अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-July
आराधना की अपेक्षा आत्मिक सुख के मार्ग परमार्थ की ओर बढ़ने के लिये—’सेवा’ सबसे सरल साधन एवं उपाय है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-September
आराधना। वानप्रस्थ आश्रम का मूल प्रयोजन भी समाज सेवा ही है। विषय-वासनाओं एवं पारिवारिक उत्तरदायित्व से मुक्त होकर ही कोई मनुष्य निःस्वार्थ भाव से समाज-संराधना के कार्यक्रमों में योगदान कर सकता है। यदि समाज की रखवाली करने वाले उसे ठीक दिशा दिखलाने और दुष्प्रवृत्तियों से सावधान करने वाले अनुभवी व्यक्ति आगे न बढ़ते रहें तो निश्चय ही मानव-समाज कुछ ही समय में भयानक रूप से पतित हो जाये और ऐसी अवस्था में मनुष्य की क्या दशा हो जाये, कुछ नहीं कहा जा सकता। निस्पृह, निस्वार्थ, निष्काम, अनुभवी एवं परितृप्त व्यक्ति ही समाज की रखवाली ठीक तरह से कर सकते हैं और ऐसे साधु पुरुष वे वानप्रस्थी ही हो सकते हैं जो पारिवारिक उत्तरदायित्व मुक्त होकर उस अवस्था में आ गये हैं जिसमें वितृष्णाओं की कमी हो जाती है और वे किसी रूप में शोभा नहीं देतीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-February
आराधना का उतना महत्व नहीं, विश्व-प्रेम ही ईश्वर का सच्चा प्रेम है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-June
आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एक बड़ा दुःख प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-December
आराधना ही सच्ची पूजा है। वाह्य आकृतियों का पूजन अवास्तविक है।
आराधना की जाती है, वह वस्तुतः अपने आपे का परिष्कृत रूप ही है। इष्टदेव और सद्गुरु के रूप में इसी को विभिन्न नाम व रूपों से प्रस्तुत किया गया है। अपने आप में गहरी दिलचस्पी उत्पन्न करके आत्म-शोधन और आत्म विकास का क्रिया कलाप ही वस्तुतः भक्ति-भावना अथवा योग-साधना का प्रयोजन है। परमात्मा के जो गुणानुवाद गाये जाते हैं, वे वस्तुतः अपने ही परिष्कृत रूप में अभ्यर्थना है। ईश्वरीय अनुकम्पा से जो कुछ वरदान अनुदान मिलने का विश्वास किया जाता है-वह कहीं अन्यत्र से नहीं, अपने ही अन्तरंग से प्रस्फुटित होता है।
आराधना माना है। अपनी अन्तःस्थिति में उत्कृष्ट-तत्वों की स्थापना करके हम आत्मदेव की आराधना करते हैं। आत्मदेव को तत्व-दर्शन ने सर्वोच्च उपास्य माना है और उसकी आराधना का निर्देश किया है-
आराधना है, जैसी ब्रह्म-विद्या के अन्तर्गत अद्वैत-ब्रह्म चिन्तन की।
आराधना का निर्देश किया है-
आराधना करते हैं। आत्मदेव को तत्व-दर्शन ने सर्वोच्च उपास्य माना है और उसकी आराधना का निर्देश किया है-
आराधना में लगो। उसी का दर्शन करके उसी में अवस्थित हो जाओ। जैसे भूमि से सब अन्न उत्पन्न होते हैं, उसी तरह परिष्कृत मनोभूमि से सब सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-January
आराधना यदि ठीक प्रकार की जा सके तो मन्त्र शक्ति के प्रार्थना के - वरदान, आशीर्वाद के- जड़ चेतन जगत को प्रभावित करने के - सिद्धि साधना के समस्त प्रयोजन उसी तरह पूर्ण हो सकते हैं जैसे कि शास्त्रों में लिखे है। वरिष्ठ साधकों की तरह आज भी साधना के वैसे ही प्रतिफल मिल सकते हैं। शर्त केवल एक ही है- वाक् साधना का महत्त्व समझा जाय और उस पर समुचित रूप से ध्यान दिया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-November
आराधना उपासना करने लगे।
आराधना उसी की करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-October
आराधना में इन दिनों नव-सृजन के निमित्त भाव भरे अनुदानों को भी सम्मिलित रखने की आवश्यकता है।
आराधना बीजारोपण के समान है, उसे अंकुरित, पल्लवित, और फलित, विकसित बनाने के लिए साधना का खादपानी लागाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। साधना का संगम महा-मानवों जैसी उदात्त जीवनचर्या एवं लोक मंगल के निमित्त किये गये त्याग बलिदान के समन्वय से बनता है। जो केवल भजन-पूजन भर को सब कुछ मान लेते हैं वे कमान वाले तीर को घूमाते तो फिरते हैं पर वे उससे लक्ष्य बेध का प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-March
आराधना का प्रतिफल है आनन्द। इसी भक्तियोग का साधक सच्चे अर्थों में जीवन लाभ प्राप्त करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
आराधना में ही सम्मिलित किया जाना चाहिये। संसार में उत्कृष्टता का अभिवर्धन ऐसा कर्मयोग है जिसे साधना क्षेत्र में प्रचलित किसी भी क्रिया कलाप से हलके स्तर का नहीं गिना जा सकता। वरन् सच तो यह है कि युग धर्म के अनुरूप यही सर्वोत्तम तपश्चर्या है। जप तप से तो अकेले अपना ही कल्याण होता है किन्तु लोकमंगल में निरत ब्रह्मपरायण महामानव तो अपनी यह पुण्य साधना भी पद दलित मानवता के उत्कर्ष में समर्पित कर देते हैं। उदारता को देखते हुए लोकसेवकों को किसी ज्ञानसाधक, योगी तपस्वी, भगवद् भक्त से कम नहीं वरन् बहुत अधिक ऊँचा ठहराया जायगा जो अपने प्रयास का लाभ स्वयं न उठा कर विश्व कल्याण के लिए समर्पित करता है उसकी आन्तरिक महानता निश्चित रूप से अधिक और अति प्रशंसनीय कही जायगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-September
आराधना, साधना व उपासना की है तथा उसका परिणाम हमारे सामने है। यही आप अपने जीवन में देखना चाहे तो आप भी प्रयोग कर सकते हैं। फिर आप हमें बताइए कि आपकी साधना सिद्धि की दिशा में फैली कि नहीं। हमारी बात समाप्त। ॐ शाँतिः।
आराधना इन तीन सूत्रों पर चला है। ये तीनों क्या है? ये है जमीन, खाद और पानी। भगवान के चरणों में हमने अपने आपको समर्पित किया है व भगवान जितने शक्तिशाली है, उतने ही हम हो गए। ईंधन को आग में डाल देते हैं, वह भी उतना ही गरम और आग जैसा हो जाता है।
आराधना कहते हैं। हमने जीवन भर आराधना, साधना व उपासना की है तथा उसका परिणाम हमारे सामने है। यही आप अपने जीवन में देखना चाहे तो आप भी प्रयोग कर सकते हैं। फिर आप हमें बताइए कि आपकी साधना सिद्धि की दिशा में फैली कि नहीं। हमारी बात समाप्त।
आराधना वह जिसके लिए हमने आपको अभी कहा। यह है समाज के लिए देश के लिए, संस्कृति के लिए, भगवान के लिए जीवन जीना। भगवान का विराट रूप यही है। जन मानस को ऊँचा उठाने के लिए लगे रहने को आराधना कहते हैं। हमने जीवन भर आराधना, साधना व उपासना की है तथा उसका परिणाम हमारे सामने है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-August
आराधना का भी उनके दैनिक कृत्यों में अनिवार्य रूप से समावेश था।
आराधना में निरत रहने से कर्मयोग। आत्मीयता के आरोपण की, प्रेम की साधना ही भक्तियोग कहलाती है। अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति करने एवं महान उपलब्धियों से लाभान्वित होने के लिए तीनों का ही अवलम्बन लेना होगा। ईश्वरीय दिव्य अनुदानों का वास्तविक आनन्द तभी उठाया जा सकता है।
आराधना में वे सतत् निरत रहे। उनकी ज्ञान की प्रखरता ने भारतीय संस्कृति को विश्वभर में प्रतिष्ठित किया। इसके पूर्व विदेशों में भारत के प्रति मान्यता दूसरी थी। इसे मात्र अंधविश्वासों में जकड़ा, धर्म के नाम पर मूर्ति पूजक देश के रूप में समझा जाता था। आदिकाल से मनुष्य जाति को सिक्त करते चले आ रहे भारतीय दर्शन का स्पष्ट स्वरूप उनने विदेशों में रखा तत्ववेत्ता-दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान के रूप में यह उनका एक स्वरूप था।
आराधना की संज्ञा देनी चाहिए। तभी आत्मिक प्रगति का त्रिवेणी संगम बन पड़ता है।
आराधना का अवलम्बन ही है।
आराधना भाव में उन्नत होता है। तब वहीं भक्ति टिकती है तथा आत्मा का परमात्मा से सतत् सम्बन्ध बनाये रखती है। व्यक्तित्व में उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श चरित्र से ज्ञानयोग सधता है, तो समाजसेवा में, लोक आराधना में निरत रहने से कर्मयोग। आत्मीयता के आरोपण की, प्रेम की साधना ही भक्तियोग कहलाती है। अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति करने एवं महान उपलब्धियों से लाभान्वित होने के लिए तीनों का ही अवलम्बन लेना होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-November
आराधना करने की प्रेरणा देती है।
आराधना से जो शक्ति प्राप्त होती है वह उसकी भावनात्मक उत्कृष्टता के अनुपात में ही उपलब्ध होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-January
आराधना की समन्वित क्रिया पद्धति अपनाने से वह अध्यात्म उपक्रम बन पड़ता है जिसके असफल होने की कोई आशंका नहीं रहती। लक्ष्य तक पहुँचने का सत्परिणाम सुरक्षित रहता है।
आराधना में परमार्थ परायणता अपनाने, सेवा साधना में संलग्न होने, उदारता अपनाने से लोक मंगल के कृत्य तथा समय बन पड़ते रहा करते हैं। तीनों का सम्मिश्रण गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलने पर तीर्थराज त्रिवेणी संगम जैसा आधार बन पड़ता है। इसी स्थिति को मनुष्य में देवत्व का अवतरण कह सकते हैं। ऐसी मनःस्थिति वालों को विशाल विश्व को व विराट ब्रह्म को समुन्नत बनाने के लिए निरन्तर सेवा साधना में संलग्न रहना ही प्रिय विषय बन जाता है। इसी मनः स्थिति और ऐसी ही गतिविधि से अपने को ओत प्रोत करने के लिए वे सभी उपचार किये जाते हैं जिन्हें पूजा अर्चा कृत्य कहा जाता है।
आराधना का तात्पर्य है सत्प्रवृत्ति संवर्धन परमार्थ परायणता। इन तीनों को ही मिला देने से एक समूची बात बनती है। सर्वतोमुखी प्रगति की पृष्ठभूमि बनती है।
आराधना के लिए अपने स्वभाव को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाला जाय।
आराधना। उपासना में उत्कृष्टता को भगवान मान कर उस पर अनन्य निष्ठ जमाई जाती है। साधना में जीवनचर्या को परिष्कृत एवं सुसंस्कारों से ओतप्रोत बनाया जाता है। आराधना का तात्पर्य है सत्प्रवृत्ति संवर्धन परमार्थ परायणता। इन तीनों को ही मिला देने से एक समूची बात बनती है।
आराधना करने का निर्देश आर्षग्रंथों में दिया गया है। महाभारत में कहा गया है- “सूर्योदय के समय जो सविता देवता की भली प्रकार उपासना करता है वह धृति, मेधा, और प्रज्ञा को प्रचुर परिणाम में प्राप्त करता है। इसी तरह सूर्य पुराण, तैत्तरीय आरण्यक, एवं श्रीमद्भागवत् में भी उदय होते हुए, अस्त होते हुए सूर्य का ध्यान करने और सब प्रकार से कल्याण का भागी बनने- पवित्र बनने की बात कही गई है।
आराधना करने वाले के लिए आदर्शवादी रीति-नीति अपनाना और लोकोपयोगी कार्यों में निरत रहने की योजना बनाकर चलना आवश्यक होता है। ऐसे कार्यों में तीन प्रमुख हैं (1) अज्ञान का निवारण (2) अनीति का उन्मूलन (3) अभावों का समापन। व्यक्तिगत रुचि, योग्यता एवं परिस्थिति के अनुसार इनमें से कोई भी लक्ष्य चुना जा सकता है। संसार के समस्त कष्टों और संकटों के यह तीन ही कारण हैं। इन्हें जितना निरस्त किया जा सकेगा, उतनी ही सुख-शान्ति स्थिर रह सकेगी और प्रगति की संभावना बढ़ेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-February
आराधना का सुफल था। हमारे अपने शरीर मन्दिर में बैठा यह परम देवता अपने सवालों की झड़ी लगाए है, पतन अभीष्ट है या उत्कर्ष? असुरता प्रिय है या देवत्व? क्षुद्रता चाहिये या महानता? इसके निर्माता तुम स्वयं हो।
आराधना होती है, वहाँ उसके साथ यज्ञ को भी जोड़ रखने की व्यवस्था की जाती है। माता और पिता दोनों का परिपूजन साथ-साथ हो जाता है।
आराधना का संकल्प और भी दृढ़, दृढ़तम होता चला गया। अनगिनत व्यक्तियों को उनने विज्ञान व अध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादन प्रस्तुत कर जीवनदर्शन सिखाया। कहाँ हैं आज ऐसे लोक शिक्षक? उन्हीं को तो खोज रहा है महाकाल!
आराधना है।”
आराधना है।
आराधना को नित्य कर्म बताया गया है। प्राचीनकाल के सभी महामानव उसी उपासना को अपनाते रहे हैं तो आश्चर्य लगता है कि आज क्यों इनकी इतनी अवज्ञा हो रही है? सद्बुद्धि और सत्कर्म की अवहेलना सर्वत्र क्यों होती दिखाई देती है? लोग अपने आध्यात्मिक माता-पिता तक को क्यों भूलते जा रहे हैं? जो माता-पिता का स्वरूप, व्यवहार और नमन तक भुला दे, उसे अपने समाज में बुरा कहा जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-May
आराधना आदि उपचार सूर्योपासना के कहे गये हैं।
आराधना करनी है।
आराधना भले ही की जाय, पर उसके साथ सूर्य तत्व का समावेश आवश्यक है। वेदों में देव शक्तियों का निरूपण सूर्यरश्मियों के रूप में किया गया है। अतः जिस प्रकार बिना अग्नि के भोजन नहीं पक सकता, ठीक इसी प्रकार बिना सूर्य समन्वय के किसी भी स्तर का देवाराधना सम्पन्न नहीं हो सकता।
आराधना से पुत्र कामना की अभिलाषा को पूर्ण किया था। भगवान राम स्वयं सूर्य उपासक थे। वाल्मीकि रामायण के ही लंका काल में कथा आती है कि परिस्थितियों की विषमता देख कर जब राम चिन्तित बैठे थे, तो आगस्तय मुनि आ पहुँचे और उनने कहा-आप सूर्य की उपासना करें। उनकी शक्ति उपलब्ध करने पर आप महाबली असुर समुदाय पर भी विजय प्राप्त कर सकेंगे। वैसा ही उनने किया भी और शत्रुओं को सहज ही परास्त किया।
आराधना से दिव्य दृष्टि की उपलब्धि होती है।
आराधना करते आये हैं। यजुर्वेदीय सूत संहिता में इस तथ्य का उद्घाटन करते हुए भगवान शंकर कहते हैं कि “मैं स्वयं श्रद्धापूर्वक सविता की, सावित्री मंत्र द्वारा, जिसे गायत्री कहते हैं, उपासना करता हूँ।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
आराधना में वह निमग्न हो गया। यहीं पर उनने कई पुरश्चरण किये और गायत्री की सिद्धि प्राप्त की। किशोरी रमण कालेज के पास स्थित, जिस टीले पर वह रहे, वह स्थान आज ‘गायत्री टीला’ के नाम से जाना जाता है। इसी टीले पर आज एक पंचमुखी कमलासन गायत्री माता की प्रतिमा भी प्रतिष्ठापित है।
आराधना आदि तपश्चर्याओं का अवलम्बन लिया था। उसी के कारण उनका चरित्र, व्यक्तित्व एवं प्रभाव बढ़ा और उसी के कारण वे अपने विचारों की छाप अपने अनुयायियों पर डाल सके। संसार के प्रत्येक देश में, वे ही व्यक्ति पूजनीय माने गये हैं, जिन्होंने अपनी आत्मा को तपाकर निर्मल एवं प्रकाशवान् बनाया है।
आराधना की जा रही है, इसका संकल्प उद्देश्य-निर्धारण ही तत्व है। मंत्राराधन में प्रयुक्त उपकरणों में किसी तत्व की प्रधानता है-इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उपयोगी सामग्री का निर्धारण करना पड़ता है। इसी कारण से भिन्न-भिन्न मंत्रों में स्थान, आहार उपचार, उपकरण आदि का जो अन्तर रहता है, उसे तत्व प्रक्रिया से संबंधित माना जाना चाहिए।
आराधना करके दिव्य प्रतिफल प्राप्त किये थे, किन्तु सामान्य व्यक्ति वैसा नहीं कर पाते। इसमें मंत्र की श्रेष्ठता एवं उपासना की गरिमा का दोष नहीं। साधक का ओछा व्यक्तित्व अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करने योग्य न होने से ही निराशा हाथ लगती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
आराधना के बीजाँकुरों को पोषण देना आरंभ कर दिया। घर का वातावरण कट्टर, संकीर्ण जाति प्रधान था किन्तु वे गंदगी साफ करने वाले शूद्र व निम्न जाति के माने वाले वर्ग में घूमते देखे जाते। छपको नामक मेहतरानी के घाव धोकर उसकी सेवा में उन्हें जो स्वर्गोपम आनन्द मिला था, वह घरवालों की उपेक्षा, डाँट व कड़े से कड़ा दण्ड पाने के बाद भी सतत् याद बना रहता था। तत्कालीन ग्रामीण परिवेश में यह प्रकार की सामाजिक क्रान्ति ही थी। जब निरक्षरों को साक्षर बनाने का, असमर्थों को समर्थ बनाने का विद्यालय अपनी हवेली में खोले हुए थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-December
आराधना साधक को परम पवित्र बनाती है और मनोरथों को पूर्ण करती है। महाभारत वन पर्व में स्पष्ट उल्लेख है कि सूर्य से ही समस्त जगत प्रकाश पाता है। वही जीवों की उत्पत्ति का कारण भी है। मुक्तिदाता भी वही हैं। उसकी उपासना कभी भी निष्फल नहीं जाती।
आराधना करेगा, उसकी इच्छा पूर्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं।
आराधना करके हम अधिकाधिक आनन्द की ओर, बंधन मुक्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
आराधना या ध्यान-धारणा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, मोक्ष पद के अभिलाषियों ब्रह्मपरायण साधकों के लिए उपनिषदों में माया के बंधनों से, कुसंस्कारों, कषाय-कल्मषों से छुटकारा पाने के लिए प्राणविद्या, पंचाग्नि, विद्या, मधु विद्या, पुरुष विद्या, षाडिविद्या, शाण्डिल्य विद्या आदि इन 32 प्रकार की विधाओं उपासनाओं का सुविस्तृत उल्लेख किया गया है। उनमें उद्गीथ विद्या के अंतर्गत अंतरादित्य विद्या का वर्णन है जिसमें सूर्य मण्डल में ध्यान करने का विधान है। सूर्यमण्डल मध्यस्थ महाप्रज्ञा गायत्री की आराधना साधक को परम पवित्र बनाती है और मनोरथों को पूर्ण करती है। महाभारत वन पर्व में स्पष्ट उल्लेख है कि सूर्य से ही समस्त जगत प्रकाश पाता है। वही जीवों की उत्पत्ति का कारण भी है।
आराधना करने से वह प्रसन्न होते हैं और साधक का मनोरथ पूर्ण करते है। गायत्री का प्रज्ञा योग सविता शक्ति के साथ जुड़ा हुआ है। गायत्री उपासना इस रहस्य को समझाते हुए सूर्योपस्थान सूर्यार्घ्यदान आदि क्रिया-कृत्य संपन्न करते हैं और बदले में सद्बुद्धि का अनुदान प्राप्त करते हैं। प्रकाश पुँज सविता की ध्यान-धारणा साधक को प्रखर प्रज्ञा का, महापुराण का दिव्य वरदान प्रदान करती है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
आराधना में व्यतिक्रम अभीष्ट नहीं। आप राह पर नजर रखें अविनीत आता होगा इधर से। उत्तर अप्रिय अवश्य है किन्तु प्रार्थना करने वाले को मालूम है कि इस परिस्थिति में उसका उत्तर भी यही होता।
आराधना करना मातृ जाति के प्रति पवित्रता की अधिकाधिक वृद्धि करना है। इस दिशा में जितनी अधिक सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात में अन्य इन्द्रियों का निग्रह, मन का निरोध एवं अनेक मनोविकारों का शमन अपने आप होता जाता है। मातृभक्त के हृदय में दुर्वासनाएँ अधिक देर तक नहीं ठहर सकती। इसी कारण श्री रामकृष्ण परमहंस, योगी अरविंद घोष, छत्रपति शिवाजी, महात्मा गाँधी, स्वामी दयानन्द आदि कितने ही महापुरुष शक्ति के उपासक थे। शाक्त धर्म भारत का प्रधान धर्म है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-July
आराधना-उपासना करनी चाहिए।
आराधना अभीष्ट है तो उन्हें चार बातों पर ध्यान देना चाहिए। पहली यह कि उनका मस्तिष्क ठण्डा हो। आज अधिकाँश व्यक्तियों के मस्तिष्क गरम हैं, आवेश ग्रस्त हैं। यही कारण है कि परस्पर टकराव देखा जाता है। चिंता, आतुरता, बेचैनी, अनिद्रा ग्रस्त लोगों को देखा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-April
आराधना की जाती है और उस दिव्य प्रकाश से स्वयं को ही नहीं सृष्टि के हर प्राणी को जीवन चेतना, सत्प्रेरणा प्रदान किये जाने की प्रार्थना की जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-September
आराधना के विधि-विधान, हमें उन तथ्यों से परिचित कराते है, जिनके सहारे ईश्वर तक पहुँचना-उसके साथ घनिष्ठता स्थापित करना और अनुग्रह का लाभ ले सकना सम्भव होता है। धन का स्पर्श करके दूध दुहा जाता है, यह बात सही है, पर इसमें इतना और जोड़ना चाहिए कि स्पर्श मात्र से ही, दूध की धार नहीं छूटती। थनों को हाथों से सुहलाने की एक ऐसी विशेष क्रिया भी, करनी होती है जो बछड़े द्वारा मुँह से थन चूसने के समतुल्य हो। ईश्वर भक्ति की सफलता इस बात पर निर्भर है कि भक्त ने भगवान से कितनी वास्तविक सघनता स्थापित की। बछड़े जैसा स्तर अपना बनाया जाय ताकि माता हमें अपना बालक मानने लगे और भावभरा पयपान कराने के लिए-आतुर रह सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-June
आराधना होगी। हिटलर नैपोलियन ही मानव के आदर्श होंगे। इस विभीषिका की कल्पना मात्र से हृदय काँप उठता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-March
आराधना करते रहे हैं। साधकों के लिए यही गायत्री है। उसका अस्तित्व और सम्मान तो अनादिकाल से रहा है और अनन्त काल तक रहेगा, पर समय की आवश्यकता के अनुरूप उसे विश्व चेतना का अभिनव उभार बनकर अपनी भूमिका सम्पन्न करनी पड़ रही है। प्रस्तुत विकृतियों का अनेकानेक नाम रूप के मूल में आस्था संकट ही एक मात्र कारण है।उसका निवारण ऋतम्भरा के विवेक युक्त शालीनता के-उभार से ही सम्भव हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-February
आराधना आवश्यक है। तभी अंतरात्मा की चेतन-शक्ति को देखा समझा जा सकता है।
आराधना और प्रसन्नता का लाभ उठाना तभी सम्भव है, जब हम उनके स्वरूप को ठीक-ठीक समझ सकें तथा उनके वर्णन-विश्लेषण के निहितार्थ को, उनमें अन्तर्निहित तत्वज्ञान को भली-भाँति हृदयंगम कर सकें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-June
आराधना इसी स्तर की थी। यौवन विकारों को पवित्र चिन्तन में परिणत करने की साधना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है। इसका अभ्यास देव प्रतिमाओं सहारे किया जा सकता है। सामान्य जीवन-क्रम में इस सम्बन्ध में अधिक अनुशासन बरतने की मर्यादाएँ बनानी और पालन करनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-September
आराधना अनिवार्य थी। ये वनदेवी प्रकृति माता का पर्याय ही थी। यही जीवों-वनस्पतियों के जीवन, पोषण, संरक्षण व विकास का आधार थी। जंगल को देवता तुल्य माना जाता था और यह आकर्षण का केन्द्र था। सभ्यता का शुभारम्भ यहीं से हुआ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
आराधना करने वाले किसी भी साधक में, संन्यासी में, मृत्यु से अठखेलियाँ करने का इतना प्रचण्ड दुस्साहस हो सकता है यह एक अनोखी बात लगती हैं, पर है सत्य। इन घटनाओं के संदर्भ में परमपूज्य गुरुदेव इतना ही कहा करते थे कि आत्मा की अमरता और मृत्यु को वस्त्र बदलने जैसी सामान्य घटना मानने की गीता की शिक्षा सदुद्देश्य के लिए बड़े से बड़ा दुस्साहस कर गुजरने की ही तो शिक्षा देती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-October
आराधना कर अनेकानेक वरदान प्राप्त किये । उनमें से श्री भी एक है। इसके उपरान्त ही श्री शब्द को महालक्ष्मी से
आराधना - उपासना व इनकी कृपा से मिलने वाली अनेकानेक सिद्धि- सम्पदाओं का सविस्तार वर्णन है। इनके कथा - उपाख्यानों के बड़े - बड़े रोचक प्रसंग पुराणों में भरे पड़े हैं। इतने पर भी वस्तुस्थिति को न जान सकने के कारण उपासक उन विभूतियों से वंचित रह जाते हैं, जा इष्ट- आराध्य में सन्निहित हैं। ऐसा क्यों होता है ? इसका उत्तर पाने के लिए हमें उस मूल भावना को समझना होगा, जिसमें देवताओं की विचित्र कल्पनाएँ की गयी हैं।
आराधना
आराधना, उपासना से लौकिक और पारलौकिक सुख, ऐश्वर्य व आनन्द प्राप्त होता है। यों तो इसकी नित्य अर्चना शुभ फलदायी है। पर ज्योतिपर्व दीपावली तो जैसे इसका महोत्सव है। यह इसके तत्त्वज्ञान को समझने एवं रहस्यमय उपलब्धियों को पाने का पर्व है। इस अवसर पर श्रद्धा, निष्ठा एवं विश्वासपूर्वक की गयी श्री उपासना जीवन में सुख, समृद्धि एवं सौंदर्य की निरन्तर अभिवृद्धि करने वाली हो।
आराधना करते हैं। 73 प्रतिशत लोगों की मान्यता है कि भगवान का ध्यान नौकरी व व्यवसाय जुटाने में सफल होता है।
आराधना व उपासना होती है। ‘श्री’ में इन तीनों भावों का अपूर्व समायोजन मिलता है। “श्रिंसर्वेयाम्” से निष्पन्न यह शब्द आश्रय-स्वभाव को समेटे हुए है। यह सुख-शान्ति और आनन्द का स्रोत बहा देता है। व्यक्तित्व के नैतिक भाव, मांगलिक भाव एवं सौंदर्य को उजागर करने का नाम ही श्री की उपासना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
आराधना नहीं होती। अपने इष्ट के प्रति लोग अद्भुत श्रद्धा रखते और उसी का ध्यान-चिन्तन करते हैं। वहाँ के बाजारों में मरियम के चित्र के अतिरिक्त कोई अन्य नारी तस्वीर नहीं बिकती और न स्त्रियोचित सौंदर्य प्रसाधन नहीं मिलते हैं। वस्त्र के नाम पर दुकानों में सिर्फ भगवा परिधान ही उपलब्ध हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-March
आराधना प्रारम्भ करने के बाद मनुष्य को महानता की ओर अग्रसर करते हुए उसे देवता बना देता है। गायत्री मंत्र के एक अक्षर में अनेक प्रकार के ज्ञान विज्ञान का तत्व भरा पड़ा है इसमें रहस्यमय तत्व छिपे पड़े हैं। इसका ही वेद उपनिषद्, दर्शन, स्मृतियों, रामायण आदि ग्रंथों में विवेचन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-May
आराधना हैं तनिक आत्मावलोकन करके देखें कि कहीं हमीं अपने कृत्यों से अपने प्रभु के शरीर पर आघात तो नहीं कर रहे ।
आराधना है, उपासना है। इसके रहस्य को जान लिया जाय तो यह स्वयं परमेश्वर है। जो प्रेमी को पवित्रता, सजलता, शान्ति, एकात्मता और अनन्तता का वरदान देने से नहीं चूकता। प्रेम के रहस्य जानने वाला प्रेमी ‘रसो वै सः’ के तत्व को समझ कर स्वयं रसमय-परमेश्वरमय हो जाता है।
आराधना

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
आराधना सीख ली है, उन्हें किसी बात का अभाव नहीं रहता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-November
आराधना के लिए कहाँ होते है, उनकी व्यवस्था और अनुशासन में दर्शकों की भीड़ भाड़ ही मुख्य आधार होती है। मथुरा, वृंदावन और ऋषिकेश में श्रीराम ने यह तथ्य अच्छी तरह अनुभव कर लिया था। मंदिर के पट बंद देखकर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ।
आराधना की पुण्य भावना सन्निहित है। इसमें अन्तःकरण और पर्यावरण के घनिष्ठ सम्बन्धों की बड़ी ही साँकेतिक एवं अलंकृत शैली में विवेचना की गयी है। प्राच्य ऋषियों ने मनुष्य की पराप्रकृति अर्थात् जीवसत्ता एवं अपराप्रकृति अर्थात् प्रकृति परिवेश के सूक्ष्म एवं स्थूल सम्बन्धों पर व्यापक चिंतन करके प्रकृति के विकासक्रम को पूर्ण करके इससे उर्ध्व स्तरों पर आरोहण का निर्देश किया है। भारतीय संस्कृति में जीवन को मूर्त एवं अमूर्त रूप में पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र, नदी, निर्झर, उपवन, वृक्ष-वनस्पति, पशु-पक्षी आदि के साहचर्य एवं सहयोग के रूप में देखा गया है। अतः पर्यावरण का संरक्षण यहाँ का धर्म कर्त्तव्य रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-August
आराधना हमारा जीवन व्रत होना चाहिए। स्वामी जी कहते थे, प्रत्येक राष्ट्र का अपना जीवन व्रत है, जो विभिन्न जाति-समूह की सुश्रृंखल अवस्थिति के लिए विशेष आवश्यक है। और जब तक वह राष्ट्र उस आदर्श को पकड़े रहेगा, तब तक किसी भी तरह उसका विनाश नहीं हो सकता।
आराधना प्रतिदिन करती हैं। पाँच वर्ष की थी, तभी से शुरू कर दिया था।” इतना कहकर पंडित रूपराम रुके। श्रीराम और उनकी बालसेना के सदस्यों का सुराजी कार्यक्रमों में हिस्सा लेना उन्हें पसंद नहीं था। आपत्ति की,” काँग्रेसियों के साथ रहना और आँदोलन चलाना थोड़ा जोखिम का काम है, कल को कुछ भी हो सकता हैं।
आराधना में, कर्मयोग में प्रवृत्त कर दिया। गीता में भगवान अर्जुन को पहचानते हैं कि उसका धर्म संन्यास नहीं है। कुसमय का कच्चेपन का वैराग्य गड़बड़ी पैदा करता है। कभी वह कहता है कि युद्ध नहीं करूंगा, संन्यास ले लूँगा। श्रीकृष्ण अर्जुन के मन से वैराग्य का भूत भगाने की कोशिश कर रहे है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-December
आराधना करने लगा। एक दिन बादल आए और सूर्य को अपने आँचल में छिपा दिया। सोचने लगा, सूर्य में बादल बड़ा है। उसने अपना इष्ट बदला और बादल की आराधना करने लगा।
आराधना करें।
आराधना हेतु स्वयं को नियोजित करने का समय आ गया है। भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है। हम आगे बढ़कर श्रेय ले लें, अपनी भूमिका निभा लें। समय चूक जाने पर तो पछतावा ही शेष रहता है।
आराधना करने लगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-January
आराधना द्वारा पकाएँ। अपनी उपासना स्वार्थप्रधान न हो। परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ मान सारे समाज−राष्ट्र के उत्थान की, मूल्यों के उत्थान की, गायत्री चेतना के विस्तार की बात हम सोचें। तब ही युगनिर्माण योजना अपने लक्ष्य पर पहुँच सकेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-February
आराधना बन जाती है। संगठन इसी आधार पर सशक्त एवं परिणाम देने वाले बनते चले जाते हैं।
आराधना वैदिक धर्मावलम्बियों तक ही सीमित नहीं है। जैन मतावलम्बी भी इनकी उपासना करते हैं। बौद्ध धर्म सरस्वती पूजन की मान्यता प्रदान की है। बौद्ध ग्रन्थ साधनमाला के अनुसार सरस्वती अपने भक्तों को ज्ञान और समृद्धि देती है। तिब्बत में सरस्वती को महासरस्वती, वज्रशारदा और वज्रसरस्वती आदि रूपों में देखा जा सकता है।
आराधना से वह सभी कुछ प्राप्त हो सकता है, जिसकी हमें कामना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-September
आराधना करता है, वह प्रतिक्षण माता का अमृतोपम दुग्धपान करने का आनंद लेता है और समस्त अज्ञानों, अशक्तियों और अभावों के कारण उत्पन्न होने वाले कष्टों से छुटकारा पाकर मनोवाँछित फल प्राप्त करता है। योग्य गुरु के पथ प्रदर्शन में की गई गायत्री साधना अभीष्ट लाभ पहुँचाती है। इन साधनाओं में फलता प्राप्त करने के लिए भले ही थोड़ा-बहुत अधिक समय व श्रम लगाना पड़े पर अन्य कष्टपूर्ण साधनाओं की अपेक्षा उन साधनाओं में जल्दी ही सफलता मिलती है। योगीजनों का कष्टसाध्य लंबा मार्ग गायत्री द्वारा बहुत सरल हो जाता है और घर में रहते हुए गृहस्थ व्यक्ति भी वनवासी तपस्वियों जैसी सफलता प्राप्त कर लेता है।
आराधना की बेला है। माता के विशेष अनुदानों से लाभान्वित होने की बेला है। अपनी साधना तपस्या द्वारा हम स्वयं ही अपने बाह्य एवं अंतर को साफ-सुथरा कर लें। अन्यथा जगन्माता को यह कार्य बलपूर्वक करना पड़ेगा। हम चाहें या न चाहें परिवर्तन तो होना ही है, सृष्टि की संचालिनी शक्ति इस विश्व-वसुन्धरा के कल्याण के लिए कटिबद्ध है।
आराधना प्रधान विभिन्न आँदोलनों को गति दे सकेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-May
आराधना करने लगे। इस भाव से साधना करने वाले साधक अपने आपको श्रीकृष्ण की सहेलियाँ, गोपियाँ मानते हैं और स्त्रियों की तरह ही रहते हैं। रामकृष्ण भी उसी तरह साधना करने लगे। सखीरुप धारण करने के लिए उन्होंने केश रखवाए। वेणी गूँथने लगे।
आराधना गिने-चुने ही करते हैं। ऐसे प्रकाशस्तंभ युग-युगों तक प्रेरणापुँज बने रहते हैं।
आराधना करने पर व्यक्ति त्व में आमूलचूल परिवर्तन आने लगता है। यहाँ तक कि शरीर भी उसी के अनुसार ढलने और बदलने लगता है। सखीभाव की साधना को विराम देने के महीनों बाद ठाकुर सहज स्थिति में पहुँचे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
आराधना (कर्मयोग) द्वारा हमारी गुरुसत्ता ने जन−जन को अपनी ऋतंभरा−प्रज्ञा विकसित करने को प्रेरित किया। सभी की जीवनसाधना निखरी, दृष्टिकोण बदले, मुग्धता की स्थिति से निकलकर वे जंतु से दिव्यकर्मी बने एवं सद्बुद्धि का आश्रय ले वे आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ते रहे। अपने आप का ज्ञान उन्हें स्वाध्याय से होने लगा। श्रेष्ठ विचारों में स्नान उनके स्वभाव को उच्चस्तरीय भाव में प्रतिष्ठित करता चला गया। जीवनोद्देश्य की जानकारी उस ध्यान से हुई, जिसमें उनने जाना कि वे कौन हैं−एक सामान्य जीव नहीं−विशिष्ट प्रयोजन के लिए जन्मे प्रज्ञा परिजन, जिन्हें उलटे को उलटकर सीधा करना हैं, विचार−क्राँति करनी है।
आराधना कैसे हो? इस सवाल के जवाब में परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि सोना भी एक कला है। सोते तो प्रायः सभी मनुष्य हैं परन्तु सही कला बहुत कम लोगों को पता है। इसी वजह से वे सही ढंग से आराम भी नहीं कर पाते। ज्यादातर लोग जिन्दगी की चिंताओं और तनावों का बोझ लिए बिस्तर पर जाते हैं और अपनी परेशानियों की उधेड़बुन में लगे रहते हैं।
आराधना करनी चाहिए॥21॥ तीनों लोकों के देव-असुर एवं नाग आदि सभी इस सत्य को बड़ी स्पष्ट रीति से बताते हैं- कि ब्रह्म विद्या गुरुमुख में ही स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है॥22॥ ‘गुरु’ शब्द में ‘गु’ अक्षर अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश। इस तरह गुरु ही अज्ञान का नाश करने वाले ब्रह्म है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है॥23॥ शास्त्र वचनों से यह प्रमाणित होता है कि ‘गुरु’ शब्द के प्रथम वर्ण ‘गु’ से माया आदि गुण प्रकट होते हैं। और इसके द्वितीय वर्ण ‘रु’ से ब्रह्म प्रकाशित होता है।
आराधना के सिवा शिष्य को कुछ भी करने की जरूरत नहीं। मन से सद्गुरु का चिंतन-स्मरण, हृदय से अपने गुरु की भक्ति, वाणी से उनके पावन नाम का जप और शरीर से उनके आदेशों का निष्ठापूर्वक पालन करने से समस्त दुर्लभ आध्यात्मिक विभूतियाँ, शक्तियाँ, सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाती हैं। गुरु ही ब्रह्म है, उनके वचनों में ही ब्रह्म विद्या समायी है। इस सत्य को जो अपने जीवन में धारण करता है, आत्मसात् करता है, अनुभव करता है वही शिष्य है-वही साधक है। गुरु तत्त्व से भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है।
आराधना है।
आराधना करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-October
आराधना से होने वाला प्रभाव सर्वथा वैज्ञानिक एवं तथ्यपूर्ण है।
आराधना, साधना, उपासना का शिक्षण भी इसी में आता है। श्रद्धा प्रज्ञा निष्ठा का तत्वदर्शन भी इसी में है। पंचकोशों का आध्यात्मिक परिचय, इनमें निहित दिव्य संभावनाएं, इनके जागरण की विधियाँ, षटचक्रों एवं कुंडलिनी का परिचय, जागरण का विज्ञान तथा आध्यात्मिक जीवन के लक्षण एवं मापन इसमें सिखाए जाएंगे।
आराधना भविष्य में बदरी में होगी। यह भी कि उस दिन कलियुग का अंत हो जाएगा अथवा सृष्टि में प्रलय भी हो जाएगा।
आराधना से विरत रहकर पूजा अर्चा मात्र से कोई भी जीवनलक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता। सेवा साधना में निरत व्यक्तियों को कितने ही प्रकार के कष्ट सहने पड़ते है। परिव्राजक जीवन की कठिनाइयाँ तो सर्वविदित ही है। वानप्रस्थ संन्यास में भी कष्टसाध्य जीवनयापन ही करना पड़ता है। तितिक्षा इसी का पूर्वाभ्यास है, ताकि समय आने पर अभ्यास प्रक्रिया अपनाने में कठिनाई अनुभव न हो।
आराधना भी है और स्वास्थ्य का व्यायाम भी। इससे अनेक प्रकार की बीमारी एवं विकृतियों का निराकरण एवं शमन होता है।
आराधना इसी स्तर की थी।
आराधना एवं उपासना से शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शान्ति एवं आध्यात्मिक अनुदान-वरदान की उपलब्धि होती है। सूर्योपासना के लिए निर्धारित तिथि को सूर्यषष्ठी के रूप में जाना जाता है। कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि सूर्यषष्ठी कहलाती है। सूर्यषष्ठी व्रत मुख्यतः रोगमुक्ति, पुत्र प्राप्ति और दीर्घायु की कामना के लिए किया जाता है। श्रद्धा और भावना के संग किया गया छठ या सूर्यषष्ठी व्रत अत्यन्त लाभदायक एवं फलदायक होता है।
आराधना दान दिये जाने आदि को अत्यन्त फलदायी माना है। ग्रीक और रोमन विद्वानों ने भी इसी दिन को पूजा का दिन स्वीकार किया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-April
आराधना करें।
आराधना के लिए गुरु कार्य हेतु अपने साधन एवं समय का एक महत्त्वपूर्ण अंश लगाना चाहिए। गुरु कार्य छोटा हो या बड़ा उसे करने में किसी भी तरह की लज्जा नहीं होनी चाहिए। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि लोगों को जिन कार्यों के लिए लज्जित होना चाहिए, उन्हें करने में वे लज्जित नहीं होते। बड़े मजे से झूठ, छल, कपट करते हैं, धोखाधड़ी करते हैं। इन कार्यों में उन्हें लज्जा नहीं आती है।
आराधना करते हैं।
आराधना करना ही शिष्य का कर्त्तव्य है। गुरु के कार्य में तनिक सी भी लज्जा करने की जरूरत नहीं है। गुरु को साष्टांग नमस्कार करना चाहिए॥28॥ शिष्य का शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण सभी कुछ गुरु कार्य के लिए अर्पित होना चाहिए। यहाँ तक कि अपने साथ पत्नी आदि परिवार के सदस्यों को गुरु कार्य में अर्पण कर देना चाहिए॥29॥ भगवान् सदाशिव कहते हैं कि हे पार्वती! यह अपना शरीर कृमि, कीट, भस्म, विष्ठा, मल-मूत्र, त्वचा, माँस आदि का ही तो ढेर है। यह यदि गुरु कार्य के लिए अर्पित हो जाय तो इससे श्रेष्ठ भला और क्या हो सकता है॥30॥
आराधना करनी चाहिए। बार-बार और हमेशा ही यह सत्य ध्यान में रखना चाहिए कि गुरु आराधना गुरु की शरीर सेवा तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक दायरे में सद्गुरु के विचारों का प्रसार व उनके अभियान को गति देने के लिए प्राण-पण से प्रयास करना भी शामिल है। इस हेतु न केवल स्वयं का जीवन अर्पण करना चाहिए। बल्कि अपनी पत्नी एवं परिवार के अन्य सदस्यों को लगाना चाहिए।
आराधना के कठोर अनुशासन जुड़े हों। उपासना-साधना के इस क्रम का भक्तिभाव और पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्वाह करना होता है। मंत्र तभी फलित होते हैं। इसके प्रभाव एवं परिणाम नियम-अनुशासन के अनुपालन में सन्निहित होते हैं। अतः चैत्र नवरात्रि के इस असाधारण समय में इन अनुशासनों का पालन करना चाहिए जिनसे मंत्र की सिद्धि होती है।
आराधना गुरु की शरीर सेवा तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक दायरे में सद्गुरु के विचारों का प्रसार व उनके अभियान को गति देने के लिए प्राण-पण से प्रयास करना भी शामिल है। इस हेतु न केवल स्वयं का जीवन अर्पण करना चाहिए। बल्कि अपनी पत्नी एवं परिवार के अन्य सदस्यों को लगाना चाहिए। अपनी यह देह पंचमहाभूतों के विकार के सिवा भला और है ही क्या?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-November
आराधना कीजिए। दीनों की मदद करो, अतिथि का सत्कार करो। इससे वे आपके किये पर अच्छी दुआएं देंगे। सन्तों का, माँ-बाप का सम्मान करो। जिससे आपको वे शुभ आशीर्वाद देंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-February
आराधना करना आ रहा हूँ, पर इस बार मुझे माता की कृपा का जो अनुभव प्राप्त हुआ वह अनोखा ही है। मैं अपने नगर की ‘नगर पालिका’ के चुनाव में काँग्रेस के टिकट पर एक वार्ड से खड़ा हो गया। मेरे मुकाबले में नगर के एक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित महानुभाव थे। मेरी ओर से प्रचार तो किया गया, पर उनके सामने मेरा प्रचार नगण्य ही था। चुनाव के एक दिन पूर्व रात्रि के 3 बजे जब कि लगातार प्रचार कार्य से थक कर व निराशा की भावना लेकर मैं हार-जीत के झूले में झूल रहा था, तो लेटे ही लेटे वेदमाता का स्मरण करने लगा।
आराधना करने लगा। जब सब बात सेठजी से कही गई तो उन्होंने उस रुपये को अपने हिसाब में मान लिया। यह सब माता की ही दया है। मेरे घर में सब गायत्री मन्त्र का जप करते हैं।”
आराधना करने वाले को कौन सता सकता है। तुम आनंद से भजन करते रहो।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-January
आराधना वर्तमान हिन्दु-धर्म में बड़े महत्व की बात मानी गई है। गाय, गोमूत्र, गोबर, गंगोदक, सुवर्णादि धातु, पीपल, तुलसी आदि के स्पर्श से पवित्रता प्राप्त होती है और शूद्र, अन्त्यज, रजस्वला, गधा, कौआ, प्याज, लहसुन, गाजर आदि के स्पर्श से अपवित्रता। इस प्रकार की बातों को धर्म का अंग मानना अति प्राचीन अवस्था के ही धर्म का अवशेष भाग है। इस श्रेणी की कुछ वस्तुयें ऐसी हैं जो पहले स्वतन्त्र रीति से पूज्य मानी जाती थीं, पर बाद में धर्म का विकास होने पर उनकी अन्य देवताओं के साथ जोड़ दिया गया। इसके उदाहरण हैं-गरुण, बैल, बन्दर।
आराधना शुरू की परिणाम आजकल वे रेलवे में एक महत्वपूर्ण पद पर हैं और 400 रु. मासिक वेतन पाते हैं और परिवार की तरफ से भी सुखी हैं। (2) मैंने भी अभी हाल में विशेष अनुष्ठान आरम्भ किया था। मेरे सन् 1952 के कुछ रुपये शासन से मिलने बाकी थे और एक महत्वपूर्ण अपील भी दायर की थी, जिसकी कोई सुनवाई ही न हो रही थी। वेदमाता की कृपा से अनुष्ठान के 4 दिन बाद ही रुपयों के पेमेंट होने की सूचना मिल गई व अपील की सुनवाई भी आरम्भ हो गई। वास्तव में माता अपने भक्तों की पुकार शीघ्र सुनती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-June
आराधना और ततः मिलन के द्वारा जो सुख प्राप्त करते हैं, वह अनिर्वचनीय है। एक उदाहरण लीजिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-July
आराधना करने की स्वतन्त्रता दी गई है। किसी एक या अनेक धर्मों को राज्य का धर्म न मानने का यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि वह ‘धर्म’ को मानता ही नहीं है। अमेरिका के सरकारी स्कूल भी, अपनी देश की सरकार की भाँति, धार्मिक विचारों की स्वतन्त्रता के दृढ़ पक्षपाती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-October
