प्रत्येक को मिशन की पत्रिकाएँ अखण्ड-ज्योति , युग निर्माण योजना व युग शक्ति गायत्री के द्वारा युग प्रवाह से जोड़ना इस संधिकाल का सबसे बड़ा पुण्य है। दस सहयोगी साधक बनाकर उन्हें गायत्री चालीसा पाठ हेतु प्रेरित करने से लेकर शक्ति संचार प्रक्रिया से जुड़ने हेतु सहमत करना व शाँतिकुँज का आमंत्रण देना भी इस साधना का ही एक अंग है। सप्ताह में एक बार अग्निहोत्र भी संपन्न किया जाय
उपरोक्त विवरण परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा “हमारी वसीयत और विरासत” तथा अप्रैल 1985 की अखण्ड-ज्योति से लिया गया है। औपन्यासिक शैली में चित्रित यह प्रसंग उनका अपनी अदृश्य शरीरधारी सत्त में प्रथम साक्षात्कार का है व बताता है कि कैसे सतगुरु की अनुकम्पा उनके जीवन पर वसन्तपर्व 1926 के उस पावन दिन ब्राह्ममुहूर्त में उतरी। किन्तु जब हम उसी सत्ता के दिव्य अलौकिक प्रसंगों पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि ऐसे दर्शन उनने अगणित भक्तों को कराये हैं कभी कष्टों से त्राण हेतु पुकारने पर, कभी मार्गदर्शन देने हेतु, कभी अपनी सत्त का आभास दिलाने हेतु ताकि भक्त की श्रद्धा को बल मिले

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-May
इसके लिए परम पूज्य गुरुदेव ने एक ही बात कही थी कि वे अपना काम करेंगे, परिजन मात्र पूज्य गुरुदेव की चिंतन धारा से जुड़े रहे शेष काम दैवीचेतना उनसे करा लेगी। चिंतनधारा से तात्पर्य है वह सब कुछ जो भारतीय संस्कृति के पुनर्जीवन द्वारा मानव में देवत्व तथा धरित्री पर स्वर्ग के अवतरण की व्याख्या करते हुए परम पूज्य गुरुदेव अखण्ड-ज्योति पत्रिका रूपी प्राण प्रवाह के माध्यम से जो अपनी विरासत छोड़ गए हैं, उसे घर-घर पहुँचाने का संकल्प लिया जाना। शपथ समारोह जो जून माह में संपन्न होने जा रहा है, इसी संदर्भ में आयोजित है
बंगला भाषा में अखण्ड-ज्योति पत्रिका का अनुवाद चुने हुए लेखों के माध्यम से एक त्रैमासिक पत्रिका के रूप में कलकत्ता से प्रकाशित होता है। इसका नाम अभी “युग निर्माण-योजना “ है। नये नाम
बाँग्ला अखण्ड-ज्योति “ से प्रतिमास प्रकाशन की योजना अगले वर्ष के प्रारंभ से है। इस त्रैमासिक पत्रिका का चन्दा अभी 20 रुपये वार्षिक है। जो भी परिजन इस संबंध में जानकारी चाहते हों , वे “युग निर्माण योजना” बड़ा बाज़ार शाखा 2 मल्लिक स्ट्रीट, तल्ला-1 कलकत्ता-7” पर पत्राचार करें
शपथ समारोह में आने वाले परिजन आने से पूर्व जून की अखण्ड-ज्योति प्राप्त करने की व्यवस्था बनाकर आयें। जिन दिनों शपथ समारोह चल रहा होगा। लगभग उन्हीं दिनों जून की अखण्ड-ज्योति पहुँचेगी
जिन दिनों शपथ समारोह चल रहा होगा। लगभग उन्हीं दिनों जून की अखण्ड-ज्योति पहुँचेगी। डाकघर से मिलकर इस सम्बन्ध में आवश्यक कार्यवाही कर लेनी चाहिए
यह पाठ्यक्रम देवसंस्कृति प्रधान आरंभ किया जा रहा है। यह पाठ्यक्रम जून 92 के अखण्ड-ज्योति अंक से आरंभ हो रहा है। समूचा अंक संस्कृति प्रधान होगा तथा इसी प्रकार आगामी इस पत्रिका के अंक प्रकाशित होते रहेंगे। अभी कुल चार विशेषांक सितम्बर माह तक निकाले जाने की योजना बनी है जिनको मूल आधार बनाकर समयदानी परिजन अपनी मिशनरी की योग्यता बढ़ाने का शिक्षण लेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-June
” (पृष्ठ 14-22) आगे चलकर उनकी गुरुसत्ता उन्हें हिमालय बुलाती रही व समय-समय पर मार्गदर्शन देती रही। अखण्ड दीपक का प्रज्ज्वलन, 24 वर्षों तक 24 लक्ष के गायत्री के महापुरश्चरण, अखण्ड-ज्योति पत्रिका के माध्यम से विचार क्रान्ति का, मानव में देवत्व, धरती पर स्वर्ग की प्रक्रिया का बीजारोपण, गायत्री महाविद्या का जन-जन तक विस्तार , यज्ञीय परम्परा का दिक्-दिगन्त में प्रचलन, आर्षसाहित्य का पुनर्जीवन, जीवन जीने की कला संबंधी साहित्य लेखन, धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया का मार्ग दर्शन, परिव्रज्या परम्परा का पुनर्जीवन, पूर्ण समयदानी लोकसेवियों का उत्पादन हेतु एक टकसाल की स्थापना, सिद्ध तीर्थ-गायत्री तीर्थ का शिलान्यास, विज्ञान व अध्यात्म के समन्वय की शोध हेतु ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया का शुभारंभ प्रज्ञा संस्थानों के रूप में संस्कार केन्द्रों की चार हजार से अधिक संख्या में भारत भर में स्थापना, विश्वभर में हिन्दू संस्कृति का तत्त्वज्ञान पहुँचाने की प्रक्रिया का शुभारंभ यह सब निर्धारण परोक्ष महाकाल की सत्ता द्वारा किये गए जो समय-समय पर परम पूज्य गुरुदेव को निर्देश रूप में दिये जाते रहे , तदनुसार ही उनके जीवनक्रम का एक-एक मील का पत्थर स्थापित होता चला गया। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्धारण जो धरती के स्वर्ग-ऋषियों की कार्यस्थली दुर्गम हिमालय में गुरु-शिष्य द्वारा किया गया , वह था ऋषि परम्परा का पुनरुद्धार-पुनर्जीवन

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-November
अखण्ड-ज्योति का प्रकाशन गायत्री उपासना अंकों से प्रारम्भ हुआ था। तब प्रथम पृष्ठ पर छपने वाली गायत्री माता की छवि के नीचे एक पंक्ति छपा करती थी-”सन्देश स्वर्ग का नहीं धरा पर लाई, इस धरती को ही स्वर्ग बनाने आई। ” तब शायद ही किसी का महाप्राण सत्ता की इस गर्वोक्ति पर विश्वास होता रहा हो, पर कालान्तर में महाकाल ने उस देव सत्ता को किस तरह घर-घर प्रतिष्ठित कर दिया यह सब के सामने है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
इन सब के बीच चौथे दशक के अंत में “मैं क्या हूं नामक आत्मोपनिषद् से आरंभ कर गायत्री महाविद्या के छोटे-छोटे सूत्रों का उद्घाटन करने वाले, गायत्री व यज्ञ को जीवन व्यवहार में हर किसी के द्वारा अपनाये जाने का प्रतिपादन करने वाले परम पूज्य गुरुदेव का आविर्भाव हुआ। देखते-देखते “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका का गायत्री चर्चा प्रसंग ऐसा विस्तृत होता चला गया कि उसने योग व तंत्र के सारे विशिष्ट को आत्मसात कर जन-जन के लिए सुलभ बना दिया। 1008 कुण्डी गायत्री महायज्ञ द्वारा एक विशाल गायत्री परिवार का संगठन करने वाले परम पूज्य गुरुदेव ने बिना अधिक स्वयं को प्रकाश में लाए, वर्ष की उच्चस्तरीय ताँत्रिक स्तर की साधना हिमालय में पुनः 1960-61 में की (जो उनकी चौबीस लक्ष की चौबीस महापुरश्चरणों के बाद की साधना है) तथा तुरंत आते ही युग निर्माण योजना को जन्म देकर जन-जन को पंचकोशी साधना द्वारा साधना पथ पर एक ऊँचे सोपान पर चल पड़ने को प्रेरित किया। सामान्यतया नारी शक्ति से तप के स्थान पर भाव प्रधान अपेक्षाएँ की जाती रही हैं किन्तु युगऋषि ने एक विराट नारी समुदाय को भी इस कठोर साधना का भागीदार बनाया, पंचकोशी साधना हेतु सुनियोजित पाठ्यक्रम चलाया, सूर्य की साधना सबके द्वारा इन प्रतिकूल परिस्थितियों में किए जाने की महत्ता प्रतिपादित की तथा महाकाल की युग प्रत्यावर्तन क्रिया का उद्घाटन करते हुए कठिन से कठिन साधनाओं को सरल रूप देते हुए एक विशाल समुदाय को गायत्री-सावित्री महाशक्ति की साधना से जोड़ दिया
इन पंक्तियों में सिर्फ ब्रह्मवर्चस् शोध अनुसंधान की एक झलक भर है। इसका व्यापक दिग्दर्शन,-प्रयोगों-परिणामों का वैज्ञानिक विश्लेषण अखण्ड-ज्योति के आगामी पृष्ठों में प्रस्तुत होता रहेगा। जिन्हें स्वयं में देवत्व जगाने की अकुलाहट है उन्हें विशिष्ट साधनात्मक प्रयोगों से गुजरने के लिए शिविरों में उत्साहपूर्वक सम्मिलित होना चाहिए। जो मनीषी वैज्ञानिक, युग ऋषि के इस शोध प्रयोजन के लिए समर्पित होना चाहते हैं
इस क्षेत्र में किए गए उनके अलौकिक प्रयास गुह्य साधनाएँ अभी सर्व-सामान्य की जानकारी से अछूती हैं। निकट भविष्य में अखण्ड-ज्योति के पृष्ठ इन गुह्य और गहन पर्तों को खोलने वाले सिद्ध होंगे। लोक जीवन उनके तंत्र उद्धारक स्वरूप से परिचय प्राप्त कर सकेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-March
जो यहाँ न आ सकें, उन्हें पत्राचार द्वारा प्रशिक्षण दिया जा सके इसकी सुविधा दी जाएगी। दूसरा यह साँगोपाँग विवेचन जिसके आधार पर देवसंस्कृति कभी विश्व संस्कृति बनी थी व अगले दिनों बनेगी, अखण्ड-ज्योति के विशेषाँकों के रूप में जून माह से दिसम्बर 92 के अंकों में प्रकाशित होगा। कलेवर उनका यथावत ही रहेगा, परन्तु सामग्री साँस्कृतिक मार्गदर्शनपरक होगी
लीला प्रसंग प्रकरण के अंतर्गत परम पूज्य गुरुदेव से जुड़े “ऑकल्ट” विवरणों को उनकी सिद्धि के घटना क्रमों को पढ़कर किसी बुद्धिजीवी वर्ग के पाठक को लगे कि “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका के प्रतिपाद्य विषय से कुछ हटकर यह विवेचना किस कारण प्रस्तुत की जा रही है तो उन्हें हम बताना चाहेंगे कि वस्तुतः यह स्तंभ भी पूरी तरह “अखण्ड ज्योति” के संकल्पों की परिधि के भीतर ही है। 1938 में हाथ से लिखा प्रथम अंक वसंत पंचमी पर निकलने वाले तथा 1940 की वसंतपंचमी से उसका अधिकृत छपा हुआ प्रथम संस्करण प्रकाशित करने वाले परम पूज्य गुरुदेव ने जीवन भर एक ही विषय को बहुविध रूप में संदर्भों के साथ प्रस्तुत किया। वह यह कि मानव में अनन्त संभावनाएँ छिपी पड़ी हैं व उन्हें विकसित कर वह देवमानव सिद्धि पुरुष-देवदूत स्तर तक पहुँच सकता है
स्थूल, सूक्ष्म व कारण शरीर की विवेचना कई बार ‘अखण्ड-ज्योति’ के पृष्ठो पर की जा चुकी है। फिर भी एक स्पष्टीकरण के नाते स्थूल शरीर तो वह है जो अभिव्यक्त है। जिसमें अन्नमयकोश व उसमें संव्याप्त प्राणसत्ता का अंश आता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
अपनी परोक्ष मार्गदर्शक सत्ता से बाल्यकाल में साक्षात्कार उनका इसी दिन हुआ था। अखण्ड दीपक का प्रज्ज्वलन से लेकर चौबीस महापुरश्चरणोँ का शुभारम्भ, “अखण्ड-ज्योति “ पत्रिका से लेकर गायत्री परिवार की स्थापना, आर्षग्रन्थों के भाष्य से लेकर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की परिकल्पना तथा युग निर्माण योजना के सूत्रपात से लेकर देश भर में चौबीस सौ प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण के संकल्प इसी पावन वेला में लिये गये। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान व गायत्री नगर की स्थापना इसी पावन दिन हुई। महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के अंतर्गत क्राँतिधर्मी साहित्य की सृजन शृंखला इसी दिन आरंभ हुई

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-April
उपरोक्त पंक्तियाँ परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अप्रैल 1982 की “अखण्ड-ज्योति” के विशिष्ट सम्पादकीय के रूप में तब लिखी गयी थीं, जब वे पूरे भारत के दौरे से लौटकर आए थे व आस्था संकट की विभीषिका का दृश्य रूप चर्मचक्षुओं से देखकर उनने एक मार्मिक लेख लिखा था-”क्या काफिला बिछुड़ ही जायेगा ?” आज दस वर्षों के बाद यदि हम स्थिति का सर्वेक्षण करना चाहें तो पायेंगे कि उनकी अपेक्षा समय के अनुरूप कितनी विकट थीं व अब और भी कुछ बढ़ी-चढ़ी मात्रा में हमारे समक्ष है। प्रतिभाओं से, जागृतात्माओं से उनने अपनी मर्मस्पर्शी शैली में एक ही बात कही थी कि “समय की चुनौती प्रतिभाओं को कान पकड़कर झकझोर रही है इसके उत्तर में निर्णय उन्हीं को लेना है कि वे दाँत निपोरें या सीना तानें। ”
ऐसे में कभी किसी प्रकार की तकलीफ उन्हें हुई भी तो वह किसी का कष्ट निज पर ओढ़ना ही उसके मूल में था। श्रीमती मायावर्मा से सभी अखण्ड-ज्योति परिजन उनकी काव्य प्रतिभा के कारण परिचित हैं। 6/12/67 को अपने हस्तलिखित पत्र में पूज्यवर उन्हें लिखते हैं कि

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-June
कुछ महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति अखण्ड-ज्योति एवं परमपूज्य गुरुदेव के वाङ्मय के संबंध में अपना अंतःकलुष व्यक्त करते एवं अनर्गल प्रलाप करते देखे जाते हैं। इनमें से कुछ स्वयं को शिष्य बताते, गुरु-भक्ति का स्वाँग बनाते, मिशन का सदस्य बताते भी देखे जाते हैं। जो गुरुदेव के विचारों का नहीं, वह उनका कैसे होगा? ऐसे गुरुद्रोहियों को स्वयं को तो शिष्य कहने का भी अधिकार नहीं है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-July
हम प्रतिदिन चार घंटे लेखन करते हैं। नौ अखबारों का हम संपादन करते हैं, अखण्ड-ज्योति का संपादन करते हैं, अपने मनोयोग और तन के सहयोग से। हम दोनों काम इसलिए कर लेते हैं कि हमारा अपना मन और तन दोनों एक साथ लगते हैं, परंतु आपकी कभी ‘तन डोले’ तो ‘कभी मन डोले’ वाली स्थिति रहती है। इसलिए आप काम में अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-January
लोक-शिक्षण के लिए हम सब कटिबद्ध होंगे। ‘अखण्ड-ज्योति’ का बड़ा परिवार है। हममें से प्रत्येक दीपक जलाने को तत्पर होगा तो इस अन्धेरी रात में दीपावली का पुण्य-पर्व झिलमिलाने लगेगा। जिन कुविचारों ने हमारे शरीरों को चौपट कर रखा है, हमारे मनों को मलीन बना रखा है, हमारे समाज को विसंगठित एवं पतनोन्मुख बना रखा है, उन्हें बुहार कर बाहर फेंक देने के लिए हमें स्वच्छता-सैनिकों की तरह अपनी झाडू सँभालनी पड़ेगी
हमारी पहली योजना यह है कि—‛अखण्ड-ज्योति’ का प्रत्येक सदस्य अब एक धार्मिक पत्रिका का पाठक मात्र न रहेगा वरन् वह एक लोक शिक्षक के रूप में अपना उत्तरदायित्व अनुभव करेगा। युग-निर्माण के लिए आवश्यक प्रकाश ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रस्तुत करेगी, वह एक बिजली घर के रूप में रहेगी और हम में से प्रत्येक एक बल्ब के रूप में प्रकाशित होकर अपने क्षेत्र में प्रकाश फैलावेगा। अज्ञान ही मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु है, इसी अन्धकार में नाना प्रकार के पाप पनपते हैं
वसन्त पंचमी अखण्ड-ज्योति-परिवार द्वारा आरंभ की जाने वाली प्रवृत्तियों का शुभ मुहूर्त है। इसी दिन अखंड दीपक स्थापित हुआ था, इसी दिन हमने अनुष्ठान आरंभ किये थे; इसी दिन मथुरा में आना हुआ था, इसी दिन 108 कुण्ड वाले गायत्री यज्ञ का आरंभ किया गया था, इसी दिन गायत्री-तपोभूमि प्रेस, और अखंड-ज्योति प्रेस, खुले थे। अब अष्टग्रही योग से संबंधित युग-निर्माण योजना का कार्यारंभ भी वसन्त पंचमी के दिन—माता सरस्वती की जन्म-जयन्ती के दिन—सुव्यवस्थित रूप से अग्रसर होता है
युग-निर्माण के लिए भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों से इस प्रकार की आशा की जा सकती है। उत्कृष्टता और भावना की दृष्टि से हम लोग संख्या में थोड़े होते हुए भी एक बड़ी शक्ति के रूप में संगठित हैं। परमार्थ का लक्ष हमें प्रिय है
हमारी पहली योजना यह है कि—‛अखण्ड-ज्योति’ का प्रत्येक सदस्य अब एक धार्मिक पत्रिका का पाठक मात्र न रहेगा वरन् वह एक लोक शिक्षक के रूप में अपना उत्तरदायित्व अनुभव करेगा। युग-निर्माण के लिए आवश्यक प्रकाश ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रस्तुत करेगी, वह एक बिजली घर के रूप में रहेगी और हम में से प्रत्येक एक बल्ब के रूप में प्रकाशित होकर अपने क्षेत्र में प्रकाश फैलावेगा। अज्ञान ही मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु है, इसी अन्धकार में नाना प्रकार के पाप पनपते हैं। उल्लू, चमगादड़, सर्प, बिच्छू, काँतर, कानखजूरे अन्धेरे में ही बैठे रहते हैं
‘अखण्ड-ज्योति’ आपके पास पहुँचती ही है। इन दिनों जो अंक उसके निकल रहे हैं तथा आगे निकलेंगे उनमें जीवन को निर्माण करने वाला तत्व बहुत कुछ है। उसे हृदय की स्याही में डुबोकर प्राणपूर्ण भाषा में, पूरे मनोयोग की कलम से लिखा जा रहा है
छोटी, सस्ती, सुन्दर, सुसज्जित एवं आग भरी पुस्तिकाओं की एक लम्बी सीरीज लिखने का हमारा विचार है। अखण्ड-ज्योति के सदस्य लोग शिक्षक की तरह अपनी डायरी में नोट किये नाम वाले व्यक्तियों को उन्हें भी यथासमय पढ़ाते रहेंगे। और उन विषयों पर चर्चा करते रहेंगे तो यह लोक शिक्षण का एक विशाल कार्यक्रम चल पड़ेगा। 20 हजार हम लोक शिक्षक यदि हर साल 10 व्यक्तियों को यह विचारधारा पहुँचाने लगें और फिर उन दस व्यक्तियों में से भी कुछ व्यक्ति इस कार्य प्रणाली को अपना लें तो चक्रवृद्धि ब्याज के सिद्धान्त से अगले पाँच वर्षों में ही देश के कोने-कोने में यह शिक्षण पद्धति कार्यान्वित हो सकती है
व्यक्ति में सुधार और परिवर्तन इसी माध्यम से संभव हो सकता है। अखण्ड-ज्योति-परिवार के साथ अब हम युगनिर्माण के लिए ज्ञान यज्ञ आरंभ करते हैं। विभिन्न प्रयोजनों की पूर्ति के लिए विभिन्न यज्ञों के आयोजन होते रहे हैं। गायत्री का अग्निहोत्र, यज्ञ प्रथम अध्याय के रूप में अब अपने नियत लक्ष तक आ पहुँचा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-December
(5) पूर्णाहुति के इस पुनीत अवसर पर हम आपके समस्त स्वजन-सम्बन्धियों को एकत्रित देखना चाहते हैं इसलिए अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों, गायत्री महायज्ञ के भागीदारों, संरक्षकों, साधारण गायत्री उपासकों तथा उनके परिवार को सादर आमन्त्रित करते हैं। जो आना चाहें वे आवश्यक जानकारी के लिए छपी हुई विवरण-पत्रिका मँगा ले और आने की पूर्ण सूचना देकर स्वीकृति प्राप्त करलें, केवल स्वीकृति प्राप्त सज्जनों के ठहरने भोजन आदि की ही व्यवस्था की जायेगी
(1) ‘अखण्ड-ज्योति’ का नया वर्ष जनवरी से प्रारम्भ होता है। सो अधिकाँश ग्राहकों का चन्दा भी दिसम्बर में ही समाप्त होता है। जिनका चन्दा दिसम्बर में समाप्त होता है, उनसे प्रार्थना है कि अपना चन्दा मनी-आर्डर से अविलम्ब भेज दें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-October
सायंकाल को नित्य की भाँति अपने एकान्त उपासना-कक्ष में प्रवेश किया। वहाँ एक लकड़ी की चौकी पर शीशे के फ्रेम में जड़ा “अखण्ड-ज्योति “ प्रेस मथुरा से प्राप्त गायत्री की एक वात्सल्यमयी छवि अपनी ममता बिखेरती रहती है। सम्मुख में वृत का अखण्ड दीप जलता रहता है
(1) अखण्ड-ज्योति के इस अनुभव अंक के लिए बहुत बड़ी संख्या में अनुभव आये थे, पर पृष्ठ- संख्या सीमित रहने के कारण उनमें से थोड़े ही छापे जा सके। शेष अनुभवों का क्रमशः अगले अंकों में निकालने का प्रयत्न करेंगे
अखण्ड-ज्योति के पाठकों को सूचना:−

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-November
यह गत 24 वर्ष से निरन्तर प्रकाशित रही है। ग्राहक-संख्या की दृष्टि में कल्याण के बाद धार्मिक पत्रों में ‘अखण्ड-ज्योति’ का दूसरा नम्बर है। उसकी उपयोगिता तथा सस्तेपन की सर्वत्र भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही है। इसमें हर महीने गायत्री सम्बन्धी लेख रंगीन चित्र तथा समय-समय पर गायत्री उपासना सम्बन्धी आवश्यक सूचनाएँ, विज्ञप्तियाँ तथा जानकारियां प्रकाशित होती रहती है
एक दिन मेरे परम मित्र श्री जीवनभर दीवानजी ने (जिनका मैं चिरकृतज्ञ हूँ और रहूँगा) मुझे गायत्री उपासना की चर्चा के संग श्रीराम शर्मा आचार्य और “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका की चर्चा सुनाई और उसी रात में मैंने स्वप्न देखा कि गायत्री मन्त्र के पवित्र उच्चारण सहित मैं महायज्ञ में आहुति दे रहा हूँ। उस समय मुझे अनिर्वचनीय आनन्द मिल रहा था। जागने पर भी मेरे अंगों में उस आनन्द का संचरण होता रहा
‘अखण्ड-ज्योति’-यह गायत्री संस्था की पत्रिका है। यह गत 24 वर्ष से निरन्तर प्रकाशित रही है। ग्राहक-संख्या की दृष्टि में कल्याण के बाद धार्मिक पत्रों में ‘अखण्ड-ज्योति’ का दूसरा नम्बर है
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा
आचार्य जी से, अखण्ड-ज्योति परिवार के अनेक अनुभवी विज्ञ पुरुषों से तथा गायत्री संस्था आध्यात्मिक केन्द्र से जिनकी किसी प्रकार का सम्बन्ध रखने की इच्छा है, उन्हें ‘अखण्ड-ज्योति’ का पाठक रहना आवश्यक है। यही सम्बन्ध सूत्र हैं, जो पाठकों को इस आध्यात्मिक केन्द्र से जोड़े रहता है, पथ -प्रदर्शन और प्रकाश देता है। यदि यह सम्बन्ध-सूत्र टूटा रहे, अखण्ड ज्योति द्वारा प्रकाशित प्रकाश एवं सन्देश प्राप्त न होते रहें, तो फिर लाभ को उठा सकने की कोई सम्भावना नहीं रहती , जो इस परिवार के सदस्य रहने पर मिलना सम्भव है
यदि आप अब तक ‘अखण्ड-ज्योति’ के ग्राहक नहीं बने है, तो आज ही 2। ) भेज कर ग्राहक बन जाइये। यदि आप ग्राहक हैं तो और नये सदस्य बढ़ाने का प्रयत्न कीजिये
अचानक एक दिन गुजराती भाषा में डॉ. गणपति सिंह जी लिखित ‘गायत्री महिमा’ नामक पुस्तक पढ़ी। फिर इस मंत्र की अधिक महिमा जानने के लिये व्यग्रता हुई और “अखण्ड-ज्योति” मथुरा का पता लगा। वहाँ से पत्रिका मंगायी-पुनः गायत्री साहित्य मंगाकर अध्ययन किया। इससे गायत्री उपासना पर मेरी श्रद्धा दृढ़ हो गयी और नित्य गायत्री जप करने लगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-March
आडम्बर नहीं - किराये के एक साधारण से मकान में अखण्ड-ज्योति कार्यालय और कर्मयोग गुरुकुल है। दस व्यक्तियों के रहने के लिए स्थान का, चारपाइयों का, पढ़ने के लिए डेस्कों का प्रबंध है। इतना सा - छोटा सा -यह बाह्य रूप ही देखने को मिलेगा! ज्ञान, अनुभव और आत्मसाधना के फलस्वरूप जो वस्तुएं मिलनी चाहिए वह यहाँ है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-April
मैनेजर-अखण्ड-ज्योति, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-December
इस मास ज्ञान यज्ञ के लिए निम्न सहायताएं प्राप्त हुई। अखण्ड-ज्योति इन महानुभावों के प्रति अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है
गत सप्ताह ‘अखण्ड-ज्योति’ सम्पादक श्री आचार्य जी की धर्मपत्नी का स्वर्गवास हो गया। कराल काल से न जाने इस दंपत्ति का स्वर्गीय सौभाग्य क्यों सहन न हुआ। श्रीमती जी के तत्वावधान में महिलाओं सम्बन्धी एक उच्च कोटि के मासिक पत्र निकलने की तैयारी हो रही थी कि अकस्मात यह वज्रपात हो गया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-October
-मैनेजर- अखण्ड-ज्योति

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-November
अखण्ड-ज्योति कार्यालय, फ्रीगंज, आगरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-December
पत्र आदि “अखण्ड-ज्योति कार्यालय मथुरा” के पते पर भेजिए
पत्र व्यवहार के लिये मुहल्ले का उल्लेख किया जाये तो भी कुछ हर्ज नहीं। अखण्ड-ज्योति कार्यालय, मथुरा के पते पर पत्र, रजिस्ट्री, मनीआर्डर आदि भेजे जा सकेंगे। अब आगरे के पते पर पत्र व्यवहार न करके मथुरा के पते पर ही करना चाहिए। पाठक इसे अच्छी तरह नोट कर लें
अखण्ड-ज्योति कार्यालय,

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-March
अखण्ड-ज्योति परिवार के हृदयों में ईश्वर ऐसी ही होली जला दें। यही आज मेरी प्रार्थना है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-October
मैनेजर- अखण्ड-ज्योति कार्यालय,

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-June
गीता एक अपूर्व रत्न है, जिसे जगत् के एक अपूर्व कारीगर ने ऐसे विचित्र ढंग से तराशा है कि उसके प्रत्येक अवयव से एक ‘अखण्ड-ज्योति’ जगमगा रही है। इस ज्योति ने सूर्य की ज्योति को भी मात कर दिया है, क्योंकि सूर्य की ज्योति तो इस संसार को ही प्रकाशित करती है परन्तु यह ज्योति ब्रह्मलोक तक प्रकाश करती है, जिसके सहारे से मुमुक्षा लोग अहरहः ब्रह्मलोक गमन करते हैं
गीता एक ‘अखण्ड-ज्योति’ बाला प्रज्वलित प्रदीप है, यह प्रदीप भारत-मन्दिर में प्रज्वलित हुआ है, किन्तु प्रकाश समस्त जगत में करता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-May
उन्हीं के भाव भरे अनुदानों से मनुष्य में देवत्व के उदय का और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न साकार बन सकेगा। अखण्ड-ज्योति परिजनों में से प्रत्येक की महत्वाकाँक्षा और भावी योजना यह होनी चाहिए कि वह अपने शरीर और परिवार तक ही सीमित न रहकर वानप्रस्थ ग्रहण करके यथार्थवादी आध्यात्मिकता का परिचय लक्ष्य निर्धारित करे तो देर-सवेर में अवसर भी मिल ही जाता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-June
घर-घर गाँव गाँव नव-युग का सन्देश सुनाने के लिए हमें बादलों की तरह निकलना चाहिए और अपनी अमृत वर्षा से संस्कृति की हरीतिमा उत्पन्न करने के लिए प्रबल प्रयास करना चाहिए। इस सन्दर्भ में अप्रैल की अखण्ड-ज्योति के सम्पादकीय लेख में बहुत कुछ कहा जा चुका है। उस प्रयोजन में हममें से प्रत्येक को कुछ न कुछ करते ही रहना चाहिए। जन मानस के परिष्कार के लिए जन सम्पर्क अतीव आवश्यक है
अन्यत्र तो किसे समय की माँग समझाई जाय और किसके आगे हाथ पसारा जाय। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य क्रमशः अपने को अधिक प्रखर स्तर के सृजन शिल्पी बनाते चलें। तभी वे अपने विशेष अवतरण का ईश्वरीय उद्देश्य पूरा कर सकेंगे। व्यक्तिगत भौतिक महत्वाकाँक्षाओं में कटौती किये बिना युग की पुकार को पूरा कर सकने के उपयुक्त अनुदान दे सकना सम्भव ही न हो सकेगा
अपने स्वल्प साधनों से ही जो सम्भव था आरम्भ कर दिया गया। अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी परिजन स्वभावतः इस अभिनव प्रशिक्षण प्रक्रिया का लाभ लेना चाहते हैं, इस स्थान और व्यवस्था की न्यूनता को ध्यान में रखते हुए सीमित शिक्षार्थी बुलाने और उनके स्वल्प कालीन सत्र चलाकर अधिक लोगों को लाभ देने की नीति अपनाई गई। यही क्रम अब तक चल रहा है। प्रशिक्षण की उपयोगिता ने शिक्षार्थियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि की है
अध्यात्म विज्ञान को सर्व साधारण के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए। अखण्ड-ज्योति इसी प्रयास में निरत है। साधना जयन्ती वर्ष में तो इसी दिशा में व्यापक वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है
बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में घुसी हुई प्रतिगामिता को निरस्त करना आवश्यक है ताकि भूमि की अच्छी जुताई हो जाने पर न्याय और विवेक के बीज बोना और सतयुग की फसल काटना संभव हो सके। अखण्ड-ज्योति का आलोक इसी प्रयास में संलग्न है। लक्ष्य की दिशा में हमारे सुनिश्चित कदम सुनियोजित क्रम से एक के बाद उठते चले जा रहे हैं
1 जुलाई से उसका नया वर्ष आरम्भ होता है। अखण्ड-ज्योति की तरह परिजन उसे भी महत्व दें और सदस्य बनें बनाएं तो निश्चय ही उस प्रयास की दूनी चौगुनी प्रगति अगले ही दिनों दृष्टि गोचर हो सकेगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-August
अखण्ड-ज्योति पाठकों की जानकारी में उपरोक्त प्रयोजन के लिए उपयुक्त साहित्य प्रयास तथा अध्ययनशीलों की जो जानकारी हो, उसे हरिद्वार भिजवा दें इससे हमारे इन दिनों चल रहे प्रयास में कुछ न कुछ सहायता ही मिलेगी। यों इस प्रयास को सफल एवं व्यापक बनाने की तैयारी तो हम में से प्रत्येक को अभी से करनी चाहिए
पूछताछ-खोजबीन-पत्र व्यवहार का सिलसिला चल तो देर से रहा था, पर अब उसे और भी अधिक तीव्र कर दिया गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार में तथा परिजनों के सम्पर्क क्षेत्र में जिन्हें इस प्रकार की जानकारियाँ हो सकती हैं उन्हें सम्पर्क में सबसे प्रथम लिया जा रहा है। स्पष्ट है कि इतने बड़े शोध कार्य के लिए अध्ययन, चिन्तन एवं परामर्श की सुविस्तृत आवश्यकता होगी। प्रतिपादन का ढाँचा खड़ा हो जाने पर उसका प्रकाशन कराना होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-November
यह शक्ति-सम्पादन एवं आत्म-शोधन के अभिप्राय से किया गया एवं विशुद्ध धर्मानुष्ठान कहा जा सकता है। तो भी उसके कुछ पक्ष ऐसे हैं जिनसे सर्वसाधारण को, विशेषतया अखण्ड-ज्योति के परिजनों को अवगत होना ही चाहिए। यह आवश्यकता न समझी गई होती तो सम्भवतः उसे गोपनीय और नितान्त व्यक्तिगत ही रखा गया होता, जैसी कि हमारी अन्यान्य कठिन तप-साधनाएँ समय-समय पर होती रहीं हैं और होती रहेंगी
उपवास का तीसरा कारण विशुद्ध रूप से अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों से सम्बन्धित है। मनोरंजन के लिए इस पत्रिका को कदाचित ही कोई मंगाता हो। जो पढ़ते हैं वे अनुभव करते हैं कि यह उनके अपने विचार हैं अथवा उन्हीं के व्यक्तिगत पत्र के रूप में लिखे गये हैं
उसके लिए जन-मानस का प्रखर मार्ग-दर्शन करने के लिए जागृत आत्माओं को वाणी से नहीं अपने अनुकरणीय आचरण प्रस्तुत करने होते हैं। अखण्ड-ज्योति परिजनों से ऐसी ही अपेक्षा की जा सकती है। उन्हें युग-परिवर्तन की इस विशिष्ट वेला में अपनी जीवन नीति इस प्रकार प्रस्तुत करनी चाहिए जो जनसामान्य के लिए अनुकरणीय बन सके
लेखकों और पाठकों के बीच कदाचित ही कभी कोई सघन सम्बन्ध बनता हो, पर हम लोगों की स्थिति भिन्न है। अखण्ड-ज्योति की पंक्तियाँ बुद्धि को नहीं, हृदय को छूती हैं और यह स्पर्श सघन आत्मीयता के रूप में विकसित होता चला जाता है। कारण स्पष्ट है, हम लोग चिर अतीत से परस्पर एक विशिष्ट शृंखला में बँधे चले आये हैं और स्थान की दृष्टि से दूर रहते हुए भी हम लोग अति निकटवर्ती जैसी मनःस्थिति में रहते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
’’ आजादी की बात तो अविश्वसनीय थी ही, पर देश विभाजन तो सर्वथा असम्भव बात ही लगती थी। लेकिन प्रो0 कीरो की जनवरी 1943 की अखण्ड-ज्योति में पृष्ठ 23 पर छपी भविष्यवाणी थी कि- ‘‘इंग्लैण्ड भारत को स्वतन्त्र कर देगा, पर मजहबी फिसाद से भारत तबाह हो जाएगा। यहाँ तक कि हिन्दू, बौद्ध और मुसलमानों में बराबर-बर विभक्त हो जायेगा। ’’ सभी जानते हैं भारत के अनेक लंका, वर्मा, नेपाल, तिब्बत आदि बौद्ध मतावलम्बी राज्य उससे अलग हो गए और इधर पाकिस्तान का निर्माण हुआ
बसन्त पर्व पर परिजनों की मिशन के लिए एक श्रेष्ठ श्रद्धांजलि ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका की सदस्य संख्या बढ़ाने के रूप में दी जाती रही है। इस वर्ष वह उत्साह घटना नहीं बढ़ना ही चाहिए। साधना स्वर्ण जयंती वर्ष इसी बसन्त पर्व को समाप्त होगा
अस्तु अखण्ड-ज्योति मिशन का- उसके सूत्र संचालक का जन्म-दिन इसी अवसर पर मनाया जाता है। पिछले 40 वर्षों से लगातार इस त्यौहार को ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्य अपना विशेष उत्सव मानते आये हैं और उसे एक पुनीत परम्परा के रूप में हर्षोल्लास भरे आयोजनों की व्यवस्था बनाते रहे हैं। इस वर्ष यह पुनीत पर्व सोमवार ता0 24 जनवरी 77 को है। स्वभावतः परिजन अपने-अपने ढंग से उसे मनावेंगे ही
किन्तु जब बसन्त की उमंग प्रकृति के अन्तराल में उभरती है तो हर वृक्ष में नई कोपलें फूटती हैं, नए पत्ते निकलते हैं, नये फल उमंगते हैं और देखते देखते वे मधुर फलों से लद जाते हैं, पशु-पक्षियों से लेकर कीट-पतंगों तक में उभरती हुई उमंगें प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती हैं और वे उसकी अभिव्यक्ति अपने अपने ढंग की उत्साहवर्धक हलचलों के साथ प्रकट करते दिखाई पड़ते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों के भाव भरे अन्तःकरणों में उत्कृष्टतावादी प्राण की मूर्छना जागनी चाहिए और नव-जीवन का आलोक जगना चाहिए तभी इस बार के बसन्त पर्व की सार्थकता है। ‘इस बार’ शब्द में विशेष उद्बोधन है। साधना स्वर्ण-जयंती वर्ष की इसी अवसर पर पूर्णाहुति है
प्रो0 कीरो की भारत की स्वतन्त्रता सम्बन्धी भविष्यवाणी जनवरी 1945 की अखण्ड-ज्योति में छपी थी। उस समय ब्रिटिश हुकूमत का दमन चक्र तेज था। भारत की स्वतन्त्रता की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी
इसलिए उनकी आवश्यकता भी है और उपयोगिता भी। बसन्त पर्व ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों द्वारा छोटे बड़े रूप में जिस प्रकार मनाया जाता है कदाचित् ही अन्य किसी संगठन द्वारा उस उत्साह से मनाया जाता हो
इसमें उपासना, भावना एवं शुभ-कामना के स्तर पर प्रायः सभी परिजन भागीदार बने हैं। इस वर्ष की पूर्णाहुति अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की संख्या दुगनी कर देने के रूप में की जा सकती है। यह प्रकट तथ्य है कि मिशन का विस्तार पत्रिका के पृष्ठों पर लिपटे रहने वाले प्राण द्वारा ही सम्भव हुआ है। उसका सम्पर्क क्षेत्र बढ़ेगा तो अभीष्ट वातावरण बनने और समर्थ सहकर्मी मिलने की सम्भावना बढ़ेगी
अगले पाँच वर्षों में ऐसे प्रखर लोक-सेवियों की एक साधु मण्डली खड़ी करने का-अपने उत्तराधिकारी परिवार के रूप में स्मृति चिन्ह छोड़ जाने का अपना मन है। अखण्ड-ज्योति परिवार बहुत बड़ा है। एक लाख से अधिक उनके परिजन हैं। इतने लोगों में से उपरोक्त स्तर से एक सौ व्यक्ति निकल सकते हैं
उसी दिन ऐसा नया आलोक मिला था जिसके प्रकाश में लम्बी मंजिल पार करते हुए-उपयोगी सफलताओं का रसास्वादन करते करते यहाँ आ पहुँचे, जहाँ आज हैं। भविष्य में भी कुछ और महत्वपूर्ण बन पड़ा तो वह उसी प्रकाश का वरदान होगा जिसे ‘अखण्ड-ज्योति’ नाम देते रहें हैं और जो घृत दीपक में ही नहीं हमारी अन्तरात्मा के मर्मस्थल में अनवरत आलोक दे रही हैं। यदि ऐसी ही प्रेरणा परिजनों को मिले, यदि ऐसे ही प्रकाश स्फुल्लिंग उन्हें प्राप्त हों तो समझना चाहिए कि पर्व का महत्व और उस पर किया गया आयोजन सार्थक हो गया
जिन्हें उससे सचमुच ही कुछ प्रेरणा मिली हो उनके लिए आवश्यक है कि इन तथ्यों की ओर भी ध्यान दें जो हमारे अन्तःकरण में इन दिनों हिलोरें से रहे हैं। हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति परिजनों में से प्रत्येक को यह उद्बोधन झकझोरे और उसे हमारे कन्धे से कन्धा मिला कर साथ देने और कदम से कदम मिला चल चलने की प्रेरणा दे। हम अपने मार्ग-दर्शक के साथ नहीं तो पीछे अवश्य चले हैं। हमारी अपेक्षा है कि परिवार के भावनाशील लोगों में इन्हीं दिनों कुछ ऐसी उमंगें उठें जिनके सहारे युग की महती आवश्यकताओं की पूर्ति में उनका कुछ करने लायक योगदान सम्भव हो सके
बसन्त पर्व अपने मिशन की जन्म-जयन्ती है। जो अखण्ड-ज्योति का-उसके लक्ष्य एवं क्रिया-कलाप का महत्व समझते हैं, उनके लिए यह स्वाभाविक है कि इस पर्व की गरिमा समझें और उस अवसर पर अपनी भाव भरी अभिव्यंजना व्यक्त करें
इस से दस की प्रचार प्रक्रिया को यदि अपना लिया जाय तो इस आधार पर कुछ ही समय में जन-मानस के परिष्कार का लक्ष्य अपने देश में तो पूरा हो ही सकता है। अखण्ड-ज्योति पाठकों में से प्रत्येक को नव-निर्माण के लिए अंशदान की श्रद्धा अभिव्यक्ति पूरी निष्ठा के साथ अपना लेनी चाहिए और संकल्पपूर्वक दैनिक जीवन का अविच्छिन्न अंग मानकर अनिवार्य नित्य कर्म की तरह जारी रखना चाहिए
अखण्ड घृत दीप ने उसी दिन दिव्य आलोक धारण किया। अखण्ड-ज्योति पत्रिका का प्रकाशन, गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास, युग-निर्माण योजना का आरम्भ बसन्त पंचमी को ही हुआ है। वेद,शास्त्र, पुराण आदि आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद, सम्पादन के कार्य किसी न किसी वर्ष को बसन्त पंचमी में ही शुरू किये जाते रहे हैं। शान्ति कुँज की नींव उसी मुहूर्त में रखी गई और महिला जागृति अभियान का अंश उसी दिन फूँका गया और अनेकों प्रकट अप्रकट क्रिया-कलाप हैं, जिनका शुभारम्भ बसन्त पर्व के अवसर पर उठने वाली प्रकृतिगत ही नहीं आध्यात्मिक क्षेत्र में भी उठने वाली उमंगों के सहारे ही सम्पन्न किया जाता है
अखण्ड-ज्योति की सूत्र संचालक सत्ता इस अवसर पर लगातार चिर-नवीन अनुदान प्रस्तुत करती रही है। मिशन के प्रायः सारे ही महत्वपूर्ण क्रिया-कलाप इसी शुभ मुहूर्त में आरम्भ होते रहे हैं। 24 वर्षीय तप-साधना से भरी-पूरी 24 गायत्री महापुराणों की शृंखला बसन्त पंचमी को ही आरम्भ हुई
शान्ति कुँज की नींव उसी मुहूर्त में रखी गई और महिला जागृति अभियान का अंश उसी दिन फूँका गया और अनेकों प्रकट अप्रकट क्रिया-कलाप हैं, जिनका शुभारम्भ बसन्त पर्व के अवसर पर उठने वाली प्रकृतिगत ही नहीं आध्यात्मिक क्षेत्र में भी उठने वाली उमंगों के सहारे ही सम्पन्न किया जाता है। अस्तु अखण्ड-ज्योति मिशन का- उसके सूत्र संचालक का जन्म-दिन इसी अवसर पर मनाया जाता है। पिछले 40 वर्षों से लगातार इस त्यौहार को ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्य अपना विशेष उत्सव मानते आये हैं और उसे एक पुनीत परम्परा के रूप में हर्षोल्लास भरे आयोजनों की व्यवस्था बनाते रहे हैं। इस वर्ष यह पुनीत पर्व सोमवार ता0 24 जनवरी 77 को है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-September
हम जानते हैं कि मानव मात्र के अन्तःकरण में धर्म का दैवी भाव भी विद्यमान है। प्रयोजन है, परम सत्य की अनुभूति का अमृत पिलाकर आत्म-परिचय कराने का- अखण्ड-ज्योति जलाकर सद्ज्ञान के अनुदान से सद्भाव जागरण का