आराधना और नाम कीर्तन द्वारा ही धर्म साधन की चेष्टा किया करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-July
आराधना के साथ जुड़ा हुआ है। संचित पशु-प्रवृत्तियों के उन्मूलन के लिए अपने दोष-दुर्गुणों की बारीकी से परीक्षा करनी पड़ती है और जहाँ जो जितनी मात्रा में खोट दिखाई दे उसे बुहार फेंकने के लिए उसी प्रकार उद्यत रहना पड़ता है जैसा कि शरीर की, कपड़ों की, घर के वस्तुओं की सफाई पर निरंतर ध्यान देते रहने और तत्पर रहने के संबंध में सतर्कता बरती जाती है। सुसंस्कारिता का अभिवर्धन दूसरा पक्ष है। इसके लिए चिंतन, चरित्र और व्यवहार को मानवी गरिमा के अनुरूप बनाना पड़ता है। सेवा-साधना को भी नित्यकर्म में सम्मिलित करना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-June
आराधना है ।
आराधना के रूप में जाना जा सकता है ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-August
आराधना-अभ्यर्थना द्वारा ही अंतः प्रज्ञा जाग्रत होगी। विवेक के जागरण से औचित्य-अनौचित्य उत्कृष्ट-निकृष्ट के बीच अंतर करने एवं उपयोगी का चयन कर सकने में मनुष्य समर्थ होता है। फलतः किसी प्रकार के भटकाव की संभावना नहीं रहती।
आराधना की प्रेरणा देता है। विवेक के अनुशीलन को महत्व देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-May
आराधना विराट विश्व ब्रह्मांड की , इस समाज की यह एक निराली त्रिधा साधना प्रक्रिया पूज्यवर के द्वारा ही निर्धारित है। उपासना में आत्मसत्ता को परमतत्व से एकाकार करने की भावना कषाय कल्मषों का परिशोधन, साधना में विचार, अर्थ, समय व इंद्रिय-संयम व उसके लिए सत्त स्वाध्याय तथा आराधना में सारे समाज का अपने को एक अंग मानते हुए समाज सेवा के निमित्त समय व अंशदान नियमित रूप से देते रहने का विधान जो उनने बनाया, वह प्रज्ञापरिजनों के लिए योगत्रयी बनाया। यह त्रिवेणी जिसमें करोड़ों व्यक्ति स्नान कर अपने आप को महाकाल की धारा के साथ जोड़ चुके हैं, आज अपने सरल-सुगम रूप में योग साधना में प्रवेश का, मानव मात्र को कुँडलिनी के जागरण का एक द्वारा हो नहीं खोलती है वरन् जन जन की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यही वह विशेषता है जिससे गायत्री परिवार अपने अधिष्ठाता के मार्गदर्शन में साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है।
आराधना की आवश्यकता है। इतने पर भी आत्म परिष्कार और लोक मंगल में संलग्न रहने की आवश्यकता बनी ही रहती है। इसकी पूर्ति के लिए अधिकाधिक समय दान और अंशदान नियोजित करते रहना चाहिए। इस निर्धारण को कार्यान्वित करने का नाम वानप्रस्थ है। उसी मनः स्थिति में ऐसा कुछ बन पड़ना संभव है जिसमें आत्म संतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह के विविध लाभों से लाभान्वित हो सकना बन पड़ा।
आराधना में सारे समाज का अपने को एक अंग मानते हुए समाज सेवा के निमित्त समय व अंशदान नियमित रूप से देते रहने का विधान जो उनने बनाया, वह प्रज्ञापरिजनों के लिए योगत्रयी बनाया। यह त्रिवेणी जिसमें करोड़ों व्यक्ति स्नान कर अपने आप को महाकाल की धारा के साथ जोड़ चुके हैं, आज अपने सरल-सुगम रूप में योग साधना में प्रवेश का, मानव मात्र को कुँडलिनी के जागरण का एक द्वारा हो नहीं खोलती है वरन् जन जन की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यही वह विशेषता है जिससे गायत्री परिवार अपने अधिष्ठाता के मार्गदर्शन में साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है। युगसाधना का कायाकल्प कर प्रत्येक के लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त करने वाले उस युगऋषि को महाकाल की सत्ता को बारंबार प्रणाम है।
आराधना। ईश्वर तक पहुँचने और उसकी सहज अनुकंपा प्राप्त करने के लिए तो अपने ही दोनों चरणों को उठाते हुए उत्कर्ष के शिखरों तक अनवरत श्रम करते हुए पहुँचना पड़ता है। वे चरण हैं (1) आत्म परिष्कार (2) विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने के लिए किये गये पुण्य परमार्थ। आत्म कल्याण का , जीवन की सार्थकता का , ईश्वर की अजस्र अनुकंपा प्राप्त करने का सदा से यही मार्ग रहा है और यह अनंत काल तक चलता रहेगा भी। उन्हीं को अपनाकर परम-पद पाया जा सकता है तथा नर में नारायण प्रकट करने का सुयोग सौभाग्य पाया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-March
आराधना की और अपने पराक्रम से उनको संतुष्ट किया । भगवान गंगाधर अर्जुन पर कृपा करने के लिए यहाँ किरात वेश में विचरण कर चुके हैं। जगंबा पार्वती के शवरकन्या के रूप में श्री चरण यहाँ पड़े हैं। यह विवरण सुन नरेश इस क्षेत्र की विशेषता जान अपने रोग को अपनी व्यथा को भूल गए। वे शिखर को प्रणिपात करते, ऊष्णोदक में स्नान करते और प्रायः भाव विह्वल रहते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-April
आराधना के सहारे ही प्राचीन भारत के महान नागरिक देवोपम बने थे, अतः गायत्री को देवमाता भी कहा गया। गायत्री को ही आत्मशक्ति, ब्रह्मविद्या कहा गया है और उसकी अमृत कलश से उपमा दी गयी है। आत्मकल्याण और ईश्वर-दर्शन का अवलम्बन और मार्गदर्शन गायत्री में मंत्र में ओत-प्रोत है। उसे अपनाने वाले साधक अमृतपान करते हैं और देवताओं की तरह सच्चे अर्थों में अजर-अमर हो जाते हैं। गायत्री को अमृतकलश इसीलिए कहा गया है।
आराधना प्रसन्नतापूर्वक कर सकते हैं और श्रद्धा-भक्ति के अनुरूप लाभ उठा सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
आराधनायें चल रही है दैन्य दुःख घटने लगे है, मेदिनी के,
आराधना करते समय ध्यान के लिये हम जो चित्र प्रयुक्त करते हैं और उपासना के समय उस पर हमारी दृष्टि गड़ी रहती है तो हमारी चित्र स्पंदित होने लगता है शाँत और गंभीर मुद्रा में महान तत्व के चिंतन में लीग बुद्ध के चित्र को हम एकाग्रतापूर्वक देखें तो हमारे चित्त में गंभीर शाँति की प्रेरणा उठने लगती है। किसी वीर योद्धा का चित्र देखने पर वैसे ही साहस और वैसे ही शौर्य के भाव उदित होने लगते हैं। गाँधी की प्रतिमा देखे तो उनके चेहरे से छलकने वाली करुणा दया और अहिंसा के भाव हमारे अंतःकरण में रिस रिस कर आने लगते हैं किसी लोकसेवी परमार्थपरायण शहीद की चित्राकृति देखकर देश और समाज के लिए हममें भी मिटने का भाव उदित होने लगता है। किसी देवी देव या अवतारी पुरुष की छवि देखकर किसी मंदिर मस्जिद या गिरजाघर में जाने पर ईश्वर तथा उसके दिव्य गुणों का अनायास ही स्मरण आने लगता है। कहने का अर्थ यह है कि देखे गये चित्रों का भाव और उनकी भाषा हमारी चेतना को अनायास ही आँदोलित कर उठती है।
आराधना द्वारा परमात्मा स्वरूप ही ही जाता है।
आराधना रूपी त्रिपदा के त्रिविध आधार को अपनाये हुए है, वे कृतकृत्य होकर रहते हैं, इसमें दो मत नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-October
आराधना!” पुरोहित को किसी भी प्रकार अपने इस यजमान के चित्त को आश्वासन देना है। वह सोचने लगे नारकीय प्राणी जैसा संबोधन महर्षि निदाध द्वारा भले क्यों दिया गया उन्हें। पर जिनके मुख से ये शब्द निकले थे, उन पर अविश्वास करने का साहस नहीं था राजपुरोहित में। वे अवधूत श्रेष्ठ निदाध-महर्षिगण उनकी चरण वंदना करते हैं। उन नित्य निस्पृह, निरंतर आत्मलीन में न रोष संभव है और न प्रमाद वहाँ प्रश्रय पा सकता है।
आराधना उपक्रम के अंतर्गत युग निर्माण योजना एवं सत्संकल्प रूपी घोषणा पत्र द्वारा मिशन को एक नया मोड़ दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-January
आराधना किये बिना हम उन प्रतिकूलताओं से नहीं जूझ सकते हैं जो आज हमारे समक्ष अवरोध की चट्टानें बनकर खड़ी हैं। परम पूज्य गुरुदेव ने इस मूल कारण को ढूंढ़ तलाश कर ही राष्ट्र की आजादी के साथ मानवी मनों को विनिर्मित करने का-विचारों में एक आमूलचूल क्राँति का तथा व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण का सारा ताना-बाना बुनकर युगनिर्माण योजना की पृष्ठभूमि बनायी थी। धर्मतंत्र ही, आस्थाओं को सशक्त बना सकता है एवं उसे विज्ञान सम्मत प्रगतिशील बनाकर यदि एक मोर्चा खड़ा किया जाय तो राजतंत्र के समानांतर एक ऐसा शक्ति-तंत्र विनिर्मित किया जा सकता है, जो आज की सभी समस्याओं का हल निकाल सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-August
आराधना का इस प्रकार आरंभ करें सतयुग को शीघ्र लाने में इतना सहयोग तो अवश्य करें। हम श्रावण की अमावस्या के एक सप्ताह तक निराहार उपवास रखेंगे ताकि भगवान सत्यनारायण की मर्जी के मुताबिक अपने को चलाने के लिए क्षमता प्राप्त कर सकें युग परिवर्तन के पुण्य पर्व में अपने कर्त्तव्य का ईमानदारी और दृढ़ता के साथ पालन करते रहने के लिए जिस आत्मबल की आवश्यकता है उसका बहुत कुछ अंश इस एक सप्ताह के निराहार उपवास द्वारा प्राप्त होगा ऐसा हमारा विश्वास है। ईश्वर चिन्तन, आत्मशुद्धि, तपश्चर्या यही तीन कार्य प्रधान रूप से इन दिनों रहेंगे सो. 1 से 7 अगस्त तक पाठकों के पत्रों का उत्तर न दिया जा सके तो उन्हें चिन्ता न करनी चाहिए इस बीच में पत्र भेजने वालों या मिलने के लिए आने वालों से कष्ट न करने के लिए करबद्ध प्रार्थना करते हैं क्योंकि इससे हमारी साधना में विक्षेप पढ़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-November
आराधना की पूर्ति तभी होती है जब निम्न लिखित आठ पुष्पों की पुष्पाँजलि भगवान को समर्पित की जाती है-
आराधना भी करनी पड़ेगी। इस आराधना की पूर्ति तभी होती है जब निम्न लिखित आठ पुष्पों की पुष्पाँजलि भगवान को समर्पित की जाती है-
आराधना करता है।
आराधना के अतिरिक्त भक्त को भगवान की अंतरंग आराधना भी करनी पड़ेगी। इस आराधना की पूर्ति तभी होती है जब निम्न लिखित आठ पुष्पों की पुष्पाँजलि भगवान को समर्पित की जाती है-
आराधना करे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-April
आराधना बन जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-June
आराधना। जो संकट आ रहा है, वह मानव के पाप का परिणाम है और इसमें जिसका कम या ज्यादा पाप है, उस पर उतना ही संकट कम या ज्यादा आवेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-December
आराधना से ही प्राप्त हुआ था। विश्वामित्र ने अपनी तप सम्पदा राम लक्ष्मण को बला अतिबला विद्या के नाम से प्रदान की थी। यह गायत्री और सावित्री के ही दो उपनाम हैं। इन्हीं के बल पर वे असुर विनाश और धर्म राज्य संस्थापन के उभय प्रयोजनों में सफल हुए थे। चौबीस अवतार गायत्री के चौबीस अक्षरों के रहस्यों को ही प्रकट करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-November
आराधना करना। उसमें सत्यम्, शिवम्, सुन्दम् का दर्शन करते हुए अपनी समस्त शक्तियों को विश्वकल्याण के लिए नियोजित रखना।
आराधना के अतिरिक्त और कहीं आश्रय नहीं मिल सकेगा। अनुग्रह आपत्तिकालीन उदार अनुदान भर है। वह नियम नहीं बन सकता। न ही सदा-सर्वदा कार्यान्वित ही हो सकता है। मूल्य चुकाना और अभीष्ट को खरीदना यही व्यावहारिकता है।
आराधना ही वस्तुतः साधना है। इस तथ्य की अपनाने वाला ही तत्त्वदर्शी- यथार्थवादी है। दूसरे तो भटकने-भटकाने वाले भर हैं। ‘सत्य’ को ही नारायण कहा गया है। सत्य की प्रथम किरण का दर्शन इसी रूप में होता है कि सफलता, सम्पदा एवं प्रसन्नता के आधार जहाँ-तहाँ ढूंढ़ने के लिये कस्तूरी हिरन जैसी थकाने वाली भ्रान्ति भगदड़ बन्द की जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-April
आराधना करने से साधक वह सब कुछ पा लेता है जो इस विश्व के राजकुमार के रूप में उसके लिये अभीष्ट है। इन्हीं तथ्यों के संकेत शास्त्रकार इस तरह देते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-March
आराधना करने से साधक वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है जो इस विश्व में पाने योग्य है। इन्हीं तथ्यों के निम्नांकित संकेत ध्यान देने योग्य है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-June
आराधना में लगी रही।
आराधना करें।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-October
आराधना उसी की करो।
आराधना में संलग्न हो गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-September
आराधना। इसके लिए सेवा का मार्ग अपनाना होता है। समाज के देवत्व बढ़े- स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण हो यह सवा अवलम्बन द्वारा ही संभव है। सेवा अर्थात् अपनी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को पीड़ा एवं पतन में नियोजित करना। यह मनुष्यता का मेरुदण्ड है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-August
आराधना में इतना निमग्न हो गया कि उसे राज दरबार में आने का ध्यान न रहा, तो उसे ईश्वर-भक्ति मानकर क्षमा ही नहीं करना चाहिये, वरन् श्रद्धा व्यक्त करनी चाहिये। यदि संगीत न रहेगा महाराज, तो जीवन नीरस हो जायेगा। फिर कौन आत्मा इस धरती पर आना चाहेगी? प्रेम, सौंदर्य और संगीत यही तो आत्मा के आकर्षण हैं, इन्हीं पर तो संसार टिका हुआ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-June
आराधना एवं उपासना से आनन्द की यह आकांक्षापूर्ण होगी। बाहर संसार में कुछ भी नहीं है। जो भी सुख, आनन्द और रूप स्वरूप है, वह सब अपने अन्दर और अपनी आत्मा में ही है। बाह्य संसार में जो भी रसानुभूति होती है, वह सब अपने अन्तर की ही छाया मात्र होती है। जिसका आत्मा जितना-जितना स्पष्ट और व्यापक होता जाता है, उसकी छाया भी उतनी ही गहरी और स्थायी होती जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-March
आराधना करते हैं, वहाँ श्रेय का श्रद्धालु उनके संयोग से योग की साधना में तत्पर रहता है वह शरीर तथा वस्तुओं के संपर्क से तपपूर्ण कर्मों की योजना करता है और उनके फल को अक्षय परिपाक के लिये बिना भोगे, छोड़ता चलता है। वह संसार के विषय से लेकर उपासना तक के सारे कर्तव्य अभोगी वृति से करता हुआ भविष्य के स्वर्ग का निर्माण करता चलता है। वह न तो इतना लोलुप होता है ओर न अधैर्यवान् कि तुरन्त के छोटे-छोटे लाभों तथा सुखों का भोग लिये बिना चैन से न रह सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-November
आराधना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-February
आराधना से साधारण मनुष्य एक चमत्कारी दिव्य पुरुष बन सकता है। अपने इस महान विज्ञान की उपेक्षा करने से ही आज का भारतीय समाज इस अधोगति को प्राप्त हुआ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-August
आराधना के लिए किये जानें वाले उपचारों का उद्देश्य है। प्रतीक उपासना से प्रेरणा पाकर मनुष्य दिव्य गुण संपन्न बन सके, ऋषिगणों का यही उद्देश्य इस पुण्य प्रयोजन के पीछे रहा है।
आराधना को। कण कण में देखे उसको ही -पुष्ट करें इस चिंतन को॥ आस पास सद्गंध बखरे, अपने मन का वतास॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-November
आराधना है।”
आराधना का उपक्रम भी बिठाती चली गयी। फलतः आरोग्य लाभ भी हस्तगत हुआ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-May
आराधना उसे कहते हैं जिससे सेवा पूजा करनी पड़ती है। सेवा हमने भगवान की है। भगवान किसे कहते हैं? सिद्धान्तों को कहते हैं, आदर्शों को कहते हैं। उन खिलौनों को भगवान नहीं कहते जिनको आपने भगवान मान रखा है।
आराधना के लिए, उसी की उपासना के लिए अपने हर एक साँस को, हर एक चप्पे को, योग्यता के हर एक कण को मैंने नियोजित कर दिया। हमने भगवान की महत्ता को समझने की कोशिश की और उसने हमको गायत्री के नजदीक ला दिया। आप तो लाखों मील दूर हैं इसलिए कि आपने केवल सुना है और कृत्यों को किया है, अतः निराश नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे। लेकिन हमको-पूरी तरीके से सच्चे मन से हजार बार कहने की हिम्मत पड़ती है कि गायत्री शक्तिवान है, सामर्थ्यवान है और चमत्कारी है। गायत्री में वह सब कुछ है जिसके बारे में बताया गया है।
आराधना कहते हैं। सूरज निकलने से लेकर डूबने एक हम बराबर भगवान के काम में लगे रहते हैं। यही हमारा भजन है, उपासना है, तप है और सेवा है। आपकी अन्तरात्मा को उछाल देने के लिए ही हमारी वाणी चलती है। जनता–जनार्दन को ऊँचा उछाल देने के लिए हमारी लेखनी चलती रहती है।
आराधना की है।
आराधना है, मसक्कत है। हमारा श्रम है-साधन है। भौतिक सामर्थ्य जो कुछ भी है हमने आराधना में लगा दिया है, चिन्तन साधना में और अन्तःकरण उपासना में लगा दिया है। यह है चमत्कारों के स्रोत। आप इसको सुनना, नोट करके रखना और जहाँ तक संभव हो सके वहाँ तक चलना।
आराधना उसी अनुपात में सफल मानी जाती है।
आराधना की है। आराधना उसे कहते हैं जिससे सेवा पूजा करनी पड़ती है। सेवा हमने भगवान की है। भगवान किसे कहते हैं? सिद्धान्तों को कहते हैं, आदर्शों को कहते हैं।
आराधना में लगा दिया है, चिन्तन साधना में और अन्तःकरण उपासना में लगा दिया है। यह है चमत्कारों के स्रोत। आप इसको सुनना, नोट करके रखना और जहाँ तक संभव हो सके वहाँ तक चलना। भागना नहीं आता दौड़ना नहीं आता तो छोटे बच्चे की तरीके से दीवाल पकड़ कर गाड़ी के सहारे चलना सीखिये-एक कदम आगे बढ़िये। लोभ, मोह की हथकड़ी और बेड़ी को-जिसने आपको मजबूती से जकड़ रखा है-छोड़िये-थोड़ा ढीला करिये फिर देखिये आपको आगे बढ़ने का मौका मिलता है कि नहीं श्रेष्ठता की दिशा में, शालीनता की दृष्टि में, महानता की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाइये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-January
आराधना समाज की। इन्हीं तीनों का मिलन गंगा, यमुना, सरस्वती का मिलन त्रिवेणी संगम कहलाता है और उसका अवगाहन करने वाला हर दृष्टि से कृतकृत्य बनता है।
आराधना की है। उसने हमारी आराधना की है। हमने अपने आपको उनके सुपुर्द कर दिया है, उन्होंने अपने आपको हमारे सुपुर्द कर दिया है। ये कैसे? वाणी से नहीं, गपबाजी से नहीं, ख्वाबों से और कल्पनाओं से नहीं।
आराधना की है। हमने अपने आपको उनके सुपुर्द कर दिया है, उन्होंने अपने आपको हमारे सुपुर्द कर दिया है। ये कैसे? वाणी से नहीं, गपबाजी से नहीं, ख्वाबों से और कल्पनाओं से नहीं। कार्य से ऊँचे उद्देश्यों के लिए, देश के लिए, धर्म के लिए समर्पण से।
आराधना इसलिए भी की जानी चाहिए कि वह मानव मात्र के समस्त शुभ और अशुभ कर्मों के साक्षी हैं। उनसे हमारा कोई भी कार्य या व्यवहार छिपा नहीं रह सकता है। सूर्य की दृश्य व अदृश्य किरणें समस्त विधाओं-दीवारों को बींधती हुई सृष्टि के कण-कण की सूचनायें एकत्रित करती रहती हैं। यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है। फिर मनुष्य तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश रश्मियों के संपर्क में रहता ही है, क्योंकि सूर्य विश्व चक्षु जो ठहरा।
आराधना कहते हैं। पात्रता विकसित करने का यह तीसरा व अंतिम अवलम्बन है। भगवान का निराकार स्वरूप वह है जो कण-कण में समाया हुआ है। जो नियम अनुशासन मात्र है। हम उसके कायदे, कानूनों पर चलकर उसके प्रिय-अप्रिय, भक्त-अभक्त बन सकते हैं।
आराधना। आराधना का अर्थ है- लोक सेवा, जनहित, जनकल्याण, समाजसेवा। अपने समय में से, अपने श्रम में से, अपनी मेहनत में से और पैसों में से भगवान का काम कीजिए। भगवान का क्या काम है? भगवान का एक काम है-उसकी दुनिया को सुसंस्कृत और समुन्नत बनाना, उसकी सभ्यता और संस्कृति और समुन्नत बनाना, उसकी सभ्यता और संस्कृति को बढ़ाना।
आराधना कहते हैं। उपासना ईश्वर की, साधना अपनी और आराधना समाज की। इन्हीं तीनों का मिलन गंगा, यमुना, सरस्वती का मिलन त्रिवेणी संगम कहलाता है और उसका अवगाहन करने वाला हर दृष्टि से कृतकृत्य बनता है।
आराधना में विचार क्राँति संलग्न है उसकी अर्थप्रणाली में समानता को ही आधार माना जायेगा। प्रस्तुत परिस्थितियों के अनुरूप साधनों से काम चलाकर हर किसी को संतोष करना पड़ेगा। तब लालच से प्रेरित असंख्य अपराधों की तथा ईर्ष्या-द्वेष के कारण उत्पन्न होने वाली आत्मिक अशाँति की कोई गुंजाइश न रहेगी। न कोई निठल्ला रहेगा, न किसी को बेतरह पिसना पड़ेगा। जरूरत इस बात की है कि हममें से प्रत्येक जन-जन को इस नजदीकी परिवर्तन से अवगत कराएँ।
आराधना। भगवान के ऊपर असर डालने वाली यही एक चीज है, दूसरी कोई नहीं। उपासना, साधना स्वयं के लिए और भगवान को प्रभावित करने के लिए अंतिम चरण रह जाता है-आराधना। आराधना का अर्थ है- लोक सेवा, जनहित, जनकल्याण, समाजसेवा। अपने समय में से, अपने श्रम में से, अपनी मेहनत में से और पैसों में से भगवान का काम कीजिए।
आराधना करने को कहा गया है। स्वामी रामतीर्थ सूर्य को सबसे बड़ा संन्यासी कहते थे। उनके अनुसार वही सबके प्रकाश, प्रेरक और जीवनदाता हैं। ज्ञानरूपी प्रकाश प्रदान करने का कार्य भी वही करते हैं, अतः वह सृष्टि के सबसे बड़े आचार्य हैं। उनका आश्रय लेकर मनुष्य अज्ञानान्धकार एवं त्रितापों से त्राण पा सकता है।
आराधना का महत्वपूर्ण स्थान है। इस संदर्भ में ईसाई धर्म ग्रंथ-”न्यू टेस्टामेण्ट” में सुविस्तृत वर्णन मिलता है। रविवार सूर्य का दिन होने से पूजा-उपासना के लिए इस धर्म के अनुयायियों के लिए विशेष महत्व रखता है। सेंटपाल का कथन है कि सूर्य के द्वारा पवित्र किया गया यह दिन दान की अपेक्षा रखता है। ईसाई लोग इस दिन को ईसा का पवित्र दिन भी मानते हैं।
आराधना करें। हमने अपने बाँस की आराधना की है। उसने हमारी आराधना की है। हमने अपने आपको उनके सुपुर्द कर दिया है, उन्होंने अपने आपको हमारे सुपुर्द कर दिया है। ये कैसे?
आराधना अर्थात् पुण्य-परमार्थ प्रत्येक के लिए आवश्यक है। हम जो बोते हैं, वही काटते हैं। संसार के साथ भलाई करना प्रकारान्तर से अपनी ही भलाई करना है। पिछड़ों को उठाना कालान्तर से स्वयं को भी ऊँचा उठाने वाली अदृश्य व्यवस्था का आह्वान करना है। पुण्य का प्रतिफल अगले जन्मों में भी मिल सकता है।
आराधना का अर्थ है- लोक सेवा, जनहित, जनकल्याण, समाजसेवा। अपने समय में से, अपने श्रम में से, अपनी मेहनत में से और पैसों में से भगवान का काम कीजिए। भगवान का क्या काम है? भगवान का एक काम है-उसकी दुनिया को सुसंस्कृत और समुन्नत बनाना, उसकी सभ्यता और संस्कृति और समुन्नत बनाना, उसकी सभ्यता और संस्कृति को बढ़ाना। सभ्यता किसे कहते हैं-लोगों की चाल-चलन में शालीनता का समावेश और संस्कृति उसे कहा गया है, जिसको उदारता कहते हैं, सेवा कहते हैं, करुणा कहते हैं, परोपकार, लोकमंगल और दान कहते हैं।
आराधना करने वाले मनुष्य जो कुछ सामग्री सूर्य के लिए अर्पित करते हैं, भगवान भास्कर उन्हें लाख गुना करके वापस लौटा देते है। सौर सम्प्रदाय के अनुयायी एवं गायत्री महाशक्ति के उपासक अभी भी सूर्य की आराधना उसके तीन रूपों में करते हैं। सूर्योदय के समय ब्रह्म और उसकी शक्ति के रूप में, मध्याह्न में महेश्वर रूप में एवं सूर्यास्त के समय विष्णु-रूप में उपासना करते हैं। सूर्य अनुपम कल्पना शक्ति वाले, सिद्धि के प्रेरक, सबको कर्म की प्रेरणा देने वाले एवं बुद्धि प्रदाता है। उनके इस स्वरूप का वर्णन यजुर्वेद में बहुत से सुँदर ढंग से किया गया है।
आराधना पापों का नाश करती है। वे हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं। स्फूर्ति प्रदान करने, विश्व में गति का संचार करने, सद्विवेक जगाने एवं प्रेरणा देने के कारण ही सूर्य को “सविता” कहा जाता है। गायत्री महामंत्र में इसी अदृश्य तात्विक शक्ति की ओर संकेत हुए उसकी नित्य आराधना करने को कहा गया है। स्वामी रामतीर्थ सूर्य को सबसे बड़ा संन्यासी कहते थे।
आराधना है। इसमें पिछड़ों की सहायता करने और दिग्भ्रांतों को सही राह बताने वाले प्रकाश की व्यवस्था बनाने के कार्यों को सम्मिलित किया जाता है। यों धार्मिक कर्मकाण्डों में लगने वाले श्रम साधन और पुरोहितों को दान-सम्मान प्रदान करना भी इसी प्रचलन में आता है। पर उसका औचित्य तभी है जब अदृश्य देवताओं को प्रसन्न करने की अपेक्षा उस दान प्रयोजन का उपयोग बुद्धि-संगत और भावनाओं को उमगाने वाला हो।
आराधना कीजिए, ताकि भगवान आपकी आराधना करें। हमने अपने बाँस की आराधना की है। उसने हमारी आराधना की है। हमने अपने आपको उनके सुपुर्द कर दिया है, उन्होंने अपने आपको हमारे सुपुर्द कर दिया है। ये कैसे?
आराधना उसके तीन रूपों में करते हैं। सूर्योदय के समय ब्रह्म और उसकी शक्ति के रूप में, मध्याह्न में महेश्वर रूप में एवं सूर्यास्त के समय विष्णु-रूप में उपासना करते हैं। सूर्य अनुपम कल्पना शक्ति वाले, सिद्धि के प्रेरक, सबको कर्म की प्रेरणा देने वाले एवं बुद्धि प्रदाता है। उनके इस स्वरूप का वर्णन यजुर्वेद में बहुत से सुँदर ढंग से किया गया है। ऋषियों ने इसे अनुभूति के स्तर तक उतारा और उनसे मिलने वाले लाभों का वर्णन किया है।
आराधना के उपरोक्त तीन माध्यमों को अपनाकर हम अपनी पात्रता को इस स्तर तक विस्तृत कर सकते हैं जिसमें देवताओं के अनुग्रह आकाश से होने वाली पुष्प-वर्षा की तरह हम पर बरसें।
आराधना होनी चाहिए। यूनान का सम्राट सिकन्दर भी सूर्य का उपासक था।
आराधना द्वारा धर्म, अर्थ
आराधना का ही प्रतिफल था। महाराजा अश्वपति ने सूर्य की उपासना करके सती सावित्री को अपनी कन्या के रूप में पाया था। यही कन्या सत्यवान को ब्याही गयी थी जिसने अपने तपोबल से उसकी मृत्यु हो जाने पर भी यमराज से उसे वापस ले लिया था। महाकवि कालीदास ने अपनी अनुपम कृति ‘रघुवंश’ में वनवास काल के समय सीता द्वारा सूर्य पर त्राटक करने का उल्लेख किया है। उसमें कहा गया है कि सीता ने राम को संदेश भेजा था कि वह गर्भस्थ शिशुओं को जन्म देने के पश्चात सूर्य पर दृष्टि निबद्ध कर अनन्य भाव से तपस्या करेंगी जिससे अगले जन्म में भी वह राम को पति रूप में प्राप्त कर सकें।
आराधना से पुत्र प्राप्ति का उल्लेख करते हुए महाभारत में कहा गया है कि महारथी कर्ण का कवच कुण्डल सहित जन्म माता कुँती के गर्भ से उनके द्वारा की गयी सूर्य आराधना का ही प्रतिफल था। महाराजा अश्वपति ने सूर्य की उपासना करके सती सावित्री को अपनी कन्या के रूप में पाया था। यही कन्या सत्यवान को ब्याही गयी थी जिसने अपने तपोबल से उसकी मृत्यु हो जाने पर भी यमराज से उसे वापस ले लिया था। महाकवि कालीदास ने अपनी अनुपम कृति ‘रघुवंश’ में वनवास काल के समय सीता द्वारा सूर्य पर त्राटक करने का उल्लेख किया है। उसमें कहा गया है कि सीता ने राम को संदेश भेजा था कि वह गर्भस्थ शिशुओं को जन्म देने के पश्चात सूर्य पर दृष्टि निबद्ध कर अनन्य भाव से तपस्या करेंगी जिससे अगले जन्म में भी वह राम को पति रूप में प्राप्त कर सकें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-June
आराधना से प्रसन्न होकर सामने प्रकट हरे गए और उनके मनोगत भाव को समझकर बोले-
आराधना करो। सूर्य उपासना सभी संकटों से त्राण दिलाने वाली इस लोक में यश-वैभव की प्राप्ति कराकर मोक्ष प्रदाता है। धर्मराज युधिष्ठिर सपरिवार सूर्य आराधना में तल्लीन हो गये। भगवान सूर्य युधिष्ठिर की इस आराधना से प्रसन्न होकर सामने प्रकट हरे गए और उनके मनोगत भाव को समझकर बोले-
आराधना का रहस्य देवो भूत्वा देवं यजेत्-अर्थात् देवता बनकर देवता की आराधना करने में है। फिर मैं क्यों अपने उपास्य से पाये दान के सद्गुणों को खोने लगा। विप्र तुम निर्भीक होकर माँगो।
आराधना, दान दिये जाने आदि का अत्यंत फलदायी पुण्य माना है। इसी कारण सारे विश्व के ईसाई रविवार को नियमित रूप से पूजाघरों में जाकर सामूहिक प्रार्थना करते है। ग्रीक और रोमन विद्वानों ने भी इसी दिन को पूजा का दिन स्वीकार किया है।
आराधना करने में है। फिर मैं क्यों अपने उपास्य से पाये दान के सद्गुणों को खोने लगा। विप्र तुम निर्भीक होकर माँगो।
आराधना में तल्लीन हो गये। भगवान सूर्य युधिष्ठिर की इस आराधना से प्रसन्न होकर सामने प्रकट हरे गए और उनके मनोगत भाव को समझकर बोले-
आराधना करो। सारा जगत इन्हीं से उत्पन्न हुआ है इन्हीं में लीन हो जायेगा। तुम यदि अपना कष्ट मिटाकर संसार में सुख भोगना चाहते हो तो सूर्य भगवान की शरण में जाओ।
आराधना करनी हो तथा बादल छाए रहने पर प्रत्यक्ष दर्शन न हो पा रहा हो तो उस ओर मुखकर के भी ध्यान किया जा सकता है। यह अनेकानेक प्रचलनों में कुछ एक की चर्चा है।
आराधना आत्मोत्कर्ष के चरम शिखर पर हम सबको पहुँचा सकता है।
आराधना करके ओजस्वी-तेजस्वी एवं ब्रह्मवर्चस् संपन्न बनाने का साधना विज्ञान निर्मित किया था। अब भौतिक विज्ञानी भी हर दिशा से निराश होकर सूर्य देवता की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं। इसे सही दिशा में उठाया गया सही कदम ही कहना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप-सुनिश्चित रूप से नवयुग की मानवी सभ्यता सविता देवता के अनुदानों को ऊर्जा संसाधन और शक्ति स्रोत के रूप में उपलब्ध कर सकेगी।
आराधना, सविता साधक करता है। उस वरणीय ज्योति को अधिकाधिक धारण करने की कामना करता है।
आराधना से ऋषित्व उपलब्ध होता, विभूतियाँ व्यक्तित्व को सौंदर्य मण्डित करती है। इसी तत्व का स्पष्टीकरण शास्त्रों में स्थान-स्थान पर विस्तारपूर्वक किया गया है।
आराधना द्वारा प्राण का ज्ञान एवं जागरण ही अमृतत्व एवं मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग है। उसी से यह लोक और परलोक सुधरता है। इसी भौतिक और आध्यात्मिक विभूतियाँ प्राप्त होती है।
आराधना की सोच कुछ गैर वाजिब नहीं है। जीवन उसी से मिला हैं धरती की समस्त जड़-चेतन हलचलें उसी की कृपा से चल रही है। भविष्य की ईंधन समस्या सहित अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें उन्हीं की शरण लेनी पड़ेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-September
आराधना प्रारंभ की। यहाँ से प्रेरणा पाकर संसार की सभी संस्कृतियों में मातृ शक्ति की उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित है।
आराधना एवं पूजा का विधि विधान बनाया। चेतनशील मानव ने सभ्यता की और जैसे ही कदम रखना प्रारंभ किया उसके मस्तिष्क के समक्ष यह प्रश्न उभरा वह आया कहाँ से? यहीं से माँ के प्रति श्रद्धा भाव उत्पन्न हुआ और ईश्वर को आदि जननी मानकर आराधना प्रारंभ की। यहाँ से प्रेरणा पाकर संसार की सभी संस्कृतियों में मातृ शक्ति की उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
आराधना है।
आराधना का यह सर्वोत्कृष्ट समय होता है। तपस्वी विश्वामित्र आसन बन्ध और हृदय में वैराग्य की धारा अहिर्निशि बहा करती थी। जप और ध्यान में कोई व्याघात नहीं होता था। बैठते ही बैठते चित्त भगवान सविता के भर्ग से आच्छादित हो गया। एक प्राण आद्यशक्ति गायत्री और राजर्षि विश्वामित्र में दिव्य तेज फूट रहा था उनकी मुखाकृति से।
आराधना करने के लिए आप लोग हजार कुण्डों का दीपक जला करके आरती उतारने चल रहे है। उस ब्रह्म शक्ति की जिस शक्ति से हम जगमगाते थे किसी जमाने में राष्ट्रों का नियंत्रण करते थे, शासकों को उत्पन्न करते−पैदा करते थे। शासकों को उतारते थे और चढ़ाते थे विभूतियाँ हमारे चरणों के अंतर्गत रहती थी, क्योंकि ब्रह्मतेजस् हमारे पास था।
आराधना−पूजा−उपासना द्वारा स्वयं को आस्तिक बनाया जाता हैँ उस सत्ता के क्रिया−कलापों को आगे बढ़ना, सृष्टि के उद्यान को सुरम्य बनाना और उसके ऐश्वर्य में सतत् निरन्तर वृद्धि करते रहना ही आस्तिकता है−ईश्वर की आराधना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-February
आराधना, गायत्री महाविद्या का अवलम्बन निश्चित रूप से महती भूमिका निभायेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-March
आराधना करते हैं।
आराधना करके अभीष्ट वरदान प्राप्त करने की आकांक्षा तभी पूरी हो पाती है जब अन्तरंग में अवस्थित दिव्य शक्तियों, वृत्तियों और प्रवृत्तियों को परिष्कृत करने की साधना की जाय। वस्तुतः इन्हीं अन्तः क्षमताओं को अलंकार रूप से दिव्य लोक में निवास करने वाली सत्ता कहा गया है। यह दिव्य लोक अपना ही अन्तः प्रदेश समझा जाना चाहिए और देवी देवताओं के रूप में अंतः क्षमताओं को मान्यता देनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-August
आराधना करना और अधिपति अन्तरात्मा को प्रसन्न करके अभीष्ट वरदान प्राप्त करना ही है।
आराधना, साधना करने वाला भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों से भरता ही चला जाता है। उसे स्वर्ग खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती उसके इर्द-गिर्द ही स्वर्गीय वातावरण बनता है। विश्व की सुख शान्ति और मानवी भविष्य के उज्ज्वल होने की सम्भावना ऐसे ही दिव्य वातावरण के साथ जुड़ी हुई हैं जो जीवन साधना के आधार पर विनिर्मित एवं अवतरित होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-October
आराधना, उपासना के लिए दूर-दूर से भक्त जना जाते हैं। अग्नि ज्वाला को दैवी शक्ति मानने के पीछे यह कुण्डलिनी अग्नि का ही तारतम्य है। यज्ञाग्नि में अग्निहोत्र करने, धृत धारा चढ़ाने के पीछे भी अग्नि एवं सोम के संयोग की आवश्यकता का प्रतिपादन है। ब्रह्माग्नि और आत्माग्नि के संयोग को कुण्डलिनी साधना कहा गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-November
आराधना की जाती है वे सफल ही होते चले जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-September
आराधना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-January
आराधना में निरत रहा जा सकता है। सर्व खलु इदं ब्रह्म-ईशावास्यमिदंसर्वं-के प्रतिपादनों से यह समस्त प्रसार ईश्वर की झाँकी की। अयमात्मा ब्रह्म की मान्यता अपना कर हम आत्म परिष्कार और आत्मविकास के परम पुरुषार्थ में संलग्न रह सकते हैं और वह प्राप्त कर सकते हैं, जिसके लिए यह सुर दुर्लभ मनुष्य जीवन मिला है। यही है इस संसार की वास्तविकता, जिसे वेदान्त दर्शन ने सूत्र रूप में किन्तु सारगर्भित व्याख्या समेत समझाया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-December
आराधना करने का उपदेश प्रदान कर फिर वेदों को आदेश दिया था, जो उनके सामने देह धारण करके देवगण के कार्य करने की सिद्धि के लिये उपस्थित थे। ब्रह्म ने कहा-’हे निगमो। आप सब परात्परा, सनातनी, मूढ अंक्तों वाली सम्पूर्ण कार्यों को सिद्ध करने वाली महामाया ब्रह्मविद्या देवी का स्तवन करो।
आराधना करते हैं।
आराधना में तत्पर रहा जाय। साहस और कलाकारिता के-पुरुषार्थ और लालित्य के-कर्म और भावना के इन केन्द्रों को प्रजनन मात्र से निरस्त न बना दिया जाय वरन नर-नारी की जननेन्द्रियों के निकट मूलाधार चक्र की शिव शक्ति को उच्च आदर्शों के लिए प्रयुक्त किया जाय। भारतीय अध्यात्म-शास्त्र का यह संदेश हर किसी के लिए अति महत्वपूर्ण हैं। शिवलिंग की प्रतिमात्राओं में इसी तथ्य का संकेत रूप में प्रकटीकरण हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-September
आराधना का यह सर्वोत्कृष्ट समय होता है। तपस्वी विश्वामित्र आसन बंध और प्राणायाम समाप्त कर जप के लिये बैठे थे। उनके हृदय में वैराग्य की धारा अहर्निश बहा करती थी। जप और ध्यान में कोई कष्ट नहीं होता था। बैठते-बैठते चित्त भगवान् सविता के भर्ग से आच्छादित हो गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-January
आराधना करे तो यही पर्याप्त उपदेश है। जो अपने को स्वतन्त्र करने का प्रयास करता है वही सच्चा उपदेशक है।
आराधना की थी। सब लोग सर्वदा तीनों कालों में गायत्री के जप करने में तत्पर हो गये थे। सभी यज्ञ के भागों आदि के द्वारा नित्य देवी की सेवासाधना करने लगे थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-May
आराधना करनी चाहिये।
आराधना करना, उसका जाप करना और उसका प्रणमन सदा करना चाहिये। ऐसा करने से वह अपनी स्वाभाविक दया प्रकट करके देही का मोचन निश्चय ही कर दिया करती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-April
आराधना में रजोगुण की प्रधानता विद्यमान् रहा करती है। क्योंकि सर्वदा अपने सुखोपभोग प्राप्त करने की ही भावना इस उपासना का एक मात्र लक्ष्य होता है। जो कर्म परात्पर के निर्मित किया जाता है, अर्थात् उसका कोई भी फल अपने लिये न चाहकर जो कुछ भी हो वह सब अपने आराध्य के ही चरणों में समर्पित कर दिया जाये और केवल पापों के प्रक्षालन होने से अपनी आत्मशुद्धि की भावना रहे और उपासना करने वाले के हृदय में ऐसी निष्ठा बनी रहे कि यह वेदोक्त विधान का करना मेरा परम कर्तव्य है, अतएव मुझे यह अनवरत करना ही चाहिए - ऐसी बुद्धि के द्वारा भेद बुद्धि का उपाश्रय करके देव भक्ति को सात्विक कहा जाता है, क्योंकि इसमें सतोगुण की प्रधानता रहती है और केवल अपने समाराध्य की प्रीति के लिए ही यह कर्तव्य कर्म समझ कर की जाती है और इसके द्वारा अपनी आत्म-शुद्धि इष्ट देव की कृपा से हो जाने की भावना सुदृढ़ रहती है।
आराधना का व्यवहारिक अवसर ही अधिक व्यापकता के साथ उपलब्ध होने लगेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-February
आराधना करनी चाहिये। उसी के प्रसाद से प्रजा का सर्ग करने का तुम्हारा कार्य सफल होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-August
आराधना का यह सर्वोत्कृष्ट समय होता है। तपस्वी विश्वामित्र आसन बंध और प्राणायाम समाप्त कर जप के लिये बैठे थे। उनके हृदय में वैराग्य की धारा अहर्निश बहा करती थी। जप और ध्यान में कोई कष्ट नहीं होता था। बैठते-बैठते चित्त भगवान् सविता के भर्ग से आच्छादित हो गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-July
आराधना में हम संलग्न हैं उसकी अर्थ प्रणाली में समानता को ही आधार माना जायेगा। गरीब और अमीर दोनों का ही अस्तित्व न रहेगा। प्रस्तुत परिस्थितियों के अनुरूप साधनों के काम चलाकर हर किसी को सन्तोष करना पड़ेगा। तब लालच से प्रेरित असंख्य अपराधों की तथा ईर्ष्या-द्वेष के कारण उत्पन्न होने वाली आत्मिक अशान्ति की कोई गुँजाइश न रहेगी। न कोई निठल्ला रहेगा न किसी को बेतरह पिसना पड़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-November
आराधना करनी चाहिये उन्हीं शक्तियों को जगाना और ग्रहण करना चाहिये, जो आत्मभूत होती है। उस आत्म शक्ति का धनी मनुष्य एक मनुष्य ही क्या सारे जगत को अपने अनुकूल बना सकने में समर्थ हो हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-May
आराधना उसे प्रेमाञ्जलि को समर्पण करने से सम्पन्न करने से सम्पन्न होती है। वसुधैव कुटुम्बकम् और विश्व परिवार की अनुभूति की ही पूर्णता प्राप्ति का लक्ष्य प्राप्त करना कहा जा सकता है। इसी को ईश्वर दर्शन अथवा भगवत् प्राप्ति का नाम दिया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-April
आराधना करने में ही क्या हर्ज है। योगी आत्म साधना में लग गया उसने ब्रह्मोपासना को ध्यान में रखकर बनाई गई विशालकाय योजनाओं का परित्याग कर दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-August
आराधना में सफलता मिल सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-February
आराधना के लिये मूर्ख मनुष्य जंगल, पहाड़, नदी, झील आदि दुर्गम स्थानों में सुन्दर फल ढूंढ़ता हुआ फिरता है, पर वह इस बात का विचार नहीं करता कि उसके पास ही भेंट चढ़ाने के लिये एक बहुत सुन्दर कमल का पुष्प है। यह पुष्प उसका मन है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने को एक जीता जागता यज्ञ बनावे। हम कोई भी दूषित, अपवित्र, विकृत और अपूर्ण वस्तु भगवान को अर्पण नहीं कर सकते। हमको यह समझ लेना चाहिये कि भगवान का मंदिर पवित्र है और हम स्वयं ही वह मंदिर हैं।
आराधना। आराधना और उपासना एक ही है।
आराधना नहीं कहा जा सकता। उसके लिये तो सबसे पहली आवश्यकता पवित्र और आकुल हृदय की है। कस्तूरी मृग के अन्दर होती है, पर वह समझता है कि सुगन्धि कहीं बाहर से आ रही है, इसलिये वह उसकी खोज में पागल बन जाता है। इसी प्रकार ईश्वर हमारे हृदय में निवास करता है, उसका अनुभव करने के लिये हमको अन्तर्मुख होना चाहिये। परमात्मा की आराधना के लिये मूर्ख मनुष्य जंगल, पहाड़, नदी, झील आदि दुर्गम स्थानों में सुन्दर फल ढूंढ़ता हुआ फिरता है, पर वह इस बात का विचार नहीं करता कि उसके पास ही भेंट चढ़ाने के लिये एक बहुत सुन्दर कमल का पुष्प है।
आराधना और उपासना एक ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-July
आराधना करने वाले के मुख से निकले हुए शाप वरदान सफल होते हैं। अस्तेय वृत्ति धारण करने से बहुमूल्य रत्नों के समान वस्तुएँ उपलब्ध होती है। ब्रह्मचर्य का पालन करने से तेजस्विता मिलती है। अपरिग्रह सध जाने पर जन्म−जन्मांतरों का तथा भूत-भविष्य -वर्तमान का ज्ञान हो जाता है। पवित्रता की साधना हो जाने पर घृणा तथा परसंसर्ग से छुटकारा मिलता है।