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-March
अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
यों उनका निज का भी समुन्नत परिवार है। पर उससे घनिष्ठ उनका आध्यात्मिक परिवार अखण्ड-ज्योति परिवार भी है। अतएव उन्होंने यह उचित ही समझा कि अपनी स्वर्ण-जयन्ती के अवसर पर मथुरा पहुँचे। शिविर के साधकों ने इस पर बड़ा हर्ष माना और 50 पुष्प हार से उन्हें लाद दिया
चूँकि हम स्वयं सनाढय हैं, इसलिए अपने समीपवर्ती क्षेत्र से सेवा कार्य आरम्भ करने की नीति के अनुसार शुरुआत यहीं से करना उचित है। अखण्ड-ज्योति परिवार में जो भी प्रगतिशील विचारों के सनाढय ब्राह्मण हों उपरोक्त तिथियों में मथुरा पधारने के लिए हम सबको आमंत्रित करते हैं। सम्मेलन में एक अखिल भारतीय संगठन बना दिया जायगा, और आवश्यक विचार−विनिमय के उपरान्त जातीय क्षेत्र में जो सुधार और आवश्यक होंगे उन्हें प्रसारित करने के लिए कार्य आरम्भ कर दिया जायगा
पता—अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
अलग निमंत्रण पत्रों की प्रतीक्षा न कर उन सभी प्रगतिशील विचारों के अखण्ड-ज्योति सदस्यों को इसमें सम्मिलित होने की तैयारी करनी चाहिए और अपने आने की सूचना भेज देनी चाहिए ताकि उनके ठहरने आदि का समुचित प्रबन्ध किया जा सके
वानप्रस्थ आन्दोलन का शुभारम्भ जिस शुभ मुहूर्त में हुआ है, जिन लोगों ने पहल की है, उसे देखते हुए यह लगता है कि यह भावना आँधी, तूफान की तरह फैलेगी और देश भर में विशेषतया अखण्ड-ज्योति परिवार में, सहस्रों व्यक्ति अगले ही दिनों वानप्रस्थ ग्रहण करने के लिए भावान्वित होंगे और देश की इस विषम परिस्थिति को बदल डालने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादन करेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-June
सौभाग्य या दुर्भाग्य से ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों को ऐसी ही उत्तरदायित्वपूर्ण परिस्थिति प्राप्त हुई हैं। भगवान ने उन्हें प्रबुद्धता की चेतना दी है। साथ ही कुछ जिम्मेदारी भी सौंपी है
‘युग-निर्माण योजना’ अखण्ड-ज्योति परिवार का एक शानदार एवं ऐतिहासिक कार्य है। उसका मार्ग-दर्शन, एवं प्रचार ठीक तरह होता रहे इसके लिए यह पाक्षिक एक अनिवार्य माध्यम है। इसे भी अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक को पढ़ना चाहिए
इसलिए जब कभी कार्य पद्धतियों का विश्लेषण एवं मूल्याँकन किया जायगा, युग-निर्माण योजना को अपने समय की एक अनुपम घटना ठहराया जायगा। इतनी विशालकाय संभावनाओं से परिपूर्ण प्रक्रिया को आरम्भ कर सकने के साहस का श्रेय अखण्ड-ज्योति परिवार को मिलता है। उसका हर सदस्य गर्वोन्नत मस्तक से यह कह सकेगा कि अपने युग की चुनौती और जिम्मेदारी को उसने समझा और स्वीकार किया। राष्ट्र की पुकार का समुचित प्रत्युत्तर देने का आत्म संतोष उसे मिलता ही है
उसका मार्ग-दर्शन, एवं प्रचार ठीक तरह होता रहे इसके लिए यह पाक्षिक एक अनिवार्य माध्यम है। इसे भी अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक को पढ़ना चाहिए। जहाँ यह अभी तक न पहुँचती हो वहाँ इस वर्ष उसे अवश्य ही मँगाना आरम्भ कर दिया जाना चाहिए
अवसर हो तो उन विषयों पर चर्चा भी आरंभ करनी चाहिये। पुरानी अखण्ड-ज्योति की प्रतियाँ युग निर्माण योजना के अंक सभी के पास होंगे, उनके ऊपर अच्छे मोटे कवर चढ़ा चिपका लेने चाहिये ताकि अनेक लोगों में पढ़े जाने पर वे खराब न हों। आदर्शवादी विचार आमतौर से रूखे और नीरस माने जाते हैं। उन्हें पढ़ना, सुनना बहुत कम लोग पसंद करते हैं
आगे हर महीने 5 नियमित रूप से छपते रहेंगे। अखण्ड-ज्योति में एक विषय पर थोड़ा-थोड़ा करके कई अंकों में लिखा जाता रहता है, पर इन ट्रैक्टों में एक बात ही एक ट्रैक्ट में पूरी तरह लिखे जाने से पाठक को यह पूरी तरह समझ लेना संभव हो जाता है। अतएव इन ट्रैक्टों की अनिवार्य आवश्यकता अनुभव करके उनका प्रकाशन आरम्भ किया गया है
राष्ट्र की पुकार का समुचित प्रत्युत्तर देने का आत्म संतोष उसे मिलता ही है। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए जो अनुपम प्रयत्न किया गया है, उस महान यज्ञ का होता—अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य—अपनी जीवन साधना को सार्थक समझे तो यह उचित ही होगा। भले ही छोटे दिखाई पड़ें पर हमारे प्रयत्न निस्संदेह महान हैं
गत वर्षों में अपनी-अपनी श्रद्धा और स्थिति के अनुरूप अखण्ड-ज्योति के सदस्य जिस प्रकार भी इस पुनीत पर्व पर जो भी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते रहे हों, वह बात अलग है। पर इस वर्ष तो हम सभी को एक ही प्रकार अपनाना है। वह है नव-निर्माण के लिए ‘यदा कदा’ कुछ कर देने की ढील-पोल छोड़कर निश्चित और नियमित रूप से कुछ न कुछ करते रहने का व्रत लेना
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य उस कसौटी पर खोटे नहीं खरे उतरते रहे हैं। हम सभी गृहस्थ हैं और व्यस्तता के बीच भी अवकाश निकालकर इतना कुछ करते रहे हैं कि सारा राष्ट्र आश्चर्यचकित है। यदि फुरसत वाले साधु सन्त हम लोग होते तो शायद इतना भी न कर पाते जितना अब करते हैं
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रबुद्ध सदस्यों को इस गुरु पूर्णिमा से यह व्रत लेना चाहिये। एक घण्टा समय, एक आना नकद, यह त्याग कुछ इतना बड़ा नहीं है, जिसे लक्ष्य की महानता को देखते हुए, कर सकना हमारे लिए कठिन होना चाहिये। नियमितता में बड़ी शक्ति होती है
समाज सुधार अभियान में अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को सम्मिलित होना है, इसलिए उसे आन्दोलन की आवश्यकता, उपयोगिता, स्वरूप, कार्यक्रम एवं प्रयोग के बारे में भी समुचित जानकारी प्राप्त कर ही लेनी चाहिए। अतएव युग-निर्माण योजना पाक्षिक का यह विशेषांक निकाला जाना निश्चित किया गया। कहना न होगा कि प्रस्तुतः अंक पाठकों को अभिनव जानकारी देगा और इनके सामने एक प्रेरणाप्रद, प्रकाश एवं ओजस्वी मार्ग दर्शन प्रस्तुत करेगा
जिनके घर जाया जाय उनसे कुशल क्षेम पूछने के साधारण शिष्टाचार के उपरान्त अभीष्ट उद्देश्य के लिये आवश्यक प्रेरणा देनी आरंभ कर देनी चाहिये। जो पढ़े-लिखे हैं उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति व युग निर्माण योजना के पिछले अंक पढ़ने को देना चाहिये। जो पढ़े नहीं हैं उन्हें प्रेरणाप्रद लेख, समाचार एवं प्रसंग सुनाने चाहिये। अवसर हो तो उन विषयों पर चर्चा भी आरंभ करनी चाहिये
मानव जीवन का गौरव समझने वाला कोई भावनाशील व्यक्ति अपने को इस घृणित परिस्थिति में रखना पसंद न करेगा—अखण्ड-ज्योति परिवार का कोई सदस्य तो निश्चित रूप में नहीं। हम लोग जिस भी परिस्थिति में है देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान अभियान में भाग लेते हुए बहुत कुछ करते रहे हैं, आगे बढ़ती हुई जिम्मेदारियों के अनुरूप और भी अधिक करेंगे। त्रिविध क्रान्तियों को सम्पन्न करने की तीन अग्नि परीक्षाओं में होकर जब गुजरना ही ठहरा तो झंझट किस बात का, जो करना हो उसे करेंगे ही
हमारी माँग यह है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य “एक घंटा समय तथा एक आना नित्य” नव निर्माण योजना के धर्म कर्तव्यों को पूरा करने के लिए दान किया करें। दान, भारतीय धर्म का अंग है। दान से विमुख कृपण की सद्गति नहीं होती
पता—अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
इसी दिन इस युग के इस महान अभियान का शुभारम्भ उस परम प्रेरक दिव्य शक्ति के द्वारा किया गया था। बसन्त पंचमी के दिन अखण्ड-ज्योति प्रारम्भ हुई और गुरु पूर्णिमा के दिन ‘युग-निर्माण योजना’। अपने परिवार के लिए ये दो कौटुम्बिक पर्व हैं। यों इनका व्यापक महत्व है
वर्ष भर में लगभग बाईस रुपया। 4) की अखण्ड-ज्योति 3) की युग-निर्माण योजना एवं 12) के 60 ट्रैक्ट इस प्रकार 22) हुआ। यह खर्च भी हमें नव-निर्माण के लिए करना ही चाहिए। यह पैसे बाहर किसी को देने नहीं हैं
गुरुपूर्णिमा पर्व अखण्ड-ज्योति का हर सदस्य सदा से मनाता आया है। सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, गुरु पूजन, सत्संकल्प पाठ, दीप दान आदि औपचारिक कर्म काण्ड प्रायः सभी शाखाओं में आयोजित किये जाते हैं। जहाँ शाखाएं नहीं हैं वहाँ वह कार्यक्रम वैयक्तिक रूप से किया जाता है
नामवरी और स्वर्ग-सिद्धि के लिये तो लोभी दुनिया न जाने क्या-क्या लुटाती रहती है पर जिससे मानवता का मुख उज्ज्वल हो सके ऐसे तात्विक परमार्थ को अपना सकना केवल विवेकशील, जागृत आस्थाओं का ही काम है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को इस श्रेणी में गिना जा सकता है इसलिये इन से इस प्रकार की याचना एवं आशा करना भी हमारे लिये उचित ही है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-October
उपासना की दृष्टि से इस वर्ष राष्ट्र की प्रतिरोधात्मक शक्ति को उत्पन्न करने के लिये अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को गायत्री महातत्व की ‘क्लीं’ शक्ति की सामूहिक उपासना करनी चाहिए। अध्यात्म विद्या के जानकारों को पता है कि ह्रीं सरस्वती, बुद्धि का, श्रीं लक्ष्मी, समृद्धि का तथा क्लीं काली, दुरित संहार का बीज-मन्त्र है। गायत्री महाशक्ति में समय-समय पर विशेष प्रयोजनों के लिए इन्हें प्रयुक्त किया जाता है
परिजन अपने परिवार से एक महीने में एक अनुष्ठान पूरा करा लेने का प्रयत्न करें। यों अखण्ड-ज्योति परिवार के 40 हजार सदस्य है पर हम 10 हजार सदस्यों से यह आशा करेंगे कि वे एक-एक अनुष्ठान हर महीने कराते रहेंगे। 24 करोड़ अनुष्ठान प्रतिमास होता रहेगा। ऐसे 12 अनुष्ठान अगले एक वर्ष में पूरे करने हैं
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों का इन संकट की घड़ियों में विशेष कर्त्तव्य है। वे नव-निर्माण योजना के व्रतधारी सदस्य हैं। निर्माण के लिए सुरक्षा सबसे पहले चाहिए
उसे ध्यानपूर्वक पढ़ते रहना चाहिये। अखण्ड-ज्योति के सदस्यों में से एक भी ऐसा न रहे जो पाक्षिक-पत्रिका को न पढ़ता हो। राष्ट्र को विजयी बनाने वाले रचनात्मक कार्यक्रमों की ट्रेनिंग एवं प्रेरणा तो उसी से प्राप्त करते है। परिजनों ने जो व्रत लिया है वह राष्ट्र-रक्षा के लिये लगे हुए युद्ध-मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की तरह ही कठोर एवं महान् है
क्योंकि टिकाऊ शक्ति तो उसी से प्राप्त होगी और दीर्घकालीन समस्याओं का चिरस्थायी हल तो उसी से निकलेगा। नव-निर्माण कार्यक्रमों में अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को तेजी लानी चाहिए। यह कार्य संकीर्ण स्वार्थपरता की कीचड़ में गन्दे कीड़ों की तरह बुजबुजाने से नहीं, वरन् अपने समय और साधनों को लोक-मंगल के लिये लगाने का मानवोचित साहस दिखाने से ही सम्भव होगा। परिजनों ने-हमारे उत्तराधिकारी और प्रतिनिधियों ने-एक घण्टा समय और एक आना रोज नव-निर्माण के लिये लगाने का व्रत लिया है, उसे उन्हें एक परम पवित्र धर्म प्रतिज्ञा समझ कर नियमित रूप से कार्यान्वित करते रहना चाहिये
इस उपासना में सिंह वाहिनी ॐ ध्वजधारी गायत्री की क्लीं शक्ति का ध्यान करना चाहिये। अखण्ड-ज्योति के मुख पृष्ठों पर इस वर्ष तथा गत वर्ष कई बार इस चित्र को प्रकाशित किया जाता रहा है। साधक उसे काट कर शीशे में मढ़ा ले और उसकी पूजा-अर्चना किया करें। यह चित्र अलग से भी छपाया गया है
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-February
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को प्रतिनिधि अथवा उत्तराधिकारी बनने का खुला आमन्त्रण प्रस्तुत किया गया है। प्रश्न साहस का है, जिनमें हिम्मत हो वे इस निमन्त्रण को स्वीकार कर सकते हैं। कोई भौतिक पदार्थ बाँटे जा रहे होते, तो अगणित याचक आ खड़े होते, पर यहाँ तो लेने का नहीं देने का प्रश्न है-भोग का नहीं त्याग का प्रश्न है, इसलिए स्वभावतः कोई विरले ही आगे बढ़ने का साहस करेंगे
अखण्ड-ज्योति परिवार में सदस्यों को गायत्री उपासना की प्रेरणा विगत 25 वर्षों से लगातार दी जाती रही है। परिजनों ने उस प्रेरणा को अपनाया भी है और उसका समुचित प्रतिफल भी सामने आया है। इस उपासना ने लोगों के आत्मिक स्तर को समुन्नत बनाने में जो योग दिया है, उसी का प्रतिफल है कि यह परिवार आत्मिक दृष्टि से समुन्नत लोगों का एक श्रेष्ठ संगठन बन कर सामने आया है और युग-निर्माण योजना जैसे ऐतिहासिक कार्य की भूमिका सम्पादन करने का साहस करने एवं उत्तरदायित्व सम्भालने के लिए कटिबद्ध हो सका है
उन प्रयासों के गतिशील बनाये रखने की जिम्मेदारी जो लोग अपने कन्धों पर उठावेंगे, उन्हें हम अपना प्रतिनिधि मानेंगे। जहाँ कहीं भी हमारी आवाज- अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, वहाँ एक प्रतिनिधि-मण्डल इसी दृष्टि से नियुक्त किया है कि वे योजना की भावना को समझें और इसे मूर्त रूप देने के लिए कुछ संगठनात्मक, रचनात्मक एवं आन्दोलनात्मक कार्यक्रम अपने क्षेत्र में जारी रखें। जो प्रकाश वहाँ पहुंचा है उसे बुझने न दें वरन् स्वयं तेल जाती बनकर उस चिनगारी को प्रकाश पुञ्ज को स्वरूप देने का प्रयास करने रहे। युग-निर्माण योजना को मूर्तिमान् एवं गतिशील बनायें रखना प्रतिनिधियों का एक प्रधान कर्तव्य है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-November
विचारों का मूल्य तभी है जब वे कर्म रूप से परिणत हों। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को स्वयं तो नव निर्माण के रचनात्मक कार्यों में लगना ही चाहिये साथ ही अपने संपर्क के प्रभाव क्षेत्र- के दूसरे लोगों को भी उनमें लगाना चाहिये
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों ने प्रतिदिन नव-निर्माण के लिए एक घण्टा समय लगाते रहने का व्रत लिया है। इस समय को संगठनात्मक एवं रचनात्मक कार्यों से लगाते रहने के लिए पूरे-पूरे उत्साह के साथ कार्य आरम्भ कर देना चाहिए। संगठन इस युग की सबसे बड़ी शक्ति है
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को इस दिशा में पहल करनी होगी। आज के सुरक्षात्मक कार्यों में हम किसी से पीछे न रहें। धन, रक्त, समय, श्रम एवं प्राण देने के लिये हम अपनी परिस्थिति के अनुसार समय की आवश्यकता पूरी करें
रचनात्मक मोर्चे को सफल बनाने के लिये ऐसे धर्म सैनिकों की भारी आवश्यकता है जो राष्ट्र को सबल तथा प्रबुद्ध बनाने का लक्ष्य पूर्ण कर सके। युग की इस महान आवश्यकता की पूर्ति के लिये अखण्ड-ज्योति परिवार के धर्मवीर सदस्यों को आगे बढ़ना चाहिये और धर्मोपदेशक के रूप में रचनात्मक कार्यों को गतिशील बनाने में संलग्न हो जाना चाहिये। ऐसे धर्मवीरों का महत्व युद्धक्षेत्र में आत्मोत्सर्ग करने वाले योद्धाओं से कम नहीं समझा जा सकता
अखण्ड-ज्योति परिवार द्वारा विगत शरद पूर्णिमा शक्ति से साधना महापुरश्चरण प्रारम्भ किया गया है। गायत्री सर्वोपरि शक्ति है। उसके साथ कुछ विशिष्ट बीज मन्त्र एवं सम्पुट जोड़ने से उसे विभिन्न भौतिक कार्यों के लिये भी प्रयुक्त किया जा सकता है
विचार क्राँति के बिना, राजनैतिक एवं आर्थिक क्रान्तियाँ अधूरी ही मानी जायेगी। अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को विचार-क्रान्ति के अग्रदूत-युग निर्माता की भूमिका अदा करनी चाहिए। उसे अपना यह एक धर्म-कर्तव्य मान लेना चाहिए कि वह अपने निज के, अपने परिवार के तथा सम्बन्धित व्यक्तियों के विचारों में विवेकशीलता एवं उत्कृष्टता उत्पन्न करने के लिए कुछ न कुछ कार्य नित्य, निरन्तर, नियमित रूप से करता रहेगा। वैयक्तिक उद्देश्य से जिनके साथ संपर्क बनाया जाय उन सबको सामान्य वार्तालाप के बीच ही सुधारात्मक विचारधारा का प्रकाश देना चाहिए
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य जहाँ कहीं भी जितने भी हैं वे एक संगठन बना लें। जहाँ युग-निर्माण शाखायें अभी नहीं हैं वहाँ तुरन्त बन जानी चाहिये। इन संगठनों द्वारा उस क्षेत्र में षोडश संस्कार मनाने के लिये हर घर में प्रेरणा देना चाहिये, जहाँ संभव हो सके आयोजन करने चाहिये
अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को यह व्रत तुरन्त आरम्भ कर देना चाहिये। अपने परिवार के लोगों को इसके लिये तैयार करना चाहिये और इस आन्दोलन को व्यापक बनाने के लिए प्रचार, पर्चे, भाषण, प्रतिज्ञा पत्र आदि जहाँ जो संभव हो, वह करना चाहिये। विजय व्रत व्यापक बनाने में हमें कुछ उठा न रखना चाहिये
इसलिये इस उपासना क्रम को धर्म रक्षा का एक आवश्यक अंग मानकर ही करना चाहिये। अखण्ड-ज्योति परिवार के लोग स्वयं तो करेंगे ही, अन्य जो लोग उनकी पहुँच तथा प्रभाव प्रेरणा के क्षेत्र में आते हों, उन्हें भी इसके लिये प्रोत्साहित करना चाहिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-April
पहले विचार यह था कि जून का सम्मेलन ‘सनाढ्य’ ब्राह्मणों का हो और शेष जातियों के प्रतिनिधि उसमें प्रेक्षक की तरह सम्मिलित हों। पर इस सम्बन्ध में अखण्ड-ज्योति परिवार की सभी जातियों ने समान रूप से उत्सुकता दिखाई है और एक-एक जाति का अलग-अलग सम्मेलन करके बहुत समय लगाने की अपेक्षा एक साथ ही सब जातियों का सम्मेलन बुलाने का सुझाव दिया है। हमें भी यह ठीक लगा। इसलिए अब सामाजिक क्रान्ति सम्मेलन सभी जातियों का सम्मिलित कर दिया गया है
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों की जन्म तिथियाँ शाखा कार्यालय में नोट करनी चाहिए और ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए कि जिस दिन जिसका जन्म दिन हो उस दिन उसके यहाँ छोटा गायत्री हवन, कीर्तन, भजन, प्रवचन आदि का सामूहिक आयोजन हो। अन्य सदस्य शुभ कामना के पुष्प भेंट करें। स्वागत में सौंफ जैसी सस्ती चीजें ही रहें ताकि दूसरों को उसका अनुकरण करने में किसी प्रकार की कठिनाई न हो
अतएव उन्हें अभी से जिम्मेदारियों को अपने कन्धों पर उठाना आरम्भ कर देना चाहिए। जहाँ अखण्ड-ज्योति पहुँचती है पर नियुक्तियाँ नहीं हुई हैं वहाँ के परिजन जनवरी अंक में संलग्न फार्म को भरकर अविलम्ब भेज दें। कोई स्थान ऐसा नहीं रहना चाहिए जहाँ अखण्ड-ज्योति तो पहुँचती हो पर प्रतिनिधि मंडल कर्मयुक्त न हुआ हो
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
प्रथम दो वर्ष में केवल योजना का ढाँचा खड़ा किया गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को किसी पत्रिका को मनोरंजन के लिए पढ़ने वाले पाठक मात्र न रहने देकर, उन्हें नव-निर्माण अभियान के मोर्चों पर लड़ने वाला धर्म सैनिक बनाया गया है। उन्हें यह अनुभव करने दिया गया है कि वे किसी महत्वपूर्ण संगठन के सदस्य हैं और संयोगवश ही सही, उनके कन्धों पर एक बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। उसे पूरा भी उन्हें करना ही पड़ेगा
जो इस स्थिति में हैं पर मोह वश साहस नहीं कर पाते उन्हें दूसरे लोग प्रोत्साहित करें यही उचित है। अखण्ड-ज्योति परिवार को बड़ी संख्या में वानप्रस्थ निकाल कर समाज को अर्पित करने हैं। इसके लिये हममें से प्रत्येक को साहस एकत्रित करना चाहिए ताकि उपयुक्त समय आते ही यह व्रत ग्रहण करने का सत्साहस दिखा सकें। जेष्ठ के शिविरों में भी ऐसा व्रत धारण करने की व्यवस्था रहेगी
6-प्रतिनिधि एवं उत्तराधिकारी- जहाँ कहीं भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वहाँ हमने अपने प्रतिनिधि एवं उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिए हैं। हमारा कार्यक्रम घटता चला जा रहा है। हमारे स्थान की पूर्ति इन्हीं उत्तराधिकारियों को करनी होगी
जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति सदस्य हैं, उन सब को एक संगठन के अंतर्गत आबद्ध हो जाना चाहिए। शाखा कार्यालय का दफ्तर स्थापित कर लिया जाय। वहाँ एक सामूहिक पुस्तकालय हो जहाँ से अन्य सदस्य जीवन निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य पढ़ने के लिये प्राप्त करते रह सकें
आदर्श विवाहों का जिनमें न्यूनतम नाम मात्र का खर्च पड़े हमें प्रचलन करना ही चाहिए। अखण्ड-ज्योति परिवार का विशाल संगठन इस दिशा में पहल कर सकता है और उसे करनी भी चाहिए। सामाजिक क्रान्ति के लिए भी हम व्रत ले चुके हैं। उसे साहसपूर्वक पूरा करना चाहिए
उसे पूरा भी उन्हें करना ही पड़ेगा। इस मान्यता के अनुरूप अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य ने अपनी जिम्मेदारी समझी ही नहीं कन्धे पर उठाई भी है। विगत दो वर्ष के प्रयत्न के फलस्वरूप योजना की यह बहुत बड़ी सफलता है कि उसे 30 हजार से ऊपर ही प्रबुद्ध एवं भावनाशील से कर्मठ कार्यकर्ता अपने महान लक्ष्य की पूर्ति के लिए मिल गए हैं। म॰ गान्धी जी ने स्वाधीनता संग्राम जिन दिनों आरम्भ किया था, उन दिनों उनके पास इससे भी कम कार्यकर्ता थे
अखण्ड-ज्योति में समाचार नहीं छपते, यह आवश्यकता पाक्षिक से पूरी होती है। अतएव उसे पढ़ना अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए आवश्यक है। जहाँ अभी तक पाक्षिक न मँगाया जाता हो वहाँ वैयक्तिक या सामूहिक रूप से 6) चन्दा भेजकर उसे तुरन्त आरंभ कर लिया जाय। आन्दोलन की गतिविधियों से हर सदस्य को परिचित रहना ही चाहिए
योजना की गतिविधियों की जानकारी उसी से मिलती है और आन्दोलन के लिए आवश्यक वातावरण समाचारों से ही बनता है। अखण्ड-ज्योति में समाचार नहीं छपते, यह आवश्यकता पाक्षिक से पूरी होती है। अतएव उसे पढ़ना अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए आवश्यक है। जहाँ अभी तक पाक्षिक न मँगाया जाता हो वहाँ वैयक्तिक या सामूहिक रूप से 6) चन्दा भेजकर उसे तुरन्त आरंभ कर लिया जाय
इस युग का इसे सबसे बड़ा धार्मिक आन्दोलन कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। अखण्ड-ज्योति परिवार ने नव निर्माण का जो संकल्प किया है उसे एक ऐतिहासिक घटना ही कहा जा सकता है। इतने विशाल कार्यक्रम की पूर्ति के लिए उसकी रूप रेखा भी उतनी ही विशाल खड़ी करनी होगी। लक्ष्य के अनुरूप ही उसके साधन भी एकत्रित किये जा रहे हैं
जहाँ अखण्ड-ज्योति पहुँचती है पर नियुक्तियाँ नहीं हुई हैं वहाँ के परिजन जनवरी अंक में संलग्न फार्म को भरकर अविलम्ब भेज दें। कोई स्थान ऐसा नहीं रहना चाहिए जहाँ अखण्ड-ज्योति तो पहुँचती हो पर प्रतिनिधि मंडल कर्मयुक्त न हुआ हो

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-December
अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
एक घन्टा समय और एक आना नित्य नव-निर्माण के लिए खर्च करते रहने का जो संकल्प परिवार के सक्रिय सदस्यों ने किया है, उसका उपयोग इन ट्रैक्टों को मँगा कर अपनी घरेलू लाइब्रेरी स्थापित करने एवं उन पुस्तकों को अधिकाधिक लोगों को पढ़ाने-सुनाने के लिए करना चाहिए। आशा है अखण्ड-ज्योति के सभी सदस्यों के घरों में युग-निर्माण पुस्तकालय स्थापित किये जायेंगे और उसके लिये इन ट्रैक्टों से शुभारम्भ किया जायगा
यों समस्त देश वासियों के सामने अपनी देश-भक्ति का परिचय देने का अवसर है, पर अखण्ड-ज्योति परिवार से सम्बद्ध व्यक्तियों ने गत 25 वर्ष में जो शिक्षा प्राप्त की है, उसे वस्तुतः समझा अपनाया है या नहीं, इसकी परख का ठीक यही वक्त है। प्रस्तुत समय की चुनौती को स्वीकार कर हमें अपना खोखलापन प्रमाणित नहीं करना चाहिये
युग-परिवर्तन जैसे महान् अभियान तो संगठन की शक्ति पर ही सफल बनाये जा सकते हैं, इसलिए हमें उन लोगों को ढूँढ़ना और संगठित करना चाहिए, जो नव-निर्माण के उद्देश्य, आदर्श एवं कार्यक्रमों में आस्था रखते हों। ऐसे लोगों में अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को अग्रणी माना जा सकता है। विगत 25 वर्षों से उन्हें यही शिक्षण मिलता रहा है। धर्म और अध्यात्म के नाम पर चलने वाली विडम्बना से घृणा करने और वास्तविकता को अपनाने का साहस और विवेक उनमें जागृत हुआ है
अखण्ड-ज्योति परिवार में जितने भी व्यक्ति हैं, उनमें से उपरोक्त परिस्थितियों के कितने ही व्यक्ति होंगे। उन्हें अब अलसाये मन से नहीं, वरन् भावनापूर्वक वस्तुस्थिति को समझना चाहिये और देश-काल को देखते हुए अपने समय और शक्ति का कुछ न कुछ भाग लगाने के लिये कटिबद्ध ही हो जाना चाहिये
पुराने सदस्यों से अखण्ड-ज्योति एवं युग-निर्माण पत्रिकाओं का चन्दा वसूल करने एवं दोनों के नये सदस्य बनाने का ठीक यही समय है। सक्रिय सदस्य थोड़ा समय निकालकर दो-दो, चार-चार की टोलियाँ बना लें और इस कार्य में जुट जायें। धीरे-धीरे देर में चन्दा भेजने से पुराने अंक समाप्त हो जाते हैं और बीच के महीनों से ग्राहक बनना पड़ता है
अखण्ड-ज्योति परिवार में जो प्रबुद्ध आत्माएं हैं, उन्हें युग पुकारता है। वे संकीर्ण स्वार्थपरता का वैयक्तिक जीवन जीने की अपेक्षा युद्ध मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की तरह कुछ त्याग-बलिदान करने के लिये तत्पर हों, समय दान करें, जन-संपर्क के लिये अवसर निकालें, और जन-जन के मन मन में नव-जीवन का संचार करने वाली भावनाएं भरें, तब काम चले
यों इस क्षेत्र को विस्तृत करके देश-व्यापी ही नहीं, विश्व-व्यापी भी बनाना है। जो भी इस प्रकृति एवं प्रवृत्ति के व्यक्ति मिलें उन सबको एक सूत्र में संगठित करना है, पर अभी तात्कालिक आरम्भ अखण्ड-ज्योति के सदस्यों से किया जा सकता है
जहाँ कहीं भी- जितने भी अखण्ड-ज्योति के सदस्य हों, उन सबको एक शाखा संगठन के रूप में संगठित हो जाना चाहिए। संगठन की एक पाँच व्यक्तियों की संचालन समिति बनाली जाय और वह यह प्रयत्न करती रहे कि वर्तमान सदस्यों का मिलन एवं विचार विनिमय नियमित एवं क्रमबद्ध रूप से चलते रहने की व्यवस्था बन जाय। जन्म दिन मनाने की प्रथा इस कार्य में आश्चर्यजनक रूप से सहायक होती है
पता :- अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा
बहुत छोटे ऑर्डर वालों को पुस्तकों के मूल्य के अतिरिक्त 1.5- पोस्टेज भी मनीऑर्डर से भेजना चाहिये। (5) अखण्ड-ज्योति या युग-निर्माण पत्रिकाओं के चन्दे पर किसी को कोई कमीशन या रिआयत नहीं मिलती
(9) कुछ दिन पूर्व अखण्ड-ज्योति प्रेस में यज्ञोपवीत से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति पुस्तक छपी थी, उसकी एक प्रति भी हमारे पास नहीं है। यदि पाठकों में से किसी के पास हो तो भेज दें। उसके बदले में उसी विषय की बड़ी पुस्तक हम भेज देंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-August
लोक शिक्षण के लिये जन जागरण के लिये खर्च किया हुआ यह थोड़ा-सा समय और जरा-सा धन भले ही देखने में नगण्य लगाता हो, पर उसका प्रभाव आश्चर्यजनक होगा। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा प्रयत्न करने लग जायँ तो युग परिवर्तन की महत्वपूर्ण भूमिका निश्चित रूप से सम्पादित कर सकते हैं
अखण्ड-ज्योति के पाठक मात्र न रहकर, नव निर्माण योजना के सक्रिय कार्यकर्त्ता के रूप में जिनने अपने आपको प्रस्तुत करने का व्रत लिया है, वे गत गुरुपूर्णिमा से (1)एक घंटा समय और (2)एक आना नित्य देने लगे हैं। उन्हें इन दोनों अनुदानों का उपयोग निर्धारित कार्य-पद्धति के अनुसार करना आरम्भ करें देना चाहिये
एक आना प्रतिदिन में यह पुस्तकालय आसानी से चल सकता है। 4) वार्षिक अखण्ड-ज्योति का चन्दा, 6) युग निर्माण पाक्षिक का चन्दा, 12) डाक खर्च समेत 60 ट्रैक्टों का मूल्य, 2) में हस्ताक्षर प्रतिज्ञा-पत्र अभिनन्दन पत्र आदि के पत्रक। इस प्रकार 24) वार्षिक या दो रुपये प्रति मास में बड़ी आसानी से यह पुस्तकालय चल सकता है। 60 ट्रैक्ट यदि रेलवे पार्सल से इकट्ठे मँगाये जायें तो एक दो रुपया डाक खर्च के बच भी सकते हैं
दस हजार युग निर्माता यदि दस-दस व्यक्तियों का भी प्रशिक्षण करेंगे तो न्यूनतम एक लाख व्यक्तियों के ऊपर विचार क्रान्ति का सक्रिय प्रयोग आरम्भ हो जायगा। यों अखण्ड-ज्योति के 40 हजार सदस्यों में से केवल 10 हजार ही सक्रिय कार्यकर्ता निकले और वे केवल दस का ही प्रशिक्षण करें ऐसी बात नहीं। इससे बहुत अधिक होना है। कितने ही कर्मठ सहयोगी ऐसे हैं जो हर वर्ष 108, 240 या 1000 तक अखण्ड-ज्योति सदस्य बनाया करते हैं
इच्छा ही न हो तो बहाने बनाने के लिये निठल्ले व्यक्ति के पास भी सौ बातें कहने को हो सकती हैं, जिसकी आड़ लेकर वह अपनी मजबूरी का रोना रोया करे। अखण्ड-ज्योति परिवार में प्रायः ऐसे बहानेबाज़ नहीं के बराबर ही हैं। इसलिये अधिकाँश ने समय दान का व्रत ग्रहण किया है और उसे निवाहते रहने का वचन दिया है। जो अलग से समय न निकाल सकने की कठिनाई अनुभव करते थे वे अपने दैनिक कार्यक्रमों में भी यह धर्म प्रचार प्रक्रिया जोड़ सकते हैं
प्रतिकार और उपचार से ही कुछ प्रयोजन सिद्ध होता है। अखण्ड-ज्योति परिवार की यह विचार क्रान्ति पद्धति ऐसी ही रचनात्मक प्रक्रिया है जिसका सुन्दर परिणाम हम थोड़े ही दिनों में प्रत्यक्ष देखेंगे
नव निर्माण के लिए जिस प्रखर विचारधारा का प्रवाह इन दिनों गतिशील किया जा रहा है, उसे कम से कम दस व्यक्तियों तक नियमित रूप से पहुँचाना होगा। अखण्ड-ज्योति, युग निर्माण योजना पाक्षिक एवं क्रान्तिकारी ट्रैक्ट माला को अपने क्षेत्र में सदस्यों को पढ़ाने या सुनाने के लिए एक घण्टा समय लगाया जाय, उनके प्रस्तुत विषयों पर चर्चा एवं विचार विनिमय करते रहा जाय तो कोई कारण नहीं कि वे विचार परिवर्तन की दिशा में उन्मुख न हो सकें
अखण्ड-ज्योति द्वारा संचालित विचार क्रान्ति का युग निर्माण आन्दोलन इसी स्तर का है, इसलिए उसके प्रतिफल-स्वर्ग को धरती पर उतरने के रूप में निश्चित है। अपने प्रयास जितने तीव्र होंगे लक्ष्य की पूर्ति उतनी ही सरल एवं शीघ्र सम्मुख आती दिखाई देगी। इस गुरुपूर्णिमा से यह अभियान अत्यन्त सुव्यवस्थित रूप से आरम्भ हो गया है
जन-जागरण की उपयोगी साधन सामग्री अभी तक अखण्ड-ज्योति और युग निर्माण योजना के माध्यम से दी जा रही थी अब इस वर्ष से इस शृंखला में एक बहुत ही महत्वपूर्ण तारतम्य जोड़ दिया गया है। वह है आग उगलने वाली ट्रैक्ट माला का अभिनव प्रकाशन। अपनी दोनों पत्रिकाओं के हर अंक में अनेक विषयों पर छोटे-छोटे बड़े उपयोगी लेख रहते हैं पर वे ऐसे नहीं होते जिनमें एक विषय पर पर्याप्त मात्रा में विचार सामग्री एक बार में ही प्रस्तुत की जा सके
एक घंटा समय देने वाले के लिये अब यह कई तरह की—कई श्रेणी की, कई प्रयोजनों की सामग्री उपलब्ध हो गई। अखण्ड-ज्योति जन-जीवन को उत्कृष्ट बनाने वाले छोटे-छोटे लेख प्रस्तुत करती है। युग निर्माण पाक्षिक में समाचार, प्रेरणा, मार्ग दर्शन एवं सूचनाओं का उत्साह वर्धक ऐसा संग्रह रहता है जिसे पढ़ने वाले को वैसा ही करने की उमंग उठने लगे। इन आग उगलने वाले ट्रैक्टों की उपयोगिता दोनों पत्रिकाओं से भी अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है
हर ईश्वर भक्त के लिये यह आवश्यक है कि ज्ञान रूप भगवान की भी अपने श्रम एवं धन द्वारा अर्चना करे। इस गुरुपूर्णिमा से अखण्ड-ज्योति का प्रत्येक सक्रिय सदस्य कार्य पद्धति को अपनावेगा। आपने अभी तक यदि इसे न अपनाया हो तो आज से ही इसका शुभारम्भ कर देना चाहिये। युग निर्माण योजना का चन्दा आरम्भिक अंक से सदस्य बने अधिकाँश पाठकों को इसी महीने भेजना होगा
गत 13 जुलाई को गुरुपूर्णिमा पर्व अखण्ड-ज्योति परिवार की उत्कृष्टता एवं गौरव गरिमा में चार चाँद लगाने आया। यों इस संगठन ने विगत 25 वर्षों में इतना कुछ किया है जिसे चिरकाल तक भुलाया न जा सकेगा पर पर्व भी और यह परिवार भी एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक तथ्य बन गये हैं
इससे बहुत अधिक होना है। कितने ही कर्मठ सहयोगी ऐसे हैं जो हर वर्ष 108, 240 या 1000 तक अखण्ड-ज्योति सदस्य बनाया करते हैं। क्या ऐसे लोग केवल 10 का ही प्रशिक्षण करके चुप बैठे रहेंगे? फिर इन दिनों 100 के लगभग वानप्रस्थ बने हैं वे क्या दस व्यक्तियों तक ही अपनी गतिविधियाँ सीमित रखेंगे? चालीस हजार परिजनों में से दस हजार ही सक्रिय रहें और शेष निष्क्रिय हो जाये ऐसा भी संभव नहीं। यह संख्या बढ़ेगी ही
ऐसे मनस्वी लोग जिनमें इस प्रकार का त्याग करने का साहस उत्पन्न हुआ है, निश्चित रूप से अखण्ड-ज्योति के अतिरिक्त ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक भी मँगाते रहे होंगे। यदि उनमें से कोई ऐसे हों जिनने अभी तक उसका मँगाना आरम्भ न किया हो, तो उन्हें इसी मास से पाक्षिक पत्रिका मँगाना आरम्भ कर देना चाहिये। प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्त्ता के लिये उसे पढ़ना नितान्त आवश्यक है
परिवार के प्रबुद्ध परिजनों पर इस बात के लिए जोर डाला गया है कि उन्हें अखण्ड-ज्योति के पाठक मात्र न रह कर अपने आप को युग निर्माता के रूप में परिणत करना चाहिए। एक घंटा समय और एक आना दैनिक इस ज्ञान यज्ञ के लिए समर्पित करते रहने का व्रत लेना चाहिए। प्रसन्नता की बात है कि यह अनुरोध परिजनों ने ध्यानपूर्वक सुना और भावनापूर्वक समझा है
प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्त्ता के लिये उसे पढ़ना नितान्त आवश्यक है। अखण्ड-ज्योति में केवल विचार धारा रहती है। उसे कार्य रूप में कैसे परिणत किया जा सकता है? कैसे किया जा रहा है? इस मार्ग में क्या अड़चनें आती हैं? और उनका समाधान कैसे किया जाता है? आदि अनेकों जानकारियाँ पाक्षिक पत्रिका से ही मिलती हैं। देश-विदेशों में युग-निर्माण की दिशा में क्या हो रहा है? अपने परिवार के लोग कहाँ क्या कर रहे हैं, और क्या करने वाले हैं, यह सारा विवरण परिजनों में से हर एक को परस्पर विदित होता रहे और उससे एक दूसरे को प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन मिलता रहे, इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिये तो उसे निकाला गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-January
परिवार के हर सदस्य के कन्धे पर यह सुनिश्चित जिम्मेदारी सौंपी जा रही है कि विचार क्रान्ति के महान् अभियान में उसे हमारा साथी सहयोगी बनना चाहिए। अखण्ड-ज्योति तथा युग-निर्माण पत्रिकाओं के माध्यम से दूर रहने को इस प्रकार परिवर्तित करने एवं आवर्धक प्रयत्न किया जा रहा है कि जो व्यक्ति इन चारों से प्रभावित हो वह नव-निर्माण के कार्य में भी उपयोगी सिद्ध हो सके। विचार-सम्पत्ति से रहित व्यक्ति उत्साह में कुछ काम कर भी जायें तो उनका वह आवेश क्षणिक होता है, अस्तु हमारा सबसे पहला, सबसे महत्वपूर्ण सबसे कठिन कार्य यह है कि नव-निर्माण की विचार धारा से अधिक लोगों को प्रभावित करके बौद्धिक क्रान्ति की भूमिका तैयार कर लें
बसन्त पंचमी 4 फरवरी की है। तब तक शायद सब के पास अखण्ड-ज्योति न पहुँच पाये ऐसी दशा में उस दिन इतना ही करना पर्याप्त होगा कि उस दिन उपवास रखा जाय। दूध, दही, शाक, फल पर रहा जाय। प्रातःकाल सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व उठकर शरीर को शान्त और मन को स्थिर रखकर ऐसा ध्यान किया जाय कि-”हमारे चारों ओर एक प्रकाश पुंज आच्छादित है और उसकी सूक्ष्म तरंग हमारे शरीर एवं मन के कण-कण में प्रवेश करती हुई नया प्रकाश, नया उल्लास एवं नया सन्देश धारण करा रही है
जहाँ से अभी उसे भर कर भेजा न गया हो, वहाँ के सदस्य मिल-जुलकर विचार करें और इस प्रतिनिधि फार्म को भर कर इसी महीने भेज दें। अखण्ड-ज्योति का पच्चीसवाँ वर्ष-रजत-जयन्ती वर्ष इसी बसन्त पंचमी को समाप्त होकर 26वाँ लगेगा। इस अवधि तक प्रतिनिधियों की नियुक्ति का कार्य सम्पन्न हो जाना चाहिए
नवम्बर और दिसम्बर की अखण्ड-ज्योति में इसी स्तम्भ के अंतर्गत ‘प्रतिनिधियों की नियुक्ति’ वाली योजना छपी है। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसे गम्भीरता-पूर्वक समझा और ग्रहण किया है। बात सचमुच ऐसी है भी कि उस पर विचार करना हर सदस्य के लिए आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है
वे ही अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं। जिनकी अन्तरात्मा में पूर्व जन्मों की संग्रहीत उत्कृष्टता मौजूद है, जिन्होंने इस जन्म में भी अपनी अन्तरात्मा को परिष्कृत किया है - जिनके सामने मानव-जीवन की महत्ता और उसकी सार्थकता का प्रश्न उपस्थित रहता है-ऐसे ही लोग इस परिवार के सदस्य बन सके हैं और इन प्रबुद्ध आत्माओं की अन्तःप्रेरणा को जागृत एवं समुन्नत बनाने के लिए एक उपयुक्त साधन के रूप में “अखण्ड-ज्योति” अपना अस्तित्व बनाये हुए है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह जीवित है
जागृत आत्माओं को ढूंढ़ने और संग्रह करने में हमको ‘अखण्ड-ज्योति’ के 25 वर्ष पूरे हो गये। अब उसे दूसरे कदम उठाने हैं। जिन विचारों का पिछले वर्षों में प्रचार किया जाता रहा है अब उन्हें मूर्त रूप देने के लिये ठोस गतिविधियाँ अपनानी हैं, और रचनात्मक कार्य खड़े करने हैं
‘अखण्ड-ज्योति’ छपे कागजों का व्यापार नहीं है। न उसके पाठक इस तरह के मनचले लोग ही है कि मनोरंजन के लिए, खाली समय काटने के लिये कुछ भी पढ़ते रहने की तरह इस पत्रिका को मँगाते हों। हमने विशेष प्रयत्न और मनोयोगपूर्वक पिछले पच्चीस वर्ष के परिश्रम से इस विशाल जनसमुद्र में से थोड़े से मोती चने हैं
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में से जिन विशिष्ट परिजनों का हम अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुनाव कर रहे हैं, उनमें प्रमुख गुण यही होना चाहिए कि अपनी ही उलझनों तक सुलझे रहने में सीमित न रखकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” की प्रवृत्ति को समुचित मात्रा में धारण किए हुए हों। घर का बड़ा वही कहलाता है जो अपने छोटे भाई बहिनों, अशक्त असमर्थों का भी पूरा ध्यान रखे। ऐसे ही गृहपति प्रशंसनीय कहे जाते हैं और वे ही उसे कुटुम्ब का ठीक तरह पालन पोषण कर सकने में समर्थ हो सकते हैं
ऐसे लोग कौन हो सकते हैं, यही चुनावक्रम इन दिनों चल रहा है। तीस हजार अखण्ड-ज्योति सदस्यों में से सभी इतने उत्साही और निष्ठावान नहीं हैं जिन पर इतना भार डाला जा सके कि वे इस मिशन को गतिशील बनाये रहने के लिये हमारी ही तरह कुछ करने के लिये कटिबद्ध हो जाएँ। यों परिवार के सभी परिजन, अखण्ड ज्योति के प्रायः सभी सदस्य अपनी आध्यात्मिक विशेषताओं से सम्पन्न हैं। पर बड़े उत्तरदायित्व संभालने की क्षमता हर किसी में नहीं हैं
अखण्ड-ज्योति परिवार में पचास सौ ऐसे व्यक्ति भी आ फँसते है जो पत्रिका को कोई जादू, मनोरंजन आदि समझते हैं, कोई आचार्यजी को प्रसन्न करने के लिए दान स्वरूप खर्च करके उसे मँगा लेते हैं। विचारों की श्रेष्ठता और शक्ति की महत्ता से अपरिचित होने के कारण वे उसे पढ़ते भी नहीं। ऐसे ही लोग आर्थिक तंगी, पढ़ने की फुरसत न मिलने आदि का बहाना बना कर उसे मँगाना बन्द करते रहते है
हमने विशेष प्रयत्न और मनोयोगपूर्वक पिछले पच्चीस वर्ष के परिश्रम से इस विशाल जनसमुद्र में से थोड़े से मोती चने हैं। वे ही अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं। जिनकी अन्तरात्मा में पूर्व जन्मों की संग्रहीत उत्कृष्टता मौजूद है, जिन्होंने इस जन्म में भी अपनी अन्तरात्मा को परिष्कृत किया है - जिनके सामने मानव-जीवन की महत्ता और उसकी सार्थकता का प्रश्न उपस्थित रहता है-ऐसे ही लोग इस परिवार के सदस्य बन सके हैं और इन प्रबुद्ध आत्माओं की अन्तःप्रेरणा को जागृत एवं समुन्नत बनाने के लिए एक उपयुक्त साधन के रूप में “अखण्ड-ज्योति” अपना अस्तित्व बनाये हुए है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह जीवित है
जहाँ एक भी प्रति अखण्ड-ज्योति की पहुँचती है वहाँ अपना एक प्रतिनिधि तो होना ही चाहिए। अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को अपने को किसी अखबार का ग्राहक मात्र नहीं समझना चाहिए, वरन् इस युग की ऐतिहासिक घटना-’युग-निर्माण योजना’ का सदस्य मानना चाहिए। एवं इस सदस्यता के साथ ही जो उत्तरदायित्व उसके कन्धे पर आते हैं उनका भी अनुभव करना चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-September
आध्यात्मिकता, धार्मिकता, त्याग एवं सेवा पर अवलम्बित है। यदि अखण्ड-ज्योति की शिक्षा उन्हें पसंद आती है तो उन्हें व्यवहार में भी उतरना ही चाहिये और वह इतना तो होना ही चाहिये जितना कि इस वर्ष के लिए हमने अपने प्रिय परिजनों से आशा की है
(2) जहाँ हमें रुकना है वहाँ उस क्षेत्र के अखण्ड-ज्योति परिजनों को आग्रहपूर्वक बुलाना चाहिए और उनके ठहरने, भोजन आदि का प्रबन्ध करना चाहिये
तद्नुसार ही सबको अपनी तैयारी आरम्भ करनी चाहिये। उस क्षेत्र में अखण्ड-ज्योति परिवार के कितने सदस्य हैं इसकी सूची पत्र लिखकर मथुरा से मँगाई जा सकती है। -
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को आरम्भ से ही यह प्रशिक्षण दिया जाता रहा है कि उन्हें मानव जीवन की सार्थकता के लिए अपने नित्य कर्मों में उपासना, जीवन शोधन एवं परमार्थ के विविध कार्यक्रमों को भी अनिवार्य कर्तव्यों की तरह सम्मिलित करना चाहिए। इसके बिना वे आत्मिक प्रगति के महान लाभ से लाभान्वित न हो सकेंगे। प्रसन्नता की बात है कि यह शिक्षा परिवार के प्रत्येक सदस्य ने हृदयंगम की है और सेवा धर्म को अपनाना जीवन की सार्थकता का अमोघ उपाय माना है
आर्थिक कठिनाई सबको वैसा नहीं करने देती, अतएव व्यक्तिगत संपर्क नहीं बन पाता। अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जो विचारधारा उन तक पहुँच जाती है उतना मात्र ही सम्बन्ध रहता है। व्यक्तिगत सान्निध्य की फिर भी आवश्यकता रहती ही है। उसकी भी अपनी उपयोगिता एवं आवश्यकता रहती है
अखण्ड-ज्योति परिवार के सक्रिय सदस्यों को अपने स्वाध्याय और अपनी साधना तक ही सीमित रहने से काम न चलेगा, उन्हें नव-निर्माण का उत्तरदायित्व भी वहन करना होगा। उन्हें एक संगठनकर्ता, धर्मोपदेशक एवं युग-निर्माता के रूप में परिणत होना चाहिए। अपने व्यक्तिगत कार्य करते हुए इन प्रयोजनों के लिये भी उन्हें समय निकालना ही चाहिये
इस दौरे में कहाँ ठहरा जाय, कहाँ न ठहरा जाय, यह इस बात पर निर्भर है कि उस क्षेत्र में अखण्ड-ज्योति परिवार के कितने सदस्य हैं और उनका वहाँ एकत्रित हो सकना संभव हो सकता है या नहीं? इस कसौटी पर जो स्थान खरे उतरेंगे वहीं ठहरने का विचार है। हमें सभी शाखायें प्रिय हैं, सभी स्वजन प्रिय हैं। पर 40 हजार परिजनों के घरों पर या 3000 शाखाओं में ठहरना संभव नहीं
पिछले अंक में अखण्ड-ज्योति परिवार का यह साहसिक कदम बड़े गर्व एवं गौरव के साथ उद्घोषित किया गया है कि 10 हजार परिजनों ने बौद्धिक शिक्षण के लिए दस-दस का जिम्मा लेकर एवं एक लाख व्यक्तियों को जीवन कला से प्रशिक्षित करने का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठा लिया है। यह बहुत बड़ी बात है। एक लाख व्यक्ति नियमित रूप से इस विचार क्रान्ति के विश्वविद्यालय में पढ़ेंगे
गत गुरु पूर्णिमा से जिनने व्रत ग्रहण किया है उनमें से प्रत्येक को ‘युग निर्माण योजना’ पाक्षिक का नियमित ग्राहक बन जाना चाहिये क्योंकि उनका व्यवहारिक मार्ग दर्शन इसी के द्वारा संभव होगा। अखण्ड-ज्योति से विचार निर्माण का कार्य होता है पर उन्हें व्यवहार रूप में कैसे लाया जाय, कैसे लाया जा रहा है, यह तो पाक्षिक पत्रिका ही बताती है। विचारों को कार्य रूप में परिणत करने का मार्ग दर्शन करना उसी के द्वारा सिखलाया, समझाया जा रहा है। जो उसे नहीं पढ़ते वे कैसे जान पायेंगे कि हमें क्या करना है, किस प्रकार करना है, कार्य करते समय जो कठिनाइयाँ आती हैं उनका हल बताने के लिये इस प्रकार की पत्रिका की आवश्यकता अनुभव हुई, तभी तो उसे निकालने का आयोजन किया गया
अखण्ड-ज्योति पिछले 26 वर्षों से निरन्तर यह बताती चली आ रही है कि आध्यात्मिकता, आस्तिकता, साधना उपासना के साथ ‘लोक सेवा’ भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उसकी उपेक्षा करने पर न किसी की साधना सफल हुई है और न होगी। हमने स्वयं इसी मार्ग का अवलम्बन किया है और जब तक जीवित है इसी मार्ग पर चलते रहेंगे
शेष पीछे भेज सकते हैं, पर उसका नियमित पाठक तो बन ही जाना चाहिये। अखण्ड-ज्योति में व्यवहारिक मार्ग दर्शन की जो कमी रहती है उसे इस पाक्षिक के द्वारा पूरा कर ही लेना चाहिये
इस वर्ष हमारी एक ही आकाँक्षा है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य नव निर्माण का सक्रिय सैनिक बने और समय एवं धन का नियमित उपयोग आरम्भ कर दे। जिनने यह प्रारम्भ कर दिया उनका हार्दिक अभिनन्दन। जो अभी नहीं कर सके हैं, सोच-विचार में पड़े हैं, उनसे अनुरोध है कि इतने छोटे त्याग के लिए इतना सोच विचार न करें
हमारा उद्देश्य एक क्षेत्र के स्वजनों का एक उपयुक्त जगह पर इकट्ठे करके उनके साथ विचार विमर्श एवं परामर्श करना मात्र है। अखण्ड-ज्योति परिवार बहुत बड़ा है वह दूर-दूर तक बिखरा हुआ है। इन परिजनों में से दूरवर्ती लोग बहुत कम संख्या में मथुरा आ पाते हैं। आर्थिक कठिनाई सबको वैसा नहीं करने देती, अतएव व्यक्तिगत संपर्क नहीं बन पाता