आराधना को करते जो तुरन्त ही उन्होंने आरम्भ की है। इस शीघ्रता का कारण उनकी जल्दबाजी नहीं वरन् वर्तमान परिस्थितियों की विवशता ही है। संसार का वातावरण दिन-दिन तेजी के साथ ऐसा विषाक्त होता चला जा रहा है कि उसमें कोई छोटी सी चिनगारी भी विस्फोट कर सकती है। संसार का भयंकर अहित हो सकता है। इस भयंकरता को शाँत करने के लिए विश्व शान्ति का जो वरुणास्त्र चाहिए वह तप के द्वारा ही उपलब्ध हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-September
आराधना है। सिद्ध हुआ सत्य भी साधक को वैसे ही वरदान दे सकता है जैसे कोई अन्य देवता या साक्षात् परमात्मा प्रसन्न होने पर अपने आराधक को प्रदान करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-March
आराधना से किन्तु हमारा सौभाग्य है कि उनकी कामना भिन्न भिन्न थी। जगजननी सावित्री ने पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक श्रेष्ठ है इसका निर्णय स्पष्ट शब्दों में ही कर दिया कि पहले तुम्हारी स्त्री की अभिलाषा पूर्ण होगी। इससे यह सिद्ध होता है कि गायत्री पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों पर शीघ्र प्रसन्न होती है।
आराधना की।
आराधना से प्राप्त हुई थी इसलिए अश्वपति ने उस बालिका का नाम भी सावित्री रखा।
आराधना मैं॥
आराधना से नृप दंपत्ति को प्रथम कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। यह कन्या सावित्री की आराधना से प्राप्त हुई थी इसलिए अश्वपति ने उस बालिका का नाम भी सावित्री रखा।
आराधना करो। यदि स्त्रियों को वेदाधिकार नहीं होता तो वशिष्ठ जी उसे प्रोत्साहित नहीं करते किन्तु उसका विरोध ही करते। और यदि राज भय से विरोध नहीं करते तो कम से कम तटस्थ अवश्य रहते। किन्तु इस उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है कि स्त्रियों को गायत्री अधिकार सदा से है और वह श्रुति-स्मृति विहित है।
आराधनाच्च सावित्र्या बभूव कमलाकला।”
आराधना कैसे और क्यों की। प्रभो! कृपया मेरी जिज्ञासाओं का समुचित उत्तर देकर मुझे अनुग्रहीत करें।”
आराधना से या स्त्री की आराधना से किन्तु हमारा सौभाग्य है कि उनकी कामना भिन्न भिन्न थी। जगजननी सावित्री ने पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक श्रेष्ठ है इसका निर्णय स्पष्ट शब्दों में ही कर दिया कि पहले तुम्हारी स्त्री की अभिलाषा पूर्ण होगी। इससे यह सिद्ध होता है कि गायत्री पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों पर शीघ्र प्रसन्न होती है।
आराधना से हुई। अर्थात् पुरुष की आराधना से या स्त्री की आराधना से किन्तु हमारा सौभाग्य है कि उनकी कामना भिन्न भिन्न थी। जगजननी सावित्री ने पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक श्रेष्ठ है इसका निर्णय स्पष्ट शब्दों में ही कर दिया कि पहले तुम्हारी स्त्री की अभिलाषा पूर्ण होगी। इससे यह सिद्ध होता है कि गायत्री पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों पर शीघ्र प्रसन्न होती है।
आराधना में अपना समय लगाकर कृतार्थ होती थी।”
आराधनाच्च सावित्र्य बभूव कमला कला।
आराधना की थी उनकी कामना को वेदमाता ने पूर्ण किया।
आराधना करते हुए जब कुछ दिन व्यतीत हो गये तो एक दिन आकाशवाणी हुई कि तुम दश लक्ष गायत्री का जप करो।”
आराधना कभी भी निष्फल नहीं होती। अश्वपति दंपत्ति ने सुसंतति की प्राप्ति के लिए आराधना की थी उनकी कामना को वेदमाता ने पूर्ण किया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-August
आराधना का दीप।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-February
आराधना करके समर्थ बनना चाहिए। आत्मस्वरूप को पहचान कर, आत्म विश्वास और आत्म गौरव की भावनाएं हृदय में कूट-कूट कर भरना, शरीर को निरोग और बलवान बनाना, मन को सुसंस्कारित, सुव्यवस्थित, विद्वान, विचारवान और सुलझा हुआ बनाना, धन कमाने एवं उसका सदुपयोग करने के स्रोतों को पहचानना और खोलना, सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों को हटाकर जन समाज में सुदृढ़ संगठन पैदा करना, राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त करना, अन्तर्राष्ट्रीय बन्धु भाव प्रचलित करना, यह सब कार्य एक शक्ति पैदा करते हैं। देखने में यह विभिन्न दशाओं की शक्तियाँ भिन्न-भिन्न प्रतीत होती हैं, पर यथार्थ में एक ही शक्ति के विभिन्न स्वरूप हैं। उसी अखण्ड शक्ति की उपासना करना मनुष्य का सबसे प्रथम कर्त्तव्य है। शक्ति प्राप्त किये बिना तो हम मनुष्य भी नहीं कहला सकते।
आराधना करें और बल को बढ़ावें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-December
आराधना करते रहो, किन्तु दूसरे देवों का भी सत्कार करते रहो, देव एक ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-March
आराधना करूंगा। जिससे मेरी आत्मा का तेज सूर्य की तरह चमके। जिससे सताने की बात तो दूर, सताने का विचार करने की भी किसी की हिम्मत न पड़े। शक्ति से ही संसार में न्याय स्थिर रह सकता है, इसलिये सर्वतोभावेन शक्ति का सम्पादन करूंगा। मैंने निश्चय कर लिया हैं कि अब निर्बलों का नहीं बलवानों का जीवन बिताऊँगा और हे ईश्वर! आपकी महिमा गाऊँगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-October
आराधना के (बिना) बिना (जीवनं) जीवन (पतनं) पतनावस्था को (याति) प्राप्त होता है।
आराधनाँ) आराधना के (बिना) बिना (जीवनं) जीवन (पतनं) पतनावस्था को (याति) प्राप्त होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-May
आराधना” के नाम से जाना जाता रहा है। आराधना परमार्थ परायणता को कहते हैं। तृष्णा के क्षेत्र तो व्यक्तिगत स्वार्थपरता तक सीमित हैं, किन्तु परमार्थ का क्षेत्र उतना ही बड़ा है जितना कि ईश्वर का विश्व विस्तार। परमार्थ में जन्म जन्मान्तरों तक लगे रहा जा सकता है। ऋषि चेतना ने भी स्वर्ग, मुक्ति, वैभव आदि की उपलब्धियों को स्वीकार करने से इन्कार करते हुए यही कामना व्यक्त की है कि प्राणियों की सेवा में ही उसे सदा सर्वदा जुटे रहने का अवसर मिले।
आराधना में-लोकसेवा में निरत रहना अनुभव करता है। यही वह त्रिवेणी है जिसे तीर्थराज की संज्ञा दी गई है। ईश्वर आराधना का अर्थ है दिव्यता के साथ अपनी संवेदनाओं को घनीभूत कर लेना। जीवन के विचार क्षेत्र में भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण को बहिष्कृत कर देना। अपनी कौशल और साधना को पुण्य परमार्थ में उत्सर्ग करते रहना।
आराधना यह तीन प्रयोग प्रकरण है जिनके सहारे ईश्वर प्रदत्त प्रसुप्त दिव्य क्षमताओं को जगाया और अपने समर्थ शक्तिवान बनाया जा सकता है। हर क्षेत्र में प्रगति के लिए प्रबल पुरुषार्थ करने पड़ते हैं। शरीर को बलवान पहलवान बनाने के लिए कितनों को कितने दिन कितनी तत्परता व कठोर व्यायाम करने पड़ते हैं यह किसी से छिपा नहीं। धनी बनने के लिए कृषि व्यवसाय कल शिल्प आदि का आश्रय लेने वाले कितने लम्बे समय तक कितनी तत्परता के साथ कितना कठोर श्रम करते है वह किसी से छिपा नहीं। उच्च शिक्षा प्राप्त करके उच्च अधिकारी बनने की आकाँक्षा रखने वाले प्रायः चौथाई जीवन जितना समय और इतना धन खर्च करते हैं जिसके ब्याज से ही जिन्दगी भर बैठे गुजारा होता रह सकता था।
आराधना के अवलम्बनों को ध्यानपूर्वक अपनाया ही जाना चाहिए।
आराधना करनी चाहिए। यश के लिए यज्ञ की, विद्या के लिए शंकर की, दाम्पत्य के लिए गौरी की, रक्षा के लिए यज्ञों की, भोगों के लिए चन्द्रमा आदि देवताओं की उपासना करने से अभीष्ट की पूर्ति होती हैं। परन्तु जिसे कोई इच्छा न हो अथवा मोक्ष का आकाँक्षी साधक परमात्मा की उपासना करें।
आराधना के लिए जप और ध्यान का उपचार सर्वविदित, सर्वमान्य एवं सार्वभौम है। अन्य उपासनायें भी विभिन्न सम्प्रदायों में अपने- अपने ढंग से प्रचलित हैं। पर उसमें शब्द और भाव का नियोजन निश्चित रूप से होता है। इन उपचारों के बिना देवता के साथ चेतना को जोड़ सकना प्रायः बन नहीं पाता। उन थोड़े मनीषियों की बात अलग है जो पूजा उपचार के बिना भी अपने कर्मों में आदर्शों की भगवद्बुद्धि को सुस्पष्ट रख साधना का प्रयोजन अपनी विशेष शैली में उपलब्ध कर लेते हैं।
आराधना परमार्थ परायणता को कहते हैं। तृष्णा के क्षेत्र तो व्यक्तिगत स्वार्थपरता तक सीमित हैं, किन्तु परमार्थ का क्षेत्र उतना ही बड़ा है जितना कि ईश्वर का विश्व विस्तार। परमार्थ में जन्म जन्मान्तरों तक लगे रहा जा सकता है। ऋषि चेतना ने भी स्वर्ग, मुक्ति, वैभव आदि की उपलब्धियों को स्वीकार करने से इन्कार करते हुए यही कामना व्यक्त की है कि प्राणियों की सेवा में ही उसे सदा सर्वदा जुटे रहने का अवसर मिले। यही है वह विधा जिसके सहारे आत्म सन्तोष लोक-सम्मान और दैवी अनुग्रह के तीनों लाभ हाथों हाथ मिलते रहते हैं।
आराधना किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार करनी चाहिए, इसका वर्णन साधना शास्त्रों में विस्तारपूर्वक किया गया है। श्रीमद्भागवत 2/3/29 में कहा गया है- ब्रह्मतेज की इच्छा वाले को ब्रह्मा की, इन्द्रियभोगों के लिए इन्द्र की, सन्तान के लिए प्रजापति की, सौभाग्य के लिए दुर्गा की, तेज के लिए अग्नि की, धन के लिए वस्तुओं की, वीर्य के लिए रुद्र की एवं अन्न के लिए आदित्यों की, राज्य के लिए विश्वेदेवता की, लोक-प्रियता के लिए साध्यगण की, दीर्घायु के लिए अश्विनी कुमारों की, पुष्टि के लिए वसुन्धरा की, प्रतिष्ठा के लिए अन्तरा देवता की आराधना करनी चाहिए। यश के लिए यज्ञ की, विद्या के लिए शंकर की, दाम्पत्य के लिए गौरी की, रक्षा के लिए यज्ञों की, भोगों के लिए चन्द्रमा आदि देवताओं की उपासना करने से अभीष्ट की पूर्ति होती हैं। परन्तु जिसे कोई इच्छा न हो अथवा मोक्ष का आकाँक्षी साधक परमात्मा की उपासना करें।
आराधना का अर्थ है दिव्यता के साथ अपनी संवेदनाओं को घनीभूत कर लेना। जीवन के विचार क्षेत्र में भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण को बहिष्कृत कर देना। अपनी कौशल और साधना को पुण्य परमार्थ में उत्सर्ग करते रहना। यही है क्रमशः उपासना, साधना और आराधना के तीन वर्ग। इनसे आत्मा सत्ता के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तीनों ही कृतकृत्य होते हैं।
आराधना के तीन वर्ग। इनसे आत्मा सत्ता के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तीनों ही कृतकृत्य होते हैं। आध्यात्म तत्वज्ञान और योग साधना के विधि विधान का यह परम प्रयोजन है। प्रचलित समस्त कर्मकाण्ड इन्हीं तीन प्रयोजनों के इर्द गिर्द परिभ्रमण करते हैं। उस कर्मकाण्ड की कोई उपयोगिता नहीं, जो जीवनक्रम को प्रभावित न करे, मात्र पूजा-उपचारों की लकीर तो पीटे, पर व्यक्तित्व के किसी क्षेत्र को प्रभावित न करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-February
आराधना से क्रियाशीलता का परिष्कार और विकास होता है। आराधना उदार सेव्य साधना से ही सधती है। सेवा कार्यों में सामान्यतः वे सेवायें है जिनसे लोगों को सुविधाएं मिलती है। श्रेष्ठतर सेवा वह है जिससे किसी को पीड़ा का अभावों का निवारण होता है। श्रेष्ठतम सेवा वह है जिससे व्यक्ति पतन से हटकर उन्नति की ओर मोड़ा जा सके।
आराधना कहते हैं। आत्मिक प्रगति का लक्षण है मनुष्य में देवत्व का अभिवर्धन। देवता देने वाले को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे धर्म धारणा या सेवा साधना भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व में शालीनता उभरेगी तो निश्चित रूप से सेवा की ललक उठेगी।
आराधना के लिए पुरे दिन को रखा है।
आराधना उदार सेव्य साधना से ही सधती है। सेवा कार्यों में सामान्यतः वे सेवायें है जिनसे लोगों को सुविधाएं मिलती है। श्रेष्ठतर सेवा वह है जिससे किसी को पीड़ा का अभावों का निवारण होता है। श्रेष्ठतम सेवा वह है जिससे व्यक्ति पतन से हटकर उन्नति की ओर मोड़ा जा सके। सुविधा बढ़ाने और पीड़ा दूर करने की सेवा तो कोई धन सम्पन्न भी कर सकते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-September
आराधना का त्रिविध प्रयास करना पड़ता है। योग और तप का बहुमुखी आधार इसी निमित्त जाना और किया जाता है। मैले दर्पण में अपनी छवि दिखाई नहीं पड़ती। मैले पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब नहीं चमकता। इसी प्रकार दुश्चिन्तन और कुकर्मों से सड़े गले जीवन से अन्तःकरण ऐसा दूषित हो जाता है कि उसमें ईश्वर सत्ता विद्यमान होते हुए भी आभास मिल नहीं पाता।
आराधना इसलिए करते रह पाते हैं कि वे खुशबूदार और उत्फुल्लतादायक स्थान होते हैं। प्रकृति का सान्निध्य आनन्ददायक माना जाता है, क्योंकि वहाँ का वातावरण वृक्ष-वनस्पतियों और फूलों के सुवास से ओत-प्रोत रहता है। यह खुशबू के प्रभाव-परिणाम हैं, पर यह सिर्फ मन तक ही सीमित होता है, ऐसी बात नहीं है। शरीर पर भी इसका असर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इसकी इसी सामर्थ्य को देखते हुए अब चिकित्सा विज्ञान की एक अभिनव शाखा (गंध चिकित्सा) के रूप में इसे विकसित किया जा रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-March
आराधना की। कड़ी तपस्या से उनने प्रजापति -देवाधिपति को प्रसन्न कर लिया। वर माँगने और देने का प्रसंग आया तो सिद्ध ने अनुरोध किया कि भगवान्! मुझे आपसे कुछ भी नहीं चाहिए। मात्र प्रातःकाल मुझे नित्य ध्यान के समय निमिष मात्र को दर्शन दे जाया करें। साथ ही जब कभी संकटकाल में, विपत्ति के समय में आपका स्मरण करूं तो भी सहायता करने के लिए पधार आया करे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-July
आराधना-कामना मन ही मन करते रहने पर वे सीढ़ी दर सीढ़ी पार करते हुए वहाँ जा पहुँचे जहाँ उन्हें अमेरिका के राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद तक जा पहुँचना था। साथी मल्लाह कोलम्बस की इतनी असंभव लगने वाली योजनाओं में सहभागी बनने पर अत्यंत क्रुद्ध थे और उसे मारकर समुद्र में फेंक देने की योजना बना रहे थे। पर कोलम्बस के मनोबल के सामने उन्हें झुकना ही पड़ा और इतनी दूर आगे भी चलने के लिए तैयार हो गये जहाँ स्वर्ण खदान समझे जाने वाले अमेरिका पहुँचने का लक्ष्य प्राप्त हो गया। मनोबल इतनी प्रचंड शक्ति है जिसके सामने वह संभव हो जाता है जिसे प्राप्त करने के लिए लोग कल्पना तक नहीं करते थे। वैज्ञानिक आविष्कारों का इतिहास ऐसा ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-April
आराधना आरम्भ कर दी। इस प्रकार कुछ ही यमष् बाद देखा कि पवन में अधिक शक्ति है वह बादलों को देखते देखते उड़ा ले जाता है। अब उसने पवन को इष्टदेव बनाया। कुछ दिन बाद उसने देखा कि पर्वत पवन को प्रवाह रोककर उसे उलटा लौटा देता है। अब पर्वत पूजन आरंभ हुआ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-December
आराधना में लग गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-August
आराधना है। इसकी उपलब्धि होने पर सर्वत्र अपना ही आत्मा बिखरा दीखता है और अन्यान्यों के सुख−दुःख अपने ही प्रतीत होते हैं। इन्हीं से आत्म साक्षात्कार और ईश्वर दर्शन का परम लक्ष्य प्राप्त होता है। दिव्यदर्शी भगवान बुद्ध ने कहा था−‘‘जब करुणा के नेत्र खुलते हैं तो मनुष्य अपने में दूसरों को और दूसरों में अपने को देखने लगता है। करुणा की दृष्टि ही माया का उच्छेद होता है और उसके पार पूर्णता की परम ज्योति का दर्शन होता हैं।
आराधना नित्य ही करनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-July
आराधना और शिव की अभ्यर्थना की साधना वे लम्बे समय तक करते रहे और अपने उद्देश्य में सफल होकर रहे। पर यह सफलता हाथ तभी लगी जब उपासना उपचार के साथ तपश्चर्या को अग्नि शक्ति का समावेश हो सका। यदि वे मात्र पूजा आराधना ही करते रहते और तप के कष्टसाध्य झंझट से बचकर रहना चाहते तो उन्हें उससे अधिक कुछ भी न मिलता जो शिव मन्दिरों और गंगा मन्दिरों के पुजारियों को नगण्य-सा प्रतिफल उपलब्ध होता है।
आराधना ही करते रहते और तप के कष्टसाध्य झंझट से बचकर रहना चाहते तो उन्हें उससे अधिक कुछ भी न मिलता जो शिव मन्दिरों और गंगा मन्दिरों के पुजारियों को नगण्य-सा प्रतिफल उपलब्ध होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-February
आराधना, अभ्यर्थना की जाती रहती है। बदले में मूर्ति कभी मुस्कराती तक नहीं। अपनी स्तब्धता ही बनाये रहती है। फिर भी भक्त इस रुखाई से तनिक भी विचलित नहीं होता और अपनी एकांगी उपासना करता रहता है। यही भक्त का स्वावलम्बन है जिनमें न कोई आशा है न अपेक्षा।
आराधना ऐसी नहीं है जो किसी दूसरे की कृपा के सहारे सफल-असफल होती हो। वह अपने भीतर से ही उगती है और अपने तक ही सीमित रहती है। दूसरे उसमें सहयोग दें, न दें यह उनकी मर्जी पर निर्भर है । प्रेमी को आरम्भ से ही उसकी अपेक्षा नहीं रहती है अन्ततः प्रतिदान की उपेक्षा करता रहता है। शाश्वत प्रेम इससे कम में हो नहीं सकता और इससे अधिक वह और कुछ है भी नहीं।
आराधना द्वारा भक्ति योग के माध्यम से किया जाता है। यह व्यायामशाला में किया गया उपार्जन है। प्रयोगशाला पाठशाला, पाठशाला में ही ऐसी ही उपलब्धि उपार्जित की जाती है फिर उस उपार्जन का व्यापक क्षेत्र में उपयोग होगा। पाठशाला में सम्पादित किया गया ज्ञान छात्र द्वारा जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रयुक्त होता है। प्रयोगशाला की उपलब्धियों से असंख्य व्यक्ति लाभ उठाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-September
आराधना करके सुदृढ़ स्वास्थ्य और आकर्षक सौन्दर्य का वरदान पाया जा सकता है। इन्हीं भगवती की वाणी शक्ति दूसरों को स्नेह, सौजन्य से परितृप्त करती है। फलस्वरूप जब समाज का असीम सद्भाव, सहयोग अर्जित कराती हुई भौतिक प्रगति का पथ निरन्तर प्रशस्त होता चला जाता है। मुख को मूर्धन्य तीर्थ और देव शक्तियों का निवास गृह कहा गया है। यदि उसका स्तर बनाये रहा जाय तो सहज ही इस देव द्वार से बरसने वाले अनुदानों से सुनिश्चित आरोग्य तो मिलता ही रहेगा।
आराधना का वरदान है। जो इस साधना को कर सके उसके लिए मरण का दिन पश्चात्ताप का नहीं वरन् अधिक सुखद परिस्थितियों के लिए विनोद यात्रा पर निकलने की तरह उत्साहवर्धक ही बन कर आता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-March
आराधना है। ऐसे ही मिलते−जुलते उद्बोधन अन्य प्रगतिशील लोकनायकों ने दिये। उसी का प्रतिफल था कि धर्म क्षेत्र सहित जीवन के समस्त क्षेत्रों में नव जीवन का संचार हुआ और उसका प्रतिफल राष्ट्रीय स्वाधीनता के रूप में सामने आया।
आराधना में लग जाओ यही परमात्मा की सबसे बड़ी आराधना है। ऐसे ही मिलते−जुलते उद्बोधन अन्य प्रगतिशील लोकनायकों ने दिये। उसी का प्रतिफल था कि धर्म क्षेत्र सहित जीवन के समस्त क्षेत्रों में नव जीवन का संचार हुआ और उसका प्रतिफल राष्ट्रीय स्वाधीनता के रूप में सामने आया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-April
आराधना की जा रही हैं इसका संकल्प, उद्देश्य, निर्धारण ही तत्व है। एक ही वृक्ष के विभिन्न अवयवों में विभिन्न प्रकार के गुण होते हैं। एक ही पदार्थ में कई प्रकार के रासायनिक कण मिल सकते हैं। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार खाद्य पदार्थों के भी स्थूल, सूक्ष्म और कारण प्रकृति होती है। स्थूल भाग से रक्त−मांस बनता हैं।
आराधना का प्रतिफल निश्चित रूप से दृष्टिगोचर हो रहा होगा। उपासना के आधारों का स्तर गिर जाने से ही उसकी सफलता संदिग्ध होती चली जाती है।
आराधना करे यह विधान जान लेने से उसके प्रभावशाली परिणाम निकलते हैं।
आराधना के लिए ही स्थान होना चाहिए, किसी और के लिए नहीं।”
आराधना प्रख्यात है। पाँच कोशों के जागरण की विधि गायत्री मंत्र के पाँच मुख चित्रित करते हुए समझाई गई है। मंत्रशक्ति को जागृत करने के लिए उपरोक्त पाँच आधारों को उसके विनियोग में समाविष्ट किया गया है।
आराधना करके दिव्य प्रतिफल प्राप्त किये थे। किन्तु सामान्य व्यक्ति वैसा नहीं कर पाते। इसमें मन्त्र की श्रेष्ठता एवं उपासना की गरिमा का दोष नहीं। साधक को ओछा व्यक्तित्व अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करने योग्य न होने से ही निराशा हाथ लगती है। खिलौना बन्दूक में रखकर बढ़िया कारतूस चलाने पर भी लक्ष्य बेध में सफलता न मिलेगी।
आराधना पद्धति में आस्था-विश्वास रखने वाला तथा एक विशेष प्रकार के मार्ग पर यन्त्रवत् चलने वाला सम्प्रदाय विशेष है। विद्वान बैबूर ने अपनी पुस्तक ‘हिंदुइज्म एट. ए. ग्लान्स’ में लिखा है, “रिलीजन शब्द का अर्थ एक विश्वास और पूजा विधि है। किसी समुदाय विशेष के सिद्धान्तों में विश्वास करना तथा उस सम्प्रदाय द्वारा निर्दिष्ट कुछ विशेष पूजा अनुष्ठान आदि का पालन करना ही पश्चिम की दृष्टि में धार्मिक कह जाने वाले व्यक्ति के लिए पर्याप्त हैं।” शब्द रिलीजन से एक ऐसे संकुचित व अपूर्ण भाव का बोध होता है कि उससे ‘धर्म’ तत्व समाहित नहीं होता। धर्म का अनिवार्य तत्व उसकी उदारता, महानता, सार्वभौम सत्ता में निहित है जबकि ‘रिलीजन’ में इस तरह के भाव प्रकट नहीं होते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-January
आराधना और इस तथ्य के समर्थन में दो घटनायें प्रमाण और साक्ष्य रूप में प्रस्तुत है। ‘साइकोलॉजी ऑफ रिलीजन’ पुस्तक के लेखक श्री थूलेस ने सेन्ट कैथराइन का प्रामाणिक विवरण दिया है। जब वह समय आता था, जब कि ईसामसीह क्रास पर कील से ठोंके गये थे, उस समय सेन्ट कैथराइन अपने शरीर के विभिन्न स्थलों में वैसी ही पीड़ा का अनुभव करती थीं, जैसी शरीर में कीलें ठोकने पर होती है। ऐसी अवस्था में एक डॉक्टर को उनकी देखभाल करनी होती थी। डाक्टरी जाँच से पाया गया कि कैथराइन की पीड़ा की अनुभूति वास्तविक थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-November
आराधना की, जनमानस को दिशा प्रेरणा और शिक्षण देते हुए। महाराज विदेदश्व, तरन्त, राजमहिषी, शशीयसी, पुरुभीड़ आदि नरेशों ने ऋषिकुमार का यथेष्ट स्वागत सत्कार किया। उन्हें कितनी ही गायें और अपार धन राशि दक्षिणा में दी। परन्तु ऋषिकुमार भिक्षा में प्राप्त राशि का निर्वाह भाग रख कर शेष सब आश्रम पहुँचा देते। और निरन्तर भ्रमण, अनवरत पर्यटन, अविराम परिव्रज्या करते रहे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-October
आराधना से सूर ने अपने जीवन को सफल बनाया, उन राम और कृष्ण की मूर्तियाँ- चित्र आज भी विद्यमान हैं पर तथाकथित उपासकों, भक्तों के लिए वे कुछ विशेष करामाती नहीं सिद्ध हो पाती। इस विरोधाभास से उन्हें असमंजस हो सकता है जो स्थूल तक ही सीमित रहते हैं। तत्वदर्शी यह जानते हैं कि एक ही तरह की उपासना के प्रतिफलों में अन्तःश्रद्धा का होना न होना ही महत्वपूर्ण है। अपनी निष्काम सघन श्रद्धा के अनुरूप ही साकार उपासना के परिणाम प्रकट होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-March
आराधना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-May
आराधना पर विशेष बल देता है। यह धर्म का एक अपरिहार्य, अपरिवर्तनशील, सार्वभौम रूप है, जिसमें किसी मिलावट— विकृति की कोई संभावना नहीं। यही वह शाश्वत अध्यात्म है, जिसे पूर्वार्त्त दर्शन के नाम से जाना जाता है। तर्कवाद ने इसे अपनी लपेट में लेने का कभी प्रयास नहीं किया; क्योंकि शाश्वत नैतिक मूल्यों में अपने पैर जमाने का उसे कभी कोई अवसर नहीं मिला। धर्म का पहला आयाम परिवर्तनशील है; लेकिन सुसंगत भी है; किंतु तभी, जबकि इसका स्वरूप शीशे के समान साफ हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-June
आराधना का अर्थ है- लोक मंगल में निरत रहना। जीवन साधना प्रकारांतर से संयम साधना है। उसके द्वारा न्यूनतम में निर्वाह चलाया और अधिकतम बचाया जाता है। समय, श्रम, धन और मन मात्र इतनी ही मात्रा में शरीर तथा परिवार के लिए खर्च करना पड़ता है जिसके बिना काम न चले। काम न चलने की कसौटी है- औसत देशवासियों का स्तर।
आराधना के रूप में भली प्रकार बता दिया था। नियमित जप-ध्यान करने का अनुबंधों समेत पालन करने के निर्देशन के अतिरिक्त यह भी बताया था कि चिन्तन में उपासना- चरित्र में साधना और व्यवहार में आराधना का समावेश करने में पूरी-पूरी सतर्कता और तत्परता बरती जाय। उस निर्देशन का अद्यावधि यथासम्भव ठीक तरह ही परिपालन हुआ है। उसी के कारण अध्यात्म अवलम्बन का प्रतिफल इस रूप में सामने आया है कि उसका सहज उपहास नहीं उड़ाया जा सकता।
आराधना के लिए- लोक साधना के लिए- गिरह की पूँजी चाहिए। उसके बिना भूखा क्या खाये? क्या बाँटे? यह पूँजी कहाँ से आई? कहाँ से जुटाई?
आराधना कहते हैं। आमतौर से लोग इस बचत को विलास में- अपव्यय में अथवा कुटुम्बियों में बिखेर देते हैं। उन्हें सूझ नहीं पड़ता कि इस संसार में और भी कोई अपने हैं- औरों की भी कुछ जरूरतें हैं। यदि दृष्टि में इतनी विशालता आयी होती तो उस बचत को ऐसे कार्यों में खर्च किया गया होता जिससे अनेकों का वास्तविक हित साधन होता और समय की माँग पूरी होने में सहायता मिलती।
आराधना में इन तथ्यों का समावेश भी नितान्त आवश्यक है।
आराधना का जो क्रम बताया था वे तीनों ही एक-से-एक बढ़कर थे। लोग उन अनुशासनों में से मात्र एक अत्यन्त प्रत्यक्ष को ही स्मरण रखे हुए हैं- 24 लक्ष पुरश्चरण को। वस्तुतः हमें जो मिला वह मात्र जप संख्या की परिणति नहीं है, वरन् समग्र जीवन में आध्यात्मिक आदर्शों का पूरी तरह समन्वय किये रहने का ही प्रतिफल है। इसके लिए आवश्यक परामर्श और दबाव देकर गुरुदेव ने हमारा कितना बड़ा उपकार किया इसका अनुमान वे लोग नहीं लगा सकते जिन्हें धन और पद के अतिरिक्त और कुछ चाहिए ही नहीं। जो इतनी ही मर्यादा में वरदान को सीमित रखते हैं।
आराधना की वे तीनों ही शर्तें पूरी करें जो आध्यात्मिक विभूतियाँ उपार्जित करने के लिए आवश्यक हैं। ऐसे लोगों की औसत भारतीय-स्तर के निर्वाह से अपनी जीवनचर्या का नया अध्याय आरम्भ करना चाहिए और कटिबद्ध होना चाहिए कि जो क्षमता बचती है उसी भगवान के खेत में बोने का साहस जुटायेंगे। निश्चय ही यह साहस सौ गुना हजार गुना होकर फलित होता है।
आराधना में नियमित रूप से होता रहा है। संक्षेप में इन्हें इस प्रकार कहा जा सकता है- (1) जनमानस के परिष्कार के लिए युग चेतना के अनुरूप विचारणा का निर्धारण- साहित्य सृजन (2) संगठन प्राणवान जागृत आत्माओं को युग धर्म के अनुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिए उत्तेजन मार्गदर्शन (3) व्यक्तिगत कठिनाइयों में से निकालने तथा सुखी भविष्य विनिर्मित करने वाला परामर्श योगदान। हमारी सेवा साधना इन तीन विभागों में बंटी रही है। इनमें दूसरी और तीसरी धारा के लिए असंख्यों व्यक्तियों से संपर्क साधना और पाना चलता रहा है। इनमें से अधिकाँश को प्रकाश और परिवर्तन का अवसर मिला है।
आराधना का समावेश करने में पूरी-पूरी सतर्कता और तत्परता बरती जाय। उस निर्देशन का अद्यावधि यथासम्भव ठीक तरह ही परिपालन हुआ है। उसी के कारण अध्यात्म अवलम्बन का प्रतिफल इस रूप में सामने आया है कि उसका सहज उपहास नहीं उड़ाया जा सकता।
आराधना बन जाती है। विश्व उद्यान को सुखी समुन्नत बनाने के लिए ही परमात्मा ने यह बहुमूल्य जीवन देकर अपने युवराज की तरह यहाँ भेजा है उसकी पूर्ति में ही जीवन की सार्थकता है। इसी मार्ग का अधिक श्रद्धापूर्वक अवलम्बन करने से अध्यात्म उत्कर्ष का वह प्रयोजन सधता है, जिसे आराधना कहा गया है।
आराधना के समन्वय से बनती है। यह तीनों कोई क्रियाकाण्ड नहीं है, जिन्हें इतने समय में, इस विधि से इस प्रकार बैठकर सम्पन्न करते रहा जा सके। यह चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में होने वाले उच्च स्तरीय परिवर्तन हैं। जिनके लिए अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों पर निरन्तर ध्यान देना पड़ता है। दुरितों के संशोधन में प्रखरता का उपयोग करना पड़ता है और नई दिशाधारा में अपने गुण कर्म, स्वभाव को इस प्रकार अभ्यस्त करना पड़ता है जैसे अनगढ़ पशु−पक्षियों को सरकस के करतब दिखाने के लिए जिस-तिस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है।
आराधना सम्बन्धी संदर्भ अपनी लेखनी से लिखे हैं। उनका जीवन क्रम बहुमुखी रहा है, तो भी उसमें से जितना भी सम्भव था, सर्वसाधारण हेतु हृदयंगम करने योग्य गायत्री-महाप्रज्ञा विषयक प्रेरणा प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
आराधना कहा गया है।
आराधना इन दोनों के समान समन्वय की आवश्यकता पड़ती है। इनमें से किसी अकेले के सहारे लक्ष्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। कोई एक भी ऐसा नहीं है जिसे छोड़ा जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
आराधना की जाती है एवं उस दिव्य प्रकाश से स्वयं को ही नहीं- सृष्टि के हर प्राणधारी को जीवन, चेतना, सत्प्रेरणा प्रदान किये जाने की प्रार्थना की जाती है। चिन्तन को बहिरंग से मोड़कर अन्तर्मुखी बनाकर हर कोई सूर्य की दिव्य सामर्थ्य का लाभ उठाता रहा रह सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-August
आराधना करें। बड़ों में बड़प्पन अधिक होता है।
आराधना की त्रिधा अपनानी पड़ती है।
आराधना का यही सिद्धान्त है।
आराधना की कसौटी पर कस कर यह जाना जा सकता है कि किसकी भक्ति सच्ची है किसकी झूठी?
आराधना की जीवनचर्या में नित्यकर्म की तरह स्थान देना चाहिए। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार के दोनों प्रयोजन इसी आधार पर बन पड़ते हैं।
आराधना का- समाज सेवा का समय आ गया। उन्होंने जल्दी ही अनिवार्य सेवा निवृत्ति ले युग देवता के चरणों में अपनी श्रद्धाँजलि चढ़ाने का संकल्प लिया है।
आराधना किसकी? विराट् ब्रह्म की। यह विराट् विश्व ही दृश्यमान भगवान का स्वरूप है। कृष्ण ने अर्जुन और यशोदा को- राम ने कौशल्या और काकभुसुण्डि को अपने इसी विराट् रूप से दर्शन कराया था। रामायण में उसी की अभिव्यक्ति ‘सियाराम मय सब जग जानी’ वाली चौपाई में की है।
आराधना करने लगा। एक दिन बादल आये और सूर्य को अपने अंचल में छिपा लिया। श्रमिक सोचने लगा- सूर्य से बादल बड़ा है। यों उसने अपना इष्ट देव बदला और बादलों की अभ्यर्थना करने लगा।
आराधना का त्रिविधि उपक्रम अपना कर प्रज्ञा परिजन पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना, जो युग धर्म की माँग पूरी करने हेतु उन्होंने प्रचण्ड तप पुरुषों के रूप में आरम्भ की है, के अंग बन सहज की श्रेयाधिकारी बन सकते हैं।
आराधना। आराधना किसकी? विराट् ब्रह्म की। यह विराट् विश्व ही दृश्यमान भगवान का स्वरूप है। कृष्ण ने अर्जुन और यशोदा को- राम ने कौशल्या और काकभुसुण्डि को अपने इसी विराट् रूप से दर्शन कराया था।
आराधना तो बीज बोकर सौगुना काटने के समान है। यह समाज भगवान का खेत है इसमें सत्प्रयोजनों के लिए भी अपना समय, श्रम, ज्ञान, वैभव, प्रभाव बोना है वह असंख्य गुना होकर वापस लौटता है। महामानवों के जीवन वृत्तांत इस लक्ष्य की परिपुष्ट में पग-पग पर असंख्यों प्रमाण उपस्थित करते हैं। दूसरों की सहायता कर वे वस्तुतः अपनी ही सहायता करते हैं। बादल बरसते हैं पर खाली नहीं होते।
आराधना में से कोई भी मार्ग ऐसा हो सकता है, जिसे अपनाता हुआ मनुष्य आत्मिक विकास के सोपानों पर क्रमशः आगे बढ़ता चला जाए। जो भी क्रिया-कृत्यों अपनी अन्तःप्रेरणा को साधना उपादानों द्वारा सशक्त बनाने के लिए किये जाते हैं, वे ही सच्चे कर्मकाण्ड हैं एवं आध्यात्मिक विकासवाद की प्रक्रिया में उन्हें ऋषि मनीषियों ने गरिमापूर्ण स्थान भी दिया है।
आराधना’ है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उनका जीवनयापन असंख्यों की सहायता से ही चल पाता है। अस्तु उसका भी कर्तृत्व है कि ऋण मुक्ति के लिए लोक सेवा के कार्यक्रमों में निरत रहे। भगवान ने मनुष्य जन्म जैसा सर्वश्रेष्ठ उपहार इसी लिए दिया है कि वह उस धरोहर का सही प्रयोजन के लिए सही प्रयोग करे।
आराधना ठीक प्रकार बन पड़े इसके लिए दो उपाय बरतने पड़ते हैं एक है- सादा जीवन उच्च विचार। न्यूनतम में निर्वाह। परिवार को सीमित रखना और स्वावलम्बी बनना। दूसरा उपाय है बचत का अधिकांश भाग सत्प्रवृत्ति संवर्धन में नियोजित करना। इस प्रकार बहुत उपार्जित करने वाला अपना पुरुषार्थ तो भरपूर करता है पर जो कमाता है उसका अधिकाँश भाग लोक मंगल में खर्च कर देता है।
आराधना। उपासना के भाव क्षेत्र को साधना से चरित्र को और आराधना से व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश किया जाता है। यह तीनों साथ-साथ चलती हैं। जिस प्रकार अन्न, जल और वायु का साथ-साथ सेवन क्रम चलता रहता है उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए हर किसी को अपने-अपने ढंग से उपासना, साधना और आराधना की त्रिधा अपनानी पड़ती है।
आराधना से व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश किया जाता है। यह तीनों साथ-साथ चलती हैं। जिस प्रकार अन्न, जल और वायु का साथ-साथ सेवन क्रम चलता रहता है उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए हर किसी को अपने-अपने ढंग से उपासना, साधना और आराधना की त्रिधा अपनानी पड़ती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
आराधना के निमित्त सुनिश्चित रूप से निकालना चाहिए।
आराधना का पर्यवेक्षण करने के लिए बिस्तर पर पड़े-पड़े विचार करना चाहिए कि आज के समय, श्रम, वैभव एवं ज्ञान में से कितना अंश लोक मंगल के निमित्त लगा? नहीं लगा तो क्यों नहीं लगा? भविष्य में उन कारणों को दूर करना चाहिए जिनसे कि अपनी विभूतियाँ युगधर्म के लिए लग नहीं पातीं। शरीर से बढ़कर महत्व यदि आत्मा को मिले तो कोई कारण नहीं कि सारा समय और वैभव पेट प्रजनन के लिये ही लगे। समय की पुकार सर्वथा अनसुनी नहीं करनी चाहिए।
आराधना के क्रम से जो प्रत्यक्ष भूमिका बनायी है, उसके कई अध्याय पूरे हो चुके। अब उपसंहार भर शेष है। यही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा जो वर्तमान को आमूल-चूक बदल डालेगा। आत्मसत्ता के सूक्ष्मीकृत रूप में प्रकटीकरण की क्या चमत्कारी परिणतियां हो सकती हैं इसे अगले दिनों स्पष्टतः देखा जा सकेगा।
आराधना :- सायंकाल सोते समय आराधना का पर्यवेक्षण करने के लिए बिस्तर पर पड़े-पड़े विचार करना चाहिए कि आज के समय, श्रम, वैभव एवं ज्ञान में से कितना अंश लोक मंगल के निमित्त लगा? नहीं लगा तो क्यों नहीं लगा? भविष्य में उन कारणों को दूर करना चाहिए जिनसे कि अपनी विभूतियाँ युगधर्म के लिए लग नहीं पातीं। शरीर से बढ़कर महत्व यदि आत्मा को मिले तो कोई कारण नहीं कि सारा समय और वैभव पेट प्रजनन के लिये ही लगे। समय की पुकार सर्वथा अनसुनी नहीं करनी चाहिए।
आराधना की विधा जिसे जीवन चर्या के साथ गूँथने पर जीवन त्रिवेणी संगम जैसा पवित्र, प्रखर, और प्रामाणिक बनता है और फिर काक के पिक एवं बगुले के हंस बनने में कोई बाधा मार्ग में नहीं आती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-November
आराधना ने उन्हें उच्चस्तरीय विद्वान बना दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-December
आराधना के पीछे मूलतः वर्ण विज्ञान के सिद्धान्त हैं। मानव मूलतः श्रेष्ठ वृत्तियों वाला है तथा वह उन्हीं को उत्तेजना देने वाले आयामों को बहिरंग में ढूंढ़ता है। आधुनिक तड़क-भड़क में श्रेष्ठता को बढ़ावा देने वाले पक्ष तो गुम हो गए हैं एवं “वीजुअल पॉल्युशन” को जन्म देने वाले चटकीले उत्तेजक तत्व बहिरंग में प्रचुरता में हैं। इन्हीं के कारण चिन्तन को निषेधात्मक फटकार मिलती रहती है। सतत् ऐसे पोषण से तनाव, बेचैनी का होना स्वाभाविक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-January
आराधना की गाड़ी चलती है। बुद्धि के परिष्कृत स्वरूप विवेक का सम्बल मिल जाने से श्रद्धा एक ऐसी प्राणवान शक्ति बन जाती है जो साधक को सतत् आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उसकी सामर्थ्य की महिमा के गुणगान से शास्त्रों के पन्ने भरे पड़े हैं। “भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा विश्वास रूपिणी”, के रूप में अपना आन्तरिक उद्गार व्यक्त करते हुए मानसकार ने श्रद्धा को साक्षात् भवानी और विश्वास को शंकर मानकर अभ्यर्थना की है। इसी सत्य को इस प्रकार भी व्यक्त किया गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-June
आराधना का प्रचलन बढ़ा है। अपराधों की स्वतन्त्रता के लिए भी तेजी से कदम बढ़े हैं। राष्ट्रीय स्वाधीनता के इन पचास वर्षों में जीवन-मूल्य बेतरह ध्वस्त हुए हैं। इनमें बुरी तरह गिरावट आयी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-November
आराधना की और जन-जन तक ज्ञानामृत बाँटा। अखण्ड ज्योति उसका एक माध्यम बनी और १९३७ से सतत् प्रकाशित इस ज्ञानगंगा ने लाखों-करोड़ों को जीवन जीने की राह दिखाकर उनका भविष्य मंगलमय बनाया है। भगीरथ ने राह बनायी और पतित-पावनी गंगा युगों-युगों तक के लिए अमर हो गयी। परमपूज्य गुरुदेव की वाणी, उनका हृदय, उनका अंत करण तीनों अखण्ड ज्योति में समाहित है। इस गंगोत्री का प्रवाह अनंतकाल तक प्रवाहित होकर जनमानस का परिष्कार करता रहेगा, इसमें किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं होना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
आराधना। यह तथ्य यदि गहराई से समझ लिया जाए तो तत्वदर्शन के उस मूल प्रयोजन को समझा जा सकता हैं जिसके लिए आस्तिकता और धार्मिकता का विशालकाय कलेवर दूरदर्शी ऋषियों ने खड़ा किया है। आत्मिकप्रगति की दिशा में इन्हीं दो कदमों को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाते हुए सभी अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकते है। यह तो हुआ सनातन और शाश्वत सत्य। यदि सामाजिक परिस्थितियों की दृष्टि से भी सोचें तो लोकमानस को निकृष्टता से उत्कृष्टता की ओर मोड़ने के लिए भी इसी उपाय का तात्कालिक उपचार के रूप में भी प्रयोग करना पड़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-August
आराधना से उस धार्मिक उत्सव को पवित्र कर रहे थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
आराधना के केन्द्र रखने पर अपनी सत्ता में समाहित विशेषताएँ साधक को प्रदान करते रह सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-October
आराधना

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
आराधना की बात करता हूँ। आपको कि आराधना क्या है? और किसकी की जानी चाहिये? आराधना कहते हैं समाज सेवा को जन कल्याण को। सेवा धर्म वह नकद धर्म है जो हाथोंहाथ फल देता है।
आराधना कहते हैं समाज सेवा को जन कल्याण को। सेवा धर्म वह नकद धर्म है जो हाथोंहाथ फल देता है। इसमें पहले बोना पड़ता है। आज से साठ वर्ष पूर्व हमारे पूज्य गुरुदेव ने हमारे घर पर आकर दीक्षा दी और कहा की तुम बोने और काटने की बात मत भूलना। कहीं से भी कोई चीज फोकट में नहीं मिलता हैं।
आराधना। उपासना के नाम पर आपने अगरबत्ती जलाकर और नमस्कार करके उसे समाप्त कर दिया होगा, परन्तु हमने ऐसा नहीं किया। हमने अगरबत्ती जलाकर प्रारम्भ तो अवश्य किया है, परन्तु समाप्त नहीं किया। हमने अपने जीवन में अध्यात्म के जो भी सिद्धान्त हैं, उन्हें अवश्य धारण करने का प्रयास किया है। त्रिवेणी में स्नान करने की बात आपने सुनी होगी कि उसके बाद कौआ कोयल बन जाता है।
आराधना कहते हैं। वास्तव में यहीं अध्यात्म की असली शिक्षा है।
आराधना-समाज के लिये, भगवान के लिये।
आराधना हमने समाज को ऊंचा उठाने के लिये की है। आप यहाँ आइये और देखिये, अपने मुख से अपने बारे में कहना ठीक बात नहीं है। आप यहाँ आइये और दूसरे के मुख से सुनिये। हम सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, असामान्य व्यक्ति हैं। यह हमें उपासना, साधना और आराधना के द्वारा मिला है।
आराधना, अभ्यर्थना करता है वह प्रतिक्षण माता का अमृतोपम दुग्धपान करने का आनन्द लेता है और समस्त अज्ञानों, अभावों, आसक्तियों के कारण उत्पन्न होने वाले कष्ट कठिनाइयों से क्लेशों, दुखों से छुटकारा पाकर मनोवांछित फल प्राप्त करता है। योग्य एवं तपस्वी गुरु के संरक्षण में की गयी गायत्री साधना अभीष्ट लाभ पहुँचाती है। वृहत्पारासर स्मृति 8-60 में कहा भी गया है “रोग, शोक, द्वेष तथा अभाव की स्थिति में गायत्री महाशक्ति की उपासना करने से इन कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। अग्निपुराण में भी उल्लेख है-
आराधना की है। आज जो कुछ भी प्रगति, उन्नति, अच्छाई, विकास दिख रहा है सब कुछ इसी की आराधना का सुफल है।” सभी मौन थे। कोई कुछ कहता भी क्या? प्रत्यक्ष को भी क्या कभी प्रमाण की आवश्यकता पड़ती है?