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-May
पेट भरने के लिये पशु की तरह जीवित रहना, आज की परिस्थितियों में किसी निष्ठुर पाषाण के लिये ही संभव हो सकता हैं। अखण्ड-ज्योति के पाठकों में से शायद ही कोई इस तरह अभिशाप जैसा जीना पसन्द करे
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
युग-निर्माण की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति परिवार अगले दिनों ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा हैं। उस अवसर पर हम अपने सभी प्रतिनिधियों एवं उत्तराधिकारियों से विशेष परामर्श करना चाहते हैं। अतएव 17, 18,19 जून को उन्हें मथुरा पधारने के लिये इन पंक्तियों द्वारा सादर आमंत्रण भेजते हैं
अप्रैल की अखण्ड-ज्योति में पृष्ठ 45 से 52 तक 10 आवश्यक कार्यों की पूर्ति के लिए परिजनों का आह्वान किया गया है। उनकी ओर हम में से प्रत्येक को पूरा-पूरा ध्यान देना चाहिए और प्रस्तुत कार्यक्रमों में से जो कुछ बन पड़े उसके लिए अधिकारिक उत्साह प्रदर्शित करना चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-July
“अखण्ड-ज्योति परिवार” के कर्मठ परिजनों द्वारा
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ का कर्मठ सदस्य होने के नाते मुझे ‘एक घण्टा समय एक आना नकद’ की माँग सहर्ष स्वीकार है। जन-जागरण के लिए घर-घर अलख जगाने के लिए एक घण्टा प्रतिदिन के हिसाब से मैं अपना समय लगाया करूंगा। अकेला या टोली बनाकर जैसे भी बनेगा-नव-निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य पढ़ाने और सुनाने लोगों के पास जाया करूंगा
युग-निर्माण योजना का उद्देश्य स्वरूप, सन्देश और कार्यक्रम ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सभी परिजनों और उसके संपर्क में आने वाले विचारशील लोगों को समझाने के लिए हमने आगामी शीत ऋतु में चार महीने का दौरा करने का निश्चय किया है। माघ सुदी प्रतिपदा से पूर्णिमा तक तो 15 दिन का शिविर तपोभूमि में चलेगा इन 15 दिनों को छोड़कर कार्तिक मार्गशीर्ष पौष, और माघ इन चार महीनों में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात इन छह प्रान्तों में जहाँ व्यवस्था और आवश्यकता होगी वहाँ जाने का प्रयत्न करेंगे। मार्गशीर्ष का पूरा महीना उत्तर प्रदेश
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को दो दो चार-चार की टोलियों में और जहाँ वैसा प्रबन्धन हो सके वहाँ अकेले ही विवाहोन्माद के विरुद्ध वातावरण बनाने के लिए कार्य संलग्न होना है। इस प्रयोजन के लिए (1) ऐसे प्रतिज्ञापत्र छपाये गये हैं, जिसमें एक ओर विवाहों में आज कल प्रचलित बुराइयों का दिग्दर्शन कराया गया है और दूसरी और उन बुराइयों को परित्याग करने का प्रतिज्ञा पत्र है। (2) 10 ट्रैक्ट गत मास इसी संदर्भ में लिखे और छापे जा चुके हैं
इस अन्धकार के घटाटोप में भी टिमटिमाते सितारे विद्यमान है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य उसी श्रेणी में है। उन्होंने आरम्भ से ही यह सीखा है कि आत्मा की प्रगति और ईश्वर की प्रसन्नता तब तक संभव नहीं जब तक कि व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत संकीर्णता एवं स्वार्थपरता के दायरे से निकल कर ‘लोक मंगल’ की ओर कदम बढ़ाते हुये अपनी आदर्शवादिता, सहृदयता, उदारता एवं श्रेष्ठता, का परिचय न दे। इसलिये उसके लिये देशभक्ति एवं समाज सेवा उपेक्षणीय नहीं रहती वरन् व्यक्तिगत कार्यों से भी अधिक आवश्यक, उपयोगी एवं आनन्ददायक प्रतीत होती रहती है
अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों में से अधिकाँश इसी स्तर एवं इसी मनोभूमि के हैं। इसलिये हमें विश्वास बना रहता है कि अपने इन परिजनों की सहायता से नवनिर्माण के बड़े से बड़े कार्यक्रमों को आसानी से सफल बना सकेंगे। अब युग निर्माण योजना का तृतीय वर्ष आरम्भ होने पर हमारी इस मान्यता का निर्णयात्मक निश्चय भी हो जायगा
17, 18, 19 जून के होने वाले समाज सुधार सम्मेलन की तैयारी की जा रही है। चूँकि अखण्ड-ज्योति का यह अंक तब तक छप चुकेगा। सिलाई, कटाई, पैकिंग आदि के लिये समय रहे, इसलिये हर महीने वह 20 तारीख तक छप जाती है। इसलिये इस अंक में सम्मेलन के समाचार न जा सकेंगे उसका उल्लेख अगले अंक में होगा
युग-निर्माण की महत्ता और उसमें ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों का योग यह दोनों ही तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इसके द्वारा ऐतिहासिक परिवर्तन होने वाले हैं। इसलिये यह प्रचार यात्रा कार्यक्रम की विशेषता एवं उपयोगिता की दृष्टियों से बहुत-चढ़ी सिद्ध होगी
अखण्ड-ज्योति ग्राहक संख्या :- .............................................................................................................
अब समय आ गया है जब कि हम आत्म परीक्षण करें और अपने गत 26 वर्षों के श्रम की सफलता, असफलता का लेखा-जोखा बनावें। अखण्ड-ज्योति जो कुछ कहती सिखाती रही है उसे कितनों ने हृदयंगम किया है अब इसकी जाँच की जानी आवश्यक है। लेख अच्छे होते हैं, पसन्द भी आते हैं ऐसा कहने वाले बहुत लोग हैं, उनकी गणना ‘प्रशंसकों’ में की जा सकती है। संसार में अनेक रुचियों के लोग हैं
गरीब व्यक्ति भी अपनी रोटी में से एक छटाँक आटा कम करके इतना अनुदान जुटा सकता है बशर्ते कि उसमें श्रद्धा विद्यमान है। ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों की श्रद्धा असन्दिग्ध है इसलिये इन्हें इसमें कुछ भी कठिनाई अनुभव नहीं हो सकती
समय दान बहुत बड़ा दान है। इसे ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों ने अपना लिया और एक घण्टा नित्य का संकल्प कर लिया तो 40000 घण्टे प्रतिदिन का सामूहिक श्रम जनता की भावनाओं और प्रवृत्तियों को उलट-पलट कर रख देने के लिये बहुत ही कारगर सिद्ध होगा
यह छोटे सम्मेलन वस्तुतः विचारगोष्ठियों के रूप में होने चाहिए। इन्हें और उस क्षेत्र के ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के परिजनों एवं विचारशील लोगों को विशेष रूप से निमन्त्रण पत्र भेजकर बुलाया जाय। उनके ठहरने, खाने-पीने आदि का प्रबन्ध किया जाय। प्रातःकाल एक कुण्डी या पाँच कुण्ड हवन भी रखा जा सकता है
अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को गत 26 वर्षों में जिस अध्यात्म एवं आत्म-कल्याण की शिक्षा दी जाती रही है उसका एक आवश्यक एवं अनिवार्य अंग ‘लोक सेवा’ को बताया जाता रहा है। विश्व मानव ही भगवान का विराट रूप है। जब तक सहृदयता, परोपकार, लोक मंगल के लिए कुछ,त्याग करने की वृत्ति उत्पन्न न हो तब तक यही कहना होगा कि भजन पूजन में रुचि बढ़ जाने पर भी सच्चे अध्यात्म का उदय नहीं हुआ
यों जिस कार्य की उपयोगिता पर आस्था न हो उसके लिये एक पाई भी भारी पड़ती है। कितने ही लोग ‘अखण्ड-ज्योति’ का चन्दा भेजने तक में हर महीने 30 नये पैसे, नित्य एक नया पैसा खर्च करने तक में आर्थिक संकट का रोना रोया करते हैं। ऐसे अश्रद्धालुओं के बारे में तो कुछ न कहना ही ठीक है। पर हम में से अधिकाँश उस स्तर के नहीं हैं
अब समय आ गया जब कि हमें इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने ही चाहिए। अखण्ड-ज्योति परिवार की युग-निर्माण योजना के सदस्यों का उत्तरदायित्व इस सम्बन्ध में बहुत अधिक है। उन्होंने नव-निर्माण की जो शपथ ली है, उसके अनुसार विवाहोन्माद को चुपचाप सहते रहना- उसका प्रतिरोध न करना किसी प्रकार उचित न होगा। उन्हें आगे बढ़कर कदम उठाने ही चाहिए
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ द्वारा संचालित ‘युग-निर्माण योजना’ का द्वितीय वर्ष समाप्त होकर इस गुरु पूर्णिमा -13 जुलाई 65 को तृतीय वर्ष आरम्भ होता है। इस पुण्य अवसर पर मैंने अनुभव किया है कि हम ‘अखण्ड-ज्योति’ सदस्यों का आज की विषम परिस्थितियों को बदलने का विशेष उत्तरदायित्व है। इस उत्तरदायित्व को पूरी श्रद्धा और तत्परता के साथ निबाहने का मैं आज के पुण्य पर्व पर प्रतिज्ञापूर्वक व्रत ग्रहण करता हूँ
“अखण्ड-ज्योति” द्वारा प्रकाशित पुस्तकों पर अब तक 10) से अधिक की पुस्तकें मंगाने पर डाक खर्च फ्री होने का नियम था। वह अब पिछले चार महीने से बदल दिया गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-March
ऐसे स्थानों को एक प्रकार से वातानुकूलित स्तर का कहा जा सकता है। शान्ति-कुँज में अखण्ड-ज्योति, अखण्ड अग्नि, नित्य एक गायत्री महा पुरश्चरण, नित्य चौबीस हजार आहुतियों का हवन, गंगा-हिमालय का मन्दिर, गायत्री महाशक्ति की नियमित पूजा आरती, प्रमुख तीर्थों की नित्य झाँकी, भावोत्तेजक प्रदर्शनी, जड़ी-बूटी उद्यान, कल्प साधकों की साधना तथा शिक्षा, गंगा की गोद- हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की साधना भूमि, गायत्री के दृष्टा विश्वामित्र की तपस्थली, प्राण प्रखरता की प्रचण्ड ऊर्जा, दिव्य सान्निध्य एवं उच्चस्तरीय मार्गदर्शन- संरक्षण जैसी विशेषताओं में से एक-एक का पर्यवेक्षण प्रतीत होता है कि यहाँ वह वातावरण विद्यमान है जिसमें मिलने वाली शिक्षा और की जाने वाली साधना सफल सार्थक हो सकती है। ऐसी व्यवस्था बना लेने के उपरान्त ही अब यह साहस किया गया है कि उपयुक्त वातावरण में उच्चस्तरीय साधना करने के लिए साधकों को आमन्त्रित किया जाय और उन्हें त्रिविधि प्रयोजनों की पूर्ति में सन्तोषजनक सहायता कर सकने वाली कल्प साधना करायी जाय

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-June
अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक विचारशील पाठक को प्रज्ञा परिजन के नाम से सम्बोधन किया जाता है। उन्हें पाठक या वाचक नहीं समझा जाता वरन् यह आशा की जाती है कि युग सत्र में उनकी छोटी बड़ी भूमिका अवश्य होगी। वे मूक दर्शक नहीं रहेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-October
‘अखण्ड-ज्योति’ का प्रस्तुत परिवर्तन इसी दिशा में आरम्भ किये गये, प्रयास का एक महत्वपूर्ण कदम है। इस अंक में लगभग आधे लेख ऐसे हैं, जो नवीन आधार पर अध्यात्म तत्त्व-ज्ञान को समझने की दिशा में प्रकाश देंगे। आगे के अंकों में इस दिशा में चिन्तन, मनन, शोध, अध्ययन का बहुत प्रयत्न किया जाना है और उन उपलब्धियों के फलस्वरूप अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के प्रतिपादन की अधिक स्पष्ट और अधिक उपयोगी झाँकी भी मिलने लगेगी
अखण्ड-ज्योति के कलेवर, स्तर एवं मूल्य में वृद्धि
अनेक वस्तुओं के दाम बढ़े हैं, लोगों ने उन्हें आवश्यक वस्तुयें माना है और उस बढ़े खर्चों को सहन किया है। फिर अखण्ड-ज्योति का भाव तो बढ़ा नहीं केवल वजन और आवरण की बढ़ोत्तरी मात्र बढ़ी है। एक सेर दूध के स्थान पर पौने दो सेर दूध के दाम ड्योढ़े देने पड़ें और उसमें मलाई भी अधिक मोटी पड़ी हो तो ड्योढ़े पैसे देने में किसी को यह शिकायत नहीं हो सकती कि कीमत बढ़ी या महंगाई बढ़ी है। अधिक मात्रा में अधिक उपयोगी वस्तुओं का मूल्य कुछ अधिक देना पड़ता है तो उसे भाव-वृद्धि की महंगाई नहीं कहा जायेगा
जो हो अब अखण्ड-ज्योति का मूल्य बढ़ाया ही जा रहा है, उसे प्रसन्नतापूर्वक वहन करना ही है। उदार परिजन इसे बिना अनखनाये स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि युग की एक महान् आवश्यकता की पूर्ति के लिये बड़े कदम उठाने का प्रयत्न किया जा रहा है, उसमें हममें से प्रत्येक का योगदान रहना ही चाहिये। थोड़ा-थोड़ा अतिरिक्त बोझ हरएक को वहन करना चाहिये
ये गन्दी तस्वीरों तथा भौंड़ी मन बहलाने वाली उन सस्ती पत्रिकाओं को खरीदने वालों से भिन्न हैं, जो अनैतिक विज्ञापनों से भरे पृष्ठों को भी कलेवर में जोड़ देते हैं और मोटी पत्रिका सस्ते मूल्य में खरीदने की अपनी बुद्धिमानी पर प्रसन्न होते हैं। अखण्ड-ज्योति का स्तर सर्वथा भिन्न है। वह उत्कृष्ट स्तर की ऐसी पाठ्य सामग्री जुटाती है, जो पाठक के जीवन को सद्गुणों और सत्प्रवृत्तियों से भर कर उसे सुखी समुन्नत जीने की सम्भावनायें प्रशस्त करे
इसलिये उसमें ओछे लोगों की रुचि के अनुरूप कलेवर चित्र तथा ओछा मैटर नहीं भरा जाता। यदि अन्य मासिक पत्रों जैसी रीति-नीति अपनाई गई होती तो औरों की तरह अखण्ड-ज्योति भी मोटी प्रकाश रूपा रही होती। पर अपना तो लक्ष्य एवं दृष्टिकोण ही सर्वथा भिन्न है। हम एक मिशन लेकर चल रहे हैं
इस अंक में लगभग आधे लेख ऐसे हैं, जो नवीन आधार पर अध्यात्म तत्त्व-ज्ञान को समझने की दिशा में प्रकाश देंगे। आगे के अंकों में इस दिशा में चिन्तन, मनन, शोध, अध्ययन का बहुत प्रयत्न किया जाना है और उन उपलब्धियों के फलस्वरूप अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के प्रतिपादन की अधिक स्पष्ट और अधिक उपयोगी झाँकी भी मिलने लगेगी। प्रयत्न यह किया जायेगा कि पाश्चात्य वैज्ञानिकों, अन्वेषकों, तार्किकों, अनुसंधानकर्ताओं, प्रत्यक्षदर्शियों एवं अनुभवकर्ताओं के अनुभव एवं प्रतिपादनों को प्रधानता देते हुए, यह सिद्ध किया जाय कि इनकी क्रमिक प्रगति भी तत्त्व-ज्ञान, धर्म एवं अध्यात्म की ओर किस प्रकार बढ़ रही हैं। नास्तिकता का बुखार अब किस प्रकार घटते हुए स्वाभाविक तापमान पर पहुँच रहा है
इसी प्रकार युग-निर्माण-योजना का स्वरूप भी आगे से अधिक- अखण्ड-ज्योति की तरह ही बढ़ाया जा रहा है। अखण्ड-ज्योति तालाब और युग-निर्माण उसका कमल है। एक को कृष्ण, एक को अर्जुन कहते हैं। दोनों का साथ-साथ चलना, साथ-साथ आगे बढ़ना स्वाभाविक है
इसी प्रकार युग-निर्माण-योजना का स्वरूप भी आगे से अधिक- अखण्ड-ज्योति की तरह ही बढ़ाया जा रहा है। अखण्ड-ज्योति तालाब और युग-निर्माण उसका कमल है। एक को कृष्ण, एक को अर्जुन कहते हैं
अखण्ड-ज्योति में अब तक जिस स्तर के लेख निकलते रहे हैं, उनके अभ्यस्त पाठकों को नया विषय बदलते देख-कर कुछ अटपटा अवश्य लगेगा। पर मजबूरी में और कोई रास्ता नहीं। नई पीढ़ी को स्थिति के अनुरूप विचार देने के लिये हमारे पास और कोई साधन नहीं
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों का स्तर मामूली अखबारों को मनोरंजन के लिये पढ़ते रहने वाले बाजारू पाठकों जैसा नहीं है। ये गन्दी तस्वीरों तथा भौंड़ी मन बहलाने वाली उन सस्ती पत्रिकाओं को खरीदने वालों से भिन्न हैं, जो अनैतिक विज्ञापनों से भरे पृष्ठों को भी कलेवर में जोड़ देते हैं और मोटी पत्रिका सस्ते मूल्य में खरीदने की अपनी बुद्धिमानी पर प्रसन्न होते हैं। अखण्ड-ज्योति का स्तर सर्वथा भिन्न है
पर पाठकों की सुविधा का ध्यान रखते हुए मूल्य वृद्धि केवल ड्योढ़ी की गई है। अब अखण्ड-ज्योति का चन्दा 4) के स्थान पर 6) वार्षिक करना पड़ रहा है। अपना बस चलता तो पृष्ठ बढ़ाने पर भी मूल्य न बढ़ाते, पर और कोई मार्ग शेष न रहने पर सब करने के लिये विवश ही होना पड़ा है
अखण्ड-ज्योति और उसके परिजनों द्वारा किये हुए संयुक्त प्रयास आश्चर्यजनक प्रगति कर चुके हैं। उस सफलता का श्रेय परिजनों को है, जिन्होंने निर्धारित कार्यक्रमों और निर्देशों को सदा पूरी सचाई और तत्परता के साथ पूरा करने के लिये भरसक प्रयास किया है। परिजनों की इसी मनोभूमि को देखते हुए हमें पूरा और पक्का विश्वास है कि अब जबकि विशेष परिस्थितियों में पत्रिका का कलेवर-स्तर तथा मूल्य बढ़ाया जा रहा है, वे उस परिवर्तन के कारण पड़ने वाले थोड़े से दबाव को भी प्रसन्नतापूर्वक सहन कर लेंगे और अपनी सदस्यता सदा की भाँति यथावत् बनाये रहेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-May
अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य से इस सर्वांगपूर्ण साधना पद्धति का अनुरोध गत अंक में किया गया है और आशा की गई कि उसे अपनाने का तत्परतापूर्वक प्रयत्न किया जायेगा। साधना और उपासना की समन्वित प्रक्रिया को अपनाने वाले 24 हजार साधकों द्वारा इस युग के अभूतपूर्व महत्तम गायत्री महापुरश्चरण को पूरा किया जाना है। पुरश्चरणों में जप-संख्या की पूर्ति ही पर्याप्त नहीं होती वरन् कर्ताओं का स्तर प्रधान रहता है
पूर्व जन्मों के सुसंस्कार पर्याप्त मात्रा में जिनके पास संचित हैं उन्हें ही विशेष प्रयत्न के साथ ढूंढ़ा और एक माला में पिरोया गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार का यही स्वरूप है। ऐसे लोगों से यह आशा सहज ही की जा सकती है कि वे उपयुक्त समय पर आवश्यक उद्बोधन पाकर अपने उच्चस्तरीय कर्त्तव्यों के प्रति सजग होंगे और जो करना ही चाहिये उसे करने में आनाकानी न करेंगे। कितने ही परिजन लम्बे समय से जप-भजन करते चले आ रहे हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-January
वे इसे झंझट भी समझेंगे और बेकार भी मानेंगे। ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों की मनोभूमि इतनी घटिया नहीं हो सकती। इसलिये उनसे सहज ही आशा की जायेगी कि ज्ञान-यज्ञ में भागीदार रहकर अपना, अपने परिवार का, अपने मित्रों का भावनास्तर ऊँचा उठाने में निश्चित रूप से तत्पर रहेंगे और इस महान् प्रयोजन के लिये एक घण्टा समय और इस पैसा रोज खर्च करने में संकोच न करेंगे। प्रसन्नता की बात है कि यह प्रक्रिया लगभग सभी परिजनों ने अपना ली है, जो शेष हैं वे इस बसन्त पंचमी से अपना लेंगे, यह आशा सहज ही की जा सकती है
अपना ज्ञान-यज्ञ अभियान इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिये है। इस पुण्य प्रयोजन में सम्मिलित- भागीदार होने के लिए ‘अखण्ड-ज्योति’ के समस्त परिजनों का आह्वान इसीलिये किया गया है कि वे अग्रणी बनकर नव प्रभात का यह संचार करें जिससे अगले क्षणों हर किसी को प्रखर प्रकाश से लाभान्वित होने का अवसर मिल सके
इसके विपरीत जिनने अपना अन्तःकरण पवित्र और व्यक्तित्व समुन्नत बनाया है उनका दस-बीस मिनट भजन भी ईश्वर की उपलब्धि और आत्म-साक्षात्कार का लाभ दे सकता है। इस तथ्य को ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों को हृदयंगम कराते हुये उन्हें आत्म-निरीक्षण, आत्म-शोधन और आत्म-निर्माण की दिशा में अग्रसर होने के लिए प्रोत्साहित, प्रेरित किया जा रहा है। पूजा, उपासना के सम्बन्ध में जितना सीखा सिखाया जा चुका है वह पर्याप्त है। उपासना के लिए यदि आधा घण्टा नित्य निकाला जा कसे तो पर्याप्त है
जहाँ-जहाँ अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वहाँ यह तलाश किया जाना चाहिए कि पत्रिका के सदस्य कौन-कौन हैं। अधिक उत्साही व्यक्ति उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलें और अनुरोध करे कि अगले वर्ष संघबद्ध होकर रहना है। किसी सुविधा के दिन सबको एकत्रित किया जाय और युगनिर्माण शाखा के नाम से एक संगठन बना लिया जाय
जो उसे पढ़ते हैं वे ही हमारी प्रेरणाओं से परिचित होते और हलचल करते हैं। अस्तु जिन्हें नवनिर्माण में आस्था है-उन्हें ‘अखण्ड-ज्योति’ और ‘युग-निर्माण योजना’ पत्रिकाओं के सदस्य बनाने का पूरा प्रयत्न करना चाहिये। इसलिए अपने साथियों और परिजनों पर आवश्यक प्रभाव एवं दबाव भी डालना चाहिए। पत्रिकाओं के पाठक घटने, बढ़ने के साथ आँदोलन का स्वरूप घटना, बढ़ना सुनिश्चित रूप से जुड़ा हुआ है
‘अखण्ड-ज्योति’ इस अंक से 29 वें वर्ष में चल रही है। गत 28 वर्षों में वह अपने पाठकों की नीति, धर्म, सदाचार, संयम, प्रेम, परमार्थ जैसे मानवीय सद्गुणों की शिक्षा देती रही है। विभिन्न स्तर के विभिन्न आधार पर लिखे गये उसमें जो लेख छपते रहें हैं उनके दो ही प्रयोजन रहे हैं, कि व्यक्ति अपने अन्तरंग जीवन में अधिक सद्भावना-सम्पन्न और बाह्य जीवन में परमार्थ-परायण बने
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के हर सदस्य को उस दिन साधारण काम-काज की छुट्टी रखनी चाहिये और वह पूरा दिन ‘युग-निर्माण’ की प्रेरक प्रवृत्तियों को गतिशील बनाने के लिए एक प्रेरक आयोजन की व्यवस्था में बिताना चाहिए। अपने परिवार के जहाँ जितने व्यक्ति हैं वे उस दिन एक स्थान पर एकत्रित हो सकें, इसकी तैयारी यह अंक मिलते ही आरम्भ कर देनी चाहिये। सभी से मिल लेना चाहिये और अनुरोधपूर्वक आयोजन में सम्मिलित होने का अनुरोध करना चाहिये
24 हजार भागीदारी द्वारा एक माला नित्य जप करने से प्रति दिन 24 लाख जप होते हैं। हर दिन एक 24 लक्ष अनुष्ठान ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यगण करेंगे। यह क्रम दस वर्ष तक जारी रहेगा। यह सामूहिक जप इतना प्रखर- इतना प्रबल और इतना समर्थ हो जायेगा कि इसके फलस्वरूप अन्तरिक्ष में युग बदल देने वाली अदृश्य शक्ति पर्याप्त मात्रा में आविर्भूत होगी और विश्व-मंगल के लिए आशाजनक परिणाम उत्पन्न करेगी
यों आगे चलकर संगठित तो समस्त विश्व के सभी धर्म प्रेमियों को करना होगा, पर इसका आरम्भ अपने छोटे से ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ से कर रहे हैं। इस परिवार में अधिकाँश व्यक्ति पूर्वजन्मों की संचित अध्यात्म सम्पदा वाले हैं। इन्हें प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़-ढूँढ़कर 28 वर्षों के प्रयत्न परिश्रम से एक झण्डे के नीचे एकत्रित किया गया है
अपने जीवन का हर महत्वपूर्ण कार्य बसन्त पंचमी के शुभ मुहूर्त से ही आरम्भ होता रहा है। ‘अखण्ड-ज्योति पत्रिका’ बसन्त पंचमी से आरम्भ हुई। इसलिए इसका जन्म दिन भी यही है। गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास बसंत पंचमी के दिन किया गया
उसे हर देश के- हर धर्म के- हर समाज के लोग समान रूप से स्वीकार शिरोधार्य करेंगे। पर अभी उसका आरम्भ ‘अखण्ड-ज्योति-परिवार’ के परिजनों से किया गया है। जो कार्यक्रम इस प्रथम चरण में बनाये जा रहे हैं वे यह सोच कर बनाये जा रहे हैं कि उन्हें हमारे परिजन तुरन्त कार्यान्वित करेंगे और फिर उनके पुरुषार्थ से यह प्रक्रिया आगे के क्षेत्रों में बढ़ती फैलती चली जायेगी। इसलिए प्रारम्भिक विचार और कार्य इस स्तर के हों जिन्हें अखण्ड-ज्योति-परिवार के सदस्य सरलतापूर्वक अविलम्ब कार्यान्वित कर सकें
जब तक यह उभयपक्षीय पूजा अर्चा एकत्रित नहीं होती तब तक बिजली के दोनों तार मिले बिना प्रकाश न होने की तरह अंतःकरण में अंधेरा ही बना रहता है। इसलिये अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को यह समन्वित साधना प्रक्रिया बताई गई है
केवल साड़े तीन वर्ष शेष हैं। इस अवधि में हमारी यह उत्कट अभिलाषा है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ के परिजनों को कुछ समय अपने पास रखकर प्रशिक्षण प्रदान करें। अब घूमना-फिरना हमारे लिए कठिन दिखता है। शरीर अभी से गड़बड़ी फैलाने लगा है
‘अखण्ड-ज्योति’ का प्रत्येक सदस्य अध्वर्यु भागीदार के रूप में इस जप अनुष्ठान में किसी न किसी भाँति भाग लेगा, ऐसी आशा है
उस दिन सभी परिजन संघबद्ध हो जाँय। जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य हैं वहाँ एक ‘युग-निर्माण शाखा’ गठित करली जाय। अधिकाँश स्थानों पर बहुत-बहुत सदस्य हैं, जहाँ कम हों वहाँ प्रयत्नपूर्वक उस अवधि में बनाए जा सकते हैं। तक भी उत्साही कार्यकर्ता यदि खड़ा हो जाय तो अपने यहाँ पाँच सदस्य बनाने और उन्हें संगठित करने के लिए-व्यवस्था कर सकता है
पुराने सड़े-गले ढर्रे को अपनाये बैठे रहने वाले व्यक्ति अभीष्ट बारीकियों को समझ नहीं पाते फलतः प्रगति के स्थान पर विकृति उत्पन्न करते हैं। हमें क्या सोचना चाहिए और क्या करना चाहिए इसका ठीक तरह प्रशिक्षण ‘अखण्ड-ज्योति’ और युग-निर्माण’ पत्रिकायें ही करती हैं। जो उन्हें पढ़ते तक नहीं उनसे मिशन को गतिशील बनाने की भला क्या आशा की जायेगी। अनजान लोगों की भीड़ इकट्ठी करके बड़ा संगठन बना लेने का विडम्बना भरी मोह नहीं करना चाहिये
पंचकोशी उपासना क्रम एक-दो वर्ष तो साधकों ने चलाया फिर उत्साह ठण्डा पड़ गया तो बहुत थोड़े साधक रह गये। अतएव ‘अखण्ड-ज्योति’ में वह साधना क्रम छापना बन्द करना पड़ा। जो साधक उस मार्ग पर चल रहे हैं उन्हें पत्रों द्वारा अगला मार्ग-दर्शन बराबर किया जा रहा है। सर्व साधारण के लिये सरल और स्वल्पकाल में सम्भव हो सकने वाला साधन ही चल सकता है
यह भूलना नहीं चाहिए कि ‘अखण्ड-ज्योति’ -हमारी वाणी है। उसी के माध्यम से इतना बड़ा अभियान आँदोलन चलाया जा रहा है। जो उसे पढ़ते हैं वे ही हमारी प्रेरणाओं से परिचित होते और हलचल करते हैं
जो कार्यक्रम इस प्रथम चरण में बनाये जा रहे हैं वे यह सोच कर बनाये जा रहे हैं कि उन्हें हमारे परिजन तुरन्त कार्यान्वित करेंगे और फिर उनके पुरुषार्थ से यह प्रक्रिया आगे के क्षेत्रों में बढ़ती फैलती चली जायेगी। इसलिए प्रारम्भिक विचार और कार्य इस स्तर के हों जिन्हें अखण्ड-ज्योति-परिवार के सदस्य सरलतापूर्वक अविलम्ब कार्यान्वित कर सकें। भारतीय धर्म में छुटपुट शुभ कार्य भी प्रार्थना, उपासना के साथ आरम्भ किये जाते हैं तो ‘युग-निर्माण’ जैसे महानतम कार्य के मूल में उपासना का आधार न रहे यह कैसे हो सकता है? गायत्री-मन्त्र भारतीय धर्म और संस्कृति का मूल है। इसमें वह शिक्षा भी है और यह शक्ति भी है जिसके आधार पर व्यक्ति और समाज का स्तर उत्कृष्ट बनाया जा सके
इसे इसी वर्ष से आरम्भ कर रहे हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार में जो भी इस प्रकार के ढलती आयु के अवकाश प्राप्त व्यक्ति हों उन्हें अनुरोधपूर्वक आमन्त्रित किया जा रहा है। साधना, स्वाध्याय, सेवा और संयम की चतुर्विधि तपश्चर्या चातुर्मास से जो कर सकें उन्हें सौभाग्यवान कहा जाना चाहिये। ऐसे सौभाग्यवानों का प्रशिक्षण करने का अवसर हमें तीन वर्ष मिलेगा यह हमारा भी एक सौभाग्य ही होगा
अक्टूबर 67 की ‘अखण्ड-ज्योति’ में महाकाल की इस विनाशलीला का कारण, आधार तथा माध्यम और भी अधिक विस्तारपूर्वक बताया गया है। उसमें कहा गया है कि- युद्ध ही एक मात्र महाकाल का दण्ड माध्यम नहीं वरन् और भी अनेक आधार हैं। रक्तपात के लिये युद्ध मोर्चे पर होने वाला घमासान ही नहीं- गृह युद्ध भी ऐसा आधार है जिससे फलस्वरूप उससे भी भयानक लोक सन्ताप उत्पन्न हो सकता है
‘अखण्ड-ज्योति-परिवार’ के हर सदस्य को स्थानीय शाखा के रूप में संगठित हो जाना चाहिये। सूत के कच्चे धागे मिलकर एक ऐसे मजबूत रस्से का रूप धारण करते हैं जिससे मदोन्मत्त गजराज को बाँधा जा सके। बँधी हुई सींकों की बुहारी झाड़ने का काम ठीक तरह करती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-February
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य निश्चित रूप से चुने हुए मणि-मुक्ता हैं। 29 वर्ष के परिश्रम से हमने बहुत खोज-बीन के बाद इन आध्यात्मिक संचित पूँजी के धनी मानियों को एकत्रित किया और एक माला में पिरोया है। वे आज राख से ढके हुए अंगार की तरह निष्क्रिय भले ही दिखाई पड़ते हैं, पर वस्तुतः उनके भीतर एक चिनगारी मौजूद है, जो अवसर मिलते ही अपनी उष्णता एवं प्रकाश ज्योति का परिचय देगी
(4) अन्तरिक्ष की शुद्धि के लिए दस अश्वमेधों का जो संकल्प अखण्ड-ज्योति परिवार ने किया है उसमें भागीदार होने तथा दूसरों को भागीदार बनाने के लिये दौड़धूप करनी चाहिये। हर दिन 24 लक्ष गायत्री मंत्र जप कर अनुष्ठान पूरा करने के लिये ऐसे 24 हजार भागीदारों की आवश्यकता है जो एक माला (108) गायत्री मंत्र जप एवं सत्संकल्प पाठ नित्य करते रहें। स्वयं को तथा अपने परिवार में हर सदस्य को इसमें भागीदार बनाना चाहिये तथा संपर्क के जिन लोगों को इसके लिये तैयार किया जा सके करना चाहिए
अखण्ड ज्योति के हर सदस्य ने उसे किसी-न-किसी रूप में मनाया होगा, क्योंकि हम सबके लिए यह एक विशिष्ट पारिवारिक शुभ दिन है। इसी दिन ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रकाशित हुई, इसी दिन ‘युग-निर्माण-योजना’ आरम्भ हुई, इसी दिन ‘गायत्री तपोभूमि’ की नीव रखी गई, इसी दिन ‘यज्ञ आन्दोलन’ प्रारंभ किया गया एवं हमारा आध्यात्मिक जन्म-दिन भी है। अपनी ‘उपासना’ भी इसी दिन से आरम्भ की, लोक-मंगल के कार्यक्रमों में भी इसी दिन हमने हाथ डाला और अब जीवन की अन्तिम तप साधना भी इसी दिन से आरम्भ होगी। इसलिए व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए और सामूहिक रूप से समस्त परिवार के लिए यह एक प्रेरणापूर्ण प्रकाश पर्व है
यह ज्ञान यज्ञ हर घर में चलते रहना चाहिए। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाएं तथा सस्ते ट्रैक्टों में कुछ पैसा खर्च करके इसी 40 दिन की अवधि में हमें अपना ज्ञान मन्दिर आरम्भ कर लेना चाहिए और दस पैसा प्रतिदिन इस ज्ञान-यज्ञ के लिए निकाल कर आगे भी इस भण्डार को बढ़ाने का क्रम जारी रखना चाहिए
इस युग में संगठन ही एकमात्र सच्ची शक्ति है जिसके आधार पर व्यक्ति और समाज को कुमार्ग पर चलने से विरत कर सन्मार्ग पर चलने के लिए विवश किया जा सकता है। इस शक्ति का उद्भव हमें अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों में उन्हें युग-निर्माण शाखाओं के अंतर्गत संगठित करके आरम्भ करना चाहिये। जहाँ जितने परिजन हैं वे इन 40 दिनों के भीतर हो। अपना संगठन बनालें और एक-मात्र कार्यवाहक पदाधिकारी नियुक्त करलें
यों बसन्त हर वर्ष आता है। अखण्ड-ज्योति परिवार भी 28 बसन्त गुजार चुका है। कभी वैसी आवश्यकता नहीं समझी गई जैसी आज है, इसलिए कभी कोई विशेष सन्देश एवं उद्बोधन भी उपस्थित नहीं किया गया। पर अब मजबूरी है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-November
दूसरा बड़ा काम अखण्ड-ज्योति परिवार की संगठित शक्ति के द्वारा विश्व के नव-निर्माण की संभावनाओं को मूर्तिमान स्वरूप प्रदान करना है। अगला समय मंगलमयी सम्भावनायें लेकर अवतरित होने जा रहा है। उसमें एक विश्व, एक राष्ट्र, एक धर्म, एक संस्कृति, एक नीति, एक परम्परा, एक अर्थतन्त्र एवं सर्वांगीण एकता के आधार पर व्यक्ति का मन-स्तर और समाज का ढाँचा नये सिरे से खड़ा किया जायेगा
हर प्रबुद्ध परिजन को अपने दूसरे साथियों में उल्लास और उत्साह पैदा करना है। इसलिये जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति परिजन हैं, वहाँ उन्हें परस्पर, संपर्क, सहयोग एवं घनिष्ठ भाव पैदा करना चाहिये। ताकि एक मजबूत श्रृंखला में आबद्ध होकर एक दूसरे से प्रेरणा प्राप्त करने की प्रक्रिया ठीक तरह चलने लगे। अपने में से एक को भी बिछुड़ने नहीं देना चाहिये वरन् प्रयत्न यह करना चाहिये कि विशालता की अभिवृद्धि हो और संख्या की दृष्टि से हम अब की अपेक्षा दूने चौगुने हो जायें
अखण्ड-ज्योति परिवार एक ऐसा ही प्रयास है। बड़े प्रयत्नपूर्वक इस माला में हमने ढूँढ़-ढूँढ़कर मूल्यवान रत्नों को इकट्ठा किया और पिरोया है। इस सर्व-शक्ति द्वारा बुद्धि और विज्ञान के दुरुपयोग द्वारा उत्पन्न विकृतियों का सामना करने के लिये एक मजबूत मोर्चा लगाया जा सकता था, सो लगाया भी गया है
हमें यह करना ही होगा। इस वर्ष अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं के सदस्य दूने कर लेने हैं ताकि उसी अनुपात से नव-निर्माण का-युग परिवर्तन का कार्य सरलता और सफलतापूर्वक अग्रसर किया जा सके
अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को अपना स्वरूप और स्थान जानना चाहिये और तदनुसार अपनी विचार शैली एवं कार्य पद्धति का निर्माण करना चाहिये
हमें विश्वास है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के अधिकांश सदस्यों में ऐसा मोड़ आकर रहेगा। उन्हें सामान्य से असामान्य बनने का अवसर मिलेगा। जानवरों की तरह निरुद्देश्य जीवन काट डालना किसी प्रबुद्ध व्यक्ति के लिये लज्जा एवं कलंक भरी बात है
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को युग-निर्माण की पुण्य प्रक्रिया में अग्रिम मोर्चा सम्भालना है। उन्हें अपने को- अपने साथी सहचरों को सजग, तत्पर, संगठित एवं विस्तृत करना है। कल तक हम निरुत्साहित थे, आज हमें उत्साहित, स्फूर्तिवान और और प्रयत्नशील बनना है
इन्हें शिश्नोदर परायण पेट और प्रजनन के जाल-जंजाल तक सीमित नहीं रहने दिया जा सकता, इन प्रबुद्ध आत्माओं को जगाया ही जाना था, ताकि वे इस महत्वपूर्ण पर्व पर अपने आध्यात्मिक कर्त्तव्य को ठीक तरह पूरा करने के लिये तत्पर हों, जागरण वेला की प्रभात-कालीन शंख ध्वनि का नाम अखण्ड-ज्योति है। उसका हर एक अंक अपने पाठकों के लिये एक प्रेरणा, प्रकाश एवं उद्बोधन लेकर पहुँचता है। जिनकी जान निकल गई- जो अपना वर्चस्व खो बैठे- उनकी बात जाने दीजिये अन्यथा अधिकांश परिजन भावनापूर्वक इस प्रकाश को ग्रहण करते हैं और उनींदी आँखें मलने और खुमारी उतारने का प्रयत्न भी करते हैं
छोटे-छोटे सिक्के बड़ी संख्या में एकत्रित हो जाँय तो विपुल धन-राशि के रूप में परिणत हो सकते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के सुसंस्कारों, परिजनों की संगठित शक्ति एक महान सामर्थ्य-सत्ता बन गई है। प्राचीनकाल में ऋषियों के बूंद-बूंद एकत्रित रक्त घट द्वारा रावण-राज्य समाप्त करने वाली सीता का जन्म और देवताओं की एकत्रित थोड़ी-थोड़ी शक्ति द्वारा विनिर्मित असुर निकन्दिनी महाकाली का अवतरण यही बताता है कि दैवी तत्व के छुट-पुट बिखरे अंश मिलकर एक बड़ी सत्ता रूप धारण कर सकते हैं
अखण्ड-ज्योति परिवार का संगठन हमारे आजीवन प्रयत्न का फल है। सूक्ष्म दृष्टि से ढूँढ़-ढूँढ़कर हमने देश भर में से संस्कारवान् जागृत आत्माओं को प्रयत्नपूर्वक एकत्रित किया है। इसमें बहुत समय लगा है और बहुत श्रम
इस युग के इन दो महासंकटों का सामना उन लोगों के लिये ही सम्भव है, जिनके पास बुद्धि और विज्ञान दोनों की तुलना में अधिक सामर्थ्य, महाबल, अध्यात्म मौजूद है। अखण्ड-ज्योति परिवार थोड़ी-थोड़ी आत्म-बल, सम्पन्न, प्रबुद्ध, सजग एवं संस्कारवान आत्माओं का संगठन है। छोटे-छोटे बिन्दु-कण मिलकर एक बड़ा जलाशय बन जाता है। छोटे-छोटे सिक्के बड़ी संख्या में एकत्रित हो जाँय तो विपुल धन-राशि के रूप में परिणत हो सकते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-March
जिस महान् उद्देश्य और कार्यक्रम को लेकर हम अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यगण चल रहे हैं, उसकी सफलता पर व्यक्ति और समाज की प्रगति अवलम्बित है। इस मिशन को जितनी सफलता मिलेगी, उतनी ही विश्व-शाँति, धर्म-राज्य एवं नवयुग की स्थापना निकट आती चली जायेगी
प्रकाश और प्रवाह को इसी प्रकार व्यापक बनाया जा सकेगा। हम में से प्रत्येक का परम पवित्र कर्तव्य है कि अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं के नये सदस्य बढ़ाने और पुरानों का प्रोत्साहित करने के लिए भरसक प्रयत्न करें। क्योंकि अपनी वाणी और प्रेरणा इन पत्रिकाओं के माध्यम से होती है
उससे ऊँची स्थिति में तो ब्रह्म-ज्योति ही एक मात्र अवलम्बन रह जाती है। यही आध्यात्मिक यज्ञाग्नि है इसी को आदित्य दिव्य-आभा- अखण्ड-ज्योति कहते हैं। यह आभा जिसे जितनी मात्रा में मिलती जाती है, वह परब्रह्म परमात्मा के साथ- सविता देवता के साथ एकाकार होता चला जाता है। संसार के समस्त जड़-चेतन में यही ज्योति प्रकाशमान है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-September
ढूँढ़-खोज में कई सदस्यों का मस्तिष्क जब मिल-जुल कर काम करता है और थोड़ा-थोड़ा समय सभी का मिलता है तो कार्य में सरलता हो जाती है और थोड़ा-थोड़ा करने पर भी कुछ अधिक काम हो सकना सम्भव हो जाता है। जो नये साथी ढूंढ़े जाँय उन्हें जुलाई, अगस्त और सितम्बर के तीनों ‘अखण्ड-ज्योति’ अंकों में छपी ‘अपनों से अपनी बात’ स्तंभ वाली यह विज्ञप्तियाँ पढ़ा देनी चाहिये और स्वयं भी उन्हें विस्तारपूर्वक सारी पृष्ठ-भूमि समझा देनी चाहिये। जिन्हें पूरी जानकारी मिल सकेगी वे ही बात को ठीक तरह समझ सकते हैं और कुछ काम के सिद्ध हो सकते हैं। अधूरी जानकारी वालों से कुछ काम होगा भी तो वह बेतुका और अप्रासंगिक होने से निरर्थक ही चला जाता है
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के प्रबुद्ध परिजन इस दिशा में क्या कर सकते हैं, इसकी संक्षिप्त जानकारी गत दो अंकों में छापी जा चुकी है। तदनुसार कितने ग्रेजुएट स्तर के परिजनों ने भावनापूर्ण पत्र भेजे हैं। हम जानते हैं कि कई पत्र क्षणिक उत्साह में कौतूहल मात्र समझ कर लिखे गये हैं और भावुकता के उफान में 20 पैसा का लिफाफा खर्च कर गये हैं
विगत दो अंकों में, जुलाई, अगस्त की अखण्ड-ज्योति के इसी स्तम्भ के अंतर्गत यह बताया जा चुका है कि अध्यात्म को आज की लोक-मनोभूमि के अनुसार प्रतिपादित एवं प्रस्तुत करने की कितनी बड़ी आवश्यकता है। आज के जन-साधारण की मनोभूमि किसी भी विषय को, बुद्धि-संगत ढंग से समझने की है। अब तर्क, प्रमाण, उदाहरण, विज्ञान को आधार माना जाता है
जो अनुवाद कार्य कर सकने में अपने को उपयुक्त मानते हों वे पत्र व्यवहार कर लें। साथ ही अखण्ड-ज्योति का एक लेख अपनी अभ्यस्त भाषा में अनुवाद करके भेजें ताकि कार्य के सम्बन्ध में अधिक परिचय प्राप्त हो सके

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-December
ऐसी दशा में तीन अरब जनसंख्या वाले इस संसार में फैली हुई इस दुर्बुद्धि से लोहा लेना, उसे असत्य, अवाँछनीय, अहितकर और त्याज्य सिद्ध करना निस्सन्देह कठिन कार्य है। वह भी तब, जबकि अखण्ड-ज्योति एकाकी इस महान् अभियान में जुटी हुई है और उसके साधन अति स्वल्प हैं
लड़ाई जारी रखी जायेगी, दुनिया के योद्धा, नेता, धनी, बुद्धिमान्, विद्वान साथ न दें तो निराश न बैठा जायेगा। रीछ-वानरों को-अपने नगण्य स्तर के परिजनों को लेकर अखण्ड-ज्योति आगे आयेगी, और सोने की लंका में साधन सम्पन्न-कुम्भकरणों, मेघनाथों, रावणों को ललकारेगी। विजय दूर हो तो हर्ज नहीं। आगे बढ़ना और लड़ना अपना काम है, सो उसे बिना राई-रत्ती हिचकिचाहट लाये, दिन-दूने-रात चौगुने उत्साह के साथ जारी रखा जायेगा
युग-निर्माण योजना (अखण्ड-ज्योति संस्थान) मथुरा
अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य को इस महीने यह सामयिक कर्तव्य पालन करना चाहिये कि वह कम से कम तीन नये सदस्य और बढ़ायेगा। सच्चे मन से निश्चय करने भर की बात है, संकल्प किसी का भी अधूरा नहीं रहेगा
अखण्ड-ज्योति का 29 वाँ वर्ष इस अंक के साथ समाप्त होकर अगला 30 वाँ वर्ष आरम्भ होगा। इस पिछले छोटे से जीवनकाल में उसने जो कुछ किया है, वह निस्सन्देह अनुपम और अद्भुत ही कहा जायेगा। एक लाख से अधिक प्रबुद्ध कार्यकर्त्ताओं की एक बड़ी सेना उसने संगठित करके नव-निर्माण के कार्य क्षेत्र में उतारी है
जन्म-दिनों के मनाने के माध्यम से यह प्रक्रिया बड़ी सरलता और बड़ी सफलतापूर्वक चलती रह सकती है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी सदस्यों के जन्म-दिन मनाये जाया करें, और उनमें वे सदस्य उत्साहपूर्वक भाग लेते रहा करें तो थोड़े ही दिनों में सबमें परस्पर प्रेम-भाव बढ़ता चला जायेगा। परिचय की घनिष्ठता और बार-बार मिलते रहने की क्रम-श्रृंखला हमें निश्चित रूप से संगठित करेगी और यह संगठन एक समर्थ शक्ति के रूप में परिणत होगा, जन्म-दिन मनाने के कार्यक्रम जहाँ भी चल पड़े, वहाँ बहुत ही आशाजनक परिणाम उत्पन्न हुये हैं। वहाँ की शाखा अति संतोषजनक ढंग से प्रगति कर रही है
हम चाहते हैं कि हर जगह यह प्रक्रिया चल पड़े। जहाँ भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, वहाँ के एक-दो व्यक्ति आगे बढ़ें, उत्साह से काम लें। स्थानीय अन्य सदस्यों से संपर्क बनायें, उन्हें इकट्ठा करें या उनके घरों पर जाकर संगठन का महत्व समझायें और उसके लिये उत्साह पैदा करें। एक बार में नहीं- दो चार बार के मिलन में सफलता अवश्य मिल जायगी और अपने विचारशील सदस्य संगठित होने में में उदासीनता दिखाने की अपेक्षा उत्साह प्रदर्शित करने लगेंगे
इस विषम धर्म-संकट की घड़ियों में अखण्ड-ज्योति की तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन कर्त्तव्य पालन करना पड़ रहा है। उसे उसी मोर्चे पर अड़ाया गया है। भौतिकवादी मान्यताओं का प्रभाव चला तो शिक्षित वर्ग से है, पर वह घने जंगलों में रहने वाले अशिक्षितों तक जा पहुँचा है
तीसरा चरण अति साधारण और बिलकुल सामयिक है, उसे इसी महीने, इन्हीं दिनों- आज ही उठाया जाना चाहिये। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं ने अपना कलेवर और स्तर यकायक बहुत ऊँचा उठा दिया है, क्योंकि उन्हें जो कार्य जितनी शीघ्र और जितनी व्यापकता से करना है, उसे देखते हुये यह वृद्धि नितान्त आवश्यक एवं अनिवार्य थी, साथ ही मूल्य भी बढ़ा है। कलेवर पृष्ठ स्तर बढ़ने की बात से तो कौन प्रसन्न न होगा, पर मूल्य बढ़ने वाली बात अखर सकती है और कुछ कमजोर तबियत के वे लोग जो नये-नये ही किसी के ड़ड़ड़ड़, सुनने या दबाव से सदस्य बने थे, कच्चे पड़ जाते हैं और सदस्यता छोड़ सकते हैं। इस संबंध में सतर्कता बरती जाय
इतना बड़ा और इतना सफल प्रयास इन दिनों शायद ही कोई हुआ हो। स्वतंत्रता संघर्ष का दौर समाप्त हो जाने के बाद भावनात्मक नव-निर्माण की दिशा में रचनात्मक प्रयत्न आवश्यक थे, उनका शुभारम्भ किया जाना समय की सबसे बड़ी माँग थी, सो पूरी करने के लिये अखण्ड-ज्योति ने अपने स्वल्प साधनों की कठिनाइयाँ रहते हुये भी जो कार्य किया है, उसे भावी पीढ़ियां गर्व और गौरव के साथ स्मरण करती रहेंगी
अखण्ड-ज्योति ने, उसके परिवार ने- अब तक जो किया है, वह आशाजनक और उत्साह-वर्धक है। आगे उसे ऐसा करना है-उतना करना है- जो मानव-जाति के भाग्य भविष्य का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करे। उसके लिये इस वर्ष के इस अन्तिम महीने में उपरोक्त तीन कार्य पूरे कर लेने चाहिये ताकि अगले वर्ष के लिये अधिक प्रभावशाली और अधिक व्यापक योजनायें बना सकना सम्भव हो सके
अखण्ड-ज्योति परिवार के हर परिजन को एक घंटा समय और दस पैसा नित्य निकालकर उसे युग-परिवर्तन की विचार-धारा व्यापक बनाने के लिये खर्च करते रहने का अनुरोध किया गया था। अधिकाँश ने उसे स्वीकार भी किया। पर उन स्वीकार करने वालों में भी अभी से शिथिलता आती दिख रही है
धार्मिक, अध्यात्मिक पत्र भी अनेक निकलते हैं और उन्हें उस प्रवृत्ति के लोग मँगाते, अपनाते हैं। उस प्रक्रिया की तुलना अखण्ड-ज्योति से नहीं की जा सकती। वह जानकारी मात्र देने का- पिसे को पीसने का- जो कहा जाता रहा है, उसे दुहराने का ढर्रा अपनाकर किसी तरह विज्ञापन या दान के सहारे अपना जीवन-क्रम चलाती रहने वाली पत्रिका नहीं है। उसका अपना ढंग, उद्देश्य, क्रिया-कलाप सबसे अनोखा और सबसे भिन्न है
अभिलाषा इतनी भर है कि अपने परिवार से जो आशायें रखी गई हैं, उन्हें कल्पना मात्र सिद्ध न होना पड़े। अखण्ड-ज्योति परिजन अपना उत्साह खो न बैठें और जब त्याग, बलिदान की घड़ी आवे, तब अपने को खोटा सिक्का सिद्ध न करने लगें। मनुष्य की महानता उसकी उन सत्प्रवृत्तियों की चरितार्थ करने में है, जिनसे दूसरों को प्रकाश मिले। जिसमें ऐसा कुछ नहीं- जो उदरपूर्ण और प्रजनन प्रक्रियाओं तक सीमाबद्ध है, उसे नर-पशु ही कहा जा सकता है
यह प्रयत्न कम मूल्यवान् नहीं। कुछ ही दिनों में यह देखा जा सकेगा कि अखण्ड-ज्योति ने जो बीच बोये थे, वे उगे ही नहीं- फले-फूले ही नहीं वरन् उनके आश्रय में नये युग की नई सम्भावनायें विनिर्मित हुईं
अखण्ड-ज्योति के लेख कागज पर काले अक्षर छाप देने मात्र की प्रक्रिया नहीं है वरन् उनकी एक-एक पंक्ति में एक दर्द, एक आग और एक प्रकाश भरा रहता है। आत्मिक अनुभूतियों के आधार पर उन्हें लिखा जाता है, यही कारण है कि उन प्रेरणाओं को पाठक अनसुनी न कर सके और नव-निर्माण के महान् अभियान में लाखों व्यक्ति जुट गये। उनके द्वारा जो किया जा रहा है और जो सोचा जा रहा है, उसे देखते हुए यह आशा एक सुनिश्चित सम्भावना बनती जा रही है कि कल इस पृथ्वी पर देवत्व उतरेगा और यहाँ स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण होगा
जो हो, जो काम सौंपा गया है, उसे अखण्ड-ज्योति ने अपनी शक्ति और सामर्थ्य को एक-एक कर निचोड़ कर, पूरा करने का प्रयत्न किया है। जितने साधन थे उसकी तुलना में हजारों गुनी अधिक सफलता मिली है। पर इतने मात्र से संतोष थोड़े ही किया जा सकता है, जो काम करने को पड़ा है, वह अति विस्तृत है, अभी मंजिल बहुत लम्बी है और इस पर देर तक-कठिन व्यवधानों से टकराते हुए आगे बढ़ना है
ध्वंसात्मक आसुरी प्रवृत्तियाँ मनुष्यता को निगल जाने के लिए सुरक्षा की तरह मुँह फाड़े खड़ी हैं। ऐसे समय में ‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रयत्न ‘नक्कार खाने में तूती’ की तरह स्वल्प प्रतीत हो सकते हैं और उनका कोई प्रत्यक्ष परिणाम दृष्टिगोचर नहीं भी हो सकता है। पर यह भी जान ही लेना चाहिये कि अनाचार की बाढ़ की एक बड़ी सीमा तक रोका गया है और मस्तिष्कों में वह प्रकाश पैदा किया गय है जिनके आधार पर अवाँछनीय से लड़ने के लिए जन-मानस में आवश्यक उत्साह एवं साहस उत्पन्न हो सके। यह प्रयत्न कम मूल्यवान् नहीं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-April
पर पत्रिकाओं पर लगने वाले डाक खर्च को तो एक दम ढाई गुना कर दिया गया है। ‘अखण्ड-ज्योति’ और ‘युग निर्माण योजना’ पर अब तक दो-दो पैसे की टिकट लगा करती थी। अब पाँच पैसे की लगा करेगी
यह पुरश्चरण दस वर्ष तक चलेगा। इस महान् जप-यज्ञ में अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को भागीदार बनाना चाहिये और एक माला गायत्री जप और एक पाठ युग-निर्माण सत्संकल्प के भागीदारों का- नित्य ही करना चाहिये। न्यूनतम उपासना क्रम में जो दो माला गायत्री जप करने की व्यवस्था की गई है, उसमें एक माला आत्म-कल्याण के लिए है और दूसरी विश्व-कल्याण के लिए है
नीति-धर्म, सदाचार का प्रसार कार्य ‘युग-निर्मा-पत्रिका’ करेगी। ‘अखण्ड-ज्योति’ अध्यात्म-तत्व ज्ञान का समग्र स्वरूप प्रस्तुत करने के लिए संलग्न होगी
उपलब्ध अनुभव और ज्ञान को सर्वसाधारण के लिए छोड़ जाना यह हमारा नैतिक कर्त्तव्य भी है। इसलिए अध्यात्म के गूढ़ रहस्य और उच्चस्तरीय गायत्री उपासना के विज्ञान-विधान ‘अखण्ड-ज्योति’ के माध्यम से हम सर्व-साधारण के सामने रख जाने के लिए यथासंभव कुछ कमी न रहने देंगे
उस क्रम को हम जानकारी के लिए अपने परिजनों को जाने से पूर्व बता जायेंगे। ‘अखण्ड-ज्योति’ अगले वर्ष सन् 1969 से पूर्णतया साधना पत्रिका बन जायेगी। नीति-धर्म, सदाचार का प्रसार कार्य ‘युग-निर्मा-पत्रिका’ करेगी। ‘अखण्ड-ज्योति’ अध्यात्म-तत्व ज्ञान का समग्र स्वरूप प्रस्तुत करने के लिए संलग्न होगी
कुछ वर्ष पूर्व- अज्ञातवास से लौटते ही हमने पंचकोशी साधना क्रम ‘अखण्ड-ज्योति’ में प्रकाशित करना आरंभ किया था और उसे तीन वर्ष छापा भी। पर देखा यह गया कि जिन्होंने आरंभ में बहुत उत्साह दिखाया था, उसमें से बहुत थोड़े ही अन्त तक ठहर सके। शेष एक-दो मंजिल चल कर ही लड़खड़ा गये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-July
अखण्ड-ज्योति परिजनों द्वारा 24 लक्ष जप प्रतिदिन करने का जो महत्तम गायत्री पुरश्चरण चल रहा है, उसमें हममें से प्रत्येक को भाग लेना चाहिये। अप्रैल अंक में इस सम्बन्ध में बहुत कुछ बताया जा चुका है। उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय
इस कार्य में अखण्ड-ज्योति परिवार के ग्रेजुएट स्तर के परिजनों की सहायता अभीष्ट है। जिनके पास एक-दो घण्टे रोज का अवकाश है और उस समय को हमारी इस सहायता में लगाना चाहें वे अपने नाम नोट करादें और अपनी शिक्षा का पूरा विवरण सूचित कर दें ताकि उनके स्तर का काम उन्हें दिया जा सके