आराधना का सुफल है।” सभी मौन थे। कोई कुछ कहता भी क्या? प्रत्यक्ष को भी क्या कभी प्रमाण की आवश्यकता पड़ती है? श्रमदेवता का अनुग्रह भाजन सामने जो खड़ा था।
आराधना के द्वारा मिला है। अगर आप इन तीन चीजों का समन्वय अपने जीवन में करेंगे, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको साधना से सिद्धि अवश्य मिलेगी।
आराधना कहते हैं।
आराधना क्या है? और किसकी की जानी चाहिये? आराधना कहते हैं समाज सेवा को जन कल्याण को। सेवा धर्म वह नकद धर्म है जो हाथोंहाथ फल देता है। इसमें पहले बोना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
आराधना अधिक सजीव और शक्तिशाली हो सकेगी। जिस दिन श्री रामकृष्ण देव ने जन्म लिया है, उसी दिन से आधुनिक भारत के निर्माण तथा सतयुग का आरम्भ हुआ है। उनके अगले अवतार में तो ये भाव अपना चरम विस्तार पा जाएँगे।
आराधना करते रहे हैं और उन्होंने प्रत्येक धर्मावलम्बी मनुष्य को इसी सुख्य-माध्य एवं शीघ्र सफल होने वाली साधना-प्रणाली को अपनाने का आदेश दिया है।
आराधना करती हैं। गायत्री उपासना सब के लिए सब प्रकार मंगलमयी है।
आराधना का अधिकार सभी को है, चाहे वे नर हों या नारी। जो लोग यह कहते हैं कि गायत्री वेदमंत्र होने से उसका अधिकार नारी को नहीं है, वे भारी भूल करते हैं। प्राचीनकाल में स्त्रियाँ मंत्रदृष्टा रही हैं। वेदमंत्रों का उनके द्वारा अवतरण हुआ है। गायत्री स्वयं स्त्रीलिंग है, फिर उनका अधिकार न होने का कोई कारण नहीं।
आराधना की जाती हैं। संसार में जितने भी रिश्ते हैं, उन सब में माता का रिश्ता अधिक प्रेमपूर्ण तथा अत्याधिक घनिष्ठ है। ईश्वर को जिस दृष्टि से देखा जाता है, वह उसी तरह प्रत्युत्तर देता है। स्नेह, वात्सल्य, करुणा, ममता, दया, उदारता, कोमलता आदि तत्व नारी में नर की अपेक्षा स्वभावतः अधिक होते हैं। ब्रह्म का अर्द्धवामाँग ब्राही तत्व अधिक कोमल, अधिक आकर्षक तथा शीघ्र द्रवीभूत होने वाला है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-July
आराधना करके गायत्री महाशक्ति की सहायता प्राप्त करनी चाहिये। दूसरों के तप से स्वयं लाभ उठाना एक गलत तरीका है जिसे चालाक आदमी, भोले भाले साधकों को खुशामद या दीनता दिखाकर प्रयुक्त करते हैं। साधकों को किसी प्रपंच में फंसकर अपनी शक्ति बरबाद नहीं करनी चाहिए वरन् उसे आत्म कल्याण के लिए सुरक्षित करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-November
आराधना करनी चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-June
आराधना के विधान मौजूद हैं। इसका मूल उद्देश्य यही है कि मनुष्य के चित्त में ईश्वर के सर्वव्यापक और न्यायकारी होने के संस्कार जमे और वह बुराइयों से बचे। निश्चय ही पुलिस कप्तान को सामने खड़ा देखकर जेबकट की यह हिम्मत नहीं पड़ती कि वह उस अधिकारी की जानकारी में जेब काटे। क्योंकि वह जानता है कि ऐसा करने पर उसका अपराध छिप न सकेगा। वह तुरन्त पकड़ा जायेगा और जेल की यातना भोगेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-March
आराधना से सब कुछ मिल सकता है, लोक और परलोक में सब प्रकार आनन्ददायक परिस्थिति प्राप्त हो सकती है, पर वह सब सम्भव तभी है जब माता की आज्ञाओं और शिक्षाओं पर भी ध्यान दें। उनके आदेशों को पालन करके जो लोग अपने आपको सच्चा मातृभक्त सिद्ध करते हैं वे ही उसकी गोदी में चढ़ने का, पयपान करने का तथा अंचल की शीतल छाया का सुख लाभ करते हैं। माता के आदेशों का हर घड़ी तिरस्कार करने वाले लोग केवल चन्द मिनट पूजा पाठ करके अभीष्ट लाभ प्राप्त करना चाहें तो यह कठिन ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-December
आराधना करने बैठता है तो उसके चारों ओर अन्तरिक्ष ( eather) में एक सूक्ष्म इमारत बन जाती है वह किसी साधन में गुम्बददार होती है किसी साधन में दूसरे प्रकार की। प्रत्येक मत के कर्म में भेद रहता है रस्म रिवाज भी दूसरी रहती है, इसलिए उनके यह ( Astrel building) आस्ट्रल बिल्डिंग सूक्ष्मगृह में भी फर्क हो जाता है और उसी के फोटो पर बाहर यह सब बनाये गये हैं।
आराधना, सरीखे सत्कर्मों में करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-September
आराधना करने पर भी अभीष्ट वस्तु प्राप्त नहीं होती। इन असमानताओं को देखकर कोई ईश्वर को, कोई साधना विधि को, कोई साधक को, कोई भाग्य को और कोई किसी को दोष देते हैं। जिन्हें सुगमतापूर्वक अधिक समृद्धि मिल गई वे अतिशय विश्वासी हो जाते हैं और जिन्हें कठिन प्रयत्न करने पर भी निराश रहना पड़ा वे अविश्वासी हो जाते हैं।
आराधना द्वारा इष्ट सिद्धि के प्राप्त होने में सहायता मिलती है। प्रार्थना ऐसी होनी चाहिए जिससे उत्कट अभिलाषा, दृढ़ता, सफलता की आशा, प्रयत्नशीलता, अभीष्ट योग्यता, विवेकशीलता एवं सात्विकता की जागृति हो। ऐसी प्रार्थना बड़ी बल- शालिनी होती है, उससे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे अवसर उपस्थित होते हैं जिनमें कठिन दिखाई देने वाले कार्य बड़ी सुगमता से पूरे होते हुए देखे जाते हैं। उसे प्रार्थना का चमत्कार भी कह सकते हैं।
आराधना से प्राप्त होती है और तीव्र इच्छा के आकर्षण से अनुकूल परिस्थितियाँ एकत्रित होकर सफलता को निकट खींच लाती हैं।
आराधना से अपनी इच्छित वस्तु के प्रति उत्कट अभिलाषा और उसकी प्राप्ति की अधिक निश्चयपूर्ण आशा जागृत होती है। यह जागरण इष्ट सिद्धि का द्वार है। जहाँ तीव्र चाह होती है वहाँ राह निकल आती है। रामायण का मत है “जेहि कर जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलत न कछु सन्देहू।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-August
आराधना में लगाते हो?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-July
आराधना का खाद पानी चाहता है। तीसरा कार्य यही है कि वातावरण परिशोधन के लिए, उसमें अध्यात्म तत्वों का अभिवर्धन करने के लिए साधना को अनिवार्य कर्तव्य मानें। स्वयं करे और अपने प्रभाव क्षेत्र में अन्यान्यों को उसके लिए प्रोत्साहित करे। एक माला गायत्री जप का भी यदि नियमित क्रम चल पड़े तो अपने चौबीस लाख सदस्य हर दिन चौबीस करोड़ जप का दैनिक अनुष्ठान करते रह सकते है। इससे वातावरण में देव-तत्वों की समर्थता बढ़ेगी और नवयुग के अनुरूप वातावरण बनेगा।
आराधना की। उससे प्रसन्न होकर वे वरदान देने आये। तपस्वी ने इन्द्रासन और उसका वज्र माँगा।
आराधना के रूप में परब्रह्म की निराकार शक्ति की उपासना आरंभ हुई ऊर्जा के अनेकानेक रूप है, पर जिस शक्ति समुच्चय ने उसे सर्वाधिक प्रभावित किया, आदिमकालीन स्थिति से वर्तमान में ला बिठाया, वह थी प्रकाश की शक्ति। अग्नि पिण्ड को देखकर उसने पहला आविष्कार अग्नि प्रज्ज्वलन के रूप में किया एवं अपनी प्रारंभिक आवश्यकताएँ जुटाई। प्रकाश व ताप की शक्ति को मनुष्य भूला नहीं है व आज भी ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के पर्याय के रूप में इन्हीं दो शक्तियों को वह प्रमुख मानता आया है। ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राण शक्ति प्रकाश रश्मियों के रूप में जीव जगत को सतत् प्रभावित करती रहती है। क्रमशः परिष्कृत होते-होते वह “लेसर” के रूप में अब मनुष्य के पास विद्यमान है, जिसकी शक्ति सामर्थ्य अपरिमित कूती जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-May
आराधना का विधान आप्त वचनों में आता हैं वस्तुतः वे प्रकाश व ताप देने वाले वृक्ष वनस्पतियों में जीवन संचार करने वाले प्राणि जगत में स्फूर्ति भर देने वाले भर नहीं हैं, उनकी सप्त किरणों में व्यक्ति को निरोग करने की अभूतपूर्व सामर्थ्य छिपी पड़ी हैं हम सही मात्रा में सही वर्ण का प्रयोग कर न केवल रोगों से बचे रह सकते हैं, अपितु बलिष्ठता भी अर्जित कर सकते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-April
आराधना हैं। मनुष्य जीवन में यदि इस तत्व के अभिवर्धन की महत्ता समझी जा सके तो सहज ही यह लालसा उठती है कि विचार संस्थान का परिमार्जन किया जाय, बुद्धि को न्यायनिष्ठ और विवेकवान बनाया जाये। कल्पनाओं और आकाँक्षाओं की अनगढ़ न रहने देकर उन्हें आदर्शवादिता के सघन रूप से जोड़ रखा जाये। बुद्धिमता या दूरदर्शी और नीति-निष्ठ रहे तो व्यक्ति का सुसंस्कारी बनना स्वाभाविक हैं। ऐसे ही व्यक्ति महामानव स्तर के बनते और महान कार्य करते देखे गये हैं।
आराधना के प्रति निष्ठावान ही होकर जीवन-यापन करते है।
आराधना अनुष्ठान से भी आकर्षित होते और अनुग्रह करते देखे गये है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
आराधना के पीछे मूलतः वर्ण विज्ञान के सिद्धान्त हैं। मानव मूलतः श्रेष्ठ वृत्तियों वाला है तथा वह उन्हीं को उत्तेजना देने वाले आयामों को बहिरंग में ढूंढ़ता है। आधुनिक तड़क भड़क में श्रेष्ठता को बढ़ावा देने वाले पक्ष तो गुम हो गये है एवं “विजुअल पाल्यूशन” को जन्म देने वाले चटकीले उत्तेजक तत्व बहिरंग में प्रचुरता में है। इन्हीं कारण चिन्तन को निषेधात्मक फटक मिलती रहती है। सतत् ऐसे पोषण से तनाव, बेचैनी का होना स्वाभाविक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-August
आराधना के साथ-साथ चिकित्सा उपचार भी अनिवार्यतः जुड़ा रहता है एवं प्रचारक उस माध्यम से जन संपर्क साधते एवं निर्धारित कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न करते है। उसी प्रकार शाँतिकुँज देश भर में फैले कार्यकर्ताओं एवं जड़ी-बूटी उद्यानों के माध्यम से स्वास्थ्य संरक्षण अभियान चलाने जा रहा है। प्रस्तुत अभियान में राष्ट्र निर्माण की समग्र साधना का योजनाबद्ध समन्वय है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
आराधना में। पड़ गई पूजा पुरानी, और बासी भावनायें, भर रहीं कितनी उदासी, हैं रुँवासी अर्चनायें
आराधना में,
आराधना में।
आराधना में। बोधमय, आनन्द, उफनाता न, प्राण, उपासना में। प्रार्थनायें याचना का गीत बन कर, रो रही है। भावनायें गिड़गिड़ाती, दीनतायें दो रही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-September
आराधना। यह तीनों दैनिक जीवन में, आहार परिश्रम-विश्राम, अन्न, जल, और वायु की तरह गुँथे रहने चाहिए। युग साहित्य के नियमित स्वाध्याय को इस प्रयास के लिए मुख्य आधार माना जाय।
आराधना कहते हैं। यही वह पूजा है जिससे आत्म संतोष, लोक सम्मान एवं देवी अनुग्रह के दोनों लाभ प्राप्त होते हैं। स्वार्थ और परमार्थ की समन्वित सिद्धि होती है। लोक परलोक दोनों बनते हैं।
आराधना का समन्वित स्वरूप है। यही वह साधना है जिसके आधार पर सिद्धियां और सफलताएं सुनिश्चित बनती हैं। दूसरे के सामने हाथ पसारने गिड़गिड़ाने भर से पात्रता के अभाव में कुछ प्राप्त नहीं होता। भले कही वह दानी परमेश्वर ही क्यों न हों। कहा गया हैं कि ईश्वर केवल उनकी सहायता करते हैं, जो अपनी सहायता करने को तत्पर है।
आराधना का अर्थ है विराट ब्रह्म की- विशाल विश्व की - विश्व मानव की सेवा साधना में समुचित उत्साह और तत्परता रखना। इसी परमार्थ परायणता को ईश्वर की आराधना कहते हैं। यही वह पूजा है जिससे आत्म संतोष, लोक सम्मान एवं देवी अनुग्रह के दोनों लाभ प्राप्त होते हैं। स्वार्थ और परमार्थ की समन्वित सिद्धि होती है। लोक परलोक दोनों बनते हैं।
आराधना धन्य होती है कि नव सृजन के विशालकाय सम्पादन में अपनी ही भागीदारी और अलग-अलग एक चावल की खिचड़ी- ढाई ईंट की मस्जिद न बना कर हीरक हार की तरह संयुक्त शक्ति का परिचय दिया जाय। युग सन्धि के इस आपत्ति काल में तो इसी रीति नीति के अपनाये जाने की और भी अधिक आवश्यकता है।
आराधना के आधार पर आत्म परिष्कार करेंगे। धार को पैनी करेंगे और इतनी अन्तः क्षमता अर्जित करेंगे जिसके आधार पर उनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य करते बन पड़ें।
आराधना के केन्द्र रखने पर अपनी सत्ता में समाहित विशेषताएं साधक को प्रदान करते रह सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-April
आराधना करने लगा। एक दिन बादल आये और सूर्य को अपने अंचल में छिपा लिया। श्रमिक सोचने लगा-सूर्य से बादल बड़ा है। यों उसने अपना इष्ट देव बदला और बादलों की अभ्यर्थना करने लगा।
आराधना करे। बड़ों में बड़प्पन अधिक होता है।
आराधना करनी चाहिए। जितना शीघ्र इस पाप से छूटा एवं बचा जा सके उतना ही कल्याणकारी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-January
आराधना प्रकाराँतर से महाकाल की ही उपासना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-July
आराधना की लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥4॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-September
आराधना इसी विराट् विश्व की, की जा सकती है। आराधना अर्थात् सेवा। सेवा निराकार ब्रह्म सत्ता की नहीं हो सकती। उसका तो अनुशासन ही पाला जा सकता है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के क्षेत्रों में मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहना, चरित्र भ्रष्ट न होना, आदर्शों का विधाओं का मर्यादापूर्वक पालन करना, कर्तव्यों का पालन ईश्वर को घट घट वासी मानकर करते रहना ही पर्याप्त है।
आराधना दृश्य संसार की, की जा सकती है। इसके लिये सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन करना पड़ता है। भगवान के अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म का उन्मूलन करने के लिये होते है। यह कार्य उसके अनुचरों को करने होते है। राम दल के रीछ, बानर, सेतु बाँधने, लंका उजाड़ने में ही नहीं, राम राज्य की स्थापना में अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन में भी जुटे रहे।
आराधना के कारण शरीर अन्तःकरण से सम्बन्धित है।
आराधना का समन्वय करना चाहिये। स्मरण रहे, त्रिपदा गायत्री के तीन चरणों में इन तीनों विशिष्टताओं को मनोभूमि में ओत प्रोत कर लेने की आवश्यकता है।
आराधना तो करनी ही चाहिए परन्तु अयाचित आने वाली विपत्तियों का भी उत्साह पूर्वक स्वागत करना चाहिए क्यों कि सीखने के लिए हमें वे बहुत कुछ देती है और सिखाने के लिए ऐसी महत्वपूर्ण शिक्षायें अपने साथ लेकर आती है कि कदाचित् उन्हें कोई सीख सके तो सुविधाओं और सम्पन्नता की परिस्थितियाँ न भी रहते हुए अपने व्यक्तित्व को सफल बना सकती हैं।
आराधना के इन तीन उपायों से ही ईश्वर जीवसत्ता में प्रवेश करता है तथा मनुष्य को देवोपम चिन्तन चरित्र विनिर्मित करने की प्रेरणा देता है। साहसी मनस्वी इस पथ पर चलकर असीम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं, स्वयं को ऊँचा उठाते हैं और दैवी अनुकम्पा उन पर सतत् बरसती रहती है। योगाभ्यास एक पराक्रम है, अपनी अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों, से संघर्ष है। जो इस देवासुर संग्राम में जितना अधिक सफल होता है वह बहिरंग जगत में सुसंस्कृत एवं अन्तरंग की दृष्टि से महान बनता चला जाता है।
आराधना। यही है वह समन्वय का महातीर्थ जिसका अवगाहन करने से आध्यात्मिक कायाकल्प होता है और कौआ, कोयल तथा बगुला हंस बन जाता है। रामायण के प्रतिपादनानुसार मात्र स्थान विशेष में जाकर पानी में डुबकी लगाने भर से वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।
आराधना अर्थात् सेवा। सेवा निराकार ब्रह्म सत्ता की नहीं हो सकती। उसका तो अनुशासन ही पाला जा सकता है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के क्षेत्रों में मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहना, चरित्र भ्रष्ट न होना, आदर्शों का विधाओं का मर्यादापूर्वक पालन करना, कर्तव्यों का पालन ईश्वर को घट घट वासी मानकर करते रहना ही पर्याप्त है। उसे किसी के धूप दीपकों या मनुहार उपहार की आवश्यकता नहीं।
आराधना। यदि विधान के साथ तत्त्वज्ञान का सम्मिश्रण रखा गया। तो उसका समुचित लाभ प्राप्त होगा। अपने अनुभव की साक्षी देकर जब यह प्रतिपादन समझाया तो सम्पर्क में आने वालों में अधिकाँश ने उस मार्ग पर चलना अंगीकार किया। यही कारण है जहाँ मात्र पूजा पाठ करने वाले सर्वथा खाली हाथ रहते और प्रपंच रचते देखे गये है वहाँ हमारे द्वारा प्रशिक्षित गायत्री साधकों में से अधिकाँश ने अपने व्यक्तित्व का कायाकल्प किया और लोकसेवा के क्षेत्र में बढ़ चढ़ कर भूमिका निबाही।
आराधना के समन्वय को तीर्थराज प्रयाग का त्रिवेणी-संगम कहा गया है। उपासना अर्थात् गंगा, साधना अर्थात् यमुना, सरस्वती अर्थात् आराधना। यही है वह समन्वय का महातीर्थ जिसका अवगाहन करने से आध्यात्मिक कायाकल्प होता है और कौआ, कोयल तथा बगुला हंस बन जाता है। रामायण के प्रतिपादनानुसार मात्र स्थान विशेष में जाकर पानी में डुबकी लगाने भर से वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।
आराधना का कार्यान्वित करना होता है। आराधना का अर्थ है। लोकमंगल की पुण्य-परमार्थ की सेवा साधना। सेवा धर्म का परिपालन भी ईश्वर भक्ति का ही एक चरण है।
आराधना भी इसी के साथ स्मरण किये जाने वाले कृत्य हैं जिनमें क्रमशः विचारणा व गतिविधियों को उत्कृष्टता के साथ जोड़ा जाता है। उपासना यदि भक्तियोग है तो साधना ज्ञानयोग एवं आराधना-कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिए इन्हीं त्रिविधि सोपानों को अपनाना पड़ता है।
आराधना का अर्थ है। लोकमंगल की पुण्य-परमार्थ की सेवा साधना। सेवा धर्म का परिपालन भी ईश्वर भक्ति का ही एक चरण है।
आराधना जिसकी की जा सकती है जो चर्म चक्षुओं से देखा जा सकता है। वह विराट् रूप के दर्शन कराये गये। यशोदा भी कृष्ण का बालक रूप नहीं, वास्तविक रूप देखना चाहती थी, उन्हें भी माटी न खाने की सफाई देते हुये भगवान ने अपना विराट् रूप ही दिखाया। रामावतार में कौशल्या को पालने में और काकभुसुण्डि को खेल के मैदान में अपना यही विराट् रूप दिखाया था।
आराधना-कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिए इन्हीं त्रिविधि सोपानों को अपनाना पड़ता है।
आराधना द्वारा अपने क्रिया-कलापों को सोद्देश्य बनाकर ईश्वरी उद्यान को और भी सुन्दर-सुव्यवस्थित बनाने आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना का विकास किया जाता है। सतत् हर क्षण इनका अभ्यास जीवन में अनिवार्य है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-February
आराधना की बात लिखी है व गायत्री महाविद्या द्वारा अशक्ति से मुक्ति, अविद्या से मुक्ति, अभावों से मुक्ति का जो वर्णन किया है उसका उनने देवीभागवत व बाद में ‘कुँडलिनी महाशक्ति व उसकी संसिद्धि’ प्रकरण में बड़ी विस्तृत व्याख्या की है। वस्तुतः शक्ति एक ही है। साकार भाव को प्राप्त परब्रह्म की ही मूर्ति देवी भाव में स्थित होकर सीता, राधा, सरस्वती, लक्ष्मी, महेश्वरी आदि विविध रूपों में विभिन्न उपासकों के द्वारा आराधित होती हैं। रामकृष्ण परमहंस ने उसी को काली के रूप में पूजा था व उसी के दर्शन अपने प्रिय शिष्य नरेन्द्रनाथ दत्त को कराकर साक्षात आद्यशक्ति के दर्शन कराये थे। श्री अरविंद ने महत्चेतना के रूप में सुपर चेतन जगत में विद्यमान सत्ता से अवतरित हो रही सावित्री महाशक्ति के रूप में उसी आद्यशक्ति की व्याख्या की एवं श्री माँ के माध्यम से उसका बहिरंग जगत को अवलोकन कराया।
आराधना अनादिकाल से होती आयी है तथा ‘वेदोक्ततस्मिह्न तस्थुभुर्वनानि विष्वा’ के माध्यम से इसी आद्यशक्ति की इस संसार का आधार होने की बात बारंबार दुहराई जाती रही है।
आराधना प्रारंभ की। यहीं से प्रेरणा पाकर संसार की सभी संस्कृतियों में मातृशक्ति की उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित है।
आराधना एवं पूजा का विधि-विधान बनाया। बुद्धि-विवेक से संपन्न मनुष्य ने सभ्यता की ओर जैसे ही कदम रखना प्रारंभ किया, उसके दिमाग में यह सवाल उभरा वह आया कहाँ से? यहीं से माँ के प्रति श्रद्धा भाव उत्पन्न हुआ और ईश्वर को आदि जननी मानकर आराधना प्रारंभ की। यहीं से प्रेरणा पाकर संसार की सभी संस्कृतियों में मातृशक्ति की उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-August
आराधना (3) उपासना समर्पण योग (4) साधना पद्धतियों का ज्ञान एवं विज्ञान (5) गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन (6) गायत्री साधना का गुह्य विवेचन (7) गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार (8) गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना (9) गायत्री की पंचकोशी साधना व उपलब्धियाँ (10) गायत्री साधना की वैधानिक पृष्ठभूमि (11) सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र (12) मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य (13) विलक्षण अद्भुत यह मानव शरीर (14) चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क (15) शब्दब्रह्म-नादब्रह्म (16) व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान (17) अपरिमित संभावनाएँ का आगार मानवी व्यक्तित्व (18) चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मन (19) विज्ञान और अध्यात्म, परस्पर पूरक (20) भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म (21) यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान (22) यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया (23) युगपरिवर्तन कैसे व कब? (24) सतयुग की वापसी (25) सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (26) मर्यादा पुरुषोत्तम राम (27) संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (28) रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ (29) षोडश संस्कार विवेचन (30) भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व (31) अमृतवाणी-1 (32) अमृतवाणी -2 (33) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (34) धर्म तत्व का दर्शन व मर्म (35) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (36) निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (37) जीवेम शरदः शतम् (38) इक्कीसवीं सदी नारी सदी (39) समाज का मेरुदण्ड ‘सशक्त परिवार तंत्र (40) अमर हो गए मरकर भी जो। (41) हमारी संस्कृति-इतिहास के कीर्ति स्तम्भ (42) महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग (43) विचार सार एवं शक्तियाँ भाग 1 (44) विचार-सार एवं शक्तियाँ भाग-2(45) शिक्षा एवं विद्या। ये सभी इन दिनों प्रेस छपाई पर है तथा शेष 15 भी इस माह के अंत तक प्रेस में पहुँच जाएँगे। निश्चित ही यह संग्रह जो युग व्यास की लेखनी से निस्सृत चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
आराधना स्वयं भगवान शिव करते हैं उन आदिशक्ति वेदमाता के अनुग्रह भाजन का अपकार, कोई कर भी कैसे सकता है। मैंने स्वर्ग की ओर दृष्टि नहीं उठाई - यही मेरा कम अनुग्रह नहीं है।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-March
आराधना में विश्वास अभिव्यक्त होता दीखने लगे। आस्तिकता संवर्धन तब होता हुआ मानना चाहिए जब एक दूसरे के प्रति प्यार-करुणा-ममत्व के बढ़ने के मानव मात्र के प्रति पीड़ा की अनुभूति होता हुआ मानना चाहिए जब एक दूसरे के प्रति प्यार-करुणा-ममत्व के बढ़ने के मानव मात्र के प्रति पीड़ा की अनुभूति के प्रकरण अधिकाधिक दिखाई देने लगें व वस्तुतः समाज के एक−एक घटक में ईश्वरीय आस्था परिलक्षित होने लगें। कोई भी अभावग्रस्त हो एवं अपना अंतःकरण उसे ऊँचा उठाने के लिए छल छला उठे तो समझना चाहिए कि वास्तव में भगवद् सत्ता वहाँ विद्यमान् है। अनीति-शोषण होता हुआ देखकर भी यदि कहीं किसी के मन में किसी की सहायता का आक्रोश नहीं उपज रहा है तो मानना चाहिए कि बहिरंग से आस्तिक यह समुदाय अभी अंदर से उतना ही दिवालिया? भीरु व नास्तिक है।
आराधना करने वाला साधक दीर्घजीवी होता है तेजस्वी होता है सुंदर गृहस्थ साँसारिक साधनों का स्वामी यशस्वी संपन्न श्रीमतं एवं ब्रह्मबल संपन्न होकर जीवन जीता है और अंत में अपने जीवन लक्ष्य को ब्रह्मलोक को प्राप्त करता हैं। तुलनात्मक दृष्टि से यह दोनों ही उपलब्धियाँ एक ही बिंदु पर आ टिकती है स्पष्ट है गायत्री महाविद्या ही
आराधना की जाती है, किंतु इन दिनों तो इस पूजा का अर्थ देवी की उपासना से मालामाल हो जाना लगाया जाता है। यही सबसे बड़ी विडंबना है यदि ऐसी बात रही होती, तो लक्ष्मीनारायण मंदिर के पुजारी अब तक विपुल वैभव के स्वामी बन गये हो तो पर वर्षों की पूजा के बाद भी उनके जीवन में ऐसा कुछ घटित होते कहाँ देखा जाता है? इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मी अर्थ तंत्र के श्रेष्ठतम सदुपयोग और सुनियोजन की देवी है। गाँवों में कन्या को प्रायः लक्ष्मी कहा जाता है। यहाँ इसका भाव उसकी उपस्थिति से पिता के धनपति बनने जैसा नहीं वरन् इतना है कि वह अपने व्यवस्था कौशल से घर को एक सुखद-सुन्दर वातावरण प्रदान करती है।
आराधना में मानवीय मस्तिष्क संलग्न रहे है और अब वह उपार्जन इतना विशालकाय इतना सघन और प्रचलित हो गया है कि आमतौर से उसे ही सत्य माना जाने लगा है। आज सामान्य बुद्धि के लिए यह ढूँढ़ निकालना अति कठिन है कि प्रचलित मान्यताओं प्रथा परिपाटियों विश्वासों रीति-नीतियों एवं विचारणाओं में सत्य का कितना अंश है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
आराधना करके तुमने व्यक्त यज्ञेश के दर्शन कर लिए। व्यक्त की उपलब्धि अधिकारानुसार काल नियन्त्रित ही होगी, नित्योपलब्धि तो अन्तःकरण में ही शक्य है।' भगवान शिव ने वृषभ की पीठ पर थपकी दी और वह कैलाश की और मुड़ चला।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-June
आराधना करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-January
आराधना, अहिंसा की कसौटी यही सिखाती है। सम्पूर्ण सत्य यदि हमने देखा होता तो फिर सत्य का आग्रह कैसा? तब तो हम परमेश्वर हो गये, क्योंकि यह हमारी भावना है कि सत्य ही परमेश्वर है हम पूर्ण सत्य को नहीं पहचानते, इसी लिए उसका आग्रह करते हैं इसी से पुरुषार्थ की गुँजाइश है। इसमें अपनी अपूर्णता को मान लेना आ गया। हम अपूर्ण तो हमारे द्वारा कल्पित धर्म भी अपूर्ण, स्वतन्त्र धर्म सम्पूर्ण है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-May
आराधना की है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-November
आराधना में निमग्न हो जाते। बेचारी स्त्री दूसरों का कूटना-पीसना करके किसी प्रकार से उदर-पोषण का प्रबन्ध कर पाती थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-February
आराधना करना। इसके लिये किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रतिमा पुस्तक, पुष्प, धूप, दीप, चन्दन अक्षत आदि किसी की कुछ आवश्यकता नहीं होती। वास्तव में इन वस्तुओं द्वारा की जाने वाली उपासना बहुत ही आरम्भ की है। जैसा बालक पहले अ, आ, इ, ई, लिखते हैं।
आराधना करते हैं, या उसके किसी गणेश, सूर्य आदि प्रतिबिंब को अपना आराध्य बनाया है, तो उसका साकार निराकार जैसा कुछ रूप आप ठीक समझते हैं, अपने हृदय में धारण कीजिये, उसी रूप की स्पष्ट कल्पना अपने मनो लोक में कीजिये चित्त को रोक कर बार ध्यान करने से वह मूर्ति स्पष्टतः अपने भीतर प्रतिष्ठित हो जाएगी। सूक्ष्म नेत्रों से उसके दर्शन अच्छी तरह किये जा सकेंगे।
आराधना करते हैं। सच्चिदानन्द परमात्मा या गणेश, शिव, दुर्गा आदि उसके विभिन्न नामों एवं रूपों की पूजा एक ही बात है। अलग अलग नाम रख लेने या अलग अलग स्वरूपों का ध्यान करने से परमात्मा की अखण्डता में कोई फर्क नहीं आता। कोई किसी देवता को पूजे तत्वतः वह ईश्वर की ही पूजा है-’सर्व देव नमस्कारं केशवं प्रति गच्छति।’
आराधना की सामग्री। जैसे यज्ञ में आहुत डालते समय सामग्री को अग्नि में डाल कर उसी के स्वरूप में मिला देते हैं, और आहुत के साथ कहते हैं। ‘इदन्नमम’ अर्थात् यह यह मेरा नहीं है। इसी प्रकार आप इष्टदेव रूपी यज्ञ में अपनी आत्मा को समिधा रूप में जलाकर दीजिये और भावना कीजिये कि इसमें मेरा कुछ नहीं है जब अपने ‘आपे’ को भुला कर हम तदाकार होते हैं तो दो वस्तुएं नहीं रहतीं। या तो इष्टदेव ही रह जाता है या आत्मा ही,बात एक ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-October
आराधना करते हैं कि वे अपनी कृपा कोर से हमें निहाल कर दें। हर साल हम इस पुण्य पर्व को नवीन आशा के साथ मनाते हैं पर सब व्यर्थ चला जाता है, भगवती प्रसन्न नहीं होती।
आराधना से सन्तुष्ट होने के स्थान पर नाश का वज्र दंड क्यों उठाया जा रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-September
आराधना की थी। जगत् में ऐसा कोई कवि या कलाविद पैदा नहीं हुआ, जो हिमाचल के सौंदर्य को व्यक्त कर सके। केवल यह सौंदर्य ही तीर्थ यात्रियों की पथ की सारी क्रान्ति दूर कर देता है।
आराधना करें। सत्य और अहिंसा के आधार पर जो आध्यात्मिक बल संपादन किया जाएगा वह आसुरी बल की अपेक्षा अधिक दृढ़ और स्थायी होगा एवं उसी के द्वारा सुख शान्ति का साम्राज्य स्थापित किया जा सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-March
आराधना को निरर्थक बताते और गाली देते सुने जाते हैं।
आराधना को कोई मनुष्य चलाना चाहे और दृढ़तापूर्वक उस क्रम को निबाहना चाहे तो इतना विधान भी बड़ी आसानी से चलता रह सकता है। सायंकाल की आरती, परिवार के लोगों के साथ सामूहिक प्रार्थना का क्रम भी जो लोग चलाना चाहें उनके लिए वह कार्य भी दस पाँच दिन में एक साधारण ढर्रा बन जाता है और बड़ी आसानी से उस व्यवस्था का निर्वाह होता रहता है।
आराधना के साथ आरम्भ होना चाहिए। नया दिन भी एक नया जन्म है। उसे आरम्भ करते हुए भी यदि प्रभु को स्मरण करने का नित्य नियम बना लिया जाय तो इसके प्रभाव से दिनभर के कार्यक्रम पर आध्यात्मिकता की छाया बनी रहेगी। प्रत्येक नये दिन का आदि और अन्त प्रभु स्मरण के साथ ही होना चाहिए। किसी धर्म ग्रन्थ का आरम्भ और अन्त मंगलाचरण के साथ ही होता है।
आराधना करने के लिए भौतिक जीवन का सुनिश्चित कार्यक्रम बनाने के लिए वर्ण धर्म का विधान बनाया गया।
आराधना न की गई हो।
आराधना रही है। इसी मन्त्र की शक्ति से इस देश का अध्यात्म बल बढ़ा है और हमारा इतिहास गौरवपूर्ण बना है। अभी भी ऐसे अनेक गायत्री उपासक मौजूद हैं जिनका आत्मबल इस गये बीते युग में भी आश्चर्यजनक कहा जा सकता है। इन तथ्यों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि उस महामन्त्र के बारे में ऋषियों और शास्त्रों ने जो कुछ कहा है वह असत्य नहीं है। पर जब अपनी निज की बात पर सोचते हैं, हमने इतने दिन इतने घण्टे इतने हजार जप कर लिया और हमारे मनोरथ तब भी पूरे नहीं हुये तो निराशा होने लगती है।
आराधना की गई है उतने समय का लाभ उसकी अपेक्षा कहीं अधिक होगा जो उस प्रयोजन के लिए भौतिक प्रयत्न करने में किया जाता। गायत्री उपासना में लगाया हुआ समय कभी किसी का व्यर्थ नहीं जाता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-April
आराधना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-June
आराधना करने, उसमें विशेषता प्राप्त करने का लक्ष्य बनाता है और उस मार्ग पर निरन्तर चलते हुए अपने तथा दूसरों के लिए सुख शाँति का लक्ष्य प्रशस्त करता है।
आराधना करने वाले को अपनी मनोभूमि अधिक पवित्र रखनी चाहिए। जिस प्रकार शुद्ध स्थान, शुद्ध शरीर, शुद्ध वस्त्र एवं शुद्ध पूजा उपकरणों की साधना में आवश्यकता है उसी प्रकार उपासक को अपनी मनोभूमि शुद्ध रखने का भी प्रयत्न करना चाहिए। कहा भी है-
आराधना में संलग्न है वह ब्राह्मण जो बल की साधना में लगा है वह क्षत्रिय, जिसने समृद्धि की अभिवर्धन में मन लगाया वह वैश्य और जो श्रम देवता का अनुष्ठान करके इस गंदे, अव्यवस्थित एवं कुरूप संसार को सुन्दर बनाने का तप कर रहा है वह तपस्वी शूद्र कहलाता है। यह विशुद्ध कर्म विभाजन है, इसमें ऊंच-नीच की क्या बात हुई? एक ही परिवार के कई व्यक्ति कई तरह का काम करते हैं। उनमें से कोई ऊंच-नीच नहीं होता। वृद्ध पिता जी पूजा पाठ एवं कथा वार्ता एवं समाज सेवा में लगे रहते हैं वे ब्राह्मण हुए, एक लड़का सेना में हवलदार है वह क्षत्रिय हुआ, दो लड़के दुकान चलाते हैं वे वैश्य हुए, स्त्रियाँ घर का काम-धंधा, रोटी चौका का प्रबंध करती हैं वे शूद्र हुई।
आराधना के लिए अहिर्निशि निष्ठापूर्वक कार्य किया। ऋषि ऐसे ही लोगों को तो कहते हैं-वेश में नहीं कर्म में उनका ऋषि-तत्व देखा और परखा जा सकता था। ऐसी ही विभूतियों से इस महान देश का मस्तक ऊंचा होता चला आया है और आगे होता रहेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-October
आराधना है। अपने में सबको और सबमें अपने को समाया हुआ दीखने का अभ्यास करना चाहिए।
आराधना आत्मा पर चढ़े हुए मल-आवरण और विक्षोभों के हटाने के निमित्त ही की जाती है। बर्तन माँजने से वे पुनः चमकने लगते हैं, धो डालने से कपड़े पुनः स्वच्छ हो जाते हैं, स्नान करने से शरीर में पुनः ताजगी आ जाती है। उपासना के द्वारा आत्मा पर उच्च संस्कार डालने की विधि-व्यवस्था यदि ठीक प्रकार बनी रहे तो उसकी पवित्रता, महानता, एवं उत्कृष्टता भी निरन्तर बढ़ती चली जाती है। यह प्रगति धीरे-धीरे उन्नति के उच्च शिखर तक ले पहुँचती है और आत्मा की स्थिति भी परमात्मा के समान बन जाती है। उसमें वे सब विशेषताएँ और शक्तियाँ अवतरित होती हैं जो उसके उद्गम केन्द्र परमात्मा में मौजूद हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-August
आराधना करता है और यही कहता लिखता एवं गाता है जिससे अनुचित का शमन और उचित का अभिवर्धन हो। जो घृणित है उसी को उछालने से विश्व मानव को कुरूप ही बनाया जा सकता है कोई सच्चा कवि ऐसी धृष्टता नहीं कर सकता। करेगा भी तो कम से कम उसे ‘कला’ तो नहीं ही कहेगा। जो ‘कला’ मानवता के शृंगार में प्रयुक्त हो उसी को तो सार्थक माना जा सकता है। रूस के महाकवि ‘पुश्किन’ ऐसे ही कलाकार थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-May
आराधना का मूल्याँकन करते हैं। कौन खुदगर्जी से मूर्ति के लिए भजन का ढोंग बनाये बैठा है और कौन प्रभु प्रेम से विह्वल होकर आत्म समर्पण की दृष्टि से प्रभु की इच्छा के अनुसार अपनी इच्छाओं को बनाने का प्रयत्न कर रहा है, यह अन्तर भगवान से छिपा नहीं रहता। वे इसी आधार पर पात्र की पात्रता परखते हैं और उसी अनुपात से उस पर अनुग्रह भी करते हैं। शबरी, निषाद, गोपी, सुदामा, आदि साधना-विधान से अपरिचित होने पर भी प्रभु का अनुग्रह प्राप्त कर सके, जब कि विधि विधान के ज्ञाता कर्मकाण्डी ज्ञानी-ध्यानी लोग भी खाली हाथ रहते देखे गये हैं। त्याग और प्रेम का, श्रद्धा और विश्वास का अभाव कठोर से कठोर कर्मकाण्ड को भी निष्प्राण और निर्जीव बना देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-February
आराधना करने से उसका प्रत्युत्तर साधक को वात्सल्य स्नेह के रूप में प्राप्त होता है और वह उस अनुभूति से कृत-कृत्य हो उठता है। यह लाभ पुरुष प्रतीकों की उपासना में संभव नहीं। पिता से माता का स्नेह स्वभावतः अधिक होता है। इसलिये परमात्मा की अधिक उच्च-स्तरीय वात्सल्य प्राप्त करने के लिए गायत्री शक्ति का माता के रूप में ध्यान करना ही अधिक श्रेयस्कर माना गया है और ऋषियों एवं शास्त्रकारों ने वैसी ही प्रतिष्ठा एवं भावना करने का हमें आदेश किया है। गायत्री का मातृ-मूर्ति के रूप में ध्यान, स्तवन, पूजन, करने का प्रायः सभी उपासना ग्रन्थों में निर्देश मिलता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-July
आराधना करती रही, धन जन शक्ति से भरी रही। आज वेदमाता को भूलकर हम लोग पददलित हो रहे हैं। घर-घर में असंतोष, अभाव और अशक्ति की आग सुलग रही है।
आराधना करते थे। उस समय गायत्री का त्याग बहुत बड़ा समझा जाता था। फलतः उस समय देश कैसा उन्नत था। अन्न, धन, दूध, घी आदि की कमी न थी। जब से हम लोगों ने माता की अवहेलना की दीन हीन कंगाल होते गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-January
आराधना, उपासना, उनकी समीपता संगति तथा अपनी समझी जाने वाली वस्तुओं को उनके अर्पण करना यह यज्ञ की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। देव गुण सम्पन्न सत्पुरुषों की सेवा एवं संगति करना तथा उन्हें सहयोग देना भी यज्ञ है। व्यावहारिक अर्थों में इसे यों भी कह सकते हैं कि बड़ों का सम्मान बराबर वालों से संगति, मैत्री, अपने छोटों को, कम शक्ति वालों को दान सहायता करना यज्ञ है। इस प्रकार ईश्वर उपासना, सत् तत्व का अभिवर्धन एवं पारस्परिक सहयोग भी यज्ञ माने जाते हैं। यों हवन के अर्थ में यज्ञ शब्द का प्रयोग तो प्रसिद्ध ही है।
आराधना में लगाना होता है। यदि वह अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और आवश्यकताओं को बढ़ा ले तो फिर वह अपने अभीष्ट उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सकता। ब्राह्मण सदा से इस तथ्य को भली प्रकार समझते रहे हैं और साँसारिक प्रलोभनों से बचते रहे हैं। उनकी इस त्याग वृत्ति ने ही उन्हें भूसुर बनाया। समस्त समाज में वे श्रेष्ठ गिने गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-August
आराधना, गायत्री जप, यज्ञ आदि आत्मबल एवं सतोगुण बढ़ाने वाले आस्तिकता पूर्ण धर्मकृत्यों को जनसाधारण के नित्यकर्मों में समावृष्ट करने का प्रचण्ड प्रयत्न हो क्योंकि आत्मा में आस्तिकता सुदृढ़ संस्कारों की स्थापना बिना सांस्कृतिक पुनरुत्थान के हो सकेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-June
आराधना फलवती होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-August
आराधना करके हम वह प्रकाश प्राप्त कर सकते हैं जिससे इन बन्धनों से छुटकारा मिल सके। “ज्ञानान्मुक्ति” सूत्र में ज्ञानयोग को ही मुक्ति का सोपान बताया गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-October
आराधना अर्चा के साथ आत्म समर्पण करते हुये कहा- “हे महान! आपकी इच्छा पूर्ण हो, हम सब आपकी भृकुटि संकेतों पर बलिदान होने के लिये खड़े हैं।” महेश्वर ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा- “मेरा प्रयोजन पूर्ण करने में संलग्न बालकों! तुम्हें श्रेय मिलेगा, यशस्वी होंगे और उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह अनन्त काल तक चमकोगे। मेरी विजय, तुम्हारी ‘विजय गिनी जायगी।’ महाकाल के आशीर्वाद ने राम दल का साहस सैकड़ों गुना बढ़ा दिया।
आराधना करने लगे। अस्थिर मति, भावावेश ग्रस्त, उतावले, अधीर और तनिक सी कठिनाई आने पर लक्ष्य छोड़ बैठने वाले ओछे मनुष्यों की देवता कोई सहायता नहीं करते। वे जानते हैं कि साहसी दृढ़ प्रतिज्ञ, उदार और आत्म विश्वासी लोग ही कोई बड़ा काम कर सकते हैं। जिनमें यह गुण न हो उन्हें वरदान आशीर्वाद या सहायता देना व्यर्थ है। वे बड़ी बातें सोच तो सकते हैं पर बड़े काम कर नहीं सकते, ऐसे लोगों को कोई वरदान देना अपने आशीर्वाद को भी उपहासास्पद बनाना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-September
आराधना की पूर्ति से सम्पन्न हो सकेगा। यह ज्ञान भौतिक और सामान्य विषयों तक तो दूसरे देशों में भी है हमें मनुष्य की फिलॉसफी में उतरना होगा। यह भी देखना होगा कि यह विश्व-प्रपंच, कौतुक और चमत्कार क्या है जो विशाल ब्रह्माण्ड के रूप में खड़ा है।
आराधना के लिये गायत्री का उपयोग करते हैं। गायत्री को माता रूप में मानने वाले साधक भी उसका रूप “सूर्य मण्डल मध्यस्था” सूर्य मंडल के बीच में अवस्थित स्वरूप का, मातृदेवी के रूप में ही ध्यान करते हैं। किसी भी रूप में गायत्री मंत्र की उपासना की जाय ‘सूर्य’ का उससे अविच्छिन्न सम्बन्ध अनिवार्य रूप से रखना होगा। गायत्री का देवता ही सूर्य है तो उसका स्वरूप भी साथ में होना स्वाभाविक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-June
आराधना करते हुए जब बहुत दिन व्यतीत हो गये तो एक दिन आकाशवाणी हुई कि तुम दश लक्ष गायत्री का विशेष जप करो।
आराधना की स्वाभाविक वृत्ति हुआ करती थी-”काव्य शास्त्र विनोदेन कालौगच्छति धीमताम्” का सिद्धान्त प्रायः सभी मानते हैं। भारतीय संस्कृति की प्रतीक देवी सरस्वती स्वयं विद्या अथवा ज्ञान का ही स्वरूप हैं। लोग उनकी आजीवन उपासना किया करते थे और इस प्रकार बिना श्रम संसार-समुद्र से पार उतर जाया करते थे।
आराधना की जा सकती है पेट पालने के लिये कोई भी साधारण काम किया जा सकता है पर ज्ञान की उपयोगिता ओर आवश्यकता देखते हुए उसका परित्याग करना अथवा उधर से मुख मोड़ना अपने लिये ही हानिकारक होता है। ज्ञान मनुष्य की शोभा है। ज्ञान ही धन और ज्ञान ही जीवन है उसके लिये किया गया कोई भी बलिदान व्यर्थ नहीं जाता।
आराधना के प्रभाव से ही राजर्षि पदवी को त्यागकर ब्रह्मर्षि बन गये थे फिर उन्होंने अन्यान्य लोकों की सृष्टि करने की श्रेष्ठ सामर्थ्य भी प्राप्त कर ली थी। अच्छी प्रकार से श्रद्धापूर्वक समराधित गायत्री कौन-कौन सा लाभ प्रदान नहीं करती? निस्सन्देह प्रणव मंत्र से युक्त गायत्री समस्त मंत्रों में अतीव दुर्लभ है। इसलिए वेदत्रयी मंत्र से बढ़कर अन्य कोई मन्त्र नहीं माना जाता।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-April
आराधना, एकान्त सेवन, दान, परोपकार सत्संग, स्वाध्याय, म्यान जैसे कार्यों से मानसिक क्षमता एकाग्रता बढ़ती है। केवल सत्य ही बोलना, हिंसा न करना, धन का अधिक संचय न करना, काम सेवन अयुक्त मर्यादा से अधिक न करना। अन्योपार्जित धन से, कटुभाषण से बचना, आदि आत्मिक बातों से आत्म शक्ति बलवती होती है।
आराधना के समय जो आनन्द उपलब्ध करते हैं उसकी तुलना संसार के अन्य किसी आनन्द से नहीं की जा सकती। रामायण में बलि की मृत्यु के समय का बड़ा सुन्दर चित्रण मिलता है। मृत्यु शय्या पर पड़े हुए बालि से भगवान राम ने पूछा कि तुम स्वर्ग मुक्ति या जो सद्गति चाहो वह प्राप्त कर सकते हो। बालि ने उन्हें उत्तर दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-January
आराधना करते हैं। राम कृष्ण आदि की ध्यान मूर्तियाँ यद्यपि कल्पित होती हैं तो भी वे एक उच्च आदर्श की ध्येय मूर्ति के समान हमारे सामने उपस्थित रहती हैं। उनका ध्यान करते समय हम उनमें अपरिमित सौंदर्य, अटूट बल, अनन्त शक्तियों और सात्विक सद्गुणों का महान भंडार अनुभव करते हैं और साथ ही ऐसी भावना करते हैं कि हम इन्हीं में लीन हो जावें इन भगवान को प्राप्त कर लें। जैसे भृंग का ध्यान करने से झींगुर भी भृंग बन जाता है वैसे ही ध्यान की अद्भुत शक्ति के अनुसार हमारी अन्तःचेतना भी गीली मिट्टी की भाँति उन ध्यान के भगवान के साँचे में ढल कर वैसी ही बनने लगती है।
आराधना की जाती है। स्नान धूप, दीप, चंदन, आरती, भोग, शयन, आदि क्रियाओं के द्वारा मंदिरों में पूजन आराधन होते रहते हैं। विशेष अवसरों पर फूल बँगले बनाये जाते हैं, उनकी विशेष सजावट होती है, मथुरा वृन्दावन में सावन के महीने में झूलों के उत्सव बड़े समारोह पूर्वक होते हैं, रथ यात्रा, दीपदान, लीला अभिनय आदि के आयोजन होते हैं, रासलीला एवं रामलीला के द्वारा भगवत् चरित्रों की स्मृति जागृत की जाती है। परमात्मा के प्रतिनिधियों के अवतारों और देवताओं के चित्र स्थापित किये जाते हैं। नवधा भक्ति के नौ प्रकार श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सरव्य, आत्म निवेदन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-October
आराधना करें और मुक्ति के लिए जनार्दन का आश्रय ग्रहण करें।
आराधना करनी चाहिए। शंकर जी संयमी, निस्पृह, त्यागी, योग स्थित (एकाग्र चित्त) देवता (उदार मना) हैं। इन गुणों से व्यक्ति सच्चे अर्थों में ज्ञानवान् बनते हैं। उन्हें तत्व दर्शन प्राप्त होता है। असंयमी, ममता ग्रस्त, लोभी, डाँवाडोल चित्तवाले, अनुदार वृत्तियों वाले लोग शिक्षा की उत्तम व्यवस्था होने पर भी, अधूरा और उल्टा ज्ञान प्राप्त करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
आराधना को बताया है और कहा है कि यह पूजा-उपासना से कम महत्व की साधना नहीं है। साधना-उपासना से जो प्रगति मनुष्य के व्यक्तित्व में होनी चाहिए वह सच्चे लोकसेवी में भी विकसित होती देखी जा सकती है। उसका भी अहंकार नष्ट होकर भावनाएँ उदात्त हो जाती हैं। उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं होती। वह मात्र विश्वमानव के कल्याण की बातें सोचता और ईर्ष्या, द्वेष, ऊँच-नीच के भेदभाव से रहित जीवन जीता है।
आराधना में ? मैंने कहाँ अपना स्वार्थ सिद्ध किया है ? उस पाषाण जैसे दीखने वाले भीमकाय व्यक्ति की आँखों से भी धाराएँ चल रही थी उस दिन ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-September
आराधना के संबंध में एकमत हों, तो फूट-फसाद का प्रश्न ही नहीं उठता। आने वाले समय में ऐसा ही होने वाला है। तब लोगों का रुझान आध्यात्मिक उन्नति को अधिक महत्व देंगे।
आराधना के लिए किसी मुहूर्त विशेष की प्रतीक्षा नहीं की जाती। सारा समय भगवान का है, सभी दिन पवित्र हैं। शुभ कर्म करने के लिए हर घड़ी शुभ मुहूर्त है, इतने पर भी प्रकृति जगत में कुछ विशिष्ट अवसर ऐसे आते हैं कि कालचक्र की उस प्रतिक्रिया से मनुष्य सहज ही लाभ उठा सकता है। उन दिनों किये गये साधनात्मक प्रयास संकल्प बल के सहारे शीघ्र ही गति पाते व साधक का वर्चस् बढ़ाते चले जाते हैं। ऐसे अवसरों पर बिना किसी अतिरिक्त पुरुषार्थ के अधिक लाभान्वित होने का अवसर मिल जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-May
आराधना॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-June
आराधना की भक्तियोग, ज्ञानयोग कर्मयोग की साधना की चर्चा परम पूज्य गुरुदेव ने की है जो गीता में बताए योगशास्त्र का व्यावहारिक प्रतिपादन है। अपनी क्रान्तिकारी लेखनी द्वारा वे हमें बताते हैं कि “तस्मात् योगी भावार्जुन” के द्वारा श्रीकृष्ण ने आसन, प्राणायाम, नेति, धौति वाला योगी बनने को नहीं कहा वरन् अर्जुन को जीवन में उतरने वाला व्यावहारिक योग समझाया है। जीवन आदर्शों के साथ जुड़ जाय यही योग है। योगी वे होते हैं जो स्वयं तो बंधनों से मुक्त होते ही हैं, औरों को भी वह पथ दिखाते हैं।”
आराधना करने वाले आज विलासिता के चंगुल में कैसे जा फँसे? “यत्र नार्यस्त पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता” का प्रचण्ड घोष करने वाला देश आज बिलखती स्त्रियों की आहों उनके करुण क्रन्दन की गूँज से भर रहा है-जानते हो क्यों?”