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-August
अतएव सुविधा की दृष्टि से इस प्रयोजन के लिये कुछ साथी सहगामियों की आवश्यकता पड़ेगी। हम चाहते हैं “अखण्ड-ज्योति” परिवार के सदस्यों में से कुछ ऐसे लोग इस कार्य में हाथ बंटाने के लिये आगे आवें। (1) जिनकी शिक्षा ग्रेजुएट स्तर की हो (2) जो अध्ययनशील प्रकृति के हों। जिनको पढ़ने में मन लगता हो और समझ आता हो (3) जिनका जीवन-क्रम अति व्याप्त न हो और जो नियमित रूप से कुछ समय बिना किसी अर्थ या डडडड लाभ की आकांक्षा किये लगाते रह सकें
लगभग दो-ढ़ाई सौ ट्रैक्ट इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए छपे हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ और ‘युग-निर्माण-योजना’ दोनों ही पत्रिकाएं इसी प्रयोजन की पूर्ति में संलग्न हैं और आवश्यक गोला-बारूद- विचार प्रवाह प्रस्तुत करती चली आ रही हैं। आगे यह प्रयत्न भी इसी गति से और भी अधिक तीव्र गति में आगे बढ़ेंगे
जो सज्जन उपरोक्त सेवा के लिये अपनी शिक्षा तथा योग्यता को उपयुक्त समझते हों, वे अखण्ड-ज्योति का कोई एक लेख अनुवाद करके उस भाषा में भेजें ताकि उस सम्बन्ध में कुछ अधिक अनुमान लगाया जा सके
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में से जो उपरोक्त भाषाओं के जानकार हों, और अपनी भाषा में अनुवाद पसन्द करते हों, वे अपने नाम नोट करादें। यदि उनकी संख्या संतोषजनक रही तो युग-निर्माण-योजना को उस भाषा में प्रकाशित करने की भी तैयारी की जायेगी
कुछ लिखा तभी जायेगा जब प्रतिपादित विषयों की पुष्टि के लिये अनेकों आधारों द्वारा प्रमाणित कर सकने लायक प्रचुर सामग्री जमा हो जाये। यों इस सम्बन्ध में सामान्य चर्चा एवं जानकारी “अखण्ड-ज्योति” के अक्टूबर अंक में प्रारम्भ कर दी जायेगी, पर उसका ठोस प्रतिपादन समग्र आधार इकट्ठे हो जाने पर ही किया जायेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
जून 2001 की अखण्ड-ज्योति में विस्तार से ‘पूज्यवर के ज्ञान शरीर को जन-जन तक पहुँचाएँ’ एवं जुलाई 2001 की अखण्ड ज्योति में हो रहा है ज्ञानयज्ञ का शुभारंभ-मंगलाचरण (ज्ञान केंद्रों की स्थापना करें एवं वाङ्मय को जन-जन तक पहुँचाएँ) शीर्ष से लेख प्रकाशित हुए थे, उसके साथ पंजीयन पत्रक भी थे। जो भी ज्ञान केंद्र की स्थापना करना चाहते हों, वे तुरंत उन्हें भरकर धरोहर राशि एवं क्रयादेश के साथ अखण्ड ज्योति संस्थान, घीयामंडी मथुरा भेज दें। ज्ञान केंद्र संबंधी सारा पत्राचार इसी पते पर करें
जनवरी 1986 में जब परमपूज्य गुरुदेव ने स्वर्ण जयंती वर्ष की विशेष साधना आरंभ कराई, तो इसमें सम्मिलित होने के लिए सभी ‘अखण्ड ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड ज्योति’ की ‘अपनों से अपनी बात’ में पूज्यवर लिखते हैं, ‘हीरक जयंती का समय आने तक हम नए शरीर से कहीं और भी अधिक महत्वपूर्ण नई भूमिका संपादित कर रहे होंगे। अस्तु उसकी प्रतीक्षा व्यर्थ है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-April
अन्यथा यह सब भी कंजूस सेठ के धन संग्रह करते रहने की तरह एक आध्यात्मिक स्वार्थ परता ही रह जायेगी। प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति के पाठक और गायत्री परिवार के सदस्य इस तथ्य को अधिक दृढ़तापूर्वक समझते जा रहे हैं और धर्म प्रचार को भी तपस्या का, साधना का, एक आवश्यक अंग मानते हैं और उसके लिए भी निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-September
यह उपेक्षा अखरने और खटकने वाली है। अखण्ड-ज्योति परिवार धर्मनिष्ठ, कर्तव्य परायण एवं जागरुक सत्पुरुषों का संगठन है। इसके हर सदस्य से यह आशा की जाती है कि मानव जाति की सुख, शान्ति एवं सुरक्षा के लिये उन्हें कुछ करना ही चाहिये। थोड़ा समय और श्रम देकर हममें से प्रत्येक गायत्री उपासना का कुछ नियमित संकल्प लेकर ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का भागीदार बन सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-January
माता दौपदी देवी, माता भगवती देवी तथा रामगंज मंडी की सुप्रतिष्ठित कई महिलाओं के नारी जागरण पर धड़े धार्मिक भाषण हुए। अखण्ड-ज्योति के सहायक संपादक प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए., आगरा के प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान पं. मुक्ट बिहारीलाल शुक्ला बी.ए., एल.एल.बी., स्वामी प्रेमानन्द जी, कुँ. नत्थासिंह जी प्रवचन करने बाहर से पधारे थे। झाँसी के श्री शास्त्री जी महाराज गुरुकुल बकानी के संस्थापक श्री स्वामी जी तथा रामयणी सत कौशल जी के भी प्रवचन हुए। स्वागताध्यक्ष श्री सत्यपाल जी त्यागी ने अपने दो दिनों के संक्षिप्त किंतु मार्मिक भाषण में बड़ी ठोस बातें कहीं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-February
कोई बड़ा कालेज खोलने का अभी मेरा विचार नहीं है, कोई विशाल भवन भी बनाने की योजना नहीं है। अखण्ड-ज्योति प्रेस वाले घीया मंडी के घर में इतनी गुंजाइश है कि यहाँ 20-25 महिलाएं रह सकें और शिक्षण प्राप्त करने के लिए जो रहती और आती जाती रहें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-March
श्री देवीशंकर शुक्ल श्यौपुर कलाँ लिखते हैं :- अखण्ड-ज्योति से संपर्क जोड़ने के बाद मैं गायत्री उपासना करने लगा था। मैं प्रतिदिन साइकिल पर एक पुल पार करते हुए पढ़ाने जाया करता था। वर्षा का मौसम था
शाखा केन्द्र के अतिरिक्त डॉक्टर साहब के यहाँ, प्रह्लाद चन्द्र जोशी जी के यहाँ भी अच्छे हवन हो चुके हैं। शिवरात्रि पर अखण्ड-ज्योति, अखंड-जप, अखंड-हवन, चालीसा पाठ तथा प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठ आदि के कई कार्यक्रम बनाये गये हैं
ऐसी दशा में अपने साधारण गृहस्थ जीवन में से थोड़ा-थोड़ा समय निकाल सकने वाले परमार्थी प्रेमी व्यक्ति अखण्ड-ज्योति और गायत्री परिवार में से ढूंढ़े जा रहे हैं। उन्हें व्रतधारी धर्म-सेवी के रूप में नियमित रूप से धर्म सेवा के लिए तत्पर किया जा रहा है। उनके शिक्षण शिविर उनके क्षेत्रों में करके धर्म सेवा की क्षमता, प्रवृत्ति एवं व्यवस्था समझायी जाये ऐसा सोचा जा रहा है
अखण्ड-ज्योति के अध्ययन से मुझ में गायत्री उपासना करने में काफी बल मिला। उस समय महायज्ञ की पूर्णाहुति का निमन्त्रण मिल गया था, पर मेरे चार सन्तान, पत्नी आदि का उदर पोषण ही कठिन था। मेरी बड़ी लालसा थी मैं अपने बच्चों को भोजन दूध दे सकूँ और पूर्णाहुति में जरूर सम्मिलित होऊँ
दुर्भाग्य से मैं दो बार नौकरी से वंचित होकर बिना जीविका के परिवार सहित भूखों मरने लगा। एक गायत्री उपासक के कहने पर ‘अखण्ड-ज्योति पढ़कर गायत्री उपासना में लग गया। गायत्री महा विज्ञान पढ़कर विधि-पूर्वक अनुष्ठान किया। फलतः बिना किसी प्रयत्न मेरी पत्नी को नौकरी मिल गयी और उसका वेतन थोड़े ही दिनों में दुगना बढ़ गया
सायंकाल प्रवचन कीर्तन आदि हुए। साप्ताहिक सत्संगों में अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित अन्य शाखाओं के कार्यों को सदस्यगण बड़े चाव से सुनते और उनसे प्रेरणा प्राप्त करते हैं
पतिदेव के परिवार में सभी गायत्री उपासक ही मिले। वहाँ पतिदेव के आदेशानुसार अखण्ड-ज्योति पढ़कर मैंने पूज्य आचार्य जी से विधिवत् दीक्षा ली और निर्देशित विधि से उपासना करने लगी। इससे आर्थिक दशा एवं मेरे कमजोर स्वास्थ्य की पुष्टि का प्रारम्भ हुआ। पूज्य आचार्य जी के आशीर्वाद प्राप्त कर मैं हिस्टीरिया रोग से मुक्त हो गयी और मेरे पूज्य पतिदेव उन्हीं की कृपा से आज समाज शिक्षा के आयेजक पद पर आसीन हो 200) दो सौ रुपये मासिक अर्जन कर रहे हैं
साँस्कृतिक विद्यालय की नियमावली अखण्ड-ज्योति में छापी जा चुकी है। उसका पूरा पाठ्यक्रम एक वर्ष का है। विद्यार्थी श्रेणी के लोग तो उतने समय रह सकते हैं और लगभग 20 की संख्या में अभी भी तपोभूमि में रह कर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, पर इतना समय दे सकना कार्य व्यस्त लोगों के लिए संभव नहीं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-June
इस ब्रह्मदान, ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत व्यापक संस्कृति विश्व विद्यालय की योजना भी जुड़ी हुई है गत नवम्बर माह की अखण्ड-ज्योति में प्रति सप्ताह एक पुस्तिका सदस्यों के लिए निकालने की योजना छपी थी, पर उसके छपाने का कागज छपाई खर्च एवं पोस्टेज की कोई व्यवस्था न होने के कारण उसे चालू करना संभव न हो सका। गायत्री परिवार का संगठन करने और शाखाएं बनाने में कागज, छपाई, पोस्टेज आदि में बहुत धन व्यय हुआ है पर संगठन से आय एक पैसे की भी न होने से वह खर्च, ऋण रूप चढ़ा हुआ है। खर्च निरन्तर हो, आय कुछ भी न हो तो कोई योजना चल नहीं सकती
गत मास की अखण्ड-ज्योति में विस्तारपूर्वक बताया जा चुका है कि इस युग में धर्म पंगु है। यदि उसे कंधे का सहारा न दिया जायगा तो उसका चलते रहना तो दूर खड़े रहना भी कठिन हो जायेगा। यह बात गायत्री आन्दोलन के लिए भी पूरी लागू होती है
लश्कर (ग्वालियर) की गायत्री-शाखा के प्रयत्न से श्री मुरली मनोहर कार्यालय देश पाँडे भवन तथा बाजार लश्कर में एक गश्ती पुस्तकालय खोला गया है, जिसके द्वारा अखण्ड-ज्योति कार्यालय की पुस्तकें पढ़ने के लिए घर-घर पहुँचाई जाती हैं। (इसमें 30) श्री0 नीलकण्ड काशीनाथ देश पाँडे ने सहायतार्थ दिया
अखण्ड-ज्योति में गत अंक से गायत्री परिवार के उन सत्पुरुषों का सचित्र परिचय छापना आरम्भ किया गया है जिन्होंने अपनी आत्मा को पवित्र करने के लिए गायत्री उपासना करने के साथ-साथ लोक हित के लिए समय और शक्ति व्यय करके, प्रयत्न और पुरुषार्थ करने का भी व्रत लिया हुआ है। इस जमाने में अधिकाँश लोग स्वार्थी हैं। हर आदमी अपने मतलब में चौकस है
हम लोग मथुरा पहुँचे और साँय लगभग छः बजे अखण्ड-ज्योति के कार्यालय में पहुँचे। आचार्य जी से भेंट हुई। डॉक्टर साहब ने आचार्य जी की प्रशंसा की, खैर, मेरे बोलने की बारी आई

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-October
पिछले दिनों अशुभ भविष्य की आशंका चर्चा अखण्ड-ज्योति में होती रही है। इस अंक में भी उस सम्बन्ध में बहुत कुछ ऊहापोह किया गया है। हमारा निज का मत है कि मानव जाति के सामूहिक दुष्कर्म जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उसी तेजी से बढ़ते रहे, उनकी रोक थाम न हुई, तो विश्व संहार की वैसी ही दुर्घटना अगले वर्षों में हो सकती है जैसी कि इन भविष्यवाणियों में बताई गई है
अखण्ड-ज्योति एवं गायत्री परिवार में ऐसे अनेकों व्यक्ति हैं जिनके मन मानस में धर्म भावनाएं लहरें मारती रहती हैं। जहाँ चाह होती है वहाँ राह निकलती है। समय देने वाले, श्रम देने वाले भावनाशील व्यक्ति यदि कटिबद्ध होकर धर्म प्रचार के लिए खड़े हो जाये तो प्रतिदिन 24 करोड़ जप एवं सवा लाख हवन, पाठ लेखन का संकल्प आसानी से पूरा हो सकता है
आगरा (मालवा) में 11 जुलाई को बैजनाथ महादेव मन्दिर में अखण्ड-ज्योति की स्थापना की गई। इसके लिये प्रत्येक भाग लेने वाले ने ज्योति के निमित्त 6 छः घी और निगरानी करने वाले को 1 सेर आटे का सीधा दिया। माता की कृपा से यह क्रम 31 दिन तक कुशलता पूर्वक चलता रहा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-November
हुलुनियाँ ग्राम (रामपुरा) में मंशापूर्ण महादेव के मन्दिर में गायत्री प्रेमियों ने अखण्ड-ज्योति स्थापित की। श्री मोहनपुरा जो महाराज तथा सेठ माँगीलाल ने निराहार रहकर 24-24 हजार का अनुष्ठान किया। पूर्णाहुति के पश्चात 101 ब्राह्मण तथा कन्याओं को भोजन कराया गया

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-December
दशमी को अखण्ड कीर्तन भी हुआ। इस बीच अखण्ड रामायण का पाठ हुआ और अखण्ड-ज्योति जलती रही। यज्ञ कार्य पं. रामनारायनजी दुबे ने कराया और जप में श्री गणेशप्रसादजी अवस्थी ने भाग लिया। अवस्थीजी के ही विशेष प्रयास से दुर्गादेवी पर पशु-बलि की प्रथा का अन्त हो सका है
श्री धुन्दीसिंह शर्मा (बड़ेसरा, अलीगढ़) से लिखते हैं कि हमारे यहाँ के श्री हुन्डीलाल टेलर मास्टर ‘अखण्ड-ज्योति’ का गायत्री अंक पढ़ने से गायत्री-उपासना में संलग्न हुये थे। 1955 की चैत्र
विश्व-शान्ति का यही मार्ग है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत 24 लक्ष आत्माओं को ब्रह्म-भोज कराना है, वह (1) गायत्री ज्ञान मन्दिरों के आधार पर चलने वाले ब्रह्म विद्यालयों द्वारा (2) अखण्ड-ज्योति के ‘ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान अंक’ के वितरण द्वारा ही पूरा होगा। जिस प्रकार आवश्यकता पड़ने पर-शत्रु का आक्रमण होने पर देश के हर समर्थ पुरुष को सैनिक बनना होता है। उसी प्रकार इस समय व्यापक अधार्मिकता से लड़ने के लिए हम सबको ब्रह्म कर्म में प्रवृत्त होना होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-October
संस्कृति-सीता, शांति-सभीता को अब मुक्ति दिलाने। लिये अखण्ड-ज्योति-सा जीवन, युग का तिमिर मिटाने॥ चले जा रहे देव, लक्ष्य की सीमाओं से आगे। सोये नहीं एक पल को भी, नींद जीतकर जागे॥ चिंतन चरण वहां जा पहुंचे, जहां न कोई साथी। साथी बनी राह में छायी, केवल गहन निशा थी॥ धर्म-साधना अर्पित जीवन, साधक, सृजक विधाता
अर्थोपार्जन और परिवार निर्वाह के अतिरिक्त दो चार घंटे का समय भगवान के लिए, देश धर्म, समाज संस्कृति के लिए, गुरुदेव के लिए युग परिवर्तन के लिए लगाकर कोई व्यक्ति घाटे में नहीं रहेगा वरन् अपने त्याग की तुलना में अनेक गुना भण्डार भरेगा। इसके साथ ही अप्रैल अखण्ड-ज्योति अंक में छपे गुरुदेव के ‘बोया ’काटा लेख को कई बार पढ़कर सत्परिणाम के सम्बन्ध में सुनिश्चित विश्वास किया जा सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-January
एक व्यक्ति द्वारा चारों वेद, 18 पुराण, छहों दर्शन, 108 उपनिषद्, 24 स्मृतियाँ आदि आर्ष ग्रन्थों का प्रस्तुतीकरण किया गया हो ऐसा या इसके समतुल्य दूसरा उदाहरण संसार में नहीं है। अखण्ड-ज्योति के डेढ़ लाख छपने का अपना कीर्तिमान है। सस्ते फोल्डर साहित्य ने ईसाई मिशन के समतुल्य उदाहरण प्रस्तुत किया है
अखण्ड-ज्योति के पाठकों- प्रज्ञा परिजनों में से उन्हें इन पंक्तियों द्वारा आमन्त्रित किया जा रहा है जो लोभ-मोह के भव-बन्धनों को काट न पाये हों तो भी उन्हें ढीला कर चुके हों। जिन्हें सामयिक दृष्टि से निर्वाह भर की आवश्यकता हो और मन से वह कर सके जिसकी जन-साधारण को- महाकाल को- गुरुदेव को नितान्त आवश्यकता है। यह कार्य घर बैठे न हो सकेगा
यह कार्य बसन्त आयोजनों द्वारा ही सम्पन्न होता रहा है। अखण्ड-ज्योति के युग-निर्माण योजना के नये सदस्य बनाने, पुरानों से चन्दा वसूल करने का कार्य भी ऐसा है जो मिशन का कार्यक्षेत्र बढ़ाता और उस विचारधारा को जन-जन के मन-मन में हृदयंगम कराने के काम आता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
इसके प्रकाश में बैठकर जब भी साधना करते हैं तो मनःक्षेत्र में अनायास ही दिव्य भावनाऐं उठती रहती हैं। कभी किसी उलझन को सुलझाना अपनी सामान्य बुद्धि के लिए सम्भव नहीं होता, तो इस अखण्ड-ज्योति की प्रकाश किरणें अनायास ही उस उलझन को सुलझा देती हैं
पर हमारे लिए ये चमत्कारी लाभ प्रत्यक्ष है। अखण्ड-ज्योति की संस्कृतनिष्ठ हिन्दी ने हिन्दी के प्राध्यापकों तक का मार्गदर्शन किया है। यह हम जब देखते हैं तो उस महाप्रज्ञा को ही इसका श्रेय देते हैं। अति व्यस्तता रहने पर भी विज्ञ की-ज्ञान की-विभूति इतनी मात्रा में हस्तगत हो गई, जिसमें हमें परिपूर्ण संतोष होता है और दूसरों को आश्चर्य
घर में जो टूट-फूट थी, अपने पैसों से संभलवा ली। “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका पुनः इसी घर से प्रकाशित होने लगी। परिजनों से पत्र व्यवहार यहीं आरम्भ किया। पहले वर्ष में ही दो हजार के करीब ग्राहक बन गये
हमारी हिमालय यात्रा का विवरण पूर्व में अखण्ड-ज्योति की लेखमाला में और बाद में “सुनसान के सहचर” पुस्तक में प्रकाशित किया गया है। वह विवरण तो लम्बा है पर उसका साराँश थोड़ा ही है। अभावों और आशंकाओं के बीच प्रतिकूलताओं को किस तरह मनोबल के सहारे पार किया जा सकता है, इसका आभास उनमें मिल सकेगा
अनुवाद ऐसा हो जो बुद्धिजीवी वर्ग एवं विदेशों में त्रुटिहीन माना जा सके, सराहा जा सके। अखण्ड-ज्योति परिजनों में जिनकी अँग्रेजी अनुवाद की उच्चस्तरीय योग्यता हो, कृपया सहयोग करने का अनुग्रह करें। अनुवाद शाँतिकुँज रहकर ही करना है
लोग पीठ पीछे कहते हैं “यह तो चलता फिरता एनसाइक्लोपीडिया है। ” अखण्ड-ज्योति पत्रिका के लेख पढ़ने वाले उसमें इतने संदर्भ पाते हैं कि लोग आश्चर्यचकित होकर रह जाते हैं और सोचते हैं कि एक लेख के लिए न जाने कितनी पुस्तकों और पत्रिकाओं से सामग्री इकट्ठी करके लिखा गया है। यही बात युग निर्माण योजना, युग शक्ति पत्रिका के बारे में है। पर सच बात इतनी ही है कि हमने जो भी पढ़ा है, उपयोगी पढ़ा है और पूरा मन लगाकर पढ़ा है
सहस्र कुण्डीय यज्ञ से सम्बन्धित महत्वपूर्ण प्रसंगों की चर्चा हम अखण्ड-ज्योति के फरवरी अंक में कर चुके हैं। उससे जुड़े अनेकानेक रहस्यमय घटनाक्रमों का विवरण बताना अभी जनहित में उपयुक्त न होगा। इस काया को छोड़ने के बाद ही वह रहस्योद्घाटन हो, ऐसा प्रतिबन्ध हमारे मार्गदर्शक का है, सो हमने उसे दबी कलम से ही लिखा है
“अखण्ड-ज्योति” पत्रिका के अपने पुरुषार्थ से दो हजार तक ग्राहक बनने पर बात समाप्त हो गई थी। फिर मार्गदर्शक ने धक्का लगाया तो अब वह बढ़ते-बढ़ते डेढ़ लाख के करीब छपती है जो कि एक कीर्तिमान है। उसके और भी दस गुने बढ़ने की ही सम्भावना है
महा पुरश्चरणों की श्रृंखला नियमित रूप से चलती रही। जिस दिन गुरुदेव के आदेश से उस साधना का शुभारम्भ किया था उसी दिन घृत दीप की अखण्ड-ज्योति भी स्थापित की। उसकी जिम्मेदारी हमारी धर्मपत्नी ने सम्भाली, जिन्हें हम भी माता जी के नाम से पुकारते हैं। छोटे बच्चे की तरह उस पर हर घड़ी ध्यान रखे जाने की आवश्यकता पड़ती थी
काँग्रेस के काम के स्थान पर लेखन कार्य को अब गति दे दी। अखण्ड-ज्योति पत्रिका, आर्ष साहित्य का अनुवाद, धर्म तन्त्र से लोक शिक्षण की रूपरेखा, इन्हीं विषयों पर लेखनी चल पड़ी। पत्रिका अपनी ही हैण्डप्रेस से छापते, शेष साहित्य दूसरी प्रेसों से छपा लेते। इस प्रकार ढर्रा तो चला

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-May
उसमें लेख नहीं छपते, वरन युग पुरुष का चिन्तन और चरित्र का सार संक्षेप लिपिबद्ध होकर कागज के पन्नों पर चिपका होता है। इस तथ्य पर हमें विश्वास करना चाहिए कि प्रज्ञा परिवार के विस्तार और उसके प्रयासों की जो विश्व भर में चर्चा है उसका श्रेय यदि किसी एक को देने का मन हो तो निःसंकोच उसे ‘‘अखण्ड-ज्योति’’ को दिया जा सकता है। हरिद्वार और मथुरा के संस्थान 2400 प्रज्ञा पीठें, 12 हजार प्रज्ञा संस्थान एवं दस लाख प्रज्ञा परिजन उसी के बेटे, पोते, परपोते हैं। अब इस कल्पवृक्ष की सिंचाई की अनिवार्य आवश्यकता पड़ रही है, अन्यथा जितना कुछ पिछले दिनों बन पड़ा उसी में विराम लग जायेगा
अखण्ड-ज्योति के नये सदस्य बनाना और झोला पुस्तकालय एवं ज्ञानरथ चलाना इतने भर कार्य से स्वाध्याय आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है। एक से दस का विस्तार होने लगे तो वर्तमान दस लाख परिजन इसी हीरक जयन्ती वर्ष में एक करोड़ में युग चेतना फूँकने का लक्ष्य पूरा कर सकते हैं
सर्वविदित है कि प्रज्ञा परिवार की संरचना, संगठन और सत्प्रवृत्तियों की युग चेतना “अखण्ड-ज्योति” के माध्यम से बन पड़ी है। यह पू. गुरुदेव की परावाणी है। उसमें लेख नहीं छपते, वरन युग पुरुष का चिन्तन और चरित्र का सार संक्षेप लिपिबद्ध होकर कागज के पन्नों पर चिपका होता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-October
महाभारत के बाद आये हुए अज्ञानान्धकार युग में जो नाना मतमतान्तरों और सम्प्रदाय बरसाती मेंढकों की तरह उपज पड़े थे उनने उपासना के मूल आधार को हटाकर अपना-अपना ही सिक्का जमा लिया था और गायत्री को शाप लगी हुई, केवल ब्राह्मणों की, गुपचुप कान में कहने की,सतयुग में जपने की आदि आशंका एवं उपेक्षा पैदा करने वाली बातें कहकर एक प्रकार से बहिष्कृत ही कर दिया था। प्रसन्नता की बात है कि भ्रम का वह अन्धकार अब हट गया हैं अखण्ड-ज्योति ने इस दिशा में समुचित प्रकाश प्रदान किया हैं
महीने में दो तीन बार भी उन लेखों को दुहराया जा सकता है। अब अखण्ड-ज्योति दैनिक स्वाध्याय के उपयुक्त ही पाठ्य सामग्री प्रस्तुत किया करेगी
आगामी माघ वदी अमावस्या ता॰ 5 फरवरी 52 में अष्टग्रही योग आने वाला है। इसकी चर्चा अखण्ड-ज्योति में समय-समय पर होती रही है। यह समय अब टिकट ही आने वाला है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार एक राशि पर चार या उससे अधिक ग्रहों का होना अशुभ माना जाता है
धीरे-धीरे समझ-समझ कर उसे पढ़े और उस पर मनन एवं चिन्तन करें तो ही स्वाध्याय की प्रेरणा अन्तःकरण में गहराई तक उतर सकेगी। इस प्रयोजन के लिए अभी अखण्ड-ज्योति से भी काम चल सकता है। उसका एक-एक लेख नित्य इसी दृष्टि से पढ़ा जाय। महीने में दो तीन बार भी उन लेखों को दुहराया जा सकता है
पारलौकिक शान्ति तो मिलती ही हैं लौकिक सुखों का अभाव भी नहीं रहता। आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास का मार्ग-दर्शन अखण्ड-ज्योति अपने जीवन के गत 23 वर्षों से सतत करती रही हैं। सद्विचारों को अपनाने, सद्-भावनाओं को विकसित करने और उपासनात्मक साधना का अवलम्बन करने का अपना एक सुनिश्चित मिशन इस लम्बे समय से चल रहा है। प्रसन्नता की जाता है कि परिवार के अगणित सदस्यों ने इससे समुचित लाभ भी उठाया हैं
इसी दृष्टि से सन् 62 जहाँ दुर्भाग्य-पूर्ण है वहाँ साथ ही आशा की स्वर्णिम किरणें भी साथ चल रही हैं। इस संदर्भ में अखण्ड-ज्योति परिवार के धर्म प्रेमी स्वजनों के लिए भी कुछ कर्तव्य बनते हैं। हम सबको उस पर ध्यान देना चाहिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-December
सृष्टि के आदि काल से लेकर अब तक प्रत्येक युग-दृष्टा ने यह प्रयत्न किया है कि सद्विचारों के विस्तार के लिए अधिकाधिक साधन जुटें अधिकाधिक प्रयत्न हो। फिर उस महान् कार्य का अखण्ड-ज्योति कैसे बन्द कर देगी? वह तो चलना ही चाहिए। वरन् अष्टग्रही योग के प्रभाव से आगामी दश वर्षं तक जो अवांछनीय स्थिति रहने वाली है उसमें समाधान के लिए तो यह कार्य और भी अधिक तीव्र गति से होना चाहिए। उस कार्य को परिवार के अन्य सब सज्जन करेंगे
उनकी मंजिल रास्ते में ही छूटेगी, फिर भी उन्हें ‘न कुछ’ की अपेक्षा ‘कुछ’ तो लाभ होगा ही। इस लिए हमारी आकांक्षा है कि अखण्ड-ज्योति के परिजन पूरी या अधूरी इस दशवर्षीय साधना को किसी-न-किसी रूप में अपनावें और अपनी आध्यात्मिक सेवा करने का जीवन के इस अन्तिम अध्याय में हमें एक और अवसर प्रदान करें
सद्ज्ञान प्रसार के लिए कोई बड़ी योजना आज अपने सामने नहीं है, पर इतना भी क्या कम है कि अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर जो हम अपनी आत्मा को निचोड़ कर रखते हैं उस दर्द को अधिक लोगों के सीने में चुभाने के लिए कुछ प्रयत्न किया जाय। अखंड-ज्योति जिनके पास पहुँचती है वे उसे सरसरी नजर से न पढ़कर गम्भीरतापूर्वक स्वाध्याय की दृष्टि से मनन और चिन्तन के साथ पढ़ा करें तो उनकी आत्मा से हमारी आत्मा का स्पर्श होने लगे। इसका और भी विस्तार इस प्रकार हो सकता है कि अखंड-ज्योति के पाठक पत्रिका में प्रस्तुत विचारों को, कथाओं, प्रसंगों, दृष्टान्तों उदाहरणों को अपने घर तथा बाहर के लोगों को स्वयं सुनाया करें, अपनी पत्रिका कई-कई व्यक्तियों को पढ़ने देने स्वयं जाया करें, उनसे प्रस्तुत लेखों के संबन्ध में चर्चा किया करें
हमारे पास कुछ तप-साधना की पूँजी रही है तो उससे स्वजनों की सुख शान्ति बढ़ाने के लिए कुछ उठा नहीं रखा है। रोते हुए बच्चों को हँसने के उपकरण प्रस्तुत करते हुए किसी भी माता-पिता को जिस प्रकार सन्तोष होता है उसी प्रकार अखण्ड-ज्योति की आत्मा भी आज अपने प्रयत्नों पर प्रसन्नता अनुभव करती है
अज्ञातवास से लौटने के बाद हम हमारे कार्यक्रम का दूसरा अध्याय शुरू होता है साथ ही अखण्ड-ज्योति का भी। हमारी प्रत्यक्ष गति विधि अब दस वर्ष तक सीमित है। इस अवधि में हम यह प्रयत्न करेंगे कि जागृत आत्माओं को अपना निज का प्राण बल देकर उनके आन्तरिक स्तर को ऊँचा-अधिक ऊँचा-बहुत ऊँचा-उठाने की चेष्टा करें
विगत 22 वर्ष का अखण्ड-ज्योति का जीवन बहुत ही संतोषजनक एवं शानदार रहा है। जिस मिशन को लेकर यह संस्था जन्मी थी उसी पूर्ति में इतने स्वल्प समय में इतनी अधिक सफलता मिलेगी ऐसी आशा नहीं थी। आज अगणित पत्र पत्रिकाएँ और पुस्तकें छपती रहती है, उन्हें लोग खरीदते बेचते भी हैं; उनमें से कितने में धर्म, ईश्वर, सदाचार आदि की बातें भी रहती हैं पर उसका कोई विशेष प्रभाव पाठकों पर नहीं पड़ता
पंचसूत्री साधना को अखण्ड-ज्योति के अगणित पाठकों ने अपनाया है। पर हमें इतने से ही सन्तोष नहीं है। उसे प्रत्येक पाठक अपनाये, एक भी ऐसा न बचे जो उसकी उपेक्षा करे, तब हमें सन्तोष होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-September
पता-अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा
आगामी भाघ वदी अमावस्या ता0 5 फरवरी 62 में अष्टग्रही योग आने वाला है। इसकी चर्चा अखण्ड-ज्योति में समय-समय पर होती रही है। यह समय अब निकट ही आने वाला है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-December
प्रश्न:- ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका में जो लेख लिए जाते हैं, उनके बारे में कहा जाता है कि वे परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से निस्सृत प्राण−प्रवाह का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या परमपूज्य गए हैं ? फिर इनमें सामयिक संदर्भ स्थान-स्थान पर देखे जाते हैं, वे कैसे पूर्व से लिखकर रख दिए गए?
उत्तर:- निश्चित ही ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका पूज्य गुरुदेव पं.श्रीराम शर्मा आचार्य जी (1911-1990) तथा परमवंदनीय माताजी (1926-1994) की विचार चेतना के प्रवाह के मार्गदर्शन में ही लिखी जाती हैं ‘अखण्ड दीपक’ जो शांतिकुंज हरिद्वार में मथुरा से 1971 में आने के बाद से ही प्रज्वलित है, इसकी एवं मिशन की सभी योजनाओं का प्रेरणा स्त्रोत हैं परमपूज्य गुरुदेव ने 1926 में जो अखण्ड दीपक प्रज्वलित किया था वही 1940 से प्रकाशित पत्रिका के ऊर्जा प्रवाह का प्रधान स्त्रोत है एवं आगामी बीस वर्षों में जो भी कुछ लिखा जाना है, उसकी मोटी रूपरेखा पूज्यवर ने महाप्रयाण से पूर्व जनवरी 1990 में बड़े स्पष्ट रूप में लिखकर दे दी थी। उँगलियाँ कोई भी लिखती हो, संपादन कोई भी करता हो, धुरी वही है मानव में देवत्व लाने के लिए-धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने के लिए श्रेष्ठ विचारों का ऐसा कल्पतरु विनिर्मित हो, जो चारों ओर ऐसा वातावरण बनाने की प्रक्रिया संपादित करें विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय से लेकर सामान्य व गूढ़तम साधना पद्धतियों के मूल में भी पूज्यवर द्वारा 50 वर्ष की अवधि में लिखा गया वह चिन्तन प्रवाह है, जो समय-समय पर परिजनों तक पहुँचता रहा है वह सदैव सामयिक रहा है, रहेगा। संपादन मण्डल द्वारा जी सामयिक संदर्भ दिये जाते हैं वे भी उनके द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के अंतर्गत ही लिखे जाते हैं, एक मिलीमीटर भी इधर-उधर नहीं हटकर विगत की व सबकी पत्रिका के प्रवाह में देखकर यह अन्तर नहीं बता सकता कि यह गुरुसत्ता की लेखनी से लिखे गए हैं या नहीं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-April
सदा के लिए परिजनों से जिन्हें प्यार दे-दे कर उनने परस्पर बाँधा था,बिछुड़ने की विरह वेदना क्या होती है, सही अर्थों में आध्यात्मिक पिता कैसा होता है, यह इन पंक्तियों के माध्यम से परिजन विगत 3 माह से पढ़ रहे हैं। जनवरी, फरवरी 1969 में प्रकाशित अखण्ड-ज्योति पत्रिका के पृष्ठों से उद्धृत उनके मार्मिक उद्गार इस समापन किश्त में