आराधना की भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग की साधना, आराधना की भक्तियोग, ज्ञानयोग कर्मयोग की साधना की चर्चा परम पूज्य गुरुदेव ने की है जो गीता में बताए योगशास्त्र का व्यावहारिक प्रतिपादन है। अपनी क्रान्तिकारी लेखनी द्वारा वे हमें बताते हैं कि “तस्मात् योगी भावार्जुन” के द्वारा श्रीकृष्ण ने आसन, प्राणायाम, नेति, धौति वाला योगी बनने को नहीं कहा वरन् अर्जुन को जीवन में उतरने वाला व्यावहारिक योग समझाया है। जीवन आदर्शों के साथ जुड़ जाय यही योग है। योगी वे होते हैं जो स्वयं तो बंधनों से मुक्त होते ही हैं, औरों को भी वह पथ दिखाते हैं।”
आराधना है।” दस्यु सरदार हतप्रभ हो सुन रहा था। दोनों तट के समीप वृक्ष के पास जा कर बैठ गए। दूर से आवाजें आ रही थीं वन्य मानव अन्य दस्युओं के साथ क्या व्यवहार कर रहे होंगे-यह सोच कर ही सरदार काँप उठा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-November
आराधना, (4)उच्छिष्ट, (5)देवमूर्ति पर चढ़ाया गया नैवेद्य, (6) शुल्क, कर, चुँगी, (7) चंवर का डंडा, (8)राजा ‘बलि’ (प्रहलाद के पौत्र)।
आराधना से कुसंस्कारों के असुरों से पीछा छूटता है। महिषासुर, देवी की दिव्य ज्योति में समा जाता है अर्थात् आत्मबोध की स्थिति तक पहुँचने के लिए मार्ग के सारे अवरोध ही उस सेना की तरह होते है, जिनसे अंतःकरण के देवत्व को युद्ध करना पड़ता है, पर यदि उन्हें साहस पूर्वक पछाड़ दिया जाये तो व्यक्ति अपने अलौकिक और आध्यात्मिक स्वरूप को स्वतः समझ लेता है, उस स्थिति में परिस्थितियाँ अनुकूल हो तो भी पाप से वैसे ही घृणा होगी जैसे गन्दगी से। उपरोक्त कथानक इस तथ्य का अलंकार मात्र है। इस युद्ध के बाद भी देवी की वही स्तुति देवताओं ने गाई है, जो पहली विजय के समय गाई थी।
आराधना किया करते थे। वे यज्ञ, यज्ञ के अंग और दक्षिणा आदि में सम्पत्ति व्यय करते थे। इनके यज्ञ के प्रधान ऋत्विक् वशिष्ठ, असित, गौतम आदि महर्षि गण थे। धन्वदेष जहाँ सरस्वती की धारा बहती है, उसी पुण्य क्षेत्र में अम्बरीष यज्ञ किया करते थे। उनके यज्ञ में ऋत्विज् और सदस्यों की कान्ति देवताओं के समान ही दिव्य होती थी।
आराधना के लिए अपने समय साधन प्रतिभा का एक अंश लगाते रहना−ऐसे नियम हैं जिन्हें रत्नों की खदान कहा जा सकता है। इन्हें अथवा सेवा−साधना के छोटे−छोटे लक्ष्य स्वीकार करने की नैष्ठिक घोषणा देव दक्षिणा के अंतर्गत आती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
आराधना में नियोजन करने की बात कही। इस सदी के प्रारंभ तक रामकृष्ण मिशन के वेदान्तिक प्रतिपादनों से लेकर, महर्षि रमण व महर्षि अरविन्द व श्री माँ के भागवत चेतना अवतरण से लेकर अधिमानस व अतिमानस के अवतरण के प्रसंगों का साहित्य व जन प्रचलन में बाहुल्य हम देखते हैं। साथ ही विदेश व भारत में श्री कृष्ण भक्ति के माध्यम से प्रभुपाद स्वामी का हरेकृष्ण (इस्कॉन) संप्रदाय महर्षि महेशयोगी का भावातीत ध्यान तथा ओशो रजनीश का नव संन्यास व प्रचलन से हट कर एक अलग ढंग की एण्टी थीसिस साधना पद्धति में जन्म लेती दिखाई पड़ती है।
आराधना क्षेत्रों में करना है। यह इतना ही सत्य है जितना कि सूर्य का अस्तित्व है। हम शरीर से समर्थ न रहने पर भी इसी प्रक्रिया में सतत् जुटे रहेंगे यह हमारी घोषणा है ।(क्रमशः)
आराधना प्रधान जियें। गौमूत्र कीटाणु नाशक है। हमारे चिंतन की दुष्प्रवृत्तियाँ इस प्रतीक स्नान द्वारा मिटें, यह भावना की जाती है। दुग्ध स्नान द्वारा जीवन को दुग्ध सा धवल, उज्ज्वल, निर्मल बनाने की तथा दधि स्नान पर अपना जीवन सुनियोजित , नियंत्रित व्यवस्थित बनाने की भावना करते हैं। घृत स्नान से भाव यह है कि जीवन में स्नेह-प्यार-शालीनता का समावेश करेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
आराधना का अवलम्बन अपनाया जा सकता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी का अवगाहन का पुण्य फल इतना ही है कि जीवन को परिष्कृत, समुन्नत, एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। इतना बन पड़े तो खिले हुए फूल पर मंडराने वाले भौरों की तरह अनेक दैवी अनुग्रह और वरदान अनायास ही अपनी समीपता का परिचय देने लगते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-April
आराधना को साथ लिए बिना वह सर्वथा अपूर्ण रहेगी और कोई उत्साहवर्धक परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगी। गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम से त्रिवेणी बनती है जिसका महात्म्य वर्णन करते-करते शास्त्रकार थकते नहीं । इनमें से किसी अकेली को तीर्थराज त्रिवेणी संगम नहीं कहा जा सकता। यही तथ्य भक्ति की समग्रता पर भी लागू होता है। अपूर्ण उपक्रम में असफलता के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
आराधना के अपेक्षित पुरुषार्थ किये जायँ। जो इन दोनों से वंचित है, उस भक्ति को ऐसा ही समझाना चाहिए जैसे ऊसर भूमि में बीज तो उग गया, पर उसमें खाद, पानी देने की आवश्यकता न समझी गयी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-May
आराधना

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-June
आराधना का त्रिविध अवलंबन लेने की बात आदिकाल से कहते रहे हैं। उपासना का उद्देश्य है- आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देना। आत्मा अर्थात् अंतःकरण, भाव-संस्थान जिसके साथ मान्यताएँ, आकाँक्षाएँ लिपटी रहती हैं। परमात्मा अर्थात् उत्कृष्ट आदर्शवादिता। इन दोनों के मिलन में यदि को सहायक हो समता है, तो वह सद्गुरु ही हैं।
आराधना करता हूँ, माता के रूप में उसकी पूजा करता हूँ। यदि कोई राक्षस किसी पुत्र की माता की छाती पर चढ़कर उसका खून चूसने लगे, तो वह पुत्र क्या करेगा ? मैं यह जानता हूँ कि मुझ में इस गिरे हुए राष्ट्र को उबारने की ताकत है। शारीरिक शक्ति की बात नहीं, मैं कोई तलवार या बंदूक उठाकर लड़ने नहीं जा रहा, पर मैं ज्ञान की शक्ति से विजय प्राप्त करूंगा।” यह है सही मायने में आस्था-विश्वास, वह भविष्य-दृष्टि जो किसी भी संस्कृति को, राष्ट्र को अमरत्व प्रदान करती है।
आराधना करने किसी बाह्य सता की जगह अपने कर्म पर भरोसा करने और वैदिक देवताओं को निरस्त कर लोकदेवता की प्रतिष्ठा करने जैसे कई अर्थ किए जाते हैं। आध्यात्मिक अर्थ इन सबसे अलग है और साधना उपासना के क्षेत्र में वही ग्रहण किया जाना चाहिए। आध्यात्मिक अर्थ यह है कि सामान्य मनोभूमि सामान्य संकल्प और औसत अभीप्सा के लोग एक साथ संकल्प करें तो भी भगवान की शक्तियाँ सक्रिय हो उठती है। उनके अनुग्रह अनुदान बरसने लगते हैं और सामान्य लोगों के लिए वह आच्छादन मिल जाता है। जो नहीं मिलता तो संभव है कि भारी अनर्थ हो जाता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-July
आराधना की।
आराधना करता हूँ, माता के रूप में उसकी पूजा करता हूँ। यदि कोई राक्षस किसी पुत्र की माता की छाती पर चढ़कर उसका खून चूसने लगे, तो वह पुत्र क्या करेगा ? मैं यह जानता हूँ कि मुझ में इस गिरे हुए राष्ट्र को उबारने की ताकत है। शारीरिक शक्ति की बात नहीं, मैं कोई तलवार या बंदूक उठाकर लड़ने नहीं जा रहा, पर मैं ज्ञान की शक्ति से विजय प्राप्त करूंगा।” यह है सही मायने में आस्था-विश्वास, वह भविष्य-दृष्टि जो किसी भी संस्कृति को, राष्ट्र को अमरत्व प्रदान करती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-March
आराधना करने से हुआ था। जब ये राजगद्दी पर बैठे, तब उनकी माता ने आदेश दिया कि तुम्हारे पिता अनंगदेव ने पुरी के मंदिर का फिर से जीर्णोद्धार कराया था। तुम भगवान् सूर्यदेव का मंदिर बनाकर अपनी कीर्ति और यश का ध्वज फहराओ। अपनी माता की इस आज्ञा से प्रेरित होकर नरसिंहदेव उन दिनों यह निर्माण करा रहे थे। उन दिनों इस क्षेत्र को आकर क्षेत्र कहा जाता था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-September
आराधना में ग्रामीण अपना समय लगाते हैं या नहीं, यह तो नहीं मालूम, पर विराट् ब्रह्म की सेवा में किसी प्रकार की कमी नहीं रहने देता। पूछने पर कहते हैं यही उन्हें बचपन से सिखाया और बताया जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-November
आराधना के साथ-साथ ज्ञानयज्ञ की प्रक्रिया भी चलती है। इन स्थापनाओं में अग्निहोत्र, संस्कार, पर्व एवं विचारों-भावनाओं को परिमार्जित करने वाले कार्यक्रम नियमित चलते हैं। मूल भावना यही रही है कि इनके माध्यम से उस क्षेत्र को संस्कारों से अनुप्राणित कर दिया जाए। इतना भर होने से इन केंद्रों के माध्यम से आध्यात्मिक और साँस्कृतिक क्राँति संभव होती देखी जा सकती है।
आराधना की। वे प्रसन्न हुए और वरदान देने पहुँचे। तपस्वी ने उनका वज्र माँगा, ताकि संसार को आतंकित करके चक्रवर्ती शासन कर सके। इंद्र देव रुष्ट होकर वापस चले गए। वरदान न पाने के दुख से तपस्वी ने निराशाग्रस्त मनःस्थिति में शरीर त्याग गया।
आराधना से मैंने शील अर्जित किया था, उसे मैं पुनः संग्रह कर लूँगा। जाते हुए सत्य, धर्म और वैभव के चरण रुक गए और प्रह्नाद को अपने खोए चारों देव वापस मिल गए।
आराधना में लगाने के लिए कहा। उनसे जो पचास के हो चले शीर्षक से उनका आह्वान गायत्री परिवार में ही नहीं दूसरे क्षेत्रों-संगठनों में भी ध्यान से सुना गया। वह पुस्तिका कई सामाजिक संगठनों में कार्यकर्त्ताओं के लिए आज भी दिशा-निर्देश की तरह है।
आराधना की। निदान उन्हें वरदान देने के लिए जाना पड़ा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-August
आराधना की जाती है, वह सबसे पहले वेदमंत्रों द्वारा ही आराधी गई है। ऋग्वेद के वागम्भृणि सूक्त (10/145) में जिस शक्तितत्त्व का प्रतिपादन किया गया है, तंत्रशास्त्र उसी का विकास हैं। स्वामी विष्णुतीर्थ ने भी इस प्रतिपादन के पक्ष में विशद विवेचना की है। उनके अनुसार आगे चलकर तंत्र-शास्त्र का जितना भी विस्तार हुआ वह वागम्भृणी सूक्त का ही भाष्य है। बृहदारण्यक (6/12) और छाँदोग्य (5/8) में जिस पंचाग्नि विधा का उपदेश दिया गया , वह तंत्र की ही आधारभिति है।
आराधना बन जाता है।
आराधना बना लेने का इससे उत्तम स्तर का प्रशिक्षण और क्या हो सका है। संभवतः पाठकों को अब समझने में कठिनाई नहीं होगी कि कैसे कुछ गायत्री साधकों से आरंभ हुआ यह परिवार क्रमशः बढ़कर एक विराट् संगठन का विस्तार पाता चला गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-April
आराधना-उपासना के लिए ही है, लेकिन कोणार्क मंदिर अपने आप में विशिष्ट है। सूर्यरथ के आकार में बने इस महालय को सात अलंकृत अश्व खींचते हुए दिखाए गए हैं। ये अश्व सूर्य की सात किरणों के प्रतीक हैं। रथान के नीचे दोनों ओर बारह पहिये बने हुए हैं। प्रत्येक पहिया दस फुट ऊँचा है।
आराधना की जानी चाहिए। देवस्थान वहाँ प्रतिष्ठित देवता के लोक की तरह दिव्य हो तभी साधकों का कल्याण करते हैं। यह मंदिर को जीवंत और चैतन्य देखने की अनिवार्य शर्त है।
आराधना माने सेवा। संसार को राष्ट्र को , समाज को आप जैसे भावनाशीलों की बहुत आवश्यकता है। सेवा की लोगों को बहुत जरूरत है। कैसी सेवा ? ज्ञानदान की।
आराधना ? आराधना माने सेवा। संसार को राष्ट्र को , समाज को आप जैसे भावनाशीलों की बहुत आवश्यकता है। सेवा की लोगों को बहुत जरूरत है। कैसी सेवा ?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-February
आराधना करो। सदैव प्रेम का शब्द पढ़ना जारी रखो। प्रेम केन्द्र में जाते रहो। तीर्थयात्रा करो। पवित्र स्थानों को देखो और भ्रमण करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-April
आराधना में प्रवृत्त साधु संन्यासी चिराग लेकर खोजने पड़ेंगे। आकस्मिक, घोर अनिवार्य विपत्ति से पीड़ितों एवं असमर्थ, असहाय दरिद्रों की संख्या भी बहुत ही कम निकलेगी। इन छप्पन लाख भिक्षुकों में पाँच हजार भिक्षुक भी कठिनाई से ऐसे निकलेंगे जो शास्त्रीय भिक्षा के अधिकारी हैं शेष साढ़े पचपन लाख तो ऐसे मिलेंगे जिन्होंने भिक्षा को एक लाभदायक व्यवसाय बना लिया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-March
आराधना से अन्तरंग जीवन में असाधारण परिवर्तन।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-June
आराधना करने से साधक अपनी आत्मा को एक योनि बना लेता है। जिसमें सविता का तेजपुँज परमात्मा का तेज वीर्य गिरता है। इसे शक्तिपात भी कहा गया है। इस शक्तिपात विज्ञान के अनुसार अमैथुनी सृष्टि भी उत्पन्न हो सकती है। कुन्ती से कर्ण का, मरियम के पेट से ईसा का उत्पन्न होना असंभव नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-May
आराधना से निश्चित रूप से दैवी तत्वों का अभिवर्धन होता है, इस अभिवर्धन से प्राणी के आत्मिक और भौतिक आनन्दों का मार्ग अवश्य ही प्रशस्त होता है, “इस ब्राह्मी शक्ति को में निस्संदेह प्राप्त कर सकता हूँ और निश्चय ही वह महत्वपूर्ण लाभ मुझे भी मिल कर रहेंगे जो इस साधना के फलस्वरूप असंख्यों साधकों को अब तक मिल चुके हैं।” इस प्रकार की भावनाओं का मन में उठते रहना, उनके कल्पना चित्र मस्तिष्क में घूमते रहना तथा उन विचार धाराओं के प्रति अधिकाधिक विश्वास भाव दृढ़ होते जाना, गायत्री साधना की श्रद्धा है।
आराधना करते हैं, अध्यात्मिक उन्नति के लिए, आत्म साक्षात्कार के लिए परमानन्द और मुक्ति के लिए उसी का आश्रय ग्रहण किया जाता है। अर्थ परायणा-किसी कामना की पूर्ति के इच्छुक-साँसारिक संपदा और ऐश्वर्य चाहने वाले साधक उसके श्रीं रूप की उपासना करते हैं। तमोगुणी ताँत्रिक, मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण आदि अभिचारों में क्लीं तत्व का पुरश्चरण किया जाता है। ह्रीं सरस्वती के रूप में, श्रीं-लक्ष्मी के रूप में क्लीं दुर्गा के रूप में पूजी जाती है। जो साधक जिस गुण की उपासना करता है उससे उन्हीं तत्वों का आविर्भाव विशेष रूप से होता है।
आराधना नहीं करते (ते) वे (स्वकर्मेभ्यः) अपने कर्मों से (च्युता जायन्ते) भ्रष्ट हो जाते हैं (अत्र) इसमें (न संशयः)कोई सन्देह नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-January
आराधना करता है? रण चण्डी के रूप में नारी का ही तो आवाहन करता है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-November
आराधना हम किया करते हैं। परन्तु देव के स्थान में दानव की-उपासना करने वाला क्या कभी फलीभूत हो सकता है। हमें बाहर से धर्म के नाश का डर लगा रहता है क्योंकि हमारे अन्दर कुछ भी नहीं है। जो घड़ा अन्दर से कच्चा है उसको बाहर का हल्का सा धक्का चूर-चूर कर देगा परन्तु हवा भरे हुए ब्लेडर को भारी दबाव (सीमित) भी नष्ट नहीं कर सकता है। हमारी आन्तरिक निर्बलता भय का रूप धारण किये हुए है और हम बाहरी शक्ति से अपना बचाव करना चाहते हैं बुद्ध को प्रचार के लिए सेवा की आवश्यकता नहीं थी न महावीर शंकर या नानक को, परन्तु हमारा धर्म इतना निर्बल हो गया कि हम तहखानों में छिपकर भी आशा नहीं कर सकते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-October
आराधना का प्रयोग करना पड़ता है। प्रथम स्तरीय साधना का अधिकांश कार्यक्रम स्थूल वस्तुओं या स्थूल विधि-विधानों पर निर्भर है। माला, आसन, पंचपात्र, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, अक्षत, चित्र, मूर्ति, हवन-सामग्री, मंत्रोच्चारण, व्रत-उपवास, पाठ, कीर्त्तन, अनुष्ठान, ब्रह्मभोज, तर्पण, मार्जन आदि यह सभी कुछ स्थूल आधार हैं। इसे साकार उपासना कह सकते हैं। प्रथम कक्षा के लिए यह सब आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है।
आराधना का प्रधान उद्देश्य है। प्रथम स्तरीय उपासना में लौकिक लाभों का मार्ग प्रशस्त होता है। (1) सद्ज्ञान (2) स्वास्थ्य सुधार (3) उत्साह एवं स्फूर्ति (4) सहयोग एवं मित्रता की अभिवृद्धि (5) अभावों की पूर्ति, यह पाँच लाभ प्रथम श्रेणी के निष्ठावान साधक को मिलते हैं। ऊँची श्रेणी में यह लाभ और भी उच्चकोटि के हो जाते हैं। (1) साहस एवं निर्भीकता (2) विवेक एवं दूरदर्शिता (3) पुरुषार्थ एवं तृप्ति यह पाँच सिद्धियाँ पंचकोशी साधना की हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-April
आराधना के लिए ही हमारा अस्तित्व है, इसी के लिए हमारी प्रत्येक प्रवृत्ति और इसी के लिए हमारा श्वासोच्छास होना चाहिए। साधारणतया सत्य का अर्थ सच बोलना मात्र समझा जाता है, परंतु विचार में, वाणी में और आचार में सत्य का होना ही सत्य है। इस सत्य को पूर्णतया समझने वाले के लिए जगत में और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता। सत्य को परमेश्वर मानना मेरे लिए अमूल्य धन रहा है। मैं चाहता हूँ कि यही हम में से सबके लिए हो।
आराधना का उद्देश्य जीवनक्रम में पवित्रता भर देने के उपयुक्त मनोभूमि तैयार कर देना है। यदि मनोभूमि की मलीनता ज्यों की त्यों बनी रही, दृष्टिकोण और कार्यक्रम में अनुपयुक्त अनैतिक तत्त्व ही समाए रहे तो यह विचार करना ही पड़ेगा कि हमारी पूजा का उद्देश्य क्यों पूरा नहीं हुआ? पूजा सफल हो रही है या नहीं, इसकी एक ही प्रत्यक्ष कसौटी है कि हमारे जीवन की गतिविधियाँ मोड़ ले रही हैं या नहीं? यदि हमारी स्वार्थपरता, असावधानी, वासना, तृष्णा, ज्यों की त्यों हैं, पारमार्थिक गतिविधियों के लिए हमारे गुण, कर्म, स्वभाव में स्थान नहीं मिल रहा है तो यही मानना पड़ेगा कि हम किसी नकली अध्यात्म के फेर में हैं। असली अध्यात्म, नकद धर्म है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-March
आराधना से ही मनुष्य तुच्छ से महान बनता है, बन्धन से मुक्त होता है। इस ज्ञान के अभाव की जो अज्ञान की जो अज्ञान स्थिति है उसमें डूबा रहने से ही मनुष्य पतन के, पाप के, अन्धकार के गर्त में डूब कर दुर्गति को प्राप्त होता है। इसलिए शास्त्रों ने और आप्त पुरुषों ने सदा एक स्वर से ज्ञान प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहने के लिए हर व्यक्ति को आदेश दिया है। जिसकी ज्ञान में दिलचस्पी नहीं, जो विवेक का महत्व नहीं समझता, जिसे मनन और चिन्तन में अभिरुचि नहीं, जो प्रस्तुत समस्याओं पर विचार करना नहीं चाहता वह एक प्रकार से पशु ही कहा जा सकता है। ऐसे नर−पशुओं की वृद्धि से धरती का भार बढ़ता है और नाना प्रकार के लोक संकट उत्पन्न होते हैं।
आराधना करके मनुष्य अपने आत्मबल को आशातीत स्थिति तक ऊँचा उठा सकता है और उससे उपलब्ध हो सकने वाले भौतिक एवं आत्मिक, लौकिक एवं पारलौकिक लाभों से लाभान्वित हो सकता है। विभिन्न प्रकार की साँसारिक कठिनाइयों के समाधान एवं श्री समृद्धि और सफलता के लिए गायत्री का उपयोग किया जाता है वह विशेष विधान गायत्री ग्रन्थों में अलग से हम लिख चुके हैं। विशेष प्रयोजनों के लिए उन्हीं से मार्गदर्शन लेना पड़ेगा। पर युग निर्माण की दृष्टि से जन साधारण में आस्तिकता का प्रसार करना अनिवार्य है और इसके लिए गायत्री को ही प्रधानता मिलनी चाहिए।
आराधना की है। सद्विचारों के बिना किसी का अच्छा स्वभाव नहीं बन सकता, अच्छे स्वभाव के बिना अच्छे आचरण बन सकना कठिन है और अच्छे आचरणों के बिना महानता का लाभ किसी को भी प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए जिसे मानव−जीवन की महानता के अनुरूप श्रेय एवं उत्कर्ष प्राप्त करना हो उसे विचारशीलता का ही अवलम्बन ग्रहण करना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-May
आराधना करके उसके द्वारा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति करने का वरदान माँग सकते हैं। अगणित प्रकार के रत्न प्राप्त कर सकते हैं। अपनी पाचन प्रणाली को यदि हम ठीक कर सकें तो समझना चाहिए कि जीवन विकास की आधी समस्या का हल करने में हम सफल हो गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-February
आराधना करे तो संसार की कठिन से कठिन समस्याएँ सुलझ सकती हैं। देश कल्याण का मार्ग खोज सकता है। सत्य को भगवान समझ कर पूजना, मनुष्य को भगवान समझ कर पूजने से कहीं अधिक लाभदायक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-April
आराधना करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-August
आराधना किया करते थे। ये यज्ञ, यज्ञ के अंग और दक्षिणा आदि में पर्याप्त सम्पत्ति व्यय करते थे। इनके यज्ञ के प्रधान ऋत्विज् वशिष्ठ, असित, गौतम आदि महर्षि जन थे। धन्य देश, जहाँ सरस्वती की धारा रहती थी, उसी पुण्य क्षेत्र में अम्बरीष यज्ञ किया करते थे।
आराधना की। भोले बाबा ने साक्षात् दर्शन देकर उससे वरदान माँगने को कहा:—उसने पितृ हत्यारे से बदला लेने का वरदान माँगा—शिव जी ने सारी विधियों सहित मारण यज्ञ विधि बताते हुए कहा:—

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-July
आराधना करनी चाहिये।
आराधना की है, बिना यज्ञ किये त्रलोक्य की विभूति स्वरूप त्रिपुरासुर के तीनों पुरों का विनाश नहीं हो सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-October
आराधना में लग गये। थोड़ी देर जप किया था, कि बालक पूर्ण स्वस्थ होकर उठ खड़ा हुआ और उल्लास से बारात वालों ने अपनी मंगल यात्रा आरम्भ की।
आराधना कर रहा था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-January
आराधना करता है तो शब्द विज्ञान और आत्म सम्बंध दोनों महत्ताओं से संयुक्त गायत्री का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है और वह एक अद्वितीय शक्ति सिद्ध होती है।
आराधना, के आधार पर उत्पन्न किया गया सम्बन्ध, यह दोनों ही कारण गायत्री शक्ति को ऐसी बलवान बनाते हैं जो साधकों के लिए दैवी वरदान सिद्ध होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-November
आराधना, मैं, मेरे पूजित का मन्दिर, मौन नियति की चेतना,
आराधना है।।44।।
आराधना है।। 12 ।।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-March
आराधना (6) रुचि और अरुचि (7) मानसिक कमजोरियाँ 8) विचारों की अद्भुत शक्ति (9) वर्तमान की समस्याएं (10) उत्साह लगन, दृढ़ता और तत्परता (11) धैर्य साहस और विवेक (12) मन को वश में करना (13) मनोबल की वृद्धि (14) एकाग्रता और दिव्य दृष्टि (15) मनोरंजन।
आराधना, स्वाध्याय, और साधना में प्रवृत्त रहे हैं। जहाँ ऐसे ब्रह्मर्षि जलवायु की उत्तमता के कारण, एवं ऐतिहासिक महत्व के कारण, अधिक संख्या में रहते हैं वह स्थान तीर्थ कहे जाते हैं। तीर्थ यात्रा में वायु परिवर्तन होता है, ऐतिहासिक स्मृतियों का अनुभव होता है और उन ब्रह्मर्षियों से सत्संग करने का सौभाग्य प्राप्त होता है जिनमें दूसरों पर अच्छा असर डालने की योग्यता का बाहुल्य होता है। तीर्थ यात्रा में पुण्य फल प्राप्त होता है इसका तात्पर्य यही है कि श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगति का उत्तम प्रभाव पड़ता है और उस प्रभाव के कारण अपने अन्दर जो सद्गुण उत्पन्न होते हैं उनके फलस्वरूप सुखदायक आनन्दमयी परिस्थितियाँ होती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-August
आराधना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-May
आराधना के लिए इसे अर्पित कर देंगे। यह रक्त, माँस और हड्डियों के अलावा और कुछ भी नहीं हैं और इससे जो मलमूत्र निकलता हैं सिवाय विष के और कुछ नहीं हैं। जो गंदगी हमारे शरीर से निकलती हैं, उसे छूना तो दूर रहा हम उसे ध्यान में भी नहीं लाते। इस शरीर का पालन करने के लिए हम झूठ बोलते हैं विश्वासघात करते हैं एवं इससे भी अधिक बुरे कर्म करते हैं। यह कैसी लज्जा की बात हैं कि हम इन कुकर्मों को करके इस नश्वर शरीर की रक्षा करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-November
आराधना स्वयं की जा सकती है उतनी किराये के व्यक्ति द्वारा कदापि नहीं हो सकती इसलिए इतना अच्छा फल भी दूसरों द्वारा की हुई पूजा से हरगिज नहीं मिल सकता। अपने कार्य के लिए आप ही साधना करनी चाहिए, जिनके मन में तीव्र इच्छा है वे ही सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-May
आराधना करता है तो व्यभिचारी ठहरता है। तो फिर विकार को आराधना क्योंकर की जा सकती है? जिसकी सारी प्रवृत्ति एक सत्य के दर्शन के लिये है, वह सन्तान पैदा करने या गृहस्थी चलाने के काम में क्यों कर पड़ सकता है। भोगविलास द्वारा किसी को किसी को सत्य की प्राप्ति हुई हो, ऐसी एक भी मिसाल हमारे पास नहीं।
आराधना क्योंकर की जा सकती है? जिसकी सारी प्रवृत्ति एक सत्य के दर्शन के लिये है, वह सन्तान पैदा करने या गृहस्थी चलाने के काम में क्यों कर पड़ सकता है। भोगविलास द्वारा किसी को किसी को सत्य की प्राप्ति हुई हो, ऐसी एक भी मिसाल हमारे पास नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-August
आराधना से शक्ति प्राप्त करने और उसके द्वारा सिद्धि प्राप्त करके जनता के शारीरिक एवं मानसिक दुखों को दूर करते थे। समय के परिवर्तन के साथ इस महान विज्ञान का भी दुर्दिन आया। महासिद्ध नागार्जुन के अवसान के बाद तंत्र विद्या कुपात्रों के हाथ में चली गई और उन्होंने उसका रावण की भाँति दुरुपयोग प्रारंभ कर दिया। मारण, मोहन, उद्घाटन, वशीकरण आदि का प्रयोग अपनी इन्द्रियों के सुख या धन लालसा के लिए किया जाने लगा। जिस तलवार से दस्युओं और हिंसक पशुओं का मुकाबला किया जाता है उसी से अबोध शिशुओं, ब्राह्मणों और गायों की गर्दनें भी काटी जा सकती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-March
आराधना भक्ति है और भक्ति तो ‘सिर का सौदा है’,अथवा वह हरि का मार्ग है अतः उसमें कायरता की गुंजाइश नहीं। उसमें हार जैसा कुछ है ही नहीं। वह तो ‘मर कर जीने का मन्त्र है।’
आराधना के लिये ही हमारी हस्ती हो और इसी के लिये हमारी हर एक प्रवृत्ति हो। इसी के लिये हम हर बार श्वासोच्छ्वास लें। ऐसा करना सीख जाने पर हमें बाकी नियम सहज ही हाथ लगेंगे और उनका पालन भी आसान हो जायगा। बगैर सत्य के किसी भी नियम का शुद्ध पालन अशक्य है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-June
आराधना के लिए ही उसके सारे प्रयत्न होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-January
आराधना सर्वसुलभ एवं सामान्य मनोभूमि के लिए सर्वथा उपयुक्त है। यदि उसके पीछे जुड़ गई, भ्रान्तियों और अवाँछनीयताओं को हटा दिया जाय तो इस माध्यम को व्यक्ति एवं समाज के भावनात्मक एवं नैतिक स्तर को ऊँचा उठाने में बहुत ही सहायक सिद्ध पाया जायगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-May
आराधना है॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-February
आराधना कक्ष को बनाने में उपयुक्त वातावरण बनाने का तथ्य ही प्रधान रूप से काम करता है। वहाँ के सुसज्जा साधन सँजोने में इसी बात का ध्यान रखा जाता है कि उस स्थान में जाते ही मन अपने आपको पवित्रता की दिव्य परिस्थितियों से घिरा हुआ अनुभव करने लगे। सामान्य वातावरण से उपासना कक्ष का वातावरण भिन्न रखा जाता है और वहाँ की परिस्थितियां ऐसी बनाई जाती हैं जिनमें बैठने पर उत्कृष्टता की अनुभूति बढ़ने से सुविधा मिल सके।
आराधना के विभिन्न उपचारों के लिए इन्हीं दिनों वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप से विशेष क्रिया−कृत्य किये जाते थे। अभी भी जहाँ−जहाँ देवियों के मन्दिर हैं, वहाँ−वहाँ छोटे−बड़े तान्त्रिक आयोजन होते हैं। यों सतोगुणी साधनाओं के लिए भी यह समय अधिक उपयुक्त है, पर प्रचलन इन दिनों दुर्गा पूजा के नाम से ही चल पड़ा है। बंगाल, आसाम, उड़ीसा, मणिपुर, नेपाल, भूटान एवं गुजरात में दुर्गा पूजा के विशेष समारोह होते हैं। बंगाल में तो उन दिनों सरकारी छुट्टियाँ भी रहती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-March
आराधना का उल्लेख है और उसे परम आनन्ददायक, प्राणियों का उत्पादनकर्ता, वरणीय, सेवनीय, भजनीय, प्रार्थनीय बताया गया है पापों का नाश−स्नेह भक्ति का संचार देवत्व की वृष्टि, सद्गुणों का अनुदान, दिव्य प्रकाश की प्राप्ति−विद्या की उपलब्धि का संकेत है। सर्व देवमयी गायत्री उपासना से लोक और परलोक में मिल सकने वाली समस्त विभूतियों को गायत्री उपासना के माध्यम में प्राप्त होने का उल्लेख है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
आराधना का अर्थ है अपनी प्रवृत्तियों और क्षमताओं का सधाया हुआ सुविकसित स्वरूप। असुरता से आक्रान्त होने का अर्थ है अपने चिन्तन एवं कर्तव्य में अवाँछनीयताओं की भरमार। साधना का उद्देश्य है- व्यक्ति का काया-कल्प, चेतना का परिमार्जन-परिष्कार इतना बन पड़े तो अपना आपा ही कल्प-वृक्ष बन जाता है और स्वर्गीय उपलब्धियों को सहज ही प्रस्तुत करता है। कितने ही साधकों को विभिन्न देवताओं द्वारा विभिन्न प्रकार के वरदान मिलने के कथानक कथा-गाथाओं में पढ़ने सुनने को मिलते हैं। यह वरदाता इष्टदेव अपना उच्चस्तरीय अंतस् ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-April
आराधना और अन्तःकरण में प्रतिष्ठापन करना, हर किसी के लिए आवश्यक है। यह तत्व जिसे भी प्राप्त होगा वह ऊँचा उठेगा। जहाँ तक अधिकार का प्रश्न है प्रत्येक सत्प्रयोजन को सम्पन्न करने-सन्मार्ग की दिशा में कदम बढ़ाने की छूट और सुविधा हर किसी को है। प्रतिबन्ध तो अवाँछनीय गतिविधियों पर ही लगाये जाते हैं। अथवा उन कार्यों से रोका जाता है जो करने की सामर्थ्य से बाहर होते हैं और क्षमता के अभाव में भारी वजन उठाने पर कठिनाई उत्पन्न होने की आशंका होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-June
आराधना करनी पड़ेगी। मन की शक्तियों को यत्न पूर्वक उस दिशा में प्रवृत्त करना पड़ेगा। जो लोग यह कहते रहते हैं कि “क्या करें हमारा तो मन ही नहीं मानता” उन्हें यह जानना चाहिये कि मानसिक शक्तियाँ सर्वथा स्वच्छन्द नहीं हैं। मन इच्छा शक्ति के अधीन है। इच्छाओं के आकार-प्रकार पर उनकी क्रिया शक्ति सम्भावित है।
आराधना, जिसमें जीवात्मा अपनी स्थिति को भूल कर अपने आपको उन में मिला दे, बस उसी प्रेम के भूखे हैं भगवान! व्याकुलता उसी के लिये होती है जिसे चित्त चाहता है। मनुष्य परमात्मा की ओर तभी उन्मुख हो सकता है जब वह अपने आपको सदैव आत्मा की दृष्टि से देखे। आत्मा का चिन्तन करने से ही ईश्वर-प्रेम प्राप्त पैदा होता है। आत्मा का परमात्मा से चिर-सम्बन्ध है, अतः आत्मस्वरूप की जानकारी के साथ उनके साथ उनका प्रेम डडडड जागृत होना भी स्वाभाविक ही है।
आराधना की जाये ताकि मनुष्य का कदम दोषपूर्ण ने हो जाय। वह स्थिरतापूर्वक अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता चले।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-October
आराधना प्रारम्भ की और अपनी परमार्थपूर्ण इच्छा की प्रबलता से अपने विश्वासानुसार भगवान वेंकटेश से इस वरदान के साथ पुत्र रत्न प्राप्त कर ही लिया-कि उनका पुत्र संसार के विषय वासनाओं से विरक्त रहकर अपने कर्तृत्वों द्वारा देश और धर्म का उद्धार करे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-May
आराधना किया करते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-July
आराधना ही है। इससे अपनी आत्मा में परमात्मा का सूक्ष्म दिव्यतत्व झलकने लगता है और अपूर्व शक्ति की अनुभूति होती है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रार्थना से प्राप्त शक्ति का सदुपयोग आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति कर सकते हैं। नियमपूर्वक की गई प्रार्थना कभी असफल नहीं हो सकती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-November
आराधना करके उपलब्ध किया जायेगा।
आराधना करने की अपेक्षा उसे श्रीमन्तों की रखैल बनना स्वीकार का कर लिया है और लेखनी, गायन, अभिनव जैसे कला कौशलों को श्रीमन्तों की कृपा पात्र बनने निमित्त गिरवी रख दिया है। पराक्रमी, दुस्साहसी संघर्षशील योद्धाओं ने अनीति से लड़ने की परम्परा त्याग दी है और वे तस्करों दस्युओं के दलों में सम्मिलित होकर आतंक अपराधों में निरत रहकर अपनी शूर वीरता का परिचय देने लगे हैं। सूर्य-चन्द्र जैसे मूर्धन्यों का सहयोग न मिलने पर इन दिनों कार्तिकी अमावस्या जैसा घनघोर अन्धकार संव्याप्त है। इससे निपटे कौन ? इसमें आशा की किरण एक ही रह गयी है।
आराधना चल पड़ी है। वे बसन्ती फूलों की तरह खिलते ओर लदते चले जा रहे हैं। आशंका थी कि इस घोर स्वार्थपरता के माहौल में वे उगेंगे नहीं बढ़ेंगे पनपेंगे नहीं, पर वह असमंजस अब दूर होता जा रहा है। प्रज्ञा परिजनों के रूप में युग शिल्पियों का एक नया समुदाय न केवल संख्या की वरन् स्तर की दृष्टि से भी युग चुनौती स्वीकारने के लिए अदृश्य आमन्त्रण के सहारे कार्य क्षेत्र में आ खड़ा हुआ है और कुछ कर गुजरने जैसा पराक्रम प्रकट कर रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-December
आराधना ही है।
आराधना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-February
आराधना-उपासना करते रहे हैं। इन सबका विभिन्न माध्यमों से एकमात्र लक्ष्य है- मनुष्य को असत् से सत् की ओर ले चलना।
आराधना की ही फलश्रुति है। अन्तः जागरण की इस प्रक्रिया से इतनी सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है जितनी कि परमाणु द्वारा भी नहीं हो सकी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-May
आराधना करे, उसे कुछ लाभ नहीं होता। गायत्री मन्त्र के सम्बन्ध में भी यही तथ्य बहुत सीमा तक काम करता है। जब साधक श्रद्धा और विश्वासपूर्वक आराधना करता है तो शब्द विज्ञान और विश्वास विज्ञान दोनों की विशेषताओं से संयुक्त गायत्री मन्त्र का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है और वह एक अद्वितीय शक्ति सिद्धि होती है।
आराधना द्वारा अपने क्रिया-कलापों को सोद्देश्य बनाकर ईश्वरीय उद्यान को और भी सुन्दर-सुव्यवस्थित बनाने आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना का विकास किया जाता है। सतत् हर क्षण इनका अभ्यास जीवन में अनिवार्य है।
आराधना- कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिये इन्हीं विविध सोपानों को अपनाना पड़ता है।
आराधना करता है तो शब्द विज्ञान और विश्वास विज्ञान दोनों की विशेषताओं से संयुक्त गायत्री मन्त्र का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है और वह एक अद्वितीय शक्ति सिद्धि होती है।
आराधना है। उपासक उसका जप मात्र ही न करें वरन् प्रचोदयात्- प्रेरणा भी ग्रहण करें। उस अनुशासन के अनुरूप उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र एवं उदात्त व्यवहार का भी अभ्यास करें तभी वह प्रक्रिया पूरी होती है जिसके आधार पर उपासना का महत्व एवं माहात्म्य वर्णित किया जाता रहा है। निश्चय है कि गायत्रीमय जीवनचर्या अपनाने पर व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का समावेश होगा और उस प्रक्रिया में संलग्न व्यक्ति को प्रगति, समृद्ध, संस्कृति एवं सुख शान्ति जैसे प्रतिफलों से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा।
आराधना भी इसी के साथ स्मरण किये जाने वाले कृत्य हैं जिनमें क्रमशः विचारणा व गतिविधियों को उत्कृष्टता के साथ जोड़ा जाता है। उपासना यदि भक्तियोग है तो साधना ज्ञानयोग एवं आराधना- कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिये इन्हीं विविध सोपानों को अपनाना पड़ता है।
आराधना के इन तीन उपायों से ही ईश्वर जीवसत्ता में प्रवेश करता है तथा मनुष्य को देवोपम चिन्तन चरित्र विनिर्मित करने की प्रेरणा देता है। साहसी मनस्वी इस पथ पर चलकर असीम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं, स्वयं को ऊँचा उठाते हैं और दैवी अनुकम्पा उन पर सतत् बरसती रहती है। योगाभ्यास एक पराक्रम है, अपनी अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष है। जो इस देवासुर संग्राम में जितना अधिक सफल होता है वह बहिरंग जगत में सुसंस्कृत एवं अन्तरंग की दृष्टि से महान बनता चला जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-July
आराधना से स्वर्ग और मुक्ति मिलती है। शंकालु इस विषय पर काफी ऊहापोह करते देखे गए हैं। वस्तुतः स्वर्ग कोई स्थान विशेष नहीं है। न ही कोई ऐसा ग्रह-नक्षत्र है जहाँ स्वर्ग के नाम पर अलंकारिक रूप में वर्णित अनेकानेक प्रसंग बताए जाते रहे हैं। वस्तुतः इस सम्बन्ध में ऋषि चिन्तन सर्वथा भिन्न है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-June
आराधना जहाँ भी होगी वहाँ किसी प्रकार की कमी कभी भी नहीं हो सकती। ऐसी कमी जिसकी पूर्ति के लिये देवताओं को कष्ट सहना पड़े।” देवतागण इस तथ्य से परिचित हुए, वस्तुस्थिति को जाना और अपनी निरुपयोगिता को समझा। मनुष्य ने उपेक्षा क्यों की, यह रहस्य उन्हें विदित हुआ। जैसे आये थे वैसे ही वापस वे स्वर्ग लोक को चले गये।
आराधना करने की ठानी है। वे आज नहीं तो कल इस लोक में स्वर्ग की रचना अवश्य कर लेंगे। खेतों में हरियाली के रूप में यह श्रम ही लहलहा रहा है। उसी का अनुदान- वरदान पाकर धरती पुत्र कृतकृत्य हो रहे हैं। जब तक उसकी अर्चना होती रहेगी भूलोक पर वैभव की कमी न पड़ेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-October
आराधना करते हैं, वह साक्षात् उन्हीं के रूप डडडड हो जाता है और अणिमादि सिद्धियों के फल को अनायास ही पा लेता है।
आराधना करके अपनी शक्ति और महिमा की अक्षुण्ण बनाये रखने में समर्थ रहे हैं। इसलिये सर्व-साधारण के लिये भी यही उचित है कि भले ही अन्य देवी-देवता की वे उपासना करते हों, पर गायत्री महामन्त्र की उपेक्षा न करें। प्रधानता गायत्री को दें। अनिवार्य उसी को रखें और फिर जिस भी देवता या उसके मन्त्र की आराधना करनी हो, करते रहें।
आराधना करनी हो, करते रहें।
आराधना द्वारा परमात्मा को पाना क्या मनुष्य परमात्म रूप ही हो जाता है।
आराधना के योग्य उस परमशक्ति का पूजन करना चाहिये। इससे बड़ा त्रिभुवन में अन्य कोई नहीं है, पर वेद-शास्त्रों का परमसत्य निर्णय है, वह सर्वोपरि है, चाहे निर्गुण हो या सगुण हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-February
आराधना इसी रूप में हो सकती है। प्रतिमाओं के मन्दिर नहीं- ज्ञान के मन्दिर स्थापित करना इस युग की माँग है। बड़े पुस्तकालय तो मिलजुल कर संगठित रूप से बन सकते हैं, उनके लिए धन भी चाहिये। पर झोला पुस्तकालय को निर्धन से निर्धन और व्यस्त से व्यस्त व्यक्ति भी चला सकता है। अपने परिचितों और मित्रों में सद्ज्ञान साहित्य पहुँचाने और वापिस लेने का छोटा-सा, झंझट, मन से संकोच त्याग देने पर बड़े मजे में चलता रह सकता है।
आराधना मानव को महामानव और पुरुष को पुरुषोत्तम बना देती है। अस्तु इसी साध्य और महानता की उपासना श्रेयस्कर है, कल्याण तथा मंगलकारी है।
आराधना करना सत्य को छोड़कर उसकी छाया पकड़ने की तरह अबुद्धिमत्तापूर्ण है।
आराधना कर सकते हैं और अपने मिशन के प्रति सच्ची श्रद्धाञ्जलि अर्पित कर सकते हैं।
आराधना के लिए आर्थिक पुरुषार्थ करना ही होगा। आज की दुनियाँ में यदि आर्थिक पुरुषार्थ की प्रकृति सर्वथा पवित्र एवं निष्कलंक बनाये रखना असम्भव नहीं तो कम से कम कठिन तो है ही। किन्तु ज्ञानयज्ञ की साधना में ऐसी कोई कठिनाई नहीं है। थोड़ा सजग रहकर ज्ञान का उपार्जन पवित्रतापूर्वक किया जा सकता है। अनैतिक एवं अनुचित विचार-संस्कार से थोड़ा सतर्क रहकर विशुद्ध एवं कल्याणकारी ज्ञान का अर्जन किया ही जा सकता है।
आराधना से भी सौगुना बड़ा माना जाता है। अपने पराये, ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का भेदभाव सहानुभूति को सार्थक नहीं करते वरन् उसकी परिभाषा को छोटा बनाते हैं। सहानुभूति सारे संसार के लिए एक जैसी हो वही सच्ची और सार्थक होती है।
आराधना है, जिससे हमारा अन्तःकरण स्वार्थ से विरत होकर परमार्थ पथ पर अग्रसर हो। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ असतो मा सद्गमय, मृत्योर्माऽमृतंगमय’, की पुकार में इसी आन्तरिक उपलब्धि के लिए आत्मा ने परमात्मा से पुकार की है। सो हमें आत्म-कल्याण और लोक-मंगल दोनों ही प्रयोजन सिद्ध करने वाले इस महान अवलम्बन ही को दृढ़तापूर्वक पकड़ना चाहिए। परमार्थ के लिए अपने, समय, श्रम, धन, उत्साह एवं पुरुषार्थ की उचित मात्रा में नियोजित करना चाहिये।
आराधना में जुट गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-November
आराधना होती चलेगी।
आराधना एक कठिन कार्य है। सबके लिये सम्भव नहीं आत्म-साधना का सामान्य तथा सरल मार्ग यही है कि अपने साधारण जीवन क्रम में उस उत्कृष्ट दृष्टिकोण को जोड़ लिया जाय जो भौतिकवाद को अध्यात्मवाद बना दे। ऐसा करने से संसार क्रम में न तो बाधा पड़ेगी और अध्यात्म की भी आराधना होती चलेगी।
आराधना, उपासना अथवा पूजा-पाठ करना पड़े। वास्तविक ज्ञान के बिना न तो जीवन में सच्ची शान्ति मिलती है और न उसको परकल्याण प्राप्त होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-August
आराधना करने से लोक और परलोक दोनों का बनाव बनता है। इसी गुण पर जहाँ आत्मा का उत्थान निर्भर है, वहाँ संसार और समाज का सृजन, व्यवस्था और विकास की धुरी भी इसी पर निर्भर रहती है। आज यदि समाज के सारे लोग केवल स्वार्थी बन जांय और दूसरों के हित का सम्पादन न करें तो कल ही समाज में घोर अनर्थ घटित होने लगे। अराजकता, संघर्ष और छीना-झपटी का बोल-बाला हो जाये, जो उद्दंड, बली और शक्तिशाली हों, वे सारे साधनों और सम्पत्ति पर अपना एकाधिपत्य स्थापित कर लें और जो सामान्य, साधारण अथवा अपेक्षाकृत निर्बल हों, वे बेचारे पिस कर ही रह जायें। परहित और परोपकार के बिना संसार का क्रम एक क्षण भी नहीं चल सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-September
आराधना मानकर पूर्ण मनोयोग पूर्वक पूरा किया जाय। इस क्रम में विश्राम का अवकाश भी रखा जा सकता है, पर उसके लिए ढेर सारा समय गंवाने की जरूरत नहीं है। कामों को बदल लेने से कार्य पद्धति में थोड़ा फेर बदल कर लेने से भी विश्राम की काफी कुछ जरूरत पूरी हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-July
आराधना करेगा, तो उसे निष्काम कर्म का पथ अनुसरण करना पड़ेगा। शरीर कर्म का आधार है। यही कर्म का साधन है। स्व की सिद्धि नैष्कर्म्य अवस्था लाने से प्राप्त होती है। कर्म त्याग इसका उपाय नहीं है वरन् कर्मफल की इच्छा के बिना कर्त्तव्य कर्म करने से वह प्राप्त होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
आराधना, व्यक्तित्व परिष्कार और सेवाधर्म के प्रयोगों से भरी है हमारी यह हीरक जयंती एवं उसकी आगामी डेढ़ वर्ष की हमारी क्रियापद्धति। यह अवधि हम सबके लिए कठोर आत्मनिरीक्षण की है। अपने क्रियाकलाप को कठोर समीक्षापूर्वक हम सभी परखें और जहाँ जो छिद्र दिखाई पड़ें, उन्हें साहसपूर्वक रोकने के लिए जुट जाएँ। लोकसेवा हमारा व्रत बने, जनकल्याण के लिए किए गए प्रयत्नों में जीवन की सार्थकता अनुभव करें। बड़ा आदम नहीं, महामानव बनने में हमारी आकाँक्षा-अभिलाषा केंद्रित हो सके, तो श्रावणी महापर्व की वेला में हीरक जयंती वर्ष के इस मोड़ पर हम अपनी गुरुसत्ता को सही मायने में आश्वासन दे पाएँगे कि उनके बताए मार्ग पर ‘मानव में देवत्व लाने धरती पर स्वर्ग उतारने’ हेतु सक्षम युगसैनिक अब पूरी तरह तैयार हैं।
आराधना का सुखद परिणाम निकला।
आराधना के तत्व भी जोड़कर सच्चे धर्मावलंबी बने।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
आराधना के लिए किया जा सकता है और किया जाता भी है। ये भगवान् प्राप्ति के माध्यम हैं। ये साधन केवल तभी अनुपयुक्त सिद्ध होते हैं, जब इनका दुरुपयोग किया जाता है।
आराधना के साथ श्रेष्ठ मूल्यों एवं आदर्शों की स्थापना है। लक्ष्मी समृद्धि, विभूति एवं सम्पत्ति की देवी है और गणपति सद्बुद्धि एवं सद्ज्ञान के सर्वसमर्थ देवता। समृद्धि का तात्पर्य विलासिता नहीं है, बल्कि यह सत्कर्मों में नियोजन है। सद्बुद्धि के प्रकाश में ही समृद्धि का सुनियोजन संभव है। अतः सद्बुद्धि के अभाव में समृद्धि हितकारी नहीं हो सकती और विपुल बुद्धि भी धनाभाव के कारण मंद पड़ जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-January
आराधना-उपासना कर हजारों साधक मुक्ति के लक्ष्य तक पहुँचे होंगे। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की आराधना की और सिद्ध स्तर पर पहुँचे। पश्चिम बंगाल के नदिया क्षेत्र में हुए इस संन्यासी को लोगों ने नहीं स्वीकारा, लेकिन स्वामी निगमानंद ने इसकी कभी चिंता नहीं की। वे कहते थे पत्नी के प्रेम ने उन्हें लौकिक दुःखों और अपेक्षाओं से मुक्त कर दिया। परमेश्वर का कोई और रूप दूसरों के लिए आराध्य होगा, मेरे लिए तो पत्नी ही ईश्वर रूप है।
आराधना की और सिद्ध स्तर पर पहुँचे। पश्चिम बंगाल के नदिया क्षेत्र में हुए इस संन्यासी को लोगों ने नहीं स्वीकारा, लेकिन स्वामी निगमानंद ने इसकी कभी चिंता नहीं की। वे कहते थे पत्नी के प्रेम ने उन्हें लौकिक दुःखों और अपेक्षाओं से मुक्त कर दिया। परमेश्वर का कोई और रूप दूसरों के लिए आराध्य होगा, मेरे लिए तो पत्नी ही ईश्वर रूप है। वही परमात्मा है।
आराधना के मूर्तिमान् स्वरूप भला मेरे आराध्य हनुमान् के सिवा और कौन होगा। महावीर हनुमान् की यह उक्ति “राम काजु कीन्हें बिनु मोहिं कहाँ विश्राम” ही उनका आदर्श वाक्य था। सचमुच ही वह कभी विश्राम नहीं करते थे। सदा-सर्वदा अनथक भाव से आत्मकल्याण एवं लोककल्याण में रित रहते।
आराधना की और जगन्नियता की झलक देखी, तो स्वामी निगमानंद ने ही कौन-सा अनर्थ किया।
आराधना भी चलती रही।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-February
आराधना समझना।
आराधना और उदार वृत्ति द्वारा जीवन निर्वाह करना आदर्श थे। मास के पहले पक्ष में वे खेतों से बीन−बीनकर चावल एकत्र करते, दूसरे पक्ष में उसे यज्ञ और अतिथि−सत्कार में व्यय कर देते। ऋषि श्रेष्ठ दुर्वासा छह हजार शिष्यों सहित मुद्गल की परीक्षा हेतु उनके आश्रम पर कई बार गए और निस्पृह मुद्गल ने उन्हें हर बार आतित्य द्वारा पूर्णतः संतुष्ट कर दिया।
आराधना समझकर किए गए कार्य दूसरों के प्रति द्वेष, विषाद या स्पर्द्धा के भाव को तिरोहित करते हैं। इन भावों या दुर्भावना से किए गए कार्य ही मन में मलीनता लाते हैं। उन्हीं के कारण कषाय−कल्मष उत्पन्न होते हैं। आराधना को व्यवहार और कर्म की कसौटी मान लें, तो किसी भी आचरण से दूसरे का अहित नहीं होगा। किसी के प्रति द्वेष−दुर्भाव ही नहीं होगा तो ईर्ष्या, क्रोध, विषाद आदि विकारों का अपने आप शमन हो जाएगा।
आराधना को व्यवहार और कर्म की कसौटी मान लें, तो किसी भी आचरण से दूसरे का अहित नहीं होगा। किसी के प्रति द्वेष−दुर्भाव ही नहीं होगा तो ईर्ष्या, क्रोध, विषाद आदि विकारों का अपने आप शमन हो जाएगा।
आराधना समझने के नियम से प्रखर होती है। किसी काम को बोझ समझकर नहीं किया जाए। आराधना समझकर किए गए कार्य दूसरों के प्रति द्वेष, विषाद या स्पर्द्धा के भाव को तिरोहित करते हैं। इन भावों या दुर्भावना से किए गए कार्य ही मन में मलीनता लाते हैं। उन्हीं के कारण कषाय−कल्मष उत्पन्न होते हैं।
आराधना समझते हुए करने का अभ्यास इस आवश्यकता को पूरी करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-May
आराधना कर रहे महाराणा प्रताप और उसके बच्चों का भूख से आकुल चेहरा मन मस्तिष्क में घुस गया। वह बालक के सिर पर स्नेह के हाथ फेरते हुए बोली, “लेकिन बेटा चारों ओर तो शत्रुओं का पहरा है। रोटी देने कैसे जाओगे?”
आराधना करते हैं, तो उन्हीं की कृपा के बल के सफलता पाते हैं। निम्न स्वार्थ से ग्रसित लोग धन, सम्मान, इंद्रिय-भोगों की कामना करते हैं। उनकी भी इच्छाएँ पूरी होती चली जाती है। सारा खेल मन का है। आपने जैसी कामनाएँ कीं, वैसा ही मनोयोग बना, क्रियाएं हुई और फल की प्राप्ति हुई।
आराधना की, वैसा ही मिलता चला गया। यही सारी व्याख्या इस ग्यारहवें श्लोक की है, जो मनुष्य की सफलता-असफलताओं की, भौतिक-आध्यात्मिक उपलब्धियों की हमें कहानी सुनाती है।
आराधना आवश्यक है। विलक्षण बुद्धि चाहने, प्रज्ञा संपन्न बनने के लिए ब्राह्मी का प्रयोग अनुष्ठानपूर्वक करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-April
आराधना पर केंद्रित भागवत धर्म आगे चलकर वैष्णव धर्म में परिवर्तित हो गया। इन दिनों भक्ति के विभिन्न स्वरूप दिखाई दिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-December
आराधना हम इसलिए करते हैं कि हमारा देवत्व निराशा न लाए। देवत्व कभी निराशा नहीं ला सकता। देवत्व की ओर चलने वाला व्यक्ति निराश हो सकता। सफलता नहीं मिली, न सही, अगले जन्म में मिलेगी। देवत्व की ओर बढ़ने वाले में क्या ताकत आ गई कि वह कहता है कि अभी नहीं तो अगले जन्म में मिल जाएगी।
आराधना करते हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की आराधना करते हैं, भक्त शिरोमणि हनुमान की आराधना करते हैं, तो इस माध्यम से उनकी जो श्रेष्ठ वृत्तियाँ हैं, उनको अपने अंदर धारण करते हैं। नहीं साहब! हनुमान जी हमें रुपया-पैसा दे जाएं, हमारा ब्याह करा दें। हनुमान जी बेटा दे जाएं। बेटे! ऐसे कैसे हो सकता है? जिसके यहाँ जो होगा वही तो होगा।
आराधना करते हैं, संघशक्ति की देवी दुर्गा की आराधना करते हैं, पूर्ण पुरुष कृष्ण भगवान की आराधना करते हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की आराधना करते हैं, भक्त शिरोमणि हनुमान की आराधना करते हैं, तो इस माध्यम से उनकी जो श्रेष्ठ वृत्तियाँ हैं, उनको अपने अंदर धारण करते हैं। नहीं साहब! हनुमान जी हमें रुपया-पैसा दे जाएं, हमारा ब्याह करा दें। हनुमान जी बेटा दे जाएं। बेटे! ऐसे कैसे हो सकता है? जिसके यहाँ जो होगा वही तो होगा।
आराधना करता हैं, माता के रूप में उसकी पूजा करता हूँ। यदि एक राक्षस एक पुत्र की माता की छाती पर चढ़कर खून चूसने लगे, तो वह क्या करेगा? मैं यह जानता हूँ कि मुझमें इस गिरी हुई कौम को उबारने की ताकत है। शारीरिक शक्ति की बात नहीं, मैं कोर्ठ तलवार या बंदूक उठाकर लड़ने नहीं जा रहा, पर ज्ञान की शक्ति तो असीम है।’
आराधना करते हैं। जब हम शंकर जी की आराधना करते हैं, संघशक्ति की देवी दुर्गा की आराधना करते हैं, पूर्ण पुरुष कृष्ण भगवान की आराधना करते हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की आराधना करते हैं, भक्त शिरोमणि हनुमान की आराधना करते हैं, तो इस माध्यम से उनकी जो श्रेष्ठ वृत्तियाँ हैं, उनको अपने अंदर धारण करते हैं। नहीं साहब! हनुमान जी हमें रुपया-पैसा दे जाएं, हमारा ब्याह करा दें। हनुमान जी बेटा दे जाएं। बेटे! ऐसे कैसे हो सकता है?
आराधना की ओर
आराधना का रूप देकर एक विराट संगठन गायत्री परिवार खड़ा कर दिया एवं उनकी जिनकी उपासना को एक विराट रूप दे दिया।
आराधना करते हैं, पूर्ण पुरुष कृष्ण भगवान की आराधना करते हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की आराधना करते हैं, भक्त शिरोमणि हनुमान की आराधना करते हैं, तो इस माध्यम से उनकी जो श्रेष्ठ वृत्तियाँ हैं, उनको अपने अंदर धारण करते हैं। नहीं साहब! हनुमान जी हमें रुपया-पैसा दे जाएं, हमारा ब्याह करा दें। हनुमान जी बेटा दे जाएं। बेटे! ऐसे कैसे हो सकता है? जिसके यहाँ जो होगा वही तो होगा।
आराधना इसलिए करते हैं कि हमारी देववृत्तियाँ विकसित होती हुई चली जाएं। देवता की आराधना हम इसलिए करते हैं कि हमारा देवत्व निराशा न लाए। देवत्व कभी निराशा नहीं ला सकता। देवत्व की ओर चलने वाला व्यक्ति निराश हो सकता। सफलता नहीं मिली, न सही, अगले जन्म में मिलेगी।
आराधना करते हैं, तो इस माध्यम से उनकी जो श्रेष्ठ वृत्तियाँ हैं, उनको अपने अंदर धारण करते हैं। नहीं साहब! हनुमान जी हमें रुपया-पैसा दे जाएं, हमारा ब्याह करा दें। हनुमान जी बेटा दे जाएं। बेटे! ऐसे कैसे हो सकता है? जिसके यहाँ जो होगा वही तो होगा।
आराधना करते हैं, देववृत्तियों की आराधना करते हैं। जब हम शंकर जी की आराधना करते हैं, संघशक्ति की देवी दुर्गा की आराधना करते हैं, पूर्ण पुरुष कृष्ण भगवान की आराधना करते हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की आराधना करते हैं, भक्त शिरोमणि हनुमान की आराधना करते हैं, तो इस माध्यम से उनकी जो श्रेष्ठ वृत्तियाँ हैं, उनको अपने अंदर धारण करते हैं। नहीं साहब! हनुमान जी हमें रुपया-पैसा दे जाएं, हमारा ब्याह करा दें। हनुमान जी बेटा दे जाएं। बेटे! ऐसे कैसे हो सकता है?
आराधना करते हैं, भक्त शिरोमणि हनुमान की आराधना करते हैं, तो इस माध्यम से उनकी जो श्रेष्ठ वृत्तियाँ हैं, उनको अपने अंदर धारण करते हैं। नहीं साहब! हनुमान जी हमें रुपया-पैसा दे जाएं, हमारा ब्याह करा दें। हनुमान जी बेटा दे जाएं। बेटे! ऐसे कैसे हो सकता है? जिसके यहाँ जो होगा वही तो होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
आराधना की। देवी प्रसन्न हुई। उन्होंने इसे दर्शन देते हुए कहा, “बेटा! तेरी समस्याओं का समाधान महर्षि आर्जव करेंगे। वे महान् ज्ञानी पुरुष और दिव्यात्मा हैं। वह यहाँ से चार योजन दूर रहते हैं, तुम उनके पास चले जाओ।
आराधना का विशिष्ट पर्व मनाया जाता है। उसे शक्ति पर्व भी कहा जाता है। भारत में आदिकाल से चला आ रहा शक्ति पूजा का यह पर्व आज भी अगम्य आस्था के साथ जारी है। हमारी संस्कृति का प्रत्येक कालप्रवाह उसकी चर्चा, विवेचन एवं साधना से भरा पड़ा है।
आराधना करने का प्रचलन भारतीय संस्कृति की एक मौलिक विशेषता है, जिसकी मिसाल विश्व के अन्य धर्मों या आस्था-परम्पराओं में खोज पाना दुर्लभ है। वहाँ ईश्वर को पिता या जगत् के स्वामी के रूप में ही देखा और पूजा जाता है, माँ के रूप में नहीं। नवरात्रि के रूप में इसी की आराधना का विशिष्ट पर्व मनाया जाता है। उसे शक्ति पर्व भी कहा जाता है। भारत में आदिकाल से चला आ रहा शक्ति पूजा का यह पर्व आज भी अगम्य आस्था के साथ जारी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-April
आराधना किया करती थी। एक बार मेरे पतिदेव एक ऊँचे पहाड़ पर गये थे चढ़ने का रास्ता संकीर्ण और खतरों से भरा था। संभल-संभल कर पग रखना पड़ता था, पर पता नहीं क्या होनहार था। सारी सावधानी के बर्तते हुए भी आखिर इनके पैर फिसल ही गये। मीलों की ऊँचाई थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-September
आराधना की जाती है। मन्त्रयोग, भक्ति का एक रूप है। जब ध्यान करने वाले और ध्येय में अत्यन्त घनिष्ठता हो जाती है तो उनका ऐक्य हो जाता है। अपने ही स्वरूप को अपने से पृथक कल्पना करके उस तक पहुँचने की चेष्टा मन्त्रयोग द्वारा की जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-February
आराधना, मनुष्य की मनुष्यता के साथ उसे अविनाशी पद पाने के लिए लोगों के समक्ष रखी है। सारे प्राणी अपने-2 कर्मों के अनुसार सुख-दुःखादि का उपभोग करते हैं। अपनी-अपनी वासनाओं के अनुसार सारे प्राणी सात्विक, राजस, तामस भेद से विविध होते हैं। उनके कल्याण के लिए शास्त्रों ने उपासनाएँ भी वैसी ही रखी हैं- ‘यजन्ते सात्विका देवान् यक्षरक्षाँसि राजसाः’ कहकर श्री भगवान ने सात्विक पुरुषों को देवोपासक बतलाया है। ‘यथाभिमतध्यानाद्वा’ कहकर महर्षि पतंजलि ने चित्त शुद्ध के लिए देवताओं की उपासना अपनी रुचि के अनुसार आवश्यक बतलायी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-March
आराधना-साधना करें, जिससे कि हमारे देश में सच्चा राम राज्य आ जाये। हम आज नाम तो राम का लेते हैं और काम हराम का करते हैं। आज हमारा शत्रुघ्न, भरत के अनुशासन में नहीं चलता। आज हमारा लक्ष्मण, राम को भूल गया है। इसलिए कहीं पर भी सीता के दर्शन नहीं होते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-August
आराधना और पारलौकिक कल्पना हिंदू धर्म का मुख्य भाग नहीं है, वह गौण है। सामान्य लोग सामाजिक और व्यक्तिगत नियमों का उचित रीति से पालन करें इसीलिए अनेक धार्मिक कल्पनाओं का आविर्भाव हुआ है, क्योंकि परलोक का भय और प्रलोभन लोगों को नियम-पालन में प्रवृत्त करता है।
आराधना करते हैं।
आराधना ही है। उपनिषद् तो ब्रह्म, आत्मा, परलोक मार्ग, अमरत्व, स्वर्गापवर्ग और अदृष्ट कर्म फल का ही उपदेश देते हैं। स्मृतियों और धर्म शास्त्रों में वर्णाश्रम धर्म तथा आचार व्यवहार के प्रायश्चित्तों का आदेश दिया गया है। इसी प्रकार पुराणों में भी परलोक साधन के लिए व्रत, तीर्थयात्रा, उपासना की विधियाँ बतलाई गई हैं।
आराधना करते हों, जिसका साहित्य भी अन्य सभ्य मानी जाने वाली भाषाओं से किसी भी दृष्टि से कम न हो, और जो भाषा कभी अपने काल में राष्ट्र भाषा रह चुकी हो भला वह भाषा किस प्रकार मृत भाषा कहला सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-June
आराधना विधिपूर्वक शुरू की और 27 वें दिन उनके पति जी उनके घर आकर मिले।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-July
आराधना के फलस्वरूप ही प्राप्त हुआ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-November
आराधना की जिससे यह होश में आकर स्वस्थ हो गया।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
आराधना। सम्भव हुआ तो जौ की रोटी। न सम्भव हुआ तो परोसे गए सामान में से जो सात्विक हो उसका चयन। यह दोनों क्रम साथ-साथ चलते रहे। दोनों परिपूर्ण श्रद्धा और सच्चाई के साथ बन पड़े।
आराधना - पुण्य परमार्थ को कहते हैं। जिसने अपने को साध लिया है, उसके लिए और कोई काम करने के लिए बचता ही नहीं। उत्कृष्टता सम्पन्न मन अपने लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय पुण्य परमार्थ ही देखता है। इसी में उसकी अभिरुचि और प्रवीणता बन जाती है। हिमालय के प्रथम वर्ष में हमें आत्म-संयम की- मनोनिग्रह की साधना करनी पड़ी।
आराधना में - “साधना” ही प्रमुख है। उपासना का कर्मकाण्ड कोई नौकरी की तरह भी कर सकता है। आराधना - पुण्य परमार्थ को कहते हैं। जिसने अपने को साध लिया है, उसके लिए और कोई काम करने के लिए बचता ही नहीं। उत्कृष्टता सम्पन्न मन अपने लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय पुण्य परमार्थ ही देखता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-November
आराधना में तत्पर रहा जाय। साहस और कलाकारिता के−पुरुषार्थ और लालित्य के−कर्म और भावना के इन केन्द्रों को प्रजनन मात्र से निरस्त न बना दिया जाय वरन् नर−नारी की जननेन्द्रियों के निकट मूलाधार चक्र की शिव शक्ति को उच्च आदर्शों के लिए प्रयुक्त किया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-July
आराधना है। दैवी गुणों की जीवन में समाविष्ट करना ही देव पूजा है। सद्गुणों की संख्या और प्रकृति असीम है पर उनमें पाँच प्रमुख हैं। उन्हें अपनाते हुए हम देव पूजा का सत्परिणाम निरन्तर प्राप्त करते रह सकते हैं।
आराधना की जाय अर्थात् जीवन क्रम में इनका प्रयोग समावेश रखा जाय तो इनका प्रतिफल हाथों-हाथ व्यक्तित्व को सुविकसित रूप में उपलब्ध होता है। यह शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-May
आराधना के त्रिविध अवलम्बनों के साथ आगे बढ़ा और ऊंचा उठा है। उसने इसी मूल्य पर परोक्ष दैवी अनुकम्पा और प्रत्यक्ष सम्पदा प्राप्त की है। अनुयायियों के लिए भी यही राजमार्ग है। वे आंधी, तिरछी मनुहार के सहारे विभूतिवान बनने की आशा न करें। आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के लिए इस राजमार्ग को छोड़कर कोई ‘‘शॉट कट’’ नहीं है।
आराधना की दिशा में जितना अग्रसर हुआ जायेगा, आत्म शोधन की साधना उसी अनुपात से सहज ही सधती जाएगी।
आराधना- लोक सेवा इन दिनों क्या होनी चाहिए, इसकी जानकारी दूरदर्शी विवेकवानों को समय-समय पर कराई जाती रही है और कहा जाता रहा है कि दुर्मति ही दुर्गति का कारण है। चिन्तन का भटकाव ही असंख्य समस्याओं का मूल है। सड़े कीचड़ में से दुर्गन्धित कृमि कीट उपजते हैं और रक्त के विषाक्त होने पर अनेकानेक चर्म रोगों का उद्भव होता है। प्रज्ञा युग के अवतरण के लिए हमें घर-घर युग चेतना का अलख जगाना और जन-जन के मन-मन में युग संदेश का आलोक पहुँचाना है। युग समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए हम कुछ समय के लिए धर्मशाला, मन्दिर, कूप, तालाब, औषधालय, प्याऊ, सदावर्त आदि ख्याति प्रदान करने वाले निर्माणों से हाथ खींच सकते हैं, और सर्वप्रथम सर्वोत्तम एवं सामयिक प्रज्ञा प्रसार को अग्रगामी बनाने के लिए प्रयत्नरत हो सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-February
आराधना करता है वे उसके साथ पक्षपात करते हैं, मनोकामना पूरी करते हैं। इस आधार पर किये ध्यान बाल बुद्धि के परिचायक हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-June
आराधना के लिए गायत्री का उपयोग करते हैं। गायत्री को माता रूप में मानने वाले साधक भी उसका रूप “सूर्य” मण्डल मध्यस्था’ सूर्य मण्डल के बीच में अवस्थित स्वरूप का, मातृदेवी के रूप में ही ध्यान करते हैं। किसी भी रूप में गायत्री मंत्र की उपासना की जाय ‘सूर्य’ का उसे अविच्छिन्न सम्बन्ध अनिवार्य रूप से रखना होगा। गायत्री का देवता ही सूर्य है तो उसका स्वरूप भी साथ में होना स्वाभाविक ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-July
आराधना करो और सदैव यथाशक्ति अतिथि सत्कार का ध्यान रखो। जो निःस्वार्थ बुद्धि से अतिथि सेवा में संलग्न रहता है वह अवश्य ही भव सागर से पार होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-April
आराधना कभी निष्फल नहीं जाती। यह तुरन्त फल देता है। गाय की दिन में ठीक तरह सेवा करने से शाम को ही दूध की देगची भर देती है, यह मन की कामधेनु उससे भी अधिक उदार और निश्चित फलदायिनी है। गाय की सेवा कभी निष्फल भी हो सकती है पर इस कामधेनु का प्रत्युपकार तो निश्चित है।
आराधना में समाप्त कर दिये है। लोग जीवन भर नाना विषयों की एक से एक विद्वत्ता पूर्ण पुस्तकें लिखते रहे है, किन्तु हम देखते है और उनमें से अधिकांश पुस्तकें नष्ट हो गई। बहुत से नष्ट होती जा रही है। जिन पुस्तकों के लेखकों ने केवल यशलिप्सा या विद्वता के दंभ की पूर्ति का लक्ष्य सामने रखकर साहित्य-साधना की थी, वे अन्धकार में क्षण भर के लिए प्रकाश करने वाली चिनगारी की तरह चमक कर बुझ गए। किन्तु जिन विद्वानों ने अपने को भगवदार्पण कर ईश्वरीय सत्ता से गुप्त दैवी बल ग्रहण कर साहित्य निर्माण किया उनमें गुप्त रूप से ऐसी महान् शक्ति का आविर्भाव हुआ कि वह ग्रन्थ युग-युग होने पर आज भी सर्वत्र पूजनीय, प्रेरक और जनता के गले का हार बने हुए हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-December
आराधना में तल्लीन हो गया। बीतते दिनों के साथ तल्लीनता भी बढ़ती गयी। एक रात्रि उसके सामने दो ज्योति पुँज प्रकट हुए जो थोड़े ही समय में दो देवियों में बदल गए। दोनों देवियां एक -से -एक बढ़कर सुन्दर थीं ज्योतिर्मय थी। दोनों उसकी सम्बोधि के कहने लगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-September
आराधना में लीन हो गए। अपने बेटे की याद में रोते रोते बायजीद की माँ ने आँखें खो दीं। बायजीद ने यह सुना तो अत्यन्त दुखी हुए। उन्होंने कहा - मनुष्य जीवन की शान्ति माँ के चरणों पर रखी है। मेरा कितना दुर्भाग्य था कि उसे खोजने बाहर निकला।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-February
आराधना अर्थात् लोकमंगल की सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में उदार सहयोग, श्रम दान, अंशदान । यह तीनों ही साथ -साथ चलने चाहिए। इनमें से एक भी ऐसा नहीं जो अपने आप में पूर्ण हो। इसमें से एक भी ऐसा नहीं जिसे छोड़कर प्रगति पथ पर आगे बढ़ना संभव हो सके । हमारे जीवन की दिशाधारा में उपासना, साधना, आराधना का त्रिवेणी संगम अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहना चाहिए।
आराधना के तीन आधार चाहिए। उपासना अर्थात् ईश्वर की इच्छा को प्रमुखता, उसके अनुशासन के प्रति अटूट श्रद्धा, घनिष्ठता के लिए निर्धारित उपासना प्रक्रिया में भाव भरी नियमितता । साधना, अर्थात् जीवन साधना । संचित कुसंस्कारों एवं अवांछनीय आदतों मान्यताओं का उन्मूलन । गुण, कर्म, स्वभाव, चिंतन, चरित्र में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश।
आराधना का त्रिवेणी संगम अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहना चाहिए। औसत देश वासियों का निर्वाह स्तर अपनाये । परिवार को छोटा रखे उसे सुसंस्कारी, स्वावलंबी बनाये। बड़प्पन की लिप्सा छोड़े। महानता का लक्ष्य अपनाये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-November
आराधना का अर्घ्य लेने आते हैं, उनके किस रूप की अर्चा......................कर दी जाय। केवल अपने साथ वे ...................हो सकते हैं। उनके शौच-स्नान-आहार-आराम का कोई निश्चित समय नहीं हो रहा हैं इसमें भी यदि दूसरों का आग्रह निमित्त न .................कौन जानता है कि ये कैसे और कब अपनाएँ जाएँ?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-October
आराधना और प्रसन्नता का लाभ उठाना तभी संभव है, जब हम उनके स्वरूप का ठीक-ठीक समझ सकें तथा उनके वर्णन-विश्लेषण के निहितार्थ को, उनमें अन्तर्निहित तत्वज्ञान को भली-भाँति हृदयंगम कर सकें।
आराधना आवश्यक है तभी अंतरात्मा की चेतना शक्ति को देखा-समझा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
आराधना के मर्म को पूज्यवर के जीवन के परिप्रेक्ष्य में समझाया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
आराधना के विभिन्न उपचारों के लिए इन्हीं दिनों वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप से विशेष क्रिया-कृत्य किये जाते थे। अब वह समय नहीं रहा, न ही सौम्य स्तर की तंत्र साधना करने वाले साधक। अपेक्षित उच्चस्तरीय मार्गदर्शन के अभाव में आत्मघाती प्रयोग करने की अपेक्षा बल सम्वर्धन की-आस्था सम्वर्धन की एवं स्वयं के आध्यात्मिक कायाकल्प की अति सौम्य चौबीस हजार मंत्र जप वाली नौ दिन की अनुष्ठान साधना कर लेना ही ठीक है।
आराधना के लिए जा रहा था। रास्ते में उसे ये एक ऋषि मिल गए थे। वे भी मन्दिर ही जा रहे थे, अतः दोनों साथ हो लिए
आराधना तथा विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना द्वारा आत्मबल का संचय इन नौ दिनों में बड़ी सरलता से हो सकता है। ऋग्वेद के अदिति सूक्त में शक्ति का मातृभाव वाला स्वरूप देखा जाता है, जबकि ऊषा सूक्त में कुमारी भाव, सूर्यादेवी सूक्त में कुमारी भाव, देवी सूक्त एवं वाक्सूक्त में शुद्ध शक्तिभाव के चिन्ह मिलते हैं। ऋग्वेद में भी पृथ्वी की स्तुति गायी गयी है एवं उन्हें पिता द्यौ के साथ वर्णित किया गया है। “समुद्र वसने देवि पर्व स्तन मण्डले। विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमस्वमे” अर्थात् समुद्र ही जिनके वस्त्र हों, पर्वत जिनके स्तन हों, ऐसी विष्णु पत्नी पृथ्वी देवी को पैर से स्पर्श करने की त्रुटि हेतु मैं क्षमा चाहता हूँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
आराधना करके ही विश्राम करते थे। भोर होते ही प्रभु नाम की प्रतिभायाँ गाकर फिर वह कामकाज में लग जाते । गर्मी हो अथवा बरसात या फिर चाहे ठिठुरती ठण्ड हो, वह पूरा साल अपने कृषि कार्य में निमग्न रहते और बीच में जब समय मिलता तो ‘गजी’ बुन लेते।
आराधना में से कोई भी मार्ग ऐसा हो सकता है, जिसे अपनाता हुआ मनुष्य आत्मिक विकास के सोपानों पर क्रमशः आगे बढ़ता चला जाए। जो भी क्रिया-कृत्य अपनी अन्तःप्रेरणा को साधना उपादानों द्वारा सशक्त बनाने के लिए किये जाते हैं, वे ही सच्चे कर्मकाण्ड हैं एवं आध्यात्मिक विकासवाद की प्रक्रिया में उन्हें ऋषि मनीषियों ने गरिमापूर्ण स्थान भी दिया है।
आराधना के लिए गायत्री को माता रूप में मानने वाले साधक भी उसका रूप ‘सूर्य मण्डल मध्यस्था’ सूर्य मण्डल के बीच में उपस्थित स्वरूप का मातृदेवी के रूप में ही ध्यान करते हैं। किसी भी रूप में गायत्री मन्त्र की उपासना की जाय ‘सूर्य’ का उससे अविच्छिन्न सम्बन्ध अनिवार्य रूप से रखना होगा। गायत्री का देवता ही सूर्य है तो उसका स्वरूप भी साथ में होना स्वाभाविक ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-June
आराधना करने के समतुल्य ठहराया जा सकता है। ध्यान से भगवान प्राप्त होते हैं-आत्म साक्षात्कार का अवसर मिलता है नीरोगता और शक्तियों जाग्रत होती हैं, ऋद्धि-सिद्धियों से भरे वरदान प्राप्त होते हैं जैसे अनेकों लाभ साधना शास्त्र में गिनाये गये हैं यह कथन यथार्थ हैं चेतना की सामर्थ्य अनन्त है उससे लाभान्वित होने में एक ही बाधा है कि मनोनिग्रह की कला हस्तगत नहीं होती । जिसने इस कौशल में प्रवीणता प्राप्त कर ली, समझना चाहिए कि उसने अनेकों देव-दानव वशवर्ती कर लिए। पंचकोशों की ध्यान-धारणा से अपनी ही चेतना के पाँच प्राण, अपनी की काया के पंचतत्व इतने प्रखर परिष्कृत हो जाते हैं कि उन्हें दस दिक्पालों , दस दिग्गजों की उपमा दी जा सके। गायत्री माता की पंचमुखी प्रतिमाओं में अलंकारिक रूप से इन्हीं अंतर्जगत के पाँच देवों की शक्तियों सन्निहित होने के संकेत हैं कुण्डलिनी जागरण की ध्यान साधना में, काय-कलेवर में बीज रूप से समाहित असंख्य शक्तियों के उद्भव एवं उपयोग का द्वार खुलता है।