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
ऐसे ही समझदारों में प्रज्ञा परिजनों की गिनती होती है। अखण्ड-ज्योति पाठकों से इसी स्तर की समझदारी अपनायी जाने की अपेक्षा रखी जाती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
पत्रिका के साथ-साथ ‘मैं क्या हूँ’? जैसी पुस्तकों का लेखन आरंभ हुआ, स्थान बदा, आगरा से मथुरा आ गए, दो तीन घर बदल कर घीयामंडी में जहाँ आज ‘अखण्ड-ज्योति संस्थान’ है आ बसे। पुस्तकों का प्रकाशन व कठोर तपश्चर्या, ममत्व विस्तार तथा पत्रों द्वारा जन-जन के अंतःस्थल को छूने की प्रक्रिया चालू रही। साथ देने आ गयीं परम वंदनीया माताजी भगवती देवी शर्मा, जिन्हें भविष्य में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका अपने आराध्य इष्ट गुरु के लिए निभानी थी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-August
पता - “अखण्ड-ज्योति” प्रेस, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-September
पता - “अखण्ड-ज्योति” प्रेस, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-April
इसमें अपने लेख, अनुभव विचार अन्वेषण भेजने के लिए हम गायत्री के साधकों को साग्रह आमन्त्रित करते हैं। अनाधिकारी लोगों से अध्यात्मिक अनुभव छिपाना आवश्यक होता है, परन्तु अखण्ड-ज्योति का यह विशेषाँक मुख्यतः गायत्री के अनन्य प्रेमियों, श्रद्धालुओं एवं उपासकों के ही पास पहुँचेगा इसलिये उनसे अपनी गुह्य अनुभूतियाँ भी नहीं छिपाई जानी चाहिये। कुपात्रों से गुह्य तत्वों को प्रकट करना जिस प्रकार निषिद्ध है वैसे ही सत्पात्रों से उन्हें छिपाने में भी एक प्रकार से कपट करने का पाप होता है। गायत्री साधक बिना संकोच के अपने लेख भेजें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-March
‘अखण्ड-ज्योति’ द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-November
गत आश्विन मास की नवरात्रियों में हमने एक साधारण अपील की थी कि” इस पुराण पर्व पर 24 हजार के लघु अनुष्ठान तपश्चर्या पूर्वक किये जाये। ” वर्तमान काल की स्थिति को देखते हुए हमारा अनुमान था कि-’बहुत थोड़े लोग इस ओर ध्यान देंगे जो लोग साधना करेंगे उनके उत्साह को बढ़ाने और अन्यों को प्रेरणा देने के लिए उन साधकों के नाम अखण्ड-ज्योति में छापेंगे। ’ परन्तु जो सूचनाएं प्राप्त हुई हैं उनसे प्रकट है कि इस वर्ष नवरात्रि में जिन सज्जनों ने गायत्री के तप किये हैं उनकी संख्या इतनी अधिक है कि पूरी अखंड ज्योति में चार मास तक केवल नाम ही छापे जावें तो भी वह नाम पूरे नहीं हो सकते। इसलिए उन सब लोगों को हार्दिक अभिनन्दन करके ही सन्तोष कर लिया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-July
सन् 80 से 2000 तक चलेगा। इसमें नैष्ठिक साधकों की सहायता से युग पुरश्चरण चल रहा है, उन्हें आत्मबल संग्रह करने के लिए सूर्यादय से पूर्व और सूर्यास्त के उपरान्त जो दिव्य अनुदान प्रस्तुत गायत्री जयन्ती (23जून) से मिलने लगे हैं उनका विस्तृत विवरण अखण्ड-ज्योति के पिछले अंगो में आ चुका है। तदनुरुप अनेकों साधक उस विशेष अनुदान को अति सरलतापूर्वक उपलब्ध करने लगे हैं। यह युग पुरश्ररण के भागीदारों और नैष्ठिक उपासना का युग सन्धि अवधि तक साधना में रहनें वालों का उच्चस्तरीय अनुदान है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-March
प्रो. कीरो ने कहा था, अरबों की नील (नदी) यहूदियों का आदाब बजाएगी” सो भी सच हुआ और अब उस भविष्य वाणी के उत्तरार्ध की प्रतीक्षा की जा रही है। प्रो. कीरो की भविष्यवाणियों की सत्यता का अनुमान किसी को करना हो तो वह सन् 1943 की अखण्ड-ज्योति का जनवरी अंक उठाकर देखें जिसमें पृष्ठ 23 पर छपा है “इग्लैण्ड भारत को स्वतन्त्र कर देगा पर मजहवी फिसाद के कारण भारत तबाह हो जायगा यहाँ तक कि हिन्दू, बौद्ध और मुसलमानों में बराबर बराबर विभक्त हो जायगा। ”
पता - अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-January
अखण्ड-ज्योति के परिजन उस दृष्टि से सौभाग्य शाली है कि उन्हें उत्कृष्ट चिन्तन और उपयुक्त कर्तव्य के लिए आवश्यक आलोक तो मिलता ही रहता है। द्वारा तो उनके लिए खुला है। अनजान तो उन्हें नहीं रहना पड़ रहा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-October
इन्हें पू॰ गूरुदेव के विशेष सन्देश के रुप में सब तक पहूँचाना है। सम्पूर्ण ‘अखण्ड-ज्योति’ को नौ खण्डों में विभक्त कर प्रत्येक दिन एक खण्ड के नबाह्न पारायण की व्यवस्था इन नौ दिनों तक चलती रहे तो इसीसे आलोक विस्तार की प्रक्रिया पूर्ण हुई मान ली जाएगी। युग सन्धि के बीजारीयण वर्ष के कारण इस आश्विन नवरात्रि का विशेष महत्व हैं। इस पर्व पर कोई परिजन विशेष साधना से वंचित न रहें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-November
दोनों समन्वय स्वाध्याय की आवश्यकता को अन्न, जल की तरह पूरी कर सकती हैं। अखण्ड-ज्योति का विषय चिन्तन को और युग निर्माण का कर्म को दिशा देना है। यह ज्ञान कर्म का समन्वय-कृष्ण, अजफ्रन का - राम हनुमान का समन्वय जैसा युग्म समझा जा सकता है। इन पत्रिकाओं को दो बार पढ़ा जाय
अगस्त, सितम्बर की अखण्ड-ज्योति में प्रज्ञा परिजनों से कुछ अनुरोध किये गये हैं जिनमें युग सन्धि के महान पर्व पर नव सृजन अभियान में कुछ सहयोग देने की प्रेरणा का समावेश है। जागृतों एवे मूर्धन्यों से ऐसी आशा, अपेक्षा की जाना उचित भी है और आवश्यक भी। व्यक्तिगत निर्वाह एवं सुख-सुविधा की व्यवस्था बनाना भी ठीक है किन्तु उसमें इतना व्यस्त और लिप्त होना उचित नहीं जिसमें आत्मकल्याण और लोकमंगल जैसे उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए कुछ भी करते धरते न बन पड़े
‘अखण्ड-ज्योति’ इस दृष्टि से उच्चस्तरीय मधु संचय है। अब इसी सहयोगिनी ‘युग निर्माण’ पत्रिका साथ में गुँथ गई हैं। दोनों समन्वय स्वाध्याय की आवश्यकता को अन्न, जल की तरह पूरी कर सकती हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-December
विगत 43 वर्षो से युगान्तरीय चेतना इसी के पृष्ठों में लिपट कर प्रकट होती रही है। युग गंगा का अवतरण भले ही दिव्य लोक से होता है, पर उसका प्रत्यक्ष दर्शन तो अखण्ड-ज्योति की गंगोत्री से होता है। उसी के स्नान अबगाहन से इतना बड़ा प्रज्ञा परिवार उपजा है। असंख्य शिशु शावकों को उसने अपना पयपान कराने तथा अचंल का आश्रय देने की सतत साधना से इसे योग्य बनाया है कि वे युग शिल्पी अग्रिम पंक्ति में खड़े हो सकें
यह कार्य देखने में छोटा किन्तु परिश्रम से महान है। अखण्ड-ज्योति के सदस्य स्थिर रखने या बढ़ाने का सीधा परिणाम है, प्रज्ञा अभियान को-युग चेतना को-उज्जवल भविष्य को-परिपुष्ट करने के लिए देखने में सामान्य किन्तु परिणाम में महान सहयोग अनुदान प्रस्तुत करना
अखण्ड-ज्योति अपने 44 वें वर्ष में प्रवेश करते हुए सभी प्रज्ञा परिजनों के प्रति अपनी सहज ममता को अधिकाधिक सघन करते चलने का वचन देती है साथ ही सभी उदार स्वजनों के अपेक्षा करना ही युग चेतना के विस्तार में उसकी कार्य क्षमता बनाने में सम्भव योग दान करें। उपेक्षा कृपणता न वरतें
युग शक्ति एवं महिला जागृति पत्रिकाएँ बन्द हो जाने से उनकी पाठ्य सामग्री तथा भावी सम्भावनाओं की अति महत्वपूर्ण जानकारी इस वर्ष से अखण्ड-ज्योति में नये आधार लेकर प्रस्तुत करेगी। अतएव पिछले वर्षो की तुलना में उसका महत्व और भी अधिक बढ़ेगा। अगले वर्ष की विचार सम्पदा ऐसी होगी जिसे आसाधारण ही कहा जाता रहेगा
‘अखण्ड-ज्योति’ को मिशन की वाणी कहानी चाहिए। विगत 43 वर्षो से युगान्तरीय चेतना इसी के पृष्ठों में लिपट कर प्रकट होती रही है। युग गंगा का अवतरण भले ही दिव्य लोक से होता है, पर उसका प्रत्यक्ष दर्शन तो अखण्ड-ज्योति की गंगोत्री से होता है
जिन प्रज्ञा परिजनों ने अब तक अखण्ड-ज्योति के सदस्य बनाने, बढ़ाने में योगदान दिया है उनसे विशेष रुप से अनुरोध है कि अपने उस प्रयास अनुग्रह को घटने तनिक भी न दें वरन् यथासम्भव उसमें कुछ बढ़ोत्तरी ही करें। इसी प्रकार जिसने इस सर्न्दभ में अभी कुछ विशेष पुरुषार्थ नहीं किया है, मात्र स्वयं ही सदस्य रहे है, उनसे अनुरोध है कि अपनी सुरुचि को एक कदम आगे बढ़ाकर अपने प्रभाव क्षेत्र से सर्म्पक साधें और कुछ नये ग्राहक बनाने के लिए इन दिनों विशेष रुप से प्रयत्न करें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-August
यह प्रकट रहस्य है कि अखण्ड-ज्योति के परिजनों में से अधिकाँश ऐसे है जिन्हे जागृत आत्मा कह जाने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। रुचि और रुझान के अनुरुप ही समुदाय एकत्रित होते है। प्रकृति की अनुरुपता ही वर्ग बनाती और घनिष्ठता के सूत्र जोड़ती है
लेखा-जोखा साक्षी है कि जो एक बार इस परिवार में प्रवृष्ट हुआ वह सदा सर्वदा के लिए उसी का परिजन होकर रह गया। अखण्ड-ज्योति को एक ऐसा सूत्र कह सकते है जिसमें बहुमूल्य मणि-मुक्तकों की माल गुँथी हुई है। हम लोग जागृत जीवन्तों की तरह एक आदर्शवादी परिवार बन कर रह रहे है
ऐसे ज्योतिषी भविष्यवक्ता और अन्तदृष्टि सम्पन्न दिव्य-दृष्टा आगामी दिनों की विभीषिकाओं के चित्र खींचते रहते है। उनमें से कइयों की भविष्यवाणियाँ अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में प्रकाशित हुई है। इन पंक्तियों में भविष्य ज्ञन की जिस शाखा की चर्चा की जा रही है, वह इस तरह की भविष्यवाणियों से सर्वथा भिन्न है। इन शाखा को (फ्यूचरोलाँजी) अर्थात् भविष्य शास्त्र कहा जाता है
अखण्ड-ज्योति के परिजनों में से प्रत्येक को नव-सृजन के इस पुण्य पर्व पर युग धर्म के निर्वाह के निमित्त कुछ साहसिक कदम बढ़ाने चाहिए। इस सर्न्दभ में किस की क्या मन स्थिति एवं क्या परिस्थिति है और उनके लिए कहाँ क्या कुछ कर सकना सम्भव हो सकता है? इसके लिए शान्ति कुन्ज हरिद्वार से पत्र-व्यवहार करके किसी उपयुक्त निर्ष्कष पर पहुँचा जा सकता है। अपेक्षा की गई है कि युग सन्धि के पुण्य पर्व पर प्रत्येक जागृत आत्मा को अपने-अपने ढंग से कुछ प्रेरणा मिलेगी और उस आधार पर उत्पन्न हुई उदारता से उज्जवल भविष्य के अभिनव सृजन में उत्साहवर्धक सहायता मिलेगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-April
अखण्ड-ज्योति परिजनों को चदि उपयोगी प्रतिपादन की तरह ही प्रेरणाप्रद वातावरण मिला होता तो निश्चय ही उसका चमत्कारी रहा होता। सम्पन्न लोग अपने छोटे बच्चों को पाँच सौ रुपया मासिक खर्च वाले पब्लिक स्कूलों में पढने भेजते है, जबकि वहाँ भी ग्रामीण स्कूलों की तरह ही प्राथमिक शिक्षा का पाठ्यक्रम रहता है। पूछने पर वे अभिभावक एक ही बात कहेंगे कि उन मंहगे स्कूलों का वातावरण ऐसा होता है जिसमें बालकों में सभ्य व्यवहार की आदत पड़ सके
अखण्ड-ज्योति परिजनों को एकाँगी सौभाग्य मिल सका। उससे उपयोगी प्रेरणाएँ तो सत्साहित्य के माध्यम से मिली, किन्तु जो पढा उसे व्यवहार में उतारने के लिए सहयोगी वातावरण न मिल सका। फलतः उस अध्ययन का लाभ चिन्तन का स्तर उठाने तक सीमित बनकर रह गया
समय की माँग है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के देव परिजनों को मात्र उत्कृष्ट स्वाध्याय का ही अवसर न मिले-वरद् उस वातावरण में रहने को भी सुविधा हो जो व्यक्तित्व को आदर्शवादी-अध्यात्मवादी ढाँचे में ढालने के लिए अनिवार्य रुप से आवश्यक है। समय को माँग-नव सृजन के लिए अपने आदर्श उपस्थित करने वाले और जन समुदाय को नेतृत्व कर सकने योग्य प्रतिभाओं का उत्पादन प्रचुर परिमाण में करने की है। उसकी पूर्ति के लिए गायत्री नगर का ढाँचा खडा किया गया है, इसमें गुरुकुल, आरण्यक और तीर्थ कल्प की तीनों ही दिव्यधारीओं का समन्वय किया गया है
नव युग में चिन्तन किस स्तर का होगा, उसकी झाँकी करने और उसे लोकमानस में जमाने के लिए अखण्ड-ज्योति ने लम्बे समय से प्रयास किया है। प्रतिपादनों के पीछे जुड़े हुए तथ्य और सत्य ने हर विचारवान् को प्रभावित और प्रेरित किया है। चिन्तन का प्रवाह मोड़ने में उस प्रयास को उत्साहवर्धक ही नहीं आशातीत कही जाने वाली सफलता भी मिली है
अखण्ड-ज्योति के जीवन काल की प्रायः आधी शताब्दी होने को आई है। उसने युगऋष्टि की भूमिका निभाई और स्वाध्याय की दृष्टि से उपयासेगी पाठ्यसामग्री प्रस्तुत करने में यथासम्भव कहीं कोई चूक नहीं रहने दी है। यह आहार लोगों ने अपनाया भी है और सराहा भी
मनःस्थिति को परिष्कृत किया जा सके तो अखण्ड-ज्योति परिजनों में से अगणित अपनी परिस्थिति गायत्री नगर में बस सकने योग्य पावेंगें। जो इस अवसर का लाभ उठा सकंगे उन्हें सच्चे अर्थों में सौभाग्यशाली माना जायेगा
कहीं कुछ अधुरापन रह गया है जिसके कारण प्रेरणा चिन्तन क्षेत्र तक घुमड़ कर रह गई, उसे कर्म के रुप में परिणित होने का अवसर नहीं मिला। पूर्ण असफलता इसलिए स्वीकार नहीं की जा सकती है कि अखण्ड-ज्योति परिजनों की आस्था, अभिरुचि एवं आकाँक्षा जन साधारण की तुलना में कहीं अधिक उत्कृष्ट पाई जाती है। यदि कोई प्रभाव न पड़ा होता तो मनःस्थिति में इतना असाधारण अन्तर कैसे आया ?
होना यह चाहिए था कि प्रेरणाप्रद वातावरण का प्रबन्ध होता और उसमें परिजनों को रुकने, बसने का अवसर मिलता। यदि यह प्रबन्ध किया जा सका होता तो अखण्ड-ज्योति की खदान से इतने नर-रत्न निकले होते जिनकी जगमगाहट से अगणित चहरे दमकते और उनके प्रभाव से असंख्यों व्यक्तित्व उभारते, उछलते द्वष्टि गोचर होते
अखण्ड-ज्योति परिजनों क आधा निर्माण हो चुका आधा शेष है। आधी मजिल चल चुके पर आधी दूरी ही करनी है। परिष्कृत द्वष्टिकोण से समस्याओं पर विचार करने की पद्वति का जहाँ तक सम्बन्ध था उसे परिजन उपलब्ध कर चुके हैं
अखण्ड-ज्योति पिछले तैतालीस वर्षों से इस प्रयास में संलग्न है कि स्वाध्याय के लिए श्रेयतम पाठ्यसामग्री परिजनों को उपलब्ध कराने में कुछ कसर बाकी न रहने दी जाये। कमल पुष्पों का मधु सर्वोत्तम माना जाता है। प्रयत्न यही हुआ है कि घटिया फूलों का नहीं प्रफुल्लित पारजातों का ही पराग ढूँढा जाये और उससे परिजनों की परिपोषण के सभी उपयोगी तत्वों से भर पूर खाद्य आवश्यकता पूरी कराई जाये
आज इसी की माँग और आवश्यकता है किन्तु उसकी पूर्ति हो नहीं रही। यदि अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादन प्रखर रहे होते तो उस समुदाय में से युग की माँग पूरी कर सकने वाली प्रतिभाएँ उभर कर आगे आई होती। यदि इस समुदाय में जीवन रहा होता, तो वे मात्र सज्जन भर बन कर न रह जाते। समय का मार्ग-दर्शन करते भी दिखते
उसकी पूर्ति के लिए गायत्री नगर का ढाँचा खडा किया गया है, इसमें गुरुकुल, आरण्यक और तीर्थ कल्प की तीनों ही दिव्यधारीओं का समन्वय किया गया है। इस त्रिवेणी में अवगाहन करने के लिए जागरुक प्राणवानों को अखण्ड-ज्योति के प्रखर परिजनों को- आग्रहपूर्वक आमन्त्रण किया गया है
इस स्तर के व्यक्ति बाजार में नहीं मिल सकतें। अखण्ड-ज्योति की प्रेरणाओं को जो लम्बे समय से हृदयंगम करते रहे है, जिनने उसके प्रतिपादनों का गम्भीरता पूर्वक अवगाहन किया है-वे ऐसा अवसर प्राप्त करनें के भी इच्छुक होंगे जिससे मान्यताओं को गतिविधियों में, आदतो में सम्मिलित कर सकना सम्भव हो सके। वस्तुतः इस स्तर के लोग ही प्रस्तुत आहवान को स्वीकार कर सकेंगे और वे ही उपयोगी भी सिद्ध होंगे
वे स्वयं भी पढ़ेगे साथ ही दूसरो का भी पढ़वागें। गायत्री नगर में बसने के लिए अखण्ड-ज्योति परिवार ने उन प्रबुद्ध परिजानों को आमन्त्रित किया गया है जो आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण की दूहरी शिक्षा साधना साथ-साथ करने में रुचि रखतें हों, जिन्हें सच्चा स्वार्थ साधने और सच्चा परमार्थ करने में उत्साह हो। बड़ी कक्षाओं के छात्रों में से कितने ही ऐसे भी हाते हैं जो छोटी-कक्षाओं के छात्रो के छात्रो का पढ़ाने की व्यवस्था बनाकर अपना काम चलाते हैं। गायत्री नगर में बसने वाले अपनी वर्तमान स्थिति से ऊँचा उठने के लिए-अपने स्तर की प्रगति करगें
अखण्ड-ज्योति परिजनों ने लम्बे समय से जो पढ़ा और समझा है अब उसे मस्तिष्क की उथली परतों तक सीमित न रहने देकर अन्तराल की गहराई में उतरना चाहिए और भुलकर आगत के सम्बन्ध में नई नीति निर्धारण कर सकने योग्य विवेक एवं साहस जुटाना चाहिए
मधु मक्खी के श्रम को सराहा जाता है। अखण्ड-ज्योति के अध्यवसाय और प्रस्तुतीकरण का यदि मूल्याँकन हो सके तो यही कहा जायेगा कि मानवी तत्परता के अर्न्तगत जो सम्भव था उसमें कुछ उठा नहीं रखा गया है
स्वाध्याय तभी सराहा जायेगा जब वह व्यक्तित्व में चमके और आचरण में उतरे। अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादन, और पाठकों के अध्यवसाय अध्ययन की सार्थकता इसी कसौटी पर आँकी जायेगी कि परिजनों के जीवन क्रम में उसका क्या प्रभाव पडा ? क्या परिवर्तन हुआ ? यदि ऐसा छ भी न हुआ हो तो समझना चाहिए कि मनोरंजन बेचने खरीदने वालों में एक संख्या अखण्ड-ज्योति के प्रकाशन को भी सम्मिलित हो गई। यदि ऐसा हुआ हो तो समझना चाहिए कि एक महान प्रयास चट्टान से टकराने वाली नाव की तरह दुर्घटना ग्रसित हो गया। ऐसी दशा में इस असफलता को अपने समय का एक दुःखदायी दुर्भाग्य ही माना जायेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-May
जो भी पत्र-व्यवहार करें उसकी एक प्रति अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा के पतें पर भी भेजने का अनुग्रह करें
प्रेषक- अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-March
इसीलिये जब तक उनका नया निर्देश न हो-जब तक वे किसी को स्वयं ही न बुलायें, तब तक उनसे मिलने के लिये किसी को भी चेष्टा न करनी चाहिये। “दिव्य अनुभूतियाँ” स्तम्भ भी उनके आदेशानुसार अब अखण्ड-ज्योति में नहीं छपेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-December
गायत्री साहित्य अखण्ड-ज्योति संस्थान से ही माँगना चाहिये। अन्य पुस्तकें युग-निर्माण योजना के पते से मँगानी चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-May
प्रशिक्षण के लिये अध्यापिका की आवश्यकता भी सम्भवतः इसी महीने में पूरी हो लेगी। इस संदर्भ में पिछली अखण्ड-ज्योति में विज्ञापन भी छप चुका है
जहाँ एक पत्रिका अखण्ड-ज्योति ही मँगाई जाती है वहाँ प्रयत्न करके पाक्षिक युग निर्माण मँगाना भी आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। क्योंकि युग परिवर्तन के महान अभियान का मार्ग दर्शन एवं स्वरूप उसी के प्रकाश में जाना जा सकता है। जो मँगाते नहीं हैं उन्हें भी यह प्रयत्न करना चाहिए कि कहीं से माँग कर पढ़ लें
यह तो पिछले दिनों से चले आ रहे शाखा संगठनों के प्रयास की बात हुई। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य तो इस संगठन की अपेक्षा अत्यधिक संख्या में हैं वे सब भी यदि इस प्रयास में लग जायें तो अगला गायत्री जयन्ती पर्व—गंगा दशहरा दस हजार स्थानों पर आसानी से मनाया जा सकता है और आश्चर्य नहीं कि उससे एक करोड़ जनता को भी प्रशिक्षित प्रभावित किया जा सके
इस पर तीन ओर सुन्दर बोर्ड लटका कर—ज्ञान रथ सजाया जा सकता है। पुरानी अखण्ड-ज्योति युग-निर्माण पत्रिकायें—ट्रैक्ट मोटे कागज के कवर चिपका कर इस गाड़ी पर रख लिये जायें और दो कर्मठ कार्यकर्त्ता अपने अवकाश के समय उसे अपने गाँव, नगर में घुमाने—जन संपर्क बनाने, मिशन का प्रयोजन समझाने और विज्ञप्तियाँ अथवा अंक पढ़ने देने पीछे वापिस लेने का क्रम चलाने लगें तो समझना चाहिए अपना कार्य क्षेत्र विस्तृत होने का द्वार खुल गया
अब आवश्यकता इस बात की है कि इसे बड़े पैमाने पर सर्वत्र कार्यान्वित किया जाय। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य इस दिशा में थोड़ा सा प्रयास करें तो वे स्वयं आश्चर्यचकित रह जायेंगे कि कितना सरल किन्तु कितना प्रभावी लोक शिक्षण का आधार उनके हाथ लग गया और अपने अशिक्षित, छोटे देहातों में फैले हुए देश में नव जीवन संचार करने के लिए किस प्रकार द्वार खुल गया और किस प्रकार एक कठिन समस्या का सरल समाधान निकल गया। इस पद्धति का अधिक व्यावहारिक स्वरूप समझने के लिए पिछले तीन-चार महीने के युग-निर्माण पाक्षिक पढ़ लेना पर्याप्त होगा। उस आधार पर यह सरल शैली हर किसी की समझ में आ जायगी
युग-निर्माण शाखाओं ने प्रेरणाप्रद पद्धति से पर्व मनाने की सम्भावनाओं का उद्घाटन एवं प्रयोग प्रस्तुत किया है। अब उसे अधिक गति मिलनी चाहिए और अखण्ड-ज्योति परिजनों द्वारा इस दिशा में कुछ अधिक प्रयत्न करना चाहिए। इससे न केवल लोकशिक्षण के लिये मंच ही मिलेगा वरन् प्रशिक्षण कर्त्ताओं की, अनुभवी कार्यकर्त्ताओं की—एक बड़ी सेना भी खड़ी होगी और वह युग परिवर्तन के—नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के पुण्य प्रयोजन को द्रुतगति से अग्रगामी बनाने की महत्व पूर्ण भूमिका सम्पादित कर सकने में समर्थ एवं सफल भी होगी। ऐसा गुरु देव का कथन था
लिखना भी कम नहीं हुआ, उनके विनिर्मित ग्रन्थ उनके शरीर से अधिक भारी हैं। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर अखण्ड-ज्योति के माध्यम से निकट भविष्य में निकलते रहने वाले लेख अभी वर्षों के लिए पहले से ही लिखे रखे हैं। अब वे अपना अनुभव लिखने के लिए ही आवश्यकतानुसार लेखनी उठाया करेंगे और प्रेरणायें अन्तःकरणों में उतारने के लिए ही वाणी का उपयोग किया करेंगे। पिछले दिनों जो किया जाता रहा है उसे ही आगे भी दुहराते रहना- पिसे को पीसने के बराबर है
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के नाम संदेश देते हुए गुरु देव ने कहा-प्रत्येक परिजन को पेट और प्रजनन की पशु प्रक्रिया से ऊँचे उठकर उन्हें दिव्य जीवन की भूमिका सम्पादित करने के लिये कुछ सक्रिय कदम बढ़ाने चाहिएं। मात्र सोचते विचारते रहा जाय और कुछ किया न जाय तो काम न चलेगा। हममें से प्रत्येक को अधिक ऊँचा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और कर्तव्य में ऐसा हेर-फेर करना चाहिए जिसके आधार में परमार्थ प्रयोजनों को अधिकाधिक स्थान मिल सके

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
बचने के लिए बहाने ढूँढ़ते रहने से देर तक काम नहीं चल सकता। इस नग्न सत्य का सामना करने के लिए विज्ञान के - तर्क और तथ्य के - आधार पर अध्यात्म गरिमा का प्रतिपादन अखण्ड-ज्योति ने चार वर्ष पूर्व आरम्भ किया था। प्रसन्नता की बात है कि उससे विश्वभर के बुद्धिजीवी वर्ग में भारी दिलचस्पी, हलचल पैदा हुई है। अखण्ड-ज्योति का अनेक भाषाओं में प्रकाशित होना और ग्राहक संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ते जाना इस नये प्रतिपादन के प्रति लोक-मानस की उत्कट अभिरुचि का ही द्योतक है
प्रसन्नता की बात है कि उससे विश्वभर के बुद्धिजीवी वर्ग में भारी दिलचस्पी, हलचल पैदा हुई है। अखण्ड-ज्योति का अनेक भाषाओं में प्रकाशित होना और ग्राहक संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ते जाना इस नये प्रतिपादन के प्रति लोक-मानस की उत्कट अभिरुचि का ही द्योतक है। आस्तिक वर्ग की निराशा को चीरते हुए एक अभिनव आशा की प्रभाव किरणें उपलब्ध हुई हैं और विश्वास हो चला है कि अगले दिनों बुद्धिवाद का रुख पलट जायगा और उसकी चपेट में आकर आस्तिकों को नास्तिक-बनने का खतरा न रहेगा वरन् नास्तिकों को आस्तिक बनकर अपनी भूल सुधारनी पड़े
उसके पीछे लम्बी पृष्ठभूमि है। यह निश्चय चार वर्ष पूर्व तभी कर लिया गया था जब विज्ञान और अध्यात्मवाद के समन्वय के लिए अखण्ड-ज्योति में विवेचनात्मक लेखमाला आरम्भ हुई थी। वस्तुतः यह इस युग की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बौद्धिक क्रान्ति है जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। कहना न होगा कि यह प्रत्यक्षवादी और बुद्धिवादी युग है
उसे मार्क्स दर्शन, अणु विज्ञान, विद्युत आविष्कार-तार-बेतार से घटकर नहीं बढ़कर ही मान्यता मिलेगी। विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय में अखण्ड-ज्योति मात्र लेख छापती रहे बात इतने से ही समाप्त नहीं हो जाती वरन् उसे प्रयोगशाला में भी सही सिद्ध करना पड़ेगा। इसके लिए गुरुदेव अपनी इस हिमालय की एकान्त तप साधना में समुचित तैयारी करते रहते हैं। तर्क और प्रमाण दोनों ही आधारों को इतनी मात्रा में संग्रह कर लिया है कि बुद्धिवाद और प्रत्यक्षवाद को उसके आधार पर एक सीमा तक सन्तुष्ट किया जा सके

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-April
कुण्डलिनी जागरण से लेकर शक्तिपात तक की समस्त क्रिया-प्रक्रिया को इस थोड़े ही समय में प्रशस्त करने का उपक्रम बन जायगा। इस भावी साधना प्रक्रिया का भावी स्वरूप और आधार अखण्ड-ज्योति के किसी अगले अंक में वर्तमान अस्वस्थता दूर होने पर ही प्रस्तुत करूंगी। इस समय तो उस प्रकरण पर थोड़ा प्रकाश डाला गया है जिसके अनुसार गुरुदेव कुछ समय के लिए यहाँ आये और चले गये
शेष सभी लोगों के लिए कुछ सन्देश दे गये हैं उनका उल्लेख इन पंक्तियों में किया जा रहा है। यों अखण्ड-ज्योति का-मेरा अस्तित्व अब केवल उनकी सन्देश वाहिका के रूप में ही है। प्रेरणा स्रोत वे ही हैं। जो कुछ किया जा रहा है-पत्रिकाओं में जो छपता है उसे प्रकारान्तर से गुरुदेव का ही प्राण प्रवाह मानना चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-February
दिव्य “अखण्ड-ज्योति दी तुमने, घर-घर फैला उजियारा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-August
अखण्ड दीपक पर पुरश्चरणों की शृंखला सम्पन्न करते हुए उन्होंने भावना क्षेत्र में यह निष्ठा परिपक्व की कि जीवन को ज्वलन्त दीप शिखा की तरह अन्तरंग एवं बहिरंग क्षेत्र में प्रकाश उत्पन्न करने के लिये तिल-तिलकर जलते रहने की प्रक्रिया व्यवहार में लाई जानी चाहिये यदि दीप उपकरण के साथ-साथ वे आत्म-ज्योति को प्रकाशवान बनाने का लक्ष्य सामने रखकर न चले होते तो उनकी अखण्ड-ज्योति भी मात्र रोशनी पैदा करने का तुच्छ सा प्रयोजन पूरा कर सकी होती

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-February
सम्पादक–भगवती देवी शर्मा प्रकाशक व मुद्रक–मृत्युञ्जय शर्मा अखण्ड-ज्योति संस्थान द्वारा जन-जागरण प्रेस मथुरा 281003 में मुद्रित

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-August
जून की अखण्ड-ज्योति और जुलाई, अगस्त के प्रज्ञा अभियान अंक में परिजनों को कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण परामर्श दिये गये हैं। उन्हें सामान्यतया यथासमय पढ़ लिया गया होगा। यह पंक्तियाँ पढ़ने के उपरान्त उन अंकों को एक बार नई दृष्टि से पढ़ा जाना चाहिए
(1)जून की अखण्ड-ज्योति में जिस आत्म परिष्कार और परिवार परिष्कार की सप्तसूत्री योजना का उल्लेख है उसे पूरा या उसका कोई अंश कार्यान्वित करने की बात सोची गई है क्या? यदि सोची गई तो उसके लिए कुछ संकल्प उठा और कार्यक्रम बना क्या? यदि बना तो उस संदर्भ में अब तक क्या प्रगति हुई?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-March
पता – अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-February
अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक से अनुरोध है कि जनवरी और फरवरी के सम्पादकीय लेखों को वह दो बार पढ़े। एक बार इस दृष्टि से कि उन्हें मिशन के सूत्र-संचालकों ने लिखा है। एक बार इस दृष्टि से कि उन्हें प्रत्येक परिजन के व्यक्तिगत नाम से लिखा गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-December
गाँव-गाँव, घर-घर, नगर-नगर दिव्य चेतना का प्रकाश पहुँचाने में निरत रहते थे। अखण्ड-ज्योति के पिछले जीवन के 50 वर्ष इसी प्रयोजन में संलग्न रहे हैं। इसकी स्वर्ण-जयन्ती यदि उसके पाठक मनाते हैं तो इसमें भी उनकी श्रद्धासिक्त सद्भावनाओं की ही अभिव्यक्ति है। मंजिल का एक बड़ा चरण पूरा कर लेने पर यदि उसके पाठक हर्षोल्लास मनाते हुए स्वर्ण जयन्ती का आयोजन करते हैं तो इसमें कुछ अनुचित जैसा नहीं है
अखण्ड-ज्योति पत्रिका ही हमारा वह उपकरण है, जिसके माध्यम से 24 लाख प्रज्ञा परिजनों का एक सुगठित संगठन खड़ा किया जा सका और उसे आत्म-निर्माण, विश्व-कल्याण में लगाया जा सका। कोटि-कोटि शिक्षितों ने इसे पढ़ा और उससे अधिक अल्पशिक्षितों ने पढ़ा। इससे उस उद्देश्य की पूर्ति हुई, जिसे कभी सन्तजन घर-घर अलख जगा कर पूरा किया करते थे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
यह अखण्ड-ज्योति का पचासवाँ वर्ष है। इसे स्वर्ण जयन्ती वर्ष के रूप में उद्घोषित किया गया है। तद्नुसार निश्चय किया गया है कि उसे हर दृष्टि से अब की अपेक्षा और भी अधिक उच्चस्तरीय बनाया जाय
स्मरण रहे अब अखण्ड-ज्योति का चन्दा पच्चीस रुपया वार्षिक होगा और वही वसूला जाना चाहिए। इस हेतु पत्रिका में रसीदें लगाई जा रही हैं- और अधिक आवश्यकता होने पर संस्थान से मँगाई जा सकती हैं
“अखण्ड-ज्योति” पत्रिका पाठकों के हितों को प्रधानता देते हुए प्रकाशित होती रही है। उसके हर पृष्ठ पर गुरुदेव की अमृतवाणी लेखनी के द्वारा इस प्रकार लिखी जाती है कि अर्धमृतकों और अर्धमूर्च्छितों में भी नव जागरण का- नवजीवन का- संचार होता रहे। यही कारण है कि साज सज्जा से रहित होने पर भी उसे दो लाख पाठक मँगाते व पढ़ते हैं
अखण्ड-ज्योति का वार्षिक चन्दा बढ़ाने की बात पिछले तीन वर्षों से हर साल सोची जाती रही है पर वैसा कदम संकोचवश उठ ही नहीं सका। मँगाने वाले परिजनों को सीमित आजीविका में ही घर खर्च चलाने की व्यवस्था बनानी पड़ती है। वे निर्वाह के आवश्यक साधनों को छोड़कर अन्य प्रसंगों में खर्च की बढ़ोत्तरी करने की स्थिति में नहीं हैं
एक विशेष अनुरोध यह है कि इस स्वर्ण जयंती वर्ष में अखण्ड-ज्योति के रूप में युग चेतना को अधिकाधिक व्यापक विस्तृत करने में इस बार पूरी शक्ति झोंक दी जाय। दो-दो की टोली बनाकर अपने प्रभाव क्षेत्र के सभी विचारशील परिजनों के पास जाया जाय और उन्हें पत्रिका के प्रतिपादनों का महत्त्व समझाते हुए कहा जाय कि उसमें जीवनक्रम का कायाकल्प करने की क्षमता है। चिन्तन चरित्र और व्यवहार को आदर्शवादी बनाने की सामर्थ्य है
नवनीत 1984 में 3/प्रति कॉपी था, 1987-76 में 6.75/ हो गया है। ज्ञातव्य है कि ये सभी पत्रिकाएं विज्ञापन लेती हैं जबकि ऐसा प्रावधान अखण्ड-ज्योति पत्रिका के साथ नहीं है, जो ऐसी ही स्थिति में पचास वर्षों से छपती आ रही है। कल्याण जैसी धार्मिक पत्रिका का वार्षिक मूल्य अब 60 रुपये है जबकि यही पत्रिका- 1983-84 तक मात्र 20/मूल्य में प्रकाशित होती रही है
कुछ पत्रिकाएँ निकालने वाली संस्थाओं का खर्च दान-दक्षिणा के आधार पर चलता है। पर अखण्ड-ज्योति के पास इनमें से एक भी साधन नहीं है। उसे ग्राहकों से वसूल होने वाले चन्दे से ही अपना संतुलन बिठाना पड़ता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-May
सूक्ष्मीकरण साधना से पूज्य गुरुदेव ने इतनी अगाध शक्ति प्राप्त की है जिससे यहाँ न आ सकने वाले प्रज्ञा परिजन भी अपने घरों पर 15 मिनट की शक्ति संचार साधना (जिसका उल्लेख अप्रैल के अखण्ड-ज्योति में किया गया है) से लाभान्वित हो सकते हैं। सूर्योदय से आधा घंटे पूर्व से आधा घंटे बाद तक के समय में 15 मिनट शक्ति संचार के लिए नियत रखें। साधकों को प्राणाकर्षण प्राणायाम के साथ हिमालय के ध्रुवकेंद्र का ध्यान करना चाहिए
स्थूल शरीर के लिए जपयोग, सूक्ष्म के लिए प्राणयोग और कारण के लिए ध्यान योग का निर्धारण है। इसे अखण्ड-ज्योति के जनवरी अंक के कुण्डलिनी योग-ग्रन्थि भेदन एवं अप्रैल अंक की ‘कुण्डलिनी केन्द्र की साझेदारी’ का सुगम संस्करण समझा जा सकता है। मार्च की अपनों से अपनी बात में जिन नौ दिवसीय सत्रों की घोषणा की गयी है उनमें यही साधनाएँ सिखायी करायी जायेंगी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-February
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-November
“ अखण्ड-ज्योति “ का जनवरी सन् 53 का अंक “मनुष्यता” अंक होगा। मनुष्यता के लक्षण, कर्त्तव्य, उसके नाश के कारण तथा उत्थान के उपायों पर विस्तृत प्रकाश डाला जायगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-May
वर्तमान समय में भी ऐसे अनेक सज्जन हैं जो गायत्री महाशक्ति की तपस्या करके अपने में अनेक विशेषताएं उत्पन्न कर चुके हैं, ऐसे सज्जन बहुधा स्वयं अपनी विशेषताएं प्रकट करने में संकोच करते हैं। इसलिए अखण्ड-ज्योति के पाठकों से प्रार्थना है कि उन्हें किन्हीं स्वर्गीय गायत्री उपासक का उत्साहवर्धक वृत्तान्त मालूम हो या वर्तमान काल के किन्हीं सफल साधक का परिचय हो तो उनकी सफलता प्रकट करने वाली घटनाओं का पूरा हाल छपने के लिये भेजें। उन महात्माओं के फोटो, या उनके द्वारा जिनको लाभ हुआ हो उनके फोटो अथवा लेखक महोदयों के फोटो भी छपने के लिए भेजे जा सकते हैं। लेख यथासंभव जल्दी ही भेजने चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-December
व्यवस्थापक- “अखण्ड-ज्योति” प्रेस, मथुरा
(5) जहाँ हर साल अखण्ड-ज्योति संस्था को अपने प्रति ग्राहक से एक वर्ष में करीब एक आना लाभ होता था वहाँ इस वर्ष एक चित्र बढ़ा देने के कारण करीब तीन आना हर ग्राहक पर घाटा पड़ा है। अगले वर्ष से टाइटिल पृष्ठ आर्ट पेपर पर तिरंगा छपने की व्यवस्था भी की गई है। इससे घटा और भी बढ़ेगा
(8) यहाँ से हर महीने ठीक समय पर दो बार जाँच कर सभी ग्राहकों के लिये “अखण्ड-ज्योति” भेजी जाती है। यदि कोई अंक न मिले तो अपने पोस्ट आफिस में तलाश करने के बाद उसी महीने हमें सूचना दे देनी चाहिए ताकि अंक बचा हो तो दुबारा भेजा जा सके। कई महीने बाद शिकायत भेजने पर पिछले अंक समाप्त हो जाने के कारण उन्हें दुबारा भेजना सम्भव नहीं होता
इससे घटा और भी बढ़ेगा। अखण्ड-ज्योति का प्रचार अधिक हो और उसे अधिक से अधिक सस्ती एवं सर्व सुलभ रखता जाय इस दृष्टि से मूल्य नहीं बढ़ाया गया है। घाटे की पूर्ति का एक ही उपाय है कि प्रेमी सज्जन एक एक दो दो ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न करें। यदि ग्राहक संख्या दूनी हो जाय तो यह घटा सहज ही पूरा हो सकता है
जो सज्जन मँगाना चाहें 3 रु. मनीआर्डर से भेजकर प्राप्त कर सकते हैं। रजिस्ट्री पार्सल से अखण्ड-ज्योति के 24 अंक भेज दिये जावेंगे
(4) अखण्ड-ज्योति उतनी ही छपती है जितने उसके ग्राहक होते हैं। देर से चन्दा भेजने वालों को पिछले अंकों से वंचित रहना पड़ता है। आप अपना चन्दा यथा सम्भव शीघ्र ही भेजने का प्रयत्न करें ताकि मनुष्यता अंक समाप्त हो जाने पर उससे वंचित न रहना पड़े

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-September
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-August
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-October
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा
ऐसा ही एक विरोध अभी हाल में बम्बई के एक गुजराती पत्र में छपा है। जिसमें अखण्ड-ज्योति द्वारा संचालित गायत्री मन्त्र लेखन का विरोध किया है, उस विरोध के जो कारण दिये गये है वे बड़े मनोरंजक हैं। पाठकों का कुछ मनोरंजन हो इस दृष्टि से उसका उल्लेख नीचे किया जाता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-July
—व्यवस्थापक-’अखण्ड-ज्योति’ मथुरा
अखण्ड-ज्योति के पाठकों को सूचना :-
ऐसे कुसमय में जब मैं बीमारी, गरीबी और लाचारी में बुरी तरह परेशान था ता. 8-8-51 की अखण्ड-ज्योति द्वारा प्रकाशित एक छोटी गायत्री सम्बन्धी पुस्तिका मिली। उसे पढ़ने से मुझे आशा की किरण दिखाई देने लगी। दूसरे दिन से ही विशेष मनोयोग पूर्वक गायत्री उपासना करने लगा
अखण्ड-ज्योति के आरम्भ से लेकर इस 50 तक के अंकों में से कुल 40 अंक बचे हैं। किसी भी वर्ष के पूरे अंक नहीं हैं। इन 40 अंकों का रिआयती मूल्य 5) और रजिस्ट्री पार्सल खर्च 1) होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-April
नवरात्रि की तपश्चर्या :- नवीन सम्वत्सर की इस नवरात्रि के अवसर पर अखण्ड-ज्योति की प्रेरणानुसार देश भर में गायत्री उपासना की तपश्चर्या बहुत ही संतोषजनक रीति से पूर्ण हुई। तप से अन्तःकरण के मल जलते हैं और आत्मबल बढ़ता है। असुरता घटती और देवत्व पनपता है
आज मनुष्य की व्यक्तिगत एवं सामूहिक समस्याएँ इतनी विपन्न एवं उलझी हुई हैं कि उनके समाधान के लिये तप के दिव्य अस्त्र की ओर ही ध्यान जाता है। अखण्ड-ज्योति परिवार सहस्राँशु ब्रह्मयज्ञ के उस महान् आयोजन में प्रवृत्त है जो इस युग के लिये अभूतपूर्व ही है। इस नवरात्रि की व्यापक उपासना से उसमें और भी चार चाँद लग जाते हैं। इस तप के ऐसे सूक्ष्म परिणाम होंगे जो इस महान् तपश्चर्या में प्रवृत्त तपस्वियों का ही नहीं, समस्त मनुष्य जाति का, समस्त संसार का कल्याण उपस्थित करेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-March
(21) “अखण्ड-ज्योति” में हर महीने गायत्री सम्बन्धी महत्वपूर्ण लेख और सूचनाएँ रहती हैं। माता का एक चित्र भी रहने लगा है। हर वर्ष गायत्री विशेषाँक निकलता है
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा
(20) साधारणतया, साधना सम्बन्धी चमत्कारी अनुभव गुप्त रखें जाते हैं परन्तु सार्वजनिक हित, नये पथिकों का पथ-प्रदर्शन एवं माता की महिमा पुण्य प्रसार होने की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में इस प्रकार के लेखों का प्रकाशन होने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। जैसे कुपात्रों के सन्मुख उन्हें गुप्त रखना आवश्यक है वैसे ही सत्पात्रों के सन्मुख उन्हें प्रकट करना भी आवश्यक है। इसलिए गायत्री साधना के उत्साहपूर्वक अनुभवों को छिपाने की अपेक्षा प्रकाशित करना ही श्रेयस्कर समझ कर विशेषाँक के लिए अनुभव माँगे जा रहे हैं
2॥) वार्षिक में उनके लिए यह अलभ्य वस्तु है। गायत्री प्रचार की दृष्टि से भी अखण्ड-ज्योति का प्रचार करना आवश्यक है। अ. भा. गायत्री संगठन में बँधे रहने के लिए तो यह एकमात्र संगठन सूत्र है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-January
इसका आरम्भ भी अखण्ड ज्योति पढ़ने की प्रक्रिया के साथ हो सकता है। जिनके पास धर्म प्रेरणा देने के लिए जाया जाय उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति पढ़ने देने और फिर एक दो दिन बाद वापिस लेने जाने के निमित्त को लेकर महीने में दो बार मिलने जाया जा सकता है और योजना में सन्निहित विषयों पर चर्चा की जा सकती है। उस प्रकार अपना समयदान, परिवार का शिक्षण और सत्प्रवृत्तियों को व्यापक बनाने की प्रक्रिया में इस छोटे-से अत्यन्त सरल कार्यक्रम के अनुसार लग सकता है
इसलिए अगले वर्ष युग निर्माण योजना के सक्रिय कार्यक्रम तो शायद ही कार्यान्वित हो सकें पर इस विचारधारा को अधिकाधिक व्यापक बनाने की प्रक्रिया आसानी से चलती रह सकती है। अखण्ड-ज्योति को पढ़ाने सुनाने की प्रक्रिया द्वारा हमारा कार्यक्षेत्र सहज ही अत्यन्त व्यापक बनाया जा सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-August
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के हम 30 हजार सदस्य आचार्य जी की प्रेरणा से आत्म निर्माण और समाज-निर्माण की पुण्य-प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिये कटिबद्ध हुये हैं। इस योजना को हमें दस-दस व्यक्तियों तक फैलाना है। इस प्रकार पहले ही प्रयास में हम 30 हजार से 3 लाख बनेंगे
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ की युग-निर्माण योजना द्वारा वैदिक परम्पराओं के अनुरूप भारतीय समाज का स्तर ऊँचा उठाने का जो प्रयास हो रहा है उससे हमारी बाह्य जीवन की समस्यायें तथा उलझने तो सुलझेगी ही, साथ ही सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाने में भी उससे भारी सहायता मिलेगी। सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण लाभ यही है। व्यक्ति का चरित्र ऊँचा उठे, आदर्शों के प्रति उसका अन्तःकरण निष्ठावान बने, धर्म और कर्तव्य को प्रधान मानकर चले तो फिर वे समस्याएँ जो पहाड़ सी विशाल और घटाओं सी भयंकर दीखती हैं बात ही बात में सरल हो सकती हैं
समाचारों का साराँश यह है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रायः प्रत्येक पाठक ने गुरुपूर्णिमा के दिन निश्चय किया है। इस परिवर्तन को ही हम युग-निर्माण की आधारशिला मानते है। हम बदलेंगे तो हमारी दुनिया भी बदलेगी यह निश्चित है
‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों में से प्रत्येक को अपने परिवार के निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिये परिवार-विद्यालय चलाने पर बहुत जोर दिया है। वास्तव में प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य का आरम्भ अपने घर से होना चाहिये। घर में शिक्षा का प्रसार करने के बाद स्वभावतः मनुष्य का उत्साह बढ़ेगा और वह उसके लिये समय तथा धन भी खर्च करने लगेगा
अज्ञातवास से लौटते ही हमने अपने मार्गदर्शक के आदेश से ‘युग-निर्माण-योजना’ को विचारधारा का परिचय देना आरम्भ कर दिया था। दो वर्ष तक सैद्धान्तिक प्रशिक्षण अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों द्वारा देकर अब गत गुरु पूर्णिमा (6 जुलाई) से उसे व्यवहारिक कार्यरूप में प्रस्तुत कर दिया गया है। उस पुनीत पर्व पर इसका उद्घाटन हो गया और योजना अब कार्यरूप में अग्रसर हो रही है
इस सुझाव का प्रायः सभी ने स्वागत किया है और तदनुसार प्रयत्न भी आरम्भ कर दिया है। जैसा कि आश्वासन मिला है यदि ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों की धर्मपत्नियाँ निष्ठापूर्वक गायत्री-उपासना में सम्मिलित हो सकीं तो इसमें सन्देह नहीं कि अगली पीढ़ी के लिए सहस्रों महापुरुष और महा नारियाँ भारतमाता का गौरव बढ़ाने वाले पैदा हो सकेंगे। पारिवारिक ज्ञान गोष्ठियाँ इस दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक हैं। इस सम्बन्ध में भी उत्साहवर्धक सूचनाएँ मिली हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-June
हम यही प्रयत्न करने चले हैं। इन पंक्तियों के माध्यम से, तथा अन्तरात्मा की प्रचंड आकाँक्षा द्वारा ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के प्रत्येक सदस्य के मन में यह भावनाएँ उत्पन्न हो रही हैं कि उसे उपासना, जीवन शोधन और सेवा कार्यों का भी उसी प्रकार ध्यान रखना चाहिए जैसे कि रोटी कमाने, वासनाओं को तृप्त करने तथा शरीर का पोषण करने का ध्यान रखा जाता है। यदि इस प्रयत्न में हमें सफलता मिलती है तो निश्चय ही तीस हजार व्यक्तियों का आज का ‘अखंड-ज्योति परिवार’ कल लाखों और परसों करोड़ों व्यक्तियों के जीवन में सत्प्रवृत्तियों का जागरण उत्पन्न करके स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण करेगा
‘अखण्ड-ज्योति’ इस प्रवृत्ति का मूल उद्गम होने से उसको अधिकाधिक लोगों में पढ़ाया या सुनाया जाना आवश्यक है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति एक सर्वप्रथम कार्य यह करे कि अपनी पत्रिका को अपने संबंधित समाज में लोक-प्रिय बनाने का प्रयत्न करे। जो लोग इसे पढ़ेंगे वे इन कार्यक्रमों से प्रभावित होंगे और उस मार्ग पर चलने का प्रयत्न करेंगे जिसके लिए कि प्रेरणा दी जा रही है
योजना का आरम्भ भारतवर्ष से और विशेषतया हम अपने से सम्बद्ध हिन्दू धर्म के प्रति निष्ठावान् अखण्ड-ज्योति परिवार से कर रहे हैं। इसलिए आरंभिक विचार भी इसी सीमित क्षेत्र के अनुरूप दिया जा रहा है, पर कुछ ही दिनों में इसके विश्वव्यापी क्षेत्र और समस्त भाषा, धर्म, देश और जातियों को दृष्टि में रखते हुए इसी व्यवस्था तन्त्र को विकसित करना पड़ेगा। समस्त मानव जाति को नीति, धर्म, सदाचार विवेक और कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित करने में साहित्य भी वहीं की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत करना पड़ेगा
इसलिये युग-निर्माण योजना का शुभारंभ-श्रीगणेश इसी शुभ मुहूर्त से किया जा रहा है। उस दिन अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को उपवास करना चाहिए। एकान्त सेवन और जितना संभव हो सके मौन रहना चाहिये वह हृदय मंथन का दिन होना चाहिये। “जीवन की इतनी अवधि अस्त-व्यस्त हो चली अब जो थोड़े दिन और शेष रहे हैं उनका सदुपयोग करने के लिये क्या कुछ किया जा सकता है?” यह प्रश्न अपने आपसे बराबर पूछना चाहिए
शने गत 24 वर्षों से जिन लोगों के साथ निरन्तरता ही व्यक्तिगत संपर्क रखा है—जिनके सुख-दुख में उसी प्रकार भाग लिया है जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपने अंश-वशं के लोगों के साथ लेता है— ही लोग “अखण्ड ज्योति “ के सदस्य हैं। अखण्ड-ज्योति” साधारण अखबारों की श्रेणी में नहीं आती। श्रेय पथ पर चलने वाले संस्कारवान् व्यक्तियों को सम्बन्ध-सूत्र में पिरोये रहने की यह एक सूत्र शृंखला है। इसके पृष्ठों को हम लोगों की अन्तरात्मा को एक दूसरे के निकट लाने और एक दूसरे की भावनाओं का आदान-प्रदान करने का एक विशिष्ट माध्यम ही माना जा सकता है
इस अभिरुचि एवं योग्यता के लोगों को ढूंढ़ना, उन्हें इकट्ठा करना और आवश्यक प्रशिक्षण देकर इस योग्य बनाना हमारा काम होगा कि वे कुछ ही दिनों में युग-निर्माता साहित्यकारों की एक भारी आवश्यकता की पूर्ति कर सकें। ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ में इस प्रतिभा के जो लोग होंगे उन्हें सर्वप्रथम तैयार करेंगे और उनको आवश्यक शिक्षा देने के लिए जल्दी ही शिविरों की शृंखला आरम्भ करेंगे
कोई भी उनमें से तटस्थ नहीं रहता। इसी प्रकार अखण्ड-ज्योति परिवार के द्वारा आरम्भ की जाने वाली युग-निर्माण योजना को एक अत्यन्त महत्वपूर्ण, अत्यन्त महान, कार्यक्रम उत्सव आयोजन माना जाना चाहिए और उसमें किसी न किसी प्रकार भाग लेने का प्रयत्न हम में से हर व्यक्ति को करना चाहिए
इसलिए उसका अभ्यास भी होना ही चाहिए। व्यक्तिगत वार्तालाप में और जन समूह के सामने भाषण देने में किन तथ्यों पर ध्यान रखना और किन बातों का अभ्यास करना आवश्यक है, इसका प्रशिक्षण अखण्ड-ज्योति सदस्यों को विधिवत् मिलना चाहिए। अन्यथा बौद्धिक क्रान्ति का यह विशाल अभियान किस प्रकार व्यापक बन सकेगा
असत् मार्ग छोड़ कर-असत् दृष्टिकोण का परित्याग कर यदि वह विवेक, सत्य, धर्म और कर्तव्य को अपना ले तो फिर इस धरती पर प्रत्यक्ष ही स्वर्ग अवतरित दिखाई देगा। इसी महा अभियान में संलग्न होने के लिए हम अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य का आह्वान करते हैं
कार्य का प्रारम्भ हम अपने आप से करते हैं। इन पंक्तियों का लेखक अपने व्यक्तिगत परिवार में ‘अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की गणना करता है। शने गत 24 वर्षों से जिन लोगों के साथ निरन्तरता ही व्यक्तिगत संपर्क रखा है—जिनके सुख-दुख में उसी प्रकार भाग लिया है जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपने अंश-वशं के लोगों के साथ लेता है— ही लोग “अखण्ड ज्योति “ के सदस्य हैं। अखण्ड-ज्योति” साधारण अखबारों की श्रेणी में नहीं आती