आराधना मेरे सान्निध्य के बिना अधूरी रह जाती है।
आराधना को किसी चमत्कारी देवता की आराधना करने के समतुल्य ठहराया जा सकता है। ध्यान से भगवान प्राप्त होते हैं-आत्म साक्षात्कार का अवसर मिलता है नीरोगता और शक्तियों जाग्रत होती हैं, ऋद्धि-सिद्धियों से भरे वरदान प्राप्त होते हैं जैसे अनेकों लाभ साधना शास्त्र में गिनाये गये हैं यह कथन यथार्थ हैं चेतना की सामर्थ्य अनन्त है उससे लाभान्वित होने में एक ही बाधा है कि मनोनिग्रह की कला हस्तगत नहीं होती । जिसने इस कौशल में प्रवीणता प्राप्त कर ली, समझना चाहिए कि उसने अनेकों देव-दानव वशवर्ती कर लिए। पंचकोशों की ध्यान-धारणा से अपनी ही चेतना के पाँच प्राण, अपनी की काया के पंचतत्व इतने प्रखर परिष्कृत हो जाते हैं कि उन्हें दस दिक्पालों , दस दिग्गजों की उपमा दी जा सके। गायत्री माता की पंचमुखी प्रतिमाओं में अलंकारिक रूप से इन्हीं अंतर्जगत के पाँच देवों की शक्तियों सन्निहित होने के संकेत हैं कुण्डलिनी जागरण की ध्यान साधना में, काय-कलेवर में बीज रूप से समाहित असंख्य शक्तियों के उद्भव एवं उपयोग का द्वार खुलता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-January
आराधना में,

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-August
आराधना करके हमने अपने स्वभाव को आत्मीयतापूर्ण एवं मधुर बना लिया है, तो बुरे व्यक्तियों की उग्रता देर तक नहीं रह सकती, वे भी सद्व्यवहार से पिघलाये जा सकते हैं, और उनके अन्दर जो थोड़ी बहुत भलमनसाहत है उससे भरपूर लाभ उठाया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-July
आराधना में गायत्री का प्रारम्भिक स्थान है फिर चाहे उसके इष्ट देव एवं विशेष साधन विधान कुछ भी क्यों न हो। आरम्भ से योग विद्या की प्रमुख सड़क गायत्री रही है अन्तः तक और कोई मार्ग ऐसा नहीं मिल सकेगा जो गायत्री से अधिक सीधा, सरल स्वल्प साध्य और निश्चित सफलता प्रदान करने वाला है। गायत्री की नौका पर सवार होकर ही। भव सागर को तैरा जा सकता है। गृही और विरागी दोनों को ही यह गायत्री रूपी कामधेनु समान स्नेह से अपना पथ पान कराती है।
आराधना करने लगे। इस आराधना का लाभ यह हुआ कि अब उनके एक पुत्र हुआ है। निराशा के अन्धकार में आशा की यह एक नवीन किरण प्रकाशित हुई है। बच्चा बड़ा स्वस्थ, सुन्दर और होनहार है, उसमें कई दैवी गुण दिखाई पड़ते हैं। बच्चे का चित्र साथ में दिया जा रहा है।
आराधना करें तो उनकी असुविधाएं दूर हो सकती हैं।
आराधना, साधना ऐसी वैज्ञानिक पद्धतियाँ है जिनके द्वारा अन्तः चेतना में पात्रता उत्पन्न की जाती है, साधक जैसे-जैसे आन्तरिक बल एकत्रित करता जाता है वैसे ही वैसे उसके उस सूक्ष्म चुम्बक शक्ति का विकास होता है जो महामाया को अपनी ओर खींचती है, कृपा प्राप्त करती है और उसके अक्षय भण्डार से उपयुक्त वस्तुओं को उपलब्ध करती है दयालु माता है वह अपने पुत्रों को बहुत देने को तत्पर रहती है पर देती उन्हें ही है जो पात्र होते हैं अनधिकारी लोग बड़ी बड़ी लालसायें और कामनाएं करते हैं पर अपनी पात्रता बढ़ाने के लिए समुचित प्रयत्न नहीं करते। ऐसी दशा में वे बड़े-बड़े मनोरथ पूरे नहीं हो पाते जो साधना के तप में खरे उतरने वाले साधकों को ही उपलब्ध हो सकते हैं।
आराधना करता हूँ। मित्र नित्य नियमित आराधना के अतिरिक्त नव रात्रियों में 24 हजार के लघु अनुष्ठान किया करता हूँ।
आराधना, लोग भूलते से जा रहे हैं।
आराधना का लाभ यह हुआ कि अब उनके एक पुत्र हुआ है। निराशा के अन्धकार में आशा की यह एक नवीन किरण प्रकाशित हुई है। बच्चा बड़ा स्वस्थ, सुन्दर और होनहार है, उसमें कई दैवी गुण दिखाई पड़ते हैं। बच्चे का चित्र साथ में दिया जा रहा है।
आराधना के अतिरिक्त नव रात्रियों में 24 हजार के लघु अनुष्ठान किया करता हूँ।
आराधना करने के स्त्री जाति के प्रति पवित्रता, आदर और श्रद्धा की भावना का जन समाज में विकास होगा। गायत्री उपासनाओं में कुमारी कन्याओं की पूजा होती है। ध्यान और पूजन में अमित सौंदर्य की प्रति मूर्ति गायत्री के प्रति मातृभावना स्थापित करनी पड़ती है। इस प्रकार मनुष्य नारी के जिन पुत्री, बहिन और माता के निर्मल स्वरूपों को भूलता जाता है उनको पुनः हृदयंगम कर सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-February
आराधना करने वाले साधक ईश्वरीय महाशक्ति को आगे रखकर, अग्रसर हों, परमात्मा को साक्षी लेकर जो कार्य किये जाते हैं वही कल्याण कारक होते हैं।
आराधना है। गीता के 10 वे अध्याय में भगवान ने बताया है कि- वृक्षों में पीपल, पशुओं में गौ, मनुष्यों में ब्राह्मण, नक्षत्रों में चन्द्रमा, ग्रहों से सूर्य, इंद्रियों में मन, पर्वतों में हिमालय, पक्षियों में गरुड़, नदियों में गंगा, मन्त्रों में गायत्री मंत्र, ऋतुओं में बसन्त मैं हूँ। अर्थात् जो जो श्रेष्ठ, सात्विक, सुदृढ़ एवं उपयोगी विभूतियाँ हैं उनमें मेरे ही अंश की अधिकता हैं। जिन विचार धाराओं में, व्यक्तियों में, वस्तुओं में इस प्रकार के तत्व अधिक हैं उनमें ईश्वरीय कलाओं की विशेषता अनुभव की जा सकती हैं। जहाँ प्रभु का निवास होगा वहाँ निर्णय पूर्वक श्रेष्ठता, सात्विकता, दृढ़ता एवं परोपकार की प्रधानता होगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-May
आराधना हूँ॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-December
आराधना भी आवश्यक है। जो सज्जन निराकार उपासक हों, वे धूप बत्ती आदि में अग्नि की ज्योति प्रज्ज्वलित करके उसे माता का प्रतीक मान कर उसकी पूजा आराधना कर लें।
आराधना की सुविधा हो।
आराधना कहते हैं। ऋत्विज के लिए आराधना भी आवश्यक है। जो सज्जन निराकार उपासक हों, वे धूप बत्ती आदि में अग्नि की ज्योति प्रज्ज्वलित करके उसे माता का प्रतीक मान कर उसकी पूजा आराधना कर लें।
आराधना, (5)ब्रह्म संदीप।
आराधना किस प्रकार करेंगे, (6)ब्रह्म संदीप के लिए किस प्रकार, कितना कार्य करेंगे। यह सब बातें विस्तारपूर्वक लिखते हुए अपना पूरा नाम, पूरा पता, आयु, वर्ण आदि का उल्लेख करना चाहिए और हर महीने अपने कार्य की सूचना मथुरा भेजते रहनी चाहिए जिससे यज्ञ की प्रगति का ठीक विवरण विदित होता रहे। कोई बात पूछनी हो तो जवाबी पत्र भेजना चाहिए।
आराधना को पूरा करना।
आराधना कर लें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-October
आराधना को जीवन का मुख्य अंग बना लें। ऐसा करते रहने से हमारी तम और रजोगुण जनित पाशविक वृत्तियों का शमन होकर दिव्य वृत्तियाँ जागरित होती जायेंगी। जिसके फलस्वरूप हमारी कार्यप्रणाली ज्ञान व विवेकयुक्त बनी रहेगी और शनैः शनैः हम अपने विकास क्रम को अर्थात् आत्मिक विकास को प्राप्त कर सकेंगे। हमारा आत्मिक विकास ही हमारे जीवन की वास्तविकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-July
आराधना करते हैं, उसी प्रकार उपरोक्त तीनों वितरणों में से अपनी स्थिति और आवश्यकता को देखते हुए कोई भी साधनाक्रम अपनाया जा सकता है, पर जा अपनायाजाय उसे जल्दी-जल्दी बदला न जाय । उतावले लोग चंचल मनःस्थिति में बार-बार अपना साधना क्रम बदलते हैं फलतः अपने श्रम को निरर्थक करते हुए संकल्प शक्ति को दुर्बल करते रहते हैं। अच्छा हो निर्धारण के समय शान्ति-कुँज हरिद्वार से परामर्श कर लिया जाय। जो इसकी आवश्कता समझे वे हर वर्ष गायत्री जयन्ती या बसन्त पर्व पर वर्ष में एकबार अपनी प्रगति का लेखा-जोखा भी भेज दिया करें । स्मरण रहे इस सर्न्दभ में परामर्श या उत्तर प्राप्त करने के लिए जबावी पत्र भेजना अनिवार्य रुप से आवश्यक है।
आराधना करने न देतीं। आदमी की आह प्रभु की अर्चना करने न देती ॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-October
आराधना में इन दिनों नव-सृजन के निमित्त भाव भरे अनुदानों को भी सम्मिलित रखने की आवश्यकता है।
आराधना बीजारोपण के समान है, उसे अंकुरित, पल्लवित, और फलित, विकसित बनाने के लिए साधना का खादपानी लागाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। साधना का संगम महा-मानवों जैसी उदात्त जीवनचर्या एवं लोक मगंल के निमित्त किये गये त्याग बलिदान के समन्वय से बनता है। जो केवल भजन-पूजन भर को सब कुछ मान लेते हैं वे कमान वाले तीर को घूमाते तो फिरते हैं पर वे उससे लक्ष्य बेध का प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-December
आराधना का अवसर भी मिलता है। इस प्रयोजन के लिए बीज भण्डार तथा पौध नर्शरी जैसी सुविधए भी जगह-जगह उपलब्ध रहना चाहिए और बोने उगाने सम्बन्धी सस्ता साहित्य हर जगह मिलना चाहिए। घरेलू शाक बाटिकाएँ आहार में जीवन तत्वों के समावेश की आवश्यकता हर जगह पूरी करती रह सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-February
आराधना के उपायों और विधानों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं, वे देव-सत्ताएँ भी विधि-व्यवस्था से ही बँधी दीखती है । दैवी विधानों की अवहेलना वे भी नहीं करतीं । तो क्या उस सृष्टि-संचालक विधान की और उसके विधाता की ही वन्दना की जाय ? पर हमारे भाग्य का निर्धारण तो वह विधि-व्यवस्था हमारे ही कर्मो के अनुसार करती है । यही उसका सुनिश्चित नियम है ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-September
आराधना से अभीष्ट की उपलब्धि होती है वह जीवन के अतिरिक्त दूसरा और कोई नहीं हो सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
आराधना शुरू की है। अपराधों की स्वतंत्रता के लिए कदम बढ़ाये हैं। आरम्भ सभ्य लोगों ने किया है तो उसका अनुकरण कुछ दिन में असभ्य भी करने ही लगेंगे। प्रभाव डालने के सारे साधन जब ‘सभ्य’ लोगों के हाथों में चले गये तो ‘असभ्य’ लोगों को बौद्धिक पराधीनता की जंजीरों में जकड़े हुए उनके पीछे-पीछे चलना ही पड़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-January
आराधना चलती ही रहती है और प्रतिदान के अभाव में भी आस्था ज्यों की त्यों बनी रहती है। प्रेमी ने हमारे प्रेम का प्रत्युत्तर क्या दिया, इसे देखने की फुरसत ही कहाँ होती है? न इसकी आवश्यकता ही अनुभव होती है। प्रेम अपने आप में पूर्ण है, वह एकाँगी एक पक्षी होकर भी यथा स्थान पर अपने पैरों पर खड़ा रह सकता है। दूरवासी प्रेमी को चित्र की निकटता जैसा आनन्द प्रदान कर सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-February
आराधना में लगाना चाहिए।
आराधना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-September
आराधना करने से साधक वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है, जो इस विश्व में पाने योग्य है, इन्हीं तथ्यों के निम्नांकित संकेत ध्यान देने योग्य है"—

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-April
आराधना करने वाले की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होकर रहती हैं। इसी आत्मदेव को ‘आयमात्मा ब्रह्म−सच्चिदानन्दोऽहम्’ कहकर उसी की उपासना करने का निर्देश दिया गया है। प्रज्ञानं ब्रह्म, “तत्वमसि, शिवोऽहम्” जैसे सूत्र संकेतों में इसी तथ्य का प्रतिपादन है कि अपना परिष्कृत आपा ही सुविकसित, सुसंस्कृत स्थिति में पहुँचने पर परब्रह्म की−परमात्मा की–भूमिका निभाने लगता है। नर−पिशाच, नर−पशु, नर−कीटक की स्थिति तो तभी तक रहती है जब तक अपने आपे का बोध नहीं होता।
आराधना के तत्वदर्शन को सही स्वरूप में प्रस्तुत करके ही अगले दिनों प्रज्ञायुग की सम्भावनाओं को साकार किया जा सकेगा। इस प्रज्ञायुग में श्रद्धा तत्व को मानवी अन्तराल में प्रविष्ट प्रतिष्ठित होने का अवसर मिलेगा। जो साधक जितना अधिक इस उपलब्धियों से सम्पन्न होगा, उसी अनुपात में उसे अपने दृष्टिकोण–स्वभाव–आचरण के स्तर को ऊँचा उठाने का सुवर्ण सौभाग्य प्राप्त होगा। इस सौभाग्य के सहारे ही व्यक्तित्व प्रखर बनता है व आत्मिक विभूतियों तथा भौतिक सफलताओं का पथ−प्रशस्त होता है। यह तथ्य भली−भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए कि आत्म−कल्याण का सौभाग्य वे ही प्राप्त करते हैं जो अश्रद्धा व अंधश्रद्धा दोनों से विमुख हो श्रद्धा तत्व को सच्चे अर्थों में अपने जीवन में उतारते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-February
आराधना है। उपासना परमात्मा की, साधना अंतरात्मा की और आराधना विश्वात्मा की की जाती है। चांद्रायणकाल में बहिर्मुखी माया-प्रपंच से अवकाश प्राप्त किया जाता है और उस अवधि में अंतर्मुखी रहकर अंतर्जगत का पर्यवेक्षण किया जाता है। इस दिशा परिवर्तन के लिए नियोजित आत्मसाधना जितनी भावपूर्ण एवं गंभीर होगी उतना ही चांद्रायण का प्रत्यक्ष वरदान उपलब्ध होगा।
आराधना के निमित्त इस अवधि में स्वाध्याय-सत्संग और चिंतन-मनन के चार प्रयोजनों में निरत रहना पड़ता है। नित्यकर्म उपासना के अतिरिक्त जो भी समय खाली मिले उसमें इन्हीं चार प्रयोजन में मन को लगाए रहना पड़ता हैं। इन चारों का लक्ष्य एक ही हैं— आत्मपरिष्कार। उज्ज्वल भविष्य का योजनाबद्ध निर्धारण। इसके लिए आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के चार प्रसंगों पर गंभीरतापूर्वक समुद्र-मंथन जैसा आत्मचिंतन करते रहना होता है।
आराधना है।
आराधना ठीक प्रकार से की जा सके तो शरीर को आरोग्य, मस्तिष्क को ज्ञान−विज्ञान, अंतःकरण को देवत्व का अनुदान, व्यक्तित्व को प्रतिभावान एवं भविष्य को उज्ज्वल संभावनाओं से जाज्वल्यमान बनाया जा सकता है।
आराधना। संयम साधना में उपवास प्रमुख हैं। इस अवधि में सामान्य आहार की तुलना में आधा ही लिया जाता है। जो खाया जाए वह पूर्ण सात्विक एवं सुसंस्कारी हो, इसका ध्यान रखा जाता है। संयम को ही तप कहते हैं।
आराधना विश्वात्मा की की जाती है। चांद्रायणकाल में बहिर्मुखी माया-प्रपंच से अवकाश प्राप्त किया जाता है और उस अवधि में अंतर्मुखी रहकर अंतर्जगत का पर्यवेक्षण किया जाता है। इस दिशा परिवर्तन के लिए नियोजित आत्मसाधना जितनी भावपूर्ण एवं गंभीर होगी उतना ही चांद्रायण का प्रत्यक्ष वरदान उपलब्ध होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-June
आराधना कह सकते हैं। इसका अभ्यास इन दिनों करना ही होगा। मात्र सामर्थ्यों से ही इन दिनों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इन आवश्यकता की पूर्ति का छोटा श्री गणेश प्रज्ञा परिजनों के लिए निर्धारित प्रथम सूत्र में होता है।
आराधना बन पड़ती है जिसकी परिणति आत्म−सन्तोष, जन सम्मान एवं दैवी अनुग्रह जैसी विभूतियाँ उपलब्ध कराने में होकर ही रहती है।
आराधना है। अस्त−व्यस्तता और कुरूपता एक ही बात है। शरीर का गठन ईश्वर के हाथ है। खर्चीली सजधज में विलासिता और अहमन्यता के उद्धत प्रदर्शन की गंध आती है किन्तु हर वस्तु को, हर निर्धारण को, हर प्रयास को योजनाबद्ध सुव्यवस्थित रखा जा सके तो समझना चाहिए कि दृष्टिकोण में गौरवास्पद कलाकारिता का समावेश हो रहा है। समझना चाहिए कि ‘मैनेजर’ का पद संसार में सबसे ऊँचा है।
आराधना करते हुए अन्तरंग, बहिरंग और पारिवारिक क्षेत्र को किस प्रकार समुन्नत बनाना चाहिए। इसकी विद्या सीखनी और कार्य रूप में परिणति करनी होगी। अभ्यास के कारण ही यह प्रयोग कठिन प्रतीत होता है, पर जब उस असमंजस को दूर कर नव निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश किया जायगा तो प्रतीत होगा कि जो कठिन समझा जाता रहा यहां कितना सरल है। जिस नीरस माना गया था वह कितना सरस है। जिसमें घाटा प्रतीत होता था वह कितना लाभदायक है अवाँछनीयता अपनाने में बुद्धिमानी और आदर्शों के अवलम्बन में मूर्खता समप्र जाने को लोक मान्यता की असत्यता प्रज्ञा परिजन इस दिशा में कुछ ही कदम उठाने के उपरान्त भला प्रकार सिद्ध कर सकते हैं।
आराधना है। इसे किसी न किसी रूप में प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को इन्हीं दिनों आरम्भ करना चाहिए और उसके प्रतिफल का सौभाग्य सूर्योदय जैसा आनन्द लेना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-December
आराधना कठिन है। किन्तु अणु के भीतर विद्यमान उस महती शक्ति सत्ता का सरल साक्षात्कार हो सकता है। बूँद में सरोवर की समस्त विशेषताएँ विद्यमान हैं। चिनगारी में विश्व अग्नि तत्व की समस्त सम्भावनाएँ सन्निहित हैं। बीज में वृक्ष और शुक्राणु में समूचा मनुष्य विराजता है।
आराधना किया करते थे। वे अन्तरिक्षीय गतिविधियों के अध्ययन पर्यवेक्षण के साथ−साथ उनसे लाभ उठाने के लिए साधनात्मक विधि−व्यवस्था बनाते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-January
आराधना जुड़ी हुई है। पापों का प्रायश्चित मात्र उपवास भर से नहीं होता, परिशोधन के लिए जीवन साधना और क्षति पूर्ति के लिए उदार पारमार्थिकता का प्रमाण−परिचय देना पड़ता है। इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखे रहना चाहिए।
आराधना की सुगन्धित शोभा सुषमा के सहारे उल्लसित रहने और प्रमुदित करने की प्रक्रिया सहज ही सधती रहे।
आराधना– विश्वात्मा की। सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए किया–बरता गया संयम और उदार−अनुदान–यही है संक्षेप में आत्मिक प्रगति की त्रिवेणी जिसमें अवगाहन करने वाले सत्यं शिवं−सुन्दरम्–की पग−पग पर अनुभूति करते हैं। यह सब किस प्रकार बन पड़े–इसका निर्णय महाप्रज्ञा के सहारे ही हो सकता है। अभ्यस्त संकीर्णता तो इसमें कितने ही छद्म रचने और व्यवधान उत्पन्न करने में ही निरत रहती है।
आराधना–इन दोनों के मिश्रण से उस सच्ची भक्ति −भावना का उदय अनुभव होता है जिसके द्वारा आत्म−दर्शन और ईश्वर

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
आराधना का विविध समन्वय है। इसे अन्तःकरण, व्यक्ति त्व और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश करने वाली सुनियोजित प्रक्रिया कहा जा सकता है। मान्यताओं, आकांक्षाओं, विचारणाओं और आदतों को बदलने की कल्प प्रक्रिया उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है जैसी कि बुढ़ापे को जवानी में बदलने वाले काया-कल्प के बारे में लोक-मान्यता प्रचलित है। न तो बुढ़ापा अभिशाप है और न जवानी वरदान। दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही है।
आराधना के तीनों पक्ष इस चार घण्टे प्रतिदिन चलने वाली कक्षाओं में मात्र एक महीने सम्मिलित रहकर साधक अनुभव करता है कि उसने इतनी छोटी अवधि में जितनी उपयोगी जितनी सुनियोजित शिक्षा प्राप्त की कदाचित उतनी वह जीवन भर में उपलब्ध नहीं कर सका होगा। उच्चस्तरीय एवं सामयिक व्यवहार दर्शन की ऐसी समन्वित दिशाधारा अभी तक कहीं अन्यत्र नहीं देखी गई जैसी कि कल्प साधना के साधकों को सार-सूत्रों सहित, सरल प्रतिपादन एवं सुगम शैली में हस्तगत होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-March
आराधना कहा जा सकता है। उसके उद्यान को सुरम्य, सुविकसित बनाने में ईमानदार और परिश्रमी माली की तरह जुट पड़ना ही भगवान को प्रसन्न करने का एकमात्र उपाय है। इस तथ्य को स्मरण रखने के लिए ही बार-बार राम नाम रटा जाता है ताकि राम का सौंपा हुआ काम दृष्टि से ओझल न होने पावे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-February
आराधना सीख ली है, उन्हें किसी बात का अभाव नहीं रहता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-December
आराधना त्रिवेणी की तरह अवगुँठित हुई है और जीवन, तीर्थराज संगम की तरह बना है। प्रस्तुत वर्ष संसार में फैले भ्रमों का निवारण कर सकने योग्य प्रमाण साक्षी बन कर खरे सोने की तरह प्रस्तुत हुआ है इसकी हीरक जयन्ती परिजनों ने मनाई है तो उसे प्रस्तुत जीवनशैली के प्रति आस्था का प्रकटीकरण ही कहा जा सकता है। जीवन के 75 वें वर्ष में मनाई जाने वाली हीरक जयन्ती का द्विवर्षीय कार्यक्रम था। इसलिए इस वर्ष उसका समापन किया जा रहा है तो इसमें कुछ हर्ज भी नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जो जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है, जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एका बड़ा दुःखद प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है, मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता।
आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जो जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है, जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एक बड़ा दुःखद प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है, मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-June
आराधना का विज्ञान भी इन तीन व्याहृतियों के साथ जुड़ा हुआ है।
आराधना के लिए आवश्यक है कि व्यक्तित्व के समग्र पक्ष को श्रेष्ठ और समुन्नत बनाया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-April
आराधना से हम अपने आन्तरिक चुम्बकत्व संकल्प शक्ति से अभीष्ट मात्रा में अभीष्ट स्तर के प्राण आकर्षित और धारण कर सकते हैं। सूर्य में असीम ऊर्जा है। उस ऊर्जा का चेतना पक्ष जितना अभीष्ट हो, जितना धारण करने की क्षमता हो उतना प्राप्त कर सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-May
आराधना करके उन्हीं के समान तेजस्वी पुत्र कर्ण प्राप्त किया था। सूर्य उपासना से ही द्रौपदी को ऐसा अक्षय पात्र मिला था जिसकी भोजन सामग्री कभी समाप्त ही नहीं होती थी। हनुमान को सूर्य का तेजाँश प्राप्त हुआ था और उन्हीं की कृपा से वे अनेक विभूतियों के अधिनायक बने थे। सीता के वाल्मीकि के आश्रम में सूर्य साधना करके ही लव-कुश को जन्म दिया था। राजा इक्ष्वाकु ने सूर्य साधना की थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-March
आराधना पथपर आरुढ़ रहते हैं।
आराधना भी कह सकते है। उपासना ही संगतिकरण है। संगतिकरण का एक अर्थ है संघबद्धता। एक है निकटतम बैठना। पूजा का अर्थ है- अपने आप को भीतर और बाहर से पवित्र करना।
आराधना का-उदय हुआ उस समय प्राथमिकता सूर्य की ही थी। जिन क्षेत्रों में सभ्यता का विकास हुआ वहाँ पूजा प्रयोग में सविता को ही अपनाया गया। पुरातत्व विज्ञान ने धरातल से जो आदि सभ्यता के चिन्ह ढूँढ़े हैं, उनसे सूर्य प्रतिमाएँ प्रमुख हैं। वे तेजस् युक्त गोलाकार है। पीछे उनमें मनुष्य के चेहरे का भी आरोपण हुआ।
आराधना करने की ठान-ठानी है और वे आज नहीं तो कल इस लोक में स्वर्ग की रचना करेंगे? खेत-खेत पर हरियाली के रूप में यह श्रम ही लहलहा रहा है। जहाँ भी इस देवता की अर्चना होती है, वहीं विभूतियाँ हाथ बाँध कर आ खड़ी होती हैं।
आराधना एक ही बात है। संकटग्रस्तों की सहायता एवं सत्प्रयोजनों में सहयोग दान है। ऐसे तो दान के नाम पर वंश और वेश की आड़ में कितने ही लोग ठगते खते रहते हैं और संकट ग्रस्त न होते हुए भी ऐसी मुद्रा बना लेते हैं जिससे गहराई में न जाने वालों को बहानेबाजी और वास्तविकता का अन्तर ही प्रतीत नहीं होता। इसलिए दान के नाम पर अपव्यय ही चलता रहता है, साथ ही निठल्लों को छद्म बनाने का अवसर मिलता है। दान में गिरों को उठाने और उबारने की भावना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-June
आराधना का अर्थ है सेवा-साधना, पुण्य-परमार्थ। इसके लिए कड़ाई से आत्म-संयम बरतना पड़ता है। उस आधार पर की गई बचत को समय और साधनों को सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाना पड़ता है। गिरों को उठाने और उठतों को उठाने के लिए भी “सादा जीवन उच्च विचार” का सिद्धान्त यही है। जो सादगी से रह सकेगा, न्यूनतम में अपना निर्वाह सन्तोष कर सकेगा, उसी के लिए यह संभव है कि आदर्शवादिता को चरितार्थ कर सके।
आराधना का जीवनचर्या में समावेश होना आवश्यक है। पेट प्रजनन की, लोभ-मोह और अहंकार की तृप्ति के लिए हर कोई व्यस्त, उद्विग्न देखा जा सकता है। पर यह भौतिक क्षेत्र की उछल-कूद हुई। उससे शरीर भर को तात्कालिक रसास्वादन करने का अवसर मिलता है। इन उपलब्धियों से तृष्णा और भी भड़कती रहती है और अधिकाधिक की माँग इस प्रकार बढ़ती जाती है कि उसकी पूर्ति संभव ही नहीं होती।
आराधना का सर्वोत्तम प्रयोग है। सामान्य कार्यों में प्रयुक्त होने वाली अग्नि तो ईंधन के सहारे जल जाती है। पर यज्ञाग्नि को प्रज्वलित करने के लिए विशेष वृक्षों की ही समिधाएँ काम में आती है। समिधा के लिए जिन वृक्षों का काष्ठ प्रयुक्त होता है, उनमें सूर्य तत्त्व की बहुलता पाई जाती है। फिर इसके अतिरिक्त शक्तिशाली शब्द शक्ति का मंत्र रूप में भी समावेश किया जाता है।
आराधना करने वाले ईश्वर की इस सृष्टि में दृश्यमान इस शाश्वत सिद्धान्त पर आस्था रखते है एवं तद्नुसार अपना जीवन-क्रम बनाते, बदले में अगणित ऋद्धि-सिद्धियों को हस्तगत करते हैं। आत्म संतोष एवं जन सहयोग की प्रकारान्तर से ऋद्धि-सिद्धि हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-April
आराधना ही है। दिव्यअग्नि का सूर्य के साथ महत्त्वपूर्ण आदान-प्रदान संभव होता है। याज्ञिक उस दिव्य विद्या द्वारा पूर्ण शक्ति का आवश्यक भाग अपनी ओर आकर्षित करते है। साथ ही सूर्य अनुदानों में उन तत्त्वों की अभिवृद्धि करते हैं, जो प्राणियों,वनस्पतियों एवं ऋतु-चक्र वातावरण को अनुकूल बनाने के लिए आवश्यक है।
आराधना करने से हमारे स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीर का परिमार्जन हो सकता है। दर्शन का काम, चिंतन को दिशा देना है और साधन का स्वरूप अभीष्ट शक्तियों को अपने में उभारने की वैज्ञानिक कार्यपद्धति को अपनाना है। हम गायत्री का तत्त्व दर्शन भी समझें और उसके साधना-विधानों को अपनाने का भी प्रयत्न करें। इस आधार पर मस्तिष्क और अंतःकरण दोनों ही महानता के ढाँचे में ढल सकते हैं और उनके स्तर के अनुरूप ही हमारे प्रत्यक्ष व्यवहार एवं क्रियाकलाप का पहिया लुढ़क सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-February
आराधना और देवी सन्निकटता के आधार पर यह बन गया है कि भारत अगले दिनों सभी क्षेत्रों में असाधारण प्रगति करेगा। इतना ही नहीं वह दूसरे पिछड़े और पददलित देशों को ऊंचा उठाने में कारगर भूमिका भी सम्पन्न करेगा। उसकी सनातन परम्परा भी ऐसी ही है। उसने उन दिनों में विश्व व्यवस्था को सुधारने में भारी काम किया थ जब संसार में सर्वत्र अनगढ़ता और पिछड़ापन छाया हुआ था। तब यहाँ के मनीषी परिव्राजक विश्व के कौने-कौने में गये थे और ज्ञान विज्ञान से अवगत कराके पिछले जन समुदाय को ऊंचा उठाया था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-November
आराधना एवं पुण्य प्राप्ति का राजमार्ग है। लाखों व्यक्ति सोमवती अमावस्या से लेकर गंगा दशहरा तक पवित्र पुण्यतोया सरिताओं में स्नान कर अपनी गन्दगी से उन्हें प्रदूषित कर देते हैं। पुण्य तो मिलता नहीं, विधाता का रोष अवश्य मिलता होगा। सच्ची तीर्थ यात्रा वही है जिससे कर्मकाण्ड को नहीं, भावना को महत्व दिया गया हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-December
आराधना में विश्वास रखते है। इसके बदले दैवी अनुग्रह एवं असीम जनसमुदाय का सहयोग-सम्मान पाते हैं, आत्मसंतोषरूपी अनुदान पाते हैं।
आराधना ही उनका लक्ष्य होता है एवं निरपेक्ष भाव से करते हुए वे कृतकृत्य होते हैं। उनके जीवन प्रसंग औरों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन जाते हैं। भारतवर्ष का सांस्कृतिक इतिहास ऋषिगणों, विभूतियों द्वारा आत्मसत्ता के प्रचंड पुरुषार्थ से अर्जित उपलब्धियों— कथा-प्रसंगों से भरा पड़ा हैं। ये पौराणिक मिथक किसी को चमत्कृत करने के लिए नहीं, वरन उन्हें अध्यात्मक्षेत्र की असीम संभावनाओं का परिचय देने के लिए वर्णित किए जाते रहे हैं। उनका बार-बार स्मरण इसीलिए कराया जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-October
आराधना भी वही है समष्टि की सेवा में संलग्न रहना ही ईश्वर भक्ति का परमात्मा की आराधन का वास्तविक स्वरूप है। यहाँ यह और भी समझ लेना चाहिए कि सुख साधन की वृद्धि ही वैभव, को अनाचार से भी कमाया जा सकता है और उससे कुटुम्बियों मित्रों के सुख साधन भी बढ़ाये जा सकते हैं। यह सेवा कहां हुई? जो 60 लाख के करीब हट्टे-कट्टे निठल्लों का निर्वाह भार वहन करते हैं वे उनकी सेवा कहाँ करते हैं, वरन् उन्हें ऋण भार से दबाने और भक्ति का पाखण्ड रचने में सहायता भर करते हैं। मुफ्तखोरी को बढ़ावा देना संसार में अनाचार को बढ़ाना है।
आराधना। उसके लिए तो शबरी की तरह दिन भर लोक सेवा के कामों में निरत रहकर अवकाश के समय थोड़ा भगवन्नाम इस निमित्त लेना कही अच्छा, जिसमें भगवान से कर्म पक्ष से विचलित न होने वाले साहस की याचना की गई हो।
आराधना करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-January
आराधना में तत्पर रहा जाय। साहस और कलाकारिता के पुरुषार्थ और लालित्य के कर्म और भावना के इन केन्द्रों को प्रजनन मात्र से निरस्त न बना दिया जाय वरन् नर नारी की जननेन्द्रियों के निकटस्थ मूलाधार चप्र की शिव शक्ति को उच्च आदर्शों के लिए प्रयुक्त किया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-September
आराधना पूरी कर लेते हैं। यदि ब्रह्म मुहूर्त में यह आराधन करना हो, तथा बादल छाये रहने पर प्रत्यक्ष दर्शन न हो रहा हो तो जिस दिशा में उस समय सूर्य की उपस्थिति सम्भव लगती हो उस ओर मुख करके भी ध्यान किया जा सकता है, यह अनेकानेक प्रचलनों में से कुछ एक की चर्चा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-July
आराधना ही है। इससे अपनी आत्मा में परमात्मा का सूक्ष्म दिव्य तत्त्व झलकने लगता है और अपूर्व शक्ति की अनुभूति होती है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रार्थना से प्राप्त शक्ति का सदुपयोग आत्मबलसंपन्न व्यक्ति कर सकते हैं। निश्चयपूर्वक की गई प्रार्थना कभी असफल नहीं हो सकती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-January
आराधना, ब्रह्म संदीप यह 5 अंग हैं और वे पाँचों ही समान रूप से उपयोगी एवं आवश्यक है। इनमें से किसी की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। फोड़े का आपरेशन तो कर दिया जाय पर उसे धोना, दवा लगाना, पट्टी बाँधना, आराम देना आदि आवश्यक उपचार की उपेक्षा की जाय तो वह चिकित्सा उपयुक्त न मानी जायगी। इसी प्रकार जिन्हें साधना करनी हो, सम्मिलित होना हो उन्हें पूर्ण तत्परतापूर्वक ही सम्मिलित होना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-November
आराधना करें। ईश्वरत्व का व्यवहार करें। जो कार्य ईश्वरत्व जैसे तत्व के विरुद्ध हो सकते हैं, हम उनसे बचकर ही ईश्वर के प्रिय पुत्र होने के अधिकारी हो सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-May
आराधना करते हैं, वे और भी भीषण अन्धकार में निमज्जित होते हैं। इसका सबसे ज्वलन्त दृष्टान्त आधुनिक भारत है, समाज से धर्म को अलग करने से अथवा धर्म को समाज से अलग करने से ऐसी घोर दुर्दशा में निमज्जित होना पड़ता है। धार्मिक जीवन और सामाजिक जीवन को हम अलग-अलग रूप में देखने लगे थे, इसीलिये आज हम न धार्मिक जीवन का ही लाभ कर सके हैं और न सामाजिक जीवन में ही विजय को प्राप्त कर सके हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-October
आराधना आज के ‘सत्यं शिवं सुन्दरं’ के तद्रूप था। अतः यहाँ तो कोई झगड़ा नहीं। त्रेता में, भरत, लक्ष्मणादि ने पुरुषोत्तम राम को- उस राम को जो सर्व मानवीय गुणों की प्रतिमूर्त्ति थे- सर्वस्व माना। उन्हें स्वर्ग एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए किसी अन्य देव की आराधना अपेक्षित न थी। राम ने भी जनता को जनार्दन माना।
आराधना अपेक्षित न थी। राम ने भी जनता को जनार्दन माना। प्रजा उनकी सर्वस्व थी। प्रेमीजन ईश्वर को पूर्ण एवं अपने को अंश मानते हैं। राम ने भी अपनी प्रजा को ईश्वर समझा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-July
आराधना, उपासना की वैज्ञानिक पद्धति से ही हम अपनी मनोभूमि को निम्नस्तर से उठाकर उच्च भूमिका में परिवर्तन कर सकते हैं। जैसे अग्नि संस्कार से संसार के स्थूल पदार्थों में भारी हेर-फेर हो जाता है वैसे ही साधना की अग्नि द्वारा मनोभूमि में ऐसे वैज्ञानिक परिवर्तन होते हैं जिनके कारण उसके पूर्व रूप में अभीष्ट परिवर्तन किया जाना संभव है।
आराधना करते रहते हैं अन्त में उन्हें उसका मधुर फल अवश्य प्राप्त होता है।
आराधना आदि तपश्चर्याओं का अवलम्बन किया था। उसी के कारण उनका चरित्र, व्यक्तित्व एवं प्रभाव बढ़ा और उसी के कारण वे अपने विचारों की छाप अपने अनुयायियों पर डाल सके। संसार के प्रत्येक देश में वे ही व्यक्ति पूजनीय माने गये हैं जिन्होंने अपनी आत्मा को तपाकर निर्मल एवं प्रकाशवान् बनाया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-April
आराधना के योग्य पूर्व महर्षियों से चयन के योग्य अन्नों से सबके पोषण करने वाले अग्नि द्वारा स्तुति करता हूँ। वह अग्नि पर्व द्वारा प्रत्येक ऋतु में कर्मों का सम्पादन करता हुआ अखण्डित अदीन दुग्धदानादि से विराजमान दस ऐश्वर्य होने से गौ विराट हैं अतएव गौ को मत मारो।’

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-April
आराधना इस विश्व का सबसे श्रेष्ठ सत्कर्म है। इसीलिए ब्रह्म-दान एवं ब्रह्म-भोज की महत्ता अत्यधिक मानी जाती है। अन्न से शरीर की भूख बुझती है, ज्ञान की आत्मा की क्षुधा शान्त की जाती है, अन्न से शरीर पुष्ट होता है और ज्ञान से आत्मबल बढ़ता है। इसलिए अन्न, वस्त्र, आदि के दानों की अपेक्षा ज्ञान-दान का पुण्य असंख्यों गुना अधिक माना गया है। अन्न आदि के दान का प्रतिफल जीव को अन्य योनियों में भी मिल सकता है।
आराधना करने से क्या लाभ हो सकता है?”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-September
आराधना करके हम अधिकाधिक आनंद की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
आराधना करना मातृ जाति के प्रति पवित्रता की अधिकाधिक वृद्धि करना है। इस दिशा में जितनी सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात से अन्य इन्द्रियों का निग्रह मन का निरोध एवं अनेक मनोविकारों का शमन अपने आप होता जाता है मातृ भक्त के हृदय में दुर्वासनाएं अधिक देर नहीं ठहर सकतीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-March
आराधना करने से मनोवाँछित लाभ मिलने एवं आराधना का तिरस्कार करने पर दुख दारिद्र एवं संकट में पड़ने की कथा इन उपाख्यानों में है। जिससे यह प्रकट होता है कि जो उस व्रत को करेंगे वे लाभ उठावेंगे और जो उसका तिरस्कार करेंगे वे घाटे में रहेंगे।
आराधना से?