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-April
जिस प्रकार आध्यात्मवाद, साम्यवाद, भौतिकवाद आदि अनेक ‘वाद’ कोई संस्था नहीं वरन् विचार-धारा एवं प्रेरणा होती हैं, व्यक्ति या संगठन इन्हें अपने-अपने ढंग से कार्यान्वित करते हैं, इसी प्रकार युग-निर्माण कार्यक्रम एक प्रकाश-प्रवाह एवं प्रोत्साहन उत्पन्न करने वाला एक मार्गदर्शन बनकर विकसित होगा। आज “अखण्ड-ज्योति परिवार” उसकी प्रथम भूमिका सम्पादित करने का विनम्र प्रयत्न मात्र ही कर सकेगा। इतना कार्य कर सकने की क्षमता उसमें मौजूद है यह भली प्रकार सोच समझकर, नाप तोलकर ही कार्य आरम्भ किया गया है। ‘लोग हँसाई’ का हमें भी ध्यान है
इस कलंक से अपने घर के सभी सदस्यों को मुक्त कर लेना चाहिए। “अखण्ड-ज्योति” का एक भी सदस्य ऐसा न हो जिसकी स्त्री बिना पढ़ी रह जाय। घूँघट और संकोच की मूर्खता को इस पुनीत कार्य में जरा भी आड़े नहीं आने देना चाहिए। घर के बड़े-बूढ़ों को इस कार्य में अपनी सहमति देने के लिए रजामंद करना चाहिए
हमारी आकाँक्षा इसी प्रकार पूर्ण हो सकती है युग-निर्माण की प्रयोग प्रक्रिया इसी तरह कार्यान्वित हो सकती है कि परिवार के सभी स्वजन “अखण्ड-ज्योति” को अपनी सत्परामर्शदात्री युग-प्रेरणा अनुभव करते हुए उसे ध्यानपूर्वक सुनें—समझें। हम सम्पादक, साहित्यकार या आचार्यजी बनकर नहीं रहना चाहते। हमारा स्थान अपने परिवार में वही होना चाहिये जो उसी घर से रक्त संबंधित अभिभावकों का होता है
अपनी परिस्थिति, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों के लोग अपने-अपने ढंग से उसे कार्यान्वित करेंगे। इसका आरम्भ मात्र “अखण्ड-ज्योति परिवार” द्वारा हो रहा है। यह आरम्भ कितना ही छोटा क्यों न हो उसका उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। अपने इस छोटे क्षेत्र में ही यह प्रयोग आरम्भ कर रहे हैं, ताकि इसका अनुकरण बड़े विशाल क्षेत्र में हो सके
“अखण्ड ज्योति परिवार” के प्रत्येक सदस्य को हम उस दृष्टि से देखते हैं जैसे कि कोई वयोवृद्ध व्यक्ति अपने निज के कुटुम्ब परिवार को देखता है। जिस प्रकार हम में से हर एक को अपना-अपना परिवार सुविकसित करना है, उसी प्रकार हम भी “अखण्ड-ज्योति परिवार” के सदस्यों को अपना निजी कुटुम्ब मानकर उसे ऐसा सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाना चाहते हैं जिसे देखकर दूसरों को भी उसी ढाँचे में ढलने की प्रेरणा मिले। पर हमारे यह प्रयत्न सफल तभी हो सकते हैं जब प्रत्येक परिजन हमें भी वैसी-ही आत्मीयता की दृष्टि से देखे और जो कहा या लिखा जा रहा है उसे भावनापूर्वक सुने समझे। उपेक्षित बूढ़े लोग जिस प्रकार अपनी बेकार बकझक करते रहते हैं और घर के लोग उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते यदि वही स्थिति अपनी भी रही तो वह स्वप्न साकार न हो सकेंगे, जिन्हें देखने के लिये ही जीवित रहने की हमारी इच्छा शेष है
‘एक से दस’ योजना के अंतर्गत प्रत्येक परिजन को यह काम सौंप दिया गया है कि वह मछली पकड़ने के लिए काम में आने वाली आटे की गोली की तरह ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका को माध्यम बनाकर सुसंस्कारी लोगों की तलाश करे और जहाँ जितने व्यक्ति इस प्रकार के मिल जावें वहाँ उन्हें प्रोत्साहित करने के लिये उनके घरों पर जाकर मिलने की ‘धर्म फेरी’ प्रक्रिया और उन्हें इकट्ठे करके समय-समय पर ‘विचार गोष्ठी’ चलाने की प्रक्रियाओं द्वारा यह प्रयत्न करते रहें कि उनके सुसंस्कारों का अभिवर्धन और परिपाक नियमित रूप से होता रहे। केवल स्वाध्याय ही पर्याप्त नहीं, उसके साथ-साथ जीवित प्रेरणा जुड़ी रहे तो ही सोने-सुगन्धि का योग बनता है। ‘अखण्ड-ज्योति’ जिस विचारधारा को प्रस्तुत करती है उसकी सजीव प्रेरणा, पाठकों को देना अपने प्रबुद्ध परिजनों का काम है
“अखण्ड-ज्योति” के लेखों को पढ़कर सब लोगों को सुनाना, परिवार-निर्माण की दृष्टि से बहुत उपयोगी हो सकता है। उस उद्देश्य के लिए जो कुछ कहना समझाना आवश्यक है वह सब कुछ अब इस पत्रिका के पृष्ठों पर रहा करेगा, युग-निर्माण के संदेशवाहक के रूप में यदि इन लेखों को सुनाया जायगा तो सुनाने वाले को उपदेशक बनने का व्यय भी न सहना पड़ेगा और अभीष्ट उद्देश्य भी पूरा होता रहेगा
केवल स्वाध्याय ही पर्याप्त नहीं, उसके साथ-साथ जीवित प्रेरणा जुड़ी रहे तो ही सोने-सुगन्धि का योग बनता है। ‘अखण्ड-ज्योति’ जिस विचारधारा को प्रस्तुत करती है उसकी सजीव प्रेरणा, पाठकों को देना अपने प्रबुद्ध परिजनों का काम है। अपने को, अपने परिवार को और अपने प्रभाव क्षेत्र को आवश्यक प्रकाश देने की क्षमता हममें से प्रत्येक में मौजूद है, अब समय है कि उसका उचित उपयोग आरम्भ कर दिया जाय
हम “अखण्ड-ज्योति” के सदस्य इस गतिविधि को सच्चे मन से अपनावेंगे तो अपना परिवार दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा। सज्जनों का समुदाय बढ़ना उनका अल्पमत में न रह कर बहुमत तक पहुँच जाना इस बात का परिपुष्ट प्रमाण होगा कि युग परिवर्तन की पुण्य प्रक्रिया सफलता के बिल्कुल समीप जा पहुँची है। इस प्रजातंत्र के युग में जिसे वोट अधिक मिल जाते हैं वही दल या व्यक्ति राज्य शासन संभालता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-September
‘युग निर्माण योजना’ के अंतर्गत बताये गये 180 कार्यक्रमों को अखण्ड-ज्योति के हजारों पाठकों ने उत्साह-वर्धक तत्परता के साथ कार्यान्वित करना आरम्भ कर दिया है। उनके सब समाचारों को छापा जा सकना संभव नहीं। पर उस स्तंभ के अंतर्गत कुछ प्रेरणाप्रद विचार एवं दूसरों के लिए मार्ग-दर्शन सिद्ध होने वाले पत्र नियमित रूप से दिये जाते रहें ऐसी व्यवस्था की गई है
गत दो वर्षों से अखण्ड-ज्योति के अक्टूबर अंक में एक वर्ष का पंचकोशी गायत्री उपासना क्रम प्रकाशित किया जा रहा है। दस वर्ष में यह पाठ्यक्रम पूरा किया जाना है। दो वर्ष बीत गये
(गायत्री महाविद्या की सामान्य जानकारी तथा उपासना विधि अब तक अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित होती रही है। इस मांग पर श्रद्धा रखने वाले जिज्ञासुओं को अधिक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण देने के लिए उच्चस्तरीय गायत्री साधना का उल्लेख इस स्तंभ के अंतर्गत भविष्य में नियमित रूप से किया जाता रहेगा। )
जून अंक ने मुझे बहुत प्रकाश दिया है। अपनी परिस्थितियों के अनुसार मैं अब अपना अधिकाधिक समय इस कार्य में लगाऊँगा कि ‘अखण्ड-ज्योति’ में प्रकाशित विचारधारा को गुजराती-भाषी जनता के लिए सुलभ बनाऊँ। आचार्य जी जो कुछ लिखते हैं वह हिन्दी में होता है। हिन्दी राष्ट्र भाषा तो है पर प्रान्तों में वहाँ की क्षेत्रीय भाषाएँ ही अधिक प्रचलित हैं और अधिक सुबोध एवं लोकप्रिय हैं
हम लोगों ने पुराने गायत्री उपासकों तथा ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों के घरों पर जा-जाकर, घूम कर अध्यात्म यज्ञ में भाग लेने की प्रेरणा दी है। मंत्र लेखन चालू हो गया है। जब यह कार्य पूरा हो जायेगा तब अन्त में सामूहिक गायत्री यज्ञ रखा जायगा, जिसमें मंत्र लेखन करने वाले व्यक्ति ही आहुतियाँ देंगे
शिक्षार्थियों को नित्य एक लेख अखण्ड-ज्योति का पढ़ कर सुनाया जाता है और फिर कुछ देर उस लेख की विवेचना की जाती है। इस प्रकार शिक्षा और दीक्षा के दोनों कार्यक्रम साथ-साथ चल रहे हैं। यह छोटा प्रयत्न देखने में साधारण-सा भले प्रतीत होता है पर युग-निर्माण योजना की पूर्ति में इस से सहायता मिलेगी इसका मुझे काफी संतोष है
पड़ौस में एक मास्टर साहब रहते हैं उनके अखण्ड-ज्योति आती थी। उनसे माँगकर मौसी पढ़ने लाया करती थी और उसके लेख मुझे सुनाया करती थीं। कुछ ही दिन के बाद में मुझे वे लेख बहुत रुचिकर लगने लगे और अपने पैसे भेज कर मंगाना शुरू कर दी
अपने निजी परिवार के अतिरिक्त स्वजन-सम्बन्धी, मित्र, परिचित एवं दूर भी रहने वाले सुहृदय सज्जनों को मौखिक रूप से अथवा पत्र-व्यवहार से प्रगतिशील जीवन बनाने का आवश्यक प्रेरणा देते रहना चाहिए। जिन लोगों से परिचय है उन्हें अपने घरेलू गायत्री ज्ञान मन्दिर, पुस्तकें तथा “अखण्ड-ज्योति” पढ़ने के लिए देते रहना चाहिए। पुस्तकें देने और फिर वापिस लेने के बहाने धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों के घर जाना और उनके साथ धर्म-चर्चा का अवसर निकालते रहना, ज्ञान विस्तार का एक श्रेष्ठ तरीका है। शिक्षा प्रसार के लिये स्कूल मौजूद हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-April
अखण्ड-ज्योति द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तक

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-December
इससे (1) ग्राहकों को आत्मकल्याण का, सुख-शाँति का मार्ग मिलता है। (2) अखण्ड-ज्योति की शक्ति बढ़ने से वह लोग सेवा के कार्यों को अधिक मात्रा में, अधिक शीघ्रता से, अधिक सफलता के साथ, पूरा करती है। इस प्रकार अखण्ड-ज्योति के ग्राहक बढ़ाना एक स्वल्प श्रम का महान पुण्य कार्य है। इस दशा में शक्ति भर प्रयत्न करने के लिये हम अपने ग्राहकों से विशेष रूप से अनुरोध करते हैं
(2) अखण्ड-ज्योति की शक्ति बढ़ने से वह लोग सेवा के कार्यों को अधिक मात्रा में, अधिक शीघ्रता से, अधिक सफलता के साथ, पूरा करती है। इस प्रकार अखण्ड-ज्योति के ग्राहक बढ़ाना एक स्वल्प श्रम का महान पुण्य कार्य है। इस दशा में शक्ति भर प्रयत्न करने के लिये हम अपने ग्राहकों से विशेष रूप से अनुरोध करते हैं
(7) अखण्ड-ज्योति के ग्राहक बढ़ाना एक प्रकार से सतोगुणी फल उत्पन्न करने वाले वृक्ष लगाना है। इससे (1) ग्राहकों को आत्मकल्याण का, सुख-शाँति का मार्ग मिलता है। (2) अखण्ड-ज्योति की शक्ति बढ़ने से वह लोग सेवा के कार्यों को अधिक मात्रा में, अधिक शीघ्रता से, अधिक सफलता के साथ, पूरा करती है
‘हिन्दू धर्म की वैज्ञानिकता’ पर भी एक बड़ी ही खोजपूर्ण लेख माला चलेगी। इस प्रकार अखण्ड-ज्योति, पाठकों की ज्ञान वृद्धि में महत्वपूर्ण अभिवृद्धि करेगी। ढाई रुपया जैसी तुच्छ चीज के लिये पाठकों को इस अमूल्य लाभ से वंचित न रहना चाहिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-April
1 - अप्रैल मास में अखण्ड-ज्योति प्रेस के सभी कार्यकर्ता गायत्री महायज्ञ की व्यवस्था में व्यस्त रहेंगे, इसलिए अखण्ड-ज्योति का अगला अंक 1 मई को न निकल कर 15 मई का निकलेगा। पूर्णाहुति के विस्तृत समाचार एवं चित्र भी उसमें रहेंगे
19—जो सज्जन इस पूर्णाहुति उत्सव में नहीं आ सकेंगे, उनको भी समुचित जानकारी मिल सके इस दृष्टि से 1 मई की जगह 15 मई को निकलने वाली अखण्ड-ज्योति का पाँचवाँ दिन के कार्यक्रम का विवरण आगामी योजनाओं का कार्यक्रम तथा विभिन्न घटनाओं के अनेकों चित्र छपेंगे। सिनेमा में दिखाई जा सकने वाली फिल्म भी इस अवसर पर तैयार की जायगी, जिसमें चिरकाल तक इन पुनीत दृश्यों को देख सकने का आनन्द लिया जा सके

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-February
हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति और गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपना कुछ काम बाँट दें और उनके जिम्मे भी कुछ जिम्मेदारी सौंपे। हमारा एक भी परिजन ऐसा न होना चाहिए जो इस आड़े वक्त में ‘फुरसत न होने’ आदि का बहाना करके हाथ बँटाने से जी चुराये। इस परीक्षा के समय में हममें से हर एक को कुछ करने के लिए अपनी शक्ति और भावना का एक अंश देना ही चाहिए
स्वयं अपनी उपासना में वृद्धि, दुर्बल संरक्षण बढ़ाने के लिए अधिक गायत्री उपासकों की वृद्धि, मन्त्र-लेखन, गायत्री पुस्तकालयों की स्थापना, आत्मदान की तैयारी, कुछ दिन पहले मथुरा आने का प्रयत्न,आर्थिक सहयोग, अखण्ड-ज्योति के सदस्य बढ़ाना, आवश्यक परामर्श देते रहना, आदि अनेक कार्य ऐसे हैं, जिनमें हाथ बँटाने के लिए कदम बढ़ाया जा सकता है, पर आज जो काम ‘ड्यूटी’ के रूप में सौंप रहे हैं, वह सन्देशवाहक का कार्य है। इस मास हम अपने प्रत्येक प्रेमी के नाम पर ध्यान रखेंगे कि किसने हाथ बँटाया, कौन चुप बैठा रहा, हमें आप सभी से इस सम्बन्ध में सहयोग की आशा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-October
शिक्षार्थी भी ऐसे चाहिए जो व्यक्तिगत आजीविका की दृष्टि से ही नहीं मुख्यतः लोक सेवा की दृष्टि से यह सब सीखें। ऐसी अभिरुचि एवं परिस्थिति के व्यक्तियों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर तपोभूमि में इस शिक्षा के लिए भिजवाना अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों का कर्तव्य है। यह विद्यालय धर्म प्रचारक उत्पन्न करने की दृष्टि से ही आरंभ किया गया है। वैसी रुचि और स्थिति के छात्र न मिलें, व्यक्तिगत लाभ एवं योग्यता बढ़ाने के लिए ही लोग सीखें तो इससे तपोभूमि के उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-December
अख्तियारपुर (बुलन्दशहर), में नौ दिन तक अखण्ड-ज्योति, अखण्ड जलधार, अखण्ड जप सहित गायत्री यज्ञ के साथ, विष्णु, लक्ष्मी, गणपति, सरस्वती एवं नवग्रह यज्ञ सोत्साह सम्पन्न हुए। पूर्णाहुति के उपरान्त ब्रह्म एवं कुमारिका भोज, एवं ग्राम के उपस्थित सभी शिशुओं को भोजन कराया गया। फिर गायत्री साहित्य वितरण कर हजारों के जन समूह में साँस्कृतिक उत्थान पर विद्वान् एवं उपासकों के संभाषण हुए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-January
कभी अखण्ड-ज्योति एक प्रकाशन था-फिर एक मिशन बना, अब वह युगान्तर की अभिनव भूमिका का निर्वाह करने में संलग्न एक सुगठित परिवार है। अब हमें अखण्ड-ज्योति शब्द का प्रयोग युग सैनिक के संघबद्ध सैन्य दल के रूप में ही करना चाहिए। हमारी यात्रा तब तक अनवरत गति से चलती ही रहेगी जब तक मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता
इसे अन्न-जल जुटाने से भी अधिक आवश्यक माना जा सकता है। अखण्ड-ज्योति ने अपने अद्यावधि जीवन काल में ऐसे आलोक का निर्माण किया है जिसके सहारे जन मानस को ऊँचा उठने और बढ़ने की प्रेरणा मिले। सही दिशा में-पूरी कर्तव्य निष्ठा और अनवरत श्रम करने वालों को जो सन्तोष एवं गर्व होना चाहिए, वह अखण्ड-ज्योति को भी है
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को अपने घर की एक महिला इस प्रशिक्षण के लिए भेजनी चाहिए ताकि वे उनके कन्धे से कन्धा मिला कर नव-निर्माण में योगदान दे सकें और महिला जागरण की मुहीम सँभाल सकें। अपने घर-परिवार का सुनियोजित पुनर्निर्माण करने की योग्यता के सम्पादन का प्रथम और प्रत्यक्ष लाभ तो है ही। बच्चों समेत या बीमार महिलाओं को प्रवेश नहीं मिलता
इस कर्म क्षेत्र में उतरने के लिए किसी को साहस नहीं हो रहा था। प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार ने उस महती आवश्यकता को पूरा करने में एक अनोखी भूमिका निबाही। नव युग के अवतरण में संलग्न कर्मवीर युग सैनिकों की एक सुदृढ़ सेना खड़ी करदी। उसके क्रिया-कलापों ने समूचे देश को, जन-मानस को जिस तत्परता के साथ झकझोरा अपने उस परिवार पर अखण्ड-ज्योति को सन्तोष एवं गर्व अनुभव करने का पूरा अधिकार है
अखण्ड-ज्योति इस अंक के साथ अपने जीवन के 37 वर्ष समाप्त करके 38वें वर्ष में प्रवेश करती है। अपने इस छोटे से जीवन काल पर उसे गर्व है। मनुष्य शरीर के लिए जिस प्रकार अन्न-जल की आवश्यकता है उसी प्रकार मानवी चेतना को सजीव रखने के लिए उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य के लिए सक्षम बनाने वाले तत्व चिन्तन की आवश्यकता है
अखण्ड-ज्योति मिशन का जन्म दिन बसन्त पंचमी है। यह अपने परिवार का सबसे बड़ा प्रेरक पर्व है। एक-एक करके अनेकों महत्वपूर्ण कदम इसी शुभ दिन से आरम्भ करते रहे हैं
नव युग के अवतरण में संलग्न कर्मवीर युग सैनिकों की एक सुदृढ़ सेना खड़ी करदी। उसके क्रिया-कलापों ने समूचे देश को, जन-मानस को जिस तत्परता के साथ झकझोरा अपने उस परिवार पर अखण्ड-ज्योति को सन्तोष एवं गर्व अनुभव करने का पूरा अधिकार है
अखण्ड-ज्योति वाचन-विनोद की सामग्री जुटाने वाला छपे कागजों का पुलिंदा नहीं रही। उसने जन जीवन में प्राण फूँकने की आवश्यकता पूरी करने के लिए ही अपने समस्त प्रयासों को जुटाये रखा है। उसका परिणाम सामने है
इस बसन्त पर्व से एक कार्य और हाथ में लिया जाना चाहिए कि प्रत्येक अखण्ड-ज्योति सदस्य अपनी पत्रिका को कम से कम दस व्यक्तियों को पढ़ाया करे। “एक से दस” के रूप में विकसित होने का यह सहज किन्तु सर्वोत्तम तरीका है। अपने परिवार, संपर्क एवं प्रभाव क्षेत्र में जिन्हें भी विचारशील समझा जाय उनके पास पत्रिका पहुँचाने और वापिस लाने का क्रम चलना ही चाहिए
इन छोटे कामों के लिए किसी को किराया-भाड़ा और समय खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। इन प्रशिक्षण सत्रों में केवल उन्हीं को आमंत्रित किया गया है जो लगातार अखण्ड-ज्योति पढ़ते रहे हैं और हमारे मन्तव्यों को गहराई तक समझ चुके हैं। अशिक्षित, अपरिचित लोग पर्यटन और प्रशिक्षण की एक म्यान में दो तलवारें ठूँसते हैं तो वे दुहरा लाभ उठाने की अपेक्षा दोनों ही आनन्द खो बैठते हैं। स्त्री, बच्चे, मित्र, पड़ोसी, सम्बन्धी लेकर इन अति महत्वपूर्ण सत्रों में चल पड़ना अवाँछनीय भावुकता है, इससे सत्रों का स्तर गिरता है और हमारी शिक्षण योजना का उपहास बनता है
इसलिए कूच को पूरे उत्साह के साथ जारी रखना है। कभी अखण्ड-ज्योति एक प्रकाशन था-फिर एक मिशन बना, अब वह युगान्तर की अभिनव भूमिका का निर्वाह करने में संलग्न एक सुगठित परिवार है। अब हमें अखण्ड-ज्योति शब्द का प्रयोग युग सैनिक के संघबद्ध सैन्य दल के रूप में ही करना चाहिए। हमारी यात्रा तब तक अनवरत गति से चलती ही रहेगी जब तक मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता
अपने परिवार, संपर्क एवं प्रभाव क्षेत्र में जिन्हें भी विचारशील समझा जाय उनके पास पत्रिका पहुँचाने और वापिस लाने का क्रम चलना ही चाहिए। थोड़ी व्यवहार कुशलता का परिचय दिया जाय तो हर अखण्ड-ज्योति सदस्य के पीछे दस अनुपाठक हो सकते हैं और आज यदि उसके पाठक एक लाख हो तो अगले महीने से ही उनकी संख्या बढ़कर दस लाख हो सकती है। देखने में छोटा किन्तु व्यवहार में यह अत्यधिक प्रभावी प्रयास है। इस बसन्त पर्व पर ग्राहक बढ़ाने के प्रयास के साथ-साथ प्रत्येक सदस्य को दस अनुपाठक बनाने का भी संकल्प लेकर चलना चाहिए
अखण्ड-ज्योति ने अपने अद्यावधि जीवन काल में ऐसे आलोक का निर्माण किया है जिसके सहारे जन मानस को ऊँचा उठने और बढ़ने की प्रेरणा मिले। सही दिशा में-पूरी कर्तव्य निष्ठा और अनवरत श्रम करने वालों को जो सन्तोष एवं गर्व होना चाहिए, वह अखण्ड-ज्योति को भी है
अखण्ड-ज्योति का कार्य यों लेखन और प्रकाशन के माध्यम से आरम्भ हुआ पर उतने तक सीमित नहीं रहा। पाठकों ने प्रेरणा ग्रहण की-वे बदलें-और दूसरों को बदलने वाले प्रचारात्मक और संघर्षात्मक शत सूत्री कार्यक्रमों में संलग्न हो गये। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण का सुविस्तृत सेवा क्षेत्र सामने पड़ा है
अपने परिवार ने बसन्त पर्व को अपना सबसे बड़ा भाव-त्यौहार माना है। इस मान्यता में शिथिलता न आने पावे इसलिए अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को इस दिशा में कुछ तैयारी अभी से आरम्भ कर देनी चाहिए। विचारशीलों को इस आयोजन में सम्मिलित करने और मिशन के उद्देश्यों, कार्यक्रमों और अब तक जो हो चुका है, आगे जो होने वाला है उसकी रूप-रेखा से सर्व साधारण को परिचित कराया जाना चाहिए। इसके लिए बसन्त पर्व का अवसर तो अनिवार्य रूप से प्रयुक्त होना चाहिए
इन सत्रों में प्रवेश पाने के लिये अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी प्रबुद्ध नर-नारियों को आग्रह पूर्वक आमन्त्रित किया जा रहा है। जिनकी स्थिति इनमें सम्मिलित होने की है उन्हें (1) अपना पूरा नाम (2) पूरा पता (3) शिक्षा (4) जन्मतिथि (5) व्यवसाय (6) शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक होने का आश्वासन (7) शिक्षा काल में निर्व्यसन, अनुशासन प्रिय एवं सज्जनोचित शील, सदाचार बरतने की घोषणा (8) जिस महीने के जिस सत्र में सम्मिलित होना हो उसका उल्लेख (9) अखण्ड-ज्योति के नियमित पाठक कब से रहे हैं इसकी जानकारी (10)जीवन के महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय घटनाक्रमों का विवरण इन दस बातों की पूरी जानकारी समेत आवेदन पत्र भेजना चाहिये और स्वीकृति प्राप्त होने के पश्चात ही आने की तैयारी करनी चाहिये
यह तथ्य कभी भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि अभिनव चेतना के प्राण फूँकने में अखण्ड-ज्योति ने मिशन के मेरुदण्ड की भूमिका निबाही है। आगे भी उसके माध्यम से बहुत कुछ होना है। उसके पाठक कुछ ही दिन में आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण की भूमिका निबाहने लगते हैं
नवम्बर 74 की अखण्ड-ज्योति में शान्ति-कुंज में इन दिनों चल रहे शिक्षण सत्रों का विस्तृत विवरण छपा है। उस अंक को परिजन अपने लिये व्यक्तिगत निमन्त्रण समझें और देखें कि वे अपने लिए किस सत्र को अधिक उपयोगी समझते हैं और कब पहुँचने की अनुकूलता अनुभव करते हैं। जिन्हें जो अनुकूल प्रतीत हो उसमें आने की तैयारी करनी चाहिए
यों प्रत्यक्षतः प्रवचन सुनने और अमुक साधन करने भर की बात प्रतीत होती है, पर परोक्ष रूप से देखा जा सकता है कि उसमें अदृश्य किन्तु अति महत्वपूर्ण आदान-प्रदान की विशिष्टता जुड़ी हुई है। साधनाएँ तो घर पर भी की जा सकती हैं, प्रवचन अखण्ड-ज्योति में छापे जा सकते हैं। वैसे जो कहा बताया जा चुका है, उसके अतिरिक्त कोई नई बात है भी नहीं, पर जिस उद्देश्य के लिए शान्ति-कुंज ने परिजनों को आमन्त्रित किया है उसमें विशिष्ठ एक सूक्ष्म आदान-प्रदान की बात मुख्य है जिसके लिए सान्निध्य आवश्यक हो जाता है। गर्मी पाने के लिए आग के समीप बैठना पड़ता है
हमारी इच्छा यह है कि अखण्ड-ज्योति के सभी भावनाशील सदस्यों को अगले दिनों हमारे व्यक्तिगत संपर्क सान्निध्य में रहकर कुछ सीखने और सिखाने का आदान-प्रदान चलता चाहिए। शान्ति-कुंज में हमें कितने दिन रहना पड़ेगा और बिस्तर कभी भी खाली करना पड़ सकता है, ऐसी दशा में फिर कभी की प्रतीक्षा न करके ‘कल नहीं आज’ की नीति अपनाई जानी चाहिए और स्वजनों को कुछ समय हमारे पास रहने की तैयारी करनी चाहिए। यों प्रत्यक्षतः प्रवचन सुनने और अमुक साधन करने भर की बात प्रतीत होती है, पर परोक्ष रूप से देखा जा सकता है कि उसमें अदृश्य किन्तु अति महत्वपूर्ण आदान-प्रदान की विशिष्टता जुड़ी हुई है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-June
जहाँ युग-निर्माण शाखाओं का नवीनीकरण करना है वहाँ समानान्तर महिला शाखाएँ भी स्थापित करनी है। इसके लिए क्या करना चाहिए इसका विस्तारपूर्वक वर्णन मार्च, अप्रैल और मई की अखण्ड-ज्योति में किया जा चुका है। संगठन टोलियाँ यह मानकर कर चलें कि जहाँ अखण्ड-ज्योति परिजनों का एक सुनियोजित संगठन खड़ा करना है वहाँ महिला शाखाओं की स्थापना भी उतनी ही आवश्यक है
यह क्रम तो लाखों वर्षों से चला आ रहा है और आगे भी उसी कुचक्र में घूमते हुए लाखों वर्ष सहज ही बिताने को मिल सकते हैं। हम अखण्ड-ज्योति के परिजन यदि एक जन्म युग संकट से जूझने में लगादें और उसमें व्यक्तिगत स्वार्थ साधनों में निरत रहने की बात कुछ समय के लिए पीछे छोड़ दें तो भी कोई बहुत बड़े घाटे की बात नहीं हैं। इन दिनों हम पीड़ित मानवता ने अपने परित्राण की आशा से पुकारा है और आँसू भरे नेत्रों से निहारा है। इसे विमुख इसलिए न किया जाय
अपने संगठन में सम्मिलित होने वालों के लिए प्रथम शर्त यही है कि वे लगातार-नियमित रूप से अपनी विचारधारा को रुचिपूर्वक पढ़ते हों। इस कसौटी पर केवल वे ही लोग खरे उतरते हैं जो अखण्ड-ज्योति के नियमित पाठक हैं। अपना संगठन अभी इन्हीं लोगों तक सीमित रखा जाना चाहिए। इसके लिए यह किया जाय कि जहाँ भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वहाँ के दो-तीन परिजनों की एक टोली आगे कदम बढ़ाये और अन्य सदस्यों के घरों पर मिलने जाकर संगठन का सदस्य बनने का अनुरोध करें
सप्ताह का एक दिन इसके लिए नियत जाय और उपरोक्त 35 दिनों में जो 5 सप्ताह पड़ते हैं उनमें 5 विचार गोष्ठियों के लिए 5 सदस्यों के स्थान निर्धारित कर लिये जायं। जो संगठनकर्ती टोली आगे कदम बढ़ाती हुई उभरी है उसका काम है कि जिनके पास भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है उनके घर कई बार चक्कर लगायें और उनसे बार-बार अनुरोधपूर्वक संगठन के अंग बनने का आग्रह करो कम से कम इन पाँच सप्ताहों में पाँच दिन पाँच स्थानों पर जो विचारगोष्ठी नियत की जाय उसमें सम्मिलित होने के लिए तो रजामन्द कर ही लें। इतना काम जो टोली पूरा कर लेगी उससे यह आशा की जायगी कि अपने क्षेत्र में व्यापक प्रकाश उत्पन्न करना और समर्थ संगठन खड़ा करना उसे के लिए आवश्यक ही सम्भव हो जायेगा। इन
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी विशिष्ट स्थिति का मूल्याँकन करना चाहिए और अपने को विशेष उद्देश्य को लेकर अवतरित हुआ मानना चाहिए। वह अपने को जागरुक रखें और मूर्च्छा में पड़े हुए अथवा दिवा स्वप्न देखने वाले मूढ़ मति लोगों को जगाने की जिम्मेदारी संभाले। आँधी में उड़ते फिरने वाले पत्तों की तरह उसे निष्प्रयोजन इधर उधर उड़ते फिरना नहीं हैं, वरन् समुद्र में खड़े हुए प्रकाश स्तंभों के समतुल्य बनना है जो घोर अन्धकार में स्वयं चमकते रहते हैं और अपने प्रकाश से उधर से निकलने वाले जहाजों को डूबने से बचाते हैं
इसके लिए क्या करना चाहिए इसका विस्तारपूर्वक वर्णन मार्च, अप्रैल और मई की अखण्ड-ज्योति में किया जा चुका है। संगठन टोलियाँ यह मानकर कर चलें कि जहाँ अखण्ड-ज्योति परिजनों का एक सुनियोजित संगठन खड़ा करना है वहाँ महिला शाखाओं की स्थापना भी उतनी ही आवश्यक है
हमें इस समय दान को ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट पूजा के रूप में नियोजित करना चाहिए। यही न्यूनतम अनुदान है जिसकी आशा अखण्ड-ज्योति परिवार के प्राणप्रिय परिजनों से हम बहुत ही आशा भरे नेत्रों से कर रहे हैं
अपना संगठन अभी इन्हीं लोगों तक सीमित रखा जाना चाहिए। इसके लिए यह किया जाय कि जहाँ भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वहाँ के दो-तीन परिजनों की एक टोली आगे कदम बढ़ाये और अन्य सदस्यों के घरों पर मिलने जाकर संगठन का सदस्य बनने का अनुरोध करें। आशा की जानी चाहिए कि उनमें से अधिकाँश लोग उसे स्वीकार कर लेंगे। जो स्वीकार करें उनसे वही एक घण्टा समय देने का प्रस्ताव करना चाहिए
समय की इस विषम वेला में जागरुक आत्माओं का विशेष कर्तव्य है। अखण्ड-ज्योति परिवार को इस आपत्ति काल में अपनी विशेष भूमिका निभानी है। उसे सामान्य नर कीटकों की तरह पेट प्रजनन के लिए नहीं जीना है। अपनी प्रतिभा को उसी कीचड़ में नहीं सड़ाना है जिसमें कि सर्वनाश के गर्त में गिरने वाली अन्धी भेड़े दौड़ती हुई चली जा रही है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-October
अगल वर्ष के लिए हम लाग अपने सेवा कार्यों में महिला जागरण और जन-सम्पर्क कार्यक्रमों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करे। इन प्रयोजनों में अपना योगदान देकर यह सिद्ध करें कि अखण्ड-ज्योति के पाठक मात्र अध्ययन में रुचि रखने वाले ही नहीं वरन् अपने समय की सबसे बड़ी आवश्यकता- व्यक्तित्वों को परिष्कृत करने और सृजनात्मक प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में भी दत्तचित्त रहने वाले लोकसेवियों की पंक्ति में भी खड़े हैं। अगले वर्ष के दो कार्यक्रम इस प्रकार हैं-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-December
आत्मा को अखण्ड-ज्योति का दिव्य-दर्शन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के क्षेत्र से आगे बढ़ाकर व्यवहार के कार्यक्षेत्र में उतारा जा सकता है। इस अनोखेपन का अभिनव प्रयोग करने का दुस्साहस किया गया और वह सफल होकर रहा-यही है एक शब्द में कहा जा सकने योग्य अखण्ड-ज्योति का इतिहास। युगान्तरीय चेतना की गंगोत्री उसे माना जा सकता है उसका साधना क्षेत्र युग निर्माण योजना के रूप में आज अति विस्तृत क्षेत्र में लहलहाता हुआ देखा जा सकता है। जन-मानस के सर्वतोमुखी भावनात्मक नव निर्माण का लक्ष्य आधी दूर है पर उस दिशा में जिस उत्साह के साथ चरण बढ़ रहे हैं, उन्हें देखते हुए किसी समय जो असंभव समझा जाता था, वह अब सम्भव प्रतीत होने लगा है
पुराने ग्राहकों से चन्दा वसूल करते और प्रभाव क्षेत्र में घूम−फिर कर नये पाठक बनाते हैं। चिरकाल से यही क्रम चला आ रहा है और इसी प्रयास से अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या क्रमशः बढ़ती आई है। इस प्रयत्न के लिए यदि दूना उत्साह बढ़ा दिया जाय, और जन संपर्क के लिए अधिक समय निकाला जाय, टोलियों में अधिक प्रभावशाली लोग लिए जायं तो कोई कारण नहीं कि पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष असाधारण रूप से पाठकों की संख्या वृद्धि न हो सके
सर्वविदित है कि अब से 38 वर्ष पूर्व ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका का प्रकाशन ठीक बसन्त पर्व के दिन ही प्रारम्भ हुआ था। यों देखने में वह भी एक साहित्यिक प्रयास जैसा लगता है, पर जिन्होंने उसे निकट से देखा है ये जानते हैं कि यह एक प्रकाश पुंज है। जिसने एक दीपक से असंख्य दीपक जलने वाले काव्यालंकार को प्रत्यक्ष कर दिखाया है
जनवरी 76 का अखण्ड-ज्योति अंक उन साधनाओं का विज्ञान तथा स्वरूप समझाने वाला होगा जो सही रीति से अपनाये जाने पर व्यक्तित्व को सामान्य से असामान्य बना सकने में पूरी तरह समर्थ है। अखण्ड-ज्योति पाठकों में से जो इन्हें करना चाहेंगे उन्हें विशेष रूप से मार्ग दर्शन एवं सहयोग भी मिलेगा। यह साधना विज्ञान पचास वर्ष की साधना का निचोड़ निष्कर्ष कहा जा सकता है
जहाँ जिस प्रकार जैसी सुविधा होती है वहाँ प्रबन्ध कर लिया जाता है। अखण्ड-ज्योति के प्रायः सभी ग्राहक; पाठक अपने प्रियजनों सहित इस उत्सव में एकत्रित होकर अपनी भावभरी श्रद्धा का परिचय देते हैं। यह सम्मेलन मात्र हर्षोत्सव बनकर समाप्त नहीं हो जाता वरन् हर उपस्थित व्यक्ति को उसके आध्यात्मिक कर्तव्यों का स्मरण दिलाता है और भविष्य में अधिक साहस पूर्ण कदम बढ़ाने का उत्साह भरता है। आयोजन पर जो श्रम किया जाता है उसे आयोजनकर्ता पूर्णतया सार्थक हुआ अनुभव करते हैं क्योंकि उसके फलस्वरूप अपने रचनात्मक प्रयत्नों में निश्चित रूप से तीव्रता उत्पन्न होती है
यह अनुभूतियाँ जिन्हें होंगी, वे अपनी प्रसन्नता सुविस्तृत क्षेत्र में बखेरने और उस प्रकाश वितरण से अनेकों को अभिनव उत्साह प्रदान करने की बात सोचे बिना नहीं रह सकते। महामानवों की देवताओं की श्रेष्ठ घटनाक्रमों की जयन्तियाँ मनाई जाती हैं तो कोई कारण नहीं कि अखण्ड-ज्योति को अपने मिशन की स्वर्ण जयन्ती मनाये जाने के लिए उत्साह उत्पन्न न हो
जिसने एक दीपक से असंख्य दीपक जलने वाले काव्यालंकार को प्रत्यक्ष कर दिखाया है। आत्मा को अखण्ड-ज्योति का दिव्य-दर्शन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के क्षेत्र से आगे बढ़ाकर व्यवहार के कार्यक्षेत्र में उतारा जा सकता है। इस अनोखेपन का अभिनव प्रयोग करने का दुस्साहस किया गया और वह सफल होकर रहा-यही है एक शब्द में कहा जा सकने योग्य अखण्ड-ज्योति का इतिहास। युगान्तरीय चेतना की गंगोत्री उसे माना जा सकता है उसका साधना क्षेत्र युग निर्माण योजना के रूप में आज अति विस्तृत क्षेत्र में लहलहाता हुआ देखा जा सकता है
जो हो, अखण्ड-ज्योति की प्रतिष्ठापना से लेकर उसकी अद्यावधि प्रगति हम सबके लिए उल्लास एवं सन्तोष का कारण है। उसका जन्म दिन मनाने में बसन्त पर्व हमारे लिए दुहरा आकर्षण बन जाता है। एक ही नहीं अनेक और भी आधार एक के बाद एक, शृंखलाबद्ध रूप में उभरे है और उन सब का जन्म भी इसी दिन होता चला आया है
हर अखण्ड-ज्योति को कम से कम दस व्यक्ति पड़ा करें यह एक से दस वाला क्रम बहुत दिन से चल रहा है। उसके अतिरिक्त इस वर्ष और विशेष लक्ष्य रखा जाना चाहिए कि अपने जितने भी अखण्ड-ज्योति अंक हों उन पर मजबूत कागज चिपकाकर नये सिरे से सीकर कुछ दिन टिकाऊ रह सकने योग्य मजबूत बना लिया जाय और फिर उन्हें अपने प्रभाव परिचय क्षेत्र में अधिकाधिक लोगों को पढ़ाते रहने का निश्चय किया जाय। यह झोला-पुस्तकालय बहुत ही सरल है। अपने संपर्क में कितने ही लोग आते रहते हैं, उनमें से जो विचारशील प्रतीत हों उन्हें पुरानी पत्रिकाएं पढ़ने चाहिए
जनवरी 76 का अखण्ड-ज्योति अंक उन साधनाओं का विज्ञान तथा स्वरूप समझाने वाला होगा जो सही रीति से अपनाये जाने पर व्यक्तित्व को सामान्य से असामान्य बना सकने में पूरी तरह समर्थ है। अखण्ड-ज्योति पाठकों में से जो इन्हें करना चाहेंगे उन्हें विशेष रूप से मार्ग दर्शन एवं सहयोग भी मिलेगा। यह साधना विज्ञान पचास वर्ष की साधना का निचोड़ निष्कर्ष कहा जा सकता है। साधना की स्वर्ण जयन्ती का इस अंक को विशेष उपहार माना जाना चाहिए और उसे अलभ्य सामग्री की तरह सुरक्षित रखा जाना चाहिए
अब तक हर वर्ष ‘अखण्ड-ज्योति’ के परिजन अपने सर्वश्रेष्ठ त्यौहार के रूप में बसन्त पंचमी को स्मरण करते हैं और उस दिन एक अच्छे उत्सव आयोजन की व्यवस्था करते हैं। प्रभात फेरी-सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, रात्रि को दीपदान, श्रद्धाभिव्यक्ति, भावी गतिविधियों का संकल्प जैसे कार्यक्रम इस उत्सव के प्रधान अंक होते हैं। जहाँ जिस प्रकार जैसी सुविधा होती है वहाँ प्रबन्ध कर लिया जाता है
फुन्सियों पर मरहम पट्टी करने की औपचारिकता स्वीकार करते हुए भी उसका लक्ष्य रक्त शोधन प्रक्रिया है। इसके लिए टिटहरी द्वारा समुद्र पाटे जाने वाले दुस्साहस की पुनरावृत्ति करने वाली विनम्र हलचल को अखण्ड-ज्योति कहा जा सकता है। आज उसका बाजारू मूल्य थोड़ा ही आँका जा सकता है, पर वस्तुतः है वह अत्यन्त गरिमा युक्त एवं बहुमूल्य। कहना न होगा कि इस महान प्रयास के सूत्र संचालन में जितना मनोयोग लगा है उससे कहीं अधिक सहयोग अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों का संलग्न रहा है
अखण्ड-ज्योति लगती भर पत्रिका है, वस्तुतः वह एक मिशन है; जो किसी वर्ग, क्षेत्र, धर्म की सीमित परिधि में नहीं बंधता और न छुट-पुट सामयिक हलचलों तक सीमित होता है। फुन्सियों पर मरहम पट्टी करने की औपचारिकता स्वीकार करते हुए भी उसका लक्ष्य रक्त शोधन प्रक्रिया है। इसके लिए टिटहरी द्वारा समुद्र पाटे जाने वाले दुस्साहस की पुनरावृत्ति करने वाली विनम्र हलचल को अखण्ड-ज्योति कहा जा सकता है
आज उसका बाजारू मूल्य थोड़ा ही आँका जा सकता है, पर वस्तुतः है वह अत्यन्त गरिमा युक्त एवं बहुमूल्य। कहना न होगा कि इस महान प्रयास के सूत्र संचालन में जितना मनोयोग लगा है उससे कहीं अधिक सहयोग अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों का संलग्न रहा है। यदि यह एक पक्षीय प्रयास रहा होता तो गाड़ी थोड़ी दूर लुढ़क सकने में समर्थ न हुई होती
अपने परिवार का दूना विस्तार सहल ही हो सकता है, यदि अखण्ड-ज्योति के वर्तमान पाठक उसे चुनाव जीतने जैसा प्रतिष्ठा प्रश्न बना लें और उसके लिए उतनी ही दौड़ धूप करें जितनी कि शासन संस्थाओं के सदस्य बनने के आकाँक्षी अपनी निजी सफलता के लिए परिपूर्ण तत्परता के साथ प्रयत्न करते हैं। कहना न होगा कि पाठकों की संख्या बढ़ने के हिसाब से ही अपने इस महान मिशन की सफलता सुविस्तृत होगी जिसका यह जन्म दिन है और जिसकी स्वर्ण जयन्ती मनाई जा रही है
जहाँ अब तक कभी कुछ भी नहीं हुआ है वहाँ इस स्वर्ण जयन्ती वर्ष पर्व से उस उपेक्षा एवं असमर्थता को सर्वथा समाप्त ही कर दिया जाना चाहिए। होली मिलन की तरह बसन्त पर्व अखण्ड-ज्योति परिजनों का एक सुनिश्चित दिन होना चाहिए। इस बार की स्वर्ण जयन्ती ने उसकी आवश्यकता को और भी अधिक बढ़ा दिया है
सार्वजनिक बड़ा आयोजन न बन पड़ा तो न सही, पर भावनाओं के प्रखर रहते निजी उत्सव-पारिवारिक आयोजन के रूप में बसन्त पर्व मना लेना कभी किसी के लिए कठिन नहीं पड़ा है। यही कारण है कि कुछ बहुत ही अनुत्साही अवसाद ग्रस्त लोगों को छोड़ कर अखण्ड-ज्योति के प्रायः सभी परिजन बसन्त पर्व को सार्वजनिक रूप से बड़े स्तर पर अथवा निजी रूप में छोटे उत्सव स्तर पर उसे मनाते रहते हैं। यह परम्परा प्रायः पिछले 25 वर्षों से तो एक प्रकार से नियमित जैसी ही बन गई है
बसन्त पर्व से आदर्शवादी नव-जीवन की उपलब्धि के लिए गत अंक में दिये गये परामर्श को अपने व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट करने के लिए समूची साहसिकता और तत्परता को प्रदीप्त करना चाहिए। हर वर्ष बसन्त पर्व नई प्रेरणा और नई चेतना देने के लिए आया करे तभी तो अखण्ड-ज्योति परिवार को सार्थक हुआ होना माना जा सकता है
हर अखण्ड-ज्योति को कम से कम दस व्यक्ति पड़ा करें यह एक से दस वाला क्रम बहुत दिन से चल रहा है। उसके अतिरिक्त इस वर्ष और विशेष लक्ष्य रखा जाना चाहिए कि अपने जितने भी अखण्ड-ज्योति अंक हों उन पर मजबूत कागज चिपकाकर नये सिरे से सीकर कुछ दिन टिकाऊ रह सकने योग्य मजबूत बना लिया जाय और फिर उन्हें अपने प्रभाव परिचय क्षेत्र में अधिकाधिक लोगों को पढ़ाते रहने का निश्चय किया जाय। यह झोला-पुस्तकालय बहुत ही सरल है
सफल संस्थाएं भी ऐसे आयोजन करती हैं। अखण्ड-ज्योति का स्वर्ण जयन्ती वर्ष मना सकते हैं और उस का शुभारम्भ बसन्त वर्ष मना सकते हैं। अगली बसन्त पंचमी 5 फरवरी 76 गुरुवार की पड़ेगी। उस दिन सदा की अपेक्षा कुछ अधिक उत्साह प्रदर्शित किया जाय और पहले सभी आयोजकों की तुलना में बड़ा आयोजन मनाया जाय तो यह हर दृष्टि से उचित ही होगा
बसन्त ऋतु में पेड़ पौधे सभी हरे भरे होते और फलते-फूलते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के उद्यान को इस बसन्त पर्व पर अधिक हरा भरा होना चाहिए और महकने फलने-फूलने में पिछले सभी प्रयासों को पीछे छोड़ कर नया कीर्तिमान स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा में जुटना चाहिए। स्वर्ण-जयन्ती वर्ष मनाने की प्रत्येक परिजन से ऐसी ही अपेक्षा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-March
समय की विकृतियों-समस्याओं के समाधान में क्या चिन्तन की उत्कृष्टता का भी कोई योगदान हो सकता है जब इस बात को बुद्धि संगत ढंग से खोजा जायगा तो विचारशील वर्ग यह स्वीकार करेगा कि यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जिस बुद्धिवाद से आस्तिकता को निरस्त करके भौतिकता को प्रतिष्ठापित किया था वही बुद्धिवाद अब नई धार चढ़ जाने के कारण-नई दिशा मिल जाने के कारण, नास्तिकता को आस्तिकता में, निकृष्टता को उत्कृष्टता में बदल सकने में पूरी तरह समर्थ हो सकता है। इस युग की यह एक बहुत बड़ी दैन है जिस पर अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य गर्व कर सकता है
(1) अखण्ड-ज्योति साइज की, उतने ही पृष्ठों की, उसी कलेवर की, हिन्दी मासिक पत्रिका ‘महिला जागरण’ इसी 1 जुलाई 75 से आरम्भ होगी। मूल्य भी अखण्ड-ज्योति जितना ही रहेगा। महिला जीवन से सम्बन्धित सभी पक्षों पर उसमें आवश्यक मार्ग दर्शन रहेगा। घर और बाहर दोनों ही क्षेत्रों को नारी अपनी गरिमा से किस प्रकार आलोकित कर सकती है इसका सर्वांगपूर्ण प्रशिक्षण लेकर यह पत्रिका भावनाशील जीवन्त महिला समाज के पास पहुँचेगी और परिस्थितियों में व्यापक परिवर्तन लाने योग्य प्रकाश एवं साहस प्रदान करेगी
(1) अखण्ड-ज्योति साइज की, उतने ही पृष्ठों की, उसी कलेवर की, हिन्दी मासिक पत्रिका ‘महिला जागरण’ इसी 1 जुलाई 75 से आरम्भ होगी। मूल्य भी अखण्ड-ज्योति जितना ही रहेगा। महिला जीवन से सम्बन्धित सभी पक्षों पर उसमें आवश्यक मार्ग दर्शन रहेगा
इसके बिना इतना बड़ा सर्वजित् यज्ञ सफल नहीं हो सकता। अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों ने प्राथमिक परीक्षायें कितनी ही पास कर ली हैं। प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक शतसूत्री योजना के आमंत्रण को प्रायः सभी ने स्वीकार किया है और न्यूनाधिक योगदान सभी का रहा है। यदि ऐसा न होता तो उज्ज्वल भविष्य की आशा किरणें हर किसी को आश्वस्त कर रही हैं उनका आलोक किस प्रकार दृष्टिगोचर हुआ होता
बाहर के लोग आपाधापी की दलदल में आकण्ठ मग्न हैं। इस युग पुकार को अखण्ड-ज्योति परिवार ही पूरा करेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-September
प्रशिक्षण का यह सुअवसर कब तक उपलब्ध रहेगा कहा नहीं जा सकता, इसलिए जिन्हें यह सब उपयोगी प्रतीत हो उन्हें यथा सम्भव अगले ही वर्ष इनमें सम्मिलित होने का प्रयत्न करना चाहिए। अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को इसके लिए इन पक्तियों द्वारा आमंत्रित किया जा रहा है
उसे एक ऐसी शिक्षण संस्था कहना चाहिए जिसमें व्यक्तित्वों को परिष्कृत करना और उनमें प्रखरता उत्पन्न करने का लक्ष्य रखा गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य-युग निर्माण अभियान के सृजन सैनिक उसके लिए उपयुक्त पात्र समझे गये। उन्हें प्रयत्न पूर्वक खोज-खोजकर एक ऐसी माला में पिरोया गया है जिसे पहनकर मानवता पुन गौरवास्पद बन सकती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-November
अखण्ड-ज्योति अपने परिजनों को नव-जीवन उपलब्ध करने के लिए जब आग्रह करती है तो उसका तात्पर्य इतना भर होता है कि चिन्तन और कर्तृत्व में समाई हुई अवाँछनीयता को पहचानने का प्रयत्न किया जाय और उसे उखाड़ फेंकने के लिए साहस जुटाया जाय। अनुपयुक्त को अपने भीतर से ढूंढ़-ढूंढ़कर बाहर हटाते चलने और उस स्थान पर सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठित करने के लिए जिस शौर्य, साहस की आवश्यकता पड़ती है, अध्यात्म भाषा में उसी का नाम आत्मबल एवं ब्रह्मवर्चस् है। योग और तप की साधना इसी प्राप्ति के लिए की जाती है
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को नव-जीवन उपलब्ध करने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए। यह आग्रह और अनुरोध इन पृष्ठों पर विभिन्न प्रकार के तर्कों और तथ्यों के साथ किया जाता रहा है। इस अनवरत आग्रह के पीछे एक ही आकाँक्षा है कि हम सब ऐसा जीवन जीने का लाभ प्राप्त कर सकें जो हर्षोल्लास से, शान्ति और सन्तोष से, प्रसन्नता और प्रफुल्लता से, समृद्धि और प्रगति से भरा-पूरा हो

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-August
उसे एक ऐसी शिक्षण संस्था कहना चाहिए जिसमें व्यक्तियों को परिष्कृत करना और उनमें प्रखरता उत्पन्न करने का लक्ष्य रखा गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य-युग-निर्माण अभियान के सृजन सैनिक उसके लिए उपयुक्त पात्र समझे गये। उन्हें प्रयत्न पूर्वक खोज-खोजकर एक ऐसी माला में पिरोया गया है कि जिसे पहनकर मानवता पुनः गौरवास्पद बन जाती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-February
अखण्ड-ज्योति इन 39 वर्षों में यह बताती सिखाती रही है कि आध्यात्मिक उद्देश्य का एक आरम्भिक चरण उपासना अवश्य है, पर उतने भर से लक्ष्य की प्राप्त नहीं हो सकती। पूजा करते रहने भर से किसी को भी आत्मबल नहीं मिल सकता। इसके लिए जीवन साधना अभीष्ट है
बसन्त पर्व का आध्यात्मिक चिन्तन परिजनों को उस दिशा में धकेल सके तो समझना चाहिए कि इस वर्ष का बसन्तोत्सव सच्चे अर्थों में सार्थक हो गया। अध्यात्म का स्वरूप समझाने में अखण्ड-ज्योति को सफलता मिली यदि वह कुछ ऐसे व्यक्ति विनिर्मित कर सके जो अपने जीवन को अध्यात्म आदर्शों के अनुरूप प्रस्तुत करे तो समझना चाहिए अखण्ड-ज्योति का अब तक का जीवन श्रम सार्थक हो गया। 38 वें जन्म दिन पर इसी सफलता के लिए प्रबुद्ध परिजनों से साहसिक कदम बढ़ाने की अपेक्षा है
नवयुग निर्माण अभियान का शंखनाद विगत 38 वर्ष से ‘अखण्ड-ज्योति’ मिशन के रूप में निनादित हो रहा है और उसकी प्रतिध्वनि से वातावरण गूँज रहा है, इस हम सब अपने इन्हीं आँख, कानों से देख सुन रहे हैं। मनुष्य मनुष्य बनकर रहे - पेट और प्रजनन के लिए कृमि-कीटकों की तरह न जिये - वरन् उस लक्ष्य की ओर बढ़े जिसके लिए उसका महान अवतरण हुआ है इस सन्देश को इस लम्बी अवधि में जन-मानस में उतारा और हृदयंगम कराया गया है। यह प्रेरणा निष्फल नहीं गई
उनकी आँतरिक और वाह्य विभूतियाँ लोक-मंगल के लिए नियोजित हो सकें तो प्रस्तुत नरक को स्वर्ग में बदला जा सकना सम्भव हो सकता है। इस संदर्भ में नवम्बर अखण्ड-ज्योति के पृष्ठ 56 पर युग देवता का आह्वान छपा है। बसन्त पर्व का आध्यात्मिक चिन्तन परिजनों को उस दिशा में धकेल सके तो समझना चाहिए कि इस वर्ष का बसन्तोत्सव सच्चे अर्थों में सार्थक हो गया। अध्यात्म का स्वरूप समझाने में अखण्ड-ज्योति को सफलता मिली यदि वह कुछ ऐसे व्यक्ति विनिर्मित कर सके जो अपने जीवन को अध्यात्म आदर्शों के अनुरूप प्रस्तुत करे तो समझना चाहिए अखण्ड-ज्योति का अब तक का जीवन श्रम सार्थक हो गया
बसन्त पर्व पर अखण्ड-ज्योति का 38 वाँ जन्मोत्सव मनाते हुए उसके परिवार का हर सदस्य गर्व और गौरव अनुभव कर सकता है - सन्तोष और मुस्कान व्यक्त कर सकता है कि हम लोगों ने मिल जुलकर सही दिशा में सही कदम बढ़ाये और उसके सही परिणाम निकले
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य बसन्त पर्व के सन्देश के रूप में यह समझा जाना चाहिए-जिस लक्ष्य को लेकर अखण्ड-ज्योति पिछले 38 वर्षों से चल रही है उसे ठीक तरह समझने के लिये प्रयत्न किया जाय और यदि वह सही प्रतीत हो तो मात्र समर्थन देने तक सीमित न रहकर उसे व्यावहारिक जीवन में उतारने का साहस जुटाया जाय
आत्म-निरीक्षण किया है, अपने को सुधारा और बनाया है। आत्म विकास की दिशा में बढ़ते हुए कितनों ने अपना चोला नर से बदलकर नारायण का पहना है - कितने पुरुष पुरुषोत्तम बने हैं - उसका लेखा-जोखा लेने से सहज ही यह विश्वास होता है कि अखण्ड-ज्योति का ज्वलन्त आलोक अन्धकार को प्रकाश में बदलने की अपनी साधना में बहुत हद तक सफल रहा है। इसके 38 वर्ष निरर्थक नहीं गये
संक्षेप में अखण्ड-ज्योति के अब तक के समस्त वाचन का यही साराँश हैं अध्यात्म और धर्म का विशाल कलेवर इसी तथ्य को हृदयंगम कराने के लिये खड़ा किया गया है। आस्तिकता-आध्यात्मिकता एवं धार्मिकता की त्रिवेणी में स्नान करके ही मानवी चेतना धन्य बनती है
प्रसुप्त चेतना को इस स्रोत से अभिनव प्रेरणा प्राप्त करने का अवसर मिलता है, जिसका कि अवतरण दिन मनाया गया। अखण्ड-ज्योति मिशन ने हर वर्ष नये उत्साह के साथ नये कदम बढ़ाये हैं और उनके सत्परिणाम एक से एक बढ़कर सामने आये हैं
पिछले पृष्ठों पर संक्षेप में यह बता दिया गया है कि पूरे 39 वर्षों में अखण्ड-ज्योति ने सनातन अध्यात्म तत्व-ज्ञान को किस प्रकार अनेक तर्क, उदाहरण, प्रमाण और आधार प्रस्तुत करते हुए स्वजनों के सामने रखा है। यदि 39 वर्ष के अंकों को निचोड़ा जाय तो उसमें से सार तत्व की इतनी ही बूँदें मिलेंगी जिन्हें इन पृष्ठों पर अंकित कर दिया गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-July
यह समय आगे अन्य बड़े कामों में भी लग सकता है, पर इस वर्ष तो प्रधानतया दो ही कामों में लगता है। (1) युग-निर्माण परिवार की विचारगोष्ठियों में सम्मिलित होकर वर्तमान परिजनों के बीच घनिष्ठता पैदा करना और एक दूसरे को प्रोत्साहन देना और संगठन में सक्रियता उत्पन्न करना (2) ‘एक से दस’ योजना के अनुसार अपने परिवार, पड़ोस, परिचय क्षेत्र में कम से कम दस व्यक्तियों को अखण्ड-ज्योति युग निर्माण तथा दूसरा मिशन का साहित्य नियमित रूप से पढ़ाते रहने का क्रम चलाना। इससे अपना प्रभाव, प्रकाश एवं विस्तार क्षेत्र इसी वर्ष दस गुना हो जायगा
संगठन टोली को स्थानीय अखण्ड-ज्योति सदस्यों के संपर्क में 23 जुलाई के गुरुपूर्णिमा पर्व तक कई बार आना चाहिए और उन्हें उस दिन के उत्सव में सम्मिलित रहने के लिए अनुरोध करना चाहिए। जो संगठन से रुचि दिखाये उनसे समय दान की प्रतिज्ञा उसी पावन पर्व पर करा लेनी चाहिए और भविष्य में चेष्टा चलती रहनी चाहिए कि की हुई प्रतिज्ञाएँ निभती रहे उनमें आलस्य, अनुत्साह उत्पन्न न होने पावे। बसन्त पर्व तक की अवधि के छह महीने यदि यह समय दान की प्रक्रिया नियमित रूप से कल गई तो विश्वास किया जाना चाहिए वह भविष्य में भी एक सरस अभ्यास के रूप में स्वभाव का अंग बन जायगी और अगले वर्ष जो गुरुपूर्णिमा पर्व मनाया जायगा उसमें यही आज के मात्र ‘पाठक’ दीखने वाले परिजन सृजन सैनिकों की अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखाई देंगे
महाकाल ने उन्हीं के कंधों पर उपरोक्त दोनों संगठनों के ढाँचे खड़े कर देने का उत्तरदायित्व सौंपा है। विश्वास किया जाना चाहिए कि जहाँ भी अखण्ड-ज्योति का थोड़ा बहुत प्रकाश पहुँचा होगा वहाँ एक-दो हनुमान भी अवश्य सजग रहे होंगे और वे युग के आमन्त्रण को स्वीकार करके समुद्र लाँघते और अपनी पूँछ जलाकर लंकादहन में निरत दिखाई पड़ेंगे
अखण्ड-ज्योति परिवार से जुड़े हुए प्रायः सभी परिजन समय की विषमता को समझने हैं और यह मानते हैं कि उन्हें अपनी जागरुक आत्मा को सन्तोष देने के लिए कुछ न कुछ करना ही चाहिए। वे यह भी समझते हैं कि संगठन का आधार खड़ा किये बिना युग परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण कार्य सम्भव नहीं हो सकते। विचार क्रान्ति के अतिरिक्त युग की अनेकानेक समस्याओं के स्थिर समाधान का कोई दूसरा विकल्प नहीं
अखण्ड-ज्योति के संचालक सूत्र अपने प्रिय परिजनों को लगभग इसी स्तर का उद्बोधन पिछले 37 वर्षों से करते रहे हैं। कभी संकेत रूप में कभी सुझाव रूप में, कभी अनुरोध रूप में कभी आदेश रूप में -परिजनों को इन्हीं तथ्यों को हृदयंगम करने के लिए कहा जाता समझाया जाता रहा है। अब वह प्रकरण इसी तरह बार-बार नहीं ठहराया जाता रह सकता कहने वाले सूत्र अपना बिस्तर समेट रहे है
इसके लिए क्या करना चाहिए इसका सुझाव पिछले अंक में दिया जा चुका है। दो तीन उत्साही परिजनों की एक संगठनकर्ती टोली बने और वह वर्तमान अखण्ड-ज्योति सदस्यों के घर घर जाकर उनसे संपर्क साधे और कहे कि उन्हें संघबद्ध होने के अनुरोध को स्वीकार करना चाहिए। सदस्यता का शुल्क एक घण्टा समय प्रतिदिन ज्ञान-यज्ञ की शर्त पालन करना है। यह घण्टा नित्य न सही महीने में कुल मिलाकर 30 घण्टे सुविधानुसार दिये जा सकते हैं
यों अब तक के युग निर्माण अभियान की सफलता में सारा श्रेय अखण्ड-ज्योति परिजनों का ही है, जिनके योगदान से संसार को आश्चर्यचकित कर देने की स्थिति तक उसने अपना वर्चस्व सिद्ध किया है। उस पर गर्व किया जा सकता है-सन्तोष नहीं। गर्व इसलिए कि इस परिवार में अनेक उच्चकोटि की आत्माएं जुटी हुई है और वे भौतिक लिप्सा से अपना मन पीछे हटाकर नवनिर्माण की युग पुकार पुरी करने के लिए बढ़ चढ़कर त्याग, बलिदान प्रस्तुत कर रहे हैं
प्रगति और समृद्धि के नाम पर अनेक क्षेत्रों में अनेक प्रयत्न चल रहे हैं। अखण्ड-ज्योति ने अपने प्रयासों को उस उद्गम पर केन्द्रित किया है जहाँ से विनाश और विकास के दोनों ही झरने फूटते हैं। विकृत चिन्तन का निवारण व जन-मानस में परिष्कृत दृष्टिकोण का प्रतिष्ठापन यही है हमारा विचार क्रान्ति अभियान- यही है इस युग का सर्वोपरि महत्वपूर्ण धर्मानुष्ठान -ज्ञान-यज्ञ। युग-निर्माण योजना इन्हीं प्रयत्नों में प्राण -प्रण से संलग्न है
प्रभात-फेरी, सामूहिक जप, छोटा गायत्री यज्ञ, सहगान कीर्तन, प्रवचन, लाल मशाल चित्र के सम्मुख पुष्पांजलि समर्पण, समय दान की प्रतिज्ञा, दीपदान आदि जैसी भी जहाँ व्यवस्था बन पड़े बना लेनी चाहिए। जहाँ अखण्ड-ज्योति का एक भी सदस्य है वहाँ किसी न किसी रूप में बसन्त पर्व और गुरुपूर्णिमा पर्व के दो आयोजन- छोटे या बड़े रूप में मनाये ही जाते रहने चाहिए। इस दिशा में क्या किया गया, किस रूप में कितनी सफलता मिली इसका विस्तृत विवरण शाँति-कुँज हरिद्वार, युग-निर्माण योजना मथुरा दोनों ही जगह भेजा जाना चाहिए। यह परम्परा इस वर्ष में तो सुनिश्चित ही कर देनी चाहिए और उसका शुभारम्भ करने में कही भी शिथिलता नहीं बरती जानी चाहिये

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-April
पहला कदम ‘सदस्य’ और ‘सभ्य’ बनाने का हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य अपनी पत्नी बहिन, पुत्री या जो भी थोड़ी सक्रिय दिखाई पड़ें उन्हें सदस्य बनाये और स्वयं ‘सहायक’ बनें। कुछ लोग टोली बना कर निकल पड़ें और अपने प्रभाव परिचय क्षेत्र में दोनों प्रकार के सदस्य बना डालने का काम पूरा करलें। जो महिला सबसे अधिक सक्रिय कुशल और समय दे सकने वाली हो उसे ‘कार्य वाहक’ चुन लें और एक कोषाध्यक्ष भी चुन लें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-September
परहित की भावना उत्पन्न होने से अपनी आध्यात्मिक उन्नति का द्वार भी खुल जाता है और जितना उस मार्ग पर वह आगे बढ़ता जाता है, उससे अधिक वह स्वयं को उन्नति पथ पर अग्रसर हुआ पाता है। इसलिए अखण्ड-ज्योति परिवार का कोई भी परिजन ऐसा न रहे जो अपने पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए भविष्य में सत्कार्यों के लिए संकल्प न करे
‘अखण्ड-ज्योति’ के अतिरिक्त गायत्री तपोभूमि द्वारा दो अन्य पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं—’जीवन यज्ञ’ (पाक्षिक) और ‘गायत्री परिवार पत्रिका’
तर्पण तो श्राद्ध में किया ही जाता है। इसके साथ-साथ पितरों की शान्ति के लिए अखण्ड-ज्योति प्रेस द्वारा प्रकाशित “सूक्त संहिता” नाम पुस्तक में वर्णन पितृ सूक्त के मन्त्रों से हवन करना चाहिए क्योंकि हिन्दू धर्म में कोई भी शुभ या अशुभ कार्य हवन के बिना पूर्ण नहीं माना जाता

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-November
गत अंक में आचार्य जी के आगामी कार्य-क्रम तथा तपोभूमि एवं अखण्ड-ज्योति की व्यवस्था के संबंध में चर्चा थी। परम पूज्य आचार्यजी जो सोचते हैं या आयोजन करते हैं उसमें कोई दैवी सूक्ष्म प्रेरणा सन्निहित होती है, इसलिए मैं उनके आदेशों में कभी ननुनच नहीं करती। पिछले सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ की घोषणा उन्होंने अचानक प्रातःकाल उठते ही कर दी थी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-October
(3) अखण्ड-ज्योति का सम्पादन इस अंक से आरंभ कर दिया है और यह प्रयत्न करूंगी कि पत्रिका में गये हुए लेखों के साथ वह प्रेरणा भी जुड़ी हुई हो, जिससे उन लेखों का प्रभाव पाठक की अन्तरात्मा पर निश्चित रूप से हो
वे सात वर्ष अगले साल पूरे हो जाते हैं, इसलिए उन्हें अब फिर अपने साधना क्षेत्र में लौटना है। अखण्ड-ज्योति का यह सम्पादन परिवर्तन भी इसी योजना का एक अंग है
उनकी आज्ञा को मैंने शिरोधार्य किया है। अखण्ड-ज्योति कार्यालय में जो घृत दीप जलता है, उसका अधिकाँश उत्तरदायित्व अब तक भी मुझ पर तथा हमारी सास जी पर था, फिर भी आचार्य जी उसकी देखभाल एवं सुरक्षा में बहुत समय देते थे, अब वह उत्तरदायित्व मैंने अपने ऊपर पूर्णतया ले लिया है
यह पंक्तियाँ लिखते समय अखण्ड दीप और अखण्ड-जप वाली दोनों प्रक्रियाएं उतनी कठिन नहीं मालूम हो रही हैं। जितना अखण्ड-ज्योति पत्रिका का कार्य कठिन मालूम देता है। यह बहुत झंझट भरा काम है। इसमें आचार्य जी पिछले वर्षों काफी परेशान रहे हैं फिर मेरी क्षमता तो उनकी तुलना में नगण्य है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-July
प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के धर्म-प्रेमी परिजन इस घटिया श्रेणी के नहीं हैं, इतने वर्षों तक उच्चकोटि के तत्वज्ञान की पत्रिका के पृष्ठों का अध्ययन किया है, फलस्वरूप उनकी यह मान्यता सुदृढ़ हो चुकी है कि परमात्मा का सच्चा अनुग्रह प्राप्त करने के दो प्रधान माध्यता का साधना और सेवा का समन्वय होना आवश्यक है। साधना से सेवा का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। इन दोनों में से एक को छोड़ दिया जाय तो लक्ष की ओर प्रगति नहीं हो सकती
श्रेष्ठ पुरुषों की यह विशेषता प्रसिद्ध है कि वे या तो कोई कदम उठाते नहीं, यदि उठाते हैं तो मंजिल पर पहुँच कर रहते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार ने जिस युग निर्माण के लिए संकल्प किया है वह उसे अधूरा नहीं छोड़ सकता
व्रतधारी आन्दोलन की रूप-रेखा सामने आने पर अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्यों ने बड़ा हर्ष और उत्साह प्रकट किया है क्योंकि इस योजना से अपने अभीप्सित कई लक्ष एक साथ पूरे होते है। आत्म-कल्याण, आध्यात्मिक उन्नति, जीवन मुक्ति का लक्ष इससे पूरा होता है क्योंकि सर्वश्रेष्ठ उपासना ‘गायत्री’ का आश्रय लेने से आत्मा पर चढ़े हुए कलुष कल्मष छूटते हैं, पवित्र आत्मा ईश्वरीय प्रकाश का आविर्भाव तुरन्त होता है और परमात्मा की समीपता का मार्ग अति सरल हो जाता है। व्रतधारी आन्दोलन में भाग लेने वाले प्रत्येक परिजन के लिए गायत्री उपासना अनिवार्य है
श्रेष्ठ पुरुषों के सत्प्रयत्नों से आगे भी युग बदले हैं, अब भी बदल सकते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार का शक्ति शाली संगठन यदि तन्मयता और तत्परता पूर्वक युग निर्माण संकल्प को पूरा करने खड़ा होता है तो आज जो अनैतिकता की काली घटाएँ चारों ओर गरजती दिखाई पड़ती हैं वे फट सकती हैं, हट सकती हैं। भारतीय संस्कृति की प्रखरता का पुण्य प्रभाव हम पुनः ला सकते हैं, वह लाने के लिए ही व्रतधारी आन्दोलन है
अखण्ड-ज्योति परिवार का लक्ष एवं दृष्टिकोण बहुत ही स्पष्ट एवं स्वच्छ है। उसका प्रत्येक सदस्य यह अनुभव करता है कि सेवा को जीवन में समुचित स्थान दिये बिना आध्यात्मिक लक्ष कदापि पूर्ण नहीं हो सकता। जप-तप की अनिवार्य आवश्यकता को वह भली प्रकार अनुभव करता है पर साथ ही यह भी जानता है कि यदि जनसेवा की उपेक्षा की गई तो ईश्वर को प्रसन्न कर सकना और अपने अन्तःकरण को देव भूमिका में विकसित कर सकना कदापि संभव नहीं
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों ने इस आँदोलन की महत्ता को समझा और स्वीकार किया है यह हमारे शुभ भविष्य का चिन्ह है। परिजन इस योजना को सफल बनाने के लिए जिस उत्साह और निष्ठा के साथ अग्रसर हो रहे हैं, उसे देखते हुए यह विश्वास दिन-दिन दृढ़ होता जाता है कि भारत भूमि में धार्मिक चेतना की जो महान् परम्परा अनादि काल से चलती आ रही है वह मूर्च्छित भले ही हो गई हो मरी नहीं है अब वह मूर्छा भी समाप्त होने जा रही है। नव-चेतना का—धर्म जागृति का—संयम और सदाचार का- नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का स्वर्ण बिहान अब बिल्कुल निकट है
प्रशंसा और विज्ञापन से बचकर ठोस धर्मसेवा करने में आस्था रखने वाले अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य विगत बीस वर्षों में जो कार्य कर चुके हैं उसके लिए भारत माना गर्व अनुभव कर सकती हैं। हमारे यह अग्रगामी कदम मंद होने वाले नहीं हैं। अब तक अथक गति से हम सब आगे बढ़ते रहे हैं
प्रसन्नता की बात है कि युग निर्माण की इस योजना का सर्वत्र हार्दिक स्वागत किया गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार प्रगतिशील धर्मसेवी सत्पुरुषों का संगठन है। इस पत्रिका को पढ़कर वे पढ़ने का शौक मात्र पूरा नहीं करते पर स्वाध्याय द्वारा आत्म-निर्माण करके और जीवन को सफल बनाने वाला रास्ता ढूंढ़ने का प्रयत्न करते हैं। इस परिवार के प्रत्येक सदस्य के अन्तःकरण में यह तथ्य भली प्रकार भर चुका है कि भगवान का अनुग्रह प्राप्त करने,स्वर्गीय शान्ति का रसास्वादन करने, जीवन मुक्ति का आनन्द लेने, आत्मा को परमात्मा में लीन करने जैसे आध्यात्मिक लक्ष को प्राप्त करने के लिए केवल जप, ध्यान, पूजा, उपवास, हवन आदि ही पर्याप्त नहीं हैं वरन् यह भी आवश्यक है कि अपना जीवन सद्विचारों एवं सत्कार्यों से परिपूर्ण बनाया जाय और उसमें लोक-सेवा का समुचित स्थान रहे
अखण्ड-ज्योति परिवार विचारशील, विवेकवान एवं दूरदर्शी लोगों का संगठन है। उसमें श्रद्धा कूट-कूट कर भरी गई है। साथ ही विवेक का पुट भी समुचित मात्रा में मौजूद है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-May
पता— अखण्ड-ज्योति कार्यालय, मथुरा
अखण्ड-ज्योति परिवार विवेकवानों का-सहृदय और सद्भावना युक्त सज्जनों का एक कौटुम्बिक संगठन है। जो लोग अखण्ड ज्योति को एक अखबार मानते हैं और इसके पाठकों को “कुछ बाँचने के शौकीन” मानते हैं वे वस्तुस्थिति से सर्वथा अपरिचित ही कहे जा सकते हैं। सच बात यह है कि अखण्ड ज्योति एक विचार दीपक है जिसके प्रकाश में दुनिया के कौने-कौने में से ऐसे लोग खोजकर एक सूत्र में पिरोये गये हैं—जिनमें आत्मकल्याण एवं परमार्थ की समुचित भावना विद्यमान है
—पता-अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा
जीवन यज्ञ अब तक लम्बे अखबारी साइज में निकलता था और उसमें चरित्र बल के ही लेख रहते थे। अब यह परिवर्तन किया गया है कि उसका साइज अखण्ड-ज्योति जैसा ही कर दिया जाय ताकि उसकी भी जिल्द बन सके और पुस्तक रूप में सदा सुरक्षित रखा जा सके। दूसरा परिवर्तन यह किया गया है कि ता. 8 के अंक में समाज सुधार सर्व आत्म निर्माण संबंधी लेख रहा करेंगे और ता. 23 के अंक में धर्मभावनाएं एवं सत्प्रवृत्तियाँ उत्पन्न करने वाली धार्मिक एवं ऐतिहासिक कथाएं रहा करेंगी। गायत्री परिवार के कार्यक्रम एवं आयोजनों की सूचना गायत्री परिवार पत्रिका में रहा करेगी अभी वह ता. 20 को निकलती है कुछ ही दिनों में उसे ता.15 को निकाला जाने लगेगा ताकि प्रति सप्ताह का क्रम ठीक रहे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-June
गत दो अंकों में ‘अखण्ड-ज्योति’ के परिजनों को व्रतधारी बनने की प्रेरणा दी गई थी। प्रसन्नता की बात है कि उसका सर्वत्र समुचित स्वागत हुआ है। अधिकाँश स्वजनों ने यह अनुभव किया है कि परमार्थ के विचारों का एक मनोरंजन मात्र सफलता और उस विषय की कुछ पुस्तकें या पत्रिकाएं पर्याप्त नहीं हैं
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों ने गत 21 वर्षों में अपनी मनोभूमि को निश्चय ही बहुत परिष्कृत किया है। उन्होंने इतने उच्च विचार, लम्बे समय तक निरंतर प्राप्त किये हैं कि यदि उनके कार्य रूप में परिणत होने का अवसर आ जाय तो इनमें से प्रत्येक परिजन एक युगपुरुष-नररत्न सिद्ध हो सकता है। उनमें अनेकों की शक्ति और स्थिति भी ऐसी है कि वे अपना जीवन सफल करें इतना ही नहीं वरन् अनेकों के बुझे हुए दीपकों को जलाकर इस निराशा की निशा में धर्म और ज्ञान की दीपावली जगमग कर सकते हैं
जहाँ तक विचार क्षेत्र की धर्म भावनाओं का सम्बन्ध है हम में से प्रत्येक सदस्य अपने को धार्मिक सिद्ध करने का पूर्ण अधिकारी है। क्योंकि अखण्ड-ज्योति ने गत 21 वर्षों में जिस विवेकसम्मत धार्मिकता का प्रतिपादन किया है उसे संकीर्ण साम्प्रदायिक या भ्रान्त नहीं कहा जा सकता। वह सार्वभौम, सर्वमान्य, मानवता के आदर्शों के अनुरूप धार्मिकता है। उसे जिन लोगों ने पसन्द एवं स्वीकार किया है वे धर्म के निष्कर्षों तक पहुँच चुके हैं यह मानने में किसी को आपत्ति न होनी चाहिए, पर इतने से ही काम न चलेगा
आत्म निर्माण और परमार्थ के मानवोचित आदर्शों को व्यवहारिक जीवन में कैसे घुलाया जा सके? इस समस्या का एक व्यवहारिक एवं समयानुकूल हल ‘व्रतधारी’ आन्दोलन है। जिन शिक्षाओं को ‘अखण्ड-ज्योति’ गत 21 वर्षों से देती रही है, अब वह समय आया कि वह शिक्षायें मूर्ति रूप धारण करें। स्वाध्याय और सत्संग के द्वारा जिन आत्माओं में आध्यात्मिक चेतना एवं धार्मिकता उत्पन्न हुई है अब उसके चरितार्थ करने का समय आ गया। शिक्षा वही है जो क्रिया में परिलक्षित हो

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-February
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा
इसी कमी को पूरा करने के लिए यह विद्यालय स्थापित किया गया है। अखण्ड-ज्योति एवं गायत्री परिवार के सदस्य इस योजना को बनाने में सहयोग करें। जो इस प्रकार के जीवन में प्रवेश करने में अभिरुचि रखते हों उनके लिए यह अलभ्य अवसर है। हमें आशा है कि परिवार के अनेक सदस्य इस शिक्षा से लाभ उठाने के लिए आगे आवेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-January
गायत्री तपोभूमि से शीघ्र ही ‘जीवनयज्ञ’ नाम का मासिक पत्र निकाला जा रहा है। ‘गायत्री परिवार पत्रिका’ तथा ‘अखण्ड-ज्योति’ यह दो पत्रिकाएं पुरानी हैं, इस प्रकार तीन अखबारों का प्रकाशन जहाँ होता है वहाँ लेखक एवं पत्रकार बनने के इच्छुक को शिक्षा प्राप्त करने का पर्याप्त अवसर है। इस मार्ग में अभिरुचि रखने वालों के लिए यह स्वर्ण सुयोग है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-April
वे ही राष्ट्र की सच्ची दौलत माने जाते हैं। अखण्ड-ज्योति-परिवार ऐसे नर रत्नों का भाण्डागार है। इस संगठन को यदि राष्ट्र का एक विशेष सौभाग्य एवं उज्ज्वल भविष्य का आशादीप कहा जाय तो इसमें कुछ अत्युक्ति न होगी। भावी इतिहासकार ही इस श्रेष्ठ संगठन की महत्वपूर्ण सेवाओं का मूल्याँकन कर सकेंगे, आज तो उनकी स्थिति बहुत ही साधारण जैसी दीखती है
यहाँ व्रतधारी धर्म सैनिकों की सेना के आधार पर योजनाएं बना करेंगी। यों अखण्ड-ज्योति के सभी सदस्य धर्मसेवी हैं, नियमित और अनियमित रूप से अब तक बहुत कुछ करते रहे हैं, पर अब समय आ गया है कि उसे सुव्यवस्थित रूप दिया जाय और एक सुसंगठित सेना के सैनिक जिस प्रकार कदम से कदम मिलाकर चलते हैं उसी प्रकार यह व्रतधारी धर्म सेवक भी—साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए—नैतिक क्राँति के लिये योजनाबद्ध कूच करें। इसलिये जिनमें समुचित उत्साह एवं भावनाएँ हैं, उन्हें व्रतधारी का प्रतिज्ञा-पत्र भर ही देना चाहिए। चैत्र से नया सम्वत्सर आरम्भ होता है
गत बीस वर्षों में अखण्ड-ज्योति-परिवार के कर्म-ब्राह्मण सदस्यों ने अपनी जिम्मेदारी को जिस प्रशंसनीय ढंग से निवाहा है, उस पर हर्षोल्लास न सही, सन्तोष अवश्य प्रकट किया जा सकता है। अखबार पढ़ने के बुद्धि-विलास के लिए कोई इस परिवार का सदस्य नहीं बनता, कलेवर, मनोरंजन, आकर्षण आदि की दृष्टि में अखण्ड-ज्योति को एक घटिया पत्रिका कहा जा सकता है, उसमें बुद्धि विलासी लोगों को कुछ आकर्षण लगे ऐसी कोई बात दिखाई नहीं पड़ती। इस संगठन के सदस्य तो ब्राह्मण अभिरुचि के साथियों को एक सूत्र में आबद्ध होने, अपनी आन्तरिक स्थिति को अधिक अग्रगामी बनाने एवं मिल-जुलकर कुछ ठोस सेवा करने की दृष्टि से ही सम्मिलित होते हैं
इस संगठन के सदस्य तो ब्राह्मण अभिरुचि के साथियों को एक सूत्र में आबद्ध होने, अपनी आन्तरिक स्थिति को अधिक अग्रगामी बनाने एवं मिल-जुलकर कुछ ठोस सेवा करने की दृष्टि से ही सम्मिलित होते हैं। अखण्ड-ज्योति पत्रिका तो इस योजना का एक संबंध सूत्र मात्र हैं। उसे अखबार, मासिक पत्र न कहकर एक चेतना, प्रेरणा एवं योजना कहा जाय तो उत्तम है अखण्ड-ज्योति की वास्तविक स्थिति यही है। इसके सदस्यों को अपने कर्तव्य के प्रति जागरुक कर्म ब्राह्मण कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य—अपनी विवेकशीलता और उच्च आध्यात्मिक स्थिति के कारण भारतीय तत्व ज्ञान के आधार पर ब्राह्मण संज्ञा में ही आते हैं। ब्राह्मण की यह परम पवित्र जिम्मेदारी है कि आध्यात्मिक गुणों में अपने आपको साधारण लोगों की उपेक्षा ऊँचा कर ले और दूसरे लोग जिस प्रकार भौतिक सुख साधनों को प्रधानता देते हैं उसी प्रकार वह धर्म एवं समाज की सेवा को अपने कर्तव्य क्षेत्र में प्रधानता दे। जिस प्रकार किसी परिवार के गृह संचालन में बुजुर्ग को अपने कुटुम्ब के प्रत्येक सदस्य पर दृष्टि रखनी पड़ती है उसी प्रकार ब्राह्मण सारे समाज की सुख-शाँति का जिम्मेदार है
अखण्ड-ज्योति पत्रिका तो इस योजना का एक संबंध सूत्र मात्र हैं। उसे अखबार, मासिक पत्र न कहकर एक चेतना, प्रेरणा एवं योजना कहा जाय तो उत्तम है अखण्ड-ज्योति की वास्तविक स्थिति यही है। इसके सदस्यों को अपने कर्तव्य के प्रति जागरुक कर्म ब्राह्मण कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी
गत बीस वर्षों में अखण्ड-ज्योति-परिवार के कर्म-ब्राह्मण सदस्यों ने अपनी जिम्मेदारी को जिस प्रशंसनीय ढंग से निवाहा है, उस पर हर्षोल्लास न सही, सन्तोष अवश्य प्रकट किया जा सकता है। अखबार पढ़ने के बुद्धि-विलास के लिए कोई इस परिवार का सदस्य नहीं बनता, कलेवर, मनोरंजन, आकर्षण आदि की दृष्टि में अखण्ड-ज्योति को एक घटिया पत्रिका कहा जा सकता है, उसमें बुद्धि विलासी लोगों को कुछ आकर्षण लगे ऐसी कोई बात दिखाई नहीं पड़ती। इस संगठन के सदस्य तो ब्राह्मण अभिरुचि के साथियों को एक सूत्र में आबद्ध होने, अपनी आन्तरिक स्थिति को अधिक अग्रगामी बनाने एवं मिल-जुलकर कुछ ठोस सेवा करने की दृष्टि से ही सम्मिलित होते हैं। अखण्ड-ज्योति पत्रिका तो इस योजना का एक संबंध सूत्र मात्र हैं
यह कार्य बिना विलम्ब, ढील और संकोच किये अब आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। जिनके पास अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वे इन्हीं पंक्तियों को व्रतधारी बनने का आमंत्रण समझें साथ ही उन स्वजनों तक यह संदेश पहुँचाने एवं उत्साहित करने का जिम्मा लें जिन तक पत्रिका नहीं पहुँचती है। प्रारम्भिक कार्य व्रतधारी धर्म सेवकों का संगठन व्यवस्थित करना है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-August
पता—’अखण्ड-ज्योति’ प्रेस,मथुरा
सबसे बड़ा पुण्य परमार्थ भी यही है। आस्तिकता एवं नैतिकता का प्रसार करके अखण्ड-ज्योति परिवार विश्व मानव की सर्वोत्कृष्ट सेवा कर रहा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-December
घाटे को पुरा करने के कोई अन्य अतिरिक्त साधन अपने पास नहीं हैं। अगले वर्ष अखण्ड-ज्योति में एक नया स्तम्भ आरम्भ होने जा रहा है-”गुरुदेव और उनकी दिव्य अनुभूतियाँ” इसमें उनकी अब तक की अविज्ञात और रहस्यमय अनुभूतियों की चर्चा रहेगी। जो अब तक प्रकाश में नहीं आई और जिन्हें जानने के लिए आमतौर से सभी परिजन लालायित रहते थे। दूसरे कुँडलिनी योग साधना जगत् की एक अद्भुत उपलब्धि है
अस्तु दूसरा ही मार्ग अपनाया जा रहा है। एक रुपया चन्दा बढ़ाना पड़ रहा है ? अब अखण्ड-ज्योति का चन्दा 6 रुपये के स्थान पर सात रुपया होगा। विवशता को देखते हुये प्रेमी परिजन इसे स्वीकार करेंगे ऐसा विश्वास है। इस चन्दा वृद्धि के साथ-साथ आगे कुछ पृष्ठ भी बढ़ाये जा रहे हैं और टाइटिल पृष्ठ भी अधिक मजबूत लगाने का सुधार किया जा रहा है
इस बार-इन दिनों अखण्ड-ज्योति के सामने एक ऐसा असमंजस भरा अवरोध आकर उपस्थित हो गया है जिसमें हम सबका चिंतित हो उठना स्वाभाविक है। सन् 71 में कागज की महँगाई बेहतर बढ़ी, स्याही के दामों में भी भारी वृद्धि हुई और छपाई कर्मचारियों के वेतन प्रायः 25 प्रतिशत बढ़ गये। इन परिस्थितियों में उसकी लागत प्रायः सवाई हो गई
अखण्ड-ज्योति का जन्म दिन वसन्त पंचमी है। युग-निर्माण पत्रिका का शुभारम्भ वसन्त पंचमी को हुआ। युग परिवर्तन का जन जागरण अभियान आन्दोलन इसी दिन से आरम्भ हुआ
जैसे ही कार्य पूरा हुआ प्रकृति ने अपनी नई व्यवस्था का क्रम जमा लिया सूर्य फिर से अपनी पूर्व-प्रखर पर आ जायेगा। (अखण्ड-ज्योति के पाठकों को यह स्मरण दिलाना समयोचित ही होगा कि गायत्री उपासना का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है अखंड-ज्योति में कई बार छप चुका है कि गायत्री सिद्ध हुये आत्मदर्शी पुरुष और सूर्य में कोई अन्तर नहीं होता दोनों तदाकार हो जाते हैं अतएव यह निर्विवाद सिद्ध है कि यह नया अवतार महान् सावित्री शक्ति (गायत्री तत्व या सूर्य शक्ति) का सिद्ध होगा। यह स्पष्ट संकेत है नये निर्माता की पहचान का)
इस अंक के साथ अपने जीवन का 33 वाँ वर्ष पूरा करके 34 वें वर्ष में प्रवेश करते हुए अखण्ड-ज्योति अपने प्रिय परिजनों का हार्दिक अभिनन्दन करती है। अनेक कठिनाइयों के बीच अब तक यह प्रकाश दीप जलता ही चला आ रहा है। इसका श्रेय स्वजनों की श्रद्धा, सद्भावना को ही दिया जा सकता है
यह प्रशिक्षण साधकों को कुछ अद्भुत उपलब्ध करा सकता है सो यह लेखमाला भी चलती ही रहनी है। विज्ञान और अध्यात्म का जो अद्भुत समन्वय अखण्ड-ज्योति ने प्रस्तुत किया है उससे विश्व भर के बुद्धिजीवी वर्ग में हलचल उत्पन्न हो गई और नास्तिकता का प्रवाह उस अद्भुत प्रतिपादन के कारण उलटकर आस्तिकता की ओर बहने लगा है। लोग इस सम्बन्ध में और भी अधिक पढ़ना-जानना चाहते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-March
1. “अखण्ड-ज्योति” का चन्दा, गायत्री और आर्ष साहित्य का पैसा मनीआर्डर, चेक, ड्राफ्ट “अखंड-ज्योति संस्थान” के नाम से भेजना चाहिये
8. पत्रिकायें न मिलने की शिकायत अखण्ड-ज्योति के लिये 15 तारीख के बाद और युग-निर्माण योजना के लिये 30 तारीख के बाद करनी चाहिये। साथ में ग्राहक नम्बर लिखना न भूलें कानूनी प्रतिबन्ध के कारण अब शिकायत पर भेजे जाने वाली पत्रिकायें 15 दिन बाद यहाँ से भेजी जाती हैं अतएव दुबारा पत्रिका के लिये 15 दिन की प्रतीक्षा करनी चाहिए
विमान ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी भारत का विज्ञान उल्लेखनीय प्रगति पर था। ब्रह्माण्ड विकास की जानकारी के लेख अखण्ड-ज्योति में पहले छप चुके है। प्रकाश की गति की जानकारी सर्व प्रथम 1675 में रोमर ने की थी इसके बाद 1925 में “माइकल सन” ने गणितीय सूत्रों के आधार पर प्रकाश की गति 186864 मील प्रति सेकेण्ड निकाला। यह जानकारियाँ बहुत हाल की हैं भारतीय ग्रन्थों का अवलोकन करते हुए हम मुनि आत्रेय की भागवत पढ़ते हैं तो उसमें प्रकाश की गति का मान निकालने वाली इकाइयाँ मिलती हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
अपने क्षेत्र में भ्रमण करके अखण्ड-ज्योति युग-निर्माण योजना के सभी ग्राहकों तथा पाठकों से संपर्क स्थापित करना चाहिए और उन्हें 17, 18, 19, 20 जून के सम्मेलन में मथुरा चलने के लिए आग्रह पूर्वक आमन्त्रित करना चाहिए, साथ ही तीर्थ यात्रा, दर्शन झाँकी करने के उद्देश्य से आने वाले स्त्री बच्चे तथा ऐसे लोगों को जिनका मिशन से कोई सम्बन्ध नहीं है केवल मनोकामना पूर्ण करने के प्रयोजन से आना चाहते हैं उन्हें निरुत्साहित करना चाहिए। मिशन से परिचित, सुशिक्षित और सक्रिय महिलाओं पर यह रोक नहीं है वस्तुतः यह आयोजन हमारे अनेक उत्तराधिकारी उत्तरदायित्वों का हस्तान्तरण आयोजन है। इससे हमारे शरीर से नहीं अन्तः करण से परिचित लोगों का आना ही उचित है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-August
(7) पत्रिकायें न मिलने की शिकायत अखण्ड-ज्योति के लिये 15 तारीख के बाद और युग-निर्माण योजना के लिये 30 तारीख के बाद करनी चाहिये। साथ में ग्राहक नम्बर लिखना न भूलें कानूनी प्रतिबन्ध के कारण अब शिकायत पर भेजे जाने वाली पत्रिकायें 15 दिन बाद यहाँ से भेजी जाती है अतएव दुबारा पत्रिका के लिए 15 दिन की प्रतीक्षा करनी चाहिए
अखण्ड-ज्योति के पिछले एक अंक में ध्यान की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालते हुए शिकागो के “टेड सेरियस” और उनके मित्र जोहन्स का उदाहरण दिया गया था। यह दोनों मित्र मिलकर इच्छा-शक्ति द्वारा हजारों मील दूर की फोटो कैमरे पर उतार देते हैं यही नहीं वे मानसिक एकाग्रता द्वारा युगों पूर्व घटित छोटी-सी छोटी घटना के कैमरा फोटो खींच देते हैं। कादम्बिनी के एक अंक में उनकी कल्पना द्वारा खींचा गया लाल किले का और फतेहपुर सीकरी के बुलन्द दरवाजे के चित्र छपे है जो लगभग हूबहू हैं
(1) “अखण्ड-ज्योति” का चन्दा, गायत्री और आर्ष साहित्य का पैसा मनीआर्डर, चेक, ड्राफ्ट, “अखण्ड-ज्योति संस्थान” के नाम से भेजना चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-May
विचार-क्रान्ति और वह भी एक सुदृढ़ संगठन शक्ति के आधार पर होने की बात विश्व की अनेक उच्च आत्मायें स्वीकार कर चुकी हैं। इस तरह की भविष्यवाणियाँ 'अखण्ड-ज्योति ' में छपी भी हैं, तथापि लोगों का ध्यान इस बात की ओर जाना स्वाभाविक ही है कि एक युग के क्षय और नवयुग के आगमन की सन्ध्या में मार्गदर्शक या अवतार की प्रक्रिया को कौन पूरा करेगा। कल्कि पुराण के आलंकारिक चित्रण को समझा जा सके तो उसमें वह सारे गूढ़ार्थ स्पष्ट है तथापि अनेक भविष्य वक्ताओं तथा योग-आत्माओं ने उस सम्बन्ध में भी प्रकाश डाला है। उन संकेतों के आधार पर पता लगाया जा सकता है कि कहीं कोई ऐसी सत्ता हम सबके समय में ही तो काम नहीं कर रही ? और हम उसे पहचान न पा रहे हों
निर्वाह व्यय माताजी उठायेंगी। जो महिला अपने को इसके लिए उपयुक्त समझें वे माताजी से अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर पत्र व्यवहार कर लें
हम अपने ऊपर अनेक अध्यात्मिक प्रयोग करेंगे और उसने परिणामों का इस मार्ग के पथिकों के सम्मुख प्रस्तुत करेंगे। हम दूर और अप्रत्यक्ष रहेंगे पर हमारे प्रयोगों का परिणाम माताजी के माध्यम से अखण्ड-ज्योति की पंक्तियों द्वारा सर्वसाधारण को विदित होता रहेगा। हमारा विश्वास है कि भौतिक विज्ञान के उत्साहवर्धक प्रशिक्षण की तरह आत्म-विज्ञान की सफल शिक्षा का द्वार भी अगले दिनों खुल ही जायगा और उसका ऐसा लाभ उपलब्ध हो सकेगा जिसके आधार पर मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न साकार किया जा सके। इस शोध कार्य के उत्तरदायित्व को अपने कंधे पर लेकर जाते हुए हमें इन वियोग की दर्द भरी घड़ियों में भी संतोष एवं गर्व का अनुभव हो रहा है
माताजी का प्यार और प्रकाश उन्हें समुचित मात्रा में मिलता रहेगा युग-निर्माण आन्दोलन का संचालन वे स्वयं करेंगी। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण हिन्दी पत्रिकाओं को हम जिस तरह संभालते थे उसी प्रकार वे उन्हें सम्भालेगी। इस कार्य के लिये उन्हें कुछ सहायकों की जरूरत पड़ेगी सो हमने व्यवस्था जमा ली है। अभियान का दिशा निर्धारण माताजी ठीक तरह करती रहेंगी
पाठकों को उस ज्ञान-गंगा के स्नान से वंचित न रहना पड़ेगा, जिसकी शीतलता और स्फुरणा से वे अब तक लाभान्वित होते रहे हैं। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकायें इसी प्रकार निकलती रहेंगी। हमारे मार्गदर्शक का-हमारा-प्रकाश माताजी के माध्यम से सर्व साधारण को प्रेरणा देने के लिए भविष्य में भी उपलब्ध रहेगा ; पर उसकी स्थूल प्रक्रिया जो अब तक चलती रही है एक प्रकार से बन्द हो जायगी। जो शक्ति हमारे हाथों से काम कराती रही, वही अब माताजी तथा उनके सहायकों द्वारा, जिनमें चि0 बलराम सिंह परिहार प्रमुख है- इस मशाल को प्रज्वलित रखेंगे और और पाठकों को जो बौद्धिक भोजन मिलता रहा है, उससे कम स्तर का नहीं ऊंचे ही स्तर का पोषण सिंचन मिलता रहेगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-July
यज्ञो द्वारा वायु-मण्डल के परिष्कार और जलवायु नियन्त्रण की बात तो अब हास्यास्पद समझा जाता है पर दरअसल आलोच्य यज्ञ करने और कराने वाले नहीं, वे तो आज नहीं तो कल निश्चित रूप से विश्व-संरक्षक माने ही जाने वाले हैं, दरअसल निन्दनीय तो आज की भौतिकता की वह बाढ़ है जो मनुष्य जाति को याँत्रिकता के रोग और धुँये की घुटन से भरती ही जा रही है। वायु-दूषण आज की मुख्य समस्या है उसे न रोका गया तो मानव अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है इस सम्बन्ध में अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में विस्तार से लिखा जाता रहा है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-June
विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि गुरुत्वाकर्षण केवल भार वाली पार्थिक वस्तुओं पर प्रभाव डालता है प्रकाश के अणु (फोटोन्स) और अग्नि स्फुल्लिंग उससे मुक्त होते हैं। सादृश्य और आर्न्तय का सिद्धान्त अखण्ड-ज्योति में वर्णन किया जा चुका है। उसी के अनुसार यज्ञ द्वारा उठी हुई लौ अपने साथ पदार्थों का सूक्ष्म अंश लेकर आकाश में उड़ जाता है और लाखों मील की दूरी पार कर सूर्य तक जा पहुँचता है। “यज्ञेनाप्यायिता देवा” यज्ञों से देवता सन्तुष्ट होते है-
ऐसे अनेक ऋषि महात्माओं का पता है जो हिमालय के बर्फीले प्राँतों में रहते हैं जहां पत्तियां भी खाने को नहीं मिलती। बंगाल की गिरिबाला का वर्णन अखण्ड-ज्योति में छप चुका है जिसने इसी साधना के अभ्यास से भूख से निवृत्ति पाली थी, उसे जीवन भर खाने की आवश्यकता नहीं पड़ी थी। विज्ञान भी यह मानता है कि अन्न का पोषण तत्व आकाश से आता है कोई सूक्ष्म विधि खोजली जाये तो उस तत्व को हवा से ही खींचा और शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है
अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में अमेरिका (शिकागो) के टेडसेरियस और जोहान्स द्वारा हजारों लाखों मील दूर और सैंकड़ों वर्ष हुई घटनाओं के कल्पना चित्र हू-ब-हू उतार देने का जिक्र किया है वह इस बात का प्रमाण है कि मन अपने तक सीमित क्षेत्र में ब्रह्मांड के प्रकाश-वर्षों की सीमाएं नाप सकने में समर्थ है वैदिक व्याख्यान माला में मन का “प्रचण्ड वेग” नामक प्रवचन में पंडित दामोदर सातवलेकर जी ने एक घटना का वर्णन किया है वह इस तथ्य का प्रकट करती है कि हम यदि ध्यान और विविध योग साधनाओं द्वारा अपने मन को सूक्ष्म पवित्र और नियंत्रित कर सकें तो वेद के अनुसार संसार के किसी भी क्षेत्र में होने वाली गतिविधि को संजय की दिव्य दृष्टि की तरह देख सकते हैं
(6) युग-निर्माण योजना तथा अखण्ड-ज्योति का सम्मिश्रित एक एक मासिक पत्र अन्य भाषाओं में भी छपने लगा है। गुजराती, मराठी, उड़िया, अंग्रेजी में प्रकाशित होने लगा है। बंगला, तमिल आदि अन्य भाषाओं में छपने की भी तैयारी है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-January
अब समय के प्रगति क्रम ने प्रत्येक जागृत आत्मा को कुछ नये कर्तव्य और उत्तरदायित्व सौंपे है। उनका स्वरूप, निर्वाह एवं उपक्रम जानने के लिए ‘पाक्षिक युग निर्माण का पढ़ना भी उतना ही आवश्यक हो गया है जितना अखण्ड-ज्योति का दोनों का परस्पर पूरक और अन्योन्याश्रित समझा जाय। उसे मँगाने, पढ़ने और पढ़ाने में उतना ही उत्साह अपनाया जाय जितना कि अब तक अखण्ड-ज्योति के लिए प्रदर्शित किया जाता रहा है। ‘पाक्षिक युग निर्माण’ गायत्री तपोभूमि मथुरा से निकलता है और उसका चन्दा आठ रुपया वार्षिक है
उनका स्वरूप, निर्वाह एवं उपक्रम जानने के लिए ‘पाक्षिक युग निर्माण का पढ़ना भी उतना ही आवश्यक हो गया है जितना अखण्ड-ज्योति का दोनों का परस्पर पूरक और अन्योन्याश्रित समझा जाय। उसे मँगाने, पढ़ने और पढ़ाने में उतना ही उत्साह अपनाया जाय जितना कि अब तक अखण्ड-ज्योति के लिए प्रदर्शित किया जाता रहा है। ‘पाक्षिक युग निर्माण’ गायत्री तपोभूमि मथुरा से निकलता है और उसका चन्दा आठ रुपया वार्षिक है। जो परिजन उसके सदस्य न हों नये वर्ष जनवरी से ही उसे मँगाने लगें
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजनों ने युग परिवर्तन की मशाल जलाने और ज्योति जगाने में अग्रगामी भूमिका निभाई-इस तथ्य और सत्य से विज्ञ समुदाय का हर व्यक्ति भली-भाँति अवगत है। विगत 43 वर्षों की लम्बी अवधि पर दृष्टिपात करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचाना पड़ता है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ की गणना लोकरंजन के लिए प्रचार विज्ञापन या उपार्जन के लिए निकलने वाली पत्रिकाओं के परिवार में नहीं हो सकती। उसका उदय अवतरण एक सुनिश्चित मिशन के रूप में- एक लक्ष्य विशेष के लिए हुआ था
युग सन्धि पर्व पर प्रज्ञा परिजनों को क्या सोचना और क्या जानना-मानना चाहिए। इसका प्रतिपादन अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर मिलता है। अब समय के प्रगति क्रम ने प्रत्येक जागृत आत्मा को कुछ नये कर्तव्य और उत्तरदायित्व सौंपे है। उनका स्वरूप, निर्वाह एवं उपक्रम जानने के लिए ‘पाक्षिक युग निर्माण का पढ़ना भी उतना ही आवश्यक हो गया है जितना अखण्ड-ज्योति का दोनों का परस्पर पूरक और अन्योन्याश्रित समझा जाय
अखण्ड-ज्योति परिजनों ने सदा से प्रज्ञा परिजन की भूमिका निभाई और नव सृजन के लिए नियमित रूप से योगदान दिया है। अब बढ़ती हुई आवश्यकताओं को देखते हुए उसमें अधिकाधिक अभिवृद्धि की आवश्यकता है। युग सन्धि पर्व का जागृत आत्माओं को विशेष रूप से यह आह्वान आमन्त्रण है कि वे निर्वाह और परिवार के दो उत्तरदायित्वों में एक तीसरा “नवनिर्माण” और सम्मिलित करें
अखण्ड-ज्योति ने ऐसे ही मणि मुक्तकों को जहाँ-तहाँ से ढूंढ़ा और हीरक हार की तरह उन्हें कलात्मक ढंग से गूँथ कर युग देवता की सौंदर्य सज्जा को बढ़ाया है। दूसरे शब्दों में उसे ऐसी पुष्प वाटिका की उपमा भी दी जा सकती है जिसमें एक से एक सुन्दर सुरभित फूलों को खिलते-महकते देखकर दर्शकों का मन हुलसता है। इस खिली पीढ़ी का विशिष्ट सौभाग्य यह है कि उनका उपयोग वेश्या ग्रहों में नहीं देवमन्दिरों में ही होता चला रहा है
उन्होंने सदाशयता को सींचने और दुष्टता को निरस्त करने के अनमेल प्रयासों की संगति बिठाई समन्वित नीति अपनाई थी। अखण्ड-ज्योति का प्रज्ञा परिवार प्रायः उसी मार्ग पर चलता और उज्ज्वल भविष्य के लक्ष्य तक जा पहुँचने के लिए समग्र साहस सँजोये हुए बढ़ता रहा है। प्रयास कितने बन पड़े और कितने सफल हुए इसका लेखा-जोखा रख सकना दूरवर्ती लोगों के लिए कठिन है। मूक साधना की प्रवृत्ति और उपलब्धि का पर्यवेक्षण मात्र अति निकटवर्ती लोगों के लिए ही सम्भव है
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजनों ने युग परिवर्तन की मशाल जलाने और ज्योति जगाने में अग्रगामी भूमिका निभाई-इस तथ्य और सत्य से विज्ञ समुदाय का हर व्यक्ति भली-भाँति अवगत है। विगत 43 वर्षों की लम्बी अवधि पर दृष्टिपात करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचाना पड़ता है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ की गणना लोकरंजन के लिए प्रचार विज्ञापन या उपार्जन के लिए निकलने वाली पत्रिकाओं के परिवार में नहीं हो सकती। उसका उदय अवतरण एक सुनिश्चित मिशन के रूप में- एक लक्ष्य विशेष के लिए हुआ था। यह कहने में कोई अत्युक्ति या दपोक्ति नहीं है कि इस लम्बी अवधि में व्रतशील तीर्थयात्री की तरह उसने प्रयाण क्रम को बिना थके-बिना डरे डगमगाये-अनेकानेक विघ्न बाधाओं को झेला और गतिशीलता को अनवरत जारी रखा है
लड़ाई छिड़ जाने पर तो एक ही बात ध्यान में रहती है जो साधन मौजूद है उन्हीं के सहारे आक्रान्त को धकेलने और सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने के लिए जो सम्भव हो कर गुजरा जाय। विगत 43 वर्षों से अखण्ड-ज्योति ने कुन्ती की तरह अपना परिवार सृजा सँजोया, पर अब तो समय के आह्वान पर उन सभी को कृष्ण के नेतृत्व में महाभारत की सृजन योजना में निछावर होने के लिए तिलक लगाना और विदा करना ही एक मार्ग है। सामान्य समय और आपत्ति काल का अन्तर तो समाधान ही होता है। एक में सामान्य निर्धारण चलता रहता है, पर दूसरे अवसर पर अन्यत्र से सामर्थ्य समेट कर एक ही केन्द्र पर नियोजित करनी होती है
अखण्ड-ज्योति परिवार में प्रज्ञा परिजनों की सौभाग्य भरी दूरदर्शिता देर-सवेरे में कोटि-कोटि कण्ठों द्वारा इसलिए सराही जायेगी कि उनने अँधेरे में दीपक जलाने जैसा साहस दिखाकर अपनी विशिष्टता एवं वरिष्ठता का परिचय दिया। साहस के धनी अनेकों होते हैं। उद्दण्ड आतंकवादी, दस्यु आततायी आये दिन दुस्साहस बरतते और दुष्टता करते देखे जाते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
जो समाचार-पत्र के स्वामी हों तथा जो अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
यह साधना की ओर गतिशील करने के लिए दिया गया एक सत्परामर्श है। आज के बहिर्मुखी चिन्तन करने वाले मानव, भटकावों में ले जाने वाली गतिविधियों में संलग्न साधक के लिए एक मार्गदर्शन है, जो विराट गायत्री परिवार के संस्थापक -संरक्षक ने 1940 की अखण्ड-ज्योति पत्रिका के जून अंक में संपादकीय के रूप में लिखा था। पढ़ें व आत्मचिन्तन करें