आराधना का तिरस्कार करने पर दुख दारिद्र एवं संकट में पड़ने की कथा इन उपाख्यानों में है। जिससे यह प्रकट होता है कि जो उस व्रत को करेंगे वे लाभ उठावेंगे और जो उसका तिरस्कार करेंगे वे घाटे में रहेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-February
आराधना से हममें चैतन्यता, स्फूर्ति, क्रिया-कुशलता आती हैं। वह आनन्द का स्रोत हैं- जब हम उसका ध्यान करते हैं, उपासना में निमग्न होते हैं तो आनन्द का पारावार नहीं रहता। आत्मानन्द की उपलब्धि ही जीवन का लक्ष्य है दूसरे शब्दों में यों कहना चाहिए कि परमात्मा की प्राप्ति ही जीव का ध्येय है। जो ईश्वर के मार्ग पर चलता है वही सत्पथगामी, बुद्धिमान और सूक्ष्मदर्शी कहा जा सकता हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-April
आराधना करने के लिये तुझे अन्यत्र कहीं भटकना नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह तेरा अन्तर्यामी तो तेरे रोम-रोम में रम रहा है। फिर तुझे इधर उधर जाने और भटकने की क्या आवश्यकता और इसमें भी कुछ सन्देह नहीं कि यह संसार एक अथाह सागर है, और यह जीव अपनी दुर्वासनाओं और निर्बलताओं के वशीभूत होकर अहर्निश इसमें गोते खा रहा है। परन्तु यह भी ध्रुव सत्य है कि जो भक्त उस करुणामय प्रभु का आश्रय ले लेता है, उसकी प्रेममयी गोद में बैठ जाता है और उसकी शरण में आज जाता है, वह इस भव-सिन्धु से तर कर पार हो जाता है
आराधना समझनी चाहिये॥30॥
आराधना करें? इस सम्बन्ध में अथर्ववेद में एक सुन्दर मंत्र आता है-
आराधना के आत्मा को परमशान्ति और परमानन्द की उपलब्धि होना बहुत कठिन ही नहीं, अपितु नितान्त असम्भव है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-May
आराधना में अपने को समर्पित करता है। ऐसा समाज यदि आज इस देश के ऐतिहासिक उत्तरदायित्व को सुनले और देश के साँस्कृतिक सामाजिक, आर्थिक पुनर्निर्माण में लग जाय तो उसमें कुछ अनोखी बात नहीं है।
आराधना और प्रार्थना करने के पश्चात् हमें जो वस्तुयें, जो साँसारिक लाभ जो सफलतायें प्राप्त हुई उनका वर्णन करना अनावश्यक है। हमें गायत्री माता की कृपा से कौन-कौन भौतिक लाभ हुए उनके सम्बन्ध में विशेष कहना भी युक्ति युक्त नहीं जान पड़ता, क्योंकि माता की बच्चे पर ममता स्वाभाविक ही है और उसके पास जो वस्तुयें होती हैं उन्हें वह बच्चे को देती ही रहती है। इस प्रकार माता की कृपा से हमने कभी भौतिक पदार्थों का अभाव अनुभव नहीं किया, किन्तु अब तक हम एक अभाव अवश्य अनुभव करते रहे को निगाह से हम अभी तक अपने को वैश्य कहते रहे, क्योंकि ब्राह्मण का जो मुख्य गुण त्याग है वह हमको आने भीतर दिखाई नहीं पड़ रहा था। ब्राह्मण को परिग्रही नहीं होना चाहिए। जिसके पास जितना परिग्रह होगा उसके पास आत्मबल की उतनी ही न्यूनता होगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-March
आराधना

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-February
आराधना को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है और जिसे जीवन संगिनी बनाने के लिए जल्दी कोई लड़की ही पसन्द नहीं आती, शायद ही कल्पना के इस माया जाल से निकल कर धरती पर पाँव रख सको, इनका उपचार तो तभी हो सकता है, जब एक नये सिरे से इनका मनोवैज्ञानिक कायाकल्प किया जाय, अन्यथा ऐसे लोगों का वैवाहिक जीवन बड़ा ही दुःखद होता है।
आराधना करता है और उसके द्वारा उन कामनाओं को प्राप्त करता है, जिन्हें मैं ही नियत करता हूँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-October
आराधना से अपने आप में आत्मा रूप परमात्मा का बोध हो उसी का आश्रय लेना चाहिये तथा उसी की ओर देखना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-December
आराधना में अनुरक्त है, वे अपने शरीर के संग अथवा सम्भाषण से भी संसार को पवित्र करते हैं। अतः सदा श्री हरि की ही पूजा करनी चाहिए। ब्रह्मन् जैसे नीची भूनि में इधर-उधर का सारा जल सिमट सिमट कर एकत्र हो जाता है, उसी प्रकार जहाँ भगवत्पूजा परायण शुद्ध चित्त महापुरुष रहते हैं, वहीं सम्पूर्ण कल्याण का वास होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-January
आराधना करके वैसा ही स्वयं भी बनने की चेष्टा कोई न्यास निष्ठ व्यक्ति तो करेगा ही नहीं। आतंक से भयभीत होकर गिड़गिड़ाने वाले आर्त भक्तों की बात दूसरी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-June
आराधना करनी पड़ेगी। जीवन उसी से मिला है। धरती की समस्त जड़-चेतन, हलचलें उसी की कृपा से चल रही हैं। भविष्य की ईंधन समस्या सहित अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें उन्हीं की शरण लेनी पड़ेगी।
आराधना करके ओजस्वी, तेजस्वी एवं ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न बनाने का साधना विज्ञान विनिर्मित किया था। अब भौतिक विज्ञानी भी हर दिशा से निराश होकर सूर्य देवता की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं। विश्व की ऊर्जा समस्या का कोई अन्य समाधान आधार नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-December
आराधना से सारी समृद्धियां सुलभ हो जाती है। श्रम के देवता ने किसी को निराश नहीं किया है। श्रम व मनोयोग के इन दो देवताओं की पूजा व्यर्थ नहीं जाती। हम इन दो देवताओं को पूजे व दो असुरों आलस्य व प्रमाद जो राहू-केतु हैं- को दूर रखें तो हमें अपने कर्म में सफलता अवश्य मिलेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-February
आराधना की। वे प्रसन्न हुए और वरदान देने पहुँचे। तपस्वी ने उनका वज्र माँगा ताकि संसार को आतंकित करके चक्रवर्ती शासन कर सके।
आराधना की। निदान उन्हें वरदान देने के लिए जाना पड़ा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-September
आराधना के लिये ही हमारा जीवन और हमारी हर एक प्रवृत्ति हो । इस प्रसंग में सत्य हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, रामचन्द्रजी, इमाम हसन, अन्य ईसाई संत इत्यादि के चरित्रों पर विचार कर लेना चाहिये और सभी बालक, बड़े बूढ़े, स्त्री पुरुष आदि को चलते-बोलते, खाते पीते, खेलते अर्थात् हर काम करते हुये सत्य की रट लगाये रहनी चाहिये। बापू का कथन है कि यह सत्य रूपी परमेश्वर उनके लिये तो रत्न चिन्तामणि सिद्ध हुआ है।
आराधना किया करते थे। इन्हीं दिनों सर्दी, गर्मी की प्रधान ऋतुओं का मिलन होता है। इसी सन्धि बेला को नवदुर्गा कहा जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-November
आराधना किया करते हैं। इस प्रकार के “विद्यार्थियों” को उचित मार्ग का प्रदर्शन भी वे ही दिव्य चरित्र वाले महानुभाव कर सकते हैं जो साँसारिक वैभव, सुखोपभोग से निर्लिप्त रह कर संसार के उद्धार का व्रत लिया करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-February
आराधना के रूप में हमारी संस्कृति में आदिकाल से प्रतिष्ठित है। अनेकानेक कथाएँ इस शक्ति-उपासना के उद्गम को आच्छादित किए हुए हैं। एक कथा के अनुसार उग्रदेव रुद्र की पत्नी रुद्राणी को आद्या शक्ति माना गया। पिता द्वारा किये जाने वाले यज्ञ में अपने पति रुद्र का अपमान न सह सकने के कारण क्रुद्ध रुद्राणी ने आत्मदाह कर लिया। इस समाचार को सुनते ही रुद्र प्रलयकारी रूप धारण कर शक्ति के शव को उठाकर त्रैलोक में घूमने लगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-January
आराधना और तदनुकूल प्रयत्न दोनों मिलकर कार्य शीघ्र सिद्ध कर देते हैं। उसने मेरे कहने के अनुसार इस मंत्र का जप करना प्रारंभ किया। बड़े-बड़े वकील, बैरिस्टर यह कहते थे कि ‘ये छूटेंगे नहीं’, किन्तु मैं यही कहता था कि हमने यहाँ की अदालत के अतिरिक्त एक बहुत बड़ी अदालत में, जो सबसे बड़ी अदालत है, अपील कर रखी है। उसमें हमारी अवश्य ही सुनवायी होगी। जिस दिन सवा लाख जप पूरा हुआ, ठीक उसी दिन रणवीर साफ छूट गये।
आराधना से लोक-परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं। अथर्ववेद के अन्दर भी यही आदेश है कि गायत्री माता के साधक को आयु, स्वास्थ्य, संतान, धन, ऐश्वर्य, कीर्ति, पशु, ब्रह्मवर्चस-दुनिया के ये सब - के सब ऐश्वर्य प्राप्त होते है और ब्रह्मलोक भी प्राप्त हो जाता है। कौन-सी ऐसी चीज है, जो गायत्री माता की कृपा से प्राप्त नहीं हो जाती? इसलिये गायत्री माता का भरोसा और गायत्री माता की भक्ति अवश्य ही करनी चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-August
आराधना की थी और उन जैसे गुणों का पुत्र प्राप्त हुआ था। भागवत में उनकी दिनचर्या के सम्बन्ध में आता है कि वह नित्य प्रति गायत्री जाप व हवन किया करते थे। हमें भी उनका अनुकरण करना चाहिए।
आराधना या दैनिक जीवन में प्रयोग में लाता है। कुछ साधक इसके पूर्व ‘हरिः’ शब्द का प्रयोग करते हैं और “हरिः ओम्” उच्चारण किया करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
आराधना में मानवीय मस्तिष्क संलग्न रहे हैं और अब वह उपार्जन इतना विशालकाय, इतना सघन और प्रचलित हो गया है कि आमतौर से उसे ही सत्य माना जाने लगा है। आज सामान्य बुद्धि के लिए यह ढूंढ़ निकालना अति कठिन है कि प्रचलित मान्यताओं, प्रथा परिपाटियों, विश्वासों रीति-नीतियों एवं विचारणाओं में सत्य का कितना अंश है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-October
आराधना उसी की करो।
आराधना में संलग्न हो गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-September
आराधना। इसके लिए सेवा का मार्ग अपनाना होता है। समाज के देवत्व बढ़े स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण हो यह सवा अवलम्बन द्वारा ही संभव है। सेवा अर्थात् अपनी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को पीड़ा एवं पतन में नियोजित करना। यह मनुष्यता का मेरुदण्ड है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-November
आराधना करके मोहिनी रूप पाया और शिवजी के मन में भी काम विकार उत्पन्न कर दिया। कामदेव भी तुम्हारी ही आराधना से अपनी पत्नी का नयनाभिराम बना हुआ है और बड़े-बड़े मुनियों के मन में भी क्षोभ उत्पन्न करता रहता है।
आराधना से अपनी पत्नी का नयनाभिराम बना हुआ है और बड़े-बड़े मुनियों के मन में भी क्षोभ उत्पन्न करता रहता है।
आराधना सन्मार्गगामी शूरवीर बनकर की जाती है गुरुदेव इन पाँचों  आत्मदेवताओं को भी उसी तरह साधते रहे, जिस तरह कि इंद्रिय देवियों  की पवित्रता अक्षुण्य बनाए रहने में तत्पर रहे। गायत्री माता के पाँच मुख और दस हाथ अलंकारिक दृष्टि से चित्रित किए जाते हैं। कितनी ही मूर्तियाँ तथा तस्वीरें इस प्रकार के चित्रण समेत  मिलती हैं। यह पाँच मुख अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, आनन्दमय कोश और विज्ञानमय कोश हैं। दश भुजाएँ उपरोक्त पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच देवियों और पाँच मनसतत्त्व से संबंधित पाँच देवता है।
आराधना में निरन्तर संलग्नता का भाव भी 'षट्पद' शब्द में है। इस मार्ग पर चलने वाले हर साधक को उपलब्ध आनन्द की अनुभूति करते हुए ऐसी ही आकांक्षा उमड़ती है।
आराधना में निरन्तर संलग्नता का भाव भी 'षट्पद' शब्द में है। इस मार्ग पर चलने वाले हर साधक को उपलब्ध आनन्द की अनुभूति करते हुए ऐसी ही आकांक्षा उमड़ती है।
आराधना जैसा ही मंगलमय होता है। मनुष्य शरीर में देवत्व का उदय करने में कुण्डलिनी शक्ति का अनुपम योगदान मिलता है। श्री शंकराचार्य ने बहुत कुछ पा लेने के बाद अंतिम रूप में यह माँगा है कि वे सर्वतोभावेन महाशक्ति में ही लीन हो जाएँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-June
आराधना शुरू करदें। यह युग परिवर्तन का शुभारम्भ है जो हमारे परिजनों को तो आरम्भ कर देना चाहिए। हम बदलेंगे युग बदलेगा’ का नारा-हमें अपने व्यक्तिगत जीवन कि विचार पद्धति और कार्य-प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन प्रस्तुत करके सार्थक बनाना चाहिए। निःसन्देह अपने परिवार में इस प्रकार का बदलाव यदि आ जाये तो फिर कोई शक्ति युग-परिवर्तन एवं नव-निर्माण को सफल बनाने में बाधक न हो सकेंगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-June
आराधना में जुट गया।
आराधना में उन्हें पिता, पुत्र, प्रेमी, पति, पत्नी, माता आदि मानकर पृथक-पृथक स्मरण करने लगते हैं। ओस प्रकार से भावात्मक शक्ति का ऊर्ध्वीकरण, दिव्य अनुभव एवं जागरण में कर उस आद्यशक्ति का रूपांतरण संभव है। स्वाधिष्ठान चक्र की साधना में इसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-January
आराधना उसी की करो। देवताओं का मिथ्या अहंकार समाप्त हुआ। तब से वे आत्मबल की आराधना में संलग्न हो गये।
आराधना-कर्मयोग हमारे जीवन में समाविष्ट नहीं होती, स्थिति और भी विषम ही होती चली जाएगी एवं सुख -चैन दूभर ही रहेगा। परमपूज्य गुरुदेव जो राष्ट्र की स्वतंत्रता के प्रत्यक्ष साक्षी रहे, इस तथ्य को जानते थे कि सदियों से गुलाम रहा यह देश जब अंकुश हटने पर उदारीकरण की हवा लगेगी तो गड़बड़ा सकता हैं इसीलिए उनने राष्ट्र को समर्थ-समृद्ध व सशक्त बनाने के लिए राष्ट्र के नागरिकों को एक श्रेष्ठ साधक के रूप में निखरने हेतु अनेकानेक उपचारों का प्रावधान किया, गायत्री को सार्वजनीन बनाया एवं यज्ञीय तत्त्वदर्शन के विश्वभर में विस्तार द्वारा सत्कर्म व पर्यावरण -संशोधन की प्रक्रिया को परिपूर्णता तक पहुँचाया। प्रस्तुत साधना महापुरश्चरण राष्ट्र के साँस्कृतिक पुनर्जागरण हेतु अनिवार्य माना जा सकता है व समय की विषमता से जूझने हेतु एक आध्यात्मिक महापुरुषार्थ भी। यह भी एक प्रसन्नता की ही बात मानी जानी चाहिए कि इस प्रखर साधना पराक्रम के शुरुआती दीप प्रज्ज्वलन के रूप में पिछले दिनों गायत्रीतीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार में एक अन्तर्राष्ट्रीय योगसम्मेलन भी सफलता-पूर्वक आयोजित हो कर इस उपक्रम का शानदार शुभारम्भ हो चुका है।
आराधना में संलग्न हो गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
आराधना।
आराधना का आधा गायत्री रहा है। गायत्री की अनुष्ठान परक साधनाएँ जानने के लिए पढ़िए-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-February
आराधना (वा0 क्र0 - 2) से
आराधना के रूप में संपन्न हो रहा है। प्राणविद्या के आचार्यों का कथन है कि आज समाज में छाया प्राणशक्ति का संकट निश्चित ही गायत्री महाशक्ति की, सूर्य को केन्द्र मानकर की गई साधना से दूर हो सकता है। श्रुति कहती है- ‘तेजो वै गायत्री’, फिर ताण्ड्योपनिषद् कहता है- ज्योतिर्वै गायत्री छन्दसाम् अर्थात् गायत्री एक प्रकार का तेज है, जो प्रकाश और ऊष्मा के रूप में विश्व का मूल है। सूर्य गायत्री तेज का सबसे बड़ा भण्डार है और विश्व के निर्माण में सबसे बड़ा कारण भी। शास्त्रकार यह भी कहते हैं कि म नहीं सविता है।
आराधना की आवश्यकता और उसका स्वरूप-सेवाधर्म
आराधना में लीन रहा। यह सब मन तथा हृदय को अच्छा भी लगता रहा, परन्तु ऐसी मनःस्थिति कभी नहीं बन पायी, जैसी कि आप बनी।
आराधना
आराधना (वा. क्र. 2) से
आराधनात्मक स्तर पर समाज परिकर में संपन्न करना है।
आराधना संभव है। आज की सेवा नियोजित होनी चाहिए, विवाहोन्माद की असुरता से प्रतिरोध करने वाले आँकलन के रूप में। विवाह संस्कार एक पावन पुनीत कृत्य है, जिसमें दो आत्माओं का आध्यात्मिक मिलन होना चाहिए। इसे एक पैशाचिक कृत्य बना दिया गया है- नेग के नाम पर, दहेज के नाम पर, फैशन-खूबसूरती के नाम पर खूब शोषण होता है। अनाप-शनाप पैसा बहाकर यह संस्कार मात्र भारत में ही संपन्न होता है।
आराधना ही है।
आराधना चेतना का उदात्तीकरण। आत्मशोधन, आदतों का परिशोधन, सविता की ध्यान-धारण
आराधना, इन तीन पक्षों पर टिका हुआ है जागृति का विज्ञान। इसमें व्यक्तित्व को परिष्कृत कर ऊर्ध्वगमन की प्रक्रिया योग त्रयी द्वारा सम्पन्न की जा सकती है, पढ़-
आराधना के आधार पर आत्मपरिष्कार करेंगे, धार पैनी करेंगे और इतनी अंतःक्षमता अर्जित करेंगे, जिसके आधार पर उनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य करते बन पड़े।
आराधना, दान दिये जाने को पवित्र फलदायी बताया गया है। यह

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
आराधना का, विश्वब्रह्मांड की सेवासाधना का विराट रूप दे दिया। विचार क्राँति के माध्यम से आसुरी चिंतन को निरस्त करने हेतु एक व्यापक ज्ञानयज्ञ उन्होंने रचा। सबसे बड़ी बात गायत्री व यज्ञ को एक सीमित दायरे से निकलकर उसे जनसुलभ बना दिया। यह अवतारी स्तर की जगद्गुरु स्तर की चेतना ही कर सकती है। पूज्यवर कहते है -हर अवतार ने अपने समय की विकृतियों के समाधान का नेतृत्व अवश्य किया, पर उनके पीछे वस्तुतः अपार जनशक्ति थी।
आराधना और उदारवृत्ति द्वारा जीवन निर्वाह, उनके आदर्श थे। मास के पहले पक्ष में वे खेतों से बीन-बीन कर चावल एकत्र करते, दूसरे पक्ष में उसे यज्ञ और अतिथि सत्कार में व्यय कर देते। ऋषि श्रेष्ठ दुर्वासा छः हज़ार शिष्यों सहित मुदगल की परीक्षा हेतु उनके आश्रम पर कई बार गए और निस्पृह मुदगल ने उन्हें हर बार आतिथ्य द्वारा पूर्णतः संतुष्ट कर दिया।
आराधना का विधान है। इस क्रम में कमल एक शाश्वत -सांस्कृतिक प्रतीक है। कमल भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही तथ्यों का प्रतीक माना गया है। यह श्रृंगार एवं वैराग्य तथा सृष्टि व प्रलय के रूप में वर्णित होता है। यह असीम -अनंत आकाश के साथ प्राणी के सूक्ष्म अन्तः कारण का भी प्रतीक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-July
आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया जा सके। बस फिर क्या था? वे जंगल छोड़कर आबादी वाले क्षेत्र में जा पहुँचे। सब लोग उन्हें अपने बीच पाकर प्रसन्न हो उठें। सोचा, निश्चय ही कोई समाधान लेकर ही महर्षि उपस्थित हुए हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-November
आराधना भी व्यापक रूप से प्रचलित होगी ही।
आराधना में भी कुछ विशिष्ट विधान रखे गए हैं। सामान्यतः सभी साधनाओं में संयम-नियम का ध्यान रखना अनिवार्य है। उसी स्थिति में यंत्रों का प्रभाव ग्रहण करने योग्य पात्रता आती है। विशिष्ट साधनाओं में कुछ विशेष विधान उस यंत्र की विशिष्ट क्षमता को ध्यान में रखकर ही किया जाता है।
आराधना का प्रतीक है। स्वास्थ्य, धन और प्रवृत्ति को जिसने साध लिया, उसके लिए सभी दिशाओं में जय-हो-जय है। मृत्यु और यम उसके लिए भाई-बहन की तरह हो जाते हैं, जो सभी स्थितियों में रक्षा करते हैं, संरक्षण देते हैं। दीपावली का समापन मर्यादा और पारिवारिक दायित्वों के स्मरण के साथ है। उन सभी का स्मरण रखना चाहिए, जो सहोदर हैं, लौकिक दृष्टि से भाई-बहन हैं।
आराधना की गई है। विपर्यय के न जाने किस दौर में यह मान्यता प्रचलित हो गई कि लक्ष्मी चलपा और चंचला है। वह किसी एक जगह स्थिर नहीं रहती। उसके आशीर्वाद-वरदान बरसते और बदलते रहते हैं। चपला-चंचला और कहीं भी पहुंचने, अपनी कृपा समेट लेने की धारणा उस दौर में ही जन्मी जब ज्ञान और साधना की परंपरा छिन्न-भिन्न होने लगी थी।
आराधना, हमारी वसीयत और विरासत जैसी ऐतिहासिक स्तर की रचनाओं के द्वारा यही प्रतिपादित किया कि हम योगस्थ हो कैसे जिएँ। स्थितप्रज्ञ बनने की दिशा में पहली सीढ़ी तो चढ़ें-सुख को भोग एवं दुख को तप बनाकर। उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं, प्रत्येक को जीवन भर इनका सामना करना पड़ता है, पर ये आते हैं हमें योगी बनाने के लिए, तपस्वी बनाने के लिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-October
आराधना के समापन और विसर्जन का दिन है। शक्ति उपासना में नौ दिनों तक दुर्गा पूजा के बाद विसर्जन के लिए विजयादशमी या उससे पहले नवमी का दिन निर्धारित है। किन्हीं क्षेत्रों में आश्विन नवरात्र के समय रामलीला का चलन रहा है। और किन्हीं क्षेत्रों में दुर्गा पूजा का। अब साधना सम्प्रदायों की कोई सीमा रेखा नहीं खींची जाती।
आराधना के रूप में ही की जाती है। शास्त्रों में ढेरों प्रसंग है, जिनमें शक्ति संपन्न होने के बाद मिलने वाले परिणामों का विवेचन मिलता है। महिषासुर और शुँभ-निशुँभ भी शक्ति के आराधक थे। देवसत्ताओं के संगठित बल को उन्होंने नवरात्र के ही दिनों में चुनौती दी। देवासुर संग्राम उन्हीं दिनों लड़ा गया था।
आराधना- उपासना के रूप में में परिभाषित किया जाता है। राम की विजय और शक्तिसाधना पूरी होने की तिथि एक ही है। विजयादशमी पर आसुरी आतंक के प्रतिनिधि रावण का पराभव हुआ। नवरात्र की अंतकथा के अनुसार इस दिन भगवती दुर्गा ने महिषासुर और शुँभ-निशुँभ आदि दैत्यों का संहार कर देवसत्ताओं को निष्कंटक राज्य दिया। विजयादशमी उस शक्ति की आराधना के समापन और विसर्जन का दिन है।
आराधना सफल हुई,लेकिन विजय श्री ने राम का ही वरण किया। साधन और श्रद्धा में कम नहीं होने पर भी रावण को पराजित होना पड़ा, क्योंकि उनके पास धर्म मर्यादा नहीं थी।
आराधना कि जाती है, वह परपावन आध्यात्मिक ही होती है। सप्तशती, रामायण, भागवत, देवीपुराण जैसे विविध अनुष्ठान अपने इष्ट और भाव के अनुसार ही संपन्न किये जाते है। गायत्री परिवार के परिजन और उपासक इन दिनों पुरश्चरण साधना के रूप में अर्जन तप करते है। वह प्रक्रिया उत्साहपूर्वक चलनी चाहिए।
आराधना के प्रसंग आते है। कहा सूर्य कि स्तुति के रूप में,तो कही संध्यावंदन और गायत्री जप के रूप में। रामायण आदि ग्रंथों में शक्ति पूजा के प्रसंग नहीं है। मनीषीगण प्रसंग को यह कहकर शक्ति पूजा से जोड़ते है कि राम का विजय अभियान सीता कि वापसी के लिए था।
आराधना करने पर राम और रावण दोनों के सामने शक्ति प्रकट हुई राम को उसने आशीर्वाद दिया ‘विजयी भवः’ - तुम्हारी जीत हो। रावण से कहा की तुम्हारा कल्याण हो- ‘कल्याणमस्तु।’ रावण का कल्याण उसके अभिमान और शूरता के साथ मिट जाने में ही था, वह आशीर्वाद फलीभूत हुआ। शक्ति की तुलना अग्नि से करे तो स्वर्ण के लिए उसका आशीर्वाद तपने और कुँदन सिद्ध होने के रूप में ही चरितार्थ होगा। वह कचरे के लिए भी प्रकट होगी और वरदान के रूप में उसे जलाकर भस्मीभूत ही करेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-April
आराधना, उपासना में लगा हूँ। सरल, सादा जीवन भी जी रहा हूँ, पूजा, आराधना, उपासना में लगा हूँ। सरल, जीवन भी जी रहा हूँ, किंतु मुझे ऐसा कभी लगता ही नहीं कि मुझ पर कुछ भगवान की विशेष कृपा हो रही है। भक्त की निराशा देखकर रामकृष्ण मुस्कराए। उन्होंने खेतों में काम कर रहे किसानों की ओर संकेत किया ओर बोल-किसान दो तरह के होते हैं, जिन्हें खेतों में काम करना सहज भला लगाता है, उन्हें नफा-नुकसान से कोई तात्पर्य नहीं, उन्हें खेती करनी है।
आराधनापरक अर्थात् हम अपनी आत्मीयता के विस्तार से समाज के कितने बड़े परिवार को अपनी कर्मशैली में बाँध पाए हैं, अपने गुरुसत्ता के लक्ष्य के साथ जोड़ सकने में सफल हो पाए हैं। अपना रौब जमाने के स्थान पर हमारी भूमिका ‘तृणादपिषुनिचेन’ तिनके की तरह विनम्र बनने की दिशा में होनी चाहिए। इसके लिए हम जितना अपना प्रेम-आत्मीयता औरों को बाँटेंगे, उतना ही हमारा परिष्कार विस्तृत होता चला जाएगा। पारिवारिकता की अवधारणा जो परमपूज्य गुरुदेव माताजी ने उसे जीवनभर निभाया भी है।
आराधना, उपासना में लगा हूँ। सरल, जीवन भी जी रहा हूँ, किंतु मुझे ऐसा कभी लगता ही नहीं कि मुझ पर कुछ भगवान की विशेष कृपा हो रही है। भक्त की निराशा देखकर रामकृष्ण मुस्कराए। उन्होंने खेतों में काम कर रहे किसानों की ओर संकेत किया ओर बोल-किसान दो तरह के होते हैं, जिन्हें खेतों में काम करना सहज भला लगाता है, उन्हें नफा-नुकसान से कोई तात्पर्य नहीं, उन्हें खेती करनी है। एक वे भी किसान हैं, जो लाभ-हानि सामने रखकर खेती करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
आराधना केंद्र ने लोकमंगल के क्षेत्र में कितना कुछ किया है।
आराधना केंद्रों को भव्य, सुसज्जित, व्यवस्थित और समृद्ध बनाने के प्रयत्न किए गए हैं। इन केंद्रों से संबंधित धर्म-संप्रदाय या विश्वास के अनुयायियों को तृप्ति मिलती रही है। यही कारण है कि प्रत्येक अनुयायी अपने इष्ट-केंद्र के लिए कुछ-न-कुछ सहयोग, दान या सेवा प्रस्तुत करता रहता है। देखा तो यहाँ तक गया है कि अपने पास जो भी श्रेष्ठ और मूल्यवान् है, उसे समर्पित करने की होड़ भी लगती रही है। यह उत्साह बिना विशेष लाभ हुए नहीं जागता।
आराधना केंद्रों या देवस्थानों के लिए बहुमूल्य और श्रेष्ठ वस्तुएँ समर्पित की जाती हैं, तो वहाँ भी यही नियम या मानदंड काम करता है। वहाँ किसी भी प्रकार का निर्धारण न करते हुए चेतन-अचेतन रूप से यही प्रक्रिया चलती रहती है कि उस आराधना केंद्र ने लोकमंगल के क्षेत्र में कितना कुछ किया है।
आराधना तेल के दीपक से की जाती है। मंदिरों में इनकी वर्जना का उद्देश्य कम-से-कम आवेश उत्पन्न होने देना है। मानवीय चेतना अविद्या-अंधकार से आच्छादित है। उसे दूर करने के लिए घी या कपूर का शीतल प्रकाश ही उद्बोधित करता है। कपूर सुगंध का घना रूप है।
आराधना केंद्रों का स्वरूप प्रायः एक समान रहता है। भवन और स्थान की सज्जा के अलावा पूजा-उपासना की जगह, वेदी, दिशा, मूर्ति या प्रतीकों के स्वरूप में आमतौर पर एकरूपता रहती है। भारतीय धर्म-परंपरा में ही अंतर रहता है। उसे अंतर न कहकर वैशिष्ट्य ही कहा जाना चाहिए। साधक का अपनी श्रद्धा भावना और आवश्यकता के अनुरूप प्रतीक चुनने की स्वतंत्रता सिर्फ भारतीय धर्म में ही उपलब्ध है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-September
आराधना करता है तो शब्द विज्ञान और आत्म संबंध दोनों की महत्ता से संयुक्त गायत्री का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है और वह एक अद्वितीय शक्ति सिद्ध होती है।
आराधना का ही आश्रय लेना पड़ता है। गायत्री के आवरण में होकर पार जाने पर ही ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। सच तो यह है कि साक्षात्कार का अनुभव भी गायत्री के गर्भ में ही होता है। इस से ऊपर पहुँचने पर सूक्ष्म इन्द्रियाँ और उनकी अनुभव शक्ति भी लुप्त हो जाती है। इसलिए मुक्ति और ईश्वर प्राप्ति चाहने वाले भी गायत्री मिश्रित ब्रह्म की-राधेश्याम, सीताराम लक्ष्मी नारायण की-ही उपासना करते हैं।
आराधना के आधार पर उत्पन्न किया गया संबंध, यह दोनों ही कारण गायत्री शक्ति को ऐसी बलवान बनाते हैं जो साधकों के लिए दैवी वरदान सिद्ध होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-December
आराधना, प्रार्थना करते हुए राजद्वार में प्रवेश करने से सफलता मिलती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-August
आराधना करेंगे।
आराधना कर रहे हैं। यह तीनों ही वर्ग गायत्री की आद्या शक्ति के एक-एक चरण के उपासक हैं। गायत्री को ‘त्रिपदी’ कहा है। उसके तीन चरण हैं। यह त्रिवेणी उपरोक्त तीनों ही प्रयोजनों को पूरा करने वाली है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-January
आराधना एवं अपने निज नहीं पकड़ सकता। यदि श्रेष्ठ साहित्य का स्वाद जन-जन को बताकर उसकी लत लगाई जा सके तो श्रेष्ठ विचारों का, विधेयात्मक आस्थाओं का साम्राज्य ही छाया दिखाई पड़ेगा।
आराधना करता है। वह प्रचण्ड तपस्वी तथा प्रकाण्ड अध्यात्मवेत्ता है। अपनी समस्त दिव्य शक्तियों एवं विभूतियों को वह मानव मात्र के कल्याण के लिए नियोजित करता है। वह स्वयं रूपांतरित है एवं अपने आविर्भाव के साथ ही जगत् को भी रूपांतरित करने की क्षमता रखता है। वह सभी को ईश्वर में एवं ईश्वर को सभी में देखता है।
आराधना की जाती थी, क्योंकि प्राण-चेतना का यह एक स्थूल माध्यम है। इससे जड़-चेतन को प्रत्यक्ष जगत् में जीवन मिलता है और सूक्ष्म जगत् में ‘सविता’ के रूप में यह प्राण-प्रवाह का प्रखर पुँज है। समस्त संसार के लिए इसे कल्याणकारी माना गया है। अतः इसकी उपासना हमारे धार्मिक कर्मकाँड का अंग है, किंतु जब ‘सूर्य नमस्कार’ के रूप में इसे हम अपनाते हैं, तो यही अभ्यास चेतना का उन्नायक और स्वास्थ्य-संवर्द्धक बन जाता है। यह उन तत्वज्ञों का आविष्कार है, जिन्हें यह पता था कि इससे केवल स्वास्थ्य-रक्षा ही नहीं होती वरन् मानसिक शक्तियों के संतुलन,नियमन और सुनियोजन में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-April
आराधना। यह दरअसल तप से उत्पन्न ज्ञान है। तप साधना की चरम परिणति है ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की प्रबल भावानुभूति है। तपस्वी यदि सच्चा है तो वह आराध्य के बगैर नहीं रह सकता। वह अपने तप के सुपरिणामों, सत्परिणामों का वितरण करता चला जाता है।
आराधना के कठोर अनुशासन जुड़ें हों। उपासना के क्रम में साधकों को पूरी भक्ति एवं श्रद्धा के साथ 24,000 का जप पूर्ण करना होता है। नवरात्रि के दिनों के हिसाब से प्रतिदिन की जप संख्या का निर्धारण होता है। 30 माला जप करने से जप संख्या का विधान भली-भाँति पूरा हो जाता है। परन्तु जैसे-तैसे जप पूरा कर लेना उपासना नहीं है।
आराधना तप की सुगन्ध है, तप का ज्योतिर्मय प्रकाश है, तप की ऊर्जा का अनुभूतिपूर्ण विस्तार है। यह स्वयं की आत्म चेतना का व्यापक विस्तार है। नवरात्रि के विशेष दिनों में यदि इसके व्यावहारिक सूत्रों पर चर्चा करनी हो तो 1.सबसे बिना किसी भेदभाव के प्रेमपूर्ण व्यवहार, 2. परिवेश-परिकर के अन्य जनों को साधना के लिए प्रेरित करना, 3. विचार क्रान्ति के सत्साहित्य को औरों को पढ़ाना, 4. छोटे स्तर पर ही सही किसी सुपात्र की सहायता करना एवं 5. सृष्टि के सभी प्राणी जगन्माता गायत्री की सन्तानें हैं, सबमें माँ ही समायी है, ऐसी भावानुभूति में जीना।
आराधना के ये सभी सूत्र मिलकर तप की उच्चस्तरीय प्रयोग भूमि विनिर्मित करते हैं। इसके परिणाम कैसे और कितने प्रभावकारी है, यह कहने-सुनने की बात नहीं है। नवरात्रि के दिनों में इन्हें अपनाने वाले की अनुभूति अपने आप ही इसकी सत्यता बखान कर देगी। प्रयोग के अन्तिम दिन साधक को पूर्णाहुति के रूप में हवन का विशेष उपक्रम करना चाहिए। हवन की प्रत्येक आहुति के साथ यह भाव रखा जाना चाहिए।
आराधना का। वह ज्ञान जो पाप समुद्र से भलीभाँति सभी को तार देता है।
आराधना का अद्भुत समन्वय होता था। पृथक से प्रकाशित पुस्तकों रहित विभिन्न कवियों को हमारे गुरुवर ने लिखना सिखाया, छंदबद्ध करना सिखाया एवं प्रायः दो से तीन हजार कविताएँ इनसे लिखवा लीं। इन्हीं का समन्वित रूप काव्य के वाङ्मय के खंडों के रूप में शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा हैं। देखने योग्य बात है- कविता लेखन पर सुव्यवस्थित मार्गदर्शन। कवि अपनी भाव संवेदनाओं को पिरोते हुए कैसे लिखें, यह स्टीक बिंदुवार चिंतन वे सतत देते रहते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-June
आराधना उनके जीवन का आदर्श होगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
आराधना बन जाएगी तो अहंकार विगलित हो जाएगा। अहंकार को गलाने के लिए निष्काम सेवा भाव एकमात्र उपाय है। अहंकारमुक्त पुरुष आकाश पुरुष बन जाता है। और वह वैदिक ऋषि के समान ‘अहं ब्रह्मास्मि’ तथा उपनिषद्कार के सदृश विराट् ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।
आराधना मानकर कहा है हर व्यक्ति, हर जीव परमात्मा है, ऐसा समझकर ही उसकी सेवा करो। और जब यह सेवा हमारे जीवन में आराधना बन जाएगी तो अहंकार विगलित हो जाएगा। अहंकार को गलाने के लिए निष्काम सेवा भाव एकमात्र उपाय है। अहंकारमुक्त पुरुष आकाश पुरुष बन जाता है। और वह वैदिक ऋषि के समान ‘अहं ब्रह्मास्मि’ तथा उपनिषद्कार के सदृश विराट् ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-December
आराधना और युगधर्म की सीडी का भी विमोचन यज्ञ मंच से हुआ।
आराधना करते ही साधन अपने आप प्रकट हो जाते हैं। बाबा के पास दुखी, संतप्त और रोगी लोग भी आया करते थे वे कुछ कहते तो नहीं थे, हाथ उठाकर सिर्फ आशीर्वाद देते थे। उनके हाथ का उठना ही संकट का निवारण होना माना लिया जाता था और कई लोगों के संकट सचमुच दूर हो भी जाते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-August
आराधना-समाज सेवा है। ये तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। बेटा, अब हमको उपासना तो नित्यप्रति करनी ही है। हमारे जो कार्यकर्ता हैं वे बजाय आलस्य के चाहें तो आधा घंटा उपासना करें। मैं यह तो नहीं कहती कि सारे दिन माला लेकर तुम बैठे रहो।
आराधना तीनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-October
आराधना में ही सम्भव है। इन दोनों तत्त्वों के समुचित विकास से ही व्यक्तित्व निखरता है। गुणवान एवं चरित्रवान व्यक्ति भले ही नाम, रूप, जाति, कुल से श्रेष्ठ न हो पर वह इन विशेषताओं के कारण लोकमान्य बनता है, प्रतिष्ठित होता है तथा श्रेय-सम्मान का अधिकारी बनता है। निम्न कुल-जाति की माने जाने वाले मत्स्यगंधा पुत्र व्यास जी ने अपनी प्रचण्ड तपस्या एवं गहन साधना के द्वारा गुण एवं चरित्र का विकास कर अपने व्यक्तित्व को समुज्ज्वल बनाया था। इनका व्यक्तित्व इतना महान् था कि उन्हें कोई उनके जाति-कुल-गोत्र आदि के बारे में नहीं पूछता, बल्कि प्रखर व्यक्तित्व के सामने माथा नवाता है।
आराधना का ही प्रभाव था।
आराधना बन जाती है। मीरा के जीवन में ऐसी ही प्रार्थना की आर्त पुकार उठी थी। उन्होंने भी अपना सर्वस्व खोया था और उन्होंने जीवन की असह्य प्रताड़ना झेली थी। पर इस क्रूर यातना एवं प्रबल तिरस्कार के बदले उन्होंने प्रभु के सिवा और कुछ भी पाने की कोई कामना नहीं थी। किसी से कोई अपेक्षा नहीं की थी।
आराधना कर सकें। इस आँकड़े से प्रदर्शित होता है कि जड़ जगत् के अध्येता-अध्ययनकर्त्ता भी अब इस जगत् से परे की ओर सोचने-विचारने लगे हैं। सन् 2000 में हुए एक अमेरिकी विज्ञान सम्मेलन में भी इस बात पर बल मिला है कि ब्रह्मांड विज्ञान में ईश्वर को मानने के अनेकों प्रमाण हैं। अनेकों ऐसे अकाट्य तर्क एवं तथ्य हैं जिसे यदि खुले मन से स्वीकारा जाए तो ईश्वर के अस्तित्त्व पर कोई भ्रम नहीं रह जाएगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-March
आराधना। लोकमंगल के लिए शिव-साधना। लोकसेवी समर्पित होकर करें॥
आराधना करती हूँ तो अपना वह दिव्य पावन रूप मेरी आँखों से कभी-भी ओझल होने मत देना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-November
आराधना जैसे जीवन सूत्रों पर आस्था। उन्हें जीवन में अपनाते हुए सीखने, सिखाने की प्रारम्भिक दक्षता।
आराधना-समाजसेवा के विभिन्न दायित्वों से परिचित कराती है एवं संकल्पित कराती है। इस अवधि में एक दिन शाँतिकुँज-ब्रह्मवर्चस-देवसंस्कृति विश्वविद्यालय दिग्दर्शन हेतु मध्याह्न के बाद खाली रखा जाता है। प्रज्ञापुराण का शिक्षण एक दिन उसका प्रदर्शनात्मक प्रवचन से हो जाता है। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य परिचर्चा एवं ग्राम्य विकास पर किन्हीं दो दिनों में गोष्ठी भी ली जाती है, जो साधकों को नई दिशाएँ देती देती है। इन नौ दिवसों को माँ के गर्भ में रहकर बिताए गए नौ माह की अवधि की तरह माना जाना चाहिए।
आराधना के क्षेत्र में अच्छी प्रगति कर सकेंगे। और उनमें साधकों की जिज्ञासाओं एवं समस्याओं के समाधान की सम्यक् सामर्थ्य का विकास हो सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-September
आराधना दोनों को ही परमप्रिय थी। जसवन्तराव नित्य-नियम से देवी सप्तशती का सम्पूर्ण पाठ किया करते थे। उनका घर-आँगन प्रतिदिन जगन्माता के महिमागान से मुखरित होता था। सप्तशती के सम्पूर्ण पाठ के साथ गायत्री मंत्र एवं नवार्ण मंत्र पर उनकी गहन आस्था थी। ‘ॐ ऐं ह्री क्लीं चामुण्डाय विच्चै’ का जप करते हुए वह भावलीन हो जाते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-July
आराधना करते और कहते है’हे परम पिता तू स्वर्ग में रहता है, पर हम स्वर्ग इसी धरती को बनायेंगे। मैथ्यू 5,44,45,47 में यही लिखा है कि परमपिता सब प्राणियों के प्रति समता और एकता का भाव रखता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी उसी के अनुरूप अपनी मनोवृत्ति का निर्माण करना चाहिए। ईसा के अनुसार ईश्वर एक ऐसे विवेकवान गड़रिये की तरह है जो समूचे भेड़ समुदाय को खाई-खड्ड में गिरने से बचाता और हित साधन का रास्ता दिखाता है। सेंटपॉल ने प्रथम काँरिथियन्स के तेरहवें अध्याय में परमात्मा की स्नेह सहकार की प्रवृत्तियों का उल्लेख करते हुए कहा है कि यदि उससे कोई दो कदम साथ चलने को कहे, तो वह उसके साथ एक मील तक जाने का उत्साह दिखाता है, किन्तु शत्रु एक ही है कि वह उसका सुपुत्र हो उसका अनुशासन पाले स्वयं ऊँचा उठे और दूसरों को आगे बढ़ाने, ऊँचा उठाने का दायित्व निभाये, तभी परमपिता भी पग-पग उसके साथ चलने का अपना वचन निभाते हैं अन्यथा अनुशासनहीन कुपात्रों की तरह उसकी उपेक्षा कर देता है।
आराधना, सूर्य नमस्कार, सविता साधना जैसे आध्यात्मिक उपाय-उपचार मानवी चेतना की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही विनिर्मित किये गये हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
आराधना कर उन्हें परिष्कृत की ओर ही नियोजित किया।
आराधना जो करता चले वह आत्मकल्याण का पथ तो प्रशस्त करेगा, औरों की मुक्ति का निमित्त भी बन सहज ही श्रेय पाता चलेगा।
आराधना है।
आराधना, जीवन देवता की साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना। इस पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ देखने योग्य हैं-
आराधना का समन्वय करना चाहिए।
आराधना से लेकर लोक सेवा संबंधी विशद मार्गदर्शन भी है।
आराधना समाज सेवा के लिए किये गये उदार सहकार भरे कृत्यों से-स्थूल शरीर से। पूज्य गुरुदेव ने अपने तीनों शरीरों से पूरी निष्ठा के साथ गायत्री साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-April
आराधना का ही एक भाग है।
आराधना का एक पक्ष है शुभ का संवर्द्धन और दूसरा है अशुभ का उन्मूलन। इन्हें सहयोग और संघर्ष के नाम से जाना जाता है।
आराधना। तीनों के समन्वय से ही एक पूरी बात बनती हैं।
आराधना-अर्थात् उदारता। देने में प्रसन्नता। लेने में संकोच। सादा जीवन उच्च विचार। न्यूनतम में निर्वाह।
आराधना और सेवा साधना का निर्वाह भी आराधना के अंतर्गत आता है। देवत्व की प्रवृत्ति एवं रीति-नीति भी यही हैं।
आराधना के अंतर्गत आता है। देवत्व की प्रवृत्ति एवं रीति-नीति भी यही हैं।
आराधना के समन्वय पर अवलम्बित है। इन तीनों को जीवनचर्या की हर क्रिया प्रक्रिया के साथ जोड़ना पड़ता है और ध्यान रखना पड़ता है कि इसके विपरीत तो कुछ नहीं बन पड़ रहा है।
आराधना के त्रिविध प्रयत्न करते रहने की आवश्यकता होती है। इसी आधार पर आत्मिक स्वस्थता बन पड़ती है। पूजन, अर्जन, उपहार, आदि क्रिया-कृत्यों को भी आत्म साधना का अंग माना जाता है पर वह ऐसा ही है जैसा कि स्वस्थ शरीर पर धुले वस्त्र और श्रृंगार साधनों की सुसज्जा। आवश्यकता उसकी भी है पर उसे महत्व इतना ही देना चाहिए जितना कि अपेक्षित है। पूजा कृत्यों को कलेवर और आत्म साधना को यदि प्राण समझा जाय तो भी ठीक है।
आराधना विज्ञान के अंतर्गत ही आता है। न्यायनिष्ठा एवं औचित्य का नीर-क्षीर विवेक भी आराधना का ही एक भाग है।
आराधना का समन्वय ही आत्मशक्ति के उपार्जन को सुनिश्चित करता है। इन्हें समान रूप से अपनाया जा सके तो कोई कारण नहीं कि जिन चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियों को अध्यात्म की परिणति माना जाता है, वे अक्षरशः सही सिद्ध न हों। तीनों की संक्षिप्त विवेचना यहाँ प्रस्तुत हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-November
आराधना परक त्रिविध अध्यात्म प्रधान प्रसंगों, पर उद्बोधन इसके पश्चात् हुआ। “ऋषिचिन्तन” नाम फिल्म के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-October
आराधना भीतर के दूषित प्रकाश अणुओं पाप-तापों एवं कषाय-कल्मषों को धो देती है और उनके स्थान पर दिव्य प्रकाश भर देती है जिससे समूचा जीवन ही ज्योतिर्मय हो उठता है। इस उपक्रम को अपनाकर हर कोई अपनी जीवन ज्योति को प्रकाशित-प्रज्ज्वलित कर सकता है। ज्योति साधना का उद्देश्य भी यही है।
आराधना की गयी हो?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-December
आराधना की और जन-जन तक ज्ञानामृत ही बाँटा। यह श्रद्धांजलि वर्ष है। इस वर्ष हमें अपनी सारी शक्ति इस महान प्रयोजन में झोंक देने से ही इस समारोह की सार्थकता है और परम पूज्य गुरुदेव के प्रति श्रद्धांजलि की सच्ची अभिव्यक्ति भी।
आराधना के अभाव में वह अंकुरित बीज पौधा बनने से पूर्व ही सूख जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-June
आराधना का मर्म सुझाने वाले यह महामानव थे- महात्मा गाँधी। समूचा देश राष्ट्र पिता के रूप में नमन करता है।
आराधना का मतलब है समय की उपासना आराधना। ठीक है न भाई।” उनका इशारा श्रीमन्नारायण की ओर था।
आराधना करूंगा”—श्रीमन्नारायण ने हँसते हुए वाक्य पूरा किया। वे भी उत्तर में मुसका दिए। स्वानुभूति के आधार पर डॉ. रामकुमार वर्मा एवं श्रीमन्नारायण को समय की आराधना का मर्म सुझाने वाले यह महामानव थे- महात्मा गाँधी। समूचा देश राष्ट्र पिता के रूप में नमन करता है।
आराधना में लगे हुए एक मिशनरी परिवार की किशोरी अपने पिता से चीन की कहानियाँ बड़े चाव से सुना करती। अकाल, महामारी, बाढ़, और सूखा ग्रस्त किसान परिवारों की मर्मस्पर्शी कहानियाँ उसके मन में विचित्र-विलक्षण हलचलें पैदा करतीं। ऐसे ही एक किसान की कहानी ने उसके मन में डेरा जमा लिया था। दाई कहानी कहती जा रही थी, चिंग जब बीमार रहने लगा तो उसके पुत्रों ने सोचा जमीन का बंटवारा कर लिया जाय। इस पर वे किसी सवाल पर सहमत न होने के कारण झगड़ने लगे।
आराधना का मतलब है समय की उपासना आराधना का मतलब है समय की उपासना आराधना। ठीक है न भाई।” उनका इशारा श्रीमन्नारायण की ओर था।
आराधना। ठीक है न भाई।” उनका इशारा श्रीमन्नारायण की ओर था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
आराधना कर उन्हें परिष्कृत की ओर ही नियोजित किया।
आराधना जो करता चले वह आत्मकल्याण का पथ तो प्रशस्त करेगा, औरों की मुक्ति का निमित्त भी बन सहज ही श्रेय पाता चलेगा।
आराधना है।
आराधना, जीवन देवता की साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना। इस पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ देखने योग्य हैं-
आराधना का समन्वय करना चाहिए।
आराधना से लेकर लोक सेवा संबंधी विशद मार्गदर्शन भी है।
आराधना समाज सेवा के लिए किये गये उदार सहकार भरे कृत्यों से-स्थूल शरीर से। पूज्य गुरुदेव ने अपने तीनों शरीरों से पूरी निष्ठा के साथ गायत्री साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-March
आराधना जैसे पुण्य प्रयोजनों में अपने को नियोजित करने के लिए कोई क्यों तैयार हो?
आराधना के लिए आगे बढ़े। समाज देवता की आराधना के लिए आगे बढ़े। स्थिति सँवर जाएगी, तब आएँगे। यह तो कायरता है क्लीवता है। जो आज न कर सका वह कभी न कर सकेगा।
आराधना के लिए आगे बढ़े। स्थिति सँवर जाएगी, तब आएँगे। यह तो कायरता है क्लीवता है। जो आज न कर सका वह कभी न कर सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-January
आराधना जो कर सकें, ऐसे संन्यासी-वानप्रस्थ-परिव्राजक समयदानी-लोकसेवी समाज के हर अंचल से निकलें एवं प्रतिगामिता से मोर्चा लें, धर्म—अध्यात्म को प्रगतिशील बना उसे नए प्राण दें।
आराधना करता हूँ। किसी व्यापारी को अपनी पूजा कैसे बेचूँ” ?