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-February
युगपरिवर्तन आन्दोलन का ताना-बाना बुनने वाले महाकाल के अग्रदूत परमपूज्य गुरुदेव ने आज से 30 वर्ष पूर्व ही जनवरी, 1969 की अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में ‘वसन्त पंचमी हमारा प्रधान पर्व’ शीर्षक से घोषणा की थी ‘अब से तीस वर्ष बाद युगपरिवर्तन का स्पष्ट स्वरूप अपनी झलक-झाँकी दिखाने लगेगा। ’ उक्त भविष्यवाणी
प्रस्तुत पंक्तियाँ 1989 की जून माह की अखण्ड-ज्योति से उद्धृत हैं। युगऋषि के चिन्तन से स्पष्ट जाना जा सकता है कि कितना स्पष्ट भविष्य का नक्शा उनके समक्ष रहा होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
अखण्ड-ज्योति दिसंबर 1987 में प्रकाशित)

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-March
पर हम मानते हैं कि भारत में दूध या मट्ठा आसानी से उपलब्ध हो सकता है, इसलिए इसके स्थान पर माँस मछली जैसे अखाद्यों को लेने की आवश्यकता नहीं है। और अखण्ड-ज्योति के पाठकों के लिए तो वह सर्वथा निरर्थक है। इसलिए नीचे की तालिका में माँस मछली का उल्लेख निकाल दिया गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-September
इस मास से ‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रत्येक अंक में गायत्री सम्बन्धी दो बड़े ही महत्वपूर्ण लेख रहा करेंगे। यह लेख माला एक डेढ़ वर्ष चालू रहेगी। आगे चल कर यह लेख माला दुष्प्राप्य हो सकती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-January
भैंस का दूध पौष्टिक तो है किन्तु कुछ देर से पचता है और आलस्य उत्पन्न करता है। दूध के विषय में विस्तृत जानकारी के लिए हमारी लिखी हुई पुस्तक “दूध की चमत्कारी शक्ति” “अखण्ड-ज्योति” कार्यालय से मँगाकर पढ़िए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-February
अक्सर देखा गया है कि कामवासना अनेक स्वप्नों के रूप में नाना प्रकार के रूप धारण कर रोगी के समाने आती है। स्वप्नों का अध्ययन करने के लिए हमारी पुस्तक “हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?” ‘अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय मथुरा से मंगाकर इस विज्ञान का विस्तृत ज्ञान प्राप्त कीजिए
पाँचों पुस्तकें एक साथ लेने पर डाक खर्च माफ। व्यवस्थापक-’अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय, मथुरा
गायत्री महाविज्ञान की विस्तृत जानकारी करने के लिए अब तक कोई ऐसा संकलन दृष्टि-गोचर नहीं हो रहा था जिसमें वह सब गायत्री संबंधी ज्ञान एकत्रित किया गया होता, जो विभिन्न शास्त्रों में फैला हुआ है। हर्ष की बात है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ ने इस कार्य को पूरा किया है। लगभग दो हजार ग्रन्थों का दश वर्ष में मंथन करके इस संबंध में महान ज्ञान एकत्रित किया गया है। उसे अब प्रकाशित करके सर्वसाधारण के लिए सुलभ बना दिया गया है
-व्यवस्थापक “अखण्ड-ज्योति” कार्यालय, मथुरा
(2) आसन तथा प्राणायाम- लेखक-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ‘अखण्ड-ज्योति’ मथुरा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-November
इस सम्बन्ध में विस्तार से अन्यत्र लिखा जाय। जल का प्रयोग कैसे हो इस सम्बन्ध में अखण्ड-ज्योति में इसी वर्ष लेख छप चुका है। भोजन क्या-क्या खायें, क्या-क्या न खायें, कौन भोजन एक साथ खायें कौन नहीं, यह भी जनवरी 49 के अंक में छप चुका है। तो भी संक्षेप में क्षयी निम्न लिखित इलाज करें
व्यवस्थापक- “अखण्ड-ज्योति” मथुरा
आगामी वर्ष जनवरी 50 में ‘अखण्ड-ज्योति’ ने ‘आर्थिक सफलता-अंक’ प्रकाशित करने का निश्चय किया है। मनुष्यों की अनेक कठिनाइयाँ इस कारण हैं कि वे रुपये का कमाना सदुपयोग, व्यय करना या बचत करना नहीं जानते। सर्वाधिक संतोष प्राप्त करने के लिए पारिवारिक आय व्यय, वास्तविक एवं कृत्रिम आवश्यकताएँ, बजट, रहन-सहन ऊँचा करने की विधि, मनोरंजन इत्यादि सभी का ज्ञान आवश्यक है
-अपनी धरणी के आस-पास चक्कर लगाने की एक मात्र गति करने के लिए ही मानव का आत्मा नहीं सृजित हुआ है, अखण्ड-ज्योति के भंडार रूप सत्य के सूर्य की भी वह प्रदक्षिणा करता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-October
पाठकों को यह जान कर प्रसन्नता होगी कि “अखण्ड-ज्योति” का जनवरी सन् 50 का अंक “आर्थिक सफलता अंक” होगा। इसमें आर्थिक कठिनाइयों से पार करने, समृद्ध जीवन बिताने के संबंध में महत्वपूर्ण सुझाव दिये जायेंगे। इस अंक का सम्पादक प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए. करेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-July
अपने-अपने स्थान पर सभी का महत्व होता है। भोजन करना, जल पीना आदि साधारण बात हैं किन्तु इन्हीं के उचित तथा अनुचित प्रयोग पर हमारा स्वास्थ्य तथा अस्वास्थ्य किस प्रकार निर्भर है यह बात ‘अखण्ड-ज्योति’ इस वर्ष के पिछले अंकों में छाप चुकी है। आज हम आपको पैखाने तथा पेशाब के संबंध में कुछ बतायेंगे। इन चीजों को घिनौनी कहकर हमें उपेक्षा न करनी चाहिए

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-May
यज्ञोपवीत संबंधी दो बड़ी ही महत्वपूर्ण पुस्तकें अखण्ड-ज्योति प्रेस से इसी मास प्रकाशित हुई हैं। (1) भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र यज्ञोपवीत। (2) यज्ञोपवीत से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-July
इन शब्दों पर संभवतः उस समय बिरलों का ध्यान गया होगा पर जिस प्रकार सूक्ष्मीकरण साधना के तुरन्त बाद उनने अपनी गतिविधियों में तीव्रता लाकर भारत भर में राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों तथा दीपयज्ञों का ताना-बाना बुना था, शाँतिकुँज परिवार में विस्तार-क्रम आरंभ किया था और फिर क्रमशः अपने सारे उत्तरदायित्व वंदनीय माताजी को सौंपते हुए इस वर्ष वसंत पंचमी से मिलने-जुलने का क्रम बन्द कर दिया था, उससे भली-भाँति पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। इस वर्ष की जनवरी एवं मार्च की अखण्ड-ज्योति जिनने पढ़ी हो तथा अप्रैल की इक्कीसवीं सदी लेखमाला का अवलोकन किया जो, उन्हें अनुमान हो गया होगा कि वसंत पर्व पर महाकाल के संदेश में दिये गये निराकरणों का ही उनमें निर्वाह हुआ था। सभी में स्पष्ट संकेत था कि वे अब सूक्ष्म शरीर की सत्ता से ही सक्रिय रह परिजनों के और निकट आ जायेंगे एवं इस वर्ष कभी भी अपनी पार्थिव देह छोड़ सकते हैं
हर परिजन को यह नियमित अंक के रूप में अगस्त अंत तक उपलब्ध हो जायेगा। इसका आकार वर्तमान अखण्ड-ज्योति से लगभग चार गुना होगा तथा पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व एवं कर्त्तृत्व संबंधी दुर्लभ चित्र अनुभूतियाँ एवं लेख उसमें होंगे। परिजन उसकी प्रतीक्षा करें
परम पूज्य गुरुदेव की पावन स्मृति में श्रद्धांजलि स्वरूप आगामी अगस्त-सितंबर माह का अखण्ड-ज्योति पत्रिका का संयुक्तांक प्रकाशित होगा जो परिजनों को अगस्त अंत तक मिलेगा। यह नियमित पत्रिका से काफी बड़े आकार का व रंगीन होगा। सभी नियमित पाठकों की यह विशेषाँक प्राप्त होगा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
उस दिन वह घीयामंडी के अखण्ड-ज्योति कार्यालय में बैठे मिशन की भावी रूप-रेखा पर चिन्तन कर रहे थे। पता नहीं क्या सोचकर बड़ी सरलता से पास बैठे एक स्वयं सेवक से पूछा-”क्यों जी तुम्हीं कुछ बताओ, मिशन को विस्तार कैसे दिया जा सकता है?” स्वयं सेवक ने थोड़ा सोचते हुए कहा-”यदि शिक्षक और चिकित्सक इस काम में सहयोग करने लगें तो प्रगति दूनी हो जायेगी। क्योंकि इन्हीं दोनों वर्गों से समाज उपकृत रहता है
पूज्य गुरुदेव ने “अखण्ड-ज्योति के शुभारंभ के साथ ही अपनी लेखनी यदि “मैं क्या हूँ” जैसे जटिल, आत्मोपनिषद् प्रधान विषय पर चलाई थी तथा परलोक लीला एवं सम्मोहन विद्या के झुनझुने कौतुकी लोगों के लिए बजाए थे तो दाम्पत्य जीवन की निर्मलता एवं गृहस्थ को तपोवन समान बना कर जीना चाहिए। इन विषयों पर विशद विवेचन भी किया था। उद्देश्य एक ही था-पुरुष अपने घर में बैठी अपनी पत्नी को यथोचित सम्मान देना सीखें, नारी शक्ति की महत्ता को पहचानें व उन्हें भी आगे बढ़ने के उपयुक्त अवसर प्रदान करने के लिए मात्र बच्चे जनने की मशीन न बनकर उन्हें बराबर का साझीदार बनाएँ
यह एक महज संयोग नहीं है कि इन दिनों जो कार्यकर्ताओं की एक सशक्त टीम पूज्य गुरुदेव के बाद गुरुतर दायित्वों को सँभाल रही है एवं वंदनीया माताजी के मार्गदर्शन में उन सब निर्धारणों को क्रिया रूप दे रही है जो पूज्य गुरुदेव अदृश्य जगत से सौंप रहे हैं, वह प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों की अग्नि परीक्षा से गुजर चुकी है। अगस्त 1972 की अखण्ड-ज्योति में उनने लिखा है कि “प्रत्यावर्तन तप की पूँजी का वितरण है। जिन भाग्यवानों को इसका थोड़ा सा भी अंश मिल सका, वे निश्चित रूप से उसके लिए अपने भाग्य की सराहना जन्म-जन्मान्तरों तक करते रहेंगे
इतना बड़ा समुदाय जो प्रज्ञापरिवार, गायत्री परिवार के रूप में अखण्ड-ज्योति, युगशक्ति गायत्री के पाठकों के परिकर के रूप में दिखाई देता है उसने इस सत्संकल्प की संजीवनी द्वारा ही स्वयं को उस स्तर तक पहुँचाया है, जहाँ वे आते हैं
बाद का निर्धारण उनके गुरुदेव करेंगे। एक लेख सन् 1962 की अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित हुआ था-”हमारे भावी सवा नौ वर्षों का कार्यक्रम। ”उनने तब तक घोषणा नहीं की थी कि अपने आयुष्य का 60 वर्ष पूरा होते ही वे मथुरा से प्रयाण कर हमेशा के लिए हिमालय की गोद में जा बैठेंगे किंतु अपनी सीमा रेखा का तभी निर्धारण कर लिया था। एक पत्र जो उनने उन दिनों एक परिजन को लिखा था, विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है
प्रस्तुत कविता की पंक्तियाँ ली गयी हैं अखण्ड-ज्योति अप्रैल 1963 के अंक से व यह बताती है कि सूत्र संचालक ने कितनी अंतः पीड़ा के साथ इन्हें अपनी पत्रिका में प्रकाशित किया होगा। वस्तुतः “नारी जागरण अभियान” स्वयं में एक ऐसा आंदोलन है जिसका शुभारंभ कर, गति देकर लाखों आंदोलन है जिसका शुभारंभ कर, गति देकर लाखों महिलाओं में प्रगति की उमंग भर देने का जो पुरुषार्थ सूत्र संचालक पूज्य युगनिर्माताओं की श्रेणी में बिठा देता है। आधी जनशक्ति के दमन, शोषण, उत्पीड़न पर वस्तुतः पिछले दो हजार वर्षों में कहा तो बहुत गया पर उसे जनांदोलन का रूप छुट-पुट स्तर पर ही दिया गया
ये पंक्तियाँ पूज्य गुरुदेव की अखण्ड-ज्योति पत्रिका से उद्धृत की गयी हैं जो सन् 1953 में प्रकाशित हुई थी। लेखनी का जादूगर, शब्दों का शिल्पी, नाचते-उछलते हृदयों को झकझोरते वाक्यों की रचना करने वाला, क्या उक्ति दें इस महामानव को! समझ में नहीं आता। सरकस में देखा जाता है कि सधे हुए जानवर रिंग मास्टर के इशारे पर सारे करतब दिखाते हैं
दूसरे निर्देश था कि इस दीपक के सम्मुख अब अखण्ड जप का आयोजन किया जाय और दस वर्षों में 24 लक्ष के 24 और अनुष्ठान कराने का उपक्रम बनाया जाय। तीसरा निर्देश था कि अखण्ड दीप और अखण्ड जप जहाँ रहें वहीं के संस्कार लेकर ही “अखण्ड-ज्योति “पत्रिका प्रकाशित हो
अनुकरण में वे अपने यहाँ दीप जला लें तो फिर उसे “सिद्ध ज्योति” जैसा बनाने का पुरुषार्थ भी करें। यदि यह न बन पड़े जो कि असंभव ही है क्योंकि दीप जलाने के साथ जो तप साधना जुड़ी है, वह भी स्वयं की, वह कर पाना हरेक के लिए शक्य नहीं है, तो उस अखण्ड दीप व अखण्ड-ज्योति से लाभ उठायें जो क्रमशः प्रत्यक्ष अग्नि व लेखनी रूपी संजीवनी के रूप में उनके समक्ष प्रस्तुत है। तीर्थों का जो महत्व होता है, उससे कहीं अधिक महत्व ऐसी सिद्ध ज्योति का है जिसमें तिल-तिल कर एक साधक ने अपना जीवन होम किया व न केवल अपनी कुण्डलिनी जाग्रत की विश्वात्मा की कुण्डलिनी जगाने हेतु सूक्ष्मीकृत-घनीभूत हो जो अभी भी परोक्ष जगत में सक्रिय है
जनवरी 1987 का अखण्ड-ज्योति अंक “कुण्डलिनी जागरण विशेषाँक” था। इसमें व्यष्टिगत और समष्टिगत नवसृजन के निमित्त किये जाने वाले साधना पराक्रम का सचित्र, शास्त्रोक्त एवं विज्ञान सम्मत प्रतिपादन था। एक गूढ़ विषय पर एक सरल सुबोध व्याख्या परिजनों के समक्ष आयी
बसंत पर्व 1988 के अखण्ड-ज्योति विशेषाँक में “ ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं” शीर्षक से एक लेख में उनने लिखा सोचा जाता है कि गुरुजी 80 वर्ष का आयुष्य पूरा करना चाहते हैं। इस दृष्टि से माता ही भी उतनी आयु का लाभ ले सकेंगी जितनी कि गुरुदेव। इस महाप्रयाण का समय अब बहुत दूर नहीं है
प्रस्तुत पुस्तक जैसा कि परिजन जानते हैं पूज्य गुरुदेव द्वारा अपने 1960-61 के अज्ञातवास में लिखी गयी लेख माला “साधक की डायरी के पृष्ठ”, “कोई एक” के संस्मरण तथा “सुनसान के सहचर” के रूप में अखण्ड-ज्योति के सन् 1960 व 61 के अंकों में प्रकाशित हुई थीं। इसमें उन्होंने प्रकृति व हिमालय को जितना समीप से देखा व उसका अध्ययन कर अपनी अभिव्यक्ति शब्दों के रूप में की है वह अत्यन्त भावभरी व बार-बार पढ़ने योग्य है। हरीतिमा व पहाड़, उस पर भी हिमालय से उन्हें अत्यधिक लगाव था
“अखण्ड-ज्योति” निरन्तर जलती रही व पूज्य गुरुदेव की चिन्तन चेतना सभी पाठकों का दैनन्दिन जीवन में मार्गदर्शन करती रही। जनवरी 1972 में बंगला देश के मुक्ति युद्ध के समापन के बाद अल्प अवधि के लिए पूज्य गुरुदेव शाँतिकुँज अचानक आए एवं माताजी को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन देकर फिर चले गए। जून 1972 में अपनी गुरु सत्ता के मार्गदर्शन पर सप्तऋषियों की तपस्थली में रह कर ऋषि परम्परा का बीजारोपण कर देवमानवों को विनिर्मित करने हेतु अपना प्रचण्ड तपोबल संचित कर वापस लौट आए
जिसमें परिजनों को उनने अस्सी ब्रह्मकमल खिलने व अपने जीवन का प्रथम अध्याय समाप्त होने की बात कही। यही प्रसंग मार्च 1990 अखण्ड-ज्योति के सम्पादकीय एवं अप्रैल 1990 की पत्रिका में दी गयी विशेष लेखमाला “इक्कीसवीं सदी में हमें क्या करना होगा” के अंतर्गत दिये गये “हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े हैं” शीर्षक लेख में उनकी लेखनी से प्रकट हुआ। वे लिखते हैं-”दृश्य शरीर रूपी गोबर कि मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिए नियुक्त किया गया प्रहरी अगली शताब्दी तक पूरी जागरूकता के साथ अपनी जिम्मेदारी वहन करता रहेगा। ” आगे के शब्द उन्हीं की लिपि में यथा रूप प्रस्तुत हैं
सूक्ष्मीकरण की एकाकी तप साधना पूज्य गुरुदेव के जीवनकाल एवं मिशन के इतिहास का एक अतिमहत्त्वपूर्ण मोड़ है। इस अवधि में उनकी तप साधना सूक्ष्म रूप से पाँच वीरभद्रों को क्रियाशील बनाने में लगी रही व लेखनी” अखण्ड-ज्योति” एवं” युगशक्ति-गायत्री” के माध्यम से हर प्रज्ञा परिजन के मन को सतत् मथती रही। इसी दौरान सन 1985 का वर्ष उनकी आयुष्य का पचहत्तरवां वर्ष होने के कारण ही रजत जयन्ती वर्ष मनाया गया एवं इसी वर्ष अप्रैल 1985 में उनने अपने जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों पर पहली बार प्रकाश डाला। इन्हीं लेखों व सूक्ष्मीकरण साधना के अंतर्गत लिखे गये लेखों का समन्वित रूप उनकी पुस्तक “ हमारी वसीयत और विरासत” के रूप में नवम्बर 1986 में प्रकाशित हुआ
महायज्ञ के बाद अगले वर्ष ही 1959 की गायत्री जयंती पर उनने पहली महती जिम्मेदारी वंदनीय माताजी के कंधों पर डाली। वह भी अखण्ड-ज्योति के संपादन की। 2 वर्ष तक अपनी हिमालय यात्रा एवं आर्ष ग्रन्थों के भाष्य हेतु बाहर रहने के कारण वे परोक्ष मार्गदर्शन वंदनीया माताजी का करते रहे किन्तु सारा प्रत्यक्ष दायित्व वंदनीया माताजी ने बड़ी कुशलतापूर्वक सँभाला। यहीं से उन्हें दस वर्ष बाद सौंपे जाने वाले अति महत्वपूर्ण कार्य की नींव पड़ चुकी थी
क्रमशः गायत्री व यज्ञ का प्रतिपादन करते-करते उनने नारी पाठकों को याद दिलाया कि वे अपनी गरिमा को पहचानें। जून सन् 1959 की अखण्ड-ज्योति में वे लिखते हैं कि वैदिककाल में ऋषिकाएँ ही समाज की विभिन्न गतिविधियों का संचालन करती थीं। सभी ब्रह्मवादिनी थी। तथा कइयों ने मंत्रों की रचना तक की है
तीनों की उपमा पूज्य गुरुदेव अमृत, पारस कल्पवृक्ष के रूप में दिया करते थे। पूज्यवर अखण्ड-ज्योति (जनवरी 1972) में वंदनीया माता जी के माध्यम से कहते हैं कि गायत्री मंत्र अमृत है जिसे पीकर हमारी सत्ता अजर-अमर, देवतुल्य हो गई। हिमालय वह पारस है जिसने हमें मानव से देवमानव, अवतारी पुरुष बना दिया, दूसरों को लोहे से स्वर्ण में परिणत करने की सिद्धि प्रदान कर दी। इस हिमाच्छादित धवल ऊँचाई को पाकर ही हम दूसरों की जलन को, तपन को मिटाने योग्य सिद्धि अर्जित कर पाए
1940-49 का समय था। अखण्ड-ज्योति हाथ के कागज से छपने के बाद कुछ ही दिन पूर्व अखबारी कागज पर छपने की स्थिति में आई थी। आर्थिक संकट यथावत था
यह प्रामाणिकता ही उस अखण्ड-ज्योति का प्राण हैं जो आज तक अगणित व्यक्तियों में प्राण संचार करती आयी है। गुरुदेव “स्नेह से सनी एक सोने की लौ” अपने पास रखते थे जिसे ज्योति के रूप में अपने प्रियजनों तक हर माह एक पाती की तरह पहुँचा देते थे। इसी ने उन सभी को उनका अपना बनाया
बाद में मोदी जी सन 1950 में गुरुदेव के पास घीयामण्डी आए। गुरुदेव ने अखण्ड दीपक के पास ले जाकर कहा मेरी “अखण्ड-ज्योति” यह है। इस दिव्य प्रकाश ने ही वह मनोबल प्रदान किया है, जो प्रकाशन का मूल प्राण है
(अखण्ड-ज्योति, जुलाई 1959 पृष्ठ 25)
नाम चुनने के लिए कोई ऊहापोह नहीं करनी पड़ी। जो अखण्ड-ज्योति उनने पंद्रह वर्ष की आयु में प्रदीप्त की थी, जिसके प्रकाश में उन्हें सूक्ष्म शरीरधारी सत्ता के दर्शन हुए थे, उसी प्रकाशपुँज को लक्ष्य रख उनने पत्रिका का नाम “अखण्ड -ज्योति” रख दिया। यही तो उनकी प्रेरणा का मूल स्रोत था
(अखण्ड-ज्योति)
तुम सबको हमारा काम आगे बढ़ाना है। ” पूज्य गुरुदेव ऐसी ही परिस्थितियों में अप्रैल 1971 की अखण्ड-ज्योति में भाव भरे अन्तः करण से कहते हैं ”अपनी कमजोरी को हम छिपाते नहीं। हमारा अन्तःकरण अति भावुक ओर मोह ममता से भरा पड़ा है। जहाँ तनिक सा स्नेह मिलता है, मिठास को तलाश करने वाली चींटी की तरह रेंगकर वहीं जा पहुँचता है
वंदनीया माता जी को मातृत्व की उदात्त गरिमा से भरा-पूरा बताते हुए मई 1971 की अखण्ड-ज्योति में उनने लिखा कि “जून के बाद माताजी शाँतिकुँज हरिद्वार रहेंगी। अखण्ड घृतदीप उनके साथ चला जायेगा। वे भी 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण संपन्न करेंगी
मैं आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानता हूँ”- यही थीं प्रथम पंक्तियाँ उस अधिकृत सत्संकल्प की, घोषणा पत्र की जिसे युग निर्माण योजना का प्रारम्भिक उद्घोष कहा जा सकता है। मार्च 1962 की अखण्ड-ज्योति में पहली बार पूज्य गुरुदेव ने इस सत्संकल्प एवं शुभ अवसरों पर इसे सामूहिक रूप से पढ़ा जाय। सभी परिजनों, पंजीकृत शाखाओं को एवं ज्ञान मंदिर चलाने वाले परिजनों को उद्बोधन करते हुए सितम्बर 1962 के अंक में लिखा गया कि यह वह विचार बीज है जिसके आधार पर युग निर्माण की संभावनाएँ सुनिश्चित होंगी
दिव्य “अखण्ड-ज्योति” दी तुमने, घर-घर फैला उजियारा। “युग-निर्माण” लक्ष्य जीवन का, सत्संकल्प तुम्हें प्यारा॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-April
अखण्ड-ज्योति पत्रिका अपने परिवार के हर शिक्षित सदस्य को पढ़नी और अशिक्षित को सुनानी चाहिए। यह अनुष्ठान प्रस्तुत महाअभियान के सूत्र संचालक को नित्य अपने घर बुलाने और उसका एक प्रवचन नित्य सुनने के समान सशक्त प्रेरणाप्रद है। इसके लिए जो खर्च करना पड़ता है वह इतना कम है कि महीन में एक बार हलका जलपान करा देने से अधिक नहीं बैठता

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-October
” कितना आश्वासन देता था यह कथन उस व्यक्ति को जो कर्म, बंधन, मोक्ष की ऊहापोह में फँसा इधर-उधर भटकता रहा था। अपनी समस्या पत्र पाते ही सुलझती देख सहज ही भावनाशील परिजन कभी कभी कुछ राशि “अखण्ड-ज्योति संस्थान” के नाम भेज देते, तब उनका जवाब होता था- “आपका भेजा हुआ (211) का मनीआर्डर मिला। आपके पैसे इतनी उच्चकोटि की श्रद्धा से भरे होते हैं कि उनको व्यक्तिगत उपयोग में लाते हुए हमारा अन्तःस्तल काँप जाता है। इन्हें पचाने के लिए उच्चकोटि का ऋषित्व अपने अन्दर होना आवश्यक है
12-11-1953 को एक अखण्ड-ज्योति पाठक को लिखे एक पत्र में पूज्य आचार्य श्री लिखते हैं “आप हमें हमारी आत्मा के समान प्रिय हैं। हम सदा आपके समीप हैं। जिस क्षण भी आप आवश्यकता समझें, आपके घर पहुँचने को अविलम्ब, तत्पर हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-December
विश्वास किया जाना चाहिए, अखण्ड-ज्योति विद्या विस्तार का मेरुदण्ड है। कोई भी ऐसा शिक्षित घर नहीं बचना चाहिए, जहाँ अखण्ड-ज्योति पढ़ी और सुनी न जाती हो। युग शक्ति गायत्री आदि अन्य सभी भाषाओं की पत्रिकाओं के लिए भी यही बात है क्योंकि वे अखण्ड-ज्योति का ही रूप हैं
यदि पत्रिका के सदस्यों की संख्या न बढ़ाई गई, तो यह आर्थिक दबाव दिनों-दिन बढ़ता रहेगा और बार-बार परिवर्तनों की आशंका बनी रहेगी। अतएव अपने सभी परिजनों से इस वर्ष व्यक्तिगत अभिरुचि लेकर अखण्ड-ज्योति और अन्य पत्रिकाओं की सदस्य संख्या बढ़ाने की अपील की जा रही है। सदस्य बनाने का क्रम चाहे एकाकी पुरुषार्थ के बल पर हो या टोलीबद्ध प्रयत्नों द्वारा रसीद बुकें अखण्ड-ज्योति संस्थान घीयामण्डी मथुरा से अथवा शाँतिकुँज हरिद्वार से मँगा लेनी चाहिए, उससे शुल्क संग्रह में सुविधा रहेगी
आत्मीय कुटुम्बियों को ज्ञात होगा, परम पूज्य गुरुदेव की स्मृति में निकाला गया अगस्त सितम्बर अखण्ड ज्योति विशेषांक 240 पेज अर्थात् चार अखण्ड-ज्योति पत्रिकाओं के बराबर का है। 84 पृष्ठ के आफसेट रंगीन चित्र और लगभग उतने ही श्वेत-श्याम चित्रों के ब्लॉक है। उसे निकालने में कागज छपाई, ब्लॉक प्रोसेसिंग आदि में प्रायः पच्चीस लाख रुपयों का बैंकों का कर्ज हो गया है
संजीवनी विद्या विस्तार जैसे आज के सर्वाधिक महत्व के विषय पर सामग्री कम करने का औचित्य कोई भी स्वीकार नहीं कर रहा है। इस स्थिति में अखण्ड-ज्योति के वार्षिक चन्दे में न्यूनतम वृद्धि की जा रही है जैसे कि पूर्व में सूचना दी गयी थी, अब उसका चन्दा 35/- वार्षिक होगा, आजीवन सदस्यता शुल्क 500/- रखा गया है। अन्य पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में आज भी अखण्ड-ज्योति का चन्दा बिलकुल कम है। किसी भी छोटी से छोटी पत्रिका का भी चन्दा 3.50 प्रति अर्थात् 42/- वार्षिक से कम नहीं हैं, जबकि उनके कलेवर और गेट अप में भी जमीन आसमान का अन्तर है
इस स्थिति में अखण्ड-ज्योति के वार्षिक चन्दे में न्यूनतम वृद्धि की जा रही है जैसे कि पूर्व में सूचना दी गयी थी, अब उसका चन्दा 35/- वार्षिक होगा, आजीवन सदस्यता शुल्क 500/- रखा गया है। अन्य पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में आज भी अखण्ड-ज्योति का चन्दा बिलकुल कम है। किसी भी छोटी से छोटी पत्रिका का भी चन्दा 3.50 प्रति अर्थात् 42/- वार्षिक से कम नहीं हैं, जबकि उनके कलेवर और गेट अप में भी जमीन आसमान का अन्तर है। इन परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए अपने कुटुम्बियों से इस सामान्य मूल्य वृद्धि को सहर्ष स्वीकार करने का हार्दिक अनुरोध है
उनके जीवन के वह अछूते प्रसंग जो अब तक अविज्ञात रहे हैं, अब अखण्ड ज्योति में परिजनों को नियमित रूप से पढ़ने को मिलते रहेंगे। विश्वास किया जाना चाहिए, अखण्ड-ज्योति विद्या विस्तार का मेरुदण्ड है। कोई भी ऐसा शिक्षित घर नहीं बचना चाहिए, जहाँ अखण्ड-ज्योति पढ़ी और सुनी न जाती हो। युग शक्ति गायत्री आदि अन्य सभी भाषाओं की पत्रिकाओं के लिए भी यही बात है क्योंकि वे अखण्ड-ज्योति का ही रूप हैं
कोई भी ऐसा शिक्षित घर नहीं बचना चाहिए, जहाँ अखण्ड-ज्योति पढ़ी और सुनी न जाती हो। युग शक्ति गायत्री आदि अन्य सभी भाषाओं की पत्रिकाओं के लिए भी यही बात है क्योंकि वे अखण्ड-ज्योति का ही रूप हैं
अतएव अपने सभी परिजनों से इस वर्ष व्यक्तिगत अभिरुचि लेकर अखण्ड-ज्योति और अन्य पत्रिकाओं की सदस्य संख्या बढ़ाने की अपील की जा रही है। सदस्य बनाने का क्रम चाहे एकाकी पुरुषार्थ के बल पर हो या टोलीबद्ध प्रयत्नों द्वारा रसीद बुकें अखण्ड-ज्योति संस्थान घीयामण्डी मथुरा से अथवा शाँतिकुँज हरिद्वार से मँगा लेनी चाहिए, उससे शुल्क संग्रह में सुविधा रहेगी
दो ही विकल्प बचे हैं, या तो अखण्ड-ज्योति के पृष्ठ कम किये जायें या फिर चन्दा बढ़ाया जाये। संजीवनी विद्या विस्तार जैसे आज के सर्वाधिक महत्व के विषय पर सामग्री कम करने का औचित्य कोई भी स्वीकार नहीं कर रहा है। इस स्थिति में अखण्ड-ज्योति के वार्षिक चन्दे में न्यूनतम वृद्धि की जा रही है जैसे कि पूर्व में सूचना दी गयी थी, अब उसका चन्दा 35/- वार्षिक होगा, आजीवन सदस्यता शुल्क 500/- रखा गया है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
उस दिन वह घीयामंडी के अखण्ड-ज्योति कार्यालय में बैठे मिशन की भावी रूप-रेखा पर चिन्तन कर रहे थे। पता नहीं क्या सोचकर बड़ी सरलता से पास बैठे एक स्वयं सेवक से पूछा-”क्यों जी तुम्हीं कुछ बताओ, मिशन को विस्तार कैसे दिया जा सकता है?” स्वयं सेवक ने थोड़ा सोचते हुए कहा-”यदि शिक्षक और चिकित्सक इस काम में सहयोग करने लगें तो प्रगति दूनी हो जायेगी। क्योंकि इन्हीं दोनों वर्गों से समाज उपकृत रहता है
पूज्य गुरुदेव ने “अखण्ड-ज्योति के शुभारंभ के साथ ही अपनी लेखनी यदि “मैं क्या हूँ” जैसे जटिल, आत्मोपनिषद् प्रधान विषय पर चलाई थी तथा परलोक लीला एवं सम्मोहन विद्या के झुनझुने कौतुकी लोगों के लिए बजाए थे तो दाम्पत्य जीवन की निर्मलता एवं गृहस्थ को तपोवन समान बना कर जीना चाहिए। इन विषयों पर विशद विवेचन भी किया था। उद्देश्य एक ही था-पुरुष अपने घर में बैठी अपनी पत्नी को यथोचित सम्मान देना सीखें, नारी शक्ति की महत्ता को पहचानें व उन्हें भी आगे बढ़ने के उपयुक्त अवसर प्रदान करने के लिए मात्र बच्चे जनने की मशीन न बनकर उन्हें बराबर का साझीदार बनाएँ
यह एक महज संयोग नहीं है कि इन दिनों जो कार्यकर्ताओं की एक सशक्त टीम पूज्य गुरुदेव के बाद गुरुतर दायित्वों को सँभाल रही है एवं वंदनीया माताजी के मार्गदर्शन में उन सब निर्धारणों को क्रिया रूप दे रही है जो पूज्य गुरुदेव अदृश्य जगत से सौंप रहे हैं, वह प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों की अग्नि परीक्षा से गुजर चुकी है। अगस्त 1972 की अखण्ड-ज्योति में उनने लिखा है कि “प्रत्यावर्तन तप की पूँजी का वितरण है। जिन भाग्यवानों को इसका थोड़ा सा भी अंश मिल सका, वे निश्चित रूप से उसके लिए अपने भाग्य की सराहना जन्म-जन्मान्तरों तक करते रहेंगे
इतना बड़ा समुदाय जो प्रज्ञापरिवार, गायत्री परिवार के रूप में अखण्ड-ज्योति, युगशक्ति गायत्री के पाठकों के परिकर के रूप में दिखाई देता है उसने इस सत्संकल्प की संजीवनी द्वारा ही स्वयं को उस स्तर तक पहुँचाया है, जहाँ वे आते हैं
बाद का निर्धारण उनके गुरुदेव करेंगे। एक लेख सन् 1962 की अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित हुआ था-”हमारे भावी सवा नौ वर्षों का कार्यक्रम। ”उनने तब तक घोषणा नहीं की थी कि अपने आयुष्य का 60 वर्ष पूरा होते ही वे मथुरा से प्रयाण कर हमेशा के लिए हिमालय की गोद में जा बैठेंगे किंतु अपनी सीमा रेखा का तभी निर्धारण कर लिया था। एक पत्र जो उनने उन दिनों एक परिजन को लिखा था, विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है
प्रस्तुत कविता की पंक्तियाँ ली गयी हैं अखण्ड-ज्योति अप्रैल 1963 के अंक से व यह बताती है कि सूत्र संचालक ने कितनी अंतः पीड़ा के साथ इन्हें अपनी पत्रिका में प्रकाशित किया होगा। वस्तुतः “नारी जागरण अभियान” स्वयं में एक ऐसा आंदोलन है जिसका शुभारंभ कर, गति देकर लाखों आंदोलन है जिसका शुभारंभ कर, गति देकर लाखों महिलाओं में प्रगति की उमंग भर देने का जो पुरुषार्थ सूत्र संचालक पूज्य युगनिर्माताओं की श्रेणी में बिठा देता है। आधी जनशक्ति के दमन, शोषण, उत्पीड़न पर वस्तुतः पिछले दो हजार वर्षों में कहा तो बहुत गया पर उसे जनांदोलन का रूप छुट-पुट स्तर पर ही दिया गया
ये पंक्तियाँ पूज्य गुरुदेव की अखण्ड-ज्योति पत्रिका से उद्धृत की गयी हैं जो सन् 1953 में प्रकाशित हुई थी। लेखनी का जादूगर, शब्दों का शिल्पी, नाचते-उछलते हृदयों को झकझोरते वाक्यों की रचना करने वाला, क्या उक्ति दें इस महामानव को! समझ में नहीं आता। सरकस में देखा जाता है कि सधे हुए जानवर रिंग मास्टर के इशारे पर सारे करतब दिखाते हैं
दूसरे निर्देश था कि इस दीपक के सम्मुख अब अखण्ड जप का आयोजन किया जाय और दस वर्षों में 24 लक्ष के 24 और अनुष्ठान कराने का उपक्रम बनाया जाय। तीसरा निर्देश था कि अखण्ड दीप और अखण्ड जप जहाँ रहें वहीं के संस्कार लेकर ही “अखण्ड-ज्योति “पत्रिका प्रकाशित हो
अनुकरण में वे अपने यहाँ दीप जला लें तो फिर उसे “सिद्ध ज्योति” जैसा बनाने का पुरुषार्थ भी करें। यदि यह न बन पड़े जो कि असंभव ही है क्योंकि दीप जलाने के साथ जो तप साधना जुड़ी है, वह भी स्वयं की, वह कर पाना हरेक के लिए शक्य नहीं है, तो उस अखण्ड दीप व अखण्ड-ज्योति से लाभ उठायें जो क्रमशः प्रत्यक्ष अग्नि व लेखनी रूपी संजीवनी के रूप में उनके समक्ष प्रस्तुत है। तीर्थों का जो महत्व होता है, उससे कहीं अधिक महत्व ऐसी सिद्ध ज्योति का है जिसमें तिल-तिल कर एक साधक ने अपना जीवन होम किया व न केवल अपनी कुण्डलिनी जाग्रत की विश्वात्मा की कुण्डलिनी जगाने हेतु सूक्ष्मीकृत-घनीभूत हो जो अभी भी परोक्ष जगत में सक्रिय है
जनवरी 1987 का अखण्ड-ज्योति अंक “कुण्डलिनी जागरण विशेषाँक” था। इसमें व्यष्टिगत और समष्टिगत नवसृजन के निमित्त किये जाने वाले साधना पराक्रम का सचित्र, शास्त्रोक्त एवं विज्ञान सम्मत प्रतिपादन था। एक गूढ़ विषय पर एक सरल सुबोध व्याख्या परिजनों के समक्ष आयी
बसंत पर्व 1988 के अखण्ड-ज्योति विशेषाँक में “ ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं” शीर्षक से एक लेख में उनने लिखा सोचा जाता है कि गुरुजी 80 वर्ष का आयुष्य पूरा करना चाहते हैं। इस दृष्टि से माता ही भी उतनी आयु का लाभ ले सकेंगी जितनी कि गुरुदेव। इस महाप्रयाण का समय अब बहुत दूर नहीं है
प्रस्तुत पुस्तक जैसा कि परिजन जानते हैं पूज्य गुरुदेव द्वारा अपने 1960-61 के अज्ञातवास में लिखी गयी लेख माला “साधक की डायरी के पृष्ठ”, “कोई एक” के संस्मरण तथा “सुनसान के सहचर” के रूप में अखण्ड-ज्योति के सन् 1960 व 61 के अंकों में प्रकाशित हुई थीं। इसमें उन्होंने प्रकृति व हिमालय को जितना समीप से देखा व उसका अध्ययन कर अपनी अभिव्यक्ति शब्दों के रूप में की है वह अत्यन्त भावभरी व बार-बार पढ़ने योग्य है। हरीतिमा व पहाड़, उस पर भी हिमालय से उन्हें अत्यधिक लगाव था
“अखण्ड-ज्योति” निरन्तर जलती रही व पूज्य गुरुदेव की चिन्तन चेतना सभी पाठकों का दैनन्दिन जीवन में मार्गदर्शन करती रही। जनवरी 1972 में बंगला देश के मुक्ति युद्ध के समापन के बाद अल्प अवधि के लिए पूज्य गुरुदेव शाँतिकुँज अचानक आए एवं माताजी को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन देकर फिर चले गए। जून 1972 में अपनी गुरु सत्ता के मार्गदर्शन पर सप्तऋषियों की तपस्थली में रह कर ऋषि परम्परा का बीजारोपण कर देवमानवों को विनिर्मित करने हेतु अपना प्रचण्ड तपोबल संचित कर वापस लौट आए
जिसमें परिजनों को उनने अस्सी ब्रह्मकमल खिलने व अपने जीवन का प्रथम अध्याय समाप्त होने की बात कही। यही प्रसंग मार्च 1990 अखण्ड-ज्योति के सम्पादकीय एवं अप्रैल 1990 की पत्रिका में दी गयी विशेष लेखमाला “इक्कीसवीं सदी में हमें क्या करना होगा” के अंतर्गत दिये गये “हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े हैं” शीर्षक लेख में उनकी लेखनी से प्रकट हुआ। वे लिखते हैं-”दृश्य शरीर रूपी गोबर कि मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिए नियुक्त किया गया प्रहरी अगली शताब्दी तक पूरी जागरूकता के साथ अपनी जिम्मेदारी वहन करता रहेगा। ” आगे के शब्द उन्हीं की लिपि में यथा रूप प्रस्तुत हैं
सूक्ष्मीकरण की एकाकी तप साधना पूज्य गुरुदेव के जीवनकाल एवं मिशन के इतिहास का एक अतिमहत्त्वपूर्ण मोड़ है। इस अवधि में उनकी तप साधना सूक्ष्म रूप से पाँच वीरभद्रों को क्रियाशील बनाने में लगी रही व लेखनी” अखण्ड-ज्योति” एवं” युगशक्ति-गायत्री” के माध्यम से हर प्रज्ञा परिजन के मन को सतत् मथती रही। इसी दौरान सन 1985 का वर्ष उनकी आयुष्य का पचहत्तरवां वर्ष होने के कारण ही रजत जयन्ती वर्ष मनाया गया एवं इसी वर्ष अप्रैल 1985 में उनने अपने जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों पर पहली बार प्रकाश डाला। इन्हीं लेखों व सूक्ष्मीकरण साधना के अंतर्गत लिखे गये लेखों का समन्वित रूप उनकी पुस्तक “ हमारी वसीयत और विरासत” के रूप में नवम्बर 1986 में प्रकाशित हुआ
महायज्ञ के बाद अगले वर्ष ही 1959 की गायत्री जयंती पर उनने पहली महती जिम्मेदारी वंदनीय माताजी के कंधों पर डाली। वह भी अखण्ड-ज्योति के संपादन की। 2 वर्ष तक अपनी हिमालय यात्रा एवं आर्ष ग्रन्थों के भाष्य हेतु बाहर रहने के कारण वे परोक्ष मार्गदर्शन वंदनीया माताजी का करते रहे किन्तु सारा प्रत्यक्ष दायित्व वंदनीया माताजी ने बड़ी कुशलतापूर्वक सँभाला। यहीं से उन्हें दस वर्ष बाद सौंपे जाने वाले अति महत्वपूर्ण कार्य की नींव पड़ चुकी थी
क्रमशः गायत्री व यज्ञ का प्रतिपादन करते-करते उनने नारी पाठकों को याद दिलाया कि वे अपनी गरिमा को पहचानें। जून सन् 1959 की अखण्ड-ज्योति में वे लिखते हैं कि वैदिककाल में ऋषिकाएँ ही समाज की विभिन्न गतिविधियों का संचालन करती थीं। सभी ब्रह्मवादिनी थी। तथा कइयों ने मंत्रों की रचना तक की है
तीनों की उपमा पूज्य गुरुदेव अमृत, पारस कल्पवृक्ष के रूप में दिया करते थे। पूज्यवर अखण्ड-ज्योति (जनवरी 1972) में वंदनीया माता जी के माध्यम से कहते हैं कि गायत्री मंत्र अमृत है जिसे पीकर हमारी सत्ता अजर-अमर, देवतुल्य हो गई। हिमालय वह पारस है जिसने हमें मानव से देवमानव, अवतारी पुरुष बना दिया, दूसरों को लोहे से स्वर्ण में परिणत करने की सिद्धि प्रदान कर दी। इस हिमाच्छादित धवल ऊँचाई को पाकर ही हम दूसरों की जलन को, तपन को मिटाने योग्य सिद्धि अर्जित कर पाए
1940-49 का समय था। अखण्ड-ज्योति हाथ के कागज से छपने के बाद कुछ ही दिन पूर्व अखबारी कागज पर छपने की स्थिति में आई थी। आर्थिक संकट यथावत था
यह प्रामाणिकता ही उस अखण्ड-ज्योति का प्राण हैं जो आज तक अगणित व्यक्तियों में प्राण संचार करती आयी है। गुरुदेव “स्नेह से सनी एक सोने की लौ” अपने पास रखते थे जिसे ज्योति के रूप में अपने प्रियजनों तक हर माह एक पाती की तरह पहुँचा देते थे। इसी ने उन सभी को उनका अपना बनाया
बाद में मोदी जी सन 1950 में गुरुदेव के पास घीयामण्डी आए। गुरुदेव ने अखण्ड दीपक के पास ले जाकर कहा मेरी “अखण्ड-ज्योति” यह है। इस दिव्य प्रकाश ने ही वह मनोबल प्रदान किया है, जो प्रकाशन का मूल प्राण है
(अखण्ड-ज्योति, जुलाई 1959 पृष्ठ 25)
नाम चुनने के लिए कोई ऊहापोह नहीं करनी पड़ी। जो अखण्ड-ज्योति उनने पंद्रह वर्ष की आयु में प्रदीप्त की थी, जिसके प्रकाश में उन्हें सूक्ष्म शरीरधारी सत्ता के दर्शन हुए थे, उसी प्रकाशपुँज को लक्ष्य रख उनने पत्रिका का नाम “अखण्ड -ज्योति” रख दिया। यही तो उनकी प्रेरणा का मूल स्रोत था
(अखण्ड-ज्योति)
तुम सबको हमारा काम आगे बढ़ाना है। ” पूज्य गुरुदेव ऐसी ही परिस्थितियों में अप्रैल 1971 की अखण्ड-ज्योति में भाव भरे अन्तः करण से कहते हैं ”अपनी कमजोरी को हम छिपाते नहीं। हमारा अन्तःकरण अति भावुक ओर मोह ममता से भरा पड़ा है। जहाँ तनिक सा स्नेह मिलता है, मिठास को तलाश करने वाली चींटी की तरह रेंगकर वहीं जा पहुँचता है
वंदनीया माता जी को मातृत्व की उदात्त गरिमा से भरा-पूरा बताते हुए मई 1971 की अखण्ड-ज्योति में उनने लिखा कि “जून के बाद माताजी शाँतिकुँज हरिद्वार रहेंगी। अखण्ड घृतदीप उनके साथ चला जायेगा। वे भी 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण संपन्न करेंगी
मैं आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानता हूँ”- यही थीं प्रथम पंक्तियाँ उस अधिकृत सत्संकल्प की, घोषणा पत्र की जिसे युग निर्माण योजना का प्रारम्भिक उद्घोष कहा जा सकता है। मार्च 1962 की अखण्ड-ज्योति में पहली बार पूज्य गुरुदेव ने इस सत्संकल्प एवं शुभ अवसरों पर इसे सामूहिक रूप से पढ़ा जाय। सभी परिजनों, पंजीकृत शाखाओं को एवं ज्ञान मंदिर चलाने वाले परिजनों को उद्बोधन करते हुए सितम्बर 1962 के अंक में लिखा गया कि यह वह विचार बीज है जिसके आधार पर युग निर्माण की संभावनाएँ सुनिश्चित होंगी
दिव्य “अखण्ड-ज्योति” दी तुमने, घर-घर फैला उजियारा। “युग-निर्माण” लक्ष्य जीवन का, सत्संकल्प तुम्हें प्यारा॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-March
अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान